Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Jnanbindu Prakarana
Front matter
सिंघी जैन ग्रन्थमाला
म बागामिक पायनिक मादिलित विहासिम, माम्मा-इमानि मिरिपरिषगुमच्या
मान लिन पाश माचीवामी परमानी पारिनाचा पाचाविम
गए पुरावा मा पोष संग्राम
सावनसापिनी श्रम प्रबारक।
प्राणानियसी यस श्रीमद् डालचन्दजी सिंघी मेसिपुष्पस्मृतिनिमिए
समुपुत्र श्रीमान् यहादुरसिंहजी सिंघी कर्तृक
संस्पति मा प्रकाशित
एम्सा
जिन विजय मुनि
[सम्मान समार-मपरम प्रतिमा समरिया मा मुमण स्वीमसमा घमण्या
मूलचा मुम्पा पुणवरिपामा पनगापारीसम्मती, सन्तितितमः
परमार नामाक्त-मताच निघ माय, बम्बई। पथ, मेस स्टीमा प्रवाति-
पुण्ठत्वमन्दिर मानि-मानस प प्राणीमाती
मराजापूर-पीली-पी या मात्र अनेक सपा-मम्म।
अन्याक १६, मूल्य रू ५००
मानधनको
बावू श्री राजेन्द्र सिंहजी सिंघी
सिंपी सरन, १८, गरियाबाट रोर,
पो० पाठीगंज, कहाचा
सापत्रमा
विसर प्रति
न्यायविशारद-न्यायाचार्य
-
श्रीमद्यशोविजयोपाध्यायविरचित
भी प्राचार्य विनचन पाम मार पपपुर
ज्ञानबिन्दुप्रकरणम्
[विस्तृतप्रतापना-टिप्पणादिसमन्विम्]
मीमान फलेवासगी मोचतवी पासण
बमपुर वालों की ओर से
पण्डित सुखलालजी सघषी
प्रपप्पा-बैनाम, दिम मितिमाम समारस;
मूत्रविममाप्यापक-पूराठ पुरवत्मदिर, पमहान
द्वपा
पपित दम्मुख मालपणिया
बार बामप्पड, विर भिक्यावर
बमारस
पमिता हीरा मारी है
म्पर-सम्मिमाम्न्वी
माठिसाम
सिंघी जैन ग्रन्थमाला कार्यालय
मनेनन्त विहार, शान्तिनगर
पो० साबरमती (महमवापाव)
सम्मानपिनमत
[पिताम
SINGHI JAIN SERIES A COLLECTION OF TAAL EDITIONS OF MOST IMPORTANT CANONICAL, PHILOSC MICAL HISTORICAL LITERARY NARRATIVE ETC. ORRS OF HAIN LITERATURE IN PRIKRIT UNSKRIT APABHRANHA AND OLD YERMACULAR LAROU AOD AND STUDID MY COH PITENT RESEARCH CHOLAID FOUNDED AND PUBLISHED SRIN BAHADUR SINGHJI SINGAI OF CALCOTTA HOOLT OF W LAT TALL ŚRI DÅLCHANDJI SINGHÍ GENERAL EDITOR JINA YIJAYA MUNI OU NOU YONO THE MANDARKA ODTAL LA INTITUTE OF DORA UD OUT LIITY ARA OF HALLD pour rapat ON OU LET UMTATYARD PUMA LOT POT POFTOR OF JAL la Or word AUDIO, VITY HALOT BATINI KITAR LUOD UD TEDY NILITY TO - orum DITO O XANT LLOT POT PUT AMINO VOLD OHUIP rood) NUMBER 16 PRICE RS. 3/8 PUBLISHED BY BABU SRI RAJENDRA SINGHJ SINOHI BINADI BADAN, 48, CARITALAT ROAD, PO BALLTAUNGI, QALOUTTA Forded) AD white [191 4D
JNANABINDU PRAKARANA
OF
NYIYAVIÁLRADA-NYATAALIRIA
SRIMAD YASOVIJAYA UPADHYAYA
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EDITED BY
PANDIT SUKHLALJI SANGHAVI
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SINGHI JAIN GRANTHAMALA KARYALAY
ANEUNT VIHAN, SHANTIKAGAR,
PO BALARLATI, (AANEDABAD)
V E. 1998]
Hind siis, * Iudad Copine
I 190D
॥ सिंघीनेनग्रन्थमालासंस्थापकप्रशस्ति ।। पति महामि देशे सुप्रसिद मनोरमा । मुर्शिदाबाद इत्यास्पा पुरी वैमवशालिनी ॥ निगसन्सनेक वा ना अकेशवश्वाः । पनामा नृपसमा पर्मकर्मपरायपाः ॥ भीगठचन्द इलासीत् तेष्वेको मामाग्यवान् । साघुषत् सबरिनो या सिपीकुटपमानरः ॥ पास्प पवागतो मो हि क पापारविस्तृतिम् । कठिकातामहापुर्या पतधर्मानिमयः ॥ कुचामया वाव महत्त्या प मुनिष्ठया । उपा विपुलां खामी माता कोअषिपो दिस ॥ वस मऊमारीवि समारीकुठमारना । पवित्रता पिया जाता शीठसोमाग्यभूषणा ॥ मीपहारसिंहास्सा सहपी सुपुत्रत्रयो । बस्येप सकती दानी धर्मप्रियो पियां निरि ।। प्राधा पुम्ममवाऽनेन प्रिया सिम्ममुन्दरी । सम्पा' सौमाग्यरीपेन प्रदीप पट्टहासपम् ॥ भीमान् राजेन्द्रसिंहोऽस्ति म्येठपुवा मशिषितः । य सर्वदात्तात् माहुर्पस हि दक्षिमः ॥ नरेन्द्रसिंहो इसास्सवेलम्बी मप्पमा मुतः । सर्वरिन सिंहम कनिष्ठ सौम्पदर्शन ॥ सन्ति भयोऽपि सस्पुषा मातमकिपराया । विनीवाः सरम मम्मा पितुर्मार्गानुगामिनः ।। बन्पेऽपि परमास सन्ति ससादिपान्भवाः । पनैनसमगोज्य तसो राप रागते ॥ बन्य- सरसला सदरासको मूसा सम्पीषियोऽप्ययम् । तवाप्प सराभारी वविध विहुपा सह ।। मगों माप्परकाये न निमसो म सुकृतिः । पतेऽस्स हे कापि सा वर विस्मयासदम् ॥ मझो गुवनाना यो विनीत सबनान् प्रति । पन्मुमनेनुरोऽस्ति प्रीता पोप्पगपेप्पपि । देशकालिखिोज्न विपा-विधानपूर्वकः । इतिहासादिसाहिल-सस्कृति-सत्कामिय। समुखले समानस पर्ममोकपहेतवे । प्रचारार्थ मुशिधाया म्पपसेप पन पनम् । गत्वा समा-समिलादौ मूवाऽम्पमपदाहिन । दत्त्वा पान यमायोग्य प्रोत्साहपति कर्मपन् । एवं पमेन रोनशानेन उपनिष्ठया । करोत्सप ययाति सकर्माणि सरायः ।। अपाम्परा प्रसझेन सपित स्मृतिदक्वे । कफन किषिर विशिष्ट पा कार्य मनसचिन्तयत् ।। पून्यः पिता सदैवासीत् सम्पम्वानपि परम् । परमापमानसमें पवनीवं मया परम् ॥ विचा सर्व विवे पुनः प्राप्प मुसम्मतिम् । भवसरममिमापी विद्वषो पापि वाप्याम् ।। मैनशानप्रसाराम साने शान्तिनिकेतने । सिंपीपदापित बैनधानपीठमतीठिपत् ।। भीनिन पिगमो विधो तस्साविष्यत्सत्पदम् । सीकत प्रार्थितोऽनेन सामोरामिमापिपा ॥ मस सौमन्प-सौहार्द-सैयौदापारिसहदै । वशीम्याति मुरा तेन सीइव वत्परं परम् ।। तस्मैव प्रेरणा प्राप्प मीसिपीसमेतुमा । सपितृमेवसे पा अपमान प्रश्पते ।। गिबनवातारा सचिदानन्दरा सदा । चिरं मन्दस्विर छोके बिननिगममारती॥
॥ सिंघीजैनमन्पमालासम्पादकप्रशस्तिः ।। स्वस्ति भीमेदपायस्पो देशो भारतविभुतः । रूपाइठीति समानी पुरिका तत्र सस्थिता ।। सदाचार विभाराम्पो प्राचीननृपवे' सम । मीमचतुरसिंहोज राठोगन्वयमिप ॥ वत्र भीवृशिसिंहोऽभूत् रावपुत्र प्रसिद्धिमान् । क्षात्रधर्मपनो पम परमारकुलामणी ॥ मुख-मोगमुसा म्पा गावा पस्मिन्महाकुठे । किं वय॑ते सुमनस्व वजातजन्मनः ।। पी रामकुमारीति सामूद गुपसहिता । पातुर्य-रूप-लावण्य सुवासिौजन्यमपिता ॥ अत्रिपाणीप्रमापूर्णा शौर्यदीप्तमुखाकृतिम् । यो स्ट्रैव मनो मेने राजन्यकुल्ला स्थियम् ।। सनु' किसनसिंहास्पो नातस्त्रयोरतिप्रिय । रणमछ इति पन्पद् यमाम बननीकृतम् ॥ भीदेवीहंसनामात्र रामपूम्यो मतीपरः । म्योतिमपम्परिपाना पारगामी बनपिप ॥ मोचरमताम्दानामायुर्यस्स महामते । स घासीद् वृद्धिसिंहस प्रीति पदासदं परम् ।। वेनाथाप्रतिमप्रेम्पा स तत्सनु खसविषौ । रक्षित शिक्षित सम्यक, तो बैनमतानुगः ॥ दौर्माग्याभिशोषास्ये गुरुवाती दिवगतौ । विमून सतस्न सक सर्व गृहादिकम् ॥ तथा च- परिप्रम्याम रेशेषु ससेम्प प पहून् नरान् । दीक्षितो मुण्डितो भूत्वा कृत्वापारान् मुरुष्करन् । धावान्यनेकशासाणि नानापर्ममतानि च । मध्यमवृतिना तेन तस्वातत्वगरेपिपा ॥ पपीता विविधा माप' भारतीया मुरोपमाः । मनेका छिपयोऽप्येव प्रस-नूतनकाठिकाः ॥ येन प्रकाशिता नेका ग्रन्या विस्प्रशसिता । लिक्षिता पहयो लेखा ऐविपतप्पगुम्फिवाः ।। पो पहुमि मुविनिस्तन्मगाठय सस्कृव । वात स्वान्पसमानेपु माननीयो मनीपिणाम् ॥ पस्स वा विमुर्वि शाखा भीमद्गा धीमहारमना । माइस' सादरं पुण्यपचनात् स्वयमन्पदा ॥ पुरे पाहम्मदापादे राष्ट्रीपशिषपाठप । विपापीठ इति स्यात प्रतिष्ठितो यदाऽमवत् ॥ भाचार्यत्वेन वमोपनियुको यो महात्मना । विश्वनकृतलापे पुरातस्वास्त्पमन्दिरे । पपामामष्टकं यावत् सम्मम्प तत्पर ततः । गत्वा गर्मनराष्ट्र पस्वत्सस्कृविमपीतवान् ।। सत मागस संसपो राष्ट्रकायें प सक्रियम् । कारावासोऽपि सम्प्राधो येन स्वग्रन्पपर्वणि ।। क्रमायस्माद् विनिमुक्त प्राप्त शान्तिनिकेतने । विषवन्पकवीन्द्रभीरवीन्द्रनायमूपिते ।। सिंपीपदसुव चैनवानपीठ पदाभिवम् । स्सापित व सिंधीमीडाठचन्दम्प सनुना ॥ मीबहादुरसिरेन दानवीरेष भीमवा । स्मृत्यम निमवावस्स बनानानप्रसारकम् ।। प्रतिष्ठितम पस्तम्प पदेऽपिठातृसम्बके । मध्यापपन् परान् शिप्यान् शोषयन् जैनमाम्यम्। वसैन प्ररना प्राप्प श्रीसिपीकुलकेतुना । खपितृ पसे घेता प्रपमाठा प्रकाश्यते ।। विडसनकवातारा मशिदानन्दरा सदश । पिर नन्दस्विप ठोके पिनविषयमारती ॥
सिंघी जैन ग्रन्थमाला अपावधि मुद्रित प्रन्य स्पम् । १ मबापविन्यामवि मेणाविरटि. संसात मुबम्ब बिजलो प्रचार स्पन्दित पुपममवापसमा प्रबल साबनेक पुण्य ऐतिपक कोचमिचि पर प्रबम्पको बातापित संपत मूल प्रब विस्तृत बिनो प्रयाला पनि ग्रीव विनियवीयप निगमएस पुण्य व संस्थाबोधनामा पूर्व पतिपत्रिक प्रम ५पानन्दमहाश्रम्प मेबविम्योपनियति पम्मी ममापिसोपालप्रम प्रब मतमापा पचोबिसयोपाबाबत मूग तय मन्त्र पाण्यात विविध क्रमालामुख ७पमावमीमांसा, मण्याचय. मूल मन्त्र at मस्त दिन्य नपरष सदित ८ समन्यायी पालन बादित प्रब पिसपुर बम्पचिन्तामनि मन्त्री मापवर प्रिया १.ममाषचरित प्रमाणात पर भून कर निहालिमान 11 Life of Homechandrichiryu By Dr G Bahler २२ भानुचन्द्रपमिचरित शिरलोपाम्मवाचित जब बिस्तृत ईधामा समेत पूर्णप १५ बामनिमममम, होरिस्तोगमावविरपित .मरमरी पावसरित 8-8-0 सप्रति मुघमाण मन्य- १मपफ्युपका २पपाषामा सपनामा, ५ मा प्रतिमाप 1-1 ५सीमेवर मनसम्पर संसार मेगावमार पौष ८पात पावसा. ९ समय पर मरम्मान १ विकारत्मकता पमा प्रमाण ११मानुपानियत समित्या १२ शिविकोपाप्मदिन मामाता पेपर -मामह १५ लामो सादर kewat
गुरवे वालकृष्णाय महोपाध्यायतामृते ।
काशी-मिथिलयोः प्राप्तो ज्ञानविन्दुः समर्म्यते ॥
सुखलाल संपपिना।
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प्रन्या नुक्रम १-२ प्राचाविक पातम्प -पीमुनि जिनवियपजी संपाय यस्तम्प-श्री पं० मुखमठ संपली मानविन्दुपरिपप- प्रग्यकार प्रम्पका पापसाप । २० ४२ प्रापका माम्पम्तरमाप १.बानकी सामान्य बची बार्बनिक परिमापायी दम्या २. मति-पुषणानकी पर्या () और इसी मैदरेगमप्रकार ()लव और गुमित मति (१)विधालाजारका इतिहास रवीण्य सम्म (.)भरिसाम बस और विपस (4) परसानातिवम बीर ऐपत मावा (१)मविधायक निर मिम्मी पापार ३.नधि और मनापबहामी पर्चा पमानकीची (1) माले विवकी स्थानिय (२)रम्पारम परिणाम (सम्हारो ल्यापारम्भ मम (.) पादपोगोंपादित राममाषया नियम बामनिरास (-)अधि और स्पविरोप वैषमतामयाब (भाष मन्तबोनसन (.)सम्मानगोपचोपडे महामेरी (.)प्रमाणावरमारपीसोपविचरण पानविन्दुपरिषयगत विदोपहर सूची संपारनमें पमुक्त मन्पो स्पी मानवियु विपयानुपम मानगिन्तु-मुरुम प पानपिन्दु-टिप्पण पानबिन्दु-परिशिष्ट परिमारिपत्रक . ५१ ८०-८२ १-१९ ११८-२३५
-
संकेताक्षरों का स्पष्टीकरण
मबह प्रवि
वहम्मति
पसल
म० मपिन
मुपर मावि
पोपबोनिसरीम
सो
समक
सू०
मामा
म.प्रमान
2.
को-सोपी
- किंचित् प्रास्ताविक - मीम यशोविजय महोपाध्यायाति बानविन्दु नामक मा गमीर प्रन्म, पण्डितप्रवर मी सुखकाकली पर्व उनके एक अन्तवासी पं. मी वळमुख मावणिया तया विनुषी सिप्स भीमती हीरा कुमारी देवी के संयुक्त सम्पादन कार्यसे समझान्त होकर सिंघी अन अन्धमाकाके १३ मणिक स्ममें व्या प्रकाशित हो या है स्तः पूर्व ८ में मणिके रूपमें, स्नी मोपाध्यायको 'मैन कमापा' नामक प्रसिद्ध कवि इन्दी परिपतवयक तत्वावधान में संपादित शेय, मो. पूर्ण, प्रकट हो चुकी है, उसके प्रारम्भ हमने जो 'प्रारगिल मसम्म दिया है उसमें, प्रहारष्टि पण्डित भौमुसाकसीके दर्शनशासविषयक प्रौढ पासिके परिणामक जो ५-१० वाक्य हमने को उनकी प्रीति तो उसके बाद इसी प्रत्यमाछामें प्रकाशित हेमचन्द्राचार्यात 'प्रमाणमीमांसा' प्रत्यके साम दिये गये विस्तृत और विशिष्ट निप्पोंकि मनोमनसे विशेपा और मम अम्मासियों को समय माशे गई है। प्रमाणमीमांसा के लिये किसे गये मे सब निप्पण कोरे टप्पण ही नहीं, वरिक मई-कई तो उनमेंसे ठस-उस विपके स्वतंत्र एवं मौलिक निकम ही है। प्रस्तुत प्रत्यके साथ, पण्डितमीने प्रन्पगत विषयका हा समझाने के लिये जो मुविस्तृत एवं सूक्ष्म विचारपूर्ण 'परिचय' निसा है या अपने विषयमा एक मपूर्व किन है। इसकी एक-एक कणिनमेंपणिनीका जैनशास्त्रविषयक बान किटना सूक्ष्म, किठना विशाल और कितना उकस्पात सय उत्तम परिचर मिलता। जैनवनप्रतिपावित हान'तरमका ऐसा पृपक्कात्मक और तुलनात्मक सस्प- किन आजतक किसी विद्वान्ने महीं किया। मिस प्रकार मूळ प्रत्यकार मायचोविजयोपाध्यायने प्रस्तुत विपमें अपना मौलिक तत्वनि रूपम प्रदर्शित किया है उसी प्रकार, पण्डित भीमकान जीने प्रस्तुत प्रन्मपरिचयमें अपना मौकिक तत्वरिग्वन एवं वस्तुनिषेचन उपस्थित किया है। प्रन्यकार मोपाप्प्याय मनोनिगपजी के जीवनपरि भएकी रप्टिसे, जेन ठकम्पपामें, संक्षिपमें पर सबसभाठम्म पेसा पोडासा ठहोम, पम्तिमीने अपनी प्रस्हाक्नामें किया है। पापकर यशोनिजमनीको साहित्मसपत्ति झुत ही समझ और वैविध्यपूर्ण है । उनकी एक-एक कृति पक-एक स्वतंत्र निम्न्के योग्य सामग्रीसे भी हुई। जेन ममण संपर्म, अन्तिम भूतमेवही मी मुद्रबहु स्वामी सह, 'मन्तिम भुटपाररममा' को पा सकते है । उनके पर यान तक पैसा छ मुलता भेन झामप्रणेता समर्म विद्वान् पैदा नहीं हुआ। - २ बाबविम्यु इनके रचे हुए प्रन्यो सौ गीर, सूक्ष्म, विपुल पर समाही ऐसी परिक विचार- संपत्ति ममी फोरमका विम्वन, प्रस्तुत प्रन्य इनितिन्युके परिचय सम्म लिने गरे पष्ठि मुसहर बम्पसपूर्ण निम्त्यमें होता है। इस परिचय पाठसे में प्रतीत हो या है कि यहोरिमनजीके ग्रन्मि सिपहुए वासनिक विचारोंकी परीक्षा करने योग्य धमता, पष्टिया मुसकाळजीके सिवाय, जैन समाप्रमें सायद ही को विद्वान् रसता थे। हमारी कामना है कि पप्टिटनी, मोकिमपनीक मन्मन्य महत्वपूर्ण प्रन्योर मी पेसा हो विस्तृत सम्बसपूर्ण परिचय करार, निदान में उनके वास्तविक 'म' के विजय प्रतिष्ठा । मारवीमि भवन बालविवबाम्बेरी) पती. १५14 जिन विजय संपादकीय वक्तव्य प्रारम और पर्यवसाम- १० स० १९१९ में बब में महेसाणा (गुजरात) में फुल सापुषों को पराम पा तप,मेप पान प्रखता मानविन्दु की पोर निरोप स्म से गया । उस समय मेरे सामने चैनधर्मप्रसारक समा, मावनगर की बोर से प्राषित 'न्यापाचार्य भीसम्मोविजयबीकत प्रन्यमान मन्तर्गत पप्राकार पानपिन्दु पप । वानमिन्यु की मचारसस्मन और दार्शनिकता देस कर मन मैषा कि यह म पायकम में माने पोप है । पर इसके उपयुक्त संस्करम की मी पसरव।। पा मनोगत संस्कार नयों तक यों ही मनमें पाया और समप समय पर मुझे प्रेरित भी करवा हा।बत में ई० स० १९१५ में बम कार्य का प्रारम बा । इस की दोव और प क लिखित प्रतियों मिशन मुनिवर भी पुण्यतिवमी के अनुप्रा से प्राप्त । और काशी में १९१५के व्यगस्ट में, पर कि सिपी मैनप्रन्य मामा के संपादक श्रीमान् निमियपनी शान्ति मिसन से मैट ए पभारे, कब उनकी मदद से उक्त दो लक्षित और एक मुमित कुम तीन प्रतिपों का मिळाम कर के पाठावर लिहिए गए। १० १० १९१५ के बारे में कुछ काम बागे बड़ा । प्रन्पकारने बानवि में बिन प्रन्पों का माम निर्देश किया या सदरण रिया । तपा बिन प्रपों के परिशीन से उन्होंने शानविन को रवासन सप के मूह सा एका करने का काम, पद तक, प० महेन्द्रकुमारवी पापाचार्य के द्वारा उस समय संपन समा । इसके बार० स० १९३. तक में, जब पब समय मिग नवन, मपम दिए गए पाठान्तर और एकत्र किए गए प्रमों के वितरणों के वापार पर, पाठविका व मपम सिमाग एक वादि का काम होता या । साप में बाप मेवान, संपादन पोर वयापन मानि के कान उस समय इवने पविक पेनिशानविद्का शेप कार्य यों रा गया। १० स० १९५८ के पुनर्जन्म के बाद, पब मैं फिर का मापा म प्रपने वन्याम्प बरे कामों के समान करने के बाद मानविद को ही मुस्स रूपसे आप में किया । मुक पारी वेपी पर हमरे सामने सपाठ पा संस्करण के रूप को निषित करने का पत्र पाठ दिनों से करते बार में किसानविनके उपर सव टीका मा होनी चाहिए। 5 का विचार पाकिबनुपद ना पहरी ।टिप्पण के बारे में मी प्रम पाकिसे किस प्रकार के लिये पॉप । क्या प्रमाणमीमांसा के टिप्पणों की या हिम्ी में मुस्मतया हिश पोप पाठ में । इन सब प्रमों को सामने रख कर वन में हमने समप की मर्यादा कमा सामग्री का प्रचार कर रे सिर दिया कि बी अनुपद पा संसय टीश रेप पसरी बकायन होने सेरो सगित भिसा पाय । हिना नमक टिप्पप बगर रखते समय पर माय बमी प्रेसमें मी म पावा । मत में संस्करण का ही सम्म सिर मा मिस सहप में या बाय पाटों के समुष उपस्थित होगा। पर ष्य या कारकि टिप्पण पोम्प अमुक सामग्री के पासे 8 से सपित कोई परी थी, पर टिप्पम का बैक्टीक पूरा ४ मानविमु काम करने के लिए बमी गाव कुछ करना पकी मी पा।ई० स० १९५९ में बाध का काम सापोग्गी भीषत दम्मुस मणिपाने पुरू किया। इस बीच में सादय मुनि भी पुण्पनिजपबीने एक और शिशित प्रति मेबी, पिसी हमने त सहा रखापर प्रति प्रथम की दो प्रतियों सेबनेक तानों में पायमेद माली मी पी वीर बिशेप पर मी। इस लिए पुना इस प्रतिसाप भिमान पुरुनिमा और प्रपम सिर लिए गए पाटावरों के सामों में मातम परिवर्तन मी किया । पर सब काम समय पता था, पर वनुमपने कादि पर धानविष्ट कोनों के पापम में है और बागे इस का प्रचार करना इरोतब इस पप्पापन मौकरा देमा बाहिर निस से एक मुनिधित परफ्य सिरोपाय । सक्त बमुमबरेवापार पर बामविलु कामप्यापन मी मुसाषा | भीम्पपगिया गौर भीमती हीरामारी-दो सिंघी बैन प्रन्यमाग स्थापक श्रीमान् बानू बहादुर सिंहनी की मागिनेपी 1-पेही रोगों मस्सतप्प मोठा पे।ये ही दोनों इस का संपादन करने वाले थे, इसलिए अप्यफ्न के साप साप दोनों ने बायपक उपार मी त्रिपा और नई नई कम्पना और मी सामग्री एकत्र की। पबपि में पाछे एक बार बामबिन्नु को, मेरे एक बाचार्य-पक्षिा पिप्प को पन कर पा परस्त इस समय का बम्पापन बनेक कारणों से अधिक वर्ष पूर्ण पा। एक तो या कि अब प्रप एपने को प्यने नाम पा! (सरा पाक पठने पाटे दोनों सिरसुती, मुत्पा और संपादन कार्य करने पाये थे । फम्त जितना ऐ सका स्वमा स पम्प की प्रति तम स्पण्ता के लिए प्रयत पिपा गया । श्री माठमणिपने टिप्पणयोग्य कबी सामग्री को सम्प- पतित कर स्मिा । और मुरण कार्य ६० स० १९१० में पुरु राणा । १९०१ में श्रीमती मारने परिमित पार दिव्य और में प्रवाना किसने की मोर पुस । १९०१ बन्त के साप हो पर सारा काम पूरा होता है । इस मा १५१. में मो सत्कार सूरम- रूप में मन पर पा पा कर रखने क्यों के पद महिप धारण कर, अब सिपी मैन प्रत्य मासा के एक ममिरूप में विद्यालयों के समुब सपनित ोता। मसार होने सस्करण का परिषय- १ मूस मन्प-प्रस्तुत संस्करण में मुन्स क्ख धानपिनु मूरच | इस का पो पाठ पार किया गया और पर प्रतियों के बार पर से , दिन का परिचय हम बागे कपएगे। किसी में एक प्रतिवापार से सारा मूग पाठ पार मकर के स्व प्रदियों के पास संगत परम में से पाँमोपाठ मविकार और विशेष उपयुक्त मादम पड़ा प्रारमन, अप शेप पायावरों को नीचे टिप्पण्य में देर मूए पाट पार रिया गया है। पति से निपों का दिमाग तपा उनके अंक भी हमने दिए हैसित पा पहसे की मुद्रित प्रधि में पैसा सम पा। मपकारने बानविन में मा प्रब के नाम एक पा लिना माम दिए बो यो सहरम लिए हम सबके मूह सान पा समय ऐसे [ कोठक में लिए पर पहाँ काम में ई गई चारों प्रतियों के मापार से बैंक पाठदिन हो सकी और में मापा, विचार, प्रसंग पा बाप साबम से पर पाठ सूप्त पगहाँ हमने ए पाठ ऐसे कोठक में निति लिया है और प्रतियम से प्राप्त पाठ यों का मोबा। ( २ टिप्पण-मूठ माप के पाद टिम्पण छपे हैं। टिप्पण अनेक ठियों से यार ए हैं या संमद किए गए हैं। इनमें एक शिवो है परिम्पा के स्पीकरण की । सारा मूस प्रम्प पार्शनिक परिभाषावों से भरा पड़ा है। हमें यहाँ मालम पसरा कि यहाँ इस परिमापा का विशेष खुटासा करमा चकती है चोर पैसा सुगमा बम्प मन्पों में मिमता, मोबाँ हमने उन मम्मा न्तरों से बना भाग टिप्पणों में दे दिया है जिस से मूछ प्रम में भाई परिमापा फुट पौर मी स्पए हो जाय, तपा साप से पाठकों को ऐसे प्रग्पान्तरों का परिचय मौ मिठ चाप । इसरी विमाधारभूत मन्यों का दिग्दर्धन कराने की। प्रम्पकार ने मिन मिम मन्पों का परिशासन करके प्रस्तुत प्रन्प की रचना की है सब प्रप उस के वापार मूत है। किसी मी लिपप की चर्चा करते समय प्रत्यकार ने पा तो ऐसे माघारमूत अन्यों में से आपरपक माग शरदद्या या पोत परिवर्तन के साप लिया है, पा की संक्षेप कर के लिपा, कहा ठों ने उस प्रम्प का उपयुक्त माग अपनी मात के ननुसार क्रम बदल करके मी लिया है । यह सारी वस्तुस्मिति पाठकों को शात हो तपा बाघारमूव उन उन मन्मों का विस्तृत परिचप भी हो, इस परि से हमने जगह जगह रिप्पों में जरूरी मात्त का भाग रिया है। पर पों पृष्ठ के पृष्ठ षापारम्स प्रत्यों के एक साप मिलते हैं यहाँ, मापा धन वापारभूत प्रपों का पान की सूचित कर दिया है, जिस से मम्यासी सुरही ऐसे मापारभूत मम्प देख सके और बान विन्दुम्त उस स्थान की पर्चा को विशेष रूम से समम सके। तीसरी रवि इतिहास और उसमा की है। प्रन्धकार ने की अमुक पर्चा की हो और यहाँ हमें उस पर्षित निपय मी कोई ऐतिहासिक सामग्री, पोरी मात, मिट गई तो, हमने उस विषय का, ऐतिहासिक राशि से पैसा निकास मारे यह समझाने के लिए वह प्राप्त सामग्री टिप्पणों में वे परे। कई जगह, प्रम्पकचर के द्वारा की जानेवामी पर्चा दूसरे प्रपों में किस किस रूपमें पाई जाती है यह तुम्ना करने के लिए मी टिप्पण दिए, मिस से पम्पासी चर्चा को ऐतिहासिक क्रमसे छमापूर्ण समझ सके और गहराई सक पाष सके । चौथी प्रिन्पकार के सूचों को संपूर्ण बनाने की। बनेक नगर पर्षा पर हर प्रन्यकार, अमुक हद तक निराकर फिर अप मस्तार से देसने बों के लिए सूचना मात्र कर देते हैं, कि या लिपप अमुक अमुक प्रश्पों से देस सेना । ऐसे मानों में प्रग्यकार के द्वारा नामनिर्देश पूर्वक सचिव किए गए प्रपों में से तपा उन के घरा बसूचित पर हमारे परोक्न में पाए ए प्रन्यों में से चहरी भाग, रिप्पों में सेपर लिए है। रिप्पों के बारे में संक्षेप में इतना ही करना पर्याप्त ऐगा कि ग्रामविन्द की संसद में टीय मजिस कार मी उसे बने रिसे अधिकाधिक समनाने के लिए तपा बप्पेत्य धौर पम्पापक के बारे धानविन्द्र की उपादानमत विशामवर सामग्री प्रस्तुत करने के लिए ये रिप्पण विशेष अमसे संमार पिए गए हैं। की कही हमने अपनी मोर से मा कुरा मिला। २ परिशिष्ट-रिपों के बाद एक परिथिए एपे, पोहानपिन्दु सपा उस एप्पणों से संबध रखते हैं। परिशिरों में क्या क्या है यह सब उन के उपर दिए गए चोर्पको से सर। परिनिय की उपयोगिन्ध बनेक नियों से है जिसके समझाने की इस प्रग - पावरिन्छ में शायद बहरत हो । एक वर से बिसरी सारी सामग्री परिधिणे में समुचित कस्लम पूर्वक संक्षेप में प्रतिविम्बित हो जाती है। मानविनपरिषय-मूह प्रप के प्रारम में काम निम्नु परि घया शीर्षक से प्रस्ताना गई है। इस में शानविन्दुरे सादिक देव और चारो को स्पा करने की भरसक घेछ की। परचप' में क्या क्या पस्तु बाई पो उस में दिये गए धोफ्कों से ही पानी पा सकती है। परिचप विस्तृत रे सही पर विशाम मगर प्पाम से पठेगे तो देखा कि इस में रानिक शाम सामग्री किंवना है। पानचिन्ह होयस्य प्रव हो कर मी बनेक सम्म दार्शनिक गों से संव।स के पते संपाहिए पर टिप्पणों में मी तसान की तपा मिास की गुत कुल सामग्री समिति। इस लिए हमने 'परिचय' इस रजिसे लियोनिबानविय में की गई छोटी बड़ी पाएँ, उन के ऐतिहासिक विकासकम से समनी पा सके और दिम्पों में संग्रहीत समय सामग्री पर सार प्रात होने के बगना उस पर शानपिन्दु की पर्चा मे साप क्या संबंपर पह मी निवित हो पाय । पप मचकार ने प्रधानन्य, जैन परंपरा प्रसिद्ध पाच पानों की पर्चा इस छानबिन्दु में की है। पर इस पर्व में सन का समम मारवीप वर्णन विषयक परिशीन प्रतिविम्भिव मा।पर देख कर हमने 'परिचय' इमी म्पापक रपि से स्थिति बिस सेबमिक पाठक प्रमेक निपप से संबंध रसने पटी पैन-मनेर परिमापार तपासन का वार्षिक वारकम्प समझ सके । 'परिचय' म्पिने में हमारी पर भी है कि मैनेवर विहान् वपनी अफ्नो परिमापा बमुसार मी बामपितु गत जैन परिमापा को पपासमष बधिक समय सके और साप व मी रवि रखी गई है किबो पैन पाठक पैन परिमापार्यों से दबा बैन पातीय लिपपों से बषिक परिचित है पर नेतर परमाणामों का एपनेवर मालमप का परिकप म रसते ये प्रामविन की पर्चा को मण से समझने के साप ही साप वर्णनात- रोप विचारगी एक मन्तम्पों से परिचित हो सके। याँ हम बधिक म जिस कर 'परिचय' बारे में इनाना पैक समझते हैमोम्स प्रत्य और रिप्पम बारिश वम्पयन र मागेकन मरे फिर भी शान और तसंबधक्य विपों की परवीय समम दर्शनम्पापी जानकारी प्राप्त करना चाहे उन के पते प्रस्तुत 'प परिचय' एक मई त सिर होगी। 'परिषद' में अनेक पार्शनिक सम्म ऐसे प्रयुक्त ए पो मानबिटु वपा उस के टिप्पों में माही मी पाप । भनेक ऐसे प्रम्प भोर मन्पकारों के नाम मी बाते है पो मूग प्रम और टिप्पणों में मी वार । वएप 'परिचय' गत उपयुक्त पदों व एक हुदा परिभिर बोर लिया गया है। मतियों का परिपप- उपर सपित मिपा गया है कि प्रस्तुत संस्करण में पार प्रतियाँ काम में भी गई। म पर संतानुसारी परिषप इस प्रकार है- (१)-मुदित नकल बो 'मन वर्म प्रसारक सम, माग्नगर से प्रध्यमिता उसे 'स' मा से निर्दिश किया है। सामान्य रूप से प मुत्रित मा घर। फिर भी उस में पुण् रास टिप हमें भी । बस कही ऐसा मी उस में निपुन पाठकोष्ठक में रखा . संपादप पस्तम्प गया है। उस में मुन्स और गौण विषय के कोई भी शीर्षक तो है ही नहीं। निपप -हिमाम मी मरण में मार दिया गया है। फिर भी उस मुदित नकल से हमें गाव कुछ मन्द मिम है। पर प्रति परिकांश ब, पत्रक दोनों प्रवियों के समान है। (२-३) 'अ-अनौर म सडक दोनों प्रतियां लमुनि महारार भी इसनिमयनी के बगैदा स्वित धाम संग्रह में पी-क्रमशः ३५ौर १३५ नबर की है। प्रायः दोनों प्रतियाँ समान । पाठों में जो फर्क बापापा सेखकों की अनभिषवा का परिणाम पान पड़ता है। समय है इन दोनों प्रतियों का मापारभूत बादर्श बसठ में एक से हो। व संबक प्रति के पत्र ५१।। प्रस्नेक पत्र में पक्तिमा १०और बयर संख्या मगमग ११है। इसकी भ्याई १२३ च और बौमा ५ च है । पत्र के दोनों पार्य में पीर एक एक इंच का ऐशिया है। प्रति के वादि में 'भीसर्पमाप नमा' ऐसा डिगा इवा। + सेहक प्रति के २१ पत्र है। प्रमेक पत्र में पंक्तियाँ ११और प्रणेक पंक्ति में भगमग बक्षर १०१ । इसी माई १०३ ईप और पोगई है। पत्र में दोनों पार्य में करीब एक एकच का धिया है। प्रति के बाद में एक सात पप लिसा हमा । निससे बात होता है कि महामुनि भी लिनपानग्दरि के शिष्य अमीनियम के शिष्य भी सविनयमी के उपदेश से यह मवि लिखी गई है। नम्वर प्रदि का लेखन कार मी मंत्र में रिपा गया जो इस प्रकार है- 'संगति १९५५ वर्षे शाके १८२० प्रबर्तमाने मार्गशीर्ष शुकले ६ तियो मर्फबारे इस्पादि। (.)-संडक प्रति पाटण ध्यागम्य माण्डार की है। पर उक्त दोनों प्रतियों से प्राचीन भी है, और पक्कि घन मी । इस में ऐसी मी पक्तियाँ । यो बप संत्रक प्रति में मिस मही है। फिर मी पे पक्तिय संदर्म की रिठे संगर हैं। 'तप्रति के पत्र २२१ । प्रतेक पत्र में पक्खियाँ ११ और प्रत्येक पक्ति में बार करीब ५८।समी पाई १० वौर बोगई है। प्रमेक पर के नो पार्थ में एक पकांचा धिया है। इस प्रति के मंव में प्रशस्तिक ९सोक पूर्ण होने के बाद इस प्रकार प रहेगी- इति भी शानबिन्दुप्रकरणं । संवत् पुगरसनठवनीवस्सरे भाकनेपरसचन्द्रप्रत माने फागुनमासे रुप्णपक्षे एखमीठिपा मुगुवासरे संपूर्ण । भीरख । फरयाग मसु । धर्म मातु सेखकपाठकपोर्मद्रमती- मरवात् । छ । भी । भी । भी। इस रेस के अनुसार या प्रति शक संवत् १९२९ और श्रम संवत् १७५० में किसी गई है। पाम्यापमा से लगप्रस लिकम संपत् ११३) के ११ वर्ष बाद भी किसी है। पी कारण है कि इस प्रति के पहले बागौच पण विस्तृतममा पा। बवरण इस का संबंप मूह मासे अधिक होने के कारण इसमें वारि मी एव कम है।
८ मामपिम्पु मामार प्रदर्शम- परनिति तीनों प्रतिया हमें स्पोरर प्रर्मक पम्पपाद भी कान्विनिनपरी के प्रधिम्प सदार घेता विद्वान मुनिर श्री पुण्यभिनयमी के अनुमसे प्राप्त है । ५० महेन्द्र कुमारची ग्यापा चार्य मे पात भम मोर ध्यन से टिप्पणों की वपिकांश सामग्री सचिव पर है और समय समय पर उनी ने पिपपरामर्भ में मी सहायता की है। महामोपाध्याय प० मााण मिम, पिम्सापक, माप निपातिमाग, काशी विशनिपाइप, ने हमें सब काम पग तब संदेशनिहषि करने में पा लिपप समझने में बालीमम्मच से मरद है। प्रस्तुत सम्पमाग के मुख्य संपा दक निमत मिासकोनिद भी मिनतिरपी मुनि ने प्रस्तुत संस्करण के प्रारंम से नन्त तामें न केवर उपपगी सूचनाएँ 0 की परिक पदों ने पायान्तर सेने, मुफ देखने-सुपारने नादि में मी पामध्य मदद की है। पता न की पिरकायेन स्ौम्म प्रेरणा और प्रोत्साहन ने या काप पूरा कराया है। प्रस्तुत प्रथमा के प्रविधाता भीमान् बार मादुर सिंहनी सिपी की रिपारसिकला और साहिमग्निपा के कारण ही इपना समती संस्करण मी सस्ता से पार हे पापा है। बतएव इस कार निर्दिए समी महानुमानों के दस से मारें। उपसहार- में बसा भनेक बार पहले मी डिन बुध, वीर का मौ नि संकोच मिसता इति मगर भी सहानुभूति दया कातरफ्रता मरे इन साप सहकारियों में म होगी तो मेरी बम्प माप राति म अलिबिवर रह पाती । भर में अपनी सरिता इस रूप में उपयोग पर सेन कारण दोनों सहकारियों का का। पाठकों को शाप बापर्प होगा कि ऐसे दार्शनिक प्रम्प के संस्करण के सम्पायकों की मामाषी में एक मगिनी का भी नाम है। पर इसमें मार्य की कोई बात म । मिनो पुष्प स्मरणापं पा सिच पैन प्रम्पमाम प्रस्थापित है - सर्गवासी सावधरित गाचादनी सिंध मे, तर ही अपनी इस दौहित्री मीमती पप कुमारी को पार्मिक सिधा ऐना प्रारम्म लिया था और मागे संपत तपा दार्मनिक शिपा पाने का सपनप मी त्रिपा पा, भीमान् मानू पर सिंगी सिंधीने तमा उन की पूजनीया नरा मातागी ने बागे बराबर भाव रखा । दौमित्री परा कुमारी की या बारशा ती कि रम्पपन के फाखरूप कम काम कर के, अपने प भावामा की पुण्यस्मारक प्राममाम रा उनके प्रविस्ताा प्रकरकरे । इन बाधप से समय समय पर काफी बार परम सीसवी और परती। परि को सिरोप प्रताप ममापा दो उपाप्पापमी काही एक बाप सपा भासिर और एम्म ऐन बनेकान्तम्पसमा नामक प्रग्य, यो प्रस्तुत शान मिट से भीगा भौर पर उसे मौत मानगिया के प्रयोगमें संपादित कर, इसी मत्पमाला के एक और मुम्पपाम् ममि रूपमें लिफ्ट मनिप्पमें प्रकाशित पत्रमा चारदी है। . बनारस -सुलताठ संघभी ज्ञानविन्दुपरिचय । प्रन्यकार प्रस्तुत प्रम्य 'मानपिन्दु' प्रणेता येही वाचाय भीमद् यझोबियपत्री में मिनी एकति पनवर्कमापा' इसापूर्व इसी 'सिपी मैन प्रम्पमार्ग में, मष्ठम ममि के रूप में, प्राथमिव दो बुध है। उस धेनवर्षमापा के प्रारम्म' में पाप्यायनी का सप्रमाण परिचय लिया गया। प तो न जीवन के सम्बम्प में, खास कर उनकी नाना प्रकार की उपियों के समय में, मावा विचार करने दबा दिखाने कामकासरे, फिर भी इस बगह सिर्फ अपने ही से सन्तोप मान लिया जाता है, मिदना कि वर्षभाषा के प्रारम्भ में मा गया है। पपपि प्रम्बार पारे में हमें पमी इस बगा बषिक मुल नहीं करना पापि प्रस्तुत शामविन्दु मामानी हवम सविझेप परिचय कराना मावश्यक है और इस मी । इस पर मम्मकार के पागीय पाणिन्स तया प्रन्पनिर्माणकौशय का मी योगा गाव परिचय पाठकों को अवश्य रोदी बायगा । प्रम्पकायापत्ररूप मन्प के पाप तरूप का विचार करते समय मुल्यवपा वीम मावों पर विचार परना भरसरमाप्त है। १ माम, २ विषय भौर परबनाती। १ नाम मम्यभर ने सब ही अन्य मानक्दि' नाम, प्रम्य रचने की प्रतिक्षा करते समप प्रारंभ में वास की समाप्ति करते समय पन्त मे हिसित किया। इस सामासिक माम में 'मान' और 'विन्दु'दोपरापाव परका सामान्य भर्य प्रसिखदीमौर निम्न परमो मम्म बानका चिन्तु मात्र १ बात् मिसमें मान की पर्चा र मिनी पति बस परशानपिनु-ऐसा बर्ष भानपिन्दु प्रमका विषमिव । बर प्रम्पकार अपने इस गंभीर, सूक्ष्म और परिपूर्ण पर्चापाले मम्बो मी लिम्बु र पोटा मूपित करते हैं तब पर प्रम पार ही में होगा है, किया प्रबन, पाचापों की या मम्म विमानों की सामविपया प्रति विस्त पाणी बघा, अपनी प्रस्तुत वर्मा को छोटी परर पस्तुसिति प्रष्ट करते ६ पा पामगर प्रकट करते। वयमा अपनी इसी विपप भी किसी बम्प पड़ी कृतिम मी सूचना परते १३ । इस शि-मेशी प्रम का अमाप मी समी मेमों में रूप ही है।नों ने बरपामा कि में शवसमुद्र से 'मान- पिई सम्मग यार भवा, सब समों में अपने भीमुख से महपोरदीरया : मेरा पर प्रम्म परेसा क्यों न फिर भी पा समुद्र प्रपो एक पिम्दु मात्र है। ११ मामाषा पत पर । २पना सम्प्रेमि सम्मानित पत्र-1 ।"माप्त गन्न । - । २ बानतिन्नुपरिषष-१ मन्ब मनाम सिमेह पाहुनाम से प्रसार का बमिप्राय पूर्वाचामों में हतियों से है। पर भी सोमबभर में अपने प्राव में, पूर्वमुत में सामात् मही वर्षा गई ऐसी सिवनी ही पा लिविकोपी, फिर भी वे अपने पापको पूर्वाचार्यों के समम मा की पिच पर है। इस पर प्रस्तुत मन प्राचीन शुवसमा म पास मात्र होने से सपी पपेमा वो पति पसदी पर साथ ही शामकिमु बाम रखने में मम्मकार और भी एक अभिमान बाल पातापापपिप्राय पर इस प्रन्पी रचना पर पवाविषयक बात वित्त वर्षा परमे वाम मार परा मन बना पुरे येविस प्राचारविन्दु एक मारे। पचपि पापम मन्थ, पान में पास नही वापि प्रकार में रही प्रमात मन्च में सोच लिया और पहफेड मी माम माम से नहीं गिना जानार्णव से विसिट नाम से । मनों ने मयुर पर्चा समय, विशेष विचार साप चानने के लिए सरचिव शागरा प्रबकी बोर संपत किया है।पानविन्दु' में की गई मी पी मय ही विधि और पूर्व है। दिर मी म्स में अधिक माराई पारने पापाचे बरपायापजी शासी अपपी की तिचा सूत्रप करते है इसमें कोई समरही नाही अपनी प्रस्तुत विमोचपनी दूसरी मी विषयी भाव पड़ी वि से भी पी एपित करते हैं। समीप शियों की पर परिपाटी पी बोर पाच मी विधी विषय पर बम बात बड़ा प्रचलिमें पब सी विषय पर बपिगरी विपी रशि से मम्मम परिमाम कापामु परिमान समयमा दोनों परिमाण का मन्ब मी र । म भारवर्ष के सावित्रिक विकास को दो प्रमेक विरप के साहिम में म्म परिपाटी के नमूने रखेंगे। पापापणी में हर मी जमेक विषयों पर लिखते समपन्स परिपाटीमा मनुसरण निम्मा है।जों ने मप, सप्तमंगी बाति बनेक विषयों पर वे जो मरण मी जिद और भी विपयों पर पो परे मन मी मिदाहरपाय 'नयप्रवीप', 'नपरास' बारि बजेटे पोटे प्रकरम, वन 'अनेकान्तम्पासा', 'नयामवरमिपी' पानि परे पा भार मात्र मी बाव पड़ता है मार विषय पर लिखते समय भीमों में पहले 'भामा' नाम भबार मन लिखा और पीछे माननिम्बुमाम प पफोटा पर प्रदेशक मम्म रमा। माना' परम्प न लेने से इस मेस्मा स्था, विनी लिवनी पौर निस लिस प्रकार पापी गई रोगी पाना संभव नही फिर मी पापाबजी के म्मलितसूबर सादिसराशि को देखने से इतना वो नासोर पाबा समय कि रो मे स पर्णकम्प में पाम संपनी पर पापप र गम होगा। मार्पोगों में परंपरा में, प्रीपन को सेहत बनानेबारे यो संस्पर माने गए है न में एक नामकरण संस्कार भी है। यवपि पर संतार सामान्य ससे मानवम्पपिसी विवापि स संस्कार भी मचा और भरपर्यता परिचार बापरपरा में भाव १ जियावन माग-1 | मगर समयमैश स्मार ममै सम्म सयप का कोण मा t-साम परमानपानम् । सम्परालाई हाना मीरममायाब मिली।
सावर्षिभूपरिचय-२ विषय विरेचन म्यापक या, दिस फाखरूप पार्यगम मामकरण परते समय गुव छ सोर विचार करते माप है। इस पी म्याप्ति यहाँ तक बही, कि फिर वो किसी मी पीस का वर्ष, नाम रखना होता है वो, उस पर खास विचार कर लिया जाता है। प्रन्पों के नामकरप पो रमपिता पिडानों के द्वारा ही होते हैबएम मे भवर्पता के साप साप अपमे मामफरप में नवीनता और पूर्वपरंपरा का मी पयार्समन मुयोग साप विम्यु' नाम सम्पर्य वोही, पर उसमें नवीनता तथा पूर्व परंपरा का मेस मी है। पूर्व परंपरा इस में मनेग्मुसी म्पत है। मौर, प्रामण मौर बैन परंपरा के मनेक दिपयों में ऐसे प्राचीन प्रम्य पान मी शात है, मिन के अन्त में 'पिन्दु सण मारे। पर्मपि के हितविन्दु' और 'न्यायविन्दु' असे मम्म म पर पाप्पापी ने नाम मात्र से सुने ही पे पस्किन का बन पम्पों का परिशीलन मी यहा। वापसति मिश्र 'सत्चनिन्दु' और मधुसूदन सरलती के 'सिद्वान्सपिन्दु' भाति प्रम्प मुविमुख है-जिनमें थे सिम्वपिन्दु' नवोपयोग प्रस्तुत मानविन्दुम पाप्पायजीने किया भी है। भाषा हरिमद्र के पिम्तु मन्तवा 'योगपिन्दु' और 'पर्मपिन्दु' प्रसिर । इन किन्तु षम्वबारे नामों की मुमपर और पाक पूर्व परंपरा को उपापापजी मे प्रस्तुत प्रम्प में म्पच पर 'शानार्ण भौर 'शामपिन्दु' की नयीन चोरी के आरा मीना मी मर्पित की। २. विपय पम्मकार ने प्रतिपाप रूम से जिस विषय को पसन किया है यह दो प्रम्प के माम से ही प्रसिद्ध है। यों को पानी महिमा मानवर्षस मात्र में प्रसिद्ध है, फिर भी मार्य चाति का पर एक मात्र पीवन-साप्प राबैन परंपरा मै बानी पारापमा पोर पूना की विविध प्रमानियाँ इठनी प्रचमिस किमी नही मानने पाम बैन मी इवना तो प्रापः पानवारे किमान पाच प्रधरसोता है। ई पेतिहासिक प्रमाणों से ऐसा मानना पड़ता हान पाँच प्रत्र, यो जैम परंपरा में प्रसिद्ध मगमाम् महा- पीर पारे से प्रचचिव रोने चाहिए । पूर्वमत बो मगवान महावीर के पहरे माना बाणारे मोर गो पार पहले से मामा सममा बावा है स में पफ 'कानप्रवाई माम का पूर्व या मिस में वाम्बर-गम्बर दोनों परंपरा के अनुसार पचतिम माम का वर्णन मा। पम्पहरा में प्रापीय समझे बाने पाइह मो में मी व स्पर परे। 'उपराम्पयन बैसे प्राचीन मूह सूत्र में भी इनकम पर्मन है। 'नन्दिसत्र में हो गए पाँच बानो काही वर्णन है। 'मापम्पकनियुक्ति से मापीन म्पारमा मन्य में पाप शारों ही मगर मान माह में मका बर्मम रिपामविपना सारिसके प्राचीन से प्राचीन समझे बाने पाडे मन्मों में भी पछाविप मानवापार पर ही धर्म १"मटर पलिपसिटौ-४ २बमएम ४५.
पारपिपरिचय-२ दिपप गिरम प्रतियों भविमानम'मोसार प्रचार पूरी ममाझि परंपरा मात्र। इस पविष हान प्र साप साप विगन्धर-वाम्बर से दोनों ही प्राचीन संबो में एक सा पारे। पर सब इसमा परिव भने रेमिए पर्याप्त दल पनविन भान विभाग मौर समापन पो गर ही पापीन होना चाहिए । प्राचीन बैप सादिनीबो कामप्रबिर परपरा वरमुसार मति मुन बषि, ममापर्पाप और मापे पांच माम मानविमागसूचक पत्रित होते है। जबकि बाग- मिक परंपरा मनुसार मतिमान में ममिवियोष माम है। पामबारों माम कामपन्थिक परंपराधमान ही है। इस पर न परपसम्व पविष शामक नार्मों काममन्त्रिक मोर भागमिक परंपरा के ममुसार प्रथम शाम होगा 'मति और मिवियोप'पो माम समान्यपंक पा पायल्ससे पपीत होते पाचार पपपि मारिपार नाम लोगों परंपरागों बनुसार एक एक दी। नो दूसरे कोई पाप बसी नही है। स्मरण रखने की पाव पालन परपरा सम्पूर्व पाहिन ने मेक्सि पोर मेनेचर अब प्रभर जाम समाबन्छ पविष विमाग में से किसी मलिसी दिमाग में, किसी ममी पाम से भिमा है। समाजमा प्रथम परपय सारे इतिहास में पसाब मागायों को अपने पाप किसी नये शाम बारे में, पालिसी बये बाबरे नाम मारे में मन पैराबा, नपा समान्तरबारियों ने सम के सामने पेसा कोई प्रम पनिव विना तप व दो मे सबान चा मार विशेष नाम का समाजात पचतिप लिमाग में पचासमप लिसी पापा दूसरे दिमाग में कर दिनारे । बम हमें भागे पर रेखमा सत पनि शार-विमाग में मापीमन भूमिका मापार पर, मशा-पिम मिस तय विधामविकासमा । बार पवा ६ म परंपरा में शाम संपन्धी विचारों पविभस पो मार्गों से गा है। एक मागे पोरेसनामात का और दूसरा है पसेनान्वयम्पास म । रोतों भार्ग पाषा परसर संबर दे पाते है। फिर भी मन पारस्परिक मेरसा, जिसके मुस समय ये-हरनाम्यासबनित हिन्मस में माम्प पतमानामों को पप- माने का मबाह नहीं है। परमवसम्मत चमतो रमवस पर विषण्ममा कमी अपडम्पन दी। स में बगर मापा एकमात्र पत्तामुखमा बर्षात् पार दी। बाचिन्तसम्पास पराइए साव विकास में पर्णमाम्वन परिमापानी को मारमसात् परमेनप्रखबर है।समें परमव बणन पाव साब कमी कमी पसाया ममी अपमान परम वा पाता है। इस पों को पान में रखकर मानकापी जैन विचार- विमर म सम्पपन तेरस बने पति पासिक भूमिन हमें और सादिन में बने को मिती है। ११. - बम ब प ४। प्रेममाया व २९१ । पागम, 1.1 १५१ ।
५ मानविन्दुपरिषय-२ विपय विरेचन मानविकास की रिस भूमिका का बाभय हे पर प्रस्तुत शानपिन्दु पन्य को पाया- जी ने रचा इसे ठीक ठीक समझने के लिए इम महाँ सानविकास की अ भूमि- पों का संक्षेप में चित्रण करते हैं। ऐसी मासम्म मूमिकाएं मीचे लिखे मनुसार सात पीमा सकती है-(१) धर्मशानीय तया भागमिक । (२) नियुजिठ। (३) ममुपोगगव । (४) वस्वागत । (4) सियसेनीय । (६) मिनमग्रीप, भौर (.) मकानय । (१)र्मशास्त्रीय दवा भागमिक भूमिका पर घिसमें पनाविप मान के मति पा पमिनिकोप भावि पांच माम मिळते है, मौर इमी पांच नामों के भासपास सरमना- म्पासमनित पोगबहत गहरा था विस्वत मेद-ममेदों का विचार भी पाया जाता है। (२)दूसरी भूमिकामा रेजो प्राचीन नियुजि माग में, पीप विक्रम की दूसरी सवादी व में, सिख पान पड़ती है। इस में पर्सनाम्वर सम्पास प्रयोग सा असर मगरप जान पड़ता है। क्यों कि प्राचीन नियुछि में मविमान याचे भनि और भमि- निपोप सपोपत संसा, प्रमा, स्मृति पार पनेक पर्याय' सम्मों की नो पति रेती माती मोर पसलिम पानपो प्रत्यय वा परोक्ष रूप से विभाग ऐसा बारे पर पसेनान्वरीम वम्यास काही सूचक है। (१) वीसरी भूमिका पारेको 'मनुयोगदार' नामक सूत्र में पापी पाती है, यो कि मापा विमीय दूसरी सवाम्दी की कति है। इस में बसपादीय 'न्यापरसकेपार ममामों का क्या उसी मनुमान प्रमाण संचम्पी मेव-यमेरों का संपाद जो नाम्तरीय सम्पास का भपनिम्प परिणाम है। इस सूत्र में बैन पचविष मानविभाग को सामने राम्रो हुए मी रसके को मारपिव सूरिने पापा, म्पापपसनमें प्रसिन प्रमापविमाग प्रेमा सभी परिमापामों को चेन विचार सेत्र में गनेस प्रबम प्रपन किया है। (१)ोपी भूमि परोपापमापति 'चार्य मोर पास मनो लोप माप्प मेरेखी जाती है। परप्रायः विमीय तीसरी सवदी मार कति है। इस में निति-प्रतिपादित प्रमप मोर परोष प्रमाण पेसर पापक गनुपोगपर 11 १ मधिपश्मि ने पथ पत्र जितना भी नियुकिमान दिस पाप खरे बरसो एकमाचारपायकपभिपी प्रवास प्रेप प्रवेशाम सर रिमाप उपम प्रपात मारने में भरपि एमएस सऐप मम भाटा मेमा मरा है। मासनधि, प समाचावत मणमा मिचि-प। १५ । बरि प्रायेल स्पो मे ज्यपान मिया रोवे प्रेम मिश्री पुर गर्न प्रेदेखने । परों पिम मानने पर AAहिर माम मरिमारपणा बान्तानुरतमा मामी और जलवा पारदर परिचमा ९एचसि साम र परोपप परमप परमात्मा होते पस्यपालमने - 11 4 शानविनपरिचप-२ रिपबचन में जीत म्पापपर्समीप धनुर्विध प्रमापरिमागी मोर मासीनवा दिखाए निर्बुकिाव विविध प्रमाण दिमाग का समर्थन किया है। पापकरे इस समर्पन पधागे के जान विप्रप्स पर प्रमाण पर पगलि फिर किसी प्रेम वार्षिक ने अपनी काम-विचारणा में चतुर्विध प्रमाणविमाग को मूगर मी मान नही दिया ।, श्वना तो बाप मा कि पारशिव पूरि पैसे प्रतिष्ठिव धनुमोगपर केरा, मापार मैन एव मै माय पाने भरन, फिर माननीय महर्षिय प्रमाप विमाग, हमेशा पाने 'मगपती बात परम प्रमाण मूव भागों में भी संग्रहीत हो गया है। पापक मासाति का परिप प्रमापविमाग कीबोर मापन यने मेदापर्व परवान परतालिबान मापायों सोपा प्रनस परोप प्रमाण विभाग वम उसीफोर कानों का विचार स्पों म मिना पाप और पसेनान्वय बर्षिय प्रमापतिमा पर मो मार दिया था। इसके सिवाय बापाने मीमांसा पादिरसेमास्तर में प्रसिर भनुमाब, बर्षापचि वारि प्रमाणों पसमावेश भी महि-पतमे पिया'बोमानक पालिसीपरामिवारामा रेना नहीं बावा । पापको प्रायपो पाते बास पार बीवी है। एक दो पर बो बिर्युषि- जीच्या प्रमाप विमान में प्रविशा पड़ने से संबन्ध रखती है, पौर दूसरी पार को पनाम्बरीष प्रमाप परिमापामो प्रभपनी शान परिमाण साम मेड पैठाती है बोर प्रासंगिक हम से पनाम्वन प्रमापतिमाग निराकरपरती। (५) पाचची भूमिका, सिरसेम दिवाकर किये गये पान विचारविकास की है। सिडसेमने-चो बहुमाया विकमीपण्ठी शताबी ज्वरवी पाप है-सपी विमितियों में,ऐसी पावें शाम विचार पत्र में प्रस्तुत हैनो भैप परंपरा में न * पहसे न किसी मेपनिववी और मायर परिसीमे सोची मीमी पाने वशी से समझने में बिवनी सरामी दीन परंपरस्पद समानस लिए किया कठिन की नगी पति बसमापानपरक भी है।पही बाल दिवाकर न विचारों पर कीन एगर पर्ष तक, मनिसी ने सामिपूर्णक मापोरना और मम्मका समान ही किया । पाप्पावणी ही एक ऐसे एप, बिनों ने सिरसेन मीच प्राव मुहरों सिर्फ पानमूतिपूर्वक विचार ही नहीं किया पति अपनी पूम्म प्रहा मौर वर्ष से पर- मार्चित नाठि प्र उपयोग से, न मुद्दों प्र प्रस्तुत पारिन्' मम्ब में, पति तिर पौर बनतीनोमा नेवाग समय पी लिया। मुरे मुलवना पार- १ मति पोर मान प्रापरिक ऐक्य । बपि मोर सनापविमान प्रवत्ता बमेर। पडणार भोर महसन का पापविक बमेर। १'पिके स्वास्थम-पामय । २0d 1, मावे करने समोसा-रो-उपेपारवहा प.५..साभ स्थगन माप११। देखे चमानिमित्र १९,षा सविता ५। ५ो निराक और सानिमा यो समापन और मना - पापविन्दुपारपय-१ विपप विचन . प्रसनरूप पर्सन का ज्ञान से ममे। इन पार मरों को प्रस्तुत रो सिद्धसेन ने, ज्ञान के मेर-अमेर की पुरानी रेता पर वार्षिक विचार का मपा प्रमात मानिसको कोई भी, पुरावन व संस्कायें वषा चारों के प्रचमित पारपान के कारण, पूरी तय समझ न समापन विचारकों में सिस सेन रे विचारों मति प्रतिक्रिया शुरु भने विद्वान् दो पनका प्रकट पिरोप करने गे, मौरछ विद्वान् इस पारे में बासीन ही ये। ममानमम मिनमा गणीने बड़े जोरों से निरोप दिया। फिर मी इम देखने पर विरोप सिर्फ चष्मान मोर पेचपन के ममेदपाठे मुरे पर दी एमा है। पानी के मुरों पर मा वो किसीने विचार ही नहीं किया पासमी ने उपेक्षा पारप की । पर वन हम प्रस्तुव मानविम्तु में उनी मुरों पर पाम्या- पणी कामामोह रेलवे बना परणारे कि उठने प्राचीन युगमे मी, सिरसेन की पर ताकिवा और सम्म रष्ठि बेम साहिम को श्रद ऐन थी । दिवाकर ने इन चार मुरों पर के अपने विचार 'निपयशाविसका मा 'सन्मतिप्रकरण में प्रकट किये। वनों ने माम विचारक्षेत्र में एक भौर मी मपा प्रमान शुरू किया। संमपता रिवार के पहले मेन परंपरा में कोईम्पाप लिपपका -मर्थात् पयर्यानुमान मौरवस्सबम्पी पपा निरूपक- विशिष्ट सम्बन पा । बब बन्ने इस अमाव मे पूर्ति के लिए 'न्यायामवार बनाया दब पा ने पैन परंपरा में ममापदिमाग पर मपे सिरे से पुनर्विचार प्रकट किया। भार्परमिक- सीहत पावसनीय वार्षिक प्रमापविममा ने गैम परंपरा में गौण मानकर, नियुकि- परसीय विविध प्रमाणदिमाग को प्रमानवा देने वाले बामपहन विकहम पर र बुरे हैं। सियसेन ने मी उसी चिनि प्रमाण दिमाग की भूमि पर माया- पचार' की रचना की पोर इस मसस मोर परोप-प्रमाणापपरा तीन 'प्रमाणों को येन परंपरा में सर्व प्रथम खाम दिया वो उनके पूर्व भारु समय से, सांस्य पर्सम दमा पेशे पिक रसेन में सुप्रसिद्ध पे मोर मम तामी। सम्मेि मौर पिक दोनों रसम निन मसम, अनुमान, भागम-इन दीन प्रमाणों को मानते जाये उनको भी भय एक प्रय से, मैन परंपरा में मान मिठा, बोलपारमा भौर पपर्वानुमान से मार प मुले। इस प्रकार मेन परंपरा में म्याम, सौम्प और पिफ वीनों रसेन सम्मत प्रमाणविमाग प्रविष्ट मा । पहां पर सिरसेनसीहत इस त्रिदिप प्रमापषिमाग मेन । १२ समति २७और मालिनी - Rो हमारे बीच ११५५ से सचमणति ५। ये मारवाए, मे १।४बपि तिरसेब मे प्रमान पासपरोक्ष विष विभाग नाममा मम्म बौर प्रपन पौनों प्रापपरापा। ५ समीप प प्रमाय मैच में समी पिक एम्मत मारो मेरो ग्स पोम मेर मात्र प्रासपारमामय ( १५)सम प्रमाल प्रभाव बामात में परेपर पर प्रभारी मद( 1 २१) मोमभिप एपम्पस दर माथेमोरपये प १०५ | मवा व पापियात सग प्रयायो प्रोनोमरम्मति अमममा पाहिए-देणे पार, वापर १ प्रमानमाधि मापरिपत्र ।
. ८ सावमिन्दुपरिचय- शिरविन परंपरा में, वारमितीय पनि निमागी पय, स्पेषा ही पास भलियर भारर मा -पए मम भाग होता है जिस पर हम मागे बा रसगे। ()ठी भूमिम, वि०ी प्रणाली पारे बिनम गणी है। प्राचीन समय से धर्म- सास मा मागम की परंपरा महसार दो यति, अपमावि पाँचबानों पविचार र परंपरा में प्रचलित था, और किस पर मिनिअर मामाचीन मम्मम्बामाग मे एवं मी से बागम के प्रवाणों में, अपनी वपनी रशिप सजि मनुसार, गवाटिकम मी परमया बा, सी विचार भूमिमा बामय र समाममम बिनभद्र ने मपमे विशाल मम्म 'पिसेपाकम्भकमाप्प में पनाविधान की बागव सोपार मीमांसा की । मोर पीबागम सम्म पविषशानों पर बरसे बागमापाची समरे बाग हप प्रभाग बाग । 'तत्वाश परम्पाला निसते समप, पूम्पपार बनन्दी भौर महारफ वो भी पचविषयावसमर्पन में, मुस्मनपा प्रबाहीमही बम्मन मिपा । ममानमप इस विमसममियो पापजीवी भागममूमिका कमानी चाहिए, सोनों ने किसी मीन मि से मम पाकिया ही मबाई, फिर भी हम सारा वर्ष भागमिक सीमाबों के पेरे में ही निरा सा-सालिमारिक पपा संकराचार्य म सारा र हुनि की सीमाबों के मेरे में ही सीमित या। समानमप मे अपने इस निशि बापापा माप्य मे हाय रे भारे में पठनी वपिक विचारसामग्री मासिवबो मागे रे समी वाम्बर प्रम्बप्रणेवानों के लिए मुम भापारभूव पनी है। पाप्यापजी वो बन कमी मिस किसी प्रभारी से शानों का निरूपम परते है भानों नमाममप विशेषावरकमास को बपने मन में पूर्णरूपेण प्रतिस्विर मेठे । प्रस्तुत जाननिम्न में मी पाप्मानजी मे नही किया। (.) सावर्षी भूमिम मा मरे, बो विनीव भाठी मताप्दीपि है। शामविचार विमसमेत्र में महारष मांग का परब मामुखी है। इस बारे में उनके वीर प्रमाविषमेव पोग्प है।पमा प्रयापत्ताधापम्म्याहोने से प्रमानववा पराजित है।दूसरा प्रमासिरसेपीप 'म्यापारवार' प्रतिविम्बमादी मा बा पता है फिर मीपस में व्यय विवि मतमता सारे। तीसरा प्रपत्र 'सपीयसप' मोर बात कर 'प्रमापसंग्रह में बिस्व की एकमात्र निजी या प्रना ठीक है। माताति मे, मीमांसकपानि सम्मत बने प्रमानों का समाज मवि पौर इव में रोषा है-पेसा सामाम्प ही काम लिया था और पूम्पपाइने' मी पेसा ही सामाम्ब बम लिया था। परण, ममा मे ग्स से भागे पार निक्षेप विशेषण के प्रण राबवार्षिक मया पवमानामिनावरच प्रमाप, मिस वएपनसर और भारत में समावि परमानन्धपियर पर बिना म नाप गोमपात मेनुसरासरस्व भिडम ॥ मनरें। पामोदरम्यान सपारगाव पदमा बम पहोचली।रेले निपनी 11.मी। रेणे पाल्माण ११ ५.१ । रार ११५.
हामविस्नुपरिषय-२ लिपप विषम ९ हो सकते हैं। रामपारि' वावम्मी होने से रस में इवना ही विपीरण पर्याप्त है पर न कोबर पर्मर्षि के 'प्रमाणविनिमय' का अनुकरण करने पागलवर 'न्याय विनिमय' प्रम्ब बनाना पस, वर में परार्यानुमान च्या पारगोष्ठी को पत्य विचार परमा पयास समय नों मे सिरसेनलीत बेक्षेपिसारपसम्मत निविप प्रमाणदिमाग में मपाठी का सबसम्पर्म करके अपने सारे विचार 'न्यापरिनिमय में पित किये । पर एसेपर म्यापरिनिमय सियसेनीय 'म्पायापवार का सवय चिन्नु विस्वव विभवीपरपी नछ नही कि भनेक मंकों में पूरफ मी है। इस वयन परंपरा में म्बापाववर सर्व प्रथम समर्पक कही है। अपना होने पर भी, ममक के सामने म प्रम ऐसे थे जो उन से सबार चाहते थे। परन प्रम पर था, लिबर माप मीमांसविसम्मत अनुमान प्रति निविभ प्रमाणे प्रत में समावेश करते है तब मारपति इस सन माम विरोपवावा किये प्रमान मवि वोर व दोनों में समाविए होते हैं। दूसरा प्रम इन सामने पापा, कि मति के पाप रूप से वो स्पति, संदा, चिम्ता बसे सग मिहिका से प्रचलित मौर मिन को उमावाति ने भी मूस सूत्र में संग्रहीत किया है, न कोई विसिर वात्पर्प किंवा उपयोगी या नहीं यतिरिक्त उनके सामने सास प्रम पर भी जिब समी मैनाचार्य अपने प्राचीन पनविष मानषिमाग में रसनाम्वरसम्मव प्रमाणों का मा नमामों का समावेश करते पाये है, पर क्या जैन परंपरा में मी प्रमाणों की कोई पराविक परिमापा पापरासंनिकम्मणोपा नहीं मगर वोल्पा । मौर माप परमी बवाए किस प्रमाणपक्षण या प्रमाणपरिमापाएँ सिफ सेनाम्वर से प्यार कीमा माघीम पैन सम्बों में गमका कोई मूग भी है इसके सिमाप मार्गको पक पड़ा भारी पर भी प्रम परेशान कर या बान परवा है कि तुम बेन वार्षिकों की साप प्रमाणप्रणाली कोई सवत्र मान रखती है या नहीं? मगर पर सामान रखती है जो उसका सांगीण निरूपण प्रेमिए । इन तपा ऐसे ही दूसरे प्रमों व नपार बमकने मोरे में 'पीपमप में दिया है, पर 'प्रमाणसमाई' में पराव सर। जैनवारि सामने पनान्तर रमि से पमिद ऐने वाली सब समसाजों का मुम्मान बक मे सर्व प्रथम सत्यमार से किया बाल पारे। इसलिए उनपर प्रसारिस मोनिका पर संक्षिप्त वर्णन से पहसाए जाना जा सकता है कि-भावी नगी प्रवाणी पर में बैन परंपरा में पान संबन्धी विचार क्षेत्र में लानाम्पास के माग से मौर सेना- म्वयम्पास के मार्ग से लिस किस प्रभर विकास प्राप्त किया । पर में रसनावरीष भारपा परिमापामों का जैन परंपरा में मास्मसात्करण दमा नपीन सपरिमापामों म निर्माण पर्याप्त रूपसे से पापा ।पस में बस जातिकमा के भरा परमों का मरसम १परवाने रोष प्रधानों में हिमा-मम मममार और प्रपत्र । इस मस्या प्रमाण व मे हम्सच्या परिपाला स्वामी .
माननिम्नुपरिषय-२ विषय विषम भी ठीक ठीक हो चुका था और पूर्वपस में मही पर्षित पेसे अनेक पपीन प्रमेयों की पर्चा मी हो मुधी पी। इस पनी पाशनिक भूमिका के ऊपर पगमे गार परों में जैन वार्षिों मे बहुप बरे मरे पर्चामटिश प्रन्थ र निमका इतिहास या प्रस्तुत नहीं है। फिर भी प्रस्तुत कामषिमु विषयक पाप्यावजी प्रमका ठीक ठीक समता पा सके, पवर पीप समपमेन पारिकों की प्रापिकी निशा संक्षेप में बानमा यही है। भाठपी-मपी सवामीने पार पान के प्रदेश में मुस्मठया दो विसामों में पाया गावा है । पर प्रपत्र ऐसा है चोभमाममण मिनमा के परा विकसित भूमिका का मात्रप पर पादपोलिभाचार्य हरिमाको 'पर्मसत्राणी भारि हतियों में रखा भाता है। दूसरा प्रपत्र माकप्रय विकसित भूमिका भपम्पन कर सामा। इस प्रपन में मर जाकर विपाशिष्य-अशिष्म पिपानम्ब, माणिक्पननी, बम- म्दी, प्रमावस, मारिणब मारि विगम्बर वाचार्य दीपक विन्तु पमपोष, पारिष भूरि, हेमरम्माचार्य पारि भनेक ताम्बर भाचार्यों मे मी बाय वार्षिक भूमिका में विस्तृत किया। इस प्रपान न पुरा मे बैन मानस में एक ऐसा परिषर पैरासिया मो पूर्वपटीन हारिषरता को देखते हुए बापजनका वा सम्वाहै। संममता सिरसेन निमार रेण्डिस मपीन सूचनों कारण न विस जो मेव परंपरा में पूर्णमा पा पासपी पवामी से सर रूप में हटने और पटने लगा। हम देखते हैं कि सिरसेन की तिरूप मिस म्यागाववार पर-पोलिसचमुच शेन परंपरा पडणेटा किन्तु मौसिक मम्मी-पप दीन सवादी दक किसीने टीची महीलीभी, सम्पायर कीबोर न पिनों का मानना गया । सि िमे एसी शताब्दी मेंस पर पापा सिस पर उसकी प्रतिष्ठा पाई और ग्बारापी भवानी में पारिता ताम्विप्रिने समे परमात या यो मरर ने 'म्यापमपमहामाप्प' को मारिस ने 'पावरमाप्प मे, भर्मसिने 'प्रमाणसमपर्य' को मौर विधानन मे 'वचार्यस्त्र बानि को बिग मा । भान्विसूरि मे ग्यापारवार की प्रथम परिका पर पटी पम्प 'बाचिरा मोर माग ही उस में न्नों मे पत्र वा परिचालणन भी किया। इस माम-रचना- पर पुग में म्पामावतार दूसरे भी एक पैन वार्षिक पान अपनी मौर बीमा। ग्याएकी सवामी के मिनेपरसूरि ने पापाववार की प्रथम दी कारिका को सेर बस पर पर पपपम्प 'प्रमासपण' नाम का पम्प रा और सभी मामा भी कारों ने सी।पर बह रिनाग के प्रमाणसमप' की प्रथम भरिका के पर धर्ममिति के प्रय रखे गए सटीक पपरम्प 'प्रमामवाहिका बना पूनपार की 'सपिसिद्धि' के प्रथम मंगर भोर पर रिपानन पर रखी गई पीक 'आसपरीक्षा' बबरण है। दर में वर्ष और पर्मन पम्पास ने जैन विचारों के मामस पर नमुरम में सवच विसार प्रष्ट करने के पीस टी ठीक दो रिपे थे। पदी कारण है कि एक दी भ्यागपवार पर निपने पासे तीनों विधनों थे विचारप्रसाठी बनेर अगर भिम मित सी बात है। १ सयादेवोभारस्य प्रगमन प्रमाण ।
मानषिमुपरिचप- सनाशी ' पर बैन परंपरा ने मान के विचारक्षेत्र में बो बनेकमुली विकास प्राप्त किया था पौर मोविशाम्प्रमाण प्रम्पयशि पैदा की थी पर मो मानसिक स्वायम्य की पपवार्षिक भूमिका प्राप्त की पी, पर सब दो पापाप पछोविषयमी को विरासत में मिली दी थी, पर साप ही में परें एक ऐसी मुविपा भी प्राप्त पई पी वो उनके पहले किसी न विद्या को न मिली थी। यह मुनिमा दयन पपा गंगेतमणीव मम्प म्पायमाम भम्पा का सापात् विपापाम पाली में अबसर मिम्ना । इस मुविपा का पाम्पापजी निकासा मोर प्रभा मे पैसा और पितमा उपयोग किया इस का पूरा सपासपो सीमे मा समया रेनिस ने उन की सप छवियों का बोड़ा सा भी मप्ययन किया हो । नम्प माप के उपरान्त पाप्पापणी मे स समय तक के पनि प्रसिद्ध मोर विकसित पूर्वमीमांसा या बेधाव बार बैविक पर्मनों के महत्वपूर्ण प्रबों का मी ममा परिधीछन किया । भागमिक मोर पार्सनिक मान की पूर्णकालीन पा समकालीन समर विचार सामग्री को भारमसात् करने के बाद पापायजी मे शान के नित्मणक्षेत्र में परार्पण किया। पाम्पायपी में मुम्पपया माननिरूपको कृतियों है । एक 'वैनतर्फमापा' और दूसरी प्रस्तुत शानपिन्दु' 1 परीति का विषय पपपि शाम ही १ वापि रस में उसके नामामुसार वर्कप्रपाठी या प्रमाणपति मुरूप है । वर्षमापात्र मुम्म पारान 'विशेपापस्यामाप्प' है, पर पर माफ के 'पीपसप या 'प्रमाणसंग्रामपरिफर विन्तु मबीन बमुकरण संस्करने मी । प्रस्तुत मानविन्दु में प्रविपाप हमसे पाम्पापी मे पनपिप मान भाग भागमिक विपय ही चुनारे मिस में उनों मे पूर्णमा में विकसित ममावपति को भी मी खान नहीं दिया । फिर भी मिस पुग, मिस विरासत मोर दिस प्रतिमा के पारक पे, पर सब पति प्राचीन पनविष हामी वर्षा करने पाहे म के प्रस्तुव पानविम्यु प्रम्ब में न माये पर समय है। पर एप हम मागेबाकर देखेंगे कि पहसे करीब गार वर्ष के बैन साहिम में पविषमानसंबम्धी विचार क्षेत्र में बोस सिख हो दुका मा पा को कम करीब सब, प्रस्ताव दामचिन्तु में पापा दी है, पर उसके पतिरिक बामपन्थी भनेक नए विचार मी, इस शानपिन्सु में समिविणारबो पाने के किसी म अन्य में नहीं देख भावे । एक पए से प्रस्तुत पानपिम् विपापश्यामाप्यगत पानिपजानवर्णन का नपा परिणत भौर ममीन रशिसे सम्पन्न संसरण है। ३ रपमाशैली प्रस्तुत प्रम्ब सावविन्दु भी रचनादेखी लिस प्रकार से सर समझने के लिए मामों की मुस्प मुल्स मेनिपों का संक्षिप्त परिचय भापकरे। सामाम्प रूपसे १९ोमवर्षमा प्रवि-पूर्व विधाररविन माय मर । २पासना में तीन अमाप में कमा प्रमाल र पौर विमेव बळमासेम्मापरप्राम पाम प्रचार में मौतमलोप मेष में बाजार और प्रभाव में जमा प्रबन पौर पर प्रतिस्पवयो# मिमी पर दोनों प्रन्यों के प्रतिम प्रताप में प्रमाल परमेप पर पाय झिप उननिरtबिससे साम्पस बैगे मोमपस मेरममा में मायरा बमोतिमवर्ग ने अपनी मापा ने इप्रसमसमा प्रपत्र स और सीन परमोम मिचिहै।
कानपिनुपरिषषः -मम्मका बाम्बम्बर सम पासेमिक परंपरा में पार जैठियों प्रतिम-1 सूत्र मे, १ फारवा झेठी, म्मामा जी, भोर " पपेन सी । मूग हमसे सूत्र सैड़ी का मारण पापस्त' पारि । मूग रूपसे परिषा मी पापाहरप रे 'सांस्यकारिका' माति । गप पर पा समय रूपमें या किसी सह मन पर म्पामा रखी गावीप पहर बामा की- वैसे 'माप्य 'बादिकादि मन । विस में मोपर पापम्पोलिसी मूए काबाम्पन मोति बिस में सवार अपने प्रतिपाय विषयक मार से सीने और पर पर्वम दो पन करवा चावा और प्रसच्यनुप्रसङ बने सम्म तिपय संबपी विषयों को प्ठाकर नलिस्पन पय मुम्म विपपरेपन को ही पुरवारपर्यन मा मारण सेमे । प्रस्तुत मन रमना, इस पर्पनी से की गई। विपानन मे 'प्रमाणपरीपा' रथी, असे मान मरमती मे विदान्तसमवित्र और सराव में पिदान्तसार' पर क्षेत्री से बनाय, पैसे दी पाम्पापणी ने शावमिन रपमा मन सेमी से पी। इस में अपने पालिसी बबरे पित गप पा पप रूम मूगम पर कम्पन पाबत एष सम्ने रूपसे पापनियुकिसी मूग मन्बी मामा महा। बापो सीये दौर से प्रतिपापरूपसे पसमये गये मान और सरे परिव प्रकार मिमप बरसेग से करता है। इस मिस्पष में प्रम्मकार मे अपनी मोम्बता पोर मोरा समसार मुमविषय से संबन्ध रखने पाछे मवेक विषयों की मानपीन साग निस मेमो मे पर लिपप सबमे पकाने मन्तम्पों पपवरण मी विसापास प्रम्बार मे बागेचा पर 'सन्मति बने बालों को (१)सम मा बार्य म्पामाम मी मारि मी पखवा न गावानों को सेना समान पास्मान करना प्रासंगिक मात्र बसपा निरूपण कम मसंग माना और स संपन्ध में माना के मवमेरों पर विषय प्रास पावर में सम्मनिगम महती गावामों प्रेम माम्मान पसे अपना विचार प्रकट रविणसर पाप्पावजी ने दी “पवन वर्व सचिव सम्मति- पाषामिरेप प्रदर्षपामा" (५०३५)मर पर मान सामदिया पानापणी ने बनेपन्तमपमा पारि भनेक मकरण प्रब पिसे है पो मानबिखरे समाव पर सभी है। इस मा बामप ममे की प्रेरणा बादाम्बरमतिका पेशवसार, 'न्यायदीपिका पारिभनेक रेसे प्रदबिपका ने पमोग भी किया। प्रन्पका धामपन्तर खरूप मबापर कप म पूरा परिचय पो वमी सेमपसाबमापन-- महरा और बात मन मनम-पुनः पुनाविन गावाब । रिमी इस बारे बो अधिमिदिमो प्रमेयोन्म बना परिसम्पद बनाये रशियाँ सो विषयमहसवम मा बहती है। प्रमभर मे शानबस्म मे सम माले दिए दिन मुम मुम्म मरों पर पर्चा भी भौर ने मुल मरे भी पी परते समय प्रासंगिक इससे बिन दूसरे मुरों पर मी विचार विमानसरों का पषा संमप निमम ब्यना इस बार इस पेसा विमर्शन के समय बासमष - ज्ञानपिम्नुपरिषप-कान सामान्य वर्ग तुम्नात्मक और ऐविहासिक रष्टि का उपयोग करेंगे मिस से मम्पासीगण मन्यभर पर पति मुरों को भौर मी विशाम्ता के साप बगाइन कर सके क्या प्रम्पले अन्त में मो टिप्पण दये गये हैं सनम हाई समाने की एक स्त्री मी पा सकें। प्रस्तुत वर्णन में काम में माई गाने पाठी तुम्नात्मक क्या पेतिहासिक रएि पपासमा परिमा, रिचार और साहित्य इन तीन प्रोसों दक ही सीमिव ऐगी। १ज्ञान की सामान्य पर्चा मम्पनर मे प्रम्प पीठिन रमते समय उसके विषयमूत मान की ही सामाम्य रूपसे पाठे पानी निस में उन्हों मे दूसरे मने मुरों पर सामीप प्रभास गरे। १ पान सामान्य काम, २ स की पूर्ण-अपूर्म भवस्साए क्या उन अपसामों के कारम और प्रविपत्मक धर्म प्रदिपम, बामापारकर्मका तरूप, ४ एक वस्त्र में 'मारवानात'विरोप का परिवार, ५ शाम्तमव में 'बालवानाइपस्वी बनुपपचि, पूपानगव वारतम्य दया इस नासिका पारम, मोर • भयोपसम की प्रक्रिया । १ [१] पम्पकार मे शुरू ही में मानसामाम्पा सेनसम्मत ऐसा महप बताया ल-को एक मात्र भारमा का गुम है मौर बोस क्या पर का प्रकारे परमार है। बेनसम्मद इस मानसरून प्रेपर्समाम्तरीय मानस्वरूप रे साम तुसना करते समय मास चिन्ता मुस्प रो विचारपार प्यान में मावी है। पहली पायरेसम्म और रेरान्त मे, और दूसरी पोख, म्पाय मात्र पानों में प्रथम पारा अनुसार, मान गुण और वित् पति नदोनों पभापार एकनीक्योंकि पुरुप मोर प्रपदी उस मे पेवन माना गया पनि पुरुष और पसे पहिरित पम्हारण प्रेही उसमें पान सपापार माना गया है। इस वए प्रपम पारा अनुसार रेतना मोर जान रोनों मिन मिम बापरगत हैं। दूसरी पारा, तम्प और मान प्रवापार मिम मिह म मान दान पोनों को एक बापारगम मत पर कारण-मार्यरूप मानती है।पोरान पिच में, प्रिसे पर माम मी पण हे पैतम्प बोर हान प्रमसित मानता है। सर हिम्पापानि पचन समिर पिच पाय सिर मारमा में ही पैठन्य और मानस पवित्र मानते हैं। जैन सन सपरिवारपा प्रजाम्बी है। यों पर एक ही भारमवस्त्र में पारप रूपसे देवमा भो मौर भाव पसे उसमान पाय प्रे मानता है। पाप्यायनी म सी मार मान को बारमगुम-पर्म रम प्रारम्यिा है। पापम्पोरेर परम्परामप्रसार बालविम्मुपरिचय-बान सामान्यपणे २.पाप्यारी ने फिर मवमपा किमान पूर्व भी होणारे भौर पूर्व भी । पाँ पर प्रम सामारिको जिप पास्मा वनसमारोप उस में मान की कमी षपूर्णता भोर कमी पूर्णता पो समाचर ऐसे समय पापापजी मे फर्मतमा विशेष निमा।। सनाने पाकि[३९] भास्मा पर पफ पेसा मी वापरण। यो विमा- प्रधिको पूर्णरूप में प्रर्य करने नहीं देवा । वही भावरण पूर्म ज्ञान का प्रतिमा होने से फेवग्यानावरण प्रणवा है। परमावरष से पूर्व मान प्रविषम्बरवार से ही बपूर्ण शान बना भी बना है। एक ही सम्मानापरणको पूर्ण पान कम हो प्रतिषम्पक मोर पसी समप भपूर्ण साम भबमक मी मानना चाहिए । अपूर्ण ज्ञान के मति मत भावि पर प्रकार है। पोर न २ मविधानापरप मार पार पावरप मी प्रथा पूरक माने गये हैं। उन चार भावरणों के धपोपमम से दी मात पाति पार पूर्ण ज्ञानों की सचि मानी जाती है। वर्ष पहो, न अपूर्ण गानों की प्रति जम्मानापरप से मों मामना । ऐसा प्रम सहबासका चर पापापणी मे बार- सम्म [२] री निगा, फिर भी यह चरम की स्पर सम परिणाम योस चरतारा पापारी ने बैन साम में रि प्रचलित एक पपपर का सचिव निरास र दिया।पर पधाम्पर ऐसा कि-बम पम्पानापरण के सय मुपास्मा में जान प्रश्न होता है, तब मरिमानापरण पार चारों भाषरण पर सेती में मति भारिप मान भी स्मों म मामे पाय । इस प्रल बगार में, एक पर पता-रणी में मति भारिपार मान पत्र पो हो। पर और मान से पमिमूत होने के भरण प्रपंपरी नहीं । इस रिमदित पर को निकिक सिर करने के लिए पाप्पावणी मे एक मपी पुछि पमिती बपूर्ण मान वो रियानापरण का ही प्रो, चाहे वपूर्ण जान का वारवम्म पा विष्य मविमानावरण भात क्षेप पार पापरपोरे पोपशम वैविप्न का कार्य पोन से पर पूर्ण मानापमा मात्र पूर्ण पानावना के मविषम्या जमानावरण के सिपाय कभी संभव ही नहीं। मत एष बडी मेंबर बनानापरण महीम पसब कोई मी मवि पारिमपूर्णबान फेरी में होदी कैसे सकते हैं। सचमुष पाप्पावनी की या सुधि सामागत होने पर भी यो पहले किसी में इस तय स्परूपये मसाई नही है। ३ [1] तपन मेप और सूर्य प्रसार मानावरम और देवमपि घाममसिन तुम्ना पण पामारी मे पानावरण कर्म रेसम के बारे में दो पाठे सास सूचिव भरें। पर वो पहलबापरणर्म एक प्रकार का इम्म और दूसरी पनि परम्म कितना ही निविर-मनमों न हो, फिर मी पर पति पापा बरसा होने से अपने पापा पान गुष को सवा बाहर करनी माता। म तिहार विपद में मारतीय बिच दो परंपराएं है। पौर म्पारपर्सन मारिएर बौर साम्प पेराम्त माहि दूसरी बोस पर्समोसापरम पावरण . १ वातानिय ।
मानविन्दुपरिषर-सानी सामान्य पर्चा बार बनेमावरणों कोमानवा है। पर उसके मवामुसार पित्तम मह मावरम मात्र संसाररूप' फसिव होता है जो की इम्पमरुप महीं है। म्याम माहि वर्मनों के अनुसार भी मानाबरप-मसान, मानगुण का प्रागमार मात्र होने से भावरूप ही फतिव होता इम्पल्प नहीं । बलि साम्प, पेरान्तममुसार बावरण पर उम्मरूप बबप सिब होवा है। सरप'मनुसार मुद्धिसत्व का भापारफ वमोगुण रेमो एक सूक्ष्म पर इम्मान मात्र है। मेदान्त अनुसार मी भापरण-महान नाम से वस्तुतः पाप्रकार का बर गुम्म ही माना गया है मिसे साम्प-परिमापा के अनुसार प्रति पा मन्वापरण कर सकते हैं। राम्त ने मुम्बमान और भवस्या-ममान रूप से या मूम्मपिया भोर गविपा रूप से मनेकविध भावरणों की परपना की वो जर इम्परूप ही है। जैन परंपरा वो पानावरण कर्म हो पा दूसरे धर्म-सब को वसन्त स्पष्ट रूप से पक प्रचार पर द्रम्म मवमवी है। पर इसके साथ ही यह मझान-रागद्वेपास्मक परिणाम, गो धारमगवरे मोर जो पौटिक फर्मइम्यम कारण पपा कार्य भी है उसको मारकर्म रूप से पोर मारिनों की पर संसारात्मक मानती है। मैनपर्सनप्रसिद्ध भानावरणीप सप के माम में मीचे लिये सम्म पर्समाम्वरों में प्रसिद्ध है। पौरपान में पविया मोर पावरण । सांस्प-पोगपर्सन में भविपा मोर प्रकाशावरण । म्याप पिकचेदान्त दर्सन में पिया मोर भज्ञान । ४ [५० २ १०३] भावस्प और मनापवत्व परस्पर विष्ट होने से किसी पर पस्त में एक साथ ए नहीं सकते जोर पूो प्रक्रिया रे ननुसार पो एक ही रेवना एक समय में चस्मामावरण से भारत मी मोर मनापूर भी मानी गई है, सोसे पर समेगा इसम वाप पाम्पावजी ने भनेकान्त रष्टि से लिया है। नो ने कहा कि पपपि पेतना एक ही है फिर भी पूर्ण भौर षपूर्ण प्रारूप माना ज्ञान इसके पर्याप रे जो किवना से फपधित् मिनामिना गम्थानापरणय पूर्ण प्रश्नस के भाव होने के समय दी उसके परामपूर्ण प्रश्रम भनाइत मी है । इस तरो मिन पर्योगों में दी माहवत्व मौर बनाइयत्व है जो कि पर्यापार्षिक रष्टि से मुपट है। फिर भी जप इम्पार्पिक रष्टि की विधा हो, तब इम्प प्रमानवा होने के कारण पूर्ण मोर पूर्ण मानस्म पयाप, इम्पास्मक पेवना से मिल नहीं 14 एप उस रष्टि से एक पर्यायगत मारवत्व-मनापवस्व को एक देवनागत माममे मोर रने में कोई विरोप नहीं। सपा- प्यापजी मे इम्यार्षिकपर्यावार्षिक रष्टिा विषेक सुपित परमात्मवरण मन पर्सन सम्मत परिणामिस्व सहप प्रष्ट रिया रेमो किरण नित्सव या ट्रसस्तनाव से मित्र है। ५ [[५] पाप्पापसी मे मैन रष्टि के अनुसार 'भारवानापवस्व' का समर्पन दी मही बिया पति इस पिपप में रात मव पोपकान्तकारी मान पर सपा पणन मी दिया है। जैसे रेरान्त प्रमको एकाम्स टस्स मानता है सदी सौम्प-योग भी पुरुप । २यो सवार, ना परमानेपरमार पापण्यापमा । पेशामा १।५ोम्मरमार पर। 1 १समार मायविन्दुपरिचय-मानकी सामान्य वर्षा को एपन्त टस बात पर निप, निर्षिभर मोर विरेश मारणा है। इसी वय बाप भारि रन मी बारमा हो एमाव निम ही मानते है। प्रम्बार में पधन्वपार में 'मावानापती अनुपपपि सिर्प पेशन्त मव समाओवना राहीको दिखाई वात् नहोंने सास्प-योग भारि मोमी समाषना क्यों मही- पर प्रम पापोवा है । इस का बाम पर मान परतापमानापरणप पदमा की भावनावत' विरुपए प्रस्तुत पर्ग का विवना साम्प (गवा मोर बर्मा) राम साब पापा गापा रखमा सास नाति पर्मनों के साप भी। बेन पर्सग पर तमवत्त मान रस में सम्मानापरवी सिदि मानवारे भौर स देवन ने उस पर मान्यवरप का विपय मी मानता है। नमवानुसार नम्- मानापरम वनवत्त में दी पर बम्प पपानों पर जामप वन प्रेमी वाव परतालिस से निपरप्रकाश देवना न वो अपमा पूर्ण प्राशर पाती है और बाम पामों का भी पूर्व प्रकार कर सकती है। शान्तमव की प्रक्रिया मी बेसी दी है। मामी समान र पिप अप में ही मिव मान र, उचे समविपन पक्षण , पाती महान प्रमनिट पर दीसे भावरतारे मिस सेलिसा भस गलबारिम से दो प्रकाात मही हो पाचा, दब भी ग्रिप से प्रकास होवा ही। न प्रक्रिया तन और मम्मानाबरण पपा मेदाम्त प्रविमा पिप बोर बमान पदार्थ में, विवना बाकि साम्मदमा सामिक और मार्मिक पाम्प, चैन प्रक्रिया प्रबम्प सोमबार प्रक्रिया के साम महीं है। मों व सांस्य पापम्प निसीपन की प्रक्रिया में समाप्रप पेवर बाबामा के मारतानार होने म पैसा वा और विस्वप विचार मही है, बेसा पाम्त प्रक्रिया में है। इसी परप से पाम्यापनी ने जैन मश्मिा प समर्थन करने के पार रसके पाप गत मंगों में मिळवी पुस्ती बात प्रक्रिया मवान किया है पर पर्सनाविक प्रकिया रेपणन का मन नही लिया । पामावणी ने पेदाम्त मत प्रनिरास मते समय उसकेमो पोम पूर्णपम रूप से पोल किया है। मे परम पम पिपरपापान [14] बोर दूसरा पाचन मित्र [ सूचित किया है। रसुवा गाद मन में से दोनों पागल पहले से पतित है। कोही बमान का बाबय और विषप मानने पाम बम पप, मुरेपयपारी 'नेपासिनि और परे सिप्प समात्ममुनि के संक्षेपशारीरकारि में, पपिचर पति पीर को समान समार और प्रमोसम विपण मानने पाम दूसरा पम मगम मिल पा गया है। ऐसा होने पर मी पामावली में पारे परमे विपरमापार्य-प्रमतरम पति प्र भोरपूसरेमे पारसतिमिम प्रस्चित किया । सभ परप हर गम्त एर्सन रेसी प्रसिधिहै। पिपरपावाने मुरेपरके मन का समर्थन रिमाऔर पापतति मिश्र मे मगम मिग्रो मत पाइसी से रेपोन्में पस ममता पिरमाचा और बापतति मरे प्रमानम से मसिर हए । पापापी में इसी प्रसिदिनुसार पस्सिा है।
साबपिम्दुपरिपय-मान की सामान्य पी समालोचना के प्रस्तुत गरे बारे में पाप्पापजी प्रकामा इतना ही नगर भेदाव पर्शन को सर्वमा निश्चि मोर टम साक्ष मारवाद परस में भवान के प्राप किसी भी वप से 'बागनायवत' पर नहीं समता, बैसा किम पर्सन पटा सकता है। ६ [10] मैन रहिरे भनुसार एक ही रेवन्त में 'पासवानावती उपपचिरने पार भी पाप्पापजी के सामने एक विचारणीय प्रम पापा । पापा पम्यारा- परम देखना पूर्वप्रकाश को बात करने के साथ ही बस भपूर्व प्रमाको पैदा करता है पर परमपूर्ण प्रश, एक मात्र पानावरणरूप कारण से बन्य होने परण एकही प्रकार का हो सकता है। स्मों कारपरेविष्य के सिवापान विष्प सम्भव मदी। जैन धाम और मनुमब वो पता है कि अपूर्ण मान अपश्प वारतम्पयुकही है। पूर्णता में एकरूपता होना संगवी पर मपूर्णता में वो एकस्मता संगत है। ऐसी रसा में अपूर्व शाम रेवारतम्य का खासा स्पारे सो भाप बसाए । सामान देते हुए पाप्मावजी ने बसठी एम यही बताया है कि मपूर्ण मान रम्नानापरण- बनिवणेने से सामाम्पवया एकरूप ही है, फिर भी उसके भवान्वर वारवम्प प कारण मम्पावरपसंबम्पी धपोपशमों प विप्प है । मनमेपात सूर्य का पपूर्ण-मन प्रकाम मी पब, कट, मिचि जाति पाभिमेर से नानारूप ऐसा ही मागबवपण मविवा- मावरण भारिप वापरणों के विविध पपोपत्रों से-विरवा से मम प्रकाश पार पम्प संगव है। एकरूप मम्म मप्रस मी पाघिमेर से वित्र-विचित्र संभव है, पर परपोत की सिखरो बावान पापियों करने पर या वैविम्य भी खतम हो पाता है। रमानावरण भीप होगाम पाय गुणस्मान रेवन्त बम्प यतिमात चार भामरण पोरनपपोपम्म मी नहीं रहे। इसी से उस समय मपूर्ण शान की दया वर्गव वारवम्प की निधि मी दोबाती है। वैसे सामू मेपपटम पमा पर मारि पापियों के म गने पर सूर्य का मम प्रकाश दमा इस प्रविष्य छ भी बाकी मही पण, एकमात्र पूर्ण प्रसादी का प्रश्न होता है, से ही इस समय वना मी सवः पूर्णतया प्रपामान होती है जो रिस्पानापमा। पापि की निधि से उपापित बरसामों की मिपि पसगवे समप पाम्यापनी ने बाबा हरिमापसासागरेर बाप्पात्मिक विकासम्म मरूप पर पामने मा प्रकाश गगम काम का सार परमात्मा रेमोपामिक पर्याप- पर्म भी तीन प्रकार है।गत गतिमाल पोप यो मात्र पोरयरूप-पापिष्ट है।पद एवरे अपमे कारणमूत लपावी मों के पर्नया इट पाने पर ही मुखि समप च होते।पया, सम्बोष भान वा मति काम नारि ऐसे पायो भगोपशमसम्म परिसर धर्मसंन्यासी प्राप्ति होने पर पाठ नाति गुमलानों में सेसेसपोपसम प्रमान सप प्राप्त परवा चाख से से समोपतमरूप पावि एने से न पायों में से वनम्प रेबिम्प मी पग पाता है।चो पर्याव पर्मपपरम्प होने से धायिक मर्षात् पूर्व पोर एसपन 3 १८ सबपिम्दुपरिषप-मान-की सामान्य वर्ष पोपों प मी भवित बगर परम्यापाराविरूप पाभिसदित हो म पूर्ण पर्याप भी मसित मुधि में (बस किरदाति पामि नहीं है)मही राणा । पर्चात् इस समय के पूर्व पर्पाप होवे तो पर सोपापिक नहीं; से विसर पाविरुधारित्र मी मुधि में मही मागपातापाप्पापजी ने पर्चा से पा पाया पास्मपर्याय माविक-पपगम्प हो पा सामाविक पर अगर ये सोपाधिक वो अपनी मपनी पापि इटने पर मही पते । मुरसा में समी पोप सब पभर की पाम पापि से मुखपी माने पावे। पार्शनिक परिमापामों की तुलना पायापजी ने मप्रक्रिया अनुसारी को मार व परिमापा में पवगपाही माव परिमापामेर से इवर मारतीय पर्समों में मी पपामत् मा पाता है। समी सन बाप्पास्मिक विकासम्म बसमवे हर संक्षेप में मर मुमुघा, जीवन्मुति बोर विरमुछिइन तीन परमामों को समान रूप से मानवे हैं और ये पीवम्मुक स्पिति मे, बाकि और मोरम सर्वमा बभाष पवा है पवा पूर्व काम पाया जा विपाभरग्मी बासुप गारिकर्मी उपाधि से पारण भौर जीवन प्रभावित मामले रुपा पर विर मुसि प्राप्त होती है जब म बापुर पाहिम की उपापि सांगा जयने से बबन्य हमारण मारि कार्य का गमाव मानते हैं। तीन अपमानों को सह स्म से बतानेपानी रासनिक परिमापायों में तुम्मा इस प्रभर है- १उस्कर साधा २ बीवन्मकि ३ विराति पारिप धर्मसंन्यास, सयोगि-बयोगि-- मुषि, सियत। गुणसान सदलपत २ सांस्प-योम परवेराग्य, सम्मान, बसंप्रभाव, धर्ममेप । सरूपमतिरपिनि संपवाव । ३ बौद वापरणागि, पापरपानि, निर्वाप, निरामय मेराम्परम । सदस्य, परंत। पिचवत। १ न्यायोपिक पुज्योगी विपुज्योगी अपवर्ग निम्पिक समापि प्रमसामातार, सरूपगाम, बानिस्ता मुछि। सानिए किस मे जान पाशरस रखन मस्ती अपनी व परि भाग एव पुण्मी है । पदपन से घोपित होने पाग विचारमोव वो और मी पुराना समझना चाहिए। [10] पाप्पापी ने शान सामान्य पर्चा पा पार पाप माननिरूपण में बार बार पाने पाले भयोपसम सपा मार गवगवा है। पर मात्र न साहिम में पाये जाने बारे पोपमम मम विवरण एमो मे बात मव २ रममावानों में मनियामनुगर सी गै परिमाषा में लिया है। मो मे पति रिस्तुप पोर पनि पियापन गरा जो राम प्रष्ट गए मम्मर पेशाबर रोजी परपरामों भपक मे। ५ देशान्त - मानपिम्नुपरिषपः -शान कोन्सामान्य पी को एसा सम्मत है। 'पूम्पपार ने अपनी गाममिक क्षेठी में सयोपडम का स्वरूप जवि संप में ही स्पष्ट किया है। रामवार्षिककार ने एस पर और विशेष प्रकाश गम्म है। परंतु इस विषय पर जिवना मौर सा विस्त दमा विचर वर्णन वाम्परीय प्रम्बों में सास र मठमगिरीप टीकामों में पाया भाषा रखना मोर पैसा रिसव विसर वर्णन हमने अभी तक किसी भी विगम्बरीव प्राचीन-अर्वाचीन प्रम्प में नहीं देखा। जो कुछ हो पर पताम्बर-विगम्पर रोमों परपरामों का प्रस्तुत विपस में विचार मोर परि मापा का ऐक्य सूचित करता है कि श्योपशमविषयक प्रक्रिया पम्प कई प्रन्मिामों की पर पाप पुरानी है और उस को बैन तत्वों ने ही इस रूप में इवना अधिक विसिव रिया। भयोपशम की प्रक्रिया का मुख्य पकम्प इवना दी है कि मप्यबसाय में विविधता दीपर्मगत निविपता परम है। जैसी भैसी रागपाविक तीव्रता पा मनवा रेसा ऐसा ही फर्म की विपाकसमा क्लिका-रस का वीनत्व पा ममत्व । कर्म की प्रमानुभवा सेवारतम्य का धापार एक मात्र अप्पयसाप की शिवपा भमुदिप पारपम्प दी है। मम मप्यबसाय में संहिश की मात्रा वीण हो पर वजन्म मात्रुम फर्म में भानुभवा तीन होती है घोर वाम्प तुम धर्म में एमवा मम्द होती है। इसके विपरीव व बप्पवसाय में मिमि मात्रा बढने के प्ररण सहिष्ध की मात्रा मम्द से बाती रे वा खन्य मुम कम में एमता की मात्रा दो वीन होती है भोर वनम्प पछुम गर्म में ममता मम्रो जादी है। मप्पासाप का ऐसा मी पहरे मिससे कुछ टीवसमविपाकी आमांश का दो पपपराही निमूग मास हो जाता है और उसे दी मांश विपमान होते हुए भी पविधिलर बन पाते ९वमा ममविपाधी फर्मान ही मनुमन में जाते है। पही सिवियोपशम भी है। पर फर्मपि बोर सकारण सम्बम्म में जो न सिम्त भया पर समान्तर से मोर रूपान्तर से (संक्षेप में दी सही) समी पुसम्मवारी पर्यनाम्व- में पाया बाण है। पापश्शेपिक, साप मोर बोसदसों में पा सठ मवणारे बेसी परेप-मोइरुप कारण की दीव-मानवा पेसी पर्मापर्म पा धर्मसंस्था की वनवा मनवा । पान्तरमन मी चमसम्मत पर्म वीम-मर प्रति वरद पमान गव नामाविप ठीन-मम्द सखियों प्र वर्णन करता है, यो पत्तमान की उत्पति पर से सेर पत्ताान पधिपार मी पपासमा प्रम परवी यवीर। इवर सपनों की बपेमा १० विषय में जैन सम के साथ योग पान प्रपिक साम्पहै। योग पान में ही बो प्रमुम, पनु विणिम मोर मार-पेपार बताएं बताईन परिमापारे भनुसार सचागत, पायोपामिक मोर मोरपिष पपसार । भतपर तुर पाप्पापसी ने पावअठपोगों के ऊपर में अपनी संक्षिप्त इति में पचव मोर पसरे माप्यार में धर्मविपया रिचारसरणी वा १२ये प्रपा ।
२० मानिनुपरिचय-मतिमोर राम पर्चा परिमापात्रों के सायन प्रकिया सुम्मा मेमो विशेष स्म से प्राव। -tो, बोमपर्शव पो. २४। पर भोप भी कर्मविषयक नेवर वर्मन और जैव वन में पास बन्दर मी मगर बाग पागधो पर विपना विरुप, विवना बारपोर बिना पर परपमा बन देन मन्बों में है वा विस्तुए, विशा और एमभरपयुम बम बिसी पम्प मेवर माहिम में नहीं है। दूसरा भम्वर पहलवणों में भ म पसायो पा परिणामों की तीनवा-मनवा पवा दि-मावि दुम पर सम्म पोगम-मूचे मरनमामों ग्राम करने का पप समपाने का बो प्रबारसम्सी बम्प पिता ने ही किया है।पही सबब में कर्मविषयक सवा साहितपति की रिपसे विसिव है। २. मति-मुतज्ञान की पर्चा बाली सामाम्म रूप घे चारपा परमेरे पार प्रथमर में विशेष विचारणा परमे से सोच भेदो में से प्रबम मत बोर व का सिप बिमारे । पचति वर्षकमी से मात बारा पहन लिपप र पार दीका विरुप प्राप्त है, फिर भी मति मौर व प्रबल एक पूसरे से श्वना विविध वहीं पर निरुपम समय पूसरे से निहपण को माग मा सो इसी से रोगों की पर्चा पाव भाव र पी गई [५.१५० सपोरे पापार से वापस माग पर संप्रदीत बने सिम्मकों के माधार से लिन बास पास सरों पर पणे विचार परमारे १- (१) मति और हव मेहरेप प्रपत्र । (१) निमित पौरमानिमित मदिन प्रह। (३) बार्षिक पाल्वादान घलास । (१) परिसा वापर विचार का दिमत । (५) पानपरिकल और पूर्वगत गाबा पौर () मी मानतिर विरुपमये नपा यापोर। (१) मति और सुत की मेपरेचा का प्रपत्र बर्मचार प्रारम्भिक समय से दो शावरण म के पांच बों में पति- काश पलाम मे समसबसमत मारे। नियमो मेमाप परमासान योग-बापमान २७। मस्त मित सामेव मात (मर । ५.) सोम (म ५५)पी परफीगर सेवक और मिमी बल्बरों मतमा पेशव रावबाबमा पार पवमा मेरमातरम सम बा बाबाचन at पुरो प्रेम-पचमा परमों में पारमय पासमान, परमेस्वरेचर और परम्पमा पर मचा पापाय पसरावासा मारममावे।।
शानपिन्बुपरिषप-मति घोर अव म मेररेखा पा प्रपत्र २१ पानावरम और मुवज्ञानावरष पे दोनों पर प्रतिपा पिठल सुपी मानी गई है। भवएप पर मी सिसोदिन प्रतियों रे वापाय रूपसे माने गये मति मोर मुत शान भी खरूप में एक दूसरे से मिल ही साबमरों को शौ। मति और पुरे पारसरिफ मेरो विषप में वो पुराफास से दीई मवमेव म मा चौर भाग मी उस में कोई मतमेर रेला नहीं बाबा पर इन दोनों प्रखरूप इन्ना अधिक समिभिव पा पम्पूसरे देखना भपिक मिटरे किरन दोनों के पीर मेरा रेखा स्पिर परमा पारदी कठिन पर्प है, मोर कमी कमी दो पर भय षसमब सा बन जाता है। मति मोर मुबीच मेरो या नहीं, अगर वो उसकी सीमा पिस पर निपारित परना इस बारे में विचार करने वाले तीन प्रपा न पास्मय में देखे जाते हैं। पाठा मपत्र भागमानुसारी, दूसरा मागममूगर वार्षिक है, और तीसरा ध्यताकि है। [१९] पारे प्रपत्र के ममुसार मवि भान पहावाबो इन्द्रिय-ममोजम्प देवया पबमामात पार दिमागों में विमलो। भोर भुकान पर पगारेयो अंग्पविष्ट एवं मंगवाय रुप से बैन परंपरा में मोकोचर शाम के नाम से प्रसिद्ध पवाबो जेनेवर बामय मौलिक झामरूप से मा गपा है । इस प्रपा में मति पौर हुर की मेरेवा मुस्पट है, क्योंकि इस में भुवपद वेग परपयरे प्राचीन पर पवित्र माने जाने पाठे साम मात्र से प्रमामतया सम्बम्प रखता है, जैसा कि उसका सोर हुति पर कि परंपरा के प्राचीन पर्व पवित्र माने गाने पाछे शामों से मुरूपतया सम्पम्प रखता है। परमपन मागनिक इस लिए है कि उस में मुख्यतया बागमपरंपरा म से अनुसरण है। 'अनुयोगवार' या 'तमार्याधिगम स्त्र' में पाया जाने पाम पुत का वर्णन इसी प्रपात का है, जो बाद पुराना पान पदवा है।-रेस्रो, बनुयोगार सूम सू. से मोर वस्तार्प० १२० । [[१५, ६२९ से दूसरे प्रम में मति मौर मुख की मेरेता वो मान दी हो गई परस में मो पटिनाई ती बावीप मेरेयाका सान मिमित करने में। पारेकी बपेमा दूसरा प्रपन लिप म्पापापों कि पहले प्रपहरे बमुसार मुखबान अप सम से दी सम्म्प रमवार पर दूसरे प्रया में समातीत मानविशेप को मी मुख मान लिया गया है। दूसरे प्रपमरे सामने जर प्रम एमालमसमान में भी कोई भासतम मौर कोई शबनम समय मोर समातीत माने जाने मारे सुत शान से रस का मेरसे समझना । । इसन बाप मरे पया ने पषिक गहराई में बार या दिया कि बसर में मतिमणि और मुपसम्मि आमा मस्पुरयोग और मुखोपयोग परसर मिस पूर, महेदी पोनों जान सत्सम दबा नसण रूप से एक मरे समान तें। मरे प्रपन अनुसार दोनों सानों का पारस्परिक मेर सम्मि और पपोग मेरी माम्पता परममित जोम धरामान में पिर प्रमानित दी है। पर मुख मोर मनधर मुन कल से जो सुतरे मेरजेन पारमय में १- इस दूसरे प्रपा का परिणाम है । 'भार पनियति (गा. १९) और 'नन्दी (९.३.) में जो 'मस्पर सती पम्म' माद चोर मुतमेर पर २२ मानचिन्नुपरिषप-यतिौर मुव मेपरेखा मया अपमरेले बा१पौर बो किसी माचीन निगरीय प्रब में हमारे रखने में भी भार, ल में महर भोर मनधर मतो मे सर्व प्रथम ही भावे पानी पाए मेरे ही पो भेदों के पापार पर अपेक्षारिसेप से गिमाये एप पर कि प्रथम प्रबहा सहप मामा पाने पाम अंगमाविष्ठ मोर मंगवास मुव भी दूसरे प्रसव रे पावरम मुम्म अपर मौर बनसर इव में समा बाण है। पपपि अमराव पारि चौरा प्रभर मनिश भाषरपकनियुटिमा नमी पूरची मदों में देखा नहीं पाता, फिर भी न चौरा मेरों के वापारमूव बमर- नपर इव की पसमा यो प्राचीन ही बार पड़ती है। क्यों कि "विशेपारम्पकमार' (गा.११.) में पूर्वगतरूप से बो गाथा की गई। इस में पधर परिष सा है। इसी तर विगम्बर-पेवाम्मर दोनों परपरार्म-साहिम में समान रूप से बर्षित हुवापीस मका में मी पर शत मविस है। बसर बोर बनसर व का बिस्तृत वर्णन तपा पोनों का मेरमपर्सन नियुटिरेवापार पर भी बिनमहगणि समा- समप ने किया। मह बहाने मी वपणनमर वाव पब निरचम राब- पातिक" में किया है-मोल 'ससिरि मनी पाया जाता । लिममा वा भक पोनों मे भययनमर शुभम्पालाम पो भिमा है, पर दोनों मम्मामान एकहप नहीं है।जोरो पर इवमा वो निमिव हीमति और पसान की मेरेगा सिर करने वाले दूसरे प्रकारे विचार में बापमसर व रूप से सम्पूर्ण मूम्बापा बाग का प्रभाव मान या-मालिस मेप रेखा को सिर करने बारे मबम प्रमाके विचार में देर शाममान ही इतरूप से पाइसरे प्रथा को बागमानुसारी वार्षिक समिप लिप्स में बागमिक परपरसम्म पनि पोर हुसरे मेरो वो मान ही लिया, पर उस मेरले समर्थन में दवा सभी रेखा बॉम्मे के प्रपा में, क्या दिगम्बर मा वाम्पर पमी ने वर्ष पर परम्गाई। [...] तीसरा प्रबल र किमो सिई सिरसेन दिवार भी गाय परवा है।मों में मति भोर हव रे मेरमो दी माम्प नहीं रस्सा बचपनों में मेरेसा सिर परने म मबह भी पही मिपा । दिवाकर सपा मकस मागम निरपेस वयानी है। ऐसा कोई वार्षिक प्रपत्र दिगम्बर मामय में देखा पारी बावा । मी और शव का बमेर पसीनेवाग पर मबन सिरसेम दिवारी खास बिझेखा पिरपिता मनी रिपक्षस ममेरगामिनी पी, बोनस दुग में प्रमानववा प्रविष्टिय मौत मापना का फरमान पदणारे।यों मनों ने ममेर मनि और अब में ही बागमसिर मेरेना विम्म व निप, परिसमपि मोर मनापर्वाप में वापस पान भौर पर पन में माने जाने पालेभागमसिन मेर को भी वर्ष के बस पर बमाम्म किया है। १२खो रसम्म प । २ 1ि५1 A+ मपणे १५मपदिनु।।.tो बिगा मनिन्द्रा । पचप्रम पामविना ।
माननिम्नुपरिषप-मति मोर एव की मेररेखा का प्रपात एपाप्पापजी ने मति और मुख की पर्चा करते हुए उनके भेद, मेरी सीमा मोर जमेर के पारे में, अपने समय कमेन बारमय में वो दिन पाया जाता था उस सर का, अपनी विशिष्ट सेटी से उपयोग करके, उपर्युक्त तीनों प्रयम का समर्थन सूक्ष्मवापूर्वक किया है। पाम्यायजी की पूस्म रएि प्रत्येक प्रयन के नापारमूव रष्टि- निम्तु व पाच वावी है। इस लिए ये परस्पर विरोपी हिसाई ने गाळे पसमेवों का मी समर्पन पर पाते हैं। पैन मानों में उपाध्यायजी ही एक ऐसे हुए जिन्हों ने मति मौर मुवी भागमसिद्ध मेदरेखाबों को ठीक ठीक बगठे हुए भी सिरसेन के अमेरगामी पसको 'नम्म' अप्प ।।१०] प्रय रूप से नवीन मोर तुम सूचित करते ए, सूस्म मोर पिपलम वार्षिक सेठी से समर्थन किया। मति मोर सुतकी मेरेला सिर परने बाले क्षया से मिटाने पाहे ऐसे वीन प्रयमों कामो पर वर्णन किया है, उसकी पर्सनाम्तरीय मानमीमांसा रे साप बम हम तुसना परते हैं, वन मारतीय वस्त्रों के चिन्तन का विकासक्रम तया सका एक दूसरे पर पामा मसर सप्ठ प्यान में मावा है। प्राचीनतम समय से भारतीय पासनिक परंपराएं मागम को सतप रूप से मम्ग ही प्रमाण मानवीयी। सब से पहले भापर पयागत पुरा ने ही बागम के सवन प्रामाण्य पर पापधि व्ठा पर स्पष्ट रूप से पा पोपित किपा कि-म सोग मेरे मन को मी मनुमा मौर वर्ष से पाँच र री मानो। प्रमहानुभम मोर तक पर पुरा इतना पषिक मार दिए जाने के फलस्वरूप बागम रेलवप प्रामाण्य विस्त एक दूसरी मी विचारपारा प्रतिवदई । मागम को सवय मोर मतिरिक प्रमाण मानने पाठी दिपारमाण प्राचीनतम पी पो मीमांसा, म्याप भोर सांस्प-योग रर्मन में बाज मी भाव है। वागम को पतिरिक प्रमाण न मामने की प्रेरणा करने बारी दूसरी विचारपाय पयपि अपेक्षा व पीछे की है, फिर मी समतीकार फेवर मोर सम्प्रदाय की सीमित नया । इस का मसर पागे पा पर पिक पसनम्पास्मानारों पर भी पग मिस से पन्दों मे भागम -पुतिप्रमाण का समाप बोरों तय भनुमान' में ही लिया। इस वर मागम को पतिरिक प्रमाण न मानने के विपप में मोट और सेपिक दोनों पसन मूग में परसर विस्त होते इप भी भविस्त महोदर बन गए। बैन परंपरा की शानमीमांसा में दोनों विचारपाराएँ मौर।मति मौर भूत की मितवा मानने वाले दमा सी रेखा सिर परने पाछे पर बर्मन किये गप भागमिष पमा भागमानुपारी वार्षिक-इन दोनों प्रपनों के मूग मेंरेदी संस्पर है गो बागम को सवम एष विरिक प्रमाम मानने वाली प्राचीनतम बिपार पाच पोपको। सुर को मति से मग न मान पर से सी एक प्रकारमात्र सापित परने पाठा १"बाप्टेप बार निता । पयस निराग्रे प्रोपररर १२ पचप्रमामा बोपल मे ।
पानविनुपरपा-अवनिमितमोर बसनिलिव मत दिपारी तीसरा प्रपा पागम में अतिरिक्त प्रमाण न मानमेवाडी दूसरी विचारपाय पसर से पता नही है। इस पर हम देख सकते है कि अपनी सहोदर मम्म पार्शनिक परंपरागों के बीच में ही बीवनपारण करने वाली वा पाने भन्ने पाली बैन परंपरा मे किस तय होनों विचारपाराबों सपने में काम से समापन पर मिया। (२) सुतनिमित भौर भमुतनिमित मति [1] मति पानी पर्चा के प्रसङ्ग में गुतमिमित गौर बसवनिमिव मेर प्रम मी विचारणीयानिनिय मलिशान गाविसमें शासम्म पाचना के योग से विशेषता भावी है। बहुत-विमिव मति मान तो अवारबम्म पासना के मनोपरे सिपाही सम होता है। वर्षात् मिस विषय में भुवनिमित मवि शान रोवारमा लिपय पारेकमी पम्म मपश्य होता दबाबमुनिमिव मनिशान का निपम पही अनुपमम्म ऐवारे। प्रम पा शानपिम्पु' में पामावरीने मतिमान रूप से लिन हुवनिमित बोर बहुवरिमित रो मेरों का पहुंछ सारीपरण किमा रन का ऐजिसिक मान क्या है इसका शुमसा पर बार पड़ता है चयोनों मेर मे प्राचीन महीं मिमे प्राचीन मनि सानो भयमा मार बम्प मेर १।लों मति माम रेपमा मारि पापा, मनिष पारि समी प्रकार वापर दिगम्बर पास्मय में समान रूप से पति ६ प निमित और बहुवनिमित कर वर्णन पर मात्र पेताम्बरीर प्रमों में है। डाबर साहिल में भी इन मेपों का रस सर्व प्रथम 'नन्दीत" में ही देवा बायो। 'मनुपोमवार में पा 'निर्पति तक मेहुनिमित और बसवानिमिव फेज का न होना पर पति रवाल पर मेर समरवा पनी एपना समय से लिप प्राचीम मही। सम्मा पर सागर नम्वीकार नही हो। १पिपास नमी बची (बर १) पैर छुपेर पित रिकीहोरीत मीयुत मे वापरल्याबर भापत्र प्रमावोसचम्म माधव पदवी मिरची पान मामबलिया और उसमे सब मत मागममी पो कम मात्र प्रेसर और पाने की वो समाप निचरमा बियप्रभा सीमेपामामामी । २, पिन - पप बानिमिणमा मान्य बाजे पी मोस्वपिन पर दिनों पनि मनात (१५.) में बार बालसामिप (Hit Ratभियोग नवनिमित मसिना और सपा परिमबमा पशुपति म बाहानामामारपप्राव होtkमरेरीमा वयोलापको प्रधि गोमा प्रित और परिमित समय में रेस्प मनिसपणे पर। ४ो पीसूत्र या मा.. ।
. मानविन्द्वपरिचय-पतुर्विम माल्यार्पमान का इतिहास २५ पहाँ पर पापक मासाति समय के विपय में विचार करने वालों के लिये प्यान में छेने पोम्प एक वस्तु है। पहया कि वाचकभी ने जब मति मान के भम्प सब प्रकार पर्णित किये पदप उनों में शुनिमित भौर वमुतनिभित का अपने भाष्य तक में रखेल नहीं किया । सप पापकभी, जैसा कि भाचार्य हेमपत करते हैं, यथार्य में मष्ट संपादक हैं। अगर इन के सामने मौजूदा 'नमीसूत्र' होता तो ये मुवनिमिठ और बमुतनिभित का कहीं न कहीं संपर करने से सागर ही पूछते । अमुवनिमित के मौलचिकी नापिकी बावि मिम चार पुगियों का तबान के मनोरंक घटान्तों का वर्णन पासे से पाया जाता है, पन को अपने प्रन्य में कहीं न कहीं संग्रहीत करने के मोम प मास्वाति धायर ही संबरम परवे । एक तरफ से, पाषामी ने कही मी नपर-बनसर भारि नियुधिनिर्विष्ट मुवमेषों का संपर नहीं किया है; भौर पूसरी रफ से, पी मी नन्दीबर्मित भुवनिमित और अमुवनिमित मलिमेर का संग्रह नहीं किया है। बर कि चरवी पिपावश्यफमाप्य में दोनों प्रकार का संपावमा वर्णन देना भावा । पर वस्तुस्थिति सूचित करती है कि शायर बाधक उमास्वाति का समय, नियुक्ति के बस माग की रचमा के समय से दबा मम्मी की रचना के समय से कछ न कुछ पूर्वगी। मस्त बोकुल हो पर पाप्पापजी ने दो शानवियु में व से मति स पापप बगते समय नन्दी में पर्मित वमा विशेपावयफमाप्प में म्पास्पाव मुवनिमित भौर भावनिमिव दोनों मेदों की वास्तिक समीक्षा र दी है। (३) पतुर्षिय वाफ्यार्प ज्ञान का इतिहास [१२०-२६ ] सपाप्यापजी ने एक दी भुतोपयोग कैसे मानना यह मिसाने के लिए चार प्रकार के पाक्पा पान की ममोरंजक मोर मोपमरी की है, पौर से विक्षेप रूपसे जानने के लिए भाचार्य हरिमा व 'उपदेश पद बातावाम भी दिया है। यहाँ प्रम पर है कि ये पार प्रकार के पाया क्या है मौर हन का विधार दिखना पुराना है मौर यह किस प्रकार से मैन पाएमप में प्रचसिव या है सपा विकास प्राप्त करता थापा है। इस मा बाप में प्राचीम मोर माचीमवर पासप रेनने से मिल जाता है। बेन परंपरा में 'मनुगम' मग मसिनो मिसका पर्य है प्याम्यानविपि । मनुगम मा प्रकार भारचिव सूरि ने मनुपोगार सूत्र (सूत्र. १५५) में पवसाप है। निममें से पोभमुगम सूचस्पर्शी और पार भरपी है । अमुगम सपा नियुक्ति मम के साथ स्वसर्शिनियुक्सनगम रुपसे हम नमुयोगार सूत्र से प्राधीन इसलिए इस बात में तो कोई मरेर गवा ही मही कि पार भनुगमपठति पा म्यारूपामगेही न पासप में बनुयोगदारसूत्र से पुरानी मोर नियुक्ति के प्राचीनतम सर पदी माग जो संभवता पुरेशी मापार मानी जाने वाली निर्मुदिप दी माग रोना चाहिए। देणे पा-191 २ो शिरप . पम्तो रोमी समाधि रेणे भरेन प्र १६५ मा १४ । ५२, पिन ।
- मानपिनुपरिचय-पर्षिय पाल्यार्पशान प्रवास मिति में प्रमुगम हम से दो मामानविपि न समावेश हमारे परम्पास्मानविषि मी पस्तुतः पात पुराने समय की एक सामीय प्रश्मिा ही है। हम पर नार्य परंपरा उपसम्म विविष पास्मय वा उन की पाठशैडी को देखते है पर इस अनुगम की प्राचीनता और मी पान में भा बाठी है।भा परपरा एक मामा बरपोनियम को देखते है तब म्स में भी पवित्र माने जानेवासे वपेता पारि मम्मों का प्रथम निपुर बार कैसे करना जिस तर पर भारि प्रविमाग करना इलादिम से म्पास्मारिषि देखते हैं। भारतीय भा परंपरा की निकासा में मो वैविक मत्रों का पाठ सिखाया नावारेमौर ममा बो उसकी मर्मविपि पचगाई गईरेस की पैन परंपरा में प्रसिस मनुगम साम तुम्ना करें तो इस बात में कोई सरेहदी मही पवार पर अगुगमविपि पखवा नहीबो परमोनियन धर्म में तवा बैरिक पर्म में भी प्रचलित पी मोर बाम भी प्रचलित है। म मोर परिष परंपरा पाठ पदा पर्यविधि विषयक तुम्ना- १ वैदिक १ संदिवापाठ (मंत्रपाठ) १ संदिवा (मूमसूत्रपाठ) २ परम्प (मिसमें पर, म बम २ पप२ पारिपाठ प्रभारी विविनापूर्षिों न समायेस) ३परामान ३ पदा, परविमा ५ १ यापार्यवान ५ तात्पानिर्भय ५सपनाम से रेरिक परंपरा में पुरु में मूग मंत्र को घर मा बस्वानिव रूप में सिखापा बाया बनन्दर न के पास विविष पिसेपण इस पार यस वर्षविचारणा-पीमांसा का समय जाता है समक्षा प्रमेक पर बाजार फिर पूरे पास का वो मान बोर बन्त में सापमापकप पूर्ण पारपाय भलिप पपा बावा है- से दी बैन परंपरा में मी कमसे कम मिति के प्राचीन समप में सुत्रपाठ निर्णय का कामही कम प्रचडिच मा मो अनुगम सम से जैन परंपरा में म्पबाव मा । बनुगम के विभाग बो भनुपोगापूध में हैन का परपराप्राप्त वर्णन दिनमा पमाप्रमप में विचार से किया है। सेपास गनिने "पास्पसमाम्य' में न दिमा वर्णन रेनगा मताम्बर से पांच दिमागों का भी निपलमा बोकुम हो इवना वो मिमित है कि मैन परंपरा में स्त्र भोर व सिखाने के समम्प में एक ममिव म्याम्पारविधि चिरकाल से प्रचारित दी। इसी मास्पानविषि को बाचा हरिमा ने अपने पार्शनिक मान के नपे प्रम में 3 मपीन समो में नवीनता के साथ १२, पुणेपारस ८ १५५ १ ५ सोहात्मामा । १ १ पार्य ४ मत्सबमान माननिम्बुपरिषप-चैनपर्म की अस्मिा का स्वरूप विवार से वर्णन किया है। हरिमासूरि की सक्ति में कई विशेषताएँ १ मिन चैन बार मम को सर्व प्रथम पम्ही की देन बनी पाहिए । पनों ने उपदेशपद' में भमानुगम परमपवित पार मेदों को कुछ मीमांसा जाति सनदान का थोपरेर पार नामों पर निरूपण किया है। रोनों की तुसना इस प्रघर रे- १ प्राचीन परंपरा २ हरिमद्रीय १ पदार्प २ परविप्रह २पाण्याप ३ महापास्या ४ पेदम्पयार्य हरिमडीय विशेपता पर नये माम में दी मही है। मन की प्पानदेने पोग्य विशेपता वो चारों प्रकार मर्यपोप का दरवमयाब समझाने के लिए दिए गए लौकिक वसा धामीप पदाहरणों में है। बैन परंपरा में मरिसा, निप्रम्पल, पान भोर प भाति प्र पर्मरूप से समपम सान है, अतएव पब एक वरफ से उन धर्मों के पापरण पर बात्सम्विक भार नपा गावा है, तब दूसरी तरफ से उस में इस अपवारों का पा एटों का रखना मी बनिसराप रूपसे प्राप्त हो जाता है। इस परसर्ग मोर अपबाद बिपि की मवार को सेर भाषा हरिमा ने छपार प्रकार के मर्पदोपों का वर्णन किया है। जैनधर्म की हिंसा का स्वरूप अहिंसा के बारे में न पर्म का सामाम्प नियम पहल किसी भी प्रामी प किसी भी प्रकार से पाव न किया गाय । पर पदार्प इमा। इस पर प्रम होता है कि मगर सर्पमा प्रामिपात पम्पहै वो पर्मस्मान प्र निर्माण मा शिरोमणन वारि कार्य भी नहीं किए जा सकते पो जितम्य समझ जाते हैं। पर भकारिपार पाक्पारे। अपाय पर्वम्य मगर पामविपिपूर्वक किया बाप हो उस में होने पाय प्रापिपात रोपापा महीं, मविपिच दी दोपापा । पर विपार 'महापापा बन्त में जो जिनामापही एक मात्र पारेप है ऐसा तात्पय नियमना 'परम्पर्याय है। इस प्रकार सर्व प्रापिरिसा सर्पमा नपेपरूप सामाम्प नियम में दो बिपिविदित अपवारों को स्थान विगने पासा भोर उत्सग-अपबाररूप पर्ममार्ग सिर परने पाना रिचार-प्रसाद पर रियापा गया उस पो भाचार्य हरिमर मे सोवित पायों से समझाने का प्रयम किया है। भरिसा का प्रम मों ने प्रथम प्ठाया है जो कि जैन परंपरा जरी। म दो परिसा परप मार्य परंपरा सामाम्प पर्म रहा है। फिर मी पर्म, मेरा, मोसम पारि पनेक निमित्तों से गो विविप दिसाएँ प्रतित रही इन बामम्तिा शिरोप मैन परंपरा ने किया । इस पिरोपकारमही सम मामने प्रशिरातियों की तरफ से उप प्रमोने मग कि बगर जैन मईया हिंसा का पिप करते है तो पुर १२चो जेर ०५:-4041 २८ शामनिम्नुपरिचय-नपर्म मैं हिंसा पसरूप भी न जीवित र सम्भौर न पर्माचरणही पर साते हैं। इन प्रमोन प्रमाण ने पी पिसे दी रिमा ने बेन संमत पहिसाखरूप समझाने के लिए चार मभर पाल्पा पोप समाहरण सप से सर्व प्रथम पहिंसा प्रभ को ही हाथ में लिया है। दूसरा प्रम निर्मन्मस्व का। जैन परंपरा में प्रम्ब-सपालि परिप्रा रखने म रमने के बारे में परमेरो गया था। इरिमा के सामने यह प्रम लास र दिगम्बरलपत्र पातियों की तरफ से ही पस्सिव हुमा जान परवा हरिमा ने जो पात प प्रम पठापामारीब परीष बापुनिक तेरापपी संप्रदाय की विचारसरणी का प्रतिविम्म है। पपपि एस समय तेरापंच पा सा दी दूसरा कोई पर पंच न या फिर मी बेन परंपरा की निधिप्रमान भावमा में से इस समन मी पान ने विम्य निसी किसी को विचार या बाना सामाविक या निसन बमाष हरिमा मे लिया है।बैनसमव उप प्रविरोष पौर परंपरा पहले से ही करती भाईसीका पाप इरिभद्र ने विमा है। इस पर बैन धर्म के प्राममूट सिद्धान्तों का रूप रहों मे उपदेशपर में चार प्रपर रामार्पोप पनिरूपण परने के प्रसंग में स्पर लियारेयोपामिक विद्वानों की अपनी रिसा-अदिसा विषयक मीमांसा का चैन रष्टि के अनुसार संशोषित मार्ग। मिम मिल समय भनेक पिओं परा समवरपा म सिशन्त तो भार्पवर्ग में पात पहरेदी सापित ऐन वा निसका प्रतिपोषो-'मा रिमात् सर्वा मूवानि'- या मुविकप बास्म । वन मारि धर्मों में प्राणिय समर्षम करनेवाले मीमांसक मी स बदिसामविपाप प्रतिमोप को पूर्णवया प्रमाम रूप से मानवे भाप । बवपन इन सामने मी भरिसा रे क्षेत्र में पर प्रम दो अपने मापदी पमित हो जाता था। हमा सम्म भार मैरिक परंपराभों परा मी पैसा प्रभ पलिटो गावापा कि हिंसा को सपिर बवपर बनिप्रसननी म मीमांसा भी मानो वष पर भारि मसंगों में की गान गाडी सा मी हिंसा होने परण पनिायनाक्यों नही। भौर पर दिसा रे नावे पदीय हिंसा मी बनिर बना सिर होती है व इसे पर्म - शत्र निमित्त माम कर पा भारि कर्मों में कैसे सम्म माना जा सकता है। इस प्रम का पाप पिना मप ममहार बरा शाम में भम पर ही नहीं सकता था। भवपण पुपने समय से पाशिम विद्या बहिंसा को पूर्णरूपेण धर्म मानवे ए मी, परम सोमव भोर रिरममालित पशबारिमों में होने माजी रिसा का पर्म-कर्सम्म रूप से समर्पन अनिवार्य अपमार नाम पर करते बाये पे। मीमांस की हिंसा-दिसा के ससर्ग-सपारमाणमासी परे प्रकार या सम इतिहास में भाग मी उमारिए सपा प्रमामा प्रन्यों में विसार मोर मनोरंयक रूप से देखने में ममता है। इस पुरिपूर्ण पारा मीमांसकों में सांस पेन, पोर मारे सामने पर सापिन रन का प्रपत्र मिला है कि सामरिदित नर्म मेमे पाने वाली रिसा भमरण प्रतम्य होने से बनिए-मपर्म लिमिच मही दो सम्वी । भीमासमा प्रतिम दास १णे मानव च।।
मानविन्दुपरिषय-चैनपर्म की अहिंसा सरूप २९ पही किसाम-रही मुस्प प्रमाण है भौर पक्ष भावि कर्म पेरविदित है। भवएप मो पर भादि फर्म को करना चाहे या जो पेटको मानवारे उसके बारे मेदामा का पाउम ही परम पर्म है, चाहे पस के पाठन में सोए करना परे । मीमांसकों का यह मात्पमनिर्णय पार भी देविक परंपरा में एक ठोस सिनन्द है। सांस्य भाषि से पाढीम हिंसा के विरोधी भी मेर का प्रामाण्य सर्पया न स्याग देने के कारण क्षेत्र में मीमांसकों के पळ वात्पर्याप निर्णय का बापतिक निरोप पर न सके। ऐसा निरोप पालिरकी करते ऐनिम्हों ने के प्रामाण्य का सर्वथा कार पर दिया। ऐसे पिरोपिभो में बैन परंपरा मुरूम है। मेन परंपरा मे और प्रामाण्य के साथ वेद विहिव हिंसा की पर्पता का मी सरंदोमायेन लिपेप किया । पर वैन परंपरा का मी अपना एक पदेश्य है जिस की सिद्धि के बाद उसके भनुपायी गृहस बोर सापु का जीवन मापश्यकी। इसी जीवनपारण में से सैन परंपरा के सामने भी ऐसे अनेक प्रम समय समय पर बाते ये मिन का महिंसा के मायन्तिक सिम्तो पाप सम मप करना उसे प्राप्त हो जाता था। जैन परंपरा बेदरे सान में अपने भागों ही एक मात्र प्रमाण मानती माई मौर अपने देश की सिद्धि के पासे समापित क्या प्रचारित विविध प्रकार के गृहम और साधु जीवनोपयोगी पर्वम्यों का पाम्न मी करती बाई। भवएर भम्त में पस के पाये मी उन स्वीच्य तम्पों में बनियाप रूप से हो पाने मारी हिंसा का समर्पन मी एक मात्र बागम की मामा के पासन रूप से दी करना प्राप्त है । मैन मामार्प इसी दृष्टि से अपने भापवारिक हिंसा माग समर्थन करते है। भाषाव हरिभद्र ने पार प्रकार के बाल्यार्य पोप को पर्यावे समय भस्सिा- रिसा सग-अपवारमार का जो सूक्ष्म विपेचन किया है पर अपने प्राचार्यों की परपरामाप्त संपचिोदी परस में उनके समप परकी विमसित मीमांसाठी का मी म य पसर है। इस दर एक वरफ से पार पापापोप पाने नों ने उपदेशपद में मीमांसा की विसिव पीप, महरि मनुसार संपर किया, पर दूसरी तरफ से मोम बोट परिमापाको 'पोग्य" में अपनाने का सर्व प्रपम मस्त किया। पीति के प्रमाणपातिक पहले से मी व परंपरा में रिसर विकास की सम प्राप्त तीन भूमिग्रमों को रसानेपाछे पुवमप, पितामय भोर मावनामय ऐसे वीन सप पोर बास्मय में प्रसिद्ध थे। हम यहाँ तक मान पापेर समते है लिभाचार्य हरिमाने दी पन तीन बौसमसिख समों को परम श्री म्याम्पा में पाम्पार्पयोपप्रपा पो समाने का प्रपम प्रयन डिपा । रों ने पोर में परि मापा दो पौरों में भी पर न प्यास्पा अपनी रधि भनुसार पोर मुखमय पाम्पार्प मानरूप से षिवामय को महावाम्मा काररूप से चोर मारमामय को पेरम्पर्ष शानरूप से पराया। मामी विधानम ने मी पोर परिमारा'तपाय भावविपरिचय-माईसा ममम और विप्रस सोनाति मेडम लिया, बाहिरिभद्र मे न परिमापामों में अपने रंग से चैन पाइपब में अपना पिया। पाप्पापली ने सामबिन्दु में हरिमर्षित चार प्रकार भ पायानोप, लिस पुपमा इशिस, निखिो अनुगम में सबा पुरानी मैतिक परंपरा मावि में मी मिता हैस पर मपनी पैनी यायिक रष्टि से मात दी मार्मिक प्रयास गया है, मोर मानित लिया है सब पाल्पा पोप एक वोपयोग हम बो मति उपयोग से पुरा है।पाप्पाजी ने शानविन्तु में दो पामा विचार समप में परसाबाबहीनो ने अपनी 'उपरेश रास' नामक दूसरी वि में विचार से किन्तु 'उपदेशपर रे साररूप से निमिव निवाबो मागे संसत टिप्पण में पत किया गया है। सो रिपप, १०.४ पं० १.से। (१) अहिंसा का स्वरूप नौर विकास [१] पाचापबी ने परिष पास्या का विचार मते समम भानपिम् में बैन परंपरा के एक मात्र पोर परम सिनाव परिमाको सासरचारमाष यो जैन बागों में परापूर्व से पी पाने वाले पर्चा की और लिस के पपावन मो ने अपने पाय-मीमांसा बानि पर्सनान्तर गमीर बम्पास म उपयोग किया है ग्स को पचासमप विशेष समझामे लिप, बागे टिप्पप में [...पं. ११] बोलित बपपरपसंमद किया है सरे भामर पर, या परिसा संबंधी पेविसिक मा पारिता मरो पर प्रभा वाहा बाणारे। परिसा मसिनाव वार्य परंपरा में गुती पाचीन ९ । पौर स का बार मी बाचाबानों में पता है। फिर भी प्रमाणीपन के विचार साप साप पवा विमिन बार्मिक परंपरामोरे विमरेसाब साबस सिसान्दविचार वया म्पपहार में मी मने मुसी विमस मावा जावारिसा विषयक विचार केला दो पोत प्राचीन काल से ही भार्य परंपरा में पाने भो ऐसा भान पता है। पालो वो मुम्पवया ममग जीवन मापसे पहने भगा, बसिप मोव माधण परंपरा- पापि बाबम-के पीपमविपार मारे प्रवाहित मा। दिसा रेवास्तिक विचार में उस दोनों मोवों में कोई मतमेव बापही पाता । पर सम्मापारिक पार पाणीपनगव उपयोग के बारे में सोपोरों में ही नहीं बस्ति प्रसेकसमण भई मापन पोरकी छोटी सी बचान्वर साखामों में भी बामा प्रघर मवमेरमा मापसी निरोप देतेपाते। पारिवाहप से पहिंसा सब को एकत्ती माम्य रोमे पर मी मरे मागरिक उपयोग में पवा वरनुसाचे पालामों में चो मतमेर और निरोप या बाण सम प्रबाम परप पीपमाप्ति समे।मण परंपरा की पीपन ममानवपा पणिक और जापास्मिर पी माप परंपरा पीपवरष्टि पपानदया सामाषिक बामेसमापी पारी में समर मी १२वो पामेरिका ।
जाननिम्नुपरिचय-पहिंसा का खरूप मोर सिप्रस करेबर तक यह भाप्यास्मिकवाका विरोपी न हो। जहाँस का मापास्मिकता से विरोम रिसलाई निया पहाँ पहनी रठि मोसंग्रह की मोर पासीन रोगी या उस प्रचिरोप करेगी । बम कि दूसरी रष्टि में मोसमा इसने विज्ञाप पैमाने पर किया गया है कि जिस से उस में माम्मास्मिाता धौर मौलिकता परस्पर टकराने मही पाती। ममण परंपरा की परिसा संबंधी विचारपारा का एक प्रभार भपने विशिष्ट रूप से पहना मा जो प्रणाम से पागे मार पीप वपसी भगवाम् महावीर के पीपम में पाच रूप में म्पमा । म उस प्रष्टीकरप को 'आपाराग, 'पत्रकता मारि प्राचीन पेन भागों में स्पष्ट देखते हैं। महिंसा धर्म की प्रतिष्ठा वो मात्मौपम्प की रहि में से ही हुई भी । पर छ भागों में उस का निरूपम भोर विरूपण इस प्रकार मारे- १हास बोर भय का कारण होने से हिंसामात्र पम्मे यह नहिंसा सिवान्द कीपपति । २. हिंसा का वर्ष पपपि मापनास करमा पा सरेना वपापि हिंसासम्म दोप प्रभामार दो मात्र प्रमाए मर्यात् गगोपारि दी है। मगर प्रमार पा भासछि महो वोकेर प्राणनाथ हिंसा कोटि में भा नहीं समवा, पह महिंसा का रिसेपप । ३ पप्पजीवों का कर, पनकी संम्पा वपान की इनिय वादि संपतिवारतम्प पर हिंसा के पोप का वारवम्प पवित्र महीं किन्तु दिसक परिणाम या धि की तीव्रता-मरवा, समानवा-बघामवा पा पठप्रयोग की म्यूनापिकवा के ऊपर पपपिवरे, ऐसा कोटिकम । पर्युकि तीनों पाते मगवान महावीर के विचार या बासर में से फलित ऐ कर भागों में परिवाई है। कोई एक पछि पाम्पधिसमूह सा ही बाप्यास्मिफ मों नो पर बब पर संपमम्मी पीवमपारण मी प्रम सोचोदन स में से उप बुर निक्षेपण मा कोटिम्म वपने भाप ही परित हो पाता है । इस एशि से रेखा पाप दो पना परवारे कि पागे के न पाममप में परिसा के सय में वो मिसेप पापोराबारेस का मग बापार वो प्राचीन भागमों में प्रथम से दी या। समूचे जैम बामप में पाप गाने पाठे भहिंसा के मापोर पर गम इम रिपाव करतेर हमे सर मलाई देण है कि मेन बामपसमास्सिासम्धी मापोर मुस्पदपा पार पहों पर पपईरित है। परण तो यह पर प्रपानवपा माषु पीपन पही बवरण मरकोटिक-पूर्व भास्सिा काही विचार करता है। दूसरा पर मि पर प्रामण परंपरा में रिहिस मानी गाने पाली भोर प्रतिधित समझी गाने पाली पदीय बावि बमेविष दिसामों का विरोप परवातीसरा पर टिपर बम्प ममम परपरामों के सागी पीपन 4 बपेया मी पेन ब्रमण का मारी पीपन पिप निपचित रखने का भामर रमवा है। पोमा पर कि परम परंपदी भाम्पर फिर में सम होने पामे पारसारक निरोष प्रमिएरमका मी प्रपामपारे।
૨૨ माननिम्नुपरिषर-बाईसा का मरूप और निमस नपरेटिक- पूर्ण बाईसा के पाछन भामह मी रसना भौर संयम पा सहरिप्रस पाटि से जीवमनिनाद का समर्थम मी करना- इस विरोष में से हिंसा के उम्म, मार बात मेरों चापोर फशिव आ मौर मंव में एक मात्र मिसन सिखाम्त यही सापित मा लिभातिर प्रे प्रमारही हिंसा है। पप्रमच पीपमम्पपहार रेसमे में हिंसात्मक वर मी यह पस्तुता भरिसकदी। पदिक इस वासिरी मतीने का संगम यहाँ वक वापर दिगम्बर पारि किसी मी जैन फिरोम इस में बोदा मी मतमेर नहीं है। सर फिरफोकी रिचारसरणी परिभाषा मोर एपीठे एक्सी है। पर हम भागे . टिप्पण गत वामरीन और दिगम्बरीय विस्तृव मपवरमों से मठी मांति पान सकते हैं। रिक परंपरा में पम, प्रविधि मार बार भनेक निमित्तों से होने वाली दो हिंसा पार्मिक मान कर ठिपित करार पी भावी पी ठप्त का विरोप सांप, पोर पोर जैन परंपरा ने एक सा दिया। फिर मी भागे मा पर इस विरोप में मुम्प माग पौर भौर जैन नदी या। नवाम्मवगव परिसा रे सापोर में उक्त निरोप में गहरी साप और प्रतिक्रिया भी है। पर पर पर जैन साहिस में रिक रिसा मममम या जाता है। साप दीप विक मोग बेनों के प्रति पर भासंका पर है बगर पर्मिक हिंसा मी नम्प दो तुम बैन पोग अपनी समार पपा में मदिरनिर्माप रेपपूग भारि मार्मिक कमों का समावेस मासिक रूप से कैसे कर सकोगे इमानि । इम प्र प्रहुगमा भी चैन पारमप रे माहिंसा संबंधी प्रापोर में सबितर पापा बाता है। प्रमार-मानसिक दोपदी मुल्यतया रिसामोर स रोप में से पलित ही मान मात हिंसा है। पर विचार चैन और पोर परंपरा में एम्सा माम्प है। फिर भी हम देते हैं कि पुयमस से न मोर पोर परंपरा के बीच भारसा संबध में पारस्परिक गणन-मणन पवमा है। 'यस्तार से प्राचीम मागम में मी पारिसा संपी बौर मन्दम्प का गगन रे । इसी पर 'मझिमनिकाय' जैसे पिटक प्रमों में भी जैन संमत मदिसा 1 सपरिएस यान पापा बापासपी निर्मुवि बाल जैन मम्मों में वपा 'मिधर्मप' मावि पोर प्रग्यों में भी वही पुराना प्रणाम-मणन मए रूप में देपा जावा है । बाम मोर दोनों परंपराएं कि रिसा एकसी विरोपिनी * और जब दोनों की महिसासपी म्पारपा में कोई वासिफ मवभेर माही वम पहले से ही पोमों में पारस्परिक गगन-मणान क्यों गुरू मा भौर पर पग पद पर प्रम है। इस परमार अब हम ऐनों परंपरानो सादिस दो प्पाम से पड़ते हैं प मिस जाता है।यणम मगन भनेक कारणों में से प्रधान परम वो पही किन परंपरा ने मरपोटिक भरिमा मूल्म म्याम्मा को भमठ में गाने लिए जो बाप प्रधिको विशेष भरचित रिया पर पोर परंपरा में महीं किया। जीवनसंबपी पाप मासिनों के भी विषम और मध्यममार्गाय दोपिम्प पर भेड़ में से हो बार पोरन परंपरा ६ भापम में गगन पणन में प्राचई। इस गटन-मबम प्रमी चैन पावरे ।
पानपिम्नुपरिषप-महिंसा का सहप भौर विकास भारसा संबम्पी दापोर में खासा हिस्सा है मिस का ७ नमूना धागे के सिप्पों में दिए हुए मैन मोर पोर मववरणों से साना सा सकता है। बाम दोमों परपगमों के सपन-मणन को तटस्स मावसे देखते हैं तब नि:संकोच मना परवा किमा दोनों ने एक दूसरे को गसतरूप से ही समझा है। इस का एक माहरण 'मझिमनिकाय' का पाठिमुच और दूसरा नमूना सूत्रम्वार (११२ २५-३२,२६ २६-२८) से जैसे न सापुर्सप का विचार होता गया और सुरे हरे रेस तमा पस में मई मा परिस्थिति के कारण नप मए प्रम उत्सम होते गए से से वेन दस्सपिम्पकों ने महिंसा की म्याम्पा और बिसेपण में से एक सए नया विचार प्रकट किया । पर पर कि भगर पप्रमच माव से कोई दीवषिरापमा-हिंसा से नाप पा करनी पर वो बह मात्र मरिसाकोटि की भव पर लोप ही मही है कि पर गुप (निर्बरा) व मी है। इस विचार रेमनुसार, साधु पूर्ण भास्सिा का लीमर कर छेमे के पार भी, बगर संपत जीपम की पुष्टि के निमिच, विविध प्रकार की रिसारप समझी पाने पाठी प्राधियों परवा पा संयमविकास में एक कदम भागे परवा है। यही बेन परिमापा के मनुसार निमय पहिसारे। बो मागी विम्य बप बात रखने के पिरोपी पे मर्यादित रूप में पम भावि उपकरण (सापन) रखने वाले सामुमों को जर रिसा के माम पर पोसने गगे वर पाति समर्पक मागियों मे सी निमम सिद्धान्त का मामप हे पर समाप दिया, कि बसंयम पारण मौर निबाह रे पाखे ही, सरीर की तरह मों रिव स्पकरण बाहिर रखना भरिसा का पापक महीं । जैम साघुसप की इस प्रकारची पारस्परिक वाचारमेरम्गक पर्चा परा मी अहिंसा के मापोह में पाव छ विकास देखा जाता है बो ओपनियुकि पाति में सर है। कमी कमी परिसा की पा एप्प वर्षकी-सी बान परती है। एक म्यति प्रम करता है, कि अगर पमरम्ममा दीको पर बिना पारे भसण दी क्यों न रखा बाप क्यों कि सरे परने में बोसूक्ष्म मणु गंगे रे पीवपावक बल होगे। इस प्रम का समाप मी सी जग से लिया गया है जानेवाण करता है, कि मगर पम पान से फेसने पाहे सूस्म मणुमो के परा पीपपात रोवावो तुम सो हम पम घाने से रोने के लिए कुछ करते हो उस में मी तो पीपपात रोवान-इन्सानि । बर।बो कुछ हो परम मिनमद्रगगिकी पर पामी में नपरपपसमत मरिसा का पूर्ण सरूप पाते हैं। श्वे स्थान सजीव हो पा निप उस में कोई पीच पावक सेवा हो पा पोई भपावरु दी ऐसा गाना पे पर इसने मावसे संसा या परिसा का निर्मप महीं से सम्मा । रिमा सचमुच प्रमार-भयवना-मसपम में ही है फिर पारे किसी पीरा पात न मी रोवारो। इसी सय मगर मप्रमार पा पवना-संपम मुरक्षित है वो पीपपात दिलाई हैन पर मी पस्तुवा मारिसा दी। उपयुक्त विदेवन से मस्सिा संबधी मैन मापोह की नीचे डिसी अमिर भूमिम पतित होती हैं। 5 १४ बामनिम्नुपरिषप-बाईसा का सहप बोर निमस (१) प्राप प नाम सिारूप होने से रस ग्रे रोना ही भारता,। (१) पीवम पारण समना में से फलित एमालीपन-बास र संगमी पीपम केशर मनिषा समझी बामे पाडी प्रहरियों करते एने पर अगर पीपाव मी बाय वो भी परि प्रमार मही देवो पापीपपात सिाहप म हो कर भाईसाही। (३)बगर पूर्वहपेण बहिसा एना हो पो बखता और सर्वप्रथम विचगव हेप (ममार) प्रदीमाग परना चाहिए । पारामा पो पहिंसा सिखाई। बारसा.कम बाम प्रवृधिपो २ सापकोई विपत संप पही। स का निपट संग मानसिक माचियों के साथ। (१) पक्विक पा सामूहिक बीपन में ऐसे मी अपवार मान भावे हिंसा मात्र परिसा दी मही पती प्रत्युव पर गुमवर्षक भी बन पाती है। पेसे पापचारिक मामों में अगर पड़ी मामे पाली हिंसा सेर पर से बाचरम मेन गया बाप पो स्टा पोप भगवा। सर हिंसा-मरिसा संबंधी नो विचार संक्षेप में पवनवासी पूर्व पूर्ण साचीय साममी पाम्पारजी को प्राप्त पी पद पर उन्होंने पापा विचार' प्रसंग में प्रेमसमप-बास पर साधु पीपनसंमत-भारसा को लेकर सर्ग-अपवादमाव की पापापापजी मे नशाम में पाए बामे बारे वपपारों का विपर सा सकिये जपपार रेसने में से ही क्यों न बस्सिानिरोगी, फिर भी न म मूल्य प्रोत्सर्गिक परिसा के बराबर हो ।अपपार बमेष पणए गए और - मनुसार नप भपवानों की मी पति समती फिर भी सब अपवारों में भारमा मुलतवा दो वत्तों में समा जाती है। नमें एक वो है गीताल बानि परिपतमायाम का और दूसरा पोमित्व वात् विचमाम्म पा भिवपाल का। पाप्माषजी शराबवलाई गई चैन पस्सिास्सिर्ग-पगारपाई, ठीक भपण मीमांसा और स्पतिमासा संबंधी पत्सर्ग-अपचारी विचारसरति से मिती बम्बर दोपही लियॉन विचारसरवि पापु पा पूर्व मागी पीय को स्म में रखर प्रतिष्ठित परी मीमांसा और माया विचारसरनि परम, मागी सभी जीवन प्रेममान में रम पर प्रवित हपोममें से पाम्प इस प्रकार है- २ वैदिक १ सम्मे पामा म विमा १ मा रिमात् परमूनानि २साधुजीपनी मरम्पदाम २चारोंजाबमसमी परमपित निमोजीवनी दमा वसपी कम्पों जमावा मप्रम मापपिदिय महतियों में रिसाोष ३सामविवि मधियोंमें रिसाोष का बाबमार बोन मिपिशाचरण बमान सात मिपिरापारी रिसा १ बैन मम भानपिनुपरिषप-परामपवितल मोर पूर्वगव गापा पाहा पाप्पान रेलिमेन तपासासम से बैन शाम को- खास पर साधु-जीवन के विभि-दिपेप प्रविपाक भासको ही हवा पर कि वैविक दत्तचिम्पक, शाम सम से उम समी भासों को सेता है जिनमें बठिक, कौटुबिक, 'सामानिक, पार्मिक भोर समीप भावि समी कम्पों का विधान है। ५ मम्वयो वा बरिसा का मर्म मिनामा ४ बम्ततो गत्लाभरिसा का तात्पर्य र -चेन शाम के पथावत् बमु तमा स्पतियों की मात्रा के सरणी। पाछन में दी। पाप्पायनी ने उपर्युज पार भूमिकापाली महिंसा का पतुर्षिप माल्या के परा निरूपन कर सपसंहार में बोम विसावा पानुवापी मीमांसा और मेपानिकी हिंसाविषयक विचार-सरमि के साथ एक पर की जैन विचारसरमि कीममा मात्र।बरा पोरना चाहिए कि विचारसरमि रान विचारसरगि का मिसेपम ही जनों ने किया है। प्रेसे मीमांसकों ने विहिव रिसा कोपरकर की हिंसा में भनिएबनात माना है से ही पाप्पावजी मे मम्त में सरूप हिंसा को छोरर दी मात्र ख-परिणाम हिंसा में ही बनिबनारस मवणपारे। (५) पदस्पामपतितस्व मोर पूर्वगत गापा [[२] चर्चा के प्रसंग में महिमा के उस्सर्ग-पपपार की विचारमा परमे के भारपामापनी ने 8व से सेप रखमेवाले भनेक पापम्य मुरों पर विचार प्रकट एए पट्मान' के मुरे की मी सामीय पर्चा की मिस का समर्थन हमारे बीवनात बहुमसे ही होय पता है। परी मम्मापक से पर ही मन्य पानेवाठे बनेकम्पत्तियों में, सम एप न का मान समान होने पर भी समापों यमों परिमान का नो पारवम्प रेखा बावापाम बपिरियों की माम्परिक किरदारवम्प कादी परिणाम होता है। सिमहमद को पच पूर्णप में डागू कर 'इत्पमाप्प मापार पर पाप्मा- "पनी मे पदमपार किपरंतपूर्णरूप सच को समान रूपसे परेर अनेक म्पपियों ममी हुबंगठ मारों सोचने की सचिम भनेकविमा वारपम्प होता है बोन की दापोह पिसारवम्प नदी परिणाम है। इस तारतम्य को सावन में गह विभाग में बांगो परमान प्रभवे । मानों को बो सब पेमपिकवान सकता पर वपर तापमवा है।सीमपेपा से हीन, दीनवर, दीनतम रुप सेन सालों का वर्णन है। मास साता की बपेमा-१ बम्तमागदीन, २ सम्मान मादान १ संपावभागदीन, . संवादगुणहीम, ५ बसंस्पायगुणहीम और मनम् गुणहीन-ये कमया तरती पाएँ ।इसी उप सप घे म्पून भागों को बानमेवारी अपेपा-१ बमन्दमागमाधिक २ बसम्पावमापमधिक १ मा १५ मानविन्नुपरिचय-पद्मानपतितत्व भौर पूर्वगव गावा संम्पावमागवाषिक, ५ संस्मारगुणमषिष, ५ मसम्पाण्गुणमपिक भौर ६ बनन्गुन मपिक-पेममा पदवी पर कमाएँ ।। इतकी समानता होने पर भी इस रे मानों के परिवानगव पारम्पकापरपबो बापोरसामग्र से पापापी मे सामने और मविसामर्म उमपरूपमा t-फिर भी न का विशेष एव से अवसामर्म मानने की पौर पर। मागे वीर्णोपपोग विषयक समर्पन में पायावती ने पल पूर्षगव गामा प [१ ९ ६०] मे किया दो 'विशेषावश्यकमाम्य' [गा ११.] में पाई जाती है। पूर्वगव समप भी पूर्व-प्राक्तन । उस गाबा को पूर्वगामा रूपसे मामठे भाने की परंपरा विनमगनि समाभमण जिवनी वो पुरानी भयाप बाम पड़ती पोलिकोद्गापार्यने भी अपनी चि में इसका पूर्वगव गापा रूपसे दी माल्यास किया है। पर पहा पर या पाव मस्र पस्य बीचती है कि पूर्वगत मानी जाने वाली पर गावा विगम्बरीय प्रन्थों में भी नहीं पाई बाती और पांच सालों का पब करने पाठी 'बाबपकनिधि में मी पर गाथा नही । इम पाकर बाए कि बासर-मनपर रूपसे वो मेरे पाप पुराने है और विगबग-घेवाबरीप पोनों परेपरामों में पाए जाते हैं । पर बमपर ती दोनों पर परागत म्पाम्मा एक मही। दिगम्बर परंपरा में बमपरमव सम का मर्प सप से पाहे बार में ही स्पर लिया है। मों मे पहप को मनमरत पक्षणवा है। बदेवानरीय परंपरा में नियुक्ति के समय से ही समपात का दूसरा पर्व प्रसिन । मिलि में मनमरमत रूपसे सिसिव, निासिव माति ही मुत किया गया है। इसी तरा परपरे भर्य में मी रोनों परपरामों मवमे ।। पकमा परार्थ पपनारमक भुप में ही पपक्षत प्रवे। बोकि सम्मान रूप है। वष स पूर्वगप गामा मामाम में मिनमा गनि पमाममप निमिष अक्षर मन मोर भएरमर को प्रसन्माष रूपसे पो प्रमर म पगते । इम्प गौर भाष रूपसे सुनके दो प्रभर मानने की प्रेम परंपरा पो पुरानी है भोर मेवाम्बर-विगावर कामों में एक-सी पर मरहमापान में दोनों परपरामोका अम्बर गया है। एक परंपरा के भनुसार प्रम्मत ही नमरजवी बरसी परंपरा ननुसार इम्प मौर मार दोनों प्रभर का नपरहवाम्मर समन बारमप में पुरानी पर उसके पचनासर-संमातर माम से पाए बामपाले यो मार देगाबर भागों में बही है। इम्पहर मौर मालमत रूप बामशान संपनी को निचार और परंपरा में पापा बाता है और मिस प्रविष स से साधरण पाप्पावनी में पूर्वगव गामा म ज्याम्माल करते हुए लिया है, पर सारा विचार, बागम (इति) मामाम्पमापी मेवानि प्रति समी दिनों में परंपरा में एल्सा है और पति विखव पाना बापा। इस सामिक एना मीचे निमुखार है- जानविन्दुपरिचय-मविज्ञान के विझेप निरूपण में नया मापोह १ चैन २ बेनेतर-न्यायादि मुख भागम-सम्पप्रमाण माप साम्पोप ध्पबनासर संशासर पम्प्यझर लिपि वधि म्मकि-बोष (प्पपोग) पदार्थोपमिति संकेवधाम, मामा, योग्यता, भासचि, पापकान मावि सामगोप के कारण हो नैयायिभवि परंपरा में प्रसिस, सन सब को उपाध्यायची मे सामगोष-परिकर रूम से सामगोप में ही समाया है। इस जगह एक ऐतिहासिक सम की भोर पाठकों का प्यानींचना सही है। यह पह कि बप कभी किसी बैन मापार्यने, कहीं भी नया प्रमेय देखा वो उस का चैन परंपरा की परिमापा में क्या लान । परबतकापर, एक वरान इनकी पुतान्तर से तुममा की है। पाहरणार्य-मरीय 'बाक्यपदीय' में सरी, मध्यमा, पश्पम्ती और सूस्मा रूपसे बो चार प्रभर की मापामों भावही विस्तृत और समस्पर्धा वर्मन है, इस कान परंपरा की परिमापा में किस प्रकार समारोश हो सकता है, यह स्वामी विपानम्पने पाप ही स्पष्टवा मोर पपार्यवा से सब से पारे पक्षणपा', मिस से प्रेम दिशामुमों को मैनेवर विचार का मौर मेवर निशामुमों को चैन विचार का सरम्ना से बोष ऐ सके। विपानम का पही समयप पारिपरि ने अपने रंगसे पर्णित किया है। पामापसी ने मी, म्माय मावि पनों के प्राचीन भौर नबीम म्पाबादि प्रमों में, बो याममोप और बागम प्रमाण संबंधी विचार के मोर पोन का उपयोग मों मे मानबिन्दु में बेन त की न विचारों सामना करने में लिया,बोनम्यासी को वास मनन करने योग्य है। (५) मत्तिशाम के पिशोप मिरूपण में मपा महापोह [४] प्रसंगमाप्त पुन की इस बातों पर विचार करने के पार फिर पम्पकारने मत मटियान विशेषों- मेलों का निरूपण पर किया है। नेम पाममप में मति भान पवार रामबाप भौर पारणा-थे चार मेर पपा पन का परस्सर पर्व भरणमात्र प्रसिद्ध है। बागम भौर वर्षपुग में इन मेषों पर पगत छ रिचार किया गपा है। पर पाप्मापनी ने नामपिम्पु में बोल मेरों की वा गम के परस्पर प फारममाव की विरचना की है पर मपानवया विशेषापायकमाप्पानुगामिनी ।। इस विरेचना में पाप्पापी ने पूरी न साहित्य का सार वो रस र हिगा। । १२यो पापब 11४। २चे ततायो देतो सरप्रम ५ो विपतम्भ प १७१-१५७ । ८ शारदिन्नुपरिपप-मतिमन रेरिपनिहरम में म मापोहे माप पा ने मपा मारोह भी अपनी बोर से सिगास पेमी चीन पाम बानो परेशर दिन पर पाप्यायमीने मग मापोर किया- (१)मरामान की प्रक्रिया में पारानियम पेष्मस । (२) मामापनिप्रपरेप का प्रम। (३) बनेसम्म घी से प्रामाम्पमस्व-परतरपी प्यासा । (१) प्रसस्त पान प्रेलिया में परमेर मसे ही हो पर रिसरमेर सी मी पाप-परिवार समीकि रागनिर हया पौरानिक भी पही मानते माँग्रिपसम्म भौर मनोगग्य प्रसाशाम सेवा परीसर पाते RT भार ग्रिप 1 ममि होता है। रिसिपमान, मनम्बर सरिसाल सा होगा जो गरारा स्पति मी पेपरवा भी मी सरिता मार पायरसे पुनः पुना मारता है। प्रस्पच मान प्रक्रिया पर सामाप कम है। इमी प्रडिया को न पराओं में अपनी पहनाममा, मनोरमा, Ro, बार मोर पारणाम परिमारा में गुल पुल्ने समप पापा । पामारी मे इस मानशि में परंपरागत जैनमडिया में सास रोगियों पर पास गहा। पालापरल-माप का परिकार मोर मारेममाम्वीप परिमारा के हाथ पेज परमाग उपना । बोषमारे प्रति पनारमा, मोर तिमी बार पर मोर मी म भागे पारणा पारालवा कापन गरेन पारम्प में पुपमा दीपरम्प मापनीर पराम मेगप्पासी सेस पान-मार तारपितु मे मपरिमारपनन रापा, कोमायसी र पम्प में माना । पारभासी में मरा मान परिवारों रिमाण र [.१.० १.]ो समिाहा। गरा पागप [I]ो गमि RAपिस मानतीम0 डोर [...] ओ परिपतमान मिपाल मौर पौषा परिसर [[-]ो पागा तप मार मास भारि मागमा बार बार पुरान परमारामार ! शिरगागामारी में प्रधानमो रिस भोपानरमार्गम मी है। सामा मामा mina Iriस और रासामो 1 पानी पापYिat remium AnirARमा रानीपरी rafetोपरापागली Rurn मोमिया मममर गुरी भारत font matो माना।
४मपाय पानपिनुपरिष-मतिमान के विझेप निरूपप में मपा ममापोह १ न्यायक्षेपिकादि वैदिक दर्षन, २ मैन दर्शन ३ पाली मिर्म प्या महापानीय बौर वर्णन १ समिकम्पमाप इन्द्रिय १म्पबनावमा १भारम्मण का इमिप मापायगमन-इन्द्रिय विपवेन्द्रिपसमिकर्ष भागम्बन समयाभावबन २लिकित्सक २ मोपमह २ चमुराविषिशान ३ संझप तया संभावना ३ ३ संपटिपन, संतीरण सविकसक निर्णय १ पोहपन ५पायपाहि मान या ५पारणा ५बबन प्याबमानुपम संस्मर-मरण पारम्मणपाक (२)[३८] प्रामाण्पनिय उपाय के बारे में म्हापोह करते समय पा. म्पायनी मे मम्पगिरि मूरिक मत बास तौर से समीझा है। मम्पगिरि घरि मम्तम्प किमवायगत मामाग्य का निर्मप बनाम की पूर्विनी 10 से ही होवा, १. चारे या एपित पा मरो। इस मद पर पाप्यापजी ने भापति ठा कर पा९] मगर शा से ही अपायक प्रामाण्य का निर्णय माना बाय वो पाविरेनसूरि का प्रामाण्पविषयविषयक सवस्व-परतरत का प्रबकारण मी पर नहीं सकेगा । म पगिरि के मत की समीपा में उपापावजी मे पात सूक्ष्म पोटिम्म पमिव लिपारे। भाप्पागजी साम्पत्ति, बो मण्यगिरि मूरि बादि से पूर्वाचार्यों के प्रति लगाव ही माररीक एवं उनके बमुगामी है, न पूर्वापार्यों के मती गुरे दिन से समारोपना करके सचिव परते कि विचार पुतीकरण एवं प्रमगोपणा के पब में परिचारी ममुसरण पापक ही होता है। (३) [10] पाप्मापजी को प्रसंगवस ममेकाम्प रशि से प्रामाण्य के सवस्व-पर वस्व निर्गप की म्पपमा करनी है। इस परेश फी तिशिलिए हों ने रो पनम्त- पापी पपप को पुनारेबो परस्सर विस मन्नम्प पारे। मीर्मासक मानवाकि प्रामाण्य की सिद्धि सवादीवीच देवामिकमणकि प्रामाम्प की सिद्धि परवादी होती है। पाप्माषजी ने पहले दो मीमांसको मुख से मतमामाण्य काही मापन परापा मोर पौडेस का वणन मैयापिके मुख से करा पर सपरा मापित करायामामामी सिरि परवा दी होती है। मीमांसक और नेपाविक परस्पर पणन-मणन पाही प्रसव प्रामापसिसिविषयक पर्चा प्रामाबर मास 'यति ठाकरकलस्म' रानिपसमय मकार पर दीपई गई। इसके पहले पाप्पापसी में सैमान्तिमसमठ और पाकिसमत पेसे बनेकविष प्रामाण्य के मारों को एक एकर पीलिप चुमा है और पम्त में बवडापापे सब प्रकार {The Payabological attitude of early Baddhit Philosophy By Ada gwika B.Gorindi P 184. बमिषम्मालमहो । २२ कप प्रेमम ।। । - ।
४० पानपिनुपरिचय-भावि भोर मनापाव पर्चा प्रस्तुवा लिए उपयुछ नही। वह 'खति ठाकरमरक्स्प' रस का प्रकार की प्रलव माता-परवस्त सिद्धिकी वर्ष के लिए उपयुक्त है। पापयोगी परी निप गए मिन और जिवने मामाण्य के प्रकारों भ, पामापची ने रिमिती सेव सामाचार सामरिन्दु में निदर्शन किया है, न भौर हने प्रकारों सा निवर्सम किसी एक बैन प्रम में रखने में नहीं पाता। मीमांसपौर मेपापिकी कामविम्युगात भवा-परता मामाण्य पाशी पो मम्म न्याय परिकारों से बाटिए बन गई है। पाप्यायची ने उपपम, गंगेप्त, रसुमाष, पम पर पाति मम्म मैयापितमा मीमांसकों के पन्नों कानो पाठ पाम लिया वापसी का गार प्रस्तुत पर्चा में पच पच पर हम पाते है।मामान्य सिद्धि सा माममा पा परवः मापना पा मपरूप माममा पा मम म परंपरा के सामने पलिवामा । पर विपामम्मि बाद मे पौर'मत को अपना र भनेकात से पार कर रिमाल जम्मास सा में मामाम्मी सिरिसता होती है और मनम्याच पसा में परवः । स बार पो फिर इस मुरे पर भनेक म वार्षिको मे संप और विचार से बनेगरी पर्चा है। पर सपामापनी में पर्चा न पूर्वापायों से निराशी है। इस का मुखभरणारे पाण्यापनी का नम्म पनिभाना सर्वाणि परिसीमन । पर्चाका उपसंहार करते र [I] पामायत्री ने मीमांसक पप में और मेवारिक के पस में पाने पापोगों न बनेकान्त मि से परिहार करके, पोनों पर्षों समम्प प्रयन मन्तम्म बापित किया । । अवधि मौर ममापाप की पर्चा मति और त बान की विचारमा पूर्ण कर मनभर मे समसः अपरि [५९, ५२] भोर मनापपोप [१५३,५४ ]ी विचारणा की है।चार्य उत्तरितको पाभरप, बो भौतिक-मैविक मम्मका बारे में सम्हों मे मौखिक पापम भर्मात् इमिप-मन पराहीसा होने पारे भनुमर मात्र पर विचार लिया। पापा स्मिक बनुमप से परिचित न पे । पर दूसरे पेसे मी परवचिन्तकारोबामास्मिक भूमिका पारे। मिन की भूमिध बाप्पारिमक-पोकोचर भी न का बमुमप भी मापारिमक रणापाप्मास्मिक बनुमब मुमका पारमभक्ति की भाति पर निर्भर है। मारतीय सेनों में समी प्रवाम बाखामों में ऐसे वापारिमक ननुभव का वर्णन पर सा है। बाप्पारिमक बनुमप की पांच भौतिक जगत् के स पार तक होती है। रिक, पौर और चैन परंपरा के माचीन समझे बाने पारे प्रग्यों में, मेसे वितिम भापारिमक भनुमोमपी भी मिझते पुण्ठे प्रमों में और भी दूसरे कामों में वर्णन मिस्या है। बैन पापप में मापारिमा भामर-साक्षातार तीन प्रकार पनि है-मबधि, मनापर्याप भौर पराबपि प्रसव पीबो इमि परानगम्य ऐसे सूक्ष्म १को प्रमाण वाले ! १५ माघ । २प्रत्तपंपरा "न्ये नमानाचा मापानिपत ।।
माननिम्नुपरिचय-अपि पौर मनापान की पर्चा पहित मौर विप्रहठ मूर्त पदार्थों का साक्षात्कार कर सके। मनापर्याप प्रत्यक्ष पर को मात्र मनोगत विविध भासामों का साक्षात्कार गरे । इन पो प्रमों का न बार मय में पाप पिचार मौर मेड-ममेर माछा मनोरा वर्णन है। मेरिकन के मनेक प्रम्पों में-वास पर 'पातठयोगमत्र और उसके माप्य मादि में- उपर्युत बोनों प्रकार के प्रमय का पोगविमूविरूप से स्पष्ट मौर भापक वर्णन है। पिकार 'प्रसस्तपादमाप्प में मी पोग-सा फितु स्पष्ट वन रे। मोर पर्मन 'मन्झिमनिकाय जैसे पुराने मन्त्रों में भी पैसे बाप्यास्मिक प्रत्यक्ष का पर वर्णन।मैन परंपरा में पापा पाने पाण 'भवपिमान सम वो बेनेवर परपरामों में रेखा नहीं बाता पर चैम परंपरा का 'मनापर्याय' सप तो 'परविचमान' पा परपिच- विमानना' से समरूप में भम्पन्न रेखा बाण है। दो सानों की वर्णनास्तरीय तुम्ना इस प्रकार है- २ विक - रोपिक पावसल १ विमुच्योगिमसम १ मुबनशान, पाराम्हसाम, पुछामयोगिप्रत्यक्ष सुवगविमान मानि २ मनापपर्याय २ परपिचशान २ परविचनाम, वापरिवान मनापीय पान का विषय मना चिम्ममान पस्तुपा लिम्वमा मनोरम्प की जयमाएँ -इस विषय में बैन परंपरा में पेकमम नहीं । लिपुचि भौर तस्मार्पसूत्र एव परमार्पस्वीप म्पाम्पामों में परसा पम पर्मित पर कवि पायापकमाप्प में दूसरे पस का समर्थन किया गया है। परंतु पोगमाप्य तपा मसिमनिप्रप में दो पर विच पालघवमन रेस में और दूसरादी पक्ष मिस का समर्थन मिनमद्रगगि पमानमण ने लिया है। पोगमाप्यार पपा मसिमानापार स्पए प्रमों में पही करते १लपेसे प्रममपरा दूसरों के पिता भी सामातार होता है, पिच रे भारम्बन का मही। पोगमाम्म में दो पिच भासम्बन का प्रण ऐन सम्ने पम में एपी मी दी गई। पणे विचारणीप पाते दो-एक तो पर कि ममापोप मान के विपपरे बारे में को चैन पास्मप में पो पप से बाते , इस भस्सा भर्प क्या पर नहीं है, पिण्मे १२चो बोयरपबिपार स १८१६ मा हो परीधीव प्रपत्रपरमाप । १८ यो माजमविप्रा । ५"प्रमरम पानिच्यानोपदूर. ५। ५ो बामपन्मापसे १.१४ प्रमावणीचा परिपना सवानिमिपा 11 ४२ सामबिन्नुपरिचप-पर मानवचित सापछि वर्मनभरी साहिमयुग में प्रत्यभर पुरानी बाम्मास्मिक मार्ग का वार्षिक वर्णन वो करते पे पर बाप्पास्मिक बनुमरा भुग बीच शुभ पा । दूसरी बाप विचारणीय बरे कि पोगमाप्प, मझिमनिकाय मौर विशेपाएपफमाप्य में पाया भामे पाग ऐपमा सन चिन्तम का परिणाम है पाकिसी एक का दूसरे पर भसर मौ।। चैन बारमय में भवधि और मनापर्याप संपम्प में बोवनीस मप का उपपोग कर के सपाम्पावती मे जानपिम्पु में उन दोनों भानों का पसा सुपरिपात लपत्र किग और व्यपगत प्रत्यक विज्ञपण का ऐसा पुलिंगम्म प्रयोजन बरणमा गो भन्म किसी प्रम्प में पाया नहीं जाता । उपाप्यापसी मे पपपविचार वो दोनों सानों के मेरको मान कर ही लिपा है, पर साथ ही मों मे बोनो शारीम मेर म मानने बारी सिरसेन विवार की रष्टि का समर्पन मी [५५-4 बड़े मार्मिकसे सिपाहै। ४ केषस झाम की पी [10] भवधि और मापापमान पर्चा समा परमे पार पाबापतीने किसान की पर्चा पहजो प्रग्यमन्त वापती बावीऔर अब में समामि के साथ ही पूर्ण होती है। प्रस्तुत प्रब में सम्मानों की अपेक्षा पर जान की ही पर्चा बधिक विस्तृत है । मति नाति पार पूर्वपर्ण शानों की पर्चाने मन्त्र म मितमा माग रोमोस सेकम ना प्रब-भाग बानी पर्चाने रोका। इस पर्चा में निन बनेक मेमेगों पर पाप्पापजी ने विचार किया है में से मीचे बने विचारों पर पाएँ विचार प्राशिवरपासt- (१) बामपचिलकी सापक दुछि। (१)पमान सहप म परिव रुपम । (३) मानसा परमों मप्रभ । (1) रागाति रोपों से मापारम्प ना कर्मग्रम्पत का मम | (५)मेराल्पमाषमा का निपस । (६) प्रणाम का निरास । (.) वि पौर स्मृतियों पन मवानुकम्पालाम । (८)वम्म न मन्तयों का कमर । (१)मारनौर मापन के कम वषा मेपामेर के संबंध में पूषापायों के पथमा। (१) मनपर भ पात्पर्य या नसोपा निधारमा । (१) केवल शान के मस्तिस्य की सापक पुति [1५८] मारतीय पत्लपितों में बो भामास्मि-मधिमान में भी माम्मास्मिाभिमान पान बारे में संपूर्ण पेमन नहीं । चाचास्मिनसिल मानबिम्नुपरिषय-वस मान के मखित की साभा पुति ४३ पाम संक्षेप में दो प्रकार का माना गया है। एक वो पर जो इन्द्रिपागम्प से सूक्ष्म मूर्त परामों का साक्षात्पर कर सके। पूसरा पर यो मूर्स ममूर्व समी कारिक पस्तुमों का एक साप साभात्पर करे । इन में से पहले प्रकार का सामातार दो समी माम्मास्मिक वसचिन्तकों को माम्प रे, फिर पारे नाम मावि के संबम्म में भेष महेही । पूर्व मीमांसको नाम्पास्मिकमवित्रम्प पूर्ण सामास्वार या सर्वनला विरोपी ? से मी पहले प्रकार के बाप्पास्मिक किसम्म मपूर्ण सापातार को मानने में कोई भापति मही हो सकती । मदमे है तो सिर्फ भाम्पाश्मिकशक्षितम्य पूर्ण साक्षात्कार हो सकने म हो सकने के विषय में । मीमांस के सिपाप दूमरा कोई भाम्यात्मिक पापी नहीं है मो ऐसे साश्य-पूर्ण सामालार को म मानवा हो। समी साश्पपादी परंपराभों के मामि पूर्ण साक्षातार अखिस्वप वर्णन वो परापूर्व से पण ही बाता । पर प्रतिवादी रे सामने सभी समर्पक मुखियाँ हमेशा एक-सी नहीं रही है। इन में समय समय पर विकास होता है।पाप्पापी ने प्रस्तुत प्रम्प में सम्पत्त की समर्पक मिस पुतिको उपस्सित किया है वह युति सवा प्रतिवापी मीमांसकों के सेमुखही रखी गई है। मीमांसफा करना कि ऐसा कोई सामनिरपेस मात्र बाम्मास्मिसचिवम्प पूर्व मान हो नहीं सकवा जो धर्मापर्म से प्रतीन्द्रिय पदापों का मी धामापर कर सके। उसके सामने सापपारियों की एक युति पर हीरे किमो पस्तु' साविसप-वरखममानापम होती रे पर पड़ते बड़वे भी मी पूर्ण रमाको प्राप्त करती है।से कि परिमाण । परिमाण छोटा भी है और परवममापसे पहा मी । नव एष पर भाकाम बाद में पूर्ण पाठाको प्राप्त वा बावा है। पहीबार जाना मीहै।मान भी भास तोही मषिक-इस वर परखमबाण देखा जाता है। वन पर पर भी न कही संपूर्ण मी रोमा पाहिए । वहाँ पर पूर्णकाप्राप्त रोगा पही सड । इस पुति परापामापसी में भी मानविन्द में पेपर शान केनचित का समर्थन किया है। पहा ऐतिहासिक रपिसे पर मम है, कि प्रस्तुत पुलिस महकमा तक पापा धावा है मोरपान परंपरा में कम से माईपली माती है। ममी तक हमारे पाचन-पिन्चमसे में पड़ी बाम पता कि इस पुतिका पुराणवम पोल पोगसूत्र बगा भम्पन मही। हम पामय योगसूत्र के प्रथमपार में पत्र निरठिसय सारणम्' [१२५ ] पेसा सून पालिस में साफ तौर से पापवळापा गया है कि मान पारवन्प दी समसिल का बीबोचो ईपर में पूर्णरूपेण रिसिव है। इस सूज पर माप्य में म्पासने पो मानों सूज निपान का नाम इवामापत् प्रकट किया। म्पा शेषिक परंपरा को साकारीसरे सूत्र माप्प भारि माचीन मम्मों में इस सहरित सापक पुष्मित नहीं, हम प्रसपार मम्मोमबती [...] में सकामेव पावे हैं। पर ऐसा माना निर्मुतिस मही रोगा १पर मुखमालाए देवो, मानमीमाण बापामप्पा । २९ोरपना १९ ४४ माननिम्बुपरिषय-देवणाम का परिणत ममण मोमबती म बहस योगसूत्र मा उस के माध्य के पार महीधमकी किसी मी मन्ती री प्रयोग बस एक बार किसी परात्रि में मा गातार पर फिर मागे पा सापारण हो वाता है। मस्तुत मुक्ति पारे में भी पही इमा बाय परता है। माता सौम्म-योग परपपने इस पुचि का भाविकार किया फिर उसने म्पाय-मैरिफ वापौर परंपरा सम्बों में मी प्रतिष्ठिव सान प्राप्त किया और इसी पर गरमैन परंपरा में मी मविधिक। जैन परंपरा पागम, नियुछि, माण नाद प्राचीम ममेक प्रम्ब समतपय से मरे परे, पर इमें उपर्युक्त मानवारसम्म नामी सहलसापक मुकिकास मबम प्रयोग मानादी की ति में ही रेसने ने मिग्न है । षमी पापाना सेमा मही कि मामारी मे किस परंपरा घे पर पुक्ति अपनाई । पर इपमा पो मिमिव ta माम्मापी पार समी दिगम्बर-घेवाम्बर वार्षिकों ने इस मुधि का पारठासे उपयोग किया।पाप्पावजी ने भी शानपिम्दु में सम्मान बसितमे सिख करने के बारे एक मात्र इसी पुधि का प्रयोग या पम्वन किया है। (२) केषसझान का परिकृत लक्षण [1५.] प्राचीन भागम मिलिभाति प्रमों में समापी पार्षिक प्रमों में यहाँ भी बहसान का बहा चैन विपनों ने बतणवा पाँरपूर समों में इतन्म दीमा गालबो मारममात्रसापेध पा पामसापननिरपेम साधावार, सब पापों को भात् महिलाम्प-पानों से विषप करता है वही परमानी पाम्बायो ने प्रसव मन्च में गड पाम न साप पोपही माना है पर सो ने सब निरुपम ऐसी मबीन सती से लिया हैबो उनके पालिसी बैग प्रम्ब में नही ऐसी बाती । पाप्पाषजी मे मैपापिक पपम या गंगेम बानि परिव परिमापा में बाजार लम का मन पवियर साबिपा है। इस बगाइन के समय से सरंग एखने पायो मुरे पर रामविक बना करनी प्राप्त है, जिनमें पागरे सापासारसमोर दूसरा सर्ववियम्ल काइन दोनों मुरों पर मीसिमित समी पानिकों ऐक- मनरे। मगर म मन में बोझ भन्वरोपा सि पपरमेर मही। म्यान-साविक रन पर 'सनिक सापाभर भवन भरता देवमानसे अपनी परंपरा में प्रसिर इम्म, गुम पानि सानो पायों में संपूर्म मार से मारे। सास-योग बप ' सपा पातार का चित्रप परवा रेप मापनी परंपरा में प्रसिर मति, पुरुष मावि वालों के पूर्ण पायाभर पाव वारपन 'सराप से अपनी परंपरा में प्रसिर पर कामों को संपूर्ण माष से मेनगरात पसेन ' सम मे अपनी परंपरा में पारमार्षिक स्म से प्रसिद्ध एक मात्र पूर्ण होता है। पर्सन भी सराम से अपनी परंपरा में प्रसिद्ध सपांव पर प्रयों को । १च गरा भगवान्पीय। र A प्र ॥ सत्तणा, छानपिन्सुपरिचय-पम्मान का परिका म्मम ४५ पूर्णरूपेप लेता है। इस तर उपर्युक्त सभी वर्णन भपनी अपनी परंपरा के अनुसार माने जाने वाले सब पदार्थों को रन का पूर्ण सामाघर मानते हैं, और उपमुसारी ममम भी करते है। पर इस माणगत र सर्पविषयमय सपा सापालारत पिमा मीमांसकी सम्व मापचिहै। मीमांसा सवारियों से पता है कि-अगर सहा तुम डोग नीचे सिले पांच पों में से कोई भी वर्ष मो वो तुम्हारे विदा मेरी मापचि नहीं । भगर तुम योग या कहो कि-सा का मामी है ' ससमको चाममे पासा (8) पा पह कहो गि-सस सम्प से हमारा ममिग्राम है वेग, पानी भात किसी एक चीन को पूर्ण रूपेण बानमा (२) पापा कहो कि-सव सम से हमारा मतमम है सारे जगत को मात्र सामाम्प रूपेण मानना (३); पा पाहो कि-सव समपन हमारी मपनी अपनी परंपरा में बोबो वस शामसिवरे उन का साम द्वारा पूर्णशान (), पा पर दो कि- सव सम्प से हमारा वात्पर्प केबस इतना ही है कि बोबो पस्त, मिस मिस प्रमय, भनुमानाति प्रमाण गम्पोम सब बस्तुभों को न प्राहक सब प्रमामोंना या समय बानना (५) पही सर्वसत्व है। इन पांचों में से दो किसी पप के सामने भीमापक की नापचि मही स्पों मीमांसफर पांचों पड़ों के सीपार के द्वारा फशित होने बाग सशस्त मानवा दी है। उसकी भापति? वो इस पर कि ऐसा कोई सामालार (प्रसप)ो मही सम्वा सो जगत् के संपूर्ण पदार्थों को पूर्णरूपेण गम से पा मुगपत् माम सके। मीमांसा को साक्षात्कारस्व माम्प है, पर पर मसर्मविषयक दान में। से सरविपयफल मी मामिमेव पर पर मामबम्म परोस मान ही में । इस पर बयान सहप के विन्द सब से प्रपर मोर पुरानी नापति माने वाम मीमांसकासको समी सदानियों ने अपने भपमे अंगसे बबाम लिया है। पाप्यापसी ने भी यह शान के बम का परिफा सम परके, इस विषय में मौर्मासम्समव मरूप से विख्य ही चैन मम्तम्प ६ परमाद बताई है। पहा मसंगपन पक पाव मोर मी बान केनी बरी है। पर पर कि पपप गाव एन मी बम्प सदारियों की तप सई-पूर्ण प्रपरिपपक सापालार माम पर मपने को ससाक्षात्कारास्मक मान का मानने पाण पतमवार और मीमांसको मन्चम्म से पुषा पाता है, फिर भी एक मुद्दे पर मीमांसक भोर पेशाम्त की एकवानपवा है। पर मुरासायसापेक्षवा । मीमांसकमताकि सर्वविपपक परोस मान भी काम के सिपाप हो नहीं सकता। बाद प्रसाशासाररूप सर्वसामातार को मान पर मी पसीनावकोपवाक्यों रात समप्रमान भठे ही सापालाररूप से परस का सेमय राम्तमाम सिपाय मही है। इस पर मूड में एकही पर- पप पर प्रमिव मीमासमोर बेदान्त कापस मान सहप के विषय में मतमेर १सो, गलामा है।
बामपिनुपरिषय-पान मसापक कारणों का प्रम होवे हर मौस के पसार भरण रूप से एक मात्र मेदसाब का लीभर परने में कोई मी मवमेर मही। (३) केवलज्ञान के उत्सावक कारणों का प्रभ [१९] पान के प्यार पारप भनेक से-मापना, मय, विक्षित सम और भापरपपरमादि। इन में किसी एक को माषाम्म भौर माी को बमावाब पर विभिन्न पार्शनिमें मेरे बाप की पति हो यो परम मानित किया। माहरणार्थ-सोप-योग मोर पोर पर्सन वेषण शान के बनकरप से भावना का पति- पावन करते हैं, बलिमाय-बैशेषिक न पोगब भएको पनामा पर- मते है। रात परवमसि' से महापाप ने मवाना बना मानवाब बेन बन गणानबनकरूप से भापरण-धर्म-पमादी मापन करता है। पापागजी ने भी प्रस्तुत प्रम्य मे फर्मसम को ही मामबनकमानित परने के लिए बम्प पयों का निरास किया। मौर्मासा बो मूग में मेरा काम ही बिमोस मे सहलासमय दिखाने लिए मापनासू सहसवारी सामने पर पीडकि-माषबाबा बाम बवा दो ही नहीं सम्ता, जैसा कि पाक म्पति का भावमामूक मामिक अमिती- सामात्सर । [१]सरे म मापनामान परोप होने से भपरोम साल का बना भी नही हो सकता । परे पह, कि अगर माघमा पो सायबर मापा गाग तो एक बषिक प्रपाम मी [1] २१] मानना पड़ेगा । मीमांसा बिपे गए पतीको दोनों में से पहले दो दोगेका मार दोपोर माम्पयोग बानि समी मारमाभरपमापी पा-सा करते ६पनि पाम्पापणी छ तीनों दोषोभ मार अपमा सिमन्तमेर [१] पक्षण रही परते। मानविन गर्म पच पर ही मार र पाप में दो साल का भरण हैकमेपर हो। धर्मपरको प्रधान मानने में उन का बभिप्राय पापही क्षेपण दान सति का सम्पपरित कारवालों ने मावना को परण नहीं माना, सो बापापसी से। सामते-भाषमा गोमाम काही मामाम्बर माहसाव की प्रसार गाव है, पर मेधपपरा दी।बत एष मारमा परवान बम पदित परम न होने से धर्मपण अपेक्षा बापान दी। गिर पुलि सेनों ने भावनापरमवार अविरास किया हैसी पुति से मों में भरावारपार ममी नयस [1]मिया है। प्रतेबगर मोगमन्च भरा पापका कारण से न मी पार्मस प्रविषम्पकमा सिपाप पास पैरामीर सवा । ऐसी रात में पराअपेमा पर्मपण ही मेरा पति में प्रगान कारण सिर रोण है । समभरपवार म निराम पाम्यापजी मे पदी राशि-सर अपारम रेमे दीयोबहरों पर परोप शाम पवमा प्रम कमी मारमा से अपरोपबामपभमा नहीं पर सम्मा।
२पौर गानपिम्बुपरिचय-रागानि बोपों का विचार सारपसचिम सब पर्शनों प समान ही है। परिमापा मेर मी नही-सा है। इस बात की प्रतीति नीचे की गई नछना हो जायगी। सौम्प-योग ४म्पाय-रोपिक ५वेदान्त १ सम्बन सम्बन मसालि 1 सम्मपन परीका- रागादियों बसलाम- रागमनासका रागानास हमादित संपज्ञात समाधि मारम प्र-मारय प्रारम पमारम पान के परमारमा बामग्याव- बर्समहाव-वर्म मामा-विवि से मोदी- साबरमम बर्ममेव समाधि मेष समाधि पाथमा रामतिरोपन बारामा पमा रापा मोमकी चम्मकी सविधि मानसिप भावमाप्र कात्यावरण समाधिवब भापारा बम द्वारा जान सरंपा सार्व (१) रागादि दोपों का विचार T] सय वाम की पिके कमरे सच में गो तुम्ना पर की गई। स से साकिराग, रेप बादि सेशों को दी सप पार्सनिकपमान कानापारक पानते हैं। सब मत से वर मान की रपति पमी समय पर कि पोगों का सपा मान हो। इस वर पाम्मापजी ने रागात रोपों में सर्वसमय फेरम्याना- मारपस का समर्थन किया है, और पीछे पदों में रागातियोपों को पर्ममप सापिठ लिया है। राग, रेप माविमो पित्तगत पा भारमगव योपन का मुम्स कारण कर्म नर्यात् पम्म-सम्माम्बर में संचित भारमगत दोपदी। ऐसा मापन परमे में पाम्पापी का पात्पर्प पुनर्जन्मबार मीधार करना है। पापापसी भाविकरर्मनसमव पुनर्गम्मवारी प्रक्रिया का मामय पर पिस पान की मश्यिा विचार रखे हैं।बव पब इस मसंग में नो मे पगात रोपों को मगम्प या पुनर्मम्ममूग म मायने पाठे मयों की समीक्षा भी है। ऐसे मत टीम है। दिन में से एक भव [] पर कि पग फरम्परेप पिचनमो और मोह मावणमासरा मत [३६.] परपण एकोपपनसम्पमादितीसरा मप [१८] पर, हिमपर में पूषी मोर बस तवति से गण पैरा रोतागो भौर बाकी दिसेरे पैरा होवार और पापु इति से मोर पेरा रोगा। मतीमों मतों में गरेर मोर मोरारण मनोगव या मास्मगत धर्म म माम पर सरगव सम्पदी मम्मा गया है। पपति च वीनो मतों मुसार यग, रेप और मोर के कारण मित मिन फिर भी उन तीनों मठ की मूसी एकही भोर पर पर पुनम पा पुरसम्मपरर्म मानरपा, नारगोगों में सधि माने १८ मामपिमुपरिषम-रारम्पमारना भनिग्रस की कोई मरत नही है। मीरगत बोपोंरा भरगत पम्प के बारादी रापति पपपिपराईजा सकती है। पपति कठीनो मतों में से पहले ही को पाप्पामणी में पाईसम अर्यात पापांक मत पारे, फिर भी विचार करने से पर स्पर जान परतावीनों मतों की नापारमूत मूग पि, पुनर्मम्म विमा माने ही मरीमान भरीर भाभप हेरविचार करले पाकी होने से, असा में पाप हिदी है। इसी रशिपभाभप से कर चिकि- साप्तामा प्रथम मक्ष को सपमिव करणारे बर कि समक्षाब दूसरे मत को पलित परवा है। दीसरा मप संमयता उपोग का रे । उठतीनों की समारोपना पर पाम्पापणी मै पर बताया है कि राग रेप पोर मोर पक्षमन मा पप का सच पसम्म पाप भाप्मास्मिर मर्यात् शाम बाम परा बारमारि करमा दी। नदी कि लदीनो मतो मरा प्रतिपादन किए जाने वाले यात्र मौधिक पाप । प्रथम भव: पुरस्वामी ने पात पित्त, कफ इन तीन भातुकों के साम्प सम्पादन में ही पगानि पोषों मन पाय याना है। दूसरे भव* मापों में समुचित पामसेवम बात कोही गालियोपों का ममोपाय माना।पीचरे मद समर्पन मियी, पर बादि परमों के समीपरम कोही रागाति ोणे कापसममोपाप मानापामापनी ने पकदीमों मतों में धमागेचमा में पड़ी पकाने की कोशिश की है समारोप वीमें मतों के बराबोगो पगाविसन प्रहपाप पापा बापापा पाप में पग पारि दोनोपनमन कर दीनही समया । कामात भारि पानुभो कितमा ही साम्म क्यों न सम्पादित किमा बास समुचित समसेवन मावि मी स्मों व बिमाबाप, प्रपिनी भाति वो घमौरप मी क्यों न मा बाप, फिर भी प वक मारम पनि मही ऐती वर या लेप बाद दोनों का प्रचार मी एच यही सवा । इस घमायोचना से पापापनी ने पुनर्यम्मातिसम्मत भाम्मास्मिा मा म दो समर्थन किया है। पामारी की प्रस्तुत समाओषमा पोई पर्वमा नगी वस्तु मही है। मारत वर्ष में बाचास्मिकबारे मौतिक रपि निराध गर्नु पर्ष पारे पे करते पाप है। महापामारबीने मी लिया है. -पर सेटी मी मबी। मानवियु में पामापी मे अपच तीमो मदों में हो समामेवना है या भमप्रति 'प्रमानवापिई और अन्तरमिव के 'वनसंपर में मी पापी पाती। (५) मेरात्म्पभाषमा का निरास [५] पारे तुमना प्रारमिवावा पा पुमल सभी बावास्मिक एलेग भावना-माम मरा ही महान सपा माल और पानी पधि मानते हैं। पर पास मामिपि भाषमा नामाकोप पर मी विचार मना मत है पा मापना रेसी पोत विषपा। मावना के सहप विषयक प्रा का बाप सत्र म एक महापासनिक शाओं में पाई जाने वाली माषना संक्षेप में तीन प्रभारी १.4। .
1 मानविन्दुपरिचय-राम्पमाषना का निरास ४९ १-मेराम्पमापना, प्रममावना मौर विमावना । मेगसम्पमावना बोकी प्रममावना मोपनिपर रसन की है। पानी के सब पसन पियेष्माषना मानवे है। मेराम्यभागमा परद-गिस में पर पिपास किया जाता है कि म्भिर पास्मा जैसी पा इम्प जैसी कोई बस्तुदी नहीं। गोकुछ पर सम मणिक पर बम्पिर दी है। इस के विपरीत प्रभावना परी-मिस में यह विपास किया जाता है कि प्रा मर्यान् पास्म-तरप सिवाय मौर कोई पस्तु पारमार्षिक नहीं है, दमा बारम-यत्व भी मिल मित नहीं है। विवष्मावना पारे-मो मारमा भोर जा रोनों प्रमों का पारमार्थिक भोर सवप नशिप मान र पम्ती है। विषेकभाषना को मेरमावना भी कर सकते क्योंकित में और पेवन के पारसरिक मेद उपसा उस में पा वेदन तरप में भी भेर मामने का भराप्त है। वीनों भावमाएँ स्वरूप में एक दूसरे से विण्य बिम, फिर भी पनप रेश्य सिरि में कोई बम्पर नहीं पड़ता। नेरास्म्ममावमा के समर्थक पौरपते हैं कि भगर मारमा जैसी कोई खिर पस्त रोवो उस पर मेरे मी सायव रोगा; मिस से पुण्णाम्गक मुख में राग भोर दास में रेप होणारे । पर वह मुक-राग मोर दुनन्दप दो वर प्राधि-निति-संसार का का मी रुक नहीं सकता । मत एष मिसे संसार को डोरना रो सस लिप सरस . सक्स डपाप भास्मामिनिवेश छोदना दी है। मोर रष्टि के अनुसार सारे रोपों की जा पर सिर भास्म-दस्त स्मीकार में है। एक बार स भमिनिरेश का सपा परित्याग किया फिर वो मररोगा पास भौर न बनेगी पाँमुरी-भपान र कट जाने से मेर सुप्णामक संसारमा अपने माप प पर वावगा। प्रममावना के समर्पक कहते हैं कि भयान ही हात र संसार की शाम पारममिम प्रस्तुमों को पारमार्षिक मान कर उन पर महस्व-ममस्त धारण करते हैं, और पमी रागोपमूक प्रवृधि निपचिका पर सवा है । षगर हम अपमिम परतु में पारमार्मिक मानना छोएर भोर एक मात्र प्रमका दी पारमार्षिरत मान है हम अमानमूसक महस्व-ममत्व की बुधि नष्ट हो जान से तामूलक पग-पगम्य प्राधि- मिचिमचा भपने पापही फायगा। निरोपभाषमा के समर्पक पर है कि भास्मा भौर पर रोनों में पारमारिल इति ने मात्र से पाप-ममस पेना महीं होता और नगारमा का सिर मानने मात्र से रागोपारिकी प्राधिोती है। मन का मम्तम्पो किनारमा को भारमल्प म समाना और ममारमा को ममास्मस्म न समझना पर ममान है। पद पर पदम पारम- पुरि भोर भारमा बल पा घुम्मत की बुद्धि करना पदी भान रे । इस नपान पाए परने के लिए विदेकमाषमा 2 भाषपाता है। प्पाम्पापी पेम रहिरे बनुमार विष्माषमा २ बसपी । पपपि विरोध भावना के मवर्गमी मारम-पाग नपा पाय-पक्षेपिर के साथ जैन रमन च योड़ा 7 बामवियुपरिचय-प्रमान मनिरास भवमेर पाप-फिर भी पाम्यापणी ने प्रस्तुत मम्म में नेतन्यमापना मोर मार भाषना के कपर दी मास पर से प्रहार करना चाहे। इस समय पर सास-मोगाविसमत विषमाषमा पैनसमव मोफमावमा से पवनी पूर पा विम नही नितमी नैरास्यमाषमा और ममभाषना है। परम्पमाषनारे सपन में पाप्मावषी ने सास कर बोरसमत सममरा पार पारी समान किया है। बगानमनटी मुख रही मापी कि एकाम्ब सपिकल मार के साथ पम मौर मोपी विचारसपनि मेग मी जाती है। पपपि पाम्पापसी मे जैसा पम्पमारवा का मामोन पूर्वक समन किया। पैसा मममाषना का मामोस पूर्वक सगर कहा किया है, फिर भीनों में पागे बार मनि विचार दान्तसमव सारी प्रक्रिया का बोलणन छिपास में मनभावना निरास भपने पाप ही समा बाया है। (१) प्रमशाम का मिरास [५] अषमंग पाद का लिएस करने के बाद चाम्पापजी भोपाविसमठ माम जो अनसनसमव देवमान माबीप है, सालणन हर।। मुस्यतया मधुसूदन सरसादी के प्रबों को ही सामने रखर पन में मविपारित समान की प्रक्रिया का निरास करते है। मपुस्पन सरलती साहर पात के बसा. धारण नम्म विहान् बो ईसा की सोपी सलामी में एभवसिरि, मिान्तपिन्, बेदान्तरपतिका बाति भनेक गमीर कौर विम्माच प्रथम मनाप ।। धन में से मुम्पपा बेगासमतिका का उपयोग प्रस्तुत प्रब में पाम्पारसी मे किया है। मासूरव सरसती मे मम्मतिम में मिस बिचार से मौर विस परिमापामें प्रशान ग वनवा पाण्यापजीने मी और पसी पिचार से सी परिभाषा में प्रस्तुत मानवियु में पपन किया। मारयत गौ ममानविना का विरोष समी पापी पर्सन एक सा परते। पापाजी में भी ऐसा ही निरोप किनारे पर पर्यवसाय में पोरा सा बन्तर बरा भर दूसरे सारी बीवन के बम के पार अपना अपना गमिमय है मापन मते, पाभ्यापसी समान के बण प्रप नदर्शनसमप - मनिया नदी सावमा म्पपन करते है। एप पापो की बसत दी नहीं बिपाम्पानी की बम पुतियों प्रापा नदीहैजो चम्म देवपारियों की होती है। मखव समान में पाधापी मे मुसवमा पार मुरों पर भापधि मारे। (१)[1] भन नपम अपिल । (२) [1] प्रयागर और मा- विषयक निविकसक पि । (३)[१९] पेसी पि श्रममाजबाला। ()[..] मान बहानातिनापि । इन पाऐं मदरों पर पय व से भापति र बन्दमें पड़ी बवमया हैगौसमत प्रबार मा सरे १२निणया (1114।।
शानपिम्नुपरिचय -प्रयज्ञान प्रनिरास द्वारा प्रसाननिवृत्ति की प्रक्रिया ही सोप मौर बुटिपूर्ण है । इस सहन प्रसंग में समों में एक पेदाम्पसमत अति रमणीय भौर विचारणीय प्रक्रिया का मी सविखर प्लेस पर सडन किया है। पर प्रक्रिया इस प्रकार है-[] राम्त पार मार्षिक, म्यानहारिक मोर प्रातिमासिक पसी वीम सचाईं मानता है जो महानगव वीन क्षत्रियों का काम है। पलाम की प्रपमा सक्ति प्रामिन बस्तुमों में पारमार्मिकस्थ पुदि पैरा करती है जिसके पशीभूत होकर मोग बाए बस्तुमोको पारमार्मिक मानते पौर पाते हैं। नपासिकात एसन, मो मात्ममित बस्तुमों का भी पारमार्थिषत्व मानवे १, परमानगव प्रथम सटिका ही परिणाम भवात् मास्ममिम नाम वस्तुमों को पारमार्षिक समाने वाले समी पसन प्रबमसजिगर्मित ममानमनिव। मग बाम्बवाप से प्राविषयक भवणादि का परिपाक होता है पर मर भमान की प्रथम महिनाच होती है मिस का कि कापे पा प्रपत्र में पारमार्पिस्व बुद्धि करना । प्रथम सक्ति के निच होते ही रस की दूसरी महिमपना कार्य करती है। यह कार्य। मपत्र में म्पावहारिकसस की प्रवीति । जिस ने मवण, मनन, नितिप्पासम सिद्ध किया हो पर प्रपत्र में पारमार्षिाव कमी चान नहीं सकण पर दूसरी प्रति प्रण से मपत्र में म्भावहारिकस्म की प्रतीति अपाय होती है। प्रससाक्षालार से दूसरी सफा नास रोवे ही पत्रम्य पाररिक्त प्रवीति का मी मात्र से बाता है। जो प्रमसामालार पार हो पा प्रपोम्पावहारिक रूप से नहीं चामता पर तीसरी पछि क्षेप पने से पस बस से पर प्रपन को माठिमासिक रूप से प्रतीत फरवार । परीसरी प्रति तपा रस का मातिमासिक प्रतीविरूप कार्य पे दोनों मंतिम बोपरे साप नाच देवोर मी मम्म-मोम की प्रक्रिया भी समाप्त होती है। पपाप्पापजी मे पर्यु रेसम्म प्रक्रिया का पहपूर्वक प्रगन यिा है। क्योंकि अगर बेस प्रक्रिया का बगन न करे वो इसका परिवार्य पर रोवा है कि रात के मनानुसार रेन पर्सन भी प्रपममणिमुक्त ममान का दी विगसो मत पर असम है। पाप्पापली मोहे मौके पर बैन रन की पथार्यवाही साबित करना चाहते हैं। मत पर पमों मे पूर्णचा हरिमा की प्रसिद्ध छि[१० १२५]-निस में पप्पी भात माप तसों की क्या रागादिदोषरूप बान्तरिक बस्नुभो पाखविरुवा पवित्रण- सासागरेर राम्त की पप्त भवानप्रति-प्रक्रिया का पगन विपारे। इस प्रगामी रमुख मानव निलिम धिमै शिषिभ परिपाठी माहिया साप मान की विधिप भारममाष बाडी प्रक्रिया श्री तुरुमा की जा । सपटी। मेन रान रे मुसार पदियरमा यो मिप्यारि रोने भरण तीबसम पाप और सीनतम भानगप से पुछो मत पर यो मनारमा भारमा मान र सिर्फ सीमें प्राच रोगापर हान्दानुसारी बापतनियुक्त महान है पर से पत्र में पारमापिनपी प्रवति परने पाले रेयान में है। बिसोम सन ५९ पानपिन्दुपरिष [ -सावम्म नमम्मम्मों मसम अंदरास्मा अर्थात् मन्य वस्तुमारे भारत-ममस की भोर से मासीन होकर सरोवर पर मारमसारूप में मीन होने की घोर पाने भाग पाता है, पर मेरावानुसारी नशानगत पूसरी सकिरा म्यापहारिफसवप्रतीति करने पारे पतिमान में है। क्योंकि मैनपर्सन सेमत भवपरमा पसी पर भात्मविषयक अपप-मनन-निविदा सन पाय रोवा , मिस पर पेराम्प संमत म्यापहारिसस्वप्रवीति बाहामा भाम-मनन-निविपासन में । नरसमसमव परमात्मा को तेरा गुपमाम में पतमाम रोने कारण प्रम्प मनोयोग पाममा राम्पसमव मशानात पीक- सन्धिम्म प्रतिमासिक्सस्सप्रतीति पाछे पति मान में है। क्योंकि पायल से सर्वमा मुख होने पर मी पपरसमस भयोपपरिर्म के संबंध से पचन भान में प्राधिकरणारे। पैसा कि प्रातिमासिकसस्थपतीति पाग म्पति मासासालार होने पर भी प्रपत्र मतिमास मात्र रखा है। मैन पर्मन, निसको हेभी गमा प्राप्त मास्मा पा मुच बाल्मा मवाद पर बात संमत शानबम्प निविष सीसे पर तिमयोग बाले भ्यपिमान में है।यो से जब मन, परम, बारा कोई विकल्पमसंग मही पवा, जैसा किदाम्पसमय मंतिम प्रयोग पारेको प्रपत्र में किसी भी प्रभारी सत्यप्रतीति मही गती। (७) मुक्ति और स्मृतियों का जैनमतानुकल प्याम्पान [1८८] पेणम्तकिया की समायोचमा परते समय पाप्पारसी में पाय- मत मावों में सेमसमव प्रक्रिया पारित परमे प्रमी प्रथम किया है। जो मे ऐसे ममेक इति-स्पति गव पाव व लिपबो मणमान, पसारा जवान क मातका दबा भव में समान प्राप्ति प्रवर्णन करते है। नी पायरों में से बेमममिया कमिव करते हुए पाम्पायसी प्रवे सभी इति-स्मृतिग रैनसमव करे मरपापमयमा पीपकमलरूप मसमव प्रममाव न ही वर्णन करती। मारपीप पानिकों पर परिपाटी हो कि पहले अपने पहले सजिक समर्थन पए प्रतिवादी रे पम पमएस रना और भवमे संमपोदो प्रतिवादी माय सामवालयों में से ही अपने पक्षको फडित र पणना । पाम्पायरी मे भी वही दिया। (८) ज्ञातम्प जैनमन्तम्पों का कपम जम्मान में प्रत्रिपा में गाने पाले हरे रे म प्रमिएस परवे समय पाया पनी ने इस इस सार मसरसमत मरों का भी स्पीकरण किया है। की दो पर स्पष्टीकरण पदों में सिरसेन सन्मविगत गापामों के भापार से किया और ही मुक्ति मोर मशासाम्पास रेपर से । म पहिया र ममासिक लिए ऐसे कप मम्समा पनि यहाँबराबस्प। (१)न ची से शिविरसा पोपपई। (२)मी वयमित में भी मस्सिा पोप का समय ।
धानपिन्दुपरिचय- सायम्स चैनमन्तम्पों का कपम ५५ (१) निर्विकल्पक भौर सविकसकोप भनेकान्त । (४) निविकसक पोष मी भाण नहीं है कि मानसिक-ऐसा समर्थन । (१)लिकित्सक पोप मी बममा रुप मही किन्तु अपाप रूप है-ऐसा प्रति पाइन। (१)[६९०] वेदान्तप्रकिया करती है कि प्राविषयक निस्किस मोप रोवार पर पाप मात्र पखित को मा मिन बगत् के भमाष को सूचित करता है। साप ही पेशाम्तप्रक्रिया या मी मानती है कि ऐसा निर्षिासबोध सिर्फ प्राविषयक दो वारेमम्प किसी विपप में नहीं । उस का पद मी मरे कि निस्पिक बोप हो बामे पर फिर कमी सविकसक पोप स्पाम ही नहीं रोता । इन तीमों मम्मम्मों के पिर पाम्पापजी मैन मन्तम्म बताते हुए करते हैं कि निस्फित्सक बोप का म एम्प का उपयोग, मिस में किसी भी पर्याय के विचार छापा व नरो। भर्यात् नो पान समर पोगों के संगम का भसमय विचार कर केवल इम्पको ही विपय करता है, महीं कि पिम्त्यमाम ट्रम्प से मिल जगत् के भमान को मी । वही दान निर्षिकसक मोष है, इस को बैन परिभाषा में मुखम्ममयावेस मी मा बाण। (२) पैसा निर्षिक पोप का भई पता कर समों ने पर भी बदलाया कि निर्षिकसक पोप जैसे रेवन ब्रम्प में प्राच ऐ सकता है जैसे ही पटार बम्प में मी पाच हो सम्वापानिपम नहीं किया रेवनद्रम्पविपकी हो। रिचारफ, मिस मिस मा पा चेवम द्रम्म में पर्यापों के संबप का मसमर विचार कर बम इम्प सरूप काही प्राण करेगा, उस सावन समी इम्प में मिमिसायोमो सकेगा। (३)[९९१] पाप्पायपी मे पर मी स्पर किया है किसानलप भास्मा का समाप ही पेसारपिनो एक मात्र मिसिक मानवरूप मही रावा । हम मुरम्प का विचार छोर पर पारों के विचार मोर एकता वा पर निस्पिक मान के बार भी पर्यायसापेक्ष सविकसक शान मी करता है। मठ एप पर मानना ठीक नही लिलिकित्सावीपपार सविसक पोप का समय ही नहीं। (५) बान्त पर्मन प्रवा किया निर्विसामोप तत्समति' इत्यादि सम्प बम्य ही है। इसके विस्य पाम्यापी पाते[१०३०, पं. २४] ऐसा निर्षिकसक पोप पापविनिमुविचारसरात मनसे दी सा होने के कारण मनोमम्प मामना चाहिए, नही अपरम्प । मों में अपने भमिमव मनोमन्पत्तका मापम करने के पंस में हम मनुड्स एतियों को भी पत किया है।९१९५] । (५)[३९] सामाम्प रूपसे मैनप्रक्रिया में प्रसिद्धि ऐसी है फिनिस्किस्पक बोप वो बबरका मामान्तर है। ऐसी मामे पर प्रमोण जिप पाम्पायजी ने रिसिक पोप को मानसिक से परायों कि अपर विचारसरमोबम्प मानरिमुपीपप-पमान नोरपोग रे मेरामेरी मीरा गुरलम्पोरयोगरूप निरिम्पर पोप विचारसरमनोसम्म । म मरो मे पद दिया है कि जिस रिसरसादाममनोगप सामो पपोगो ने पिपरईसमरिपारम्प भाग और माम गयारणमा म रदिव मोरे। इन मरजेनानिमन मनमोका सोरण र सम्स में मोने यही मूरित RR माग सम्बरिया पर नरद से जैनसमव शुभम्पनगरेमी शिरमानिरि मी पेराम्बरात्परम्प मात्र प्रसाशातार ही परमार १५मा माननाय दो रिमी नरमी जेनसमान से मदी मला। (.)पर शान-पानोपयोग मेवामद की चर्चा [१०] समान की PM और रते हुए मापसी ने मानवियु में सलमान भोर रस रानरे संप में तीन पभमेरो जवान् विप्रतिपति मापसापनी परिमारा में पाभिन रियाद मोरिन पपरा में पापीन समय से जानित ो हीन पप इस प्रपर- (१)सम मार मौर पर न रोनों पयोग भित और परमार मते रमहा भवान पर समपरे मर से सारे (2) रामोगराग मित्र वोर पर नरनिमिम सपा परी मार दोती ली। (A) रोनो योग बनुमा मिन नही है। योग तो एकदम अपेपर मार भोर म रमन एमे रो मामात माम गिरा सपोग में भी भाप्रेमी है। जमीन और officारमा जापानमार माना wn finath Muीप गम पाले गरे ताप योगनगे गन पाना में सिर समान भार सपना । म मा मे राम-नागार्यमाप्र म एमा पामो सम पुगात्म गगमा पपारा पर ANILE-fa Munt Prarti anा-पामा पुनरा भारी kath me TRA मिरमेन Dinanatime सागास पर Prमारे rammartime Hotu 1 111-1111 बामपिन्दुपरिचय-पमान-समोपयोग मेवामेव पर्चा ५५ गवगया होगा। अगर हमरा पर अनुमान ठीक है दो ऐसा मान कर पम्ना चाहिए विकिसी ने वसापमाप के उन की पुगपत् परफ मी म्माम्पा की पी, नो भाग पम्प नहीं है। 'नियमसार प्रम्प बो दिगम्बर वाचार्य महम की कति समझा बापा है सस में स्पष्ट रूप से एक मात्र पौगपप पमण (गा० १५९)ी पेस। पूम्पपाद पनन्वी ने भी तस्वार्थ सूत्र की म्याम्पा 'सर्वार्थसिदि" में एक मात्र युगपत् पसका ही निरेश किया है। मीनका भौर पूग्यपार दोनों दिगंबरीप परंपरा के प्राचीन विद्वानो भौर दोनों की हतियों में एकमात्र पौगपप पक्ष पर होगी। पूम्पपार कचरपति निगराचार्य समम्वमद्रने भी अपनी 'यासमीमांसा' में एकमात्र पोगपप पास पहल किया। यहाँ पर पर स्मरण रखना चाहिए कि पाप, पूम्पपार पौर समन्चमा-इन तीनों ने अपना ममिमय योगपप पक्ष पवणमा है, पर इनमें से लिसी ने योगपपविरोधी कमिक या ममेद पमा सणान नहीं किया है। इस पर हमे मीछापाम से समन्तमा तक किसी भी बिगबराचार्य की, कोई ऐसी रुति, वमी उपसम्म नहीं है मिसमें क्रमिक पा जमेर पसाबणन हो । ऐसा मान हम सब से पाठे भाजी वियों में पाते हैं। मानक मे समम्पमद्रीय माप्तमीमांसा की 'एबी"म्पापा में पोगपप पम का मापन करते हुए अमिक पक्ष का, संक्षेप में पर स्पर रूपमें, बडन किया है मौर अपने 'राबपातिक" माप्प में दो कम पप माननेवाण को सपनिम्बर पर एस पक्ष की नमामवा की मोर संपत किया है। या उसी रानमाविक में दूसरी बगह (६१.१४-१५)नों ने ममेर पक्ष की अमामवा की मोर मी सष्ठ ईसारा किया। पाक ने ममेर पहरे समर्पक सिरसेन विषाकर के सन्मतितर्फ नामक मन्च में पाई चामेबाली दिवाकर की भमेरविपपक मीन भ्याम्या (सम्मति २ २१) का सपना उमेस कर के इस का बबाम इस पयरिया बिबिस से अपने पमिमत पुगपत् पस पर कोई दोप न मारे मोर स का समर्थन भी रो। इस परम समूचे दिगम्बर वाग्मय को लेकर पर देखते है कि पही निकाल दिगम्बर परंपरा एकमात्र योगपप पसमे ही मामती माई मोर उस में भाग पहले किसी मे अमिक पा ममेष पप का खण्डम नहीं किया है, परमपने पक्ष मनिस मात्र किया है। बम बम भेवाम्मरीप पामयी मोर पिपाव करें। म परम कि वस्वार्पमाप्प पूर्वपति पम्प मागमिक साहिम में से दो सीधे दौर से गए मपम ही पवित होता है। पलवस्तापमान हेत से बुगपत् पम पम पोष सेवा है। मालाति मौर मिनमा माममण-दोनों के बीच कम से कम दो सौ पोंका मन्चर १"पाप समनापा सममितिदम्पत्यमेव पर्वते । नरमपन् । सार्व- १९ "सम प्रमान ते पुसमालम् । ममानव पगम भागारमातम्यम् । माघमी० म १।१"गासमोन्माचे स्वाभावित पर लिपीचेर आमा पनि सपोस्पिचारपोरमार प्रतिमायग्रेचर प्रतिवन प्रयमाप-मएयती-मपसरली प "पातिक ।
पानबिन्दुपरिचय-सम्मान-पर्सनोपयोग मेषामेर शर्मा है। इतने पो भवर में समा गया कोई ऐसा मेवानरीप पम्प ममी पाप नही है जिस में पौगपप तथा अमेर पक्षी पर्चा पा परस्सर पपन-मडन होर प बम विक्रमीम सापनी सही में एप मिनमा समाप्रमण की स्पडम्म हो कतियों में देसतेज पेसा पाप मानना परवा न पाहे भवाम्पर परंपरा में पोरग- पर पम की पमा ममेर पप में पेठ सापना ही मही। बी, पसिन तीनों को परस्सर पणन मणन माग साहित्य मी पर्याप्त मात्रा में मन पुत्र बा । लिममा गरिने अपने पति विस्तृत 'विक्षेपावश्यक्रमाप्प' (गा ३.९ से) में अमिक पप का बागनिमें की ओर से गो विश्व स-ई स्पापम मिपा एस में लाने पोगपप वा ममेर परम मागमानुसरण पर विस्तृत लहन मी किता। तदुपराम्ब उन्होंने अपने छोटे से 'विशेपणरती मामक पम्प (गा १८४ से) में वो, विक्षेपावश्यकमाप्प की बपेमा म भसम्व विखार से अपने मामिमव मपक्ष का लापन क्या मनमिमत पोगपप वा अमेर पसा वहन किया। समागमणकी दोनों हतियों में पाए जाने वाले पणन-मगमगत पूर्वपम चरसपी रचना मा इसमें पाई जानेवाष्ी अनुश्क- प्रतिइश पुलियों का मामसे निरीपम करने पर किसी को पा मानने में समर महीप सम्वा विमानम के पूर्व सम्मे भर्से से पेशाम्पर परंपरा में दीनो पो मारने पासे मोर पे भौर से पपने अपने पक्ष का समर्थन करते हुए विरोपी पक्षका नियस मे पर पे। परम छ मौसिकदीम पता पा पक्कि सामपर भी होगा रा। मात्र पाय मसे ही मौतुर मरों पर भमानमरे सक्स पोमो पत्रों में उनका सार रेसने को मात्र मी मिम्ग है। इस पर से हम इस नतीने पर पाते हैं कि सिनमा पहले भी वामर परंपरा में तीनों पक्षों को मानने वाले वा परसर खणन मगम करने वाले मामा परे । बाम से म दिनमा समय तक में ऐसा कोई दिगम्बर विद्यार नहीं मा जान पावा मिस मे म पप पामेर पमप्र पणन रिया हो । पौर विगंबर विज्ञान की ऐसी कोई कति दो बार तक भी पम्म्म मही मिठ में योगपप पारे पठापा दूसरे किसी भी पप का समर्पन हो। पो ७ दो पर पों पर मन दो पैरा दोवादी प्राचीन भागो र पाठ सीने पोर से जम कम पनाही समर्थन से प म परपरा में बोगपच पर और पभेर पथ परिपार यो र रासिकमा । इस का पाप हमें रो पप से हावा है। एक तोगति पर भसह पारी मीमांसर ने समी सरह पारियों के सामने . मम "सापरणपतिएम पि (नगर 'सा') गो परिप ग्पमागा- -सपागचचगान मत मात्रै बनेकोबाप अधिकार गरेममा प्रभावाम तालपोमा परी माना istrifle anो बीमार दतवन्यापार नामरोष दादी मारमा प्रभात trERMANCE Ajit बाग रतिराम (म बानपिम्नुपरिचय-मम्मान-पानोपयोग मेदामेप की ी पर माप किया' किंतुमारे सर्पद मगर कम से सप पहायों को जानते है पोरे सनदी से १ घऔर बार एक साथ समी पदार्थों को मानते हैं वो एक साप सप पान मेने के पार मागे पे क्या जानेगे मी दो फिर बसाव नही है। ऐसी पक्षा में भी ये असरंद ही सिट हुए । इस भाप का बबाव दूसरे सह पारियों की वय नों को मी मा प्राप्त हुमा । इसी वर पोख भावि सांडपाही भी चैनों के प्रति पर बामेप करते गोंगे कि तुम्हारे सर्प मात को कम से मानते रमते ७ मत पर के पूर्ण सम ।। इस बाप बाप को एक मात्र जैनों को ही रेना प्राप्त था। इस वय पहुंच पा पम्प पेसे भापों का जवाब देने की विचारणा में से सर्व प्रथम योगपप पस, कम पसरे विरुण चैन परंपरा में प्रविष्मा । दूसरा पर भी समय किन परंपरा के शी विचारों को अपने भाप दी मम पक्ष में मुटि दिखाई दी और उस दुटि की पूर्ति के विचार में से पौगपप पक्ष सर्व प्रपम सूम पस। बोन विधान पौगपप पथ को मान कर स र समर्पन र पेन के सामने कम पम मानने पापा बरा भागमिक पलामो मागम के भनेक मारयों को छे पर पर वणवे पे कि पौगपद पक्षका कमी म पागम द्वारा समर्थन किया ही जा सकता । पपपि शुरू में पौगपप पस वर्कर भापार पर ही प्रतिष्ठित हमा भान पवाद पर संप्रदाय की मिति ऐसी पी, किले पर वह अपने पोगपप पस का भागमिक पाम्यों पारा समर्थन मरें मोर मागमिक पायों से ही कम पठ मानने बालों को बबाब म, पब तक न पोगपप पस का समदाय में भारर होना समय मपा । ऐसी लिति देवकर पोगपप पक्ष के समयंक वालि विधन मी बागमिक मानों का मापार अपने पथरे लिए मेने छगे या अपनी ठीण को भागमिफ पापों में से फलित करने एगे। इस वर वाम्बर परंपरा में क्रम पम पमा पोगपप पमा भागमामिव लडन-मणान चन्दादी पा लिपीच में किसी को भमेर पम में की । ऐसी सूप्त माग वार्षिक पौगपए पक्ष बागेको परमने भगा कि नगर कम पम में एटिवो तुम पौगपप पम पाडे भी सहुरि से पच नहीं समवे । ऐसा कर कर स मे पौगपप पक्ष में मी बसम्मल पात दोष रिवाप । चोर अपने अमेर पपप समर्पन एरु किया। इस में तो सरदी नहीं कि एक बार कम पम छोर जो पौगपय पस मामवापानगर सीधे वर्षा भाप्रय हे दो से भमेर पम पर अनिवार्य रूप से माना ही पाता है। बमेद पस सापाले में सीधे पास से अमेव पप को पलित करके प्रम पम दवा पोगपच पहन लियस हो पिया पर पुरु में सामापिक गेग स पाव मागमिक पापों के मुरझाब सिपाय भीभर से करते। इस कठिनाई को हटाने के लिए ममेर पस पानं मे भागनिक परिमापानी का नपा नर्म भी करना शहर दिपा और ममा ने अपने ममेर पसोड से उत्पम पर मीमत में भागमिक परिमापामों के डारे में पिया दिया। म, पोगपप पौर बमेर पपपक विमस की प्रकिया कम से कम १५. वर्ष वा वापर १२) परमप्र १४ मे।
५८ मानविमुपरिपप-समान-मनोपयोग मेरा मेरी परेपय में एक-सी पन्नी पी । और प्रखे पसरे समय पुरंपर निधन होते थे, पौर प्रम्ब मी रोपे।बारे ऋम बार गिर चैमेवर परंपयी बोर से माझेप ए पा पारे जैन परंपरा के भावरिक विम्बम में से ही बासेप होने सगे हो, पर इसका परिणाम भम्त में मना पौगपप पम पमा अमेर पस की साया मेंदी भाया, बिस की मलित मिनमा पम्प पिपपपती और पिसेरापमामाम्स नामक दोनों कवियों में हमें देखने को मिडती है। [३१..] पाप्यारी मे को तीन विमतिपतियों दिखाईमा पेविासिक विघस हम ऊपर दिवा पुर। पर रिमविपचिमों पुरतर्ण रूप से पापापरी रेप प्रस्तुत किए गए वीन नाचार्गारे पारे में का विचार करना सही है। पापापजी मे कम पम पुरस्कारुप से दिनभद्र भमानमपो, पुगपत् पक्षी पुरस्काइप से मठपादी को और ममेर पास पुरसमप से सिरसेन विरार को लिरि लिया है। साथ ही दो मे मम्पगिरि मन साप मानेपाली बसंगति का वार्षिक रष्टि से परिहार भी किया है। मसंगवि बों बाती किस पाप्यारी सिरसेन दिवार को पभेद पस का पुरसतो पणते व मीमा गिरि सिरसेन निवार को बुगपत् पक्ष का पुरस पवागवे । पाम्पारजी मे बसंगति परिघर वापर कर लिया है भीमम्बगिरि का कपन बमुपगम पार की रिसेरे पात् सिद्धसेन दिवाकर वस्तुवा ममेर पप पुरस्कार पर बोडी पर के लिए कम पाच लगन करने लिए छह में पुगपत् पक्ष का नाम पर और फिर मम्स में अपना भमेर पप स्थापित करते हैं। पाप्पापसी मे बसंगति म परिवार लिसी मी वय मो म लिया हो परंतु में दो पर तीनों विप्रति पचिमों क पपपको र्साने पाठे समी मेलों पर पेविसिक शिसे विचार हम पर ऊपर पवन पुनकिकम, पुगपत् मोर ममेर इन तीनो पारो की पर्चा मारे सबसे पुराने रो पम्प इस समय हमारे सामने बोरोन् बिनभद्रगगि एमाप कोही ति ।म में से, बिपावरप माम्म में दो पर्षा परते समय बिमाने पपगाररूप से न तो किसी का बिझेप नाम निपार मौरन मित्' 'नमें मार से सगरी मपि किम। परंतु विपभवती में पीनों पारों पर्चा करने के पाले मिनमा ने पेचिन् पग से पुगपत् पक्ष प्रथम रखाइसकेपार 'बम्पर कम पर रममा भारत में 'मम्ये पर धमेर पसत्र नमकिनारे। विभेपपरवी की नीलोपा म्पाला मही रेस से हम पहनदी सकते हैं कि मिनमाको पनि और 'बम्प सप मे स स पापुराम्तो रुप से पौन नभाचा जमिव । १देवो मा । .tी एमापनासार निगमले पोले : को रमित शिरला.' -निरोपणपती।
छानविम्वुपरिषप-फेरम्यान-पर्मनोपयोग मेपामेरी पर्चा ५९ पपपि पिपपपती की सोपट म्माम्या नहीं है कि मी रस में पाई जापाठी प्रस्तुत पीन बार संबपी गापामों की व्यापमा सब से पहरे में विक्रमीप पाठवी सदी भाचार्य विनास गणि की 'नन्दीपूर्णि' में मिस्त्री है। स में भी हम देखते हैं कि मिनास गमि चित् और 'बम्पे' सम्म से किसी भावार्य विशेप का माम सूचित नहीं करवे । सिर्फ इतना ही करते है कि पान भौर पर न पपोग: पारे में भाषामों की विमतिपतिया है। मिनरास गमि के बोरेदी समय पार पाचार्य परिमा ने सी नन्दी पूर्णिमापार से 'नन्दादि लिखी है।लों ने भी अपनी इस माली सति में विक्षेपपरवीगध प्रस्तुत पर्चापाठीश गापामों को करन की म्याम्या है। बिनवास गपिने सब चित्' 'मन्ये सर से किसी विशेप भाषा का माम सूचित नहीं किया तब हरिमासूरि में विक्षेपमपती की मी गापामों में पाए जानेवाले विचित्' 'पम्ये सम से विशेप विप भाचार्यों का नाम भी सूचित किया है।नों मे अपम किचित् सम्म से पुगपद के पुरा हम भाषा सिद्धसेन का माम पित पिपास पाए 'मम्मे सप से मिनमा समाममपको कमबार के पुरस्कर्ता रूप से सूचित किया है और दूसरे मम्मे धम खचार्य को ममेर पारा पुरस्का पत- गया है। हरिमासूरपार मायणी सदी मापगिरिसूमि मे मी मन्दीसूद के पर टीका छिली है। स ( १५४ ) में नो मे चारों के पुरस्कतों के नाम के बारे में परिमारि कपन भी मनुसरण किया है। पहाँ मरण रकने की बात पर निरोपावरपकमाप्म की परम्म पोनों टीकामों में-मिनमें से पारसी भाठी मी सकी कोट्याचार्य की और दूसरी पाररानी सदी के मम्मारी मचम कीरे-तीन पारों के पुरस्का रूप से किसी माचार विशेप म नाम निर्विर मही। कम से कम कोव्याचार्य के सामने वो विपापापा माप्पी मिनमदीप सोपर पाया मौदा भी दी। इस से परमापा सम्मा रे कि उस में भी वीनों पापों के पुरस्का रूप से पिसी बिग्रेप मापा मनाम पानसेगा अम्पपा मोठ्याना स बिनमदीय बोपच म्याम्पा में से विमेव नाम अपनी विरोपावापक माध्यचि में सहरमेते। इस पर मरेप है कि बिनभद्र की एकमात्र विषेपणपती पद गामानों की पास्या करते समय सबसे पहले माना हरिभर ही वीमों पापों के पुरस्कानो प्रविधेप नामोश करते है। दूसरी तरफ से हमारे सामने प्रस्तुत तीनों पारोपी पवाणा पूसरा प्रम्ब 'सन्मति- पोलिसिंगार सिरसेन तिगार हतास में दिवाकरमी ने मारप १"पर सियसेनानादिया मतिर रम पमी पापा 1nu मम मममा निमार' मना बरे दिनमद्रगविल्माणमपावरा। एअन्तरिम पानी पापी पर 'इमान्दापसेमपपासमाइपरेप स्म । यात्रा कर निपरामिपन्दि बिमसतियारमा परेममा परेर म मान्ने परम-बम्दीपिरिमद्री । ५। १ मापने ममेर पहर समय एवं अपितयेदमपहिरवम् इमार पप सामिपाक प्रम पामार पाण पानमा पुष्पुिरमसे एक दोस्ममारे समर प्रेममेरपरी मागे विपचपन्नासची पपयनरमलपन -1 शानपिम्बुपरिपप-सम्मानननोपपोग के मेरामेपी पर्चा पूपिम रूप से पसरते समय किचित् इवना ही मारे । पिसी विशेष मागम मिस नहीं किया है। युगपत् भोर भमेर पार को रसते समय दो कमों ने पपिन् ' असे सप का प्रयोग भी नहीं किया है। पर हम सब विमीय ग्यापी सरी के भाषा ममपरेप की 'सन्मतिटीका' को रेलवे है म तीनों पा पुरस्कामो अम समें स्पष्ट पारे । ०६०८] भमयदे हरिमा की पराकम पारा पुरस्कयों को मिनमा पमाममण को ही बवगावे पर धागे नाम हरिमा केपन से पुर। पाता है। दरिमा पर पुगपर बार पुराना रूप से माचा सिरसेन का माम सूचित परवे १ भमरेप उसके पुरस्कर्ण रूप से पापा ममापी का माम पूनित करने १।रिमा पर जमेर पाद पुरस्का रूप से सपासमाम पूपित करवाया बमपरेर उसके पुरस्नो रूप से भाचार्य सिरसेन का नाम सूपित करते है। इस तरा पोसम में जो भेर पा पिरोपीस पर विचार करना भाषणा। पर वर्गम से पर वो पाठाप मी माति मान सके होंगे किरिमा दया बमपरेप रेपन में कम पार पुरस्का के नाम के संबंध में कोई मवमेर मही। उनम मवमेर युगपर पार मौर मेरे पादपुरतर्वामी नाम संप में है। पर प्रम पर किरिमा और बमयदेव दोनों के पुरस्कतों संबंधी मामसूमा काम क्या भापार । यहाँ तक हम जान सके माँ पार सफल होमो रि के सामने म पार पा समर्पक मोर पुगपत् वा बभेद पार का प्रदिनारक सादिम परुमात्र निममा दीपा, मिस से दोनों भाचार्य इस पाव में एम्मक, किम बार भीमिनमा गणि पमानमण का। परंतु भावार्य हरिमा का पता नगर सप मेसों में मान्य है तो यह मानना पवार किम के सामने पुगपडू पार प समर्पक कोई सर्वत्र सम्म या रोगाबो सिखसेम विवार से मिन किसी अन्य सिरसेन कापमापा रोगा । वाम सामने अमेर पार का समर्पक पेसा भी कोई मम्म रख दरोगा को सम्मति से मिम दोगा मौर जो सार्वरित माना जाता होगा। नगर ऐसे कोई प्रम्प बम के सामने न भी रो दयापि कम से कम करें ऐसी को सामायिक पनाति पा मेई ऐसा लेप मिन होगा जिस में भाग सिरसेन को पुगपर मार का या पराचार्य को भेर मारनपुरसम्ता माना गया हो। बो इसे पर एम सासा पर महीं सकते छि रिमा पैसा पाहत नापार्य यो ही मापार सिपाप पुगप पार पमा बमेर बाद पुररावांनी विशेष माम पान र। समान मामपाले बनेकपाचार्य होते माप । इस रिप बसंभव मदार सिमसेन निवार से मिल कोई इमरे मी सियसेन हुप रो मोति पुगपर् पार समर्पण परोपा मान जावे । परि सम्मतिवर्ष में सिस्न नमार मे अमेर पसा ही सारन रियाद पर इम रिप में सम्मविना थापार पर हमम मिररोष पनि का ममेर पारपुररकता प से सिखसेम निवारमामय पम पिण्णम सही भोर हरिमा बम विपारणीप है। पर हम ऊपर परमार शिम भारि टीमों मानी पा पार पहले से एक मोर मतानियों का पामपिम्बुपरिषप-पण्याम-पर्सनोपयोग के मेवामेर की पर्चा । पास में भनेक भाचारों ने एक एक पम कर समप समय पर भाग लिया। ऐसी मिति है वष पदमी फसना की जा सकती है कि सिरसेन दिवाकर केराचार्य नाम के भाचार्य मी ममेद पार के समर्थक एए होंगे या परंपरा में बाते होंगे। सिद्धसेन दिवाकर गुरुरूप से स्वाति का लेख भी पानकों में । बाता है। भामर्म नहीं कि प्राचार्य की बारी में मोर गुप पानि समर्षित बमेर बार काही विशेप साठीकरण तथा समर्थन सिप्प सिरसेन पायर ने किया हो। सिरसेन रिवार के पासे मी ममेष पार समर्थक सिरेर । सेपर यह बात तो सिद्धसेन मे किसी अमेर बार के समर्पक एकदेशीय मत उम्मति २२१] कीबो समारोषमा रेसी से सिरहै। पर दोहोरिमझीम मनापार की पाव । भनाइम ममयोग के मन के भापार पर विचार करते हैं। भमयोग पूरिके ममे दिनमा समागमण का अमपावसमर्पक साहिल रहा बो भान मी पम्म्म । सपा उन्होंने सिखसेन विपार सम्मतिवर्क पर तो पतिविस्वत टीकाही मिली नि बिस में दिवार मे अमेर पार पाप मार्मिक सष्ठीकरण किया है। इस पर मबरे पापों के पुरस्कासरगी माम बारे मन में बोम पार पुरस्कतों रूप निमम का मा अमेप बारके पुरस्कर्वा रूप से सिरसेन दिवाकर का पोखरेपर वो पारीदी पर पुगप पार के पुरस्कयो रुप से मापानिको ररसाने माग बोषमयदेष जनसभामार याt:-पर प्रम मवाय होता है।बैन परंपरा में ममापी मकई भाचार्य हुए मामे बावे पर पुगपद् भार पुरस्वा रूप से समपरेप के अप नयि माहवापी पदी माविमुस्य प्रेमम जिन कारचा दावारनपपाक मौमूर और मिन्दों ने हिवार सन्मति पर मी टीका किसी बी'मोकपसम्म नहीं है। पपपि पपधारनया भर रूप से पसम्म नही पर पासिंहगणि श्रमामयप कर साप हरित प्रतीक रूप में पम्म्मषमी हमने स सारे सटीक नया अपोषन करमा दोस में भी मी देबडवान भौर पर पर्सन के संगम में अचमित पर्युप पारों पर पोरी मी पर्चा मही मिठी । पपपि सम्माविवर्ष की महपारित [ीका पडा महीर पर बब मम्मावि ममेव समर्पक दिवार मन्म पर टीका मिले दर पर कैसे माना जा सकता किमों ने रिवार के मम्मी पाल्पा लिखते समपसी में ननिस्ट पपमा पुगपत् पम किसी पपमापित किया हो। इस पद पर हम सोचते हैं न पर नहीं प्रसवेनमपरेषयुगपत् पार पुरला रूप से मापारिक साभापार नवा पा उनकी सन्मतिटीन में से या रोगा। मगर बमपरेमच खात पभान्त एष सापार वो अधिक से पपिक हम पही पसमा पर सच्चे हैं कि महापावि का कोई भम्म पुगपत् पम समर्थक छोटा बम प्रम्प ममपरेप के सामने पारोगा भवमा पेसे मन्दम्प बागोई गम में १"पनि मारिना मत-मतान्पतालमा ।
मानविन्दुपरिचय-मन्यचरमवासर्य वयानी सोपा विधारणा मिण होगा। बस्तु । गोहहहो पर इस समय हमारे सामने इतमी पतु निमिवर बम्प पापों का तणन र म पार का समर्थन करने पाग मा पम्प बाप समन रमेर पार का समर्पन परमे पाग सर्व साहिल मौरीमो बस से मिनभागणि उमा सिखसेम विवादरा पाया है। भम्प पारों पक्षणमा एक मात्र पुगपर पार का बटम सापमरने पाग कोई सवा मन्य भगर मे पावापरीय परंपरा में मही पर विगवरीय परंपरा में है। (१०) मन्पकार का तात्पर्य तपा उम की सोपज्ञ विचारणा पाप्पापसी के निति विमतिपत्तिों के पुरस्कर्वा कपारे में बोका प्रमा मा से समाप्त करने के मारत में दो बा करना। (१)च टीन पारों के एम पो बवमने लिप पाम्यापजी मे निममगमिरे किसी पम्प को पर पाननिम्म् में सभी म्पासा क्यों नहीं में भौर दिवाकर सम्पतिवर्षगव बारमा माग को करसी म्याम्पा क्यों की। में इस पसेरंगी पकारण पर पान पड़ता हैपाम्पायनी को तीनों पारों रात को अपनी पि से प्रकट करना भमिमव पा फिर मी न वार्षिक मुनिका भषिक एकाप पपश्य ममेर पार की भोर याहै। मामनिम्तु में पाठे मी यहाँ मसिनाव, भोर भबपि-मनापोप के ममेर का प्रम मापा पानी में पड़ी सूजी से विवारी बमेर मत म समर्थन किया है। पर सूपित करता पाप्यापसी म मुस्मा निजी पास जमेर पह काही । पाँ पर भी प्मान में सम्मति जानकारी गावामी म्याम्पा करते समप पाम्पानी मे जगह पूर्व पायाभर बम कविवरणी समाजमा मौरस में पुटिपा पवग र स बार नये रंग से पाम्पान भी किया। (२) [१४] सरी पार पापायसी विपिए सून से संपर रखतीत बालमानवियुगल में पाप्पारसी में प्रस्तुत वीनों पदोन नवमेरी बपेया से समम्मपरिपारे जैसा दिन पहले किसी को सूमामा माममी पावा। इस बगर इस समनर परमने पारे पों पठमा इस बार पप गप जान मारपसूचक पप प्रसार ने प्रोम हम मरण कर मी सचे। सब से और पाप्पाषजी ने अपनी प्रतिनिस में सुर अपना दा पनी गुरु परंपराभ पही परिचपो मोबन में बम्ब हटियो मदिरों में भी पारा जाता है। पुलिस पपीका पार इस प्रकार है- १-यो भेग गतानुगतिक पुरिपार होने परष प्रापीम सामों का भरमा पर है मौरमा संगत भी करने में पा समस्तीभरने में महिला सप्रेमय मे एपर पामारी वेब-साम के पुराने भाग में से १.१.१५॥ - । भामविम्मुपरिषप-प्रम्पयर का वास उनी सोपस विधारणा युटिसंगत नया वर्ष निकाम्ने में ही छोग र सकते हैं जो शाम से मनमिय है। शाम के मान फार दो अपमी प्रज्ञा से मये मये व प्रमाशिव परने में कमी मही हिचकिचाते। इस बात पपाहरण संमति का दूसरा काणही है। जिस में फेरसमान मोर केपछनि विपप में म, योगपप तया अमेर पमा लणन-मणन करने बाली परे। मिस पर्चा में पुराने एक ही सूधपाक्यों में से हर एक पक्षकारने अपने मपने अभिप्रेव पक्ष को सिद्ध करने के लिए वर्क शरा शुरे हरे भर्य पाठित पिए है। २-मम्बादी जो एक ही समय में मान-सन दो उपयोग मानते है उन्हों ने मेरस्सी म्वार मय का मामय लिया है। मर्यात् मणमादी का योगपप भार म्पपहार नप के भाममाप से समझना चाहि । पम्म भी गिनमगलि धमाझमण को कम मार के समर्पक परम मोर फर की सीमा में शुद्ध मसूत्र नम का प्रतिपादन करते है । मर्यात् कारण मोर फळ हम पेक्षान-पर्सन का मेर तो म्यबारनपसिद्ध मानवे पर उस मे से भागे पर परवेजलसूत्र मप रष्टि से मात्र एकसमयावमिम बस्तु का मखिल मान कर मान मोर पर्शन को मिम मिम समयमानी प्रयकारणरूप से कम पर्ने प्रतिपारित करते हैं। सिरसेन पूरि पो ममेर पम के समर्पकलों ने संमा नप का माप किया tो जिपर्य-कारण पा लम्प विपक मेदों केल्योर में दी मनमा है। इसलिए पे तीनों प्रिपस मपमेरो अपेक्षा से परस्पर विरुण नहीं । १- पर्याय उत्सम हो कर भी विािम मही होगा। मन पर स सान मानव पर्याय धाम सही पावनभूध वन्यशक्षिका ममेर मान कर ही भवन्म को शाम में पारि-अवमा। और उसे बो अमपी पा सातिसाम्ब कराईपो और पर्याप मिम मि समपारपियन योरेभाग वन्य की ममेर विषपासे परमपर्याय एक मान लिया वन वदव सूक्ष्म मेर विवक्षित नहीं है। बोरबर पाण्य सूक्ष्म जरिवमिव ब स फेरपर्याप की भलाता गौण है। ४-मित मिम मममागी भवानरे मान और शानों की सचिो मेर मापार पर प्रचलित ऐसे मिम मिझ नपामित बनेक पक्ष भाम में पैसे मुने जावे १ से दो अगर तीनों भावों में पड़ों में ममामिद मतमेए वो क्या नाम है। पानी विपप में भरे हरे विचारों समाम रूप से प्रधानता बो दूर की पराका रटिगोचर होती है। इस बगह पाप्यापनी ने प्राममसिस न मयामिव पममेरों की सूचना की रेमो भमाननाश भोर पानोत्पतिम समय मुसाहा मान पर सपा पफ मान पर मचालित है। एक पक्ष वो पही मया कि मारण प नाश धौर मान लिपि पे पोनी, शरा पर स्पन होते है पर ही समप में । बम छिदूसरा पा रहा है कि रोनों में रखपि समयमेए से रोती है। प्रथम भानमात्र मोर पीछे पानोसधि । तीसरा पप पवा लिनमान भ मान मोर मान की मसचि ये कोई जो हो मार मदी। पारी पस्तुले पोपभाषप्रधान मोर माषमपान दो मिन सप मात्र है।
६४ पानपिन्दुपरिचय-प्रम्पकार म तात्पर्य वा उनी स्रोपा बिचारमा -निस म साब ने भनेभन्दप से सत्तभोर बसत से परसर निम पों प समन्वय पिया और जिस ने विशेष को मी विपण मौर विमेपन को कमी विशेष मानने म समचार लीभर मिपा पर जैन सामान बारे में मबनित तीनों पक्षों की गौण-मपान-माप से पगमा परे वो पर संगत दी। -ससमप में मी पो ममेकान्त शामरेपर ममाम मौर मब उमस प्रप सिर है। अनेकान्त में उस उस नप मनपने अपने विपप में भामर बाप रावा है पर पूसरे नप के विपन में ताला मी पती ही है। पड़ी मनेकात में भी है। ऐसा भनेमन्त कमी मुगुरमों की परंपरा को मिप्या मही भरावा । विलास रिपाठे विपन् सरसन सी को मते मिस में सामवम को मान हो। .-बम पुरुष एल्बुद्धि होने के भरण नोंच राम तो छ भी नहीं चामवे परंतु गरे धिमों विमिन पमों में विरोष पवावे है। पेब सचमुच चम् और पूर्व वा प्रकृति और विहति काम्पलम परमे वाले हैं। बर्षात् पे पद को निम वा दिय को पत एवं भरप को कार्य वा पर्व को भरण करने में भी नहीं हिचविषा। की बात है कि कहीं भी गुण को जोग महीं सकते। ८-प्रस्तुव मानपिन्दु सम्म बसापारण मार के सामने पसाप का फायर पा पीर है। दमा इस पाननिम्मु के माल्या के सामने ब्रासाल्पा, भपता और बीसंपति भारिबानंदी रमणीयता भी क्या भी।
ज्ञानविन्दुपरिचयगत विशेषशब्द सूची। [भाको सूचक ५४ | मनेम्वरष्टि १५.३९४० भनेकाम्दध्यपमा ८-१२२२३६५५ हकीप ५५ अम्बाकरण १५ १५. अमर-बनसर पम्परारमा ५२ थपरमप ८९१ २२ मपवर्ग पक्षण प्रपत्र भविस्व ५० पपवार भापपिए २१२२ भपाय मनपाए २१ २२ षपूर्ण समान १५ १६ १९४८.१९.५१ | मपूर्मशान ५२ ६३ | बसूर्मप्रच बयान कायापप पप्रमच पशाम मस्ति भरमार पष्ट २०४५ मापदेव बहकारमबार ४५ भमाप पोतभावना २२ बमि पम्म स्पसंगहो ३९४१ पोचपापी ५० ममि पोप रुपम २८ बमिनियोप पम्पासाय बमेरपक्ष ५५.५१५.५८१५ मनसर ८ बमेरमार अनमरव २१२२१६ चम्पासपसा १० भनम्वदीप बम्युपगमवार ५८. चाम्पासरसा भमूर्व पापपसाप २० जनावरण पनुगम २५२१३० अनुमान २४ मनुमानादि ५५ मर्परिमारणा मपोग ५. मर्पविधि २६ मभुपोगप्रर ५२१ २२ २६ पर्पती भमेकाम्पपपपापाटीका ६. मनुगम २५ भनेत्रपमान ६४ यापदि ६ 9 ५-० १२५ भबोप बईत २५ मार्पशाबा ६६ पावपिपरिचमान विपक्षण सूची। पर्वावमा १८३९ बास्मामिति 4.बाम्पास्मिक वात १८ पापास्मिकता अपमा २१ २४ ३.५५ वाम्बारिमविकासम्म अबपि १२९ १० ११ १२ बाम्यारिमसस्विमहान ४२. भवधि-मनापाप बाप्तपरीक्षा पसाबमान १५.बातमीमांसा ५५ भारम्ममका इनिष पापाय गमन परिणा भार्यपरंपरा २६ मरेचा २६ भारमिव घडवनिमिव ३. भरपही ५५ भाषयम मसापी वापरण ५५ बसस बाबरपर्म १४ बर्ष भाबरणमय भर्सवय २५ भापति ४५११२४॥ बईत-ममस्व ४९ मरिसा २०२.२८१०१११२ २० २५१४ | बासति भारसारसा २९ भाविकार १७ आ मामा | इतिहास इनिगमम्म | इमिक-मन भागमसारी २११२ बामिक पागममूग वार्षिक २.१८१९५५ ११ ॥ उ पापापा रस्ट मुमुक्षा हुचराप्पथम १८ प्रसन भारमवत्स बामपपाप भास्मन्सटि मारमावि मारमा रसा-अपवार ४८ रपम २. २८२९३.३४१५. ४.४१ छानपिन्दुपरिषगत विपक्षम सूची। २.२९ बम पपदेशपर २५२७ २८ २९३० परमरहम कारण ६५ उपयोग २१ कारणांत ३८ पाप्यापजी ५-१.२५-२५३० फातिमाशेठी १२ १ २५-६१ कामम्पिक पासिर काकारण ६५ मावाति ५६८९२५ ५५ ५५ कार्यकारणमार काश्री म एपेभो भो इनन्द २८ मारिक ८१०२८ माउसूत्र मय रससवार एकान्दमापी स्पोगित ३४ ऐदम्पर्यो मोपनि छि ३३ सम्मान . १२२२१२४८५४ ५९ बोलचिकी २४२५ मौदपिक १९ म्यान्यवरण मोपनिपद पर्सम ४१ जम्मामाचारकर पोनापिकपर्याय . २२५१५९५५ बम्पर्षाप करी २५४१ मी ४८. हेस १९३४१. १. गरम सम्म २५ झापरणानि १५१९ बस्य कर्मपपरम्म २.यस्मानापमा कमलपपप १५ोव्यापा ८.६५९ कम पाय १० धर्मवर्णन हमपम ५५.५६५.५८ कर्मविषयक २० प्रमवर्तित कर्मशास्त्रीय मसादिम २१ग १७ १४ मणमकमाए मांतरण समाप्स १८.४. मममास १८ सयोपसम ३. पम्पर्शन कर ५ ३५. परम्पी १२ शामिपरिषपणन विपक्षिम थी। - १५१९ वम्पितिधि पसोपशमी प्रकिया भोपशमबम्प शापिक सायिकमारित्र पायोपामिक १५ बगत् १९ बन्द परयो स्पिन स १७१८ ६४बर १४ 1 गंगेम जीवात लिनासगनि गुण ४४ लिममा .८१.२२२६२३॥ गुणमान ११५५.५६५९६०१५ बिनमद्रीय गोम्म सारखीवकाम ४ गोजापानमा विमेघरसून पीप ११४०१४ पीपनारशि जीयम्मुचि मुपरिधिान ) २९ | जीवविएपना बार्षिक प्रमाम दिमाग १७१८२६२८३२१५-११ भर्तिपमानाकाम निवास २ ४४४. पागार १८ वर्षमा पा २६ २७ र २८३९५४१९.५१५२ विकिस्सामा १८ | चैन १५. | परंपरा २५५२ चिसाम्प ३४ नपारमय सितमति ११५४ १५ नमाम १४१४ २३ नसाहस ९ मसिन वामप २१ | मेर देवन बेतमा ३१२१५ रेवमामछि मान पाँच प्रभार २ देतापमान ४१ मानगुण १५ सानपरोप ०६ मानाप ५२ २७०८ २०५५ १८०२४४ १९१६६२ मानविन्दुपरिषयगत विपसम सूपी । नप्रपा ३ नास्पयार्यनिर्णय नाम पियु १-१२२२ २४३०-४८ बाराम्भूमान ५४ ६२ | त्रिविध प्रमाणविमाग पानमीमांसा २३ मुगविपा पानपिरोप २१ देज पानसामान्य १३ |सागी मानसामान्य का सक्षम २३ परजस मानाबरण १४१५२० प्शन प्रामापरणीय १५ दान मानापारकर्मा सरूप १३ गापरण विगम्बरयामप १४१५ दिगमरवापर त दिगम्परीय ४५ गिम्मीयपरंपरा उत्तम २३ दिनाग २१ दरभी ३ पीपोपयोग वरणमुरम पुराण रापमसि देवनदी समसमर २३३९४०४४४५ सपूमा ४८५४ ६प से परपतिका सभर सत्ता ५२५ सरपामाप्य ६८५४ ५५ चार्य शक्ति ट्रम्पपयाय २९३.४० समासू इम्पहर बरसायापिगमसूत्र इम्यार्षिक २१ रारमपर १९ तिविप प्रमागदिमाग पप २०२८ चमोगुन रसादी ८५५. ४.४८४९ प २७ पुग नरसाप धरिषर पर्मसम्पाम पतान ६१ पर्म १४१८/पनि 'पर्मशित मविपरिषगव विपक्षण स्त्री। १८ ८ - ममीभार मर्ममार्ग अमेसमापी निस्सिपाव प्रापर्म १९४३ मिसियोप ५३५१ मारमा ३.१८३९ विश्सासमाथि पाराचाही परत ३. निमपप्रविधिम हरगतिमान ११ मेपासिक म | मेयम्परमैन मम्मी | गत्मभावना मेयरमभाषाम नियम मन्त्री पूर्ती नेमतिनि ५८ मम्मी टीका १८ १५१५२५1016 मन्दीरसि पापा १० नम्मी ५४२१ २४ २५.१९५९ बापराम पामीन १२. मपर भ्यापविम नपरीप २ म्यापमाप मपमेर म्यापमीमांसा पपररस म्पायपि ९ नपावरगिपी २ बाप रिक्षारपल साबित म्यापरि १४१९.२८१५४ मध्यमा ४०५४ मम्पम्पायसास ११माकोरियामाग पाम १५ पाप ५१२२. बामभरमसंस्मर २ पापारगर ५...११.२४ माममामात ११ म्यापासमारीन मी मायापपरप्ररिप . ११ निलिम्पासन पथ पर निपम पार ५५ | पनविषयान निरागमन सम्वन्ति १८ (प्रतिमानमर्गम निर्मम्बत्व २.२८ प्रमनिममाननिमाग मिति १९९२२४ २५ २२ पसमा पासप पुहिकार • पवन निर्वाच मानपिनुपरिषमा पिसेपशप्प सूची। ३० प्रति ७ परछेर परविपर पदार्प पदार्पोपसिति परपिचमान परपिचापिमानना परमात्मा परपेयम्प परानुमान परिपतमासमान परिपाांश पसभामुख परोस पयाय पवायार्षिक पश्यन्ती पाव पासपोगसम पारमार्षिक पारमार्मिक पानीष मिपम पाठीमारमय सिटक पिच पिचरम्प पुनर्जन्मपार पुरप पूर्वपर पूम्प पार पूर्ण पूनम पूर्वमीमांसा प्रणी पोतिष पोनिटाम्प पषधान २६२५ प्रकाशास्मपति २६२.५७ प्रकाशावरण १५४४५४ प्रमा प्रमक्ष ५.९४१४४ ५२ प्रत्यक्षडान १८ | मसम-परोसममाण विभाग प्रत्यमामुमब २४ प्रसवस्थान २६२७ ३८ प्रथमपर्ममम्म प्रमाण प्रभाकर प्रभापम् प्रमाम प्रमाण परीक्षा १२४० प्रमामप्रमाठी ९ ममाम मीमांसा ४१४३ ममाणमीमांसामापाटिपण ५१ प्रमाणम्मम ९ प्रमामबार्मिक १०२९४८ ममाण विनिमय प्रमाणसमस ४८ ममाणसंमा ४. प्रमाणों मा समावेश ८ प्रमार २१२२१०२४ प्रमाण प्रमेय ५.४३ ८१.१९५५ १५ प्रतिनिधि प्रसपार ४३ प्रत पाएमाप्प ७२५४१ प्रशवि ६२ प्रमुन १५ प्रसंख्यान 7 फ M २७३०५ । R भारदिनपरिषपगव विपशप एपी। मसम्मान-सम्मावाव समाविका प्रारम्भ ५५ ब्रममावना ४९५. प्राचीन परंपरा २० TOHIRSR १८४.५१५२ माधिमासिक ११ पापप्रपरेरा प्रातिमाधिक सत्व भ मामाम्प ३९१ मगपती १२४ प्रामाण्यनिमय मामापविमरपाया मम मषाः २८ मय १ मररी ५ मदरीप ३८ ममोपहिर्म ५२ माव पचीसी माधम ५० माबमा २८४६४ पाप-मोह मानापरणबार परिसरमा मापमापरवाही १६ भविनाबम्प २२ मापनास २९ बुद्धिमत्त १५ । मानव याप्प १२२५४१४४ पररूपमाप्प ५२६ माघार १९ २.मुपनमा मोस १३ १४ १८ २८ २४१४४१. मोबन ४. मोगरसेन १५७३८४४४६ मौदिया पौरपीमापा मोसम महिमादिकाय २८२२२२४१ बोडसम्पराग २५ मगन मिस १५ १५५३५४ मत १८९१५२१२२४१५ मम्माम ५. ५५ |मतिबादपार पान प्रपमानमनिरास १२ महिमान ५२ २३ २५४ मायाम सेनानादिमी लिपि ५० मतियानगरप मपनिहाल १८ मविपनि २१ १२ | मनिमुन प्रमाद ५. मक्सिामर्ष माईसम रतस्प ४५ । मदिर पोगविम्यु सावषिमुपरिषयगत पिशेपसम पी। ७३ सखुपयोग २१ योगरीन १९२० मपुमान मम्ममा ३. | पोगमाप्य मन पोगमाप्मपर ११ मनोसम्प २८५३ | पोगसूत्र ५५ मनापर्याय ४२२४०४१४२५१ योग्यता मम २६ योगपचपन ५५ ५६ ५७ ५८ मम्मकाम १० बोगपपवार ममिरविमर्माण ३२ मपगिरि २५३९५८५९ ४० मछप गितपटीन रपुमाय १९ राग ४.४८४९ महबादी ४४५८६०६१44 महापामा पति दास का प्रारम्म २७२९ मा गियानन्दी राजवार्षिक ८९२२५५ मा रिमात् पर्वमूवाति रायपापिपर समीपसम मिप्यारपि पम्पि मीमांसक ८२३२७ २८ २९.३४३५ किमि २९४०४५४४४५४६ मेप्रेचरमाम मुचि ४१ मू-अमूर्च प मूर्चकर्मरचमा २० मू-समान १२ पाम्बपरीप मोप ५० पास्या २५.२६ २७ २८ २९ ३० ३४ मोह ४८ वापसविनिम २१ हिशाम १५ वर्णनही मूग परिपा प २८२९ २९ पास्मापन ४ पदीय हिंसा पचना पसोनिनपणी पुफ्तयोगी पुगपत् पक्ष पुगपदपार उखानयोगी प्रसन 10 १८/पाइयोधी १ ५४ पादपरि ५९६१६२ पासुस पायम मनिषिमुपरिचयगत दिवसमस्त्री। ५२५१५४ १२ ४ वैदिक २६५४४१ २६ . ७२. ५१. देशाम्त प्रक्रिया देशान्द्रमक पार्विकार पावसार देखी बासना सिरुति विचार विचित्र परंपरा किम विवडा रिकस्यता विर सचि बनपिणी विपाम २०१२२९१५४० अवस्तिर मिति-निरोप विपाश्मरम्मी बायुप विषयम लिपतिपचि ५४५८५९ विसू विमुक्त पोगी १८ बोपन विमुक्त पोगी प्रसस परिव Aथ्याचा म्यहमापर नियमादि म्हावापर विषमापना ४९५ म्पपरिचय रोपण बाकरममघमाम्म विषधी ५६५८५१ भ्यासाठी विसे पापभाप्य ८११२२॥ मापायम २५ २६४५१२४६५६५८५९ मारपारिक विषेप्य ६४ मोमबती रिपय १६ योमशिष चि सपारी शक्ति मग २८ समप्रमाण परमित रसाय शाहिम घरमाध्य १४ १५ १४१८७५१ धामपोष देशान्तरसमा धाम रातरम १६१५ माचीवमुपप १२ २८ ५१५२ ५२३४५४४ . जापा ४८ R मुपपरसम्म मप्पान सुखवार्षिक कानपिन्दुपरिचयगत वियोशिप स्पी। १७ धाम्मरीपरंपरा ४६४. ताम्बरीपपारमय ४४ एव्यम्पमपारेस शुपम्पोपपोगहर चमचम् शुपम ५३ पद्मागम ५३५४ पमान २ | पद्मानपत्रिवत्त ४९ पोर २. स २० रापाव शोपरदेसम्म मानरूपदर्शन का मानसे ममेर भमणीपन मममपरंपरा ८ | संहासर ५० सचागद सस्प मत्सगवेपमा सरन . ६५ ५१ पदर्शन ५२ समिकर्ष भीपर भषण-मनम-निविप्पासन | सनिक ३९. सम्म वि.१२२२५२५५५९६०॥ ४८९२११२३५३७४० ६१६२६३ समन्वमा सम्पानावरम समापियभ्य पर्मरामाश्य मुपपर सम्पचि निमिव २०१५ सम्पदान इनिमितमोर नवनिक्षित सम्पादन मतिका प्रम समग्रष्ठि समोगी-मोरी गुणमाब १८ मुताम्पि मुपसामध्ये १४२१४१५३ समापी मुविस्सपाय २८ शाम मुनि मुनिप्रयाय २३ ससिदि ८१०-२२५५ हुतिस्पति ५२ सिपिरसहान २८ होपयोग २१२५१.ससिनिय वापर दिगमर १२३६ सरिससमोष वापर दिगमरमर सम्मे पामा म सम्या ३४ २१ सय २६ साथ भावविन्नुपरिषगव विशेगान स्पी। २५ सहिण २७ (संदिवा पाठ सांस ५ ३५. मेह सामसार ४३४४४५ संसार सापुजीवमी महसवान मह ३४ संस्मरस्मक साघुसा २६ सामाम्पनियम सामूहिक १३१४१५१९२८२९३२ सारपबनक मौसमरिन ५१२ साप पापी सौस्परम सित १८ सम्प-योग १५.१८२५४४४५ सियपि सिरसेन ६.१०२२ २३ २५१५ | सिंगल ५२५५५८५९६.६१ १२६५ विभर सिस सेमपनि भी " सिससेमी सानाधि ६ सिसोम ३५ सिवप्रयत्व विशन्त पितु मुप ४९ मरण १८ मरेपराचा स्मार्ग ३४ सूचना २१३२५ स्पति ५९३४२८ सत्मा बापरासपा सूप सापरबाकर सूत्रमाप्प ४३ सवायरवस्थ सूत्रकी सवस्वमरवमामाम्प सूरतसिंपनियुक्तमुगम मपामाम्य सूपसी २५ हतस्व-परवरूप सरूपमतीप्रविधि १८ विज्ञान सोपचारमार्मिक | साहित संग्रहमय उघोग सा ५. दरमई ५१०१.१६ १७.५१ कार संतारण संपरियम १७२९३११२११५. संप्रमाव १८.हिसा-बारिसा २८५४ ३३ दिनु ३ सक्षर वा सम्मारमा २९ हेमरम् संपर १९ हेमरगमामारी २. 1. सहपमम सेपास २९ रमही १९ दिसा सेपम सपादनमें उपयुक्त प्रन्यों की सूची । परत-(म) पनरमामय (मगमगाम ) ममगार-मार्माएन (पीमा मामा ) मभिप-arishपरिपा) मापामा (मोसमय) मा मातमी. पळदीमामा (रमागरम ) मापनि प्रतिमामा कपूर (पिमत) मर्ग-टरमा परेशर (तमाममा गोल) محمد (مطبعا هتلها معلينا) मापनियोग (जामोरी गुम) لماممتحده (سه میله هسها) धर्म-गोम्पानारमा ( भारत पाप) मर-मंग(रो) पाम (Mothe) उपमा-पार (सम्मा) खाए (Maanuary تولد اسدالسمه مهمند) पियनी ( Ant) मार सामाग (Ranam) जागा (Ans रन) (10)xuvadin हाtratima امیرمحمد (محمد مهنا ها هنا - Wapmap.in - سید سوله Ant.rentrate }mirr(se rathoritaintimmotu minTI red rouristup tette -- संपादनमें पास मन्त्रों की सूची। प्रमगुपपर्यापमो पस (सोवियोपासन) म्यानपोगतमा (मेशापलिक) शानाबविमा (विरार) पम्मम (पाप) चर्मपरीमा (होरिमन) मन्दीपासून निमप-पकिन पनि (मेक्षि) पापमान ध्याय--वाफारम (मानव समाज) व्यायामामुमालमे व्यापरिनित (बौका तिरी ) व्यापम-बाबरी ( ध्यानमा बारमात्मालामाल (सिमी) प्यारा भगवार्षिक (मेशाबा शिरीष मी) यत्पबा-वा-सत्यवार्तिकवायव्य पत्र-पम्य (वादियोt) पारधी पविभागप्रतिमा पा(मावस्य) पानीपत पात मायान्मापाच पुरपार-तार (a) प्रथापना (कमोपपसमिति) ममायनरम्यानपदवालोणार प्रमाबमा-मालपाकि(मा) मामी-मा-मामांच-पथीम (म) H ( मधम-मतिमा मातम्पन्ना (निवासस) प्रमो-बोरर प्रामाण्यवादगावाबरी पदमापन(ममाएबा समा) पानागपात पानामपूर (मन्वयाम) सामना-पाल(ल्प) बोधिय-बोधिषपया (वि मामा) मप-समय ममजीता भावि-मानिसमा मामवी-मीम मन्तिमवियप (मोन्स) . संगनमें गार प्रन्यों सूपी। मम्पाम्तमपरिमापापेम मरामारण (साग) मारर-पापा (.m) मीमांमारामामार्गर पुग-सगरमा मुषमा-पापीरातमुगाई मसमम्ममममममम (दिरा) पो.मा-मोतिहासिम पोगर-भोपान पोगर--मोगरा पोगमाप (पान पसी) परपावागार) सोम्पामा विपपिरर(N) रिम-निरपोकर रिमाल (पो रमा) तर-रामापी) dried MyRIAND میللدهسههلسعيد पार-रामान (Ayuminawaranana दिमा-image منهله (سنسنعلی) HARDay HOMrtun नामनि-नाम Ummanyuman میدمرتمله (ما سمحي لما) (una-Mann (PRIMAunty (५."nary السعودية (باد) (Mana ( Atmenp سلسجمان محمد (مله) ज्ञानपिन्तुप्रकरणस्य विषयानुक्रमः। १ १ २ - ६-२० १ सामान्यपर्षया मानस पीठिकापा पिगम्पपूर्णप्रकासनिरूपणम् मत्सारिनुपरूपममप्रमाविरूपणम् पेवम्पस पासवानाववे विपरणाचार्यमवस मिराठा अमानस जीवामपल प्राविपमा पेति भावसतिमवम नियमा ममप्रकासस भयोपनममेरेन मानावसमर्पनम् प्रासद्धिकी पपोपसमप्रक्रिया २ मति युवधानवर्षा मविधानस छमणम् मुलनिधिवासवनिमितमविज्ञानयोगपषम् परारिरूपचतुर्विपनामार्पवानम मुवरुपैसार्पोपमोगलसमर्पनम् शुक्सानाम्पतरस्म मतिविशेपम इवस्वसमर्पनम् पूर्वगवगापापा म्याम्मामामिस अवम्पवानुगमनम् चतुर्णामबहादीना कार्यभरपस्वपरिवार। भाषा निमाय वयो। परसर संपम्परिधारा प्रामाण्यतो ईसामर्मपरीक्षा मामाण्माप्रामापो लवस्व-परवस्त्वानेबान्ते मीमांसमवेन दूपणम् मीमासकीयम चूपपमोगरा भनेकाम्वरला प्रामाण्याप्रामाम्पो मतप-परवस्तसमर्मनम् मारपोर्पापारामस्वमपावस व फळामस्वामिविप्रवर्गमम् पारपायाः परिपालमपावपार्परम बम्पमतेन मुखमममम् मनिहतोपयोगयोरमिमत्तमिति सिखसेनीपयक्षम तिमीकरणम् २ अपिमानर्स ५ मन पर्यापनानपा मरपिममापपापहानबोरमिनस्वसमपंचम् ५ काठमानपा पसमिसानुमानोपम्पासा देबठे माषमाया। मामारेनुत्तनियमाव पत्र। पोगापमापनिपनापरपम्पमतसिमित . .
८१ २३-३३ २३ १५ ७ १३-१८ मानसिरप पियानुम्मा । पगाएगानापासागमनम् गगाममगिटन परपस मरामा मेगग्पमापनानिरागाय मामिप्यागोरिया ६. सम्यानममीधा भाIEREIनपाएममुमूरनमलनिगमा ििरमामामानिनिनि-रियापा: निगमा समान पुननिरम गिलगनोग्योपमेदार प्रमागरा प्राविषपापाम पनिंग्गारापानिगा नेपालमानस प ना ममदापनप मुनिम्स एप नेण्समरामारगमपनम् मिपा घसम्पनपारेनषाक्तिः गरिमपिरपसारनसनम गमनम् दुगेर प्रोपर गरमानगरपालिका ७ पानपान-मनपोदामेदपपी सामान पोर मनिष NEETA मनोमाम गगनम समान-नानपरिषभुमानम् ग। पान-गरपास्मिरनिराम रान-पान मसागरिरोप प्रगाभेरपपमोरयाणा भोपेर गमनागमरम गमनम् भारम्पत्रिग्पगमारपरम्न प्रक्षेपमा मास्तिरामा गममातिम् मगोपारिवारमा बामपन समिरम् RATNोपरा तपसगार Fridोरातारा Teamin formerika Trnment re Cent entmathurrn ૧૮ "
४५
८२
मानविन्दुमारणस विपयानुनमः ।
बस्राविपरमानापसनस्मामास्तम्
मुखबानस्म पर्सनत्ताभाषा
मरपिसानमेराबपिसनम्
एकसेग पसोपयोगस ग्यारमारपम्
समयाम्वरोल्पातोपिता परतीधिकामिपाया
रपिसप पर्सनमपि सम्परमानमेष
सम्यग्यसनम विशिष्मानस्वम्
८ अन्यत्प्रततिर
९ धानपिन्दुप्रकरणस संपावासटिप्पगानि
१० पानविन्दुमकरणस परिशिष्टानि
१ पानपिम्दुगताना पारिमापिसमाना सूची
२ वार्षिम्युगवानो प्रम्ब-मम्पप्रतिविपनामो सूची
२ शामनिम्बुगतानो पापाना सूची
१ पानमिसुगवानी वरपामा भी
५ मानमिन्दुटिप्पभगवानो पारिमापिक्सप्पाना सूची
३ शाननिम्युटिप्पणगवानो बिशेपमामा सूची
११ दिसाविपत्र
१८-१९
५१-११७
१२८
श्रीमदयशोविजयोपाध्यायकृत ज्ञानबिन्दुप्रकरणम् ।
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यौपापाय विनयपद्रशर मगर ययपुर भीमान फलेनामी पौष न्यायविशारद-न्यायाचार्य पपपुर वासों मोर से श्रीमद्यशोविजयोपाध्यायविरचित ज्ञानबिन्दुप्रकरणम्। ऐन्द्रस्तोमनत नस्था धीर तत्त्वार्थदेशिनम् । ज्ञानविन्दु भुताम्भो सम्पगुद्धियते मया ॥१॥ . [१ सामान्यचर्चया ज्ञानस्य पीठिकाप पः1] फेषलाम्पपूर्णप्रकाधानिरूपणम् - १त्र पान वानदास्मनः स्वपरापमामा असापारणो गुणा । स प अम्रपट । सविनिर्मुक्तस माम्पत इस निरस्तसमस्वापरणस्प जीवस्प समारभूवः केवलज्ञानम्पपदे उमते । याहुरापार्या:- फिषरूनागमणतं सीबसहा तप निराबर ।" इति । मस्यादिचतुष्करूपमन्दमकाशनिरूपणम् - २ पवमानं पपपि सर्वपाति फेवसमानापरणं कारपैनव आवरीतुं म्याप्रियते, क्यापि तस्स मनन्तवमो मागो नित्यानाति एमावतिष्ठते, वयाखामाप्पा - "स- भीग पि प प मानरस्स मनन्ततमो मागा मिनुपातिमो चिहा। सोवि र मान- रिया, वेष जीवो भनीववर्ण पाविमा ।" [मन्दी० स० १२ ] इति पारमर्पप्रामाम्पात् । अयं प स्वमाला कालमानापरणाइवस्स वीवस पनपटलच्छमस्स रपेरिस मन्दमय इत्युम्पवे। १२ कोतवटमानावरणमे । फलतमानम्पापमानत्तम्पाप्यमाविविपार रिएमे डालस पानार्मस्वात् । मत एप न मविमानापरमधयादिनापि मतिमानापु- स्पादनप्रसङ्गः । अत एव चास 'पिमा गुणत्यमिति प्रसिदि। १४ स्पष्टप्रभासप्रतिय पके मन्दप्रकाशमानकपमनुत्पते पागपावरपे बनादार प्यम्, न द उस्मट इयादाविति कपमत्रयमिति थे। न, ममापापरये उसको उमपस दसनात् । मत एक पत्र- "मावि मेपसमुदए ऐति पमा पंवराण ।" [मन्दी• सू०१२] । १परदेश बना। Rधानमती hal २ सामषिमुममपम् । इसे प्यान्वित पारम । अस्यावेऽपि पन्द्रपर्यादी दिनरबनीविमागोवरपर सपन भीवेप कन्यम्यावर्चकचकन्पमावाविर्माप वावश्यक इति परमार्थः । एषकर्ष मावानातत्वमिति तु' अर्पिदम्पपर्यायास्मना मेदामेरमादेन निसोंठनीयम् । पैतन्पस्य भारतामातत्वे विवरणाचार्पमतस्य निरासा- ६५ ये तु 'चिन्मात्रामप-रिपयमबानम्' इति विवरणापार्यमताभगिपो पेदान्तिनसेन एकान्तवाविना महस्मनुपपचिरेग, अपानामपस्वेन मनात पसन्यं यत् परेप परिपप क्याजमिति विरोपात् । न प 'असमस्वादि बचानविपपा, बसन्म बामया' इस विरोमा समस्यादेः बिदूपस्वे मासमानस भारतवायोगात् , यमिद्यस्वे पब भावरपायोगात् । करिपतमेवेन असणत्वादि मिपम इति पेत् । न, मिमावरये परन्पा- • नापरणात् । परमार्यो नास्त्येष मावरण पैक्न्ये, परिपर्व को रमतमिन क्स गविरूपम् । वेनैव च पिनासमसादिमेवारपना-'पैतन्य स्फरति न असगास्मादि- इमेस्पास्मीयमाना' न बिमति पेत् । न, परिपवेन रमतन रखककार्यरत् परिप- सेनापरपेन सावरणार्यापोगान् । 'म मा न भानामि इस्मनुमर एष कर्मस्वाशे मार- रणविपपक परिपतस्थापिक्स पर्पकारित्वमाषणे, अशानरूपक्रिपामन्यस भविमपस • भावरणरूपमैन प्ररुवे धर्मस्वात्मनस्यात् । मत र अस साधिप्रस्पयत्वेन समोचरम- मागापेषा न निधिप्रसाद इति चेत् । न, 'मा न बानामि' इस्यस विशेषज्ञानामावनि- पपस्वाद , मन्पया 'मां बानामि' इस्पनेन विरोधात् । टप इत्वम् 'न किमपि पानामि' इस्पादित मध्यसान्न प्रपोया | फिज, पिक्षियविशिष्टयो। मेदामेदाम्पुपगम पिना बसमस्यादिविपिर पैतन्यमानेन विशिष्टावरणनिाचामपि पुरकन्यामाप्रसा, • विशिष्टस फरिपतत्वात् , अविशिष्टस प मन्नुमपात् । महावाप्पम निर्धर्मकामविपयर्स बोनौठपिप्पामा। भसामय जीवामपत प्राषिपयत्व पति पाचस्पतिमतस्प निरासा- १६ एतेन 'जीतामय प्रमविपर्य - महानम्' इति वाचस्पतिमिभाम्पुपगमोती निरस्ता, बीवनयपोरपि परिपतमेदत्तात् । म्यागारिकमेप्रपि वीमनिष्ठापिपया और प्रश्नोत्पधिप्रसङ्गात् । न च 'माहारादिप्रयोस्पपिन इंटष, भाचपादिप्रमाबोस्य- पिस्तु विपपपपपातिन्पा वरिपाया ईसरे सत्येन मैप पुक्का इस्पपि साम्प्रदम् । समातरमण एष एतन्मवे ईपरतेप्रप महान्टक रखतोपादानत्वात् उस भाापावित्र- पोपादानलामिपानासम्मवात् । रमक्ससे हि वर्मधारन्छेन रखवादानमिदमेशा पेमेन रखतोत्पादकम्' इति लपा स्तम्, एक्पवानं तु मविप्रकोण क्या । प्रात्तेत . मा बीब मारोपमादम। प्रतिमा पतलेपनाहरक मु। •प भरम। मु १ मामापा हानमटिकामा 1 . प्रमादागम्नराव न सिमिदान् । आमनिपमन गुरे पापागदगी पर पिमहादिनि रिमनियमान । बम्बा मनगनगदापारवाना पन मातोपी मननापमागारतिरोनाल र मानरामार मामात पाणी अनन्नापापरिमारितमूनिः मन्दमममनामयो नानुरम। पन्दमातम्यक्षपोपनममदन नानास्यगमनम् - [७ मानगगान्तिपतिमानापारपोरमममेदाम्पादित मानाने परम्परामा मन्दवासमा अनगरमायापारम्पविरामोपात् । म -सन्मादिपयापरन् माग्मममारणेप्री मतिनानादिरूपमन्दमममम उापिमरण मादिगमारपेन उपापिरिगम निगमसम्मान काममारानुनित पामाप्पा' । म पत्रिीपापरणे नागिपर्नगावमगम पापारमिय पादिपमा गरि प्रगति नर ना हरिमापाप नितिम् । मिपि पागपमा निमुनापार पनिपामगारम धारिमारि पारिएपग पुनारन मानम् । परमप्पर-परमानारगन नपणा मारगामधाम नला. समागम पग्न मनिशानाम्पादिना न गारर गम्मा तिर गागपाडसागर गरंपातिग्गापरापार परगाव, मम ५ परिवानामसामिातिपति- परिटिन। भापतिसपोराममपिता- मार पपारमानिसा राममो निरनना भरिया-rit नाननति मायति मानिमा मानमरन नामिभारनियमन निमाठाना पकानो गा. . با سلالمعما لجهلنا تقل | شقتلن کلرشرشر لسلالم د درمرمم لشهما للا هللللنترا هدرا ه بسدرا سرا للبشرا محيط ، ولمنعما و هزتردا لاهورا مهد تشكيلا امستمرا و مسليا عشتها ، يا اللطفلشعلشاعظمیدیا حتسليمها للشليع برنالمللعلا بهترهله تست خرمشعلاليط المالية لسطر شیشعلیه ما شد بها هنرمند و رزمندلس دا سا منا بفرنسا اسيا ممثلا قا عاما لا يندرلا الدننرملسلسقلعه که به دنيا بدمدل اشا نطنشرالطمع لملش تبلع بيد . منعسلهما فرد ملههننلسم کددا !! حنا دیا Lural Leaut- " छानपिमुपपरमम् । फरसबन्पयोग्पा परमप्रकर्पप्रम्सा शुदिा अनिाचियादरामाया संस्मेवेम्यो मामेम्मा परवो बायते, सदा बन्पमेन न ता मापान्तीति । न प 'पपा अम्पारोहे जनिापि पादरावाया संस्स्पेमेप मागेए मतेपु परयोप्रविपिनुरस्तात् मतिनानापरणादीनां एक सानफरसपमा, क्या आपकमेण्यायो सामसम्परायस परमरिफमादिसममेड पर • मानस अतीपरिशुद्धस्मान् केरलहिफस सम्ममन्पस एकम्पानकरसपन्या कर न मबति' इति महनीयम्। सपस्मापि केलसशिरसम सर्वपातितात् । सर्वपाविना मपन्पपदेप्रप निम्मानकरससब सम्मपाट । नुमानामपि प्रहतीनां अस्पन्दी वर्त मानपतासानम्मेर रसं पनाति । ततो मन्दमन्दमपिशमी तु विम्यानक दिम्बानगा। संहिबारायां पतमानस्त मप्ररुटीरेन न नमावीति जता नवरसखानपिन्वा ।। - पास्तु अतिसलिए मिष्पायै नरकगतिप्रायोग्या क्रिपौवसापा शुभप्रायपो बन्म- मायान्ति, वासामपि वपा साभाम्पात् बपन्यतोप्रपि हिम्बानफ एष रसो बन्पमापाति नकमानक इति' पेयम् । ननु उत्तष्टस्पितिमा हिलोकम माति, ततो परेव' अप्पासायी मारुतीनो उस्तरा सितिर्मवति रेच एफसानकोप रसः किन सादिति पेत् । ठम्यते-हि प्रयमस्सिवेरारम्प समयारसा असंस्पेयाः सितिपिपा मपन्ति । एकस्सा प स्थिती मसंगपेपा रससर्पसंपातविशेपा । क्व उत्तरसित बम्पमानापा प्रतिसितिपिशेपं मसंस्पेया ये रससर्पसंपातपिशेपास्ने वान्तो दिसार- परससा पटन्ते, न एकसानकस्सेति न ठमप्रस्टीना उस्कएसिविर पेपि एमसार- प्रसन्मा। उकप- 'उकोसहिई मसरसाणेहि एकट्यपिमो दद। पमिमाम मठिामसनमुम्पिमा र अणुमागा ।" [पंपदा म ५० पाति । १९ एवं सित देशपातिनो पापियानापरवादीन्ये सर्वपातिरसस्पर्प विष्ठा- प्परसापतो देवपातिक्या परिणमनेन निहतप, बसपाविरमसकेध प मतिसिग्मा अस्परसीहते, पदन्वर्गकतिपयरसस्पर्पकमागस उदपावलिकामगिटस घमे, शेक्स विपाकोपविफम्मलथपे उपनमे, बीपस भाषिमनापर्यायानपानाइयो • गुपाषापोपपमिया प्रादुर्भवन्ति । दकम् - 'मिहप्स सापाइरसेम फरेस देसपाईन । बीमस्स गुणा गावि मोहीममराहमाईम" [पंच... मा. ३०] नितेषु पावितया परिणमितेषु ! का अपिमानावरमादीना कठिपपदेशपालि रमस्पर्षमयोपसमा पतिपपदेषपातिरसस्पर्पानां चोरपा पोपनमानुषित बार - पिको मावा प्रानि । अत एव दीपमानाषषपोपनमाया वर्षमानापभिवानी पपवित। पदा पगापिपानावरगार्शन सर्वपाठीनि रससमिनि पिादपमागतानि मन्ति, सदा परिपय मौदपिको मारा फेवा प्रार्तते । फेसठ जापिमानापरवीप सर्वपाविरसस्सपना दसपातिक्पा परिमामा कदापिन् पिपिएमप्रतिपस्या का १। युदरमा व 0 १ सामान्पर्षया मानस पीठिकापम्पः । पिप तामन्तरेणैव साद, भषप्रत्ययगुणप्रस्पयमेवेन तसविध्योपदर्शनान् । मना- पर्यायनानापरणीयस्स विशिष्टसंयमाप्रमादादिप्रतिपचार, तयास्त्रमापानामेन पप काले वे मधनात् । पमुर्दर्शनापरणादेरपि वदिन्द्रियपर्याप्त्यादिपटिवसामाया तथापरिपामः । मतिताररणाऽयमुर्दर्शनापरणान्तरायप्रकृतीनां तु सदैव देपघातिना- मेष रससर्पकानामदयो न सर्पघातिनाम् , सतः सदेव' वासा औदयिकमायोपशमिकी । मानौ समिभी प्राप्यते, न केवल सादपिक इति उक्तं पनसमामूलीकायाम् । एतध वासो सर्वपातिरसस्पर्धनानि येन तेनाम्यवसायेन देनपातीनि काशस्यन्ते इत्यम्पु पगमे सति उपपपवे' भन्पपा पमोपनीवाना मविमानापरणादिदेसपातिरसस्पर्षमा अनिचिनादराया संस्पेयेषु मागेषु गतेप्वेन सम्मषात् तदर्माग् मतिमानापमान प्रसङ्गर, सदभाषे प सदसलम्पदबस्यालामानुपपचिरिति' अन्योयाभयापातेन मतिमा . नादीनां मूख्स एप ममामप्रसङ्गाम् । एवं मतिमुप्तालानाचमुर्दर्शनादीनामपि पायोप- पमिकत्वेन मणनात् सर्वपाविरमसर्पकोदये तबलामा देशपातिरसस्पर्मशानां च ममा मान्मात् मम्पवसायमात्रेण सर्वपातिनो देशवातिस्परिणामानम्पुपगमे सर्पजीवाना व्छामानुपपपिरिति मावनीयम् । १० ननु पदि येन तेनाम्परसापेन उतरसस्पर्पसाना सर्वपाविना देशपावितया परिमामा का अर्मादमा सान्प एक किं प्रयोजनमिति पेत् । न कि 'प्रयोपनपति मिया सामग्री कार्य नार्नपति' इति पतमम्पासितोप्रस! | पनि पूर्णे प्रयोमने पूरणनुमं चकन माम्पेत । सम्मान प्रकवे हेदसमाजादेस सर्वपातिरसस्पर्षकम पी- पपिचभ्पषसायेन का वचदम्पमसापेन सर्पदावोसपालिस्तपरिणामे पमाघरममावः । ११ वदे पानापरणदर्मनावरणान्तरायाणा विपाकोदयेऽप षयोपशमोऽनिरुद इति सितम् । मोहनीयस्स तु मिप्यास्तानन्वानुष म्यादिमरुतीनां प्रदेसोइये पायोपश- मिको मागोभीदा, न पिपादये, वासा सर्वपातिनीस्वेन बसस्पर्षपस तयावि माम्यवसामेनापि देयपातिवया परिणमपितुमचम्पस्मान् , रसस्स देसपातिवपा परि पामे तादात्म्पेन देसमातिन्पा तत्वकल्पनान् । विपाकोदयविष्कम्मम ह वासु सर्व- पाविरसम्पर्माना थायोपप्रमिकसम्पम्त्वादिसम्पमिपायकसिद्धान्तरलेन पयोपन मान्पयानुपपस्पर पारिपाम्पयसापेन कल्पनीयम् । परमानफेवउदर्सनापरणपोस्त रिपाफोदपरिप्यम्मापोग्पस्से स्वमाप पर परममिति माह सिमावादेर सदमाग सदेम्बेन परप्यमानेऽभ्यमसाये तत्थयोतुतारपनाया एपापित्यादिति । पुत्तम् । समान् मिप्पास्वादिप्रारुतीनां विपाकोदो न धयोपप्ठमसम्मका किंतु प्रदेपोरसे। ११२ न प 'सर्वपातिग्मसर्पस्परेमा मपि सम्पपास्यगुपपाएनम्बमाषा इति । सप्रदेशोदयेपि फ बायोपथमिकमारसम्म पनि पाप्यम्। मेप मुपातिरस सर्पयदेमानी सम्परमापपिपेम मनाग्मन्दानुमाीहनपिग्मोपमानदेशपातिरम सपन्नम्पवेसिवानां पयास्पितम्पपतपस्रनाममर्पवान् । तापपटे पप समय सीपत मानविस्तुपकरणम् । ६१३ मिथ्यात्वाऽऽवासपायरहिताना शेपमोहनीयप्रातीनां तु प्रदेशोदो दिपाकोरसे या योपनमोऽविरुदा, वासा देशपातिनीस्तात् । दीपसर्वपाविरसस देश पातिवपरिणाम सा पारिवानुगतोऽभ्यासायनिक्षेप' एक एम्पा । पर वा प्रसपो सुपोदया इति परिपाकोदयामा पापोपमिकमा पिसम्ममामे, प्रदेशोदपवस्पोप्रपन सामनागपि देशपातिम्या । विपाको पे' प्रपर्वमान पायोपसमिकमारसम्म मनाम्मा सिन्यारिवाद देशपातिन्यस्ता मान्तीति संक्षेपः । विस्तरार्षिना सु मस्कसकर्ममाति- विसरमादिविशेपान्या बरोकनीया|उका धयोपशमप्रक्रिया । [२ मति-श्रुतज्ञानचर्या । ११४ इत्यै च सर्वपातिरसस्पर्पयन्मतिद्वानापरणाविषयोपशममनि मतिपुतापषि- • मनापर्यापमेदात् पतर्षि पापोपसमिम मानम्, पाम पापि कमानमिति पर प्रकारा मानसा मतिमानस्प लक्षणम् - {१५ तय, मतिमानत्वं भुवाननुमापनतिनपिज्ञानत्तम् , अाग्रहाविक्रमबापपोगर न्यमानस्य या । अबप्पादिकमविपितमेन । मुर्व स भुतानुसावेति न पोरविम्याधिः । भुतानुसारिवं प पारगात्मकपदपदार्यसमप्रतिसन्मानमन्पमानस्वम् । तेन न सरि कत्सकमानसामग्रीमानप्रयोन्पपदपिपयतामालिनीहापायपारगारमक मटिमानेम्पाति- ईशादिमविधानमेस भुवमानस्त्र व साधरस्वापिशेपेऽपि । 'अयं पटा' इत्यपायोपरम् 'असं पटनामको न वा इति संतपादनात् वचमानोऽप्यपापेन प्रापाव वदारणोपयोग 'बई पदमस बाथमम्', 'अपमर्य एतत्परस पाप्या' इति परपदार्यसमपासापि - प्रौप्पेय बजनितमुम्दानस्सैव भुवानुमारित्वम्पपम्पितेः । स एष पारणालेन भुतदेतत्वाव-"मभुम मुभ ।" [मी० २१] इस्यनेन भुवस्वारपोरेन मतिर्पल रिपिा । 'म मई धमपुमिया ।' [नन्दा २५] इत्पनेन च मतित्तसामानापिरम्पेन मुवलिनिपेयोपमिहिना सत्यते । मुतनिभितामुननिभितमतिज्ञानपोर्टक्षणम् - ११९ कप पुननिभिनापुननिधितमेदेन मतिझानइविप्पामिधानमिति चेत्। उप्पने-असमानाधारभुनमानाहितनामनामनोपममानमासीनचे सठि धुनोपपोमामार पठीनं पुननिभितममहादिवतुर्मेदम् । उक्तबामनाप्रमोपो पारणासायोपपुन्पते, मुनोपयोगामारप मनिमानसामग्रीसम्पादनाय, उतनामनामयोपनाले मुनपानोपपोपा स्मयानगपना, मनिमानसामापा मुनमानेप्रति पञ्चेभी शामेछापानीपस *तम उपाया । मविज्ञानअन्यम्मरणस मविमानस्वार पुरमानजन्य स्परपमपि । मोमासर मु। भोगे पाम गरयोग . पी मायभाष मु। .
N म १ मविववामपों। ध्रुमपानमम्प एव परिगमनीयम् । उकरासनाप्रमोपासमानकालीन मतिनानं मोत्पचिक्यादिचतुर्मेदमभुतनियिवमिस्पमिप्रायेण द्विधाविमागे दोपामावः । तदिदमाह मामाग्यकार- "पर्षि मुमपरिफम्मिममइस्स संप मुआईम । व पिस्सियमिमर पुण भमिस्सिम मइपटक [विशेषा० ग्र० १६९] इति । 1१७ मपूर्वपत्रादिम्पकिपी त्योपविकीस्वमेप आश्रयणीयम् , ऐन्द्रियकमुसमान- सामान्ये पारपास्वेन, तदिन्द्रियजन्यमुसे तदिन्द्रियनन्यधारणात्वेनर मा हेतुत्वात् , प्रागनुपलम्बेऽर्षे भुवमानास्तिवासनाप्रमोपामापेन मुवनिमितमानासम्मयात् । पारणापा मुखहेतुत्व एव च मतिमुत्योः छम्पियोगपपेऽपि उपयोगममा समन्यते । प्रागु परम्पार्पस बोफ्लम्मे पारवाहितमुखानाहितवासनामयोपान्मयात् मुसनिभिवत्तमा बश्यकम् । ३१८ पारणादिरहितानामेकेन्द्रियादीनां तु आहारादिसंझान्यपानुपपरया अन्वल्पा- कारोविनधितार्यवापसम्दसंसटामझानरूपं मुखवानं धयोपयममाषअनि नास्यन्दरमेन । ।१९ भाप्तोकस शप्पस म्यास्पप्रमापेन पदपदार्यशक्तिमहानन्तरमामायामाना- दिसापिम्पेन बापमान तुझान स्पष्टपारणाप्रायमेष । पदार्पादिसपचतुर्विपवाफ्यार्पज्ञानस्य मुक्तरूपैकवीर्योपयोगस्वसमर्पनम् - २० पाम्दपोपपरिकरीमूतप पावान् प्रमाणान्तरोत्यापिसोऽपि पोपा सोप सी भुक्मेन। [२१ अव एप पदार्पवाक्यार्पमहानास्पारम्पर्यापमेदेन पतुर्विधनाम्यापमाने ऐद म्पर्यापनिमयपर्यन्वं भुतोपयोगम्यापारान् सर्वत्र भुतत्वमेव इत्यमिकैकापदेशपदादौ । ५ का-"सम्पे पापा सपे मूमा पहना।" इत्यादी ययाभुतमात्रप्रतीतिः पदार्थपोमा । एवं सति हिंसास्वापच्छेवेन अनिटसापनस्वमतीते माहारविहारदेवार्चनादिकमपि मागो. पपावडेतुस्वेन हिंसारूपस्वाद अपम्पिं स्पादिति पास्पार्थबोध: । यतनया किपमामा मादारविहारादिक्रिया न पापसापनानि, पिचादिफसलात् । अयतनया क्रियमाणं त सरं हिंसाताराव पापसापनमेखि महावास्यायोगः । 'माय धर्मे सार इस्यबाद । सपि गीवार्पयतनास्तपोगिकारणपर्दः निपिदमाप्पहुएवम् , विहिसफियामात्रे प स्वरूपहिंसासम्मवेभपि अनुपन्पहिंसाया ममाना न पोपलेशसापि अवस्य इस्यैद म्पषियोमा। ३२२ एतेषु सर्वेप एलीपोपयोगम्यापाराव न धुनान्यपानपश, ऐदम्पर्पयोपल- सपफ्तम्पाप्यतपेष भुवस्स सोश्वरप्रामाप्पप्यवम्पिता । पास्पपि ममिनाममोप जनके 'तपात्मप्यस्पधिप्रतिस पानपति पुत्पचिमति पुरुष न विरम्पम्यापारादिपमा मतपम मुसलम५ोगमत। पारम्पतिमा पुगेम। १मिपमागे ८ मानपिम्भारपम् । पहा सोध्यमिपोरिस रीपदीपतरो म्यापार 'यत्पर सम्मा सम्मावि मयाभयपात् । २३ पतेन-'न हिंसात्' इस्मादिनिपेपपिपी विपविपिसापपर्याडोक्नया, अनुमिती प्यापकवानपम्छेदकेनापि विशेषरूपेण प्यापकसेप, साप्पोमे वशिलेस हिंसात्वेन पनवम्छेदकरूपेणापि निपेप्पस प्रवेशा-इति निरस्तम्। उपाधपपाली पनस प्रचोपपोगान्तर्मापे अस्मदुक्कामरस्यैव सामान्यार, तदनन्तर्मादे पस सामान्यपाक्पार्षपोषन सा मिसनामावेन रिशेपपर्यवसापकस्यासम्मवान् । १२५ अम्पबदिवदिप्रपणमध्ये एकविशेषवापप्रतिसन्मानमेव सामान्यनास्पार्मस तदितरविक्षेपपपरमापत्रमिति फाल्पनायो न दोप इति षेत्। न, विषयमाननुगमा। • पसंसारस पक्षपक्षपम्पापानेऽपि फठोरपचेम संस्परपावर अनुमस मनुसरणी पित्मात् । बब ति मतिमुतसाधारणविचारपोपयोग एपोपयुज्पसे' । मत एप सामान्पनिपेघवाने निरोपसम्पन्न निक्षेपविपिस्सवाबपि विचारगया वविवरविशेष- पर्यनसानम् । २५ अपि प 'स्वर्गामो पजेव' इस्यप्र यया परेपो प्रयम स्वमत्वसामानापिक प्पनेव पागनयंतापहा, अनन्वर १ मनुगतानविप्रसककार्यमतजातिविशेषकरूपनम्, क्या प्रकृतेऽपि हिंसात्वसामानापिरम्पन पापयनफस्नबोधे अनन्वरे वनवासावर कानुगवानविप्रसफरूपमन्पने किं पापकम् , सर्मचम्पसन हिंसासामान्पोपस्क्विायपि पततम्यरूपानुपन्पावनिक्षेपस करपनीयस्वात् । सेव प फस्पना माल्यार्पदोषास्मि फेदि न वान्छेया। १२५ किय, पदार्थपोपा हिंसासामान्ये अनिष्टसाधनस्वारे आहारविहारापिक्रिया सनिष्टसापनत्वप्पाप्पहिंसात्वारोपण अनिष्टसापनत्वारोपतषणस्मक स पापार्य- पोपः । तस युक्या विपर्ययपर्यनसानास्मो महावाक्पार्पोपा । तो तिसरूपाम पत्रपपिप एष हिंसापदार्य रसैवम्पार्पयोपा, इसते पोपा भनुमपसिरसारेप दुर्गारा। • सुतजाना पन्तरस मतिविशेपस्य मुतत्यसमर्पनम् - १२० मुशानभूठोादेप भुनय मति-मानमूलोहा मतियानस्वपदेशाम्पेयम् । गा एष भुतानाम्पन्तरीभवमतिरिसेपरेप पदसानपतिवम्ब पर्दपविरामपि मापयत सम्प्रदायात । तया पोपभाप्पे- मानामेव समा म्पहिय दुति मइपिसेसेहिं । वे दिख मई बिसेन समागम्मन्तरे माप ॥" [विशेष गा. १५) ६२८ पदि प सामान्पमुनमानस पिपरसापकसमेर मविधानस पुतवाना म्पनरीभूतपम्, उपयोगवियोरेभप एपेपपोगम्पपदारप फनपापान्पारेरोति . १मा मोति। मनमा' ।। rai - । ॥ २ मति-मुक्सानपपा। निमाम्यते, सदा पदाथ बोधयित्ता विरत चाक्य वाक्यार्थपोषानिरूपविचारसहरुतमा त्या पिशुपं पोषपरम्पयायपत्यम्पपदम उमत इति मन्तव्यम् । परं सम्मसंस्पृष्टार्य- प्रहणम्पापुरत पदपायसम्म पाइकोहादियत् वस्प प न थुतन्वम् ?, घुमसम्पृष्टार्प ग्रामदेवरुपसम्धिविशेपो पारणसमानपरिणाम भुतमिति नन्गिरपाठी दर्मनात् । पूर्वगतगाथाया व्यापामाभित्य गुनलमणानुगमनम् - "सोइदिमोबन्दी होइ मुझ सेसप तु मानार्ण । मोपूण दमसुम अपरम्मो म सेसेमु ।" [ विशेषा० गा० ११७] पति पूषगतगाथायामपि भयमय परमो ठम्पते । ३२९ तथा प अस्सार्थ'-गोत्रठियगोपलम्भिरेप मुतमिस्पषमारणम्, न तु भोत्रनियोपतम्मि 'भुतमयति । मरग्रहहाठिम्पायाः भोपेन्द्रियोपलम्भरपि मतिमानरूप-. स्वात् । पापबार- 'सोइदिमोबसली व मुर्म न उ नई मुर्म चेय। सोइदिओवळदी विर्घा नम्हा मालाण ॥" [विशेषा० गा० १२२] सेप त पचारादीन्द्रियोफ्लम्भिरूपं विमान उन्मतिमानम् । तु शम्दोऽनुक्तसमुपयाप । स प अरग्रहशादिम्पा मोत्रदियोपलम्पिमपि ममुपिनोति, पाप्यार - "समुचपवयमामो कार सोईदिमोबस्दी नि । मा एक सर सोउमाहारमो होति माममा ।" [ विशेपा० गा० १२३] ६३० अपवादमाह-मस्या द्रव्यमुत पुस्तकपत्रमाठिन्यम्ताधररूपम् । तदाहिताया' उम्दापपर्यालोचनात्मिनया अपन्द्रियोपरम्परपि भूतत्वान् । अक्षरलामम य अपप्प पीन्द्रिय पदापपयालोचनात्मकर, न तु फेसठः, वस्पहाठिस्पस्वाद, तमपि मुफ्स्पेति । मोपस्कार' म्पारम्पयम् । १२१ नन्वरं पन्द्रियप्पपि अधरलामस युनन्वोक्त भोप्रतियोपउम्भिरेव मुतमिति प्रतिधा मिशीर्येव । मेरम् , समापि भोरन्द्रियोफ्लम्पिफत्पत्वादिति पहा । ६३२ भोरेन्नियोपरम्भिपठन भोप्रन्नियखन्पम्पअनावरमानाहिता प्रापी रि, इम्पभुतपठन प पधुरागन्नियनन्यसमाधमानाहिता मा, अपग्लामपठेन प सहविरि छयुतवानापरणकर्ममयोपन्नमनिसा पुपित इति सर्ममापारणो पारमानायचानाधि सम्सस्टार्पाकार निक्षेप पपानुगत" लक्षणम् , त्रिविपाषरधुतामिपानप्रस्तापि संसार म्पअनयो द्रम्पयुवत्वेन, सम्मिपदस्स प उपयोगायन्वेन म्पास्थानान् । म चानुगत- १ मा मुमत Ita मु। पाठ । मरिया पाठर- कपार मतपुरलपेपरष परमपशपमेनुसम्मतिक्षेप । एमात्र यस मतभारम्पपक्रियात्म भाप पापम् सादिना प्रपामारतत्रिप्रवनचरपमनानगरमसः प्राचिन्नुमा इम्पसमलिमिनो प्रयमविप्रेममयमेवर पासपने माता पि अरवर सवि प्रदिप जुपितः मान-स । ५ मिनत्र म-सि. नमसोममा मु! म तम्मति मुमय। पारि मु। पर पोपभ। म मु।१वम् मु। . + .
, . मानवियुमरपम् । सक्कमेव सक्षपमिति । श गोन्यायेन विविधोपलम्भिरूपमात्रमुलानमिति लमा मामादि। ६२३ अवग्रहादिक्रमबदुपयोगस्वेनापि प मविज्ञान एप बनाना, न भुम्हाने, म शायोपयोगत्वेनैव हेतुस्वात् । चतुर्णाममहावीना कार्यकारणस्वपरिष्कार। ३३५ मतिनाने प नानगृहीवमीमते, नानीहितमपेयते, नानपेतं च पाते, इति ममनिकपनमन्वयम्यतिरेफनियममामनन्ति मनीषियः । स्व-वपनासायां भर्मि मानस्वन, तदबान्तरघमोकारेशापा सामान्यज्ञानस्पेन पाहापाप वर्मप्रकारवानिक पिक्तर्मिनिष्ठसिदत्वाम्पविश्यवापदपायस्वागछिमे पदमश्कारवानिरूपितवानमिनिःसा- ध्यस्वास्पविपयवादीहातेन, पटाकारावप्ठिमसिसास्परिपयशायदपापत्तागछिये वाप्यसाम्पत्तास्यविषयतावदीहात्वेन या पारणायां प वपायस समानमारकानुमा- लेन, विशिष्टमेरे समानविपयकानुमबस्वेन वा कार्यकारगमाव । अपग्रह देपा बिमस्प तयो परस्पर संप परिचारा- (३५. ता अाग्रो दिपियो म्पञ्जनावमहाविग्रहमेदात् । मत्र म्पअनेन प्रमादि • परिगतदम्पनिम्मेण म्पजनस्स भोवेन्द्रियादेरवग्रह सम्पन्पो म्पजनावप्रा । सप महकमवियोपरान्ताम्पो सत्रोळाम्पामसंस्पेयसमयमावी। वस्सामप्यबसायो सम्पका पानमावा प्रथमसमभेन अमरतभरमसमये भवनान्यपानुपपरपा मान्यता प्रति पादिता । युक्त पत्, नियमतोऽपिसारपस्वैर धोत्पचिम्पाप्पत्वात् । अपिस भरणं माने उपयोगेन्द्रियमन | तब म्पअनावग्रहाले उम्पसचाई की म सधर्म मानं बनमेदिति अपमुपयोगस कारमाय । ३६ ननु म्पन्नाचमा प्राप्परिणामेपेनिपाणासको नामाप्पकारिणोः कर्म- नसोरिति सत्र कः परमां बाप्पा । पदि अविनासहि सर्वत्र स एवास्तिपति पेत् । न, जापि अपावग्रहात् प्राम्लम्पीन्द्रियस प्राणोन्मुखपरिमाम एर उपयोगस परपशि स्पपगमात् । न च सर्वत्र एकसैव पामयपमिति पुकम्, इनिपाची •माप्पपरिवापाप्यारिसम्पबम्पाप्रपुषस हस्सीपारपांचमेस आगमपुलप- पमन्येन प्रतिबन्दिपर्पनुपोगानवमशात् । १३० अविना-सामान्यमात्रग्रह, पता किथिएं मया, न तु परिमाक्तिम् इति म्पवहार । स सामपि । मामाण्पससी इंदामामपंपरीक्षा- ६३८ मत ईशोपयोग 'जान्ताहतिक प्रगति । स प सभूतासमवरिपोपादान- स्पामाभिएसएरिपारगारमा पपन्ते तपस्पश्चरेण पर्मिणि साप्पत्तास्पविपपम- मनपान् मबति । मन एर फळपानी मानप्रामाम्यसंथपान विषयसंथपा करम म। मानित। . शीता २ मलि-मुबानमा। प्राचापपीन्द्रियादिगतगुनदोपसंशपेन विपयसश्याव इन्द्रिपसागुम्परिचारममपीहर बन्यते । केवलमम्यासदनायो झटिति बायमानत्वात् कालसौम्पेप नोपलक्ष्यसे, मनम्पासष्ठायां तु वैपरीस्पेन स्पन्सपलक्ष्यत इति मठपगिरिप्रमृत्यो पदन्ति । १३९ एव सति समन्यापाये सर्वत्र अर्यपापात्म्पनियपस्स इयैव बन्पमानस्वाद "तुमगमुसपी परत पर, नवौ त सत' परसप" -इत्यारस्त्र विरुम्पेस । 'समयम् - प्रामाण्यमप्रामाण्यं प परत एब' इति कारणगतगुमदोपापषपेत्यर्थ 1 'सव परतम' इति । संपादकलापमानानपधया बापमानतं स्ववस्वम् । तब वम्यासदश्शायाम् , केवल षयोपटमस्व का व्यापारात् । तदपक्षया बायमानत च परतस्त्वम् । सब अनम्पास पशापाम् । अप प पिमागो पिपयापेषया, स्वरूपे तु सर्वत्र स्वत एव प्रामाण्पनिमय स्पपरार्य इति । श्यैय हि सर्वत्र प्रामाम्पनिमयाम्पुपगमे किं संवादसमस्ययापेक्षया । नसले गमकमपेक्षितमिति गमकान्तरमपि अपेषणीयम् । न च पाया पडविपसात् पत्र न भरमसाद्गुण्यविचार व उकलवस्थपरतस्त्वष्यरसा' इति वाच्यम् । ईहायां कमिएकषिपारम्पमिपारोपगमे माम्यासिमपापपूहापां अनुपसत्पमाणसापि सद्धि पारस' नियमझल्पनानुपपत्तेः । न पोहविचार ईहायां प्रमाजनकतावच्छेदका । न त वन्यतिबनकसापच्छेदफ इस्यपि युकम् , फरणगुनादेय प्रमोत्पची घस्सावधात्वात् । न प'माविधानस्य मसिदत्वात् उक्तविपारवत्यापील्या वद्वप्रामाभ्याग्रह' इस्पपि साम्म म् । विचारेण फरमसागुम्पग्रहे' माविधानमामाम्यग्रहस्सापि संमृतसामग्रीकत्माद इत्यादि विचारमीयम् । मामाण्यामामाण्पपो स्वतस्पपरसस्स्थानेकान्ते मीमासकमतेन दूपणम् - ५. ननु मवर्ग-सैद्धान्तिकमते उपयोगे-मवग्रहादिविषदष्टपम्याप्पत्त्वम् , एफा - पनि प्रापान्पन सामान्यपिशेपोमपाषगाहिस्सपर्याप्त्यापारस्वं वा ताकिम र प्रमेया- म्पमिचारित-प्रामाण्य भयोम्पत्वात् सम्पासेनापि दुम् , समर्थप्रापनौपपिकत्वेन मनुपाय च । पौइलिम्सम्यक्त्रया सम्परत्वदसियन्निवोऽपामा प्रमाणम् , पापिन्सम्यास्पपा परलोयांश इति उचापत्यादिनयनतास्पर्यपर्यालोचनायो त सम्पत्तिसमानापिफरणापायत मानस प्रामार्ण्य पर्यनस्पति, अन्ययाऽनुगमात् । पर विक्षेपपरिक्षेप्पमारे पिनिगमनापिरः । 'शानं प्रमाणम्' इति वपन मिनिगमकमिति पेट कपि समर्थप्रास्पोपपिकेन रूपेण चिनिगमयेत्, न त विशिशपायस्पेनानीप्तेन । सम्यक्त्वानुगतस्पेन झानस मानत्वम्, मन्यमा समानस्वमिति म्पपस्या हु नापापमात्र प्रामाम्पसाक्षिपी, सम्पग्यप्टिसम्बन्धिनां संशयारीनामपि भानत्यस महामाप्यावा परिमापितस्वात् । न च-'सम्पास्वसाहिस्पेन मानस सपिरूपस्व संपपते, पिरूपं पहान, ममापमिति सम्पत्ति विवेपपोपादानं फलमत्' इस्पपि साम्यहम् , एक्स म्पपहारोपयोगि स्पेऽपि प्रारपनुपयोगिस्यात् । न प पटापपापरूपा रुपिरपि सम्यस्त्वमिति म्पपारन्ति सदान्तिका, बीवानीवादिपदार्पनरकारिफ्यफसमाउम्मनमानविशपसंग रुपिरूपर- "भा मिस चाणपतरे। व परथमा . - मानापम्युमकरणम् । पापात्स्वान् । केवल मत्संम्यादिमागपाखान तमिर्पयो मारसम्यक्त्वम्, सामान्यतस्तु उम्पसम्परस्पमिति विशेपइति । न प-'पटायपापेऽपि रुविरूपत्वमिटमर, सदसहिउपवा- निशपगादिना सवत्र मानामानम्पसबारुपनात् , तदप पप्रामाम्पमप्रस्याम्' इति बासम् । बनेकान्तम्पापसासादिप्रतिसन्धानारित्वासनारवामेव ताप्सबोधसम्मवाद , तदन्यतो तु । द्रम्पसम्पसनर पानसमारम्यनसितः । भव एव परमकरणप्रधानानामपि ससमपफ रममयरकम्पापाराणा द्रम्पसम्परत्वेन पारित्रम्यवस्मितावपि मावसम्यक्त्वाभाषा प्रतिपादित समदी महावादिना । द्रम्पसम्पप-"वदेव सत्य र बजिनेन्द्र प्रवेदिवम्" इति धानाहितबासमारूपम् , मापतुपापनुरोमा गुम्पारणम्परूप मा इत्पन्य बसन् । सम्मामत प्रामाण्यप्रकाश प्रारयापपिया। ६४१ वदति सरप्रकारकत्यरूप मानप्रामाण्यं तु प्रारयापमिकमपश्चिप्यते, तस्स पम्पो प्रापत्तमगोषितम् । न्यापनपेऽपि भाने पुरोवर्तिविशेप्यताकत्वस रवतस्वादिप्रकारकस्यस १ अनुम्यवसायमापतापामनिवाठात् , 'इर्म तत्वेन बानामि इति प्रस्पया, तब पिशप्यापनरस्त्रयोरर द्वितीयावतीमार्यत्वात् । तत्र पुरोवति हरलेन रमवम्पादिनापि घोपनपक्सा भासताम् । न प-दत्तभिम पुरोमविनि न मासवे'-इति पाप्यम् । पिशेप्पणापा पुरोगतिना स्वरूपको 'मानानुपपणे वापविभपमानाभागाद, बन्पया प्रमेयत्वादिना जतादिनानेऽपि तमाशानापता, वास्यतिरिसस किभिमप्रकारेगा माननियमाघ । फिस, प्रामाण्यसंसमोचरम 'इव रजतं न पा' इत्येव सभयो, न तु रख तमिई न या', 'द्रम्म ग्न न मा इत्यादिरूप इति यशिशप्यरूपम्पन्धरकमानस्वापन्छेवेन प्रामाण्यसंमय वरमविशिष्ट व प्रफारफसंशय इति नियमात् इवत्वेन पर्मिमानमावश्यक • इर्दस्वरजस्वादिना पुरोवर्तिन उपनयमत्याच सामानमनुम्परसाप दुर्गारमिति किमपरम गशिप्पते प्रामाम्मे पातुम् ।। नप एसम्पन्धन तति सम्मपान्तरेग तत्प्रकारकमान म्पादन तन मम्म भेन सन्मारफलमव प्रामाण्यम् , सप गुणम् इति धान्यम् । म्पासाने पेन सम्म पन रजतनादिकं प्रकार सेन तदतोऽनुम्परमाये मानाव, संसर्ग होने मानाइ । वप्रकार र वस्तुगत्मा तन्मम्पन्मापछिमप्रकामवासम्ममिति प्रकारताभि- - प्रसनत्र मा समानम् । अत एप - रमनमिति ताराभ्यारोपप्पाप मुम्पषिसप्पणा प्रामाम्पे निमनीयति सम्पत्यस अरस्वमिस्पतरपि मनमाना, वस्तुगत्या मुस्पति पप्पटापा व निशा, ताहारम्पारोप आरोपांन ममापन मामाप्यसपपि अप तप । पनेन-निप्पकरवे मति समकारकत्वमा न प्रामाण्यम्, 'इम रारम निमे गगरजन इनि रिपरीपतुप्पाममापारण्यात, किन्तु टिप्पामापछिमतरप्रयाक सम्, तप प्रथमानुम्परमाय दुपहमिस्पपि निरन्नम् । पम्तुगत्या वापरनामस्वस मुप्रासाप, समा भनुम्पामापमामापा ममामध्पस, म्परमायमतिपन्यासमा प्पन समिनिसन मपुदिसिमानामात्रम्, नयापनापामप्रामाणिकगारवान् । एतेन पिपपतपा अनुम्यरमाप म्यानपण प्रामापमान प्यासापप्रतिरमहापापनापि नगर मु। मत। गचौरमोनिय ४धि अनुमावदेशमा •स (मु। .
. . . २ मनि-मुतमानपई। परास्ता । तत्र तारिशेप्यकतोपसितिवदमावपदिनेप्यरुत्वामाषोपस्सिस्यादीनां उथे- वात्वादिकल्पने महागौरवात् । यदि च विशेप्यत्यादिकमनुपस्सितं न प्रकार, सदा विशेप्यितासम्म पेन रजतादिमये सति प्रभारिठया रजसत्यादिमत्तमेर प्रामाप्पमस्तु । एतदानमेव सापमान प्रात्योपयिकम् । समाज्यप्तौ प्रामाण्यस्स स्ववस्वमेव पुकम् । अप्रामाण्य तु नानुम्यवसायग्रामम् , रचततामावरत्वेन पुरोपतिनोज्यासे योपनी- मानापोगा , रक्तस्वादिमचया नुकस्यादिपीविशेष्यकत्वं स्वत्वप्रकारफस्स प पत्र गुमते, यत एप "मममापि प्रमेस्पेव गुपसे" [तस्सपि० मत्यक्षमण, ५० १७१] इति चिन्तामणिग्रन्प', प्रमेतीत्येव म्यास्थ्यासस्तांत्रिम इत्मप्रामाण्यस्स परवस्थमेव । न च 'प्रामाम्पस स्वतस्पे झानप्रामाम्पसमयानुपपचि, भानग्रहे प्रामाण्यग्रहात् सदग्रहे पर्मिग्रहामावाद' इति वाच्यम् , दोपात् तत्संचयात् पर्मीन्द्रियसमिकर्पस्पैम संशयातु- सात् । प्राक् प्रामाण्पामावोपरिसती पर्मिनानात्मक एव वास्तु प्रामाण्यसंशय इति स्वत- स्त्वपरवस्स्वानेकान्त प्रामा पाप्रामाम्पयो बनानां न एक इति षेद- मीमांसफीपस्प बूषणस्योदार १४२ मामा-रमवत्पमहिप्पकत्वावपिछभरबक्त्वप्रकारसाकस्वरूपस्य रमतमान- प्रामाम्पस पस्तुसतोऽनुम्यमसामेन ग्रहणात् वसस्त्वाम्पुपगमेप्रामाण्पस्सापि स्वतस्ना-- पाव', रमतममानुम्पयसापेनापि वस्तुतो रजतत्वामावविशेप्यमत्वाप्छिभरमवत्स प्रकारवाकवसैप ग्रहाद । सत्र च यस्मामिरनेनन्सवादिमिरिष्टापषि फतुं शक्यते, द्रम्पार्पवा 'प्रस्पषस योग्यद्रम्पप्रस्पधीकरणबेलायां वद्वानां योग्यायोग्याना पमाणा सोपामभ्युपगमात्, सपरपर्यायापेक्षया अनन्वधर्मात्मकं वसमिति यासनामत एम्पत्वे सर्पहस्पधौम्पाम्युपगमाव। " एग वापर से सन बापा। ने सर्म पापा से एग बागा ।" [मापा० १३११२२] चि। पारमपस इत्पमेन' सारसम्पारम्पानात् । अवोधाम च अध्यात्मसारप्रकरणे "भासविपारपाम्पाससकार्मादिमिराभयन् । पर्यायमेकम पेति माबाद अपोऽसिलम् ।" [२३०J इति । न पेय रीतिरेपन्समादिनो मनस इति प्रतीप्छप्रतिबन्दिद पहारम् । मनेकातरट्या मामाण्पाप्रामाण्यपो स्वतस्पपरतस्स्षसमर्पनम् -- १५३ ननु रमतत्वरिशेप्यास्वरववस्वमारफम्पयोरेर मानोपरि मानम् , अपछि- मास्वं तु वयोरेप मिया संसर्गः, एक्य मासमानयोईयोर्मयोः परस्सरमपि सामानाधिक- रम्पेनेर अरपिटमलेनापि मन्त्रपसम्मवाद इत्येवं प्रामाम्पस बातम्, अप्रामाभ्यस, तुन तवास्थम् , स्वतस्तामाक्स प्यवसामेञ्फरमेन उपदिशेप्यातस प्रीतमयप परम्प मापसेका मुस ५। ३ बसप्रेशम म् । पोम्माकोम्पमा पर्मा र भरतको मु। • र मु। . भमवस सम्मुरपमान्सबा ५पलरम्यादा १४ मानविम्युमरपम् । स्वाद, मानगाइफसामम्पास्तु उपसिसनिक्षेप्पत्वादिग्राहस एप पापाराव इलाम दोपवि पेत् न, प्रामापचरीरपटकस्सारछिमत्पस संसर्गतया मानोपगमे प्रसन मामाम्पस प्रकारवासिद्धे, बंशतः प्रचारतया मानं प म्यामपविशेप्यावठिवास वासमधेन रमतत्वस पानोपरि मानेऽपि सम्मपवीति सारदेव प्रामाण्य साद , सस्से शानग्रमसामपाः सपापामाम्पर एप सामाद, मत एष नाप्रामाम्पस सतस्त्वमिति चेत् न, एनमम्मुपगमे 'मप्रमापि प्रमेतीत्येव गृसते' इस्मस प्मापावर, पत्र रक्तस्वस गानोर्पकसम्बन्धासम्ममाव , 'कम्मग्रीमाविमामास्ति', 'पापं नासि इस्पायोमन्नपिसारनेरकाछिमाठियोगिठाया इस प्रकठे उसमन्मस उत्तरमा रितानिर्पितारमारिवारूपा विठषणैव सुममा सांसर्गिकविपयतेति न दोप इति । • न, सबपि सपणादिनर बोप', उफप्रतियोगिवायास्तु 'पटो नास्ति' इस्पादामेर मरूपतः संसर्गस्तम् । उक प मिमा-“पीपची नो देवदत्त इमत्र प्रतियोगिल सरूपत एष वसन इस्पे समर्षमात् ।" १४ बस्सुतोऽमाफ सर्वापि विपया द्रम्पार्पतोसरा, पर्यायावम सतगति सम्पूर्णमामाम्पविपपक्षाशासियोभो न संपादपप्रस्पप बिना, न पा तापापामाप्परिपस वाममोपो वापरप्रस्पर विना समयोरनम्पासइयायां परतस्त्वमेष, सम्पासवधात धपोपर्षमविपसीधीनया 'वारसतारोहया वधावयोमपग्रहणे सवस्त्वमेव । अत एप मामाम्पान्तरस्पापि न दुम्रालम् , खोपयोगाप्रपरमूवेहोपनीतप्रकारसैप जपायेन ब्रा पात् । वारसी व प्रामाप्पविषयता नावग्रहमाचप्रयोन्परवेन मैफिकी, नापि पृथगुप- पोमप्रपोम्पस्पेन मस्प्रेकिकी, किन्तु पिठहति न किथिदनुपपर्म अनन्तधर्मात्मक • बस्त्वम्पुपगमे । अत एष वस्तुसप्लो पाने या परपरिणाम इति विधमप्रामामा- परबारपि न पतिः । एक प प्रमे मरजतनिमिचो रबवापर, संगठक्पायरामा सम्पाचरमवापराया मुक्केरेप बासमानताव, प्रमाया त रखतनिमिच इस्पाकारवषा- स्वस', परत स्वतोप्रहाम्पाम् प्रामपप्पाम्पमाप्रमोशवनेकान्ता" इति प्रा पापामपि विमर्ष कान्त एवेति प्रष्टम्पम् । १४५. न्यायामिपुका अपि पयाममावत्प्रेफिरूप्रस्मपसर्मस प्रतियोगिताबदार- मरगाहमान एक सर्मविपिएस प्रतियोगिस्लमबगाइते तथा मानठौकिमाहात्यारोपी धर्मस विक्षेप्पतापाप्मेदमसमरगाहमान एक परिशिष्टम रिशेप्पादिम्मागात" इति इईसविशिष्टसैर विसप्पस्वमरगाहेत', इदंसस विशेप्पतावप्छेदकस्मात्, न । रसम्लादिविपिएस, रमतवादरवपत्तिाव दरवं नियमस्त स्मकिन नोपनयमपाय मोफिमताप्पसापास्कारेअप न अतिरिवि पदन्तो विनोपनयं प्राथमिशनुम्पपसारस . विप मायामा बामपुरतमा अपिलमा पानिपी। मेषः । पसमयमा वारा मामला "पसरत प्रवेश २ मदि-मुवज्ञानवर्षा। १५ प्रामाम्याग्राहकस्वमेष आहुः । यदेव प तेपामुपनयम्प' कत्यं सदेव भस्मासमीहापा' इति वे प्रसकेन। अपनदेहयोापरांशत्यमबापस्प च फलांशस्वमिति प्रदर्शनम् - १६ प्ररुतमनुसरामः । एसामग्रोहास्यौ म्यापारांचौ । हानन्तरमपाया प्रपर्वते 'मयं घर एवं' इति । अत्र च मामुत्यादिजनितषयोपशमवसेन यानीहितो धर्म वामान् । प्रबरी मति, वनकर देवदत्तोऽय" 'प्राममोध्य' 'पापकोऽयम्' इस्पादिप्रत्ययमेदो पपचि । इत्यं च 'रूपविशेषाद मणिः पपराग' इत्युपदेशोचरमपि दाहितमासनामतो 'रूपविक्षेपात् अनेन पचरागेण भवितम्यम्' इति ईहोचरमेव 'अय पपराग' इस्पपापो पुन्यते । उत्तोपदेव पपरागपत्राम्पत्योपमितापेव उपयुज्यते । 'अयं पपरागा' इति तु सामान्यानग्रोहाफमेणबेति' नयापिकानुयायिन' । 'घर' इस्पपायोचरमपि यदा 'किम , सौवर्णो मार्गों पा' इत्यादिपिशेपजिवामा प्रमतते, कदा पापात्यापायस्स उचरवितेपामग मापेषया सामान्पालम्मनस्मात् म्यापहारिकापग्रहस्पम् । क्तः 'सौपर्ण एवायम्' इत्यादि रपाया । वापि उपरोचरविशेपजिनासायां पापास्यस पाधास्यस म्यावहारिकावग्रहत्त तृष्टम्पम् । बिमासानिाची सु मन्स्पविशेषमानममाप एबोम्यते, नावना, उपधारमारणा- मावात् । मर्य फलोमा। मासमान तु असान्वर्गहतमेन । सौदामिनीसम्पावनितमस्मयस्स पिरमननाधर्म्यमिधार इति थे । न, अन्तर्महतसासंम्पमेदस्मात् । पारणायाः परिपाकाशस्पमपायपार्पफ्य प- ४. अन्स्यविशेपारगमरूपापायोचरमविन्यविरूपा पारणा प्रवर्तते । सापि भान्त सहविकी । भयं परिपाकांश । गासनाम्मृती तु सर्वत्र विशेपावगमे द्रष्टम्मे । दार बिनमदगणिक्षमामममा- "सामनमित्तमाहण नेप्समो समयमोमगहो परमो । ततोऽयंतरमोहिमवत्पुबिसेसस्स योऽपामो ।। सो पुष ईशानायवेपनाए योग्मको वि टबमरिभो । पम्सबिसेसावेस साम गिपए वर्ष ॥ सपोऽसतरमा समो भवाभो म तमिसेसस्स । इस सामनपिसेसावेपसा बाबतिमो मेमो । समस्येवाया, मिच्छपमो मोमाइसम्मान । संबगहारत्वं पुण, समरवाऽजमहोपाभो ॥ परतमजोगामारेआमो बिय पारमा सतम्मि । सम्मत्वासणा पुस मषिमा मास्तरे चिर्स " चि॥ [विशेष. मा० २८२-२८१] १। या सापमितिमा पिसापतिपदेसरचो परामु। पापी मावा ५ मध्ये पाह। समुद। मुविस विषमत म .
मानविम्युमरणम् । ११८ नप -अपिप्पुतेरपायावस्मानान् पार्यस्पे मानामार, विनेपविमासानिाल पण्डिमभ्यम्पस कमिन् मिमत्वान् । 'अवगृहामि', 'हे', 'अवमि', 'स्थिरीकरोमि पति प्रस्मया एप प प्रतिप्राप्पनुभमसिद्धा अग्रादिदे प्रमाणम् । स्मृतिजनम्ताव छेड वेना मा अपिप्पुनित्य धर्मविभप करप्यन, तचदुपधान्पस्वस स्मृतिजनम्साबरछे 'दफरिप्रने गौरवादिति घमपिशपसिहा पर्मिविशुपसिदिरिस्पपिर्क महतमानार्ममा अपसेपम् । तदर्भ निरपित मतिमानम् । वमिम्पपेन च भुतधानमपि निम्मपितमा । इयोरन्योन्पानुगतत्वात् त्या म्परम्पापितवाच । मन्पमतेन मुनलक्षणम्- ४९ अन्य तु अहोपाङ्गादिपरिमानमा युतन्नानम्, अन्यप मतिमानमिति । • जनपोगपि मजनन । यदवार पाचपरी-"एकादीन्यकमिन् भाग्यानि साचतुर्म ।" [तत्ताप १२१] ति घसंस्मरायमाप्रमादित्वेन मुवस्ने सु मरग्रहमायमेव मतिमान प्रसन्पेन । पारणोचरं म्बममानकारधुनावश्यंभावकल्पनं तु म्यनामनामात्रविमृम्भिवम् । सणसंम्पटोपा मवरर थुनमापरिमापण तु न प्रषगुपपोगापामिति मादजानमन सुनसानम्, न तु अपगेधमिन्त्रिपबन्यमपि इत्याहुः । मतिभूतोपपोगयोरभिमस्यमिति मिटमेनीपममम्य षिगवीकरणम्- १५० नप्यास्तु मुतोपपोगो मम्पपयोगाद न पृषक, मन्पुपयोगनेर वकार्पोपपचा चम्पार्पश्पकल्पनाया म्पपत्यान् । जाप प्रदजन्यमामान्यमानोवर बिनपवित्रामापी समनफमत्यपानिपामा न प्रयगाइकल्पनागारमर, ग्राम्दमामान्पमानमा पर भास्पात् । नप - 'अनारद नाम्दम्प तन्मामम्या का प्रतिष पम्मीप्पा ने कल्पना पुन्ता' पनि पापम् , अमान्दत्वस प्रतिरप्पतावप्छदावे प्रतियोगिप्रेय उप मनमनिवानम्मापि प्राधान्, अन्पपा युताम्यन्तरीमनमतिमानोप्छेदप्रमगाव । किया माप्दमानरूपयुतम्य अवग्रहादिक्रमयतो मतियानाइ मिमयोपगम मनुमानस्मृतिप्रत्पमि मानादीनामपि नावं म्मान इत्पतिप्रमा, मॉम्पबहारिहत्त्वसामानम्मापि से उपवान् । पदिप अपग्रहादिमदा मांम्पबारिपस्यवरपम्पप मनिमानस सूत्र -प्राता, अनुमानादि तु पगेयमनियानमयर मिदमिनीप्पने, सहि युगमदम्पपदेश्य अाम्दमानमरि पायमतिमानमरशिपका दिमस्यालीपन्यापामपणन | 'मस्या जानामि', 'मुमा जानामि' इत्यनुमा पप अनपार्मेदापपादफ इति पेत् । न, 'अनुमाप जानामि', 'प्मसाजानामि' इस्यनुमोनानुमानम्मत्यादीनामपि मेरापनः । अनुमिनिरा दिक मनिपप्पाप्यमानि पर्याप्त पादनमपि दिन नया ? 'मस्पा न जानामि इति - प्रीति न पापिन पेन। न, पापिसगा 'नानुमिनामि' इति प्रतीतरित भाग । - MR पन मना - मु. मुना Trly ३ अपपिवानपर्चा। सस्या विशेषविषयत्वाम् । नप 'निसर्गापिगमसम्यक्रवरूपकार्यमेदात् मतिभुतवानरूप- पारगमेदा' इत्यपि साम्प्रतम् , तत्र निसर्गपदेन समावस्यैव प्रहगात् । यद् भापक "विभागमोपदेसम्मणान्मेकोर्षिनन्यपिगमस्स । एका परिणामो भवति निसर्गः सभाषम " [मठम० का० २२५] इति । यत्रापि म भुतमिमत्वेन प्रहम चत्र गोवसीमर्दन्याय एन आप्रयणीयः । सविदममि । प्रेस्याह महावादी सिद्धसेना- "स्पाविप्रसमाम्मा न मत्यम्मपिकं मुवम् ।" [निमम० १९] इति । इस्याह। [३ अवधिज्ञानचर्चा |] M [५१ मबपिमानव रूपिसमम्पाप्पविषयतामासिमानाविधानवम्याप्पवातिमत्वम् । रूपिसमम्पाप्पविपयतामासिवानं परमापभियानम्, "रूपगम मा समं ।" [ भाग० गा० ११] इति वचनात् । बदधिज्ञानस्सम्पाप्या बाविरवयित्वमपिडानमात्र इति तपमसमन्मयः । समस्याप्यत्वमपरुप म्यापकस्वमात्रदाने मगमापकविपपतामस केमरस पिम्पापक- विषयताकत्तनिपमा चिकेवलत्वमादाप फेमलपानेऽतिम्माप्तिः । समग्याप्पत्वदाने । छ अपिपि प्यमिधारम्व फेवलमानविपयसाया रूप्यम्पाप्यत्वात् समिति । न प 'परमावपिनानेऽप्पठोके लोकप्रमाणासम्प्पारुप्पाकासखणविपपतोपदर्षना' मसम्मका यदि वानस्म सगेपु रूपिद्रम्प स्मात् तदा पक्ष्मेदिति प्रसङ्गापादन एप तदुपदर्शन तास्पर्यात् । न च तदेशे पिपपपापेन स्त्रामामाण्यम् , स्वरूपबामेऽपि पक्तिपिपज्ञापनेन फ्लावापाच । एतेन मसझामन्थापना म्यास्पाता पहिर्षिपपवाप्रसाधिका तारसम्पेन . सकिादिम छोफमय पर सस्मरम्मतरस्फान्धारगाइनफलवतीति न प्रसङ्गापाद नपर्म्यम् । यद्वाप्पम् - "बहुतो पुष माहि होगत्वं देव पासई दर्म । मुहमपरं सहुमपर परमोही बन परमाणु " [विशेषा० गा.१०५ति । १५२ भठोके लोभमागासस्पेयताविपयवा अापेरिति अपने विपपताप समि वरप्पपिरणवापसभित्तादपिकपिविषयतापरमिति न बरूपपापोऽपीति तलम् । बाती पानवम्याप्पस्वविन्नेपर्ण धानत्तमादाय मस्पादारविम्याप्तिवारणार्यम् । न ५ सयमप्रस्यपावपिडानमनापयापमानसापारपनातिपिशेपमादाय मन पर्यायनानेति- पाति, मपपिस्वेन साइप वारसास्यसिद्ध न प 'पुद्गला पिणः' इति शाम्योपे प्रेममय। मम । परिवर्तकर पक्ष। ५मिमापि मुह।
१८ - मानपिन्दुमरपम् । पिसमभ्याप्यविषयताकैपतिम्पाप्तिा, विपपतापदेन सरिशेपानखानादिवि सोए। [e मन पर्यायशानघर्चा ।] १५३ मनोमात्रसापास्मारि मन पपापमानम् । न प ताप्पावपिधानेप्रतिम्यातिः, मन मायापारियोषधे स्मन्पान्तरम्पापि साक्षात्कारिस्पेन वाप्यारमिनानासिदः। न प'मनस्परिपतस्कमाठोरि बासमप्प मनापर्यायवान साधाकरोतीति तस मनो- मात्रसापास्कारित्नमसितम्' इति नान्यम्, मनोहम्पमात्रालम्पनतपर सस पर्मिबाहक मानसिकता, पापार्याना तु मनोदम्यागामेष वयारूपपरिणामान्पवानुपपधिप्रस्तानु- मानव एवं प्रणाम्पुपगमा । आप माप्पकारा- "मापा पमाणुमागे ति" [विशेषगा. ८१०] १५१ पामार्यानुमाननिमिषकमेव रित मानसमसुदर्सन बहीक्रियते, परपुर स्मरण पत्र 'मनोदम्पागि बानाति पश्यति पैठ' इति म्यवाहियते । एफसपेपि पाने इम्पापपेषषयोपशममपिम्प सामान्यरूपमनोरम्पाकारपरिग्छेदापेक्षया 'पश्यति' इति, रिशिष्टवरमनोद्रप्पामारपरिछेदापेषया प 'मानाति' इत्य को पापयते । भापेक्षिक सामान्यमानम्पापि म्यावहारिकारमान्मायेन प्यावहारिकवर्सनरूपवान् । निमपस्तु • सर्वमपि वनानमा, मन पर्यापदनानुपरेशादिवि एम्पस् । भयपि मनापर्यापज्ञानपोरभिन्नत्वसमर्पनम् - १५५ नम्पामा पामापाकारानुमापश्मनोइम्पाकारमाह मानमरपिविशेष ष, भप्रमचम्पमविशेषजन्यगासपोदाजादे' अपितप्पाप्पापा एर सनाद धर्माधि न्पापा । इस्य हि 'मानाति पायति' इस्पा शेरवमिदनविपपरवेनर उपपचा सपना -सत्पनगौरवमपि परिन माठि । सूत्र मेरामिपान र धर्ममेदामिप्रापम् । परिर सहसपिन्पपरिपतटम्पमात्रग्राममेहान् सदाद मानमतिरिकमितिमा निर्मपा पदा दीन्द्रियादीनामपि इष्टानिरप्रापिनिाचिदर्शनान् सबनम्ममसरसजननपरिनाम विपपमपि मन पपापमानमम्पपगन्तर्प साद, पेप्टादेतोरेर मनसः द्रापस्यात् । न प तेन नीतिपादीनां समनम्मनापचिा, परिपसरया पनिमसेर, पाया गरा गोमरम्पेत्र, सम्मम मनमा ममनम्हम्मस आपादयितुमघायस्वाद । वपिरममिप्रेसोर्ट निपपरिशिपयां मागदिना- मार्यमा प्रतिपादाम्या पेहन्ते हीन्निपारखा। मन पापिन पुर्व मे न पाया ।" [नियर. १.] इति । १५६ नमानस पथविपरिमागापादान् उत्पशापवि, प्पहारतपरंप सेन उमापा अपि मापा निपपता हरिप्पामिपानरमपरित उत्पामारादिति दिया । भरता ५. सम्मानपा .. [५. फेवलज्ञानवर्चा ] [५७ सर्वविपर्य फेवल्यानम् । सर्पविषयस्य व सामान्यपर्मानवमिछमनिसिलपर्मप्र- कारकस्से सति निखिलपर्मिपिपपत्तम् । प्रमेयमदिति जाने प्रमेयत्तेन निखिठपर्मप्रकार के अतिम्याप्तिपारपाप बनवसिमान्तम् , फेयरवने अतिम्पाप्तिधारमाप सस्पन्तम् , विशेष्यमामस्तु पर्यायपापमिमतप्रतीत्यसमुत्पादरूपसन्तानविपयफनिखिलमर्मप्रकारकावा- ननिरासाठः । पामो निखिल याकारणत्वं फेवसमानतम् । फेरउदर्शनाम्युपगमे तु सत्र निखिलम्पाकारवस्तमेष, न तु निसिलपेयाकारवणमिति नातिम्यातिः । न च 'प्रतिस फेवरमाने केवलबानान्तरचिखप्राफालविनष्टवस्तुसम्पन्धिवतमाननापाकारामापात्' असम्ममा स्वसमानकालीननिखिछ्यापारवत्वस्य विवछणात् । न प 'तपापि केरल धानप्राय मापक्षणचितग्रस्यरफस्वापच्छिमपिशेप्यताया द्वितीयषणे नाम, द्वितीय धमाचिस्वप्रकारकस्पावठिमविशेष्यवायाम उत्पादः, इत्यमेव प्रापसामान्यविशेप्पता धौम्पसंमेदेन केल्याने प्रेसपप्पमुपपादितमिति एकदा निखिल याकारवालासम्मक एष' इति शनीयम्, समानकालीनस्पक्ष षणगर्भसे दोपामामाद । मस्तु या निसिख- बेयाकारसङ्गमयोग्यतामत्वमेव उपपम् । केवलसिवाषनुमानोपन्यास:- १५८ प्रमाण पत्र पानत्वमस्पन्दोत्कर्षवपि मस्पन्दापकपदृषिलाद परि मापत्वमद इस्पापनुमानमेव । न प अप्रयोबस्म ज्ञानवारतम्पस सर्वानुमबसिनस्पेन वदिमान्तो अत्यन्तापोस्कोम्पा पिनासम्मवार । न च 'इन्द्रियाभिषमानव रममावदर्शनात् तमेष मन्स्पप्रकर्पो युका' इस्पपि शनीयम् , अतीन्द्रियेऽपि मनोमाने धावावधारणरूमे शाखमापनापकर्पमन्ये, सामाविकान्तविपये मतीन्द्रियविषयसामर्य- योमाचिसापने वयात्मष्ठानसिप्रातिमनामधेये व वरममावदर्शनात् । केबले भावनापार साक्षादेतुत्वनिरासाप पर्चा- १५९ नन्ने भावनामन्यमेष प्राविमनस्केवर्स प्राप्तम् , पपा १ अप्रमाणे साद, कामातुरस्य सर्वदा कामिनी माषयतो म्पपरिवकामिनीसापालारपत् मापनापन्यमानस मप्रमामलम्पपसि। ६६० अप न मापनापन्पतं का अपमाभ्यप्रयोयम्, किन्तु पापितविपरस्त्रम् , माषनानपेक्षेप्रम शुधिरबहादिप्रमे पापादेष अप्रामाम्पस्त्रीनरात् । मन विपसबाप इति नामामाम्पम् । न च 'म्पबाहिकामिनीविममादौ दोपत्वेन मारनायाः वसत्वात् तबन्पपेनासापामाम्पम् , बापितविपमस्तपदोपमन्यसमापि प्रमलप्रयोगा- वाद । तपा पोकं मीमांसामाप्पकारेम-"यस दुर्ग काकोरप पत्र मिप्ये-- म्यादिमामिप्मेप्रविप्रोत्पप स एपबासमीनो मान्य इति ।" [स्मर० ११५] पातिकमरेपाशुहम्- - २० मानविन्दुमकरणम् । "समारोपपस्मकस्वेन प्राधा मुझेः प्रमाणता । मन्मयतोतूलवोपानावपोपते ॥ [मेकसू० २ ० ५३ ] इति । अब हि मुस्पनदेवापामाण्यप्रपोवद्यमुकम्, तस्मात् पापाऽमावेऽपि दोपमन्यस्थात् मप्रामाण्यम्" इति वान्यम् , मारनाया' कपिहोपलेपपि सर्वत्र दोपत्वानिधया, अन्यथा सपीदत्वमममरणीमतस पीवदम्पस स्वविपपलानेपपि वप्रामाण्पप्रयोगको सान्द, इति न किविदेख्द, काचिदेव कपिदोप इलेवाङ्गीनराद, विपपपाभेनैव दोपन्यत्व' प्रकल्पनाच, दुष्टकारगमन्पसापि मनुमानादेविपयावापेन प्रामाण्याम्मुफ्गमा, अन्पमा परिमापामाप्रापचे । मीमांसामाप्प-भार्षिकाराम्यामपि पाधिसविपपत्वम्याप्पत्वेना दुष्टकारपवन्यस्वस ममामाम्पप्रयोजकत्वमुक न खाता पेपेति पेन। ६६१ मैवम् , क्वापि परोपज्ञानजन्यमापनाया अपरोषशानबनकस्सासम्मवात् । न हिपहपनुमिविधान सहस्ररुत्व माचमपि वहिसाक्षात्काराय फत्पते । न च 'बम्पर- मान मानं परमप्रकर्षप्राप्त सपा मपिप्पति' इत्यपि पानीयम्, सानोरक्वापाविषद् यम्पसमानसापि परमप्रकर्षायोगात् । न प 'मनसैकस्सायसिसस्सामापात् अपरापर प्रयास पूर्वापूर्वातिप्रपिलानोस्पादन एष म्पापाराव् याबछापितम्यं ताबमावादेव सेप्मादिना चाम्भात्कायो सहायितु शक्रोति यम्पासासावितसेप्मदपपद्यमावमोचरकास घनोतीति स्त्र म्पासितोकवा । उदकतापे तु अतिशयेन किपमाणे बदामपखैर पसाव न वापि ममिरूपतापचिस्पोऽन्योतकर्मः । विज्ञान संस्काररूपं पासपर गर्दनापन्यपानुपपश्योपरत्रापि बनुपर्वत इति सत्र अपरापरपसान्य सपएपयोगात अस्पन्दोस्को एक इति तद्वता मावनाघानेनापरोध केनपान मन्पवे' इति टीम एकमपि विचारसहम् , तस्प प्रमाणान्तरलापचो, मनो' यरसापारपमिति न्याया। मन्पपा पमुरादिम्याप्सिसानादिसारुतस्स मनस एव सर्वत्र प्रामाम्पसम्म प्रमाणान्तरो- पदापोः, मुरादीनामेप(पा) सापारम्पात् प्रामाप्यभिस्यम्पुपगमे मावनापामपि वना पछ सम्पत्वात् । एव प परोषमापनाया अपरोषधानमनका तस्साः प्रमापान्तर प मन्यत्राएपर कल्पनीयमिति महागौरवमिति । १२ अनुक्कोपासम्म एपा, प्ररुटमावनामन्यस्वस केतवानेऽम्पुपगमपारेनन टीपातोपतात् । वस्तुतस्तु वजन्पाप्रमादापरणभपादेव केवरदानोस्पचिरिस्मेव सिदान्तात् । योगजमर्मजस्वनिपेभेमावरणक्षयजस्मसिदि।- १३ पैरपि पोममपर्मस मतीन्द्रिपमानजनकत्वमम्पपगम्पवे, सरपि प्रविपन्यापार * पपस हारस्वमसम्पमाभपमीपम्, सति प्रतिवन्यके भरणस अकिहितमत्वात् । कार्स . चामेतिहा पता जम्मचारोह। पपि तसतम परकम्पपामा श्रेषगपात मावा A ५ नम्मानपा। तेर्योगवमर्मस मनम्प्रत्यासविस्वम् , सेन समिकर्पण निखिठनात्यंशे निरवच्छिमप्रकार- पायाने, पोउन्नपदार्थविषयकपिलपणमानसझाने वा तत्तभाननामपेये मनसा करण- स्वम् , पानुपादिसामग्रीमठ इस तौकिकमानससामग्रीकासेप तानसत्वमानानुस्पचे सखझानाल्यमानसे सदिकरमानससामाया प्रतिबन्पकत्वम्, तत्वज्ञानरूपमानससाम उमाप प्रणिपानरूपविजातीयमनासयोगपटिक्त फल्पनीयमिति अनन्तमप्रामाणिका स्पनागौरवम् । अस्माक तु इरिवषयमावं सत्र धारणमिति तापपम् । बद एपेन्द्रियनो- इनियहानासापिम्पेन केवलमसहायमिति प्रायो व्याचक्षते । पापरणारम्परिवपयो' मावनातारम्पाद सारसम्मेनोपवायमानस्तदत्यन्तप्रकवि मस्यन्तप्रकर्षमनुमपतीति फिम- नुपपमम् ।।दार असाहो(समन्तमहो)ऽपि- "दोपावरपयोहानिनि शेपास्त्यतिमामन्यम् । परिपणा सोतम्यो पहिरन्तर्मम्मया " [भात० का १] इति । ६६४ न च निम्बापोपपोपयोगाद् तरसममार्योपचीपमानसापि सेप्मणो नास्य विकपया इति म्पमिपारा, पत्र निमापौषपोपयोगोत्कर्षनिष्ठाया एप आपादयितुमन- पत्यात् , तदुपयोगेऽपि सेप्मपुष्टिकारणानामपि सदेवासेपनात् , बन्यपा औषधोपयोगा- पारसैर रिनामप्रसाद । चिकित्साशास्त्र हि उद्विकपातदोपसाम्पमदिष्य अपर्वते, न तु तस्म निर्मूलनाष्ठम्, पन्यवरदोपात्यन्तक्षपस मरणाविनामाविस्वादिति प्रटम्यम् । रागादे केबसशामावरफत्वसमर्पनम् - ३१५ रागापावरणापाये सर्वशहानं पेत्रपमाग मस्तीस्थापन विमादो रगोनीरा- रापावरपापाये पाविज्ञान त्या दर्शनात् । न प रागादीनो कपमावरणस्वम् , इमा- पीनामेव पौडलिकानां वपालदर्शनाद्' इति वाच्यम् , म्यादीनामपि प्राविमादापनावार फास्मात् , हानपिशपे नेपामावरणत्वयच असीन्द्रियझाने शगादीनामपि स्पास्समन्वय- प्पतिरकाम्यामेव सितम्, रागापपचये योगिनामतिन्द्रियानुमयसम्ममात् । पौद्गसि- मत्वमपि द्रम्पफर्मानुगमेन वेप नासिदम् , स्वविषयग्रहणधमस मानस सदग्राहकवाया "विशिष्टदम्पसम्बन्मपूर्वकतनियमात् पीवत्परपुरुपज्ञाने दमा दर्जनात् इति श्रेयम् । रागावकर्मजस्वसिल्पे कफाविजत्वस्य निरासा- १६९ पाईस्पस्पास्तु- 'रागाहयो न तोमादिकर्मोदयनियनाः फिन्नु कमाविषक वितुमः । वयादि-कफोतको राग, पिचहेतुफो नेपाबावोसुकम मोहए । कफावपम संदेष समिडिवा, शरीरस स्वात्मसान्, स्वो न साशमुनीवरामस्वसम्मा' इस्पा । इसकम् , रागादीनां प्यमिपारेण कमादिनुकत्यापोगाद, येहि गावपस्वेरपि रामडेपो, कम्पकतेरपि शेपमोहो, पिचमकवेरपि मोहरापानिति । एकसार प्रल पपक सर्वदोपभननसक्युपममे १ सपा समरागादिमत्तप्रसाद । न ५ . . म भापमपा पापा मुममियम सपिभार। विभिप्रमाभासवे मुम।
२१ जानपिम्युमकरणम् । 'सखयोग्यक्रमिकरामादिदोपजनकापापपान्तरपरिणतिविपख प्रतिप्रामिणत्पनाद ना बोपी पतिवाप्पम्, दबान्तरवास्पामणिमहेतुगोफ्यायामपिफर्मप्येव विभामा नि यम्मासजनितप्रसरबाट प्रतिसंस्पाननियतनीयस्वाय न पादिहेतुकर्म रागादीनाम् । १६० एवेन मुकोपरयातक एक रागो नान्पहेतुक इस्पापपि निरस्त्रम् , अस्पन्दनी- 'सेनापरस्म पीपमुसापि रामोरेपानात्, मुझोपरयस सर्वत्रीसापारपाभिाजन सेन फसपिदेव रागोद्रेफ इस्पसानुपपधेय । न र असाधारम्पे रूपमेव व हि वायामपि सचिवागदर्शनातु । न पत्र उपचार एस हेतुा, रमेनापि विसकायो राम- दर्भनाल । तस्मात् सम्पासदर्शनयनितोपत्रपपरिपार्क कमव विपिनसमावठया का कहा उपस्मरणापे कत्र वा रामावितरिति प्रतिपचम्पम् । १६८ एवेन एपिम्पम्मम्पस्से रागः, योगाउम्पस्त्वे इसा, जलमायुम्यस्तते मोर इस्पारपोऽपि प्रलापा निरस्ता, वस निपपपिचपापक्षपातिवादिति विकर्मवाना रामातीनां सम्परमानक्रिपाम्पो षण पीक्सगलं सर्पद वनाविम्मेव । मेरारम्पमापनानिरासाय भणमझे मिप्पास्वोक्किा- १६९ पौद्धोदनीयास्तु-निरारम्पादिमावनेर रामाविहयानिोता, नैरास्म्मान- * पारेर आत्मास्मीयामिनिमेशामापेन रागोपोम्छेदात् संसारमूलनिधिसम्मवात् , बारमा पगतौ प क्स निस्मतेन पर मेहा मलप्पादिना प्रसानिया बहुचम्- " पश्मस्वारमान तपस्यामिति प्रापतः । रेम्सखेपु तप्पति तमा दोषस्विरहरवे । गुमदी परितप्यस्पास्मनि स्थापनान्मुपायचे । सेपरमामिनियेसो गावचावच संसारः ॥ [प्रमाणमा० २ २१५,११८ ति। 1७० ननु यपे मास्मा न रिपते, किन्तु पूपिरथग टिवानुसन्मानाः पूरी प्रतिमा पानपपा एप क्या क्या उत्पपन्त इत्यम्मुपगमखदा परमार्पतो न पमिफान- पोपभरमसमाव इति समुप्पते 'ममपाम् सुगतालपया सम्सलोपराप देना फतवान् इति । बमिसमपि यचन्न, परि दत्तरी पमोजन् विना सर 'न पापनापियां मुसो मविप्पामि' पति बानाना फिमर्म मोपाम पन्त इति । रोपवे- समान् विपापीनालामा समपि स्मारसित पसंतरिपीपमा नराम्मानि- पस्वादिकमपगमपि सेपासफार्मसत्ता निष्लेषणोस्पादनाय प्रपतवे, क्तो बार- सम्ममस्साशातारा स्पमसम्मानः पूरिकपानिक्षेपर्सामा सर्पोपप रेस- मापा मार्दत, अश्मितास्पार्थम सन्ततिमतविसिष्टमोस्पच सामाप्रान्वे, इति न किमपि ममपपमम्' इस्माइः । १ अविस्मशानविसितम् । वात्मामा यमोसापेपिकरमत्तायोमा । म . 'बाप्पा . ६ अपमानसमीक्षा वसन्तानापेक्षया समापिा, स्पापिषमानतिरेके एकस्पासिदो, एकोप द्रम्पसैन नामान्तरता, पमाठीपपपप्रपन्यसे सन्ताने च न पारगम्यापार इति समीपीन सरमप्रापपादनम्। ७२ अथ महिएक्षपे 'अलिष्टक्षमतेनोपादानसमिति सबातीयषणबपोपपचिः। शुददेशिवमार्गे तु वस्प्रयोजकत्वज्ञानादेर प्रापिरिति चेत् न, एमान्दादे मनेन रूपेग। निमिवलं अनेन रूपेण प उपादानत्वमिति पिमागसैव दुर्वचत्वात् । मष्तिष महिम एषपसेनैव उपादानस्वे मापालिष्टक्षणसानुस्पचिप्रसाद, भन्स्यलिटपणसापारपस रेवापन्दकप मत्पने पशिष्टषपअन्पवारच्छेदकेन साहदि, अन्पबनकषयप्रय पकोटौ पश्यपप्रमपरित्यागयोरिनिगमकामावाद । एतेन इतरम्पापल्या प्रतिदि- शेपेण वा अनमत्पमिस्पपि मपास्त्रम् । न प 'एक्दनन्तरमई उस्पर्म एतस्य पाई सनकम् ॥ इति गम्छति षणरूपं पानमिति न मपन्मते कार्यधरगभावः, नापि व्दागमा, वो पापिक्कमपनमेक्न् एकसन्ततिपतिवत्वात् एकाधिकरणं इत्पमोषादिफमिति । पसेन उपादेयोपादानपणानां परस्परं पासवासकमानात् उचरोचरविशिष्टविशिष्टवरषणोत्पा मुक्किसम्मय इस्पपि अपास्त्रम् , युगपझाविनामेव विलासमादीनां पासपासफमापद नात् । उकंप- "बास्सपासकोक्मसाहित्यात पासना । पूर्ववगैरनुपनो पारस्ते मोतरपणा " [ोक. निराम० मो. १८२] इति । कत्पिपर्णसन्तानास्तियैर मोषोपाये सौगवानां प्रापि, तदप प सुगवदेषना इत्सम्युपगमे प वेपी मिप्याष्टिकम्, तत्कस्पितमोक्षस प मिप्यास्वं फटमेष । अपि तायाम् । [६ नमानसमीक्षा ।] भभण्डमझामपरकमपुस्वनमतमिरास:- [७३ एतेन मखमाइपानन्दकरसप्रमपानमेप केसवानम् , तसएप प मविपानिर्षि रूपमोपापिगम इति वेदान्तिममपि निरस्सम् , ताप्नविपपामाषेन सदानस मिप्पा- स्वात् । कीर्ण प प्रमानमाननियर्सकमम्पपेपं देवानांप्रियेण । न केवलपवन्पस, इस सदा सस्पेन मविपाया निस्पनिधिप्रसङ्गमम् , क्ल्प हन्मससंसारोपसाम्पसम्मवाद सर्पधानानारम्भमसात् , अनुमपपिरोपाचा नापिपिरूपम् , सस्थत्वे तत्कारणान्ता नपारिपारेरपि सत्खस भापम्पकसन स्पा तमिापेरशम्पत्या सवेिदान्तामपिठमा- पच। मिप्यास्ते व फसमधाननिवर्तकता! । नहि मिप्याबानमहाननितम् एम्, स्त्रमदानस्सापि तत्तप्रसङ्गात् । [४ नप'सस्पसैष खन्पस प्रमाणपन्यापरोपावारणास्पमिम्पफस माननि . १कामेगायिका . जानपिन्सारणम् । वर्तप्त्या, म घरमतावच्छेदसत्येन दमत्यादिवत् अन्पपासिसन कारमतानही पाराव, माच्छेदकस कसितोपि आपस पासवत ने विहन्पते, यद्रमतत्वेन मातं वचिद्रम्पमितिबद , वार्षिनरपि मागासस सम्दप्राहकस्वे कर्णधासीसमापस अस्सिवस्सैम मान्छेकवाङ्गीकारान् , संयोगमावस निरषयवे नमसि सस्मिना सत्ते नाविप्रसञकलात् , मीमांसकम परिपतहसस्तीर्णत्पादिसंसर्गावच्छिमानामेष पनि पपाशानबनकसोपममार, मनिधर्मापा भनिगतस्पेनैव मानाद, वर्षाना प पिम् नामानुपूर्वीविपाशानादतिप्रसाद वर्णनिष्ठतेन इस्त्रस्वादिकल्पनस रोपामावश्यकवाद, वश्वस्माकमपि करिफ्तावच्छेदकोपगमे को दोप' इति मधुबनतपसिनोऽपि पर्व विपारसहम्, मिभ्यागटान्तस सम्यगप्पा प्रहपानीपित्यात्, नैयायिम्मीमांसको • कससेधपि मनन्तपस्मिनसुनीघरे फरिपटाबम्छेदककवविरम्बनाया अपसराव, विखरेपोपपावित पैठ संमतिाचौ- ०५. न पोकरीस्मा पचेरवच्छेदस्तमपि पुछम्, प्रतियोगिमपा माननिायो सामानाधिकरम्पेन समानविक्षेप्पकसमान परफारेस्सन्मते हेतुस्मस पुचत्तात् । वन एब खापर उपसिना सिद्धान्तपिन्दो-"विषयावरणम् - एमसत्यापायकमन्त करा- -कासाविनिष्ठम्, मन्नत् नमानापवर्क विपापविनापन्यनिष्ठम् , 'पटमई न पानामि इसम्मापवानुभवात् । मात्र परोक्ष्मफरोधसापरपममामात्रेम निवते मनुमितेऽपि पस्यो बातीति प्रतीस्मनुसयात् द्वितीय व सावकारेपेव निर्वसे याममं यदातर मान यावर क्यामरमान प्रावतीति नियम्पद" [ २९१] इस्पादि । वस्तिमिदानी मुत्यामानो सप पर विस्मृतम् । येनोसाचेरवछेदमसेन अन्पवासिमिाह । एक रिपटादापति • इप्पपिसिटामसत्तेने हेतु बदतो वदन र पिदम्यात् । । बनपैन मिया-वतन्म निछापा प्रमामयन्यापरोधान्तकरणाचेरेव ममाननामकलाङ्गीकारेऽपि न हो, पारमार्थिकसचामावेप्रप व्यापारिफसचालकारात् । न च समाविषन्मिभ्यास्तापपि, सरूमवो मिप्यास्त्रस अप्रयोजकत्वात् , विषयतो मिथ्यात्वस न बापामाबादस्मि, धूममममन्पमापनुमितेरपि चापितविपपवपामामाप्यानजीकाराब, परिसतेनापि प्रति -विमोन पासपनिम्मानुमानप्रामाम्पाच, समासापि मरियादिरपत्याब, पपिचाप सम्पमादेनागरेजपि बाचेरवापाच' इति तपखिनोचम् - इति पेन। एमपि भविषा- रिवरमयीयम् , सम्मते सम्बामरपोर्मबहारविशेषस्थापिकमिशासवान् , पापामायेन प्रथम व बटारेरपि परमार्थसत्वस यात्पूरत्वाव, अपवासस्मो बन्ममोपादेशी वास्पेन पवारस एप परदानात् । निमिपाझामशक्तिमिचिमकिपापाः मिरास:- 1 एतेन माननिष्ठाः परमार्पम्पमारप्रतिमाससत्सप्रतीस्पनुमस्तिसर पर परप्यन्ते, मापया प्रपणे पारमार्षिकसत्तप्रतीतिर, यत पर नयापिकादीनां पास महिमपा ११ ममग्रेमा। . मामाच्या . D ६ प्रपणामसमीक्षा। २५ पगमा, सा प भवणापम्यासपरिपाफेल निवर्तते, ततो दितीपया क्या पापहारिक सर्व प्रपनस प्रतीयते, वेदान्समवपापम्यासवन्तो हि नेम प्रपत्रं पारमार्षिकं पश्यन्ति, फिन्तु म्यागारिफमिति, सा च तवसाधास्पनरेग निमटते, क्त वतीपया सक्ष्या प्रातिमासिकसमप्रतीतिः क्रियते, साप अन्तिमतवयोपेन सह निरर्वते, पूर्वपूर्वक रूपरोपरशक्तिमार्यप्रतिमन्मकस्वाब न पुगपस्कार्यधयप्रसा, पा च एतदभिप्राया। अति:-"तसामियानाद् मोपनात् सत्तमागाइममान्ते विममापानिवृति[घेता. ११०] इति । मसा मयमयी-तस्स परमात्मनोऽमियानादमिमुखा भ्यानायगाप- म्पासपरिपाकादिति यामत्, विममायाया विपारम्मकाविपापा निधि, मापठक्तिनान विशिष्टनाक्षात्, पुन्मते अनेनेति योजन तत्वज्ञानं सम्मादपि पिममायानिधि, द्वितीय सक्तिनाम्शेन विशिष्टनाप्लास् , तलमावो विदेशकैमस्या वैन्तिमः साक्षात्कार इति यावद , समादन्ते प्रारम्पक्ष सा वतीपषम्पा विधमायानिचिः। अमिम्पानयोगनाम्या अकिश्पनाभेन विशिष्टनाशापेषमा भूपाः शम्दोऽम्पासार्यफ इतीस्यादि निरस्वम् , अमिप्यानादेो प्रामपरमार्यसदादी परमार्थसस्वादिप्रतीत्यम्पुपगमे अन्यपास्यास्या- पावात् । 1७७ न च 'तरप्यक्तिपिष्टिामानेन परमार्थसत्तादि बनपिस्व प्रस्पाय्पत इति नापं दोप' इति पापम्, साक्षात्कवतस्वस न किमपि पस्स्समावमिति प्रातिमासिक सवोस्पादनम्पानाभावात् । प्रमाारसपा प्रमविपपवैक बमानस नाशिवा, वतीय अतिविशिष्टं तु अज्ञानं पावरप्रारम्घमनुपर्तत एषेति प्रमातिरिकविपये प्रातिमासिकसषो. त्पादनादपिरोप इति पेट , न, पर्मिसिससिरिम्पो म्पाघातात् , विशेपोपरागेम मझाते दुपगमे प ममप्पपि प्रातिमासिकमेव सर्व सानु, वन कसपिदेशानस सिता विदेविप्रपि लइवस्पितिया सर्वाचानानिाचा मुक्कापनापासप्रसमाव । ६७८ अप टिसृष्टिबारे नेयमनुपपचिा, सन्मते हि पस्तुसत् प्रपंच, प्रपत्र प्राविमा- सिफ एप, वस्स प अमिप्याना मार पारमार्षिकसमादिना प्रविमास: पारमार्मिक सदापावरमानाम्युपममादेव म्पपाद इति पेट, न, तस प्राधीनोपगतस्प सौगतमतमाय वेन नम्मरुपेक्षिप्तस्वात् , म्पबहारवादसंब रावस्तात्, म्यवहारवादे चम्पारारिक, प्रपर्ण प्रातिमासिमस्पेन प्रतीयता दलमानिनामस्मन्तप्रान्तत्वं दुनिबारमेव । अस म्पाद- हारिफम्पापि प्रपजस तमदानेन पापितसापि प्रारम्भबन बाधिवनाया प्रतिमासः वतीयसा के कार्यम्, न पापितानापा प्रतिमासानुईला सूतीपा अतिः प्राति- मासिकमुक्तसम्पादनपटीयसी किरून्यते, सा प मन्तिमतलयोन निवतत इस्पष मदोप इति चेत्, न, बापितं हि स्वन्मते नाशितम् , तस्थानापिरिति बदतो पापावाद । - बापितत्वेन बापितस्थापच्छिममचया मा प्रतिमास कम्पप्रारम्पकार्यमिति पेत् । दीपा मकिपर्या, याबहिषामा पापितो तेपो तपाप्रतिमासस सोश्य दिनानुपपपेप, . - १म्तिमा "पिप्यायमु। ५प्रमुख विमुत। सवसमा मधमा २६ मानपिन्ट्रमनपम् । द्वितीयशकिनिमिष्टामाननाचा सविमर्म सत्कार्म न नश्यति, स्वस्मृतीपक्षमा प्रारम्भकार्ये दग्परस्पानीया बापिताबसा पन्यते, इपमेष पापितानापिरिति चेत्, न, एवं सति पटपटादी तत्तनस न पापिक्सत्वपी., न पा म्यावहारिकपारमाणिसवपी- रिति कत्र फिनिदन्पदेष कल्पनीयं साद , तवा चे सोकशावविरोप इति सूर्य परिमदाबाया- "मनिमम्ममयो परपरिवापारा मवेऽनुमपसियाः । रागावयप रोना मसत्तात्मास्पद मेकेा परिकस्सिता यदि ठठो म सन्ति तस्वेन कमममी परिति । 'परिकस्पिते प तत्त्वे मरमपविगमो कर युफो ॥" [पोग्सक १९८-९] इस्पादि । म्मावाचावहारिकसत्यापि न निस्वारः । प्रपये परमारमेव म्पर बारामापि सचान्तरानगाहनादिति स्मर्तम्पम् । प्रमशाम पुमर्मिरस्य सिरसेमोक्स्योपसंहार- १७९ किन सप्रकार निप्पनरं वा सम्मान वज्ञाननियतकामिति बकम्पम् , आपे - निष्प्रकारे प्रमणि सप्रकारमधानस अपमार्पस्वाद न बाननिवर्चकता, उस पक्षाने पा नाद्वैतसिद्धिः, रितीपपपस्तु निष्प्रचारकमानस वापि बनाननिर्तकस्वादर्जनाये बानुकाबनाई।। किन निष्पकारकमानस त्रापि बधाननिवर्तकरवं न पटमिति शुभ प्रमझानमात्रात् कपमवानानाधिः । १८. न प 'सामान्यपर्ममात्राप्रकारकसमानविपयप्रमास्वं भवाननिाची प्रपोजीम्। -अत्र प्रमेयमितिमान अतिम्पाप्तिवारणाय सामान्येति, प्रमेयोपट इस्यापापविम्या(पम्या)ति- पारगाय माति, वेनेई विशेपप्रकारे नियचरे चानुगवमिति निष्प्रकारकममवानस्सापि प्रमामाननियर्सकन सक्षणानयात्, न प सामान्पपर्ममात्र प्रकारेकमानेऽम्याप्ति, समनिई पा, प्रमेयमप्रमेयं मा इस्याविसक्षपापदर्शनात् सामान्पमात्रप्रचारकापानानीकारेण वर निसर्तकस्स तस्सामा इति वाच्यम् , निष्प्रचारकसंशयामावेन निष्पनरकानानासिरसा निष्पहारकाममानस्सापि वमितरूपायोगान् । एका पर्मिपि प्रयरागामनन्तस्व प्रसार निष्टतया निरवपिछमप्रमारतामम्मन अमिष्ठानप्रमारपेन सपा माननियर्तकस्वी. पिस्पान् । मभिष्ठानत्वं प ममपनकामानविषपर्व वा अमानविपपल पामरागोपापिया। नप 'पिपपवर वन पुतम् , प्रमेपस्वस पपासानपिनोनहीधराद न प्रमसमिति मानाइ पटापाकारापाननिाचिप्रमा' इति वाग्यम् , द्रम्पमिति प्रानाद पदापचेरणा -रणात् । न प 'तस गप्यमपिसिएविपपरवेप्रपि परम्पविशियाविषपस्मा बारमम् , द्रम्पमामिनिष्टम्पर पगराएदन परस्वविशिष्टवान् मद्यविशिष्टमम्मपन, निमिष्टसिपना नन विभिष्टविपपापाननिास्पम्पपगमपि प प्रमणा मचिदानन्दस्वादिपर्मसियममा मातम्रोrnel 1 मुत A५ अपातायाम्नेव सरमिएममुम। पनमेष पमुत। हामिदाराला २० १ प्रणाचसमीक्षा। १८१ पतेन-वन्यत्र घटाबानत्वपटत्वप्रकारकप्रमास्वादिना नाश्यनाफमावेऽपि प्रकृते प्रयामाननिचित्तेन प्रयप्रमावेनैव कार्यकारममावा, न तुप्रमत्यप्रकारफेति विशेप महपादेयम् , गौरवादनुपयोगाविरोषाच-इत्यपि निरम्तम् , विशिष्टप्रथम एष संशयेन विशिटावाननिहाप विशेपोपरागेर प्रधानस अन्वेपणीयस्वाद, श्रुचिरक्सादिस्स लेपि विशिष्टाधानविपयस्वैग अधिष्ठान समिति यत्रापि मयं न्यायोध्नुसतम्या। ६८२ फिज, ग्रमणो निर्मकस्वे तत्र विषयवाया अप्यनुपपमत्वात् वतिपयमानत्वमपि स्त्र एर्लमम्। विपपता हि फर्मतेवि सदीकारे तस्म क्रियाफलचालित्वेन पाविषत पत्वापा, सतिपयशानायनपत्थे च तत्र पेदान्तानां प्रामाप्पानुपपचिः । नप दमा- ननिवर्तफवामान वहिपयस्वोपचार, अन्योन्याभयात् । न प फरिसता विपयवा कर्म- स्थापयोनिका, मास्तषविपयवाया शापि बनङ्गीकाराद, म्यावहारिण्याम तुस्यत्नात् । । 1८३ न प 'ममणि धानविपयवासम्मवेअपि पाने प्रयविषयता सहिम्पग्राहकम रूपाज्या पाकापिदनिर्वचनीया सम्मपतीति नानुपपचिा, विषयवैवाकारा प्रतिविपर्य विउपवा, बस एप प्रमाकारापरोक्षप्रमाया एप ममाननिवर्सकत्वम् , बहानषिपयस्वरूपा कारापरोपमास्वस सर्वबानुगपत्ताद , न प-इदमिस्याफार पटाकारमिति-हिमपि सत्यम्, माकारमेदस स्फटतरसाधिनस्पषसिदत्तात्' इति वाच्यम् , माननिष्ठापा बपि. अपविपपवाया प्रमनिस्पितस्वस्मावश्यकस्बेन प्रममि तमिरूपकत्वमर्मसत्वे निर्मकस्स प्पापावाद, ठमपनिरूप्पस विपयषिपयिमावफपर्मस्पेन निहायोगात् । न च 'असम्यपि करिपविपपतोपगमे कर्मस्वेन न वरस्वापाता, खसमानसचामपिपयतापा एवं कर्मत्यापादकत्वाद, पटोदो हि विपयवा स्वसमानसचाका इयोरपि पावहारिकस्वाद , प्रममि ह परमार्यसति म्यावहारिकी विपयता न भवेति स्फटमेव पम्पाद्' इति माम्यम्, - सचाया इस विषयसाया मपि प्रमगि पारमार्षिकस्योकावपि बापामावाद, परमार्य निरूपिवपर्मस्स व्यापारिके म्यावहारिकपपयावहारिकनिरूपिम्स पर्मस पारमार्पिक पारमार्षिकवाया अपि न्यायप्राप्तस्वात् । सचामुफ्यममेदेऽपि उपलक्ष्यमेकमेवेति न दोप इति पेत् । विपपवायामपि एप पर न्यापा । एषा मनन्सपर्मास्मकपघूमेदेऽपि प्रमणि बेटरप्य ट्रम्पादिशात् अम्पाटमेष । पपा प बन्यूनानतिरिकपर्मास्महम्प खमाबलामसषपमोषगुमेन ममवन्तं तुष्टाव सुविचार- "मयपीममनम्तमति बिनम्मानमनन्तमर्षितम् । मीनकोऽसि माविक समां बाप्पतिवम पतसे ।" [.१२९] इति । प्रमाकारापा प्रमविपयापाम तेमिस्सारस्वोक्किा- 1८४ एतेन पिकल्पविपपतेव परतापादिन, न तु पपिविषयवापि, "वो पायो नियटम्" [वैचिरी० २.१ " नषा गूपते नाति वाचा" [मुण्ड० ३१८], मिजीत निकाय निमाविपक्षण प्रम। ५ विपरस्परमेय ह । - सरस्पिल्स उसपर ૨૮ पामनिम्मरणम् । "त सोपनि पुरुष पृच्छामि" [पावा. १९२५] । "प्रवेदविन्मनु मह" परेनैव बदितम्नम्" इस्मापुमपविषयुस्यनुसारेण इमं प्रपनात् । "कसम्माप्परसमेवास सामरुमिर्निवारितम् ।" [पंचवटी ९०] "प्राममननाशाय पिम्माधिरपेक्षिता ।" [पयशी . ९२) इति कारिकायामपि फलपद कन्यमात्रपरमेम इप्टम्यम् , प्रमामयन्यान्ताकरणास्पमि. प्पलपैतन्यस पाने फलपेन म्पपरियमाणस प्रापे क्याप्पसापा भन्मपम्पविरेाम्पा बरसापादकत्ये प्रमण इस साविमासानामपि बरवानापचा, चैतन्यकर्मता तु रिति मत्वापान सर्वत्र येति सन बास्वप्रयोनिका । न प 'इचिविपयरवेप्री पैन्परिपपल निपत चेविदासरगर्मिम्पा एरोस्पा, मुक्तम् - "विसदसलमानानुरोपादेव न प्रेरफात् । विपरसम्पूर्णवोसो हमसे सा पियाम् ॥ पट दुासादिरूपतं पियो पर्माविदेखतः।" [भवा० से. ५१५, ५००] 'लतासिदार्पसम्बोपम्पधिर्मस्वनुरोपत " [हरा० से. ५१२] इति । ज्या प वाव दुर्निवारम्' इति वाम्यम्, इस्पुपरकम्न्यस स्वत एप पैसन्यस्पोन "पाप्पस्वामापात् फले फसान्तरानुत्पनिमानां तु खतो मानरहिवानां स्मारप श्याभयमीपस्वाद इत्यादि मधुरदनोकमपि अपातम् , प्रविषिपयवाया अपि निर्मक प्रभम्पसम्मवात् , कल्पितविपयवाया स्वीमरे पकसितप्रकारवाया बपि स्वीपरापा, उमपोरपि पानमासम्माधिमास्सत्वेन पैकन्पानुपरजकत्याविशेषात् , पानस स्वनिफ्या- निवर्तकत्वेन प्रवरानिाचित्रसामपस प पिपखपनिाधिपष र पर्मपर्मियोर्ग- स्यन्तारमकमेदामदसम्मन्पाभपयेनैव सुपरिहरत्वाद, उतान्तकोपस्येप्रन्टवादिनामपरि कदापि न निपर्वत इति का प्रतिकार। 1८५. यदि प रविपपतं प्रपगि न वातरम् , खदा सकरर्शनमाम भारमनि पादाविन गपगमपि पटत कदापि नापेठीत्यापुक्क न पुन्यते । सवा प- "मसनमात्रेण परभेनसते सरा। लपनमोऽसमारमा परपस मासते। समकायतमा किसे दिमात्तवेदमम् । इदिप वपनास्पेवि पोप तु पयदिए। पय निधिते बुदिर्मश्सस्पेव या परः । रंगे मे सम इति पेसममाएपनि ॥ निमित्य सास्पाने पाहा रेषतम् । रई मन् वा मा प्रत्येव हि रामनिद ।। भरभरममाभासा । Tuktadri r ५। पवाणी। . M मुम। ।
। M प्रममावसमीक्षा। उपासक इस ध्याहौकिक विमरेपदि । मिसरस्पेष सा प्यानादिस्मतिर्न तुपेदनात् ॥" [पावती भ्यान छो० ९२-९५] इत्यादि प्यानदीपवनं विष्टपेवेति किमतिविस्तरेण । तस्मात् प्रमविपया प्रमाकारा मा चिरविचिवसार। एचस्वकारणाझामस्य प नाशासमषकपनम् - 1८६ फर्म पाया निचिरिति वफष्पम् । स्वारपालाननाप्लादिति चेत्, अमानना पमानावस्सिास विनश्पदवसाधानमनिसस पायस पिरमप्यनुाचौ सत्कापनामासः। उतप्रमाषिशेपत्वेन निवर्तकता स्पस्पेन प निवर्त्यसेति रम्पत्तोन रूपेम अविषया सह स्वनिवर्त्य स्वेऽपि न दोपः, निवर्पतानिरर्तफसयोः अपम्छेदफैन्य एष धममङ्गापवेरिति पेत् न, प्रमाया अप्रा प्रत्येक निवर्तकस्वदर्शनेन पयस्वस्म लिबलवानवन्दफस्वात् । नमानस महाननाशकवापि प्रमाणसिदा, मन्पया समापन्यासकारणीभूवस्साझानस पागरादिप्रमाममानेन निाची पुनः समाभ्यासानुपपधिः । स्व अनेकयानस्वीकारे । वात्मन्पपि तपासम्ममेन मुक्कापनामासः । मूसापानसैम विचित्रानेण्यक्तिस्वीकारा एकपकिनाशेषप समस्यन्तरेम स्वमान्तरादीनां पुनरापिट सम्मपति, सर्पक्किमवो. ममदानस्यैव निसची तु भारपान्तसम्ममाद, द्वितीयस्थ प सामसानहीकाराद, न प्रपास पुनरुत्पपिरिति तु सपासनामात्रम्, परमानं या महामाननीठक षणविशेषो पेति यत्र पिनिगमरमापात् , बनन्वोचरोचरशक्तिपपु वनन्तपूर्वपूर्वशक्तीनां प्रतिबन्ध कत्लस, परमशक्तिकार्य परमभक्के, तमाशे प परमदानस्स हेवस्वकल्पने मागौर पाद, पूर्वपक्तिनाथ इस चरमसकिनाशेधप पणमूलासानावारपापल्पनुदाराचेति, न. फिशियन् । 100 एतेन-चामरादिप्रमेण खमादिप्रमतिरोपानमा क्रियते, सर्पप्रमेय रमा पाराममविरोपानपत्, माननिापिस्त प्रमारमैपविधानादेव इस्पपि निरखम् । एवं सति शानसामाननिवर्तकताया प्रमाणानुपसम्मेलभित्रपिस्तमोपानापासात् । मुतिम्प पर जेनेएकर्मवाद-मनमाषसमर्पनम् - 1८८ मा पर उदाइरपोपसम्मा, भूति: मुतापिषिष एतदर्य प्रमाणतामणगाईते एन । बस मुविसावत् "वमेन विदित्वा निसलमेति" [वा० ३.८] "मुसरविणा" इति पाने प्रसिम् । क्या- "समावास्यान्ते विधमामानिमि" [देख० ११०] स्मतिप-सी पेच गुणमयी मम माया दुरपया । मामेष मे प्रपफ्न्ते मायमेवो वस्ति ते " [ममवतीया ५१.] विस्वेदिता १माप्रमपमन्येकी ४ मत। ५ऐपि मम्माननियपि मूममममम्पादन " बानचिन्नुपरमम् । "शानेन तत्ववानं येषां नासिवमात्मनः । तेषामाविस्मयानं प्रकाशयति सत्परम् ॥" [भगवद्रीय ५१९] इस्मादि । एसस्-"प्रसविद् प्रल माति" [मुण० ३२९] "सरति पोडमास्मविद" [मन्दो. A "ममपिक विस्तादि यमिमिवेधिते । योगी मामाममेमाय तमै धानास्मने ममा" इति । "मविपाया पर पार सारगसि" [प्रमो.५८] इस्मादिः। अवार्षापचिय-प्रमबाना प्रबमाः म्पमापसमापायामाननिधिमन्तरेप नोप पपव इति शानाबाननिर्षि गमपति । "मनतेन हि मस्य" [मन्दो० ८१२] "नीहारेप मासा" [भास० १०८२ .] "पुष्माकमन्सम्" "मत्रानेना बार्य तेन मुपन्ति बन्त" [मगवद्गीता० ५.१५] इस्मादि मुतिस्मृविनतेम्पोधानमे व मोषम्यवपापकस्वेनावगवम् , पालैप तप मानेनहाननिहरपम्पुफ्गमाव 'नान्या म्यभिचारवर्शनेन मानसामाननिवर्तकतापायो " मीचि पेव । न, एक्सैकसीपमकिवादस्म भनामावपरपत्ता , अन्यमा नीलान्तरपति मासस खामिकालीतान्तरपतिमासकट विनमते वीवप्रतिमासमात्रस्मैव तवावं साविति पाकिमक्साम्राज्यमेव वेदाम्टिना प्राप्त स्मात् । 1८९ उतभुवपस्तु धर्मप एष म्पापापासम्, पीवकस्मिन एव च ममूर्य प्रतिपादहिसरसहन्त इति किं पणमसहोदराबानादिकल्पनया छमिप्रापपिरम्पनेव।। 'निर्विकल्पपोभे शुद्धद्रप्यनयावेशस्मोकि:- १९. निर्विकल्पकममयोपोप्रप एडम्पनपादेपतामेवायसम्पत्यम्, सर्वपर्यापनप विसयम्मुकाम एक तस्त्रावो, न तु सर्वथा बगदूमाषपषपातितामिति सम्पमा पचनो माधाद एव स इस्पा तु नामा, मावस्पर्यायोपरागासम्मपविचारसारुवेन मनसैर मासम्मवात् । न फेरठमास्मनि, फिना सरवर द्रम्पे पर्यापोपरामानुपपचिप्रमत- विधारे मनसा निर्विकल्पक एप प्रत्मपोऽनुस्पते । उर्फ प सम्मती- "मजनमत पई दम्मासिस्स बदन । बन दविमोबमोगो मपधिकमरियप्पनिमययो।" [सम्मति इति । ६९१ पर्यापनगेन म्पुरकान्त गीला विचारेण मुकं बस्तु द्रम्पार्षिकस परम्पम् । पपा 'पटो प्यम्' इस्मप्र पटवविशिष्टस परिप्टिमस इम्पस्वविशिष्टेनापरिण्डिमेन • सहामेदानयासम्म इति मदेव ट्रम्पमिति म्याम्मिापिसवापि समेक्षिश्यामपरा- पदम्पार्पिकमावि पाबद्रम्पोपपोया । न विपेते पपिमे उपरे विकल्पनिषपने समि- पम्पमा १ र मोर मुम। ५ पासपरेमापस एकत। . - प्रमशानसमीक्षा। त्पनीम्यवहारौ यत्र स तपा शुद्धसदहामसान इति यावत् । स्तर पर विकल्परच नामाचा इत्येवसा अर्थः। सपिकल्पाधिकल्पयोरनेकान्तम्य समर्पनम्- १९२ "तस्वमसि" [छान्दो० ६८०] इस्पादापि यात्मनस्वचदन्यद्रम्पपर्यायो- परामासम्मवविधारशतप्राचार मुद्रम्पविपर्य निर्विकल्पसमिति गुदण्टी पटवाना । मममानस्स को मेदा । एकत्र सददैसमपरत्र पसानादेवं विपय इत्येसाबति मेदे स्वौचरकालिक सविफल्पकमेव साधीति सविकल्पम्नविकल्पमत्वयोरप्पनेसान्त एष भेयान् । सदकम् - "सविनप्पणिधिमप्पं इस पुरिर्स पो मणेज मनिमप्प । सविमप्पमेव वा पिष्ठएप ग स पिपिठो समए "[सन्मति० ११२५] इति । . ६९३ न प निर्विकल्पको प्योपयोगोऽमग्रा एवेति तत्र विचारसरुवमनोजन्य सानुपपधिा, पिचारस ईहात्महत्येन ईहामन्यस म्पुपरवाइस सस्व नैसयिकापाय रूपमैव बम्पपगमाव , नपाये नामजास्पादियोजनानिपमस्तु शुद्रम्पादेषरूपभुव निमिवातिरिक एवेति विमाननीय स्वसमपनिप्यावैः । मुस्यैय प्रायोषस्य शाम्पत्वषन्मानसस्वोक्किा- १९४ प्रमाकारपोपस मानसस्वे "भावेदविन्मनु उपान्त पेदेनेव व्देदिसम्म" "d स्वोपनिषद पुरुष अमि" [छा० ३९२५] इत्यादिमुविविरोप इति चेत् । पाम्य धपि “पद्वारानम्पदिस", [फेनो० १०] "म पमुपा गृपते, नापि अचा," [मुण. ३ १८] "पतो बचो निवर्तन्ते" [वैपिरी० २.१] स्यादिमुतिपिरोपसुस्प एर। १९५ अपवारगम्पत्वनिपेपम्मुतीनां सम्म्यस्यविपयस्वावगाहितेनोपपपि वाद- गहथपपैर ममणि महापाक्पगम्यस्वप्रतिपादनात् । मनसि त मुरण्यामुस्पमेदामाबाद "मन्मनसा म मनुते" [नो १५] इस्यादिविरोप एन, स वेदा यौफ मान्ति स मानसीन पमा मनसैपनुद्रप्टम्मा" इत्यादिमुवी मानसीनत्वं तु मनस्पपापापुपसम्पमानत्वम्, न तु मनोनन्यसाधास्फारस्वम् । मनसवेति तु मर्तरि बठीया बारमनोकाईत्वमविपादनार्या मनसो दर्शनम्तामा, न करणताम् , बोपनिपदसमास्यापिरोपात् । “कामा सरसो . लिपिकिस्सा भाऽमक्षा प्रतिरपतिसािरिस्पेतत्सर्व मन " [वा० १५१] इति मुवी मृापट इतिबदुपादानमारगरमेन मनासामानापिकरप्पमविपादनात् , तस्स निमिच परपस्वविरोधापति पेद । न, कामारीन मनोपर्मस्वप्रतिपादिया: भुते मन परिण वारमलपणभावमनोविपपवापा एष न्याप्यत्वात् । "मनसा पेग पश्यति मनसा शृणोति" [दा. १५१] इस्यादी मनामरगत्वस्यापि मुतेर्पालिकसंघानरूपदर्शनप्राणेन पारादिपरणसपि सकारार्यान्वपोपपत्ता, स्वन्मतेऽपि प्रमणि मानसतविधि . . राशिमप्र । १di ३ पुनरित्रि) मु। मोहमप। सीपत। •पसापि । म।
पाववियुमरमम् । निपेपयोः चिपिपपत्तदुपरकपैन्याविषयत्वाम्पागपपचेप । शम्दस सपरोपकान मनकत्वे खमावमाप्रसङ्ग एव सप्टं पणम् । १९६ नप 'प्रपमं परोषवान बनयतोऽपि सम्पस विचारसहकारेप पपाइपमहान- बनकस्पमिति न दोप' इति मान्यम्, वर्षमरतीपन्यापापाचात् । न खतसम्मस परोपज्ञान- बननखामार्प साकारिसरसेगापि मन्पयाका सम्पम् , भागन्तुकस समारतानुपपणे। न प संसारसापरेप पापा प्रस्पमिशानात्मम्प्रत्ययजननमदुपपपिा, पई संसार- सापेपत्त म स्मतिस्पापातो यवक्षे च परसापेषत्वं पर्दछे प्रस्पपलापात इति भिग प्रस्पमिमानस प्रमावान्तरस्पमिति बैनः खीकारात् । खे न विपये एमपन्नान जनपदो- पमुसंस्कारयोराईसमानेमाननफस्वमेव पर्यवसति, कन्यत्रा रजसंस्कारसम्परेप "असमिकप्टेअपि स्यते पामुपमानापपेरन्ययास्यास्यस्वीकारमयसा इति बर्दस्तपस्वी वूमपारमकमानाननुप्पयसापादेव निराकम्पा, अन्पबा रखतममपि उमयात्मकता- प, पर्वतो परिमान् इस्पनुमिवापि उमयसमाबादेशे प्रस्यवानुमित्मास्मकतापचेष । १९० अब 'मनस इस पम्पस परोधापरोषज्ञानबननखमागाजीपदोपः। मनस्पेन परोपकानमनता, इन्द्रियस्वेन वापरोपवानबनता इस्पति मनसान्छेएकमेव इति व शमसापि विषयावन्यज्ञानजनकत्वेन पा शानमनहरवेन पा परोपशानमनाम योग्यपदार्थनिरूपितत्वंपदार्शमेदपरशम्यत्वेन वापरोपधानननातेति कर्म नावग्मक मेर, पार्मिपस्त्वमसि इत्पादौम्पमिपारवारपाय निरूपिवान्त विशेपमम् , इसम्मागर्म त स्पष्टमेव । एतच 'समस्त्वमसि 'राबा स्वमसि' इस्पादिवास्यात् 'दामोप्रमसि' 'राजाममि इस्पादिसापास्कारवर्णनास्करप्यते, 'नाई समा' इस्पादिप्रमानाचो, क्व - इत्पमेष सम्मवात् । साक्षात्कारिममे साक्षात्कारिनिरोपियानवेने विरोपिस्वकल्पनाम् । नव का नास्पात्स्वार्थमायोपलिती मानसः संसर्गोपः इति वाच्यम्, सर्वत्र पारसे सपा बळ असत्येन समप्रमायमाप्रोम्छेदप्रसाद' इति स्। मैषम् , 'दशमस्त्वमसि इस्पादौ मास्यास्परोपमानानन्तरं मानसमानान्तरसैव प्रमनिकसमपनाव, 'पार्मिक स्वमसि' इस्पायौ विक्षेपांशस योग्यस्वादेव गोम्पपदार्थनिरूपितेस्मा पोम्पपदावार कपिभिरेस्पसाबम्पयाम्पस्पेन महापास्यादपि पदार्मागरम बपोम्पतेन नपरोपमानासम्मवाय, बयोग्योपपोगेन योम्पोधोपादानामिप्रखरमपावत्तमेष मोम्प पदावमित्युको प पार्मिकस्त्वमसि इस्पादापि शापोवपिपप बसावकविता पदानानुपपपि । वान योम्पसम्पपरस्पी उदाहरमसानदौसम्पस् । बर्ष प विस्तो ऽमा पर्यापपिनिमेकित भयम्पपिपयतापर्यवसापस दम्पनयस इत्पस प्रमादेन । ६९८ किला, संपदार्थमेवपरसम्मलेन वपोषानबनसोको 'यूर्य रामान' पल वोसिसंगोम्पपिप्पाभराजस्व प्रकारकापरोपपामाथि, तब वानमानसाम्मुपगमे पान्या प्रेरामा!। पवेन एसपनान्तसंपदार्थहमेअपि न निझार एसिप D " पीम। ५चमेना। समा भोप ४ मा परवानासनगोमेदामेरपर्चा। स्पमिति प्रयोगेप्रातेम एम्नमिप्रापकपदप्रापे पतपदमित्रायफसम्बस्वेन तवच्छाद पोपोतुत्लमेर एकम् । अत एव बास्यादपि द्रम्पावदिशादसणा, पदादपि च पर्याया पदिसात् सखण्ड भाम्दपोष इति बनी शास्त्रव्यवस्सा । तमाम सम्दस अपरोक्षमान वनम्त्वम् । ९९९ एवेन-अपरोक्षपदापामेदपरम्मम्दत्वेन नपरोषधानजनकत्यम् , अस एम 'मुक्ति । रियम्' इति वामपादाहस्य रवतममनिषिा, एव च पैतन्यस्य वास्तवापगेषस्वाद अपरोष भानजनकस्व महावाक्पस-इत्यपि निरस्तम् , बालमापरोक्षस्वरूपविपपत्लस स्वमीस्पा 'वत्तमस्मा दिपार सम्मपेपि 'नमस्त्वमसी'त्यादापसम्मवात् , निाचाज्ञानपिपपस्वस पशाम्दपोषापूर्वममापात्, यदा कदामिभिावामानस्वग्रहणे 'पर्वतो महिमान्' इत्यादि मास्यानामपि अपरोषस्वरूपपिपयतया अपरोषभानजनकम्मप्रसाद , "यतो या इमानि ।। भूतानि चायन्ते" [सैघिरी० ३११] "सत्य हानमनन्तम्" [वैतिरी• २११] इस्पादि पास्पानामपरोषस्वरूपविपयत्या अपरोपमानजनकत्वे महानास्पवैयापाताप । ३१०० किश, पर पटोप्रतीति नामे चामुपत्तमप्यापवेद , मपरोषपदार्यामेवपर सम्दादिव नपरोषपदसायकानुमितिसामग्रीवोमरोषानुमितिरपि च प्रसन्येत । एवं प मिमविपयस्वापप्रपेशेनैर अनुमितिसामापा लापवात् पलपस्वमितिविशेपदर्शनकालीन- प्रमसंभयोचरप्रत्यक्षमायोच्छेद इति बहुवर दुर्मरम् । ११०१ एवेन-प्रमाबमेदपिपयत्वेन अपरोपमानजनकस्वम् -इत्यपि निरस्तम् , 'सर्वहत्वादिविशिष्टोऽसि इत्यादिशाम्पादपि क्याप्रसङ्गात् , ईमरो मदमिमधेतनत्वात् मादिति अनुमानादपि तपासावेति । महावाक्यजन्यमपरोक्ष समाविषयमेष केपलानमिति मेदान्विनां महानेर मिप्पालामिनिवेश इति बिमाबनीर्य परिमिः । [• केवलज्ञानदर्शनयोमेवाभेदचर्चा 1] ६१०२ इदमिदानी निरूप्यते-केवळपान स्वसभानापिटरपनपचनसमानफासीन न बा, फेनठमानधणस्वं ससमानाधिकरपदर्शनषयाम्पमहियोचरस्पम्पाप्यं ने वा ! एम मापाः क्रमोपयोपवादिनां जिनमगणिधमाभमणपून्यपादानाम् , पुगपडुपयोगवादिनी महापादिममृतीनाम् , यदेव के समान क्वेग फेरलदर्शन मिति वादिनी व मागादि . भीसिद्सेनदिवानराणाम् , सापारण्यो मिप्रतिपचयः । यतु उगपपपोगनादित्य सिरसे- माचार्यामा नन्दिाचायुक्त तदम्पपगमवादामिप्रापेण, न तु खतमसिद्धान्तामिमायेम, कमा मोपयोपश्यपर्पनुयोगानन्तरमेष सपपस सम्मवी उशामिक्त्वादिति एम्यम् । णपस्सिकशानदर्शनयोरेग क्रमपर्तिस्वम्- ११.३ पतब सपछिकं सम्मविगापामिरेव प्रदर्शयामः । "मपमानातो माणस्स य परिसपस्न र मिसेसो । केसनामं पुष समति नापति म प्रमाण " [सन्मति २॥१] फोरम ". पणभा बादा ३४ सानविन्दुप्रकरणम् । ६१०२ पुगपदुपयोगइयाभ्युपगमनाइोध्यम् -मनापर्यापमानमन्तः पर्यवसान पस सपथा, मानस दर्जुनस प रिसेपः पृषग्मार इति साम्पम् । अत्र प पसोपयोगत खएम्पः। तपा प प्रयोगः- पारपारवपिनानानि पारपारसपिरपनेम्पा का स्मनि, छबम्मोपयोगात्मम्मानस्वाद, भुतमनापर्यायानपत् । पाझ्या विपये मुक- 'माने, मनोद्रम्पविशेषाठम्पने मन पर्यापमान पादर्भनम्बमावे मस्मरपिवादर्शनोपयो गादिमनन्तं प्रसिइमेवेति टीकाछतः । १५ वर्मनत्रयपृयकालस्वस प्रापि एकसिमसिसामयिपिक्स्माद, स्वदर्शनप्रम- शास्त्पस प सिमापपिपिरस उकष्टान्तपोरमावा - सापरपर्व हेस', म्पविरकी १ प्रयोगा, वजन्यस्वं पा हेतु मपवयं सचतः प्रपाठमिति सामान्यम्पासो यथा * दमाद पर इति च प्यान्त इति तु युतम् । ११०६ केरसपान पुन वर्धनोपयोग इति पा पार्न शानोपपोग इति मा समान तुल्सकासे मुस्पाठीनोपयोगरयात्मकमित्यर्प । प्रयोगप-कसिनो शानदर्शनोपयो गाफमालीनी, सुमपदायितवमानस्वात् , यावेव तापेरम् , पपा के प्रकापणापा । केवलज्ञानदर्शनयोः प्रमपावस्य मण्डनम् - ३१०७ वयममिमाय बागमपिरोपीवि केमाभिन्मवम् , घनमिक्षिपमार- " मति बश्या बाप्पा वारा व पास रिपो ति। सपमयममामा विरमगरासाबवा भीक ॥" [सन्मति० २११] ११०८ फेषिबिनभद्रानुपापिनो मपन्ति-'यदा वानाति सदा न पश्पति मिना इति । खम् - किसी में मते इस रवपप्पम पुर्वि भागारेहि पमाणेहि रेबी सटाणेति * मरिपारेहि समय अपामो समय पासदाता मोफ्मा । केवठीण" [मबापना पर २ ८० २१० ] इस्पादिकमरसम्ममाना। ११०९ बस प रस फिस्सयमर्पनेपाममिमा-गली सम्पूर्णदोष । पमिति बारपालदारे । मते इति भगवन् । इमा रसप्रमामन्नमिपानो प्रमीमाचरा समनिमो मवादिमिा, प्रमादादिमिर, हेतुमिः अनन्तानन्तप्रदेशिक सन्मा, संसाना परि मपसादिमिर, परिवारैनोदपियस्यादिमिः । * समर्म पो समयमिदिम मनोरस्यन्तसंगोगे (पए २५५] इति द्वितीया सप्तमीपिका, टेन यदा बानाति न या पम्पति इति माषाः । विक्षेपोपयोगः सामान्योपयोगान्तरिवा, सामान्पोपमोगम विशेपोपपोगान्तरिया, वत्सामाप्पादिति प्रमाः । उरं पुन:-त, गोयमेस्मादिक प्रभानुमोद गौतमेति गोत्रेमामंत्र प्रभानुमोदनार्थम् । पुनस्तदेव स्त्रमवारपीपम् । *प्रभस पात्र स्त्रे उचरम् - "सागारे से माने हा भामरे से इसमे[प्रशासन पर ३ ३११] इति 1 साकारं विशेपावलमि मस फेसिनो पानं मपति, मह। असिमाम परमपमरेपर। मार1 ३५ . सशानदर्शनयोमेंदामेवपी । अनाभरमतिफ्रान्तपिशेपं सामान्याम्पिदर्शनम् । न पानेम्प्रत्ययोस्पचिरेकदा निरापर पस्मापि, सरस्वामाण्यात् । नहि प पसुदानचले श्रोत्रमानोस्पतिरुपरम्पते । न प भारतस्वापदा क्यनुत्पपि, खसमयेऽपि अनुस्पषिप्रसङ्गात् । न प अणुना मनसा यदा यदिन्द्रियसंयोगसदा सज्वानमिति क्रम परवापभिमतोऽपि युधिमान् , साङ्गीणमुखो पतम्मायुपपचये मनोपर्गमापुद्गलानां भरीरव्यापकत्वकल्पनात्, सुप्रप्तौ मानानुत्पतये। तपनोयोगस मानसामान्ये इतुस्पेन रासनकाले स्वाधरासनोमयोत्पतिवारपस इत्य मप्पसम्मवाच । सतो युगपदनेफमत्ययानुत्पदा स्वमाष एव कारणं नान्यत् । समि रितेभपि च मास्मके विपये सर्पविशेपानेव फाल्पानं गृहाति, सर्वसामान्पानि प फेवल- दर्शन मिति स्वमाव एवानयोरिति । १११० पसे च म्यास्पातारस्तीपारामातनाया अमीरवः, दीर्वसरमायावपन्तो न. बिम्पतीति यावत् । एवं हिनि सामान्यस्स निविपस्स पा मस्सनोमावेन न किबिला नाति फेवली न किनिस्पश्यति इत्यपिषपौष पर्यनसानाद । नप अन्यक्रमुस्योपसर्जन विषयतामपेक्ष्योमयपाहिलेप उपयोगममाविरोपा, मुस्योपसर्वनमान उमपग्रहणस षयोपशमपिपप्रयोज्यस्वाद, केवलमाने छपम्पन्नानीययावद्विपपसोपगमे भवनहादि माहीर्णरूपप्रसङ्गात् । उत्तरशस तु न मवयुक्त एनार्यः किन्तु अयं-केवसीमा रसामा - प्रचिती येराकारादिमि समर्क तुप मानाति, न तैराकारादिमिस्तुस्प पश्पतीति फिमेवं प्रापम् । एवमिस्पनुमोदना । क्तो वो परे सति तत्प्रतिवपनं मिभासम्मनप्रदर्शक वन्दान साकार मवति यवो वर्भनं पुनरनाकारमित्यतो मिमालम्बनायेती प्रत्ययापिति प्रस्पपादीति टीकाकत। अत्र यपपि 'चं समय इत्या ' इति मम्भावा प्रारुलक्षणाद, पक्कतमिस्यत्र ज फयं इति प्रयोगस लोकेऽपि दर्षनादिति रक्त अल्पते, तथापि सती, यान्तपदवाप्पैरामरादिमिः तप्तवतीयान्तसमासस्वयत्पदास्स समापदार्पस प मन्यूना- नतिरिकपर्मविविएस रमप्रमायां मिमजिस्वादनन्वय इति यत् समफम्' इत्यादि झिया- विशेफ्णत्लेन म्यास्पेपम् । रमप्रमाकर्मकाकारादिनिरूपित्यापदन्यूनानतिरिकतिपयवाक मानमान् न वारसवावदन्यूनानतिरिकविपयवाफदर्शनवान् फेमलीवि पस्तिोम । यदि पतालम विशिष्टदर्भनस निपेभ्यस्साप्रसिहेर्न तमिपेषा, 'मसठो गलि मिसेहो" , [विशेषा० गा० १५०१ ] इस्पादिवपनादिति साममीस्पते, हा क्रियाप्रपानमाम्म्याव- मिति वैयाकरणनयाभयमेन रसप्रभाकर्मकाकारादिनिरूपितयादन्यूनानतिरिकविपयता शान न वार कातिकर्ट के वर्भनमित्येव गोष', सर्वनयात्मक मगवस्मयपने ययो पपमान्यतरनयग्रहये दोपामावादिति तु पयमातोपपामा । केवलज्ञानदर्शनयोपोगपपेनुमानम् - ३१११ हेतुपौगपपादपि बलेन उपयोगयोगपपमापतति इस्याह- गमावावरणासयबाप पर पहा माण । बदसण स पुण्य मिरमावरपस्सयस्तते ।" [फन्मति० ।५] १पाधि पारिमिक। . वा । . मानविमरणम् । ६११२ सया, नवरं निशावरपषयसान्त इति वर्णनावरणयसानन्तरमन इस्पर्क। न च एकदोमपावरमदयेऽपि म्यमावोतुक एप उपयोमझम इत्सकमपि साम्प्रकम् । एवं सति समावेनैव सर्वत्र नियहि कारणासोच्छेदप्रसाद, कार्पोत्पचिलमारस परपेने तस्कमसमावस तस्कमेपेव निवासत्वाच । १११३ एतेन-सर्वम्पतिविपयन्ससर्वजातिविपयमस्वपो प्रपगेनावरगण्यकता पम्मेवफवादस्वपपछिमोपयोगायसिदि-इत्यपि वपास्तम् । तत्सिदापि सामा सिद्धराबरपाययकार्ययोः समप्रापान्येन अपंगवेरप्रसराय । न च मतिमुखानावरसमोर एम्दा पयोपन्नमेषी यथा तदुपयोगक्रमसवा पानदर्शनापरपयोमुगपस्थप्रप केवसि- न्युपयोगमा सात्' इति पहनीयम् । स मुखोपयोगे मविधानस हेतुस्पेन, धामादो - प्रस्पधादिसामया प्रतिबन्पायेन व तत्सम्मपात् । यत्र हु धीमावरमत्वेन परस्पर कार्यकारममावप्रतिषप्पप्रतिमन्यममाषापमावेन विशेपात । सबसे शानदर्शमपोर्मिनासस्पस्य मिरासा- 1११४ एवदेगाह- मण्णासीवायरमे या मइन्ध पिये म संमबह । वह सीमावरणिये बिसेसमो वसम मस्थि ।।" [सम्मति २१५] १११५. मम्पते निमित्योन्पते पीणावरपे जिने यबा मतियानं मस्पादिशाने या प्रहादिचतुष्परूपं वाधान न सम्मपति, सबा पीपावरपीप विभपतो मानोपयोगमा म्मका दर्भनं नास्ति, ममोपपोगस्वस मत्यापास्मफस्सम्याप्पत्ता सामान्यविशेने मयासम्मनक्रमोपपोमस्वस व महापारमात्मम्पाप्यस्वाद, केवम्यो प्रमोपयोगी सभापचिरिस्पापादनपरोऽयं प्रन्यः । प्रमानंद-नमर्दन केवल्यानतुल्पकारोस्पषि कम्, तरेककालीनसामग्रीकस्वाद , वामपन्तिरात्, प्रसकवर्षनुग्रहीवमनुमानमेषेति द्रपम्पम् । केपलक्षामदर्शनयोः क्रमवादे भागमविरोपा- १११५ न फेरस प्रमवादिनोऽनुमानविरोधा, अपि स्वागमविरोमोऽपीस्साह- 'सर्चमि म साई-मरासिम विच पुर्व मजास्पबचमीमहि परामय हो ।' [सन्मति. २१.] १११७ सापपर्यवसिते तख्दामने सो प्रोके, प्रमोपयोगे तु मितीपसमये व्योः पर्यवसानमिति तोपर्यवस्विता ।। तेन खाशावनामीममा प्रमोपयोगवादिमि तदपि इटम्पम् । पोऽप्पः । न पेललं नसी में मते इर्म स्यपप्पर्म पूर्षि इस्पापुर • पवाभुवाप्नुपपचिमावमिति मावः । न च दम्यापेक्षयामर्यवसितम्, द्रम्पवितप प्रमोचरामुगनच- बर्पियनपिसि" [वलाय.५३१] इति तत्वायनानुरोपन भ्यार्पणयाभुतपोरपि क्योः परसनं पुलम् , अन्यथा पर्यायापामुत्पादपिगमात्मकताव . महा पिप पारे।
. - • सम्मानदर्शनयोमहामेरपर्चा । मवतोऽपिक तयोरपर्यवसानता?-इति पर्यनुयोन्यम् , पारछिमे मिझत्पप्रसिद्धि, पिच्छिम मपर्ययस्तिस्वान्वयस निराममहत्वात् , अन्यमा 'ऋमुत्त्ववक्रत्वे अपर्यय सित' इति प्रयोगस्यापि प्रसङ्गात् । मम तु रूपरसात्मरक्टम्पबदम्ममाविमिमोपापि प्रेस्पादविगमात्मत्वेऽपि विलिदम्याइन्पतिरेकता तयोरपर्यवसितवं नानुपपमम् । अय पर्यापतावच्छेदकधर्मविनिमोकेम शुरदम्पादेशमाचेः कमैकान्तेऽपि केवलयो । पर्यवसिदत्वमपपत्सते, अत एप पर्यापद्रम्ययोरादिष्टद्रव्यपपायल सिद्धान्ते गीयते, वपदरच्छेदकविनिर्मोकस्य विवक्षाधीनत्वादिति थे। किमयमुक्तपर्मविनिर्मो कस्तचत्र- दार्पसापच्छेदकविशिएयो' अमेठान्वयानुपपरया ठम्यलक्षणया, उस उकमर्मस विश्पमतपरित्यागेन उपलक्षणस्वमात्रविवक्षया? आपे वायपद एव लक्षणायां शुरद्रय दास्मद्रम्प का मपर्यमसितम्' इत्येव पोपः साद । सादितस्यापि तत्र अन्धपप्रपेशे तु । किसिट्रम्पं सापपर्यरसितम्' इस्थायरफ एम । उमयपदलक्षणायां तु शुखद्रम्पविपयचे निर्विकल्पक एप पोप इति फवसवानदर्शने सापपर्यवसि।' इति पोपस म्पमपि अनुपपचिः । बन्स्पे व केवलस्योपसक्षितास्मद्रम्पमात्रमाणे सत्र सादित्यान्वपानुपपचिा, फेरतिपर्यायग्रा नपरिपोपचारमध्ये पर्याये पर्यायोपचार एवाभयपीय म्यादिति समीपीनं द्रम्यापविशसमपनम् ! नियतोपलायसायप्छेदकरूपामाषेऽपि समुग्योपलक्ष्य । विपपकवानोमस्वीकारे च पर्यायोमर्यवसितः' इस्पादेरपि प्रसकिर । द्रम्पार्यतया कवल्यानकेवलदर्शनयोः अपर्यवसिवत्वाम्पुपगमे द्वितीयक्षमेऽपि तयोः सझावप्रसक्ति, मन्यया ट्रम्पार्यत्वायोगात् । १११८ वदेव ममाम्पुपगमे तपोरागमविरोध इत्युपसंहरमाह- 'संतमि केवले दसणम्मि मापन समयो परिव । केसम्पपम्मि म वसमस तमा भनिहणार ॥" [सन्मति० २।८] १११९. स्वरूपतो दयो ऋमिकस्पेऽन्यवराज्यक्रामाषप्रसा, तपा च उतपस्य- मागपणगणोपनिपाव', तमात् शापप्पपयोगी केवलिन स्वरूपतोनिमनावित्यः । प्रम्पकृताध्मेवपक्षम्योपन्यास:- ३१२० इत्वं ग्रन्पदामोपयोगदयाम्पफामेन ममोपयोगवादिनं पर्यनुपुन्य स्वपर्य - दर्षपितमाह- "वसणमापारमाए समामम्मि फस्स पुमयरो'। होज व सेममोप्पामो इदि दुवे परिम उपभोगा " [ सन्मति० २०९] ३१२१ सामान्पविटेपपरिच्छेदापरप्पापगमे फस्स प्रपमरमरपादो मरेत् , अन्यत रोत्पादे पदिरस्याप्युस्पादप्रसाद, मन्यत्रसामग्र्या अन्परप्रतिपन्यकन्ये व उमसो. रप्यमाषप्रसङ्गान् । 'सम्मामो ब्दीमो सागारोबमोगोरठतस्म" इति वमनपामाम्यात् प्रयम केनतमानस पमान केवलदननस्पोत्पाद इति पे, न, एतरचनस सम्भि- पुपर-सम्मतिः। 14 डामो-सम्मति। भोजपचा - - . मानपिनुपरमम् । मोगपप एप साधित्वात् , उपयोगफमाझमयोरोठासीन्यात्, योगपपेनापि निर्मा- हेऽदर्शनेजन्नरोस्पश्यसिदा, एयगोत्पविकनिउमानयोरेवणन्यूनाधिश्मयुपयोः केवलिनो कमिकोपयोगव्यपाराया निर्वाहयितुमनस्यत्वाप । ११२२ अपशानोपयोगसामान्ये दर्शनोपयोगत्तेन देततेति निर्षिकत्सकसमाधिस्पछप सकालीनदर्शनात् प्रथम फेलरधानोस्पषिा, केवदर्शने केलखमानसेन 'षिशिप्य तिस्ताप द्वितीपक्षपे फेरम्वनोत्पचिा, तप झमिसामग्रीदयसम्पत्या प्रमिषोपयोगायपारा- निर्माह इति, एकपणन्यूनापिनयुकयोस्तेश्यपे फास्त्रानोरपस्यस्वीपर एक गतिरिति पेत् । न, "सपपुग्म नगर्प" [सन्मति ० २।२२ ] इत्यादिना सपाहतस्वस प्रमाणामान निरसनीयतात् , उत्पमस कारमानस धायिकमारलेन नानायोगाम । न प कि • समये पापिकारिवनाथपपपक्षिा, पापिकत्वेऽपि तस्स योगम्पैपनिमिचफरपेन निमिच नाप्सनाभ्यत्वात् , केरवानस पानमिचकत्वात् उत्पचौ असो पावरगक्षयातिरिकनिमि- पानपेपस्नैप सेस स्वप्रमाणतम्पबस्सितो, मन्यथा सापेषमसमर्मम्' इति न्याया- प्रामामाम्यप्रससात् । एवेन-देवदर्जनसामग्रीत्वेन स्वस्मैव खनासमतामिति के समान पविकस्वम् --इत्यपि अपास्तम्, अनैमित्तिक पणिहत्वायोगात, अन्यथा वस्तष एम वरपाधि नामक इति सर्वसाममननपसाम्राम्पस दुनिबारतादिति किमति- पठविवेन ! । नन्वियमनुपपचि कमोपयोगपक्ष एपेस्पामा दाउपयोगी सामिस्पापोते मादी, "मबेदा समयमेरुसम्मुत्पादयो। इति । कोपयोगवारी प्रवच सिद्धान्तयति 'रन्दि' हापर्व प्रापपोगो नकदेति, सामान्पषिक्षेपपरिन्छेदास्मन्तवाद केमस्पानस, पदव पानं तदेव दर्शनमित्या निर्मर, उमपोतसमाजे समासम्मको स्पाइसैर मन्यत्र रएस्वाद नात्र अपरिरएफल्पनाइस इति मायः । भमेवपक्षे एप सशतासमवस्य समर्पमम् - ६१२२ गमिव वादे फेमिना सर्वातासम्मब इस्पाह- 'बा सम सामारे गामा एक्समरण प्रमप्यू। मुख्य समावि एष महमा सर्म म मामार'[सम्मति. २१ ] ३१२१ पदि सर्व सामान्यविशेषात्मक धगत् साधरं तचातिम्पनिाविधर्मनि- सिष्टम्, साधरमिति क्रियाविनपर्व मा-निरवष्ठिमवरजातिप्रचारयनिस्सपिस्वचमाफि विशेप्यतासहित परस्परं याबद्रम्पपर्यायनिरूपितविपपतासहितं पा पपा साचवेत्सकी। अपना इत्येतीपरीस्पे सर्व न बानाति स न मानीपादेकदेशोपयोगपतित्वात् मतिम- निवदिया। क्पा पोसम्मानमेव केवमनमिति सितम् । भव्यक्तवर्शनस्य केवतिन्पसममोपदर्शनम् - ११२५ सम्पसारवादपि पमम्दन सहिनि न सम्मवतीमार- 'परिमय सापार भविमा सम भपावार । + य सीमावरनिने मुख सुविषयमविय। [सन्मति २।११] । बिऐनामा पोमु। निकमा मोटवा मिमा ४म श्वेता । ७ केवमानसेनयोर्मेडामेपर्चा । २९ ६१२६ मानस हि म्पकता रूपम् दर्शनस्य पुनरम्पकता । न पक्षीमावरपेठति ध्यक्तसाऽम्पकते युज्येत, सतः सामान्पविशेषरेयसंस्पर्युमयकस्वभाव एवाय केसतिम त्ययः । न प प्रापदित्वात् ग्राहकदित्वमिति सम्मावनापि युक्ता, केवलझानस प्रापान- न्त्येनानन्ततापः। विपपमेदवो नहानमेद इत्यम्मुपगमे तु दर्शनपार्यस्पे का प्रस्याशा', आवरणद्वपक्ष्यादुमयमखमावस्यैष कार्यस्स सम्भवात् । न च एफसमावप्रस्यपस । सीतोप्मस्पर्शपद परस्परविमिमस्वमाषपविरोध', दर्शनस्सनसतिदयास्मफकदेवदत्त बस्वमापदयात्मकैकप्रत्ययस फेवलिन्यपिरोघाद । मानवदर्शनतपर्माम्यां पानदर्शन योमेंद, न सु पर्मिमेदेनेति परमार्यः । अत एम पदाररममेदेऽपि स्वाझाद एर । तदुकं सुती ग्रन्यरुप- "अनुर्वचननिहानं परमाप्पोम्परोक्ष्यवत् । वापरणमप्येक न पा कार्यविशेपत" "निमय० ८] इति । ११२७ परमाणाप्णरूपस्पश्यसमावेशपचाभुपे धानत्यदर्घनत्वयो' समावेश इस्पा । इस्प प पाशुपानदर्शनावरणफर्मापि परमार्यत एफम्, कार्यविशेपत उपाधि- भेदतो वा नकमिति सिद्धम् । एवमपपिकेवलस्पलेऽपि द्रष्टव्यस् । बार- "पपुर्वदिपयास्पतिरपभिज्ञान केवले । शेपाणिविशेषापु ते मते ज्ञानवर्धने " [दा० १०३०] इति । ११२८ चतुर्वपापपशिपयाम्म्यातिः स्पृष्टशानामाषा अस्पृष्टमाने इति यामद, मापामावरपे वस्तुनि अमावत्यामिधानमपि दोपानावहम् । नेपा योऽस्पृथ्मानानि वाम्यो विशेप' स्पृष्टवामिशेपेग पक्ष्यमाणरीत्या स्पारिपयाचितम्पसन, वस्माघे गापिकेनले मानपदेन दर्शनपदन प वान्ये इत्यवदर्मः । ममेदपक्षावन्पन्न सात-प्टमापिस्याभाष:- ११२९, क्रमाक्रमोपयोगद्यपक्षे मगपतो पदापपते दाह- "मरिह भण्णाय पजती पर मासद सय वि । एगसममम्मि हदी समविगप्पो न समजा ।" [सन्मति० २।१२] इति । ११३० आपपछे मानप्रसेडएम् , दर्शन पामातम् , द्वितीयपक्षे प सामान्या - पेप्यात विशेषसि पाएम् , एवमुकप्रकारम फरली सदा मापत, वत' 'एफस्मिन् समये भा र प भगवान् मापने' इत्यप पचनस विझन्पो विशपो मनदर्शन न सम्मरठीवि गृपताम् । न पान्परकालेन्पतरोपटपणा उपमनपा विपपान्तरमहणान् उक वसनविकल्पापपपिा, पद सति प्रान्तपापम्पेपि त्याप्रयोगप्रमहा । यदा कदापिन् सामादिकया मानदमनविपपस्सर पदापस सदुदारनुप्रयेनादिति म्मतप्पम् । परमानोमवार (निपप । म-निपप। ३री पर म्रता भरतमोसाममपत। •ममा .
४० माननिम्नुपमपम् । ११३१ पाप सर्पवसं न सम्भवतीस्याह- "मण्यार्य पासवो मदिई भरहा विमानसो । पापा पाय र समष्णु पि पाह[सन्मति २|१३) ६१३१ असार पश्यन् मरटं च मानानः किं पानाति किंवा पश्यति । विविदिस्यका र कप का तस सर्वपता मवेत् । । न परमपीस्पमा । समसम्यकविपपकस्वेनापि केवप्तयोरेफ्पम् - १११३ पानदर्शनयोम्पिपविश्यैकसंम्पाप्मासिस्वादपि एकसमित्यार- फिनापमपतं गोषलवस्गं पण । सागारमाइमाहि य पियमपरि मनागर " [सन्मदि० २०१०] » १३४ यपेकवंशानदर्षनपोर्न सात् क्वाऽपविपयस्वादनमनन्त न सादिति "मति केरम्नाने ममते फेसब्सगे' इस्यागमविरोध प्रसन्येत । पपनस हिसानारे साकार प्रत्पादनन्तविक्षेपवर्दिवानादनावर सामान्यमानासम्मि केबलवर्सनं यतो निपमेने न्नेनै परीवमर्ल मातीति स्वो विपयामापादनन्तता । न च 'उमयोस्तुस्परिपपता- विधेपेपि मरूपोपसर्जनमाषातो विशेषा' इति वाच्यम् , विशेषणविशेप्पमारेन वचन • पनि शानिकसमान्पावपिम्मनिपयतमा पान आमचारान् । थापेक्षिकस्म पतलाम- दादिजावेगापिरोहा । एतच निरूपित्तलम् “पये घे मावे [भाग०२८२] इस्पारि नियुकिमाषापा नयमेवेन म्पास्पाये बनेकान्तम्पासापाम् ममामिः । मामोपयोग- इसपादीत प्रात्तमापापा साकारे यदा दर्षन क्स नियमोजम्मायो पाबन्दो विषेपास्वान्स्मसमासखणोपापिस्पामि बातिरूपाणि पा सामान्यानीति हेवोसेनापी- हमनन्समिस्मारप्रसेपेच पापरे । कममाविकतागमविरोमाविपरिहारस्प दूपणम् - ६१३५. झमबारे जानदर्घनपोरपर्यवसिसत्ताविक नोपपपत इति पार्क कापसार समापचे- "मप्पा मा परनय गुजा पिवमा सरेन एव । मप्पाम पंचनापी बोर भरता तोस ।' [सन्मति० २।१५] ११३६ मम्प मामिप्यते यपाक्रमोपयोगपाचोप मस्माविश्र्वानी जिसम मपावपर्पसिवानो झारापमापी माता या प निपमेन सुम्पते । वापि एक- स्पादिना यदपर्पपसिवस्वादि प्रमोपयोगे फेवहिनि प्रेते, बदपि साविकमरम्मान दर्शनपतिसमन्वयात् उपपपत इस्पर्यः । मम्पते बोचरं पीपदे-यौपाईम पगानी, वरवपि प्रयवादिना याप्पते- मेदतो शानवाम् पर्मनाप-वपि न मावील। मत्यापावरमपपप एकमेवादिमो मविधानादेखि, एनपरपबपि तोमरस . . पीमा मापral पिन पत। 18. कामत म - • देवमानासनयोमदामेवर। कासिनि मेरेनानुपपवेरिति मानः । इसांस्तु पिझेपा-मदमेदेनापि फेरतमाने दर्शन- सना सिदान्तसम्मता, न तु मसिमानादिसति, वत्र हेतू अन्वर्योपपरपनुपपत्री एवं द्रष्टम्प । मयं च पारिवादः । पस्तुता प्रमयादे यदा बानाति ददा पश्यति इस्यादेरनुपप चिरेण, आभपस्वसंवारम्पावापत्यान् । सम्पैस्तदर्पत्ये सु घादर्शनवेळायामपि 'पट पश्यति इति प्रयोगप्रसाद, परदर्शनलम्बेस्तदानीमपि विपमानत्वात् । 'पाप्मान् सर्ने । पश्यति, न सन्मा' स्यादा लगस्पा लम्धेयोग्यताया पास्पातापत्वमम्पुपगम्पत एव, न सर्वत्राप्पय न्यापा, अतिप्रसङ्गात् । न प सिद्धान्ते विना निषेपविरोपमासिका पदापिरलमार्यत, पसरिसागरोपमम्पितिकन्यादिकमपि मतिभानादेम्प्यपेषयति हुपम् , एफस्सा एष धयोपप्ठमरूपलम्बेस्खापत्कालमनासाना , द्रम्पापपषपा विपि प्रापरापरषयोपशमसन्तानसेन प्रात्युपगमात् । किन्तु एकजीवापछेदेन अमानातिरि कपिरोपिमामम्पसमाहितपदपष्टिमागरोपमधमत्वम्पाप्यवसमातीयोत्पषिकत्वे सति बद विकषणानुस्पचिकम्यमुजातीयत्वरूपं तम् पारिमापिकमप पकम्पम् , एममन्पदप्पूपम् । भापरणभपजस्यादिना केषष्लज्ञामवर्शमपोरैफ्पम्- ११३७ क्रमेण युगपा परस्परनिरपश्यविपयपयेवसितमानदर्मनोपयोगी कैमहिन्य सर्मित्वात् मत्यादिमानचतुष्टयम स्त इति रटान्समा समावनापूर्वमाह- "पण्यपणिय गावा समन्ममनापदसणानिसमो। मोहिमपपखवाम र भण्णोपविस्मयमा विसओ ॥ सम्रा उधिमागो पुजा प उ मापदसण पिणाणं । ससम्मणाबरणमणतमसम केर गमा" [सन्मति० २।१५,१०] इति । ११३८ प्रनापनीया प्रमामिलाप्या माषा म्यादया समस्तमुवमानस्स शवसामा-. पात्मयस्स दर्शनाया दर्जनप्रपोविकायासदुपजावाया पुनः विषय आलम्पनम् , मतेरपि व एव शम्दारसिता विपपा द्रष्टम्या, समपरिकर्मपाहिसषयोपमममनितस्स मानस ययो- कमावविपपस्स मनिस्वा मतिथुतयोग्मवपर्यायमद्रम्पविषयतया सुस्पायत्वप्रतिपाद नाप, ममपिमनःपयायपो पुनरन्पोन्यनिरुपणा भाषा विपपा-भरपे रूपिम्पमाप्रम् , मनापर्याय र मन्यमानानि दम्पमनांसीस्यमुरायान्पतानि । सम्मान पतुप्पो मस्याहरीना - रिमागो पुम्पते, तवषयोपशमप्रस्पपमेदाद, न तु जिनानां मानदनयोः । 'नागर्द सम पि' अविमक्तिको निर्देश नस्सा । ता पुनरेतदित्यार - यम्मात् कार्स सम्ल परिपूर्णम् । तदपि त ? । यवोनाररगम् , नहि अनाहतममुकलरिपर्य मरति । म प प्रीपेन म्पमिधारः, यतोऽनन्तमनन्तार्थग्रहणप्राचम् । तदपि वा।। यतोऽवपम्, धयो हि पिरोपिसजातीयेन गुपेन सात् , बदमापे तम्पापपस्वम् , तवम मनन्तममनवपमिति- माग | तम्मान मनमोपयोगमपारमा एक एष देवोपयोगः । तत्रैकर्म म्पल्या, रसात्मकसं च नृसिंहसरहानिकजात्यन्तररूपत्वमित्येक । मापे निग्मोप्पलगायाप्य । मोपनारम्य बने। १मगात। गपुरा पानपिपरपम् । इपिजातिापपत्तमिस्पपरे । केरलतमावरमषयात् , मानस्वं भातिविशेषा, वनित पिपपता विशेष दोपक्षपमन्पतायन्वक इति तु वयम् । अमेवपक्षे मागमपिरोपपरिहार:- १३९ ननु मगदुरूपये किली पं' इस्मादिस्ने समय इस्पादौ पस्समामि • स्पापो न सर्वस्वरससिर, वानप्रयोगान्तरे क्वामिवरणामावान , समा 'नापरसबागाए दुबे मा [मम• १८१०] इस्पापागमनिरोपोप्रप, पद्मविशिष्टषिपपावन मेहनपार्पर्ण समर्मविशिष्टापेषपेव द्वित्वादेः भायल्साद, अन्ययातिप्रसाद इत्याठाम किसिद्धा त्राों प्रापा, वेप स्वसमयपरसमपादिविपपमेदेन पिपित्रसाद इस्पमिप्रापपानाह- "समपामा भविस तेस तेल गरम् । मत्वगामो म तेसि निर्मबन बापमो मा" ॥ [सम्मति २।१८] ३१४. परेषा पैशेपिपीन पानि पकम्पानि पो पहा भविष्ठा वेषु सेपर। से तमपपरिकर्ममादिदेवोनियताः । वर्मगत्यैव सामपनम पामर्याना म्यति सर्व प्रबादम्वादशाङ्गापिरोपेन शक्ने माता नोति । तया समय इस्पादेर्यवायुतायें फेरसी मुतामपिमनापर्यायहेलस्पन्यतरो प्रायः, परमावपिनमोरपिष्टपसातिरिक- विपये साकादिविपये वा सारसरणमापी का परतीपिंकनकम्यताप्रतिवर्स पाव्यम्, एवमन्यत्रापीति विक। केवलज्ञान केवलदर्शनरूपनिर्देशभेदेप्पैन्यम् - ११५१ फिवम्नापे मेलम्सपे इत्पादिमेरेन निर्देशनार्षिकपरवैयेत्पमिमायेच • उपक्रम "ष मनोविसरममाण सर्प परिव दमवाधर्म । सो मनमाना निममा नाम : मिनि" [सन्मति २।१९] ११४२. पती मनापर्यायानविपसमता तडिपयसमानुप्रविष्टानां परमनोरम्परिक पापा नापपिन्समानार्षगमकसोपपिकाविशेषरूपस्सैर समापात् वर्णन सामान्परूप नास्ति, • अमान्मनापर्यापज्ञान शानमेवाऽऽगमे निर्दिष्टम् , प्रापसामान्यामा सस्पतया दापोन- सदर्शनामानात् । न तु सामान्पविक्षेपोमयोपयोगरूपस्वात् उमपरूपामेति भावः । निर्देशमेदेमैव कपत्रितपोरनेक्प मान्पपा- १११३ सो उमपस्मस्पेन परिपठितवादप्यमयरूप केनत, न तु मममोगादिवार (गादिसपमेदारस्पमिप्रापपानाह)- 'माधिमधाम सभा १९TI मेरे मामा नामा मीन बाकि बस पनि मुतामा बोलाभिचारेन वामन मिति ने सुमन ममामन पापि तस पुनीमून पुन मनाया पारस समुषिताम्य, अपनीमारेषा मनात थापा-१०। Aसपोर्षिामाबलमा परिमारामग्रीसमिरता परिमार - बसमामासनपोमपामेरपर्षा । "पानुभवक्समबषिकेषमण सममम्मि देसपनिमप्पा । परिपठिमा' केवम्नामदसणा सेम' विस मया ॥" [ सन्मति० २२०] १४४ सप्टा | चारादिमानवदेव केवल मानमध्ये पाठात् भानमपि, दर्शनमध्ये पाठाच दर्शनमपति परिमापामाप्रमेवदिति ग्रन्यरुतस्वात्पर्यम् । मस्युपयोगपस्केपलोपयोगस्य शिरूपत्ममियेकवेशिन:- ३१४५. मविवाना क्रम इव केरलस्साझमेऽपि सामान्पविक्षेपाबाहकोपयोग- रूपतपा पानदर्शनस्पमित्येकदेशिमवमफ्न्यस्पति- "सगमुगहमेष पहोति निबचणा सा नाण । यह इस्व केरगम नि बिसेसप इपियं ष" ।। [सन्मति० २।२१] ३१४६ मवग्रहमात्र मतिरूपे पोषे दर्शनम् , इदं वदिस्यम्पपदेश्यम्, घट इति, नियमेन बर्मना तदाकारामिलीप इति यावत् । कारणे कार्योपचागव पटाकारामिसाप बनकं घटे मटिहानमिस्पी । "यचा तपा फेवलयोरप्पेवापन्मात्रेण विशेषः । एकमेव केवलं सामान्यांसे दर्शन विपशि वझानमिस्पर्पः। एक्वेशिनेर सामवर्शनयोगमतभेदनिरासा- ३१४७ एक्देश्येप ऋमिकमेदपर्ष पपति- “वसणपुर नाणं, माननिमिच सण परिख । वेग मुमिमियामो दसपनायण मण्णव " [सन्मति २२२२3 ३१५८ दर्शनपूर्व धानमिति छपस्योपयोगदलायो प्रसिद्धम् । सामान्पमपतम्प हि पपात् सो विशेपलपलमत इति, प्राननिमित्तं तु दर्षन नास्ति स्थापि, तपाप्रसिदे। वेन समिनिमिनुमा 'दसणनामा' इति दर्जनभाने नान्यस्त न क्रमापादितमेदं केवलिनि. मजत इति शेप' । क्रमाम्पुपगमे हि केवसिनि नियमानानोचरं दशन मान्य, सर्मासा सम्पीनां सारोपयोगमाप्पस्पेन पूर्व पानोत्पस्युपममौचिस्यात् । तया मानहेतुममेष केवलिनि दर्शनमम्मुपगन्सम्प, बास्मन्तादर्शनम्माइसमिति मागः। या योपशमनि पन्मनक्रमस फेरसिपमावेपि पूर्व प्रमवर्धनाचसाठीयतया पानव:नयोरन्पतमिति टीचमारम्पानं, क्त्स्नमारमेवतास्पर्पण सम्भवदपि दर्षने पाननिमिचस्वनिपेपानति प्रयोजनक्या कर्य योमस इति विचारपीपम् । ११५९. ननु पपा परेसा करिश्ता क्रमो वर्षनिष्ठो बुदिविक्षेपमनमवारपरकोमा पमिमामिभपर्यापविशेषरूपा, तथा सिपानदर्भननिष्ठस्वामा प्रम एवावरमपपबन्प तापरकर सादिति नोकानुपपपिरिति । न, वर्णक्रमस फ्रमनस्यतमयोन्पस्स सुरवतेप्यामिकापरणयप्रयोम्पस रपयोगक्रमस दुर्गचस्वाइनन्पगस्पाप्रमि। १ परिया-सम्मति देन दे मम्म-सम्मति पत्ताभप हम। ५मा पम्पमा । पसम्मपि । म 1 . भानगिन्तुमकरणम् । कादप्पापरणापभयान प्रमवदुपयोगोत्पत्यम्मुपगमे चठभाषकारणामावादविकतमत्वा- चाप्योपयोगान्तरपारापा भरिन्छेदान "जुगव दो मरिष उबमोगा" [ भाव. ९७९) इति पचनानुपपतिः। न प 'मानस दर्शनमेषापान्तरपरिणामतपणो यस इस्पपयोमा योगपपम्' साम्प्रतम्, सापनन्तपापविश्परूपसौपापसितिविरोपिस्वादान्तरपरि मामसपनपंससातपात्वात् , अन्यथा तत्तत्संयोगविमागादिमावेनानुसूयमानपटारसि- युन्छेदापचे । नप - 'अगवं दो परिव उपयोगा' इत्यस्योपयोगयोKगपरस्पचिनिरोप एष तात्पर्यम्, न तु पुगपदवलानेऽपीस्युपयोगस्यपारानां नाशकारणामाबेन सा- खानेऽपि न दोप इति - साम्प्रतम् , बम्मवादिनाप्प प्रमाण्डिभोपयोगायमीम- पपनिपेपफ्रसस र पत्पत्वाद, सूत्रासंकोचसारस्सादरे यदेव पाने दर पर्षनमित्पमाछसैव पुकस्पादिति विरु। एकपेशीपमतत्य निरासा- ३१५० मतियानमेवानग्रहास्मना दर्शनम्, अपापात्मना व मानमिति' पार्क प्यान्तारएम्मामेकदाशिना वषयमाह- 'बह उग्गहमि वसर्प वि मप्पसि बिसेसिमा नाप । महनाममेव सपमेयं सर हाइ निप्पण।" [ सन्मति २।२५] ३१५१ यदि मतिरेषावारूपा दर्शनम्, विशेपिय मानमिति मन्यसे या मति मानमेन दर्शनमिले सति प्राप्तम् । न चैतपुकम् , “स लिवियोऽवतु।" [तस्मा • २९] इति प्रपिरोपाव, मतिमानस्साटाविंधतिमेोतिरिरोपाच । "पर्व सेसिन्दियसपम्मि लियमेव होइ प य पुर्व । मावच माणमि अप्पा पाहम्मि नि मेग [सन्मति २R.] ३१५२ एवं शेपेनियदर्शनेपप्पपग्रह एप दर्मनमिस्सम्मुपगमेन मनिशानमेव वविति मात्, वप न पुरुस्, पूर्वोकोपानतिाो । प प भोत्रादिप्पिन्द्रियेषु दर्शनमपि मनवानमा प्रपत, मात्रष्टमस एपेनम्परम्परपात्, स्पान्छेदम क्याम्पबहार- भावार, भोवधान प्राममानमित्यादिम्भपदेश एकति लोपसम्यते, न त भोगवर्षन मापदर्शनमित्यादिम्पपदप्ता कपिदायमे प्रतिमा, ताई पम्पपि तर रापत मानमिति न त पधुनिमिति । अपनपनम् , इवरप्राप्रप पैर पर युकेतुत्पस्वाद । पर्शमपदस्प परिभाषणम्- ३१५५ रूप धरि पाने यमुनादिप्रसाद इस्पत मार- नापमपो [यो] भविसप म भत्तम्मि बस हो । मजून सिडमो में नमाममाईपविसएम । [सम्मति० २२२५] ११५९ अस्पृटे में पापा य उरति प्रस्मयः स मानमेव सपारनिमित्युप्मने, १ सयपम्मान मेसिन पवार-1-1 . .
"पणामदर्समवोर्मेदामेवर्ग। न्द्रियाणामविपये प परमावादावर्षे मनसा य उदेति प्रस्पया समानमेव सदचक्षुर्दर्शन- मेस्मन्यते । अनमिस्याविरूपे मनोमन्पन्नानेऽविप्रसङ्गमाशाह-मनागवावीतविपमेषु पक्षियो सानादेवि 'वयं काल मासममविष्यदृष्टिकस्तपारियमेमोमतिमामात्, वर्ष देश आसमाटमेपा पूरपिनेफ्मसात्' इत्याविरूपं मक्त्वा । इसापलपण भावना बन्यज्ञानातिरिक्तपरोषमानमात्रस्स, तस्यास्पृष्टारिपयार्यस्साधी दर्शनरपेनाम्पबहारा । । मनापर्याये दर्शनस्वस्यातिप्रसङ्गामाषः- ११५५ पपस्सूराविपयार्पज्ञान दर्शनममिमतं वर्षि मनापर्यायझानेऽतिप्रसङ्ग स्या- मक्ष समापचे- - M "मगपखामाण दंपण ति तेगेह होइ ण म जुवम् । मन्द नार्ण गोइन्दियम्मि प पावभो बम्हा " [सन्मति २।२५] ११५६ एतेन लपमेन मनापर्यायधानमपि दर्शनं प्राप्तम् , परकीयमनोगतानां पटा पीनामासम्म्यानां तत्रामत्वेनासप्टेऽविपये च पटादावर्षे सम्म मावात् । न चैतपुकम्, वागमे वह दर्शनत्वेनापाठ । मम्पसेयोचरम् -नोइन्द्रिये मनोपर्गमासपे मनो विक्षेपे प्रवर्तमान मनापर्यायपोपस्म मानमेव, न दर्शनम् , यस्मादस्पृष्टा पटादयो नाम विषय इति क्षेपः । निसं तेषां सिङ्गानुमेयत्वात् । सपा पाजामा-"बापा पोष्णु- भाषामो" [विशेपा० गा० ८१०] चि, मनोपर्गलास्तु परास्मगता अपि स्वामयात्मस्पष्ट मातीपा एपेति न वदंशेऽपि वर्डनस्वासः । परकीयमनोगताओकारपिफम्प एपास भायरवस चोमपरूपतेप्रप छापस्सिकोपयोगसापरिपूर्मग्राहिमाम मनापर्याफ- शाने दर्शनसम्मन इस्पप्पाहुः । भसध्यविषयकशामार्शमस्याएपफ्स्वम्- 1१५ कि- "मइसमनामणिमिचो समरमे रो मस्परपसम्मो । एगपरम्मि विसिम सप ईसणं कसो ॥" [सन्मति २।२०] ११५८ मतिमुवाननिमिचा पसानामर्पोपसम्म उफ मागमे । सपोरेकवरमि अपि म दर्शन सम्भवति । न पामर दर्शनम्, वस हानात्मकत्वात् । सातो. दर्शनम् ? नातीस्पर्फः। मृतझामख पर्शनस्थामावा- ३१५९, न भुम्मस्प्रेध्ये विमिति दर्षनं न मोद ! वधार-- " पचासगह ण इन्ति मुमनापसम्मिमा मत्वा । तमा सबसदो प हो सपो वि समनागे " [सम्मति २।२८] ११५. पमापवानप्रमिता बर्षाः प्रस्पषमहर्ष न पान्ति, मषमस्व म्पगारवा प्रस्पषस्वात् , तमाद सबसेप मुख्याने दर्शनसम्दो न मबति । तमा पम्पसनावप्र- मोपवे काममा१'मा-विणेपा। .
4 A ४६ मानविन्दुमनपम् । हाविपयाप्रस्थपत्यमेव दमनत्त्वमिति पर्यवसमम् । प्रत्यापदादेव मुजानपदमिलने पारको परोधमिमस्व सतीति विश्पर्ण न देयम्, 'मुजूम लिङ्गमो कपडसाप्पी सात्पर्य द्रष्टम्पम् । इयं पापमुर्दर्शन मिस्या नपा पदासापकत्वादमा मनपरेन मानसपनिमेन प्रापम् , मप्राप्यारिखेन मनस एप पसरपस्लाम प्राणपरनामीति सम्पपपते । भवपिज्ञानमेवाधिदर्शनम् - ११५१ तया प'मबपिदर्शनमपि रूप सङ्गछते, पख म्यानावग्रहविषयात्री स्पेऽपि पवारत' प्रत्ययत्तामाराव' इति महापा:-प्रत्यक्षपरस्म व्यवहारनिपयसापार समस्यधार्यताव, भगविधानस प नैपकिकपत्यषस्याम्पाहता-परिहारममियाना- 'मं मप्पुध माया मोहिण्णाजस्स होन्ति पचासा । तमा मोहिण्यामे वंसजसो वि उपउचो ।" [ सन्मति• २१२९.) ६१६२ स्पा । उपयुक्ता सम्पनिमिचारकाः। एकस्यैन केवखोपयोगस्य स्यात्मकत्वम् - ३१६३ केवलज्ञानेमी सधगमम्पाहतमिस्पार- " ममो मारे बाबा असर य केगसी निपमा । सम्हा वेगानं दसण व भविसेसषो सि" [सन्मति २।३०) ११६४ यशोऽस्पृष्टान् मामामियमेनावस्यतया फेवती पनुमानिय पुरालित मानाति पम्पति पोमपप्राधान्येन, सम्माचकेवरूपानं दर्शनं पाविशेषत उमयामिपाननिमिचसा विशेषाद सिरम् । मनापयपानस तु म्पननावमहाविपयार्यकप्रत्यक्षपेपि वासविसने -प्पमिपारेण स्वनामताबन्दकामगोदेन प्रस्पमस्वाभावाम दर्शनस्तामिति निकः । ११५५ मा यहीकारुता 'प्रमामप्रमेयपोः मामान्पनिनेपात्मकसेऽप्पपनीवावरपे पुगपद्मसम्ममायो बोधः, उसम्माप्रमाा स्वपगतावरणलेन बर्मनोपयोगसमये पाना पपोगामावादमाप्परिनपनमनाममवापग्रहादि, मतिमानोपयोगफ्फासे पुष धुदशन, मरिमानोपपागमापास पापिक्सनमाविर्मगति इति प्याल्यात मजरती- • मन्यायमनारति, प्राचीनप्रमपमात्रानुरोपे भोत्रादिवाना प्रागपि पचनाम्मुपगमता पर्मनीपस्वात् , म्यअनावग्रहापावग्रहान्तराल दसनानुफ्लम्मा , सदनिपाप, अमय सामपिरम्पअनावमहान्स्पषपे "बरे द्वन्दि करे" नदी ०५मागमेनापावा रुपनेरेर ममनाव, म्पअनावग्रहमाकाले दर्तनपरिस्पन पास्वन्ताञ्चवितरवा । तथा सनि तपनि पार्यमभिकादपि निकटस्पेनानुपपोर्मस्पप्रसङ्गाप, प्राप्यारीन्द्रिपा • नम्पले मनानुगम पान्मत्रापि मिमनकल्पने न किचिन्प्रमाणम्, 'नाममा ला. दिना मानापमानादर्भनरमावप्रतिपादनाव 'वसुदिपपाम्याति स्यादिस्तनिधि पापलपाती नया मारसार । उपम्पमानोपयोगे दर्शनोपयोगररेन हेतुसे तुपापर मियोमा ५"TITIO.१५॥ प्रदेगारिसरात J . + H 4 ७ पम्यानरसनयोमदामेरपी। पर्सन नान्पत्रेति फर्य भदेयम् १ । सम्मान्छीसिद्धसेनोपजनश्पमते न स्यापि झाना- दर्जनस्प बालमेदः । किन्तु स्वग्रामवापछेदकाबन्छेटेन पअनापमहाविपपीकसार्य प्रत्यक्षतमेव दर्डनमिति फलितम् । ११६६ यदि प चाभुपादावपि भानसामग्रीसामर्थ्यप्रापवर्तमानकालाशे मिति मात्रापशे च न दर्मनसष्यवहारस्तदाऽविपयताविशेष एष दर्शनत्यम् । स च कपिदेशे योग्यताविपचन्पसानप्छेदफा, कपिष मारनाविशेपजन्पतालच्छेदका, फेरले र सर्षाने आवरणपपमन्पताऽसम्छेदक इति प्रतिपक्षम्यम् । न प 'अनव पियां निक्षेप इति न्यायादाप्रविसपेमाने पिपयसाविशेपाऽसिदि" इति शश्नीयम् , अप्रपि ज्ञानानु रूपस्खमाषपरिकल्पनाद , अपाऽविशेपेऽपि पैः सम्हालम्मनादिशिष्टमानस व्यापये प्रकारिताविशेपसाऽभ्युपगमाघ । ने हिस्स तत्र मासमानवैशिम्पप्रतियोगितानत्तमेष निस्पकविशिष्टमानस्व गर्ल सम्पम् , दमापुरुषसंयोगा इति सम्हालम्पनेप्रतिप्रसङ्गान् । न प मासमान परिशिष्मप्रतियोगितात् शानस्वमेव वया, दमपुरुपयोगपतियो- गिस्वानुयोगित्वानीति माने दरविशिष्टमानत्वापची । न च सरूपतो मासमानमित्पा- मुकामपि निस्तार, प्रतियोगिस्वादेरतिरिकले प्रकारित्वादेर्माननिष्ठस्स पत्पनाया एष मनुस्वात् । अनतिरेके त दणदणास्मादिनिफित्पकप्रपि दमादिविलिष्टमानस्थापः । ११९७ एतेन खस्मतो भासमानेन सिमेन गर्मितलक्षणमप्यपास्तम्, संपुक अमपापादे सम्बन्पस्वे वरूपत इस्पस दुर्षपस्माच । तस्मात् पाम्पुपगतप्रकारिता विशेषरदाकारविक्षेपा साझादवयानुरूइस्तदननुरुपो पा पाने दर्शनश्चम्दम्पपदेष खरनापिलवस्समय एषामज्ञानयोरविनिगमेनाकाराकारिमालखमावानिर्माणादित्सेप पुनरम्मा मनीपोन्मेपः। सुमपान्तरोत्पादोक्कि परतीधिकामिप्रापा- ३१५८ तस्मायामक एफ एप फेवसानपोप इति फलित समवमुपदर्भपति- "साई भजासिम सिरो वि ते ससमय यह एपम् । पतित्विया व एगसमयसम्पाभो ।" [सम्मति. २११] १९५९ सालपसिन पमितिले पपि शमले से टम्पसदपाय - सपिति यावत् । मेयं पससमयः खसिद्धान्तः । यस्फसमपान्तरोत्पादस्त्रयोर्मप्यते तस्परतीपिकयासम् , नाईपनम् , नयाऽभिप्रायेण प्राचस्वादिति मावः । चिरूप दर्शनमपि सम्पग्ज्ञानमेव- १७. एसम्भूत्वस्तुतत्तमदानरूपं सम्पम्वर्द्धनमपि सम्पवान विशेष एष। सम्पम निस्तस्माप सम्पमानतम्पाप्पमातिविशेषरूपस्वाद , विषयताविशेषरूपस्वादस्पार- मबिबरम। भारम। बोमिमा ४पविमा मप।पिरमप्र मनसमेत मनपयो मा सोमबा समरमु । . .
१८ सावपिनुपरमम् । "एवं विपण सममानस्स मारबो मावे । पुरिसस्थमिमियोहे सनसदो हसा मुतो॥" [सम्मति० २।२] ३१७१ दिनप्रगतमागविपर्य समूहालम्पनं अनिरूपं शान रूपं सम्पम्पनिम्, वासनोफ्नीता विपर्य भयविनानमपि माकं तदिति वारपार्थः । समग्दर्शमस्य विशिमानस्सम् - ११७२ ननु सम्मग्लाने सम्पदर्शनलियमरदर्शनप सम्माननियमान सात् । इत्पत्राद- "सम्मताने नियमेव दस, बसगे उ मममिय। सम्म चाप प म ति मरयमो हर समय । [सम्मति २।११ ११७३ सम्भवाने नियमेन सम्पन्दनम् , दर्षने पुनर्मगनीय विकल्पनीयम् । सम्पनानं एकान्तरुचौ म सम्मपति, मनेकान्तायौ । समस्तीति । अतः सम्पयाने पेर्द सम्पम्पर्धन पेत्यर्पतः सामादिकमेवोपपर्म मपति । गमा सम्पत्तमिन एवं मानविशेफरूपमेवेति निम् । - [प्रन्यवरप्रशस्ति ।] १७. प्राच पापी बिमुखविपयोन्मेपरस्मेक्षिाया, मेरम्यानीमयमपिगता नम्पमार्गाजमिला। पामेपा समपपणियां सन्मतिनन्धमापा, पियासाम सनपविपगिप्रान्पपाणिन्पनीमी ॥१॥ मेदवारिम्पयाविनर्म संमियो मारवादी, पुन्याः प्रायः रणमसयो सीमि घरखम् । मेरोमोन्मुसमषिमतः सार सिमसेन समादेते न सह निपमा गरिमालपोप ॥२॥ चिस्सामान्य पुरुषपदमाखमस्से विशेपे, रूपम छटममिति सापनन्त योग। एस्मरौ कमाविरमप्युन्यमान न हुए, तत्पूरीमामियममिमता ररूपगौणम्पपन्या ।। ३॥ मोमगमषिजनुग्धपमिदानिदानोपार, मुवा बहुमा भुते नमविवादपक्षा पया। वसा का विसपो मत परिपपत्रये, मपानपदी पिपा का पीयसी म्यते ॥४॥ पनि मनगर।पेस समविग्रेसg १९ . . केवबामदर्सनपोमेंदामेदपमा प्रसप सदसस्पयोर्न हि पिरोपनिर्वापर्क, पिशेपपविश्प्पयोरपि नियामक यत्र न । गुणागुणविमेदवो मतिरपेक्षया सास्पदा फिमत्र मबनोर्जिते स्वसमये न सङ्गपछते ॥५॥ प्रमापनयसङ्गवा स्वसमयेऽप्यनेकान्तपी- नंपमापताम्यवोष्ठसपाधिकिारिता । फदाचन न वापते मुगुरुसम्प्रदायक्रम, समञ्जसपद पदस्परपियो हि सदनम् ॥ ६ ॥ रासं पानन्ते किमपि न नपानां हपियो विरोष मापन्ते विविषयुपपद्ये बद खताः। गमी चन्द्रादित्यमतिरिकतिम्पत्ययगिराः, निराधारमाउपहा न गुमानोपणपराः ॥७॥ खादादस भानपिन्दोरमन्दान्मन्दाखो कर फसासादगः। द्राक्षासायास्कारपीयपधारादारारीन को बिठासमरम्पः पच्छे भीविषयादिदेषसुगुरो म्यम् गुणानां गर, पौरि पौरिमपानि बीतविषयाः प्रामा परामैया । तस्मातीर्ण्यमूळ नपादिविषयमादोचमानां शिव- सत्वं फिशिविदं यशोविषय इस्यास्यामदास्पाक्वान् ॥ ९॥ ॥ इति उपाध्यायभीयशोविजयगणिना रचित झानविन्दुप्रकरणम् ॥ . नये मामा रास्वमा
असारशां प्रमादप्रस्तानां चरणकरणहीनानाम् ।
अब्धौ पोत इवेह प्रवचनराग शुमोपायः ॥
न्यापासोक भीयशोविगया।
खागर्म रागमात्रेण द्वेषमात्रात् परागमम् ।
न प्रयामस्त्यजामो वा किन्तु मध्यस्थया दृशा ॥
पानसारे भीमबोरिवयः।
ज्ञानविन्दुप्रकरणस्य संपादककृतटिप्पणानि । मानविन्दुमधीयानानुपक मलं मवेत् । ताग्विचारसामग्री टिप्पणैरुपनीयते॥ ५ 11. १०१ ० ५. 'सपराबमासको पु. १ ५०८ किल' - हुम्मा-'उमयावरमाामो केरम्मरणामर्दसणसहालों 4 पृ० १ पं० १० प समागम्' - पपलि पमानावरणीय धर्म मानण्यम गुण सांस्ममा लव प्रपर्वते वापि न वद वेन समूह समवे, दमास- भावस्थात्" -इत्यादि-मम म 1AI "रण्यामावरणीय कर्म शानभगं गुणं सर्वात्मना ला प्रवर्तते समापि मनस सम्पादक समवे वपालमावत्वात् । पमा अविषहोनापि जीमूतपटमेन रिनकर रगनिरपरनिकरतिरस्परेऽपि सवा स्वयमा मापरीतुं शस्पते । भम्पमा प्रविमानिमसिन दिनरबानीविमागाऽभावप्रसङ्गात् । पर्व- "सा नि मेपसमुदए, होर पहा पन्दपुराण ।" पाचवमानापरणीयेनाऽपि सर्वात्मना पळाने पापोऽपि बद्रवमरविधि- रिशिपवरप्रभारूपो मानेमेसो महिनानाविसहिता, पवायोर्ग मविद्यावधिमनापीय पानापरणानिम्ति, वालि भपातीनि । परी म ए 01 | ३०१०११ 'सम्पनीमार्ग-"इसमन भावमा -निविनिविस्वरमेपफ्टमेगा- विवयोरपि सूर्माधम्मसोनचन्दन वनमानाचा संपपते, सर्वस सर्पमा समापापमपमस्म - ममममत्वात् । एषमनन्तानन्तैरपि जानरमावरणकर्मपरमायुमिरेपरमात्मप्रदेशमा अमेरितपरिपेरिसमापि मैकान्वेन दम्पमात्रमाप्रमाणे मपति वो पत् सरप चम्मविपरमम् पता सिोऽमरमानन्दवमो मागो रिसोदारिवा।" र म - सुबालदिइ सम्मवाणं णिपुग्पार गिरावरम ।" - पोप में • १ ५. १. 'नासामेला' - "ननु समसमको पारणा मटियानादीनि वा- परपमयोपसमेऽपि प्रादुम्पन्धि, वो निम्तसावरणविण्ये पानि मुरी भविप्पन्ति, पारिपरिणामबत् । क्च- "मापरणरेसपिगमे गाइ विनापति महसुपाईगि । प्रापरणसम्पविगमे का वार नदि जीवस्स ॥"
५२ पामपिन्युमरपम [१०१ ५०१- स्य-शुपमा बालम मरवानिमर्मसोपविग्मम पापमापापि सम्पममपगम- वापर पमा बबा रेषदो माविसया तथा वा रेसवोऽमिम्पविरुपयायो । सार । कपिलारित् पवित् मरतीमनेमनरा, वा पारमनोऽपि सभामापापसम्मि निमिष्पापरिपोररपैकपारमार्थियबरूपमावावरणमापटपसिरोहितमरूपा गवर मापापि मिसिनर्मममपगमः वामपमा यमा पेशवा धर्ममगोफेरा वमा उमा सवा बम विसतिरम्मते । सा प चिताचित् बाहिरिसनेमभरा - "मठविमपेप्पर्मिपानेकप्रदरता । कर्मपिटास्मपितिनमानेकअरवा " सा पानेमारवा मतियारिमेनापसेगा । यो पषा मरणानिममेरगमगपयम- •मो समचासलेसम्पक्तिम्पपगमेन परिस्फुटस्पैचामिम्पक्तिस्पायवे वास्मनोऽपि माननवारिणममावतो नापेपरपमहामारोपमासम्बनेकरूपा बविया सर्व मस्नुपापसापालारिणी विप्रप्तिगासति । यायोक्तम् - "पपा बास्यस सस निम्शेपमसहानिया। स्फटैपरूपामिम्पक्विर्षिमाप्तिवादात्मन' ।" दको मारिनिरपेरम्मानम् । मा परम्ममियान यात्पेष्लभाष ठठो प्रत्येक्लमाषत्वाविशेरे मिस एप मामिनियोपरिमे। सेपमेराहत वित्-माहि-पार्वमानिक पख भाभिविमोपियामल देव। हिसाभारपा ममामपनिपामो पनिर्गोचरा समानमा रुपियाम्पमपिशाला • मनोरम्पानि मनापापमानला धमतपर्यापाश्चि सर्व पस्त मानस । रेसमी चीनम् । पर्ष सविनम्यामल मेरमाइस्थमसस्त। । बाहि-क्षेपमेपाल पानम्म मेरा। पानिपानि प्रसेम्मामिनियोपिकारियानानामिप्यम्ते पानि साज्यपि समाधी विपये, बम्पमा ज्ञानेन रोपामपापप्रमहात्, परिपपत्तात् । पमान पति और दिनोऽवसर्वपत्तप्रसङ्गा, भामिनियोपिकालमापापविषयगावम मामापात् । न पैतामिति अयोध्मेव-मतिपत्तिाप्रामेशवा बामिनियोपिकारिमे । मादि -म पारसी से पपिरामिवियोधिष्मामम्म पारसी हवमानम मितु जम्माशी । मषमपप्मानितानानामति प्रतिपचम्मम् । वो मरसेप प्रविधिमेदवो गानमेरा । परमपुरवम् । एवं सी एकस्मि अपि पाने मेरमसक्तेः । मादि-बचरेमनपुरूपलरूपभेरेन विविपमानमेवा प्रविपचिपापमम्स प्रतिपपते । होपोऽपि पा पाम् । म्यारेवन् -बलापारकर्म, परमपरम् । पवा दोरा बाबाष मानमण मेम्वा प्रतिश्पते । पानापारपर्म पप्रपा, प्रसारमा पामिपानात् । पवो पसल पसमा महप्पवे । परेवरतीय मुक्तसहवम् । बर मागापेषमागारम्, गत मापाई भेरेष तामापा र शमिम्पारेपया मामपि पर पता कपमाबाराम -परस्पता।।मानम्मान परिपो भेगा पडीत ।
9 पृ.१ ५.१.] टिपपालि। नम समावव पपामिनिमोमितिको पानस मेवो, न प समामा पर्ययोगमभुते । न बापिनो राति नानामिति कोऽपि पर्यनुयोगमापरति । महो। माती महीयसो भवता शेमुपी । ननु परि समापद एष भामिनिरोपाविको पानस मेवा, तर्हि मगर सदस्पानिप्रसाः। बाहि-मानमास्मनो पमः । वस पामिनियोपारिको मेला समापन परम्पपलिता मीणापरणस्यापि वपसना सविसावे मम्मामलेग मगरवोऽपि । पसलमापपवे । मेषज्ञानभावतः समलबस्तुपरिवानासदिलमिति चेत् । मनु पारोपपोगसमपरा व मग मगवता सर्व पातु भामिनिरोपिपति पानोपयोगसमका बारेमकः परिच्छेदसंभवात् भरमाध्यमेष तस्मापि पछारेवाप्समस्त मापपते । म च पापम् - तस्स वदुपयोग एष म मविप्पति, भास्मसमावस्वेन तस्मापि अमेणोपयोगरम निवारयितुमसस्पस्थात्, केबसमानान्तर मदर्सनोपयोगबत् । ततः फेरम्मानका समक्षेपमानोपयोगकाठे पासशस्वमापपवे । वष पिस्टमयोऽनिष्ट मिति । बार- "नचेगसहापचे मामिणिपोहाइ किमो मेदो। नेयपिसेसाओ पे न समविसम जमो परिमं ।। यह परिणचिबिसेसा नेगेमि मप्पेगमेयमावाओ । भाषरणविमेमो वि समापमेयं विणा न मवे ।। दम्मि य र सम्पेसि सीणावरणस्स पावई मायो। ससम्मघाउ चिप चिबिरोहा स पाणिडो॥ महावि वसम्मम् मामिणिपोहाइमाग्यो निपमा। फेलसमानामो पे सम्मष्णू नए सिरुमिम ॥" वस्मार रमेण पुस्तियुक्त परुपामो पहुवावमाकानारारम्य पापदुतर्पप्राप्त परमावपि मान यावत् सलमप्येकम् , तबसम्सेशिवम् , भोपवस्तुविपपस्वामावात् । भपर - फेमिना । पर सफासेदिवमिति साप मेरो । क्व प- "वमा मनमाहामो मारग्म हेगमेव नाणं ति । वर्ष छठमस्सासफल इयर प फेवासिमो ॥" बम मतिविपीयते । पत्र पचापशुपत- 'सरमपीई पान सपेकसमावस्वादिपे स्वि पप भामिनियोपारिको मेरे इति तत्र सापेकसमाषता कि सामान्पो ममता म. पगम्बवे सोपयोपा। पत्र वापरापा पहा मितिमापचे सियसाम्पवमा पाल वाम परवागोगात् । बोपसरूपसामान्यापेक्षया है समयमपि पानमस्मामिरेफमभ्युपगम्मत एव । वा नो एनिरिति । अप द्वितीयपक्षः । तमुक्तम् । भसियत्वात् । म माम दिशे. पदो विधानमेटमेवोपरम्मते प्रतिपागि ससवनमत्रसेपोतपापपरसनात, भव पपु- तापर्पमात्रमेपरसनात् पामभेषः वर्हि तालपापकपी मविप्राणि देसाणपपेमपा पक्सपो भिवे । वः कर्ष पत्रावा! | नेप पोषः। परिपूनिमिचमेवा पापात्मस प्रतिपारनात् । तपादि- 4 - . मानविम्बुमरणम [1०१.०१- सम्माविषयो मिमि सम्मानम । मनःपर्यायदानस तु मामापमारिसपुरेक्स प्रमाइशेगापि अस्विम विशिष्टो विभिशम्परसापानुगतोऽप्रमाणात संशयस सम्म पमापरविवस्स विपिहरिनिमदों' इति पपमपामाम्यात् । नवविधानस पुना तपादित विपिस्पदम्पसामागमनिपम्पनममोपन्नमविशेष मतिभुतमामयो छमनमेारिक वामे पस्पते । - "नचेगसहारचे मोम मिसंसबो पुम असि । एगततस्सहावचषमो का हामिहीमो ॥ मरिपतिपसहारे बचे एगवतस्सहापर्व । न यहोरसदा उकरिसामगरिसरिसेसा ।। वमा परिप्रामो निमिपमेयामो समयसिसमो। उपसचिसंगमो पिप आमिणियोहाश्मो मेओ ।। पाहसमो निमिच केवम्नागस्म बभिशे समए । ममपबनामस्स उपहाविहो गप्पमामो चि।। ओहिनाणस्स वा अणिदिपर्स पि मो समोरसमो । मसपनाणामे पुण लालपमेयादिमो मेजो॥" परप्पुम्तम् - 'शेपमेवावमिमा'ि तरप्पनम्मुपगमतिरापथार् पूरापावासरम् ।। वर्ष रोममेरमात्रठो मानसा मेरमिच्छामः । परनाप्यममादिना पापानिपवस्तुपदको परम्मात् । परपि ममपात-प्रविधिप्रकारमेरह सात हरपि ममो पापामापातमम् । * पतसे प्रतिपतिप्रभा देशकाचादिभेरेनानम्समपि मविपपमाना न परिरपूरनिमित्तभोग म्पसमापिवानामिनियोरिकारी जाविमेशरामविकामम्ति । वा समेस्मिन् भनेज्मेरमात्र प्रसाnिd- "न प परिवचिपिसेमा एर्गमि य पेगमेयमावे दि। से हा पिसिटे न बारमेए विसपेह ॥" पाप्पबारी-बापापेभामारपम्पमादि पनि न नो मनोपापाये । का परिरभूरनिमितभेरमपिता परखापितो मानस मेरा पसरपेचमापारम्मपि तमा मिपमान न पुप्मासनापनीयतामारम्मति । एवमुवेविवो मूगा पागाम्मै पराम- बनि-बनु परिसरनिमितभेरपरसापिया अप्पमी भामिनियोपियरपो भेरा ज्ञानभा रममूना बसानारममूताः । किमावा । मपयापि दो।। पाद-पपात्ममूनाखवा भीगा -परमेऽपि मारमनः । मा समतं प्रागुणवत्रीमा तलापपवे । ममानारमभूषा, नदि म पारमारिता, समावापापेभो पाताभापारावापि मनोरमम् । सम्पाबस्तुगरपापरिवाना र ६ सम्मपनपरमविनिमुपतमाररातिनमगिरिए पमन्यका ममनमुयोमानासमायो जीवः । सम्म १ मामूवा समादेषमानमिति म्पपश्यिते । स र पपी मईपानिमा पस्मानापरणेन गाविप मा समानम्तवमो • भागो मिलोमाटिव स "माधरस्म अर्गतो मामो निशुपारियो । नर पुष सोनि १०१ पं० २२.] टिपमान ५५ यापरिक्षा देणं मीमो अबीरधर्म पाविना" इत्मावि यस्यमाणप्रवचनप्रामाण्यात् । तवा वसा मस्तानापरणावस्म पनपटम्मष्ठावितसर सूर्पस पो ममा प्रामा सोआम्वरा मापसितमरिमानापावरणमपोपमममेरसम्पारित मानावं मबते । पमा पनपटमगावसूर्य मम्ममममोआवरामसिवस्टाम्पापापरणविपरप्रदेसमेवा । स नाना भयो- पञ्चमानुरूपं दमा तमा प्रतिपयमाना असहयोपसमानुसारेणामिपानमेरमभुवे । पमा । मविवानापरपक्षयोपशमबनिवः स मममममो मविज्ञान, भुवमानापरणमयोपसमबविता मुखमानमित्यादि । दवा बारमसमापमूला मानस्मामिनियोपिकाएको मेदान मष चमोपदसिवपरिरपूरनिमिचमेरता पनसम्पाः । वयापेक्षमावारफमपि पनवोपचापमान न विसम्पते । न चमारमसमावमूतत्वे सीमावरणमापि भावप्रसङ्गा । पत पते मति बारापरपारिएपोपशमस्मोपापिसम्पादिवसचाया। पपा सूर्यस्म पनपटम्यापम मन . प्रकासमेगा परमात्यावरणविवरभेदोपामिसम्मारिवा कर वे धमालपमयोपसमा मारे भवितुमईन्ति ! । न बा सभापमपटसण्टाम्पापावरपापगमे सूर्पस वे बाहा ममममममेराः भवन्ति । - "कपिपरागपफिरणा मेसरियस्स बह दिसस्स । ते परमेहापगमे न हाँति बह वह इमाई पि ॥" पतो पना बम्मादयो मामा जीवमात्मभूषा बपि कर्मोपापिसम्पावितसचामत्वात् वर मारे न भवन्ति, सावामिनिमोपिनदयोऽपि भेदा बानरमात्ममूला भनि मविदामापरणावि धर्मसमोपचमसापेमत्वात् परमारे फेवमिनो म मरम्ति, तो माससत्योपमा । H . "अमिर मस्पषम्मा सम्माईया न होति सिद्धार्म इस फेठीयमामिविपोहाभाषम्मि को दोसो।। इति ।" मी म 1 Aप म प्र HAI ५० १५० २२ 'बि'-ना 'सावि मेहसमुपए ऐति पभा पम्पसूरानं ।' १० २६.५ भिन्मात्रामय-दराचप्रम्पु महानामपत्यतिपय मुस्मतपी- मवार्म रयते । बसाय मामितमेति पम्, पीवामितमेव वत् पपरम् । सर्पसारम- मुनिना पीपे संपहापरापार्मिक प्रपमं मी समषितम् । नितीब मणनमिनीवत्वेम निसिप र वौष माविक मिरवम् । समर्पमपरा परिका( ११९ यम्- "बामपस्वविषयसमाणिनी निर्विमागधितिरेर वसा । पूर्पसियतमसो हि पपिमो नाभपो मपति नापि मोपर ।।" निरसपरा (२ १४४) पम् - "वीपमकिगतो यबाह मगवान् सत्संप्रदायमः। बीवबानमा दीगुचित पूर्वापराठोपनात् ।। - सामनिमुमारपस्म [...- मन्यत्रापि त्या पायुतममा पूर्वापरासोपना । नेसम्म पदित्य मंग्नार वसन्पया प्रसितम् ॥" जम्पा कारिकापाटीकापो परमेव मणनम निरिएम् । पाहि- कपर्दि मणननिमारयो बीबस्मानाभयतममिया मासस परि मतान्तर । भाप्पकारीपमत दमेसाह- परिपी'-मगमको मोस्वामयेन पणनीयम् ।" प्रथमारमपतिनामा विमरणाचार्येम सर्वहारममुभिसमर्षियोमानस प्रमामालपण पपाविका मिरखप वम जीवानिवस्वपमः। पापस्सविमिमेप तु मणममिमीपस्वेन सर्ववामिमुभिनिरत एरशानस जीवापत पमा सधपायो माम माम्यम्पाम्पाप्रसझेन वर्णिता ।बत एप बसानस प्रणामवरण -पमा विवरणापापमलानस्वेन, तस्म जीवामयस्वपमः माचस्पतिप्रस्मानस्वेन बेरमा परापो पहियमामो मते । इममेष म्यपहारमाथिन प्रम्बकारेण पपा क्रममा चिरणापामकरन पाचस्पतिमवरयेम प निर्विर मा प्रन्ये समायोचितम्- विवरणापाबत समतोपपाइन चेरयम् - "मनु रिमामयेपमविया । म वापरतापरमविशिरसरूपामया ममाषामात् । म महमद इति प्रतिमास एष विशिष्टयमयस्वे प्रमाणम् माइमनुमनामीत्समुभवस्तापि चैवम प्रकाशम्प पिपिरामपामसात् । मनु पना बयो रवीति रमलापसोरेगापिसवान परस्परसरंगाबमासा पपानुमबाम्बाबरमपोरेकरमसर्मपाचपावभासो मातारणमालुम पामपस्वामिवियेत् । पत्रमशानाम्तारपयोरेपरमसंपवारामन इत्सवमासो माम्बारप म्यादानसंपन्यामिति तत्पम् । प्रतीवेरम्पपासियो परपरसपम्पसमायोगारमनि परिचा - संगम्यम्म सुपुमेपि संप्रविपमरमाव । भव खरूपमात्रामपस्वानुपपत्तेनिशिणामय स्मा दिपेन् । म । रिशिप पसंपम्पम्प विद्यमानत्तानाम्प पमानामबारे अग्विसम्म नामपोरपि तरायतमगा । मनु पापेऽपि प्रमानुपपचिरतुस्मा । समम् । अनुपमापानपतरसनार संमतिपमतरूपामबलोपासनम्, मोझारस्पाम्पिन र मेषम्मानपरान्। बत मिरम्तारणम्मेवाणानमिति असति । स यसमा रिमात्मा सपियो निरिमारे साचिन पिन गामातील पियानरमोषसमेवारपनो पर्मिता । अपामरणमिम्मामामयोसरमामपरपेपि मापरुपामानमम्तारणामिति । पन् । मानाम्पिरामानम । बारसममानामप्यमानरबान रिमायामशानविरोपीला, मिलापोमानाबानोरेवियोगी विरोचिरणाशनान । रमायमान प्रांगण • मानेन सिम्या | प्रमाणामाचा । पुरमामो तमाचारगेन होगमानेन पराममूनेस समिमिनयमानुमानिनामाभिशापानाम् भान्ति मिलन समारनामाममित रारापी अमंगा ।
२०५] टिप्पणानि। देवाचेपामनापानामयत्वानुपपचिरिति पेत् । मन्दाकरणेपि तस्यम् । सत्तार्यबादाम मि सापम्ताकरणमिति चेत् । नमुरादाबपि तुस्पम् । मतो म बदनापमानामयमिति । मीनापतिशय प्राप्तानानाममहणणवा पेवनानामेवाइवस्वामिपानामाम्वाकरणा मसान किन्तु वम्यामपमिसम्मतिविसरेण"-पंप लिए 1 MAY पाचस्पतिक समवोपपापन वेत्थम् - "मनेन मन्ताफरणापपरिठमा प्रत्यगास्मा समनिदरूपा देवना पर्चा भोक्ता कार्य एमाऽविपायापारा भामरासद संसारी सोनसमारमावन धीगारमा इवरेवराप्पा पादानः तदुपादानम अप्पासः इत्यनाविस्वाद् बीमारपत् नेवरेवरामयत्वमिस्पुर्ण ति।" मामी ५ "नाऽविधा प्रमाभया, फिन्तु जीरे । सा तु भनिरंपनीया इयुलम्, वेन नित्यायमेव " मामी १२१ विधारण्यस्पमिमा सये विवरणप्रमेपर्समरे मम्ममिनीयं पारस्पतिमिमपर्णिवम् मानस जीवामपत्वपम सपिचर निरस्मता प्रसंगात् भास्करसम्मवम् बयानरम बन्दः रपानपस्वपममपि निरम समारममुनिसम्मवः विवरणाचार्योपपावितम मसनम प्राण परवपक्षः पोइसिता । तपपा-"पपप्पसावरिया निम्मात्रसंबन्धिमी जीवामणी चिम वे वनापि माखरूपमुपेस्य पीवमाग एप पमपाविनी संसार बनयेर् यया मुखमा- बन्धि पणात पिम्पप्रतिपिम्पो पिमम्प प्रविपिम्पमाग पपाविशयमावमावि वात् । बहमास इमाशरविधिरास्मानितमशानमनमासते न चिन्मात्राभितमिति चेन् मैषम् । पा को पतीत्सम दहलायसोरेनमिसंबम्पात् परस्सरसंगमावमासा तपमानाम्दाकरपयो- कास्मसचम्पारेष सामानाधिकरण्याबमासो म वन्वाकरणसामानाभयत्नात् । पम्पपाऽदि. गबम्बे सत्यम्तापरणसिविरम्तापरणविशिष्ठे पापियासंपन्य इति स्मारन्पोम्याभयता । म सम्तापरणमन्तरेणाविपासंपन्यो म एचरा मुफ्ते संमवस्यात् । भवासम्म पैवम्पसा. पत्तानुपपवेविशिष्ठयमयत परमव इति चेत् वदाप्यन्तारमवम्पवत्तपम्पानामेष शिष्टस्ने वम्पमामय दुरिम् । षम्परेच वेम्यो वितिरमिति चेत् पवापि गरम वम गवानामपरपम् । पम्पमा भान्तिसम्परमानमोसाणामपि जगमयस्वप्रसाहात्, भपामेन - मोकामवत्तलिपमात् । न पन्नम्म कास्सनिनावपस्वेन पावर पसात शिम्पते । अपमिग्माणाभिवमझान पीपपमपाक्सिानीमाभिवमित्युच्यते । पठ मास्करोस्तारपसेवामानामपर्व मत्पवे उस पापपारमनः सा समत्वमनु मपविस्यम् । प्रससपेर पापित् विपिम गानातीममानमास्मन्यम्युपेयमेष । गमा महपमिप्यमानयोरारमामयतेऽपि माषरूपमपानमन्तारपामपमिति सम्पसे वापि, मानादम्पधेरणानं घरमममपेप क्स्स्मात् । बप मानविरोपि यम । भारमाणितमानेनाम्या परपाभिवस्मादानम्म विरोपासमवात् । पकमिमपि रिपपे वाचनियमानेन पसरचनिधा- मामसामिगत। बम्पत्र मिनाभपयोरविरोऽपि रषगवमान गपकानेन सिम्पत - 9 ५८ बानविम्युमरणम [२०१५.५- इति ह । पाचोऽयम् भतारमाध्यममाम् सुषप्तो जीवमानान्तावरपलारिक मावर गचे सिवेनानेन पानेमामुमितिकरणमूते सप्तपारचयाकरले सितमासान मानित । पासपम्पिम्पन्तापरणे मिवस्म निचिरस्मेति पेट, म । महानमाता- करणगत मामाभावात् । विमर्व रणगत प्रातिनिमिचोपत्वात् प्रचारिकरिति के परि मुरारिषु पत्रसमेत । सारित्वात् नेपामनापयामामयत्तामुपपत्तिरिति चत, पन्चा परमेऽपि तस्वम् मवो मान्दारणाभवममाने कि लामामबम् । तदुक्तमाधेपपूर्वक वियरूपाचा- "नन्वनिपा सर्प म्पोतिरास्मानं पते पम् । घटसमारतीयं च सहसान यषा समाः ॥ प्रसिदवादविपापा सामहोईन अस्पते । मनास्मनो न सा मुक्या पिना त्यास्मा तपा न हि इति । वसामाविपापा जीवनमाविमागोवत्त पुराणे ममिहितम् । "विमेदजनवाने नाधमास्यन्तिक गते । जास्मनो अमषो मेदमसन्त का करिम्पति ।" इति ।" विव xHam मपुस्एनसरलती पोसिये पच पसवमपि सलिन समर्ममते । वपमा- "रिपाया मामयस्तु एवं प्रौष । तदुक्तम् - "माभयसविपयस्वमागिनी निर्षिमागपितिरेव महा। पूर्वसितमसो हि परिमो नाभयो माति नापि गोपरा।" इति । पपंपस मुबमात्रसंपन्वेपि प्रतिमुले मातिन्यबत् मतिविन्ने पीने संसारा, म किये समणि पायो प्रविनिम्बपपपातित्वात् । मम तापमशानाभया तम प्रमा- सारूपत्वात् वयोम दमामकासवीसनमाषत्वारिति पेम, बयानपिरोपि मानकर पेचम्पमात्रम्, किन्तु विपतिविम्भिवम् वर मारिवामा पाविधामा वर नाशान- मिरोमि । नपरि नियोऽपानविरोषित्वामारे पगादिवरमकासलापचित पप परेन तमा पपमानविरोपित्तात् मस्तपत्मरिमासम्म सौरगम सूर्यप्रचारप्रेन मामतपमानिसलबत् क्वोऽपिपावत्मरमासम्म विम्बम विरोष बाब मनु मामय इति पर्मिमारय सामिण महरायमितत्वेनासाना पहपात् पापा, म मोस्वामीमामासापर स्ट इनिबरसानामचिरस्याप्पासात् पगलायसोपामि संचम्पारको पदवीविपरमानापारगोरेपपिपाभ्यासाप बामसाविधीप्रान्वेतिपापम् । चिोमामानपत्लासिमा मम्मोम्बावादिति चेम, मारमाधिपाधीनत्वेन वरनाममा पित पपापानामयस्से सिरे मामय इति प्रवीठेरेक्याम्पासनिवम्बमनापापसात् । भविपासयत्वारेगाहारोऽस्सिवोऽस्तपम्पित पर पा रायत्तमस्तु परिपापामनु परेरणशरावारिति बाप्पम् । भामर्थन पावनिमर्मस्पेन रास्तेगास्सिक्लायोगात् ।
५०२ १०५] टिप्पणादि। चिम्मात्रानिवल बिना वोचरपरमास्यनिवर्यत्वापावात् , खफस्सिवास स्पभिवस्वेन स्यमय स्वायोगात् । नचाबिपायाममुपपचिरमरा, भनुपपछिमात्र नागरा, पिम्तु सस्तावि पापमुक्तावमुपपचिा, मभ्यया पाविषयसोऽनरकातापचे। मौत १०। "बाचस्पतिमिमस्तु पीनामिवैवाऽपिया निगपते । ननु-जीवामिवाविया वत्प्रतिविम्बित पैक्स मा तदबहिमवन्य बा, दलसितमेदं पा जीना, तथा पाम्पोम्पामय इति पेन,' किसयमम्पोम्पामय पसची शप्तो स्सियोमा । नापा, बनाविस्वादुमपोः। नबितीया, मझानस्स खेपि ति सप्रकासन वदमास्पस्वात् । न पूतीयः, सEि परस्परामिवरवेन वा परस्परसापेमलिविकत्वेन वा स्मात् । वन, प्रमयस्साप्यसिमा भवानस्म विदाममस्मे चिरपीन- मितिकरवेपि चिति भविषाभिवस्ववपपीनस्थितिम्सयोरमावात् । म बमम्पोम्पापीनवा- भतिः । समानकाठीनयोरपि अरोपावरफमावमात्रेम वदुपपते पटवदपछिमागर-. बोरिष प्रमाणप्रमेययोरिव । दुवम् - "खेनैप फत्सिते देशे प्योति यदस्पटादिकम् । सपा नीवाभयाविषा मन्यन्ते धानकोविदा ॥" इति । पोन पपुसतिप्तिमात्रप्रतिवम्भरपेनाम्मोम्पापेक्षवापा भदोपत्व वा मैत्रमबारेर मोम्पारोहमापापचिरिवि निरखम्, परसरमामयामसिमावस्मानहीकारात् । न पेपरजीव- पोरीपरजीवकसितस्ये मात्मामया जीवकस्मिकस्से पाम्पोम्पामपा, न पुस्ख चित् पसिका तमा मशानामाषाविति पाध्यम् । पीपाभितापा परिपापा एष जीयेसासको मेवारिकपारसकासात् वमाखीवामपत्वेऽप्पदोपा।"ca ! ५.५। समास्ममुनिसमर्षियोमानरूम मणामयत्वपमा वदीपगुरुमुरेभराचार्यप्रणीतापां मेक- मंसिरी स्पट रयते- “ऐकास्म्यापतिपचिर्या स्वात्मानुमबसंभया । साविया संस्तेज समाधो सक्तिरात्मन' ॥" नफ १. "पफोऽदितीया भास्मा एकारमा वम भाषा ऐनाम्य परिपपाऽप्रतिपरिकाम्यामवि पपिरिमविपाविपयो रसिंवा सांप्रदमामयोपि स एपेयार-बारमेति । तमामो मारमा देवि स्वास्मा । स्वयमेन आरोपिवारममापान महारान् म्यापर्वपति । सारमा पासा . पमुमपति सपत्मानुमः स पर मामयो परमाः सा मोक्ता " ... "पायाने सारममात्रनिमिच म संमतीति सचित् मिमितिपये भरवीत्मभ्युपग म्दम्पम् । र पदार्पर्य रिपोरितम्-पास्मा भनारमा परवानारमनवापत् नामा मेनामिसंबरपा । वमबलरूपमेवामान । न बसतोऽशानसामान पटते । संमरापि पशमसमाप्रमान मविस बमयेत् । म प पत्र मानमाप्तिरति पेन पदविपेपारमझम मान मात् । बनामममाणानप्रसूतत्वात् । मह पूर्वसि सन् ददो पम्पास्मठामस सेत्सव भामयसामयि संमबति । हरनपेक्षा र पम निस्त्रमावस्वान् । एतेभ्म पर खम्पो मानास्मरिपपमहान संमतीति प्रामम् । एवं पापमानारममोमामिल मापि वरिपमहानम् । पारिसेप्यास्मन पावन दमाहोप्रमोसनमानात् । "सोई मानविन्दुमममस्म [१०. ०११- भगको मप्रतिपास्मि मारमपित्" इति तेः । न पात्मनोप्रानसहपण तम तम्पमा:- स्थमाम्पारशियर संभपति बानविपरियोपो मानप्राप्तेष संभवलम शानधारिस्वात् । म बाबानास्व टसारमसामाम्यार, ममामानपेमस चारमना स एष रूपसियुक्त मात्मन एवामत्तम् । * विपर पुनदास्मनोऽभानम् । मारमविपपमिति मा ! नम्बारम- मोऽपि मामस्वरमवारमम्पत्याच प्रानप्रतिवानिम्मम खम्यो मेषायाम पटते । पटप एप । पम् । जबानमात्रनिमित्त्वात् परिमागस सपास्मष रखा। वस्माचरपणे देवापाभावः । वरपनोपमा पाल्यारे वत्सरपपामोमिनस । र । १.२ ५. २४ 'तोष प्रपञ्चोस्पधि'-गडपावानल विपये मताप पाचस्पतिमिमा भुपगवस्त्रेम म्यागम्यमानं मिममिममम्पेषु श्यते-सिसम्वविमो पीपम अपनोपा मानले पाचस्पतिमिभमतस्पेन म्मानर्मितम् । सिसाम्पले चरम प्रपझोपारामत्व पाप सनिमित्व लिपिवम् । मसारम पीनामवस्वविपर्य वानस्पविलिभाम्मुपगर्म निरपणा अम्बापरेण ममाप्ता फोटो पावसविमित्रपझे पीये प्रपत्रोत्पचिमसहस्र्प पर्म वचम् । स - प्रमभरपर्च पर्म पावसतिमिमा मुपगतलेर सिसम्बनपर्मिवं मपप्रम परोपादामस्वपधमममम्मेष • संगणवे । म त सिद्धान्तवियुववि प्रपनल जीरोपापानलपधमणसम्म्म । सिशाम्क- चिन्नुपर्षितपधाभवेण हि वाचस्पविमपावलम्बिनो जीने प्रपञ्चोपचेपिरस्येमानिध्यपावनरुपम प्रम्बकाररवप्रसाद बस्यावममत्वात् । सियापविम्युसिमान्तलेशयोः प्रसवोपयोगिनो पाठो प्रत्वम्- "मसामविपपी वैवम्बमीपरा । बजानाबपीभूव र पीर बी पावसतिमिला।। बमित्र पसे ममानमानात्तात् पीपनानालम् । प्रतिजीपा प्रपञ्चमेरा । पीपमेन जापानोपहिवतया बगापावायत्वात् । मसमिया बात साहापात् । चरस्म - सापक पीपारिपापिनत्वेन फारकत्वोपचापरिति। मपमेष पापपारा लियत ११.२३ "पाचस्पतिमिबास्तु-पीपामिवमापाविषयी मम सत पर पाम्पामपप्रपत्रापारेप विषर्तमानवगोपारानमिति मापासफारिमात्रम् न मानुगर्व परभरपामिनाहा लिएक "स्मासि जीवामिदमाराविपची प्रम प्रपडायरेण विपर्वमानदपा पारानमिति । पर्व पारम्भपापिपरपमाले-मूगारममेष माम्मात् कार्यात् येन देन कार्यानरेन नसबत् समाएपसरत प्रविपनवे इति । भाम्मात् कारिति बम्मनपर्पविमिसा । मठो ६ प्रमिरविवानिवरूप एष पचामिनेपासमरूपा प्रतिपप, एवं पीरविकावयत सरप्रसासमविवाहिमपाभरता पारा म्पयामिपमा मतिपपवे इति मायापारमा वोक्मा मापसतिमर्व मायामिम मिमीयते । दुस्ट बसवरी- पं० १२] 'टिप्पणानि । - । "ममाननत्व प्रम कारणं शंकरोलवीत् । जीवाशानं मगनी अगौ पाचस्पतिस्तथा ॥" इति ।' शान्टीभापत्रमा च ॥ ३ प०१० मधमाप्पफार'- "सेसभामारगमे सुइयर फेवलं बहा नाण" -बिसेषा १११। "नाण केवलपर्स साई संवो समोसमो" -निमेय म १ . । "सम्पावरमापगमे सो सुदपरो मवेज सो च । सम्मपमावामावादण्णाणि न अच से ॥ एवं पगासमामो जीचो छिराषमासयमाओ । किंपिम्मेच मासइ छिरापरणपनो म्ब ॥ मुबहुपर विपाणइ मुसो समाप्पिहाणविगमाओ । मरणीपघरो म्प नरो विगपापरणपायो व ॥" . ३ ५० १० 'अत एव द्वितीया- "द्वितीयापूर्वकरणे प्रपमस्ताविको मवेत् ।" योगा ।। पमा धर्मसन्याससशिवः सामप्ययोगा तास्विका पारमार्मिको मवेत् सपफमेगि शापोपशमिमाम्दाविपर्मनिाचे ..दोपा ये १.पणे ॥ . - १५० १२ 'सक्वाननरस्सानम् - "सिखाग पुणा । गोपमा ! सिमा मो नो पसेरता, नो संजतासंभवा, नोसेमव-मोषसंगद-मोसंबवासमवा" प्रमापा । पसमिमनिमम्यत्वामाबाबाम्पत्र परसम्पाप-कान-मन-सिमावेम्पा ।" परम पुत्सममाषमापनीयम नोपारित्री मोमपारिधी सिप्पतीति ।" पप मा , .। रिम ऐन सिप्पति १ । नापपरेशेन चतुपपविरसपारिनेम मा सिमित, पुस्पमात्र ते हमपरमात् न पारिनेम म्पपरेशविरमेवेन भावेन सिमित या - "सम्मपरिचाई साई सवो य मोरसमिसोध्य । दामाइतदिपणगं पर पि य सारमो मात्र प..। समोपचमिसपा (सारिसपपसिनरूपा) पापियोपि भाषा सीपमोह-मर पिसापो रानछापमोगोपमोगदोपराधिप पारित्र वाभिम सारिसपत्रसित D * मानदिनुपरणम [१०३.१८- विमिति र भवति । इति चेत् । दरयुक्तम् । सिने नो परिची मो वरची इति पर मात् । पापिषसम्मास-सम्मान सम्मान-सियत्वानि पुनः सिमसामपि मरन्ति, बता पापानिज भायिको मारा पाविरपर्यवसान इति । मम्मे उरावारिणिपात्रा पारि सियूमापीजन्ति पदारपस पत्राप्रमाणात् । बापरणामानेऽपि सरे पीपमोहाविमपि वासस्वासंग्ग्रत् । पचम्मवेन चारित्रारीना सिखलायामपि समापन भपर्ववसितलात् एकस्मिन् शिवीयमा पप पारिको मायो म मेपेपु प्रिमिति ।" निमेष यै पनयर प.पं.१८ भयोपसम' - "हमपात्मको मि। सबा वमिवाम्मति पराम- विनम्पसबम्मात् परम भीपाशीपाधि"- १.१॥ "सर्वपातिस्पर्षभनागरसहयात् वेपामेव सदुपशमा सिपातिसर्पघमामर पापोप सपि मापो भवति"-सर्थ १.५ । "मयात्म मिनः भीमामीपमरशस्विमवत् ॥ ३ ॥ पमा प्रमाणनविशेषात् पीनाक्षीपमवासक्तिकस्स फोदगाम्पस हिमा वृत्तिा मा पोक्सपयोसनिभाने सति धर्मप एकोसम्म पगात् परेशम वीर्योपचमात्मनो मान गमगात्मको मिम इति मपरिपते ॥" प ११ "सर्वपाविस्पचनामुरगपपात् वेपामेव सद्पन्नमादेसपातिसमकानामुने पायोपन मिको मारा ॥ २ ॥ पिविष सर्वम् -ममाविस्पर्क समातिस्परवि । पापा सम्पतिसम्मोषपो मपति बपदपि बारमगुणतामिम्पक्विांसि चस्माचदुबमामाषा पर खुम्पते । तमेव सरंपाविसकरमानुपपमाप्तम सापमा परम इत्पुष्पवे । बन -स्वरूपी तित्तापात्मसाहनिवसर्वपाविस्समोरवक्षसे रेपमासिकमा चोरगे सति सपासमाबाहुपणम्पसानो भाषा झालोपत्रमिक स्युनते ॥ राम १.५बा 11-14 प १४ । ५.१ ५.१९ 'रसस्पर्मान - "अविमागपरिफिमर्मप्रोपरसमागमपरिक माशिमहानि सर्पम् ।। ३॥ गमाप्तम्म गर्मपः प्ररेखा बमम्मामामनन्तगुणाः सिरागसमन्वमागप्रमाणा । वत्र सबवपम्बगुणः प्रोमा परिएडीवः पसानुमागा प्रमा पोमेन वापपरपरिभिता पारपवर्षिमागो न भवति ते भविमागपरिप्पा सजीमा मामबागुणाः एको पति वा [व] । एवं प्रमाण पतष परिधिमा पहीलता वा वर्गया । बपर एकाविमागपरिमापिका परेशः परिपदीवर पहाविमागपरि मास्वा स एको पभिः । ष समगुणाः पहीच्या वर्ग वर्गमा । पपगा अता पायोनिमागपरिमारिनामम् । वागमेऽनन्तरं मानेगमेषसी पहीच विशेष दीनाला भाविकमाएनियुक्तानां समुपपा सरकमिपुष्पवे । वव परिधिविधतालेषा सोपपरसा म ममम्रो बानगुमरसा एप । वमोसो बसम्माषा परिपडीया तन पालमागाविमागपरियोमा पूर्वपत् मासं समगुणा पा समुविधा वर्गपा ममति । पअतिमागपरिमाविमा पूर्वपहिणीच्या वर्गा वर्गमा अवस्ति वापरम्पर मपति पापसी मबति । एवमक क्रमेण पिम्प मिमा बमम्मावामनपानि मिरा- प.१ ५.२१] टिप्पमानित मामनन्टमागप्रमामानि स्पर्पकानि भवन्ति । परेवस्समुरिकमेकमुश्पसार्न मपति " बबन मम या २७। "शर्ममायोग्यवर्गणान्तापाविनः सन्ता र्मपरमाणपो न वाविपरिशिपरसोपेवा पासीर किस्तु प्रापो नीरसा एकसहपाम् । यदा तु जीवन गृपन्ने वानी माणसमपे एर पा पापारिमाम्यबसायेन सर्पजीवेम्पोऽपि मनम्तगुणा रसाविमागा भापपन्वे,. पानापरकस्यादिविचित्रसमापता र मपिन्मस्थान जीपानी प्रद्रगना र सो । मतद मुपपमम् , पारसनात् । वपादि-मुष्करणाविपरमाणवोऽसम्पनीरसा मपि गराविमिराहीला विभिभाराविरसस्मतया च परिणम्पन्चे इति ।" मंत्र "मम्मेभ्योऽनम्तगुणाः सिखनामनन्दमागकस्सा मनम्ता पर्गणा एक सर्पकम् । एकेन रसाविमागेनाम्ममिका परमाणपो न प्राप्यम् । नापि धम्माम् । मापि त्रिमिः । मापि । संस्पेयः । नाप्यसम्पेये। । नाप्मनन्तः । किन्तु मनस्तानम्वेरेर सजीवेम्पोऽनम्तगुणैर म्पपिकार प्राप्यन्ते । बता पा समुदायो रितीयस्म स्पर्षकम प्रपमा पर्गमा । अव एकेन रसादिमागेनापिकानां परमाणूनों समुदायो द्वितीया वर्गणा । अम्मा रसाविमागाम्यामपि फार्मा परमाणूनो समुदापस्वतीया नगमा । पबमेकरसानिमागपूरक्षा वर्गणाचनमा पावरममेम्योऽनन्तगुणाः सिमनामनन्दमागकसा मम्ति । तता वासो समापो दितीय । सर्पक । ततः पुनरप्पतः कामिन रसादिमागेनाम्यधिभा परमाणपो म प्राप्यन्ते । नापि पम्पा । मापि निमिः । नापि संम्पेयः । माप्यसंस्मयः । माप्मनन्तः । किन्तु मन- न्तानदरेष सजीवेम्पोनम्तगुमा । बता पा समुदायस्तीपस्म स्पर्षकम प्रपमा वर्गमा । पता पुनरप्पत पयोधरमेमरसाविमागारमा रितीयाविन वर्गमास्वाराच्या पापर- मम्पेभ्योऽनन्तगुणा सिशनामनन्तमागकसा मबन्ति । दरखासां समुरापस्वीर्य सर्व- कम् । स सर्पकानि दाबाच्यानि पावरमम्पेम्पोऽनम्वगुणानि सिमानामनन्दमागसानि भवन्ति । वेषां समुपाय एकममुमागबन्यमानम् । भमुमागापवानं नामैकेन मापामि- याप्परसायेन गृहीतानां धर्मपरमानूनी रससर्वसमुदायपरिमाणम् ।" और १०३ ६० १९ 'तत्र वस'-पंच प्र प्य ! । १०३ प० २० 'बिंधते- प्र ग 01 ११५ । १०३ पं० २. 'सर्वपातिनीनाम्' - "पाः सर्पपा सम्पाविरसस्पर्पमिमा पार सम्पासिम्या । पास्तु सिपातिरसस्पर्षान्त्रिवाना रेसपाहिन्या प्रकारान्तरेण सर्वपावित समाहिर प्रतिपारयति । विपयो पानातिपणो गुणा, दम पर पापर्न वम पो मेदोवान्पविपया, तेम बातिल-सपास्सि देसपाविस्वं रसेपम् । सरसविपर पातिम्या सपनिम्या । सविपकरेयपालिम्पो रेसपाहिन्या ।" मम .." मंत्र बने । २१ सपपातीन्येष'-"या सविपर्ष पामार सम्ममपि पावरति बकापसापन मति भसमय रोवि परसा सरंपावी मावि।स र वामभागमति शिये प्रमिवाविनयेन मिग्पा, क्षारचमुका-दमोसोरपिता, टिकामारावी- .
म प्र ण - H मानपिमुमरणम [१०३ प०२५- निर्मा।हरसारणेन भवति वो रसस्पषसंघाव एपहपो प्राम्पा पा म प्र 41४ मंघ पो पू ५। २०५ ० २१ 'उस्तक्षेपापाम्'- 16 १९५। १.१५० २१ दिसधातीनि' - "इवरो मपाती रेसपाविस्वात्मविपकरेबपाति- । स्वार मरति । स प विविपछिावा, तपा -कमिानरसनिमापिवान इबारित्यूर पिासना, पमितमाम मपमपिबरमावसकता, कोऽपि पुनसमाविषमक्षण बासोबरतीपास्मविपरसंवा । वा सहपतोऽसमेहा चोकमापिमागसमुपामरूपा । मनिमम्म मर्मस्परविम प म । १० . २१ पतासान- "ए ममतीनो रसा भीरमणादिरसोपमा, भाभप्रमताना लिम्पोपावस्यादिरसोपमा । पस्पते -"पोसामनिम्नुपमो नमु माम मुमाण खीरखनुगमो' । सीपरिरसम सामाविरु एकसानभरपवे इमोतु - मोरामचने से सति गोऽअभिभ्यते एका प म हिम्बानका, धमाषी पापामापने कवे सविर एका कर्पोऽवशिरस निमामा, चतुपा कोपामापने सस्पुतरियो प पहा पीस पालाना । एकसानकोप + रसो सम्मानिनुराकाससमक समझोपानिममेपाम्मषमनवरातिमेरत प्रविपपवे, एष रिस्पानकारपोऽपि । तवा धर्मपामपि नामानभरपो रसा भाषनीयाः, प्रसेकमनम्वमेपमिमाप । बर्मनी कला नरसार निखानगरमो रमा पषोपरमनन्तगुणापर म म वा ५। • १ प २४ का पानाबरण' - 'संप्रति पासा प्रतीनो बालम्ति एपमपिस रससर्पचति संममन्दि वासा वापन्नि लिरिषिमुराद- -बावरण पानापरप पर्सनावरण » पत् कसम्मतमिमाह-मसम्मम् सर्वज्ञानं रसम मा स्वीति सम सर्वपाति, पर मम्मात् गम्पानावरम सम्ममावरम प, म विपते सर्प पत्र तपसी रमाना. परमनगरसनावरपरिवमिमर्पः । पवार भपति-बयामापरमपनि गनि मति- हुवावपिमनापर्गपमानापरपम्मपानि स्वारि मानापरणात समर्शनापरपपर्यानि क्षेपानि पहरणमुरपपिरसेनापरणस्माणि श्रीमि पर्समापरणानि, वा 'पुनम्नवयधि- पुपोहा बलारा संगठना! पारपा पत्रपिसमन्वराप पानाम्परामाति, पसंम्ममा सप्ताहवयासतासानपरिणवा परिविचनासामसपरिमपाः प्राप्यते पिसासामेलामको हिसानकमिसानकमतामान पा रसा प्राप्पवे इस मापा । वह पापमापापि भेमि प्रतिपपम्ने सम्वपचपरासां मातरम्पमामपि प्रवीनो बबामपसार- सम्म हिमानक हिस्सानक तासानका रस पम्ति देवि प्रतिपमा भनिदिधार -रसम्पपवावापा समयेप मागेपु गतेपु सत्सु वा परमेवासा मातीनामधमलापसन्द विमुपवसापपोगव परमानक रस गान्ति, सत पर बम्पमपिन पामारपरिषवार माप्यते । पात सारसम्मतिरिया मा गएमा वा विषाणारच-मबमविष्य बिमामरसामिलाकरसातामानमसाम म मापनाप्येसानममा । परमेवर बसेरमिति चेत्, सपा पपापा-मा गठमाय बनाममपातीनामेषमान- - १०२.] १ टिप्पणानि । रसपम्पसम्पदोनिवृत्तिवापरसम्परापाशपा संम्पेयेम्पो मागेम्मा परता, मार्वाक, पो- प्पामासापमानासम्मवात, परतोऽगुजपा ससदसमस्तीतिरिय शेपा बामप्रक- यो पत्यमेव नापान्ति, सन्महेतुम्पपोवात् । पे भपि मानापरणनरसना- परणे बाबमापाता, पयोरपि समाविस्वा पिलानक पर रसो पम्पमागमति, नेक्सा- मम सर्वपाविनीनां पम्पपदेऽपि दिसानपरसपपसम्मपात् । पास्त सुमारे प्रहरखा' मामसन्तविपुखी पर्चमाममतासानम्मेष रस पनाति, म बिस्सान दिखानक था । मम मानवरपिपरी पर्वमानभिस्थान मा समाति निमान बा, परामन्याविषयसलेमा- यापी पते, तदा वम एमप्रकवयो बम्पमेन नापाम्ति, पावरससानपिम्वा । का पति नराविमायो पावोऽतिसहिएमापि कियवेबसाविमा प्ररुपयो पम्पमा- पाम्ति, वासामपि वयापमाम्मात् विमानमेव रसम्म बम्पा, मैकमानकरम, परपामे, सपमेव पस्पति, परमिट प्रवामान्म् । वव इत्व पप्रमतीनामेसानरसन्यासम्म पार समीचीनमुछ हिनियतामामपरिणतः क्षेपाः प्रहम इति।" पर म प्र प्य " . १०५ पं० २८ भिवास'-"पापुमानामपि मागुस्वमतिमानावरणीयारिसप्तर- मातिम्पतिरिक्वानामभुमप्रवीना नेम्मानकरसबम्बसम्भवो पत्-पमात् कारणात् मप । मेवरे सपफमापूर्णभरमस इवरपोप्रमत्तपमचर्सपतपोर्न वाशी एविर्पत एकसानकरस- पम्मो, पा पम्मानमसमन्पपोम्पा परमप्रकपप्राप्ता विहिरमितिमावरसंपरापासपा सम्पपेम्पो मागेम्मा पदो बापते पापपमेन म पा भामाम्तीति म पासामेकसानको रसा। या मुभानामपि मिप्यार िसंशिटो निमिव मैकमानक रस मनाति, पमाचा एमप्रादीनामतिसहि मियामी बन्यो न भवति निम्न मनाम् विमुखममाने, संहतो. लये व मुममवीनामेकमानारसबम्पसम्मको म तपमा, पवलासाममि अपम्पपरेऽपि दिमामक एष रसा, मैष्मानका, पास्त्वनिसकोऽपि मिप्यारो मरगतिप्रायोग्या रेसिप वैबसारिका एममतयो बम्पमापास्ति, पासामपि तवालामाम्याअपम्यतोऽपि विमानक एष रसो मनमणिपति मान" परब प्र प ५१ . । ५ १ ० २ 'न, पया'-"ननु पया भेण्यायोऽनिधिमारसम्परापासाया. मेरेषु मागेपुगवेपु सस्त परवोऽतिविधिसम्ममाम्मविमानापरपीपापीनाममप्रवीनामे मानक रस पास, तपा भपकोपारोहे सूस्मसम्परापभरमारपरमारिपु समयेपु पत्त यानोऽवीवनिगरपालेडीस परवानापरपदेबठानावरपरूपम नम्मानक रस नियति 1, मणी माममतिविनुसार मायापु सपकोण्पाका स्मसम्पराया, पदो मनिशानापरणीपारिष सम्मपहिगडमिमाप्पसानपरसपम्पा समोचन पनि प्रारमिमापः । तया रामारिषु पीसप्तम्मोरवं प्रमभेदान् । हामापीना-रामरति मानुपाप्मानामछमात्वात् भपूर्वोऽपूरप्पो हाम्माविषयधर्ना मरे पस्मातिविनाविप्रा मामात्तात् । गुमादीनां च एमप्रहदीना मिप्यारिपिसकिए। सीसमकपसम्म एम मातीनामेकमानकोऽपि रसमन्पा सम्माष्यवे, इति ममेकसान रस न समावि 1, येन ६ माननिममममम [१०५..- पूर्वोच्म एष सप्तरस प्रत्ययमतुमिसानसा रमन्ते, न भेषाः प्रापा ! मप्र 11 MI "मन परिया-बरेवासमेऽपि बरेजानुस्पेऽपि पाये मम्मम्मपगषमागवे म मनीषम बम्भानावरणमणर्ममावरणरूपमेमसालिको रसो मति, ? इमार-पत् परमात् में वस देवणीत अनुमपि सवपम्पमप्पापरणं रसम्म निमिदं सर्वपाति मणि दीपकरगमप सत्रपम्पोऽपि रसचा समावी मनिव इति भावार्पः । सर्वपाती र रसो बसम्बपरेऽपि रिभानक एष मपति नेसाना, तवोन पणीमानरसमयसम्म म प्र पा ५१४ १५ १ ५.६० पंचर्समासूखटीयाम्' - मोहनीयमोपनममा पनि भोपामिक सम्पावसविरविस्मो गुणो पीपम माधुर्मपता । पाविवर्मणो मनोपशममारे सति पारिवायो गुमा मादुर्भवन्ति । भार-पानसमे परिसम्म पारिधरपो गुनाः किमिति जमिनीमन्वे ।। प्यते-बानपनियोजनाप्रापम्मानिसमापनार्थ पाविर्मप्रदिपुर मुनिमपि पयोपत्रममाषामावधापना र पारिवारो गुप्ता नमिहिवार । पत्र मति- मानावरपापियोपसमे सति मलादीनि चस्पारि जानामि । नमुनापरपानो भयो ० पाने सति पर्सनत्रयम् । एषमम्तराममयोपसमे पति रामारिपत्रसम्मको भवन्ति । मिया त्वप्रथयापारमबोपनमे रेषसम्मक्तम् । हितीपरूपापपपोपसमे ऐपिरविचारित्र दवीपकलापमपोपझमे सचिरविचारित्रमिति चारित्रारयो गुणाः। 4 सो प्र. तथा रेपवरणोदये सनपि यो स्तम्माधिपयम रेलमार्मा स पानोपशमिको - मालाभार :-पपेर वा सर्वपातिपदेसोपो मोहनीयम का ज्ञापोपसमिमे भाष पनि पठे-प्ररेषा रसमावेनाप्रपा पपासम्म समाविषेपमानरसागवा लम्सममरपन्चो पातिरसमापापात् पायोपत्रमिकमाष बमपन्ति । पर्व मनापाक- मानवमुरपपिएसनानामपि मापना कार्य। मनिमुखानामुनापरणाम्ठरापप्रवीना सौगोषप प्रति देखापातिरसस्सनमामेबोरपा दो मापारी माविवमेव ।" एक को म प।११।। 'सम्पति पौषमिको मापा पुगे मपति पषा सपोपममाननिवषयोपरसपति- बपिशानाहरणप्रमतीनो रेसपाविना मी सम्पम्पिपु सरंपारिसस्परेषु समाधिपति सपासावविशेपमेन निदप ऐसपातिकमाया परिणमिवेषु देसमानिससररेणापि पाविधिपत्सरसीप, रोपां मप्पे विपपरससबगवनोदमाषमिकाप्रनिराशल • सपे पेपम चोपनमे विपापविष्णम्मस्मे सन्ति पीरमावपिमनापायातका मारगो गुणाः भायोपमिका बाबम्वे माधुर्मपन्ति । मुमतिपदा बषिकामा परणीपादीमा समातिना भयो सर्वपातीनि रससवाति विपाकोषमागवानि परम्ते पदरा परिपत्र बोरविष एक पब मावा मागे मपति पापाविरमसमरसर परवा पदुरगापोरपिको माषा तिपयानो रसपाविरससबानी सम्बन्धित गपाप -प्रिमिदम पे ऐपस पानुभवमोपनमे भापोपसमिक इन सबोपनमानित - ०६ पं० १४ ] टिप्पणानि । मोरपिकमावा मतिमुवावरणाबासनावरणास्तरापप्रकवीनां । सौर रेसपाविनामेव रसस्सस्कानामुरया न सर्वपाविना वेन सापि वासामोपमिमायोपशमिको मापो समिमी पाप्येदे, म स मौदपिका प म प्र मा १ पृ १५३। १०५ पं० २० 'विपाकोदयेऽपि -"भार-मायोपामिको माना कर्मणामुरये मति मवति भमुदये वा १ । म नाबदुपये विरोपात् । तपाई-मायोपसमिको मात्र सर । बागरिकाप्रविष्टमांश्चम सये सति अनुदितस्म चोपसमे विपाकोदपविषम्ममाणे प्रादु संगति मान्यपा तो पपुल्या कर्म भयोपनमा, भयोपशमसेत् रुपमुख्यः इति । मया नरप इति पमा पपा सविन मायोपशमन मान १, पपयामापारेर विपक्षिवफम- सिके । वाहि मविमानादीनि मतिभानावरमाधुरपामावादेष सेस्मन्वि पायोपामिक माषपरिपस्सनेन । प्यते । पये भायोपामिको मावः । न र पत्र विरोपः । पर, भार- मानावरणीमातीनि कर्मामि भासर्पसगात् मोदपानि, वस्येपामुरपे एष भयोप प्रमो पटते नानुदपे, पामारे पामेवासम्मवान् । तव उपस एवाविरुया सायोपचमिको मावः । यदपि पिरोपोगवनं च्वं 'पपुषपा 4 मयोपसमा' इत्यादि परप्पयुक्तम् । सपातिस्पर्पकानामुपयेऽपि विपपदेसमातिस्पर्पकाऽपेपपा परोक्तमयोपसमाविरोपात्। स र योपशमोऽमेकमेका वचाम्यक्षेत्रमाणविसामग्रीवो पिम्पसम्मबारमेष्यप्राय । पर पापिम्प एप सामोपसमिको मारो यदि भाति वर्हि न सर्वप्रहतीनों किन्तु अपानामेष भयो भानावरणदर्सनावरणान्तरामाणाम् । मोहनीसम्म पनि भावा । इति चेत् । भव पार-मोहनीपत मदेशोरपे सायोपसमिको माबोऽबिस्य न दिपाकोरपे । पतोऽनम्वानु- पप्पाविप्रायः सम्पातिम्पा, सर्वपाविनीनां च रसस्तकानि साम्यपि समावीन्मेर न मातीनि । सर्वपातीनि च रसस्पर्मपानि खपास गुन सास्मना मन्दि म सवा, वव - घेषां विपायोदये न मयोपशमसमबा, किन्तु प्रदेशोषये । नमु प्रदेशोरयेऽपि को भायो- पामिफमाषसम्ममा, सम्पातिरसस्परेशाना ससपासगुपपावनसमावस्यात् । तर उम्, पहलवस्तापरिवानात्, व सर्वपातिरसस्सर्वमरेमासपाविपासायविपतो मनाममानमावीम विरणविरम्वया वेपमानरेसपातिरससकेपान्ताप्रवेशिता न पपा- पलिवमात्ममाघरम्प प्रश्टमित समया, दवो न ते भयोपचमहम्बारा, इति न बिरुम्पते । मोसोरपे भायोपसम्मिको मापा । 'ममेगमेरो' पि इत्मविसमस्माधिकरमापिकचर्पसंसूब मामिप्यात्वापारपायरीवाना शेपमोनीयमस्वीना मदेसोरये विपामोरये या पयो पसमोऽविस्त इति एम्पम् वासा देवमादित्वात् । वत्राप्पर सिपा -वाशेपा मोर भीपमहसयोऽपोरया, तो विपाकोरपामा भापोपसमिरे मापे विगुम्ममाणे प्ररेसोरप सम्परेऽपि म वा ममागपि रेसविपाविन्यो भवन्ति । विपाकोरसे प्रबचमाने मायोप- मिछमारे मन्यम्मानिन्धमात्रकारितादेसपासिम्यो मपन्ति । म ध प १०१। .०६ कर्मप्रकृति'. -1 11-1४ामी म । १.५५ १४ 'मुख हु- "इदियमणोनिमिर्च विणापं सुपाशुसारेण । निपपस्पचिसमय मावसुर्य मा सेस ।" निरोप , ।
1 - ३८ बालविलमममस [१०१०१५- इनिपानि सनातीनि मनम निम्मासि पानि निमिपम परिन्त्रिपनमो. मिमिचम् । इन्द्रिप-मनोधरेप परिणाने वागत समयावत् किम्!, माह-दर भाषा एखानमिसपा । इमिपमनोविमिर्ष , भविमानमपि मावि बक्सरबार्षमाह- समानुसारेण इति । भूपत इति एवम् -म्पहुवर्ष कम नमः । न सहेवरिषषपणे- पोशमा हुवप्रचारमन्मेर एमवे । वनुसारेणैव पापपते वत् अवज्ञानम्, माम्मत् । समान पति-सतमम्माच तमन्दसम्बन्धि पापहारियणमनुपन पामपापक- भाषेब संबोच बिटो बटा' स्मापर्वसाधरमम्बम्समोन्यम्बिततिमिवारिनिमिर्च पक्षानमोवि वयानमिति । सव कप मूतम् ! स्मार-नियोक्तिसममिति । निरास बस्मिन् प्रतिमासमानो पोऽसौ पटामिरपापमोक्किा-परमे प्रतिपादनम्, तत्र सम पम- -भिवकार्पोक्तिसमर्पम् । भयमिह माषामा । समोससहित विमानमुत्ता सप्रतिमास मानामविपारसबमति । वेन पर ममाप्यते मे निरोक्तिसममिर मरी बमियाविषयमिति पामत् । प्रहपरिशेप वत्, समासारेमोत्सवसायम निरभोंस्विसामर्याम्पमित्रायत् । 'मई सेसवि' पप - इनिपमनोनिमितमधुवन- सारेच परममारियान वत् मटिमानामिका में , १०॥ १५ दिन न'-"चार मित्-मनु परिमोलसहित व्यान मिप्यते क्षेत्र मविज्ञान वापसमाजमरूपोऽसमद पर मपिका पात् म पुनरापापा वे समोससहिवत्वात्, मनिशानमेवत्वेन वे प्रसिया, तत् मुलायम पम माविम्यामिदोषा, पर्यटन मरिमामलाम्माप्तिप्रसंगा।पर प-बालापति हरिपु "भामर सी सम्म साईब गाठ सपमपसिप र मारिसर मेरे मन मामभेरहस्मानामनपरेणीना समात् समापि तम मनिशानवासहाण, मविकार भेगाना पेहापाबाचीन सामिमपस्वेन हुवमानस्वमगमनम्पपरवा परोपम मात् । मनोपवे - यत् पारस्तम्-अपमह एष मविजा जात् म लोहारपा, पालो देवमादित्वात् । वजुक्तम् । यतो पपापमा सामिमपा, वापि मग एकसय, पुणानुसारिन एक सामिपमामल मात् । बाबमामा इवनिमिया पर सिजाते - मोक्या, दुक्तितोऽपि गरिपु प्रमामिणमा सवामपापिताप्पाइसरपमन्तरेण न रंगप्प भवाय पी एलानुसारिणम् । । दरयुक्तम् । पूर्व अपरिमिदमरेते समुपगावन्त इति निमिण चले न पुनर्मगधरमले हवानुमारित्वयेतेपति । परी मुक्तिटोपिमापुरतम् पापि न समीचीनम् । पहेकामपापियामपरिकर्मियुरीया मरपाले वरनुपरपमन्वरेणापि विप्रपपरपयपूर्वनिविपनाचियत् । बी -पूर्वपापसोवा चपीवहतमम्पाम म्पपारमा प्रतिविम्सम्ये पापामामतापूर्व मबाणगवनिसहर्ष पवम्, पामुकमिन् मन्ये पारिपसमिरिवमिमे हुजन्य भामुसरम्पो एन्वे, पम्पासपापयत् पानुपरवमन्तरेणाप्रवनपर मितभाषण मानपत्र अपामुमारित्वं कामवाऽमामिबिलिसिबवे । सात वाह- सारिसामान लामावासमापबारपाना पायोर मशिावाला म मायक wa . - ०१.२० ] टिप्पणादि। माऽम्माप्तिदोषा, हवल्पवापाम एवानुसारिवेर सामिणमझानविशेष मापात् न हुर नियमपसाऽतिम्पाप्तियो पोपा । मपरं पारामहविष्यनिशपमेष मतिपूर्वमेव मुन ति पस्यमामपचनात् प्रमम सप्यापसमापन समाहारा समुपगायन्ते, पते पाऽनुवा- सारित्वात् मतिमानम्, पस्तु वेप्यानविणम्मेष वानुसारी मानविक्षेपास बातम् । बसमानामविष्यविश्वमेवानां सामोन मविज्ञानस्वामानात, रिपु । विमेरेष सतानुसारित्वामान मुबालासम्ममा नोमसम्मपसीवादोपोऽप्युपपपत हे सा मुखम् । मह मतितपो परमाणु-करिमोरियाऽऽसम्विको मेगा सममेपणीपा, का मागिलोकम् - विकिस कमिए मविविक्षेप एष हुवम्, पुरणारपि र पस्पते- सपास मतियानं सवानिवपरिकार्प भुतडानम्, म पसाम्पो परमाशयर रामम्तिको मेवा, किन्तु कारणपर्यमापन पर, सहापि विपते, मवे परपस्पेन, . वमा कार्यस्वेनाऽमिपासमानत्वात् । कारणपर्ययोरेशान्तिको मेवा, कनपुण गरिपु, मस्पिगहारिषु च बाप्रमात् । वमारपसापेमयाऽनमिगपत्वात् मग त मामिमपत्वात् सामिगपामिछाई मनिमानम् भवानुसारि र, महेवकाम- पचम वापसम्पम्पिको पासपम म्पबहारकासेननुसरणात् । मान तु सामि आपमेष, मुवानुसाव , सस्तकामाचम एवम्यसम्पम्पिनो पा चम्मरूपम मुवम सबसरफासेऽपश्यममुसरणाविति लिवम् ॥ मन पा ! ३० प० २. 'मत एष पारणास्पेन' -"मविपुम्भ मुर्च इतिपयनरागमे मतिः पूर्व पाम छन् मतिपूर्व भुतमुत्तम्, म पुनर्मवि मुतपूर्षिका इति अनयोरपं विद्वेषा । परि पर मतिद्धवयोर्भवत् रेषभूवो मरमेन पूर्वपमाडाबो पटवलरूपयोरिव न मात् । अधि वायम् । यो मेर इति मापा । विमिति मविपूर्वमेय पुसमुक्वम् इमार-पमात् । भारणात् मुवम मति। पूर्व प्रथममेबोसपते । ता इत्माह - 'पूरणेमार पुनातुः पालन- पूरपोरर्पयो पल्पते, सम र पिपति इति पूर्वम् निपालवे । पतम एवम पूरणात पानाच मतिर्यस्मात् पूर्णमेव पुम्पते परमात् मन्तिपूर्णमेव मुमुस्वम् । पूर्वसनमापनिह परमपर्यायो दाम्पा, पात् पूर्णमेव कारणम मामात् “सम्पाणामरिका सम्पुरुष सिवि." [म्यापरि० ११ स्मादौ तवा मैनाच । वम मतिपूर्व समिति st प्रधान कार्य मविस्त वतारणम् । मेध मै प १५। "स्थानमेवे पूरणारयोर्मा विभिधम्यूरपारपारीनन्तरेण तु न सत्पन्चे पम्पूरा एसम मविधानमेव इति सपा प्रतम मविरेप कारणं, पम् । पेच में 1 "परस्त मतेरपि हसपूर्णतापाइनेनाविरोपमुसपनाह-परमार धर्म वा परिपा- पा मसिम्पपवे सा इवपूर्ण-वभरपैर पका र पदि म मा मपपुगिनधि' पर्व मारपयुक्त मामोदि। बोचरमा-परमाणाममार्प या महिमापते , ममम इम्पदमावलात् इम्पत्प्रपा न मावहतकारमा । पसत न वाम पाते । पिम्न एतरेन पर्ष यो ११ । भानपिन्सम [१०६०१ पास भापडवार मनिमोनि-मापवस्ति मतिर्म माठि । प्रमहत्प्रममा म ने दोष प १९॥ "तु मारणापूर्व मति सर्पबा न माति।। मारहार मति भवन माचीति । समस्त मतिचीमेषम । किमिमा का पति इमेवत् सोनी । मम्मते बम्पपा वामरणामि अवमानोपयोगपसात् । ममा भुवोपयोगो पन्यते । परने नलिभरपम्मपात् सौष माचा पुनरपि मतिरपविम्वे पुमखपैर एवम् । तर मति। मन मपति-पमा सामान्पभूतेन पुवर्षेन सरिसेपहपा PRE मेरमायो पम्पम्ते, असे पत्तासम्पपरेस पमन्त पर सुबर्ष सबम्पत्वात् दत्ता- तया न म्पपपिरते, परम कारणावरेया सिरलात्, ममानिनि पोपरये । सपर्माका माम मेन म निवास पर्व ममापि सामान्यतया सविक्षेपरूपातोपयोप्ये पम्पते, पर उतम समये, मविस्ववसम्मतात् वार्ममा म म्पपविरबते, वमा देवन्तयत सदा सिसवाद, सनिक्षेपमूलहतोपयोगोपरमे माया मत्सपखान म लिवावे, भामरणात राहतोपयोगमसात् ।" विशेन मै पा ५ ५ ० २५ कप साई भुत- 'भामिनिमोदिखनापं दुनिई पप्णच मामुक निस्सिय बमुनिस्सिप च " बसे । 'पत्र समपरिकर्मितमम्सारका धामापांशेषनमनपेस्मैच पापमारते मविज्ञान बत् विविदितम्भवमहानि । पसुना सवा सायसंसरदतम बानिनमयोपसम भाषत एममेव पवावलिवरस्तुसिर्सि पविमानमुपगाव दत् बहतविमिवनोत्पचिपाति बीयप WAI 'परे हुवनिलिवनबममात्रा विमान्वयात् रूपमनानाना परो बुक्तिमिशि- तोपि विम्मीमूना माह-विलिनियमेवाबमारिक सूने रेन प्रकारेप मभिवम् । योप्यते-गु रिति-परोपरेसा बागमनम्बर । म्पपदारपणत् पूर्व तेन इन स्त पण संतापमानस्पो बम वत् हतोपकारम् । बयानमिनी मारकाले सम पूर्वमाचा संस्थापणापवमानपेक्षमेर प्रति यत् धनिमिवमुमते मारा -मिणमयुस्यत्वमाप इति ।" ऐषा में । १ 'मविधानमोस्पचिपादि'-"अमुमनिस्सिम पावर , बा-अमचिना मेणामा कम्मपा परिणाममा।" । "पुर्म भविमस्मजमपेपवक्तपपिसबमहिमत्वा । समाहपमतमोगा पदी उप्पचिपा नाम ।। मरनित्वरमसमत्वा विषम्ममुचत्पमपीसपेमान । उममोसोमपाठबई विपयसमुत्मा हसा परी ।। उपमोमदिवसरा अम्मपसंगपरिपोम्पपिसान। साहुपारफतई कम्मसात्वा इमादी । अजुमापोउदिवसादिया पपविगपरिणामा । रिमनिस्सेजसमा परी परिपामिमा नाम - नि । . . .
1 M .. पं० १२.] टिप्पयामि। "मनुवनिमिदं चतुर्दिप प्रभात, पपा-उत्पतिरेव न घामाम्पासर्मपरितीम्नारिक योग्न-कारणं पसाः सा बौस्पपि । ननु सर्वस्या मुळे कारणं झपोपक्षमा वकप मुम्पते -स्पतिरेव प्रयोगनमस्मा इति 1 1 उभ्यते-मयोपशमा सहुलिसापारणा वो मासौ मेरेन प्रविपत्तिनिबग्भन मवति, बम पुसम्वरान प्रविपत्पर्य म्पपरेसान्दर सुमारणम् , म्पपदेपाम्वरनिमिचमप्र न किमपि बिनपाविक विक्रेबम्मेबमेष यो। सपिरिति सैव सामाभिविष्य 1 वषा विनयो-गुरुभूपा स प्रयोगनमस्मा पनि रेनयिकी । या मनापाकर्म, सापापक शिसम, मयबा सापित शिस्तम्, सम्पतिकर्म- धर्मयो बावा कर्ममा । तया परिसमम्ताममनं परिणामः मुदीका पूर्वापरपर्यावनगम्य भारमनो पर्मनिपः स प्रयोयनमस्साः सा पारिणानिधी । मनो म । "मासा जुडीनो विशेपापी मानकारपसेयः" - मन् म ५ ५। १०. पं० १ 'पुम्बि' - याममा- म्पहारकाम्यत् पूष पयोहपेण भवेन परि पिता बानिवसंस्मय मनिस्म स मा वम साम्पारेत् साम्प्रव म्पबहारका अवावी इनिरपेक्ष मानमुपमायते यत् सवनिमिवमवमहानिक सिखाते प्रतिपादिवम् । स्वरत् पुना ममुनिमितम् वर मौलविक्यारिमतिबाफ द्रष्टम्मम्" -रिपा में प १५९। १०. ५०९ 'सम्पियागपयेऽपि'-"तिरि मविते वावरणमपोपशमरूपगम्पिवा- भयोगवर । तर मम्भिवो ये मतिमुवे ते एक समकार ममतः । यसबनयोरुपयोगः स इगपर म मपसेप, किन्तु काम्मान-पर्सनपोरिव तपास्यमाम्पात् कमेपेय प्रर्वते । पत्र परि समिमीम मतिपूर्णता सुतस्त्रोक्ता मविप्यतीति पेत् । नेवम् । एतु मुवोपयोग पर मविप्रमोश्रीक्रियते, न हम्मिरिति मावः । भुतोपपोगो के विशिएमन्तनस्सार अबादसारिद्वानममिवीपते, पर भरमणीनम्वरेण भाऽस्मिक न भवति, मनपारपत्र र पतिरेव इति पत्पूर्णवा तम्म न निरम्पते ।" बिच में प १ । .. प० १५ 'पारमादिरहिवानाम्'--" वापरेनेन्द्रियापामाहारारिसमा वियते वपा भनेकपोऽमिपानात् । संशा मिमप रम्पते पत पम् भारपस्टी- पम्-पाधरसंशा पाहारामिठापा पुरेपनीयप्रममा सस्तारमपरिणामदिन। इति । ममि मारर 'मरूपं बस्तु पुरिपरि पपीरममाप्यते बता समीचीने मनति' एष प्रमाणों, देगानुदिता पुष्ठिमिमिचमूतमतिमियवस्तुपापम्पबसाया स प भुतमेस तम मपार्य- पोषणास्मसात् । समापिपासोचनात्मकर्स र 'ममेवरूप वस्तु पुरिरि पपीर माय' इमेषमारीना समानामन्तर्गस्पाचारपानामपि विषमिवानाचवमा प्रपर्तमान- ताम् । तस्म संम्ममत्वान् । समापपाठोपन र नाम पाम्पबारमारपुर स्सरीपरेप शमषाम अर्पस प्रविधि, सम्मेन्द्रिपामामम्पच्मेव "पति परेमिपामा प्ररपोपस्माद् इम्पटन नाति, पानि बापापरमाया सापारिवासमभरण नामकाएं व गरमपमोपचममात्र मारपुर रेडियम मी मम्तम्पम् । म स्पापरसायो सामासिक धर्म न भमोति न मिसनधि इस - [.. ५.११- यापम्माप तम मान्मारो ममाप्यते ति बापापमोचरम प्रसीवर मापात पापपसि समिष माग तम पाऽसतिति परदिवे, एपमेरेनिगावामान साममीकस्वार पपान इम्पहवामाना, प्रवामि भावरपारपोपमहर्प माषाहतममसेगम् । परमयोगिमिगत्वात् , मम्मारिपार मनपरिमामैपुनसंपारेचमिस पवारेति । बार-मनु समपतिम्ममापि वा माषतं भावगभामा समादि-को- पभोपपरिनत भास्मा गमोतीति एवम्, भगवे वरिति वा मुवमिसनपोर्मप्ये कमा मुत्पत्ता समसायो मुखमम्मुपगम । वाया पयो नपुस्ता, ममम रोपपोग्यऽसम्मकार । रितीयोप्रीम पहवा, वत्र सम्पम वाम्यवाद, वसापि जपतोऽसम्मपारिति । समम्, मित अमोमोन ममार, अस्मिन् ति मुत्तचिरियामीयते एवं मुख्यानाबरक- .हपोपमो पाया संपपवे, सपा, पम्पिामा पाचीवि मलपित् पदिदीबते।' शिवा मे मा । पास हमसायोमागोजाम्बिरचिवमोचितम परमविपापन-परोपीरियाममा निम्म मारहवा रस, नागाव छापनाबामनि कम बिरूपवबा बासी रिदिनुमोपवे बम निपल मापा-पोत्रमित माविरम वर्ष मोप- आपके, धमकर्ष परखीति प्रवीपते।। बोपरमार-एमिपामा पापोगाविद्रम्मेनिनामावेऽपि मानिपज्ञान पनि पच पर, पपसमावि समिपमामात, माहि-पाठोड़ी मधुरपडमोहार भगवान सपा असम-सम्पादिप्रसबो नियममाधि अपमिप्यावन मा विजयर मेक्पो । सिम्पावितरपु पुनः कमनीपप्रथिमीकमममीजमिनुषम्मेपनमा परिपात् मुसापारिाषम परिणाम, पम्पकारिपुत निविषमुगम्बियान बलपिकरम्मोम्मिमनिममीवन्समिम्मेवात् वनकटम प्रावेमिसारम, परिसूम्र दरम्माविमापिमरकापरसम्ममामिनीमुखरचयमुनाडसरमिवारपीगन्नुपलपरमात् पाविपरणे रसनेनिपमानमा प्रतिलिपिमपोरिडमेपु पनपीनोमवार महामविप्रमापवामितहम्मनपरकम्पमिषम्पसका पामरणभूषितमम्मभामिनी - मुरम्वाऽवग्यानमुखात् निम्मिासमरापूर्वतोपपतलापमपाणिमएराब सगिवि मजून पम्मारिममा पनिपात साई मिममिपीस्पते । वक्षम बनाने मिपासतम्मेवर भाषेपियन् मार्य सम्बनसिरमति पा इमाचमारे मापहवमति मविप्पति । एते है मायमरोपजीवना मनसमादीपामारका सोचनवापारीमा वसपारपीमाप्रसंप्रेषमामिम्मो मपणा बियातित सम्मानरामोमीन व पुनसभा पसिंदेष, रिलपणवाना निवालीसवालियो परिपापमोचनानिम्ना परिमासंहा। पैताः संहा माषवमन्तरेयोपपपन्ते । पमा भारमियरमपनोपामार मारेन्द्रिवणमानव मावहतावरणमयोपायसरा पारम्पहवामाजी पर वापर माषामा सन्द्रिपानाम् सलियरेन । पkि 4 मन्नान पुपायुमारे इतिहमाम म्पमिचा मागोवि समाविमा योना- ।
- - प... १९ ] दिप्पणानि। . येद्रियामा मावभुताभ्युपगमादिति चेत्, नेवम् , ममिमायाऽपरिमानात, धम्बोनसहित विलिष्टमेव भावहुक्मामित्य वापप्रमुखम्, पसेकमियाणामौपिकमविक्षिरमारभुतमात्र हारपमयोपशमस्वरूपम् , सपुतानुसारिसमन्तरेणापि परि मनि, दयापि न पिए म्पमिपारा बिपा से प १३-१ ३...! १०. ५० १९ 'पदाप-य- "सुत्त पर्व पयत्यो समयमओ दिग्गो बियारो य । दूसिपसिद्धी नयमयरिसेसो नेयमणमुर्च ॥" मिपा गा । "सरिसा प पद पेय पदार्य पदविग्रह। पालना प्रस्परस्पानं म्पाम्प्पा समस परविया ।। Rश मे । "संहिसा य पर्य व पयत्यो पयविग्गहो । चालणा य पसिद्धी य छवियां विदि समसणं ॥ ३०२॥ वा दिति कोऽयः, इत्याए- सभिकरिसो परोहर संहिया संदिया व मरपा । छोगुचर ठोगम्मि य हसर वहा पूमकेउ चि ॥ ३०३ ॥ पोलोनो पा पदामा 'प' भस्मसिवारिगुणोपेतो विविक्वामरो मटिति मेपा. विद्यमर्पपरायी समिती' संपर्क स संहिता । भयमा पर मोः संहिता पपा संहिता । सा शिविपा-योकि गेफोतय । वा गैगिकी 'यपा मोतु' इति । पया इति परम पति पर तुरिति परम् ॥ ३ ॥ तिपपं या मोगम्मे घूम भमिम फेउ उस्सए अस्यो । को सुचि भग्गि उचे कि सासपो दाणपपणाई ।। ३.४ ॥ 'पया भूमकेतुः' इति संहिगसूर्य त्रिपदम् । सम्प्रति पार्प राप्यते-पपेति गोपन्ये । भूम इति भमिमरे, 'भूमि पून' इति पचमात् । तुरिति माये । पप पार्थः । पूमा मेनुरम्प इति पूमकेतुरिति पाविपहा । कोऽसौ इति पेन् ममिः । एवमुक्वे पुनरा-1 wिwणा । सूरिया-गन-पचनाति । रहन-पचन प्रकाशनसमर्पोऽपिप्माम् १.४॥ बाबाम्नां मत्सवसान बार- ना एक मुष-सोपीरगाई रिति अग्गिमासेतो। न वि ते भमिग पामा फसिमग्गिएपमित्रो देऊ ॥३०५॥ दिगो परगारो न पिब उक्लेरणाइतकारी। ममा अहुपदेठसमभिभो निगमणं भग्गी ॥३.६॥ पनि माम एन-सबमारिपारि एप-मोगोरपायोऽपि ररम्ति, पारयोऽपि पति पपोतमनिप्रभूतपोऽपि प्रारम्ति तक्ते पि भनिमपिनुमान्ति 1- 'मासेपारा प प्रमासानमाह- मेग एमायोऽनिर्मबन्दि इति मन्वमा 'समगुमसममिवरमा रविवा। हाम्तो पटवारा।यमा दि पर पतिगणपधोरमपमोलुसम्म . .
" मामविन्दुमारणस [.. ०२०- पठम प्रत्नामिनिका मिनिर्पचम्म मोटोपनोशनसमपी, पपाम्पे पुरपार, म से पटसोलेपणापपा कारी पटमामिनियता । एपमपि पो पनि पचति प्रम- पति व पपा मगवेन भयगेनासापारमा स एष पोस्वहेतुसमम्मिता परिपूर्णोऽमिर्न हारप इति विगममम् ॥ ३५॥५॥ सम्पति गोकोचरे महिवारीनि पर्सपति- उपरिए वा दुमाई सत्यदेऊ भविम्गहो । को पुग दुस सि पुचो मण्या पचाइबरेजो ॥३०॥ करमावे न एस पि य दमाचे दिस चिप परमा। तम्गुणधी हेज विनतो होइ राकारो ॥१०८ ॥ सम्प्रति मताम्वरेपाम्पपा मालाम्पणमर- पर्च पर्य पपरयो पयनिस्सेयो य निमपपसिदी । पंच विगप्पा एए दो सचे तिमि मत्पम्मि ॥ ३०९ ॥ मपमतोऽस्वासितारिगुणोपेत सूत्रमुचारप्पीपम्, पवा 'पर पाणो विगा । वपनवर पापा कममीन । पता 'परतिमेप:' परामोपना । परमन्दर निर्णयप्रतिनि' नियति पानम् । पाविमा पराऽम्वद्वा । परमेते पाच " विसा प्रश्रया म्पाम्पा भवन्ति । का सूर्य पमिति निरस्पो सूत्रे पनियै । 'पा' पपाप-ताप-निर्णयप्रतिमा बर्ष इति ॥ १०९।-सार । .4 २. 'उपदेषपदादी-नरेपलम ८५९५८५ । ग्रेस । "मादिरहितमा नपुत्वं मध्यम मन्दानम् । परम रिकामफल विपर्पयो मोहतोऽन्य इति ।। मायामात्रविषय कोष्ठकमतनीयसमिमं मानम् । मुखमयमिह विप मिभ्यामिनिषेधीतमसम् पतु महागापागमतिमसपक्विचिन्तपोपेवम् । उबक इस कैलपिन्दुसिपि चिन्तामपं व् साम् ।। ऐबम्पर्यगत परिम्पादौ पारोबी। एकतु माषनरमपमहरसादमदीप्तिसमम् ।।" यो । "सूर्य लमत्त मीरा पुग होई पापा मस्यो । सो पुप पहा मपिमोदि पयरपरमेएप ॥१५५ ।। 'मूई मूपुरमनुत्र कमपिरमाणावकम्, सम्सून म्मामामरहिषधम् । बी - पुना प्राठा विद्या परायोपवारिति । तमेगानाए । सुपरने । प पूरक पानिमेटेन पर्य मनिवः । वहुक्तम् - "पपरमहापकत्वमाईपर्श र पत्व पचारि। सममावावगमम्मि एदि पगारा विपिविता " [पोलाद ५५] प प . .
.. पं० २०] टिप्पणानि । वा पार्षों पमातापपठे गम्मतेऽ: सामाम्पल्पोऽपालिकाप्रसवस्मापियो पेनेति मुखः । वदार- "अस्यपदेण हुबमा एरप पर्य हो सिइति ॥ [पर प ..] वाफ्या- पानावास्यामः । महापास्यायम प्रत्यबस्थापना (नारम)मापापा । मेरम्पर्यापसवात्पर्याः इति ॥ १५५ ॥ इत्वमपातपिम्पमन्येषामपि सम्मतमिसाह- अम्णेहि मि परिवम एवं सामुग्गहाउ नहस । महस्स य मग्गालो मग्गमामस्स गारणं ॥ १५६ ॥ मम्यैरपि एतत्पूर्वोक्त प्रविपमम् महीध्वम् । कसमित्याह - अनुपरामस्स पारमिपुत्राची मसिवयता पुदपस्म बपिपिमा मु प्राप्तस्म साबुपस्सिते प्रदीप्यमयमिति मपात् पसायि, उस पयो मागास मार्गद्वानरम मार्गावोपम मावेन म्यम्वेन । तस्म हि मार्गनिमा- साप दूरे पुरुषमात्रमशावविशेष राम सहसा उत्समीपगमन न संमति, काचित् मारपि मरेरयमिति सरहात् । मापि तस्स परिमामकाविषेशपारिपोअप समीपे पपपपा गमन पुषम्, मोरपि पपिकविमासनाप वाविषपेतमविपचे समाम्पमानस्वान् ।पागादिम्पा समाविवयाऽमुमतेम्या पूच्यायोग्य पुरुप हसास्वाऽनुहले मनापानधनादिना निरप : समार्गपरिक्षामा वस्समीपगमन युम्पठे । एव हि भा पुस्पमात्रपर्सनतुस्मा पापा, मधुरेममेरदर्भमतुस्यो वास्मा, वागविभ्या प्रामाणिकपुरुपापगमनतुस्पो महापास्यार्पः, परम्पयार्यस्तु मोऽधिकारी मरम्य इति अष्ठम्मम् ॥ १५ ॥ पार्यापीमामेव सम्भूय कार्यकारित परस्मापपति- एरप पपरपाई मिहो भवेपसा हु पुष्यमार्ग । सोपम्मि भागमे वा वह पफरमे पयस्याण ॥ १५७ ॥ पर परामर्मारिपु मेरेषु, पापापीमा मिचा परस्परमपेमा श्रमिकोत्पाररूपा पूर्ण मापात एकोपपोगाभपपापपर्यापसिरिनियापनम, डोरे मागमे या पपा बाम्पा पाबानाम् । पब मायामतीतो पदार्यप्रवीतीनो रेगुवान पत्र वरपेमा पुम्पते । प्रहने पापीनामरम्पर्यापपर्यवसमत्वेन कार्यान्वयमावात कमियोऽपेपास्त्विति चेत् । म पारसदाप्रतीतीनामेव पापापमतीतिरोन वेपो परस्परमपेमावतहानीमा परस्परम योपपचे, सापेक्षपदादिसायास्मकोपयोग पर वापरणामयोपममतत्तात् ॥१५॥ सरोक पप पावत् पहाबादीनां मियोऽपेक्षा पुत्पादपति- पुरो चिसो इस पामो पपरयबुद्धी । हिवामपभोपणपुदीमो ईति परात्रो ॥ १५८॥ 'पुरततिति समः' इति बापान पार्षदुसा माभिमुखोमस्सिलामो स इत्या- पाहापापमपोजमविषया इवरा माझ्यापमहापायाभरपर्यापीपा पुरयो मन्ति। पादिभमे पति इति प्रतीमनम्ता पक्षो मार भानो पा मानियो । - माननिम्दुमनपल [१० . ०२- इदिपायाप्रतीति प्रादुर्मपति । यता प्रतिविमिरामराममोरमेन 'भार एवागम्' हात महामायापी। मात् । वा पुरासरम् 'मामार्टिना प्रबर्वितम्यम्' इस्रम्पपिरिति । म मम बिना मिरापप्रतीतिः सिखेत् पार्षमाध्यामात् परावस्मारिवविणेपार्ष जिशासाल्माषा भामंधाया भनुष्मान बारमार्यस्मापर्यवसियत्वात् ॥ १५८ ॥ . मागमेपि छामाह- रतमा नो भूत्रा सम्मेश पायरो पिप पपस्यो । मपमाईहि पीर समेसि र ण करिना ॥ १५९ ॥ 'सोमि मूतानि नवम्पानि' प्रर पप पाया। मनमानिमिर्मनोगामा पीडा पापो सर्वेपामेव समवानामपि पीवाना न र्यात्, म विरप्पारिधि ॥ १५९।। भारमममनि एक पारतोषकरमाई। इस पारयोग महापारमो पुम इमो एरथ ॥१६॥ एवं पति लगामेवारणारिम्मरणीय सामाना गर्मम्ममापनम् , बापि परपीडामुगमान् इसेप पाक्वार्षमाम्मागम्पा । महापास्यामा पुमरवारम् ॥ १०॥ अपिरिरमि दोसो तो विरिमा पेर हो मागर्म । माईपबत्यो पुम भाणा पम्मम्मि सारो चि ॥ ११ ॥ बपिपिकरणेऽमीतिविषाने सगहोरापोपो दिसापतिः विपिरमनाम्तरीयका- पत्माचिनितिपरिणाममनिवनारिसाहप्पम मध्यपात् । यत् तप्मात् पिपिने परिवर्म भवति गावापर्षे । वदिरमुक्तम् - "मविप्रिमि भागाविसापा ममेव एएसि । जा पिहिमा वामम "-[पकमर ५.] सारपरिषिम- "विनमानकरमविधि पुरा भूमिर्दवं च मष्ठादि । सवारनतिसत्पानं लापति समासेन ।" इमारिमम्बोक्या । मेषकर्मविपिस्तु- "पुरोगो म बिमा पासालासेस हर पेराम । सम्मा पठमासे शाम हो एम्मासे ॥" समापुस्तः । पेसम्पापा पुमा भाग ममें सतइति । गमन्तरेण पपुमापि स्वम निरपपत्लामिमवस्मापि पर्पस मिसवारिति॥११॥ पाल्पान्तरमपिपाह- गर्न पपना एत्व वि सपेत्रपाषेमर्म पए पर। एस पपरयो पपरोस्पो पुष इमो हो । १५२ ॥ प्रर्व मयेत् स्मवापि सवनमपर्व र पस्तु मम गृहीपात् इति एम ममा पापापाः पुनरपंच थमायम्सपो भवति ।। १५.n .
१.७ . २० टिप्पणालि। .. पत्पाईप मगहणं एवं पर्व मणीण अविसेसा। आमापाए दोसो नष्णा पत्यामगहणे वि ॥ १६३ ।। पर्व सति प्रम्बमात्रमाणनिपेथे मुनीनामविशेषाप्रमादीनामपहर्ष प्राप्त । न हि सोनिक मम्मो पारि म अन्य इस विशेपोऽसि । बाशामागे "शिणाम पारसहयो" सारिपनोजने पमाविमहणेऽपि दोपोऽतिरिक्तोपकरपस्माविपरमरूपत्वात, माम्पपा। बाचाया प्रमागे पसारिमाणेऽपि दोपः ॥ १५ ॥ एसमगहणं मापा अहिंगरणधायमो मुपेसम्म । एस महापकरणो मादपर्छ । पुम्मुच ॥ १६४ ॥ पद पवासाविसहर्ण माषात् परसवोऽपिकरणसागव भावंप्यामातिपरिवायत् भार्ग मुर्गमम्मति सापम्पम् । पमाणपरिणामोपष्टम्म प्रहणमपि मा भमरपमेव । एप मरा.. पाक्पार्पः । पदम्पर्य र पूर्वोक्त बार सर्वत्र पर्ने सार इति ॥ १९९१ पामाम्वरमपिसार- वमन्माणार या परप पयत्यो उ सम्माहि जोहा । गुस्सम्गाई फरण से सिवाई ति ॥ १६५ ॥ 'पोप्पानानि ओर पत्र वाक्ये पापस्तु सर्व भोपेम समर्यासमरिपरिहारसामा- म्येन निमाम मोपा पोत्सगोदीमा पर रेप इति ॥ ५५॥ सुन्छापचाई सफरणं प्रकरण समो पर्च। पदोसपसंगामो पारयो एस दानो ॥१५॥ अण्डा मसमपाः पाणशरिरमणाः, धम्मक्ताम अगीवा!, भाविनापरपमानि पोम्पाविमापामता पदार्मात् तस्मरण पठौरसर्गानिकरम प्राप्त पारोपप्रसंगात् शस्त्पति- मेग वमोम्पानाशिवष्यानुमानमार्दप्पानमवस्पेन लियंग्यपधुमसम्मापापच बार दस वोऽकरणमेष वत्, पप पायामों रम्मा ॥ १५॥ एस महामारपो समयापाप एस्प जमदोसो। सम्पत्य समपणीई मार्दपजस्यमो का ।। १५७ ॥ पप मावास्या: परसमपापानागमामुपानेन, पत्रादोपः । भाममायमन . म्पपलिवा- "सो जान दे पीस न पारि विमससोगिपर्च प । वह पम्मन्मामपही वहा इमोह कायर्म ।।" पेरम्पयोपत ऐदम्पोपमानित्य सर्वत्र समपनीविरागमनीतिरेप, पमिमवा । तमा पर सवापिमपिकापारिदिमागमएसनहेतुत्वान् ॥ १६॥ पापमान्तरमाणपित्यार- दाणपससमिसेरे पापो तप रिपिपरिसे। एप पयत्यो एमो पर दो महापारा || १६८॥ RA
शानपिमुमनपस [.. प. २..
नाममांसायो प्रापपपा पनिवेपेच पचिप्रविषेपा, पतेने सूत्रांगसूत्र सवे-
"जिउ दार्म पसंसति पहमिच्छन्ति पापिम् ।
वे भर्ण परिसेईति मिचिोय मन्ति ।[ा "11
भत्र पाप पपा-मोवी मैदानमर्मसामिपेपो महापापाएमगविडामाम्तयपारिमापाप-
प्रबिम्बतुत्वादिति ॥ १५८॥
परमो पुण एवं पिप्लेमोहोन देसगाई ।
एवं बिसेसभिसर्य एमइ मणिर्म तुबो जे ॥१९॥
पायाः पुनरेषमभ्युपगम्यमाने मनापीना पानापानानिविषयवानविमिनिपारिरेस-
भाषीनी विदा मात्-
"पर्मसारिपर दाने दान पारिपनाशनम् ।
बनप्रिय पार्न दान सर्विसापनम् ॥
पी पपोसरे धिर्म न फसाय प्रसारप्यदे।
वयामानेषु पदम्न निप्पस परिपाः ।"
स्वासिमनापाची पीबर्दिसानुमतिगमान्वरापमसाम मोपापमानलान् । समात्
. पापि विपविषय वस्तु पुचते, ने इस पारपूरणाों निपाता ॥ १९॥
बागमपिहिमाणिपिदे महिगिष पसंसणे पिसहेव ।
मेसेप दिपो सो एस महापगम्मरपो ॥ १७०॥
बागमे सिगते रिक्ष लिपि पानमरिकम प्रससमे मिहेनापि मो
पोपः समापिपम रिदिवबानम्मापारमा रिसाहपत्तामापेन यापसमे दिसामुमोरनसा-
» प्रसामत् । प्रत्युत सन्तामुमोदनमेष सम्मपात्, लिपियानम्मापारम पवाचित
दिने चिरपरिणामामारेमाम्वरापानीमात् । प्रत्युव परीवाबमावान्तरायकर्मपि।
रएष । परिपक्वमुपरेसपो-
"मागमरिदिम तवे परिस्थि पारिगिध पो बोसो चि" -[ 1]
भागमविनिर्व संचरणे सुपाचे समक्वानिपानम् । बसंभरणे बासमक्वारिसरमति
पलिपि र सानारिमनुकम्पारा मपि न लिपि भरा-
"मोक्खत्वं वदा पर एसो विही समस्तामो।
मपुकम्पालाण पुप निषेहि न पापि परिसि ।।"
एप महापासगम्पोपः ॥ १० ॥
बाईपास्पो पुप मोपसर्ग होर बागमाषाहा ।
एवं पास पिस पालाप पायसो मुर्च ॥ १७१ ॥
क्षमा पुनर्मोमाइ मति, भागमाषापा बागमापनम् । भतिरेखमाइ-
एममुपपविमरेष प्रतिपूर्ण पाबन्दि मान्दगीमस प्रायो म्पामा पुष बतिस-
बिप्तपचिनोरायपेसा प्रायन म्युक्तम् ॥ ११ ॥
१०. पं०२१] टिप्पणानि । १ स एवतिसत बार- एवं सम्ममार्ण दिपिरोहनाणविरहेण । माणपरगमा फासा मुअमिहरा कासर अनार्ग ॥ १७२ ।। पर मतिसूवमुक्तकमेण म्पास्पाने सम्पग्मान म्युत्तमम्प निरामप्रतीतिरूपं साम् । एवमेव सस्तेवत् सवचिन्तामाषनारमोन परिपूर्णवामास्कम्दति । इवरया एवं पारपामा । मारे भम्पवरगमारेस्तरमर्यमागमनम्तगमतमध्यपचिवमामिल्स स्पपिटिपरीवामिनिवेश रविवम्म श्रोता रेष्ठविरोपमानविरेण शावरमानशाभाम्पवरदिग्दसमानामारेन मुर्व बामाण्यवानानाविठवमानमात्र भवति, मरिम्वामावनाम्यां परिपूर्णम्, स्पषित विपरीवामितिसमता मोठा भमान विनरपेन षप्रामाण्यमानाकरितस्वाम् पस्पदोऽमान मेव वत् स्यात् ॥ १२ ॥" - सोसयम । प.. प. २१ 'सम्ये पाणा'. "उरा जगतो बोग विषमासं पठिति य । समे असदुस्सा य यो सम्मे अहिंसिवा ॥ एवं सु नापिणो सारं नम हिंसद किंधग। अहिमा समप पेव एतारन्त पियाणिपा ॥" ला ११४-1 । - म सवारेमा "प्रमार्य फम्ममासु अप्पमापं वहाजरं"- "से सा माम मम परसार्य पडेग या म्ममाजरस गार पोमुक्सममायमपि दिसापरणं दुर्य भर्प परिसरोमि इव गण सम्मे जीरा सम्रे मूग सम्ने पापा सम्मे एम्ममामा माष गोयुस्यमणमापमपि हिमाचरण दुक्म भर परिस.. ऐति, ए मा समे पामा जाम सचा परवाना प बत्रादेपमा न परिपेतम्मा प पखारेसम्मा म एवेपमा । से प्रेमि मे प नदीवा मे प परुपमा जे प नागमिस्सा मारता मगन्ता सम्मेवे पषमाइक्वरित पाप पहाति-समे पाना साप सत्ता मईसम्पा बाप गरयम्बा -पम पम्मे पुरे पीठिप सामए समिप मोर्ग पेपर परेर - केर सुएगा पाणा आसरा संनि महातपा । मरिस सहि रति अपरिसंति प नोबए।" मा १५। "येश्चन मुद्रा दिपारयोस्पमा वा मानोऽपया मराठा महासापानेर म्पाराइन मास मर्म र पा विरोपसमम ममानगुम्पोपवाविरोष म परेन् । गया रिसर्स दरिट्रियानमा पिसावारिश भरि नरेन् । पता नाम्गो प्रया, मान्यम्पा म्यारोन रिपते । पदो न पप्पानुरोपी पर्मपरिदेोऽति बन परम प्रभारी मममारो मामाचोमानमाो मामलोपा पनि पासपो मानो मानमानाnt गिनीमा भारमप्पपेपर ममापरिसम्पामु गमोरिया ।मदिपसागममम्पपेपर सपा किमानसिनारी २० सामान्य एनुमरि प्रो माग रास न । .
मानपिनुपरम [.. पं. २१- "कर्म पर्य न गप्छर पउम्बिई मिक्सुसमपम्मि खा है। "धर्म पपपप चतुर्विधमपि म गाति मिनसमये हाक्पागमे । पार्विन मणोऽपिशोपरितम्-प्रविधाममरिया मोपचिवम्, अनामोगम्वमिसर्पः । बमा मातुः जमापाकममम पुत्रम्पचापप्पनामोगान कर्मोपनीयते । दमा, परिधान पयिता-पन 'मनसा पर्वाचनम् । पेनापि समरित्यामिनो म्यापारनामाषा फर्मोपरपामार इति। पा, रिपोषी-गमनम् । न बनितमीळप्रत्यमम् । अपि कर्म उपभवन गपति मालिम्पासारनामिसम्बरमापारिति । मा समाति-मममम कर्म मोपनीयते गया सममोबने मात्रा में। "साम्प्र पाल निर्मुक्तिबारेमोरेमपर्षामित्ररे-धर्म पर्यम गति पनि • मिसमय इव वापिसार- आपरं पुरस्सार्य किरियामाइदरिसर्प । सम्मपितापमान संसारस्स परहणम् ॥ २ ॥ 'अपमानम्वर्ग, मानमाविमपानम्तरमिदमम्मत् 'पुर-पूर्वम्, बाम्मानम् -- कमिवम् पुनपरिमार-पिपारिरसेनम् दिपेष सम्मारिका प्रमाने मोमाइमिसेर पनिट साम्मे बियावादिना, रोगो समम् -गमा-शिवापानियनम् । लिभूषाचे किपा पारिन इमार-कर्ममि-सामापरणारे पिता-पोवनम् -मबिवा, वमा ना अपगवा धर्मनिम्ताममा । बवचे भविधानापुपति चतुरि कर्मपन्य मेम्पम्ति भवा धर्मपितामना । वेपोर्गन संसारपसमिति ॥ २४॥ पामपिम्तावो मयरमा पर्सवितुमाह- मार्ण भएमध्याही मारोप दिसति । शो सपा पर मारियर्ष समापन ॥ २५ ॥ पो 'सान पगन्छन् मागिनो दिमति भयेम पानी पर्ने बासन मास विपते पसासाराजी मापनाशी मुक्त मपति-बोलकोपारेनिमि चात् और ममोम्पारेप मानिनो म्यापारमति, म र भवेन मारवयवान ऐमनेर मारोपापारे पटव म माय वमोपपयो म मनवीसी । पा, मदुपा भगा- मानाकासम्मापारमान पर दिनसि मामिन नीि मनोम्यापापमापा कोपरम पति । बनेन भोमन पाक्न नियुक्तिमा पथा-परि कर्म मोपचीपठे मित्र सम' इति का पाप्योपरितमपियोपचिवालय मेरा सायापात पतीबापपल्पन्दि- मेरा समेनोपापम् । मोपपयो मरति हायवे-पपसौ एबमाना मामी भपति एमय पर पापी हानमुलपवे स्पेन मिलेर पनि पुति माडाप्पान सामु परिरमा प्रपती वसावपि वपसी प्राणी म्यागपते पोरसा वम पो- परयो भवतीति । परामरामाधीनमा म प कर्मपानी रानी पसा सिरिसोपेगलरियामा भोल- -
१०. २०२१ ]
टिप्पणामि ।
"प्राणी प्राणीशान पाक्कपिच प तदता घेश ।
प्रामेष विप्रयोगः परमिरापपवे हिंसा ।।"
रिमेनतेनेष परिमोपरिवादिना फर्मोपचयो न भवत्येव । भवति कापिरम्पपद-
मात्रेति रमपितुं रोकपमार्षमा- 'पुरोति । येन केनग्मनोम्यापाररुपपरिमोपरिवेन
घसघ्रपक्रियोत्पेन पाऽपिशोपरितेनेर्यापपेन स्वमाम्तिन र पतुर्विनापि कर्ममा 'मटा'.
पता संस्तस्कमाऽसो सर्ममात्रेमेष परमनुभवति । म तस्मापिको विपाकोऽति ।
इत्यापतितसिवामुष्टियस्पर्शनम्तरमेव परिसटवीत्ययः । बस पर हम सामारोऽमि
गीयते । म पुमरत्यम्तामाष इति । एव प हवा व 'अम्पक्सम् भपरिस्फुटम् । सुरम
पारणे । पम्पमतमेव, स्पष्टविपाकानुमवाभावात् । मेलमम्पक्व सहावपेन-गण वर्तव
परिशोपपिताहिकर्मेति ॥ २५ ॥
ननु पपनन्तरोक्वं पमुर्विप कर्म मोपपय पाति कप वाई कर्मोपचयो भवतीत्येवरा
मलाह-
संतिमे सठ मायामा जेहिं फीर पारगं ।
थमिकम्मा य पेसा य मणसा अशुजाणिया ॥ २६ ॥
'सम्ति' विपन्ते अमूनि त्रीणि मादीयते स्थीतिमते भमीमिः फर्म इत्यारानानि । एवरेन।
सवति-वैराशनः 'विप' विधीयते, निप्पापते 'पाप' ममप दानि पानि । उपपा-
'ममिझम्पेलिं' बामिमुम्पेन वम प्रामिनं अम्ला-व्दावामिमुल र विपाप, पत्र खत
पर प्रागिन म्पापादपति दरेक कर्मादानम् । तमा, अपर प्राणिपाणाप पेप्ये समाविश्य
पाणिम्पापादन परिवीर्य कमारामम् । तया, अपर म्यापाड्यन्त मनसाऽनुगानीत इसेवत्
पूवीर्य फर्मारानम् । परिशोपविदामाप भेरा-वत्र वस मनसा पिम्वनम्, एमपरेण -
प्पापापमाने मागिन्यनुमोदनमिति ॥ २६ ॥
परे यत्र स्त्रय सारिवानुमवयः प्रानिपावे नियमामे विपन्देहियाप्पासापस्म प्राणा-
विपावर और कोपरपो मान्यत्र इति पसमितुमार-
एसे उबट आयाणा मेडिंकीय पारगे।
एवं मारविसोहीए निम्बाममभिगन्छति ॥ २७॥
पुरणपारणे । पताम्पेष पूर्णाक्वानि त्रीणि म्पचानि समवानि वा भावनानि पेसुधप्प
पमापसम्पपेरे पापकर्म उपचीयते इति । एष प सिते पत्र परिवानुमत्या प्रागि
प्पपरोपन मवि न विपते ज्या मावविपुरा भरततिरपुस्खा प्रपतमामस्स सत्सपि माना
विपते पसेन मनसा, कायेन पा ममोमिसन्पिरदिवेन, उमयेन पा विपुपुलेन
मोरपपा । परमापार निवामं सपानोपरठिसमारं अभिगमति भाभिमुस्पेन ,
1
मामोतीति ॥२०॥
मावास्ता प्रपर्वमानम्म पर्मपम्पो म भरतीसा यन्तमार-
पुर्व पिया समारम्भ आधारेज असंबए।
संजमापो य मेहादी फम्मना नोरतिप्पा ॥ २८॥
जानविम्युमकरपम [.. पं० २१- पुर्व अपनं पिता बमका 'समारम्प मापाच पाशवं स्वामित्वावियागामापरि पपुखरणार्य परक्रतिमा पसंखों रामलपिशित मुखामोपि पाममापिसम्मा- वामिति, पपा मेमामपि संबवोपीनमः । पदेव ग्रामो मिर्षा सा पिभिवाश्यपि धर्मपा पापेन मोपनियते मासिम्पत इति । पपा पात्र पितुः पुत्रं म्मापारपारक्त शिमनसामपन्चो न भवति, पाम्पमापि परस्परिणतापरपस प्रानिषये समतिम कर्मयो मदतीति ॥ २८॥ सोमवमेनफ्यापार- मपसा घे पठस्सन्ति पिसेसि प विधा। मगधमई सेसि प से संबुराचारिणो ॥ २९ ॥ या परिशी सातामारपपिस्सिया । सरपंठि मममापा सेपटी पापगंबणा ॥३०॥ वहा मस्सापिपि ना बापमपो दुसीया । इई पारमार्ग संवरा य पिसी ॥१॥ एवं समपा एमे मिछपिडी गवारिया। संसारपारसी वे संसारं वपुपरिपईति ॥ ३२॥ हिमिलिमिचात् मनसा बनवायरमेन 'प्रचुम्पन्दि' मोपमुपयान्ति सेना पर पताल वन विपते । मे पचैरमिहिवम्-पमा गम्मनामजप बमपर्प कोपरमामार इति यत् वे 'चतवम् पसरपामिभावित । पदोन वे संपवचारियो मनमोप्रास्त्वात् बाहि-पोपपये रम्ये मन एष प्रधान परम पारी मयो- -विनापमापारे कर्मोपचामावोऽमिदिवा, दम पत् पस्मिन् पनि मपति बसवि तुम मपति, पत् वम प्रचार कारपमिति । मनु वमापि प्रपरेशरहिवमाकारणवस स्वम् । समम्, तम् अयुव तम् । पदो मवैव एवं मावनिमुखा बापममिगत वीति मनवा मनस एकम मापापमम्ममारी उमापति भामिशिवम् - पिचमेष हि संसारो रामादिक्सेपमासिकम् । तदेव वैषिनिर्मम मवान्त इति कप्पते ।।" समाश्रपि पमिदिवम् - "मतिविमर! नमस्खे पद समस्वेऽपि पुसाम , परिणमसि समांची मरमपपिस्तमेव । नरमनगरपर्मप्रसिवा परमेके, उपपिन्टमवस्या र्पसम्मेदिनोऽन्ये ।।" परे मपरम्मुपगमेनैव किएममोम्मापारा धर्मवन्यातुन मबी । वा पति पपनुपपुप्तो पानि पशुपबुस्वदेव फिरविचति कर्मपन्नो मनसेन । बयोपपुज्ने पानि क्योऽममतत्वारपायक एष । पपा पोयम् - "उपालिपम्मि पाए इरियासमियस्स संझमहाए । पारवेश ठिी मरेज गोममासन ॥
। . प.. पं० २१ ] टिप्पणानि । मो य तस्स समिमित्तो पो सुमो पि देसिमो समए । अमरलो उपयोगेण सम्यमावेम सो बमा ||" [पति ram] समान्तिरम्पपिचसापापीपदम्पो मपलेप । स . मवमप्यम्मुपगत एक चम्पक्त वत्सावधम्' इत्यनेन । देव मनसोऽपि शिकस्मेष म्पापारे गपसाबात् पहुक्त मनवा प्राणी प्राणिशाममित्यादि तस्स प्रबत ति । पदयुक्तम् - 'पुर्व पिवा समा- रम्स' इत्यानि तदप्यनाठोपिवामिपानम् । पतो मारयामीसेष पापम पिचपरिणामोऽभूत् बाबम मिपापावपति । एषभूमितपरिणतेम फसमसहिष्टवा । विचहिने पावरप मागी फर्मरम्प इस्पुमपोः संवादोऽति । पदपि यः कचिदुप्यते यपा- 'परम्यापाविवपिशितमममे पदसाहाराहामार पर दोपा' इन्वि-तदपि सम्माचप्रष्ठपिवपदनाकर्ममीयम् । पपा परम्यापारिते मिक्षिक.. ममगेमुमविरप्रतिदता, वस्लामपन्य इति । क्या मान्यैरपि पमिदिवम् - "अनुमन्ता विससिता संहा क्रयविक्रयी । संस्कळ पोपमोक्ता र पायकमाष्ट पावका ।" पर स्वपरिवामुमतिरूपमारानत्रयं वैरमिक्षित वनेममवमासाइनमेष रसायन । वरे कर्मचाट मोपचयं पातीसे समिरपानाः कर्मपिम्तावो नय इति मुमतिष्ठित मिदम् - - १११२-१४ । "हास्यपुत्रीया मिक्षप समजा- पिभागपिरीमपि विद पसे फेर पएमा परिसे इमे ति । मलाठय पानि मारएपिस लिप्पति पाणिपहेण अर्म। महानि विदण मिरमसु पले पिपागाईप नरं परता। इमारगं वारि बठापुति न लिप्पा पाणिरहेण भम् ।। परिसं च रिण मारग पा सूलंमि केर पर चापवेए । पिमायपि सतिमाहेचा मुद्धामापति पारमाए ।" का 11-11 "खितापमा परिपत्र वस्पुरिए । प्रोरित्याइ- संपन्यरेणानि य एगमग गापेण मारेत महाग ह। सेसाण सीवाप दयापाए पास गयं विधि पप्पपामो दमा १५ "मन परमापो प पामभूपार हिमा। पन्मा पार कम्म से होरका फर्स॥१॥ कई परे, पि, प्रमासे, ई मए । एवं संमन्तो मासन्तो, पारकर्म न पन्पा ॥॥ वर्य पर चप पिढे अपमासे जयं सए । मयं संतो मासंतो पारसम्म न पनपा ॥८॥ . - . भानबिन्दुमारपस [.. पं० २१- सम्पयप्पमयस्स सम्म म्या पासत्रो । पिरिगासवस्स देवस्स पावकम्मं न पंपा॥९॥" पर ।। "सम्वे बीमा विष्ठन्ति मीविठं न मरिविले । तमा पानियां पोरं निग्गन्या पक्षयति ॥११॥ स । "हिंसाए परिवायो होर अहिंसा पठविहा सा ट। दमे मारे पहा असिञ्जीवाश्यामोधि । म प ५। "पत्रार्थ मासमाषामा-अम्पयो मारवमवि- पुरि मिभापरिणामपरि पर मिभ पातिचा भावनाइपिकोईरजी भर लिसिरिया, से पमिए वेष सरेप किसे मए सिग, पसा पममो रिसा माग्यो पि । पा पुनर्गम्भवो म भाषा सा नाति समितम सामोपरमे गपात इति-प-बानिम्मि लादि । वा पुनर्माणतो मम्मता सेपम् -एक पुरिसे मरमपपगासप्मरेसे सेठिये रेसिपशिगम रख पासिचा एस परिधि वमपरिणामपरिपप निकालिगसिपचे दुम तुम किरिमा, एसा भाषषो दिसान पनवो। परममंगल शम्म इति पर्षभूषामा विंसाया प्रतिपमोप्रीसेवि ॥" एक एमपीस-११ 1411011. II "मद यो बीपर मीमो भपदाचारस्स मिपिठमा हिंसा । पपदस्स नपि बन्पो हिंसामिचेम समिदस्स !" प्रल ३॥ "प्रमचयोगात् पापम्पपरोपर्व हिंसा-तम् .. "प्रमचो पर कामवासनोयोगे मापबपपेपरोति सा हिंसा"- "प्रमच एष हिसको माप्रमच इति मविपादयति । प्रमचोमाप्तमपीवागमनिरपेयो रोस्सारिवपारमर्पसूत्रोरेगा सफरप्रमावितभयाविरचिरमामाण प्रामिप्रापापहारमा स्वया मोति । इम्ममानमेापानुपातिनी हिंसा । पत्र साचित उम्पपा मापाति पासा म भाववा । सपरिणामनिमिरे र दिसारिसे । परमावा परिणामो महीमसोज पातर । परत मिलिमिमिचमाविस कारणीमपति रिसापास इम्पो पापको न म्यापम इति मावीबोपमोगिनी पिता। वा पा मानपानमुपेन्वीपमतता भावा धर्मपपजायेग परणसम्परा प्राचा अविसमा बिगामपिनियन प्रबचनमामिलाहीतः पादम्पासमार्गावमेक्विपिपीरिमनि पत्ता समुक्षि परपमाघ मसमा पिपीडिभोरपरि पारम्पमति, समन्वमामा मामी मगति वाम्म इम्मापनरोपपमाशरनम्तमालयन पास्पपरिनिहीपरियातसो माति हिसारणम् । - काचित् मावया पापाठिपाता, मम्मका। पापानिममारपसरविमा बामगयोग- सम्मिकोरम सरगोचरपर्विनमुरियपैपर विसर्भिवतिकीमुसल परपावलानारपक्षवे पारणे वसोभावलात् मस्तेऽपि प्रापापपरे इम्पोनपरेपपि मानेपु मममेष हिसा, दिसारूपेण परिणवत्वात् प्रण्म्मेपिणा, सल्वपापुमकर्मक्षेपारपयो मगः पुरुषाराष सेवा मारविहिरमेषापो म्मापारम् । तमा समानरावमाश्म मिपासोममन्वयम्- पालमातम माषटो इम्प रिसा ही। -लाभ .
८५ - पू०. पं० २१ ] टिमपानि । एपरिवे विकसत्रये प्रमपयोगत द्वितीयत्तीयविसयो, मत्खयोरेप हिंसफ्स्य, मप्रथमसेवि सावत्-वस्तु पूतीयविकासे प्राणातिपाता, संपूर्णग्मणत्वात् । मायमाणा प्राणी पदि मगति, इलम माणति पवि विज्ञान पाव, इत्मीति प पति मपकचिचोलावा, परि मापारिवः स्मात् सप विदुपप तृतीये । वितीयविष्पे नास्येवत् समवम् भवः । मंत्र हिंसकत्वम् । एतदेव च प्रामाविपापण्मममपर स्पष्टव प्रपतिम- "भावातिपातः संपिन्त्य परस्साप्रान्तमारणम् ।" [गमिष ४.५] पदि द्विविष मारण सचिम्मासचिम्मच । संपिम्मापि शिविमम् -प्राम्तमाप्रान्तम - - " पाकिमपःमाम्य प्रमिलति । म प्रमाय मारपति इलामपितु सम्वेपिति । पर रिपब सल्यानम्मे निरोगपत इममिप्राय । सो बम का । अनिव- मिलो पर्वत इति । चिनिमितो मापुः प्रवर्तते । सितानिपातितात् । तपादि-मिरोगासन- मापिसम्पपनस एकस प न प्रीते । सानेपुक्यम् - इसे मापामावाने प्रविधिवा पर्वत विपतम् लिचसनिभियन्त पवियाम्पम् । र अनिचलमिट बन्द हल-पत्तनम् । पावितसनिभिता पन्त इति पापम् ।। मार-मापतित्सनिमिता पर्यन्त विमा यम् पनि रियर व्यपि पावनति । व अप विनामनाममा । पसलमा सरसमिरोमार मागतमोत्सपि प्रविण निरोक्का- पुष्पते । ममा प्रगति पल मा बामपि सन्तम् कर्म व निरोपति रामनामतमोत्पति- पीकवात् । परिवनि पा प्राप तिमिस्सलमा एवं पर्सपछि । समरियम् । परमाणपत पाहा मानी बीवितमामवापतो मति । बौदाम हरि मित एवं प्राणी मावि पम् । शारे परम्परेषप्रकारचे । ममामति मोर स्मानिया पागमन प्रतिमिप्यामि । मात्र अपरिव्य सामान्याधिकम् इममियाना । सम्मात् पनिक प्रयोपति निपौर प्रयास पवितम् । बास्मथ इति गति । स एल परिनिलो मास्ति। - । - पारिति रिवरामचिन्माम्ब पि मातिपात भरपो बध अतिसारपरिपूषोत परिनाम्य निर्मन्बा ममासमः । वे निवागामेपरिसम्परिपूपि परम्पस पर प्रसपा । पापप्रम स्म । बतिस्पर । मिमपिरोयोको । निर्मचपिरसोत्पने चिोरपावसायमाप्रपनर्ममा । भनिन् । सपोरेने पानिमनपाचरमपंगो समयपेवानाम् । परम इम्बोत्साएम्मपर्माब मपचति तरपपिप्रमरपे च । निन्याय विपिया बरिष नरपे। पा-बसरः । बचप्रा । बामेव मरफ्धरणात् । पारपि विषमा परम्मम्मति। मानुपमम्मोष । मातुमर्मस्वस बोम्यानिमित्तात् परमप्रमाः । वा एमियाद । सम्मम्पपिन प्रेषणसम्बार । मानसिपाधिमाकपात् । बम प्रसाद सन प्रभाविपापविम्प मापद। मारपत् । बामहिमपासमबम पहा! । वाममपि इव पातिपादन देय मानिनेपोऽपालते । पररथ पोषमान मनाया। परेवामि सपतः सर्पमिनुतोषा- प्रत् । नामेननर्मामुपगमात् । मरेप प्रभवाम् । प्रामाबिम् । पाते पनवant पनि पसार । पापयामीसिमिया प्रकिनवे । म मान्माणमा बिबरमा एग पृ. ४५०१। 'भा पारिमारिति । न रा हामीसमिपामावो पाप से सतनामी पाना-फरार्पा पृ०४.प.५। प्रासपातAAD पवा देकर मारपामाममिमाष पार मारस्तो म प्राबादपाये मी बत् । मिन् पनि प्रोणेभिप्रायन क्स प्रसामिति म सममयापार इमारे फरा. ४.प.१३॥
१ । . सालपिम्नुपरपस [.. पं.२१- समस्यप्पस्पस्स सम्मै भूपाइ पासो । पिहिनासबस्स देवस्स पावकम्मं न संपर॥९॥" "सम्वे बीमा वि एच्छन्ति पीविठं न मरिजिडे । हमा पापिवई पोरै निम्पन्मा बजति पं ॥११॥" ५। "हिंसाप परिषस्लो होइ अहिंसा पठबिहा सा छ । दम्बे मारे मसा बहिसभीवाइपामोधि । प ५। "पाप मान्मापायी-म्पपो भावम इवि-बार पुरिसे मिजमापरिणामपरि पर मिम पासित्ता बापमाणपकोरंजीये सर लिसिरिबा, से म मिए वेप सरेण बिये मप सिपा, एसा पम्मो दिसा मावो म | पा पुनईम्पतो म भापता सा बाईपाति समितम सामो कारमे गत इति-हवंचपातिमम्मि लाति । या पुमर्मापो मम्मता सेषम् -बारापि पुरिसे मामपगासप्परेसे सठिय सिपरिपका रस पासिचा एम परिपि तमापरिपामपरिणय माविमासिपच हुम तुम मितिमा, एसा मानमो दिसाम पम्मको। परमभगस्त शून्य इति एवमूषाचा दिसामा प्रतिपक्षोप्रीसेति ॥” पाले चामपाट 1.111111111८1. "मए पो पीपर चीयो क्यदाचारस्म मिपिमा हिंसा । पास्स नरिव धो हिसामिरेम समिबस्स ॥" प्रल 110। प्रमचयोगात् प्राणम्पपरोपर्ण हिंसा-ना ... "प्रमचो या बायपामनोयोगः मापम्पपरोपर्ष करोति सा दिसा-ला मा • । "प्रमच एप रिसको मापमच इति प्रतिपारयति । प्रमचो व भाप्रपीधगमनिरपेको रोस्सारितपारमर्पसूत्रोदेखा नपामभाक्तिगाविसत्तियानमामा मानिमायापारमा पवमा करोति । इम्पभाषमेरामानुपातिमी हिंसा | साचित् इम्पका मामादि- पापा - मावतः । सपरिणामानिमिरे च हिसारिसे । परमावा परिपामो महीमसोs- पापम् । परत मिबिनिमिचमाविन भरणीमपति हिंसापास भयो म्पापो र मापन इति मातीवोपयोगिनी पिम्वा । पत्र परा बारवायम्मुपेवणीपसत्ता भावः मपपमान परपसम्पमा प्राता माधियां मियामपिसिन प्राचनमापमिरमणीवा पारम्मासमार्गावमेक्विविभिपात सत्ता समुविषप्त चरणमाक्षेविसमा पिपीमिरेपरि पारम्पमावि, समन्वमायम मपी मावि वाम एम्पमापम्परोपपमाघरमम्वानुमाशयम पायपरिमिहीपनिमम्पसो पनि दिधकतम् । कपाचित मारता मानातिपाता, न म्यवः । कपागाविसमारपसर्विनाममगपोरा- भरिमफोरणाम सरमोचरवनिमुहिरवई विसर्विवसिममुखम घरपायमानारपसवे साये मेसोपवलात् पापि प्राचापपरे इमोमबारोमपि मापेषु मरमेव रिसा, हिसारपेण परिमपत्तात् प्रामापिणा, स्वापुसकर्मक्षेपारपसपो मगः पुरपाकाय देवल मरविधिसमेवातो पापारम् । वा तमालपणावमापम मिमांसोमसमन्वय -मालम्मपन मानवो इम्मवार हिसा इव। . .
.. प० २१ ] टिप्पणानि । ८५ एक्सविवे विस्पत्रये प्रमचयोगत्व द्वितीयवृतीयविकल्पयो, भवसयोरेग सिफल, प्रपसमेति मादेवत्-पस्त पतीपविकसे प्राप्पातिपाता, संपूर्णब्धमत्वात् । मार्यमाणा प्रामी पनि पति, तुम प्राणीति पति विज्ञान माई, एम्मीति पनि सचिवोत्पादा, पति पारिता स्मात् सर्व रेन्दुपपर्म वतीये । द्वितीपपिकल्पे । नास्येवत् समचम् मता। सिकत्वम् । । एतदेव र प्राणासिपावधपमपरं सरवर प्रपत्रिम- "प्रापातिपाता संपिन्स्य परसामान्समारणम् ।" [अमिष ..] वे विविध मारणं संचिम्मासपिन्स च । संधिम्यापि शिविरम् - प्राम्साप्राम्वरम 1 “पश्य परिधिमा वा प्रतिभातिम प्रभाऽमे मारपति इमः। इपिपु समिति । रोन विमान सन्मान कर बम्प लिये बिना इममिप्रामा । प्रत्ये काम पाए । कापतित- भने पर्वत ति। वित्तलिमिवो पापुः प्रवर्तते । विप्रतिपाति । पारि-नियमापन पश्चिममापवस समय न प्रवर्तते । चारपातम्- इसे बावासप्रथामा * वे अपसमिभिता पर्वत माम् ।, विनिमिया वन्त इति पापम् , अनिवसनिमिता बदन्त पनि-पस्तमम् । परिनिमिता पम्त विस्तापम् ! । माद-प्रतिनिमिता कति पति पापम् पति नियन मपि पावतीति । निमावीमायः । बस रसनिरोगार मापतामोत्पपि प्रविजन निरोपर- पोप्रोपं निरोपपति नमामिपि जन्तम् च सविरोष बनामतमोपति- प्रेमाचार । परिनिर्वमा प्रान इति । निमिप्रविसमा एवं वर्तवति । भावीपिठम् ।। पदभारम्पत इति। प्रानी गाविसामावान्पूणे मपति । पोलाची माधि प्रात् । क्व पर पति की मनम् । पान्दारे पाप्रतिषप्रथये । सम्मान पोर्न मानसत्र प्रतिमिमामि । माय बापदेन समाप्यासिकम् इममिप्रापा । स्मार नमा पानी निक्कम भिवम् । बासर इति दसपति । स एष चरित्रको - परिमारिख । मसपिनमा मपि प्राप्यतिपाद दरों पचा अमिरंपानिपुर पिनयर पनि निन्यानमारमा । तेच निर्मलानामेगारिमामहविलपि परपरसमसन पापप इसी । बहिन्यात् । मन्वपिरोबोको । मिन्पपिरोत्सार भोपारमाध्यमाने परमप्रभा । समिरमात् । प्रत्पादेशने । निर्माणहरममप्रमधे मुख्यमपेवायम् । रसायोपारम्पधर्मान मालति सामिपूनियामर । निर्मचारीमा भीरब पर। या। अपर पचायेक मरकपरमात् । सोऽपि प्रिमिका परम्पर्ममेट। अपर्यस्नोव । मातुमस्सा पायो यसमिनिला अपप्रम । तत एवासिताद । पचमामि । रमाकान्ला । पतिपादिगारकबा । जपर्म प्रयाः । बोलपति प्राप्यतिपातपिमा समाधि। सातारात् । मार्ग मम्मपन ! समयमपि इन त्यति। बरामी क्यानिमोऽपेपरे । प्रसव पौष मसावि बर्षमाप्रा । परम्भमि समता ससरगुजा सारा पोरगर्ममाम्मार । चेतना पागम् । भारंगम । यावे पापारिक अभय पात् । पापप्रपामा प्रमानानिये । यसमाधारपद शिविरमावि उप-५४.१। मा पानम्मारिति । पर देपरचय हरामीमामिप्रापमालो पसाच्चय पती बातमी निशान-स्फुयर्प. पू. ०३.०५। प्रातिपातपातामा रेसद मारपामाममिप्रापेर मार मारपणे म प्रायविपाटो भी बर। मोमन पनि प्रमोणेमिप्रसस्नु पारमुक्तमिति म सात प्रममिधाचार एमपो पा. 20.1 ८६ मानविम्मरणम [१०. प०२१- रामप्रावमापि शिरिपम्-मारमनः परम चेति । बतो विशेषपत्रपमुपाचीपते । श. हुक्त मबति-परि 'मारयिम्पामि एनम् वि संकाय पर मारयति, वमेव मारपति माम प्रमिला। सवा प्राणाधिपादो मवति । पा संशमिवो मारपति प्रालिन प्राणी सपायो बेहि सोपि भगारमेव निसर्ग माया वत्र मारवि पोतु सोऽस्तु पति एवमेवानेन बाग- पि न मरतीति । दमासपिम्न पो बम मिन्यते प्रान्तम पा मारमनो पासम प्रापातिपावा । प्राण वायु, कारपियसनिमितः प्रमतवे पिचप्रविषयाचिल्लात् वमति- पावपति विनासमति गावस्म सरससहिरोपारमागतस्मोपसिं प्रविषप्नातीति । पीमिते निर्परा प्राणाः । मौष १ सेनियम पनीवितेन्द्रिय म्पपदिश्यते । न त्वम्यान, भास्ममोऽमाषात् । न हारममा विशित् प्रतिपाय ममाममचि । पम्पस्स्वाह- "वायुस्माष विमानं यदा प्रपा प्रबन्स्पमी । अपविरसदा शेते यथा भष्टमषेवनम् ॥” इति भाईताः पुनरपुरिपूर्वकमसचिम्मापि प्रामाणिपात प्रतिमानवे | भविपूर्वावपि प्राप पात्रपों पाऽमिस्पर्धा परः । वेपो रेलममुपयवा परवाएसमस्पर्सने र प्रमिम इस पापोरवयप्रसारः । मानुशिरोमने स्टपोरेभने सास्तानमेवाधर्म प्रसा। विधिधमरण नाममापिना भाषषपः । मावगर्भमपोमाम्मोपासानिमिचत्वात् पापयोगः । पप्पमापि न पश्मिासनम्मात् भामिना खानपणापपपर्ममता । परेप भरपको मापर्ममसहा । म बानिमन्म सईवर प्रपोजयिका पण् । भोपनाना। पारेरकाहीना गृहपावे प्रामिणमा पापप्रसङ्गः । न प्यम्तमान्यत् स्वपपसिद्धिरितोष मनेसोपसमपानापुतिपूर्ण प्राणाविपावापथमचीति । मनोमते अने:-प्राणातिपावापमपेन प्रमच एष पुम्मते । प्रमचम निपमेन यगोप- मोराधिः । प्रमारपोरगावप्रमावस्म मापाम्पम् । पारमाणेन मोइनामर्मासो मिम्पादनमपि संविवाभिमविवादिभेर पिनुनित, रागोपोच विकम्भूिबाममधमारेण प्सम्बपिनो। निद्राममा पवियोऽपि पर्समापरणोरयारसानलमाया बराकृतिक विचो मा इत्युच्यते । पगोपमोसमात्मना परिपामविका मापातिपावापनपदेवमा समे - ोपपारिमिपविगानेनाम्मुपेयम् । सिसम्वविहितविपिना र परित्यागाकर हरीपणेम- मस्तीसमापिरतिः अनिचियरमनः परिमनिविष्ठेषः । साऽपि मापाविपावापयतमा निधि भगवता भगवत्सानिमतीवकामपरिमुक्तानि सरीपनि पासहपत्वात् समा- सारिपरिपामाम्वणि वरपमानि पा पापरपि पोगरपम्मेण मगन्ने भाषा वापरपि मस्तिोमरपरिमुर्गीपामायुसरपासपकपणापानरेन परिपवानि मागिनो परिवार - सरदार पा लिपति सन्ति पूर्ण पपेष पोगमापारयन्ति । मती देवोरे-पो पम परिमो वर्तमाना परमामेति इन्धि म्यापारपति वा ना परिमादीनुरोपसमपकारिण मपरिसस्वा न पानष पुरत्यापपपपरेषा परी पुण्यदेवको ना पूर्वस गर्नु पापीरपणम्पतित्रयाहारपरिषमा पसिनामुपपरवान् मसम्बस्ते मेवरे- भगवती.७० १६.१।
१०. पं० २१ ] टिप्पणानि । 1 संपेक्ना मात्- मरपमपिरतिलभम् । नियत मिरतिरोतकेन । पुण्य र मिरतिहेतुकमेव भूपसा । नहि पापाबादमिरचा पुण्येन फर्मनिरपेन वा पुम्पत इति । एपाऽप्पविरविर्मोहमनेन्मेहम गती प्रमापसेपास्वदति। प्रमचयोगाच प्राणातिपावापवपमिति म्पपस्सिवे मदुच्यते परेण-मसपिन्स पा प्राम्मा या मरप नापपोखमिति । मन्त्र प्रतिविधीयते--असपिम्य हर्षवो पपपपासमपखतो। मिप्यारमाषः मुगवक्षिप्पाणाम् । पम्मान कमिम्मिप्या प्रतिपय प्रेमापूर्णकारी मिप्येति चिन्म । पपैर मन्येमा-वेपामधेन पोगो मिथ्याभिनिवेशात् समति, एवं सर्दि पका एमाई करसपता क म हिंसा भयोचरफाछमाविनी प्राप्तवत्वमानस्म - 'मिप्यावनमेवत्' इति । तुस्पमेव वत् सर्पोरेऽपि । मप संचपखवात् मिनावमममयकारण सहि लिखितषियः साम्पादेरिदमेष वस्वमिति नाप स्मात् ।। संसारमोचकासककपाहिष्मतीनो र प्राणियारिणो पर्म इत्येवं संचरवाममों- समिति पर्व वा संवा नाव मात्, भम्पामिभिस्वात् । अवे मम्मेवा! --संतम मेर ते प्रामिनो वर्ष हम्म इति । सममेव वत्, किन्तु मैप पिचोत्पादो हम्यमानेगमों मपतीति । संविद्रवे न सुटमेवं सौगा-प्रमापारम्ममोरपश्यमानी प्राणवप इति । क्या पुरम ये शोपिवमाकर्षवम्ति वपुपः मुगतोऽयमिझे विमाय तेपामपीविनरकगतिकार- मानम्वर्षकमपुरनिस्वारे न स्मात् । इप्यते चानन्तयकम् । अम बुद्धोऽसमित्येवंविष पुरमावेऽपि संप्रपितामहमलमासंपेवयवो मवेदानन्तर्पम, एष सति मापासूनपीया मामपि भरपेन मोगा स्मात् पहा ते विनम्माईगमवभिमानपपनमानस्सवमा प्राणिना । गोषमारेया मुशोयमिति संज्ञानमात्रेण सम्पाविरपि विम्तपत्सेन । एवं वार संक्षामात्रेण चितवतः स्पाकारमपि पुरानामान प्रत मानन्वक स्मात् । तमा मागपिपस्तूप- भेदानन्तप्यपि पोम्पम् । बाडम किस पास्नेव देवयतोऽममित्येव वा घेवयवो पुराय मियानोपनमा पशुपष्ठी सम्म पाठ इति मुगवतासनविदा प्रवीतमेष । ऐनमसचेति- पायो भाम्विपम प्रामातिपातापनपद्धतया मायौ । सम्पमा पाल्पति मुखमापिठ- मिति । वमा मास्मयमोऽपि नानामबपोखरेय विमरणोपायाचे समोरम्बनामिन- प्रतिमिा । तस्मादारमनोऽपि भविविषपोऽप्रपोरिति पतिनित् परमाणमपि इति ।- एवं सति कचित् पचिर् मावद पप मापानिपावापवपममनिणाननरकगामि । बन्दुम्मत्स्य मेव । पनिर उम्पभाषाम्पा प्रापातिपाताव हिंसा मारकमेवेति । प्रमापस पोरपि विकसयोरमभानाविण्यपाबता प्रमत्तम्भापारेण परपारदर्भने वा मरमेवारयम् । यामचम भागमालसारिणो न मपति । समानापरमेतद् बमुभमोरामिपगृराम गुमसेवाप्रेमाचारिणा ! मर्य पुनप्रसंग पर, मटेनोपम्पका-सिरोष्ठबनायुपरेसे भास्तुः मेवाधर्ममसंग इति पवसामानाविप्रमा- समयोऽयन्तमेप मासिवरि । पपगोपमोहेनापि भगवा मुमुक्ष्मी धर्मनिरोपापस्पेन पपो रेपिवम् । योऽपामिरप्रमत्मेति । ममदानमपि प्रयतम्मारिगुणसमम्मियो- .
. मानदिनुपरपस [१०. पं० २१- प्रमचो गुणपते पाचाय पवाति म्पाप्यम्, साना ताकारिताननुमवं प्रहीवाप्यागमाह- परपा एहाति, वरनापपेन पोगा?, अमरापिरो पानमा पर मर्मनिरमाविषय मिनिपि।विरिष: मुवयमविशिवाचारपरिमिताविमोजिमोऽम समर्मविपाक एषा- साविति, नासमपीयानपि पावरप्रमचत्वार रोपः । पमाम विधिमगार प्रमार पति पेत् । पाचा जामम पाम एष भक्तवाद, परग्रहीयेन है परम्भापति समचारोपण वीति । यथापालि-मावर्गों द्वापोवर्मातापि गर्मम दुनिमिचमिसुमगोईपरतुरमारपपेर योग इति, म, वमिमतमेष जैमामाम्, यो प्रमचतात् । म चारमेकाम्ता परमोत्ता- पारगावमाऽरपेन मविवम्यम् । बापापम में मुनेरपायसम्ममावस पर्सने पति प्रमनीवसाधर्मोपपते, तापुस्खाचरीरस्म मा म्पपगवामुनो मैन, म गुमानिमित्तम माम्पमापति सापोः । प्रम्पमात्रपणे वागमानुसारिणो मिपपरमेष परालोसारे सलाम मारि पापागमा, एवं परमुखोलारेनषाद इन्पाप्मम् । मीसयो सेगमापापयवा मुखो त्पादपि ममपम पोगा ।कषित् परमुनोत्पारे पुष्पशो नियमा-विहिवामुखपिना सामो? मुस्सिपासार्वमापारियनेन पपमानिएन मासुकामपानगानेन पेीि । पयोक्तम्- अमियाम्पमामात् बयोपि नरपेन, पश्मिासंपन्पायपत् । नया पमिः पूर्व साभपं रहतीनममाविक, पप बपक्रिया पप्पसंपम्पिनी प्राए वापर पम्पमेवारपन पोगपति "धर्ममा मिरे किमा" इति पचनात्, यथा मिमधि सूफ पाच हो हन्ति मानिममिति । परेवरसहिति । भमया सिम्पपा धममापिम्पा सूमिमा- रपमुखापते सा मिलिनिया विधिवा । तमा न पमा गवया इनमभिनगा प्राषि- नियोजन कर्म मियते सा विषभिवा । चमनोप्मेवापता यातीलतोऽविरमाननमाना सपमानो पुद्धिपूर्पकमम्पमा मा परम । पर्व मामादिपायोपि ममन प्रसार क्रियमाणावरमारवयाऽयन पोगपति साम्साः । वरिपूर्णता प्रमचवा। पर प्रसो बममापसेमा पकसममापिनी र मननिया फरफसमापिन्वेष । प्रमचमाप्पपसायो बम्परेता प. पणनास्महनने प्रमचतापसापा । प्रावधर्मा पानेकपा पत्र कबिदेष धर्ममाभिम एव पम्पमते । बर समपर्मविषयमा -सन्तोपादान क्वोच मिरिमर्मसाप मार् प्यन्ता । विकाससमा पेप गाविस पवा मसुमधुरमेन पायमादित्वमपिपपोधि । म भिगावाः सापेरपयोग सा, वमाभानियावात् साम्मसिपिरिति । एवेन पावपि प्रत्युक्तम् – “परेप च परमवो मानर्मपण । नदि बनिमन्वेन स्पर्मवम् प्रयोगमिता एप' इति । परप्पमिशिवम् - सतमानो रगतीमो पपाते प्राणपात् पापप्रसार ति । समेतत् । पदो पेपो पीवानो मध्यति भरीर पर चामुस्था मानवचेपामविरतिमसपमयपमिप्यत पोति म भनिए पापा । पोस्वम् - न प्यन्वमात्रात् लपमसिसिरिति । एतरप्पयुक्तम् । पानानम्माति प्रमचल प्रामाधिपावारपपम्मिति प्रमामिलाहवा । प्रयोगा- मस प्रायवकिपा परपरेता प्रमचमातारनिचित्तात् प्रवीररिसमानाधिपापरिति । पमापपरेनं मपति स प्रमचम्मापारनिचोपि म मगति पा प्रबमरिकम्प इधि । "मासोक्तम्-बरसमा मागेपु पनि परपियामनिरपेक्षेषु पापुभानस्तोत्मम्विा -मम्मा- १०. प्र०२१ टिप्पमानि। जयमेव मपति न परप्रपोन पिनाश्पते, पापुमापातिपादकस्यामानमर्द प्रपत्रा मोति । पनामवम सणसोसर्वि प्रतिवमातीति । पवदप्पसम्वमयुक्तम् -बवागवस्त्र मात्माममा मणो न वापसपते प नामावलम इस प्रतिबम्पा , पसरसरूपस्या समाप । मयो मामाया सक्या । प्रविषन्माप्रतिवन्यो समापविपयो । मर्म पप्रायतिपातम्मप सं घौगतेन-पाणी पर मपति प्रामिपिान सोसावे इम्ता ।। चामारा प्राणी न र मामिसमा पत्र रिति । सिम्प्रायोगिकविनाशमेवाब न सर्व एक निष्कारणो नामः प्रागभूतास्मामातू अपरिमन, खुमत्त्वात्, यदि किसम्पादित विनासोसि विनासवानितिप्रसंगा । पदा विनासमेन भवस्यप्तरपरिणतिस्मोमि पीबने पदा छिमनिमम् । पत्रापि पूर्वावसोपमईमा विन्यायवाच्यम् । एवमपि म विनासम्म विना विशितू कारणमुपग्मामरे। एम्पम पूर्णपणमापी-मिमारपो बिनाशा किमयानुव मिस इति । बससे बिनासम्म सर्पमाषानां निमतामसार निमो मिनामा, भर्पोत्सारामाषा, सरा बिनाभेन प्रविवशत्वात् । पोव-पायमैच सेमियम तबीक्वेि- भिवं म्पपरिश्वते नवम्पस्मात्मनोऽभाषार् इति । तदृष्यसमीचीनम् । पर एफनिव- परनवम्पनाः सप्पमुभवस्मरपप्रमपानुमानार्यामिपानममपम्ममहासका मित मात्मा । प्रति मिन् पुरुषार्याधिपधिपपिरिति । ननु चानुमवस्मरणारया सम्पमात्र, पिानमात्रवापी माननिम्ताः । वा मिरववक्निपरत्वात् सम्पानो निशानस प सम्ता- माम्मुपगमे समुपपन्नमिति । वन, परमार्यवतमासस्वात् । म पासमात्मनि वाणीव मापाविपाकमणविषयापपारणं साय कर्तुम् । समिम परस्माप्रान्तिमारममिति मिना सोनारिम्मपा मारणासानाचत्र कम मापातिपावा-8 संतपिता, भय पम पर पिानमुमपमाभान्तिा, भय येन मारित इति। । सर्पमा गृहीवारपाया भष्यगरमा- पर सौगवा से विचार्यमाणं मुगवशासनं निस्सारस्वात् नसुक्ति पमत इति।" "भमारा सपायत्व, सपनात्मपरिवामा प्रमचा प्रमचम योगः प्रमचयोगा । मात् समवयोग्यत् । इमिपारमो पक्षप्रापा, पो पयासमर्म मपरोपप वियोगकरणं दिसेल मिनीपते । सा मागिनो हामवतारममता । ममचमोगादिति विशेष पहं प्राण-. मपपेपण पाषर्माप इति तापनार्थम् । पप-"वियोगपति माममि बमेव संयुम्प" इति - "उपास्विम्मि पादे - [मेव ..] "सप्ा परिग्गा पिप भाप्पपमाणदो मणिदो।" ननु र प्राणम्पपरोपभामाषेपि प्रसचपोगमात्राप हिंसेप्यते -- "मर व जिप व बीलो मपदाचारस्स गिभिछदा हिंसा । पपदस्स नस्पिापो हिंसामिषेण समिदस्म ॥" [10] पति । मैप रोपा, बपि प्रापम्पपरोपपमति मात्रमपम् । पया मोक्तम् - "स्वपमेपास्मनाऽऽस्मानं हिनस्स्यास्मा प्रमादवान् । पूर्व प्राम्पन्तराणा तुपमा साधन मा नया इdि" - eit ..
९. माननिमुमपरपल [प० . ०११- "ममविशेपनोपाराम बम्पवयमाणे हिसाऽमापापनार्थम् ॥ १२ ॥ मला पेरपानम्मा भियते- "बसे पन्दा ससे बन्सुराम पन्तुरेन । बन्नुमात्मा ठोके कर्ष मिहुसका। पति सोचारकास न ममते । मिघोमिमानपरामपम प्रमचयोगामापात् । भूपसूक्ष्मजीवाभ्युपगमात्- "एल्मा न प्रविपीएपन्ते प्रापिना स्पूनमर्तयाः । पापा विपन्यन्ते का रिसा संयतास्मनः ॥ इति"- "ननु प्रमचयोग पर हिंसा पामारे संपणात्मनो पो मापपरोपपेशिरिसारिति मित् । मालम्पपरोपणमेन रिसा प्रमचयोगामारे परिपाने प्रारमिचोपरेशात् । पवा बहुमगोपागानं ये किमर्पमित्मपरा । पत्रोते-समपविभेपोपतानमम्मवमामारे दिसा. मारणापनार्मम् । हिंसा किया। भाषवो इम्पवम । तत्र मापयो रिसा प्रमचयोगा सन् मात्र मावमापम्पपरोपणसापरपमाविश्वात् । पता प्रमचमात्ममा सारमपातित्वात पगापुत्पपेरेष दिसावेन समरे प्रतिवर्षमात् । ट्रम्परिसा : पपम्पप्रायम्बपपेपर्व सारमनो पा, पीपापिया मापमिचोपदेसो भावमापम्पपरोपभाभावात् वरसमपात् प्रमच पोगा मात् । पति पूर्णपस पवेरप्परबमापात् । यता प्रमचयोगा मापम्पपरोपर्ण रिसेवि शापा ममोपान कर सूत्रे युक्वमेव ।" , मेक. "पापं धर्म परे एखाद पुम्पं च मुखतो पदि । मोक्नासापो परमेयाय निमिचता ॥ पुष्पं हर्ष सतो हासात् पाप प मुखतो यदि । पीकागो गनिपिस्ताम्या युध्याभिमिचतः ॥ विरोपामोमपैयरम्य साहारनपापविहिपाम् । जगप्पवैकान्तपस्वि वान्यमिति पुन्यते ॥ विधिसहिशाईपेट लपरम्भ मुतासुखम् । पुष्पपापासो पुक्तो नये म्पसगाईत मामी १५-१५ "महिंसा मवानां जगठि विदितं प्रम परमम् , न सा बारम्मोऽस्स्यपुरपि प यत्राममविपी । ततस्तस्सिसर्व परमम्मो प्रन्पसमपम्, मानेपास्यापीम प पिस्तोसोपपिरतः । परत " "अनाप्पपिसोहीए नीपनिकायहि संपो खोए । देसिपमाहिसग निषेहि सेसोपदसीहि ॥ ७० ॥ उपासिमम्मि पाए रिमासमिपस्स संपमहाए । पापड सिमी मरिच मोगमासन ॥८॥ न य सम्म मिमिचो पो मुहमोवि वसिषो समए । अपनो उपयोगेण सम्ममाण हो जमा ॥१९॥ " .. पं. २१] टिप्पणानि । . प्र . नापी कम्मस्स सुपहियोगडितो य हिसाए । बया असर अहिंसत्यमडिवो बबाओ सो उ ।। ७५० ॥ सस्स असंचेययो संघययवो य बाई सचाई। बोगं पप्प विपस्संति नत्वि हिंसाफठं तस्स ॥ ७५१ ।। मो य पमचो पुरिसो सस्स य मोग पाप ने सचा । पावते नियमा वेसिं सो हिंसबो होई ।। ७५२ ।। जेवि न बाविति नियमा सेसि पहिसयो सो उ । सावनो उपयोगेण सम्बमाषण सो बमा ॥ ७५३ ॥ थापा पेव महिंसा आया हिंस पि निम्म्यो एसो। चोहोर अप्पमचो महिसमो हिंसमो इपरो ॥७५४ ॥ बो य पयोग मुंबड हिंसत्पं मो य अभमाषेम । यमणो उ यो पठंबा इत्म पिसेसो मा पुचो ।। ७५५ ॥ सित्वं पुर्वतो मुमा दोसो अपतरो इपरो । यमपो य बप्पदोसो बोगनिमिष विमेवो ॥ ७५६ ॥ रचो वा हो पा मटो पाबं पहुंचा पयोग । हिंसा कि सत्व माया मा सो हिंसमो हो ॥ ७५७ ॥ न प दिसामिषेप साबढेमावि सिबो होइ । मुदस्स उ संपची अफता मणिया बिगपरेहि ।। ०५८ ॥ था अपमापस्स मो विराहणा सुचविहिसमग्गस्त । सा होइ निखरणफठा अन्नात्वापिसोलिपस्स ॥ ७५९ ॥ परमरास्समिसीर्ण समचगणिपिरगतरितसारा । परिणामिर्प पमाणे निप्छयमवर्सबमाणार्ण ॥ ७६०॥ निफपमानन्ता नियमो निच्छर्य अयागंता । नासंति परमकरम पाहिरकरणाससा केर ॥ ७६१ ॥ एपमिणं उबगर पारेमागो विही परिसर । हमा गुणाणायवर्ग वविहि वसझे अपायपगं ॥ ७६२॥" कोठी । "एपमहिंसामावो बीचमगं ति न य मोमिहिम । सस्थोपापमनीष न य वीरपण ति पो हिंसो ॥ १७५२ ॥ मम्मेष सदि मोकमातीवपिम्पारिगीपममत्वात् बर्दिसाऽभावा । संपतेरपि पारित मानवमित्व निर्वाइपितुमसम्पमिति भावः । पदेन न, पवोऽनम्वरमेनामिदिवमस्मामि- पोपा पिम्मारिकमणी मबति । उपजीवले पाउवाकारिवारिपरिमोगेन निरमेय पतीनों संयमा । म र 'पीपपनो मोका' इमेवायम्मानेर दिसा संभपतीदि ॥ १॥२॥ माह-मनु पीपा मोरेपश्यमेव पीपपाया संमाम्पवे पीकाम मन् क रिसको मसात् १ इमार- न य पायठ पि हिंसो नापापतो पि निष्ठियमहिसो। न पिरल्जीपमहिसो न य बीरपति मो हिंसो ॥१३॥ - एम पापविम्प्रकरण [१०.१० ११- बातो वि हिंसो द्वाचनमो ममो ममिमरो म्य। माहितो ने विहिसो परायो महा विछो ॥ १७६५ ॥ म पावकः' इलेवारवा रिमा म पात्रमनि निमपनममतेनाहिमाः । पि पिरम- पीपम्' इमेवाग्मानेगारिमा, न पानि जीवनम् इनेवापत निर्द, बिमिमरो गगतिपावन स स धप्पासामोऽममपि सिंमो मतः । नापमानोऽी . एपरिपामो न रिसो पचा पः । इति मनप्परिमा, मम मि समता ॥ १.६३-१५६४॥ ससस मूवो माया स्वार- पंचसमियो विगुतो नापी अमिसियो न विवरीयो । होटप संपची से मा पा बीयोक्रोम ॥ १०६५ ॥ पञ्चमि। समिनिमिा समिवा विसमिसिमिम गुप्तो पानी श्रीवलरूप-वामानिमामिया सांगा भीगरपापरिणामपरिकका खपतम समपि सिमपरिहिसको मवः । पवरिपरी पम्पपल मारिसम, लितु इस पारम्, बहुमपरिणामत्वात् पासपीर्विसामास्तु पीयोपरोन पोषन गरेपरोनोपपातेन संपचिर्मबद्ध, मा भू पा से पल साना, सिमले वमा बमेमविवादिति ॥ १५॥ इवा वमा बमन्तिरसमिनार- असमो यो परिणामो सा हिंसा सो उ पारिनिमिच । को विभपेस्खेजनाममाप्रेमवियं पन ॥ १६॥ बमारिए मिसपनवदो योऽनुमपरिणामा स प हिंसा स्माम्यायो । सपनाम- • सत्ताविपातयिाम्प लिमिर्च कोप्पपेपवे प्रेम पुनरनिरपेक्षोऽपि पवेत्। पचा पतु मस्तानाम्, पस्मारनप्रन्तिकमेव बामनिमिचम्, वत्सरावारिसास्वात, मामेभी सिमसात् इति ॥ १४॥ पोरं मामो पीपपाता सरसा न भपति पते कमिर मवारी जमिन । यम् । सह- अमुमपरिणामोळ पीनाबाहो धियो मयं हिंसा। अस्स ट न सो निमिचं संवो बि म तस्स सा हिंसा ॥ १७२७॥ पा-वस्मात् बो जीवापायोऽशुमपरिणामलाबा बामपरिणामो रेखा पर पसाधावामपरिणामोखीमापापा जीपमाला ससा इति मत पीपरगमपराणाम् । बस पावापापन सोशमपरिप्पो निमि स जीवापामा समपि पल सापोर्न रिसेटि॥१. in बमुमेवावधान प्रापमाह- सदियो यफसा न पीपमोहस्स मावसदीयो। बनीताबाहो न समपसो कि हिंसाए ।। १८ ॥ . .
.. पं० २१ ] टिप्पणानि । पोह पीवरागडेपमोहम मगवता इष्टः समस्पाइयो भावविभूतियो म फरापिए रसिया रतिमनका संपपन्ते पनी यह मास्मनो रुपमसाममि मावरि न विपयामिगपा संगारते, या एखपरिमामन पावा सापो सत्तोपगावो म रिसाये संपपते क्सोमपरियामननावे पाप नमिचमनेकाम्लिम्मेदेखि ॥ १५५८"निपा "हिंसामि मुसं मासे हरामि परदारमाविसामि ति। बिते को नय बिसियाण कोपाइसंमई ॥ ३२५९ ॥ तहदि य पम्मापम्मोदयाइ संकप्पयो गोहानि । वीयफसाए सक्मोऽपम्मो पम्मो य संयुणयो ।। ३२६० ॥ दिनामि हरिणादीन्' 'स्पा मापेप्रम् सपणावपयामि देवरचापीम्, 'पनमपाराम' प्रमेव परवानाविधामि-निपेरेजम्' इत्यादि पम्मित् पितयेत् । म न पा लम्तियाना : बिसातिचिन्ताविपयमूवानो परिणादीनां वर कोपारिसति-कोपारिसममोऽधि । क्यापि रिसारिचिन्तकमारी, पातिसंकरपवतु वो पो भवति, इत्यापमोरपिगानेन प्रचिवमेव । तपहापि प्रस्तुते गीतकपामानप्यस्सियापीन् अपमानस्माधर्मः, संस्तुपवस्व पर्य नेप्यते ॥"मशेषा "बापा र अहिंसा वाया हिंस चि निम्म्यो एस । यो होइ अप्पमचो असिओ, हिंसत्रो इसरो ।। ३५३६ ।। सरमा मनाप्रतिना परणेन इननमातमाऽनुमतिष्ठधर्मा हिंसा तनिधिहपामारा पोतीति म्ममहारा, भा - गामा लिभपनयमवेन भास्मैव हलमारिग्मणा दिसा म एष र भिधिरुपाऽसित्सुक्तम् । तपनेनास्ममा पल पोगलमपल कर्मणाकालमुर्व मातीविषा । मौषति ग्य ना। "पर एष धर्मधपात् धर्ममतीनो विक्षिप्तरोशरपनिपमा क्षपण्यामुपपमोरण सम्पतिप्रारपि वन पर पाकरणनिपमा बीषणः भीगमोहरिगुणस्माममा अनि मैव विशित् रोल गईणीय पीरिसारि, रेणोनपूर्वकोटिका जीपमति, मरणीयम्मापारबीचभूतकर्मम गईणीपाइरेरयोगात् ।' रूपरेगम गा । "ननु पनि सरा गईणीपाप्रातिनिरागस्माऽम्पुपगवा वा सम्म गमनागममतदार प्यापारो न पुसतमा पतोऽम्मोन्यायप्रेरकस्पेनापि परमाणम्पपरोपपावरमलेन सान्वद्वमा गईणीपत्तांत, विसारको दोपण एव हि गईणीया गानामियाभास समापचे- पप तस्स गरहणियो पहारमोरियोगमिषेण । चं अप्पमचाईगं सबोगियरमाम गो हिंसा ॥ ११५ ॥ नवम बीवयगल, पेष्टारको गमनागमनसमारिम्भापार गमीयोऽति, पर परमार्, योगमात्रेण रागोपासापरितेन गम्पोगेन, पप्रमचादीनां सोगिपरमावा पीवानाम् । नो मेष, हिंसा, तेषां मोगम पराचित् प्राभ्युपमर्पोपदितरवि पत्तों हिसारूपालामापात यादवो रिसापा एक गांणीपत्ताविति भाषा, म्पमवीमविप्पति मुपयिन् ।" - सोप- - . पर १५ म २२ बालपिम्युमरममा [.. ०११- "मन्दिर नमनीविकामानिमित म ममागीनिवामिति वासना- मपिर्य पप्पमासे परवयाहिगारमादिस्स। एवं सविसेसे परिवेषममिप सम्मं ॥ ११ ॥ मनि पमुपपरोक्तम् , समाम्मे परमनविमानसमर्थन लिमार मुनिमेष्य 'सपूर्वोचरस लिन, पति देतो, पम्पल्पविपचम्ममया, कम्पमाम्मामिप्रापमानम् -' परेशास ११६॥ "सदो पहिं सम्छवि दमा का पार्वति ते यो वि बाब लोगो । पत्वस्स देशस्स य यो विमो स्वो विपादादि मरिति कोयं ।। मो! भाचा! पत्र पसे मिपमाने समा समति गेमका पा सूक्ष्मपस्यापना हीपन्वे । पो पारेपि ततो निर्गवा मेन्ये पापत् प्राप्नुवन्ति । वा पसल रेमप पो पिमल पवापि विनिर्गवा पावारपः प्रसरम्तः सम्मपि प्रेमापूरपम्वि । वरिफसि अंतिम उई संबोमिया तेरे पति । उह गहे यावि पठदिसि पि परिति लोगं तु खपेष सम। बमापात इपसि मम्पसे, पपमपमनमुत्या समपरमवापानिपारा, म दूर गेमन्त गाम्ति पाई संमोमिवामाभिचार सन्तोऽपरे प्रबन्ति । यबमपरापरणा- प्रेरिया मा मसरन्ता पमेनोपमानिइचवसति र समपि लोक बापूरणन्ति । पट एणमवा- विनाय मारममित्र सदोस मा बामहिहिहिया । दुई सएमोबह बावरेही यहोर सोमवारी तु पाप ॥ परमनन्तवं सम्मेषपूरपास्मन्मारम सदोष पुस्मजीपनियमनवा सापप निकाय पमा कारणात् पास पर्व ममिति मेमारियो, बत नवं मनितम् , मामापतौ-बापर ही पीना सैया सम्म्पा चेयवानिमा पासो र्मयो मयमा त म मबति । दया पाणपका-"शप प पर पीपे सपा समि पपर, पेगा पणा, पार, सम्मामीफ मार्य परिषमा पप तस पीपसतिरियामबा।' मरेल मपिप्पर पर मिसातिविमिषयी मलिदेखि नैषम् , पर- मा यानि का परिणामामो संपस्सदेवादि विषा महो। संपिाए नेवमण्ठिसमाये परममि संबाया पासो ॥ पामापि पेश रिमा संपश्यत कोरणनीर्या मिपासवापारी गमन, मात समार मोबनायनारको प्रमन्ते, पठामिर्षिया पोइनिस्वात् म सविस्तेमाल हमन्तरेण र पममापि म्परा प्रायोति बसे अमरभिपमामे न हमारा संगापते भयो म दमनीपम् । मित्र जहा बहा अप्पम्प से गोमो हा हा अप्पतरो सेयो। निरुपयोगिस्म से महोर अफ्छिापोवस्स बणारे ।।
.. पं० २१ ] टिप्पणानि । नपा पमा से सम्म बीवसापवरो पोगनपा से वम अस्पवरो पो भवति, यो मा निस्योगी लोयरमायां समा मनोवाजपम्यापारविरमिता वम धर्मपम्पो म मगति । सातमाह-अभिमाइपोवस्मेबाम्नामे, पमा छि निमिाप्रपाण सविस- संरपर्सपूर्वेपि वरामी वर्तमान सस्सममि भए माभवति, पप निस्सयोग्यपि बर्म वर्गमापारिवानभूमपूर्णसमापभिरन्तरं लिविवेपि मोके पर्तमानः सस्पीपोपि कर्मा मेयरमा कर्मबबल पोगान्वपम्पविरेकरिमामिवया तत्परिनिहीमा परगनाति माता पवियः । इत्व परेण सपझे स्मापिते सति सूरिया- पारममिहोबा भासवाय गुची य सेमाप वहा नु साह । मा फेर पारेहि छिनमार्ण पतिप्यहाणी प मवोमहा ते॥ बारेममिटोधि मभरोग्रामगिका, हे नोरड यपारमखपामवाय फर्मोपादानाय सो-: मिमेवा, गुप्तिम तत्परिहाररूपा मेमसे-कर्मानुपादानाय अभिप्रेता तपा सति है मायो मा सर, मा बा पर्म जिपमान पारय । निमुक्त मवति । परि मसन पारम- दमा ममता फर्मवन्पनिकम्मनमभ्युपगम्पते, तो पेय बमोदनप्रतिपेवाम एलसन मास्मिन पेय कियवे यो वा दमतिपेपको मनिपार्यते वामप्यारम्मदपा भवता न नम्बो, बवो महुवोपरेशापम्पमा चेत् करोपि तता से प्रविादानि । साचनविरोफ.. यण पूपममापपव श्यपी । मप सीपा पोऽयं मयाबपोनप्रतिपेपने परिवार्यवे म बारम्मप्रतिपेपरवामियोप इति । मत्रोम्यते - भदोस ते या एस सपो मष्णो विकमा प म मदोसो। महिन्या तुम सदोस एको एवं सठी फस्स मधे न सिदी । पपेपत्तीमा मोनोपान वयोऽम्पोऽपि बमोनातिसमुत्या सपा मारपोो। म मवेत् । । सम्मापि ममायातिरिक्वपरिमोगविमूपातिरोपपरिहायस्मात् । भयेछपा व्यभिप्रायेण परेको बमोनाणा सपोपोऽपरत निर्यौपा, पर्व सति परम म अपय सिधिर्मवेत् । सर्वस्मापि पागाडम्बरमात्रेण मम स सामिप्रेवासिनिर्मवेरिति माया । पवमामामिरपि पर्व पतुं शक्यम् - पोरं बबछेदनसमुत्या प्रमा स निदापा, ममत्सरिफस्सिवनिपिसमवविति ।- संबिमोहोज सईदोसो सोमा पेप पत्रो कर। से पहतो ति विणे दिपेतु संपाउगवे य णिइन्स पि॥ वयप पचं पिमान प्राणनो पोमातिम्रोति पदचर्म मिमता सोपा गोपो मोत्, मभिपमाने पर प्रयामातिरिक्त प्रत्युपेपमापन पे भूमियोनारपः धमत्युपेमणा गोपा दिमे दिने मपन्धि, १ वाम संप्रायो पिमूपारपो पालो पोपा-, चाबपि निमुम्पस प्रषिणी निमीत्म सम्पग् विरूपप इवि मावा । बार-परि पराड्ने पुप्पामतेनामि सरोपा समपति वा परिहिमतामप्ती गामा सयोगेनेव परिमं पर्व परेर एपणाम् । प्यते- पेतमग मिममदिस्थिय ते या ममाते हामि सुवादि वार। बप्पेस बोसो गुममूविडपो पमाणमेवं तु वो रिति ॥ । समतात, 4 १६ मानरिनुपरमस [.. ०११- बम यो म पवा पिरमाप गोप्य मित्र गृहीवम्पम्, वन ते-पापत् उत् मिर ख मार्गपति वचन पदो सूनार्यपौरम्मा पनिर्मपति । बतिया पर पवारनम्पपोोपास मत्युपेसपाशिनिपापरिहारमतीमो रामाय भूमा संपदा पता बागुपपलिव इति भाषा स्माद । पवा प्रमाममेष बममानी सापकान्ति म पुनमाविक निमपि सूत्रापापातापिपमनीति । बामा पानि विदा रियाश्यामों इमार परोक्त पगिरमाह- माहारपीहारमिडीस घोगो सम्बो दोसाय पहा अवस्स । हियाप सस्समिर सस्सिपस्स मंग्स्स एवं परिधम्म । पचा पतम प्रमापरत सापोप्पारनीहाराविविविक्षिपमा सो पोगो मषम्मतेमाल रोपाप मावि, वपा माणमोपकरमा परिर्मनमपि ममारिमेयमेव पवनका निफ्मा विपि प्राम्पम् । पारदमा-बाप ससमिष सस्सियस सि-इलेग परवि शासिका हम पाहिएप परिवर्मन रिपनाविक देवाप मति दपेमपि मागपरिवर्मपम् । वा बोक्वम् - "पहलसहिता पस्साकीमप्रपि विभता । या मपति शसपीरा यसमा सारफदोषाय । सनीपहिवार्य पीपाकीपि पिचरवो सोफे। या मति जीतपीरा यसमा सारपदोपाय ।।" अप्पर सिमसालमापो हिंसर्ग माससि पोपर्वत । दमग मावेष म प्रविमचा पचारि मंगा बह हिंसपचे ॥ बपि इसम्मुराये, परमम्मामि पासम्पमिति मागा। पर पोगपन्य गोपरि पापारमन्वं पी बिसात मापसे, वत् मिश्रीरते धम्पसियतमगरान पूर्व प्रापति । न सिग्रम्ते मोगमात्रममगारेर रिसोपवर्मत, समचर्सवापानी सबोगिकी पताना बोगवतामपि वपमापात् । परि सा प्रापने पामते हार । उम्मेष -मादेन र सरिमस्वायत्तारो महाा पाठ दिसमले भवन्ति । सबारी । मतो मामेका सा न मावता । मावतो मामेका सान प्रमाका । एमइम्मयोऽपि मारयोअी । एम मम्पतो मापि माषतः । बोप्रमेव पवार्म मारो इनार -- भाप हिंसा समिपस्स पाहू सा दममो हम मापवो छ। मायेप हिंसा सुवर्सवतस्सा, पारि सम सामति ।। संपचि वस्सेव नदा मनिता सा परिसा तरु मारमो म । अन्तरसमुहस्स बदा पहरोमा पप गोमो एटी मीसा ।। समिवलेसिमिताइपयुक्तत पाप्रापाविपि दिसा मरेत् सा इम्पतो रिसा प्रमागोम्पमावान वरायोप्रसिब पम्तम् । प्रमचयोग्य मापम्पपेपर्ष रिसा इस सपना, म मापव इति । मारेर मारतो ना साना द्रमा सा संपतल मागाव- .
१०. पं० २६] टिप्पणानि । - B - पात्यारेमिहाचम, उपम्क्षणत्वात् सववस्म पानुपयुक्तगमनागमनानि इतः । पानपि सत्तार पसौ सपम इम्विधानप्यामिम मम्तम्मावि म बाविनम्ती निपमा देसि त सियो सोरायोपनि १५] इति पचनात् । पराइ यस्मैव प्रापम्पपरोपणर्समाप्तिमपति तदा सा प्रपदो मारतोपि दिसा प्रविपतम्या। पापुनरम्पारमना पेतामगिमानेन मुरुपयुक्तगमना- अपरिविनाकारीवः । वम पाबमेन प्राणम्यपरोपमेन पर मोगा संबम्पो न भवति । वारिपापि ट्रम्पको मापयोऽपि परिसा न भवतीति माषा । देष मगरमणीतप्रपने पिंसान्निपपासलारो महा उपचपन्ते । अत्र पापमहे रिसापां पापियमापाययोगोपि मालव पमुक्ततपा मगरादिरसिक एवोक्तः । वदो यदुक्त भपवा परप्रनम्यापार मंदो हिंसा भवतीवि वामपनरहस्सानमिसवासूनकमिति ।" बार या ९९१-१९४४ । परराम 11-11८। चर्मपरीषा गा - पुस्पा - बाप्पर । ११-201॥ पर १४-१r- एचमिपात १.२.४,62011२. । पमपर र RSHY५। मरिमन्निनावे गोषमुक्त-५५, पारिमुष-१६ दिनपिरो मसम्म ६.४१४ साप .. २. पेषिपर्यावणार पर ९-१। पिबाम्बपप १-५५५ भबडाटा १०१समरामारत पाशिम शे से १५ मे १६-118 BE VOL50-धाममोजामः। ३०. ५० २१ 'गीवार्म- "गीपरयो नपणाए करबोगी कारणमि णिोसो। एगेसि गीयफ्नो मरचको मनपपाए ।" पार परेडयम या १५ "इय दोसा उ अगीय गीपम्मि उकासहीपारिम्मि । मीपत्पस्स गुमा पुण होति इमे यतकारिस्स ।। ९५० ॥ भायं कारणं गार्ड पर्व धर्च ससधि खपर्य समप सपरिमस फर्सद बिविध पियाणा ॥९५१ ।। संकादीपरिसरे सर सामेश्या वामियोपि। एमेष य गीपरपो भार्य दई समायय ॥ ९५२ ॥ मसिमर्षफिस्पाणिएम किंपिलसिपस्स तो पम्हा। पापणोपाये सामो पसंजमनायसे ॥ ९५३ ।। नाणातिगस्सास कारण निकारण तुम। बहिरण पिस विषय सजातपयसमागार ॥ ९५४ ॥ भापरियाई बर्ष वेर्सि पिय पुच होई चोम्म । गीय परिभामगा बाबरर्प इयरे पुण बबरपु ॥ ९५५ ।। पिश सारीरा सची भायपरगवा च तं न हावेति । वयपा बस विपरिरया बठमे पच्छा पममागी ।। ९५६ ॥ घर परतोगे य फर्स दामाहाराइ समेस्स । सिद्धी सग समन्वा फस तु परसोश्य एवं ॥ ९५७।
९८ . " बावचिन्हमारपस [१०.०२- सेपोज्यसोय करममिणं सागो उपाोय । च चि य भोगि चि य, इस करवेगी बियामाहि॥९५८ ॥ बोयम्भूतो सिचे पाले मारे पदं समापरम् । कपा सो अप्पो मोमीव या महावेतो ॥९५९ ॥ वापण कचा सस्था, न सेग कोषिवती कार्य किषि। कचा व सो कचा एवं घोगी नि नापमो ॥ ९६०॥ किमीपस्थो मिति पनि जाग य गाणे प । व रागोसे भपंतकापस्स पढपया ॥ ९६१ ॥ सर्म नेयं पठाधिपो बहा हा गीवो। विचमपिच मीस परिचपत पसासमतो ॥९६२ ॥ काम खस समम् नापेपत्रीयो इवाम्मी । पमचीद स तुझे केवानाम पयो मूर्ख ॥ ९६३ ॥" पर । ..पं० २. 'स्वरूपरिसा'--"वचामदपतमाऽपरपपोगात् प्रमापात्, सहप- वम प्राणम्पपरोपणवा, मनुषस्पतधपापकर्मचम्पानिवदुःखमपात्- हिंसा प्रतीयते । -वाद सूत्र-बब परमाणो प पापमपाई दिसा। ई पाप फम्म से हज पर्म " उपयसन्स ।। प्र.८ पं० १ 'सोयमिपो'- माय १११-११-२॥। पारणा पाम्पस बास्पा सक्तिरिति बरम्ति । बम्ले त मुक्तधरम्पारेन एपमामिषमा पार्य स्पतित पावापोषम मपतीति परस्ति । परेव पापमपामा मत्पर्यत एवम्बर -मिति कीहन्ति'-मा १४। "ये त्वमिरपति सोपमिपोरिष दरो पापार इति पत्परा समास समापा क 'मामवोपजीवियां मोरपीनाममिम पयमासह-लिनि।" मैं , ३.८.१ 'एवेन-पपसि म्पापम्वापसेम शीवमर्मावगादिपरामर्शात म्पापण्यायोगस्ववर्मापफिनकारिऔर ममुमिनियामते, पुमपश्यामपसरपर्मा- म्वराभिमप्रचारिका इति म्यापमाया यमापि परिसेपवारमीनपरामर्शत् मापक- वामपणापापभिमप्ररिम मनुमितिः प्रामाणि पपा पहिलावप्पियाम्मापण्या- पगादिना महानसीमेवरपशिगावकाठीनपरामर्मात् पावो महानसीयपरिमान् स्मेप माप यामरम्मानपीवत्वामिनकारिन भनुमिनिर्भपति एवं परमामसरामापि परामर्थात् मापसानपणापमानगिनारा अनुमिनिर्गमते पणा -पहिलापनि म्भापत्यवादिमा मानसीयरहो गपवमितियुनिसहरुत्पत् परामर्मात् परंपो मानसीर गदिमान इमेव पनुमिति पते । हवारष्ठिामिप्यावसानिरूपिणशमिरमानाममा वापिसोपहिला ०९. पं०१८] टिप्पणानि। प्रमाणिमविषयक एक शामपोषो जायते इति म्पायनया, पया -पटवावष्ठिमो परपरसपा इति शानबन्यपटलावधितोपस्सित्या बायमाने शाम्पमोरे घटस्वाब मित्रमेव विपयवा पवापि स्वपित् पापप्रविसंमाने पावितेतरस्बेन इत्समबोरारूपेगापि वा पागयोपविषमता पषा पटेन चम्मानय इत्यत्र बसानपने सचित्रपटकरणम्स पाभितमिति प्रतिसंपाने स्पिनवसन्नेितरत्वमेव पटम सापकोपविपपाता। समति, रहि समिानेवरपटकरण नखानयनमिति मामलोषात् । सं मा रिमात् सर्वा भूतानि इमत्र हिंसात्वसामाम्पापमोन पनिष्टसापनत्वपोप बनकापि निमिषाक्यात पानिपोमीय पशुमाठमेव इस्पारिविलेपहिंसाविपरप्रसापनत्व मोपकापवारसाहतात् पचापमादेवसिामान एष मनिष्ठसामनत्वविषयका मापयोपस- पपवे इति सापपादोस्सर्गविधिवास्पसले एफेनेष भामगोपेन कार्यसिरी म मौरसर्गिकाप, पारिश्मास्पबम्पानी विमिभानो बाममोपाना पल्समा समुरिति मीमांसभरिसेमवशाम पोषसियामुगामिनः । १०८ पं० २. 'पट्सानपतिक्त'- " पोरसपुम्मपरा छाणगया परोप्पर होति । रोप उ अणन्समागो पाममणिवाण सुर्व ॥ १४२॥ "पर परमात् भरणात् पासपूर्वपराः पद्नानपरिणाः परस्परं मबम्ति, हीनाभि स्पेनेवि गोपः । वसा दि-सफणमिणप्पपवितया प सकसपतुरंभपूर्वपरा, ततोऽम्यो दीवादीनवराति भागमे इत्वं प्रतिपारिवा-पपा-बदमागहीणे बा, मसनमागहीणे पा, संचममाहीमे पा, तिब्गुणहीमे पा, पसलेनगुपहीणे पा, नर्मगुप्पाहीणे गा'। परत सर्वसोवामिणप्यपस्वापरया सर्ववपम्पा तवोऽम्य स्तर पराविरप्पे । -चमतमागम्मदिए ना, असोजमागम्महिए पा, विममागम्महिए पा, संखेनगुपम्मदिप बा, ससेजगुमम्मदिप बा, ममत्गुणम्महिए वो । रे पता परसरं पद्मावपतिवाभार्दिकपूर्वविदा, तस्मात् भरपात बत् सूत्र पचपूर्वग्मन तत् मापनापानी भाषामामनन्तमाग पनि । परि पुनर्यापम्ता प्रतापनीया भाषावापता सरेधी सूत्रे मिरा मरेपुर, वा पोविना तुस्सवेष मात्, न पन्नानपविक्त्वमिति । मारा॥"- ये । ५०९ ५०३ 'साम्यसंसप्टापा - "शृणोति माध्यबाराभाषपुरस्सरं माणविपमेन मन सा संसम्म परिभिनस्पास्मा येन परिणामविशेपेण स परिमामविक्षेपः सुखम् ।। १०१. पं० ४ 'नन्दिास्पादों- १० १ ० ८ 'पूर्वगतमापायाम् - "इतिपूर्वगवगापासोपार्य:- mpी म १४१ १० १५० १८ 'पपाइमाई - सर्वसाक्षेपेमियोपापः सर्गस मति मानवे प्राप्त सति अपनारमार-मोतु पम्पमुई मुला इमाई । विमुठं मपति- 1 दपमा- .
- समनिनुभपरपस [१०९, पं०१९- मुक्त्वा पुचकमा मदिम्यवापरउम्मतविपर्या भगापयधिोपनारिमन झेपोपटम्पिम् , पना इम्मानरूपत्वात् । पब द्रम्मतम्पतिरेकम भयोऽपि पेलिपेपु बरणमा सम्पार्पपोमेघनात्मक सोऽप मुखम् म पोऽमरममा | नगे व मपरममा मवाति शिविरमा मबदिम सा वडामम् । मत्राह-ननु परिपेमियेनपर भमा एवम् पईि परमधारणमुच्म् -मोमियेग पम्पिरेप हुवमिति वरिपरते क्षेपेलिपोपम्मेरपि संप्रति दुबेन प्रविपमस्वात् । नेप रोपा, पता पेनिगाधरगमा स पते पा समापर्वाचनात्मका, समापर्यास्मेवनानुसारी बरणमा मोमियोपरमिस इति म कमिरोमा पो म स ५ ५। ०९.१९ 'यपरतामय पा'- "सो विमुयस्तराम गो सामोसं मां सेसा । पबा बासरपिय सा सम्वा न प्वचेवा ॥ १२६ ॥ सोसिपेमियाघरममः स एष मुवम् । पाकिमिलाद-या वापरायो धामा, मस: -मा संविखतिपयसम्मानुसारी समकारपोपा लिपि मरणमा, स एवम् , म तावानुसारी-पावारिषु परिस्फरपपरमममात्रमिमा । परि पुनरमर 'हामन सर्वसमापि इवेन डीकरणामधरैष मतिरम्मुपगम्प, वा सा पासपोपवाय मारणामा सिताम् मोक्ता, दवा सर्मापि म प्रबर्वेव, सपि महिलं नानुमरिमपी, नितु नमपराचात् भवप्रामात्रमेव मतिः स्माम लीलय, वेपामपरममारमसलाद । वाणानुसाबापरणमा , क्षेपं तु मविणायम् ॥ --होन में १०९ १० ११ 'नन् शेपेन्द्रि'-"अब प. पूर्वोपरनिरोपमुसपना- मा मुपमक्सरसामो न नाम सोमोरसारिरेष सुर्य । सोमोनादिरेवस्थामा संमबाट चि ॥ १५ ॥ मनु पणुकम्मापेन मियामरामोपि भवम्, परि, 'मोनियोपाम्पिरेप पम्' प्रति पारपारप उपवरसंगवम् , थेपेनिपापरणममापि हवला स्मादि-प में। प्र.१4 २४ 'मोवेन्द्रियोप-मिग्र से प ११॥ प १.० १५ 'प्पभुसपरेन' - प प romen १.१ १. विविधामा' - "सेनि बक्सरम पापमु लिपि पहप बहा-साम्पर समक्य परिष-00 पप - - - र १.०६ नानाशीd- हिच्य नागीिर्य नय नामीरियं न पानाम् । पारिप पर तेण बमोमगहाई ट" इत्यादि- घ १.० १५ 'वत्र म्पमनेन - माय 1 1५1 १०११ पै. २४ ] टिप्पणानि । १०१. पं० १६ मटकमवियोप-"एष पहाबीसइविहस्स बामिमिपोहि घनाबस्स बणुगगास परवण करिस्सामि परियोगविहवम महादिवेण ५ । से परिपोरगरिति । । परियोगविद्धतणं से गहानामर को पुरिसे पपि पुरिस मुच परि- पोदिय बमुगा प्रमुगति, वस्व चोपगे पनवग एक बयासी - एगसमयपरिक्ष पुमाग दमागपति दुसमयपविठ्ठा पुगण गहमागमति बार इससमयपलिहा पुग्गला । समयागमति सचिवसमयपछि पुमान गापमागपति मसंसिसमयपविठ्ठा पुम्गमा दाबमापति । एस पदव बोमग पम्मवय पर पयासीनो एगसमयपविटा पुमामा गहण- मायाम्ति मो समयपरिक्षा पुमाग गहमागाम्ति मापनो ससमयपविधा पुग्गण गह क्यागपति नो संविबसमयपविद्या पुमाग गहमागाति मसवित्रसमयपत्रिका पुमाम्म पवमागपति से परिमोगविश्वेम । सेत मगतिवर्ण १ । मस्टगरिविणं से। पाण्यामप का पुरिसे भमागसीसामो महगं गाय पस्मेगं गर्षिषु पक्लेषित्रा, से नछे, बन्ने वि परिसर्च से बिहे, एवं पक्खिप्पमाणस पक्सिममाणेसहोदी से पगर्मि मे १० यस्वर्ग राविधि, रोही से गगर्षिदू ने व मार्गसि ठाई सि, दोदी से पगर्षि ने पं में मग भरविधि, होही से पगर्षि मे पर्व महाग पाडेहि ति। एसमेव पश्चिममाणेरि पतेरि पुमारि गरे पक्षण परिम हो वा चिये, मो पेग गापा के वि एस सपा । पदो परिसइ, मो पापा ममुगे एस सराइ, वमो मवाय परिसर, दमो से पगप एसई, वमो प भारणं परिसइ, मो ग पाप संसिव मा कार्य मसवित्र पा से व मस्सगाविस्तष" । म १॥ विशेपा प १५ । १०१० ५० १६ 'वस्यामप्यास्सायो -दिपा या १ १०१. प० २. 'पर्यावग्रह-मशेण य १५१ । वर्षमामा ४ । ५०१० पं० २८ 'स पैमसामयिका'- प ५। १० ११ पं०३ मध्यगिरि- म ।। ५०२. 'एका पस्तुनि' - 'म्पमिपरमापमिति म्पमिचारिणी, माप एमपमवादिनी-पामाम्पमेवाशिम विशेपाः सन्ति, लिपेपमात्र पा समरिन सामा- म्पमित्यादिम, पता सा नपान्तरेमापधिप्पवे असमत्वात् , भवो म्पमिचारिणी, म पनि भारमी चम्पमिचारिणी । पापोनयवापार सावत्वेन परिगृप प्राचा पवित् सामाम्प इम्पाविषमाणमा सत्यम्, विशेपास पर्यापारमानमानसमा स्मादिप्रपा माम्ममिधारिमी" m * 1 । १.११ प. २५ वसापादि "पायसम्पपा मतियान" -वा " "पग्मविधान पर्मियोपार वत्स परोम प्रमाण मा साम्पते । मते-भपाय- साम्पवया मविधानम् पर्मिस्पेन पम्बलम् , पापो निमय निम्बरपी सम्पमिति- सोमनानि इम्पामि पम्पमामिनि, पापम साम्पामि र वेपो मारा सहपारम- पुनः तपा प्रत्याभूतवा मतिमा भर्मि । पर्व मपति- मरिणामस्म अपमानिमाम्म " १०२ मानविन्दुमपरपल [पू० ११ पं०१८- मध्ये पोऽपामा समविमान परोष प्रमाणमिति। मनोगेरनिमिवस्वान समति प्रामाण्यम् । स पापायः सम्पामुगवो परि म मबलि वन्मिप्यारऐरिष बासपनिमा पिता, वो पोापा सम्पामुपस प्रमाण मधिमेवाः पावर पसनसप्तक पीर्य भवति सासराम्यामा कम प्रमापवा मिनपपायांसमवे-साम्पत्या इलनेन पर्यव कम-सम्बग्योऽपाता इति। मपति पाऽसी सम्पग्रपामा | सपना एक- गोममा समय माति-पायट्रम्पलगोपः मधीपरमसप्तम पर गृहीता एपेन चपापाम्पसमेन, वमा रितीयेम भपायो पा ट्रम्प मोम इम्यम्, मा पाना सम्पम् । बा भीपासनसप्तकस भवति । पवेनेहयुक्त भवधि-सम्बगर्भनिना सीपापीपरर्शनसप्तकम पोऽभागो मतियान तत् परोध प्रमाणम् ।" पर ये 11191 पो । १० ११ पं० २८ 'सम्यक्त्वानुमवस्पेन'-"सासवोरविझेपा परप्टोपसम्मेह- म्मचमात्" ५। "वमिसेसिया मा पिप सम्मरिहिस्स सा माणा । मश्वमार्य मिष्ठरिहिस सुर्य पि एमेव ॥ सद-सदापिसेसपाजो मपोटजदिम्छिमोपसम्मायो । नामफलप्रमागायो मिन्सपिहिस्स मम्याण Rपा 111५३५ । १० ११ १.१९ संनयादीनामपि - "नाग पिप संसपाईया ॥ १४ ॥ भारम्पमिा 'समीनिवषयमाप मा, इतररमानम्' इसेम म्पबारिमा प्रमाणाममाप. मूवेबानामाने विचारपितपुपाभन्वे, किन्तु शापवे न किमपि यत् सम्पटिसपग्यि भारम्, इलेवासम्माप्रकमेव म्पासानुममिप्रेवम् । प्रस्तुपरिणाममात्र संबयातिप्पमि पिपने पति मपामा समर्सिपम्पिनो मानवानि।। पुनः पेसपारयो मानम् ।-माह- परपुस्स देसगमगचमाषयो परमपप्पमाम। फिर परदेसविण्यापोपयो, सुपसु त मोर्छ । ३१५ ।। पसमेगमाम संसपारया पठवे शानम् । मड देवोरसिनो मन्यमाना पर परि बस्नेरेसविमानदेवका संभवादावस्मो निशान पसेवामापार मपएकोसपादिलो परम्त इति परमामिाया। पापापा मार-गम् । पवाधिनावमेवाई- रबत्युमस्परपममपनयापंतसचिसंपर्म । मस्सेगरेसविण्ठेयधरिमो संसपाईया ॥१६॥ र बस्नुमो पटारेसम्ममत्व गमवनचल-मयपीपयुक्तलारपोऽकपा पमानावपापा बनम्ता मपम्ति । पठ-पर-कुम्म मारलु पनरूपा पोंगा अपनप पारेपमम्ता मपन्ति । बारिसमा परम्पापिलपा भयनन्दा गृपते । म पतु पर निरसनुपातिना सिनु परोयानम्वपर्मममममसुमोऽनन्ता एप मा। .
म १. १२.५० ८.] टिप्पणानि । सम्तीति पर्व मन्मामहे सम्मम्माकोसमादिमा संक्षयादयोऽपि मान्सेप सिरम देशातम् ।। मे संसयादिगम्मा पम्मा बत्युस्स ते वि पलाया । सदहिगमचओ से नाण पिय संसपाईया ॥ ३२१ ॥ सम्बनम्वपापं सर्वमपि वस्तु इति मपहिरातम् । वम प पटादिनस्सन पस्मिम् काठ । पामेर सहित् पटवापिपपार्य सम्पादष्ठिरपि गाति । अवोऽनन्वपर्यायमपि स्वेपी- बखपा गावखस्मापि कर्म मान मात्, अम्पयास्थितस्याम्पपापामार इत्यानमार- पडायमासयन्तो पद पि वमो पयोपपरसामो। तपियपमा पिप गिणा मापमो परई ॥ ३२२ ॥ पादुक्य मपति-भाष भागमप्रामाण्याम्मुपगमामिप्रापत: सम्पपिना पपास्मि - भनवपर्याय बस्तु सदेव गहीवमेवाले, जर प्रोगनाशात् एक पर्यापमामयति । मिप्यारपि पर्व भविप्पवीति चेत् न, इसार-- निमयनले निमो न बहार विदंति के वस्यं । मिच्छदिडी मा सम्म थिय तेसिमप्यार्ण ॥ ३२३ ॥ सपमा मापानमानमेव वेपाम्, नितु अपाप्माधिस्य विशित् शव दर्शपमार- कायर पमा विपनमो पेष मिष्टदिशीण । मिप्डामिणिदेसामो सम्बस्व पोम परपुटी ।। ३२४ ।। पर मापवरेपाऽपि तत् समर्मयमार- मामा बस्दिनामोपयोगओ तम्मपवर्ष हो। वा संसपाइमाणे नाणं नागोपयोगाभो।। ३२५ दिन 140 11. ५०११ ५०३३ 'नीलामी- पत्तापमानम् सम्बपर्सनम् । सवार । १० १२ पं० १ 'मस्तस्पा' - शिलामिलसापनाविष्रपमितिविमानता । घस्पाक्षेमस्पर्मनकावरमापासमालेमा गा...। १० १२ पं० • संमती महापाविना- "चरणकरमप्पहाणा ससमय-परसमपमुखापारा ! घरपकरणस्स सार पिपपमुईम यापति" ॥मति १० १२.५०. 'वदेश सलै- मते दमेव सरणीसंकमिणेरि पवेश्य । गोपमा पमेव सब मीसंग शिरि परे ॥"- मपटी पर पाबाचमा १५९ २० १२.५.८ 'मापतुप- "वत' सरिरमतं च पाटे मात्वा तपोधनम् । सामायिफमुमसा व संपादपीपरन् ।। . मृण - माननिम्नुपकापस [१० ११ १०१०- मया मा रुप्म मा तुप्पेत्सबमेन स मस्तिः । पोपपामास क्यापि विस्मृतिखस बापते ॥ सवो महाप्रयान संस्मस्प फिल फिजान । खासी पोपमामास तुष्टो माफ्लुपेत्यतम् ॥ ततसपोपगामित्वं मापतुपेत्समिरम्पपा । ल्याविनीतो महारमासा बासिया कीरनापरे।। एवं सामायिनपऽप्पनस्तो गुरुमश्रितः । मानकार्यमसौ खेमे कामता वसमियम् ।।" उपदेशपरीव ५। ५० १२ प. १० 'सतो प्रामत्व'-सम्म पप लबनसामग्री-साबम्पसम - समसामप्री-ससम्बाहावसानिमामिनिसामग्रम्पवमेभ्य इवि पावत् । वा अलैब सपामा पनिपातपा समनासामम्मेष तनिष्ठप्रामाण्वनिमाविम वि गुरमा । बोचर पर्विसविपरम्मोजिमममम सनिएप्रामाण्यविषयकसया सबम्पसारिपकसमसामग्री मनिष्ठमामाण्पनिमाविम इति मिना । पामलादीमियतया प्रसमासमोन ससम्ममावता- गिनानुमितिसाममी खनिम्मामावनिमाविका इति मानः।" पानि प्र । या। १० १२.६.१५ 'न्यायनयेपि-वापि ताति पत्रकारमान ताजिकि- मशन पा प्रामाण्य बियपारेर मिकम्पम्पमापत् अपवाद मावर गौरवात् । व सानप्रासाममीमासमेगा बाहि-निये समरस पर्ममकारकपण सावस भनुम्परसामेन अनुमिमा सप्रकाभेन पा गृपवे विपरनिरून पानम् बतो "मानवित्तियेपो विपया इसिम्पपसापे मासमाने धर्मपर्मिपत् वसिममपि विपपम्पब साबरूपप्रसासचे स्पस्वात् सम्पम्पिचापोररूपाच्या शायमाने सम्पम्पिनि सस- परिपपरार्मनिरूपणम् श्सनुम्यवसायत रणवस्वामित्रस्म पुरोगतिविपरतार । बमा पुगेबसिन रज प जानामि इति वापरासाद, मन रमतत्वेन पुरोगधिर- मिति।"-स्पति, १२ . २५ 'यस एपेई रममिति'-"पठेने रसवमिति पापात्म्पारोपमा पर्चनाय प्रामाण्यमपरे मुखबिशेप्मवा निमेषा, मुम्पनियता , प्रमरवानरथिन पिपता व भरणानरपिसम म सतो माणमिति -प्रवराव १० १५५ ३ 'प्रामाम्पमस्तु'- परतुवस्तु रिप्रिवासम्बन सूर्मपरपरि मारिवासमा प्रेम पारसमपि प्रामाण्यम्" पानि , म | पू. १२ प.. 'ममामा- समारत पसारमानस्थममायाम्प परयो मापसे वापसम्म प्रमानुद्धिसिवलेन बनुम्पबसाापिपपत्या-ती १.१५.८ 'वापि- 'ममेटोति परमपस्तुपा प्रमेसापरमामयम्पो पोम्पासापासव सर्पः । सतामगोपारपरि अनुम्पपसायसेवि-पारम् पाने पमा विपीमूनम्पसमापपिपासे तारमनपर मिसा मामवे क्षमा भमानुम्मा प्र.१६५० २६ ] टिप्मपानि । सावेशी प्रमविक्षेप्ये दबारीभूतपेशिम भासत इति स्पवेति भाषा । मात्रस्त प्रमेसेज गृपते । प्रमास्वप्रकारेण गृपये इत्यर्पः इसाः । सरसत् सामागुम्मनसायेन प्रमालासा- सवलात्-पापनि प्र माधुरी 1 ११। ०१३ प० २१ ज एग मामा-मना-दिपा पप २२० । ५. १५ पं० १० 'पट इस्पपायोचरमपि -विशेषा १०-१८० । मापा। मा ५ २०१५ ५० ९ 'अलोपाल-"मुमनामे दुति पनवे-या-मंगपविद्ध र मंगपादिर व ॥" स्थान सू ।। पवार्य । १० १६ ५० १० 'एकादीनि' -वस्वार्पसूत्रे हरस्य पाठा-"एकादीनि माम्मानि पुगपरेमिमा पातुर्मः।" पत्ता । “अपना-अमिंमिनीने मसापीनामेक मपति मिमिजीरे मषवा । कमिमित् वीमि मपन्ति । मिमित् चस्पारि भवन्ति । एतमानम मनिमानेन नियतः सामाषा वपूर्ण तात् । यस सुझान वम नियत मविधानम् । यस्म । मविमान वम अक्सान सा पा नदि पवार्य मा । 'एकादीनि माम्पाल' इत्माविसूत्रीया सार्वसिद्धिर्म माप्पमनुपापति, । पत्र मसिधवयोः । लियवसारचर्यमेव प्रतिपारितस्वात् कापि मविधानाम सतविक्षणोऽसमवात् । १० १६ प० ११ 'सम्यसंसपार्षमात्रग्राहिस्पेन' - "ममे ममसरासरबिसेसजो मा-सुपाई मिदन्ति । र्व मानाणमणक्खरमस्वरमिपरं च सुपनाय ।। १६२ ।। मधाचार्यों पूपणमार- मा मारणपसरषिय मपेज नेहादमी निरमिसप्पे । पाशुपरिसाइपजापविगो किर पु होजाति ॥ ११ ॥ परि मविरमरेप मात्-मपरामिडापनिवेष मपवाऽभ्युपगम्पवे, दर्द मिरमिन- प्रोऽप्रविमासमानामिमप मापारिक मलनि ईशारयो न प्रबरन् । पता लम् । स्पुमो-वर्मा मतावनमरखेम लावादिविकस्सामावात्- 'स्थाणुरण पुरुपो पा' स्मानि । पर्यायाया वस्तुपर्मापा लियको विवर्षोऽम्मपम्पतिरेपादिना परिच्छेयो न स्मात् । समादि परमपर धान मा वामपपर्यापाविषिरेका पवाऽनमहे, तथा बेराइमा, दमात् पेपपि नासो प्रामोति"-Aषा में । पृ०१५ १० १५ 'अर्पनरतीपन्पाय' - "न हानीमवरतीय सम्पम् पा बरयाकामयतेऽर्ष नेति।" पार मा । "न चामरतीयमुचितम् । मनपा पफो भागः पाकापापरो मा प्रसमाप परम्पवामिति । र सवा 11 विपचा!
मामविन्दुभारमम [१० १. 4.- १०१. . २ 'यापका-निसर्गः परिपामा समावा परोपदेश साम्बा दरम् पविगमा पमिगम नागमो निमिप ममपं शिक्षा उपदेश स्मनन्तरम् ।"- - पृ० १७ ५.५ गोवलीवईन्याय-"ठीपरस्म गोपिसेपस्सेजी पढीपर्पस मटिति गोपेन बोपमा बमा प्रयोगमाययोः सामान्परिसेपल्सयोसटिवि पोपमा बल प्रयोग- पास प्राधिक २५। १० १० १० . 'यये- वैयतिप्रसंगाम्पा न मस्सम्पषिर्क भुवम् । सर्वेम्पा कैवत चामुः तमामविवेकमन् ॥ १२ ॥ निवभात्रि १ १. पं० १२ 'लग मा सम्बस्'- "परमोहि असंसेवा गमिचा समा वसतिला । समयं मम सर्म सेचोवमियं बगणिनीया ॥ ४५ मात A " ५ १. पं. २ 'एवेनासझाव- "समागपिजीमा निरन्तरं बचिर्य मरिणाम । खिर्च सम्मदिसार्ग परमोही सिच निदिमाग मी-प। नयमिद मन्त्ररावा सर्पपमित्रीबाट प्रापोऽशिवस्पमितीपहासे प्रानन्वे, पहार मम्मनुनमा स्पसंमवात, सूक्ष्मामोत्तापरपर्चिना वष विवस्मन् वम समालो- नम्तीमा मपन्ति, पोलमुस्ता पोपमार्ग परिकल्प्यते-शेषोपरेसे एकत्रीमान - गाइनया सवयरपो पन इति प्रमर्म, स एष पनो पीप सावगाहनादिमिरिति दितीयम्, एक प्रवरोऽपि रिमेशरा, निरपि विमा, पापा: पद्मप्रकारा बनारेपा पुत्रमारपीक- या माणमाणत्वात्, पम्त प्रकारा सूचारेसः। सावगाहनासंभापिवसम्मानम्जीपा- पमेहमा परस्मिालिना सोम विस भरपर्यन्वेन भाम्पवे, साप प्राम्पमाला सम्मे पान् गोमात्रार विभागानोरे व्यामोति, पवारक्षेत्रमबस्तसमिति, सामने मानमुपपर्णते, एतापनि धेरे पति हम्म भवति ताई पायवि, पारवा वम विषवे बोरे रूपिप्पामामसमपात, रूपिम्मविषयमावविश, जसमपं विक्षेपो-बायपापि परिपूर्णमपि भो पाति तापविर स्फबानेर पापति परा पुनरमेरे प्रसरमपविरपिरोहति वा पना पमामिहरिमासावयति उमा वा होरे पुस्मात् एस्मवयम् सापार परपति, पापन्ने परमाणुपपि परमापपिजिवम निपमाइम्समतमात्रेण गोषणामी- -माठिाति-" बा 11. पं० २३ बहतो'-"मम्पयन प्रोपगाया सोपयोगेटि मामावा।' ५ १८ ५.५ पासमप्पर्यम्' - N 4 १८ पं० ११] टिप्पमानि । "ममपझपनार्ण पुण बममणपरिचिन्हिपत्यपापरणं । माणसखिचनिपद गुमपाइपं परिचायो। बाप ROMI "मनन्दमागे मनापर्यायस ॥" तत्व १५। "पानि मीगि म्यामि भवभिमानी मानीवे ततोऽनन्तमागे मनापयामस निबम्पो पति । पपविधानविपयस मनम्तमाग मनापर्यायशानी सानीते रूपिम्पामि मनोरहम । धारणवानि च मानुपक्षेत्रपोपमानि विश्वराल पेति।" पापा भा १९९। पाये सर्वार्थसिमाविगवासापि दिगम्बरपरम्परा माम्पमुस्पैन । २०१८ पं० १ 'वाणा पो- "दप्यममोपलाए वाणइ पासह य तम्गएर्णते । वेपारमासिए उण बापा ममयुमा ।" विशेपा गा १४। "ममिवत्व पुम पलक्समो न ऐक्ला, मेप मप्पोदमान मुख्यमुच पा, सो प भयो र मणुमापभो पेसा मो पासमिमा मनिया ।" it R Y , RAI २०१८ ५० १० 'मानसमय- "सो य किर अधातुईसप्पेण पासा महा भुपमामी । शुक्ष मुए परोसे परस्ते न उ मणोनाणे ।। ८१५ ॥ परम पावाविमर्म विम्यतः सामादेष मनापायवामी मनोइम्यामि पापजानाति शान्येवर मानसेनापमुनेन विकासपति, पता वरपेक्षया पावतीपुच्यते । पर मित् प्रेरक प्राइ- 'मविपुते परोसम्' इति वचनात् परोमाविषम पानम् , कपमुसनमपि मचिमेदवार परोमाविषयमेव दत्तो युक्त मुखभावविषयमूते मेस्वर्गारिक पमेऽपरेमा, सापि वामननपेन समानविपयस्यात् । * पुन लाई न युक्तम्, FAT-भाभिमनापर्यापबामि प्रस्मयम्' इति पत्रमा पुनः ममक्षा- विषयं मनापयशान पहा परेशाविषयमापनाम कयं पत्र प्रतिरमुपगम्पते, मिमविपपत्वात् । अत्र सूरिया- या शुबर परोक्से पचासे न विसेसमो पर। नावंद पनपख न वंसर्ग सस्स को दोसो ।। ८१६ ।। पनि परोपेऽऽअमल मतिरम्पुपगम्पवे पर प्रमझे अपराममेपमहीमा विक्षेपेभ समानुपाता, Agमस्मोपरम्पपटाविवरिति । म तिमभिमानिनाम मुरपारनाम्या परोहमयं पश्यतः प्रमशालिवाया फोऽपि विरोपा समापपये, परिपि। रेषा मे । म प १९। 1.१८६० ११ जे- 'तत्व पममो मार्ग मर्मवे अपक्षपपसिप खरे बामह पास" मी म् १ २०१८ पं. ११ एकरूपेऽपि ~ "वना पार-पूर्षिहत्-मापा छरमत्यरस पाविमोबसममेल पितिशोपमोगर्समो मप गा परमेष नमाविस 1 - सानपिम्नुभयरपस [१० १९.५० प्पमोगो बमो बिसेससाममरमु बनुमा पामइ पासइचि भमिर्म न सोपी- - १० १९ पं. २ 'सर्वषिपयर -भाषA निमेश प ८५-८१/un-1 १० १९ प०५ 'प्रतीस्पसमस्पाद'--" मा प्रतीससमुत्तारो माम । परिस 'मविपामसपा संस्मया, संस्कारमसमें विज्ञानम्, विधानस मामरूपम्, मामरूपता परापवनम्, पापवनम्सया स्पर्धा, स्पसंपलपा मामा, नाम्समा इप्ना, समानता मुपापानम्, पापानमत्सयो मबा, मवानमा पातित, मातिमत्वमा बरामरपसाएपरिष दुम्सौमनसारया ।वनिपा करमा-पतेपामेन पणा पात्म्पम् वेबसा पिगमा निलसमा टमसमा मापसेमा मुबसेमा बारमसमा सवसेना पीवसेना पम्पमा मनुग "संवा मामपसमा भायरममकारसमा एपमाविविनिममशान मिगमुच्यते बलिया । एपस विद्याप समो लिपपेषु यगोपमोशा प्रबचम्ते, वा से रागोपमोश विषये नमी परिणा- प्रमया संताप इत्युच्यन्ते । पस्तुप्रतिषिमाप्तिनिशानम्, पस्वारि महामूवामि र पा मानि रूपम् पेकमरूपम्, विमानसेवासत्तारोऽपिणा स्पा पाम, नामरूपम् । नामह- पसमिनिवानि इनिपानि पहायतमम् । अयाो पापो समिपावः सप्तः । स्पोनुमयो "मेरमा । परनामासान एप्पा । मापुस्तमुपासारम् । पापानतिजा पुनर्मगमन कर्म मषः । भरतका सम्पप्रादुमांगो पातितापासमिनिचाना सन्माना परिपाले बरा। सम्पविनायो मरणमिति ।" पिन 41 मिझ । २९१ मप ५४। पथात बमिषश्रेष-१४। । १९ ५.५ 'प्रमाणेच ब-परिरमवीतानामवप्रत्युत्पामसेसमुबा- वीमिपानमसं बडिवि सर्वशीयम्, एतरि वर्षमान पत्र निरतिशय स पर्यशापति प्रशामिः सर्मनीबसा साविसवस्थात् परिमापरिति, पत्र भयप्राप्तिमानमा स सासर पुरविपइदि" पोपणाप ११५१ ज ११५। लता पंप । प.१९, २. 'भावमापना' - "मनाबारपान मापनाम्पाससम्मम् । मपति पापा ममें कान्तारासि कामिनाम् ।। ममोल सविपरम् म तमापा पमिति बम्पासपणापातीनिषेपमर्षेषु परिलमा प्रतिमासा प्रादुर्मपम्तो पश्यन्वे" साता पम्प प्रमान १ मा . ५ का 1-तिनि । १० ११५ २० 'सामर्मयोम- "धासेदर्षितोपापनाविकान्तमोधरा। समसमरिशेपेच सामप्याम्मोध्यापमा योपनि ५। 1 १९. पं. १ 'प्राविमनाम- पाप्रापविधावपापपीमामतीवाचाव- मामेभपीलिप मौलिए मनोपनिनेपानुपतिवरे पास्ममयो संगोगार् धर्म- विशेषाव वत् प्राधिर्म पनाविवेपन गालमसले पामिमापयते । वह हमपरेच खर-२६ । २०२२ पं० १४] टिप्पणानि । सम्म पापिष पौरिकामा यपा कम्पका प्रवीति यो में माता बागम्वेति खप मे कमरठीवि " प्रवच । १५.1 ग्रेपर पापम• प्रपाल ! वोच्यते-नेत न पा न मानाम्वरमिति, रात्रिमिपाऽरुणोदयात् । पसमोरयो दि न रात्रिदिवातिरको, म प सपोरेकोपि बक्तु पार्यते । पप प्राविममप्येवत् न सारिक न प योरेकमपि पई सक्यते ।" योमरि म १० ११. १० १३ 'नन्वे मारना' - 'समसि' इमाविमहापास्याम्ये अपक्षाने पपरोम सापयितकामेन श्रीमता मधुसूदनेन सधयमेराम्तम्पमतिका पूर्वपमरूपता पर्चा सविस्तरमारबिधा सैव प्रबकारेण प्रस्तुतकेषज्ञानवर्षायां पूर्णपक्षरूपेण अक्षरशः पिवारिता-tar -11 ०२० ५.११ मम्पसमान मान-योगिमानस मापमामयम्प पीर्चिना त्रिवम्, परेर प शान्तिरमितेम तससमहे सहासमाभानपुरस्सरे प्रपा समर्षितम् । परेप कमस्या स पापः समिध्य प्रदसिंता । सम्मतिटीला ममपरेवेन सर्वोपि पूर्वोचरपमा अभ्युपगमपान गृहीतः पर्यवसाने र नसरण्यैष पम्पम्म योगि- सम पूर्णत्व म्पवस्यापितम् । वयाहि - ध्यावनिम्म् । सनदा १ ११-१२३NE 1-1 सम्मति में । १०२० प० २० 'मनो यदसापारणमिति' - "वदेन प्रमाणावर पत् मसाधारण सामरि समासाप ममो दिगोचरा प्रमा बनयति पपेमिपाधि, संतपस्यमौ न प्रमे अनि म निझा प्रमाणावरत्वम् ।" पनि पण्प पू । १०२० पं० २५ 'मम्पुपगमवादेन' -"अपरीशिवाम्युपगमाचविशेपपपपणम म्युपगमसिमाम्ता म्याग १ २०२० ० २९ 'योगमप' -भास्मनि भारमममसो। संयोगविपाचारमप्रत्य सम् ।" "योगमपर्मानुभहा पास्ममनसो समिक बिशेपा । 1.111 १०२१ ६० • विलम्' -विशा प १० २१ ६.१८ रागापावरणापाय-ममा ५. न . . १० २१ पं० २५ 'पाईसस्थास्तु'- भाग 1-1५-१९९१ | २. २२ ६.३ म्या-त्तर भ १४.९५ । १० २२.५.४ एतेन कोपपप - an 41 की म . । १० १२ पं. १. 'एपिम्यम्मभूपस्से मापा १.९ मम् ॥ २० २१ ५०१५ नरारम्पादि'- "धन्यवासासनापानादीयते मारसामना । लिपिमास्तीति पाम्पासान् मापि पपारमाहीपते ॥३३॥ पदा न उम्पते मारो यो नामीवि प्रश्नप्पने। पदा निरायपोमार कर्ष तिष्ठन्मते पुरा ॥२४॥ १ । मानमिदुमकरस [५०२२ ६.२१- पदा न मानो नामाको मतेः सविणवे पुरः । सदान्पगत्पमायेन निरासम्मा प्रसाम्पति ॥ ३५ ॥ सोपाइविषमापतिपयो हि शून्पता । वी सपनवानमो न भावयति वंकलम् ॥ ५५ ॥ याहाखबनने वस्तु वासस्तम्मात्यबायताम् । स्न्पता दाखमनी स्वामि नापते मपम् ॥ ५६ ॥ पतसतो वास्तु मयं पपई नाम किंचन । वामेव न पियां कम मविप्यति ॥५७ ॥ यथैव कवठीसम्मो न कपिदाग कर। ववाहमप्पसतो मृम्पमापो विचारत ॥५॥ पदि सत्वो न विपेव फसोपरि रुपेति पेत् । कार्पिमम्युपतेन यो मोईन प्ररूसित १७५॥ काय कस न पेन सक्य सत्पीहा तू मोहतः। दुरसम्पुपातमा तु पार्यमोहो न पार्यते ॥ ७ ॥ दुसरेरावार भास्ममोहात् तु पर्पते । ततोऽपि न निर्ल्सयेत् परं नराम्पमावना ॥७८ ॥ योभित्र सा परि । पूनमम बाप प्रवक्त्तर 10-1बी म1-14 प. २२ प २१ ननु यम-काम ३१-५१ । गत 1 mi-मम 114 १-२५ मार 1111101मणापत्र । • २२ ० २८ 'हिपाविप' - प्रमाण पृ. २५ ० १ 'सन्मानापेमया' - कवस्वादिम्पमसात सन्तानस्पषिधया । पनारोपितवेय नाङ्ग सा उपसस्सिवे ॥५०॥ मानसानां गुमाना पिचसन्ततिरामया । साऽऽमारपोगतो पचाम पचिम बहते ॥२१२३ || unt १. २. ५०१ अपाहिएपपेशीर -- पचयः पनाम्पा किरा- लिया"-जोमा १५. हेपतु मानपप्रपत्रीमणा हिसार मसाविविषया गुणापिपरविरोपिम्पोऽशिया, विपापविता गप्पनि शिफ्रेिप्पशिश मन्ति, बाहिरष्ठिरेपु हिश इति । सामातीमा संस्मरा घिमिरेष नियन्ते संस्मरेम य इत्येवं परिसस्पर सम्मनिझमावत, बोमन विचमवसिवामिछार भारमपम मतिश्ते प्राय या पपाधीला-बोपण १५॥ . 4 - - H ॥ २१ ०] टिममानि । १० २३ पं० ९ 'शक्तिविशेपेण- "यपाभयविनाशेपि शत्पनाशोऽम्पपेयवे ॥ १९५ ॥ पगिकत्व प हीयेत न पारम्मोऽन्यमा मवेत् ।" औक माम । १० २५ १० ११ कार्यकारणमात्र:- मारे पूषसाश्या मिमवापास्ति वासना ॥ १८६ ।। नन्दस्खनुरूप तु क्षणिकस्से पियां तन । पूर्वमानं तनुस्पर्म कार्य नारमते कमित् ॥ १८७ ॥ न विनष्ट न सास्ति निप्पमस क्षण सितिः। वेनोत्पनविनष्टस्यामारस्पारम्मषणोऽपि हि ॥ १८८ ॥ निरन्धयविशिष्टत्वादानुरूप्प जता पुन । न सदीयोऽस्ति कमिव धर्म उत्तरसदिपु ॥ १८९ ॥ निरन्वपविनाशिन्या कार्य कर्म अमाद । विना कारणस्पेष्टः फारिम्मम नान्पया ॥ १९३ ॥ तर झाननाशेन विना सबवासना । पेन समाम्प एताम्पा सर्वाकार यस्थितम् ।। १९४ ॥ मानमेकसणेने विनार्य गन्तुमर्हति । मान । र पnिe- 1-0s 2. २५ पं० १३ 'बापवासकमाषा- "वणिकपु प पिचेषु रिमाशे च निरन्पसे ।। १८१॥ पासवासकयोमेमसाहित्याम पासना । पूर्पक्षणरनुस्पमो पासवे नोचर क्षणः ॥ १८२ ॥ उचरेण विनएस्वाम प पूर्वस बासना । साहिस्पेपि तपोप सम्म पोसीस्मासना ॥ १३ ॥ पणिकन्यादयसापि म्यापारो न परस्परम् । पिनत्यय कर्ष पस्तु पासवेन नश्यमा ॥ १८ ॥ मासिवा हिवासन्ते मारामाभैरवस्सिरीः । यापितो हिपूर्णस्माझिपते नोचरो पदि ।। १८५ ।। पूर्पवासना तप न सादेवाऽविपत । बाम स्यारम 11: ५० २५ प २० 'सतापाम् पाय पणे १५-१५ । । २५६ २१ 'एसन असणा-या प्रति १० १५ पापत् प्रथकारण, गावमवनियचाय पानी का बर्म वनमणन राम्वरसविता पर बाद इस्पेन ग्रही- (। १० २४ पं० १ 'अन्यपासिरसेन' - "यत् अप प्रति भरपल पूविषा मेन रूपेण गपठे पकार्य प्रति अपमन्यबासिनम् -सपा पर प्रति पणालमिति"- M४०१५ भ मानपिम्बुमरपस [५० २५ ६.५- १० २४ पं० ५. 'मीमांसकम- "न च स्पूसरस्मस्पे छप्पे प्रदाचिनी । पुदितीव्रतमन्दरपे मासात्पसमात्सना ।। २१९ ।। सा प पदी मरने महातेजाममभिवे । भन्दप्रचशिते मन्दा पटादावपि सर्वदा ।। २२०॥ एवं वीर्षादयः स धनिभर्मा इवि सितम् ।" समरि । पौनापा 21011101 "म्पमिचारिमापि निगेन साप्परति पसे अनुमिविप्रमारर्सनात् । पतिपरमवी- सरविक्षिणेस मियामूरपि निर्षिमुमिर्मी ममा झाप्पममितिः किपर इति * मीमांसकरम्मुपगमात् गम्बमागभावाबपिठो पटे पास्सिाम्पास्माविमवापि पपिपीसोन भवाविष्णमानुमितिदर्सनात् प्रतिबिम्पेन च बिम्बानुमितिर्समात्' बीच । १६५। १. २४ ५.११ संमतिाची-1 me I । प. २१ ५.३१ पतेन-विमुलाचार्य-मधुसूपनसरलतीमरतिमिपिवाया- मानस परिधानायकत्वामिन्माना: मम्मपरेप निरसममितः प्रारम्पम् । "पए म्यायमुमायामाराम्मपादरपपारित संसारमूगकारणभूताऽविधा पपयेर वनापि मा सम्पेग बहर बामणः । बोका प्रपञ्चस परमार्पसत्तामोहा, रितीपा मनियासमवस्तुपसका, तृतीपस्नपरोपप्रतिमासमिपमा भरपरका । पावसमत्वा प्पासापन समचोवसमलकसानो निपठे । मनिवासमर्थप्रपझोपाराममागाभरा वस्वसाधारकारेप विनीपते परोपप्रतिमासयोग्मापोमासमनात मायासेमो धीमुक्त - स्वामिता समाम्पसार्या विरोदिवा बम्पदा रेघमासनगामासदेतबावने प्रारण कर्मयोपमोगावसाने उनिपते- " बिल ३५ "तुष्अनिर्वचनीया प वास्तगी पेस्पसौ त्रिपा। मेया मापा त्रिमिपि भावयाँक्विाटकिर॥१३०॥" पार पत्र १५ ।कार मोरका ४. २५ प० । 'तसामिप्पाना'-"धरै प्रधानमरणापर र पपरमानानवे देष एका । मामिम्मामा पोगाचवमापार भूपयाम्ने विधमामानिचित ।" पेन्य 8 'तम परमरमनोऽसिम्पानात् योजनाबीमामा परमारमसेपोममात् पत्तमापार मा प्रमामि इति मूगम वसहान्ने प्रारम्मम्माम् मा सरमामनिप्पपिा बता पमिन् स्परमसामोरोगपो विधमापानिधि मुपासमोएल्मकापमपमहपमापा- मिति" '-मारमानारोगा। १०२५.०२. 'रिमार्टि- "भमानोपरि विमरेसम्पमीपरा बामप्रति विमानम्र पीप इति पापमानानुपरिर्व एसौवम्पमीपरा मानोपडि पीर इति का पुरो राम्नसियाम्ना परजीवारामा ममेव हरिपारमाधमते जमिन महे १.३० ५० १५ ] निप्पणानि । बीप एक स्पानमसात् जगदुपापान निमित्ताराप मर्व प्रातीविकम् । परमेशराब पीर मेरश्यन्ति । एकमेव सकसितगुरुक्षामापुपरहिवमवणमननारिदात्यात् बाल्म सायपरे सति मोमः । शुकादीना मोसमषण नवापः। महापास्ये 7 साल बनम्तममारिबर् ममानामुपमिततम्पस्म सक्षपयोपस्थापकम् इस्मापवास्तरमेवा जय मूएपीया"-शानिनु १९ । मौत । ५५ विदाम्पस प ५-१५। १० २५ २० १४ "पि सप्रफारम्' - सिमकारम्' इमारम्प 'मनुबनाई।' पति पावत् पाठः प्रणये न मनसोः । मप्रवनम्र कि निप्मकारमानम स्मारम्म भवाननिति' इति यावत् पाठः 'म-प्रमोरेप म ''प्रवो । वापि परवा मोरपि समुचितल माति इति द्वयोरपि प्राण स्वम् । पौर्वापरमपि मनमो. पर समुचित भाति पपा मम्मामिरुपन्यतम्- वेदान्त । सि । . बौलानि । १० २८ ६०३ 'फसम्पाप्यस्वमे-पसा-सम्पाप्पत्तमिति-फई पति प्रतिविम्बितविधामासा ताप्पत्वमेव अस प्रमगारममो निराहा खोप सरपरूप लानिधि मारः ॥ ९० ॥रामीमात्मनि वो मम दर्शयति मावि प्रत्यगणोरे सस ममानेन भापवताचम्म भमानस्य निबचपे भास्पजम्मया मां प्रणामीसेवमा। भरला धीहत्या म्याप्तिरपेस्पते ॥ ९२ ॥" पापी यमायेव । २५९। १. २८ पं० १० 'पियरस'--- "प्रामम त्रेम म्पाप्तौ व्याप्नुवस्स भगव विवरण प्रस्तासियास्मम्याप्तौ नामनोपि विभरमसात् म बेगावोपम टला मापसाह-विपतिति । पमा मम्ममोपचो वियता पूर्णता वियता सर्पगतलसरूपानुरो- पारेष व क्रियावस्थात् क्या भियां पचीनां वरमापा र गारमना म्माप्तिः पद्रवत्रियां । दिना पूर्णचिरत्रहताशारेर भयो पुछा वेदान्तपेपम टस्सपा इत्पर्यः ।" - अचम् ।। ५० २८ पं. १२ 'पटाखादि - मामा-"मास्ममो रिकापरवे पुरक्षाविम्याप्ती इसारेरपि रिमा विकारं माणतरविसमाचारमगर्न मान् पोयत्वाविशेषात् मम्पपा मात्मनोऽपि विमणारेर सुरक्षारम्पारेरकूटस्यता इति पत्याइ-पदेखि । पुरेगार मानम् न न खारसिदिबोप्पगोषमयोरपि परिस्मिस्वात् पौरेस साभास : उपिविकिपात्यात पुण् पुराण विपयापारस्पमिसः रा । २०३० ५० १५ एजीपमुक्ति-"प्रपा पीर पका, ज्वाषनुपरोक्त पसारमपिता पिराठा-एको जीपा, म कमेव शरीर मनीषम् । भम्पानि पतराणी, निमनि । तामास्सिर्व सर्व भगत्, वम स्मासनापारवि सो म्यबहारा । मुस्तम्पबमापि भासि, पीपम्पैकत्वात् । मुफ्सारिमपि लाम.. पान्तरणमारिमिक इस्तितम् । नत्र प समाविवरणसमपमहान . पमिपारपम्पम्' इति । मम्ये स्वभिमानीरवारे मनःप्रसयमसममाना! भिपिक : भेनिसा' 'गोगात्पम्' इत्मातिसूत्रावाधिक घर पर जगत। मध्य म पोषः । तमा , ११४ मानविपकरणस [३० १२ १.१- ममतेन प्रयोजनामान पर छीमर प्रगता परिमादि प्रतिपादयनिर्विरो र मम्पमामा हिरण्यपर्म एमपमतिविम्यो मुस्यो पीपः। मम्मे । पतिपिम्पमूगामित्रपटलिसिवममुप्मदेशफ्टिामासासाः पीनाभासा संसारारिमाम इति सरिशेपामेश्वरीक्जीवपारमाविन्ते । भपरे हिरण्यगर्मम प्रतिकसं मेरेन म हिरण्यगर्मल मुम्ब पीपत्तमिलन नियामक दावीवि मम्पमाना एफ एष बीवोऽपिपेण सर्व मीरमपिविति । म पेष मरीयवकपमेर मरमेरेऽपि परस्परसुवापनुसम्पानमसः । मम्मान्वरीपमुसापनु सम्पानारर्समेम सौरभेस बदमनुसम्माममपोजकत्वहप्तः । पोगिनस्तु प्रपम्पूसखापमुसम्पान बहिवार्थप्रापपयोगप्रमावनिषन्धनमिति न • वाराहरपमिति भविक्षेपानेसरीरकजीपमा रोषयन्ते ।" निसन्तमा १९५-१५01 तानि RIसन्तपिन २०५५ पं० १ 'सम्पस स्वपरोष'-"यपपि मिप्पासपो बन्यो जानवाला, पपापि पम्पलापरोपस्वात् न परोसस्पेम बापागानेन स पाम्पते, जारामपयेष सर्पप्रवीवो वर्तमानापा 'पार्य सो रहरेपा' इमातोपरेममनिवपऐमसर्पविपरीतवाममारेन " मानिसचिवमनात् । बातोपदेसम्म तु भपनिाचिकृत बस्तुगापास्म्यापरोपनिमिचाधि नेन । वपाहि-रनुसर्पपनममात् पणा पुरो 'नार्य सर्पो रमुरेषा' स्मातोपरेशेम वापावात्म्परसमे प्रापत्तन प्रमण पा भवानिवर्तते । म सप पर प्रलमशान अनपवीति पर गुस्तम् वम भनिमियत्वात् । पानसामप्रीप्पिनिमाम्येन पपरोपसाप मामि । न नासानमिदिवसकर्मानुशनपरिवरूपारम भवणमनननिरिम्पासननिमुखीय पापविण्यस्म पुष्पम पाम्पमेषापरोपशान बनपति, नियमतिबन्ने पत्तरेऽपि पुणे पानसाममीविपापामिमिपारीमा सविपरलियमाविनमारसेनेन वरगोगात् ।" भीमान पू० ५. ३२ ५.१८ 'एक्प समस्त्वमसि - ४ । पथरी . १० ५२२ 'दमिदानी निरूप्यते' -अस्मिन् विपमे सम्मनिटीकागत दिख [१०५९.टि.] टिप्पर्ण प्राम्पम् ।- ५. २५ 'नन्दिापी-चन सिखसेमाचादियो 'ममी' सुबवे निमिसार-'युगपत् एमिमा 'रेरी मामबार म तपाणलो पानाति पति व नियमात् नियमेन' - मT B। 'सम्मतिगापा - एका गावा मम्वभरोऽमयोपातिमनुपमेष मारमो मायावषानिति तुपमा निशामुमिरमयरेसीमा इचिईसम्मा। १८ किपिजिनमानुपामिना - "मपि पिम पमधी-पमरमाईमु बार निको समर्प । अंगापा न वि पासर मारयणप्पमाईणि ।। ३११२॥
०३. पं०११] टिप्पणालि। -- तु ममत्या मगमत्याम् प्रशापनायां व सूट मणिवमेव उमेर पया मिना केनछी परमापुरखममारीनि मस्तूमि में समय मामाचि परिमम् समये चानाति 'न विपासावसिं' यस्मिन् समये नैप पश्यति किन्तु जन्ममिम् समये नानाति सम्पमिस्तु परपति । इयमत्र भावना-ए मगरमी वापरतापमानवम अप्ठमोदेमके स्मेबोकम् । तपा-उम्मस्मे ण भने ! मधुस्से परमाणुपोमा जाणइ न पासा खादो न वापर न पासा । गोयमा,' प्रत्येगार बाणा म पासा, मयेगइए न वागरम पासा पर्ष बाग बसंनित्रपरसिप की (ए एपलो मिरविनयो गृपते पत्र मुशानी एवमानेन परमाणु मानावि म पश्मति हुने पर्सनामावात् भपरस्त म बानाति न पश्यति) एवं मोतिर वि । परमोदिप पं भठे ! मसे परमामुपोमास व समयं गामा त समय पासा, व समय पासा व समय पाणा ! को इसो समझे। से केण?ण मते । एष पुल। गोपमा' सागारे से मानं मवा मणागारे- पे दसम मका, ठेगम एवं उप प्रमादि । एवं प्रज्ञापनोजमपि पम्यम् । तदेव सिखाते इटामरैऍगपदुपयोगे लिपित्रेऽपि निमिति सर्वांनमूठ वरमिमानमुरमग्य मोपयोगो मेष्यते इति । ॥ ३११२ ॥" मिशेषा से । १० ३५ ५० ५ 'सुपसौ-"मय मानमात्रे वरमनासपोगरम परि कारणलं तदा पसनमानुपाविमममम लाचप्रत्यभं स्मात् विपयस्वासपोगम तरमनासंबोगम अस्वान् परस्सरप्रविबम्पारेकमपि वा न मानिर्वि" - मुसालभ ५॥ ५०३५ ५० २५ 'असतो णरिप'- "मसमो नत्यि निसेो संबोगमपरिसेहो सिई। संभोगाइयटक पि सिदमयंवरे नियय । तिमेच पा १५। १० ३६ प० २ 'स्वमायोतुफ-विम्यानरसेनविपये सत्यपि परापरणहये न पुगपत्तदुपयोगसम्ममा, तपाजीवसामाम्पात्" - 1 दिन मा । "पयोपशमापिटेपेपि मत्यादीनामिन जीवसामाम्पादेव देवमानावरणपर्सना परपमयेपि सतत वयोरमाधुर्मावाविरोधात्" - मी म . १ • ३६ ५० ५ 'प्रपगेवापरण' -रोग पा ३५ian 0 1 १०३६ पं० २७ 'सापपर्पपसिते. "समपमवाई सताई तपोममोवओगोपि । सापपपपसिवस्वार परमारपर्यन्ते मदिनागिनी सावस्थिते देखानासने तेन वमाद् इगपडुपयोग इप्यते भस्मामिा | CR पर पोपनमार सादस्पिन र सोपयोगेनापि सरा भवितव्यमेर, भरपपा उपसकसमपरेन बोपतमावरणानुपपत्तेः । सहोपयोग र पो पुगपदुपयोगः सिर एपेखि परस्माभिमाया"-Rषा मे या ०३. पं० ११ 'नररिपोपपारमप्प- "अमभूनम्पहारो प्याररुपपारत' । परपरिणतिसपमन्यो मदो नामः ॥४॥ .
सामपितुपकरण [१०३. पं०१४- बसम्पपहारा सप्प पा पराम्पम्प परिपत्मा मिमिया । पर्मात् उम्पायर्मा- पमदिरूपवारवा पधरणात् परपरिणपिसेपनम्मा-परस पस्तुना परिणति। परिणमन वम मेगा संसर्गचेन बन्या परपरिपतिसेपमापोऽसयूवम्पबहारा पम्पते । स नबपा मा मनरो मरति । माहि-इम्मे इम्पोपचारा, गुणे गुणोपचारा २, पर्याये पर्यापोपचारा ३, इम्मे गुपोपचारा, इम्मे पर्शगोपचारा ५, गुणे इम्मोपचारा, गुणे पायो- पाये अम्मोपचारा ८, पोंने गुणोपचारा। द्रप्पे दम्योपपारो हि पचा पुरसमीषयोः । गुपे गुणोपचारप भावद्रम्पारम्पसेश्पयोः ॥ ५॥ भीनिमसागमे प्रनम्वीपोरैम-पीना पाहपः पुणत्मका । बा पोषोऽपि "म्यम्, पारगेऽपि द्रम्मम् । उपचारेप पीपा प्राणमय पासपमपहारेण मन्यते । म परमार्षदा। एमे एपोपचारो पचा - माणसाइम्पमेश्मयोहपभारः । मानपाल भास्मनोऽस्पी पा, वम विपत् मनीगतिकवनं बटते पनि पुनमम्मगुममोपचारोऽधि । पाप किस पर्यायोपपारप पवा भवेत् । सकन्या यबास्मद्रम्पस गाविसखा समे ॥६॥ पर्यापे पोपम पमा-बास्मद्रम्पपर्यापम गबवानिमुनाः पर्यापत्तमा पापरात्म इम्मम समामगावीपाम्पपोयाचे पाप्मन् । पास्मपाममोपरि पापा पसोपवरणात् रूम्या परिश्चन्वे वापत् । द्रमे गुणोपधारय गौरोप्रमिति द्रम्पके। पर्यायसोपचारम पाईपीति निर्णया ॥७॥ 'मां गौरहिषया बामिति मात्माम्मम् का गौरव प्रामवासो गुपपचरितः। अब इम्मे पर्शयोपचारा-माहीमा बामिति बारमरम्पम् , पर नास्परम बिगो दीति मम बचीत ही । पामिति परमम्म समानवावीगाम्बपर्याय परिव।। गुपे इम्पोपचारम पर्यावधी पैष । और बारमा देरमात्मा गान्तोरिक्रमाचयो।। ८५ गोपेशपते पचास्मा '--बन गौरमुरिष भास्ममो विधानं निवे-पचतिर गौरवास्पानोपर भारमाम्ममोपचारपठनमिति । पाये इन्बोपचाये बमा-' -पक्षनिमारमा बाहमिति देशभरपरिषवाना गया पर्याए विपपमूतेषु चारमाममोपचाराया। पुणे पर्यायधारण मतिबा यया मर । पाये गुपचारोऽपि धरी मतिरिप्पते ॥९॥ गुणे पञ्चेपोपचारा परा-मशिाम तरेन मशरीरधर्म पते वा भरपापण • मरिबापस्मारमपविषये रिमापापमोपचारावा ।
- - ०१. पं..] टिप्मणान। पापे गुणोपचापे पया हि पूर्णप्रयोगजमम्पपा कियठे । यहा शरीरे दोर मन्धिानरुपो पुगोऽपि । भत्र हि सरीररूपपपर्यायविपये मविधानरूपाम्पस्म गुणस्मोपचार किप'- मनुपर- १ -१५॥ पणुपमायनो राम प १३-१५। ०३. ५० ३१ सम्माओ- "सम्मानो लडीमो व सागरोषप्रोगलामामो। तेयेह सिद्धलदी उप्पजा समउचस्स ।।" विशेष ।। १.१८ पं० २९ 'मसिमेव वादे - tषा । ५० १० १० १९ 'शक्तिसमन्वयात्' - रोग या " १० १२ पं० १० 'परसचम्मय - विक्षेपा । २०४२ १० १५ 'परमाणपिक-मपा ३-mer १०४२ पं० १५ 'सावादि' - R-1। १. १४ ५० १८ 'मविमानसायानिशठि' - "सोइंदियाइमेएण छमिहाअग्गहादोऽमिहिया । ते होति उम्पीस पउम्बिा सपोग्गहण" ॥ ३० ॥ रहा । १० ४५ प० २ 'मनागतातीतविपयेपु' - "ममा पर्सनेन पाप्रसमापोऽनु पते । पूर्ववनिति पारणेन कार्यमनुमीपते, पमा मेपोभमा भविष्यात तिरिति । कमवत्-पत्र कार्येण भरणमनुमीपते, पूर्वोदकविपरीतमुएफ नपाः पूर्णत्वं शीमत्ता पा खोक्सोऽनुमीपवे मूगा ठिरति" - १.४६ ०८ 'प्रत्यक्षपदस्स' - भिकारम् -सम्पपरिक पारमार्षिक" २०४६ पं० २१ 'अत्र यहीखाता' ~ "उपसावमार्या । प्रमामप्रमेययो। मान्यरिसेपारमपनपगवापरणस्मात्मनो दर्शनोपयोगसमये पानोपयोगमासमबाद माप्पपारिनपनमनभमभावहारिमविमानोपयोगप्रावनी भरमा परराषमासि समारकरवपरिपमरमा म्पबस्थितात्मप्रमोमरूपा मुरपमुसनम्मपरेसमासापपछि । म्पमाम्पिासोमाविमानापरणकर्मभपोपसमाविसामप्रीममबरूमानिविपरमाणपरिणवि- . रमनोऽपमहानिरूपा मनिसानसागराध्यताममुवे । भुपानावरमकर्ममयोपशमनास्य- मादिसाममीरिझेपनिमिचमाटो मारामाणपरिपतिसमालो बास्पारणानिमितो भारममा पुमानमिति सपामिरेयनामाप्नोति । पिरम्परमपरिमतिविपरम पीस रगुपममपान विधानावरपकर्मयोपशममार्मूतो छोपनादिसानिमित्तनिरपेक्षा मामि- निमिति पतिश्पते त्यो वरपिपर्सनावरणर्मक्षयोपक्षमभावुभ्वस्तु स पर परम्प.. पाम्पपपोमोचनसमायोपपिपरामम्पपरेशमा भवति" - पम्ममियम ।। ४०१४ ० . 'मन' - "मावत्- मुममपिरमेव मारपम् । या nि योऽयम इति सामान्यता, साभारतवोऽपमर्ष पनि रिसेपतो पिएसविशेपममेव लिमिट रिहरवि इति । गमत् । पपा दि- अनेक विशेपो र निराम्परतपा पियाम् । पासामु । -भायमा ११५मटर पू .
ज्ञानविन्दुप्रकरणस्य परिशिष्टानि । १ ज्ञानपिन्दुगताना पारिभाषिकशम्दानां सूची' [म] परिचवीप 4. भार (मा) २६४ापबाण ५५.नुमान ८३५ 17 पारोगपमिति ३५मिमी १२.11 1211 २८ असामेषि माग 14. बारपार ५. कन्या ११५मापन मात मन्तातरम ५५२३.२५२५२५.१०मन्वय सानिमा (मा) २.17 सामनावि २१.२३ बवाम्मावि २६. ममातिर पटी २५१UR २५.१ २९.१२/मारोध ४४)मपरोशन परपेशामा १२.11111 २७११ १.111444 सा समाव do मोतिरि शिव जातिापमान पुणे २६.1 हिरण २५१ विमापूरन २३मधषम १.H २.१५मापार २९.१८मत्रामाम २७ 10 प्रामध्यरत १.५५बासन ३५१ ममारमारपण ४६.१८ अभिभाष १"क्तिसम मामा मा गरपामा माहारामा।
१ज्ञाननिम्बुगवानो पारिमापिकाप्पानो सूपी। भयानोपनावरण " २०२५,३३.२७ भाषितावरण ५६ मनःपर्यापायापरण बासस पवारण बमाब २२.१ मधुसापरण पपति मानावरप . पमा १.१७४५.२५ मापारपान २५४ १०११ ममायापारपरम १.१४१५४१८1७19. हामाहरण १११ १.१४ भागमा २.२ १.१४ माशा ७१. फलसरपणा १८.१... मातापि परमपावधि पुनप्रसपाधि उपयोमेनिन परमाधि १७१४२.१५ १७१ यमवाद पापियालालर ४११ । इनियमित २११ पियानोपयोग ५४ [1] भनिरन २.10111८ रण होपयोग २९. परिहा २.२४ [] निधारम् २५ मसधि भापति ११३८" २२.१२ बापरवारिष m. पापियानस २.१६ मम्मामस्वारा ५.११. प्रदेपोरब प्रेरक परवापछि ५.२५ २२२१. [मा] २७। ३५४ पौष मामा २२.१९८४. सपवर १२.१४ ८२७११.७५ मारिनुवमपारमनिमोस्पोप हमेपयोग मएफ्योप सिपयोग २.1 मोरोष २..
१ मानविन्गवामा पारिमापियानो सूची । उपशुपयोग [] उपत्येषगोपा २४ाम रण्योपयोग २४" शानोपयोग 12.1111सितमक्या २." साबरपोपपोप ३५1५४१.२.भरमापर २३. विषयम समाम्योपयोग परमीय निमित्त L समोरप्रेष ४०१६/भरपतगुनोय कमेपमोग ११३॥ अपरपमान १०११२३ १२.! एभेषको रोपमेय कमायोपयोपुष 1.10१.५.२५३५.. १७.. मनिकापमोच भागाम्मरणाम RL भाषिकामोरोप VI.२४ उपस्पानोपयोग RJखपालोमागावरण सरपयोपपर योमायामा रमानोस्पति नाव१९५५011 २७५ वन्दनाविर R सरगम २७१ रोष २६.लिन् २५रतोरक्षक २३.१ मरण ३७११,३९.१५ गारेगाराला महिमामोल कमीपर ७४.मोरोपात ८. मात्र ८८सान पार 1411८11 पदोन पोरण्मयिा यामिक पानिरोपमाल पारिस्पर CL [५] 2.100.R रसार 11 निष रम 14. [२] सनाविरोष mym जीणमात ७१रगुत ७६पामगर योमरम जापादनमा [मो १ कामविन्दुगवानां पारिमापिकसम्पाचौ सूची । १२१ परर प्रस्ताव २२.१७ 141 २२.२.बम २५ २३४बारामय २६.४ावाति २..विष २१.२५ २६.प १८५११ २६.पप्रममित् ४०० २६५ साल ४०१४ २६.14मर १५१५.०१८२५,२६१२५.२९ १५.४४. ३७५ २९. पतिशप २२१४ मारवहन ७१ पानोपासनान पीपायन म्भ [ग] समाकम्पमाल पुलाम परमावविहान भाषा मापन इमिनिष २७.. २८ [] ५१५ परम २०१ ३९-४४ अध्याप पमा २.11 २.१. २१... २१... २१॥ २१.१. परिवारमोनियमन ५८२५ निरामर पीवपूर्णम्मान पारमाणात २०२८ RC २११४ RIT २०१५ २७.. मेष बतपरिपन [] स्परपम मिणभरपान भासस २९ .२५ R1-11- १२.. १५३ मोपग्रेष पेशाब मवरमा १२२ माननिम्युगवार्ग पारिमापिक्समा सूची। ...]प्रपरक्याब २८२८ असातिपयशान प्रापपरीक्षामा १.१५.गोपना ४८. देवति १०म २२.४ प्रपामाम RR बापत ३४1111८९ सपरिक २०१५५७ [] २०१८ २५५१२.... पाव पत्म ०१५ परमानन् प्रमोष विष्यामेष देवोपासोपा १२.1 १७.२५ दीपवाल्म २२.पवित 11 २१.५ [] कोमुरिम्प बारमामा RAM.५१३९." ५५.11.2. पारोपपोष 1 २४ ३९. ४४ बम ७८) १.१२... पापिरम समय १८२ ४१.१७५ ५८14 कष vern.६ ५८11 २.१३ १२३ १ पानपिन्दुगतानो पारिमापिकामानां सूची। १२... १८१८ प्रमिलान मधरम संपरप्रसव ३१.. २६.प्रम २.११.२४.१०२६११२.१. ३०१ माप्रथाप्रपथ महापराविषय २.१५ १८१ प्ररमापिस ८. व्यापारिकप्रपत्र २५.२ १०. प्रमध्यप्रयच सम्पादिमाना ." बेवानिए [प] ११.२६. प्रमाण २२.१४ | ममाचार ४६. |प्रमापप्रमेव ५५.५ प्रायोपथिक प्रातिम ४०१ अपमान प्रामाप ५१प्रामापसंच ६१९-१.मारण १९.११,२१.. १.२.. ११।१२.७१३.. परसापेरम्बन्ध शिवार [फ] रखरख परपी २२३१ परमाधिक मोजाना पाव २५ २५.१८ ४२.१५ बमोहा २०१२ बाहर २०४ाषा १२.षित २.५ पिछविया २६...पारिवाधि २०१९प्रषिवापरण १९.१७२०... २१. पवावरित १५.११ २८1. २११ पारित २६.१४.. २.1 मनामनरासस २.४ ४७१४ निपभर २५१४ २२.३ममार प्रीम मथ मा २६१२.१९ प्रविषय ४३. ममपरपोष १८५१ मामा १जानपिनुगवानों पारिमापिम्ममार्ग पूची। याम्पस २१ ५.../सा २./ मोड मोर मानीमा २८.२५ औरमिक ... | माया २१. सपपमित १२. प्रणव २०१८ मामा १९.५u.t निप्पा- २॥२५" मारपास २.१५ बमोमिमाम २१.२५ पपोमप्यास २०॥ मिप्यान् २५१ मूत २.४ पैरमार्पण समोरसव ४.४ मैचमेरपार RRIL २८ २. [म] २२.१५ मी परिसर 148.5mm पोखम्र २१.२. RRI एम मोपण ५.१. [५] बारपत्रक अपरिचित RL त्पति फ्पुरतोय 12 निप्रेमीप्यम पोषमयमै २.११. पारानिपोपमा उधम्मपरीत निवासस [] पोट २१.१५ रक्स 1.15 .१६म २... प्रेममा R इपिम्पले पा २२१ पम् १८MR.Mण्यात २.२६ जान १९.14 मोन १८-२५.पिम्प २८18CL ३५.पिटक १७११८४२, [-] ...मम्म मारपीट २.५ ८१५४in... ७.७१७२९ परामायण २.१.पर ५१५ ४, ८३ ३८९१.पोपलेप १.मानविन्दुगताना पारिमापिसामानों सूची । १२५ [] पारामारामाणिसमस्पर विशेप २४१,५९ बमममयावधिमा ३५.12 साधारणमादिनिक्षेप सलबोम्यक्रमापापनमा अम्रपारिवातिविशेष २२.१ ग्रामविसमानापमस्तीपमिनिष ४२.४ पएपेष सम्बयापापप्यादिमिरेप पिपरिमेय मालवायोष निपनिमेषम्य १.१४ निक्षेपरिधि १४२५ मेयमेरपर २. विष्यवाद मिथिता नियमान २५.१७२९.२. मिरियर २५.२५ १५१२७.. २५.११ दिरासविषया १०१ अमानुपपोयाम्पमवार पामतिपय ५.२५ विपाटा प्रास्याम्पत्रिपक्वा करमावविपक्ठा बान्तारिन मेषाप्रमाणपत्रपत्रिपन्न एमन्तारिन् पापविमा २७१ अमोपोन् ७.४ बालविता २७.११ पुपरफ्लोपारिन् १.२४ 11.४ अमितापपता २.१ एपोपवारि १८. सम्पामध्यप्रथा २०१० ममोपयोपपमान एमाद परपामिपिया मम्मपहिर 1. ४४ पहिरन २०.. पम्प पिनियन २७३ पवारयोग प्रसपाट पपरम्प RLI अपक्षमनिपल्या नयममुम्पसमरिया ३५.१२. अपर्वागमतिपय दिवालिए रिप यी २. २.१ [टएप २११०२२.५ 1.ति २०२५१२८१९ माप्तिबादिवि ८.५/वारस पवम्मानुभाष ८.८ रेपपमा २६.16 अपमपम्पतमपहिरन ८.पिम्प 1.
१२६ मारठा पबहारी मारप ३.८.. A.L १ मानपिन्तुगानों पारिमापितमाना भी। १०१५-१६ [स] १२.१९. वर २८१५-मन २"दिनमा २५१५ याराम ५८1.सबर्म १५. उu १८४ पारपार्षिक २.१४ १५१५ [] पारमार्षियत २०० भीमारित 42स्त काश मापारपर्पन स्मारकर पायरीय २६... २ २५.१५ २४.१३ एस R१४ RL पम्पोष पापसोपस्मन ८३१ समाधि (ARRE) ७. सम्पूर्वगोष 121180 ३५२८ २११४८८ नतम प्रबाही पारिष ११४ शम्मान पामिरम्मत Lintoutuv ११. मिपापिफ्पामात ८11.उम्पयार १७ ७112" २२.१८ ५७... २५१५१.७१/चरि ५१.मा अमनोरोप २८१८ १६.१२.१८-1. मा पाति १५/नयमा २९. [तान २९.१.सविस LARसहारमा भिन् नोयोग मारित १५11. VI.२८ ४.४ प्रयोग गणे क सम २१. दिप २ पानबिन्दुगताना प्रथमम्मकारादिविशेपनाना भी मातापिरम्प २२.० समावस्या समायोपोप २४.14 ४६१ दरमम फारम ३४१.स्पति २५६ सासद २२.५ मिरान्त ३५५विस्त ४.४ सम्ममा ४२. कपा ४२ पापसम्मान २. २४१८ ३५५ ५७२६ मजसमग्रम ५७१९ सम्ममा २१.१४१४ बरिरान्त ११.१७७३८१९ 1] बस्मरण ७२० स्मर ८१ २२." २२.१ २३.५ २२. ३५४ पर्व १६.५ माप २१.२४ पम्मान ४२.११ हम पासपमह २८१५. पापी २. ज्ञानविन्दुगतानां प्रन्यमम्पकारादिविशेषनाम्नां सूची। बमोपचोप्पणादिर बम्पमसार २...मबार ४.10/मपीर १३.१५ मोपचीमवादिन ३... मोबम ५.10/टम पम्मटोरियोस् ४१. २०१५३८९. १२.५ववि १.AN R.१५ १२१६२४ पादेखिए ५.१. विषयपतिम् Roman | मनमानापिर २६..णीय २.७१३. २८/ ५९.१४ ३२. पपरोक्वाहिर कमेपविराम मामलाप ८१८ बापामेष १२८ ३मावनिम्बुगवाये म्मावापी पुत्री। मार २०१५२०१७011५1. मित्र 1 [मीमांक ३५-पौमांसभापमा पनाच २४१४२४१६४१२ हुम्पापपोपलादिए "..11 २०५ १९५१२४ पापम्पतिए २१.४ बातदिमिश ३६. वार्षिकास ११७२५१५दिवायचा २.५ RURORLUR. 1.1MILR वाविशनुमानिए वैवाविमीमांस पन्नम्म्यम सनि शाम पार १२.१ ११.२.११ मोरीष २२.१४ ४२११ PLU२९.० प्रति ५८. १२.४८११ सन्मानिधि २४11 ५.१११५५ सबसेष (पाम) ३.1010८ २५.१६ (निरावित २५.17 १.२५) परदेश २३.16 CAR1५१८ पुष २५ १११११.५ २८.२८पत २६.१९५४ माचार भागात 11 मसमाना मायामा माचार पावादी सिरम ८८1-1410ोर विमान १५.११.स्पति १२.१८५सार १२. पाप ३ ज्ञानपिन्दुगताना न्यायानां सूची। बबरिषद ४७. गुप्मात् पनि हतार .... १६.१६७३२४ादिबाव पोन्मेपरमार १०५ यो परमाणाममितिमाल मोगरवार १.अपेपमम्ममिपाव १८ ४ ज्ञानपिन्दुगतानामवतरणानां सूची। ममतेम दि प्रत्यू मेक्वाटमेण समा- समनाममम पीवसई-[ १. [मायो ३.. देवमाणापरण- [सम्मति २] ३५११ मविद्यापार पर पार- [प्रो (J..बसी पं मवे र्म- मसठो पत्यिविसहो- [प्रारम र १४] २५१५. [रपा पप १५४३५३५. गुप्पणी परिषप्यस्यास्ममि- [प्राय १२१0] २२.११ [पा 14/परम्पादिपसारा प ५] २८१ मप्रियम्ममयो- [ोमा MAJRAN पगदी मिमिते बुदि- मानेना शाले-[नगडीया ५१५] ३.११. [पर पाप १४] २८.२८ मन्याय पासतो मईि- पक्समबरामबपिनसम्मति ... [समति २०१पुनविदान [विबर १९.. मधिमण्णार्परळी- बर्षद्विपपाल्पातिमा १३९.१५. [सम्मति १.१] १९९५मासमामि सर्व- मम्पपमाफमम्मरम्- ३." [सम्मति २RIJVZr बममापि प्रमेसेष प्रपते- बासर्प सापार- [स्पति 1 ]३८५ [पाप प्रल १m]..बापाबमामामे- मोपची महापा- १५12 [रा प १८.१५, मर्पितानतिमिरे पर गर्व दो पत्पिपयोगा- माधिपारचाम्पास- [भाग १]w... अपामार . १३.३४ गापासेसई- पासबभ्याटीकि- [च 11९५] १५१ [ी मार ५२९. पेप मपोलिसपणपाण- बोसर्वि मन्ससामेति- [सम्मति ] ४२.५ [४]"मप्पा भाषा- [सम: RjRT एमादीम्येभिर माज्यानि- बम मारे- [भयत ॥ ]n.. त्ति जमा-मन मnjan पर्व विषपायचे मति mes | पवस्वम्मा- [मति AR] ... पर्व सेसिन्दिपसपम्मि- पाने परवाने [1].. [पति AVM 11.मिपम सम्पारसेसु- कामा संकल्पो विचिकित्सा- [म 10 115 [भाग १] ११५ चोरतमीदा- प्राबनोरमन्तपोगे- [ो ३] १५१५ [१५]४१५/वषमति- [मो ..] १४ मवि गापा- [मति Arjun ववमाषापमान्ते-[व 2.JRRH पहनाणमदेव- वामपमुत्पत्ती पप्त एक- [स्पति ur.. [प्रपा ११.१९५ मनपरेचा पाच प्रमाणपतोमेवावपि इन मात्र हीरत्सागुम्मे पारित पसाब पापमपा (मसाममाप प ५.) से भयावा लागे पडे समापि च पानातामानासोर प्रस्तुपीमाविश्व । क्व भागमा विमान नमयान, पादेशमनिपा।
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पत्र ४] पिपिप पा भापि संप्रार-२१वों मर्प २५५ प्रस्पेफ फ्स मिम मिम समपसे गीता हुमा माश्म होगा (उसके मिम मिम होनेका कारण कुछ तो होगा ही)। एक मनुष्यने ऐसा स सकल्प किया कि में सावनपर्यंत मौका प्रितक्मतक भी न करेगा परन्तु पाँच पट मी म गीत पाये और उसका पितान हो गया, तो फिर उसका कुछ तो कारण होना ही चाहिये । मुझे जो शाबका मम्मान गुमा है उससे में यह कर सकता हूँ कि पह पूर्वकर्मके किसी मी मशका उदय होना चाहिये । कैसे कर्मका ! तो कहूँगा कि मोहनीय कर्मका । उसकी किस प्राप्तिका ! तो करेंगा कि पुरुषवेदका ! (पुरुषोदकी पन्द्रह प्रतियों है।) पुरुपवेदका उदय र सफस्पसे रोक्नेपर मी हो गया, उसका कारण मन कर सकते है कि वह कर्म भूतकालीन कारण होना चाहिय, वीर बनुर्मासे उसका सरप विचार करनेसे पर कारण पुनर्मम ही पिए होगा। इस बातको बाससे तोद्वारा कानकी मेरी इच्छा थी, परम्त मितना सोचा पा उससे बाधिक कपन बढ़ गया है। बौर आमाको जो बोध आ है उसे मन ययार्थ नही मान समता, और मनके मोषको बचन पयार्य मही कह सकते, गौर बनके कपन-बोधको काम सिम्स नहीं सकती; ऐसा होनेके कारण, और इस विषयके व्यापोहमें बहुतसे मस शम्दोके उपयोगका मावश्यकता रोनेके कारण बमा हाल तो इस विषयको अपूर्ण र देता है । यह अनुमान प्रमाण जा। प्रत्यक्ष प्रमाणके समपमें यह बानागम्प होगा तो उसे मिट, अथवा में होने का अवसर मिला तो उस समय छत्र सगा । आपके उपयोग हो रम हा तो मी वापकी प्रसमताके लिये एक रचनोंको पहा विसता १ सबकी मफेक्षा भारमान श्रेष्ठ है। २ धर्म-विषय, गति, मागति निमपसे है। ३ म्पों म्यों उपपोगको शुरता होती जाती है क्यों त्यों मारमशान प्राप्त होता जाता है। १ इसके लिये निर्विकार परिकी भावश्यकता है। ५ 'पुनर्जन्म' पर योगसे, शससे भौर सभासे बनेक पुरुपोंको सिर ला है। इस कामे इस विषयमें अनेक पुरुषोंको नि:शका नहीं होता, उसका कारण फेरठ सामि कमाकी म्यूनता, विपिप तापको म्प, मोगासवरिप्रमें भापकी बताई ई निर्जनावस्थाको कमी, सरसगका न मिसना, समान बार अपपार्य रिहा है। आपको अनुसता होगी तो इस रिम्पमें मिशेष फिर कहूँगा । इसम मुझे भास्माताका परमठाम है इस कारण वारको मनुमा होगी हो । परि समय हो तो दो पार बार इस परफे मनन फरमेसे कहा जा अन्य भाशय मी भापको बहुत ररिगोपर हो जापगा। ठीके कारण विस्तारस कुछ लिम्मा है, तो मा में समाना कि जैसा चाहिये बैमा मही समझाया पा सा परम्तु में समझना है कि इस विषपका धीरे धीरे मारके पास मुरसवपमें रण सहगा । . . पुनमगवान्य जानपरिष मेरे पास नहीं मापा । बनुमना वो मिरपानेको सूचना परे । सम्पुरोमा परित्र दर्पगरप है । दुद और जैनधर्मके उपगमें महान् जन्तर ।
भीम पस्नम्न [ बाप गुणस्पानचे प्रास पुरुपको पात्रता प्राप्त होना माना जा सकता है। यहाँ धर्मप्पानको गौणता है । पाँचोंमें मप्पम गौणता है। मैं मुस्पता वो परन्तु व मध्यम है। वीर साम उसकी मुस्मता। हम इस्पामममें सामान्य विषिसे बपिकसे वधिक पाँच गुणस्थानमें तो आ सकते है। इसके सिवाय भाव नपेक्षा तो कुछ और ही बात है। इस धर्मभ्यानमें चार मारमाजोसे भूषित होना समवित है- १ मैत्री-सब जगत्के गांवोंकी भोर निर मुनि । २ प्रमोद-किसीके मात्र गुणको मा देखा ऐमाधित होकर उठसित होना । १ कामाबगरके जायक सरेकर बनुमा करना । १ मा पस्म मपषा उपेक्षा पुर समरिक मम्मी के पोम्प होना । इसके बार बान है। इसकी चार समि। इसके पार पाये । इस प्रकार धर्मपान अमेक मेलोमे विम। पो पान (मास) का उप करवा , मनका जप करता है। जो मनका जप करता है बाम-गमता प्राप्त करता है ऐसा मी हा गाया तो म्हारमात्र है । निधपसे निमय बर्षकी मपूर्ण योजना तो सपुरपका मन ही मानवा क्योंकि भासका बय करते हए मी सत्पुरुषको बाहाका मग होने की समावना यता है इसलिये ऐसा मास-जय परिणाममें ससारको ही पावा। बासका जप हो कि हाँ बासनाका प है। उसके दो सापन है-सहरू और समग । उसकी दो बेमियों 1-पपासना और पाता। उसकी दो प्रमसे रिहती है-परिचय और पुण्यानुषी पुष्पता । सबध मा एक बारमात्री सत्पात्रता हो।हामे तो इस लिपपमें ना लिखता है। । प्रमाणसागर समापूर्वक पपा माप ता पह दसता देनेवाला प्रप। नहीं तो यह प्रशस्त मागोको मानेगास्म प्रप है। बबाणीमा नि १९१५ म्पप्ठ मुदी र पक्षपाती म म मीरे, न देपा पित्मविए । पुतिमापनं पस्म, वस्प कार्यः परिग्रह। -महरिमदापार्य मापका शापसी का धर्म पत्र मिला। उस पत्रपर विचार करनके मिमे विशेष माप मोस या तर लिसमे मुझसे इतना विमा दुजा सम्मेि इस कम्पके सिपे क्षमा करे । उस पत्र में बार जिलाकि किसी भी मासे मायामिव बानका सपान करना या शानियोंका उपया, परचम मुझे मी मान्य है। प्रत्येक दर्सनमें वामाका ही उपदा किया - . पर 3 पिषिध पत्र भादि सपा-पौ वर्ष गया है, बार सबका प्रयत्न मोक्षके लिये ही है। तो भी इतना तो भाप भी मानेंगे कि जिस मार्गसे वामाको नरमय, सम्यगवान, और यथार्य पशि मिसे यहाँ मार्ग सत्पुरुपकी बाहानुसार मान्य करना चाहिये । यहाँ किसी मी दर्शनका नामोहेन करनेको नामपफता नहीं है, फिर भी यह तो काहाना सकता है कि निस पुरुषका वचन पापर बखरित है, उसके द्वारा उपरेश किया एला दर्शन ही पूरि हितकारी है। वासि मा'मा यथार्थ परि' भपवा 'वसुधर्म' प्राप्त करे नहींस सम्पाझाम प्राम होता है, यह सर्वमान्य बात है। मामय पानेके लिये क्या देय है, क्या उपादेय है, और क्या झेप , इस विषपमें प्रसग पाकर स्पुरुपकी भाशानुसार आपको पोका पोहा निजता रहूँगा । यदि होय, हेय, और उपादेयतपसे कोई पदाथ-एक परमाणु मी मही माना तो यहाँ बारमा भी नहीं बानी । महारिक उपदेश किय हुए आचारंग नामके संचातिक शाममें कहा है कि ने एगं माणई से सम नाई, न सन मामा स एग माणी--अर्थात् विसने एकको माना उसने सब नाना, मिसम सब जाना उसने एक्फो गाना । यह सपनापूत पेसा उपभरता है कि जब कोई भी एक माम्माका माननके लिये प्रपान करगा, उस समय उसे सब जाननेका प्रयत्न करना होगा; और सम माननका प्रपन्न करा एक मामा दो बानमेके सिये ह । फिर भी जिसन विचित्र जगत्मा सम्प नहीं जाना मह मामाको मही नामता-यह उपरेश भयधार्य नही हरता। जिसे यह शान मही तुमा कि आमा किस कारणस, फस, भार किस प्रकार बंध गई है, उसे इस पातका भी दान नहीं हो सकता है यह किम कारणसे, फेस, मार किस प्रकार मुक्त हो सकती है। वीर पर मन न हुआ तो यह वचनामृत ही प्रमाणभूत हरता है। महावीरक उप- देशको मुम्य नीच उपर पचनापतसे शुरु होतीभीर उन्होंने उसका सगप सोचममाम्म समवाया है। इसक विपपमें प िभापको अनुकूलता होगी ता जागे कहूंगा | पाँ मापा एक यह भी निवेन कर देना पाग्य है फि महार अया किसी भी पूमर उप- एकफे पश्चात कारण मरा कोई कपन अपना मेरी काई माम्पता महा परन्तु भामय पानक उिप जिसका उपदा अमु सौक सिप मुझ पक्षपात (1) शिराग-और प्रशम्मरग, अपमा उमौकपि म मायका बार उसाच मापारसे मेरी प्रतिमा है इसलिये यदि मरा कई मी कपन आमरी बाधा पचाना हा तो उसे बनासर उपकार करने पहिय । प्रत्यक्ष समगी ता परिहाग हो, और पुण्यानुवर्षी पुण्य का ही फर ६ ता मी अबतक मानशिक अनुमार पराम ममग मिना देगा तपास उम में जाना मनाप हो ममगा। • निप शासन प्रानादका सनिय र मानता है । गातिाना, पापादना पार मनाये अनेफ भ है परनशानादतार बिना पे मप सना र माम मरना भयपा गुम्प परमाये ही। ३ पुनम गरम भन्न रिपार प्रगट पानक गिय आन मगन किया था, उमरु मारमे प्रममा निगना मार सक्षेम गिाना - भीमासचन्द्र [1. बकई एक निर्णयोंके उपरसे में यह मानने भगा कि इस कामें मौ को कोई महामा को भषको नातिस्मरण मानसे मान सकते है। मोर पा पानमा कम्पित महीं परन्तु सम्पन होता है। र समेग, शान-पोग मौर ससगसे मी पर मान प्राप्त होता है-अर्याद पूर्वमा प्रत्यन अनुमत्रमें ना जाता है। मराका पूर्वमा भनुभवगम्प म हो तबतक मामा भविष्यकार किम शक्तिमापसे धर्म- "यान किया करती है, और ऐसा सशकित प्रपरन योम्प सिदि नहीं देता। मा 'पुनम रे' इस विषयमें मिस पुस्पचे परोस वपमा प्रस्पक्षसे निकला महा ई उस रुपको भाम्बान प्रान हवा है ऐसा शास-सी नहीं प्रती । पुनमको सिद्धिक संपमें भूत- डामसे प्रास एखा को बाराय मुझे बनुमबगम्य रामा। उसे थोडासा यहाँ कावा. (१) पैम्प' और 'या'म दोनोंको पहिषामने के लिये उन दोनों में जो मिम मिम गुम । उ पहिचाननेको पहिम मानस्मकता है। तपा उन मिम मिम गुणोंमें मी बो सबसे मुस्य मिनचा इसई देती है पर पाक बन्य में 'उपयोग' (वर्षात् मिससे किसी बहका बोध घेता गुण) यता है, वर 'नामें पा नही गया । यहाँ शापद कोई या शंका करे कि 'नर' में पद, पर्ग, रूप, रस और गंन शक्तियों होता है, वौर पैतापमें ये शठिया नही पापी नाती, परन्तु या ममता वाकाराको अपेक्षा नेसे समझमें नहीं मा सकतीक्योंकि मिरजम, निराकार, वरूपी स्पारि में एक गुण ऐसे में जो भाकारा तय मारमा मी यते है, इसलिये भाकामको बारमा सरा नगेना जा सकता है, क्योंकि फिर इन दोनों में कोई मिम धर्म न या। इसका समाधान पाकि इन दोनों अन्तर है, और पबन्तर बारमा पहिले भामा उपपोग' नामक गुण बताता है, क्योंकि गुम माकाशमें नही। बना और न्याय सम्प समझना पुगम हो जाता है। (२) गौरका मुस्य गुण कपका पण उपपोग' (किसी भी बठसभी मानना) बोध बान) है।पिस पानामा मयुर और वपूर्ण उपयोग यता गावाहमा (म्पमारमयकी अपेक्षासे'- क्योंकि प्रत्येक मामा अपने घर नपसे तो परमात्मा है परन्तु वहाँकन सरूपको पपार्य नही समझौ पातक गौनामा छमस्थ यता)-परमात्मामें नहीं पापा | मिसमें उस और सम्पूर्ण पदार्प उपयोग गता है। परमात्मामाको प्रमई मामा मानी जाती है। पर उपयोगी ऐसे ही वात्मा कम्पित I (जाल ) को सम्पग्मान मान यी है। और उसे सम्पमानके बिना कुछ मी पुनर्गमका यथार्थ निस्वप नहीं हो पाता | मधुर उपयोग होनेका कुछ मी निमित्त होना चाहिये । या निमित्त बनुमसे माते हुए पासमासे प्राण ये हर फर्म पुनक है। (इस कर्मा पपार्य स्वरूप सस्मतासे समझने योग्य है क्योंकि यामाको ऐसी दशमे किसी मौ निमित्से हीरोनी पाहिये । और प निमित्त जबतक पाप रविसे समहमें न बाते बता मिस एस्तेसे बाना उस रास्तेपर बाना हो हो नही सकता ।) सित्र परिणाम विपर्यय हो उसका मरम बपुर उपपोगके बिना नही होता गोर बार उपयोग भूतकाळे किसी भी सर्वपके बिना महाँ होता । हम परि वर्तमान मेस एक एक पल्को निकालते गा और उसपर प्यान देते थे, तो पर ४ ] पिपिप पर मारि संपाद-२५ों पर्प प्रत्येक फ्छ मिम मिम सम्पसे बाता मा मास्म होगा (उसके मिन मिम होमेका कारण कुछ तो ऐगा दी)। एक मनुप्पने ऐसा स सकम्प फिया कि मैं जीवनपर्यंत खीका विषमता मी म करेगा परन्तु पाँच पट मी म बीत पापे और उसका पितमन हो गया, तो फिर उसका कुछ तो कारण ऐना हो पहिये । मुझे जो शामका मन्पवान हुमा है उससे में यह कर सकता है कि पर पूर्वकर्मके किसी मी जशका उदय होना चाहिये । कैसे कर्मका ! तो कहूँगा कि मोहनीय कर्मका । उसको किस प्रासिका तो कहूँगा कि पुरुषवेदका ! (पुरुपवेदकी फ्ला प्रहतियों हैं। ) पुरुपदका उदय प सकापसे राक्नेपर मी हो गया, उसका करण मा कर सकते है कि कोई भूतकालीन कारण हाना चाहिय वीर अनुपू से उसका स्वरूप विचार करनेसे कारण पुनम हो सिद होगा। इस मातको बससे एनोराय करनेकी मेरी इच्छा थी, परम्तु जितना सोपा पा उससे अधिक कपन वा गया है, और मामाको बो बोध का है उसे मन यपार्य नहीं जान सकता, और मनके मोषका पपन यथार्थ नहीं कर सकते, और बघनके कयन-मोषको कसम लिख नहीं समाना ऐसा होनेके कारण, और इस विषयके आपोहमें मासे मा शम्दों के उपयोगका भापकता रोनेके कारण वमा हाल तो इस पियको मपूर्ण शोष देवा ।। या अनुमान प्रमाण मा। प्रत्यक्ष प्रमागके सबध गरबानीगम्य रोगा तो उसे रि, अपना मेंट होनेका अवसर मिला तो उस समय फुल कर सांगा । भापके उपयोगमें हो रम हा तो मी आपको प्रसमताके लिये एक सपनोंको यहाँ लिसता - १ सनकी अपेक्षा बारमान श्रेष्ठ है। २ धर्म-विषय, गति, वागति निययसे हैं। ३ म्पो म्यों उपयोगको पुस्ता होती पाती है स्पो स्यों वाम्मान प्राप्त होता जाता है। . इसके लिये निर्विकार रएिको माश्यकता है। ५. 'पुनर्जन्म है' पर पोगसे, शासमे गौर समानसे अनेक पुरुपोंको सिमामा। इस कामे इस विषयमें अनेक पुरुषोंको निका नहीं होती, उसका कारण के साथ साकी म्यूनता, विविध सापकी पूर्णा, प्रांगोकुलपरिप्रमें भापको बताई मिर्जनावस्याको कमी, ससंगका न मिलना समान और अपचार्य पशि ही है। मापको अनुकता होगी वो इस विषयमें विशेष किर काँगा । इसस मुझे बास्मोग्गलताका परमठाम है, इस कारण वारको मनुकता होगी ही। यदि समय हो तो दो चार बार इस परके मनन करनेसे कहा जा भन्य भाप मी मारो पात टिगोचर हो बापगा। शेठी कारण विस्तारसे पुण् दिमाई, तो मी में ममता कि जैसा चाहिये पैसा नहीं समझापा पा सका; परन्तु में समाना कि इस विषयको धीरे धीरे मारक पास सरताप रण सगा। - . . पुरमगवान्पा गीवनपरिज मेरे पास नहीं मापा । पनुरना से दो मिनमानेको मूपमा करे । समुपोंका परित्र दर्पगन्य है ।पुर और चैनधमक उपदेशमें महान् बन्तर है।
भीमद् पश्चन्द्र [१ ४२ सब गोषोंकी क्षमा मांगकर यह पत्र पूरा (अपूर्ण स्थितिसे ) करता है। पर वापको वाया होगी तो ऐसा समय निकाल जा सकेगा कि निस्से बामपन हो। मुगमता म होने के कारण छेसमें पोप बाना समय है, परन्तु कुछ गधारी पौ; लपण सरवाला उपयोग करमेसे मामलको विशेष गरि सकती। वि धर्मालनका साफ रायचन्द्र रक्जीमाईका दिनपप्रभारसे प्रशस्त प्रणाम ४१ आमदावा से १९४५ म्येष्ठ मुदौ १२ भौम मोबारको क्वाणीचा कारसे सबमें फ्रोपानको अपेक्षासे एक विचार मिसे थे। इस विपपमें अकाश पाकर पुछ बताने के बाद, उस विषपका प्रत्यक्ष अनुमवगम्य बानसे को पुछ निधम मेरी समधमें भाया है, पर यहाँ करना चाहता है। पा पत्र मापको म्मेष्ठ मुनी ५ को मिका होगा। भाकाश मिम्नेपर पर कुछ उत्तर देना पाम्प मादम हो तो उत्तर देकर, नही सो के पांच रिसकर शान्ति पधारें, यही निदेन है। निर्मपद्वारा उपोश किये हुए शानोंको सोजके लिपे करीब सात दिनसे मेरा पौगाना वाहै। पोपमालनके मुक रामचन्द्र रमणीमईका स्पानिधि प्रमाम ४२ बगामा (काठियावार) र.स १९९५ मासा सदा १५ वापका मापन मुली ७ का हिस्सा मा पत्र मुझे समाण केम्पमें मिग । उसके बार मेरा पहा मामा दला, इस कारण पाँच मिसभेमें विसंग गा। पुनर्जन्मसेवी मेरे विचार वाफ्को बनुछ ए इस कारण इस विपपमें मुझे भापका सहारा मिम गपा। मापने मोअंतकरणाप-भाममातबन्ध-अमिठापा प्रगट की सौ वाशामपुरुप निरतर एमते बाप है। उन्होंने ऐसी दशाको मन पचन कापा कर मामासे प्राप्त की है और उस दशा प्रकाशसे दिम्पई भरमासे गामाशरा सोपम भाप्यामिक पपनापोको प्रदर्शित Aमा " मिमकी कार से सपात्र मनुष्य निरंस का करते । पर यही भगतमबके माग्मिक दलको र करमेकी परम भारपि। सहन पारिणामिक मासे मुक्तिका उपदेश करते है या मि संशप है, परन्तु पपार्प पनि दए बिना सब दर्शनाप तापमान हदपगत नही होता । या होमेके रिपे सपापोती प्रशस्तमलि उनके पापा मार उमा उपदेशका असम्मान निर्विकार ज्ञानयोग इस्पादिषो मापन है मेपुर उपयोगस माप दोने चाहिये। पुमम्मका मापन नपए तपा म्प माप्पासिक चापो फिर कभी प्रसंगानुश करनेकी भाजा पाता।
पर ४५,४] पिपिप पर मादि संप्रह-२१याँ वर्ष दुग्भगवान्का चरित्र मनन करने योग्य है, यह कपन पक्षपातरहित है। अम में कुछ आभ्यास्मिक तत्त्वोंसे युक्त पचनामृत रिस सगा। धर्मोपमीनके पछुक गयचन्द्रका विनययुक्त प्रणाम ४३ वाणीधा, आपात बदी १२ बुध १९४५ महास्वामी मोसमासा थषण करती है, यह बहुत सुश और छम दापक है। उनको मेरी वरफसे निति करमा कि वे इस पुस्तकको पपार्थ प्रवण करें और उसका मनन करें। इसमें मिनेमरके पुर मार्गसे बाहरका एक भी बधिक बचन रखने का प्रयत्न नहीं किया गया । जैसा मनुमबमें आया और कालमेद देसा पैसे ही मप्पस्पतासे यह पुस्तक लिया है। मुझे आशा है कि महासतौनी इस पुस्तफको पकायमापसे प्राण करके आरम-कान्पागमें पदि करेंगी। ४४ भदीच, वि स २००५ धावण सुदी ३ युन पमाणा भामके गाँवसे लिखा हुमा मेरा एफ लिमप-पत्र वापको मिला होगा। में अपनी निवासभूमिसे जगमग दो माससे सत्योग और एसगकी पदि करनेके लिये प्रवासरूपसे कुछ स्पटॉमें हार कर पाई। मामग एक समाइ मापके दर्शन भौर समागमको प्रतिके लिये मेरा यही आगमन होना समय है। सब शासोको नामनेका, क्रियाका, शानका, योगका और भतिका प्रयोजन अपने स्वकपको प्रामि करना ही है और यदि ये सम्पर भणियाँ आरमगत ऐ गोप पो ऐसा होना प्रत्यक्ष संभव है, परन्तु इन वस्तुमोको प्राप्त करनेक लिये सर्म-संग-परिपागकी भाषश्यकता केवळ निनावस्या पोर पोगमिमें पास करनेसे ना समाधिको प्राप्ति नहीं होती, मा तोनियमसे सर्प-संग-परित्यागमें हो रहती है। देश (परदेश) संग-परिस्पागमें केस उसकी मनना सभव है। जबतक पूर्वकर्मक बरसे गहमास भोगना बाकी तबतक धर्म, अर्थ और कम्मो उपसिन-उशसान मापसे सेवन करना योग्य है । नाममापसे गृहस्प-प्रणा होनेपर अतरंग निर्मक श्रेणीकी वापता है, और महा पाईरहाँ सर्वसिदि है । इस मेगामें मेरा नामाभिठाया गत महिनासे हा करती है।ई एक म्पमारोपाधिफे फारण धर्मोप- बोपनको पूर्ण भमिठाया सफल नहीं हो सकती, किन्तु उससे प्रथम बिमारा सपको मिदि होती है पर बात सर्वमान्य हो, भौर इसमें किसी मास पप अपना बेपछी अपेक्षा नही है। निर्मपके उपरेशको अचठमातमे गौर शेपम्पसे मान्य करते हुए अन्य दर्शनोपे उपरेशमें मम्पत्पता रखना दी योग्य है। पाहे किसी भी एतेसे वार किमी दर्शनसे फल्याण तो सिर मतिरको कोई मरेशा मना पोग्य नहीं । रिस अनुभासे, जिस दर्शनसे, निम बानस माम्मम प्रास होता तो बदी बनुप्रया, सो दर्शन और हावान सर्वोपरि है। नपा जितनी आमा पार दरे है, पर्तमानमें पार होती है, और मपिप्प पार होंगी ये सब इस एक दी भाषका पाफर है। हम इस मापको सब तरहस प्राप करे यही इस मिठे हुए अप जग्मी साडता है।
पद भीम पराम [पा ४५,४५, कर्ज एक मान-विचार पिसते समय उदासीनताको इदि हो गानेसे वमोहलपमें रसमेमें नही वा पाये भौर न से बाप मेसोको बताया " चा सकता है। यह फिसा का काम। कामरहित किसी मी सपमें नाना प्रकार के विचार पदि बापक पास रस्में तो उन्हें मोम्यतापूर्वक भास्मगत करते हुए दोके पिप-मविष्यके म्सेि मी धमामात ही रक्से । इस सम्प मुवमानसे एक प्रश्न करमेकी बाबा चाहता। वापके पक्ष रोगा कि प्रत्येक पदार्थको प्रापनीमता चार प्रकारसे ऐती है:--म्प (उसका बस्वस्थमाष ) से, क्षेत्र ( उसकी मौपचारिफ अपना मनौपचारिक म्पापकता ) से, करसे मौर भाव (उसके गुणाधिक मात्र) से । म नके बिना बामाको म्यारसा मी मही कर सकते। बाप पदि काकाश मिन्नेपर इन प्रशाफ्नीयवा- जोस इस बास्माको म्यामा सिगे तो इससे मुझे गात संवोन होगा | इसमेसे एक बहुत म्पापा नि सकता है परन्त बापके विचार परिम्से कुछ सहायक से सकेंगे, ऐसा समधार पर मापमा की है। पोपचीक्न प्रास करनेमें भापको वापताको प्राय वाश्यकता परेगी, परम्त सामान्यतः चिमासाधी मापक विचार जान लेने के बा हो उस बातको पम देना, ऐसी है। शाम या परोसमार्ग है। मौर प्रत्यक्षमार्ग है। इस समय तो सना । फिर पर पत्र विनय-मानपूर्वक समास करता। विमा स्पचद रबजीमाईन प्रणाम पह ममि मेठ पाग-भूमि है।पो मुझे एक समुनि झ्याविन साप यसा। - ४५ माध, मावण पदी १० १९०५ जगत्में बालमानसे म्पबहार को, वौर बतरगमें एकात शौसममूत गत् निप यो, यही मान्यता और उपदो। ४६ बी, महफ्रका १९९ मेर उपर सममापन पर रग रक्सी, इससे मधिक वीर कुमम करो। धर्मप्पान और म्पमार इन दोनों समाज रस्सयो । सोमी गुरु, गुरु-शिष्य दोनोंकी अगतिका कारण है। मैं एक संसार मसे सम्पवान है। में पद गुरुको बस्त्रत है। बम्बई, मावपद बी१२ पनि १९४५ (पदापि पादे मरापमान ) प्रतिमासाचा कारण पाकि समागममें बानेवाले मग विमल प्रवित पते । १० मतमेकि करण मामाने बनत कालमें मोर मनत बग्मम मी माग-धर्म यो पापा, ममी कारण कि सत्याप उसको पस नहीं करत पानु'सल्प प्रणाम करते हैं।
पर ४८] चिविष पत्र मादि प्रह-२सौ वर्ष २१९ पाइर्थनाप परमात्माको नमस्कार बम्बई, मासोममी २गुरु १९९५ बगतको मुदर बसानेको जनतबार कोशिश की, परन्तु उससे यह सन्दर नहीं हुआ, क्योंकि कातक परिममण और परिभ्रमणके हेतु मौन्द राते हैं। पदि बारमाका एक मी भव सुन्दर हो जाय, मुनरतापूर्वक बीत माय, तो जनत ममको कसर निकल बाया ऐसा में प्रमुखमापसे समधा, और यही करनेमें मेरी प्रति ह । इस महानवमसे रहित ऐनेमें मो सो साधन मौर पदार्प भेष्ठ गें उन्हें प्राम करना, यही माम्यता है। तो फिर उसके लिये जगत्को अनुकूलता-प्रतिकताको क्या देखना ! वह चाहे से बोडे, परस्त वामा यदि अपनरहित होती हो, समाधिमय दशा प्राप्त करती हो तो कर सेना । ऐसा करनेसे सदा के रिपे कार्ति-अपकीर्तिसे छूट मा सकेंगे। इस समय इनके और इनके पक्ष के लोगोंक मेरे विपपमें मो विचार है मेरे प्यानमें है, परन्तु उनको भूग बाना ही श्रेयस्कर है । तुम निर्भय रहना, मरे विषयमें कोई कुछ कहे ता उसे सुनकर सुप पना, उसके लिये कुछ मी शोक-दर्द मत करना । मिस पुरुषपर तुम्हारा प्रशस्त पग है, उसके इन परमात्मा मिन महायोगांन्द्र पार्सनाय बादिका स्मरण रसना, और जैसे बने पैसे निर्मोही होकर मुक्त दशाको इम्य करमा। जीने के संबंध में अपना जीवनको पूर्णता के सपनों को सकम्प-विकम्प नहीं करमा । उपयोगको पर करनेके पि भगल्के सकल्प-विकम्पोको मूग गाना पार्यमाप वादि योगी- सरको दशाको पति करना, और यही अभिमपा रस्से एना, यही तु पुन पुन भाशीर्वादपूर्वक मरी शिक्षा है। यह मा बारमा भी उसी परकी भमिमपिणी और उसी पुरुपके चरणकमछमें तीन ई दौम शिष्य है, और तुम मी ऐसी ही मशा करनेकी शिक्षा देती है। पारस्वामीका उपदेश दिया एमा प्रम्य, क्षेत्र, काळ मावसे स-सरूम यपातप्य है, यह मत भूसना । उसकी शिक्षाको पदि किसी भी प्रकारसे विराबनाई हो तो उसके लिये पचाताप करना । इस काठको अपेमासे मन, पचन, कापाको आरममावमे उसकी गोदमें भर्पण करो, यही मोक्षका मार्ग है । नगरे सम्पूर्ण दर्शनोंकी-मनोको प्रयाको मूह बाना, चैनसबन्धी सा विचार भूलकर केवल उन सग्पुरुषोंने ममत, पोगपुरित चरिमें होगपना उपयोग गाना । इस अपने मान ए के लिये किसी भी प्रफारस शोक मही परमा । उसको डा करत समय-विफल्म्से परित होनेकी । उसको इस विचित्र जगत्मे हुए भी सबप भयका सना देना म01 इसलिये उससे उसके लिये कुछ मी विचार मैं अपना योगे जाप, तो मी वा उनकी वार मानेको इपय नहीं है । जगत्मसे जो परमाणु पूर्वकासमें इका किये हैं, उनें पाम पामे उसे दकर प्रणमुक्त हो जाना यही उसकी निरंतर उपयोगपूर्ण, प्रिप, घर बार परम अपिठापा है-इसके सिवाप उस पुए भी माना नाता नहीं, बीर म उसे मरी पुए पाहना हो । उसमा यो कुरा रिचरना है उसके पूरकम धरण हो, एमा ममतकर परम सAre रमना। पह बात गुम राना । हम क्या मानते है, और हम फेस बनार करना है, इस बातको जगत्का Pिमा- मा जबरन नहीं । पर भामास ना ही उनकी नमरत है कि परिदमुनिकी इप्या परती "सम्माप पुरुष
भीमा रामचन्द्र
[१, ५.
है तो संस-विकाप, पग-पको मेड़ है, और उसके माने परि तुझे कोई मापा मारम हो तो उसे
पाए उसे स्वय माम बापगी भार उसे अपने वाप छोर देगा। वहाँ कहाँसे मी सगपति
होना मेरा धर्म है, और उसका तुम्हे मी अब उपदेश करता है। परस्पर मिघ्नेपर मदि हरें
पुस मामल-साधना बतानी होगी तो बताऊँगा । बाकी का जो मैने उपर कहाही धर्म ।
भार उसका उपयोग रहना । उपयोग हो साधना है। इतना तो पार कर देमा पाहता कि विशेष
साधना तो केवल सत्पुरुषोंके चरणकम हो।
बारमभावमें सब कुछ रसना । पर्मप्यानमें उपयोग रमना । बगतके किसी भी पार्यका, मा
सपीका घटुंगो वीर मित्रका कुछ मी हप-शोक करमा योग्य नहीं है। हम परमति प'को पस
करें पी हमारा समाप धर्म, और यह इम्छा करते करते हो पा मिस पापगा, इसके रिसे निर्मित
यो। मैं किसी गम्में नहीं, परन्तु मामा , यह मत भूपना ।
बिसका दो धोपयोगके लिये ही ऐसी देहको रसमेका यो प्रयत्न करता है मामी
धर्म ही है।
म रापर्षद
मोहमपी, यासावश १० शनि १०१५
दूसरी किसी बातको मार न कर, कास एक सत्पुरुषको सोनकर उसके चरणकममें सर्वमार
अर्पण करके प्रति करता । फिर पति तुझे मोक्ष म मिले तो मुझसे पना ।
सत्पुस्प ही है जो निशदिन मपमी वाहमाके उपयोगमें सन राता है, और रिसका कफ्न
ऐमा लबो शाबर्मे महीं मिमता, भार यो पुननेमें नहीं पापा तो मी मिसका अनुभव किया जा
सकता है पर जिसमे मतरग स्था महीं, ऐसा जिसका गम भाचार ; बाकाका तो ऐसा निक्षण
है जिसका वर्णन मी लिपा वा सकता ।
पौर इस प्रकार किये बिना हेरा विकास में मौ मुटकारा होनेवाला मही। या अनुमचपूर्ण वचन
है, से व सपा सप मान ।
एक सत्पुरुपको पसम करनमें, उसको सबभाओंको प्रशासा करनेमें, उसे ही साप मानने में
पर सारी स्विगी मी निकल गई तो बनिफसे अधिक पना मवमें त्वाम्म मोझ नापगा।
५०
न से १९९५
मुसकी साडी मसी पदासीनता
मप्पास्ममी बननी है सदासीमता ।
मुझे मेटीसी उमरसे तत्वज्ञानका मोष ऐना पुनर्गन्मय सिदि करता है, फिर भीक्के
R भागमनके सात रनेकी क्या भारत्यकताtinen
मसमभामा सानो गोष
पारने एमके पति भावपोष॥१॥
विपिप पत्र मादि ममर-२१पों वर्ष बो सस्कार मापात नम्पास करनेके पार उत्पम होते हैं, ये सब मुछ बिना किसी परिममा मिट हो गये, तो फिर वप पुनर्भयको झ्या शका है।॥२॥ म्यों ज्यों बुद्धिकी अल्पता होता जाती । और मोह माना जाता है, स्यों स्यों समार-भ्रमण । बहता मावा और अतोति मसान जाती ॥३॥ अनेक तबके नास्तिरूप मचारोंपर मनन करनेपर यही निणय होता है कि मस्तिमप चार ही उत्तम है ॥१॥ पुनर्जन्मको सिदिके लिये यहाँ एक महा अनुकूल तई कि या मन दूसरे भरके बिना नही सकता । इसको विचारमसे भाग्मधर्मका मूस प्राप्त हो जाता है ॥५॥ - बि स २०१५ श्रीसपंपी मेर पिचार बात बहुत शस्त विचार करनेपर यह सिद हुआ है कि निम्बाध मुहका वाधार पुर हन, भारही परम समानि मी बस बाय बालरमको पिसे भी समारका सर्वोचम मुम्ब सन ही गई, परन्तु वस्तुतः ऐसा नहीं है । श्विक परिसे देखनेपर माक साथ सयोगस्न्य सुमके मागनका गा पिमा मन परने योग्य स्पान मी नहीं मरता । बिन जिन पार्योपर हमें प्रणा माती है ये सब पाप भीक शरारमें मानद है, आर उनको बह जन्मभूमि है। सिर पर मुम क्षणिप, के नप, मार सुबसक रोगक समानही है। उस समयका स्परपमें अकिलकर म िवसर निमार करें तो सी बात है कि यह कैसा भूम। संक्षेपमें कानका अभिप्राय यह है कि उसमें पुल मी मुठ नहीं। और यदि उसमें सुख हो तो उसका धर्महित दशाका वर्णन तो कर देमा! तब उसमे यही माश्म होगा कि यह माम्यता पर मोहदशा कारण है। पहों में सीके भिम भिम जायस पारिक मागोंका विवचन करने नही बेटा, परन्तु उस ओर पिर भी अामा म पी जाप, पह रोका, उसका सामाप मूमन किया है। तीमें कोई दाप नहीं है, परन्तु पाप तो अपनी भामा है । बार इन दोनों निकल मानसे शामा जो कुछ देगुनी यह मान जान मारपी है। इसठिप इस रापसे पहत होना, या परम भमिठापा है। प्रसार पो, मत मालकापा मा परिणम मानव ॥३॥ म मम मति भण्णा भये मार ठपोत, हेम वैम माना भया भर मानdan परीपम्नास माना मामिवार पर अमिवर राना मार ॥४n मा भरत मानहीं बता माल पिता पागा, ममाम मुराn
भीमद् पजवान
[१,५१
यदि मुद्र उपयोगकी प्रालि हो गई तो फिर यह प्रतिममय पूर्वोपार्जित मानायचे मस्सी मूठ
कर सकेगी पर बनुभकाम्प पचन है।
परन्तु मातक मुझसे पूपानित कर्मच संबंध तस्तक मी किस तरस रति हा!
चिरनेसे मुझे निम्न लिखित समाधान हमा।
उसवानका प्रामिक ये
बि स १९९५
मग में जो भिन्म मिस मत भार दशन दसनमें भाते है सब पर भेद मात्र ।
मिम मिल मो मत दिखाई दे यह कह एक रएिका हो मेद में समा मानों एक ही
पत्रके मासे पाए.॥१॥
उस सवरूप पसका मूल भारमधर्म है जो धर्म जाममको सिद्धि करता है, सो उपारेप
धर्म ॥२॥
सबसे पहिसे मामाको सिदि करनके लिये प्रामक विचार करा
अमुममा गुरमी सेना करनी चाहिय, यही पण्डित सागाने निणय किपा ॥३॥
गिसकी बारमामेसे क्षण ठणमें होनेवाली मस्थिरता बार मालिक मोर रह गया है,40
वमुमयी गुरु १ ॥१॥
निसके पास मोर पम्पतर परिमाको प्रन्थियों महा यी ठसे 0 सरम रिसे परम पुरुप
मानो ।। ५॥
से १९१५
१ मिसको मनोविनियमानमपसे महा करती है, जिसके संकम्प-विस भर पा गमे,
गिसके पाँच निपर्योसे विरत पुरिके भकुर प्रस्फुटित हुए है, जिसने शक फारम निर्मुस कर दिमे
है, वो वक्त-परिमुक एकान-रपिका संचन किया करता निसी के यही पुयाति, वर
प्रतापी पुष्प चपान होलो।
२ में ऐसा बननेका प्रपाल करना चाहिये।
मित्र मिस मत देसिन महीनो एप
एकदममा मात्रा माया मनोज॥१॥
वह कालमान, नामकर्म । मूड
समानी सिदिको धर्म है बबनुन ||
प्रथम मशिन या कमि शान विचार,
मनुमा गुने रोने दुषम्ममा म |||
पाये मारमा भने बिमाविमोहरा
नयमी पला, हे अनुभव गुजरा ४०
बाल देम मम्मा, मंच प्रान्त नहिं रोग
पाम पुख्यमेमोन्स भिबोर ॥५॥
पत्र ५४, ५५] विविध पम मादि संप्रह-२१पौ पर्प ५४ वि सं १९१५ बघेहो। कर्मकी सी विचित्र बघ-स्थिति t! निसको सममें भी इम्या महाँ होती की मिसके लिये परम शोक होता है, उसी गमीरतारहित दशासे धम्ना पड़ता है। पेनिन-ईमान नादि स्पुम्स कैसे महान् मनोमिनयी थे । उमें मौम एना, ममौन यना दोनों ही मुठम पे, ठरें जनुड्स-प्रतिकूम सभी दिम समान थे, उनें गमनानि दोनों समान पी, उनका कम फेवर भारम-समता के लिये ही था। कैसे माधर्षकी बात है कि निस एक कम्पमाका एक कम्पकायमें भी मप होना दुर्लम है, पेसी अनत कम्पनामोंको ठमोंने कम्पके अनवर्षे भागमें ही शान्त कर पिया। A स १९१५ परि दुसिया ममुपोका प्रदर्शन किया बाप तो निमपसे में उनके सासे कम भागमें बा सकता है। मेरे इन बचनोंको परकर कोई विचारमें पाकर मिम मिम कम्पनायें म करने मग गाप, अपवा इसे मेरा भम म मान बैदे इसलिये इसका समाधान यही संपेपमें किसे देता!- तुम मुझे बासंबधी दुस नही मानना, ममासबधी दुस नहीं मानना, पुत्रसबषी दुस नही मानना, कीर्तिसपी दुस नहीं मानना, भयसाधी हु, मही मानना, शरीरसभी दुष मही मानना, अपना मन्य सर्पवस्तुसंबना दु स नही मानना; मुझे किसी दूसरी ही तयका दुस ।कास बातका मही, कफका नहीं, पितका मही, शरीरका मह, पचनका मही, मनका नही वा गिनो तो इन समीका है, बोर न गिनो तो एका मी नहीं) परम्तु मेरो मिति तप्त सुसको न गिननेक लिपी स्पोंकि इसमें कुछ और हो मर्म बन्तर्वित है। स्वना तो तुम चकर मानना कि मैं बिना दिवानापनेके यह कलम पण गा। मैं रामचन्द्र नामसे कहा जानेवासा वाणीमा नामके एक छोटेसे गावमा एनेवाला, सममा साधारण रोमेपर मी मार्परूपसे माना गानबासम दपाश्रीमायका पुत्र गिना जाता है। मैंने इस दोहमें मुस्त्यरूमसे दो मन किये है, गीणका फूल हिसाब नहीं। मुटपनकी छोटी समझमें कौन मामे सि पे बी की फाफ्ना बाया करती थी। मुसकी अभिष्मपा भी कुछ कम न पी, मौर उसमें भी महछ बाग, बगीचे, ही तया राग-रग मी कुछ मनोरप पे, किंतु सबसे बड़ी कम्पना इस बातकी पौ कि यह एप स्या है ! इस कापमाका एक बार तो ऐसा फल निकम कि न पुनर्जन्म है, म पाप है, और न पुण्य है। सुरसे यना, मौर संसारका मोग करमा, बस यही हतारस्पता है । इसमेसे दूसरी सनटोंमें म पाकर धर्मका मानायें मी निकाल राठी । किसी मी धर्मक दिने पोड़ा बहुत भी मान भयमा भयामात्र न रहा, किन्तु पोका समय बीतने के बाद इसमेसे कुछ और ही हो गया।
[पत्र भीमद् रामचन्द्र जैसा होनेच मन कम्पना मी म को पी, तपा जिसके लिये मेरे विचार मानेबाम्म मेरा कई प्रफान भी न पा, तो मी मचानक फेरफार हुमा कुरा दूसरा हो भनुम पूमा और पा अनुमत ऐसा पा को प्राप' म शाखोंमें लिसा था, और म नागादियों को कम्पना हो या। या अनुमत क्रमसेमा भौर मकर मर एक ही हो' का पाप करता है। भर यहाँ समाधान हो सापगा। पा पाव अम्य वाकी समसमें भागापगी कि मुखे मूतकाल में म भोग (ए भयका मनिम्पकाभेन भय आदिके इसमें से एक भी तुम नहीं है। सिवाय कोई दूसरा फार्थ सास करके मुझे नहीं रोक सकता । दूसरा ऐसा कोई मी ससाणे पदार्य मही मिसमें मेरी प्रति हो, और म किसी मौ मयसे मरिक मात्रामें निराएमा मी नहीबार समयमें मेरी भमिसपा कुछ और और बाचरण कुछ और है। मपपि एक पक्षमें उसका कुछ कातक सेवन करना योग्य मा गाई फिर मी मे ता कहाँ सामान्य प्राति-अप्रीति, पस्तु तुम यही है कि अमिपा न होनेपर मी पूर्णकर्म मुझे पों मेरे एनेसे ही इसका अन्त मोता, परन्तु इसके कारण भले न गनेपा पदापीको देखना, सूचना और स्पर्श करमा पाता है और इसी कारणसे प्राय उपाधिमें यना पड़ता है। मारंभ, महापरिमा, कोष, मान, माया, मम अपना ऐसी ही कप बातें जगत्में कुछ मी मगी, इस प्रकारका इनको मुग देनेका म्याग करनेस परमानंद यता । उसको उपपेत कारणों से देखना पर पही महापदको पात है। अंतरंगचर्या मी कसी प्रगट नहीं की ना सकतीऐसे पात्रों मुझे दुर्ममता ॥ गई है, यही बस मेरा महादुरलीफ्ना ना जा सकता है। A स १९०५ यहाँ कुशमता है। मापको पुस्ता पार।बाप मापका बिास पत्र मिग । इस निबार पत्रके उत्तर मनमें दो पत्र भेना चाहिये या पत्र पहा- इस पत्रमें हस्थाममके संवबमें अपने कुछ विचार मापके समीप रस्ता ।इनके रहनेका खस इतना ही 6 बिससे अपना गीतम किसी मौ प्रकारके उत्तम क्रममें म्पतीत हो और अबसे उस क्रमका बारम होना चाहिये पाठवमी मापके पप भारंभ मा बर्षात् भापकरे उस कमरे बतानेच मा उचित समय है । इस तरा बताये हुए क्रम विकार त सस्कारपूर्ण है इसनिपे इस पाशय प्रकाए है। भारको तया किसी भी मामोमति अपना प्रशस्त इमकी इमा नेपारेको बास ही बात उफ्पोगी होगे ऐसी मेरी मा पता है। तत्यानकी गारी गुम्का परि दर्शन करमे गाँप तो माँ नेपप्पमेंसे यही पनि निको नाम कौन हो । महासे बाप हो ! यो माये हो। तुम्हारे पास पर सब क्या है। स्पा में अपनी प्रतीति है!या तुम दिन, मनिाणी सपना को सही राशि हो। इस वयके मनेक प्रश्न उस भनिसे इसमें प्रवेश करेंगे। भर गब बाामा इन प्रश्नोंसे सि गई तो फिर दूसरे दिबाको पातही पोषा बारा ऐगा| पलपि हा विचारांसे मतमें सिद्धि है। चार दिसे विस चम्पावाप पर ५५] विविध पत्र मादि सपा-२१ वर्ष मुस्कोडा है उसकी प्राप्ति होती है और हा विचारोंके मनमसे बनत कालका मोह र शेवा है, उपापि सके लिये मही । पास्तविक अस्सेि देसनपर जो उसे अनसतक पा सके एसे पात्र बहुत ही कम है। काल बन गया है। इन मस्तुवोंके अतको चादमामी अयशा नीचतासे ठेने बामेपर महर निकलता है, वौर वा भाग्यहीन अपात्र इन दोनों प्रकारके छोकोसे भष्ट होता है । इसलिये कुछ सतोको मपपादनम मानकर गाकीको उस ममें पाने के लिये उस गुमका दर्शन करने के लिये परत समक्तक वम्यासकी जरूरत काचित् यदि उस गुफाका दर्शन करने की उसकी अ न हो तो मी अपने इस भपके मुसके लिये-पैर होने और मरनके घीसके भागको किसी तय बिताने के लिये भी इस बम्पासको निमयसे बनरत है। यह कपन अनुभवगम्य है, यह बहुतोंके बनुमबमें लाया है, और बावसे मार्य-संतपुस्य उसक ठिये विचार कर गये है। उनोंने उसपर ननिकाभिक मनन किया है। उन्होंने लामाको सोनकर उसके अपार मामिसे गो प्राप्ति है उसकेशारा बहुतोंको भाग्यशाली बनानेके लिये बने क्रम बाप ने महात्मा अयन्त हों ! बार में निकाय नमस्कार ! हम थोपा देरफे रिपे तत्वानको गुफाको विस्मरण करके ना जापौशारा उपदेश किये हुए अनेक अपर मानेके सिप तैयार होते हैं, उस समयमें यह सवा देना योग्य ही है कि हमें बो पूर्ण बाहारकर भगता है, और जिसे हमने परमसुखकर, निवार, और एपम्प माना है, -ह सब कुछ ठसा एमनुमवगम्प है, और यही तो इस गुफाका निवास है, और मुझे निरंतर इसाको वमिपा रहा करती है।यपि ममी हममें उस भमिछापाके पूण रोनेके कोई चिन रिसाई नहीं देते, वो मी क्रम-मसे इसमें इस क्सकको भय ही मिलेगी, ऐसी उसे निश्चयसे घुमाकांक्षा है, बार यह अनुमनगम्प मी है। ममीस ही यदि योग्य निसे उस जमकी प्राप्ति हो गाय तो इस पत्रके सिने नितनी टोल फरनेको मी इण्म नही परन्तु कारकी करिनता है माम्पकी मता र सतोंको क्यारि रष्टिगोचर नहीं है, मौर ससगकी कमी है। वहाँ कुछ )- तो मी हमें उस क्रमका बीमारोपण भषय हो गया है, और यही पुसकर मा है। सक्केि राम्पसे मी मिस मुसके मिस्नेको नाशा नहीं थी, तपा जो मनत शांति किसी भी विसे किसी मा मोरपिसे, साधनसे, ससे, पुत्रस, मिश्स मपया दूसरे भनेक उपचारोंसे नहीं होनेवाली पी पर हो गई है। भव सा सिये मबिम्पकामकी माति बसी गई है, और एक साधारण भाजनमें भाषाम करता हुमा या पारा मित्र इसीके कारण जी या है, नहीं तो जीनेमे नि भयसे शका पौ । विपोप क्या करें। या भ्रम नहीं है, पहम नहीं , बिल्कुल सस्प ही है। मोनियल एक्टम परमप्रिय और बालन बस्तु उसकी प्रालिका बीजारोपण कैसे और फिस प्रकारसे मा! इस बात का विस्तारपूर्ण विचन परनेका यहाँ वासर मो, परतु पहा मुझे निश्चयसे विकासमाप, स्तना ही में पहों करना चाहता है, क्योंकि रोपन-समप गाव योगा। इस शिप जीवनको मुत्र कोई पा गाँप सब कोई इसके लिये पात्र बनें, यह सबको प्रिय यो, सबको इसमें रुचि रो, ऐसा भूतकाममें कमी हुमा नहीं, वर्तमान काठमें होनेवाय मी, भार भनि प्पकासमें कमी होगा मही, बार यही कारण है कि विकासमें यह जगत् विचित्र बना यसा है। गा हम मनुष्पके सिवाय इसे प्राणियोंकी गति देखते हैं, तो उसमें इस बस्तुका निक नहीं माम होवा भब जो मनुष्य ये उन सब मनुष्योंमें मी या बात नही देख सकेंगे २२याँ वर्ष ५७ वर्मा, स १९९६ भाई। इतना तुझे अगस्य करना चाहिये १ इस हमें ना विचार करनेवाला यह होसे मिम । इसी पा । यह या कर ले। २ तुमे हुस तो होता ही होगा, बार एसके कारण मी तुझे रिगोचर ही होते होंगे, फिर भी पदि काषित् म ते 0 वो मेरे किसी मागको पड़ जाना, इससे सिदि हो नापगी । इसे दूर करनेका गे उपाय है केवल इतना है कि उससे बायाम्पतरकी वासतिररित गना। १ उस वासकिसे रसित होनेके पर कुछ बार हो रहाका अनुम्न होता.पा में प्रति- पूर्वक करता। • उस सापनके छिपे ससग-परित्सागी हानको वापसकता है। निर्भय सारके चरणमें जाकर पत्ता योम्पी। ५ जिस माक्से का माप उस मासे साकास गने सबसे पहिले निमय कर | पदि रामे पूर्णकर्म सम्मान गते ऐ तो जापागी अपना देशपागी हो ग, किन्तु उस वस्तुको भूबना मत। ५ सम्से पहिले जैसे बने से त् अपने मोक्नको जान । माननेको नसरत इसलिये है जिससे तो मचिम्पसमाधि हो सके । इस समय अप्रमादरी होकर राना । ७ इस जायुके मानसिक माहमोपयेगको केस रमपमें रस । ८ गौतम भाव मेठा है, उपाधि पात है और उसका त्याग न हो सकता हो तो मौका पाते पुनः पुनः ममें रस- १ उसी पहचकी ममिमया रक। २ संसारको धन मान । १पूर्वकर्म नहीं है, ऐसा मानकर प्रत्येक धर्मा सेवन करता जा; सिर भी पदि पूर्पकर्म दुमदे तो कोक नही करमा । १ मितनी देहकी चिंता रसता है उतनी नए किन्तु उससे वर्मतगुनी मषिक बारमा बिता रस, पोंकि एक मवमें अनतमय दूर करमे है। ५पर तुमसे कुछ पारण किया जा सके वो हननेका भम्यासी बन । मिससे मितना कर सके उत्तमा कर । परिणामिक चारपाठा बम । ८ अनुत्तरवासी कर प। ९ प्रतिमाप अनिम उदेश्यको मत भून गाना पचभमुरी और नदी धर्म है।
पर ५८, ५. विविध पत्र मावि समर-२श्वौ वर्ष बई, कार्तिक । स १९९६ समापूर्वक भम्पमाषी होनेवालेको पचाताप करनके वासी पोरे अवसर जानेकी समावना है। हे नाप ! यहि सातवें तमतमप्रभा मामक नरककी वेदना मिली होती तो शापित् उसे स्वीकार कर लेता, परन्तु अगत्की मोरिमी सीकारी नहीं जाती। यदि पूर्वक अझुम कर्मका उदय होनेपर उसका पेदन करते पुए शोक करते हो तो भब इसका भी ध्यान रक्यो कि नये कौका बब करते हुए मैसा दुसद परिणाम देनेवाले कर्मोका तो बम नही रहे। यदि भास्माको पहिचानना तो बाहमाका परिचयी, और परमस्तुका त्यागी होमा चाहिये। गो काई वफ्नो नितमी पौवालिक यमाई पाहता है उसकी उतनी ही बामिक योगविणे जानेको सभावमा है। प्रशस्त पुरुपको मकि कणे, उसका स्मरण करो, उसका गुणचितम कर। . ५९ बम्बई। स १९१६ प्रत्येक पापका अपत क्विक करके इस मीषको उससे अधिस रस्से, ऐसा निर्मप कहते है। जैसे पुर स्मारिकमें मग्य रगका प्रतिमास हानेसे उसका मूग लस्म एझमें नही जाता भैस र निर्मल पा पेक्न अन्य सपोगके तदनुरूम भम्पास अपने सहपके मसको नहीं पाता । इस्प मावको पोरे गात फेरफारफे साप जैन, वेदांस, सांग्स, योग मादिने भी कहा है। - ६० माई, वि स १९०१ पुरुप प्रपमे 'सार मिस या पुरुष अपने भापको ही समय करके यह सब कुछ उसकी बब बतरंगने ऐसी दशो कि बिना किसी अपना उसने सभी ससारी मनोको मी विस्मृत कर दिया है। पकुछ पा मी चुका है, और ए पूर्णमा परम मुमुक्षु मी है, पबन्तिम मार्गका नि धक अभिलाषी है। अमी हामें गो भावरम उसके उदप बाये है, उन भावरणास इसे सेद नही, परम्नु बस्तुमा में होनेवाली मेवाका असे पर। बाधर्मको विधि, वर्षकी विधि, और उसके बारस मोक्षकी विधिको प्रकाशित कर सम्वा । इस काम महुत ही कम पुरुषों का प्रप्त इजा होगा, ऐस धपोपशममात्रका धारकप पुस । उसे अपनी सविफे लिये गर्व मही, तर्फक ठिये गई महा है, तथा उसके लिये उसन भीम रामचन्द्र पक्षपात मी मही है, ऐमा होनेपर भी कुछ बातें ऐसी हैं मिमको उसे मानाचारमें करना पाता, इसके लिये उसे है। उसका भब एक विषयको छोड़कर दूसरे विषयमें ठिकाना नहीं । यपि र पुरुष वाश्म उपयोगबाग ६ तथापि उस तीक्ष्ण उपयोगको दूसर किसी भी विषयमें गानेका प इमरुन। " बम्बई से १९५५ एक बार इस्वमुखममें बैठा था। बगम कीन मुखी है, उसे गरा दे तो सही। सिर अपने किये भफ्ना विचार करें। इसकी इस अभिगाकी पूर्ति करनेके लिये अपना सप उस समय स्थानको देखने के लिये बातसे पुरुष (वारमा ), भार बहुतसे पदार्थ उसके पास बामे । "ममें कोई गा पदार्य न था।" "कोई ती वामा भी देसनेमें न बाई । मि कुछ देहमारी ही पे। उस पुरुपको शंका ये मेरी निरपिके लिये वापे है। पास मामि, पामी भार भूमि इनमेसे कोई क्यों नहीं मापा ! (नेपप्प) ने सुसका विचार तक भी नहीं कर सकते । २ विचारे दुससे फ्पपीन है। सिन्द्रिय गाव स्यों नहीं बाप ! (नेपप्य ) इसका मी यही कारण है । चरा आँस उठाकर देसो तो सही। उन विधाको कितना अधिक उनका परम उनकी परपणट, पराधीनता स्मादि देसे नहीं जाते। ये बहुत ही बधिक (नेपप्प ) इसी गाँसे मब तुम समस्त जगत् दस छो । फिर इसी बात करो। बी बात है। दर्शन वा, भानंद पापा, परन्तु पीस के उत्पम गुमा। (मेपप्प ) कब सेव कपों करते हो। मुझे मो कुछ दिखाई Pया क्या पाठक पा। " मदि ठीक पा तो फिर पक्राती बार राती पो दिखाई देते हैं। "मोसी होते है ये दुपी मार मो मुसा होते है ये पुची दिखाई देते हैं।" जो स्पा परतासी मही है। ॥सा देसी पैसा मानो । यदि विशेष देखना ये तो पछो मेरे साप । पायतामाकरणमें प्रवेश किया। अपकरण देखते ही मुझे माम्म म पहिले यो देसा था गोठालया। उसका करण गुप्त हाही था । मर्मत प्रकारके भोसे परपर कॉप पा था। सनायुपको गेराजे निग गा पा । हापमासमें उसकी पि पी। फैकरों में उसकी प्राति पाप और मानव उपासक था। वस।
विविप पत्र मावि संप्रह-२२खौ पर्व पण, तो क्या देखोकी दशाको क समझें । "निषय करने के लिये असो इन्द्र के अन्त करणमें प्रवेश करें।" तो चलो- (उस श्द्रकी मभ्यताने भूमें राल दिया । या मी परम दुसौ था। विचारेको मुत ऐकर किसी वीमस स्पसमें चन्म सेना पा, इसलिये यह सेद कर रहा था । उसमें सम्पपटि नामकी देखो यती पी । पर उसको उस सेदमें सोचना दे रही थी । इस महान सक सिवाय उसे और मी मातसे सम्यक हुसपे। परन्तु ( मेपप्य ) क्या ससारमें बोला जय मौर अकेली बारमा नहीं है। उनोंने मेरे इस वामऋणको स्वीकार ही नहीं किया । "जरो शान नहीं है इसलिये या विचारा तुम्हारे इस मामऋणको कैसे साकार कर सकता है। सिद ( एकरममाषी ) मी तुम्हरे वामत्रमको स्वीकार नहीं कर सकत । उसमी उनें कुछ मी परवा नहीं।" मरे! इतनी मधिक मेपरमाही । पर्ने वामत्रम तो स्वीकार परमा ही चाहिये, तुम क्या करते हो। "परन्तुइमामत्रण-अनामत्रणसे कोई सबध ही नहीं। वे परिपूर्ण स्वरूप-सुसमें पिराममान"। में मुझे बतायो । एकदम-बहुत मस्दीसे । उनका दर्शन बहुत दुख है। इस गमनको काम गे, पुसते ही उनके दर्शन हो माफो।" महो! ये गुत मुसी भय भी नहीं, शोफ मी मही, हास्य मी मही, परता मी मही, रोग भी नही, माधि मी मही, म्पाधि मी नहीं, उपाधि भी मही, इत्यादि कुछ भी नहीं। परन्त के बमवानव सचिदानद सिरिसे पूर्ण है। हम भी ऐसा ही होना चाहते हैं। म क्रमसे हो सकोगे"। पम्म म हमें नहीं चाहिये, हमें तो तुरन्त ही यह पद चाहिये । "जरा पम्त शेगो, समता रक्सो, मार मामको अगाकर करो, नही तो उस पदपर पांच मेकी समानना नही"। "ए, यहाँ पहुँचमा समय न0" तुम अपने इस पचनको वापिस गे। परम सौम बतानो मार उस पदमें नमी तुरत ही मेमो । "तसे मनुष्य भाये है। पी मुममो । उममेसे में प्रम मिझ सकेगा" की ही पी कि इतने में ला गपे- बाप मेरे भामत्रणको लोकारकर यहाँ बसे भापे इसके लिये मैं जाप मागोका उपकार मानता है। भाप डोग सुखा है, क्या या बात ठीक है। क्या वाफ्का पर सुखयुक्त गिना जाता है। एक र पुरुपने या--" तुम्हारे वार्मण साकार करना अपना न करना ऐसा हमें कुछ मी परन महा है। हम सही है या दुखी, पार बताने के लिये भी हम यहाँ म बापे है। अपने । २२ " " भीमद् रामचन्द्र [१ पदको म्यास्पा करने के लिये मी हमारा यहाँ बाना नहीं मा। हमारा मागमन कुमार कम्पाणके रिप पाहै। कृपा करके शान करें कि बाप मेरा क्या कायाण करेंगे। इन बागम्तुक पुस्मोन परि पप तो करदये । उसने इस प्रकार उन परिपप देना शुरू किया'-~- बाम 4१७८९१०१२ नंबरबाले मुल्पत मभुम्प हो। और ये सब उसी पके बाराषक योगी र मिस परको तुमने प्रिय माना है" " नबर चौपसे सेकर य प पुखरूप है। भौर बाकीको अगत्-मबस्पा जैसे हम मानते हैं उस ये मी मानते हैं। उस पदके प्रास करमेकी उनकी छर्दिक अभिपया परन्तु वे प्रपन मही कर सकता कि पारे समपतक उने बतराय है। नवपय क्या करनके लिये तत्पर हुए नि महाही समझना चाहिये । पर-म बन्दी न करो । उसका समाधान तुमें नमी होनेवाला है, और हो ही गापगा। टीक, आपको इस बातको म माने ता । पर -नबर ५५" मासा कुछ प्रपन भी करता है, और सब बातोंमें एम " केही अनुसार। मबर " पारम सब प्रकारसे प्रयत्न करता है, परन्तु प्रमत यासे उसके प्रफनमें मदवा का नाती नंबर "७ माग मा प्रकारसे मामलमासे प्रणाम करता। नपर"८-२१ 'पा उसकी अपेक्षा कमसे उम्पस है, किन्तु उसी नातिके है । नबर "११' पाग पतित हो जाता है इसम्मेि उसका पहा बाना ही सका । दर्शन होने के लिये में बारों में हो (हरा हमें उस पदको सम्पूर्ण देसमे बाण) परिपूर्णता पानेवाल। मासु-स्पिति के पूरी होनेपर सपने देखे गए फरमेंसे एक परपर तुम मुझे मी देखेंगे। पितामी!-बाप मामापशाला। ऐस नंबर किसने । नर-अपमके तीन अंबर तुममें नमुन मी मागे । म्पायनों नबर मी वनइम नही होगा। मबर १९११' मा तम्हारे पास बा ऐसा उनको कोई निमित म0पा। पपद मा बाप परम्त पैसा तुलारा पूर्व धर्म हो तो ही उसका बागमन हो सकता है, अपपा मही। पोबारक मानेके कारण माननेको (म मी मत करना । उसका करण कुली नहीं। (पप्प) मुम इन सबोंडे वतरमें प्रवेश करो। मैं हाक ऐता । पगे। नबर १ स सकर ११+१२ तकमे बम कमसे मुक्की उत्तर भरती पर " नंबर " उमायापी वधिक क्या करें। मुझे परमात प्रिय ध्गा । और 40 मुझे वपमा भगा।
पा १२] पिपिप पर मादिसपा-२खों वर्ष परने मेरे मनोगत मावको बानकर कहा -पस, यही तुम्हारा कम्याण मार्ग। इसपरसे होकर जाना चाहो तो भी बात है, और नमी नाना तो ये तुम्हारे साथी ये। में उठकर उनमें मिस गया । (स्वविचार भुवन, बार प्रयम) હર बई, कार्तिक मुदी ७ गुरु १९९६ इस पत्र के साथ भरक वीर योगबिन्दु नामकी दो पुस्तके वापको टिसे निकल भाने के लिये मेन या हूँ। योगक्नुिका दूसरा पृष्ठ हिनेपर मी नहीं मिल सका, तो मौ बाकीका माग समझमें वा सकने जैसा है, इसलिये यह पुस्तक मेमी है। योगष्ठिसमुघय बादमें मेगा । परम गूद तत्तको सामान्य मानमें उतार देनेकी हरिमवाचार्यकी पमहति प्रशसनीय है । किसी स्परपर सापेक्ष संग्न मनका भाग होगा, उसफा गोर बाफ्की पि नहीं है, इससे मुझे मामद है। यहि समय मिल्नेपर अप' से मेकर ' इति' तक मक्सोफन कर नायगे तो मेरे उपर स्पा रोगी । (जनदर्शन मोसा बसा उपदेश करनेवाला चौर मास्तविक तत्वमें ही प्रदा रसनेवाला दर्शन रे फिर मी पुछ छोग उसे 'मास्तिक 'काकर पहिसे उसका संगन कर गये है, यह साम ठीक नहीं इबा इस पुस्तकके प नानेपर यह बास मापको परिमें प्राप मा बायगी)। मैं मापको मधर्मसमधी अपना कुछ मी वाह नहीं बताता । वौर वारमाका यो स्वरूपम स्वरूप उसे किसी मा उपायकारा मिल जाप, इसके सिवाय दूसरी मेरी कोई मातरिक अमिठापा मही है। इसे किसी भी तरसे काकर पा बनेको वा माँगता कि मदर्शन मी एक पवित्र वर्णन है। पर बल पड़ी समझकर कह रहा कि जो वस्तु मिस रूपसे स्वानुमनमें भाई हो, उसे उसी रूपसे करना चाहिये। सब सत्पुरुष के एक मार्गसे पार हुए हैं, और यह मार्ग वास्तविक पारम्यान भार उसकी बमुचारिणी देशका स्थविपर्यत सत्रिपा अथवा पमरेप और मोहरहित दशा एना; ऐसी दशा गनेसे ही र वत्त उनको प्राप्त हुना है, ऐसा मेरा स्वकीय मत है। बारमामें इस प्रकार किसनेकी ममिलापा पी इसलिये पर किसाहै। इसमें यदि कुछ म्यूना- चिक हो गया हो तो उसे क्षमा करें। प, वि सं १९५६ कार्तिक (१) पर पूर्ण कागजपमानों सर्पम्पापफ चेतन है। उसके कितने मागमें मापा सम! माँ नहाँप माया हो यहाँ हाँ चेतनको ष समझें पा महो। उसमें पुरे मुद्दे पोषोंको किस तए मानें ! और उस जीवको बप होना किस तर माने । उसपको निति किस प्रकार माने ! उस गपकी निापि होनेपर वनके कानसे मागको मापा- रित मा समझें निस मागसे पहिसे मुल र क्या उस मागको निराकरण समा पा और
माम राजवन्द्र
[स
कुन बार एक नगर निगरपना, दूसरी जगह भाहरण और तीसरी जगह निराकरम ऐसा कैसे
बन सकता है। इसका चित्र बनाकर विचार करो।
सम्यापक मारमा
सित रोख
माया
जगत्
पटाभरा, चौव बोप फ्टम्पम क्या फल है।
मोम
'पिराद
लोक
ईपर
चेतन
कोअपरण
।
स वए तो पर ही ठीक नहीं बता ।
(२) प्रकाशतरूप पाम है।
उसमें अनंत मप्रकाशसे भरे ए तकरण है। उससे फर क्या होता है।
फस पर होता है कि नहाँ हाँ ये मत करण म्पास हो जाते है यहाँ मापा मासमान
होने प्रगती है मारमा सगरमित होनेपर भी सगसरित माश्म होने मगती है, बकर्ण होनेपर मी
फर्ग मास्म हा माती। पारि भनेक प्रधरको विपरीततार Pat देने गती।
तो उससे होता क्या है!
बामाको पका कम्पना हो तो उसका क्या करें !
पन्त करणका सम्पप र करमेके सिमे उसे उम्से मिम समझें ।
मिम समझनेसे क्या होता है!
मात्मा निमनप का पर्व है।
किर नारे एक निरागरण से अपना समीश निस्तरण ।
२३वाँ वर्ष ६४ बर्ग, १९४६ कार्तिक सुदी १५ सवत् १९२९ में कार्तिक सुदी १५ को रविवारके दिन मेरा जन्म मा था। इससे सामान्य गणनासे वाम मुन्ध गाईस वर्ष पूरे हो गये हैं। इस बाईम वर्षकी अल्पवयमें मैने आस्मासंबवा, मनसबधी, बचनसमयी, तमसबधी, और धनसबंधी अनेक रंग देसे है । नाना प्रकारकी सतिरपना, नाना प्रकारको सांसारिक बरे गौर भमत टु सके मूसकारण इन सबके अनेक प्रकारसे मुख अनुभव हुए है। समर्प तत्वज्ञानियोंमे वीर समर्थ नास्तिकौने मो गो विचार किये है, उसी तरके बनेक विचार मैंने इसी अन्पायम किये है । महान् चक्रवर्तीशरा किये गये तृष्णापूर्ण विचार और एक निस्पृही बारमाधरा किये हुए निस्तापूर्ण विचार मी ममे किये है। भमरतको सिदि मौर धणिकालको सिरिफर मैंने सूब मनन किया है। बम्पलपमें हो मैने महान् विचार कर पाले है, वीर महान् विचित्रताको प्राप्ति हुई है। मब इन सब वावोंको बात गमारमावसे वाम मैं पान पूर्वक देस जाता है तब पहिलेको उगती मेरो विचारमेणी वीर बाम-दशा तपा मामको विचारणी और भाम-दशामें भाकाय पताका बतर रिसाई देता है। यह असर इतना बहा कि मानों उसका दौर सका मन्त कमी मी मिलाया नहीं मिलेगा । परन्तु तुम सोचोगे कि इवनी सब विधि तामोंका किसी स्थहपर कुल मेटन मया मिश्रण कर रहा है या नहीं ! तो उसका इतना ही उपर दे सकता कि यह सब हेसन-विश्ण स्मृतिके चित्रपटपर ही बंकित है, अन्यथा सेसनाको उठाकर उन जगत्में बतानेका प्रपन कमी नहीं किया । यपि मैं यह समझ सकता है कि यह पप-चर्या बनसमाको बहुत उपयोगी, पुन पुन मनन करन पोम्प, और परिणाममें उनकी वरफसे मुझे मेपको प्राप्ति करानेवासी है, परन्तु मेरी स्मृतिने पैसा परिथम उठानेकी मुझे सपा मना को पौ, इसलिये चार बोकर क्षमा मांगे मेता है। पारिणामिक विचारसे उस स्मृतिकी इच्छाको दबाकर उसी मतिको समसाकर पर सका वो उस बय-पाको धीरे धीरे कमरय भरस पत्रपर निगा । तो मी समुचफ्लप-पर्याको मुना वाता- १ सात पर्वतक मित बापय सम्मान में मोती यौ । उस समयका केवल इतना मुझे पार पपता है कि मेरी मामा विचित्र सपना (पनाके स्वम्प अपना हेतुको समझे बिना हो)मा करती पी। सेस-रमें मी विजय पामेको मार रामराजेश्वर सी पी पपा प्राम करनेको मेरी परम मिळणारा या करती पो । पम परिमनेको सश एनेको, पाने पामेको, सोन टनेकी मेरी सभी दशायें विदेशी पी फिर मा मेरा इय चमठ पा । यह दशा बब भी मुझ गात या माती है। यदि मागका विकयुक्त ज्ञान मुझे उस मास्थामें होता तो मुझे मोक्षके लिये बहुत अधिक जमि- काता न र पाती । ऐसी निरपराप दशा होनसे पा दशा मुख पुन पुन या जाता है। २ सात वर्षसे म्याद वर्ष तकका मेरा समय शिक्षा प्रान करनेमें बीता था। मात्र मेरी स्पतिको मितनी प्रसिदि उस प्रसिदिके कारण पा का हान जैसी वाश्य मारम होती है, पर श्रीमद् पस्चन्द्र [पर १४ उस समयको स्पति विशुर ऐनेसे पिस एकबार । पाठका पामेकम करना पता था, फिर भी कैसी मा स्पाति पानेका हेतु न पा इसभिये उपाधि हात कम पौ। स्मृति इतनी अधिक प्रबडयो किसी स्मृति इस कामें इस क्षेत्रमें पाव हो पोरे मनुष्योंकी होगी। मैं बम्बास परमेमें भाव प्रमाण पा, मात बनाने में होशियार, सिगदी और बहुत बानी गोल पा । जिस समय पाटको शिक्षा माता पा उसी समप पाकर मैं उसका भावार्य कर जाया करता या बस इतनेसे इस तरफसे पी मिस पाती यौ । उस समय मुन्नमें प्रीति और सरस मास्सत्य बहुत था मैं सबसे मित्रवा फै। करना पाहता पा सबमें मातमाव हो तो हो मुसो, या विपास मेरे मनमें सामाणिस्पसे या करता था । गोगोंमें किसी मी प्रकारका जुदाईका बकुर देखते ही मेरा बत करण ये पाता था। उस समय पम्पित माते करमेकी मुझे बात बात पौ । बाटो मैने कविता की पी, गो पीछेसे जाप करनेपर प्रशासके नियमानुछ ठीक निकली। अभ्यास मने इतनी शीप्रवासे किया था कि मिस भादमीने मुझे परिसी पुस्तक सिवानी पुर को पी, उसाको मैंने गुजराती भाषाका शिक्षण ठीक तबसे प्राप्त करके, उसी पुस्तकको पापा था। उस समय मैंने कई एक काम्प-ग्रंप पाकिये थे, तया अनेक प्रकारके छोटे मोटे, उम्टे सोचे शान- मंप देख गया था जो प्राय का मी स्मृतिमें है। उस समपतक मैने स्वाभानिस्लपसे भरिकताका सेवन किमा पा । मैं मनुप्पमाविका बहुत विमाम पा | सामाविक परिरचनापर मुझे बात ही प्रीति पी। मेरे पितामह हणको भाव किया करते पे । उस वपमें मैंने उमके कृष्ण कामके फोको, तपाहु लदे मातरमषी धमकमाको मुना पा । जिससे मुझे उन क्रवारोंमें मलिक साप साप प्राप्ति मी उत्पन्न हो गई थी और रामरासनी नामके साधुसे मैंने बागमें कठी मी पाई पी । मैं निस्प होणके दर्शन करने जाता था। मैं उनकी बात बार कपामें धनवा पा; मिससे सताके चमकापर बारबार मुग्प हो गप्पा करता पा, पौर उमें परमात्मा मानना था । इस कारण उनके यनेका स्था देखनेको मुझे परम उत्कंठा पौ। मैं उनके सम्प्रदायका महत अपना स्पागी हो तो किमना बाना मिले बस यही कम्पना हुला करती पी | तपा सब कभी किसी पन- पैमनको विभूति देखता तो एमर्थ मनशाम होनेको इमामा करती थी। उसी बीच प्रमाणसागर नामक प्रप मी में पा गया पा । पपपि उसे बधिक समष्ठा तो म पा, फिर भी पासपी मुभमें साल दो और निरपाधि होकर कया अषण करते हो तो कैसी भागद-दशा हो! यही मेरी कृष्णा या करती थी। गुजराती मायाका पारमासमें गई एक जगहमें जगककि सर्वपमें उपेश दिया गया। या उपोश मुझस हो गया पा। इस कारण जैन लोगों से मुस पहत पणा या करती पौ । कई भी पदार्प पिमा मनापे कमी नहीं बन सकता, इसरिये जैन लोग मूर्व, उमें कुछ मी समर मही। उस समय प्रतिमा पूजनके बमदा मेगाली मिपा मी मुठं वैसी 0 Pसर्व देवी पी, इसलिये उन किसानों के मान गनेके शरण उनसे में बहुत सता पा, अर्यात में लिपा मुझे प्रिप मही भाती थी।
पर १५] विदिप पत्र भादि समाह-यो वर्ष मेरी पन्मभूमिमें मितने षामिळ गेग गते ये उन सबकी कुम-प्रया यचपि मिम मिम थी फिर भी पए पोपी बार प्रतिमा पूजन के अमवालके ही समान यो, इस कारण उन लोगोंको ही मुझे सुधारना पा। सोग मुझे पहिसे ही समर्प शाजिवाला और गाँपका प्रसिद्ध विपापी गिनते ५, इसलिये मैं अपनी प्रशसके कारण नानासकर ऐसे मडल्में बैठकर अपनी चपस शक्ति दिसानेका प्रयत्न किया करता पा। ये लोग कठो बाँधने के कारण वारपार मेरी हास्यपूर्वक टीका करसे, तो भी मै उनसे वाद-विवाद करता पौर उमें समझाने का प्रयत्न किया करता पा । परन्तु धीरे धीरे मुझे उन लोगोंके प्रतिक्रमणसूत्र त्यादि पुस्तकें पहनेको मिण । उनमें गत मिनपपूर्वक जगत्के समस्त गावोस मित्रताकी मावना म्पक की गई पी, इससे मेरी प्रीति उनमें मी उत्पम दो गई भौर पहिम्में भी हो । धीमे धीमे यह समागम कहता गया, फिर मी स्वय गनेके गौर दूसरे प्राचार-विचार मुझे मेणवोंके ही प्रिय थे, सपा अगरकाकी मी भदा थी । इतने में बैठी टूट गई, और इसे दुपारा मैंमे नहरी पाँची । उस समय वोधने न बाँधने का कोई कारण मैने नहीं स्टा या । यह मे तेरा वर्षको मप-चर्या है । इसके बाद मैं अपने दुकानपर बेटने ज्या था, अपने मायकी छटाके कारण कण दरबारके महलमें लिस- मे म्पेि नव बन बुलाया जाता था तब तय कहाँ बाता था । दुकानपर यते हुए मैने नाना प्रकारको मौन मनायें की है, भनेक पुस्तकें पढ़ी है,राम आदिके परित्रोंपर कविता रची है, सांसारिक तृष्णा- पें की है, तो मी किसीको मैने कम अधिक मात्र नही कहा, वक्या किसीको कम म्पादा तोरकर नही दिया, मा मुछे बराबर याद नाया। पई, कार्तिक १९९५ दो भेदोंमें निभळ भर्मको तीर्थकरने दो प्रकारका बताया है १ सर्वसगपस्यिागी २ देशपरित्यागी सपरिस्पागा- उसके अधिका- पात्र, क्षेत्र, काठ, भाष पात्र-वैराग्य मादि सक्षम, त्यागका कारण, और पारिणामिक मानध मोर देखना | क्षेत्र उस पुरुपको जन्ममि बौर त्यागभूमि में दोनों । कार-अधिकारीको अवस्था, मुप्प पार फार। माव-दिनप बादि, उसकी योग्यता शकि, गुरु उसको सबसे पहिण मा उपदेश करे; पर- सैमासिक माघारंग इत्यादिसबभी विचार; उसके नबाशिव होने के कारणसे उसे सतत्र विहार करने देने वाला स्यादि।
भीमद् पनपन्द्र [ निम्पपर्या पर्पस्प अन्तिम बरस्पा -~-ये बातें परम वापस्यको देवापागा- अपश्मिा निश्पकम्प मति अणुक्य पान, चो, तप, भातका स्वरूप, बालके लिये उसका परिकार | -ये बातें परम भापकर (२) जानका बार- भुवानका उदप करना चाहिये । पोगसबंधी प्रप त्यागसमी प्रय प्रक्रियासमंत्री प्रेय अम्पारमर्सवपी प्रय धर्मसनको प्रय उपरोध प्रेध माम्मान प्रेप प्रम्पानुयोगी प्रप -स्पानि रिमाग करने चाहिसे -उमएम और उपकरमा पहिरो निय धर्म गा वाचार्य प्रवचम उपाभ्याम्प दम्पकिमी मुनि कम्य दर्शनसपी सस्प -इन सबड़ी योगना करना चाहिये मतमतांवर मार्गको शैग उसफा सस्प भाषमा बिताना उसको समझाना उपोत पर विचार। ६६ बम्बई, कार्तिक दी एफ. १९९१ माना प्रकारके मोहके होनसे बारमाकी पर अपने स्वामानिक गुणसे उत्तम सुनकी प्राप्ति कामोर जाती है, और बादमें उसे प्राप्त करनेच प्रयत्न करती है, यही हि उसे उसका सिवि प्रदान करती है।
पत्र, ५८] विविध पत्र मावि संप्रह-पीपर्प ६७ पी, कार्तिक बदी ३ रवि १९९६ हम भयुके प्रमाणको नहीं मानते । बाल्यावस्था तो नासमझौम म्यतीत हो गई । कम्पना करो कि २६ वर्षकी वायु है, अपना इतनी बाप है कि नवावस्थाका दर्शन कर सकें, परन्तु उसमें शिपिळ दशाके सिवाय हम दूसरी कुछ मी बात म देख सकेंगे । भव केवल एक युवावस्था माको गधी, उसमें मी पदि मोहनापको प्रयस्ता न घटी तो मुसकी निद्रा न आयगी, निरोगी नहीं रहा जायगा, मिष्या सकप विकल्प दूर न होंगे, और बगह जगह भटकना पड़ेगा-जोर पा भी ना होगा जब कि प्रति रोगी, नहीं तो प्रथम उसके प्राप्त करने का प्रयत्न करना पड़ेगा । उसका इन्मनुसार मिझना न मिलना तो एक मोर गा, परन्तु शायद पेटभर वम मिलना भी दुर्सम दो नाप । उसीकी पितामें, उसीके विसम्पमें, और उसको प्राप्त करके मुस मोगेंगे इसी संकम्पमें, केवरु दु सके सिवाय इसरा कुछ मी न देख सकेंगे। इस मरस्पामें किसी कार्यमें प्राति करनेसे सफल हो गये तो माँस एकदम तिरण से बॉयगी । य िसफल न हुए वो छोकका तिरस्कार और अपना निम्फस सेद मात इस देगा। प्रत्येक समय मृत्युका भपबाग, रोगका भयवाला, बीविकाका भयवाला, परि यश मा तो उसकी रक्षा करनेका भयवासा, यदि अपयश हुआ तो उसे दूर करनेका मयवाडा, यदि अपना नामा तो उसे केनेका भवाग, यहि फर्म दुमा तो उसकी हायतोवाका भयान, यदि सी हुई तो उसके का भयबाटा, पदि मई तो उसे पानेका प्रचारबाला, यदि पुत्र पौत्रादिक हुए तो उनकी चिन्ताका भयवाल्म, यदि न हुए तो उन्हें प्राप्त करनेका विचारवाला, यदि कम प्रति तो उसे सानेके विचारणाला, यदि अधिकई तो उसे गोदामें मर फेनेका Aधारपाण, स्पादिम्पसे दूसरे समस्त सापनों के लिये मी अनुभव होगा । कमसे कहो अपना भक्रमसे, किन्तु साक्षेपमें करने का तात्पर्य यही कि मुस्का समय कौनसा हा बाय-वास्यास्पा ! युवावस्पा' रावस्पा! निरोगावस्या ! रोगा- पस्पा ! भनावस्था ! निमावस्या । गहस्यावस्था । या वहस्पारस्पा ! श्व सब प्रकार के पाप परिभमके बिना अपरगके श्रेष्ठ विचारसे गो कि हमारे ही हमें इस पि कराकर मका के रिपे मुसी बनाता है। इसका अर्थ क्या । इसका अर्थ यही है कि अभिक नि तो मी एसी, म नियें तो भी सुना, फिर सम सेना पो तो मी सुखी, और माम म हो तो मी मुसी। पई, कार्तिक १९९६ ऐसा पवित्रदर्शन हो जाने के बाद रिपो जैसा मी वाचरण स्पों न हो परन्तु उसे तीन बधन मही रहता, अमत संसार महो रहता, सोम मा नहीं यते, अम्पतर दुस मही पता, एकामा निमित्त मही रहता और बतरग-मोहिनी मी महोणती। उससे सत् सत् निरुपम, मोचम, मुख, पत्तिस, अमृतमय दर्शनान, सम्यक् म्योतिर्मय, घिरात वादको प्राप्ति हो जाती है। उस वहत सरप दर्शनको मसिहारी है। महा मतभेद नही, मका, संसा, वितिगिष्णा, मणि, इनमें कुछ मामी को कुछ भीमद् रामवन्द्र [९. है उसे कम किस मही सकती, चमारा उसका वर्णम नहीं हो सकता, और उसे मन भी मरी मनन कर सकता- ऐसा । बर्मा कार्तिक १९१६ सा दर्शनासे उच्च गति हो सकती है, परन्तु माधक मार्ग हानियोंने उन पर सस रूपसे नहीं कहा, गोमतासे रममा ह । वसे गीण क्यों रक्सा, इसका सोचम भारम यही माम होता है निस सम्प निश्रय भवान, निपानी गुरुको प्रम्ति, उसकी बाहाका बाराभन, उपक समाप संग राना, अपना ससगको प्राप्ति, पे बातें हो जायगी उसी समय यात्म-दर्शन पास होगा। कमाई कार्तिक १९९५ ७० नवपर-म्पानियोंकी गदि करमेकी मरी बाकांक्षा । ७१ बमई मंगसिर मुदौ १-२ र १२१॥ है गोवम ! उस घालमें बार उस समय में प्रस्थ बम्पामें एकादश वर्षको पर्यायसे, म पामते, सामानाने साप हातर पभर्पा और सपमपूर्षक बामलको भातमा भावे पर पूर्वानासे पम्ते एए, एक गाँसे दूसरे गा में नात ए पपमारपुर मामक मगरके भोजनमा नागके मोककर सके मात्र प्रभाषितापापर माया | बार होकार पके मारे, प्रमाक्षिणा- पाके उपर, बाम मत माण करके दानों पैरो संकुचित भो हापोंको मा करके, एक पुलमें रशिको स्पिर करके निमेपरित नयमोसे जरा नीरे मुख रसकर, पोएको समाधिपूर्वक, सब इन्द्रियों को गुम करके एक पत्रिका महाप्रतिमा भारम के विचरता था। (चमर) ७२ पी, मंगसिर मुरी १ मि १९९५ तुमने मेरे लिम्पमें गो गो प्रशामा डिसी उसपर मैने गत मनमकिपा ।मिस तब से गुण मुसमें प्रकाशित हो, उस तराका भाचरण करनेकी मेरी मामिडापा है, परन से गुणा मुखमें प्रकाशित से गपे में ऐसा मुझे तो माम नहीं होता। मधिसे मभिक यह मान सकते है कि मात्र उमको कषि मुशमें सत्यम है। हम सब स बने तसे एक ही परके शक ऐकर प्रपनहाल होते है, और पा प्रपन पर सहमोको पाना' । मामाम बात है जिस व्ययम ५ सके उस तय माना ।
पा.३, ४, ५, .५] विविध पत्र मादि समा-२५ वर्ष ७३ बर्मा, पौष सदी । पुष १९१६ नीचेके नियमोंपर पात मय दिया जाना चाहिये- १ एक बात करते हुए उसके बीच ही मावश्यकता बिना दूसरी बात न करनी चाहिये । २कही गई यातको पूरी तपसे मुममा चाहिये । ३ सय धौरसके साप ठसका उचम उत्तर देना चाहिये । • मिसमें बारम-बाधा अपना मारम-हानि न हो पर बात करनी चाहिये। ५ धर्मफे स्वपमें हार्म यास ही कम बात करना । ६ डोगोंसे धर्म म्यवहारमें न पदमा । ७४ बम्बई, पौष १९९५ मुझे तेरा समागम इस प्रकारसे क्यों हुआ ! क्या कही व गुप्त पका हुवा पा! सर्वगुणासही सम्पाव। ७५ पई, पीप मुदी ३ बुध १९१२ पातसे उत्तर सापोंसे यदि कोई ऐसा योजक पुरुष (होनेकी इच्छा करे तो) धर्म, अर्थ और कामको एकता प्राय एक ही पदसिमें—एक ही समुदायमें—साधारण श्रेणीमें ठानेका प्रपन करे, मोर या प्रपन निरासमाबसे १ धर्मका प्रथम सापम २ फिर वर्षका साधन १ फिर कामका साथम १ अन्तमें मोक्षका साधन ७६ बर्मा, पैर पुदी ३, १९१६ सत्पुरुषोंने धर्म, वर्ष, काम और मोझ इन चार पुस्पार्षाको प्राप्त करने उपरेरा दिया है। ये पार पुरुषार्थ निम दो प्रकारसे समझमें बाप है १ पाके सभाषको धर्म करते है। २ बा और वैल्पसंबधी चारोंको भर्ष करते है। १ चिच-निरोपको काम करते है। ४ सब बघमोंसे मुक्त होनेको मोठ करते हैं। ये चार प्रकार संग-परिस्पागाका भपेशाम्से ठीक कटते है। सामान्य रविसे निमरूपसे- धर्म-नो संसारमें वोगतिमें गिरमेसे रोककर पकाकर रखता है वह धर्म है।
भीमराम्यन्त [पा- - - . वर्षाचनमें सवापत पैमब, ममी बादि सांसारिक साधन मर्य है। काम-नियमित रूपसे मौका समपास करना काम है। मोक्ष |--स्प बमोंसे मुकि हो बाना मोश है। धर्मको स्पसे पहिले रसनेका कारण इतना है कि पर्य' और 'काम' ऐसे ऐने पाहिये जिनका मा 'धर्म'। इसलिये पर्प मौर कामको बादमें एक्सा गया है। मास्पाममी सर्वपा पूर्ण पम साधन करना चाहे तो या उससे नहीं बन सकता । उस स्पागके लिये तो ससग परिपाग ही वामक है। गास्यके म्पेि मिक्षा मादित्य मी पोम्म नही। वीर परि गास्पाममा ७७ बम्बई, पैस १९९९ गिस फारमें मार्ग-प्रेषकर्तामोशरा उपदेश कि हुए चार नामम देशले बामपणके रूपसे वर्तमान ५, उस कामको पाप है। चारों नामोंमें सम्से परिग पर्याभम, इसरा गृहस्थामम, तस्य वानप्रस्थाश्म, और भोपा सत्यासामम। परम्प मापक साप पकाना पाता है कि यदि बाबमका ऐसा अनुक्रम हो तो सका भाग विपा ना सकता हापदि कोई सौ वर्षकी मामुपासा मनुष्प इन भाममों के अनुसार पसता साप तो पर मनुष्प इन सब बाममों। उपभोग कर सकता है। इस वाममके नियमोसे माम होता है कि प्राचीनकाल में मार मौतें कम होती होगी बम्बई, पीप १९०६ प्रानका वार्षम्मिमें चार नाम प्रचलित थे, वर्षात् मे बामम मम मुम्परूपसे फै पे । परमर्षि नाभिपुश्न मारत निध धर्फको मन्म देनेके पहिस सस ससकोगोंको इसी मासपी पसारधा उपदेश दिया था। कम्पासे मनोपमित पापैकी प्राप्ति होनेका उस समपके छोगोंध प्यार का पटता या या पा । पानी पमपमाने देस मिया कि माता और म्यपहारका मानता होनेके कारण उम ोगोंको कम्पाका सनपा पास होगामा मात दुमापक दोगा इस धरण प्रमुने उनपर परम कागाभाग कर उमक म्पमहारच कम निमत कर दिया। यम भगवान् सकिरकफ्स भिफर थे उस समय उनके पुत्र मरतमे महापारिके रिपे उनके उपदेशका अनुसरणकर वकालीन बिदामोशप चार दोषी पोजमा कम् | उनमें पार मामाने भिम भिम धर्मा तथा उन चारों वर्षो मातिरातिका समावेश किपा । मगवान्ने गो परमकरणासे छोगोचे भविपम धर्मप्राप्ति मे लिये म्पबहार-शिक्षा और म्पपार-मार्ता पवाया था, उसमें मरतगक इस असे परम गमग हो गई।
पत्र.९,८] पिविष पर मादि संग्रह-शयाँ वर्ष इसके उपरसे चार बेद, चार बाश्रम, बार वर्ण और भार पुरुपार्योंके सबधमें यही कुछ निपार करनेकी रा , उसमें भी मुम्पत्प्ससे घार माग्रम बौर पर पुरुषायोके समय में विचार गे, और अन्तमें हेयोपादेयके विचारके सारा म्य, क्षेत्र, कार और माअपर विचार करेंगे । बिन चार में बाप-गहधर्मका मुस्परपसे उपदेश दिया गया था, वेद निम्नमपसे पे- बम्बई पौष १९४९ प्रयोजन "नो मनुष्य पर्म, अर्थ, काम और मोश इन चार पुरुपायोको प्राप्त कर सकमकी दया करते हा ठमके विचारोंमें सहायक ऐना-" इस पापमें इस पत्रको टिम्सनेका सब प्रकारका प्रयोगन दिसा दिया है, ससे कुछ न कुछ सरमा देना योम्प है। इस जगत्में मिम मिम प्रकारके देवधारी नीव है तथा प्रस्पन और परोन प्रमाणोंसे पा सिद्ध हो चुका है कि उनमें मनुष्यरूपमें विपमान देहपारी भास्मा इम चारों वर्गीको सिर कर सकनमें विशेप सक्षम है। मनुष्य मातिमें बितनी बारमा। ये सब कहीं समान तिकी, समान विचारका, समान अमिठापाका और समाम इमामाली नहीं, यह बात हमें प्रत्पन्न स्पर दिसई देती है। उनसे हर किसीको सूक्ष्म पिसे देखनेपर उममें रधि, विचार, अभिछापा मौर स्माओंको इवना अधिक विपि प्रता माम होता है कि या माचर्य होता है। इस बारचय एनेका पात प्रकारसे पार करने पर यही धरण दिसई देता है कि किसी भी अपवा के विमा सम प्राणियोंको मुल प्राप्त करनेकी दाया करती है, और उसकी प्राप्ति यात कुछ बोंमें मनुष्य देहम ही सिद्धरा सकती। ऐसा होनेपर मी रे प्राणी मुसके रसको हो ये है, उनकी यह त्या केप मोइरिसे पर्य, पीप १९५५ महावीरके उपदेशका पात्र कौन है! १ सत्पुरुपके चरणों का इतुक २ र सूरम मोपको वमिणमा रहनेवास्म, १ गुणोत्पर प्रेममाण रसनेनाग, १ प्रमहरिम प्रीति रसनेवाडा, ५ अपने दोपोंको देखते ही ठर करनेका उपपोग रस्नेवाला, र प्रापेक परको भी उपयोगपूर्वक दिवानेपाटा, • पकतमासको प्रशसा करनेवाला, भीमद् रामचन्द्र [पा १,८१८५४ ८ वादि प्रवास करनेको ठमग रसनेवाग, ९ माहार विहार, और निहारका नियम रमनेपाम, १० अपनी गुम्ताको छिपानेवाग, - गुणों से युक्त्त कोई मौ पुरुष महापौरके उपदेशका पात्र है- सम्पदाका पार है। फिर मी पहिले के समान एक मी नही है। बई, पौष १९४५ प्रकाश अषन निबक्से या सप है। ऐसी ही स्थिति है। तुम सबोर फिरो-सन्होंने रूपकसे से का । उससे भिम भिम प्रकारसे डाम हुमा वौर होता है, परन्तु र विमगरूप है। यह बोध सम्पन है, तो मी पा पाव ही सूक्ष्म है, और मोहके दूर होनेपर ही प्राप पाता है। सम्पा बोध भी सम्पूर्ण स्पिति महो रहा है, फिर भी जो कुछ बचा है मा पोय हो। ऐसा समझकर का पाम्प मार्ग प्राण करो। कारण मत दो, मना मत करो, तर्क-वितई न करो । प तो ऐसा ही। पर पुस्प पपार्थ बच्चा था । उनको अपपा पनेका कुम भी कारण म पा । सई, माघ १९१५ कुटुम्मरूपी कायम्को कोनी निवास करनेसे संसार कता है। उसका कितना मी पार करो वो भी एकताससे बिना संसारका पय हो सकता है उसका सौली माग मी उस धमाके परमें पनेसे मही समता क्योंकि मा कपायका निमित्त । और बनादिकासे मोहके यमेका पर्वत है। पा प्रत्येक अवर गुन गागापमान है। संमत्र कि उसका पार करनेसे प्रदाको सत्पणिो माप, इसठिये को वापभावी होना वापसासी होना, पपरिचपी होना अपप्रेममाय रखामा, माप- मानना दिसानी, बप्पसापारी होना, मश्यगुरु ऐना, और परिणामका AIR करना, पापकर। बई, माष बदामुक १९१५ मिनमगवान्के हुए पार्प पपार्षद है। पही इस समय मुरोप है। ८४ बर्य मम मुदा ८ गुरु १९९९ प्पपापेरापि वा। रचनाको मित्रता सम्मानका उपदेश करमेवारी।तुम, रेग ८५ मे ममेक यस प्रय] विविध पत्र मावि समह-शयों पर्प १८ और दूसरे तुम्हारे समान मालक योग धर्मको इच्छा करते हो, यदि या सबकी नरश्माको प्रमो तब तो परम कल्याणरूप है। मुझे तुमारी धर्म-बभिमपाकी यपार्थता देखकर स्तोत्र होता है। समसमूहके माम्यकी अपेक्षासे यह काम बहुत ही निकर है। अषिक क्या करें। इस बातका एक बसमा बानो ही सम्धीहै। सोक-अलोक रहस्य प्रकाश (१) बर्मा, फामाम पदी १, १९०६ गेकको पुरपके बाकारका वर्णन किया है, क्या तुमने इसके पस्पको कुछ समझा है! क्या तुमने इसके कारणका कुछ समझा है, क्या तुम इसके समधानेको घर्षको समझे हो। ।। १ ॥ या उपदेश शरीरको प करके दिया गया है, मौर से शान और दर्शनकी प्राप्तिके उदेशसे कहा है। इसपर मैं शो करता हूँ पर सुनो, नहीं तो क्षेम पुलका छेना देना ही ठीक है ।। २ ।। (२) क्या करनेसे हम मुसा होते है, और क्या करमेसे हम दुखी होते है । म स्लम क्या है, पौर कासि बाये है। इसका शाम ही अपने मापसे रवान मे ॥ १॥ माँ का है माँ संताप है, और नहाँ हान है माँ शंका नहीं ग सकती । जहाँ प्रमुका भलिहाँ उत्तम काम है,वोर गुरु मगवान्द्रारा हो प्रमुको प्राप्ति की जा सकती है।॥१॥ गुरुको पहिचानने के लिये वतरगमे राम्पको मापसकता है, भौर या रम्य पूर्वमायके उदयसे ही प्रास रो सकता है। यदि पूर्वकालीन माम्मका उदय न तो सरसंगवारा मि सकता है, और सासगकी प्राप्ति न हई तो फिर यह किसी इसके पहनेपर प्राप्त होता है ॥२॥ ८५ पकमलोक रास्पप्रकाश बेक पुससपने मो पनो मेद स्मे करो! पल भरण समलाई, रेसमम्मामानी गई। ॥१॥ परपरमी एरपोण शान बसने ठोस बम बनायो धमिरे दम बांदोए परम ॥२॥ रिपाची पोरी मुबी पारी पोवे पुल्ली। पोले साधी भाप एनो मागो ग्रीम बाप || मानसा मनस्तार दान वहाँ न मदिसा) प्रमुभदियो उपम मान प्रम मेम्ममा गुरु मापान ॥१॥ गुर भामबाग पर राम से अपना पूर्षित भाग मनोतिय देम मी तोमरंगा॥
भीम रामचन्द्र [८५ मेटमणेर यस प्रमा (१) सम धर्मोमें जो कुछ तस्यान या गपाप सप एक है, और सम्पूर्ण दर्शन पहा विवेक है । पे सममानेको सैसिपी है, इनमें स्थाइशेली मां सत्य है॥१॥ यदि तुम मुझे भूभ स्थितिके विषय मे तो मैं ए योगाको सो देतामादि में, मम्पमें वीर तमें एकस्म है, जैसा क्मेिको ठोकौ ॥२॥ उसमें नीर-चाके स्वरूपको समझनेसे भासलिका माष दूर हो गया और शंका दूर हो गई। स्थिति ऐसी है। क्या इसको समझाने का कोई उपाय नही "उपाय क्यों महा"! मिस्से सका महे॥॥ पर एक महान् वार्य है। इस यस्मको कोई विरसा हो मानता है । जब बारम-काम प्रगट हो जाता है वमी परान पैदा होता है। उसी समय पर पार बप और मुकि यस्पको समानता बोर ऐसा समानेपर मिस कालीन शोक एक दासको र करता है ॥ ॥ यो गौच संधयुटोप काँसे सहित है, और ये कर्म मिश्चयसे पुरम्मी ही रचना है। पनि पुलो मान , उसके परमात् ही मनुप्प-देहम प्यानकी प्राप्ति होती है॥५॥ पथपि यह दो पुसकी ही बनी है, परन्तु वास्तविक स्पिति मुग सही है। माय पिच स्पिर होगापगा उसके बाद दूसरा शान कांगा ॥ ६॥ (५) वहाँ एग और पयाँ साहो देश मानो । यहाँ सदासीनतास बास होस सोमनाशी ॥१॥ । माघे सकले एक सपन मे एक समयमानी मी स्पसावकमाल बा ॥१॥ महलहित बोझे मने वो सोपी एटमी कने। मकम भरने मम्मे एकमेकस्म मामोरे ॥१॥ बाबा ने बाई म्मो भोटो सो एमसिदिला नही पान उपम की मीनभव।।। पनामबाप बागेमारे मारे माल; समवेबमासमेब निरसी यडे सोपस्वी ||४|| भुत व कर्म और पुमनाम सापट सन्दाम प्रकमा मगो पी पामे मान ॥५॥ पुरनो एग पो पर मरमा ममी पाप मार ॥६॥ बारामासमएमालो सपनीमलानोमा पार समोसा मास ||१|| पा ८५ विवि पर मादि सपा-या वर्ष ही तीनों कालका काम होता है, और देहके गनेर मी ही निर्माण है । यह दशा ससरकी अतिम दया है। इस दशामें नरमाराम धाममें माफर बियरते ॥२॥ बी, फागुन १९१६ हेमौष ! मममें मत पा, तुझे शिवको बात करता है। सुम तो तेरे अन्तरमें है, यह बाहर इमेस नहीं मिलेगा । वह मन्तरका मुस अन्तरगको सम-प्रेणीमें है उसमें स्पिति रोमेके लिये वाध पयायोका विस्मरण कर, माधर्य । सम-अपीमें गमा मात दुर्गम है, क्योंकि जैसे जैसे निमित्त मिते जाते हैं 1 से पति पुन पुन चरित होती जाती है, फिर भी उसके चलित न होमेके लिये मापा गमार उपयोग रल । यदि या क्रम यथायोग्यहपसे चलता बन जाय तो तू जीवन स्पार कर रहा है, इससे पापाना नही, व इससे निर्मय हो नायगा । भ्रममें मत पर, तो हितकी बात करता है। या मेरा, प्राप ऐसे मात्रकी भावना म कर । यह सका है, ऐसा मत मान बैठ । इसके लिये भविष्यमें ऐसा करना है, यह निणय करके न रख । इसक लिये यदि ऐसा महुवा होता तो अवश्य ही मुम होता, यह स्मरण न कर। इतना इसी तबसे हो जाय तो मन्म हो, ऐमा भाप मत करके रस । इसने मेरे लिये अनुपित किया, ऐसा स्मरण करना न सोश । इसने मेरे ठिपे उचित किया, ऐसा स्मरण न रस । पा मुझे बहुम लिमित है, ऐसा विकम्प न कर । पा मुझे धम निमित्त है, ऐसी खता न मान बैठ । यह म होता तो मैं न फंसता, ऐसा नपप न कर । पूर्पकर्म वरुपात है, इसीलिये ये सब बसर मिले है, एसा पकान प्राण न कर । यदि अपने पुरुषार्थको सफलता न होता ऐसी निराशाका स्मरण न कर । सरके दोरसे अपमेको बचन होता है स् न मान । अपने निमितसे दूसरों के प्रति लेप करना भूठ गामा । तेरे दोरस ही तुझे बनी यह सती पहिला शिक्षा है। दूसरेको भफ्ना मान रोमा, भार सयं अपने भापको भूम माना, बस इतना ही तेरा दार है। मनकाम कर रास्ता निकाल माम्नी ए ए एम बाम मार्गन पस्य ॥२॥ .
भीम पवन [८५ इन सबमें तेरे प्रति को प्रेममान नहीं है, फिर भी मिन मिय स्पोम व सलमान बटा है। हे मा! ऐसा न कर। या तुझे तेरा हित कहा | तेरे अन्तरमें सुस। जगत्में कई ऐसौ पुस्तक, ऐसा कोई सेस वधपा को ऐसी साधी नही है जो सो तुमको या बता सके कि अमुक हो मुसा मार्ग है, वा तु अमुक प्रकारसे ही चलना चाहिये, वपना सभी नमुक कमसे हो चगे। यही इस बात सषित करता है कि इन सबको गतिके पीछे कोई म कोई प्रम कारण मन्साहित । १ एक भोगी होनेका उपना करता है। २ एक योगी होनेका उपदेश करता है। १म दोनामेंस हम किसको मानें । । दोनों किसमिसे उपदेश करते है! ५ दोनों किसचे उपोश करते है। ६ किसकी प्रेरणासे उपदेश करते है। ७ किसी को किसीच, बार किसीको किसीकर गलेश क्यों बम माता। ८ सके क्या कारण है। ९ उसकी कौन सीट! तुम क्या चाहते हो। ११ परसि मिलेगा बपया पहलसमें है। १२ से कौन प्राप्त करेगा! १३ उसे पो होकर मवागे । ११ लामा कौन सिमावेगा। १५. अपना समर्प ही सीरहो। १६ पनि साचे पए हो तो कहसि साले । १० बीपन पारे। १८ गौर क्या है। १९ हम क्या हो। २ सब सहायानुसार क्यों नही होता! २१ उसे कैसे कर सकोगे। २२ में बाबा प्रिय असा निरागावता! २॥ एकहोरो मार बिस किस तय है। घि निर्णय करो। भवरमें मुख महर महा। सप वा।
पर ] पिपिप पत्र मादि संपा-शपाव है गाय ! मूग मत, तछे सस्प करता है। पुस मतरमें ही है, बाहर दिनसे नहीं मिलेगा। मातरिक सुख अतरको स्पितिमें है, उस सुखकी स्थिति होमेके लिये ( माय फार्थसंबंधी भारचर्योको भूगगा। उस सुखकी म्पिति इनी गात ही कठिन है, क्योंकि जैसे जैसे निमित मिळते बाये है, पैसे से मारगार ति मी पसित हा बाया करती है, इसलिये पतिका उपयोग स रसना चाहिये । यदि इस झमको र यथायोग्य मिलाइता बहेगा तो तुझे कमी हताश नहीं होने परेगा। निर्मय हो गापगा। हे जीव ! तू मूठ मत । कमी कमी उपयोग प्रकार किसीके रबन करनेमें, किसीके शाप मित होनेमें, भपका मनको निर्यलता के कारण दूसरेके पास मोर मंद हो जाता है, या वे भूल है। उसे न कर। ८७ बी, फागुम १०१२ परम सत्य। परम एस्प। निकासमें ऐसा हो। परम सस्प है। म्यबहारके प्रसंगको सावधानीसे, मंद उपयोगसे, और समतामाषसे निभावे माना। दूसरे तेय कदापों मही मानते, या प्रश्न तेरे क्तरमें फमी फैन । दूसरे वेरा का मानते है, गार यह पात ठीक है, से ऐसा स्मरण कमी न हो। सब तबसे अपने ही प्राप्तिकर । बोलन-बगीवन पर समापिहो। नीवन हो तो इसी पिसे पूर्ण हो। जबतक गहमास ये तस्तक प्रकारका प्रसंग होनेपर मौ सपो पो। गामासमें मी उसामें हो यो। गासासमें अपने कुटुम्पिोचे उपित पि रखना सिम्पाः सबको समाम दी मान । उस समपतफा तेरा काड बहुत ही उचित म्यतीत रोगो'- अमुक प्यार के प्रसंगका भाष, उसके सिवाय वस्सबपी कार्याल, पूर्वकर्मोन्य काम, निद्राका पदि तेरी स्वोर तेरे प्रमसे उसे तेरे पावन वर्षात् पदासायी सता al उपित प्रकारसे भरना म्पहार पाना।
१८८
भीमन् परमन्न
[पत्र ८८ ८
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परि उसकी इसके सिपाप दूसरे किसी भी कारणसे सतोपाति म पता हो तो उसे उसके करे
मनुसार प्राति करके उस प्रसगको पूरा करना चाहिय, बर्षात् प्रसंगकी पूर्णाहतितक ऐसा करने में
राध सदसिम मना पाहिये ।
रे म्पहारसे ने साए में तो उसी पिसे निराइमापसे उनका भला हो, से ऐसा
करनेको सामपानी रसना पाहिये ।
मोगमति पशासे विवेक नहीं होता, पर ठीक बात है, पपा वस्तुमसे यह कि पार्ष
है। बहुत ही सूक्ष्म भयोवन रक्सो ।
१ सपको तो सप ही एने दो।
२ गितना कर सको उतना ही करो। परापता न पायो ।
३ एकनिष्ठ हो।
पकनिष्ठयो।
किसी मा प्रशस्त ममें एकनिष्ठ यो।
पौतरागने यमार्य कहा।
हेमामन् । स्थितिस्थापक दका प्राव कर ।
इससको किससे कमें। और कैसे इसे दूर करें !
अपने माप अपने बापका बैरी है पर कैसी सभी बात।
बर्मा, सबदी र गुरु १९९६
आम मुसे अनुपम ठास हो रहा है मान पाताबा मेरा सम्म हो गया है।
मस्तु क्या है उसका विक पाहै, उसका पिक कौन है स क्रमके सर माननेसे मुझे सपा
मार्ग माम हो गया॥१॥
-
पपई, पैशल को गुरु १९९५
हो बासना परिसवा मह इनमें सनो।
है भूम गये गत एव॥१॥
रचना बिन-उपदेशकी, परमोचम लिनु ।
इनमें सब मत दत है कर निम समाउ ।।२।।
मात्र रिकी
भाग मने राग भनुपम समालाई बोलक्यायो।
बास्लम पल सिम मार्ग मनाये ॥१॥
पा ११, १२] विविप पर मादि समह-२वों वर्ष रिन सोही मातमा, जन्म होई सा कर्म; कर्म करे सो निनबन, तत्पपानिको मम ॥३॥ मा नाम्पो निमरूपको, तब नान्यो सब होके । नहिं अम्पो मिनरूपको, सम नान्यो सो फोक ॥ ॥ एीि Pाको महता, हम बिन माय; विनसें मार बिनु कबू, महि या दुसदार ॥ ५ ॥ म्पमारसे देव मिन निहसे है बाप, पहिबचनसे समन के, बिनप्रवचनकी मप ॥ ६ ॥ एहि माहीहै कारपना, एही नहीं विभग जब बागेंगे बातमा, तब लगेंगे रग ॥ ७॥ - बी, वैमासको गुरु १९१६ मारग साचा मिल गया, ५ गये सन्देह, होता सो तो बह गया, भिम किया निव देह ॥१॥ समम पि सब सरह है, मिन समर मुशकील, ये मुशकीली क्या करें! ॥२॥ खोज पिर माफा, पचा तो पण माप पेहि प्रामाणि पासना, जब गाये तब ॥३॥ भाप पापक मुठ गया, इनसें क्या अमेर । समर समर बब इसत है, मई मुळेगे फेर ॥१॥ यहाँ काफ्ना गल्पना, तहाँ मानु हुगर्म मिटे कम्पमा यष्पमा, तब बस्न् तिन पर ॥५॥ है पा इष्मत हो या समूह जब इयाका माश पब, मिते बनादी मूठ ॥६॥ एसी कहसि मति मा, माप भाप नाहि । मापनतुं न मुठ गये, अपर पास गई, भाप माप ए शोपसे, भाप बाप मिट जाय; आप मिसन नप बापको; 11 h ९२ बमई शाम बदौ ५ शुष १.१५ इशारहित कोई भी प्राणी नहीं है। उसमें मौ मनुष्य प्राणी ता पिप माशामोसे घिरा हमा सा तिरपेचात में ऐसा मी पाममुमारक [पा ९५ भीम प्रचन्द्र है । जबसक इमा और आशा अता पती तबतक र प्राणी वोपरि मनुष्य नैसा है।पाको जय क्रमेबाशा प्राणी कर्मगामी मनुष्य जैसा है। - ९३ बर्मा मेशास पदी १२,१९९५ भाग भापका एक पत्र मिम । यहाँ समय वमुक है। वापके यहाँकी समय-सन्ता चाहता है। भाको यो पत्र मे बनेको मेयरलायो, ससे अधिक विस्तारसे मिसनको बायकवा होनेसे- तथा ऐसा करनेसे उसकी उपयोगिता मी अधिक सिद्ध होनेसे—उसे विस्तारसे लिखनेकी त्या पी, और मग मी है । तपापि कार्योपाविकी ऐसी प्रवता है कि इतना शांत अक्कारा मौ मही मिता, नाही मिल सका और ममी पोरे समपतक मिसना मी समय महो। वाफ्को इस समयके बीच, या का मिल गया होता तो बहुत ही अधिक उपयोगी होता तो भी इसके बार मी इसकी उपयोगिताये तो भाप अधिक ही समान सकेंगे । बापका मिजासको शान्त करके लये ठस परका संधिम सार दिया। यह भाग जानते हो कि इस जन्ममें वासे पहिसे में मगमग दो पसे कुछ अधिक समय उभा तबसे गृहस्थामी रामा। निसके कारण गृहस्थाश्रमी कडे मा सकते है उस पस्तुका और मेरा उस समयमें पुछ अधिक परिचप नहीमापा, वो भी उससे वस्तषी कामिक, माविक और मानसिक पति मुझ पपाशम्य बात कुछ समझमें कई बार इस कमणसे उसका और मेरा संबध योग- नमक नहीं हुवा । यह बतानेका कारण यही है कि साधारण तारपर मी गृहस्पाश्रमका म्याम्पान देते हुए उस सबमें जितना अधिक अनुभव हो उतना अधिक हो उपयोगी होता है। मैं बुक संस्कारिक मनु मरके उदित हानेके उपरसे पर कर सकता ! मेरा गृहस्थाश्रम अबतक जिस प्रकार सतोषजनक नही है उसी तर यह उचित स्तोपनमक मी नहीं है। बह के मम्पम है और ससके मम्पम होनमें मरी कुछ उहामानाति मी सहायक है। तत्त्यामधे गुम गुमाका दर्शन करनेपर पविकतर इस्पाममसे विरक होमेको पात ही सूमा करती है और मारप हो उस वलामका सिंह भी इसे प्रगट एमाथा । कामको प्रबर बनिस्तके पारण उसको पापोग्य समाधि-संगी प्रामि न होनेसे उस पिचे महासेरके साप गीम करना पा और सचमुच ! परि ऐसा म हो सका होना तो उसक मानका 0 व भागता । ( उसके अर्यात् इस पर का)। जिस सिको मारके साप गाम करना पा उस सिको विचापि प्रसम या करता है। उमय पान प्रधानता नही रम्मी या ततो इसके लिये बकपाप से होता है । तथापि गोई उपाय महो।हाँ सहनशीपता ही मापक है, ऐसी मान्यता रोमेसे चुप हो बैठा है। कभी कभी मंगी और साथी भी ना निमित्त हाने माने है। उस समप उस किपर किसी तरा भारण आता है ता भामा बहुत ही। उस समय मापन रहित हो जानेकी- ।
पिविष पत्र भारि समाधिप देहत्याग करनेका—तु सस्थितिकी अपेक्षा अधिक भयंकर स्पिति हो जाती परम्तु ऐसा बहुत समपतक महीं गता, वौर ऐसा नब देगा तो अवश्य ही इसका त्याग कर दूंगा । परन्तु में बसमाधिसे प्राति न कर, ऐसी मस्तककी प्रविा बराबर कायम चठी बाई । । वर्मा, स्पेष्ठ मुरी : गुरु १०१६ हे परिचयी ! तुमें मैं अनुरोध करता है तुम अपने पापमें योम्य होनेकी रम उत्पन्न करो। मैं उस इलाको पूर्ण करमेमें सहायक होगा। तुम मेरे अनुपायौ हुए हो, और उसमें सम्मानरके योगसे मुझे प्रधानपद मिला। इस कारण तुमने मेरी माशाका भवम्मान करके वाचरण करना उचित माना है। पौर मैं मी तुम्हारे साथ उचितरूपसे ही ध्यपहार करनेकी पाकरता, किसी दूसर प्रकारसे नहीं। पदि तुम पहिले जीवन-स्पितिका पूर्ण करो, तो पके लिए ही मेरी इस क्रो। ऐसा करना में उचित समसा, और यदि मैं करें तो धमपात्रके रूममें मरा स्मरण ये,ऐसा देना चाहिये। हम तुम दोनों ही धर्मति होनका प्रयत्म करें । यो हपसे प्रपल परे । तुम्हारी गतिकी अपेक्षा मेरी गति भष्ठ होगी, ऐसा अनुमान कर लिया है-" मतिमें "" मैं तमें उसका गम देना चाहता हूँ क्योंकि तुम बात ही निकरके सबधी । यदि तुम उस व्यभको उठानेकी इच्म करते हो, तो दूसरी कलममें को मनुसार तुम जहर करोगे, ऐसी मुझे आशा है। तम स्वमताको बात ही अधिक बारना, बीतराग-मतिको पाव हो वधिक साइना मेरी मक्तिको मामी तौरसे पाहना। तुम जिस समय मेरी सगति हो, उस समय मिस तय सस प्रकारसे मुध मानन्द हो उस तबसे राना। विचाम्पासी होमो। मुमसे विपापुच्छ विनोहपूर्ण समापण करना। मैं तुम पोम्प सपेश दूंगा । म उससे रूपसपान, गुणसपम बार इन्दि च्या बुद्धिसपन होगा बादमें इस दशाको देखकर मैं परम प्रसम होगा। मी म्येष्ठ सदी ११ शुक्र १९९६ सबेरके सबसे ८ बजे तकका समय समाश्मेिं बीता पा । महाके विचार भात स्परप बिरसे मंपि, और मनन किये पे। बर्मा, म्येष्ठ । १२ शनि १९९६ का रंगाशंकरची मानवा, इसलिये सबस मिसिसित क्रमको पार्यप्रभु रशित :- १५३ श्रीमद् रामचन्द्र [पा ९. ९८,९९,.. १ फार्पणावि २ सकारण साधारण भाषण १ दोनों मतकरणको मिर्मस प्रति १ धर्मामुग्रन ५ मेरम्पका तीस्ता ९७ बई, म्पेष्ठ कशी ११ मुफ १९९५ तुम अपना बस्तित्व मानमेमें कौनसी का है। यदि कोई शका तो ठीक नहीं। बम्बा, म्येष्ठ वदी १२ शनि १९९६ कल रातमे एक भात सप्न मापा जिसमें एक-दो पुरुषोंको इस जगत्का रचनाके स्वरूप वर्णन किया पहिसे सब कुछ मुगाकर बादमें जगतका दर्शन करापा । सप्नमें महापरिदेवकी शिक्षा प्रामाणिक सिलाई। इस समाप्नका वर्णन गुत मुनर और चमत्कारपूर्ण पा इससे परमानद मामा उसके सबमें अधिक फिर भिगा । नई, बापत सुदी १ शमि १९९५ कलिकाम्ने मनुष्यको स्वार्थपरपण और मोहके बहा कर दिया है। जिसका एय पर भार स्वीके बताये हुए मार्गसे पम्ता है प धन्य है। ससंगके बिना पड़ी गई मामणी वनिकतर पतित हो जाती है। बम, मापात पुरी ५ चि १९९९ सब पर म्पहारोपाधि प्राण की पी उस समय इसके प्राण करनेका हेतु यह पा -"मपिम्प- में जो उपाधि अधिक समय गो, मा उपाधि मदि अधिक दुखदायक मी ऐगा, तो भी उसे पोो समपमें भोग मेना, पही अधिक प्रेयस्कर है। ऐसा माना पा कि या उपाधि मिसिनित रेर्कोस समाधिरुप होगी। "इस कारमें गृहस्थावासके लिपपमें धर्मसर्मपी मरिक बातचीत न हो तो बना। मोहसे मुश्किस स्गता हो परम्तु इसी क्रमसे बस । निश्चय ही इसी ममसे पर। दुसको सहन परके हमको समाग्मेकी परिषद सदन करके मनुहम्-प्रविस उपसर्गको सहन कर पचन य । माबका पहाचित् अधिकतर कठिन माम हागा परन्तु मातमें पर फटिनता सरस हो जायगी । फो में मना मत । बारबार काता ! फैसना मत । महक इसी हेगा, और पथाचार करेगा । इमच भरोधाभासे इन बरनोंको लपमें उतार-प्रतिपूर्णक उत्तर । १ किमाक मी पाप नदेन । यो गुण्या मतेरे अपमे हो दोस्से होता है, ऐसा मान ।
विविध पत्र मावि संपा-२वों वर्ष - , २ दूवफ्नी (बारम ) प्रभासा मही करमा मौर यदि करेगा तो मैं समझता किही इसका है। ३ मिस तर सरेको प्रिय लगे, उस तबका अपना आचरण रसनेका प्रयत्न करना । यदि उसमें तुसे एकदम सिमि म मिछ, वपना विन भाषे, तो मी नापासे पामे धीमे उस क्रमपर वपमी निष्ठा ध्याये रसना । १ निसके साप म्पपहारमें समर मा हो, उमके साप अमुक प्रफारसे वर्ताव करनेका मिर्णय करके उससे कह दे । यदि उसे मनुकूल भावे सो ठीक है मन्यथा पा निस तय करे उस वयका बर्ताव रखना । साप ही या मी कर देना कि मैं भापके कार्यमें (बो मुझे सौंपा गया है उसमें ) किसी तय भी अपनी निष्ठाके द्वारा माफ्को हानि नहीं पहुँचाउँगा । भाप मेरे विषयमें दूसरी कोई मी शक न करना मुझे इस म्पहारके विषय, सम्य किसी मी प्रकारका माय नहीं है। मैं मी मापके द्वारा इस तराका बर्ताव नहीं चाहता । इतना ही नहीं, परन्तु कुछ यदि मन, पचन पोर कायासे विपरस बाचरण मा हो तो उसके सिप में पालाप काँगा । पैसा म करनेके लिये मैं पहिल्से ही बात सामाना रसंगा। वापका सौंपा इवा काम करते हुए मैं निरभिमानी होकर दूँगा। मेरी मूल के लिये यदि आप मुझे उपासम देंगे, तो मैं उसे साम करेगा । यहाँतक मेरा बस चलेगा, यहाँतक मैं सप्नमें भी भारके साप द्वेष अपमा आपके विषयमें किसी भी तयको भयोग्य कम्पमा नहीं करूँगा । यदि वापको किसी तरकी मी शका हो वो बाप मुछ कहें, में वाफ्का उपकार मानगा, और उसका सपा मुलासा करूंगा । यदि सुलासा न होगा, तो में भुप अँगा, परन्तु बसस्प म योगा । केवळ मापसे इतना ही चाहता है कि किसी भी प्रकारसे आप मेरे निमिवसे बमुभ योग, प्रवृत्ति न करें । माप अपनी इभानुसार वर्गध करें, इसमें मुझे कुछ मी भधिक कानेकी नवरत महो । मुम कक्स वफ्ना निरिणामें प्रापि करने दे, और इस कारण किसी प्रकारसे अपने पतकरणको मेटा म करें और पनि मेटा करनेकी वापको महो हो तो मुझे वयस्प ही पहिस्से कह दें। उस ग्रेगोका निमानेको मेरी इसलिये वैसा करनेक सिप को कुछ करना होगा ग में कर इंगा। नहातक बनेगा यहाँतक मैं भापको कमा कर नही पॉपाऊँगा, और मम्तमें यदि पा निपिमेणी मी वापको अप्रिय होगी तो मेसे बनेगा बस सापनासे, पापक पारसे-बापको किसी मा तयको हानि पचापे मिना पपाशति मम पहुँचाकर, और इसके बाद मौ हमेशा के सिप ऐसी इच्छा रसता हा में पगा। - . गर्ग, नशा मुदा । १९९६ इस उपाधिमें पामो बार यदि मेरा लिंग लम्यान-र्शन मा हो रहा हो-पार्थ हो या रो-सो जूनमाई आपादमी क रन गुरुवार की रातमें समापिशात हाकर इस धणिक गांवनका स्याग करके चले जायेंगे, पैसा । २५ प्रीम पात्र [पा ११ ११ (२) बर्मा, बापत ती १० १९११ उपाधिके कारण लिंगदोहजप शानमें थोड़ा सात फेरफार हवा मारम दिपा । पमित्रामा मा माईक उपरोज विधिौ परतु दिनम स्वर्गवासी होनेको वाव पर मिली है। इस पाक्न वारमाके गुणोध स्पा स्मरण करें। मह मिसाविको मनाश महो, यहाँ सतिका ऐना कैसे मामा पाप! (" देहपारी होनेके कारण इसका गैविक नाम हो सस्प पा) या वाम-दसारपसे सवा पैगम्य ही था। उसका मिप्या पाना भाव क्षीण हो गई पी; यह गीतरागका परम रागी पा, संसारसे परम गुप्सित पा; मतिको प्रधानसा उसके अंतरगमें सदा ही प्रकाशित या करती थी, सम्पन मानपूर्वक वेदनायक बनुभव करनेकी उसका मनुव समता पौ। मोहनापकाको प्रमता उसके बतरमें गात शून्म हो गई पी; मुममता उसमें उत्तम प्रकारसे देदापमान हो उठी यौ। ऐसे इस महामाईकी पवित्रामा मात्र जगत्के इस भागका त्याग करके पछी गई। सानारिमोसे मुक्त ॥ गई है। धर्मके पूर्ण बामादमें उसकी बधामक हो वायु पूर्ण ऐ गई। (१) मेरेरे ! इस में ऐसे भास्माका वन छोपसा होना, पर कोई अधिक वाधर्षकी बात नहीं । ऐसे पवित्रात्माको स्पिति इस काम्मे सि हो सकती है। दूसरे साथियों के ऐसे भाप को कि उन्हें ऐसे पवित्रामा दर्शनका माम वरिक कातक मिलता ये! मिसके अतरमें मोक्षमार्गको देम बाम सम्पन प्रकाशित भा था, ऐसे पवित्रास्मा नझामाईको नमस्कार ! नमस्कार हो। १०२ का वासात पुदी ११ १९१६ (१) उपाधिकी विशेष प्रबस्ता यती है। यदि मान-कालमें ऐसे किसी पोगके जानेको सभागमा हो तो मीन-उदासीनमाक्से-प्राति करना प्रेयस्करो। (२) भगवतीक पाठले लिपपमें सकिस मुग्णसा नीचे दिया जाता है भर नोर्ग पार्ष गणारंमी, भमा नीग पार्ष भापारमी परारभी वर्भयारमी । बामा शुभ पोगको बपेक्षासे मनारमी; तथा मातुम पोगकी अपेक्षासे बास्मारमी, परारंभी, बार तदुमपारमी (बहमारमी मौर मनारंभी ) होती है। पहाँ पुमका अर्प पारिणामिक घुम छेना चाहिये ऐसी मेरी शि। पारिमामिक पपीत् विस परिणामसे हम अपना जैसा चाहिये वैसा यना । यहाँ पोगका बर्ष मन पचन और कया है । ( मेरी रिसे । ) शासकारका या पाम्पान करनेवा मुस्मरेत पयार्थ वस्तु मिसान भौर शुभ योग प्रति रमका पाऐगा, ऐसा मैं सममता । पाटमें बहुत ही सुन्दर उपमा दिया गया है।
विविध पत्र मावि संग्रह-२वों वर्ष (३) तुम मेरे मिलापकी इच्छा करते हो, परन्तु या किसी अनुचित काका उदय थापा, इसछिपे अपने मिठापसे मी मैं तुमको श्रेयस्कर हो सकेगा ऐसा बहुत ही कम आशा है। दिनोंने पयार्प उपदेश किया है ऐसे भीतरागो उपदेशमें तत्पर रहो, यह मेरा विनयपूर्णक तुम दोनों माइयोंसे गौर दूसरोंसे अनुरोध है। मोहापान मेरी बात्मा गामोपाधिसे किसनी तरइसे घिरी हुई है, यह सब तम गानते ही हो, इसलिये बधिक क्या लि ! ममी पामें तो तुम बपनेसे ही धर्म-शिक्षा गे, योग्य पात्र नो, में मी योग्य पात्र गर्ने , अधिक फिर देखेंगे। १०३ बम्बई, बापाल पुदी १५ मुष १९९९ (१) यपपिलि सस्यपरायणके स्वर्गवाससूचक शब्द मपकर किन्तु ऐसे रामोंके जीवनका ध्या होना कासको सध नहीं होता । धर्म- पकके ऐसे अनम्य सहायकका पने देना, मापादेवीको योम्प न मगा | कामको प्रमक हरिमे इस बामाके-स गीवनके गस्पमय विमामको सोच मिया । पानपिसे शोकका कोई कारण नही दीखता तथापि उनके उपमोचम गुण शोक करनेको बाम्प करते हैं। उनका मात अधिक स्मरण होता है बषिक लिस नही सकता। सत्यपरायणके स्मरणार्थ यदि हो सका तो एक शिक्षा प्रय छिसनेका विचार कर रहै। (२) "बाहार, विहार वौर निहारसे नियमित " इस बाम्पका सक्षेप गर्य या निसमें योगदशा बाता है, उसमें द्रम्य वाहार, विहार वौर निहार ( शरीरको मके त्याग करमेको क्रिया ), ये नियमित वर्षात् जैसा चाहिये पैसी—आरमाको किसी प्रकारको बाधा न पो चानेवारी-मिपासे प्रति करनेवाला । धर्म, संसान हो यही बारबार अनुरोध है। यदि हम सस्पफ्ययणके मार्गका सेवन करेंगे तो भारसमेष मुगारगे भौर पार पायेंगे, ऐसी मुझे बाधा है। ठपाधिप्रस्त रायपदका यपायोग्प १०४ बर्मा, बापाल को रवि १९९६ निमाससे प्रति करके सम्पपा बर्ताव करनेवाग भाग पाप करता है। १०५ गई, वाया की ७ भीम १९९५ निरतर निर्मयपनेसे रखित ऐसे इस भतिस्म समारमें वीतरागता हो वम्यास करमे योग्य है। निरंतर निर्भयपनेसे विपरमा ही श्रेयस्कर रे, पापि काठका मोर कर्मको विश्वासे पराधीन होकर करते है।
भीम पत्रचन्द्र [पत्र ! १० निसन मातरम्प भपार , ऐसी वायकरदेवका बाणीची मादि का। १०६ बमई, बापाठ वदी ११ शनि १.१६ (१) प्रिसका कोई अस्तित्व Aधमान नहीं है, ऐमे पिना मंगिक इस मगल्फो वारेमो। बई, भागाद बदौ १२ वि १९९६ (२)रि मी सर करो कि किसमें मामसे सूक्ष्म दोष भी दिमाई, सक, भौर उरे देखते ही पय किये ना सके। १०७ मई (नागदेशी) गापाद बदौ १२ प १९१६ इसके साप आपकी योगवासिष्ठ पुस्तक मेव हा । उपारित ताप शमन करनेके लिये यह तक चंदन है इसके पड़ते हुए वारिपाधिन वागमन संमष नहीं । इसके लिये मैं बापका उपकार मानता है। पापके पास कमी कमी मानेमें मी एक इसी पियर्थ हो विज्ञासा है। बात मासे माफके मत करणमें पास करती हुई अपरियाका बारके हो मुम्मसे पण मिले, तो अपूर्ण शांति हो। किसी मी मार्गस फ्ति बासनामों का नाश करके पयापोप स्पिति प्रानिक सिवाय दूसरी कोई भी राम। परन्तु म्पचारके सबंधमें बातसा उपाधियों एती है, इसपिये समागमका कितना माकाश चाहिप उतना नहीं मिलता । तपा मैं समझता बाप मी गुतसे कारणोंसे उतना समय देनेमें वसमर्थ १ वर इसी कारणसे बारबार मत करणको प्रतिम चिनापको नहीं बता सकता तया इस संत्रपमें बभिक बातचीत भी नही हो सकती । यह एक पुप्पको पूनता है, दूसरा क्या ! म्पचारिक स्वपमें बापक संघमसे किसी तरच मी म उठाने स्नमें भी इस मही तपा आपके समान इससे भी इसको इम महाँक। एक ही चम मार मी योो हो कासका उसे प्रारम्यानुसार बिता मेमें पौनता करमा अपित महाँ, पा मिययसे प्रिय है।साम-मापसे भाचरण करनेकी बम्पास-प्रणाटिका कुछ (पोदेसे) पसि वाम कर रही है, और इससे निक्किी पृदि ऐया। इस बात को माँ बतानेच ना हो हेतु है आप शकालत होंतपपि पूर्वापरसे मी सकादित पने के लिये दिस रेलसे में वापकी भोर देखता । उसे करपा वौर यह स्वाहानता संसारसे तासानमारको प्रास दशाको स्थापक ऐगी, एसा माप होनेसे (कहा)। पोगवासिष्ठके समय में (प्रसग मिमनेपर) वापसे कुछ पाना चाहता ।। चैनधर्म मापसे । मोक्ष है, इस मापतको वामा पात समपसे भूल चुकी है। मुख- भागमें ही मोश। ऐसौ मे पारणा है। इसरिये निवेदन है कि बातचीत के समप बाप पुण बपिक करते रन में।
१८ ११, ११ ] पिविष पत्र भादि समर-२३याँ पर्प मई, १९१६ मापार विस पुस्तक पानेसे उदासीनता, पैराग्य वयमा चित्तकी सस्थता होती हो, ऐसी कोई भी तक पठना; ऐसी पुस्तक पड़नेका विशेष परिचय रखना जिससे उसमें योग्यता प्राप्त हो । धर्म-कथा उिसनेके विषयों को विसा, तो वह धार्मिक-कया मुख्यम्पसे तो सगमें ही मा ती है। दुपकारके होनेसे इस कामें ससगका माहरम्प मी जीवने म्यानमें नहीं भाता, तो र सम्पाण-मार्गक साधन फसि हो सकते है ! इस बातकी तो बहुत पाक्सी क्रियाएँ वादि करने- से गोको मी सबर हो, ऐसा माम नहीं होता । स्पागने योग्य समाचार बादि कारणों में तो बीन रुधिपूर्वक प्रवृति कर याद और जिसका स्पषम करना योग्य है, ऐसे बारमासम्म स पुरुषों के प्रति या जौष मानो विमुखताका अधपा पनि साफ्नेका बाचरण कर या। वौर ऐसे बससंगियों के साथासमें किसी किसी मुमभुको मी गना इता है। उन दु सिपात्रों में तुम और मुनि वादि मी किसी किसी वंशसे गिने गा सकत है। सरसंग बौर स्वेच्छासे माचरम न हो अफ्षा उनका अनुसरण म हो, ऐसे आचरणसे भवति रमा का विचार रक्सपना ही इसका मुगम साधन है। १०९ बई, १९१६ वापत पूर्पकर्मका उदय गात विचित्र है। अब यहसि आगे पासे प्रमात हुमा समझना चाहिये । तीय रससे बार म" रससे धर्मका बत्र होता है । उसमें मुम्प ख गग-रेप । है। उससे रिणाममें वधिक परवाचाप होता है। पुर पोगमें गोवामा नमारमी । मधुर योग, सगाई मामा आरमी । यह बाप रिकी मगवतीका है, इसपर मनन करना । परस्पर एसे दोमेसे धर्मको मूठी हुई मारमाको स्मृतिमें पोगपरका स्मरण होता।धर्मकी बासताके पोगसे एक तो परमासमें उत्पम एए, परन्तु किसी एक घुम ठपसे गो योग मिला से मर्मयोपका पोग बात ही थोषी मामाओंको मिम्ता है। बार पर रविकर होना पशुत ही कटिन । ऐसा योग फेस स्पुरुषोंकी स्पाररिमें है। यदि मापकर्मका योग हेगा तो ही पा मिल सकेगा। इसमें साप नही जिस पुस्पको सावन मिले तें और उस पुरुषको शुभोदय मा हो तो यह निश्चपसे मिल सकता परिकिर मी म मिले तो इसमें गएउ पर्मा ही दोष समठमा चाहिये ! पम्, १०१६ बापाल पर्मप्यान मापूषक हो, यही भाम-रितका राना है। वित्तका सकार-विकम्योमे रवित होना, पा मापारका मार्ग है। अप्तिमानमें एना, पर रिकीका पम्प है। 1 भीमन् परचम्द्र [ १११ ११५ ११५ पाणीवा, मा बदी ५ मौम १९९६ (4) (4) दिसंण () () रिसं अपरिपद यो बिस मिस दिशाको मोर बालेको इच्छा करता है, उसके विपे वह विद्या बाप्रतिमा अर्पात् सुखी है। ( उस रोक नहीं सकती।) जबतक ऐसी दशका वम्यास न हो, तबतक यपार्य त्यागको तत्पति होना कैसे सम्म हो सकता है। पौराधिक रचनासे वरमाको मित करमा उपित मही। ११२ बमाणीया, भाषण बदौ १५ जुन १९९५ बाम मतांतरसे उत्पम मा पहिला पमण बारम गा| भगळे मासमें दूसरा पपण पारम होगा । सम्पपछिसे मततिर दूर करके देखनेसे पहा मतिर गुने लामका कारण है, क्योंकि इससे दुगुना धर्म-सम्पायम किया पा सकेगा। चित्त गुफाके योग्य हो गया है। कर्मरपना मिचित्र है। पवाणाला म भार सुदीसोम १९९५ (१) मापके दर्शनों का नाम मिळे गए मगमग एक माससे कुछ ऊपर हो गया है। वर्मा मेरे एक पक्ष बा। बमा एक वर्षका निवास उपाधि-ग्रम या । समाधिमप तो एक बापका समागम हो पा पौर उसका मी वैसा चाहिये पैसा लाम प्राप्त न एमा। सचमुच हो शानियोस फरफ्ना किपा मा पा कलिकाल है। धनसमुदायको बतियाँ विपय-कलाप बाविसे विषमताको प्राप्त हो गई। इसका प्रवक्ता प्रत्यक्ष है। उ रामसी गतिका बनुकरण प्रिय हो गया है। तात्पर्य-रिकियोंको बौर पोल्प उपशमपालोंकी तो सपा तक भी नही मिलती। ऐसे विषमकाको बग्मी ई यह पेमा पाहमा अनादिकालो परिममयको पाटको उतारने निति के लिये पई पी, किन्तु उाट भविबातिमें फंस गई है। मानसिक चिन्ता करी मी का मही ना सकती । मिनसे इसे पा सके ऐसे पात्रोंकी मी कमी है। हौवा क्या करें । पपि पपापोम्प उपशममाचे प्रात मामा ससर और मोक्षपर समाति रमती, वर्षात पक्प्रतिमरूपसे विचर सकता है परन्तु स वास्माको तो बमी पह दशा प्राप्त की। उसका बम्पास है तो फिरउसके पास पर प्रति पो की होगी। निसने प्रत करने में चारी है उसको सहन कर बाना मुस्वापक है वौर इसी तरका बाचरण कर मी रस्ता परन्तु गोषम पूर्ण होने परिये पायोम्प प्रतिसे मौकी का बानी १ मन बन और कापसे मामाच मुछ-मात्र । २ मात्र उदासीनरूपसे प्रति ।
फा ११५ ११४] पिपिप पत्र मावि संमा-शवों वर्ष - ३ पचनका स्पागदपना (निराप्रपना )। १ कापाकी पस-दशा (माहार विहारकी नियमितता)। भपका सा संदेशोंकी निषि, सर्प भपका छ्टमा; और सर्व बानका नाश । सतोंने मनेक प्रकारसे शामों में उसका मार्ग बताया है, साधन मवाये है, और योगादिसे सत्पन हवा बफ्ना अनुमन कहा , फिर मी उससे यथायोम्प उपशममाव वाना दुर्लम है। या तो मार्ग है, परन्तु उसके प्राप्त करनेके लिये उपादानकी स्थिति वख्यान ऐनी चाहिये 1 उपादानको सम्मान स्थिति होने के लिये निरप्तर ससग चाहिये, और प नहीं है। (२) शिनुषयमेंसे ही इस पिके उदय होनेसे किसी मौ प्रकारका परमापाफा मभ्यास नहीं हो सका । अमुक सप्रदापके कारण शाशाभ्यास न हो सका। स्सारके भनसे व्यापोहम्पास मी न हो सका, पौर या नहीं हो सका इसके लिये कैसा मी खेद या चिन्ता नहीं है, क्योंकि इनसे बरमा और भी अधिक निकम्प पर माती (इस विफस्यकी वातको में सबके टिये मह कह रहा, परन्तु मैं केवल बपनी अपेक्षासे ही करवा ) और विकम्प आदि देशका तो माश ) करमेकी इच्छा की पी, इसलिये जो शुजारा कल्याणकारक हीमा परन्तु अब जिस प्रकार महानुभाष बसिष्टमगमान्ने यारामको इसी दोपका विस्मरण कराया था, पैसा वा कौम कराये । अर्थात् मापा बम्यासके बिना मी का पात कुछ परिचय पुना है, धर्मके म्यवहारिक बातामोंका मी परिचय है, तथापि ससे इस बारमाका वादावरण दूर हो सके, यह बात नहीं है, एक ससंगके सिवाप और योग-समाधिक सिवाय उसका कोई उपाय मही! अब क्या करें ! इवनी बात भी कहनेका कोई सत्पात्र स्पड म था । माग्पके ठग्यसे बाप मिले, जिनके रोम रोममें यही मधिकर है। (३) कापाको नियमितता । पचनका स्पाशदफ्ना । मनकी तासीनवा । बारमाको मुकता । -पही अन्तिम समझा। ११४ पाणीवा, प्रथम भार मुदी, १९९५ बाबके पप्रमे, मतांतरसे दुगुना ठाम होता है, ऐसा इस पर्युषण पर्वको सम्पशिसे दमनेपर माश्म हमा । यह बात अच्छी ब्गी, तपापि यह पछि कम्यामके लिये ही उपयोगी है। समुदायके कम्पाणको रिसे रहने से दो पप्पोका होना दु मायक हैं। प्रत्येक समुदायमें मार बरमेन चाहिये, किन्तु परम बाहिये ।
भीमद रामनन [पत्र १३ , माणीवा, प्रपम माप मुदी २,१९ प्रयम सपसरासेकर भापके दिमतक पदि किसी भी प्रकारसे मेरे मन, बपन और का किसी मी योगाम्यबसायो तुम्हारी बपिनय, वासातमा और मसमापिई हो, तो उसके लिये मैं ! पुन बापसे क्षमा माँगता है। बोनसे स्मरण करनेपर ऐसा कोई मौ का माम महोवा, मया पाद मही पाता बिस कामें, मिस समपमें इस मापने परिभ्रमण न किपा हो, सफम्प-विकम्पका रत्न न किया धीर इसस ' समाधि' को न मूस गया हो निरम यही स्मरण या करता है, और यहो। वैराग्यको पैग करता है फिर स्मरण होता है इस परिभ्रमणको पछ समदतासे करते हुए इस बारको उपसा क्यों न बाई ! दूसरे मोके प्रति कोष करते हुए, मान करते हुए, मापा करते पर, मेम करते बरमा सम्पया प्रकारसे बाताव करते हुए, यह सब अनिए इसे पोम्प प्रतिसे क्यों न चाना! इस तय मानना पोय पा तो मी न माना, यह भी परिभ्रमण करनेका रम्य पैदा करता है। चिर स्मरण होता किनिसके बिना में एक फामर भी नहीं जी सकता, ऐसे गतसे फ (मी बादि ) को बनतबार छोड़ते हुए, उनका क्मिोग वे ए बनत कामो गया तपापित बिना गाता रहा ५ कुछ कम बापर्यको पात नहीं। मत् जा जा बैसा प्रतिमान किया था वक्ठ कम्पित ) या ऐसा प्रतिमात्र स्मों का! पा विधार फिर फिरसे बम्प फिर मिसका मुस कमी मी न देस, गिसे में कभी भी प्राण म करें। उसीके घर पुनम सोममें दासस्म, पासालपमें माना गंतुरूप में क्यों अम्मा बार ऐसे रेपसे ऐसे उपेमि मम ना पा ! बीर ऐसा करनेको विद्या मी इस महीं पी तो कयोकि ऐसा स होनेपर क्या इस रेधित धारमापर युगुप्सा महाँ माती ! बकर बाती है। बधिक क्या करें । पूर्वके मिन मिन भातरोंमें प्रतिफ्नेसे भ्रमण किया, उमा स्मरण के गि यह पिता ही होगा। फिर ममी मो जन्म म सेना पर बार फिर इस । म करना पो मात्मामें ऐसी सता फैश होती परन्तु पात मचारी है, पौ मा करें । बोपण। उसे पूर्ण बरना-माप पूर्ण करना, यस पहो एन गी हप नो मि बात है उसे एक बोर इटामा पाता है, बाद उसे दूर करमा पाता है और व हो सका पण मावा सब गोवन पग माता कातक पपपाम्प जमानो उस स तक से मजाले देला ऐसौ सता है। उसके लिये क्या करें। पर काचित् किमी राहिसे उसमें कुछ करत मी हैं तो एमा स्थान हो गाकर । अर्थात् संतो गाकर इस दशाम बैरकर उसकी पुएता प्राप्त करें। तो स्पा करें।
, " विविध पत्र मादि समा-२५पौ बर्ष २०१ कुछ भी हो, कितने ही दुम स्पों न पों, कितना मी परिपर क्यों न सहम करनी परें, कितने ही उपसर्ग क्यों न सहम करने परें, शिवना हो म्यापियों यों न साम करमी पों, कितनी ही उपाधियों स्पों मना पों, कितनी ही माधियों क्यों न बा परें, चाहे गोपन-काठ काम एक समयका हो क्यों न हो, वीर किसने दुनिमित्त पो म हाँ, परन्तु ऐसा ही करना । है गांव ! ऐसा किये बिना मुटकारा नहीं इस तय मेपप्पमेंसे उत्तर मिलता है, और यह पोम्य ही माश्म होता है। क्षण क्षणमें पम्टनेवाली स्वमापतिकी बालत्यकता नहीं, वमुक कास्तक शून्यके सिवाय किसीकी मी मावश्यकता मही; यदि यह मी न हो तो अमुक कारतक सतोंके सिपाप किसीकी मी बावश्यकता नहीं, पर यह भी न हो तो बमुक काखसक सरसगके सिवाय किसीकी मी माश्यकता मही; पदि पर भी न हो तो वार्याचरपके सिवाय किसीकी मी वाश्यकता नहीं, यदि बा मी म हो तो निममधिमें अति शुदमानसे डीन हो मानेके सिवाय किसीकी भी मावस्यकता नहीं यदि यह भी म हो तो फिर माँगनेकी मी या नहीं। (वार्यावरणार्य पुस्पोदारा किये हुए वापरण)। समझे बिना मागम अनर्यकारक हा गाते हैं। ससगके बिना प्यान तरगतम हो जाता है। संतके मिना भतिम मातका अत महाँ मिख्ता । लोक-समासे छोकके अपये मही पा सकते । सोकस्पागर बिना रम्यकी पयायोग्य स्थिति पाना दुर्हम है। ११६ बाणाशा, प्र मार मुरी ७ शुफ स १९९६ पंप स्यादि स्थडोंमें सहनकी ई उपाधिके कारण, तपा यहाँ वानेके मार एत भारिफ बमार (म हाना), और दुएताकी अप्रियता के कारण से बनेगा बसे उस तरफ शाम बाऊँगा। ११७ मागाला, प्र भादप ११ माम १९९६ कुछ पाइए मतकरणमें एक महान् इच्छा या करता है, जिसे किमी भी स्पसपर नहीं करा, चामही कडी सकी मही कही जा सकती और उसको कामको मारपकता भी नहीं है। अपत मशम् परिभमसे ही उसमें समाता मिल सकता है, तथापि उसक हिर जितना चाहिये उतना परिकम नही दाना, पाक भामर्ष भार प्रमाना। पहा सामाविक हो उत्पमाई थी। चयनकर पाप सनिस पूर्ण म हा तर भामा ममारिप हाना नही चाइनी, अपना समाधिस्य म । सकेगी। पकिमी बबमर भाषेगा तो उस इण्याकी साया मानस प्रपाम करेगा। इम पास कारण जीर प्राप बिनाया ही जीरन प्यार करता रहता है। परिषद किना-दशा भी पम्पागारक हो । तथापि मरो प्रति उतनी ही पम्पासक हातमें गए पुछ मोगी।
भीम परचम्न [पर ११८ बत करणसे उदय हुई वमेक उर्मियोको पातबार समागममें मैंने तुम्हें बतौर ठ- एन- कर उनको कुलशोंमें धारण करनेको मारी इस देसनेमें वाई है। मैं फिर अनुरोष करता ! कि बिम बिन स्पोपर उन टर्मियोंको मतमा , उम उन स्पोंमें पानेपर फिर फिर उनका अधिक स्मरण पाम करना। वल्मा है। पापी गई है। प्रकको कर्ता है। मकर्मकी मोधी। मोक्ष उपाय। मामा उसे सिर कर सकती है। -ये म महाप्रवचन है, इसका निर्रवर मनन करमा । पाप ऐसा ही होता है कि दूसरेको किवनाका बनुमा नहीं करते हुए मपम अनुमको हो हम करनेवाम नप हो पाता इसलिये मैं चाहता हूँ कि तुमने जो स्वरमाके बनुमहमें परि गई। उसकी पवि करते यो और इससे परका भनुपर मी कर सकोगे। धर्म है जिसकी अस्थि गौर धर्म हो मिसकी ममा, भर्म से मिसा रि, धर्म हो मिसका वामिष ६, धर्म हो मिसको बचा है, धर्म । निसको इन्द्रियों , मर्म मिसका धर्म है, धर्म ही निसका पाना है धर्म हो सका बेठमा धर्म ही बिसका सबा पना , धर्म ही बिसा शायन रे, धर्म बिसको बागति, धर्म हो जिसका पाहार ,धर्म हो मिसका विहार है, धर्म हो निसका निहार (Ot भर्म ही निसका रिकाम्प है, पर्म 0 मिसका सम्पी गर्म हो मिसच सर्वस्त १ से पुरुपको प्राप्ति ऐना दुर्गम है और मनुम्प-नेहमें ही परमात्मा है । इस दशा स्पा एम इसी करवे ।म करते , तो मी प्रमा- गौर वस्सग के कारण उसमें पति नहीं देते। बारम भाकी पदि करना और देह-भावको घटाना । ११८ (मोरमा) वेतपर, प्र भार शो ५६ष १.१६ मगमतीमूनके पाठके सबंध मुझे वो दोनों ही मर्य क गते हैं। बाम्मावों मोवासे टप्पा का वर्ष हितकारक हमार मुमुमों पे तुम्हारा कम्पना किपा मा बर्ष हितारक तपा संतोक सिपे दानों को हितकारक है। मिससे मनुष्प हानके लिये प्रयत्न करे, इसके लिये इस स्पच्पर प्रस्वास्पानको दुष्यापास्मान कहा गया है। पदिशानकी प्राशि सी पाहिपे सीन हो तो जो प्रस्पास्मान दिया। प्रदेव वादि गति देकर संसारका ही कारग होता है - लिये इसे प्रत्यास्पान मा परम्तु इस जगा के बिना प्रस्पास्मान विस भी करना ही नही, ऐसा कानातीपारका बमिमाप नही है।
पत्र ११९ १५ ] विविध पत्र मादि संप्रह-शायर्ष प्रन्याम्त्यान मादि क्रियात्रोंसे ही मनुष्यत्व मिटता है। उप गोत्र और मादेशमें नरम मिझता है, चौर उसके वा बानकी प्रामि होती है, इसलिये ऐसी क्रियाको मीशानकी सापनभूत समझनी चाहिये। ११९ यमाणोजा, प्र माद बदी १३ शुक्र १९१६ क्षणमपि सम्जनसंगविरेका, भपति भराववरणे नौका सपुरुपोंका षणमरका मा समागम ससारनपी समुद्रको पार करनेमें नौकाल्प होता है---या पाम्प महरमा शंकराचार्यबीका है। मौर का यार्प ही माश्म होता है।मतकरणमें मिरतर ऐसा से मापा करता है कि परमार्थप होना, और मनेकोंको परमार्थक साम्य करनेमें सहायक होना, पही सम्पद तो मी अमी ऐसे योगका समागम महीं है। १२० पवागामा, रिताप भाव मुदा २ मौम १९१६ यहाँ जो उपाधि है, यह एक भमुक कामसे उत्पमई, और उस उपाधिके लिये क्या होगा ऐसी कोई सम्पना मी नहीं होती, अर्यात् ठस उपाधिके सबधमें कोई पिता करनेकी पति नहीं है। यह उपाधि कालिकासके प्रसगसे एक पहिलेको सगतिसे उत्पम है, और उसके लिये जैसा होना होगा, या पोरे कारमें हो येगा । ऐसी उपापिका इस संसारमें माना, यह कोई वायर्पको बात माही। ईपरपर विश्वास रउना यह एक सुखदायक मार्ग है । रिसका परिणाम होता है, पदुम्सी मही होता अपना दुसी हो मी तो या उस दुसका वनुमब नहीं करता, उसे दुस्स उण्टा पसरूम से बाता है। मास्मे छा ऐसी ही एती है कि ससारमें प्रारम्भके भनुसार पाई किसी मी तरका शुम नाम फर्मका उत्य हो, परन्तु उसमें प्रति अप्राप्ति करनेका हमें सकम्पमात्र मी म करमा चाहिये। रात दिन एक परमार्प विषयका दी मनन या करता है। वाहार मा यही निया मी यही है, पापम भी पा स्वप्न मी यही है, मप मी पहा है, मग मी पही है, परिण मी यही है पबना भी यही भौर बासन भी यह अधिक क्या कहा गाय ! हार, मांस और उसकी मजाको एक इसी रंगमें रंग दिया है। रोम रोम मी मामा इसाच विचार करता है, और उसके कारण न कुछ देसना वम भगता है,मस फ्ना मागता है,न कुछ सुनना पसगवा है, म कुछ पसना मम बगता है, न नए ना मन्मा जगता न य योजना बन्या माता, म मीन राना मन ध्यता है, म बैटना मष्ठा उगता है, म उटना महा भगता है,म सोना बय गवारे, म मागमा बम भगता है, न साना पअ भाता है म मूठे एमा मागतान असग बस्न गता है, न संग बच्चा पाता है, न ममी बच्ची गती है, और म मम्मी ही वष्ठा गती है। ऐसी दशा हो गई है तो भी उसके प्रति माया या निराम कुछ मी उदय होती हई नही मारम होती, पाहो तो मी टीक और न हो तो भी टोक या हुसका कारण नहीं है । तुमको २०४ भीमद् परबत [पा १२१, १२२ कारण के एक मिपम धामा है, मोर मा यदि सम है, वो सब पुस ।इस पिके काम समावि रहती तो मी बाइरसे गास्थपनेको प्रति महीरो सकती, दह-मात रिसाना नही सरा माता, महम-मानसे प्रति नहीं हो सकती, भौर बाममापसे प्राति करनेमें गुस्से क्वम्प है। फिर स स्पा करें। क्या पर्वतकी गुफामें पडे गाय वीर बाप हो चॉप ! यही टन हा करती है तो मी नामरूपसे कुछ ससाय प्रापि करनी पाती है। उसके लिये शोक वो मही, तो मी उसे सहन करनेके लिये गाल पा नहीं करता । परमानन्द मागी इसकी इस करे भी कैसे ! और इसी परणसे म्पोतिष वादिय बोर हमें पिच न किसी मी तबके मविप्यान मा सिदियों की इम्णा महो। तपा उनके उपयोग करनेमें मी उदासीनता यती है। उसमें मी में तो और भी अधिक पता छिपे इस शानसपी पाए प्रमेक विषयमें वित्तको सस्थता होनेपर विचार करकिर लिगा, बपरा समागम हानेफर करेंगा। घो प्राप्मी इस प्रकारके प्रमोके उस पानेसे मानद मानते है, मोरके मचीन है, और उनका परमार्थका पात्र होना मी दुर्लभ है, ऐसी मान्यता है इसलिये ऐसे प्रसंगमें वाना मी बम श्री हगता परम्त परमाके कारण प्रति करनी पड़ेगी, तो कुछ कहेंगा म तो नही होती। . १२१ माणामा, रितीय माग भदौ ८ वि १९९६ पापको मापनाया तो एक धर्म है। फिर उसमें सेद करके बाहमाय विस्मरण स्मों करना ! पर्म मौर मजिस मुच ऐसे तुमसे ऐसी याचना करमेश्य पोग केवर पूर्णकर्मने हो गया है। बहमे तो सस केपित है। निम्मायताके सामने सहनसीमता दो मुख्यापक है। इस क्षेत्रमें इस काल में इस देहला जन्म होना पोय न पा । पचपि सा में जन्म मेनका हमको उसने रोगहीद, तपापि प्राप्त ए सम्मके पि शोक प्रदर्शन करमेके लिये पेसा..... मिसा है। किसी भी प्रकासे किसी ना, पपायोम्प बोरनमुक्त-शाके बिना, मयामोम्प निर्मप-दशाके बिना एक क्षणमरका मी बावन देख्ना गोलको मषिकर मही व्यता, तोवर मा योाई शेष नापु कैसे बौदेगी ! यह मामेन्मको बिमा है। यपापोम्म शायबा भी में मुमा य वो प्रालि गई तो मी सम्पूर्णता प्राप्त ए रिना यह गान पतिको प्राप्त करे, ऐसी दा मातम महीं होती । एकके उमर मा और सरेक पर रेप ऐसी पति उसे एक रोममें मी प्रिम महीं । बनिक स्पा पा सम्म ! सरेका परमार्य परमेरे सिवाप देह भी वो अभी नहीं भाती ! बाम-मारपाणमें प्रति दरमा । । १२२ सामीमा रिताप मत भदौ १० मे १९९९ मुमभुवारे असे प्रमाण किया मा म एप परम स्वोष देता है। नादिकारका पत्र १२१ १२४ १२५] विविध पत्र मादि संग्रह-शा वर्ष . परिभ्रमण मय समान हो, यस यही अमिछापा है, यह भी एक कल्याण ही है। जब कोई ऐसा योग्य समय जा पहुँचगा, तब इट वस्तुको प्राप्ति हो जापगी। पियोंको निरन्तर मिसते गना, मिशासाको उत्तेजन देते राना; तपा निम्नछिसित पर्म फयाको तुमने अषण किया होगा तो मी फिर फिरसे उसका स्मरण करना। सम्पक शाके पाँच क्षण है- शम सवेग अनुकपा निद पास्पा कोष वादि कार्योका शत हो गाना, उदय वाईई कपायोंमें मंदता होना, केनौमूत की बा सके ऐसी बारम-दशाका हो माना, मथषा बनादिकालकी पपियोंका शान्त हो बाना हो धम है। मुक होनेके सिवाय दूसरी किसी मौ प्रकारकी इच्छा और अमिपाका न होना ही संग है। गबसे ऐसा समझमें माया कि केवल मातिसे ही परिभमण किया, सबसे वर मात मा! मरे मौत का तो यार, ऐसा मार होमा यह निद है। परम माहात्म्पबासे निशा पुरुपोंके वचनमें तीन बना यही भदा-बास्पा है। म सपके पारा यात्मात्र नीलाम वफ्नी मारमाके समान मुमि होना पाक्नुकपा है। पे लक्षण अस्प मनन करने योग्य , स्मरण करने योग्य है, हम करने योग्य है, वौर बनुमय करने योम्प है। १२३ पत्राणीमा, रितीप भाद्रपद एदी १४ रवि १९९१ मापका संवेगपूर्ण फा मिठा । पसे भधिक क्या बताउँ । बवतक वाहमा बारम-भाषसे कम्पपारूपसे अर्थात् देर-मावसे माचरण करेगी, ' मैं करता।' ऐसी बुद्धि करेगा, 'मैं हरि मादिमें अधिक ऐसे मानेगी, शानोको पासप समझेगी, मर्म किये मिथ्यामर करेगी, उस समयतक उसको प्रति मिना दुर्सम है। इस परसे पही करता है। इसमें ही बहुत कुछ समाया मा है। यात बगह बाचा पो पुमा हो वो मी इसपर अधिक झ रखना। १२४ मोरनी रितीय भाद्रपद कदौ १ गुरु १९९५ पत्र मिटा । शतिप्रकाश नही मिग । वापशातिम प्रति करना । योपता प्राप्त करना इसी तरहसे पह मिलेगी। पात्रताको मासिका मषिक प्रयास करो। १२५ मोग्मी, दितीय मार ली ७ रवि १०१६ (१) भा रुचक प्रदेशाके तिपयमें तुम्हारा प्रथम प्राप्त है।
भीम पमनान्द्र [पत्र १२५, ११. १२६ माणोत्रा, रितीय माद की १२ १९९५ प्पासमगवान् श्रते हैं- एणदेपपिहीनेन, सर्मम समपेदसा । मममचिपुफेन, प्राशा भगवती गविः। इच्म मार देपके बिना म नगर समापिसे देखनेवाले पुनि मगवान्को मधिसे मुक्कम भागवतो गतिको वर्षात् निर्माणको प्राप्त किया है- भाप देस, इस पचनमें रहने किन्ना वधिक परमार्प भर दिया है। प्रसंगमा इस मासका स्मरण होनेसे इसे किसा। निरर साप पने देनेमें मगवान्का क्या नुकसान होता रोगा! भाकित- १२७ पाणीभा, वितीय भाव को१२ शनि १.४५ माँचेको मायाका बम्पास करने होगना -- १ किसी भी प्रकारसे उदय कई और उसमें मानसाठी कपापोंको शान्त करना । २ सम प्रचारको अमिठापाको निति र पना। ३ इतने कामतक गो फिपा उस सम्से निप रोजो, उसे करनेसे अब को। १ तुम परिपूर्ण सुसी से ऐसा मानो, और दूसरे प्राणियोपर गनुर्कपा करते यो। ५ सिी एक स्पुणगे, और उसके कैसे भी पचन हों उनमें भा रक्सो । प पाँचों प्रकार के सम्मात काम ही पोपपता प्रदान करते हैं। पांचोंमें फिर चारों समालका से बात है ऐसा बरस मानो। अपिक स्पा । किसी मो समय इस पापको प्राप्त किये बिना इस परिभमणका न माहीमापगा। बालीक बार इस पाँचोको प्रा करनमें समापक है। पाँच नम्पामो मित्राय-उस प्रमिरे सिवाय-मुन दूसरा का निर्माणका मार्ग नाही सा, भार समी मामानोको भी ऐसा ही मूझा हागा (महा)। अब गुरेजमा याम्प माम हा सा करा । यह तुम सबको रिमी वधिक स्था गरी न करो। जितना भी उतनी ही कबर्ष, और जितनी कपई उतनी ही कटाई इम भापभिर कपनो मानमें रमना । मापसे गोषित रामबदन पधापाम्प या १२८,१११,११,१५१ विविध परमादि संग्रह-२स्यों पर्य १२८ पाणामा, रितीय मात्र पदी ११, १९१६ तुम तया और जो पो दूसरे माई मुझसे कुछ मास्म-छामको इच्छा करते हो, ये सब बारम- छामको पानो, यही मेरीत करणसेवा है, तो मी उस गमक प्रदान करनेकी पपायोग्य पात्रसामें मुझे वमी कुछ बामरण है, और उस हामको केमेकी तथा करनेवालीकी योम्मताकी मी मुझे बनेक वयसे म्यूनता माइम एषा करता है, इसलिये ममतक ये दोनों पाग परिपक्व न होगाय, तस्तक इस सिदिमें विलय है, ऐसी मेरी मान्यता । बार बार मनुकंपा वा जाती है, परन्तु मिम्पायताके सामने क्या कहें। अपनी किसी न्यूनसाको पूर्णता कैसे कर। इसके उपरसे मेरी ऐसी इम या करती है कि में अब तो मिस तर म सब योग्यता मा सको उस तयका कुछ निवेदम करता ", वौर गो कोई सुम्सा मे उसे पुलि-चनसार स्पर करता , अन्यथा योग्यता प्राप्त करते हो, सी बासको मार मार सूचित करता एँ १२९ बाणावा, दि मावपर पदी १५ सोम १९१५ पैतम्पका निरतर विशिम अनुभव प्रिय है, यही चाहिये मी, इसके सिवाप दूसरी ला भी ( मही यत्ती, पछि गती हो तो भी उसे रस्नेको इअ नहीं । बस एक 'वहीत् ' यही एक वस्समित प्रवाह निरन्तर चाहिये । अधिक क्या कहा जाय ! यह किसनेसे सिसा नहीं माता, और करनेसे कहा नही बाता, पर फेक मानके गम्य है। अपना या मेणी भेगासे समझमें वा सकता है। बाकी तो सब कुल सम्पकही। सहिये जिस निस्सह दशाका ही रटन है, उसके मिल्नेपर-इस कन्पितको भूल जानेपर . सुटकारा " १३० वाणीमा, वासाब मुदी ५ पनि १९१६ कैप नीपनी बंदर नपी, समग्या है पाम्पा सगती तीर्थकरदेशमे रग करनेका निभ किया है, अर्थात् नक्तक रम्ग यता तबतक मोक्ष नही होती; तो फिर मुछ संबपी राग तुम सबको हितकारक कैसे होगा ! जिसनेवाला बम्पकमा १३१ बामौवा, बासौम मुदी ६ रवि १९१६ बमा हो तन्मय हर बिना परमापक मार्गको प्राप्ति बहुत ही दुर्सम है। इसके लिये तुम क्या उपाप करोगे, अपना तुमने क्या उपाप सोचा! वधिक क्या इस समय इतमा ही यात है। .
२.५ भीम पन्द्र [पर १२५ उत्तयम्पयनसिकतम जो सब प्रदेसोंसे कर्म-संबंध मवाया है, उसका देत पा समझमें वाता है ऐसा पना फेस उपदेशके किये है। 'सर प्रदेशस' मेसे शासक या निषेध करते हो बाट उपक प्रा फर्मास हित नही है, यह नहीं समलना चाहिये । परन्तु पात्र या कि जब असत्यात प्रग मारमा बस वाट ही प्रदेश कर्मपित है, तब वसंम्पात प्रदेशों के सामने ये कौनसी गिना में है। असत्यात के सामने उनका इतना भरिङ्ग गमक शासकारने उपदेशको अभिकता के लिये इस बातको पंत करणमें रखकर बाहरसे इस प्रकार उपदेश किया है। और समी साकारों की पी शेसी है। उदाहरण के लिये अंतर्मुर्तका साधारण बर्प दो पाक मौतरका कोई मी समय होता है परन्तु शासम्मको साके वनुसार इसका पर वर्ष करमा पपवा किमाठ समयके माह मोर दो पर भीतरका समय ही बात। परन्तु म पो से पहले कहा। इसका बर्य हो सके मातरका कोई भी समप समझा जाता है वो मी शाबकारको शैली हो माप को गाती है । विस प्रकार यहाँ माठ समयको बात बहुत म्मु होनेसे शानमें स्पक स्पम्पर उसका उल्लेस नही किया गया, इसी तरह वा रुचक प्रदेशोंकी बात मौ , ऐसा मैं समानता, और इस माता भगवती, मशाफ्ना, ठाणग मावि सिवाच पुष्टि करते हैं। इसके सिाय में तो ऐसा समझता है कि यहि शामसमरने समस्त शाम में न होनेवाली मी किसी बात उस साध मा हो वो या मी कुरा पिताको पात मही है। उसके साथ ऐसा समाना चाहिये किस धामोध रचना करते हुए उस में कोई बात शासकारफे यामें पी। मौर समस्त शालो बपेक्षा कोई पिवित्र बात किसी शास्त्रमें कहीद वो से वपिक मानमे मोम्प समझना चाहिये धरण कि पप बात किसी निरहे मनुप्पके लिए हो कोईवी है; बाकी पपन तो साधारण मनुप्पो ये होता है। यही बात बाट सपक प्रशीको गा पाती है, इसलिये बाट स्पक प्रोश पनरहित है, इस बातका निपेव नहीं किया गया है, या मेरी समझ है। माका चार गस्तिकामा प्रसार पम्पर इस रुचक प्रशोधे गोरकर बो केपीके समुदाय करमेका वर्णन मह ाक्सी चास जातका बर्ममान नहीं ऐसा सममाने के लिये कया है। इस मासको प्रसंग पाकर समागम मेपर पर्चाकये तो योगा। (२) सरा प्रम पर कि शानमें कुछ न्यून चहा पाप तो नतनिगो में जाते २, और जम्प बानयाने बधिक से अधिक फ्टर मयोंमें मोच नाते है। इस बात समाधान भाप से करते हो। इसका उचर जो मेरे रूपमें है उसे दो का देता, पा जय बान दूसरा है और यह प्रसंग मरा । पम्प हाल बर्षात् सामापास मी मगजस्ता बाल अनिधप म्यून होनेपर मी मोशका नागनम इसीलिये ऐसा पासपा एकटेशम ऐसा पर पूर्णपारका बाल पक मूछ- कानुरेशानके सिताप म0 सा कानुओंका गामनेवाडा ता गया परन्तु पर देह-पविरमें रहनेगारे शासन पाको मही जान सभा और यदि या शामत पाये दोन मान सकार, पिस वय सामाघरमा तार मसापक मिदि नही करता उसी तरह पर मी पप जैसा हो गा। जिस पके पास करने ये गिनमगानने वार केिबानका उपदेश लिया है, पति पर पर १२५ ] पिविष पत्र मादि संप्रह-वर्ष ૨. वस्तु हीन मिली, तो फिर पता पूर्वका हान वानरूम हो एमा- यहाँ 'एकदेश कम' चौदर पूर्णका शान समझना चाहिये । यहाँ 'एकदेश कम' करनेसे वफ्नी साधारण मुछिमें तो यही समसमें आता है पड़ते फरसे बौदा पूर्वक मन्ततक पहुँचनेमें गो कोई एकाच षष्पयन बाकी र गया हो, ता उसके कारण मटक पके, परन्तु पस्तुत इसका ऐसा मतपय मही है। इतने माषिक शानका बम्पासी मी यदि फेवक एक अल्पभागके कारण हो मम्यासमें पराभव प्राप्त करे, यह बात मानने जैसी नहीं है, मर्यात सायको भाषा भयमा मर्य कोई ऐसा कठिन नहीं है जो उमें स्मरणमें रसमा कठिन पर फिन्त वास्त- विक कारण यही है कि उन्हें उस मूख्वस्सुका हो शान नहीं हो सका, और यही सबसे बड़ी कमी है, और इसीने चौदह पूर्वके समस्त ज्ञानको निष्फल बना दिया । एक नयसे ऐसा विचार मी हो सकता है कि यदि तत्व ही प्रास मावा वो शास-रिसे हुए पाका मोसा होना और पाना इन दोनोंमें कोई अन्तर नहीं क्योंकि दोनाने हो वोकेको उठाया है। बिसने पत्रोक्य मोशा सोया उसने शरीरसे मोक्षा उठाया, मौर मोफ गया उसने मनसे बोझा ठठाया, परन्तु वास्तविक प्रस्पार्य बिना उनकी निरूपयोगिता की सिर होती है, ऐसा समसमें माता । निसके घर समस्त सपणसमुद्र पर तूपा- तरको तूपा मिटाने में समर्प नहीं, परन्तु मिसके पर मीठे पानीको कुंदपा भी है वह अपनी मौर दूसरे बातोंकी तपा मिटा में समर्प है, और हानापिस देसनेसे महल भी उसीका है। तो मी वर दूसरे नपपर पशि करनी परती है और पाया कि यदि किसी तय मी शासाभ्यास होगा तो कुछ न कुछ पात्र होनेकी अमिछापा होगी, और फाह आनेपर पात्रता भी मिळेगी ही, मौर पर दूसरोंको भी पात्रता प्रदान करेगा, इसलिये यहाँ शाखाम्पासके निषेध करनेका ममिप्राय नाही, परम्त मूम्सस्ससे दूर के जानेबारे शास्त्रम्यासका निषेप करें, तो हम एकावनादी नहीं कदापगे। इस तय इन दो प्रभाका सभेपमें उत्तर मिस हा। लिसनेको अपेक्षा बचनस मधिक समझापा मा सकता है। तो भी पाशा है कि इससे समाधान होगा और पा पासाके कुछ न कुछ वंशोंकी पदि करेगा और एकात-परिको घटायेगा, ऐसी मान्यता है। बो! मनत भबके पर्यटनमें किसी सपुरपके प्रतापसे इस दशाको प्रास इस वेपारीको तुम पाहते हो और उससे धर्मकी करते हो, परन्तु यह तो बमी किसी बायकारक उपाधिमें पड़ा है। पदिय निात होता तो बहुत उपयोगी होता।मा, तुम्हें उसके लिय जो इतनी अधिक मा यती है, उसका क्या कुए मसकारण मामामा ! इसके व्यर कोई भया, और इसका का एला धर्म अनुभव करनेपर बमर्पकारक तो नहीं उगता है म! वर्षात् अमी उसका पूर्ण कमाटी करना, भौर ऐसे परमेमें प प्रसन्म है। उसके साथ ही साथ तुमें पोग्यताको प्राप्ति रोगी भार काचित् पूर्वापर मी शकारमित भया होगी तो उसको तो कैसी हो रखने कम्पाम है पसा पर काना पोग्य मारम होता पा, इसलिये वान सरिया है। वायके पत्रकी माषा बहुत ही प्रामाप सिमी है, परन्तु उसका उद्देश केस परमार्प हो। वागमके उपासको इदि करमा-~-बहर । अनामनीका प्रणाम
प्रीमद् रामम
[पत्र १२१, १२.
१२६ माणीमा, दिवाय मात्र बदौ १२ मुक १९९५
ग्यासमगवान् करते है
इणदेपविहीनन, सर्वम समपेवसा ।
ममबतिपुतिन, माता भगवती गतिः।।
शा और पिक विना म बगह समारिसे देख्नेवाले पुरुषोंने भगवानको भक्सि पुल होकर
भागक्ती गतिको बर्षात निर्माणको प्राप्त किया है-
माप देस, स वचनमें उन्होंने कितना अधिक परमार्य भर गया है। प्रसगवश इस बारपत्र
स्मरण होनेसे से सितार।
निरवर साप यने मेमें भगवान्का क्या नुकसान होता होगा!
१२७ जाणीवा, दिवाय मात्र १३ शनि १९९५
नाचेकी बावाका सम्पास करते हो यमा'--
१ किसी भी प्रकारसे उदय भाई और उदयमें बानेवाली कपायोंको शत करना ।
२ सब प्रकारको वमिमपाको मिचि करते यना ।
२ इतने कातक मोकिमा ठस सबसे निारा होमो, उसे करनेस पर रो।
• तुम परिपूर्ण पुसी हो, ऐसा मानो, और दूसरे प्राणियोपर गनुपा करत यो।
५. किसी एक सपुस्पको एगे, और उसके कसे मी पचन हों उममें महा रक्सो ।
पे पालो प्रशारके बम्पास बस हो योम्यता प्रदान करते हैं। पाँचामे गिर पाएँ एमावेश
हो जाते हैं पेसा अपप मानौ ।
अधिक स्पा करें। किसी भी समप इस पापको प्राप्त किस बिना स परिमममका बार
माहीमापगा।
बाकाकार इस पापी मन रममें सहायक है।
पापा बम्पास के सिबाप---उसकी प्राप्तिके सिपाप-मुझे इसरा कोई निर्माणका मार्ग नाही
सूप भार धमी महामाया मी ऐसा ही सूधा हगा (सक्षा)।
मसा पाम्य मामा पैसा । तुम सबको फिर मी बाधिक
म करो बलम को । मितनी गन्दी उतनी ही कई और मितनी कमाई उतनी ही बाई,
इस मासिक कपनको ध्यान, रमा ।
प्रारणसे गोषित स्पचन्दका मपापोम्प
पर १२८,१५९,५,१११]विविध पत्र मादि सपा-यों व १२८ मवाणीवा, वित्तीय भार बदौ १३, १९९६ म त्या और गो को दूसरे मई मुमसे कुछ मारम-छामको इच्छा करते थे, रे सब नाम- नमको पामो, यही मेरी बात करणसेण्डा है, तो मी उस हामफ प्रदान करनेकी पयायोग्य पात्रता मुझे अमा कुछ भावरम है और उस डामको हेमेकी या करनेवालोंकी योग्यताको भी मुझे ममेक वयसे म्यूनता माश्म इभा करती है, इसलिये भवसक ये दोनों पोग परिपत्र महोबोय, ततफ इस सिदिमें विसप है, ऐसी मेरो मान्यता है । बार बार मनुकंपा का नाती है, परत निस्पायताके सामने क्या करूँ मपमी किसी म्यूमताको पूर्णता कैसे कर। इसके उपरसे मरी ऐसी एचा या करती है कि हमें भय तो मिस तर तुम सम योग्यता जा सको उस तहका कुछ मिवेदन करता एँ, भौर मो कोई सुसासा मे उसे मुदि-बनुसार स्पर करता है, पम्पया योग्यता प्राप्त करते यो, इसी मातको बर मार सूचित करता हूँ। १२९ क्वाणीजा, नि मारपर दी १३ सोम १९४६ पापका निरतर बरिपिएम अनुमब प्रिय । यही चाहिये भी, इसफ सिवाय दूसरी कुछ भी रम मही इतो, यरि हती हो तो भी उसे रसनेको एम नहीं । रस एक 'वहीत् ' यही एक मस्सासित प्रवाह निरन्तर चाहिये । भाषिक क्या कहा बाप' पर लिसनेसे विसा नही चाता, वौर करनेसे कहा नहीं गाता या फेक इनके गम्प है अपना यह भेणी श्रेणीस समाधमें पा सकता है। बाकी तो सब कुछ मम्मत ही है। इसलिये मिस मिस्श वाका ही रटन है, उसके मिसनेपर-इस कल्पितको भूल जानेपर ही-गुटकार। सुनी ५ शनि १९०६ कंपनीपनी अंतर नयी, समम्पा पाम्पा सनसी दीपकरदेवने राग करनेका निपेन किया, वर्यात् जबतक राग यता तबतक मोक्ष नहीं होती; तो फिर मुस संबपी राग तुम सबको रिवकारक कसे होगा! सिमनेवासा मम्पकाशा २३० माणामा १३१ बमाणामा, मासोन सी ६ मि १९५६ मात्रामें हो तम्मय हुए बिना परमार्पक मार्गकी प्रामि बात हो दुखम है। इसके लिय राम स्था उपम्प करोगे, अपना तुमने क्या उपाय सोचा। अधिक स्पा ! इस समय इतना परत है। " भीमद् पसबद्र [पा ११५ ११५ १३४ १३२ क्वामीबा, वासोच सुर १० गुरु १९४६ बीमाल फोन करे तापमान मगवान् मद्यपार पाश को पाने योम्प सस्म महो। वामी स्नाकर ३ + १ २ ये सब निमतियों किसने कही! हमने बानसे ऐसार जैसा मोग्य माम दुवा पैसा म्यास्या की। भगवान् महावीरदेव १०,९,८,७,५,१,१,२,१ करीन पाँच दिन पहले पत्र मिठा पा (यह पत्र बिस पर ममी वादिको लिचित्र दशा वर्णन किया है। मा भारमा ऐसे वनेक प्रकारके परिस्पागो विचारोंको पर पाठकर एकल युनिको पाकर महामाके सगी बाराधना करेगी, मयमा सर्प किसी पूर्वके स्मरणको प्राप्त करेगी तो यह तिनको पायेगी, इसमें संशप है। धर्मप्यान, निपाम्पास स्पारिको दिनमा । १३३ भागामा, न सं १९९६ बाग पर मैं उसे मौतकी मौषधि देता है। सफ्पोग परनेमें भूख नही करना । को न प्रिपरे! मुझे पहिचाननेवाला । ऐसा मौकरते हो। बमी देर है। क्या होनेवामा रेकर्म ! एसे लिखित बया करता कि मति मार नेकोले अपर मेरा पर नहीं माना । १३४ वि स १९०६ वासोग तीन प्रकार मा.- (१) महार्य (२) मन्पताल (1)मस्पतार्य पत्र ११५, ११५] विविध पत्र मादि संपा-शा वर्ष तीन प्रकारका महापार्य कहा है (१)सालिक (२) रामसिक (३) तामसिक तीन प्रकारका साविक छ महावीर्य का है। (१) साविक उम (२) साविक धर्म (३) सात्विक मिम तीन प्रकारका सालिक एक महापर्पि कहा। (१) बाम (२) शुरदर्शन (३) शुरुचारित्र (गोल) सालिक धर्म दो प्रकारका कहा है- (१) प्रशस्त (२) मसिम प्रशस्त इसे मी दो प्रकारका कहा है (१) पमतसे (२) अपर्मतसे । सामान्य केपली तापकर यह वर्ष समर्थी। पाणीवा, मासोग मुदी ११क. १९१६ (१) पर पा एमाही मोक्ष पाता है, ऐसा क्यों मही कर देते ! ऐसी किसकी है कि सा होने देता है। जिनमगवान्के बचनको रचना महत है, इसकी तो माही कर ही नहीं सकते । परन्तु पापे पर पदार्पका सरस उसके शामों में क्यों मही! स्पा उसको बारचर्य महीं माश्म वा होगा, क्यों छिपाया होगा! (२) एक बार पर अपने भुषममें पैर था प्रकाश था, किन्तु सा पा। मंत्रीने बाफर उससे कहा, भाप किस रिचारका कर ठया दे! परि या योग्य होतो उसे इस दौनसे करकर उपाय करें। पणीला बासो पदी ११ शुक्र १.१६ पद मिठा । सर्मापसिदी ही बात है। निसिमांतमें ऐसा कहा गया है कि सर्वार्थमिद महारिमानी नगामे बार पोरन दूरपर मुक्ति- भिरा। कमर मी पगारे नामसे मानद भान में मा गये हैं। बाद पोपहर परमान दुमा । प्रमानमें गण उय, टमी समपसे कोई बर्ष दोभानम्द भीमद् पमचन्द्र [ पत्र १५. १५८ हा करता पा । इवनेम पर मिम, वर म्हपदका वविश्य स्मरण गुमा एकसान हो गया । काकारातिय वर्णन धम्दसे कैसे किया जा सकता है! यह दशा दिनके बाप बजेवक यी । पूर्ण निन्द तो का मा पैसाका पैसा ही है, परन्तु उसके बाद कार सप बाते (जानकी) करने ग गया। मम्मान से पामशु, पामधु, पामचरे के० " ऐसा एक पर नामा । पय पात मानन्दमें है। (२) नारफे मस्तित्वका तो किसी मौ कारमें संशयन थे। जीके मिश्यपनेका-विकामें होनेकर किसी भी समय सराप न हो। गायक कम्पपनेका-विकास बस्तित्वका-सी भी समय सशप मरो। उसको किसी भी प्रकारसे पथदशा यती है, इस बातका लसी मा सम्प संशय न हो। उस रथको निति किसी मी प्रकारसे निस्सन्दो पोय है, इस बातका पिसी मी समय सशप हो। मोक्षपद, इस बातका किसी मा सम्प संशय न हो। १३७ पाणीवा, पासोम सदा १२ धनि १९९५ ससारमें बना और मोष होनी काना, या बनना कठिन है। सदासीनता बम्पामको मनमी है। १३८ मोरपी, मासोग १९९५ इसरे बहुत प्रकारके साधन जुटापे, और स्वयं अपने बाप तसा फापना की, परन्तु सत् पुमके कारण उन्य संतापीमता गया ॥१॥ रिस सम्प पूर्वपुण्यके सदपसे सहम्बा योग मिग उस समय वचनरूपी गमतके कानों पर मेसे पसे प्रकारका शाक र गया ॥ २ ॥ इससे मुमे निश्चय हो गया कि पीपर सताप नए होगा । बस फिर मैं एक से नित्यही वह सारा संग रमेगा॥३॥ बोये गाना पवना भार असा मला इसमे मो टाप | पूर्व पुन्ना सर्व ममोन्स पावन मामानेचा, चव गणेग ॥१॥ Aषर एपीने सो महाँ खरीप में एक आप १४१] पिरिम पत्र मादि संप्रह-शाँ वर्ष २१३ मोरसी, भासोज १०१६ १३९ महाँ ठपयोग है यहाँ धर्म है। महावारदेवको नमस्कार. १ अन्तिम निर्णय होना चाहिए। २ सब प्रकारका निर्णय तत्तहान है। ३ बाहर, बिहार और महारको नियमितता । १ मर्पको सिदि। मार्पगोपन उत्तम पुरुपाने भाचरण किया है। १४० बई, म स १९९६ नित्पस्मृत्ति १ नित माकार्य के लिये तू पैदा एमा? उस महाकार्यका बारंबार चिन्तन कर । २ पान पर है, समाधिस्प होगा। २ म्पबहार-कार्पको विचार वा । उसमें विस कार्यका प्रमाद वा है, अब उसके लिये प्रमादम हो, ऐसा कर । बिस कार्यमें साहस एमा हो, अब उसमें पैसा न हो ऐसा उपदेश । • तुम प योगी, वैसे ही हो। ५ कोई मी मोसे छोटी मूठ तेरी स्मृतिमेसे मही जाती, यह महाकापाणको बात है। ६ किसा मी सिम न होना । ७ महागमौर बन । ८ न्य, क्षेत्र, काठ और मात्रको विचार गा। १. पथार्यकर। १० कार्य-सिदि करता एभा पाया। १४१ बर्मा, १९९५ सहजप्रकृति १ पर-हितको ही निननीत समाप्सना, और परतु सको ही अपना दम समझना । २ सम्मुस ये दोनों ही मन मात्र कम्पना है। पक्षमा दी मोनका मम्पशन है। १ सबके साप मप्रमापसे पना हो सबा म्यम है। ५, शांत सभाष की सप्रनवाका पपाप मूग है।
२१५ भीम रावचम् [पा १४१, १४५ ६ सपेस्माकी पारी समनताका सास माण है। ७ दुर्जनका कम सहसास करो। ८ सम्म सकिदिसे भावरण कये। ९ पत्र वमान कये। इस (हेप) कस्तुको पिस्त मानो । धर्म कर्मम पचि रस्ो। ११ नीतिको सीमापर पैर माही रस्तो। १२ निवेत्रिय मनो। १५ बान पर्चा, विचा-विकासमें तपा शम्बाप्पफ्नमें गुम हो। १. गंमारता महो। १५ ससारमें बनेपर भी गौर नतिपूर्वक मोग करभेपर भी निशा रम्सो । १५ परमामाको मतिमें गुप यो। १७ परनिन्दाको हो सब पाप मानो । १८ दुर्घनतासे सकस होना ही हारना है, ऐसा मानो । १९ मारमान और सम्मोकी सगति रक्यो । . १४२ बई, नि.सं १९९५ बहुतसी मावे ऐसी है मो के बारमगम्प है, और मन, वचन और कायासे पर ।। मा पातसी मा पेसी में जो पचन और मासे पर है परन्तु उनका अस्तित है। श्रीभगवान् । श्रीमपशाप। प्रीमयसाप १५३ बम्व सं १९९५ महारदेवमे प्रपम तानों कागेको मुगम पर किया, मर्यात् जगत्को इस प्रकार साा- उसमें वमन्त वैम्प बात्माको मुख देता। अनम्त पैतन्य मामाबोकोस देख। भनम्ततम भरमायौंको मोशन पाव देसा। अगम्त तप मामामाको मोपका पात्र देना। अनन्त लम्प आमामाभगतिमें देमा । जामन्त परम्प भामाग्रीको उम्रगति देय। मान् म म,पदमौर म मारमाधएक एप मार न मर और न मारपीता एस एम मममम ममममार।
पर १४४, १४५] विविष पण मावि संप्रह-श्यों पप उमको पुरुषके रूपमें देखा। उनको घर बैतन्यारमक स्वहसमें देखा। . १४४ पपई, कार्तिक मुदा ५ सोम १९९७ मगवान् परिपूर्ण-सर्वगुणसपना-करे माते हैं, तो मी इनमें भी दोष कोई कम नहीं है। चित्र-विचित्र करमा ही इनकी लीग है। बधिक क्या करें। समस्त समर्प पुरुप मफ्ने बापको प्राप्त हुए धानको हो कर गये हैं। इस बानको दिन प्रतिदिन इस भारमाको भी विशेषता होती जा रही है। मैं समझता ! कि केवम्यान प्राप्त करनेतककी मेहमत करना म्पर्ष तो नहीं पायगा | मोसको हमें कोई नावस्यकता नहीं । निशकपनेका, निर्मयफ्नेको, मिम: पनेकी, और निस्पृश्पनेकी जरूरत थी, यह बात कुछ प्राप्त ईमाश्म होती है, और उसे पूर्ण बंसमें प्राप्त करनेको गुन येए करणासागरको पा रोगी, ऐसी बाशा यती है। फिर भी इससे मी मनिक बलोकिक दशाको प्रालि होने की इच्छा या करती है | यहाँ रिशेप स्पा करें। बातर-निमें कमी मही, परस्त गाड़ी पोडेकी उपाधि प्ररणका थोराही पुस देती है। या निचिके सिपाय दूसरा समी कुछ माश्म होता है । जगत्को मार बगतको खोलाको भेटे बेटे मुफ्तमें ही देश ये। १४५ बम्बई, कार्तिक मदौ ५ सोम १९४७ सम्परुपक एक एक पाइपमें, एक एक पदमें, मनंद मागम मरे हुए है, परपात कैस होगी ! मांचे पाम्प मैंने मसत्य सत्पुरुषों को सम्मतिसे प्रमेक मुमकि छिपे मंगलमप माने है- मोझके सोचम कारणरूप माने है। १ पार कमी हो क्यों मरो किस्त मायामय सुम्सको सब प्रकारको गामको मेरे मना कमी मी एटकारा होनेवाग नहीं इससिपे सबसे यह बास्य मुना है उसी समयसे सस क्रमका मम्यास करमा हो पोम्प है, ऐसा समझ लेना चाहिये । २ किसी मा प्रकारसे सहरुको सोम करना सोप करके उसके प्रति तन, मन, बचन धौर मात्मासे मर्पण-मुदि रसना, उसीकी माझाका सब प्रकारसे सकारहित होकर बारापन करमा, पार तो हो सब मायामय बासनाका बमान रोगा, ऐसा समसमा । । अनादिकालके परिश्रमणमें बनम्तबार शास-अषण, बनम्तबार पाभ्यास, वमन्तबार निन-दीक्षा, मनम्तबार भाचार्यफ्ना प्रान हमा, पित एक सत् ही महीं मिला। सत् ही नहीं सुना, सत्य हो भशान नहीं किया, वौर इसके मिसनेपर, इसके मुनमेपर, क्या इसकी मदा करनेपर ही बहमासे एनेका पातका मणकार होगा। १ मोक्षका मार्ग बाहर नहीं, किन्तु मामा ।।
२१५ भीमद् पाद्र १४६ बर्मा, कार्तिक । १२ सोम १९१० १ जिसने इसके स्वमका दर्शन प्राप्त किया है, उसका मन किसी दूसरी मी जगह ममग मी करता । बिसे रणका मामात्र मी समागम यता है, उसके मन संसारका समागम होममा महो मावा ॥१॥ में विस समय सिवे सेयते ए प्रगटहपसे हरिको देस, उसी सम्प मेरा गान सम। पोषाकवि करते कि तम्मुछ वामम्दमें बिहार करमेपा! ही हमारे जीवनका एक मात्र वापार ॥२॥ २ म्पादये गुणस्पाम से भुवामा पौष कमसे कम तीन, और अधिक से अधिक मा मा करता है, ऐसा बनुमय होता है । ग्यायमें प्रातियों का उपामभान होनेसे मन, बचन कौर कापाका पोग प्रवर पुममाम पता है, इससे साताका पर होता है, वौर पर साता बहुत करके पाँच बनुतर विमानों से जानेपाम ही होगा। पर्मुसले बोपन पाम तेर्नु मन नपरेपीचे मामय पायनो मेमसंगनेनगमे संसारको संगरे।। इसतो रमवा मगरारी मारमीम्पु सफल बग मुकामबनो नाप विशारीर मोमा जीवशेरी ममापरे ।२॥
२वाँ वर्ष १४७ बम्बई, कार्तिक मुदी १४, १९४७ नामाने भान पा लिया, यह तो नि सराप है, प्रया-मेद हो गया, यह दोनों काम स्प बात है सब शानियोंने मी यह बात स्वीकार की। का बम्तकी निर्विकम्पसमाधि पाना ही माफी यो t, ओ मुख्म है, पर उसके पानेका हेतु मा यही है कि किसी भी प्रकारसे नमृत सागरका - कोकन करते हुए पोपीसी मी मायाका जावरण पाधा न पहुँचा सक, अषोकन-मुसका किचित्मान मी विस्मरण म हो नाय एक दही त्' के बिना दूसरी रन न रहे, और मायामय किसी मी मया, मोहका, सकम्प और विकल्पका एक मी मा बाकी न य जाय । पदि या एकसार मी योग्य रीप्सिसे प्राप्त हो जाय तो किर चाह मैसे बाबरण किया जाय, से योग नाप पो बसे आहार-विहार किया माय तो भी उसे किसी भी तरकी गापा मही, उसे परमात्मा भी पूरा नहीं सकते, और उसका किया मा समी कुछ ठीक है। ऐसी दशा पानेसे परमापक लिये किया एला प्रयत्न सफल होता है, पर ऐसी दशा हुए बिना प्रगट-माफि प्रकाशन करनेकी परमात्माकी माता नहीं है, ऐसा मुझे माझ्म होता है इसपि इस दशाको पान के बाद ही प्रगट मार्गको कामे बौर परमार्थका प्रकाश करमेका ग निपप किया है, तबतक नहीं; और इस दसाको पानेमें सब कुछ बधिक समय मी नहीं है। रुपयेमेसे पत्रा मानेता पो इसे पा गया , निस्किस्पता तो0 परन्न निधि नही है। यदि निति हो तो इसके परमापक सिप क्या करमा पाहिये, उसका विचार किया जा सके। उसके बा त्यागको वाव यकता है, और उसके बाद ही इसरों के द्वारा त्याग कराने की माश्यकता है। महान् पुरषोंने कैसी दशा पार मार्गका उपदेश छिपा , क्या क्या करके मार्गका उपदेशा किया ,इस बातका भारमाको नली तर स्मरण याकरता है, और यही बात इस बातका हिमाम्म होता है कि प्रगट-मार्गका वपदेन करमे देनेको पिया है। इसके लिय जमा हामें तो सम्पूर्ण गुम हो गाना पोप है। एक अक्षर मी इस विषयमें मात करनेकी पा नहीं होती। भापकीरणकी षा करमेके लिप कुछ प्राति पता है, अपना मात परिचयमें बापे हुए योगपुस्पको इच्छा- के विप पुकामा वयका सिसना परता है। इसके सिताय अन्य सम प्रकारसे गुप्तता हो ममी है। भवानी रोकर पास करमेको इप्य रोक रमसा है। मिससे कि भपूर्वका में जानके प्रकाश होनेपर पापा नवाये। कहिये कुछ नहीं लिया । गुगराणा पारिका उत्तर मही सिमना। सूत्रको तातक मी नहीं हैं। कल म्यवहारको रमाके लिय थोडीसी पुस्तकोंक पम उपता है। पाकी पो समी कुछ पत्परपर पानाक चित्र असा रस भोपारामप बाम योगमें प्रदेश है। Farat, इन कारणास १८ प्रीमद् पसन्द और बही याचना मी वर योग ( मन, बचन गार काय ) मानरूपमें पूर्णकर्मको मोग मारे। घेतोयका माश होनेतक गृहस्यावासमें राना योग्य भगता है। परमेश्वर पान मकर मेरदय रस्ता है, कारण कि पंचमकारमें परमाकी वर्षा हतु होने देमेको उसकी पोपी होइम माझ्म होती है। तीर्थकरने यो मो समझा बयबा जो जो प्राप्त किया है उसे इस कामें म समझ सके वमा न पा सकें, ऐसी कोई भी बात नहीं है। यह निर्णय पुत समयसे कर रहा है। यपि तापपर हानेको मनाही है, परन्तु तापकरक किये अनुसार करनेकी इया है, इतनी अधिक उन्मचता वा गई। उसके शमन करनेको शक्ति मी वा गई है, परन्तु जान कर ही शमन करमेकी रकम तराकी ग्रेणियों ठेठ पहुँच गाने मापसे चिति है कि पुरसे पुगा बनें, और इस वक-बाकि वप्रणाके मी नाणी बमें । पोरे मिलेको गुत समझना । गुणठणाबकि भेद कह समझनेके लिये किये हैं। उपशम और सपक पे है। उपशममें प्रत्यक्षा-दर्शनको समाना नहीं होती, किन्तु आपको होती है। प्रत्याश-दर्शनको समनताले समानमें या बाल म्याग गुणस्पानतक गाफर यहाँसे पीछे छौटता है। उपशममेणी दो प्रकारका --एक नावारूपा और दूसरी मार्गको माने विमा स्वाभाविक उपशम होनेरूप । भावारूप उपशम प्रेमालामा बाबाका बारापन होनेतक पक्ति नहीं होता, कि पिडा बार मी मार्ग न माननेके कारण पतित हो जाता है। या वाससे सीई, और भारमासे बनुमत्र की मात है। समय है, पर किसी में मिल भी गाय, वौर न मि तो कोई हर्ष महो । मह बात तीर्थकरके उसमें पी, सामने गान किया। दसवारी स्पादिको भावाका भारापन रनेको महामारदेसको सिधाक लपपमें बापने नो सिसा र टीक है। इसने तो बहुत ही अधिक मा पा) परम्त उसमेंसे पोनही बाकी का और प्रकाशक पुप गहस्पानासमें है, माफीके गुफा है। कोई कोई मानते भी है, परन्तु उममें मा पोगा ही। बाइनिक को बानेवाः मुनियोका सूत्रार्थ तुममेतको मी पोम्प नए । सूत्र कर उपरेस करनेकी एक रिनों पीछे जहरत मी पडेगी । सूत्र और उसके कोमे कोने सब कुछ गामे एहै। (२) (१) जिनसे मार्ग पछा है, ऐसे महान् पुरोके विचार, बछ, निर्भयता बादि गुण महान् हो । एक राम्पके प्राप्त करनेमें मितने परामकी मावश्यकता है उससे मौसा नविक पराक्रमी पापकता बर्ष अभिप्रायसहित धर्म सतविक बमके लिये चाहिए । पोरे समप परिने मुसमें पैसी तपास्मशाल माम होती थी, मी उसमें निकलता देखनेमें माता है, उसका खस्या होना चाहिये, चार करमे पोम्य है। मौ पत्र १.] विविप पर मादिसंमार-२चों वर्ष २११ समय है, वह मार्ग सप्रदायकी पैतिशय बहुतसे गोगोंको मिल मी नाप, किन्तु दर्शनकी रीतिसे वो पा रहे होगीयों को प्राप्त होता है। पदि मिनभगवानका अभिमत मार्ग निरूपण करने योग्य गिना जाय तो उसका समाय-मेदकी कोटिस निरूपण होना विसपुत मसंभव है, क्योंकि उस मार्गको रचमाको सांप्रदायिफ स्परपमें साना बत्यन्त कठिन है। दर्शनको अपेक्षासे फिसी नीरका उपकारी होने जितना निरा बाता है। (२) मा कोई महान् पुरुष हुए ये पहिलेस ही सम्वरुप (मिमलि ) समन्न सकते थे, माषी महान् कार्यके बीनको पहिटेसे ही अम्यकरप वपन किये रसते थे--अपना सापरणको अनि रोन जैसा रसत थे। मुझमें यह दशा विशेष निरोधमें पाई जैसी माश्म होती है। यह विरोध क्यों माश्म होता है, उसक कारणों को मी यहाँसित देता है. १ संसारकी प्रतिके समान विशेष प्यार एनेसे । २ प्रमचर्मका पारण । (३) वीतराग दर्शन (१) उदेश प्रकरण (३) भग उपांग मूल ऐ सपा-मीमांसा | भाशय प्रकाशिता टीका पीन मालोकन म्पबहायतु बावग अभिप्राय विचार परमापन म्पबदार प्रकरण परमार्थ गौणवाफी प्रसिदि मुनिपर्म म्पहार विस्तारका पर्यवसान जागारधर्म अमेकांसारित मतमतांतर निरापरण सगत मतिर निहरिप्रपान उपसहार. उपरम उपमहार भविमपि छान (२)महासचिन गुमम्थानरिपेचन वर्तमान कायमें भाममाधम भूमिका कर्मप्रातितिरेपन तरदान म्याम्याला अनुपम रिपारपरति प्रपाभिवपन मोरासमति गौरामाररिमति घामा माना २२. श्रीमद् प्रसाद [पन १४८, in मेरास्पान ! धर्म अधर्म मस्तिकापरुप प्रम्य । स्वाभाविक बमम्पल! अनादि बनत सिदि। बनाविनतका काम किस करो! मामा संकोच-विस्तार सिब ठगमन-पेतम, सरकी क्यों नहीं है! केवस्थानमें पोकाठोकका दान कैसा होता है ! मेकस्थिति मशिका ! शामत यस्तु सक्षण। उत्तर उन उन स्थानों में बनेगण सूर्य चन्द्र बानि बस्त असा नियमित गति । दुपम उपम मादि का मनुम्पको उचाई माविका प्रमाण ! बमिकाप भादिका निमिच्योगसे एकदम अपर हो जाना। एक सिदमें मनत सिमाको मारना। बर्मा कार्तिक१९१७ उपचाममाम सोल भावनामोंसे भूपित होनेपर मी नयाँ स्वप सोहर माना गया है, जो दूसरों की सक प्रताहे कारण वफ्नी न्यूनता होती हो, और कई मसरमाव नाकर पला बाप तो वह उसको उपसम- मात्र या धाषिक नहीं पा पा निपम ।।। (२) यह पणा म्पों पर गई। और यह दशा मीमों नहीं । कके सापसे, मानेभमसे, बगा- गृवपनेसे और गो बारि परिवहोको बप न करमेसे । निस किया जाचको रंग भगता। उसकी पही स्थिति होती है, ऐसा जो निमगवानका ममिप्राय पसप है। मातारकरने महामोहनीपक यो तास स्पान को एप। मनवानी पुरुषोंने मिसका कोई मी प्रापपिच नहीं कहा और मिसके स्पागको हो एकान्त महा दी। ऐसे चमसे यो म्पाक महीमा यही परमारमा है। १४९ बपतिक सदी ११ १९४७ वमन्तकासे वाहमाको भात्मविषयक जो भान्ति होगा। यह एक बपाप्य मत चार करने जैसी बात है। मति गति नहीं पाँवाको गति कैसे हो सकती । निरन्तर उदासीनता के क्रमका सेवन करना। सत्पुरुषको मलिमें न होना म्पुरमौके पर का स्मरण करना मपुरपोकेम्पोच मिन्तवन करना; सपुष्पों की मुखातिका मापसे गरमेकन पत्र १५ १५१,१५२ १५३]विविप पत्र मादि समा-२४याँ वर्ष ૨૧ करमा, उनके मन, पचन मोर कायकी प्रत्येक घेष्ठाके अद्भुत पस्योंका फिर रिसे निदिम्पासन करना भार उनके द्वारा माने एएको सर्वया मान्य करना । १५० भई, कार्तिक सुदी ११, बुध १९९७ निरतर एक ही थेणी रती है। पूर्ण हरि-कपा है। सत् प्रयाको पाकर) गो कोई मारा धर्मके निमित्तसे अ करे ठसका सग रहो। १५१ पई कार्तिक व शनि १९१७ यह प निवासपूर्वक मानना कि यदि इसको ठन्यकामे म्पपहारका वमन न होता ता या हमें मार दूसरे यम्से मनुष्योंको अपूर्व हितको देनेबाग होता । जो पुत्र प्रापि होती है उसक कारणसे उसने पुत्र विपमता नहीं मानी, परतु यदि उसे निति होती तो वह इस बामामौके लिये मार्ग मिनका कारण हो माता । नमी उसे रिसत होगा । पचमकाकी मी प्राति है इस ममें मोक्ष गानेवाले मनुष्योंका समय होना भी कम है त्यादि कारणांसे ऐसा ही हुमा होगा, तो उसके से पुश सेद नही। १९०७ १५२ मई, कार्तिक बदौ ५ साम संतकी शरणमें जा समसग या बोसेगमा सापन है। सत्पुरुपका प्रयाके बिना छुटकारा नहीं । इन दो विपर्योका शाब पारिसे उनको उपश करते गना । ससंगकी वि करना। . सय १५३ वर्मा नामुरा मोहल्ला, कार्तिक बदी शुक्र १९४७ एक बार तो परमार्थ-मार्गको शीप्रतासे प्रकाशित करने गया है, बार दूसरी बार बलम ' में डौन हो मानेको र पता है । यह भारमा भएस 'हप में पूर्व पूर्ण समापिए हो गई है। योग के द्वारा समावेश फरमा यही एक एन पीई है। परमार्पने मागको यदि बातम मुमम पा, भसन-समाधि पाप, तो पात भन्छा हो, आर इसीक लिये कुछ ममन भी है। दोनयुकी सी पा होगी पैसा हो ऐगा। निरतर ही महत दशा पा करती है। हम भाप्त हुए है। वौर बापूत करना तसे गोषोंके प्रति रशि। महापरिदबने इस काठको पत्रमा प्रकर हुपम का, म्यागने कलियुग या, इस प्रया २२२ [पत्र १४ भीम परचय भनेक महापुरुपोंने इस काम्को कठिन मा या बात निस्सन्देह सम्पपोंकि मदिर ससंग पिश बछे गये हैं अर्थात् सप्रापमें नही ये, और इनके मिना बाका पुरका नो इस कामें इनका मिना दुपम ऐ गया है, मौखिये इस काठको तुपम कया है, पर बात योग्य हो । हुपमरे विषयमें कमसे कम जिसनेको म होती है परन्तु जिसने अपना योग्नेको वषिक इण नहीं दी। पेशाके उपरसे हो समझमें आ मापा को ऐसा निपटा है। ॐ मीसद्गुरुपरणाय नमा १५४ बम्बई, कार्तिक १९४क १९१७ मुनि ... सर्वपमें भापका रिसना ययार्य है। मम्-स्थितिको परिपकता ए बिना, दोन- बधुध रूपा बिना, और संत-चरणको संवा बिना पीनों पाठमें भी मार्गका मिलना कठिम हो। मारो संसार-परिभ्रमणक मो को कारण है, उनमें मुम्प सबसे बो कारण मेरे कि सप निस जानके पियमें शक्ति है उसी बानका उपए करना, प्रगटलपमें उसी मार्गध रक्षा करना; तपा उसक लिये एपमें पम-विषा मान होने पर भी अपने प्रवाहनोंको उसी मार्गके पपा दोनेका उपदेश देना । इसी तरा परिबार उस मुनिके सबमें विचार करेंगे तो पर बात ठीक ठाक घर होगी। जिसका नौव सम हो धकामें दुरक्रिया साता हो, फिर भी पदिए निशंक मार्गक उपदेश कर मेका दम रखकर समम्न जीवन बिता दे, तो यह उसके सिमे परम शोचनीय है। मुनिके समपये यार- पर हुए कोर मापा हिमा गया है ऐसा मास हाता. फिर मी यहाँ पैसा अभिप्राय किस भी मही है। जैसा ( मसान सा किरण: तिस लिसा । इसी तपसे सरे बनत जोग पूर्वकाठमें मटके में वर्तमानकामें माफ ये, भोर मविप्पकासमें मी मटकेंगे। गोएटमे लिये ही माता है य बंधन में नहीं माता, या माक्य न बनुमनपूर्ण है। अपनच त्याग करनेपर ही परम्परा होता है ऐसा समझनेपर मी उसी मेघनाद करत राना, उसमें अपना महत स्पारित करना वोर पूम्मवाका प्रतिपान करना या नीबको पात ही भाषिक मासानेवाला है । यह पुटि संसार-समाक निकट मापे हुए जीवको ही होती, पर समर्प पक्रनी वैसी पर बाप हानेपर भी उसका साग करके कर-पात्र मिया मागकर जीने मार मे मान संगर परणोंको भनन मनन्त प्रेममासे मते है, और ये जहर छिन गाते है। नाभुको पमा वि किएनके इकको गोपमा नहीं मार पोफे एकको कोषमा मही। प रिमो पचराग गौरका एसी शका हा सकता है को तोपना कमी भी पता मही हगता मा एमेकी हो या राता है तो सिर गांव पोप माता! इस शफाका मना समान है कि पा अनुमब मा कि जिस मनेकदा होती है उसको पनाही शम दो मिर गाना मोर इस बयान सही पर सर है।
फा १५५ १५५, १५०] पिविप पा मादि सपा-सपो वर्ष २२३ १५५ वई, कार्तिक को १५ गुरु १९४७ बतरकी परमार्य पपियोंको योरे समयतक प्रगट करनको पछा नहीं होती । धर्मको इच्छा करनेवाले प्राणियोंके पत्र, प्रम आदिको तो इस समय घघनरूप माना है, क्योंकि जिन इन्ठामोको बमा हाल्में प्रगट करनेकी इच्छा नहीं, उनके कुछ वश पिवश हाकर इनके कारणसे प्रगट करने पड़ते है। मिरय निपममें हमें तथा अन्य सब माईयोंको म्स समय तो मैं इतना ही करता कि निस किसी मी मार्गसे धर्मसकारसे प्रसित वाहका, अपनेफ्नका, बार असम्सगका ना हो उसी मार्गमें पति भगानी चाहिये, पहा बितवन रमनेसे वार परमपका स पास रखनेसे कुछ अशोंमें जय प्रास हो सकेगा। १५६ बम्बई, कार्तिफ बदौ १९ पुष १९१७ ममी हासमें वो मैं किसीको मी स्पटपसे धर्मोपदेश देनेके योग्य नहीं, अपना ऐसा करमेकी मेरी (अ नहीं है। इच्छा न होनेका कारण उन्यमें गनेवाले कर्म ही है। मैं तो यही चाहता कि कोई मी निकास हो पर धर्मप्राप्त महापुरुषसे ही धर्मको प्राप्त कर, तपापि में मिस पर्वमानकाठमें । या का ऐसा नहीं है। सबसे पहिने मनुष्यमें पपायोग्य निवामुफ्ना आना चाहिये पूर्वके वाहों और बससंगको इटमा चाहिये भौर जिससे धर्म प्राप्त करनेकी इच्छा मा समय भी उसे पाया जा है कि नहीं, इस बात की पूर्ण जाँच करनी चाहिये। यह संतको समरने जैसी बात है। " " " " " बर्मा, मगसिर मुरी सोम १९१७ नीचे एक बास्पपर सामाम्पत स्पाशद पापाई इस कालमें कोई भी मोझ महीं जाता। इस काम कोई भी इस क्षेत्रसे मोष नहीं जाता। " इस कामे, कोई मी इस कामें उत्पन्न हुमा इस क्षेत्रसे मोक्ष महो माता । इस काल में, कोई भी इस काठमें उत्पम मा सर्वथा मोश नही माता । इस कामें कोई मी इस कामें उत्पम हुमा सब कर्मास सर्वपा मुक नही पाता। बब इसके ऊपर सामान्य विचार करते है । पहिस एक भागमाने का कि इस कामें कर मी मोश्च नही जाता । पोहो पा पाप निकम त्याही का दई कि स्पा इस कामें महाविदसे भी मोश नहीं माने पासि तो मा सकते है इसलिये फिरसे वाक्य बोलो । अब उसन मरी पार पा--इस फाठमें कई मी इस क्षमसे मोश नहीं माना । तब सिर प्रश्नाका ना, , सुपर्मातामी एपादि से मोक्ष बहे गये । र मी तो यही काल था इसठिय तिर पर सामनबाठा पुर पिचार करके बोडग-'म कारमें, कई मी इस कामें गरमा मा इस क्षेत्रमे माश्च माह) गावा।'किर प्रभ " १२५ भीमद् वचन्द्र [पर १११ १५५1 निरन्तर सेवन किया करते है। और इनके इस दासबके प्रति हमारा दासत होने का मौ यो है। मोगा भगत, मिस्त कोली स्पादि पुरुष योगी ( परम पोम्यतापासे) पे। निरंजनपरको समझनेबारे निरनन कैसी स्थिति में रखते है, या विचारनेपर उनको र गतिपर गमीर समाधिपूर्ण सी वासी है ! धन हम अपनी दशा किसी मौ प्रकारसे नहीं सकते फिर किस तो करत र भापका दर्शन होनेपर होमो कुछ वाणी कर सकेगा पा करेगी, बाकी तो गपारी।। मुक्ति तो चाहिये मही, और मिस पुरुषको अनशनका केरमान मी नहीं चाहिये, उस ! परमेश्वर का कौनसा पर बंगा, क्या पर कुछ वापके विचारमें जाता है। परि वाता वापर्य करमापपा यहाँसे किसी रीतिस फुल मी बाहर निकाश पा सके ऐसी समानमा नहीं देती। भाप बारम्बार पिसते है कि दर्शनके स्पि बास बातुरता है, परम्त मालीरगने से काल कहा है, और म्पासमगवान्ने कम्मुिग कहा है पाकहाँ साप रहने दे सकता है! पदि ग्रने दे तो भापको उपाधिमुळ क्यों न रक्से । - बम्बई, मगसिर पदी १०, यह भूमि ( बम्बई) उपाधिका छोमा स्थान है। बादिको पर एकबार मी बायका समग हो माप तो यहाँ एक व्ध रमा यहाँ यो सकता है, बम्पपा हाना दुर्मम है, क्योंकि हमें हमारी भापति पात कम है १६३ प, पौष पुदौ ५ गुरु मसस माम धुनी सगी गगनमें, ममन भया मन मेरामी । मासन मारी घरव एपारी, दिया भगम-पर रामी । परश्या मस्त देवारामी। १६४ वर्मा, पीप सुदी १० सोम प्रत्नम्पारण सत्यका माहाम्य पदारे उसपर मान मी किया था । हामें हरनमकी संगतिक भारसे करस मटिमतासे म्पत्ति होता है।रिजनकी मी उसके प्रति महिपरना यह बहुत प्रिप साता। भापको परमार्यविषयक मो परम भाभा है हमरे तो किसी मपूर्ण मार्ग पापगी । मिनको भातिक कारण परमार्थका क्ष मिना दुर्लभ चे गया। ऐसे भारत पति र परम पाउ परमाला करेगा। पर नमी हामें कुछ समपतक उसकी २२७ पर १५५, १५६१९.] विविध पर मावि संपार-सवी वर्ष बम् पौष मुदी ११ शुक. १९१७ करना फकीरी क्या दिसगीरी; सदा मगन मन रानामी मुमभुमोको इस पत्तिको अधिकाधिक बहाना उचित है। परमार्थको पिताका होना यह एक पुरा विषय है। भवरगर्भसे म्पमारको पिताका पेन कम करना या मार्ग पानेका एक सापन है। हमारी पिनो करना चाहती है, यह एक निष्कारण परमार्थ हो,भौर इस विषयमें माप भी बारम्बार गान हो चुके हैं तथापि कुरा समवाय कारणकी न्यूनताके कारण भी हाम्में तो पैसा कुछ मधिक नहीं किया जा सकता इसलिय बनुरोप है कि ऐसा कपन प्रगट न करमा कि हारमें हम कोई परमार्थ-पानी है, अथवा समर्प है, क्योंकि यह हमें वर्तमानमें प्रतिक मैसा है। तुमसे वो कोई मार्गको समसे है, वे उसे साम्प करने के लिये निरम्तर सत्पुरपके चरित्रका मनन करना चालू रस्से उस विषयमें प्रसग आनेपर हमसे पंगे, तया सन्यासका, सकपाका भीर सब्रतका सेवन करें। गि निमित्तमात्र १६६ बर्मा, पौष बदौ २ सोम १९९७ इमको प्रत्येक मुमामोंका दासस्व प्रिय है इस कारण उन्होंने जो कुछ मी उपदेश किया है, उसे हमने पहा है। यपापोग्य ववसर प्राप्त होनेपर इस लिपपमें उचर मिसा ना सकेगा, तपा बमी हम निस माधम (निस स्थितिमें बना है या स्थिति ) में है उसे छोड़ देनेको कोई वास्यकता नही। तुमने हमारे समागमको बो आवश्यकता बताई यह अवश्य हितैपी है, तपापि ममी इस दशाको पानेका पोग नहीं जा सकता। या तो निरन्तर ही भानन्द है। यहाँ सबको पर्मयोग न करनेके लिये विमति। १६७ बर्थ, पौष १९९७ "जारको मार्ग नहीं मिमा, सका क्या कारण है"! इस बातपर बारम्बार विचार करके पति पोम्प गे तो सापका (मीका) पत्र मना । हमें तो माश्म होता है कि मार्ग समठ है, मुसम है, परन्तु प्राप्तिका पोग मिझना हो दुर्गम है। सस्स्सम्मको ममेदभारसे भौर मनम्प मक्तिसे ममोनम गो निरन्तर अप्रतिमयभानसे विचरते है, ऐसे हानी पुरुषोंकी मायाका सम्प प्रतिके हपे बिना तथा उसमें वपळ स्नेह पए बिना सतरूपके विचारकी ययार्य प्राप्ति नहीं होती, और पैसा दध्य बानेसे बिसने उनके चरणारविन्दका सेग्न किमा , पुस्प बसी दशाको प्रम कमसे पा जाता है। इस मार्गका बारापन किये बिना मौसमे मनारिकारसे परिभ्रमण किया है। वहाँतक गारको सरस्मी अपाक्न मीमद महातक इस मार्गका दर्शन नहीं घेता । यह मापन हटा- मेके लिये गौरको इस मार्गका विचार करना चाहिये स मोशेन्ना करनी चाहिये। और इस विचारमें । भीमद पवाद [पर १५८ १५९ एला कि किसका मिप्याल तो नाच होगा या नहीं ? उत्तर मिला कि हाँ, होता है। तो फिर शंका- कारने म कि यदि मिष्याच मर हो सकता है तो मिप्यासे मोक्षजा कहा जायगा पा महीं ! फिर सामनेवालेने जवाप Pया कि, ऐसा तो हो सकता है। मम्तमें शकाकार योग कि ऐसा नहीं, परन्तु ऐमा हेगा कि इस कामे, काई मो इस कामें उत्पम मा म कमास सर्वया मुक मा होला ।' इसमें मी अनेक मे है। परम्त यहाँतक कदाचित् सधारण स्पाराव माने तो पर नशामके सिपे स्पीकरण हुमा नैसा गिना जायगा । येत नादि वो इस काम मी सब कर्मास सर्मया मुखिका प्रतिपादन करते है, इसरिये ममी और मी बागे गाना पडेगा उसके बाद भी चाचर मापको सिदि हो पावे । इस तरह माय बोभनेको अपेक्षा राना उचित कहा जा सकता। परशहानके उत्पम हुए बिना इस मपेशाका सत यमा संभव नहीं, वरना हो सकता है वोप सपुरुपको कपासे हो सिर हो सकता है। इस समप बस पही। पोरे सिसेको गत समाना । उपर रिसोई सिरपुमा नेपाण बातें किसना मुझे पसद नहीं। शहर के प्राकमका समाने पमान किया है परन्तु यहाँ तो गासहित मपतका नारि प, इसलिये यह कैसे पसंद ना सकता है परन्तु साप ही इसे माफ्स मी नही किया जा सकता । मम्तमें बाज, कल और हमेशके लिये यही करना किसका संग होने के बाद सब प्रकारसे निर्भय बना सोबना । भापको यह बाय सा म्ाता है। १५८ बर्मा मगसिर सदा ९ धनि १९१७ सरस्वरूप हाँ तो तीनों ही काल समान है। पालम्पबहार के प्रति विषमता नहीं है, और उसको स्पागनेको इटा रस्सा है, पर पूर्व प्रातियों मे बिना कोई पुटकारा मही। कारकी पमता.. से या प्रति मार्ग बहुतसे पांचोंको सत्य दर्शन करनेसे रोकता है। तुम सबसे पड़ी गनुरोप है कि इस बास्माके सबमें इससे कोई बातचीत मतरना। १५९ बर्मा, मगसिर दो १५ पुष १९४७ भार पड़े गो वार विस्त है उन परकर वापको पोम्मवाके लिये प्रसम होता परम प्रसमता होती है और फिर निरसे सतयुगका स्मरण हो भाता है। मार भी मानते कि इस में मनुष्यो मन मापामय सपत्ति इमायुक्त हो गये। रिती रिसे मनुप्पोका दो निर्माण मार्गको स शायुक्त यमा समय है। पवार रिगो हो ससके चरणों के साम करनेसे प्राप्त होती है। इसमें सहमही कि मा भारपाने इम कारमें मरना सम्म किमी कारण तो मा हो परन्तु स्पा उपाय किपा माप, इसको तो सम्पूर्णतान नाम एसलेगा तभी कुछ उपाय बम सरेगा ।
विपिप पन मादि समर-२पयों यप २२५ १६० पर्मा, मंगसिर मुटी १०, १९९७ आनन्दमूर्ति सस्परूपको अभटमारस वीनों काल नमस्कार परता हूँ जो जो इम्छा उसमें कही है, फम्याणकारक ही है। परम्मु इम इच्छाकी सब प्रकारका धरणाएँ तो सभे पुरपके चरणकमलपी सेवामें ही मम्सत है (पर सब अनन्तझानियोफा माना आ नि शक बाम भापका निमा), और बह गएमा मसग ही अन्तर्भूत है । परिभ्रमण करते हुए जीवने अनारिकारसे मबतफ वपूर्णको नहीं पाया जा पापापसम पूर्वानुपूर्व ही है। इन सबको बासनाका स्याग करनेका अम्पास करमा । स प्रमसे और परम उछाममे यह अम्पास जयवंत होगा, भार मह फाउकी अनुकूलता मिउनेपर महापुरुषफ योगसे अपूर्णकी प्राप्ति करापेगा। सा प्रफारफी वियाफा, योगकर, सपा, और इसके सिवाय अन्य प्रकारका पेमा छा रखना कि मामाको छानक लिये ही सब कुछ बधमके उिपे नहीं, जिससे मधन हो उन सबका (सामाम्प किपासे टेकर सर योग आर्पित ) स्पागना ही पोप है। मिष्पा भामधारीका पधायाम्प पई, मगमिर बदौ ११, २०१७ माप्त हुए सस्मरूपी मभदमारस अपून समापिम स्मरण करता है अन्तिम सएफे समझने में भीर धनुमस करनमें पोड़ीमी भी कमी नहीं रही है पर मे है मे ही मब प्रकार से समसमें आ गया है। सर प्रकाश पेपर पपा प्राफर आप सर पुष भनुभरमें भा पुका ८ । एकलेश मी एमा मही या ना समाप्त न आया । परम्त याग (मन, पचन, पाय ) पूषा सगदीन हसनके पे बममासको नाप पफ्ना बार ऐमादामेपर ही पद पाश मी अनुमबमें वा नापगा अर्थात् उनीमें रहा गागा परिपूग लागतोर-मान उरम मा मिनु म उस्म करनेफा (सी) भारशा नही रही तार यह उपम मा महागा' पाहू मी वापरफ ६. परिपूर्ण स्नान ता उत्तम पुगसमभार इस ममारिमेम निरमा गरमक प्रति बाना यम गा! पर भी पार पप गुश दी मदी रस्तु पर रिममगामी एक सादामी पुनको भार कागजमा नातिमें भी पारी मागम पारेर पुरा होगा। जन-ममुरुपये उन महामाभोली परिधान मन मारण उनम कमपि भाग गरी पर मर जारण उन मनमाओt प्रति मा उरम न रा ८६ मा भरत र गिन । इन गान गई निमशनरी न TB SrI II मिना उनम गुम हो ममरम पामे पुरगौर परे पगा। गुग्ने प्रति गल गरम Eिn और मानो निता उनसे परोसा करते हैं, मग श मे मुमुधुर अशिप उनम inti उगारला २२१ भीमद् रामचन्द्र [पत्र ११२, १३, १४ निरन्तर सेवन किया करते है। और इनके इस दासबके प्रति हमारा दासत्व होने मी यी कारण है। भोमा मगत, नियंत कोसी इस्पादि पुरुष पोगी ( परम योम्पतला)पे । निरमनपरको स्मन्ननेबारे निरंजन जैसी स्थितिम रमते है, यह विचारनेपर उनकी अतीन्द्रिय गतिपर गंभीर समाधिपूर्ण सौ माता है। जब हम अपनी दशा किसी भी प्रकारस महीन समते फिर किस तो पास सगे। भापका दर्शन होनेपर ही वो कुछ वाणी कर सकेगी पर करेगी, बार वो मचा है। हमें कुछ मुक्ति वो चाहिये नहीं, वीर बिस पुरुषको नैनदर्शनका फेनमान भी नहीं चाहिये, उस पुरुषको परमेश्वर वा कौनसा प देगा, क्या पर वापके विचार पाता है। परि वाता से तो बापर्य करना बन्यया पहाँसे किसी रीतिसे सभी बाहर निकाय मा सके ऐसी समाजमा सर्व नहीं देती। वाप बारम्बार पिसते क दर्शनके लिये बात आतुरता है, परन्तु महामारदेखने इसे परम- कास का है, वीर म्यासमगवान्ने कमियुग का प्रकासि साप बने दे सकता है। और परि गने दे तो भापको उपाधिमुक्त क्यों न रम्ते ! - १६२ बम्बई, मगसिर पदी ११,१९१७ यह भूमि (ब) उपाधिका शोमा स्थान है। बादिको यदि एकबार मी वापका ससंग हो जाय तो महाँ एक ब करना चाहिये पहो या हो सकता है, पपा होना दुर्सम है, क्योंकि हमें हमारी मावि मात कम है। .. बर्मा, पौर मुदौ ५ गुरु १९१७ भलस माम धुनी सगी गमनमें, मगन भया मन मेरामी । मासन मारी मुरव एपारी, दिपा भगम-पर रेरामी । परश्या मसख देवारागी। बई, पौष मा १ सोम १९४७ प्रस्तम्पारणमें सपका मदाम्प पदा है, उसपर मनम भी किया था। हाल में हरिजनको सम्पातिक प्रभासे कार कठिनतासे म्पत्तीत होता हरिजमको संगतिमें मी उसके प्रति मति करना या बहुत प्रिय साता है। भारी परमार्पनिषपक बो परम माशा है, या पिरेमा ई तो किसी वपूर्ण मार्गस साल हो जापगी । जिनको भाषिके कारण परमार्पा पक्ष मिडना दुम हो गया है, ऐसे मारवाडी मनुष्योंके प्रति प परम कृपा परमामा करेगा। परन्तु मभी हमें कुछ समपतक उसकी रहा हो, ऐसा माश्म नही पता। ।
पत्र १५५, १६, १६.] विविध पत्र पादि संप्रार-पाँवर्ष २१७ १६५ समई पाप पुरी११ शुक्र. १९९७ करना फकीरी क्या दिसगीरी, सटा मगन मन रानामी मुमुक्षुमोको इस पतिको अधिकाधिक माना उचित है। परमार्पको पिताका होना या एफ पुरा विषय है। बतरगर्भसे म्पबहारको पिताका बेटन कम करना या मार्ग पानेका एक साधन है। हमारी रति जो करना चाहती है, वह एक निफारण परमाय ही है, और इस विषयमें बाप मी पारम्पार गान हो चुके हैं, तथापि कुछ समवाय कारणको म्यूनता के कारण ममी पासमें तो बैसा कुछ अधिक नहीं किया जा सकता, इसलिये अनुरोध है कि ऐसा कपन प्रगट न करना कि हमें हम कोई परमार्यनवानी है, नपा समर्थ है, क्योंकि या हमें वर्तमानमें प्रतिम सा है। तुमसे वो कोई मार्गको समझे है, ये ठसे साप्य करने के लिये निरन्तर सत्पुरुपके परिप्रका मनन करमा पाइ रममें, उस विषयमें प्रमग नामेपर हम्मे पंछ, ज्या सवयामका, स्कयाका और सहतका सेवन करें। नि मिमित्तमात्र बम्बा, पीर बदी २ सोम १९९७ हमको प्रत्येक मुमभुमोका दासम्म प्रिय है। इस कारण उन्होंने जो कुछ मी उपदेश किया है, उसे हमने पाहै। पपापोग्य मवसर प्रास होमेपर इस विषयमें उत्तर लिसा गा सकेगा; क्या अमी हम बिस मामम (जिस स्पितिमें बना है या स्थिति ) में हैं उसे छोष देनेकी कोई बायकता मही। तुमने हमारे समागमकी दो बारश्यकता बताई र ममाप हितेपी तथापि ममी इस दपाको पानेका पोग नहीं मा सकता। यहाँ तो निरस्तर ही मानन्द है। यहाँ सबको धर्मयोगको गदि करमके लिये विमति है। १६७ गई, पाप १९१७ "बारको माग नहीं मिम, सका क्या कारण है" इस बातपर बारमारचार करके परि पोम्प गे तो साथका (मोचका) पत्र पाना । हमें तो माश्म होता है कि मार्ग सर, मुनम है, परन्तु प्राप्तिका पोग मिलना ही दुर्मम है। सस्स्वरुपका मयेदमापसे मौर मनन्य मसिमे नमानम गो निरन्तर प्रतिबदमावसे विचरते है, ऐसे शामा पुरुषोंकी बाशाको सम्पक प्रवास्तिक पे बिना, तथा उसमें बचछ स्नेह हुए बिना ससम्एके विचारको पधार्य प्राप्ति नहीं होती, मौर पैसोया आनेसे जिसमे उनक परमारपिम्दश्य सेवन किया है र पुरुष बसी दशाको प्रम ममसे पा नाता है। इस मार्गका वारापन झिपे दिना सपने मनाशिफारसे परिभ्रमण किया है। वहाँवा पालको सन्छम्पी पारन मौनद, बहानक इस मार्ग दर्शन नीता। यह पाम हा के लिये नीतको इस मार्गका विचार करमा पाहिपेस मेकरमा पाहिम और इस विचारमें २२८ भीमद् रामबाण [५८ १५९ अप्रमत यना चाहिय, प्रमी मार्गको प्राप्ति होकर बवास्न र समता। बगारिफारसे गाल ठम् मार्गपर रस हा, पपपि उसने पप, तप, शाबाम्पयन बगैरे बनन्तबार किये है, क्यापि भो कुछ करना आवश्यक पाप उसने नहीं किया, जो कि हमने पहिले होछया है। सूपगमेगसूत्र में यहाँ भगवान् अपमतेवनाने अपने मान पुत्रोंको उपदेश किया है, और उन्हें मोह-मार्गपर चढ़ापा यहाँ सवयका उपदेश दिया है-आयुष्मानों ! इस मारने एक मात्र कर सब कुछ किपा पो मताभो कि यह एक बात क्या ! तो नियमपूर्वक प्रते है कि पुस्पका का वा बधन- उसका उपदेश से इस पारने नही मुना, बोर ठीक गतिसे नही धारण किया और हमने उसको मुनियोंका सामायिक (माम सरूपय प्रति ) कहा है। मुपास्वामी जम्मामाको उपदेश देते है कि, बिसने समस्त जगत्का वर्णन किया है, ऐसे मातारम्गमान्ने हमें इस तय कहा है-गुरुके माधान होकर वापरण करनेवाले ऐसे बनन्त पुरुषोंने मर्ग पाकर मोक्ष प्राप्त किया है। एक इसी जगह नही परतु सब बगह बार सब शाम यही बात करने तोच है। माणाए पम्मो भाषाए तो बाबाका मारामन ही धर्म है वाशय वापयन ही वप है- पा माराम गालको समसमें मही बापा, इसके कारणों से प्रपात कारण सार। २६८ बाई, पौष १९१७ सस्वरूपको अमेररूपसे ममन्प भक्तिसे नमस्कार गिसको मार्गको इम उत्पम हुई। उसे सब निकम्पोको मेकर कमा यही एक विकम्प सिर फिरसे स्मरण करना बास्को- बनवकासे मान परिममण कर या है, फिर भी उसकी निजि क्यों मोवी ! पौर परनिति स्पा करमेसे हो सकता है। इस वाक्पमें वनन्त वर्ष समापिए है तथा इस पापमें सपपेच तिन किये बिना और उसके लिये स होकर तम्मम हुए बिना मार्गको Pमाका किंचित् मी मान मही होवा, पूर्वमें नही पुमा और भविष्यकासमें भी नहीगा। हमने तो ऐसे ही गाना। इससिपे तुम सबको मी साथी बोज करना है,किर उसके बाद ही म क्या सामनेको मारती उस बात का पता पकता । मई, माप पुदी ७ नि १९१७ रिसे मु- पनसे बना पाता। एसे मिासु ! नारफे दो बोवन :-एक सM और दूसरा प्रतिष | मिसय सभावा हानेकौरम है उसे पानी नाका माराधन करना चाहिपे, तथा रिसको प्रतिवध हटानेपा, उसे सह- संगका पानी होना चाहिय । यदि ऐसा न होगा तो मंचन मत न होगा। मिसध सभ नए हो पा १.०, १.१] विदिप पर मादि संग्रह-२५ वर्ष २२९ गया है, उसका प्रतिबघ मी बासरके प्राप्त होनेपर नाश होता है, इतनी शिक्षा स्मरण करमे योम्य है। यदि म्यास्पान करमा परे तो करना, परन्तु म्याल्पान करनेको योग्यता ममातक मुझमें नहीं है, भौर यही मुझे प्रतिबंध है-ऐसा समझते हुए उनसीन मासे म्पाल्पान करना । म्पात्यान न करमा परे इसके लिये पपाशस्य मोतवर्गको मितने रुचिकर प्रश्न हो सके उतमे सब करमा, किन्तु यदि पैसा फरमेपर मी म्पास्मान करना हो पो सो उपरिनिए उदासीन भावसे ही करना । - १७० बाई, माघ सुदी ९ मौम १९९७ धान परोसो किंवा परोठ, इस विषयको पत्रमें नही लिसा ना सकता, परन्तु समाकी वायके पीका दर्शन दुला है, और यदि कमी मसगसाके साय भापका संग मिठा तो वा बतिम परिपूर्ण प्रकाश कर सकता है, क्योंकि उसे प्राय सत्र प्रकारसे नान लिया है और नही उसके दर्शनका मार्ग है। इस उपावियोगमें मगवान् इस दर्शनको नहीं होने देंगे, इस प्रकार से मुझे प्रेरित किया करते है अतएव निस समय एकातमाप्ती हो सकेंगे उस समय पान मूझकर भगवान्का रक्सा इना परदा घोही प्रपानसे हापगा। १७१ वई, माघ सुदी ११ गुरु १९१७ सत्को अमदमावसे नमोममा दूसरी सब प्राधियों की अपेक्षा गीतको योग्यता प्राप्त हो, ऐसा विचार करना योग्य है और उसका मुफ्प सापन सब प्रकार के काम-मोगसे बैरमयसहित ससंग। ससग (समाम बसवाले पुरुषोंका-समगुणी पुरुषोंका योग ) में विसको सत्का साक्षा- कार हो गया है ऐसे पुरुपके बचोका मनुासन करना चाहिये, और उसमें से योग्य काठ वानेपर सदकी प्रास होती है। बाल वपनी कम्पमासे किसी मी प्रकारसे सत्को प्रास नहीं कर सकता । सनीपन मूर्ति प्राम होनेपर हो सत् प्राप्त होता है, सत् समसमें माता सत्का मार्ग मिता है, वौर सत्पर व्य चाता हैसमापन मूर्तिक ख्यक बिना जो मौ दुग किया जाता है, पर सब चीत्रको बधम होt, पही हमारा हार्दिक अमिमत है। पर काम सुठभावित प्राप्त होनमें विस्म है, निर भी इसमे काठोंकी मपेशा वमी उसका विषमपना बहुत कुछ कम है ऐसे समयमें जिससे वयना मार मापना प्राप्त होता है ऐसे मापारसम्यगारमें उदासान शेना ही अपस्कर सत्का मार्ग तो कही मी PHई नहीं देता। तुम सबको भाउकल बो कोई बैनर्शनी पुस्तकें पानेका परिचय रहता हो, उसमेंसे सि मागमे जगत्का विशेष वर्णम किया उस मागके पानेका मा फम करना; तथा गोपने क्या नहीं किपा, और उसे बा या करना चाहिये, इस भागफे परनेका भार विपारनेका निशप मच रसमा ।
। २१. भीम रावत [पर १०२, १४॥ यो कोई दूसरे मी दारे सरसासी (माक आPि) धर्म झिपाके मामसे क्रिया करते हों, उसका निषेध मही करना | गिसमे हमें उपाधिमप इठा साकार को ऐसे उस पुरुषको भी किसी प्रकारसे प्राट न करना । ऐसी पर्मनपा किसी र मिजास दो पोड़े पदों में करना (परमी पदि पर (स रखवा हो तो) मिस्से उसका सा मार्गको भोर निरे। बाकी इसमें तो तुम सब अपनी समसतारे चिये ही मिथ्या धर्म-वासनापोंका, तिपय मादिकी प्रियताका, और प्रतिवभका त्याग करना सालो । रे कुछ प्रिय करने पोग्य , उसे जाने की मही माना, बार बाकी कुछ मी प्रिय करने पोम्पो मही, यह हमारा निसप। पोम्पता के लिये प्रमचर्प महान् साधन है, र बससंग महान् मिस है। १७२ बर्मा, माप पुरी ११ गुरु १९४० उपाधि-योगके कारण परि शम्मान मसाला होता ममी उसे ग्रने देना, परच उपाधिस निस्प पोका मी मात्रा कर बिससे पिति स्थिर हो, ऐसी निमेिं बैटनेकी बात वासकता है, वीर उपाधिमें मौ मालिक सभ रमनेका पान रमना । नितना मापुन समप है उस संपूर्ण समयको परिभाष उपाधियोंमें म्गापे रो तो मनुष्यत्वका सह रोना कैसे समय हो सकता है ! मनुप्पचको समता किसे हो जाना कम्पाण- कारक है, ऐसा निमय करना चाहिपे | तपा उस समताके लिये जिन लिन सारमों की प्राति परमा पोप है धमें प्राठ करनेके मिसे निस्य 0 निति प्राप्त करनी चाहिये । नितिका सम्पास किये बिना चीनको प्रावि र नहीं हो सकती, यह एक ऐसी बात है जो प्रत्यय समहमें मा गाती है। गोलका बंधन धर्मक रूपमें मिथ्या पासनामोके सेवन करनेसे मास महामने रख हए ऐसी मिथ्या बासनाएं किस तरार हो सका चार करनेच प्रयत्न पाए रखना। २७३ बई, माघ सुदी १९९० बचनापती १ पौष अपने मापको भा गया है, और इसी कारण उसका सहससे योग हवा है, ऐसग सब पर्नामें माना। २ बान मिल्नेसे मपने बापो भूम्यानरूपी माला नाश होता है, ऐसा सदो रहित मानना । १ उस पानको प्राधि कानाके पाससे होनी चाहिये। पर सामरिकरूपसे समसमें भामेराग बात है तो भी बार मेगमा मारि कारणोस मामाका मात्रय मही मेरता, यही अनशनुपी कपापका ही। मानको प्रसिधाम करता है सेनाका मनुसार पम्मा चाहिये ऐसा दिमागम बार सभी शाल प्रवेश बनी इमासे पते हुए मील वनादिका मटक याहै।
पर १७१चनावमे] विविध पत्र मादि संपह-शार्प . ५ पबसक प्रत्यक्ष वामाको अनुसार, पर्यात् उसको माहानुसार नहीं चला गाप, ता- तक नामकी निवाति होना समय नहीं। ६ जानार्की बाधाका वाराषन वही कर सकता है बोएकनिष्यसे तन, मन, धमकी वासपिका स्पाग करके उसकी मफिमें गे। ७ समपि बानी लोग मकिकी इच्छा नहीं करते, परन्तु उसको किये बिना मोक्षामिलापको उपदेश नहीं उगता, तपाइ उपदेश मनन और मिरप्यासन आदिका रे नहीं होता, इसलिये मुमच भोंको हानीकी भक्ति माश्य करना चाहिये, ऐसा सत्पुरुषोंने कहा है। ८ उपमदेवलीमे मपने वान पुत्रों को शाप्रसे शौम मोश चानेका यही मार्ग बताया था। ९ परीक्षित रामाको शुकदेवगीने पही उपदेश किया है। १. यदि चीत्र अनन्त कास्तक मी मपनी इच्छानुसार पळकर परिश्रम करता येतो भी यह भरमै आपसे बात नहीं प्राप्त कर पाता, परन्तु मामाकी मात्राका नाराषक पन्तमुहर्तमें मी केवल- बाम पा सकता है। ११ शाखमें कही ई भाषायें परोक्ष है, और ये बीनको अधिकारी होने के लिये ही कही गई है, मोपप्रासिके सिप तोशामाकी प्रत्यक्ष नाका बारापन होना चाहिये। (२) चारे से निकट मार्गस मी यदि परमम्मामें परमस्नेह होता हो तो मी उसे करना ही पोग्प है। सरस मार्ग मिस्नेपर उपानिके कारणसे तन्मय भक्ति मही पती, मौर एक्सरसा स्मेह नही उमराता। इस कारण से या करता है, और बारम्बार पनवासको इजा आ करती है। पपपि पैगम्य तो ऐसा है कि प्राय म मौर बनमें बारमाको कोई भी मेद नहीं गता, परम्तु उपाधिके प्रसंग- के कारण उसमें उपयोग रसनेकी बारमार पसरत या करती है, बिससे कि उस समय परम स्नेहपर वावरण छाना पड़ता है, और ऐसे परम स्नेह मौर ममम्य प्रेममाजिके वाये बिना देरमाग परमेकी इच्छा नहीं होती। पदिसापित् सब बारमाजोंकी ऐसी ही हो तो फैसी मी दीनतासे उस इभको नित करना, किन्तु प्रेममतिकी पूर्ण रुप मापे पिना देहस्याग नहीं किया जा सकता, और बारम्बार यही रटन एनेसे हमेशा यही मन यताबममें गाय' मनमें आप 'पदि वापका निर तर एमग रहा करे तो हमें पर मी बनवास ही है। भीमदभागक्तमें गोपांगमात्र मुदर भास्पापिका दो, और उनको प्रेममक्षिका वर्णन किया है। ऐसी प्रेममकि इस कठिकारमें प्रत होना कठिन है, पपपि यह स्पमान्य पपन है, तथापि कटिकामें निस्वय मतिसे यही रटम मी येतो परमामा भनुपर करके शीप ही पर मकि प्रदान करता है। यह दशा बारम्बार यार जाती है। मोर ऐसा उग्मत्पमा परमामाको पानेका परमार, पही रवा दिए थी। भरतमीचे रिमके मासे समय लिपी, और उससे गहमरतके ममें मसग होकर २४ श्रीमद् रामचन्द्र [ फा ..., v८, बगत् मी, माँ मापापूर्वक ही परमामाका दर्शन, कुविचारपर पग रसने वैसा भगता है। इसी लिये हम वसगताको इम्य करते हैं, आपत्रा पापके सगको इन्म करते है, या योम्य हो। बम्बई, माप बी १५ रवि १९१० गाल परिचयके लिये मापने कुछ नहीं लिखा, सो दिनों। पारमायिक विषयों में मौन पनेका कारण परमामाको इया। बबतक हम संग ने होंगे, और उसके बाद उस इच्छा म हागी, कबतक हम प्रगट तसे मार्गोपदेशन करेंगे। पौर सब मामाजोप ऐसा ही Rबान है। हम तो केवळ दान । मागक्तबाली बात हमने बारम- बामसे बानी है। १७८ बर्मा, माघ वदी १५ र १९९० वापको मेरे प्रति परम उमास होता है, और उस लिपपमें वाप बारम्बार प्रसमता प्रगर करते हैं पर हमारी प्रसमता बात बपने उपर महोती, पोंकि जैसी चाहिये मैसी बसंग- वयासे नही या बाता वोर मिथ्या प्रतिमे पास गया है। यपि परमापके लिये परिपूर्ण एम है परन्तु ममी ठसमें मातक तिरेकी सम्मति नई तक मेरे विषयमें मन ही मनमें समय रममा मोर चारे पैसे से मुमसुमोको मी मेरा नाम लेकर एक न करना | मी में हमें ऐसी दशाही पना प्रिय है। - १७९ बर्थ, माघ वदी ११, १९१७ यपि किसी मा क्रियाश भग नहीं किया जाता तो मी उमको सा गता , इसका कोई कारण होना चाहिये, उस कारणको दूर करना यह कम्पामरूप है। परिणाममें 'सत्' को प्रात मानेवाग और प्रारममें सत् ' को भूत ऐसी समको पिने प्रतमता देनेवाय परम्प-कपाका प्रमग पाकर उनके साप परिचय करोगे, तो उनके समागमसे भी कम्पान ही पविगत ऐगा भार पहिल्या कारण मी र होगापगा। मिसमें पूपिषी बारिका विस्तारसे विचार किया है, ऐसे बचोकी अपेक्षा वाभि 'बषयम मैसे पचन मेरम्पकी शाम करते हैं, और उसमें दूसरे मतमा प्राणांको मोगापि नहीं होती। गो सापु तम्हारा मनुकरण करते हों, उन्हें समय सम्पपर काते यना धर्म इसाको कहा जा सकता है जो धर्म होकर परिणमे; शान उसीको ना बा सकता है कि जो शान होकर परिणमे; पदि म मेरे करनेका र तु म समतो हम वो सब सा वोर पाचन अपादि करते है, वे मिप्या है, तो में उमसे कुछ करना परवा ! करकर उनें मना पाहिप कर गो कम करते है उसमें कई ऐसी बात माको य गाती है कि किससे 'धर्म और शान में अपने अपने रूममें मही परिणमारो, क्या कपाप मोर स प्रकार पत्र १८ 1 पिविष पर मादि समा-२५वीप २१५ मिप्पाच (सदर) मद नहीं घेते, इसरिये हमें जीतके कापाणका पुन पुन विचार करना चाहिये। चौर उसका विचार करनेफर हम कुन म कुछ फल पाये बिना म रेंगे। हम लोग सब कुछ यानमेका तो प्रयान करते है, परन्तु हमारा 'सह' कैसे दूर थे, यह जाननेका प्रयत्न मही करते । बौर जबतक ऐसा न करेंगे तबतक सन्देह कैसे जा सकता है, और चबतक सदेह है, तक्सक पान मी मही सकता, इसलिये सन्देह टानका प्रपन करना चाहिये । प सदेह या कि माय मम्प है या वमम्प ! मिप्याटि पा सम्पमति ! मासानासे पोध पानेवाणीपा कठिनतासे बोप पामेवाका ! निकर ससाप या मधिक संसारी! बिससे हमें पे सब बातें माश्म हो सके ऐसा मयान करना चाहिये । इस प्रकारको बान-कपाका उनसे प्रसग रखना योग्य है। परमाके उपर प्रीति होनेमें सम्संग ही सर्वोस्कर और अनुपम साषम है, परन्तु इस कामे पैसा सयोग मिलना बात ही कठिन है, इसलिये गीतको इस विकटता राकर पार पानेमें विकट पुरुषार्य करना योग्य है और पाया कि "अनादिकारसे मितमा नाना है उतना सबका सब मााम हो, उस सबका विस्मरण करना चाहिये ।" सत् ' सत् है, सरक, वौर सुगम है, उसको सर्वत्र प्राप्ति सकती है परन्तु सत्को' बतानेवाला कोई 'सत् ' चाहिये । मय वनत है । प्रत्येक पाम वनन्त गुम-मर्म में, उनमें जनत नय परिणमते हैं। इसलिये एक अपवा दो चार नोंद्वारा बस्तुका सम्पूर्ण वर्णन कर देना समय नहीं है। इसलिये नप बादिम समवानाम हो गना चाहिये । शानियोंको बागी 'मय ' में उदासीन यता है, उस मामाको नमस्कार हो। . - - - बई, माघ वदी १३, १९४७ मय ममम्त है प्रत्येक पदार्थ बनात गुणोंसे, मौर बनम्त भोस पुक है। एक एक गुण और एक एक धर्म भनत नोंका परिणमन होवा राता सठिये इस मार्गस पदार्पका निर्णय करना पारें तो नहीं हो सकता, इसका कोई दूसरा ही मार्ग होना पारिप बहुत करके इस बातको पानी पुस्प ही मानते है। और ये मय आदि मार्गके प्रति उदासीन गते हैं इससे किसी मयका एकांत बाम मी मही पता, और न किसी मयका एकान्त मण्डन होता है। जितनी गिसकी योग्यता है उस नयकी उतनी सजा हानी पुस्पोको मापोती है। बिने मार्ग प्रात मही इमा ऐसे ममुप्प 'नयंका पाम करते है और उससे विपम फल की प्राप्ति होती है। यहाँ किसा मी मपका विरोध नही होता ऐसे शानियोंकि बपनोंको हम नमस्कार करते हैं। विसको कानोके मार्गको इया हो ऐसे प्राणीको तो मय वादिमें उदासीन एनेका हो अम्यास करना चाहिये किसी मी नयमें बात नहीं करना चाहिसे और किसी भी प्राणाको इस मार्गस कर न देना चाहिये और निसन्त पार मार हो गया है, पर किसी मी तबसे प्राणियों को सेश पांचानेका ठा मही करवा ।
[rt भीमद् पसन्द ये पे । इसी कारणसे मुझे मी मसगता गात पाद भाता है, और कमी कमी तो ऐसा हो जाता है कि वसगताके बिना परम एस होता है। अनसमासे प्राणीको मितमा यम र स्वायफ नहीं आता उससे भी अधिक हमें संग दुसदायक माताहै। ऐसौ एक्सी वरियों है जो एक ही प्रवाहको है, भो किसी भी नहीं जाती, भौर व सिविना पुप मी रहा नही पाता, मोर वापका वियोग सदा सम्ता यता है। कोई मुगम उपाय मी नहीं मिला । उदयकर्म भोगते हुए दीमत्ता करना वस्ति मही । मविपके एक क्षणी मी चिन्ता नहीं है। सत् सत् और सत्के साधन स्वरूप बाप यहाँ । बधिक मा करें। विरकी इस ऐसी ही है, और उसे प्रसस्म रक्से बिना छुटकारा मही नहीं तो ऐसी उपाधियुक्त दशामें न यें और मनमाना करें । परम..... के चरण प्रेममतिमय ही में, परन्तु प्रारम्ब कर्म प्रह। . १७४ सम्बई, माघ वदी १, १९९० सवा निर्विकार होनपर भी परमभ मेममय परामकिक पप है, या यम पिला मिसन हदपमें इस पावका भनुमय किया है, ऐसे पानिकी यहाँ परमानन्द । मगरपि होनेसे समुदायमें यना मत पटिम माम घेता है। किसका पपार्थ मानन्द किसी भी प्रकारसे महका जा सकता, ऐसा सस्वकप जिसके प्रयमें प्रकाशिवामा है, ऐसे महामान्य ज्ञानियोंकी वीर बापको हमारे उमर कसा ऐ हम ता मापको चरण-ग । और दोनों का निबनोसे ही प्रापना कि ऐसा ही प्रेम बनाये। बार प्रभातो निरजमदेवका कई भात मनपा प्रकाशित हवा । भाग बात हनसे इति परामचि किसी मनुफ्मरूपमें उदित हुई। श्रीभागवतमें एक कपा है कि गोपियों भगवान पासुदेव (रणद) मसनकी मटकी रसकर बेचने के लिये निकण पाद प्रसंग बाब पास पाना या है। वहाँ भगत प्रवाहित होता है, यही मसर-कम है, मौर को या मसनको मठको है, और नो पारिपरप उसमें निराममान है, ने यहाँ मावान् बासुदेव है । सत्पुसकी रिचाप्तिमी गोपीको उसकी प्राप्ति होनेपर पर गोपी उसमें वाकर इस लिहा मुमुसु मामाभोंस पाक कोई मानपगे, हरि मापनमो --वर्या मासिकातोरे कि भारिपुस्पकी प्रालि हो गई है, और बस पह एक ही प्राप्त करमेने योम्य है, इसराइम मी प्रत करनेके योग्य नाही; इमम्पेि तुम इसे मात करे। उसमें फिर फिर करती जाती है म उस पुराणपुरुषको प्रस कये और पति उस प्रातिपणा बस प्रेम्से करते हो तो हम तुस मारिपुसको दे दें। हम इसे मरकामें रहकर पेचने निकली है, योग्य मा देखकर देती। कोई माइक नो, मर प्रेमसे प्रारक बनो, तो हम बामदेवकी प्राप्ति करें। मटकी में रखकर बेचनेको निकम्मेका गुर भाशप पाहै कि हमें समय-सममें पासुरेन भगवान् मिड गपे है । मरम्नम रेवल नाममान परि समस्त सुरिको मथकर मापन निष तास एक भक्तपी मासुगमगन हो मिकाते हैं। इस कपाता का सूक्ष्म सरूप 1 पिविष पत्र मादि संप्रह-सौ वर्ष यहाँ है, किन्तु उसको स्पूम बनाकर, म्यासमाने उसे इस रूपसे वर्णन किया है, और उसके द्वारा अपनी वडत भलिका परिचय दिया है । इस क्पाका दौर समस्त मागमतका वधर मवर केवल इस एफको से प्राप्त करने के उदेशसे भरा पड़ा , और पर (हमें ) पात समय पहले समझमें वा गया है। मान पात हो म्पादा स्मरणमें है, क्योंकि साक्षात् वनुमबकी प्राप्ति है, और इस कारण वानकी दशा परम बहुत है । ऐसी दशासे नाव उमत्त हुए बिना न रोगा। तया वासुदेवहरि मान बूझकर कुछ समपके लिये बन्सन मी हो मामेबारे क्षणों घारक है, इसीलिये हम नसगता चाहते हैं, और पापका ससास भी असगता ही है, इस कारण मी पारमें विदोप प्रिय है। यहाँ स्स्सगकी कमी है, और विकर स्थानमें निवास है। हरितापूर्वक ही धूमने फिरनेको चि रासी है, इसके कारण स्वपि कोई से तो नहीं परन्तु मेरका प्रकाश नहीं किया जा सकता यह पिता निरन्तर हा करती। बनेक षनेक प्रकारसे ममन रमेपर में यही निथयावा कि भक्ति की सर्वोपरि मार्ग है वौर या ऐसी अनुपम बस्तु है कि यदि उसे सत्पुरुपके चरणों के समीप सफर की चाय तो मा क्षणभरमें मोम दे सकता है। विशेष फल मिला नहीं जाता; परमानन्द है, परन्तु बससग है, अर्थात् ससग नहीं है। (२) किसी सरसके मोक्ताको कोई विरछा योगी दो बानता है। १७५ बई, माघ वदी १, १९९७ भवी ई बचनावठीमें भापकी प्रसमता होनेसे हमारी प्रसनताको उपेगमा मिली। इसमें मतका भात मार्ग प्रकाशित किया गया है। यदि यह एक ही रजिसे इन बायोका माराधन करेगा, और उसी पुरुषको मात्रा हान येगा तो मनन्तकारसे प्राप्त हुआ परिभ्रमण मिट नापगा। उसे मायाका विशेष मोह है, और यही माकि मिनेमें महान् प्रतिषध माना गया है, इस- मिपे मेरी उससे ऐसी रज्यिोंको धीरे धीरे कम करने की प्रार्थना है। १७६ बई, मान दी ११ शुक्र १९४७ ताको मोह का शोका एकस्वमनुपश्यता गो सत्र एकत्र (परमात्मस्वरूप) को ही देखता है, उसे मोह मा भार सोक क्या ! यदि बास्तविक एस जगत्की दिमें वाया रोता तो पानी पुरुषोंसे निफ्त किया जा मोक्ष स्पान छर्षमोको नहीं होता, परम्त यह जगत् ही मोशरपान होता । पपपि यह बात सत्य हो कि बानीको तो सर्वत्र हो मे है। फिर भी उस हानाको पा (२) कोई रन्ध्र मोपी ग्रेई प्रारम्ना मेपा। गारे कोई पार गोपी कोसरहना मेगी। - २४ श्रीमद परचन्द्र [पा ११, १०८, ११ जगत् मी, माँ मामानक ही परमात्माका दम है, चारकर पग रसने असा भगता है, सी- लिये हम बसाताकोणा करखे है, मपया आपके सगकी इच्छा करते है, यह पोम्प है। बम्बई, माप गदी १२ वि १९४७ गाल परिचयके लिये वापने कुरा म लिसा, सो लि। पारमाधिक विषयमें हममें मीन एने कारण परमात्माको म। अबतक हम सग म होंगे, और उसके बाद उस इम्म न हागी, तबतक हम प्रगट रीतिसे मार्गोपदेश म करेंगे। और सब मामागोका ऐसा स्पाम है। हम तो केवछ दीन है। मागवतवासी बात हमने बाम- बामसे पानी है। बी, माष नदी १३ रवि १९१७ मापको मेरे प्रति परम उशाम होता है, और उस लिपपमें बाप मारम्बार प्रस्मता प्रगठ रखे हैं। परम्त हमारी प्रसमा अमावक अपने उपर महीं होती, क्योंकि पैसा चाहिये जैसी बसग- दशा मही या गावाबर मिम्मा प्रतिवमै बास यताद। पापि परमार रिपे परिपूर्ण प्रयम है, परन्तु ममी उसमें सतक रेपाको सम्मति महोई तस्तक मेरे विषयमें मन ही मनमें सपना रहना; बार परे से दूसरे मुमामोंका भी मेरा नाम लेकर कुछ म कामा । वमी हाम्मे हमें ऐसी प्यासे ही बना प्रिय है। - १७९ बई, माघ कहा १५ १९९० पपति किसा मी कित्याका मग नहीं किया जाता तो मी उनको पैसा ध्यता है, इसका को पारण होना चाहिये, उस परणको दूर करना यह कम्पाणस्म है। परिणाममें 'सत् को प्राप्त करानेवाग और प्रारममें ' सत् 'कोलभूत ऐसी तमको मनिको प्रसरता देनेवाली राम्प-कपाका प्रसंग पाकर उनके साथ परिचय करोगे, तो उनके समागमसे मी कम्पाण होवगत होगा, बार परिस कारण मी दूर हो गायगा । मिसमें प्रपिती माविका विस्तारसे विचार किया है, पसे पचनोंकी गया तासिक' बप्परम जस पपन मैरापार करते है, भार उसमें दूसरे मतवाले प्राणीको मा बाप महा सेती । गो साधु सहारा वनुकरण करते हो उन्हें समप समयपर मते यना कि "बर्म उसको मामा सकता है यापम होर परिगमे पान उसको हावा सकता है कि शाम होता पदि तुम मरेपरनेच पातु न समझो के हम जो सब किया और पाचन पादि ते ६ मिप्या है, तो मैं तुमस युग काना पाहता"। इस प्रकार पर उन पर करना चाहिए कि यह से कुछ हम करते है, उसमें कोई ऐसी बात माको र गती है जिसमें धर्म बार शान में मन नपभे रूपमें नहीं परिणमाते, तपा काय बोर परिणमा पर १८ ] पिषिप पत्र मादि प्रह-२४वा पर्व २३५ . मिथ्याव ( सोह) मद नहीं होते। इसलिये हमें नौबके कायाणका पुन पुन विचार करना चाहिये और उसका विचार करनेपर हम कुउ म कुछ फस पापे बिना म रेंगे । हम छोग सब कुछ जाननेका तो प्रयत्न करते हैं, परन्तु हमारा ‘सदेह' कैसे दूर हो, यह माननेका प्रपन नहीं करते । भीर बपतक ऐसा म करेंगे तबता सन्देह कैसे जा सकता है, और जबतक देर, सतक दान भी नही हो सकता, इसलिये सन्देह हटानेका प्रयत्म करना पाहिये । म सह यह है कि चौष मम्य है या वमम्प ! मिष्यामि या सम्पग्दरि ! वासानासे बोध पानेपाना है या कटिनतासे बोध पानेमा निफर संसारी है या अधिक संसारी' मिससे हमें ये सम मा मायम हो सके ऐसा प्रपरन फरना चाहिये । इस प्रकारको शान-कपाका उनसे प्रसग रसना योग्य है। परमार्यके उपर प्रीति होनेमें मसग ही सोलर वीर अनुपम सापन है, परन्तु इस कासमें पैसा सयोग मिझना बहुत ही कठिन रे इसलिये चीनको इस विकटतामें यकर पार पानेमें विकर पुरुषार्थ करना योग्य और पाया कि "अनादिकापसे नितना बाना है उतना सबका सब बहाम हो, उस सबका पिम्मरण करना चाहिये।" सत् ' सत् हो, सरम है, और एगम है, उसकी सर्वत्र प्राप्ति हो सकती है। परम्म 'सत्को 'बवानवाला कोई 'सत्' पाहिये । नप धनंत है। प्रत्येक पार्पम नमम्त गुण-धर्म- उनमें अनंत मप परिणमते है। इसलिये नक भपका दो भार नपोस वस्तुका सम्पूर्ण वर्णन कर देना समर नहीं है। इसलिये मप मामि समतावान हो ना पाहिये । शानियोंकी वाणी 'मप ' में उदासीन रहती है। उस पाणीको नमस्कार हो। । १८० बई, माप ॥ १५, २०१७ मय जनम्त है। प्रत्येक पदार्प बनम्त गुणोंसे, और अनन्त धमसि युट है। पक एक गुण और एक एक पर्ममें अनत मोका परिणमन होना पता है, इसलिये इस मार्गस पापका निर्णय करना चाहें तो नहीं रो सकता, इसका कोई सय मार्ग होना चाहिये बात करके इस गानको शानी पुरुप की जानते हैं। और ये मप वार मार्गके प्रति उदासीन पत है इसमे मिमी मपका प गान भी नही होता, और न किसी मयका एकान्त मगन ही होता है। मितनी निसफी पोग्यता है उस नपको उतना सता बानी पुस्यों को मान्य होती।बि मार्ग प्राम महीमा मे मनुष्य 'मप' का भामद करते है और उसमे रिएम फल प्रामि होती है। वहाँ किसी मी मपमा रोप नही होता ऐमे निपोछे सपनोंको हम नमस्कार करते हैं। निमको बानाक मार्ग हा हा प्मे प्रागारोतो मप भामि सासीन पनेका बम्पास करना चादिप; किमी मी नपमें भाप्रद नही करना चाहिये। मोर किमी भी प्रागीको इस मार्गस कर नोना चाहिए, और निमुन पद माद र गाई, पर ग्रिी मी तपसे प्रातिपोश पानेको रामही करना । 1 भीमद् रामचन्द्र [पा १८१, १८१ (२) माना प्रकारके मय, माना प्रकारचे प्रमाण, मामा प्रकारके भगवास, और नाना प्रकारके अनुपोग पे सब एवणाप हो। तो फेस एक समिशनन्द । . १८१ ब, मापदी १३, १९४७ सत् 'कुछ दूर नहीं है, परन्तु र गता है और यही मानका मोह है। 'सत्'यो है, 'सत्', सरह है, मुगम है; और उसकी सर्वत्र प्राप्ति हो सकता है। परस्त निस मतिरूप वापरण-सम या जमा है उस प्राणीको उसकी प्राप्ति कैसे हो सकती है। कार पारे कितने भी मे- क्यों न करें किन्तु उनमें कोई ऐसा मे नही पा सकता जो उमाका हो । जिसे मावरण-तिमिर पात में से प्राणीको कल्पनाम की कोई मी कम्पना 'सत्' मास्म मही होती और पर प्राणी सत्' के पासतक मी जा सके यह समय महा है। जो 'सत्' है स भावि की है, म मन्तिसे सर्वमा म्पतिरिक (जुरा), कापनासे 'प' (र) है इसलिये सिने उसको प्राप्त करने का निधय किया । उसे यह स्वप कुछ भी नहीं पामता, ऐसा पहिले सनियम पुत्त विचार करना चाहिये, वौर पादमें सत्'की प्राप्तिके मिपे बानीको शरणमें गाना चाहिये। ऐसा करनेसे काय मार्गको प्रासि वी। ये नो पचन सिहे है, वे सा मुमुक्षुषोंको परमवन्मुके समान , परमरक्षकके समान है, भीर में सम्यक् प्रकारसे विचार करनेपर ये परमपदको देनेवाले इनमें निन्द प्राचनको समस्त शो, पदर्शनका सर्वोत्तम तल, और बानाके उपदेशका बीग सपेपसे पारपास- सिये शिर फिरसे उनकी समाल करना रिचारना, समझना समाधनका प्रयत्न करना इनका बाना पापानेवासे दूसरे प्रकारोंसे उम्सीन बना) और हमें 0 विधव्य करना, हमें और क्य किसी मी मुमुक्षुको गुस्त रीतिसे कनेका हमारा यही एक मंत्र है। इसमें 'सत्' ही कय है, पर समझने के लिये निफसे अधिक समय बप भगाना। बर्मा माप सौ ११, १९९७ सत्स्वरूपको भभेदमापसे ममोममा मा बसे । न तो पुछ समता मी नहीं क्योंकि दशा हुदीही यती है। फिर भी प्रसग पाकर कोई मपि मेवाली पुस्तक होगी तो मेगा। हमारे उपर तुम्हारी चाहे वैसा मा भजि क्यों न हो तो मी बाबके सब चालान और होप करके धर्म-जावो तो हम तीनों का दास है। तो समझो इतना करना चाहिये कि पुराना मेरे बिमा तो समय दो नही और ए मेयने मोत्यसरे, या माना स करना । मार्ग सर पर प्राधि दम है।
पत्र १८१] पिषिप पत्र मादि संग्रह-भवों षप २१७ - . , - १८३ बम्बई, माघ वदी १९१७ सत्तको नमोनम फाम' शमा वर्षात् इश, वर पवेन्द्रियों के विपयोंके अर्थमें प्रयुक्त होता है अनन्य' वर्षात् निसके समान कोई दूसरा न हो वर्यात् सर्वोत्कृष्ट । 'अनन्यमधिमाल' बर्षात् मिसके समान कोई दूसरा नहीं ऐसा मणिपूर्वक उत्तएमात्र । निसके वचन-यम्से सीव निर्वाण मार्गको पाता है, ऐसी समीचन मर्तिका पाग यपि जीवको पूर्णका में मनेक बार हो चुफा है, परमा उसकी पहिचान नहीं हुई। चीनने पहिचान करमेका प्रयत्न शायद क्रिया मी होगा, सयापि भीलको एपको रसनेवाला सिदि-योग वाPि, अधि-योग पानि एव इसी तरह की दूसरी कामनाओंसे उसकी सुदको एि मछिन थी, वार यदि दृष्ठि मछिन रोतो उससे समर्तिके प्रति सक्षम म्गकर यह क्ष कम्य वस्तुओंमें ही रहता है, जिससे पहिचान नहीं हो पासी, भौर जग पहिचान होती है तब जीवको कई अपूर्व ही स्नेह पैदा हो जाता है, और यह ऐसा कि उस मर्तिके वियोगमें उसे एक पामर भायु मोगमा भी मिरमाना माझ्म होती है, अर्यात उसके वियोगमें या उदासीन मावसे उसीमें इति रसकर नीता है और इसे दूसरे पदार्थोका संयोग और मृत्यु पे दोनों समाम हो हो बाते है । मब ऐसी दशा वा माती है, तब नौत्र माकि बहुत ही निकट पा जाता है, ऐसा समझना चाहिये । ऐसी दशा वानेमें मापाको संगति यात विनम्प है। परतु इसी दशाको भनेका मिसका रस निषय है उसे प्राय करके थोरे ही समयमें यह दशा प्राप्त हो पाती है। तुम सब ठोग हाममें तो हमें एक प्रकारका बषन करने छगे हो, उसके किये हम स्पा करें; पर कुछ भी नहीं सूसता । ' सजीवन मूर्ति 'से मार्ग मिल सकता है, ऐसा उपदेश करते हए हमने सस्य वपमे पापको ही बघनमें गड किया है, और इस उपदेशका वर्ष तुमने हमारे उपर गाना शुरू कर दिया । हम तो सभीवन मूर्तिक केवल दास है, उनकी मात्र घरणमा । हमारी ऐसी वगै किक दशा मी कहा कि जिस दशाम फेवस वसगता हो यती हो! हमारा उपाधियोग तो पैसा तुम प्रत्यक्ष देसते पैसा है। पे दो पन्तको बा मेने तुम सबके लिये किया है। जिससे हमको बब कम संवम हो, ऐसा करनेकी सपसे प्रार्थना है। दूसरी बात एक यह भी कहना है कि तुम गेग हमारे विषपमें ना किसीसे कुछ मी न करना । उदयकास तुम मानते हो। मुमा बै० पोगमार्गक बच्छे परिचयी है, इतमा ही मानता , पोम्प गीत है । जिस करके साझाकारके तिपयमें तुमने म है उन्हें बमौतक साक्षात्कार नहीं एषा है। कुछ दिम परिसे उपर Pग्रामें विचरनेकी बात उनके मुससे सुमी पी, किन्तु इस विषयमें इस उमप कुछ भी नहीं दिया जा सकता । परि में हमें इतमा विश्वास दिला सकता है कि नोंने तुम मिप्या मही कहा है। ।
૧૮ मीमद् परमात्र [mter मई, फागुन पदो शनि १९१० पुराणपुरुपको नमोनमः यामेक त्रिविर वापसे माकुम म्याकुल है, और ऐसा दौम है कि गतृष्णा चम्मो मेने के लिये दौर दौरा करके उससे अपनी तुपा बुधानेकी रहा करता है। मानक कारण अपने सपने मूत्र या वीर इसके कारण उसे भपकर परिभ्रमण प्रश्न वा । समय समयपर ना क्स हेर, भर मावि रोग, मरण वादि मय, और वियोग वाशि दुसोका वनुमच करता यता है। ऐसी पसर- रणवावा इस जगत्को एक स्पस्प ही घरण है। पुस्पकी बाणा बिना दूसरा कोई मी इस ताप वीर वपाको बात नहीं कर सकता, ऐसा निश्चय है। क्वएक फिर फिरसे हम उस सपुष्पके पर गोत्र म्मान करते है। ससार सपा मसातामय है। पर किसी प्राणीको यो माप मी साता दास पावतोय मी सम्परपका हो अनुहो। किसी मी प्रकार के पुण्यके बिना साताको प्राप्ति नहीं होती और सस पुण्पको भी सम्पुरपके उपरेशके बिना कोई मही मान पापा । पात काम पूर्ण उपोश किमा माया पुण्य भाग ममुक पोसी स्कीयोंमें मान मिया गया है। इस कारण ऐसा माइम होता है कि मानौ पा प्रप वादि प प्राप्त वा है, परन्तु पस्त इसका मूग एक सपुरुप बिवरण हम तो पाही जानते है कि साताके एक से मेकर पूर्ण मानदतककी सस समाधियोंका मम एक सपुरम । है।हनी बधिक सामर्थ्य रोनेपर मी निसको कोई भी सहान, उन्मत्ता नही, मफ्नाम नही, गर्व नही, गौरव नी, ऐसे बाधर्मको प्रतिमारूप सपुरपके मामको हम फिर फिरसे स्मरण करते हैं। नियोकके माप पशमें होनेपर भी वे किसी ऐसी ही वटपटी दशसे राते किनिसको सामान्य मनुप्पको पहिचान मी होना तुम है, ऐसे सपुरपका हम फिर शिरसे स्तन करते हैं। एक समय किये मी सपा वसंगपनेसे पना, पानिकको पश करनेको अपेक्षा की बामिक कठिन फर्म है। वो विकासमे एस बापमस यता है, एस सपुरपके मंतकरणको देखकर हम उसे परम बापस नमन करते है। रे परमात्मन् ! हम तो ऐसा ही मानते हैं कि इस कामें मी जोरको मोड़ सकता। सिर मी जैसा कि बैन मपोंमें कहीं कही प्रतिपादन किया गया है कि इस काम मोपनीया, तो प्रतिपरमको इस क्षेत्रमें वपने पास रस और हमें मोष ऐनेको बपेक्षा, हम सम्पुस्मोही परणका ध्यान में और उसके समीपमें ये, ऐसा योग प्रदान कर। हे पुस्पपुराण। हम उसमें मार सपुस्यमें कोई भी मे मही समसते तेरी पेशा हमें तो स्पुण होनशेप माम होता है, स्पोक्किदमी उसके मापान पता है और हम ससम्मको पहिचाने बिना दमे मा पहिचान सके, वेरी यही दुर्घटना हमें सुपुम्भके प्रति प्रेम रत्पम करती है। क्योंकि हे वश करनेपर भी वे उग्मत्त न येते, वौर में तुमसे मी वरिक सरह सविध मा जैसा कसा करें। हे माष! ६ गुण न मानना कि हम से मी पुस्पाही भपिक स्तन करते समस्त स पर १८५ १८१] विविप पत्र मादि सह-सौ वर्ष भगत् तेरा ही स्तवन करता है, तो फिर हम मी तेरे ही सामने बैठे रंगे, फिर तसे स्तबनकी कहाँ पाहमा है, और उसमें तेरा अपमान मी कहाँ एमा! (२)शानी पुरुष निकाझी बात बानमेपर मौ उसे प्रगट नहीं करते, ऐसा जो मापने पूसाहै, इसके सममें ऐसा मालूम होता है कि ईश्वरीय इग्न ही ऐसी है कि किसी भी पारमार्थिक मातके सिनाप हाना मेग त्रिकाम्सषधी दूसरी बात प्रसिद म करे, तया हामीको नांतरिक छा भी ऐसा ही माम होती है | मिसको किसी भी प्रकारकी बाधा नहीं है, ऐसे हानी पुरुषको फुट कम्प मही या, इसलिये गो कुछ मी उदयौ माता है उतना ही ये करते । हमें तो कही पैसा बान है नही, बिस्से तीनों काठ सब प्रकारसे जाने ना सके, और हमें ऐसे बानका को विशेप मक्ष भी नहीं है। हमें तो ऐसा जो पास्तविक सरस है उसीको मति वीर मसगता प्रिय है, यही निवेदन है। १८५ बाई, फाल्गुम सदी ५ रषि १९४७ बमेद दशाके बाये बिना यो प्राणी इस जगतकी रचमा देसमा चाहते है, इसमें फंस बावे। ऐसा दशा प्राप्त करने के लिये उस प्राणीको इस रचनाके कारणमें प्रीति करनी चाहिये। और मपनी बास्म भाँतिका परित्याग करना चाहिये । सब प्रकारसे इस रचनाके उपमोगको या त्यागनी हो पोम्प है और ऐसा होनेके सिये मपुरुषके शरण सी एफ मी मौषधि नहीं । इस निश्रय पााको बिचारे मोशेष प्रामी मही जानते, इस कारण तीमा तापसे उनें जलते देसकर परमकरुणा वाती है, मौर बरबस यह उद्गार मुंहसे निकल पड़ता है कि नाप ! तू मनपा करके आपनी गतिम मति प्रदान कर । उदयकामके भनुसार घरते है। परि कदाचित् मनोयोगके कारण इस उत्पम हो गाय तो पर दूसरी बात है, परन्तु में तो ऐसा माझ्म होता है कि इस बगदके प्रति हमारा परम उदासीन माय यता है। यदि यह सब सोनेका मी गाय तो मी हम वो इसे वणवत् ही मानते है, और परमामाको मिति हमारी मलि केन्द्रित है। वार्थकित १८६ बई, फाराम भरी ८ १९९७ ये प्रश्न ऐसे पारमार्षिक है कि ममा पुरुषको उनका परिचय करना चाहिये । हमरो पुस्त- कोंके पाठीको मो ऐसे प्रश्न मी उठते, ऐसा हम समठते हैं। उनमें भी प्रथम मंबरके प्रस्त (नगरके सतहममें मवमत्तर क्यों है!) को तो बानी पुरष भपमा उसय भागाका अनुसरण करनेपाछे पुरुष ही सदित कर सकते हैं । यहाँ सतोपानक निधि नहीं पती, सठिये ऐसी ज्ञानमार्ग सिनेमें परा विसमा करनेको यरूरत होती है । अन्तिम प्रप्त मापने हमारे गमवासके विपपमें पूण मह प्रम मी ऐसा है जो बनाया बत्ति बामनेवाले पुरुपके सिवाय पायद ही किसी दूसोफे द्वारा पूण [.. भीम रामद भापकी सर्वोत्तम प्रहाको हम ममस्कार करते हैं । कठिकाउमें यदि परमात्माको किसी मष्मिान पुरुपके ऊपर असम ऐना हो तो उनमसे बाप मी एक है। हमें इस कामें बापका सहसा मिष्म, और उसासे हम पारित है। १८७ बमई फागुन मुवी ११ १९९० 'सत्' सत् , सरसो, गम है उसकी प्रति सर्वत्र होती है। 'सत्' है, उसे कामसे बाभा मही, प समका वमिष्टान है, और या वाणांसे वाम । उसकी प्राप्ति होती है। वीर उसकी प्रासिका उपाय है। समी म्प्रदापों एवं दवानोंके महामाया म एक 'सत्' है। वाणीम्य वाम्म होने के कारण उसे मूक-घेणीसे समझाया गया है, निससे उनके कपनमें कुछ मे माइम होता है, मित वस्तुत' उसमें कोई मेद नहीं है। सब कामें मेकका स्वरूप एकसा मही यता या क्षणक्षणमें बदम्ता यता है उसके ममेक नये मपे रुप होते है, अनेक स्पितियों पैदा होती है, वौर अमेक ब्य होती जाती। एक भक्के पहिसे मो रूप मानानसे माम म ऐता पाए सामने दिखाई देमे भगता है तपा समरमें मात वा विस्तारमा रुम एप हो जाते हैं। मास्माके शानमें मेवाका मेकका स्वरूप मानापर अनुपा करने के लिये कुछ दे रूपसे कहा यावा है, परस्तु मिसकी सर्व कामें एफसी स्पिति गहरी, ऐसा या रूप 'सत्' मही1, इस कारण उसे परे बिस रूपसे वर्णन करके उस समय भांति दूर की गई और इसके कारण यह नियम म0कि सर्वत्र यही सरूप होता है ऐसा समसमें बाता है। मार-मार वो उस स्वरूपको शामतरूप मानकर भांति पर जाते हैं परन्तु कोई सपात्र नाव ही ऐसे विविधतापूर्ण कथनसे ग माकर 'सत् की तरफ कता है। बात करके सब मुमधुनोंने इसी तबसे मार्ग पाया है। इस जगत्के बारम्बार मसिम पर्जन करनेका बो पुस्पोका एक ही उसो कि उस सस्मो विचार करनेसे प्राणी मति पाते कि और बस्तुका सरूप क्या है ! इस तय बो भनेक प्रकारस कहा गया है, उसमें क्या मान र मुझे कम्पाणावरक क्या है।' ऐसे विचार करते करते, सको एक भातिका हो निफ्य मामकर, महाँसे 'सत्' की प्राप्ति हाती है ऐसे सतको सरम विना राम, ऐसा समाकर से उसकी सोग करते है और उसको शरणमें पान 'स' पाते और समं स्वरूप हो गाते है। मक विदेशी ससारमें रामेपर मी विदेशी य सके, यह स्वपि एक सा मारपर्य है और पा महाठिम है, तपापि परम्मानमें ही मिसको वात्मा तमप हो गई। ऐसी ममप मामा निस तबसे सती है उसी तर मी हताचो मैसा कर्मका उदय क्मों न मा नाम फिर मौ उसको नुसार सनेमें बाबा नही पाँचती । किनको इतका मा मापना र हो गया है, ऐसे उस मान माम्पको देश मी मानो नाममातसे हो इती थी, तो फिर उनकी दशा मेवधाम से ऐ सकती है। मारण महात्मा थे।शानी रोनेपर मी उदयमासे सारमें ये पे, इतना को मैन प्रोसे पर १८८,१८९ १९ १९१]यिविष पत्र मादि संप्रार-सवों वर्ष भी जाना मा सकता है, मोर या पयार्य ही है, तपापि उनकी गतिक साधम ना भेद बताया गया है, उसका कुछ उदाही कारण है। स्वर्ग, मरक आदिकी प्रतीतिका उपाय योग मार्ग है। उसमें मा बिनको दूरदेशी सिद्धि प्राप्त हाती है, पर उसकी प्राप्तिके लिये योम्प है। यह प्रतीति सर्वकाठमें प्राणियोंको दुर्लभ पी गती है। भान-मार्गम इस विशेष बातका उष्टेस नहीं किया, परन्तु य म जबर । बितने स्थानमें मोश्च बताई गई है। समय है । कर्मस, प्रातिस, वयमा मापासे इनका माम ही मोक्ष है। यही मोक्ष शम्दकी म्याल्पा है। बीच एक मी है, धीर अनेक मीहै। " १८८ बर्मा, फागुन नदी १ गुरु १९१७ एक देखिये बानिये" इस दाईके बिफ्यमें बापने डिसा है। इस दाहको हमने मापको निःशकताय पता होने के लिये महीं मिला था परन्तु या दोहा सामाषिक तौरसे हमें प्रशस्त सगा इसलिये इसे बाफको सि मेगा था । ऐसी छौ तो गोपांगनायोंमें पी। श्रीमद्भागवतमें महारमा म्यासने वासुदेव भगवान्के प्रति गोपियों को प्रेम-मतिका वर्णन किया है, यह परम काहारक और भाचपकारक है। नारद-मक्किसूत्र मामका एक छोटासा शिक्षाशास मार्पि मारदनाका रचा दुमा है। उसमें प्रेम-मलिका र प्रतिपादन किया गया है। १८९ वर्मा, फागुन वदी ८ पुष १९९५ मीमद्भागवत परमभकिस्म हो। इसमें गो नो वर्णन किया गया है या सब केबछ म्मको एपित करने के लिये है। परि मुनिस सौम्यापक वधिष्टान–आमाक विषयमें एम चाय तो उनसे टप मुछ मी उचर नहीं मिल सकता। और कम्पित उचरसे कार्य सिदि नहीं होती। वाको भ्योतिष वादिकी मी शाउमें इस नहीं करनी चाहिये क्योंकि यह कपित है वीर फपिकपर हमारा कुछ भी मक्ष नहीं। वर्ग, फागुम बदौ ८ पुष १९९७ परमात्माकी क्लासे परस्पर समागम काम हो ऐसी मग इहै। यहाँ उपावियोग निमेष यता है, तथापि समाधिमें योगकी वप्रियता कमी महरा, एमा भिरका अनुह देगा, ऐसा माश्म होता है। बमा, फागुन १० शनि १९९७ भान जन्मारके साप मारप पत्र मिठा । जन्मकुंडा सबभमें चमी उत्तर नही मिल भीम रामचन्द्र [पत्र १९९, ११ सकमा । मक्तिविषयक प्रमोंका उत्तर प्रसग पाकर निंगा । हमने पापको निस विस्तारपूर्म पामें "वपिछन "के संबपमें लिया था, प मापसे मेंट होनेपर ही समसमें वा सकता है। " वषिष्ठान" वर्षात् मिस से बना उत्पम हो, जिसमें पा स्पिर थे, और जिसमें व म्स पाये। जगत्का अधिन" का वर्ष इसी म्याख्याके वनुसार ही समाना। मैनापनमें परम्पको सम्पापक नहीं पा है। इस विपमें वापके जो कुछ भी सम हो उसे कि। १९२ बई, कम्गुन वदी ११ वि १९४७ मोतिषको कम्पित करनेघ यही है कि यह पिय पारमार्मिक मानकी अपेवासे स्पित है। भौर पारमार्पिक ही सत्य है, और उसीकी ही रटन गाई है। हामें विरमे मेरे सिरपर उपाविका मोशा विशेष रस रस्सा, ऐसे करनेमें उसकी इसको मसाप ही मानता है। चैनप्रय इस कामो पचमकाएक मामसे करते है, बौर पुसमर्मप इस रिकामे मामसे कात सय इस कासको टिम ही काल कहा गया है। उसका सही व किस में पीको सरसग बौर मशाबा सपोग मिम्ना पति कठिनी वीर इमाश्मि इस काको ऐसा उपनाम दिया गया है। हमें मी पंचमस पपा कवियुग हाम्में तो बनुमब हा । हमाप नित भतिशप मिस्पूह है, और हम नगत्में स्याह होकर या सम कति- मुगकी हो पा है। २ १९३ समई फागुन पौष १९९७ देशमिमाने गडिवे, विसावे परमात्मनि । यत्र या मनी याति, सम वा समापया। में कर्ता , मैं ममुम्प , मै मसी, मैं सी, स्पानि रूपसे एनेवाम निसमा भिमान भर हो गया है और निसने सोचम पदरूप परमात्माको पान हिमा है, उसका मन गाँ की भी जाता है, उसको समामि है। कई बार मापके पिस्तुत पत्र मिमी बौर से पत्र मार पहिये तो बाके समागममें हो बनेकी हम होती है। तपापि कारणसे उस मका किसी भी तबसे विस्मरण करना पाता है। तथा पत्र निस्तर उन्म लिसनेको महोती तो माम मौ मात करके शाप को पूर्ण हो पा । इसके दो कारण एक तो पर कि इस निषपमें मधिक विमने पोम्प पषा नहीं दी बार म्य कारण उपाधियोग है। उपाधियोगको पेषा विमान दशातामण अधिक काम है। दशा पात निहा और उसके कारण मन माप विषयमें प्रवेश नहीं करता, और उसमें मी परमापक विपपमें मिलने से तो फेवल खूप मा मापा करता है। इस विपमें रेडगा . पर १९५, ] विषिभ पन मादि समा-२४वा वर्ष २४३ शक्ति तो बहुत ही अधिक शूम्य हो गई है। हाँ, पाणी प्रसग पाकर जब भी कुछ कार्य कर सकती है, और उससे भाशा मताकि समागम होनेपर नहर ईधर रूपा करेंगे । पाणी मी जैसी पहिरो क्रमपूर्वक बात कर सकती थी, वैसी या नहीं मालम होती । मेसन शक्तिके शून्मता पाने वैसी हो बानेका एक कारण यह भी है कि चिचमें उदिप्त बात बात नोसे पुक होती है, और ये सब नय सिसभेमें मही पा सकते, मिससे विच मिरफ हो जाता है। वाफ्ने एक बार मक्तिके विषय, प्रम किया पा। इस सपषमें वधिक बात तो समागम होनेपर हो सफती है, बौर गगत करके सम बाकि किये समागम ही ठीक माइम होता है, तो मी पाप हो सक्षित उत्तर लिखता है। परमारमा गौर वास्माका एक रूप हो जाना (1) पह परामधिको अन्तिम हद है। एक ऐसी ही तछौमताका एना ही फ्यमति है। परम महात्मा गोपांगना मारमा मासुदेवकी मछिमें स्सी प्रकारसे छान सी पी । परमात्माको निरजन कार निर्देशरूपसे चितवन नेपर नीयको ऐसी तासीनता प्राप्त करना अति कठिन है, इसलिये निसको परमात्माका साक्षात्कार मारे, ऐसा वषारी परमारमा उस परामछिका एकतम कारण है। ठस बानी पुरुपके सर्प परित्रमें ऐक्यभावका पक्ष ऐनेसे उसके दयमें विराजमान परमात्माका ऐक्यमाप होता है, और यहां परामकि। हामी पुरुष पौर परमारमा बिकु मी सत्तर नहीं है, और नो कोई नन्तर मानता है, उसे मार्गकी प्राप्ति होना नमन्त कठिन है। हानी वो परमात्मा ही है, और उसको पहिचानके बिना परमरमाकी प्रासि मही होती, इसीलिये सब प्रकारसे भलि करने योग्य ऐसी देशपाप दिम्पमतिानीरूप परमामाकी को नमस्कार बानि भक्तिसे गाकर परामजिक बतिक एकतधीमतासे वारापन करना, ऐसा शामका प्या है। परममा ही इस देहधारीरूपसे उत्पम इजा है, ऐसी ही हानी पुरुषके प्रति गौवको मुशि होनेपर मछि उदित होती है, वौर वा भकि कम क्रमसे परामजिस्म हो जाती । स विषयमै श्रीमद्भागक्तमें, मगवद्गीता बहुतसे मेद बता करके इसी प्रकी प्रशसा की है। वधिक क्या करें। बानी-सीर्थकरदेव पक्ष होने के लिये जैनधर्ममें मी पचपरमेष्ठी मंत्रमें " नमो वयितार्ण पदके बाद ही सिपको नमस्कार किया है। मही मषिके पारेमें यह सुपित करता है कि प्रपम बानी पुरुपकी भाळ करो, यही परमामाकी प्राप्ति और मतिका निदान है। दूसरा एक प्रश्न ( एकसे वषिक मार ) वाफ्ने ऐसे मिला था कि म्पबहार म्यापार बादिके संबधमें इस वर्ष जैसा चाहिये पैसा छाम मही दोसता और कठिनाई गा करती है। मिसको परमात्माकी मणि ही प्रिय है ऐसे पुरुपको ऐसी करिनाई न हो तो फिर उसे सचे परमात्माको ही मकि नहीं है, ऐसा समझना चाहिये अपना पान भूमकर परमामाकी अरूप मापाने ऐसी कटि- नाईयोंको मेममेके कार्यका विस्मरण किया समन्चना चाहिये । अनक विदा और महारमा रुणके लिपपमें मापाका विस्मरण हुषा मास होता है तपापि ऐसा नहीं है। बनक निदेहीका कठिनाकि संबंधम यहाँ कानेका मौका मही है, क्योंकि यह कटिनाई मप्रगट कटिनाई, वीर महात्मा कृष्णको सकरप कठिनाई प्रगट ही है। इसी तण उनको भएसिद्धि वीर नानिधि मा प्रसिद्ध हो । तथापि कटिनाई सो पौदी भीर होनी मी वाहिये । यह कठिनाई मापाकी है, और " भीमद पाचन [पत्र १९४ १९५ , परमात्माके मसका रिसे तो यह सरप्ता ही है। वौर ऐसा हो। अमु सबाने कोर तप करके परमात्माका वाराषम किया परमात्माने उसे देहसास्के रूपमें दम दिया और पर मांगनेके रिसे कहा | इसपर प्रम रामाने पर माँगा कि भगवन् ! आफ्ने वो ऐसी राम्फामी मुझे दो है, प विकुछ भी ठीक नहीं। परि मेरे उपर तेय मनुपा हो तो पर पर दे कि पतिपयकी सापनमम इस एम्यानमार फिरसे मुचे सण मी म हो । परमारमा बाथर्यचकित होकर 'तपात करकर सघामको पचार गये। रमेका वाशय पर ऐसा हो पोम्म , कठिनता और सरता, साता चौर वसावा ये भगवान्के मळको सब समान ही है। बौर सच सो वो कठिनाई वौर साता तो उसके लिये मिशेप वमुझ, पोंकि यहाँ मायाका प्रतिवष ररिंगत नहीं होता। भाप तो पर बात बानते हो। तपा फुटुमा बादिके सिक्यमें कठिनता होना ही ठीक नहीं है, परि ऐसा भगता ऐ तो उसका कारण पही है कि परमात्मा ऐसा करते हैं कि तुम अपने फुनुम्बके प्रति स्नेह रहित ऐषो, और उसके प्रति समभावी होकर प्रतिषम रहित बनो, यह हमारा फेसा न मामो, और प्रारम्भ योग के कारण ऐसा माना जाता है, उसके हटाने के लिये ही मैंने यह कठिनाई भेजी है। पिक स्पा करें। यह ऐसा ही है। १९४ बर्मा, फागुन १९९७ सस्स्वरूपको अमेव भक्तिसे नमस्कार बासमाके उपशम करने के लिये उनकी सूचना है और उसका सोचम उपाय तो बानी पुस्पका योग मिझना हो। मुमुक्षुता हो वीर कुछ कास्तक पैसा पोग मिण हो तो जातका पाम हो राप । तुम सब एसंग, साल मारके Aपपमें नमी से ( योगसे ) यत हो, पा भिसना । इस पोगके लिये प्रमादभाव करना बिलकुल भी पोम्प नहीं है। हो, यहि पूर्वका कोई गाल प्रति हो तो मारमा इस विपमें मप्रमत्त हो सकती है । तुम्हारी इसापूर्तिक लिये कुछ भी किसना पाहिये, इस फमण प्रसंग मिकमेपर सिनता माली तो वमी हाम्में सकपा सिसी ना सके, ऐसी दशा (I) महो। १९५ बम्बई, फागुन १९४७ बनतकापसे जातको क्सत् बासनाका बम्पास है। उसमें सल्का संस्कार एकरम स्पिती होता । मे मछिन दर्पणमें वैसा चाहिये पैसा प्रतिबिम्ब नही पड़ सकता, असे ॥ क्सत् पासमाबुत पित मी सत्या संस्कार योग्य प्रचारसे प्रतिविमित नहीं होता; कुछ से ही होता है। पाँ और फिर अपने मनतकाम के मिष्पा अम्पास परम्पमें पा जाता है, और इस कारण उन सके भोंपर भी पित् बावरण अभाव है। पदमपी संस्कारका पताके लिये सड प्रकारका १९५, १९७ १९८] विविध पत्र मावि संप्रह-शयों पर्व २४५ ठोकसत्राफी उपेक्षा करके सम्माका परिचय करना ही श्रेयस्कर है। किमी मी बो कारणका सिदिमें मेष समाका तो सब प्रकारसे स्याग करना हो पाता है। सामान्यत समगका सोक-समुदायमें तेरस्कार महोद, निससे मोक-सना दु माफ नहीं होती, कंबल चिचौ ससंगके छामका विचार करके निरतर बम्पास करते हैं तो परमार्थविषपक सता होती है। १९६ बाई, क्षेत्र मी ५ सोम १९९७ एफ पर मिठा, जिसमें कि पाक्से जीवोम पोम्पता तो है परन्तु मार्ग बतानेपाडा कोई नहीं, या बात किमी है। इस विषयमें पहिठे बापको बहुत करके सुगामा किया था, पपपि पर कुछ गूड ही पा; वापि वापमें अत्यधिक परमार्थकी उम्सुकता है, इस कारण वह सुडासा मापफो पिम्मरण हो इसमें कोई जापर्य नहीं है। फिर भी भापको स्मरण रहनेक लिये इतना विमता है कि अबतक ईपरेप्टा म दागी तबतक हमसे कुछ मी म हो सकेगा। एक तुपा तुमके दो दुको करनको मी सत्ता हममें मही। अधिक स्पा करें। आप तो करुणामप रे । सिर मी बार हमारी फरणाक सबमें स्पों उस नहीं देत, और ईभरको पयों नहीं समझते। जाप, बई, मंत्र मुरी ७ पुष १.१७ मदामा परजी तथा नरसी मेहता मटि अनन्य, अमौरिफ, बमुत, और सरस्ट पा ऐसा होनेपर मी र निस्पृह पौ । ऐमी दी स्थिति होनेपर भी उनाने सनमें मी पालिका लिये-पहारके लिये परमेपरफे प्रति दीनता प्रफर मही की । यपनि दीनता प्रस्ट किये बिना पिप्पानुसार म्पाहार पटता गया है, तपापि उन रिदातम्या भाजतक जगप्रमिद दो बार पही उनका सरन मादाम्प है। परमामाने इनका परपा' पूरा किया है, बार बद भी इन मनको हास पिएर मार त्रिपादपोंकि मी मोंगी इपानीमही क्षेत्री, भोर या मारता उमें मनिफ पम्प प्रामि मी न हो । भार मरे ही हम बाते शि परम्नु सता र निगडी नदी (अपना मते) तलासर सिंबना ही है। चैत्र पुष १.०० परणनुपारी दमद महीं होना (१)मापारा प्राच प्रतिशत बाधा पाना है। उम प्रायके गासी मावि मानो रिमा पसनुप पापागे दोनी , मपा तो काम तो है। इन दानों में भी ममरी I मरममा मारत नितिन्हीही और इस मामक ए भीमद्रासन [पा १९९ मेके सिपे गानको पोय होना प्रशस्त है। उस पोग्प होने में बापा करमेवाम या मापाप्रपंच, जिसका परिचय ज्यों म्पों कम हो सा बाधरण किये मिना पोम्पताका वापरण भंग मही होता । का पगपर भक्पूर्ण मान-ममिमें दोष बिना चिारे ही करोण पोगन तक पता चल जाता है बना योम्पताका साथ काम मिल सकता है। ऐसा म होनेके लिए, किये गए अपर उपरफको से बने पैसे प्राप्त करके (स लिफ्रकी ) सर्व प्रकारसे निति करके योग्य म्पपार पानेका प्रयत्म करना ही उचित है। यदि सर्वथा मचारी थे तो म्यपहार करना चाहिये, किन्तु उस पारको प्रारम्बका उदप समसफर के निस्सह-गुमिसे करना चाहिये । ऐसे म्पहारको हो पम्प म्पमार मानना । यहाँ ईमरामद है। (२) कार्यपी वामें वा समेके बाद प्रापः प्रत्येक मौरको पचाताप होता है। कापक गम्म होनेके पहले ही विचार हो पाप और यह राये, ऐसा ऐना बहुत ही कटिम -ऐसा नो वचक्षण मनुष्य करते है यया हो। पमाचप करनेसे कार्पर वाया एता परिणाम बवषा मही होता, किन किसी ऐसे ही इसे प्रसंग उससे उपदेश अस्प मिल सकता है। एसा ही होना पोम्य पा, ऐसा मानकर पोषण परिस्पाग करना और बेबस मापाको प्रयम्ता बिमार करना पड़ी उतम है। मापाका सम्म हो ऐसा कि इसमें 'सत्' प्रास हानी पुरुपको भी पना मुश्किल है, तो फिर मिसमें नमी मुमताके बोकी मी मनिता है, ऐसे पुस्पको उसके सहपमें स्थिर गना परत कठिन, समममें सम्मेवात * पणयमान करमेवाडा हो, इसमें कुछ मी नाप नही है-ऐसा जबर मानमा । . बम्बई, क्षेत्र सदा छक १९४७ जम्मूसलामाका शान्त प्रसगको प्रबस करमेबाठा मोर बहुत भानन्दकारक मिसा गया है। मुटा देमकी हा होनेपर भी, चोधरा पहरण हो जानेके कारण अपका पाग, ऐसा ठोक-प्रवाहको मापता परमापी लिपे करंगबर है, ऐसा भो महाम! अंगका वाराप थाप सपथा। इस प्रकार पहाँ इस बात का अप करके भर भापचे प्रश्न होगा कि पिचको माया प्रसंगोंमें माम म्याकुसता हो, और उसमें वामा मितित पा करे, क्या यह ईपर-प्रसस्वाका मार्ग है ! तपा पानी पुरिसे मी, बिस्तु लोक-प्रवाहके रण मी कुलुमा पारिके कारणसे शोषण होना, क्या पर वानिक मार्ग है। क्या हम बास होकर कुछ कर सकते है। भौर पर कर सकते है तो हर वरपर पिचास रणनेका क्या फर एमा। नियर पुरष पा ग्योति जैसे परत पिपने सांसारिक प्रसंग मन करते तेगे! हाम तो हमारी हो या ना हम ज्योतिष मानते है अपना पुछ कर सकते हैं, ऐस म मानें तो टीका पत्र २ ,२१,२ २] विषिष पर मादि संग्रह-शायर्प २०० समई, चैत्र मुदी १० शनि १९९७ सास्मस्वरूपको नमस्कार बह दशा जिसमें अपमा और विराना कुछ भी मेरमात्र नहीं यता-उसकी प्राप्ति कब समीप ही है, (इस देहमें है), और उसके कारण परेम्यासे यते हैं। पूर्वमें रिस निस विमा, बोध, बान, पौर नित्याको प्राप्ति गई है, उन सबको इस चन्ममें ही विस्मरण करके निर्षिकम्प इए बिना मुटकारा नहीं, वौर इसी कारण इस तसे यते हैं, सपापि बाफको अत्यधिक बाकुलता देसकर यत्किंचित वाफ्को उचर देमा पा , भौर पर भी वे असे नहीं दिया है। ऐसा होनेसे मापसे प्रार्थना है कि इन सब मापायुक्त निपा अथवा मापायुक्त मार्गके समधमें मापको सरफसे मेरी दूसरी दस्य नेतक स्मरण न दिखाया बाप, यही उत्तम है। बर्ग, क्षेत्र मी १५ गुरु १९४७ शानाकी परिपालनास्पा (दशा) होनस राग-रेपको सर्मया निति हो जाती है, ऐसी हमारी मान्यता। ईपरेपके मनुसार गो हो उसे होने देना, यह महिमान के लिये मुख देनेपाली बात है। २०२ बर्मा, पैत्र सुदी १५ गुरु १९१७ परमापम मीचकी बातें विशेष उपयोगी १ पार होने के लिये नीमको पहिल स्पा बानमा पहिये ! २ गीतके परिश्रमण करनेमें मुफ्स कारण क्या' ३ कारण किस तर दर पे सकता है। . उसके लिये मुगमसे उगम वर्षात् कम्पकाल में ही फल देनेवाग उपाय कौनसा है। ५ क्या ऐसा कोई पुस्प है कि जिससे इस विषयका निर्णय हा सके। क्या तुम मानते हो इस कामे कोई ऐसा पुरुष होगा। और मानत हो तो किन कारणोंसे ! ऐसे पुस्पके कौनसे चम से सकते हैं। वर्तमाममें ऐसा पुरुष तुम्हें किस उपायसे प्राप्त हो सकता है। ६ क्या यह हो सकता है कि पुस्पकी प्राप्ति होनेपर पीपको मार्ग म मिड । ऐसा तो उसका क्या कारण है। यदि इसमें चीनको बयोम्पता बान परे वा यह योग्यता किस रिपपकी। ... सगसे पोपवा वानेपर या उसके पाससे शानको प्राति हो सकती है। जानकी प्रासिके लिये योम्पता बहुत पसबान कारण है । ईसा मम्मान है और मुसाकारक है। बारम्बार यही शंका मनमें उठा करता है कि क्या मपमहीन कमी बपनमें फंस सकता है। मापकी इस पयमें स्पा राय है। .
। भीम पगबन्द्र [पत्र १४१५ २०३ भई, पैत्र वदी १९१० उस पूर्णपदकी मानी सोग परम मेमसे उपासना करव सगभग चार दिन पारे वारका फा मिठा । परमाननपके मासे यहाँ समाधि है । सठियों रसनेकी भापको इन यता है-पर पाकर बारम्बार वानर हवा | विचकी सरलताका रम्म और 'सत्' प्राप्त होनेको भमिस्मा-पे प्राप्त होना परम दुर्गम , वीर उसकी प्राप्ति परम करण- स्प 'ससंग' का प्राप्त होना ता और मी परम दुर्गम है। महान् पुोंने इस काम कठिन काल ना है, उसत्र मुख्य कारण तो यही है कि पीपको 'ससंग प्रयोग मिसमा मात कठिन है, भीर ऐसा होनेसे कसको मा कटिन महापौर राम् छोक मायाम्प बमिसे प्रश्नमित है। उस मापामें बीसको मुनि रग-पच रही है, धीर उससे चीन मी उस प्रिनि तासपी बामिसे सम्म करता है। उसके सिये परमकाम्प मूर्तिका उपदेश हो परम शौतम बल है, वयापि पीचको पारों भोरसे पूर्ण पुष्पक कारण उसकी प्राप्ति होना अस्पन्त कठिन हो गई है। परन्तु इसी बस्तुका पितान रम्ना । 'सत्' में मीति, समात् 'सत्' रूप मतमें प्रीति, वीर उसके मार्गको भमिगपा-मही निरन्तर स्मरण रखने योग्य है। मोर इनके स्मरण रहनेमें पम्प वार परिश्वासी पुस्तके, बैरम्पयुद्ध सरए बिना मनुम्पों संग बोर वपनी पि-हि-सबर करण है । प्रातिको ठन रमना मायाणकारक है। यहाँ समाधि है। . २०४ बम्बई, कत्र यी ७ गुरु १९९७ माप्यं सौने मारपामरे पपति का मत उपाधि समुछ बाता है, किन्तु इबरेपानुसार पम्ना प्रेयस्कर और योग्य है, इसलिये से पाया है, से चारे उपाधि वो मी ठीक, भौर म हो तो भी ठीक हमें तो दोनों समान ही है। ऐसा तो समझमें भाता है मेरका मे दूर होनेपर दो पास्तविक तत्व समझमें बाता है। परम भमेश्यप 'सत्' सत्र है। २०५ बम्ब, पैत्र पदौ १५ गुरु १९१० मिसे मोहै, उसको होगी है, और उसमे उसे नानी है, और मो"पी पी" पुकारता फिरता है। मामा दमा कैसे बीमाय ! म कि मामीका मा प्रवेश महा। बधिक मा को मिसे गौ है उसको होगा। उसीके चरण शरण संगसे मिस्ती और मिल गाता है मी पुकारा होता है। इसके बिना सा मुगम मोधमार्ग ही नही तपापि को प्रमान मही करता। मोबड़ा बयान है!
पर २ १, २ . १८,२१]विधिप पत्र मादि संप्रह-त्रों वर्ष २४९ २०६ बाई, मैत्र १९१७ मुरल स्वमानसे भारमार्पका प्रयत्न करमा । वाम-कल्याण प्राप्त करमेमें प्रायः प्रपस परिपहों के बारम्बार पानेको समाना है, परस्त पदि उम परिषदों को शांत चित्तसे सह मिया माप तो दोर्षकाम- में हो सकने योग्य कल्याण बात बल्पकारमें ही सिद्ध हो जाता है। तुम सब ऐसे शुर वापरणसे मना कि मिससे कमको काल मौतनपर, निपम परिसे देखनेवाले मनुपमिसे बातोंको, अपनी उस दहिपर पश्चाताप करनेका समय आये। धर्य रसकर बारम-काम्याणमें निर्मय राना । निराश न होना । वामार्पमें प्रयत्न करते रामा । २०७ बमा, शास पुदी ७१ १९९७ परम आनंदमूचि है। हम उसका तीनों काम मनुग्रह चाहते हैं कुछ निधिका समप मिंग करता है। परनाम-विचार तो म्योंका मों हा ही करता है। कभी कभी तो उसके लिये वामन्दकी किरणे पुत यात स्फुरित होने भाती हैं और पुरको कुछ (बमेद) बात समझ जाती है, परन्तु यह ऐसी है मो किसीसे कही नहीं पा सकती हमारी या बेदना पह है। पेदनाके समय कोई न कोई साता पूछनेवाला चाहिये, ऐसा म्यावहारिक मार्ग है, परन्तु हमें इस परमार्प मार्ग, साता पूँग्नेगाम कोई नहीं मिलता, और यो है मी ठसका वियोग रहता है। २०८ बम्बई, शास नदी २,१९४७ लियको भी मुखदायक मानना । भैसे हरिके प्रति विवालिको नहानेसे उसको साक्षात् प्राप्ति होती है, वैसे ही सबके निदान मबसे साक्षात् उसको प्राप्ति होती है। स्वरेनासे अपने सबध मी ऐसा ही सममना । पूर्णकाम हरिका सरूप है। उसमें जिसको निरन्तर मे लगी गती है, ऐसे पुरुपोंसे भारत क्षेत्र प्राय शूम्प जैसा हो गया है। माया मोह ही सर्वप्र दिखाई देता है। मुमुक्षु कश्चित् ही साई देते है। और उसमें मी मतातर मादिके कारणोंसे ऐसे मुमुक्षमोको मौ योगका मिना भति कठिम हो गया है। बाप मो हमें बारमार प्रेरित करते हो; उसके लिये हमारी जैसी चाहिये वैसी योग्यता मही है, भौर मबतक हरिने साक्षात् दर्शन देकर उस बातको प्रेरणा नहीं की, तबतक उस विषयमें मेरी कोई एस मही होती, भार होगी मी मही। म शास दो ८ रवि १९९७ हरिफे मवापसे भापरिका सरूप मिलेगा व समझाऊँगा बिचको दशा पैवम्पमय रहा करती है। इस कारण हमारे म्पहारके सब काम प्राय भम्प- परपासे होते है। हरिनाचे समापफ मानते हैं, इसरिये या उपापि-योग यता है उसे भी हम समापि-पोग मानते है।
भीमद् पसन्द [पा. पिचको सम्पबस्त्याचे कारण मु मात्र हो सकनेमाले कार्यक विचार विचारमें दी पदा Pन निकल नावे वर कमी तो उस कार्य बिना किये होय पाना पाता।समी प्रसकाम यदि ऐसा ही होता ये तो मी पनि नहीं माना; परस्तु वाफ्को कुल कुछ जान-मार्ता को पाप तो विशेप मानन्द यता पोर इस सबैचमें विचको पुन म्यवस्थित करनेको माया करता है। सिर भी उस स्थितिमे वभी हार हमें प्रमेय नहीं किया था सकता, ऐसा विचको निरंकुश दशा हो रही और उस निरंकुशताको प्रतिमें हरिका परम कृपा हो घरमीभूत है, ऐसा हम मानवे । और उस निरंकुशताको पूर्ण किये बिना पिच पथोचित समाधियुक्त नहीं होता, ऐसा स्नाता है। इस सम्म तो सब-कुछ बम रगता है, और कुछ मी अमही भाता, ऐसी स्थिति हो हो । ग सा एक मात्र मम होगा करेगा तभी निरफुमाताची पूर्णता होगी।सीका अपर नाम पूर्ण कामना है- पहा सत्र हरिहर सर रिसाई देते हैं। इस समय ये कुछ वस्पर जैसे पोसते है, परस्तु ऐसा अनुमबहै। यो रस जगत्का जीवन है, उस रसका अनुमय होनेके या हरिके प्रति अतिशय ही सगा। और उसका परिणाम ऐसा वाफेगा कि हम माँ बिम रूपमें हरिर्शन करनेकी हारेंगे, हामें हरि दर्शन देंगे, ऐसा मविष्यकाल ईयरे मके कारण जिम्मा है। हम अपने अंतरग विचारको मिस सकनेमें वतिशय जनक हो गये हैं, इस कारण समागमको प्या करते हैं परत घरेणा ममी ऐसा करनेमें बसहमत माश्म होती है, इसलिये नियोग हो यते है। उस पूर्णस्वरूप हरिमें निसकी परम मपि है, ऐसा कोई मी पुस्प हमें दिखाई नहीं देता, इसका क्या कारण है। तया ऐसी गति तीन जना ताम मुमझुवा मी किसी सई नहीं देती, इसका क्या कारण होना चाहिये । पदि की तीन मुमुक्षुता दिलाई मी देतीसगी तो क्या बनातगुण-गौर भानावार पुरुषका म्ध क्यों महीं देसनेमें माता इसके कारण के सबप को वापको लगे सो सिमना । दूसरी बकी बारचर्मपरक बात तो पहलवा सोको सम्पमानके मोगको परामविके मटका-प्रालि हानेपर मी उसके मात्र मेद क्यों नहीं प्रास ता! तपा हरिविषयक बना रूप भयम्प बिना पाहिय उक्ना क्यों बिगत नहीं होता ! इसका जो कुछ मी कारण मापके पानमें जाना हो सो विसना। हमारे विकी ऐसी सम्पमस्या हो जाने के कारण किसी भी काममें पैसा चाहिये पैसा उपयोग मादा पवा स्मृति मही खत्ती, अपना नबर हो म यताउसके लिये क्या करें । स्पा करें इम्स हमारा भाशय यह है कि प्यपारमें यमेपर मी ऐसी सोचम दशा दूसरे किसीको हुस्स 40, ऐसा हम क्या करे ! मी तो हमारे माघर ऐसे है कि कमी कमी उनसे किसान परेच बात है। म मरे म्सिाये मी मानादम्प हमें इस रिपिता पता है इसलिये वे इसे करेंगे। माय श्रम वो उस रसाको पूर्णता प्राप्त करमेश सा मानते हैं। पा सर किसीको मो संघरप एनेका तो सममें मी चार महा। हम दो साके दास है, तो हरहमें माप कौन मानेगा !
पत्र २१ २११] विपिप पत्र मादिसमह-२५ों वर्ष २५१ प्रथापि यदि म्पबहार-प्रसगमें हरिको माया हमको महीं सो सामनेवाळेको मी एकके मदछे दूसरा मात्र पैदा कर दे तो पाचारी, परम्त इसके लिये मी में तो शोक ही होगा। हम तो हरिको सर्व- शक्तिमान मानते हैं, और उनीको सब कुछ सौंप रस्सा है। वषिक क्या सिमें। परमानन्द हरिको एक क्षणमर मी न मूख्ना, यही हमारी समाति, पति और विस्नेका हेतु है। २१० बई, बैशास बदी ८ रमि १९५७ ॐ ममा मनोपशतक मेगा है, यह पहुँचा ऐगा । इस सतकका सम सपोंको श्रवण, मनन भौर नि प्पासन करना चाहिये । सननेपाको सबसे पहिये यह वात प्यानमें रखनी चाहिये कि इस पुस्तकको हमने पेशातकी पदा करने के लिये नहीं मेनी, इसे किसी दूसरे हो कारणस भेगरे, बोर का कारण बहुत करके विशेष विचार करनेपर तुम मान सकोगे। हमें तुम्हारे पास कोई ऐसा योष करमेबाला साधन न होनेके कारण यह शतक ठीक साधन है, ऐसा समझकर इसे मेना है। इसमें से तुम क्या मानमा चाहिये, इसका विचार तुम स्वयं कर सेना । किसीको पा पुनकर हमारे विषयमें ऐसौ शका मही करनी चाहिये कि इस पुस्तकमें गो जा मव बताया गपा है, ही हमरा मी मत है। केवल पित्तकी स्थिरता के लिये इस पुस्तक के विचार पात उपयोगी है और इसीलिये इसे मेगा है, ऐसा समझना। %3D २११ बम, ग्पेष्ठ मुटी ७ पनि १९४७ नमः काठ काम होनेसे नौषको वहाँ अपनी पति भगानी चाहिये यहाँ म मही गा सकता। इस कासमें प्राय सधर्मका ता छोस दो पता है, इसलिये इस कासको कलियुग कहा गया है। सधर्मका योग सत्पुरुपके बिना नहीं होता, क्योंकि इसमें सत् नहीं होता । प्राय सत्पुरुपके दर्शनकी और योगको इस काठमें वप्राप्ति । दिसाई देवी है। जब यह दशा सो समर्मम समाधि मुमुसु पुस्पको कारसे प्राप्त हो सकती है। बार अमुक फाय म्पतीत होनेपर मी बस ऐसी समाधि प्राम महाँ तो तो मुमुक्षुता मी कैसे रह सकती है। मापः ऐना होता है कि गांव से परिषपमें बना है, उसी परिचयप वपनेको मानमे माता है। इस बातका प्रपत्र मनुमब भी होता है कि वनार्य फुलमें परिचप रखनेवाला और मनायतामें ही पानी सता रमता है, मोर वार्यत्वमें मति नहीं करता । इससिपे महान् पुरुषोंने बार उनके बापारसे हमने पेसा स निथप किया है कि जीबके पिये ससंग दो मोक्षका परम साधन है।
भीम रामचन्द्र [ पत्र २१२, २११ २१ पैसा अपमी पोत्यता है, जैसी पोग्यता रसनेबारे पुस्पों संग ही ससंग करते हैं। वपनेसे बो पुरषके संग निमासको हम परम सांग करते है। मोकि इसके समान को हितमक साधन इस जगत्में हमने म देता है और म सुना है। पूर्वमता महान् पुस्पोंका विपन करना पपि कापाणकारक है, तपापिया स्वरूप-म्पिति कारण महीरो सस्ता स्मोकि बौनको क्या करना चाहिये --पर बात हमके स्मरण करने माम समसमें नहीं पाती । प्रस्पक्ष संयोग होनेपर बना समझामे भी सस्पस्थिति ऐनी हमें समय म्गती, वौर उससे यही निम्मम होता है कि उस पोगका वौर उस प्रत्यय पितामय पर मोध ऐता पोंकि सत् पुस्प ही मुर्विमान मोप है। मोगत (रंत बादि) पुस्पच चितवन बहुत से मानानुसार मोक्ष मार मात्र देनपाम होता है। सम्परमात पुरुषका नियम होनेपर और पोपता के कारणसे नीच सम्पक्स पावा। २१२ बई म्पेष्ठ भदौ १५ र १९४७ सोन मधिको पूर्णता पानेके योम्प तमो वा है यह एक दम मात्र मी हरिसे मही माँगता, और सब दशायोंमें भकिमय हो गया है। प्पाहार चिन्तामोसे वापि होनेपर ससग नमानमें किसी भी प्रकारसे शान्ति नहीं होता, ऐसा को वापने पिता सो ठीक हो तो मी म्पावहारिक चिन्तायोंकी नापि करना वरित नहीं है। सत्रि हरि समान है। पा बतानेके सिप हो रिमे पसा किया है, ऐसा निस्सो स्माना; समिपे यो कुछ भी हो ससे देने भाबोर पोर दिन पदि उससे बाधि पाए तो देसी। पर कमी समागम होगा तबस्स लिपपमें हम बातचीत करेंगे । बावि मत करना । हम तो इसी माम्स पर ए| छोटम हानी पुरुष थे। उनके पदको रचना व श्रेष्ठ है। सामरूपसे हरिकी अगर प्राप्ति' इसी शम्मको में प्राप प्रत्यर्थन मिलता है। २१३ सा, पेष्ठ पदी शनि १९९७ हरि-मासे चौना , मौर पर पास बना है। बारिक क्या को। २१४ बर्ग, पेष्ठ १९९७ में मेटमा पर-संभ और पुस्तके चिनेका परिचय रमना । कोण पसे ऐसी पुस्तके माना जिनमें सग मदि, और पविणगता माहात्म्पका वर्णन किया हो।
पर २१५ २१९ विविध पत्र मादि संपा-२४याँ वर्ष २५३ मिनमें ससग नादिके माहात्म्पका वर्णन किया हो ऐसी मा पुस्तके, पद या काम्प हों, उन्हें बारम्बार मनन करमा और उनै सतिमें रहना उचित सममना । वमी हायमें यदि मैनसूत्रोंक पढ़नेकी हम हो तो उसे निएच करना ही ठीक है, क्योंकि उनके (जैनस्त्रोंके) पड़ने और समझनेमें अधिक योग्यता होनी चाहिये, उसके विना पचार्य मम्मी प्राप्ति नहीं होती, तयापि यदि दूसरी पुस्तके न हो तो .. उपराम्पयन " सूपगई"के दूसरे वन्यपनको पढ़ना और विचारमा । अपमा २१५ बर्मा, आषाद एदौ १ सोम १९१७ सबक गुरुके द्वारा मलिका परम सरूप समठा मही गया, और उसकी प्राप्ति माही हुई, तब- तक मधिमें प्राति करनेसे अकास बोर वशुधि दोप होता । बकाल कौर याचिका मान् विस्तार है, वो भी संक्षेपमें पिसा है । 'एकांतमें ' प्रमातका प्रथम पार यह सेम्प-मणिके लिये पोग्प काल है। सरूप चितवन भक्ति तो सुमी कामों में सेय है।स प्रकारको अभियोका कारण एक केवल न्यास्थित मन । बाघ म आदिसे रित तन और गुर स्पट पाणी, इसका नाम शुधि। २१६ बर्षा बापाल सुटी ८ भीम १९१७ निाशकवास निर्मपवा सत्तम होती है, और उससे निासंगता प्राप्त रावी? प्रकृतिके विस्तारको गिसे चीत्रके कर्म अनंत प्रकारकी विचित्रता लिये इए है और इस कारण दोपोंके प्रकार मी बनन्त ही मासित होते है, परन्तु सबसे बना दोष तो पाकि मिसके कारण 'तोष मुममुता' उत्पम नरोती, वया 'मुमुसुता' ही उत्पम नहीं होती। प्राप करके मनुप्पामा किसी न किसी धर्म मतमें होती है और इस कारण उसे उसी धर्म-पतके अनुसार प्राति करनी चाहिपे-ऐसा था मानती है परन्तु इसका नाम मुमुमुवा नहीं है। मुममुवा तो उसका नाम है कि सब प्रकारको मासहि डकर केवल एक मोशके लिये। पन करना और वो मुमुधुता उसे करते है किगमन्य प्रेमपूर्वक प्रतिषण मोक्षके मार्ग प्राधिकरमा । तीन मुमुक्षुताके विषयमें यहाँ कुछ करमा नहीं है। परन्तु मुमभुताके विषय हो करना है। अपने दोष देसनेमें निष्पक्षपात होना, पही मुमुक्षुताके उत्पम होनेका मण है, और इसके कारण सससका नाश होता है। यहाँ सरको पोपी षषमा मत हानि, यहाँ उतनी ही बोध-नीमके पोम्प भूमिध तयार होती है। समन्द प्राय दर माता है, पर 'मार्गप्राप्ति' को रोक रसनेबारे केवळ पान कारण ही मुल्परूपसे होते है, ऐसा हम समझते हैं। इस प्रकको भम्प मी मुमेन्म, परम पिनपी न्यूनता, मेरे पापका मनिर्णय, इन सब कारणों करके बोरको किर कमी करेंगे। उसके परिवे उन्ना मरणोंको विस्तार करते है। इस होकी वस्प मी मुसेप्स, यह बात मात करके टीम मुमताको उत्पति नेके परिजे भीमद् रामचन्द्र [पर. हुला करती है। उसके होने कारण ये है कि "यह 'सत्'है" इस प्रकारको निशमनेसे पता नही , वा "यह परमानंदरूप हो?" ऐसा निमय नहीं हवा ममा तो मुमभुता मी कर वानन्दका अनुमान हता है, इससे पाच साताके कारण मी कई बार प्रिप माते है, और इस कारण इस शोकको पाप मी मुझेन्डा या करती है, विरासे गोत्रको योम्पका रुक हो पाती है। पापातम्प परिचय होनेपर सम्में परमेश्वर-पुदि रखकर उनकी बवानुमार बम्ना, परम पिनप कहा है। उससे परम योग्यताको प्राप्ति होती है। बक्क या मम ममम नही वाटी, बतक पौरको योम्पता मही पाती। कापित ये दोनों प्राप्त मौए हों, क्यापि वास्तविक पाप पानेको पुस योम्पताको कारण पार्ष-निर्णय न हुवा हो, तो पिच म्पाकुर पता है, मिप्पा समता जाता है, और इपित परामें 'सत्' को मान्यता होने प्रगती है जिससे मात काय म्पतीत हो मानेपर भी उस अपूर्व फार्पसमधी परम प्रेम उत्पन्न नहीं होता, बौर यही पम पोम्पवाको हानि है। पे तीनों कारण, हमें मिले हुए अधिकांश मुमसुमोमें हमने देते हैं। केस दूसरे करणी पकिचित् म्यूमता किसी किसीमें देसी है। और परि उनमें सब प्रकारसे परम दिनयको कमीको नि होनेन प्रयान हो तो योग्य हो ऐसा हम मानते हैं। परम निमय इन तीनों में समान सापन है। मभिक पा को बनन्त कायमें फेस यही एक मार्ग है। परिम और तीसरा कारण दूर करने के लिये दूसरे कारणको शनि करना और परम किनमें बना पोम्य है। कवियुग है, इसलिये क्षणमर मी वस्तु के निचार विना नयना देसी महामानों की मिला है। (२) मुमधुके मेत्र महामाको परिधान मेते है। २१७ बम्बई बापाल सुदी १५ १९४५ एसना सिंघु भौसामानन्दगी, ममनीवनके मगलंदनी परणागतना सदा पुसकंदनी, परसस्नही जी परमानन्दमी। हमें हमारी दमा कैसी है या माननेको ARTR परन्तु व से विस्तारसे बारिसे स निस्तारसे मी किसी का सवा समेि इसे पुन पुन नहीं मिला। पो संक्षेपमें किसते हैं। एक पुराण सुरुष और पुराण-पुरुपको प्रेम सपति बिना हमें कमी वाम नहीं गया हमें किसी मी परामि विम्मुम मी सपि मही या कुछ मी प्राप्त करनेको इभ मही होती; मार से पता है इसका मी मान नही जगत् किस स्पितिमें । इसकी मी पति मही यती मा मसमें कई मा मेरमात नही या कौन है और न मि मा सगर रमणी मही सीन इम पारी पा और माया पाद ते मुक्ति से शान पाते है। हमें क्या करना पासाकी मी ममममें माने सामा) हम समी पदापासे उदास हो मानेसे चाहे जैसे " पत्र २१७] विविष पत्र मादि समाह-सौधर्प २५५ प्रस्तते हैनियमका भी कोई नियम नहीं रस्सा, मेदमावका कोई भी प्रसग नही, हमने अपनेसे विमुख जगत्में कुछ मी माना नहीं, हमारे समुस ऐसे ससगाके न मिटनेसे खेद हा करता है, सपचि भरपूर है, इसध्येि सपतिको पा नहीं, शद वादि अनुमर किये पुए सिपय स्मृतिमें मा पानेके कारण-जपा चाहे उसे ईमरेम कहो--परन्तु उसकी मौ अब इम्भ नहीं यो अपमीरासे ही पोपी ही प्रति को जाता है, हरिको इच्छाका क्रम असे चलातारे से ही पते पट पाते हैं। व्य प्राय शून्य मैसा हो गया है। पात्रों इन्द्रियों शुम्परूपसे ही प्राति करती है, नय-प्रमाण मगैरद शाख-भेद याद मही माते इस मौ मोचनेमें पित्त मही लगता खानेकी, पानेकी, बैठनेको, सोनेकी, परुनेकी, मोर पोछनेकी पतियों सब अपनी अपनी इच्छानुसार ऐती रती है। तया हम अपने साथीम पामही, इसका मी यथायोग्य मान नहीं रहा है। इस प्रकार सब तबसे विचित्र उदासीनता आ जानेसे चाहे जैसी प्रति हो जाया करती है। एक प्रकारसे पूण पागष्पन है, एक प्रकारसे उस पागलपनको कुरा छिपाकर रखते हैं, और जितनी मात्रामें उसे मिपाकर रसते है उतनी हो नि है। योम्परपसे प्रतिको यी है अपना क्येय रुपसे, इसका कुछ मी हिसाब महा रस्ता । मानि-पुरुपमें एक अक्षर प्रेमके सिपाप दूसरे मोक्ष वादि पापोंका मी माकचाका नाश हा गया , इतना सब हानेपर मी सतोपमनक उदासी नता मी मई, ऐसा मानते हैं । ममा प्रेमका प्रवाह तो नशेक प्रवाह जैसा प्रवाहित होना चाहिये, परन्तु बसा माहित नहीं हो रहा, पेसा हम गान । ऐसा करमेसे मानसा मोका प्रयाह प्रमाणित रोगा, पेसा निपपरूपसे समझते हैं। परन्तु उसे करनमें कार कारणमूत हो गया है और इन समका दोष हमपरमपमा हरिपर, उसका टॉक टयम निथप मही किया जा सकता। इतमी अधिक उासीनता होनेपर मी म्पापार करते हैं देते हैं, देते हैं, सिसते १ मारते है। निमावे मारे, से पास है, और हसत भी है, जिसका टिफाना मही-ऐसी हमारी दशा है और उसका कारण केवल यही है कि अबतक हरिकी मुसाद पन्छा नही मानी जातक सेद मिन्नेवाग नही। यह बात समझमें माया, समठ मी ये है भीर समझेंगे मी, परन्तु सर्वप्रहरि ही कारण है। लिस मुनिको भार समझामा पाहते हो बासमें पोग्प पा नहीं, सो इस मही जानत स्योंकि हमारी दशा में मा-योग्यको छाभ परमेवाली नहीं हम ऐमी जसका उमें नही पाहवे। इसे रस्सी दो महो; और उम मुबका घरबार सा चमवा , इसका स्मरम मी नहीं है। ऐसा हानेपर भी दम इन सबको अनुकस्य वाया परती है। उममे अपमा फिमा भी प्रामास दमन मनसे मिरमान न समोर एका जा सकेगा मी नहीं। महिपाठी पुस्तके फमा कमी दागते है परम्नु यो सब पुरस करत हर दिना Pानकी दसे करते हैं। प्रमुको परम पा है। हमें फिमी मी मित्रभाष मदो रहा है किमाझे मी प्रति दोर-शुद्धि मदी माता, मुनिफे पिपमें हमें कोई सा पिचार नदी, परम्तु २ मा प्रतिमें पड़े, निममें हरिको प्रामि दम हो । बम बम-पान ही उनका पम्पा । पर सके, पेमी इनकी और दूसरे भीमा पन्न [पत्र २१८ १११ पातसे मनमुबोध दशा नहीं है सितमान मी साथ होना पहिये । पर सिमसार हमारे श्यमें पारितस्मसे पसाया है। यदि हरिको म प्रगट होने देने से म प्रगट ऐगा। हमारा देश रि, प्राप्ति हरि , काल हरि , देह हरि, रुप परि , नाम हर है, दिशा पर सब कुछ हरि ही हरि है, और फिर हम इस प्रकार कारगारमें छोर है, इसकी इसका कारण है।शान्तिः शान्तिः शान्ति । २१८ बम्बई, बापाल पदी सनि १९९७ बाल समावसे ही पित है, तो फिर उसके दोक्का बार देसमा, पर बनुकपाका ला करने जैसी बात है, वौर को पुस्प इस तबकी बाचरण करने का नहीं करते । अमिनुगमें मससंग एवं भासमाके कारण भूम्से भरे ए रास्तेपर म पम गाप, ऐसा होना बहुत होकठिन है। २१९ बी, भाग १९१० भीसद्गुरु कृपा माहात्म्य बिना नफन पाये ना, बिना नयमको पाव । से सद्गुस्से परन, सो पाने सम्हात् ॥ १ ॥ पुची बहत मो प्यारो है मुझनकी रात पाचे मही गुस्गम बिना, शोनादि स्पित ।। २ ।। एही नहीं कम्पमा, एरि नही मिंग यि पर परमधमें, देसी वस्तु बमंग ॥३॥ महिंदे उपदेशक, प्रपम पी उपदेश सबसे पारा गम है, मोजानाका देश ॥ ॥ जप तप, बार मतादि सगी श्रमस्मा गाँगो की सक्को पई या बनूप ॥ ५॥ पापाकी ए बापनिग मदनको मेष पिछग सत्पुरुषक, वो सब धन तोड़ ॥६॥ (२) पातुर पिपनकी मेहनत करना । जो तपातुर नहीं उसे पातर करनेकी अमिकापा । करमा । मिसे पर अमितापा पैदा न हो उसके प्रति उदासीन पना। उपाधि ली गाईप्रम भी नहीं हो पाता । परमेश्वरको वनुक मही माता वो स्पा करें।
पर २२ २२१ २२२] विविध पर मादि सपा-२यों वर्ष . हम वापसे २२० बई, प्रावण मी र पुष १९१७ सर्वशक्तिमान हरिकी इच्छा संदेव मसरुम ही होती है, मौर निसे मळिके कुछ भी *श प्राप्त ए ऐसे पुरुषको वो सहर यही नियप करना योम्प है कि "हरिको इम्म सैप मुखम्प हो होती" जापका वियोग रानमें मौ हरिको ऐसी ही ठा, मौर बह इच्छा क्या हागी, पह हमें किसी तइसे माम मा है, जिसे समागम होनेपर करेंगे। भानमारा " सबषी पोहा भी मूळ मार्ग इस पारके समागममें करेंगे; वार पा मार्ग पूरी वयसे इसी जन्ममें मापसे कहेंगे, ऐसा हमें हरिकी प्रेरणा है, ऐसा माझ्म होता है। ऐसा माश्म होता है कि वाफ्ने हमारे लिये ही सम्म धारण किया होगा । धाप हमारे अस्पत उपकार्य , मापने हमें हमारी इमनुसर मुस दिया, इसके लिये हम नमस्कारके सिवाय दूसरा स्पा बदस्म दें। परन्त हमें ऐसा माश्म होता है कि हरि हमारे हापसे भापको परामति दिखायेगा, हरिके स्वरूपका हान करायेगा, मोर इसे ही हम अपना महान् माग्यो प समझेंगे। हमार मित्त तो बात ही वनिक हरिमय हा करता है, परन्तु सग सर्वत्र कलियुगका ही राता है। पत दिन माया प्रसंगमें ही गना रोता है, इसलिये चित्तका पूर्ण हरिमय र सकना बहुत ही कठिन होता है और तक हमारे विचका उग भी मही मिठगा। ईसरार्पण २२१ सर्थ, प्रापण सुदी९ गुरु १९४७ समकार बताकर योगको सिद्ध करमा, यह योगीक क्षण नहीं है। सातम योगी तो हो कि गो सब प्रकारको स्पृासे रहित ऐकर सस्यमें केस अनन्य निष्ठास सब प्रकारसे सत्का ही वापरण करता है, और मिसको नगत् विस्मृत हो गया है। हम यही चाहते हैं। २२२ बर्मा, भाषण मुरी ९ गुरु १०१७ खभातसे पाँच-सात कोसपर क्या कोई ऐसा गाँव है कि जहाँ बासरूप में तो भनुम हो! परि ऐसा कोई स्थन प्यानमें आगे कहाँ गम बनस्पति और मएिनबना. टोक रोहा लिला पप्पणसे पहले भीर भाषण सो १२ बार यहमि पोहे समपके लिये निार हानेकी पाहों हमें मोग पमझ संबपसे मी पहिचानते हैं, ऐसे गांवमें मी पाळमें तो प्रवृत्ति ही मानी है इसलिये साल में समात भामेका विचार समय नही। हा पोरे समपके लिये यह निति सेना पाइता है। जबतक मर्यकायक ठिये (मायुपपत) मासि पानेफा प्रसग म मापा तबतक धर्म-संरसे मी प्रगरमें मानेकी नाही मात्र निरिकारनेसे हागा सके ऐसी म्परस्पा करना। समाधि " अपमा मीमद् रामचन्द्र [पा २१॥ २२३ बर्ग, भाषण पदरी १९९० इस जगत्में, चतुर्पकार से कामें मी म्सगकी प्राप्ति होना बहुत दुर्गम है, वो फिर इस दुमकाउमें तो उसकी प्राप्ति ऐना कमत हो दुईम है, ऐसा समझकर मिस गिस प्रकारसे मसंग वियोग रहनेपर भी बारमा गुणोत्पति हो सके, उस उस प्रकारसे नापरम फरमेका पुरणार्य परम्पप जब कमी भी वीर प्रसंग प्रसंगपर करना चाहिये। तथा निरन्तर सम्सगको म-सम्म उदासीनता–पनेमें उसका मुख्य कारण पुरुषार्थ हो, ऐसा समाप्तकर मिाधिक गो कोई कारण हो उन ठन कारणोंच बारम्बार पार करना योम्य है। हमको इस तय सिमते हुए यह स्मरण वा हा क्या करें "सिौ मी प्रकारसे नहीं होता " ऐसा विचार तुम्हारे पितमें पारम्पार वासा पता होगा तपास ऐसा योग्य माम बता ( कि यो पुरुष दूसरे सब प्रकार के विचारको मर्तम्पम्प समझकर वाम-स्पाय हो उपमा होता है, उसमें कुछ न माननेपर मौ उसी निधारके परिणाममें यना योग्य है, और 'किसी मी प्रवरसे मही हाता' इस वर मास होने के प्रगट होमेका कारण या तो मोतको उपयो माताहै अपना मतपताका खम्प उत्पन्न हो जाता है। हामी पुरस्ने दोषपूर्ण स्थितिमें इस जगत्के बालों को तीन प्रकारसे देखा-(१) बीन सिी भी प्रकारसे दोर वा सम्पाणका विचार नहीं कर सका, वयवा विचार करनेको परिमें पर बेमप-ऐसे जीवोंका पह प्रथम प्रकार है। (२)ी बालतासे बससंगके बम्पारसे मास- मान होनेवाले गोषसे दोष करता है, और उस मियाको कम्याण ससम्म मानता है-ऐसे गोरोध पर सप प्रकार है। (१) मिसको स्पिति मात्र उपके वारीन राती है, और सब प्रकार के पर-समापन साया ऐस्य बोध-सहप जोर केवल उदासीनता कर्ण Pसर्व देवा है-ऐसे चौका पा तासय र है। इस प्रकार बानी पुरपने तीन प्रकारके गानों समय देना है। प्रापः करके प्रथम प्रकार मी पुत्र मित्र धन भाविध प्रामि-अप्राक्षिके प्रकारमे तद्रूप परिणामीके समान माझ्म एनेपाछे गानोंध समावेश होता है। इस प्रकारमें मुना पुरा धर्मोको माम-नीया करनेवाले पौष, परासर परिणामी, रो मान भागधे परमार्प-मार्गपर घमनबाठा मानते है, ऐसी पुलिसे मात गायका समावेश होता है। तोमरे प्रमरमें ऐसे गांवों का समावेश होता है कि गिनी, पुत्र, मित्र बारिकी प्राप्ति-भप्रानि वादिक मानमें पैराम्प उपम हो गया । मया पग्य हुमा करता है। जिनके सर परिणाम र दाम भार को निरस्तर हो से माचारमें गत है। वना विचार तो पेमा है कि मि प्रभार सिन दो माप । मा विचारवान है उन्हें पयामिपूर्वक, समयस और समगमे पद रिचार प्राR TRIT R उनमें मनुषमसे दोपरक्षित बसा साप उत्पन होय है। पर बारि हिरमै सात हुए, मागत हुए और मग तसे मी विचारन और मनन करमे योग्य है।
२२४ भीम्मलियस ] पिपिप पर मादि संग्रह-२४ावर्ष २२४ रामब, मात्र मुदौ ८, - -- भीसहमभक्ति रहस्य हे प्रमु! हे प्रमुरे दौमानाय दयाल । हे करणेश! क्या करें, मैं तो अमत र पात्र ॥१॥ मुझमें मुख-मात्र महीं है, वौर न मुझमें तेरा पूरा स्म हो, म मुझमें छyता है। दौनता है, तो फिर मैं परम-सस्मकी तो बात ही क्या करें। ॥२॥ न मैंने गुरुदेवकी मात्राको दयमें बपठ किया है, म मुप्तमें आपके प्रति ख विध है, और न परम बादर होई॥ ३ ॥ म मुझे ससंगका पोग है, न स्सेपाका पोग है, म सम्पूर्णपसे अपनेको वर्पण करना है, और म मुझे अनुपोगका नामय ही है ॥१॥ में पामर क्या कर सकता है। मुझे ऐसा विवेक महीं है। मरण समपतक मुझे बापफी पारणका पीरज मी तो नहीं है॥५n तेरे बभिनय मायाम्पका मुझमें प्रश्चित मात्र महाँ, न मुझमें स्नेहका एक भी वंश और न किसी प्रकारका परम प्रभाव ही मुस प्राप्त जा॥६॥ मुझमें न तो अचस भासकि है और म सबका ताप , म सेरे प्रेमको बम्प का और न उसका कुछ परिताप हो ॥७॥ म मेरा मषि-मार्गमें प्रवेश है, न ममनमें लता है, म अपने धर्मका समास, भीर म देशमें मेरा पास हो॥ ८n विकासे काल-दोष हो गया है इसमें मौत और धर्म मही ये, तो मी मुझे मा महाप्रमु ! मेरे कर्म तो देसी ॥ ९॥ - । - २२४ भीसहरुमलि पस्प प्रीम माना ऐर भनतम, मान परमार ॥१॥ परम्पब मुसा मी नपान गुरम्प नया नया ए परमलपा ॥१॥ मर्थ भाग गुरदेखनी मन रागमा मातको विमान में परमास नाहि ॥३॥ मग म सगना नन्गादगारेट मावता मर न मामय मनुराग ॥ ४॥ है पामर । एका नप विर पर एन पारस मी मात्र मुनी ॥५॥ भचिस्प नु माहाम्फनो मी प्रालि मात्र मगम एकलेनोम पम प्रमाण भबनकामालाडमी मीनियनोवार यमनमा कुरा प्रेमनी नदिनो परिणाom मखिया मायनरनी मनमाना नया नयनी मरिएम रमन ॥८॥ पर पानी मापसे मी म्या! मी मम पुरा॥
२३. मीमत् पन्चम [२१ बीजमाध्यम ओ सेना के प्रति बंधन है, उसका मैंने त्याग महा किमा दो और न्दियों मानसी मही है, और बास बस्तुपर राग किया करता ॥१०॥ तेरा वियोग सरित न होता, अपम और नयमका कोई यम-नियम मही, सपा न मोगे ए पदासि वौर पर मानिसे ठासीन भाष महो॥ ११ ॥ म मैं कहभालसे ररत , न मैंने अपने ममय ही संचप किया है, और म मुझमें निर्मक- भारसे अन्य प्रति प्रति कोई निति॥१२॥ इस प्रकार में अनंत प्रकारसे साधनोस रहित हैं। मुझमें एक भी तो सगुण नहीं] में बना मुंह से बताः ॥१३॥ हे दोनम दीनानाप ! वाप के काणाको मूर्ति हो, और मैं परम पापी कनाप रे प्रमुग! मेराशप पो॥११॥ रे मगन् ! में विभा जानके नंत का मटका किरा, मैंने सतगुरुको सेवा नहाँ को चोर वभिमानका त्याग नहीं किया ॥ १५॥ सतके चरणोंके भाभपके बिना मने बनेक साधन जुटापे, परन्तु उनसे पार मही पर्व, और विकमारा मात्र भी उनसे सदित महीना॥१५॥ मितमे मर साबन ये सब बंधन हो उठे और कोई उपाय मही या। पासए सामन से मा समछा, तो फिर बंधन कैसे दूर हो सकता है।॥१७॥ म प्रमु प्रमुकी पोशी गो, और न सद्गुरु पैरेंमें 0 पोस वपने दोपही नही देसे तो सिकिस उपापसे पार पा सकते ॥१८॥ मैं सपूर्ण जगत्में वभसे भषम वौर पवितसे पवित | इस निश्चयपर पर मिना साधन मी स्या देगे।॥१९॥ हे मगन् ! में फिर किरसे तरे भरण-काम पा पाकर यही मांगवा ! मगर सत, ऐसा मुसमें सवा अपम कर ॥२ ॥ सेवाने प्रसन्न नीला पत्राव माने नदि मे पासपर पग ॥१॥ मलाप पप्पो म पचन नसक्म नादि न उरात ममतभी, म प्रारक म्याद ॥ ११ ॥ मामारपी रवि नतिर्मनस नाम, ममी नापि निर्मपये मम पानी कई | RH एम बनन्त प्रभार न म एकलन समुह मत सम्मानिनमा पनी परम मनाई यो प्रभु ॥ १४ ॥ भनेव कामी माघमो ना मन मापाता मरि म स्खने मूल नरिमाममान ॥ १५ ॥ माणगाना सपना अनेक परनपामिग्रे सम्मा मर॥२॥ सरगम न मा पोई पाप वन हमनमो नौ मन ॥ १ ॥ मम मममममी मा पन्नोमा पार ठाम निमोषधो पर प्रेप उपार! || १८॥ मम्मरमा बषिको परिचयपत्र नियम माना गनणे स! ॥१९॥ पोपी इस पर करे मार्ग पर नमस्तसम्म ब एसा कर देव ॥ . n पर २२५, २२५] पियिप पत्र मादि सपा-या वर्ष २६१ २२५ रावन, माद मदी ८, १९९७ सत् शु सापन पाकी रचरस पीन शु! पम नियम सबम बाप कियो, पुनि त्याग विराग बयाग समोर वनवास डिपो मुख मौन मो, दबासन पम म्गाय दियो ।॥ १ ॥ मनपीननिरोष बोध कियो, हठयोग प्रयोग सवार मयो; अपमेद पे तप त्यहि तपे, ठरसहि उदासि ही सब ॥२॥ सब शासनके मय पार दिये, मत मान सम्म म मिये, यह साधन बार वनंत कियो, तदपी महाप हन न पर्यो ॥ ३॥ का क्यों न मचारत है ममसे, कडु वीर या उन साधनसे । बिन कोउ न भेद मे, मुम मागळ है कर बात करे॥२॥ कम्मा म पाबत तुमको पर बात रही मगुरु गमका, फ्समें प्रगटे मुख भागठसें, सब सगुरुपर्नसु प्रेम बसे ॥ ५ ॥ तनसे, ममसे, भमसे, सबसे, गुरुदेवकि वान सत्राम बसे, तब कारन सिद बने सपनो, रस बमृत पाहि प्रेमफ्नो॥६॥ पर साप मधा दरसालहिंग, धतुगुछ गम मिन, रसव निरममको पिबही, गहियोग जुगोयुग सो नियही ॥७॥ पर प्रेम प्रकार बड़े प्रमुसें, वागममेद सुउर बसे। एकेको बिर ग्यानि को, निमको वनुमौ बतलाइ रिये ॥ ८॥ २२६ एन, मार सुरी ८, १९४७ (१)माका गम्प ही परिणमम हता है, वीर बेतमा पठनपसे ही परिणमन होता है। दोनोमेसे कोई भी अपने ममात्रको छोड़कर परिणम्न नही करता ॥१॥ जोगाई तनो काम नाही यता है मी तरह का पतन है,पवीनी कारमें पेतन दो पता है यह बात प्रगमापसे अनुपगमें आई है, इसमें संशप क्यों करना चाहिये | Hon पर किमी मोसमें गा पेतन हो गप और वेतन जागाप, तो बस और मोक्ष मही बन सम्ले, और निस्-िमापि मी मही बन सपती ॥ ३ ॥ (१) बाम ग परिसमे कान पान मा राप्रपनो मी, ही मार समान ॥ १ ॥ जापानमा फेन केन खेम का मर्नुमान, मंगर देय रेया॥॥ को पानाम्मा मानन ऐ मोर दोमरी पर मासि प्राति मा.n
२१२
भीम पमबार
बास्मा चक्क बध पौर मोके संबषसे मात यता , तस्यक पपने समापस
पता है, यह मिनमगवान्ने का
वारमा अपने परको वातासे पके प्रसंगी प्रवृति करती है, परस्त इससे मामा सस
माह दो माती, यह सिद्धांत प्रमाण है ॥ ५॥
बरूपी रूपीको पका लेता है, यह बात भारवर्यकी बात है, जीव पिनको बागवार
यह कैसा अनुपम दिनमगवान् सित tum
पहसे देहनारि पी इससे देहही देह दिखाई देती पी, परन्तु जब भामा पनि हो
स्सासिये देवसे मेहर हो गया non
बा वीर पेसनका यह संयोग वा वनत है, उसका कोई भी कर्ण महोते, या
मतान्ने कहा है ॥ ८॥
मूहदम्प न तो उत्पम हामा पा, और न कमी उसका नाश होगा, या
सिद, ऐसा जिनबरने ॥९॥
यो वस्तु मौजूद है उसका मास नहीं होता, वौर निस बस्तुका सया बात है उसकी
मही हो सकती दापीको मबस्पा देसी, नो बात एक समपके लिये हमेशा के लिये है
(२) परम पुरुप, समर, परम हाल वार मुसके पाम निस प्रमुने निमका बान है
हमा प्रणाम ॥१॥
(१) बिस बिस प्रकारसे वास्माका पितषम किया हो, यह उसी उसी प्रकारसे ।
सित होती है।
विपयापिनेसे महताको प्रात पार शक्तिमाले जातको बास्माको निस्पता नही मासित
ऐसा प्राय हपई देता , पर ऐसा हवा है मत पपाप क्योकि पनित्प
बाप-पुदि होनेके कारण उसे अपनी मी बनिस्पता हो मासित हो।
विचारयानको बारमा विचारवान गती ।। शून्यवासे मिलन करनेवासको वात्मा
माती अमिस्पतासे चितवन परमेबानो मामा मनिस्य माती , र निस्पतासे ।
परमेयोको बामा नित्य भगवी है।
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मेवगनामा माम मान सम्म लमानो मले निम्मान ॥४॥
दरामा निसाना परमाला भी समाप्त एमिएका
मा मापन ए मरम्मी पान और रकन बार नहीं सोनिया ॥
प्रथम राजा व मस्यौपापी मामा, यो नद-॥
बाचन स्थापना वास मा मनाममा टेक्नी माले निममव ॥८॥
माम उत्सव मी मारमा परेमा भगमन मि मरे मिस एम || ॥
सेष देतो मार महि मान मलिक मोहमद और माला मेन ।'
(१) पम पुरुष प्रम म्एस परम मान न घमा ने भाई माननिय के प मनाम ॥ १॥
पर २२.] विविप पत्र भादि संपा-सपों पर २२७ रम्सब, माद्रपद १९१० (१) सप सम्पा ! सुनो, निनबरने इसे ही मान फाt- निसने नए-पूर्फको मी पर लिया, परन्तु पदि उमन नीषका नही पहिचाना, तो पर सब जमान ही कया गया है। इसमें भागम साझी है। ये समस्त पूर्व सीपको विशापम्पसे निर्मठ बनानफे लिये करे गये हैं। सब मम्पो ! सुना, दिनकरने इसे हो बान का ॥१॥ बानको किसी प्रयमें नहीं बताया, कविको पनुराका मी बान नहीं कहा मरतत्रोंका भी डान नहीं बताया बान को भाषा मी मही। हानको किसी दूसरे स्पानमें मही फहा-बानका धार्मि हो देखो। हे सब मन्यो । पुनो, मिनबरने इमे हो हान की॥२॥ सबतक मार और 'यहदार' इस प्रकारका मेद माश्म मही पहा, तबतक पासाग करनपर भी उसे मोक्षका हेतु नहीं प्रा। यह मर्पया निर्मक उपाश पाच बगमें या गया है। रेस्त्र मन्या ! मुनो, त्रिनारने इस ही बान शाह ॥३॥ न केवल अपपर्यस, और न केवस सपमसे ही शान पहिचाना जाता है, परन्तु बानको फेरठ पानसे ही परिमानो ।हे सब मम्यो । मनो, बिनबग्ने इस ही शान का ten विशेष शामोंको माने या म साने, किन्तु उसके साथ मान सम्पका दान करना अपना मा विश्वास करना, इसे ही ग्राम करा गया है। इसके लिये समति बादि प्रप देमो। सब मम्मा ! मुमो, निमबरने से शान का ॥५॥ पदि भानाके परमार्यमे बार समितियोंको गान लिया, तो ही उसे माझार्यका कारण दोनमे शाम कहा गया है, कत्र वानी कम्पनाके मे करो शान र दना, यह कब मनका नाकार हो। सब मम्यो ! मनो, जिनबरन इसे ही धाम मा ६॥ निरपोपानदेने स मम्मय- याप पूष ममत्र नर पर गरने या नहीं तो कर मकान माम मामी मपम मी ए पूषन प्रमाण, मी कामानिमम निबर पारेन ने न मोमिन्मे ॥१॥ मरिच मदिन मा धान नरकवि भानुरी, नहि मात्रा मान रानो बान मारि मायरी नई मम स्पान गन माप मान हानीमा प्रमे मिरमाननन म मम्मी ममम ॥ बाब मन मास एषा मेरमा मास्ता नहीं पालान कोषो स्पन भाषा पम्पा नरों ए पचिमे मप मे उर्स मे, मिमकर प्रप्त तने का मामी नामान्य ॥ पर मारपी मन मरिमामय पत्र सात पती मिरर को मात देने न मप्पा मामय 1 on पोस्पियनीत पर बा बागि निबम्न पदरा मानव पर भारी मपा मन सन ने मानिसमम्मत भारि स्पये मिरकोशन न न मम्मो माये ॥ भाउ समिति भागीर चपनीता समापर्ण कामात मदने, भार माधरंगा नरनार यात्रा मात्र मन्ना भामा निरपशान न काममा मन्मे ॥
२१५ भीम प्रसाद [1 ११८, १९९ भार पेर तया पुराण भाग सा मिथ्या है, यह बात, जहाँ सित्तर मे म वर्णन किया है, यो मधिमे या तापानीको दोहोवाद, और पही यफ बटना मी है। सर मया । मुनो, जिनरने से दो शान का ॥ 00 न कोई किपा, म गई पमाण किपा, भीर म फिगो बस्नुसत्याग ही गि परम्न पारगमन देश छो, अणिम आगे जाकर मतकर होगा । उसन वर्णन मोंने ऐद पिया || ८॥ (२) शिरि मष्ट होने वा बाद शाम पाहे वाकपन हो, चाहजो रचन हो, बार बाद जो स्पन दा, बद प्रापः बहितमा कारण नदी होता। फमा (प्रश्न) क्ताप सातमी! बपि सोश र ! पापपारय। प्रथम गार क्यापी आम्पो ! बते और नशे क्यो। तने पमाप फेम! २२८ मारपर १९१० (उचर) भाबाट नापटी (माप उम्प्रेप्पपी) सर पुग भरधामपा (भौमत् पुरुषाचममापी), जरी र सगुस्पी. २२९ पाणांमा, मात्र बदी । मौम १९९० " सत्" शाम यही है कि नहीं एक अभिप्राय हो; प्रधश पोहा से अपना म्पा, परन्तु माध " साम्प मारिके शानसे निस्तारा म, रतु निस्तारा अनुमचानसे है। चार र पुरान मारणपणे मिभावना भनारो माल मेरमाना, पर जाने जान मला एक मोठणे निरसन ने मम्मो समामे.॥ नरि पयालाल नर नरि त्यस पल पोईनो, मारपतीपर को मिय येई स्म या मनवा 11८॥ मही प्रम मोर उत्तर ऐनो निनोपला म र एस रामप्र मूल मम पम है। प्रथा र नायकमा मूल बाहर भागका एक एक मनमा पाये। अपमानेभाने-मानेर मनगरमा मार्ग इसमले भी प्रकारे मरप बनवा । तपनो मे मी समाना पारिसे। मभक २ पारेकारभारा। भरपामते (भौमत् पुरोपमेन) मतमीकहाँ पापा उपायाला नएल २१५ R २३१ २१२ २५१,१]पिपिपरमादि समा-वापर पटनम्न १०१ एमै एक परपरा-मिबिल अन्त सरका परिचय निा। चाप बह पग मेलमा बारिम प्रसरतेह, नरामभुमिवार स्पिा करते है। मदने अमन २३१ या मदीरमान १०१ गिम महान् पुरा प म मी अपरदन पर हो हो से महशनाके : होनेर, निम्सहममे बिस दर कमी मी अचान करना परिप र टमी तरह आपरण करता हो, ता मुमुभुय केनी घर सन्नी पहन स्मन सोह। अगर म ૨રૂર पर श्रा, मा ५ पु १० परियुग मे सरपरी पहिचान हाती रि मी उसने पन कार पानिन माह का प्रेमध उन मही हाल देता । वीपी सि मीकि बह पदिपान दानपर भी उ निधनाम नही रह सम्मा, भार पारिपरिग रग इसमें मादित महा दाना उस नमस्कार ૨૩૩ Kा मार दी ५ पुष १॥ दावा 'सत्''अगर रहा ना मान दवा है। यह पार गुपेश प्रगट मा माननमें आता (पाग वा साधन बामाय प्यान, भायाम-पितान, शुष्करे गैरदम), परन्तु परमा नहीं। बिनमगा। मितान्त: बिस्मिा कारमें भी गर नदी का मरना भार जी फा में मी नामी साता इसी तरह रिमा फागमे । मर मी माफ मिग मा किमी सारनम उरम नदीमाता रि भी भाभप मिसर पर ममममें आनगरीय गा माहित दायर पनी सपनाम मत पग्नेस र मा उम 'मन पर और सर का उरत परता गगदमें मर गाना Pप मुमधु और पुट भी भापम परे, नाम। उमराहीबापर कर। प्रम २३२ पगा मा ५१. भार आदि। गार गामाश किसान In men ममतारमा सम्मा मीनाकी नर म माना me पत्नी है। ...गाभागे ' नना है। 1 प्रामान गि ने भी rijra fना उमkumr tant भीम म्यन्द्र [पत्र २३५ २६ २५. २१८ २५५ सार्प नहीं है। सखिये कहना योग्य है कि वे प्राप केवल 'सत' से मिमुस मामे ही प्रति कर । मो उस तय वापरण नहीं करता, पाहा तो अप्रगत रानकी ही इसा करता है। बापर्यकी मात तो यह कि फक्किाम्ने पो समयम परमार्पको परफर अनर्पको परमार्प बना दिया है। २३५ बबाणीवा, मायपद पदी ७, १९९७ चित उदास राता है। कुछ मी वानरी माता वीर जो कुछ ना मी माता ही यनिक मबर पाता। यही मुनाई देता है, तो वह क्या करें ! मन किमी मी फार्पमें प्रापि नाही कर सकता । म कारण प्रत्येक कार्य स्थगित करना पाता है। कुछ मी गोपन, छेसन भवना बन परिषयमें मधि नहीं होती। प्रचलित मतके मकी बात कानमें पानेसे हवपमें मृत्युसे भी अधिक बंदना करती है। या तो तुम इस स्पिनिको मानते हो, या निसे इस स्थितिका वनुमय माम बानता है, वपमा हरि मानते हैं। २३६ बवाणीमा मात्रफ्ट दी १० रमि १९४७ जो मारमा रमण कर ये ऐसे निन्य मुनि मी निकारण हो भगवान्को मफिमें प्राप हते हैं मोंकि भगवान्के गुण पेमे ही है' -भीमद्भागक्त । २३७ मवाप्पाचा माइप बी ११ सोम १९९७ जबकि बीवको संतका संपोग नही तपतक मतमातरम मम्पस्य एमाही मोम्म है। २३८ बाणोत्रा, मानपद बदी १२ मौम १९९७ बताने योग्य तो मन है कि यो सतरूपमें मा स्थिर हो गया है (जैसे नाता गाँसुरीके उपर) स्थापि उस दक्षाके वर्णन करमेकी सपा सर्वाधार हरिने पाणीमें पूर्णरुपसे नहीं दी और मेसमें तो उस माणौका मर्नतों मग मी मुस्लिमसे ना सकता है। यह परिम्पित्ति रम्नेका एकतम कारण हो कि पुस्पोतमके समपमें हमारी वीर तुमायै नमम्प प्रेम-मछि क्षण या प्रेम- मजि परिपूर्ण मत होगी पही याचना करते एका वधिक नहीं मिलता । स्तरेषा २३९ बापामा भरपद पदौ ११ गुरु १९४७ असत् परम सभाम सुमम्मी जैसे महात्मा प्पासमी मा पा, देस हो जब हमारा मो हासभाम-दर्शन पाने पर मौ म्पासजी बालन्द-सम्पम महाँ र मेस्पोंकि उन्होंने हरिरस सारूपसे मां गाया था। माय मी पत्र २४ ] विपिघ पत्र मादि मप्रह-श्श्यों थर्प २६७ यही हाल है। परम प्रमसे बसा हरिरसका असंपनेसे अनुमव करना ममी कहाँसे वा सफत है। और अबतक ऐसा न हो तमतक हमें नगत्में की एक वस्तुका एक मगु भी गए मानेवाग मही। बिस पुगभगवान् म्यामजी पे वा पुग दूसरा था, यह कमियुग है। इसमें हरिस्वरूप हरिमाम, गौर हरिचन देसनेमें नही बाते, मुनने सकमें भी नहीं जाते; इन तीनों से किसीफ भी स्मृति , ऐसी कोई मी पौर दसनेमें नहीं पाती। सव साबन कलियुगसे घिर गये हैं प्राप सभी मीच उन्मार्गमै प्राति पर ऐहै, भयका स्मार्गके सन्मुस बनेपासे जीन टिगोन नहीं होते। कभी कोई मुमुमुहे मी, परन्तु उनें बमी मार्गकी सविकटता प्रास नहीं है। निष्कपटोफ्ना मी मनुष्योमसे घसा हासा गया है स्मार्गका एक भी बच बार उसक सौपाश भी किसी नजर महीं पाता; केवयानका मार्ग यो सर्वथा सिर्जन ही हो गया। कौन जाने हरिको क्या इच्छा है! ऐसा कटिन का तो अभी ही रेखा ।। सर्वया मा पुष्पलासे प्राणियोंको देसकर परम अनुकंपा उत्पन होती है, भार सम्सगकी न्यूनताके कारण पुष्ठ मी बन्छ नही रुगता। बहुत बार योपा थोका करके कहा गया है, तो भी ठीक टोक शम्दोंमें माइनसे अधिक स्मरणमें रहेगा, इसलिये कहते है कि बहुत समयसे किसी के साथ बर्य-संवध और काम-सबंप विष्कुस होमटा नहीं पाता । अब तो पर्म-सबर बार मोश-संबंध भी भम्झ नहीं लगता। धर्म-सबष भार मोक्ष-सबध तो प्राप्प योगियों को भी मठा गता है, और हम वो उससे मी मिरफ ही बना चाहत ।। दासमें तो हमें कुछ मी षम नहीं गता, भार यो पर अच्छा सगता भी उसका अत्यन्त वियोग है। अधिक क्या टिमें। मान करना ही सुगम है। २४० बवाणीभा भासोन मुटरी गुरु १९४७ 'परसमप' के गाने बिना 'स्वसमप' नाम लिया है, ऐसा नहीं कर सकते। २ परदन्प' गाने बिना 'स्वाम्प ' मान लिया है, ऐसा मही कर सकते। २ सम्मविसूममें श्रीसियसेन Pाकरमे या मिनिकन बचन मार्ग है उतने ही नयकार है, और चिक्ने नयबार है उतने ही परसमय हैं। १ अक्षयमगत कपिने कहा. फर्चा मरेता कम, ए ए मा ममनना मम । मा सं मीर वा कर्चा हरी, मा तं विष वा बस्सु गरी । सं छो जीप ने हूँ ण नाप, एम की मम्न प्रत्यया य परि तानेका मात्र मिर नाप तो र्म पर पवारमा ममम मम ।। दिन गैरसर । पर वो वस्तु मी पहै। न ही जीव है भौर तरी माघ । एपम मत्र' न हार सरफ मिया भीमद् रासवान [पत्र २४ २४५ ॥ तुम भेग मा, यो में जानते है उनमेगोंकि सिमाम अधिक मोगोंको, दमें माम, स्थान और गाने बताना नही। एकसे नवबोगनवीय एक है। २४४ अपाणीवा बासोम बी ५,१०१४ मादि पुरुप सेस सगाकर गरे एक वाम-तिक सिवाय नयापुरामा तो हमारे को! और उसके सिमने पिवना मन काश मी बाहै! मी तो समी पुस नया है, और समी कुछ पुराना है। २४५ माणामा, नासोग बदौ १. सोम १९९७ (१) परमार-पिपयमें मनुम्पोंध फापहार अधिक पसता है और हमें मनुकना। भावा। इस कारण मापसे उत्तर तो किसे ही नहीं जाते। ऐसी परिमो पर हमें मा मात्र प्रिय मोर। (२) कामे प्रापि, और यह दशावमी मात सममता ग्रेगी। उस समयक वरपामार मपि करमा पोम्प समसा है, इसलिये किसी भी प्रसगपर पाबाकी पप मिसमें पदि निम्मा हो गाय पपमा पाप न दी गाप, मयमा कुरा उत्तर न Pया नाप, तो उसके किये ले करना पोप ग्री, ऐसा निश्चय करके ही हमसे परम्ममार रसना । २४६ वाणीमा, वासोम की १९९४ (१) पोस्पिति-पही मात्र भोर 40 रूप है। भले ही वाय कापना करके दूसरी या किन्तु पष्टि पार्न चाहते हो तो यह..। विमंग पान-वर्धन कप दर्शनमें माना गपा है। इसमें मुम्स प्रपोंने सिधर्म मार्गका बोध Pमा , उसके सम्यक् होनेके सिपे स्पार मुद्दा वामपकता है। स्यात् मुटा बसमस्थित मामा है। रामको अपेक्षा सलपस्थित मामाले सो शिक्षा है। (२) पुनम है जहर है इसके लिये मैं तुमसे हो करमे पछ (१) इस काम मेरा मान्म ना, मानें तो इसापक है और माने तो पापक मा है। (१)मा मा कोई पाँचत नहीं या कि जिसे बाँधनको मरत हो। मिसके सगमें जाकर एका मामि रो जाया करती पा, ऐसे माय इस कामें न्यूनता हो गई है। विकासका किराए मामा परंतुस तय अपमान हो । यही कामाग। N N H H पत्र २४७, १४८, ४१] पिपिप पत्र मावि समर-२४ाँ पप (५) परि रानी दी मोम कर सको ता राम पुछ पा माओगे, पिरो गीगे हैं। मुझे बमुभव है। एप करता है। यधार्थ कहता है। निफ मानो । इस सम्पफे समंध पुन्छ कुछ फिसी स्थम्पर रिस साठा है। २४७ पयाणाला, बासोम पदी १२ गुरु १०४७ ॐ पूणकामपित्तको नमो नमा भारमा ना-समामि दमन वनमें है। एक दूसरेफे नाममा अनुफमरोद कुछ किया परपी ।। रा स्पिसिमें तुम दोनोंक पत्रोफा विस्तारपूर्वक और योपम्प उपर फैरो भिमा जाप, याम्दी पदो । निनफा धर्ममें दी निपाय , पेरोइन एमभुमीको दशा बार राति युगको रमरणगें रम्पनी योग्य प, भीर मनुकरण करमे पोप है। निसरो पफ समयके लिये मी पिइ म दो, इरा सरबरो परांगगे दी बनेपा इशारे परम्त द तो हरिइसके बाधीन है। फपिगमें रसगफी परम पानि छा गई है। कंपार अया एभा है। इस कारण रागफी अपूर्णताका जीवको पधार्थ भाम मही दाता । तुम सब परमार्थ पिपपगे पसी प्रतिम रहते पड सिम्पना। पिनी एम नही पद एप प्रसगक विषयमें विस्तार पर जिगने की इस थी, उरामा गी निरोष फरमा पपा । पद प्रसंग गंभीर दोनेक कारण उराको इराने पातफ ददयगे दी लमारी। पर उमस है कि मरें, परन्तु तुम्हा सगगतिके मिछने पर करें ता परें । २४८ मागीभा, भागोन पदो १५ शुक्र १०५७ भी सम्पिए भी... पिराहको वेदमा में पपिप रहसी है। क्योंकि पौतगगता विशप है। जम्प गर्म पात उदासीनता है। पग परियारा भनुसरण परक प्रमुग पाकर विरहगे रहना परता ६, और उस इप्छाको सुम्पायफ मान है, या मही है । मति बार सांग सिह रमनेको छ एमापक मानमेमें छमारा पार मदी रहता । श्रीहरिको बोधा इस विषयमें दग अधिक स्वतंत्र है। २४९ समाई, १०४७ धाप्यानका प्याम फरमेयो पेशा धर्गप्यानमें प्रति माना, पदी भेपम्फर बार विरारे ध्येि भासप्मानमा म्यान फग्ना पाता हो, पहोरी पा तो मनको उठा ना धादिय, नपा उरा इसको कर राना पाहिए कि विरासे पिरक हुवा पा एके। पर पीपक रिय पदुत महा दोष । पट निराकार हो गया है, उग मार्गका प्रम पाना परत सुरुमा वर्ष २५वों २५७ मागोवा, कि पदी १९९८ - पपापोग्य बदन स्वीपर करमा । समागम होनेपर दो-पार कारण मन गोम्कर वापस बात नहीं करने देते। वर्मतकाली पति, समागम् योगोंधी रवि और भेकमा ही प्राय इस कारणका मूल होता है। ऐसी परम प्राम' मेरी नहीं पता कि पेमे कारणोस किमी मी प्राणीके उपर काम बामे, परन्तु हमें मेरी दया के मी छोकोचर बात करते रह जाती है। वर्षात् मनका कुछ पता नहीं पाता। • परमार्थ मौन' मामा कर्म हमें मी उदयमें है, इससे कनेक प्रकारका मौन मी अंगीकार कर रहा है। वर्षात् अधिकतर परमासंबंधी मातचीत नहीं करते। ऐसा । उदप-कार है। सावित् साधारण मार्गसंबंधी गावात करते है, क्यथा इस तिपयमें वामपण, त्या परिचयात मौन वोर शून्यता दी xण कर रस्सा। सम्वक योम्प समागम ऐकर चित्त मानी पूरुपका स्वरूप नही जानता, पाता उपर कोर तीन परण सर्पपा दूर नहीं होते, और तबतक 'द का पपा कारण मी प्राप्त नमी दोवा । एसी परित्पिति हानेका कारप्प, कमें मेरा समागम रोनेपर मौ बात म्पावहारिक और मेक-समा पुठ मात करनेका प्रसग येगा। और उससे मुझे गाव बानि बाप किसीके मौ साप मेरा सम्पगम होनेक पथात् इस प्रकारकी बातों में गुप नाम, से मैले योम्प नहीं समझा। - - २५८ वानन्द, मगफिर मदोगुस १९५८ (पैसा भी ) परमसस्प सच इस प्मान करते मगवान्को सब कुछ समर्पण किये बिना स कामें औषका ऐशमिमान मिन्ना प्रभम मोरे, इसध्मेि हम समातनधर्मरूप परमम्पका निरस्तर हो पान करते है। जो सफा पान करता है, एसप रो माता । २५९ बर्थ, मंगसिर १५ भौम १९४८ *सत् मीसहजसमाधि पहा स्माधि है। स्पति पता है। उपालि निक्ष्यापता है। अगमति होनेसे भयुमात्र मी उपाधि मान सके, ऐसी (पा महीनो मी सहन करते है। Aपार करके पराको निर किरप्ले एमाना, मनसे विपेर अपको साक्षात् निचय ग्री मानना।
२५१ २१२] विविष पर मादि समा-रपार शानीय किनेर चियचे दानर प्राति करन्ने हो कल्पा-हिरो देसी ऐनहर | मुगकवि ने हने सदा नहीं है । न टनच स्वप सा, और वही घट! २६० पा, मनि पी १४ गुरु. १९९८ अनुक्रमे सपम सनोमी, पाम्बी सापकमार रे, सैपरभेगी फुलामी, पू पद निप्पार रे । (माना अनेद पिनास) उनके एकके बाद एक अनच कनुमा कर मनात (जापरिविध स्पा) मत सो वाल पुत्र, टनक निर्मक परम्मरको पालाप मटाने पूरा । बरफ पचन कमिप गर्मर है। पपापा स्तरका पपात्र २६१ पन्य, पैप सी १९९८ मनुभम सयम सर्मयोगी, पाम्पो सायमाप र, सपमभगी पोनी, पूर्वी पद निप्पाप रे । देनेन सकपना मय ग्रो, माप रो निग मारे रे, रितकरी जनने समीरनी, पारा सा पराप रे । दमन म यो जूना, हे मोप नमरन फेर रे, ष्टि यिविध तामा, सपछि राष्टिन हरे । पागा बीम प ग्रो, मिनबर मुद मामी रे, मााचारम सैरना, मारग मुगमा रे। ૨૬ર पम्प, पैर मी ५, १९९८ सायिक परिषको स्मरण करत उनक रिदाय बाट। कम्नमानच पर स्ने । पोपम्मर चप्पा लले मरेको उत्त. २६ २ सन्त एप्न मेमपाले सत्रे भैरसग्दान नप। उप म्दा रिपर सोनप पपपरे। पनि तप्त पिपरेने दिखायरे बम मेरमनियो। ४म में ऐसा काररे, एमिरमर सनबरे, मापार से पदमारार्म।
मौमापनबाद [पा २५ , १५१ २५५१५१, २५४, मौका मनम, २५० पवि चिकी स्थिरता येतो ऐसे समयमें यह स्पुरुषों के गुणों का विस्तबम, उनके पर- उनके पारिका कपन, कीर्तन, और प्रत्येक पेशका फिर फिरसे निरिभ्यासन हो सकता हो, तो इससे ममका निम्न वन्य हो सकता है और मनको नानेकी सपमुष यही कसौटी है। ऐसा होने से प्याम क्या है, या समसमें वा पापगा; परस्तु उदासीनमाषसे निक-स्थिरताके समयमें उसका पो माम परेगी। २५१ बम्बई, १९०७ १ वरपको बध परिणामस मोगा जाय, तो ही उत्तम है। २ दोके तमें रानेवाम पक्षको कितना भी क्यों न है, फिर मोग नहीं जाती, और भेदनेस मेदो नही जाती "---ौवाधारंग । २५२ बर्मा, १९१७ भारमारे लिये विचार-मार्ग और भरिमार्गको माराधना करना पोम्प है। परम्त विसी विचार-मार्गको सामH नही उसे उस मार्गका उपोक्ष करमा योम्म नहीं, स्पादि यो मिसा यह पैक हो। भी स्वामीने केमदर्शनसाधी होईगो शका किसी ससे बाँधी है। दूसरी मतसी बाते समय म्नेके पर ही उस प्रकारको शंका समाधान हो सकता है, अपमा प्राय उस प्रकारको समानेकी यौम्पता जाती है। हाम्में ऐसी शंकाचे सषित करके अपना सरत कर पप निकट वाहमार्यका पार ही पोम्प है। २५३ वाणीमा कार्मिक : गुरु १९४८ म विपम मा गया है। सर्सका योग नहीं बार बातम्गता शेष है, इसलिये कही मी साता नही भर्पात् मम कही मी विमति मही पासा । कनेक प्रकार विरग्ना तो हमें नहीं है, तपापि निरन्तर सा नहीं हो सो मा सम्ममा है। मेरे संग मा मही भगवा । २५४ कमाणाबा कार्तिक सदी . मि १९५८ पाहे मो किया, जप, तप नया शर-मापन करके भी एकही कर्म सिय करना है, और पर पाक जगत्को विस्मृत कर देना, और सबके घरणमें राना। और इस एक ही बपके उपर प्रति करमेसे पापको ससे पा करना योम्म है और क्पा परमा बमोम्म है, यह बात समझमें मा मातीपा समहमें बाने माती है।
पर २५५ २५५] पिपिप पत्र मादि संग्रह-२५पो थप इस छाके सन्मुस हुए बिना मप, तप, ध्यान अपना दान किसाकी मी यथायोग्य सिरि मही है, और अबतक यह मही तबतक भ्यान बादि कुछ मी काम नहीं है। सखिये इनमेंसे वो जो सावन से सकसे हों उन सबको, एकम्झकी-मिसका उठेस हमने रूपर किया है-माप्ति होने के लिये, करमा चाहिये । जप, सप बापुस निपेप करने योग्य नहीं, त्यापि वे सा एकरक्षकी प्राप्तिके छिपे ही हैं, वौर इस क्षके बिना गावको सम्पप-सिद्धि नहीं होता। बविक स्पा करें । विना उपर का उतना ही समानके सिपे समस्त शाम रचे गपे है। बाणीचा कार्तिक मुदी ८, १९१८ किसी प्रकारका दर्शन , उसे महान् पुरुयोन सम्पम्बान माना है ऐसा नही समझना बाहिये । फार्थक यपार्य-बोध प्राप्त होनेको ही सम्पम्मान माना गया है। निमका एक धर्म हो निवास है, ये नमी उस भूमिकामें नहीं माये । दर्शन मादिकी अपेक्षा ययार्प-बोध भेष्ठ पदार्थ है। इस बात के करनेका यहाँ बभिप्राय है कि किसी भी तरकी कल्पमासे तुम कोई भी निर्णय करते हुए निरत होगी। ऊपर जो कस्पना शम्दका प्रयोग किया गया है इस वर्यम है कि "हमारे सम्हें उस समा- गमको सम्मति देनेसे समागमी छोग बस्तु-पान के सबधमें जो कुछ प्ररूपण फरसे , अथवा वोध करते , नैसी ही हमारी भी मान्यता है, वर्षात् जिसे हम सत् करते है, उसे मी हम हामें मौन बनेके कारण उनके समागमसे उस भानका बोध में प्राप्त करनेकी दया करते है। - " २५६ बाणीमा, कार्तिक मुदौ ८ सोम १९४८ यदि मगर बारमरूप मानने वाये और नो कुरामा करे बर ठकि हो मानमेमें लाये, सरके दोष देसनेमें न वायें, अपने गुणोंको उत्तपता सहन करनेमें बाये, तो हो स ससम्में पना योग्य है, क्य प्रकारसे महीं।
वर्ष २५वाँ २५७ बमामात्रा, कार्मिक सदी १९१८ पपायोम्पदन साकार करना । समागम होनेपर दो-चार कारण मन सोकर वापसे बात नहीं करने देते। मनतकारकी पि, समागमी छोगों की पति मौर मेक्समा ही प्राप इस कारणका मूल होता है। ऐसी दशा प्राप" मेरी नही गयी कि ऐसे कारास किसी मी प्राणाके उपर कटाक्ष बामे, परन्तु हमें मेरी दशा कोई मा कोचर मात करते ए फ माती है अात् मनका कुछ पता नही चम्प । परमार्प मौन' नाम कर्म हालमें मी उपमें, इससे अनेक प्रकार मौन मी बंगाकार कर रम्सा है बर्षात् अधिकतर परमार्थसंबंधी बातचीत महीं करते। ऐसा 0 उदय-बार है। मनित् साधारण मार्गसबभी बातचीत करते हैं क्यपा इस विषयमें वाणीघरा, तपा परिचपशारा मौन और शून्यता 0 प्रण कर रस्सी है। बबतक पोम्य समागम होकर चित्त बानी पुस्पका स्वरूप माही मानता, तबतक उपर को ए तीन कारण सर्मथा दूर नहीं शेते, और तक 'सत् का पपा कारण भी प्राप्त मही होता। ऐसी परिस्थिति होनेका कारण, में मेरा समागम होनेपर मी बहुत म्पाभारिक और मेक-मजा मुख बात करनेका प्रसग येगा। और उससे मुझे बहुत बार आप किसीके मी साप मेरा समागम होने के पचात् इस प्रकारको बातों में पाय, इसे मैंने योग्य नहीं समझा । २५८ मानन्द मगसिर मुरीगुरु १९४८ ( एसा बी) परमसस्प पसका हम प्यान रखे भगवान्को सब कुछ समर्पण किये बिना इस कारमें बोलका ग्रामिमान मिटना समर महीने, इसधिमे हम सनातनधर्मरूप परमसापच निरन्तर ही पान करते हैं। गो सत्पका पान करता है, यसप हो जाता है। २५९ कई, मगसिर मुदा ११ मैम १९४८ *सत् मीसहजसमापि या मापि स्मृति यता तपापि निष्पापता। मगमचि होनेसे म्णुमात्र मी उपाधि साम हो सके, ऐसी एसा ही है, ये मी सहन करते हैं। विचार करके गरुको फिर किरसे समाना, मनसेयर निश्पको सामान निश्चय नही मानना।
पत्र २५ , २६१,२५२] विविध पत्र मादि संग्रह-२५वा वर्ष , बानोशारा किये हुए निश्चयको नानकर प्रवृत्ति करनेमें ही करपाण है-फिर तो जैसी ऐनहार । सुधाक लिषयमें हमें सन्देह नहीं है । तुम उसका सनस समझो, वीर तब फल मिलेगा। २६० बम्बई, मगसिर बदी ११ गुरु १९१८ अनुक्रमे संपम पर्मतोमी, पाम्यो सायफमाप रे, संपमभणी फूतडेमी, पूजू पद निप्पान रे। (भारमाको बभेद चितनारूप ) संयमके एकके बाद एक क्रमका अनुभव करके क्षायिकमाय (जब परिणतिका त्याग) को प्राप्त नो मौसिथार्थफ पुत्र, उनके निर्मग चरण-कमसको सपम श्रेणीवप फलोसे पूजता हूँ। उपरके बमन बतिशय गमार हैं। पपार्थबोध स्वरूपका पयायोग्य २६१ बम्बई, पोप सुदी रवि १९९८ भनुरूप संयम स्पर्मवीमी, पाम्पो सापकभार रे, सपमभणी पूसरेनी, पूर्वी पर निप्पाय रे दर्मन सकसना नय मो, आप रो निम माये रे, हिवारी मनन समीरनी, पारा देह पराप रे । दर्भन मे यो जूना, ते ओप नमरने फेर रे, प्टि यिरादिक तहमा, समकित रष्टिने हरे रे। योगना बीम इह प्रर, मिनपर शुद प्रणामो रे, मारापारम सेनना, भय उद्ग पठायो रे । २६२ बाई, पौर सुनी ५, १९९८ सायिक परिपको स्मरण करते है सनक विहाफी मात मन है । फरसनदासका पत्र सममें है। पोषसम्पका पपायोम्प १रत पररे भरे रे रेना सर मै १५ मनुवारण १ समस्त नागो मरम्मत उमा मौरस निममम मन थे। वप मनुष्य लिरामनाम पापपरमे। १ये हम मिन मियरन रिपाई पावे। परमोष किनेरी दिखाई देते | A मार तिम्र मेर समम्मिनित। समें योगका पीय प्रम पर, सपा मिस एम प्रशामरे, मपातामा भोर मारने उद्वेग रो, बही मान प्रतित्रा मार्ग है।
श्रीमन् पम्वन्द्र [पत्र २५१ २५४ " २६३ बी, पौष मुदौ ७ गुरु १९१८ गानीकी मास्माका भरसोफन करते है। और सही हो माव मापको स्पिति सक्षम है। अपनी इन भी धर्म है। गुम्स्यनुप्रणाम जो बात मिली है, मामी सस्प है। कर्मका उदय मोगमा पाता, ममौ सत्य हो है। वापको पुन पुनः पवियप से होता है, प भी मानते हैं। वापको वियोगका भसय ताप राता है, यह मी मानते है । पात प्रकारसे ससगौ गना योम्प है ऐसा मानते हैं, तथापि हामें तो ऐसा ही सहन करमा पोम्प माना। बारे जैसे देश काम्में यपापोय एना-पपापोग्प बनेको होइम करना-पही उपश है।म्म नपने मनको कितनी मी चिन्ता क्यों मलिलो तो मी हमें तमारे उपर सेव नही होगा। शानी मपपा नहीं करता कम्पपा परमा उसे सूझता मा महाँ, फिर दूसरे उपायको भा भी मी परमा ऐसा निवेदन है। कोई इस प्रकारका उदय है कि अपूर्ण गौतणगता होनेपर मी म्पापारसमी कुछ प्रालि कर सकते है, तथा इस साने-पौनेको प्रापि मुस्किम्से कर सकते हैं। मनोखी मी वियाम नही मिलता माप करके पर पहाँ किसीके समागमको इच्म मही करता । कुल मिसा मही जा सकता। मरिक परमार्य-पाम्प बोलनेको इम नही होती । किसी के पाए भन्नोंके तचर नाननेपर भी विस नही सकते चित्तका मी वधिक सग नहीं है। मारमा वाम-मानसे पता। प्रति समपर्मे बनत गुणविशिश नाममात्र पता गाता हो, ऐसी दय। यो प्राप समक्षनेमें मही नाती अपवास मान सकें ऐसे पुरुपका समागम मही है। भोवर्धमानको बारमा सामाकि स्मरणपूर्वक प्राप्त मा न पा, ऐसा माम्म होता है। पूर्ण बातगका-सा मोष हमें स्वाभाविक हो स्मरण हो पाता है इसलिये हमने ०मिमा पाकिम ' पदार्थ को समठो । ऐसा सिनेमे वीर को दूसरा वमिप्राम म प । . . २६४ पपई, पोर ११ सोम १९९८ सस्प स्वमायमें है। पानीके चरण सेवनके बिना वमन्तकातक भी प्रास न हो सके, ऐसा पर्गम भी है। मात्म-सपमका स्मरण करते रते हैं। पपारूप मातरागवाली पूर्णताकी र करते हैं। हम और तुम हामें प्रत्यक्षरुपसे वियोग हा करते । पर मी निबनच कोई मन प्रबंध सदमें होने केही कारणसे उमा माश्म होता है। (२) हम कभी कोई काम्य पद पपचा परण मिसकर मेमें और पति वाफ्ने सनेंना पत्र पाचा मपणा मुना मी हो तो मी उन्हें वर्ष समझें । हम स्क्यं तो हमें पपाशाप ऐसा इस करनेको म करने जैसी दशा नी। भौगोषस्वरमका पपायोम्म १५ २९५, २६९ विविध पक्ष भावि संप्राओं २६५ मई, पौष बदी ३ रवि १९९८ एक परिनामके न करता दर दो, दोर परिनाम एक दर्प न परतु है। एक करत्ति दो दर्य कई न करे, दाइ फरवृति एफ द न फरत है। मीन पुदगल एफ सेव भमगाही दाउ, अपने मपन रूप फोउ न टरस, मह परिनामनिको परवा है पुदगठ। चिदानन्द वन अमात्र आपरत है। (समयसार-नाटक) २६६ बई, पौष कदा ९ रवि १९९८ एफ परिनामक न करवा दरप दोर (१)मस्तु अपने सम्पमें ही परिणमती है, ऐसा नियम है । जी जीररूप परिणमा परता है, और ना बारूप परिणमा करता है। बीका मुख्य परिणमन पेल्न (शाम ) सम्म और चाका मुख्य परिणमन बहल सरूप है । जीवका जो चेतन परिणाम है किमी मी प्रकारसे ना पाकर मही परिणमता, वौर चाका गो वह परिणाम है प कमी पेठन परिणामस नही परिणमत्व ऐसी बस्तुको मर्यादा है और घेवन, पठन ये प्रकार के परिणाम तो मनुमवसिय है। उम मेंके एक परिणामको दो तम्य मिठकर नहीं कर सकते मर्यात मीत्र वीर या मिरकर केस चेतन परिणामसे परिणम नही सकते, अपमा केबस बचेतन परिणामस मही परिणम सकते। बीच चेतन परिणामसे परिणमता है और सा बचेतन परिणामसे परिममता है। ऐसी वस्तुस्थिति है। इसलिये निनमगवान् करते है कि एक परिणामको दो इम्प नहीं कर सम्से । बो यो ब्रम्प है, यह सम्म अपनी स्थिति होवा, वीर अपने समान ही परिणमता है। दोप परिनाम एक दर्न न परत इसी तर एक दम्य दो परिणामोंमें मी नही परिणम सकता, ऐसा बसुम्पिति है। एक गौर म पेतन वीर अचेतन इन दो परिणामोसे नही परिणम सकता, भषा एक पुस द्रम्प जप- तन पोर पेतन इन दो परिणामोंसे मही परिणम सकता केप सब अपने ही परिणाममें परिपम सकता है। अपेक्न पदार्थमें रेतन परिणाम मही होवा, और चेवन पदार्प, वतन परिणाम नही हा, इसलिप एक सम्म दो प्रवरके परिणामोंसे नहीं परिणम सप्ता, मर्याद दो परिणामोंको धारण मही कर सकता। एक करवि दोर दर फरई न करे इसलिये दो दम्प एक किपाचे कभी मी नहीं करते । दो इम्पोच पा मिल जाना योग्य मान, क्योंकि परि दो मिटनेसे एक इम्प उत्पन होने गे तो बस्तु सपने सरपच त्याग - प्रीम पन्धन [पत्र १५० कर दे, वौर ऐसा तो कमी मी हो नहीं सकता कि बस्तु अपने स्वझपका ही सपा स्पाग कर दे। पब ऐसा नहीं होता तो दो इम्प सपा एक परिणामको प्राप्त ए बिना एक भी किया कासि कर सकते है। बात कमी नही कर सकते। दोइ करदवि एक दर्य न करत इसी तय एक दम्प दो क्रियाथोंको मी धारण नहीं करवा; क्योंकि एक समपमें दो उपयोग माह हो सकते, इसम्पि- भीष पुदगस एक सेव-मागाही दोन मोल वौर पुलाम्मे काचित् एक क्षेत्रको रोक रस्सा हो तो मी- मानें अपने समोर न ठरतुरे कोई बस्ने भरने स्वपके सिवाय दूसरे परिणामको प्राप्त नहीं होता, और इसी कारण ऐसा कहा गया कि- पर परिनामनिको करवा है पुगस देह भारिसे गो परिणाम होते है, ठमका कर्ज पुनस्योंकि ये देश बावि बाई और जा परिणाम वो पुनछमें ही होता है । जब ऐसा होतो फिर मार भी बार-सरूपमें हो यता, इसमें मम किसी दूसरे प्रमाणकी भी बावश्यकता नहीं ऐसा मानकर करते हैं कि- पिदान पेवन पुमार मापरतु है काम्पकाकि कानेक मामिप्राय पाहै कि परि तुम इस तण वस्तुस्थितिको समझो तो हो यापी निनसम्ममान मिट सकता है और तोही अपने स्वरूपका तियेमार प्रगठहो सकता है। विचार करो स्थिति मी ऐसी है। बात गहन बातो महा संपमें यहै। ( पपि) मिसको यथार्थ पोष है उसे तो पर मासानीसे ही समहमें बा बापगी। इस बावपर कईबार मनम भरनेसे बहुत प्रयोग ऐ सकेगा । (२)पित प्रापः करके बनमें यता है, वात्मा तो प्राय मुलस्वरुप सी गती है। बीत गगता विशेष अंगारको तय प्रापि करते सगेका अनुसरण मी करते है । जगत्से पात उदास हो गये है पस्तास तंग वा गपे है। दशा किसीसे मी का नहीं सकते; करें मौ तसा ससंग महो। मनको जैसा चाहें पैसा किरा सकते हैं। इसीसिपे प्राधिमें ए सके।सी प्रकारस रामपूर्वक प्रापि म हो सकने सी दसा है और ऐसी होनी पता है। परिचप बामही लगाता गौ सात्य महोते, तयापि किये एकमात्र निर्गरा करना है सम्यि निसाप है। यथार्थ बोपस्वामका पयायोम्प २६७ बर्मा, पीर पदी १० गुरु १९०८ से बने से मरिचारका परिचप फरमेके लिये ( उपाधिमें गे पनेसे) बिससे योम्प लिसे प्राविम होनी हो, उस बातको बानियोंने में रहने पोप बताई।।
पा २९०,२५८ १५९ २० पिपिप पत्र मादि संग्रह-२५ वर्ष दूसरे काममें प्राति करते हुए भी वन्यस्वभावनासे गाम करनेका बम्पास रसना योम्प है। सम्पमापनासे मूपित शासमपारस भादि अन्य निरन्तर चिंतन करने योग्य प्रमाद वैराग्यको पात्रता-मुमझुवाको मद करना योग्य नहीं, ऐसा निमय रसमा योम्प है। प्रीयोपस्वरूप २६८ बळ, माष मुदा ५ पुष १९९८ मनवकारसे अपने स्वरूपका विस्मरण हानेसे बीसको क्न्यभाषच भम्पास हो गया है। दार्ष- कालतक ससगमें रहकर बोध मूमिकाका सनम होनेसे यह विस्मरण और अन्यमापका मम्यास र होता है, वयात् क्न्यमासे ठासीनता प्राप्त होती है । इस कासके विषम होनेसे अपने रूपमें तम्म- यता पनी कठिन है, व्यापि सस्गका दीर्घकालीन सेक्न तम्मयता प्राप्त करा सकता , इसमें स्देह नहीं होता। मिन्दगी बम्परे, गौर चना बनन्त, सत्यात धन है, वौर तुणा अनन्तो पो स्वस्म स्मृति सभव नहीं हो सफती, परन्तु यहाँ मनाल अप है, और निन्दगी वामद, तपा तृष्णा बम्प है, अपना ही महीं, और सर्वसिदि है, यहाँ पूर्ण स्वरूप स्थिति होनी समग है। समय बैसा पाशाम पालन-अपनसे बाहत होकर मा पला वा गाउदय बहमान है। . २६९ बर्मा, माम मुदी १५ पुष १९४८ (राग-प्रमाती) मीप नगि पुगसी मैर पुमास कदा, शुगसापार नहीं पास रगी, पर वो ईस नहीं अपर ऐभर्यवा, बस्नुपर्ने कान परसगी। (भौमुमतिनागनु स्तबम -देवपत्री) २७० बम, माम बदी २ रवि १९९८ मपन्त उस परिणामसे बनेगा पैतपको, बानी छोग प्रापिम हानेर मी पैसा ही रमते फिर मी ऐसा कहा गया है:- मापा दुस्तर है, दुरत है, अणमर भी एक समयके किये मी-"सका बारमा स्थान देना पोम्प नहीं, एसो ती दशा मामेपर बस्फ्त सदास परिणाम उत्पम होता है और ऐसे उदास परिणामको प्रालि (गास्पपनेसे पुरु)माव-परिणामी का मामे पोग्य ।गे योग-सबूपमें स्थित है, पर मुश्किलसे इस वएको प्राति कर सकता है, क्योकि उसको तो परम पैगम्य है। होनेसे गो रामा बनाको प्रति पी, पर बापत उदाम परिणामके कारण ही थी; प्रायः १ इस पर भी भिरेजो पत्र में २० (१) नमुपदक २८ प्रीम वाय [पत्र २. उप समारत मात्मामसे ईपी, तथापि मापाके किसी दुरत प्रसंग से समझने माग यरिक चित् शापमान होती है, जैसे ही परिणामोंका गेछापमान होना संभव होनेसे, प्रमेक मापाके प्रसंगमें निसकी सरया उदास यास्था पौ, ऐसे निरगुरु भयाको घरण ताकम करमे कारण, माया बासनास पार कर सकने योम्म हो सके ये क्योंकि महात्मा वासानका ऐसा हो नाप है। (२) (१) पहि हम और हम ही सीरिक दृष्टि से माधि करेंगे वा पिर माठौकिक रिस माचि न करेगा? मामा एक पत्रा वनेका कर्ण है पा वकर्ण जगत्का कोई का अपना जगत् सतही उत्पम माया बातें समपूर्णक सत्मा होनेपर हो समबने यन्य है। ऐसा समझकर इस पिपमें हाटमें पत्र माही मित्र सम्पन् प्रधर शान में वसा विश्वास रहनेका फ निस्चपसे मुक्ति है। संसारसांची तु जो कोचिंतामें है, उन वितामोंको प्राप' हम गानवे है, और इस रिपसमें परें जो वमुक अमुक विकल्प या करते हैं उ. मी हम नानते हैं । इस तब सगके रियोगके कारण तुरे परमार्थ-पिता मी या करती है, उसे मी हम नगनते है दोनों ही प्रकार के विकल्प होनेसे में याकुलताम्याकुल्या या करती है। इसमें भी मारपर्य महो माश्म होता, वयमा समस्या नही माम हाती I का इन दोनों ही प्रकारोंक विषपमें जो कुछ मेरे मनमें है, उसे तुरे शम्दोंमें नाये मिडनेका प्रयास किया है। ससारसंगरी यो में पिता है, उसे पो म्यो य उपमें बापे, पो पो ठसे बेदन करना-सहम रना चाहिये । इस पिताके हानेका कारण ऐसा कोई कर्म महो कि मिसे दूर करनेके लिये हामी पुरुपको प्राति करो हर बाबा म मापे । सबसे पयार्प बोधको उत्पतिवमीसे किसी मी प्रकरके सिवि-पोगसे अपना रिचार पोगस निवसी बपना परसबपी संसारिक माधम न करनेकी प्रक्षिा के मसीहै बार यह याद नहीं पाता कि इस प्रक्षिा याक एक पठमरके मिमे भी मंदता भई । तुपारी नित हम जानते हैं, और हम उस पिताके सी मी मागको नितमा बन सके उवना देदन करना चाहते हैं परन्तु ऐसा वो कभी तमा नही कर पा से हो। हमें मी वाय- पा ऐसा हो यता विहाने इरि-मोग ज्यमें नहीं है। प्राणामात्र प्रापा बहार-पानी पा गाते है, तो फिर तुम जैसे प्राणीको कुटुमके प्रिपे इससे सम्म परिणाम मापे पेमा सोचना कदापि पोय । महो। मुटुम्बकी र बारमार बीचमें बाकर जामाता पंछ करता है, उसे पारे तो सो बान को तुपारे लिये दोनों । समान | पाहिनिसमें पाया गया। उममें तो गो हो सके उसे ही योग्य मानमा, यो पनि सम्पर है। में जो निम्पि मामकी समाधि ,पो मामाकी सहमपरिणति पनेके कारण है। भामा साप सापता हममें प्राप' करके निम्पिका ही एना संमा, स्पोकि अब भातमें मुम्पन हमारी विपण मी प्राधि नही है।
पा १.१] विषिष पर मादि संप्रह--२५पौ वर्ष ૨૮૨ निस दर्शममें पंप, मोसकी पपार्थ म्पपस्या यथार्यरुपसे कही गई है, वह दर्शन निकट मुक्किा कारण है और इस पयार्य म्यवस्थाको कान योग्य हम परि किसीको विशेपसपसे मानते हैं तो वह मीतीर्यफरदेव ही है। वीर इन तीर्थकरदेशका गो बतर भाशय है, यह प्राय मुम्यम्पसे परिवारफल फिसीमें, इस क्षेत्र हो, तो पर हम ही होंगे, ऐसा में लम्पसे मासता है स्पोंकि हमारा जो अनुमय-मान है उसफा पस गीतरागता है, और पौनरागका कहा मागो मुबान है, यह भी उसी परिणामका कारण माश्म होता है, इस फारण हम उसके सो बास्सरिक भनुयापी है-सपे अनुपाया। किसी भी प्रकारसे बन और पर ये दोनों ही हमारे लिये तो समान है, तथापि पूर्ण वीतराग-भावक ठिये वनमें हमें यना अधिक रुचिकर गता है। मुखको इच्छा मही, परन्तु पीतयगताको इच्छा है। जगत्के कम्पाणके लिये पुरुषार्थ करनेके पिपपमें हिस्सा, तो उस पुरुषार्थक करनेकी इच्छा किसी प्रकारसे पता भी है, क्यापि उदयके भनुसार घसनेकर इस अरमाका सलमान जैसा हो गया दे, और क्सा ठम्य-कास हातमें समाप माइम नहीं होता; पर उसका उपरक पैसा कार से माने जैसी हमारी दशा नहीं है। " भिक्षा मांगकर गुमर पला खेंगे, परन्तु सेदसिम न होंगे; शामके अनन्त आनन्दके सामने यह दुस तृणमात्र है"-इस भाशयफा गोबपन जिम्मा , उस पचनको हमारा ममस्कार हो । ऐसा बचन बाम्तरिक पारपताफे बिना निकलना सभव मही है। (२) "जीम पौनसिक पाप नहीं है, पहल नहीं है, और उसका पुरस आधार नहीं है, और पाह पुहरके रंगवाठा मी नहीं है, अफ्नो सम्प-सताके सिवाय यो पुरानन्य है, उसका बद स्मामी मही है, क्योंकि परका ऐपर्प स-सपमें नहीं होता बस्नुपको रिस देउनेपर बद पमी मी परसंगी भी मही है"म तय "जीव नयी पुम्गली " भानि का सामान्य वर्ष है। अम्मदुसरूप करमफम नाणा, निपप एक मानदा र, पवनवा परिणाम म पूज, पवन पर निनचदी रे । (पागम्यम्मान-आनयम) - . . पही समापि । पूर्णशानसे पुत सम्पति पारवार पा' आपा परती है। परमसत् प्पान करते है। उदासी पनी । २७१ बाई मायबल १.१८ जहाँ पारे भार उपरिको गाठा प्रभारित दादी दा ऐम प्रमगमें समारि पदमी परम दफार है भार पर बात का परमानी मिना दानी भापत हो नि । दमें भी अधर्म , परिमाप मी दो प्रतिमा अनुमा म भोर मुगनी ममता । निभाने नो मामामानो भागामारीमती - भीमद् पाचन [पा २.२, २३ निसे पदार्थ बामभाव समझमें वाया है, और मह उसे निमा गता है, उसे ही या समाधि प्राप्त होती है। हम सम्पम्वनिका मुस्प पण पीवण्गताको मानते हैं। और ऐसा ही बनुमबहै। २७२ बर्मा, माघ दो ९ सोम १९०८ पपीते पक्न दिमावसों सति मात्र, समै पाइ मपनी धमाव गदि सीनौ है। सपी मो मो सेन नोग सो सी सब सीनी है, मी भो त्यागमोग सो सो सब रिदीनौ। सैवको म सी गैर, स्पागिपिकी नाही और, पाकी का उबाँध, कारनु नबीनौ । संग स्पामि, भग स्पागि, पान परंम स्पागि, मन स्पामि, परि स्यागि, पापा एयीनी है। फेस बहुत दशा है। २७३ बम्बई, माष पदी १. मौम १९४८ बिस साप बामरूपसे सह नात लक्स्पा गती है, वर्षात् वामा अपने समरूपमें सपा जागृत ही बाती है, उस एमप उसे 'केम्मान होता है, एसा काना योम्य है ऐसा प्राचार्यकरमा माशय है। निस पदार्थको तीर्थकरने "मात्मा का। उसी पदार्थको ठसौ समरूपसे प्रतीति हो-उसी परिणामसेबामा साधात् भासित हो-तब उसे परमार्थ सम्मकत्व', ऐसा भौतार्यकरका नमिप्राम । बिसे ऐसा रूप मामित पा, पेसे पुरुषोंमें मिसे निकाम भदा है, उस पुरुषको बाप सम्यक्त्व है। मिस गामें ऐसे गुण हों कि मिससे ऐसे पुरुषको बाधारक्षित निकम मति प्राक्ष हो, मा पील 'मागमसारी है ऐसा मिनमगवान् पाते। हमाय देहके प्रति यदि कुछ मी बमिप्राम है वो मात्र एक धामापक किये ही दूसरे प्रपो- जनके मि म । पदि दूसरे किसी मा पराक पि बमिप्राप हो तो पर बभिप्राय पदार्प किम माहो, परम्तु बारमार्पके सिपे हो।पनामा उस पदार्पकी प्राति समातिमें हो, ऐसा हमें माम भी होता । "बामाव' इस पनि सिपाप ई सौ पनि किसी भी पार्षक प्राण भएका माग करनेमें स्मरम करमे पोम्प महो । निरन्तर वामव बन्ने बिमाउस स्पित्तिके बिना--कम सम्म पुरासस । ।
पत्र २०४, २०५,२५,२४] पिपिप पत्र मावि मप्रह-२५ पौ पप २८ २७४ वर्मा, माघ पी ११ पुष १९१८' मुटता रिपार भ्याग, मुददामें कासि करे, मुदतामें घिर में अमृतपारा परसे। ( समयसार-नाटक) २७५ बमाई, माघ मी ११शनि १०१८ अबुत दशाफे काम्पका जो वर्ष निमकर भगा ह बह यपार्य है। अनुमबकी म्यों ज्यों सामर्प उत्पम हाती जाती है क्यों स्यों से काम्य, शुम, हास्य यापातम्यम्पस परिणमल जाते हैं। इसमें भापर्पफारफ दशाका वर्णन है। जीरको मापुरुषको पहिचान नहीं हामी भार उसके प्रति भी अपने पैसा म्यावहारिक पम्पना रहती है। नौवका यह कल्पना किम उपापसे दूर हो, सो लिमना। उपाधिका प्रसग बहर यताह। एसगफे बिना जी रहे हैं। २७६ पपई, माप बी ११ रवि १९५८ माफी न सी टॉर, त्यागिरफी नाही मौर, पाही परा उपपा जु, कारण नबीनो है। सम्पका भान होनसे पूर्णकामा प्रामाई, इसठिये भम किमी मी नगहमें कुछ भी एनके लिये नही रहा । मर्म मा अपन नपका तो कमी मी त्याग करनेकी र मही करता, मोर पदों पण साप-म्पिनिह पो ता फिर दूसरा कुछ रहा ही महीं; इसरिय पागको भी जमात मदी दी। इस तर जब फि ऐना, दमा पे दानों दो निक्षल हागपे ता दमय कोई मपीम कार्य कानफे लिये रिवादी क्या । अात् जैमा हाना चाहिये पमा हा गया तारि मरीन रेनको अंगाल पर दो सस्ती है। इसलिये पमा छा गया कि पही पूर्णकामता प्राप्त है। २७७ बर्थ, माप ११.५४ कक्षगरिये भी कई अधिप परमा नी पादना, यानि पाना पागा, पर बात पेगा पिरलोमिमा निधन आप। अधिषण ममारिका प्यान भर िभी नही मिला नि भनेर परिण परिवारापना पाले जान गाला प्रमर ताला मी नार पिलाता मना, सीरिय मामे preluना पर उगरि भी कारगर नही ली जान उमेगा मारा। - मीमासम्म [पच २.८ इसरोको परण करके यवपि कोई महान् मोमवता मही मोगी, शाद नारि लिपपोका पूरा वैभव प्राप्त नहीवा, कोई विशेष राज्याधिकार सहित Pन मही बिताये, मफ्ने निरके गिने नामेबारे ऐसे किसी धाम भापमा सेवन मा किया, और वमी हाम्में तो मुवावस्पाका परिका माग होमर, सपापि ममेसे किसीकी हमें वाममानसे कोई वा उत्पन मही होती, या एक बसा वारपर्म मान- कर प्रवृत्ति करते हैं। और इन पापोको प्राशि-प्राप्ति दोनों समान मानकर बात मकरसे बार- कम्प समापिका बिनुमब करते है। ऐसा ऐमेपर भी बारमार बनबासकी याद वापा करती है। किसी मी प्रकारका छोक परिचय रुचिकर नाही मातासमको ही निरंतर कामना गा करती है और हम बम्पस्थित दशासे उपाधि मोगमें यते। एक वरिकाम्प समापिके सिवाय इसरा कुल बास्तविक तसे स्मरण नही यता, पितम मही पता, रुचि नही यती, लपवा कई मी काम नहीं किया जाता । मोतिप नादि निपा अपना अणिमा नादि सिदिको मायिक पदार्य चालकर बात्माको इनका चित् । स्मरण होता है। इनके द्वारा कोई बात मानना भपा सिब करना कमी मी योग्य माम नही होता, और इस बासमें किसी प्रकारसे हायमें पिचका प्रवेश भी नहीं रहा। निधन मिस मिस प्रकारसे उदय बाये, उस उस प्रकारसे बनुकमसे बेन करते बाना, ऐसा करना हो पोम्प मा। तुम मी, ऐसे बनकममें भले ही पोवेसे पोरे पंछमें ही प्रारम्पों मामा पाप तो भी प्रापि करनेका बम्पास रसना और किसी मौ कामक प्रसगमें वनिक शोकमें पर नामेका बम्पास कम करना। ऐसा करना अपना होना यो हानाको स्पामें प्रवेश करमेका ER है। तुम किसी भी प्रकारका उपाधिका प्रसंग बिसते हो, यह पचपि पाँचनेमे तो वाता हो, तपापि उस पियका पिमें बरामी थामास न पाने के कारण प्राप उत्तर लिसना मी मही ममता से भाप पारे दोष को या गुण परस्त र ममा करने मोप है। हमें भी संसारिफ उपाधि कई कम नही है। तपापि मसमें निमफ्ना नाही ग बानेके कारण उससे पारमट पैा महोती। उस उपाधिके उदय-पास के कारण हमें सम्पपिका बस्तिल गौणसा ऐसा है। और उसके सिपे शोर या करता है। बौतरागमायका पपापोम्प . २७८ मई, माप १९०८ दीकास्तक पपा मोषध परिचय होनेसे बोप-चौमकी प्राप्ति होती है। और पा मोप-बीर प्रापा निभप सम्पास ही होता है। बिमभगवान्ने सो माईस प्रकारके परिपा को ठनमें 'दर्शम' परिपा नाम मी एक परिपा कहा गया है। इन दोनों परिपडोसा घR करमा योप है। पर चार रनेकी पत्र २..] विविष पत्र मादि संग्रा-२५वा व २८५ मारी भूमिका है। अर्थात् उस भूमिका ( गुणस्पानक) के विचारनेसे किसी प्रकारसे तुम्हें यथार्थ रम प्राप्त होना समय है। यदि किसी मी प्रकारसे अपने बाप मनमें कुछ ऐसा संकल्प कर , कि ऐसी दशा वा मोप, अथवा इस प्रकारका म्यान फरें तो सम्पमतकी प्राप्ति हो जायगी, वो यह सकम्प करना प्राय बानीका सम्म समझनेपर) मिष्पा है, ऐसा माश्म होता है। यथार्थ-योष किसे करते हैं, इसका विचार करके-बनेक बार Aधार करके-चानियोंने अपनी सम्पना मिरत करनेका धिान किया है। अभ्पारमसारका पाँचन, प्रवण चार है-या अष्ठा है। मपके भनेक मार पाँचनेका चिन्ता मही, परस्तु निससे किसी प्रकार उसका दीर्घकासतक बमुप्रेमण रहा करे, ऐसा करना योग्य है। परमार्थ प्रास होनेके लिये किसी भी प्रकारकी आकुलता-म्पाकुम्म्ता रसनेको 'दर्शन' परिषद फरते हैं। या परिपह उत्पम हो तो उसकारक है, परन्तु पनि उसको परिमसे पेन किया गाय तो उससे दर्शनकी उत्पति होना संभव है। तुम्हें किसी भी प्रकारसे दर्शनपरिपा, ऐसा यदि तुम्हें गता हो तो उसका घोरपसे बेदम फरना ही योग्य है, ऐसा उपदेश है । हम जानते है कि तुम प्राप दर्शनपरिपाद है। हाउमें तो किसी भी प्रकारकी भाकुलताके बिना पेराम्य-भाजनासे-पीतराग भाइसे-पानी में परम मतिमापसे- सत्तशाम्म बादि और एसगका परिचय करना ही योग्य है। परमार्थक सबमें मनसे किये हुए सकम्पके अनुसार किसी भी प्रकारकी इच्छा नहीं करनी चाहिये। अर्थात् किसी मी प्रकारके दिम्य-तेमपुळ पदार्थ क्यादि रिपाई देमे आदिकी इच्छा, मन कम्पित म्यान मा, इन सब सफल्पोंकी से बने से निति करना चाहिये । तसुधारसमें कही भावमा, और अप्पारमसारमें करा एमा आमनिधयाधिकार किररिसे मनन करमे योग्य है। इन दोनों में विशेषता मानना । मास्मा है, या निस प्रमाणसे गामा नाय धारमा निस्य, या सि प्रमाणसे जाना जाय, भामा कर्वा है, पर जिस प्रमाणसे जाना जाय, वात्मा मोच्च है, पहनिस प्रमाणसे नामा जाप, मोक्ष है पह जिस प्रमाणसे गाना गाया और उसका उपाय है, यह रिस प्रमाणसे जाना जाप-बाबात पारम्बार दिपारने योग्य है । अप्पामसार भयका दूसरे किसी भी प्रयमें यह बात सातो चारनेमें बाधा नही है । कम्यनाका पाग करके ही विचारमा योग्य है। उनफरिणदीप पात दामें जाननसे तुः कोई फस न होगा। २७९ माई, माघ १९९८ भानिफे कारण सुमप मामित हानेबाउ इन समारी प्रमगों और प्रकामे अबतक मापपो प्रेम हना है, तबतक जीका मन्ने मतपमा भामित हाना भमभर और मसंग माम्प मी यापातप्पापस मासिन होना असमर है। बता र ममा u riam- २८4 भीमद् पमबद्र [पत्र २८ , १८१ नहीं हो जाता तबतक मिश्पपसे अप्रमत्पनेसे बरमा पुरुषार्थका स्वीकार करना ही योग्य है। या पात तानों फासमें संदेहरहित है, ऐसा मानकर निफामरूपसे मिसा। २८० बई, पम्गुन मुदी १ पुष १९९८ (१) वाम और परिणाका न्यों व्यों मोहर होता जाता है,म्मों म्पों उनसे अपनेफ्मा गमिमान मद परता माता है, स्पों स्पो मुमुक्षुता मती पाती । बनतकापसे निसस परिचय पग वा या। ऐसा पह ममिमान प्रत्य एकदम निपच नहीं हो पाता। इस कारण तन, मन, पन भादि दिनमें अपनापन बा गया , उन सबको हानी के प्रति वर्पण किया जाता है। यानी प्रापः उनमें मुछ प्राण नहीं करते, परम्त उनसे अपनेपनके दूर करमेका उपदेश देते हैं वौर करने योग्प भी मही भारम, परिपाको पारम्बारके प्रसंगमें चार विचारकर अपना होते ए रोकना; तमी मुमुमुता निर्मत होती है। (२) • जारको सपुस्पको पहिचान महाँ होतीउसके प्रति मी वपमे समान हो म्यापारिक कम्पना या करती है-बोलकी पह (शा किस उपामसे दूर !" इस प्रथका उत्तर पयार्य हो लिया है। पर बसा है निसे बानी अपना बानाके वाभयमें एनेवाला हो मान सकता है, सकता है, अपना किस सकता है । मर्ग कैसा ऐना चाहिये, या मिसे योग नहीं है, ऐसे शाणा- म्पासी पुस्प उसका पपार्य उत्तर मरे में, या मी पपार्ष ही है। "सता बारे प्यारे "स पदके विपमें फिर कमी मिलेंगे। अंगारामगोको पुस्तक संघ बापने विशेप पाँचग करके यो मामिप्राप मिला है, उसके लिपपमें बातचीत होनेपर फिर कमी प्रेगे । हमने इस पुस्तकका पावसा भाग देना , परन्तु हमें उनकी बातें सिवात-मनसे मराबर बैठती मी माम होती। और ऐसा हो तथापि उस पुरुषकी दशा मनी मार्गानुसारी सी है ऐसा ता कर सकते हैं । मिसे हममे समान्तिक वपमा पपार्प जान माना है, पो बस्यन्त ही सूक्ष्म है और यह प्रप्त हो सकमेवाम बान है। विशेष किर। मम्मा फागुन मुदी १ प १९०८ •फिर कमी निलंगे, सिर कमी मिलेगे ऐसा बतबार सिर मी किया नहीं जा सका, पापमा करमे पोम्पले पोति विक्की स्थिति प्रायकरके विदेशी असो यता सम्येि कार्यमें मम्मकथा ऐ जाती है। जैसा पित-स्थिति सो अमुफ समक्तक रस्से बिना पटकारा पानी पुस्प गात गातो गये। परन्तु उनमें हमारे पैसे उपाधि-मसंग और उपासान- मस्पात उदासीन-चित्तस्पितिवासे प्रायः पोरे होए। सपाभिके प्रसारण वात्मापी यो पत्र २८२ पिपिप पत्र मावि संप्रा-रो वर्ष २८७ , विचार है ये वसारूपसे नहीं हो सकते, मयका गौणतास गुना करते है, ऐसा होने के कारण बहुत फालतक प्रपघमें एना परता है, और उसमें तो बसन्त उदास परिणाम हो नानेके कारण क्षणमरके लिये मी पिच नहीं टिक सकता। इस कारण बानो सर्पग-परित्याग करके प्रतिबद्रसपसे विचरते है। सर्वसग शम्दका पार्थ यह है कि ऐसा सग बो बहररूपसे मामप्यान अथवा योषको मुस्पतासे न रस सके। यह हमने सक्षेपमें है। किसानौर इसी क्रमको पानसे और अतरसे मना करते हैं। देह होनेपर भी मनुष्य पूर्ण वीतराग रो सकता है, ऐसा हमारा लिसा अनुभव है, क्योंकि हम मी निमपसे उसी स्थितिको पानेवाले है, ऐसा हमारी वामा मसररूपसे करती है, और ऐसा ही है- अबश्य ऐसा ही है। पूर्ण पीतरागकी परण-रन मस्सकपर हो, ऐसा या करता है। मस्यन्त कठिन बावरगता वापत वापर्यकारको तयापि या स्पिति प्राप्त हो सकती है, इसी देहमें प्राप्त हो सकती है, पह निमय है। उसे प्राप्त करनेके लिये हम पूर्ण योग्य है, ऐसा नियम है, इसी दोहमें ऐसा हुए बिना हमी उदासीनता मिट जापगी, ऐसा माश्म नहीं होता, और ऐसा होना समब है-अप ऐसा ।। प्राप करके प्रश्नोंका उत्तर सिसमा न बन सकेगा, क्योंकि पित-स्थिति जैसी कहासी हो या करती है। हमें यहाँ कुछ पाँचना, विचारना चाह है या नहीं, यह प्रसग पाकर सिसना । स्पागको इम करते है, परन्तु होता मही, या स्याग काचित तुम्हारी इच्छा अनुसार ही करें, तपापि उतना मी हासमें तो बनमा समष नहीं है। अभिम मोपमयका प्रणाम पर - ૨૮૨ बई, फागुन मुदी ११ बुष १९९८ उदास परिणाम आमाको मना करता है। निरुपायताका उपाय पाठ है। समझने के लिये मो विगत लिप्सी है, पर ठीक ह। ये बातें अबतक नीयके समझनेमें नहीं जाता, तबतक पपार्ष ठासीन परिणति मी होना कटिन प्रगती है। पुस्प पहिचाननेमें नहीं जाने" स्यानि प्रश्नोको उत्तर सहित विज भेजनेका चार तो रोता है, परन्तु किसनेमें जैसा चाहिये बैसा चित्त नही यता, और एमी अम्पका के लिये हो रहता है, इसलिये मनको यात लिममें नहीं आ पाती । भाग्माको उपास परिणाम सम्पम्त भना करता है। एक-भाषी विकास-रिवाछे पुरुषको कप भार नि पहिले एक पत्र भेजनेक लिये सिखा पा । बादमें अमुक कारणस पिचके रुक जानेपर बह पर ग्यों का स्पों पर 'पा, गा कि भारको पहनके लिये मेगा है। गो वास्तविक हानीको पहिचानते हैं, वे पान आफिी इशा नहीं करत, एसा हमारा मनरग अभिप्राय रहा करता है। बाबानोको ही इशा करता है, उसे ही पहिचानता भार मजता है, पर वैसा ही हो जाता है, और उस ही उत्तम मुमच गानना चाहिये ।
२८८ भीमा पजन्द्र [पत्र २८५ २८४ १८५ (२) विशेप करके पैराम्प प्रकरणमें, मायाको नो अपने पैरम्यके कारण माम हुए, वे साये है, वेरिफिरसे विचार करने से है। - २८३ बम्बई फागुन मुटौ ११॥ गुरु १९४८ पि युके स्वर्गवासकी सबर पाकर पद बा । चो यो प्राणी देह पारप करते , सा दहका स्पा करते है, यह बात हमें प्रत्यक्ष अनुमसिर हिसाई देती है। ऐसा होनेपर मी मपमा पित इस दोको बनित्यता विमरकर निस्य पदापक मार्गमें नहीं पता, इस शोचनीय बावन बारम्बार विचार करना योम्प है। मन पौरन देकर उदासी मेरे बिना काम नहीं चलेगा | Pम्मीरी म करने पर परिजसे उस दुसको छान करना, यहाँ अपना धर्म है। इसको भी कमी न कमी इसी तण त्याग देना है, यह बात स्मरणमें वापा करती है, बीर संसारके प्रति विशेष सम्म या करता है। पूर्वकर्मक गनुसार को कुछ मी मुस-भस प्राप्त हो उसे समानमाषसे देन करमा, यह बानाको सिधा पाया जाता है, सो निसी है। मायाकी रचमा गहन है। २८४ कमाई, फागुन मुदौर मुक. १९९८ परिणाममें अस्पत उदासीनता पण करती है। म्यो म्पों ऐसा होता है प्यों त्पा प्रापि- प्रसमा मी मा करता है । मिस प्राधिका प्रस्ग ऐगा, ऐसी फरफ्ना मीम की पी संग मी प्रात पे गाया करता वोर इस कारण ऐसा मानते कि पूर्वमें पंधि पुए कर्म नित होनेके किये शाप्रतासे उदयमें मारे। २८५ मई, फा पुती १०% १९९८ किसीका दाप नही हमने कर्म पपि । इसलिये हमारा ही दोप म्पोतिषको वामापस्वी यो पोषौसी बातें मिसा के पी। उसका वाचसा भाग पामते है, तपापि उसमें चित्त जरा मी प्रवेश नहीं करता और उस विषयका पाना बसा एनना काराभिद चमत्कारिक मी होतो मी माररूप माश्म हता है उसमें जरासी मी मचि महो यो। हमें तो केवल एक मपूर्ण सत्केबानमें दो सपि पता है।स्य बो न मी करनेमें अपना बनुकरण करममें जाता है, प सब भासपासके पंधन के कारण ही करते हैं। में गो पुरण म्पसार प्रते है, उसमें दे और मनो बाम उफ्पोगमें बना पाता है, इससे मत माकुम्वा वा बाता है। मोफुस पूर्वमें मंचन किया गया है उन कति निार होने के लिप-भोग नेके मिये- पत्र २८५ २८७, २८८] पियिष पत्र मादि संप्रार-पयाँ पर्प २८१ योडे ही कामें मोग सेनेके लिये-नस म्पापार नामके म्पावहारिक कामका दूसरेके लिये सेमन फर रहे हैं। इस कामको प्रहति फरसे समय मित्नी हमारी उदासीन दशा थी, उसमे मी भान विशेष है। कोई मी जीव परमार्थकी इच्छा करे, बार म्यावहारिक सगमें प्रीति रस, और परमार्य प्राप्त हा माप, ऐसा तो फभी हो ही मही सकता । पूर्वकर्म देखते हुए तो इस कामको नितिहारमें ही ऐसा रिसाई मही देता। इस कामके पीछे 'त्याग' ऐसा हमने शानमें रेसा था और हासमें भी ऐसा ही परप निवाई देता , इतनी आवर्यकी बात है। हमारी वृतिको परमायके कारण अवकाश नहीं है, ऐसा होनेपर मी बहुत कुछ समय इस काममें वितते है। हो माय, २८६ बर्ग, फागुन पुग१५ रवि १९९८ मिस पानसे महफा अन्त होता है, उस शानका प्रास होना गोषको बहुत दुर्लभ है। सपापि बह शान, स्वरपस तो अत्यन्त ही सुगम है, ऐसा हम मानते है । उस हानक सुगमतास प्राम होने में मिस दशाको आप यकता है, बह -शा प्राप्त होनी मी बहुत पहुत कटिन है, और इसके प्रास पानेके जो कारण है उनके मिरे विना बीनको अनतकाठस भरफना पाह। इन दा कारणों मिटनेपर मोक्ष होता है। ૨૮૭ पई, पाम्गुन वदी ? गुरु १०९८ वित्तमें अपि उपरपसे पना-समाधि रमना । उस बातफो पिच नित्ति फरमक लिये आरको डिपी आर इसमें उस गावली अनुफपाके मिराप भार पोइ मरा प्रपोजन नहीं है। हमें तो पाए जो कुछ भी हा ता मी ममाधि ही सपना पता यता । वरने ऊपर पदि कोई आपरी, विमाना, परामर मपग पेमा ही उभा पर ता उस लय पिमीर दोपरा भायेग परनेकी हमारी इच्छा नहीं हामी । तपा उस परमाप-शिम देम्पनम ता पदोपदी र म्यारहारिक रिमेटेगनेर नही दगाने जमा है भार बदौनक गोरफा पारमारिफ-टिहानीरबहोर पारमा पिरसरा म्यार पाना बहन इफर ।। मावर मुग्प पारण जैम भारने निगम दा है। विशारि निर्मणा । २८८ यम्बर फागुन पनि २०५८ पहा मार-मार तोहाइप्प-गमारि मान ठिप पूसमको निसन दान “ना योग। माउस परमे वा पिद ! अपरा मरा रिम पहन! अपग उग बानो मुग्यो हिमान मरत है। पदी सिमि।
- भीमद् रामचन्द्र [पा २८९, २९ २८९ बई, फागुन वदी १० पुष १९१८ उपाधि उदपरूपसे है। मिससे पूर्वकर्म तुरत हो नि , ऐसा करते है। (२) किसी भी प्रकारसे ससंग योग बने तो उसे किसे पना यही फरम्प है, और विस प्रकारसे जातको कफ्नाफ्न विशेष गुणा करता हो भयका पसा करता हो, तो उस प्रकार से बने से संकोच करते गना, या भी ससग प्रा निवासी माना है। २९० बबई, सोमवती अमावस्या का सोम १९१८ हम जानते है कि जो परिणाम बाब समयमें प्राप्त होने वाला उसमे पोरे समपमें प्राम होनेके सिप ही यह उपाधि-पोग विशेषरुपसे पता है। में हम यहाँ पापारिफ म पो प्रमाणमें बात करते है, उसमें मग मी पूरी तयस देत है, तो मी पर मन म्पहरमें भगता नहीं है। अपने विषयमें पता है, इसलिये म्पहार बहुत बोझारूम यता । समस्त लोक तानों का हुमसे पीड़ित माना गया है, और उसमें भी काउ राता है, यह तो महापम काठी बौर सपा विनातिका कारण कम्परूप बो मौसमसग है पर तो सर्पकामें प्राप्त होना दुसम हो। फिर कर इस कामें प्राप्त होना गात बहुत ही तुम हो इसमें कुछ मा माइबर्य महो । हमारा मन प्राप कोषसे मानसे, मापासे, सोमस पसे, रविसे, परतिसे मपसे, साझसे शुगुप्सासे वपमा हद मानि विपर्यासे मप्रतिषप पैसा है कुटुमसे एनसे, पुसे, बैमनसे, मासे नपत्रा देहसे मुख जैसा है, उस मनका मी समगमें अपन रमना मात बहुत या करता है। - २९१ मई, क्षेत्र परी २ दुध १९४८ परमेशस्थिति दी ऐसी कि उसमें सम्यकी मापना करना परम कठिन है। समस्त रचना बसस्पके नामाको मालाना करनेवाली है। मोक-स्पिति बारपर्यकारक है। पानीको समग-परित्याग करमेक क्या होगा ! २९२ बाई, चैत्र मदा ९ पुष १९४८ रिलो किम्ही दासके प्रसगो म्हानि हो वाती है और उसके करण राम्प मी हा करता पस्तु बीमा सबा कापाम मौर मुख वा ऐसा समझने में माम सवा किस्स मम्मनिका कारण अपना पत्र २९५, २९४, २९५, विविप पत्र मावि संप्रह-२७यों पर्प उपार्मम किया हुमा प्रारम्भ है, जिसे मोगे बिना छुटकारा नहीं होता, और उसे समतासे मोगना हो योम्प है। इसलिये मनकी म्मानिको मैसे बने कैसे शान्त करना वीर जो कर्म उपानित नही किये मोगनेमें नहीं मासे, ऐसा समझकर दूसरे किसीके प्रति दोप-दष्टि करनेको हसिको मैसे बने तैसे शान्त करके समतासे प्राति करना, यह पोम्प माश्म होता है, और यही गीतका फर्सम्य है। २९३ बाई चैत्र सुदी १३ शुक्र. १९४८ (१) एक समयके लिये ही अप्रमतधाराको विस्मरण नहीं करनेवाम ऐसा वारमाकार मन बीमाम समयमें उदयानुसार प्रधि करता है, और जिस किसी भी प्रकारसे प्रधि होती है उसका कारण पूर्वमें बंध करनेमें मापा हा उग्य ही है उस उदयमें प्रीति मी नही और बीनि मी नहीं, समता है, और करने योग्य मा यही है। (२) समकितकी स्वर्शना कब हुई समधनी पाहिये ! उस समय कसी दशा गवाहे ! इस लिपपका पनुमा करके लिखना। सांसारिक उपाधिका गोकुछ मी सेवा हो उसे होने देना यही कम्य है, और यही नमिप्राय रहा करता है। धीरबसे उम्पका केदम करना ही योग्य है। (३) प्रतिवयफ्ना दुसदायक। सम्पस्प यथायोम्प २९४ पर्व क्षेत्र कही १ पुष १९९८ बारम-समाधिपूर्वक याग-उपाधि रहा करता है। इस प्रतिबंधक कारण हासमें तो कुछ भी इमिगत काम नहीं किया जा सकता । इसी तुरे पारण मोडपम भादि शानिर्पोने पार जानिके प्राति करनेके मानका मी स्पाग किया था। समस्पित भार २९५ बर्मा, पैत्र ५ १९४८ ससंग होने के समागमको इच्छा करते हैं पर उपाधि-पागके टदपका मौ रेग्न किये बिना उपाय नहीं । जगत्में काई से पाय तो हमें मिली मी सपिके कारण नहीं थे। जो पुरा रपि यी है वह केवल एक सपाय प्यान करनेवाले 'मन'के प्रति, जिसमें नामाका वर्णन है ऐसे ।
. भीमद् रामचन्द्र [पत्र १९५१ . १९८ सत् शासक प्रति, भौर परंपामे परमापक निमित्त कारण 'दान मालिक प्रति होवामा वो स्वार्थ दुवा मान पाता। - २९६ बई, क्षेत्रमा ५ रपि १९०८ भगवर्क ममिमापन देमकर नीपने पदार्यका पाप माप्त किया है। मानी अमिमापको इसकर नहीं प्राप्त किया। जानीरगानीके मभिपापस पोप पाता है, उस जीप सम्पन्दन वा मार्ग हम दो प्रकारके मानते हैं। एक उपदेश प्रासिय मार्ग मोर सप वास्तविक मार्ग । विचारसागर उप श-मासिके लिये मिपारने योग्य प्रय है। हम जैन शामोंको बोचनेक ठिप करते १ नो रोनेके सिप नहीं करते, मदन मात्र बाँचमेके म्पि प्रवर तो वेदांती हानके लिपे नहीं करते। इसी तर अन्य शाओंको बाँचमेके लिये जो करते हैं तो अन्य हानेके लिये नहीं करते। जो करते हैं पर केवल तुम सब योगीको उपदेश देने के लिये ही करते हैं। इसमें मैम मौर मेहता मारिके भेदका स्पाग करो। बामा मेसी मही है। २९७ बमई, चैत्र वदी १२ परि १९९८ माँ पूर्व-कामता है, यहाँ सवारी जिसे गोव-बायको उत्पत्ति हो जाती है उसे सहप-मुस्से परिनि यती है, और निपपके प्रति वयन एका राती है। जिस जीवनमें क्षणिकता है, उसी मोक्नमें बानियोंने निस्यता प्राप्त की है, यवपरयको मातहै। महिनावको परिवृति न पा करती हो तो उसे वसा बारम-बोध वा मही समना । २९८ पाई, वैशास मी एक १९१८ वक्षय तृतीया माग समाधि है माम उपाधि है जो मारको गौम र सके ऐसी पर स्थिविनायतपाति समाधि रातीहै। हमने यो पूर्ण कामता लिपपमें मिला है वापस माशपसे मिसाक पिस प्रमाणसे मानका प्रकमा हाता नाता है उस प्रमाणसे सम् वादि पापारिक पास निधाता वाती जाती है। माम सके कारण परितमि यती है। अन्य किसी भी समय इणम ऐनी पह पूर्ण जानका म्षण है। पानी बनिरप गावनमें निस्यता प्राप्त करता है, ऐसा नो विापस माशपसे किया है कि उसे मृत्युसे मा निर्मपता पता है। जिस ऐसा हो जाय उसे रि पनिस्पता दो। ऐसा न करें, तो यह बात सत्य हो ।
पर २९९,३ १] पिषिध पत्र मादि सप्रह-२ या वर्ष बिसे सवा वारम-मान हो जाता है उसको में अन्य भावका कर्ण' एमा बोध उत्पन्न होनकी जो महप्रस्पप-युधि है, उसका विलय हो जाता है। ऐसा ही समुनड भागम-मान वारपार रहा करता , तथापि जैसेको इप्ठा करते है पैसा तो नहीं। समाभितप २९९ बम्बई, शास्ड सुरी ५ रवि १९४८ हामें तो अनुक्रमसे उपाधि-योग विशेष रहा करता है। अनंतकात म्पबहार झग्ने म्पतीत किया है, तो फिर उसकी अंगालमें, मिससे परमार्थका विसर्जन म किया जाय उसी सप वार करना, ऐसा मिसका निश्चय हो गया है, उस से ही होता है, ऐसा हम मामत । बनमें उदासानसासे स्थित योगीवन और सायंकर बादिके मामनकी पार आती है। - ३०० बमई, शाम मुरी १२ रपि २०१८ १ मममें बारमार चारसे निश्चय हो रहा है कि किमी भी प्रकारसे उपयोग किरकर अन्य मात्रमें अपनापन मही होता; भीर भसण माम-पान रहा करता है, ऐसी शामें सिकट उपाधि योगका उदय वा पर्यकारक है। हमें तो पो भोंकी निहसि मी मुरियसे ही यती है और महति कर सकनेको योग्यताबाठा तो चित्त है नहीं, भार इसमें ऐमी प्रति परना पही कपि, तो उदासीनतासे ऐसा करते हैं। मन कही मी मही लगता, वार कुछ भी अच्छा मही लगता । २ मिमपम आम-ज्यान जो तीयकर भाभि कियापह परम आधर्यकारक। उस काउमें मी बापर्पकारक पा । अधिक स्पा कहा जाप ! 'बनकी मारी कोपष्ठ' की कहावत के अनुमार इस कासमें और इस प्रतिमें परे है। ३०१ शाम ६ भाम २०१८ शमीम परिफिमी मी प्रकसम पम भारिका बाठा रमपी जाती है, तो जानकर दानावरणीय कर्मा प्रतिबध विशेष उत्पम होतानी ता प्राप इस तरह ही प्राधिकरता है कि जिसमे भरनेस रिसीमा पमा प्रनिराध महो। पानी भरना उपनाम्न-आनीपिका-भी पूर्वमर्म अनुसार ही करना हनिमोहनमें प्रति मदता भाये इस ताकी भाचारित नहीं करना, अपरा इस तरह आामिन बगनक प्रमग या मही फरता, ऐमा मानमे है। जिम हामी प्रति मर्पया नि मा टममे अनी १५ पानीमा मी भीमर्पणचन्द्र [पत्र २९८ २९७ १९८ सत् शब' के प्रति, और परेशास परमापक निमिच कारण 'दाम बानि के प्रतियोहै।वामा वो कता मा जान पाता है। २९६ बई, पत्रकोमि १९९८ जग ममिप्रापको देखकर मीपने पदार्यका पाप प्राप्त किया है। मानीके मभिमायो देखकर मही प्राप्त किया। मा जीप मानीके भमिमापसे पोप पावा है, रस जीपको सम्पन्दर्षन होता मार्ग हम दो प्रकारके मानते है । एक उपवेध प्रातिका मार्ग और दूसरा वास्तविक मार्ग । विधारसागर उपदेश मानिके लिये विपारमे योग्य प्रय है। जब हम जैन शामोको गोधर्मके लिये करत बनी होमेके लिये नहीं करते। जब मेदात शाख पाँचमेके लिये करते है वो हावी होमे किसे महीयते इसी तय बम्प शसको बाँचने के लिये जो करते तो अन्य होनेके सिप मही करते । जोते हैं वह केवल तुम सब छोगको उपदेश देनेके म्पेि ही करते हैं। हमें मैन मोर माती मारके मेका त्याग करे। मामा पैसा नहीं है। २९७ बर्ग, त्र दो १२ री १९१८ मारे पूर्व प्रमवा है, यहाँ साता जिसे बोर-मानको उत्पति हो जाती है, उसे स्वरूप-मुम्से परितृप्ति यती है, और लिफ्पके प्रति वायन दशा गती बिस जीवन में क्षणिकता है, उसी पीचनमे शानियोंने नित्यता प्राप्त की है, यह बपरस्की बात है। पदि जीवको परिदृप्ति न पा करती हो तो उसे पता बाल-बोष मा मही समाना। । २९८८मई शाम मुवी : १९९८ मध्य वृतीया माग समाधि है। गाय उपाधि । जो माको गौण कर सके ऐसी पर स्पितिवारी, तपापि समाधि पाते। (२) हमने यो पूर्ण-कामताक विपपमें लिया है इस बासमसे रिसाद बिस प्रमाणसे बागका प्रकाश बाता माता है उस प्रमाणसे श भादि पाहारिक पशोसे निस्पृहता माती जाती है। वाम-मुम्के कारण पपिति यती है। बाप किसी भी सुराही दसा न होनी पर पूर्ण जानका क्षण है। जामा मनित्य जीवनमें नित्यता प्राप्त करता है, ऐसा जो सितारेयस बायसे लिया। कि उसे पषुसे मी निर्मपता पता है। विसं ऐसा हो माप उसे फिर वनिपता हो। ऐसा न में दोपबात स्प।
२९५ पत्र १९९३ १] यियिय पत्र मादि सपाद- यो पर पिसे सबा आम-मान हा जाता है उसी - मैं अन्य भाषफा भकपामा ओध उपन होने की जो बामन्यय बुद्धि, उसपा दिल्य हा जाता है। ऐमा ही समुन्ना भाम-भान मारम्बार रहा परता है, सपारि नसकी इच्छा परने है पसा तो नहीं। समाधिम्प २९९ बम, पान सुनरी ५सी १९४८ दागमें तो अनुरुमसे उपाधि-पग विशेष रहा करता है। अनवरा म्पबहार करनेमें प्पतीत किया , ता रि उसकी गंगाउमें, निममे परमारा मिर्जन न किया जाय उसी तरह बर्ताव करना, ऐमा जिसका निपप से गया ६, उन मे दी तापसाहम मानत। पनमें उपासीनताम स्थित योगीमन आर धिमा आरिफे जामको पार आती । ३०० बम्बर, पैशा री १२ रवि १०५८ १ मनमें वारपार विचारसे निपहा कि किसी भी प्रकार उपपागा रिफर अन्य भारमें अपनाउन मही होता; भीर भगग आम-पान रहा परता , प्रेमी शाम विर गरि पोगका उप आपकारक है। हमें ता थारे गोंकी मिसि भी मुहिम मे होगसी है और प्रति फर सम्मेवी थापतागग तो पिच है मही भारदा में प्रेमी प्रति माना पदी पचरा दे, तो उम्मीनताम ऐमा करते है, मन की मी नदी टगता, भार गुण भी अच्छा नही माना । २ निमपम भाम-पान जो मापार आग्नि किया, पर परम भाभधारप ६ । उमा में भीमापर्यवरक था। विक या पदा गायनी मागोपन' पी परातो अनुगार ग फारमें और इस प्रनिमें हम परे । ३०१ बाप भार २.५८ गनम पग्गिा भी प्रग्रगम ग्न आरिवारमा रम्मी गीर, मोदनालार पति प्रोतारानादार मानि रमा ८ मिरिममे गरिमामा सिमा पानी अलग जान-मामीरा- भीम अनुमामालिया लाजार मनाना स म ा ाी Burton तीसरेगा मरने। शिनीnaprr Human - भीम परचम्य [पा २ निसे दोप देना नहीं बाता, ऐसे की जानीक वामयसे पौरनपूर्वक पछनेसे भापपिका माश हाता मया बापति गगत मद पा जाती है, ऐसा मानते हैं तयापि इस कामें ऐसी धारर यमा गुत हो कठिन है बार इस कारण जैसा कि ऊपरया, पातबार ऐसा परिणाम बानेसे रुक जाता है। हमें तो सौ गाहम उवासीन यतीमार मीवर पिमान परम परमपम्पहारनीयौ मनको कमी मी मग्री छगने देता वोर म्यपारका प्रतिष तो सारे Rम ही रसमा परग।पमें वो ऐसा उदय पक्ष या । इसम माम होता है किपमा सम्मका है। वान पौष मास ए तबसे हम यगत्, पर वौर म्यमान-इन सबसे उत्सालम्पसे रहते है, तथापि पर मात गौर ऐनके कारण तुम्हें नही लिखी । हम जिस प्रकारसे ईबर बाविक लिपपमें प्रवाशात हो, हमारे पि उसी पर पावि करना फापागकारको।हमें तो किसी मी वयका मे मात्र उत्पन न होने के कारण सत्र कुरा जनादप है; वर्षात् ईयर बादि वक, तासीनता यती। हमारे इस प्रकारक किनेको पपकर हमें किसी प्रकारसे सनेहमें पाना पोम्प नहीं। हामें तो हम 'पत्रम्म से हते हैं, इस कारण किसी प्रकारको शान-पा, मी नही मित्र सकते परन्तु मोश्च तो हमें सपा निकटम्पसे होय मात तो प्रकाशित है। हमारा वित वारमा सिमाप किसी रसरे स्पपर प्रतिबर होता ही नहीं, मणमरके किये मी बम्प मात्रमें स्पिर मही यता-सरूपमें स्थिर पता है। ऐसा मो हमारा वापर्पकमक समापन पर हमें दो कैस मीमा मही गाता | बहुत महिने बात मानके कारण में कर सणेय माने लेते हैं। ममधाम बाँचना । हम मेरित है। - ३०२ मई, पैश्याम की १५ भौम १९४८ निस निरंतर होममेद-पान या करता है, ऐसे श्रीयोप-पुस्पा पपायोग्य पाँचना । यहाँ माननिष्पक तो समापि ही पता हो और बायविषयक सपापि-पग राग तुपारे पापे पर तानों पत्र प्राप्त हुए है, और इसी कारण प्रत्युचर नहीं लिया। इस की ऐसी विपमता है कि मिसको गत समपतक ससंगध सेवन माहो, तो गोन नियमक होक-मानना कम हो सकती अपना म्पको प्रम्स से सकती है। मालनाके भापरणके कमण गावो परमार्म मानाके प्रति उठास परिणति नहीं होती और गातक पह नाहीती तबतक गोष-सपास मस्सो हावा है। जो निरन्तर सत्संगके सेवन करनेको दशा करता है ऐसे मुमा पानको पातक उस योगा निय गवद तक्तक स मारसे उस मामाको पचासहित प्रत्पेक धर्म करते हुए विचारपूर्वक प्राधिकरके मपनको मु मानकर वस्ने देसनेमें वानेशले दोरको निति पर करके सरम्वासे मन करते पना पोप है। और बिस कम्पकारा ठस भावनानी उमति हो ऐसी जान-मार्च अपमा जान-स मा मपका पुट विचार करते यना पोप है।
पिपिप पन मादि संपा-२५ो २९५ जो बात ऊपर कहा है, उसमें तुम लोगोंको बाषा करनेवाले अनेक प्रसंग बाया करते है। यह हम बानते है, सपापि उन सब बाधा पहुँचानेबाळे प्रसगोंमें मैसे बने पैसे सनुपयोगसे विचार पूर्वक प्रति करनेकी रछा करमा, यह क्रम मसे ही होने जैसी बात है। किसी भी प्रकारसे मनमें सताप करना योग्य नहीं, वो कुछ पुरुषार्थ हो उसे करनेको सदा रखनी हो योग्य है, और जिसे परमबोध स्वरमको पहिचान है ऐसे पुरुषको तो निरन्तर ही पुरुषार्पक विषयमें कैसी प्रति करते र मेमें घबहाना योग्य महो। मनतकाल में भी नो प्राप्त नहीं (जा, उसकी प्राप्तिके लिये यदि अमुक कास प्यतीत हो गाय तो मी कोई हानि नहीं है। हानि केवल इसी । कि बनतकाठमें भी जो प्रास नहीं हुआ, उसके विषयमें भान्ति हो-मूह । पदि परम ज्ञानीका सहप मासमान हो गया है तो फिर उसके मार्ग, मी मनुमसे मायका प्रवेश हो सकता , यह मासानीसे समझ मा सकने जैसी बात है। निस तय मन ठीक रातिसे चणे, स तयसे वार करो। रियोग है तो उसमें कल्याणका मी नियोग है, यह बात साप तयापि परिहानांके बियोगमें मी उसी विषयमें पित्त या तो कम्पाण है। पीरमका त्याग करमा योग्य नहीं। प्रीस्वस्मफा पथायोग्य ३०३ बर्मा, वैशाच बदी ११ पुभ १९४८ मोहमपीस निसकी अमीररूप स्पिति है, एसे भी का ययायोग्य " ममके कारण ही पह सब कुछ है," ऐसा गो वातकका किया हुआ निणय लिम्मा पह सामाम्यम्पसे तो याघातप्य है। तथापि मन', 'उसके कारण ही ', ' यह सब कुछ ', और उसका निर्णप', ये नो इस बायके धार माग होते है, यह बात समपके पानसे पयार्परपसे समसमें वाता है, ऐसा मानते हैं । मिसकी समझमें यह आ जाता है, उसके वशमें मम रहता है, यह बात निषयरूप है। तयापि पर न यता है तो भी वह भामसम्मम हो यता है। मनके पशमें होमका पर उतर कपर लिखा है, यही सबसे मुम्य है। जो पाप लिसा गपा और बहुत प्रफारसे रिचारने पोम्प है। मामाकी देह दो कारणोंसे विपमान यता -प्रारम्भ कर्मका मोगनके लिये, और नाकि कम्पाणके लिये; तथापि ५ महामा इन दोनों में उपासरूपसे ठप आईई प्रापिस रहता है। ऐसा मानते हैं। प्यान, अप तप, भार यदि इन रिपाक मारा ही हमारे द्वारा पर हुए मास्पको परम फसमा पारण समझते हो बार परि उसे निमपसे समझने हो ता-पाठसे मुदिणा-मका, शान-समार न जाती हो तो-और घी गई हो तो वह भनिर्मक पर्म गइ, एमा समझते हो ता-और उम पापको वनेक प्रकारके पारपसे विधारनी यादो तादी कमनी या पाती। भी इससे विशेषणपसे निमपरिपया धारणा फरमके ठिप सिम्मना बासा चैमा माझ्म ऐना , तपपि पित्त नाकापसे नहीं पता, इमरिप जामिया है उसको मुम्यएस मानना ।
भीम समय [पा ४ (२) सा प्रकारले उपाधि-योगको तो ना करना ही योग्य त्यापि यदि उस उपाधि-योगकी प्रसंग आरके लिये ही इस की जाती हो, क्या पिम्सी पित-स्थिति समभावसे रवी तो उस उपरि योग प्राधि करना अपस्कर। प्रतिवद्ध प्रणाम ३०४ कई वैशाख १९९८ पारे किलनी ही पिपचिों क्यों न पड़ें, पापि मानीद्वारा सांसारिक फसकी इच्छा करनी याग्प नही ठन्य नामे पर बतरायको सम परिणामसे बेदन करना योग्य है, विषम परिणामसे बन करना पोम्प मही। मारा मानविकासपी स्थिति बहुत समयसे माम है यह पूर्वकर्मका योग है। जिमे यथार्थ जान है, ऐसा पुरुप बन्पया बाधरण नहीं करता, इसलिये तुमने जो वाकुसताके कारण 'ठा प्रगट की है, उसे निवृत्त करना ही यौम्य ।। परिवानाके पास सांसारिक मेमन हो तो मी मुमुपुको उसी किसी भी प्रकारसे हम करना पोम्प नहीं है । प्राय करके पर हानीके पास ऐसा बैमय होता है तो कब मुसमुको विपति दूर करने के लिये उपोगी होता है । पारमार्षिक बैमक्मे बाली, मुमुक्षुको समारिक फस देने की रण नही करता स्पोकि शानी कम्य नही करते । हम मानत है कि तुम्हारी इस प्रकारको स्थिति है कि जिसमें पारस बना दिन है ऐसा हनपर भी परिममें एक बाकी मी म्पनता न होने देना, या तुमय कम्पभार कमी पपार्य बाप पानेका मुख्य मार्ग। हामें तो हमारे पास ऐमा कई सांसारिक सावन महो कि हम उस मार्गसे तुम्हारे उिप औRI मारण हो मकै परन्तु ऐसा प्रसग सममें रमको बाके दूसरे प्रदान करने योग्य ही नहीं है। किमी मी प्रपारका मविप्पका सांसारिक विचार एकर वर्तमान में समतापूर्वक प्राति करनेका हा निधय करना हो तुम्हें पाम्य है। भनिप्पमें नो रोना गा होगा, ए वो बनिवार्य है ऐसा मानकर परम पुस्पायड़ी मोर म्मु हाना हो योम्य है। किमी प्रमासे भी होनाहापाइम मपक स्पान ऐसे मनिप्पको स्मरण करना हो याम्य है। उसकी बिनाम परमार्यमा विस्मरण होता है और पमा ऐना महा भारतिरूप है। इसलिये इतना ही बारपार विचममा पौरप RAसमे मह भासिन मापे । बात समपसे वागरिकतार छोक BI मर तुमरे अतरमें सा हो रहा है, इस विषयमें या तो निर्भयपमा ही भगीकार करना योग्य है । जिग्मे कि पही दरम्प है। पयार्य बापा पही मुम्प मार्गस स्पलमें भूल पाना योग्य नदीमा जम्मा भार आता मिप्पा है । कुनुमा बादिका ममप म्याग वो भी गोहाना होगा विविध पत्र मावि संपा-२५औं वर्ष प तो होगा हो। उसमें समता रस्सोगे तो भी गो होना होगा पह, होगा इसलिये निशफवासे निरमिमानी ना ही योम्प-सम परिणामसे एना योग्य है, और यही हमारा उपदेश है। या नबतक नहीं होता तबतफ यथार्थ बोध मी नहीं होता । ३०५ पई, शास १९९८ निनागम उपशमस्वरूप ।। उपशमस्वरूप पुर्पोने उसका ठपशमके लिये प्ररूपण किया है- उपदेश किया । वह उपराम वारमापके लिये है, दूसरे किसी मी प्रयोजनके लिये नहीं । बामार्थक छिये यदि उसका वारापम नहीं किया गया, वो ठस बिनागमका श्रवण धार बाँचन निष्फल जैसा है या पात हमें तो नित्सवह पयार्प माश्म होती । दुसकी निति समी बीच पाहते, और इस दुसकी निधि, जिससे दुस उत्पम होता है, ऐसे राग, देप वीर बयान बादि दोपकी निति हुए बिना समय नही है। उस राग भारिकी निति एक भास्मभानको छोड़कर दूसरे किसी भी प्रकारसे मूतकामें हुई नहीं, वर्षमानकासमें होवी नहीं, बौर मनिप्यकाठमें हो नहीं सकेगी ऐसा सब बानी पुरुषोंको मासित हाहै। अतएम भाबके लिये प्रयोगनरूप गो बारम्बान है, उसका सर्वश्रेष्ठ उपाप सद्गुरु के बचनका मरण करना अपमा सत्यसका विधारना ही है। मो कोई गार दुसको नितिको इच्छा करता हो--उसे इससे सर्वया मुकि प्राप्त करनी हो तो उसे एक इसी मार्गको वाराधना करनेके सिवाय भीर कोई दूसरा उपाप मही है। सछिपे गीबको सब प्रकारके मतमवरका, कुल-मर्मका, लोक-सबारूप पर्मका, मोपसहा. रूप धर्मका उदास मापसे सेवन करके, एक वाम-विचार कम्परूप धर्मका सेवन करना ही योग्य है। एक मकी मिअपको पात सो मुमुक्षु गौरको यही करमी योम्पा कि ससगके समान कस्पाण व वन्य कोई वषपान कारण नहीं है और उस समगमें निरतर प्रति समय निवास करनेकी हण करना, पसगका प्रत्येक क्षण क्पपामात्र विधारना, यही प्रेयरूप है। बात बात करके यह पात अनुमबमें छान वैसा। प्रारम्भके बनुसार स्थिति र, इसलिये मसबाग उपावि-पोगसे निपमता नही माती, भस्यत अरुषि हो नानेपर मी, उपशम-समाधि-यपासप गती है क्यापि निरंतर ही पिच ससाको माश्ना या करती है। ससगका बस्यंत माहाम्प जो पूर्वमनमें बेदन किया है, यह रिकिसे स्मृति में आ ग्रसावीर निरंतर मगहापसे या भाषमा पुरित या करता है। जबतक इस उपावि-योगका उल्य है, तबतक समवस्थापूर्वक उसे निबाहमा, ऐसा प्रारम्भ तपापि नो काउ म्पतीत दाताह प्राय उसके त्यागके मा में ही पतीत होता है। निहति से क्षेत्रमें विचको पिरतापूर्वक पनि हामे सूत्रागमत्रके भरण करनकी इस हो तो प्राण परमेमें कोई पापा नहीं। यह केवस और उपशमके लिये ही करना पोम्प है। किस मनको मिशपता है, भीर किस मतको ग्यूनता है, ऐसे पराम पानेक ठिपे उसका भ्रषम करना योग्य नहीं है।
- २१८ भीमद् रामचन्द्र [पम ५,३॥ ऐसा हमारा निवप कि बिन पुरमोंने इस प्रहातांगकी रचनाको वात्मस्वरुप पुरुप पे। गीतको पा कर्मरूपी बोश प्राप्त मारे, कैसे दूर हो।' इस प्रश्नको मुमुक्षु शिष्पके ज्यमें मत करके, ' बोध प्राप्त करनेसे दूर हो सकता है' या सूत्रतांगका प्रथम पाप है। फिर शिष्यको दूसरा प्रश्न होता है कि 'यबपन स्पा है, और मा क्या माननेसे दूर हो सकता है, तपा उस बधनको पौरस्मामाने किस प्रकारसे कहास प्रकारके वाक्यद्वारा यह प्रम रस्सा गपा है, वर्षात शिप्पके प्रभमें या वाक्य रसकर प्रत्यकार ऐसा करते हैं कि हम में बामस्वरूप ऐसे नाचीरस्वामीका करावा बारमस्वम्म करेंगे, क्योंकि वास्मस्वस्मके लिये नामस्वस्म पुरुप ही मर्पत प्रतिके योग्य है। इसके पश्चात् मन्पकार बो उस भवनका स्वरूप कहते है, म फिर फिरसे विचार करने मोम्प है। तत्पश्चात् सपर विशेष विचार करनेसे पकारको याद वाया कि पा समाधि मार्ग बामाके निधपके बिना प्रप्त नहीं होता, तथा जगदासी गांव पानी उपदेशकोंसे पालका क्पया स्वरूप बानकर-करपाण पपा स्वरूप मानकर-मम्पपाको ही सत्य मान बैठे हैं उस निभयका मग ए बिमा-उस नियप सम्र परे बिना--जो समाधि-मार्ग हमने अनुमग किया है, पाउनें किस प्रकारसे मनानेसे कैसे फलीभूत होगा-ऐसा नानकर प्रयकर करो कि ऐसे मार्गका त्याग करके कोई एक घमण बायण कातपनेसे, बिना विचारे बम्पया प्रकारसे मार्ग काते इस क्यषा प्रकारके कपन के पश्चात् प्रत्यकार निवेदन करते है कि कोई पंचमहाभूका हो वतिय मानते हैं, और इससि मामात्र उत्पम होना मी मानते है।मो ठीक मही बैठता ऐसा काकर मन्पकार बहमाको निस्पताका प्रतिपान करते हैं। बिस पीने अपनी निपता ही नहीं मानी, तो फिर निर्माणका परम किस प्रपोजनसे करेगा। ऐसा बमिप्राय बताकर निस्यता रिसाई गई। इसके पधार मिम मिम प्रकरसे कम्पित ममिप्राप दिखाकर यथार्थ वमिप्रायन उपदेश करके पपार्प मार्गके बिना प्राय मही, गर्म दूर नहीं होता, जन्म र नहीं होता मरण र मही रोता, दुस र मगही होता, मावि, म्पाधि और उपाधि कुछ भी दूर नहीं होती; और पैसा हम ऊपर कर मापे। कि ऐसे सबके सब मतबादी ऐसे ही पियोंमें निमन है कि मिस्से मम्म, गरा, मरण पाका माय नही होतास प्रकार विशेष उपपलप भामापूर्वक प्रपम वप्पपम समाप्त किया। उसके परमात् मुम्मसे इससे गाते र परिणाममे बारमापक कि उपशम-करपाण सफ्रेश दिया है। इसे मधपूर्वक मना और अपण करना पोपी । कुम्भमके लिये सूत्रागा पाना चौर मनन करमा निफसी। . ३०६ पई, शासभा १९४८ श्रीस्वमतापरासी निबासुकने श्री मोरमयासे बमोहसरूप श्री . का बारम-समान- भारको सतिपूर्वक पपायोग्य माँचना । दासमें यही बारा प्रादि सपोग रिशेपरपसे पता है। बानाका उपान किपे हुए पूर्वधर्म निच भरने के लिये भौर पकी मनुकंपाके किये होगा।
पत्र १७] विविप पर मादि संपा-२५ वर्ष निस माक्से ससारको उत्पति होती है, या भाव बिससे निच हो गया है, ऐसा शानी मी पाय प्राधिकी निति और सस्समागमके निवासको इच्छा करता है। जहाँतक इस योगका उदय प्रास मी रोता, यहाँतक नो प्रात स्थितिमें अविषमवासे गते है, ऐसे हानांके चरणारविन्दको फिर फिरसे स्मृति मा गानेसे हम उनको परम विशिएमापसे नमस्कार करते हैं। पाल्में मिस प्राचि-योगमें रहते है या पात प्रकारकी परेमके कारणसे राते हैं। बाम ररिकी असातामें इस प्राप्ति-योगसे कोई बाधा नहीं बाती इसलिये उदय बापे हुए पोगकी ही बाराषना करते है। हमारा प्रकृति-पोग बिहामुके प्रति कस्पाण प्राप्त होनेके समधमें किसी प्रकार वियोग- रूपसे राता। विसमें सतरूप एता ह, ऐसे बानीमें रोक पहा आदिका त्याग करके चो मानपूर्वक भी वामितरूपसे पता, पा निकटहपसे कल्याणको प्राप्त करता है, ऐसा मानते हैं। नितिके समागमकी हम बहुत प्रकारसे इच्छा करते , क्योंकि इस प्रकारफे अपने गगको हमने सर्वपानिपत महीं किया । कालका कठिस्वरूप धर रहा है। उसमें पविषमतामे मार्गकी शिासापूर्णक, बाको सरे अन्य माननेके उपायोंमें उदासीनतासे वर्ताव करते हुए मा वो बानीके समागममें यता, पर अत्पत निकरहमसे कम्पाम पाता है, ऐसा मानते है। नगर, घिर वादि सबधी प्रश्न हमारे बहुत विशेष समागममें समझने पाहिये। इस प्रकारके विचार (कमी कमी) करनेमें हानि मही है। कदाचित् उसका यथार्य उचर अमुक कालतक न मिळे तो इस कारण पारनका साग करनेको टपत होतीहाई मतिको रोकना योग्य है। यहाँ भविषमतासे वाम-पान गता है, ऐसे ' भीरायन्त्र' प्रति किर फिरसे ममस्कार करके पर पत्र इस समय हम पूर्ण करते है। ३०७ बर्थ, पैशाष १९९८ गो मामामें हो राते हैं ऐसे बानी पुरुष साग प्राप्त प्रारम्प भनुसार ही प्राप्ति करते हैं। पास्तबमें तो बात यह है कि बिस कासमें पानसे धान निरत हुषा, उसी कासमें हानी मुबहोजाता है।ह आदिमें वप्रतिवर मानीफो कोई मी भानप भयत्रा भासमान मही है। पौरम प्रास होने के लिये उसे बरेठा आरि" मा नारा हाना योग्य नहीं है। मलितको जो कुछ प्राप्त होता है उसमें किसी प्रकार देशको देखकर तटस्य पीरब इनके लिये यह मावना किसी प्रकारसे योग्य है। जानाको तो प्रारम्भ सवरेप्ठा मादि समी बानोंमें एक ही मार-समान ही मार है। उसे साता-असावा फुछ भी किसी प्रकारसे राग-देष आनि कारण नहीं होने पर तो दोनोंमें । उमीन है। गो उदासीन है, पर मूडम्पलपमें निरागन है और मिराममननप उसको उसनताको म पिरेमासे मी पपान मानते है।
भीमा प्रवचन ईसरे मामको मी वावरसे समाना योग्य है। सिरे अरूप मानन, यह माधपस्प ऐसा मतिको ही पोम्म ।। निरामय पानीको वो समी कुछ समान है। अपना हानी सहन-परिणामी । सहम-सहपी है, साब-स्वमानसे स्थित है। मन-समानसे प्राप्त उदयको भोगता है। सहन-समाक्से मोहोता है सो होता है, जो नही होता सो महाँ होता मह कम्परहित कम्यभार उसमें पप हो नाता है इसलिए तुरे ऐसा जानना चाहिये कि उस बानाले स्वरूपमें प्रारम्पक उत्यकी साग प्रति अधिक योम्प है। निस्ने वरेसा विषयमें किसी प्रकारसे इस स्थापित की है, उसे इसापान पाना याम्य है।बानी अरहित है या यासहित, ऐसा करना मी मही बमता, तो केवल सास-सस्प है। . ३०८ बई, म्येष्ठ सदी १० रवि १९९८ वर वारिक समसमें जो मिअय है, उस विषयमें हमें विपारका त्याग करके सम्मापासे सम्पसार पाना मोम्यवर्षात् स्थरके धामपसे हमें पौरन पता, मापौरम उसके विकम्पमें पर मानेसे पना कठिन है। निभमसे बकर्ण, वौर म्पहारसे कर्ण स्पादि म्यास्याम को समयसरमें है, पर विचारमे योग्य है, परन्तु या म्यानपान ऐसे बानीसे समाना चाहिये कि जिसके मोषसमी पोप ना हो गये। स्वरूप समझने तो योग्प ऐसे पानासोनिविसे निम्पिवा प्राप्त हो गई है। ससाके वापसे जाके रोप न होकर उसकी प्राप्ति होती है, और समझमें भाता है। म मास सपूर्ण हए सबसे, मिस फमापके प्रति एक मी विकल्प उत्पम नही इमा ऐसे मो को नमस्कार है। बम्पेठ दी १ क १९९८ मिसकी मासिक पभात् मनवग्रसकी मापकवा र रोकर सर्व कासके मिये मपावरुवा माप्त होती है, ऐसा जो कोई भी हो वो एस इम वरण-वारन मानते -लसाको भयो मोब तो इस काम्मे भी प्राप्त हो सकता पता होता है, परन्तु उस मुलिझा दान करनेवाले पुरुषको प्राधि परम दुर्लभ है। वर्षात् मोफ तुम नही, ता दुर्गम है। संसारसे वापि प्रत किये गए तो बात का हो गया है। पापि बमा संसारका प्रसंग निमाविको प्रास ही रोता र एक प्रकारका महान् मधेश या यता। पामें तो नि होकर बनेको भौहरिके हाथमें सौंपे देते हैं। हमें तो कमी करने के लिये मन नहीं होगा और सिनेके मि मी मन नही होगा कुल एक बाणास प्रालि करते है उसमें मौ मम नहीं होता! के नामरूम मीन बौर तरसषी प्रसगमें ही मन गता है। मोर संग तो इससे मिम प्रकारका ही यता।
पत्र ११ ११] पियिष पर मादि संप्रह--पोयप १०१ ऐसी ही ईपरेप्छा होगी। एसा मानकर जैसी स्थिति प्राप्त होता है बसे ही योग्य समझकर गते हैं। मन तो मोरके सबध में भी स्पृहायुछ मही है, परन्तु प्रसंग पर गता है। इस प्रसगमें 'मफी मारी कोप' ऐमी एक गुनराम देशमा कहालत याम्य ही है। शान्ति शान्ति शान्ति । ३१० बई, ग्येष्ठ १९४८ प्रमु-मतिमें मे बने तसे तत्पर राना, यह मुझे तो मोसफा पुरषर मार्ग मगा, पाहे तो मनसे भी स्थिरतापूर्वक पैरफर प्रमु-मति वास्य करना योग्य है। इस समय ता मनफी म्परता होनेका मुन्य उपाय तो प्रमु-मलि ही समयो । बागे भी वही बार मा ही है, ता भी इसे स्मूसतामे लिखकर बताना अधिक योग्य लगता है। उत्तयम्यपनमत्रमें दूसरा इमिगत बप्पयम मना । बीस लम्पपनकी प्राएमको चौतीस गापा । मनम करना। ये सोग, निर्वेद, नास्पा, वीर मनुक्या इत्यादि सद्गुर्नामे योग्यता प्राम करमा भादिया और किसी समय तो महारमाके संयोगसे धर्म मिाही नायगा । समग, मशान और सद्रात उत्तम साधन है। (२) या पगास्त्रको प्रातिका साधन हो तो उसका दूसरा मप्पयन, तथा उकाडारबाग जयपम पानेका परिचय रमाना । तया उत्तराप्पयनके पास मराम्य धार परिवार बम्पयन फरते रहना। मीर प्रमात जण उटनेका परिचय रमाना। एकातमें पर हार भेटमेका परिचय रमना । माया मर्यात् जगत्-मोक का जिसमें वरिक वर्णन फिपा गया है, ऐसी पुनर्को पानको भाशा, जिनमें सपुरुपके चरित्र अधवा पेराम्य-कथा विपरफमे रों, पेमी पुम्नोंक पानेको माना रणमा । जिसके द्वारा रापनी पदि हो ऐमा बाँपन शिपम्पमे एपना मतमनिरपा त्याग करना; और विसमे मतमतिरको गदि हो ऐमी पुस्तकें नही पामा। अमसंग वा में उपम हाती पिका हटानेशा दिपार बारम्पार करना पाग्य है। पम्, म १.५८ . ३११ जो रिपारवान पुरुषको माया बदाम्प भामिन हाता है, पमे इम समारमें रिग्मे आममाम्म जन्म म उनको निपर प्रतिता है। मानों पारमें भर इमर पधात् इस ममारफा मस्प अम्पयामे माममान होना योग्य नदी, भौर पर माममान -मा तीनों कारमें होना मुभप मदी।
भीमद्यपान [पा ११ यहाँ वाममारसे समाधि है। उप-भावके प्रति उपाधि यती है। भीतीर्थकरने तय गुण स्पानको रहनेवाले पुरुषका निम्नमिमित सहप करा मात्मभाष किये जिसने स ससार सात कर दिया है अर्थात् मिसके सब संसारको भाती ईन्डा मिम्द हो गई है, एस निर्मको पुरुषको तेयो गुणस्पानको समझना चाहिये। ममसमिनिसे युज, गवनसमितिसे पुछ, कापसमितिसे पुक, किसी भी बस्तुका प्राण पोर स्पाग पर हर समितिसे मुक्त, दर्ष मका वादिका त्याग करते हुए समितिसे पुल, ममका सकोच परनेमाग, पचनका संकोच करनेवाला, कापाका सोच करनवाला, इत्रियोंके सकोचपनेसे मनपा, उपयोगपूर्वक रम्नेपाडा, उपयोगपूर्वक सहा होनेपाका, उपयोगपूर्णक बैठनेपाम, उपयोग पूर्वक शयन करनेवाठा, उपमोगपूर्वक योनेपामा, उपपोगपूर्वक वAार सनेपाछा, उपयोगपूर्णक बासे- लास पनवासा माँसके एक निमेषमान मौ उपयोगरहित माचरण न करनेवाग, वपना जिसकी उपयोगरहित एक मी क्रिमा महो। ऐसे निर्मपको एक समयमें किपाका भ होता है, दूसरे समपमें उसका पेन होता, तीसरे समपमें कर्मररित हो जाता है, वर्षात् पीपे समपमें उसको किया- समधी समाप निता पाती है। आतीपर बसेको मा पन्त नियम (अपूर्ण) ३१२ बमाई बापाल पुदी ९ रचि १९१८ निमय वित्त र वाद पाँच विषयोंकी प्राप्ति या बायन्त म्पाकुम या करता है, पेसे जीर यो विधेपर से Pमाई देते हैं, ऐसा हुपमा कपिपुग नामका कारी। उसमें मी जिसे परमापक सपमें निदस्ता मही, जिसके पित्तको बिशेप नोमा, बिसे सगशरा प्राणि-भेद नहीं मा मिसका रिए इस प्रौतिक संरचसे बात नहीं मा रिसका विलास दूसरे कारणों में मही हा ऐसा कोई भी हो तो प इस कासमें दूसरा श्रीराम' है। किर मी देमकर मेहपूर्वक वाचर्य होता है कि इन गुणोंसे किसी वशमें भी सपम अस्प जान मौरिगोचर मही होवे। निहाके सिवाय बालके समपर्मेसे एकाप फेरे सिवाय शेष समप मन, पचन और कापासे उपारिक योगमे पता है। उपाप नहीं है, इसलिये सम्पपरिणतिसे सदन करना ही योग्य है। महान् पापको प्रक्ष रानेवाले ऐसे मस, पापु चन्द्र सर्प, माम मादि पदाकि गुण माम्प प्रकारसे मी गांवों में रिमें नहीं माने, वीर लाने पोसे परमें अपच मोर मौ सय किती पानाम किसी प्रसार मानो मापर्यकारक सबप देखकर महमान पता। यह देखकर ऐसा होता है गोत्र अमादिषसका भिम र महीमा । बिससे पार ॥ ऐसे उपायमें गांवकर जान भी नही परम, भार उसय पहिचान होनेपर मी सेपासे बर्तत करनेकी मुनि बारम्बार उति लाता है। प्रमे गतम गाको स्थिति देखकर ऐमा समझो कि पर छोक बमी भनकायक रामपाशा पा ११५] पिपिम पम मादि संप्रह-२नों वर्ष २०॥ . ३१३ मझ धापाठ १९९८ सूर्य उदय-अस्त रहित है। यह फेक छोगोंको मिस समय पाकी मर्यादासे बाहर चग जाता है उस समय बस्त, भौर विस समय चक्षुकी मर्यादाके मीसर यता उस समय उनिस माश्म होता है परन्तु पास्तबमें सूर्यमें तो उदय-मस्त कुछ भी नहीं है। बानी भी इसी तय है, यह समस्त प्रसंगोंमें जैसारे पैसा ही है, परन्तु बात यह है कि केवळ समागमकी मर्यादाको छोड़कर छोगोंको उसका पान ही नहीं पता, इसलिये मिस प्रसगमें मैसी अपनी दशा रो सकती है पैसी ही दशा लोग पानीको मी कल्पना कर खेते है, तथा यह कम्पना भीरको धानीके परम मारममाव, परितोपमाप, मौर मुक्तमारको मालूम नहीं होने देती, ऐसा मानना चाहिये। हासमें तो निस प्रकारसे प्रारम्पके कर्मका उदय हो उसी तरह प्रापि करते हैं, और इस तय प्रति करना किसी प्रकारसे तो सुगम ही माझम होता है। पपरिहमाय चित नेत्रके समान है—नेत्रमें दूसरे वाययोंके समान एक रज-कण मी सहन मही हो सकता । दूसरे अवयोन्म अन्य पित है। मिस चित्तसे हम राते हैं प चित्त मेहप है, उसमें पापाका उठना, समझाना, यह करमा नयबा या म नग्मा, ऐसा विचार होना या बहुत मुस्किम्से बन पाता है। गुतसी किया तो शून्यताको तह होती है, ऐसी स्थिति होनेपर भी उपाभि-योगका तो मम्पूर्वक वागनन कर ये । इसका बेदन करमा कम कठिन नहीं माश्म होता, क्योंकि यह बाँसके द्वारा नमानको रेतको उठाने वैसा कार्य होता है, मिस वर यह कार्य दु ससे- अत्यन्त दुमसेनोना कठिन है, वैसे ही पित्तको उपाधि परिणामरूप होना कठिन है। गमतासे चिपके स्थित होनेसे वा सम्यक्प्रकारसे वेदनाका अनुभव करता है-असर समाधि रूपसे अनुमब करता है । इस बात के मिसनेका बाशय तो यह है कि ऐसे उतर सम्पर्म ऐसे उपाधि-योगके अनुभव करने के प्रसगको फैसा गिमा गाय ! और यह सब किसके लिये किया जाता है। नानते हुए भी उसे फ्पों को नहीं दिया जाता है या सब विचार करने योग्य है। मरेम जैसी होगी बैसा हो जाएगा। रिकाम्य करनेसे मंद होता है वीर पर तो जातक उसकी इच्छा होगी तबतक उसी प्रकार प्रति करेगा । सम रहना ही योम्प है। दूसरी तो मी स्पृहा महो। कोई प्रारम्परूप सा मी माही । सत्तारूप पूर्वमें उपस्ति की ई किसी उपाधिम्प सहाको तो अनुक्रमसे सफेदन करनी ही पोग्य है। एक ससग-गुमारे मसागकी सा गा करती है बार तो सचिमात्रका समाधान हो गया है। इस भापर्पम्प बातको कहाँ कहना चाहिये ! बापर्य ऐता है। यह जो देह मिग परि यह पहिस कमी मी नहीं मिली हो तो भविष्यकाठमें मी या प्रश्न होनेवाली नही। मम्परप-ताप ऐसे हममें उपाधि-योग देखकर समी भेग मूछ करें, इसमें बाधप नही तपा पूर्वमें भी सत्पुरुषको पहिचान मही हुई, तो यह ऐसे हो योगके कारणसे महा। वनिक सिमना नही सूक्षता । नमस्कार पापि। समस्तनप भीरापचद्रका पपायोग्य भीमद पपन्न [पत्र ११४ ११५ ११५, 1. ३१४ बई वापार दी १९९८ सम-मास्मपदेश स्विविसे यपायोग्य पत्र मिले हैं। यही उपानि नामसे मरम्प उदय है। उपाधि निक्षेपीत होकर प्रापि करना, पर गाव अत्यंत कठिन है, जो प्रती है र पोये ही समयमें परिपक समाधिस्प हो पाती है। शति ३१५ बम्ब, बातण मी १९९८ रोनको पफ्ना स्काप माने सिवाय सुटकारा नहीं, तबतक पपायोन्य समाधि हो । यस माननेके किसे मुमधुता और सनीको पहिचान उत्पम होने योग्य है। यो बानीको यथायोम्यरूपसे परिधानता बानी हो जाता है--कमसे बानी हो जाता है। भानन्दननीने एक स्थम्पर ऐसा कहा है कि- मिन या मिनन मे भारापे, सहि मिनपर होगे रे मुंगी सीकाने पटकाये, ते मुंगी बग भाप रे । दिन होकर पति सांसारिकमानसपो मारममाव मागकर यो का मिनमगवान्की वर्षाद विम्यवानोको-पीतमाका-भारापना करता है, पर निथपसे बिनपर वर्षात् कैवल्यपरसे युज हो माता। इसके लिये श्रमरी मोरटका प्रस्पझसे समसमें भानेवाग रात लिया है। यहाँ हमें मी उपाधि योग यता, मबपि जय मालमें भारममाव उत्पन्न मही होता और यही मुस समाधि। ३१६. बाई, मानण पदी १ पुष १९९८ भास्ममदध-समस्पिविसे नमस्कार विसमें जगत् सोता है उसमें डाली जागता है-गिसमें पानी अगवारे उसमे जगत् सोता है। जिसमें जगत् मागता है उसमें बानी सोता है'-ऐसा मारण है। ३१७ ब भाषण सदा ५ १९९८ जगत् और मोषका मार्ग पे रोनों एक महो। बिसे जगतकी रस, चि और मामा , उसे मोधकी मिया माचि और मावना होती है, ऐसा माश्म होता है। १ बानिय भूवाना तला मामी। वस्थापति महानिनिय फाक्ये मुने || म पंचा म्ना गो-मलन समर्मा पानी बमोह। दीपुजवाद सपा मग, बलात मानव हुई। पोगान्तोक-परमात्मा-४७॥ एच माहानापानापामगध भी मिला है। मनुबारक पत्र ११८ १११] पिपिष पम मावि संप्रा-२५पों वर्ष ३१८ मई, श्रावण सुदी १० बुध १९९८ २० नमः निष्काम यथायोग्य निन उपार्मित कर्मोको मोगते हुए मविप्पमें बहुत समय म्यतीत होगा, ये कर्म यदि तीस्तासे उपमें एकर क्षयको प्राप्त होते हों तो कैसा होने देना योग्य है, एसा बहुत बोका सकल्प है। मिस्से म्पाहारिम प्रसगसबधी चारों तरफसे पिता उत्पम हो, ऐसे कारणोंको देखकर मी निर्भयताके बाधित गना ही योग्य है । माग इसी तरहै। हामें हम कुछ विशेष नहीं लिस सकते, इसके शिये क्षमा माँगसे हैं। नांगरमुख पामर नब माण, पष्ठमसुख न कुमारी रे, मनुमबपिण वेप ध्यानवणं मुख, कोण माणे नर नारी ।। मन महिसार्नु पहासा पपरे, वीमा काम करंदरे। (२) 'सत् ' एक प्रदेशभर मी दूर महीं है, पर-तु उसके प्राप्त करनमें बनस असमय या करते हैं चौर एक एक मतगप मेकके बराबर है। नीका कम्य यही है कि उस सत्का प्रमचतासे माण, मनम, और निदिम्पासम करनेका वसा मिथप रक्से । - रे राम ! मिस पासरपर को प्राप्त हो गाय उसीमें सतोपपूर्वक यमा, यह सत्पुरुषोंका करा हमा स्नातन धर्म है-ऐसा पसिष्ठ करते थे। . ३१९ बई, भाषण एरी १० गुप १९५८ पन मरिगर्नु पाठा पर, पीना फाम करंध रे, वेम भुवपर्मे मन र परेशानाक्षेपकर्पत रे । मिस पत्रमें मनको म्पाम्याके विषयमें मिया, मिस पत्रमें पपिटके पत्तेका प्यम्त लिखा है, मिस फरमें " पम नियम सपम माप कियो" स्यादि काम्म भारिक विषयमें जिम्मा है, जिस पत्रमें मन बादिके निरोप करनेसे शरीर वादि म्पपा उत्तम होनेके विषपमें सूचना की है, और इसके बादका एक सामाम्प पत्र-पेस पत्र मिड है । इस विषपमें मुम्प महिमपी इच्छा और मर्णिका प्रस्पक्ष ऐना, इस बात के संबंध प्रभात पाप माँगा। मझमें है। इस प्रमके सिवाय वाकांके पो उत्तर सिममेका मनुक्रममे विचार होते हुए मोमें हम उसे समागममें पूछना ही योग्य समप्यते है, मर्यात् यह बताना वाम पोम्प मास होता है। साल पर मामरिक नो पामर मेगा महीं गान को मौरपुपरी परिम्स गुलामासन सदी इसी वा भनुभव नाई मी मरमा मामानम्र नुन नही बन रणे।
भीमद् परवान [पा ११४, १५ ३१५, 10 ३१४ ब बापाट गरी १९९८ सम्-मास्पद स्पितिस पचापाग्य पा मिस है। यहाँ उपाधि माममे प्रारम्भ उदय है। उपाविमें विपरीत होकर प्राप्ति करमा, यह बात पत कटिन , ओ यता हा थारे समबमें परिपक समानिनप हो जाती है। शति ३१५ मई, भाषण मुरी १९४८ चौरको मना लवप जाने भिवाप पुटकारा नहीं, तबतक मपापम्प समाधि नही । पा बाननके लिये मुमता और मानीको पहिचान उत्पम होने योग्य है। नो सामीको पयायोग्यरूपसे परिचानता माना हो पाता -मम शानी हो जाता। भान मथनीने एक स्पटपर ऐसा कहा है कि- मिन पर निनन में आरोप, वे सहि मिनबर हाने रे। मृगी सीधन परफाप, ६ मुंगी जग भोर रे। दिन हाकर नाव सांसारिकमावषी माममात्र स्पागकर नो कोई मिनमगवानको अर्माद सम्पचानाचीतरागको भारापमा करता है, निपपस जिनवर बर्षात् कैम्पप से मुठ हो जाता है। इसके लिये भमरी और मटका प्रत्पभसे समतमें बामेसाठा कर दिया है। पहा मी उपाधि-योग यता है परिन्प मारमें बाममात उत्पम नहीं बता, और यही मुम्प समाधि है। ३१६ सम्बई, मारण मुझ पुष १९९८ भास्ममद-समस्यिविस नमस्सपा गिसमें जगत् मोता है उसमें पानी मागता है-जिसमें जानी नागता है उसमें जगत् सोता है। मिसमें जगत् नगा उसमें पानी सोचा है -ऐमा नौहष्ण खते। बम्बई भाषण एशी ५, १९९८ जगत् भार माधका मार्ग य दानों एक महो। पिसे जगत्को इस संधि भार माना , उस मास बनिम्प पति और अमावना होती है, ऐसा माम व है। १ बालियान रम्ना मला मिमी । सत्या मामा शानि | A पासो पुनःम पवार मुन्ना कोयामा परेदिसा बोस्पिडमी पर। सीमामा जमित मपि दुई। बायोमोष-परमात्म्यप --1 मरमरम मापाप ममता।
पर ११८ १११] विविध पत्र मावि संप्रा-२५ों वर्ष ३१८ सम्बई, ग्रामण मुदी १० पुष १९९८ ॐ नमः निष्काम यथायोग्य निन वपार्मित कर्मोको भोगते हए भविम्पमें वास समय व्यतीत होगा, ये कर्म यदि तीव्रतासे उत्यमें गकर आपको प्राप्त होते हो तो पैसा होने देना योग्य है, ऐसा बहुत पोका सकाप है। मिससे म्यावहारिक प्रसंगमापी चारों तरफसे चिसा उत्पम हो, ऐसे कारणों को देखकर भी निर्भयताके वाप्रित रहना ही योग्य है। मार्ग इसी तरह है। हामें हम कुछ विशेष नहीं लिख सकते, इसके लिये क्षमा मांगते हैं। नौगरमुख पामर नब माणे, मलममुख म छमारी रे, मनुमपिण वेम प्यानवM मुख, कोण नाणे नर नारी है। मन मदिसार्नु पासा उपर, पीना काम करत रे । (२) सत् ' एक प्रदेशमर भी दूर नहीं है, परन्तु उसके प्राप्त करनेमें बनत बतराय रहा करते है बौर एक एक नतराय लोकके बराबर है। नीषका करीन्य यही है कि उस सत्का अप्रमतासे प्रवण, मनन, और निदिध्यासन करमेका वपर निसय रस्से । (३) रे राम 1 मिस मनसरपर जो प्राप्त हो नाप उसी तोपपूर्वक गमा, यह सपुरुषोंका कहा वा सनातन धर्म है-ऐसा पसिष्ठ करते थे। . ३१९ बा, भावण पुटी १० बुष १९९८ मन मदिसान पासा परे, बीमा काम करत रे, वेम भुवपर्मे मन र परे मानाक्षेपकरत रे । मिस पत्रमें मनको म्पारपाके विषयमें लिखा है, मिस पत्रमें पापडके पचेका स्यान्त किसा, पिस फरमें " पम निपम संयम भार कियो" झ्यादि काम्प भाPि के विषयमें सिम्हा है, जिस पत्रमें मन मादिके मिरोष करमेसे शरीर वादि म्पया उत्पन्न होनेके विपपमें सूचना की है, और इसके बादका एक सामान्य पत्र-पे सब पत्र मिसे है। इस विपपमें मुल्य मतिसबी इम्य वौर मर्षिका प्रत्यक्ष होना, इस बात के संबंध में प्रधान वाक्य बाँचप है। इस प्रश्नके सिवाप बाकीफे पत्रोंका उचर मिसमेका बनुक्रमते विचार होते ए भी हमें हम उसे समागममे पूछना ही योग्य समझते हैं भपात् यह बता देना दाउमें पोम्प मान होता है। निमार मगर मेगन मर गेम कहाँ जान से मार इमारी निम्न गुनगे नत्र सच्ची इसी पर मनुमप रिना भी मर ग्रनारी ननमुन नहीं बन सच्चे।
भीमद् रामचन्द्र [पत्र १२ पदि कोई दूसरा मी परमार्पर्सी विचार--प्रश्न-उत्पम ऐौर पर उसे निसार रख सको मिस रस्नेका विचार पोम्प है। पूर्वमें बाराषमा की हुई, जिसका नाम केसर उपानि, ऐसी समाधि उदयरूपसे यती है। में कहाँ गाँधम, माण, और मननका सापन किस प्रकार गता है। बानन्दधनना के दो पाप पार माये है, उन्हें मिसकर यह पत्र समाप्त करता है। इनविष परस्सी मन पिसरापी, मिनरर गण में गार रं, दीनघुनी मार नगरवी, मानंदपन पद पाने हो। मष्टिमिन सबफ हिम अपगणिप। मन मशिगनु पाम पपरे, मीना काम करत । ३२० समई, भाषण पदौ १०, १९९८ मन पहिसान महासा परे, बीमा काम करव रे, म अवपमें मन र परे, पानाक्षेपकवत रे। पन पन सासन भीमिनररवमुं । निस प्रकार परसंबपी दूसरे समस्त कार्य करते हुए भी पतिनता ( महिण) मीका मन अपने प भरमें ही छीन यता है, उसी तय सम्पररी जानका चित्त संसारमें यकर समस्त काकि सगमें प्राति करते पर भी, मानौसे माण किये हुए उपदेश-धर्म हो म राताहै। समस्त प्रसारमें सौ और पुस्पके स्नेहको ही प्रमान माना गया है, उसमें भी पुरुपके प्रति नौका प्रेम इससे भी किसी प्रकार विशेष प्रधान माना गया है और इसमें भी पति के प्रति पतिता का स्नेह तो सपान गिना गया है। यह स्मेह ऐसा मप्रनान क्यों माना गया है ! इसके उत्तरमें सक्तको प्रथम दिखानेके सिमे इस यतको देनेवाले सितकार करते किम उस स्नेहको सर्व- मान सौमिप मानते है कि दूसरे सब परसंबधी (और दूसरे मी) काम करते यनेपर भी उस पतिवा हिमका बिच पति ही मनम्मस प्रेमरूपते स्मरणस्मसे, प्यामरूपसे और ममस्मसे यवाहै। परत मितकर पते है कि इस स्नेहका चरण तो संसार प्रत्यपी है और यहाँ तो ससार त्पपी करनेके रिये करने म है। इसलिये जिसमें यह स्ने मनरूपसे प्रेमरूपसे, स्मरणरूपसे, पामस्मसे और मारपसे करना पोम्प है-गिसमें पह स्नेह ससार-परिणमनको प्राप्त करता है- उस उपदेश-धर्मको प्रते। उस स्लेशको पतिस्ताप ऐसे मुमयको बानसभा मवणरूप उपदेश भार धर्ममें उसी प्रचारसे करना पोम्प बोर मा यो गोल उसके लिये उसी प्रकारसे चाचरण करता है, तब या "ता' नामको समपितसंबंधी शिम स्पित ऐ बावा, ऐसा हम मानते । - १५ प्रभा पवा करके मम सम्पम देनेवाले निमकानगान म्हापसमा दो भानरचे मापूर पर पाय है।
विविध पम मावि संप्रार-श्यों व ऐसे वर्षसे भरपूर ये दो पद है। पहिण पद मफिप्रधान है, परन्तु यदि इस प्रकारसे ग्रह वाशयसे गांवका निदिध्यासन न हो, तो फिर दूसरा पद ज्ञानप्रपान जैसा मासित होता है, मौर तुम्हें मी मासित होगा, ऐसा समझकर उस सरे पदका उस प्रकारका मास-बोध-कोनेके लिये फिरसे पत्रके नवमें केवल प्रपमका एक ही पद लिसकर प्रधामरूपसे भक्तिको प्रदर्शित किया है। मक्तिप्रधान दशासे माचरण करमेस बोरके सम्म वादि दोष मुगमतासे नष्ट हो जाते है, ऐसा बानी पुरुषोंका प्रधान माशय है। ठस भकिमें विस चौवको माप भी निष्काम भक्ति उत्पम हो गई हो, तो यह वातसे दोपोसे र करने के लिये योग्य होता है। कपड़ान, अथवा बानप्रघान-दशा, ये ममुगम मार्गको वोर, स्वर वादि दोपकी मोर, वयवा पार्थसबपी भ्रांतिकी बोर हे चाते है, प्राय करके ऐसा ही होता ह, उसमें भी इस कालमें सो गात कामतक बीवनपर्यंत मी मीसको मक्तिप्रधान-दशाका दोबारावम करना योग्य है। पानियोंने ऐसा ही नियय किया मागम होता है (हमें ऐसा माश्म होता है, और ऐसा हो)। तुम्हारे उदयमें जो मक्केि दर्शन करनेको इन्सा, (में) उसका प्रतियप करमेवाम मारा प्रारम्ब-स्थिति है और उस स्थिति के परिपन होनेमें नमी देरी है, फिर उस मधिको प्रयश- रूपमें तो शामें गृहस्थाश्रम है, और चित्रपट सन्यस्त-आभम है, या पानका एक दूसरा मुम्प प्रतिबंध है। उस मधिसे उस पारमस्वरूप पुस्पको दशा फिर फिरसे उसके वाक्य आदिके अनुसथानसे विचार करमा योम्य है, और पा उसके एय-दर्शनसे मी महान् फ्छ है। इस बातको यहाँ सक्षिप्त करमी पाती है। मुंगी ईसीकाने घटकामे, वे मुंगी मग नोगे रे या बास्य परम्परागस है। ऐसा होना किसी पद संभव है, तयापि उस प्रोफेसरकी गरेपणाके अनुसार यदि मान कि ऐसा नहीं होता, तो मी इसमें कोई पनि नहीं है, स्पोंकि पब प्रान्त पैसा प्रमाष उत्पम कर सकता है, तो फिर सितिका ही अनुमा अथवा विचार करना पाहिये । प्राय करके इस पन्तके साबमें किसीको हो सका होगी, इसलिये पाहात मान्य है, ऐसा माश्म होता है। या ठोकतापिसे मी अनुभवगम्य है, इसलिये सियतमें उसकी प्ररसता समझकर महान् पुरुष उस रातको देते आये है, और किसी तरा ऐसा होना हम समय मी मानत है। काचित् पोपी देरके किये बह दति सिद्ध न हो ऐसा प्रमाणित हो मी नाप, तो मी तीनों काल में निरावाष-सह-सिट बात उसके सिखान-पकी वोहै। मिनस्तस्प या मिन भाराप, ते सहि मिनपर परे भामम्दपनमी वथा पसरे सब बानीपुरुष ऐसा ही करते है। और फिर जिनमगवान् और ही प्रकारसे करत है कि वनम्तबार दिनमगमान्को मक्ति करनेपर भी बीयफा कम्न्याण मही हुवा। दिन- मगनाम्क मार्गमें पन्नेबारे जी-मुरूप ऐसा करते हैं कि दिनमगवान्को बारापमा करते हैं, और नहीकी माराधना करते गाते है, भपना उमफी भारापमा करनेका उपाय करता है, फिर मी ऐमा माम मही सेवा किये प्रिनवर हो गये, तानों का बामप मित तो यही परित का जाता है, तो फिर पर बात शंका करने योग्य क्यों नहीं!
भीमद् पद [पा १ ३२१ बई, भाषण पदी १९९८ - म भुवपमें मन र परे, मानसिपकांत रे सिच विचार-वान विशेपत हो गया है, ऐसा मानापकरत'-माम-कस्पाणको एमबाठा पुरुष हानीके मुम्से अषण किये गए शाम-कम्मापनप धर्ममें निश्चय परिणामसे मनको धारण करता है—ा उपरक पदोंका सामान्य मात्र है। उस निश्चय परिणामका सहप यहाँ से पटता है, इस बातको पहले ही बताया है। पर इसी तय पटता । कि मिस तय परके दूसरे काम प्रति करवे पर भी पतिमवा बीका मन अपने प्रिय सामामें ही सीन पता है । इस फ्रका विशेष बर्ष पहिले मिला है, उसे स्मरण करके मितरूप उपरफे परके साथ उसका अनुसषान परमा योग्य है क्योकि " मा महिमाम् पारम उपमे" यह परह के तरूम है। परमन्त समर्थ सातका प्रतिपान करते हुए जानके परिणाममें उस सिविके ठीक ठीक बैठ जाने के लिये समय स्यंत ही देना योम्प है, ऐसा मानकर मंपका इस स्पष्पर अगत्म-ससारमें- माय मुख्य, पुरुषके प्रति स्पेश माठि भतरीत जो सोका काम्प प्रेम है उसी प्रेमको सम्पुरपसे प्रगण ये हुए धर्म परिममित करके पे करते है। उस सत्पुरपारा अषण किये हुए धर्म, बन्प सब पापोंके प्रति बो प्रेम है, उससे उदासीन होकर एक म्पसे, एक स्मरणसे, एक श्रेणीसे पफ उपयोगसे और एक परिणामसे सर्व धिमें बनेपाले काम्प प्रेमको हटाकर, वधर्मरूप करनेका उपरेछ किया गया है। इस काम्प पेमसे मी ममत गुणनिशिए प्रेम मुतके प्रति करना योग्य है, फिर म त इमय सीमा मही बना सम्ध। इस कारण गाँतकात पाँच सका, पीकका प्रेम कहा गया है या सितशी चरम सीमातक नही पहुंध सका है। अनादि काम्से मालो संसाररूप वर्मत परिणति प्राप्त ऐनेके कारण उसे अस्मारस्म किसी मी असवान नना। यातसे करणोध स्पेग मिनपर उस बंश-रिक प्रगट होनेका योग परि उसे मिठा मी तो इस विपम स्मार-परिणति के कारण उसे पाचश नहीं मिम्ता । रक्तक यारा नहीं मिलता तबतक गालको निमको प्राशिका भान पना योग्य नहीं और बबतक इस प्राधि न हो तबतक जीनस को मुरपना माप नहोउसे हु भी कहना हो योम्प है। ऐसा देखकर पिसे पर्वत बनत हरुमा प्रास , ऐसा बाम पुम्प, दुम दूर करनेके मिस मार्गको उसने जाना है, उस मार्गको परवा पा करता है और भविष्यमै धेगा। मार्ग मोकिमिसमें गालका सामान कि मप प्रगट हुवा है-विसमें बासका साभाविक मुप प्रगट मा है-ऐसा बानी पुल्प हो उस कान-परिणति भार इसते प्राप्त बोरस्परिणाम है उससे मामाको स्वाभाविकरूपसे समझा समानेके पोप हैकर सकमेके योग्य है और पाचन मामा के सामाबिक शानपूर्व ही हाता है, इसन्पेि पा उस दुसर कर सबनेमें समर्प है। इसलिये पहिमपन किसी भी प्रामसे भागको प्रवण हो उसे गर्वमा गानफर उसमें परम प्रेम पारित हो तो का अपना अनुमसे बामात्र दामानिक सप प्रगट ऐ सस्ता है।
पा १२२] पिपिप पर मादि सपा-२५ों पर्प ३२२ बर्ग, ग्रावण वदी १९९८ निरन्तर हो जात्मसरूप या करता है, जिसमें प्रारम्पोदयके सिपाप दूसरे किसी भी मयका शका योग नहीं है। इस उदयमें कमी परमार्प मापा कहनेका योग उदय माता है, कमी परमार्प-भाषा लिसनेका पाग उदय पाता है, और कमी परमार्य-भाषा समझानेका योग उदय लाता है। हमें तो पदयाका योग विशेषतासे गा करता है, और वो कुछ उदयमें नहीं पाता उसे हमें तो कर सकनेकी असमर्पता है। मीवितम्पको केवल उदयाधीन करनेसे-कोनानेसे-विषमता र हो गई है। तुम्हारे प्रति, अपने प्रति दौर दूसरों के प्रति किसी मी तरका माधिक मात्र प्राय उदित नहीं होता, और इसी कारण पत्र बादि कार्य करनेरूप परमार्थ-भाषा-योगसे बकाश प्राप्त मही, ऐसा लिखा है, यह ऐसा हो। पूर्वोपार्वित सामाविक उदयके अनुसार देहकी स्थिति है वारममावसे उसका नकाश अस्पत समावरूप है। उस पुरुपके स्मरूपको जानकर उसको मक्तिके सम्सगका महान् फल होता है, जो केवल चित्रपरके पानसे नही मिन्ता । गो उस पुरुपके स्वरूपको पानता है, उसे स्वाभाविक अस्पत सुख मारमस्वरूप प्रगट होता है। इसके प्रगट होने के कारणमूत उस पुरुषको जानकर सब प्रकारको असंसार-संसार-कामना परित्याग सप करके परित्याग करके-मुख मधिसे उस पुरुप-स्वम्पका विच करना योग्य है। जैसा ऊपर कहा, चित्रपटकी प्रतिमाके एय-दर्शनसे महान् फस होता है यह माम्प बिसवादररित समझकर मिला है। मन महिसान पहासा पपरे, बीना काम करत रे इस पदके विस्तृत वर्षको वाम-परिणामनप करके उस प्रेम-मधिको सपुरुषमत्यतरपसे करमा योग्य है, ऐसा सम तीर्थकरोने कहा है, तमाममें करते हैं, और मविप्पमें मी ऐसा ही करेंगे। उस पुरमसे प्राप्त उसकी वास्मपति-सूचक मापा, गिसका विधारनान विपरित हो गया है, ऐसा पुख्य, उस पुरुषको भारमकस्याण के लिये नानकर, यह भुत (अत्रण) धर्ममें मन (बारमा) को पारण करता है उस रूपसे परिणाम करता है। परिणाम किस तय करना पोम्प है, इस बासको मन महिनन पाम ठपरे, बार्ग काम करत रे' या त देकर समर्थन किया है। ठीक तो इस तर पटवा है कि यपपि पुरुषके प्रति बीका काम्प-प्रेम ससारके बम्प भायोंकी अपेक्षा शिरोमणि है, फिर भी उस प्रेमसे मनत गुणषिशिय प्रेम, सपुस्पसे प्राप्त वारमरूप श्रुतधर्ममें ही करना योग्य है, परन्तु इस प्रेमका स्वरूप नयाँ रतको उपम कर जाता है, वहाँ बानका अवश महै, ऐसा समझकर ऐ, परिसीमाभूत सुतधर्मके किये मारफे प्रति पीके काम्प प्रेमका बत दिया है। यहाँ रयत सिमातको परम सौमातक नहीं पाँचता इसफ मागे पाणी पीछेक ही परिणामको पाकर यनाता है, और वास्म-म्पटिसे ऐसा माश्म होता है।
भीमद् पबम्ब [पा १० ૨૩ बाई, पाषण ही ११ गुरु १९९८ गुमन्म संपम माई ००तमतीर्थ जिसकी भास्मस्मापमें स्पिति । ऐसा यो उसका निष्काम स्मरणपूर्वक पपापोम्प बाँचना । उस तरफसे "मायफळ हायिक समक्ति नहीं होता" पाहि सांपी म्यास्पानको पानिपपक तुम्हारा मिसा हुमा पत्र प्राप्त मा । यो भार उम उस प्रकारसे प्रतिपादन रते है-उपदेश करते है, और उस सबमें चीनको विशेषरूपसे प्रेरणा करते हैं ये गार पछि उतनी प्रेरणा-गवेषणा-भाग के कल्याणके विषयमें करेंगे तो इस प्रश्नके समाधान हानेका उने कमी म कमी पास बासर मिझेगा | उन मावोंक प्रति रोनारि करमा योग्य नहीं है, केनरा निम्फाम करुणासे हो उन बायोको देखना पोम्प है। इस संघमें किसी प्रकारका पित्तम फेर लाना योग्य नहीं, उस उस प्रसगपर शोको उनके प्रति कोष मान करना योग्य महो । कदापित उन मायाको उपदेश देकर समधानेकी तुमें पिता होती हो तो भी उसके लिये तुम वर्तमान दशाक्ये देखते हुए तोमचारोगे, इसलिये वनुकपा-बुद्धि और समता-पुरी पूर्वक उन बीचोंके प्रति मर परिणामसे देखना, सपा ऐसी हो पण करना चाहिये और यही परमार्थ मार्ग, ऐसा नियम रखना योग्य है। हाम्मे उन्हें गो कर्मसमधी वावरण है, उसे मग करने के लिये यदि ने स्वयं ही पिता उत्पन हो तो सिर तुमसे अपना राम जैसे दूसरे ससंगीके मुम्से, उने कुछ मी बारम्बार मरण करने उम्सनधि अपम ; या किसी बामसमप सपुरुपके सयोगस मार्गको प्राप्ति हो परन्तु ऐसा नवा उत्पा होनेका यदि उनके पास साबन भी हो तो हसमें वे ऐसी घेणापूर्वक नाचरण न करें। और यतक उस उस प्रकारका गावकी पेय यसो है नवक वाकर पैसे आना-पुस्पका पाप भी उसके किम निफर होता है तो फिर तुम रोगोंके वाय निष्पा हो वौर उनें या शरूप माझ्म पो, इसमें कुछ मी वापर्य नी । ऐसा समझकर पर प्रदर्शित कोई अंतरंग मावनासे उनके प्रति पनि करना और किसी प्रकारसे मी विससे उमें तुमारेसे क्रेशका कम कारण उपस्थित हो ऐसा विचार करना, यह मार्गमें पोम्प गिना गपाहै। फिर, एक सण धनुरोध कर देना मी सररूपसे मिलने पोम्प माम होता है, किसे मिसेदते । पहले कि हमने पहिले म गेगोसे कहा था कि जैसे बने से हमारे स्परम दूसरे पायोसे कम ही बात करना । इस मनुफममें बस्ने म्य पनि विस्मृत हो गया हो वो मा फिरसे स्मरण रखना । हमारे सममें वीर हमायरा कहे गये अपपा से गये मायोक संगमें ऐसा करना योग्य है और हमें सके भरणोंको तुम पर क्या देना पोप मा । परन्तु पदि या व बनुनमसे नमुसरण करने में मपत होता है तो मा सरे बायोटो का बादिका कारण होता है पा मी बब 'पापिका पर्चा इस्पादिके पसे तुमारे अनुभवमें वा गया है। इसका परिणाम पा घेता है कि जो भरण धानको प्राप्त होनसे कापामके कारण हों, उन गानोंको उन कारणोधी प्राति इस मरमें होता मनाती स्पोकि ये तो बानी मानतासे किस परिधान महीई ऐसे सपुस्यके सबमें तुम छोगोंसे माना पाक्से उस सपुम्पके प्रति विमुख होते हैं उसके विषय, भामापूर्वक या - पर १२३] विविध पत्र मावि संप्रा-२५ वा पप दूसरी-दूसरी पेठा कस्पित कर लेते हैं, और फिरसे ऐसा सयोग मिल्नेपर पैसी विमुखता प्राय फरके भौर यम्यान हो नाती है। ऐसा न होने देनेक जिये, और इस मवमें यदि उनें ऐसा सयोग बमानपनेसे मिठ मी बाय वो वे कदाचित् मेयको प्राप्त कर सकेंगे, ऐसी धारणा रसकर, अतरगमें ऐसे सत्पुरुषको प्रगट रसकर वामरुमसे गुप्त रसना ही अधिक योग्य है। वह गुसपना कुछ मापा-कपट नहीं है, क्योंकि इस तरा बताव करना मापा-कपटका हेतु नहीं है, म भविष्य-कास्याणका ही है। यदि ऐसा हो तो या मापा-कपट नहीं होता, ऐसा मानते है। मिसे दर्शनमोहनीय उदयमें यम्मानरूपसे है, ऐसे चीनको सपनेहरा किसी प्रकार सत्पुरुप वादके विषयमें नयापूर्वक योजनेका मवसर प्राप्त न हो, इतमा उपयोग रखकर पछना, यह उसका और उपयोग रस्नेवाले दोनोंके कायाणका कारण है। बानो पुस्पके लिषयमें क्यापूर्वक गोम्ना, तमा इस प्रकारके प्रसगमें उत्साही होना, मीवके बनत संसारके मनेका कारण है ऐसा तोर्पकर कहते है । उस पुरुपके गुणगान करना, उस प्रसगमें उत्साही होना, और उसकी माझा सरल परिणामसे परम उपयोग-परिपूर्णक बना, इसे तीर्थकर मनत ससारका नाश करनेवाला करते है वौर ये बाप बिनगममें है। मतस मीन इन पाक्योको अषण करते होंगे, फिर भी मिनोंने प्रथम वाक्यको निष्फल भार दूसरे पास्यको सफर किया हो, ऐसे बीच तो स्वचित् ही दसनेमें जाते हैं। बीपने मनतबार प्रपम वाक्यको सफल और दूसरे गाम्पको निष्फल किया है। उस तबके परिणाममें मानेमें उसे बिल्कुल मी समय नहीं समाता, स्पोकि भनादि कासे उसकी वारमा मोह नामकी मदिरा म्पात हो रही है। इसलिये वारमार पिचारकर पैसे से प्रसगमें पपाशकि, पपावत और वीर्यपूर्वक कार को अनुसार भावरण करना योम्प ।। फापित् ऐसा मान को कि ' इस कामें क्षायिक समकित नहीं होता, ' ऐसा मिम माग ममें स्पष्ट किसा। अब उस जीवको विचार करना योग्य है कि 'क्षापिक समकितका स्पा वर्ष होता है। निसके एक नबकारमा बितना भी मत प्रस्पारस्पान नहीं होता, फिर मी पह गान अधिकसे बपिन तान मपमें और मही तो उसी भवमें परम परको प्राप्त करता है, ऐसी महान् बामर्य करने- पाछी उस समकितकी म्पाया है फिर बब ऐसी पर कौनसी दशा समझनी चाहिये कि जिसे सायिक समकित का माप ! ' यदि दीपंकर मगवान्की स प्रया' का माम पायक समकित माने तो उस भयाको फैसो समझनी चाहिये ! भोर मो प्रदा हम समझते है तो निश्चपसे इस काठमें होती ही मौ । यदि ऐसा मालूम नहीं होता कि अमुक दशा बपका नमुक प्रमाको भाषिक समकित करा t,वो फिर हम करते है कि निनागमके शादोंका केवल यही अर्थ मा कि कापिक समकित होता हो महाँ । जब पदि ऐसा समझो कि ये शब्द किसी दूसरे भाशयसे छे गये है, अयत्रा किसी पीके का निसर्जन दोपसे लिस पे गये है तो मिस नौवने इस लिपपमें आसपूर्वक प्रतिपाम किया हो, का गीर से दोपको प्रश्न होगा, या सभे करणापूर्वक विचारना योम्प है। में बिमें निनसूत्रों के नाम का गाता है, उन सूत्रोंमें 'धाषिक समकित नहीं है' ऐसा स्पर नहीं रिसा, तपा परम्परागत वीर सरे मी पाससे प्रपोंमें यह बात पछी बाती..ऐमा . 1१२ भीम प्रसाद [पा १२५ पसा है, और मुना भी है और यह वाक्य मिप्पा है अपवा मृपा है, ऐसा हमारा अभिप्राय नहीं है तथा पर माप विस प्रकारसे सिक्षा है यह एकति बमिप्रापसे सिसा, ऐसा मा हमें नहीं गता। कदाचित् ऐसा समझो किवाय एकतिस्मसे ऐसा हो तो मी किसी मी प्रकारसे म्याफुल होना पोग्य महो। करण लि पर इन सब म्यास्यानोको म्पुस्पके नाशयपूर्वक नही नाना तो फिर से मान्पायें ही सफस नही है। काचित् समझौ कि इसके स्थानमें, मिनागममें मिला हो कि भोपे कालको तरा पाच कामे मो बातसे गांवों मोम ऐगा, तो इस बातका भत्रण करना कोई तुमारे बोर हमारे सिपे कम्पाणकारी नही हो सकता, अपना मोध-प्राप्तिका कारण मही हो सकता, पोक्ति बिस दशा यह मोक-प्राप्ति की है, उसी दशाको प्राप्ति हो रहै, उपयोगी है, और कम्पाणकारी है। कलम करमा तो एक बात मात्र है, इसी तय इससे प्रविन पाप मी मात्र एक गात ही है। ये दोनों ही बातें लिया हो, अपना कोई एक मिसाणे, वयमा दोनोंसे एक भी बात न रिसकर कई मी व्यवस्था म बताई गई हो, तो भी एप वपना मोक्षका कारण नहीं है। केवर मध दशा हो बम , और मोक्ष दया ही मोक्ष, क्षायिक दशा ही चायिक है, क्य दशा को न्यो बो प्रमण है पापण है, जो मनन हैमा मनन है, जो परिणाम है परिणाम है, जो प्रति प्रति है-ऐसा सपुस्पका नियम है। जो कोमा मोक्ष महो, यो मोक्ष हैपयप नहीं, यो बोसो, बो बिस स्पिति या उसी स्थिति में है। जिस प्रकार अंब-गुदि दूर हुए बिना मोश जीवन्मुद्धि-मानना कार्यकारी नहीं है उसी तर वापिक धासे मायिक मानना मी कार्यकारी महो। म माननेका फर मही, फल केवल दशाका है। भब पर बात है तो फिर वर नमी वामा हामें कौनसी दशामें है, और उस धापिक समकिता नीवको दशाका विचार करने योग्य है या नहीं, वपषा उससे उत्तरता नपया उससे पाठी दशा विचारको गौच पपाहपसे कर सकता है अपना नहीं सोच विचार करमा गीतको पत्र है। पम्त मनतकास बीत गया फिर मी नावने ऐसा विचार नहीं किया | उसे ऐसा पार करना पोप है एसा उसे मासित मौ महीमा वोर यह गोल वनंतबार निममता सिर-पाकका उप रेश पर पुको उपर कोर उस बमको उसने बिना विचारे से किया है-चारपूर्वक पपार्व मिधारसे नही किया। जिस प्रकार जीबने पूर्वमें यपार्य विचार विमा हो ऐसा किया है उसी तय प उस दशा (पया अपारदशा) के बिना वर्तमानमें एसा करता है, और जबतक मानको अपने पल का मान नहीं होगा तबतक मविप्पमें भी इसी तर प्रवृत्ति करता येगा । जीके किसी मी महापुम्पक योगका त्याग करनेसे तया से मिप्या उपदेशपर पसे बीतका बोन-बाबर गध प्राप्त हो गया है ऐसा गानकर इस विषयमें सामान होकर पर यह निराकरण होनेका चार जगा र सा उपोश करनेसे सरेको प्रेरणा रनेसे और बाइपूर्वक बोलने क पापगा। मषिक पा करें। एक बार मोमो दूर मी मतिसय वतिराम प्रेरणा भी पाणी मोनको ही प्रत होगी। और उस मानको प्राप्त ऐनेके पर ही गौमसे एक बभरका सस्प बोडा राना मी भाशय या मात्र किसी मी प्रकासे कानों का सह करने योग्य नहीं है।
पत्र २२४] विषिष पर मादि सपा-पों व तीर्यकरन मी ऐसा ही कहा है, वौर पाहामें उसके भागममें मी है, ऐसा बात है। कदाचित् यदि ऐसे कहा ावा बर्य बागममें नहीं मा हो, तो मी नो शरद ऊपर को मागम ही है- विनागम हो। ये सम्द राग, देष और मान इन तीनों कारणोंसे रहित, प्रगटबपसे लिने गये है, इसलिप सेपनीय है। पोरेसे पापोंमें ही लिस गठमेके लिये विचार किया हुमा यह पत्र विस्तृत हो गया है, और यपपि यह गुत ही संक्षेपमें मिला है, फिर भी गात प्रकारसे भपूर्ण स्थतिसे पर पत्र वय समास करना पाता है। तमे तथा तुम्हारे नैसे दूसरे दिन मिन भाईयोंका तुम्हें समागम है उने, उस प्रकार के प्रसगमें इस पत्रके प्रथम भागको विशेषरूपसे स्मरणमें रहना योम्प है, और काफीका दूसरा भाग तु मौर दूसरे वन्य मुमुल नीनों को मारमार विचारमा योग्य है। यहाँ समाधि है। " प्रारम्बदेही " ३२४ वर्मा, भावण दी ११ रवि १९४८ . ) स्वस्ति श्रीसायम्म प्राम शुमस्थाने स्थित, परमार्थक नसा निश्चया, निफामस्वरूप ( के पारमार स्मरणरूप, मुमुक्ष पुरुपोंस क्मन्य प्रेमसे सेवन करभे योम्प, परम सरस, वौर शान्तमति ऐसे श्री 'मुभाम्प " के प्रति भी " मोहमयो " स्थानसे निफामस्वरूप ऐसे स्मरणम्प सत्पुरुषका विनयपूर्वक पथायोग्य पांचे। जिसमें प्रेम-भकि प्रधान निकामहपसे लिसी है ऐसे तुम्हारे लिसे हुए बातसे पत्र मनुकमसे प्राप्त हए है। भारमाकर-स्पिति और उपाधि-योगल्स कारणसे केवमन फकी पाच मात्र लिस सका। पहा माई रेपासकरका शारीरिक स्थिति पयापोम्य न यनेसे, बौर म्यबहारसंबपी काम कामके का जानेसे उपाधि-योग भी विशेष हसा बापा है, और रहा करता है इस कारण इस भौमामें बाहर निकलना मान्य हो गया है। चोर इसके कारण तुम्हारा निष्काम समागम मास नहीं हो सका, और फिर माडीके पहिछ ठस प्रकारका सपोग प्राप्त होना समय भी मही है। तुम्हारे लिखे हुए बहुतसे पोंमें गांव वालि समाव और परमात्रके मानसे प्रस्न लिम्मे हुए बाते ये इसी कारणसे उनका मी प्रप्युचर नहीं सिखा पा सका। इस बीचमें रमे मी जिहासुओंके मातसे पर मिरे, प्राय करके इसी फारणसे ही उनका मी उतर नहीं लिण्डा मा सका। इसमें गो उपाधि-योग रहता है, यदि उस योगके प्रतिपके पागनेका विचार करें वो स्पाग हो सकता है तथापि उस उपाधि-पोगके सहन करनेस प्रिस प्रारम्भको निति होती है, उसे उसी प्रकारसे सहन करमेके सिवाय दूसरी इच्छा नहीं होती; इसलिये इसी योगसे उस प्रारम्पय निव होने देना पोम्य है, ऐसा समझते हैं, और ऐसी ही स्पिति है। शासों में इस कामको कम क्रमसे भीग होनेके पोप कहा ह धार इस प्रकारसे कम क्रमस इजा मी करता है। मुझपरपसे या माणता परमार्थसपी क्षीणता ही फही है। जिस कामें अक्त कठिनतासे परमार्पको प्रासि हो, उस काउने दुपम काठ करना पाहिये । यपपि मिसमे सकालमें । - भीम रामचन्द्र [पत्र १४ परमार्थको प्राप्ति होती है ऐसे पुरुषोंका समोग दुर्गम ही है, पर ऐसे काम तो या मर्पत हो दुर्गम ऐहा है। बालों को परमायापि क्षीण होती ना हो है, इस कारण उसके प्रति जानी पुष्पों के उपपया कम होता पावाद, और इससे परम्परसे या उपदेश मो क्षीण होता जा या है- वर्षात् मा क्रममसे परमार्थ-मार्गक म्पमा हानेका काठ भा रहा। इस कामें, और उसमें मी नामक समाभग सौ वर्षोंसे मनुष्योंकी परमार्थति मत धाम हो गई है, और या बारा प्रत्यक्ष है। सामानदप्तामाके समपतक मनुष्योंमें यो सरळ रचि पो, उसमें और बारकी सरक जिम महान् क्न्तर हो गया है। उस समयता मनुप्पोको गतिमें कुछ कुछ वाकारित, परमार्प इम, और तसंषा निययमें पता-ये बातें जैसी वा पैसा वाब नही हो । स कारण भान तो गुत ही धोणता मा गई है। पति ममी इस कामें परमार्पाचिका सईया म्पद मीषा, सपा मूमि मी सत्पुम्पोस मत कहो, तो भी पा का उस- काकी पेक्षा पविक विषम है-गत विषम है-~-ऐसा मानते है। इस प्रकार काका स्वरूप देसकर सदमें बहारूपसे महान् जनुकंपा या करती है। किसी मी प्रकारसे जीवोंकी मस्पत दुसकी निविका उपाय मो सोम परमार्थ, पहि उस परमार्यसबभी पति समती जाती हो, तो ही उसे सत्पुरुपको पहिचान ऐवी है, नही तो नहीं गवावर ति फिरस पीवित हो, और किती मी नीनोका--पास मीनोंको-परमार्पसबषी मार्ग प्राप्त हो, ऐसी बनुकंपा बारपसे या करती है तो मी एसा होना हम बहुत दुर्गम मानते है, वौर उसके कारण मी उपर बवा पे । मिस पुस्पका बौपे काळमें मिना दुर्गम पा, ऐसे पुरुषका सपोग इस कामें हमा है, पर नाचोंकी परमार्पसाषी पिता अस्पत भाग हो गयी है। वर्षात् उस पुरुषको पहिचान होना अस्पत कठिन है । उसमें मी गृहपास वाधिक प्रसगमें उस पुरुषको स्थिति देसकर तो पारको प्रति आना और मी दुर्गम है - अपत की दुर्गम है और पति काचित् प्रतीति बा भी गई तो इसमें जो उसका प्रारम्पका क्रम पवारे उसे देखकर उसका निषय गना दुभ है और पनि कदाचिद उसका निभय मी बाय तो मी उसका ससग यना एम , मौर परमार्थका गो मुम्प कारण वो यही है, उसे ऐसी स्पितिम देखकर उपर बताप पर कारणोंको अधिक बसबालमापसे देसत्ते दौर पह बात देसकर फिर फिरसे अनुकपा उत्पम ऐ बाती है। ईबरेपासे मिस किसी बीपका मी पाम वर्तमानमें होना ऐगा यह तो उसी तय होगा, और हम इस पिपपमें ऐसा मी मानते है कि परमेसे मही परन्तु इमसे ही होगा । परन्तु हम ऐसा मानते है कि जैसी दमा बापापुरम बिससे गांवोंको पैसा परमार्थ-विचार और परमाप-प्रापित हो सके पैसा सपोग हमें किसी प्रकार से कम होमा।हम ऐसा मानते हैं यदि या देश गंगा पमुना आकि प्रधम बापा गुबराव देशमें उत्पम रोती-हिंगत होती तो या एक सम्मान मण होता । तथा हम ऐसा मानते है कि यदि प्रारम्पमें गहमास बाकीम होता और अपवर्ष पापमपास होता पो पर मो फ सरा बरमान कारण होता । समिर गामास बाकी होता बार उपाधि पर १२४] रिविष पन मादि सपा-२०वा पर्प योगरूप प्रारम्य म होता, तो वह परमार्थका तीसरा वसवान कारण होता, ऐसा मानते है। पहिले को हुए दो कारण तो हो चुके है, इसलिये अव उनका निवारण नहीं हो सकता, फिर भी नमी ऐसा होना बाकी है कि पीसरा उपारि-पोगरूप प्रारम्प शीघ्रतासे निहस हो–उसका निष्काम करुणा पूर्वक बेटन हो। किन्तु यह विचार मी नमी योग्य स्पिति में है, अर्यात् ऐसी हो इस पती है कि उस प्रारम्पका सानमें ही प्रतीकार हो बाप, अपया उस प्रकारका उदय विशेष उदयमें बाकर पोरे ही काममें समाप्त हो नाय, तो ही बसी निकाम करुणा ग सकती है। और इन दो प्रकारे सो हाल्में उदासीनसासे वर्षात् सामान्यम्पसे हो रहना है, ऐसी बारम-मावना है और इस मघमें बारमार महान् चार हा करता है। नबतक उपाधि-योग समाप्त नहीं होता सबतक किस प्रकारके सम्प्रदायपूर्णक परमार्य करना, यह मौनरूपसे और विचार अथवा निर्षिचारमें हो रस्ता है-मर्यात् हसमें या विचार करने के विषयमें उस भाव गता। वाग्माकार स्पिति हो चानेसे प्राप करके चित एक वंश भी उपावि-योगका वेग्न करने योग्य नहीं है, फिर भी पा तो जिस प्रकारसे साम करनेको मिले उसी प्रकारसे सहन करना है, इसलिये उसमें समाधि है। परम्त फिनहीं बीपोंसे परमार्यसंवधी प्रसग पाता है, तो उनें उस उपाधि-योगके कारण हमारी जनुकंपा अनुसार माम नहीं मिलता, और तुम्हारी किसी को कुछ परमार्यसबनी मात भाती है वह भी चिठमें मुस्लिम्से ही प्रवेश हो पाती है, क्योंकि हाम्मे उसका उत्य नहीं है। इस कारण पत्र आदिके प्रसगसे भी तुमारे सिवाय दूसरे मुमुक्ष जीवोंको इन्छिस भनुकंपासे परमार्यापि नहीं दी जा सकती, यह बात मी मित्तको मात पार सगा करती है। पिसके वधनपुछ म हो सकनेके कारण, जीप ससारफे संधों की वादिरूपसे प्राप्त हुए हैं, उन जोपोंकी यष्ठाको भी लेशित करमेको नहीं होती, वर्षात् उसे मी अनुकपास, और माँ बाप पारिक उपकार भादि घरासे उपाधि-योगका बलमान तिसे सहन करते है। और जिस जिसकी जो कामना उस उस प्रारम्भक उदयमें जिस प्रवरस या कामना प्राप्त होनी है, जबतक या उस प्रकारसे न हो, तबतक निधि प्रहण करते हुए भी गौर उदासीन ही पता है। इसमें किसी प्रकारको हमारी कामना नहीं है, हम तो इस सबमें निफाम ही ई, रि मी उस प्रकारके बपन रखनेरूप प्रारम्भ उदयमें गता है। इसे भी दूसरे मुमुक्षुकी परमार्थति उत्पम करनेमें हम विनम्प समप्तत है। नबसे तुम हमें मिसे दो तमासे यह बात-यो उपर अनुमम सिग्यो-पादनकी इच्छा था, परन्तु उस उस प्रकारसे उसका उदय नहीं था, इसम्पेि पसा मही बना था पर उन्य बताने पोम्प था इसलिये इसे सभेपमें कर दिया है, इसे तुम्हें पारमार विचारमेके पिये सिखा है। इसमें बात पार करके सूक्ष्मपसे रूपमें धारण करने योग्य बात जिसी है। तुम भोर गोशाके सिचाप इस पत्रके समाचार नानमे योग्य दूसरे गौर हामें तुम्हारे पाम महीं है, इतनी बात स्मरण रमनेफ लिये ही लिही है। किसी बातमें, शोंके सचिम होनेक कारण, परि कुछ एसा माझ्म कि सभी हमें किसी प्रकारको संसार-मुखमादि बाकी है, तो उस पर्यो रिसे विचारना योग्य है। यह मिषप श्रीमद पवाद [फा १४ परमार्थको प्रालि होता है ऐसे पुरुषोंच सपोग दुईम ही है, पस्तु ऐसे कामें तो या मर्पत हो एम हो रहा है। मोदी परम्पयाति धाण ऐती ना यो है, इस कारण उसके प्रति जानी पुरुपोंके उपोका मा कम होता पाता है, और इससे परम्परासे र उपदेश मी पाण होता मा हा- गर्यात् मन क्रम बमसे परमार्थ-मार्ग म्पयनका कहना याहै। इस काठमें, बोर उसमें मी बामकर लगभग सौ वर्षोंसे मनुष्यों की परमार्थाति यात पाम हो गई है और यह बात प्रत्यक्ष है। सहवालदस्थामांके समपतक मनुप्पोम पो सरल पि पी, उसमें गोर बानका सरस पिम महान् बन्चर हो गया है। उस समक्तक मनुष्यों को रिमें कुछ कुछ मधाकारित, परमार्प इम, और तरसपी निभयमें प्रता-पे या नैसी थी मैसी मानी रही है। इस कारण मान वो बहुत ही बीगना मा गई है। यपि ममी इस कालमें परमापतिका सर्वपा म्याम्के मही हवा, तया ममि मी पुरुपोंसे खत नहीं है, तो मी यह काम उस- काउकी अपेक्षा अधिक विषम है-यात विषम है-ऐसा मानते हैं। इस प्रकारका काका काप देसकर पदपमें मसारपसे महान् मनुकंपा हा करती है। किसी मी प्रफारमे गोषों की भयंत दुसको मितिका उपम मो सोंचम परमार्थ, यदि उस परमार्यसमधी पनि कुछ माती जाती हो तो ही उसे स्पुस्पको पहिचान होती है, नही तो नहीं होती। गा वि फिरसे नारित हो, और किती मी बालों को-पातसे गांवोंको-परमार्थसबपी मार्ग प्राप्त हो, ऐसी बनुकंपा वसारपसे या करती है, तो मी ऐसा होना हम बहुत दुर्गम मानवे है, और उसके कारण भी ऊपर बताये। जिस पुस्पका चोपे कारमें मिम्मा दुर्लभ पा ऐसे पुरुपका संपोग इस कामें इमा है, परन्तु बोकी परमार्पसंगची पिता अपत क्षीण हो गयी. वर्षात् उस पुस्पकी परिचान होना पंत कठिन है । उसमें भी गरमास प्रारिक प्रसंगमें उस पुस्पकी स्थिति देखकर तो मोनको प्रताति भाना बार मी दुर्सम है-भपत ही एर्सम । बौर पदि कापित प्रतीति भा भी गई तो हाम्में गे उसका प्रारम्पका कम पता उसे देकर उसका निधय राना दुर्गम है और परिमाथित् उसका निपप मी से नाम वो मां उसका समग यना धर्मम है और परमार्थका रो मुम्प कारण है तो यही है, उसे ऐसी स्थितिमें देखकर ऊपर बताये हुए चरणोधे अधिक बरबालापसमत है, मार प बात देखर किरकिरस अनुकंपा उत्पम हो जाती है। रेणसे विस सी जीवका मी स्याण वर्तमाममें होना होगा तो उस वयोगा, और हम इस सिपमें ऐसा मी मानते है कि इससे नहीं परन्तु हमसे ही होगा । परन्तु हम ऐसा मानवे IF सी हमारी अनुकंपापुल इशा, बिससे जमाको ममा परमार्थ-रिचार मोर परमार्थ-प्राप्ति हो मरे, मा संपाग हमें मी प्रकार नाम ऐसा मानते है हिपहि पार गंगा यमुना वाप्रपा मथना गुजरात देशमें उपम रोना-होहिंगत होती तो मा एक बयान गाण सातपाइम ऐमा मानते हैं कि परि प्रारज गहमाम माफी म हाता वीर ममचर्य या वास होगा तो यह भी पफ गरा बगान कारण सा । राषित् गइबास बाकी होता और उपारि पर १२६, १२.] विषिष पत्र मावि संग्रह-२को वर्ष एक झणमरक लिये मी इस ससर्गमें रमा अठा नहीं जाता, ऐसा होनेपर मी पास समयसे से मान किन्य घरे बाते हैं, वौर अमी अमुक कातक सेवन करनेका विचार रसना पा, बौर तुमें मी यही अनुरोध कर देना योग्य समसा है। जैसे मने से विनय आदि साघमसे सफल होकर मस्सग, सशासाम्पास, और आरमविचारमें प्रति करना हो श्रेयस्कर। एक समयके लिये मी प्रमा करनेकी तीर्थकर यकी बाधा नहीं है। ३२६ मर्थ श्रावण मदी १९१८ बिस पुरुषका दम्पसे, क्षेत्रसे, कासमे और माक्से किसी भी प्रकारको प्रतिबद्धता मही यता, वा पुरुष नमन करने योग्य है, कीर्तन करने योग्य है, परम प्रेमपूर्वक गुणगान करने योग्य है, और फिर फिरसे विशिए भास्मपरिणामसे म्पान करने योग्य है। मापके पातसे पर मिले हैं। उपावि सुयोग इस प्रकारसे पता है कि उसकी सिममानतामें पत्र सिम्बने योग्प सबका- नहीं पता, अथवा उस ठपारिको उन्यरूप समाधकर मुम्परूपसे भारपना फरत हुए, तुम से पुरुषको भी जानसकर पत्र नहीं हिसा; इसके लिये क्षमा करें । सबसे पिछमें इम उपावि-पोगकी माराधना कर यहै, उस समपसे जैसा मुकमार यता, पैसा मुक्तमान गनुपारि-प्रसगमें मी नहीं बता पा, पेसी नियस दगा मगसिर मी ६ से एकपारासे चमी भायी है। ३२७ बई मात्रपद मुदी १ भीम १९४८ सत् तुम्हारा वैराग्य भारि विपासे पूर्ण एक सविस्तर पत्र करीब तीन Pिन पहले मिला था। मीवको बेरम्प उत्पम होना, इसे हम एक महान् गुण मानते हैं । वौर इसक साप शम, दम, विवेक मारि साधनोंका भनुकमसे उत्पम होनेम्प योग मिसे तो जीवको कम्पाणको प्राप्ति मुडम हो जाती है, ऐसा मानते हैं। (उपरको साइनमें जो योग शप शिवा उसका अप प्रमुग अयमा समग करना चाहिय)। अनत काउस जीव ससारमें परिममण कर पा है, और इस परिभमणमें इसने वर्नत तप, जप, पैरम्प आदि सापन किये माझ्म होते हैं फिर भी जिसमे यथार्थ कम्याग सिद रोता है, ऐसा एक भी साधन हो सका हो ऐसा मायम नही होता । मे तप, अप, अपना भैरम्य, अपवा दूसरे सापन केवल संसारम्प ही ए, ऐसा मो एमा र मह किम कारण हा! यह बात फिर सिरसे विचारम योम्प ।।(यहाँपर किसी भी प्रकारमे या, वा, वैराग्य आदि साधन सब निपट है, ऐमा एमका अभिप्राय नहीं है, परन्तु ये गो निपल हुए, उसका क्या होगा, पह निपार करने लिये पा लिया गया है। पिसे कम्पागको प्रालि हा गाती है, एमे जीपको गम्य भारि साधन तो निपपसे हस्ते हो।
भीमद् पसन्द [पत्र १२५ है कि तीनों कामें हमारे सबध प मारम होमा कल्पित ही समझना चाहिये, वर्षात् ससार-सुर- पिसे हमें निरन्तर उदास मात्र होता है। ये बाप पा समसकर मही मिसे कि तुम हमारे प्रति पुरा कम नि भय है, अपना पर होगा तो पनिाच हो चापगा इन्हें किसी दूसरे ही से सिसा है। जगत्में किसी भी प्रकारसे जिसकी किसी मी पोषके प्रति भेनटि नही, ऐसे भी.. निमाम बामस्तरमा नमस्कार पचि । "जगसीन" शम्का वर्ष सम मानो। ३२५ बई, भाषण १९९८ मुमुभुबन पनि ससंगमें वो मे निरम्तर उकासित परिमाममें यकर आय कारमें हो वाम-साथम कर सकता है, पर बात यथार्य है । तपा ससग वमाप सम परिणति पना कटिन है, फिर मी ऐसे करनेमें हमाम सावन यता है, इसलिये चाहे नैसे मिष्या निमित्तमें भी विस प्रकारसे सम परिणति मा सके उसी प्रकारसे प्रति करना योम्प है। परिवाना वामयमें निरन्तर बास हो तो थोडे हो सामनसे मी सम परिणति माती है, इसमें तो कोई मी विचार नहीं । परन्तु मा पूर्वकर्मक पपनसे अनुकूल न जानेबारे निमित्वमें बना होता है, उस समप पाहे किसी भी तय, जिससे उसके प्रति रेफरहित परिणाम ये, ऐसे प्रापि करना ही हमारी पति है, और यही शिक्षा मी है। निस तथ सत्पुरुपके दोपच उपारण मी न कर सकें उस तर पदि तुमसे प्रति करना बन सकता हो तो कप सहकर मी उस तए वापरण करना योग्य है। हमें हमारी में ऐसी कई शहा नही कि सिसे तुम उनसे बहुत तबसे प्रतिक पम्ना पो। पर किसी बात तमें में तुम बहुत प्रति समसते तो जातका अनादिका बम्पास है ऐसा गानकर भारत रखना ही बपिक बोम्प है। सिक गुफ्गान करमस गीत भा-मुल ऐ गाता ८ उसके गुणगानसे प्रतिक होकर पोपमासे प्रापि करना यह गोषको महा दुसका देनेवाग है, ऐसा मानते है, और अब पैसे प्रकारमें बार बार फंस जाते हैं दो हम समझते हैं कि बौको कोई ऐसा ही पूर्णकर्मका अपन होना चाहिये । हमें तो इस विषयमें हेपररित परिणाम हो गया है, वौर उनके प्रति करणाही वाती है । म मी इस गुण अनुमण कयेपौर निस तय उन गोंको गुणगान करनेके मोम्प सरपके बर्मपद पोम्नेका बास उपस्थित न हो, ऐसा योम्प मार्ग प्राण करो यही अनुरोप।। हम सर्प उपाषि-प्रसगमें यते बाये हैं और परे है, इसके उपरसे हम स्पा मानते कि उस प्रसगर्ने सम्पूर्ण वारममा से प्राति करमा दुईम है। इसलिये निम्पानिपूर्ण इम्प, क्षेत्र, काल और मानध सेन करना मापक है। ऐसा बानते ए मा हामें तो हम ऐसा ही करते सिमे उस उपाधिका पन करते हुए निम्माधिका निसर्पम न हो बाप ऐसा ही करते यो । मन हम जैस मी सरसका सेवन करते है तो कर ए तसे बोवनीय ऐ सला है पहचानते हैं परन्तु में हम पूर्वकर्मको ही मर थे, इसध्येि तुम्रेमरा मार्ग हम कैसे बताने पर मोचा।
पर ३२९ ५,५१, ३१२] विषिष पन भादि संप्रा-२५ वो पर्ष ३२९ सम्बई, मावप' मुदी १० गुरु १९९८ निस विस प्रकारसे भामा वाम-मावको प्राप्त करे, ये सब धर्मकरी मेद है। निस प्रकारसे रमा अन्य मावको प्राप्त करे. वा भेद मन्यरूप ही है, मर्महप नहीं । तुमने हालमै जो वचन मन- के पपात् निष्ठ्य अंगीकार की है, यह निष्टा श्रेयस्कर है। यह निष्टा बा िमुमुमुको स ससग मिठ- पर बनुकमसे दिको प्राप्त होकर आमम्पिविरूप होती है। बीवका, धर्मको केवल अपनी ही कल्पनासे अपना कम्पना-प्राप्त किसी अन्य पुरुषसे श्रवण करना, मनन करना अया आरावना करना योग्य नहीं है। जो का बारम स्पितिसे ही राता , ऐसे मपुरुषस ही भास्मा बयना मारमधर्मका प्रवण करना योग्य है-यातनावन माराधना करमा याम्य हा ३३० बी, मादपर मुदा १० गुरु १९४८ समार-कारसे सगाकर इस क्षमसक तुम्हारे प्रति किसी भी प्रकारकी अविनप, वमधि, मस- कार बपया ऐसा जिन्य दूसरे प्रकारका कोई मी अपराध मन, पचन और कापाके परिणामसे हमा हा, उम सबको गत्पत नम्रतासे, उन सब अपराधों के अस्पत उप परिणाममप मारमरियतिपूर्वक, म सब मकरस क्षमा मागता , धौर इसे क्षमा कराने के मैं योग्य हूँ। तुमें किसी मी प्रकारसे उस वपराभ पारिका ननुफ्पोग हो तो मी क्यवरूपसे, हमारी किसी भी प्रकारसे पैसा पूर्वकासमधी मानना समठकर, इस क्षणमें अस्पतरूपसे क्षमा करमे योम्प अामस्थिति करने के लिये समुतामे प्रार्थमा है। . बम्बा, मारपर मुनीर गुरु १९४८ इस क्षमपर्यंत तुम्हारे प्रति किसी भी प्रकारसे पूर्व बानि काठमें मन नपम और कायाफे योगस यो जो कुछ नपराम वारि हुए हों उन सबको मन्यात भाममावसे विस्मरण करके क्षमा चाहता हूँ। इसके बाद किसी भी कारमें तुम्हारे प्रति उस प्रकारके अपराषका हाना अममा समप्तता, ऐसा होनेपर भी किसी भनुपयोग दोपर्यत, परिवह अपराध कमी हा मी जाप ता उम विपसमें भी पहाँ बापत मप्र परिणामसे क्षमा पाहता आर उस क्षमामापनप इस पत्रका विधारते हुए परमार चिंतन करके तुम मी हमार पूर्वकासके उस सर्व प्रकारके अपरावको भूठ जाने योग्य हो। ३३२ बम्बई माद्रपद मा १२ रवि १९१८ परमार्थ गौप्र प्रकाशित हानेके पिपमें तुम दाना माहपूर्ण पचन प्रास हवा; वया तुमन यो पहार-पताके विषयमें लिखा, वीर उसमें मी सम्म्ममान निषेन किया, पर भी वापदफ प्रामजादा हालमें ता म सबके पिसान कर देनम्प उमानता को पता है, धार उम सबको ईमरे भयक बापान दो साप रेना पोय हा हाम्मे ये दानों बातें बतक हम निमम तबतक मम्मरण ही करने योम्प है।
१८ भीमद् पसरण [पा ११८ निरंतर हमारे समग एमके संबंध जोपाया, उस विषयमें हमें दुना किस सकना असमय है। तमाम हवा होगा कि हमारा यहाँगना होता एउपाधिपूर्वक ही होता है, पर र उपावि इस प्रकारसे है कि ऐसे प्रसंगमें धावायकर जैसे पुरुपके पिपमें मी पुस निर्णय करना हो तो मी कटिन हो नाय, क्योंकि अनादि कापसे गीतको के मान प्रतिको भयमा मात्र निधिको हो पहिचान होता है, और सीके वाधारसे ही वह सरपुस्पको बहपुरुप कम्पना करता बाया है। कदाचित् किसी संगके योगसे यदि गोलको ऐसा नामनेमें माया मा नि " या पुसी", वो भी फिर निरंतर उनके सम्म प्राचिरुप येणाको देसकर जैसा चाहिये पैसा नियम मही रावा, अपमा निरवर मनिगत होता एमा मक्किभाव नही यता, बोर कमी पो पान को प्राप्त होकर से सत्पुरुषके योगको त्यागकर निसको केरा बाम निहाल ही माश्म होता है, ऐस नस पुस्पका सामापूर्वक सेवन करने लगता है। इसछिये मिस कारमें सपुरपचे निधि-मसंग रहता से प्रसगमें उसके समार बना, पा चाकको हम शेष हितकर समस्ते हैस बात इस समय इससे अधिक किस्सा माना बसमा । यदि किसी प्रहमपर हमारा समागम हो तो उस समप तुम इस विषयमें पूछना, भीर उस समय यदि मुना विद्याप करने योग्य प्रसंग होगा तो उसे कर सकना समय है। यदि दीक्षा मेनेकी पारम्पर इस होती हो तो मी हरमें उस प्राधिको शान्त ॥ करना चाहिये । रूपा कम्पाण क्या है और यह किस तय हो सकता है, सम बारम्बार प्रचार मौर गपणा करनी चाहिए । इस कममें बनत फारसे भूल होता वाती है, इसरिये भाप चारपूर्वक दो पैर तयाना योग्य है। - ३२८ बर्थ मनप सदी ७ सोम १९९८ सदप देखकर दाम नहीं बना ससारका सेवन करनेके मार्रम काम्स गाकर बाबतक तुम्हारे प्रति जो कुछ अपिनप, पति और अपरार मार दोष उफ्योगपूर्वक जपचा बनुपपोगसे हुए हों, उन सबको मर्मत मासे क्षमा चाहता। भीतीपंकरने मिसे धर्म-प गिनने योग्य माना, ऐसी दस वर्षको सकस पवीत। किसी मीना के प्रतिकिसी भी प्रकार से किसी मी काम्में बात साप दोष भी करना योगय मही ऐसी बाव मिसोम्य परमोहएकपसे निषित, ऐसे इस चितको नमस्कार करते है और इस पाक्यको एक मात्र स्मरण मे योग्य ऐसे में ही मिला । इस मास्पक तुम निराकर एसे जलवे हो। तु चिारको पत्र लिगा' ऐसा मिला था परन्तु मी नि सब, पर प्रमा करने पाम तुमने म्पपार-प्रसंग विवेचना के संबपमें प्रोफत मिशा पा उस धमाको पित्त उधारमे और Rधारने म पाँ, परन्तु मम सके मामाकार हो जानेस निफर हो गई और छ समप पुष वियना कर सके ऐसा माम नही होवा इसके विपे मर्पत ममतापूर्वक धमा माँगकर इस पाको समाप्त करता। .
पत्र १२१, ११, ११, ११२] विविध पम भादि सपा-२५ौ वर्ष ३२९ बम्बई, माद्रपद मुदी १० गुरु १९९८ मिस निस प्रकारसे मारमा नाम मात्रको प्राप्त करे, मे सब धर्मक ही भेद है। जिस प्रकारसे मारमा बन्य भावको प्राप्त करे वह मेद अन्यरूप ही है, धर्मरूप नहीं । तुमने हारमें बो बघम मुन नके पपात् निष्ठा बगीकार की है, वह निष्ठा प्रेयस्कर है । वह निष्णा वादि मुमुक्षुको घससग मिळ- मेपर मनुमसे परिको प्राप्त होकर मास्मस्पितिरूप होती है। जीवका, धर्मको सेक्स अपनी ही कल्पनासे अथवा कम्पना प्राम किसी मन्य पुरुपसे आपण करना, मनन करना अपना आराधना करना योग्य नहीं है। गो केवर आरम-स्थितिसे हो रासा, ऐसे सत्पुरुषसे ही बारमा क्यमा बारमधर्मका श्रवण करना योग्य है—याकनीषन मारावमा करमा योग्य है। ३३० पी, मावपद सदा १० गुरु १९१८ ससार-कारसे भगाकर इस आणतक तुम्हारे प्रति किसी मी प्रकारकी अग्निप, चमक्ति, बस स्कार वषषा ऐसा ही अन्य दूसरे प्रकारका कोई मी अपराध मन, पचन और कापाके परिणामसे एमा हो, उस सबको अस्पत नम्रतासे, उन सब भपराधों के वस्या छप परिणामहप मामस्थितिपूर्णक, मैं सब प्रकारसे क्षमा मांगता । और इसे क्षमा करनेके में योग्य है । तुम्हें किसी भी प्रकारसे उस भपराभ वादिका अनुपयोग हो तो भी मस्पतरूपसे, हमारी किसी भी प्रकारसे वैसी पूर्णकाउसबंधी मावमा समझकर, इस क्षण अस्पतरूपसे क्षमा करने योग्य आत्मस्पिति करनेके लिये मुतासे प्रार्थना है। ३३१ बम्बई, मारपद और गुरु १९४८ इस क्षणपर्यंत तुम्हारे प्रति किसा मी प्रकारसे पूर्व आदि काठमें मन वचम और कायाके योगसे यो गो कुछ अपराध आदि हुए हों उन सबको अपत वाममावसे विस्मरण करके क्षमा पाइता है। इसके बाद किसी भी फाडमें तम्हारे प्रति उस प्रकारके अपराधका होना मसंभव समझता है, ऐसा होनेपर भी किसी गनुपयोग भातसे देोपर्यंत, यदि यह मपराध कमी हो मी आप तो उस विषयमें भी पर्चा रयत नम्र परिणामसे क्षमा चाहता हूँ और उस क्षमाभावरूप इस पत्रको विचारते हुए मारम्बार चिंतन करके तुम भी हमारे पूर्वकालके उस सर्व प्रकारके अपराधको भूम जाने योग्य हो । ३३२ बनई मारपद मा १२ रचि १९९८ परमार्प शीघ्र प्रकाशित होनेके पिपपमें तुम दोनोंका भासपूर्ण पपन प्राप्त हुवा वया तुमने जो म्यबहार-विताके विपमें डिम्मा और उसमें मी सकाममात्र निवेदन किया, यह भी भामहपूर्वक प्राप्त हुआ। हमें ता इस सबके सिन कर देनेन्स उासीनता ही पता है, और उस सपको ईपरे के माधीन हो सौप देमा योग्य है। हाउमें ये दोनों बातें अबतक हम फिरस म निमें तबतक विस्मरण हो परने योग्य है।
1२२ प्रीमद् पसन्द्र [पर 10 नही मी होता, परन्तु निसको वारमा पूर्ण मुदता एती है, वह पुरुप तो निभपसे उस पानको पानता है-मतरको बानता है। मारमा निस्प है, अनुमवरूप है, पती-न स्व प्रकारों के मत्पर- रूपसे सपने डिपे शव के प्रसंग करे गये है। पदि किसीको मावरका स्पए पान न होता हो तो यह यह करनेके बराबर है कि किसाको पामाका स्पर शान भी नहीं होता, परन्तु ऐसा तो नहीं । मारमाका स्परपान तो होता है, और मतर मी स्पर माइम होता है। वफ्ने तथा परके भव भाममेके शानमें किसी मी प्रकारका मिस तोर्यकरको मिक्षा किये जाते समय प्रत्येक स्पानपर सवर्ण-धि यानि हो हीदो-ऐसा सबके का नेत्रावर्प नही समझना चाहिये । वपना शाम कोए बायोका या उस प्रकार भर्ष होता हो तोप सापेथए।पा बाप मेक-मापाका ही समझना चाहिये। जैसे यदि किसीके पर किसी सजन पुरुषका भागमन हो सो वापता'मायभमृतका मेष बरसा' जैसे उसका हकाला सामेल है-पपाप है, परन्तु पर शरदके माता पिया है, शदके मा वर्षमें ययार्प नहीं है इसी तय तार्यकर बादिका मिबार रिफ्यमें मोहै। फिर मी ऐसा ही मानमा पोपबामस्परपमें पूर्ण ऐसे पुस्पके प्रमस्के यम्से पहहोना भरपंत समलित है। ऐसा कामेका प्रयोजन नहीं कि सर्वत्र हो ऐसा एमा, परम्त कानेका ममिप्राप पर है कि ऐसा रोना समयो-ऐसा होना पोम्य है। माँ पूर्ण नामस्वरूप है, माँ सम्मात् प्रभात-पग बामितरूपसे पता है, पर नियामक बात है-नि.सन्दोह मोकार करने योम्प बात है। यहाँ पूर्ण वात्मस्वरूप यता हो यदि महत्-प्रमाण-योग न यता हो तो फिर ह दूसरी कौनसी नगह पर विचारने पोय है। उस प्रकारका इस तो कोई स्पाम शेना संभव नाही, फिर महत्-प्रमाण-योगका ममात्र होगा। परन्तु मम पूर्ण भामसम्मका प्राप्त रोना मी नमावरूप नही, तो फिर मात् प्रमाण-पोगका बमात्र दो कराँस हो सकता है। और यदि काचित् ऐसा का नाप कि बारमस्वरूपकी पूर्ण प्राप्ति होना तो पोप है किन्तु महत् प्रमाण-पोगकी प्राप्ति होना पोम्प मही, तो पाना एक रिसाद पैदा करनेके सिलाप और कुछ नहीं कहा जा सकता । क्योंकि यह करने बामपुर वात्मस्वरूपके मात्पनेसे मर्पत हान ऐसे प्रमाव-पोगो महान् समता है-गीकार करता है और पर पेसा सूचित करता है कि म मा वामस्वरूप माननेवासा नहीं है। उस वाहमसरुमसे कोई मी मान नहीं है। जो प्रमान-पोग पूर्ण बात्मस्वरूपो मी प्राप्त न हो। इस प्रकार इस मुहिम कोई प्रमा- योग सत्पमाला नहीं, वर्तमान में है म0, पौर मागे उत्पन होगा नहीं परम्त स्व प्रमा-पोगमें मामलरूपको कोई प्राधिकरम्प नहीं है, यह बात तो बम है और पदि उसे उस प्रभाr-पोगमें कोई कम्प माश्म होता है वोन पुरुष बामबहसके वस्पंत मानमे । यता है, ऐसा मानते हैं। करने का अमिप्राप पहले कि बामरूप महामाम्प तोर्पकरमें सब प्रकारका प्रमाल योग होमा पोम्प है—ोता है। पर उसके एक वराका मा प्रकट करना उनें पोम्प नहीं । किसी सामाविक पुष्पके प्रमासे पुर्णमामि पावि हो, ऐसा माना बसमय ही, वर पवारपरको बापाकारक भी नहीं है । यो तापकर ये बास्मस्मरूपके सिताप कोई क्म्प प्रमाल वादि नही करते, और जो करते हैं ये बामस्म तीबर को जाने योग्य नही, ऐसा मानते हैं, और ऐसा ।।
- पत्र १५८] पिषिष पम मादिसपा-२५पाव રા नो निनमगवान्के को ए शान माने जाते है, उनमें कुछ बोके विछिम हो मानेका कपन है, और उनमें केवमान आदि दस बार मुख्य है, और उन दस पोठोंके विशिम ए दिसा- मेका बाशय यही बतानेको किस कामें 'सर्वया मुछि नहीं होती' ये दस बोग जिसे प्राप्त हो गये हों, वयवा बिसे इनमेंका एक मी बोळ प्राम हो गया तो उसे चरम-शरीप जोर करना योग्य है, ऐसा समसकर इस बातको विरोदरूप माना है। फिर भी एकातसे ऐसा ही एना योग्य नही–पेसा हमें मायम होता है, और ऐसा हो।योंकि इन पोठोंमें क्षायिक समकितका मी निपेम है, बार यह चरम सरीरीके होहो, ऐसा तो ठीक नहीं, अथवा ऐसा एकांत मी नहीं है।महाभाम्प श्रेणिकके क्षायिक समकित होनेपर भी ये घरम-शरीरी नहीं थे, इस प्रकार उनी निनमगवान्के शामों में कपन है। तया निनकल्पी सापुके निहारका म्यपछेद करना मेताम्बरोंका हो कपन है, दिगमका कपन नहीं । ' सर्वथा मोष होना' इस कामें समब महा है, ऐसा दोनोंका ही पमिप्राय है। और यह मी अस्पत एकातरूपसे नहीं कहा जा सकसा । हम मानते हैं कि इस कामें परम शरीरीपना नहीं है, परन्तु यदि अशरीरी- मानरूपसे बारम-स्थिति है, तो प मापनयसे परम सराफ्ना ही नहीं किस सिद्धपमा मोहै। और मामशरीरा-भाव इस काळमें नहीं है पनि यहाँ ऐसा करें तो यापह करके तप है कि हम ही सर्य मौन्द नही है। विशेष क्या करें ! पर सर्मपा एकांत महो।काचित् या एकांत हो मी तोपर, मिसने बागमको कहा है, उसी बाशयो सत्पुरुपारा समझने योग्य है, और यही मारमस्थितिका उपाय है। (२) पुमर्दग्म है-वस्य है, इसके लिये मैं अनुभबसे 'हो' करनेमें बचा है। - परम प्रेमसम मलिके बिमा बान शूम्प ही है। जो भटकामा केवळ योग्यताको कमीफे ही कारण पटका मा है। पानाके पाससे बानी इम करनेकी स्पेधा बोध-सहप समसकर मतिकार करना, यह परम फलदायक है। निसपर ईसर रूपा करे उसे कठिपुगमें उस पदार्थको प्राप्ति हो । या महाकठिम है। ३३८ बई, वासोग बी ६, १९१८ (१) पहाँ बारमाकरता यता है। मामाके वाम-स्वरूपमापसे परिणामके ऐनेको नामाकरता करते हैं। (२) नो पुरा होता है उसे होने देना। म उसीन होना । न भमुधमा होना।म परमात्मासे मकरमी, भौर म म्यास होमा । यदि सामान रूकावट वा तो नितमा बने उसको रोकना और ऐसा होनेपर मी यदि या दूर न होता हो तो उसे ईपरके ठिपे वर्पण कर देना। परन्तु दौमता न खाने देना।मागे क्या होगा, इसका विचार नहीं करमा, मोर गोरो उसे करतेयमा। मनिक उपयुन करनेका प्रपान मही करमा । माप मी मप नही रमना । जो कुछ करनेका बम्पास हो गया है उसे विस्मरण किपे गना-सो ईपर प्रसन्न होगा-गोही परममलि पानेका फल मिठेगा-तो हमारा भार तुम्हारा संयोग हुमा योग्य है।
११० भीमद् रामचन्द्र [११४ बर्ग, मारपद बदौ ३ ठक. १०१८ पाहसि लिसे गए पत्रके तुम मिम्मेसे होनेवाले मार्नदको निवेदन करते हुए, हमने हसमें दोधासबषी सिके झोम प्राप्त करमेके विषयमें बो हिसा, सोझोम हालमें पोप ही है। कोष भादि बनेक प्रकारके दोपोंके भय हो गानेपर ही संसार-स्यागरूप दांचा सेना योग्य है, अपना किसी महान् पुरुपके सयोगसे कई पोम्प प्रस्मा मानेपर ऐसा करना पोप है। इसके सिवाय किसी दूसरी प्रकारसे दौमात्र धारण करना कार्यकारी महीं होता और जोर वैसी दूसरी प्रकारकी दावारूप भान्तिसे मस्त होकर पूर्व कल्याणको एकता पपषा बिससे विशेष अन्तराप उपस्थित हो ऐसे योगका सपान करता है इसलिये में तो तुम्हारे पोमको हम पोप हो समझते हैं। पा हम जानते है कि तम्हारी पा समागममें धानेको विशेष या फिर मी में तो उस स्योगकी का निरोप करना ही पोम्प है, अर्थात् यह सयोग बनना बसमा और इस बातका सुरुम्सा नो प्रपाके पर दिया है, उसे तुमने पा ही होगा । इस तरफ वानेको इटामें तुम्हारे यकों बादिका मो निरोगी हामें उप्त निरोषको उफन करनेकी इस करना पोरम नहीं। मनामहमें बुद्धिका ठासीन करमा ही योग्य है। और हामें तो गास्थ धर्मको अनुसरण करना भी योम्य है। वफ्ना हितरूप बानकर अपना समसकर बारम-परिम्हका सेवन करमा पोग्प नही । और इस परमार्थको बारम्बार विचार करके सम्मका पाँचन, मरण, और मनन वादि करना पोम्प है। निष्काम पपायोम्य ३३४ सर्च, मानपद सी बुध १०१८ अनमस्कार बिस मिस कामे मो गो प्रारम्भ उदय मापे उस सबको सहन करते माना, यही पानी पुरुषों का स्नातन नाचरण है और यही बाचरण हमें उत्य या करता है अर्थात् मिस संसारमें स्नेह मही पा, उस प्रसारके कार्यको प्रालिका उदय गता है और उस उदयका बनुकमसे बेदन वा करता है। उदपके इस क्रममें किसी भी प्रकारको हानि-नदि करनेको इचा उत्पम नाता और हम ऐसा मानते है कि पानी पुरमोंका मी ही स्नातन बाचरण है फिर मी मिसमें स्नेह नही या, अपरा स्नेह रस्नेका मनात हो गई है अपना निात्त होने भाई है, ऐसे इस संसारमें कार्यरुपसे फारमरूपसे प्रति करने की इस नहीं हो इस कारण बहमा निति हो या करता है। ऐसा होनेपर मा जिससे उसके अनेक प्रकारके सग-प्रसगमें प्राप्ति करमा परे ऐसे पूर्वमें किसी प्रारम्पका उपार्जन किया है, मिसे हम सर परिणामसे सहन करते है परन्तु वमी मी कुछ समयतक या उदयमें है, ऐसा गानकर कमी कमी से होता है, कमी कमी विशेष व होता है। और उस सेदका कारण विचारकर देसनसे तो परानुसारूप ही माश्म होता है। हमें तो सस प्रारम्पको स्वामा रिक सदपके अनुसार ऐन ये बिना बम्प इम पम नहीं होती तपापि उस वदपमें हम दूसरे चिसोको पुन, एस राग, , मम मौर बममके कारणस्मसे माम होते है। इस माम होने में छोक-प्रसंगकी विचित्र प्रति देखकर सेद होता है। मिस सारमें साथी कळके रूपसे माना ।। १३५, ३१५ १७] विविप पत्र मावि संप्रह-२५ों व १२१ . ता है, उस ससारमें उस सामोसे साक्षीरूप रहमा, और कारूपसे भासमान होना, या दुधारी सपारपर चम्नेके समान है। ऐसा होनेपर मी पदि यह साक्षी-पुरुष प्रांतियुक्त टोगोको, किसाको सेट, दुसवार मलामका चरण माइम न पो, तो उस प्रसगमैं उस साक्षी-पुरुषको अस्पत कठिनाई नहीं है। हमें तो पस्पत ठिनाइक प्रसगका उदय एता है। इसमें भी उदासीनमाव ही शानीका स्नातन धर्म है (यहाँ धर्म शम्द वापरणके अपम है)। एक बार रब एक तुच्छ सिनकेके दो भाग करनेकी क्रिया कर सकनेकी शफिका मी उपशम है, उस समय जो ईपरम्प होगी वही शेगा। मधिस्पदशामास ३३५ या, वासोय सुदी १ बुध १९४८ नीमके कत्ल-जकर्तृत्वको समागममें अषण करके निदिध्यासन करना योग्य है। बनस्पति भाविके सपोगसे पारेका कर चाँदी बगैर रूप हो पाना संभव मी होता, यह त मही है। योग-सिद्धि के मेदसे किसी तय ऐसा हो सकता है, और मिसे उस योगके बाट क्गों से पाँच वग प्राप्त हो गये है, उसे सिदि-योग होता है । इसके सिपाय कोई मरी कम्पना करना वर कालपरूप ही है। यदि उसका विचार मी उत्पम हो तो यह भी एक कौनकरप ही है, और कीचक मारम-परिणामके ठिये योग्य नहीं है । पारेका स्वाभाविकरूप पारपन हो। ३३६ बम्बई, भासोग मुदौ ७ भौम १९१८ प्रगट वास्मस्वरूप अपिपिएममापसे सेवन करने योग्य है। बास्तविक वात तो ऐसी है कि किये हुए फर्म बिना भोगे निमृत होते नहीं, और नहीं किये हए किसी कर्मका फल मिम्ता नहीं। किसी किसी समय मकस्मात् किसीको पर अपना शाप देनसे गो धम अपना अशुम फर मिलता दवा देसनेमें वाता है, वह किसी नहीं किये हुए कर्मका फल नहीं है- मी किसी प्रकारसे किये हुए कर्मका ही फस है। एकेन्द्रियका एकापतारीपना अपेक्षासे समठने योग्य है। ३३७ बा वामोर सुदी १०, १९९८ भगवतो वारि मिमांतोंमें भो किती किती गायोंके मातरका वर्णन किया है, उसमें कुछ संशय होने जैसी मात नी । तीर्थकर ता मग पूर्ण भामसाप है परन्तु यो पुरुप केस योग, म्यान वादिके बम्पसके बम्से यते हों, उम पुरयोंमेले मी पावस पुरुष मवरको जान सकते हैं और ऐसा होना फुल कन्धित बात महो। रिस पुरुषको भास्माका निधपामझ शान है उसे मावरका बाम होना योम्प –ोता है ।बधित् शानके त्वरणम्प-अपोपचम भेसे पैसा कमी TRE भीम रामान [पर 0 माही मी होता, परन्तु बिसको वात्मामें पूर्ण शुद्धता पती, प पुरुप तो निभयसे उस ज्ञानको नानता है-मातरको पामता है। वारमा निस्य , मनुमबरूप है, मस्त है-इन सब प्रकारेंके गर्पत- रुपसेनेके किस शाबमें प्रसंग को गये। परिकिसाको भतरफा स्पान न होता हो तो यह या करनेके बराबर है कि किसाको वास्माका स्पर पान मी नही होता परन्तु ऐसा तो नहीं । बारमाय स्परबान तो होता है, और मातर मी स्पा मालम ऐता है। अपने तपा परके भय जाननेके शानमें किसी भी प्रकारका पसं पाव नो। तीपंकरको मिक्षाके किये माते समय प्रत्येक स्पानपर सुवर्ण-टिइत्पादिहोशीदो-ऐसा शासके कर मेका मर्प नहीं समलमा चाहिये । वपना शाम छोर पापोका पदि उस प्रकारका नर्थ होता हो तो पा सापेक्षतामा बाल्य सोक-मापाका दो समाना चाहिये। से यदि किसीके पर किसी सजन पुरस्का बागमन हो दोपहरताकि बाय नमृतका मेघ बरसा' से उसका यह करना सापेक्ष है-पपाप है, परस्त कर शके भातास ही पपार्थ है, शदके मम ममें पार्य नहीं है। इसी तरा तोर्पकर मारिका भिमाके विपपमी है। फिर भी ऐसा ही मानना पोप है कि वामस्वरूपमें पूर्ण ऐसे पुरपके प्रभावके मम्से पाना मस्मत समक्ति है। ऐसा करनेका प्रयानन नहीं है सर्वत्र ही ऐसा माहै, परन्त करनेका अभिप्राय पाए कि ऐसा ऐना समय-ऐसा होना योग्य है। नहाँ पूर्ण वात्मस्वरूप है, गर्म मा प्रमा-पोग बामितरूपसे पता है, यह निमयामक पात–नि सदो बगाकार करने योम्प बात है। शों पूर्ण बात्मम्मम पता है पनि सा-महत्-प्रमाण-पोग म यता हो तो फिर जसरी कौनसी भगाये पर विचारमे पोय है । उस प्रकारका बस्य तो कोई स्थान ऐना समय नहीं, तो फिर स म्हद-ममा मोगका बमान ही होगा। परन्तु पर पूर्ण बामसरूपका प्राप्त रोना मी गमावरूप महारे, वो फिर मार प्रमाण-पोगका ममात्र तो कासे हो सकता है। वौर पदि शामित् पेसा का बाप कि नामस्वस्मको पूर्ण प्राति ऐना तो योग्प , किरामात् प्रभाव-योगको प्राशि होना पोम्प नहीं, तो पा फामा एक सिपाद पैदा करनेके सिवाय और स मही कहा जा सकता । क्योंकि पार करने बाम शुर बास्मस्साहपके मात्पमेसे नस्पत हन ऐसे प्रभाव-योगको महान् समता-बगीकार करता है। और या ऐसा सूचित करता है कि पख बहमारूप माननेवाण नही। उस बालस्वस्से कोई भी महान् नहीं है। जो प्रमा-योग पूर्ण वारमतरूपको मौ प्राप्त न हो। इस प्रकारका इस सलिमे कोई प्रमान-योग सत्पनामा नहीं, वर्तमानमें हेमही, मोर मागे उत्पम होगा नहीं परत एस प्रमान-योगमे बाहमवरूपको कोई प्रापि कर्षम्म नही है पागात दो बस और पदि उसे उस प्रमा-पगमें कोई करम्य माध्म होता है तो पुस्प वारमसपस्मके वस्पत महान हो यता ऐसा मानते है।मनेका अभिप्रापयाकिबामस्म महामाम्प पीकर सब प्रकार प्रभार पोग ऐना योम्प है-होता है। परन्तु उसके एक बंशका मौ प्रकट करमा उने पोम्प नहीं । किसी स्वाभाविक पुष्पके प्रमासे पुनर्णमावि स्पादि हो, ऐसा कहना समय मी, और पा ताफरपरको पापकारक माना। यो परमात्मस्वरूपो सिखाप कोई बम्य प्रभाव बादि नहीं करते, और जो करते हैं ये बात्माप वार्यकर परेमाने मोम्प नहीं। ऐसा मानते है, और ऐसा है। .
पत्र ११८] यिविध पत्र मादि संप्रद-२५यों पर्ष ૧૨૫ - गो मिनभगवान्के कहे ए शाम माने जाते हैं, उनमें कुछ बोलोंफे विभिन्न दो नानेका कथन है, और उनमें केनखान आदि दस बार मुख्य है। वीर उन दस मोझेफे मिम्मि ए मा. नेका वाशय पही बतानेका है कि इस कामें सर्मया मुक्ति नहीं होती ' । ये इस पोउ निसे प्राप्त हो गये दो, अपवा निसे इनमेंका एक भी पोछ प्राप्त हो गया हो तो उसे परम-गरीरी नीय कहना योग्य है, ऐसा समझकर इस बातको विदम्प माना है। फिर मी एकातसे ऐसा ही फहमा पोग्य मही-ऐसा हमें माश्म होता है, और ऐसा ही है। क्योंकि इन नोटोंमें क्षायिक समफितका मी निपेध है, और पद परम शायरी ही हो, ऐसा तो ठीक मही, वयना ऐसा एफरत मी नहीं है। महामाग्य श्रेणिकके क्षायिफ समफित होनेपर मी ये परम शरीरा नहीं थे, इस प्रकार उन्ही निममगमान्के शाखोंमें कपन है। क्या गिनकल्पी साधुके महारका व्यवछेद पदना सेताम्पफा ही कपन है, दिगम्बरोंफा कपन मही । 'सम्पा मोश दोना' इस कालमें समष मही है, ऐसा दोनोंका हो अभिप्राय है और मद मी वस्यंत एफनल्ससे मही कहा मा सफसा । हम मानते हैं कि इस काठमें परम-शारीरीपना नहीं है, परन्तु यदि अशरीरी- भाषहपसे आरम-स्थिति है, सो वह भावनयसे चरम-शरारीपना ही नहीं विस्त सिद्धपना भी है । वीर बह अशी-भात इस कारमें मही-पर पदों ऐसा फरें तो यह पाह कहनेके मुस्प है कि हम ही स्वयं मौजूद नहीं है । विशेष क्या करें ! या सर्वपा परत नहीं है। फाधित् पहफात हो मी तोपर, मिसने बागमको कहा है, उसी भाशयो सम्पुरुषाय समधने योग्य है, और यही बारमस्थितिफा उपाय है। (२) पुनर्मग्म है-अपश्य है, इसके रिपे में अनुभवसे 'दो' कहने में अपरा।। परम प्रेमाप मकिके बिना हान शम्प ही । जो अग्का पह फेरस पोग्यताकी पमोदी कारण बटफा रखा है। हानी के पाससे धामको इपस करनेफी अपेक्षा बोध-म्पप समझकर भकिफी इज फरना, यह परम पटनायक है । मिसपर वर कृपा करे उसे कलियुगमें उस पार्थफी प्राप्ति हो । पर महाकटिन है। ३३८ नई, मामाघ ६, १९४८ (१) पदो बारमाकारता रहती है।बामाके भारम-सनपभाषसे परिणाम मानेको आग्माकारणा (२)जो पुत्र होता है उगे होमे ना ।म ददास्पन होना । न बमुपमी होना । म परमामासे होछा करनी, और म म्याग होना । परि अमाप रुपमा सम्वा होता जितना बने उसकी फ्ना वीर ऐमा होनेपर मा परि पद र म ना हो ता उस ईघरके लिय अणि कर देना। परस्तु दीनता म जाने देना। माग पा होगा, इसका रिपार नहीं करना, और जो दो उसे करते पना। भरिक उमा-पुन परमेवा प्रपन नहीं करना मग मी मप नही गमा। गा पा करमफा नभ्यागु हो गपा ( उसे विस्मरण मिरो पना-नो दी ईसा प्रसन दोगा-गो ही परममक्ति पानेका मिलेगा-तादी मारा और तुम्हारा सपोग मा योम्प है।
120 भीमद् रामचन्द्र [पर १,५४ वीर उपाधिमें क्या होता है, या बागे घग्कर देस गे। देस छो-सका भर्य पाठ गंमार । सर्वस्य हरि समर्थ है। मत पुरयायपासे निर्वस मति कम हो यती पि पापके उपाधि योग याया करता है, परन्तु गो फुल सत्तामा सब सामाके ही हाथ है। और या सत्ता निपपसे वाधारित ऐसे जानाको । प्राप्त होती है। जबतक उस सर्गमा हरिकी इम मसे हो, पैसे दानाको भी पसना, पह बावित धर्म है। उपर गो उपाधि से बहमारके ोड़नेके बचन बिहे हैं, उनके उपर वाप पोरे समप विचार करें । भापकी उसमें उस प्रकारको दशा हो भाप ऐसी आपकी मनोरति है। फिरसे निवेदन है कि उपाधि से बने तैसे निक राकर उबम करना । बाग क्या होगा, पह विचार गोर देना । । ३३९ बई, पासोम पदौ ८, १९९८ सोक-म्पापक बपकारमें अपनेशरा प्रकाशित हानी पुरुष ही यापातप्प देखते हैं। का पण मादि कामनायों के प्रति रेगते हुए मी उदासीन यकर नो केस वपनेको हो स्पररूपर्स देखते १, ऐसे कानोको हम नमस्कार करते हैं, और इस समय इतना ही किसकर पानसे स्फुरित वामभावको स्प करते है। । ३४० वर्मा, पासोम १९४८ ॐ (१) जो कुछ उपाधि को नाती पहा निर-भालके कारण करने में नहीं वाता-उस प्रकारसे महीको माती । पर जिस कारणसे की जाती है, मारण भनुमसे पेन करने पोप ऐसा प्रारम्प कर्म है। गोम उदपमें बाये उसका असिना परिणामसे पेन फरमा, इस प्रकार गोपानीका योग, प.हममें निधठ पता है-पर्यात् हम उसी प्रकार ऐन करते है। परन्तु वो ऐसी तीन किलम्प का हक समपर्म हो-यदि मा उदय को प्राप्त होवा हो तो हम इम सबसे उठकर चले ऑप-कामामें इतनी स्वतमनाया करती है। फिर भी मिदा काम, मोमन-काल तथा अमुफकास-ससके सिवाय उपाधिका प्रसंग रहा करता है और कुछ मिमप नही होता, तो मी रिमी भी प्रापर भामोरयोग भप्रधानमा संबन करते हुए देखा जाता है, और उस प्रसंगपर पायुके शोकसे मी वधिक शेक होता है, यह बात निस्सन्देह है। ऐसा होनके कारण और अबतक गहस्थ-प्रस्पयो प्रारम्प उदयमें ये तबतक संपा गया. पर माता सेवन दरममें पित्त यने में ही बानी पुस्मोन मार्ग यता है, इस कारण इस उपाधिका सेवन करते हैं। उस मार्ग उपेक्षा करे तो भी हम कानाच नियम मही करते, फिर भी उसकी उपानही । समता । पर उसकी उपेक्षा करें हो रहस्य मात्मा मा बमवासरूम सक्न हाने मग गाप, पेसा र पम्प हारता है। स प्रकार सर्वपमें उदासीनसा ऐमे हम्मे यदि एएए स्फवा हो दो एक पो हो सकता पत्र १४१, ३४२] विविप पम मादि संप्रह-२५कों व १२५ है कि पूर्वोपार्जित कर्मका समता मापसे मेदन करना और जो कुछ किया जाता है यह उसकि बाधारसे किया जाता है, ऐसी दशा रहती है। (२)में ऐसा हो जाता है कि हम यपि मप्रतिबद्धतासे रह सकते है वो भी हमें स्मारके बाल प्रसगकी, अतर प्रसगकी, वौर कुटुम्म भारिक स्नेहके सेवन करनेकी इच्छा नहीं होती, तो फिर तुम मैसे मार्गेछापानको-निसे प्रतिबद्धतारूप मपकर यमका साहचर्य यता है-उसके दिन-रात सेवन करनेका वस्पत भप क्यों नहीं पता जानी पुरुषसे सहमत होकर नो ससारका सेवन करता है, उसे तीर्पकर अपने मार्गसे बाहर करते हैं। काधित् नो कानी पुरपसे सहमत होकर संसारका सेवन करते है, यदि ये सब सार्यकरके मार्गस बाहर ही को पाने योम्प हों, तो फिर श्रेणिक आदिको मिप्यास्त्रका होना समय होता है, और सार्यकरके वचनमें विस्माद वाता है। यदि तीर्यकरका बचन सिंबामुक हो तो उनें फिर तीर्थकर कहना ही योग्य नहीं। तीर्यकरके कहनेका बाशय या कि मोहानी-पुरुपसे सहमत होकर बारममावसे, सागर वासे, कामनासे, वनुरागसे, हानाके पचमकी उपेक्षा करके, अनुपयोग परिणामी होकर ससारका सेपन करता है, यह पुष्प तीर्षकरके मार्गसे बाहर है। ३४१ बम्बई, बसोग १९१८ हम किसी मी प्रकारके अपने वात्मिक बनके कारण समारमें मही रह रो।।मोमी है उससे पूर्वमें बाँध ए मोग और कर्मको निहत करना है, और बा कुटुप है उसका पूर्वमें छिपा हुवा पर्व बापिस देकर निरत होने के लिये उसमें रह ये हैं। वनके लिये, धमके लिये, मोगके सिप, पुमके लिये, साफ छिपे बसमा बम्प किसी तयके भारिमक-धमके कारण हम संसारर्म नहीं रहे है। बिस जीतको माझ निकटतासे म राता हो, मह पौष ऐसे बतरग मेदको फैसे समठ सकता! किसी दुखके भयसे हमने ससारमें यना स्वीकार किया है, यह बात भी मही है। मान-अप मानका तो जो कुछ मेद है सब नित दी हो गया है। ३४२ पी, मासोग १९५८ (१) जिस प्रकारसे पहों कहा गया था, पर्यो उसमे भी गुगमनपसे प्याना सरप गा है। १ किसी निर्मल पाम पशिश स्थापित रमेका अभ्यास करके प्रपम उस पमतादित स्थितिम टाना। २ इस तय पुरा पिरता प्राप्त हो जानके बाद महिला ऑपमें मूर्य बार बाम पन्द्र धिन है, इस प्रकारको मापना करना । इस भावनाने तबता सर बनाना, अबतक कि या भावना उस पाकिभाकार मालिके दानको उत्पम न कर दे।
१२३ भीमन् पाचन्द्र [फा ४१ . उस प्रकारका पुषता हो जाने के पचात् चन्द्रको दाहिनी माँसमें पीर सूर्यको ई माँसमें स्थापित करना। ५. इस मामाको कबतक पुल पनाना, यातक पह मापना वस पदार्थक बाकर मादिके दर्शनको उपम न कर दे। (पागो दर्शन कहा है, उसे भास्पमान-दर्शन समन्चमा ।) ६न दोनों प्रकारोंकी उल्टी-साधी माकनाजोंके सिम हो बानेपर सकुटीके मम्प मागमें उन दोनोज तिवन करना। ७ पहिले इस पितवनको बाँस रोककर करना । ८ उस तिनके भनेक तबसे सहो जाने के मा मौसमंद रसकर, ठप्त पदार्थ दर्शनका माक्ना करना। ९ उस भावनासे दर्शनके मुसो गानेके पचात् यमें एक भएदए कमका पिन करके उन दोनों पदापोको अनुकमसे स्थापित करमा । १. इसमें इस प्रकारका एक मन कम माना गया है, परन्तु पहा ऐसा माना गया है कि र पिमुखरपसे यता है, इसठिये उसे समुसरूपसे भर्पात् सोपी तपसे भिवन करना । ११ उस वका कमसमें पहिले पत्रके क्षेत्रको स्थापित करना, फिर सूर्यके तेमको स्थापित करना, और फिर म हिम्पाकार ममिको म्पोति स्थापित करना । १२ उस मारके सो गाने के बाद, उसमें जिनका हाल, पर्सन और भामचारित्र पूर्ण ऐसे मानीतरगदेयकी प्रतिमा मातेगोम्प सरूपसे रितपन घरमा । ११ उस परम प्रविमाका म माग, न पुमा बौर म पर, इस प्रकार रिम्पस्वरूपसे पिताम फरमा । ११ ऐसी मावना करना कि संपूर्ण बान-दर्शन उत्पम होनेसे मापावरगदेष पही स्वरूप समाधिमें विपमान है। १५ ऐसी मावना करना कि सरूम-समाधिमें स्थित मौतरमा भारमा सरूपमें ही तदाकार। १६ ऐसी भावना करना कि उनके मर्मस्थानसे उस समय ॐकारको पनि निकर हो। १७ ऐसा माना करना कि उन मावनामोके पहो पानेपर पहकार स्व प्रकारके पम्प-पानका उपए रहा। १८ जिस प्रकार के सम्पम्मासि पतिरागरेपने पौतरग-निपाताको प्राप्त किया है, ऐसा मान उस ठपदेशका रास्म है, ऐस्म पितफन करते करते पान क्या है, ऐसी भावना करना । १९ ठस माक्माके प हो पाने के पचात् उन्होंने बो दम्प बादि पदार्प को है, समको मापना करके वामाका निम सरूपमें पितलन परमा—सागसे विल्यम परमा । (२) पान बनेकनेक मेह। इन सबमें सेठ प्यान तो पहीला नाता है निसमें भास्मा मुम्पमापसे गती है।बार प्राप करके नाम-मानको मारिदिना या भाम-म्यानको प्राप्ति नही होती। इस प्रकार वाम्बान यपार्य गोषको प्राधिक सिमाप उत्पम नहीं होता । स पपार्य मोषको प्राप्ति प्रायः करके क्रम क्रमते मात्से गांवोंको होती और उसका मुम्स मार्ग बोषस्वरूप पैसे बानी पुस्पा बाम्प बता संग, और उसके पति मान-प्रेमपानी पुरसका उस उस प्रकारका रंग - पण १४१] पिषिप पर मावि संप्रह-२५ो वर्ष - जीवको बमतकालमें यात बार हो पुका है, परस्तु' या पुरुप हानी है, इसलिये वब उसका आश्रय माण करना ही कम्य है। ऐसा मान इस बीवको नहीं हुवा, और इसी कारण जीवको परिभ्रमण करना परा , हमें तो ऐसा खतापूर्वक माझ्म होता है। (३) बानी-पुरुपको पहिचान न होनेमें प्राय करके गौरके हम तीन मान् दोप मानते हैं (१) एक तो मैं जानता , में समस्ता १, इस प्रकारसे बीयको मान यता है, यह माम । (२) सरे, हामी पुरुपके ऊपर एग करनेकी चपेना परिह बादिमें विशेष राग होना। (३) तीसरे, होक-भपके कारण, अपकीर्ति-मपके कारण, और अपमान-मपके कारण ज्ञानासे भिमुस राना उसके प्रति निस प्रकार मिनयाधित होना चाहिये उस प्रकार मोना । ये तीन कारण यौनको हानीसे भाात हो रसते है। चीनकी प्रानामें मी अपने समान हो कल्पना या करता है अपनी कल्पनाके भनुसार ही पानी के विचारका और शासका मी माप किया जाता है, प्रयोंके पठन भासि थोड़ा भी ज्ञान प्राप्त हो बानेसे, बीपको उसे अनेक प्रकारसे रिसानेको इपा रहा करती है यानि दोप उपर बताये हुए तीन दापोंमें ही गर्मित हो जाते है। बौर इन दोनों दोषोंका उपाशन कारण ता एक 'सम्छ' मामका महाशेप ही है और उसका निमित्त कारण असत्सग है। निसको तुम्हारे प्रति 'तुम्हें किसी प्रकार कुछ मी परमार्पकी प्राप्ति हो' इस प्रयोजनके सिवाय दूसरी कोई मी पा नहीं, ऐसा में इस बातको यहाँ स्पर बसा देना चाहता हूँ कि तुम वमी उपर बताये हर दोपोफे प्रति प्रेम पता है। मैं बानता, में समाप्तता', या दोष बनेन बार प्रतिमें रहा करता है। असार परिह बादिमें भी महत्ताको इच्छा पती है-पादियो दोष , ये पान और हान इन सबके कारणभूत बानी पुरुष और उसकी बाबाका मनुसरण परनेमें बाधा रासते है। इसलिये ऐसा मानते कि से बने से आमा ति करके उनके कम परनेका प्रपन फरना, और भौफिक मावनाके प्रतिभसे उदास हाना यही कम्पाणकारक है। (२) शरीरमें यदि पहिले मात्मभावना होती हो तो उसे होने देना, कमसे सिर प्राग बामभावना परमा शिर नियोंमें बारममा ना करना, फिर संकम्प-विकपम्प परिणाममें नाममापना परना, बार फिर स्थिर बानमें भाममाषना फरना-वहाँ सब प्रकारको अन्य माउनोस रहित पति फरना चाहिये। सोह प्राण, पाणी, उसाप्पान करना। ३४३ मामात्र स १९४८ हे परमाराम रे ! जम, गरा, मरण मा मा दुगोरे अपत ५प करनेगमे ग
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पर m] विषिष पत्र मादि संप्रह-सवाषर्प २२९ कितना करें, मिस मिस तय इस राग-दोपका विशेषरूपसे नाश हो उस उस तय वाचरण करना, यही निनेपरदेवकी मात्रा है। ३४७ बम्बई, मासोज १९१८ (१) निस पदार्थसे निस्प हो विशेप म्पय होता हो और बाप कम हो, तो यह फार्प क्रमसे अपने फ्नका त्याग कर देता है, अर्थात नाश ऐ माता है-ऐसा विचार रसार ही इस म्यवसायका प्रसंग रसना चाहिये। पूर्वमें उपनित किया था वो कुछ प्रारम्प है, उसके प्रेग्न करनेके सिपाय दूसरा कोई उपाय नही है, और योग्य भी इसी रीतिसे है, ऐसा समझकर मिस मिस प्रकारसे जो कुछ प्रारम्प उदयमें जाता है, उसे सम परिमामसे फेदन करना ही योग्य है, और इसी कारणसे यह म्यवसाय-प्रसंग योग्य है। पितमें किसी रातिसे उस म्पबसापका फव्य नहीं माश्म होनेपर मी, या म्यवसाय केवन खेदका हो हेतु है, इस प्रकार परमार्यका निश्चय हानेपर मी, प्रारम्धरूप होनेसे समसग वादि योगका अप्रभानमारसे बेदन करना पड़ता है। उसका वेदन करनेमें इला भनिन्म कुछ भी नहीं है, परस्त बास्माको इस मिफल अधिक संबधको देसकर सेद होता है, और इस विपपमें बारमार विचार या करता। (२) इन्द्रिय विपपरूपी क्षेत्रका बमानक गीतनेमें तो बारमा वसमर्थता बताती है, बार समस्त पृषीके गोस भनेमें समर्थताका विचार करती है, यह कैसा आचर्यकारक है। प्रातिके कारण भामा नितिका विचार मही कर सकती, ऐसा कहना फेरस एक महाना मात्र है। यदि यो समयके लिये मी प्रापि छोड़कर मारमा प्रमादित कर हमे नितिक हो विचार किया करे, तो उसका बर प्रापिम भी अपना कार्य कर सकता है। क्योंकि हरेक बस्तुफा अपने कम-ज्यादा परके अनुसार ही अपना अपना कार्य करनेका समान है। मिस तय मानक पाप इसरी सुराकके साथ मिझनेसे अपने असली स्वभावके परिणमन करनेको नहीं भूल माता, उसी तर जान भी अपने समाषको नहीं भूलता । इसळिये हरेक औषको प्रमाद रहित होकर, पोम्य में निहारिक मार्गका ही निरतर विचार करना चाहिये । - व्रतके संयंपमें यदि किसी जातको मत ना हो तो परमारसे इसरेको साक्षीसे ही सुना चाहिये, उसमें रि सेडासे प्रति नहीं करना चाहिये । तमें ए सफनेपाली पदि कोई ए रक्सी हो और किमी कारणविशेषसे पर उस वस्तुका उपयोग करना पर बाप तो वैसा फरमके सर्व अधिकार्य म बनना चाहिये । पानीको माग अनुसार ही आचरण करमा चाहिप नही तो उसमें शिपिस्ता मा पाठी है, भीर व मग हो जाता है।
२८ भीमद् पयवान [ प १४, पौवराग पुरमका ममार्ग माप श्रीमद्ने भनत पा करके मुझे प्रदान किया । इस वनत उपकरके प्राप्युपकारका बाखा पुकानेके म्पेि में सर्वपा वसमर्प हैं। फिर भार भीमत् कुल मा मेक म्मि सपा निस्ट। इसस में मन, वचन और कापाकी एकाग्रतासे बापके घरणारविन्दमें नमस्कार करता। वापकी परमभक्ति भार वीतराग पुरुपके मूह धर्मकी उपासना मेरे इयमें भषपर्यंत भरूपसे बागा या करे, इतना ही चाहत, या सफर होवो ! ॐ शान्ति शान्ति शान्ति । ३४४ विक्रम बत् १९९८ भबवासी मूवशा रविकै दोव भस्व व दिन दिन प्रति, अमुसी भीषन पो जीवन पटा है। काम्फे प्रसव मिन मिन दोव न बन, मारकै पसव मानी ठसौ पठतु। पते परि मस न सोमै परमारपी, स्मारयत भ्रम मारव ठटर है। म्गो फिरै सोगनिसी पयो परै मोगनिसाँ, विपरस मोगनिसौं नेक न पर।१॥ मैस मृग मच पारिसी वपत माहि, सुपायत मूपानस कारन मा । से भपपासी मायाहीसौ रित मानि मानि, ठानि गनि भ्रम भम नाटक मटा, आगैको घुकव पाइ पीपरा पाइ! जैसे नैन न नर मेपरी बटन है, से मा पवन मकव करतति करे, रोपव सव फस सोपव सटा है ।। २ ।। (समपसर-माठक) (२) ३४५ बई, १९९८ संसारमें ऐसा क्या मुकि मिसो प्रतिबघमें पार गनेको म करता है। मई, १९९८ ३४६ पिमा मामा, रागरोसा गई पिप्तिममंति, वा वा पपरिमर्म, एसा माणा मिणियाणम् । , पर ३४.] विषिभ पन मावि संप्रासापर्व कितना करें, मिस मिस पर इस राग-दोपका विशेषरूपसे नाश हो उस उस तब आचरण करना, यही बिनेनरदेवकी वाहा। ३४७ बर्मा, वासोत्र १९१८ मिस पदार्थ से निस्प 0 विशेष म्यय होता हो और बाय फम हो, तो वह पदार्थ क्रमसे अपने पमका त्याग कर देता है, अर्यात् नाश हो माता है-ऐसा विचार रखकर ही इस म्पासापका प्रसग रस्सना पाहिये। पूर्वम उपनिय किया जा ची पुट प्रारम्प , उसके पेदन करनेक सिवाय दूसरा कोई उपाय मही, वीर योम्प भी इसी रीतिसे है, ऐसा समझकर निस जिस प्रकारसे मो मुल प्रारम्भ उदयमें जाता है, उसे सम परिणामसे बेदन करमा ही योग्य है, और इसी कारणसे यह म्पबसाप-प्रसंग योग्य है। पिसमें किसी पतिसे उस म्पवसापका कन्य मही माझ्म होनेपर मी, यह म्पबसाय केबल स्वेदका होत है, इस प्रकार परमार्थका निपय हानेपर मी, प्रारम्भमप रोनेसे मसग वादि योगका अप्रधानमानसे बेदन करमा पाता । उसका बेदन करनेमें इशा-निष्ठा कुछ भी नहीं है, परन्तु बारमाको इस निष्फळ प्रातिक सबपको देखकर से होता है, और इस विपपमें बारम्पार विचार हा करता है। (२) इन्द्रियके विषयरूपी क्षेत्रकी जमीनके पावनेमें तो मारमा भसमझता बताती है, और समस्त पृमीक जीत नेमें समर्यतामा विचार करती है, यह कैसा माधधारक है। प्राधिके कारण बामा नितिका विचार नही कर सकती, ऐसा करना केवल एक बहाना मात्र है । यति पोरे समपके लिये भी प्रति अपकर ममा प्रमादरहित होकर इमेशा निरचिका हो विचार किया करे, तो उसका बस प्रारिमें मी मपना कार्य कर सकता है। क्योंकि हरेक बस्तुका बने कम ज्यादा परके बनुसार ही अपना अपना कार्य परनेका समाव है । जिस तरह माफ पदाप दूसरी तुराक के साथ मिझनसे अपने असली समायके परिणमन फरमेको महा भूस बाता, पान मी मने स्वभावका नहीं भूसता । इसपिये हरेक जीपको प्रमा' रहित होकर, योग्य कारमें नितिक मार्गका ही निरतर विचार करना चाहिये । (२) प्रतके संपपमें य िकिसी बीचको मत छेना हो तो स्परामाषसे सरेको साशीम ही सना चाहिये, उसमें किर सासे प्राति नही करना चाहिये । तमे र सकपाशी या कोई छ मला हा भार किसी घरणविशेषस पदि उस मनुका उपयोग करमा पर गाप तो पैसा फरनके मप पिक बनना पाहिये । बामौकी भाशके अनुसार ही वापरम करना चाहिपे नही तो उसमें शिविश्वा भा माती है, और प्रतका मग हो जाता है। उसी तरह ४२ भीम परवान [पत्र - (१) मोह-कपाप हरेक बारको पेवासे पानाने कोष, मान, माया और गोम-परक्रम रस्सा है। यह क्रम इन कपार्योक पप होने वयासे रस्सा है। परिण कपायके क्षप होनसे कमसे दूसरी पापोंका सप होता है। तमा वमुक अमुक नालोंध बफेवासे मान, माया, छोम और कोम ऐसा मोम रस्सा गया है यह देश, काल वीर क्षेत्रको देसकर हो पा गया है। परिरे पातको जपने मापको सरेसे उँचा समझनेसे मान उत्पन्न होता है। फिर उसके सिप ए मा-कपट परता है, और उप्तसे पैसा पैदा करता है, और पैसा करभेमें निम करनेवाले के उपर क्रोम करता है। इस तबसे कपापको प्रहतियाँ अनुकमसे पती है। जिसमें डोभको तो इतनी प्रब मिठत कि गांव उसमें अपने मानतकको मी भूग पाता है, और उसकी परवाहता भी नहीं करता सम्पेि मामरूपी कपायके कम करनेसे वहमसे पम्प कषाय भी इसके साप साप कम हो जाती है। भास्पा और प्रदा हरेक भाको पोरके मस्तित्व से भगाकर मोहतककी पूर्णरूपसे कहा रसमा चाहिये । इसमें बरा मी का महा रस्ता पाहिपे । इस जगह बना रखना, यह जीके पतित होनेका कारण है, और पर इस प्रकारका स्वामको कि पासि मोरे गिर गानेसे फिर कोई भी स्थिति नही र पाता । एक तमाम सत्तर कोषाकोपी सागरकी स्थिति पता है, जिसके कारण पानको मसम्पातों मयों में प्रमण करना पलता है। चारित्रमोहसे गिरा वा तो ठिकाने मग मी माता है, पर वर्मनमोहसे गिरा दुमा ठिकाने नही म्गता । कारण यह है कि समहमें फेर होनेसे करनेमें मा फेर होमाता है । गौतमगरूप मानांके पवनमें पपामाप होना संभव नहीं है। उसके ममममें गकर मानों मस्त हो नि, इस गतिसेयाको मग मी म्यून नहीं करना चाहिम । पर मय शका उपस्थित होनेका प्रसंग उपस्थित 0, तब सब भावको विचारना चाहिये कि उसमें मानी 0 भूग होती है। मिस मतिसे बातरम पुरुषोने बानको प्रापा मवि इस पीवमें है ही नही और इस मौकी मति तो पवि शाकमें नमक कम पन्नो तो इतने मात्र ही एक गाती है तो फिर मौवरम्पके दानको मत्तिका मुकाम तो कर फरसे कर सकता है। इस कारण पाय गुणम्पान के क्तक मी जातको बानीका बचपन केना पाहिपे, ऐसा कहा है। अधिकारी नेफर मी जो पे जानका उपदेश दिया भाता है, पर इस बारको बनेको बाला और चतुर मान भेमेके कारण-उसके मान नए करनेके भरण-दो दिया गावा है। मौर को मायके स्थानको मात्र हो पाती, पावर सरिये कत्रो पाती है पैसा प्रसंग प्राप्त होनेपर मी जीव नीचेका नीचे ही थे।
२६याँ वर्ष ३४८ बर्मा, कार्तिक मुदी १९९९ बिनागममें इस काको जो 'इपम' सबा कही , या प्रत्यक्ष साई देता है, स्पोंकि गो 'दुससे प्राप्त होने पोम्प ऐ' उसे दुपम करते हैं। उस दुमसे प्राप्त होने योग्य तो मुस्पतपसे एक परमार्प मार्ग कहा जा सकता है और उस प्रकारको स्थिति प्रत्यक्ष देखनमें बाती है | पपपि परमार्य मार्गको दुर्छमता सर्व काछमें है, परन्तु इस कालमें सो काठ मी विशेषरूपसे दुर्ममताका कारणमूत है। यो कानेका यह प्रयोगन है कि प्राय करके इस क्षेत्रमें वर्तमान कास्में पूर्वमें निसने परमार्थ- मार्गका माराधान किया है, यह दो-मारण नहीं करता । वौर यह सत्य है, क्योंकि परि उस प्रकार के चौगोंध समूह इस क्षेत्रमें देहधारीरूपसे पता होता, तो उमें और उनके समागम बानेवाछे भनेक भीलोंको परमार्प मार्गकी प्राप्ति मुखपूर्वक हो सकी होती, वीर इसमे किर इस काठको टुपम काठ कर मेका कोई कारण न रा माता । इस प्रकार पूर्वाराषक नौवाको मापता श्यादि होनेपर मी वर्तमान काठमें परि कोई भी जीव परमार्प मार्गका वायवन करना चाहे सो पाप हो भाराभन कर सकता है, क्योंकि दुसपूर्वक मी इस कामे परमार्थ-मार्ग प्राव तो हो सकता है, ऐसा पूर्वशानियोंका कथन है। बर्तमान कालमें सब पापोंको मर्ग दुम्से ही प्राप्त हो, ऐसा एकान्त अभिप्राय मही समझना पाहिये परन्तु प्राय करके मार्ग दुससे प्राप्त होता है ऐसा मभिप्राय समझने योग्य है। उसके बहुतसे कारण प्रत्यक्ष दिखाई देते है। (१) प्रपम कारण पा सा उपर बताया है कि प्रायः परके सीवको पूर्णकी बारापकता मही है। (२)सरा कारण यह है कि उस प्रकारको मापषमता म होने के कारण वर्तमान में उस भारापक मार्गकी पति मी पहिले न समझनेसे, बनायपक मार्गको दो भाग्यक-मार्ग मानफर औषको प्राप्ति होती है। (३) तीसरा कारण यह है कि प्राय करके कही हो ससमागम अपना सहरमा पोग होता है, और ए मौचित् होता है। (.) पीपा कारण पर कि बसमग भारि कारणोंसे नारको सार बारिकी परिमान होना भी मुस्फर होता है, और प्रापः करके असहरु नादिमें दो सप प्रतावि मानफर जोर नही सक जाता है। (५) पाँचका कारण पह है कि सथित् समागमका संपोग बने वो मी व मार्य बारिकी इस प्रकार शिपिरता गया है कि क्यामरा मार्ग महण नही फर सस्ता, मयबा उसे समन्च नहीं सम्ता, वपना असमागम आदिसे पा मम्मी कम्पमासे मिप्यमें सस्पमपम प्रनीति कर बना है। प्राप करके वर्तमानमें औषने या तो शुभ-किपारी प्रधानता, माघमार्गका कम्पना की, वपरा बाम-किपा और मुद म्पपहलीपाके उापारन परनेमें मोम मार्गी फरमा पापा - भीमद् पवन [पा ३४८ वपना पुद्धिको कम्पनासे वम्यात्म के प्रपोको पार कपनमात्र वयाम पाकर मोक्ष मार्गका कम्पना की है। ऐसे कल्पना कर सेनेसे नारको ससमागम मारिदमें उस मान्यताका वामह पापा उपस्थित परफे परमार्थको प्रालिम स्तमरूप ऐता है। यो गौच मुफीयाको प्रभावामें दो मोभ-मार्गको कल्पना फरते है, ठम गोषोंको तपारस उपदेशश मापार मी या करता है।न, दर्शन, भारित्र और तप, इस तरह पर तरास मोम- मकिये जानेपर मी पहिलेके दो पर तो ठमके विस्मृतम्य ही है, और चारित्र का वर्ष देप तथा केनत बाप-मिति में ही समझे एके समान होता है। तथा तप शाम का अर्थ केरस उपवास आदि मतका करना मी कि बाप-स्वामें ही समझे एके समान पता है। तया यदि कमी प्रान दर्शन पर कामे मी पर नाय तो गोंगकिम कपनके समान मानोंके कपनको शान, और उसकी प्रवति वा उस कामेवाको प्रवातिमें ही दर्शन शम्बका मर्प समझे एके समान यता है। जो जीव बाप-निया (एन वादि) वीर पुर पगार-क्रिया के उत्यापन करनेको मोक्षमार्ग सम्पते है, ने मौष शासकि किसी एक बचनको मासमशीसे हो प्राण करके समन्वे । । परि दान वालि निपा किसी भाकार मामि, निम्न बुनिसे, अपमा यहाँ उस प्रकारको किया संभव न हो एसे गो गुणम्यान वानि स्पानमें की गाय, वो पसाराहात है, ऐसा धाका मूह वाशय है । परन्द्र दान वा क्रियाक मूम्स पी अथापन कर राउनेका सामोका अभिप्राय मही है। इसे पार पस बपनी मतिकी छपमा निषेध करता है। क्या पहर दो प्रकारका k- '-एक परमापीठात महार और दूम्मा म्पाप म्पबहार । पूर्णमें इस गोलके वमबार बारमार्प करनेपर मौमामार्ष नमा ऐसे थानों में बाम्य है। उन पापोंको पाकर गौर याने बापको म्पसारका । उत्पादन करनेवाला समझा हुमा मान सेवा है, परन्त शाबकारने तो ऐसा भी नहीं कहा। मो म्पसार परमापीतमा म्पहार मही और केक म्पपातु म्यार, UNEारने उसीके दुरामका निपेष किया है। निस म्पमा पर बर्गति होवार म्पमार म्पपहार हेतु भा ना सकता है मया मिस म्पबहारसे भारमा लिमान-दसा र होने योग्य न हो, उस म्पहारको प्पयाधयेत म्पमार या जा सकता है, इस शामकारने निमेष किया है, और पर भी एकविसे नहीं किया । केवट हुम्हसे बपया उसीमें मोश मार्ग माननेवारको से सन्ने म्णमाके उपर मानेके पि इसका निपट किपा है।ौर परमापस पवार--सम, सोग, मिर, चतुष्पा, बास्पा मपला सद्गुरु स्थान और मन पचन नादि समिति, वा गुमिका निषेध महा किपा । और परि ससका निषेध करने योग्य होता ये क्ति का सपदेश फरफेवारीमा समझाने पैसा प बावा पा अयमा रि किन साममोको अपनेचा उपदेश करना बाकी य माता पा निसते धानका उपदेश किया ! बर्षात् उस प्रकार म्हारसे परमार्थ प्राप्त किया माता है, और गोरो उस प्रचरका पपार माय हो मम करना चाहिये, जिससे च परमार्प प्राप्त करे, ऐसा मानका बाप । सम्पास्मा मा उसक समागमा इस बाश्यक समझे बिना ही उस मारका सत्यापन करके बने और दूसरे मोचि-दुर्गमता करते हैं।
पत्र ३४९,१५ ] पिपिप पत्र मावि संप्रह-२६षों पर्प धम, सग नादि गुणों के उत्पम होनपर अपमा सम्पतिशेष, मिप्पक्षता होनेपर, काय भादिके श होनेपर पथमा किसी मी प्रज्ञाविशेषसे समझनेकी योग्यता होनेपर, जो सहरके पाससे समझने योग्य जम्माम प्रपोंको-बो पाँतक प्राय करके दाम जैसे-अपनी कल्पनासे नसे तैसे पाकर निमय करके, उस प्रकारके मंतर्मेदके उत्पन्न हुए पिना ही मपया दशाके बदछे बिना ही, विमावके दूर हुए बिना हो, वपमे बापमें जानकी कल्पना कर छेता है, तपा क्रिया मौर शुर म्यवहाररहित होकर प्रति करता है-मा अष्फ-प्यारमाका तीसरा मेद है। नीयको बगह जगह इस प्रकारका संपोग मिकता पाया है, अथवा वानरहित गुरु या परिम्न मा क गुरु, केवळ अपने मान पूना भादिका कामनासे फिरनेपाले मीयोंको, अनेक प्रफारसे कुमार्गपर चहा देते हैं और प्राय करके कोई हो ऐसी अगर होती है, यहाँ ऐसा नहीं होता । इससे ऐसा माश्म होता है कि कातकी दु पमता है। यह जो हु पमता सिसी है मह कुछ चौरको पुरुपार्यरहित करनेके लिये नहीं लिसी, परन्तु पुरुपापको बागृषिके लिये ही लिखी है। मनु संयोगमें तो चीरको कुछ कम मागति हो सो भी कदाचित् पनि म हो, पस्त नहीं इस प्रकारका प्रतिछ योग यता हो यहाँ मुमुक्षुको भवस्य ही वधिक नागस गना चाहिये, जिससे तपाम्प परामब न , भौर वा ठस प्रकारके किसी प्रवाहमें प्रवाहित म हो नाप । यपपि पर्वमान काठको दुःपम कार कहा है, सिर मी या ऐसा मी है कि इसमें बर्नत भएको छपकर केवळ एक मक वाकी रसनेबाठा एकापतारीफ्मा भी प्रश्न हो सकता है। इसलिये विपारपान नावको इस बयाको रसकर, व्यर को ए प्रबाहोंमें न पाते हुए, पपाशति वैग्रम्प आदिका भाप हो वारापन करके, सहरुका योग प्राप्त करफे, कपाप बादि दोपको नए करनेमासे वौर बामसे रक्षित रोनके सप्प मार्गको प्राप्त करना चाहिये । मुमुक्षु माबमें नो शम मादि गुण कहे , ये गुण वाप समय होते है, षयमा उन गुणोंक मिना मुमभुता ही नहीं कहा जा सकती। निस्य ही उस प्रकारका परिचय रसते हुए, उस उस बातको भगण करते हुए, विचारते हुए, फिर रिसे पुण्यार्य करते हुए प मुमुसुता उत्पम होती । उस मुमुभुताके उरम होनेपर चीनको परमार्य मार्ग पन्य समसमें बाता है। ३४९ बमई, कार्तिक वदी १, १९१९ प्रमाके कम एनका उपयोग स बीवो मार्गकि विचारमें स्पिति कराता है, और विचार मार्ग स्पिति कराता है। इस यातको फिर फिरसे विचार करके उस प्रफरनको यहाँ किसी भी तय दूर करना पोम्प है। यह बात मूडने योय नही है। ३५० ब, फार्तिक बदौ १२ पुष १९१० "पुनर्मम है-श्य है, इसके छिपे मैं अनुमबसे करनेमें मचछ," यह पाय पूर्णमाके किसी संयोगके स्मरण होते समय सिद हानेमे दिखा। जिसको पुनर्गम वा मानस किया है उस पदार्पको किसी प्रकार से मानकर हो यह बाप लिसा गपाहै। . - भीमद् पाचन [पर १५१ १५२ १५३ बर्मा मगसिर ९ प्रेम १९९९ (१) उपारिक सहन करनेके लिये मितनी चाहिये उतनी कठिनाई मेरेमें मही है, इसलिये उपाधिसे कर्पत मिति पाने की प्या या करता है, फिर भी उत्पनप जानकर पपपपाशवि सम्म होती है। परमार्पका दुस मिटनेपर मौ ससारख प्रासंगिक दुर तो यारी करता है और पास वनी रम बारिके कारण नाही, परम्त दूसरेको बमुकम्पा तपा उपकार बादिके कारण ही रहता पौर उस वायनामें पित्त कमी कमी विशेप देगको प्राप्त हो जाता है। इसमे सके उपरसे पा ठरेग स्पर समझमें मही वा सकताकुछ अंशमें तुम्हें समहमें बायेगा । इस उद्वेगके सिवाय हमें दूसरा कोई मी संसारके प्रसंगका दुख नहीं माश्म होता । नितने प्रघरके ससारके पाई है, यदि उन समें निस्सहता हो और ठोग रहता हो, तो पायकी अनुरूपा अपना उपकार अपना इसी प्रकारफे किसी कारणसे रहता है, ऐसा मुझे निपपरूपसे माश्म होता है। स तोगके कारण कमी तो वो वास मा नाते है, और उम सत्र कारों के प्रति प्रापि करनेका मार्ग बमुक मशमें परतंत्र । Pसाई देता है, इसलिये समान ठासीनता बागायो। धानांके मार्ग निधार करनेपर मास्म होता है कि यह किसी मी प्रकारसे मर्म करने के योम्प नही उसके इसे इस मामाको छोक करना योम्प नही मारमाको भाम-महानसे धोक करमेके सिमाप उसे दूसरा कोई शोक करना पोग्य नहीं है। प्रगटरूपसे पमको समापने देख्नेपर मी निसको देहम मी नहीं पाती, उस पुरुपको नमस्कार है। इसी बावका पितान रमना, पर हमें तुरे वीर सबको पोम्य है। देह बारमा नगी है। मामा देह नहीं है। जैसे पोको देखनेराग घोसे मिम, इसी तय दोहको देखनेपाम, माननेवाग मामा से मित्र है, मर्यात् पदे नहीं। विचार करनेसे यह बात प्रगर बनुमसे सिर होती है, तो फिर इससे मिम देहके स्वाभाविक अपनद्रिरूप बार परिणामको देखकर हर्ष-शोक युक्त होना किसी भी प्रकारसे योम्प महो। और हमें और हमे उसका निर्धारण करना हना-पोम्प है, और पोशाके मार्गको मुख्य पान है। (२)म्पापारमें पदि कोई पत्रिक म्पापार सूच पड़े तो बायका कुछ काम होना समय है। ३५२ बई, मगसिर दो १५ पनि १९५९ भावसार स्खुशापाने मपाइमें सह पाच मिनिटके मौतर देशको त्याग दिपा । संसारमें ग्यासान बने सिमाप दूसरा कोई उपाय नहीं है। ३५३ बई, माम पुदी ९ गुरु १९९९ तुम सब मुमुहमोके प्रति ममतासे पापोम्प पहिम निरन्तर जामा पुरुषको सेवामा पर ३५४, ३५५] पिपिम पम मादि समाह-२५याँ वर्ष करते हैं, परन्तु इस दुपम काउमें तो उसकी प्राप्ति परम दुपम देसवे है, और इससे ज्ञानी पुरुषके मामपमें बिसको यदि स्पिर है, ऐसे मुमुक्षुग्नमें सरसगपूर्वक महिमाक्से गनेको प्रातिको महामारप रूम मानते है, फिर मी शुष्में तो उससे विपर्यय । प्रारम्पोय यता है। हमारा स्म्सगका मन बामा । यता है, रि मी उदपाधीन स्थिति है, और यह हाउमें इस प्रकारचे परिणामसे यती है कि तुम मुमुसुरोंक पत्रकी पहुँचमात्र मी पिउनसे दो बाता है। परस्त किमी मी स्थिति में हमारे मपराध-योग्य परिणाम नहीं हैं। ३५४ बर्मा, माघ बदी ७ युध १९९९ पनि कई मनुष्य हमार विषयमें कुछ कहे तो उस महातक बम गमीर मनसे मन रमना, इक्ना ही मुख्य कार्य है। यह बात टीक है या नहीं, यह जाननेके पहिसे काई हप-विपा- मैसा नहीं होता। मे चिमतिक सिपमें जो कमी कमी विसा नाता है, उसका वर्ष परमार्थक उपर सना पाहिय, और इस जिसमेका वर्ष म्पबहारमें कुछ मिप्पा परिणामबासा दिखाना योग्य नहीं है। पो ए सकारोंका मिग्ना दुर्सम होता । कुछ कम्याणका कार्य हो अपना पितान हो, यही साधनका मुरूप करण है, बाकी ऐसा कोई भी विपय मही कि जिसके पीछे उपानि-तापसे दोन तापूर्वक वफ्ना योग्य हो, अथवा इस प्रकारका फोर मय रखना योग्य नहीं कि गो अपनेका केस मेक-सहासे ही पता हो। बर्मा, माप से ११ रवि १९१९ यहाँ महषि-उत्यसे समाधि ।। प्रमानके विषयमें गो बापक विचार राते मे काणामाबके कारण या करते है, ऐसा हम मानते हैं। कोई मी जीव परमार्थके प्रति केबल एक यशसे भी प्राप्त हानेके कारणको प्राप्त हो, ऐसा निमारण करणाशी रुपमा वारि तीर्यकान भी किया हक्योंकि सपुरुषों के सम्प्रदायको एमीही सनातन काणावस्था होती कि समयमात्रक बनवकाशसे समस्त लोक वामात्रम्पारे प्रति समुठ हो, भरमस्वरपके प्रति सम्मुम हो, मारमममाभिके प्रति सम्मुम हो भार बम्प बास्पाके प्रति समुस न । पप स्वम्पक प्रति समुस न हो, भय नाभिके प्रति समुम नो निस शानस समस्प परिणम का , परवान सब जामको प्रगट रो, मनबकाशहपसे सब जीव उस पानके प्रति सविसम्पम "सा प्रचारका विप्तका कामाशीच समान है, सनातन पुरुषोंका सम्प्रदाय है। भारके अंत:करणमें इसी प्रकारका करमानसि प्रमारक मपयमें बारम्बार चार माया करता है। गौर वारके बिचारका एक वश मी फल प्राप्त हो.भपा सस फक प्राप्त नेता IEDA हो, मीमा सम्द्र [१५५ ऐसा होना समर नहीं, पौर मह स मासि होना योग्य नहीं, ऐसा हमें लगता है। मिस्से या समप होना योग्य , नपवा सफा मो मार्ग है, में तो प्रतिके उदयमें है, वैर भातक पा कारण उमर म म मा गाय, तबतक कोई दूसरा उपाप प्रतिवषरूप हो है--नि संशप प्रति- अषरूप होगा यदि वान-परिणामी हो तो मिस पर उस बवानको नियमितरूपसे मारापम करनेसे कम्पाण नही, उसी तय मोहरूप मार्ग अपना इस प्रकारका मो इस गोसनपी मार्ग है, मा मात्र ससार है। उसे फिर चाहे मिस भाकारमें रस्सो तो मी या संसार ही है। उस ससार परिणामसे सीव करनेके म्येि व बससारगत पापाका अस्वच्छंद परिणामसे वापार प्राप्त होता है उस समप उस सप्तारका बाकार निराकारताको प्रार होता माता है। बफ्नी रसिके अनुसार दूसरा प्रतिबंध किया करते हैं, तया वपनी उस पीसे पहिानीफे वचनकी मी बाराधमा करें तो कल्याण होना योग्य माम नहीं होता। सम्मेि हम तो ऐसा लिसो कि या तुम किसी मान्याणके कारणके ननदीक होनेके उपायकी या करते थे, तो उसके प्रतिवधका कम होनेका उपाय करो और नहीं तो फापाणी दणका स्पाग करो। शायद तुम ऐसा समय हो कि जैसे तुम सप वाधरण करते हो पैसे । कम्पाण है, मात्र यो सम्पमा हो गई है, हा एक अकस्माण है। परन्तु पदि ऐसा समझते हो तो पर पयार्प महा है। बास्तबमें मो महाग वापरण है, उससे कश्याण मिममौर पर तानब ना निस निस पागको उस उस प्रकारका मनस्थिति बादि योग समापने रो, तब तब उसे पा प्राप्त होने योग्य है। समस्त सम्हमें को कल्याण मान ना पोप ना और यदि ऐसे कायाण होगा हो तो उसका फल संसात्पर्म । । पोंकि पूर्वमें इसीसे बीन संसाच राता वापा है। इसम्पेि मा विचार तो गब पिसे वाला होगा तावापेगा। हमें तुम अपनी पिके अनुसार वषबा चो तुम मास होता है, उसे कस्पाण मानकर प्राप्ति करते हो इस लिपपमें साग हो, किसी प्रकारको मामको इसके बिना ही साह इनमा बिना ही में श उत्पम करनको इसके बिना ही, मुझे जो कुछ वित्तमें माता है उसे कर देता। रिस मार्गस कम्पाण होता है उस मार्गके दो मुख्य कारण देखनेमें बाते हैं। एक तो यह कि जिस सम्प्रदाय मापापके लिये ही सम्पूर्ण बसगवाज क्रिमा होयूसर किमी मी प्रयोजनको इससे म हो मार निरंतर ही शान-दशाके उपर सीबोका विच पता, उसमें समय की कम्त्यापरे सत्यम होनेका योग मानते हैं। यदि ऐसा न हो तो पोगका मिना समय नहीं है। तो गेम संबासे, बोप-संवासे मानके लिये पूगाके रिपे, पके म्हपके पिये मालक बारिके अपनेपन के लिये, अपना मा तय किसी दूसरे घरोसे जप, तप वादि म्पास्मान वादिके करनेको प्राधि पछ परी परत किसा मी तरा वामापके लिये महीनामापके प्रतिषषरूम है। इसपि यदि तुम कुछ इन्म करते हो तो उसका उपाप करने के लिये यो दूमय करण करते है, उसके बसगता साम्य होनेपर लिसा सम्म मी कापाण होना समय है। असगता अदि मामाके सिवाय संग-पगमे नही पाना--शिष्य मावि बनाने भाप ससारके साथियों के संगमें बातचीत करमेका प्रसा मी रसना, शिष्प आदि मानेके लिये गावासी पर १५१, ३५.] विषिष पत्र मादि संप्रह-२६वों पर्प पत्राको साथमें नहीं माना। दीक्षा के हे तो तेरा कात्याण होगा', इस प्रकारके वास्प तीर्थकरदेव भी नहीं करते थे। उसका हेतु एक या मी पा कि ऐसा कहना भी उसका दीक्षा लेनेका विचार होनेके पहिले ही उसको दीक्षा देना-कायाणकारक नहीं है। जिसमें तापकरदेखने मी इस प्रकारके विचारसे प्रति की है, उसमें हम छह सा मास दीक्षा लेने का उपदेश बारी रसकर उसे शिप्प बनाते है, यह केवल शिष्यके लिये ही है, वात्मापक लिये नहीं । इसी तरह यदि पुस्तकको जानकी बाय- धमाके सिप, सब प्रकारके अपने ममत्वमावसे रहित होकर रस्सा माय तो ही बारमार्थ है, नहीं तो पा मी एक महान् प्रतिवध है, यह मी विचारमे योग्य है। पा क्षेत्र भपमा है, और उस क्षेत्रको रक्षाफे लिये पातुर्मासमें यहाँ यनेके मिये नो विचार किया जाता है, यह क्षेत्र प्रतिवध है। तीर्थकरदेव तो ऐसा करते है कि दम्पसे, क्षेत्रसे, काग्से और मापसे -इन पार प्रतिवर्षोंसे यदि बास्माप होता हो, वपना निर्मप हुमा नाता हो, तो वा तीर्थकरके मार्गमें नही है, परन्तु ससारके हो मार्गमें है। - ३५६ बम्बई, फागुन मुदी ७ गुरु १९४९ मामाको निमाणसे बमकारयुक्त करमेके म्पि और समाबमें वनक्काशनपसे यमेके सिप पदि फो! मी मुल्य ठपाप हो तो ग मारमाराम जैसे हानी-पुरुषका निफाम मिसे महि-योगरूप सग ही है। उसे सफल बनाने के लिये निति-क्षेत्रमें उस प्रकारका सयोग मिझना, या किसी महान् पुण्पका योग, वौर उस प्रकारका पुष्प-योग प्राय इस जगहमें अनेक पतरापोंसे युक्त विसई देता है। सलिये हम समीपमें 10 ऐसा बारम्बार याद करके मिसमें इस स्मारकी उदासीनत्य कशी हो, उसे हास्में माँचो वौर उसका विचार करो । बारमा केयर भारमरूपसे ही ये ऐसा बितवन रसना, यही सबौर शासका परमार्थरूप है। इस बारमाको पूर्वमें मनतका उपवीत करनेपर मी नहीं जाना, इसपरसे ऐसा माश्म होता है कि उसके माननेका कार्य सबसे कठिन है। भषवा माननेका तपारूप योग मिलना परम दुर्मम है। नीव बनतकारसे ऐसा ही समठा करता है कि मैं अमुकको मानताई नमुकको मही मानता, परन्तु ऐसा ना। ऐसा होनेपर मी मिस रूपसे र स्वप है उस रूपका तो निरन्तर हो विस्मरण वा बाता है-पा अधिकाधिक प्रकारसे रिचार करने योग्य है और उसका उपाय मी गात प्रकारसे रिपार करने पोम्पो । । ३५७ बर्मा, फागुन मुरी ११, १९१९ निस काठमें परमार्थ-धर्मका प्रशिके कारण, प्राप्त होनेमें पतपम हों, उस कालको सार्थकरेगने इपम कार का और इस काछमें यह बात स्पर दिखाई देती है। मुगमसे सुगम ऐसा नो सम्पा- गका उपाय है, मी जीवको इस कासमें प्राप्त होना मर्पत ही कठिन है। मुमता, सरयता, ॥ भीमपरचम [पर 1५८ निहाति, ससम बादि सापोको इस कामें परम दुर्गम नामकर, पूर्णके पुस्योंने इस कालको 'ग पासर्पिणी' काम कसा बौर पर बात स्पष्ट मा है। प्रथमके बौन सारमोका सपोग तो कहा मी इससे किसी कसमें प्रात हो नागा सुगम था, परम्तु सग तो समी काठमें दुर्छम हो माश्म होता है; तो फिर इस काठमें तोपमसंग असि मुग्म हो सकता है। प्रथमके वाम सापनोंकी मी किसी गतिसे गीर साहमें पा चाप, तो मी पम्प । काविधी सीपकरको पाणाको सप करनेके सिप हमें इस प्रकारका उदय यता, बौर प समाधिरूमसे स्नान करने पम्प है। वारमतरप (२) बई, फागुन बदौ १७, १९९९ इसके साप मणिरानमा तपा योगकम्पदुम पानेके सिप मेने है । जो कुछ बधि हुए कर्म २, उनको मेरे बिना कई उपाय मही। वितारहित परिणामसे जो कुछ उपमें गाये, उसे सहन करना, इस प्रकारका माताकर बादि शानियोंका उपदेश। ३५८ बई, पैत्र मुदौ १,१९१९ समता रमवा घरपवा, धायकवा मुखमासा बेदकता वन्यता, ए सर मीपरिसास । विस तीपंकरदेक्ने सहफस्प मारमस्वरूप होकर, पम्पहप-जिस प्रकारसे पर बारमा कमी जा सकती है उस प्रकारसे ---उसे बापत पपायोम्प कहा है, उस तीर्थकरको दूसरी सब प्रकारको बफेशामोका स्यामा करके हम ममस्कार करते है। पूर्वमें बहुत से शादों का विचार करनेसे, उस विचारके फसमें सत्पुरुषमें जिसके पचनसे मणि टपम उस सौपकरके मचनको हम नमस्कार करते है। मात प्रकारसे गीतका विचार करनसे, प गोत्र वामम पुस्पके पिना गाना गाय, या समान मही, इस प्रकारको निम प्रशा उत्पम करके उस करके मार्ग-पोषहम नमस्कार करत। भिम मिम प्रकारसे उस पर विचार करने के लिये उस चीन के प्राप्त होने के लिये-पोग बार भनेक सापोंके प्रयास परिमम करनेपर मौ मिसको प्राति म हुई ऐमा पानीम, जिसके रा सत्य राप्रत गाता है-पी मनेका विसका नरेश-उस तापकरके उपदेश-समको हम ममस्कर (वपूर्ण) (२) इस जगत्में जिसमें बाणासरित विचार-शकि मौन पेसा मनुस्म-प्राणी म्यागका प्रचार परनेक ये सबसे भरिक मोम । किर मी प्राप जातको बनवार मनुष्यता प्राम रोनेपर भी का पम्पाल सिद्ध महामा, जिसमे बन सन्म-मरणो मार्ग बारापन करना पड़ा है। अनादि इस होममें नतोकी सपा मनत-कोयी। उन नामकी प्रति समप ममत प्रकारको सम्म मरण पर १५८] पिविष पर भादि समाह-२१ पाँ पप वादि स्थिति होती रहती है, इस प्रकारका वनतका पूर्वमें मी म्मसीतामाइन बनत-मोटी मीचोंमें निसने वाम-कम्पाणको वाराधना की है,षयमा निसे भारम-फल्माण प्रात मा है-ऐसे जीव भस्पत हो पो है। वर्तमानमें भी ऐसा ही है, वौर भविष्यमें मी ऐसी ही स्थिति होना समय है-ऐसा ही है। वर्षात् चीनको सानों का कल्याणकी प्राप्ति होना पयंत दुर्मम हैइस प्रकारका जो धीती- कर मादि शानका उपदेश रैमा सम है। इस प्रकारको बीच-समुदायको मति बनादि सपोगसे पर्श ना हो। ऐसा ठोक?—ऐसा ही है।पा भ्रांति मिस कारणसे होती है, उस कारणके मुख्य दो भे- माइम होते है --एक पारमार्षिक वीर दूसरा म्पापहारिक । वीर दोनों मेोका एकत्र यो अभिप्राय है वह यही है कि इस चौबको सची मुमुमुवा नहीं माई, चीवमें एक भी सत्य भक्षरका परिणमन नहीं इषा, चौपको स्पुरुपके दर्शनके लिये रुचि नही ई, उस उस प्रकारके योगके मिसमेसे समर्प भतरायसे मौवको का प्रवियप पता बाया है, और उसघ सबसे महान् कारण वसत्सगको पासमासे अग्म पामेबाठा निम्ममात्र वोर मसपर्शनमें सवनिरूप भाति है। किसीका ऐसा अमिप्राप कि वामा मामका कोई पदार्य ही नहीं है। कोई दर्शनबाठे ऐसा मानते हैं कि भारमा नामक पदार्थ केस सांपोगिक है। दूसरे दर्शनबाडोका कपन है कि देहके हो मारमा यती है, देहके नाश होनेपर नहीं यती । बारमा क्णु है, मामा सम्पापक, वारमा शून्य है, बारमा साकार है, पारमा प्रकाशरूप है, मामा सवत्र नहीं है, बारमा कर्ण मही है, वारमा कर्ण मोक्का मही है, वास्मा क; मही है मोय है, बारमा कर्ज भी नही मोय मी मही, पारमा नाहै, मारमा त्रिम है, श्यादि गिसके बनत मय हो सकते है, इस प्रकारफे अभिप्रायका मालिके कारण असदर्शनके बाराषन करनेसे, पूर्वमें इस जीपने अपने वास्तविक स्वरूपको नहीं जाना । उस सबको ऊपर को वनुसार एकात-जपपार्षपसे बानकर भामामें अपवा वामाके नामपर ईपर माश्मेिं पूर्वमें गौक्ने माध्यम किया है । इस प्रकारका मो वस्सग, निननगमात्र, और मिथ्यादर्शनका परि णाम है जबतक नहीं मिटवा, तबतक यह बीच शीत सुद बसस्प प्रदेशमा मुफ होमेके योम्प नहीं है, और उस वसंग मादिको निति करके किये ससम्म, पानीको बाबाका अर्पत बगीकार करना, और परमार्पतरूप को मारममाव है उसे जानना पोय है। पूर्वमें होनेवाले तीर्थकर मावि बानी-पुरुषोंने उपर श्री ई भांतिका कर्पत AIR करके, अमत एकाप्रता-समपतासे-जालका स्वरूप विचार करके गौरके समपमें शुर स्थिति की है। उस बारमा और इसे सब पदार्पाको सत्र प्रश्चरको भातिरणित मानने के लिये प्रीतीर्थकर मादिने बापत दुष्पर पुरुषार्थका बाराषन किया है। बारमाको एक भी वणुके माहार-परिणामसे वनाप भिम करके उन्होंने इस देश में सास ऐसी माहारा मामा'को स्वरूपसे जीवित रहनेवाला देसा है। उसे देसनेवासे ताकर मादिशानी स्वयं ही मुशात्मा है, तो फिर उनका भिमरूमसे बो देखना ना रेस यपपि पोम्प मही है, फिर भी पाणी धर्मसे ऐसा कहा है। इस तर मर्मत प्रकारसे चारनेके बार मी गानने योम्प 'पैतन्यपन भा'को तापकारने दो - [पा ५८ । भीमद् रामचन्द्र प्रकारसे कहा है, जिसे म्पुरुषसे बानकर, विचारकर, सत्कार करके गाल बपने सरूपमें स्थिति करे । वाकर वा बानाने प्रत्येक पदार्थको मजल्य वीर वळम्प इस पर दो प्रकारफे म्पबहार-मर्मपुछ माना है।नो कम्पस्मसेरेप पहाँ वहम्प हो।बोपणम्परपसे जायकापर्म रे, उसे तापकर वादि सब प्रकारसे अनेके लिये समर्प है, वौर पर गांव के विधुर परिणामसे बपमा सत्पुरुषसे जानने पोम्य पर नापका धर्म , भौर पो मर्म उस पक्षणसे अमुक मुख्य प्रकारसे इस दोहे में कहा गया है। पापल्या परमापके कपत बम्पाससे अस्पत स्परसपसे समझमें माती है, और उसके समान नेपर अस्पत बारमस्वरूप मी मगठ होता , तो मी यपाकाश यहाँ उसका वर्प मिसा है। (३) समता रमवा घरपवा, पायकवा मुखमास) बेवफवा चैवम्पवा, प सप भीपविकास । भौताकर ऐसा करते है कि इस जगत्में इस चीन नामके पदार्पको भावेनिस प्रकारसे कहा हो, परन्तु पदिशा प्रकार उसकी स्थिति के लिपपमें हो, तो उसमें हमारा उदासीनता।निस प्रकार निरागार रूपसे उस नाच नामके पदार्पोहमने माना। उस प्रकारसे उसे हमने प्रगटस्पसे कहा है।बिस पक्षणसे उसे हमने कहा है, पर सब प्रकारसे निर्माध है।मने उस भारमाको इस प्रकार माना है, देगा। स्पा बनुमय किया है, और प्रगटरूपसे हम यहाँ वारमा र बारमा 'समता' भणसे पुल है। वर्तमान समय मा उस मामाकी क्सस्स-प्रदेशामक पस्पिति, सा पहिले एक, को तीन, चार, दस, संम्पात मसम्मात वौर वनत समयमें पी, वर्तमानमें है, और भविपमें भी उसकी स्थिति उसी प्रकारसे होगी । उसके मसल्स प्रदेशमकता, पैतन्यता बरूपिल पारि समस्त समान कमी मी ने पोम्प महीं है। मिसमें ऐसा समपना-समता 'ए बार है। पg, पक्षी, मनुष्य मादिको देह वौर पक्ष भादिमें मो इस रमणापता दिखाई देती है, लपवा त्रिससे प सब प्रगट स्वर्तिमुक्त माम आता है-प्रगट पुदरतापुछ माम होता है। 'रमणापपना-रमता मिसका पण माचीव नामक पदार्प। जिसत्र मौवदगीके बिना समस्त जगत् पून्यात् मास होता है, जिसमें ऐसी रम्पता-पापण निसमें पठता है-या पौर। कोई भी मानमेवाण कमी मी, किसी मी पदार्थको अपनी गैरमौमरगीसे मान , पायात होने योग्य नही। परिसे अपनी मौनगी होनी चाहिमे पौर किसी मी पदार्थ प्राण, मग वारि अपना उदासीन बान होनेमें अपनी मौजूदगी ही कारण है। दूसरे पदापक बगीकार करनेमें, उसके कम्पमात्र भी शानमें परि पहिरवपनी मौनगी हो तो होमवान हो सकता है। इस प्रकार सक्से पविलेपमेवाला नो पार्यौपानील। उसे गौण करके बाद उसके मना । पहि कोई पुस मी मानना चाहे तो पा समय नहीं है। के हो मुस्प हो तो हो सरा कुरा माना जा सकता है। इस प्रकार गिसमें प्रगट उता-मर्म'। उस फार्पको मौतार बार प्रते। प्रगट ना पाई और बोनमै दोनों पिस भरणसे परस्पर भिम पड़ते है, चौमाण मायता' मामका गुण है। किसी भी समम वापसीव मासे यह जान-पदार्थ किसी भी मनु पर २५.] विविध पत्र मादि सपा-२५ों व भव नहीं कर सकता, और इस बार नामक पदार्यके सिवाय दूसरे किसी मी पदार्यमें कामकता समा नही हो सकती । इस प्रकार अस्पत बनुमवका कारण निसमें मायकता' म्शण है, उस पक्षार्यक तार्यकरने चोर कहा है। शम मादि पाच विषयसबंधी अपवा समाधि बादि योगसबपी निस स्पिसिमें मुस्ट होना समः है, उसे मिम मिमहापसे देसनेसे बन्तमें केवल उन सबमें मुसका कारण एफ बार पदार्थ ही समवितो। इसठिये तीर्थकरने जीवका ' मुखमास ' मामका सक्षण करा, वीर म्यबहार रातसे निवागयय प्रगट माथ्म होता है। निस निप्रामें दूसरे सब पदायासे रहिवफ्ना है, वहाँ मी - मैं मुसी ।' ऐसा बोमन होता है, वह वाकी बचे हुए चीव कार्यका ही है, दूसरा और कोई कहाँ विधमान नहीं है, वोर निदामें मुसका मामास होना तो अस्पत स्पष्ट है । यह जिससे मासित होता है, पर पण बीर मामके पदार्पक सिवाय दूसरी किसी मी जगह मही देखा जाता । र सादरहित है, यह मीठा है, या खा है, या साप है, मैं इस स्थितिमें , में ममें ठिर याई, गरमी पर दो, मैं दु सी, मैं दुमका अनुभव करता है इस प्रकारका गो स्पखान- वेदमान-अनुमान-अनुभवफ्ना यदि किसीमें मी हो वो मह जीव-पदमें हो, अपना वा मिसफा क्षण ऐप पदार्थ मील हो होता , यही तीर्थकर मादिका अनुभव है। स्पष्ट प्रकाशपना-बनतानत-कोटी तेनती दीपक, मणि, मन्त्र, सूर्प वादिकी काति-निसके प्रकाशके बिना प्रगट होमे के लिये समर्थ नहीं है। नत् रे सब वपने भापको मवाने वपया पान के पोम्प नहीं है जिस पदार्थ प्रकाशमें चैतन्यरूपसे ये पदार्थ गाने माते हैं--पर मासिव घेते है- रे पदार्थ प्रकाशित होते 1-मार्थ नो को है तो पर एक वीर हो। वर्षात् उस जीपका यह यण–प्रगटरूपसे स्पष्ट प्रकाशमान अपर निराबाध प्रकाशमान पैतन्य—उस जीके प्रति उपयोग लगानेसे प्रगट-प्रगटहफ्से दिसई देता है। ये गोप्मण को है, ने फिर फिरसे विचार करनेसे बीब निराबापरपसे जाना जाता है। मिसके माननेसे जीव जाना गया है, उन क्षणोंको तापकर नाविने इस प्रकारसे कहा। बर्थ, पैत्र पुदी ६ गुरु १९१९ उपानिन्ध योग विशेष गता है। जैसे पैसे नितिक योगको विशेष दा होती जाती है, से पैसे वपाधिको प्राप्तिका पोग विशेष दिखाई पाता है। पायें तरफसे उपाधिकी ही मीद है। कोई ऐसी शिशा इस समय माम नहीं होती कि वहाँ इसी समय इसमेसे घर पसे गाना तो किसी के नफ्यपी न गिने भोप । टने का प्रपन करते हुए किसीके मुख्य अपराधमें पकड़ा जाना स्पर संभव रसाई देता है। भौर पर वर्तमान अवस्था ठपाभि-रहितफ्भेके अर्पत योग्य है । प्रारम्पकी प्यास्थाका इसी प्रकार प्रमप किया गया होगा।
१४२ भीमद् रामप्र [पा २६ ३६० पई, क्षेत्र सुदी ९, १९९९ (१) बारम, परिणा, वरसंग वादि कल्याणमें प्रतिवर करनेपासे कारणोंका, जैसे आने से कम । परिचय हो, और उनमें उदासीनता प्राप्त हो—यही विचार सम्में मुस्परूपसे रसना योग्य है। (२) हमें उस तरफ भापकों माविक होनेवाले समागमके सर्वपमें समाचार पो। उस प्रागमें बागको कपि अपना पनि उत्पम नहीं, से श्रेयका कारण मानकर, उसका अनुसरण करके, मिरतर प्रवृधि करनेका परिचय करना योम्प है। और उस वसासगका परिचय, वैसे कम हो से, उसको अनुरूपाकी इन करक गना योग्य है। जैसे बने पैसे ससगके संयोगको रम करना बौर अपने दोनोरेसना योग्य है। वर्मा, चैत्र वदी १ रवि १९९९ पार तरवारनी सोहसी बोदसी, चौदमा मिनवणी परणसेवा पारपर नारवा देस वामीगरा सेवना-पारपर रो न देगा । (वानंदन-वनंतग्नि-स्तवन) इस प्रकारक मार्गको किस कारणसे कर्पत कठिन का, या विचारने पोग्य है। ३६२ बर्ग, र पदी ९ रचि १९९९ मिसे ससारसमयी कारणके पापो प्राप्ति मलमतासे निरन्तर पुषा करे, और कई बपन न हो, परि ऐसा ई पुरुष गे उसे हम तीर्थकरतम्य मानते हैं। परन्तु प्रायः इस प्रकारको मुग्म प्रालिके योगसे पापको कप काम संसारसे अस्पत पैराम्प मही वाता और स्पा बामवान सपम नही होता—ऐसा मानकर जो कुछ उस सम्म मासिको हानि करनेवाम स्पोग मिमता है, उसे उपकारका प्रमण मानकर, मुर्मक यना पोम्प है। ३६३ बई पैड बदौ ९ मि १९९९ सेसाय-पेशसे एहते पर नसी स्पितिसे म्पपात करें तो कहो, ऐसा कदाचित् मासित हो वो मी उस पधारका करना तो प्रारम्पके बापान है। किसी प्रकार के किसी रग, रोष वपना महान के कारणसे मोन होता , उसका कारण उदय हो मम होता है। समें सामातिक शांतता है, परन्तु सूर्य बाहिके तापके संपसे या उण तामा हसाई बार परर मा बेलब है, परन्तु या भगानस्तरमा काम्न है। प्रयेकर मोम पल्पर भरपर नाको हुए ऐसे पते पर प्रमुझे परमीयत्वाम्म पात्म तो रेखा मेव में महापर।
पत्र १५४ १५५ ५५ विषिप पत्र मादि सपा-सा पर्प देता है, उस तापका संबंध दूर हो जानेपर ही बस फिर शीतछ हो जाता है । बीचमें दो जल शीतलतासे रहिव माश्म होता था, पर फेवस तापके सपोगसे ही माश्म होता पा । ऐसे ही हमें भी प्रकृतिका सयोग है, परम्त हास्में तो उस प्रवृत्तिके दिन किये बिना कोई दूसरा उपाय मही है। ३६४ बई, चैत्र वदी ९, १९१९ जो मु यहाँ चातुर्मासके लिये वाना चाहते हैं, यदि उनकी भारमा दु सित न हो तो उनसे कहना कि उन्हें इस क्षेत्रमें वामा निचिहप नहीं है। कदाचित् यहाँ उन्होंने ससगको इच्छासे पानेका विचार किया तो यह संयोग बनना बहुत कठिन है, क्योंकि हाँ हमारा बाना-आना बने, यह समय नहीं है। यहाँ ऐसी परिस्पिति है कि यहाँ उने प्रषिके बसवान कारणोंकी ही प्राप्ति हो, पेसा समाकर पदि ननें कोई दूसरा विचार करमा सुगम हो तो करना योग्य है । हामें तुम्हारी हो फैसा दशा यती है। यहाँ विशेपहपसे ससगका समागम करमा पोय है। बारमस्थित ३६५ मई, वैशास बदी व रवि १९१९ (१) प्रत्येक प्रदेशसे गीचके उपयोगको भाकर्षित करनेवाले संसारमें, एक समपके लिये मी वरकाश भेनेको हानी पुरुषोंने ही नहीं कही-स विषयका सपा निषेप ही किया है। उस भाकर्षणसे पनि उपयोग बारा प्राप्त करे तो या उसी समय आत्मरूप हो जाता है उसी समय वास्मामें पर उपयोग मनम्म हो जाता है। इस्पादि अनुमक-मार्ग जीवको ससगके स निमयके बिना प्रास होनी बायत कठिन है। उस सगको निसने निषपल्पसे मान लिया है, इस प्रकारके पुरुषको भी इस हु पम कारमें उस सससंगका संयोग राना अस्पत कठिन है। (२) मिस मिताके उपापसे तुम पबहाते हो, उस पिताका उपद्रा कोई शत्रु नही है। प्रेम-मजिसे नमस्कार । ३६६ गई शास बदौ ८ भाम १९९९ जहाँ कोई उपाप नही, वहाँ से करना योग्य नहीं है। धिरेगा के अनुसार जो हो उसमें समता रस्मा ही योग्य है। भीर उसके उपायका परिक विचार सूझ पड़े तो उसे करते यना, मात्र इतना ही अपना उपाय है। कवित् संसारके प्रसगोंमें अबतक अपमेफो ननुकूमता या करती है, तनवक उस समारमा सम्म विचारकर त्याग करना योग्य है, पाप इस प्रकारका निधार रपमें जाना कठिन है। उस संपारमें जब अधिकाधिक प्रतिक प्रसंगोधी प्रापि हाती है, तो कापित् गोरको पहिसे हार परमहोकर पीछेसे वैराग्य भाता । उसके बाद भाम-धमकी सूस पावा। और पास मीमद् परवान t पर। हमारे समागमका तयप बामकर चिपको प्रमारका बकाप्स देना योग्य नहीं, परस्परम मईपकि समागमको बम्पपस्पित योने देना योम्प मही, मिरिक क्षेत्रके प्रसंगको म्यून होने पोम्प नाही, कामनापूर्वक प्रापि करना उचित मही ऐसा नपरकर से बने तैसे बममचत परस्परके समागमका, निति क्षेत्रका पौर प्रतिको उपासानवाघ माराधन करना चाहिये। मो प्रापि यहाँ उदयमें है, पास्त प्रकारको है कि उसे से किसी मार्गस पानेपर मौ । नही जा सकतीर सान हो करने योग्य है। इसम्पेि उसका अनुसरण करते हैं, फिर भी स्मर वो अम्पासार स्थितिम वैसी की तैसी है। बाय पाहम बाठो पत्र लिखते है। इसे हम सब मिनाम माईयोक मारम्बार विचार करने के हिमा पिच इस प्रकार के उदयबाग कमी कमी हो यता । वाम उस प्रकारका अनुभमसे : होनेसे सस उदपके अनुसार रिसा है। जब हम मी ससंगको तपा नितिकी कामना रमते वो किर मा म सबको रसमी योग्य हो तो इसमें कोई माधर्म नहीं है। जब हम मी म्पका यते हुए कस्पारमको और भाप परिमाको, प्रारम्प निविरूपसे पाहते हैं, तो फिर में उस बार करना पोम्प हो, इसमें कोई संशय करना योम्प मां । इस समय ऐसा मई मताकि सम होनेके सपोगा नियमित समप किया जा सके। - कई, पेष्ठ मुनी १५ भौम १० जीर के पीद सोचना परे १ रुप्मने करोय करे। भीबई धीर सोचना पर । रुप्मने कर दोपरे। पूर्वमें बालो पुस्प हो गये। सन शानियों से पानी-पुरुष सिरि-योगगामा हो है, जो कि कपनी पा सका है पा टा! पर बापका प्रभ है। मौर' या सपा : होता है ऐसा मापत्र अमिप्रापपा पर साक्षात् देखनेमें नए माता', यह वापको निवास कितने ही मार्गानुसारी पुस्प बोर मान-योगी पुरमोंमें मी सिरि-योग होता है। करके सिदि-पोग उनके पितको भक्त सरबतासे बचा सिदि-पोग बादिको मान- सरणा प्रदान करमेसे प्रति करता है। सुपरि पुस्प-निके पीपा गुणस्थान ऐप है जैसे जाना-सुरुवाले पित् | होती है और वित् सिनि मही होती | मिनके होती है उन उसके प्रगट करनेछ प्राप' महीरो मार प्राप करके या रम ही है उस समय यती व पोप प्रमारके होना और पदि सस प्रकारको छानो पर सम्पापसे गिर जाता है। प्रायः पाँच और एमम्मानमें मी उत्तरोत्तर सिदि-योग शेष सभा होता माता है। मोर को मा पनि प्रमादप पागसे और सिदिमें प्राति करे तो उसका प्रथम गुणस्थानमें बा गाना समय है। सात बाटने मत्र और दश गुणस्पानमें, पापा करके प्रमारका बकाश कम होग म्पाप गुणस्थान में सिद्धि-पोगा मेम संमत्र होने के पारण, गौसे प्रपन गुणस्पान मा चाना सम पर ३११३७,] पिविष पत्र मादि संग्रह-२६याँ वर्ष ३४७ पाकी नितने सम्यकसके स्थानक हैं, वौर गतिक आस्मा सम्पन्-परिणामी है, पतक उस एक भी योगमें निकायमें मी भीषको प्रति होना सभप मही है। सम्पमानी पुस्पोंसे छोगोंने चो सिद्धि-पोगके चमत्कार जाने है, ये सब बानी पुरुपारा किये हुए समय नहीं मान होते, वे सिद्धि-योग स्वमाक्से ही प्रगटित हुए गते है। दूसरे किसी कारणसे जानी-पुरुपौ बा योग नहीं कहा जाता । मार्गानुसारी अपना सम्पमधि पुरुपके जापत सर परिणामसे गुतसी बार उनके फो ए पपनके अनुसार बात होनाटी है। जिसका योग बढ़ानपूर्वक है, उसके उस मामरणके उदय होनेपर, महान प्रगट होकर, वह सिदि-योग अस्प काछमें ही फर दे देता है। किन्तु हानी पुरुषसे वो पर केवल स्वाभाविकरूपसे प्रगट होनेपर ही फल देता है, किसी दूसरी तयसे महीं। मिस हामीशरा स्वाभाविक सिदि-योग प्रगट होता, यानी पुरुष, को हम करते हैं उस तहके, क्या उसी प्रकारके दूसरे अनेक सबके चारित्रके प्रतिबएक कारणोंसे मुक्त होता है; दिन कारणात बारमाका ऐश्वर्य विशेष पुरित होकर मन बार योगमें सिद्रिके सामाक्ति परिणामको प्राप्त करता है। कत्री ऐसा मी मानते है कि किसी प्रसगसे जानी-पुरुपाय मी सिदि-पोग प्रगट किया जाता है, परम्नु प कारण बस्यंत बलवान होता है। मोर दा मी सम्पूर्ण ज्ञानशाका कार्य मही है। हमने जो पह सिसा है, यह बात विचार फरनेपर समसमें मायेगा। हमारी बाबत मार्गानसारीपना गाना योग्य मही है। वहान-योगीफ्ना तो जबसे इस देहको धारण किपा भासे नहीं है, ऐसा मालूम होता है। सम्यारिफ्ना सो मप सभव है । किसी भी प्रकारक सिदि-योगको सिद्ध करमेका हमने कभी भी समस्त जीवनमें बम्प मी विचार किया हो, ऐसा याद मही बाता, अर्यात् साधनसे उस प्रकारका पोग प्रगट हुमा हो, यह मायम नाही राता। हाँ, अरमाको Rशुद्धता के कारण पदि कोई उस प्रकारका ऐर्य हो तो उसका धमाल नहीं कहा जा सकता । ऐप कुछ भगमें संभन है। फिर भी यह पत्र लिखते समय इस ऐशर्यको पति है, मही तो पात कामसे या बात स्मरणमें ही नहीं, वो फिर उसे प्रगट करनेके सिये कभी भी हो, यह नहीं कहा जा सकता, यह स्पट बात है। तुम वीर हम कुछ हुली मही है। बोर्म है वो यमके पौदह पके हुसका एक नि मी मही, पापोंके तेरह वर्षीक हुसकी एक पड़ी मी मही, और गनमारके पानकी एक फ्ठ मी मी किर हमको इस बापत कारणको कभी मी बताना योग्य मही। में शोक मही परमा चाहिये । जो दो मात्र उसे देखते रहो-इस प्रकार नियय रणनेका पार पा उपयोग करो और साबधानासे हो । पाही उपदेश है। ३७० बबई, प्रथम बार पीरपि १९.. गत मंगसिर महामें सबसे यहाँ बाना शुमा उस समयमे उपाधि-योग उचराचर Rोपावर ही होता भापा, और प्राय परक पद उपाधि-यांग दिप प्रकारफे उपपोगमे सदन करमा पारे।
प्रीमद् शासन [पत्र १५- १८ प्रीतम पचमके अनुसार मुमुक्षु मक्को ये सब प्रसग, मिन प्रसंगोंके कारण वाम-साधम सूमता है, मुस्थापक मामने पोम्म । अमुक समक्तक बनुन प्रसामुक ससारमें कचित् यदि ससंगका समोग वा हो, तो भी इस कारमें उससे वैराग्यका बैसा चाहिये पैसा केइन होना कठिन है । परन्तु उसक मा पदि के कोई प्रसग प्रतिछ । प्रतिकूम बनता पम नाप तो उसके विचारसे-उसके पपाणपसेसमग हितकारक र बाता है, यह जानकर बिस किसी प्रतिछ प्रसंगको प्राधि ऐ, उसे वाम-साधना कारणरूप मानकर समापि रसकर जागृत गना चाहिये। कम्पितभा में किसी प्रकारसे भूएएफे समान नहीं है। ३६७ पई, वैशास का ९, १९४९ मामहावारदेक्से गैतम मादि मुनिगम मते थे कि हे पप ! महण प्रमण, मिथ और निर्मम स शब्दोंका स्पा बर्ष है, सो इमें करिये । उसके उत्तरमें मातीर्थकर इस बर्षको विस्तारसे करते थे। बनुक्रम इन चारों बगुव प्रकार की बीवरमा वयस्थानको विशेष-पति मिशेपरूपसे करते थे, और सदर चिम्म उस शस्तके मर्पको धारण करते पे । निर्मपकी कमेक दशामों को करते समप निर्मपके तार वामवादप्रत' इस प्रकारका एक पाद का ५ । टीकाकार भीमेकाचार्य उस वारमवारप्राप्त ' शम्मका अर्थ इस प्रकार का है- । उपयोग मिसका क्षण सम्स-प्रदेशी, संकोच-निकासका मानन, वपन किये हुए मौका मोवा, म्यवस्थासे ब्रम्प-पर्यापहप, निस्प-अनित्पबानत परमक ऐसी वारमाको माननेमाम बाहर . ३६८ बम्ब, म्येष्ठ पुदी ११४ १९९९ सब परमार्पके साधनों परम साधन समग-सुपुरपके रामके समीप निवास है। सब में उतकोटिनता है, बोरस प्रकार के विषम कामें तो पानी पुरषोंने उसकी मत्पत ही कठिनता मानी। बामा-पुरुपको प्राणि, प्राति नैसी नहीं होती । मैसे गरम पानी में भूमिका मुफ्म गुण नदी कहा जा सकता मे ही बानीको प्रालि है, फिर मी हाना-पुस्प मी किसी प्रकारसे निरकिा हो का करता है। पूर्वकालमें मापन किपे हुए निरपिक क्षेत्र, मन, उपम, पोग समावि और समग भारि बामी पुस्पको प्राप्ति होने पर भी मारम्बार याद मा पाते हैं, फिर भी पानी उप-मात प्रारपाका बिनुसरण करते हैं। ससंगको कपि यती है, उसका म राता है, परन्तु पर समय हा नियमित कही। पाणविषयक बो चो प्रतिवधम्म कारण, उनका चालको बारमार विचार करना पोप है। उन सब मरों को पारम्बAIR रके वर करमा योग्य वार इस माहि अनुसरण किये बिना फस्पानको प्राप्ति मारोती । म प र महान पे चौपके बनारिकेतीन दोष है। पानी पुस्यामचनकी प्राप्ति होनेपर, टसच यमापोम्प दिपार करनेसे मानव निति होती है। उस पर १५ विविध पत्र मादि समा-शोध ३४५ कानको सतति बसवान होनेसे, उसका निरोध करनेके लिये और बानी-पुरुपके सपनोंका यथायोग्य विचार करने के लिये, मछ और विक्षेपको दूर करमा योग्य है । सरसता, अमा, स्व-दोपका निरीक्षण, अस्पारम, परिपा स्पादि ये मत दूर करनेके साधन है ।बानी-पुरुषकी भस्थत माळ यह विक्षेप दूर करनेका साधन है। पदि हानी-पुरुपके समागमका बतराय यता हो तो उस उस प्रसगमें पारम्बार उस पानी-पुरुपकी दशा, पेण, और उसके सपनोंका सूक्ष्म प्रतिसे निरीक्षण करना, ठनका याद करना और विचार करमा पोम्पहै। वौर उस समागमकेतरायपारिक प्रसंगमि-बापस सावधानी रसना पोप, पोंकि एक तो समागमफा हो कर नहीं, धौर दूसरी मनादि षम्यासाठी सानाकार प्रापि यती है, जिससे भावपर भाषरण वा जाता है। घरका, बातिका, अथवा दूसरे उस तरह के कामोंका कारण उपस्थित होनेपर उदासानमावसे उने प्रतिधरुप चानकर, प्राधि करमा ही योग्य है, उन कारणों को मुल्य मानकर कोई प्राधि करना योग्य नहीं, और ऐसा हुए बिना प्रतिसे वकाश नहीं मिलता । मिम मिम प्रकारको कल्पनाम मामाका विचार करनेमें, छोक-समा, बोष-सहा और नस- रसग ये भो कारण है, इन कारणोंमें उदासीन हुए मिना नि सरम ऐसी सोकसपी जप, तप वादि क्रियामोंमें साक्षात् मोझ नहीं है-परंपय मी मोक्ष नहीं है। ऐसा माने बिना नि सब मम्शाम वौर मसद्गुरुको-चो भारमस्वरूपके वावरणके मुख्य कारण है--साक्षात् नाम पातक चाने बिना चीनको जीयके सम्पका मिषय होना बहुत कठिन है—अत्यत कठिन है। जानी-पुरुषके प्रगट भास्मतरुमको कानेगाले पचम भी उन कारणों के सबसे ही नीतक सम्पका रिचार फरनेके लिये बसमान मही होते। वंर यह निधय करमा योग्य है कि निसको बामस्वरूप प्राप्त है प्रगट है-उस पुरुपके बिना दूसरा कोई उस भारमस्वरूपको यथार्थ करनेके योग्य नहीं है, और उस पुरपसे बात्माके पाने बिना दूसरा कोई कम्याणका उपाय नहीं है। उस पुरुपसे वामाके बिना गाने हो भात्माको बान लिया है, इस प्रकारको कम्पनाका मुमुक्षु गौवका सर्मया त्याग ही करना योग्य है । उस भारमलम पुरूपके सगको निरवर काम्ना रखते हुए जिससे उदासानमानसे कमसमपसे और कर्मसमपसेए सके, इस प्रकारसे पार करना पाहिये । मिस म्यहारके करमेमें बीचको भफ्मी महला वानिकी इच्छा उत्पम हो, उस म्यबहारका करमा योग्य नहीं है। रासमें अपने समागमका अंतराय मानकर निराशमानको प्राप्त होते है, फिर मी पैसा करनेमें ईमरेप्छा नामकर, समागमकी कामना रखार, निकना मुमुक्षु भई पोका परस्पर समागम बने उतना करना चाहिये, गितमा बने उतना प्रतिमें विरळमात्र रहना चाहिये सत्पुरुषक परित्र और मार्गानुसारी ( संदरदास, प्रीतम, असा, कबीर बादि ) बोकि पचन, और मिनका मुस्ल्प ठरेत्य बाम-चिपक कपन करना ही है ऐसे (विचारसागर, सदरगसके प्रप, मामन्दधनमी, बनारसीशस, बमा बारिक मत्य ) पोंका परिचप रहना और इन सब साधनोंमें मुस्प सापन मौसपुरपके समागमको ही मानना चाहिये । .
भीमन् सम्म हमारे समगमका मंतराप जानकर पित्तको प्रमाइका अवकाश देना योग्य मही, परस्पर मम माईयोके समागमको बम्पपस्थित होने देना योग्य नही, नितिक क्षेत्रके प्रसंगको म्पून हाने रेना योम्प नही, कामनापूर्वक प्राति करना उचित नहीं ऐसा विचारकर से बने वैसे अप्रमताका, परस्परके समागमका, निरपिके क्षेत्रका और प्रातिको उपासालताका वारापन करना चाहिये । यो प्रापि यहाँ उदपमें है, पर इस प्रकारको है कि उसे दूसरे किसी मार्गसे चल्नेपर भी मेरी नही पा सकती-पर सहम करमे मोम्प है। इसलिये उसका अनुसरण करते हैं, फिर भी स्वस्पता तो मध्यापार स्थिति पैसोको सी है। वाय परामाठयों पर मिलते हैं। इसे तुम सब विशाल माईक बारम्बार चार करमेक पे लिया है। पिच इस प्रकारके उदयमाला कभी कमी हो या है। वान उस प्रकारका अनुमसे उदप होनेसे उस उदयके मुसार रिख। यब हम भी सासगी तथा नितिको कामना रखते हैं, तो फिर यह तुम सबको रणनी योग्य हो तो इसमें कोई वार्य नहीं। हम मी म्पसारमें यते हुए मापारमको और बत्प परिमारने, प्रारम्ध निरपिरुपसे परते, वो फिर तुम्हें उस वय पाप करना योग्य हो, इसमें कोई संशय करना योग्य नहीं । इस समप ऐसा मही सूतता कि सम्प्रगम रोनेके स्पोगका नियमित समप रिसा जा सके। २६९ बी, ग्येष्ठ सदी १५ भौम १९९९ जीप पौद सोचना परे । कृष्णने फरखं होप है करे। मौर मीद घोषना परे । रुष्णने कर रोय वे करे । पूर्वम हाना पुरुष हो गये हैं उम शानियों में गातसे पानी-पुरम सिदि-योगमा मी हो गये हैं, पामो मेरिकनापन है प स्वारे या एम पा मापका प्रभ है, और 'पा सपा मम्म तारे', ऐसा नापका मभिप्राय है; तपा या साक्षात् देखनेमें महाँ माता ', या भापको निजाता है। कितने ही मार्गानुसारी पुर मौर मान-मोगी पुरोम मी सिदि-योग होता है। प्राप' परके म सिदि-योग उनके पिच ममा सरबतासे मपा सिरि-योग बादिको माल-मोगसे पुरणा प्रदान करनेसे प्राधिकरता है। सम्यक्पी पुरुष-विनके पीपा गुणस्पान होता है-से बानी-पुरुषाने पवित् सिमी होतो और चित् मिति नहीं दी । मिनके होती है, उनको उसके प्रगर करनेकी प्रापरम माप और माय परके बा रण होती तब उस समय होती। अब यो प्रमाइके बरा होगा और यदि उस प्रकारको पाई तो पा सम्पपसे गिर गया है। माया पाच वौर को गुणस्पानमें मी उत्तरोत्तर सिनि-योग विशेष संभव ऐता मावा देनारों मी पनि प्रमार बारिके योगसे बात सिदिमें माचि को दो उसघ्र प्रपम गुणत्पान बा गाना संभव है। सात, मालमें, नममें और दश गुणत्थानमें, प्रापः करके ममाइका मकारा कम होता है। म्याप गुणस्पानमें सिद्धि-योगका गेम संभव होने के कारण, पांसे प्रथम गुणस्थानमें ना माना संभव है।
पर ३५९३., पिविष पम मावि संप्रह-२१पा वर्ष . माको मितने सम्यक्त के स्थानक है, और महातक वात्मा सम्पपरिणामी है, महातक उस एक मी योगमें त्रिकामें भी भावकी प्राति होना समय मही है। सम्पमानी पुस्पोंसे लोगोंमे नो सिदि-योगके चमत्कार बाने है, ये सब ज्ञानी पुरपारा यि हुए समझ नहीं माश्म होते, वे सिद्धि-योग स्तमाक्से ही प्रगटित हुए पते है। दूसरे किसी कारणसे धानी-पुरुप यह योग मही कहा जाता । मार्गानुसारी षपका सम्पादपि पुरुपके वापत सरम परिमामसे यमुक्सा बार उनके को हुए बनके अनुसार बात हो जाती है। निसका योग कानपूर्वक है, उसके उस मावरणके उदय होनेपर, महान प्रगट होकर, पर सिद्रि-योग वम्प काछमें ही फल दे देता है। किन्तु हानी पुरुषसे तो पर केवल सामाविकरूपसे प्रगट होनेपर ही फल देता है, किसी दूसरी तयसे नहीं। बिस हानीवाय सामारिक सिद्धि-योग प्रगट होता है, यानी पुस्प, मो हम करते हैं उस वयके, तपा उसी प्रकार के दूसरे मनेक तबके चारित्रके प्रतिबधक कारोंसे मुक्त होता है, मिम मारणोंसे बरमाका ऐश्वर्य विशेष पुरित होकर मन मादि योगमें सिदिके स्मारक परिणामको प्राप्त करता है। कही ऐसा मी मानते हैं कि किसी प्रसगसे जानी-पुरुषाय मी सिदि-योग प्रगट किया जाता है, परम्त यह कारण अस्पत बम्बान होता है। और यह मी सम्पूर्ण जान-दशाका कार्य मही हमने जो यह रिसाद, यह पत पार फरनेपर समझमें मायेगा । हमारी मारत मार्गानसारीफ्ना काना योम्प मही है। पाान-योगीपना तो सबसे इस देहको धारण किया तमासे नहीं है, ऐसा मारम होता है । सम्पपिपना तो अवश्य संभव है। किसी भी प्रकारके सिद्धि-योगको सिद्ध करमेका हमने कमी मी समस्त जीवनमें बम्प मी विचार किया हो, ऐसा पार मही वाता, वर्याद साधनसे उस प्रकारका योग प्रगट एमा ही, यह माम नहीं पता, वाग्माकी विमुरता के कारण यदि कोई उस प्रकारका ऐचर्य हो तो उसका अमात्र मही का गा सकता । मा ऐषय कुछ मंशमें समय है। फिर मी पा पत्र लिखते समय इस ऐशर्यको स्पति हो, मही तो मात कारसे यह बात स्मरणमें ही मही, तो फिर उसे प्रगट करनेके लिये कमी मी आई हो, पाह नहीं कहा जा सकता, या स्पर बात है। तुम वीर हम कुछ इसी मही है। वो दुम है यह तो रामके पौदह पोके दुखका करिन मी नही, पापक तेर पकि दुसको एक पड़ी मी नहीं, और गमसूमारके पानकी एक पर भी नहीं, तो फिर हमको इस अत्यंत कारणको कभी मी बताना योग्य म । तुम्हें शोक नहीं करना पाहिये । मोरो मात्र उसे देखते यो-इस प्रकार निपप रम्मनेफा प्रचार का उपयोग करे भीर सापपानासे या। यही उपश। ३७० बर्मा, प्रथम बापत गरी १९९० गतवर्ष मगसिर महानमें सबसे यही माना हुमा, उम समपसे उपाधि-योग उचरोवर शिवापर हो होता नापा है, भौर प्राप करके पर उपाधि-योग विशेष प्रकारक उपपोगसे मान करना परा।
भीम प्रसाद [पर १५ हमारे समागमका अवयप मानकर चिठको प्रमा' अवकारी देना योग्य नहीं, परस्पर मुमुस माईयोत समागमको सम्पस्थित होने देना योग्य नहीं, नितिक क्षेत्रके प्रसंगको म्यून होने देना योग्य म0, कामनापूर्वक प्राधिकरमा राषित मही-ऐसा विचारफर जैसे बने वैसे भप्रमवताका, परस्परके समागमका, निधि क्षेत्रका और प्रवृत्तिको उदासीनताका बारापन करना चाहिये। यो प्रति यो उदयमें है, यह इस प्रकारको कि उसे दूसरे किसी मासे सनेपर भी सोपी मही जा सकती- सहन करने योग्प है। इसलिये उसम्म बनुसरण करते, फिर भी सस्थवा वो बम्पानाष स्थितिमें पैसाको सी। भाग पाम बाठो पर किसते है। इसे तुम सब मिास माईयोंके बारम्बार विचार करने के लिये किता है।पित इस प्रकार के उपवास कमी कभी को पता है। वाम उस प्रकारका बनुनमसे उदप होनेसे उस तरयके अनुसार रिसा। चप हम भी मसगको तया निधिको कामना रखते हैं वो किर या तुम सबो रहनी योम्म हो तो इसमें कोई वापर्य नहीं है। जब हम भी महारमें यते र मापारमको भौर कप परिपाको, प्रताल नितिसपसे पाहते है, तो फिर में उस तय पता करना पोग्प हो, इसमें कोई सशप करना मोम्प मही। इस समय ऐसा नही हवा कि समागम दोनेके स्पोगका नियमित समय मिसा ना सके। बाई, म्पेठ सुदी १५ मौम १०१९ जीप मीद घोचना परे ! रुम्पने करए पते करा नीच हूँ पीद घोपना पर कृष्णने कएं होय ते करे । पूर्वम नामी-पुरुष हो गये हैं उन शानिमोंमें गत्से बानी-पुरुष सिद्धि-योगमा मों हो गपे ६, मह जो मैषि-मपन है पर सबा है या छठा'! पर आपका प्रभ है। पौरपा सचा माश्म होता है , ऐसा नापश्च मभिप्राप है, तपा पा साक्षात् देसनेमें नहीं बाता', पानापको मिहासा है। किराने की मार्गानुसारी पुरुष और काम पोगी पुरनोंमें मी सिदि-योग होता है। प्रायः परके प सिदि-योग उनके वित्तको आपत सरवासे अपवा सिदि-योग बानिको माममोगसे समय प्रदान करनेसे प्रापि करता है। सम्पनि पुल-मिनके चौथा गुणस्पान होता है-से जाना-पुस्पति मषित मिति ऐती है, और पित् सिमि नहीं हो । जिनके ऐती है, उनको उसके प्रगट करनेको प्राप' या मही होती बौर प्राप करके जब पूछा होती है उस समय तीब पौत्र प्रमाइमे पास होता है, और यदि उस प्रकार की महतो र सम्पालसे गिर जाता है। प्राया पाच और को गुप्फ्स्पान, मी तव्यतर सिद्धि-पोग विशेष संभव होता जाता है और बा मी पदि प्रमाय मारिफ पागसे गाल सिदिय प्राठि करे वो उसका प्रथम गुणत्पानमें बा बाना संभव है। साठ, बाठ, नामें मोर दश गुणत्पानमें प्राय करके प्रसारका माध कम होता है। पाप गुणस्थानमें सिरि-मोगा मेम समय होने के कारण, मासे प्रपम गुपस्पानमें मा बाना समय है।
पत्र १९९५] विविध पन मादि संप्रा-२१मा पर्प - वाकी नितने सम्यक्सके स्थानक है, और जहाँतक बामा सम्पक्-परिणामी है, यहाँतक उस एक मी योगमें विकासमें भी बीपकी प्रति होना समय नहीं है। सम्पबानी पुस्पोंसे मोगोंने पो सिरि-योगके साकार गाने है, ये सब हानी पुस्पाय किये हुए समग मी माश्म होते, ये सिद्धि-योग समावसे ही प्रगटित हुए गते है। दूसरे किसी कारणसे शामी-पुरुपमें यह योग मही कहा जाता । मार्गानुसारी वपमा सम्पम्दापि पुस्पके अस्पंत सरठ परिणामसे बहुस्सी बार उनके करे इए पचमके अनुसार पात हो बाटी है। बिसका योग बनानपूर्वक है, उसके उस पावरणके उदय होमेपर, बहान प्रगट होकर, यह सिदि-योग वाम कालमें ही फस दे देता है। किन्तु हानी पुरुपसे तो यह केवल स्वाभारिकरूपसे प्रगट होनेपर ही फल देता है, किसी दूसरी तरइसे मही। मिस हानीशरा स्वाभाविक सिदि-पोग प्रगट होता है, वा मानी पुरुष, गो हम करते हैं उस तयके, तथा उसी प्रकारके दूसरे अनेक तरके चारित्रके प्रतिबंधक कारणोंसे मुक्त होता है। दिन कारणोंसे नारमाका ऐश्वर्य विशेप पुरित होकर मन वादि योग सिदिके सामानिक परिणामको प्राप्त करता है। कही ऐसा मी मानते है कि किसी प्रसगसे शानी-पुरुपवाय मी सिदि-पोग प्रगट किया जाता है, परन्तु यह कारण मस्यत बलवान होता है। वौर या मी सम्पूर्ण जान-दशाका कार्य मही है। हमने गो या बिसा है पाबत विचार करनेपर समझमें मायेगा । हमारी मारत मार्गानुसारीपना करना योग्य मही।।वहान-योगीफ्ना तो चवसे इस देहको धारण किया तमास नहीं है, ऐसा माश्म होता है । सम्यक्पएिफ्ना तो वप सभप है। किसी भी प्रकारके सिदि-पोगको सिद्ध करनेका हमने कमी मी समम्त चीपनमें बम्प मी विचार किया हो, ऐसा पाद मही बावा वर्षात् साधनसे उस प्रकारका योग प्रगट हुभा हो, यह माम नहीं होता। हो, बारमाको विशुयता के कारण यदि कोई उस प्रकारका ऐश्वर्य हो तो उसका बमान महीं कहा जा सकता । ऐपर्य कुछ भशमें समय है ।रि मी यह पत्र छिसते समय इस ऐश्वर्यको स्मृति ई, मही तो मात कामसे यह बात स्मरणमें ही नहीं, तो फिर उसे प्रगट करने के लिये कभी मी इछाई हो, पर मही कहा ना सकता, या स्पए पात है। तुम बोर हम कुछ इसी नहीं है। नो दुमो बह वो रामके पौदह वर्षीक उसका एक दिन मी मही, परिकि तेग बकि उसकी एक पही मी नहीं, और गगसूकुमारके प्यानको एक पल मी मही को फिर हमको इस वपत कारणको कभी भी बताना योम्प नहीं । तुमें शोक नही करमा चाहिये । जो से मात्र उसे देसते रहो इस प्रकार निभय रमने चार क्या उपयोग करे और सापानीसे रहो । यहाँ उपदेश। ३७० ब, प्रथम नापारी १९९. गवर्ष मंगसिर महामेमें जबसे यहाँ बाना हुआ, उम समयमे उपाधि-पोग उत्तरोत्तर विशेषाकार होता आपा है, और प्राप फरक पर उपाधि-पोग विप प्रभार उपयोगमे सदन करना पड़ा।
[. भीमद् रामचन्द्र सालको तापकर वादिने स्वमानसे बहुपम काल का है। उसमें मा विशेष करके चार बनाताले योम्पमूत्र ऐसे इस क्षेत्रमें वो का स और भी बम्मानरूपसे पता है । गोको वाम- प्रस्मयके योम्प पति पत्पत मारा ऐने पोप हो गई है। इस प्रकारके सब तबके हुपम योगमें प्या- हार करते र परमार्पका भूत बाना वापत पुषम , और परमार्थको पति होना मर्मत बापत दुम है । इस पत्रको हुपमाको पनी विशेषता है जितनी कि मानन्दपनगीने चौदह बिन मगवान् के स्तबममें कई बार बानन्दपनगी काकी वपेक्षा वो वर्तमान काल और मो सेप दुपम परिणामी है। उसमें यति माम प्रापया पुरुषके सभमे योग्य कोई उपाय हो तो केवश एक निरंतर विनियम पापसे ससंगकी उपासना करना हो माध्म होता है। जिसे प्राप सब कामनाके प्रति सदासानमात्र है, ऐसे हमें मी या सम म्पमार और कार बानि, गोते साते मात्र संसार-समुपसे मुक्तिम्से ही पार होने देता है। फिर भी प्रति समय उस परिग्रम बयत साद उत्पम मा करतावर संताप उत्पनरोकर ससगरूप पकी कमतरूपसे तपाया करती है। चोर पड़ी एक इस माम हुमा करता है। ऐसा होनेपर भी इस प्रकार म्पसारको सेवन करते हुए उसके प्रति रेप परिणाम करमा योरम नहीं है इस प्रकार को सर्म हाना-पुरुषोंका वमिप्राय है, उस पारको प्राप समतामात करता है। ऐसा गा करता है कि परमा उस लिपपमें मामों पूरा करता ही नहीं। विचार करमेसे ऐस्य मी नही भगवा किया यो उपावि उदपमें , सब प्रकारसे कासपी है। जिससे पूर्वोराश्रित प्रारम्ब शास होता है, उस उपाधि-परिणामको बारम मस्पयी करना चाहिये। मनमें हमें ऐसा रहा करता है कि बस कामे ही पह साषि-योग र होकर मायाम्मतर निर्मपता प्राप्त ए तो वधिक थोम्प है, परन्तु यह बात प फ में हो सके, ऐसा नहीं सूमता और जातक ऐसा न हो तबतक उस रिताका दूर होना संभव नहीं है। पदि वर्तमानमें 0 इस समस्त पगार मेा दिया हो, तो पाक्न सकता है। दो-तीन सरपणे पाहम इस प्रकार के प्रते है कि मो भोगनेसे हो मिच हो सकते है और में इस प्रकारके म कपमें भी उस शेप की स्थिति से बाप का नमाम नही किया जा सकता और इस कारण हम मूनको तय सम्पहार सेक्स किया करते है। म्पिमें, किसी क्षेत्रमें, किसी में और किसी मालमें स्थिति जाप, ऐसा प्राण मानो का मामाई नही देता । उससे केवल सब प्रकारका प्रतिमामान रोना योग्य है, किर भी मस्-िक्षेत्र, निशिका, समंग बारम-विचारमें हमें प्रतिमा कपि यी है। का योग किमी प्रमासे मी से बने से पोहेही काम्में तो पाप-सी तिनमें रात Pापरते।
पत्र २0१,३०२, ११,] विविध पत्र भादि समर-२५ो वर्ष ३७१ बर्माम बापाड पौर सोम १९१९ . निसे प्रीतिसे ससारके सेवन करनेकी स्पसछा होती हो, तो उस पुरुपने हानीके सपनोंको हो नही मुना है, पपया उसने बानी-पुरुपका दर्शन मी नहीं किया, ऐसा पार्यकर करते है। मिसकी कमर टूट गई है उसका प्राप समस्त बस क्षीण हो पाता है । निसे हानी पुरुषके वचनरुप सकतीका प्रहार हुमा है, उस पुरुप उस प्रकारका संसारसंघी बछ होता है, ऐसा तीर्थ- कर करते हैं। झाना-पुरुपको देखने के बाद भी यदि मौको देखकर राग उत्पम होता हो, तो ऐसा समझो किहानी-पुरुपको देखा ही नहीं। बानी-पुरुषके वचनोंको सुननेके पचात् नीका सजीवन पारीर नापनरहित रूपसे मासित हुए बिना न ये, और धन वादि संपत्ति वास्तबमें पृषीके विकारपसे मासमान हुए बिना न ये। काना-पुरूपके सिवाय उसकी मामा दूसरी किसी भी जगह क्षणमर मी टहरनेक सिपे इच्छा नही करती। स्यादि सपनोंका पूर्वमें शाना-पुस्प मार्गानुसारी पुस्पको बोध देते थे, जिसे जानकर-मुनकर सरह बीच उसे वारमा धारण करते थे । क्या प्राणस्पाग जैस प्रसंग मानेपर मौवे उन सपनोंको बापान न करने योग्य मानते थे, और वैसा ही वापरण करते थे। सबसे अधिक स्मरण करने योग्य बातें तो बहुतसी है, सिर मी ससारमें एकदम उपासीनता होना, दूसरों के अम्प गुमि मी प्राप्ति होना, अपने यत्य गुणोंमें मौ कस्यत क्लेश होना, दोपके माश करने में मर्पत पापका स्फुरित होना पे बातें समग ममा एक शरणागतरूपसे पाममें रमने योम्प है। वैसे बने पैसे निवृति-कास, निषि-क्षेत्र, निहनि-प्रम्य और निरावि-मानका सेवन करना । वीर्यकर, गौतम से जानी-पुरुषको मी सबोधन करते थे कि 'हे गौतम ! समयमात्र मी प्रमा करना योग्य मही'। । ३७२ सर्प वापा १५माम १९९९ अनुसता-प्रतिकूसता के कारणमें कोई विषमता नहीं है। सगके इच्छा करनेवाले पुरुषको या क्षेत्र विफमम्प है। किसी किसी उपालि योगका अनुहम हमें मी या करता है। इनकार गोको निस्पति करते हुए भी गो परमें गना है, उसमें कितनी ही प्रतिसता है, इसलिये इसमें छम सम भाईयों का विचार कुछ स्पगित करने योग्य (पैसा) है। ३७३ बम, प्र भाषा बा१४ पुष २०१९ माप करके प्राणी वापसे हो जाते है। वैसे वैसे सहा विशेष होती ना से पैसे मिशेष माणके मम्से बीवित एना होता है। यहाँ मात्र पक नामविचार और मामान वाम भीमद रामचन्द्र [पत्र .. होता है, वही सब प्रकारको बाशाको समाधि होकर पायके ससपसे जाषित या पाहै। मिस पक्षको कोई मी मनुष्य इम करता है, उसकी प्राप्तिको भविष्यमें होम करता है। और इस मासिकी इमाप मायासे हो उसकी सपना बोषित एती और काफ्ना प्राय करके कम्पमा हो या वीरे। पदि नारवा कम्पना न हो और बम मी न हो, वो उसकी दुसरा भयकर स्थितिका जपनीय हो मामा समय है। सब प्रकारको वाता-चौर उसमें मी मामाके सिवाय इसरे बाप पापोंकी मारा, समापि किस प्रकारसे प्रम हो, या करा! ३७४ वर्मा, दितीय वा मुदी धुध १९९९ रस्ता हुआ कुछ पता नही भोर मेकामा कुछ बता नहीपस प्रघर परमा चार करके किसके प्रति पौनता करना अपवा शिफ्ना दिखाना पोप नही है। समागममें दाममात्र नही बाना चाहिये। - ३७५ बर्व रितीय मापारी, १९९९ मौण बारिक क्रिया उदासीन जैसी पौ। जिस जाबो सम्पाप तत्पम ो जाय, उसे उसी समप सम प्रकारकी सांसारिक क्रियायें म , या कोई मियम महो, सम्पास तत्पम से बालके पर सांसारिक किपाबोका रसरित पाना संभव है। प्रायः फरक ऐसी कई मौध्यिा बस नामको मही होती जिससे परमार्यमें भांति उत्पन पोर सतक परमामें मांति न रो, तबतक सरी किपाभोंसे सम्पपलको पाषा नई बाती । इस मगरके ग सर्पको पूजते है, परन्तु वे वास्त- बिक पूप-विसे उसे नहीं पूजते, किस मपसे पूमते है~मानसे मही ते बोर देमको मेग पर्यत भाषसे पूजते है। इसी प्रकार सम्पनी गांव इस संसार को सेवन करताना रस देता है, म पूमि बनिए प्रारम्प-कसि ही विसर्व वा पावनिक टिसे मानपूर्वक उस संसारमें उसे कोई मी प्रतिबंध नहीं होता, प के पूनमक उपमम ममसेवा । नितने मेपसे मान प्रतिबन हो उपने वश हो उस बालके सम्परफ्ना हवा। नवामधी कोष मान, मापा और भेमका सम्पावके सिवाय मम मा समय महीरे, ऐसा जोय माता पार्य है । संसाय पापोंमें बोलको तात्र स्नेह के बिना कोष, मान मापा और ओम नही होवे बिसले बासको प्रसारका क्र्मत बनुबंध । मिस बात संसारी पदामि वा स्ना पता उसे किसी प्रसंग मो नमानुपी पाक पिसाच मी सदय होना सम । वर अबतक सम पामि तार ने परमा-माना नही होता । परमार्थ- मार्ग से करते है कि बिसमें परमार्थका सेक्न करता हुमा मात्र सब प्रकारसे सुबमें मरम इसमें कम्पर ना करे । कायरता ऐमा तो हापित् दूसरे गारोको मी समय है, परत संसार-पसको प्रातिमें भी कापरवाना-उस उसका वा नहोगमा उसमें मौरसवा ऐना- पा परमार्प मागी पुस्प होता है।
विविध पर मावि संपा–२६वौ वर्ष जीवको उस प्रकारकी मीरसता परमार्यभानसे भपका परमार्यमानी पुरुषके निश्वयसे होना मर, दूसरे मकारसे होना समय नहीं । अपरमार्परुप ससारको परमार्थ-हानसे गानकर फिर उसके ते तीन मोप, मान, माया अपना सोम कौन करे भयपाबा कासि हो! निस बस्तुका माहात्म्य परिस हो गया है, फिर उस वस्तु के लिये मसत देश मही यता । संसारमें मतिरूपसे गाना एला मण, मार्पानसे भाति हो भासित होता है, और जिसे प्रति भासित हुई है, फिर उसे वस्तुका स्पा हात्म्य माझ्म होगा ! इस प्रकारकी मारम्प-दृष्टि परमार्प-नानी पुरुषके निधपयुक्त गौवको होती है, और इसका कारण मी पही है। कदाचित् किसी बानो मावरमके कारण भावको स्वच्छेदक कान न हो, तो मी उसे पानी-पुरुषको अवारूप सामान्य ज्ञान तो होता है। यह बान बाके जिकी तर परमार्प-भरका बौन है। तीज परिणामसे और मसार-मयसे ररिस भावसे बानी-पुरुष अपना सम्यगरि चीनको क्रोध, माम, प्पा अपवा छोम नहीं होता । गो ससारके लिये अनुबंध करता है, उसकी अपेक्षा परमार्थक मामसे गाँतिगत परिणामसे, मो असहरु, देव और धर्मका सेवन करता है, उस गोषको प्राय करके अनवान- घी कोष, मान, मापा, लोम होता है। क्योंकि दूसरी प्रसारको क्रियायें प्राय करके वनंत मनुषम करनेवाग नहीं है। केवस वपरमार्थको परमार्थ मानकर मौष आम्हसे ठसका सेवन किया करे, या रमार्प-शाली पुरुषके प्रति, देवके प्रति और धर्मके प्रति नियदर है-ऐसा करना माप पधार्य है। हमगुरु, देव और धर्मके प्रसि, भम्र वादिके मापासे, मिण्या-गोषसे, वासातमासे, उपेक्षापूर्वक पि करे, या समय है। तपा उस मिष्पा संगसे उसकी सतार-पाम्नाके परिछिम न होनेपर मी उसे परिच्छेदरूप मानकर यह परमापक प्रति उपेक्षक ही यता है, पही भनत क्रोध, मान, मापा पौर गेमका चिहै। ३७६ बर्थ, नि मापार पदी १०सोम १९९९ शारीरिक वेदमाको, एका धर्म चानकर गौर बाँधे हए कौक्य फल समझकर सम्यक्प्रकारसे सान करमा पोग्प है। बहुत बार शारीरिक वेदनाका विशेष बछ गता है, उस समय जैसे उपर कहा है, उस तय सम्पमकारसे श्रेष्ठ गांवोंको मा स्थिर यना कठिन माता है। फिर मी त्यमें बारमार उस बातका विचार करते हए, और मास्माको निस्प बगेप, ममेप, और बरा, मरण पादि धर्मसे मत भावना करते हुए विचार करते हुए कितनी हो तबसे सस सम्पप्रकारका निधप बाता है । यो पुरुषोशरा सहन किये हुए उपसर्ग तथा परिपाके प्रसंगोंको नीनमें सति उत्पन करके, उसमें समके गनेवाले बसा लिययको सिर फिरसे लपमें स्थिर करने योम्प जाननेसे, गावका पर सम्पपरिणाम फलीभूत होता है। और फिर पेदना-वेदनाके झपकासके नित होनेपर- वेदना किसी मी कर्मका कारण नहीं होती । रिस समय शरीर म्याधिरक्षित हो उस समय बोक्ने पदि उससे अपनी मिमता समसकर, उसका मनित्य वादि सम्म गानकर, उससे मोह ममत्व मारिका स्पात कपा हो, तो पा महान् मेय है। फिर भी यदि ऐसा म आ हो तो किसी मी म्याधिक उत्पन श्रीमद् पारण [१४.५ हाता , वहाँ मा प्रचारको मामा समात्रि होकर गांव के सरपसे गावित या माताहै। शिम बस्तुका मार मी मनुष्य श्या फरताह उस प्रालिका मदिप्यमें ही इस करता है और इस प्रामि, इसानप आपसी टमका कल्पना गाषित यती बार यह कम्पना प्राप करके इना हो या करती है। परि गीतका बहसम्मना न हो बार पान मी न हा, तो उसकी हुमधारक मकर स्थितिमा अपनाप हा गाना ममय । सब प्रकारको वाशा-और उसमें भी वा माझे निपप रे बाप पार्षीकी भाशामे, समाधि हिम प्रसाम प्रामा, पर कहो ! ३७४ बई, दितीय बापान मा ६ष १९१९ रम्मा पादुक पता नहीं और अडामा कुरा मा मही–स प्रकार परमार्थ विचार साफ किमीफ प्रति दानवा परना अया मिशता रिवाना योग्य नहीं है। समागममें दोनमात्र नही जाना चाहिय। । ३७५ बाई शिवाय मा ५, १.१९ औरण वानिकी क्रिपा उगमन सी पी। जिम गरि सम्पान उत्पम बाप, उस उसी ममय सब प्रकारको सम्पारिक किपा मगे, पर कोई नियम नहोस, सम्पत्र उपम नानके मा मारिल शिपाओस रसारित जाना समा। प्रापकाके ऐसा कोई मी लिपा उस बाप महीनी सिम परमार्य भति उत्सम दो भार बार परमार्थ, भति म हो, तबतक मी दिपाओम मम्यानको बारा नहीं बानी । इस जगत् सग सम पूमते है परंतु पान कि पाप-पुस्मि उसे नही पूजन, किमु मफ्स पून -मामे मही परते, और इसको रोग भक्त भार पूजन है। इसी प्रकार सम्पपरी बार इस मुमार नो सेवन करता हुमा लिई ला, र पूर्मि परिर प्रारम्प-कर्मम ही कमाई देता है--बाम्नविक रश्मि भावक उस समारमें टम को मा प्रति महीना, केरल पूर्वधर्मी उदयम्म मपसे होवाशितने वशमे मार- प्रतिपय न १ उनन भराम ही उस गीतक सम्परना होता है। जननानुषी कोष मात्र, माया और छोमय सम्पामो सिताप नाश हाना संमा मही ऐसा जो कहा जाता है पपाय है । ममा पापोंमें जीवका ती स्नेहक किना म, मान मापा और मोम नही त निम्म गरिन समारण मर्मत मनु । मिस गोरच संसारी पदामि तौर स्नेह यता हो उमे सिमी प्रमग मी अनंतानुषी तुमसे किमान भी उप हाना सेमरी और जबतक उन पनि वीर नेहा, तबतर और पप ही परमार्प मार्गहाण मही साप । परमाप- मार्ग उसे पति रिस परमार्था मेरन करता गुमा गोल मा प्रकारसे उनमें अपरा १म वायर को न पापरमा ना वो सावित् मरे पोधे मी ममा, परम्नु मेमार-गुणी प्रमिय भी सपना ऐना-उस समयमा महोगना-उममें मारसना रोना- पर पामार्प मागी पुरषो ही होता है।
पिपिप पर भादि समर-२५ वर्ष . मीवको उस प्रकारको मीरसता परमार्थधानसे भया परमार्पधानी पुरुषके निभयसे होना समव है, दूसरे प्रकारसे होना समय नहीं । अपरमार्थरूम ससारको परमार्यमानसे नानकर फिर उसके प्रति वीय क्रोध, मान, माया अपमाडोम कौन करे भयकामा कसि हो निस पसका माहात्म्य परिसे दूर हो गया है, फिर उस बस्तुके छिये मयत देश नही यता। ससार भतिरूपसे गाना हुना मुम्स, परमार्थ-पानसे भांति ही मासित होता है, और मिसे भ्रांति मासिता है, फिर उसे मस्तुका म्या माहात्म्य मारस होगा ! इस प्रकारकी माहात्म्यमपि परमाथ-पानी पुस्पके मिमपयुक्त पौषको होता है, और इसका कारण मी यही है । कदाचित् किसी जानके मातरमके कारण नीतको म्याकडान न हो, तो मी उसे हानी-पुरुपकी मदारप सामान्य शान तो होता। या हान बाके बीजकी तर परमार्पाका बीच है। ठोर परिणामसे और ससार-मयसे रहित मासे पानी-पुरुप अथवा सम्पपशि भारको क्रोध, मान, माया अपना मेम नहीं होता । यो ससरके रिसे मनुबध करता है, उसकी अपेक्षा परमार्प मामसे भतिगत परिणामसे, मो मसहरु, देव और धर्मका सेवन करता है, उस नीनको प्रापः करके बनतानु- यमी कोष, मान, मापा, होम होता है क्योंकि दूसरी ससारकी क्रिया प्राय करके वर्मत मनुषध करनेवासी मही है। केबस अपरमार्षको परमार्य मानकर बील मापासे उसका सेवन किया करे, या परमार्थवानी पुरपके प्रति, देवके प्रति और धर्मके प्रति निरादर है-ऐसा करना प्रायः पयार्य है। समगुरु, देव और बर्मक प्रति, असगर वारिक मापासे, मिष्पा-पोरसे, मासातनासे, उपेक्षापूर्वक प्राति करे, पर समव है। तया उस मिप्पा सगसे उसकी स्सार-पासनाके परिसिम न होनेपर भी उसे परिवरूप मानकर पर परमार्यके प्रति उपेक्षा ही यता है, यही अनंत क्रोर, मान, माया बोर होमका पिहो। ३७६ बर्मा, विभागात कदा १०सोम १९१९ शारीरिक वेदमाको दहका धर्म मानकर गौर पि ए कर्माका फर समझकर सम्यक्झकारसे सान करना योम्प है। मात पार शारारिक वेदनाका विशेष का पता है, उस समय से उपर कहा है, उस तय सम्पप्रकारसे भेष्ठ बीयोंको मी स्थिर गना कठिन हो माता है। फिर भी इसमें मारमार ठस बातका पार करते हए, और भात्माको निप्प मठेप, अमेप, मौर जरा, मरण पारि धर्मसे रक्षित मानना करते हुए-विचार करते हुए-कितनी ही तहसे उस सम्पायकारका निय माया है । बडे पुरोधरा सहन किप हुए उपसर्ग वया परिपाके प्रसोको गारमें स्मृति उत्पन करके, उसमें उनके एनेपा मसा निभयको किर फिरसे हइयमें स्थिर करने योग्य जाननेसे, पोका पर सम्पपरिणाम फलीभूत होता है। और फिर वेदना-वेदनाके क्षय-कारके निच होनेपर-या वेदना किसी मी कर्मका कारण नहीं होती । मिस समय शरीर म्याविरहित से उस समय गौवने यदि उससे अपनी मिमता समझकर, उसका अनिस्य वादि साप गानकर, उससे मोह ममन बादिका स्पाग 'कपा , तो यह महान् मेप है। फिर भी परि ऐसा न ना हो तो किसी मी म्याधिक उत्पन ।
- - भीमद रामचन्द्र [पर - होनेपर, उस प्रकारको भावना करते हुए गोषको प्राप निकल कर्मवधन नहीं होता, वीर महान्याधिक उत्पति समय तो मील देशके ममत्वका बहा त्याग करके, बानी-पुरुषके मार्गका विचारपूर्वक माचरण करे, पर श्रेष्ठ उपाय है। यपपि दोका इस प्रकारका ममल त्याग करमा भपका उसका कम करना, पर महाकठिन बात है, फिर मी मिसका पैसा करनेका निमय है, पबन्दी या देरमै कमी न कमी अस्प सास होता है। मातक देह बारिसे जीवको बारमापाणका साथम करना बाकी या है, तबतफ उस देश में परिणामिक ममताका सेवन करना हो पाप है। वर्षात् पदि इस देशका कोई उपचार करना परे, तो या उपभार देह में ममत्व करनेकी इमसे नहीं करना चाहिये, परन्तु जिससे उस देहसे जाना-पुस्तके मार्ग वारापन हो सके, इस प्रकार किसी तय उसमें गमेमा गमके लिये, बौर उसी प्रकार मुरिसे, उस देशको म्याधिके उपचारमें प्राति करमेमें बाधा नहीं है । यो कुरा ममता बमपरिणामिक ममता है, वर्यात् परिणाममें समता सस्म है, परन्तु उस देशको प्रियताके मि, सांसारिक साधनोंमें गो या प्रधान भोगका देवरे, उसका पाग करना पता है। इस प्रकार वार्सम्पानसे किसी प्रकमसे मी उस देहमें पुदि म करमा, या हानी-पुरुषों के मार्गको शिक्षा ग्रामकर, परमकल्याणके उस प्रकार के प्रसगमें मक्ष रसना योग्य है। भौतीपंकर जैसेंने सब प्रकारसे मानांको पारणमें पुनि रसान निर्मक्ता वर सदरमित माग सेन परनेकी मिया है, और हम मी पाही करते । किसी भी कारणसे इस संसारमें मेशित होना योम्प नहीं। भविचार और भात, पस लेगों का मोहका मोर गतिका कारण है। सरिवार और मत्मयान मामगतिका कारण है। उसका प्रपम साक्षात् उपाम, हानी-गुरुपको नाकाका विचार करना ही माश्म होता है। ३७७ कई धापण सुदी १ भौम १९४९ जब किसी सामान्य मुम्भु गौरका मी इस ससारके प्रसंगमें प्रापिसबपी वार्म म पर माता तो हमें बसंरवी मरिक महता हो तो इसमें कोई मापर्य मही माझ्म होता । पिर मी सी पूर्ण प्रतमें प्रारम्पके उपार्जन करमेका इस प्रकारका क्रम हा होगा, जिससे उस प्रसंगमें प्रति करना रहा करे, परम्तु पर किस प्रकार या करता है। कम इस प्रकार या माता किमो कोई खास मार-सुपी ममयुक उसे मां उस तारनामनु ममापे । पाप पायात केद करने पोम्म नहीबार म उमीनताका ही सेवन करते है मिस भी उस कारणसे एक दूसरा मेर सायम होता पर पाकिससा और नितिको भप्रधानता पा करती है, और पिसमें परम सपि, इस प्रकार के मामशान भोर मामवार्वाको किसी भी प्रकारकी इण्णा बिना बचित् स्पाग जैसा ही रखना परता है। मामग्राम होनेसे म्पमता मही रोती परन्तु मामान रियोग म्ममता पैदा करता है। संमार मगा देगन विही परना। परि बितामें समता देताना मामषितन वैसी ही है।
पर ३०८ १.१, १८ ] पिविम पर भादि संग्रह-२६पों व ३५३ ३७८ वमा, धावण मुदी ५, १९९९ (१) गहरी गोग ऐसा मानते है कि यदि एक साधारण सुपारी से उसम रगका, पानागर और पाटदार माणिक ( प्रत्पक्ष ) दोपरहित हो, सा उसकी करोड़ों रुपय भी कीमत गिने तो मी ना कीमत थोड़ी है। यह विचार करें तो इसमें केवल ऑम्मके टयरने और मनळ इम्याकी कम्पित मान्यताके सिवाय दूसरी धौर कोई मी मात नहीं है । फिर मी इसमें एक मांडके यहरनेकी पूर्वाके सिये और उसकी प्राप्तिके दुर्गम होने के कारण लोग उसका बत माहारम्प बताते हैं वार निसमें आमा स्थिर रहती है, ऐसे अनादि दुर्गम सम्सगमप साधनमें गेगोंको कुछ भी हपूर्वक रुचि नहीं १, पर भामर्पको बात विचार करने योग्य है। (२) बम्सगमें उदासीन रनेके टिपे जब जीवका मप्रमाररूपसे निषय हो जाता है, समी समान समाधा जाता है। उसके पहिले प्राप्त होनेवाल वोपमें बहुत प्रकारका अतराय या करता है। । ३७९ बम्बई, भाषण मुरी१५रवि १९९९ प्राप करके बरमामें ऐसा ही रहा करता है कि गवसक इस म्यापार प्रसगमें काम-काब करना या करे, तबसक धर्म-कया बारिके प्रसग और भर्मक नानकारके रूपमें किसी प्रकारसे प्रगटलपमें न बाया बाय, पही क्रम यथायोम्प है। व्यापार प्रसगके एनेपर भी सिक प्रति मक्तिमान रहा करता है, उसका समागम मी इसी क्रमसे करना योग्य है कि जिसमें वाल्मामें बो ऊपर कहा हमा क्रम या करता है, उस कममें कोई वाधा न हो। जिनमगवान्के को ए मेर वादिके सबघौ गौर वजोंकी कही हुई पिषी पारिफ सवपमें समागम हानेपर बातचीत करना । हमारा मन बात उनसान रहता है, और प्रतिबए इस प्रकारका रहा करता है कि वहाँ पर उदासमात्र सम्पूर्ण गुम जैसा करके सइन न किया गाय, इस प्रकारके पापार आदि प्रसगमें उपाधि योग सान करना पड़ता है। परि बास तो मामा समाभि-प्रत्ययी है। ३८० बाई, सारण बदौ ५ १९१० गतर्ष मगसिर मुत्री को यहाँ भाना हुआ था, तबसे गाकर भाबतक अनक मारमा उपाधि-पोग सहन किया है, मौर पर भगापा न हो तो इस फामें उस प्रकारक उपाधि-योग, पाके उपर सिरका राना मान होना ऐसा हो ए बात बार देता है। भार रिमन माम- सर मान लिया है से पुरुषका भौर इस ससारका मेउ मी म साप, पही अविर निभय हुमा । सनी पुरुष मी वर्पत निमय उपयोगमे बर्ताव परते करते मी पचित में परिणामी हा माप, मी इस समारो वापसभा बोधका माग तामही दाना, किरमा भाममनपके पोषके दिन परिणाम प्रति एक प्रकारमा बावरण दानम्प उपाधि-भाग दाता । सत्य उस उपाधि-योगसे भी प्रासापाया परत है और उस उम पागमे रूपमें और मुगौ मायम पास प्रमुग्ध नाम रणकर मुकिससे हो ग प्राति करक सिदर ए सकते हैं। परि सम्पास अपात -१ - भीमद् पवन [११८१ योपविषयक माति प्राय नहीं रोती, परम्तु बोधके विशेष परिणामका बननाश हेता है, ऐसा तो स्पए दिखाई देता है। और उससे बारमा भनेकवार म्याकुल होकर पागका सेवन करवा पी, फिर भी उपार्जित कर्मको स्पितिको सम परिणामसे, बदीनतासे, पम्पासतासे सहना करमा, यही गाना-पुरुषोंका मार्ग है, और हमें भी उसका ही सेवन करना है-ऐसा स्मृति होकर स्पिरता यती। वर्षात् भाऊ उता वादि मालकी होती विशेष पहाट समाप्त होती थी। जबतक सारे रिन निकृषिके हो पोगों का न म्पतीतो तबतक मुस न मि--स प्रकारको हमारी स्पिति है। मामा मामा', 'उसका विचार', 'शानी पुरुषको सति', ...उसके माहाम्पका कपा-मार्ग', 'उसके प्रति वमत मणि' 'उनके पनाका बाम चारित्रके प्रति भोर ।-या इमको बी वार्षित किया ही करता है, और उस का सेवन करते हैं। कामे मो जो कालानी-पुरुष समागममें म्पतीत मा है, पका पन्य है। क्षेत्र वापत मतपत मन्य है उस भमणका, मणके कर्णको वौर ठसमें मधिमानयुक्त गायको निकल रत् हो । वस वानस्वरूममें मलि, वितन, वाम म्पास्यासाठी शाना-पुरुपकी पाणी, अपना गाना शाव अपना मार्गामुरी हाना-पुस्पक तितिको मपूर्णताको हम प्रति मजिक प्रणाम करते हैं। वसा वाप-मुनकी एकवार उस बातो में अमी प्रमापूर्वक सेवन करमेकी पत बानुरता या करती है और दूसा बोरसे इस प्रकार क्षेत्र, इस प्रकार गे पार, इस प्रकारका उपाधि पोग और दूसरी उस उस वपकी बातों को देखकर विचार को तय गावा है । ईचरे का । फेसपर मारपद परी १ १९१९ १ जिसके पाससे धर्म माँगमा उस प्राप्त किप हुएको पूर्ण चौकसी करनी-समास्या स्पिर पिचसे विचार करना चाहिये। २ जिसके पाससे पर्म माँगना, परि उस पूर्ण कानाची परिचान जीवको तो उस प्रकार शानियोका समग करना और यदि सग हो बाप तो उसे पूर्ण पुष्पका उदय समना । उस ससग उस परम बानाके उपदेश दिये हुए शिक्षा-मोषको प्राण हरमा-विस्से का, मतमतांतर, निवासपात और बसवचन पाविका तिरस्कार हो-बार टने प्रण नही करना, मवधवार पोष देना । मामाका धर्म वामा मामा-माम पुरुषच उपदेछ रिसाएमा बर्म वाम मार्गपशा, पाकाले माफि मतमें नही पाना । १ ना होने के बाद ससग होनेपर मी पदि बीबसे काम मतमवर मावि पर न मेरे गा सकें ये शिर उनसे दमेको बासा मी न मनी चाहिये ।हम सप किसी वारे-पात अपार पामही करते । बारमार ने तो मौ मा बात स्मृतिमें यतीमारे संगमें बापे हुलिसी बीचोंको वठक माँ हमने ऐसा नहीं कहा किस प्रकार चलो पा पा करो । परि अस का ऐगा तो चरेस रिवा-पोषके सममें हो रहा रोगा। ऐसा करो पत्र १८१, ३८२] पिपिप पत्र मावि समह-२५पों वर्षे . हमारा उदय इस प्रकार रहा है कि इस तरको उपदेशकी बात करते हुए पाणी पीछे सिंच बाती है। कोई सामारण प्रभो तो उसमें वाणी प्रकाश करती है, और उपदेशही बातमें तो पाणी पाछे । सिंच माती, इस कारण हम ऐसा मानते है कि ममी उस प्रकारका उदय मही है। ५ पूर्ववता वनतहानी पपि महाशानी हो गये हैं, परन्तु उससे जीवका कोई दोष र नही होता । मर्यात् यदि इस समय चीवमें मान हो तो उसे पूर्ववता बानी करनेके लिये नहीं आते; परन्तु हामें भी प्रस्पक्ष हानी विरानमान हों, वे ही दोपको पताकर दर परा सफर है। उदाहरणके लिये दूरके क्षारसमुद्रसे यहाँक तुपातुरकी कृपा शान्त नही हो सकती, परन्तु यह यह कि एक मोठे पानीके करशेसे ही शान्त हो सकती है। ६ गोल अपनी कम्पनासे कल्पना कर लेता है कि पानसे कन्याण होगा, समाधिसे कल्याण होगा, योगसे कम्याण ऐगा, भयवा इस इस प्रकारसे कल्याण होगा, परम्तु उससे बौवका कोई कपाण नहीं हो सकता । मीतका कायाण तो हामी पुस्पके वय यता है, और ना परम मसगसे ही समझमें ला सकता है। इसलिये पैसे कम्पोंका करना छोड़ देमा पाहिये । ७ गीतको सबसे मुख्य पात विशेष ध्यान देने योम्प पहो कि परि सरसग आहा तो समसग भवण किये गए शिक्षा-पोषके निप्पम होनसे, साबमें ही चीरके उत्पम ए कामा मारि दोप तो एट हो जाने चाहिये, निस्से दूसरे नीयोंको ससंगके मार्णवाद के बोल्नेका प्रसंग उपस्थित न । ८ हानी-पुरुपने कुछ काना बाकी नहीं रस्सा है, परन्तु जीवने करना बाकी रस्सा है। इस प्रकारका योगानुपोग किसी समय ही उदयमें बाता है। उस प्रकारकी मॉमसे रहित महामाको मतितो सपा कापाणकारक ही होती है परन्तु किसी समप महाग्माके प्रति पनि उम प्रकारको गोडा और उस प्रकारको प्राप्ति हो चुकी हो, वो भी वही बांछा यदि वम् पुरुषके प्रति की हो, और उससे जो फल होता है, उसकी अपेक्षा इसका फल शुग ही होना समय है। पदि सापुस्तके प्रति उस कासमें निकता यो हो तो काम बानेपर उनके पाससे समार्गकी प्रामि हो सकती है। एक प्रकारसे हमें पपने आप इसके लिये बात शोक यता पा, परन्तु उसके कम्पाणका विचार करके घोकको निम्मरण कर लिया है। ९ मन पपन बार कापाके पोगसे निसका कबीस्पनप मार कर नामार वर हो गया है, ऐसे पानी-पुरुपके परम उपशमन्स भरणारदिको ममस्कार करके, बारम्बार उसका पितवन करक, तुम उसी मार्ग प्रापिकी इच्छा करत हो—पर उप श देफर यह पत्र पूरा करता है। विपरीत में अमले होनेछ कारण उम्म111 ३८२ समान मारपर १९१९ बनागिकारसे निर्यप पुदि होनेसे, और शानो-पुस्मी मातमी परा भवानी-पुरम मोदी गिमाई रेलसे पानी-पुरुषमें रिश्रम बुदि उत्सम हो जाता है अपय जीवको हानी-मुम्प प्रति उस उस पेशका रिकम्प भाषा करता है। परिवानी-गुपका इमरी रिपोमे यथार्थ नियम मातो [पत्र १८३ । श्रीमद् रामचन्द्र तो यदि किस्प विकम्पको उत्पम करनेवासा बानीको उन्मत्त भादि मावयुत वेध प्रापक्ष देसनेमें मापे, तो मी दूसरी रिके निपपके यमके कारण पारा अविकल्परूम ही होती है। वपपा बानी पुरुषको पेयका कोई जगम्पफ्ना हो इस प्रकारका है कि यह मग अस्पासे अपवा बरे निभयसे गोषको निमम मौर विकम्पका कारण होता है। परन्तु वास्तविकमपर्मे सपा पूर्ण निमय होनेपर पा विमम पौर विकम्प उत्पन्न होने योग्य नहीं है, इसलिपे इस पौषको को हानी-पुरुपके प्रति अपूरा नियम है, पही इस जोपका दोपहै। बामा पुरुप सम्पूर्ण रीतिसे बानी पुरुपसे वारपसे समान नहीं होता, और यदि तो फिर पानी हो न स मकारका नियप करना ना माना-पुरुषके निमप करमेका यथार्थ कारण है। फिर मी हानी और कहानी-पुरूपमें किसी इस प्रकारसे विरक्षण कारणोंका भेद है कि निससे पानी और पानीका किसी प्रामसे एकरूप नहीं होता । मानी होनेपर मी जो जीत शानाका सरूप मनपाता हो उसका निम्मणवासे निपप किया बाता है इसध्येि प्रथम बानी पुरुषको रिब्धमताका निमय करना योप।मौर यदि उस पिम्सम कारणच सहम जानकर मानाका निथप होता है, तो फिर मषित् महाना के समान नो गोपानी-पुरुपको पेय देखने वाली है, उस विषपमें निर्षिक:पता होती है, और नहीं तो जानी-मुरुपकी या पेश उसे विशेष मावि मौर स्नाका कारण एती। प्रत्येक बीचमात् परिबानी यानी समस्त स्थानों में समान हो तो फिर मामा- पानीका भेद नाममात्रका भेद ए गाता है; परन्तु पैसा होना योग्य नहीं है।माना वौर कानी पुरुप पपय हो विम्क्षणता ऐनी चाहिये । विस सिम्प्रणताके पपार्प निमय होनेपर मीसको बानी- पुरुष समाधमें जाता है मिसन योपासा स्वस्म पहाँ बता देना पाग्य है । मुमुसु जावको मानी और माानी-पुरुषकी विणता, उनकी बर्यात् हामी-बहानी पुस्पको दशाशरा ही समझमें बाती है। उस दशाको पिम्णता मिस प्रकारसे होती है, उसे बता देना पोम्य है। गौवको दशाके दो माग हो सकते है-एक मूसा और दूसरी उत्तरदसा । बर्थ भारपद १९१९ पति मान-सा सती हो मोर गारने भम भादि कारणसे सस हान-शा मान मेरो, तो को उस उस प्रकारके एस पढ्ने प्रसंगोंमें अपया उस तरके सरे कारणोंमें और देवकी साताको सेवन करने की त्या परता है वौर से होवा करता है। पर सबा शान-दय हो तो उसे दुक-मासिके कारणोंमें विषमता नही होती और उस उसको एर करनेकी सनी अधिक पिता भी नहीं होती। ३८४ बमई, मारफर बा १९१९ विस प्रकार इस मामले प्रति पशि उस प्रकारको पशि जगत्को सर्म वामानों के प्रति है। जिस प्रकार स्नेह इस मामाले प्रति , इस प्रकारका स्नेहन मात्मामोंक प्रति। मिस पर ३८४, १८५ ] पिपिप पत्र मादिसंप्रह-२६वा पर्प प्रकारको इस मारमाकी सहानद स्थिति चाहते है, उसी प्रकार सर्व वारमाणोकी घाइते हैं। वो पुल इस मारमा छिपे चाहते है, यह सम, सव वात्माबोंके लिये चाहते हैं । जिस प्रकार इस देहके प्रति मात्र रस्ते हैं, उसी प्रकार सर्व देहों के प्रति रसते है। जिस प्रकार सुद देहों के प्रति पर्याय करनेका क्रम रखते हैं, उसी प्रकार इस देहके प्रति प्रम यता है । इस देश में विशेष-बुद्धि और दूसरी देहोंमें विषम-युद्धि प्राय करके कमी मी नहीं हो सकती । मिम सियों आदिका निजरूपसे सबध गिना चाता है, उन बियों वारिके प्रति यो कुछ स्नेह नादि है अपया समता है, उसी प्रकार प्राय सपके लिये रहता है। केस वात्मस्वरूपके काम प्रति होनेसे जगत्के सम पदायाँके प्रति जिस प्रकारका उदासीनसा यती है, उसी प्रकार निजरूपसे गिने बानेवाले लियों आदि पदाकि लिये यसी है। प्रारम्बके योगसे नियों आदिके प्रति जो कोई उदय हो, उससे विशेष प्रति प्राय करके बारमासे मही होती ।काचित् कस्मासे कुछ उस प्रकारको प्राप्ति होती हो तो उस प्रकारको प्रत्ति उसी क्षणमें उन उदय-प्रतिष वास्माओंके प्रति इसी है, अपना समस्त जगत्के प्रति यती है। किसीके प्रति कुछ विशेष मही करमा, अथवा कुछ म्यून नहीं करना, भौर यदि करना हो तो फिर उस प्रकार एक हीधारको प्राति समस्त जगत्के प्रति करमा--यह जान मारमाको पास समपसे स है-निश्चयस्वरूप है। किसी स्पसमें न्यूनता, विपता, अपना ऐसी कोई सम-विषम घेगपूर्णक प्रापि दसी नावी हो तो यह वपश्य एवात्मस्पितिसे पारममुदिसे नहीं होती, ऐसा माइम होता है। पूर्वमें मंघि गए प्रारम्पके योगसे उस प्रकार पुस उम्पमावरूपसे होता हो तो उसमें मी समता ही है। किसीके प्रति यूनता या अधिकता वास्माको कुछ मी मना नहीं स्माता, वहाँ फिर दूसरी अवस्थाका विकम्प होना योग्य नहीं है। सबसे बमिल भावना है। जिसकी जितनी योग्यता है, उसके प्रति उतमी ही भमिम माबका स्कृति होती है। बाचित् करणा-बुधिसे विशेष स्थति होती है। परन्त विपमतासे अयमा विपय परिणा बार कारण प्रत्यक्से उसके प्रति प्रति करमेका भात्मामें कोई समस्य माझ्म नहीं होता किम्य रूप स्पिति । विशेष क्या करें ! हमारे कुछ हमरा नहीं है, क्यवा सरेका मही, वपना इसग नहीं है। सा है पैसा है | जैसी बारमाको स्थिति है जैसी दी है। सब प्रकारको प्रापि निष्कफ्टमाबसे उदयमें है। सम-विषमता नहीं है। सहमामंद स्पिति है। यों वेसा हो यहाँ दूसरे पदार्थ, बास-पुद्धि योग्य नहीं मोती नहीं । - । पी, मासोर मी १ मोम १९९९ " हानी पुस्पके प्रति गमिम मुनि रो, यह कापामा महान् निथप है"-इस प्रकार सब महारमा पुरुषों का अभिप्राय माश्म होता है। तुम तया बे-निनका देश हा काय वेदसे रहता है- दोनों ही त्रिस तर हानी-पुरुषके प्रति विशेष निर्मगमाबसे अमिमता हो, उस तरहको प्रसंगोपात मात करो; वह योग्य है। वौर परस्पर अर्थात् उनके वीर तुम्हारे बीचमें मिससे निर्मप्रेम थे, वैसे प्राधि करनेमें बाषा मही है, परन्तु वा प्रेम नस्पतर रोना चाहिये । प्रेम इस तयका मोना चाहिये पैसा -पुस्पका काम मादि कारणोंसे प्रेम होता है । परन्तु कामां-पुस्पके प्रति मनोका भीमद्रासन [पर १८५१० माधि-गा, इस पर दोनों ही अपनेको एक गुस्से शिप्प समझकर, और निरन्तर रेनोका समग हा करता है या जानकर, माई जैसी बुद्धिसे या उस प्रकारसे प्रेमपूर्वक या गाय तो यह बात विशेष योग्य है।हानी पुस्पके प्रति मिनमारको सर्पया दूर करना पोग्य है। ३८६ पा, बासोन भदौ ५ शनि १९९९ बामाको समाधिस्य होने के लिये बामस्वरूपमें स्थिति होनेके टिये-मिस मुखमें सुधारस बरसता है यह एक वर्ष मापार है। इसलिये किसी प्रकारसे उसे बोमनात मा को को कोई पर माही । केजर इतना है. मद है कि बानी-पुरुष जो उससे भागे है, यह माननेवाण होना पाहिये कि परबान भारमा है। दम्पसे दम्प नहीं मिता पागाननेपाका कोई कम्पि नहीं करा पा सकता। परन्तु यह किस समप ! गए उसी समय बा कि स्वदम्पको ब्रम्प, क्षेत्र, काठ और भाषसे पपारस्थित समस ठेनेपर, स्वाम्य सरूम-परिणामसे परिणमित होकर, बम्प द्रम्पक प्रति सर्वपा उदास होकर, कसम होनेपर, पुण कर्दम्य नही पता ऐसा योम्प है, और ऐसा हो। " ३८७ बबई, बासोग मा ९युष १९१९ (१) तुझे पत्रमें सुधारसके पिपमें प्राप सरह लिखा था, उसे गानपूछकर लिसा पा ।सा पिनेसे उसा परिणाम बानेपाम नहीं यह जानकर ही निस्य था। इस बावकी इस पुल पर्चा परनेचा गार यदिप बात परममें वाप तोपगात उससे सपा निर्धारित रोगाप, पामही हो सस्ता । परम्तु पर हो सकता है कि मिस पुस्मन पे पाप विशेह पुस्प किसी सर्व मार्गका बाना है और उसमे इस बातच निगरम होना मुस्पतासे समय 'पामानकर उसका उस पुस्तके प्रति पुछ मी माषना उत्पम हो । कदाचित् ऐसा मान में कि उसे उस पुरुपतिश्पक पुस पुरा पान हो गया हो और इस सर सेसक पानेस उसे विशेष ज्ञान होन, स्वयं वस्ने माप हो बानिपपपर पप गाय, परम्त र निथप म तय नही होता। उसके पपार्प स्परका गान सेना उससे महारो सपना, और उम कारण परि गारको विशेषको उपति हो कि यह बात किसी प्रकारसे मात साप तो अप्सपो उस प्ररुमसे मी, मिस पुरस्ने सिपा। उसके प्रति उसको मारना उत्पपिना समा। वागरा प्रकार इस वपसमझना चाहिये कि 'परिसपुस्तक वामी परमसे माउिमा गो यो मा सिमे उमका परमार्प-सपुरका ससंग-माईकितनपट महो मा उसे समझाना कटिन पोता'म प्रसर उम पामेराडे कमी मी सर सहामा समा। पपपि हमने तो मति मही गिा पा वो मी उरें इम प्रसार पुछ संमा मास होता है। परन्तु हम तो पेमा स्पसते १ मिति सर शिरोता मी पाप कर समठ मही बाा, सपा सिरी समहमें - ३८.] पिमिप पन मादि संग्रह-यावर्ष " , है, वौर जन्में फिर उसे निक्षेप उत्पम होकर सन्मार्गमें भावना होना समय होता है। इस पत्रमें ने इमपूर्वक ही स्पर सिसा पा । सहन स्वमापसे मी न विचार किया हुमा प्रायः परमार्थक स्वपमें नहीं लिसा गाया, मयबा 1 मोठा पाता, नो वपरमार्थप परिणामको प्राप्त करे । (२) उस शान के लिपपमें हमारा सिसनेका जो दूसरा नाशय है, उसे पो विशेषतासे सिस्य है। (१) निस हानी-पुरुपको स्पट भात्माका किसी अपूर्ण प्रक्षणसे, गुणसे भौर मेनरूपसे नुभव हुवा है, वौर जिसकी बात्मा तड्प हो गई है, उस पानी-मुस्पने यदि उस सुधारसका बान न्या तो उसका परिणाम परमार्प-परमार्थस्वरूप है। (२) और यो पुरुप उस सुबारसको ही वरमा मानसा है, यPि उससे उस हानको प्राति ई वो पम्पहार-परमार्य स्वरूप है। (३) यह बान कदाचित् परमार्य-परमार्यस्वरूप हानीने म दिया हो, परन्तु उस हानी-पुरुपने वको इस प्रकार उपदेश किया हो, मिस्से यह समाकि सन्मुस बार्पिस हो, पौर परिमाको पकर हवा हो तो उसका बान परमार्थ-म्पहारस्वरप है। (१) तया इसके सिवाय शास मारिका माता को सामान्यप्रकारसे मार्गानुसारी जैसी उपदेशकी व करे, उसी प्रक्षा करना, या म्पबहार-म्पहार सरूम है। इस तर सुगमतासे समझने के लिये ये र प्रकार होते हैं। परमार्प-परमार्यस्वरूप मोशका निकट उपाय है । इसके बाद परमार्थ म्पपहारवरूप परंपरा मसे मोषका उपाय है । म्यबहार-परमार्पस्वरूप बहुत कामें किसी प्रकारसे भी मोशके साधनके रणमत होनेका उपाप है।म्पबहार-म्पबहारस्वरूपका फस बामप्रापपी होना संभव नही । इस बातको र किसी प्रसगपर विशेपटमसे मिलेंगे, इससे वह विशेपरूपसे समझमें भायेगी । परन्तु परि इतने पसे विप समझ न पाये तो म्याकुल नहीं होना । निसे पक्षणसे, गुणसे, वौर पेदनसे बारमाका सरूप माश्म हुमा है, उसे भ्यानका पा व्तम उपाय है, रिम्स भारम-प्रदेशकी स्थिरता होती है, और परिणाम भी स्थिर होता है। रिसने अगसे, गुणसे, और वेदनसे मामाका सस्प महीं जाना, ऐस मुमुभुको पनि पानी-पुरुषका बताया नाबान हो तो उसे अनुकमसे सक्षण वादिका मोष मुगमतासे होता है। मुसरस भौर उसका उरति व पकवपूर्ण-कारणरूप है, पर तुम मिषयसे समझना । उसके बारका मामा-गुरुपका मार्ग बिसे मात्म न हो, इस प्रकार तु हाना-पुस्पका समागम हुआ है, इससे उस प्रकारका निभय रखनेफे से बना है। यदि उसके बाका मार्ग मेशन्म होता हो, भीर प•ि उसमें किसीको अपूर्व रणपसे निययामा ऐ तो किसी प्रकारसे उस निथपको पो हाना हो उपायम्प है, इस महमा वामा म्स या करता है। कई बाानमानसे पानको स्पिरता करता है, परस्तु भासालासका निरोप फरमा उसे कम्पा- बघ हेतु नहीं होता । वौर कोई जानीको मात्रापूर्वक मासोवासन निरोध करता है, तो उसे उस १५८ भीम रामचन्द्र [पा ३८५ १८० माति-पग है, इस वय दोनों ही अपनेको एक गुस्फे शिम्प समझकर, वौर निरन्तर दोनोध सासंग या करता है या बानकर, मई जैसी बुद्रिसे पर उस प्रकारसे प्रेमपूर्वक या माप हो पगात विशेष पोम्प है । हामी-पुरुपके प्रति मिचमानको सर्मपार करना योग्य है। ३८६ बई, बासोन मदो ५ शनि १९९९ वात्माको समाधिस्प होने के लिये-चारमस्वरूममें स्थिति होनेके सिपे-गिस मुसमें प्रभारस परसता है, प एक पूर्व वाषार है। समिप किसी प्रकारसे उसे पौम्माम मौ करो तो कोई पनि नही। इवना है। भेद है कि जाना-पुरुष गो उससे बागे है, या चाननेवासा होना चाहिये कि मान बारमा है। दम्पसे प्रम्प नए मिता, पानामनेवाका कोई कर्तम्य महीना जा सकता। परन्तु या किस समयप उसी समय जब कि लपम्पको इम्प, क्षेत्र, मह और मानसे यथामस्थित सम्म नेफ्र, स्पम्प स्वरूप-परिणामसे परिणमित होकर, बम्प इम्यके प्रति सर्मपा उपास ऐकर, स्तम होनेपर, कुल पम्प नाही यता ऐसा योग्य है, और ऐसा है। ३८७ बम्बई, वासोच पुरी ९मुभ १९९९ , सुले पत्रमें सुपारसके विषयों प्राप स्पर लिखा पा, उसे मान-भूसकर मिसा था । ऐसा शिसनेसे उल्टा परिणाम वानेबाम नहीं, यह जानकर हो सिसा पा । इस बातको कुछ कुछ भी परनेवाले गीतको पदिय बात पानेमें जाने तोपगात उससे सर्वथा निर्धारित होगाप, परमहीरो सकता । परम्त पर हो सकता है कि जिस पुस्पने ये पाप सिहै, या पुरुष किसी पूर्ण मार्गका जाता है, और उससे इस बात का निराकरण होना मुस्त्यतासे समर है' परमानकर उसकी उस पुरुषके प्रति कुछ मी मागमा सापप हो । काचित् ऐसा मान में उसे ठस पुस्पविषयक कुछ कुछ काम हो गया हो और इस स्पर सेमफे परमेसे उसे विशेष शान होकर, सप अपमे भापरिनिपपपर पप गाप, परन्तु र निषय इस तय होता। उसके पधार्थ स्पम् जाम छना नस्से माहा हो सकता, और उस कारणसे यदि गीतको निक्षेपको सत्पति हो कि यह बात किसी प्रकारसे मान ही नाप तो कम है, तो उस प्रकारसे मी मिस पुरस्ने सियो उसके प्रति उसको मापनाती उत्पचि होना समन। तीसरा प्रकार इस तर समझना चाहिये कि 'परिसपुरूपको पाणी सरूपसे मी लिखी गई तो मी दिसे उसका परमार्य-सपुस्पा समग-सवितरूपसे मही सा, उसे समझना कठिन होता है इस प्रकार उस पानेवाले कमी मी सर बान होना समय है। पचपि हमने तो पति सर नहीं मिल पा तो भी उन्हें इस प्रथम कुछ समय मास होता है। परन्तु हम तो ऐसा समावे १कि परिवति सर मिला हो ये मी पास करके समधमें मही बाबा, अपना विपरीत हो समझमें पत्र १८.] विविप पर मारि संप्रह-२५ों पर्ष . मचिकर हुआ हो माता है, और वन्समें फिर उसे विक्षेप उत्पन ऐकर स्मार्गमें भावना ऐना संभव होता है। इस पर हमने इच्छापूर्वक । स्पर लिसा पा। सार स्वमाबसे मी म विचार किया रामा प्रायः परमार्य संघमें नहीं लिहा मासा, मयमा मही पोसा माता, गोमपरमार्परुप परिणामको प्राप्त करे । (२) उस मानके विषयमें हमारा सिसनेका चो दूसरा वाशप है, उसे यहाँ मिशेषतासे टिना है। (१) मिस हानी-पुरुषको स्पष्ठ भास्माका किसी अपूर्व अक्षणसे, गुणसे और वेदनरूपसे मनुमा हुमा है, और निसको भारमा तप हो गई है, उस हानी पुरुषने यदि उस मुघारसका ज्ञान दिया ऐ तो उसका परिणाम परमार्थ-परमार्पस्वरूप है। (२) और वो पुरुप उस सुपारसको ही बारमा बानता है, पदि उससे उस पानकी प्राति दुई हो, यो प म्यबहार-परमार्थस्वरूप है। (३) बान काचित् परमार्प-परमार्थस्वरूप बानीने म दिया हो, परम्तु उस हाना-पुरुपने जागो इस प्रकार उपदेश किया हो, जिससे यह स्माकि सन्मुस भाकर्षित हो, और पदि का जीवको उसका ज्ञान परमार्यम्यबहारस्वरूप है। (१) पा इसके सिवाय शाम गारिका ताजो सामान्यप्रकारसे मार्गानुसारी जैसी वप शकी मात करे, उसको भया करना, या म्पपहार-व्यवहार स्वरूप है। इस तय सुगमतासे समझने के लिये ये चार प्रकार होते है। परमार्थ-परमार्थस्तहम मोक्षका निकट उपाय है । इसके बार परमार्पम्पमारबहस परंपरा सबसे मोशका उपाप है। म्पबहार-परमार्पसरप बहुत काममें किसी प्रकारसे मी मौसके साधनके कारणम्त होनेका उपाय है।म्पारम्पबहारसलपका फल बामप्रत्ययी होना सभा माही। इस पातको हिर किसी प्रसंगपर विशेफरपसे मिलेंगे, इससे प रिशेपम्पसे समप्तमें आयेगी । परम्तु पर इतने संधेपसे विशेष समम न माने तो म्यान्न नहीं होना । निसेमणसे, गुणसे, और वेदनसे आमाका स्वरूप माश्म हुआ है, उसे प्पानका यह एकतम उपाय है, मिसस माम प्रदेशको स्थिरता होती है, और परिणाम भी स्पिर होता है। बिसने सणस, गुणसे, और पेनसे मामाका सहप नही जाना, ऐस मुमुभुको परवानी-मुस्पका बनाया एमाद्वान हो तो उसे अनुकमसे क्षण मारिफा बोध मुगमतास होता है। मुम्मस और उसफा उगति क्षेत्र या कोई मर्य-कारणम्प है, पर तुम निधपसे समप्तना । उमऊ बाबाना-पुरुषका मार्ग निर्म क्रेशरम न हो, इस प्रकार में पानी-पुम्ममा समागम हुआ, इससे उस प्रघरमा निपप ने उिपे याहै। परि उसके मात्र मार्ग क्याम्प दाता हो, भार प-ि उसमें रिमाका गर्व कारणकपसे निष्प मा से दो किसी प्रकारस उस निपपको पीछे साना दो उपापम्प है, प्रसर हमारी मामा माया करता है। कोई मानमारसे पानको स्पिरता करता है, परन्तु मामापासा निरोध करना उसे पम्पा गरा हेतु मही रोता । और दोई हानीको बाापूर्वक प्रासापामा निरोप करता है, तो उसे उस भीमद् रामचन्द्र [पा ३८८ १८९ कारणसे नो स्पिरता वासी है, क बारमाको प्रगट करनेका छ होता है । मासोधासकी स्थिरता होना, यह एक प्रकारसे गाव कठिन बात है। उसका मुगम उपाय एकतार मुसरस करनेसे होता है, इससिपे पर विशेष स्थिरताका साधन है। परन्तु प सुधारस स्थिरता वानमारसे फीभूत नहीं होती, अर्थात् कम्पाणरूप नहीं होती तपा उस बीमामय प्यान मा महानमारसे काम्याणरूप नही होता इतना हमें विशेष निधय मास्तिहमा करवा मिसने पेदनरूपसे मारमाको बान किया है, उस हानी पुरुषको वासासे या कापाणरूप होता है, और यह मामाके प्रगट होनेका वपत मुगम उपाय है। यहाँ एक सय भी पूर्व बात किसना पूसती है। बात्मा एक चंदन वृक्षके समान है। उसके पास जो जो वस्तु विशेषतासे सपा है ये सब वस्तु उसकी मगधका विशेष बोध करती है। नोष पानके पासमें होता है, उस नसमें पन्दनको गप विशेषम्मसे सरित होती है। जैसे जैसे पर होता जाता है, से पैसे मुर्गच मद होती जाती है और यमुक मर्यादा पचात् का गवरूप पक्षोंका बन भारंम हो जाता है, भर्यात् उनमें चंदनको मुगप महा यती । इसी तय जबतक यह भरमा विभाष-परिणामका सेक्न करता है, तबतक उसे भरन-क्ष करते है, और उसका सबके साप अमुक ममुक सम्म बस्तुका समय है, उसमें उसकी अपाम्प पुगेप विशेष पाती है। मिसका हानीको मालासे प्यान होनेसे भागमा प्रगट होती है। पानी बपेभा भी सुपारसमें वाहमा विशेष समय यता है, इसलिये उस बामाको विशेष डापा-सुगंधका प्पान करना योग्य उपाय है। यह भी विशेकापसे समाने पोम्प है। ૨૮૮ बर्मा पासोग दी ३ १९५९ ॐ प्राप प्यारम्ताके समय चित म्पाकुम्वाको दूर करमेकी शौनतामें पोय होता है पा नही, इस पातको रसम सावधानी काचित् मुमुजु गनको मी कम हो जाती है, परन्तु पर बात योम्प हो रस तय है कि उस प्रकारक प्रसंगमें पु पोरे समयके लिये चाहे जैसे काम-कानमें उसे मीन समान-निस्किस्यकी तरह-कर रामनाम्पातको पातम्मे समपतक कम्पम यनेबाली समस पटना योग्य महीहै। और परिह म्पानुलता बिना पौरनके साम की बात है तापमापकान होनेपर मा मरिफ भारत बनेगासी से गाती है। इसठिपे हरेस नीर " पपायोग्य' समझकर मौन गमा र योग्य है। मीना पर करना चाहिये किमरमें रिमाय और सत्ताकपा करना । ३८९ पाई भासोर पदी १९९९ भावमभावना मारतो, मीर सोफामान ।
पा९ १९१, १९२] विविध पन मादि संपा-५ों वर्ष ११ ३९० बम्बई, वासोच कदौ १३ रपि १९९९ बापके समयसारके कवितसहित दो पत्र मिले हैं। निराकार-साकार चेतनातिपयक करि- तका ऐसा मर्प न कि उसका मुखरसम कोई सबंध किया ना सके । उसे हम फिर लिखेंगे। पदवा विचारे व्यषि, मुदवा केलि फरे, मुदवा पिर मै, ममृतपारा परसै । इस कवितामें सुधारसका जो माहाम्प कहा, यह केवर एक पिससा (सव प्रकारके भन्य परिणामसे रहित बसख्यात-प्रदेशी बामद्रम्प ) परिणामसे स्वरूपस्य वीर अमृतम्प बास्माका वर्णन है। उसका परमार्थ यपार्यरूपसे हयगत है, मो अनुक्रमसे समसमें बायेगा । ३९१ पई, बासोन १९९९ मे मया पहाभागा पीरा मसमपदसिणो। ममदं वसिं पर सफर पाई समसो ॥१॥ मे प या महामागा पीरा सम्पत्तदसिणो । मुर्द सि पर सफल पर सम्मसो ॥ २ ॥ ठपरको गापायोंमें यहाँ 'सफल' पद है यहाँ अफस' क माश्म होता है, और यहाँ कार' शब्द है महाँ 'सफल' ठीक माश्म होता है। इसलिये पा इसमें खेस-योप रा गया है, या पे गापाय ठीक । इस प्रश्नका समाधान यह कि यहाँ मेस-दोष नहीं है। यहाँ सफल शम्द को सफल ठीक है, और जहाँ अफल शम्दी यहाँ वफल ठीक है। मिथ्यापरिको क्रिया सफल-फसहित है-वर्षात् ठसे पुष्प-पापकर फस मोगना। सम्पमाएिको क्रिया मफल-फम्महित --उसे फट नहीं भोगना है-अात् उसको निरा है। एकको (मिप्यापिका) क्रियाका संसारोधक समसफ्ना है, और दूसरेको (सम्पमारिका) किपाका ससायेजक वफम्पमा है- ऐसा परमार्प समझना चाहिये । ३९२ बम्बई, वासोग १९५९ (१) स्वरूप स्वभावमें है। बानीको चरण-सेवाके बिना जनत कामतक प्राप्त न हो, ऐसा कठिन मी है। हम वौर तुम हममें प्रत्यक्षारपसे तो वियोगमें गा फरते हैं । यह भी पूर्व-निबधमक किसी ममान् प्रतिपके उदयमें होमे योग्य कारण है। (२)ो पम । मिस भवसरपर गो प्रास हा गाय उसमें सतोपसे पना, पह सम्पुरपोंका भाषा समावन पर्म है, ऐसा पसिष्ठ प्रते थे। (३) गो ईभरेष्म होगी र रोगा। मनुष्यका काम के प्रयत्न करना Othीर उसीसे जो अपने प्रारम्भमें होगा बह मिल पापगा, इसलिये मनमें संकन्य-विकम्प मही करना चाहिये ।
" २७याँ वर्ष ३९३ बम्बई, कार्तिक ९ १९५० " सिरपर गया है" इतने पायके मापोह (विचार) से गर्भ-श्रीमत भौशारिमा, उसी समपसे जो वादिके परिपपके स्पाग करनेच प्रारम करते हए । पा देखकर सामनाभद्रके मुस्से राम्पके सामाषिक पचन उर होते हुए कि " नित्य प्रति एक एक पोका त्याग करके अनुमसे पर शाभिम बसों मियोंका त्याग करना चाहता है। इस प्रकार पाश्मिा बत्तीस विमतक काम्-शिकारोध विश्वास करता है, यह महान् मार्य है। पा पुनकर शासिमाको पनि वीर भनाभयकी पत्नी पनामदके प्रति इस प्रकार सार सपन करती कि "बाप जो ऐसा करते हो, पपपिया हमें मान्य है, पस्तु वाएको भी उस प्रकामसे त्याग करना कठिन है।" पर मुनकर चितमें किसी प्रकारसे सेशित ए बिना ही श्रीपनामर उस ही समय स्पागकी शरण मेते हुए, वीर भीशासिमनसे करते हुए कि तुम किस विचारस कासका विश्वास करते हो! पा सुनकर, मिसका पित्त मामरूप हो गया है ऐसा पौरपतिमात्र मौर पनामा इस प्रकारसे गा माविको छोरकर ससारका त्याग करते हुए कि " मानों किसी PM उम्होंने अपना कुछ किया ही नहीं।" इस प्रकारके सरपके पैम्पको पुनकर मी पागल बात को मामले काका मिलास कर रहा है, वह कौनसे से करता होगा-पर विचारफर देखना योम्म है। ३९४ व मगसिर पुदी १९५० पाणीच स्पम करना अपरूप है परन्तु म्पहार सर्वप इस तरात्र राता है पनि सर्वपारूपसे उस प्रकारका संयम रमसें तो समागममें बानेवाले गांवोंको पका हो, इसलिमे मात करके पनि प्रयोजनके सिाप मी स्पम रस्सा माय, तो उसका परिणाम किसी वय पस्म बाना समय है। बोरके हमारका सिर सिरसे प्रत्येक धममें, प्रत्येक समागममें विचार करनेमें परि सारपानी म एखमेमें बाई वो इस प्रकार को सपोग पमा है पर भी सपा है। बम्बई पौष पदी १० रचि १९५ में रिशेपासे नही मिसा नाता । ससमें उपाधि भपेपा का संक्षेपभाष मोप कारणस्म है । (वितको इमामें किसी प्राणिय संक्षिप्त हो जाना—यून हो माना—उसे यहाँ संक्षेपमा पिसा) हमने ऐसा अनुभव किपाकहाँ मौ प्रमप-दशाहो हो बारमाने जगत्-मत्पपी कामका पत्र ३९५, १९.] पिविष पर मादि समार-२७वा व वफाश होना योग्य है। वहाँ सर्पया अप्रमचता है, यहाँ नास्माके सिवाय दूसरे किसो मी मारका वाकाश नहीं रहता। यपपि तीर्थकर मादि सम्पूर्ण शान प्राप्त कर मेनेके बाद किसी तरकी देश-क्रिया सहित दिखाई देते है, परन्तु यदि वात्मा इस क्रियाका अवकाश प्राप्त करे तो होगा उस क्रियाको कर सकती है। बान होनेके परमात् इस प्रकारको कोई क्रिया नहीं हो सकती, चौर सा हो यहाँ सम्पूर्ण ज्ञान होना योग्य है, यह हानी पुरुषों का दाहित निश्चय है-ऐसा हमें लगता है। जैसे अर नादि रोगमें चित्तको कोई स्नेह नहीं होता, उसी तय इन माम मी स्नेह नहीं रासा छामग स्पर रूमसे नहीं पता, और उस प्रकारके प्रतिबंधके शितपनेका विचार एवा करता है। ३९६ मोहमया, माप बदौ १ शुक्र १९५० तुम्हारा पत्र मिला है। उसके साथ यो प्रभोंकी सूची उतारकर मेनी है यह मी मिली है। उन प्रभोंमें चो विचार प्रगट किये है, पहिले विचार-भूमिकामें विचारने योग्य है । मिस पुरुपने यह प्रय बनाया है, ठस्ने वेदांत वारशामके अमुफ प्रयके भरोकनके ऊपरसे ही ये प्रश्न सिसे हैं। इसमें कोई अत्यन्त नापर्यकी बात नही सिसी है। इन प्रश्नोंका तपा इस तबके विचारोंका गास समय पहिले विचार किया था, और इस प्रकारके चारोंका विचार करने के लिये तुमें क्या को करा पा । तथा दूसरे उस प्रकारके मुमुसुको मो इस प्रकारके विचारों के भरोकन करनेके विषयों करा था, अयबा बा मी करते है, बिन पिचारीक करनेसे अनुमसे सत्-असत्का पूरा विवेक हो सके। हामें सात-बाठ दिनसे शरीर बरसे प्रस्त पा, अब दो दिनसे ठीक है। नो फपिता मेगी पर मिली है। उसमें भाठापिकानपमें तुमारा माम बताया है, और कविता करने में जो कुछ विपक्षणता चाहिये, उसे दिसानेका विचार रक्सा है। कविता टीक है। कविताका कविताके लिये मापन करना योग्य नहीं—समयके लिये वाराभन करना पोम्प मही। परि उसका प्रयोगन भगवान्के मबमके लिये-भारमकल्याणके लिये-हो तो मीनको उस गुणकी अयोपशमताका फर मिसता है। मिस विपासे उपशम गुण प्रगट महरला-विक नहीं भापा, षयका समाधि महीई, उस पाके विषयमें श्रेष्ठ जीवको वामा करना पोय महो। समें भव प्राय करके मोताको सरी बर हो रही है । वो पिम्पम है उनका मी कम कमसे पेच गळनेका विचार कर रहा है। यदि यह प्रसग म हाता तो उस प्रसगमें उत्पम हानेपाली मंगाठ मोर उसका उपशमन न होता । अब यह स्वमग्नम्पसे अनुमत्रमें नाया है। वह मी एक प्रकारको प्रारम्पको निचितप है। । ३९७ मोहमपी, माघ बी. गुरु १.०० पकि उपाधि-पसंगमें पुरा विशेष सहनशीलतासे गना पर, इस प्रवरफी मौसम होने भीम प्रसाद [पत्र ३९८ १९९४ कारण वारमा गुणको विशेष स्पम्वा गती है। प्राय करके सबसे यदि मने तो नियमितम्पसे कई ससंगकी बात लिखना। ३९८ बर्मा, फागुन पुदी नि १९५० वारंवार वरपि हो जाती है, फिर भी प्रारम्प-पोगसे उपापिसे दूर नगमा गा सकता । (२) हाथमें ग-यो महिने ए सपानिके प्रसंगमें विशेष विशेपहपसे ससारके ससम्मका बेदम मा +। पपपि इस प्रकार के अनेक प्रसंगोंका बेदन किया है, फिर मी प्राय बामपूर्वक केन मही किया । इस ऐहमें और सस पहिलेको पोप-बीम देवबाग देहमें किया गवा वेदन मोक्ष कार्यमें उपयोगी है ३९९ बई, फागुन मदी ११ मि १९५० "वाकरदेव प्रमाको कर्म करते है, और प्रमावको उससे विपरीत मात् बर्मरूप पारम- स्वम्प करते हैं। इस प्रकारके मेरसे बहामी और हानीका स्वरूप (का) -सूपगग्सू पार्य-अम्मपन । 'मिस में जन्म हवा, बोर नौर जिसके सहबासमें पता है, उसमें परमानी बाग ममता करता है, और उसमें निमग्न गा करता है" (स्यगर-प्रपमाप्फ्फन) गो बानी-पुरुप भूतकाळमें हो गये है, और यो हानी-पुरुष मविम्पकाने होंगे, उन सब पुरयों ने शानि (समस्त निमात्र परिणामसे पक बाता-नित बाना) को सब धर्मक्त बाधार कहा है। वैसे भूतमानको पप्णी वापरत है, वर्षात् भैसे प्राणीमात्र प्रमाके हो वापारसे यते —प्रथम उनको उसका मापार होना पोम्प है वैसे ही प्रणीको तय, मानो पुराने सत्र प्रधारापाणकामाचार शाति ना"--(सूपगा) ४०० बर्मा फाल्गुन मुदा ११ रचि १९५. (१) उपवारको एक पत्र मिगे, नही तो रविवारको विस्तारसहित पा लिगे, ऐसा सिसा पा, उसे जिससे समप वित्तमें पप बापा पा कि तुम मुमभुमोको कोई नियम वैसी स्पिरता होनी चाहिये, वीर राम पपमें कुछ मिना सूछे तो मिलना चाहिपे । मिक्ते समप ऐसा मा कि यो पुरा विना मना है उसे ससंगर समागममें Rस्तारसे करना योग्य है, और पर कुछ फलस्वरूप होने योग्य है। (२) इतमी पान विषय रमना पाम्प शानो-पुस्प मी प्रारम्भ कर्मके मोगे बिना नाच मी होता, भार दिना मागे नित होने मानांको कोई भी नहीं होती कि सिमाप इसे पर४ १,४२,४] विविध पन मादि संप्रह-२vषों वर्ष २१५ मीयोंको भी इस एके पातसे कर्म है, नो मोगनेपर ही नित्त होते हैं अर्थात् वे प्रारम्भ वैसे होते है। परन्तु दोनोंमें इतना भेद है कि खानाको प्रापि तो मात्र पूर्वोपार्जित कारणसे होती है, और इसकी प्राधिका ठरेश भविष्य-ससार है। इसठिये हानीका प्रारम्प पुरा ही पड़ता है। इस प्रारम्पका यह निश्चय नहीं कि वा नितितपसे ही उदय वाये । उदाहरणके लिये भीषण वादि बानी-पुरुपके माचिम्म प्रारम्भ होनेपर मी उनकी कान-दशा थी, जैसे गहस्थामस्पा भीतीर्थकर की थी। इस प्रारम्पका निरच होना केवल मोगनेसे ही संभव होता है । जानी-मुरुपको प्रारम्भ-स्पिति कुछ इस प्रकार की है कि जो उसका स्वरूप मानके लिये मीनोंको संरेहका खो, पौर उसके लिये जानी-पुरुष प्रप करके मा-मौन-दसा रसकर अपने दानापनेको बस्पर रस्ता है। फिर भी प्रारम्बके पश्से पदि मा दशा किसीके स्पर गाननेमें या बाय, तो फिर उसे उस पानी पुरुषका विचित्र प्रारम्भ सदेहका कारण महीं होता । ४०१ गई, फागुन वदी १. शनि १९५० प्रशिक्षापत्र प्रयोगम-विचारनेमें हमें कोई बाधा नहीं है। वहाँ कोई शकाका देत उपस्थित ऐपहा विचार करना, नपा कोई प्रम सने योग्य हो तो पूँज्नेमें को प्रतिवष नही है। सुदर्शन सेट पुरुफ्त्वमें था, फिर मी पा रानीके समागममें म्याकुलतासे गीत था । जापत भारम-पम्से कामके उपशम करनेसे कामेन्द्रियमें मनागृतपना ही समय होता है। और यदि उस समय पनौने कदाचित् उसकी देहका सहसास करनेको इप्ठा मी की होती, वो मी श्रीमुनिमें कामको बागृति देखने में न वाती-ऐसा हमें सगता है। ४०२ गई फाल्गुन वदी ११ १९५० शिधापत्र प्रपमें मुख्य मतिका प्रपोग्न है । मटिके आधाररूप विवेक, भैर्य और मामय इन तीन गुणोंकी उसमें विशेष पुरि को है उसमें धैर्य गोर बामपका Aशेष सम्पप्रकारसे प्रतिपान किया है, जिनका विचार करके मुमुमु गीचको उनें वपमा गुण बनाना चाहिये । इसमें भीषण बादिके बो यो प्रसंग माते हैं, वे इस प्रकार है कि पे शाप सरेरफे हेतु रों, फिर भी उममें औरण के सरूपको समझनेका फेर समसकर उपेक्षित रहमा ही योग्य है। मुमशुक्र मयोगन के रिमुनिसे बाँचने-विचारनेका होता है। ४०३ बई, फागुन ११ व १.५. उपाधि नर करने के लिये दो प्रकारसे पुस्पाप हो सकता है-एक तो किसी मी म्यागर आदि कार्यस, और दूसरे विपा, मत्र वारि साधनसे । यदि इन दोना पहिले गीतको मंतयपके दूर होनेको रापता होनी चाहिये । परि पहिया बताया हुमा पुयार्प किमी तय बने तो उसे काम - भीमद् रामचन्द्र [पत्र ४४ हमें हमें प्रतिबध महाँt, परस्तु दूसरे पुरुपाके विषयमें तो सर्वया उदासीनता ही है, और इसके स्मरणमें वा पानेसे मी चित्तम से हो जाता है इस तर उस पुरुषार्थक प्रति बनिश्छा हो। बितनी बाफुलता है उतना ही मार्गका विरोध है, ऐसा हानी पुरुष का गपे । ४०४ वी, फागुन १९५० 1 ताकर बारम्बार नाच करावा उपदेश करते पे रे बांग ! तुम समझो ! सम्पप्रकारसे समझो ! ममुष्यता मिझना बहुत दुर्गम है, और चारों गतियों मपसे म्यात है, ऐसा मानो । काानसे सविशेषका पाना कठिन है, ऐसा समझो। समस्त पोक एफत दुम्से गाया है, ऐसा मानो । और सब गौच मप्ने वपने कमसि विपर्यास मात्रका अनुमान करते। ठसा विचार करो । (सूपगर अध्ययन ७-१२) बिसका सर्प दुमसे मुळ होने का विचार एवा हो, उस पुरुपको बारमाको गषेपणा करनी पारिये, और पनि वास्माको गवेषणा करना हो तो यम नियम मादि सब साघमोके मामाको कप पान करके मसंग गयेवणा एवं उपासना करनी चाहिये । बिसे ससगको उपासमा करना हो उसे ससारकी उपासमा करने के बाममावका सर्मपा त्याग करना चाहिये । अपने समस्त बमिप्रायका स्वाग करके अपनी सर्व शालिसे उस ससंगकी माशाली उपासना करनी चाहिये । तीर्थकर ऐसा करते हैं कि मो को उस मासाकी उपासना करता है, पर वनस्प हो सगको उपासना करता है । इस प्रकार जो सरसगफी उपासना करताप अमरस हो मामाको उपासना करता है और वास्माकी उपासना करनेवाग सदुपोंसे मुफ हो बाता है। (गीका महासूत्र )। उसको उपदेश मिला है, पगापा सूपगरमें निम्नरूपसे है।- संपुम्मा यो माणुसर्च, दळू मर्य बासिसणे असमी । पर्मवापस भरिए व सोए, सकम्ममा विपरिया सह ॥ सब प्रकार की उपानि वाघि मोर म्पाविसे पदि मुफ्भावसे यते हों तो मी संगमें समि- निस मषि, हमें रोना कठिन माझ्म होती है। समगध सर्वोतम बपूर्णता में दिन-रात रहा करती है फिर मी उदय योग प्रारम्बसे उस प्रकारका तराय हा करता है। प्राप करके हमा बारमा किसी बातका फेव उत्पम नहीं होता किर मी प्राप करके हमारे बतायका मेन तो रिन-रात या करता है। सर्प भूमि सब मनुप्प सब कम्म सब बात-पात वादिके प्रसग, सामाविकरूपसे महात पैसे सया परफे, सदासीन से बरमणीय बमोजफर और रसस्त माहित होते हैं। फेसबाना-पुरुष, मुमश्च पुरुष वपना मार्गानुसाय पुस्यों। समग त, निमका, प्राधिकर मुर बारूप और रसासरूम मासित होता है। इस कारण हमारा मम माप करके वप्रतिषमताका सेक्न करते करते तुम जैसे मार्गे महान पुरुषों में प्रतिबद्धता प्राप्त करता है।
पर ४ ५,४] विविप पर मादि संप्रह-२ वर्ष - ४०५ बमाई, फागुन १९५० ॐ मुमुक्षु चीनको इस कालमें ससारकी प्रतिकूल दशाओंका प्राप्त होमा, वह उसे ससारसे पार होनेके बराबर है। वनकासे अम्पसित इस ससरके स्पष्ट विचार करनेका समय प्रतिकूल समागममें बपिक होता है, यह पात निधय करमी योग्य ।। यदि प्रतिकूछ समागम समतापूर्वक सहन किया जाय तो यह बीबको निर्वाणको समीपताका सावन है। म्यावहारिक प्रसगोंकी नित्य चित्र-विचिसा है। उसकी ऐसी स्थिति है कि उसमें केवल कल्पनासे हो मुख वार कल्पनासे ही दुम है। अनुकूछ कम्पनासे वह अनुकूछ भासित होता है, प्रतिकूल कापनासे यह प्रतिकूल मास्ति होता है और पानी-पुरुषोंने ये दोनों ही कल्पना करमेको मना की है। निपारवानको शोक करना ठीक नहीं-ऐसा प्रीतीपंकर करते थे। प्रयम पर बर्ष फागुम १९५० (१) अनन्य शरणके देनेसास भीसद्गुरुरेनको अस्पत माक्तसे नमस्कार को मिन्होंने शुर भारमस्वरूपको पा म्यिा है, ऐसे बानी-पुरुषोंने नाच करे हर छह पोको सम्पर्शनके निवासका सर्वोकर स्थानक कहा- भारमा है। वैसे घट, पट वा पदार्थ है जैसे ही वमा मी है। अमुक गुगों के होने के कारण से पर, पर मालिक होने का प्रमाण मिलता , से ही रिसमें स्व-पर प्रकाशक पैठप सताका प्रत्पक्ष गुण मौन है, ऐसी आमाके होनका भी प्रमाण मिलता है। इसस पर 'मास्मा निस्य है । पर, पर आदि पदाप अमुक कामें दो यते है। मामा विकासमता है। घर, पर बार संयोगमन्य पदार्प है। बाामा सामारिफ पदाप ६, क्योंकि उसको उत्पति के लिये फोई मौ संयोग बनुमबमें नहीं बाता | किमी मी संयोगी इम्पसे पवन-सत्ता मगर होने योग्य नहीं है, इसठिये यह भनुत्पम है।पर भमपोगी दोनसे अरिमाशी, स्पोकि विसकी किसी सयोगसे उत्पति मही रोती, उसका रिसा नाश मी मही होता। तीसरा पर 'भामा कर्ण है'। सब पार्थ म-नियासे सम्म है । सभी पदार्थो पुन म पाठ क्रियासहित परिणाम देखनमें भाता है। मामा मी किपा-सरम है। रिया-सरम हानेक कारण पए का है। यामिनभगवान्ने इस कारनेका तीन प्रकारसे बिरेचम किया है -परमार्थम भामा रममाव-परिमतिसे निजम्पका क ह । अनुमचरित (अनुमबमें आने पाप-विशेष मधसहित) प्यमारसे थामा ट्रम्प-कर्मका कर्ता है । उसबारसे भामा पर मगर भारिमा कलादा चौपा प-यामा मोच्यो जो कुछ शिपायें होती है, वे सर किमी प्रपोजमर्पक - -" भीमद् पसचन्द्र [प३४॥ हो होता है—निरर्पक नहीं होती। जो कुछ मी किया जाता है उसका फस बरस मोगनेमें वाता t, पर प्रत्यक्ष अनुमबहै। बिस तर विष सामेसे चिपका फल, मिनी सामेसे मिग्रीका फल, स्पर्म करनेसे भमि-स्पर्शका फल, हिमके स्पर्श करनेसे हिम-स्पर्शका फल मि बिना नहीं गया, उसी तय कपाप वादि बफ्ना बपाय मावि रिस किसी परिणामसे मी मारमा प्राधिकरती है, उसका फल मी मिसना योग्य हो, और यह मिश्ता है। उस क्रियान्न कर्चा होमेसे भारमा मोछ। पाँचों पद —' मोक्षपद है'। निस अनुपचरित-म्यपहारसे गाक्के कर्मका कल निहाण किया और करीब होनेसे मोक्तृत्व निरूपण किया, या फर्म दूर भी बस होता है। क्योंकि प्रस्पन कपाय बारिकी वापता होनेपर मी उसके बनम्पास्से-अपरिचयसे उसके उपशम करनेसे-उसकी मेहता Pसाई देती है पापाण होने योग्य माझ्म होता है—ीण हो सकता है। उस सब प-मानके कोण हो सकने योग्य होमेसे उससे शित नोएर बारमभात है, उसम मोक्षपद है। छन्न पद:--' उस मोमका उपाय है। यदि कपित् ऐसा हो कि हमेशा फौध बष हो बंप दमा करे, तो उसका निधि कमी मी नहीं हो सकती। परन्तु कर्मवपसे विपरीत स्वमानवाले कान, दर्शन, समाधि, पैरम्य, मक्कि मादि साधन प्रस्प है। मिस सापनके पसे कर्मष शिपिए होता है-उपशम होता है-श्रीण होता है, इसम्पेि ये बाम, दर्शन, संपम बादि मोझ पदके उपाय है। समानी पुरुषोशाय सम्पदर्शनके मुस्प निवासमूत को गए इन सा पदोंको यहाँ सक्षेपमें कहा है। समाप-मुतिगामी मारने स्वामाविक निपारमें ये पद प्रामाणिक होने योग्य है-परम मियफ्रूप जानने पोम्य है, उसका वात्मामें उमका सम्पूर्णम्मसे निस्तारसहित किक होगा योम्प है। ये सर पर सदहरीतऐसा परम पुरुपने निरूपण किया है। इन पद का विवेक बीनको निवसरूम सम- झने के लिये कहा।बना स्वप्न-वसाके कारण उत्पम ए गोरके मामा-ममत्वमालको करके किये गाना-पुरूपोंने न म पो देशमा प्रकाशित है। एक केबस अपना ही सरुम उस समदशासे रहित । पदि मौन ऐसा विचार करे तो पगमात्रमें मागत होकर सम्पम्पसमको प्रास; सम्पादनको प्राप्त होकर निग स्त्रमावस्म मोझको प्रापरे । उसे किसी स्मिाथी बमुख और बम्पमाबमें हर्प शोक और संयोग उत्पम न , उस विचारसे निम सरूपमें ही निरन्तर पुरता, सम्पूर्णता, बपिनाविना वर्पत मानन्दफ्ना उसके बनुमसमें माता है। समस्त निमाव पर्यापोंमें केरल अपने होमप्यास्से एकता है उससे अपना नया मिमवा दो। यह उसे स्पर-प्रस्पब-- नस्पत प्रत्यक्ष-अपरोक्ष अमुमत होता है। बिना अपना सम्म पापक सपोगमें उसे इ-बनिए- मान प्राम नहीं होता । परम, भग, मरण, रोग माविको बापाप्मत, सम्पूर्ण माहाम्पके स्थान ऐसे निम्-सम्पको जानकर--मनुमत करके-या प्रताप होता है। दिन निम पुरुषों को पनप पो प्रमाणभूत ऐसे परम पुस्प पचनसे बामाका निधपमा ठम सब पुरुषोंने ससकपको पाठिया पाधि, प्याधि, उपाधि और ससंगस रक्षित हो गये है, होते हैं, वीर भरिप्पमें मां से एगे । मिन सपुषोंने यन्म, जरा और मरणय माश करमेवान लिग लसपमें साम-बापान रेका उपदेश दिया है, उन सबुरुपोंभात महिसे ममस्कार है । उनी निकरण कामासे ।
. विविध पत्र मादि संग्रह-२ज्वाँ वर्ष निस्प प्रति निरतर स्तन फरनेसे भी बारम समाप प्रगरित होता है। ऐसे सब सम्पुरुष मौर उनके चरणारविंद सदा हो एयमें स्थापित हो । बिसके बचन वीकार करनेपर, यह पदोस सिख ऐसय पारमसमप सहनमें ही प्रगन्ति होता है, निस वारम-खरूपके प्रगट होनेसे सर्पका जीव संपूर्ण मानदको प्रास होकर निर्मप हो पाता है, उस बनके कहनेपाछे ऐसे सत्पुरुषके गुणों को म्पाझ्या करनेकी हममें असामध्य ही है। क्योंकि मिसका कोई मी प्रत्युपकार महीं हो सकता ऐसे परमात्मभावको, उसने किसी मी एमके विमा, केवल निष्कारण करुणासे ही प्रदान किया है। तपा ऐसा होमेपर मी निसने दूसरे मीनको यह मेरा सिप्प है, वपना मेरी मति करनेवाला है, इसलिये मेरा है' इस तर कमी मी नहीं देखा-ऐसे स्पुरुषको मर्मत मकिसे फिर फिरसे ममस्कार ! बिन सम्पुरुषोंने यो समुरुकी मक्ति मिरूपण की है, पह मलि कर शिप्यके कल्पामके सिये हो की है। मिस मक्तिके प्राप्त होनेसे सहरको नामाको भेशमें पिणे, नपूर्ण गुण पटिगोचर होकर कम्प सन्न रहो, भौर सहबमें बारम-बोध मिले, या समसकर मिस्ने भक्तिका निरुमण किया है, उस मतिको भौर उम सत्पुरुपोंको फिर फिरसे विकास नमस्कार हो। पपपि कमी प्रगटरूमसे बर्तमान में केवमहानको उत्पपि नहीं, परन्तु रिसके पचनके विचार योगसे केपणाम शाकिस्मसे मौजूद है, या स्पठ चान लिया है –स प्रकार भदायपसे फेषम्यान या 2-विचार-दघासे फेरगान मा है-इस-दशासे विख्यान हुमा मुम्न्स मपके हेतुसे केस- मान यता है, मिसके संपोगसे माप स मम्यागार मुलके प्रगट करमेबारे उस केवमधानको, सक- मात्रमें पानेके पोम्य एषा है, उस सम्पुरुपके उपकारको सोतर मजिसे ममस्कार हो। ममस्कार हो!! (२) सम्पदर्शनप्तरूप प्रीजिनके उपदेश किपे हुए मिस डिसित र पोका माया मारको पति- शयरूपसे विचार करना पोप है। पामा है, क्योंकि यह प्रमाणसे सिर है-यह मस्तिपद | बामा नित्य है-पर निस्यपद । बामाके सरूपका किसी मी प्रकारसे उत्पम हाना गौर निमारा होना समय नहीं। बारमा कर्मका कहै-यह कपि । मामा कर्मका मोठा है। उस मास्माकी मुलि सकती है। निनसे मोक्ष हो सके ऐसे साधन निमित है। ৪০৩ बर्ग, त्र मुदी १९५० हममें पाँबाय स्पानि हुन्छ कम रहता है। तुमारे पत्रौ यो प्रश्न टिमे है, उनका समापन मारे मिया है,पार करना ।
भीम रामचन्द्र पूर्पकर्म दो प्रकार है । वयमा नापसे चो नो कर्म किये जाते हैं, वे दो प्रकारसे किये जाते हैं। एक कर्म इस तरके कि उनको काम बादिको बिस तय स्थिति है, ह उसी प्रकारसे मौगी ना सके। मेरे कर्म इस प्रकार कियो कर्म शामसे-विचारसे—मान हो सकते हैं। मानके होनेपर मौ निस तपके मौको माप मोगमा चाहिये, में प्रयम प्रपरके कर्म करो, बौर मो शानसे दूर हो सकते है, ये दूसरे प्रकार के कर्म है। केवमानके उत्पम होनेपर मी दो यती है । उस देहका यना कोई समानाको इसे नहीं, परन्तु प्रारम्बसे होता है। कना सम्पूर्ण बात यह होनेपर मी उस दाम्य स्थितिक वन किये बिना केवयानी भी नहीं घट सकता, ऐसी स्थिति है । यपि उस प्रकारसे झ्टनेके किये कोई बानी-पुरम म नहीं करता, परन्तु य करनेका अभिप्राय या कि बानी-पुरुषको मी या कर्म मोगमा योम्म है। सपा पम्प वादि वमुक कर्मको इस प्रकारको म्यषस्पा है कि या साना-पुरुषको भी मोगमा योग्य है। वर्षात् साना-पुस्प मी उस कर्मको भोगे बिना मरत नही कर सकता । सब प्रकारके धर्म इसी तरह है कि वे फलित नही मात केला उनका नितिक ममें हो फेर होता है। एक कर्म तो जिस प्रकारसे स्थिति बगैया बष किया है, उसी प्रकारसे मोगने योम्य होता है। सय कर्म ऐसा होता है, जो गीत के बाम माति पुरुषार्थ धर्मसे निच होता है। मान बादि पुरुषार्थ- धर्मसे निपर होनेवासे कर्मको नियति बाला-पुरुष भी करते हैं, परम्त भोगने पोय कर्मको पानी-पुरुष सिदि वादि प्रयत्नसे नित करनेकी इच्छा न करे, पर समय है। कर्मको पपापोम्परूफ्से भोगनेमें बानी-पुरुपको सकोच नहीं होता । कोई कानदशा होनेपर मौसफ्नी शानदशा समझनेवाग पीच काचित् भोगने योम्प कर्मको भोगमा म पारे, तो मी पुटकारा तो मोगनेपर ही होता है, ऐसा नियम है । तपा यदि गोका किपामा प्रस्य बिना मागे हो फाररित सा जाता हो, तो फिर मष-मोजकी म्पवस्था मी कासि क्न सकती है! बो पेदनीय नादि कर्म हो तो ठमें मोगनेकी हमें वनिमम नही होती। यदि कदापित मनिमम होती वो पितमें सेव हो कि गीतको देशमिमान , उससे उपषित कर्म भोगते एद होता है, और उससे पनि होती है। मंत्र बाविसे, सिलिसे और दूसरे उस तरके वमुक कारणोंस अमुक धमाकरका हो सल्ला असंभव नहीं है। फिर भी पैसे हमने उपर बताया है से भोगने मोम्प यो । नियमित कर्म' किसी भी प्रकार से रमही हो सकते । चित् भमुफ शिपिडर्म'को निति होती है, परन्तु ऐसा माकप फुल उपार्जित करनेवाले के म किये बिना ना हो जाता है। बातिक फेरसे उस कर्मका मेश्न होता है। कई एक इस प्रकारका शिपिठ कर्म होता : मिसमें अमुक समपचित स्परता से तो पनि हो चाप । उस तबके कर्मच उन मत्र मादिम स्परता सरसे नाच होना संभव है। म किसीके किसी पूर्वकामका कोई इस प्रकारका बंध होता है जो केवल उसको पोषसी हो कपासे फलीभूत हो पाप-पा भी एक सिदि सा है । तपा पदि कोई गमुक मत्र बारिक प्रफनमें से, भीर गमुक पूतिपक नए होनेच मसग समीपमें हो, वो मी मन्त्र बाहिसे कार्य सिविक ऐना माना पत्र ४८] विविध पत्र मादि संग्रह-२मावर्ष . मा समय है परन्तु इस पावमें कुछ पोहा मी पिच होनेका कारण मह। यह निफर बात है। इसमें वामाके कापाणका कोई मुख्य प्रसग नहीं है। ऐसा कया मुख्य प्रसगकी विस्पषिका ही कारण होती है, इसठिये उस प्रकारके विचारके अपना सोनके निर्णय करमेकी इजा करनेकी अपेक्षा उसका त्याग करना ही उत्तम है वौर उसके स्पाग होनेपर उसका सहनमें निमय हो साता है। जिससे वारमा विशेष वाकुलता न हो पैसे गना। गो होने योग्य होगा यह होकर ग्रेगा, नौर वाकुलता करनेसे भी नो होने योग्य होगा यह वो वपस होगा, उसके साप मारमा मी अपराधी बनेगी। वर्मा, चैत्र बदा ११ भीम १९५० मिस कारण विषयमें मिसा पा, चित्त बमी उस कारणके विचारमें है और नमीतक उस विचारके पिचके समाधानरूप वर्षात् पूर्ण न हो सकनेसे तुमें पत्र नहीं सिखा । तया कोई प्रमाद-दोष जैसा कोई प्रसग-दोष हा करता है, जिसके कारण कुछ मी परमार्थकी मात उिसनके समधर्म पर फागकर सिस्ते हुए एकरम रुक गाता है। तथा मिस कार्पकी प्रचि यता है, उस कार्यकार प्रापिमें वीर अपरमार्थक प्रसगमें मानों मेरेसे पयायोग्य उदासीन का नहीं होता । ऐसा सगनेस, वपने दोपके विचारमें पा बानेसे पत्र लिसना रुक जाता है, और प्राय करके उस विचारका समापान मी एला, ऐसा बो उपर उिसा है, उसका यही कारण है। पदि किसी मी प्रकारसे बने तो इस कररूप ससारमें अधिक म्पक्साय न करना-ससम करना ही पोम्प है। मुझे ऐसा म्गता है कि नोलको मूलरूपसे देखते हुए पदि मुमुमुता माई से तो नित्य प्रति उसका ससार- पटता बाप । ससारमें पन वादि सपपिका पटना या न पटमा तोपनियत है, किन्तु सारके प्रति नीवको गो भावना है वह परि मंद होती पछी बाप, तो वह वनुक्रमसे नाश छने पोम्य हो । इस कारमें प्राप करके यह बात देसनेमें नहीं माती । किसी मिम सम्पमें मुमुपुको वोर किसी मिमी सम्पमें मुनि बगैयो देसकर विचार वाता है कि इस प्रचारके संगसे जीवको उर्व दशा होना योम्प मही, किन्तु वनोदशा होना ही योग्य है। फिर जिस ससगका बुरा समागम हुआ है, कार-दोपसे ऐसे जीवको म्पबत्याको मी पल्टनेमें देर नही गती । इस प्रकार स्पट देसकर पिच मेद होता है, और अपने पितको म्यवस्था देखकर मुझे मी ऐसा होता है कि मुझे किमी मा प्रकारते या म्पासाप करना योग्य नही-पन्य पोम्प मही। बरमयत बनर-इस गानका कुछ प्रमा, हो तो निसे प्रगटरूपसे मान लिया है, ऐसे जारको पानेमें बीवको प्रापि कैसे हो सकता है। वयमा पदि ऐसा म हो तो फिर उसमें उदासीन प्रापि हो। तो मी उस प्रातिको बब पदि किसी प्रकारसे मी समाति को या होने पोय ,मही तो गबर किसी भी प्रकारसे पत्रिका हो चाप है। भकिमी लिसा गा सकता, इससे पितमें खेद होता है। बा तो प्रगटापसे किसी मुमुमुको, इस गोषका ऐप मी गितनी प्रकारसे बने उतनी प्रकारसे प्रकट करक, मीना उतना वा सेर करना चाहिये, भौर उस प्रकार दोषी परिसमानिके लिये उसके संगरम उरकारको दा करना चाहिये ।
भीमद् पबचन्द्र [४. मुछे सपने दार के लिये बारम्बार ऐसा भगता मिस पोरके बटको परमासे देखते हुए मैंने पर कहा है। परन्तु दूसरे वाधुनिक बायोके दोपके सामने अपने दोपी बस्यत मन्पता मास शेती है, पपरि ऐसा माननेको कोई पका नहीं है, किर मी स्त्रमासे इस ऐसा ही माश्म होता है। ऐसा होनेपर मौ किसी विशेष अपराधीको तय मातक हम पर म्पबहार करते है तबतक अपनी भास्मामें होमो मेंगे । हमें और तुम्हारे सगौ एनेबारे किसी मी मुमुक्षुको यह बात कुछ मी निपारने योग्य काश्य माश्म हाती। (२) पह त्यागी मी मही अस्पागो मी नहीं । पा एगी मी नहीं, बौतमी मी नहीं। अपना क्रम नियठ करो। उसके चारों पर निच भूमिका मसो । या बो दर्शन आता है, क्या कर पा पा गावासका विचार पुनः पुन' ए मूर्ण या माती। संवनने वफ्ना कम नहीं होता है, लिहोंने छोर गया है, उन्होंने परम वसमाविको पाया है सतफ्ना पति अति दुर्सम है। बानेके बाद सतका मिराना कठिन है। सतपनेको निसाना अनेक परम्त दुर्गम स्वफ्ना तो दुसम हो। झापोपसमिक जानके विकास होते हुए क्या देर मावी! पति इस मापने उस मालिक परिणामको पीण म किया तो पा इसी मममें प्रस्पक्ष इसका बेगम लेगा। ४०९ बर्थ पैर बी १२ १०५. जो मुम गार गृहस्पके ममहारमें पता हो उसे पहिले वो मामामे बसा माविका मूत स्थापित करना चाहिये। महो तो उपरेश बारिकी निपता ही होता है। इम्प वादि फैशाने बादिम सांगोलंग म्पापसम्म पनेका माम मति है। इस मति गोरते हुए प्राण गानेको दशा बानेपर स्पाग वैम्प सधे सहपमें प्रगट होते हैं और यहाँ पातको सपुरो बनके तपा महा-भर्मक अलत सामर्प, महापौर यस्पको समझाता है और इससे सब तिर्यो निमम्पमे प्रति परमेका मार्ग पर सिद्ध होता है। माप करके तुम दश, पर संग मादिका विपरीत संयोग यता, इमलिये बारम्पार, प्रत्येक पडमें और प्रत्येक काम सारपाना भीति वादिधर्मा प्रति दरमा योम्प है। तुम्हारी तय गो और कम्पागको माया रखता है और मिसे प्रत्यक्ष सपुपमा लिथप , उसे प्रथम मुमिनमें पर माति परम मापार है। गो गाय पेमा मानता है कि उसे सपुरषका थिय मा परन्तु उसमें प. उमर होईनानि प्रातन्य महो और प उसमे कम्पागकी पाचमा करे, वा बाल करे, पर ४१ ,४११, ४१२, ४११]विविप पर भादि संप्रा-२७यों व या निमय केवल सत्पुरुपको ठगनेके ही बराबर है। पपि सपुरुष तो वाचक्षाररित है, वर्षात उसका टगा पाना संभव नहीं, परन्तु इस प्रकारसे प्रकृति करनेवाले जीव बाप मपराधी ऐसे हैं। स वातपर बारम्बार तुम्हारे तपा तुम्हारे समागमकी इच्छा करनेवाले मुमुक्षुओंको एश रखना चाहिये। परमात महिनी सम्येि महीं हो सकती, या कल्पना मुमुनुमोको महितकारी है और स्पाम्य है। ४१० बई, चपदी ११ शुफ १९५० उपदेशको माया या करती है । उस प्रकारकी आकांक्षा मुमनु गौवको हितकारी है- भागृतिका विशेष है। म्पों ज्यों नौतमें त्याग, ग्रम्प बोर नामय भक्तिका बल बहता जाता है, स्पो त्यों सपुरूपके बचनका भपूर्व और बहुत सहम मासित होता है और बध-निरपिके उपाय सहममें से सिर हो जाते हैं। यदि प्रस्पा संपुरुपके चरणारपिदका सयोग पुछ समयतक ये तो फिर उसके विपोगमें मी त्याग, बैराग्य और वाभय मक्तिको मगाम भारा हती है, मी तो मिथ्या रेश, कास, सग वादि संयोगसे सामान्य प्रतिके नीम, त्याग, पैराग्य बारिके यसमें नहीं पा सकते, मन पर जाते है, अथवा उसका सर्मया माश ही कर देते हैं। अपमा ४११ बाई, शास मुदी १ रवि १९५० पोगमासिक पानेमें एमि नहीं है। वारमाको संसारका सरूप काराप्रइकी तरह बारम्बार प्रशिक्षण मासित एना करे, या मुमुश्ताका मुम्म सण है। योगवासिष्ठ बार गोमो प्रय उस मरणके पोषक है, उनके विचार करनेमें हानि नहीं है । मूड पात तो यह है कि गौरको राम्प वानेपर भी जो उसकी बायत शिपिता है-दागपन है, उसे दूर करना, उसे अस्पत कदिन माम्म पोवा है और बहे मिस तबसे मी ०, प्रयम से हो र करना योम्प है। ४१२ बम्बई भास पुरी ९ म १९५० विस म्पबसापसे गोषको भान-निद्रा न परवी हो, उस म्पबसायको पर किसी प्रारम्पले पोगमे परना परवा तो उसे कर फिर पीछे एकर, 'मैं महान् मर्पफर हिंसायुक्त हुए कामको किया करता है, इस प्रकारसे फिर रिसे विचारकर और बातमें रोपनसे ही प्राप करके मुझे या भविष है', पह फिर फिरसे निथप करके, गितना पने उतना म्पसायको कम करते हुए प्रति , तो पोषका सफर होना संभव है। ४१३ वर्मा, वैशाप सु. रवि १०५० पहाँ उपाधिमा पबहार रहता है। प्राप वाम-समाधिकी स्थिति यती है, ता मी पहा रके प्रतिवयसे एक बात बारम्बार स्पलिमें बापा करती है । उस पारम्पको निति दोनतक तो प्पहारका प्रतिष पना योग्य है, इसलिये समरिक स्पिनि पता है।
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पर ४५] विविध पब मादि समाह-२५वों वर्ष पैदा करता है। इस प्रकार प्राप होना योग्य ही है क्योंकि सिद्धांत-शान' तो भाबके किसी भस्पत उमर क्षपापसम भनेपर और सहरुके बचनको माराधनासे उस्त होता है। 'सिमानान'का कारण 'उपदेशबान' है। पहिले सद्गुरु अपवा स्वाबसे नीबमें इस उपदेश-भानका सहोना पोग्य है, जिस उपदेश-धानका फल राम्य और उपशम ह । वैराग्य और उपशमका मह बढ़नेसे गरमें सामाविक क्षयोपशमी निर्ममता होती है, और यह मान हमें सिदात-बान होनेका कारण होता है। पनि जीवमें बसैग-दशा आ जाय तो वारमस्वरूपका समधना या सम्म हो जाता मोर उस वरूप-दशाका हेतु सम्प-उपशम है। वो फिर फिरसे बिनागममें तथा वेदांत नादि बहुससे शामोंमें पा गया है-विस्तारसे गया है। इसलिये नि सशपहपसे सम्प-उपशमके कारण पोगवासिष्ठ वादि समय विघारमे चाहिये । हमारे पास वानमें किसी किसी प्रकारसे तुम्हारे परिचयी श्री “का मन रुकता या, वीर उस तरहको सकापट रोना सामाविक , क्योंकि प्रारम्भके वशसे हमें ऐसा न्यबहारका उदय यता हमारे विषयमें सहन ही शका उत्पन्न हो पाय, धौर उस प्रकारफे म्पबहारका उदप देखकर प्राय हमने धर्मसमभी सगमें किक-सोकोत्तर प्रकारसे परिचय नहीं किया, जिससे लोगोंको हमारे इस म्पन पारके समागमका पार करनेका कम अवसर उपस्थित है।मसे अपना भी " से क्या किसी दूसरे मुमुभुसे यदि हमने कोई भी परमार्थकी मात की तो उसमें परमार्यके सिमाप कोई दूसरा कारण नहीं है। इस संसारके निपम और मर्यकर सम्पको देसकर में उसकी नातिके विषयमें बोध याद, निस भाषसे नौबमें पति भाकर समापिशाई है वह योग इस जगत्में किसी भनत पुण्यके पोगसे ही जीवको प्राप्त होता है-ऐसा मामा पुरुष फिर फिरसे कर गय है। इस उपमकानमें भवकार प्रगट हराकर पोषका मार्ग वापरण-पास होने जैसा हो गया है । उस कालमें हमें रेह-योग मिठा, इससे किसी तर सेद होता रि भी परमार्पसे उस दफा समाधान किया है। पान्त उस देह-पोगमें कभी कभी किसी मुमु के प्रति छोक मार्गके प्रतीकारको फिर फिरसे करनेका मम हाता विसका सपोग तुम्हारे और भी के साप साहनी हो गया है। परम्नु उससे तुम हमारे कपनचे मान्य करा, इस मामहके लिये कुछ मी करना नहीं होता । केरम हितकारी मानकर हो उस बायका मारह इजा करता , अप tant-परि इतना सा दे तो किसी तरह सगका पस मिना सभो। से बने से जीरका अपन दोरफे प्रति श करके मरे जोकि प्रतिनिशि पर माधि करमा गोर शिससे पाशमका मापन सा घरमा, यह स्मरण करने पाम्य पदिनी गाना (२) एक स्पर्म पर सर रिम तरद पटता है।
भीमद् पस्चन्द्र [११४ . ४१४ बर्मा शास दी ७, प्राय बिनागममें 'समीवरति' साधुको पा समाचार भावि जिसमेको बासा नहीं है, बार यदि पैसी सदिति ममियमें गकर मी सामु पत्र समाचार आदि लिखना चाहे तो वह अतिचार समय माप । इस पण साधारणतया धामका उपरेश है, और या मुख्य मार्ग तो योग्य हो मागम होता है किर मी निनागमको रचना पूर्वापर वषिम्य माझ्म होती है, पर उस अविरारकी रक्षा के लिपे पर- समापार वारिक हिसनेको वाचा मी किसी प्रकारसे मिमागममें है। उसे तुम्हारे पिच्के समाधान होमके लिये यहाँ संश्चपसे विसवा ।। बिनमगवान्को नो गो मात्रा में सब बाबा, मिस तय सर्व प्राणी बर्षात् जिनकी बामाके कम्याणके लिये कुछ यो उम सबको, या कायाम प्राप्त हो सके, वौर जिससे मा कम्पाण सविंगत हो, तपा बिस तब उस फस्याणकी रक्षा की जा सके, उस पर की गई है। प िमिनागमों को ऐसी बाबा की कि माझा बमुक सम्प, क्षेत्र, कार और मारके सपोगसे न पम सकती ईमामाको नापक ऐती तो वहाँ उस बाबाको गाम करफे--उसका निषेध करके-पीतापकरने दूसरी बाबा की। गिसो समिति की है ऐसे मुनिको सचिरति करनेके समयके कासरपर " सपाई पाणाई- पाप पचरसामि, सम्पाई मुसानप पयसामि, सम्पाई चाणाई पचासामि, सवाई मेहमाई पर- सामि सम्पई परिग्गा पासामि' इस उद्देश्य के पचनोंको गोगनेके लिये कहा है। वर्षात् सर्व प्रामाधिपात्से में निहत होता सर्व प्रकारके पाप से मैं निरच होता।" सर्व प्रकार अचानसे मैं निच होता, 'सर्व प्रकारके मैयुनसे में निात होता,' मोर सर्व प्रकारके परिपासे में निच होय, (सब प्रकार के रात्रि-मोननसे पपा दूसरे उस उस तबके कारणेसे में बत होता इस प्रकार उसके साप मौर मी गातसे त्यागके कारण समझने चाहिये), ऐसे गो वचन को सर्वपिरतिको भूमिकाके सण कोरिमी उन पाँच महातों-मैथुन स्पागको मेकर-चार महामि पी से मगवान्ने इस बात की जो वा पपपि प्रत्पम- हप्से तो महातको कदापित् बायफ माश्म परन्तु ज्ञान-पिसे देख्नेसे हो र पोप है। उदाहरण के लिये मैं सब प्रकार के प्रामाप्तिपातसे नित ोता 'स तय पासाण होनेफर मी मगो पार करने से प्राणाविपासप प्रसगकी मात्रा कमी पदी है। मिस बाजाका, परि होलसमुदायका विशेष समायम करके, साधु बारापन करेगा, वो पत्र माना निर्मड होने का समय पापगा पर मानकर भगवान्ने नदी पार करने की बाबा दोन बाबा प्रमझ प्राप्पत्तिपातस्म होनेपर मी पाच प्रातको रक्षाका अमूम्प व होनेसे प्राणाधिपातको निलिस्म हो, योनि पोच महामोजी याका खम्म यो कारम है। प्राणातिपातको मितिका होनहै। पपपि प्राणाति- पात होनेपर मी भदौके पर करनेकी प्राणाविपातकस भादा होती है फिर मी 'सब प्रकारफे प्राणा- सिपानसे मिरत होगा। इस पापको एक बार पति पांचती है। परन्तु या पति फिरसे विचार करनेफर तो रसको विशेष प्रवासिये । मान्म होती है। तण मरे पनि किसे मारे। - ४१४] विविध पम मादि संप्रा-२७वा वर्ष 'मैं परिमाको सर्पपा निति करता , इस प्रकारका रत होनेपर भी बस, पात्र और पुस्तकका संप देखा माता है- अंगीकार किया हो माता है। उसका, परिणाकी सर्वया निहासिके कारणका किसी प्रकारसे रक्षणरूप होमेसे हो निधान किया है, और उससे परिणाममें मपरिह ही होता ह। मूम-रहित भारसे निरय बाम-दशाको परि होने के लिये ही पुस्तकका बगीकार करना बताया है। सपा इस फामें शरीरके संहननको निता देसकर पहिले बिचको स्थितिके सममात्र बनेके लिये पिम, पात्र बादिका प्राण करमा बताया है, बर्षात् जब बारम-हित देसा तो परिमा रहनेको वामा दी है। यपि कियाको प्रतिको प्राणातिपात का है, परन्तु भाषकी पिसे इसमें मम्सर है । परिणा पुद्धिसे अपना प्रामाविपात बुद्धिसे इसका कुछ भी करने के लिये कमी मगवान्ने माहा नहीं दी । मगवान्ने वहाँ सर्मपा निसिप पाँच महामतोंका उपदेश दिया है, वहाँ भी इससे मौके हितके लिये ही उनका उपदेश गया है, और उसमें उसके त्यागके समान दिखाई देनेवा अपबादको मी मात्म-तके लिये ही का?-पर्यात् एक परिणाम होनसे बिसका स्पाग कहा है, उसी क्रियाका प्ररण कराया है। भैपुनस्यागमें गो अपबाद नहीं है, उसका कारण यह है कि उसका पग-पके बिना मग भी हो सकता और राग-रेप मारमाको पहितकारी है, इससे भगवान्ने उसमें कोई भपवाद नहीं पवाया । नदी का पार करमा राग-रेपके बिना ऐ सकता है। पुस्तकका प्राण करना मी राग-पके बिमा ऐना संमक है, परन्तु मैथुनका सेवन राग-पके बिना महीं हो सकता, इसलिये भगवान्ने इस मतको मपादीत कहा है, और दूसरे प्रतोंमें वारमाके हितके म्यि ही अपवाद का है। इस कारण निस व्यापका-संयमका- -रक्षण ऐ उसी तय करनेके लिपे मिनगमकी रचना की गई है। पत्र मिसने वषषा समाचार नादि कामेका भो निपेष किया है, उसका भी पहो । निस्से मेक समागमकी दिम हो, प्रीति-नीतिक कारमको इदि न हो, मियों भादिके परिचममें पानेका प्रपोजन न हो, संयम शिपिस न हो जाय, उस उस प्रकारका परिग्रह बिना कारण हो स्वीकत म हो पाप-इस प्रकारफे सम्मिलित वर्मत कारणों को देखकर पत्र भारिफा मिपेष किया है, परन्तु मामी भरबारसहित है। से पृहकम्पमें कना-भूमिमें विचरमेको मना की है, भीर माँ क्षेत्रको मर्यादा गाँधी । परस्त पान, दर्धन भौर सयमके कारण यहाँ मी विचरनेका विमान किया गया है। इसी वर्यके उपरसे यह माम होता है कि यदि कोई हानी पुरुष र पवा -उनका समागम होना मुरिका हो, और परिपत्र समाचारके सिपाप दूसरा कोई उपाय म हो तो फिर बारम-दितके सिवाय इसरी सब प्रकारको मुनिका स्वाग करके उस प्रकारके पानी-पुरुषको भातासे अपवा किसी मुमुसु-सरसंगाको सामान्य बाबा सा करनेका दिमागमसे निषेध नहीं होता, ऐसा माश्म होता है। इसका कारण पर है कि नहाँ पत्र-समाचारके किसनेसे वाम-रतका नाश होता हो वही उसका निषेष किया गया है। वपा जाँ पा समाचार न होनेसे पारम-हितका नाश होता , माँ पत्र-समाचारका निपेभ किया हो, पर मिनागमसे बन सकता है या नहीं, यह सब विचार करने योग्य है। इस प्रकार विचार करनेसे दिमागममें भाम, दर्शम भौर सपमकी रक्षा के छिये पर समाचार मा म्पबहार मी साकार करनेका समावेश होता है। परम्तु किसी काम उिपे, किसी महान् ४८ १५८ भीम पसबाट [पर प्रयोगनके लिये, महास्मा पुरुषों बादासे वपना फेवा बीपके करपाणके उदेश्ससे हो, उस किसी पात्रके म्पेि उपयोग बताया है, ऐसा समझना चाहिये । नित्यप्रति और साधारण प्रसंगमें पर-समाचR बार पाहार करना योग्य नहीं है ।हानी पुरषके प्रति उसको वातासे निस्पप्रति पर वादि म्यपार करना ठीक है, परत सरे मैजिक बार प्रयोगमके ये तो पापा निसिद्ध हो माम होता है । फिर पल ऐसा वा गया है जिसमें इस तय करनेसे मी विषम परिणाम वाना समय है । छोक मार्ग प्राति करनेवाले साधु करके मनमें यह म्पपहार-मार्गका नारा करनेवाल भासमान होना समय है। तया इस मार्ग के प्रतिपादन करमेसे अनुमसे बिना कारण हो पा समाचार मादिका चार होना संभव है, जिससे साधारण द्रम्प-स्यागकी मी हिंसा होने लगे। पा गानकर इस प्यपहारको प्राप मी से भी नहीं करना चाहिये मोति पैसा परमेसे मी म्पसायका पाना ही संभव है । पर तुम सर्व पचासाण हो, तो फिर को पत्र म जिसनेका सामुने पचासाम दिया है पनही दिया जा सकता; परन्तु पदि विपा हो तो भी शनि मही समानी भारिपे । यह पचासाण मी पदि हानी-पुरुपको बाणासे रूपांतरित दमा रोता तो हानि न पी, परन्त जो साधारमम्मसे सपांतरितावा है, यह पोप मही वायाँ मूम-सामाविक पदासाग- की म्पासा फरमेय वासर नही सोकपाताणको बाकसरपरस्तु उसे मी साधारण- वया कपनी इससे तो राम्ना योग्य मही–स समय तो इस प्रकारसे ही प विचार रखना चाहिये। मम गुणों के प्रगट होमेके साधनमें विरोध ऐता हो, तब उस पयस्थाणको हानी-पुरुपको पाप्पासे अपना मुमुक्षु बोके समागमसे सहम सरूपमें फेरफार करके रास्तेपर माना चाहिये क्योंकि बिना कारण छोगोंमें शका पैदा होने देने की कोई बात करना पोप न।प पामर मार दूसरे गोको बिना कारण सहितकर होता है-स्पादि गातसे कारण समाकर सातक मने पत्र बादि महारका कम करना ही योग्य है। हमारे प्रति पापित् पैसा म्पबहार करना तुम रितकर है, इसजिसे करमा पोग्य माश्म हो तो उस पत्रको मी मी' जैसे किसी ससंगी पारी मेगना, मिस्से 'हान पकि सिवाय इसमें कोई दूसरी बात नहीं,' पर उनका साथी मारी मामाको दूसरी प्रपरके फरम्पसारको करनेसे रोकनेके म्मेि संमर हो । मेरे बारके अनुसार इस पातमें भोप म समझें । कदाचित् उ विरोष माश्म रोता तो किसी प्रसगपर हम उनसे इस एपको निरप कर देंगे, दिर मी त प्राप: प पत्रम्पार करमा योग्य नहीं। इस भने म पूमा। माप शपका बर्ष देवल इतमा,प्रिससे हितकारी प्रसंगमें पत्रका मो कारण बताया गया है, उसमें बाधा नवापे । विशेष परम्पहार करनेसे परिपालाची ऐगी तो भी डोक- म्पपहार यान संझपमण होगी। केरठ मिस तर प्रसंग प्रसंगपर गो माम-रताके किये उसमसिमा भार उस बिना परमी योग्य है।हमारे प्रति सोपान-समरे किये पर लिनेकी परि तुम्हारी तो मा tim- “से पर ही माना, निम्न में गुम उसपहने र बाला उपस्थित हो। - विविध पत्र मादि संग्रह-यावर्ष .. तुपारे ग्री को पत्र मिसनेके विषयमें पर्चा, पायपि योग्य नहीं हुवा फिर मौ मे परि में कोई प्रायमित दें तो उसे के सेना, परन्तु किसीवान-बाकिस्सय लिसमे के बदले में उसे मिलाने में वागापीठान करना चाहिये, ऐसा सापमें पपापोग्प निर्मठ बंत फरणसे काना योग्य है-यो बात केवल जीवका हित करनेके सिपे ही है। पप्पण नादिमें साधु दूसरेसे मिलाकर परम्पपहार करते हैं, जिसमें यात्म-रित पैसा तो यपपि पोका ही होता है, परन्तु पापी पाठ मानेके कारण डोग उसका मिपेष नहीं करते । तुम उसी तर उस स्वाके अनुसार बाचरम रमसोगे, तो मी हानि नहीं है-मिससे समें पत्र मिसानेमें वाचन न हो बौर कोगोंको मी संदेह न हो। हमें उपमाको कई सार्पकता मही। केवर मारी वित्तको समापिके म्येि ही में मिसनेका प्रतिवप नही किया। बम्बई, शास बदौ ९, १९५० सूरतसे मुनिमी का परिने एक पत्र वाया था। उसके प्रत्युचरमें यासि एक पत्र मिला पा। उसके पचात् पाँच मदिन पहिले उनका एक पत्र मिग पा, मिसमें तमारे प्रति को पत्र बादि किसना एषा, उसके सबध होमेवाली ठोक-चर्चा विषयक बावसी बातें पी । इस पत्रका उत्तर मी यासि सि दिया है। संक्षेपमें इस तरहै. "प्रामाप्तिपात बादि मात सर्वस्यागके म्येि है, वर्षात् सब प्रकार के प्राणतिपातसे मिश्र ऐना, सब प्रकारके मृपाबाबसे निात होना स तय साधुके पाँच महारत होते है। और जब सामु स माता के अनुसार बसे, तब या मुनिके सम्प्रदायमें गता है, ऐसा भगवान्ने कहा है। इस प्रकारसे पाँच महामतों के उपदेश करनेफ्र भी जिसमें प्राणातिपात कारण है, ऐसी मौके पार गैय करमेको वाता मा निममगवान्मे दी है। इसलिये कि जीवको मती पार करनेसे जो बप होगा, उसको अपेक्षा एक क्षेत्रमें निवास करनेसे बनाम बध होगा, भौर परपरसे पाँच महास्तोंकी हानिका वासर उपस्पित होगा-या देसकर-निसमें उस प्रकारका प्रम्प-माणातिपात है, ऐसी मौके पार करनेको माया मीबिनमगवान्ने दी है। इसी तरा कम पुस्तक रसनेसे पपपि सर्वपरिप्रह-विरमण मत नहीं ग सकता, फिर मी देहको सावाके लिये त्याग कराकर भारमार्गको साधमा करने के लिये दोको साधनरूप समठकर, उसमेस सम्पूर्ण मूळ दूर हानेतक बिनभगवान्न बनके निस्पृह सबका और विचार-बतको पदि होने तक पुस्तक के रस्नेका उपदेश किया है । मर्यात सर्वत्पागमें प्राणाविपात तथा परिमाका सब प्रकारसे वगीकार करनेका लिपेप मेपर भी, इस प्रकारसे गिनभगवान्ने बगाकार करनेको मावा दो सामान्य रिसे देखनेफ्र काचित् विषम माम होगा, परन्तु निमभगवान्ले तो स्म हो रहा है। दोनों होमात गावके फयाणके किये ही कही गई है। मिस तब सामान्य बाबका सम्पाण हो से चार पूर्पक हो कहा है। परन्तु इस प्रकारसे मैथुन-पाग प्रवमें लपपाद मही काा, क्योंकि मैथुनका सेवन गग- रेपके बिना नही हो सकता, पर दिनभगवान्का अभिमत है। वर्षात् राग-रेपको अपरमार्थप जानकार बिना अपवाद के ही मैथुन-स्पागका सेवन बवाया है। इसी तय गृहकापसूत्रमें नहाँ सापुके चरण ।
भीमद्पमचान्द्र [पर ४१५ करनेको भूमिका प्रमाण करा, यहाँ चारों दिशामोंमें अमुक नगरतकको मर्यादा बताई है, फिर भी उसके पपात् कनार्य क्षेत्रमें मौ शान, दर्शन र स्यमको परिके पिम्प विचरण करने वपनार बताया गया है। स्पोंकि पार्य-मूमिमें यदि किसी योगवश हामी पुरसका समापने विचरमा न हो और प्रारम्प-पोमासे धामा पुरुषका कनार्य-मूमिमें ही चरना हो, तो यहाँ बानेमें भगवान्को प्रतिपारित बाबा भैग मही होती। इसी प्रकार पदि साधु प-समाचार वादिका समागम रस्से वो प्रतिबंधको पनि हो, इस परम मगमान्ने इसका निवेश किया है। परन्तु मनिष बानी-पुपके साथ किसी उस प्रकार के पा-समाचार कार में अपवादरूप मम होता है। क्योंकि निकामरूपसे बानकी भाराधनाके किये हो हाना के प्रति पर समाचारका म्यभार होता है। इसमें मा कई संसार-प्रयोगमा उदेश मही, पति उण्टा मसार-प्रयोपन दूर होनेका 10 उपेश है तपा संसारका ए करना इतना ही तो परमार्थ मिससे पानी-पुरुपी अनासे वपना किसी सगी मनका मासे पा समाचारका कारण उपस्थित हो तोप संपमके पिम हो, पानी कहा मा सरुवा । फिर मी तुममें साधुने यो प्रयासमान दिया था, उसो भंग होमेका दोष तुमारे हो सिरफर बापण करना योग्य है। यहाँ परमाणक सम्मका विचार मही करना है, परन्तु तुमने उमें यो प्रगट विपास विमापा है, उसके मग रमन या रेत है। पदि उस पहासागके सेममें तुम्हारा यथायाम्प चित्त नहीं था, तो तुम महम्ना हो योम्प न था; और यदि मसी मेक-दनासे पैसा आ तो फिर उसका भंग करना योग्य नहीं और पवि मग करनेका यो परिणाम है र मंग न करमेकी मपेशा मामाच दिशेप रित करनेवाल हो, वो मी ठसे मासे मंग करना योम्प नही। क्योंकि बाल रगप वपना भानसे सहनविपरापी होता। उसका विचार किया गया विवादित विचार गुम्बार विपर्यय होता है। इस कारण तुमने जिस प्रकारसे उस पयसाणका मंग किया है, प वपापक योम्प है, वौर उसस्त्र प्रापपिच किसी मी तरामा योम्पो । परन्तु किसी तयकी संसार गुरिसे या कार्य नही मा, वौर ससार-कापके प्रसंगसे पत्र-समाचारकेम्पपहर करनेकी मेरी इमा महोते, तपा परमो कुछ पत्र मावि मिहनामा मात्र किसी मामले कापाणको मात पयों होता है। और पदि काम किया गया होता तो मा एक प्रकारसे कापाणरूप हो पा परत इस प्रकारसे घिमी म्पमता उत्पन्न होकर बतरमें मेश होता पा, सम्मेि मिसमें कुछ संसार-मपोग्न मी, पिसी पनकी दूसरी म मही केस बारके हितका ही प्रसंग है-ऐसा समाकर इसका मिना वाहै। मायके पण दिया हुमा परमसाण मी मेरे हतक किये पा मिस्से में किसी संसारी प्रपोग्नमें म पर गाड़ी और उसके लिये उनका उपकार या । परन्तु मैंने सोसारिक प्रयोजनसे व कार्प माही दिया है-आपके सपारके प्रतिवनको तोड़नेके म्पेि पार बर्म महाया है। तो मी पर एक प्रकार मय भूमी म उसे बाप साधारण प्रापयित देकर घमा करना पोम्पहै।' पप्पण मादि मि सार मेग मारकसे मारको नामसे पत्र बिताते हैं उसके सिपाप किसी दूसरी वयसे दर प्राति म की गाप, और हाम-वर्षा किसी गाय तो मी बाबा मही -स्यादि मान सा है। तुम मी उसे सपा इस पत्रको परफर से केश उत्पथ म ऐसे करना । किसी मी - पा ४१५] विविप पर मादि सपा-२७वों वर्ष २८१ प्रकारसे मान करना ही मेष्ठ है। ऐसा न बने तो सहब कारणमें होगय शरूप ही परिणाम बाना समव है।यहाँतम वने यदि प्रायधिवका कारण म वो म करना, नहीं तो फिर पोका प्रायपित्त मेने भी माना नहीं है। यदि प्राययित बना दिये ही कदाचित् इस बातकी उपेक्षा कर दे तो मी बमारे भर्यात् साधु को पित्तमें इस बातका इवना पचाताप करना तो योग्य है कि इस तय करना होयोम्प म पावव इसके बाद सापु मैसेको सममतापूर्वक प्रापकके पाससे यदि को किसनेवाला हो तो पत्र जिसकामेमें मामा नी नी म्यवस्था उस सम्प्रदापमें पला करती है, इससे प्राप मेग निरोध नहीं करेंगे। और उसमें मा परि विरोष पैसा मादम हो तो शमें उस बातके लिये मी धोरच प्राण करना ए हितकारी है । लोक समुदायमें छेश उत्पम म होसमें इस लक्षाको पूकना पोम्प नहीं है। क्योंकि उस प्रकारका कोई अम्बान प्रयोजन नहीं है। श्री का पत्र बाँचकर साविकर्ष एला।निस तद मिशासाका पाय उस तर प्रपन करना यह प्रपम भूमि है। राम्प और उपशमके हेतु योगमासिष्ठ मादि प्रयोंके पढ़नेमें बापा ना है। अनारमनीका बनाया हुमा विचरमाला नामका प्रप क बाटोकन करने योग्य है। हमारा चित्त निस्य संगकी हो रठा करता है, परन्तु स्थिति प्रारम्प बाधीन है। तुम्हारे समागमा भाईपास मितना मने उतना सम्म पोंका भागेका हो, या मप्रमापूर्वक करने यग्य है। और मिससे एक दूसरेका नियमित परिचय किया जाय उतना मन रममा थोम्प है। प्रमाद सा मौका है। बई, शास १९५० मनका ४१६ पचनका तथा कापाका म्पक्साप, बितना समझते हैं, उसकी अपेक्षा इस समय शेप हा करता है, और इसी कारण तुममें पत्र बावि शिसमा मही ऐ सकता । म्यवसायको प्रियताको इच्छा नहीं होती, फिर मी म प्रास एवा करता है, दौर ऐसा माम होता है कि म्यवसाय बनेक प्रकारसे पेन करने योग्य है, जिसके मदनसे फिरसे उसका उत्सपिका संघ र होगा- निरत होगा | पनि फराधित् प्रवाहपसे उसका निरोप किया गाय तो मी उस निरोवरूप शके कारण, बामा मात्मरूपसे मिसा परिणामको तप परिणमन नहीं कर सकती, ऐसा म्गता है। इसलिये उस प्पषसापको जिस प्रकारसे बनिसहमसे प्राप्ति , उसे पेन करमा, पह किसी तरा विशेष सम्पा माम होता है। किसी प्रगट कारमका भवसमन करविचारकर--परोक्षरूपसे पो भाते हुए सब पुरुषको देवा सम्पापिनेसे मी पहिचान छिपा नाय तो उसका महान् फरी और पदि से न होवो सपको सब कानेका कोई मारमसमपी फस मही, ऐसा अनुभवमें जाता है। प्रत्यक्ष सर्वत्र पुरुषको भी यदि किसी कारणसे-विचारसे-वनसे- सम्पामि-ससे मी म बाना ऐ तो उसका भारम-मत्पपी फर नहीं है । परमासे उसकी सेवा असेनासे गौरको कोई ) मे नहीं होता। इसलिये उसे कुछ समय कारणम्पसे धाना पुस्प साकार मही किपा, ऐसा मास ऐता है। माति ( 1८२ भीमद् रामचन मातसे प्रत्यक्ष पर्वमानों के सरसे ऐसा प्रगट मास होता है कि यह एक नियम वया हुपम वपना कम्पुिग है। काम-को परावर्तन दुपार में TRAR मा चुका है, फिर भी ऐसा एपमका कमी कमी हो माता है। बेताम्बर सम्प्रदाय इस प्रकारका परंपरागत बात को बाती कि 'यसपती पूजा' नामसे माचर्यमुक्त -पर-पस प्रकार के इस पचमकासको ताकर बारिने अनंतकामें मापर्यवस्म माना है, प बात हमें बात करके बनुमबमें बाती -साक्षात् मामों ऐसी 0 माश्य होता है। कार ऐसा है। प्रायः बनार्य मैसा है। उसमें स्थिति है । प्रसग, इम्म का सामगसे सरक मेपर मी थोक मारपसे गिनने योग्य है । इम्प, क्षेत्र, प्रक, बौर मारके मा- मन मिना निरापरस्मसे मिस वय नाममात्र सेक्स किपा आप उस तर पाबामा सेवन करती है, इम्प उपाप पारे। झास १९५ . निस्पनियम * भीमत्परमगुरुम्पा ममा सबेरे सटकर इपिथिको मविकाम करके रात-दिनमें जो कुछ पापके भव्य स्थानोंमें प्रापि हो; सम्पन्नान, दर्शन और पारितसंबंधी मो बाप मा रो किसी भी मानके प्रति किपिग्मात्र मी अपराम किया र बानकर मा हो अपना बनमानमें जमा हो, उस सको प्रमा कराने के लिये उसकी निश करनेके लिये विशेष निदा करने के लिये, बामासे उस अपराना विसर्जन करना ऐना बाहिपे (एनिमें सपन करते समय मासी तय करना पीये)। मौसपुरुपके दर्शन करके चार पीके लिये सर्वसाप म्यापारसे निरत्त होकर एक मास्नपर बैठना चाहिये । उस समय " परम्गुरु की पांच माग गिनकर स मम्पपम करना चाहिपे । उसके पपात् एक पपी कम्पोसर्ग करके औसत्पुरुषोंकि पचनोको कायोत्सर्गमें बप करके मापिका ध्यान करना चाहिये । उसके बाद मापी पी भपि निको मात करमेनाले पदों (बामनसार ) को बोलना चाहिये । नानी पहा " परमगुरु 'सम्यको कापोत्सर्गरूपसे अपमा पारिप बीर ॥ योग" मामका पाँच मामा फेरनी चाहिये । [समें पप्पपन फरमे योग्य सासराम्परातक, त्रिमपरागपात, वसपा- रस बप्पामकम्पदुम, पारिसमुषप, नवल पाति प्राप, पर्मपितु मामानुशासन, मानायोप, मोघमार्गप्रकाश, मोशमाठा, उपमितिमापंचाया बन्याममार, प्रोमानवमनयाकी चीनी- समिस मोरे स्वपन -१ १, ५ . ८,९१, १३, १५, १६, १०, १९, २२ ] सात म्पसन (बा, मांस, मदिरा सप्तामन शिकार, भोप परबी) का स्पान । पा मापिप मदिरा दारी, मासेफ पोरी परनारी पण भाव विसन सदा, हरिव भूप रमविक माई। - पर ४१८] विविप पत्र मादि समह-जो वर्ष रात्रिभोजनका स्याग । फुसको छोरफर वनस्पतिका त्याग । कुरा तिथियों में विना त्यागी हुई पनस्पतिका प्रतिबंध । ममुक रसका त्याग । बामचर्यका त्याग । परिमा-परिमाण । [ शरमें विशेष रोग मादिके उपानसे, बेमुपिसे, रागा अपवा देव मादिके बसस्कारसे यहाँ बताये गए निपोंमें प्राति करनेके लिये यदि समर्य म मा बाप तो उसके लिये पश्चातापका स्थान समझना चाहिये । उस नियममें सेठापूर्वक म्यूमाधिकता कुछ मी फरमेको प्रविा करना | सम्पुरुषको वासे नियममें फेरफार करनेसे नियम भंग नहीं होता। ४१८ बम्बई, शाम्य १९५० मौताकर भादि महामाजोंने ऐसा कहा कि जिसे विपर्यास र होकर देह वादिमें होने- बाली वारम बुद्धि और भारम मात्रमें होनेवाली देह-मुखि र हो गई है-अर्यात् गो मारम-परिणाम हो गया है-ऐसे पानी-पुरुषको भी अबतक प्रारम्पका म्पइसाप है, तबतक गतिमें गना 0 योग्य पोंकि भवकाश प्राप्त होनेपर हमें यहाँ मी मनादि विपर्यास मयका ख माश्म एमाहै। माँ पार घमघाती कर्म शिम हो गये हैं, ऐसे साबस्वरूप परमामा तो सम्पूर्ण छान वौर सम्पूर्ण जागतिस्प धावस्था ही पता है-अर्यात् बह: ननादि विपपासके निवासपने को प्राप्त हो गानेसे या विपर्यास किसी मी प्रकमसे सब हो ही नहीं सकता, परन्तु उससे म्यून ऐसे निरति भारि गुणस्थानक यने बाबानीको तो प्रस्पेक कार्यमें नौर प्रत्येक क्षणमें मारम-नागति होना ही योग्य है । प्रमादके कारण जिसने पोर पूर्वका कुछ नशसे भी न्यून ज्ञान प्राप्त किया है, ऐसे हानी-पुरुपको मी भनवकास परिभ्रमण मा है, इसलिये गिसकी म्पसारमें बनासक मुदि , उस पुरुपको भी यदि उस प्रकार के प्रारम्पका उदय हो तो उसकी क्षम भणमें मितिका चिंतन करना, बोर निन मागको जागति रस्मी पाहिये। इस मकारसे बानी पुरुषको मी महासानी भीतीर्पकर आदिमे भनुपम किया है, तो फिर रिसका मार्गानसारी भवस्पामें मी षमा प्रवेश नहीं हुजा, ऐसे गोषको तो इस सर म्यवसापसे विशेष विशेष निपत मान रखना और विचार-बागति रसना पोप है-ऐसा बताने जैसा भी नही यता, क्योंकि या तो सहममें ही समाप्त पा सकता है। शानी पुरुषोंने दो प्रकारका बोप बताया है—एक सिद्धांत मोप, और दूसरा उस सिदान-पोषक होने कारणभूत उपदेश-पोर । पदि उपदेश-बोध बारके बतरणमें स्थिर न एमा तो उसे केषस मिस्त-मोपका मछे ॥ भत्रण हो, परन्तु इसका उ फल नहीं हो सकता । पराक सिदभूत तरूपको सिति-पोप करते है। पानी पुरुषोने निकर्ष निकाठकर जिस प्रकार से अन्तमें पाये गाना - मिस प्रकारसे बाणाशय कहा मा सके उस पर बताया है. :-इस प्रकारका जो बोध है, उसे सिदो-बोध करते हैं। परम्नु पाप निर्णप करनेके उिपे गौरका मतरापमप उसको बना विपर्यास मात्रको प्राप्त बुद्धि, पतपसे वपना नप्पलपमे विपर्यास मासे पाक सम्म निथप कर ली है। उस विपर्यास बुद्धिका बस पानेके उिपे, पपासत् वस्तुप्तरप गानने के रियमें प्रवेश रोनेके लिये, जारको राप मोर उपराम नामके स्पपन पर है। चोर इस प्रकारे ३८४ भीम रामचन्द्र [पर ४१८ नो गो साधन नाको संसारका मय जाते हैं उन उम साधनसंपी गो उपोश मारे, या उपदेशोप है। पों पर विचार होना संमप है कि उपदेश-मोपको अपेक्षा सिसात-बोधको मुस्पता माम होता है, क्योंकि उपदेश-बोच मी उसीके लिये है, वो फिर यहि मिति बोपन्न हो पहिने अगाइन किया हो तो यह गोषको पहिसे हो समतिका छ । परन्तु पर विचार होना मिथ्या है मोंकि उपदेश-पोषसे ही सिवान-पोषका जन्म होता है। जिसे सम्प-उपशम सबपी उपदेश-भोप न वा, उसे बुद्धिका विपर्यास मात्र या करता है, और पातक दुरिका लिपास भार ये तक सिहतका पिचार करना मी विपर्याप्त मापसे ही संभव होता है। वैसे बमु गितमा मनिता गती है, उतमा ही पदार्थको मनि देसतीहै और यदि उसका पटग अस्पत पम्मान तो उसे मूड पार्थ ही साई नहीं देता तथा निसको चलन पपावत् सपूर्ण तेन विमान है, प पदार्पो पपायोम्प देखता है। इसी प्रकार निस गावको गाा विपर्यास पुति है, उसे तो किसी मी तर ति योष विचारमें मही वा सव्वा । परत रिसको विपर्यास दुनि मत हो गई। उसे ठस प्रमाणमें सिखातका बवगाहम होता है और निसने विपर्यास हुमिका शेषरूपसे आप किमा 1, ऐसे जानको विशेषस्मसे सितिका मागाहन होता है। गृह-कुटुमा परिपत्र वादि मारमें नो महत्व-ममता और उसकी प्राति-भप्राप्तिके प्रसगमें यो राग-रेप कपाप है, पी विपर्यास भूमि है। वीर बह राम्प-तपशम अत होता है, करता-ममता तथा कपाम मंद पर पाते हैं ये अमुकमसे नाश होने योग्य हो जाते हैं। गा-कुटुमा मावि भाविषयक बनासक पुदि होना पैरम्य है और उसकी प्राप्ति-अप्राषिक मिमित्तसे उत्पन्न होनेवाले कपापोशच होना उपशम है । वर्षात् ये दो गुण विपर्यास बुद्धिको पप्पर करके सात पैदा करते हैं और प सम्हाशि पाच वार मादि पदार्थको मस्या जैसी माश्म होती है स प्रकार सिता विचार करमा योप है। वैसे पहुं परस बादि भतापके र होनेसे व पदार्थको पपावत् देखती है, ससौ तर नाता मादि पटमास मदता होनेसे गोको हानी पुस्पके को ए मियात-मात-बाममाव-विचार चासे रिसर्च दते हैं । गाँ राम्य वौर उपराम बम्बान । यो प्रस्तासे रक होता है। या रम्प-उपशम सम्मान न हो का विवेक बनान नहीं होता अपना यथावत् विवेक मही होता । गो बस भस्मतरूप है ऐसा समान मी प्रपम मोहनाप कठे सपके पार ही प्रगट होता है और इस मात्से बो उपर सिवात मतापापसप समझमें बाबापगा। फिर बानी-पुरों की लिप शिक्षा बैरम्प-उपशमका बोध करमेवाम देसनेमें पाती है। पिन मगमा के बागमपर परि सम्मेसे यह पात निरोप म्पर गाना गा सकेगी। सिज-पोप वर्षात् मिस मागममें पान मसात पदार्पका मिक्सपसे नितना पन रिया है उसकी अपेक्षा विशेषरूपसे पति दिपस्मते राम्प मोर उपशमका कपन किया है, स्पोंकि उसको सिमि से ममेके पचाए सबमें चार निर्ममय होती है और विचारको निम्ता सिप कपनको स्मन ही में अपना पोरे ही परिजमसे बगावत कर सकता है अर्थात् उसकी भी साम सिनि होती है, और 1 पर ४१९] विधिप पत्र मावि संप्रार-ज्यों व बैमा होने के कारण जगह जगह इसी मधिकारका माध्मान किया गया है। यदि गीरको मारम-परि प्राकी विशेष प्रवृत्ति सती हो तो, और बैराग्य भौर उपशम हो, तो उसका मी मए हो पाना समप क्योंकि भारंम-परिम्स मोराम्प वौर अनुपचमका मूल है, राम्य बीर उपशमका काल है। भीठागसूत्रमें इस बारम बौर परिमाके गल्को मतानेके पश्चात् उससे निात होना योग्य है, पर उपदेश करनेके किये इस मापसे दिमगी कहाँ १ पौषको मतियानावरणीय कबतक होता है। मक्तक बारम वीर परिणाहो तबतक । २ गोषको मुतवातावरणीय कबतक होता है। जबतक मारम मौर परिमा हो तबतक । ३ गोषको अवधिकानावरणीय कबतक होता है। जबतक मारम और परिणा हो तबतक । १ नौवको मन पर्यशानापरणाप कबतक होता है जबसक बारम बार परिप्रहहो तबतक । ५ चौवको केरमानावरणीय कबसक होता है ! चक्तक मारम भर परिपा हो तबतक । ऐसा कहकर दर्शन वाटिके मेद बताकर उस बातको सहबार बताई है कि बाबरण तबतक यते । मबतक भारम और परिणा होता है। इस प्रकार वारंम-परिमाका बछ बताकर फिर पपिचिहमसे फिरसे उसका महीपर कयन किया है। १ नौवको मविवान का होता है। बारम-परिमासे मित्र होनपर । २ मीनको मुक्तान कब होता है। वारम-परिणासे निहाच होनेपर । ३ जीवको अबभिवान कब होता है। भारम-परिपासे निात होनेपर । २ नापको मन पर्यवहान का होता है। भारम-परिग्रहसे निात होनेपर। ५. जीवको केवमान कब होता है। भारम-परिमासे निश्च होनेपर । इस प्रकार सर मेदोंको फिरसे करकर, बारंभ-परिमहकी नितिका फल, वहाँ पन्तमें केवमान है, पातक रिया है। गौर प्राधिके फ्छको वेवणानतकके भातरणच तुरप करकर, उसका मायत क्तमानपना बताकर, गोषको उससे मिल होनेका हो उपश किया है। रिफिरसे हानी-पुरुषोंके पचन पौत्रको इस उपदेशका ही निथप करमेके लिये प्रेरणा करनेको इणा करते हैं फिर भी बनार उत्पम हुई दुए इस आदि भाषमें मह ामा यह नीच दोष नाही मास करता और उन मानोफी निति यि बिना भपका निचिका प्रयत्न किये बिना ही भेपकी या करता है जो कमी मी समज नही हुजा, बर्तमानमें होता नहीं, और मरिम्पमें होगा नहीं। ४१९ बई, म्पेठ मुझ १४ रति १९५० विचमें उपाभिक प्रसंग लिपे बारम्बार पेरता है। पर इस प्रकारका उन्य इस देहमें बहुत समपतक पा कर तो समाधि-दहाड कोसन्न है, ए मध मिस ऐसा हो वापानमपमें रममा पो, और मिसमें नर्पत भप्रमा-योग रणना पाप है, उसमें ममार-पाग जाय ।
[पा १ मीमद् रामचन्द्र काचित् सा महो तो मी 'इस ससारमें किसी प्रकार रबि-योग माइम नहीं होता-पप्रपत्र रसीत स्वस्म हो सई पाता है। उसमें कमी भी सहिचारमान चापको भाप मी रुचि मही होती,' पा निबप या करता है। बारम्बार ससार मपस्म भगता है। मयरूप मानेका दूसरा कई कारण माम नहीं होता । इसका हेतु फेला यही है कि इसमें पुर बारमस्वरूपको वप्रधान रणवर प्राति होती है, उससे मान का पता है, वौर निस्प छुटकारा पाने मया करता है। फिर मी बमी तो वरप गता है और प्रतिवर मी या करता है। तया उसी तरके इस भनेक निक- म्पस बारे गमेवारे इस संसारमें हम बड़ी कठिमाइसे यथे। (२) माम परिणाम विशेष स्थिरता होनके लिये उपयोगपूर्वक वाणी और कापाका सपम करना पोप है। ४२० मोहमयी भापास मुदी ६ रवि १९५ पौष और काया पदार्पहरूपसे कुदे हुवे है । परन्तु जबतक उस देहसे गोब कर्म मौगता, ज्वतक ये दोनों सर्मषरमसे साचा । मौपिनमगवाम्मे बीच वार कर्मका संघ मार-नारके सर्व भी तप बताया । उसय हेतु मी पो कि यचपि धार और मौर एकत्र पर दिखाई देते हैं परन्तु परमार्यस बेहुरे बुदे ।—पदार्पणमसे मिम है। वक्षिका प्रयोग करनेपर में फिर स्पट वे मुझे हो जाते है । उसी तय नीव और कर्मका सबमकर्मका मुख्य स्वरूप किसी प्रकारको देह हो, गौर नारको इश्रिप बानिय किया करता मा देखकर या बौन है, ऐसा सामान्यरूपसे काा माता है। परन्तु बान-शा बाये बिना गांव बौर कापाको पो स्पर मिमता पर मित्रता गारो बानने में मही बातापरन्तु यह मिमता क्षौर-नीरको तयानके सस्कारसे - भिमता एक- दम स्पर दो गाती है। बा पहा ऐसा प्रश्न किया गया है कि पदि पानसे गार वौर कापाको मिम मिश्र नाम म्यिा है तो फिर पेनाका सहन करना पा मानना किस कारणसे होता है। फिर न होना पाहिये । इस प्रसव समाधान निम्न प्रकारसे- पैसे सूर्यसे तपा एमा पत्थर सूर्यक वस्त होने के बाद मौ बमुक समयता न यता है, और पीछेसे अपने सम्ममें भाता है। उसी तह पूर्वक मान-संस्कारसे उपारित किये हुए वेदमा बाधि ताफा इस गानसे सबध है। परिवान-प्राप्तिका कोई कारण मिग गाय तो फिर ग्रामका मास से चाता है और उससे उत्पन होनबाग माती कर्म नाश होता है परन्तु उस ग्रानसे उत्पमार दीप कर्मच-उस मानके सूर्यको तय, उसके मस्त होनके पयात्-पपरस्मी गीतो साप सब पता है यो माप मत मात्र होनेसे हो नापा होता है। इतना है भेद है कि पानी-पुस्पको कापामें माम पुनि मही होती, बौर मम्मामें काम पनि नही रोती-उसके शानमें दोनों । स्पास्मसे मिल "श्म पाते है । मात्र पैसे पल्परको सूर्पक ताफा सप पता है, उसी तरह पूर्वसवपके पा ४१] पिरिम पम मादि संग्रह-२यो वर्ष . बनेसे वेदनाप कर्म माम पूर्ण होनेतक नविषममातसे सान किया जाता है। परन्तु उस बेदनाको सहन करते हुए नौवके सस्मभानका मग नहीं होता, वा यदि होता हो उस मानके उस प्रकारका सहपमान होसभव नहीं होता। बाहम-बान होनेसे पूर्वोपार्जित वेदनीय कर्मका नाश हो ही माय, ऐसा कोई निपम मही है। वह मफ्नी स्थितिपूर्णक ही नाश होता है। फिर बहकर्म धानको भावरण करनेवाला नहीं है-सम्पाबाघमावको ही बावरणम्य है। अपना तबतक संपूर्ण वम्पावाषपना प्रगट महीं होता, परन्तु पूर्णपानके साप ठसका विरोध नहीं है । सम्पूर्ण धानीको बारमा मम्पानाम है, इस प्रकार निबनपसे भनुम है। फिर भी सापसे देखते हुए उसका सम्पावावपना वेदनीय कर्मस अमुक भावसे रुका हुवा है। पपपि उस कर्ममें हानाको बारम-बुद्धि न होनेके कारण मम्पावान गुणको भी मात्र संबधका ही वापरण है-साक्षात् भावरण नहीं है। वेदना सहन करते हुए जीवको थोड़ा मी विपमभावका होना, परवानका पक्षण है, परन्तु जो वेदमा है परमानका सक्षण महीं है- पूर्वोपावित मसानका ही फर । वर्तमानमें वह केवल प्रारम्बम्प है, उसको सहम करते हुए बानीको अपिषमभाव पता है--अर्यात् गीव और काया मिम मिम, ऐसा बो ग्राम-योग है पहबानी पुरुषको निर्वाध ही राता है । मात्र मितना विपममापसे ररितपमा हैजानको वाधक नहीं है, जो विषमभाव है यहाँ धानको बाधाकारक है । रिसको देह में देह-बुद्धि और पारमा बाम-गुमि मिसे देहसे उदासीनता है वौर बारमा निसकी स्थिति है, ऐसे हानी-पुरुपको वेदनाका उदय प्रारम्पके सहन करमेरूप ही है, वह मये कर्मोका मही है। दूसरा प्रश्न यह है कि 'परमात्मस्वरूप सब जगह एकसा है, सिम वौर संसारी जीव एकसे है, फिर सिदकी स्तुति करमेसे क्या कुछ बाधा वाती है।' परिठे परमात्मस्वरुपका विचार करना योग्य है । म्पापकरूपसे परमात्मस्वरूप समंत्री या नहीं, या बात चार करने योग्य है। सिद और ससारी बीच समान सतायुज सरूपसे मौर, यह बानी-पुरुषोंने यो निधप किया है, यथार्य है। परन्तु दोनोंमें इतना ही मेरे कि सियोंमें वह सचा प्रगटरूपसे है, और ससारी नाम पर सत्ता केवळ सवारपसे है। जैसे दोपको वमि प्रगटरूपसे है, भौर पकमक पत्परमें प सत्तहमसे हैं, उसी तय यहाँ मी समझना चाहिये । जैसे दीपक और चकमक पत्थरमें जो वामि, परममिकपसे समान है—म्पजिलप (प्रगटरूप) से वौर शळिरूप (सलाम) से मिम है, परन्तु उसमें वस्तुको चातिरूपसे भेद नहीं है, उसी तय सिरके गांवों को चेतन-सत्ता है, को सत्ता सब ससारी बाबोंमें है, मेद फेछ प्रगट-अप्रगटफ्नेका हो। प्रिसे पर चेतन सत्ता प्रगट नहीं हुई ऐसे स्सारी भारको, उस सत्ताक प्रगर होनेके हेतुरूप, प्रगट-सत्तायुक्त ऐसे सिनमगवान्का स्वस्म विचार करने योग्य है-प्यान करमे योग्य है-स्तुति करने योग्य है। क्योंकि उससे मामाको निम-सम्मका विचार-प्पान-स्तुति करनेका भेद प्राप्त होता है, जो वद्य करने योम्य है । वामसम्प सिदतरूपके समान है, पर विचारकर मोर वर्तमानमें इस बारमामें उसकी मप्रगटता है, उसका ममात्र करने के लिये उस सिद-सहपका रिचार-प्पान-सुति करना योग्य है । पाह मे समठार सिकी स्तुति करने को मापा न0 माश्म होती । , 1८८ भीम रायमान [पत्र ११ 'बामस्वरूपमें जगह नहीं है,' यह बात पेत कही है, अपना ऐसा योग्य । परन्तु बाप जगत् नही है,' मर्प फेक्स नौरको उपशम होने के लिये ही मानमे योग्य गिना पा सकता है। इस प्रकार इन तीन प्रभोका सचिस समापान सिसा है, इसका शेषरूपसे विचार करना । कुछ विशेष समाधान करनेकी श्या हो तो किसना। मिस प्य रम्प-उपशमकी नादि हो, हाम्में तो उसी तय करना चाहिये । (२) बैनदर्सन मिसे सप्रकारकता कता है, शान्त उसे म्यापकता करता है। 1-पर बात किसी ४२१ बर्ण, वापान पुरा गरी १९५. बब-पियोंका उपशम करमेके लिये और निति करनेके लिये मातको बम्पास-सतत बम्पास-करमा चाहिये, क्योंकि बिना विचारफे, बिना प्रपासके, उन रचियोंका उपभम वपचा निापि किस प्रकारसे हो सकता है। कारपके बिना कोई कार्य होना सभा महो। तो फिर पदि इस बोलने उन पतियों के उपशम अपना निति करनेवई उपाय न किया है, वर्षात् उसका वमान म तो पर बात स्परस्मसे संभव है । बहुत बार पूर्वकामें परियोंके उपशमका तपा निधिका गोलने पमिम्मान किया है परन्तु उस प्रकारका कोई साधन नहीं दिया, और अबतक मी उस क्रममें गीत सपना कोई ठिकाना मही करता अर्थात् वमी मी उसे उस अम्पासमें कोई रस दिखाई न देता । तपा कामास माम होनेपर भी उस कावासके उपर पैर रसफर, यह बीच सपश्चम-निदिमें प्रवेश नहीं करता । इस बात का इस दुए-परिणामी बार बारम्बार विचार करना चाहिये- मी तय विस्मरण करने पोप म । मिस प्रकारसे पुत्र बारि सपनिम इस गीतको मोह होता है, प प्रकार सर्मपा मारत और निंदनीय है। परि जान नरा मी विचार करे तो स्पन माम हो पाप कि इस गोपने किसी पुत्र- फ्नेको मान्ना करके सपने बाहित करने में कमी नही रस्सी वीर किसी पिचमान मानकर मी पैसा ही किया है और कोई चाल वर्मातक तो पिता-पुत्र हो सब ऐ या देखा नहीं गया । सब पते हो करते माते है कि पहसका पुत्र है पा सच पिता है परस्त विचार करनेसे स्पा माम होता है पर बात किसी मी कामें संमत्र नहीं । वनुपम इस मोनको पुत्ररूपसे मानना, अपचा उसे मनमानेको रग मना पह सम नानकी माता है। और पमहता किसी मी प्रवासे समाधमनार गौरको परना पोम्प नही। जो तुमने मोह मारिश मेवफे विरपमें किय, पोनों भ्रमणका ?--मत्त विनम्नाका है ।शाना मुरुष मी यदि इस तर माचरण करे तो मानके उपर पाल रहने पैसा है, और कस प्रकारसे वातनिद्राची। इस मेरा विचार करके दोनोको सम्मान करना चाहिये । यह बात मासकामें ही बात करमे पोप है। मितमा को उतना तुम बपया सरे दमो मसगियोंको नापिका मनकाशना चाहिये, मौकोरता है।
पर ४२२] विविध पड मारिसंप्रह-२ण्यों यर्प ४२२ मोहमयी, मापात सुदी ६ रवि १९५० (१) इस नौबने पूर्णकालमें जो जो साधन किये हैं, वे सब साधन बाना-गुरुपकी बाजासे किये हुए माश्म नही शेते—यह बात शकारहित माश्म होती है। यदि ऐसा हुआ हो तो गोपको ससार-परिभ्रमण हो महो। बानी-पुरुपको जो माहा है यह ससारमें परिभ्रमण करनेके टिये मार्ग प्रतिषके समान है, स्पों निसे मात्मायक सिवाय दूसरा कोई प्रपोवन मही बौर मारमार्थ सिद्ध करके मी निसको देह केस प्रारम्बके पशसे ही मीद पता है, ऐसे बानी-पुरुपकी माझा सन्मुस बालको केवळ बारमार्पमें हो प्रेरित करती है और इस गीवने तो पूर्वकाठमें कोई बारमार्थ गाना ही महीपरिक उन्टा मारमा विस्मरणरूपसे ही चम्म वाता है। यदि यह वफ्नो कम्पनामाप्रसे वारेमाप साधन करे, तो उसस भारमार्य नहीं होता, बल्कि उन्टा मामाका साघम करता इस प्रकार दुरभिमान उत्पम होता है, यो चीनको ससारका मुरूप हेतु है। जो बात स्वप्नमें मी नही माता, उसे गौर यदि निरथक कन्पनासे साशकार सम्सी माम मे तो उससे कम्पाण नहीं हो सकता । तथा इस जीतके पूर्वकारसे मन रते हए मी पदि पर अपनी काफ्नामाप्रसे हो बारमार्य मान मी हे तो उसमें सफलता म मिठ, पर बात ऐसी जो बिम्पुछ समझ ना सकती है। इससे इतना तो माश्म होता है कि बीचके पूर्वकालीन समस्त मिष्या साधन-कम्पित साश्न दूर करनेके लिये अपूर्ण जानके सिवाय दूसरा कोई उपाय नहीं है, और उसका वर्ष हमारके बिना उत्पम होना समय नहीं है, मार बार अपूर्व पिचार अपूर्व पुरुषकी भारापना किये बिना दूसरी किस तब गीतको प्राप्त हो, पर विचार करते हुए बतमें यही सिद्ध होता है कि बानी-पुरुपकी जा माराधन, पर सिद्धि-पदका सर्वश्रेष्ठ उपाय है और जबस इस बातको जान मानने गता है, तमासे सरे दोपोंका उपशम होना-निाच होना शुरू ऐ गाता है। यौगिनमगबामने इस ओरके बहानको नो नो म्यामपा की है, उसमें प्रतिसमय उसे बर्मत पर्मा म्पपसापी पहा है, मीर पर बनार काममे बर्गत कर्मका न करता वा माया , ऐसा कहा है। पर बात यथार्य है। परनु यहाँ भापको एक शाई है कि तो फिर उस तरह के गनंत कोक निर करनके लिये चाहे जैसा बरपान साधन होनेपर भी अनंत पात्र बीननेर मा उसमे सामता मही मिस सकता। इसच उत्तर या है कि परि सपा पेसा ही होता असा गुमने डिग्या है मा संमर है। परन्तु बिनमगवान्ने प्रकार से जीवको बनत कर्मावर्ग कहा-हवनतमामे कर्मका कसा माता है, ऐसा कहा है। परन्तु पर नही करा कि मा प्रतिसमप, गो बनन कामतक भोगना पो ऐमे कर्मको भागामी काट के रिपे उपान करता है। किसी गैरकी गोशामे इस साल र रमार, निवार को पेमा पहा है कि सप फर्माका भूत सो वहान-माइ परिणाम है, ए ममी और ऐमान प्रमाण मार, रिस परिणाममे उसे बनत परतक परिभमा दुमा और परि पर परिणाम वमी भी पा भीमद् सचम्द्र [प ४२१ करे तो वी मी उस ही तय बनत कातक परिभ्रमण पता पछा नाप। अमिक एक समिगमें इनी सामर्प फिर समस्त स्मेकको जा सकता है, परन्तु उसे वैसा पैसा संयोग मिझता है, से पैसे तस्य गुण फळपुक होता है। उसी क्याम-परिणाममें बाल वनानि काम्से मका या है तथा संमत्र है कि नमी बनत कातक मी चौदा गोकमें प्रत्येक प्रदेश उस परिणामसे मनव मन्म-मरम होना समय हो। फिर मी विस तापमाका वमि सपोगके वाधीन है, उसी तय कारके फर्म परिणामका मी कोई प्रति होती है। उत्तरसे ठहए यदि एक नाव मोहनीय कर्मका पर हो तो सचर कोनाकोपर्यातक हो सकता है, ऐसा निनमगवान्ने कया है। उसका हेतु पर कि परिचालको वनत कामका बंपन होता ऐ तो फिर जीवको मोझ हो म । या यदि वमी निरन एमाणे, परन्तु गमग नाच होनेके लिपे वाया हो, तो फराचित् उस प्रकारको सो स्पितिका मंच दोना संमन है, परन्तु इस प्रकारके मोहनीय कर्मको-निसको कामस्थिति पर की है-एक सम्पमें वरिक योपना समय नहीं होता। अनुमसे वावक उस कर्मसे निच होनेके पहिले सब उसी स्पितिका कर्म बाँचे तपा दूसरे के नित होनेके पहिले तीसरा कर्म मंषिपरन्तु दूसग, वीसरा, पाया, पाँचों का स तब सबके सब कर्म एक मोहनीय कर्मक सर्वपसे उसी स्पितिको मापते में ऐसा नहीं होवा । पोंक मलको इक्ना काम्न नहीं है। इस प्रकार मोहनीप फर्मको स्पिति है। तथा मापु कर्मक स्पिति प्राधिनमगवान्ने इस वय कहो कि एक मात्र एक दहमें पते र, उस देशको मितमी बापु है उसके तीन मामिसे दो मा म्यतीत हो जानेपर मगामी ममको वाम गाँपता , उससे पहिस मही पाता । तपा एक भवमें भागामी कामे दो मोकी नाम नही पता, ऐसी स्पिति है। वर्षात् नीरको मान-मालसे का समय पाना या फिर मी उन काँध स्पितिके कितनी मी बिमारूप होमेपर, धर्नेत दुसवार मका व होनेपर मी मिस मिसमें गौर उस्से नि हो उठने वमुक प्रकारको निकाल दमेपर सब अबकाय हो मनकाश है। इस बायको मिनमगचन्ने बहुत सूक्ष्मरूपसे मा है उसका विचार करना योम्य है, जिसमें नीषको मोपका जगभरा करकर कर्मवर कहा है। पर मात वापको सक्षेपमें रिसी। उसे फिर मिरसे विचार करनेसे पुण समाधान होगा बौर क्रमसे अपना समागमसे उसका एकदम समाधान हो बाफ्गा यो ससंगरेप कामके बहमनेका प्रपा उपाय है। सब का पुराने कामके गाने अत्यात फटिन छारे या सर्वया सिौर म्पो म्यो हाना बचना बगाइन रोगों त्यो कुमकुछ करके पीछे हटनेसे मनुमसे मोरा नार्म प्रबर होकर चाक्से कामको सामर्पको मास करता है। बावने बानी-पुरपके पचन सुनकर काम सकप ही नहीं गाना वीर परि पाना होत्य तो उसी उस विषयमें सपा मरसता हो गई होती। (२) नमो भिमान मिदमार्ण विसी प्रत्यय दशा हो पोषस्म है, उस मसान् पुरुपये पम्प है। बिस मठमेरसे पर गीत प्रस्त हो याही मतमेद उसके स्वरूपच मुल्स मारण है।
पर ४२५] विविध पत्र मादि संप्रह-२ौ बर्ष पीतराग पुरुपके समागम बिना, उपासना बिना इस जीवको मुमुभुसा कैसे उत्पम हो' सम्पमान कास हो। सम्यदर्शन कासि हो । सम्पचारित्र कसे हो ! क्योंकि ये तीनों वस्तुएँ बम्प स्पानमें मही होता। हे मुमुक्षु । बौतराग पुरुपके मायके समान यह वर्तमान कार है। पौवराग-पद पारंवार विमार करने योग्य है, उपासना करमे योग्य है, मौर म्यान करमे योग्य है। ४२३ मोहमयी, मापार सुदी १५ भौम १९५० प्रश्न – मगवान्मे ऐसा प्रतिपादन किया है कि पादर राजू सोको कायके पुरको तरह सूक्ष्म एकेन्द्रिय वीर मरे हुए है। ये मौष इस तबके करे गये। यो जगनेसे बन्द नही, ऐ मेसे रिदते मही भोर मारनेसे मरते नहीं। उन गीयोंके भागरिक शारीर मही होता, स्पा इस कारण उनका अग्नि मादिसे म्पाघात नहीं होता । अथवा गौशारिफ शपैर होमेपर भी क्या उसका अग्नि वारिसे म्यापात मही होता है तथा यदि वारिक शरीर हो तो फिर उस शरीरका अग्नि बारिसे क्यों म्पायत नहीं होता! इस प्रयको पड़ा। विचार के लिये उसका यहाँ सक्षेपमें समाधान लिखा है। उत्तर --एक देहको स्पागकर दूसरी देश धारण करते समय जब कोई गौन यस्तेमें यता, उस समय अपना अपर्याप्त वस्या उसे केस तैयस और फर्माण पे दो शरीर होते हैं बाकाफी सामवस्थामि बर्षात् कमसहित स्पितिमें सब जीवोंको मानिनमगवान्ने फर्माण तेयस, तपा वीरिक अपना क्रियक इन दो शरीरों में से किसी एक परीरकी समातमा बताई है। केस मार्ग, एनेवाले चौरको कार्माण और बस ये दो शरीर होते हैं, अपना जबतक जावकी भपाप स्थिति तबतक उसका कार्माम भार तजस घरीरसे निर्वाह हो सकता है, परन्तु पर्यत यति उसक नियमस तीसरा पायर होना समय है। आहार आदिके प्रहण करमेरूप टीक टोक सामर्पका होना, यह पर्यन स्पितिका लक्षण है और इस बाहर वादिका वा पुण मी ग्रहण करना पतीसरे शयरका प्रारंभ १ पर्याद नहाँसे तीसरा शरीर पुन एमा समसमा पाहिपे । मगवान्म मा सूक्ष्म एकेदिप जीर को, उनका भग्नि मादिसे म्याघात नहीं होता । उन चौके पर्याप मूम एफेन्द्रिप होनेसे पपरि उमके तीन शरीर होते है, परन्तु उनके जातीमा भौतारिक शरीर १, बदलना मरम नबगाहमायुक्त . कि उसे शन मानि म्पर्श नहीं हो सकता । अनि आरिमार स्पूछा , भौर स्पोनिय शरीरका जो सूक्ष्मवा इस प्रकारका है कि निम एक मरेश साप मही हो सकता। मात् या ऐमा कहें कि परि उना साधारण मध दो, वामी मनिराम मा में जो नाकाश है, उस मकाराममे उन एपेत्रिय गीगेंग गुगमनाम गमनागमन हो सफलेके कारण, उन गायोग माग से सके, अपच उमय म्यागत रामपा उस प्रकारका उपनि . - " भीम पवाद [पा ४२४ रात भारिका संपन हो, यह नहीं होता । यदि उम चौधोको स्यूट मगाइना हो, वपना ममि बालिका वापत सूक्ष्मना हो, बिससे उनकी मी एकेन्द्रिप और जैसी सूममता गिनी भाप, तो ये एकेन्द्रिय गोषका प्पाघात करनेमें समर्थ गिने गय, परन्तु पैसा तो है नहीं। यहाँ वो पोका अस्पत समान है, और अनि शस माविका करपत स्पस्त है, इस कारण उनमें म्यापात करने योग्य संबध मही होता, ऐसा भगवान्ने का है। परन्तु इस कारण वारिक शरीर बरिनाशी कहा, यह बात मही है। उसक समारसे अपधारम होनेसे अपना उपारित किये हुए उम पानों के पूर्वकर्मक परिणामसे बौदारिक पारीरका नाश होता है। शायर का दूसरेसे मारा किया गाप तो ही उसका नाश हो, या मो नियम नहीं है। यहाँ धसमें म्पापारसमंत्री प्रयोजन गता इस काम करत हो पोरे समपके लिये भी निकला सक्ना कटिन है, क्योंकि प्रसंग इस प्रकारका है कि मिसमें समागमके बोग मेरी मौजूदगीको बार पक समझते हैं। उनके मनको पोर न पहुँच सके, अपना उनके काममें यहसि मेरे दर को गानेसे कई प्रबल हानि न हो सके, ऐसा पासाप होणे पसा करके पोडे समपके लिये इस प्रविसे मा- काशनेका पित है। परन्तु मात्र तरफ बानेसे अगर परिषयमें खाना जरूर ही संमा रोगा, इसलिये उस तरफ मानेका पित होना कठिन है। इस प्रकारका प्रसंग पनेपर मा परि ठोगोंक परिचपमें धर्मक प्रसंगसे वाना पो, तो उसे विशेष शंका योग्य समझकर भैसे बने तेसे उस परिचपसे धर्म-प्रसंगके मामसे विशेषरूपसे दूर बनेका दीवित या करता है। जिससे परम्प-उपशमके बझी पहिरो, उस प्रचारफे ससग-मराका परिचय करमा, पर चौरको परम हितकारी है। दूसरे परिचपको पैसे बने से नाप करना ही योग्य है। ४२४ बर्मा, मागम सदा ११ १९५. योगवासिष्ठ बार प्रयोक बाँचने-विचारनेमें कोई दूसरी भाषा नहीं। हमने पहिले विमा पाकि उपदेश-अप समझकर इस प्रकार के प्रयोंके बिचारमेसे जीपको गुण प्रगट होता है। प्राय से प्रेप परमप और उपशमके छिपे हैं । म्पुरमसे मानने योम्प सिमात-बानको मानकर पारौ सरसता, निमिमानवा मादि गुमोके पास होनेके सिपे योगवासिड, उत्तराष्पपन, महतांग बारिक चार में ई बारामही, इतना स्मरण एना। बेभीर मिन- सित इन दोनों में बना प्रारसे भे। रेत कामसमरामे स स्थिति परता. विमागममें उससे मिन ही सपना गया है। समपमार पाते हुए मा बानसे गाबोकर एक पकी मापताम सित हो मान्य है। गत गमंगम ना रम्य भार उपसमझा र शिपमपमे पानेफे पधात् सिमतिका पार करमा पाहिष । पपिमा नरिया गाए तो गरमो माम माम्प होकर मय और उपशमसे न नागना। पसमय कीबार परनेमें बाधा नही अपरा अनेक मारमा पत्र ४२५, ४२५, ४२.] विविध पत्र मादि संप्रा-२७वा वर्ष करनेमें भी माधा नहीं । तुमें तथा दूसरे किसी मुमुभुका मात्र अपने सम्पका नानना ही मुम्प कम्य है, और उसके गाननेके शम, तोप, विपार मौर ससग पे साधन है । उन साधनों के सिद हो बानेपर बौर परम्प-उपशमके परिणामकी दि होनेपर हो, 'भारमा एफ' है वयया 'वामा बनेक है, स्पादि मेदका विचार करना योम्य है। ४२५ पई, प्रावण सुदी ११, १९५० नि सारताको मयतमपसे जाननेपर मी म्पबसायका प्रसग वाम-मीर्यको पुछ मी मदताका ही कारण होता है, वह होनेपर भी उस म्यासायको करते है । मो मामासे सहन करने योग्य नही, उसे सहन करते हैं। यही बिनती है। ४२६ बम्बई भाषण मुदी ११, १९५० मिस तय धारम-बल अप्रमादी हो, उस तय ससग-सनाचमका समागम नित्यप्रति करमा योग्य है। उसमें प्रमाण करना योग्य नही-बबप ऐसा करना योग्य नहीं। . ४२७ बाई, श्रारण बी १, १९५० जैसे पानी के स्वमारसे शीतल होनेपर मी उसे यदि किसी बरतम रसकर नारे यामि नसती हुई रस दी गाप, तो उसकी इच्छा न होनेपर भी यह पानी ठप्ण हो जाता है, उसी तए पाप्यवसाय भी समापिसे शीतल एसे पुस्पके प्रति उष्णताका कारण होता है, यह बात हमें तो स्पर जाती है। वर्षमानस्वामीने गृहपासमें ही पह सर्व म्पसाप मसाल है-करम्पलप मही-ऐसा जान छिया था, तथापि उन्होंमे उस गृहमालको स्यागकर मुनि पर्या प्राण की थी। उस मुनिस्वमें मी भाम बउसे समर्प होनेपर मी, ठस बड़की अपेक्षा भी मत्यत भरिक बळकी नवरत है। ऐसा जानकर उन्होंने मौन भौर मनिद्राका सगमग साने वाय पर्पतक सेवन किया है, जिससे म्पासापहप मि तो माप पैरान हो सके। जो वर्षमानस्थमा गृहबारमें होनेपर मी अमोगी से पे-अम्पबसायी से पे-नियर थे- और सान समारसे मुनि से पे-जामस्वरूप परिणामयुक पे, पवमानस्लामी सर्व म्पपसापमें भसा. रता मानकर---पौरस्ता मानकर मार रहे, उस म्पबसायको करते हुए मरे जीवन उसमें किस प्रकारसे समाधि रखनेका चार किपा है, या चार करने पोम्प है। उसे मारकर निर शिरसे उस पर्याको प्रम्पक कार्यम, प्रत्येक प्रालिम, स्मरण करके म्पमायके प्रमगमें रहती ई इस रुपिका माग करना ही योग्प है। पी एसा म किया जाय तो प्राप करके पमा रगता है कि अभी इस जाकर मुमभु-प में पपापोग्य बभिवारा मही , भपना यह गौर मात्र छोर-संशाम ही कम्याग से जाप, इस प्रकारको मारना करना चाहता है। परन्तु उसे कन्याग करनेको अभिडाग करना याम्य महा है, क्योंकि दानों दी जावोंके एक्से परिणाम हों और प्रभा, सरेका र न , प्रेमा निम्तमें भी होना पोप नही। - भीम रावचम् [पत्र ४५८,४१९,४१,४१ ४२८ श्रीमान् महावीरस्वामी बैसोंने मौ वासिर पद रसकर गरबासरूपका बेदन किया, गृणाससे निहार होनेपर मी सारे मर (बरस) पैसे दीर्घ कासतक मौन रस्ता, निद्रा मेषकर निपम यह सहन किमे, इस स्या है! और यह गौष इस प्रकार बर्ताव करता है, तपा इस प्रकार का है, इसका क्या है। यो पुरुष सद्गुरुको उपासनाके किना व वफ्नो कम्पनासे ही वारम-सरूपका निमय परे पर पिस वपने सदके उदयका मेन करता है ऐसा विचार करमा योग्य है। नो चीर स्परपके गुणका विचार न करे, भार वपनी कम्पमाके हो बाभपसे पसे, म मौन सनमात्रमाननि उत्पम करता , क्योंकि यह अमर होनेके किसे नहर पाता है। ४२९ बम्बई, पापण दी ७ १९५० तयारी भोर मरे मुमुक्ष लोगोंकी वितक दशा माश्म को है।बानी-पुरुषोंने मप्रतिबनवाये ही प्रधान मार्ग का है और सबसे मप्रतिवर दशाका पारसकर ही प्राति गती, तो भी सत्संग मादिमें नमी हमें मी प्रतिबर दुति रहनेका हो चित्त बताए । हामें हमारे समागमका प्रसग नही । ऐसा मानकर तुम सब माईपोको, निस प्रकार से भीगो शांत दातभाव उस्त हो, उस प्रारसे गोपन वादिका समागम करना योम्य है-या बात करने पोम्प है। ४३० बा, बारण बदी ९ शनि १९५. चीवमें मिस तण त्याग पैरम्प बोर उपशम गुण प्रगट हो-उरित हों, उस क्रमको सममें रममेकी जिस पामे सूचना सिपी पी, पा फन प्राप्त मा है। नयतक ये गुण गौमें स्थिर नहीं होते तबतक मोबसे पपार्परूपसे बारमस्वरूपका रिसेप विचार ऐना कठिन है। वरमा स्मी या मरूपी' इत्यादि किम्पोंका जो उससे पहिले ही विचार किया जाता है पर काफ्ना जैसा है। बीच पुन मी गुप्प प्राप्त करके परि शाता हो माय तो फिर उसे विशेष विचार करना पाहिपे । माम-दर्शन मादि प्रसंग, तीन मुमुक्षुताके तापम होनेके पहिले प्राय करके कस्पितरूपसे ही समसमें बाते है। मिस्से हाम्मै इस विषयको सकाका सात करना ही पोप है। ४३१ मर्थ भावण बदौ ९ शनि १९५ (१) प्रारम्प-पासे प्रमाको पाएँ विशामोंके वासे सम्पासामुळ कार्य होते है। परत पिके परिणामके साधारण प्रसंगमें प्रति करते हुए विशेष संकुचित एमेके कारण, इस प्रकारका पत्र मादि मिहना बगैय नहीं हो सकता, निससे अधिक नहीं मिला, इसलिये दोनों जमे सम्म करें। (२) इस समय पिसी मी परिणामको बारे भ्मान मा।
पर ४११] विषिष पर मादि समह-ज्या वर्ष ४३२ बमाई, श्रावण वदी १५ गुरु १९५० में कुछ शान-वाचक प्रसगमें उपकारक प्रश्न उठते है, उनें तुम हमें निम्नकर सचित करते हो, और उनके समाधानको तुम्हारी विशेष इच्छा राती है। इससे किसी भी प्रकारले पनि सुम्हें उन प्रश्नों का समाधान लिम्बा गाय तो ठीक हो, यह पिघार विमें पते ए मी उदय-योगसे देखा नहीं बना । पत्र लिसनेमें पित्तका स्पिरसा बहुत ही कम यती है, अथवा विच उस कार्यम अम्पमात्र अया जैसा ही प्रवेश कर सकता है। जिससे हमें विशेष विस्तारसे पत्र मही विण्डा नाता । चिवको म्पितिके कारण एक एक पत्र छिमते हुए दस-दस पाँच-पाँच बार, दो-दो चार चार छान लिखकर उस पत्रको वध्य छोड़ देना पाया है। क्रियामें रुचि नहीं है, तथा हाछमें उस क्रिया प्रारम्भ-बसके मा विशेष उदययुक्त मोनेसे तमें तथा दूसरे मुमुक्षुओंको विशेषरूपमे कुछ शान चर्चा नहीं सिसी मा सकती। इसके लिये चित्तमें सेट या करता है, परन्तु हायमें तो उसका उपशम करनेका ही पित पवा है। हायमें इसी तरहकी कोई वाम-दशाको स्थिति यती है। प्राप जान-बूमकरके कुछ करने में मही माता, मर्यात् प्रमाद भा िदोपके कारण पर क्रिया नहीं होती, ऐसा नहीं माश्म होता । समपसार प्रयको करिता मादिका तुम जो मुप्सरससबषी ज्ञानविषयक भर्य समसवे हो यह पैसा ही है। ऐसा सब जगह है, ऐसा करना योग्य महा। पनारसी सिने समयसार प्रथको हिन्दी मागमें करते हुए बहुम्से कवित, सपैया बगरमें उस प्रकारकी ही बात कही है। और यह किसी तरह पीन पानसे मिकती हुई माझ्म होता है फिर भी कही करी उस प्रकारके शाम उपमानपसे भी जाते हैं। बनारसारासमे जो समपसार बनाया है, उसमें महाँ यहाँ ये शय आपे हैं यहाँ वहाँ सब गहरे उपमाम्म हो, ऐसा माश्म मही होता; परन्तु बहुतसी जगह ये शरद बसुनपसे करे हैं, ऐसा मालूम होता है । सपपि परमात कुछ बागे पम्नेपर मिल सकती है, वर्षात् तुम जिसे बीम-मानमें कारण मानते हो, उससे पुए आगे बाती ई बात अपय यही बात उसमें विशेष हानसे मंगीकार कोई मारम होती है। उनकी समयसार प्रयको रखमाझे ऊपरसे माइम होता है कि बनारसीदासफो फोई उस प्रकारका स्पाग बना होगा। मूस समपसारमें माननानके पिएपमें इतनी मधिक स्पर बात कही हुई नही माझ्स ऐती, और बनारसीशसने तो बहुत नगर बस्तुमापसे भार उपमारपसे बह बात की है। बिसके उपरसे ऐसा माइम होता है कि बनारसी सको, सायमें अपनी मामा रिपपने जो बुरा अनुमामा ६, उपौने उसका भी पुरा उस प्रफारसे प्रकाश किया है, जिससे यह बात किमा RE जीके मनुमनको वाधारभूत हो-उसे विशेष स्थिर करनेवाली हो। ऐमा मी सगता है कि बनारमोदासने उसण भारिप मेस जोरफा विशप थप किया था, और उस उस सक्षम वादिके सतत मनन होते रहनेमे, उनके वनुमहमें बाम-सरप कुछ तीमगरपसे मापा है और उनको अम्पतरएमे माम-सम्पफा मी म मा । और उम मप्पट PAR उन्दोन उस बोगसमको गापारे । अपळ Pya वर्ष पणे पद है कि पिचमासिक पिएस माम-रिवार टगे एलेस, बनारमीको दिम अधर्म परिणामरी निर्मः पारा प्रसाई भीम परवद्र [पर ४१२ है, उस मिर्मस पारफेसरण वपना निजका यही द्रम्प है, ऐसा यति स्पष्ट पाममेमें महाभापा, ते मी बस्परूपसे मात् सामाविकरुमसे मी नमक वात्मामें पाया मासमान, मौर निस करम या बात उनके मुससे निकल सकी, वीर बाग पाकर यह बात उमें सहन ही काम स्प हो गई दो, प्राप दमकी ऐसी दशा ठस प्रपके सिस्ते समय ही है। मागरके मंतरमें चोद या है, पर किसी प्रकारसे योग्य हो,ौर पर सेव प्राप राम मी हा करता है, ए हमारे माननेमें है। क्या दूसरे मी बहुतसे मुमुम बानोको इस प्रकारका से या करता है। या बालनेफ्र मी और 'तुम सबका या सेद र किया जाय तो को ऐसा मगम रामेपर मी, प्रारम्बका बेदन करते है।तपा हमारे चिचमें इस विवपमें अस्पत कमान से गता है। गो सेद दिनमें प्राप मनेक प्रसंगोप सुरित वा करता है और उसे सपशात करना पता है और प्राय तुम सोगोंको भी हममे विशेषरूपसे उस सेवके रिफ्पमें नहीं मिसा- अपना नया बतापा । हमें उसे वताना मी योग्य नही गा पा । परन्तु हामें माइगरके पनेसे प्रसंग पाकर उसे बताना पड़ा है। तुमें वीर रंगरको गोद पता है, उस विषयमें हमें उससे मां- म्पात गुणविशिष्ट सेव पता होगा, ऐसा गता है।स्पांकि रिस मिस प्रसगपर परमात बारम-प्रदेशमें स्मरण होती है, उस उस प्रसगपर समस्त प्रदेश शिथिल से ऐ बाते है, और पाका 'मिस्प समान ऐनेसे, गाव इस प्रकार र करते [ए भी जाता है इस प्रकार तकपद होता है। रि परिणामांतर होकर पोरे पक्काशमें मी उसको पात प्रमेक प्रदेशमें पुरित होकर निकलती है, और वैसीको पैसा हो रश हो नाता है। फिर भी मामाघर भत्पत पनि करके उस प्रकारको एल्में तो उपशान्त करना ही योम्प है-ऐसा चानकर उसे उपरान्त किया जाता है। मोगरफे अपना तुम्हारे विमें पदि ऐसा होता हो कि साधारण कारणों के सबसे हम इस प्रकारको प्रापि नही करते, तो र योग्य नहीं है। पदि यह तुम्हारे मनमें पता हो तो प्रापा पैसा मही है, ऐसा हमें प्राव। निस्यप्रति उस बातच विचार करने मी उसके साप वमी मम्मान कारणों का संबंच ऐस गानकर मिस प्रकारको तम्रा रा प्रभाषके में है, उसको मन्द करना परता है। वौर उसके रोषक कारणोंके क्षीण होने देमेमें वात्म-वार्य कुछ मौ फर्गमूत होकर सस्पिनिमें यता है। हारी इमो मनुसार हाम्मे भो प्रवृत्ति नहीं की गाती, उस दिनपमें मो मम्माम कारण बरोधको उनको में विशपससे बतानेका पित नहीं होता क्योंकि अमी उनके विशेषरूपसे मतानेमें बपनाको गाने देना ही पोम्प है। जो बसपान कारण प्रमावके हेतुके अवरोधक है, उनमें हमारा पुद्धिपूर्वक कुछ मी प्रमान हो ऐसा किसी मी तय संभव नहीं है । तपा बम्पपसे नर्यात् मही माननेपर मी मो गारसे सबमें हमा करता हो, ऐसा र्य प्रमा' यह मी माम महीं होता। फिर मौ किसी में सस प्रमारको संमत्र समजवे हुए मी उससे मारोपकता हो, ऐसा मान से सके या पाच नोकि मामाकी निपप पि उसके ममुरा नहीं है। गोगोंमें उस प्रतिको करते हुए मानभंग होनेच प्रसंग बाये तो उस मनगपके सामन हो सकमेरे कारण प्रमानके हेदकी उपेक्षा गाती । ऐसा मी नहीं लगता क्योंकि उस माना।
प४५] विपिप पत्र मादि संग्रह-२७ओं वर्ष मानमें प्राय करके चित उदासीन जैसा है, अपना उस क्रममें पित्तको विशेष उदासीन किया हो, तो हो सकना संभव है। हाद वादि विषयों के प्रति कोई मा बछवान कारण बरोधक हो, ऐसा मी माश्म न होता। पपपि यह करनेका प्रयोजन नहीं कि उन पिपयोंका संथा क्षायिक माप हो, फिर भी उसमें बनेफ रूपसे नौरस्ता भासित हो रही है। उदयसे मी कमी मदरुषि उत्पम शेती हो, तो मा मी विशेष अवस्था पानेके पहिले हो नाश हो जाती है, और उस मंद इपिका पेदन करते हुए मी मारमामें सेट होगता मर्यात् उस रुचिके बापादान होती जानेसे प मा बनाम कारणरूप नहीं है। दूसरे दौर मी वनेक प्रमाक पुरुप हुए हैं, उनको वपेशा किसी रेसिसे हममें विचार-दशा धादिका प्रासाप ही होगा। ऐसा माता है कि उस प्रकार के प्रभावक पुरुप वान माश्म मही होसे; और मात्र उपदेशकस्मसे नाम वैसी प्रमाक्नासे प्रवर्तन करते हुए कोई कोई भी देखने-सुननेमें माते हैं। उनकी विधमानताके कारण हमें कोई बरोधकता हो, ऐसा मी माश्म नहीं होता। 1 बर्मा, मात्र सुदी ३ रवि १९५० मारको बानी-पुरुपको पहिपान होनेपर, तपाप्रकारस बनतानुपी कोष, मान, मापा, मोमका शिपिठ रोमा योग्य है, जिसके होमेपर बनुकमसे उस पप होता है। मों ग्पों जीनफो स्वरुपकी पहिचान होती है, स्पों त्यो मताभिप्रा, दुराम वा मात्र शिथिल पाने लगते हैं, बार वपने दोषों को देखनेकी बोर पित्त फिर गाता है, विक्रया बादि मात्रमें मीरसता मगने म्गती, या सुगुप्सा उत्पम होती है। पात्रको बनिस्य वादि मानाके चितम करनेके प्रति, बल्याक एरित होनेमें मिस प्रकारसे बानी-पुरपके पास उपदेश सुना है, उससे भी विशेष सम्मान परिणामसे या पध विषय बादिमें बनिय बाPि मारको रस करता है। पर्यात् सत्पुरुषके मिळमेपर, यह सपुस्प है, इतना गानकर, सपुरुषके पाननेके पहिले मिस तर वारमा पचविषय वादिमें भासक पी, उस वह उसके पचात् पास नहीं रहता, मौर बनुकमसे निससे पर भासवि-मा शिथिस पो, इस प्रकारके रम्यमें जान प्रवेश करता है। नया स्पुरुषका संयोग होने के पचात् वामशान को दुर्गम मही है, फिर भी पुरुपमें-उसके वचनमें-उस पनके मास्यमें, पबतक प्रीति-मलिनो तबतक गौतमें वाम-विषम मी प्रगट होना पोम्प नही मोर सत्पुरुपका भीवको सपोग हवा है, इस प्रकार टोक टोक गोषको मासित एमाले, पसा करना मी कठिन है। गौरको सत्पुरपका संयोग मिसनेपर तो ऐसी भाषमा होता है कि अबतक मेरे जो प्रपन कम्पाणके लिये पे, सानिमल थे-सशके विमा छोरे ए बाम तप पे, परन्तु मा सपुरुषका भपूर्व सपोग मिग है, तो ए मेरे सब साधनोंक सम्म होने त है। लोक प्रसंगमें । कर बबतक जो निगम-मरहित साधम झिपे हैं, पब उस प्रकार से सत्पुरुपके सपोग, म करते है सहर बवर-भामा चारकरस परिणाम रखकर, गोपको इस सपोग-धनमें जागृत होना योग्य भीमद् पस्चन्द्र [पा ४५४,४१५ है-बागृत गना पोम्प है और उस उस प्रकारसे भावना करके गौवको रद करना चाहिये, जिससे उसको प्राप्त हुना सपोग निफ म पण बाप, भार सम प्रकमसे मामा यही बहभाना चाहिये कि इस संयोगसे बोलको वर्ष फरका होना योग्य है। उसमें मतपय करमेना- " में बानता पर मेरा अभिमान, बुल मर्म, और दिसे करते हुए पसे बाते है उस किसान कैसे त्याग किया जा सकता है, पेसा शेष-भय, सत्पुरुषको मति पादिमें मी गैविक मात्र वोर कदाचित् किसी परिपपाकार फर्मको बानीके सदसमें देसकर उस तयके भाषा सर्व मापन करना "-पारि चो मेद, यही बनवानुवपी कोप, माम, माया, ओम है । इस मेरको विशेपम्पसे समपना पाहिये। फिर मी इस समय बितना दिसा गा सका उतना पिसा है। उपशम, पयोपशम और धायिक सम्पपके किये संक्षेपमें गो पामा बनायौ, उससे मिराठी ई पाल्पा के स्मरणमें है। नहाँ जहाँ इस नाम्ने रन्म लिया है-ममके मप धारण किये जायाँ तयाप्रकारके बमि मानसे ही इस गाने पाचरण किया है-विस बभिमानको निात किये बिमा की इस गारमे उस उस देश और दहके संबंध आनेवाले पदार्थाचा त्याग किया है। वर्षात् वातक उस मानको सस शान-रिचारके द्वारा नए नही किया, पर ऐसे पूर्व सना इस गोषके वभिमानमें नमी सोको वैसी ही पती पती वानी है --पही इसे समस्त छोकको अभिकरण क्रियाका ख का है। ४३४ बर्मा भन्न मरी सोम १९५० कमार साहसके दो पद और पारिनसागरके एक फरको ठमोंने निर्भयतासे घा, पाये हिमा है उसे पढ़ा है। चारिप्रसागरके उस प्रकार के पारसे प पहिसे मी परनेमें गाये है। इसी निर्मप बानी मुमुक्षु गातको प्राप धर्म-मुस्पाम बठमान बनाती है। हमारे शाप उस प्रकारके पर बना काम्प रप हुए देख्नेको जो तुमारी इहै उसे हमें उपशात करना मोम्पहै। पोलि ताम्मे पैसे पर धने-विचारने नपा कमानेमें उपयोगका प्रदेश मही हो सस्या-पापा समान मी प्रमही हो सकता। ४३५ मई मात्र ११ सोम १९५. जना रिपमानता प्रमाणे धतुमे मो शेप विज्ञासा है, और परिबर रेतु उपभ हो तो दगा भतार ल उपगा उस Aविज्ञासा और असीम हसिपी तुमारित सिका हम ममतने है।
पत्र ४३५]] विविध पत्र मादि समा-२७वर्ष न्या अनेक जीवोंकी वान दशा देकर-सपा ने चीन कफ्ना मत्पाण करते है अपना अपना कल्याण होगा, इस प्रकारको माक्नासे अयवा इसे, उने बान-मार्ग प्राप्त करते हुए देसकर--- उसके म्पेि मस्यंत करुणा होती है, और किसी भी प्रकार से इसे दूर करना ही योग्य है, ऐसा ऐ माता है। अपवा उस प्रकारका मात्र पिचमें वैसाका पैसा ही पा करता है, फिर मी पा बिस प्रकार होने योम्प होगा उस प्रकारसे होगा, वीर मिस समय पर बात होने योग्य होगी उस समय होगी- बात मी चिचमें रहा करती है। क्योंकि उस करणाभावका चितवन करते करते मास्मा पाप माहात्म्पका सेक्न करे, ऐसा होने देना योग्य मही, और नमी कुछ उस प्रकारका मय रखना योग्य माता है। हाम्में तो प्राय दोनों ही बातें निस्प विचारनेमें जाती है, फिर मी यात समीपमें उसका परिणाम बाना समष नहीं मालम होता, सम्पि यहातक कना पाक में नहीं मिला अपवा या नहीं है। तुमारी इा होमेसे वर्तमानमें जो स्थिति है, उसे इस सांपमें सक्से किसी और उससे तुम्हें किसी भी प्रकारसे उदास ऐना याग्य मी, क्योंकि हमें वर्तमानमें ठस प्रकारका उदय नहीं है, परन्तु हमारा नाम परिणाम उस उदयको बम्प- काम्में ही दूर परभेकी वोर है । वर्षात् उस उदयकी काल-स्थिति किसी प्रकारसे अधिक सवासे फेदन करनेस घाती हो तो उसे पानेमें हो यती है । बाम माहारम्पको इछा बारमाको बगुव समपसे मी पैसी ही हो गई है। नत् मुनि बाम माहारम्पको प्राय इशा करती ई नहीं माश्म होती, फिर मी बाम माहारम्यके कारण, मीन निससे थोका मी परिणाम भेद प्राप्त म करे, ऐसी स्वस्थतामें हम म्यूनता कानी योम्प है और उससे जो कुछ मप पता है, वह तो पता हो , मिस भपसे परत ही मुक्ति होगी, ऐसा माम ऐसा है। (२) प्रश्न -यपि सोनेकी वाहतियों पुरी बुरी होती है, परन्तु पदि उन भाकृतियोंको बागमें वाम Pया माय तो मे सा माहतियों मिटकर एक केवळ सोना ही भोप रह जाता है, अर्थात् सम पाहतियाँ युगु बम्पत्वका त्याग कर देती है, भौर सब मातियोंकी भातिको समातीयता होनेसे से मात्र एक सोनेरूप बम्पत्वको प्राप्त होती है। इस तर त लिखकर वात्माकी मुहिवार दम्पके सितके ऊपर जो प्रश्न किया है, उस संघमें सभेपमें निम्न प्रकार से कहना पोम्प है। उत्तर: –सोना बौपचारिक इम्प है, पर गिनभगवानका अभिप्राय है। भौर मा यह वनंत परमाणुगोंके समुदायरूपसे पता है, तब मुगोबर होता है। उसके गो जुदा जुदा नाकार बम सफते है, ये सब संपोगसे होनेवाले हैं, और उनका मो पौडेसे एकरप किया जा सकता उधी संपोगयम्प है । परस्तु यदि सोनके मम स्वरूपका विचार करते है तो यह गर्नत परमाणुमोका समुदाय है । यो प्रस्पेक समग असा परमाणु है, वे सब अपने अपने लवपमें ही यते है। कोई भी परमाणु अस्मे स्वरूपको गोकर दूसरे परमाणुरुपसे किसी भी तण परिणमन करने योग्य मी, मा उन सबके समातीय होने के कारण और उनमें स्पर्श गुण होने के कारण उस स्पर्शक सम-विपम सयोगमें उनका मिना हो सकता है, परन्तु मह मिटमा र्य इस प्रकारका मी कि मिसमें किसी मी परमाने पामी ५०० भीमद् पावर [at मप्ने सम्मका त्याग कर या हो। करोड़ों प्रकारसे उन बनत परमाणुरूप सोनेके बाकारोंको परि एक रसरूप को तो मी मे म परमाणु भपने ही सरूपमें एते है, वपने ब्रम्प, क्षेत्र, कार और भालको नहीं छोपते, क्योंकि महोना किसी मी आपसे अनुमबमें नही बा सकता । उस सोनेके मानत परमाणुषोंकी तय सियोको बनत मागहना गिनो तो कोई बाधा नही है, परन्तु उससे कुछ कोई भी मौत्र किसी मौसेरे जीवको साय केवळ एकवरूपसे मिस गपाव बात नहीं है। सब अपने अपने मावमें स्थितिपूर्णकर सकते है। जागरूपसे जानकी एक प्रति हो, इस कारण कोई एक गौष वपनापन स्पाग करके दूसरे गानों समुदाय, मिझार सरपच स्पाम कर दे, इसका क्या है। उनके नियके प्रम्य क्षेत्र, काल, माष, कर्मवध वीर मुनस्पा, ये बनारिसे मित्र है, और परि किर मौत मुख्नस्पाने, उस ब्रम्प, क्षेत्र, काड और मानका त्याग कर के तो फिर उसका बफ्ना सरुम हो क्या हा ! ठसका अनुमत्र हो क्या हा! और अपने स्तरमो मार हो जानेसे उसकी कर्मस मुक्ति अपना अपने सहपसे ऐ मुछि हो गई ! इस भेदका विचार करना चाहिये । स्पादि प्रकार से निनातान्ने सर्पमा एकरलका निपेश किया है। ४३६ वीर्य करने सगको महापरूम कहा, एसप है। इस प्रकारको मिझ गुणस्पान नसी स्थिति कातक रसनी चाहिये ! गो पात पिच मही उसे करना और जो पित्तों है उसमें सदास पना, परम्पसहर किस पयो सकता है। स्प-पसे और निर्मपमापसे यते हुए कोटाकोटी विचार मा करते हैं। देप बौर उस बेपसपी म्पपारो देखकर गोकराशि उस प्रकार से माने पाठक, वौर नियमापसे एनेबाम चित्त उस म्पपारमें पपाप मावि मर सके यह भी सप , इससे इस तबसे दो प्रकारको एक स्थितिपूर्वक बात नहीं किया जा सका । पोंकि प्रथम प्रकारसे यो पए निर्मपमा से उदास बना परे तो ही पपाप म्पबहारको रक्षा हो सकती है, और पनि माक्से में तो फिर या प्यार चाहे जैसा हो उसकी उपेक्षा करना ही योग्य है। यदि उपेमा म को पाप तो नियमानहानि पर बिना न दे। उस म्यबहारके त्याग लिपे बिना वपषा मर्यत बाम्प रिपे मिा पपा नियता प्रा यती, और उदपस्म होनेसे म्बहारका त्याग नहीं किया जाता। इस सब विमान-पोगके बराए बिना हमारा पित दूसरे किसी उपापसे संतोष प्राप्त करे, ऐसा नही पता। पतिमा-पोग दो प्रकार एक पूर्वम निपम बिसा मा सदपस्वस्म, और दूसरा मात्मबुविक एगसरित किपा गाव एमा मानस्वरूप । बात्मभावपूर्ण माणसाची पोगको उपेक्षा ही पस्कर मास होता है। उसका निस्म हो विचार किया जाता है। उस समाररूपसे एनेबारे भाममातो मात कुछ परिपाम कर दिया और बमी मी यो परिवति पा रखी।
पा ४१.] विविध पत्र भारि सप्रह-ज्यों वर्ष ५०१ उस सम्पूर्ण विमाष-योगके निवृत्त किये विना चित्त विप्रति प्राप्त करे, ऐसा नहीं माश्म होता; पौर हसमें वो उस कारपसे विशेष देश ही सहन करना पड़ता है। क्योंकि उदय तो विमार- क्रियाका है, और इन्छा बारममाघमें स्मिति करने की है। फिर मी ऐसा रहा करता है कि यदि उदपको विशेष कारतफ प्रति ये तो वाममार विशेष बघत परिणामको प्राप्त होगा | क्योंकि वारममावके विशेष अनुसंधान करनेका मबकाश उदयकी प्रतिके कारण प्राप्त नहीं हो सकता, और उससे यह माममात्र कुछ शिपिस्ताको प्राप्त होता है। चो वाममात्र उत्पन हुमा है, उस भारममावपर परि मिशेष लक्ष किया जाय तो अन्य कामम ही उसकी विशेष दिये, और विशेष जागृत मवस्पा ठत्पम हो, और योर ही कामें हितकारी उबवाम-दशा प्रगट हो, और यदि उदयकी स्पिसिके अनुसार ही उदय-फाटके रहने देनेका विचार किया बाप तो अब पारम-शियिता होनेका प्रसग आयेगा, ऐसा गता है। क्योंकि दीर्घ कारका नाममात्र होनेसे इस समयतक चाहे जैसा उदय-बछ होनेपर मौ र मामभाष नए नहीं हुजा, परन्तु कुछ कुछ उसको वजागृत बस्था हो जानेका समय वाया है। ऐसा हानेपर भी पर सब केवल उदयपर ही प्यान दिया गापगा वो शिपिळमात्र उत्पन होगा । पानी-पुरुप उदयके वश होकर देहादि धर्मकी निधि करते हैं। यदि इस तर प्राधि कोहो तो आरममात्र नए न होना चाहिये । इसलिये उस बातका में रखकर उम्पफा पेन करना योग्य है, ऐसा विमार करना मी भन योग्य नहीं । क्योंकि शानके तारतम्पको अपेक्षा पनि उदय- बासा मा देखने में वापे तो महाँबानीको मा बहर मागृत दशा फरनी योग्य है, ऐसा भीसने कहा है। पर अस्पत दुपम काहे इस कारण, बार हत-पुष्प लोगोंने इस मरत क्षेत्रको घेर रमा है इस कारण, परम म्ग, सत्सग अपना सरल परिणामी बीयोका समागम मिना भी दुर्सम, ऐसा मानकर से बन्प कासमें सापपान एमा गाप, बैस करना योग्य है। ४३७ पा मौनदशा धारण करनी चाहिये। म्पहारका उदय ऐसा है कि जिस तर बह पारण कोई दशा लोगोंका फपायका निमित्त हो, पैसे म्पबहारको प्रति नहीं होती। तब क्या उस म्यहारको छोर देमा पाहिये। या भी विचार करनेसे कटिन माश्म देता है। क्योंकि उस तरहफी कुछ स्पिनिके पेन कर ने पिच हा करता सिर पर चाहे शिपिस्वासे हो, उ'यस हा, परेमा सवयपा बमा सहन दसा'ससे । ऐसा होनेपर भी वन्य कामे म्पहारक पाने ही पिता पाम्यबहार किस प्रकारसे पटापा जा सगा ! क्योंकि उसका विस्तार विरोपमासे दंगनेमें माना है । प्यापारसम्पम उदा-प्रतिभसे, पुषवस्था प्रतिबभस, दपायल्पसे विकारमसमे, उइयत्ता दया पारगोने पर पपहार पिस्तारहप मारम होता।
४०२ भीमपचन्द्र [४५८,४९,mt मैं ऐसा मानता है कि बब बनतकाम्से अप्रास तरह बारमस्वरूपको ज्यान सम्दान- साससे वर्ममि । उत्पन्न कर लिया है, तो फिर पर्ष-र मासके समय, इवना या म्ममा कैसे म नित हो सकेगा ! उसको स्पिति केस बागतिके उपयोगांवरसे है, और उस उपपेगके सम्मानित्य हो विचार करनेसे काप में पा पार निस्कने योप है। तो भी उसी किस प्रकारसे निति करनी चाहिये, या ममी विशेषरूपसे मुझे विचार करमा पोप है, ऐसा माना हैं। क्योंकि पौर्यसेवी दशा कुछ मंद पती है । उस मंद दशाका क्या है। तापके पसे ऐसा परिचप —मात्र परिचय ही-माप्त एमा, ऐन कामेमें क्या करें या है। उस परिचयको विशेष अति विशेष बाषिराती है। उसके होने पर भी परिचय करना पाहै। यह परिचयका दोष नहीं कहा जा सकता, परत नियका हो दोप मा जा सकता है।बपि होनेसे समास दोप न करकर उदयरूप दोन मारे। ४३८ पात विचार करके निम्नरूपसे समाधान होता है। एकात ब्रम्प एकांत क्षेत्र एकांत का और एकांत मानस्म संयमी नारामा किये बिना विचको शांति न होगी, ऐसा पता है ऐसा मिथप यता है। ठस पोगका ममी कुछ दूर होना संमत्र है, क्योंकि उदपका पासपर उसके निात मोतिक विप समप मोगा । ४३९ मपि मप्पणो विदेहमि, नापरवि ममाइप -(महात्मा पुस्प) अपनी ऐहमें मी ममल नहीं करते । ४४० काम, मान और सदावामी इन वनों का विशेष संपम फरमा पोम्प है। ४४१ रेगा सम्मत मानेगाले इस म्पसापसे मन नितो मान! उस म्यवसापके करनेमें बरे निवना मनान प्रारम्बोदर दिखाई देता हो तो भी उससे निार, मिच! पपि मौसममे ऐसा हापौर गुणस्पानमें एमेवाम पांच मी प्रारम्प देन किये बिना मुछ नही हो सकता, वो मौत उस अफका मारपस्म ऐनेसे अपना दोष नाना उसका सात ठासे विचार करके उससे नाचहरो, निरच!
परm, m] पिपिप पर भादि समाह-ज्यों पप मात्र केलस प्रारम्भ हो, और दूसरी फर्मदशा न यती हो तो इ प्रारम्प सहर ही निच हो जाता है, ऐसा परम पुरुपने साकार किया है। परन्तु या केरम प्रारम्प उसी समय कहा जा सकता है जब प्राणों के वंतता मी निटामेद-टि म हो, और तुसे सभी प्रसगोंमें ऐसा होता है, इस प्रकार चमतक सम्पूर्ण निथप न हो तबतक यही प्रेयस्कर है कि उसमें स्पाग मुदि करनी चाहिये । इस बातका विचार करके, रे चाव ! या तू मन्प कामें से निवृत्त हो, निरच ! ४४२ हे गौर ! वर तू संग-निचिहप काउकी प्रतिमा कर, प्रतिक्षा ! पदि सर्वया संगनिहचिरूम प्रतिषाका विशेप वकार देखने में बापे तो एफदेश सग निजिप इस म्पयसापका त्याग कर। बिस शान-दशामें पग-अस्पाग कुछ मी समय नहीं, उस बान-दशाको मिसमें सिदि, ऐसा सर्वसंग त्याग दशाका पदि माप काठमें ही पेदन करेगा, तो यदि सम्पूर्ण जगत्के समागममें ये दो मी तुझे यह बाधास्म म हो, इस प्रकारसे वापरण करनेपर मा सम्पने निधिको । प्रशस्त कहा है, क्योंकि सपम वादि सब परम पुरुषोंने बतमें ऐसा ही किया है। ४४३ बाई, मात्र मी १० रवि १९५० पा बारममाव है मौर या वन्यमान है, इस प्रकार दोप-बानके वामा परिणमित होनेसे पम्पमा में सामाविक उदासीनता उत्पम ऐती है, और यह उशसौनता अनुक्रमसे उस बम्पमापसे सर्पया मुछ करती है। इसके पथात् जिसने निर मौर परके मानको गान छिपा है ऐसे जानी- पुरुषको पर-मार कार्यका मो कुछ प्रसंग पता है, उस प्रसंग प्राति करते हुए मी उससे उस पानीका समाप छ्या ही करता है, उसमें हिस-धि होकर प्रतिबंध प्रतिष नही होता, या बात एकांत महीं है। स्पोंकि यहाँ बानका निशप प्रावन्य म हो, हाँ पर-भाष ग्रेप परिचपका उस प्रतिस्परूप हो जाना मी समर होता है और इस कारण मी मानिन मगनाम्ने बानी पुरुष के लिये मी निन हानसे सत्रए रखनेगळे पुरुषार्पा बसान किया है। उसे भी प्रमाद करना पोम्प नहीं, बया पर-माल परिचप करना योग्प मही, पोंकिपा मी किसी पसे मात्म-पापको प्रतिस्परेमाने योग्य है। साताको प्रमाद मुदि संमा महा है, ऐसा पपपि सामान्यरुपसे मौविन वादि महामाबोंने पा, को भी उस पदको चौथे गुणस्थानसे संमर नहीं माना, उसे वागे गाकर ही समषित माना है।निससे Aचारपान गौतको तो मास हो वैसे बने तैसे पर-माषक परिचित कार्यस र यमा- निए ऐना हो पोम्प है। प्रापः करके विपरपन गौरको ये भी बाद एक है। At मा पिसा प्रापके पासे भीम रामचन्द्र [पर पर-मानका परिचय बम्बालम्पसे उदयमें हो तो निम्प गुदिमें स्फिर पना कठिन है, ऐसा मानकर निस्प हो निपर होनेको पुरिकी विशेष माझ्ना करनी चाहिये ऐसा महान् पुस्पनि कहा है। कप कामें सम्याबार स्थिति हामे के लिये तो अस्यत पुरुपार्य करके गांवको पर-परिचपसे निच होना ही योग्य है। धीमे पामे नित होने के कारणोंके उपर मार देने मपेक्षा मिस प्रकारसे शौम्यासे निवृत्ति हो गाय उस विचारको करना चाहिये । और वैसा करते हुए यदि असावा वादि भापति-पोगका पेदन करना पाता तो उसका बेदन करके मी पर-परिचपसे शीप्रवासे र होने मर्ग प्ररण करना चाहिये—यह बात भू बामे योम्प नहीं । जानकी मम्मान तारतम्यता होनेपर तो जीतको पर-परिषयमें कमी मी स्वाल्ममुवि होना समय नाही, वौर उसको निति होनेपर मौ बान-मम्मे उसे एकातरूपसे ही विहार फरमा पोम्प है । परन्तु बिसको ठससे निम दशा है, ऐसे जोरको तो वास ही पर-परिचयका मेदन करके ससा करना चाहिये; मिस ससगसे सहरी अम्पावाल स्थितिका अनुमप होता है। बाला-पुरुष-बिस एकादमें विचरते हुए मी प्रतिबध समय नहीं-मी ससंग निरन्तर रमा रमता है। क्योंकि नौवको यदि मन्याबाद समाधिकी दम हो तो सगके समान अन्य ई मी सरस उपाप नहीं। इस कारण दिन प्रतिग्नि प्रत्येक प्रसंगमें पात वार प्रत्येक क्षणमें ससगके बारापन करमेकी पीछा गित मा करती है। ४४४ बर्मा, मन यी ५ गुन १९५ पोगवासिष्ठ वादि यो रो भेष्ठ पुरुषों के वचन है, सब वाालिका प्रतीकार करभेके लिये हो। बिस मिस प्रकारसे अपनी भाति कपित की गई है, उस उस प्रकारसे वस भतिचे समाचार तस्बपी अभिमानको मात करना यही सब तापकर महामानों का कपन है, वौर ठसी बायके उपर जोनको विशेषरूपसे स्पिर होना है-विशेष विचार करना है और ठसी बायको मुस्पस्मसे मनुषण करना योम्प है—उसी कार्य सिदिके लिये ही सब सावन छ।महापि भाविक बबमे किम, गाय क्रिया अपना मतके वाहके सिप सम्प्रताप पानेके पि सपना पूरा भाषा प्राप्त करभेके किने किसी महापुरुषका कोई उपदेश नहीं है और उसी कार्यको करनेको बानी पुरुषको सर्पपा बामा । अपनी वाल्मामें प्रादुर्भूत प्रश्नीय गुमोसे उत्कर्ष प्राप्त करना पोम्प नही, परन्तु अपने भाप दोपको मा देसकर फिर लिसे पपाणाप करना ही पोम्प है और यामाइ मापसे ठस्से पाछे फिरमा हो उचित उपदेश हाला-पुरूपके पचनमें सर्वत्र समिति वीर उस भालके पास होने के लिये समान मादि यो सावन बने। बेमपूर्व निमित है। गोषको उस सापनी बारावना निमस्कार प्राप्त करने के कारणस्म पर परस्त गान पी भी पचमा पिसे मापि करे तो कभी मौ कम्याग महो। पंचना-पुति मात् समय पर सागसपुर बादिम पिपिप पत्र मादि संग्राह-२ज्यों पर्ष ५०५ सरे माममावस नो माहात्म्य घुद्धि करना योग्य है, उस माहाम्य युरिका न होना, और अपनी पारमाको वहानता हो यती चली गई है, इसलिये उसको बन्पन्नता–सधुता विघारकर नमाहाम्प बुद्धि नही करना । उसका ( माहाम्पबुद्रि बादिका ) सग-सद्गुरु बारिमें वाराधन नहीं करना मी पचना-युद्धि है। यहि बीच बहो मी समुता धारण न करे तो जीव प्रत्यभ्रमपम मत्र-भ्रमणसे मयमीत नहीं होता, यही विचार करने योग्य है । जालको पनि प्रपम इस मातका वधिक एस हो तो सब शाबार्य भार वामार्थका सहन ही सिद्ध होना समय है। ४४५ घई, नासोर मुटी ११ पुष १९५० जिसे स्वामें मा ससर-मुम्पको इम नहीं पी, धीर बिसे ससारका सम्पूर्ण समाप निस्सारमूत भासित हजार, ऐसा हानी-पुरुप मी बारबार वामावस्थाका मारम्बार स्मरण कर करमे नो प्रारम्भका उम्प से ठसका पेन फरता , परन्तु वामावस्थामें प्रमाद नहीं होने देता । प्रमादफे अवकाश-योगमें हानीको मी किसी भशमें समारस मा म्यामोहका समय होना कहा है, उस ससारमें साधारण जीवको रहत हुए, छौकिक मापसे उसके म्यबसायको करते हुए बारम-हितको इया करना, यह माने जैसा ही कार्य है। क्योंकि पाकिक मात्रके कारण यहाँ बारमाको निवृत्ति नहीं होती, वहाँ सरी तबसे हित-विचार होना संभव नहीं । यदि एककी निधि हो वो दूसरेका परिणाम होना समय है। अहितक क्षमूत ससारसबी प्रसग, डीकिक-माव, ठोक-मेश, इन सबकी संभाउका से बने तसे दूर कर उसे कम करके प्रारम-दिसको घरका मा योग्य है। आरम-दितके लिये ससगके समान दूसरा कोई बलवान् निमित माम्म नहीं होता। रि मी उस सरसंगमें भी बो नीर साविक मापसे बकाश नहीं लेता, उसे प्राय पा मिफल दाहाता है, भोर पदि सहर सम्सग पछवान हवा हो तो मी पनि विशेष-अनि वि ठाकरमेश पता हो तो उस फलक निर्मम हो जानेमें दर नहीं उगती 1 तथा मो, पुत्र, भारंभ, परिप्रहक प्रसास पदि निम-मुदिको हानेका प्रयास म किया जाय तो ससंगका फसवान हाना मी कसे समय हो सकता है ! जिस प्रमुगमें महालानी पुरुष मी समठ समउपर पमते हैं उसमें रि इस गीतको तो मम्पत वापत समापूर्वकयूनतापूर्वक बसमा चाहिये, यह बात की मी भूसन पाग्य नरी । ऐमा निमप करके, प्रत्येक प्रमगमें, प्रत्येक फार्प, और प्रस्पक परिणाममें उसका मन रमकर जिसमे उसस गुरपारा हो जाए उसी तरह करते रहना, पर दमन भीतरीमानम्पामापी उपम्प मुनिधपक रयतसे कहा था। १४६ बमाई मामात्रयुष २०५० 'भगवत् मगपत्का समाप करेगा पर उसी समप करेगा सा और मना मामात्र और देगा,' इस प्रकार यो मनोरा पवन १, पदमी पर बरनम तिवारी है।
भीम प्रसाद [पन गयो रात (२) एम, रेप और बहानका पारपंतिक मार करके वो साल पुर वामसरूपमें स्पित होगा है पसरूम हमारे स्मरण करमेके, भ्यान करनेके वीर पाने के योग्य स्थान है। (३) समा-पदका पान करो। बाई, मासोबपदी व शनि १९५० सत्पुरुपको नमस्कार भामापा, गुणाही सांग-पोम्प माई भीमोहनगमे प्रति रफ्न, श्री बम्बई सिमित गौरमुख शाके एक गपकन्द्रका वामस्सविपूर्णक पपापोप पनि। हमारे किसेए पत्रमें दो बारमा बादिक लिपपमें प्रल, वीर बिन प्रश्नों उचर यान मेकी हमारे पिचम दिशेप मातुरता है, उन दोनों प्रति मेरा साग सार बनुमोदन है। परन्त रिस समय ताप पर मुझे मित्र उस सम्म मेरी पिचक स्थिति सच उत्तर मिस सकने वैसी न पी, और प्राप पैसा होनेका कारण मी पर पाकि उस प्रसग पायोपाधिक प्रति सिप राम्प परिणाम प्राप्त हो या पा । इस कारण उस पत्रका उत्तर मिलने से काम मी प्रापि ऐ सकना संमत न था। पोचे समपके पचात् उस रमपमेसे वारा कर भी मारे पत्र उचर मिलेंगा, ऐसा विचार किया था । परम्त पासे पैसा होना मी समय हो गया । सहारे पकी परेच मी भने म सिमा पा, पौर इस प्रकार उचर किस मेमनेमें मो लिम्प मा, इससे मेरे मममें पेरामा पा, और इसमें मुक माल तक भी पा करो। चिस बगसरपर नि परफे या या उस मन्सरपर र मनमेमें मापा बितमा विचार तुरत ही इस देसमें बाने। इस कारण कुछ चितमें ऐसा बापा हमें उचर मिसमे पो विक हमारे भी वारे समागम होनेसे विशेष लाभकारक होगा । पोंकि पाप पातसे उपका समतामा कटिन पा और तुरे रो तुरत ही न मिड सकनेके कारण हमारे चिमे मो भातुरता रूपमई, र समागम होनेपर उत्तरको तुरत हो समा सकनेरे लिये एक श्रेष्ठ कारण मानने पोम्प पा । बा प्रारम्पक उपसे पर समागम हो सब कुछ भी उस प्रकारको नाममा होनेका प्रसंग मारे, पा माहा एसर नेपमें उपारे प्रश्नों का उत्तर लिसवान प्रश्नों के उचका चार करने के लिये निtar artAAचारकप पम्पास बारसकता । उत्तर सक्षेपमें किया गपात कारण बहुतसे सरल मिचि होना तो कयापित् पटिन देगी तो भी मेरे पितमें ऐसा पनी कि मेरे पचम रे पुरा भी वशेष निवास है, इससे हमें पौरन व सहेगा, मोरप प्रभोके पापोन सम्पपात दोलेप बनुमसे ममम्त ऐगा, ऐसा मुझे पता है। मारे परमे २७ प्रम , उम उतर सक्षेमें मारे kि- पर गांधायक प्रमोके उचर ] विविध पत्र मादि मह-२७वर्ष " १ प्रमा--पारमा क्या है ! क्याप कुछ करती है! वोर-उसे कर्म दुध देता है या नहीं। उत्तर-(१) मैसे घट पट मादि ना कस्तुप है, उसी तरह भारमा शानसरूप पर है। पठ मादि वनित्य है-विसमें एक ही स्वरूपसे स्थिरतापूर्वक य सकनेवाले नहीं है । वास्मा एक स्वरूपसे निकामें स्पिर य सकनेपाली नित्य पदार्प है। जिस पदार्यकी उत्पति किसी भी संयोगसे मो सकती हो या पदार्थ निस्य होता है। मामा किसी मी सपोगसे उत्पम हो सकती हो, ऐसा माम मही होता । क्योंकि वह चाहे कितने मी स्योग म्यो म करो तो मी उससे चेतनको उत्पति मी हो सकती । जो पर्म मिस पदार्पमें नहीं होता, ठस प्रकारके बक्से पदार्थों को कर मेसे मी ठसमें गो धर्म नही है, पर धर्म उत्पम नहीं हो सकता, ऐसा सबको अनुभव हो सकता है। नो पट, फ्ट वादि पदार्थ है, उनमें प्रामस्तस्म देखनेमें नहीं माता । उस प्रकारके पदार्पाका यदि परिणामांतर पूर्णक सपोग किया हो अथवा स्योग वा हो, वो भी पर उसी तरको बातिका ऐता, बर्यात् पर जातरूप ही होता है, बानसरूम महीं होता । वो फिर उस तबके पदार्थक संयोग होनेपर बारमा बपना मिसेजानी-मुरुप मुल्य जनस्वरुप झण्प्युज करते हैं, उस प्रकार (पट पट वावि, पृथ्वी, पल, बाप, भाकाश ) पापसे किसी तर उत्पन्न हो सकने पोम्प नहीं । पानसारूपच पर मामाका मुम्स पक्षण है, और जामा मुस्स ब्क्षण · उसके बमानस्म । है। उन दोनोंका पनादि सब समान है। ये, तपा इसी तरके दूसरे हजारों प्रमाण मामाको "निरप' प्रतिपादन कर सकते है। सपा उसका विशेष विचार करनेपर निस्पापसे सहनस्वरूप वाल्मा मनुमबमें मी माती है। इस कारण मुभास वार मोगनेवारे, उससे निात होनेबारे, विचार करने मारे, प्रेरणा करनेवाले इत्यादि भाव विसको विषमामवासे वनुमबमें पाते हैं, ऐसी र बारमा मुस्य चेकन (बान) क्षणसे पुषहै । और उस भावसे (स्थितिसे) सब काम्में य सकनेवारी मित्य पदार्थ है। ऐसा मान में कोई भी दोप वपना बाा मारम नहीं होती, पति ससे सत्यके स्थाकम करमेकम गुपको ही प्राप्ति होती है। पा प्रम तपा तुम्हारे दूसरे मातसे प्रान इस तपकि गिनमें निरोप मिसन, करने और समझानेको वानस्पकता है। उन मनोका उस प्रकारसे उत्तर निसा गाना में कठिन होनेसे मपम में पस्दर्शनसमुचप प्रप भेगा पा, मिसके बाँधने और चार करमेसे तुम्हें किसी भी बंग समावाम , और इस पत्रसे मी कुछ विशेप मामें समाधान हो सकना समान है। क्योंकि इस सबभौ भनेक प्रश्न उठ सकते है, बिनके सिर फिरसे समाधान होमेसे, विचार करनेसे समाधान होगा। (२)बान दशा-अपने सरूममें यपार्प मोबसे उत्पमा दहा- -भावात्मा नियमापका वर्षात् पान, दर्शन (पपास्थित लिभप) और सहन-समाभि परिणामका कर्जबान दशा कोष, मम, माया, बोम स्पादि प्रहतियोंका कर्ता है, और उस मावके फसमा मोजा होने से प्रस्गवश क पट वादि पदापोंका निमित्तरूपसे का है । मर्यात् फट पट बादि पाक मा सम्पोका प क महीं, परन्तु उसे किसी बाकारमें पनेरूम क्रिपाका होका है। पर जो पछि पशा का जनदर्शन उसे 'धर्म' करता है, वेशदर्शन उसे ' मति' पता है, और इससे - भीमद् पम्पन्न [ पत्र प्रमी उतर दर्शन मा इसासे मिस्ते बुम्त इसी प्रकारके शम्द करते हैं। वास्तविक विचार करनेसे वामा घट पट पारिका तपा कोष बादिका कर्ण नहीं हो सकती, र केरस निनस्वस्म शान-परिणामका हो का है-ऐसा स्पष्ट समसमें जाता है। (२) मानमानसे किए हुए फर्म प्रारम काम्से बीयरूप होकर समयका योग पाकर फारम इसके परिणामसे परिणमते है। भर्पात् उन कर्माको मामाको मोगना पड़ता है। जैसे बति स्पर्शस उष्णताका संबप होता है वौर प उसका सामानिक वेदमारूप परिणाम होता है, से की बामाको कोप वादि मायके कफ्नेसे बन्म, जरा, मरण बादि बेदनास्प परिणाम होता है। इस पातका हम विपरूपसे विचार करना और उस संबपमें यदि कोई प्रश्न हो तो म्सिना । पोंकि इस बातको समझकर उससे न होनेस्म कार्य करनेपर गायको मोक्ष दशा प्राप्त होगी। २ ममः-श्वर क्या है। यह मगत्का कर्चा है, क्या यह सच है! उत्तर - (१) हम तुम कर्म अपममें से एनेमा नीम है। उस जीका सहनस्वरूप वर्षात कर्म ररितफ्ना मात्र एक वामलाप-बो सरूप, पही ईमरपना है। जिसमें नाम जादि ऐधर्म । पाईबर को जाने योम्मो और यह विरफ्ना वास्माका सहन स्वरूप है। वो सम्बप कर्मक कारण माम ही होता परम्तु उस कारणको बम्य स्वरूप बानकर पब मामाकी बार राति होती है, तमी अनुक्रमसे समता वादि ऐश्वर्य उसी वारमा माश्म होता है। और इससे विशेष ऐश्वर्ययुक्त को पदार्थ- कोई मी फार्थ-स्नेपर मी अनुमकमें नहीं जा सकता । इस कारण स्वर वात्माका दूसरा पर्यायवाची नाम है। इससे विशेष सतापुछकोई पदार्थ ईश्वर नहीं है। इस प्रकार निभयसे मे वभिप्राय है। (२) मा नगल्या नहीं, बर्षात् परमाणु वाकाश आदि पदाप निम ही हम समय है, वे किसी भी वस्तु से बनने सभव नहीं। कहाचित् ऐसा मानें कि ईबरमेंसे यमे है तो यह बात मी पोम्प नही मारम होता। क्योंकि यदि चिरको बेसन मानें तो फिर उससे परमाण, वापस मौर से उत्पन्न हो सकते हैं। स्पोकि बेतमसे पाको उत्पति कमी संभव ही नही होती । महि ईश्वरको बा मामा गाय तो पान ही नववान मारता है । तपा उससे गोवरूप अतम पार्षको मपति मी नहीं रो सम्सी । परिसरको जग और चेतन उभयरूप माने तो फिर जगत् भी पा चेतन उभपसप होना चाहिये । फिर तो पप उसका ही सण नाम पर रखकर तोप रहने जैसा होता है। तपा जगत्का माम ईघर रसकर सतोप रस मेध पेमा जगत्को जगत् कारमा ही विशेष पोप है । कदाचित् परमशु भाकारा मादिको निस्प माने वौर ईबरको कर्म बाविक फल देमेवाम पाने, पो मी यह बात सिद्ध होती ई नही माम शेती । इस विषयपर पदर्शनसमुषपमें श्रेय प्रमाण दिपे। ३ प्रमा-मोक्ष स्पा है। उचरा-निस कोष मादि मानभायमें देह बादिमें वामाको प्रतिष है, उससे सपा मिति दोना-मुचि होना--ससे शानियोंने मोश-पर कहा है। उसका पोकासा विचार करनेसे कर प्रमाणभूव मारम होता है।
प गोपीगीके मोके उच्चर] विषिष पन मादि समस्-ज्यों वर्ष उतर -मोक्ष मिळेगा या नहीं। क्या यह इसी देहमें निमितरूपसे गाना ना सकता है। जैसे यदि एक रस्साके बहुतसे यवनोंसे हाय बाँध दिया गया हो, और उससे क्रम झमसे म्पों म्पों मपन सुटते जाते है पो त्यों उस धनको निधिका धनुमत्र होता है, और मह रस्सी बमीन होकर खतत्रमारको प्राप्त होती है, ऐसा मान्म होता है—अनुभममें माता है, उसी तर बास्माको भानमापके अनेक परिणाममप यधनका समागम लगा हुआ है, मह पम म्यो म्यों श्ता जाता है, त्यों त्यों मोसका अनुभव होता है। धीर जब उसकी नस्पत वल्पता हो पाती है तब मन ही वास्मामें निगमात्र प्रकाशित होकर अज्ञानमावरूप यघनसे झट सकनेका वपसर माता , इस प्रकार स्पष्ट वनुमब होता है। तथा सम्पूर्ण आत्ममाव समस्त बवान वादि मापसे निहत होकर इसी देहमें यमेपर मी मारमाको प्रगट होता है, और सर्प सबरसे केवल बपनी मिस्ता ही वनुमवमें माती है, वर्षात् मोक्ष पद इस देहमें मी अनुभवमें जाने योग्य है। ५. प्रम —ऐसा पड़नेमें माया है कि मनुष्य, देर छोरनेके पाद कर्मके अनुसार रामबरों में सम्म सेवामा पत्पर और गम मी हो सकता है, क्या यह ठीक है। उपर --यह छोानेके बाद उपानित कर्मक अनुसार ही जीवको गति होती है, इससे पतियंच (पानबर ) भी होता है, वौर पृप्णीकाय बर्यात् प्रप्पीरूप शरीर मी धारण करता है, और बाकीकी दूसरी पार इत्रियोंके बिना मी जीवको कर्मक भोगनेका प्रसग वाता है, परन्तु या सर्मथा पत्पर अपना पृभिपी रो जाता है पर बात नहीं है। यह पत्थरम्प काया धारण करता र, वौर उसमें मी मम्पक मानसे बीच सीक्रुपसे ही यता है। वहीं दूसरी पार इन्द्रियोंका मन्पक्त (अप्रगट) फ्ना होनेसे पर पुप्पीकापहम बीत्र को नाने योग्य है । क्रम क्रमसे ही उस कर्मको मोगकर नीष निश्च होता है। उस समय केवल पत्थरका दल परमाणुरूपसे यता , परम्तु उसमें जीनका संबध पम माता है, इसलिये उसे बाहार वादि संक्षा नहीं होती । वर्षात् पौत्र सर्पया जहपत्पर-को चाता है, यह बात नहीं है। फर्मकी विषमतासे चार इनियोंका बम्पछ समागम होकर केवल एक स्पर्शन इन्द्रियरूपसे गोबको मिस कर्मसे देहका समागम होता है, उस कर्मके भोगते ए पर पृपिनी नादिमें सम्म सेता है, परन्तु मा सर्वपा पृषीरूप अपना फपररूप मही हो जाता, जानवर होते समप सर्वपा गानबर मी नहीं हो पाता । जो देह है वह जीवका बेपमारीपना है, स्वरूपमा माही। ६-७ प्रमोचर ~समें से प्रमका मी समाधान मा गया है। इसमें सात प्रमका मी समाधान मा गया है, कि केवल पत्पर अपना पृथ्वी किसी कर्मका कर्चा नहीं। उनमें वाकर उत्पम हवा नाम ही धर्मका पर्चा है, वार हमी दूध और पानीको तय है 1 बेसे दूध और पानीका संयोग होनेपर मी भ प भार पानी पानी ही है, उसी तर एफेत्रिय आदि कर्मभसे गौरा पत्थरफ्ना सपना-माम होता है, तो मी पर गाय तर तो चीवनपसे ही है, और जो भी गवाहर मप आदि सहापूर्वक ही पता है, जो बम्पत बसी है। ८ प्रमः-चार्यधर्म क्या है ! पा सबको उत्पति पे से ही हुई है।
भीम परचन्द्र [पत्र यापारी प्रति उस उचर --(१) मार्यधर्मकी म्पास्या करते हुए सबके सब मपमे अपने पक्षको ही बार- भर्म करना चाहते हैं। मैन जनधर्मको, गौर गौवधर्मको वेदांती वेदातधर्मको मार्यधर्म करें, या साधारण मात है। फिर भी पानी पुस्प तो बिससे भारमाको निन स्वस्मकी प्राप्ति हो, ऐसा मो वार्य ( उत्तम ) मर्ग है उसे ही वार्यधर्म छते है, वौर ऐसा ही योग्य है। (२) सक्को उत्पत्ति केवमेंसे होना समय नहीं हो सकता । वेदमें जितना शान कहा गया है उससे हमार गुना बारापपुछ जान भौताकर वादि महामाोंने कहा, ऐसा मेरे मनुमबमें जाता है और इससे मैं ऐसा मानता कि काप वस्तुमसे सम्पूर्ण वस्तु उत्पम नही हो सकती । इस कारण मेवमेंसे सबकी उत्पपि मानमा योग्य नहीं है, पण वावि सम्प्रदायोंकी उत्पति उसके भाभपसे मान में कोई बाधा नहीं है। जैन यौदके वन्तिम मापीर बादि महारमा पूर्व देव सिपमान थे, ऐसा माश्म होता है। तया वेद वात प्राचीन प्रप है, ऐसा भी माम ऐता है। परस्तु जो कुछ प्राचीन से यह सम सम्पूर्ण ऐ बपमा सस्प हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता त्या गो पासे उत्पन्न हो पा सब बसम्पूर्ण मौर परश्य हो, ऐसा भी नहीं कहा पा सकता । बाकी तो बेदके समान गमिप्राप और पैनके समान बमिप्राय भनाहिसे चावा यास मात्र बनादि हो, मात्र उनका रूपांतर हो जाता है; सपा उत्पत्ति बयया सर्वथा नाश नहीं पवा । वेद, जैन, पौर दूसरे सबभिप्राय अनादि है, ऐसा मानने में कोई बाधा नहीं है फिर उसमें किस बातका माद हो सकता है। फिर भी इस सममें विशप बळमान सस्प बभिप्राय किसका मानना पोम्प है, इसका हमें में सबको विचार करना चाहिये । ९ प्रम. देर किसने बनाये ! क्या ये मनादि। पदि बेद वनादि हो तो बनाया क्या । उत्तर -(१) दोको उत्पछि यात समय पहिसे हुई है। (२) पुस्तकस्मसे कोई मी घास अनादि नहीं, और उसमें कर वर्षक बनुसार तो समी शाम पनादि है। क्योंकि उस उस प्रचारका बमिप्राप भिम मिम बार मिम मिमरूपसे करी मापे है और ऐसा ही होना समय है। कोप वार मात्र भी बनादि है और पमा बाधि मात्र मी अना। रसा भादि धर्म माँ बमादि और भाईसा नादि धर्म मी मनादि है। के गातको हितकारी पाहै इक्ना Aचार करना हो कार्य है। बनादि तो दोनों है, किर भी म्सिामा कम मात्रा स होवो और कभी किसका विशेष मात्र का होता है। १ मत -गोता किसने बनाई है। ईपररात तो नही। पदि ईयरत हो तो क्या उसका कोई प्रमाम। उत्तर -उपर से दुर उच्चस इसका बहुत कुछ समाधान हो सकता है। अर्थात् ईपर का मर्प हानी (म्पूर्ण ज्ञानी ) करनेसे तो परराव हो सकता है, परन्तु निरय मिश्रिय माशी परफे पाक सोमप्रनेपर दस प्रकारको पुस्तक पारिको उत्पति ऐना समय महाँसिक वयोमरण कर्प,विसन कर्तृत्त बारमानक होता है-अनादि महारो।
पm गांधीक प्रमोरे सर पिपिप पर मादि साह-ज्यों वर्ष गीता वेदम्यासगीको रची पुस्तक मानी गाती है, और महारमा भीषणमे बर्जुनको उस प्रकारका वोध किया था, इसलिये मुख्यरूपसे मीरण ही उसके कर्ता को गाते हैं यह बात संमब है। प्रय श्रेष्ठ है । उस तयका वाशय मनादि कारसे पछा वा या है, परस्तुपे ही लोक बनादिसे पसे वाते हों, या समव नहीं है, क्या निष्क्रिय ईमरसे उसकी उत्पत्ति होना मी समय नहीं। वह क्रिया किसी सक्रिय अर्यात् देहषा से ही होने योग्य है, इसरिये भो सम्पूर्ण ज्ञानी है। ईपर है, और उसके गारा उपदेश किये हुए शाम ईमरीय शाल , यह माननेमें कोई बाधा नहीं है। ११ प्रम-पशु वादिके या करनेसे थोडासा मी पुण्य होता है, क्या यह सच है। उत्तर –पझुके बघसे, होमसे मयता उसे योगासा मी दुस देनेसे पाप ही होता है, तो फिर उसे या करो वपया चाहे तो ईमरके पाममें बैठकर करो। परन्तु यामें दो दान वार किया होती है, के कुछ पुण्यकी कारणमूत है। फिर मी हिंसामिभित होनेसे उनका मी अनुमोदन करना योम्प मही है। १२ प्रश्न --जिस धर्मको पाप उत्तम कहते हो, क्या उसका कोई प्रमाण दिपा पा सकता है। उचर -प्रमाण तो कोई दिया न बाय, वीर इस प्रकार प्रमाणके बिना ही यदि उसको उत्तम वाका प्रतिपादन किया जाय तो फिर तो अर्प-बनर्प, धर्म-अधर्म समाको उत्तम ही कहा जाना चाहिये। परम्त प्रमाणसे ही उत्तम-मनुत्तमको पहिचान होती है। जो धर्म संसारके क्षय करनेमें सबसे उत्तम हो पौर निजामानमें स्थिति करानेमें सम्मान हो, यही धर्म उत्तम और ही धर्म बयान है। १३ प्रश्न'-क्या बाप सिस्तीपक विषयमें कुछ जानते है ! यहि जानते है तो क्या वाप अपने विचार प्रगट करेंगे। उत्तर -सिस्तीधर्मक लिपपमें में साधारण हो बामता । मरतसाके महात्माजाने मिस तबके धर्मको शोध की विचार किया है, उस तरके धर्मका किसी दूसरे देशकेशरा विचार नहीं किया गया, या वो थोडेसे वम्पाससे ही समझ मा सकता है। उसमें (सिस्तीधर्ममें ) नौवको सदा परवशता की गई है, और यह दया मोक्षम भी इसी तरकी मानी गई है। जिसमें बाबके ममासम्मका पपायोम्प विरेचन मही है, जिसमें कर्म-अपकी म्पवस्था और उसको निति मी जैसी चाहिये पैसा मही कही, उस धर्मका मेरे अमिप्रापके अनुसार सर्वोत्तम धर्म होना संभव नहीं है। मिस्ती- वर्मम जैसा मैने उपर कहा, उस प्रकारका मैसा चाहिये मेसा समाधान देसनेम नही माता । इस मापको मैंने मतमेदके परा होकर महा लिसा । अधिक ने पोम्प माश्म हो तो उना -वा निरोप समाधान सकेगा। १. मन -रे गेग ऐसा करते है कि माइकठ ईपर-प्रेरित है । ईसा ईपरका भावार है- प उसका पुनौर था। उत्तर –पर बात तो भासे हो मान्य हो सकती है, परस्तु या प्रमाणसे सिद्ध नही होती। जो गात गाता गौर के चिर-कलके विषयमें किसी है, वही बात माणसमे सम्पमें मी समझना चाहिये । नो बन्म-मरणसे मुक्त हो, यह ईश्वर नातार छे, यह संभव मोक्योंकि राग- ४१२ भीम परचम्न [पर पांचौरे पर रस देप बादि परिणाम हो सके है। ये निसके मही है, ऐसा ईबर अपवार धारण फरे, परमार विसरमेसे यपार्य महा मास ऐतो । 'एईमरका पुत्रो मौर या मासको भी यदि किसी सपकके तौरपर विभार करे तो हो या कदाचित् ठीक बैठ सकती है, नहीं तो पा प्रत्यक्ष प्रमाणसे पारित है । मुछ ईपरके पुत्र हो, या किस तय माना जा सकता है! वीर यदि माने मी तो उसकी उत्पति किस प्रकार लौकार कर सकते हैं। यदि दोनोंको पनादि माने तो उनका पिता-पुत्र सांप किस तय ठीक बैठ सकता है। स्यादि बातें विचारणीय है। जिनके विचार करनेसे मुझे ऐसाता हैकिपरमात पयायोम्प नही माश्म हो सकती । १५. प्रभ-पुराने कपरमें जो मविप्प कहा गया है, क्या यह सब ईसाके विषयमें ठीक ठीक ठवरा उत्तर -परि ऐसा हो तो मी उससे उन दोनों शाखों विषयमें विचार करना पोम्प है। तया इस प्रकारका मषिष्य मी ईसाको ईमरावतार कानमें प्रथम प्रमाण नहीं है। क्योंकि ज्योतिष वारिसे मी मामाको उत्पति गानी मा सकती है। अपना मठे किसी बानसे बात कही हो परन्तु म मविप्म-मेशा सम्पूर्ण मध मार्गका माननेवाला था, पर बात जबतक ठीक ठीक प्रमाणभूत म हो, तबतक र मनिप्प भगय केवल एक भवा-माम प्रमाण हो , और यह दूसरे प्रमाणसे भाषित म0, पर बुदिमें मही खा सकता । १५ मन –स प्रश्नमें ईसामसीह के पमत्कारके पियमें किया है। उत्तर ---जो गाय कापासे सर्दया निकाकर चला गया है उसी गानको पदि उसी कायामें दानित किया गया हो अथवा पर दूसरे जीवको उसी कापामें दासिल किया हो तो पर होना संभव महा और यदि ऐसा तो फिर कर्म मादिको म्यवस्था मी निमरोहो चाप । बाको योग बाकी सिदिसे बातसे पार उत्पम होते है और उस प्रकार पावसे चमत्कार ईसाको ए रों सो पानपा मिप्या है, अपना समर है ऐसा नहीं कर सस्ते | उस तबका सिदिपा भात्माके ऐपके सामने अस्प-चारमाके ऐपर्पका मात इससे अर्मत गुना है। इस लिपपमें समागम होनेपर पूछना पोम्प है। १७ प्रश्न -बागे घसकर चैनसा जन्म होगा, क्या इस बातको इस मामें सबर पारी अपरा पूर्वमें कौनसा मम पा इसकी कुछ सबर पा सकता है। उत्तर:- यह हो सकता है। मिसे लिमर बान हो गया हो उसे पैसा होना संभव है। से बाइस इत्पारिके चिोंके उपरसे बरसातरा अनुमान घेता से इस जीतको इस भयो पेयो अारसे उसके कारण कैसे होने चाहिये पार मी समर्म मा सकता है-परे पोरे भोंसे समा मापे । इसी तरह पेश भविष्यमें किस परिणामको प्राप्त करेगा, यह भी उसके मरपके उपरस गाना गा सकता और उसके विशेष AMIR फरमेपर भरियो रिस भएका ऐना समन है, सपा में कौनसा मा पा ५ भी मौतए RIRL मा सकता है। १८ मभ-मरे माही पर किसे पड़ सस्ती है ! उचाममा उत्तर पर ना धी पर गावामके प्रमोरे ठर] विविध पत्र मादि संप्रा-२ज्यों व १९ प्रम -जिन मोक्ष प्राप्त पुरुपोंके नामका बाप उल्लेख करते हो, यह किस माधारसे करते हो! उत्तर--स प्रभको यदि मुझे सास तौरसेक्स करके हते हो तो उसके उत्तरमें यह कहा जा सकता है कि जिसकी सुसार दशा अस्पत परिक्षीण हो गई है, उसके वचन इस प्रकारके समय उसकी पेय इस प्रकारको समम है, इत्यादि वसे मी अपनी वामामें दो वनुमब हुवा हो, उसके आधारसे ठम्हें मोक्ष हा कहा जा सकता है और प्राय करके मा यथार्थ ही होता है। ऐसा माननेमें गो प्रमाण है ये मी शान वादिसे माने मा सकते हैं। २० प्रम -मुद्रदेवने मी मोझ नहीं पाई, यह बाप किस वाधारसे करते हो। उत्तर ---उनके शास-सिबतों के बाघारसे । बिस तबसे उनके शास सिद्धांत है, पदि उसी तय उनका अभिप्राय हो तोप वमिप्राय पूर्वापर-बिरुद्र भी दिखाई देता है, और पा सम्पूर्ण झानका पक्षण मही है। यहाँ सम्पूर्ण बान नहीं होता पहाँ सम्पूर्ण राग-रेपका नाश होना समय नहीं । यहाँ कैसा हो वहाँ स्सारका होना ही समय है। इसलिये उन्हें सम्पूर्ण मोश मिली हो, ऐसा मही करा ना सकता। चौर उनके करे पुए शामोंमें मो अभिप्राय है उसको छोड़कर उनका कुछ दूसरा 0 अभिप्राय था, उसे दूसरे प्रकारसे तुममें वौर हमें जानना कठिन पाता है, और फिर मी पदि करें कि पुरदेवका वभिप्राय कुछ दूसरा ही या तो उसे कारणपूर्वक करनेसे यह प्रमाणभूत न समझा नाय, यह बात नहीं है । २१ प्रश्न -दुमियाकी अन्तिम स्पिति क्या होगी ! उत्तर -सब भागोंको सौपा मोक्ष हो बाय, भपपा इस दुनियाका सर्मपा माश ही हो जाय, ऐसा होना मुझे प्रमाणम्स मही माझ्म होता । इसी तयके प्रगाहमें उसकी स्थिति यती है। कोई मान रूपांतरित होकर घीण हो जाता है, तो कोई वर्षमान होता है यह एक क्षेत्रमें बहता है तो दूसरे क्षेत्रमें घट गाता है, स्पानि रूपसे इस सटिकी स्थिति है । इसके उपरसे और बहुत ही गहरे विचारमें उत्तरमेके पभात् ऐसा कामा समय है कि या सष्ठि सर्वया माश होगाप, अपया इसकी प्रठप होगाप, पर होना सभा नहीं । सएिका वर्य एक इसी पृयित्रीसे माही समझना चाहिये। २२ प्रम-इस वनप्तिमेंसे मुनौति उब्त होगी, क्या यह ठीक है। उत्तर -स प्रमका उत्तर मुनकर गो बात बनौतिकी इच्छा करता है उसके छिपे इस उपरको उपयोगी होने देना योग्य नहीं। नाति-अनौति सर्व मात्र बना है। फिर भी हम तुम बनातिका माग करके यदि नातिको स्वीकार करें, तो इसे साकार किया मा सकता , और पही बारमाका कर्रम्प है। धौर सब मानोंको अपेक्षा वनौति दूर करके मांतिका म्यापन किया नाग, पा बचन मही फरा पा सकता, क्योंकि एकांतसे उस प्रकारको स्पितिका हा सकना संमत्र नहीं। २३ प्रम-क्या हुमिपाको प्रठप होती है। उत्तर -महयका बर्ष पदि सपा माश होना रिया नाप तो यह बात टोक नहीं। क्योकि पदार्पका था माघ ो गाना समय 10 मही है। पदि प्रसपा प्रर्प सब पापोंका ईभर वारि भीमद् रामचन्द्र [पर mपाची प्रमो उन सचर । न होना किया जाय तो पिसी वमिप्रापसे यह बात स्वीकृत हो सकती है, परन्तु मुझे यसमा महा माती। क्योंकि सम पदार्थ सब पीर इस प्रकार सम परिणामको किस तर प्रान कर सकते है, विससे इस प्रकारका सयोग बने ! वौर यदि उस प्रकारके परिणामका प्रमा बासे मी तो फिर विपमता मही हो सकता। यदि सम्पतरूपसे गांवमें विपमता और म्यतसपसे समताके होमे प्रल्प स्वीकार करे तो मी दो बार सबपके बिना विषमता किस वापरसे ए सकता है। पर दो वारिका संबंध मानें तो सबको एकेतियफ्ना मानमेका प्रसग बाय और पैसा माननेसे तो बिना कारण ही दूसरी गलियोन निषेध मानना चाहिए-वत् ऊँची गति के बारको परि उस प्रकार परिणामका प्ररंग दूर होने मापा हो तो उसके प्रात होमेन प्रसंग उपस्थित हो, स्पादि गत्से विचार उठते हैं। बाप सर्व पीयोंकी अपेक्षा पम्प होना संभव नहीं है। २१ प्रश्ना-बानपाको मलि करनेसे मोघ मिम्ती है, क्या पर सच है! -मकिपाका त है।हान मोक्षकाख है। जिसे अक्षरमान म हो पदि उसे मनपा या हो तो उसे मति प्राप्त होना असंभव है, पर कोई बात मही। प्रत्येक पाल पान-स्वमारसे पुका है। मलिक यम्से शाम निर्मक होता है। निर्मक मान मोका देत होता है। सम्पूर्ण कानको बावि र बिना सर्वथा मोन हो जाय, ऐसा मुझे माश्म नहीं होता। वौर गाँ सम्पूर्ण पान है हौस भाषा-ान समा जाता है यह करनेकी भी वाश्यकता महाँ । भाना-नाम मोक्षका है तथा पनि म हो उसे वामभान न हो पा कोई नियम नहीं है। २५. मन मानवार और रामावतारका रोना क्या ५ सची बात है! परि हो तो कौन थे ! पे साक्षात् पर पे या उसके बस पेस्पा उन्हें मानमेसे मोस मिती है। उपर -(१) पे दोनों महात्मा पुरुष थे पर तो मुझे भी नियप है। वात्मा होनेसे घर थे। परि उनके सर्व मावरम दूर हो गये हों तो उने सपा मोक्ष मानमें निबार नहाँक पान ईपरका बरा है, ऐसा मुझे नही मादम होता । क्योंकि इसके विरोधी हगा प्रमाण देखने वाते है । तपा मोक्को ईश्वरका बंश माननेसे बष मोक्ष सब म्यर्प हो हो मंमिगे । पोंकि फिर तो पर ही बान बादिका कर्चा बा मौर पदि कान वादिका कर्ण हो तो यह मिर ऐवपरमित रोवर पर मपमा बिरल हो सो ठे; मात् बोक्का स्वामी होनेका प्रपन करते हुए बरको ठम्य हानिके सहम करने का प्रसग सपरिपत हो । तपा गोषको ईबर वन माननेक बाद पुस्पार्य करना किस वप पोम्प हो सकता है। पोनिया स्वप तो कोई कमर्च सिद हो नही सकता ! इस्पानि निरोष बानेसे किसी भीरको बरके शरूमसे स्वीकार करने की मी मेरो उदि मोती। तो फिर औरण पपा एम वैसे महात्मावों के साथ तो उस संपके माननेको मुनि से से सकती। दोनों पम्पच बर पे ऐसा माननेमें पापा महा। फिर मा उने सम्पूर्ण ऐवर्ष प्रगट दमा पा पा नाही, याच विचार करने योम्प है। (२) प्यारो मानमेसे मोक्ष मिस्ती । इस प्रश्न उत्तर सार।बारके सस राग, और वानप जमाव ऐना भर्यात उमसे फूट मानेछ माम ही मोप। मनिसके उपदेशसे - - पर गांधीजी प्रमापाठचर] विपिप पर मादि संप्रार--२७वा व हो सके, उसे मानकर भार उसका परमार्थ सरूप विचारफर वपनी मारमा मी उसी सबकी निष्टा रखकर उसी मामाको आत्माके माकारसे (स्मरूपसे ) प्रतिष्ठान ऐ, तमी मोझ होनी संभव है। पाकी दूसरी उपासना सर्वथा मोक्षका हेतु नही है या उसके साधनका होत होती है। यह मी निश्चयसे हो ही, ऐसा नहीं कहा जा सकता। २६ प्रमझा, विष्णु और महेपर कौन थे! उत्तर-सृष्टिकेतुरूप तीन गुणोंको मानकर उनके वायसे उनका यह रूप बताया शे, तो यह मात ठीक बैठ सकती है, तथा उस प्रकारके दूसरे कारणोंसे उन ममा मादिका स्वरूप समछमें माता है। परन्तु पुराणों में निस प्रकारसे उनका स्वरूप कहा, यह स्वरूप उसी प्रकारसे है, ऐसा मानने मेरा विशेप मुकाम नहीं है। क्योंकि उनमें बक्से सूपक उपदेशके लिये करे हों, ऐसा मी मारम होता है। फिर भी हमें उनका उपदेशके रूपमें छाम ना, और प्रया मादिके सरूपका सित करनेकी मामें न परना, यही मुझे ठीक टगता है। २७ प्रश्न -पदि मुझे सर्प काटने वाये तो उस समय मुझे उसे काटने देना पाहिये या उसे मार रामना चाहिये । यहाँ ऐसा मान लेते है कि उसे किसी दूसरी तय हटाने की मुममें शक्ति नहीं है। उत्तर-सपको तुम काटने देना चाहिये, यह काम पपि स्वय करके बतानेसे विचारमें प्रवेश कर सकता है, फिर मी यदि तुमने यह पाम लिया हो कि देर बनिस्प है, तो फिर इस मसारभूत देशको रक्षाक छिप, निसको उसमें प्राति है, ऐसे सर्पको मारना तुम कैसे योम्प हो सकता है! जिसे बारम-दितकी पाहमा है, ठसे तो फिर वफ्नी देहको झोर देना ही योग्य है। कदाचित् पदि किसीको बारम-रतकी इस न हो तो उसे क्या करमा चाहिये। तो इसका उत्तर मही दिया जा सकता है कि उसे नरक आदिमें परिभ्रमण करना चाहिये, बर्यात् सर्पको मार देना चाहिये । परन्तु एसा उपदेश हम कैसे कर सकते हैं। यदि वनार्य-विहो तो उसे मारमेका उपदेश किया जाय, परन्तु पर तो हमें और तुम स्वाममें भी न थे, यही क्या करना योग्य है। मन संशेपमें इन उत्तरोंको लिसार पत्र समाप्त करता हूँ। पदर्शनसमुचपके समानेका विशेष प्रयत्न करमा । मेरे इन प्रश्नोत्तरीके सिनेके सकोचसे तुरें इनका समाना विशेष बकुसता बनक हो, ऐसा यदि नरा मी माझ्म हो, तो मी विशेषतासे विचार करना, और परि कुछ भी पाण्य मे योग्य मारम दे तो परिपूछोगे तो प्राप करके उसका उत्तर लिगा । विशेष समागम होनेपर समावाम होना अधिक योम्प गता है। सिस्ति वामसरूपमें निस्प निमाके खभूत विचारको पितागनेवाले रापचन्द्रका प्रमाम । . . बम, कार्विक पुटी १, १९५१ ४४८ मद्विान भारिके प्रश्नों के लिपपमें पारा समाधान ऐना फटिम है। क्योंकि ठरे निशेष बापनेकर या उपर सिबनेकी मायकल प्रति मही हो सकती।
मीमद् पसचन्द्र [पत्रmपापी प्रमोश्च न होना किया चाप वो किसी वभिप्रायसे या बात सौम्य हो सकता है, परन्तु मुझे पर संमत माही प्रगती । पोति सद पदार्थ सगाव इस प्रकार सम परिणामको जिस तय प्राप्त कर सकते हैं, निस्से इस प्रकारका सपोग बने और यदि उस प्रकारके परिणामका प्रसग बाये मी तो फिर पिमता नही हो सकती । यदि बन्यतापसे गांवमें विषमता और मापसे समताके होनेको प्रम्प साकार करें तो मी दो बादि सबपके विना विपमता किस भापारसे र सकती है। यदि दो पादिका संबध मानें तो सबको एकेन्द्रियपमा माननेका प्रसग बाये और पैसा माननेसे तो पिमा कारण हो मी गतियोंका निषेध मानना भाहिए—जर्षात् ॐची गतिके मोक्को यदि उस प्रकार के परिणामका प्रसंग दूर होने वाया हो तो उसके प्राप्त होमेश प्रसंग उपस्थित हो प्रवादि गतसे विचार ठरते। बतएप सन बालों की अपेक्षा मध्य होना संमन मही है। २१ प्रल --अनफाको मति फरमेसे मोक्ष मिमती है, क्या या सच! उत्तर-मलि जानका रेवान मोझका है। मिसे अधर-चान हो पनि उसे मनपा कहा तो उसे भजि प्राप्त होना बसमत्र है, यह कोई बात नही है। प्रत्येक बार मान-स्वमासे युक्त है। भक्तिके बख्से कान निर्म होता है। निर्मशान मोसका पता है। सम्पूर्ण दामको वापि हुए रिमा सर्वपा मोक्ष हो गाय, ऐसा मुझे माश्म नही होता वोर को सम्पूर्ण जानी माँ सर्व भाषामान समा गाता है पर कामेकी मी बायकवा महाँ । भाषामान मोक्षको है तथा या मिसे न हो उसे वामनान म हो, पर कोई नियम नही। २५. परम पावतार और रामावतारका होना क्या या सी बात है ! पदि हो वो कौन थे । पे साक्षात् पर थे या उसके वंश पेमा ने माननेसे मोक्ष मिती है। उत्तर --(१) पे दोनों महात्मा पुरुप थे, या तो मुझे मी नियम है । वामा होमेसे वे ईपर पे। यदि उनके सर्व कारण पूर हो गये हों ता उमें सपा मोक्ष माननेमें विवाद हो । गाव ईवरका बरा है, ऐसा मुझे नहीं माश्म होता । क्योकि इसके विरोपी हजारों प्रमाण रेखमेमें बाते हैं। तपा गारको ईपरका वंश माननेसे बध मोष सम्पर्प हो जायेंगे । क्योंकि फिर तो पर हो वाल वादिका का गला, पौर पदि यह मान मारिका फर्क तो कर ऐश्वर्यरत होकर पनपना ईसरल हो यो बर्षात् मागका स्वामी होनेन प्रपान करतेर ईश्वरको सम्ठा हानिके समान करमेका प्रसग उपस्थित हो । तपाबीको ईपरका मश माननेके पार पुस्पा परमा निस वा पोम्प हो सकता है ! पोंकि यह सम तो कई वर्ग सिर हो नहीं सकता। इत्यादि रियेप मानेसे किसी बीचको ईपरके वरूपसे साकार करने मी मेरी दुरि मही पत्र । तो किर औरण वपना राम बैसे महामानों के साथ तो उस सबपके मानमेकी मुदि कसे हो सस्ता है ! ये दोनों सम्यक बिर थे, ऐसा मानने पापा महो। फिर मी उन्हें सम्पूर्ण ऐचर्य प्रगत हमा पा या नहीं, यह बात विचार करने पोम्प है। (२) 'स्पा सरे माननेसे मे मिलता है इस प्रश्नका उचर साम। गांव के सब एग, रेप पोर पानका बमात ऐना अर्थात् उनसे छूट पाने का नाम ही मोप है। मरिसके उपोपसे पm गांधीगी प्रमोपटचर] विविप पत्र माधि संप्रह-२७ वर्ष । हो सके, उसे मानकर बार उसका परमार्थ स्वप विचारकर अपनी मारमामें मी उसी तरकी निष्टय रसकर उसी महामाकी वात्माके भाकरसे ( सहपसे ) प्रतिष्टान हो, तुमी मोक्ष होनी समय है। बाकी सर्व उपासना सर्वपा मोलका हेतु नहीं है- उसके साधनका होत होती है। यह भी निपपसे हो हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता । २६ प्रश्न -प्रमा, विष्णु और महेयर कौन थे ! सएिफे खरूप तीन गुणोंको मानकर उनके बायसे उनका या रूप बताया हो, तो या वात ठीक बैठ सकती है, क्या उस प्रकारके दूसरे कारणाम उन प्रया भाविका सरूप समसमें वाताहै। परन्तु पुराणोंमें निस प्रकारसे उनका सहप का है, मह स्वरूप उसी प्रकारसे है, ऐसा माननेमें मेरा विशेप मुकाव नहीं है। क्योंकि उनमें बक्से रूपक उपदेशके रिपे करे हों, ऐसा मी माश्म होता है। फिर भी हमें उनका उपदेशके रूपमें छाम छेना, और प्रमा मादिके सहपका सियत करमेकी मंचासमें न परना, यही मुझे ठीक मगता है। २७ प्रश्न:- यदि मुझे सर्प काटने माने तो उस समय मुझे उसे काटने देना चाहिये या उसे भार गम्ना पाहिये ! यहाँ ऐसा मान लेते हैं कि उसे किसी दूसरी तय हटानेको मुममें शक्ति नहीं है। उत्तर ---सर्पको तुम कारने देना चाहिये, यह काम यपि सय करके बतानेसे पारमें प्रवेश कर सकता है, फिर भी यदि तुमने पर मान लिया हो कि देह बनिस्प है, तो फिर इस जसारभूत देहको रक्षाके किये, मिसको उसमें प्रीति है, ऐसे सर्पको मारना में कैसे योग्य हो सकता है। जिसे वारम-हिवकी चाहना है, ठसे तो फिर अपनी देरको छोड़ देमा ही योप है। कदापित् यदि किसीको बास्म-रितकी इम न हो तो उसे क्या करना चाहिये। तो सका उत्तर मही दिया मा सकता है कि उसे नरक नादिमें परिममण करना चाहिये; वर्षात् सर्पको मार देना चाहिये । परन्तु ऐसा उपदेश हम कैसे कर सकते हैं। यदि भनार्य-पिहो तो उसे मारनेका उपदेश किया बाप, परन्तु पर तो हमें भौर में स्वममें मी न हो, यही इस करना योम्प है। अब संक्षेपमें इन उचगेको सिसकर पत्र समाप्त करता है। पदर्शनसमुचपके समझनेका विशेष प्रयत्न करना । मेरे इन प्रश्नोतरोंके किसनेके संकोचसे में इनका समाना रिशेप असता- जनक हो, ऐसा यदि नरा मी माम हो, तो मी विशेपतासे विचार करना, और पदि कुछ भी पाय हने योग्य मारम दे तो पदि योगे तो प्राय करके उसका उत्तर सिगा । विशेष समागम होनेपर समापान दोमा अधिक योम्प भाता है। सिसित बामसरूपमें नित्य निष्ठाके भूत दिपारकी चिंता बनेगा रापचन्द्रका प्रणाम | बम्बई, कार्तिक मुदी १,१९५१ ४४८ मतिमान भादिके प्रश्नों के विषयमें पारा समाधान ऐना कटिन है। क्योंकि उन्हें विशेष पाँचमेकी पाउचर जिसनेको भारत प्राति नहीं हो सकती। ।
४५८ भीमद् रामचन्द [Part तो बिनुमसे महानको निति होगी, क्योंकि यही नियत उपाय है, बौर पर नौका मित होनेको पुति तो फिर वह पान निराधार हो जानेपर किस तर सर सकता है। एक मात्र पूर्व कर्मक योग सिमाप पहाँ उसे कोई भी बापर नहीं है। तो मिस गानो संग-सत्पुरुपका सपोग हुमा है, बार निसका पूर्व कर्मको मिति करनेका ही प्रयोजन है, उसके अगसे दूर हो सकता , ऐसा विचार करके मुमधु नौवको उस आनसे होनेवाम माकुम- प्यारम्ताको पौरसे सहन करना चाहियेस तय परमार्प करकर परिपाको कहा है। पो हमने सुक्षेपमें उन दोनों परिषयोंका सहप सिद्ध है। इस परिपाका सरूप मानकर ससग सापुरपके स्पोगसे मिस कहानसे पसाराह होती है, यह निाच होगी-या निश्चय रसकर, पपाउदय मानकर भगवान्ने धारन रखना ही बताया है। परन्तु धीररको इस वर्ष मही करा कि समग मपुरुषो स्पोग होनेपर प्रमाह के भरण निकम करना प धारन है और उदय है, यह बात मी विचारपान नावको सचिम रटना पोय है। भौतार्यकर बादिने फिर फिरसे जीयको उपदेश दिया है परन्तु जीव रियामाही गना चाहता है वो फिर को कोई उपाय नहीं चल सकता । उन्होंने फिर फिरसे ठोक कर कहा कि परिया गोव एक इसी उपदेशको समास बाप तो मोक्ष सहन हो, नहीं तो धनत उपायॊसे मी मोक्ष नगी निम्ती मोर समझना मी कठिन नहो।पोकि मौका गो स्वरूप है केस ठसे ही गोषको समन्धना है पर यह कुछ सरके सतपकी बात नहीं कि कर्मा दूसरा उसे छिपा के अपना म बताये, और इस कारण र समातमें न वा सके । वपने बापसे अपने मापा गुप्त यमा मी किस त्यो सकता है। परम्त निस तय पान पण दशा बसमाम्प मपनी मृत्यु मी देखता है, से हो मान दशाम स्वप्नरूप पोगसे या गोष गोप निमय ममी है, ऐसे मे इम्पोंमें निरफ्ना मान या है। और पा मापता ही सार है, यही वयान है, मरक वारि गतिका व मी पही है, यही बना मरण है, और यही देह है, यही ऐका विकार है। यही पुत्र, पही पिता, पही सम, पही मित्र मादि माक्को कम्पनाका कारण है। मौर या उसकी निचियाँ सहम की मोक्ष। तपासी निरिक बिपे ससग-सपुरुष वादि साधन को है, और परि न साधनों में भी पर अपने पुस्पार्पको विपापे और मगाये तो ही सिर ।वधिक क्या करें। स्वना सक्षेप कपन ही पदि गौरको ग बाप तोप सर्वात पम, नियम, जप यात्रा, भक्ति, शासनान माविसे मुजो बाप इसमें कई संझप माही। ४५३ बर्थ, कार्तिक एदी ७ १९५९ रुणदास के विचको म्परता देखकर तुमारे सबके मनमें से पता है यह ना सामाविक है। पदि बने तो योगवासिष्ठ वको तीसरे प्रपरमसे उमें चना अपना अषण करना) वर प्रापि प्रसे मिस तर बकाश मिले तपा सरसग हो, उस तर घरमा । विममें मिससे पैसा अधिक समय बरकाश मिझ सके उतना व्य (सना योम्य है। विचमेसे निवि करमा पित है।
फा ४५४,४५५] चिपिय पत्र भादि संप्रह--२ण्या यर्प ४५४ बम्बई, कार्तिक मुदी ९ पुष १९५१ साफ मनसे खुलासा किया जाय ऐसी तुम्हारी इष्य हा करती है । उस इसके कारण हो साफ मनसे खुलासा नहीं किया जा सका, और बत्र मी उस इसके निरोध करनेके सिवाय तुम दूसरा कोई विशेष कर्तम्प नहीं है। हम साफ चिचसे मुखासा करेंगे, ऐसा समसकर बयाका निरोष करमा योम्प मारी, परन्तु सत्पुरुपके सगके माहाम्यकी रक्षा करनके लिये उस इच्छाको शान्त करना पोम्प है, ऐसा विचार कर उसका शान्त ही करना उचित है। सासाकी इच्छासे ही यदि ससारके प्रतिषधक दूर होने की दशाके सुधार करने की इच्छा रहती हो, वो भौहासमें उसे दूर करना ही योग्य है। क्योंकि हमें ऐसा लगता है कि तुम यो बारबार जिससे होवा कुटुम्म मोह है, सारा परिणाम है, और किसी अशसे असासा सहन न करनेकी ही पुति है। और जिस पुरुपको यह बात किसी मटरनने सिसी हो तो उससे उसका रास्ता बनाने के बाठे ऐसा होता कि जबतक इस प्रकारकी निदानादि ये तस्तक सम्यक्त्वका विरोष ही बसा है। पेसा रिचारकर से ही होता है। उसे तुमको सिसना योग्य नहीं है। ४५५ बमाई कार्तिक मुदी १० सोम १९५१ । - सब गोल बारमरूपसे समभमान है। दूसरे पार्यौ जीव पर निमति करे सो परि भ्रमण दशाको प्राप्त करता है, वार पदि निरके विपपर्मे निगमुधि हो तो परिभ्रमण दशा दूर होती है। जिसके पित, इस मार्गका विचार करना पावश्यक है उसको, जिसकी बारमा पान प्रकाशित हो गया है, उसकी सानु सहमसे बनन्य मछि करना ही परम श्रेय है। और उस दासानुदास भक्तिमानकी मलि प्राप्त होनेपर जिसमें कोई विपमता नहीं पाती, उस बानीको पम्प है । उतनी साध दशा जबतक प्रगट न हो तबतक बामाको कोई गुम्रूपसे पारापमा करे तो प्रपम उस गुरुपनेको छोड़कर उस शिप्पमें ही वपमी दासानुदासता करना पोम्प है। (२) है न 1 स्पिर पिपूर्वक त्वतरंगदेश, तो समस्त पर द्रोसे मुफ तेरा परम प्रसिद ससमाप उसे अनुभवमें वायेगा । हे मी । बसम्यग्दर्शनके कारण पा सम्म तुझे मासित महीं होता । उस स्वरूपमें तुझे प्रकारे म्पामोहरे और मप है। सम्पदर्शनका योग मिम्नेसे उस काम मादिको मिति होगी। हे सम्पदर्शनसे युक्त ! सम्पभारिप्रको ही सम्पदर्शनका फल माममा मोग्य है, इसम्पेि उसमें अपमत हो। बो प्रमधमान उत्पम करता है पर से कर्म-धको सप्रीतिका कारण है। है सम्पभारिप्रसे मुख! बब शियिता करना पोम्प नहीं । पोमात वयप पा पह तो भी निरमा, फिर प्रब कतरापरत पदमें किसलिये शियिता करता है।
४५ भीमद् परम्प [पm महामाक पितको स्थिरता मी रिसमें एनी कमि है, ऐसे हुयमकाटमें तुम सापर वनुया जाती है पहचारफर छोकके वामेशमें प्राति करते हुए मुझे तुमने जो प्रश्न बानि सिमानेरूप मे बाकसमान किया, इससे मेरे मनको सतोप एमा। ४४९ बई, कार्तिक पुरी दुध १९५१ मी सत्पुरुपको नमस्कार श्री सूर्यपुरस्थित, परम्पषिध, ससग-योम्प श्री "के प्रति भी मोहमयी भूमिसे गोन्मुख दशके गुरु श्री का वारेमस्मृतिपूर्वक यथायोग्य पाँधे । विशेष स्मिता है कि हमारे सिर तीनों पत्र पोरे पोरे दिमके खतरसे मिले है। या गौष कपत मापाके वावरणसे दिशा-मा हो गया है, और उस समपसे उसी परम्पर्प- रपि प्रगट नहीं होती-परमार्थमें परमार्यच प्रबाह हो गया है, और उससे बोध प्राप्त होने के सनपसे मी मिससे उसम बापका प्रवेश हो सके, ऐसा मार स्फुरित नही होता, स्पानिपस गौरकी चिपम रशा करकर प्रमुके प्रति दीनता प्रगट की है कि नाप ! भा मेरी कोई गति ( मार्ग ) मुख मही दिशा देता । पोंकि मैंने सर्वम्व स्टा देमे नैसा काम किया है, और सामाविक ऐबक होते हुए प्रपान करमेफ मी उस ऐचर्यम विपरीत मार्गका हो मैन वापरण किया है, उस उस सोपसे मे0 निति कर और उस निवृत्तिका सोतम सदुपायम्त जो सद्गुरुके प्रति शरण मात्र है, बिससे सत्पथ हो ऐसी रूपा कर। इस मानके पास दोहे विनमें "हे प्रमुरे प्रमु! ४ का ' दानामाप पा प्रपम माय । दोरे तमें या एंगे। जिससे इन दोहोंची विशेप अनुप्रेक्षा हो मैसे करोगे तो या विशेष गुणासिका है। उनके साप से बाठ पेटक पदोंकी मनुप्रेक्षा करना भी पोम्प है, जिसमें इस गाँवको क्या भाधरम करना बाकी या और भो भो परमापक नामसे माचरण किमा पर मातक सा हो मा तपा उस माचरपमें मिप्या बापाको निदत्तकरमेके लिये गो ठपोश पाहै या भी बनुप्रेक्षा फरमेसे गालको विशेष पुस्याका है। पोगवासिष्ठका पाचन पूरा हो गपा हो तो पाये समप उसको मद रसकर वर्षात् भय फिरसे उस बिना रद करके उचराष्पपनसूत्रका विचार करना । परन्तु उसका कुर-सम्प्रदाय बामाक मार कर लिये ही विचार करना। पकि बाको मुम-पोगसे गो सम्मान प्राप्त मा पता परमार्पस्म है या नही ऐसा विचार करनेसे पीबागे नही पती बौर सहर हो उसे ही परमार्थ मानकर पीच परमापसे फ ाता है। सन्येि मुमा बार तो पो दरम्प वारको सद्गुम्के योगसे फापामको प्राप्ति कप कामें होने के साबममूत सम्प मौर उप- शमके लिये पोगवासिम उक्षामपन मादिका विचार करना पोप, तपा प्रत्यक्ष पुरुस्के पत्रमोका पूपिर मणि भाव माननेके पि विचार करमा पोम्प है। 1 दयाक पत्र १५ ,११४५२] विविध पत्र मादि समार-२७या पर्व - ४५० पई, कार्तिक मुदौ ३ मुभ १९५१ श्रीकृष्ण चाहे मिस गतिको प्राप्त हुए हों, परन्तु विचार करनेसे स्पा माझ्म होता है कि ये बारममावमें उपयोगसहित थे।निन भीमने कांचनको वारिकाका, छप्पन फरोग पादोंके समाइका बोर पनिषयके वाकर्षित करनेवाले कारणों के संयोग, सामीपनेका मोग किया, उन कृष्णने जब देहको छोगा, तब उनका क्या दशा पी, या विचार करने योग्य है । और उसे विचारकर इस मीवको बहर वापुस्तासे मुक्त करना योम्प है। कुछका सहार हो गया है, पारिका मस्म हो गई है, उसके शोकसे मिल होकर वे मके बनमें भूमिके उपर सो हेरें । यहाँ अण्डमारने अप पाण मारा, उस समय मी निसने धीरचको रस्सा है, उस मिकी दशा विचार करमे योग्य है। ४५१ बम्बई, कार्तिक सुदी १ गुर १९५१ मुमुक्षु जीवको दो प्रकारकी दशा गती है -एक विचार-दशा और दूसरी स्थितिप्रा-दशा । स्पितिप्रा-दशा, विचार-दशाके भगमग पूरी हो जानेपर अथवा सम्पूर्ण ऐ बानेपर प्रगट होती है। उस स्पितिमा-दशाको प्राप्ति होना इस कामें कठिन है, क्योंकि इस कामें प्रधानतया भारम-परि मामा पापातरूम ही सपोग राता है, और उससे विचार-दशाका स्पोग मी सग्रस्के सरसगके पंतपसे प्रात मही रोता-ऐसे कालमें कप्णदास विचार-दशा की इस करते हैं, यह विचार-दशा प्राप्त होनेका मुख्य कारण है । वौर से बीनको भय, चिन्ता, पयमब बादि मानमें निग बुदि करना योग्य मही। वो भी धारणसे ठरें समाधान होने देना, और पितका निर्भय रसना ही पोम्प है। ४५२ बम्बई, कार्तिक मुदौ ७, १९५१ मुमुमुजीवको भर्पात् विचारवान बीपको इस ससारमें बसानके सिपाप दूसरा कोई भी भय मही होता । एक बहानको निनिको पा करमेकप बोण है, उसके सिवाय विचारवान बायको इस कोई मीरा नही होती, और पूर्व कर्मक मस्से कोई पैसा उदय हो वो मी विचारणानके पितमें 'संसार काममा , समस्त छोक हु ससे पारित है, मयसे माकुछ है, गगनेपके प्राप्त फासे प्रमादित है' या विचार निधयसे पता । वोर मान-प्रासिका कुछ बतराप है, इसलिये पर काम संसार मुझे मपका ख और मुझे डोकका समागम करना योम्प मही,' एक पही मय Aचारवान रसमा योग्य है। महात्मा मोतीपंकरने निर्मात्यको प्राप्त हुए परिपा सहन करनेका बारम्बार उपरेश Pपा है। उस परिपहले सरपका प्रतिपान करते हए मानपरिपा भौर दर्शनपरिपा इस प्रकार दो परिपोका प्रतिपादन किया है। भर्पात् किसी उदप-योगका प्रावत्य हो भौर समग-मपुस्पका योग नेपर मी गोषको मानके कारणों को दूर करनेमें हिम्मत म चा सकती हो घबराहट पैदा हो जाती हो, तो मी पौरन रखना चाहिये, सग-सपुस्पके सपोगका विशेष विशेषरूमसे बापवन करना चाहिये- - भीमद् पामचन्द [ फा 40 पोरा मनुक्रमसे वानका निचि होगी, क्योंकि यो मिरिचत उपाय है, और पनि गावकी मा होने की पुदि है तो फिर परमान निराधार हो मानेपर किस तय पर सकता है। एक मात्र पूर्व कर्मके पोगके सिवाय यहाँ उसे कोई मा वाधार नहीं है।तो निस पावर समग सत्पुस्पका संपोग हुवा है और जिसका पूर्ण कर्मकी नाति रमेका ही प्रयोजन है, उसाचे कमसे दूर सकता है। ऐसा विचार करके मुमुसु बीपको उस मानसे होनेवामै वाकुल म्पासताको पौरजसे स्पाम करना चाहिये-स तय परमार्प करकर परिपाको कहा है। कहाँ हमने सक्षेपमें उन दोनों परिपहोंच स्वस्म मिसा है । इस परियाका स्वरूप मानकर सस्मग-सपुरूषो सपोगसे, निस मानसे पाण्ट होती है पनिहत होगी--पर निश्चयरपकर, यपाउदय मानकर मगवान्ने पौरन रसना ही बताया है। परन्तु पौरवको इस वर्ष नहीं का कि सरसंग एपुरुषके संपोग होनेपर प्रमादके कारण तिन करना या पारयो और उदय है, यह बात मी विचारपान गोषको स्पतिमें रहना पोम्य है। भावार्थकर मादिने फिर फिरसे बीयों को उपदेश दिया है परन्तु पीर नशा-मदीराना चाहता है तो फिर पाँकोई उपाय नहीं पा सकता । उन्होंने फिर फिरसे ठोफ ठोककर कहा कि यदि पा मौष एक इसी उपदेशको समन्स बाय दो मोक्ष सहन हो। नहीं तो बनत उपापोंसे मी मोक्ष नही मिस्ती गौर या समझना मी कोई कठिन नहीं है। क्योंकि नीरा मो स्वरूप है उसे ही गोषको समानारे मौर पर कुछ दूसरेके सरपको बात मी कि कमी दूसरा उसे किया मना न मतापे और इस कारण प समझ न पा सके । वपने वासे वपने भापका गुप्त राना मी किस तराणे सकता है। परम्त रिस ठरा गाँव स्वप्न पचा मसमाम्य भपनी मृत्युको मी देखता है, वैसे ही मान दशाम सनम योगसे यह बात को सप निना नहीं है, ऐसे दूसरे इम्पोंमें निमफ्ना मान या है। और या मान्यता हो संसार है यही पान नरक मादि गतिमी यही पही स्म है, मरण है, मोर पसी । यही देहका विकास है पहौ पुत्र पहा पित्य, पानु यही मित्र वादि माको फापनाका कारण है। मौर वहाँ उसकी निवृति ई माँ बाग । मोक्ष है । तपा सो निरिक म्पेि समग-सपुरुष बादि सापन को बौर पर इन सापोंमें भी पांच नपने पुम्यापको पिापे और भगावे तो हो सिदि । बधिक क्या करें। इक्ना सक्षेप कपन हो यदि गौरको म्ग गाय तो पर्वत यम नियम अप यात्रा, मळि शासनान वादिसे मुळ को गाप, इसमें कोई संशप प्रो। ४५३ बर्च, कार्तिक ७ १९५१ रणदासके वित्तको म्ममता देवर तुमारे सबके मनमें सद यता, पहोना सामाषिक है। परि बने तो योगवासिष्ठ प्रम्पको तीसरे प्रकरणसे ठने माना अपना अषण कराना और प्रापि- एनसे जिस तयश मि तथा मसग हो, उस व्य परमा । दिनमें निस्से पैसा बधिक समाप कनकास मिल सके उसमा ब्श रसना पोभ्य है।णास विमेंसे निक्षेपको निरापि करमा राषित है।
पर ४५४ ४५५] विषिष पत्र मादि सपा-ज्यों वर्ष ४५४ बर्ग, कार्तिक मुदौ ९ गुन १९५१ साफ मनसे खुस्पसा किया जाय ऐसी तुम्हारी इछा रहा करती है । उस इमके कारण ही साफ मनसे सुखासा महीं किया जा सका, और अब मी वस इलाके निरोध करनेके सिपाय सुमें दूसरा कोई विशेष फर्सम्य नहीं है। हम साफ पिचसे मुलासा करेंगे, ऐसा समझकर इसका निरोप करमा योम्प नहीं, परन्तु सत्पुरुपके सगके माहाम्यकी रक्षा करनेके लिये उस इम्मको शान्त करना योग्य है, ऐसा विचार कर उसका शान्त ही करमा उचित है। समसगकी इप्यासे हो यदि ससारके प्रतिववके होनेकी दशाके सुधार करनेकी इमारती हो, सो मी में उसे दूर करना ही योम्प है। स्पोंकि हमें ऐसा आता है कि तुम जो बारबार लिखते हो वह कुटुम्ब-मोह है, सामेश परिणाम है, मौर किसी मासे मसाता सहन न करनेकी ही युद्धि है।ौर निस पुरुषको यह बात किसी मतमनने सिसी हो तो उसे उसका रास्ता बनाने के बदले ऐसा होता किनबतक इस प्रकारकी निदानमुनि ये तबतक सम्यक्त्वका विरोव ही राता है। ऐसा विमारकर सेद ही होता है। उसे तुमको लिसना योग्य नहीं है। । ४५५ बर्मा कार्तिक मुदी १५ सोम १९५१ (१) सब जीव आरमरूपसे समस्वभावी है। सरे पदार्यमें पौष पदि निनादि करे तो मा परि झमण दशाको प्राप्त करता है, और पनि निनके विषयमें निबदुन्धि हो तो परिभ्रमण दशा दूर होती है। जिसके पिचमें इस मार्गका विचार करना बावश्यक है उसको, निसको वारमामें यह बात प्रकाशित हो गया है, उसकी दासानुसरूमसे बनन्य मति करना ही परम श्रेय है। भोर उस गासानुस भक्तिमानकी भक्ति प्राप्त होनेपर विसमें कोई विषमता नही माती, उस पानीको धन्य है । उतनी सात दशा जबतक प्रगट मई तबतक बारमाकी कई गुरुरूपसे वाराधना करे तो प्रथम उस गुरुपनेको छोड़कर उस शिप्यमे ही वपनी दासानुसता करना पोम्प है। (२) हे गीत 1 स्थिर रधिपूर्वक तू मतरंगमें देस तो समस्त पर बोसे मुक वेग परम प्रसिद समरूप व मनुमबमें बायेगा। है नाता सम्पम्दर्शमके कारण पा सरूप तुझे मासित नहीं होता । उस सरूपमें तुझे शकते, म्पामोह। और मय है। सम्यग्दर्शनका योग मिनेसे उस महान बादिको निति होगी। है सम्पदर्शमसे मुक्त ! सम्पचारिको ही सम्पनिका फल मानना पोम्प है, इसलिये उसमें बममत्त हो। यो प्रमत्तमान उत्पम करता है प से कर्मषको मप्रतीतिका कारण है। है सम्पभारिप्रसे युद्ध ! बब शिपिम्ता करना योग्य नहीं। गोगात बतराप पाहतो वा निाच हवा, फिर जब ब्रतापदित पदमें फिसठिये शिपिस्ता करता है।
वर्ष २८वों
परमपद-प्राप्तिकी मापना
(अंतर्गत)
गुणमेणीस्वरूप
४५६
बा, कार्तिक १९५१
ऐसा पपूर्व बक्सर कम प्राप्त होगा ! कब में बाल और बम्पतरसे निम्त्य गर्नेगा ! समस्त
मयके वाण अपमको भेदकर कार में महान् पुरोक पपपर विचरण काँगा ऐसा पूर्ण कर
का प्रास होगा।
समस्त मास उदासीन पि होकर, दो भी के सपमके हो तोतया कप किसी
कारपसे वन्य पु मी कम्पना न हो, पौर देश में कचिन्मात्र मी ममान मये। ऐसा वपूर्ण वासर
कर प्रास होगा। ॥२॥
पनिमोहनापके नाश होनेसे शान सत्पन हो सवा दोसे मिम स भवपके ग्रामसे
पारित्रमहनीयको पौण ाबा देखें इस तय र लपका पान या करे । ऐसा पूर्व वसम का
प्राप्त होगा! ॥३॥
तोनों पोगोंके मंद हो गानेसे मुस्यस्पसे देपर्यंत भारम-स्पिरता थे। सपा इस स्पिरताका
पोर परिपाइसे अपना उपसर्गाके मपसे कमी मी बंद न बा सके । ऐसा अपूर्ण वसर का प्राप्त
ग: n
एफमके हे पोग प्रालि और प भी बिनभगवानको नाभापान होकर निर.
स्वरूमके उससे हो। तथा पर मी प्रतिक्षण पाती हई स्पिविमें हो, मो मतमें निग सरूममें चीन
पाय । ऐसा भपूर्व नपामा प्रास होगा। ॥५॥
।
नपूर्ण भार एसोपा मारणेपर पर कामावर नियो!
नाम नलिने चिया र मत्पुल्पने
पंपूर्ण प
सोमाधिक मात्र सम्प)
मग परमापसेमा दोपवित् मूल नव थे। भपूर्व ॥२॥
एमयेरम्पतीवीरपोषमित्रपट पैदराबान।
देवी प्रचास्तिमोर मोने पवे एईमसम्पप्नापूर्व ॥३॥
भारतगती मुस्ले ग्रेसचे
और परमारसमम्मे माती परे पहा मानो वयो।मपूर्ण avi
स्यामा प्रायना स्वामिम्मम भापनि ।
सनमा परी मतपय राम ॥५॥
१६ परमपद-मासिक माना] विविध पर मादि संप्रह-२८षों वर्ष पाँच पिपयोंमें राग-देपका ममाव हो, वौर पचप्रमादके कारण मनमें क्षोम म हो । तया द्रम्य, क्षेत्र, काम और मायके प्रविषम विना ही छोमरहित होकर उदयके वाधीन विचरण कर। ऐसा अपूर्व अवसर कम प्राप्त होगा! ॥६॥ कोषके प्रति क्रोध समान ये, मानके प्रति सरख्याका मान ये, माया प्रति साक्षा-मापका माया ये, और छोम के प्रति उसके समान छोम न थे। ऐसा वपूर्ण अवसर कब प्राप्त होगा!॥ ७॥ बात उपसर्ग करनेवाईके प्रति मी क्रोष मये, यदि चक्रवती मी पदमा करे तो मी मान म ॥ देह नाश होती हो तो मी एक रोममें मी माया उत्पन्न न हो, तथा प्रबल सिरिफा कारण होनेपर मौ छोम न हो। ऐसा अपूर्व मनसर कर प्राप्त होगा! ॥८॥ मममात्र, मुरमात्र, स्नानाभाष, बदत-धोक्न, त्यादि परम प्रसिद छमणम्प जो ब्रम्पसपम है वपा केश, राम, नस अपना शरीरका श्रृंगार न करनेडप ओ मावसयम है, उस दम्प माव सयममय पूर्ण मिमप मवस्था ये। ऐसा अपूर्व मबसर कर प्राप्त होगा। ॥९॥ श-मित्रके प्रति समदर्शिता ये, मान-अपमानमें सममान से, बीवन-मरणमें म्यूनाधिक मात्र न ऐ, तपा ससार और मोक्ष पुर सममाव । ऐसा अपूर्व ममसर कब प्राप्त होगा। ॥१०॥ स्मशानमें पके सपरण करते हुए, पतिमें पाप सिंहके सपोगमें यते इर, मनमें धोमको प्राप्त न होकर बगेछ बासनसे स्थिर रहैं, और ऐसा समाई कि मानो परम मित्रका हो सब प्रास वा है। ऐसा अपूर्ण असर कब प्राप्त होगा ! ॥ ११ ॥ मोर तपश्चर्या भी मनको स्ताप न हो, स्वादिए मोनममें मी मनको प्रसता म हो, तपा रस-कणसे कर वैमानिक देवोंकी अदितक समीको एक पुद्रसहप मार्ने । ऐसा अपूर्व अबसर कब प्राप्त रोगा ॥१२॥ विषयमा गयोपविणेवता पंचम्परे म मने मननो मनो। इम्म नै पात्र मात्र प्रतिपरक वियप उपानिय पीतयोम मपूर्ण ॥ पौषपदीप प्रेक्समावता मानाने दो निपमान मान यो मासापासे मापा जी मारनी मयले महीलम समानामपूर्ण ||on बारपाकस्से पत्र मेष नही पीचर वापि न म मन थे। हाप पर माया पार न रोमा प्रेम मागे प्रश्न विदि मयन थे । म n नममा मुटमा बममानवा मंतपोषन भादि परम प्रक्षिप म ऐम मनमम गंगार नहीं मान समर नियो|भपूर्व ॥९॥ पण मित्रप्रत्येक उमार्गिका म्यन ममाने र सेम सम्परयो। विपरपे ना म्पूनाधिम्या मह मोच पर एर म समपर थे। मपूर्ण है। एफी परतो स्मशान परी पर्वतमा पाप गये। भरोत मान, ये मनमा नरामता परम मिला या पाम्या सोग थे। मपूर्ण र बोर वर्गमा पल मनने पर नहीं मन मा नहीं मनने प्रतहमा ; रसपरेन वैम्पनि देखनी में मापा एकसमा सेमपूर्व ११ - ।
४२२
भीम पमबन्ध
[सम्पर-पास माना
इस पद पारिप्रमोहनीया परयय करके माँ अपूर्वकरण गुणस्पान है उस दशाको प्रश्न कर,
तपा एपकोणी वास होकर अतिशय शुम म्वमावका बपूर्व चिंतन करें। ऐसा वर्ष बसर कर
पास होगा! ॥ ११॥
स्वयंभूरमणरूपी मोह-समुद्रको पार करके धीणमोह गुणस्पानमें बाकर , वीर यहाँ
मन्तमार्तमें पूर्ण पावराग सम्बप ऐकर अपने फेरणानके स्थानेको प्रगट कर। ऐसा वपूर्ण सर
कार प्रास होगा। ॥१॥
या चार पमपाती काका नाश हो जाता है, जहाँ ससारके बीमका बापंतिक मास से
माता है, ऐसी सर्वभावको बाता ब्रह्म युद्ध, कास्य प्रमु, वौर यो भनत पार्यका प्रकाश पता है,
उस कास्पाको प्राप्त करें। ऐसा भपूर्व वसर का प्राप्त होगा' ॥ १५॥
यापर नगई रस्सीकी वाहतिके समान वेदमीय बादि चार फर्म ही बाकी र पाते हैं।
उनकी स्थिति देह वायुके वाधीन ( और वायु कर्मका नाश होनेफ्र उनका मी नारा रोमाता है।
पेसा पूर्व अपम का प्रप्त ऐगा ! ॥१६॥
गों मन, पचन काय, और कर्मको वर्गकारूप समस्त पुत्रों का सबम छुट माता है, ऐसा
माँ बयोगकेवण नामका महाभाम्प, ससदापक पूर्ण और बंपरीत गुणस्पान पता है। ऐसा वपूर्ण
बक्सर का प्रास होगा॥१७॥
यो एक परमाणुमात्रकी मी स्पर्शता नहीं है, जो पूर्ण कर्मकरीव करोड स्वरूप है, बोपुर,
निरंजन पैतन्यमति, आनन्यमय गुम्म्मु, मम वौर सहचपदस्प है। ऐसा वपूर्ण मसर का प्राय
होगा। ॥१८॥
पूर्णप्रयोग भार कारणास बो कर्ष-गमन करके सिमासपको प्रत होकर सुस्थित होता है, और
सार-मर्मत गमत समापि-मुसमें विराममान होकर बनत दर्शन पौर मनत बानपुट हो पाता है।
ऐसा बपूर्ण सर पर प्राप्त होगा। ॥१९॥
पम पम ने चारजमोनो बाई लामालनपूर्व मन
ली पतली कीने मासावा मन पूर्षितम बलियब सलमाष बो।मपूर्ण |
मोर स्यमय तरी की तस्मा बीसमोर एनस्पनो)
*त समय तो पूर्वलस्म वीतराग मा प्रयापमान निमान बोभपूर्व tra
पारनण्यापार मपना पौषो मायावक ना
नमय गावापा माल प्रमुबी भमेत प्रसाधनो। बपूर्ण १५॥
पेप्नीमावि चार धर्म पगा, मैरपत् मारी मात्र
पर मन भनी विवि : माडर पूर्व सरपे किया हो । बपूर्ण ॥१५॥
मन रमन मा धर्ममी पर्वणा सेन्सर बो।
एवं भयोम गुरुत्लानरमा बा महामाम्प मुनमा परामर्ष १
एक मातु माननी के म सा पूर्व प्रति भोमसाप ।
मरम्म पतनातिनमक नगुमला मनापासपूर्ण ॥१८॥
पूर्व प्रोगादि प्रचना गरी उर्मनामान माम मत परिज
मानित अनंत मापक, मनन भन मनवीर थे। मपूर्ण ॥१॥
पंत्र ४५० ४५८ ४५९] विविध पत्र मादि समाह-२८यो वर्ष
કરી
इस पदको मौसहने बानमें देखा है, परन्तु भीमगवान् मी इसे कह नहीं सके । फिर इस
सहपको नम्प वाणीसे तो क्या कहा जा सकता है। यह मान केवल अनुम-गोचर हीदरता है।
ऐसा नपूर्ण अवसर पर प्राम होगा ॥२०॥
बिस परमपाकी प्राप्तिका मैने म्यान किया है, यह इस समय शकि गैर यपपि फेरठ मनो-
रयसप ही है, तो मी यह रायचन्द्र के मनमें निश्चयसे है इसज्येि प्रमुकी बालासे उस स्वरुपको
अवश्य पाउँगा । ऐसा वपूर्ण अवसर का प्रास होगा ॥२१॥
-
४५७
केबस समयस्थित शुद्ध चेतन ही मोक्ष है।
उस समावका बनुसघान ही मोक्ष मार्ग है।
प्रतीतिके सपमें यह मार्ग यहाँ शुरू होता है वहाँ सम्पम्दर्शन है।
एक देश वाचरणम्पसे उस वाचरणको पारण करना यह पचम गुणस्पानक है।
सन वापरणरूपसे उस बाधरणको धारण करना पड या गुणस्थानक है।
वप्रमत्तरूपसे उस भावरणमें स्थिति होना यह सप्तम गुणस्थानक है।
अपूर्व मास्म-जातिका होना यह मएम गुणस्थानक है।
सवागत स्मल कपापोंका बम्पूर्वक निजस्वलपमें बना यह नार्को गुणस्थानक है।
सूक्ष्म
दसों
उपशांत
म्यागयों
क्षीण
वायाँ
"
"
"
"
.
४५८
पानी पुरुषों को प्रतिसमय वनंत सयम परिणामोको पनि होती है-ऐसा सोने का है,
यह सप है।
पर सुपम, विचारका तीक्ष्ण परिणतिसे तथा प्रमरसमें स्थिर होनेसे प्राप्त होता है।
४५९
एकांत मौनके द्वारा निनभगवान्के समान पानपूर्वक में
वाकिचिनरूपमें विचरते हुए
यमपामस्वरूपाकर होगा।
परमानी शानमा कही एसा नहीं पाते प्रेमपवान थे।
सम्पने मम्म पानी मे! मनुमगोचर मारवेशान थे। मप २ ॥
पर परम्पमासिन मर्नुपान में गमगर ने हाय मनोरपस्म बो,
दो पप निथप पम्पन्न मनने मो ममुमागए पर्यवे लापमो । मपूर्व ॥२१॥
भीमद् रामचन्द्र [सर ४॥ ४६० एक बार विक्षेप शत ए बिना अति समाप बामे दे सकने योग्य भपूर्व उपम प्रकट नहीं होगा। कैसे, को, स्पिति करें! ४६१ बर्प, नर्तिक मुदी १५-मौम १९५१ मोठमोगसूत्रको एक बौमात्र उत्तर पहाँ सक्षेपमें हिसार- (१) यो बाहमाका तो भवति करे किन्तु दूसरेका न करे, पा प्रत्येकनुर बपना पशोप्पा केली। क्योकि ये उपदेश-मान नहीं चलते हैं, ऐसा प्यार है। (२) यो वाहमाका तो मात नहीं कर सकता किन्तु सरेका मत करता है, पर परिम- सरीरी चार्य है, अर्पात् ससको कुर धारण करना वमी और बाकी है।किन्तु उपोध मार्गको बारमारा उसको पहिचान र स कारण उसके द्वारा उपदेश पुनकर भोता गाँब उसी मबसे इस संसारका मत मी कर सकता है और भाचार्यको उसी मासे मात म कर सकनेके कारण उसे दूसरे मग रस्सा है। वपना कोई बीच पूर्वकालमें हानायवन कर प्रारमोदयमें मद अयोपशमसे वर्तमानमें मनुप्प व पाकर बिस्मे मार्ग मही जाना है, ऐसे किसी उपदेशकके पाससे उपदेश सुनने- पर पूर्व सस्कारसे -पूर्वक वागमनसे-ऐसा विचार करे कि या प्ररूपमा मबस ही मोशका व मही है, क्योंकि उपरेडा बषफ्नेसे मार्गको प्रसपणा कर दाहै नपवा पा उपदेश देनेवाम नाव स्वय परिणामी पर उपदेश दे रहा है, यह महान है—ऐसा विचार करते हुए उसका पूर्वागमन बागतो ठठ, और व उदयका मारा कर मात करे-इसीसे निमितरूप पाण कर ऐसे उप- देशव समास मो इस मगमे किया होगा ऐसा माश्म होता है। (३) नो रूप मी तरें वौर इसको मौ तारें, वे मी वीर्षकगदि ।। (१) जो स्वयं भी तरे नहीं और इसरों को भी तार न सके ममम्प पा दुर्मम्प पर है। इस प्रकार यी समाधान निमा हो तो विनगम निरोपको प्राप्त न हो। ४६२ बम्बई, कार्तिक १९५१ मापसगी वो तादात्म्पपन है, हावाम्पफ्न पदि मात हो नाम तो साल समापसे वाल्मा मुक्त हो-ऐसा मारमादि पर्नत बानी-पुरु कर गये। यो पुस म उसी रूममें समापा मारे। १६३ पर्या, चर्तिक वदी १५ दि १९५१ जब प्रारमोदप इम्यादि परणों में निर्मको तब विचारमान चौबको निरोप प्राप्ति करना पोय माही, बप बासपासको प्रापि पात सँमासे करना उभित के० एक ही गम देखते एका मापिकरमा नपित महा।
विवेप पत्र मावि संप्रह-२८यौप ४२५ दुविधाके शरा किसी कर्मको नितिकी इच्छा करते है तो यह नहीं होसी, और बार्चम्पान होकर मानके मार्गपर पा रस्सा गाता है। - ४६४ बम्बई, मगसिर मुदी ११ १९५१ प्रश्न-उसका मम्प मही, वर्ष नहीं, और यह अप तथा अमेष है, इत्यादि स्मसे श्रीगिन भगवान्ने परमाणुकी म्याच्या कहा है, तो इसमें अनन्त पर्याय किस तर घट सकती है। अपना पर्याप या एक परमाणुका हो दूसरा माम है या जार कुछ। इस प्रनसूरक पत्र मिग था । उसका समाधाम इस प्रकार है उत्तर - प्रत्येक कार्यकी बनम्त पर्याय (कास्पार) होती है। मनन्त पापरहित कोई पदाथ हो ही नहीं सकता—ऐसा भौजिनमगवान्का वमिमत है, वह यह पयार्य ही माश्म होता है। क्योंकि प्रत्येक पदार्थ समय समयमें अबस्पान्तरको प्राप्त करता एषा प्रत्यक्ष रिसाई देता है । जिस तरह बारमा प्रतिक्षण सकम्प विकल्प परिणतियाँक कारण मरस्पान्तर मा करती है, उसी तय परमाणु भी वर्म, गध, रस, रूप मबस्पान्तरको प्राप्त होते गत है । ऐसी कास्पान्तकी प्राति होनेस उस परमाणुके अनन्त भाग हुए, ऐसा काना ठीक नहीं । पोंकि या परमाणु अपने एकप्रदेश क्षेत्र अगा- हिलको मेरे बिना ही उम अवस्थाम्वरोको प्राप्त होता है। एकप्रदेश-क्षेत्र अगाहिलके बनत माग हो नहीं सकते। एक ही समुरमें निस तय तरगें उठती इसी है और ये तरर्गे उसीमें समा जाती है। पुदी वरगोंके कारण उस समुद्रको जुदी जुदी अबस्थाएँ होनेपर मी मिस तय समुद्र अपने बगा- हक क्षेत्रको नहीं छोरता मोर म कहीं उस समुद्रके कनन्त मिन मिम हिस्से ही होते, मात्र अपने ही स्कसपमें वह कोमा करता तगित होना पर समुद्रको एक परिणति है यदि गस शान्त हो तो शाम्तता उसकी एक परिणति ह–कोई न कोई परिणति उसमें होनी जरूर पाहिए । उसी तय मर्ण, गपादि परिणाम परमाणुसे बदसते यते है, किन्तु उस परमाणुके की दुको दो गाने का प्रसंग मही माता के मात्र स्यान्तरको प्राप्त हाते यते हैं। जैसे सोना कुणाकारको मेरकर मुकाकार होता है, उसी तर परमाणुकी मी एक समयको बरस्पासे दूसरे समयको वरस्पामें मुझ क्न्तर रामा करता है। वैसे सोना दोनों पापोंको परण करनेपर भी सोना ही है, वैसे ही परमाणु भी परमाणु को रहता है। एक पुरुष (जीव ) बालापन छोड़कर बवान होता है, जबानी मेकर र होता है, किन्तु पुरुप यही पता है इसी तप परमाणु मी पपायों को प्राप्त होता है। माकाश मी बमन्त पर्यायी है और सिद्ध मी मनात पर्यापी है ऐसा निनमगवान्का अभिप्राय है। इसमें विरोभ नही माश्म होता । यह बहुत कुछ मेरी समझमें भाया है, किन्तु विशेषलपमें नहीं किसे जा सकने के कारण, जिससे तुमको यह बात विचार करने कारण हो, इस तरह उपर उपर से मिली है। मोसमें मेष-उम्मेष यो भवस्थायें है,ये उसको पायें है। दीपककी हसन चमन स्थिति उसको पाप है। बामाको सकम्प-निकस्प दशा बना हाल-परिणति पर उसकी पाप है । उसी तरसे वर्ष गंध परिणमनको प्राप्त हों, यह परमाणुकी पप्प है । पर इस वाहका परिणमन न हो तो पर ५२ भीमद रामचन्द्र [पर ४५ जगत् इस विचित्रताको प्राप्त नहो सके, क्योंकि यदि एक परमाणुमे पाय म होगी तो सभी परमाणुगों में भी पापै म रोंगी । स्योग, नियोग, एकरस, प्रपक्व झ्यादि परमाणुको पाप है और ये समी परमा दुओंमें होती है। जिस तर मेर उम्मेपसे भुका नाश नहीं होता, वसा तय पदिन भाषा प्रति समय उसमें परिवर्तन होता ये तो मी परमाणुका म्पय (नारा) नही होता । ४६५ मोहमयो (बम्ब) मगसिर दौ ८ गुम १९५१ पासि नितच होने के बाद बहुत करके बाप्पीया वर्षात् इस सबके अन्म माममें साधारण म्यापारिक प्रसंगसे यानेकी जरूरत है। पिच गुत प्रकास उस प्रसगक छूट सकमेका विचार करनेसे उस्से छूटा जा सकता है, पर मी समप है। फिर भी बहुतसे वीवोको वाप कारण ही कमी बधिक सोनेको मी स्माफ्ना होती है इसलिये वप्रतिषध भावको विशेष प करके यहाँ गानेका विचार है।पो नानेपर एक महीनेसे अधिक समय मग गाना संभव है ।काधित दो महीने भी लग गोप। उसके बार फिर यहाँस कर इस क्षेत्रको तरफ माना हो सकेगा, किर माँ हाँ- तक हो सकेगा हातक दो-एक महालेका एकान्तमें निति योग मिल सके तो पैसा करनेको रा है, और बा योग बप्रतिष मानसे हो सके इसका विचार कर या है। सब म्पपहासे निबत्त हुए बिमा पित्त ठिकाने नहीं बैठता ऐसे वप्रतिष--बसगमानका पिचमें बहुत पुरा विचार किया है इस कारण उसी प्रवाहमें राना होता है किन्तु उपानित प्रारम्पो नित होनेपर हो सा हो सकता है ना प्रतिवध पूर्वकत है मामाको इलाका प्रतिबंध नहीं है। सर्व सामान्य लोक म्पहारको निविसभी प्रसगके विचारको किसी दूसरे प्रसगपर बताने के लिये रसकर इस क्षमसे मिश्च होनेको विशेष या या करती है। किन्तु यह मी उदपके सामने नहीं बनता। फिर मी रात नि पही पिम्तम या करता है तो समन कि पोरे सम्पमा पारो माप । इस क्षेत्र के प्रति कुछ मी रेप मात्र नहीं है, तपापि संगका विशेप कारण है । प्रतिके प्रपो- जन बिना पहों बना नामाके कुछ विशेष गमका कारण नहीं है, ऐसा गानकर इस क्षेत्र नित होमेका विचार पता है। पपपि प्रति मी मिजबुरिसे किसी भी तय प्रपोगमभूत नही गती है, तो मी उदपानुसार काम करते यनेके का उपदेशको बगीकार कर उदयको मागनेके लिये हमें प्रापि-योग हमा पारे। भानपूर्वक मामा उत्पम इमा पह निथप कमी भी मही पता है कि समस्त संग बहा मा बामपपते देखते प्रसंग करते एक समपमात्र पर निबमारको विस्मरण करा देता है। और पर प्रपन देखने में मी बाई माती और पा सकती है। इस कारण यत नासबो भारत्रम्म समस्त सगमें उस मात्र यता है और पनि प्रतिदिन बहता हो तो इसलिये विशेष परिणामको प्राप्त कर सब संगोंसे निधि हो, ऐसी बपूर्व करण-पोगसे या या करता है। समर पर पत्र प्रामसे म्पाहारिफ सत्पमें लिया गया माम हो जिसमें परवाना Rayभी नहीं है। असगमा रिपपमें माम-मापनाका योदासा Rचारमात्र यहाँ मिसा है। - ४५५] पिपिप पत्रमादि सप्रह-२बोवर्ष बमई मगसिर बदी शुक्र १९५१ ४६६ बानो पुरुषका सत्सग होनेसेनियम होनसे-और उसफ मार्गफा भाराषम करनेसे नागफा दर्शनमोहनीय कर्म उपरफ्त हो जाता है नया रूप हो जाता है, और क्रम झमसे सर्व मानको प्राप्ति होकर चार स्तमस्य होता है यह बात पपपि प्रकट सत्य है किन्तु उसस उपार्जित प्रारम्प मी नहीं भोगना पाता, यह सिदांत नहीं हो सकता । जिसे केवलज्ञान हुभा है, ऐसे गीतरागको मी जब उपार्जित प्रारम्भस्मथप चार कर्माको भोगना पाता है, सो उसस मीची भूमिकामें स्थित मीयोंको प्रारम्प मोगमा ही पड़े, इसमें कुछ मी भार्य नही । विस तर उस सर्वन बीतगीको घनघाती पार कर्माको, उनका नाश हो जाने के कारण, मोगना नहीं पाता है, मीर उन कौके पुन' उत्पब होने के कारणों की स्थिति उस सत पौवरागमें नहीं, उसी तय पानीका निश्चय होने पर महान मावसे जीतको उदासीनता होती है बार उस उदासीमताक करण ही भविष्य मासमें उस प्रकारका कर्म उपार्जन करनेका उस नीवको कोई मुम्न्य कारण नहीं रहता । परिकाचित् पूर्वानुसार किसी जीवको विपर्यप उदय हा बाप, ता मी या उदय क्रमश उपशाव एवं क्षय रोकर, गौत्रको बानाके मार्गको पुन प्राप्ति होती है और यह अर्षपुन्नर-परावर्तनमें बाप ही समार-मुक हो जाता है। किन्तु समकिती बीपको, भयका सौ बीतरणको, अपवा अन्य किसी योगी या बानीको शानकी प्राप्ति होनेसे उपार्जित प्रारम्भ न मोगमा परे, भयत्रा दुम्म म हो, पह सिद्धांत ही हो सकता । तो फिर हमको तुमको यहाँ मात्र सस्गका अम्प होछाम होता है, यो सब सामरिक दुख नित हो गाने पाहिमे-ऐसा मानने सगें तब तो केवउझाना निरधक होहो नापगे । स्योंफि उपार्जित प्रारम्म पनि बिना मोगे नए होगाप वो फिर सब मार्ग इंटय ही होगाप । पानीके ससंगस बहाना प्रमगकी चि मुरझा जाती? एक सत्पासम्पका विवेक रोशा बनन्तानुबधी झोपारि सप गाते हैं। और कम कमसे सब राग-रेप क्षप हो जाते हैं यह सब कुछ होना समय है, वार हानीफ निमय- शरा यह अन्पकासमें ही वपत्रा सुगमनासे हो जाता है यह सिद्धांत तो मी नोदुम इस तरहम उपार्मित किया जा है कि मिसका भागे बिना नाश म से उसे तो भागना ही पड़ेगा, इसमें कुछ मी सह नहीं है। मेरा बान्तरिक मान्यता तो यह है कि य िपरमायके म किसी मुमुसु भाको मेरा प्रसंग हो और यह बाप मुसते परमार्थक हतुकी दो इण्या करे वा ही उसका कम्पाण हो सफता है। किन्तु पदि दम्पारिकारमको पुरा भी इछाए अपरा बेस म्पत्रमापका मुप्त उसर आग पता पख नाप, फिर गाय मनुरुममे मम्नि पामनाफो प्रास होकर मुमपुताका मारा परता -मा मुस निधय है। भार इसी कारणस तुमारी तरफस जा पप्पाबहारिफ प्रमुग विमा आपावर सब तुमझा कर बार उपाठम देकर चित मी किया था कि मरे प्रति तुम्हारे सारा इस प्रकार म्पपमप म्पक म किया आप, इसका तुम समय ही प्रपन करना। और हमे पार मा रहा है कि तुमने म इस सूचना साकार मी को पी, किन्तु तानुसार पोरे समपनकदीमा ।पा में मार परसापक संबध में तुम टिमने थ्यो , ता बार हमारे पर मनन घर मा पमेश उम मानस भीमद् बद्र [पमा तुम छोड़ देना और यदि निस्प वैसी हो पनि रस्सा करोगे तो पहमदय ही मारे किये हित हागा । उससे मुझे ऐसा माझ्म होगा कि तुमने मेरी व तिचे उमासित करमेका कारण दिया है।सक प्रसंगमें कई मी ऐसा करे तो मेरा पिच गत ममारमें पर गाय अपना पण जाता है, क्योंकि 'परमाको नाश करनेवाग या मानना इस गांवके उदयमें गई,' ऐसा भाष, भा जब तुम म्पासापक साप लिसा करते हो तर सब मुझे प्राप खा करता है। फिर मी पापको पनि विशेष परिवर्तन होनेके कारण पोरी बात पारवट पिच कम हुई होगी । तुमको परमार्थको पठाइसलिये इस बापर तुमको बम्प स्पिर होना चाहिये । ४६७ बम्बई मगसिर यदी ११ रवि १९५१ परसेंके न लिसे पुए पत्रमें जो गमर वाशय मिाह विचारवान गौनको बामाका परम हितेपी हागा । हमने तुमे या उपोप अनेक बार योबा-गत किया है फिर मी भागारिकाक कसे उत्पम रेशक कारण तुम पात बार उसे भूल गये हो वा भूस नाते हो । हम्परे प्रति माता के समान तुमारा भकिमान है ऐसा मानकर मिसनेमें कोई हानि नही है। ज्या इस सन करनेको बसमर्थता के कारण हमारेसे पैसे म्पसारको याचना हमारे द्वारा दो प्रकारसे रे एक तो किसी सिद्धि-पोगसे हुए मिठाया जा सके इस मसबकी, और दूसरी याचना किसी म्मापार रोजगार बारिकी । इन दोनों प्रकारको तुमारी याचनाओं में से एक मी हमारे पास करना या मारा मामाके हित के कारणको रोकनेवास्म और बमुद्रमसे मफिन बासमाका कारण होगा। पोंकि निस मनिमें गो करमा अनुचित है, वोर मरि कोई मीत्र हो उसमें करे ता उस ममिकाप उसे मारय हो त्याग करना पडेगा-समें कोई सन्देह नहीं है। तमारी हमारे प्रति निकाम मकि होना चाहिये, तुम कितमा मी दुसम्यों न मा पो फिर मी में उसे पूर्वक ही स्ान करना चाहिये । परि सा म हो सके तो मी उसके एक बयरकी भी सूचना हमको न करनी चाहिसे—पहा तुमको सभा पोप है । बार दमको जैसी स्थितिम देसमेकी जितना मे दम है और स्तिमा मारा उस स्पितिम दिती पखाए अपना पचनसय हमसे बताया नही पा सकता। फिर मी पूर्णम किसी उसी उदमके कारण तुम उस बातो मम माते हो जिससे तुम हमको मिसकर सूचित परनेकी श्या बनी रती है। उन दो प्रकारको पाचनामोंमें प्रपमा पाचना तो किसी भी निक-मम्मको करमी योग्य महो। भR परिभाचित् सम्पमात्र हो भी तो उस महसे होकाट गम्मा सपित है। क्योंकि पर सोतर मिप्याबका कारण है ऐसा कराविध निधय बोरामो मी सप्रमाण माइम होता है। दूसरे प्रकारको पाचना मी करमा योग्य नही, स्पोरिया मी हमारे ठिपे परिप्रमका कारण है। इसका प्रसारका परिप्रम देकर म्पबहार निमाना पाइस गौरय साविक बहुत ही अस्पता Karपोंकि हमारे लिये परिश्रम करके तु पहारका पण सेना पड़ता हो तो म्हारे लिए निमय, और हमारे सिबे भी सदुए मिमिचधारण नहीं है। ऐमी परिस्पिति होनेपर मो हमारे ४५८] विविध परमादिसम्रह-२८यों क्य । पिच ऐसा रिचार या करता है कि समसक हमसे परिप्रह मादिका लेन देनेका म्यार उत्पमें हा तबतक सय उस कार्यको करना चाहिये, नपा उसे म्याहारसबधी नियमोसे करना चाहिय । किन मुमुक्षु पुरुषको तसवधी परिश्रम कर महाँ परमा चाहिये, क्योंकि उस कारणसे नापके मछिन पासनामा पैदा हो जाना समत्र है । कदाचित् हमारा रित अद ही यसकता हो, किन्तु र मी काही कुछ ऐसा है कि यदि पम्पसे मी शुद्धि में तो दूसरे जीवमें मिपमता पैा भ होन पाये, और मधुर चिवान बाब मी तदनुसार पर्सन कर परम पुरुषोंके मार्गका नाश न करे-इत्यादि विचारपर मेरा पित्त या हताहै। तो फिर मिसका परमार्थ-बस अथवा विच-गुदिमाय हमसे कम हो उस तो अमरप ही उम मागणाका मस्त बनाये रहनी चाहिये, याही उसके छिपे प्रमउ श्रेप है, और तुम्हारे नसे मुमुक्षु पुरुपका सोमाय ही सा करना उचित है। क्योंकि तुमारा मनुकरण साज हसरे मुमुमुमकि विवाहितका फारण हो सकता है । प्राम जानेकी विषम अस्थामें भी तुमको निष्कामता ही रसनी पाहिये-हमारा या विचार सुम्हारी भाजविका के कारण चाहे जैसे दु सोंके प्रति अनुकपा होनेपर मी मिरता नहीं। किन्त उटा और बलवान होता है। इस विषयमें पिशप हतु देकर तुम्हें मिथप करानको माह और बानिथप तुझे हगा ही, ऐसा हमें पूर्ण विश्वास है। इस प्रकार तुम्हारे अपना दूसरे मुमुसु जोकि हितके ये मुधो ठीक मगा यह लिखा है। इतना विम्मनके बाद मेरे बारमापके संबंध मेरा कुछ दूसरा मिगी रिपार है, जिसका सिमुना उचित न था। किन्तु तुम्हारी जाण्माको दुसाने जैसा मेने तुममें दुछ लिसा , इसजिप उसका सिमाना पोम्प मानकर ही उस यहाँ मिला है। पर इस प्रकार है कि जबतक परिमारिका समा दमा दो-बसा म्पार हमारे उदयमें हा, तबतक जिस किसी मी निष्काम मुमुमु सपना सपात्र जीवकी अपना उसकी हमारे द्वारा अनुकपा मालकी जो कुछ भी सेवा-भारी, उसको कहे बिना ही, की ना सके, उसे उम्पा पार्यसे मी करनी चाहिय । क्योंकि इस मार्गको रुपम आदि महापुरुषोंने भी कही कही बीपको गुण-निप्पमताके लिये भातश्पक माना है। यह हमारा अपना नियका विचार हमार साभाबरण सपुरूपके लिये निपिद नहीं है, स्तुि किसी प्रकारसे कम्पोरि उस पिपप या सेवा-मामे उस जीवके परमार्मका निरोष हाना हो मो उसका मा मरपुरुषको उपशमन । करना चाहिये। ४६८ बाई मंगमिर १०५५ श्रीजिन आम-परिणामको स्वस्पताल समावि र माम-परिणामकी अस्सम्धनासा अमुमारि परत हैं। यह अनुमानानसे सनेस परम सप सिद्ध होगा। अस्पम्प कार्य प्रानि करमा भार आम-परिमामका म्पम्प ग्मना, मा सिम प्रति श्रोताकर से बानीरा मी पनना फाटिन काही है, तो सिर मरे गोरस हारा उम बात ममपित फर निगाना करिम हो इसमें कुछ भी भापर्प महो।
भीमद् पयरम् [पत्र ४५९ किसी भी पर पाक लिये हमाची प्रचि परमा, पौर किसी मौ पर फार्थमें Aयोगी चिन्ता करना, उसे जिन बातम्यान करते है, इसमें सन्देह करना पोम्प नहीं है। तीन वर्षकि उपाधि-योगसे उत्पम ए क्षेप मावको मिटानेका विचार यता है । यो प्रापि जबरम्पपानके पिचको माधा कर सीरपा प्रत्य परिकार परम्पवान गोषको कायापक मु न हाने दे तो इसमें कुछ मौ भापर्य महा। संसारमें रितमी परिणतियोंकी सरभूत माना गया है, उतनी ही माम मामको म्यूनता मोतीय करम कही परिणाम साहाता ऐसा सिद्धांत नही है। पवन तन परिणाम होता है बार मचेतनको अपतन परिणाम होता , ऐसा बिनभगवान्ने अनुमप किया है। परिणाम भयमा पर्यापरहित कोई मी पाप नही ऐसा श्रीबिन कहा। और पस्य है। भगिनने मो मामानुभव किया और साकि सम्मको साबरकार कर जो नियम किया है वह सब मुमुक्ष गोपोंको अपने परम सम्पाणके म्पेि पबम विचार करना चाहिये। जिन मगवान्दारा कक्ति सब फार्पके मात्र एक मारमा प्रकट करनेक लिये हो? और माक्षमागर्म प्रहति तोकपदाकी ही क्षती —एक बारम-नानीकी और एक माम-पाना बामपनाम- पसा भीबिनन महा। की एक मुतिमें कहा गया है कि मामाको सुनना चाहिये, चारना चाहिये, मनन करना चाहिये अनुभव करना चाहिये मर्यात यदि केवल यही एक प्रकृति की माप वा गाव साम सागरको तरकर पार पासप ऐसा लगता है। पाली तो मोतीपंकरके समान मानांके बिना हर चिसोको इस प्रतिको करते हुए म्यामका विचार करना उसमयप होना तपा माम-सस्पताम प्रास हाना दुमम है। ४६९ बई मंगसिर १९५१ ईश्वरेण्डा बसचान है और पाठ मौसा मपम है। पहिछ ही मानत पे और स्पर बसान पा किनी-पुरुषको सलाम भासहित मनसे मामाका प्रतिबंध होता। और पात पार तो ऐसा परमापरि मर होकर समाप रि गाती शान प्रति ऐसा शिदोनेसे पुन मुलम-मोरिता मान होना बरी काटिन बात है ऐसा मानकर की मी गार सकाम मापसे समागम मर, मी प्रचारपा आचरण स रहा पा। हमने तुममा तपा भी मादिको इस मार्गके मग्में कहा था कि हम सर उपरशाही मति किमी पूर्ण प्रारम्भ योगस तकार ही उसका पाहण "मको म पा) मा कमी मी तसा कुछ भी करत घेता पूणि आपापोंने ऐसा आचरण सिपा-मा प्रारक प्रगुतर हप बाते च । उन उत्तरोने हमारे रिचम इसलिये गागरोना था कि पार गरामनी रसम पर फारण मे मुमुक्षु पुरुष मी पर है मही ता उमरा में मी नाममान पापपरि उस समाममानिस तुम परमार्थ शिमारको भूग गानोगे एमा - पा. ४०१ ४०२] पिविष पत्र मादि साह--२वों पप सशय नही होता था, फिर भी प्रसंगानुसार परमार्थ रसिक ठिये शिथिलताका कारण होनेकी समागमा Pिमार देती थी। किन्तु उसको देखते हुए कहा ये तो इसख्यि होता था कि इस मुमुक्षुको पुलुममें सम्मादि विशेष होगी बीर परमार्य गरि मिट नायगी, मपया उसकी उत्पतिकी समावना दूर हो मापगी, और इस कारणसे दूसरे मातसे जीवोंको यह स्थिति परमार्थको अप्रामिमें हेतुमूत होगी। फिर सकाममापसे मननेवालेका पिको शांत करमा हमारे शरा हाना कटिन बात , इसलिये सफामी जीयोंको पूर्वापर विरोष मुदि होने अथवा परमार्य-पूज्यमावना र ो गानेकी समावना हमें जो निमाई देनी पी, यह पर्तमानमें म ।, उसका विशेष उपपोग हे, इमाठिये उसे सामापरूपसे लिया है । पूर्वापर इस बातका माहाप समता माप और दूसरे गायोंका उपकार से पैसा विशप छन रखना। ४७० मोहमयी, पाप मुनी १ पुक. १०५१ मिस किसी प्रकार बसगतासरा माममात्र साम्य हो उसी प्रकारका वाचरण करना, यही मिनमगवान्की बाधा है। इस उपाधिम्म म्यापारादि प्रसगसे एनेफा बारबार विचार या करता है, तो भी उसका अप रिपक फारा समझकर उदपके कारण म्पबहार करना पाता है। किन्तु उपार-विनिमत जिनमगवान्की जागा प्राप विस्मरण मही होती है, और हामें तो हम तुमको भी उसी भाषक पार करनके मिये करो। ४७१ बाई पार गरी १. रवि १९५१ प्रत्यक्ष जम्मामा होनेपर भी उसका त्याग करनेकी सापकी या मही हाती, भयमा बह अस्पागरूप शिपिकताको स्पाग नही सकता, भपका का स्पाग मुशि होनेपर स्पाग करते करत काल यापन करता गाता है-इन सब चारोंको गौर फैम दूर करे, अम्पकाठमें रैमा करना कसेरा, म बिपपम हो सके तो पत्र लिसना । ४७२ बम्पई, पार बी२, १९५५ +२-२-१मा--१९५१ एफ सक्ष मारमयी मार द्वारपन उमार •रार-२-२-३मा--१ ५१-२-या २-गोर माम्मान ११ प्पोररी १५१ पास मोहमसनमा म. ८-१-पर भोर मार महीने पारिवाना र ब..मिली गामा एक परमार एस्तभार माने नाममा मौर ऐसी निलम मी उत्सम भनुनार मानि पाना |-अनुगम श्रीमद् प्रवचन [पर mur उदासीन भम्प- एकक्ष क्षेक-मोहमयी म प्रारम मा--उपमान ४७३ बर्मा पौष वदी १० रवि १९५१ । निपम संसारकपमधे बोरकर नो पस मिकसे, उन पुरुषको भनत प्रणाम में चिक्की म्परस्पा पपायोम्प मोनेसे उदय प्रारम्भके सिवाय अन्य सब प्रकारोंमें बसगमार रसना ही पोम्प माश्म होता है; बौर पर यहाँवक कि बिनके साप मान-पहिचान है, उनको भी हमें मूस गाँप तो भी बात । मोंकि सगसे निफारण हो उपाधि मा करती है और सी उपाधि सहन करमे पोम्प हाम्में मेरा पित मही है। निस्पापताके सिवाय फस मौ प्यपहार करनेकी इमा माम नहीं होती है और जो म्यापार म्पपहारकी निम्पायता, उससे मी निरत्त होनेकी पितना ण करती है । उसी तह मनमें दूसरेको बोध करमेके उपयुक्त मेरी योग्यता हाम्ने मुझे महागा, क्योंकि जबतक सब प्रकार के विषम म्पाममें समावि न हो तबतक पपार्थ भामबाण नहीं करा जा सकता और जबतक ऐसा हो तबतक तो निज वन्यासकी रक्षा करना ही योग्य है और हारमें उस प्रकारको मे स्थिति होनेसे में इसी प्रकार य पापा पम्प है। पाकि मेरे चिचौ कम्प कोई तु नही है। (२) पेदान जगत्को मिथ्या करता है इसमें असत्य ही क्या है। । ४७४ बर्मा पौष १०५१ पदि जानी-पुरपके च भाजपसे सर्वोत्तम मोपद मुगम है तो रि प्रतिक्षण बारमोफ्योगको स्थिर करने योम्प पर कटिन मार्ग उस पानी-पुरुपके प बाभपसे दोना पुष्म क्यों न हो ! क्योंकि पास पावन Aचार मा मारम दोन- प्रमा-माया दिप पातो! उ.-रान पने। पमः-पाम सिम्पाद! उचरमेह नहीं पाया। प्रभा-एक और भार ममीका प्रहतियात पिणापर! रचय-प्रमा। मामा-भरा।
पत्र..] विविध पर मादि समा-खों वप ४३३ उस उपयोगकी एकामताके बिना तो मोक्षपदकी उत्पति ही नहीं। हानी पुस्पके बचनका रस आमय निसको हो बाप उसचे सर्व साधन मुर्मम हो जाते है, पेसा मसा निथप सत्पुरुषोंने किया है। ता फिर हम कहते है कि इन हपियों का गप करना ही योग्य है । उन पियोंका जप क्यों नहीं हो सकता ! इतना तो सपो कि इस दुपम कासमें ससगको समीपसा अथवा सवाश्रम अधिक पाहिये, और वरसगसे भरपन्त निति चाहिये, तो मी मुमुभुके लिये तो यही उचित है कि कठिन से कटिम भरम-साधनकी ही प्रथम इछा करे, जिससे सर्व सापन अपकारमें ही फीमूत हो गाय । श्रीतीकरमे तो इतमातक कहा है कि बिस बानी-पुरुपको ससार-परिक्षीण दशा हो गई *, उस पानी पुस्पके परपरा-कर्मबंध होना सभव नहीं है, वो भी पुरुपायकाही मुम्प रखना चाहिये, मो दूसरे बीलो सिये मी वात्मसापनके परिणामका देत हो। पानी-पुरुषको आत्म-प्रतिबधमपमें ससार-सेमा होती नहीं किंतु प्रारम्प-प्रतिवमलपमें होती है, फिर भी उसस निषिरूप परिणामकी प्रातिको । हानीकी रीति एषा करती है। जिस रतिका भामय करते हुए पान तीन बोसे विशेषरुपसे बसा किया, और उसमें बस्यमेव आम शाको मुगनेका समय ये ऐसे उदयको भी पपाशस्य सममानसे सहम किया है। पपपि उस बदन काठमें सरसग निति किसी भी प्रकारसे हो बाप तो नही बड़ी बात हो, ऐसा सय प्यान रहा है । फिर भी ससग मिचिस वैसी दशा होनी चाहिये, पदशा उदपमें रहे, तो उम्पकाखम ही विशेष कर्मका निति हो जाय, पसा आनकर बितना हो सका उतना उस प्रकारका प्रपन किया है। किन्तु मनमें मन यो रहा करता है कि यदि इस प्रसगसे अर्थात् सकल गुरबाससे र म मा मासके, तो म सही, किन्तु यदि म्यापारा प्रसगसे निच-दूर-जा ना सके तो उत्तम हो । कि माममापसे परिणामको प्राक्षिमें बानीकी या दशा होनी चाहिये, बह दशा इस पापार-पत्रहारसे मुमुधु गोत्रका दिम्बाई मही ती है । इस प्रकार को लिया उसके विषयमें अमी दासमें कमी कमी विशप विचार ठन्ति हाता है उमझा जो पुस मी परिणाम आने सटीक । ४७५ बई, माप मुदी पित्तमें कोई भी प्रचारपति परिणमी है, पह जानकर एपमें पान मा । असार पर्व देशमा आरम परिमहके कार्यमें यल हुए यदि यह बात कुछ मी निभय नपा अमागृत ह तो पाव वर्णक उपासित पैराग्यके मी निप्पम पम नामेही रमादा गाती है म प्रफार निस्प प्रतिनिधयको याद करके निरुपाय प्रसगमें रमे करत हुए वितम अनिरायनपमें प्रबल दोना पादिय-इस बातका मुमधु जीफे प्रत्येक काम पण अममें आर प्रस्पेक प्रमगमें सम्प सम्म बिना मुमुभुना रहमी समर और पमी "पाका अनुमा किपे बिना मुमुभुता मी मुमा नही ।। मेरे पिमें दान में यह मुम्प पार हो रहा ह।
भीमद् पम्वद्र [पत्र - ४.० ४ ४७६ बम्बई, माघ सुदी ३ सोम १९५१ बिस प्रारम्पको मोगे बिना कोई दूसरा उपाय नहीं है, प प्रारम्भ हानीको मी भोगना पाता है। बानी बततक माहमार्पको त्याग करनेकी इम्म न करे, इतनी ही मिरता हाना होती है, ऐसा यो मापुरुोने कहा है, एसप है। ४७७ माष सुटी ७ शनिवार क्रिम सबत् १९५१ के बा' से पसे अधिक स्पति मही बार उतम कामें उसके बारका मानना किस तर मोगा पाप, उसका विचार किया जायगा । ४७८ मई, माप मुटी ८ रवि १९५१ तुमने पत्रमें वो कुछ हिस्सा है, उसपर बारबार विचार करनेसे गति रसनेसे, जिनमें पत्र विपपाविका वाधि-सम्पका वर्णन किया हो, ऐसे शायों एवं पुरुषोंके चरित्रोंको विचार करनेसे तपा प्रत्येक काम जय रसकर माच होनेसे दो पुस मी उस भावना पाता उचित है सो ऐगी। ४७९ बाई फागुन सुटरी १२ पुक १९५१ विठ प्रकारसे बनोसे झ्टा जा सके, उसी प्रकारको प्रवृत्ति करना या हितकारी कापरे । बाप परिचयको विचारकर निात करना या इटमा एक मार्ग है। मांग इस बातको बितनी विचार करेगा उतना ही हानी-पुस्पके मार्गचे समाने समप समाप माता गापगा। ४८० बाई, फागुन पदी १५ नि १९५१ मारण इस सारमें निषित मिसे म्मान करना मिसको योम्प म ममता हो और उस म्पमारके सबमको निहत करने एष पाम करने में विशेष का म्पतीत हो जाया करता हो तो उस कामको सपकाळमें करनेके लिपे गोको क्या करना चाहिये । समस्त संसार पस्यु मावि भों कारण मशरण है शरणका देत हो ऐसी कल्पना करना फेक पग-तृष्णाके मके समान है। विचार कर करके भीतीपंकर पैसे महापुरुषोने मी ठससे निपत साना—गाना-पही उपाय है। ठस संसारफे मुख्य कारण प्रेम-पम तपा सपन सब बानियोंमे पांकार किये।। उनकी पतारे कारण गोषको निमका विचार करने का बकाया ही प्राप्त नहीं होता है और परि होता भी है तो उस पोगसे उन बंधनो कारण बारमार्य प्रापि नही कर सकता वौर पर समस्त प्रमाना है। और इसे प्रमारसे मामार-समपकास-मी निर्भय वपया अमागृत गमा पर इस गीतको मतिराप निकता, वरिवनिता । नाति र वौर उसके दूर करनेमें गति कठिन मोह ।। समस्त संसार दो प्रकासे पाया है। प्रेमसे और रेपसे । प्रेमसे विरक्त ए बिना पसे - पत्र ४८१ ४८२] विविध पत्र मादि प्रह-२८पों पपं छ्य नहीं गाता, और प्रेमसे मिरक्त पुरुपसे सर्भ सगसे विरक्त हुए बिना म्पपहारमें रहकर अप्रेम (उदास ) दशा रणनी एक भयकर क्स है। यदि यस प्रेमका त्याग करके म्पबहारमें प्रथरिकी नाय तो कितने ही गायोंकी दयाका, उपकारका एक सार्थका भग करने जैसा होता है, और सा विचार कर यदि दया उपकारादिके कारण कोई प्रेमदशा रतनसे विवेकीको चित्तमें नेश मी हुए बिना न राना पाहिये, तो उसका विशेष विचार किस प्रकारसे किया बाप! ४८१ बर्मा, फागुन मुदौ १५, १९५१ मीभीतरागको परम भकिसे नमस्कार मीदिन जैसे पुरुपने गृहलासमें सो प्रविबप नहीं किया, प प्रतिष न होने के लिये जाना वयना पत्र लिसना नहीं हो सका, उसक लिये अत्यन्त दीनमानस धमा मांगता है। सपूण पौतरगता म होनेसे इस प्रकार वर्तन करत हुए बसरमें मिशेप मा है और यह विश्वेप मा शान्त करना पाहिये इस प्रकार हानीने मार्ग देना है। बारमाका गोवस्तापार (मन्तर परिणामकी पारा) है यही बब बोर मोक्ष (कर्मसे आमाका बन होना तया उससे बास्माका छट बाना) की म्पवस्थाका त है, मात्र शचर पेशन-मोशको म्यवस्थामा त नहीं है। विशेष रागारिक मनसे बानी-पुरुपके शरीरमें मी निवसता माता, म्लानता, रूप, से, मूळ, बाम-विमम मादि दिखाई दते हैं, तथापि जितनी शानदार बोपारा बराम्परा बारमाकी निर्ममता दुई, उतनी निर्ममता होनेपर उस रोगको वर्तपरिणामसे बानी सोदन करतारे बार सकेम करते ए काचित् बास्पिनि उमत्त दिमाई देती हैं, फिर भी बतपरिणामके अनुसार हो कर्मबल भपया निशि होती है। होता जाता ૪૮૨ बमाई फान्गुन बो५शनि १९५१ सुख भई प्रोमोहनमायके प्रति, भी बन । एक पत्र मिला। यो म्पों उपाधिका स्पाग होता जाता है स्मों स्मों समाधि-मुख प्रगट । पों पों उपाधिका प्राण रोता माता स्यों स्पों समारि-मुम कम होता जावा । विचार करनेपर यह बात प्रस्पक्ष अनुभबसे सिद्ध हो पाती। परि इस स्मारके पार्षीका कुछ मी विचार किया जाप को उनके प्रति पम्प उत्पा हुए बिना न ये स्पोंकि अविचारके कारण ही उनमें मोटि हो यी है। भारमा है ब्रामा निस्प है मामा कर्मका का मामा धर्मका मोच्च है, इससे बह नित इस समसी है, और निच हो सकने के सापन है-इन घरणोंकी निसने विचारपूर्वक सिदि कर मो। उसको विधान वयमा सम्पर्शनको प्राप्ति ई समा मेनी चाहिये, ऐसा प्रीमिनमगवान्ने निरुपण किया है, और उस निवपणका मुमुभु जीवको विपनपस अम्पास करमा चाहिये । पूर्षिक किसी विशेष भम्पास-म्मे हो इन पर कारणोंका विचार उत्पम होता , अपना मस गाभाम्रपसे उस रिपारके उपम हानेका योग बनता ।
- मीमद् चन्द्र [पा ८५ वनिम पदार्थक प्रति मोरि होनेके कारम मारमान वस्तिन, निस्वस्थ, सम्मापान समाधिमुस भानमें मही माता है। उससे मोइदिम पातको समादिकाम्से ऐसी एकमता नसी मा यो उसका पिक करते करते मायको बार हारकर पाछे गेटमा पक्षण है, और उस मोर प्रपाको नाम्य रमेका समपके वानेक परिकही उस पिचकको छोर मेटनेका योग पूर्वका में बनेकवार बना। क्योंकि जिसका ममादिकाम्मे बम्पास पर गया है उस, कस्पात पुमार्य बिना कस्पकरमें हो मेवा महा जा सकता । श्सपिम्पे पुन पुन सरसंग, सतार, और अपनेम सरस बिपार दया करके उस विषयमें विशेष मम करमा योम्प है, मिसके परिणाममें निस्प शरबत मौर मुखस्वरूप बारमब्रान ऐकर निम स्वरूपमा वानिमीत होता है । इसमें प्रथमसे ही उत्पन्न होनेवाला संशय, धैर्य एवं विचारसे शांत हो जाता है। मंस मया टी सपना करनेसे मौषको केवल अपने प्रितको दी त्याग करनेका बक्सर बाता? और अनित्य पदार्पका राग यनेसे उसके कारणसे पुन पुनः ससारके भमणका पोग या करता है। कुछ मी बास्मविचार करनको इन्म तुमको या करती है -या मानकर बात सन्तोप एमा है। उस स्तोपमें मेरा पुछ भी स्मार्य नहीं है। मात्र तुम समाधिके मार्गफर वाना बात हो, इस कारण ससारदोषसे निहार होनेछ तुमको प्रसंग प्राप्त होगा स प्रकारकी संभवता देसकर स्वामाविक सन्तोष होता है-पही प्रार्थना है। ता० १६-३-९५ मा स्व प्रणाम। ४८३ बाई फागुन् की५ शनि १९५१ गरिकसे अधिक एक समयमें १ ८ का मुछ होते है इस मेक-स्पितिको निमागममें स्वीकार किया है और प्रत्येक सम्पमें एक सौ वाठ एक सौ बाठ मान मुक्त होते ही हते है, ऐसा मानें तो इस क्रमस तानों का मितने गांव मोस प्राप्त करें उतने सालोंको मोबनत संस्था हो उस संस्थाले मी ससारी गोषों को सम्मा मिमागममें बनतगुनी प्रक्ति को गई है। वर्षात् तानों काम नितने गोन मुल होते हो उन अपेक्षा संसारमें बनतगुन गाव यते। क्योंकि उनका परिमाण इतना अधिक है। भार इस कारण मोश-मार्गका प्रवाह सा प्रवाहित पते कुए मी संसार-मार्गका उम्झे हो गाना कमी समय नहीं , और उससे बम-मोशी म्पत्राधा मी विरोष महाँ माता । इस विषयमें वनिक बचा समागम होनेपर करोगे तो कोई बाधा नहीं । गोबर-मोधको म्पत्रस्पाले लिपपमें संक्षेपमें फा किया है। सबको अपेक्षा हाम्म निचर करन पोम्प बात तो यह उपाधि तोहरते पौर मा सर्वपा संग ये, ऐसा होना स्पेन कदिन है। तथा उपावि करते हुए ग्राम-परिणाम रचा न हो ऐसा होना बसंमत्र बसा है । र जानाका शाम हम सबको वो पर बात भरिक भम रहन पोग्य है कि मामामें मितनी बसम्पूर्ण समावि पवा। भपय गोयसकती है उसका उम्मेद हो ममा चाहिये ।
फा ४८r] पिविष पत्र मादि समा-२वों पप ४८४ पई, फात्गुन वा ७ रवि १९५१ सब लिमाबसे उदासीन बार मत्यत मुद निव पर्यायको सहमम्मसे मारमाके सेवन करनेको श्रीनिनने तीन शानदशा कही है। इस दशाके मापे बिमा कोई मौ चौब पनसे मुछ नहीं रोता, यह मो सिमांत श्रीविनने प्रतिपादन किया है, प असो सस्प है। कोई परछा हो गोत्र इस गहन दशाका विचार कर सकने योग्य होता है, क्योंकि अनादिसे अत्यत जान दमासे इस बीवने बो प्राधि की है, उस प्रात्तिके एकदम मसस्य और वसार समसमें आनेसे उसकी निति करमेकी बात सूझे, या होमा वहुत कठिन ।। । इसलिए जिनमगवान्ने बानी- पुरुषका मात्रय करमेरूप भक्तिमार्गका निरूपण किया है, बिस मार्गक वाराषन करनेमे मुमतामे शानदशा तत्पम होती है। हानी-पुरुपके चरणमें मनके स्थापित किये बिना मळिमार्ग सिद महीं होता । उससे फिर रिसे मिनागममें बानीकी बाबाके भाराषम करनेका जगह जगह कपन किया है। जाना-पुरुपके चरणमें मनका स्थापित होना पहिसे तो कठिन पाता है, परन्तु पचनको बपूर्ण तासे उस पचनका विचार करमेसे तपा बानीके प्रति अपूर्ण हिसे देसनेसे, ममका स्पापित रोमा मुम्भ होता है। पाना-पुरुपके भाभपमें निरोध करमेबार पचविषय भारि दोष है। उन दोपोंके वानके सापोंस से बमे से रही गना परिमे, मोर प्राप्त साधनमें मी उदासीनता रसनी चाहिये, अपना उम उम साधनों से वासि हटाकर उने रोगमप समतकर ही प्रति करना योग्य बना दोपका इस प्रकारके प्रसगमें विशेष उदय होता र पोंकि मारमा ठस दोपको नए करमेके लिये उसे वपन मन्मुस लाती है, उसका स्वरूपांतर कर उसे आकर्षित करती है, और गागृतिम शिपिस करके अपनेमें एकाग्र बुद्धि करा देता है। बह एक मुदि इस प्रकारको होती है कि 'मुझे इस प्रापिसे उस प्रकारको विशेष पापा नहीं होती में अनुक्रमसे उसे छोडगा बौर पहिरेकी मपेक्षा जागृत रंगा'। स्पा भात शाको पर दोष उत्पम करता है । इस कारण जीव उस दोपका संबध मी प्रता, अपना पर गोप बहता हो जाता है, इस बातका नामको अझ महीमा सकता। इस रोगी साधनका दो प्रकारसे त्याग हो सकता है -एक ता उस सापनके प्रसगकी निधि करमा भीर दूसरा विचारपूर्वक उसकी ममता समझना । रिचारपूर्वक तुप्यता समझनेके लिये प्रपम इस पंचविषय मानिके साधनको निति करना अधिक योम्प, स्योंकि उसस विचारका बाकाश प्राप्त होता है। उस परवियप बादि साधनको सपा निति करनेके लिये यदि गौरका बाठ न पडतातो कम कमसे पोहा योग करके उसका त्याग करना पोम्प है—परिमा तपा मोगोरमागके पशोंका अप्प परिचप करना पोय है। एसा करनेसे अनुक्रमसे ना दोष म परे, वामप-मधि सतपा सातौके पचन मामा परिणम परत जानसा प्रगट होकर मौर मुछ हो सकता है। जीर या कभी कभी इस बातका चार करे सो उसम अनामिम्पानमा बल पमा काटिन भीमासचन्द्र [पर ४८५ ४८५ ४८. हो पाय परन्तु दिन प्रतिदिम हरेक प्रसंगमें, और हरेक प्रवृटिस परिदरि फिरसे विचार करे तो बनादि जम्पासका सरकार पूर्ण भम्पास सिदि होनेसे मुम्म मामय माक्तिमार्ग सिब हो सकता है। ४८५ कई फागुन वदी १२ पुक. १९५१ सम्म मरा मरम वादि दुसॉस समस्त ससार वशरण है। मिस्ने सर्व प्रकारसे संसारको वास्था मे दोही निर्भय या है, और उसाने वात्म-समानकी प्राप्ति की है। पर दया विचार विमा बीचको प्राप्त नहीं हो सकती और संगके मोहसे फ्यषीन ऐसे इस बातको पार विचार प्राप्त होना कठिन है। ४८६ बर्मा फागुन १९५१ मातक बने तृणाको कम ही करना चाहिए । बग्म, रा मरण किसके होते । मो तृष्णा रखता है उसे ही मम्म, परा वीर मरण होते है। इसबिम्पे वैसे बने तैसे तृष्णाको कम हो कर आमा चाहिये। ममतक पपार्य सम्पूर्ण निगतरूप प्रकाशित हो, तबतक निनस्तरूपके निम्म्यापनमें स्पिर यमेके रिये बानी-पुरुषके पचन वापारमूख है- ऐसा परमपुरुप तापकरने को कहा, पासप है। बाप गुणस्थानमें रहनेवाण लामाको निदिम्पारसनरूप मानमें भुक्तवान वर्षात् मुस्पभूत मानांके बचोका नाशप माँ पापारमत है—पा प्रमाण मिनमामि वारंवार कशापोपयोग प्रालि होमेपर मिमी- णमार्गको पधार्य प्राप्ति होनपर मी उस मार्गमें यपास्थित स्थिति होने के लिये बानी-पुरुषा बामय मुन्य साषन है और प ठ पूर्ण दसा होनेवक यता नही तो मालको पतित हो जानेका भव है ऐसा माना गया है । तो पिर स्वयं अपने मापसे पनारिसे मात गाको स्युम्के स्योगके बिना निमसरूपच भान हाना अशक्य ऐ इसमें सराप कैस हो सकता है। जिसे निमम्मच नियम यता है मग ऐसे पुरुषको भी प्रत्यक्ष गगत्य म्पबहार वारंवार मुख देनेके प्रसंगको प्राप्त करा देता t तो नि उससे म्यूम दशामें भूम मा मानेमें तो भारवर्य दाया है। अपने विचारफे सम्पूर्व मिसमें संग-ससावध माघार न हो ऐसे समागममें पा जगत्मा म्पबहार विशेष बोर मारता है और उस समय बारबार मौसम्म मागम्य बीर नासमका सहप तथा सार्थकता वापत बपोश सम्प दिखाई देते।
पा४८८४८ पिरिप पर मादि संप्रह-२वाव ४८८ बम्बई, पैत्र मुटी ६ सोम १९५१ मात्र एक पत्र मिण है। यहाँ कुसलता है। पत्र दिसते लिखते अपना कुछ कारसे कहते बारम्बार पित्तकी अप्रति होती है और 'करिपत बावका इतना अविक माहाम्य ही क्या है। कामा फ्पा' जानना क्या' सुममा क्या। प्रति कैसी !' स्पादि विक्षेपसे पिचकी उसमें मप्र पति होती है और परमार्थक सवधर्म करते हुए, रिसते हुए उससे दूसरे प्रकारके निक्षेपको उत्पत्ति हाती है । मिस पिझेपमें मुस्य इस तौर प्रतिके निरोपके बिना उसमें-परमार्थ कपनमें—मा हाटमें मप्रापिही श्रेयस्कर भगती है। इस बावत पहिए एक सविस्तर पत्र लिखा है, इसलिये यहाँ विद्याप सिसमे जैसा इस नहीं है। यहाँ मात्र चितमें विशेष स्कृति होनेसे ही यह रिहा है। मोतीके म्यापार वगैरकी प्रकृतिका वनिक न करना ये सके तो ठीक है, ऐसा मो लिसारे पा पपायोग्य ह और चितकी इच्छा मी निस्प ऐसी होगा करती है । गोमके हेतुसे या प्राति होती है या और किसी हेतुसे ! ऐसा विचार करनेपर गेमका निदान मादम नहीं होता। मिपय पारिको इसे मा प्रति होती है ऐसा मी माझ्म नहीं होता। फिर मी प्रति तो होती है इसमें सम्दह मही। जगत् कुछ मेनेके लिये प्रावि करता है, यह प्राति देनेके सिपे ही होती होगी, ऐसा माश्म होता है। यहाँ का पह माझ्म हाता है, सो यह यपार्थ होगा या मी उसके लिये विचारपान पुरुपयो को सो प्रमाण । । ४८९ बबई क्षेत्र सुदी १३, १९५१ हमें यदि किसी वेदान्तसबधी प्रपाका बाँचन अपना प्रत्रण करना यता हो तो उस मभिप्रायका विशेष विचार होने के लिये पोहसमपके लिये श्रीमापाएंग, सूपगोग तथा उचाप्ययनका पाँधना-विचारना हो सक तो करना । बेदान्त के सिसात तपा निनगमके सितिमें मिमता है तो मी मिनागमको विशेष चा- रका स्पड मानकर गान्तका पृपकरण करने के लिये उम मागर्मोका बोधना-विचारमा योग्य है। ४९० बमई क्षेत्र परी ८ पुष १०५१ वनको घेतन पर्याप हाती , और बाकी या पर्याय होती है-यही पदार्थक स्थिति है। प्रस्पेक समप जो यो परिणाम होते है ये सब पाप है। विचार करनेसे यह बात पपाथ माश्म होगी। लिसना कम हो सकता। इसठिपे से विचारों का फरना बन नही सकता । सथा बारसे विचारों के उपशम करनेहम प्रातिका उदप होनेसे किसाचे स्पश्नपसे घना मी मही रो सक्ला । हमें इतनी अधिक उपाधि नहीं पता तो मी प्रापिप स्म होनसे तया क्षेत्रफ संतापनप नसे पोरे Pमके लिये पहसि नित होनेफा विचार होता है। बब इस मिरयमें गेरो सा टीम।
भीम राव [पा ४४ पूर्ण बानी पासपमन भादि पुरुषोंको मा प्रारम्पो य मोगमेपर ही पहुआ? तो फिर हम सोंको पर पारम्पोप भोगना ही पो इसमें कुछ भी संशप नहीं है। सेर केवल इतना । होता कि हमें इस प्रकारके प्रारम्बोयमें मातम मानि पैसा वरिषमता ये इतना बस नदी वीर इस कारण प्रारम्मो पके होनेपर बारबार उससे अपरिपक्व कामे होछूटनेकी कामना से वाती है कि परिइस पम प्रारम्पोदयमें किसी मी उपयोगच पयातम्ममात्र नया तो फिर बारम स्थिरता होवे हुए मी कासर ईरना पड़ेगा, भार परपावापर्षक देह छटेगी-ऐसी पिता बहुत बार हो जाती है। इस प्रारप्पो पके र हानेपर निचिकमके पेदन करनेडप प्रारम्पका उदय होनेका विचार रहा करता है परन्तु प रत ही वर्षात् एकसे रेढ़ वर्षके भीतर हो नाप ऐसा तो दिसाई नही देता, भीर पल पल मी बोसनी कटिन पाती है। एकसे वर्ष बाद प्रतिकर्मक मेदन करनेका सया भय हो जायगा-ऐसा मी नही मारम होता । कुछ कुछ उदय विशेष मा परेगा, ऐसा म्गता है। बामाको कुरा मस्थिरता रहता है । गतवर्ष मातियोंका म्पापार गभग निबन्ने बापा है। इस पर्पका मोतियो म्पापार गतवर्षको पेशा लगमग गुना हो गया है । गतवर्षको क्या उसका कोई परिणाम भामा कठिन है। पोडे नोंकी अपेक्षा हारमें ठीक है, और इस पर्प मी उसका गतबर्ष असा मही तो मी कुछ परिणाम ठीक आनेगा या समा। परन्तु उसके चारमें मात समप म्पतीत होने पैसा हाता है, और उसके लिये छोक होता है कि इस एक परिमाको कामनाकी दो पम्मान प्रापि वैसी होती है, उसे शांत करना योग्य है और उसे कुछ कुछ करना पो, ऐसे कारण पते है । मब उसे से करके प्रारम्भोदय तुरत । अप से जाप तो असारे, पसा बहुत बार मनमें वाया करता ।। पौ गो वा तपा मोतिपोका म्पापार है उससे मेरा छटना हा सके वपना उसका बहुत समागम कम दाना समत्र रो उसका कोई रास्ता भ्यानमें माये तो सिमा । चाहे तो समागममें विशेषतास कह सको तो कामा । यह बात सम रखना। सगभग तीन वर्षस ऐसा हा करता है कि परमार्पसापी अपना म्पमसपी कुछ मौ गित र मावि मातीर आर मिते मिस्ते कम्पित पैसा सगनेस बारम्बार सपूर्ण मेर देनेवारी मन होता है । जिस समय वित्त परमार्पम एकामवत् हो उस समय यदि परमार्पसपी सिपना अपना करना हो सके तो पर पपार्प का नाम परस्तु विच परि मत्पिरमत् ह और पर मार्पमापी विमा वयना कहा माप ताप उदारणा जैसा ही होता है। या उसमें अंतर पापातप्प उपयाग म दामेस र वाम पुरिसे लिमित अपना कपित म होनेसे कम्पिवरूप हौसा जाना । सिर्स तपा उस प्रसारफै नमो कारणाम परमार सर्वपमें मिसमा अपना काना गान दो काम हो गया ।इम स्पश्पर सहन प्रश्न होगा कि पिचके अस्थिरषत् हो पानेषस्या जाति परमार्पमे सिर पर रहता पा उस पित्तके परमार्थम अस्पिरपत राजानप कुरा का कारण हाना ही चाहिये । परि परमार्थ संशया देख मास माहाता वैसा पाना संभव अपच किमी पप पिर मर दाने हा प्रारम्भोरपके पासे पैसा दो तम्तामा विषयौ पत्र ४९५] विविध पत्र मावि सप्रह–२वर्ष हेसुमोसे परमार्थका विचार करते हुए, सिससे हुए, अयमा करते हुए चित्रका अस्थिरयत् रहना समय है। उसमें पहिले को हुए रेतका होना संभव नहीं । केवल वो दूसरा हेतु कहा है, वही समय है। भारमायके म होनेन्म तत्र प्रारम्प्रोग्य होनेसे उस हेतुको दूर करनेका पुस्पार्प होनेपर मी कारक्षेप वा करता है, और उस प्रकारके उदयतक बह वस्पिरता दूर होनी कठिन है, और उसने फरमार्पस्वरूप पिचके बिना तत्सबधी लिखना या करना, यह कस्पित भैसा ही लगता है । तो मी कुछ प्रसगोंमें विशेष स्थिरता यती है। म्याहारके सबधमें कुछ भी सिखते हुए उसके वसारभूत और साक्षात् भांतिमय लगनेसे उसके सवपमें कुछ लिसना वयया काना तुम हो, या भात्माको विकासमाका हेतु है, और जो कुछ सिसमा या कहना है, वह न कहा हो तो मी चह सकता है। इसलिये जबतक बसा ये तबतक तो वास पैसा करना योग्य है, ऐसा गानकर बहुतसी प्यावहारिक मा विमाने, करमे अथवा कानेका बादत नही दी है। केवल बिस म्यापार भादि म्यगारमें तीन प्रारम्रोदयस प्राति है, वहाँ बुरा कुछ प्रचि होती है। यमपि ठसका मी पपार्पता माइम नहीं होती। मोनिन पीतरागने दम्प मान सयोगसे फिर किर एनेका उपदेश दिया है, और उस संयोगका विपास परम बानीको मौ मही करना चाहिये, यह निथर मार्ग जिन्होंने कहा है, उन भौनिन गतिरागके चरण-कमळमें वस्यत नन परिणामसे नमस्कार है। दर्पण, बर, दीपक, सूर्य और च के सम्मके उपर रिपार करोगे वो पहचार के समानसे पार्थ प्रकाशित होते है, ऐसा जो कहा है, उसे समझनेमें कुछ कुछ उपयोगी होगा। ४९५ पानसे पदार्प किस वय हिसाते है! इस प्रसका उत्तर समागममें समानेसे स्पए समसमें जा सकता है। तो मी संक्षेपमें नाचे ठिा- जैसे यहाँ हाँ दीपक होता है, वहाँ हाँ यह प्रकाशनपर होता है उसी तर जहाँ यहाँ बान होता है बहीबार प्रकाशवपसे ही होता है। प्रेसे दीपकका सहर समान ही पार्यको प्रकाश करनेका होता है, वैसे ही बानका मन समाव भी पापोको प्रकाश करनेका ।एक इम्पका प्रकाशक है, और जान द्रम्प-मान नौका प्रकाशक है। से दीपकका प्रकाश होनेमे उसक प्रकाशको सीमा को कोई पदार्थ होता है यह पाप कुरता हो दिमाई दवा है, उसी तरह जानकी मौन्दगीम पार्प सामानिकपसे दिखाई देते हैं। जिसमें सम्पूर्ण पार्ष पापावण्य भार स्यामाविषपसे गिलाई है, उसे फेबछवान कहा है। पपरि परमामे ऐसा कहा है कि केवलहान मी भनुम में सोमवार आत्मानुभवका हो कता है, वह परहारनपसे हो डोकाठोक प्रकाशक है। से पण, पीपक और भु पाफे प्रकाशफ है, उसी तरबान भी पार्षण प्रकाशक है।
भीमद् रामचन्द्र [पा ४९. ४९२ वा, पैत्र १८, १९५१ मास्म-पीके मात्ति करने में और संकोच फरनेमें बहुत विशारपूर्वक माधि करना योग्य है। गुमेप्म सपन माई के प्रति । उप्स बोर जाने के संबधमें मारे लियी परिस्थिति है। निस्से मेगाको सदेह हो इस तबके बाब म्पपहारका उदय है, और उस प्रकारके मारक साप पमान निर्णय पुरुष जैसा उपदेश करना, पमर्गका विरोध परन बैसा।और ऐसा समय कर तपा समके समान दूसरे कारण सम्मका विचार कर प्राय करके जिससे रोगको सो हो, पैसे समागममें मेरा वाना नहीं होता । कदाचित् कमी कमी कोई समागममें बाता है, और कुछ स्थामायिक करना-करना होता है। इसमें मौ पितको इपित प्रापि मही है। पूर्वमें पथास्थित विचार किये बिना बोलने प्रकृति की, इस कारण इस प्रकार के प्यारका उदय प्राप्त जमा ससे पात बार पिचों चोक यता है। परन्तु उसे पपास्पित सम परिणामसे स्मन करमा ही पोम्प है—ऐसा गानकर प्राप' करके उस प्रकार की प्रापि यती है। फिर मी वात्मसाके विशेष स्पिर होनेके म्येि वसंगतामें पक्ष या करता है। इस म्पापर वारि उदय-म्पहारसे को यो संग होता है उसमें प्राप करके असंग परिणामी तय प्रति होती है क्योंकि उसमें कुछ सारभूत नही मालम होता । परन्त बिस धर्म-म्पहारके प्रसगमें माना हो, को उस प्राधिके अनुसार जम्मा योम्प नही । तथा कोई दूसरा वाशय समझकर प्राति की माप तो हमें उतनी समर्पता नहीं। इससे उस प्रकार के प्रसंगमें प्राप' करके मेरा षामा कम ही होता है और इस क्रमको बदस देना, पा पाक निमें नहीं बैठता । फिर मी उस बोर बानेके प्रसगमें पैसा करन मैंने कुछ मी विचार किया पा परन्तु उस हमको मदनेसे दूसरे विषम करणोंका उपस्फ्ति होना बागे माफर समय होगा, ऐसा प्रत्यक्ष माश्म होनेस मम करनेके सममें पिके उपशम करने योम्प भगमेसे पैसा पाहै। इस वाशपके सिवाय उस मोर म माने संबंपर्म विपमें दूसरा भाशय भी है। परन्तु किसी कोक-मा हाररूप कारपस मानेके लिफ्प विचारको नहीं भेजा है। पिपपर बहुत बार देकर स स्पिति किसी सर रिचार कर पवि कुछ बासक जैसा माश्म हो तो कमी रकमगाईको सुमसा करमा । मेरे पाने न मानेक पिपमें पदि किसी बावा कपन न करना समन हो तो रुपम न करनेके लिये दो निती है। ४९२ बर्मा चैत्र वदी १ एक वाम-परिणति मिलाप सरे विषोंमें पिम्पपस्पितरूपसे गता है, और उस प्रकारका बम्पपस्थितपना कम्पहारसे प्रतिक होनेसे गेम्पबहार सेक्स करमा रविकर नहीं माता और साथ ही छोना मी नमो बनता स मनाता प्राय परके सारे ही दिम सोदन होता राता। बनेके सबमें पीने सर्व मोमेके संभमें सोनेके समंवमें, मिसके बम बम रसरे म्माचारिक पापति सबमें जैसा चाहिये पैसे मानसे प्राति नहीं की जाती और उम प्रसंगोक पत्र ४९३, १९४] विषिष पत्र मादि सपा-२८पों वर्प ४४१ यनेसे वारम-परिणतिको सतत्र प्रगटनपसे अनुसरण परनमें विपचियों वाया करती है, पर इस विपयका प्रसिक्षण दुस ही रहा करता है। निमा वामरूपसे रहनेकी स्थितिमें ही पितेम यती र, भार उपरोक प्रसगोंकी वारतिके कारण उस स्थितिका बहुतसा वियोग या करता है, और यह रियोग मात्र परेछास हो रहा , स्पेमके कारणसे नहीं रहा-यह एक गभीर वेदना प्रतिक्षण ला करती । इसी मबमें वीर योरे ही समय पहिले म्यवहार के विषयमें मी तीर स्मृति यी | वह स्मृति मग न्यबहारमें कचित ही मारूपसे रहती है । पोरे ही समय पहिले अर्यात् थारे वो पहिले पाणी बहुत बोल सकती पी बकापसे कुशलमासे प्रकृति कर सकती थी। वह भव मदतास अप्पन स्थासे यती है। योर वर्ष पहिले–पोरे समय पहिल–सनशक्ति अति उग्र पी बोर धाम क्या तिर्ने, इसक सूप्तने सूझनेमें ही दिनके रिन भ्यतीत हो पाते है, और फिर मी जो कुछ लिसा जाता ब, बह इति भपया योग्य व्यवस्थायुक्त नहीं लिया जाता-वर्यात एक वारम-परिणामक सिवाय दूसरे समस्त परिणामोमें उदासीनता ही रहती है।वार मो कुछ किया जाता है, वह पैसा चाहिय वसे मायके से अशसे भी नहीं होता । ज्यों यों कुछ मी कर लिया जाता है। किसनकी प्रवृतिकी मपेक्षा वाणीको प्रवृत्ति कुछ ठीक है इस कारण जो कुछ वापको पूरनेकी रम हो-जाननकी एस -उसके विषयमें समागममें कहा जा सकेगा। कंकुराचार्य और बानन्दघननीका सितिविषयक ज्ञान तीन था । कुदकुन्दाचार्यजी तो यात्म-स्थितिम बात स्पिर थे। पिसे केबल नामका ही दर्शन थे ये सव सम्यग्बानी नहीं करे जा सकते। । ४९३ बई, पत्र बनी ११ शुक्र १९५१ ममे निर्मळवा रे रस्न स्फरिकवणी, तेपन नीपस्ममाष र, ते मिन पीर र धर्म प्रकाभियो, अपर पाप अमाप रे । साम-दम्पके बयत प्रकाशित होनेपर भर्षात् समस्त कर्मोका क्षय होनपर नो असगता भार मुस-स्वरूपता कही ह, बानी-मुरूपोंका बह पपन अपत सुस्प ।। फ्योंकि उन बचोका ससगर्स प्रस्फ्य-अस्पत प्रगट-अनुमन होता ।। निकाल उपयोगका सम, स्थिरताका परिचय करनसे होता हामधारस, सरसमागम, सशान, सद्विचार और बैराम्प-उपशम ये सब उस स्थिरता है। ४९४ बमा पत्र वदी १२ रमि २०५१ अधिक विचारका मापन हानक सिये यह पत्र लिखा ह । सय रमक रनडी निर्मपता हो । ग्नी का का समान है । पर निरन प्रत पास ममापवर्म प्रकाशित दिया।
भीमद् रामबाण [४१४ पूर्ण बाती भौशपमदेव बाPि पुरुपोंको मी प्रारम्भोदप मोगनेपर झप हुमा है, तो किर हम सोको प प्रारम्बोदय मोगना ही पो इसमें कुछ भी समय नहीं ह । से केवल इतना ही होता है कि हमें इस प्रकारके प्रारम्पोपमें मालपमग वादि जैसी वषिषमता गे, इम्ना या नहीं है और इस कारण प्रारम्बोग्यके होनेपर बारबार उससे अपरिपम्म कायम होएनेकी कामना पाठी है कि परि इस विषम प्रारम्मोत्यमें किसा मी उपयोगका पपातप्पमात न या वा फिर वारम-स्पिरम ते ए मोमासर (रमा पड़ेगा पार पचातापपूर्वक देश इंटेगी-ऐसी पिता बहुत बार हो मातीहै। इस प्रारम्बोदपके र हानेपर नितिकर्मक बेदन करनेरूप पारम्पका उदय होनेका हो विचार या रता है परन्तु परत ही अपात् एकसे में वर्ष मातर ऐ गाय, ऐसा तो रिसई मही देवा, वीर पर पड मी मौतनी कठिम पड़ती ।। एकसे ग वर्ष बाद प्रतिकर्म न करनेका सपा क्षय हो बापगा -ऐसा भी नहीं मान होता । कुछ कुछ उन्य विशेष मंद पडेगा, ऐसा मगता है। बारमाको कुछ अस्थिरता रहता है। गतवर्षका मातियोंका म्पापार मगमग निबटने पापा है। इस वर्षका मोतियोंका म्पापार गतवर्षकी अपेक्षा गमग दुगुमा हो गया है । गतवर्षको व्य उसका को परिणाम बाना कठिन है । यो दिनोंको अपना हमें ठीक है, और इस वर्ष भी उस गतवर्ष पैसा नहीं तो मी कुछ परिणाम ठीक बागा पा समय है। परन्तु उसके विचारमें पात समप म्पतीत होने जैसा हाता है और उसके लिये शोक होता है कि इस एक परिमाकी कामनाको यो पक्षपान प्रति सी होती है उसे शांत करना पोम्पी और उसे कुल पुजकरमा पर। ऐसे करण यते । मन जैसे से करके या प्रारम्बाय तरतो पो बाप तो ना है, ऐसा बहुत बार मनमें भाया करता है। पहा बो बाहत वपा मोतियोंका म्यापार है उससे मेरा छ्टमा हा सके नपा उसका कहत समागम कम होना समझ रो उसका कोई रास्ता म्यानमें बाये तो मिसना । पाहे तो इस पियमें समागममें विशेषतास कर सको तो घना । पह बात क्षमें रखना। प्रमग तीन वर्षस ऐसा रहा करता है कि परमार्थसपी वपना म्पहारसाधी कुछ मी विस हुए बारि हो जाती र पौर विसते मिलते कपित पैसा गनेसे बारम्बार अपूर्ण मेष देनेका ) मन होता है । बिस समप चित परमार्यमें एकामसत् हो उस समय पदि परमार्पसमा सिना बया करना हो सके वो पा पार्ष का बाप, परन्तु वित्त यदि वस्पिरबत् हो वौर पर मार्पसमधी मिणा वपना कहा माय तो मा सदारणा चैसा होता।तपा उसमें वति पायाम्प उपयोग न हानेसे गवाम-मधिसे रवित नपा कपित न होनेस कल्पितरूप ही कहा गाता है । बिससे तथा उस प्रस्म के दूसरे कारणास परमापक स्वपमें मिसना बना बना मात कम ऐ गया है । इस स्पडपर सारा प्रश्न होगा कि वित्तके मस्थिरवत् हो जाने क्या है है बित्त परमार्पमें विशेप एकमात् यता पा उस पिक परमार्थमें मस्पिरपत् होगामेका अ तो भरण होना ही चाहिपे । यहि परमार्थ समयका ख माम मा ऐ तो पैसा ना समन समय किसी तथाविध मामलारम होनेहम तीन प्रारमोदमके बससे पैसा हो सकता है। । दो पत्र ४९५] विविध पत्र मावि संप्रह-२बों वर्ष समोसे परमार्पफा विचार करते हुए, सिसते हुए, मथवा करते हुए पित्तका वस्थिग्यत् राना समय है। उसमें पहिले को हुए देखा होना समय नहीं । फेवळ को दूसरा हेतु कहा है, वही समय है। भात्मबोर्यके मद होनेल्प तीन प्रारम्पोदय होनेसे उस हेतुको दूर करनेका पुरुषार्थ होनेपर मी कासक्षेप हुषा करता है, और ठस प्रकारके उदयतक वह अस्थिरता दूर होनी कठिन है और उससे परमार्यसम्प पिसके बिना तत्सर्वघी लिसना या करना, यह कस्थित भैसा ही लगता है। तो भी प्रसोंमें विशेष स्थिरता गती है। म्यपहारके सवधर्मे कुछ भी लिखते हुए उसके असारमूत बौर साक्षात् मतिरूप उगमेसे उसके सवधमें कुछ मिसना थयथा करना तुम ही है, यह पारमाको विकलमाका हेतु है और वो कुछ लिसना या काना है, वह न कहा हो तो भी वम सका है। इसलिये अपतक पैसा ये पतक तो माप सा करना योग्य है, ऐसा मानकर बहुप्सी म्पाशारिक बाते म्सिने, करने अपना करनेका बादत नहीं दी है। केवल जिस म्यापार वादि म्यारमें तीन प्रारम्पोदयसे प्राधि है, वहाँ कुछ कुछ प्राति होती है। यपपि उसका भी ययार्पता मापस नहीं होती। भीबिन भीतरागने ब्रम्प-भाव समोगसे फिर फिर इटनेका उपश दिया है, वौर उस संयोगका विपास परम शानोको मी नहीं करमा चाहिये, या निधम मार्ग निम्होंने कहा है, उन मोमिन बौतरागके चरण कमलमें वापत नम परिणामसे नमस्कार है। दर्पण, जस दीपक, सूर्य और चमुके स्वरूपके ऊपर विचार करोगे तो परचार केवलधानसे पदार्थ प्रकाशित होते है ऐसा नो कहा है, उसे समझनेमें कुछ कुछ उपयोगी होगा। ४९५ केवमानसे पदार्य किस तय विसईते हैं। इस प्रमका उत्तर समागममें समझनेसे स्पष्ट समझमें भा सकता है। तो मी संक्षेपमें नीचे पिसा है से जहाँ गाँ पापक होता है, वहाँ बाँप प्रकाशरूपसे होता है, उसी तय यहाँ जहाँ बाम होता है महाया प्रकाशरूपसे ही होता है। वैसे दीपकका सहन समान पदार्पको प्रकाश करमेका होता है, वैसे हीनका सार समान मा पोको प्रकाश करनेका है। दीपक प्रम्पका प्रकाशक है और शान ट्रम्प मान दोनों का प्रकाशक है। जैसे दीपकका प्रकाश होनेसे उसके प्रकारको सीमाम मो कोई पद्यर्थ होता है, पदार्थ कुदरती ही दिखाई देता है, उसी तयानकी मौदगासे पदार्थ स्वाभाविकरूपसे रिसाई देते हैं। जिसमें सम्पूर्ण पदार्प पायातप्प श्री स्वामाविकरूपसे दिखाई देते है, उसे फेषमान प्रा। पति परमापसे ऐसा कहा कि केशान मी अनुमबमें वो केवल आत्मानुमका ही कर्चा है, परम्पहारनपसे छोकालोक प्रकाशक है । सेर्पण, सीपक और पशु फार्थक प्रकारक है, उसी तर कान मी पदार्गका प्रकाशक है। ।
४॥ भ्रामद् रामचन्द्र [पत्र ४ ९.४५८ ४९६ वी, पत्र बदी १२ र १९५१ भीमिन बीतरागर्ने ट्रम्प मार सागसे फिर फिर छन्नका उपदेश किया है, भौर उम सपोगा विश्वास परम मानीका भी नहीं करना पाहिये, या मसर पार्ग जिसने कारे,पस श्रीमिन बीपरागफ परम-कमक प्रति यत्पत भकिसे नमस्कार ।। भारम-सम्मक नियम होमेमें गायन ममारिकारसे मूह होता माती है। समस्त पुतवान सम्म दागमें सबसे प्रपम उपदेश करने योग्य नापारगम्य है । उसके प्रथम भुतस्कपमें प्रयम अम्पयन के प्रथम तदशके प्रथम माम्पमें गे भौगिनने उपदेश किया र, यह समस्त अंगोंके आमन्त मुतवाना सारभूत है-मोधका बारभूत सम्पत्तिमाए। उस पास्यमें उपयोग स्पर होनस जीवको नियम होगा कि पानी-पुरुष समागमकी उपासना विना जीव जो कुछ सरसे निधय कर पटनेका मार्ग मही ह । सभी पोषका सभाष परमात्ममरूप इसमें सस्प नही पोरि श्री भनेको परमात्मसम्म माने ता पर मान असम्म नहीं। परन्तु जबतक पर स्वाप पापातप्प प्रगट म हो तवक मुमुक्षु- सिासु-पाना होगरिक उत्तम ६, और उस रास्तेसे पपार्य परमारमस्वरूप प्रगट होता है, मिस मा को कर प्राति करनेस उम पका मान मही होता तथा मानिन बीतमा सर्व पुरोध आसवना करनेरूप प्राति होती है। दूसरा मुन्छ मत-मद महा। मृत्युका बागमन बाप है। । ४९७ तु, तलिपपक मपके गाँधमेका सपना उस प्रसग बातचीत मरण करनेका समागम हता तो जिससे उस गाँधनस तथा प्राणसे बीबम बम्प और उपशमको आदि हो ऐसा करना योग्य है। उसमें प्रतिपादन किय हुए सिद्धांतका य िनिमय होता हो तो करनेमें हानि नही, फिर भी पानी-पुरुपके समागमको उपासनासे सिद्धांतका मिपम किये बिना मात्म-विरोम ही होना समय है। ४९८ स, चैत्र पदी १० गुष १९५१ चारित्र--(मीगिनके अमिप्रापके अनुसार बारित्र पाहै। यह विचारकर समपस्थिति होना)- मणासपी वनुप्रेशा पानसे बाबमें सस्पता उत्पय पोती । मचायारा उसनई चारित्र-परिणाम मामाचस्प सस्पताक बिमा जान निफ्टी या मो मिनमगवान्मा अमिमतअम्पायन स्प है। सवयी बनुमेधा बहुतबार बनेपर मी पत्रम परिणविक हेतु उपाधि-योगः पात्र उदय- म्स रोनेसे पितमें प्राय कर से जैसा यता है और उस मेसे शिपिता उरात होकर इस विशेष नी या मा सस्ता । माग्ने कुछ ने निवपमें तो विचमें बहुत बार यता है। यही विनती है।
पत्र ४९९,५ विषिष पत्र मादि सग्रह-२वों यर्ष ४४५ . ४९९ बमई क्षेत्र १९५१ विषय आदि इमिगत पार्य भोगकर उनसे निवृत्त होनेकी इम्म रसना और उस ममसे प्रति करनेसे भागे घटकर उस पय- मका उत्पम होना समय न हो, यह होना कठिन है स्पोकि पान दशाके बिना विषयकी निर्मुस्ता हाना समव नहीं। विषपोंका फेवर उदय मोगनेसे ही नाश होना सम्मत्र है, परन्तु यदि बान-शा न हो तो पिषम सेवन करमेमें उत्सुक परिणाम हुए बिना म ये, और ठसस परनित होनेके पाले उम्टी विषयको पति ही होना सभव है। बिनें दान-दशा है, पैसे पुरुष पियाकांपासे वथवा विपपका मनुभा करके उससे रिक्त होनेकी इच्छासे उसमें प्रापि नहीं करते, और यदि में इस तरह प्रधि करनेक लिये उचत हों तो जानपर मी बावरण आ चाना समय है। मात्र प्रारम्बसवयी उन्य हो, वर्षात् छ्टा न वा सके, ठसीसे जानी-पुरुपकी भोग-प्रति है। यह भी पूर्व और पचात्में पचासापयुक्त और मातम परिणामपुक होता है। सामान्य मुमुसु बीचको वैराग्यके उसके लिये विषयका वारापन करनेसे वो प्राय करके बघनमें पड़ जाना ही समझी स्पोंकि हानी-मुख्य मी उस प्रसगको बहुत मुश्किळसे जीत सका है। तो फिर निसको केवल विचार-दशा है ऐसे पुस्पकी शधि नहीं है कि वह उस तिपयको इस प्रकारसे गीत सके। ५०० बिस नीयको मोहनीय कर्मरूपी कषायका त्याग करना हो, और जब उसका एक म माग करमेका पार करेगा तब कर सकेगा' इस प्रकार के विनासके ऊपर एकर, जो उसका क्रम क्रमसे स्याग करनेका विचार नहीं करता, तो यह एकरम माग करनेका प्रसग बानेपर मोहनीय कर्मक करके सामने नहीं टिक सकता । कारण कि कर्मरूप शत्रुको पोरे पोरे निर्वक किये बिना उसे निकाल गाहर करना एकदम मसमष रोता है । बाहमाको निम्ता के कारण उसके उपर मोहका प्रारम्प यत, है। उसका जोर कम करमके लिये या मारमा प्रफन करे तो एक बारगी ही उसके उपर जय प्राप्त कर मेनेको पारणामें पा रगा बाती है। सातक मोहनति ममेके लिये सामने ही माती तमातक मोहके बाहोकर वारमा अपनी बात समझती है, परन्तु उस प्रकारको कसौटीका वसर उपस्थित होनेपर मामाचे वपनी कम्परता समझमें बा गाती है। सलिये मैसे बने तैसे पांचों इन्द्रियों को पशमें मना पाहिये । उसमें मी मुल्यतपा उपस्प इद्रियको वश मना पाहिप । इसी प्रकार अनुक्रमसे दूसरा इन्द्रियों (अपूर्ण) ५०१ स १०५१ पैशास सुदी ५ सोमवार के दिन-सापकासे प्रत्याख्यान स १०५१ वैशास मुदा १० मामबारके Pन भीम रामचन्द्र प ५०२ यी, शास सुदी ११ रवि १९५९ धर्मको नमस्कार पीवरागको नमस्कार भीसपुरषोंका नमस्कार (२) सो पम्मो मस्प दया, दसादासा म बस्स सो देयो, सो एक बो नाणी, मारंमपरिम्मा पिरमो । ५०३ (१) सर्व शसे और दुससे मुक्त होनेका उपाय एक बहम-पान ।नधारके विमा माममान नहीं होता वीर यससंग त्या बसम्प्रसंगसे पौनका विचार- प्रति नहीं करता, इसमें शिपिग्मात्र मी साय नही । वारम-परिमाको मापता करनेसे असमसगका बम घटता है। सरसगके वापसे क्सास- गका बापता है। भस्मसम्गका र परमेसे माम-विचार होमेका सपना प्राप्त होता है। वाम-विचार होनेसे नाम-पान ऐता है। बौर बारम-नामसे निग स्वभावरूप, मेरा और सर्व दुसरवित मोक्ष प्रात ऐती है—पह बात सपा सप है। यो गीर मो-निमा सो ये समुनि , मुनि त निरंतर बारम-विचारपूर्वक बागृत ही यो है । प्रमाको पा मप है सप्रमायाको किसी तण मी मप नहीं, ऐसा होमिनने बाहै। समस्त पदाकि स्वरूप पाननेच एक मात्र देखभामबाम प्राप्त करना है। पदि वामनान म तो समस्त पदाकि हामको निफरता है। विवना बारम्भान हो उतनी ही माम समाधि प्रगर हो। रिसा मी त्याला स्पोगका पाकर बायको यदि एक भणमर भी बातमैद-मागति हो बाप वो उसे मोश विशेप र महो। अप परिणाममें वितमी तादात्म्यापि उतनी ही मोक्ष दूर है। पदि कोई वामपेग बन गाय तो स मनुष्यताका किसी तय भी मम्प नहीं हो सकता । प्राय मनुप दोरके बिना आमपोग मही बनता—ऐसा मानकर मर्मत मिषय करके इसी देहमें बास्मयोग उपम करना पोपी। विचारको निर्ममासे पायगांव बन्य परिचपसे पर माप वो उसे सहयो-मी- भामपोग प्रगट पाप । १ चौरपामिश्य ऐक नही पानी भोर भारम-परमाते परिव पर गुरू।
विविप पत्र मावि संप्रह-२वा वर्ष ५७ बससगफे समागमका विशेष मिराब है, और यह पीन उससे बनादिकाम्स होनसत्त हो मानेके कारण उससे बकाश प्राप्त करमेके सिये, वयमा उसको निति करने के लिए पैसे बने पैसे यदि रसंगका भाभय फरे तो वह किसी तय पुरुषार्प-योन्य होकर विचार-दशाको प्राप्त कर सकता है। निस प्रकारसे इस सप्तारकी बनिस्पस्ता असारता नस्पतरूपसे मासित हो, उस प्रकारसे माम- विचार उत्पम होता है। इस समय इस उपाधि-कार्पसे इनके लिये विशेष जति विशेष पोका रहा करती है, और पनि इससे एटे बिना वो कुछ मी काठ म्यतीत होता है, वो पर इस बीपकी शिथिलता ही है, ऐसा माता है, अपना ऐसा निषय रहा करता है। जनक मानो उपापिमें रहते हुए मी बामसमावसे पते थे, उनकी एसे आउनके प्रति कमी मा पुदि म होती पी। श्रीपिन से ममत्यागी मी जिसे मेकर पळ Pये, ऐसे मयके हेतुरूप उपाधि-योगकी निहासिको करते करत पदि यह पामर गीर कास म्पत करेगा तो बोय होगा, यह मप गोत्रक उपयोगर्म रहता है, क्योंकि ऐसा फिर्तम्प है। जो राग-रेप आर परिणाम वानके बिना समवित नहीं होते, उन गरेप बा परिणाोके होनेपर, जीमन्मुकिको नया मानकर, बीप बीमन्मुच्छ दशाकी मासातमा करता है--स प्रकार प्रापि करता है उन राग रेप परिणामोंका सर्वया अप करना हो करम्य ।। नहाँ अस्पत बान हो, यहाँ अस्पत स्याग होता है। यत पागक प्रगट र बिना अस्पत काम नहीं होता, ऐसा भीवीर्यकरने सीकार किया है। बारम-परिणामपूर्वक जिवमा अन्य पार्यका तादाम्प-अभ्यास-निवृत्त किया जाप, उसे प्रीमिनमे त्याग कहा है। उस तादाम्प-अप्यास-निविरूप स्पाग होनेक सिये इस बाम प्रसंगका त्याग मी उपकारक है-कार्यकारी है । वाम प्रसंगके त्यागके लिये भाग नहीं कहा-ऐसा होनेपर भी इस गोषका अपागके लिये गान प्रसगको नितिको कुछ मी उपकारक मानना योग्य है। हम नित्य एनका ही विचार करते है, मौर से बने विससे यह कार्प तुरत ही निबट चाय पैसी आप जपा करते हैं। पपपि ऐसा व्यता है कि पापार वीर बाप अमी तपाप मही:- शिफ्टिा इसलिये अत्यंत विचार और उमतास उस गापके नापपम फरमका कपकाउमें सपोग जुटाना योप है--ऐसा या करता है। प्रसंगपूर्वक का परस्परके सबध जैस बचन इस पर सिमे है। उनक विचारमें परित होनेसे, उस-विचार-रहिके लिये और तुम्हारे गाममे-विचारनेके लिये लिया है। (२) रोष, प्रश, पप्प, सम्पात, बम्पात गर्नत बारिक विवपमें तया रसको म्यापक ताके विषय समपूर्वक समझना योग्य होगा । - मो भीमद् परबद्र [१९५४५५ ५५ ५०४ बाई, मैशाह सुदी १९५१ “से मुषारसम्बधी पातचीत करने का तुम अबसर प्राप्त हो तो करना । नो दा पूर्ण पुपालस्पामें बौर सम्पूर्ण वारोम्पायुक्त रिस देनेपर मी झममगुर है, उस रोमें प्रति करके क्या करें । जगत्फ समस्त पापोंको नपेक्षा मिसके प्रति सोतस्य प्राप्ति है, ऐसी पर देह मा हुसको होत, फिर दूसरे परामें मुसके हेतुको क्या कम्पना करना ! मिन पुरोने, वैसे पर शरीरस मिम । इसी तय वारमासे शरीर मिय:-पहचान लिया, पुरुष पन्य है। दूसरे की वस्तुय अपने द्वारा इण हो गया हो, तो रिस समप या माश्म हो जाता ह कि या पस्त दूसरेकी है, उसी समय हामा पुरुप उसे पापिस मौटा देत है। दु पम का है, इसमें सराय नहीं । तपारप परमानी पास-पुरुपका प्राय विस हो। विरत ही बाब सम्परमात प्राप्त करें, ऐसी फास-स्थिति हो गई है। नयाँ सइन-सिर-चाम- चारित्र दशा यती है, ऐसा कमान प्राप्त करना कठिन है, इसमें सशप मह) । प्रातिप्रान्त नही होती तरकमाष पविक दवा। नमें अपना एकातमें सार सह- पका मनुमष करती हुई मामा पिपय हे, एसा करने की समस्त या कोईरे। - ५०५ बमई बैशास सदी १५ र १९५१ धामा भापत सहर लत्पता प्राप्त करे, यही मौसमझने समस्त शानका स्वर कहा। ममारिकाम्से जानने निरतर अस्वस्थताको ही माराधमा की बिससे जीनको स्वस्पताको भार पाना कठिन पाता है। प्रीमिनने ऐसा कहा कि 'पपाप्रतिकरण'तक जोष बनत गर या पुचो परन्तु बिस समय प्रपी मे होनेतक मागमन , उस समप या शोम पाकर पौ७ ससार-परिणामी हो जाया करता है। प्रयी-भेद होभेमें गो पार्य-गति पाहिये उसके होमे किसे गानको नित्यप्रति सासमागम सरिचार और सर्मपका परिचय निरतररूपसे करना पस्कर है। इस बाकी मामु प्रत्यक्ष उपाधि योगसे म्पतीतई ना हो इसपि वस्पत शोक सरा और उसका या मत्पचास ही उपाय न किया गया तो हम जैसे अविचारी लोग भी पोरे हो समस्ने पदिय । निस शान काम नाश हो उस बानको वापत ममिसे नमस्कार हो । ५०६ बर्ग, शास मदो १५ प १९५१ सबकी अपेक्षा निम्म बनिक स्नेह हा करता । ऐसी या छपा रोग अप मारिसे अपनी ही बारमाको मम स बाती र ो फिर उसमे दूर ऐसे धन मारिसे बोबको तपारूप (पपायोग्य ) मुसापि हो एसा विचार रनेफ्र विचारवानको पुतिको मचश्म धोम होना चारिमे और उसे किसी दूसरे ही विचार वो नाना पारिय-ऐमा बाना-गुस्पोने नो निर्णप या । बार पापातप्प।
विपिप पन मावि संप्रह-२बों वर्ष ५०७ बमई, मैशास की ७ गुरु १९५१ पेदान्त बानिमें वो आत्मसमपकी विचारणा कही है, उस चारणाकी अपेक्षा मीनिनागममें जो वारमसमपकी विचारणा है, उसमें भेद भाता है। सम-विचारणाका फळ मारमाका साग समापसे परिणाम होना ही है। सम्पूर्ण राग-पके धय हुए बिना सम्पूर्ण बारमबान प्रगट नहीं होता, ऐमा मो जिनमगवानने निर्धारण कहा है, यह वेदांत वारिकी अफेशा प्रक्सनपसे प्रमाणभूत है। ५०८ सबका अपक्षा वीतरागक वचनको सम्पूर्ण प्रतिका स्थान मानना योग्य । । क्योंकि नहीं राग वादि दोपोका सम्पूर्ण क्षय हो गया हा वहीं सम्पूर्ण मान-स्वभावके प्रगट होनेके लिये योम्प निमयका होना सभव है। धीनिनको सबको अपेक्षा उत्तए पीतगगताका होना समब है। क्योंकि उनके बचन प्रत्यक्ष प्रमाण है। जिस किसी पुरुपको जितने भशमें बीतरागता होती है, उतने ही वशमें उस पुस्पके मास्य मानने योम्प। सोल्य मादि दर्शनमें वध-मोक्षकी निस मिस म्पान्याका उप श किया है, उससे प्रपठ प्रमा- जसे सिद्ध म्पामया भीबिन वीतरागने की है, ऐसा मैं मानता है। ५०९ हमारे चित्त बारम्बार एसा बाता वीर ऐसा परिणाम स्थिर रहा करता है कि मैसा भारम कम्याणका निर्धारण भावधमान स्वामीन अपना श्रीऋषभदेव भाग्नेि किया ६, बसा निधारण दूसरे सम्प्रदापों नही। वेदान्त वाशि दर्शनका मन मी वाम-बानकी और सम्पूर्ण मोधकी बोर माता एमा देखनेमें भाता है, परन्तु उसमें सम्पूर्णतया उसका पयापेम्प निर्धारण मासूम मही होगा-जमे ही माश्म होता है, और कुछ कुछ उसफा मी पर्यायांतर माश्म होता है। पपपि ये तमें जगह जगह माम पर्याफा ही विरेचन किया गया है, परस्तु पह ची स्परपसे भविस्ट है, पेमा भमौत नहीं माझ्म हो सका । यह मी होना संमब है कि काचित विचारक किमी उप-म-से गतका भाशप मिमारपसे सम्समें माता हो, बार उसमे निराध मागम होता हा ऐमी माका भी कर फिरसे वित्तमें की है, शेष प्रति विशेष आमकार्यको परिणमाकर उसे अनिरोधी रेगनेक पिये चार दिया गया है सिर भी एमा माम्म हाता है कि पन्त, विस प्रचारमे आमम्पमए कहा ह उस पफारस बेत सांया विरोध मावका ग्रास नहीं हो सकता । स्योंकि जिस तरह पा कहतार, ४५० [पत्र ५१ करा जाता भीमद् पवन बामसरुम उसी तरह नहीं -उसमें कोई बड़ा मे दसनेमें माता है, और उस उस प्रकारसे सांस वारदर्शन में मौ मेद देखा जाता है। मात्र एक भिनने पो वास्मस्वरूप कहा है विपातिविशेष अपियेषी देसनेमें माय --उस प्रकारसे केदन करनेमें मावा है । विनमगवान्का कहा मा बामस्वरूप सम्पूर्णतया बरिरोभा ऐना उचित है ऐसा मासूम होता है। परन्तु यह सम्पूर्णतया विरोधी हो र, ऐसा बो नहीं उसमा त केवल इतना ही है कि वमी सम्पूर्णतया वारमातम्या प्रगट नहींई। इस कारण जो अबस्या बप्रगट ( उस सस्थाका बतमानमें वनुमान करते है निससे उस अनुमानको उसपर जमत मार म देने योग्य मानकर पारिशेपातिविशेप वनिरोगी रऐसा कहा - सम्पूर्ण भनिरोधी हाने योग्य है, ऐमा भाता। सम्पूर्ण मामस्तप किसी मी तो पुस्पमें प्रगट होना चाहिये -इस प्रकार वारमा निधप प्रती -मात्र आता है। भौर पर फसे पुरुषमें प्रगट होना चाहिये, यह विचार करमेसे पा बिनभगवान् से पुरुपको प्रगट होना चाहिये, या स्पए माश्म होता है । इस सरिमासमें यदि किसाम भी सम्पूर्ण वाग्मसाप प्रगट होने योय हो तो सर्वप्रथम श्रीवर्धमान स्वामी प्रगट होने पोप गता सपा उस दशाक पुरुपोंमें सबसे प्रथम सम्पूर्ण बामस्वरूप (अपूर्ण) ५१० बम्बई, मैशात बदरी १ मि १ ५१ बन्नामें उपाधिरमित हानेकी इण्य करनेवासको माम-परिणतिको किस निधारमें ठाना पापी बिससे यह उपाधिषित हो सके।' यह प्रश्न हमने मिसा था। इसके उत्तरमें तुमने लिस्ट किसानक रगका पनपक उपाधिरहित नहीं भा गाता बार बिससे पहपन वाम परिणतिसे कम पर माय सी परिणति ऐ तो वयकाउमें हो उपाधिरहितमा वा सकता है-म तर से उत्तर डिमाई पर पपा है। पो मनमें इतनी विशेषता कि परिमापूर्वक उपाधि-पोग प्रप्त ऐना दा, उसके प्रति रगनेपबा परिणति कम । उपगि करके मिपे रिच वारपार मेरयता हो भार उस उपारिफ पाग परनमें परिणाम या करता हा, पेसा होनपर मा उपप-पठसे पनि उपाधि प्रसंग रहता ना उसकी फिम उरापमे निति मा सस्ती (इम प्रतिपपक मा श पर सोडिराना । मागपत्रण प्रप हम्न पहा है। उसमें सम्प्रदापक विमा गुण् कुछ समाधान सके, मी सपना की है परम्नु तारतम्पमा बाम्नाविक शापानको रचना मही ऐसा मुझ गता। औडगरने ' मग पुल पक परम्मा मासांपा सिपाया था। हंगरण ग मापाय fT अनुभा पर इस माया मी माप फरक छापा मा उपरेश गनमें MPा मार उगग प्रमुर निर्गपदिया गगनार और कभीजा निजपरिचा नाग तासगर गिनीमा-मा प्राय पर में मई। भाता । म पुरुषार्थ-धमरा हम प्ररफर पत्र ५११ ५१२५१३] विविध पन मावि संपाबा बर्प ४५७ पाणी अनेक तबसे बख्यान वनाती है, इतना उस माणीका उपकार बहुतसे मीनोंक प्रति होना समय है। तुम्हारे पारके पत्रमें मतमें श्रीगरने बो सासी किसाई है-'म्यपहारनी जाळ पादर पदिरे परमळी —पह जिसमें प्रथम फहै, वह यमाय है। या सासी उपापिसे उदासीन चितको धीरजका कारण हो सकती है। , बा, पेशास ब ११ गुरु १०५१ शरण ( आमय ) और निमय कर्तव्य है । अधैर्यसे छेद नहीं करना चाहिये । पिचमें देर जान भपका विक्षप मी करना योग्य नहीं । अस्पिर परिणामका उपशम करना योम्म है। ५१२ बम्बई, ज्येष्ठ मुदी २ रवि १९५१ मपारकी तर ससार-समइसे वारनेपासे ऐसे सद्धर्मका निष्कारण करणासे मिसन उपदेश किया है, उस हानी-पुरुपक सपकारको नमस्कार ! नमस्कार ! मुझे प्राप करके निति मिस सकती है, परन्तु या क्षेत्र स्वमानसे विशेष प्रवृत्ति है; इस कारण निषि क्षेत्रमें जसे सासमागमसे वारम-परिणामका उत्कर्ष हाता है, बसा प्राय करके विशेष प्रचिवाले योभमें होना कठिन पाता है । कमी विचारपानको तो प्रापि क्षेत्रमें सरसमागम विशेप लामायक हो जाता है। हानी-पुरुषको मीबमें निर्मठ दशा Pमाई देती है। स्पादि निमिचसे भी गा विशेष धामापक होता है। पर-परिणति के कार्य करनेका प्रसग ये भीर स-परि पतिमें स्पिति रमसे रहना या भानदफ्नामे बो चौदा बिनमगमान्की सेवा कही है, उससे मी विशेप कठिन है। पानी-पुरुपके जिस समयसे नवबाइसे विमुर प्रमचर्य दशा ये, उस समयसे गो सयम-मुस प्रगट होता है, पर अवर्णनीय है । उपदेश मार्ग मी उस मुसके प्रगट होनेपर ही प्ररूपण करने योग्य है। - ५१३ बम्बई, ग्येष्ठ पुती १. रवि १९५१ मात बो पुरुषोंके शशि-योगके सत्रपमें शानमें बात माती है तथा लोक-कपनमें मी पैसा पाते सुनी जाती है, उस विषयमें बापको सशप पता , उसका उत्तर संक्षेपमें इस तर:- वर महासिनि वादि जो जो सिदिपा कही है, ''भार जो मप्र-पाग कहा है, वह सब प्रय है। परन्तु मम पर्पके सामने यह सब है। गौ वाम-स्पिरता है, गाँ सब प्रकारका सिरि-पोग यता है। इस कारमें वैसे पुस्प Pसई नहीं देते, उससे पर उसको अप्रतीति दोनेका कारण हो जाता है। परन्तु वर्तमानमें किसी किसी गावमें हो उस तपकी स्थिरता देखने में बानी है। तसे गायोंमें सत्तको म्यूनता पता है, और उस कारणसे पैसे चमकार मानि माई नहीं ते, परन्तु , ४१२ श्रीमद् रामपद्र [प ५१४ ५२५ ५५ उनका भलिव ही नहीं यह बात नहीं है। तुम इस पातको शमा रहती है, यह बापर्य माम हाता है । पिसे भारमप्रताप्ति उत्पम हो गय उसे सार ही इस बात निशिकता होती है। स्पोंकि बामा नो समर्पता है, उस समर्पठाके सामने सिदि-सम्धिकी कोई भी विपता महीं। ऐसे प्रश्नाको बार कभी कभी किसते हो इसका क्या कारण है, सो विमना । इस प्रकार के प्रश्नोन चारपानको होना कसे समब हो सकता है। । ५१४ मनमें ओ रग रेप वारिका परिणाम हवा करता है, उसे समप वादि पर्याय नहीं कहा जा सकता । क्योंकि समय जायन्त सम्म १, वौर मनके परिणामोंको बेसी सूक्ष्मता नही है । पदार्पा जयंतसे वापत सूक्ष्म परिणतिका दो प्रकार पिसमप । एग-रेप बा िचारोंका उसब होना, या गावके पूर्योपार्जित किए कर्मक संघबसे ही होता है। वर्तमान कामें मारमा पुस्पाप उसमें कुछ भी हानि-दिमें कामणरूप है, फिर भी कर विचार Aष गान है। योगिनने नो साप्पाप-कास या, पर यमार्प ।। स उस प्रसंगपर प्राण मारिका कुछ सरि-भेद होता है। उस समय विचमें सामान्य प्रकारसे विशेषका निमित्त होता है हिंसाबादि योगा प्रसग होता है अपना यह प्रसंग कोम परिणाममें विनम्प कारण होता है, स्पादि शामोंसे साम्पापका निरूपण किया है। अमुक स्थिरता होनेराक मिशेप सिकना मही मन सकता, तो मी मितना पना उक्ना प्रयास पर यतीन पत्र लिमे है। ५१५ बम्बई स्पेष्ठ पुदी १५ शुक्र १.५१ र तपाप गंमार बाप मही1, तो मी वाशपक गीर होनेसे एक छोकिफ पचन हमें भारमा गत पार पा हो माता है । यह पाम्प इस तरह है-री रूए, माटी रुए, पण साव मरतारवारी तो मादुम न रपार। यपशि इस बास्यक गंमार न नेसे वनेमें प्राति न होती, परम्नु भापके गमार होनेस भौर अपन विपपमें सिप चार करना दिसम दनके कारण तुम पर म्मिनकाम्मरण दुमा इसपिय यह माप विमा है। इस पर पपाशातिचार करना । ५१६ बर्मा पेट बा २ १९५१ शिवारानको देश एनेक संधी दक्ष-विपाद परना योग्य नही । वामपरिणामका विमाना पनि और बड़ी मुम्प मरण | तमाम् समुमता और उस प्रकारको इस पर परिग को पर ५१.५१८] पिविष पत्र मादि संग्रह -२बावर्ष ४५३ ५१७ यम ग्येष्ठ पदी ५ युम १२५१ सबमें सम-माषकी छा गती है। ऐ भीपास्नो रासकरवां, गान ममृत रस मुठ्यो रे । मुम । (मायोविजयनी ) तो वैराग्यवानको, बिस उदयका प्रसग शिपिस करनेमें बहत वार फलीभूत होता है, जैसे उदयका प्रसग देसकर घिरमें वरयत उपासमात्र वाला है। यह ससार किस फारणसे परि चप करने योग्य ह! तथा उसकी निवृतिको रछा करनेवासे विचारमानको प्रारम्बाशसे उसका प्रसग या करता हो ता पर प्रारम्भ किसी दूसरी प्रकार शीप्रतासे पेदन किया जा सकता है मयमा मही । उसका तुम क्या श्रीगर विचार करके छिमना । निस तीर्थकरने ग्रामका पा विरति कया है, उस तीपकरको बम्पत मदिसे नमस्कार हो! इच्छा म करते हुए मी गोषको भोगना परसाई यह पूनकर्मके समयको यपार्थ सिद्ध करता है। ५१८ वी, म्पेठ १०५१ मानीक मार्गक माषपको उपदेश करनपासे पाप- १ सहम मारपसे बीवी म्पित्ति होना, इसे श्रीगीतराग मोक्ष करते है। २ पाप सहन सम्पसे रहित नहीं, परन्तु उस हम सरपका जीवको केरळ मान नहीं है पर भान होना, पही सहन स्पस स्पिति है। १ सग योगसे पर गौर सहर स्थितिको भूठ गया १, सगको निहतिसे मान सम्पका वपरोष मान प्रगट होता है। १ इसलिये सब तीर्थकर मावि शानियोंने वसगताको दी सोय कहा है जिसमें सब जारम-साधन समिविर हो जाते है। ५ समस्त बिमागममें करे हुए पवन एकमात्र अमगतामें ही समा जातक्योंकि उसीके होनेके लिये ये समस्त पचन को । क परमाणुसे मेमर पोर राम् ककी भौर मेप-उम्मेपसे सेकर शेणी मास्यातककी जो सब किसानोंका वणन किया गपा, उनका मा अमुगताके समझाने के लिये वर्णन किया है। ६ माषसे मस्गता ना पह समसे फटिनस करिम सारन और उसके आयपण बिना सिर होना अप्पर फटिन है-ऐसा विचारफर श्रौतीर्थकरन संगफा उसका भापार कहा निस एसके सापसे गावको सहर पम्पमूल बसगता उत्पन्न होती है ७ पाससंग मी बीचको बात गार प्राप्त होनेपर मी पमान नहीं हुआ, ऐमा भाषीन- एगने कहा । पोंकि उस सामुगको पहिचानकर इस पीनने उमे परम हितकारी मही समय- परम पहसे उसकी उपासना मही -भार प्रासको मा अमाम पमान हाने योग्प समास सोर १मश्रामो पन मिचो हुए हानामा न बरना है। - ५५८ भीम पवाद [पा ५२. प्रश्नोपर तुम, मेगमाई व्या मोगरको निरोप विचार करना चाहिये । वन्य दर्शनमें जिस प्रकारसे केरमान बालिका स्मास का और मदर्शनमें उस पिपका जो सम्म का, ठम दोनामें गुव इस मुख्य मे देसनेमें वाता है, उसका सबको AIR होकर समाधान हो गाप तो मामा कम्पाणका बगभूत है इसलिये इस विषयपर अधिक विचार किया नाम तो सन्म। २ वस्ति' इस फसे लेकर सब मात्र यामार्य पिये ही RHR करने योम्प है। उसमें ये निज सम्मको प्रामिका है, उसका ही मुस्पतया प्रचार करना योम्म है। वो उस पिचारके म्मेि अन्य पदायिक विचारकी मी अपेक्षा पता है, उसके लिये उसम्न मी RER करना उचित है। परस्पर दर्शनों में गहा मे देखनेमें बाता है। उन सकी तमना करके बमुक दर्शन सपा यह निपप सप मुमसुमोको होना कठिन ६, क्योंकि उसकी तुम्ना करनेकी प्रमोशमशाकि किसी किसी गौरको ही होती है। फिर एक दर्शन सब बोंमें सप है और दूसरा दर्शन सब में बसप है यह पाव या विचारसे सिद्ध हो जाय तो दूसरे दर्शनोंक प्रवर्तकको दशा वारि निधारने योग्य है। पोंकि निसका पैराम्प उपशम अम्बान है, उसने सर्वया बम्पका ही निरूपण क्यों किया होगा। स्पानि रिचार करना योम्प है। किन्तु सब गायोंको पा विचार होना कठिन है मौर विचार कार्यकारी मी है परने पोम्य है परन्तु या किसी माहाम्यवान ही हो सकता है। फिर बाकी यो मोनके इस बार है, उन्हें उस संभमें क्या करमा चाहिये, ए मा चार करना उचित है। सब प्रकारके सर्वाग समाधान के हुए बिना सब कमेम्स मुक्त होना वसभव है पर विचार हमारे निमें या करता है और सब प्रकार के समाधान होने के लिये पदि वगतका पुस्पार्प करना पाता हो तो प्राप करके कोई भी बीच मुघन हो सके । इससे ऐसा माश्म होता है कि वस्पकाल में ही उस सब प्रकार के समाधानका उपाय हो सकता है। इससे मुमुक्षु गावको कोई निराशाका कारण भी नरी। . भाषणमदी ५-६ का पहसि निच ना बने, ऐसा माइम होता है। यहाँ वेत- सपना होगी ही स्थिति होगी। ५२७ सारस बेदार पोग पापिक, बीद + + + + + ++ + + + निम पानिप परिणामी वपरिणामा साही साधी-फळ , पर ५२८, ५२९, ५३ ] पिपिप पन मारि संपर-२८पौ पप ५२८ १ सत्यदर्शन करता है कि बुदि कही। पास और येतदर्शन मी ऐमा ही करते हैं। जिनान तारेकि पुदि तन है। २ तान करता है कि वामा एकही। बिनदशन करवा कि वाम्मा जमत है। गाति एक है। सम्यान मी ऐसा ही करता है। पानवदर्शन भी ऐसा ही कहता। ३ शासन करता है कि यह समस्त मिल पम्पाके पुत्रके समान है, निन र्शन करता है कि यह समस्त मिस पास है। १ पातवदर्शन कहता है कि निरय मुक वर एक ही होना चाहिये । समिपान इस बातका निषेध करता है। निनन मी निषा करता है। ५२९ बर्ष, बापम कदी १२ पुस १०५१ मिस विचारगान पुस्पकी रिमें समारा माम्प नित्यप्रति शमसूप माममान होता हो, सांसारिक भोगोपभागमें रिसे नौरमता जैसी प्रति होती हा, उस विचारमामको दूसरी तरफ लोक- म्यवहार बारि, प्यापार वारिका उदय यता हा, ताबा ठप-प्रतिवध इत्रियक मुखफ डिपे नहीं, किन्तु बारमहितार्प र करनेके लिये हो, वा उसे दूर कर सफनेका क्या उपाय करना चाहिये । म -स्वपमें पुछ करना हो तो मना । बर्मा भारती१. रवि १००१ जिस प्रकारसे साल ही बन जाप, उस फरनेक लिपे परिणति या करती है भयका बन्तमें परि कोई उपाप न स तो बछपान कारण निम्मे बाधा न हो सी प्रति हावी है।पात समयम म्पापारिक प्रसगको वारिके कारण पनि पोर समय मा निविसे फिसी क्याम्प क्षत्रमें या नाप ता अन्या, ऐसा पिसमें दा करता पा । तया यहाँ अधिक ममप नमक कारण, जो ममके निमित्त कारण २ म माता पिता बारिकेमपनक लिये उनक विचपा प्रियता के मधोमध मिये,तया छ एमके विषय अनुमत्राके लिये भी पार न पास पाणीसा जानेमा रिचार उत्पन्न एमा था । उन दोनों बातोंरे किसे कमी सपाग मिठ ता अा ऐमा पिपार फरनेसे पुन्छ ययायाम्प समाधान न होता था। उसके चारको माहा उन विशषतामे हा वो कुछ मसारको मस्त स्पिरता , उसे तुम्हें बताया था । सब प्रकारके ममग-मभुक विचारका पहमि वामग ममकर र रमकर अन्यायअमगताका हासने पुछ विचार रम्मा है, पर भी मन ममा- पसे उम्पानुसार ही है। भारत ॥ ११ स माइपर मुरी १० क गमग तक किमी निधि क्षत्र राना हो तो पैस, पपाशदि उपरो उपम मा रमन प्रति कामा पाहिप पनि शेष मितिका उपस पम्प दमनसे ग्राम बना काटिन जान परती है।
[५१ १२,
बर्मा,
वारी. १९
न हो, मानध मणमौर नित्य प्रति मिरपा प्रतिभौण होती रो, यही सपारदीय
बम अमुक बनविकी अमुरुमे दो सपति होती से हो मनुक अनुपम
नाति मी हावी है। सामान्य प्रकार भामके रस-सारको वार्या नक्षत्र रोपण
बमा मकबारगाम उत्पम होता,उसकी रितिका समय भी वादा नपत्रएका
नही है।किसामान्परपसे चैत्र वेशात आरिमाराम उत्पल होनेवाले बामकी होवापिस
सातासमयममें बुरा प्रमग पाकर का जा सकेगा सोसा करनेकी म यतीको
हाना पाय गमाचारहरमा। गोरयाग JAIN मेक प्रकारसे मारप-भा
मीम् रामचन्द्र
फस । यदि मिप्या प्रापि कुछ मी ए न हो मो स्पयशान मी समज नही।
२ दे कसे जो मनुप्पटलमें आप, उसे अधिक मापा जानित
समापसपस फिना, निरुपम नही।
५२२
निय प्राप करके विचार-या हो या करती है। जिसका सभेसे मी सिमना कर
उमस में भी रितफाक पिराएगी।
कारपधी ही माप उस समागम करने में पापा पनि उनकी
तुएँ पयापार न पाती तो उस बार ARE ON उमके RTIST
।
उमति करता है।
सारसी समागम विशेष उM HIT CHINIोनाति
प्रापिपास निरपरमा मोबन सका।
बर्मा, भाषा सुदी १
पा ५२४,५२५ २५ पेविध पत्र मावि संप्रा-२व्या वर्ष ४५७ हल्ला करते हुए भविनाशी परिणाम कहा है, उस परिणामस प्रहति करते हुए भी बनतानुबपीका होना समय है। सभेपमें मनतानुबषी कपायको म्पाम्पा इस तर माश्म होती है। (0) पुत्र वार वस्तुएँ छोक सहासे इच्छा करने योग्य मानी जाती हैं, उन पस्तुजाफा दु सापक और सारभूत मानकर-प्राप्त होनेके या नाश हो जानेस-इम करने योग्य मही संगती थी, वैसे पापोंकी हालम इम्म उत्पम होती है, भौर उससे वनित्य भाव बैस बनवान हो पसा करनेकी ममिछापा बूत होती है'--इस्यादि जो उदाहरणसहित डिसा, उसे वारा। निस पुरुषको हान-दशा स्थिर बने मोग्य है, ऐसे हानी-पुरुपको मा यदि ससार-समागमका उदय से तो नागतम्पसे हो प्रवृत्ति करना योग्य है, ऐसा वीतरागने नौ फहा है, पन्यथा नहीं है और हम सब बागृत मावसे प्राति करममें कुछ शियिता रक्से तो उम ससार-समागमसे बाधा होनेमें देर म सगे-या उपरेश इन बचनोंशरा मारमा परिणमन फरना योग्य है, इसमें सशप करना उचित नही। प्रसगकी सर्वथा निति यदि अशक्य होती रो, वो प्रसगको न्यून करना योग्य ह, और प्रमपूर्णफ सर्वथा नितिरूप परिणाम गना ही उचित है, यह मुमुक्षु पुरुषका भूमिका-धर्म है। सासग-सशासक सयोगसे उस धर्मका शेपम्पसे मारापन सभव है। ५२४ बई, बाद मी ३ गुरुः १९५१ श्रीमद् पीतरागाय नमः (१) केवलहानका ससरप किस प्रकार घरता है ! (२) इस मरतक्षेनमें इम फाउमें उसका होना समज हो सकता है या नहीं ! (३) फेपानीमें किस प्रकारको वाम-स्थिति होती है। (५) सम्पन्दशन सम्पग्वान भार कासशनके स्वपमें किस प्रकारस मे हो माना है। ५) सम्पदर्शनयुक्त पुरुषको आमम्पिति सी होती है। उपर फर पचनोपर पपाशाकि रिशप रिचार करना योग्य है। इसके सबंध पारा तुमम जो निम्मा ॥सके सा सिम्पमा । दाउमें पही उपाधिका कुछ म्यूनता है । ५२५ बम्बई बापा ॥२ गरी १९५१ श्रीमद् वीतरागको नमस्कार सममागम वार साये मामका बादमेबारे मुमुभुमोको आरम परिम और रमामार आफ्रिा प्रतिबध म्पन करना योग्य है ऐमा भीजिन आ महान् पुरुषोंने कहा है। जबतक अपना Rवारफर उसे कम फग्नरे पि प्रसितार नएमा पाप बता सपुस्पके पदे एप मागमा पर प्राम करना करिन है । इम पाना मुमभु जारो कि निधार करना चापि । ५२६ बमा भाग १०.१ *नमा वीतरागाप १ इम भरनमें हम पामें फागम गमाई या मा!! पारा प्रमापि, उनके अगर तुमदार नपा पोटराना के शिकार, प्रा र परम पिग मास हैन भीमद् रामचन्द्र [पत्र ५१८ दिया है, ऐसा कसा है। यह जो हमने कहा ह उमी मातके विचारस, जिसमे हमारी जामा आत्म- गुण मानिर्भूत होकर सान समाधिपर्यंत प्राप्त एमा, ऐसे ससगका मैं अर्पत भापत मजिसे नम सार करता है। ८ माश्य ही सगावको प्रथम सन साधनोंको गाण मानकर निर्वाणके मुख्य हेतु ऐसे सासगको ही सर्पिणरूपसे उपासना करमा योग्य है जिससे सम सापम मुसम होता है-ऐसा हमारा वाम-साक्षात्कार है। ९ उस सरसगके प्राप्त हानेपर पर इस गीतको करमाण प्राप्त न हो ता अवश्य इस जानका हो दोष है क्योंकि उस ससगके अपूर्व असभ्य वीर अस्पत दुग्म ऐसे सपोगमें मी उसने उस समसंगके स्पोगको पारा करनेवाले ऐसे मिष्मा कारणों का त्याग महीं किया । मिमामा, समता, प्रमा” और इन्द्रिय विपयोंसे यदि उपेक्षा न कोई तो मी सरमण फसमान महीं होता वषका समग एकनिष्ठा पूर्व मछि म फी हो, तो भी ससग फरमान मही होता । परि एक इस प्रकारको अपून भपिसे सस्माकी उपासना की हो तो अल्पकाम्में ही मि पापर वादिका नाश हो और अनुक्रमसे नाव सब दोपास मुछ हो जाय । ११ स्स्सगकी पहिचान होना चीनको दुर्गम है। किसी महान् पुण्यके योगसे उसका परि चान होनेपर मिषपस यही एमग-स्पुरुप है, ऐसा मिसे साझौमात्र उत्पम इवा हो उस बीचको तो वश्य ही प्राविका सकोच करना चाहिये अपने दोपोंको प्रतिक्षण, हरेक कार्यमें हरेक प्रसंगमें तत्व उपपोगपूर्वक देखना चाहिये पर दसकर उनका पप करना चाहिये, तपा उस स'सगफे निपे या देश माग करना पड़ता हा तो उसे भी स्वीकार करना चाहिये । परन्तु उससे किसी पराध विशेष मणि- स्नेह-होने ना योग्य नहीं। क्या प्रमा मे रसगारण मानिदोपोमे उस ससगाके प्राप्त होनेपर पुस्पार्म धर्म में पता है और ससंग फम्मान नहीं होता या नामकर पुष्पा पार्यका गुप्त रसना योग्य नहीं। १२ सरसगका वर्षात् सपुषको पहिचान होमपर भी यदि पा स्पोग निरन्तर न रहता हो तो सम्गसे प्राप्त उपरेशको प्रसष सत्पुरुषके हुन्य समझकर उसका विचार तथा वारापन करमा चाहिये निस वाराषनसे गीषको वपूर्ण सम्यक्त्त तत्पम होता है। १२ नौरको सबसे मुस्स चौर बावसक पा निश्चय रमना चाहिये कि मुझे जो कुछ करना है जो बामाके कम्पाणम्प हो उसे ही करना है और उसीके छिपे इन तीन योगोको उदय-ससे प्राति होती हो तो होने हेमा तो मी अन्तमें उस त्रियोगसे रहित स्पिति करनेके मि उस प्रानि सकोच करते करते किससे उसका स्प होगाय नही उपाय करना चाहिये। उपाय मिप्या बापाका स्पा सरता स्पाग प्रमP और इशिप-विषयका स्पाग या मुन्सी । उसको एसंगफेसपगमें अवश्य ही मापन करते गना चाहिये और समाकी परोक्षवामे तो उसका माश्य मास ही मारापन करते ग्रना चाहिये । क्याकि सत्सगके प्रसगमें दो यदि बीचको कुछ प्यूनता मी हो तो उसके निवारण होनेका साधन समग मौजूद है परम्त ससगकी परोसता तो एक मफ्ना बारमाही मापन है। यदि र वातावस सगसे प्रश्न बोधका अनुसरण म करे, उसका वापरण म करे, बाबरण करमेमें होमेबारे प्रमावको म छोरे, तो कमी मी गौत्रका कम्पाप न हो। .
पत्र ५१९ ५२ ] पिषिम पम मादि सपा-२८वों पप ४५५ सक्षेपमें मिस हुए हानौके मार्गके बाशयको उपदेश करनेवाले इन मास्पोंका मुमुसु गीतको अपनी वास्मामें निरन्तर ही परिणमन करना योग्य है कि हमने आत्म-गुणको विशेष विचारनेके ये शम्दरूपमें बिसा है। वर्मा, ज्येष्ठ पुदी १० रपि १९५१ जानी-पुरुपको जो मुस्त रहता ह वा निज समावमें स्थिरताका ही सुस रहता है । बाम पार्यमें उस मुख-बुद्धि नहीं होती इसलिये उस उस पार्षसे हानीका मुस-दुःस वादिकी विशपता अषमा न्यूनता नहीं कही जा सकती । यद्यपि सामान्यम्पस शरीरको सम्पता आPिसे साता और गर पारिसे बसाता ज्ञानी और मशानी दोनों को ही होती है, परन्तु बानीको यह सब प्रसग हर्प- विपा का हेतु नहीं होता अपवा यहि बानकी तरतमतामें न्यूनता हो तो उससे पुछ कुछ हर्ष-विवाद हाता ह फिर मी सर्वया अमागतमालको पाने योग्य हर्ष-विपाद नहीं होता | उदय-ससे कुछ कुर पैसा परिणाम होता है तो मा रिचार जागृतिक कारण उस उदयको क्षीण करनेके लिप ही बानी पुरुषका परिणाम रासाह। जैसे पायुको दिशा बछ जानेसे नहान दूसरी तरफको चळने माता , परम्तु गहाम पठानपाठा उस नहायको धमार मार्गकी मार रखने के ही प्रमानमें गता , उसी तय बानी-पुरुप मन बचन भारि योगको निममात्रमें स्थिति होने की बोर ही गाता है फिर भी उदयम्प मायुके सघसे यत्किचित् दिशाका फेर हो जाता है, तो मी परिणाम---प्रपरन-तो अपने ही धर्ममें रखता है। हानी मिर्धन ही हो बयबा घनबान ही हा, बार बाानी निर्धन ही अपरा धनवान ही हो, यह काई नियम नहीं है। पूर्वमें निपम गुम भगुम कर्मके अनुसार ही दोनोंको उदय गवाहै। पानी उत्यमें सम रातारे वानाको र्स-विपाश होता है। महाँ सम्पूर्ण बान है वहाँ तो मिर्पो वादि परिमइका मी अप्रसग ।। उससे म्यून भूमिकाकी शान-दशामें (पाप पाँच गुणम्पानमें नदी उस योगका मिलना समय है, उस दशामें ) रामेषाम पानी-सम्पगएिको हो-निया बानि परिमहकी प्राप्ति होती है। (२) पर पासि नितने मगम र्प-विवार हा उतना ही बानका तरतम्प कमती हसता है, पसा समाने का। ५२० बमई, जापान मुठी १ रवि १०५१ १ सस्पका मान हानक पापात् मिपा प्राचि दूर न हो, ऐसा नहीं हाता । स्योंकि तिने वंशम सम्पफा शान हा उतने ही वशमें मियामात्र प्रकृतिका पूर हामा सुमब, यह बिनमगपान्का निश्चय ह । मी पूर्व प्रारम्भस पनि माग मारिफा राय बना हस, तो मी मिथ्या प्रतिम तागप्प भीमद् रामान [पत्र ५२१ ५१२ ५२३ न हो, यह शानका स्म । भौर नित्य प्रति मिप्या माति धर्माण होतो ये, यही सस्प हालकी प्रवीतिका फरहै। यह मिप्या प्रति कुछ मी र मोवो सत्पका शान माँ समझ नहो। २ देवमेकोसे मो मनुष्पमे कमें माये, उसे वधिक गेम होता है-स्यादि यो सिसा,म सामान्यरूपसे पिसारे, एकांतस्मसे नहीं। ५२१ सर्भ, बापाल पदी १ रनि १९५१ से अमुक बनस्पतिकी अमुक तमे ही उत्पति होती है पैसे की मुक में ही उसकी विकृति मी होती है । सामान्य प्रकारसे वामके रस सार्या मधन विकति होती है। परन्तु मार्या मसके बाद गो वाम उत्पन्न होता है, उसको विकृतिका समप मी वर्वा मक्षत्र हो, या मात मही है। किन्तु सामापरपसे पैर पैशास मामिासमें उत्पन्न होनेवाले बामको ही षा मऋषमें निति होना समय है। ५२२ बई वापर सदा १ रवि १९५१ पिन राव प्रत्य करके विचार-शा ही हा करती है। पिसका सभेसे मी निसमा मही मन सकता । समागममें कुछ प्रसंग पाकर कहा जा सकेगा तो रेसा करमेकी इच्छा रासी, पोंकि उससे हम भी हितकारक स्थिरता बनी। कारपया हाँ बाप उनका समागम करनेमें बाधा मही है। तथा यदि उनकी प्राप्ति वई यपायाम्प म लगती हो तो उस बातपर भविक पक्ष न देते हुए उनके विचारकर कुछ बनुकरम करना याप मो ता विचार करना। जो परम्यान हो उसका समागम अनेक प्रकार से वारम भारी उमति करता है। गेकसबधी समागमस विशेप उपास मात्र रहवा । वषा पोत से पोगके बिना रतनी ही प्राधिोका निराध करना नहीं बन सकता । ५२३ मई आपात सुदी ११ पुष १९५१ (१) मिस कपाप परिणामम मनत समारका बवो उस कपाम परिणामकी मिनप्रापनमें मनतानुपी संवा कही है। जिस रूपायम तन्मयतासे अप्रशस्त (मिथ्या) मात्रमे दी उपपोगसे बामाकी प्रति हाती है यहाँ अनंतानुबंधी स्थानक समय है। मुख्यत जो म्यानक यहाँ का है उस स्पान यो उम करायकी विशेष समपता। -निस प्रभारसे सदेव सहकबार सार्मा मोहाता हो उनकी मसाला हा ठया उनसे विमुन्न भाव होता पक्ष्यादि प्रातिस त्या असत् दब क्मत् गुरु और मगर धर्मम विस प्रारम भाप होता हा तसाधी मारपता मान्य हो इत्पादि प्रत्तिसे भाचरण करते " अनतामुनी कपास उत्पम दाना, पका हामीले पचममें ती-गुप्र बादि मानोंमें जो मर्माण पधार पष५२४ ५२५ ५२६ पेपिप पब मारिसमार-~२वा वर्प इण्य करते हुए भरिना गो परिणाम कहा है, उस परिणामसे प्राति करते हुए भी बनतानुषाका होना सभव है। सनेपमें बनतानुबमी कपायकी म्पाम्या इस तरह माश्म होती है। (२)ो पुत्र आदि वस्तुएँ लोक सहासे इशा करने योग्य मानी जाती है, उन वस्तुमोको सापक और क्सारम्त मानकर-प्रास होनेके बाद मारा हो जानेसे इच्छा करने पोम्य नही खासी पी, कैसे पदापोको हाम्मे हम्छा उत्पन्न होती है, और उससे बनिस्प मात्र से बयान हो सा करनेकी ममिछापा मत होती है'-स्पादि गो उदाहरणसहित लिखा, उसे माँगा है। बिस पुरुपको दान-दशा स्थिर रमे योग्य है, ऐसे बानी-पुस्पको भी यदि ससार-समागमका उदय होतो नागतरूपसे ही प्राप्ति करना योग्य है, ऐसा भीतरागने को कहा है, सम्पपा नहीं है और हम सप नागृत मापसे प्रति करनेमें कुछ शिपिळता रक्से ता उस ससार-समागमसे मापा होनेमें देर म यो --या उपदेश इन बचनोहारा मारनामें परिणाम करना पोम्य है, इसमें सशप करना उचित नहीं । प्रसगका सर्वथा निति यदि बस्य होती हो, तो प्रसगको म्यून करना योग्य है, और क्रमपूर्वक सर्वथा निसिप परिणाम छाना ही उचित है यह मुमुसु पुरुषका भूमिका धर्म है। समग-सत्याबके सयोगसे उस धर्मका विशेषरूपसे नाराषन समब है। ५२४ बम्बई, मापार सदी १३ गुरु १९५१ भीमद वीतरागाय नमः (१) केवमानका स्वम्प किस प्रकार घटता है! (२) इस मरतक्षेत्रमें इस काम उसका होना समय हो सकता है या नहीं। (२) केवगानीमें किस प्रकारको वारम-स्पिति होती है। (१) सम्पग्दर्शन सम्पमहान और फेवणानके स्वरूपमें किस प्रकारसे भेद सकता है। (५) सम्यग्दर्शनयुक पुरुपको वात्मस्थिति कैसी होती है। उपर को हुए सपनोंपर पपाशक्ति विशेष विचार करमा योग्य है। इसके ससंभमें पारा तुमसे यो मिसा मा सफे सौ लिसना । हमें यहाँ उपाधिको कुछ यूनता है। ५२५ सा, बापाल की २ रपि १९५१ भीमद वीतरागको नमस्कार सासमागम वौर सभालके छामको बाहमेवारे मुमुमुखोंको बारम परिमा और रसास्वाद वादिका प्रतिबन न्यून करना पोग्य है, पेसा मीनिन नावि महान् पुस्पोने का है। जबतक अपना दोष विचारकर उसे कम करनेके लिये प्रातिशीस म एषा नाप, तबतक सपुस्पके को ए मार्गका फल प्राप्त करना कठिन है। इस बातपर मुमा चीनको विशेप विचार करना चाहिये । ५२६ बा बापाद बटी ७ रवि १९५१ ममा वीतरागाय १स मरवक्षेत्रमें इस कामें केवडान समय है या नहीं। इत्यादि यो प्रश्न रिसे ऐ उनके उत्तरमें हमारे सपा पी लहेरामाकि विचार, प्राप्त हुए पत्रसे मधेपरपसे माम्म ए है। न ५८ - । मीमद् परचन्द्र [पा ५२. प्रश्नोंपर त, मेगमई तया भौगरको विशेष विचार करना चाहिये । बप दर्शनमें जिस प्रवरसे केरमान आदिका वास सामोर नदर्शनमें उस पिपत्र गो स्वरूप कहा है, उन दोनोंमें यात मुम्स भेट देखने में माता, उसका सबको विचार होकर समापाम हो बाप तो याबामा कल्यामा वंगभूव है इसलिये इस विषयपर अधिक विचार किया पाप तो बाहै। २ 'अस्ति' इस पदसे मेकर सब भाव वारमाकि रिपे ही विचार करने पोम्प है। उसमें बो मिज लम्मको प्रामिक व उसका ही मुस्पक्पा Aचार करना योम्प है। और उस Rचार के लिये अन्य पापक विचारको मी वपेक्षा यती है उसके लिये उसका मी विचार करमा उचित । परम्पर दर्शनों में बड़ा मेव देसनेमें माता है। उन सपको बना करके बमुक दर्शन सबा , यह निश्चय सब मुममुमोको होना कठिन ६, क्योंकि उसकी तमना करनेकी क्षयोपशमशति किसी किसी बोको ही होती है। फिर एक दर्शन सब मशोंमें सत्पी और दूसरा दर्शन सब व में बसन है या बात यदि विचारसे सिद्ध हो जाय तो दूसरे दर्शनोंक प्रवकको दया बादि विचारने योग्य है । क्योकि विसका राम्प उपशम समान है, उसने सपा बसपका ही निरूपण क्यों किया होगा। स्पाविचार करना योग्य है। किन्तु म गानों को पहचर होना कठिन है भार या विचार कार्यकारी मोहै—करने पोग्य है परन्तु पर किसी माहात्म्पवानको ही हो सकता है। फिर बाकी जो मोलके अमुक गोब है, उन्हें उस समभमें क्या करना चाहिये, या मी विचार करना उचित है। सब प्रकार के सर्वांग समाधानकाए बिना म कमास मुळ होना वर्समन है, याचार हमारे पिच पण करता है और सब प्रकारके समापान मे म्येि परिबनतकास पुस्पा करमा पाता हो तो प्राय करके कोई मी गौन मुक्त म हो सके । इससे ऐसा माश्म होता है कि कम्पकारमें हो उस सब प्रकारके समाधानका उपाप हो सकता है । इससे मुमुक्षु गोरको कोई निराशाका कारण मी नही है। ३ अरणमुदी ५-६ के बा यहसि निचहाना बने ऐसा माश्म होता है। पर्थना होगी ही स्पिति होगी। ५२७ पोग नैयायिक, बौर + + + + + + निम बनिस्प परिणामी बपरिणामी साधी साधी-कर्म + + पर ५२८, ५२९, ५३.] विषिष पत्र मादि संप्रह-२ववर्ष ५२८ १ सौम्पदर्शन करता है कि बुदि बा । पातळ बौर वेदासदर्शन मी ऐसा ही कहते । बिनदर्शन कहता है कि बुधि चेतन है। २ वेदान्तदर्शन करता है कि मारमा एक ही है। बिनदर्शन करता है कि भास्मा अनत है। गावि एक है। सारस्पदर्शन भी ऐसा ही करता है। पातनम्दर्शन भी ऐसा ही कहता है। ३ वेदान्तदर्शन करता है कि या समस्त मिस बयाके पुत्रके समान है, मिना न करता है कि यह समस्त विश्व शासत है। . पातम्म्दर्शन करता है कि नित्य मुळ ईश्वर एक ही होना चाहिये । सांसदर्शन इस बातका निषेध करता है। मिनदर्शन भी निषेष करता है। ५२९ बम्बई, बापाव बी ११ गुरु १९५१ निस विचारवान पुरुषको परिमें ससारका स्वरूप निस्पप्रति देशस्वरूप मासमान होता हो, सांसारिक मोगोपमोगमें मिसे नीरस्ता जैसी प्रति होती हो, उस विचारवानको दूसरी तरफ छोक- म्पवघर बादि, म्यापार बादिका उदय यता हो, तो यह उदय-प्रतिबध इन्द्रिय मुसके लिये नहीं, किन्तु वामहिवार्य पूर करनेके मिये हो, तो उसे दूर कर सकमेका क्या उपाय करना चाहिये । इस -सबंध में कुछ करना हो तो करना। ५३० बम्बई, बापादकी१० रवि १९५२ मिस प्रकारसे सहन हो बम बाम, उसे करनेके लिये परिणति या करती है अथवा मत्तमें यदि कोई उपाय न घरे तो कमान कारणको जिससे पाषा म हो जैसी प्रकृति होती है।मात समयके म्पानगारिक प्रसगको बाचिके कारण यदि योरे समय मी निरपिसे किसी तयारूप क्षेत्रमें रहा जाय तो पन्म, ऐसा पिच या करता पा । क्या यहाँ अधिक समय गनेके कारण, जो देहके ममके निमिच कारण है ऐसे माता पिता मादिके पचमके दिये, उनके पिचको प्रियता मधोमके लिये, तथा फुल फुल दूसरों के चित्तको नुप्रेमाके लिये भी पोरे दिन बास्ते माणीमा जानेका चार उत्पम एषा या । उम दोनों बातों के लिये कमी सयमा मिड तो बम, ऐसा रिसार करनेसे कुछ पपापोम्प समाधान न होता पा । उसके लिये प्रचारको सान ब्त विशेषतासे हारमें गो कुर निधारको मस स्परता ही, उसे तुम्हें बताया था । सब प्रकारके असम-समके विचारको, यहाँस प्रसग समसकर, र रम्मर मापनकी माप अमगताका हास्में कुछ विचार रमसा मी सहज समा बसे उदयानुसार ही मारे । भाषण पदौ ११ से माफ सुदी १० के मामग तक किसी मिति क्षेत्रमें पना हो ये से यपाशछि उदयको उपशम अंसा रसकार प्रापि करना चाहिप पपपि विशेष निविद्रो उदयका सस्म देखनेसे प्राप्त होना कठिन जान पाती है। - भीमद् जपत्र [५११ ५९ स्मिा मी प्रसग प्रति करते हुए व्या सिमरो हुए जो प्राय निप्रिय परिणति गती है, सम परिणतिक कारण हासमें विचारका बराबर काइना नहीं बनता । सहनामस्वरूपसे यथायोम्य उन जापरण बर्थ वापात बदौ १५सोम १०५१ नमा वीतरागाय (१) मर्म प्रतिघस मुक्त हुए बिमा बहुमसे मुह होना समन नहीं । (२)मम बिसे मति मत भार भाभि प तीन शान थे, और बारमाफ्योगाणायदा भी, तथा मस्साड में भोग-कर्म क्षीण करके संपमा मरण करते हुए मन पर्यवसान प्रम किया था एने भीमर महानगरम्मामी भी पारदर्गभार सर छह महीमेतक मान रहकर पिचरते थे। इस प्रकारका उरा उपमार्गका प्रचार करनमें किसी भी औषको अल्पतरूपसे विचार करके प्रहास परमा पाप है,'म अगर शिक्षाका उप करता है । तथा बिनभगपाम् जैसेने मिस प्रति- भफी Air: ठिप प्रयत्न रिया उस प्रतिवध भागृत एने योग्य कोई भी गीर मही पता गा बनायाभार अनत गामार्पच उस आपरमस प्राधिपार-उस नमक प्रति विपारमेय ATTAधरना दती 6-सरपना थाप्य है। जिम प्रसारका पूर्व प्रारम्भ भागनेर नित दोने पाम्प , उस प्रारक प्रारम्भमा उनORI म करना ठापन जिसम उस प्रचारक पनि प्राति फरते पुर जो कोई बरसर मस होता, उग उम अपगरपर रागृत उपयाग न दो ता जीवका समाविकी Rरापमाहाते हुए देर न लगे । 4गा मगभारो माया परिणमा पर जिसने मोग रिना मुकारा न हो सर, मेरी मांगो पनि निदान "ना पाप र ता भी उस प्रपरका परत हुए शिमम समाश असगता उत्पाहा उमगारागान करमा उचित " मयपग मा पनि उग्ण-पानि' म भेदस प्रालि रहा तो । मुम1 पर गहती ८ ।सपास उग पातमा प्रारम्पारण उपमा निमम पाम RATAL गरी उरण पति पर पारि पर पदार्थ भार म पनी म दम पावि नमे आमा म हता यानि गमारि-गोगा। ममता पमा गुना पा र मम पा र दारमें मरम्पयन | 4TH सि ममगमम जान आ पुए भी प्रभातर nina THशन-फानी भीमारी पयापरा आमा सम को MITRA रिना । ममा हानहाना मम पापमा पर भी पर मना नग" ५३२ एर भाग. १५१ 1TMLA fre AMTEMural 17 arr Hit F-10 ग नगर भाग में ' ग ग पर ५५५ ५१४, ५३५] पिक्षि पत्र मादि संप्रह-यावर्ष ४११ समपतक हानीकी बादापर पैर रखकर प्रकृति होना समव मही 1 किन्तु जहाँ मोग मादिमें सीव तन्मयतास प्राति हो वहाँ बानीको भाडाकी कोई अकुशवा समझ नहीं-निमपतासे मोग प्राति ही समरित है। जो भविनाशी परिणाम कहा है, वैसा परिणाम यहाँ थे, वहाँ मी मनतानुबपी समय है। तथा ' मैं समझता, मुझे गापा नही है' जीव इसी तरहकी बेहोशीमें रहे, तया भोगसे निति समय है' और फिर मी ५ कुछ मी पुरुषार्थ करे तो उस निहचिका होना समय होनेपर भी, मिप्या शानसे पान-या मानकर यह मोग बादिमें प्रति करे तो बहो मी अनतानुषधी सभष। मागृत अबस्थामें वैसे वैसे उपयोगको गुदता होती है पैसे से समदशाका परिक्षय होना समव - ५३३ बबाणीजा भाषण सुदी १०,११५१ सोमबारको रात्रि संगमग ग्यारह बसके बाद मेरे रारा गो फुछ बचन-योग प्रकाशित हुभा या, या पनि स्मरण या हो, तो वह पयाशात स्मिा गा सके तो सिना । जो पर्याप है, या उस पर्पका विशेष साप है, इसलिये मन पर्यपानको भी पर्यायाधिक धान मानकर उसे रिशेष शानोपपोगमें गिना है। उसके सामान्य प्राणरूप रिपयके भासित न होनेसे उसे दर्शनोपयोग नहीं गिना, ऐसा सोमबारको गोपहरके समय कहा पा । तदनुसार चैनदानका अभिप्राय मी वाम देगा। परमात वधिक स्पर सिसनेसे समप्रमें वा सकने जैसी है, क्योंकि उसको बहुवसे रस्त भारिसे करना योग्य रितु यहाँ वा पैसा हाना असमय है। मन-पपरके संबधमें गो प्रमग विचा, उस प्रसगको पपा फरने मागस मही मिणा । ५३४ बागाध, पाषण सुदी १२ शुम १९५१ पद गोल निमिवासी पर एक सामान्य वपन है । म सग-प्रसासे होती चारही परिणतिक पपमें ममते प्राय सिदासरूप मास हो ममता है। ५३५ वाणीमा मात्रम मुनी १५ सोम १९५१ वामा लिप विचार-माग बीर मजि-मार्गको भाषमा करना योग्य है कि विचार मार्गक पोम्प गिसकी समर्प नही, उसे उस मार्गका उप पा करमा उपित नही पानिमा सिलाई पर योग्य है, तो भी उस पिपमें हाटमें पुरु मी सिमना विच मही जा सकता। श्री. फेवमुनि बसमें कोई मोदका रिमी है, उसे पड़ी है। मरे अनेक भक समानेके पचात् उस मकारकी एका निर होता है अपरा यह फ्रम प्राप फरके समझने पोम्प होता है। ऐसी पाचन दाउमें कम करफ अपना मत करके विशेष निकट प्रेम बामापा ही विचार करमा पोप है।
४१२ भीमजयम [पर ५५५, ५. ५३६ बवाणीला मारण पदाबि १.५१ पहाँ फ्यूपण पूर्ण होनेवक ग्रना संभव है।समान वादिका क्या इस कामे होना संमर है। इत्यादि मन परिसे मिले ये उन प्रस्नोपर पधाराणि वनुप्रेक्षा सपा भी शादि साप परस्म प्रस्नोचर करमा चाहिये। 'गुणके समुवापसे मिल गुणाका स्वरूप होना समय है अपना मही!' तुम लोगोंसे हो सो ठो इस प्रस्मक उपर विचार करमा । मौको तो बस चार करमा पाप है। ५३७ सवाणामा श्रावण दी १९भुक १९५१ पासि प्रसग पाकर लिएर नो पर प्रश्नोंका उत्तर लिसा सो बाँचा है। पहिले दो प्रश्नोंक उत्तर सक्षम है, फिर मी यपायोग्य है। तीसरे प्रश्नका उत्तर सामान्यत टोक है, फिर भी उस प्रश्नका उत्तर मिशेप सूक्ष्म विचारसे किसने योग्य है। यह वासरा प्रश्न इस प्रकार 'गुणके समुदापसे मिम गुमाका सम्म हाना समो वपना नही। भर्पात् 'क्पा समस्त गुणोंका समाप होगुणी मर्यात् दम्प है! बक्या उस गुणके समुपके माधारभूत ऐसे भी किसी मान ब्रम्पका अस्तित्व मौजूद है।' इसके उत्तरमें ऐसा सिसा है कि वामा गुणी ह उसके गुण नाम दर्शन गय भिम बस प्रकार गुणी वौर गुणको सिया की है। परन्तु यहाँ विशेष विषक्षा करमा योग है। यहाँ प्रश्न होता है कि फिर हान दर्शन बार गुमसे मिन्न बालीका वारमत्व ही क्या रा गाता है। इसलिये इस प्रस्नका पपाशति विचार करना योग्य है। चोया प्रम परो कि इस काम मान होना सम है या नहीं। इसका उत्तर इस तरा शिक्षा प्रमाणसे देसनेसे तो पा संमत।पा उत्तर भी संबिस है।इसपर पात विचार करना चाहिये। इस पीपे प्रस्तके विशेष विचार करने के ये उसमें इतना विशेष वौर सम्मिनित करनारगिस प्रमापसे चैन वागममें मियान माना है वाहा महक्मानका सरूप पापाताप होकनारे- पा ऐसा मागम होता है या किसी दूसरी तय ! और यदि सा हो मानका सहए हो ऐसा माम होता हो तो प स्वरूप इस काम मी प्रगठ होना समबीबपा नहीं! अपना यो बैन बागम करता है उसके कामेका क्या कोई गुनाही कारण है। पर क्या केवमानका स्वरूप किसी सर्व प्रकारसे होना और सनमा माना संभव है। इस बातपर पपाशति अनुप्रेक्षण करना उचित है। इसी तरह गो OF प्रमग मी बनेक प्रकारसे विचार करने पोम्प मिशेष मनुका पूर्वक इन दोनों प्रोन उत्तर मिसना बने तो किसना | प्रथम प्रोंक उपर सेवेपमें मिले १ ठपितासे विहाना कर सके तो उन्हें भी लिखना । तुमने पाँच प्रभ भिभो। उनमें तान प्रनोंका उचर यहाँ संधेपसे मिसा है। प्रपम प्रम मातिम्मरण मानवाम मनुप्प परिमे मो किस तब रान मेवा। उत्तर:--विस तय रफ्नमें गौन बस्तु बार देखा हों और बरे होनेपर किसी प्रसंगार मिस समय उन गा मावि मामा स्मरण रोगा। उस समय उन गान बादिका बास्पार्षे । ।
पा ५३.] विविप पर मादि संमह-२ौंपर्प मान होता है, उसी तर माशिस्मरण हानबारेको मी पूर्वमक्का मान होता है। कदाचित् यहाँ या प्रश्न होगाक' पूर्णमघमें अनुभव किये हुए देह वादिफा जैसा ऊपर कहा है पैसा मान होमा समय t-इस गातको यदि पापातप्प मानें तो मी पूर्णमत्रमें अनुभूत देह वादि अथवा कोई देवलोक मादि निवास स्थान गो वनुभव किये हों, उस अनुभवको स्मृति ई, और यह मनुमा पायातम्य मा है, पर किस नापारमे समझना चाहिये !' इस प्रश्नका समाधान इस तपो-अमुक अमुक वेग, गि तथा परिणाम मादिसे अपने बापको उसका स्पष्ट मान होता है, किन्तु दूसरे किसी गोषको उसका प्रवीति होने के लिये तो कोई नियम नही है। कचित् अमुक देशमें अमुक गाँवमें अमुक घरमें पूर्वमें देह पारण किया हो, और उसके सिरे जीवको बतानेसे, उस देश बादिको सपना उसके निशान वानिकी कुछ भी पिपमानता हो, तो दूसरे जीवको भी प्रतीतिका कारण होना संभव है, अपवा मातिस्मरण हानबाकी बोधा निसका बान विशेप है, उसका उसे जानना समय है। तया निसे जातिस्मरण हान है, उसकी प्राति आदिको जाननेवाला ऐसा कोई विचारवान पुरुष भी गान सकता है कि इस पुस्पको किसी पैसे शामका होना सभव है, या मातिस्मरण होना समवी अपना बिसे गाविस्मरण बान है, कोई बीच उस पुरुपके पूर्वमहमें सबमें बाया हो-विशेषरूपसे माया हो, उसे उस सबपके पानेसे यदि हा मी स्मृति हो तो भी दूसरे चीनको प्राति मामा समय। दूसरा प्रश्न -बार प्रतिसमय मरता रहता है, यह किस तय समझना चाहिये। उत्तर -निस प्रकार मारमाको रथन देहका वियोग होता है-मिसे मरण या गाता - उसी वर स्यूड दोको मापु बादि सूक्ष्म पर्यायका प्रतिसमप हानि-परिणाम होनेसे योग हो याह, उससे यह प्रतिसमय मरण कहा जाता है। यह मरण म्याहारनपसे कहा जाता है। निधपमयसे बामाके सामाविक बान दर्शन मादि गुण-पर्यायी, विमान परिणामके कारण, पनि एजा करती है और हानि भारमाके निस्पता मारि सम्मको मी पको यती पर प्रतिसमय मरण कदा गाता है। तीसरा प्रश्न -फासवाननमें भूत और मरिम्पकालो पदार्प वर्तमानकाळमें बतमानम्पस ही रिसाई देते, वपमा किसी दूसरी तए। उत्तर -विस तरह बर्तमानमें वर्तमान पदाच साई देते हैं, उसी तरह भूतकाल के पार्ष भूतकासमें विस सरपसे थे उसी पम्पसे वर्तमानकाळमें दिखाई देते हैं, और ये पार्य मविश्यकालमें निम सरासे होंगे उसी स्वरूपसे वर्तमानका में दिए देते हैं। भूतकाठमें गो जो पर्याप पामें पता देने कारणम्पसे वर्तमान पाप मोम है, और भविष्यकाठमें गे गो पपाप देंगी, उनको योम्पता वर्तमान पामें मौन्द है। उस घरणका और पोम्पाका शान वर्तमानपाटमें भी जानाको पपा सरपसे हो सकता है। यपपि इस प्रस्नो रिपपमें बात्से विचार बताना योग्य है।
भीमद् पक्ष ५३८ वाणांथा मानण वदी १२ शनि १९५१ गत शनिबारको लिसा वा पत्र मिला है। उस पत्रमें मुस्पतमा वान प्रश्न लिसे है । उनका उत्तर निमरूपसे है। पहा प्रश्न-एक मनुष्य प्राणी दिन के समय भारमाके गुणोंशय अमुक मर्यादातक देख सकता है और राति समप अंधेरे कम भी नहीं देख सकता । फिर दूसरे दिन इसी तय देता है, बार रात्रि में कुछ भी नहीं देसता। इस कारण इस वय एक दिन रातमें, अनिधिमरूपसे प्रवर्तमान आमाके गुमके उपर, अभ्यासापके बाले बिना हो, क्या नहीं देसनेका वापरण मा गाता होगा। सपना देखना यह वास्माका गुण ही नहीं, और सूरबसे हो सब पुरा दिखाई देता है, इसलिये रचना मरवका गुण होने के कारण उसकी अनुपस्पितिमें कुछ मी PHई नहीं देता। और फिर इसी व्य मननेके रातमें कानको यपास्पान न रसनेसे कुछ मी पुनई मारी देता, तो फिर बाहमाका गुण से मुठा दिया जाता। उत्तर.ामारणीप पा र्शनापरणीप फर्मक अमुक पोपणाम होनेसे इत्रिफलम्धि उत्पा होती है। इन्द्रियाधि सामान्यस्मसे पाच प्रकारको यो गा सकती है। पर्यन इन्द्रिपसे माम इनियत सामान्पहासे मनुष्यको पाँच इन्द्रियोको साधिका झयोपशम माता, उस पयोपशमकी शतिको गाँतक बमुक म्पापय पातक मनुप्प वान देस समय है। देखना यह पन्द्रिपका गुण परन्त ववकारसे अपना बस्तुके ममुक दूरीपर होनेसे उसे पदार्थ देसनेमें नही जा सकता क्योंकि बसु इनिपट स्पापराम-मम्मि उस दतक गाकर रफ गाती है। वर्षात् सामान्यस्मसे बयोपशमको पनी हो पति है। दिनमें मी पमिष वकार हो अपना कोई वस्तु गत अपकारमें रमसाणे अपना वमुक सीमासे दूर हो तो पप से दिखाई नहीं दे सकती । तपा इस इन्द्रियोंकी मी बाम सर्वधी पोपशम शकिक ही उमके लिपप हाम-दर्शनको प्रति है। बमुक म्पापात होनेतकरी ने स्पर्श कर सकती है संप सकती है, स्वार पहिचान सकती हैं पा सुन सकती है। इम्प प्रश्न -मात्माके मसम्स प्रदेशोंक समस्त शममें पापक होनेपर मी, मौसके पीचर भागचे पुतमासे ही देखा जा सकता है। इसी प्य समस्त शरीरमें असस्पात प्रदेशों माफक होनेपर मी एक छोटेसे कानसे हो मुना गा सकता है। अमुष स्पामसे हो गये पता होती है अमुक गगहसे हो रस पणा होती है। सवारणके लिये मिनाका स्वाद एफ-पार नहीं बानवे गौम हो बानवी है। मामा के समस्त शायरम समानरूप म्यापक होनेस मी बमुक मागसे जान होता इसका क्या कारण होगा। उत्तर-जीत जान दर्शन पदि पापिक मापसे प्रगट हुए हों तो सर्व प्रदेशसे उसे सपा- प्रधारका निवरणपना होनेसे एक सम्पमें सर्व प्रकारसे सर्व मागका शापकमान होना समन है परम् यो बयोपशम मावसे बात दर्शन या मिन मिल प्रकरसे बमुफ मनमें बापकमात्र ऐता। मिस गोषको मर्मत माप कान-दर्शन श्योपशम पानि पती । उस गोरो बयर बने माग मितना प्रापकमाल हताहै। उससे विशेष क्षयोपशमसे स्पान विपकी सभी पा ५१९] विदिप पत्र मादि सपा-२वों पर्प कुछ कुछ विशेष म्पक (प्रगट ) होती है, उससे विशेष क्षयोपशमसे स्पर्शन नौर रसना इन्द्रियकी सम्धि उत्पम होती है, इस प्रकार शिफ्तासे उतरोतर स्पर्श, रस, गव, पण मीर शब्दको प्राण करने योग्य पधेन्द्रियसबधी क्षयोपशम होता है। फिर भी झयोपशम दशामें गुणफी सम-विषमता रोनेसे, सागसे यह पन्नियसबधी बाल-दर्शन नहीं होता, क्यों शक्तिका बसा तारतम्य (सत्त) महो कि मा पाँचों रिपय सागसे प्रहण करे । यपपि भवधि मादि बानमें पैसा होता , परन्तु यहाँ तो सामाम्प अयोपशम चौर यह मी इन्द्रिप-सापेक्ष पोपशमकी बात है। अमुक नियत प्रदेशमें ही उस इन्द्रियम्भिका परिणाम होता है, उसका हेतु योपशम तपा प्रासभूत योनिका समय है, जिससे निपत प्रदेशमें (अमुक मर्या-मागमें ) जीवको अमुक अमुक विषयका ही ग्राहण होमा समय है। सासरा प्रश्न -जब शरीरके बमुक भागमें पीड़ा होती है तो नीच यही सछम हो जाता है, इससे मिस माग पीला है, उस भागको पीका सहन करमेके कारण क्या समस्त प्रोश ही सिंच माते होंगे। जगत्में भी कहावत है कि नयाँ पीका हो मार दी संजना रहता है। उत्तर -उस पेदनाके सहन करनेमें गुतसे प्रसौपर विशेष उपयोग कतारे, और दूसरे प्रदेशोंका उस बोर पातसे प्रसोंपर सामाविक वाकर्षण मी रोता है। किसी वासरपर से नाका बारम्प हो तो समस्त प्रदेश मागत स्पितिको प्रस करते है और किसी नासरपर वेदना वपना भपकी बाबतासे सर्व प्रदेश पर्याद जारमाके दशम भार आदिको एक स्थानमें स्पति होती है। पह होनेका रेशमी यही हकि कम्पावाप मामक जी समारके तयाप्रकारसे परिणामी महाके कारम, मातिरायके क्षयोपशमकी वैसी सम-विषमता होती है। इस प्रकार के प्रश्न गतसे मुमुभु जीवोंको विचारको शुदिके लिये करने चाहिये, मोर बस प्रमोंका समाधान बतानेकी पित्त चरित् सहना मी गती है परन्तु सिमानेमें विशेष उपयोगका रख सकना बहुत मुश्किम्से होता है। 1 ५३९ भागामा, मात्रण बई १५ सोम १९५१ प्रथम प में ऐमा कहा कि मुममु ! एक भारमाको गानते हुए समस्त ठोकाठोकको गानेगा, और सब कुछ गाननेका फल मी एक भारम-प्रालि हो। इसलिप मास्मासे मिम ऐसे दूसरे माक माननेको बारंबारको मासे व नित हो और एक निनम्मरूपमें रशिदे, पिस रिस समस्त सरि पम्पसे तुझे अपने रिगोचर होगी । तत्सम्बरप सत्पमें कहे हए मर्गका मी पर तत्त, प्रमा सत्यानियोंन कहा ३, फिस्नु उपयोगपूर्वक उसे पिमें उतारना कठिन है। यह मार्ग जुगा, भार उस समय भी पुरा मात्र कपनमानी जैसा प्रवे रे बदमा नहीं, इसलिये जगह जगह वापर क्या पूछता है। स्पोकि उस भभात अप जगह जगहमे प्रास नहीं हो सकता। मरे पका संतिम वर्ष -रे मुमभु ! यम, नियम मारियो साधन श्योंने कहा उपरोळ अपसे निप्पस यरेंगे पायात मी नही है। पोंकि वे मी सिमा कारण पिये दीकर ३। परण इस प्रकार है-विसमे भाममान ए सकेमा पात्रता प्राप होना लिये, और निममें भीमद् रामचन्द्र [पत्र ५४ उसमें स्पिति हो पैसा पोम्पता मनेके मिये इम कारोंका उपदेश किया है। इस कारण वापानाने इस हेतसे ये सापन को परम्त पावको समासमें एक साथ फेर हो जानेसे प उन सापनोंमें ही बाक या, वपना उसने उन साधनोंको मा अमिनिवेश परिणामसे प्राण किया । मिस प्रकार वामको गठसे कर दिखाया जाता है, उसी तय तापधानियोंने इस तलका सार का।' - -- ५४० पाणीचा, बाबण बा १५ सोम १९५१ 'बालपमेय वया पुवालस्पामे इत्रिम विकार निशेष नाफा होता है, इसका क्या कारण होना पादिये। ऐसा गो मिथा। उसके लिये संक्षेपमें इस तप विचारमा योग्य है। उत्तर ---पोन्पो कमसे बनस्पा पता जाता है त्यों मो इन्द्रिम-बम मी मावा है तपा उस यसको निकारके परमभूत निमित मिलते है, और पूर्व भवमें बसे विकारके संस्कार गते गाये है। इस कारण या निमित्त वादि भोगको पाकर विशेप परिणामयुक्त होता है। जिस तरा बोच तपारूप कारण पाकर प्रसार परिणमता है, उसी तण पूर्वके बागमत संस्कामोंका कमसे विशेषाकार परिणमन होता है। ५४९ पपाणीवा मन मुटी ९गुरु १५१ निमितपूर्वक रिसे दस होता है निमिपूर्वक लिसे शोक होता है, निमिपूर्वक मिसे इन्त्रिप- मम्प लिपपके प्रति नाकर्षण होता है निमिपूर्वक विसे इन्द्रियके प्रति विषयोंमें देष होता है निमिपूर्णफ मिसे उत्कर्ष वाता है निमितपूर्णक ही मिसे कमाय उत्पम होती है, ऐसे गोको फ्या- शक्ति उन सब निमित्तवासी नोंघ संग त्याग करना योग्य है और निस्यप्रति सम्संग करमा उस्ति समग म मिससे उस प्रकारके निमिचसे दूर राना पोम्प है। प्रतिषण प्रस्पेक प्रसंगपर और प्रत्येक निमित बपना निज दशाके प्रति उपयोग रखना योग्य है। भाबतक सर्वमानपूर्वक धमा मांगता है। ५४२ मनुमन्यात प्रथमेसे नाममानजीले प्रति समुम्देवका कहा हमा यो उपदेश प्रमालिका पप बास्तविक है। पारुप निर्षिकम्प और वर निवतस्मसे ममिम शानके सिाय स एम दर करनेका बम्य कोई उपाय बानी-पुरमन नही जाना। ५४३ राणपुर (रमतीमा) मछ मदार भौम १९५१ मंतिम पत्रमें मान लिने पेज पर सो गुम गया माम होता है। प्रक्षेपमें निम लिक्षित उत्तरप पिचर करना । (१) बम्ब इम्प समार-परिणामी होनेसे निपिप करे गये है। परमास ये ब्रम्प भी पर ५४५] विदिप पत्र मादि सपा-२ौ वर्ष १६० सहिप । पाझार नपसे परमा, पुष्ट और सहाय गोत्र सक्रिय है, पोंछ रे भन्यो-माइन, स्परा मदिसे एक परिम्पको वह संकर होते हैं। नष्ट होना-विबस होना-पह पावत् पुष्टके परन एका धर्महाद.. ..परमाठि गावादिका पलमा और स्कषका पिस गाना कहा है। ठि पत्र) ५४४ पपुर, मासोब सदी २ मुझ. १९५१ कुछ मी बने तो नहीं मानार्थको चर्चा होगी से यहाँ राना माना और काग आदिका सम्मान करना योग्य है। चार वो जैनदर्शनके तिप्प दूसरे दर्शनको साम्या होती हो तो उसे मो विचारक टिपे मना करमा गोम्प है। ५४५ श्रोसमात मालोज सुदी १९५१ सत्यसबपी उपदमा सार पलको पयार्प सरूपसे जैसे गालना-अनुमब करना- उसे उसी तय करना एसम्प है। सत्र दो प्रकारका है-एक परमार्प सप्प और सय म्पएर सय । परमार्य सम्प अर्थात् जानाके मिाय इसरा कोई पदार्थ वाना नहीं हो सकता, ऐसा नि पप सनतकर मारा बोलनमें म्पहारसे देह, बी, पुत्र मित्र, पन, पम्प, गृह वादि रस्तुओंके सबप बोटनके पहिले एक आमाका छोरर मा कुउ मा मेरा नही है-पह उपयोग राना पाहिये । जम्प माफ सबमें बाएते समप उस बारनाने गाति लिंग और उस प्रकारक बौरवारिक भेद म हलपर मौकेरठ म्पबहारनपसे प्रमोउनके लिये ही उसे सोधित किया जाता है--इस प्रकार उपयागपूषक मोठा गाय तो वह पारमार्षिक मापा है ऐसा समाना चाहिये। असे कोई मनुप सपनो भारोपित दोको परकी पौध पुत्रको अपना मन्य पदाध बिस मनय बात करता हो, उस समय स्पररूपसे उन सब पगोसे पोजनेपास में मिम, और रे मेरे मही इस प्रकार बोलने काटेको समापसे मान हो तो पर सप कदा गाता। विस प्रघर कोई प्रेपकार मनिक गणा और पेटमा एनाकानन करता हा, ये दोनों मामा , और केजर भेगिकके माय बरेशास हो उनका तपाबी, पुत्र भन, गप्प गएका सरप था, इस बात के उपमें रसनेके पपात् दोसने प्रहधि करे-पही परमार्प सप है। महार सपके मापे शिना परमार्पसप्प सपना बोटमा नही हो सकता। इसरिये पहा सत्य निम प्रचारस जानना चाहिये म्पबार सप-गिस प्रकारसे पशुध सहर देसन, जनुपरनस, भान करनेसे बरा संचनस में अनुमा चापागे, उसी प्रकारस पापावप्पास पस्तुध सरूप घने और उस प्रसगपर पचन बोउन माम म्पहार सय है। जैसे किसी ने किसी म्नुपध स्पट फोन बंगठमें भिके गाए बरे देश हो, और हिसार स्नेपर उसी वर पापप्प पचन होत देना, या ४१८ [Art मीम रामचन म्यमार सत्य है। इसमें मी यदि किसी प्राणीके प्राणों का नाश होता हो, और उन्मस्तासे पचन मोम गया हो-पपपिए वचन सत्य हो हो 1-सा मी या वसपके ही समान है, ऐसा मानकर प्राधि करना पाहिये । यो सस्पसे विपरीत हो उसे वसस्प ना पाता है। कोष मान, माया, सोम, हास्प, रसि बरति शोक, भय गुम पे बहाम वादिसे होबोटे गावे होपातप कोष बादि मोइनायक होता है। उसका स्पिति एससे समस्त कसि वधिक गत् सकर कोकाकोल सागरको है । इस कर्मके सप हुए बिना बातावरण वादि कर्म सम्पूर्णरूपसे क्षय माही को सकते । पपपि सिदान्त पहिबानारण मारकर्मीको गिनाया है, परन्तु इस कर्मको माप परिक है, क्योंकि ससारके महमूत राग-पका या मूलस्थान है इसलिये स्सारमें भ्रमण करनेमें इसी कर्मकी मुन्यता है । इस प्रकार मोहनीय कर्मको प्रस्तारे फिर भी उसका बय करना सरमौ । अर्थात् जैसे पेनाप कर्म भोगे बिना निकर नहीं होता सो बात इस कर्मके विषयमें नहीं है। मोहनीय कर्मको प्रतिदप क्रोध, मान, माया और मेम बा िकपाय तपा नोकपापका अनुमसे समा, ममता, निरमिमानता, सरम्ता अदमता, और सतोष मादिको विपक्ष भानमामोंसे, वर्षात के विचार करनेमासे उपर बताईई कवाय निफर की जा सकती। नोकरम्प भी विचार करनेसे क्षय की जा सकती है। भर्पात् उसके किये गाय कुछ नही करना पाता । ' मुनि' या नाम मी इस पूर्पोळ रीतिसे विचार कर पचन बोम्नेसे ही सप है। प्राप करके प्रपोमनके बिमा मही बोसनेका नाम ही मुनिफ्ना है। रग रेप और बहानके बिना पपास्पित बस्तुका स्वस्म करवे गए या बोलते हुए मी मुनियना-मौलमान-समाना चाहिये । पूर्व तीर्थकर वादि मारमार्गाने इसी तय विचार कर मौन पारण दिया था। बार मग सारे बाप पर्प मौन धारण करनेवाले भगनाम् बार प्रभुने इसी प्रकार के उत्तर विचारपूर्वक वारमार्मेस फिरा फिराकर मोहनीय कर्मक संबपको मिल बाहर करके केरमानदर्शन प्रगट किपा पा। भारमा चार करे तो सप योजना हुआ कठिन ना। पर सप-मापा बनेकपार बोम्ने माती है कि परमाध सम्प बोसनेमें नहीं बापा इसछिपे इस बीबको संसारका भमम मिता मही है। सम्पत्र होनो बार बम्पाससे परमार्थ सप योग जा सकता है और बादमें कोप अम्पासपूर्वक लामाविक उपयोग या करता है। मसपके बोठे बिना मापा मही सकता । निवासपात करमेय मी असाप ही समाश होता है । हे रस्तान सिमानेको भी बसप जानमा पाहिये । सम्मान मानवादि मारनासे वाम-प्रताप करने जैसा होगा बनाना उसे भी असत्प समाना चाहिये। कमा सम्पम्दान प्राप्त हो तो ही सम्पूर्णहपसे परमार्थ सम्प पचम बाठा पा सकता पर्यात् ता हा आमासे मम्प फापस मिलनप उपपोगोनेसे अपनी प्राति हो सकती है। पदिई पोलिस तत यो पा गया है, तो उसका कारण पानमें रखकर पदिकई बोडे तोप सम्पदा समय जाप । म्पहार स्पो मी दो माग हो समते-एक सपा म्पबहार सबौर स्रा देश पत्र हर सप । निथप सम्पर उपयोग पर प्रिय भर्यात गो पचम स्पो अपना मिसके मनसे पत्र ५४ ५०] विविध पत्र मादि संग्रह-२बावर्ष बोल गया हो उसे प्रीतिकर हो, पप्प और गुणकारी हो, इसी तयके सत्य वचन मोहनेवाला प्राय सर्प विरति त्यागी हो सकता है। संसRके उपर मात्र न रसनेवाला होनेपर भी पूर्णकर्मसे अयना किसी सो कारणसे स्सारमें गनेमा गृहस्पको एक देशसे सत्य बचन बोलने का नियम रसना योम्प है। पा मुख्यरूपसे इस सरी–मनुप्पसबभी (न्यासबपी ), पलुसमी (गायसवमी ), भूमिसममी ( पृप्पीसमधी), मूठी गवाही, और नीको वर्षात् मरोसे-विलाससे रसने योग्य दिये हुए दम्य वादि पदार्थको पापिस मंगा सेना, उसके बारेमें इन्कार कर देना-ये पाप स्पूत भेद है। इन पचनोंके मोरसे समय परमार्प सपके उपर ध्यान रखकर यथास्थित धर्षास् जिस प्रकारसे वस्तुओं का स्वम्म यथार्थ हो उसी तय कानेका, एकदेश प्रत धारण करनेबाझेको कमश्य नियम करना योग्य है। इस को हुए सस्यो लिपपमें उपदेशको विचार कर उस क्रममें जाना हो ठाभदायक है। ५४६ एवमूत पिसे अनुसूत्र स्थिति कर । गुसूत्र पिसे एवमूत स्थिति कर । नैगम ररिसे एमभूत प्राप्ति कर । एवम्त पहिसे नैगम ममुर कर । संग्रह रशिसे एषभूत हो । एषभूत घरिस सपा विमुद कर । म्यभार पिसे एवम्तके प्रति बा । एकभूत ररिसे म्यवहारको निति कर । शब्द परिसे एपमतके प्रति वा । एवमत ठिसे शम्द निर्विकल्प कर । सममिन पिस एवमूत पक्रोकन कर । एवमूत पिसे सममिस स्थिति कर । एषभूत रशिसे एवमूव हो । एषमूत स्थितिसे एवंमत टिको शमन कर । ति पति शांति । ५४७ मैं बस गुद पतन्यस्वरूप सहर निब बनुमक्स्सस्प है। मात्र म्पबार परिसे इस मचनका बा ।। परमार्पसे तो केस में उस बचनस म्पनित मूह बर्यरूप है। तुम्हरेसे जगत् मिम । वमिमा भिमामिम । मिम, भमिम मिमामिम यह अबकाश-स्वमपस महीं। म्पपहार पिसे ही उसका निरमण करते है। -भगत् मरमें मासमान होनेस अभिम है परन्तु अगत् गगत्सरूप है । मैं निबस्पाप, इस घरण गगत् मेरेसे सर्वथा मिम । उन दोनों घरियोंसे जगत् मरस मिमामिल है। पुर निर्विकम्पबतम्य . भीम पचन्द्र पर ५४८ ५४९, ५५ ,५५१,१५१ पई, वसोब सुदी १२ सोम १९५१ देसत यूसी टळे तो सर दुम्सनो पप वाय- ऐसा स्परा अनुभव होता है, ऐसा होनेपर मी उसी 'साफ दिखाई देनमाली भूस के प्रवाहमें ही गौष बहा रहा ना रहा है। ऐस जीनोंको इस धगत्में क्या कोई ऐसा माघRT: मिस मापारसे- आयसे-पा प्रवाहमें म बो। ५४९ गई, वासोग मुदौ १२ १९५१ बात र्शन करता है कि वामा असग । निमदर्शन मी करता परमार्पनयसे वामा मग हारे। इस पांगताका सिर होना–परिणत दोना-पा मोश्च । प्राय करके उस प्रकारको साधात् सगता सिब होनी क्समबर और इसलिये माना-पुरमोंने मिसे सब स स करमेको इम है ऐसे मुमुमुको ससंगकी निस्प । उपासना करनी चाहिये ऐसा बो का है या अस्पत सस्प है। ५५० बम्बई पासोन मुदी ११ भौम १९५१ समस्त प्राप करके पर-कपा और पर-तिमें बहा पण माया, उसमें राकर स्थिरता कासि प्रास हो। एसे वमन्य मनुष्पमाको एक समय मी पर-पिसे जाने देना पोम्प मी, और कुछ भी पैसा दमा करता है, उसका उपाप विशेषरूपसे पोजना चाहिये । जामी-पुरुपका निधप होकर भवर्भव न ये तो बाम-प्राप्ति सपा मुग्म है- पुकार पुकार कर कर गये। फिर मा म माम्म गेग क्यों भूमते । -इस प्ररबानी बर्थ मासोग मुदी १३, १.५१ करने पोम्य कहा हो र विस्मरण न हो माप, इतना उपयोग करके क्रमपूर्फ मी उसमें बस परिणति करमा पोम्प है। मुमभु नामें स्पाग पैरमप, उपशम और मफिके सहा बमानमप लिप बिना भाम-शा कैसे बारे! किन्त पितासे प्रमासे यह बात वित्त हो जाती है। कम्प मामार यी ३ र १९५१ बनादिस किमान सम्पास पल बा है उससे पैरम्प उपशम मादि मानों की परिणनि एक महीरो सपना अपना दोनी पनि पातरि मी निरन्तर उन मायके प्रति य रस नेस सिरिजम्य दोहै। परिससमागमन याग न तो मार सि प्रकार से रिंगत हो उस प्रसार ग्राम पर मादिको उपासना करमी सदशानन परिचप करना योग्य है। सब कार्पोको ५५५, ५५४ ५५५, ५५५] विविध पत्र मादि संप्रह-रखावर्ष अपम भूमिका ही कठिन होती है, तो फिर बनतका से नम्पस्त ऐसी ममता के लिये पैसा हो तो इसमें कोई भापर्य नहीं । सागरमस्वरूपसे प्रणाम । मोहमयौ, बासोम बदी ११, १९५१ 'समग्या ते शमाई रमा' तपा 'समम्पा त समाई गपा'—इन वाक्यों का क्या कुछ भिम अर्थ होता है । तथा दोनोंमें कौनसा वास्प विशेपार्यका गायक मागम हाता है, तथा समाने योग्य क्या है ? बार शान्त किसे फरना चाहिय' तथा समुपय वाक्यका एक परमार्थ क्या है। यह रिचार करने योम्पहै-विशेषरूपसे विचार करने योग्य है। आर जो विचारमें बाये तथा विचार करनेस उन पास्पोका विशेष परमार्य सम माया हो तो उसे पिसना बने तो मिसना । ५५४ यो मुसकी इच्छा न करता हो वह या तो नास्तिक है या सियो अपना ना। दु सके नाश करनेकी सब गोत्र एडा करते हैं। दुमका मात्पतिक प्रभाव कैसे हो ! उसे म बतानेसे दुस उत्पन होना संमग । । उम मार्गको दुलसे छुपानेका उपाय बीच समतता है। जन्म, सरा, मरण या मुरूपरुमसे हम है। उसका पार कर्म है। कर्मका बीर राग-पहै। अया उसके निम्न पाँच कारण- मिप्यार, अविरति, प्रमा, काय, योग । पहिले कारणका नमार होनेपर दूसरेका अमात्र, फिर वोसोका, सिर चीपेफा, और अन्त में पाँच कारणका अभाव होता है, या ममात्र होने का क्रम है। मिप्पा, मुरूप मोइ है। बाविरति गीण मोह। प्रमाद और पाया अतिरतिमें बत हो सकता है । पोग पारीपनेस उत्पन होता है। चाके माश हो जानेक बार मी पूर्व तसे पोग हो सकता है। । ५५६ बमई, भासोर १०५१ सब गोको अप्रिय होनेपर भी निम दुमका मनुमा करना पाता है, पदुम समारण होना चाहिये । इस भूमिकासे मुम्पनया रिचारपान विचारगी उरित होती है, और उसारसे कमसे मामा कर्म परटोर, मोश भारि मारोगा सरप सिर मा हो ऐमा मास arel बर्तमानमें जो अपनी पमानता है, तो भूतसमें मी उसी पमानत्य पानी दिप और मपिप्पमें मी पमा होना चाहिये । इस प्रकार के विर बाप मुमु गोरको परना भीमद् सपाद [पत्र ५० ५.८ ५.९ उक्ति है। किसी मी पस्तुका पून-पयात् पम्तिव म हो तो उस अस्तित्व मप्पमें भी नही होता- या नुमच निधार करनेसे होता है। बस्तु सर्वथा उत्पति सपना या माश नही हाता-उसका वस्तिन सका है Rat- परिणाम मा करता पस्तुसमें परिवर्तन नहीं होता यह निमका गोलमिमत है, म विचारने पोम्प है। पदर्शनसमुचप कुछ कुछ गहन है वो मी फिर शिरसे विचार करनेसे उसका पत पुग मोध होगा। मों म्यों पिकी मुदि और स्थिरता ती त्यो त्यो हानीक पचनोका निधन पपापोप पतिसे हो सकता है। संधानका फल मी पास्म-स्थिरता होना ही है, ऐसा पतिराग पुरुषोंने रोका हैमरमपंत सत्य है। ५५७ निर्माणमार्ग बाम बगो पर है, इसमें सशप महो । ममी पाकिस, सुरके माप किना उस मार्गकी सोम करमा वमबी ऐसा बारबार दिखाई देता है। मा होमी, जितु यासहरु चरण वामपपूर्वक बिसे बाप-बीचको पानि हो, ऐसे पुरुपको मी सारके समागमका नित्य बाराम फरमा पारिप । जगत्के प्रमाको देसनेसे ऐसा माम पता से समागम और मात्रयके बिना निरास बोषका स्थिर राना टिन । स्पको मिसन आप किया और बस्यको न्स किया ऐसहानी-पुस्पोका बायकारक बनत पे पौर्य-बाणास पा जा सकना समय नहीं। माती एक पर भी पीछे नही मिती और मा वमूम्य तो फिर समस्त बाम स्पितिकी तो बात ही क्या है। एक पका मी दोन उपयोग या एक अमूल्य कौस्तुम सो मेके बफेला मी विशेष निरफ है, तो फिर ऐसौ साठ पकी एक पदाका नि उपयोग करनेसे कितनी हानि होनी चाहिये । इसी तय एक दिन एक पट्र एक मास एक पर्प और बनुक्रमस समस्त भाइ-स्पिविका होन उपयोग यह कितनी हानि भार कितने मधेपन कारण होना समय है या विचारपसे करनेसे तुरत बीमा सकेगा। पुष और मानन्द सब प्राणिया व बालो सुन सालों बौर सम गोको निरन्तर प्रिय फिर मी नेहास गौर वानन्दको मोगते है इसका क्या कारण ऐना चाहिम ! तो उत्तर मिता किमाम वौर उसके द्वारा मिदगीका नि उपयोग होने पर रोकनेक शिय प्रत्येक प्राणीको इनहोनी चाहिये । परन्तु किस साप !
पत्र ५६ ] विविध पत्र मादि सपा-२वा वर्ष - ५६० दिन पुरुपोंकी बर्मुसारि हो गई है, उन पुरुपोंको भी प्राचीतयगने सतत मागविरूप ही उपदेश किया है पोंकि बनतकारके वप्पासयुक्त पदार्योका वो सग यता है, हम गाने किस प्रएिको वाकर्पित करणे, या मय रसना उचित है। बब ऐसी मूमिका मी इस प्रकार उपदेश Pया गया है तो फिर निसको विचार-दशा ह ऐसे मुमुक्षु गोलको सतत जागति रसना योग्य है, ऐसा न कहा गया हो, वो मी यह स्पष्ट समझा जा सकता है कि मुमुसु बीचको निस विस प्रकारसे पर-अभ्यास होने योम्प पदार्थ बादिका त्याग हो, उस उस प्रकारस बवश्य करमा उचित है । यपि धारम परिमाका त्याग रयूळ दिसाई देता है, फिर भी मतर्मुसात्तिका हेतु होनेसे बारमार उसके त्यागका ही उपदेश किया है। ।
। - २९वाँ वर्ष ५६१ बई, कार्तिक १९५२ बारमारपको CERHIT FERI नाम समझना है। तया उससे अन्य विकल्पसे वित उपपेगर FAT माम शान्त समारे। पस्तुत: दामों एक। सामा समस समस उपयोग निजतापमें समा गया, और बारमा सभापम्प हो गई-पइ समनीने भाई सा' इस प्रथम बाम्पका वर्ष । अन्य पापके सपोरगमे मो अभ्यास हो या पा, वौर उस पम्पासमें गो वहमान मान रस्मा या या अम्पासरूप अहंभाव शान्त हा गपा-यह 'सममीने धमाई गया' इस मरे पास्यका वर्ष । पर्यापान्तरसे इनका मिम मर्परा सकता है। वास्तवमें तो दोनों बाप्पोका एक ही परमार्थ रिचार करने पाम्प है। रिस सम समन्स मिया उम सबमे मेरा', 'तेरा' स्पादि कमाव-ममत्वभान-शान्त पर दिया । स्पोकि सा काई भी मिजस्वमाव देखा नहीं गया और मस्समाषको तो पचिप अम्मानस्वरूप सपा मिनीसा इसदिय ब कुछ ठसामें समाविष्ट हो गया। वामा साप पर पदार्पमें जा मिर मान्यता थी, उसे र करके परमापसे मोलभाव वा । सपा पाणीदारा पा इसनपा कपम करनेरुपम्पबहार, पचन वादि पोगके नेतफ कपित् या मा किन्तु भारमासे यह मरा यह किम्प सर्वथा त हा गया-सा से पवित्प मानुभव गोगा परमें मानता हो गई। पालो दाम्प जो सोक-मायाम म्पयन हुए है के माम-मापासबापे । जो उपर पा तानुसार रिसमे शान्त मही किपा प समझा मी नदी-इस तर इस बापका सारभूत To अपरा प्रितने आमे बिमने शात किया उतन दी बशसि समहा इतना मिम अपदो सकता। फिर भी मुम्प में ही उपयोग हा उचित है। मतकापसे पम मियम शम्यासोस्न मार्म करनेपर मी समझ लेना और पास्त करना म मा वामा पापा नही और उसमे परिममगकी नितिनही। जा मयने और शान्त पामेका एकीकरण को एसा मत्र-पदमें है-उसम परिममण ना साप । सदामा रियो रिना गोमे उस पामार्गको दाना नही और पानमेके प्रतिरबाट बगुसग समर मर पिचारका निरा या मदी विससे सपना और गत कामा इन नो मरम ममा-पाधप प्रसिब है। पर भाम पर 4 उप उपरयो भूमिकाकी उपाममा करे वो गौर समसार शास्त माय, म मरेर महा।
पर ५५२ ५५१, ५९४ ५९.] विविध पत्र मादि संग्रह-२९पौष ४७५ मनत बानी-पुरुषोंका अनुभव किया हुमा यह शामत गम, माक्षमार्ग गौरके छझमें नही खासा, इम्से उत्पन ए सेसहित मार्यको भी यहाँ शान्स करते हैं। ससग सद्विचारसे शान्त करनेतक के समस्त पद बस्मत सस्प है, मुगम है, मगोचर है, सहव है और हरमित ५६२ बई कार्तिक सुती ३ सोम १०५२ पीपदान्तमें निमपित मुमनु बीवका उण तथा प्राविशारा निहापित सम्पति जीवका क्षण मनन करने योग्य है ( यदि उस प्रकारका याग न हो तो पाचने योग्य है) विपरपसे मनन करने योग्य है-मात्मामें परिणमाने योग्य है। अपने क्षपोपशम-वळको कम बानकर, मई ममता वादिके पराभव होनेके हिपे नित्य अपनी म्यूनता देना चाहिये -विशेप सग प्रस्गको कम करना चाहिये। । ५६३ पई कार्तिक मुली १३ गुरु १०५२ (१)मात्म-तभूत सगके सिवाय मुमुक्षु गोरको सर्वसगका घटना ही योग्य । क्योंकि उसके 'बिना परमार्पका बारित होना कठिन है । और उस कारण प्राबिनम या म्यबहार-अम्मसपमरूप साधुत उपदेश किया है । सहयात्मस्खलए (२)तर्छश्यको तय हास्में जो पति बर्तन फरता हुई दिखाई देती है मह उपकारक है और यह ति क्रमपूर्वक परमार्थको यथार्थतामें विशेष उपकारक होती है। हमें सुदरासमाके प्रय अथवा मीयोगवासिष्ठ बाँचना । भांसीमाग पही। १०१ १८९५ (१) निशदिन नैनमें नीद न आय, नर तपरि नारापन पाये । -सुरासनी ५६४ यमई मगसिर मुदी १० मग १९२ निस मिस प्रवरसे परदम्य (बस्तु)क कार्यको सम्पता हो नियके दोपरेसनेमें सक्ष ये, र ससमागम सत्याबमें मती हुई परिणतिमे परम भदि रहा फरे उम प्रकारका काममात्र करते ए तया बामौके बपोका विचार करनेसे शा-विशेष प्राप्त करते हुए या पथार्थ समात्रिको योम्पदा, एसा अझ रसना-पह कहा था। शुभेम, विचार दान [पारि सब भूमिश्चत्रामें सर्वमंगका परियाग बबन उपकारी, पर समझकर पानी-पुरुषाने अनगारपा निमाण किया है। पपपि परमाने मबमग-परियाग पपार्य बोध होमेपर प्राप्त होना समय है यह गानत दुए मौ यदि निस्य समगम ही निवास होता भीम रासस [पत्र ५६॥ ५९० ५५८ ५५९ पैसा समय प्राप्त हो सकता है, ऐसा बानकर पानी-पुरुषोंने सामान्य प्रतिसे नाम सर्वसग-परित्यागका उपदेश दिया है, मिस नितिक संयोगसे मुमेभावान गौत्र गुरु सपम्प और ससानको यथा- योग्य उपासना कर पथार्थ बोपको प्रास करे। ५६६ बर्मा पौष १६ व १९५२ दो मिनिवेशों के मार्ग-प्रतिबंधक बनेसे चौब मिष्याला त्याग महीं कर सकता । मे वमिनिबेच दो प्रकारके -एक किक और दूसरा शात्रीप | झम झमसे सरसमागमो समो गसे बीच यदि उस ममिनिषेशको छोड़ दे तो मिपालका त्याग होता है-स प्रकार हामी पुस्पोंसे पाच वाविवारा बारम्बार उपदेश दिये जानेपर मी पांच उसे मेमने के प्रति क्यों उपेक्षित होता है। यह बात विचारने पोपी। ५६७ सब ए मात्र मस सपोग (संघ) है, ऐसा शानक्त तकमे बना है। समस्त बानी-पुरुषोंने ऐसा देसा है।मम्पोग मुस्यरूपसे तयसे कया है--मंतरसंबपी बीर बामसपा । वंतर्सपोगका विचार होने के लिए बारमाको बाध संयोगश्च मपरिचय करमा चाहिपे, मिस मपरिभपको सपरमार्थ इस पानी-पुरोने भी की है। ५६८ अंदापान सपा दो पण, भो नवि माय पमायो रे म्य वस रपम दे पामे संयम ठान भो नापो रे । मापी है, गायो, भसे पीर भगत् गुरु गायो । ५६९ पर्ण पौष मुदौ ८ भौम १९५२ मात्माक सिवाय मिस मिस प्रकारसे जीने शाम मा पता करके स्माता मान मी, यह सब बागीय अमिनिवेश है। साता तो र महार्ग, और ससमभामका संयोग प्राप्त हो गया है, उस पोगमें मी स्वताके निर्वाह के लिए शावके किसी एक वचनको गो बापतके समान बताता है सपा शासको मुम्स साधन ऐसे ससमागमके समान पाता । चपला उसपर उससे मी अधिक मार देता है उस भाव मी मप्रशस्त माय बमिनिदेश। १मा मममम भी पाबमा पुल होनेस मी या प्रसार मान नहीं मा दो और प्रापछि उपमये प्रास वा।
५.१ ५.२] विधिप पर मादि संपा-२९षौ वर्ष ४७ . मामाके समझने के लिए शाब उपकारी है, और ये मी सन्द रहिस पुस्यों को हरा है- इसना पक्ष रखकर यदि सशामका विचार किया गाय तो पर शासीय मिनिवेश गिने जाने योम्प महीहै। सक्षेपसे ही लिखा है। मोहमपी क्षेत्रसमधी ठपाविका परित्याग करनेके यमी बार माहाने मौर दस दिन बाकी है, और उसका परिणाम होना समप है। दूसरे क्षेत्रमें उपानि (म्यापार) करनेके वमिपापसे मोहमयी क्षेत्रकी उपाधिके स्पाग करनेका विचार या करता है, यह बात नहीं है। परन्तु जबतक सर्मसंग-परिमागरूप योगका निराकरण न हो, तबतक वो गृहाम्रम ये, उस गृहाम्रममें काग म्पतीत करनेके लिपपमें विचार करमा चाहिये क्षेत्रका विचार करना चाहिये मिस म्यवहारमें यमाहै, उस म्पहारका विचार करना चाहिये । क्योंकि पूर्वापर अरिरोष मात्र म हो तो ग्रना कठिन है। ५७१ मू- स्थापना मुर- ब्रममहण ध्यान योगबस निय वारि सम्प्रदाय निरुपण भू स्थापना मुस सौदर्शन अविरोध योगबल स्वायु-स्थिति मारमास निद्राका चय ५७२ मारका मय बासनका जय पासपम निनापदिए बामप्यान बिनोपरिप्ट वामप्यान किस तर हो सकता है! बिनोपरिट छान अनुसार प्मान सम्ता है, इसठिये धानका तारतम्य चाहिये । स्पा विचार करते हुए, स्या मानते हुए स्पा दया रते हुए चौपा गुणस्थानक या नावा! किसके द्वारा चौपे गुणम्पानम्मे तेएवं गुणस्थानमें आते हैं।
-- भीमन् गायन [१५. ५.४५.५ ५७३ समई, पोप कशी १०५२ योग मसल ने जिन कमा, परमात रिदिदाम्मी । नरपर समन भागमा, आवमराम ए सास्ती रे॥ भीभीपाउराम 1 ५७४ गृह बार प्रतिक पोगसे उपयोगका रिप बस गहना संभव है, एसा बानकर परम पुरुष सर्वसंग-परिस्पागका उपदेशश करते हुए। ५७५ बमा पारी २, १९५२ । सब मकारक भयक निवास स्पानरूप इस संसारमें माम एक पराम्प की ममप में मान् मुनियोंका मी जो परम्प-रच्या प्रम्स होनी दुठम है, मेराग्य-शा तो पाप मि ग्रामासम ही यती थी ऐसे श्रीमहावीर अपम आदि पुरुप भी पागको प्रहण करके पर जोरकर चठे गये पाही स्यागको उहपता बताई गई। गबतक गृहस्थ यानि पत्रहार ये तबतक बारमशान म हो वत्रा निसे मामबाल ऐ उसे गृहस्प बादि म्यपाल म ए ऐसा नियम नहीं है। वैमा होनेपर भी बानाचे मी परम पुरुषोंने म्पसारके त्यागका उपदेश किया । क्योंकि स्पाग बास्म ऐश्वर्यको स्पर म्पछ करता है। उससे और छोकको उपमारम्व बोनके कारण त्पागको अकर्तव्य-ससे करना चाहिये इसमें सन्देह नही है। निमसरूपमें स्पिति होनेको परमार्प मपम कहा। उस सपमके परमभूत ऐसे क्य निमि- तोको प्राण करनेको म्पबहार संपम कहा है। किसी भी हानी पुरुपो उस सपमका निषेध मही किपा । कित परमार्थकी उपेक्षा (बिना म्स ) से मो म्पाहार संपममें ही परमार्थ स्पमको मान्यता रस्ते, उसका वभिनिवेशा दूर करमेक होमिए उसका म्ममार स्पमका निषेध किया है। किस म्पसार संपममें कुछ मी परमार्पका निमित्त मही-एसा हामी गुरुपाने महीं कहा। परमापक कारणम्न म्पबार सपको मी परमार्थ संपम कहा है। १ श्रीपाम्पसमै निमरो पच इस स्परे हुए है- मासम्ममनी समातिभी रासीरे । निम नवपासी कामे मारमपम हाती ॥ मग उम्ममा नपर समयालो रे । णम ममम्मो बावमधान प्रमानोरे। भा-लिम्प प्रतिमा मस्मि भार बाठ सिमी सम्पूर्णता परम पिचाई यां, उत्तौ ज्य गरी म म परमै । समान्य परिष-रकी बात मनमापानने को मठमात योग्य मामलम समपर मुन माना चाहिये। मतएप इस मारेमानसे ये चमकन पस्ना मी प्रमा।
पत्र ५०६ ५.० ५.८] पिपिप पत्र भादि मंग्रह-२९याँ बर्ष ४१ . प्रारम्ब है', ऐसा मानकर हानी उपाधि करता है, ऐमा माश्म नही हाता । परन्तु परिणतिसे छट नानेपर मी त्याग करते हुए बाम कारण रोकते हैं इसलिये शानी उपाधिसहित दिखाई देता है, फिर मी प उसको निातिके पक्षका निस्प सपन करता है। बर्मा, गैप परी ९ गुरु १०५२ दशामिमानरहित सरपुरपोंका अस्पन भक्तिपूर्वक विकास नमस्कार से पानी-पुरुषोंने बारमार भार[म-परिमाके त्यागको उपना की और फिर फिरसे उस "पागका उपदेश किया है, भार प्राय करफे स्वय मी ऐमा आचरण किया है, इमलिये मुमुक्षु पुरु- पचे वाश्य ही उसका वायता करना चाहिये, इसमें सदेह नहीं है। कौन कौनसे प्रतिववसे गाव बारम्भ-परिमाका स्पाग नही कर सकता, जोर र प्रतिबा किस तरह दूर किया जा सकता है, इस प्रकारसे मुमुसु जीपको अपने पिचमें विशेष विचार अफर उत्पम करके कुछ भी तपाइप फर ठाना योग्य है । पदि से न किया गाय तो उस गौरको मुमुसुता नही है, ऐसा प्राप करा जा सकता है। भारम्भ बीर परिपाका स्पाग होना किस प्रकार का माप इसमा पहले विचार कर, पीछेमे उपरोल विचार पुरको मुमुमु जीवको पाने बस करणमें अवश्य उत्पन्न करना योग्य है। ২৬৩ बाई पाप १३ घरे १९५२ उस्कए सारपिके स्थान यो पाती आपा है उन सरमा मनिष्प मानर विचारवान पुरुष उन्हें छोपर पड दिये हैं अपना प्रारम्भोग्यपे याद उनका नाम उपर्ने एमा मो ताने अगर नपसे उवामीनमापसे उसे प्रारम्पान्य समझकर ही शाबरण किया है और पाग करनेका होला रस्म्या। ५७८ महारमा बुद (गातम ) अण, दारिद्रग रग मार माप इन चारोमा, पक जामदान के गिना भन्प सब उपायोंसे बरेप समाकर, उनका ठरति हेतुन ससारका छोर पर जाने पर। भीम आर्मत जानी-शुरुगन भी इसी उपायरी उपना कार सर सीमा उम उ- पका उप पिाहै । उस मास्मयानका प्राप दुर्गम मार निम्फारण काणाप उन सउने भक्ति-मार्गक्न प्रकार किया है, जो सब मगरमन निम शरणम्प और सुगम।
४८. भीमद् रामद [पा ५.१ ५८ पई, माष सि १९५२ मग बामस्वरूपको ससंगका संपोग मिस्नेपर सबसे मुन्म काना योग्य है, इसमें ईम्पनी है। पानी पुस्पाने बविशयरूपसे यो पर्सगका महास्य करावा पपा है। इसमें विचार पानको किसी तपका विकम्प करना उचित नहीं है। समई पम्न मुदी १, १९५२ समुपसाव बानीका सब पहार परमार्थ मम होता है, तो मी मिस रिन उदप मी मरमाकर प्राधि करेगा, उस दिनको क्यो। न कुमास मुल होनेका सोस उपाय को वाम्बान या याना-पुरुषों का मन - अबतक बागको तपारूम बारमवान महो तम्यक मात्पतिक बनको निति होना समा माही इसमें सर्शप मही है। उस वाचानक नेतक माय मुर्विमान वामान लरूम ' गुपच बाप निरन्तर माम ही करना चाहिये, इसमें संम्प नही है। अब उस बामपका नियोग होता निस्प ही बाम माना भरमा चदिपे। उदपके पासे तपाइप बाबान होने के पूर्व पदि उपदेश कार्य करमा पाता तो Aभारणाम मुमा परमार्थ मार्गके बमुसुरण करने हेतमूत पसे सत्पुरुषको मावि, सपुरमके गुणगान, सहस्पो प्रति प्रमोवभावना और सपुरूषके प्रति भनिरोप भावनाका मेगोको उपदेश देता है जिस तयR मतरका अभिनिवेश रणे और सत्पुरपके पन प्रण करमेकी भामाविरो, पैसा करता है। वर्तमान कामे उस कमी मिशेष हानि होगी, ऐसा समझकर हानी पुरनि स्व कालो दुधमकाम मा और सम प्रत्पप दिखाई देता है। सा कामेिं कम्पबामा है-या मावना ममा बोलको मित्य करनी चाहिये । ५८१ कई फागुन मुदी १० १९५२ समुपसाव (१) में विस्तारपूर्वक पत्र किसना नही ता उससे वित्तमें पैराम्प उपशम मालिक विशष प्रदीत यनेमें सशसोही एक विशेष लाभारम्त निमित समझाकर श्रीसुदरवास पारिके पंपोन पो सो तो दोसे चार तक जिससे नियमित पावना मनासा करने के लिए किसा पा । मौसंववासमा प्रपका वादिन मेर मततक हाम्में सिप अनुप्रेमापूरचार करने के लिए मिलती है। (२) कापाले गनेता मामा (अर्थात् षाम बादि । समग ये ऐसा को भाता है एमभिप्राय प्राप (गत बरडे) तो पपार्य ।।वो मी किसी पुरुष -- पत्र ५८९ ५८५, ५८४] विविध पत्र मादि समर-२९वों वप विशेपमें सर्वपा-सस प्रकारकी—सम्बरून मादि कपायका अभाव होना समा माश्म होता है, जौर उसके समान हो सफनेमें संदेह नहीं होता। उससे कापाके रोनेपर मो कपायरीपना समय है-मात् सर्वथा राग-देपरदित पुरुप हो सकता है। यह पुरुष राग-वेपरमित ह, इस प्रकार सामान्य चीन बाय पेयसे चान सकें, यह सभव नाहीं । परन्तु इससे र पुरुप पायरहित-सम्पूर्ण गौतयग- न हो, ऐसे यमिप्रापको विचारवान सिद्ध नहीं करते। स्पोंकि गाय घेरास मारम-दशाको स्थिति सर्वथा समक्षम वा सके, यह नहीं कहा जा सकता। (२) भीमदरदास्ने बास्मनागम्-दशामें 'स्यतन बंग' कहा है, उसमें विशेष उपासित- परिमातिसे धपीरताका निरूपम किया है- मारे काम कोप मिनि सोम मौह पीसि दारे, इन्द्रीक कवस करी कियो रनपूती । मार्यों महामत्त मन मार्यो माकार मीर, पारे मद मच्छर , ऐसो रन स्वो है। मारी मासा दप्णा सोळ पापिनी सापिनी दोऊ, सबको मार करि निन पर पहली अंदर काव पैसो साधु कोक झपीर, मैरी सामारिके निर्षित हो वो है। नौमुरदास—सूरान बंग ११ कवित ॐ नमः बिन संघ गीतराग समा एमापका वायत क्षय रो सकता है। मानक प्रतिवरक राग-परे। गीतका समूत धर्म है। गौष एक वर्सर सम्पूर्ण दम्प होनेसे उसका शान सामl-सम्पूर्ण है। ५८३ समा-पद बारमार अषण करने पोप बाँचने योग्य, विचार करने योम्प, सक्ष करने योग्य और सानुमा-सित करने योग्य है। ५८४ सहदेव सराव निप गुरु निप्प गुरु उपशममम धर्म श्रीमद् गम्य [पत्र ५८५ ५८६ ५८. सर्वात निय गुरु निर्भप गुरु सियतमहर्म बिनाबामह धर्म नाका स्वरूप नियका ससप धर्मका स्वरूप सम्यक क्रियावर ५८५ ॐनमः प्रश सम्प परमाणु i गुण पर्याप in बेवन ५८६ बाई फागुन मुदा ११ रवि १९५२ भी सद्गुरु प्रसाद यपा शान उत्पन होनेके पहिले ही दिन पौरोको उपदेशकपना यता हो ठन सीबों को मिस प्रकारसे मैराम्प उपसम वौर भकिका सम हो, उस प्रकारसे समागमें बाये गए गायोंको उफ्रेस देना योम्प और जिस तर उन्हें माना प्रकारक बस भाद्रका तपासनपा बेप म्पमा बारिका अमिनिवेश कम हो उस प्रकारसे उपदेश फलीभूत ॥ से बाहमा विचार कर काना पोग्प है कम क्रमसे मीच बिससे पपार्थ मार्गके समुसह ऐसा यथाशति ठपस करना चाहिये । ५८७ बर्मा फागुन गी । सोम १.५२ दापारी पोनपर मी भो निराकरण मानसहित रावे हैं, ऐसे महापुरुषो निकाय ममस्कार हो देहप होनेपर भी परम पानी मुरूपमें सर्व कपाफ्का ममात्र होमा सभत्र है पर नो हमने सिमी सो उस प्रसंगमें अमाप सम्बर्ष पप समपर ही पिसा है। प्रश्न -जगत्बासी नामको गोप नाश हो गानको सार मही परती । बार गा महान् पुरुप है मानते है कि इस महामा पुस्पमें पग-पका ममात्र अपना उपशम रहता है-ऐमा विसकर मापने शका पाकिसे मामा पुरुपको नानी-पुरुष अपना स मुमुक्षु मात्र नाम मेते हैं उसी तर जगत्के बीच भी क्यों नहीं मानत । उदाहरण के लिये मनुप्प वादि प्राणिपोंको रेकर जैसे जगत् पासी गांव मानते है कि पे मनुप्प बादि है उसी तय महामा पुस्प मी ममुप बारको मानतो इन पर ५८८] विविध पत्र मादि संग्रह-२ पाप ५८ पायोको देखने से दोनों ही समनस्मसे जानते है, और प्रस्तुत प्रसगमें ता जाननेमें भेद पाया जाता है, उस मेदके होनेका क्या कारण है, या मुख्यरूपमे विचार करना योग्य है।' उत्तर - मनुष्य आश्किो यो बगवासी नीव बानते हैं ये दैहिक सरपस क्या दैहिक पेशसे ही जानते हैं । एक दूसरेकी मुदामे आकारमें और इन्द्रियोंमें नो मेद है उसे चमु वादि इत्रियोंसे नगत्वाती जौष मान सकते है, और उन नापाक कितने ही अमिप्रापोंको भी जगत्पासी जीन अनुमानस मान सकते है, क्योंकि म उनक मनुमबका विषय है। परन्तु जो शानदशा अथवा वीतराग दशा है, वह मुस्यन्दपसे दाहिक पप तथा दैहिक चेयका विषय नही है-वायतममाका ही गुण है । वौर अतरम्ममात्र बाप नौवोंके वनुमत्रका विषय न होनेसे, तया जिने तपाझप अनुमान भी हो ऐस जगत्वासी बयोंको प्राप करके पैसा सम्कार न होनेसे में जानी अपवा बौतरागको नहीं पहिचान सकते । कोई कोई जीव ही ससमागम सयोगसे, साज गुम कर्मफे उत्यसे और तधारप कुछ सस्कार प्राप्त कर बानी अपना बीवरागको यपाकि पहिचान सकते हैं। फिर भी सची सपी पहिचान सो स मुमुमुताके प्रगट होनेपर तथालप ससमागमसे प्राप्त उपदेशका अबधारण करनेपर, गौर अन्तररम-ति परिणमित होनेपर ही जीव, बानी बया गीतरागको पहिचान सकता है। भगत्यासी वर्षात् नो जगत्तापि नीम में उनकी रपिसे ज्ञानी वयमा भीतरागकी सची सदी पहिचान कासे हो सकती से बन्धकारमें परेर पापको मनुप्प पा नहीं सकती, उसी तय हमें रानेवाले पानी अपना बाँतरागको जगत्-पशि बीच नहीं परिचान सकता। बसे अषकारमें पो हुए पदार्यको देखने मिये प्रकाशकी अपेक्षा रहती ह उसी तरा जगत्-शिबीवोंको धानी अपना बीत रागकी पहिचानके लिये विशेष शुभ सस्कार और ससमागमकी अपेक्षा होमा योग्य । यदि पर स्पोग प्राप्त न हो तो बसे भवफारमें पदामा पाप और भधकार दानों ही एकरूप मासित होते है उनमें भेट नाही मासित होता--उसी रारह तपारप योग बिना हानी अपना भन्म ससारी नावों की एकाकारता मासित होती है-उनम ह आदि चेरास प्राय करके भेद मासित नहीं होता। जा देहषारी सर्व कान और सर्व कपायरहित हो गपाह उस देहधारी महरमाको विकास परममधिसे नमस्कार ! नमस्कार हो ! यह महरमा वहाँ यता, उस दहका, भूमिको परको, मार्गको मासन आ सको नमस्कार हो! नमस्कार ! ५८८ बदई चैत्र मुदी १ मे १९५२ प्रारम्पादयसे सि प्रकारका म्पहार प्रसग यता है उसके प्रति पि रमते हुए स पत्र वादि मिसनेमे अस्पतासे प्रति हाती बैसा अधिक योग्य है—यह अभिप्राय प्राय करके हा करता है। वास्माके वास्तविकतपसे उपकारम्न ऐसे उपरेश करनेमें बानी-पुरुप मध्यभावसे बात न करें, ऐसा प्राय करक ऐना समय है। सिर भी निम दो कारणोंगरा बाना-पुरुष मी उसी प्रकारसे प्रहा करते है । भीम रामचन्द्र [पब ५८ (१) उस उपोषाका निवास पीवमें निस तर परिणमन हो ऐस स्पोगोंमें यह निवास बात न यता हो, वपना उस उपदेशके विस्तारमे करनेपर मौ उसमें उसक म्हण करनेको तपास पोम्पता म हो, तो पानी-पुरुष उन बीगोंको उफश करने में अपमाबसे प्राति करता है। (२) वा वनेको बाप पगार ऐसा उदय हो कि यह उपोश बिाम घोपको परिणम्न होनेमें प्रतिवरस्प हो भला वषारूप कारण के बिना पैसा बर्ताव कर या मुल्प मार्गक निरोधरूप वपया सशयके वरूप होने कारण होता हो तो भी बानी-पुरुष उपदेशमें कम्पमा से हो प्राधिकरता बपना मौन राताहै। (२) ससिंग-परिशपाग कर बसे गामेसे मी बीन उपाधिरहित नहीं होता। क्योंकि मस्तक वर्ष रिणतिर पशि न हो और तथारूप मामि प्राति न हो, तबतक सर्पसंग परिरपाग मी माम मात्र हो शेता है। और से अबसरमें भी मतपरिणतिपर रि देनेका भान चीनको बाना कठिन है। तो फिर ऐसे गृह-म्पसार किक मभिनिवेशपूर्वक बकर अतर्परिणविपर दि रस सकना कितना दु साम्प होना चाहिये उसपर भी विचार करमा योम्प है। तपास न्यबहार गकर गोलको अन्तपरिणविपर कितना बम रमना उपित , मामी चारना चाहिये, और भाप वैसा करना चाहिये । अधिक पा मिले। गितनी अपनी शाकि दो उस स शाहिसे एक ब्य रसकर, मैतिक बभिनिमेश बम्प कर मी गपूर्व निरापरणफ्ना विचई नहीं देता, इसध्येि के बभिमान को इस प्रकार पातको समझाकर मिस प्रकारसे गौर जान दर्शन और पारिश्में सवत गागत हो उसीके करनेमें पति गाना और रात दिन उसी रिवनमें प्राति करना यही विचारणान जीवका कम्य है। और उसके लिये सम्सग, सत्शान और सरस्ता मावि निरगुण उपकारमत है ऐसा चारन उसका मामय करना उचित है। अबतक मीनिक ममिनिषेश बर्षात् प्रप्यादि मेम, तृष्णा दैहिक-मान, पुल, पाति बादिसरी मोर मचा निक्षेप मान हो उस बात पाग न करना हा, बपनी मुविसे-सोमसे-अमुक गम बारिकपा मापइ रमना हो तबतक यौको अपूर्व गुण से उत्तम हो सकता है। उसका विचार सुगम है। इसमें बनिक विध गा सके इस प्रकारका पहाँ उम्प महो। तपा अधिक किसना अपना करना मी किसी किसी प्रसंगमें ही होने देमा योम्म है। तुम्हारा विशेष मिशासासे प्रारम्बोवफ्फा बेदन करते हुए योग सिसा या समता पा उसको अपेशा मी कुछ कुछ उदारणा करके विशेष । लिहा है। समस मेन सर्व क्षेत्र मुदा २ सोम १९५२ रिममें पण मरमें हर्ष और क्षण भरमें शोक हो बारे ऐसे इस म्पहारमें यो शामी पुस सम दघामे रहते है ठमें पर्पत मतिम पम्प मानते और सर मुमुक्षु जी को इसी दशाकी उपासना पामा पदिय ऐमा निथप समझकर परिणति करना योग्य है।
पत्र ५९ ] विषिष पत्र मावि संग्रह-२९षौ बर्ष ५९० वाई, चैत्र सुदी ११, १९५२ सदगुरुपरणाय नमः १निस शानमें देह वादि बभ्यास दूर हो गया है, और दूसरे पदार्थम भासा-ममता नहीं हो, तपा उपयोग निब समावमें परिणमता है, अर्थात् शानस्वरूपताका सेवन करता है, उस बानको 'निरापरण-बान' करना चाहिये। २ सब बालोंको अर्यात् सामान्य मनुष्पोंको बानी-मानीकी वाणीका मेद समझना कठिन है, पह बात यपार्य है। क्योंकि बहुसस गुम्फडानी शिक्षा प्राप्त करके यझिानी भैसा उपदेश करें, तो उसमें बचनकी समानता ऐसनेसे, सामान्य मनुप्प शुष्कहानीको मी जानी मान में, और मद-दशाबाले मुमा जीवोंको मी ठन सपनोंसे भांति हो जाय । परन्तु उए दशावाले मुमुच पुरुषको, पुष्पवानाकी वाणीको शम्दसे कामीको वाणी जैसा समझकर प्राय भांति करमा योग्य नहीं । पोंकि बाशयस, शबानीकी बाणासे बानीकी वाणीकी तुम्ना नहीं होती। द्वानीको वाणी पूर्वापर बविम्द, आत्मार्प-उपदेशक वीर वपूर्ण वर्षका निरूपण करनेवाली होती । वीर बनुमसहित होनेसे पह मारमाको सवस बागृत करती है। शुष्कबानाकी गाणीमें तपारूप गुण नहीं होते। सबसे उतर गुण गो पूर्वापर बनिरोषमात्र १ मा झुकानाको वाणीमें नहीं र सकता, क्योंकि उसे यथास्थित पार्यका दर्शन नहीं होता, भार इस कारण जगह जगह उसकी पाणी फापनासे पुक होती है। इस्पादि नाना प्रकारके भेदोंसे शामी मार शुष्मानीको बाणाको पहिचान उस्कूए मुममुको हो हो सकती है। बानी-पुरुषको तो सहर समासे ही उसकी पहिचान है क्योंकि इसय मानसहित है और मामसहित पुरुपके विमा इस प्रकारके वाशयका उपदेश नहीं दिया जा सकता, इस बातका ग सारही मानता है। पिसे शान बौर भानका भेद समसमें वा गया है उसे बनानी और बानीका मेर सहममें समझमें भा सकता है। जिसका वशान के प्रति मोह शान्त हो गया है ऐसे शाना-पुरुषको शुप्पबामाके पचन किस तय भाति उत्पन्न कर सकते है! हाँ सामान्य गोषोंको वा मदरसा बोर मप्यम- दशाके मुमुक्षुओंको शुकवानाके पचम समानरूप दिसई देनेसे दोनों ही बातोके पचन है, ऐसी मास्ति होना समान है। उप ममुहको प्राय करके पैसा मांति समय नहीं, क्योंकि उसे पानीके रचनको काला बस विशेषहपसे स्थिर हो गया है। पूर्वकालमें मो धनी हो गये हो मोर मात्र ठमको मुस-पामी हो पाको दो हो, पो मी क्तमान कायमें बानी-पुरुष यह बान सकते हैं कि यह पाणी जानी-मुरुपकी है। क्योंकि रात्रि दिवस भेदको तर वानी भीर बानीको वापीमें भाशप मेद होता है, और भारम-दशाके तारतम्पके अनुसार माशपयुक्त पाणी बानी पुस्पको ही निकलती है। माशय उसकी पाणाके उपरसे 'बर्तमान हानी पुरुष'को स्वाभाविक ही परिगोचर होता और कारनेवासे पुस्पी दशाका तरतम्य में माता है। या मो वर्तमान बानी पुस्प' लिखा है, या किसी विशेष प्रभात प्रगटोप-भीमसहित पुरुप .
५4 भीमद् ण्वन्न [पा ५९ सम्बके हो वम लिया है। पानीके चनको परीक्षा पदि सब जीवोका पुराम होतो ता निर्माण मी मुरुम ही हो जाता। ३ मिनागम बानके मति मुन बार पाँच मे कई बानो मे सब है -उपमानाषक नहा है। वि मन पर्यण वामान वर्तमान काम्म म्यान्मुः सरीले माम हवे है, उम उमसे उन बानोंको उपमानापक समझना योग्य नही। ये बान मनुष्य जीवोंको चरित्र पर्याय पिपुर तारतम्पसे उत्पम होते है। वर्तमान काल में यह विशुर तारतम्य प्राप्त होना टेन है। क्योंकि इस प्रत्पश्च सरूम चारित्रमोहनीय वादि प्रकृतियों के विशेप बमसहित प्रानि करता एला देखनमें माता है। सामान्य वारमचारिख भी किसी किसी गौतमें ही एना संभव है। पमे काम्में उस बानाको सम्मि म्पा सी हो बाप तो इसमें कई बापर्य नहीं है। इसम उस हारको उपमानापफ समझना योग्य नहीं। बारमस्वस्मका विचार करते हुए तो उस जानकी करमा असंभक्ता दशर्म नहीं देती। या समी वानोंको पिनिका क्षेत्र मान्मा है तो फिर पनि मन पर्पब मानिाना क्षेत्र बारमा तो इसमें सराप करना कैसे उचित है ! यपि शासक पथास्थित परमार्थमेव रिस प्रकारस म्पाम्पा करते है यह प्याल्या विरोधयुक्त हो सकती है किन्तु परमापसे उस ज्ञानका होना समर । निनगमम उसको जिस प्रकार के बाशयमे पारसा कही होमपान्मा बीर बहानी गाव वाशपके बिना जाने हो जो म्याल्सा करे उन दोनोंमें महान् मेर हो तो इसमें बाधर्य नहीं बार उस मेदक कारण उस शामके लिफ्यमें सदा होना पाय है । परन्तु वारममाएसे देखमेसे पा सगरू स्थान नही। १ काममा मामसे सूक्ष्म दिमाग समप' है। स्पी पाच सूमसे सम्म निमाग 'परमाणु' है, वीर वरूपी पार्षका सम्मसे सूक्ष्म विमा प्रश' है। पे तीनों ही ऐसे सूक्ष्म में किस्मत निर्मम जानकी स्पिति ही उनके सम्पको प्राण कर सकती है। सामापरूमसे ससरी गानाप उपयोग वसम्मात समपाता। उस उपयोग समात्म्समे एक समपका हान संमा नाग। पापा उप- पोग एक-समयबती और शुद्ध हो तो उसमें साक्षात्म्पस समयम्य हान हो सकता है । उस उपपोगका एक- समपरतिष कपप गारिकममासे होता गम्पोंकिरपाय मानके मोगसे उपयोग माता बारिमाम करता है तपा बसम्मात समपतिपको प्राप्त करता है। उम कपाय बाविक मासे उफ्पोगका एक समपतिल होता । वर्षात् पाप वारिक संबधसे उसे असमपात समपर्ममे एफ एक समयको नमा रमेकी सामर्प नही पी उस फयाप बाकसमामे पर एक एक समयको बब्ग करकक्षगाइन करता है। उपयोगका पक-सम्पवर्तित पापरहितफ्ना हकबादी होता है। इसलिये एक समप एक परमाणु और एक प्रवेशका मिसे शान हो उस काम्न प्रगट होता ह ऐमा बोया है, सप है। कपायरीवपके मना केबान होना मभव नही। बौर कपापरहितपनेके बिना उपयोग एक समयको साहात्म्स पर नहीं कर सकता। इनमये याबह एक सम्पको परण करे उस समय अस्पत कपापरहितपना होना चाहियेऔर हो भन्फत कपापका अभाव हो समान होत्य है। सहिये पर कहा है कि एक मपय एक परमाणु मार एक प्रदान जिसे बनुभव हो उस ४८७ . - . पत्र ५९ ] विविध पत्र मादि संग्रह- प्रो वर्ष केवमान प्रगट होता है। गोषको विशेष पुरुषार्थक लिये इस एक सुगम साधनका बानी-पुरुपने उपदेश किया है।समयकी तरह परमाणु मार प्रदेशको सूक्ष्मता होनसे सोनोंको एक साथ प्राण किया गया है। वतबिचारमें प्रवृति करनेके म्पेि बानी-पुरुषोंने बसस्पात पाग कर, उ के बीचका एक यह विषारयोग' मी करा है ऐसा समझना चाहिये। ५ मुमेन्छामे गाकर सर्म फर्मरहितपनेस मिबस्वरूप-रिपति होनेतक वनेक भूमिका है। बोगो बारमाचा जीव हो गये। यार उनमें विस मिस यशसे मागाशा तत्पमई, उस उस दशाके भेदसे उन्नोंने वनक भूमिकामोंका धाराधन किया है। श्रीकबीर मुदरदास बादि साधुबन वामाधी गिने जाने योग्य है और शुभेचासे उपरको भूमिकाओंमें उनकी स्थिति होना समय है। अपत नियस्वरूप स्थितिके लिये उनको मागति भार अनुमत्र भी म्हमें जाता है। इससे विशेष स्पष्ट मभिप्राय हमें देनेकी इच्छा नहीं होती। ६ मानके स्वरूपका विचार कठिमी, भौर श्रीगा उसका एकान्स कोटीसे निश्चय करते है, उसमें यपि उनका नमिनिवेश नगा, परन्तु बैमा उमें मासिन होता है इसरिये ये कहते है। मात्र एकान्त कोगी है और मन-मविप्यका कुछ मी शान किमीको होना समय नहीं ऐसी मान्यता ठीक महीं है। मत-मावस्यका पयार्य हान हो सकता है परन्तु यह किसी बिरडे पुरमोंको हो वीर वा भी मधुर भारिक सारतम्पसे ही होता है। इसलिये यह सदेहरूप भगता है, पोंकि बसी बिनुन चारित्रका तरतमता समानमें नहीं वैसी ही पती है। वर्तमानमें शामवेत्ता मात्र शादोषसे नो फेवमानका वर्ष खाते हैं, या यथाय नही ऐसा यदि श्रीगरको लगता हो तो पा समव है । तपा भूत-भविष्य जाननेका नाम ही केवमान है, पा म्पान्या शासकारने भी मुस्परूपस मही कही । हानके पत्यंत पर होनेको हो बानी-पुरूषोंने केवलान कहा और उस शानमें बारमम्पिति और बारम-समाधि ही मुख्यत कही है। जगत्का शान होना स्पादि यो करा गया है, वह सामान्य माबोंसे अपूर्व विषपका प्राण होना वर्समन नानकर हो कहा गया है पोंकि मगत्के शानके ऊपर विचार करते करते बाम सम्मH समझमें मा सकती है। माहगर महामा श्रीधपम बार के विपपर्मे एकास कोटी में करते हों और उनके माता बर्तिों (*से महापौरस्तामाके दर्शनमें पाँचसौ मुमुक्षुओंन फरमान प्राम किया ) को यो महान कहा है उस केवमानको एकान्त कोटी करते हों तो यह बात किसी तय योम्परे। किन्तु फेवमानका सागर एकांत निपा र तोप वात्माकेही निपट करमेक बराबर है। लोग हाल में जो फेशानकी म्मात्मा करते हैं बह केवम्यानको म्यात्सा लियेषा माश्म होता है, ऐसा उन्हें माता हो तोप मी संमत्र । । क्योंकि वर्तमान प्ररूपणामें मात्र जगत्बान हो केवम्- पानका विषय कहा जाता है|इस प्रकारक सभागानक दिसते समय भनेक प्रकारका बियेप गिोचर होता है। भार उम विरोधोंको साकर उसका समाधाम सिमना हमें तुरत बनना वसभव है। उसमे सपसे ही समाधम शिक्षा है। समाधानका समुहम्पार्भ इस तय है. बामा विस समप मस्पत मुशान-स्थिविध मान करे, उसका नाम मुस्त्यत के शान है । सब प्रकारक रमा-रेपका बमार होनेपर बस्यव धुमशान-स्थिति प्रगट हो सकती। उस - ५८८ भीमद् रामचन्द्र [ पत्र ५९१ ५९२ ५९५ स्थितिम गेम जाना जा सके, मा केपमान वौर पर संग करने पोम्प महो। भौगर मो एकात कोटी करते है,हमी महामारस्वामी के समीपमें यनेवाले मारता पायौ केली पैसों प्रसगामें ही होना सभव है। पगल्के शानका म्स मेकर मो शुद्ध भावान है, यही फेजम्मान है--ऐसा निकल करते हए वात्मशा विशेषमावत सेवन करती है" इस तरह इस मनके सम्मा- धानका सझिम वाशप है। से बमे से अगरफेशानका विचार परकर बिस तय सम्मान हो, से समानका विचार होनेके सिपे पुरुषार्थ करना चाहिये । जगत्के शान होनेको मुल्यार्परुपसे फेरणाम मानना योग्य महीं। मगल्के गांवोंका विशेष मा होने के लिये बारमार जगत्के मानको सायमें छिपा है, और मकुछ कम्पित है, यह बात नहीं है। परन्तु उसके प्रति मिनिवेश करना योग्य नहीं है। इस स्पस्पर विशेष सिनेमा होती है और उसे रोकनी पती है, तो मी संक्षेपमे फिरसे किसते हैं। वारमा से सब प्रकारका अन्य बप्पास र होकर सरिफको तय मामा अस्पत बताका सेवन करे-पही केरमान है, पौर बारम्बार उस रिमागममें जगत्के हानहमसे कहा उस माहाम्पसे पाधि नाव पुस्पामें प्रवृति करें, यही उसका है। ५९१ बम्बई पत्र बदौ ७ वि १९५२ सस्समप्रामक बमाके वासरफर तो विशेष फाफे वारंम परिमासे ति म्यून करनेका बम्पास रहकर ग्निमें पाग-पप वादि परमार्थ-साथमका उपदेश किया है जैसे पंप मॉचमेन परिचय करना चाहिये पोर प्रमत्तमापसे अपने दोपोशा बारम्बार रेसमा हो पोम्प है। ५९२ बम्बई, यी १० रन १९५२ मम्प पुरुपकी रपिम, नग परहार सलाय । दापन पर मम मही, कोम्पबहार पवाय! -विहार दान ५९३ बई, मैझार मुदी १ मौम १९५२ परोके प्रति चिनही पाएपण मर मी मिसे करना भासित नहीं होता और परमेसे उत्पम होनेवाले फा के प्रति मिसको उरासीमता सा बात पुस्प तपाझप प्रारम्ब-योगसे परिणा सपोग बादिमें प्राप्ति करताना देखा बता ऐ पोर मिस तयफ पुरुष प्रावि को उपम को पैसे कार्पसहित बात करते हुए देसनेमें माता हो तो उप्त पुस्प बान-दसा। पाकिस तय माना जा सकता है। वर्षात् मा पुस्प बात-परमार्य के लिये प्रतीति करने योग्य नपणा झाली है पर किस भणसे पहिचाना जा सकता है। कदाचित् किसी मुसको दूसरे किसी पुरषो संसपोगते ४८ पत्र ५९४ पिविध पत्र मादि समर-२९वा पर्व यह जाननमें वाया भी हो, तो जिससे उस पहिचानमें भ्रांति हो, मैसा म्यवहार जो उस सत्पुरुषों प्रत्यक्ष रिपाई देता है, उस भांतिके निवस होनक लिये मुमा गोषको उस पुरुपको किस प्रफारसे पहिचानमा पहिये, जिससे उस उस तरफे म्पशारमें प्राति करते हुए भी जान-स्वरुपता उसक लझमें रहे! सर्व प्रकारसे बिस परिण वादि सपोगके प्रति उदासीन मान रहता है, अर्थात् जिसे सपाम्प सपोगोंमें महता ममतामाय नहीं होता, अपवाग मात्र जिसका परिक्षीण हो गया है, ऐस पानी-पुरुपको 'अनतानुबधी प्राविस रहिस मात्र प्रारम्बफे उदयसे ही बो म्पहार रहता हो, पम्पबहार सामाम्प दशाके मुमुसुको सेरका कारण होकर उसके उपकारमत होने में निरोधरूप होता हो, उसे यह हानी- पुरुष नाना है, और उसके लिये भी परिग्रह सपोग वादि प्रारम्बोदय म्यबहारको क्षीणताकी ही इच्छा करता है सा होनेसक उस पुरुपने किस प्रकारसे वर्ताव किया हा, तो उस सामान्य मुमभुके उपकार दोनमें हानि न हो। ५९४ बवाणीजा, नशाम्ब नदी ६ रवि १९५२ पार्प श्रीमाणेकचद भारिके प्रति, मौस्तभतार्य श्रीसुरसारके पैशास बी१ को देह ओ देनेकी नो मार पिसी है, पर गाँची । अधिक समयका मौदगीके बिना ही पुवावस्यामें अकस्मात् देर गोदेनेके कारण, उसे सामान्यरूपसे पहिचान मेगाले छोगोंको मी उस बातसे सेट ए बिना म ये, तो फिर मिसन पुलुम्म भारि सम्बपक महसे उसमें मूर्म की जो उसके सहबासमें या हो, निसने उसके प्रति मायय-भावना रस्सी हो, उसे मेर हुए बिना कैसे र सकता है। इस ससRमें मनुष्य-प्रामीको जो से नयनीय प्रसग प्रात हासे है, उही कपनीय प्रसगोमन यह एक महान् सेदकारक प्रसग है। उस प्रसगमें पपार्थ विचारबाम पुरुषोंक सिवाय सभी प्राणी विशेष सेको प्राप्त होते हैं, और यथार्प विचारवान पुरुषों को विशेष रम्प होता है-उमें संसारको जशरणता, अनित्यता और मसारता विशेष स होती है। विचारपान पुस्पोको उस सेवफारक प्रसगका मूर्यामापसे सेद फरना, यह मात्र कर्म-अपका हेतु भासित होता है। और वैराग्पतप सेइसे कर्म-सगका निपछि मासित होती है, भीरपा सस्प है । पी- मापसे खेद करनेसे भी विस सीका योग हो गया है उसकी फिरसे प्रामि नहीं होती, और मोमर्श वीपा मी अविचार दशाका पास है ऐसा विषारकर विचारवान पुरुष ठस मूर्याभाषप्रापयो मेको शान्त करते है,वपना प्राप करके बैसा ऐ उन्हें नहीं होता। किमी मी तय उस का हितकारी- पना देख्ने मही बाप, और आकस्मिक घटना ठेका मिमित होती है, इसलिये से भवरपर विचारवान पुरुषोंको, श्रीरको हितकारी हो उरस्म रोता है। सगको बारणता, भावना, मनिस्पता, भौर माता तया भयावएना देखकर भरने भापको विशेष प्रमिबोध रोग की। उसमें मौइस संसारविश्यक उप मा मात्रमे मा रहती हो तो उसे स्याग कर" "पाग कर, उस गुम्छामा कुए मी पाठ नहीं है । उस समारमें कमी मी दारणाप मा मात्र मास शानेबाठा मही, और अविचारमा के बिना उस समारमें मोह होना योग्य नहीं जो माह बना जन्म मरण और प्रम्पक्ष रोका है, ९ए और का पान है, उसे शांत फर-उसका क्षप कर । इसके मीम पवन बिना कोई मरा हितकर उपाय महीं है' श्यारि, पवित्र मामासे विचार करनेपर पैगम्पको गुर और नमक करता है। जो कोई जीव पर्य विचारसे देखता है, उसे इसी प्रकारसे मासूम होता है। इस मौषको देर-सबध हो जाने के बाद परि मृत्यु न होता, तो इस ससारके सिवाय एसौ बार उसकी बतिके सगानेकी इसम हो न होती । मुस्यतया मृत्यु के भयसे ही परमार्यरूप दूसरे स्थानमें बोक्ने पिको प्रेरित किया है, वौर पर मी किसी परहे पात्रको हो मेरित है। पासे गानों को तो मार निमित्से मृत्यु-मयके उपरसे बाप पणिक पैराग्य प्राप्त होकर, उसके विशेष कार्यकारोए मिना दी, पापि नाश हो जाती है। मात्र किसी किसी चारपान अपना सुषम-बोपी पाम्पुकमी जीतकी हो उस भयक उपरसे भक्निाची नि प्रेयस पदके प्रविधि होती है। मृत्यु-मप होता, तो मी परिपमा नियमितरूपसे परावस्थामें ही प्राप्त होता, तो भी मिक्ने पूर्व में विचारमान हो गये हैं, उतने न होते, मर्यात् समावस्थातक तो मत्यु-मय है ही नहीं, ऐसा समझकर बार प्रमा सहित ही प्राति करता । मृत्युध मास बागमन देसकर, उसका वनियवरूपसे वागमन देसकर, उस प्रसगके प्राप्त होनेपर स्वमन बादि सबसे वपना बरक्षण देसकर, परमापक विचार करनेमें बप्रमतमान हीरतकर माम मा वोर समग महितकार माम मा चारपान पुरमोंको यह निधप निसन्देह सत्य है-वानों का में सप। म्र्भमालके का त्याग कर विचारपानको बगभान- प्रत्पयो मेद करना चाहिये । पनि इस ससारमें इस प्रकार के प्रसंग नामा करते, बनेको वपना परको कैसे प्रसोका बासि मसाई दी होती, मरण आदि मात्र न होता, तो परिपके मुस-साधनकी मिन प्राप मी म्यूनता न पी ऐसे मालपमदेव बाद परमपुम्य, और भरत जैसे परत वादि उसका पो त्याग करते ! एकात भसगमाका किस कारणसे सेवन करते ! रे मार्प मामेकथर मादि ! पपा विचारको म्यूनता के कारण, पुत्र मावि मालकी कापना और मधमके कारण तमें कुछ मी विशेष सेव प्राप्त होना समय है, तो मी उस का रोनोंको सभी विता फल न होनेसे मात्र बसा विचारके बिना किसी दूसरे पापसे रितकाफ्ना मही रे, ऐसा विचारकर होतेए सेदको यथामति विचारसे बानी-पुरुपोंके पचनापत्से, पपा साधु पुरपके बालप समागम बारिसे पौर निक्सेि सपत करना ही रम्प है। ५९५ मोरमपी निवीय म्पेष्ठ मुदा २ शनि १९५२ निस दसे बर्षात् शारिक रोगनिशेषके परण तमारे निपम छट पी, पर गिरिशेष यता, इससे उस छठको ग्रहण करते हुए माहाका मग अपना अतिकम ऐना समन मही। क्योंकि समाप निपम उसी प्रकारसे प्रारंभ मा था।म्ति यही कारणतिरोष होनेपर मी परिचपनीमसे उस छुटका माण करना हो तो बाका मग अपना बतिक्रम ऐना संभव है। सर्व प्रकारके मारम तथा परिमाके सभके मूब मन करने के लिये समर्प प्रमचर्य परम सावन है।
विविध पत्र मादि संप्रह-२९पौ वर्ष ससारका यो अशरण मादि भाष सिसा है यह ययार्य है। पैसा परिणति वसा येतो हो नाव सकार राम्पको पाकर निजस्वरूप-धानको प्राप्त कर सकता है|मी कमी किसा निमिवसे पैसे परिणाम होते है, परन्तु उनको मम करनेवासे सग-प्रसगमें भीषका निवास होनेसे बह परिणाम असा मही यता, और ससारके प्रति ममिरुरि हो जाती है । इससे मत परिणतिके इछापान मुमुभुको उसके लिये निस्प समागमका भाग्य करने की परम पुरुपने शिक्षा दी है। जबतक चारको र सयोग प्राप्त न हो तवतफ कुछ मी भैसे पैराम्पको वापारफे हेतु तथा अप्रतिम निमिवरूप ऐसे मुमुक्षु बनका समागम प्रपा सस्थामका परिचय करना चाहिये । दूसरे सग प्रसंगसे दूर बनेको भारम्बार स्मृति रसनी चाहिये, और उस सतिको प्राधिप करना चाहिये- बारम्बार चीन इस वातको भूग नाता है, और उससे इन्छित सामन क्या परिणामको प्राप्त मही करता । , ५९६ बबई, रितीप स्पेष्ठ बदौ ६ गुरु १९५२ वर्तमान कामें इस क्षेत्र निर्माणको प्राप्ति नहीं होती, ' ऐसा मिनागममें कहा है और बेदात बादि दर्शन ऐसा करते हैं कि इस कामें इस क्षेत्र निर्माणको माप्ति हो सकती है। पर्वमान काल में इस क्षेत्र से निर्वाणको प्राति महीं होती, इसके सिवाय दूसरे मी बहुतसे मानोंका मिनगममें तथा उसके वामपसे लिसे गये पाचापोशरा रचित पानोंमें विमण का है। केवलान, मन पर्पवान, अपरिहान, पूर्वहान, यपात्यात चारित्र, सूक्ष्मसापराय चारित्र, परिवारविनुदि चारित्र, क्षायिक मक्ति और पुछाकम्धि ये मार मुसहपसे विपो माने गये हैं।' वर्तमान कामें इस क्षेत्र मामार्पकी कौन कौम मुम्य भूमिका ठहर अधिकारीको मास सकती है, और उसके प्राप्त होने का क्या मार्ग है।' इन प्रश्नोंक परमापके प्रति विचारका स रपना। ५९७ गमई आपत मी २ रवि १९५२ मान किया मोर भफियोग मत्युके साप मिसको मित्रता हो, अपना मापुस मागकर गोपू सकवा रो, भपका ' में नहीं माँगा' ऐसा बिसे निचप हो, पद मसे ही मुखपूर्वक सोरे-(पीतापार :-रह जीवनिकाप मप्पयन)। बान-मार्ग कटिनवासे वारापन करने पोम्प है।परमाषगार पामे पहिले उस मार्गत युत होनेके वनेक स्थान है। सदर, विकल्प, सांता, बतिपरिणामीम्ना स्पादि कारण औषको बारम्बार उस मार्गमे धुत होने हेतु होते हैं, अपना पे हेतु ठप भूमिका प्राप्त मही होने देत। किपा-मार्गमें बस मामिमान, म्पहार वापर, सिदि-मोर, पूग स्थार मारि योग, और देहिटियामें वामनिष्ठा मागिदार संमद हैं। किसी किसी महामाको छोड़कर बानस विचारपान गौशेने उम्ही कारणोंमे मार-मार्ग मीमद् रामचन्द्र [पत्र ५९८ भामप लिया है और वादायितमाम नपा परमपुरुप साम्में सर्पिण-सानिमारको सिरसे पदमीप माना है, और जैसे ही प्रवृत्ति की । मितु सा योग प्राम होना चाहिये, नही तो बिसय वितामणिके समान एक एक समय है, एसी मनुष्प-दो उम्टा परिभ्रमणको अनिका । व ऐना संभव है। ५९८ भी के अभिप्रायपूर्वक तुम्हारा भिसा वा पत्र तपा मी का विसा मा कामिम है। भी के पमिप्रापपूर्वक दी ने लिसा नियम बौर म्पबहारको अपेपासे । जिनागम व्या बेदात भारि दर्शनमें वर्तमान काम्में इस प्रस मोशका निपा उपा विमानका कहा माना समन है- पर विचार विशेष अपेक्षासे यथार्थ दिखाई देता है और .. "ने लिप्सा है कि वर्तमान काठमे सषयण भारिके हौन रोनेके कारणसे केवग्यानका जो नियेष किया यह भी अपेक्षित है। यहाँ निरोपाप में मानेके सिपे गत पत्रके प्रश्नको स्पररूपसे शिक्षवे? निस प्रकार मिनागमसे केषमानका बर्ष वर्तमानमें, वर्तमान नसभा में प्रचमित है, उसी तयका उसका नप में यथार्य माश्म रोता है या कुछ सण वर्ष माश्म होता है ! सन देश का बारिता बान केवजानीको होता है, ऐसा मिनागमा वर्तमानमें सरि-वर्ष है। दूसरे दर्शनोंमें या मुस्पार्प नहीं है और मिनागमसे पैसा मुस्म बर्थ होगोंमें वर्तमानमें प्रचलित है। परिबर्दा समानका मर्थ हो तो उसमें पातसा निरोप दिखाई देता है। उस साको पो मिस सकमा नहीं बन सकता । तपा निस निरोगको निस्सा उसे भी विशेष विस्तारसे मिसना नहीं बना । क्योंकि उसे यपाक्सर ही मिलना पोप मास होता है। जो सिसा प उपकार दिसे सिसा, यह सम रसना । योगधारफ्ना वर्षात् मन पचन वर कापासहित स्थिति होनेस, वापर वादिके लिये प्राति हाते समय उपयोगातर रो मानसे, उसमें कुछ मी पतिका बर्षात् उपयोगका निषेध ऐना समय है। एक समयमें किसीको दो उपयोग नहीं यते सब या सिहांत है तो महार मारिका प्रतिके उपयोग- में यता मा केपमानाका उपयोग केममानके अपक प्रति राना समय नहीं बार यदि ऐसा तो केपणानको मो नमलित कहा। प्रतिहत वा माना नाप । पहाँ कदाचित् ऐसा समाधान करें कि जैसे दर्पणमें पार्थ प्रतिविमित होते है जैसे ही केपमानमें सर्व देश का प्रतिविम्पित होते तथा केरलाना उनमें उपयोग माल उरें मानता है पह बात नहीं है कि सहम समापसे । ये फार्य प्रतिमासिठामा करते हैं, इसम्मेि भाहार आरिमें उपयोग गते ए सहन समारसे प्रतिमासित ऐसे फेवसामचा बस्तित्व पपा । तो यहाँ प्रभ ।। सकता कि दर्पणमें प्रतिभासित पार्यमा कान दर्पणको नहीं पता और पहाँ तो ऐसा कहा कि केवगानाको उन पाका बान होता है, क्या उपयोग के बिाप मामाका ऐसा कौनसा दूसरा स्वरूप है कि बा बाधर बारिमें उपयोग यता हो म उससे अमानमें प्रतिमास्ति होने पोम्म देयको बारमा बान सके ।
] विविध पत्र मावि सपा-पों पर परि सर्व दपा कास मारिफा झान बिस बस फो हो उस कान्टीको 'सिद' मानें तो यह समय माना जा सकता, क्योंकि उस योगधारीपना नहीं कहा। किन्तु इसमें भी यह समझना चाहिय किमिर मी यागपारीको अपेक्षासे सिदमें पैसे केवधानको मान्यता हो तो यागरहितपना हानसे उसमें सर देश का आरिका धान समय हो सकता है-तना प्रतिपारन फरमक लिय ही यह सिम्मा है, किन्तु सिदको बैसा बान होता ही है, इस अर्यका प्रतिपान फरनके लिय नहीं लिसा । यपरि मिनागमके म्पी-मर्पक बनुसार दखनेसे तो 'देहधारी कवठी' भार सिद' में केवख्यानका मे नही हाता-गनोंको ही सर्व दश काळ वारिका सम्पूण धान होता है, यह सही-भर्य है। परन्तु दूसरी अपेक्षासे बिनागम देसनेसे पुछ मिल ही माझ पाता है। मिनागममें निम्न प्रकारसे पार देसनमें माता- "केवरज्ञान दो प्रकारका काहा -सपोगीमवस्थ-केवउडान भोर भयोगीभपस्प केरबान । सपोगी केवटज्ञान दो प्रकारका कहा है-प्रयमसमप वर्षात् उत्पम हानेक समयका सयोगी वेबनान, और वमपमसमप अर्पात् अयोगी होनेक प्रश समयके पहिलेका काठमान । इसी वह अयोगीमत्रम्प फरहचान मी दो प्रकारका परा है-प्रथमसमपका विमान और वप्रथम अर्थात् सिर होनेफ पहिन अन्तिम समयका कपडान । श्या प्रफारमे करसवानके मे बिनागममें को है, उसका परमार्थ क्या दाना चाहिये । पापित् यह समाधान करें कि मान कारणकी अपेक्षासे बनवानक ये भेट बताये है, तो यही पसी शका हो सकती है कि वहाँ कुछ मी पुरपार्थ मिद न होता हो, और जिसमें विफम्परा अबकाश म हो उसमें भ- फरने की प्रवृत्ति बानी बबनमें मम नही है। प्रपमममय-ऐक्सशन और मप्रथमममप पासवान इस प्रकारफा भे फरमेमे पर फस्नानका तारतम्य परता बसता होता वह भेद समय है, परम्नु तारतम्यमें तो सा होता मही ताहिर मा परने का क्या पारण'-पाभि पहा हाते हैं, उनक उपर भीर प्रथम पत्रके उार पधादि विचार करना चाहिय । " ५९९ हेतु भरतम्य ! पप रिस तरह पर्पवमान हा सरना ! अपमादी नहीं। पमहाभारना दीपमा पा रिमी हग मिट राजा! ६०० सामिपनि-भानामी-पार 7 उमा समान' उमा पपान् गोरगरए प्रति सरगर प्रनिरालयम पर्नमानमें (में) मि तार प्रकृति परना उचित है।
भीमद् पाषाण ६०१ वानों का मा बस्नु नस्पतर न हो, उसे योनिन इम्य करते हैं। कोई मी दम्प पर परिणामसे परिणमन नही करता-अपनेपनका स्पाग नहीं कर सकता । प्रत्येक प्रम्प (प्रम्प, क्षेत्र, काठ, भानसे ) स-परिणामी । पानिपत बनादि मापसे यता है। यो बेतनी कमी भवेतन नहीं होता नो अचेतन पा कमी वेतन नही होता । हे मग, ६०३ पन्नको उत्परिक कुछ मी सांग रिसाई नहीं देते, इस कारण चेतन अनुपम है । उस पतनके नाश होने का कोई अनुभव नहीं होता, इसछिप प मविनाशी । निस्प वनुमास्तरूम होनेसे मह नित्य है। प्रति समप परिणामांतर प्रास करनेसे वह बनिस्प है। नियमनमा त्याग करनेके लिये मसमर्प होनेसे वह मूहम्म। ६०४ सबको मना पावरगफे पचनको सम्पूर्ण प्रतातिका स्पान करना पाप है, पोंकि गाँ राग बाट दोगेश म्पूर्ण अप हो वही सम्पूर्ण जान-ममात्र नियम प्रगट होने पोम्प है। मौपिनको सबकी अपेक्षा उतए बोवरणवा होना समन ।। उनके बचन प्रस्मस प्रमाण । इसलिमे रिस किसी पुस्पको मितने वाप्समें पौतरगय समन है, उतने मिशमें उस पुस्पा पास्म माननीय है। सम्म वारदर्शनीम प-मोशनी मोगो म्यान्मा को उससे प्रबल प्रमाण-सिम मासा भौदिन मौतमने ही ऐसा मानता है। शा -मिस मिनमगवान्ने रेतका निरूपण किया है मामाचे मरम्मका तय तामा है, का मोच्य कहा है और गो निलम्प समारिके बतयपमें मुरम कारण हो ऐसी पदार्पकी म्पाम्या मा। उस बिनमगवान्को शिक्षा प्रभा प्रमाणसे सिम ऐसा कैसे बाबा सकता है। के भीत मौर सहा मरिम्प समाधिक कारणमूल ऐसे पेशात वादि मार्गका उसको अपेमा मम्म हो विशेष प्रमाणसे सिर होना समय है। उपर.-एक बार जैसे दम ते हो से परि मान भी है, परन्तु सप दर्शनों को शिक्षाको पंच १५,५ विविध पत्र मादि संप्रा-२ौ वर्ष अपेक्षा दिनमगवानकी करी ई पब मोक्षके मरूपको शिक्षा जितनी सम्पूर्ण प्रतिमासित होती है, उतनी दूसरे दर्शनोंकी प्रतिभासित नहीं होती, और यो सम्पूर्ण शिक्षा र यही प्रमाणसे सिर है। शका-परि तुम ऐसा समजत हो तो किसी सर मा निर्णयका समय नहीं भा सकता, क्योंकि सब दर्शनोंमें, जिस मिस दर्शनमें निसको स्पति उस उस दर्शन के लिये सम्पूर्णता मानी है। उत्तर –पदि ऐसा हो तो उससे सम्पूर्णता सिद्ध नहीं होती, जिसकी प्रमाणारा सम्पूर्णता से महा सम्पूर्ण सिख होता है। प्रम --मिस प्रमाणके द्वारा सुम बिनभगवान्की शिक्षाको सम्पूर्ण मानसे हो, उस प्रकारको तुम कहो; बार निस प्रकारसे मेदांत मादिकी सम्पूर्णता हमें समव मारम होती है, उसे मी कहो । , ६०५ मस्पक्षसे बमेक प्रकारके दु सोको देखकर, दुसी प्राणियोंको देसकर तथा जगत्को चित्र रचनाको देखकर, से होनेका हेतु क्या है। उस दु सका मूळम्मरूप क्या है और उसका निधि किस प्रकारसे हो सकता ह! तया जगत्को विचित्र रचनाका क्र्सवप क्या । इन्यादि मेदमें मिसे विचार-दशा उत्पमा है ऐसे मुमुक्षु पुरुपने, पूर्व पुस्पोशरा उपर को हुए चारोसबरी जो पुरा अपना समाषान किया था वा माना या, उस विचारके समाधानके प्रति मी ययाशक्ति भाठोधमा की । उस पासोचना करते हुए विविध प्रफारके मतमातर तपा ममिप्रापसाची पया- शील विशेष विचार किया। तथा नाना प्रकारके रामानुन भादि सम्प्र-योंका विचार किया। तथा वेदान्त वादि दर्शनका विचार किया । उस बालोचनामें बनेक प्रकारसे उस दर्शनके सहपका मयन किया, और प्रसग प्रसगपर मपनकी योग्यताको प्राप्त ऐसे मैनदर्शनके स्वधर्म अनेक प्रकारसे जो मंपन हुआ, उस मपनसे उस दर्शनके सिर ऐनक लिये, गो पूर्वापर विरोध से माइम होते है, ऐसे माये हिसे कारण साई दिये। ६०६ धर्मास्तिकाय, बपर्मास्तिकाय बोर वाफाशास्तिकापके मनपी होनपर भी पे रुपी पार्यको सामर्प प्रदान करते है, और इन तीन दम्पोको समावसे परिणामी या है, तो ये परपी ऐनपर मी ममीको कैसे सहायक हो सकते है। धर्मस्तिकाय भर मपर्मास्तिकाप एक क्षेत्र मागाही है, और उनका सभाब परस्पर विरुद, किर भी उममें गतिशी पाके पति स्पिति-सहाफ्तारपसे भौर स्थितिशील बस्तके प्रति गति-सहा- पतारुमसे पिरोप क्यों नहीं पाता। बस्तिप, अपर्मास्तिकाप और एक मामा-ये तीनों बसपात प्रोशी है, इसका स्पा को इसप हो यस्प है। पर्मास्तिकाय धर्मास्तिकापकी जनगाहना समुफ ममताकारसे-ऐसा होने में क्या पुण्यस्प है।
भीमद् रामचन्द्र छोकरस्यान के सा एक स्वपस एनेमें क्या मुग रम्प है ! एक तारा मी घर-बर नही होता, ऐसी बना स्पितिको किस कारणसे मानना चाहिये ! धामतता पाल्या क्या है। पारमा अथवा परमाणुको कदाचित् शासत मान में मूस बम्पर कारण परन्तु वारा, पन्न, निमान बादिमें बैसा क्या कारण है। ६०७ सिद-पारमा छोकाशक-प्रकाशक ह, परम्तु छोकासोक म्यापक नहीं है,म्पापक तो वपमी - गहना प्रमाण है-जिस मनुष्योरसे सिरि प्राप्त की, उसका तीसरा माग कम पन-प्रदेशाकार है। बर्मात् बारमबम्प सोकाडोक-म्पापक नहीं, किन्तु मेकालोक प्रकाशक वर्षात् सोकाठोकभाको । मेकामेकके प्रति वास्मा नहीं पाती, पार करत मी कुछ बारमामें नहीं वाता, सब अपनी अपनी बबगाइनामें अपनी बफ्ना सतासे मौन्द है, सा रोनेपर मी मामाको उसका चान-दर्शन किस तरह होता है। माहाँ पनि त Pिया बाय कि जिस तयण बस्तु प्रविनिम्मित होती है, से ही वारमा मा मेकाशक प्रकाशित होता है-प्रतिबिम्बित होता है, तो यह समापान मी पविरोधी Pसाई नहीं देता, क्योंकि वर्षममें तो बिनसा परिणामी पुलम्माधिसे प्रतिबिम्ब होता है। बामाका मगुरुसभु धर्म है उस धर्मक देखते हुए आरमा सर पापोको पानता, स्पोंकि समस्त दम्पोंमें बगुम्म्मु गुण समान है-ऐसा करनेमें पाता है, तो वगुरम्भु धर्मका क्या वर्ष समाना चाहिये। ६०८ वर्तमान कामकी तय यह अगत् सर्वकालमें है। म पूर्णकारमें न हो तो वर्तमान कामें मी उसका मस्तित्व न हो। परबतमाम में है तो भविष्यकाम मी उसका भापत नाश नही हो सकता । पदार्थमा के परिणामी हानेसे यह गत् पापान्तररूपसे परिगोचर होता है, परस्त मूह. समावसे उसकी सहयमानता है। ६०९ मोबस्त समयमात्र ठिये, पकाके किये है। जो मारोप मौनदी जो माननीय मौद्र नहीं। से प्रकारका पदार्थ समान लिमाषपूर्वक पर दिखाई देता है-चा-समान वोर चेतन समान। ६१० गुणविशपता किसे करते है। उसका किस तरह मारापन किया जा सकता है! मानमें पवित्रपता क्या है। वीर्षकरमें अतिशयता स्पानिपत क्या है। + पर १११, ६१२ ५१३ पिपिच पच मादि संप्रह-२९ो वर्ष यदि जिनसम्मत केवमहामको मेकाोकनायक मानें तो उस फेवरहानमें भाहार, निहार, मिहार वादि क्रियायें किस सद ऐ सकती है। पर्तमानमें उसकी इस क्षेत्र प्राप्ति म होनेका क्या है। ६११ मति, भूत, ववधि, मन पर्पस, परमानषि, फेक्ट . ६१२ परमावधि जानके उत्पम होने के पश्चात् केवलज्ञान उत्पन होता है, या यस्प विचार करने पाम्प है। बनादि वनत काका, बनत वोकका गणितसे बतीत अपना वसंपातसे पर ऐसे जोक समा, परमाणुसम्र के अनंत होनेपर ममतपनेका साक्षात्कार हो उस गणितातीतानेके होनेपर-साश्चात् मनतफ्ना किस तर नामा गा सकता है ! इस विरोषका पबिहार उपर को ए रास्पसे होने योग्य माश्म होता है। तपा केपमान निर्षिकम्प है, उसमें उपयोगका प्रयोग करमा पाता नहीं। सहन उपयोगसे हो पर शान होता है। यह यस्य मी विचार करने योग्य है। क्योंकि प्रथम सिद काम । प्रथम बीच-पर्याय कौनसी है। प्रथम परमाणु-पाप कौनसा है। यह केरमान-गोपर रोमेपर मी मनादि ही माश्म होता । अर्थात् केपदान उस भाको मही प्राप्त करता, धौर केवमानसे कुछ छिया मा मी नहीं है, ये दोनों बातें परस्पर विरोधी हैं। उनका समा- पान परमारपिके विचारसे क्या सान उपयोग के प्रचारसे समझमें बाने योम्प रसिंगोचर होता है। -- ६१३ कुछ मोहै। किस प्रकार है। क्या यह मानने योम्प है। जाननेका फल पारे। मयका तुपा है। बंध पुरके निमिवसे है मपमा जातके दोसे है! मिस प्रकारसे समसते ति उस प्रकार बप नहीं एम्पावासमता, पेमा सिर धवा सपिये मोश-परफी हानि होती है। उसका नाम्निम यरता है।
भीमद् रामपन्द्र [पत्र बर्तता कोई वस्तु है या बात ! अमूर्तता यदि कोई वस्तु है तो वह कुछ स्पो पा नहीं' मत पुलका और अमल गोषका संयोग से हो सकता है। पर्म अधर्म और बीत इम्पका ष-म्पापिय मिस प्रकारसे मिनमगवान् यते, उस प्रकार माननेसे ये दम्प उत्पम-समानीको तय सिद्ध होते है,पोंकि उनका मध्यम परिणामाफ्ना है। धर्म वर्म बौर नाकाम इन पदार्पोको द्रम्पकपसे एक गाति, और गुणरूपसे मिम मिम नाति मानना पैक है, अपना दम्पसको भी भिम मिम मानना ही है। मम्य किसे करते हैं। गुण-पर्यापक बिना उसका दूसरा क्या सहम है! करणान पदि सर्व दम्प, के, का मालफा शायक परे तो सब वस्तुएँ निफ्त मर्या में मा नॉप-उनकी धनतता सिब न हो क्योंकि उनका अनंत-अनादिफ्ना समसमें मही वाठा वर्षात करमानमें उनका किस रीतिस प्रतिमास हो सकता है। उसका विचार बराबर ठीक बक नही बैठता। ६१४ बनदर्शन रिसे सर्वप्रकाशकता कहता है, मेदान्त उसे साम्याफ्ता करता है। रए पस्के ऊपरस पाएका चार लोग करने योग्य है। दिममगवाम्के वमिमापसे धारमाको स्वीकार करनेसे पाहिले हुए प्रसंगों के ऊपर अधिक विचार करना चाहिये १ असतात प्रदेशका मूह परिमाण २ सकोप- विसबाम दो मामा स्वाधर की है, यह संकोच विकास क्या महापामें दो समता तपाप किस प्रकार सकता। १ निगोर मास्थाका स्पा विशेप परण है। १ सर्व इम्प क्षेत्र बाहिको नो प्रकाशकता है, बाहमा म्प केवमान-स्वभावी है, या निक- स्वरूममें स्थित निग्रहानमय दो केसमाम है। ५ बामा योगसे विपरिणाम है, स्वमालसे परिणाम है। लिपरिणाम वामाकी मूळ सपा है संयोगी सजा है। उस सपाका गप्पा इम्प प कारण। ६ वन हामारिक मास्पाको मास करे, उसमें क्या कुछ विशेष धरण है। निव स्वभाषणा पुरस स्पोगा बपना उससे कुछ मिन हो। ७ मिस तप मोग-परमें बारममा प्रगट हो उस वर मा इम्म मानें, तो मात्मा जोक म्पापक-प्रमाण न होनेका क्या धरण है। ८ पान गुण है और मामा गुमी है इस मितको अग्रते हुए बामाको सनसे कपंपित मिन किस पेपासे मानमा पारिप । मालमासे नाम किसी गुगकी सफेवासे ।
पत्र ५१.५१५६१७६१८,१११] विषिध पत्र मादि संप्रह-२४ा पर्व २ मध्यम परिणामबाग वस्तुको निन्यता किस तब संभव है। १० शुद चेतनमें भनेकको सख्याका भेद कैसे घरित होता है। ६१५ सामान्य चेतन सामान्य पैतन्य विशेष पतन विशेष चैतम्प निर्षिशेप चेतन (चैतन्य ) सामाणिक बनेक बारमा ( नौव )-निर्मन्य सोपाधिक अनेक बारमा (जी)-वेदान्त ६१६ पभु अप्राप्यकारी मन प्राप्यकारी चेतनका बाप बागमन (गमन न हामा) बानी-पुरुषोंको समय समयमें बनत सपम परिणाम दिगत होते हैं, ऐसा नो सबने कहा पासपोमा सयम विचारकी तीपण परिणतिसे तथा प्रमरसके प्रति म्पिरता करनसे उत्पन्न होता है। ६१८ धीतीर्पकर आत्माको संकोच-विकासका मानम यागदशा मानत है यह सिात विधानपसे विचारणीय है। ६१९ बई वापाड पुदी मौम १९५२ मंगेपनी जुक्ति ता सपै मागिय, समीप रो पपा शरीरनो नहीं सग ना: पनि यसई रे, एकम आसने, मम पर वा पर भमनपा मंग ना । मोपपनी भाग सापन कर। १ मम (सिसिपेर पूमनेका गबुमान वर्ग ) पादुमा सोमना गानने समयम गनार मी उरें परीणा सा नी गवा । परनु न दो पालिएकात एकही मामन रेना चाहिये पर भून अपना मन मा ऐना उमा है। भाप, म माप उन दौरस मापनींग पीत!
भीमद् रामचन्द्र [पत्र १ बमई बाप मुदी ५ गुष १९५२ - प्रभ --'मौसमान के सपनामृतम नामस्वरूपके साम महर्निश प्रत्यक्ष मावान्को मनि करना, और उस मतिको स्वधर्ममे रहार करना इस तब भगा अगह मुस्मरूपसे बात भाती है। पदि सपर्म 'धम्का बर्ष 'वामतमान' वा 'वारमसहम' होता हो तो फिर सपर्मसहित मति करना, या कराने क्या कारण है!' ऐसा जो तुमने सिसा उस उत्तर हाँ मिसा उपर -सपर्ममें यकर मकि करना ऐसा मोकहा, स्वधर्म शम्का पर्ष वर्णाममयम है। निस मामण वादि वर्णमें देह उत्पम ईरो, उस पर्णको मुति-स्पतिम कोए मर्मका भाचरण करना या वर्णधर्म और अमचर्य मादि बाममके क्रमसे आचरण करने को मर्यादा अषि- स्पतिमें की गई। उस मर्यावासहित उस उस वामममें प्रापि करमा, पा बाममबर्म है। पापण पत्रिप पैश्य गौर शह ये चार वर्ण । तपा मचर्य, गृहस्प, वानप्रस्म वार म्यस्त पे चार वामम है। मण वर्णमे वर्ण-धर्मच आचरण इस तय करना चाहिये, ऐसा प्रो मुति-साविमें कहा हो, उसके अनुसार प्राधण भाचरण करे तो पर्म कहा जाता है और परि उस प्रकार बाचरण म करते हुए अपमण, सत्रिय वारिके वापरण नमे याप पर्मका बाचरण करे तोप परपर्म कहा जाता है। इस प्रकार निस बिस वर्णमें दो पारण की हो, उस उस वर्णको अति- स्पति को ए पर्मक अनुसार प्राति करना या सधर्म कहा जाता है और पासरे व धर्मका वापरण किया गाय तो वा परधर्म या जाता है। यही पात भाममवर्मफे विषयों मी है। जिन वर्णोको इति-स्मृति में मचर्य मादि वामम- सहित प्राति करने के लिये कहा। उस वर्नमें प्रपम बीबीस पर्पतक गहस्पामममें रामा तपथात् कमसे पानप्रस्प और सपस्त आश्रममें बापरण करना इस तरह बाग्रमका सामान्य कम है उस उस नामममें माचरण करमेश माहाके समपने प िकोई दूसरे बाबा बावरणको प्राण करे तो पा परधर्म कहा जाता है। और यदि उस उस नाप्रममें उस सस वाममके धाँध बापरण करे तो पलपर्म कहा जाता है।म तय वेदामित माम वर्णाममधर्मको सधर्म कहा। उस वर्माबम धर्मको हो सर्भ शप्पस समझना चारपे, मर्यात् सहनात सामीने पहा वर्षाममधर्मको स्विधर्म उम्दसे कराई। मक्षिपभान संप्रदापोमें प्राय भगधति करना होगाका मर्म है ऐसा प्रतिपादन किय परन्तु पो उस ममि समर्म शब्दको मात्रा क्योंकि मलिका सधर्म पर ही करना भारिप ऐसा मारे । इसलिय सपर्मको मुशहपसे प्रण किया है और उसे वर्णाजमबर्मक अपने होमण किया। मौका समर्म मदिपा भवानपि तो मति सदके बारे दाचित् होइन संपायोंमें मपर्म शनका प्रयोग किया गया है, और प्रामामानन्दक पचनापत मासिके बदले तपर्म र संसा-पापल्पसे मी प्रयुछ मही प्रिपा, घाखा मावलमाचार्यने तो या प्रयोग किया।
पत्र १२१, २२, १९१] पिविष पर मादि प्रह-२९पों वर्ष ५०१ ६२१ बाई, बापान बरी ८ रवि १०५२ समाके द्वारा नो स्वयंभूमण समको विर गप, तेरत है भौर रंग, चन सत्पुरुपोंको निष्काम भक्सि पिकास नमस्कार म एक धारासे वेदन करने योग्य प्रारम्बके सहन करते हुए, कुछ एफ परमार्यम्यबहाररूप प्रति पत्रिम जैसी लगती है, मार उन कारणोंसे पोपमात्र मी नहीं टिम्मी चित्तको जो सहन ही अबसबन है, उसे खीम एनसे आर्तमान होगा, ऐसा बानकर उस दयाफे प्रतिबरसे इस पत्रका रिसा है। सुस्मसगम्प और नामसगाप दुस्तर स्वपमूमण समुद्रको गो वर्धमान मा पुरुष मुमासे तिर गये है, उन्हें परममधिसे नमस्कार हो । युत हामफे भयफर स्पानको साबधान रहार, तयाम्प सामर्प विस्तृत करफ निसने सिदिको साधा है, उस पुस्पायको या करके रोमाभित, मर्नत और मौन ऐसा प्राधर्ष उत्पम होता है। ६२२ प्रारम्पप दुस्तर प्रतिबघ रहता है, उसमें कुछ लिसना अपना कहना त्रिम असा ही माश्म होता, और उससे हरासमें पत्र आदिमी पाँचमात्र मी नहीं लिया। बातस पोंके लिये पैसा ही साद, इस फारण पिचको सिप म्पापुरता होगी, उस विचारम्प दयाके प्रतिबभसे यह पत्र लिम्मा है। रमाको जो ज्ञानसे पठायममान कर डाले, ऐसे प्रारम्पका पान फरत दुए एसा प्रतिबंध उस प्रारम्पके उपकारका हेतु होता है, भौर किसी किसी पटिन अपसरपर कमी ताबह मामाको मुखानके गमन करा रेनतारा स्पितिको प्राम करा दता है, पेमा समझकर, उसम करती आचरण फरमा योग्य है। यह विचारपर पत्र बारिकी दप मही निर्ग उसे धमा परनकी ममता सहित प्रार्पना है। भहा। मानी-पुरुषका भाशय, गैमौरला, भारत और उपम । महा ! अहा! बारमार महो! ૬૩ बई भाल१५माम १.५२ तुम्हें सपा मरे सिमी सममागमको निष्टागउ भाईपोका मार गुमागमको अमिरा रा फरती है, पद बात मानने में है, परम्नु उम रिपक अमु कारावर फाने र प्रति मी सती । प्राप पितमें ऐमा रहा कराना है कि दार मरिक ममागम मी का मस्ते पोप या मटी ६। प्रथमम दाम प्रसारका रिपार हा परला पा, भार मापार अमि धरमर गगता था। रितु उपशम ममम माइयोन ममागम होनसा प्रमा मा निमे पर प्रराम प्रतिर दान मोर दा दुए मा गाभा मारमहा है। वर्तमान rim र उनना प्रविस होने देने पम्प मना मुग ममणि दी। गगन पुए पुपमा ति। 'मा ममता दा, ५.२ भीम रावत [पत्र १४ इस अपमामें गुणका विशेष प्राकट्य समझकर, तुम सप किन्ही मुमधु मईयोको माजि रहता हो वा मी उससे उस मकिकी योम्पता मेरे लिपपमें समय है, ऐसा समझने की योग्यता मेये नहीं। यही एक प्रापना करना योग्य कि इस मामामें तुमे गुणका प्राश्ट्रप भासमान ता हो बार उससे अलरमें मवि पती हो तो उस मलिका पपापोग्य विचारकर बस में योग्य माश्म हो पैसा करना पाप्म्य । । परन्तु इस मारमा स्वरमें हालमें हर किसी प्रसगको चर्चा हाने देना योग्य नहीं। क्योंकि बधिरविनप उप होनसे गुणका प्राकट्य हो, तो भी बह गोगोंधे भासमान हाना कठिन पो, और उससे उसकी निरापना हानेका कुछ मी करण ऐना सभा है, तथा इस मामा महापुस्पके वमका सान करनके समान कुछ मी प्रधिका समक्षा बामा सभा है। ६२४ नई भाषण मुरी ५ शुक. १९५२ . १ प्रभ --विवागममें धर्मास्तिकाप भारिप बम्प को गये है, उनमें काउको मा इम्प या भीर अस्तिकाप पाप कर, काठको मस्तिकाय मही का-सा स्पा कारण होमा चाहिये ! कदाचित् कासका मम्तिाय न करने या हेतु सवा है कि धर्मास्तिकाप भारि प्रशके समाप और पुपु-परमायु भी सी हो यापनानाग इम्प, बार का पैसा मही है। मात्र एक समयप है उससे पाठमो अस्तिाप नही कहा । पहाँ ऐसी बार्शका होता है कि एक समपके पार रसारि तामस तरह समपकी पारा पता रती है, और उस पारमें बापमें भामाश मही हाता उससे एक दूसरे सम्पका समप अपना समहामकपना होना समा ६, जिममे का भी अम्निमप या गा सकता है। तया सका दान का हान ता पेसा जो पहा है, उसम भी ज्मा माइम हाता कि सत्र काम-समा शान-गापर हाला, और सर्व सम्र वान-गापर EMIE तारका अम्निकाप हाना समाह, भार बिनगमम उसे अतिभार माना मही। उत्तर -पिनामरी पर पगा है कि कार भारचारिक इम्प सामारिक उम्प मही। मा पो निकायमा मुपमपम उमय बर्नमा नाम हो । उम बनाकर मारा नाम पर्याय मा । धानिराप एक समयम अमेयान प्ररेशर ममूलए माझम दामाद मे कार गम भए । माम नदी का । र गमय गरर मरा आता तर मरा समय उसम हता AREIमारा गामम गाम मग गाना काहान Ene मा प्रापरा. उमा गुम्प पता कि उसे पीनगर मनपा समसाम । कोसा ran I मम में मना भी गम मा सारे आर भूगा l मागमा महागात पाप मी मार दता पद मार्गमान रानी का नाम ।
पत्र २५ ६२५] विविध पप्रमादि संपा-९याँ पर्प - सर्वश मूतकारको ' उत्पम होकर नए हो गाने ' वार मावीकाठको, ‘माग अमुक सब होगा'क रूपमें देखते हैं। परन्तु मूवकाठ दम्पमें समा गया है, थार मात्र काल सतारपसे सनिविष्ठ है, गेनोंमेंसे एक मी वर्तमानरूपसे नहीं है, मात्र एक समयरूप ही वर्तमानकाल यता है, इसम्मैि सर्वहको शानम भी उसी प्रकार भासमान होता है। से किसीने एक घोको ममी देखा हो, उसके बार महसरे समयमें नाश हो गया है, मोर उस समय बह घोरूपसे विषमान नहीं है, परन्तु देखनेवारको बह घड़ा जैसा था वैसा ही शानमें भासमान होता है। इसी तरह इस समय मिटीका कोई पिर पहुआ है, उसमें थोड़ा समय बीतनेपर एक पक्ष उत्पन होगा, घानमें एसा मी भासमान हा सकता है, फिर भी मिका पिर वर्तमान पुस घरेपसे नहीं यता । इसी तय एक समयमें सशको विकास-शान होनेपर मी मर्तमान समय सो एक हो। सूर्यके कारण मो दिन और रात्रिरूप काठ समझा चाहता है, यह म्याहारकाल है, क्योंकि सूर्य स्वाभाविक द्रम्प नहीं है। दिगमार कालके वसत्यात मगु स्वीकार करते हैं, परम्म उनका एक दूसरेके साप सब , ऐसा उनका अभिप्राय नहीं है, और इससे उन्होंने काठको मस्तिकापम्पसे स्वीकार नहीं किया । २ प्रस्पक्ष ससमागममें भदि पैराम्प नासि साधनसहित मुमुक्षुको, सहरुको आदासे द्रम्पा- नुयोगका विचार करना चाहिये । ३ श्रीवपतमीम अभिनन्दम मगवान्की स्तुतिका प- सिकर नो उसका बर्थ पूछनापा है, उसमें 'पद्मभनुभव त्यागयी, करपी जY परवीत हरा'—ऐसा जो लिखा है, यह मूमर नही है। मूलपर इस तरहै-'पुस मनुमप स्यागपी, फरगी नमु परतीत रा वर्ण गघ बानि पुनम्-गुणके अनुमबका बर्षात् रसका साग करनेसे, उसक प्रति उदासीन होनेसे, नस'वर्यात् निसको वामाकी) प्रतीति होती है। -अर्यात् . - ६२५ निस बमादिनीव बनादि है। पुनम परमाणु अनादि । नीव वीर कर्मका सबध नारि। संयोगीमानमें ताम्प-अभ्यास-कोनसे पात्र बन्म-मरण बानि मोंका वनुमय करता है। ६२६ पाँच मस्तिकापनप ठोक अर्थात् विश। बैतन्य रक्षण नीव है। पर्म, गंध, रस और स्पायुक्त परमाणु है, पर समय सम्पमे नहीं, विमान है। - ५४ भीमन् परवान्द्र [पा ११ १२८ ६२७ कम्मदम्मति सर्म, सनोमी भी होईनीपस्स | सो पो गायमो, तस्स पियोगी मनमोक्सो । ६२८ बर्मा माषण १९५२ . पंचास्तिकायन सधिस स्वरूप को मीर पुनस, धर्म वर्म वौर वाकाय ये पाँच गस्तिकाप को जाते है। बस्तिकाप भर्यात् प्रदेशममारमक प्रस्तु । एक परम प्रमाण भई बस्तके मागको प्रदेश करते है। जो वस्तु भनेक प्रदेशारमक हो उसे अस्तिकाप करते हैं। एक नीष जसप्त्यात प्रवेश प्रमाण है। पुद्रम् परमाणु पपपि एक प्रदेशात्मक परह दो परमाणुमोंसे भगाकर सम्मात, बनत परमाणु एका हो सकत है। इस तब उसमें परम्पर मिम्मेकी अति पनेसे यह व प्रदेशात्मकता प्राप्त कर सकता है, जिससे पर भी वस्तिकाप करे याने पोय। पर्म प्रम्प वसम्मात प्रदेश प्रमाण, वधर्म द्रम्प बसम्मात प्रदेश प्रमाण, और नाकाश अम्म भनत परेश प्रमाण होनेसे के मौ मस्तिकाय है । इस तब पाँच वस्तिकाप । इन पाँच बस्ति- कामके एकमेकल्प समावसे इस मेकको उत्पति। वर्षात् मेक इन पर मस्तिकापमय है। प्रत्येक गाव क्रमात प्रदेश प्रमाण है। जौष वमत । एक परमाणुके समान वनंत परमाणु है।दो परमाणुओके एकत्र मिनेसे मना दि-गणुक संग होते है, तान परमाणुभोंक एकत्र सम्मिम्ति ऐनेसे मनव नि-मणुक कम होते। चार परमाणुगों के एका सम्मिमित हानेसे बनत चार-बणुक स्कंब होते । पाँच परमाणुोक एका सम्मिलित होनेसे बनव पाच-मुक स्रूप होते है। इसी म परमाणु सात फरमाशु, पाठ परमाणु, नी परमाल, दस परमाणु मोके एकत्र सम्मिभित होनेसे ऐसे बनत कर होते है। इसी तरह पाय परमाणुसे सौ परमाणु, सप्पात परमाणु मसम्पात परमाणु, तथा बनत परमाणुगोसे मिझार बमे ए ऐसे अनंत स्कर होते है। धर्म दम्प एक है, परस्पात प्रदेश प्रमाण ठोक म्यापक है। अधर्म रम्प एक, मी मर्ससात प्रदेश प्रमाण कम्पारक है। भाकाश दम्प एक है, अमत प्रदेश प्रमाण है, पोषणे-म्पापको प्रमाण गण भसमयात प्राम। गरेपम्पम होनेकोख भार ग्लेसियोग होने पर।
पत्र २९ विषिष पन मारि संपा-१९यो वर्ष ५०५ फार दम्य इन पाँच बम्तिकार्योंकी वर्तना पर्याय रे, वर्षात् यह भौपचारिक दम्य है। वस्तुत तो वह पर्याय ही है। धौर पर पिडसे भगाफर वर्षादि पर्यंत जो काउ सूर्पकी गतिफी उपरसे समझा जाता है, मह म्पावहारिक कार, एसा घेताम्बर माचार्य करते है। गम्बर वापार्य मी ऐसा ही करते है, किन्तु मे इतना विशेष करते हैं कि काकाशक एक एक प्रदेशमें एक एक काठाणु विषमान है, जो भवर्ण, बगध, मरस बार मस्पर्श है, बगुरुच्यु स्त्रमापसे युक है। ये का वर्तना पर्याय और म्यापारिक काउके निमित्तोपकारी फारमणु द्रम्य परेसाने पोग्य है, परम्तु मस्तिकाय को गाने योग्य नहीं । क्योंकि एक दूसरेसे मिलकर वे भगु, क्रियाकी प्रकृति नहीं करते। मिससे बारे शारमक न होनेसे का दम्पको अन्तिकाप कहना क मही, और पचास्तिकायके मो. चनमें मी उसका गाण स्वरूप कहा। नाफाश बनत प्रदेश प्रमाण है। उसमें नसम्स्यात प्रदेश प्रमाणमें धर्म अधर्म द्रम्प व्यापक है। धर्म नभम दम्पका यह समान है कि जाब दौर पुद्रर उसकी सहायताके निमित्तसे गति और स्पिति कर सकते हैं, जिससे धर्म वर्म दस्यको म्यापरवातक ही बीर और पुनसकी गति-स्थिति है, और उससे ठोककी मर्या होती है। जीप, पुन्नर, पर्म, अधर्म वौर द्रम्पप्रमाण भाकाश ये पाँच दम्प जहाँ पापक है, पर ठोक कहा जाता। ६२९ बम्बई, मारण १९५२ (१) दुर्गभ मनुष्य देर मी पूर्वमें बनतकार प्राप्त हुई तो मी पुग मी सफलता नहीं हुई, परन्तु स्तार्यवा तो उसी मनुष्य देहफी है कि जिस मनुष्य देहमें इस गाने हानी पुरुषको पहिचाना और उस महाभाग्यका बामय किया । जिस पुस्पक नामयसे भनेक मिष्या प्रकारके भार मानकी माताई उस पुरुपके भाभयस पर दो एट नाप, पही सार्थकता है। पग्म, गरा, मरण पारिको नाश करने पामा बारमशाम मिसमें पता है, उस पुरुपका वाय ही गोषको जन्म, गरा, मरण मारिका नाश कर सकता है, क्योंकि यही पपासमर उपाय है। सयोग सबसे इस देहके प्रति इस बीपको गो प्रारम्भ होगा, उसके निात हो गानेपर उस देहका समागम निार होगा। तथा उसका कमी म कमी तो प्रयोग निथप है, रितु बाभपपूर्वक देवरे यहाँ मम सापक ,निस बाभयको पाकर जीर उसी मबमें अपरा मविप्पमें पोरेहीकालमें निगसम्ममें स्पिति कर सके। (२) तुमपा भीमुनि प्रसगवश ..के यहाँ जाते राना । प्रापर्य, भपरिवारको पपाशचि धारण करमेकी उन्हें समावना माश्म ह। मुनिको पैसा करमेमें प्रतिर मही। (१) श्रीसद्गुम्ने फना है कि ऐसे मिग्य मार्ग सा ही माश्रय य। में दह भादि पनप महा बार देह, बी, पुत्र नादि कोई मी मरा मही 11 में पुर भैतन्यस्तरप गपिनाशी मारमा है। इमरा नाममापना करते हुए पापा धप एना संमक।
भीमद् सबम्यू [पर 41,18 ६३० फाति प्रापण १९५२ शरीर किसन! मोहका है। इसलिये मसग माझ्ना रसना योग्प है। राडा, भावण को १३ सन १९५२ १ प्रम-बमुफ पार्षक गमनागमन भाविक प्रसगमें धर्मास्तिकाय नारिके मुक प्रय, प्रक्रिया होतीमार परि इस वा हो तो उनमें समाग होना समर, जिससे वे मी काम समयकी तर पस्तिकाय नहीं करेगा सकते ! उचर -निस तय पर्मस्तिकाय मादिके सर्व प्रदेश एक समपमें वर्तमान है, बाद रिपान है, उसी तरह कालके सर्प समप कुछ एक समयमें विधमान मही होते, और फिर बम्पी बना र्पा पके सिमाप काका कोई पुणा द्रम्पत नाही, रिम्से उसका पस्तिकाप होना समय हो । वमुक प्रेशमें धर्मास्तिकाप वाल्मेिं क्रिया हो, वौर बमुक प्रदेशमें न हो, इससे कुछ उसके बस्तिकाप होनेका भैग भी होता । पम्प केवल एक प्रदेशामक हो और उसमें समाहात्मक बनेको पोम्पदा म हो, तो उसके वस्तिकाप हानेका भंग हो सकता है बत् तो होप बस्विकाप मी कराया सकता । परमाणु एक प्रदेशामक है तो मी उस तबके दूसरे परमाणु मिलकर बा समात्मारूप होता है, इसलिये र बस्तिकाप ( पुतगस्तिकाप ) मा पाप है। तथा एक परमाणु मो ममत पर्यापारमकपना है, और कारके एक सम्पमें सनत पर्यापात्मकपना मही है, क्योंकि बाप ही बर्तमान एक पापाप है। एक पापस्म होनेसे न इम्परूप नहीं खरा,गो फिर उसे मस्तिकाफ- रूप माममेका विक्रम्प करना भी संमष नही है। २ मा कापिक पौधोंका स्वरूप अर्पत सूक्ष्म होनेसे, सामान्य ज्ञानसे उसका विशेषरुपसे भान हरोमा कठिन है ता मी पदर्शनसमुबप मपमें, यो हामें ही प्रसिद्ध गा, १११ से १०१ प्रस्तक उसका कुछ स्वरूप समजाया गया है। उसका विचारमा हो सके तो चार करमा । १ अनि अपना सरे बलान शबसे नयापिक म बालों का नाश ऐ गाना संमन ऐसा समझमें बायो । यहाँसे माप बादिम्म होकर जो पानी पर वाकाश बाम्पसे एकत्रित होता 14 माप पादिरूप होनेसे बघित्त माम ऐता है, परन्तु बारसम होनेसे परिसे सपित हो गावा है ।वी भारि रुपसे जमीनपर पामेपर मीप सविच नावा। मिती बादिके साप मिस- मेसे मी या सवित्त व सकता है। सामान्यरूपसे मिमी अनिके समान मान शम नहीं है, इसलिये कैसा होतो मी उसन सचित पमा समन। . बौर जबतक योपे बानेसे उगनेको योम्पाता पण तब निर मही दोवा, या मालीशा पाता है। बामपि पचात् बर्षात् सामान्यस्मसे बीग (बारा) ताम पतरु सील य सकता है। इसके बीचमें उसमें से गांव भुव मी सस्ता है, परन्तु उस मर्षिक - 1 पत्र १२] विविध पन मावि संप्रह-२ वर्ष - पोतने के पश्चात् उसे निवीय मर्यात् निर्माय ऐनाने योग्य कहा है। काचित् उसका मान जैसा बाकार हो, मी परन्तु यह योनेसे उगमेकी याम्पसारमिस हो जाता है। समी बौनोंको वधि तीन पपकी नहीं होती, कुछ ही बीनोंकी होती है। ५ मैच विद्वानद्वारा सोन किये हुए पत्रकी विगतके बारेमें सो समाचार मेरा है, उसे पापा है। उसमें उस पत्रका जो 'बाहमाके देसनेका यत्र' माम रस्सा है, पपयार्य नहीं है। ऐसा किसी मी दर्शनकी म्यास्पामें वरमाका समावेश नहीं हो सकता । तुमने सप भी उसे भारमाके देसनका पंन मही समझा है, ऐसा मानते है । तथापि उससे कार्माण वपया तैमस शरीर दिखाई दे सकते है, मपया कोई दूसरा हाल हो सकता है, यह जानने की तुम्हारी मिडासा माझम होती है। परन्तु कार्माण मपया नस शाम मी उस तरसे नही देखे जा सकते। किन्तु पशु, प्रकाश मा पत्र, मरने बाळेकी देह, और उसकी छापा वा किसी वामासविशेफ्से पैसा होना समय है। उस पत्रविषयक गरिक विवरण प्रसिद्ध होनेपर, पर बात पूर्वापर अधिकतर जाननेमें जायेगी। हमाके परमाणुमोंके दिखाई देनेके पिपमें मी उनक लिएनेको वपना देखे हुए सबपकी म्पाझ्या करनेमें कुछ कुछ पाप-मेर भास होता है । हमासे गमन करनेवाले किसी परमाणु कपका (म्पापहारिक परमाणु-कुछ कुछ विशेष प्रयोगसे गो टिगोचर हो सकता हो) पिगोचर होना सभव है, बी उमकी अधिक कति प्रसिद्ध हनेपर विशेष समाधान करना पाप माश्म होता है। ६३२ रात्र, पाषण पदी ११ रवि १९५२ रिचारपान पुरुप दो कैमस्पदशा सेनेतक मृत्युको निस्प समीप समझकर ही माचि करते हैं प्राय उत्पम किये हुए कर्मको यस्पास मसि मृत्युके समय ही होती है। दो प्रकारके भाव हो सकते हैं- एक तो रचित, पोदा हो, परिचित हानेपर परमार्यप माष मोर दूसरा नित्य परि पित निन कम्पमा भादि मापसे रूति-धर्मका प्रणरूप माल । सहिधारसे यथार्थ भारमपरि षा पास्ताविक उपासमता तो सब जीवसमाको देख्नेपर, किसी किसी रिसे जीवको । कचित् कभित् हात बौर दूसरा यो पनाति परिचित मात्र है, वही प्राय सब जीपोंमें देसनेम माता है, और देहांत होने के प्रसार मी उसीका प्रायम्य देखा जाता है, ऐसा मानकर पस्पुके समीप आनेपर विचारवान पुरुष तयारूप परिणति करमेका AIR छोड़कर पहिसे ही उस क्रममें गया है। हम मप मा बाम क्रियाक बिरि-मिषेपके बारको बसनबत् करके, बफमा उसमें तपरिणामस उदासीन होकर देर और तरिपपक बमका पारम्पारका निक्षेप गोड़कर पयार्थ नाममात्र विचार करनेका सप राहा तो ही सापकता है। मन्तिम अवसर भानपर बनाम बादि संस्तर माविमा मझेन । प्रति क्रियायें हरित बनें या न मी ने ता मा जो नापको उपर कहा है, 4 मार जिसके उगा सम्म सफम । और या प्रमसे न यसको प्राप्त होगी। बाम -- श्रीमद् पाचन [पर ॥ तुमको भाप किया पारिके कितने ही कारगोस शेष विधि-निषेपका क्ष देसकर हमें और हो पा कि इसमें काय म्पतीत होनस भामाशापा कितना सहप स्थितिको सेरन करता है, और पर किस पयार्प सपा पार कर सकता है कि तुम्हें उसका इतना मधिक परिपय खेका कारण मारम नही रोता ! साममात्र हो विसमें उपयोग टगाया हाता या किसी तप ठीक कहा जा सस्ता t, परन्तु उसमें यो मगमग गागति-काउका अधिक माग म्पत होन जैसा होता है, पकिस निपे ! वोर उसका म्या परिणाम पापों हमारे प्यानमें मही खाता ! इस विषयमें धपित् एक प्रेरणा करनेकी रम भ है किन्तु तुम्हारी तपास्म सपि और स्पति म देखनेस प्रेरित करते करते पिको सकृषित कर लिया ।।ममा मी तुमारे विमें इस बातको अपश देने योग्य वासर है। सोग बनेको विचारवान बना सम्पपशि समझें, कबस उसासे कल्याण नहीं है, वापस म्पबहारके अमेक Aपि निपेच करमके माहाम्पमें मौ पुर स्पाम नहो। ऐसा हमें ये मगता है।पा पुछ गतिक पिसे सिमा । बत्रा इसमें और कोई हेतु, इस बिचारको मेहकर ये कुछ उन बच से बर्मुमति होने प्रेरणा हो उसे करने का विचार रसना ) सुविचार-की। 'मेक-समाप को मम्म होनेवाग नही पा सुति-निन्गके प्रफल सिप पिचारमानको इस देहको प्राधिकरम्य नहीं है। माप किपाकी वर्मुमति बिना विधि-निपेत्रमें कुछ मी वास्तविक कम्याण नहीं है। गण बादिके मेदका निर्वाह करमेमें, नाना प्रकार के निकम्प सिब करनेमें, मामाको मातरण करनेके बराबर है। बनेकातिक मार्ग मी सम्मक् एकात निवपदको प्राप्ति करानेके सिमाप दूसरे किसी अन्य देशसे उपकारक नी' ऐसा समझकर यो मिसा है पाकेवट वनुकंपा मुहिसे, निए- मासे निपटमासे पदममासे, पौर रितके लिये दो लिसा है—पदि तुम पार्ष चार करोगे तो पारिगोचर होगा मौर बचन के प्राण गया प्रेरणाके होनेका कारण हगा | ६३३ राख्न मापद सदी ८ १९५२ १ प्रम -प्राप करके समी मागौ मनुप्पमयको मोशन एक साधन मानकर उसका यात बखान किया है, और चीनको मिस तब प्रान हो वर्षात् विसस उसको पिरो, उस तय तसे मार्ग में उफ्रेश किया मालूम होता है। मिनोळ मामि वैसा उपदेश किपा माश्म नो ऐता । मेरो मार्गमें बपुरको गति नहीं होती पादि कारणोंसे वपा पार भाममोपमा पूर्वक विचार करनेसे जिससे मनुप्पी साबि । पैसा उपदेशा किपा मा रिगोपर होता है। निमोक्त मार्गमें उससे उभ्य ही देखा जाता है वात् सा न करते पर, या कमी मी मौरको पराम्प रो नाप तो संसारका त्याग कर देना चाहिये-ऐसा उपदेश देसनेमें वापससे मासे मेगो गृहस्थाश्रमका प्रण किये बिना ही त्यागी दो गाना भार उससे मनुप्फ दि समाना संमपी स्पोकि उनके नायागसे मो छ धनके समानापतिको समापना गती प्रवानगी और उसने गरे माय ने बैसाणे गापगा । इससे दुर्गम मनुष्पमपये यो मोधका सापनरूप मामा , उसी सारी समाये, इसपे विनमगवामय पैसा मामिप्राप कसे ये सकता है।
पत्र ६५] विषिष पत्र भादि संप्रार–२९ों वर्ष ५०९ उचर -ौकिक और बमैकिक (टोकोत्तर) दृष्टिमें महान् भेद है, क्या ये दोनों ठियों हो परस्पर विख्य समावबाग है। किक रछिमें म्यवहार ( सांसारिफ कारण) की मुख्यता है, और मगैकिक छिमें परमार्थकी मुस्यता है । इसलिये बगैकिक परिको छौफिक राष्टिके फलके साथ प्राय' (बहुत करके) मिठा देना योग्य नहीं । मैन और दूसरे समी मागौम प्राय मनुष्य देशका नो विशेष माहाम्य बताया है, अर्थात् मोक्षके साधनका कारणरूप हानेमे उसे चो पितामणिके समान कहा है, पर स्म है। परन्तु पदि उससे मोक्षका साधन किया हो, तो ही उसका यह माहात्म्प है, नहीं तो पास्तविक उठिसे पशुके देह नितनी मी उसकी कीमत माश्म नहीं होती। मनुम्प वादि पशको पदि करना, यह विचार मुल्परूपसे लौकिक टिका है परन्तु उस देहको पाकर बक्य मोक्षका साधन करना, मपत्रा उस साधनका निपय करना, मुख्यरूपसे यही विचार अगकिका पएिका समझना चाहिये । मौकिक टिमें मनुष्य बादि मशकी मि फरमा यह नो नहीं बताया है, उससे उसमें मनुष्य मादिके नाश करनेका बाशय है, ऐसा न समझना चाहिये गिकिक रपिमें तो पुर वादि अनेक प्रसंगोंमें हवा मनुष्पोंके नाश हो बानेका समय आता है, और उसमें बातसे गेग पायरहित हो जाते है, किन्तु परमार्थ भर्थात् अौकिक परिमें पैसा कार्य नहीं होता, जिससे प्राप पैसा होनेका समय बा । वर्षात् इस जगह गैतिक इशिसे निरता, अविरोध, मनुष्प वादि प्राणियों की रक्षा वौर ठमके यशकी मौमूदगी, यह स्वस हो यन गाता है और मनुष्प आदि वंशकी पदि करमेका मिसका हेतु है ऐसी शैकिक सि, उल्टी उस बगह पैर, विरोध, मनुष्य बादि प्राणियोका माश और उन्हें पचरहित करनेवाली होती है। यौकिक ररिको पाकर, वपना क्लौकिक रएिके प्रमावसे, कोई मी मनुष्य जीवस्या त्यागी हो जाम, तो उससे निसने गहस्थामम प्राण न किया हो उसके पशका, मथना मिसने गास्थामम प्राण किया हो भौर पुप्रकी उत्पत्ति न हो उसके पशका नाश होनेका समय माना समप रे, और उतने ही मनुष्योंका कम उत्पन्न होना समय है, जिससे मोम-सापनके हेवभूत मनुष्य दोहको प्रासिक रोकने मैसा हो गाय । किन्तु यह ौकिक पिसे ही योम्प हो सकता है, परमार्थ रिसे वो प्राप करके कम्पनामात्र होता है। कम्पना करो कि किसीने पूर्णमें परमार्थ मार्गका बाराषम करके यहाँ मनुष्पमा प्राप्त किया हो, और उसे रोटी मबस्पासे ही त्याग-पराम्प मतासे उदयमें बाते हों तो ऐसे मनुष्पको सतानको उत्पपि होने के पथात् स्याग करनेका उपोश करना अपवा उसे वाभमके क्रममें रसना या यपार्थ नहीं माश्म देता। क्योंकि मनुष्य दो तो केवल माप परिसे अपना वपेचारूपसे ही मोधको साधनभूत है, मगरूपसे दो पदार्थ स्याग-पैरम्प हो मोशका साधम समझना चाहिये । और से कारणों के प्राप्त करमेसे मनुष्य देहकी मोक्ष- सापकता सिद्ध नहीं होती, सिर उन कारणों के प्राप्त होनेपर उस देहसे भोग भादिमें पानेको मान्यता रहना, यह मनुष्प दोको मोसके सामनरूप करने के बराबर का जाप, भपका उसे ससम के साधनम्प करनेके बराबर कहा बाय, यह विचारणाप है।
भीमद् रामचन्द्र [पा ॥ मोळ मार्गमें बो चार वाममोकी पदस्था की है, या एकातरूपसे नही। पामच, एकदेष, बाभरतमी स्पा वाममके क्रम मिना हो स्पागलपसे चिरे है। निमसे पैसा होना मशक्य हो, रे परिणाममें पपार्थ त्याग करनेच मन रसकर बाममपूर्वक प्राति करें तो यह सामान्य प्रतिसे है, ऐसा गा गा सकता है। परन्तु मामु ऐसी क्षणभंगुरता कि सा क्रम मी किसी मिरको ही प्राप्त शेनेका बसर पाता है। कदाचित् वैसी बायु प्रामाई मी, तो जैसी पिसे भात् पैसे परिणामसे पपार्प त्याग हो सके, ऐसा सच रस्कार प्रापि करना तो किसी किसीसे ही मन सकता है। जिनोळ मार्गच मी ऐसा एकात सियत नहीं कि चारे निस भवस्या पर विस मनुम्पको स्याग कर देना चाहिये । तपास ससग वीर समगुरुके योग होनेपर, उस वामपसे किसी पूर्ति सस्कारमाहा वर्षात् विशेष राम्मवान पुरम, गृहस्पाममके प्राण करनेके पहियेही त्याग कर है, तो उसने पोग्य किया है, ऐसा बिनसिमान्त प्राय' करता है। क्योंकि मपूर्ण साधनोंक प्राप्त होने पर भी भोग मादिक भोगनेके विचारमें पाना, और उसकी प्रासिक लिये प्रफान करके, अपनेको प्राप्त मारम-साधनको गुमा देमे पैसा करना, और अपनेसे वो सतति होगी। जो मनुष्यदेह पाचंगी पदेह मोक्षक सापनरूप हेगी, ऐसी मनोरयमान कम्पनामें पड़ना, यह मनुष्यममको उत्तमत्व दूर करके उसे पछवत् करने के समान है। दिया भादि निसको धत नही, और शाना-पुस्पको धिमें गो वमी स्पाग करने पम्प मही, ऐसे किसी मा नपका मोहरम्पवान बौनको त्याग ऐमा प्रशस्त हो, ऐसा निमित्त कुछ एकत- समसे नहीं पा प्रपमसे ही मिसे सचम सस्कारपुळ गप न हो, या पुस्प काचित् त्पागका परिणाम म्प रस्कर माममपूर्वक वापरण करे, तो उसने एकातसे भूगो, और उसने त्या ॥ किया होता तो उत्तम था, ऐसा मी मिनसिात महाकेस मोके साधनका प्रसंग प्राप्त होनेपर उस नम्रको गुमा न देना चाहिपे यो निममगवानका उपदेश है। उत्तम Bस्कारमा पुरा गहस्पाममा सिपे बिना ही त्याग कर दें तो उससे मनुष्पकी पनि कम गाय, और उससे मोम-साधनके कारण मी रुक गाय या पार करमा वस्प रिसेही मोम्प माश्म से सका है। किन्तु तपाहप त्याग-पराम्पा पोग प्र रोनेपर मनुष्प देशको सफमता होनेके लिपे उस पोगका प्रमत्तसपसे, बिना विकसके गम प्राप्त करना पह विचार तो पूर्वापर परिम्स मोर परमार्थ पिसे ही सिख या जा सकता है। बापु सम्पूर्ण होगी और वपने संतति हो तो ये मार मोक्षका साधन करेंगी पा नियम कर तपा सतति होगी ही यह मानकर, और पारसे ऐका ऐसेही त्याग प्रकाशित होगा ऐसे भविष्यको कम्पना कर बाममपूर्वक प्रति करनेको कौन विचारपान एतरूपसे पोम्प समझेगा । एष अपने पैराम्पमें मिसे महता न हो और शाना-पुरुष जिसे स्पाग फरमे योग्य समझते हो उसे दूसरे मनोरपमात्र कारणोंके ममा अनिषित करणों के विचारको मेहर, ममित पौर प्रास उचम कारणोध माप करना, पो उतम है और यही मनुप्पभाको सार्पकता । बाकी दिमारिको तो यह पनामात्र है। मोके मार्गका नाग कर मेको कम्पना करने जैसा वो या होना सकी। तपा निस तपास पोलियम पापमयोमा पो उसे (होमवार मात्र मनुभ्यकी दर पत्र ] विषिष पत्र मारि संग्रा-२५ौ पर्प . पुत्रको ) मी रुकना पो, उससे तो किसीको मी तस्कर स्यगरूप मोच-साधनके प्रास हानेका संयोग न जाने देने जैसा ही होता है। तया नब किसी किसी ठसम संस्कारवान पुरुषोंके गृहस्पाश्रमके पहिसके त्यागसे मशरिक रोक- नेके विचारको लेते हैं, तो वैसे उत्तम पुरुषके उपदेशसे, अनेक गान बो मनुष्य मादि प्राणियों का नाश करते हुए नहीं करते है, ने उपदेश प्राप्त करके वर्तमानमें उस तससे मनुष्य माविका नाश करते हुए क्यों नहीं रुक सकते, क्या भुमहतिक प्राप्त करनेसे फिरसे पे मनुष्पमा क्यों नहीं प्राप्त कर सकते । पौर इस रीतिसे तो मनुष्पकी रक्षा और दि होना ही समय है। बगैक्षिक ररिमें तो मनुष्यको हानिनदि वादिका विचार मुख्य मही है, कश्याण-अमन्याणका विचार मुत्स है। वैसे कोई गया पदि मौकिक ररि प्राप्त कर तोमर नपने मोहसे हगारों प्राणि पोंके युबमें नाश होनेके रेतको देसार, मत मार बिना कारण हो मसे पुद न करे, जिसस बहुतसे मनुष्योंका बमाल हो चौर ठससे बाकी पनि होकर बहुतसे मनुष्य यद चाय, पर भी विचार क्यों नहीं लिया जा सकता। इस्पादि भनेक प्रकारसे विचार करनेसे लौकिक मि दूर होकर बौकिक पिसे विचारको मागृति होगी। (स्यादि भनेक कारणासे परमार्प परिसे नो मोम किया है, यही योग्य मारम होता है। इस प्रकार के प्रमोटरोंमें विशेष करके उपयोगको प्रेरित करमा कठिन होता है, तो भी संक्षेपमें जो कुछ सिमना बना है उसे उदीरणाकी तह करके हिसा है।) जबतक बने तबतक बानी-पुरुषके पचनोंको मौकिक भाशयमें न उतारना चाहिये। अपना अगकिक एपिसे ही विचार करना योम्प है। और नबतक बने तबतक मैफिक प्रश्नोतरमें भी विशेष उपकारके बिना पाना योग्य नही, बैसे प्रसंगोंसे कितनी ही बार परमार्थ ररिक सोम प्राप्त करने पैसा परिणाम माता है। २ माके सफल नपवा पीपमकी पाम्मको कुछ उनके वंशकी हरिके करने से, उनके रक्षणके खसे, ठमें ममक्ष कहा है, ऐसा नहीं समझना चाहिये । किन्तु उनमें कोममता होती है, इसम्पेि उनमें अनंतकायका होना समय है, क्या उसके बारे इमरी बहुतसी चीस निपापरूपसे या जा सकता है, फिर मी उसके भगोकर करनेको या रसना, या तिको तुष्मता होती है, इस कारण इन्हें भमन्न करा, या पपार्प माम होता है। । पानीको निमें बसरसाव जीत। यह बात ठीक है। किन्तु उपर कहे जनुमार जो पाके परफल बगैरके कारण के कारण इसमें नहीं है, इस कारण उसे बमस महीधा पनि से पानीके श्रममें नेकी मी बाहा है, ऐसा नहीं कहा और उससे मी नमुक पाप होना ही समय है, ऐसा उपदेश किया है। १ परिखके पत्रमें मोगके सचित्त-अधिक संवबमें समापान मिला है, उसे किसी Rष से . ।
५१२ भीमद परवद्र [१४ हो मिस किया परंपराही वनुसार मिला है फिर मौ उसमें जो कुछ कुछ विशेष मेद सम्मामें जाता है उस नही मिला । जिसने पोग्प न मगनेसे उसे नहीं किया । क्योकि यह मे पार मन है और उसमें कुछ उस तयका उपकार गर्मित उमामही गान पाता। ५ नाना प्रकारके मानोत्तरोन म्य एक मात्र बारमार्पक लिये हो, तो वामाका बहुत उपकार होना समय हो। । । बातें तपा ६३४ स्वमतापके पास पहना मप्र.सुदौ११गुरु १९५२ सागामसम्मसे पपापोम्प पधि । ताम पत्र मिले। 'कुछ मी ति रोकते हर विशेष अमिमान हताहै।।तपाहणारे प्रचार में बसनेसे उसमें या बाते मौर उसकी गतिक रोकनेकी सामर्थ्य नाही पती' हानि क्षमापना और टी राक्षसीके मोगवासिष्ठके प्रसगकी, गत्का भ्रम दूर होनेक लिमे, यो विधपता' रिसी, उसे पड़ी है । हाम्मे सिनेमें विशेष उपयोग नहीं य सकता, इससे पाये पांच भी सिकनेसे र माती है। सशेपमें उन पत्रोंका उत्तर मिनरूपसे विचारमे योग्य है। १ ति माविको न्यूनता बभिमानपूर्वक होती हो तो करना पोम्म है। विशेषता इतना है कि उस जमिमानपर निरतर से रखना हो सके तो क्रमपूर्वक पि आदिको म्यूनता ऐ सकता है, और उसपी मिमानका मी म्यून होना समय है। २ वनेक स्पोत्पर विचारपान पुरुषोंने ऐसा कहा कि शाम होनेपर काम, कोष, तणा भारि मात्र निर्मूल हो गये है,यसप है। फिर मी उन पचोंका पेसा परमार्थ नही किमान होनेके पूर्व में गन्दन पो अपना कम न हो । पपपि उनका सम् मेरम ता मानके रोता है परन्तु पातक कपाप भातिकी मदता वपना म्यूनता न हो तबतक प्राय करके शान उत्पम ही नही रोता । बान प्रास रोने में विचार मुस साधन है । और उस विचारके बैरम्प (भोगके प्रति ममा सचि) तपा उपशम पाप भाविकी बपन्त मरता, उसके प्रति विशेष सेद) ये दो मुस्प मापार है। ऐसा पालकर उसका निरन्तर ब्य रसकर पेसी परिणति करना योग्य है। पुस्पके पचनके पपार्य प्राण से बिना प्रापा करके चारध उम नहीं होता। और सत्पुरुष पचनका पपा रण-सपुस्पकी प्रवीति-यह कम्पाम होनेमें सोका निमित से सन बनम्य बामप-मछि परिणमित होनेसे होता है। प्राप करक पे दोनों परस्पर क्याम्पाम्पके समान है।की किसीको मुस्पता है, और जो किसी मुस्मता है, फिर मी ऐस्त तो बनुमबमें वाता हैलो सबा मुमुख से उसे सस्य वाम्पमणि, महमाल माविषन करने के लिये और माया में विचारदशा मीमूत हानेके लिये उत्तर कारणाम होती है। मोगमें बनासपि हो तमा अकि विशेषता दिखाने की पुदि कम की माप, तो दणा निक होती गाती है। परिफिक मानवारिक वा स्मन मा माप तो उसकरिशेषता मास नई, और उससे उसकी दय स्परही माप, ऐसा पपा मारम ऐनामात पत्र १५, ६१] पिपिप पत्र मादि संपा-२४ वर्ष , कठिनतासे बानीविका पन्ती हो तो मी मुमुक्षुको वह पात है । क्यों विशेषका कुछ वाश्यक उपयोग (कारण) नहीं है-ऐसा गबतक निश्चय न किया जाय, तबतक तृष्णा नाना प्रकारसे बावरण किया ही करती है। सौकिक विशेषतामें कुछ सारमूतता नहीं , यदि ऐसा निधय करने में बा माप, तो मुस्किम्से वारिका सिवना मिसता हो तो मी इसि ए सकती है । मुशिमसे वार्माविका नितना नही मिलता हो, तो भी मुमुक्षु नौव प्राय करके वाप्यान होने नहीं देता, अपना होनेपर उसपर विशेष सेद करता है, वोर मार्माधिकामें निराश होता मा भी ययाधर्म उपार्जन करनेकी मंद कल्पना करता है, झ्यादि प्रकारसे पर्याव करते हुए तृष्णाका परामर क्षीम ने पोम्प माश्म होता है। १ प्राय वाम्पामिक शाम मी सत्पुरुषके बचनको मारमदानका होता है, क्योंकि 'परमार्य वारमा ' शासमें इती नहीं, सत्पुरुषमें ही रहती है। यदि मुमुसुको किसी सत्पुरुषका बाध्य प्राप्त हुमा से वो प्राप पानको यापमा करनी योग्य नहीं; मात्र तपारूप वैराग्य, उपराम वादि प्राप्त करनेका उपाप करमा । पोग्य है । उसके पोग्य प्रकारसे सिम होनेपर झामीका उपदेश मुखम होता है, और पर पपा विचार तपा जानका होता है। १ जबतक कम उपाधिपुछ क्षेत्रमें बागीविका वस्ती हो सबतक विशेप मास करमेकी कल्पनासे मुमुक्षुको, किसी एक विशेष मठोकिक हेतुके मिना, अधिक उपाविपुल क्षेत्रमें जाना योग्य नहीं, क्योंकि उससे बात सी सतिया मद पा जाती है, नपत्रा विंगत ही मही होती। ५. योगवासिरके पहिलेके दो प्रकरण और उस प्रकारके पंपोंका मुमुक्षुको विशेष करके पक्ष करना पोम्प है। ६३५ ममम भारिमें होनेवाले शानके मिषयमें प्रथम बम्बई पर मिला था। राउमें उस रिपपकी विगतका यह दूसरा पर मिला है। वह सब शान होना समत्र है ऐसा करनेमें कुछ कुछ समझके मे में प्पास्मा भे होता है। श्री का तुममें समागम , ता उनके द्वारा उस मार्गका पपाशकि विशेष पुरुपार्य होता हो तो करने योग्य है। पर्तमानमें उस मार्गक प्रति हमारा विशेष उपपाग बता नहीं। सपा पत्रधारा उस मार्गफा प्राप दोष माया मा सस्ता मही। वामाफी कुछ कुरा उमटता के लिये उसका भस्तिप तथा माहाम्प मा मतासिमें भाने डिप, तपा माम्बानफे अधिधरीने के लिये का साधन उपकारी है। इस सिवाय माय दूसरी तरह उपधरी नही, इतना सच भाप रगना पोग्य है। ६३६ रासा, मादर १.५२ जैन दर्शनको परतिस देग्नेपर सम्पार्शन, वार स्वर्ग परतिमे गनेर में फेरबान समर।
। भीमद् पसबाद [पर नर्भममें दो फेममानका सहम रिसाद, उसे उसी तरह सममाना मुश्किल होता है। फिर वर्तमानमें उस पानका उसमें निपेप किया है, मिस्से तापी प्रपन करना मी सरसों माम होता चैन समागममें हमाय माविक निवास पवार, किसी भी प्रकारसे उस मार्ग उद्धार हम सौके परा विशेषरूपसे हो सकता है, क्योंकि उस सस्म विशेपकमसे समसमें बापा स्पादि । वर्तमानमें बैनदर्शम इवमी अधिक मम्यवस्थित वना विपरीत स्पतिमें देसभेमें माता है उससे मानो बिनमगवान्का xxx पम गया है, मोर भेग मार्ग प्ररूपित करते हैं । पास मापापची बात यहा दी है, और तमार्गमा प्रायः विन्द पैसा हो गया है। वेदोळ मार्ग, वो दोसौ पारसी पास कोई ई महान् बाबा र मौ देखने में माते , जिससे ग्रामों मनुष्यों को बेदोक परतिको बागृति ई पया सापारमरूपसे कोई कोई वाचार्य नपत्रा उस माकि माननेपाछे मैप पुस इसी तय होते यते । गौर नमामि पात मांस सा गणा माम मा होता। नमामि प्रग मी बात पोपी ही बाकी यो है, और उसमें भी सकों मेद । ना होनी, कित मूसमार्गके प्रमुख होने की बात भी उनके कानमें मी पाती, और वा उपदेशकके मी म्पमें मी-ऐसी स्पिति हो दी। इस परण विचमें ऐसा बाया करता है कि जिससे उस मार्ग बभिक प्रचार हो तो पैसा करना नहीं तो उसमें एनेवाली समग्रमको मूमनाम्पसे प्रेरित करना । पर काम मात कठिन है । तपा बैनमार्गको सप पित्तमें उतारना तथा समझना कठिन है। उसे विचमें उतारते समप बहुतसे कारण मार्ग-प्रविषयको गॉप, ऐसी स्थिति है । इसलिये मैसी प्रा चिको करते हुए र माश्म होता है। उसके साथ साप पर मोतीकि पदि यह कार्य इस कामें हमारेसे कुछ मी बने तो बन सकता है नहीं तो हमें तो मूळमार्गके सन्मुख होनेके लिये किसी सरेका प्रयान काममें मारे, ऐसा माश्म नहीं होता। प्राप करके मूत्रमार्ग दूसरे किसीके उम्में नहीं है। तथा उस के सतपूर्वक उपदेश करनेमें परमम्मुत यादि गुण मापा । इसी तर पातो भवरंग गुणोंको मो मायापकता है। पाँ मौद्र है, ऐसा रारूपसे मारम होगा। इस प्रतिसे यदि मूबमार्गको प्रगटसमें मना हो तो प्रगट करनेवाप्रेसनमा परित्याग करना पोम्पो स्पोंकि उससे वास्तविक समर्थ उपकार होने का समम मा सकता है। वर्तमान दशाने देखते हुए सत्ताके कपर ररि गाते हुए, कुछ समय पचात् उसका उइसमें बाना समय है। हमें स्वर-सरूप हान है मिससे पोग-साधनको इतनी अफेशा न होनेसे उसमें प्राति नहीं, तपाया ससंग-परिपागमें अपना विशुद देश परियागमें साधन करने योग्य है। इससे गंगोत्र मात उपचार रोता है। पपि वास्तविक उपकारका कारण तो बाहम-मानके बिना सरा नही है। हाटमें से पवर तो पर योग-साधन विरोफ्लपसे उसमें वाले पैसा दिखाई नही देता । इस कारण इसके बारके समपको फापना की जाती है, और तानसे चार वर्ष उस मार्गमें म्पतीत करने में बा तो में न समग-परित्यागी उपदेसका समप पा सकता है और गोंय कम्पाण होना हो तो मारो । पराभनुपर पर ५५५,५५] विषिष पम मादि समा-२९या वर्ष ५.५ । छोटी उममें मार्गमा ठसार करनेके संबध मामिमापा पो । उसके पचात् शान-शाके बामे पर क्रमसे प. उपशम जैसी हो गई । परम्तु कोई कोई भोग परिषयमें लाये, उने कुछ विशे- पता मादम होनेसे उमका कुछ मूरमार्गपर म्या पाया, और इस बार वो सफलों वौर हवा मनुष्य समागममें भाये, जिनमें से कुछ समझबाले तथा उपदेशकके प्रति वास्याबारे ऐसे सौ-एक मनुप्प निकगे । इसके उपरसे यह देखने में माया कि छोग पार होनेको इण्या करनेवाले तो पास है, परन्तु उन्हें पैसा स्योग नहीं मिलता । यदि सबै सचे उपशक पुरुषका संयोग मिझे तो बहुतसे बीन मूल- मार्गको पा सकते हैं, और दया मादिका विशेष उपोत होना समय है। ऐसा माम्म होनेसे कुछ चिचौ माता है कि यदि इस कार्पको कोई करे तो महै। परम परि शामनेसे वसा को पुरुष म्यानमें मही बावा । इसलिये पुछ सिम्मनबालेको बोर ही परि माता है, परन्तु मिसनपाठका मम्मसे हो ब्ध इस तयका या है कि इस पदके समान एक मी चोखम-मरा पद नहीं है, भौर सहोसक उस कार्यकी, अपनी वैसा चाहिये सा पेपता न ये, यहाँतक उसकी मात्र मी म करमी, धौर प्राय अबतक ठसी तण प्राति करनेमें गई है। मार्गका पोग बहुत सरूप भी किसी फिमीको समझापा, फिर भी किसीको एकत-पपासाणतक-मी पिया महाँ, अपया तुम मेरे शिष्य हो, भौर हम गुरु, यह भेद प्राप प्रदर्शित किया नहीं। कहनेका वाभिप्राय यह है कि सबसग परिस्पाग होनेपर उस कार्यको प्रति साज-स्थमावसे उत्यमें काले यो फरमी पाहिये, ऐसी ही मात्र कम्पना है। (२) उसका सचा सवा बार नहीं है, मात्र अनुक्पा वारि तया शान-प्रभाव रहता है, इससे कमी कमी हरि उठती है, अपवा अन्याशसे ही भगमें माधि है, फिर भी यह स्वाधान है। हम समझते हैं कि या उस तर सग-परित्याग हो तो हमारें मेग उस मूसमार्गको प्राप्त करें। और हारों सोग उस सन्मार्गका मारापन कर सङ्गप्तिको पारें, ऐसा हमारेसे रोना समय है। हमारे संगमें स्याग करनेके सिप भनेक गायोंकी पति हो, ऐसा भगमे पाग है। धर्म स्थापित करमेका मान बहा है। उसकी स्पृहासे मी कचित् ऐसी रति यसकती है, परन्तु बारमाको अनेक बार देखनेपर उसकी समवता, इस समयकी दशामें कम ही माझ्म होती है। और यह गुण इस सवा दो होगी तो वह मी क्षीण हो सायगी, ऐसा वात्प माश्म होता।क्योकि जैसी चाहिये सी योग्यताके बिना देश छ्ट बाय, पेसी स कल्पना हो, तो मी मार्गका उपदेश करमा नहीं, ऐसा बारम- निथप निस्प राता है।एक इस बसपान कारणसे ही परिमादिके त्याग करनेका दिपार या करता है। मेरे मनमें ऐसा पता है कि पदि रोज धर्मका प्रकाशन करना अपना स्थापित करना हो तो मेप दशा पपापोग्य है, परम्त निनोक धर्म स्थापित करना हो तो ममी इतनी पोम्पता नहीं, तो मी विशेष योग्पता है, ऐसा माइम होता है। ६३७ रेनाप! पाता पोमति करनेम्प पारा सहयमाबमे समाधान हो, ऐसा रागाप, नपा परा अवश्य प्रर्पनप परिणत होगाप!
भीम पसवय [८ उसका कार्यन्म होना माय बात तुफर माझ्म होता है। क्योंकि छोटी छोटी बातों में म मत मतभेद है, और उसका मूग पहुत गहरा है। मङमार्गसे होग सासों ग्रेस पूर है । इराना हो मही, परन्तु उन परि मूरमार्गविासा उत्पन्न करानी हो, तो मी बहुत काम्का परिचय होनेपर भी, माहरोनी कठिन पो, ऐसी उनको दुरामा वादिसे सप्रधाम दया गती। उमतिके साधनोंको स्पति करता योनगीरके स्वरूपका निरूपण मुम्मार्गक वनुसार भगा मगह हो । मगह जगह मतमेदसे कुछ भी करयाण नहीं, यह मात फै। प्रत्पन्न सहरुको वाहासे ही धर्म है यह बात हम माने । इम्मानुपोग-मात्मनिपाका -प्रकाश हो। स्पाग राम्पको विशेषतापूर्वक साधु मेग विरें। नपतलाश साबुपर्मप्रकाश बारकपर्मभकाश पशविसर. पाय बोंकी बनेक गोषोंको प्राप्ति ६३८ पाषा भत्रपद १५ सेम १९५२ ॐ (बानको पेवासे ) सर्वम्पापक सचिदानन्द ऐसी में मामा एक-ऐसा विचार करना -- पान करना। निर्मक, अस्यन्त निर्मस परम पुर पैतापपन, प्रगट वामस्वरूप है। सब कुछ पटाते पटाते को बाप अनुभव पता है, वही नामा है। यो सबको चामतीदरवारमा है। जो सर भाषाका प्राश करतीपा वात्मा। उपपोगमप बामा है। भम्यावाच समाधिस्वम्पबामा है। भामा ।मामा अत्यन्त प्रगट है क्योंकि सदन प्रगट अनुभवमें है। मनुस्म्म मौर मममिनस्ताप होनेसे मामा निस्प है। भानिमपसे परमार है। उसदेससभोता , मान होनेपर मात्र परिणामी है। सपा सभार परिणाम पर मारे । सहर समग साराब, मरिचार और संपम भारि ' उसमे साबन है'। भामा भलिबसे ज्गार निर्माणतर पर सपे-मयंत स है, क्योंकि वे प्रगः अनुमा भाते है।
पत्र १, ५१.] विविध पम मावि संपा-२ यर्प ५१७ प्रतिरूपसे मामाके परमावका कर्चा होनेसे शुभानुम कर्मकी उत्पति होती है। कर्मके फछ- युछ होनेसे उस शुमामुम कर्मको बारमा मोगता है। इसलिये उस्कृष्ठ शुमसे उसय भशुमतक म्यूनाधिक पर्याय भोगनेहप क्षेत्र माश्प है। निवस्त्रमान शानमें केवर उपयोगसे, तन्मयाकार, साम-स्समावसे, निर्विकल्परूपसे जो मारमा परिणमन करता है, पकेगान है। सयारुम प्रतीतिमावसे चो परिणमन करे, यह 'सम्पाता। निरन्तर वही प्रतीति या करे, उसे 'पायिक सम्यवस्व' कहते हैं। कभित् मा, कपित् पीय, कचित् विस्मरण, कचित् स्मरणम्प इस तय प्रतीति ये, उसे क्षयोपशम सम्परत्व करते हैं। उस प्रतीतिको चबतक सणगत भावरण उदय मही बापा, तबतक उसे ' उपशम सम्पन्न , बास्माको नब बावरण उदय भारे, तब वह उस प्रतातिस गिर पड़ती है, उसे ' सास्वादन सम्परत्व' फरसे है। वापत प्रतीति होमेके योग्य यहाँ सत्तगत अल्प पुगडका बेदन करना बाकी रहा है, उसे बेदक सम्पत करते हैं। वपारूम प्राप्ति होनेपर अन्य भानसंबधी बा-ममस्त वादि हर्प, शोक, कम फमसे क्षय होते हैं। मनरूप योगमें तारतम्पसहित बो कोई चारित्रको बाराधना करता है, यह सिदि पाता और यो सस्प-स्पिरताका सेवन करता है, पर समान स्थितिको प्राप्त करता है। निरन्तर स्वरूप-गम, स्वरूपाकार उपयोगका परिणमम स्यादि समाव, अन्तराप फर्मक पप होनेपर प्रगट होते हैं। जो केवल समाल-परिणामी बान है, वह केवलकान है। ॐ सविनम्दाप नम । ६३९ बानद मात्र परी १२ १९५२ पत्र मिमी। मनुष्य मानि प्राणियोंकी पति" के सपमें तुमने जो मम ठिसा था, पर प्रम निस कारणसे लिया गया था, उस कारणको प्रश्न मिलने के समय ही मुना था। ऐसे प्रश्नमे विशेष वारमा सिर होता मही बया सपा काब्धेप पैसा ही होता है। इस कारण बारमार्थक प्रति छन होने के लिये, तुम उस प्रकारक मानके प्रति पथमा उस तयके प्रसंगोंके प्रति उदासीन एना ही योम्प है, पर सिहा पा । तपा यहाँ उस तबके मनके उत्तर जिसने वैसी प्राप बर्तमानमें दशा यती नहीं, ऐसा लिया था। बनियमित भौर बाप बापुवाली इस देश में भामापका मश सबसे प्रपम करना पोग्य है।
[पर५४ ५१८ भीमर्मवन्द्र ६४० ठा, मात्रप १९५२ बोय, नैयायिक स्य, बेन और मीमांसा ये पाँच मास्तिक वर्षात् बप-मोध मादि मारो सागर रमेवारे दर्शन है। मैयामिक मभिप्रायक समाम शेपिफोंका वमिप्राप, सोयो समान हो पागका ममिप्राप है-इनमें पोका ही मेद है, इससे उन दमोंका नव्या रिचार मही किया । मीमांसा के पूर्व और उत्तर इस पर दो भेद है। पूर्वमीमांसा और उत्तरमामासाने रियर विचार-भेद है, फिर भी मीमांसा शब्दसे दोनोंका चोप होता है। इस चरण या मौमासा ससे रोगों हो समझमे पाईये । पूर्वमीमांसा मिनाय और उत्तरमीमांसा मेवात नामसे मी प्रसिद्ध है। बौद्ध और जैनदर्शन के सिवाय याकांके दर्शन बेको मुल्य मानकर होने है, इसठिपे ये दाभित दर्शन को प्रकाशित कर अपने दर्शक स्पापित करनेका प्रपन करते हैं। पौर और नर्मन बदक मामित नहो- स्मन दर्शन है। वारमा वान फार्पको न साकार करनेवाला चाल नामका प्रयदर्शन है। मौसमक मुख्य चार भे है- १ सौचविक, २ माप्पमिक, २ शुम्पबादी और • विज्ञानवादी । २ मिम मिम प्रकारसे मागेच म्पबस्पा स्वीकार करते है। कनवर्धनके पो ही प्रकारतरसे दो मर-दिगमार और भेवयम्बर । पाँच मान्तिक दर्शन अगत्को बनादि मानते है । बौख, सांस्य, म मोर पूर्णमामासाले मता- मुसार सुपिका पर नहीं है। मैयापिकोंके बनुसार बिर स्परूपसे फर्ता है । इतके मतानुसार मामा नगद विरूप वर्षात् कम्पितरूपसे मासित होता है, और उस विसे नसमे ईपरको भी कल्पितरूपसे ही कर्ता स्वीकार किया। योग वमिप्रापके अनुसार ईथर निपतास्मसे पुस्पविशेष है। पौर मतानुसार निधर और पस्तुतमप ममा म पणिक है। शून्यबादी बोलके मा- नुसार पबिहानमात्र है। और चिानवादी बोरके मतके अनुसार समातिल । उनमें मिल रूप क्षणिकस्मसे माया है। नैयापिकाक मलके मनुसार सम्पापक भसमय गवस मी सर्वम्यापक है।बामा मारिका मनके सामिप्यसे पान उत्पम होता है। सत्यके मतानुसार सम्पापक वर्गस्य बारमाय मिल्प परिणामी मौरमिमात्र सस्म है। १ एमपी पर ही ममम माश्रिामोकार पनि प्रल पप्पा मोबाइल म्पमामिक मोर एपबारे रोग एक मित्र मनपराएमा म निस्म । ने वित माविक मीमावा। २ समयमा जलसमा महामारी और प्रानमारतीसरे .
पर १४१] विविप पत्र मादि संप्रार-२५ो पर्प 1 चैनके मतानुसार बनत द्रम्य वरमा है । प्रत्येक मारमा मिन मिम है । धान दशन वाद पेतनास्वरूप, नित्य वौर परिणामी प्रत्येक बामाको असक्ष्यात प्रदेशो सशयर-अक्गाहमा माना है। पूर्वमीमांसाके मतानुसार मीच मसत्य है, घेवन है। उत्तरमीमांसाके मतानुसार एक ही मामा सम्पापक सचिदानन्दमय विकागवाम्प है। ६४१ बानद, बासोम १९५२ वास्तिक मूस पाँच दर्शन आरमाका निरूपण करते है, उनमें नो मेद देसनेमें लाता है, उसका क्या समाधान Pन प्रतिदिन बैनदर्शन क्षीण होता हुमा देसनेमें वाता है, मौर पर्वमानस्वामीके होनेके पमात् पोरे दो वर्षोंमें उसमें नाना प्रकारके मेद ए रिसाई देते हैं, उन सबके स्पा कारण हैं। परिमल मादि भाचार्याने नवीन योजना की तरह राधानको उमति की माश्म होती है, परन्तु पोक-समुदायमें मैनमा का अधिक प्रचार हुआ दिखाई नहीं देता, क्या तपासप अतिशय- सपन धर्मप्रवर्सक पुरुषका उस मार्ग में उत्पम होना कम हो रमाई देता है, उसके क्या कारण है। बब, वर्तमानमें स्पा उस मार्गकी उमति होना समय है। और यदि हो तो किस तर होना संमत है, मर्यात् उस बातका फासि उत्पम होकर, किस रीतिसे, किस रास्तेसे, कैसी स्पितिमें प्रचार होना सममित मान पाता है। फिर जाने वर्षमानस्वामीके समपके समान, वर्तमान काळके योग भारिके अनुसार पर पर्म प्रगट हो, ऐसा क्या दीर्घ-पिसे समब है। और पनि समय हो तो किस किस कारणसे समब है। गो नैनसूत्र हासमें निपमान है, उनमें उस दर्शनका सम्प बात मा सिसा इजा देखनेमें यह नियम किस सय दर हो सकता है उस दर्शनकी परपरामें एसा कहा गया है कि वर्तमानकामें फेषणहान नहीं होता आर पणानका विषय समस्त काळमें मोकामेकका द्रम्प-गुण-पर्यायसहित जानना माना गया है, क्या पर पया जान पाता है ! अयथा उसके सिपे विचार करनेपर स्पा कुछ निर्गप हो सकता है। उसकी म्पामयामें क्या पुरा फेरफार दिखाई देता है । और मृा म्याम्पाके भनुसार पदि कुछ दूसरा मोवा होवो उस वर्षक मुसार वर्तमानमें फेरबान उपम ऐ सकता है या नहीं 1 बार ठसा उपरश दिया जा सकता है या नहीं ! तथा दूसरे मामाको यो पामा की गई है, क्या पह मी कुछ फेरफारसाठी माश्म होती है। भौर पर किन घरोंसे ! पर्मास्तिकाप, पर्मास्तिकाप इम्प मम्पम वनगाही, सोच-विकासको मानन मामा, महा- विदेश वादि सत्रकी म्पाप्या-कुए मपूर्व विसे मना कही तसे माफ्त प्रवण प्रमाणसरित सिर होने पोप गान पाते हैं या नहीं। पाता - ५२. भीमर पाचन [ne गमके मतमतान्तर बहुत ही छारे छोर विषयोंमें प्रबउ भामही होकर मिम मिमहपसे दर्शक मोहनापके घरण हो गये है। उसका समाधान करना कठिन है। क्योंकि उन गेगोंकी मतिमें, निरोप मापरणको प्राप्त किये बिना इतन अप कारणोंमें बयान मारना संभव नहीं। वपिरति, देशविरति, समिति, इनमें कौनसे आममया पुरुषसे विशेष उपति होनी समहो। सविरति गतसे कारणोंमें प्रतिष के कारण प्राति कर सकता नहीं । देशनिति और भतिर विकी तथाम्प प्रताति होना मुस्किा और फिर जैनमार्गमें मी उस मावका समावेश कम है। यह स्किम्प हमें क्यों उठता है! भार उस शमन कर देनेका ति है, उसे सम्म किये देते। ६४२ जिनाप नमः (१) मगवान् मिनके पाएगेकसम्पान मारि मात्र मायामिक रिसे सिम हो सकते है। पासा बारिका सरूप मा माप्यामिक रिस समसमें वा सकता है। मनुष्यको उचाईक प्रमाण मारिम भी ऐसा ही हा कानप्रमाण मारि मी ठसी तर पाते। निगोद बादि मी उसी तरह घर सकते। सिवस्वम्प भी इसी माम्से मनन करने पोम्प मामला। मेकशामका मर्य बनेकांत शम्दन बर्थ प्राप्यामिक है। संवा शप्दका समहाना बहुत गा है। धर्मकपादप चरित माध्यामिक परिभापासे भगत भाम होते हैं। महार मादिका वर्णन मी वाप्पामिक परिमायसे निम्पित किया माम होता है। (२) मन्त्रिप जानके मिनमगवाम्ने रो मे मता है प्रत्यक्ष पार न प्रत्पन देश प्रपत्रके दो मे अनि और मन पर्यव । इस्मिारूपस काणेकम करत हर मामा, अन्त्रि पक बामन पिना ही मुक मशिने माननेको यदिखते हैं। बनिम्विापसे मानसिक रघु बिर महसे माननको मन पर्पज प्रते है। सामान्य विशेष बाप माहमपरिम परिनिहित युद्ध के- बान सब प्रस्पना (१) प्रीजिनमगवाम्के को हुए मात्र सम्पारम-परिमापामप होनेसे समधी बामे कठिन है। परमपुस्सका सपोग प्राप्त होना चाहिये । म परिमाया चारच यथारपार निभासम करमा । पोम्प है।
काषिठा, भाषण बदी २, १९५२ ६४३ * उपदेश-छाया । मी, पुत्र, परिग्रह वादि माबोंके प्रति महान एनेके पपात् यदि ऐसी मानना ये कि 'गप में गोगा तब इन वियों मादिक समागमका त्याग कर सकेंगा,' तो यह मानके ही मन कर देने की बात समझनी चाहिये, मर्यात् उससे मुहानमें यपि भेद मही पाता, परन्तु मा वाम रणरूम हो जाता है । तपा शिप्य मादिभपना मछि करनेवाले मार्गस युक्त हो मागे वत्रा घटक मागे, ऐसी मापनासे पदि हानी-पुरुप मी वाचरण करे तो बानी-पुरुपको मी नियबरणवान वापरणरूप हो जाता है और उससे ही वर्धमान नादि धाना-पुरुष अनिदापूर्वक साढ़े बाद वर्पतक ये उन्होंने सर्मया संगताको ही प्रेयस्कर समझा एक शरदके मी उचारण करनेको पयार्य नहीं माना और सर्वथा निराकरण, योगरहित, मोगरहित और मयररित बान होने के बाद । उपदेशका कार्य वारम किया । इसलिये इसे इस तय करेंगे तो ठीक है, अपना इसे इस तर न या बाप तो मिप्या है, इस्पादि विकल्पोंको साषु मुनियों को न करना चाहिये । वामकसके समपमें मनुष्योंकी बुरा भायु तो मीक पास पठी नाती है, कुछ निद्रा पठी पाती है, कुछ धीमें पछी पाती है, और वो कुछ पोपीसी बाकी हता है, उसे गुरु ष्ट । वर्षात् मनुप्प-मब निरर्थक हो पा जाता है। (२) भाषण पदीय प्रश्न – केबबहानाने जो सिद्धानका प्ररूपण किया है या 'पर-उपयोग' या 'स उपयोग! शाममें कहा है कि केसवानी स्त-उपयागमे ही रते है। उत्तर --तीर्थकर किसीको उपोश दें वो इससे कुछ 'पर-उपयोग नहीं कहा जाता ! - उपपोग' उसे कहा जाता है कि जिस उपाको करते हुए रति, परति, हर्प और महकार होते हों। जानी-पुरुषको तो तादात्म्प संप होगा मही, निससे उपश करते हुए उसे रति वरवि नहीं होते। रति-वरतिका होना पर 'पर-उपयाग कहा जाता है। यदि ऐसा हो तो केवडी पोफाको जानते १-देखते ६ टौमी 'पर-उपपोग' का गाय । परन्तु यह बात नहीं है, क्योंकि उनमें रवि-अरतिमाघ मही है। सिदातको रचनाके पिपमें या समझना चाहिये कि परिवफ्नी बुद्धि न पाच, वो इसमेरे बचन बसत् है, ऐसा म करना चाहिये । पोंकि जिसे हम भसद करते हो, उसे तुम परिसे शामसे हो ना बनीव करना सीम्डे हो । भर्पात् उन्दी शामक वाधारसे हो, तुम नो कुछ पानत हो उसे कन् १९५९परम-मपरम्प में श्रीमायावतमानस भागत कामिन या पापा मारिष माचिरमिये । उस समय उनके समीपाती माई अंगार मनी स्माभिम भीमो उपदे-रिपायरी गजामात्र ग मई, गनरे बापारले उनि उत NIOR मित्र मिस वर परत मन भार मापन ममम लिव सिमा पापही पर यहाँ उप-जापा ममें रिपा-मनुवाद .
- भीमद्रासचन्द्र [६५ तुमने गामा , मो फिर सई वसत् काना, या उपकारके कोप करनेके बराबर हो यि मायगा । फिर शामके निशानेबाने मी विचारवान थे, इस कारण रे सिविक विषपमें गाते ये | सिात महापौरस्वामी के बहुत बर्ष पमा लिने गये है, इसलिम उमें बसत् काना दोप गिना बापगा। हामीको बाबासे पम्नेमा मधिक मुमुक्षु बालको, पदि गुस्ने 'एचके पाउने अर्यात् चिये मादिक समागममें न जानेको' बदा को हो, तो उस बचनपर विचास कर, परमी उस उस स्पानको नहीं नाता यस कि निसे मात्र वाप्यात्मिक शास वाहि गोचकर ही मुमुक्षता ऐ गईणे, से ऐसा बाकार या करता है कि इसमें उसे गीतमा ही क्या है। एस ही पागम्पमके कारण उन नियों बार के समागममें जाता है। कदाचित् उस समागमसे एक-दो बार कामच मी गाय, परस्त पीसे उस पदार्पको घोर एि करते हुए 'पो,' ऐसे करते करते ससे उसमें मानन्द बाने णता, और उससे या सिपोका सेवन करने भगता। मोडामाम पौग तो मानाको भावानुसार हा वाचरण करता है भात् पर दूसरे विकल्पों को न करते हुए पैसे प्रांगमें कमी मी नही पाता । इस प्रकार निस गानको, इस स्थानको बारा पोम्प नहीं ' ऐसे पानी के सपनोंक प निवास पर प्रपच स्तमें सकता है। वर्षात् यह इस कायमें प्रात मही होता, जब कि रिसे यानाकी नाकारिता नहीं, ऐसे मात्र माध्यामिक हा मोचकर होनेवासे मुमुक्षु फरमें किरा करते है, और समझा करते है कि इसमें उसे बोलना होक्स है।' ऐसी मा पताको कर पा चार युत हो जाता है और बागे मनहीं सकता । या यो क्षेत्र हैम नितिवाम है, किन्तु जिसे निति हो उसे दो तोहै। पपा बो सवा मानी , उसके सिमाप दूसरा कोई कामचर्यक परा न हो पर केस कपनमात्र है। जैसे गिसे निति मही उसे प्रयम तो ऐसा होता है पर क्षेत्र मेष्ठ है पापना पोम्प परम्त फिर ऐसे करते करते विशेष प्रेरणा होनसे पि क्षेत्राकार हो जाती है। कितनाति क्षेत्राकार नहीं होती, स्पोंकि एक तो क्षेत्र निषिवाम है, और इससे उसने स्वयं मी निचिमात्र प्राप्त किया है, इससे दोनों योग अनु। प्रवानिपोको प्रथम तो ऐसा ही अभिमान हा करता है कि इसमें गौवना ही पाहै। परम्त पासे बपीरे धीरे भियों बार पदार्पोमें फंस गाता है, जब कि सोहानाको पैसा नहीं होता। हाहमें सिखातोंको गो रचना देखने माती है उन्ही बक्षरों में बमुकमसे सकरने उपदेश रिपा या कई बात मोहै। पल्तु जैसे किसी समय किसाने वाचना प्रपना, परावर्तना, अनुप्रेक्षा कर धर्मपाके विपपमें जा तो उम सम्प लासपी बात पर बतई । फिर किसीने म म पक्षमा मिसन प्रचाकी है सोया कि चार प्रकारकी---माक्षेपणी रिशेपणी, निमणी, सगणी । इस इस पय म मा होती हों या उनके पास जो गणपर होते उन मातोपानमें इस मे। और अनुमसे उन रचना करते हैं। से यहां भी कोई मनुषई बाप परमेसे प्यानमें रसबर मनुस्मसे सय रचना करता है। बाकी तार सितना में उतना पुछ समय सब उनके प्यानमें हो या औरत अमिताप हो प्यानमें बताया गणपर मी पुरिमान थे, इससिपे उन ahu परे हुए बाम कुछ रनमें नहीं बाप, या पात मी नहीं है।
प्राप्त ५४५] उपदेश-प्रपा કરી सिवातोंके नियम इतने अधिक सहत है, मिर मी यति छोगोंको उससे विरुण आचरण करते ए देसते है । उरणके लिये कहा गया है कि सामुभको तेल राख्ना मही चाहिये फिर मीने ोग गम है। इसमें कुछ बानीको वाणीका दोष नहीं है, किन्तु गायकी समझनेकी शकिका ही दोष । सीबमें समादि म हो तो प्रत्यक्ष योग भी उसको उल्टय माझ्म होता है, आर पPि सद्धि हो तो सोपा मासित होता है। = बानप्रास पुरुष । वात = विश्वास करन योग्य पुरुष । मुमुखमात्रको सम्पमपि नीव मही समन्च छेना चाहिये, नीबके मूहमे स्थानक बनेक इसलिये विशेष विशेष जागति रसनी चाहिये, म्याकुस होना नहीं चाहिय, मरता म करनी चाहिये, पुरुषार्थ-धर्मको वर्धमान करना चाहिये । बीपको सत्पुरुषका संपाग मिलना कठिन है। बफ्ना शिष्य यदि मरे धर्ममें बसा नाय तो अपारमार्थिक गुरुको सर वा भाता है। पारमार्षिक गुरुको 'पह मेरा शिष्य है। यह माष होता नही। कोई गुरु-आश्रित बीच बोधके प्रवण करनके लिये कभी किसी सहस्के पास गया हो और फिर पर अपने उसी पुगुरुके पास वाये, तो वह कुगुरु उस गोरको बनेक विचित्र विकल्प मैटा देता है, जिससे पर जोर किरते सगुरुके पास जाता नहीं । उस विचारे बीनको तो सत्-असत् पाणीकी परीक्षा मी नही, इसठिये बा टगा नाता है, और सग्मार्गस म्पुत हो जाता है। राछन भाषण परी ६ शनि १९५२ मकि यह तय मार्ग मजिसे परकार दूर होता है, सण माश होता है, भार साथै मामि गमन होता है, भम्य विकन्प र होते हैं-ऐसा यह मलिमार्ग भष्ठ है। -बामा किसके भनुमत्रमें माई कही जानी चाहिये ! उत्तर -रिस तरह तलवारको म्पानमसे निकासनेपर प उससे मिल मागम होती है, उसी तय विसे मारमा रेइसे स्पर भिम माश्म होती है, उसे धामाका मनुमत्र हुमा कत्रा यावा है। मिस तय ष भौर पानी मिले हुए है उसी तप आग्मा और देर मिझे हुए यते है। चौर पानी किया करनसे जा भिन्न भिन्न जाते हैं तब भिम कर माने है। उसी तर मामा और देवपासे मिन हो सानेपर मिम मिम को गाते हैं। बतफ एप की बार पानी पानीका पायो प्रास न फर वरतक निया माननी पाहिये । परि मामाको गान शिया हो वो किरक पर्याय भगाकर समस्त निमस्पनप सकको भति पण महाँ । वरना दोष कम से बाहरण र हो, तोही समझना चाहिये निबानीकन सचे हैं। हमें भम्प अमम्पकी चिता म रम्म ए, हसमें ता जिससे उसकार हो ऐम छाम धर्म-म्पापार करना चाहिये । पान उसे करते है मोलमोरके समपमें उपस्थित रहे अपात् बिससे हर शोर न हो। सम्पाशिल गोकमारिके समागममें एकाकार होता नहीं । उसके भरत परिणाम नही। अज्ञान मार O मा कि यह जानते ही उसे तुरलगा देता है। बहुत ही जागति होती है। मप भवानका ही है। वैसे कोर जि पठा मा पास और उसमे सिंहनाको मप माता नही, मितु उसे - प्रस्न ।
५२४ भीमा पचान्द्र [५४॥ माम्म होता कि मानो की कुल हो चहा वाया । उसी तए पौशिक संयोग पानी एममता है। रम्पके मिडनेपर वामंद होता हो तो पमान है। कानाकी दशा गुत ही बहुत ।। पापातम्प म्याण यो समसमें पाया महाँ, उसका कारण पचमको बावरण करनेवाम दुरामात्र-कपाप है। बुरामहमालके कारण मिमात्र क्या है समामे बाता नहीं । दुरापाको मेव दें तो मिष्याल र मागने लगे। कम्पाणको बकरपाण वोर मम्याणको कम्पाण समन्नम्मा मिप्पाल है। यह मादि मायके कारण ओक्को कास्पाणका काम बतानेपर मी सममें माता नहीं । कपाप दुरामा वादिको छोड़ा न बाप तो फिर या विशेष प्रका- रसे पौका देता है । म्याप सत्तास्मसे मोर यता है, और या निमित्त बाता है समीरो माती तबतक पी होती नही। प्रम-पा विचार करनेसे स्ममात्र बात है। -विचारमानको पुनरमें तमपता-तादाम्पमार-होता मी मानी पदि पौराणिक संयोग दर्पका पत्र बांध तो उसका भाग प्रम दसाई देने गता है, और परि भया फा बपि तो उदास हो पाता है। सर्प देसार नब नामामि मपका कारण उपस्थित हो उस समय तादाम्पमाल प्रामाता है! निस मयता हो उसे ही हर्ष-शोक होता है। जो निमित्त है पपना कर्प से बिना मा यता । मिष्यापिके मध्यमें साझा (बानरूपी ) मही २६ वर नामा दोनों मिम मिम, ऐसा हानाको भेदमा पानी के मममें साधौ । पान पर जागति होता इनके पैगसे जो मिमित मि उमें पाटा सकता है। श्री स विमान परिणाममें ये उसी समय कर्म योगा, और यस स्तमान परिणाममें से उस समप कर्म पावता नहीं। सपा पूर दो ही मोल होती है। सहरका बाके बिना वारमाया मानके पासोमासके मिबाप दूसरा कुछ भी नही हो सकता ऐसी बिनभगवान्को भाता है। पाँच इन्द्रियाँ किस तर मय होता है ! उत्तर -पाकि उपर तमामात पनेसे । कि मुखानेसे उनकी सुगंधि परे ही समय- तक पकर मा हो जाती है कुमम गाता है, और उससे कुछ सोप हवा मही । उसो तय तुल्य मान मानेसे इन्दियों के विषयमें हम्मा होती हो। पाँच इत्रिपोंमें निहानियके वश करनेसे बाकीको पार इजिपो सान हो वश हो जाती । प्रमा-शिपमे बानी-मुम्पसे प्रश्न या के बाद उपांग तो गत गहन है और इससे * मे समसमें महीमा सकते, इसचिपे सपा बरसे बाद मंगोंका सार ही पतासे कि गिसके अमुसार माचरण को मेरा स्पानो गाय । एवापर मम् परमपी गुम्य मानोरम ज्योषा मनराम वर्ग माई मायने मप्रस्ने भिव्य :-सिमामे Todaमाले बाबरवले हुए मोई नाम मरी बम्प मिपान कोई मरमहो।-अनुषार १४] उपदेश-छाया જર उत्तर -सष्टमने कहा-पियोंका आप करना हो बारह उपांगोका सार है। पे पतियों दो प्रकारकी कही गई है -एक वाघ बौर दूसरी वसरग । वाणाति अर्थात् मामासे बाहर माचरण करमा । तथा बामाके भीतर परिणमन करना, उसमें समा चाना, वह वत ति। पदार्पकी तुम्ता मासमान हो तो भाति र सकती है। मिस तय पोसासी काम- तके मिजाके घोके झट मानेपर, बादमें उसका त्याग करते हुए मरमातिमें झोभ होता नही, कारण कि उसमें तुम्ता समझ रस्सी है, इसी तब बानीको जगत्के सत्र पदार्थ तुम्न भासमान होते हैं । आनाको एक रुपयेसे गाकर सुबर्ण स्पादितक सव पदामि सर्पया मिडीपना ही मासित होता है। बी पा-माँसका पुतळा है, यदि यह स्पर गान मिया है, वो इससे उसमें विधारवानकी सिमें खोम होता नहीं। तो मी साधुको ऐसी बापा को किबो हवायें देवांगनामोसे मी मगयमान न हो सके ऐसे मुनिका मी, जिसके नाक-कान काट दिये हो एसी सौ बरसकी पुश मोके पास मी एना नहीं पाहिये, क्योंकि म पिको मुम्भ करतो हो है, ऐसा हानाने नाना है । सया साधुको इतना शान नहीं किया उससे घरमयमान न हो सके, ऐसा सोचकर ही उसके पास एनेको बाहा नहीं की। इस बनके उपर सर्य हानीने मिशेप मार दिया है, इसलिये यदि गतियों पापोम लोमको प्राप्त करें, तो उमें तुरत ही मापिस बीचकर उन बाल पतियोंका क्षय करना चाहिये । मो बौद्ध गुणस्थानक मतापे है, बश बशसे बारमाके गुम बता है वार जन्तमें में किस तबके है, था बताया है । मिस वय किसी हीरेको पनि चौह की बनामो, तो वनुकमसे उसमें से विशेष बति विशेष कान्ति प्रगट होती है बौर पर कली बना सेनेपर बन्तमें होरेको सम्पूर्ण मान्ति प्रगट होता है। इसी तण सम्पूर्ण गुणोंक प्रगट होनेसे वास्मा सम्पूर्णरुपस प्रगट होती है। चोर पूर्वपारी वहन (ग्यायों में से)मो पीछे गिर माता है, उसका कारण प्रमाद है। प्रमादके कारणसे या ऐसा मानता है कि 'भव मुझे गुण प्रगट हो गया है। ऐसे पमिमानसे यह प्रथम गुणस्यामकमें मा पता है, और उसे बनतकालका भ्रमण करना पाता है । इसलिये जीवको वाश्य गांगत गना चाहिये कारण कि क्यिोंकी ऐसी प्रक्सता है कि पहरेक प्रकमसे टगती है। बाप म्यायन गुणस्पानकसे पुत हो पाता है उसका कारण परी कि हतियों प्रथम तो समझती है कि इस समय था शूरता है, इसक्रिय प्रपना बह पम्नेमाछा नही है और इस कारण सबष होकर खाईरता है। परत पिपाने नहीं समझा कि अपसे मा ठगी नही बोपगी, मानसे मी ठगी नहीं गॉपगी, तपा मायाका र मी पसनेवाम नहीी', हाँ तुरत हो मेम उदयौ वा गाता है। उस समय मेरेमें फसी हदि सिदि भार ऐपर्य प्रकट हुए है, ' मी रवि होनेपर, उसका गम हो जानेस जीव पास युक्त हो जाता है, मोर परिसे गुणस्थानमें आ पाता है। इस कारणसे इच्चियोंको उपशम करनेकी भपेशा उनका क्षय ही करना चाहिये जिससे फिरसे उस्त हो म सकें । विस समय शनी-पुरुष त्याग करने के लिये करे कि इस पदार्थको त्याग दे, तो ति गारिस दो गावी है कि यक है मैं दो रिन पचात् त्याग करेगी। पि इस वयके पोमेमें प्रा जाती है कि समानता है, पछो ठकमा, माधुक समयका मचाएमा सो पर्प जाता है। . .
[ ५२५ प्रीमद् चन्द्र इतने में ही वो शिपिसके कारण मिरे कि पियों पा करकर ठग तो इसके त्याग करनेसे रोगके कारण तापम ग, सहिमे इस समम नएं परन्तु फिर कमी त्याग करेंगी।' इस दगासे बनानकार बीच ठगाया पाया। किसी वीस वर्षका पुत्र मर गया ऐ तो उस समय तो उस बोलने ऐसी कामट म्गती कि यह ससार मिप्यारे। किन्तु ऐता क्या है कि सरे ही दिन स विचारको पार पि यह करार विस्मरण करा देती है पुत्र कस बड़ा हो जायगा; ऐसा तो होता ही वाता, किया क्या बाप!' परन्तु या मही होता मिस तय र पुत्र मर गया है उस तर मैं मी मर गाउँगा । इसध्येि समझकर पैगम्प लेकर पम ना तो बाहै-ऐसी चि नहीं होती। याँ पिठा मेती। मात्र ऐसा मान बैठता है मैं परित , शावका मेवा । होशियार !, गुणवान , मेग मुझे गुणवान करते है' परम्त पम उसे तय पदार्थका स्पोग ऐता है, उस समय तुरत हो उसकी पि उस वोर सिंच पाता है। ऐसे बीवको पानी प्रवे हैं कि तू गरा चार तो सही कि पण कार्यको मतको अपेक्षा मी तेरी कीमत तुम है। जैसे एक पाईको पर बीबी मिती है अर्थात् पार पाईको एक एक पौधा —उस पोरका यदि तसे म्पसन हो और वर्माना पचन अषण करता हो, तो पर हो भी करीसे बीमार माना गया हो तो ये मामा मो मा निकमने भगवा, और बानीले बबनोंपरसे प्रेम जाता यता है। वैसे पदार्पम, उसकी किया प्रतिक मान होनेसे परिका सोम ना होवा नही ! जब पान पाईको मोसे मौ ऐसा जाता है तो फिर सनकी कीमत तो उससे मी त एक एक पक्षको चार धार माना हुई। सम्पेि हरेक पदार्थ प्रस्ताव विचारकर विने बार बाते ए ऐनी चाहिये और उसका पप करना चाहिये। मनापासमीने का एक बहानी परोर ममिप्राय , और करोर शानि- याि एक ममिमाय है।' उचम जाति, भाषा उत्तम और ससग झ्यादि प्रकार से बाम-गुण प्रगट होते है। दम पैसा मानते ऐसा बारमाका मूग स्वभाव नही है। इसी तय बाल्माको फर्माने कुछ सर्वपा पाहत फर नही रहा। मामाका पुरुषार्थ मर्मत्र मार्ग तो सपा सुम वा। बागरे और गेहूक एक हानेको पदि एक मस पर्वतक रस छोड़ा हो (तमे दिनोंमें सई बापगा पह बात हमारे मानमें है) परन्तु यदि उसे पानी मिबारका संमोग म मिले तो उसय उगमा समय नहीहै उसी तय ससंग बौर चार सपोग न मिले तो बाल्माका गुण प्रगटता महो। रेगिक पमा नरफ है परन्तु सममापसे रे, समकिती है सम्मेि उसे रास नही है। पार करा वरील भी चार प्रकारके होते हैं:- कोई पर मारले गहमें गमे । पहिले पहिल सबने धीमा उदय भास मागे पल्ले पर पदन मापा । पाँ तानने दो दिन के लिया और उनमेंसे एक ने सगा कि कि इस समय करिया बिगो पामही, इसम्मेि मुझे तो हर महीना । हम भो रोग मेते है, । माम मी ५२७ ६४] उपदेश छाया मुछ तो केही सदियों बारे।'भागे बस्नेपर चादी सोना थापा । उन तीनमॆसे दो जनोंने भन्दमको फेंक दिया, और सोना-चाँदी छ लिया। एकने सोना चाँदी मही लिया । बहोंसे बागे चले किचिन्तामणि रस्न वाया। इन दोमेसे एमने सोना फेंककर चिंतामणि रान उठा लिया, बार एकने सोनेको दीपने दिया । १ पहा इस तर पर्गत घटाना चाहिये कि मिसने फेवल छकड़ियों की सी, और दूसग कुछ भी म लिया था ऐसा एक तबका बीन होता है, जिसने मलौकिक कार्योको करते हुए हानी-पुरुषको पहिचाना मही, दर्शन भी किपा नी । इससे उसका बग्म, जय, मरण मी र हुमा मही, गति मी सुपरी नहीं। २ मिसने बदन उठा लिया और एफहियोको फेंक रिया- इस तरह रर्यत पटाना चाहिये कि निसने पोदा मी पानीको पहिचाना, उसके दर्शन किये, तो उससे उसकी गति श्रेष्ट हो गई। २ जिसने सोना मादि प्रहण किया, मान इस तर फगाना चाहिये फि त्रिसने बानीको उस प्रकारसे पहिचाना उसे देवगति प्राई। १ बिसने रितामणि ररन लिया, उस व्यवको इस तरह घटाना चाहिये कि बीसको बानीको यथार्थ पहिचान ई कि जीव मरमुकाला। कल्पना करो कि एफ बन है। उसमें गातसे माघारम्पपुक पाई है। उनकी जैसे वैसे परिपान होती है, उतमा ही उनका माहारम्प माश्म देता है, और उसी प्रमाणमें मनुष्य उनफो प्राण करता है। इसी तरह बानी-पुरुषमा मन है। उस हानी पुरषा माहात्म्य अगम बगावर है। उसकी जितनी नितनी पहिचान हाती है, उतना ही उसका माहारम्प माइम होता है, और उस उस प्रमाणमें मौरका प्रयाण होता है। सांसारिक मेदके कारणों को देखकर, गौरको कमाइट माझ्म होनेपर मी पर मैराग्यके उपर पार रखकर पसा जाता है, किम् रम्यमें प्राधिकरता नही। सोगानीमा मोक-ठिसे देखें तो उसे पहिचानते मही। भाहार मा में मी पानी-पुरुषका प्रति बाघ रहती है। किम तपा से मिमी बामाको पानामें सरे हफर, पानाम परि रमार, बाग साधकर उपर टंगे ए पाका मेन करना दवा है। लोग बोसमाचते हैं कि वेधम करनेवासी दिपाननिमिमाम्नसमें रेमा जाप तो उस भामीको पोका पेपन करना है इसउिप उसर म करनेफ बाम्ते, पेपन करमाडीको टि भामाश हो रहती है। इसी तपमानाची पहिवाम पिसी विचारपानको दी दी है। समिधप करना कि बाहर बाती लिपोप सप करना पादिये-जाप सप फरमा पादिये पानीको मा। राध प्रतिम संसार करनेकी दोनो दो ता समझना चाहिये कि पानी-गुरको हेमा । मही । विस तर प्रथम संगारमें रसरदिन मारण परला हो उस वद, जातीय संपोगोनेर किर भापरणबरे-पहाडनाता है। ।
भीमर्पसचन्द्र [६॥ पानीको पान-रस्सेि परिसरेसनेके पचात् माको देसकर गग उत्पम हर मही। स्पेकि पानाच स्वरूप विपम-मुसको कम्पनासे पुश । मिसन बनन्त पुसको साम म्यिा हो उसे राग होता नहीं, और जिसे एग होता नही, उसाने बानीको देखा है, और उसाको सना-पुस्पा दर्शन करने पमा पीका सगौन शरीर बावनस्पसे मासित ए बिना पता नही । योग उम्ने बानी पचनोको पयार्प रीतिसे सत्प गाना है। मिस्ने बानीके समाप, दो बार मापने मिम-पपल प्रपा-बान मिपा है, उसे दो और वास्मा मिम मिल मासित होते है, और उसे लाका शरीर वौर बाहमा कुरा अदा माइम होते हैं। उसमे मौके परीरको माँस, मी, ही बाविध पुतम ही समसा है, सम्पेि उसे उसमें रग उत्पन होता नहीं। समस्त शरीरका उपर नीचे बस कमरके ऊपर हो पण। पिसी कमर मट गई उसका सब बस भए ऐ गया है। लिपप भादि गोही तृष्णा है। संसाररूमा शरीका काम विषय बारिरूप कमर के ऊपर दो रस्य गुमाए। शामी-पुरुपके बोपोगनेसे रिपय बाविस्म पर मग हो जाता है, वर्षात् पप वाठिक तुममता माझ्म होने मगती और उस प्रकार से संसारका बस पठता है, वर्षात् पानी-पुरुष के बोपमें ऐसी साम है। महामारस्वामीचे संगम मामके देवताने मात । ऐस ऐसे पपा दिये कि निनमें प्राण त्याग होते हए मी देर न म्ो । जो सी बात समता रक्सी ! उस समय उनाने विचार मा म बिस वर्णन करनेसे कम्माण होता हो, माम स्मरण करनेसे कम्पाप होता हो, उसीके समागममें बाबर इस पाचको मनन्त संसारको विका कारण होता है। ऐसी बनुमा बामेसे मौसमें वास् मा गये । सी बहुत समता है। दूसरे की दया किम तण वरित से मिकर्म पी ! उस समय मोरपम्ने पपिरा सबका गापा होता तो तुरत हो तोधकरफ्ना संम्त म यता; और कुछ नही तो देखता तो माग हो म । बिसने मनायो माया मम्से नाम कर पा र वर्षात् मोरको बात म्पिा है, र मोर कैसे कर सकता। प्रामास्वारस्वामा पाप्त गोशामने जाकर दो साधुयोंको जग गम उस समप ठमोने वार मरा भी समर्पपूर्ण सापुमोकी रक्षा की होती तो उमें वारपनेको फिरसे करमा पाता । परन्त जिसे मैं गुरु , पर मेरा शिप है' ऐसी मानना होनी उसे पैसा पुस मौ करना नही पाता। सनाने ऐसा विचार किया 8 में शरीफे राणका OR महाँ के मार-उपदशावतार । पदि में इनकी रमा काँ तो मुझे गोशालाकी मी रक्षा करनी चाहिये अपप समस्त जगत कला परमी अपित है। बात वीर्षकर ऐसा ममत्व करते ही नहीं। दामें इस कामें परमरी होना मारे। निमगवान्के मतानुसार इस कामे एका बोल होते है। पार्ग पोपी बात नहीं, पोंकि इसके पश्चात् उस मोच ने परिकारेर माती महो। पोदा हो पायपाता और गो पता फिर सहर रहो बाता है। ऐसे पुस्पकी दसा-सिपा-बसी होती है। नाविध पातसी चिपा शान्त मोर सनी मनिक शान्ति पता है कि गरेप सब नारा ऐने पोम्प हो गये है-उपशास्त हो गते । - उपदेश-प्रपा सद्धियोंके उत्पम होनेक लिये गो गो कारण-साथम--बताये होते हैं, उनै न करनेको शानी कमी करते ही नहीं । वैसे रात्रिमें भोजन करना हिंसाका कारण माश्म होता है, इसलिये शानी कमी मी बावा नहीं करते कि पत्रिमें भोजन कर । परन्तु मिस निस सहभाबसे भाधरण किया हो, और रात्रिमाउनसे ही आपका 'इस बमुक्से । मोक्ष होगी, क्या इसमें हो माथी' ऐसा दुरापासे माम्य किया हो, तो वैसे दुराको छपानेके पिये पानी-पुरूप करते हैं कि इसे छोप दे पानी-पुरुषोंको बाासे पैसा ( रात्रिभोजन-रपाग मादि) कर' वौर पैसा करेगा यो कम्पाण हो पायगा । वनादि कारसे दिनमें बौर राठमें मोसन किया है, परन्तु गीतको मोक्ष ईन! इस कासमें माराधकता के कारण घटते जाते हैं, वौर विरामकताफे मवण बढ़ते जाते है। केशीस्वामी यो थे, और पानाप स्वामीके शिष्य पे, दो मी उम्हनि पाँच महात सोफार किये थे। फेशीस्वामी और गौतमस्वामी महारिपारवान थे, परन्तु केशीस्वामीने यह नहीं कहा कि मैं दोला बारा ससिपे तुम मेरेसे पारित्र प्राण करो' विचारवान और सरह बीवको, निसे तुरत ही कम्यागपुछ हो गाना है, इस प्रकारकी बातका भाप्रद होता नहीं। कोई साधु निसने बान-अबस्थापूर्वक भाचार्यपनेसे उपदेश किया हो, और पीसे उसे मानी-पुरुषका समागम होनेपर, पाशानी-पुरुप यदि साधुको बाचा करे किनिस स्थानमें ले भाचार्य- पनेसे उपदेश किया थे, वहाँ गाकर सबसे पीछे एक कोनेमें बैठकर सबोगोंसे ऐसा कह कि 'मैंने पानमानसे उपरेश Pया है, इसलिये तुम लोग मूछ साना नहीं, तो साधुको उस तर किये बिना मुटकारा नहीं है। पदिय सामु यह को कि मेरेसे ऐसा नहीं सकता। इसके बारे यदि वाप कहो तो मैं पाके उपरसे गिर पाउँ, अपना बन्य जो कुछ कहो सो करें परम्तु पाँवो में महोबा सकता'-चो पानी करता कि 'काचित् त् सास बार मी पर्वतके ऊपरसे गिर जाय तो मी पर किसी कामका नहीं है। यही वो परि रेसा करेगा तोही मोक्षकी प्राप्ति होगी। सा किये मिना मात्र मही है। इसलिये परिपाकर क्षमा माग तो हो तेरा कम्याम हो सकता है। गौतमस्वामी पार इनफे पारक | मानन्द प्रापक उनके पास गया मानन्द प्रारको कहा कि मुझे धान उत्पन्न हो गया है। उत्तरमें गौतमप्तामाने हा कि 'नहीं, नहीं, इतना सर मही सकता, इसलिये तुम धमापना गे'। उस समय मानन्द भावाने विचार किया ये मेरे गुरु संभ इस समप पे मुह परते हों, तामी आर भूल करते हो', पर करमा योग्य नही । पे गुरु इसलिये इनसे शान्ति हो बोटना टौको पर सोचकर मानम भापकने कहा कि महाराज ! सस्तावका मिपामि दुसर' भयना असतापनका · मिपयामि दुपातमने हा दिवतापनका ही 'मिछामि दुमा' होता है। इसपर मानन्द प्रारम्न पहा कि मादागर में मिमामि दुर'ने पोम्य महीपालनेमें गौतमम्पामा बहस पस गये और उनोन नार मदागरमामा पूणा । पपरि गौतमलामा सर्प उसका समाधान कर सको प, परम्नु गुगो मोगर पते पए देख करना टास मरा, इस कारण उन्होंने ममारिसाद पाम पार पा .
५. भीमा पाचन [१४१ सम मार दी। महावीरस्वामीने कहा कि गौतम ! हो, बानर पैसा समझता att और तुम्हारी भूम है, इसध्येि तुम वामदके पास जाकर क्षमा मागो' गौतमस्वामी विधान' पकर घमा माँगनेके छिपे चल दिये । यदि गौतमस्यामाने मोह नाम मासुझको फ्यमा न लिया होता तो येहाँ माते ही मही वौर कदाचित् ऐसा कहते कि 'महाराण! बाप को एक्ने सम शिप, उनकी मै चाकरी कर सकता , पर माँ वो मैं न गाउँगा,' तो बात सोलर होती । गौतमस्वामीने स्वप हा पाकर दमा माँगी । 'सास्वामसमकिन ' वात् समन किया रामा समकित-अर्यात् जो परीभाई पी, उसम यदि वावरण वा पाम तो मी मियाल और समलितको कीमत उसे मिम मिम माइम होता है। वैसे मण्से पहिले मासनको निकाल नेपर पास उसे मण् गरें, तो माम मौर म पहिले वैसे एकमेकप से एकमेक वे पर नहीं होते उसी तय सममित मिष्मावको साप एकमेक होट नहीं । वपना बिसे रामणिको मत हो गई हो उसके सामने यदि विरका टुकरा माने तो उसे रामणि साक्षात् वनुमत्रमें जाती है-यह प्यत भी पारी पटता है सार सरेप वीर जी के प्रति लिए धर्मको सम्पाव शार, परन्तु सत्देव और केवल ये दोनों सगुस्में गर्मित हो जाते हैं। निप गुरु बर्षात् पैसे रशित गुरु नहीं, परन्तु मिसका प्रपि भेद हो गपा है, ऐसे गुर। सद्गुरको परिभान होना पगारसे प्रन्धि मे होने पाप है। जैसे कसी मनुम्पने चिौरपणे कर विचार किया मेरे पास सर्भ मणि है, ऐसी हो भी मिलती न ।' बाद उसने बम किसी पदर बारमा पस बाहर मा कि ' मे मणि वसगरे,'वो उस पर भायमाने उससे भी बात परिपा बड़िया अधिक वधिक कामतको मणिया बतातर का देस इनमें से फरक माश्म देता है। बराबर देख । उस मनुष्यने नवाब दिया कि हाँ इनमें फरक तो माम पाटा है। इसके बाद उस पर पुरुषने शाय-फान्म बताकर कहा कि देश, तेरी सी मणियों को मारों मिती है। सम साप फरमूम दिलाने के पश्चात् गा उसे उस पुरुपने बम्सी मणि बताई तो उसे उसी ठीक ठाक कीमत माम पी और उसने उस मणि मि न समझकर फेंक दी। बाद में फिर इसी दूसरे नादमीने मिम्नेपर उससे मा किने निस मणिको असम मम मम है, जैसी मणिया तो बात मिलती है। वो इस प्रकारके भावरणसे पहम ना जानेसे मात्र मूल पाता है पस्त पासे उसे पाठा ही समानता है मिस तय साकी कीमत उसी क्यसे समझता है- तुरत ही भागृतिमें माता है कि बसली बात होती मात् माचरण तो होता है, परन्तु परिका मो पहिचान है पर की जाती नही | इसी प्रकार विचारपान गुरच संमोग होनेपर तल-मतौति होती है परन्तु परमें मिप्पाप संगसे भावरण वा पानेसे उसमें शंका हो पाती है। पापि तल प्रतीति मा महो हो बासी RT उसे बारण मा माता का नाम साप्तादनसम्पत है। सद्गुरु बौर मसद्ग्रामें राव दिन बितना अन्तर है। एक गौरी पा । उसके पास म्पापारमें अधिक मुकसान हो पानेसे मी इम्प माला नहीं। पर मरमेन समय महाक मा पचा, नेपाल चोकच विचार करने गा कि मेरे ५४३] उपदेश-पापा पास कुछ भी तो इम्प नहीं है। किन्तु पदि ममी इस बावको का तो Bाका छोटी उमरका है, इससे उसकी देह छट जायेगी । मीने सामने देखा वोर पूल कि कुछ कहना चाहते है ! पुरुपने काम्या कहूँ।' बोने कहा कि निस्से मेरा और बोका उदर-पोपण ऐसा कोई माग बताइपे, पौर कुछ कहिये । उस समय उस पुरुपने सोच विचारकर या कि घरमें बपाहयतके म्यूकमें कीमती नगकी एक लिविया है। उसे, बब उसे बहुत नरूरत पो, तो निकायफर मेरे माईक पास नाकर बिकना देना, उससे तुझे बहुतसा ट्रम्प मिठ बापगा। इवना काकर पुरुष काम-धर्मको प्राप्त इमा। कुछ दिनों बाद बिना पैसेके उदर-पोपणके म्पि पीडित गुमा मागच, भपने पिता के को ए उस जवाहरातके नगको एकर अपने काका (पिताके मई जौहरी) के पास गया, वार करा कि काकानी मुझे इस नगको बेचना है, उसका चो पैसा बाले उसे मुझे दे दो। उस मोहरी भाईन म, 'स नगको बेचकर तुझे क्या करना है।'मकेने उत्तर दिया कि उदर भरनेके लिये पैसेको चम्पत है।' इसपर उस बोहरीने कहा 'यदि सौ-पचास रुपये पाहिये तो रे, रोग मेरी दुक्कामपर भा, और सर्व खाय। इस समय इस नगर यने ।' उस छाकेने उस बाहरी काकाकी बातको कबूल कर लिया, और उस गबाहरातको वापिस ले गया । तत्पधात् यह माघ रोग गौहरीकी दुकानपर चाने मा, मोर धीरे धीरे मोहरीके समागमसे हीरा, पमा, माणिक, मौसम मकी परीक्षा करना सीख गया, और उसे उन सबकी कीमत माश्म हो गई। बा उस नौहराने का जो पहिले वपने जपहरातको भने छापा पा उसे छा, उसे अब बेच देंगे।' इसपर साकेने परसे पानी बबाहरातकी रिबिया लाकर देखा तो वा मग नकली माम Pपा, इससे उसने उसे तुरत ही फेंक दिया । गर उस गौहरीने उसके फेक दनेका कारण पूसा, वो गाने नबाब दिया कि पर विचार नकली था, इसठिये फेंक दिया है। देखो, उस गौहरीने यदि उसे पहिसे ही मकरी बताया होता तो यह साका मानता नही, परन्तु निस समय अपने वापको पस्तुकी कीमत माहम हो गई और नकलाको नकसीरूपसे समझ किया, उस समय गौरको काना मी पहा नहीं कि या नकली। इसी तय अपने बारको सद्गुरुकी परीक्षा हो बानेपर पदि मसगुरु मसत् मान लिया तो गार वस गुरुको छोड़कर सद्गुरके चरणमें मा पाता है। वर्षात् अपने बापने कीमत करनेको शक्ति बानी पाहिये । गुरुके पास हर रोज गाकर या नीव एकेन्द्रिय मादि जीवोंके सबममें भनेक प्रकारको शकाय पौर कापना करके पंग करता है, परम्त किसी Pन मी पर पुरावा नहीं कि एकेन्द्रिय गाकर पचेन्त्रिपको गाननेका परमार्थ स्पा! एकेन्द्रिय आदि जापासबपी सपनाओंसे कुछ मिथ्पानरूपी प्रर्धाका छेदन पता नहीं। एफेत्रिय बारिबीका स्वरूप माननेका हेतु तो दयाका पासन करना है। मात्र प्रश्न करनेके लिये सी बातें करमेका को फछ मही। मास्तविकम्पसे तो समफित प्राप्त करना ही उस समका फल है। इसलिये गुरुके पास जाकर म्पर्धक प्रम करनकी बपेश गुरुको करमा चाहिये कि भाव एकेन्दिप लादिकी बात बार गान छौ । यब उस गायको भाप करके पिन न करें, किन्तु समफितको म्यवस्था करेंस तय करे या किसी दिन निस्वारा हो सकता है। परम् रोन रोड एत्रिप भादिको मापापपी करे तो इस गीत कम्याग का होगा।
५० प्रीमद् पाबन्द [४ सब बात कर दी। महावीरस्वामीने या गाम 1 हाँ, वामन्द बसा समयता हम हो और तुम्हारी मूर है, इसलिये तुम भान पाम गाकर क्षमा मांगो। गौतमसामा सिपमु' एकर क्षमा मांगनक लिये पटाये। यदि गावमम्मामाने माह नामक महामुमको परामा नय हाता तो यहाँ बाते ही नहीं, वौर कदाचित् ऐसा करते 'महाराण | वारके गो इने सर शिष्य में उनकी म पाच्य कर सकवा । पर यों तो मैं न गाउंगा,' तो पगात सावर ता। गौखमस्थामान यहाँगाकर खमा माँगी। 'सास्वामसमष्ति' वपात् नमन किया पुत्रा समशित-अर्पात् यो परीश पी, उसस पनि भातरण मा गाय तो मी मिप्यार और समषितकी कीमत उसे मिम मित्र मास होती है। जैसे मासे परिस मासनको निपल नेपर पीछेस उसे पागमें राठे वो मस्खन और मा पहिले जैसे एकमेक प मैम एकमेक वे रि नहीं हो उसी तय समध्यि मिष्पालको साप एकमेक हाय नहीं । अपना बिसे हीरामणिको कीमत हो गई हो उसके सामने यदि विहौरका टुका वारे तो उसे हरामणि सायात बनुमबमें जाती है-पात मी यहाँ पटवा है। सपर सब और केजी के प्रसारित किये हुए धर्मको सम्पात का है परन्तु सदन कर कामे पे दोनों सम्में गर्मित गाते है। निय गुरु बर्षात् पैसे पत गुरु नही परस्तु मिसका प्रपि मेर हो गया है ऐसे गुरु! मगुरुको पहिचान हाना म्पहारसे प्रन्थि भेद होने का उपाय है । जैसे किसी मनुप्पने रिकार्ड टुकड़ा लेकर विचार किपा मेरे पास बसम मणि है ऐसा को भी मिलती मही।' बादमें उसने मा किसी पर मामकि पास गाकर कहा कि मेरी ममि मसला है, तो उस चतुर भाइमामे उम्भे मी पात बलिया बहिपा बरिष पिक कामवको ममिपा बताकर कहा कि देश इनमें कुछ फरफ माम देता है। पर देख उस मनुप्पमे समान Pा कि हाँ इनमें फरफ तो माझम पाव है। इसके म उस चतुर पुराने सामान्म बताकर ना कि देस है जैसी ममियों तो गायें मिकतारें। साध्या फल्म रिसाने मचात् बा उसे उस पुम्पने कमी मनि बताई तो उसे उसकी ठीक अंक कीमत माश्म पदी वौर उसने उस मणिको विस नग समतकर दो । पामें हिर किसी से मामीने मिलने पर उससे मारने मिस मणिध बसी समय राता है, जैसी मणियाँ तो बहुत मिलता है। इस प्रकारक वारणसे गम वा जानेसे गान भूस भाव पम्त पास उसे पटा होममहना है-मिस वर सभामतो उसी रायसे सममता है- पुरत हो भागनिमें बाता है कि वही बात होती नहीं । वर्षात् वारण तो ऐता है परन्तु परिठी गो परिचान र मग सत्य नए । इसी प्रकार विचारवान सदगुरुप पोग होनेपर पर मोति तो परतु बामें मिम्पा मासे बाबरणमा बानसे उसमें शका हो जाये। पिता प्रति भी हो मत लिनु उसे बार बा माता है । इस नाम सास्वादनसम्पत है। सुगुर गौर सद्गुम्में गत दिन रितना मवर है। Wऔर पा । उसके पास स्पागारमें मरिक नुकसान से मानेसे कुछ मी वन्प को पता हो। गा मरनेका समय ना पहुंचा तो पायाच विचार करमे गा कि मेरे ४] उपदेश-णापा प्रम-उदयकर्म किसे करते हैं ! उत्तर -ऐश्चर्यपद प्राप्त होते समय उसे धका मारकर पीछे निकाय माहर करे, कि ' यह मुन्न पाहिये नही मुझे इसका करना क्या है." कोई राना यदि प्रधानपद दे तो भी स्वय उसके मेनेकी एम करे नहीं । ' इसका मुझे करना स्पा है' घरसंधी उपाधि हो तो यही बात है- उस पदको मना कर दे । ऐमर्यपदको अनिथ्म छनेपर मी राजा फिर फिरसे देमेकी इन करे, और इस कारण या उपर वापिके, तो उसे विचार होता है कि 'देस, यहि वेरा प्रधानपद होगा तो पक्से गायोंकी दया पटेगी, हिंसा कम होगा, पुस्तक-शानाय सुग्गी, पुस्तकें छपाई गारंगी' इस तय पर्मक तसे कारणोंको समसकर पैराम्य मावनासे बेदन करमा, उसे उदय कहा जाता है। प्रयासहित तो मांग करे, वौर ठसे उदय बताये तोपशिपिछता और समारमें मटकनेका ती कारण होता है। बहुतसे गाल मोह-गर्मित राम्पसे भौर बहुतसे दु गर्मित वैराग्यसे दीक्षा के मेते हैं। दीक्षा सेनेसे बन्छ मगर बौर गाँवों में फिरनेको मिलेगा। दीक्षा मेनेके पचात् बच्चे बछे पार्य सानेको मिगे । स मुस्किल एक इतनी ही है कि गरमीमें भगे पैरों पन्ना पोगा, किन्तु इस तरातो सापारण किसान अपना पटेठ सोग मी गरमा मगे पैरों चरते है, तो फिर उनको तय या मी बासानासे हो हो बामगा। परन्तु वार किसी दूसरी तराका दुस नहीं है, और करपाण है'- ऐसी मावनासे दीक्षा केनेकर नो राम्यो मोह-गर्मित सम्पहै। पूनमफे नि गतसे ठोग राफोर गाते हैं, परन्तु कोई परमधार करता नहीं कि इससे मना कम्पाण क्या होता है। पूनम के दिन रणछोरनीके दर्शन करमेके लिये उनके बाप दा गाते थे, इसलिए उनके छाके यो मी जाते है। परन्तु उसके हेतु विचार करते नहीं । यह मी मोह-गर्मित बैराग्यका मेद है। यो सांसारिक तुमसे संसार-त्याग करता है, उसे दुस-गर्मित यग्य समझना चाहिये । पााँ नामो महाँ करपाणको ही पनि हा, ऐसी प पुदि करनी चाहिये । कुम-गयके बापाको सुसाना, यही ससंगके माहात्म्पके सुननेच प्रमाण है। मतमतांतर भाति, धर्मके गो गो भनतानुबधी पतके फाटककी वय कमी मिलते ही नाकामा करना नहीं और यो काम कर से वो उसे धोरमसे समझाकर सुपा देना तो ही समानेका फल है। अनतानुबंधी मान, कन्याम नेमें माधम स्तमाप कहा गया है। गों नहाँ गुणा मनुप्प हो हो हा विचारपान मात्र उसका सग करनेके डिमे करता है। पानीके मसण सौकिक मारके होते है । यही नहीं दुरामा से उस उस बगहसे ना चाहिये । ' इसकी मुझे नाश्यकता नहीं,' पही समझना चाहिये । (१) रासा मादप सुरी ६ शनि १९५२ प्रमारसे योग उत्पम होता है। मानाको प्रमाद है। योग प्रदान उत्पाता हो, वो यह कानीमें मी समबो इसठिये पानीको माग होता है, परन्तु प्रमाद होता नहीं। 'समा एमा वीर निमारसे छूना, याही मुम्प बात समाप्सनेको । मास-बीबकि समझने के लिये पानी-पुरुषोंने सिद्धान्तों के बारे मागच वर्णन किया है।
. - ग्रीमद् पवाद्र [१ समुद्र सारा है । कम तो उसका सायपन दूर होता मह। उसके घर करमेश उमप यो कि उस समुद्रमेंसे एक एक असा प्रवाह कर उस प्रवाहमें, मिससे उस पानीघ बन रहे और उसमें मिठास-मा बाप ऐसा सार गना चाहिए । उस पानांके मुसमे दो उपाप है- सूर्पका ताप गौर दूसरी बमौन । इसलिय प्रयम यमान प्यार करना चाहिये और बादमें नालियो पानी से माना चाहिये और पीछेसे मार राना पाहिए, जिससे उसका सारापन दूर हो नाममा न्य मिप्पावरूपी समुद्र है, उसमें समा मादिरूप पारापन है, इसलिये कुख्यमसी प्रकार योपतास्म जमीनमें से पाकर उसमें दोपहली बार रामाना चाहिये-ससे सपुरुषसी तापसे सारापन दूर होगा। दुर्वस देने मास नपपासी, बोके मापारग रे, वो पण गर्म मनवा सथे, पासे बीच भग रे । + गितना प्रान्ति बाधिक उतना ही अधिक मिप्यास । सबसे बड़ा पेग मिप्पाल । पर ब तपप्रर्या करना पन न उस समवसे न करना, मांफरसे नएस गोंद लिये न करना । चीनको बो कुछ करना है उसे सबसे न करना चाहिये। में होशियार !' पर वो मान रखना, यह किस भोलिपे ! होशिपार मही', इस तय सिने समान लिया र मोश्चमें गया है। सबसे मुख्य विप्न स्वाद है। जिसके दुराहका दम हो गया है, र गोंको भी प्रिप होता है-कापा र दिपा हो तो दूसरे मेगोंको भी प्रिप होय है। इसचिपे कदापाके मेर देनेसे सब स मिटमा समय है। गौतमस्वामीने महावीरस्वामी सबपी पल । उन प्रश्नोंच, विम्ने सत्र रोगों अप कर दिया है ऐसे उन मारतामीने मेकित देकर समाधाम (सिस) कर बताया। इसरेको उब गुममें माना चाहिये ति किसीको निन्दा करनी मही। सो समय तासे दुग मी पना नही । इस करमे योम्प हो तो भाकारीत मासे ही करना चामिले । परमार्थ रिसै पनि मानेष पट गये हों तो ही फदायको, स्पोकि पारसे तो भो गोर भी रागीप परे हुए गते हैं परन्तु परमासे सगाईप मापा गमे हो तो पाणका कारण मान् पुस्पोको रिसे दम्नेसे सब दर्शन एक्से है। जैन दर्शनमें बीमार गौच मतमा पोरानीकी पिसे भेदाभेद होता नहीं। मिस गोषको बनतानुषीका उदप है, उसे सवे पुरुपकी बात मी भविकर होगी मही, या सो पुस्पको मात मी सुमना उसे मागता नही । मिपातको जो मन्पिो उसकी सात प्रतिमा है। मान बाने तो सावं साप साप माता उसमें मनतासुबाको बार प्रतियों पर समान सीमा तय प्रन्धित निकलने दे। मही । मिप्यारत्न रतबाम (सपा) है। समस्त जगत् उसकी सेवा बारा परता है। •पुरानो एक एक मातम उपजानुपरम बारमा मर्म बाप प प म मम मा मय। +पाँ मूल्यम्म पारमा प्रतिपयरे देवपारे । -अमुगर ।
। 1] उपदेश-भपा होम हवन वादि बातस लौकिक रवानाको प्रचलित देसकर तथफरमगमानून अपने समयमें दयाफा मात ही सूक्ष्म रीतिसे वर्णन किया है। जैनदर्शनके समान दयासबषी विपर कोई दर्शन वषषा सप्रदापवाले ग्रेग नहीं कर सके । क्योंकि पैन लोग पवेन्द्रियका पात सा करते हो मही, किन्तु उन्होंने एकेन्द्रिय बादिमें भी गावके अस्तितको विशेष मतिविशष स करक, दयाके मागका वर्णन क्रिया है। इस कारण चार पेद मठाय पुराण बादिका जिसने वर्णन किया है, उसने बहानसे, स्वगरसे, मिष्यावसे भौर सशसे ही किया है, एसा ना गया है। ये बचन बहुत ही मारी किसे । यहाँ गगुत अधिक विचार कर पीछेसे वर्णन किया है कि अन्य दर्शन-वेद वादि के गो पो उने पदि सम्पति बीर गोरे तो सम्यक् प्रकारसे परिणमन करता है, और दिनमगवान्के बवा चाहे विस वयके प्रपोंके परि मिप्यारदि गांचे करे तो या मिथ्यावरूपसे परिणमन करता है। जीवको शानी-पुरुपके समाप उनके वपूर्ण पचोक मननेसे अपूर्ण उठास परिणाम वाता है, परन्तु बादमें प्रमादोहो गानेसे वपूर्व उहास माता मही । मिस तबाम यदि वरिकी सिगरीके पास बैठे हो सो रगती नहीं, मौर सिगासे र बडे पानेपर फिर ठंर म्गने प्रगती है। उसी तरा बानी पुरुषके समीप उनके वपूर्व पचोंक प्रबण करनेसे प्रमाद भादि ना हो नाते हैं, और उहास- परिणाम बाता है; परन्तु पासे फिर प्रमाद वादि उत्पन्न हो जाते है । यदि पूकि सस्कारसे अपचन वर्ष रिणामको प्राप्त करें तो दिन प्रतिदिन उम्पस परिणाम माता हो मापा चौर यथार्प रीतिसे भान हो। बहानके र होनेपर समस्त भूगर हो जाती है-सरूम वागतिमान होता है। बाहरसे सपनों सुननेसे अन्तरिमाम होता नहीं, तो फिर पिस तर सिगाँसे र पळे गानेफर फिर मान माती है, उसी तरा उसका दोन पता नहीं । केसीस्वामाने परदेशी रानाको बोध देते समय वो उसे 'बा जैसा' 'मूर्ख नैसा ' कहा था, उसका कारण परदेशी रामामे पुरुषार्प मागत करमेका पा। बता-म्हता-के र करनके लिये हो या उपदेश दिया है। कानाके बचन वर्ष परमार्थको मेहकर दूसरे किसी कारणसे होते मही। बार-बार ऐसी बाते किपा करते है कि पपस्यमापसे ही केशीस्वामाने परदेशी गगाके प्रति से पचन को पे, परन्तु यह बात नही । उनकी वाणी परमापके कारण को निकम्मे पी। या पदार्थको मेने-सनेमें उम्मा से प्रति करे तो उसे सपम या । उसका कारण या कि मम्दबासे सेने रहनेमें बात्माच उपयोग कार तारम्पमार होगा। इस कारण उपयोगके पूक गानेचे वरुपम या है पाकारसे वाचापमान पारण कर दंम रक्से और उपश दे तो पाप साताहै। बारमावि रमनेक लिये ही उपयोग रखना चाहिये । भीमाचाग पत्रों का कि वो भानका परिवत्रा है' और यो परिसरा बारा।' पो मात्र पानीको मोक्षच होता है, और जो सार इसपर होनेपर मी बानीको पका हेतु होता है-ऐमा स्परमसे माहै। उसका कारण बानी में उपयोगी मागति करना है, और यह माना है नहीं।
फिसीके उपर रोप करना माही तपा किसीके उपर प्रसम होना नही । ऐसा परमेसे । शिप्पको दो पा सम्मान प्रगट होनेका शाब वर्णन माता है। नितना रोग होता है, उतनी ही उसकी दवा करनी पड़ती है। बीचको समधना हो बोस होमचार पगार होगाप परम्त मिथ्यावरूमी महान् रोग मौजूद है इसरिये सपननेमें गात काम कर होना चाहिये । शावमें बो सोम रोग को, ये सब इस गौषधे मौजूद है, ऐसा समझना चाथि मो साघम बताये है, में सर्वपा मुझम है। समासे, बाकारसे, मेक-साबसे जम्म रमणके लिये तपश्चर्या करमी नही-चामापक लिमे हो करनी । तपश्चर्या पाय प्रकारको करो। बाहार न केना वार ये बारा प्रकार । मसापन करने के लिये जो फुल बताया हो उसे सपुर बायसे करना चाहिये । मपने बापसे प्रवृत्ति करना ही सम, ऐसा करा सद्गुरुयात दिमा वासासास किया मना बम्प कुछ मी करना नहीं। सापुको सपुशका मी गुरुसे झकर ही फरमी पाहिये, ऐसी बानी-मुरमोंकी मात्रा है। सामाचारसे शिष्य बनाना हो तो साधु माहा माँगता नहीं, मपा उसकी कम्पना हो देता है । मरोपकार परमेमें मिय्या सम्पना या करती हो और पैसे कोक लिम्पोप लार गोरे मही पर यानी वामाचे वित करता है। पापाइसी तरा सा बाटोका परता , वीर परमार्थक रास्तेका उम्पन कर बाणी बोतारापोवनी होशियारी, और से हो साहा गया है। माय मतको मभिक मेमेसे मिथ्यात्वका नाश कर देंगे-ऐसा बीच विचार करे, तो पा समय मही। क्योंकि जैसे एक मैसा गोहगारों मार-बापरेके पूरके पूरे गपाहै न एक सिमोसे गरता 0; उसी तय मिप्यास्वरूपी भैसा, जो परेलला बनतानुबंधो कमायसे वनों चारित्र सा गा । या तिनके रूपी बाप तसे कैसे र सकता है! परभुजैसे मैसको यदि किसी बपनसे गाँव में तो में हो साता , सही मिप्यालरूपी असेचे मामा बलपानसे बाँध देनेसे पास हो गाताबर्थात् अब बारमाका मा बहता तो मिप्याम पटता है। मनारिके कान के सण तिना भ्यतीत पगा, उतना काल मोध होने के लिये चार मही । कारण कि पुस्पार्यका बस कमको वरेखा वनिक किठने होगा दो पर सपाम कर गमे । सम्पमारि किसी भी तय हो मामाको उचे बाणा हैमर्पत सम्पपल मानकर जोकपिपरहवाती। मिष्याटि समकिती मनुसार ही अप रूप मावि करता है, ऐसा होनेपर मी मियासिक जप तप मार मोइ पारगमन होते मी संसारके ही कारणमूत होते है। समकिताव हो जप तप बादि मायके कारणमूत होते है। समन्तिी ठने दम रित करता है अपनी मामाको मिरा करता है, और वर्मा कोसे पोस्टवायरनेसे उसके नाम बादि साभार से पट जाते है।मान के समस्त अपमानास्पद करते है, और संसारक नशामा पारेकि डम्भिया उत्पन्न होती है। वीर बेदर्शन पम्पसे । मते मातार पर इस बात तो दानों ही बने मूल करते है इसपे पर सब है । बामा सारी देता है उम्पै समप मामा मास-परिमाम बाता। ।
५४३] उपदेश-पया . इस बाकी साप राग-रेप स्टा ए हैं। गीर यपपि व तहान-दर्शनसहित है, परन्तु राग देयके कारण या उससे रहित ही है, यह वाठ पावके प्यानमें माती नहीं। सिवको राग-रेप नही ।सा सिक्का स्वम्म, वैसा ही सब गोषोंका मी सरूम है। चौपको केवल बनानके कारण यह म्यानमें बाता मही। उसके लिय निभावानको सिदके स्वरूपका विचार करना चाहिये, जिससे अपना स्वरूप समझमें वा बाप । वैसे किसी मनुष्य होपर्म पितामणि रान बाया ऐ, और उसे उसको (पहिचान) है तो उसे उस रानके प्रति बहुत ही प्रेम उत्पन्न होता है, परन्तु निसे उसकी सबर ही नहीं, उसे उसके प्रति कुछ मी प्रेम उत्पन्न होता नहीं। इस नीबकी अनादिकालकी चो मूह है, उसे दूर करना है। दूर करनेके किये गानको बाँसे यही भूए क्या है। उसका विचार करना चाहिये, और उसके मूहका सेदन करनेको बोर म्ब रसना चाहिये । अबतक मूग यती है तबतक या बढ़ती ही है। 'मुझे किस कारणसे बपन होताबोर ' किससे दूर हो सकता है। इसके पान नेके म्पि शाम रच गये है, गोंमें पुराने के लिये शाब नहीं रथे गये। इस बीचका स्वरूप क्या। जबतक गोषका सहप जाननेमें न मारे, तबतक वमन्त सन्म मरण करने पाते है । बीपी स्पा भूगो! पवमातक प्यानमें बाती महो। गीरकाश नष्ट होगा तो मूळ दूर होगी। निस दिन मूग दूर होगी उसी दिनसे साधुपना कहा जायेगा । यही बात ग्राबापने के लिये समधनी चाहिये । कर्मको र्गणा पावको म वौर पानी के संयोगको तय है। बानिके संयोगसे वैसे पानके बह जानेफर दूध माको ग बाता है, इसी वर बामरूपी भमिसे फर्मवर्गणा नए हो पाती है। देहमें वामान माना हमारे इस कारण गोषको भूल दूर होती नहीं। गौर देहको साप एकमेक हो बानेसे ऐसा मानने लगता है कि मैं बनिया ,''मामण,' परन्त शुद विपारसे तो उसे ऐसा वनुभव होता है कि मैं उस ससपमय' । मामाका नाम ठम्म कुछ मी नहीं है- चीच इस तय विचार करे तो उसे कोई गाली गैर दे वो मी उससे उसे कुछ भी पता नहीं। गाँ यात्री बाब ममत्व करता है यहां उसकी है। उसके दूर करनेके छिपे । शाह रघे गये हैं। चाहे कोई मी मर गया ऐ ठसका यदि विचार करे तो पपेराग्य है। गों नहाँ पर मेरा मई पशु इस्पादि मारना है, याँहा कर्म-अधका कारण है। इसी तएको मावना पदि साधु भी अपने चेके प्रति रक्से वो उसका बाचार्पपना मारा हो जाय । मह बदमता, नियंकरता करे तोबारमाका कम्पाण हो सकता है। पाँच इन्द्रियाँ किस तर पश होती है ! बमोंके उपर तुप भाव छानेसे। पैसे कमें पदि मुर्गभ हो तो उससे मन स्तुए होता है, परतु म सुगम पोड़ी देर एकर नए गाती है, वौर प्रस गुमग नाता है, फिर मनको कुछ भी स्वोष होता महो। उसी वर सब परामि तुसमान + ५॥ भीमद् पसरद [AT उपयोग दा प्रकार को इम्प उपयाग २ मात्र उपयोग जैसी सामर्म सियमगवान्की है, सी सब गीचोंको रो सकता है। केवल मानके कारन पपानमें वाती महा 1ो विचारवान चीन हो उसे तो नित्य ही तासाचार करना चाहिये। गीत ऐसा समझा है कि मैं को किया इससे मोश है। क्रिया करना का t, परस्त उसे पा मेक-समासे परे तो उस फल मिस्ता नहीं। पैसे किसी भादमाक एपमें तामप्पि रल वा गया हो किस्तु यदि उसे उसको समर म हो तो पर मिफल हो चला नाता पौर यदि सबर हो तो ही उसका फल मिम्ताहै। सा क्या परिवारको पानाकी सभी सदी पर पो तो ही उसका फल है। नौवको कनारकासे मूड ची माती है । उसे समझने के लिये चीनको यो मूल-मिपानी, उसका मूलसे ही छेदन करना चाहिये । पदि उसका मूडसे छेदन किया जाय तो या फिर करित होती नहीं, अपया वह फिरसे बारित हो जाती है। जिस पर प्रपा परिपको याबाई हो तो पर रिसे उग भाता है । इसठिये नावको वास्तविक म क्या है, उसका विचार विचार कर उस्से मुक होना चाहिये। मुझे किस कारणसे पाम होता है, यह किस तय र सला '! पाविचार पारे करना चाहिये । रात्रि भोजन करनेसे बालस-प्रमाद उत्पन्न होता है, जागृति होती नहीं, अचार बसा मी, इस्पानि बनेक प्रकारक दोष यति भोगनसे पैश होते है । मैषुम करने मचात् भी पहुक्से दोष टापन होते हैं। को हरिपाण दिनारता हो तो प हमसे ऐसा गा सकता ही । पपा मामा उनकता प्राप्त फरे तो पास ही बनुपा दुदि पती। शानमें सभा ही माहित होता है, उन्ला मासित नहीं होता । हानी मोहको प्रवेश परमे देख मही । उसके गागृत उपयोग होताना मिस तम परिणाम सा हो जाता होता है । तथा मिस तरह मानाका परिणाम हो सो बानका कार्य होता है। पनाम पसना सौपा गोडमा सीमा भौर सब कुछ सौपा होता है।कानाच सम का उल्टा 0 हैन विकम्प होते है। मोसा उपाय है। मोम-मासे सबर होगी चारमापसे प्रतीति मारेगी। बयाना रूप से काम कोष बारितामी उसका है। हाना हापसे पारिप्र मा हो तो मोश दो बाप । पानी गोमो है सब सतारे मात्र पार उतारनेवाले। समषित मानेक पथात बारमा समात्रिको प्राप्त करेगी, क्योंकि माया सदीदागा। - मादपद मुदी १९५२ प्रश्न -पानसेम निर्यप होती है क्या पहा! उत्तर.-सार मानमेवान रते हैं और सार न माननको मान पाम मिमी मी पामे मित पा सम्याण प्राति परे परमार्थको मरमा चार । गदंपरदिन होमवादित बामा प्रातिपरका माम 'निर्गय है।
उपदेश-या प्रम उत्तर - --मारमा एकमयमा भनेक । उचर -यदि वारमा एक ही हो तो पूर्वमें बो रामचन्द्रची मुक्त हो गये है, उससे सबको मुक्ति हो जानी चाहिये । अर्थात् एककी मुठिाई तो स्वकी मुक्ति हो जानी चाहिये, और तो फिर इसरोंको सस्थान सहरु मादि साधनोंकी भी वाश्यकता नहीं। प्रम -मुक्ति होने के पचात, क्या जीव एकाकार हो गाता है! -यदि मुक्त होने के बाद बीय एकाकार हो जाता हो तो स्वानुमत्र वानन्दका अनुमय फरे मही। कोई पुरुष पोवाकर बैठा, बौर पर विदेह-मुक हो गया। बा में दूसरा पुरुष यहाँ भाकर बैठा, पर मी मुक्छ हो गया। परन्तु इस तरह तीसरे चौथे सबके सब मुफ हो नहीं जाते । बारमा एक है ठसका वाशप यह है कि सब वारमायें वस्तुस्मसे तो समान है, परन्तु स्वतत्र है, स्वानुमा करती है। इस कारण पास्मा मिम मिम है । "वारमा एक है, इसलिये मुझे कोई दूसरी भांति रसनेकी यरूरत मही! जगत् फुल चीन ही नहीं, ऐसे मन्तिरीत भारसे पर्तन करनेसे मुछि"- ऐसा मो कहता है, उसे विचारना चाहिये कि तब तो एकको मुक्तिसे बसर सबकी मुदि हो जानी चाहिये । परन्तु ऐसा होता नहीं, इसलिये वामा मिन मिम है । गत्की भांति दूर हो गई इससे ऐसा समझना नहीं कि पत्र सूर्य वादि ठपरसे नीचे गिर पाते हैं । इसका बाशप यही कि चारमाकी विपक्से भान्ति दूर हो गई है। सदिसे कई कल्याण नहीं । बामाके अब विचारको प्राप्त किये बिना कस्पाग होता नही । माया कपटसे धूठ बोसनेमें बहुत पाप है। वह पाप दो प्रकारका है। मान और धन प्राप्त करनेके पि झूठ बोले तो उसमें मात पाप है । वामीविकाके किये मूठ मोना पड़ा दो, बोर पपाताप करे तो उसे पहिलेको अपेक्षा पुल कम पाप गता है। बाप स्वयं पचास बरसका हो वोर ठसका मांस बरसका पुत्र मर जाय तोप बाप उसके पास गो मामूषण होते ने निकाल लेता है! पुत्रके देहान्त-क्षणमें जो राम्य पाप स्मशान पैराम्य था। मगवान्ने किसी मा पदार्थको सरेको देनेको मुनिको वाडा दी नहीं । देशको धर्मका साधन मानकर उसे निबाहने के लिये वो सबारा दी है, उतनी ही बाड़ा दी है। बाको दूसरेको फुछ भी देनेकी अमादी नहीं। माशा दी होती तो परिणाकी पनि ही होती, और उससे पनुक्रमसे कम पान वादि साकर कुटुम्मका मपना दूसरोंका पोपण करके बहका दानवीर होता । इसध्येि मुनिको विचार करना चाहिये कि तीर्थकरने यो का रसनेको भाडा दौरे पर केबल तेरे अपने लिये हो और र मी गैकिक मि पाकर सपमम मानेके दिये ही दी है। कोई मुनि गृहस्थके घरसे या ऐ, और उसके सो बानेसे प उसे वापिस न दे, तो ठसे तीन उपपास करने चाहिये-ऐसी हानी-पुस्पोको वादा है। उसका कारण यही है कि मुनि उपपोगशम्प या है। यदि इतना अधिक बोसा मुनिके सिरपर न रस्सा नाता, तो उसका दूसरी बस्तुषोंक मी मनेका मन होता, वौर वह कुछ समप बाद परिग्रहको हमि करके मुनिपनेको हो गुमा बैठता । जानीने इस प्रकारफे जो कठिन मार्गका प्ररूपण किया है उसका यही कारण है कि पा मानता है कि यह बात विसासन पात्र महीं है। कारण कि मा भान्तिकागो । परि पु छ्ट दो ५८ सात पातुएँ पहाई, भीम परद [५४९ जानेसे इन्द्रियों को प्रियता होती मही, और उससे कमसे इन्द्रियों में होती है। सपा पाँच त्रियों मी गिा निपके पश करमेसे बाकीच पार इन्द्रियाँ सहर हो या हो जाता है। प्रार करना चाहिये । किसी रसबा पदाको बारे प्रेरित होना नही । बसिष्ठ महार करना नहीं। पैसे कसा बनमें सून, माँस, डी, पमपा, मौर्य, मय, और मूत्र ये और उसका वोर कोई देखनेके रिम्प को वो उसके उपर वापि होती है, और एकातक मी मी माता उसी तय मा पुरुषके शरीरको रचना है। परन्तु उसमें ऊपर उपरसे रमनापता देसर मारको मोर होता है और उसमें यह तृष्णापूर्वक प्रेरित होता है। मानसे गौर मूछता है-ऐसा विचार कर समझकर, पायक उमर मरधिमाल जाना चाहिये । इसी तर हरेक वस्तुको तुष्मता समझना चाहिए। इस तर समझाकर मनका निरोप करना चाहिये । तार्यकरने उपवास करने वाला को, पापा इनियोंको पश करनेके छिपे ही की। बक उपचासो भरमसे इनिौ पश हाती मही, परन्तु पदि उपयोग होतो-विचारसरित हो वो. -स होती । बिस तर म्नहित वाण म्पर्प होम गाता है, उसी तय उपपोगरहित उपवास पाहमापके लिये होता नहीं। अपनेमें कोई गुण प्रगट हुमा हो, और उसके लिये पदि कोई वफ्मी स्तुति करे, और मी उससे अपनी मामा नकार उत्पन्न हो तो ग पछि हट पाती। मपनी मारमा मिनार मही बम्पतर दोप विचारे नहीं, तो गीत मैकिक मारमें चमगाता है, परन्तु पदि अपने योगों का निरीक्षण करे वफ्नो नामाच निन्दा करे, वरमावसे रित होकर विचार करे, वो सपुरफके बामपसे बारममक्ष हाता है। मार्गक पानमें अनन्त मन्वयप है। उनमें फिर मैंने पप किया ' मैं पा सा सन्दर किया ' इस प्रकारका बमिमान होता है। मैंने कुछ मी लिपा ही नही' पारपि रखनेसे हो पा बमिमान दूर होता है। मेडिकौर वगैलिक इस व्य दो मात्र होते है। मैकितसे ससार और बगैकिसे मोग होती। बाध इन्द्रियों पञ्च किया हो तो सुपुस्पके बालपसे तम्ब हो सकता है। इस कारण या इन्द्रियोंको पशमें करना श्रेष्ठ है । बाग इन्द्रियाँ वशमें रोप वीर सपुस्पा बामपन हो तो गौकिक्रमाचमें पर मानेको समावना यतीहै। उपाप किये बिना को रोग मिटता नहीं। इसी तय गौरको गेमरूमा यो रोग। उसका उपाय किये बिना पा दूर होता नहीं । ऐसे दोपके र करने के लिये गाल परा मी उपाय करना महा। पति उपाय करे तो होप हा में हो माग गाम । कारणको बना करे तो दो कार्य होता है। कारण मिना कर्म मही होता । सचे उपापको गौब सोमता महीं । गांव जानी-मुस्पके रचनाको प्रवण करे तो उस एवममें प्रताति ऐती नहीं। मुझे गेम छोड़ना है, ऐसी बीममूत माना हो तो दोष र अनुम्मसे बीम-बान प्रगट होता।
५४३] उपदेश-पाया ५३९ प्रम-मारमा एक है मयबा बनेक उचर -यदि वामा एक ही हो तो पूर्वमें बो रामचन्नबी मुफ हो गये है, उससे सरको मुक्ति हो जाना चाहिय । वर्षात् एककी मुक्ति हुई हो तो स्वकी मुक्ति हो जानी चाहिये, चौर तो फिर दूसरोंको सत्चार सहर वादि साधनोंका भी नाश्यकता नहीं। प्रम-मुकि होनेके पमात, म्या जीव एकाकार हो जाता है! उत्तर -पदि मुल होने के बाद बीप एकाकार हो जाता हो तो म्वानुमय वानन्दका अनुमत्र करे नहीं । कोई पुरुप यहाँ वाकर बैठा, बोर वा क्देिह-मुफ हो गया। बादमें दूसरा पुरुष यहाँ आकर बेठा, वह भी मुक हो गया। परन्तु इस तर तीसरे चौपे सबके सब मुक्त हो मही बाते । बरमा एक है उसका वाशप यह है कि सब आश्मा बस्तुमसे तो समान है, परन्तु स्वतन्त्र है, स्वानुमम करती है । इस कारण वास्मा मिम मिम है । "लास्मा एक है, इसठिये तुझे कोई दूसरी भांति रसनेकी जरूरत नहीं ! जगत् कुछ पीर ही नहीं, ऐसे मन्तिरमित मापसे बर्तन करनेसे मुकि है" ऐसा बो कहता है, उसे विचारना चाहिये कि तब तो एकको मुक्षिसे जरूर सबकी मुकिहो मानी चाहिये । परन्तु एसा होता नहीं, इसछिप वामा मिम मिम । यगत्की भ्रांति दूर हा गई, इससे ऐसा समझना मही कि चन्द्र सूर्य वादि उपरसे नीचे गिर पाते है। इसका माशय यही है कि भारमाकी विषयसे भान्ति दूर हो गई है। हमसे कोई कल्याण नहीं । बारमाक शुद्ध विचारको प्रस किये बिना कपाण होता नहीं। मायाकपटसे झूठ बोसनेमें बहुत पाप है। यह पाप दो प्रकारका है। मान और पन प्राप्त करनेके सिप छठ पोडे तो उसमें बात पाप है । वागविकाके लिये झूठ बोगना पका, बोर पमाचाप करे वा उसे परिमेकी अपेक्षा कुछ कम पाप गता है। बाप स्वप पचास परसका हो, और उसका बीस बरसका पुत्र मर गाय सो मा माप उसके पास चौ बाषण हाते है उन्हें निकाल लेताहै! पुत्रके देवास-क्षणमें बा वैराग्य या, ना स्मशान वैराग्य पा! मगवान्ने किसी भी पार्षको दूसरेको देनेकी मुनिको बाजा दी नहीं । देशको धर्मका साधन मानकर उसे निबाहने के लिये मो कुछ मात्रा दी है, उतनी ही वाला दी है। बाकी दूसरेको कुछ भी देनेकी मात्रा दो मही। पाहा दी होती वो परिमाको पनि ही होती वौर उससे मनुक्रमसे अप पान बादि छाकर फुटुमश्च वया सरोका पोषण करके सबका दानवीर हाता । इसरिये मुनिको विचार करना चाहिये कि तार्यकरने को कुछ रसनेको महा दीकेस तेरे अपने लिये ही है और म मागकिक परे पाकर संपममें छगनक लिये ही दी है। कोई मुनि गृहस्पके पसे मई माया हो, और उसके सो गनेसे पर उसे वापिस न दे, तो उसे तीन उपवास करने चाहिये-ऐसी पानी-पुरुषोंको माहा है। उसका कारण यही है कि पा मुनि उपयोगशून्य या है। यदि इतना अधिक पोसा मुनिके सिरपर न रमणा वाता, तो उसका यसरी यस्तो मी मनेका मन होता, और पपष्ट समप बाद परिमाको पनि करके मुनिपनेका गुमा बैठता । जानीने इस प्रकारक को कठिन मार्गका प्रसपण किया है उसका यही कारण है कि पा मानता है कि यह गाव किसासका पात्र मही है। कारण फिर मान्तिमान है। परिसरको [४५ भीमरायचन्द्र हेगी तो काममसे ठस उस प्रकारमें मिशेष प्रति होगी या पानकर हानाने र सी निगा बाके सवपमें मीस तर माचरण करनेकी वाचा।का परि तो या बात सपारण है। परन्तु हानाको पिमें ठत्नी मी बसम्म्से नाश कर सके इतनी यही माश्म हाती है। अपमदेवीके पास वान पुत्र पर मानेके वभिप्रायस वाये पेकिनमें रान प्रशाम करो।' पोवो अपमदेवने उपदेश देकर पानके मानयोको दी मर मिया । देणे महान् पुस करणा। फेशोस्वामी और गौतमस्थामा फैसे सरापे ! दोर्मोंने ही एक मार्गको माननेसे पाप मनात मरण किये थे। मानकरके समयमें दोनों पोंकाइक होना हो तो या न बने । वामको दिय गौर तप्पा, तथा हरेक युदे संघाका इच्छा होना हो तो यह न बने उसमें कितना ही कार म्पतीत हो पाप । पपपि ठसमें है फुट मी नहीं, परन्तु मरम्ता के कारण प समय ही नहीं । सत्पुरुप कुछ सत् बनुमानका त्याग कराते नहीं, परन्तु मदि उसका माहामा होता है से बापा दूर कराने के लिये उसका एक बार त्याग कराते हैं। वाय दूर होने के बाद पासे उसे में प्राण करनेको करते है। बहता राजा जैस मी नम होकर परे गये है। कोई पक्रतता राया हो उसने राम्पका माग कर दीधा प्राण को हो और उसकी कुछ भूल हो गई और कोई ऐसी बात हो कि उस पामार सम्पमात्र सीकर कई पुत्र उस भूसको सुपार सकता हो, तो उसके पास जाकर, चमता को उसके कथनके प्राण करमेकी मात्रा की गई है। पदि उसे उस दासौके पुत्र के पास माते समय ऐसा हो कि मैं दासीने पुत्र के पास कैसे गाउँ तो उसे मटक मटककर मरना है । ऐसे कारणों के उपस्थित होने- पर गेर-पानको बनेका 0 उपदेदा किया है। वर्षात् माँ मामाको उप के मानेका कोई असर हो कहाँ खोक-लाम नहीं मानी गर । परम्त कोई मुमि विषय रणसे पेश्याके पर पाप और माँ गाकर उसे ऐसा ऐ कि मुझे लोग देसमगे तो मेरा निन्य होगी, इसलिये पहोंसे पाक्सि औठ पाना चाहिपे ' तो यहाँ बोक-लाम रसनेका विधान है। क्योंकि ऐसे स्थानमें बगेकगका मप सामेसे जपचर्य पता है मो उपकारक है। दिवो क्या से समझना चाहिये । पाठमको तकरारको विपिके लिये करना मह, परस्तु हरियागके रक्षणके छिपे ही सिपि पानी चाहिये । हरिपाके पके किसे मार मा विपि कही गई है विधिक सिपे वारम वादिको कामही । सम्मेि वाटम वादि लिपि साहको दूर करना चाहिये । यो कुरा कसा कामहके फरनेके मि का नहीं । धामाको पुलिस गितना करो उतना प्रितकारी है। गितना बरिसे करोग उतना ही परितका है इसलिये मुस्तापूर्वक समतका सपन करना चाहिये। हमें तो प्रमग, रेणव पाहबो0 सब समान ही कोई न कहा जाता हो और मतम प्रत हो तोप अहितकारी, मतरहित हो हितकारी है। सामापिक शासकार विचार किया कि यदि कामाचे स्थिर रसनी होगी, तो पीछेसे विचार करेगा; निपम ही बाँधा दो तो रमो धममें पा जायगा सा समझकर उस प्रकारका नियम बना।
उपदेश-प्रया जैसा मनका परिणाम हो वैसा ही सामायिक होता है। मनका घोड़ा दौरता हो तो कर्मवध होता है। मनका घोड़ा दौरता हो और सामायिक किया हो तो उसका फल कैसा हो! कर्मवधको थोड़ा योगा छोडनेकी इस करे तो छ । जैसे फोई कोठी भरी हो, और उससे कण कण फरके निकाण गाय तो मह मतमें साठी हो जाती है। परन्तु समासे कोको छोपना हो सार्थक है। बावश्यक स प्रकार है--सामायिक, चौवीस्थो, पदना, प्रतिक्रमण, कायोरसर्ग बौर प्रश्पारल्यान । सामायिक वर्षात् सावप-योगकी निवृति। पचना (बाँचमा) पृष्ना (म्ना), परिवर्जना (फिर फिरसे विचार करना ) और धर्मकया (धर्मविषयक कया करनी ), ये चार प्रम्प है, और अनुप्रभा ये भाव है । यदि अनुप्रेक्षा म जाये तो पहिले चार द्रम्प हैं। नहानी लोग ' बायकछ केवलबान नहीं मोव नहीं है' ऐसी हीन पुरुषार्पकी बातें करते है।बानीका बचन पुस्पार्थ प्रेरित करनेवाग होता। वानी शिपिक है, इस कारण पर ऐसे दोन पुस्पार्यके पचन करता है । पचम काझी, मास्थितिकी मयमा वायुको वातको मनमें मना नहीं और इस तराकी वाणी मुनना नहीं। कोई हीन-पुरुपाया बातें करे कि उपरान कारपकी क्या जरूरत है। पूर्वमें यशोप्याकेबली शेही गरे। तो ऐसी बातोंसे पुरुपार्य-हीन म होना चाहिये । ससंग और सत् सामनके विना कमी मी कम्न्याण होता नहीं। यदि अपने आपसे ही कल्याण होता रो, सो मिट्टी से स्स्य होघका उत्पम हो मापा करे । परन्तु बसों वर्ष म्पतीत हो चाप फिर मी मिझीमसे था स्वय उत्पम होता नहीं। उसी तय उपादान कारणके बिना कम्याण होता नहीं । शाबका मचम है कि तीर्थकरका सपोग इजा और फिर भी काम्याण नहीं जा उसका कारण पुरुषार्य-रहितपना ही है। पूर्वमें उमें हानीका सयोग मा पाकिर मी पुरुपाके बिना बसे गा योग निफ चम गया उसी तय जो बानीका योग मिम्मी, और पुस्पार्थ म करो तो पर योग भी निष्फल हो पण गापमा । इसलिये पुरुपार्य करना चाहिये और तोही कारस्पाम होगा । उपादान कारण है। ऐसा निश्चय करमा चाहिये कि सत्पुरुषके कारण निमितसे-अनत गौच पार हो गये है। कारणके बिना कोई बीच पार होता नहीं। बशोप्याकेपीको वागे पारे सा संयोग मिम होगा। ससंगके बिना समस्त जगत् बहो गया है। मीरा महामलिवान थी। सुदर वाचरणवा मुम्दर समागमसे समता आती है। समताके विचारफे सिप दोघही सामायिक करना कहा सामायिक मनक मनोरथको ठग सीपा चिंतन करे तो कुछ मी फल महो। सामापिकका मनके दौरते पर घोड़ेको राकनेके लिये प्ररूपण किया है। एक पल, संक्सरीके सिमबत्री पौषकी तिथिका वापर करता है, बार इसरा पक्ष पाँचमको वियिका आग्रह करता है। माना करनेवाले दोनों ही मिप्यात्पी हानी-पुरुषाने तिथियों की मर्यादा मामाके सिये हो की है। क्योंकि या कोई एक दिन महिपत न किया होता तो प्रश्यक विधियों का निपम पता नहीं। बामायके लिये विधिको ।
५४ [४१ भीमद् रामचन मर्यादाका छाम मेना चाहिये । बाकी तिपि-विपिके मेदको मेरो मा चाहिये । ऐसी कल्पना करना नहीं, ऐसी भगनासमें पाना नहीं। वानन नजीने का है- फल भनेकोव सोधन न देखे, पर अनाव पिरिया करी बापग, रहबरे पार गतिमादि सेसे । बर्यात विस किमाके करमेसे ममेक फल हो गए किया मोक्षके लिये महा। अनेक किपा- मोका फल मोश ही होना चाहिये | माके बोंके प्रगट होनेके सिपे किपाका वर्णन किया गया है। परि नियामोंका या फल न दुखा हो तो ये सब किया ससारको ही देख है। 'निदामि गरिहामि कपाल बोसियमि' ऐसा यो का है, उसका रेखा कपापको विस्मरण करानका परन्तु छोग तो विचारे एकदम बारमाको ही मिस्मरण कर देते हैं। जीको देवगतिको मोके मुला, और भन्म उस तयकी कामनाका दाम रसना चाहिये। पचमसके गुरु कैसे होते हैं उसका एक सन्यासाच पन्त - कोई संन्यासी अपने शिम्पके पर गया । स बहुत पर पी पी । मोमन करने ठमेके समप शिष्यने स्नान करनेके लिये कहा, दो गुम्ने मनमें विचार किया कि मं बहुत पापो? और इसमें स्नान करना पागा , पE Aचार कर म्यासोने कहा कि मे तो बान-गगाम में स्नान कर डिपा शिष्प पुद्धिमान् था समत गया और उसने ऐसा रास्ता फका बिससे गुसो कुछ शिक्षा मिले । शिप्पने गुस्साये मोजन करने के लिये मानपूर्णक युग कर उन्हें भोजन करापा । प्रसाद ने बार गुरु महाराम एक कमरेमें सो गये । गुस्माको या प्यास लगी तो उगों ने शिप्पसे बस मैंगा। इसार शिप्पन तुरत ही बाब दिपा ' महान माप मान-गगार्मेसे ही मा। मा शिष्यने ऐसा काटिन राम्ता पकड़ा तो गुम्ने स्वीकार किया ' मेरे पास शाम नही है। देशको साताके लिये आमने स्नान न करमेके लिये पेसा कराया था। मिप्पाशिक पूर्वक जप-तप अमातफ भी एक मम्महितार्पके लिये हुए नहीं। बहमा मुम्पत्पमे मान्मम्ममावसे नाचरण करे पर 'अभ्यामपान' । मुस्मापसे मिसमें आमाका वर्णन किया होगा मप्पामाम । अशर (घ) मप्पाहमाका मोश होता नहीं। या गुण भयरोमें करे गये २ गुण परिवामा पंता मोश्च हो गाय । सपुरुषों में मार अपाम प्रगर रहता है। कार पाणी सुननेक लिये हो जो पचनोंको मुने उसे शम्द-अप्पानी करना चाहिये । शप-सप्यारमा छोग वप्पारमको बातें करते है और महा समर्थकारक बापरण परने हैं। इस कारण उन पैसोंको बान-दान करना चाहिये । पसे अम्पामियों को सुप और मानी समठना चाहिये। पानी-पुरुपनपी मूर्परे प्रगर रोनेके पपात् सो सम्पामी पुष्फ ररिसे बाबरण करते नहीं से मार-अप्पाममें ही प्रगटपसे एते है । वामा सो सके गुणों के उपम होने के बाद मोती राम में द्रम्प-अध्यात्मी गाना बहुत है । दम्प-अप्पामा मे मलिश शामा समान है।
६४१] उपवेरा छापा मोह मादि सिकार इस तय है किबो सम्यम्दष्ठिको मी पायमान कर सकते है, इसलिये तुम तो ऐसा समझना चाहिये कि मोक्ष मार्गक प्राप्त करनेमें से अनेक विप्न है। वायु तो थोकी, और कार्य महाभारत करना है। मिस प्रकार नाका तो छोटी हो वौर बड़ा महासागर पार करना हो, उसी तर वायु तो योनी और ससाररूपी महासागर पार करना है। दो पुरुष प्रमुके मामसे पार ए हैं, उन पुरुपोंको धन्य है। कहानी जीवको सबर नहीं कि ममुफ मगह गिरनेकी है, परन्तु यह बानियोंगरा देसी है। महानी-द्रम्प-अप्यारमी करते हैं कि मेरेमें कपाप नही है। सम्पादपि एप-सपोगसे ही है। कोई मुनि गुफामें ध्यान करनेके शिये ना ये थे। यहाँ एक सिंह मिल गया। मुनिके हापमें एक सकसी पी। सिंहके सामने पदि डकरी उठा बाय सो सिंह भाग बापगा, इस प्रकार मनमें होनेपर मुनिको विचार भाया कि मैं वरमा बनर ममर , देस प्रेम रसना योग्य नहीं । इसलिये हे गीर ! यही समा य । सिंहका गो मय है वही काम है । देशमें मूकि कारण ही भप है, इस प्रका- रकी माक्ना करते करते थे दो घणक यही सो ये, कि इतने में केवमान प्रगट हो गपा । इसपिये विचार विचार दशामें गात ही बन्तर है। उपयोग नौसके बिना होता नही । म धौर चैतम्य इन दोनोंमें परिणाम होता है। देहधारी बीवमें मध्यबसायकी प्राति होती है, सकल्प-विकल्प उपस्थित होते है, परन्तु निम्पिपना हानसे ही होता है। बप्पक्सायका बानसे क्षय होता है। यही प्यानका त है। परन्तु उपयोग गना चाहिये। धर्मप्यान और शुझम्पान उधम को पाते हैं। मार्द और विम्यान मिथ्या को जाते है। पाम उपाधि ही अप्पबसाप है । उपम भल्या हो तो पान या गाता है, वौर बारमा सम्प परिणाम प्राप्त करताहै। माणेकदासमी एक वेदान्ती पे । ठम्होंने मोशको वपेक्षा ससाको हो भविक पपार्प माना है। ठनोंने कहा निम पदनस ना मिसे, हीरा पहुंठ पाम | सकपासे पाईये, सो परि सबसे गम । गुरु और कहानी पायरियोंका इस कामें पार नहीं । बडे बरे परपोषा पड़ाये, और द्रम्प सर्च करे -यह सब ऐसा जानकर कि मेरा पाण रोगा। ऐसा समझकर हमारों रूपये सर्व कर रास्ता है। एक एक पैसेको झूट बोग मोसकर तो एका करता है और एक ही साप हगारों रुपपे सर्प कर देता है। देखो, गामका कितमा अधिक ब्यान ! पुष पार नही भावा। वास्माका जैसा स्वरूप है उसके उसी सहरको 'पपासात पारिन' का है। भय वानसे है।शिका मम मिहिनीका होता नहीं। नागका भय नागिनीको होता नहीं । इसका कारण पहीहै कि उनका महान र हो गया है। जबतक सम्पन्न प्रगट नशे तबतक मिप्यान है और जब मिम्र गुणस्यानकका माश अप्प तब सम्पक्ल हा गाता है। समस्त अहामी पहिले गुमस्पानकर्मे है।
[१४१ . प्रीम रामचन्द्र संश-सद्गुरके वापसे गो सयम होता है, उसे ' सरागसपम' कहा जाता है। निधि पनि विस्थानकच तर पो तो सम्गसंपमसे । बोकमासपम' पैदा होता है। उस मावि बनिरपि दोनों ही बराबर है। सwसे प्रपना ऐना भान्ति । या तो स तया, म्स तय होगा' इस प्रकारका मात्र 'का' है। समझने के सिप विचार करके पूछनेको 'बा' - अपने बापसे वो समझमें न माने, 'बासका मोहनीय है। स्पा गाम किया हो वीर फिर मी सबा सबा भाव न बावे, या मी' नाशका मोहनीय है। वपने वापसे मो समझामे न बाले उसे पाना चाहिये । ममस्वरूप माननेके पश्चात् सचर विषयके समय पर किस व्य होगा, इस प्रकार गानने के लिये निसको साक्षा हो उसत्र सम्यक्रम नर होता नहीं वर्षात् म पतित होता नही। मिप्या भान्तिका होना शंका है। मिप्पा प्रतीति बनतानुवषामें हो गर्मित हो जाती है। माम- मालासे दोपका देखना मिप्यान । क्षयोपशम वर्षात् रूप और उपशम हो पाना । (६) राम बाब प्रदेश बरके नीचे दोपरके दो बये पदि शान-मार्गका मारापन करे तो रास्ते नमते हुए भी ज्ञान हो जाता है। समझमें का गाय तो वामा सहममें ही प्रगट हो बाप, नहीं तो निन्दगी पात पाप तो मी प्रगट न हो। केवळ माहात्म्प समझना चाहिये । निकाम बुद्धि और मलि चाहिये । बत करणको प्रति हो जाल सता ही उत्पम ऐ गाता । पदि जानाका परिचय हो तो जानकी प्राप्ति होती है। पदि किसी बीचे पोम्प देखें तो हानी उसे पता है कि समस्त कापना मेष देने वैसा । पानीको मात्र परिबोध-स्वासे परिचाने तो यपार्यवान होता नहीं। गग मानाका पाग-पत्पाबाले वर्षात् पैसा चाहिये मैसा पपार्थ त्याग करने बानी करे, तो मापा मुसा देती है, इसध्येि बराबर जागृत गमा चाहिये और मायाको पूर करते पना बाहिप । जानके त्यागानीके बताये हुए त्याग के किसे कमर कसकर तप्यार रहना चाहिये। अब समग हो तब मापा र यती है। गौर संगका संयोग र हुमा किन किर हैप्पा- रको तप्पार मोहै। इसलिये बाग उपाधिको कम करना चाहिये । इससे विशेष रूसंग होता है। इसपरणसे पार पाग करमा श्रेष्ठ है। हाना इसी बहानाको ही डास है। समापि करनेके ये सावरणका सेवन करना चाहिये । जो नकली रंगरेपा तो नको हो । बसणे ही सदा यता है । जानीर मिनके एर गई, वर्षात् प पारण करना नहीं पता, ऐसा समझना चाहिये । सपन प्रथम तो पुरे माते है, परन्तु पीछेसे माश्म रोचा किशाना-पुरूप संसारके मनन्त इनोको दूर करता है। जैसे पौष की तो होती है, परन्तु पर दीपक के रोगको दूर परेती। - पथात् देह ६४] उपदेश छाया स्यागके उपर हमेशा छा रसना चाहिये । त्यागको शिथिल महो रसना पीये। प्रावकको तीन मनोरथ चितवन करने चाहिये । सस्यमार्गको बाराधना करनेके लिये मापासे दूर रना चाहिये । त्याग फरत हो जाना चाहिये । माया किस तर मुग देती है, उसका एक प्यन्त एक सम्पासी कशा करता था कि 'मैं मायाको पुम्नेतक मी न दूँगा, मैं नम होकर रियाँगा'। मापाने कहा कि 'मैं तेरे बागे बागे पगी'। सन्यासीने कहा कि 'मैं जग में अकेला निचगा'। मापाने कहा मैं सामने वा गाऊँगी'। इस वयमा सम्पासी जगसमें रहता, और 'मुझे कहा और रेत दोनों समान है। यह कहकर रेतपर सोया करता । एक दिन उसने मापासे म कि बोल पब कहा। मापाने समझ लिया कि इसे गर्व बहुत पा रहा है, इसलिये उसने उत्तर दिया कि मेरे आनेकी जरूरत क्या है। मैं अपने दो पुत्र माकारको तेरी खिदमतमें भेम हो चुकी है। माया इस तर टगती है । इसलिये बानी कहते हैं कि मैं सबसे न्यारा, सर्वया स्पागी हो गया , अवमूत हूँ मन , तपश्चर्या करता है। मेरी बात वगम्य है। मरी दगा पात ही श्रेष्ठ । माया मुझे रोकेगी नहीं' ऐसी मात्र कम्पनाले मायारा गाये गाना नही चाहिये। सछमें बाकार है। जबतक राग-रेप दूर होते मही तबतक तपपर्या करनेका फस हो क्या है। अनकविहीमें मिडीफ्ना हो नहीं सकता, यह केवळ कम्पना है। ससारमें निदेहीफ्ना यता नही,' ऐसा विचार मही करना चाहिये । भपनापन दूर हो बानेसे उस तप या जा सकता है। नमकािकी दशा उचित है । सब बसिष्ठमीने रामको उपरेश Pया, उस समय राम गुरुको राम्प वर्पण करने लगे, परन्तु गुस्ने राम्प लिया ही नहीं । शिष्प और गुरु ऐसे होने चाहिये । महान दूर करना है । उपदेशसे अपनापन दूर हटाना है। जिसका जान गया उसका हुस पहा गया। हामी गृहस्यावासमें बाघ उपदेश त देते नहीं। यो गृहस्यात्रासमें दो ऐसे परमजानी मार्ग बसाते मही, मार्ग पानेको गतिसे मार्ग पणते नहीं। स्वप बरिरस रफर गत माण पते मही, क्योंकि वैसा करनेसे बहुतसे पारणोंमें विरोष जाना संभव है। साम मक्सेि हान होता नही । नझाम मदिसे मान होता है। हानीके उपरेशमें पुतता है। मनिप्छामासे उपदेश देते हैं, पृाहित होते हैं । उपोश शानका माहाम्य है। माहाम्यक कारण बने मी बोध पारे। आनीक सकाम उपदेश होता है, जो संसारके फलका कारण रे । जगत्में अज्ञानीका मार्ग भधिक है । चानाको मिप्पाभार आप हो गया है। वर्षमात्र र हो गया है। इसठिपे उसके सम्म्प अपन मिकरते हैं। बास-जीबोको जानी-अङ्गानाको पहिचान होती नहीं। भामार्पगने जपोश समावस प्रमारी जानकर, दादा तीन तीन नि अन्तरसे नियम पाठनेही भाशा 1धियों के लिये मिष्यामा म रम उम छोड़ना चाहिये । परामद सुराने रिय तिथियों बनाई है पाम् उमझे पदसे उसी PF कापा पड़ता है। हार परत बसि पपूपण तिथियोंकी भान्ति पग करती है। निधियोंक नियमोम मर तररार करना मोश जानसा राम्ता मही । रचित् पौषम नि न पाग जाप, और कई पनि पाठे [१४१ । मीमद् रामचन्द्र और बात्मामें कोममता हो तो यह फम्दायक होता है। निससे वास्तबमें पाप गता है, उसे रोना वपने हापमें , या अपनेसे बन सक्ने जैसा है। उसे भीष रोकता नहीं बौर दूसरी सिपि परिक्ष पोही फिक्र किया करता है। मादिसे शम्द, रूम रस, गप और स्पर्शका मोर पवा बापा उस मोरच पूर करना है। बड़ा पाप माना है। निसे वपिरतिके पापका पिता होती हो उससे यहाँ गा ही कैसे पा सकता है! स्क्य त्याग कर सकता नहीं और शाना बनाते कि मुझे क्न्तराम बात है। मा धर्मका प्रम वाने तो करता है कि उत्य' ! 'उदय उदय' हा करता है, परस्त कुछ में गिर पता मही। गामें बैठा हो और गहा बाबाने तो सबमें समझर चलता है। उस समय उदयको मूग माता है। वर्षात् मफ्नी तो शिषिकता हो, उसके बदले उदयका दोष निभाता है। कौकिक दौर कोचर विचार अदा पुरा होता है। उदयका दोष नियना या कि विचार है । वनादि काले कर्म तो दो पलीमें नाश हो जाते है इसलिये कर्मका दोष निकाम्ना पारिने नही मात्माको हो निन्दा करनी चाहिये । धर्म करनेकी बात बारे तो माग पूर्ण कर्मके दोपको बातको मागे कर देता है। पुरुषार्प करना ही श्रेष्ठ है । पुरुषार्यको परिने करना चाहिये | मिप्यात्म, प्रभाव पौर वाम योगका स्पाग करना चाहिये । कमकि दूर किये बिना फर्म दूर ऐनेवाले नहीं। तने के लिये ही हानियोंने शाओंकी रचना की है। शिपिक होनेके साधन मही पतापे। परिणाम उधे याने पाहिये । कर्म उदयमें बायेगा, पर मनमें ये तो कर्म उदपमें पाता है। माको पुरुषार्थ करे तो कर्म र माय । निम्से उपकार हो पही व रमना चाहिये। (७)वापा स्परे ११बये भावफ सदी र गुरु १९५२ कर्म गिन गिनकर माश किसे नहीं जाते । पानी-पुरुप तो एक साप ही सबके सब इको कर नाश करता। विचारपानको दूरमे वासंबन मेकर जिससे बारमारे पुस्पार्पका बप हो पैसा बापन सेना चाहिये । कर्म-बरन बाबन नहाना चाहिये । मारमामें परिणाम होत अनुप्रेया । मिा पो मनमेकी सत्ता है परन्तु मम देर पक कुमार वा को हों तमी तो । इसी क्य भामा मामिपो उमे सद्गुरू मारिका साधन मिले तो ही मामशान उस्म होता है । गोशान एमापा पूर्णकामन शानियोंने गो बान सम्पान किया है उसके साप और वर्तमानमें गोशाल पानी-गुमान सम्पादन किया है उसके साप पूर्वापर समय होना चाहिये, नहीं तो बहानको हो शान मान लिया ऐमा कहा जायगा। मान से प्रकारक-एक बोगभूत जान बार दूसरा हलभूत दान । प्रतिसे दोनों ही समान है उनमें भेद नही । सम्व-सर्वथा निराकरण हान-ो तो उसी मनसे मोध हा माप और यामम्न जान हो वा कप पत्रा मन मोध। मामा जन्मी बर्षात् प्रवर्ण गक्ष रस और सरिदित बस्तुहै-अरस्तु मही। विमने पदर्शनोको रचना गरे उसने पात मुदिमानीय उपयोग किपा है। ।
। ६४५] उपदेशा छापा बघ मनक अपेक्षावोंसे होता है, परन्तु म्ए प्रकृतियाँ पाठ हैं। ये कर्मको बाटोको उधानके लिये माठ प्रकारको हो। वायु कर्म एक ही मबका घता है। अधिक भवको वायु पंचती नहीं । यदि ममिक माको आयु मवता किसाको भी केवळयान उत्पमनो। बानी-पुरुष समतासे कल्याणका नो सरूप बताता है, वह उपकारके लिये ही बताता ह। जानी-मुस्स मार्ग में मूठे मटके हुए गौत्रको सीधा रास्ता बताते हैं। जो हानीक मार्गसे चले उसका कम्पाम हा बाप कानांके लिए होनेक पधार बहुत काल छा पानेसे वर्षात् मधकार हो जानेसे याानको प्रकृति हो नाता है, और ज्ञानी-पुरुपोंके पचन समामें नहीं वासे । इससे लोगोंको ठम्टा ही भासित होता है। समझमें न मानेसे लोग गम मेद बना मेते हैं। गम्के भेद शानियोंने बनाये नहीं | पानी मार्गका गेप करता है। पानी हो तो मार्गका उपोत करता है। माना जानाके सामने होते हैं। माफि म्मुस होना चाहिये । बाप और बचानी जीव छोटी छोटी बातोंमें भेद ममा छेते हैं। सिडक बोर मुंहपची गैरह के वामहमें कन्याण नहीं । महानाको मतमेद करत ए देर छगती नहीं । बानी-पुरुप सरि-मार्गके मरने पुर-मार्गका प्ररूपम करते हों तो ही जीवको जुदा भासित होता है, वौर यह समझता है कि यह वफ्ना धर्म नहीं। जो पीव कदापीत हो मास मार्ग सादर करता है। विधारणानोंको तो कल्याणका मार्ग एक ही होता है। महान मार्गक पनन्त मेद है। जैसे अपना मका कुरामा हो और दूसरेका ठपका मतिरूपवान हो, परस्तु प्रेम वपने परके पर ही होता है, और यही मममी खाता है उसी पर जो मुस-धर्म अपने वाफ्ने साकार किया है, या चार फैसा मी पणयुक हो, वो मी यही सम्पा मावा है । वैष्णव, बौर, घेतामार, Pगमार नैन मादि चाहे कोई मी हो परन्तु जो करापारीत भावसे मुद समतासे वावरणोंको पागा उसोका कम्पाण होगा। (कापाको) सामायिक कायाके रोगको रोकता है। वारेमाके निर्मल करने के लिये जायाके पोगको रोकना चाहिये । रोकनेसे परिणाममें काम्याण होता है। कापाकी सामायिक करमेकी अपेक्षा एकबार तो बामाको सामायिक करो । दानी-पुरुपके बचन मन मुमकर गाँठ बाँधो तो मारमा सामापिक होगी। मोशका उपाय अनुमत्रगोचर है। जैसे धम्पास करते करते बागे पाते है, से हो मोक्षके दिये भी समसमा चाहिये। जब बारमा कोइ भी क्रिया न करे तब वर्षष कहा जाता है। पुस्पार्प करे तो कस मुल हो । वनन्तकालके कर्म हों और पनि गार पपार्थ पुरुषार्थ करे, तो कर्म पह नहीं करता कि मैं मही गाता। दो पड़ामें मगन्त कर्म माश हो जाते हैं। वरमाको परिचान हो तो कमात्र मात्र हा साप । प्रभ-सम्पल किससे प्रगट होता है! उत्तर -पारमाका पयार्य क्ष हो उससे । सम्पल दो तरका-१ म्पहार वीर २ [ in । . भीमद् यन्त्र परमार्थ । सहके पचनोंका मनमा टम पचोंका विचार करमा, उनको प्रताति करमा, पम्पकार सम्यमत्व' ।बामाको पहिचान होना गए 'परमार्य सम्पाव। पन्तकरणको सुद्धिक बिना मोर पसर करता नहीं। इसलिये प्रपम बंद करणमें माता मानी चाहिये । म्यपार बौर निश्चय स्पानिको मिप्या पनि वामामत यना चाहिये-मपात मात्से पना चाहिये। मामाके स्वमातका मो बारण है, उस हानी 'कर्म' करते । चा सात प्रकृतियों का स्प हो उस समय सम्पाप प्रगट होता है। बनवानुबधी चार कयाय मिप्पाबमोहनीय, मिप्रमोशनीय समकितमोहनीय, पे सात प्रतियों या आप हो पाप उस समय सम्याव प्रगट होता है। प्रभ -कपाय क्या है। उत्तर --सपुस्प मिम्नेपर गौचको बताते है कि नो विचार किये बिना करवा पता है, उसमें पाण नही, फिर मी उसे करमेके सिप भी दुरामा रमता है, यह काम है। उन्मार्गको मोक्षमार्ग माने, वौर मोक्षमार्गको उन्मार्ग माने या मिप्पाच मोहनीप' है। उम्मार्गसे मोश्च होता नहीं इसध्येि मार्ग कोई दूसरा ही होना चाहिम ऐसे मारको ' मिम मोशनीच' मामा पा हेगी'—ऐसा बान होना 'सम्पमत मोहनीप' ।'वामा '-ऐसा नियमान सम्पार है। निपमसे सीब कोमा होता है। दया वाती है। मनके परिणाम उपयोगसहित दो दो कर्म कम लगें। और पदि उपपोगरहित में तो मपिक में । त करणको कोमल परमेक रिप-पुर करनेके छिपे-त बारि करनेका विधान किया है। स्वार-मुनिको कम करनेके किये निपम करना चाहिये । पुर-धर्म याँ यहाँ देखते हैं वही यहाँ रास्तेमें लाता है। (८) परवा मादपद परी १५ शनि १९५२ सौकिक टिम रूप महिमा र पुरुषार्थ करमा मौर सत्प एतिस माचरण करना भान गावा नहीं। उसे तो भेग मूठ हो गये हैं। खोगा या परसात माती पानी टंकी मरकर रस से हो मुमधु गोल इतना इतना उपस पुनकर उसे जरा भी परवा मही पर एक बार्प है। उसका उपकार सियो। शानियाने दोके मानेने ये अनुमबके बचन करे, इसम्येि से पचनों स्मरमर पर उसे समझा जाप-उनका मान-मनन तो साराही मारमा ठप हो पाप । पैसा करने पुण्यात मेहनत महा। उन पचनाच चार म करे तो कमी मी दोष पटे नहीं। सदाचार सेवन करना चाहिये । हानी पुरपामे दपा सम्य, दान प्रमचर्प परिमा परिमाण मापार हानियों का सेवन करना बताया है, २ पधार्थ --मेग्न करमे पोप है। बिना सानाक बीसको मत-नियम करने चाहिये मही। रिप मार आदि वाम गये बितामा समाप आशपाले दया भारि मामाले मही तो मिर ५४.] स्परेमा-अपा गहन मारायबा दया मगरह तो कहाँस बा! विषय कपापसदिस माझ नाते नहीं। बताकरणकी शुद्धिके बिना माहमवान होता मही । मक्ति सब टोपोंका क्षय करनेवाम है, इसठिय र सोशष्ट है। जोक्को विकम्पका म्यापार करमा चाहिये नहीं। विचारवानका विचार और नकाप करते हुए क्षोम होता है । वकार्य करते हुए मिसे पोम न हो यह विचारगान है। जकार्य करते हुए प्रथम नितना कर रहा है उतना कर दूसरी बार करते हुए पता नहीं । इसरिये पहिसे ही वकार्य करनेस स्कना चाहिये-नानिमय कर कार्य करना चाहिय नहीं। सम्पुरुप उपकारक छिय गो उपदेश करते हैं, उसे अषण करे भार उसका दिपार करे, तो भास्य 10 चौबके दोप परें । पारस मणिका सपोग पुमा, और पायरका सोना म बना, तो पाको समै पारसमणि ही मही, या बसुठी फत्पर ही नहीं। उसी तरह गिसक उपदेशसे बाामा सुवर्णम्प नो, तो या सा उपदेय ही सत्पुरुष नहीं और या उपदेशानेबाठा ही योग्य गीत नहीं। चीन पोग्य हो बौर सत्पुरुप सपा हो तो गुण प्रगट ए बिना नहीं हैं। गकिक मासम्पन कमी करना ही नहीं चाहिए । माग समय मागत हो तो समस्त विपरीत कारण दूर हो जॉप । वैसे कोई पुरुष घरमें नीदमें पड़ा सो रहा है उसके घरमें पुचे मिडी बगैय घुस कर नुकसान कर बॉय, वौर बा में बागनेके बाद मा पुरुष नुकसान करनेवाले कुने मादि प्राणियोंका दोष निकाले, किन्तु वपना दोष निकाले नहीं कि में सो गया था इसीलिये ऐसा हमारे इसी तय जीव भपन दोपोंको देखता नहीं। सय जागृत गता हो तो समस्त विपरीत कारण दूर हो गौप, इससिपे स्वप जागृत गना चाहिये । गान ऐसा करता ह कि मेरे तृष्णा, सहकार, गेम वादि दोप र हाते नहीं, वर्षात् जीव अपने रोष निकास्ता नहीं चौर दोपोंके ही दोष निकालता है। वैसे गरमी बहुस पायो वीर इसडिये बाहर न निकल सकते हों, तो नीच सूर्यका दोप निकासता है, परन्तु या एतरी वीर ते यो मूर्पक तापसे बचने के लिये मताय है उनका उपयोग करता म । बानी-मुम्पाने गैकिक माष छोड़कर निस विचारसे अपने दोप घटाये हैं—नाश किये है–उन विचारोंको बीर उन उपापाको शानिमि उपकारके लिये कहा। उमें प्रबण कर जिससे मामा परिणाम हो वैसा करना चाहिये । किस तबसे दोप पा सकता है। बीच डौकिक मार्कको तो किये बग माता है, और दोय क्यों पटते नही पसा कहा करता है। मुमुमुवोको मात वति मागत होकर पैराग्यका बाना चाहिये । म्पुरुपके एक पपनको सुनकर परि मानेमें दोषाक एनके कारण बहुत ही सेर करेगा, वीर दोपको पानेगा वो ही गुण प्रगट होगा । सत्संग-समागमची भापकरता है । माको म्पुस्प तो, जैसे एक मागदर्शक दूसरे मार्ग ददाको रास्ता बताकर चला जाता है उसी तर रास्ता बताकर पण पाता है। शिप्प बनानेको सत्पुरुपकी रा नही । जिसे दुराया रहमा उसे वामान मान होता है । भान्ति दूर तो तुरत हो सम्पास उत्पम रोगाप। बाहुबलियाको, जैसे केपणान पासमें हो—अतरमें ही- -था कुछ बाहर न पा, उसी तय सम्पमत्व अपने पास है।
५५० [१॥ म भीमद् पत्र गौर जाकर रहता है, वसत् पत्रम बोलता है, भान्ति रमता है, उसका उसे मिली मान नहीं । इस मानक हुए विना निस्ताप होनेवाण नहीं। घरबार बचोको सग एक मी मचन महो पहुँचवा । गोरको सम्पुस्पका काम समसमें मही गापा । पापम म्फाट सम्वा हो तो उसे छोड़ देना चाहिये । काम बित नहीं । हिम्मत करके वारकापसेर यना चाहिये, परन्तु विरोध करना चाहिये नहीं । सब बानी-पुरूष होते है, तब मतमेद का पता देते हैं।ानी अनुकंपाके स्मेि पर बोध करता है । मानी मुगुरु भगा गा मतभेदको पदाकर कामको सतर्फ कर देते है। सचे पुरम मिले और ये नो कम्पाणका मार्ग बता उसके अनुसार जान भावरण करे, लप कापाम रो बाम । मार्ग विचारमानसे ऍम्ना चाहिये । सत्पुरपके वामपसे भेष्ठ माचरण काम चाहिये । सोटी बुद्धि सबको हैरान करनेवामी, या पापको करनेवाली।महो ममत्व हो पा मिप्पात ।। भावक सब दपाठ होते है। कस्पाणका मार्ग एक होता है, सौ दोसौ नहीं । मांतरका दोष नाश होगा, और सम परिणाम बोलेगा तो हो कस्पाण होगा। भो मतमेरका शेरन करे या पुस्प है। जो सम परिणाम प्रस्में पहले ही सग है। विचारणानका मार्ग मेद मारी। हिन्दू और मुसलमान समान मही है। दिनाँक भर्मगुरु जो धर्म-बोध कर गये थे, उसे बात उपकारक छिपे पर गये पे । पैसा बोध पौराणा मुसम्मानों के शाम नही। मारमापेमासे तो मी, पनिप मुमहमान कुछ मी नहीं है । उसत्र भैर गिसे पर रो गया यही पुरी मे भासित होना, यही जनादिको मूहै। कुमार के अनुसार गो सचा मान मिया यही कपाम है। प्रभा-मोच किसे पता है। उत्तर --मामा अपत शुद्धता कानसे श माना, सब कर्मस मुछ ऐना मात्र है। यापातप्प ज्ञानके प्रगट होनेपर मोध होता है। पातक मान्ति ये तबतक नामा जगत्में पता है। बना कामका जो पता है उस समा जाननापान- फिर भी गौर वो मूग गाताप क्या है ! जाननेमें म्यूनता है। पाप्राप्तप्प भान महा। पूनता किस वय र हो। उस जान- सप समात्रको भूब बाप उसे वारंवार सकरे तो म्पनता र हो सकती है जाना-पुस्पक पवनोंका मापान मसे मान होता है। जो साधन है उपकारक छ । मभिकाना पुस्प बामपसे से तो साधन उपरके हेतु। सत्पुसका ररिसे पानस शाम होता है । सहपके पचोंके वामा निप्पम हानेपर मिष्यात पात प्रमाद भनुम योग एमा- समान दास अनुक्रम शिपिठ पर गाते । मवान विपारनेसे दोष माश होते हैं। साप पुखर पुकार कर गया है। परम्नु नरोतो काम मार्ग पाना है और होकापर मना, और दोर म्यों र हाते नही केस पमा ही करते रहना । साम्या भर संपका मामन पुनमानी एक पल भौर मुलकमान पनी मनुसी । TAITणा नाममा १० बरे ना मारह एक म। गाँवोरीती-मारक - उपवेध-प्रपा छोरकर सत्पुरुपोंके वचनोंको वास्मामें परिणमन करे, वो सब दोष दूर हो बॉय । नीमको अपनापन पाना हो न चाहिये। बाई और महत्ता छोरे बिना बारमा सम्परत के मार्गका परिणाम होना कठिन है। बेदातशाह पर्तमानमें स्वच्छता पानेमें बाते हैं, और उससे मुष्कता जैसा हो जाता है। पदर्शनमें मगन नहीं, परन्तु मामाको केवल मुस-दारिसे देखनपर तीर्थकरने या विचार किया है। मूल छल होनसे जो गा बळमों (सत्पुरुषों) ने कहा, ययार्प है, ऐसा माश्म होगा । मात्माको कमी भी विकार उत्पम न हो, तया राग-देप परिणाम न हो, उसी समय केवलज्ञान कहा जाता है । फ्दर्शनवार्कोने नो विचार किया है, उससे बारमाका ठरें मान होता है-तारतम्प माव, मेद पाता है। पदर्शनको अपनी समझसे बैठा तो कमी मी के नहीं । उसका बैठना सत्पुरुपके वामपसे ही होता है। निसने बारमाझा असग निषिय विचार किया है, उसे मान्ति होती नहीं |-संशय होता मही, भास्माके भस्तित्व स्वपमें शाका यती नहीं। प्रम ---सम्पमत्व कैसे मागम होता है ! उत्तर –बब भीतरसे दशा बदगे, तब सम्पपलकी सार सय ही पाता है । सदेव पर्याद राग-रेप बार बहान बिसके क्षय हो गये हैं। सतुर कौन कहा जाता है ! मिथ्यात्वकी प्रन्धि निसको किम हो गई है । सद्गुरु वर्यास् निम्रप । सर्म वर्षात् जानी-पुरुषोशरा बोच किया हुषा धर्म । इन सानों तलोंको यार्प रातिसे बननेपर सम्पक्स मा समझा गाना चाहिये । महान दूर करनेक किये कारण (सापन ) बताये हैं। जानका सहप जिस समय गान से उस समप मोक्ष हो जाय । परम पो सहर मिले और उपरेशरूपी दवा मारमामें ग तो रोग दूर हो । परस्त उस दबाको नीव यदि अन्तरमें न उतारे, तो उसका रोग कभी मी दूर होता नहीं । मीन सपे समे साधनोंको करता नही । जैसे समस्त कुटुम्मको पहिचानना हो तो पहिले एक मादाको मानमेसे सपको पहिचान हो पाती है उसी तय पहिगे सम्पमत्रको पहिचान हो तो मारमाके समस्त गुणोंनपा कुटुमको पहिचान हो जाती है । सम्पाल सोराय साधन बताया है। बाम चियोंको कम करके नाच वतर्परिणाम करे तो सम्पसका मार्ग बारे । पते पम्ते ही गाँव वाता है, बिना पसे गाँव महीना जाता । मीषको पपार्य सत्पुरुपोंको प्रवाति ई नहीं। गहिररमासे मस्तरामा होमेके पचात् परमारममाव प्रास होना चाहिये । जैसे दूध और पानी पुदा शुगर उसी वय स्पुरुपके बायसे-प्रतातिसे—देह और बारमा गुदा जुगार, ऐसा मान होता है। परमें वपने वत्मानुभवलपसे, असे समीर पानी उदे पुरे होते हैं, उसी तरह देह बार वात्मा गब भिम मास हो उस समय परमाममात्र प्राप्त होता है । रिसे अस्माका विचारलपी प्पान है-सतत निरतर प्यान है, जिसे वारमा सनमें मी कुरा हो मासित हाती , बिम किमी मी समय मात्माको भाप्ति होती ही नहीं उसे ही परमारममाल होता है। बम्तममा निरन्तर पाय आदि र करनेक लिये पुस्पा करती है। चौदह गुणस्पानतक पर विचारसय मिपा रहता है। जिसे मेरम्प-उपशम पता ऐ, उसे ही विचारपान करते हैं। मामा मुछ भीमद् रामचन्द्र [ होने के पश्चात् ससारमें वाती मही । बारमा सानुमा-गोचर है, पर घमुसे रिसाई देवी गी; मन्त्रिप खान उसे मानता है। मो मारमाके उपयोगका मनन करे प मम सम्मता के कारण मन मिम कहा जाता है। सकल्प-विकम्प त्याग देनेको उपयोग करते हैं शानका वारण करनेवाडा निकाषित कर्म बिस्ने म बाँधा हो उसे सम्पुरुपका बोध पाता है। मामुप बहाने पास्कता नहीं। नौबने वान पका रक्सा , इस कारण उपदेश माता नहीं। स्पोरि वायरमकेमा म्गमय कोई यस्ता ही नहीं । मबतक ठोकके अमिनिमेशको फापना करते यो तबतक बाम 30 उठती नही और तबतक म्याण मौ होता नही । बहुम्से नीत सत्पुरुपके गोपको सुनते हैं, परस्त उने विचार करना पोग बनता महो। इन्द्रियोंके निप्रहका न होना -पर्मका भाग, मान-अपाठी कामना, बमन्मस्पमान या का है । उस कराको गौर सवतक नहीं पता तबतक पाण होता नहीं । मष पूर्वको पा तो मी गौच मरफा ! मह र मक नाना परन्तु देहमें यमेवाली वामाको म परिचालय, इस कारण भटका! शाली पुस्प समस्त शकाोध निवारण कर सकता है। परन्तु पार होनेछ सापन तो सपुरको पिसे चम्ना ही है, वीर तो होस नाश होता है। माम मी बीच यदि पुरमार्थ करे तो मामान हो बाप | मिसे बारमान मही उससे कात्याण होता नहीं। पहार विसका परमार्थ है, से नाम-पानीको मालासे बनेर नामा म्पमें जाती है-- प्रमाण होता है। नाममान सहन नही। पंचीकरण, विचारसागरको पढ़कर कपनमात्र माननेसे ज्ञान होता नही। रिसे बनुभव हमारे ऐसे बनुमा वामयसे उसे समहकर उसकी बाणानुसार बावरण करे तो शान । समझे बिना रास्ता पात विकट है। हीरा निकाम्नेके मिस मानके सोने तो मेहनत । पर हरेके सेनेमें मेहनत नहीं। उसी तरह मामाची समसच वाना तुम , मही तो मारमा कुछ दूर मही मान नहीं इससे पर माश्म होती है। गौनको कम्पाप्म करने र करने मान नही, और बपनेपनी राय करनी है। चाप गुणस्थाममें प्रपि-मेट होता है। जो ग्यापमस पाता है उसे उपम एम्पाल का बाता है। गेम चारित्रके गिरानेवाला है। गुणस्थानमें पशम वौर पायिक दोनों होते हैं। उपशम बर्षात् सचा वापरणका एना । कमाणके सने सो कारण गोरके विचारमें गए। गो घास तिको न्यून में नही किो संकुचित करें महाँ परन्तु उम्टी उसको पनि हो करें से शाममि न्पाय काम हो सकता है। मत देनेवाले और तम्बाले दोनों को ही विचार तया उपयोग रखना चाहिये । उपपोग रमनही और मार रहे तो मिकावित कर्म चिकिम करना परिपकी मग करनी पर जिसके मनमें पेश शिपिड कर्म पापा । पाप करनेपर कोई मुधि होता महो। के एक स्को कर गोसानको दूर करना चाहता है ऐसे गानो बान पत्रे कि तेरे जितना हो चारित्र में बा गया। उसमें या तापा बड़ी बात है।
४.] उपदेश-काया ५५॥ गो साघम कोई पता, ये साधन पार होनके साघम हो तो हमे ससापन है, बाकी दो सत्र निष्पत साधन । म्यमहारमें मनन्त पाधायें जाती है तो फिर पार किस तरा पो कोई नादमी गन्दी गन्दी बोले तो मा कपायी कहा जाता है, और कोई धीरमस बोले तो उसमें शान्ति मासूम होती है, परन्तु तपरिणाम हो हो ही शान्ति कही गा सकती है। निसे सोनेके दिये एक विस्तरा-मर चाहिये, पर दस घर फासत रस्से तो उसकी पि का संकुचित होगी! नो पचि येके उसे पाप नहीं । वात्से गौन ऐसे हैं जो इस बयके कारणोंको का करते है कि जिससे पि न फे-ससे पाप नहीं रुकता । भाद्रपद मुदी १५, १९५२ चौदा राम् छोककी नो काममा है ए पाप है, इसलिये परिणाम देखना चाहिये । फगापित् ऐसा कहो कि बौदा राम् गोकका तो सवर मी नहीं, तो मी निवनेका विचार किया उन्ना तो निमित पाप हवा । मुनिको एक तिनकेके प्राण करनेकी मी छूट महो । गृहस्प इतना प्राण करे तो उसे उतना ही पाप है। चा और वास्मा तन्मय नहीं रोवे | सूतको बोटी सूतसे मुदी मही होती, परस्तु बाटो सोलने में कठिनता है, पपपि सूत घटता पता नहीं है। उसी तर बारमा बोटी पर गई। सपुस्प वीर सशाम पा म्यहार कुछ कपिट नहीं । सहरू-सशासरूमी म्पबहारसे जब निव-समरूप दुख हो बाप, तब फेवमाम होता है। निम-स्वरूपके चाननेका नाम समकित है। सत्पुरपके मघनका समना दुर्वम है, प्रदान करना दुईम है, विशार करना दु:म है, तो फिर बनुमण करना दुर्गम हो, इसमें नमीनता हो पा है! उपदेशसान बनादि काम्से पटा नाता है। अकेली पुस्तकसेबान महीं होता। यदि पुस्तकसे शान होता हो तो पुस्तकको ही मोक्ष ऐ गाप ! सहरुको वामानुसार पटनेमें भूठ नाप तो पुस्तक केवळ समानरूपी । बैतन्यमान सत्यमें वा नाप तो पेवमता प्राप्त चाप, घेतमता नमुमगोपर है। गुरुका पचन मरण करे, मनन करे और उसे बास्मामें परिणमा तो कम्पारण हो बाप। पान और अनुभव हो तो मोक्ष से पाप ! म्पबहारका निपेष करना मही चाहिये। अकेले म्यबहारको हो छोराना नहीं चाहिये। भारम-पानको पात, जिससे यह सामान्य हो नाप–स तय करनी पोम्प नही । बामपानकी मात एतमें करनी चाहिये । वामाका बस्तिम चारमें भावे तो अनुभवमें माता है, मही तो उसमें का होती है। मैसे किसी बादमाको अधिक पटक होनेसे Pसई मही देवा, उसी तय बावरणको समाता के कारण मारमाको दिखाई नहीं देता । मादमें मी बारमाको सामाम्पापसे मागवि गती है। वाल्मा सम्पूर्णम्पसे सोती नहीं, उसे वापरण बा गाता है। मास्मा सेवा पान ऐना संभव हो तो सिर बान किसे हो। वपनेको बफ्ना मान ऐमा-अपनेको वपना बान होना-पसीन्मुख होना है। ।
भीमद् रामचन्द्र [६४५ होने के पश्चात् संसारमें वाती नहीं । बारमा सानुमा-गोचर है, वापसे दिखाई देती नहीं, इविक्से मित हान ही उसे बानता है। जो मारमाके उपयोगका मनन करे या मन है संम्मताने म मन मिम कडा गाता है। संकम्प-विकम्प त्याग देनेको उपयोग करते हैं ।वामन बावरण करनेवाग निकाचित कर्म बिसने न पापा हो उसे सुपुरमा बोप गता है। बाडा महो परकता नही। गीने बान पका रस्सा है, इस कारण उपदेश माता नहीं। क्योंकि मारग के कारण भानका कोई रास्ता ही नहीं। जबतक कके वमिनिवेशको कल्पना करते यो तबतक बाहमा ३ उम्ती नहीं और तबतक कल्याण भी होता नहीं । बारसे बात ससुरुफके बोषको मुनते है, परन ठने चार करने योग बनता नहीं । नियोंके निम्मका न होना, कुर्मच बामह, मान-प्रपाको कामना, बमप्यस्पमान का कदापरे । उस कराहको गोल सतक महो मेषता ताक पाण होता नहीं । म पूर्वको पसा तो मी पौष मटका ! बौदा या मक पाना परम्त देहमें रहनेवाम पारम्पको न परिचाय, इस कारण भाच! हानी-पुरुष समस्त शकालोक्य निवारण कर सकता है। परन्तु पार होनेष सापन तो सापुरुपको रविसे बना हो वीर तो ही इस नाश होता है। वाम मी गाल प पुरपाई करे तो बाबान हो जाय । जिसे वात्म-ान नही उससे फमाण होवा मही। प्पबार मिसन परमार्थ है, से मामभाना मासे चम्नेपर बामा सामे बात है-- कल्पाण दोवा। भास्मान सहन नहीं। पंचीकरण, विचारसागरको पाकर फफ्नमात्र माननेसे पान होग नही। जिसे वनुमय पाया है, ऐसे अनुमा मापसे उसे समठकर उसका मानानुसार बावरण करे तो जान से । समझे बिना रास्ता पात विकट है। हीरा निकाम्मे छिपे चमके सोद में तो मेहनत पर होरेके केने मेहनत महो। वसी तय बारमाली समाजका वानाम है, माँ तो मारमा कुछ दूर नहीं मान नही इससे यह र माश्म होती है। गीतको कस्याण करमे म परनेका मान ही है, और अपनेपनकी रक्षा करना है। पापे गुणस्पानमें पंपि-मे होता है। गो ग्यारमिस पाता है उसे उपाम सम्पमतमा गाता है। सोम पारिश्के गिरनेवाला है । पाये गुणस्पानमें उपशम और धायिक दोनों होते हैं। उपशम वर्षात् सता भावरणका यना । कम्पाणके सन्ने सन्चे कारण गीपक मिचारमें नही। पाधिका म्यून रेमो जिका सचित करें नहीं परन्तु उम्टी उसी पनि हो करें, से शाम पाप काम्पो सम्वा है। देनेवासे मार त सनेवाले दोनोमो व पिचार तथा उपभोग रखना चाहिये । उपप्लेग रमो मसी भोर मार को तो निसारित कर्म । कम करना' परिमाण मादा करनी का मिमके मनमें दावा शिपिए कम बाँचता है। पाप करमेपर कोई मुलि होती मही। केवल एक तो मेर जो भयानकार करना चाहता है ऐसे गारो मान तामिमा हो पात में न्यगण । उसमें पह ता क्या की बात है। .
उपदेश-पापा बाधा नाही, तो फिर मरणका मय क्या है ! जिसको देोकी मूर्म चग गई है उसे वास्मपान गुमा कहा जाता है। प्रभ –मौसको किस तब बर्ताव करना चाहिये। उत्तर --जिस तय ससंगके योगसे बास्माको सुरता प्राप्त ए उस तय । परन्तु सशसस गका योग मही मिलता । मोक्को योग्य होनेके लिये हिंसा नहीं करना, सम्प बोलना, बिमा दिपा हुधा नहीं मा, ममचर्य पापना, परिमहको मर्यादा करनी, रात्रिमोजन नहीं करना-त्यादि सदाचरणको, शानिने सुर बस करणसे करने का विधान किया है। मामी यदि बारमाका एक रसकर किया जाता हो तो उपकारी है, नहीं तो उससे केस पुष्प-पोग ही प्राप्त होता है। उससे मनुप्पमा मिडता है, देवगति मिस्तो र, रान मिम्ता है, एक भवका पुस मिलता है, और पाछेसे पाणु गतियोंमें मटकना पाता है । इसलिये शानियोंने तप बादि वो क्रियायें पारमाके उपकारके ठिपे, भाकारीत माक्से फरनेके लिये कही है, टर्ने परमशाना सय भी नगरके उपकारफे लिये निधपरूपसे सेवन करता है। महावीरस्वामीने केवमाम उत्पम होनेके बाद उपनास नहीं किया, ऐसा किसी भी जामाने नहीं किया। फिर भी लोगो मनमें या न हो किशान होने के पमात् साना-पीमा सम एक-सा है इतने के पि ही वन्तिम समय तपकी वाश्यकता बताने के लिये उपवास किमा; दानके सिद्ध करने के लिये पीक्षा नेके पहिले सयं एकवर्षीप दान दिया । इससे मगत्को दान सिम कर रिसापा, माता-पिताकी सेवा सिखकर दिमाई । दीक्षा को छोठी वयमें न मी यह भी उपकारके ठिपे हो, नहीं तो अपनेको करना न करना दोनों ही समान है।गो सापम करे, वामन करनेके लिये हैं। परके उपकारके लिये बानी समाचरण सेवन करता है। हाइमें जैनदर्शनमें बहुत समयसे वम्यात एकी तरह जावरम मा गया है, कोई हामी-पुरुप मही। कितन हो समयसे कोई हामी नहीं हुमा, जन्मपा उसमें इतना अधिक कदापर नहीं हो माता । इस पंचमकाममें सत्पुरुषका याग मिलना तुम है, पौर उसमें गरमें तो शेष दुर्गम देसनेमें जाता है। प्राय पूर्णके सकारी नील देसनेमें मासे नहीं । गतसे नीमों में कोई कोई ही सचा मुमुक्षु-विकास- देरनेमें भावा । पाको तो तीन प्रकारके गीष देखनेमें वाते है, जो वास पिसे पुछ- १ क्रिपा करना नहीं चाहिये क्रिपासे बस देवगति मिझती है, उससे क्या प्राप्त नहीं होता । मिससे चार गलियों का भ्रमण र हो, यही सस्प है'—ऐसा कहकर सावरणको केमा पुष्पका हेतु मान उसे नहीं करते, और पापके कारणों का सेवन करते हुए भटकते नहीं । ऐसे मालोको कुछ करना 0 नही है, मौर बस बी सी बातें करना है। इन चीजोंको 'मानवादी' रूपमें रम्हा या सकता है। २ एकान्त क्रिया करना चाहिपे उसीसे करपाण होगा,' -इस प्रकार माननेगा एकम्त म्पबहारमें कम्पाण मानकर का मही योदते । ऐसे गानोंको ‘क्रिया'मा 'क्रियामा समझना चाहिये । निया-जाने वामाच मन नहीं होता। .
। । भीम पन्द्र पैतन्य एक हो तो प्रान्ति किसे गई समलनी चाहिये । मोक्ष किसे हुई समानी चाहिये । समस्त भैतम्पकी राति एक है, परन्तु प्रत्येक चैतम्पका सत्रापसे मुदा चैतन्य है । पैसा समान एक है । मोक्ष सानुभक्-गोचर है। निरापरणमें भेद नहीं । परमाणु एकत्रित न हों, वर्षात बामा पौर परमाणुका संबंध न होना मुधि है; परसससपमें मिझने का नाम मुक्ति नहीं है। सम्पाण करने म करने का तो मान नहीं, परन्तु नीको अफ्नाफ्न रम्मा | कनक होता है। योग पैतन्य न हो तबतक । एकेन्द्रिय बादि पोनिमें मी सबका मान-सम्मत सपास नहीं हो पाता, रासे सुण हो यता है। अनादि काम्से गांव मा मा। निराम- रण होने के पश्चात् बता महो। मैं मानता।' ऐसा मो बमिमाम है यही चैतम्पको मरत्व है। इस जगत्में बप कौर मोक्ष न होता सो फिर प्रतिका उपदेश किसके लिये होगा। बाहमा स्वमालसे सपा निष्क्रिय है, प्रयोगसे सक्रिय है। जिस समय निर्षिकम्प समाधि होता है इस समय निधिपता हो। निर्विवादरूपसे बेदान्तके विचार करनेमें बापा नही ।वारमा - पप विचार करे तो त हो पाप । सिवपदका करे तो सिव हो बाप । बाचार्या विचार करे वो माचार्य हो माप । उपाप्पापच विचार करे तो उपाम्पाप हो माय । मीरूपा विचार करे तो मात्मा भी हो माया गर्यात् बामा निस स्वरूपका विचार करे तदूप मात्रामा हो जाती है। बामा एक वा बनेक है, इसका चिम्चा मही करमा । हमें तो इस विचारको बसत है कि 'मैं एक' । जगत्मरको का फरमेको क्या पदरी। एक-अनेकका विचार मात र दशके पांच पसात् करना चाहिये । जगत् चौर वास्माको स्वममें मी एक म) मानना । बामा बक, निराकरण है। वेदान्त सुनकर मी मामाको पहिचानना चाहिये । बाम सम्पापक है, नया वाहमा देह-म्पापक है, यह अनुमा प्रमय मनुमवगम्प है। सब धर्मोका तात्पर्य यह है कि बारमाको पहिचानमा चाहिये । सरे यो सब साधन है ये मिस गगन पाहिपे (पोम्प 1 ), उने धानको बाबापूर्वक उपयोग करनेसे वधिकारी गोलको रोख है। दया भादि वाहमा निर्म होनेके सावन ।। मिथ्यात्व, प्रमा, बात, बशुभ पोग, ये अनुक्रमसे दूर बाप तो सत्पुरपका वचन मामा प्रवेश करे। उससे समस्त दोष अनुमसे नाश हो गोप । बारमान चारसे होता है। सपुल पुकार पुकार कर र गये है। परन्तु गौच गेक-मार्गमें पहला और उसे छोकोतर मार्ग मान पाहै। इससे किसी भी तर दोष र महोता। मेकका मप छोड़कर सफुरुपों के पन भामामें प्रवेश करें तो सब दोष दूर हो बाप । जीवको नईभार गना मही चाहिमे । मान-गाई मोर मरणरेमगे बिना पम्पमार्ग वामा प्रवेश मही करता। अनचर्यके विषपः-परमार्थके कारण मदो उतरने के लिये मुनि मे पानाच्या बाजारा परन्तु मात्र या नहीं दी और उसके हिप है कि समाहार परमा, उपवास करमा, एयर करना, भोर मम्तमें जहर खाकर मर जाना, परम्त प्रसपर्य भंग नही करना । दिसे को पूर्ण उसे कम्पाण किस तय माम ऐ सकता है। सर्प काठ बाप और मपम हो तो समझना चाहिये कि मामलाम प्रगट है। मामा मार मार है। '३' रमे- तो ५४.] उपदेश-छा है, और उस प्रकारके कर्मसे पंधि हुए दोनों गतिको प्राप्त होते हैं। ऐसी मुश्किल चैन छोगोंमें विशेष गई है। । , . - । मय भास्माके समझने के ठिये कहे है, परन्तु जीव तो मयनादमें ही ऍप माते है । मामाको समझते हुए नयमें गुप बानेसे यह प्रयोग उम्टा ही हो गया । समफिलमटि गीचको 'केवरमान या बाता है। उसे वर्तमानमें भान हुमा है, इसठिये 'देश-केराम' कहा गाता है; बाकी तो बारमाका मान होना ही केवमहान है। इस तर हा पाता है -समफितरपिको अब बरमाका मान हो तब उसे केवलझानका मान प्रगट हजा; और जब उसका मान प्रगट हो गया, तो कपडाम पास ऐना चाहिये, इसलिये इस बफेशासे समकिप्तधएको केमधान कहा है। सम्पमा पुजा मर्यात् समान बोतकर मौन बो दिया; पक्ष हुमा, फळ बाये, फछ पोरे हो साये, और साते मात वायु पूर्ण ऐ गई, तो किर व दूसरे भरमें फर सावेंगे । इसलिये 'केवडान' इस काठमें नहीं-नहीं, ऐसा पिस्पैत मान महीं भेना, वौर नहीं करना । सम्पक्स प्राप्त होनसे धनतभव दूर होकर एक भम काकी या जाता है, इसलिये सम्पक्व उत्तम है। बारमामें केवग्नान , परम्नु सावरण पूर होनेपर माम होता है । इस कामें सम्पूर्ण सावरण र महीं होता- भर बाकी र जाता है। अर्थात् जितना फेसम्भानावरणीप दूर हो, उतना ही केवलवान होता है । समफित भामेपर, भीतरमें-अंतर- रशा रस गाती है केसवानका मीर प्रगट होता है। सद्गुरु बिना मार्ग मही, ऐसा महान् पुरोने या है। यह उपोश मिना कारण नहीं किया । समकिती वर्षात् मिण्याबसे मुक्त केवटहानी मर्यात् भारिप्रावरणसे सम्पूर्णम्पसे मुला और सिद वात् देश वारिसे सम्पूर्णम्पसे मुक्छ । प्रमः-कर्म किस तप कम होते है। उत्तर --क्रोध न करे, मान मरे, माया न करे, सोम म करे--उससे कर्म कम होते हैं । बाध किया कमेंगा तो मनुम्प यम्म मिगा, और किसी Pन स्वरुपका संयोग होगा। प्रश्न-पत-मिपम करने चाहिये या नहीं ! उत्तर ----निपम फरने चाहिये । परन्तु उसकी साय अगदा, कम्प, छाके बये, और परमें मारामारी नहीं करना चाहिये। पी दशा पाने के लिये ही प्रत-नियम फरमे चाहिये । सबेरेकी परीधा करके उपर एक सपे भवता PRE-- एक पमा गत मकिना था। यह महकी बहुत सेना स्यिा परता था । बहुतसे मध्येको बम-बम वासि पोपण करने के कारण तसे मला गपे । प्रधानने सोपा कि राजा रिचाय मोना है, और भाग इस बातको राजाका परीक्षा कराना चाहिय । परन्तु इस समय तो गमाघे इनपर मात प्रेम है, इसलिये वह मानगा नहीं, इसलिये किसी दूसरे भामरपर बात गा। ऐसा विचार समय कर कमा असर मिनेपर उमने गा प्रा-माप सात समपमे सर मोकी एक-सी सेवा पाकरी करने है, परन्तु उनमें कोई बड़ा दोगा और कोई छोटा समा, इमलिये सरकारमा चाहिये ।' पाने इस बात को साकार किया भार कि तो सिर क्या करना माहित कर प्रधानमे जान जारमझ पाउन मुरी .
पशमी जो यो सापन, भीमद् रामचन्द्र [४॥ १, 'हमको सामान है। मामाको भान्ति होती ही नही, मामा कर्ज मी नहीं, और मोळा मी मही, सम्पिय पुछ भी नहीं'इस प्रकार पोम्नेबारे शुफ बम्पारमा होकर क्नाचार सेवन करते हुए रुकते नहीं । इस तरह वान प्रकारके चीर देसनेमें वाते हैं। गौरको यो पुरा करना ,बामाके उपचार लिये ही करमा है—पा मात दे भूष गपे हैं। में नौ चौरासीसे सौ गएको गये है। उन सम्में कदामा हो गया है, फिर माये सब करते है कि मैनधर्म हमारे'। परिमामि, निामि' मादि पाठका गोको वर्तमानमें ऐसा वर्ष हो गपा माइम होता। कि मैं मामाको विस्मरण करता मर्यात् जिसका अर्प-उपकार-करना है, उसीको–बामा- को दी-विस्मरण कर दिया है। जैसे पारात पर गई। और उसमें वय वरके पैमब बगैर सब कुछ परम्त पदि एक पर न हो तो बारात घोमित महीं होती, पर हो तो एग्रोमित होती है। उसी तय किया रम्य मादि, पछि वारमाका शान हो कोई शोमाको प्राप्त होते है, नहीं तो नही हो । म हसमें वाहमाको रिस्पति हो गई है। सूत्र बौदह पूर्वोचबान मुनिपना, भानपना, नारों तरह के सदाचरण, क्पपर्ण वारि यो जो मेहमत, जो यो पुस्पार्प को ये सब एक बाहमाको पहिचान के लिये। पर प्रफान पदि वास्माको परिचाममेके लिये-सोन निकालने के लिये-यात्माके म्येि होतो समक t, नही तो निफर है। पबपि उससे गाल फल होता है, परन्तु चार गतियों का नाश होय नहीं। मोनको मापुस्पका योग मिथे, और पहा तो पाच सहममें ही योग्य हो पाप, भौर गारमें पति सहस्की मास्या हो तो सम्पत्त उत्पम हो । शम कोष बारिका रुस पर बाला । सवेग मोपमावि सिवाय कप किसी इन्सका न ऐना। निद-मसारसे पक जाना—ससरसे भटक बाना । मास्पा-सपे गुस्की—सद्गुरकी-वास्था होना । बनुकमा सब प्राणिोंपर सममान समा-निर मुद्धि रखना। ये गुण एमबिन्ती गोन्में सामालिक होते है। प्रथम सो पुस्तक पहिचान हो वो बाग्में ये चार गुम पाते है ।वातमें विचार करने के लिये पट् सपरिया बताई। विवेक परम्प मादि सहण प्राप्त होने के बाद बाल योम्प-मुमुसु-मा पाता है। समन्वित बोमरेशचारित है-एक देशसे केसमान है। शावमें इस कामें मोक्षका सम्पा निषेप नहीं। बेस रेम्मायके रास्तेसे मार्गपर मादा पाँच जाते है और पैराले रास्ते देरमें पांचते ८ ठसा तय इस कामें मोगका रास्ता पैदो रास्ते समान हो और इससे पौन पाँच समें या कोई बात न। मन्दी पहें तो गरी पाँच पॉप-स्ता सम है। इसी तर मोघमार्ग है, उसका नाश महा। यानी मायाणके मामि कम्पाण मान समद कम्पना पर बालोंका पर सेना बंद कर देता है। मानांके एगी मोम्मा समानाके को अनुसार पम्ते १] उपदेश-प्रपा । वौर उस प्रकार के कर्मसे बाँधे हुए दोनों फुगतिको प्राप्त होते हैं । ऐसी मुश्किल मैन छोगोंमें विशेष गई है। - । मप मारमाके समझनेके लिये को है, परन्तु नीव तो नयबादमें ही गुँप पाते है । मात्माको सम्बावे एए नपमें गुप मानेसे का प्रयोग प्रस्टा ही हो गया। समकिनधि गोषको केनमान' मा यात्रा है। उसे वर्तमानमें माम गुना है, इसध्येि 'देश-केवलान ' कहा भाता है। बाकी तो बामाका मान ऐना ही केवमान है। मह इस वर या पाता-समकितपरिको भय वात्माका मान हो तब उसे केवलसानका मान प्रगट हुमा और यम उसका भान प्रगट हो गया, तो केपकान पास ऐना चाहिये, इसलिये इस अपेक्षासे समक्तिपीरको केवमान करा है। सम्परत्व वा अर्थात् माम बोतकार मौन यो दिपा पक्ष हुआ, फल वाये, फल पोरे ही साये, वौर साते साते बायु पूर्ण ग गई, वो फिर बस दूसरे भममें फर सागे । इसलिये 'फेवल्याम' इस कामें नहीं-नहीं, ऐसा विपरीत मान महीना, जौर नहीं करना। मम्पपस्व प्राप्त होनेसे बनवमव दूर होकर एक भव की ए पासा है, इसरिये सम्यक्त उत्तर है। बारमामें केवम्यान है, परन्तु मावरण र बोनेपर देवमान होता है। इस काळमें सम्पूर्ण पादरण दूर मही होता-एक मष वाकी व गाता है। मर्याद बितना देवयानावरणीय दूर हो, उतमा हो केवमान होता है। समकित मानेपर, मातरमें-अतरमें- पणा कर जाता है, केरणानका पोर प्रगट होता है। सद्गुरु बिना मार्ग नही, ऐसा महान् पुरोने भा।पा उपदेश बिना कारण नहीं किया । समकिती बर्यात् मिप्यावसे मुक्त केवमानी वर्षात् पारिप्रावरणसे सम्पूर्णरूपसे मुक, बौर सिख वर्षात् देह भादिसे सम्पूर्णरुपसे मुक । प्रमा-र्म किस तय कम होते! सचर:-कोर म करे, मान न करे, मापा न करे, सोम न करे—उससे कर्म कम होते हैं बाम किया करेंगा तो मनुष्य जन्म मिमगा, भौर किसी दिम सत्पुरुषा संयोग होगा । मला-त-निपम करने चाहिये पा नहीं ! उत्तरात-नियम करने चाहिये । परन्तु उसकी साप अगा, करमा, पके बचे, भौर परमें मारामारी नहीं करना चाहिये । उभी दशा पानेके लिये ही नव-नियम करने पाहिये । स्पे-मूठेकी परमा करने के उपर एक सये भजका प्रान्त एक रामा पात महिनामा पा। पर मोंकी बहुत सेवा किया करता पा । मासे मःो वम-पत्र मादिसे पोपण करने के कारण एक्से मत इको हो गपे । प्रधानमे सोचा कि राना विचाप मोठा है, और मच गेग ठग । इसठिये इस बातकी रामाको परीक्षा करनी चाहिय । परन्छ स समय तो पाये इनपर मात प्रेम है, इसलिये गा मामेगा नहीं, इसपिये किसी दूसरे बमपर बात काँगा । ऐसा विचार का समप ठारकर किसी बासरके मिटनेपर उसने गयासे कहा-'भाप मगत सम्पसे सब मकोको एक-सौ सेवा चाकरी करते हैं परन्तु उनमें कोई बड़ा होगा और कोई रोटा ऐगा। इसलिये सपकी परीक्षा परकेही भक्ति करना चाहिये ।' राजाने इस बात को स्वीकार किया और पंण कि तो सिर क्या परमा चाहिये । रामाकी पाहा रेकर प्रधानने गोहनार मद ये उन सबको । - भीमद् सपण ४५ या करके करण्यापाकि बाप सब गेग रसायके बाहर बा, स्पोकि रामलो देसकायहरत है इसरिये बाप मच तेल निकामना है। तुम सब गेग पाव गिनने राजा के माम् मसाले पा रो, तो बार रामाका इतना काम हमें वाश्य करना चाहिये । सब मच्ने, पाणी गठकर तेल निकायनेक बात सुनी तो सबके सब माग गये वीर माप हो गपे । उनमें एक सवा मत पा, उसने चार सिपा कि रामाका नमक साया है तो उसकी नमारामी से की जा सकती है। गलामे परमार्य समाहर मम दिया है, इसलिये पणा पाहे कुछ मी करे, उसे करने देना चाहिये । या विचार कर पानी पास जाकर उसने कहा कि मापको महक निकामना दो निकालिये 'प्रधानने राजासे डा-देसिपे बाप सर मच्चेकी सेवा करने पे, परन्तु भापको सो-टेको परीक्षा म पौ'। देखो, इस तय सम्बे गाव तो विरसे ही होते है, और वैसे पिर सो स्पस्की भक्ति मेफ्स्कर है। सबै सहरका मजि मन पचन और कपासे करनी चाहिये । एक बात परतक समझ म वारे तबतक सरी बात मनना किस कामको ' सुमे इएको भूलना नहीं। वैसे एक बार को मोजन किया है, उसके परे बिना सय भोगन मही करमा चाहिये । पर बगैर करना कोई महाभारत बात नहीं, इसलिये तप करनेपालका कार करना नही माहिये। तप या मेटेमें मेरा हिस्सा है। मूसे मरना और उपचास रमेका नाम रूपमा । भीतरसे पुर तकरण येतो तप पा गाता है, और वो मोमगति होती है। बाप प शरसे होता है। वप या प्रकरका-१ वि होना, २ एक बासनसे कापाको भेटाना, ५ कम बाबार करना, १ नारस भाार करना और सचिोका सनित करना, ५ संवीनता और वाहका त्याग। सिपिके लिये उपचास ना करमा, परन्तु वाहमाके ये उपास करना चाहिम । बाप प्रपरका तप धा। उसमें MAR न करमा इस तपको बिदा इन्द्रियको पश करने उपम्प समझकर कहा है। विदा इन्द्रिम परा को तो पर समस्त इन्द्रियोंके पशमें होनेका निमित्त है। उपवास को तो उसकी बात बाहर म करो मेका निदान करो, झोप न करो। पदि इस प्रकार के दोष कम दो महान् भम । उप बानि मामाके सिमे ही करने चाहिये-कोसके विसामो ये नही। फापके घटनेको तप मा।किक परिने भूग पाना चाहिये । सपणे सामापिक करते हैं और कातेको शानी साम करे । समक्ति रोगा पा नही उसे मी पशिबानी सोभर करे तो सभाहै। परन्त बानी क्या साकार करे ! मानात साकार परमे जैसा ही हमारा सामापिक, रत और समषित है। बाद मास्तविक सामापिक और सममित मारेमें महो । मन नपन पौर काया म्पहार-समधाम स्पिर में, पर समकिती। वैसे मांवमें स्पिर योग माम होता है फिर मी पस्तु' या स्थिर मीरे और इस कारण र एमवा मी महाँहै। मन पचन और फापा बीब पुणस्पान- कहोवे है, मन ये पर्प किये बिना पैठता ही नहीं। मेरी ममयोग पा रोग परम्त मामा चमक नही होती। मामा चौपे गुणस्पानको चपक एवी, परन्त नषा महो । 'गान गात् बामा ने पायातप्प मानना । दर्शन 'मर्षात् बामाको पापावाप प्रवीति ।
- ४] उपदेश-माया ५५९ चारित्र' नात् भारमाका स्थिर होना। मारमा और सद्गुरुको एक ही समझना चाहिये । यह बात विचारसे म्हण होती है। विचार यह कि देहे भयका दोके समान सय मात्र सद्गुरु महाँ, परत गुरुकी वारमा ही गुरु है। निसने वात्मस्वरूप पक्षणसे, गुणसे, और वेदनसे प्रगट वनुमत किया है, पौर ही परिणाम गिसकी आमाका हो गया है, यह वारमा और सद्गुरु एक ही है, ऐसा समझना चाहिये । पूर्वमें जो वाान इकडा किया है, वह दूर हो तो बामाको पूर्ण कमी समझमें बाये। मिम्मावासमाधर्मफे मिथ्या स्वरूपका सन्या समसना । पप बादि मी बानकी कसौटी है। सावा-शौस वापरण रक्सा हो और वसाता था माप तो ज्ञान मद ऐ जाता है। विचार बिना इन्द्रियाँ पश नहीं होती । विचारसे इन्द्रियों दौरती हैं। निचिके लिपे उपपास रमा बताया है। हमें बहुतसे बचाना बीब उपवास करके दुकानपर बैठते हैं, और उसे पोपत्र खाते हैं । ऐसे कम्पित पौषप पावने वनादिकाससे किये है। ठम सबको हानियोंमे मिफस पराया है। चम सी, घर, वाम गरे भूत माप, उसी समप सामापिक किया कहा जाता है । म्पधार-सामायिक परत निषेध करमे पोप नहीं, यपपि चौपने म्पबहाररूप सामापिकको एकदम ना बना गा है। उसे करनेवाले गानोको पबर मी नहीं होता कि इससे करपाण क्या होगा ! पहिले सम्पमत बाहिये । निस बननके उननेसे मामा स्पिर हो उस सत्पुरुपका पचम ममण हो वो पा से सम्यक्त्व होता है। सामान्य विचारको लेकर इन्द्रियों वश करनेके म्पेिस कायका बारम कायासे न करते हुए नय पि निर्मठ होता है, तब सामायिक हो सकता है। मवस्पिति, पचमकामें मोक्षका नमान बादि शकामोसे मारने पाय पति कर रक्सी है। परन्तु यदि गीत ऐसा पुस्पार्प करे, पौर पंचमकार मोक्ष होते समय हाप पकड़ने बाये, तो उसका उपाय एम कर देगे । वा उपाप कोई हायी नही, वपना नानापमान वमि नहीं। मुफ्त में से चीनको मात्र रस्सा है। जीवघे पुरुषार्थ करना नहीं, बौर उसको लेकर नहाना सुना है । इसे अपना पदोप समाधना चाहिये । समताको राम्यकी बातें एनमी मौर विचारनी चाहिये । माय बातोंको पैसे कने से छोड़ देना चाहिये । चार पार होमेका अभिवापी हो, और सनुरुको बापाने प्राति करे ये समस्त पासना पर होगाप । सुसमी बाबामें सब साघम समा गये है। जो गाव पार होमेके अभिमापी होते है, उनमें सब पासनामोका माश हो जाता है। वैसे कोई सौ पचास कोस दूर हो, वो वा दो चार दिनमें पर भार मिस सकता है, परंतु गोडासों कोस दूर हो वह एकदम पर माकर कैसे मिल सकता है। उसी पप गीत म्याणमास पोबार हो तो पाकमा कम्पाण प्रास कर सकता है, परन्तु पनि म एकदम हो उठे गस्त होतो कासि पार हो सकता है ! देह वादिका नमार होना--पूर्णाका माश होना- मुकि है। निसय एक मन मा हा से उसे देह इतनी बभिक पिता उचित महो । महान दूर होने के पश्चात् एक मयको कुछ कीमत हीमों मा बसे गये तो मिल एक भव तो किस हिसाबमें है।
भीम प्रसन्न । किसीको दो तो मिष्पाल भोर माने पर ग्रा-सातवाँ गुणस्थानक, तो उसका क्या करना । पौय गुणस्पानी स्पिति कैसी होती है। गणधरके समान मोक्षमार्गको परम प्रतीति वाले (ऐसी)। पार होने ममिठापी होम मिनटकर देते ए पाछे माही हटता | गो शिफ्ठि यो पोरे कुम्मण हों उमें भी नही मेड़ सकता । पौवण भी जिस पचनको करते हुए रेहै, उसे खानी सन्तासे करता है, तोप फिर से देगा। महापारस्वामीफे दीयाके परपोरेका बावका स्वरूप पदि चारें तो रम्प हो। पर बात बहुत है। भगवान् वामारी थे। उन्हें पारिप गता था, परन्तु मिस समय उन्होंने बाम पारित प्राण किया, उस समय में मोच गये । मविरति शिप हो तो उसका वादर सस्कार से किया गाप । कोई राग-द्वेप नाश करके पिये निकले और उसे तो अममें ही किया, तो रागश्रेय कमि दूर हो सकते हैं। जिनमगवान्के भागमका जो समागम हुवा हो या वपने पयोपशमके वनुसार होता है, परन्तु प सद्गुरु अनुसार नहीं होता । सद्गुरका पोग मिस्नेपर मो उसका भावानुसार पग, उसका पग-रेप सचमुच र हो गया। गमीर रोगके दूर करने के लिये मसग दवा परत हो पर देवी है। मर तो एक ही दो दिनमें दूर हो पाता है। मार्ग और उम्मार्ग परीक्षा होनी चाहिये । पार होनेका अमिगपी' इस शब्दका प्रयोग करो तो बमम्पका प्रश्न ही नही उटवा । बभिमपीमें भी मेद है। प्रम -सत्पुरुपकी किस तप पपेशा होती है। उत्तर:-पुरुष नपने लोस पहिचाने जाते हैं । सत्पुरुषोंके सण-उमकी वाणीमें पूर्मास वविरोध होता है, के क्रोनका मो उपाय बताने, उससे ग्रेग रोमाता है, मामका यो उपाय बतलें, उससे मान र ऐ बाता है। दाना पाणी मार्परूप ही होती है। पूर्ण है। हालांकी पामी सो मवाना पाणी उपर पर ही होती है। बताको बाणी पुमा मारी तबतक सूत्र मी नारस जैसे माम होते है । सहरु वीर नसरको पका, सोने और पतिकको पाठयको परीक्षाको तय होनी चाहिये। यदि पर होनेका मिठापी, और सहर मियाम तो कर्म दूर हो जाते हैं । सनुस कर्म दूर करने कारण है। कर्म पावने के कारण मिलें तो धर्म बचते है, और धर्म दूर होनेके घरण मिले तो कर्म र होते हैं। नो पार रोनेत्र बमियपी हो या मपस्थिति बादिक वामपनको मिप्पा पाता है। पार होनेघ वमिमी किसे कहा जाप ! मिस पाने वाली मार में उसे गार समसफर मेरे और शानाही नावाबारापन करे, उसे पार होनेका वभिण्या या गहा है। उपदेश पुनने के लिये सुमनके बमिकामाने कर्मक्ष्म गुड़िया बोहरपती, उससे उपदेशरूप की नही गती । त्या गो पार होने ममिगी। उसने बोताका मोह मवेद, इससे उसपर उपरेशरूम सी बादिमें ममरती । पाचौ बमम्पके सरनेसे पार हो बाप, ऐसा महो। चमगामें यह मर्य महो। विसामोके परमय नाम मुनिमे इसकी च की है।
६४] उपदेश-माया स्वप यो पार हुआ नहीं बौर दूसरोंको पर उसारसा है, इसका अर्थ अषमाग मताने जैसा है । बसहरु इस प्रकारका मिप्पा आयन देते है! जम्मूदारप्राप्ति नामक जैनस्प्रमें ऐसा कहा है कि इस काउमें मोच नहीं । इसके उपरसे यह न समझना चाहिये कि मिप्पास्त्रका दूर होना और उस मिप्यास्वके दूर होनेरूप भी मोश नहीं है। मिथ्याबके दूर होनेरूप मोक्ष है, परन्तु सर्वथा वर्षात् आत्यतिक दारक्षित मोक्ष नहीं है। इसके उपरसे यह कहा जा सकता है कि इस काठमें सब प्रकारका फेवग्यान नहीं होता, परन्तु इसका मर्प यह नहीं है कि इस काममें सम्परून मी न होता हो। इस कालमें मोझके न होनेकी ऐसी बातें कर्म करे ता उन्हें सुनना मी नहीं। सम्पुरुपकी बात पुरुषार्थको मद करनेकी नहीं होती-पुरुषार्थको उत्तेजन देनेकी ही होती है। चहर भौर अपत दोनों समान है, ऐसा शानियोंने कहा हो, वो यह अपेक्षित ही है। नहर और बमको समान करनेसे कुछ चहरका प्राण परमा वताया है, यह बात नहीं । इसी तर शुभ और मचम क्रियानोंके सवपमें समझना चाहिये। शुभ और बमुम क्रियाका निषेप किया हो तोप मोषक अशासे हो। किन्तु उससे शुभ और बगुम दोनों क्रियायें समान है, मह समझकर पुम क्रिमा भी नहीं करमा बनिये-ऐसा हानी-पुरुषका कपन कमी भी महीं होता । सत्पुरुपका पचन कमी वधर्ममें धर्म स्पापन रनेका नहीं होता। मो किया करना उसे बईमफ्नेसे, निरहंकारपमेसे करना चाहिये-क्रियाके फनकी बाकांक्षा मही रखनी चाहिये । शुम क्रियाका कोई निषेप किया ही नहीं, परन्तु वहाँ जहाँ केवल बाम नित्यासे ही मोक्ष सीयर किया है, वहीं उसका निपेच किया है। शरीर ठीक रहे, यह भी एक तरकी समावि है। मन ठीक से, यह भी एक तरहकी समाधि है। सहम-समाधि अर्थात् गाय कारणरहित समानि । उससे प्रमाद वादिका नाश होता है। जिसे यह समापि यती है, उसे कोई खास रुपये दे तो मी उसे मानन्द नहीं होता, अपना उससे कोई ठम् जमर्दस्ती छीन से तो मी उसे से महीं होता । बिसे सतसाता दोनों समाम है, उसे सार समाधि कही गई है। समकितपरिको बम्प हर्प, बम्प शोक कमी हो मी नाप, परन्तु पछिसे पर शन्त हो जाता है। उसे जगका हर्प नहीं पता मिस तब उसे मेोपा उस पर उसे पीछे सोच देता है। विधारता है कि इस तर होना योग्य नहीं', और वह भामाझी निम्दा करता है। उसे लोक हो तो भी उसका ( समकिता) मूल माश मही होता । समकिताशिको असे साग प्रवाविक होनेसे सटा हो समाभि रहता है। पतंगको रो पैसे हाप यती है, उसी तय समकित रिकी विरूपी गेरा उसके हायमें ही पतीहै। समकितपरि चापको सार-समाधि है। सवा फर्म बाकी रहे हों, उसे फिर मी सहर समाधि हो। उसे मान कारणोंमे समारि नही, किन्तु भामामे जो मोह र हो गया हो समानि है। मिप्याररिक राप गे नहरी, इससे 4 बाम कारणोंमें तशकार होकर उसमय हो जाता है। समकितरिको पान दुस जानेपर भी मर नहीं होता । यदि यह ऐसी इच्छा मही फरता कि रोग मापे । परम्तु रोग आनेपर उसके ग य परिमाम नहीं होते । गानीनगर नगर में भा गये। ।
१२ भीमद् पंचम्द [५४१ घरीरके धर्म-रोग वादि केडीके मी होते हैं क्योंकि वेदमीय कर्मको तो सबको मोगना हो पाता है। समकित बापे बिना किमाझी सास-समाधि होती नहीं। समकित होनेसे ही सार समानि होती है। समक्ति होनेमे सहमें दो बासहिमाल दूर हो जाता है । उस दशामें वासति- मानके सान मिषेध करनेसे बब यता नहीं । स्वरूपके बपम अनुसार- उसको वातानुसार- मो पर उसे अंशस समकित हुवा है। इसरे सब प्रकारको कम्पना छोपकर, प्रमश पुरुषको बाचासे उनक पचन सुनना, उनी सपी मया करना, भौर ठमें वामा प्रवेश करना चाहिये, तो समकिन होता है। शाम को महावीर स्मामाकी नपानुसार पटनेचा बाप वर्तमानमें नहीं है। इसलिये प्रत्पशानी चाहिये । बास पिकण्ठ है। मुगुरबोंने मेकको निष्पा मार्ग बठाकर मुम दिया है—मनुष्यमा ए लिया है तो फिर मोर मामि मिस ए बा सकता है। यपि गुरुषोंने ए तो लिया है परन्तु उसमें उन विचारोंघ नेप नही पोंकि उमें उस मार्गको सबर ही नही ।। मिण्यावरूपी विनीको गाँठ मोटी है, इसलिये सब पण दोघाँस र हो सकता बिसकी प्रपि हम गई है, उसे सहन समानि होती है, क्योंकि निसमा मिपाल नए हो गया है, उसकी मम गाठ ही नए हो गई, और उससे फिर क्प गुण माश्य ही प्रगट हो जाते हैं। सत्पुरुपका मोत्र प्राप्त होना या अमृत प्राप्त होनके समान है। यानी गुरमोंने बिचारे मनुप्पोको पर लिया है। किसी गौवको गम्हा वापर कराकर, किसीको मतका बामा कराकर बिससे पार न हो सके, ऐसे वाग्मन देकर सब कुछ कर म्यानुस कर गया है-मनुष्य भय होटलिया है। समवस्मरणठे मगवान्को पहिचान होती है इस सब मापापीका रमेश देना चाहिये । मस समपसरण हो परन्तु पनि वाम न तो काम्याग नही रोता बान हो ताहो कपाण होता है। भगवान् मनुष्प से ही मनुम्प पे। वे साते, पोते उठते और बैठते थे-म बावोंमें फेर नहीं है। र कुछ सय । समवसरण मादिके प्रसंग रिक-मावना है। मगवान्का स्वरूप ऐसा नहीं है। मगवान्न स्वरूप-सपा निर्मक वामा- सम्पूर्ण शान प्रगट होनेपर प्रगट होता है । सम्पूर्ण बात प्रगट हो माप यही भगवान्का सरूप है। वर्तमानमें मगवान् होता तो तुम उसे भी न मानते । मगमाघ माहाम जान है । मगवान्के स्वरूपका चितवन करनेसे वामा मानमें आती है, परम्त मगवान्को देहसे मान प्रगट नही आता । मिसके सम्पूर्ण ऐपर्य प्रगटोगप उसे मगाम् करा माता है। बसे पति मगवान् मोन्द्र हाते और वे तुम बताते तो तुम ठर्न मी म मानव इसी तर वर्तमान में हानी मौन्द हो तो ग मी मही माना जाता । तया समान पांचोके मा छोग करते कि ऐसा माना जमा नहीं। और पासे ता गेग उस प्रतिमाको पूमते । परन्तु वर्तमानमें उसपर प्रति भी नहीं पाते। गांवो बानीको पहिचान पर्तमानमें हस्ती नहीं। समविसका सबा सवा चार कर तो नौ समयमें पान दो बाप, मही तो एक मवमें औरणाम होता है, और क्न्तमें पदरचे मासे तो केवमान हा हो जाता है सम्पेि समषित सर। पुश Rधारन्मेको भामामें मम होनेके लिये कहा है। परत भेदमें ही मामा पुमानेके मि महा करा । हरेक परमार्थ होना चाहिये।
१४.] उपदेश-छापा समकिताको केवमानकी इच्छा नहीं। मानी गुरुओंने लोगोंको फुमार्गपर चड़ा दिया है, उस्टा पका दिया है, इससे लोग गछ, स, वादि ठौकिक मावोंमें तदाकार हो गय है। अबानियोने ठोकको एकदम मिष्या ही मार्ग समझा Pया है। उनके सगसे इस काठमें अधकार हो गया है। हमारी कोई हरेक-प्रत्येकासको पा कर करके विशेषरूपसे पुरुषार्थ करना चाहिये। गा आदिके कदामहको छोड़ देना चाहिये। चौल बना काम्से भटक रहा है। यदि समकिस हो तो सान ही समाधि हो माप, मौर बन्नमें पत्याण हो। नाव मत्पुरुषके आभयसे यदि बाहाका सम्चा सम्पा माराधन करे, उसके उपर प्रतीति अवे, वो अवश्य ही उपकार हो । एक मोर तो पौदा राज ठोक्का मुसहो, और दूसरी ओर सिरके एक प्रदेशका मुसहो, ठो मी सिबके एक प्रदेशका सुस्त बनतगुना हो जाता है। इति चाहे किसी मी तयो रोकना चाहिये, हाम-विपारसे रोकना चाहिये, बोक-यासे ऐकना चाहिये, उपयोगसे रोकना चाहिये किसी मी तय हो पतिको रोकना चाहिये । मुमुक्षुभोंको, किसी अमुक पार्षक बिना म च एसा नही रसना चाहिये । चीन नो अपनापन मानता है, वही दुस, क्योंकि वहाँ अपनापन माना और चिताई कि बर कैसे होगा! वन कैसे करें । पितामें दो स्वरूप हो जाता है, वही वहान है। विचारके वाय, मानके द्वारा देसा बाप तो माश्म होता कि कोई अपना नाही । यदि एककी चिंता करो तो समस्त जगत्को । किंवा करनी चाहिये । इसलिये हरेक प्रसंगमें अपनापन होते हुए रोकना चाहिये, तोही पिता-पम्पना- कम होगी। तृष्णाको नैसे बने कम करना चाहिये । विचार कर करके तृष्णाको कम करना चाहिये । इस देहको कुछ पचास-सौ रुपयेका तो सर्व चाहिये और उसके बाले पा हमारों बसोंकी चिंता कर अमिसे सारे नि जग करती है। वान उपयोग सृष्णाको इमि होनेका निमित है। जीव मान-हाकि कारण तुप्माको बढ़ाता है, उस मान-माइको रखकर मुक्ति होती नहीं । वैसे बन से मान-मर्य, तृष्णाको कम करना चाहिये । निर्षन कौन है ! गो धन मॅगिनकी पया करे- निर्धन है। गो न माँगे वह धनमान है। मिसे समीकी विशप तृष्णा, उसको दुविधा, पौड़ा है, उसे जय मा मन नही। सोग समझते हैं कि श्रीमंत मोग सुसी है, परन्तु पम्मुत उमके तो रोम रोममें पीड़ा, इसलिये कृष्णाको घटाना चाहिये । वाहारी बात मर्यात् सानेके पापोकी बात तय है, उसे करना नहीं चाहिये । विहारको बर्षात् भोपाकी बात बात है। निहारकी बात भी बहुत है । परीरको साता और दीनता ये सब तुमताका बातें करमी नहीं चाहिये । माहार किया है। रिचार करो कि खानेके पीउ विय हो जाती है। विय माप साती है तो दूध हो जाता है। और मेव, साद गझनेसे मनायरो जाता है। इस वय उत्पम हुए बनामके माहारको विष्टाम्प समात, उसकी पर्वा न करना चाहिय । परा बात है। सामान्य जीवों से सर्वपा मौन नहीं पा भाता, और परि में मी तो मतरको कपना दूर होती मी मौर मबतक कन्यना ये तबतक उसके लिये कई यस्ता निकाडमा ही चाहिये । इसठिये पारमे के सिर कम्पनाको बाहर निभाते हैं। परमार्थ गाममें मोडना चाहिये । म्पपार का - भीमा पमचन्द्र [१ - प्रयोजनके मिना म्पर्पकी बातें करनी नहीं । गो मापापची होती हो वहसि र पना पाहिपे- पति कम करना चाहिये। कोर, मान, माया, टोमको मुछे कम करना है, ऐसा मब स होगा- -ब उसन्न पोका पोहा मी म्स्य किया जायगा-तप यार में पास हो पायगा । वामाको वारण करनेवाले दोष रब माननेमें मा माप तब उने र भगाने दम्पास करना चाहिये । कोष बादिक पोहे पोरे कम होने के बाद सम सान हो जायगा । बाद में उने नियममें मेनेके पि कैसे बने बम्पास रखना चाहिये। और विचारमें समय बिताना चाहिये । किसीके प्रसंग कोष मादिक उत्पन्न होनेन निमिच हो तो उसे मानना मही चाहिये क्योंकि जब स्वप ही शेष करें तमा फोन होता है। जिस समय अपनेपर कोष करे उस समय AIRमा चाहिये कि उस विचारेको हाम्में उस प्रतिका उदप है। यह स्वय हो पा दो पो शांत हो जायगा । इसशिप मैस बमे से अर्विचार कर समय स्थिर रहमा चाहिये। कोष मादिकपापको हमसा विचार विचारकर कम करना चाहिये । तृष्णा कम करनी चाहिये । स्योंकि बा एकांत दुमदापी है। जैसा उदय होगा पैसा होगा, इससिपे तृप्माको माश्य कम करमा चाहिये । पाप मसंगोंको से बने से कम करना चाहिये। पेमतीपुत्रने किसाका सिर काट सिमा पा । बा में समानीको मिग, और कहा कि मोध दे, मी यो तेस मी सिर काट मगा। इसपर बानीने कहा कि क्या त् क काता है। विवेक (सको सचा समाना) शाम (सबके उपर सममाष रसना) बीर उपशम (तियों को बाहर न गाने देना और अंततिरसना) को शेषातिविशेष बारमा परिणमानेसे वात्माको मोक्ष मिस्ती है। कोई सम्मायबाछा करता है कि देवतियोंको मुनिको अपेक्षा–स भम-दशाको अपेक्षा- तो पार गतियों को भेष्ठ है। इनमें अपने पापको सुप दुसघ अनुमत्र तो यताहै। सिबमें संबर नहीं कहा जाता, क्योंकि यहाँ कर्म बाते मही, इसलिये फिर उनका निरोप भी मी होता । मुल्में एक गुमसे-शसे --भगाकर सम्पूर्ण अंशतक सभाष 0 रहता है। सिरा सभाषमुग प्रगट हो गया है के बावरण दूर हो गये है तो फिर मा संबर- निरा किसे गंगे ! पोवान योग मी नही होने । मिष्याय मात, प्रमा, कपाप, योग इन सबसे मुक्त उनको कर्माका आगमन नहीं होता। इसरिये उनके कमौका नियेच मी मही होता। जैसे पफ हमारको रकम हो, और से पोपी पोड़ी पूर्ण कर देता सता रहो माता है, इमी तप कर्म जो पाप कारण पे, उरें सार-निगसे समान कर पा इसउिपे पाच कारणोपी माता बंद हो गया, अदि पारि पौसे किसी भी तरह प्रास नहीं होता। धर्मसम्पासम्मोध मान मापा, छोभ बाहोगेका रेग्न करना । गौरता सावित होम्सिी समय भी सोता नहीवपण मरता नहीमरमा उसका मभा नही । सभारमे सत्र जार जीवित हो है । जैसे गसोपासके बिना कोई गौर देउभेमें माता मही, उसी तरहानसम्पयफे बिना कोई और नही है। भारमाही निरामा चाहिये और पेमार करना पाहिये शिकणाप उपम हो- मंमार मणा पास हो । चाहे भी मर गाप पर रिसी में जाम् का बार-संसारको - उपदेश-पापा ५१५ । मसार मान सम्म, चरा, मरणको महा भपकर समझ बैराग्य प्राप्त कर बासू या जोय—बह उत्तम है। वपना पुत्र मर चाय वीर रोने लगे, ता इसमें कोई विशेषता माही, या तो मोहका कारण है। मामा पुरुषार्थ करे सो क्या नहीं हो सकता। इसने यो यो पर्वतके पर्वत काट ग है, और कैसे कैसे विचारकर उनको रेतयेके काममें लिया है। या तो केवल बाहरका काम है, फिर मी विजय प्राप्त की है। मारमाका विचार करना, यह कुछ बाहरको बात नहीं । जो बहान है उसके र होनेपर मान होता है। मनुमयी मैप दया देता है, परन्तु यदि रोगी उसे गमें उसR सो हो रोग मिटता है। उसी वय सद्गुरु बनुमषपूर्वक वानरूप दवा देता है, परन्तु उसे मुमुक्षु प्रहण करमेहप गळे उतारे पो हो मिथ्यात्वरूप रोग दूर होता है। दो मही पुरुषार्थ करे तो केवलान हो जाय --ऐसा का। रेसोझ्यादि, चाहे कैसा मी पुरपार्थ स्पों न करें तो मी दो घडीमें तप्पार होती नहीं, तो फिर केरबान फिसना सुसम है, सका विचार तो करो। यो पातें मोबको शिथिल कर राती है-प्रमादी कर गम्ती सी बातें सुनना मही। इसके कारण नीव मनादिकाससे मटका है। मर-स्थिति काल वादिका भासबन भेना नहीं । ये सब महाने है। गौरको सांसारिक बासक्न-विपनाये-छोड़ना तो है नहीं, और एमिप्या भासवन डेकर करता है कि कर्मक दल मौजूद है इसलिये मेरेसे कुछ बन नहीं सकता। ऐसे वागमन कर गौर पुस्पार्थ करता नही । यदि यह पुस्पार्थ करे दौर मपस्थिति अपवा काठ रुकावट गहें तो उसका उपाय हम पर गे, परन्तु पहिले तो पुरुपार्य करना चाहिये। सस्पुरुपकी भाषाका वाराधन करना मी परमार्थरूम ही है। उसमें डाम ही है। या म्यापार ममका ही है। निस वादमीने गमों पोंके साम्मे पीम फिरकर देखा नहीं, पर या गो हजारके म्पापारमें बयाना निकामता है उसका कारण यही है कि नवरसे बास्मापकी इच्छा नहीं है। जो वारमापा ऐ गया है या पीछा फिरकर देखता नहीं पातो पुस्पार्थ करके सामने मा नाता है। शासमें कहा भवस्थिति का पकवी है तो करते हैं कि जब पुस्पार्थ करे वय । पाँच कारण मिसबाप तो मुक्ति हो जाय। पोचों कारण पुरुपा, भन्तस्ति । जनत भोये मारे मिस गाँप, परम्तु यदि सर्प पुरुषार्थ करे तोही मुक्ति प्राप्त होती है । जीवने गमत कासे पुरुषार्थ किया नही । समस्त मिथ्या भावनोंको भर मार्गमें विन से है । कस्पाम चि उदित हो तर मनस्थिति परिपकह समझनी चाहिये । शूरता हो तो वर्षका काम दो पार्मि किया जा सकता है। पसारमें पाये गुणस्थानमें कौन कौन प्यबहार गगू होता है। इस प्यार या . कि वावरण, समान, . प्रभ बार करें। उत्तर --उसमें इसे समौ म्यवहार मागू होते है । उदयसे शुमाहम म्पहार होता है, और परिणपिसे शुम म्पार होता है।
- भीमद् पत्रचन्द्र [४ परमार्थसपुर फर्ता कहा जाता है। प्रत्याभानी अप्रस्यास्पानीको सपा दिया है, इसलिये या पुस म्पहारका करे। समरिताको बास म्यवहार र करमा है। सममिती परमासे पुर वर्ग है। नपके वनेक प्रकार है, परन्तु निस प्रकारसे माहमा ऊँची वारे, पुरुषार्थ पर्वमान हो, उसी प्रकार विचारना चाहिये । प्रत्येक कार्य करते हुए अपनी भूखके उपर या रसना चाहिये । एक पदि सम्यक् उपयोग हो तो वनेको वनुमत्र हो गाय कि कैसी मनुमन-दशा प्रगट होती है। ससग हो तो समस्त गुण सागमें हो गॉप । दया, वत्तान, प्रमचर्य परिमा-मा मादि काररित करने चाहिये । ग्रेगोंको बताने के लिये कुछ मी करना नहीं चाहिये । मनुष्पमा मिला है, और स्वाधारका सेवन न करे तो फिर पीछे पम्ताना होगा। मनुष्यभषमें सपुरपके पचनके मनमेका-विचार करनेका—सपोग मिठा । सत्य बोना, या कुछ मुसित नही—विश सार। मो म्मापार वादि सपसे रोते हो उही करना चाहिये । परि र महीनेतक इस तय भाचरण किया जाय तो फिर सम्पका बोम्मा सरत हो पाता है। सस्प बोलनेसे कदाचित् प्रपम तो पोरे समपतक पोका मुकसान भी हो सकता है, परन्तु पीसे बनत गुणको धारक वामा जो तमाम मुठी बायो पठती और हो जाती है। सप बोभेसे पामे पामे सहर होमाता है और पाहोने के पश्चात् बत देना चाहिये- सम्पात रमना बानिये, योक्ति उता परिणामाम बाल्मा कई विरण होती है। गौचने पदि क्लौकिक मपसे मप प्राप्त किया हो, तो उससे कुछ भी नहीं होता । मेक बारे वैसे बोले उसको परवा न करते पार, रिसते नामवित हो उस सापरणध सेवन करना चाहिये । हान को धम करता है यह मत है। सत्पुरपके पचनके बिना विचार नही माता । पारके बिना पैराग्य माँ माताराम्पके बिना हान नही माता । इस कारण सत्पुरुपके वचनोंका मारवार विचार करना चाहिये। पास्तविक बाशका दूर हो जाम तो पाव-सौ मिरा हो जाती है। नगर परि सम्पुसका मार्ग मानता हो, उसका उसे बारंबार बोष होता तो बहुत करो। जो सात अपना नंत नय? सब एक बारमार्थक किये है, और मामार्प ही एक सका पहै। नयका परमार्थ गांवमेंसे निकर नाप तो फ्छ होता है-मन्तमें उपशम मते तो कर होता मी पो पातको मका बान शामरूप हो माता, बौर पर फिर मकार ममेका स्थान होता है। सम्पुरुपके मामपसे पर गायर हो गाता है। म्याम्यानमें कई मंगवाल रा ( सर ) निकालकर सुनाता है परन्तु उसमें बारमय हो । परि पुरुष बाभपसे काय बादि मंद पणे भर सदाचार सेवन करके प्रकार रहित जामो, तो मारा और मरेका मत हो सकता है। मरहित मामासे साचार सेवन करमा पारिये, शिससे उपकार हो। साप समालो और उसमें ये होतोयस काममें जा सकती है। उसी तब जबतक देसी स्पिति हो कि भामा परा परेरा न करे, तर पकिस प्रमका । अबतक उपरेश-पार्ता पामा प्रवेशमारे पता उसे फिर र मनम परना और विचारमा चाहिये -उसका पीया मेला - Art] उपदेश छापा नहीं चाहिये—कापर होना नहीं चाहिये—कायर हो गाय तो बारमा उची नहीं जाती । जानका वन्यास बिस तद बने मवाना चाहिये--अम्पास रसमा चाहिये--उसमें कुटिम्ता अथवा नाकार नहीं रखना चाहिये। भारमा वनत शानमय है। जितना सम्यास यो उतना ही कम है। सुंदरविकास भाविके पानेका बम्पास रखना चाहिये । गच्छकी अपना मतमतिरकी पुस्तकें हायमें नहीं मा । परम्परासे मी कदाह वा चाय तो जीव पीछेसे मारा जाता है इसलिये कामको बावोंमें नहीं पहना । मतोंसे पमा गना चाहिये--पूर एना चाहिये । मिस पुस्तकसे राम्य-उपशम हो, वे समकिसरिकी पुस्तकें । पैराग्यही पुस्तकें पाना चाहिये । दया सस्प वादि मो सापन है, पिमाषको त्याग करने के साधन है।तस्पर्शस विचारको बसा यामय मिकता है। अबतकके सापम बिमाषके आधार-स्वम ये उन सबै सारनोंसे बानी-पुरुष दिला गते हैं। जिसे कल्याण करना हो उसे सस्प-साधन भय करमा चाहिये । सरसमागममें भीष भाया पौर इन्द्रियोंकी लम्धता न गई, तो मह समागममें पाया ही नहीं, ऐसा समझना चाहिये । नमतक सस्य मोठे मही तबतक गुण प्रगट नहीं होते । सत्पुरुष हापसे पकार प्रत दे तो । हामी पुरुष परमार्पका ही उपदेश देता है। मुमुक्षुजोंको ससाधनोंका सेवन करना योम्यो। समकिसके मूछ बारा त-स्यूल प्राणाविपास, स्यूग मृपाबाद, स्पूण करनेका हेतु०-- कानाने बारमाका भौर ही मार्ग समक्षाया है। प्रत दो प्रकारको समकितके बिना मान है। चौर समकितसहित मर्मत है। समकितसहित मारह प्रोका परमार्थ समछमें मानाय वो फल होता है। मायात वर्षसके लिये है जैसे कि एकका भक सिखानेके लिये कारें बनाई जाती है। परपि प्रथम तो कोरे करते हुए एकका अफ टेवा मेडा हो जाता है, परम्त इस वर करते करते पीसेमा भक ठीक ठीक बन गता है। पौवने मो जो कुछ श्रवण किपा), मह सब मिप्पा ही प्राण किया है। बानी विचारा क्या करे । जिवना समसामा सममानेको पैतिसे ही तो समचाता है। मार स्टकर समझानेसे वो मामझाम हाता म) । पहिरे नो नो बबादि क्येि २ सब निष्फर हो गये, इसठिपे ा सम्पुरपको रपिसे परमार्थ समझकर करो । एक ही तो, परन्तु यह मिप्पारएिको अपेक्षासे बच है, और सम्पादपिकी अपेक्षासे निरा है । पूर्वमें जो प्रत वादि निफर गये, उमें ना समय करने योग्य पुस्पका योग मिला है, सखिये पुरुषार्थ करना चाहिये । सशचरणका बाध्यसहित सेवन करमा चाहिये--मरण वानेपर पाडे पटना नहीं चाहिये । पानी पचम भवण होते नहीं-मनन ऐते मही, मही तो दशा बदसे दिना कैसे र सकतीti मारंभ-परिमाको म्यून करना चाहिये । पानेमें चित्त न हो तो उसका कारण नीरसता माश्म देती है। जैसे कोई माइमी नौरस बाहार कर ले तो फिर उसे पासे मोमन बस मीत) शानियोंने गोमा, उससे और विपरीत ही पड़ता है, फिर सपुतकी वाणी कसे म सकती है। मेक-हाय मादि शम है । इस फल्पके कारण भीषण पामौ चमकता नही । उस रापपर ।
(४५ - भीमद् पश्चन्द्र यदि सपुरमसे बचनरूपी टॉकीसे दरार पड़ माप तो पानी चमक उठे । गोषका शाप हवा Pमके यातिपेगके कारण र नहीं होगा परन्तु ससग सयोग पदि एक महानवक मी हो तो पार हो नाप, और बीच रास्तेसे पा गाय । पातसे समुफमा ससारी गांव को पुरके उपर मोर करते पए नितना मेद होता है उतना मी पर्तमान के महतसे साधुमोको शिप्पके उपर मोह करते हुए या नहीं। तृणावाम गांव सदा मिसारी सतोषाला जीव सदा मुसी। सवेरेवकी, सबै गुरुकी, सबै धर्मको पहिचान होना गात मुस्किल । सबै गुम्न पहिचान हो, उसका उपदेश हो, तो देव, सिर, धर्म इन सबकी परिभान हो बाप ! समका सरूप सहम्में समा पाताहै। सचे देव बांत, सबै गुरु निन्य, मौर सो हरि राग-देप सिके र हो गये है। संपरमिव वर्षात् गाँठरहित । मिप्पाच वर्षन्धि है । परिमा मात्र प्रन्थि है। मूळमें बम्पतर प्रपि छिम म हो वातक पर्मका सहप समझमें मही वाता | मिसकी पन्धि नर हो गई, सा पुरुष मिले तो सचमुच काम दो चाप, और उसमें पदि ससमागम ये ता विशेष फन्माण हो। निस मूस गाँठका झाव न करना ना है, उसे सब भूग गये है, और बाहरसे उपचर्या करते है। सास सहन करनेसे मी मुजि होती मही क्यों दम करनेका कारण यो वैराग्य है, गौब उसे भूए गया है। हममानका। मदरसे मुठे वमी पारसे झटता है, भदरसे छुटे विना बाारसे छूटता नही । केवल बाबर पाहरसे मेष देनेसे काम नहीं होता । बाम सापनके बिना काम्पाण होता नहीं । बाम मोर भतर गिसे पोनों साधन है, पाठकर पुरुष है और इसध्येि प मेष्ठ है । मिस साबुके एगसे बतर्गुण प्रगट हो उसका सग करना चाहिये । कर्ण और बादीके रुप्पे दोनों समान मही कोनाते । काकि उपर सिमा गा दो फिर भी उसी रूपयको मत नहीं होती और योग से तो उसके स्पर सिन्ध म गावो तो मी उसकी कीमत कम नही हो पाती । उसी वय यदि ग्रात्य स्पा समकित हो तो उसकी कीमत कम नहीं हो पाती। सब काते कि हमारे धर्मस भोश है। बात्मामें गगनपके मास हानेपर पान प्रगट होता है। चाहे वहाँठो और बारे रिस स्पिदिमें मोप हो सकती है। परन्त मा-रेप मा ऐतमी हो । मियान और मांस नाश र गिमा पर्ष रामपाट मेरदेशको तय सूरा बाप, फिर मी मोक्ष मही होती । मिपाल मारा बनके पापात् होस साधन स । इस परम सम्पदर्शन मेष्ठ है। ससारमें मिसे मोह, बी-फमें अपनापन रोपा, वौर कपासका गो मरा जमा है, पनि भोवन न करे दो मी मा वा ! सब मिप्पाल पग बाय तमी उसका समर हो। हामें चैनधर्मी गितने साधु फिरते हैं उन समा. समकिती नहीं समामा, उमें रान देने में सानि नही परतुरेहमाय फम्यान नहीन सकते । सम्माण नहीं करता । यो साधु केवल पाप दिपाय दिपा प्रता, उसमें शान नहीं। जान तोमर कि मिससे पार सियों माता--संसारपरसे सबी प्रति पट जाती - सबैको सवा समझने गटा। मिससे मारमा गुम प्रगट होपाल । । ।
४५ उपदेश-णाया . मनुष्यमय पाकर मटकनेमें मौर बी-मुत्रमें वदाकार होकर, यदि बारम-विचार नहीं किया, मफ्ना दोष मही देसा, मारमाकी निन्दा नहीं की, तो वा मनुष्पमय-चिंतामणि रत्नरूप देह-पाही घग चाता है। नौर कुसगसे मौर बसद्गुस्से मनादिकालसे मटका है, इसलिये म्पुरुपको परिचानमा पहिये । सपुरुष कैसा है ! सत्पुरुष तो वह है कि जिसका देहके उपरसे ममत्व दूर हो गया है- मिसे बाम प्राप्त हो गया है। ऐसे हानी-पुरुषको बाहासे आचरण करे तो अपने दोप कम हो जाय, कपाप बाटि मा पर गय और परिणाममें सम्पक्व उत्पन हो। कोष, मान, माया, गेम ये वास्तविक पाप है। उनसे पास कर्मीका उपार्जन होता है। हमार वर्ष तप किया हो परन्तु यदि एक-दो पाली मी क्रोध कर मिया तो सब तप निष्फर पण बाता है। मसका मोठा मी राम्प मेषकर पा गया, और मैं ऐसे धाप म्पबहारमें बाप्पन और वाकार कर मैठा !'-चीम ऐसा क्यों नहीं विचारता ! बायुके इतने पर्प म्पतीत हो गये, तो मी छोम फुछ पा नहीं, और महान ही प्राप्त हमा । चाहे कितनी मी तृष्णा हो परन्तु जब आयु पूर्ण होती है उस समय वह नरा भी काममें माती ना और वृष्णा की हो तो उस्टे उससे कर्म ही रते है। अमुक परिमाको मर्यादा की उदाहरणके म्पेि दस इनार रुपयेकी - तो समता आती है । इतना मिस मानेके पथात् धर्मप्यान करेंगे, ऐसा रिचर रक्से तो भी नियममें मा सकते हैं। किसीके उपर क्रोध नहीं करना । जैसे रात्रि-मोनना रयाग किपा है, वैसे ही कोष मान, मापा, गेम, नसम्म बादि गोग्नेके लिये प्रयत्न करके उनें मद करमा पारिप । उनके मद पर गानेसे अन्त में सम्यक्त्व प्राप्त होता है। पांच विचार करे तो बनतों कर्म मद पर बॉय, और परि विचार न करे तो बनतों काका उपार्जन हो। बा रोग उत्पम होता है तन मी, माक-मो, माई वपना दूसरा कोई मौ रोगको से नहीं सकता ! सतोपसे धर्मप्पान करना चाहिये, छपके बचों बगैर किसीकी बनावश्पक चिंता नहीं करनी चाहिये । एक स्थानमें बैठकर विचार कर, सम्पुरुपके सासे, कानाके वचन मननकर निघारफर धन मादिकी मर्यादा करनी चाहिये । नामको पापातम्य प्रकारस तो कोई विरा ही नीष पाठ सकता है, तो मी कामसे मी समचर्यका पाउन क्यिा आप तो पर उत्तम है। मिप्पाल र गया तो पार गति र दो गाती है । समकित म भाया ये भौर पस पर्पका पान करे तो देवलोक मिकता है। गोत्रमे काप, मामण, पशु पुरुष, बी बादिको कम्पमासे में वैश्य , प्रामण , पुरुष, से पशु-ऐसा मान रस्सा है परन्तु मी विचार करे तो पासयं उनमेंसे कई मी महो। मेरा समतो उससे हरासहै। सूर्यके उपोतकी तरह दिम पीत गाता है, तपा मटिके मम्मी तरह भायु पीत गाती है। निस तय की मापसे काटी जाती है, वैसे ही वायु म्पतीत हो पाती है। तो मी मूर्म परमात्र साधम नही करता भौर मोहके रेरको इफया किया करता है। - [1 श्रीमद् रामचन्द्र पानी निकलती है। किसी नौकको ऐसा नहीं करते कि रोधा से। सार्यकरने पूर्वम गो धर्म पि, उनका फेदम करने के लिये ये दूसरे चौधोंका कल्याण करत , नही पो ठने उदयानुसार दया यती है। या निफारण , तथा उमें दूसरे निगसे भपमा करपाण नहीं करना है। उनका कस्पाण ता हो हो गया है। तीन मेकका नाप वो पार होकर बैठा है। मपुरुष भपमा समरिताको मी ऐसी ( सकाम ) उपदेश देनेकी इप्सा नहीं होती । मी मिझारण दयाके पास्ते ही उपरे देवा। महापारस्वामी गृहषासमें यते पुए मौ स्पागी भैसे पे। हमारों वर्षका सम्मी मी जैसा पैराम्प मही रस सकता, पैसा पैराग्य मगवान्का था। गाँ यहाँ मगवान् यो, यहाँ यहाँ सा प्रपरका उपकार भी गता है। उनकी वाणी उदयके अनुसार शतिपूर्वक परमार्प हेवसे निकम्ती है वर्षात् उनकी वाणी कल्याण के लिये ही होती है। उनें सन्मसे मति, भुत, माधि थे तीन शान थे। उस पुस्पके गुणगान करनसे बनत निर्बरा होता है। पानीको माव वगम्प है। उनका अभिप्राय माननेमें मही माता । पानी-पुरुपको सबी खूबी यही कि उनी मनाहिसे दूर न होनेवाले राग रेप और मानको मम मिम कर गया है। इस मगजानकी पनत छपा है। उन्हें पदीसप्तौ वर्ष हो गये, फिर भी उनकी दया आदि वाम मी मौस है। यह उनका बनत उपकार है। पानी बाम्बर साने के लिये पार करते महीने सहम खमानसे उदासीन मानसे पते । पानी दोबके पास जाकर दोपत्र ऐनम कर गमता है। गा कि मसानी मार दोपको कोष नही एक बात पर है। गामें कम्त्याण नहीं है। बानाका मादा होता है। वैसे पल्पर स्वर्ग माही तेरता और दूसरेको मी पही तैरता उसी तय मानी है। पतिरागन मार्ग मनादिश्च । रिसके रग रेप और कान धरणे गपे उसका कम्पाण हो गया ! परन्तु मानी करे कि मेरे धर्मसे कम्पाण है, तो उसे मामना माही। इस तरह कन्याण होता नही। लपाना अपवादप्पापना माना हो तो क्याप पाती है। तप्पा इटियाके साप बैठा हो तो साप बढ़ती है और पूलिया वयाके साथ बैठे तो काप माता पर्ने बानी समाना चाहिये। दोनों ही समझे बिना मामा नारकर कर्म उपार्जन कर मामले फिरते हैं। पहरेको नाडेको तर मताप्रा फको बैठे हैं। मुंपत्ति वादिके बापाको मेर देना चाहिये । ममार्ग पाहै ! एग देष दौर मानका नाश हो पाना। मबानी सामुोंने मोठे गायको समझाकर उने मार रासमे जैसा कर दिया है। यदि प्रथम सपचार करे कि मेरा दोष कौनसा कम परप (बोय) इसमम बर्मन एक पासा मनुपाचौ सुरुमानी एक बात होती है। पौरप मेयरम मार (मिमा एकमेप मुसम्मनार पम-समयमै मुखमपी मनुनी हो यो ।पोरय मेग प्रापा मारामा बाबा बने रे भेग पीक पेश करना पसंद नहीं करते। इनके धर्मगुरु पमीच प्रान मास्तम है। बरसी पोई पोरय मापाप काम मात्र मार पम म पापा पोमे गे यहा मावा वो पानीजानने औरपरले 'शा पलाम रोधियार होगबेठने मा। मामले पर तो प्रायमेमे बेगमन होगी से नापा प्रमौर से पी-चोरी- म म्यारामाधानमा ममिया इस रो पात्रो पोषा या परन्तु पाण्टीने समय बापाचन मात्र साकर बैठने मे सपा । तमे नाको देश कारगर। -मानुपातिक ६४.] उपदेश-पाया पाहै, तो मादम होगा कि मैनमर्म तो मेरेस वर हो या है। जाप उम्टी समासे अपने कन्याणको भूल कर दूसरेका बकायाण करता है । तप्पा दियाके साघुको, मौर दिया तप्पा सापुको बम-पानी न देने के लिये वपने अपने शिष्योंको उपदेश करते हैं। कुगुरु योग एक दूसरेको मिछने नहीं देते। यदि ये एक दूसरेको मिझने दें तो कपाय कम हो गाय -निम्दा पट जाय । गीर निष्पक्ष नहीं पता । मह मनादिसे पक्ष पदावा है, और उसमें एकर कम्पाण भूल पाता है। बाद कुलकी मो गोचरी कही है, उसे बहुतसे मुनि नहीं करते । उनका फरसे मादि परिमाका मोर रहमा नहीं। एक बार आहार मेनेके लिये कहा है फिर मी दो मार लेते हैं। मिस बानी- पुरुषके बचनसे आरमा उस दशा प्राप्त करे या सचा मार्ग हा अपना मार्ग है। सबा धर्म पुस्तकमें आश्मामें गुण प्रगट न हों तबतकपकुछ फल नहीं देता । 'धर्म अपना है। एसी एक कम्पनाही नापर्म - जैसे महासागर किसीका नहीं, उसी तर धर्म मी किसीके पापका मही है। जिसमें जा हो, उसे को पाठो । वह किसीके वारका नहीं है । पापनादिकासका है-शत है। परीकि धर्म अपना है। परन्तु शाबत मार्ग क्या हैबत मार्गसे सब मोक्ष गये गेरी हपची या कपका कोई वारमा मही। कोहरेकी नारेली तर मात्र पक्षका मामा एमी नानकी मूडता है। अपने जनधर्मके शायोंमें सब कुछ, शान अपने पास पन बीब कर बेटा है। तथा कोष, मान, माया और छोभरपी पार जो यत मि टका उसे मान नाही। मार्ग सपा है। इम्पमें कौमीतकमा रसनेफी आश मही। मेणयोंके कुठपर्मक गुरु कोरे बिना ही ठोगोंक पाससे छपमा ग्रहण करते हैं, भीर उस तरा तो एक म्यापार के समय अग्निमें बसते हैं, तो फिर उनसे दूसरोंकी वामि किस तरह शान्त हो सकती ( परमार्थ सझे गुस्से समझना चाहिये । बिस गुरुको सार्थ हो वह अपना मान्याण उससे शिष्यों का भी अकम्पाण होता है। पारण कर वीर भगतों बार मका यामबती लिंग धारण कर हाफि म्पब म मटका है ।इस जगह वह जैनमार्गका निपेध करता नही । मतरगमे नोमितना सपा म है। मही ताबमारिकाम्से गौन झटेका सपा माना है, भार पदी की साधकता तभी है न कि मिप्या आमर-दुराप्रह-गोरकर फन्याग होता हो। int | जब मामान प्रगट रो उसी समय आम-वानीना मानना चाहिये- गुम मापना उसे मानना पद भूउ पाइरानकी कीमत जाननको पालिके बिना राना मानना मही पोहए । मानी मियाको सपा नाम दकर बादा पवारता ह । पसिद्ध पहिचान दो रिमी ममय तो सापका प्रहण शेगा। आग' मा पर १५ मगर यो गार पाने मुमुभु मानता दो, पार हानका मनियारी मानता हा, भार उसे में गहाले समप माता-याकुमता होता हो, वो उम समप शिकार करना चाहिए कि वे मुमुसुना-होशियारी- मम बारा [1 भीमद् रामबाण सबकी अपेक्षा में सबसे बड़ा हो गई। ऐसे वस्पन के प्राप्त करनेको क्षणाम, पाँच इत्रियों में गमन मधपापांच तह, पग-तृणाके के समान, ससारमें जीत्र भ्रमण किया करता है, और मुम, गाल और गतियोंमें मोहके नचानेसे नापा करता ह! जिस तर कोई पा रस्साको बटवा गाता है, और यहा उसे माता गाता है, उसी तय भमानीको किया निष्कर पी जाती है। ' में कर्ण , मैं करता , में कैसा करता झ्यादि गो निभात्र है ही मिप्यात । माकारसे सप्तारमें मनात इस प्रप्त होता है-पारों गठियों मठमना होता है! किसी Pिया मा Pया नहीं जाता किसीका किया मा लिमा नहीं बाता; जीव म्पर्पको फरफ्ना करके ही मटका करताहै। जिस प्रमाणमें कमात्र उपार्जन किया हो उसी प्रमाणमें डाम, माम, भायु, साता बसाता मिते हैं । अपन मापसे कुछ रिया लिपा नी माता । जीव वाफारसे मैने से सुर दिया, मैंने दुस या मैंने बम Pया' ऐसी मिथ्या मालमा किया करता है बोर उसके कारण कर्म उपान करता है। मिप्पास्ममे विपरीत धर्मका उपार्जन करता है। जगदमें या इसका पिता है या इसका पुत्र है, ऐसा म्पयहार होता है, परन्तु कोई मी किसान मनो। पूर्व कर्मक उत्यसे ही सब कुछ बना है। वाफारसे वो ऐसी मिप्याबुद्धि करता है, या भूगामा है- चार गतियोंमें मठकता है, और दुस मोगता है। परमाधम पुरुष के क्षण सत्पुरुपको देखकर बिसे रोप उत्पम होचो, उसके मन सुनकर जो उसकी निंदा करता है-मोटी हशिबाग से समुद्रिकालेको देसकर येप करता है-सरस्फे मूर्म करता है, को दिनय करे उसे पनका सुशामती करता है, पाँच इन्दिया जिसने बहो उसे माम्यहान करता है सब गुणवानो देखकर रोष करता है, जो जो पुरुषक ममें हीन यात्र-ऐसे बाल कुगतिको प्रप्स होते है। जल कर्मक कारण अपने सरूप-दानसे परे, उसे बानको सार नहीं है। एक नामके लिए-मेरी माफ हे तो पच्छा -ऐसी म्पमाके कारण जीव वफ्मी शूरपरता दिखाने के लिये माईमें उतरता है-पर माक तो रास हो पानेवाली है। देह कैसा है। रेतके पर सौ । स्मशानकी ममी वैसी। पर्वतको गुफाके समान देह में भयो। धमाके कमरण उपर उपरसे सुदर माडूम होती है। देश महगुणका पर तथा मापा और मैके पर स्थान है। हमें प्रेम रसने के कारण गार मटका है। पदो मनिरप है, योगको सान है। इसमें मोह रखनेसे पान चार गतियोंम भटकना ।किस तरा मटकता! पाणी रेको तथ। गाँउपर पाँव मेता है, पम्ने मार्गमें उस ग रोकर बना पड़ता है, फ़्टनेकी रम होनेपर मी पछट जी मनसा मूससे पारित होनेपर भी प्रकार नही सकता, चासोमास पा भिरानुसता केही सका । उसको तय मा फ्यपान है।यो संसारमै प्रति करता है, इस प्रकार FRम करता। बुरे से कयो पहिनकर बाम्बर रचते है, परन्तु मे बुरी तरा मा रो मानेपाहे बामा न मायाले कारण पाहुमा यख है।
५४५] उपदेश-पाया ५७१ जो बीच भारमेच्छा रखता है, वह पैसेको नाकके मैठकी तरह त्याग देता है। जैसे मक्सिणे मिठाईपर चिपटी रहती है, उसी तरह पे अभागे जान कुटुमके मुसमें सवलीन हो रहे हैं। पद, युना, वायफ-पे सबससारमें हो गए है-कायके मुसमें है, ऐसा भय रखना चाहिये। उस मयको रस ससारमें उदासीनतासे रना चाहिये । सौ उपवास करे, परस्तु जबतक मौतरसे वास्तविक दोष दूर न हों तबतक फल नहीं होता। श्रावक किसे करना चाहिय ! निसे सतोप बाया हो, पाप मिसको मद पा गई हों, भीतरसे गुण उदित हुए हों, सरसग मिग हो-ठसे नायक करना चाहिये । ऐसे जीको बोध छगे तो समस्त ति वरठ बाप-दशा र जाप । मसंग मिसना यह पुण्याचा योग है। बीर बविचारसे भूछे हुए हैं। नए कोई कुछ कह दे तो तुरत हो युरा ग नाता है, परत AIR मही करते कि मुझे क्या । वा फोगा तो उसे ही कर्म अध होगा। सामायिक समताको कहते है । मीत्र बाकार र वाघ-क्रिया करता है, अहकारसे माया सर्व करता है- पुगतिके कारण है। सत्सगके बिना यह दोष नहीं घटता । नीरको अपने मापको होशियार कहलवाना परत बण्ठा जगता है । महमिना युगये होशियारी फरके गाई मेता है। मिस नीवको विचार नहीं, उसके छानेका बात नहीं । पर विचार करे पौर स्मार्गपर बसे तो नेका मन्त माये । भकारसे मानसे पिम्य प्रगट नहीं होता । वह बड़ा दोपजनमें गो की कल्पना यता है। मावलियाने विचारा कि मैं अकुशरत , इसलिये मान, भारफ वही १५ सोम पदरा मेसे मो सिर कहा है, उसका कारण यह है कि निसका राग देप भौर पान मय हो गया है, उसका पाई बिस बेपमे, पाई बिस स्पानसे भीर चाहे मिस लिंगसे सम्पाण हो जाता है। सत् मार्ग एक ही है, इसलिये भाग्रह मही एखना । ममुक लिया , अमुक तपाई, ऐसी पना नहीं रखना । दपा सप आP सावरण मुक्तिके मार्ग है इमरिपे सदापरण सेवन करना चाहिये। सोच परना किस लिये कहा है ! पारीरकी मपताकी वह परीक्षा है। (सिरमे बार होना ) यह मोर पानेका कारण है। उससे स्नान करमेका मन होता है, पण सेनेका मम दाता है, उसमें मुह दगनेका मन होता है, भौर इससे किर उनक साधों के लिये उपानि फरनी पाती है। इस पारण शनियोने पशोच करने के लिये पहा है। पात्रा फरनेफा एक तो कारण यह है कि गुलामको उपापिसे निति मिठ समा सरे सो दामी को आरगे भार कम हो सके तया परदेशमें देशान करनेसे कोई मरते गाने मिउ नापतो पाणबाप । ल कारगौसे पाश करना पनाता है। रामपुरप दूसरे जीने मरा देवर कन्याग बताते हैं, उन सुरुषोंगे तो मनात साम प्राप है। सपुष इमर और निष्णाम फरमा मागर है । बागी उदप अनुमार उम [१ - भीमामबन्द्र पहा वर्ग गई। जो पार होनेश अमिळापा हो तो देहको बसार समप्यता है- देश आपसे निम मानता है-उसे बाइटता बानी चाहिये ही नहीं । देशको समान करते हुए पा सेंमाछी मातीनी, क्योकिया उमाक्षणमाश हो जाती है उसमें एणभरमें रोग, पणमरमें काना हो जाती है। देश मासे देश दुम देता है, इसलिये माकुसता मानुसता होती है, वहाँ बान है। शाम त्रण कर पेग ऐप पमा है कि देह वामासे मित्म ह-जगभंगुर है, परन्तु दोशे परि देना हो तो यह गीत रागरेप परिणामसे शोर-गुग मचाता है। तो फिर, देह धणमगुर है, पर तुम शासमें मुममे गावे किस छिपे होणे तो हमारे पास है तो अनुमत्र क्रो देह पर मिली जैसी है-इ साई रस्सी मही ना सम्यो । पेदना दन परते ए कोई उपराप चरता नहीं। वा फिर किसय समाल करें। कुछ मी नही मन समय । इस तप देहका प्रस्पक्ष ननुमत्र होता है तो फिर उस ममता करक क्या करमा ! रोका प्रगट बनुभव कर शाम मारिया बनिय है हमें मर्म करना योग्य नहीं । जावा देह में मारमादि र न हो तबतक सम्परत नही हाता । पात्रको सपई कमी गर्न नहीं यदि वाई होती तो मोश हो पाती। मडे ही साधुपना, धात्रकपना भपका बारेमा पनि कर सो, परन्तु सचाई पिना सब स्पधन पारे । देहमें मारमधुधि र करने के यो साधन क्वा बेसाभम, देरमें अमिपुरि रहो आप सभी सन समझे जात है । देहमें जा बामगिई है उसे दूर करने के लिये लपमेपमको त्यागनके सिपे साधन करने भान पर हैं। यदि पार न हो तो साफ्ना ध्यर करना, शात्रभरण अपना उपदेश सब कुछ अरण्यरोदन के समान है। मिस यह भम पूरा गया है, तो साधु को भाचार्य और बदी हानी है। जैसे कोई अमृतम भोजन करे तोप छिपा (मा मही यता, उसी हाद प्रतिकार हामा मिसीसे दिशामा यता नहीं। लोग कहते है कि समरित है या मही, उसे रिहाना गाने । परन्तु गो सप वामान उसे पो मही मानती! मामा कुछ गार तो पसा ही मही गई । अर्पा समकिन हमारे इसे मार सपी मानना है । बसे किसी पार्क मानेपर पर अपना फस देता है, उसी तरह समरितो सर भतिर जानेपर रसमा साम्य सर्व ही जान तो फलको शान देता ही IAN मस दार्थ मान के अनुसार देता दी है। भारमा-अम्तरमेंसे-प-कर्म मालेगणार र ा उसमें मलेग गबर या म परे। अात् गार पाती है। सम दिशा दिली नही पती । गित गमकिन ममकिन मानमा पारो गोमकी गनने ममान। रामनिता रेमें मारपुरि पक्षी मोर मप्यमयोग, रिसर मा मौका नुमर तो पागे से माम मुधि र हातोहार गनेर बिसे HTTAR उमे मिपा समाना पाहि । गिन HITRAL, म भरेग मntm उगने गमत पागले। रिमो? उगस परम परमाणु मर गार नोभी मेरो हानगरिय गारोती है और विमाना MRI मामा मामा मालिनी स्प-शानामान with and MUTHI - 1] उपदेश-पापा बामाको पुत्र मी नहीं होता और पिता मी नहीं होता । गो इस तरह की कम्पनाको रूप मान बैठा है पा मिथ्यात्वी है । कुर्सगसे समझमें नहीं बासा, इसध्येि समकित नही माता । सत्पुरुषके संगसे योम्प पीर हो तो सम्यक्त्व होता है। समकित और मिथ्यात्वकी तुरत ही समर प जाती है। समकिती और मिष्यावीकी वाणी धी पी पुत्री पाती है। पानी की नाणी एक ही धरायुफ पूर्वापर मिलती चली जाती है। जब भतरग गोठ सुले उसी समय सम्यक्त होता है। रोगको चान के, रोगको दमा जान , पप्पको जान से और वदन्सार उपाय करे सो रोग दूर हो जाय । रोगके माने बिना अहानी को उपाप करता है उससे रोग मता ही है । पप्य सेवन करे और दमा फरे नहीं तो रोग कैसे मिट सकता है। पर्यात् नहीं मिट सकता । तो फिर यह सो रोग कुछ और है, और दवा कुछ और है! कुछ शान तो ज्ञान कहा नहीं माता । बान तो उसी समय कहा जाता है नव अतरगस गाँठ दूर हो जाय । तप सपम बारिके लिये स्परुपके सपनोंका प्रवण करना बताया गया है। हानी भगवान्ने कहा है कि साधुओंको बचित्त बाहार मेना चाहिये । इस कयनको तो मासे साधु भूल ही गये हैं। दूध का सचित भारी मारी पार्योका सेक्न करके बानीकी आमाके उपर पनि देकर पम्ना कम्पाणका मार्ग नहीं । डोग कहते है कि मा साधु है, परन्तु बारम-दशाकी मो साधना करे बही तो साधु है। मरसिंहमहेवा करते हैं कि बमाविकाम्से ऐसे ही चम्ते चलते काठ बीत गया, परन्तु निस्वारा हवा नहीं। यह मार्ग नहीं है, क्योंकि अनादिकाम्से पस्ते बस्ते मी मार्ग दाप गा नारी । यति मार्ग यही होता तो अबतक कुछ मी हापमें नहीं बाया-ऐसा नहीं हो सकता पा । इसलिये पुरा मिल ही होना चाहिये। तृष्णा किस तरह घरती है। किक भावमें मान-पहाई स्पाग दे तो । मुझे करमा हो क्या है ! लोकमें चाहे नैसे हो, परन्तु मुझे तो मान-पाईको मेकर चाहे किसी मी प्रकारसे, निससे राणा कम हो पैसा करमा ('—ऐसा विचार करे तो तृष्णा घट गाप- . घर-कुटुमा बारिका परमाया सपका बभिमान कैसे घट सकता है। त्याग करनेका उपयोग रसनेसे । 'मुझे यह अभिमान क्यों रोता है'-स प्रकार पार करनेसे वभिमान में पड़ेगा। पानी पता है कि चीन यदि कुंगौली बानकर विचार करे तो बचानकपी वाम सुरु नाप-कितने ही तारे खुल गय । पदि कुत्री हो तो ताण सुस्ता है, नहीं तो पौड़ी मारनसे तो बाग टूट ही गावा है। करपाण न जाने क्या होगा ऐसा गाको गाम है । यह कुछ हापा पोड़ा तो है नहीं। गीतको ऐसी ही प्राप्ति के कारण काम्याणकी मुनियों समझमें नहीं माती । समधमे मा जाप वो सब धगम है। बीकी भान्ति दूर करने के लिये बगत्का वर्णन किया है। पर गान हमेशाके घमासे पपाप तो मार्गम भा पाप ।
। ." भीमद् पसराय [४१ पानी यो परमार्थ-सम्पाव- ससेही ते है। पाय घटेपही कम्पास है। बौक्के राग, रेप, वान रो नाप तो उसे कम्पाग कहा नाता है'-ऐसा तो गेग करते हैं कि हमारे गुरु ही करते है, तो फिर सम्पुरम मिम हो क्या बताते है" ऐसी उम्टी-सौषी रफ्ना करके बीचको वपन दोनोंको दूर करमा मही है। मम्मा मानरूपी पपरसे दब गई। हाना ही मामाको ऊँचा उठावेगा । मामा दब गई सम्पेि कन्याण सूटता नहीं । बानी गो सविधाररूपी सरक नियोंको बताता है हमारें ताको समाती गीतके मौतरसे बनार्ण र ो चाप तो वपत वच्छागे उसी तह प्रतिरूपी मनाने र होनेपर ही करपाण हो सकता है। परन्तु बीबको तो महानी गुम्ने महका रम्सा है, फिर भातिरूप वर्मार्ण दूर कैसे हो सकता है। वानी गुरु बानके बदले तप बताते हैं, तपमें डान बताते है इस तर उस्टा उम्टा बतास है, उससे जीवको पार होना बहुत कासाप्य है। पाकार बादिलित मापसे तप वादि फरमा चाहिये। का छोपकर नीव विधार करे तो मार्ग पुना हो। समकित सुग्म है, प्रत्यक्ष , सरस है। नौब गाँवको मेपर दूर पण गपाहै, वो फिर यब पापा फिरे तो गाँव मा सकता है। सुपुरुषोंके पच का बास्पासिरित प्रवण मनन करे तो सम्यक्त्व जाता है। उसके उत्पम होने के पथात् म परायण माते है और उपयात् पाँचयाँ गुणस्पानक प्राप्त होता है। सधाई समातमें बाकर उसकी बास्या हो जाना । सम्पपल । निसे सब-मूठेकी कीमत हो :- मेद निसका दूर हो गया है, उसे सम्पमत प्राप्त होता है। सद्गुम्से सत् समसमें मही पाता । दपा, साप, बिमा दिया था न मा स्पादि साभार सत्पुरुषके समीप मानेके सत् साधन है। सत्पुरुष को करते रेप सूझके सिमान्तका परमार्प है।हम वनुमबसे प्रते हैं-अनुमक्से शंका दूर करने को कर सकते हैं। मुमत प्रगट दोपक है, और सूत्र कामाबमें हिस्सा पूजा दीपक है। वियाफ्ना बयका तप्पाफ्ना किया करो, परन्तु उससे समलित होमेवाम नही । यदि वास्तविक सबा स्वरूप समतमें मा गाय-मौतरसे दशा पदक पाय, वो सम्पान उत्पम होता है। परमाम प्रमार बत् मारमामेसे वाम पति | पातिकर्म उसे करते है गो पात करे । परमाणु वामा निरपेस है परमाणुको पपात नहीं, उसे बिस रूमसे परिणमा प उसी रूपसे परिणमता है। निकाचित कर्ममें स्पितिया हो वो बराबर होता है। स्थिति-काज मोमोर विचार करे पयार पासे झामका विचार करे तो उस म होता है। स्पिति-काज हो तो भोगमेपर एटकारा होता है। प्रेष माविशारा दिन काँडा उपार्जन किया हो उनका भोग्नेपर ही मुटकारा होता है। सदय मानेपर मोगमा हो चाहिये । गो समता से उसे समताका फोता है। सबको अपने अपने परिणाम के बनुसार कर्म मोगाने पाते है। पानी चमें पुस्पलमें एक समान है।जान मारमाका हो। । - in विषिमपत्र मादि समाह-२ौ वर्ष ५७७ ६४४ मन पर्पमान किस तय प्रगट होता है। साधारणतया प्रत्येक नीयको मविधान ही होसा है। उसके वायभूत मुहानमें पवि होनेसे उस मविवानका बछ बाता है। इस वह मनुक्रमसे मतिज्ञान के निर्मक होनेसे वास्माका मर्सयममात्र दूर कर सयममात्र उत्पम होता है, और उससे मन पर्यनाम प्रगट होता है। उसके सबसे भरमा रसके अमिप्रायको बान सकती है। किसी ऊपरके बिहके देखनेसे सरेके चो कोष हर्प मादि मात्र जाने जाते है, यह मतिजामका वियप है। तया उस तयका मिह म होनेपर मो मात्र बाने गाते है, का मन पर्यवधानका विषय है। , बानम्द, मासोग मुदी १, १९५२ ६४५ म्समार्गरहस्य श्रीसद्गुरुपरणाय नमः भ, पदि पूना मादिको काममा न हो, भतरका ससरका दुस प्रिय म हो, तो असा तिको सम्मुत करके दिनमगवान्के मूहमार्गको सुमो ॥१॥ बिनसिमान्तका शोधन कर गो कुछ जिन-धनको तुलना की है, उसे केवल परमार्प-हेतुसे मना । रसके इस्पको कोई मुमा ही पाता है। मिनभगवान के समार्गको धनो ॥ २ ॥ एकस्म और मरिसर को बन्न दर्शन और पारिप्रकी मुस्ता है, वही परमार्पसे विनमार्ग है, ऐसा परितमोंने सियतमें शामिनभगवान्के मूळमार्गको मुना ॥ ३ ॥ वो चारित्रके किंग और भेद को सब इम्म, देश, काठ नारिको अपेक्षाके भेसे है। पतु जो बान पारिको धुरता पर तो तीनों का में भेदरहित है। बिमभगवान्के मूसमार्गको सनो ॥2॥ वा हान दर्शन जानिशम्दों का संक्षेपसे परमार्थ पुनो। उसे समाप्तकर विशेषतपसे विपारनेसे स्वम बारमार्य समछमें वायेगा। जिनमगवान्के मूडमार्गको सुनो ॥ ५॥ मूस मारग मन्मे भिननो रे पैच मनामुला मूठ मोच पूनादिनी पे कामना, मोप मा भवन माल । मूर १० परीने ये पचननी तुम्नागे गो गोपिने मिनिमम । मूल मात्र पई परमार परे पमे ममयमा मूत्र ॥२॥ सानन बारवनी परवा, एमाले भने भरिपमूल मिनमारग परम्पी एम म पिपुर। मम ॥1॥ मिप भने मेरो पनारे मरेपर मेरापूब पर मारिनी परतारे होने पर ममर । मून ॥rn रशन एनारि मनोपरे पयो परमा।मूब शिनमगये उत्तम भाप । मू १५ ५८ भीमद् पंवाद [१४५ मूलमायस मात्मा, दो वादिसे मिमी, उपयोगमप है, सावविनाशी है, इस सब सहाके उप देशसे पानने का नाम बान का है। मिनमगवान्के मूहमार्गको सुनो n६॥ यो प्रनाय माना है, उसकी चोपुर प्रतीति यती है, उसे भगवान्ने दर्शन शारे उसका दूसरा नाम समकित मी है। जिनमगवानके मूगमार्गको पुनो on पालको गो प्रतान्ति ई-उसे वो सबसे मिम बर्सग समन्ना-उस स्पिर स्वमा उत्पा होनेको चारित्र करते है। उसमें हिंगका भेद नहीं है। जिनमगवानके मूझमार्गको मुमो ॥ ८ ॥ नहाँ ये तीनों अमे-परिणामसे यते म मामाका सरूप है। उसने जिनमगवान्के मार्गको पा किया है, बपमा ठसने निगमको हो पा लिया है। जिनमगवान्के मूहमार्ग पुनो ॥९॥ ऐसे मूलबान वादिके पानेके छिपे, जनादिका व एर होने के लिये, समुम्न उपदेश पाने लिमे, सशर गौर प्रतिषको दूर करो । दिनमगवान्फे मूत्रमार्गको पुनो ॥ १ ॥ इस सय धिमेन्द्रोपने मोक्षमार्ग पर सहप का है। उसका पहा मकानों के हित के लिये सक्षेपसे सस्म का। मिनमगवान्चा महमार्गको मुनो ॥ ११॥ । ६४६ मी मामा, मासोग मुदौ २ गुरु १९५२ में सद्गुरुप्रसाद मीराम सम्मामाको बमई ईवासमोष मामको पुस्तक मराठी मापामें है। उसका गुबाती मातर मकर प्रगट ऐ गया । इस पुस्तकको पाँचने-विचारनेके म्पेि मेगी। उसमें प्रथम वो गमपति बादिको पति की है। उसके पाचात् जगत्के पदापोका मामरूपसे वर्णन करके उपदेशा किपा है। बादमें उसमें वेदावको मुस्पताका वर्णन किया है। उस सबसे पुरु मी मप न परत ए, अपना काम करते पुए, प्रत्यकचक नामानिपक विचारांचा बगान करना पोम्प है। पारिवी मिनापरे उपरोपी रामायण । मूग परमारे नपरेशान वेनु नाम का । मूग ॥६॥ बेशले नेपाली परी । मून पपवे न न न बोर्ड नाम समय ॥ असभा मताधिनी, पाल्पमित्र मग । मम बरसम्मकार म बारिष हेमलिंगा।" बमेन परमामयी मोर वे भात्यस्म । मून देर मरय निनो पासोपारा मोललाम । मूठ ॥१॥ एषा मनारि पमा बनेगा मनासि उपदेपमा मनासम्म रुकने प्रतिवाद ॥१॥ पनिी मरे मेषमापनुपरसम्म । मूम मनमाना ख्नेि मलेसेिमतसाद्र १५॥
विपिपपत्र मादि संप्रह-२९पों वर्ष वारमार्यफ पिचारमेमें उससे कम क्रमसे मुखमता होती है। थी को चो म्याम्यान करना होता है, उससे जो आभाष भारिका भय रहता है, वह समय है। जिसने सद्गुरविषयक तथा उनको दशाविषयक विशेषता समस छी है, उसको उस तरह के प्रसंगके समान दूसरे प्रसगोंमें प्राय करके आंमात्र उदय नहीं होता, क्या या तुरत ही शान्त हो जाता है। उस महमालको यदि परि वारफे समान समझा हो तो यह पूर्वापर कम समय होता है। वपाछ कुछ वरमें चातुर्य बादि मापसे, सूक्ष्म परिणतिसे मी, उसमें मिठास रक्सी हो तो वह पूर्वापर विशेषता प्राप्त करता है। परन्तु यह पार ही है-निश्चयसे गार होई-स्पर काउट बार है, इसमें किसी तर मी सशय नही और पदि सशय हो तो सशय मानना नहीं, उस सशयको मान समझना चाहिये-ऐसी तीन साराश कर राठी होता हमार प्राप 46 महीं कर सकता । काधिद उस मामारके रोकनेस निरईभाप हुमा हो तो भी उसका रिसे मामात्र हो जाना संमष है। उसे मी पहिल्से पार, और बारही मानकर प्रति का हो तो वामाफो बापा नही होती। . देसा ६४७ श्रीआनन मासोर, मुरी ३ शुक्र. १९५२ बारमापी मई मोहमष्ठासके प्रति रिबन, तुम्हारा लिया जा पत्र मिठा पा । पहाँ उसका संक्षिप्त उचर लिप्सा है। नाम पाता है कि नैटाछमें गनेसे तुम्हारी सी सावियोंमें विशेषता का गई है । परम्त उसमें हाय उस तर प्राति करनेको उत्तरा फारणभूत है। रानकोटको गरेक्षा नैटार ऐसा क्षेत्र रबर है कि गो मतसी बातों में तुमारी तिका उपकारक हो सस्ता है, पर मानमेमें हानि नहीं है। पयोंकि हमारी सरमताफारसा फरममें जिससे निजी विनोका मप रा सके, ऐसे प्रपंच मनुसरण करनेका बार नेटाउमें विशेष परफे नही है। परन्तु जिसकी सहतियों विशेष बलपान न हो अपना निर्मठ , और उसे इंगठा आदेिशमें स्वतंत्रतासे पना ऐ तो उसे नमा भासिंवधी दार उग सकता, माम होता है । बस तुम नेटाउ क्षेत्रमें प्रपंपका शिष सपोग न होनेसे, तुम्हारी सदातियों गिोरखाको प्राम , से परफोट जैसी जगह होना पटिन हो, या पपार्प माम होता है । परम्त किसी अष्ठमात्र समग बाहि पोगमें हमारी पतिपोका नेटाउ मरेडामा रिता प्राप्त रना समर है। तुम्हारी दियोको दराने दर गाठ तुम्हे भनाई अपने बसर कर सके, प्राप: मी मे मान्यता मही । परम्नु पर्दा ससंग ना योगको विशेष करके प्रामि न होनेगे कुए माम- निकरण म दोनेकपानि मानना पुरा विशेष योग्य उगता है। पता को भाप मापार-चार' के सुरक्षित रानो माप, गिमा पा, उसय मार्प पर -आ-आNर अव मुम्परपसे दया सप, एमा मार गुपोच भापरग पाना, और पर सपाट मुमपनपने मामाका भनित, निप, माना उग समान, नपा उग भान मोर मान न होनेक पारा उन गारगो मासिऔर देगा हम पम्पासा पाना मानादित निममें मना दिनान सप निरा ना। इस पर समे पुल मर्दो र उन को रिग है।
। भीमद् रामचन्द्र [ar पर्णाश्रम मादि-वर्णाश्रम आदिपूर्वक भापार-या साधारफे वगमूठक सम्पन है। विशेष पारमार्पिक हेतु न तो वर्णाश्रम बार पूर्वक बर्तन करना हो पोम्म है, ऐसा विचारसे सिद। यदि पर्णामम धर्म वर्तमानमें मात निश स्पितिको प्राप्त हो गया है, तो मी इमें तो, अबतक हम उस स्याग दशाको न प्राप्त करें वौर पबतक गृहामममें पास हो, तबतक तो सरूप वर्गधर्मका अनुसरण करना ही योग्य है।पोंकि उसमें अमन मादि मण करनेका प्यार नहीं है। ऐसी वासंका हो सकती है कि पापा मेग मी उस तय पाचरण करते है तो फिर उनके बम बाहार वार के प्राण करनेमें क्या हानि है!' तो इसके उत्तरमें इतना ही कर देमा उपित होगा कि बिना कारग उस रिचयको मसना मी योग्य नही। क्योंकि उससे, बादमें, इसे समागमनासी अपना पिसी प्रसंग बार में बपने ऐति-रिमामय अनुकरण करनेवाले, यह समझने गंगे कि किसी भी वर्णक यहाँ मोबन कर में हानि नही। साणाके पर मम माहार प्राण करमेसे वर्णधर्मको हानि महोती, पंत मुसलमानों के घर बम बाहार प्राण करते हुए दो वर्णधर्मकी विशेष हानि होती है, और पा वर्मपर्मर मेप करने दोपके समान होगा।बपी किसी लोकके उपकार षादि कारणसे वैसी प्रापि होती -पपपि रसहायता दुपिसे पैसा प्राति न रोती हो तो मी वफ्ना पा माधरण ऐसे निमितक त हो गया है कि दूसरे गेग उस हेतुके समसे बिना ही प्रापः उसका अनुकरण करते है, और वदमे नमध वारिक प्रण करनेमें प्रति करने गते । सीलिये उस तर वापरण म फरमा वर्षात मुसलमान वारिका कम माहार मावि प्रम मही करना यह उपम है। मारी चिको तो बात कुछ प्रवति है परन्तु पदि किसीक उसमे उतरतीति हो तो उसका बमक्ष बाद पार संपोगसे प्राप' उस मार्गमें से जाना समय है। इसलिये इस समागमसे निसतबर या गाय उस तप विचार करना करम्प है। दयाको मारमा शेष रस्नी दो तो गो हिंसाफे स्पालक? तपा से पार्य बा बरीचे गाते है, जो पके अपना गाने बानेके प्रसंगको न बाने देना चाहिये, ना ये प्रापा सी चाहिये कैसी दपाको मानना नही पती । तपा माके उपर ति म जाने देने के लिये पौर उस मार्गको उन्नतिन अनुपाम करने के लिये, अमक्ष मावि द्रण करनेवालेका बाहर वार्षिके किसे परिचय म रमना चाहिये। पालनारिसे देखनेसे तो जाति बादि मेश्की विशेषता बाद माम ही होती परन्तु मचाभरने भेदका तो वहाँ मी विचार करना चाहिपे और उसके विपे मुम्पमसे इस पतिका रहना ही उत्तम है। पारसे कार्य ऐसे होते है उनमें कोई प्रत्यक्ष दोष नहीं होता, अपना उनसे कोई माप ऐप मी मगता परम्तु उसके सबसे सरे दोगोंको माइप मिता, उसका मी विचारानको स रखना उभिव।नटाउकेगो उपकारके लिये कचित् सारी ऐसी प्रति तो है, ऐसा भी मिथप हो समधा गसमता परि सरे किसी मा पम्पर पैसा माचरण करते हुए पापा माश्म हो, और माचरण पानाम बने दोहोपतु माना जा सका। सपा उन लोगो उपकार के लिये वैसा भाचरण करना चाहिपे ऐमा रिचारनेमें मी पुण्य तुम्हारी समय-फेर होती होगी ऐसा मगा करता है। तुम्हारी नापिकी प्रती है इसलिये इस रिपपमें भरिकसना पोप मी गान परम । विसर पर और सदिचारण रापन हो सा बापाजामा पोम।
५४., An, ५ विविधपणमादि संप्रह-२ौवर्ष इसरो नीच नातियों वपश्च मुसम्मानों नादिके किसी से निमत्रमोंमें मम बाहार बादिके सदमे, म पकाये गए फमहार वादि नेसे उन लोगोंके उपकारकी रक्षा संभव हो, तो उस तर भाचरण करना पोम्यो। ६४८ बोक्को म्पापकता, परिणामीपना, कर्मांध, मोक्ष-क्षेत्र में किस किस प्रकारसे घट सकते है। उसके विचारे बिना तपाइप समाधि महीं ऐती । गुण और गुणीका भेद समझना किस प्रकार योम्म है। चापका म्यापकता, सामान्य-विशेपारमकता, परिणामीपना, होकायोक-हायकता, कर्मसंबध, मोश क्षेत्र, या पूर्वापर अविरोषसे किस तर मित्र होता है। एक ही बीव नामक पदार्थको उदे उदे दर्शन, सम्प्रदाय और मत मिम मिम स्वरूपसे करते । उसके कर्मसबषका और मोहका मी मिन भिम स्वरूप करते है, इस कारण निर्णय करमा कठिन , क्यों नही . ६४९ भास्मसापन सम्पमें एफ, मसग , सर्प परमावसे मुक्त है। क्षेत्र में असत्पात निव-वगाहना प्रमाण || काल- बबर, अमर, शासत । साप परिणामी समपात्मक। भान –में मुख चैतम्पमात्र निर्विकम्प प्रध। ६५० बबन सयम- मनो सयम- काप संपम- बचन सपम मनो संयम काप रुपम वासन-स्थिरता, सोपयोग पथासूत्र प्रति पचन संपम- मनो सयम- काय संयम- काय सपम- इन्द्रिप-संक्षेप, इन्द्रिय-स्थिरता, पचन संपम- मौन, पचन संक्षेप, मनो पिम- मनो संक्षेप, बामर्षितन, सोफ्योग यपास्त्र प्रहचि, बचम-गुणातिशयता मन स्थिरता भीम पनपन्न [१५१, ५५३, १५१ ट्रम्प, क्षेत्र, काठ और मान- संपमके कारण निमिवरूप प्रम्प, क्षेत्र, काह और मात्र इम्य-संपमित देह पेष-मितिवार क्षेत्रमें स्पिति-पिहार काल-पपास्त्र काम मान-पपासूत्र नाचि-साधन-विचार ६५१ अनुभव ६५२ ध्याम पान-ध्यान पान-प्पाम-ध्यान भान-पान-पान-ग्याम पान-पान-ध्यान-ध्यान-माम पामध्यान--पान-पान-पान-पान पान-पान-पान--ध्यान-मान-प्पान-पान ६५३ विधामप, परमत, बाग, एकाप, एक खमालमप, सात प्रदेशात्मक, पुस्पाकार, चिदानन्दमनका व्याप्त करो। का बामविक बमान । प्रदेशसव-प्राप्त पूर्व निपा सपामास, उदयप्रात, उदारणापास ऐसे परमा: गो मा और नीमच मेदन करमेसे बिसे मप्रभमान हो गया ह ऐसे पुसल्म दिन निर्वि नोमोमासक चमकारके भान है। सपमानातलीयर मारनीष मो मोमीन में संक्रमा नाम गौ - १५४,५५५, १५६, १९] विपिम पम मारि संमा-२१पा पर्प ५A ६५४ सोर (भापर्यकारक ) महापुरुषोंने गरेपणा की है। फस्पित परिमतिसे चीवका विराम लेना जो इतना अधिक कठिन हो गया है, उसका हेतु स्पा होना पाहिये। मारमाके प्यानका मुख्य प्रकार कौनसा कहा था सकता है। उस प्यामका सहप किस तरह है। केवहानका निमागममें गो प्ररूपण किया हैमा यपायोग्य है! अपना बेदान्तमें नो प्ररूपण शिपाईप पपायोग्य है! - - ६५५ प्रेरमापूर्वक पप गमनागमन क्रियाका बारमा सत्यात प्रदेश प्रमाणके लिये शेप विचार करना चाहिये। प्रम -परमाणु के एक प्रदेशात्मक और वाकायके भनत प्रदेशात्मक मानने में गोहे, यह ख वाहमाके वर्सम्यात प्रदेशस्तके ये यापातप्य सिद्ध नहीं होता। क्योंकि मध्यम परिणामी मस्तु अनुपम देसमें मही माती । उचर- ६५६ भलको क्या म्पाप्सा है। जनतालको क्या म्यास्पारे। पाकारका वगाहाभमन किस प्रकार है! मामतका मध पदि भान न होता तो पावना से कैसे हो सकता है। समार इस मार बम्पपा किस तय माना जा सकता है! कोष मार मार औरमें परिमामौरूपसे है पामिविलास! पदि ठमें परिणामीहपसे करें तो वे स्वाभाविक धर्म रोगाप, वौर स्वामाविक धर्मका र होना सी भी मनुमबमें भावा नहीं। परिउरे नितिनपसे समझें तो रिस प्रकारसे जिनमगवान्ने साझाव ए कहा , उस ए मामनेमें रोष भाना समय है। ६५७ दिनमगवान के अनुसार केसान, और वेदान्त के अनुसार प्रन इन दोनोम क्या है।
भीमरावाम [९५७, १५१,१५१ इम्प, क्षेत्र, कार और मार- संपमके कारण मिमितरूप दम्प, पत्रकार और माल इम्प-सयमित देश क्षेत्रपिाठ क्षेत्रमें स्थिति-हिार, काम-पपासूत्र माल-मपासून निति-साधन विचार ६५२ चनुमष ६५२ ध्यान ध्यानपान प्पान-पान-पान पान-याम-ध्यान-ध्यान ध्यानपान-ध्यान-पान-प्यान ध्यान-पान-प्पान---ध्यान-ध्यात. माम-पान-पान-पान-पान-पान-पान ६५३ चिद्भातमप परमशत, नाग, एम, एक समातमप, अल्पात प्रदेशामक, पुस्पार, चिदानन्दमानच म्यान करें। मापतिक मात्र । प्रदेशसेवेच-ग्रास, पूर्व निगम, समानता, सदपप्रास सदारणापाव ऐसे चार मा. गोमा और मापन केन करनेसे जिसे सममान हो गया ऐसे प्रताप मिन विमान सोहाम्-मास मकाराप। मानावरारदानापलीक यो सारा मारनामा
प्रकार कम्पपा क्सितरा माना पा सक्रवा!
1५४,१५५, १५५, १५.] पिविष पर मादि संपर-२१वा प
६५४
सोश (भापर्यकारक ) महापुरुषोंने गोषणा की है।
कल्पित परिमातिसे गावका निराम ना मो इतमा अधिक कठिन हो गया है, उसफा हेव क्या
होना चाहिये।
मात्मा के पानका मुख्य प्रकार कौनसा कमा सकता है।
उस पामका स्वरूप किस तय है।
विमानका मिनागममें यो प्ररूपण किया है वह पपायोग्य है ! मयना वेदान्त को प्ररूपण
किया है। यथायोग्य है।
प्रेरणापूर्वक
करमा पाहिये।
स्पर गमनागमन किपाका वात्मा असत्यात प्रदेश प्रमाणपके छिपे विशेष विचार
प्रश्न:-परमाणुके एक प्रदेशात्मक और वाकाशके धनत प्रदेशामक मामनेमें गोहेत है, वह
व नामाके असंख्यात प्रदेश पापा न ता पोंकि मध्यम परिणामी वस्तु
पनुपम देखने में महा माती।
६५६
चमूत्वको क्या प्याया।
जनतालको स्पा म्यास्या है!
मात्रका गाहक-धर्मल किस प्रकार है।
मामूर्तका बं पदि मान मही होता तो श बनादिसे कैसे हो सकता है। प्रस्तुस्लमान इस
कोष मादि मार गांवमें परिणामोरूपसे पा मिनिहासे ।
यदि उन परिणामीरूपसे करें तो ने सामाणिक धर्म हो योप, वौर स्वामाविक धर्मका दूर होना
मी मनुमबमें वाता महो।
यदि तले निरिस्मसे समझे तो मिस प्रकारसे गिनमगमान्ने साक्षात् पर कहा है, उस
प मान बिरोष वाना समय है।
६५७
मिनमगवान् के अनुसार सम्दान, और वेदान्तले ननुसार इन दोनोंमें क्या भेद है।
भीमद् पसन [११0 १५८, १९ (२) बिनके अनुसार- वात्मा सम्मान प्रदेश, संकोच-विकासको भाप्रन, परमी, मोकप्रमाण प्रदेशामक है। ६५८ मिन- मम्पम परिमाण नित्पता, कोष वारिका पारिवामिक मात्र पे बात्मा स तद पटते हैं। फर्म संवत मामा है। पुर। या दोनों है। अपना इससे मौ को मिल प्रकार है। मुठिम बारमा पन-मन किस तय है। इम्पको गुणसे मिमता किस तय है। समस्त गुण मिसकर एक सम्म होता है, या उसके बिना इम्पच दुसरा विशेष स्वस्म है। सर्व प्रम्पके वस्तुत्व गुप्पको निकाल कर विचार करें तो पाएको पा किसी दूसरी तय! बामा गुमी है, कान गुम है, या करनेसे मामाका कर्पषित् बान-विपना ठीक है या नहीं। परि बामामें शाम-हितपना स्वीकार करें तो पाहो बायगी । उसमें परि चारित्र वीर्य बादि गुण माने तो उसकी बानसे मिमता होनेसे वा माहोगपगी, उसका समाधान किस पर करना चाहिये। बमम्मान पारिणामिक मा में किस तर पा सकता है! पर्मास्तिकाप, बमर्मास्तिकाप, माकाश और गोरको द्रम्प-रिसे देखें वो एकमत पामहा! इम्पल क्या। घमस्तिकाय, मधर्मास्तिकाप और मानका विशष सम किस तप प्रतिपादित हो सकता है! मेक सम्म प्रदेशी है, और प समा रस्सातों रे,स्पादिविरोषका किस तरा समाधान हो सकता है। पामा पारिणामिकता किस तरहै। मुचि मी सत्र पापोका बान सि क्या होता है। बनादि-बनतका शान किस तय हो सकता है। ६५९ मार- एक मामा मनारि मापा मप-मोधका प्रतिपादन, पामो तुम करते ऐकामही पठ समा। बामर और पैन्पो पापिलदेमगीने यो विरोष पाउसप क्या समाधान है। उसा पपापम्प समाचाम मातमें देखने में नही माण। मामा भाना माने बिना बंद-मोश ही नहीं सकप और पोतो कप ऐसा होनेपर मी रसे पश्चित करनेसे उपस बादि कार्य करने बोम्प नहीं यरवा ।
मात्मासिदि ५८५ ६६० प्री नपिपाद, वासोन वदी १ गुरु १९५२ श्रीआत्मसिद्धिशास्त्र मीसनुरुपरणाय नमः ने स्वरूप समम्पा पिना, पाम्पी दुल अनव । सममाम्पु वे पद मई, भीसद्गुरु भगव ॥१॥ मिस नामस्वरूमके समझे बिना, भूतकाम्में मैंने बनत ह स मोगे, उस सरूमको मिसने समझाया-वर्षात् भविष्यकाठमें उत्पम होगे योग्य निन भनत (मोको मैं मान करता, उसका बिसने मूग ही नष्ट कर दिया ऐसे श्रीसहरु भगवान्को मैं नमस्कार करता हूँ। पर्चमान मा काठमा, मोक्षमार्ग पर सीप । रिचारपा पास्मार्षिने, मासपो मन अगोप्प ॥२॥ इस पर्तमानकालमें मोश-मार्गका बात हो ोप हो गया है। उस मोक्षके मार्गको, मारमापी पीक विचारक लिये, हम यहाँ गुम्-धिप्यके समाइरूपमें स्पएरूपसे कहते हैं। कोई क्रियामर पा रसा, गुप्फहानमा कोइ । माने मारग मोशनो, करुणा उपने गोद ॥३॥ कोई तो क्रिया मगे हुए हैं, वौर कोई शुफबानमें लगे हुए है, और इसी तप से मोक्ष मार्गको भी मान ये-उने देसकर दया जाता है। पाम फ्रियामा रापता, बंतर्मेद न कांद। ज्ञानमार्ग निपेपर्वावह क्रियामर आदि।॥ ४ ॥ चो मात्र पास क्रिया हो रपे पो है, बिमके भवरमें कोई मी भेद उत्पम नहीं हुआ, और यो शान-मार्गका निषेध किया करते है, उमें यहाँ किसाबा कहा है। पंप मोस , कल्पना, माल पाणीमादि। पर्च मोहापेपमा शुष्करानी है माहि॥५॥ जय वीर मोल केस कम्पना मात्र स निधय बायको जो केवस ग्रमीसे ही माछा करता, और पाहप दशा विसकी हाई नहीं और गो मोहके प्रभाव में ही पता है, उसे पहा अपमानी का। •मीमद् रामाने भात्मखिति पप-मद रफ्ना भी भाप की भषा भारि मुम, पप मम पनि विकीपर निम प पिरित वारे श्रीमाप भने भीमा मादि मुगुणकार। तच मम्म वि पारने कमो योष नुतपत्र । भारमादि इन पॉप साबित पिरेचन मई मद्यपानने मिा। भीम ती मा पुर। वन किती किती पा से विस्तृत विवेचन रिगसर्व मीमाता पिता मानिने परिप परमपस मिलाबा-मनुवार - A भीमदारपत्र पैराम्पादि सफल वी, मो सा मावमान । वैमन मावमामनी, मातिवां निदान ॥ ६॥ पैरम्प त्पाग वादि, पदि साप बारम्बान होवो होस, वर्षात् दोहोरे मोठको प्राप्तिके हेतु। वौर नहाँ माम्बाम म हो यहाँ मौ यदि उने महममानके लिये किया जाता हो तो मी देमामपानकी मासिके कारण है || बैरम्प, त्याग, दया भावि गो तरंगकी क्रिया है, ठमको साप यदि बारमशान हो तो सत् तो हो भनके मूगका नाश करती है । वपमा राम्प, स्पाग, दया भावि माहमालको प्राप्ति के कारण है। वर्षात् पौनमें प्रथम इन गुणोंके गानेसे उसमें सद्गुरुका उपदेश प्रवेश करता है । उमा वंतकरणके बिना सशस्त्र उपवेश प्रवेश नहीं करता । इस कारण या कहा है कि राम्प वादि वात्मानको प्रतिके साधम है। पही, नो गोल किपा-या, नरें ऐसा उपयंत्र किया है कि के पास रोकना ही कुछ मात्मशानकी प्रातिय कारण नहीं । यति सम्म बादि गुण मा.मान प्राप्तिके खरे, सरिये तुम उन दियायोंका भगाइन पोमणे परम्त उन क्रियामोंमें ही ठग राना पोय महोपोनिमाम जानके बिना में किपायें भी संसारके मूलका ऐदन नही कर सकती । इसखिये मामानकी प्रासिक लिये उन पैराम्प बादि गुणोंमें प्राति करो, और क्रायक्लेशमें—मिसमें रूपाय वारिका तपारस कुछ मी सौणवा नही—म मोप-मार्ग रामह म रक्सोपा उपदेश किया-चाको Pपा है। सपा बो पुकमानी माग सम्म कादिरहित-केजचनमानी तो उन्हें ऐसा क गपाल रम्य बादि गो साबन है बामझाम प्रापिके कारण बरूर बताये , परन्तु कारणले बिना कार्प उत्पति होती मही और तुमने नब रम्प बाशिको भी नहीं प्राप्त किया वो फिर बाम बाम म कास प्रत कर सकते हो। ठसका मय वाहमा चार तो करो। ससार प्रति बार उदासीनता, देहको पूर्णको बापता, मोगमें बनासहि, तपा माम मादिका पता इत्पावि गुपो बिना व भामहान फल्मम्त होता ही नहीं, और मामबान प्रान करने नेपर तो गुण मर्पत स हो जाते पोलिसमें बाममानस्म बो महीमा मस हो गया है। वपा उसके पासे तो तुम ऐसा मान ये हो कि हमें पावान है। परन्तु पारमा तो मोग बादि कामनाको बनि नगर पूमा सार भाविको कामना बारबार करित होती है, पोपासी बसातासे हो बहुत वापुरता म्पाकुलता ऐ गाती है ।हिर पर क्यों लममें नासा नही कि ये बामशानके असम महो। में केस मान मादिको कामनासे हो बनेको नामबानो काममाता'–पा पो तुम समझमें नहीं माल उसे समो) भोर प्रपम तो बाप भादि सपनोंको बारमा उत्पम करो मिससे नामकारका स्मुखता सके। स्पाग पिराग म रिचमा, पाप न लेने शान । मटर स्पाग निरागा, वो मूचे निममान ॥७॥ मिस चित त्यागप बा साधन उत्पन्न न हुए हों उसे शाम नहीं होता और जो पागलेरापी समता पर माममा बाधा महारमारपना मान मूग गाता है- - मास्मसिदि पर्यात् या मानपूर्वक स्पाग-वैराग्य बादि होनेसे, पूना-सत्कार वादिसे परामर पाकर बारमार्पको मूठ गाता है॥ मिसके वंस करणमें स्याग-वैराग्य बादि गुण उत्पम नहीं हुए, ऐसे गौरको बारमशान मही होता। क्योंकि जैसे मछिन बत करणरूप दर्पणमें वास्मोपदेशका प्रतिबिम्म पाना समष मही, उसी पप केवल स्पाग-बैराग्यमें रचा-पचा गकर नोगतार्यता मानता है, या मी अपनी बारमाका मान मूह जाता है। वर्षात् आत्महान न होनेसे उसे वहानका साहपर्य यता है, इस कारण उस स्याग-मेराम्य मानिकच मान तापम करने के लिए, और उस मानके छिये हो, उसकी सर्व स्पम बादिको प्रावि हो जाती है, जिससे ससारका उच्छेद नहीं होता। पर केवल उसीमें उम्त माता अर्थात् पर बाबानको मात नहीं करता । स तय क्रिया-नाको साधन-क्रिया-और उस साधनको पिससे सफलता हो, ऐसे बामामका उपदेश किया है, मौर शुष्कतानाको स्पाग-राग्य मादि सापनका उपदेश करके केवळ पचम-मानमें कारपाण नहीं, ऐसी प्रेरणा की है। ग्यां या मे ने योग्य है, यहाँ समनई वेह। त्पा स्पो ते माचरे, मास्मार्थी मन ए ॥ ८॥ नहाँगों नो योग्य है, यहाँ पो उसे समझे और यहाँ यहाँ उसका वापरण करे, यह बारमायाँ पुरुषका लक्षण है। मिस बगह मो योग्य है मर्यात् यहाँ स्पाग-वैराग्प मादि योग्प हों, यहाँ वो स्पाग-राम्प अादि समानता है, और यहाँ वामान योग्य होगो बारमधान समझता है स तय जो वहाँ योग्य है उसे को समझता है, वीर यहाँ तदनुसार प्रवृति करता है - बाहमापा गौर है। वर्षात् जो कोई मनाया अपना मानापी होता है, या योग्य मार्गको प्राण नहीं करता । अपमा क्रिपामें बिसे इराद हो गया है, अपना एक हानके भमिमानमें दो पिसने शानापना मान लिया है, पर स्पाग- पैगम्प भारि साधनको मयमा भारमानको प्राण मही कर सकता । जो वारमाया होता है, यहाँ नहीं मो गा करना योग्य है, उस सरफो करता है और माँ जहाँ गोमो समसमा पोम्प उस सबको समझता है। मपणा य नहीं जो जो समतना योग्य है, जो उस सरको समता है, और गो गो गो नाचरण करना योग्य है, उस सबका माचरण परताहै--पावामापा कहा भाता है। पहाँ समधना' और 'भाचरण करमा' सामाप है। परन्तु यहाँ दोनोमस मग बाग कामेका पह भी बाप है कि जो गे नहीं समझना योग्य है उस सब समझनेछ और गे गोगा माचरण करना योग्य है उस सरको यहाँ भावरण करनेको मिसको कामना मामी भामाची कहा जाता है। सेरे सहम परणने, स्पागीदई निमपस । पामे है परमार्पन, निमपत्नी से सस ॥९॥ भरने पभको प्रेरकर वो सहगुरके चरणी सेना करता है, ए परमार्पको पाता है, और उसे भासपा होता [1 श्रीमद्रासचम्द बाका'—ाताको क्रिया -चमा राती और माताको सुप्फनानापमा पवा है, उसका क्या कारण होना चाहिये ! सम्प्रधान —चो बपने पक्ष वर्षात् मतको मकर सद्गुरके चरणको सेवा भाता है। म पार्यको प्राप्त करता है, और मिनपदका वर्षात् वाम समायका म्प प्रण करता है। बात मातोंको यो क्रिया-सहता पती , उसका हेतु यही है कि उन्होंने, यो मारमशान और वामानके सापनको नहीं जानता, ऐसे बसका भाभय के रक्या है। इससे पसगुरु ठगों, ह बने बो मात्र किपा-पताके पर्यात् कापडेशके मार्गको मानवा, सीमें ग्गा मेता है, और फुस-धर्मको १ करता है । इस कारण उन्हें सद्गुरुके पोगके मिस्नेको वाला मी महीं होती, वपना सा योग मिलने पर भी उनें पक्षको प बासमा सदुपदेशके स्मुस नहीं होने देती, इसम्मेि क्रिया महत्ता पूर महोती, वौर परमार्थकी प्राप्ति भी नहीं होती। तपा को अपनानी है उसने मी गुस्से परमका सेवन नही किया और फेक्ट नमी मतिको फापनासे दोसदम्पसे पप्पाहमकेप पाहिये। अपना किसी गुमानांके पाससे पैसे व बपप बचनों को सुनकर क्पनेमें शानोफ्ना मान लिया है। बौर शानी मनपानेके पदका नो एक प्रकारका मान 1, उसमें उसे मिठास पत्ती वाई, और यह उसका पक्ष हो हो गया है। पना किसी विशेष कारणसे वासोंमें दपा, दान मौर रिसा, पूमा यो समानता की है, उन वचनोंको, उसत्र परमार्प समो विना हो, आपमें मेकर, नस वपमेको हानी मनपाने के लिये, और पामर पीक तिरस्कार के लिये, प उन पचनों का उपयोग करता है। परन्तु सन पबनों किस असे समझनेसे परमार्थ होता है, या माही पानवा । तपा से दपा दान बादिको शायोंमें निममता कही है, उसी तय ननपूर्णतक का मेनेपर मी लिफाप गये-स तद बानो मी निमम्ता कहा-औरगावो गुफ-मानका निपेष है। ऐसा होनेपर मी उसे उसका क्ष होता नहीं। पोंकि पप पपनेजानी मानता सक्रिमे उसकी नामा म्वतको प्राप्त ऐ गई, इस कारण उसे विचारका बकाश ही मही या । सवय क्रिया पर वपना एकनानी दोनों ही मूसे हुए है और ये परमार्थ पामेली इस रखते है। बता दे पते है कि हमने परमार्प पा लिया है। पा र उनका तुरामा ।—पा प्रत्यक्ष माझ्म होता है। पदि सद्गुरके चरणका सेवन किया होता तो ऐसे दुराम पर पानेका समप न माता, गोर बाम-साधनमें प्रेरित होवा पारूप साधनसे फ्माको प्राधि हरता, और नियपरके भो प्ररण कप्ता बर्षात् उसकी चि माहमारे एमुख हो जाती । वया बगर बगह एकाकाहापसे विचरने का जो निषेध है, और सद्गुरको हो सेनामें परनेका गो उपदेश दिया है, इससे मी पहा पमझमें बाता मी गातको हितकार्य वीर मुस्स मार्ग है। सपा बसगुस्से भी पम्पाण होता है, ऐसा माना तो तीपंकर बादिकी-जामौकी-वासना करनेके ही समान है। क्योकि फिर तो उनमें और बसहरमें कोई मा भेद नहीं या-नीर तो मम्माघमें और भात घर निर्मठ बसपा में पुल पूनाधिकता होमय। तया मीरगमको चौभगी प्राण करके कई पेमा परे फि बम या पार रिसा हवा भी पार हो गाता है तो प्रवचन मा तो पापान ' मन ही है। क्योंक पर तो मममें मग पा पाठ ही नहीं और जो पाठ है मास्मसिदि - H म तय विसका शम्दार्य इस प्रकार के । उसका विशेपार्थ टीकाकारने इस तय किया है । उसमें किसी भी जगह यह नहीं कहा कि वमम्पका पार किया हुवा पार होता है, और किसी टयामें किसीने मो यह बचन सिता है, पर उसकी समाप्तको मसपार्यता ही माश्म होती है। काचित् कोई इसका यह मर्य करे कि 'बो अमम्प करता है यह यपार्य नहीं ऐसा मासिव होमेके कारण यपार्यक्ष होनेसे जीव सस-विचारको प्राम कर पार हो जाता है, तो पर किसी तप सभव है । परम्तु उससे यह नहीं कहा जा सकता कि । वमम्पका पार किया हमा पार हो जाता है। पर विचारकर बिस मार्गसे मनत गौच पार हुए हैं, पार हाते हैं और पार होंगे, उस मार्गका पागाइन करना, और सफन्पित मर्यका मान भारिकी रक्षा कर स्याग करना ही भेयस्कर है। पदि तुम ऐसा करो कि सीव अमम्पसे पार होता है, तो इससे तो अपप निश्पप होता है कि सद्गुर पर करता है, इसमें कुछ मी सन्देह नहीं। वया कशाप्पा-केबसीको, मिन्होंने पूर्व में फिससे धर्म नहीं मुना, किसी तपानप वावरणके रूप होनेसे धान उत्पम मा है, ऐसा मो शासमें निरूपण किया है, यह धारमाके माहाम्यको बता- मेके लिये, और मिसे सद्गुरका पोग महो उसे नाप्रत करने के लिये और उस उस मकान मार्गका निनाण करमेके लिये ही प्रर्शित किया है। उसे कुछ सद्गुरको मापासे प्रति करने के मार्गको उपेक्षित करने के लिये प्रदर्शित नहीं किपा । तया पहाँ तो उन्हें उस मार्गक उपर टि बनेके लिये ही उसे अधिक मजबूत किया है। किन्तु वयोप्या फेवली नर्यात् पशोप्पा केपटीक इस प्रसगको सुनकर किसीसे नो शापत मार्ग पहा नाता है, उसका निषेध परनेका यहाँ नाशप मरी, ऐसा समझना चाहिये। किसी तीन पास्माको कदापित ऐसे सहरुका योग न मिठा , मोर उसे मानी ती मामना सामना निम-रिपारमें पा गानेसे, अपना तीन बारमार्यके कारण निम-रिचारमें पर भानेसे नामान हो गया हो सो सगुरुके मार्गको उपचा न कर, और 'मुझे सहरसे बान नही मिया, इसलिये में बना है, ' ऐसा मात्र म रस, विचारवान गौत्रफो जिससे शासन मोक्षमार्गका छोरन 0 ऐसे बचन प्रकाशित करन पाहिये । एक गाँसे मर गाँवमें जाना दो बार निसने उस गौरका मार्ग मोठा हो, पम् सिमी पत्राम बरस पुरएको मी-पपरि सापों गोर ग बापा रो-उस मार्गको पहर मही पाती। रिसासे पूछनेपर ही उसे उस मार्गको गदर पाता है, नही तो पर मूठ मा गाता है। भार पनि उम मार्गध जाननेवाला कोई दस बरसा पाठक भी उसे उम मार्गको Pमा दे ता उमस पद पर स्थानपर --पद बात साफिक म्पसारमें भी प्रया है। इसठिये गा मामापा हा नपा निमें भारमार्पये इडा हा उमे मरके पागमे पार हानेक मनियारी और निमम एप्पा राम मार्ग काला योग्य मा क्योंकि उसमे सहाना पुरुषों की मात्रा यार करने जमा होगा। पारा -'म सहरम्प योग तो भनेक पार (मा, रि मी नीरस कम्पा मरा H 1. पार सम्है-- थीम पसवान एमा। इससे सहरके उपदेश की ऐसी कोई विशेषता दिसई महा देवा। सन उपर इसेरे पदम पाई। उत्तर:-को मपने पसको त्यागकर सके परणी सेवा करता है, परमार्य प्राप्त करा बर्षात् पूर्वमें मगुरुके योग हानेको तो गाव सप है, परन्तु यहाँ नापने उस सद्गुरको माला नहीं, उसै परिचाना मी, उसी प्रवति ही नए की, और उसके पास अपना मान मोर मत मेगा ही ना, और इस कारण उसे सद्गुरका उपस भगा ना, और परमार्थको प्राप्ति महा। बार इस तय पनि सपने मत बर्षात् समय और धर्म वाय दूर कर सदुपयोग के प्राण करनेका भिमपीएमा होता तो क्याय ही परमार्पको पा माता । बारा-पहाँ बसहस्से परापे हुए दोपसे अपना माम पारिको तार कामनाने या मा बाधक हो सकती है कि कितने ही मानोंका पूर्नमें कम्पाण मा है, और उ मासे चरणय सेवा किये बिना ही कमाणको माठि हो गई है। पपना वसागुम्से मी काम्याणको प्रति पोतावसद्गुरको मोदी स्वर्य मार्ग प्रवीति न ऐ, परन्तु पा सरेको उसे प्रश्न कर सकता है। वर्षात् दूसरा कोई सब्ध उपदेश सुनकर उस मर्गकी प्रवीति करे, व परमार्यको पा सपना । सकिए सद्गुरक परणको सेवा किये बिना मी परमार्थ माति हो सकता है। उत्तर ~ पबपि कोई गार सम विचार करते हुए मोषको प्राप्त हुए है ऐसा शाबमें प्रसंग वावा है परन्तु कही ऐसा प्रसंग मी माता कि अमुक मीचने वानरसे बोष प्राप्त किया है। पर, किसीने स्वयं विचार करते हुए मोच मत किया है ऐसा को कहा है, उसमें पाक करने पर बभिप्राय म कि सद्गुरको मासे पानसे गीला कस्पाण पेवा है, ऐसा हमने यो काम बात पदार्प नहीं ' वपना सहस्की माय मोबको कोई भी कारण नहो, यह करने के लिये भी पैसा नहीं कहा । तपा मानने वो विचारसे सर्प हो बोष प्राप्त किया है, ऐसा गोषण, सो उगाने मी पबपि वर्तमान में पने विचारसे अपना बोबसे Or मास किया है, परत पूर्वमें या चार पपना मोच सामने से उनके प्रमुख किया है, और उसीसे वर्तमानमें उसव स्फुरित होमा समम है । तपा पाकर बारिको नो सर्पर का, सो उन्होंने मी पूर्णम तीसरे मा सगुम्से मिथप समकित प्राय लिया है, ऐसा बताया है। वर्षात् गो सपना कहा पर्तमान दो बचासे को कहा है, इस सद्गुरुके पदका निषेध करनेके लिपे उसे महा महा। मोर परि गम्पदा विषेष तो फिर वो सदेव परवीर सधर्मको प्रतिति बिना समकित न होता' प्रयो पतपास कपनमात्र मा। सपा विस साताको तुम प्रमाण करते हो, अशाच सनर विनमगवान्का पना हुना है इस कारण उसे प्रामाणिक मानना चाहिये । सपना का किसी असाच मामास कारण उसे प्रामाणिक मालमा पारिपे ! पनि बसगुस्से शाडोको मौ प्रामाणिक माननेमें बाधा न तो शिर मात्र और पा-पके सेवन करनेसे मी मोझ हो सकता है, पर करनेमें माई बापा नर-पकिराया पारमसिदि ।प्पा पार " वाचारंगसूत्रमें कहा प्रपम भूतकंघ, प्रथम अध्ययन के प्रथम ठरेशफा पा प्रथम पास्य है- पौष पूर्विस भापा है, पश्चिमसे वाया है, उचरसे पाया है, दक्षिणसे मापा है, उसे बाया है, या मभिसे वाया है, अपना किसी दूसरी ही विधासे पाया है। वो पा नहीं जानता पर मिप्याशि बो बानवा है । सम्पति। इसके बाननेके निम्म तीन कारण है (१) सापकरका उपदेश, (२) मद्गुका उपदेश, पौर (१) मातिस्मरण पान । याँ नो गातिस्मरण शान कहा है प मी पूर्णक उपदेशके संयोगसे ही कहा है, वर्षात् पूर्वम उसे बोष होने सद्गुरुको बसंभावना मानना पोम्प नई । तपा मगह जगह बिनागममें ऐसा कहा है गुरुणी दाणू पच-गुरुध मानानुसार चकना चाहिये । एस्की भावानुसार चम्नेसे वर्मत जीव सिदए गये है, सिर होते है और सिप होंगे । तया किसी गाने गा मपने विचारसे योग प्राप्त किया है, उसमें भी प्रायः पूर्वमें सद्गुरुका उपदेश ही कारण होता है। परन्तु कदाचित् महाँ बस्य न हो हो भी उस सद्गुरुका निस्प बमिकापी यते हए, सविचारमें प्रेरित होते हए हो, उसने सविचारसे बारमशान प्रात किया है, ऐसा करना चाहिये । अपना उसे किसी सदगुरुको उपेक्षा माँ है, भौर नहाँ सद्गुरुकी उपेक्षा यती है, हाँ मान होना समय है, और यहाँ सद्गुरुके प्रति मान हो वहाँ कल्याण एमा रहा है, वर्षात् उसे सधिमारके प्रेरित उस तबका माम बामगुणका क्माप घातक है । बाहुबहिनी भनेक गुण विद्यमान ऐसे ए मी 'अपमेसे मेटे मान भाईयोको वंदन करमेमें अपनी पुता होगी, इसलिये यही भ्यानमें स्थित हो माना है। ऐसा सोचकर एक वर्षतक निहाररूपसे मनेक गुणसमुदायसे वे प्पानमें भर स्थित ये, तो मी उमें भामहान महावा । बाकी इस हरेक प्रकारको योग्यता होने पर भी एकस मानके दो कारण राम का इजा था। जिस समय पासपमा बसे प्रेरित सामी और सुंदरी सति- पौने उन्हें उस दोपको निवेदन किया और तमें उस दोपका मान एमा, तथा ठस दोपकी उपेक्षा कर उन्होंने उसको बसारता समन्त्री, उसी समय उन केम्मान गया। समान हो यहाँ चार पर- पाती कर्माका मूड हो या पा। तमा बार बार महीनेतक नियहारस्मसे, एक असे, एक मासनसे, बहमविचारमें हमेशा ऐसे पुरुपको इतनेसे मानने उस तपकी बाण महीने की दशाको सम्म म होने दिपा, भर्षात् स दासे मी मान समझ म बाया और ना सगुरु यौउपभोगने सूचना की कि मान , तो या मान एक मुहूर्तमें होना हो गया | या मी सरकारी माहाम्य मताया। तथा सम्पूर्ण मार्ग हानीकी ही वासाने समाविर बाता है, ऐसा वारंवार का है। माचाएंग सूत्रमें कहा कि । सुधर्मस्वामी सम्पूस्वामीको उपदेश करते है कि समस्त जगत् का निसने दर्शन किया है, ऐसे महावीरमगवान्ने हमें इस तण या है। गुम्के वाधीन होकर पम्नेले ऐसे वनात पुरुष मार्ग पाकर मोक्ष पछे गये। उत्तप्पयन, सूपगग मात्र में जगह अगर यही का। करनेका वामगुण कहा है। H 4- ..
मीमद् रामचन्द्र सम्पगम मिझनेपर भी, उसमें पोष मिनभगवाम्के बचोकी बपेक्षा मी मान् उपपर स्पाय मा'स बातको मही समसता, तबतक उसे भारम-विचार उत्पम नही होता । सनुस्ना उपोषण, सपनाय न मिनस्म । समस्यापम सपकार पो! समरपे मिनसाप ॥ १२ ॥ सास्के उपदेशके विना लिनका सस समसमें मही बाता, और उस स्वस्मके समर्म माने विमा उपस मी क्या हो सकता है। पदि बाल सारुके उपदेण्से मिनका स्वस्म समय बाप तो समानेपाली बाल्मा मतमें विनोदशाको प्रात करे ।। सास्ना उपदेशपा, सममे बिनस्म । तो पामे नियदा, किम मात्मस्वरूप । पाम्या प्रवासमारने, चिन तेपी पूम्प । समबो मिनस्वमाल तो, भाममायनो गुम्प ॥ सास्के उपदेशसे जो बिनका स्वरूप समझ जाता है, या अपने स्वरूपी दशाको प्राप्त कर प्रेता है, क्योंकि पुर बामभाव ही मिनका स्वरूप है। वप रा रेप और महान यो जिममगा- न्में मही हो र बामपद, बौर पर पद तो सत्तासे सब गानोंको मौन है। समुस्-गिनके पानसे बौर निममगवान्के तरूपके कपनसे मुमुसु भातको समसमें वादा है। भास्मादि मस्विस्वनी, म निस्सा पास। मस्पाम सम्योग मही, स्पा मापार सुपात्र ॥१३॥ मो बिनागम मादि भारमाके अस्तित्व के तपा परलोक नाविक पस्तित्पर उपदेश करनेवाले शामी यो प्रश्पत साम्य योग न हो ही सपात्र बारको नापाररूम है, परन्तु उमरे सहरके समान भाति दूर करमेवामा महीमा बा सकता । मपवा सहरुए मा, में मवगाहम काम । ते निस्प विचारपा, रीमावर स्पाम ॥ १० ॥ अपना परि समुन्ने ठन शाखा विचारने नवा दी हो तो उन शाखौंको मतर बात मुन्धर तर्पण करने के बाद भान्तिको गोकर, क बात्मा किये है निम पिचा- रना चाहिये। रोके जाप सनदी, पामे भवाय मोम। पाम्या एम बनत मास्पं निम निर्दोष ॥ १५॥ बीरबमारिकाम्से को पनी चतुरसे और अपनी इससे पम्वा मा या इसपनाम सपरिवारको से वो या गरूर मोहको पा बाप और सतप भूतका में बत पात्राने मोन पापा है-ऐसा राग रे दौर जबानमेसे बिनके एक मी दोप नहीं, ऐसे निदाप बोकमाने कहा।
मात्मसिरि मस्पस सद्गुरुयोगपी, स्मद रोकाय । मन्प सपाय फर्या वकी, प्राये पमणो पाप ॥ १६ ॥ प्रस्पस सहस्के योगसे पा सण रुक जाता है, नहीं तो अपनी इच्छासे इसरे अनेक उपाय करनेपर मी प्राय करके यह गुना ही होता है। समान मत मात्रा वनी, पर्चे सरपक्ष । समकिव वेने मालि, कारण गणी प्रस्पक्ष ॥ १७ ॥ स्वद तपा भपने मतके भाइको छोड़कर नो सहरके म्पसे पम्ना है, उसे समक्तिका पक्ष कारण समसकर गीतरागमे 'समकिस' कहा है। पानादिकपा मा, निमदे न मराय । नावा सरधरणा, मस प्रयासे नाप ॥ १८ ॥ मान और पूजा-सत्कार मादिका छोम झ्यादि वो महाशत्रु है, वे अपनी चतुराईसे पम्नेसे माण नहीं रोते, वौर सास्को पारणमें जानेसे वे योवेसे प्रयत्नसे ही नाश हो जाते हैं। ने सगुस्तपदेपयी, पाम्पो फेमरमान । गुरु रमा पपस्प पण, पिनप करे भगवान ॥ १९ ॥ बिस सनुस्के उपदेशसे मिसने केवणानको प्राप्त किया ऐ, और पा सनुस नमी रामस्प ही रो; तो मी मिसने विमान पा लिया है, ऐसे केवगै भगवान् मी वपने छपस्य सहरका पा- इप करते हैं। पो मार्ग रिनप तणो, माम्यो भीवीवराग । मूग हेतु ए मार्गनो, समझे कोई मुमाग्प ॥ २० ॥ इस तरह मोमिनमगवान्ने निनपके मार्गका उपदेश दिया है। इस मार्गका मो मूग हेतु है- पर्पत् उससे वारमाका क्या उपकार होता है-उसे कोई हो माम्पशाली वर्षात् पुम्भ-मोमी भयमा मापनकी समझ पाता है। मसानुर ए बिनपनी, गम लोगो कोइ । महामीहिनी कर्मवी, रे भषमा माहि ॥ २१ ॥ पर दो दिनपमार्ग का है, उसे शिप्प मादिसे करानेको इन्गसे, जो कोई भी असर अपने समर स्पापना करता है, महामोहनाप कर्मका उपार्जन कर मक्समुदमें बना है। पोय समय भीर, समने पर विचार । रोय मवाी भीष, अपनो से निर्धार ॥ २२॥ यो मोझापा गार होता है तो इस फिनप-मार्ग बारिक विचारको समझ मेता है, जिसनो अपा शेताप उसका उटाहो निधय करता है।मात् या तो पासर्प उस दिनयको किसी शिष्य पारिसे करता है, अपना बसहममें सद्गुरी भांति रस स्वप इस विनप-मार्गका उपयोग करता है।
भीमामचन्द्र मात्मशान समदर्शिवा, विचरे सइयमपोग। अपूर्ण पाणी परमभुव सतुमसमग पोग्प ॥१॥ यामशानमें निमको स्पिति है, पर्याद परमाषको इससे गो रहित होगये है, तया शत्रु, मित्र, हर्ष, शोक, नमस्कार, रिस्कर वादि मारके प्रति दिन समता यती है। पूर्वम उत्पल ए कर्मक उदयके कारण हो रिनको विचरण मावि किया है, जिनकी वाणी महानीसे प्रत्यक्ष पिम । और यो फ्दर्शन के तात्पर्पको मानते हैं- उत्तम सद्गुरु ॥ स्वरूपस्फ्ति इमारत विचरे पूर्णप्रयोग। वपूर्ण पाणी परमभुत गुरुक्षण योग्य ॥ पारमस्वरूपमें बिसको स्थिति है, विपप गौर मान पूणा वादिकी इससे बोशित ६ और केक पूर्वमें तत्पर हए कर्मके उदयसे हो नो विचरता है, अपूर्ण सिको बानी -त् विसका उपदेश निन बनुमवसमित होने के कारण बहाना पाणीको अपेक्षा मिम पाता है और परममत वर्षात् पदर्शन पपारूपसे गो गानकर है- योग्य सद्गुरु है। पहाँ रूपस्थित' गो पा प्रपम पदया, उससे शान रक्षा कोपामो प्रमादितफ्ना' करा, उससे चारित्रदशा कहा। जो याशित होता यह किस तरह बिचर सकता है इस वाशकाकी या करकर निधि कोकि प पूर्णप्रयोग अर्थात् पूर्वर बोए प्रारम्भसे विभरता है-विचरण वादिको उसे घमना बाको नहीं है। अपूर्व नाणी' करनेसे पचनातिशपता मोर, स्पोकि उसके बिना मुमुसुका उपयर नहीं होता । परमभुत ' करनेसे उसे पट्यानिके वपिमा दणका मानकर कहा है इससे मुबानको विशेषता रिसाई है। बार्शका वर्तमानकर स्वरमस्पिट पुरुष मही होता इसलिये वो सरूपस्थित विशेषणमुख सार कराणमाका रोना समव मही। समाधान:-बर्तमानका में काचित् ऐसा ना दो ता उसका मर्प यह हो सकता है कि फेल-मूपिका के सबमें ऐसी स्पिति बर्समय है, परन्तु उससे ऐसा नहीं माना सकता कि भाम पाम ही नई रोवा और दो माहबान है की सरूपस्थिति है। बासचा-वामान हो तो पर्तमान सम्में भी मुजि होनी चाहिपे, गौर मिनागममें तो इसका निपेष किया है। समाधान-स बचनको वापित् एकातसे सो तय मान मौतो मी उससे एकागवारी- पने निषेप भी रोता वार एकापतापपना मामानके बिना प्राप्त होता नही। बारा-पाग-रम्प बाशिको पतासे हो उरुष एकामतारपना का होगा। समाधान -परमापसे उत्तर त्यागमयके बिना एचपापना होता ही मी पासित और वर्तमान में मौ चोपे पांचवें और जो गुणस्पानका ग मी निपेम ही बार चौपे गुपस्पामसे मावान संभव है । पाँचमें विशेष सम्मत्पिति होती मात मासे सरूपस्थिति होती .
भास्मसिदि ,ओं पूर्वप्रेरित प्रमादके उदयसे इस योगासी । प्रमाद-दशा बा गाती है, परन्तु पर बारमग्रामको रोपक मही, पारित्रको रोधक है। भाधका - यहाँ वो 'सस्मास्थित पदका प्रयोग किया है, धौर सहमस्पिति तो तेयों गुण- स्पान । समपा - समाधान समाधान - सहपस्थितिकी पराकामा तो चौदह गुणस्पानके पातमें होती है, क्योंकि नाम गोल बारि चार कर्माका पर्चा नाश हो जाता है। परन्तु उसके पहिये केवडीके चार फौका संग यता है, इस कारण सम्पूर्ण स्वरूपस्पिति तेरहवें गुपस्थानमें भी कही जाती है। वाशका -यहाँ नाम नादि कोके कारण वयावाच स्वरूपस्थितिका निपेष करें तो यह ठीक है। पन्त सहमस्पिति तो केवमानहम है, इस कारण यहाँ सस्पस्थिति करनेमें दोप नहीं , और यहाँ वो पौ मही, इसलिये पाँवरमस्पिति कैसे की जा सकती है। केवमानमें स्वरूपस्थितिका विशेष तारतम्प है और चौथे, पाँच, छो गुण- स्पानमें पर उससे बल्प है-ऐसा कहा जाता है, परस्त पो सरूपस्थिति ही नहीं ऐसा मौका जा सकता । चौपे गुणस्थानमें मिम्यालरहित दशा होनेसे बामस्वभावका वाविर्मा मौर स्वरूप स्थिति है। पाँच गुणस्पानको एकदेशसे चारित्र वातक कपार्योंके निरोष हो पानेसे, पीयेको अपेक्षा बामसमावका विशेष निर्माण और ममें कपार्योंके विशेष निरोप होनेसे सर्व चारित्रका उदय है, उससे पहा मारमस्वमायका मौर मी विशेष पामिर्माद है वतनी ही बात है कि छो गुणस्पानमें पूर्व नियमित कर्मके उदयसे पावित् प्रमत्त दशा पता है, इस कारण वहाँ ' प्रमत्त सर्वचरित्र' का माता है। परन्तु उसका सम्पस्थिति से विरोध महीं है, क्योंकि बा मारमस्वभावका माहुरूपतासे पानिर्भाव है। तथा वागम भी ऐसा करता है कि पीये गुणस्पानकसे वेगमें गुणस्थानतक वामप्रतीति समान 1- केवल शामके तारतम्पका ही मे। यदि पौये गुणस्पानमें जरासे मी सहसस्पिति म हो तो फिर मिप्यात नाश होनेका फस होस्पा एमावर्यात कुछ भी नहीं लामो मिप्याच नए हो गया नहीबामसमासका वाविर्भाव है, और यहाँ सहमस्पिति है। यदि सम्पमवसे उस स्म सत्पस्थिति म होती, तो श्रेणिक आदिको एकारतापना कैसे पास होता है या एक मी तु-परमाणतक मी मही था, और महाँ भव तो कम एक ही बादा-ऐसा जो बाप ससाफ्ना मा यही सहरम्पितिवप समकितका बढ़पाँचवें और को गुणस्पानमें चरित्रका विशेष बसो, पौर मुस्पतासे उपशफ-गणपान को जा वीर तेदना हैं। बाकी के गुणस्पात उपशकको प्रति कर सकमे योग्य नहीं है। वर्षात् तेरहवें भौर को गुणस्पानमें हो पा सरूप यता। मस्पक्ष सद्गुर सम नहीं, परोक्ष मिन उपकार । एको सक्ष पपा पिना, ग न आत्मरिचार ॥ ११ अबतक पीसको पूर्वकागन गिनतीर्थकरीको पापपर हो सक्ष या करता है, मार पर उसके 1 उपकारको गाया करता है, और जिससे प्रत्यक्ष वाम-मतिका समापन हो सके, ऐसे साधा ।
[. भीमद् रामचन्द्र समागम मिमनेपर मौ, 'उसमें परोक्ष बिममगवान्के वचनोंको बसा मी महान् उपकार स्पा हमारे,' इस बातको नहीं समाता, तबतक उसे बारम-विचार उत्पम महाँ होता । सलुम्मा पपोषण, सममाय न मिनस्म । समग्याषण उपकार पी? समम्ये मिनसप ॥ १२॥ सद्गुके उपदेशके बिना विनय स्मास समझमें नहीं पाता, और उस स्वरूपके समक्ष माये विमा उपकार मी क्या हो सकता है। परि गौच समुसके उपदेशसे मिनका स्वरूप समझ गाय तो समझनेपालीमात्मा स्तम बिना दयाको ही प्राप्त करे ॥ साम्ना उपदेशपी, समये गिननु रूप । तो ते पामे निमदणा, बिम के मामस्वरूम । पाम्पा पुदसमावने, चिन तेपी पूम्म । स्मनो गिनस्लमाव तो, बाममानमो गुम्प n मनुस्के उपदेशसे दो निमका स्वरूप समाई गाता है, पर वपने स्वस्मकी दक्षाको प्राप्त कर देता है, स्पोंकि पुर नाममात्र हो मिनका स्वस्म है। वर्षमा प्रग रेप वीर बाम गो बिनमगणा- नमें नही, ही एक मामफ और यह पर तो सत्तासे सब गांवोंको मौजूद है । मह सहर-विमके सम्मनसे और बिनमगवान्के स्वस्मो कपनसे मुमुसु मात्रको समझने वाला है। भास्मादि मस्विस्वमा मह निस्सा पास। मस्पात सहपयोग नहीं, स्पा मापार पाच ॥ १६ ॥ यो मिनागम बादि वाहमाके बस्तित्व तथा परकोक बारिक बस्तिलके उपदेश करनेपरे घाबर मी गाँ प्रत्यक्ष सम्पन्न पोग न हो पा पात्र गातको भावरूप है, परन्तु में साम्के समान प्रति पूर करनेपाहा नही पाबा सकता। मपना सरए पा, मे मपगाइन काम । मिस्प पिपारवां री मर्यावर स्पाम ॥ १५ ॥ बफ्ना पदि साम्ने उम साबोंके चारनेको बाबा हो, ये उन शालोको मातर बर्षद कुछ साफ करने हेतु वादि भ्रान्तिको मेरफर म मामाक से 0 निम निधा- रमा चाहिये। रोमीय स्सम दो, पामे माश्य मोस। पाम्पा एम मनव b मास्पं मिन निर्योप ॥ १५ ॥ गोर बनादिकासे गो अपनी पतुसे और अपनी इमसे चम्बा मा पा सत्र नाम लक।पनि पास समरको एक तो ग बहर मोहाको पा माप और इस तरह भूक्कामे बनत बानोंने मोम पापा है-ऐसा राग रेप और मसानोंसे दिमचे एक मी पोप नाही ऐसे पौनेमा।
६५ ] मास्मतिथि - । प्रस्पल सगुरपोगयी, स्वछंद वे रोकाय । अन्य उपाय फर्या यकी, माये पमणो याय ॥ १६ ॥ प्रस्पक्ष सनुस्के योगसे या साचंद सा जाता है। नहीं तो अपनी इच्छासे दूसरे अनेक उपाप करनेपर मी प्राय करके पाहुगुना ही होता है सम्न म आग्रह बनी, पर्चे सहस्सा । समकिन वेने मालिप, फारण गणी प्रत्यक्ष ॥ १७ ॥ सम्म तपा वपने मतके भाप्रहको मेरकर चो सहरके मासे पल्मा है, उसे समकिता प्रपा कारण समझकर बीतपगमे 'समकित' मानादिक ग्रभु महा, निमदे म मराय । जावा सारभरणा, अस्प प्रपासे भाप ॥ १८ ॥ मान बौर पूजा-सकार बादिका मेम स्यादि यो महारानु, अपनी चतुराईसे चलनेसे माम नही होते, और सहरको शरणमें पानेसे रे पोरेसे प्रपनसे ही नाश हो जाते हैं। मे सनुरुउपदेशपी, पाम्यो फेसनमान । यह रमा एपस्य पण, पिनय करे भगवान ॥ १९॥ मिस सगुरुके उपदेशसे बिसने केवमानको प्राप्त किया हो, और यह सहर बमी छपस्थ ॥ हो; वो मी बिसने केवमान पा लिया है, ऐसे फेवटी मगवान् मी अपमे एप्रस्प सारुका पा- . . उत्प करते। एलो मार्ग पिनप राणा, मामयी भीपीवराग | मन त ए मार्गनी, समझे कोई सुमाग्य ॥ २० ॥ इस वय माबिममगवान्ने मिनपके मार्गका उप किया है। इस मार्ग को मन देत है- बर्षात् उससे वामाका क्या उपकार होता है उसे कोई ही माग्यशाली वर्षात् मुसम-गोपी पका भयपक गौर । समझ पाता है। मसद्गुरु ए बिनपनी, साम गरे जो काइ। महामोदिनी कर्मपी, पूरे मपमा मादि । २१ ।। पागो बिनय मार्ग कसा है, उसे शिप्प भादिसे करानेको इप्यासे, जो कोई मी असार भग्नमें सहरको स्थापना करता है, वह महामोहनीप कर्ममा उपार्जन कर मत्रसमुदमें बता है। पप मुसा जीप से, सममे पर रिसर । गेप मनायी जीप है, भरणे निरि ॥ २२ ॥ मोक्षापा गार होता है तो इस पनप-मार्ग बाकि विचारको समध एता, मिनु को मापा होता है उसका उल्टा हो निमय करता है। वर्षात्यात पसर्प उस निपको मिशिल्प माYि पक्ष है, सपा बसहरमें सदगुरफी भांति रग सप इस रिनप-मार्गका उपयोग करता है।
५९१ भीम पवचन्द्र होय मतापी वेहने, पाय न मावसमक्ष । वैर मवापिसाणा, मही का निर्पत ॥ २३ ॥ यो मताथा नीष होता है, उसे भारमशाना स नहीं होता। ऐसे मतापी बोरके पो मापन होकर मरते हैं। मवापीक सलणा- पाम स्याग पण शान नहीं, वे माने एरु सस्प । मपमा निमन्पर्मना, ते मुरुमा म ममस्व ॥ २४॥ जो केश बामसे हो स्पागी दिखाई देता है, परन्तु पिसे वाहम्यान मही, और उपहमसे पिसे बतरंग स्पाग मी नहीं है, ऐसे गुरुको यो सहर मानता है, बपया वपने फुलधर्मका चाहे कैसा मी गुरु हो, उसमें ममल रहता है- मवाया है। मे मिनदेशममाणने, समवसरणादि सिदि। वर्मन सममे मिनस, रोकी रो निमबुद्धि ॥ २५ ॥ बिनभगवान्को देह वारिप नौ वर्णन है, जो उसे मिनका नर्णन सममता और अपने मुम्पर्मक देव है, सम्पेि बईमाषके मिस्त पगसे भो ठमके समक्सरम बारिमारामको । गाया करता है, और उसीमें वफ्नो बुरिको रोके यता अर्थात् परमार्पाकाप ऐसे शिवका को मानने योम्प बतरग सरूप है उसे गो नहीं जामता, तपा उसे गाममेका प्रफम मी मर करा, बौर के समक्सरण आदिम 0 मिनका स्पास बताकर मवाम प्रस्त पता है- मस्पस सनुरुपोगा बचे रष्टि विमुख । मसहुस्न र करे, निममामायें मुख्य ॥ २६ ॥ प्रत्यक्ष सनुरुप कभी योग मि मी तो दुराणा मादिके माध करनेवासी उनकी पाणी मुन- कर, गो उससे उम्टा ही पता है, वर्षात् उस हितका पाणीको मोहण नहीं करता, और यह सम्म सबा स मुमभु है इस मानको मुम्न्यहमसे प्राप्त करने के लिये ही बसर पास जाकर, जो रूप उसके प्रति अपनी विशेष सत्य बताता है-५ मतापा है। देवादि गवि मैगा, में सममे अवमान । मान निम मवरपना, मामा किनिदान ॥२७॥ देख मरफ वा गतिके भग' वादिघा यो सम्म किसी विशेष परमार से कहा उस मे रिसने नही मामा और उस मैगमाघेही नो भुतान सममता, सपा अपने मतका-- पकमाल रसनेको हो मुछिका कारण मानव है- मतापी है। साई सरूप न परिन, अप्रय भमिमान । प्रामही परमार्पन सेगा मौषित पान ॥२८॥ पिन सम्म स्थाउसे मी गेमही मानवा बीर बाप ऐसा अभिमान निम्न पारन कर रहा है। सपा परि कमी परमाकि उपदेशका योग बने मी, तो छोको यो बाना मान और पा सकार भाति १ हपण नायगा बपना मान मारि किर पा से प्राप्त न होग'- पेमा समटकर, जो परमाचे प्रात्र मही करताप मनाया। - मनाया।
4.] स्परेश-छाया मयमा निश्चपनप आहे, मात्र अपनी मांय । सोपे सदम्पपदारने, सापनरहित पाप ॥ २९ ॥ अपना समयसार या योगवासिष्ठ जैसे प्रयोको गाँधकर गो केवल मिश्चयमयको हो प्राण करता है। किस तरह प्राण करता है ! मान कपनरूपसे प्रण करता है। परन्तु निसके तरगमें तपारूप गुणको कुछ मी स्पर्शना नहीं, और बोसहर, सयाम तथा मैराग्य, विवेक वादि सम्पबहारका मेप करता है, तथा अपने भापको हानी मानकर जो सामनरहित भावरम करता है मतायी है। मानदशा पाम्या नहीं, सापनशा न काद। पामे वैनो संग मे, से पुरे मर माहि॥३०॥ पाबीच बान-दशाको नहीं पाता, और इसी तप पम्प मा सापम-दशा भी उसे नही हैं। इस कारण ऐसे जीवका यदि किसी दूसरे चीनको सयोग हो जाय तो यह जीव मी मन-सागर, इस बाता है। ए पण मीय मवायमी निममानादि काम । पामे नही परमार्थने, अनभपिकारिमा ज ॥ ३१ ॥ या नाच मी मतामें ही यता है। स्पोंकि उपर बछ गनुमार भागको बिस वय पुरुधर्म पारिसे मतार्यता यती है, उसी तय से भी अपनेको पानी मनमानेके मानकी इस अपने शुक मका वाणा राता है। इसलिये यह भी परमार्थको मही पाता, बोर इस कारण वह भी अनधिकार वर्षात् जिसमें बान प्रवेश होने योग्य नहीं, ऐसे गायोंमें गिना जाता है। मही पाप उपभोवता, नहीं अर्पिराग्य । सरम्पM न मध्यस्पता, प मनापी दुर्भाग्य ॥ ३२ ॥ जिसकी कोच, माम, माया धीर होमरूप कपाप रश नहीं पा बिसे गाय सत्पन मी मा मिसे मारमा गुण प्राण करनेन्स सरता नही है। सपा सप सपकी तना करनेको निसे पचपावरहित रएि मही है, पर मतापी जीप माम्पहीन है। मपात् जग्म, जरा, मरमका ऐश्न करनेवाले मोक्षमार्गक प्राप्त करने योप उसका माग्प हो मही, पेसा समधना पदिये। सतण का मताना, मवार्प मापा काम । पि कई मास्मानी, भात्य-मर्ष मुरसान ॥ ३३ ॥ इस तर मनापा मारफे सक्षण कहे । उसके कहनेका यही है कि रिसम उम्बानन गोबोध मनापरवा मामाची और सण कहते हैं। मण से है ! हिमापाले बम्पाप मुखको सामागके हेतु। मारमापक ससण- मात्मज्ञान स्पा पनिपण, सापा राम दोप। पाही इन्गुरु कल्पना, मारमायी मी भोप ॥ ३५॥ नहीं जामशान से ही मुनिपना होता है। वर्षात् नहीं मामबार मही बहो मुनिन्य समय ॥
- भीमद् परचम [५६ महा। सर्मवि पासह मोणंति पासा-या समशित भात् बामशान है माँ मुनिमा समझो, ऐसा माभागसूत्रमें कहा है। मर्पात् मारमाया गोल ऐसा समहवा कि जिसमें बामशान होपही सबा गुरु है। और नो मारमझानसे रहित हो ऐसे मरने कुझके गुरुको सहर मानमा-परमार कम्पना है, उससे फुरा संसार नाश नहीं होता। मस्पस सद्गुरुमाप्तिनी, गले परम उपकार । मणे पोग एफलपी, पर्वे मातापार ॥ ३५ ॥ पर प्रत्पन्न सहरुको प्राप्तिका महान् उपकार समझता है; मर्यात् शाल मादिसे गो समाधान मही हो सकता, और जो दोष सहाय माता पारण किये बिना दूर नहीं वे, उनम्र साको योगसे समाधान हो जाता है, और ये दोष दूर हो जाते है। इसलिपे प्रपत्र सनुरुप या मान् उपकार समझता है और उस सहलके प्रति मन पचन बार कापाकी एकतासे बाधापूर्वक पाता है। एक होय पण काठमां, परमारपमा पंथ । मेरे ते परमार्पन, ते म्पबार समंव ।। ३६ ॥ तानों का परमार्पका पंप वर्षात् मोधका मार्ग एक ही होना परिये बौर सिसे प परमार्प सिद्ध हो पा पणार नानको मान्य रखना चाहिये, इसप नही। एम रिपारी मंदरे, घोप सद्गुरुयोग । काम एक मास्माई, बीमो मी मनरोग ॥ ३७॥ इस तर बतर भारत को सामने पोगको शोष करताएक बारमार्यो । रा रहता है। मान पूजा पादि अधि-सिद्विको कुछ मी दा नहीं रखता मनमें दो मही-मात्मापा। कपापनी पाववा, मात्र मास-ममिणप। मर खेद माणी चया, स्पा मास्मा निवास ॥ ३८ ॥ कपाप यहाँ हश पर है, पर एक मो-पके सिप मिसे दूसरे किसी परकी बमिबाण मी संसारपर मिसे परम्प पता है और प्राणीमानके उपर मिसे प्या है-ऐसे पोहमें बात्मार्पन निष्पस होता है। दपा म पपी पासपी, मीप सी नहीं नोम्प । मोसमार्म पामे मी, मटे न भवनुम ॥ २९ ॥ यमक ऐसी योग-दशाको सात मही पाचा, तबतक उसे मोजमार्गकी प्राप्ति नहीं होता, मोर माम अतिकम बनत हसत वर-पेग नहीं मिटता । मारेपो एपी दशा, सहयोप मुदाय । पीपे सपिचारणा, स्पा ममटे मुखदाप ॥ ४ ॥ यहाँ ऐसो रहा ult पहाँ सम्म मोप होमाचे प्राप्त होता है—फौमूत होता है, और उस मोरके पामत ऐसे सम्मायक सविचारण्य प्रगट होती है। पाऐग बिसके मास्मसिदि . . . या मगरे मरिधारणा, त्पा मगटे निममान । मे माने क्षय मोर पई, पामै पर निर्वाण ॥४१॥ नहाँ सुविचार-दसा प्रगट हो, वहीं मामबान उत्पन होता है, और उस पानसे मोहका आप कर बारमा निर्माण-पदको प्राप्त करता है। उपमे ते सपियारणा, मोक्षमार्ग समनाप । गुरुशिप्पसंपादपी, भालुं पट्पद भारि ॥ ४२ ॥ गिससे परिधार-दशा उत्तम हो, और मोश-मार्ग समझमें बा चाय, उस विषयको पहा पद् पदरूपसे गुरु-शिष्पके सबाररूपमें करता है। पदपदनामकयन- मास्मा , निस्प छ, छ कर्वा निमकर्म । ऐ मोक्ता, पळी मोल छ, मोल उपाय सपर्म ॥४३॥ वारमा है', 'या भारमा निस्प है', र बारमा अपने कर्मको कर्ण', 'पा कर्मको मोळा है', 'उससे मोक्ष होती है', वार 'उस मोक्षका उपापम्प सधर्म है। पदस्पानक संसपा पदार्शन पण सा । सममाना परमार्पने, को मानीए पर ॥४४॥ पेमा स्यानक भयमा म पद यहाँ सक्षेपमें को है। भीर विचार करमेसे पदार्शम मी पहा है। परमार्थ समझने के लिये बानी-पुरुपने ये एप पर करे। ११का-शिप्य उबाप- शिम्प मारमाके अस्तित्वाप प्रपम स्थानका के रिपपमें शका करता है नपी टिमा आमता, मपी गणातु रूप । पीमो पण मनुमर नहीं, वेपी न जीपसरूप ॥ १५ ॥ परमिमें नहीं माना, और उसका कोई रस मी माइस मही होता । तया स्पर्श बानि मा अनुभबसे मी उसका हान नहीं पता, इससिपे गौपका निवनप नही १, अर्थात् जीव नही है। मयादा जमातमा, मपमा इन्द्रिय माण । मिप्पा जूदा मानरो, नहीं नई एंपाण ॥१६॥ अपना जो देही यामा, अपना गो इन्दियों में ही मामा अपना भामापवास मामा वर्षात् पे सब एक एक परक देशसत्र में इमठिये भामारो सिम मानना मिप्पा है। क्योकि उसका कोई मौ मिम पिद दिलाई मही दता । सिमापार सपने सम्पादनावरका सम्ली या भान गुममा 01 रन निगम समामा परमानार AAR- मदिरा सानिया र मुन्धर पुलमारी। मास्वसिषा बलोरामो म पा ॥ •रिशिषनरगिलो. - भीमर पवन पसी मो मावमा होप वो, मणाय ते नी म । मणाय मी ते होय वो, पटपट मादि प्रेम ॥४७॥ और पदि मामा हो तो यह माम पों मही होती ! जैसे पट पट मादि पदार्य मौक, और ये माइम होते है, उसी तय परिवारमा हो ये बह पों माइम मही होवो ! माटे ऐ नहीं बावमा, मिथ्या मोमपाप । ए मेवर कावणो, सममापो सदुपाप ॥ १८ ॥ मतरप बामा नबौर मा नहीं, इसध्येि उसके मोक्ष मिस पाप करना भी म्पर्ष है-इस मेयं भवरकी शकाच कुछ म सदुपाय हो तो कृपा करके मुझे समझाइपे-अर्षात् इसका कुछ समाधान हो तो कहिये। समापान-सहरु माप- सपा समाधान करते हैं कि भारमाका पस्तित है:- मास्पो देशप्पासयी, मात्मा दोसमान । पण ते पमे मिम छ, प्रगटसक्षणे मान ॥१९॥ देशाप्पास वर्षात् वनादिकाल वान परण देहका परिचय होता है, इस कारण से भामा देश जैसी बात् वास्मा देह हो मासित होती है। परन्तु बामा और देश रोनों मिम मिस परिक दोनों ही मिम मिम मममपूर्वक प्रगट देसभेमें वाते हैं। मास्पी देरापासपी, मात्मा देसमान । पण है पम मिम, म मसि ने म्यान ॥५०॥ बमारिका के महान परण देहके परिचपसे यह मामा मासिनी, पपा के समान मामा भासित है। परन्तु जिस तब तठमार और म्यान रोमों एक म्यामरूप मास तेरि मी रोनों मिम मिम है, उसी तर मामा और देश दोनों मिम मिम।। प्रश रिएिनी, म भाणे ७ प । मबाप्प अनुमा मेरो, जीवसस्प ॥५१॥ प मामा, विबर्षात् मापसे कैसे दिगई दे सकती है। मोलि उम्टा भामा बासको रेग्नेगरी । मोरपड मुरम बाकि सरपको जानता है। और सबमें मिली न किसी प्रकार या माती है परम् विसमें किसी भी प्रसारको मापा मही पा सकती ऐसा नो भनुमा, होगीता पिदिप मरपान, निम निम पिपपर्नु मान । पोप इन्दिना रिपपर्ने, पण मारमाने मान ॥ ५२ । मा मन्त्रिपम सुमा गगता है उम वर्गशिप गनती है, उसे पशु विप नहीं जानती और जोपो देपा गाताउमेलदिप मही नामती । मटि सब इन्दिपोहा माने जाने Prathat, रमाइपोकीपन और भामाता पारो इसों के मास्मसिरि विषपका ज्ञान होता है वर्षात् जो उन पाँच इन्द्रियोंसे प्राण किये हुए विषयको बानता है, वह भरमा बौर ऐसा को कहा है कि भास्माकं बिना प्रत्येक इन्द्रिय एक एक विषयको प्राण करता है, यह केस उपचारसे ही कहा है। दान भाणं वेहन, माणे न इन्द्रिप माण । मास्मानी सचापर, तर पर नाण ॥ ५३ ॥ नसे न तो देह मानती है, म इन्द्रियाँ बानती है, भौर म पासोवासरूप प्राण उसे मानता है। ये सब एक बारमाकी सतासे ही प्रति करते है, नहीं तो पापही पोरते। ऐसा समय। सर्प असस्थाने पिपे, न्पारो सदा नणाप । मगटस्प पैवन्यमय, ए एपाणे सदाय ॥ ५४ ॥ नामत स्वम और निदा ववस्थामोंमें पनेपर मी मह उन सब भवस्था से भिन्न या करता है, और उन स भवस्थानोंक बात जानेपर मौ उसका मस्तित्व पापा उम सब स्थानोंको माननेवाला मगटस्वरूप बैतन्यमय है, अर्थात् जानते रामा हो उसका स्पर समान है, और उसका पर निशाना सा ही यतीहै-उस निशामाका कमी मी नाश नहीं होता । पट पर मादि माण, वेपी वेने मान । माणनार व मान नहीं, पहिय कई शान॥ ५५ ॥ पर पट वादिको तु स्वय ही मानता है, और तू समनवा कि ये सब मौजूद है। तपा बो फा पर वार का गानमेपास है, ठसे त् मानता मही--तो उस हानको फिर कसा या बाप । परमपटि रुप देशमा, स्पून देर मति मत्स । देशोप मी भावमा, पर न माम रिकल्प ॥ ५६ ।। दुर्मठ देहमें तीक्ष्ण पुद्धि भौर स्थूल देहमें बप मुनि देखनमें जाती है। पतिदेह ही भारमा से तो इस शका-विरोध के उपस्थित होनेका बासर दोनही वा सम्वा । जर पवननो भिम छ, करल मगर समभार । एकपर्ण पाप नही, पण काय भाव ॥ ५७ ॥ किसी कार में भी विसमें जाननेका स्पमाप नहीं बना है, और बोसा ही मानमे समारम मुख पर तम है-इस तरह दोनों का सर्वपा मिन भिम समाप, और पर किसी भी प्रकार एक नहीं हो सकता। तीनों काछमें गा बारपसे और पनन ननरपसे दी यता है। इस तरह दोनो ही मिम भिम दैतभाव स्पर अनुममें आता है। मास्मानी भका कर, मारमा पावे माप । काना करनार, भपरन पर मपाप ॥ ५८॥ अम्मा सय हो वास्माको शव परती । परम्नु या सम परनेशामा बदौ मामा इस बातचे भामा जानती नही पह एक भसीम बापर्प है। सम्पचा मी मारमारे मस्तिषी प्रश्मि पुनि- नमामारि लम् गी म माम्मानिसमा सरेक सार । मानोरको (reate) ने भी पारित moth argum-1.m becaun laint-मरमा परि में मौर।।
१२ भीमद् पवचन्द्र २ध-पिम्प नाप- शिष परवी किमामा नित्य नही है- भास्मामा मस्विस्वना, मपि मा प्रकार । समय नो पाप, अवर् कर्मे विचार । ५९ ।। मात्माके वस्तिवमें बापने गो गो बातें श्री, उनका बारगमें विचार करनेसे म मस्तिन तो समय मास होता है। पीबी पंत पाप स्पा, आस्मा नही मविनाप । दोयोगपी पमे, देहपियोगे नाश ॥ ६ ॥ परन्तु इस संवा या होती है कि परिवारमा है तो मी या भक्मिाशी वाद मिस्प मही है। तीनों कारमें रहनेवाण हार्य नद्रा, प केवल देके संयोगसे तत्पम होती है और उसके वियोगसे उसका माश ऐ जाता है। मपरा बस सपिक क्षमे सणे पाम्दार । प मनुमबषी पन मही, भास्मा निस्प बजाय ।।६१ ॥ पपन्य बस्तु भण क्षणमें बदम्ती देसनेमें जाती है, इसलिये सब वस्तु पणिक है, और अनुमबसे देसनेसे मी मारमा निस्य मही माश्म होती। समापान-सहर पाच- गुर समाधान करते है कि मामा निस्प है:- देर मात्र संपीम परी मरम्मी एप । पैनना पत्पचि सय, कोना मनुभव पाय ।। ६२ ।। समस्त देर परमाणु के संपोगसे पनी सपना सपनगसे "बामाके साप उसका संबंध है। तथा बा देह या रुपी है और इस वर्षात दूसरे किसी के बानने विषय है। इसलिये या वामपने भापको मी नहीं मानती तो फिर चेतनको उत्पत्ति गौर नाशको वोकासि जान सकती है। उस देरके एक एस परमानुष विचार करनेसे मी पाही समतमें बाती । इस कारण उससे चेतनकी उत्पति हो सकती बौर पर उसमें उसकी उत्पत्ति नही हो सकती तो उसके साप चेतनका माश मी नही सकता । तथा बा देह रूमी बर्षात् स्वत बादि परिणामनाम है, और वेतन यो फिर उसो पोगसे रेती उत्पचिस तरह हो सकती है।मौर उसके साथ उस मास मी कैसे रोसमता तपा देहमसे चेतन सत्म होता है और उसके साप होप नाश होगा। यह बात किसके भनुमनके भाषीन है। मत् इस बात कौन मानता है। क्योंकि माननेवाले चेतनको उत्पपि इसे मपम तो दोवा मही मोर नाश तो उससे परिवही हो जाता हैमोरियामनुमा किसे होता है। माशंका जीवका तलम बपिनाशी बत् नित्य रिफायता रोना संभव नीम के मोगस मन् देशके सम्म साप ही पैदा होता है और देहके मपोग अनि देशके नाश होमेपर या माप्त हो जाता है।
मास्मसिसि १०॥ समाधान -देहका नायके साय मात्र स्योग सबष है। वह कुछ बनिफे मम सकपके उत्पम होनेका कारण महो। अपना गो देह है वह केस संयोगसे ही उत्पम पदार्थ है, तपा या वर्षात् वह किसीको भी नहीं चामती, और बममा मपनेको ही मही मानती वो फिर दूसरेको वो पा क्या चान सकती है। तपा देहरूपी है स्यूम बादि स्तमाक्युक्त है, और पशुका विषय है। सब स्वयं देहका ही ऐसा सरूम है तो मा पेसनको उत्पति गौर नाशको किस तर नान सकती है। वर्षात् सब या पफमेको ही नहीं जानती वो फिर मेरेसे यह चेतन उत्पन्न हुआ है, इसे कैसे जान सकती है। वीर 'मेरे छुट जानेके पश्चात् या चेतन मी झट पायगा—माश हो जायगा -इस बातको बा देह कैसे चान सकती है। क्योंकि माननेवाला कार्य हो तो जाननेवाला यता है—देह तो कुछ जाननेवाग हो नहीं सकती, तो फिर तमकी उत्पति गौर नाशके मनुमबको किसके बापान करना चाहिये । या अनुभव देहके बापान तो कहा जा सकता नहीं। क्योंकि मा प्रत्यक्ष नारे, और उसके घरवको बाननेवाळा उससे मिल कोई दूसरा हो फार्थ समझमें वाता है। काचित् यह करें कि पेतमकी उत्पति वौर माशको पेतन ही मानता है, तो इस बात के योने में ही इसमें बाधा आती हक्योंकि फिर तो चेतनकी उत्पति और नाश बाननेवा के रूपमें चेतना होगीकार करमा पा) बर्मात् यह वचन तो मात्र अपसिमातरूम वौर कयनमात्र हो हमा । पैसे कोई करे कि मेरे मुहमें जीम नही,' उसी तय यह कपन है कि चेतनकी उत्पत्ति और नासको पेतन बानता है, इसलिये चेतम निस्य नहीं'। इस प्रमाणको कैसी पथार्यता है, उसे वो तुम ही विचार कर देखे। मना मनुमय पश्य ए, उत्पम पपर्नु शान । व वेषी जूदा पिना, याप न फेमें मान ॥ ६ ॥ मिसके वनुभवमें इस उत्सति और नाशका कान राता है, उस बानको उससे मिम माने बिना, माम किसी मा प्रकारसे सभव नहीं। वर्षात् चेतनको उत्पति गौर नाग होता है, यह किसी भी अनुमप में नहीं भा सकता ॥ देको उत्पति और देहके माशका दान मिसके बनुभवमें पता है यह उस दोहसे यदि जुदा म हो तो किसी मी प्रकारसे देहकी उत्पत्ति गौर नाशका ज्ञान नही हो सकता । वपना जो बिसको उत्पत्ति और माशको मानता है उससे जुदा ही होता है, और फिर तो बह सप उत्पति और नाशप न यय, परम्त उसके माननेवाम्म हो यरा । इसलिये फिर उन दोनोंकी एकता कैसे हो सकती है। में संयोगी देखिपे, ते मनुमय रस्म । सपमे नहीं संयोगपी, मास्मा निस्प मस्पक्ष ॥६५॥ जो यो सपोग हम देखते है, वे सब अनुभारूम मामाके य होते है, मर्यात् बाहमा उमरे मामता मोर उन सपोगों के सम्मका विचार करमेसे ऐसा कोई मी संपोग समझमें माता जिससे वाहमा उपम होती हो। इसलिये भारमा संयोगसे अनुपम र मर्यात् प मसपोगी है- स्मारक पदार्थ है-सध्येि पर निस्प' समाठमें माता | गो गो देह मारि सपोग दिखाई देते हैं वे सब मनुभवसम्प वरमाके हो एप है, मात् भीमद् रामचन्द्र मात्मा हो नमें देसने वीर भामनेवाडी है। उन सब संपोगोंका विचार करके देखो तो तुम किसी मी सपोगसे बनुभवस्वरूप बारमा उत्पम हो सकने पेप्प माइम न होगी। कोई मी सयोग ऐसे मही यो तुम बानते रों, और तुम तो उन सब संयोगोंधे मानवे हो, इससे म्हारी उनसे मिमता, वार वयोगीफ्ना-उन संयोगोंसे उत्पम म होना-सान ही सिर होता है, पौर बनुभषमें माता है । उससे किसी मी सयोगसे-मिसकी उत्पति मही हो सकती, कई मी सपोग निसका उत्पषिके लिये अनुभवमें नही पा सकता, धौर बिन स्पोगोंकी हम कम्पमा करें उससे यो वनुमत मिम सर्वपा मिल के उसके बावारूपसे यता, उस अनुभवस्वरूप वामाचे तुम निस्प स्परहित-रिसने उन सपोगोंक भावस्म स्पर्शको प्राप्त नही किया--समझो । मापी घेवन पिणे, पवनवी मायाप । एको मनुमय कोईन, परि कदी न पाय ॥१५॥ बासे बेवम उत्पच होता है और चेतमसे पर उत्पनाता है, ऐसा किसाको कमी मौ बनुमब नही होता। को संयोगोपी नहीं, मेनी उत्पचि थाप । नाश न नो काईमा, वेपी निस्प सदाय ॥ १६ ॥ मिसको उत्पति किसी मी सपा से नहीं होती, उसका नाश मी किसीके साप नही होता इसलिये बास्मा भिड मिस्य ॥ जो किसी भी सपोगसे उत्पमम हुनाहो बर्षात् अपने समावसे ही मो पदार्थ सिब हो, उसका मास दूसरे किसी मी पदार्पक साप मही होता। गौर यदि दूसरे पदार्पक साय उसका नाश होता 0 तो प्रथम वसमस उसको उत्पत्ति होमा वारपा पो ना तो उसके साथ उसको मानरूप पता भी महो सकता । सहिये नामाचे वपन और बबिनासी समझकर यही प्रतीति करना योग्य । किपा नियो। क्रोधादि वरवम्यता, सादिरूनी माय । पूर्णमम्म-संस्कार ते, नीष निस्पवा स्पाप ॥१७॥ सर्प नादि प्राणियोंमें कोष बाद प्रातियों की विशेषता नमसे देखने में बाती है- वर्तमान में उन्होंने र बम्पास किपा महो । पर वो उनके सम्मसे है। पर पूर्ण समका ही सकार है । पर पूर्वमन्म चीनको नित्पता सिद्ध करता॥ समि जन्मसे मोषको विशेषता दसनेमें जाती है। कबूतरमें मम्मे दो बरिसक्नति रेक्लेमें माती है। मानो मादि गुमोको पकडनेपर उने पकानेसे हुास होता है, पर मप संज्ञा उमफे भनुमयमें परिम्से पता है। और इस कारण दीये माग गानेच प्रश्न करते है। इसी वण किसी प्राण में ममसे ही प्रतिष, किसी में समताको किसीमें निर्मपताकी किसीमें गमौरताको किसी विशेष भय HAN किसी धम वादिके प्रति संगवकी और किसीमें बार बादिम ममषिक सम्भताकी मधेपता देखने में भाती है। स्यादि जो मेरे बाद मोष वादि समाधी गो म्यूनाधिनता है, सपा उन सब प्रातियोधयो सो सम्मसे ही स्परेखने में माताई ठसारण पूर्व संस्कार गरे। काचित् परखें कि गर्भ बोर्म मौर रेठसके गुणके सपोगसे उस उस परके गुग सपना भास्मसिरि होते है, उनमें कुछ पूर्वबम कारण नहीं है, तो यह कहना मी ययार्य नहीं । क्योंकि वो मा-पाप कम-वासनामें विशेष प्रीसियुक्त देखनेमें बाते है, उनके पुत्र मापनसे ही परम वीतराग से देसे नाते है। तपा बिन माता पिताओंमें क्रोषको विशेषता देसी माती है, उनकी सततिमें समताको विशेषता पहि गोचर होतीहै -यह सब फिर कैसे हो सकता है। तया उसमीर्य-रेतसके पैसे गुण नहीं होते, क्योंकिग पोर्पनेसस स्वप चेतन नहीं है, उसमें सो चेतनका संचार होता है-वर्षास् उसमें चेतन सप देह धारण करता है। इस कारण वीर्य और रेखसके मामिप्त क्रोष वादि भाव नहीं माने ना सकते-चेतनके बिना ये मात्र की मी अनुभवमें नहीं पाते । इसलिये ये केस पेतनके ही वामित है, वर्षात् मे मीर्य मौर रेससके गुम नहीं । इस कारण वीर्यकी न्यूनाधिकताकी मुख्पतासे कोष मादिको न्यूनाधिकता नहीं रो सकती । चेतनके न्यूनाधिक प्रयोगसे ही कोप वादिको म्यूनाविकता होती है, मिससे वे गर्भस्य पार्पनेतसके गुण नहीं को बा सकसे, परन्तु वे गुण चेतनके हो बामित हैं, वौर का म्यूमाधिकता उस घेतमके पूर्वके वभ्याससे ही समव है। क्योंकि कारणके बिना कार्यको उत्पत्ति नहीं होती। यदि भवनका पूर्वप्रयोग उस प्रकारसे हो तो ही या संस्कार यता है, मिससे इस देश बादिके पूर्वक संम्कापेका अनुभव होता है, वौर पे सस्कार पूर्व-अम्मको सिद्ध करते हैं, तथा पूर्व-जन्मकी सिदिसे वात्माको निस्यता सहम ही सिर हो वाती है । आस्मा द्रम्पे निस्प , पर्याये पस्यप । पागदि पय प्रम्प, पान एफने याप ॥ ६८ ॥ बारमा बस्तुरपसे निस्प है, किन्तु प्रतिसमय बान बादि परिणामके पलटनेसे उसकी पर्या- पर्म परिवर्तन होता है। वैसे समुरमें परिवर्तन नहीं होता, केवल उसकी मरोंमें परिवर्तन होता है। उदाहरण के लिये बास पुषा वौर पर ये जो तीन अवस्थायें हैं, ये बारमाको सिमाव-पाप है। बाल बमस्याके पते हुए मारमा बालक माश्म होती है। उस पार भवस्याको छोड़कर ब वरमा पुवावस्था धारण करती है, उस समय पुषा माझ्म होता है, और युवावस्था छोड़कर अब पावरपा पारण करती है, उस समय हर माध्म होती है। इन तीनों भवस्पायोंमें बो मेरो वा पर्यायमेवही है। परन्तु इन तीनों ववस्थामोंमें मारम-त्रम्पका मेद मी होता। वर्षात् फेरस अवस्थाओंमें ही परिम- चन होता है, मात्मामें परिवर्तन मही होता । पारमा इन तीनों अबस्पायोंको मानती है, और उसे हो उन तीनों भवस्थामोंकी पति है। इसलिये परि तीनों अबरपाओंमें एक 0 बारम् ऐ तो ही यह होना समय है। यदि मारमा षण क्षणों बदसती यती हो तो यह अनुमय कभी भी नहीं सकता। भपपा शान सणिकन, मे माणी पदनार । बदनारो क्षणिक नहीं, कर मनुमय निर्पार ॥ ६९ ॥ तथा वमुक कार्य क्षणिक है जो ऐसा मानता है, और पणिकतच पन करताना अपन करनेवाग अर्थात् माननेवाग क्षणिक महीं होता ! क्योंकि प्रथम सममें निसे अनुमत्र मा उसे ही दूसरे सणमें यह अनुभव हुला कहा जा सकता है और यदि दूसरे क्षणमें पतय हो न हो पो फिर उसे यह मनुमन सि कहा जा सकता है । इसलिये इस क्नुमसे भीर वामा Aml वन नियप कर।
भीमद् पसन्द [१ क्पारे कोई वस्तुनी, कपल हाय म नाम । पवन पामे नान वो मां मने सपास ॥ ७० ॥ तपा किसी मी बराका किसी मी काठमें सर्वपा मारा नहीं होता केस मास्थातर ही होता है, इसलिये चेतना मी सर्वपा माश नही होता । तया पश्चेितनका अबस्यातरम्प नाश होता है पाकिसमें मिल जाता है! बपचाप किस प्रकारक अवस्थांतरको प्रश्न करता।इसकी तू सोग कर। पर बादि पदार्थ नब टूटकर गाते है तो होग करते है कि धा नए हो गया है परन्तु कुछ मिहापोका नाश महाँ हो जाता | पा सिम-मिम होकर पनि उसको बस्पम्त बारीक पूडो चाप किर मी वा परमामुषों के समरूपमें तो मौन यता है-उसका सपा नाश नहीं हो पाय और उसमें परमाणु भी कम नहीं होता । क्योंकि मनुमवसे देखनेपर उसका बस्पांतर तो हो सकता है परन्तु पदार्थका सम्स माश हो सकना कमी भी समय नहीं। इसपिय परिपेठनका नारा को तो मी उसका सर्पपा माश तो कमी कहा ही नहीं जा सकता, मह मारा केवल वयस्तररूप हो या पायगा । जैसे पा टूटकर कर अनुकमसे परमामुमोंके समारूममें सा है, उसी तय ने पतिनका अस्पांतर नारा मानना हो तो किस स्पितिम र सकता है। अपना विस तय घरके परमाणु परमाणु-समा मिस नाते है उसी तय पेवन किस बस्तमें मिझ सकता है। इसी तू सोय कर । बर्षात् इस तप पदित् मनुमा करके देखेगा वो तो माम होगा कि चेतन-- भामा—फिसामें मीनी मिड समवा व पर-सरूममें उसन अपस्पांतर नहीं हो सका। २त्र-पिप्प माप:- शिप्प करववाहमा कर्मको कर्वा नहीं है:- कर्चा भीष न र्मनी, कर्म न करी फर्म । अपरा सहम समाष का, कर्म नीवनी धर्म ॥१॥ गांव कर्म कर्ण नहीं कर्म ही कर्मका का अपना कर्म बनायास होते यते हैं। यदि ऐसा न हो वीर गावचे सत्र कर्ता कहो तो फिर पगावका धर्म होखरा, और व उसका धर्म है सलिये उसकी कभी मी निति नहीं हो सकती। भास्मा सदा मसंग ने, करे महाविप । मपमा पर प्रेरणा, पी पीर मप ॥ ७२ ॥ बपमा परि ऐसा न येता यह मानमा चाहिये कि वामा स्श नसा है, और सल बादि गुमयुत प्रातिया होर्मका बप करती है। पर ऐसा मी न मामो वो फिर यह मानना बारसे गरको कर्म करने की प्रेरणा ईपर करता है इस कारण ईपरेमपर निर्भर होनेसे बारकी उस कसि अपंच हो मानना चाहिये। माट मोम पापनो, ईम मिणाय । कर्मवई पर्यापणे, नही को नहीं माय ॥ ३ ॥ इसपिप बार किसी व्य कर्म का नहीं हो सकता, और न तब मोम के उपाय करमेका कोई कारण मास होता है। इसरिये पा तो गालको गर्म कर्ण हो म माममा चाहिये और पति उसे फर्ण मानो वो उसका पलमाल किसी मी एमाश नही हो सकता।
१६] भारमसिसि समापान-सहरु नाना- सहर समाधान करते है कि बारमा कर्मको कर्ता किस तय होप म पेवन प्रेरणा, कोण ग्रोवो कर्म ।। मरसमाप नहीं प्रेरणा, हुमो पिपारी पर्म ॥ ७४ ॥ वन-चारमा-को प्रेरणारूप प्रापि न हो तो कर्मको फिर कौन क्षण करेगा! क्योंकि नाम समाव तो कुछ प्रेरणा करनेका है महीं। बरमौर चेतन दोनों धर्मोको विचार करके देखो ॥ यदि चेतनकी प्रेरणा न हो तो कर्मको फिर कौन ग्रहण करेगा प्रेरणास्मसे प्राण करामेरुप समाव कुछ नाका तोही । वौर पर ऐसा हो तो घर पर वादिका मी क्रोध वादि भावमें परिणमन होना चाहिये, और फिर तो ठमें मी कर्मको प्रहण करना चाहिये । परन्तु ऐसा तो किसीको कमी मी अनुभव होता नहीं । इससे सिद्ध होता है कि चेतन-जीव-जी कर्मको प्रहण करता है, और इस कारण उसे ही कर्मका कर्ण करते है इस तय मीच हो कर्मका कर्ता सिद्ध होता है। इससे 'कर्म कर्म कर्म ही कहा नायगा या नहीं। तुमारी इस शंकाका मी समाधान हो जायगा । क्योक्ति गकर्ममें प्रेरणास्प धर्म म होमेसे यह उस तय कमौके प्राण करमेको असमर्थ है इसलिये कर्मका कफिन बीपमें है, क्योंकि प्रेरणाशति उसामें है। मो पेवन करतुं मपी, यो नयी वो कर्म । देवी सहन समार नही, मम नहीं जीपमर्म ।। ७५ ॥ पदि बाहमा कर्मको म करती तो वह कर्म होता मी मही इससे यह करना पोम्य मही किया कर्म साग समानसे-मनापास हो जाता है। इसी तय गावका धर्म भी नहीं है पोंकि स्वमाछा तो नाश होता नही । तपा यरि नाहमा कर्म म करे तो कर्म होता भी मही) अर्थात् या मार र हो सकता है, इसम्पेि भाहमाका यह स्वाभाविक धर्म महीं । कैप व मसंग मो, मासत तन न फेम।। मसग परपार्यपी, पण निगमाने दम ।। पदि बाहमा सर्मया बसंग होती मर्यात् उसे कमी मी कर्मका कपन न होता, तो फिर स्वयं पसे हो पा बास्मा परिम्से ही क्यों न भासित होती ! पपपि परमास तो बारमा बसंग हो, परम्त पर तो जब हो सकता है कि सरूपका भान हो माप । का ईथर को मही, पर शुद समार। भपपा गैरफ से गम्पे, पर दोपममार ॥ ७ ॥ जगत्का अपना मीयोंके कर्मका कर्ण कोई घर नही है । क्योंकि बिसका पुर नामस्मात प्राट हो गया है ही ईमर है, और पदि उसे प्रेरक पर्याद कर्मका कर्ण मानें तो उसे मी दोषका प्रमान मानना चाहिये । इसध्येि जौबके कौके काफ्नमें हरकी प्रेरणा भी नहीं कहा जा सकती। या तुमने जो कहा कि वे धर्म मनापास ही हास दते हैं, तो यहाँ बमापासका क्या पर्य होता। (१)क्या कर्म मामाके परा बिना विचार होहो गये।
१०८ मीमद् परवान (२) या नात्माका कर्वत्व न होनेपर मी कर्म हो गये! (१) पासर बार किसकेमा देनेसे कर्म हो गये। (१) या प्रहरिके सम्र्पक स्वप हो बानेसे कर्म ऐ गये ! स पर मुस्स चार विसापोंसे बनापास कपनका विचार करना पोम्प है। प्रथम पिम्प पीकि 'वारमाकेदार विना विचार हो कर्म गये परन्तु पर ऐसा होता हो तो फिर कर्मका महण करमा होमहीयता और वहाँ कर्मका प्राण करना न होपो कर्मका मस्तित्व मागही हो सकता । परन्तु गीच तो उसका स्पन वितमन करता है, और उसका प्राणायाम करता है, ऐसा अनुभव पता। तपा जिनमें गौर किसी भी तय प्राति नहीं करता ऐसे कोष वादि मात्र उसे कमी मी प्राम मही होते; इससे माम होता है कि भारमाके बिमा बिचारे हुए अपना बहमासे न किये गए कर्माचा प्राण बारमाको नहीं हो सकता । मर्यात् इन दोनों प्रकास पनापास कर्मका प्राण सा मही होता। तीसरा विकाप पाकिसर बादि किसीके कर्म भगा देनेसे मनापास हो कर्मका प्राण होता है'-या मी ठीक नहीं। क्योंकि प्रथम तो ईमरके स्वरूपका निमय करना चाहिये। और इस प्रसगको भी विशेष समाना चाहिये । फिर मी पहाँ ईश्वर पपका विष्णु मानिको किसी तरा कर्ण स्वीकार करके उसके उपर विचार करते। परिवर मादि कर्मशम्मा देनेवाग हो वो किर तो बीचमें कोई जीव नामका पदार्प होम या। क्योंकि बिन प्रेरणा मान से जोमा मस्तित्व समसमें पाया था, के प्रेरणा बादि वो स्वर इस बारे; वपमा रके ही गुण बरे। तो फिर नील समस्या बाकी य गया भिमसे रखे बार--मामा-मामा सके। वर्षात् कर्म बरसे प्रेरित नन्तु मे स्वर्प मामाके हो फिपे हए हो सकते हैं। तपा 'प्रकृति मारि के बर्वक कर्म ग बानेसे कर्म बनापास ही हो पाते हैं'-मा चौपा किकम्प मी पपा नही है। गोंकि प्रामा, नेपामा हो प्राण म को तो वे उससे किस तए संमो सस्ते है। अपना दम्पर्मत हो इस माम प्रति है। सनिपे पर तो कर्मको हो कर्म कर्ण करने के बराबर ाषा गौर इसका तो पूर्वमें लिपेपर। जुके हैं। पत्रिो कि प्रति म हो तो बात करण वाशिमो कर्मको रण करते है उस्से बामा, भर्तृत्व सिद्ध होता है तो मी एकांतसे ति मही हो सकता । स्पोंकि बन्तःकरण बाहि मौ सतरण बारिरूपसे चेतनकी प्रेरणा बिना पति घर होस सकते । पोंकि राम कोक संवाय मनन करने के यि मोबबबनता है से बात करण करते हैं। इसलिये परि पतन उसका मनन न करे तो कुछ सय उस समता मनन करनेत्र धर्म महीप तो केवा बा। चेतन चेतनकी प्रेरणा से उसका मन कर प्राण करता है उससे उसमें क;- फ्मेका भारोप होता, परम्त मुस्पनमसे तो प्रचेतन होमका कर्ण है। पहा परि दान्त बादि रिसे विचार करोगे तो हमारे पे पाप किसी भांतिपुत पुस्पकमाए मास्म होगे । परन्तु मिस प्रकारसे नाचे मारे उसके समझनेसे में उन पास्मोको यथार्थता माम होगी और प्राति दूर होगी।
५] मारमसिदि . पदि किसी मी प्रकारसे भारमाको फर्मका कर्तृत्व महो तो या किसी भी प्रकारसे उसका मोला मोना हो सकता और पदि ऐसा हो तो फिर उसे किसी मी तबके दुमकी समाषमा मी म माननी चाहिये । क्या पदि भारमाको किसी भी तबके दुसोंकी विसकुछ मी संमानना न हो तो फिर वेदान्त मादि साथ सर्व दु सोसे छुटने के मिस मार्गका उपदेश करते हैं, उसका से किसलिये उपोश देते । मेदान्त वादि दर्शन करते हैं कि 'बतक भारम्बान न हो तबतक दुपको मापन्सिक निति नहीं होती'-सो पदि दुसका दो सपा अमाव हो तो फिर उसकी निविका उपाप मी क्यों करना पाहिये ! तथा यदि मारमा काँका कल न हो तो उसे दुमका मोक्तृल मी कासि हो सकता है! या विचार करनेसे नामाको कर्मका कर्तत्व सिव होता है। प्रमा-अब यहाँ एक प्रश्न हो सकता है और तुमने मी या प्रम किया है कि यदि बामाको कर्मको कर्ण मानें तो पबमाका पर्म यरता है, और यो बिसका धर्म होता है, उसका कम्य मी तोद महा हो सकता, भात् पह उससे सर्मया मिम नहीं हो सकता । जैसे बमिका वमया और उसका प्रकाश उससे मिच नहीं हो सकते, इसी तए पदि कर्मका कल कामाका धर्म सिर से तो उसका मास मी नहीं सकता।' उचर — प्रमाणाशके साकार किये बिना यह बात सिदगो सकता है, परन्तु बोरिचारपान होता है। किसी एक प्रमाणशको स्वीकार करके दूसरे प्रमाणाशका उच्छेद नहीं करता। ' उस गोषको धर्म कर्तृत्व नहीं होता और परिणे तो उसका प्रतीति नही हो सकती' स्मादि प्रमों के उत्तरमें चोरो कर्मका क; सिय किया गया है। परम्त बारमा यदि कर्मको कर्वा तो उस फर्मका नाश हो म हो- कोई सिांत नहीं है। क्योंकि प्ररण की हुई पतसे प्राण करमेवाम मतको सर्पथा एकता कैसे हो सकती है। इस कारण बीच यदि भपनेसे ग्रहण किये गये द्रम्प-कर्मका स्पाग करे तो परोसकमा समस्पोंकि पर उसका सहकारी समान होसार समान मही । वपा उस धर्मको मैंने तो बनादिका भ्रम करा, अर्थात् उस कर्मका कपन गानको महानसे ही प्रतिपादित किया है। इस कारण मी पफर्म ना हो सकता है-या बात सापमें समझनी चाहिये । गोनो मम होता है, यह सब बस्तको ठम्य स्थितिकी मान्यतास्म ही होता है, और इस कारण पर नित किया जा सकता है। वैसे मगरमेस जम्मुनि । पानेका अभिप्राय पाए कि यदि वहानसे भी बामाको कपना न , तो फिर झा मी उपदेश मादिका प्रवण विचार और जान बाहिक समसने कोई मी हेतु नही गया । का पाँगालका परमापसे गो कफ्नि है, उसे करते हैं- पवन मो निममाना, कर्चा मापस्वमाप । पर्चे मी निगमानर्मा, फर्चा फर्मममार ॥ ७॥ मात्मा पनि बपने घर बैतम्प मावि स्वमानमें से वो पनपने उसी समाको का, बर्षात् पर उसी सम्पर्मे स्पित एती है। और पदि पर शुर पन्य बादि समारके मानमें म पता हो, यो परकर्ममाषच करे| भीमद् परवान भएन तरूमक मानमें बाहमा अपने समाप वर्षात् पैतम्य बादि समावको एक है, क्प किसी मी कर्म बादिको क महीनौर गम बाना बपने सरूमके मानमें नहीं पता, दो से कर्ममा कर्णमा। परमापसे वो गोप निक्रिप tt, ऐसा वेदान्त वादि दर्शनोंका कपन है। और मिन-प्राधम्म मी सिद्ध वर्षात् पुर बामाको निक्रियतामा निरूपण किया है। फिर भी, यहाँ पोहो सकता है कि हमने वात्माको शुदासस्पा फर्श ऐनेसे सक्रिय क्यों कहा। उस सोकी निरपि इस तर करनी चाहिये -रामा, परपोगको परमात्रको वर मावको कर्ण महाँ है, इसलिये यह निषि करी पाने योग्य है। परन्तु परि ऐसा कि मामा पैताप पादि समानको मी कर्ण नही, तो फिर उसका कुछ सरूप होनहाय माता । इस कारण सामाको योग-क्रिया न होनेसे या निक्रियो, परम्त सामाफिक पैतन्य जादि समानरूप किया होनेसे महसदिय मी है। तया बैतपतमान, भामा सामाणिक गुण है, इस कारण उसमें एकामरूपसे हो बामाका परिणमन होता है और उससे यो परमार्पनपसे मी वरमाको सक्रिय शिषण नहीं दिया ग सकता । पास्तु निर समाचमें परिणामरूप किया होनेसे हर वामाको निन समावका कर्मपन है। इस कारण उसमें सपा पर सधर्म होनेसे उस एपमम्प्से परिणमन होता है इसलिये उसे सक्रिय करनेमें मी दोष नही है। निस विचारसे सक्रियता और निधिपताका निरूपण किया है, उस मिपारके फरमार्थको प्राण करके सक्रियता और निफियता करने में कुछ मी दोर मा।। १५का-शिप्प पाप:- मिसम्य प्रताकि गोल फर्मका मोठ मही होवा - बीर का कहो, पण भोका मही सोप । समर्म मा कर्म, फळपरिणामी दोप! ॥ ७९ ।। परि गोल कर्मका वर्ग मान मी से तो मी गोल सकर्मका मोका मही याता। क्योंकि जा कर्म इस पातको क्या समझ सकता है उसमें फल देने शादि। फदमय पर गम्मे मोक्तापणे सपाय । पम को परवर्ण, परपण म माय ॥ ८॥ परि फल देनेवाले रिमोईपरो मानें तो मोस्तृतको सिर कर सकते है। वर्षात् गौरको नं मोगमाता, मानें तो गांव का मोय सिद्ध होगा। परम्तु इसमें सिर पर मी विरोध मावा मिपरिको इमेको त देने वादि प्राधियुत माने तो उसय ईश्वरल ही मही राता । रिक सिर र दिना-सी पर देमे भामिरिमा माईपरके सिकाए बिना--जगई पसपाय Pा संभर मी -इस संबध निहलपमे पार करना चाहिये परिवर्मधासानेपाम माने ता पहा रिचाचरत दो मरी रहता। क्योंकि दूसो पत्र देने बाकि प्रारमें प्रति करते हुए, चिरको देश मारि भनेक प्रचारक संग दोना मार और उममे उमी पपाप पुस्ताप भा है। मे मुझ और घिमी, बर्षात् असे या परमार बारिया Catोपरप परमात भारिपका तोरि उसे समारको प्रालि हानी पारिस भास्मतिथि । फिर ईनखारा कर्मका फल उसी टए पदि ईयर मी पूसरेको फर पेमे मादिरूप ज़ियामें प्राति करे तो उसे मी परमाव वादिके पिनेका प्रसग बाता है, और मुक्त गीतको अपेक्षा उसकी न्यूनसा ही धरती है-ससे तो उसका चिराप हा उच्छेद करने जैसा हो जाता है। तपा मोब वौर ईपरका समाप-भेद माननेसे मी मनेक दोष मासे हैं। क्योंकि यदि दोनोंको ही वन्य-स्वभान मानें तब वो दोनों ही समान धर्मक कर्ता हुए। फिर उसमें ईपर तो जगत् धादिको रपना करे नपा कर्मक फल देनेरुप कार्यको करे, बौर मुछ गिना माप तथा गीच एक मात्र देह पारि सरिको ही रचना करे, और वफ्ने कमौका फल पानेके सिपे ईश्वरका मामय से, क्या बंधनमें पर समझा बाप यह बात पथार्थ नहीं माइम होती । पा विषमता किस तयो सकती है। तपा बीवकी पेक्षा यदि ईयरकी सामग्रं विशेष मानें, तो भी विरोष पाता है। क्योंकि चिरको पदि पुर पैतन्यस्वरूप मानें तो फिर शुर चैतन्य मुछ बीचमें वौर उसमें कोई भेदहीम होना चाहिये, और बादि कार्य मी न होना चाहिये, वपना मुक पावसे मी यह कार्य होना पारिये । वौर यदि ईश्वरको बशुन चैतन्यस्वरूप माने तो फिर वह भी ससारी गावकि हो समान मारेगा। फिर उसमें सब बादि गुण कासि हो सकते है ! वपचा पदि देहमारी सनकी तरह उसे 'देहमाय सप घर' मानें तो भी मौके पस देनेल्प बो विशेष समारोपईघरमें कौनसे गुणके कारण माना चापगा तथा देह तो बिमाशीक, इस कारण ईमरको देह मी माश हो नापगी और प्रमुख होनेपर फर्मका फल देमेवाण न ऐगा, स्पादि वनेक प्रकारसे ईपरको कर्म फन्दाता भनेमें दोप माते है, और ईश्वरको उस सहमसे माननेसे उसका ईखराब हो उत्थापन करनेके समान होता है। चिर सिर यया पिना, मग-नियम नहीं रोप । परी शुमासुम फर्मना, भोग्पस्पान नहीं कोय ।। ८१ ॥ या ऐसा फलदाता कोई ईपर सिद मही होता, तो फिर जगत्का कोई मिपम मी नहीं पता, और धुम बाम कर्मके भोगनेका स्थान मी कोई नहीं करता तो बीचको फिर कर्मका मोस्तृत मी काही या समापान-सद्गुर उबापा-- मगर समापान करते कि बार अपने किये हुए फर्मको भोगता है भापकर्म निमन्सना, माटे पेतमरूप । भीपीपनी फरणा, प्राण फरे नाथप ॥ ८ ॥ गोषको मारकर्म बफ्नो प्रतिसे हो, इसलिये पर उसे तमकप मान या और उस भाविध अनुसरण करके हो औषका पीर्य स्फुरित होता है, इस कारण पर बा इम्प-कर्मक वर्गणा मरण करता है। मार्शवा-कर्म तो वारे, तोप क्या समझ सकता है कि इस गासको मुझे इस तय कर देना है, अपना उस सस्पसे परिणमन करना है। इसठिये गोव कर्मका मोळा न हो सकता। समापन -गौर अपने सम्मकेबानसे दो कर्मका कर्ण है।तपा 'यो बानमा पत्त- ११२ भीमद् पचन्द्र [१ मस्म है, पतिको नियो कम्पना है, और उस पल्पनाके मुसार ही उसके पाप-सभातर्ष सर्ति होती है, क्या उसके मुरूम हो उसको सामका परिणमन होता है, और इस कारण प मम्पकर्मडप पुङ्गको वर्गणाको प्राण परता है। पेर सपा समने नहीं, मीच साप फर पाप । एम शुभाशुभ कर्म, मोकापर्प नणाय ।। ८१ ॥ बार और बसत स्वयं नहीं मानते कि हमें इस बातको फल देना है, तो मी यो गीत उमें भी उसे उनका पर मिला है। इसी क्याम-नाम धर्म परपि यह नहीं चानते कि हमें इस मोनको पा फर देना है, ये मी पण करनेवाम गोल गर मौर बस्तके मी तय कर्मच फर प्राप्त करता है| पार वर बसत स्वयं या महीं मानते कि हमें सानेपाको प्रस्प और पर्षामु पिकती है, परन्तु से ठने प्रहण करनेवाको समासे ही उनका फल मिक्ता है, उसी तय बागमें पुम-बम कर्मका परिणान ऐता है, और उसका रमिता है।इस तर गौर कर्मका मोका समतमें मान्य है। एक राकमे एक भूप, ए मादि भेद । परण पिना न कार्प , प म गुमासुम रेप ॥ ८ ॥ एक को और एक पमा पावि प्रकार से मानता, उपता, फुलपता, मुस्मता वादि पासी विचित्रता देख पाता है, और इस प्रकारका मो भेद सबको समान महायता-पही बारको धर्मका मोस्कल सिर करता है। क्योकि कारणके बिना कार्यको उत्पति मही होती। पदि उस पुम-गम कर्मका फल न होता तो एक को और एक रानापारियो भेद है, मम होना चाहिये । पोकि गांवल और ममुप्पल वो सबमें समान है, मुभास मी समान होना चाहिये । इसशिप मिसके कारण ऐसा विचित्रवाये माम ऐतारे ही पुमागम कर्मस उत्पम मा मेद है। स्पोंकिकरणके बिना कार्यको सम्पति महोहोती । इस तरा पुम और बधुम धर्म मोगे पाते। फम्दावा चिरवनी, एमा मपी बम । धर्म समारे परिममे, पाय मोगपी र ॥८५॥ इसमें माता ईश्वरको कुछ मी बरत नापार और अपको तय मागम कर्मका मी समानसे हो मिलता गौर से बाहर मर जपुत निम्न हो बानेपर, फल देनेसे निाच हो पाते है। उसी प म मागम कर्मके भोग नेसे कर्म भी निःसन हो पानेसे निको पाते हैं। पर मरम्प कर देता है और बपत पतस्मसे फल देता है, उसी तय नाम पएम रुमसे कर देता है और एम कर्म गुमरूमसे फल देता है। इसलिम गाव पैसे से बरसा- पसे बर्मको मरण करता से पैसे पिाकससे कर्म मी कर देता है।वपा से पार मोर करत फा देने के बाद निसलो खाते है, उसी तपरेपर्म मी मोगसे दूर हो पाते हैं। फिर सब मास्मसिधि है, - से मोम्प विषेपना, स्पानक द्रम्प स्वभाष । गहन पाव रे झिप्प मा, कही संसपे साप ॥ ८६ ॥ उकर गुम बप्पासाप ठकर शुभ गति है, और उप मशुम अभ्यासाय ठहर भशुम गति पुमागुम अप्पासाय मिन गति है। वर्षात् ठस जीपके परिणामको ही मुसहपसे गति कहा गया है। फिर भी उत्कृष्ट गुम दम्पका तर्षगमन, ठकर बशुभ दम्पका वयोगमन, मुम-बशुमको मप्प म्पिति, इस तर इम्पका विशेष समाव होता है। सपा उन उम कारणोंसे वैसे ही मोम्यस्पान भी होने चाहिये । हे शिष्प ! इसमें बरतनके समान संयोग नादि सम्म सहपका पातसा विचार समा गाय सम्पेि पावात गान है, तो भी उसे बत्यत सक्षेपमें करी॥ शका -पदि ईयर कर्मका फल देनेवाग न ऐ वषषा उसे नगर की म माने, तो मी मोगनेके विशेष स्थानक-नरक मादि गति मादि स्थानकहाँस हो सकते है ! पोंकि उसमें तो ईमरके फलस्वकी भावश्यकता है। समाधान —मुसरूपसे तो उत्तर शुभ वप्पक्साय ही उसए देवोक है, उकस बम बम्प- पसाय ही उत्तर नरक है, पुम-नाम बम्पसाप ही मनुष्प-तिर्यच मा गतियों तथा स्पान विशेष-उसोको देवगति-श्यादि यो मेद है, वे मी बीचोंके कर्मदम्पके परिणाम विशेष हो, पर्पत ये सब गतियों जायके कर्मक परिणाम-विशेप आदिसे हो सभव है। या बात बात गहन है। क्योंकि बचिस्प जीव-पौर्य वौर मचिस्प पुद्रम्-सामर्पके संपोग- विशेपसे होकका परिणमन होता है। उसका प्रचार करनेके छिपे उसे अधिक विस्तारसे करना चाहिये । परन्तु पाँवो मुम्परूपसे बारमा कर्मका मोय है, इना सक्ष करानेका अभिप्राय होनेसे हो इस कपनको पर्यंत सक्षेपसे कहा है। ५का-भिप्प पापा- शिप्प कावा है कि गावको उस कर्मसे मोस नही है:- का मौका मीप हो, पण देनी नहीं मोस । पीस्पो कास मनंद पण, पर्चमान ऐ दोप ॥ ८७ ॥ गौर कर्ण मोर मोका मठेही हो, परन्तु उससे उसका मोश हो सकता है, पापात महा है। क्योतिका बीत गया तो मौ वा चीनमें कर्म करनेहप दोष दिपमान 101 सुम करे पळ मोगरे, देवादि गवि माप । मगम करे मरमादि फन, कर्मरहित म पाप ॥ ८८॥ पदि गौर छम कर्म करे तो उससे या देव वादि गतिमें उसके गुम फलका भोग करता है, और पदि भनुम कर्म करे तो माह मरक मारि गतिमें उसके मम प्रसका मोग करता है, परन्तु किसी मी जगह पौष कर्मादित नहीं होता । समापान-सहर पाषा- म्गुरु समाधान करते हैं कि उस कर्मसे गोपको मोच सकता है - श्रीमद् पचन मेम शुमाशम कर्मपद, माम्यां सफर प्रमाण । वेम निति सफल्ता, माटे मौत मुभाग ।। ८९ ॥ मिस तप ले चोपको गुम-अनुम कर्म करने के कारण गीतको कोका कर्ण, बोर वर्ग होनेसे उसे धर्म मोळा समसा है, उसी तए उसे म करनेसे वफमा उस कर्मको निचि करमेसे उसको निराति मी होना समय है। इसलिये उस नितिका मी सकता है वर्षात जिस तय प शुमागुम कर्म निष्फल नहीं माता, उसी तरह उसको मितिमा निकर नहीं गा सकती । इसलिये विचक्षण | द यह विचार कर कि उस निविस्म मोक्ष है। पीस्पो कान मनवकर्म शुभाशुम माप । वेर मागम दवा, उपमे मोम सभाष ॥ ९०॥ कर्मसहित नो बनता पीत गपापा सब सुमाग्नुम कर्मके प्रति गौरको बासफिके काम हो बाता है। परन्तु उसपर ठासीन होनेसे उस कर्मक मान किया जा सकता है, और उससे मोश-स्वमान प्रगट हो सकता है। देादि संपीगनो, मास्पविक पियोग । सिद मोम शासवपदे, निम भनव मुखमोग ॥९१॥ दो वादि संयोग बनुमसे वियोग तो सदा होता होता है। परन्तु पर उसप ऐसा रियोग रिया बाप कि फिरसे प्राप न हो, तो सिताप मोश-समाष प्रगट हो, और शासन पश्में अनंत बारमानन्द मोगने को मिले। ६का-पिप्प पापा- शिष्य करता कि मोषका उपाय नही- होप कदापि मोक्षपद, मही मरिरोप पाप । फर्मों कार मनवना, भाषी रेपो बाप । ॥ ९२ ॥ काचित् मोच पद से मी परम्त उसके प्राप्त होनेका कोई विरोषी बत् जिससे पापातप्प प्रवति हो, ऐसा कोई उपाय मात्म नही होता। क्योंकि नंतकामे गोप बाप मायुको मनुपास कैसे परम किये जा सकते हैं। अपना मव दर्मन पर्मा को पाप मक। देपा मत साची कपी बने म पर पिफ ॥ ९३।। अपका सचिव पनुप की काप बायु पगरानी शंका को मारें, तो भी ससारमें अनेक मत और दर्शन है और माइके भनेक उपत्य खते हैं। वर्षात् को कुरा प्रहार और कोई कुरा एवरे रि उनमें मसा मत सबा, कोना कठिन है। फपी माविमो मोसोकपा पमा मोस! पनी निपप मा बने, पणा मेद ए दोप ॥ १४ ॥ प्रामण मारि किस गनिमें मोक्ष बना दिस से मोक्ष , सच मिथप ऐना मास्मसिदि पठिन है। क्योंकि पैसे मातसे मेद है, और इस दोपके कारण मी मोशका उपाप प्राप्त होने योग्य रिपाई नही देता। वेपी एम मणाय छे, मळे न मोस उपाय मीनादि माण्यातणा, मो उपकार म याय ॥ ९५॥ इससे ऐसा मालूम होता है कि मोक्षका उपाय प्राप्त मही हो सकता । इसलिये जोर आदिका साप माननेसे मी क्या उपकार हो सकता है! अर्थात् मिस पदके लिये इसक जाननेको बावश्यकता है, उस फका उपाय प्राप्त होना असंभव दिखाई देता है। पचि सचरपी य, समापान सोग । समर्नु मास-पाप वा, उदय उदय सम्राग (ग्य ) ॥ ९६ ॥ मापने गो पाँच उत्तर को, उमसे मेरी कामोंका साग-सम्पूर्ण रूपसे--समाधान ऐ गया है । परन्तु यदि मैं मोशका उपाय समक्ष है तो मुझ सम्झाम्पका उदय-मति उदप-हो। (यहाँ उदय' शब्द बो दो बार कहा है, मा पाँच उत्तराफे समाधानसे होने पाठी मोशपरकी निवासाकी तीरता दिखाता है)। समापान-सद्गुरु उमाप:- सपुर समाधान करते है कि मोचका उपाप है पांच चरनी ई, मात्मा विपे मतीत । पाचे मोक्षोपापनी, सान प्रवीद ए रीत ।। ९७॥ बिस तप तेरी बारमा पाँच उत्तरों की प्राति हुई है, इसी तरह मोरके उपायको भी उसे सरहा प्रताति हो जापगी । होगी ' और ' सार ' ये दो पद यो सयुम्न कई है, वे इसठिये करें कि बिसे पाँचों पोको शका निच हो गई है, उसे मोक्षका उपाप समझाना पुए मी फटिन मही है, तथा उसमे शिष्यही विशेष विज्ञासामहिके कारण उसे ममय मोनोरायका ठाम होगा--पर सहरके उदय सपना वाशप है। कर्मभाप अमान है, माझमार निमपास | मंपकार ममान सम, मार मानममाश ॥ ९८॥ जो कर्ममात ही जातका बानी और गो मौनमार है बड़ी सौगय निव समपमें स्थित राना है । वामका समाप अपकारफे समान है। इस कारण जिस तरह प्रशारा हसनर दार्पपडान अपघर होनेपर मी नाश हो जाता है, उसी तराशनका प्रकाश हानेर भान मी मर दो गाता है। मेने पारण पिना, सरबपना पप । वारण पदक दवा, पासप भरभन ॥१९॥ गानो कमरे पर सब धर्ममारके मार्ग ३ भार उन मा भारतमा रेन राग गोरगर नही मोशय मर्ग है-मारय है।
३-२पेमाप- भार बामा दिएर जापता
भीम रानन्द
मस वर्षन आमा वनी, पचें सलमा।
सो शुद्ध समकिन है, मां और न पक्ष ॥ ११ ॥
पाचे निमसमभागमो, भनुभव साम बतीत ।
रचि पी निममाषमा, परमाएँ समकीव ॥ १११ ॥
उस विशाम मीनको पदि सहरका उपसमिमा बर्म
मत और दर्शमका बाम छोपकर यो सालको मर्म रमामला
पहा बारम-समाषका यनुभव पौर प्रतीति रहती है,तपापा
गा। उसे र करता है, और उससे समान-समाधिरूप पारिता खरोखर
इसमकित, महती भारासे दास्प शोक बाधि मोकुल बागमन
सदय पाय चारिपना, पीवरामपद पास 8 ११२॥
यो सगाभारास खत बारम-समानामा--जो कभी मौसहिरवा
करिये कैरम्यान दर एका निर्माम ॥ १५॥
माश को-पेसाबान रातारे, ससेपमान करते सि केत्रमा प्रारम
पिमाल पमेपर मी, तर गौमुळ दवाइप निर्माण पहीपर मनुममें बायो।
पेरोसा भी जिस तयामत होनेपर धरतातो ना
तिम दिपाव समादिमी, मान पार पाप ११॥
1ि2में धोनीनेभरममा मान लिया और उसकारममा-पुष
m-भा-यााममा परिकामामी माना गापा रोग
पवरकी शोधमें गता है।
करता है मिसमें कोई मी भेद और पत्र नहीं है।
होती ही परमार्यसे समक्ति होता है।
सापके भयस्वरूप भीतरागपदमें स्थिति होती है।
पिन निमसभामर्नु, मसापचे शान ।
कोटि पैन सप्न पण, मानव पर्वा प्रमाण ।
पर्मपान समकिन ई, यो मिथ्यामास ।
भी बना रिम्प मा मामानके होते ही रो भाता है।
एराप्पास वा, महीपर्चा दर्म।
मी मासा दरमो, एन पर्मनी मर्म ।। ११५ ।
* भोगतम।
एक पपप बातमीपमा ।
बारपन मनापाप मम॥ ११९॥
मारमसिरि
.
वको रोकना है, या अकर्म-दशाफा मार्ग है। यह मार्ग परलोकमें नहीं परन्तु यह अनुमममें वाता
है, तो इसमें फिर क्या करना'
गरी मत दर्शन वणी, मानह सेम सिफस ।
फनो मार्ग मा सापसे, जन्म केहना अस ॥ १०५॥
या मेरा मत है, इसलिये मुझे इसी मसमें छो गना चाहिये; भयमा यह मेरा दर्शन है, इस
लिये भाहे जिस तर मी हो मुझे उसीको सिद्धि करनी चाहिये—स वाह अयमा विकम्पको
मेहकर, उपर कडे हुए मार्गका नो साधन करेगा, उसके क्ल्प ही भव बाकी समझने चाहिये ।
यहाँ 'मन्म' शब्दका चो पशुवचनमें प्रयोग किया है, वह पी बताने के लिये किया है कि
चित् वे साधम अरे ये हो भपना उनका जघन्य या मध्यम परिणामोंसे माराधन मा हो, तो
समस्त कर्माका छाप न हो सकनेसे दूसरा बम होना समय है, परन्तु वे बन्म यात मही–हुत ही
पाा वेग । इसलिये 'समकित होनेके पथात् पदि बादमें नीव उसे बमन न
तो मधिकसे
भबिक उसके पन्दय भव होसे है, ऐसा बिनमगवान्ने का है, तया ' शो उत्करतासे उसका
अापनम को उसकी उसी मवमें मोक्ष हो गाती-पहा इन दोनों बातोंमें पिरोष मही है।
पदपदना पसभ में, पूछपा करी विचार ।
ते पदनी सोगवा, मातमार्ग निरपार ॥ १०६ ॥
रे शिष्य ! तूने को विचार कर र पदके एक प्रश्नोंको पंग है, सो उन पदोंको स्वागतामें ही
मोश्चमार्ग है, ऐसा निश्चय कर । अर्थात् इनके किसी भी पदको एकातसे अपना भविषारसे उत्पापन
करनेसे मोधमार्ग सिख मही होता ।
मावि वेपनो मेद नहीं, कपो मार्ग मा होय ।
साप वे मुकि मा, एमां भेद न कोय ॥ १०७ ।।
मोशन मार्ग कहा है, यदि यह मार्ग हो, तो चाहे किसी मी मावि वपना बेपसे मोक्ष हो
सती है, इसमें कुछ भी भेद नही । जो उसकी सामना करता है, यह मुद्धि-पदको पाता है। क्या
रम मोक्ष दूसरे किसी भी प्रकारका ऊपनीर आदि भेद नहीं है। मपपा यह मो पचन करा
उसमें दूसरा कोई मेर-फेरफार नहीं है।
कपायनी पावता, मात्र मोस-अमिसाप ।
मर खद भंवर दया, से परिप मिनास ॥ १०८॥
श्रेष बादि कपाय मिस मन्द होगा , मामामें केवल मोश होने के सिचाप प्रिसको
Put मा या नहीं, और सारक मोगों के प्रति शिसे उठासीनता एती है, क्या अतरंगमें
अनियति र मिसे दया पता है, उसनको मोक्षमार्गका निशान करते हैं, अर्थात् यह बीप
मग प्रान करने योग्य है।
६ मियाम मीरन, पाय सहरुघोष ।
सो पामे समावन, पर्चे अंतरोप ॥ १०९ ॥
1 भीम प्यचन्द्र राग देप महान ए, मुरूप कर्मनी प्रेय । पाय निधि पापी, केज मोक्षमो पंप ॥ १..॥ या रेप मोर मानकी एकता हो की मुस्स गोठ है। इसके मिना कर्मका बप नहीं होता। उस निति बिससे दोपही मोक्षका मार्ग है। बारमा सत् पैन्पमप, सर्वाभासचिव । भवी पर पामिपे, मोमपंप रीव ॥ १०१॥ 'सत्'-अविनाशी, पापमप'-समाबको प्रकाश करमेस्म समावमय बाद म सर्वत्रिभाष और देर बाकि सपोगके वामाससे रशित, वया 'केवर'-गर-मामाचे प्रास करना, उसकी प्राप्तिके लिये प्रति करना, यही मोका मार्ग है। धर्म मनंत मारना, वैमा गस्पे माठ । मा मुस्प माहिनीप, हणापते कई पाठ ॥ १.२॥ कर्म बनत प्रकारके , परन्तु उनमें मानावरम माहि मुल्स वाठ भेद होते हैं । उसमें भी मुस्प कर्म मोहनाप कर्म है। निससे पा मोदनाप कर्म नाश किया जाय उसका उपाय करता। कर्म मोनीय मेद, दर्षन पारिप नाम । हमे मीप गीतरामवा, मचूक उपाप माम ॥१०॥ उस मोहनाप कर्म दो मेव -एक दर्शनमोहनीय भौर सय चारित्रमोहमीप । परमार्यों पपरमार्ष मुनि गौर भपरमार्पम परमार्थबुद्धि दर्शनमोहनीय करते और तयारूप परमार्थ परम मानकर बामस्वमानमें जो स्पिरता हो, उस स्पिरवाको निरोप करमेबारे पूर्व सत्कामरूप का और मोकपापको चारित्रमोहनीय है। बामबोध दर्शनमोहनापका और गोवरगता पारिश्रमोशनापका मारा करते हैं। ये उसके बनून उपाय है । पोंकि मिप्याबोध दर्शनमोहमीप । बसका प्रतिपक्ष सपनामबोध । तपा चारित्रमोहनाप जो पग बानि परिणामहम है, उसका प्रतिपक्ष तगमान है। पर मिस तण प्रकाशके होनेसे पधार न हो जाता है उसका अचूक उपाय है-उसी तर पोष और माता मनुमसे दर्शनमोहमीप बोर चारित्रमोहनापरूम वकार र परमे प्राश सरूम सकि उसके बफ उपाय है। कर्मयोपादिपी, एम क्षमाविवर। मस्पम भनुमा सर्पम, पमारी सन्दो॥१०॥ कोष मादि मासे और समा गावि मासे G नाश हो जाता है। मर्पत पा रणनेस ग्रेप ऐसा का रासे माया पेको मा सकता है, संवोपसे मेम पेन मा सकता है । इसी तय रति नाति बारिक प्रतिपकसे ये सब दोष कमा सकते है। जी का विष है, और सास का सबसे प्रत्यक्ष अनुमा ।। अपना उसका समो प्रया भनुम हो सकता है। कोष माहि एकमे कमाते , और जो कर्म के - , - मानियोंकि उपर पिसे दमा गती, उस पीपको मोधमा शिाम करते हैं, अर्याद पर और मारमसिरि बरसे रोकना है, वह मर्म-दशाका मार्ग है। या मार्ग परलोकमें नहीं परन्तु यही वनुमममें माता ये इसमें फिर क्या सह करना ! छोरी पव दर्शन वणो, मारह वेम सिकल्प । कमो मार्ग या साप, मन्म केहना अल्प ॥ १०५॥ यह मेरा मत है, इसलिये मुझे इसी मतमें हो यना पाहिये, भयका यह मेरा दर्शन है, इस लिये चाहे बिस तब भी हो मुझे उसीपी सिद्धि करनी चाहिये—इस धामा वयका विकल्पको मोरकर, उपर कहे हुए मार्गका जो साधन करगा, उसके मप्प ही मब बाकी समसमे चाहिये । यहाँ 'कम' शब्दका नो गावचनमें प्रयोग किया है, वह यही बताने के लिये किया है कि पवित् वे साधन बरे हे हों अथवा उनका बम्प या मध्यम परिणामस माराधन हुआ हो, तो समस्त कर्मोका थप न हो सकनेस दूसरा नम होना समय है, परन्तु वे भन्म बहुत मही-बहुत ही चार दरोगे । इसलिये 'समकित होने के पचात् यदि बादमें बीब उसे बमन म करे, तो अधिक से वधिक उसके फ्दए भव होते हैं, ऐसा बिनमगवान्ने कहा है', तथा 'यो ठकपतासे उसका पपन करे उसकी उसी मवमें मोश हो जाती है यहाँ इन दोनों पामि निरोप नहीं है। पट्पदना पसम , पूजा करी विचार । से पवनी सोगवा, मोक्षमार्ग निरपार ॥ १०६ ॥ हे शिष्य ! तूने जो विचार कर के प्रमोंको पूछा है, सो उन पदोंकी सांगता हो मौसमर्ग है, ऐसा निश्य कर । अर्थात् इनमें किसी भी पदको एकतसे वका अविनारसे उत्थापन मावि वेपनो भेद नहीं, कमो मार्ग जाप । साप वे सक्ति मो, पमा भेद न कोप ॥ १०७ ॥ भो मोक्षका मार्ग कहा है, परिमार्ग हो, तो मा सी मी माति अथवा पसे मोक्ष हो सकती है, इसमें कुछ मी भेद नामो सकी साधना करता है, यह मुछि-प को पाता है । तथा उस मोमें दूसरे किसी भी प्रकारका उप-नीच मादि में नहीं है। अपना यह नो बचम कहा है कपायनी उपसांवता, मात्र मोक्ष-अमिलाप । मर सद भंवर दया, फाहिय निमास ॥१०८॥ प बादि क्याप निसको मन्द होगा, मामा काड मोश होनफे सिकाप जिसकी सप कोई भी इस मामा मागप्रति से उसनता ही है, तथा मतरंगों करनेसे मोक्षमार्ग सिर नहीं होता । . उसमें रम्प कोई मेर-फेरफार--मही है। मर्गध प्रम परमे पोप है। व निमास मीरन, पाप सनुरुषाप । वो पाम समावने, पर्षे भवरनाप ।। १०९ ॥
. भीम पत्र उस दिशाम मौवको यदि सृष्टस्का उपरेश मिक माय मा समक्तिको पा गातार बोर बतरकी शोधमें पता। मत दर्षन माना यमी, पर्चे सद्गुरुसा । सो शुख समकिन वे, मेमा मद न पस ।। ११० ।। मत और दर्शनका वामा मेसकर नो सदरको सक्षम रसता है, पर घर समक्तिको प्राप्त करता है, जिसमें कोई मी मे बौर पन नहीं है। बचें निमस्समापनी, भनुमर सक्ष मवीच । पचिपा निममाषपा, परमा समीत ॥ १११ ।। चहाँ पात्म-समात्रका मनुभव Bध और प्रति यती है, तथा बाम-समाप इति प्रपारित होती. ही परमापसे समविस होता है। पर्षमान समकित र्या, यने मिप्यामास । रदप पाय चारिमनी, पीवरागपद मास । ११२॥ या समकित पहता धारास हास्प शोफ मादि यो कुछ बारमामें मिप्या मामास माश्म एआई उसे दूर करता है, और उससे स्वमात-समाविल्स पारिका उदय होता, जिससे समस्त राग-पके सपस्मरूम पौतरगपमें स्थिति होती है। देवळ निमस्समाप, मखर पर्चे मान । करिये फेममान ते, देश का निर्णाण ॥ ११३ ॥ यहाँ सभामाससे रहित बाम-समाक्का मसाजो कमी मी संरित महो-मय महो- नाश न -पेसा बान या है, उसे केवमान करते है। इस केपणानके प्राप्त करनेसे, देशके निवमान बनेपर मी उत्तम सातामुच देशाप निर्माण याहीपर बनुभमें माता है। कोटि पर्पन सप्न पण, जाग्रत पा पपाप । क्षेम पिमाष मनादिनी, शाम पा र पाय ॥ ११ ॥ करोषों बोका स्वप्न मी मिस तय गमत ऐनपर तुरत ही शव को गाता है, उसी तय मोबमारिच तिमाल है वह नामानके होते हो दूर हो जाता है। से देशाप्पास तो, नहीं फर्चा धर्म। नहीं मीता देानी, एम पर्मनो मर्म ॥ ११५॥ हे शिम्प ! दहमें नोगामे भास्ममात्र मान लिया है और उसके कारण बी-पुत्र बादि सबमें गो मामा-मनमान-राता है पर बारममात्र परमात्मा हो माना गापा और गोपामास है हमें भारम-गुदि भार भामा पनि रार हो गया येत् कर्म का मी नहीं, और भोप मी नही की बर्मन मर्म । एम पर्मपी मोत से मोमसस्म । मर्मत दर्षन शाम है, भम्पावाप सम ॥ ११५॥ - भारमसिवि इसी धर्मसे मोझ है और तू ही मोक्षस्वरूप है, मर्यात् शुद्र बारमपद ही मोक्ष है। गर्नयान दर्शन सपा वम्पावाघ सुसस्वरूप है । शुद्ध मुद्ध वन्यपन, स्वपज्योति मुखपाम | बीमुं कहिये फेटलं कर पिचार वा पाम ॥ ११७ ॥ व देह बादि सब पदार्थोसे पुदा है । वामदम्प न किसी दूसरे मिस्ता भौर न मारमाध्यम ई निता है। परमार्थस एक ब्रम्प दूसरे दम्पसे सदा मिम है, इसरिये तू शुर-बोध स्वरूप है- पैक्प-प्रशामक है-स्वप-योति है तेरा कोई मी प्रकाश नहीं करता- खमावसे ही प्रकाश सरूप है, और सम्पाबाध मुसका घाम है। अधिक कितना करें। वधिक क्या करें ! सक्षेपमें इतना मते है कि यदि तू विचार करेगा, तो तू उस पदको पायेगा । निमय सर्वे हानीनो, मागी मप्र धमाप । परी मौनता पम की, सहनसमापि माय ॥ ११८ ॥ सब बानियोंका निश्चय इसी में भाकर समा माता है—यह करकर स्लुरु मौन धारण करके- पचन-योगका प्रवृत्तिका त्याग करके साम समाधिमें स्पित गये । - पिम्प-पोपवीन प्राप्ति कपन-- सद्गुरुना उपदधयी, माम्पु अपूर्व भान | निमपद निम माही साप, दर पर्यु भमान ॥ ११९ ॥ शिष्यको सद्गुरुके उपदेशसे अपूर्ण–यो पूर्वमें कमी मी प्राप्त न हुमा हो -भान पूजा उसे निवका स्वरूप वपने निबमें बैसाका ऐसा मासित एमा, और देश में बारम पुद्धिरूप उसका बगान दूर गया। मास्सं निमस्सस्स , शुद पेवनास्प। मगर भमर भविनाभी ने, देशातीव स्वरुप ॥ १२ ॥ एमपना निजका सरूप मुद, पैक्पस्वरूप, अनर, वमर, अविनाशी लौर देहसे स्पर मिम मासिव एमा। की भोका कर्मनी, पिभाव पर्ने ग्याप । रधि नही निगमागमा, पयो मका स्पाय ।। १२१ ॥ योनिमाव-मिप्पाल–पता है, वहीं मुम्पनयसे कर्मका कपिन वीर भोयपन है। माम समाव ति प्रसारित होनेसे तो पा गाव भक; ऐ माता है। भपमा निमपरिणाम मे, शुद्ध पवनाप । का भोका तानो, निकित्सस्सस्प ॥ १२२ ॥ बपना व पसरूम यो बारम-परिणाम है पीर ठसका मिरिकम्प सरपसे फर्चा और मौछ। मोल कमी निमालवा, पामे वे पंप । समनाम्पो सोपा, सकल मार्ग निर्मन्प ॥ १२३ ।।
१२० भीमद् रामचन्द्र [. वात्माका यो स्वपद है यही मोमबार बिससे पा मोच मान किया जाप व मोक म्पर्ग है । मौसागुरूने रूपा करके निम्न्यके सकल मार्गको समझाया है। महो! मही! मीसहर, करुणासिंधु अपार । या पामरपर पर कर्यो, मही! महो। पकार ॥ १२ ॥ महो! बो! करणाके पार, समुदमरूप, मात्म-अमीसे पुछ सद्गुरु ! बाप प्रमुने इस पामर पावर वामपंचमक उपकार किया है। शं मम परणाने पर! मास्मापी सौपीन । देवी प्रसप भापियो, गर्नु परणापीन ॥ १२५ ॥ में प्रमुके घरों के समय क्या रम्स ! (गुरु तो यपपि परम मिकाम निकारण करणासे 0 उपत्यके देनेवाले, परन्तु शिप्पने शिष्यवर्मसे हो पा बबन का है) जगत्में मितनेमर परार्प , सब वाहमाकी अपेपासे तो मत्पान हो। फिर उस बामाको ! निसने प्रान किया है उसके चरणोंके समीप मैं दूसरी और क्या मेंट रस। में केवर उपचाणं इतना ही करने को समर्पक में एक प्रमुके भरोक ही वाधीन । मा दादि आममी, बर्षो प्रामापीन । दास दास दास , देह प्रसना दीन ॥ १२६ ॥ इस येह वादि शम्पसे बोकुल मेरा माना जाता है, यह पायसे । सरप्रमुख बाधीन को में उस प्रमुका दास-दास-दौन दास ।। पद स्पानक सममापीन, मिम पवाम्मी माप । म्पानबकी वरपारपत् , प उपकार ममाप ।। १२७ ॥ हे सद्गुरु देव ! म स्पानोको समसार, मिस तय कोई म्पानसे मारको जग नियम बताता है उसी तय बापने देह बादिसे वारमाको स्पर भिम बताई है। इसरिपे वाफ्ने मेरा बसी उपकार किया है। उपसंहार- वर्षम पटे धमाप , मा पट् स्पामक मादि । पिचारको पिस्वारपी, संसप रो न काय ॥ १२८ ॥ प्रों दर्शन इन न स्पानोंमें समानित ो गाते हैं। मका निरोपमसे विचार करनेसे इसमें किसी मा प्रकारका सेशप नहीं पाता। भास्माविसम रोम नहीं, सानुर पैप समान ! परमाकासम पप्प नहीं, भोपप विषार ध्यान । १२९॥ मात्माको यो अपने लिय स्वरूप मान नही–के समान दूसरा कोई मी रोग नही। मारके समान उसका कोई भी सबा बपना निपुण + महो, सस्को बाापूर्वक पके समान दूसरा कोई मी पप्प नही और चार तपा निविपासनके समान उसकी दूसरी कोई मी वोपरि महा। मा इण परमार्प दो, परी सत्प पुरुषार्ष। मास्पिदि मावि माम म, दो नहीं बास्मार्य । १३.। + मास्मसिदि ६२१ पदि परमार्पकी इच्छा करते हो तो स्था पुरुषार्प क्ये, और मवस्थिति वारिका नाम मेकर वामार्पका छेदन न करो। निश्यवाणी समिळी, सापन वनयां नोय । निमय राखी ससमां, सापन करमा सीप ॥ १३१ ॥ बामा वर्षद है, बसग है, सिद है, इस निषय-प्रधान बाणाको मनकर साधोका त्याग करना योग्य नहीं । परन्तु तपाप निभयको क्षमें रसकर साभन जुटाकर उस निश्चय सरूपको प्राप्त करना चाहिये । नय निपप एकांवपी, मामा नपी कोछ । एकदि म्पनहार नही, पमे साप रोस ॥ १३२ ॥ यहाँ एकविसे निधयनयको नहीं कहा, वपना एकातसे म्यबहारनयको भी नहीं कहा । दोनों । माँ नहाँ निस गिस तरह घटते है, उस वय साथ रहते हैं। गणमवनी के कस्पना, वे नहीं सत्यवहार । भान नहीं निमस्पत, निषय नहीं सार ॥ १३३ ॥ गम्मतको यो कम्पना है, पर समगार नहीं, किन्नु पारमाकि सभणमें दो दशा कोई मोर मोशके उपायमें निजामुके गो मक्षण नादि करे , हो सपहार है। उसे पाँ पसे शाद। जीवको अपने स्वरमका तो मान न-सि तया मनुममें माती है, उस वय वारमाका अनुमत्र तो पुमा नहीं बल्कि देहापास ही रता है और यह मेराग्य वादि सापनके प्रश्न किपे बिना ही निथप निमय विष्ठापा करता है, सिता निभप सारमत नही है। बागळ मानी पी गया, पर्चमानमा रोय । पाच काळ मषिष्यमा, मार्गभेद नहीं कीय ॥ १३४ ॥ भूवकास में मोबानी-पुरुष हो गये हैं, वर्तमामकाछमें नो मौदा और भविष्यकाउमें जो होंगे, उनका किसीका मा मार्ग मित्र नहीं होता, मात् परमार्थसे उन सबका एक ही मार्ग है। भौर पदि उसे भास करने योम्प पहारको, उसी परमार्थक सापकरूपसे देश का मादिके कारणमे पूर्णक या , वो भी यह एक ही फरको उत्पन्न करनेवाण है, इसलिये उसमें परमार्पस भेद नहीं है। सर्व मीम सिद्सम, मे सममे के यार। सहरमाश मिनदया, निमिप फारण मांय ॥ १२५ ॥ सब चौदोंमे सिद्ध-सचा समान है, परन्तु मतो उसे ही प्रगट होती है गो उसे समठवा है। वसो प्रगट होने में सहरुको मासे प्राति करना पाहिपे, तपा सहस्से उपदेश की ई निन-शाका विपार करना चाहिये दोनों ही निमित्त कारण है। उपादानन नाम सई, ए में तमे निमित्त । पाम नहीं सिदसने, माविमा स्थित ॥ १९ ॥ सहरसी भाडा भादि बारम-साधमके निमित्त करण , भौर मामा के कान दर्शन मार १२२ भीमद् रामचन्द्र उसके उपादान कारण है-ऐसा शाब में कहा है। इससे उपानका नाम लेकर जो करें उस निमिपच स्पाग करेगाह सिदत्वको मही पा सकता, और गा भातिमें ही या करेगा। मोंकि वाममें उस उपाशन पाल्पा सो निमितके निपेश करने के लिये नहीं की। परन्तु शासकारको श्री उस म्पाध्याय ही परमापक उपानके बगाप्रत रखनसे सवा निमित्त मिसनेपर मी काम मरोगा, इसरिये निमिव मिझमेपर उस निमित्तय वकान मेकर उपा नको म्मुन्न करना चाहिये, और पुरुषार्थहीन न होना चाहिये । सुस्तपी शान कषे भन, मंवर एयो न मोर। ते पामर माणी करे, माम मानीनो द्रोह ॥ १३७ ॥ मो मुससे निश्चय-प्रधान बचोंको कहता , परम्त बरसे गिसका अपना मोर एटा मी, ऐसा पामर प्राणी मात्र केवमानी सम्पानेको कामनासे हो सहानी पुरुपका प्रोह करता है। दपा शौवि समवा क्षमा, सस्प स्याग पैराग्प । रोप समापयदिपे, पर सदाय समाग्य ॥ १३८ । दया, ति, समता सस्प त्याग, बौर परम्प गुप मुमुमुके पटमें सा होगाप्रत पते हैं, वर्षात इस गुणोंके बिना तो मुमचफ्ना मी नहीं रोता । मोहमार मय होप प्या, मपया होप प्रशांत । कहिपेशानी दशा, बाकी काहि भ्रांत ।। १३९॥ यहाँ मोबभावका भय हो गया , अपना यहाँ मोह-वधा श्रीण होगा हो, उसे पानीको द करते हैं। गौर नहीं जिसने अपने होपान मान सिपा ऐप तो केवल भाति हो। सकल नगर वे एम्प, मवपा समसमान । देशीये शानीवशा, पाकी गावाहान ॥ १०॥ समस्त जगत्को बिसने उभिए समान समया है, बपना मिसके शानमें जगत् सप्नके समान माम्म होता है, पीपानीको दशा है बाकी वो सब क पचनमान—मात्र कपन बम-है। सानक पांच दिपारीने, ण्ड पर्चे मा। पामे स्थानक परिस, एमा नहीं सदेह ॥ ११ ॥ पायों को वारकर गो गोप में प्राधिकरता है-यो मोषके उपाय उपर को, उनमें प्राधिकरता-प पाँचों स्पानक मोक्षपरको पाता। देवो भनी दमा, बचें देशवीव । वेशानीमा चरणमा, होइन भगनिव ॥ १५२॥ बिसे पूर्व प्रारम्पक पोगसे देर रामेपर मी रिसको मा उससे बात-दो बारिधी पापनावित-बामामय पता है, उस पानी-पुरुषके चरण-कम में बगपित बार पंकन ऐ। महो। श्रीसाधरणार्पणमस्तु ।
4.१,५१,५] विपिप पम मादि सभा-रो पर्प ६६१ जोरको बसमके मुस्ल्प दो रेतु है- एग और देष। रम्गके बमापसे उपका बमा होता है। एम मुस्प है। माके कारण ही मारमा सयोगमें क्मय रहती है। की मुस्परूपसे कर्म है। म्यो न्यो मग-वेप मद होते है पो त्यों कर्म बघ मी मद होता है। और म्यों ज्यों राग-रेप तौर होते है त्यो स्पों कर्मबंध मी तीन होता है। माँ राग-रेपका धमाल है यहाँ कर्मवधका सापयिक ममात्र है। राग-द्वेष होनेका मुख्य कारण मिप्याय-अमुम्यग्दर्शन है। सम्परमानसे सम्पदर्शन होता है, उससे भसय्यदर्शनकी निति होती है। उस बीवको सम्प- चारित्र प्रगट होता है। वही पीतरागदशा है। सम्पूर्ण पविरागदशा बिसे गती है, उसे हम परमशरारी मानते हैं। ६६२ अपरिहाण विमुक, दिम सिरिपरमाणमिणपदं ।। xसिरिनीरमिण दिम, कम्मपिमार्ग समासमो पुग्छ । की मिएण ईकारि, मेण तो मम्णए फर्म ।। +कम्मदहि समं, संगोगा मा होई मीपस्स । सोपी जायणो, वस्स पियोगी यम मोक्म्मो ॥ ६६३ नदिपार, वासोम बदी १. शनि १९५२ १ श्रीसद्गुरदेखके बमुझसे पहाँ समाधि है। २ इसक साथ एकांतमें अवगाहन करनेक सिपे बामसिविणाम मेगा है। हमें को बगहन करने पोम्प है। "वपवानी को पनि निमागमक चारनेको म ऐ वा वाचायग, सूप- गोग, दाबकासिफ, उत्तराप्यपन और प्रमभ्याकरण विचार करने पोम्प। • पर सम्पूर्ण मधा निम्मरप है।- पंचविसावमुकीम रिपमानामा । पामाईक समालभाषामित मात् धर्म-रकी रफ्ना पत भावनाम्न ममतार पके मनि मावि गौरा मार्गचा पहले पसमिरमंप। xभाचारमिनको नम्तार से समविया मामक प्रपनो मेंपा। पेपर पिनी या विमा पवासेकर्म करते। +भपीमिरेतो र ६१७॥
भीमद् पेस्चन्द्र
[पेर १५९.
वहाँ सम्पर्शनसहित विपयारमको निति-ाग रेपका धमाल-दो पाता, यहाँ समाधिका
सदुपाप यो अवापरणा प्रकट होता है ||५||
वहाँ इन तानोंके अमिन समापसे परिममन होनेसे वामपस्म प्रकट होता है, गनिमपसे
बनन्य समसापक पूर्ण परमफ्रकी प्राप्ति होती है ॥
बीच वर्गव पदार्य, सपा पुष्प, पाश बाप, बंध, संवर, निर्भय ये साठ तस मिलकर गै
पश्चर्य हवे ॥७॥
बाब बनीवमें इन ना तत्तोंका समावश हो जाता है। बस्वका विशेषरूपसे विचार करने के
लिये महान् मुनियन र मिम मिम प्ररूपित किया kn८॥
६६९
बगाणीमा प्रतिक बली २ क १९५१
शानिने मनुष्यमबको पितामणि रानके समान कहा है, इसका परि विचार करो तो या प्रत्यक्ष
समधमें मानेवाली मात है। शेष चार करनेसे तो उस मनुष्पममा एक एक सम्प मी पिताम्ममि
एनसे परम माहाम्पवान मौर मम्पमान माइम होता है। तपा यपि मनुप्पमय देहार्यमें हो म्पटीत
हो गया तो वह एक भी कौमको कौमतका मी नहीं पर निस्सन्देह मालूम होता है।
६७०
वाणीमा ऋतिकवी १५. १९५१
ॐसशाप नम
जातक देहका और प्रारम्भका उदय बलयाम हो तबतक देहर्सबभी कुटुम्मो-निसचा मरण
पोषण करनेका संच नए सफनेवाण हो अर्थात् नापासपर्पत बिसम्म मरण-पोषण करमा वधित
हो-पदि मरण-पोपण मात्र मिन्ता हो, तो उसमें मुमुसु गांव सतोष करके बामहितच हा विचार
और पुरुषार्य करता है। प्रदेश और रेसबपी कुटुमो माहात्म्प मारके किये परिण वादिको
परिणामक स्पतिको मी नही होने देता। क्योंकि वे परिण माविका प्राति मावि ऐसे कार्य है कि
बात करके मामीत मनसरको ही प्राप्त नहीं होने देते।
६७१
मागीया मगसिर मुदी १ शनि १९५१
सर्वज्ञाप ममा
जय मापु भनियन प्रामि असीमापान-मसंग प्राप करके पूर्वको मायभकता, बलीर्यको
दानाप-इन कारणों से रहित महापिरहा हो और योगा ऐसे इस कामे पूर्णम कमी मीन
सामा मा मनानन यि मा भाराभन न रिमा हुमा मोर समारसे मसिद ऐसा मार्ग प्रक्ष
तपाय पनि गोमा नपराभरा बल तमनन प्रसारण समाधि पर .
समितभार सचमी मातापमापन परमराया मममम्म गुजरात
ममा पश, पुन पर भाषा यामर मे पत्तमामा..
Meth नरेतो मारेप
पारो मिस पेनामात पर ॥८॥
पर १०२,01,10] पिषिप पर मादि संपा-२०वों पप करना कठिन हो तो इसमें कुछ वार्य महीं है। फिर मी मिसने एक उसे ही प्राप्त करनके सिवाय इसरा कोई मौ रक्ष नहीं रमठा, यह इस कारमें मी बप हो उस मार्गको प्राप्त करता है। मुमुक्षु गीत हौकिक कारणोंमें अधिक दर्प-विपाद नहीं करता। . ६७२ पाणीआ मगसिर मुरी गुरु १९५२ श्रीमाणेकचन्द्रकी देहके छट जानेके समाचार मालूम हुए। सर्व देहपारी नीव मरणके समीप शरणरहित है। मिसने मात्र उस देहका प्रथमसे ही यपार्य स्वप जानकर उसका ममस्त्र मए र, निन-स्थिरताको अपवा हानीके मार्गको पपार्प प्रतीतिको पा किया है, वही जीव उस मरण-समयमें शरणसहित होकर प्राय फिरसे देह धारण मही करता, अपका मरणासमें देरक ममत्वमाको पता होनेसे मी मह निर्भय हताहै। हके छानेका समय नियत है, इसध्येि विचारवान पुरुष अप्रमामावसे पहिसे ही उसके ममलके मित्र करने मरियेषा उपापोध साधन करते है और इसीका में और हमें सबको सक्ष रम्बमा चाहिये । यधपि प्रति-वधनसे के होना समय है, परन्तु इसमें अन्य कोई उपाय न होनेस, उस से को राम्पमपम परिणमन करना ही विपारवानका कम्य है। ६७३ पाणीमा, मगसिर सुग १० सोम १०५२ सर्पज्ञाप नमः योगवासिष्ठके मालिक दो प्रकरण, पोकरण, दासबोध तया विचारसागर पे पंप तुम्हें विचार करने पोप हैं । इनसे किसी प्रयको पनि मने पहिले बाँचा तो मी उमें फिरसे बाँधना और विचारमा पोम्प है। ५ प्रप मैन-पतिक नहीं है, पर बानकर उन प्रयोश्य विचार करत हुए क्षाम पौकिक परिमें जो गोमाते अपना पस्तुये-जैसे शोमापुछ गृह पनि बारम, अठार मार परिम्ह, पोक-शिको विचक्षणता, लोकमान्य धर्मको प्रदा-मापनकी मानी जाती है उन सब बातों और मोश प्रहण करना प्रस् का करना है, इस बातको पथार्थ समझ बिना ही तुम उन्हें पारण करते से इससे उस सम होता । बारभमें उन बातों भौर बानुगाफ प्रति गार-गरि पाना कटिन समाकर कापर न हो पुस्पा करना ही उरित है। प्रम करना उचित नहीं। ६७४ बमामात्रा मगमिर पुरी १२, १०॥ सर्वज्ञाय नमः १ मामसिरिक टीकाके पृष्ठ मिठ है। २ पनि समBAIR मार्ग समछमें ना माप साइम ममुप्पगएका एक एक समय मी सगाए पिधमगि है, इसमें साप नही ।
भीमद् रामचन्द्र [६५५ ६५४,५५ । ग्री • पारमासिविधायका -भागे प्रकार भगाहम करना विशेष हित चामकर, उसे हारमें मात्र मी को हो वागाहन करने के लिये सिता है।ो भी पति को हमें विशेष वाकांक्षा यती हो तो उ मी प्रत्यक्ष सत्पुरपके समान मेय किसी भी परम उपकार नहीं किया, ऐसा असर निभय कामामें अफर, और इस देोके माविम्य माननमें मी यदि में उस बसर निभयको छोर तो मैंने बामार्थ हो माग दिया, और सबै उफ परीके उपकारके विस्मरण करनेत्र दोष किया, ऐसा ही मानूंगा और नित्य सत्पुरुषी बाबा पने ही नामाका कल्याण'-सतरा मिममासे खत, कोकसंबंधी बप सा प्रकारको काफ्ना अपकर, निमय भी मुनिके सापमें इस प्रयके भगाइन करनेमें हमें भी बाणा महा। उससे पातसा शकावोंच समाधान हो सकेगा। (२) पुस्पको मात्रा पम्नेका पिसका प निभय पता है, मोर को उस मिमयको बारामना करता है, उसे मान सम्पन प्रकारसे फल्लम्स होता है—पा बात मामापा बीचको समय में रसना योग्य है। हमने बो या पचन मिसा है, उसके सब बानी-पुरुप साधी हैं। जिस प्रकारसे से मुनियों को भी परम्प उपचम बौर विकी पर हो, उस उस प्रकारसे मी तपा भी “को उमें पधाति मनाना और वापरण कराना योम्प है। इसी तय बम्प बीच भी बारमार्थक समुस हो, पानी-पुरुपको माया निश्चपको प्राप्त करें, रित परिणामको प्राप्त करें, तपा रस बादिको ममता में करें, स्यादि प्रकारसे एक मामाक निमे ही उपदेश करमा पोल्प है। बनेत्या देहके किसे नाहमाको म्पतीत किया है। देह वाहमापक म्सि म्पतीत को बागी, उस को माम-विचार पामे योम्प समझकर सर्व देशप कस्पना मेकर एक मात्र मामा, 0 उसा उपपोग करना योग्य है, नियम मुमुक्ष बायको मास करना चाहिये । मौसदनात्मस्वास ६६४ महिपाद, बासोन वदी १२ सोम १९५२ पिराधोपितामी! बमासे इस मोर बाने में केवल एक मितिकोतपरको मापासे इस बार माना मरीमा है। बापकी पासे मी साप पम्ममि रोगके सपनो कारण मापक तथा रेवाकर भाईकी बाबाहोनेसे इस मोर विशेष स्थिरता, मोर उस स्थिरता मामाको विशेष निति यती है। में बमईम ऐगको मात शांति से गई। सम्पूर्ण विरो मानेपर उस मोर मानेका विचर , मोर या गाने के पश्चात् मात करके भाई मनासको नापकी तरफ पोरे समय के लिये मेबनेकी , निससे मेरी मावेबके मनको मौ बम मोगा । बाप तापसे पैसा पैश करनेका ये गावपरके मेम-मही , जितु मामा परम कम्पाम करनेकी पाहै। मेरा मातेपरीने पापमान पहुँचे । बाबा स्पचन्द्रका एमात् । मरियार मासोग पदी १५ १९५२ बान महा निर्मका देत होता है मान मनभिकारी मानापम मानेसे प्राप उसे माहितकाम्यहोर र देता है।
३०वाँ वर्ष ६६६ वाणीवा, कार्षिक सुदी १० शामि १९५३ मानेसरीको मर वा बानेसे, क्या कुछ समयसे यहाँ मानेके सबंध उनको विशेष बाकांक्षा होनेसे, गत सोमवारको यस आधा मिल्नेसे, नरियादसे मगलवारको रवाना हुआ था। यों पुपवारको दुपहरका वाना मा। का शरीरमें वेदनीयका बसातारपसे परिणमन गुभा हो, उस समय विचारवान पुरुष शरीरके कन्यथा समावका प्रचार कर, उस शरीर और शरीरके साप संबधसे प्राप्त मी पुत्र भाका मोह छोर देते हैं, वयमा मोहके मद करनेमें प्रति करते हैं। बामसिदिशासका विशेप विचार करना चाहिये । ६६७ पाणीमा, कार्षिक सुदी ११ रवि १९५६ गवतक नीब लोक-पएिका बमन न करे और उससे पतति म झ्ट गाय, तक बानी परिका माहात्म्य इसमें नहीं बा सकता, इसमें साय नहीं। ६६८ प्रमाणाबा, कार्तिक १९५३ *परमपद पप अपना पीवराग दर्शन गीति जिस प्रकार परम वीतरागमे परमपदके पपा उपदेश किया है, उसका मनुसरण कर, उस प्रमुको मजि-गसे प्रणाम करके, उस पंपको पहाँ कहेंगे ॥१॥ पूर्ण सम्पन्दर्शन शान वीर चारित्र ये परमपरके मह कारण । माँ पे तीनों एक स्त्रमानसे परिणमन करते है, वहाँ पुर परिपूर्ण समाधि होती है ॥ २ ॥ मुनीन्द्र सधने मिस प्रकार गा और चेतन मागेका मनसोकन किया है, वैसा तर मास्था प्रगट एनेपर तपोंने उसे दर्शन करा ॥३॥ सम्यक् प्रमाणपूर्वक उन सब भावोंक पानमें मासित होनेको सम्पपान करा गया है। यहाँ संघप विप्रम दौर मोहका नाश हो जाता है ॥ १ ॥ पंच परमरर पोप्या, मी प्रमाने परम पविराम | ते मनुवरप प्रयीने हे प्रमु मति मे || मुल परमपर भरण उम्पदरान पान परम पूष । मत्रमे एक सम्पर पर समाधि पर || में पेवन गा वो भागमा मुनीता तयो । ची भर भात्या प्रमाप रन तो ॥३॥ उम्प प्रमानपूर हे माग्रे मन A माते । तामहान गरम र साना • सी ३५ पार पति का वासी की गुम गई। पास मार मौगिरीयो ।
६२१
भीमद् सपन्द्र
[पत्र १९.१
यो सम्पदर्शनसहित विषयारमको निति गरेपका बमार-
दो बाता है, याँ समाविका
स्नुपाय
नो सुरापरण है प्रकट होताtn५॥
नहाँस्न वानोंके बभिम समावसे परिममन होनेसे वामम्वरूप प्रकट होता है, यहाँ निययसे
बनम्य सम्यापक पूर्ण परमपरकी प्राप्ति होती है ॥ ६ ॥
बीच अनाव पार्य, तपा पुष्प, पाप, वासय, बघ, सबर निरा ये सात दस मिडकर मौ
पाप हाते ॥ ७॥
बीच अनीपमें इन नी तत्तोत्र समावेश हो जाता है। बस्तुका विशेषरूपसे विचार करनके
किसे महान् मुनिरामाने इन्हें मिम मिन प्रक्ति किया ॥ ८॥
६६९ पडामोडा, कार्तिक बदा २ एफ १९५१
पानिपोंने मनुष्यभवको चितामणि रानके समान का है, इसका परि विचार करो तो यह प्रत्यक्ष
समसमें मानेवाली बात है। विशेष विचार करनेसे तो उस मनुप्पमयका एक एक समप मी चिंतामणि
एनसे परम माम्यवान और मम्पवान माझ्म होता है । तपा परि पर मनुष्यमा देशामें हो म्मतीत
ऐ गया, तो पा एक स्टी कौड़ीकी कीमतका मी न0 या निस्सन्दो माङ्म होता है।
६७०
मामीमा प्रतिक बदी १५पुक १९५३
ॐ सर्वज्ञाय नम
जबतक देहका वौर प्रारम्प उदय बसमान हो तबतक सबंधी कुटुमको-विसका मरम
पोपण करनेका सबब म श सकमेकाष्ठा हो अर्षात् गहनासमर्पत मिसक मरण-पोषण करना उचित
हो-पदि भरण-पोषण मात्र मिकता हो तो उसमें मुमुक्षु गाव तोप करके बामहितका हो चार
और पुरपार्य करता है। पाह और देहसबपी कुटुमके मसारम्प बारिक लिये परिमा बारिका
परिणामपूरक स्पतिको मी मही होने देता। पोंकि वे परिणा मादिको प्राप्ति नादि ऐसे सर्प है कि
बाव करके बात्महितके मासरचे ही प्राप्त नहीं होने देते।
६७१
माणीक्षा मंगमि सुदी १ शनि १९५१
सर्वज्ञापनमा
अन्य मामु मनियत प्राप्ति बसौम-अम्बान-ससंग, प्राय करके पूर्वको बनारापकता बम्पर्पको
हनता–दम कारोंसे रमित माँ को रिम चार होगा ऐसे स कामें पूर्वमें कमी भी न
बाना मा प्रतीति न किया गया बापमान न किपाषा और समापसे मसिए ऐसा मार्ग प्राप्त
पिगम निधि पमोनो नमन कर। बीत सम्मान पाचन वा मार सुपार 411
से ममि लम्पचे परचमी मामलस्मन्बार । पूर्व परमपमा समेत मनमम ॥५॥
और मन परापुन पर मात्र तयारमा मोष समानक परामचE
बिहे नोपानो समोर पत्र | ARU, मिा प्रपोमा मयान नए ॥ ८॥
१९७२६१,६४] विपिम पम मादि संग्रह-३०याँ वर्ष काना कठिन हो तो इसमें कुछ वापर्य नही है। रि मी जिसने एक उसे ही प्राप्त करनके सिवाप इसप कर्ज मा झ मही रस्सा, वह इस काठमें मी अश्य हो उस मार्गको प्राप्त करता है। मुमुसु नीव गौकिक कारणोंमें मधिक हर्ष-विपार नहीं करता। ૬૭૨ बपाणीजा मगसिर मुरी ६ गुरु १०५३ प्रौमाणेकपाको देहके छुट जानेके समाचार मालूम हुए । सर्व दोषारी नौब मरणके समीप शरणरहित है। जिसने मात्र उस देहका प्रयमसे ही यथार्थ सप गानकर उसका ममत्व मए कर, निव-स्थिरताको अथवा हानीके मार्गको यथार्य प्रतातिको पा लिया है, जो गौत्र उस मरण-समयमें शरणसहित होकर प्राप फिरसे दर पारण नहीं करता अपना मरणकामें देरके ममत्वमाकी अस्पता होनेसे मी या निर्भय रहता है। के छानेका समय मनियत है, इसलिये विचारवान पुरुष प्रमा-मावस परसे ही उसके ममत्र निरत फरनेके अविशेषा बायोका सामन करते है। वीर इसीका में और हमें सत्रका पक्ष रखना चाहिये । यपि माति-वपनसे से होना सभव है, परन्तु इसमें अन्य कोई उपाय न हानेसे, उस से को वैराग्यम्प रूपमें परिणमन परना ही विचारवानका कम्पहै। ६७३ पापात्रा मगमिर मश १. सोम १०५३ सर्वज्ञापनमा योगवासिष्ठक मादिके दो प्रकरण, पचीकरण, दासबोप तया Rपारसागर पे पंप तुम् विपार करने योग्य है । इनमें किसी प्रयको परि तुमने पहिले ना दो तो मा उने रिसे बाँधना और विचारमा योग्य है। ये प्रपन परतिक नहीं है, पर मानकर उन प्रपोका चार करते हुए धाम प्रम करना उचित नहीं। डाकिक परिमें ना जो बातें अपरा सु-से शोमापुछ गृह आदि भारंम असकार बा परिणसोक-पशिकी विशणता, छोकमान्य धर्मको प्रदानी मानी जाती है उन सब बातों और पसभामा मरण फरमा प्रस्पन मारका ही प्राण फरमा है इस बात को पपा समझे बिना ही तुम उम्दै धारण करते हो, इससे उस रसिका एव नहीं होता। भारंभमें उन बातों और पम्नुमोफ प्रति बह-शिबाना काटिन समार अपर न होने पर पुस्पाप परना ही उचित है। ६७४ बागांमा मगमिर पुरी १२,१०५३ सपनाप नमः मामभिरिको टोकाले पृष्ठ मिठहै। २ परि सामाचा मार्ग राममें भा गप ता इस मनुष्य एप पर मुमत्र मी मोटर तिमी, इममें सराप नही।
१२८ भीमद् रामचन्द्र [पा ५.५,५०६.६.८५.९ ६७५ माणीजा, मंगसिर सुदी १२, १९५६ समग-परित्यागके प्रति पत्रिका तपारूप य एनेपर मी मिस मुमुभुको प्रारम्बनिरोपसे उस पोगका अनुदप पा करता है, और कुटुमा माविक प्रसंग तथा वामीविका बादिके कारण विसको प्रति यती है-चो न्यायपूर्णक करनी परती है, परन्तु उसे स्पागके उपयले प्रतिबंधक समझकर गो उसे सेदपूर्णक ही करता है, ऐसे मुमुक्षुको यह विचारकर कि पूर्वोपार्जित शुमाग्नुम कर्मानुसार ही बागोनिका वादि प्राप्त होगा, मात्र निमितरूप प्रयत्न करना उचित है, किन्तु भयसे वाकुल होकर पिता अपना पापका स्पाग करना उचित नहीं क्योंकि प तो फेस पामोहहै। शुम-बम प्रारम्पके वनुसार प्रासि ही होती है। प्रपल तो केवल म्यापारिक मिमित है, इसलिये उसे करना उचित है, परन्तु पिता तो मात्र बाम-गुणका निरोप करनेवाग , इसकिने उसका शान्त करना ही योग्य है। ६७६ पपाणीबा, मंगसिर पदरी ११ बुध १९५५ बारम तया परिमाको प्रति बारमहितको अनेक प्रकारसे रोकनेवाणी पपणा सरसमागम योगमें एक विशेष भवरापका कारण समझकर हानी-पुरुन उसके पागरूपसे बाल सपमका उपदेश किया । यो प्राप तुमें प्रप्त है । तपा तुम यथार्प मान-संपमको विकासासे प्रवृत्ति करते हो, सकिने समूल्प मासर प्राप्त हवा समझ कर पुरुषों के बचोकी भनुप्रेधाशय, सत्याच अप्रतिषता वोर वितकी एकापताको सफल करना उचित है। ६७७ माणामा, मगसिर या ११ पुष १९५६ पैगम्य और उपशमको विशेष मानके लिये माननाघोष, पोगवासिष्ठफे नारिके दो प्रकरण, पंचीकरण स्यादि पोंका विचारमा योम्प है। गानमें प्रमाद विशेष समिपे माहमाके कार्यमें गालको नियमित होकर भी उस प्रमावको दूर करमा चाहियेाश्य दूर करना चाहिये । ६७८ वाणांचा पौष सदी १ भौम १९५६ विषम मातके निमिर्तोके बम्बानरूपसे प्रास होनेपर मी गो बाला-पुरुप अपिपम उपपोगमे ये है, यते । वीर मविपमें येगे उन सबको बारम्बार नमस्कार ! सत्तम्से राहत उपसे तप तप उत्तरसे उत्तर नियम, आपसे उतरा सम्धि, सारपसे साहस ऐप्स-पे मिसमें सहाय ही समा गाते। ऐसे निरपेक्ष विषम उपयोगको ममस्कार हो! पहा पान है। - ६७९ पपानीमा पौप दी ११ पुष १.५१ गरेपके प्ररपक्ष बयान निमित्त प्राप्त होनेपर मी विसत्र मात्ममा मिचिम्मान भी धोमको ant होता, उस शानो शाम चार करनेसे मी महा निर्णय होती, इसमें संशप नहीं।
फा १८,५८१,५८१ ९३] विविध पर मारिसमाह-पों वर्ष ६८० माणामा, पौर वदी १ शुक्र १९५५ बार्रम मोर परिमाका इच्छापूर्वक प्रसग हो तो यह मारम-छामको विशेप पावक है, मौर बारम्बार वस्पिर और अप्रशस्त परिणामका हेतु है, इसमें तो सशप नहीं। परन्तु वाँ भनिभमसे मी उदयके किसी योगसे यह प्रसग यता हो हो मी यात्मभावको तकरताको बाषक वीर वाम स्थिरताको पतराय करनेवाले उस वारंभ-परिमका प्राय प्रसग होता है। इसलिय परम पाल बानी-पुरुषोंने स्पागमार्गका मो उपदेश दिया है, यह मुमुमु गौषको एक पासे और देशसे अनुकरण करने योग्य है। मोरबी, माघ मुदी ९ बुध १९५३ म्यसे, मेरसे, कार और मानसे-इन चार तरसे, बारममावसे प्राचि करनेवासे निधिको चो मप्रतिपमान कहा है-या पिशेप अनुप्रेक्षण करने योम्प है। ६८२ मोरबी, माघ सुदी ९ शुभ १९५३ (१) कोई पुरुप स्वय । विशेप सदाचारमें बौर सयममें प्रासि करता हो, तो उसके समा- गममें वानकी इच्छा करनेवाले नामोंको, उस परसिके जबलोकनसे वैसा सदाचार तथा सपमका छाम होता है, पैसा गम प्रायः करके विस्तृत उपदेशसे मी नहीं होता, यह उसमें रहना योय है। (२) जामसिदिका विचार करमेसे क्या कुछ भारमासमी वनप्रेमा रातीहैया महो। (३) परमार्य-रि-पुरुषको मारप करने योग्य ऐसे समागमके काममें विकापहप तय कम्प नही है। समाय मम । ६८३ मोरबी, माघ की : रवि १९५३ (१) संततका परिचप न हो तो करना । (२) जिस तय न्य मुमुसु गौओंके बिच बार वंगमें निर्मठ भावको पनि हो, उस तब प्राति करना चाहिये । बिस तए निपमित्त प्रवण किपा माप, बीर यह बात चित हो गाय कि मारम-परिमाके स्वरूपको सम्यक् प्रकारसे समझनेसे निचि और निर्ममताके यातसे प्रतिबंधक मौद, तथा उस तर परस्पर जानकपा हो वैसा करना चाहिये । ६८४ मोरबी, माघ पदी १ रमि १९५१ (१) सकल संसारी इन्द्रिपरामी, पनि गुण मावपरामी है। मुरुपपणे भावमरामी, कपिप निष्कामी रे ॥ जय मुजमे ही रमण परनेबारे रे मोर निम्मी माघमणमा ।। रनवते मातमयमै पते, उनी निनामी का बायो।
भीमद् पत्रचन्द्र [1 अप्पासाय -श्या परिणामकी कुछ स्पाहपसे प्रति । सकस्प- प्रति करमेका कुन निर्मारित बप्पासाय । विकम्प -प्राप्ति करनेका फुल अपूर्ण, वनिर्धारित, सशस्मक अभ्यासाय । सवा -भागे पागेकी कुछ विशेष विमति भपका स्मृति । परिणाम -यसके बप्प समातकी तरा दम्पको कयचित् अगस्पांतर पानेको यो सात उस बास्पातर विशेष भारापा परिणति । कान -मिप्यारमसहित मविज्ञान वया भुवयान । विमगाम -मिपालसहित पतीन्द्रिय पान । विशाल -कुछ मिशेष बान। (२) मुर पैतम्य गुर पैन्य पुर चैतन्य सदायको प्रति-सम्पम्दर्शन भुगारमपद कानको सीमा कौनसी। मिराबरण जानकी क्या स्पिति है! क्या मौत एकातसे घटता है। प्पान और बध्ययन । स० बप मैनमार्ग १-सस्थान २ धर्म वधर्म बाकारा अम्म . सुपम एपमादि का ५. उस उस कसमें मारत भारि को स्पिति, मनुष्यको सामारिका प्रमाण । ६ सूक्ष्म निगोर ७दो प्रचार पौष-मम्प मौर अमम्प ८ पारिगानिक मापसे विमान दशा ९. प्रदेश और समय-उसका कुछ म्यागारिक पारमार्षिक सरुम १ गुण-समुरापसे इम्मका मित्र ११ प्रदेश-समुपच कमान १२ रूप रस गरऔर सरसि परमाणु मिमता पिपिए परमादि संग्रह-२०षों प4 . १५ प्रदेशका सोच-विकास १. उससे घनत्व या सूस्मत १५ वस्पर्शगति १६ एक ही समयमें यहाँ और सिरक्षेत्रमें बस्तित्व, अपना उसी समयमें बगेकांत-गमन १७ सिदसनधी वबगाह १८ चौपका तथा पप पार्थकी अपेक्षासे अवधि मन पर्यव और केयानको मुख म्पावहारिक पारमार्षिक म्पासा 'उसी प्रकारसे मति-सुतकी मी म्पारूपा १९ फेबहानकी कोई अन्य म्यास्या २० क्षेत्रप्रमाणकी कोई बाप म्यास्या २१ समस्त विसका एक रेवतत्वपर विचार २२ केसानके बिना किसी अन्य घामसे जीके सकपका प्रत्यक्षमपसे द्रण २३ बिमावका उपादान कारण २१ तथा उसका समाधानके पोम्प कोई प्रकार २५ इस कामें दस बोके म्यपणेद होनेका कोई माप यस्य २५ केवळानके दो भेद बीजभूत केवगान और सम्पूर्ण फेरभान २७ पौर्य बादि भरमाक गुणोंमें पेतनता २८ पानसे बात्माकी भिमता २९ वर्तमानकाळमें बालके स्परा अनुभव होनेके ध्यान के मुख्य भेद १. उनमें मी सरकार मुख्य मेद २१ अतिशयका स्वरूप २२ (पाठसी) गम्भिया ऐसी मानी जाती हैं मो बीतताप माननेसे सिम होती है ३१ मेक-दर्शनका मतमानकासमें कोई सुगम मार्ग ११ देशक-दर्शनका बर्तमानकाळमें मुगम मार्ग १५ सिपल-पपोम सादि-अनत, मोक्ष वनादि-अनत० १६ परिणामी पार्य पदि निरंतर साकार परिणामी होतो मी उसका कम्यबस्फ्ति परिमामी- फ्ना तया नो मनादिसे हो पा केपणानमें भासमान हो-ये पराम किस तरफ सकते। (.) १ फर्मम्पवस्था २ समाता ३ पारिणामिकता २ नाना प्रकारफे चार बार समाशन भीमद् पसपन्द्र [पत्र.९९ - ५. वन्यसे म्यून परामब ६ नहाँ माँ अन्य स्व विकही नही या अधिक है। तपा पहों पर निकल रिसाई देता है, वही बम्प किसीकी पित् परिकसता यही है, अपपा नहीं । *६९१ बर्मा, भाषम १९५० (१) १ रिस पत्रमें प्रापच भाप्रपका ससप मिसा या पत्र यहाँ मिग है। मुमुसु जावको परम मचिसहित उस सस्पकी उपासना करनी चाहिये । २ रोसपुरुप पोग-मम्मनित-जिनका उपश गवसे नायको पोरे हो प्रयाससे मोपका सापनम्म हो सके ऐसे अतिशयसहित होता है, पप गिस समय उसे प्रारम्बके अनुसार उपदेश- म्पबहारका उदय प्राप्त होता ह उसी समप मुम्परूपसे प्राप उस मस्तिरूप प्रस्पक्ष-बाभम-मार्गम प्रकाशित करतारे से उदय-पोगके बिना यह प्राप उसे प्रकाशित मही करता। ३ सत्पुरुप नो प्राय दूसर किसी म्पबहारके योग मुस्पतपसे उस मार्गको प्रकाशित मही करते तो उनका फरमा-पमान है । गल्के बांका उपकार पूर्णपर विरोधको प्राप्त न हो वपना मात्से गायोंका उपकार हो स्पाPि नेक कारणों को देसकर मम्य म्पपहार प्राधिकरते समय, सत्पुरुप से प्रत्यक्षा-बामपरप-मार्गको प्रकाशित नही करते । प्राय करके ता अन्य म्पबहारके उसमें के बाकर होयते ।बपना किसी प्रारम्परिशेपसे ये सम्पुस्परूपसे किसीके चाननेमें वामे भी हों, तो मी उसके पूर्वापर प्रेमका विचार करके, गाँतक बने पातक वे किसी विशेष प्रसगमें नहीं पाते । सपने मात करके अन्य म्पबहारके उदयमें सामाम्प मनुप्पी तय हो चरते हैं। १ तथा मिस्से उस तय प्रारि को गाप बैसा प्रारम्भ न हो तो वहाँ कोई उस उपदेशका अबसर प्रास होता है, हाँ मी प्राय करके ये प्रत्यक्ष वामप-मार्गका ठपरेश महारते । कपित् प्रत्यक्ष वामप-मार्गक स्पानपर 'वामप-मार्ग इस सामाप शपसे अनेक प्रकारका ख देखकर ही कुराते बर्षात् में उपश-म्यमारके पाने के लिये उपदेश मही करते। (२) प्राप करके रो किम्हा मुमुमुलोको हमारा समागम मा है उनको हमारी शाके समपमें पो पाव बरस प्रतीति है। फिर मौ यदि किसीको मी समगम न मा होता तो अधिक योग्य था। पहाँ यो छ म्पपहार उइयमें यता मा म्पबहार भादि मनिप्पमें सत्यमें बाले पोप है। ऐसा मानकर, रावक तपाउपदेश-पहारका उत्य प्राप्त न इषा हो तबतक हमारी दशाके विपर्मे तुम गोको गो म समसमें मापा से उसे प्रकासित न करमेके लिये काम, पही मुम्स कारण पा और का भी है। मा पत्रकापमाना।
५९२ भानन्दन पानीसी-विरेचन] विपिन पत्र मावि समर-२०षों पप ६९२यो गाणीवा मोरबी, कार्तिकसे फागुन १९५३ भीमानन्दघमजी पौवीसी विवेचन अपम मिनेवर मातम माहरो रे, भोर न पाहु रे केस । रीस्यो साहिष सग न परिहरे रे, मांगे सादि मनं ॥ अपम०॥ नामिरामाके पुत्र प्रीऋषमदेवया तोफ्कर मेरे परम प्रिय है। इस कारण मैं अन्य किसी भी स्वामीकी इस नहीं करती । ये स्वामी ऐसे है कि नो प्रसन होनेपर फिर मी मी सग नहीं छोपते । मेय इनका सग एषा है इसलिये तो उसकी बादि है, परन्तु यह सग पटत होनेसे बनस॥१॥ विशेषार्थ सो सरूप-निबाप्त पुरुपो में बिहोंने पूर्ण शुद्ध स्वरूपको प्राप्त कर मिया र ऐसे भगवान्के स्वरूपमें मपमा पतिको तन्मय करते हैं । इससे उनकी स्वरूपदशा बागृत होती पाती, बोर बह सोकर पथास्पात पारित्रको प्राप्त होता है। जैसा मगवान्का सरूप हैसा ही सुदनयको अपेक्षा वामान भी सम्म है। इस बारमा गौर सिदभगवानके स्वरूपमें केपट मौपाधिक भेद है। यदि सामाषिक सलपसे देखते हैं तो धारमा सिमगवान्के हो म्प है। दोनोंमें इतना ही मेर है कि सिखभगवान्का सम्बप निराकरण है, वौर वर्तमानमें इस मास्माका स्वरूप भावरणसरित है। बस्तुत इनमें कोई भी भेद नहीं । उस वावरणके क्षीण हो बानेसे वास्माका सिद्धस्तम्प प्रगट होता है। तया बतक यह सिवस्वरूप प्रगट नहीं खा बसक निगहोम सामाविक पुर सरुपको प्राप्त कर लिया है ऐसे सिनमगवानकी उपासना करमी हो योम्प है । इसी तरह बामगवान्की मी उपासना करनी चाहिये क्योकि ये मगवान् सयोगी-सिर । पपपि सपोगरूप प्रारम्बके कारण ने दोषाप है, परस्त ने भगवान् स्वरूप-समवस्पित है । सिनमगवान् और उनके पान, दर्शन, पारित्र अपना पार्यमें कुछ भी भेमा है। अर्थात् वामगमान्को उपासना मी या बारमा स्वनाम मयताको प्राप्त कर सकती है। पूर्व महामामोंने हा मे माग मरित, दमाणपजयीय । सोनाणा निप मप्पा, मोही सह बाइ वस्स सर्प । —जो ववमगवान्का स्वरूप, इम्य गुण और पर्यायसे मानता है, अपनी बारमाने समाफको मानता है, और निमपसे उसका मोह नाश हो जाता है। उस भगवान्को उपारम्ना गायों को किस अनुक्रमसे करनी चाहिये, उसे प्रोमानेदपनी नौ स्तनमें करनेवाले है, उसे उस प्रसगपर निस्वारसे करेंगे । मगवानसिरके नाम, गोत्र वेदनाप और बायु इन फोका मी वमान रहता है। मगवान् सर्वपा कमसि रहित है । तपा मगवानुमतको केक्स बारम्वरूपको बावरण करनेवास कामा । धप । परन्तु उने पर कोए चार कर्मोका दम करके धोण करनेपर्पत-पूनम यो इस कमण से परमारमा साकार-मगणान् करे गाने पोम्प है। सन बातमगवान्में, निम्होंने पूर्वमें तीर नामकर्म शुमयोग उत्पम किपा , सीकर मगवान् को गाते हैं। उनका प्रताप उपदेश पठ मार महत्पुण्यपोगफे उदरसे माधर्मकारक शेनाको प्राप्त होता।
भीम पमपत्र [१९२ माननन सेस भरमें वर्तमान अवसर्पिणीकायमें भाजपमदवसे गाकर श्रीवर्धमानतक ऐसे पोस तापकर हो गये। पर्तमानकालमें वे मगवान् सिदाम्पमें सहपस्थितभावसे विराजमान है। परस्त मूब प्रापमाप नपसे उनमें वीर्यकरपरका उपचार किया जाता है। उस औपचारिक नपरष्टिसे उन चौबीस भगवानोंक स्तबनरूम इन पौगास स्तबनोंकी रचना की गई है। सिरमगवान् सपा मूर्तपदमें स्थित है इसरिये उनका सहम सामान्यरूपसे चितवन करना कठिन है। तथा तमगवान्का सहप भी मारिसे चितलम परमा तो वैसा ही कठिम है, परन्तु स्पोगा- परके मरमपूर्वक पितान करनेसे प सामान्य जीवोंकी भी पति स्थिर होनेका कुछ सुगम उपाप ।स कारण तमगमान्के स्तम्नसे सिरपरका स्तवन हो मानेपर मौ इतना विशेष उपकार समा- कर मावानवपनाने पोलीस तरीके स्तनहप इस चौबीसीकी रचना की है। नमस्कारमत्रमें मी प्रपम तपरके रखनेका पोती कि उनका हमारे प्रति विशेष उपकारमान है। भगवान्ये सहपका चितवन करना पर परमार्थापियुछ पुरुषों को गौमतासे मिगतरूपका होलिन करना है। सिरप्राप्त का? भारिस सिदसहायो, वारिस सहापो सममीराम । वमा सिदेवई, कायम्मा भमनी ।। -वैसा सिरमगवान्का वामस्वरूप है, पैसा ही सब मीयोंकी वारमाका प्लस्म है, इसलिये भप बालोंको सिदत्वमें सपि करना चाहिये । सो तर मादेवकनस्मामाने मोबासपूम्पके स्तवनमें का। मिनमा रे है निमपूमना--पदि यपा ममारिसे देखें तो बिनमगवान्की पूरी हो माय- स्वरूपका प्रवन है। इस तय स्वरूपको बाबा रखनेवाले महारमा माने मिनमगवान गौर सिबमगवान्को उपासनाको तस्मकी प्राप्तिका हेतु माता है। क्षीणमोह गुणस्थानतक सस सससपका पिताम करना भानको प्रबह बमन है। तपा मात्र बोले पप्पारमस्वरूप पिंतपन नीको म्पामोह पैदा करता है, तसे पाय एकता प्रात पता है क्या सेश्माचारिता उत्तम करत्व वपमा उन्मत प्रताप-वता उत्पा करता है। सपा मगवान् के स्वरूपके पातके मानसे मणिप्रभात शि होती है और बप्पामधी गम ऐती। इससे मुकता, प्रचारिता और उम्पत्त-प्रमफिल महीं होता। बादशा प्रपोमेसे लाभानिक बप्पामप्रमानता होती. मामा उब गुणोका सेवन करती है बर्षात् शुकता बानि दोष सापय नही हो और मधिमार्गक प्रति मी सुगुप्सा नही होती तथा सामानिक भामदशा सरूम-निताको प्रश्न करती जाती है। गौमात् मारक सरूपके मानके मनके बिमा परि पामाधमता सेवन करती है, माँ
१९२ पानम्दान वीसी-चिन] पिषिष पथ मादि सप्रह-ब्बों वर्ष
(२)
बीवरागियोंमें ईपर ऐसे अपमदेवभगवान् मेरे स्वामी है। इस कारण वा मैं किसी दूसरे कतको
इम नहीं करती। क्योकि में प्रभु यदि एक बार मी राह पोय तो फिर छोरते नहीं हैं। उन प्रमुका
योग प्राप्त होना मह उसकी बादि है, परन्तु मा योग कभी मौ निहत नहीं होता, इसम्येि मानत है।
चैतन्याति नो बगरके भावोसे उदासीन होकर, पुश्चतम्प-स्वमाबमें समास्थित भगान्में
मोतियुक हो गई है, आनदघनना उसके हर्पका प्रदर्शन करते हैं।
अपनी प्रदा नामकी ससीको बानदघननीकी चैतन्याति कहती है कि हे ससि ! मन अपमन
भगवान्को साप उन किया है और पा मगवान् मुस सर्वप्रिय है। यह मगवान् मेरा पति हुजा है,
इसलिये पत्र में अन्य किसी मी पतिकी कमी मी इच्छा न करेंगी क्योंकि अन्य सब जीव बग्म चरा,
मरण पादु मौस माफुल म्याकुल है-क्षणभरके लिये मी मुसा नहीं है। एसे सीमोंको पति बनानेस
मुझे पुस कहसि हो सकता है। तया मगवान् अपमदेव तो धनन्त वम्यानाभ सुस-समाधिको प्राप्त हुए
हैं, इसलिये यदि उनका बाप प्राण कह तो मुछ मी उस वस्तुको प्राप्ति । सकती है। वर्तमानमें
सस योगके मिसनेसे, हे सन्ति ! मुझ परम शीतलताई है। दूसरे पतियोंका तो कमी नियोग मी हो
जाता है, परन्तु मेरे इस सामीका ता कमी मी वियोग हो ही नहीं हो सकता। सबसे पर स्मामी
प्रसम हवा तमासे यह कभी मी सग नहीं छोड़ता । इस स्वामीके योगके स्वमालको सिमातमें 'सावि
अनंत' कहा है, वर्षात् उस पोगके होनेकी भादि पो है, परन्तु उसका कभी भी रियोग होनेबाठा
नही, इसलिये र ममत है। इस कारण वा मुझे कमी मी उस पतिका वियोग नहीं होगा ॥१॥
हे सति ! इस जगत्में पतिका योग म होमके लिये सियाँ मो नाना प्रकारके उपाय करती
है, वे उपाय पपार्प उपाय नहीं है, और इस तरह मेरे पतिकी प्राप्ति नहीं होती । उन उपायोंको
मिग्या बतानेके सिपे उममेंसे पोरेसे उपापोंको तुझे काती ।
कोई दी तो पतिको साप काग्में बउ मानेकी एग करती है, मिससे सा ही पतिको साप
मिडाप ये। परन्तु वह मिठाप कुछ समझ नहीं है क्योकि या पति तो अपने कर्मानुसार माँ उसे जाना
पा वहाँ चला गया और जो भी सती होकर पतिसे मिसनेकी इम्या करता है, यह मी मी मिसााके
लिये किसी पिताम जसकर मरनेकी ही इशा करती है, परन्तु उसे ता वपन फर्मामुमार की देर
पारण करना है। दोनों एक ही जगह देह धारण करें वौर पति-पत्नीलपमे सबर होकर निरतर समका
माननानगाव भीमपनि सानो पाँच पप निम प्रकार :-
काम मिनबा प्रीतम मारणे, भोर न पाईरेस।
पोखरा रंगन परिदोरे भाग गाभिनव पम ॥१॥
प्रेत कारण परमात करो मन भने बाप ।
ए मैन्न नबिपि भवरे मनमे राम म अप || करम ॥२॥
फोर परिम्न मनिपगुजरे परिम्न दनवार ।
प पसिरमन में नपिरित परे रम्न बानुमेयर काम
कोई को बंधारे महान भात प्यारे तन पूर मन भाए।
रोष रहिलने म नरि परे से मना परिमाना काम
पिच प्रसपरे पूम्मत परे पूरा मधील ए।
सरपत पईममतम-भरपत्रा रे, मानरपसरदय । काम ॥५॥-अनुसार
॥४॥
- भीमद् रामचन्द्र [६९२ माननम्न कोरियन मोग करें, ऐसा कुछ नियम नहीं है। मत् निस पतिका वियोग हो गया, और बिसर म्योग भी बब समझ नही या, ऐस पतिका यो मिगप उसे मैने मिष्या समझा है, क्योंकि उसका नाम टिकाना कुछ महो। वा प्रपम फ्का पह बर्ष मी हावा-परमेपरमप पतिकी प्राप्तिके छिपे के काष्ठका मभण करता है, वर्मात् पचाम्मिको धनी भगकर उसमें काष्ठ होमकर, कोई उस वमिका परिपा समान करता है, और इससे ऐसा समझता हम परमेश्वरमप पतिको पा मंगे, परन्तु यह समझना मिया है। क्योंकि उसका तो पचामि तपने ही प्राप्ति यती है। उस पतिका सारूप मानकर, उस पतिके प्रसन्न होनेके कारणोंको बानकर, कुछ उन कारणोंको उपासना मही करता इसठिपे फिर पर परमेश्वररुप पतिको कस पायेगा । यह तो उसको मतिका विस समाष परिणमन राजा है, सी हो गतिको पायेगा इस कारण उस मिश्रापका कोई मा नाम ठिकाना नही ॥२॥ हे ससि ! कोई पतिको रिझाने के लिये अनेक प्रकारके तप करता है, परन्तु व केरस शरीरको हो सताप देता है। इसे मैंने पसिके असम करनेका मार्ग नही समझा । पतिके रमन करमेके सिपे तो दोनोंची पातुओका मिसाप हाना पाहिये । कई बीच कितने ही करस तप करके अपने पति के रिक्षाको इन्चा करे, तो मा जबतक यह मी अफ्नो प्रकृतिको पतिकी प्रातिक समावानुसार म कर सके, तबतक प्रकृतिको प्रति- सताके कारण प पति कभी मी प्रसम नहीं होता और उसनको मात्र अपन शरीर में ही सुपा वासितापच माप्ति होती है। इसी तय किसी मुमुक्षुकी बपि भगवानको पतिरूपसे प्राप्त करनेकी हो तो यह परि मग- मान्के स्वरूप अनुसार मृत्ति न करे, वौर पप सकपमें रूपिमान होते हुए, अनेक प्रकारका तप करके कारका सेवन करे तो मी म भगवानको प्राप्त नही कर सकता। पोंकि रिस तय पति-पत्नीका समा मिसाप बार सपा प्रता पातु एकसमें हो। उसी तपो सम्मिा भगवान्में इस पवित्र पतित्र स्थान करके उसे पास रखना हो तो उस मगवानको साप पाज-मिलाप करना ही पोम्प है। मर्यात् उन भगवान्ने यो पुस्पैम्प पाशुरुमसे परिणमन किया है, सी एम पैलपाति कर नेस हो उस भानुसे प्रति समानके मित्रत होनेसे ऐक्य होना समय, बौर उसी पानुके मिसापसे उस भगवान्नप पतिकी प्राप्तिका कमी मा रियोग नहीं होगा ॥३॥ हे समि । कोई गिर ऐसा करता है कि पा जगत् ऐसे मगवानको तोला है कि मिसके तरूपको पहिचान समेका सही मारो साता और ममम मगवान् सरपणा पूर्ण करतास कारण पर इस जगत्को भगवानको सीमा मानकर उस समपसे उस मगवान्को महिमाके गान करमेमें ही भानी पूर्ण होगा--भगवान् प्रसन्न होकर उसमें संममता करेंगे-एसा मानता है। परन्तु यह मिप्पा है। क्योकि यह मामा के सपा प्रान म होने दी ऐमा मता है। मा मगमन् मर्मत हान-दर्शनमप सारस पुन समाधिमप है ए मगवाम् इस गधन रित यो मना है। भीर मन मारण प्रानि मिस तरह हो सकता की प्राति तो मोम होमा। जो पूर्ण समारो कुरा मा प्रमही रत्व । तपा मगधन् १९२मानन्दफ्न पौनीसी-विपन] विविध पत्र मावि संप्रा-वों वर्ष तो मनत अम्पावाध मुससे पूर्ण है। उनमें अन्य कोई कस्पना फरासि वा सकती है। व्या साठगकी उत्पत्ति सो कुवाल पिसे होती ह और पैसी कुलाइ धितो बान-मुसको मपरिपूर्णतासे होती है। तया मगवान् भान आर पुरा दोनोंसे परिपूर्ण है, इसलिये उनकी प्रापि रगत्को रचनेसप छोराक प्रति कमी भी नहीं हो सकती । तथा यह सीसा तो दोपका विलास है और ए सरगांके हो समग? । सथा जो सरागी होता हमारेपसहित होता है, और जिसे ये दोनों होते हैं, उसे क्रोध, मान, मापा, मोम आदि सब दोगेका होना मी समा है । इस कारण पयार्य दृष्ठिसे देसनेसे तो लोठा दोषका ही मिठास यदरता है, मेर ऐसे दाप-विलासकी ता इन्ठा नभानी ही करता है। जब विचारवान मुमुसु भी ऐसे दोप-विकासको स्या नहीं करते, ता फिर अनत ज्ञानमय भगवान् ता उसकी इच्छा कैसे कर सकते है। इस कारण गे उस मगवान्के सहपको मंगफ मावसे समझता है यह भान्ति है, बार उस भान्तिका अनुसरण करके बो भगवान्के प्रसन करनके मार्गको प्रहण करता है, यह मार्ग भी भान्तिरूप ही है। इस कारण उसे उस मगवानरूप पतिकी प्रामि नहीं होती ॥४॥ हे सशि पतिके प्रसन करनके तो बनेक प्रकार हैं। शाहरणके लिये भनेक प्रकार के पार स्पर्ध वारिक मोगसे पतिको सेवा की जाती है। परन्तु उन सबमें पित्तकी प्रसता ही सबस उत्तम सेवा है, और यह ऐसा सेवा । जो कभी मी सरित नहीं होती । कपटीत होकर बारमसमम करके पतिकी मा करनेस वस्पन्स वानरके समूहको प्राप्तिका भायोग्य होता है। भगवानरूप पतिको सेनाके भनेक प्रकार है-जैसे द्रव्यपूजा, भावपूमा, बावाजा । दम्पपूगाके मी बनेक भेद है। उनमें सर्वोत्तए पूना तो चित्तको प्रसमता-उम भगवान्में पैम्पत्तिका परम हम एकसको प्राप्त करना ही है। उसमें ही सव सारन समा बात है। यही नहरित पूगा है, पाकि यह चित्त भगवान्में ठान हो तो दूसरे योग मी विपके गाधीन होनेसे रे भगवान्क ही माधान यत है और यदि भगवान से पित्तकी सीनता दूर म हो वा हो बगतक मानोंमें उदासीनता पी, भौर उसमें प्राण-स्पागरूप किम्प नहीं रहते । इस कारण वह सबा वसाही यता है। सबतक रित्तमें अन्य कोई भाव से तबतक पनि इस बातका प्रर्शन किया जाप कि 'तुमारे वित्राय मेरा दूसरे किसीमें कोई मी भाव नही', ता बरथा है और कर कपर है, भार जबतक का पता है तबतक मगवान्के परणमें भामसमर्पण कहसि हो सकता है। इस कारण जगत्के स माकि प्रति नियम प्राप्त करके तिको पुर चतन्यभावपुल करनेसे ही, उमरतिमें क्पमाल न गनेके कारण, वृत्ति पुर की जाती है और उसे ही निकपर करते हैं। ऐसा पतन्याति भगवान्में सीन की माप तो नही आग्मसमर्पणता यो नासी है। पन धान्य मादि सब कुछ मगवान्फो अर्पण कर पा हो, परम्नु पनि भामसमर्पण म किया हो, बर्षात् उस पारमाफी विका मगवान्म गान न की हा, तो उस धन पात्य आरिका वर्पण करना सम्पत है। क्योंकि मर्पण रमेवानी मामा भपका उसी रति ता किसी दूसरी जगह सीन एबी है। तथा गो सप इस मगह छीन है उसा अर्पण किये हुए मरे ग पाय मगवान्में घाम मत हा सस्ते है। इसलिये मगगनमें विधिको सौनता ही मामसर्मागता है, मोर पहा मानदपन पदका रमा नात् परम भम्पावाल मुखमप मोशप को निशानी है । भर्षात से मार्य प्राप्ति हो गाय या परम मापनस्ताप मोशका प्राप्त होगा । या एमण ही समापन १.५ति प्रापमग्नि-स्तवन ।
भीमद् पसन्द [१९२ मानमरपन पौरिया प्रथम स्तम्नमें मगवान्में प्रतिक सौन होमरूप को बताया है, परन्तु वह पि असं वीर पूर्णरूपसे न हो तो ही मानदफ्न-पदको प्राप्ति हो सकती है। इससे उस पतिको पूर्णताकी राम करते ए मी भान पनी दूसरे तीर्थकर मौवनितनाथका सबन करते हैं। भो पूर्णताकी ला है, उसके प्राप्त होने नो नो विन हमने हैं, उनै मानदघनमी मगवान् के दूसरे स्वबनमें सक्षेपसे निवेदन करते है और मफ्न पुरुषत्वको मद देखकर मेदसिम होते है स तय ऐसी मायनाका चितवन करते है जिससे पुस्पच बाप्रत ये। रेससि ! दूसरे तापकर मनिकनाथ भगवान्ने यो पूर्ण मनताके मौका प्रदर्शन किया है- गो सम्पर चारित्ररूप मार्ग प्रकाशित किया है-उसे जब में देगती ! तो या मार्ग बमित है- मेरे समान निट चिके मुमुक्षुसे अमेय है। सपा मगवान्का जो अमित नाम है पर सस्प है, क्योंकि यो यो पो पराक्रमी पुस्प को पाते हैं, उनके द्वारा मी निस गुणक पामरूप पंपका स्म नहीं था, उसका भगवान्ने वय किया है। सम्मेि मगवान्का अमित माम सार्थक हो है, और बनत गुणोंके मामम्म उस माकि गौतनेसे मगवान्का गुणोंका पाम का माना सिद्ध है। ससि ! परन्तु मेरा नाम मो पुरुष कहा जाता है सस्य मही । तया भगवान्का नाम सो बनित है। मिस तण यह नाम तद्रूप गुणों के कारण है, उसी तय मेरा नाम भो पुरषोमा तद्रूप गुणों के कारण मारी। पोंकि पुरुप तो उसे कहा जाता है जो पुरुषार्पसे सरित हो पराकमसे सहित हो। परन्तु में तो पैसा हूँ नहीं । इसलिये मैं भगवान् से करता कि मगन् । उमारा नाम गो अमित है या पपार्थ है, बोर मेरा नाम को पुपम मिथ्या है। क्योंकि पग रेप, महान, क्रोध, मान, माया, मेम बादि दोपोंका तुमने जप किया ।स कारण तुम बमित को जाने पोम्य हो, परत उन्हा दोपौने तो मुझे गीत लिया है इसम्पेि मेरा नाम पुरुप कसे कहा जा सकता है।॥१॥ है ससि ! उस मार्गको पाने के लिये दिम्प नेत्रोंकी वापसकता है। बर्मनोंसे देखते र तो समस्त ससार भूम हो मा है। उस परम तत्वका विचार होनेके मिसे बिन बिम्प मेत्रोंकी माश्यकता है उम Pम्प नेत्रका निपपसे पर्तमामकाउमें वियोग हो गया है। है ससि ! उस अगितमगवान्का ममित होनेके लिये प्राण कपा मा मार्ग कुछ इन धर्मचनुमसे रिसाई नही पाता । पोपि प मार्ग रम्प है, और उसका तरामापिसे हो र मोकन मिमा जा सकता है। जैसे एक गाँसे दूसरे गारमें गाने पे पिणापर साफ बगैण मार्ग बात है उस तय पा बाप मार्ग महो। अपामा चर्मपशुसेटेसमेपर दिसाई पानेवाला मार्ग मारे पुण धर्मचमुझे मा भन्दिप मार्ग दिसई नही देता ॥ २ ॥ अपूर्ण मातरम्नमेल मलिनाव लम्न पप सप्रम- पंचो मारेबान और भनि मभित गुमनाम | देबारे चिनिपुण रिसरमाम । सो ॥१॥ परवर मलारे भूमो समन्दिर । निबनेभरमारय म्यारो परिलो ५५५,५९४] विविध पन भादि सपा-पाँवर्ष ६५१ ६९३ देशातपुत्र मगवन् ! काकी पस्त्रिारी है। इस मारतके पुष्पहीन मनुष्योंको वेरा सस्य पसर पर पूर्वापर विरोधीत शासन कहाँस प्राप्त हो सकता है उसके प्राप्त होनेमें इस प्रकार के वित वपस्थित हुए। मेरे उपदेश दिये हुए शानों की कल्पित वर्षस विराममा की, कितनोंका वो समूह मन कर दिया, ध्यानका कार्य और सस्पका कारणरूप मो सेरी प्रतिमा है, उससे कानपरिसे हासों गेग फिर गये, वौर सेरे बादमें परपरासे मोबाचार्य पुरुष हुए उनके बचोंमें और तेरे पचनोंमें मी शका गल दी-एकान्तका उपयोग करके तेरे शासनको निन्दा की। हे शासन देवि ! कुछ ऐसी सहायता कर कि जिससे मैं दूसरोंको फम्याण-मार्गका मोध कर सई- रसका प्रदर्शन कर सई-उसे सवे पुरुष प्रर्शित कर सकें। वम निर्मन्य प्रवचनके वोधको मोर निराकर उमें इन मारम-विरोधक से पीछे सींचनेमें सहायता प्रदान कर 1 समाधि चौर बोधिमें वायवा करना तेरा धर्म है। ६९४ ॐनमा . मनत प्रकारके शारीरिक और मानसिक दु से लाकुछ म्याकुल पापोंकी, उन सोसे स्टनेकी पास बहुत प्रकारसे इच्छा होनेपर भी वे उनसे मुक मही हो सकते-सका क्या कारण प्रश्न अनेक मानोंको एला करता है, परन्तु उसका यथार्प समाधान तो किसी रिले गीतको ही होता है । बबतक इसके मूल कारणको यपार्परुपसे म नामा हो, तबतक उसके दूर करनेके पि पाहे कितना भी प्रयत्न क्यों न किया गाय, तो मी दु सका आप नही हो सकता और उस इसके प्रति चाहे कितनी भी जमचे भप्रियता और बनिम्म क्यों न हो, तो मी में वह अनुमव करना हो पाता है। वास्तविक उपापसे यदि उस दु सके र करमेका प्रयत्न किया माप, पौर उस प्रयरनके बसर परिभम्पूर्वक करनेपर मी, उस दु सके र न होनेसे, दुख दूर करनेको इप्पा करनेवाले मुमुमुको बस्यात म्पामोह हो जाता है, अपना हुवा करता है कि इसका क्या कारण है। पहापों र नहीं होता है फिसी मी तब मुझे उस एसको प्राप्ति इए न होनेपर मी, सप्नमें मी उसके प्रति हा मी ति न होनेपर मी उसकी ही प्राप्ति हुआ करती है, भोर में गो गो प्रपान करता उम सबके निफर दो मानेसे मैं दुसन ही अनुभव किया करता , इसका क्या कारण है। क्या यह दु किसीमा मी दूर नहीं होता होगा 'स्पा दुखी होना ही जीका समान रोगा क्या कोई जगत्का कर्ता ईसर होगा, जिसने इसी तय करना योग्य समझा होगा ! क्या यह बात मविदम्पताके भाषीन होगी। नवा या कुछ मेरे पूर्वम किये हुए अपराधों फल होगा! इस्पानि बनेक प्रकारके विकल्पोंको मनसहित दोषारी गौर किया करव है। वीर गोगार मन रहित है वे कम्यक्तरूपसे हु तन मनुमन करते हैं, वीर थे बम्पतम्पसे ही उन दुमके दूर हो मानेको इम्म किया करते हैं।
[4m प्रीमपचन्द्र इस बगप्राणीमात्रको म्यक मपया बम्पत इस मी पहो कि मुझे किसी भी तबसे हुन न हो और सर्मषा मुस हो मुग हो, वौर उनका प्रफम मो इसीसिपे है। फिर मी पास क्यों र नहीं होता ! इस तबके प्रश्न यो यो विचारवान मायोको मी भूतकाळमें हुए थे, वर्तमानकाळमें मौ होते है और भविष्यकाळमें भी होंगे। तया उम बनतत विचारवानोंसे बनत विचारणानों को तो उसका पपार्थ समाषान भी हमारे और दुससे मुछ हो गये है। वर्तमानकामें भी मिन विचारपानों को उसका सपार्थ समाधान होता है, वे भी तयारूप फरक प्राप्त करते है और मनिप्पकामें मी पिन निन विचारवानों को पार्य समाधाम ऐगा में सब क्यारूप का पारेंगे इसमें समय नहीं है। शारीरका गुरास पदि केवल औपच करनेसे होरहो नाता, मनका दुस यदि धन मार के मिसनसे हो माग बाता, धार माम ससर्गसमी तु म पनि मनको कुछ मी भसर फैा न कर सकता, तो छ सके र करनेके छिपे को बा प्रयत्न किये जाते है ये सब, सभी गायोंको सफल हो जाये । परम्त या या होना समय PIS A Pया, तमी विचारमानोंचे प्रश्न उठा कि दु सके दूर होने के लिये कोई दूसरा ही उपाप होना चाहिये । सपा मह जो कुछ उपाय किया जाता है ए बयपाप है, और पा सम्पूर्ण भम पाहै इससिपे उस दुमका यदि पपार्थ मूल कारण मान लिया बाप और तदनुसार उपाय किया बाप तो ही दुसर होना संभव है महाँ तो वा कमी मी दूर नही हो सकता । यो विचारमान दु सके पधार्थ मूस कारण बिधार करने के लिये उत्कंटित हुए हैं, उनमें भी किसी किसीको हो उसका यपार्प समाधान मा चौर गातसे तो पपा समाधान न होभेपर मी मति मामर पनि कारणोंसे ऐसा मामने में है कि हमें पपा समाधान हो गया है, और ये तदनुसार उपश मी करने हो । तपा ममेक ोग उनका अनुसरण मी करने लगे है । अगमें मिम मिम बो धर्म-मत देसभेमें बाते है, उमय उस्पतिका मुख्य कारण यो। विचारपानोको विशेषत पी मापता धर्मस दुस मिट जाता है। परन्तु धर्मके कस्म समझमेमें तो एक दूसरमें बहुत अन्तर पा गया है। पतस तो अपने मूग विषपको ही भूल गये हैं, और बगुवसोंने उस विषपमें अपनी बुद्धिके पफ मानसे अनेक प्रकारसे नास्तिक मादि परिणाम बना लिये। कारण और उनकी किस किस तर प्रति इसके संगमें यहाँ पोरेसे मुम्स अमिप्रायोको संक्षेपमें कहा माता। पस्या है। उसके मूल कारण स्पारे । मोर पाहु सपिस तय दूर हो सकता है। उसके सबमें मिनमगवान् वीतरागने अपना नो मत प्रदर्शित किया है, उसे पा सक्षेपसे करते है भब, ए पपा है या नही, उसप बरगोकन करते हैं।
११४] विविध पत्र मादि समा-यों वप ६॥ दिन ठपापोका प्रदर्शन किया है, वे उपाय सम्यग्दर्शन सम्पमहान वौर सम्पचारित्र में, बया उन तानों का एक माम · सम्पमोक्ष' है। उन पीतयगियोंने अनेक स्थलोंपर सम्पदर्शन सम्यग्वान गौर सम्याचारित्रमें सम्पम्दशनकी मुस्पता कही है। यपपि सम्पमानसे ही सम्यग्दर्शनको पहिचान होती है, तो मी सम्पादर्शनको प्राप्ति के बिना बान, ससार- दुका कारणभूत है इसलिये सम्पग्दर्शनकी ही मुस्मता बताई है। पों म्पों सम्यग्दर्शन शुर होता जाता है, स्पों त्यो सम्पचारित्रके प्रति बौर्य उल्हासित होता बावा है; और क्रमपूपक सम्पचारित्रकी प्राप्ति होनेका समय वाता है। इससे धारमामें स्थिर समात्र सिद्ध होता जाता है, भौर क्रमसे पूर्ण स्थिर समान प्रगट होता है और भारमा निजपदमें हीन होकर सकर्म कामसे रहित होनेसे, एक शुर वामस्वभावरूप मोझमें-परम वम्यावा मुसके वनुभव समुद्र में स्थित हो जाती है। सम्पग्दर्शनका प्राप्ति ऐनेसे गिस तय पान सम्पास्वभावको प्रास करता है -पहसम्पग्दर्श मका परम उपकार है-से हो सम्यग्दर्शन क्रमसे शुर होकर पूर्ण स्थिर स्वभाव सम्पमारित्रको प्रास होता है, उसके लिये उसे सम्यमानके वळको सबी वानश्यकता है। उस सम्यगानकी प्रालिका उपाप गावपाठ और उस भुतपतका उपदेश महरमा पुरुप है। वीतरागभुक्के परम यस्पको प्रात वसग बौर परम करमाशीय महामाका संयोग मिलमा पतिशय कठिन है। महान् भाग्मायके योगसे ही यह योग प्राप्त होता है, इसमें सशप महो। कसा मी. तरा रुपाणं समणाण- - उन भमण महात्माबों के प्राति-पक्षणोंको परम पुरुपने इस तप चाहे. उन महरमाोंके प्राति-लवणोंसे सम्पन्तरदशाके पिहोंका निर्णय किया जा सकता है। पापि प्रति-सक्षणों के अतिरिक अन्य प्रकारसे मी अम्पान्तरदशानियमक निधप होता है परन्तु किसी पुर धिमाम मुमुमुको ही उस बम्पन्तर पाकी परीक्षा होती है। ऐसे महामाभोंके समागम और विनयको क्या वापकता है। तपा पारे मैसा मी पुरूप हो, परम्नु मो अशी तरह शाम फाकर मुनाता हा ऐसे पुरुषसे मी जीव कन्पाणके पयार्प मार्गको पो मी पा सकता। इस आशकाका समाधान किया जाता है- भीमद् पसन्द [५९४ ऐसे महात्मा पुरुषों का मोग मिटना अत्यन्त पन्त कठिन है। बब श्रेष्ठ देश काठमें मी ऐसे मामाका योग हाना कठिन है, तो ऐसे दुस-प्रधान काठमें वैसा हो तो इसमें कुछ करना ही नहीं ग्रता या भी यपि उस महारमा पुरुपका पोग झपित् मिम्ता मोरे तो मी पदि कोई मुद चिमान मुमुसु पुरुष हो वो या उस माहूर्तमात्रके समागममें ही वर्ष गुणको प्राप्त कर सकता है। जिन महात्मा पुम्मों के बचोंक प्रतापसे पारती राया मी एक माहूर्तमान में हो षपना राबपाठ छोरफर मर्पकर बनमें तपपर्या करनेके लिये परे नाते थे, उन महारमा पुरक पागसे वपूर्व गुण क्यों प्राप्त नही ऐसझते ? भेष्ठ देश काममें मी कचित् हौ महात्माका पोग मिलता है। क्योंकि वो वप्रतिपद-विहाय होते । फिर ऐसे पुम्पोंका निस्म सग य सकना तो किस तय कर सकता है निम्स मुमभु चीन सर्व दासोका क्षय करने के वमन्य कारणों की पूर्णरूपसे सपासना कर सके। उसके मार्गको भगवान् बिन्ने स तय मोकन किया है:- निम हो उनके समागममें बाबाचीन यार प्राधि करनी चाहिये, वौर सप्तके किसे पाप बाम्पत्तर परिमाप स्पाग करना ही पोग्य है। जो उस त्यागको सर्वथा करनेमें समर्प नहीं, ठमें उसे निम प्रकारसे एकदेशसे करमा सचित है। उसके सपत्र सतरा उपदेश किया है उस मामा पुरुषले गुणोंची बतिष्ठपतासे सम्पन् माचरणसे, परम शानसे परम शांतिसे, परम निरपिसे मुमा बारकी नाम चियों परतत होकर शुम समाको पार निनसापके प्रति मुसहोती माती। उस पुरपके पचन म्पपि भागमस्तक है तो मी बारंबार अपनेसे पचन-मोगको प्रापि १९४] विषिष पत्र मावि संमा-या वर्ष होनेके कारण, निरतर समागमका योग न बननेके कारण, उस बचनका उस तयका प्रवण परणमें न गनेके कारण, मावसे मानोंका स्वरूप माननेमें भावनिकी नावस्यकता होनेके कारण, या अनुप्रेक्षाफे मख्की पनि होने के लिए, बीतरागभुत-पीतरागशाब-एक पलयान उपकारी साधन । यपि प्रपम तो उस महामा पुस्परा हो उसके हस्पको जानना चाहिये, परम्त पारमें सो शर रष्टि हो जानेपर, वह श्रुत महात्माके समागमके वतरायमें मी बम्बान उपकारक होता है। वर्षमा हाँ उन महामामोका र्मया सयोग ही नहीं हो सकता, यहाँ मी विनुम् रहिवासको वीतरागवत रम उपकारी है, और इसीलिये महान् पुरुषोंने एक स्पेकसे म्गार हादशगतककी रचना की है। उस शदशांगके मूह उपदेष्ट्य सर्वज वीतराग हैं। महरमा पुरुप उनके सकपका निरतर प्पान करते हैं और उस पदकी प्राप्तिमें ही सब कुछ गर्मित है, यह प्रतीतिसे अनुमयमें वाताहै। मज पोतरागके बचनको धारण करके ही महान् बाचार्योने हादशागको रपमा की पी, वौर उनकी वाहामें बनेगाने महात्मामोंने बम्प अनेक निर्दोष शाखों की रचना की है। प्रागके नाम नेम प्रकारसे - (१) वाधारंग, (२) सूत्रातांग, (३) स्यानोग, (२) समवायांग, (५) मगवती, (२) माताधर्मकपांग, (७) उपासकदशांग, (८) मतदशांग, (९) मनुचौपपातिका (१०) मश्नम्याकरण, (११) पिाक धौर (१२) पिबाद । उममें इस प्रकारसे निरूपण किया है- कामदोपसे उनके भनेक स्पर तो बिस्सत हो गये है, और केवल पोरे हो स्पस बाकी गो कल्प स्पस बाकी बचे है, उन्हें ताम्राकार्प एका श बगके नाममे करते हैं । गमर इससे सम्मत मही है और ऐसा करते है. दिसंबा अपामारको रविसे तो उसमें दोनों सम्प्रदाय सर्वथा मिम मिम मार्गकी पर देसममें बाते है, परम्त स दीपशिसे देखते हैं वो उसका कुछ और ही फारम सम में जाता है।
श्रीमद् रामचन्द्र
चाहे जो हो परन्तु इस तर दोनों गुत पासमें बा चाहते हैं
विवार के बनेक स्थड तो प्रयोजनशून्य जैसे हो, और ये मी परोक्ष है ।
वपात्र मोठाको इम्पानुयोग वारि भाषके उपोस करनेसे, नास्तिक वादि मामों के उत्पप
होने का समय माता है, वपणा पुकानी होनेका समप पाता।
धव, इस प्रस्तावमाचे पहाँ संक्षिस करते और बिस मारमा पुरुपने
(वपूर्ण)
पदि इस तय बी तय प्रतान्ति हो भाप तो
हिसारदिमी पम्मो, महारस दोसपिररिलो देवी ।
निर्मवे परपणे, साहने होई सम्म ।
.
तपा
गातको या तो मोक्षमार्ग है, नही तो उन्मार्ग है।
हुसका पप करनेवाम एक फ्रम सनुपाप, सर्म जीवोंको हितकारी, सहुनि म्पका
एक बाल्पविक उपाय परम सदुपापरूप बौतरगदम है। उसका प्रतिसे, उसके अनुकरम,
उसी मााके परम मनमसे, बान मा-सागरसे पार हो पाता । समसामगसूत्रमें या-
बामा क्या है। कर्म क्या है ! उसका कर्ता है। उसका उपादान कौन है! निमित्त
कौन है । उस रपति सिमा किसके हापस परिमाणमें कर्म बाँध सकती है।
स्पात मानका सरूप पैसा निप सिबात पर सूक्ष्म गौर सकसमा प्रा पैसा किसी भी
दर्शन नहीं है।
-(पूर्ण)
* मरिचमानतमान
११४ नम्मम पिरे] पिविप पत्र मादि सपा-२०पों पर्ष जैनमार्ग विषेक वन समाधान के लिये यथाशति नो चैनमार्ग समझा है, उसफा यहाँ कुछ सभेपसे विचार करता हूँ पर जैनमार्ग, निस पार्यका पस्तिथ है उसका अम्तिाल और जिसका अस्तिप नहीं है उसका मान्दिन स्पीकार करता है। प कहता है कि जिनका नम्तिव है ऐसे पदाप दो प्रकारके -चीन और अनार । ये पदार्थ स्पष्ठ मिन मिन। कोई भी किसीके स्वभावका त्याग नहीं कर सकता । जीव की और वरपीके भेसे दो प्रकारका है। चीन मनस है। प्रत्यक मात्र तीनों काठमें जुग पुगो । जीब बान दर्शन थालि मासे पहिचाना जाता है । प्रस्पेक जीव मसम्ल्यात प्रशकी अवगाहनासे पता है, कोप-मिकासका मानन है, बनारसे कर्मका प्राहकी । यथार्य सम्पको जाननेसे, उसे प्रतातिमें ठानेसे, स्थिर परिणाम होनेपर उस कर्मको निति होता है । मनपसे नीच वर्ग, गध, रम और स्पर्शसे रहित वनर, बमर भार शापत बस्तुहै। (अपूर्ण) मोक्षसिद्धान्त मगवान्को परम मदिसे नमस्कार करके अनत बम्पानाप मुममप परमपरकी प्रामिक छिये, मगमन् सनद्वारा निरुपण किये हुए मोश- सितको करता है दम्यानुयोग, कारणानुपाग, चरणानुयोग और धमकपानुपोगके महानिधि नियग-मापनको नमकार करता है। कर्मनपी राका परामय करनेवाले अहतमगवान्को शुद चल्यप में मिसालपमें निराधमान सिदभगवान्को; शान दर्शन पारित्र, तप आर कार्य इन मोधक पचापागेका पालन करमा, और दूसरे माप जीनोंको माचारमें गानेबाई बाचार्यभगवान्को दाग भम्पासा और उस भूत, शर, पप पर रहस्पसे अन्य मम्प जांगोंका अप्पयन परानबारे आम उपाप्यायमगानका क्पा मोक्ष- मार्गका मामबागृतिपूर्वक साधन करनेपाडे एम साधुमगवान्का में परम मधिसे नमम्पार करता है। भाजपमापसे भीमहावीरपर्यंत मरनक्षेत्र पर्तमान चोवीस तारोके परम उपकार में बार मार स्मरण करता है। पर्नमानश्चमक परम ताकर श्रीमान् पधमानगिनती सिमामे ही वर्तमान में मोशमागमा पनि मामा। उनके इस उपकारको मुबारित पुस्प बारम्बार बारबर्षमय समाप्त है। चार दोपमे मगर भूम-सागरका पदनमा भाग पिम्पन । गया है और वर्तमानमें केरल मिन्दुमात्र भएका अपमान ही बारी बना है । भनक रडारे पिम्पन हो जालमे, भार भनेक स्पोमें भीमद् पसचन्द्र [१९४ मोगमा स्थल निरुपण गनेके कारण, वर्तमान मनुप्पोको मिर्मन्पभगवान्के उस इतका इस क्षेत्रमें पूर्ण मम नहीं मिलता। भनक मतमतातर मादिके उत्पन्न होने हेतु मी पहा है, भौर इसी कारण निर्मठ भारमपणे सम्पाप्सी महारमाओंकी मी मापता हो गई है। भुतके क्ल्प ए मानेपर मी, अनेक मतमातातरों के मौमूर गनेपर मी, समाधान के बहुत से साधोके पपेक्ष होनेपर मी, महामा पुस्पोंके कचित् कषित् मागद पनेपर मौ हे मार्यनगो ! सम्पदर्शन, मृतका यस्यभूत परमपदका पंथ, भारमानुमका हेतु सम्पधारित्र और विशुन वाम- प्यान नाम मी विचमान है—या परम हर्षका कारण है। पर्तमानकासका नाम हुपम का है। इस कारण बनेक मतप्पोक होनेसे, प्रतिस्ता होने और साधनों की दुर्ममता होनेसे, मोसमार्गी प्राप्ति हुमसे होती है, परन्तु वर्तमानमें कुछ मोधरा मार्ग होमियम हो गया है पर विचार करना उचित नहीं। पचमका में होनेवाले महर्पियोंने मी ऐसा कहा । तदनुसार यहाँ करता हूँ। सूत्र वौर मे बनेक प्राचीन आचार्मोका बनुकरण करके राए बनेक शाप निपमान है। सबोभित पुरुषोंने वो उनकी हिवकारी बुद्धिसे होरपना की है। इसम्पेि पदि किती मतवादी, मादी भौर शिथिलताके पोषक पुरुपोंके सय रचीई कोई पुस्तके, उन सूयें बपषा भिमाचारसे म मिलती हो, मौर प्रयोजनको मर्यादासे बाप हो, तो उन पुस्तकोंके उदारण देकर मममीर मामा लोग प्राचीन सबोधित मापापोंके वचनों के उत्पाफ्न करनेका प्रपन नहीं करते। परन्तु पर समझकर कि उससे उपकार ही होता है, उनका बहुत मान करते हुए उनका फ्यायोग्य स्तुपपेाग करते हैं। बिनदर्शनमें Pगमर और नेताम्बर पे दो मुस्स भेद है । मतापिसे वा उनमें ममान स्तर देसनेमें वाता है । परन्तु मिनर्शनमें तवारिसे पैसा विशेष भेद मुस्परूपसे परोस है। उनमें कुछ ऐसा भेद नहीं है कि नो प्रत्यक्ष कार्यकारी ऐ सकता हो। इसलिये दोनों सम्प्रामे तापम होनेवाले गुणवान पुस्प सम्पनयिसे ही देखते है और जिस तय वापतीविच भवराप कम हो पैसा वापरण करते है। नामामसे निकले हुए सरे अनेक मतमतांतर मीहै । उनके स्वरूपका निरूपण करते पर मी ति सकुचित होती है। जिनमें मम प्रयोजनका मी भान नाही इतना ही मही परन्तु गो मूल प्रयोजनसे RE पति हो पाठबन तेरे में मुक्ति सम भी कम हो सकता है। पोकि ये दो मह प्रपोगनको मूहकर देश पोहए है और अपनी पम्पता माविक सिपे गोको परमार्थ-मार्गम भतराप करते है। २ मुनिपग मी पारण नहीं करते, स्पोकि सोमपनासे हो उनको साप्राति पता है। निगम चपा वाचार्य पर तो रेस माममात्र ही उनके पास है, वास्तबमें तो ये उस्मे परामुपही है। कोई जाडसी और कोई गरे असो बम्प बस्तु रण-यागके मापासे मिम भिनमर्ग । ।
२९४ इम्पप्र] पिविष पम मादि सपा-३व्या वर्ष सम, . पता है, वीर तर्षिका मेद पैदा करता है, ऐसा महामोहसे मूड बीप लिंगामासपनसे बाज मी पांवरगदर्शनको घरफर बैठा हुवा है--पही असपतिपूना नामका वापर्य माश्म होता है। महात्मा पुरुपोंकी अन्य मी प्रति स भार परको माझमार्गक सम्मुस करमेवासी हसौर। लिंगा. मासी नीव अपने बसको मोक्षमार्गसे परामुख करनेमें प्रवर्तमान देखकर हर्पित होते हैं, और यह कर्म-प्रतिमें बहते हुए मनुमाग भौर स्थितिबपका ही म्यानक है, ऐसा मैं मानता (मपूर्ण) (५) द्रम्पप्रकाश प्रम्य पर्यात् मस्तु -वलपर्य। इसमें मुख्य तीन अधिकार है। प्रथम बभिकारमें गांव और वर्गीय प्रम्पके मुम्न्स मेद करे हैं। दूसरे अधिकारमें नीव भार मनीषका परस्पर संबप और उससे पौवका क्या हिवाहित ऐसा ८ उसे समझाने के लिये, उसको विशेष पर्यापनपसे पाप पुष्प भादि दूसरे सास तत्वोंका निरूपण किया है। सातों तल बीच वीर बाब इन दो तत्वोंमें समाविष्ठ हो पाते हैं। तीसरे अधिकारमें ययास्थित मोशमार्गका प्रर्शन किया है, मिसको मेकर ) समस्त पानी- पुरुषोंका उपदेशहै। पदार्थक निषेचन वौर सितपर मिमकी नीव रक्सी गई है, और उसके द्वारा मो मोलमार्गका प्रतियोप करते हैं, ऐसे दर्शन गरें--(१) बौद, (२) न्याय, (२) सन्पि, (.) बैन, (५) मीमांसक भौर (६) शेषिक । यदि पैशेषिकदर्शनका न्यायदर्शनमें अवर्मान किया जाय तो मास्तिक-विचारका प्रपादन करनेवासा छा पाकिदर्शन बम गिना जाता है। प्रश्न त्याप, पैशेषिक, सांस्य, योग, उत्तरमीमांसा और पूर्वमीमांसा ये के परिमापा र दर्शन माने गये है, परन्तु यहाँ तो बाफ्ने इन दर्शनोंको मुद्दा परविसे ही गिनापा है । इसका क्या समाधान वेद-परिमापामें बताये हुए दर्शन मेदको मानते हैं, इसलिये उन्हें उस ररिसे गिना गया है, और उपरोळ क्रम तो विचारकी परिपाटीके मे से बताया है। इस कारण यो मम योम्प है। मम्म और गुणका यो अमन्मत्व-ममेर -बताया गया है पर प्रदेशमे -सतपना ही है-क्षेत्रभेद-शितपना नहीं । इपके नाशसे गुणका नाप्त होता है वौर गुमके मास इम्पका नाश होता है, इस तर दोनोंका ऐक्पमालो ।म्प और गुणका नो मे कहा, महास सपनकी अपेक्षा है, वास्तविक पशिसे महीं । यदि सस्यान और सम्पाविरोपके भेदसे शान और मानाका सर्पया भेद तो फिर दानों बचेतन से गाय-पर सह वीतरागका मिति |बारमा शानी साप समबाप सबपसे बानी नहीं है। समातिको समवाय प्रत। वर्ण, गंध, रस और सर्ग-परमाणु, द्रम्पके गुण हैं। (अपूर्ण) पर पत सुप्रसिद्ध है कि प्राणीमात्रको दुम प्रतिकूल और बप्रिय , क्या मुस धनुष्ट और मिप है। उस दुससे रहित होने के लिये और मुखको प्रातिके रिपे प्राणीमात्रका प्रयान यता है। ८१ - मीमद् रामचन्द्र [१४ । प्राणीमाता या प्रफन होनेपर मी, ये दुसका हो वनुभव करते पए रिगोघर होते हैं। पवपि कही कहीं कोई सुम्का वश गो पिसी किसी प्राणीको प्राप्त हुमा विसई देता मौ है, तो पर भी दुमका बाइस्पतासे ही देसनेमें बाता है। शंका -प्राणाम्मको हुसवप्रिय होनेपर मी, तथा उसके दूर करनेके म्मेि उसका सा प्रयत्न गमेपर मी, या दास दूर नहीं होता, तो फिर इससे तो ऐसा समझमें बाता है कि उस हु सके दूर करनेका कोई उपाय नहीं है। क्योंकि जिसमें सबका प्रयत्न निफर हो भन्म गाता हो म बात तो निम्पाय हो हानी चाहिये। समाधान'- सके स्वरूपको पयार्थ न समझनेसे, तथा उस दुःसके होनेके मूल कारण क्या है, और वे किस रा र हो सकते है इसे यथार्थ न समझनेसे तपा दुख दूर करनेका गानाका प्रपन स्पमापसे ही अपपार्य होनेसे, रास दूर नहीं हो सकता । हुःस स्वपि समीके मनुमक्में बाता है, तो मी उसके स्मारूपसे ध्यानमें वानेके रिसे उमायाँ पोडासा म्यास्यान करते है। प्राणी दो प्रकार के होते है- (१) एक प्रस और दूसरे स्थावर । स उनें करते है जो सायं भय मादित परम देकर भाग जाते हो और यो पम्ने-फिरने मादिको शक्ति रखते। (२) स्पानर उन पाते हैं कि नो, बिस जगह देह पारण को है ससी बगा गवे हो और बिनमें मप मादिके कारण समटकर माग नामे बगैयकी समसमाधि न हो। अपना एफेनियसे भगाकर पोच इनियतक पाँच प्रकार के प्राणी होते है। एमोनिय प्राणी त्पावर पो गाते हैं, और दो इन्द्रिपाले माणिोंसे भगाकर पाँच इन्द्रियोतको प्राणी स बजे जाते । किसी भी प्राणीको पाँच इन्द्रियासे अधिक इन्द्रियों मही होता । एकेन्द्रियके पाच मेर।-पपिषी, मक मामि, बायु और पात्पति । मनस्पतिका बीमत तो साधारण मनुष्यों को मौ कुछ बनुमानस समसमें बाता है। प्रपिषी, जल, वमि, मोर नामुमें बीवन बस्तित्व बागम प्रमाणसे और विशेष चारमसे कुछ समसमें मा सकता है-पपि उसका सर्वपा समाधम बाना तो प्रबनविषयो। मग्नि मौर वायुकायिक जीप कुछ कुछ गतिपुछ देखने में बात है। परन्तु पर गति अपनी निमको पछिको समापूर्वक मही होती, इस कारण उन्हें मा स्पायर हो या माता है। पबपि एकत्रिय कानों में बनस्पतिमें भी अप्रतिम है, फिर मी इस प्रपमें अनुकमसे उसके प्रमाण बारेंगे । पपिनी, नए मि चौर मापु निम्न प्रकारसे मालकी सिदि की गई है-(पूर्ण) (.) पौषकेशण गावत मुस्स सण पैताप, परोकेप्रमाण पिविध पन मादि समा-श्यों पर्व मा असम्त्यात प्रदेश प्रमाण है, यह पसंपात प्रदेशस्य लोक प्रमाण है, मह परिणामी अमरे, मनत भगुरु पुगुणसे परिणमनशील द्रम्प, सामाविक दम्य है, का है, मोका है, मनादि संसारी, मम्पत्त सम्धि परिपाक बारिसे वह मोझ-साधनमें प्रति करता है, उसे मोक्ष होती है, या मोचमें सपरिणाममुक्त ह, स्मार-भवम्यामें मिप्यान, अमिरति, प्रमा, कयाय वौर योग उच्चर बपके स्थान है। सिदानस्थामें योगका भी बमान, मात्र पैतन्यससरूप मात्माम्य हो सिदपद है, निमात्र परिणाम भाषकर्म है। पुद्रम्समष दम्यकर्म है। (अपूर्ण) भासपानाबरणीय बादि कर्माका पुनसके सबसे गो प्राण होता है, उसे उम्पाहर मानमा चाहिये । निनमगाम्ने उसके वनेक मेद करे। बन -जीव निस परिणामसे कर्मा पंप करता है यह माक्सव।कर्म-प्रदेश, परमाणु बार मापका क्योन्य-प्रवेशम्पसे सबप होना दम्पर्य है। प्राति, स्थिति, अनुमाग वौर प्रदेश इस वर पार प्रकारका मप है। महति वौर प्रदेश योगसे होता है। स्थिति वीर अनुभागम कपापसे होता। समर-यो मासयका निरोप कर सके वाचतम्पसमाल मावसभर ६ वीर उससे जो दम्पा समका निरोष करना है या इम्पसबर है। समिति गुप्ति, धर्म अनुप्रेधा वौर परिपा-जप इस तप पारिके नो वनेक मेद है उनें मावस्परके ही मेद पानना चाहिये । निरा-तपपर्याशरा मिस काल में कर्मो पुल रसको भोग आते है, ए मावनिग, पया उन पदर परमाणुओका बारमप्रदेशसे सा गाना दम्पनिर्गरा है। मोश -सब कर्माक एप हानेरूप वात्मस्वमान मात्रमोश है। कर्म-वर्गणारी बामद्रम्पका पृपक् हो माना इम्पमोश है। इम मेमिका भाचवमएकी पापमाप बनुषार दिला पारे।
। प्रीमद् रामचन्द्र [१९ पुण्य और पाप'—औषको उम और भनुम मात्रके कारण ही पुण्य पाप होते हैं। साता, मुम मापु, गुम नाम और उप गोत्रम हेतु पुण्य है। उससे उत्टा पाप है। सम्पर्शन, सम्पदान भौर सम्पचारिप ये मोशके कारण हैं। म्पहारनपसे ये तानों मम्म बमा है। निचपसे बारमा इन तीनों है। वामाको प्रेकर ये तीनों रन बम्प किसी भी दम्पमें नही इते, इसलिये बात्मा नामों रूप है, और इस कारण मोक्ष कारण भी वारमा है। माप वादि तत्वोंकी वास्याम्प बारमसमाव सम्पादर्शन है। मिप्या वापासे रहित होना सम्पवान है। सशय पर्पय वीर भतिसे पहित मो मामतरूप भौर परस्परुपको पपास्मसे प्राण कर सके या सम्पमान है। उसके साकार उपयोगरूप क्नेक भेद हैं। जो मानों के सामान्यस्म ठपयोगको प्राण सके पर दर्शन है। दर्सन शम प्रशाके अपने भी प्रयुक्त होता है, ऐसा मागममें कहा। उपत्यको पहिले दर्शन वौर पीछे जात होता है, केषणमगवान्को दोनों साप साप होते हैं। बशुम मावसे नावि मार गुम मातमें प्रति होना चात्रि है। म्पबहारनपसे चौबीतपगियोंने उस चारित्र मतको समिति गतिहमसे कहा है। सुसारके म्हेतुओका विशेष नाश करनेके लिये पानी-पुरुपके गो बाम और अंतरग किया। निरोप ऐना है, उसे पोतरागियोंने परम सम्पधारित्र का है। मुनि पान के पास मौसके कारणम्त इन दोनों पारियोको बस्य प्राप्त करते है, उसके लिये प्रपनबान चिचसे धानका उमम अम्पास करो। पदि तम स्थिरताको दया करते हो तो प्रिय बप्रिय बस्तुमें मोह म कणे, एग न करो, रेप न। बनेक प्रकारके मानकी प्राप्तिके शिये पतास, सोय, , पाँच, दो मोर एक परमेप के मात्रक को मत्र है उनका अपपूर्वक पान करो । इसा निरोप सम्म भौगुम्के उपदेशसे जानना चाहिये। ॐनमः स हु का मास्पतिक बमान और परम सम्पामाप पुसकी प्रासि हो मोल है, और ही परम हित। बातराग मार्ग ठसा सापाप है। सस स्मार्गका सधिस विवेचन इस तय सम्पादर्शन एम्पमान और सम्पन्चारित्रको एकता ही मोक्षमार्ग है। समीकेशानमें भासमान तत्वोको सम्पक प्रतीति ऐना सम्पदन है। उस तलपोपोना सम्यमान है। उपादेय जातका बम्पास होना सम्पचारित है। अब बामपदस्वरूप तिगामें स्पिति ऐना, परामोको एका।
१९४] पिपिप पत्र मादि संग्रह-वों व सहदेव, निर्मय गुरु और सोपदिए धर्मकी प्रतातिसे तत्वका प्रतीति होती है। सर्व बानावरण, दर्शनावरण, सर्व मोह, मौरस मीर्य भादि बतण्पका क्षय होनेसे वारमाका सनातराम-समान प्रगट होता है। निर्मपपदके मम्पासका उत्तरोवर क्रम उसका मार्ग है । उसका यस्प सोपदिए पर्म है। (१०) -कथित उपदेशसे बामाका स्त्रम्प मानकर उसकी सम्पक प्रकार प्रतीति करके उसका ध्यान करो। म्यो म्पों पानको निशुद्धि होगी स्यों स्यों हानावरणीयका क्षप होगा । या पान अपनी कल्पनासे सिर नहीं होता। मिनें शानमय बारमा परमोहए मावसे प्राप्त हुई है, और मिन्होंने समस्त पर ब्रम्पका स्पा कर दिया है, उस देवको नमस्कार हो । नमस्कार हो! बाय प्रकार के निदानरहित वपसे, राम्पमापनासे मावित भौर महमापसे रहित हालाही फोकी निरा होती है। का निर्मग मी दो प्रकारको समम्मी पाहिये – सकारप्रात भार तपपूर्वक । पहिग निरा चारों गतिमें होती है, वौर दूसरी पारीको ही होती है। न्यों म्पों उपशमको पनि होती है क्यों त्यो त्यों तप करमेसे कर्मको वधिक निर्नग ऐती है। उस निराके समको करते हैं। मिप्यादर्शनमें राते हुए मी मिसे पोरे समयमें उपशम- सम्पदर्शन प्राप्त करना है, ऐसे जीवको अपेक्षा बस्यत सम्पपिको यसत्यात गुण निर्भय होती है, उससे बसम्मात गुण निर्मग देशपिरतिको होतीर, उससे मसाल्यात गुण निर्नरा सर्वरिति बानीको होती है, उस्से अपूर्ण) (११) रिप गुरु } रेनोप इतना वधिक स्पा प्रमाद ! शुद्ध वाम पदको प्राप्ति रिपे वीतराग मार्गको उपासना करनी चाहिये । संपादेव पेपुर पारमारि होनेके भाबम है। दयामुस्य धर्म घागुम्से साहारा मनुभूत ऐसे मुझ परमप्राप्तिके उपापको समसकर, उसके यस्पको पानमें मेबर मात्मप्राप्ति करें। समिति-धर्म पपाबातिबीर यपागि । देशपिरति-धर्म मार प्रचारका है। सस्मपरि होते हुए बम्पानुपोग सिम होता है। विवाद-पाति मात करते पर परमानुपोग सिम होता है। प्रताविपुल परि होते हुए करणानुपोग सिम होता है। कम्पक को समझाते हुए धर्मकपानुपोग सिखोता है।
भीमद् रामचन्द्र (१२) मोममा बस्तित्व बागम गुरु धर्म धर्मको पोग्यता कर्म जीव चारित्र निर्मरा प्रमाण बम नय मोक्ष क्नेकरत पान डोक दर्शन वडोक बरिसा सत्य म्य बसस्य गुण प्रश्पर्य पर्याय अपरिम संसार वमा एपेन्द्रियका मस्तित म्पबहार स्पम बर्तमानकर गुप्पस्थान ब्रम्पानुयोग करणास्पेग परमानुयोग धर्मकपाल्पोग मुनिल गृहपर्म परिण उपमा पुण्य पाप ६९५ ॐनमः मरम्प शायत । द्रम्प और बीच पर्याय वशाधव अनादि निस्प पप्पा-मैरू बादि ममो भिमार्ग मिखमपाणे निमतत्त-संक्षेप वाकाश बर्मत है। उसमें गाचेतनात्मक विच सपिपिए है। विका मर्पश से अमूर्त मम्मोसे है गिमें धर्मास्तिकाप वौर नपर्मास्तिप करते। गार और परमानु-पुद्रा ये दो बम्प सक्रिप। सब इम्प दम्मापसे शामत है। पार गर्नत। परमाणु-पहरू बनतामत है। पर्मास्तिकाय कार्मास्तिफाप एकहै। भामाशास्तिकाप एकाकार है प्रापेक गौर विस-प्रमाण क्षेत्रागार कर सकता है।
विविध पत्र मादि सपा-यो वर्ष ६९७ ॐ नमः सब बीच मुसको इन्छा करते है। दुम सबको बप्रिय है। सब चीन दुससे मुछ होनेकी या करते हैं। उसका वास्तविक सहप न समझनेसे दुम र मह हवा । उस दुःसके मास्पतिक नमारको मोश करते है। मस्पत गीतराम ए बिना मोक्ष नहीं होती। सम्पमानके बिना बीतग्रग नहीं हो सकते । सम्यग्दर्शन के बिना बान असम्यक् कहा जाता है। बस्तुको मिस स्वमासे स्थिति है उस समावसे उस वस्तुकी स्थिति समझनेको सम्पमान सम्पदामसे प्रतीत वाममाक्से वापरण करना चारित्र है। इन तीनोंकी एकतासे मोक्ष होती है। नीच स्वाभाविक है। परमाणु स्वामाविक है। नीष वनंत है। परमाणु बनत है। जीन और पुद्रसका संयोग अनादि है। अबतफ गौवको पुटरका संबंध है तबतक बाब कर्मसहित हा पाता है। भाषफर्मका कर्ण जीप है। मात्रफर्मका दूसरा नाम मात्र कहा माता है। मारकर्मक कारण और पुठको प्रहण करता है। इससे तैयस बार शरीर और चौवारिक मानि शरीरका सपोग होता। भारकर्मसे विमुख होता निनमात्र प्राप्त हो सकता है। सम्परनिके रिमा गार वास्तपिकनपसे मारकर्मसे पिमुम्म नहीं हो सकता। सम्पादनिके रोनेका मुम्प हे बिनचनसे तत्वार्य में प्रतानि होना है। (२) ॐ नम पि ममानि। बाकाश पम्पापकरे। उसमें छोक समिपिरहै। मा पेतनस सम्पूर्ण ठोक मरपूर है।
[१९८५११
भीमद् रामचन्द्र
धर्म, वधर्म, वारा, कार और पुगए पे दम्प पर है।
जीव दम्प घेतन है।
धर्म, अपर्म, वाफाश, का ये चार इम्म बर्व ।
मस्त कार नौपचारिक द्रम्प है।
पर्म, वधर्म, और वाकाश एक एक दम्य है।
कार, पुगत और गौर नंत दम्प है।
दम्प, गुण वौर पप्पलक है।
६९८
एकांत वामपति
एकात बारमा
फेमठ एक माहमा
केक एक बारमा ही
कैपय मात्र वाहमा
काम मात्र बारमाही
पुरबारमा
इन बात्मा
बस निर्विकम्प सप्यात सायस्वरूप बामा ।
६९९
मैं बसग पुर घेतमा परमातीत निर्षिफस्प एकाच एस बनुमयसरूम ।।
में
परम पुर बर पियात ।।
भविद् पातुके स्पोग रसके इस मामासको तो देखो।
बाधर्षपद बायर्परूप, पटना है।
पविली भी सिम्पका समय नहीं।
स्पिति मी ऐसी है।
पवाविप्र]
पिषिभ पन मादि सपा-३-पाँ वर्ष
७००
*सर्वशाय नमः -नमा सहर
पचास्तिकाय
शत इन्द्रोशरा बदनीय, तीनों गोकाको न्याणकारी, ममुर धार निर्मक जिनके वास्प है,
धनंत निनके गुण , ससारको बिगोने चीत लिया है, ऐसे सज गौवरागको नमस्कार ॥१॥
नीको पारों गतिमेि मुक्त करके निर्माण प्राप्त करनेवाले ऐसे बागमको नमस्कार कर,
सर्वक महामुनिके मुपसे उत्पन अमृतरूप इस शासको फरता ! उसे प्रवण करो ॥२॥
पाच मस्सिकायोंके समाप म-समपको सर्पक बोवरम्गदेवने सोक कहा है। उसके पचात्
बनत भाकाशरूप मात्र अठोकरी मडाक ||३||
चौष, पुनक्समाइ, पर्म, अधर्म तथा वाकाश पे फाय मिपमसे अपने वस्तिवमें हो यो,
ये अपनी सचासे अमिम है, और अनेक मशरमक ॥१॥
भनेक गुण और पर्यापोंसे सहित बिसका बस्तिल-समार है उसे मस्तिकाप करते। उससे
गेस्म उत्पन होता ॥ ५ ॥
ये अस्तिकाप सानों का मावरूपसे परिणमन करते हैं। तया इनमें परिवर्तन वणवाले
कासदम्पके मिठा देनेसे हर दम्प हो जाते हैं ॥६॥
ये दम्प एक दूसरे में प्रवेश करते हैं, एक दूसरेको भाकाश देते हैं, परस्पर मिल जाते है,
और फिर उद्योगाते है, परन्तु फिर मीरे अपन अपने स्वभावका त्याग नहीं करते ॥ ७ ॥
सत्तास्वरूपसे समस्त पदाथ एकरूप है। यह सचा वर्नत प्रकारके समावपाली है, पर उत्पाद
म्पप धौम्पसे मुकरे वो सामाप-विशेषारमक है ८॥
दम्पका अक्षण सत् है पर उत्पाद प्यप और प्रीपसे पुछ है, गुण-पर्यायका मामयम्त है-
ऐसा संपादेवने फरार ॥ ९॥
दम्पकी उत्पत्ति और नाश नही होते । उस समाष हो 'बलि' । उत्पाद म्पप
भोर धौम्प, ठसकी पर्यापको लेकर ही हवे ॥१०॥
दम्प अपनी सफाप पापोको प्राप्त होता है उस उस भाषसे परिणमन करता है-मठिये
उसे दम्प पाते हैं, पर अपनी सपासे अभिम रे ॥ ११ ॥
पापसे रहित दम्प नहीं होता, और इन्पादित पर्याप मही होतीनों ही अनम्पमारसे
पवे, ऐसा महामुनियोन का ॥ १२ ॥
दम्पके रिना गुण मही हाते, और गुर्गोंके बिना ट्रम्प नहीं होन-इस पारण दोनोंय (दम्य
और गुणा ) सप अभिमरे ॥ १३ ॥
स्पाट अनि, स्पात् मास्ति, स्वत् अस्ति मास्ति, स्पात् भरकम्प, स्यात् मणि मालम्प,
स्पात् माप्ति मान्य, स्पात् मन्ति मास्ति मातम्य-न शोको लेकर पोसा
मग ते॥१५॥
भीमद्रासचन्द्र [• पंचालिका माषका कमी माश नहीं होता, और बमाको उत्पति नहीं होती । उत्पाद और म्पय गुण- पायके समापसे ही होते है॥१५॥ गोल वादि सपा है । बाबका गुण तम्प-उपयोग है। देव, मनुप्प, नारक, विपंच पादि उसको अनेक पर्याय ॥ ११ ॥ मनुप्प पापसे मरण पानेवाला गौर, देव अपना अन्य किसी स्पानमें उत्पम होता है । परस्त दोमों जगह पावन तो धुम ही एता है। उसका नाश होकर उससे भन्या उत्पम नही होता ॥१७॥ गो गान उत्पनामा पा, उसी बायका नाश होता है। बस्तुत तो यह नाम म तो तत्पर होता है और म उसका नाश होता है। उत्पन वीर नारा तो देव र मनुष्प पर्यापका ही होता॥१८॥ इस तर सदका विनाश और बसत् जीवको उत्पत्ति होती है। पौषको नो देव मनुष्य बादि पर्याप होती है में गतिनाम कमसे ही होती हैं ।। १९ ।। गानने हानाबरणीप मादि कर्ममाोंको पुषरुपसे--भविष्ठय गाररूपसे जॉप रस्स्यो। उना ममाव करनेसे नमूतपूर्व सिरफ निस्तारै २ ॥ इस ठरा गुम-पर्यापसहित यौन मार, जमाव, मावामान और अमाभावसे संसारमें परिभ्रमण करता॥ २१ गौष पुनमसमा, भाकारा तया वाकी बस्तिकाय किसीक भी बनाये पर नहीं सरूपसे हो बस्तिम-समाप, और मोकके कारणमूव है ॥ २२ ॥ सा स्वमाया गार वौर पुम परिवर्तनसे उत्पम बो कर है, उसे निमपाक कहा॥ २३ पर कार पाँच वर्ण पाच रस, दो गम, और पाठ स्पसे रित है, मगुरम्मु गुमसे सरित है, बमूर्व और पर्तना सणसे पुक। ॥ २९ ॥ + समप, निमेष काय, कठा माली, मुर्ग, रस रात्रि, मास इतु, वौर सकसम बारि कासम्पपारका २५॥ कासक किसी भी परिमाण (माप) के बिना गाकार और बम्पकाका भेद नहीम सकता । क्या उसकी मर्या। पुनम दम्पके बिना नहीं होती, इस कारण कायका पुनस इम्पसे सत्पर होना कहा जाता है॥२६॥ बागलपुष जाता उपयोगसहित, प्रमु, कर्ण भोय, देश के प्रमाण, नियममपसे बमूर्च और कर्मावस्था मूर्त ये गांवके वण २७ ॥ धर्म-मनसे स प्रकारसे मुक्त होनेसे उठोके मतको प्राप्त होकर, या सर्वच सय बात इनिपसे पर अनंतमुखको प्राप्त करता है ॥२८॥ मरगति पर पुम्सपमुनिना मे मतिम दो से तम्बमाने समयमै मेरे पास मतमोजक्या सम्पीच एक मेर दोपा मारा गया एक प्रम सी।बीन प्रमोशी कम्मरोगी मारपीन पगोडी एक नानी भरमा परिन । सारा मना है। दोन म एक रिल-पय रोग-बार 1 पवास्तिकाप] पिविष पत्र मावि सप्रह-वाँ वर्ष अपने स्वाभाविक मावों के कारण पास्मा सर्वद वौर सर्वदशा होती है, और अपने कर्मोसे मुल होनेसे यमनत मुसको पाती है ॥ २९ ॥ कल, इन्द्रिय, वायु और स्वासोश्वास इन चार प्राणोंसे मो मूतकाळमें चीमित था, वर्तमान कामें जीवित है, भार मविप्पकाठमें चौषित देगा, मा मीन है ॥ १० ॥ मनत भगुरुण्मु गुणोंसे निरन्तर परिणम्नशील बनत बीव हैं। पे जीव वसपात प्रदेश प्रमाण है। उनमें कितने ही बीोंने मोक-प्रमाण अवगाहनाको प्राप्त किया है ॥३१॥ कितने ही बीमोंने उस बागाहनाको प्राप्त नहीं किया। मिप्यादर्शन कपाय और योगसहित बनत ससारी जीव है। उनसे गीत बनत सिरनौब है। ३२॥ निस प्रकार पमराग मणिको दूधमें सब देमेसे वह इसके परिणामको वन मासत होती है, उसी तरह देहमें स्पिच धारमा मात्र देह-प्रमाण ही प्रकाशक है, बर्यात् बारमा देह-म्पापको ॥१३॥ मिस तय एक काया सर्व अवस्यामि नहीका वही गान गवा है, उसी तर सर्वत्र ससार मास्थानों में भी नहीका ही सीव गता है। बम्पवसापविशेषसे ही कर्मरूपी रगोमलसे यह नीष मकिन होता॥३१॥ बिनके प्राण-धारण करना बाको मही हाहै-निमके उसका सर्वपा वमान हो गया है- देसे मिन बार पचनसे बगोचर सिर भीर हैं॥३५॥ बास्तबमें देखा जाय तो सिदपद उत्पम नहीं होता, क्योंकि वह किसी दूसरे पास उत्पम होनेवाम कार्य नहीं है। इसी तय यह किसी के प्रति कारणम्त मी नहीं है, क्योंकि उसकी पम्प किसी संवषसे प्रवृति नही होती ॥ ३३ ॥ पदि मोघमें बीचका वस्तित्व ही न हो तो फिर शाश्वत, अशत, मम्य, मम्प, शून्प, बान्य किान बौर पबिहान ये मात्र हो किसके हों ॥२७॥ कोई गोल फर्मक फटका बेदन करते है। कोई और कर्म-सरपके कर्तवका बेदन करते है। पौर कोई नाम मात्र छ कानो समावका बेदम करते हैं -इस तप कमावस बार तीन मेद ॥ १८ ॥ स्पावरकायिक नीब वपने वपमे किये हुए फोक फलका मेदन करते है। प्रसपान कर्मप पेतनाव बेदन करते है और प्राणोंसे रहित बीन्द्रिय मीच पुरखान चेतनाका बेदन करते हैं ॥२९॥ मान मौर दर्शनके मेदसे उपयोग दो प्रकारका है। उसे मारसे न कामें मिम समसमा चाहिये ॥ १० ॥ मति, भुत अवधि मन पर्यप, धौर केपम्के मेदसे शानके पाँच मेद । कुमति, कुमुव और निमग ये वहानके तीन भेद है। ये सब बानोपयोगके मेद ॥१॥ चमुनि, सबभुदर्शन बरषिदर्शन और मविनासी बनत केवदर्शन ये दर्शनोपयोग के बार मेद ॥१२॥ मात्मा कु हान गुणके समपसे बानी है, पपात नहीं है। परमासे वो दोनोंकी अमिमवा हो॥१३॥ , ६१. भीमद् पसचन्द्र [. वाशिम पदि इम्म मिमो और गुण मिम हो, तो एक दम्पके वनंत ब्रम्प हो गॉप, मपम म्य- नही बमार हो माप nou मम्प वौर गुण वमिमरूपसे यते है-रोमि प्रदेशमेद नहीं है। उनमें ऐसी एकता है दम्पके नाशसे गुणध माय ऐ जाता है, वौर गुमके नाशसे द्रम्पका माश हो जाता है ॥१५॥ प्पपदेश (कपन ), सस्पान, सम्मा और विषय न घर प्रकारको विवक्षामोंसे हम्म और गुणके वनेक भेद हो सकते है, परन्तु परमार्पनपसे तो इन चारोंका गमेद हो ॥१५॥ बिस तय किसी पुरुषके पास पदि धन से तो वा पमबान का बाता है, उसी तय बामाको शान होमेसे पाबनवान को गाती है। इस तर सत्ता पुरुष भेद-अमे समको दोनों प्रकारोंसे भागते॥१७॥ परिवारमा बौर बाना सपा मेद तो फिर दोनों बचेवन हो ऐ गाय-पापांतरण समय सिद्धान्त है।॥ १८॥ पदि ऐसा माने कि बानका संबंध होनेसे हो बामा हानी रोती है, तो फिर वात्मा और बान (बसप) दोनों एक ही हो जायगे ॥ १९॥ समापिको समपाप करते हैं। वयाभूत और क्युतसिम है, इसलिये बीतगिोंने इम्प वीर गुणके सर्वपको वपुसिय कशा॥५०॥ परमाणुके वर्ण, रस गप पौर प ये चार गुण पुनबदम्पसे अमिन । म्यमारसे ही पुरदम्पस मित्र को पाते ॥५१॥ इसी वय दर्शन और पान मी गारसे वभिनी। म्पबहारसे । उमका बामासे मेर पा माताtn५२॥ बामा (वस्तुरूपसे) पनादि-वनंत है और स्तान अपेक्षा सारि-सांत है, इसी वय या साहि-वनंत मौ । पाँच माषाको प्रपानतासे हो सब मग होते हैं। सवारूपसे तो जान इन जमत॥५॥ इस तर सत्य बिमारा और असत् गीतका उत्पाद परस्पर विस्त होने पर मा, मिस तय भनिरोपस्मसे सिर होता है, उस तब सड मातरम्गने शा॥५१ ।। नारक तिपंच, मनुष्य और देव ये मामकर्मकी महतियों सत्का बिना वीर असदभावका सपा करती॥ ५५॥ उदय एप क्षयोपशम बीर पारिणामिक मासे मारके गुणोंका बहुत Rear ॥ ५५ ॥ दम्पर्मया मित पाकर उदय बाहि मास का परिणमन करता है और भाषानिमित पाकर बम्पर्म परिणमन करता है, पमान कर्म एक दूसरे मानके कामही है, तथा वे किसी कि बिना ही होवे ॥५॥ सकभरने अपने समाके कसा तय मामा भीमपने ही मातकर्णीबापा पुरा-पे बातयगरे बाप समधने चाहिये ॥५८ ॥ उपशम .. पंचास्तिकाप] षिविप पत्र मावि संग्रह-३व्या वर्ष ६६१ यदि कर्म हो कर्मका कर्ता हो, और बारमा ही बारमाको फर्ण हो, तो फिर उस कर्मक फरका भोग कौन करेगा और कर्म अपने फसको किसे देगा। ॥ ५९॥ कर्म अपने सभावके अनुसार यपार्थ परिणमन करता है, और नाम वपने स्वमायके वनुसार मात्रफर्मका कर्चा है॥५०॥ सम्पूर्ण छोक पुद्रम-समाहोस-सूक्ष्म वौर मादर पिविष प्रकारके बनत स्कोंसे--अतिशय गतस्मसे मरा वाहै॥६१ ।। पारमा निस समय अपने मावकर्मबप समावको करती है, उस समय यहाँ रहनेबारे पुनर- परमाणु अपने समायके कारण दम्यकर्मभावको प्राप्त होते है, तया परस्पर एकक्षेत्र मागाहरूपसे वविशय गारुप हो जाते हैं। ६२ ।। कोई कर्ण न होनेपर मी, निस तए पुद्रदम्पसे अनेक कोंकी उत्परीि होती है, उसी तय पुनस्सन्म कर्मरूपसे सामायिकरूपसे ही परिणमन करता है, ऐसा मानना पाहिये ।। ६३ ।। जीव और पुद्ग-समय परस्पर मयस्तरूपसे सबद है। यथाकार उदय बानेपर उससे जीन सम्-दुसरूप फलका बेदम करता है।॥६१ ॥ इस कारण गार कर्ममापका का है, और मोठा मी वही है। पेदकमानके कारण यह कर्मफसका बनुभव करता है॥६५॥ इस तर वास्मा वपने भाषसे ही कला और मोका होती है। मोहसे चारों बोरसे भाधारित या नीच ससारमें परिभ्रमण करता है६६ ॥ (मिप्यास्त्र ) मोहका उपचम रोनेसे अपवा क्षय होनेसे, बोवराग-कपित मार्गको प्राप्त भीर पुरहानापारबत बार निर्वाणपुरीको गमम करता है॥१७॥ एक प्रकारसे दो प्रकरसे, तीन प्रकारसे चार गतियों मे से, पाँच गुणोंफी मुस्पतासे, यह आपके भेदसे सात भगोके उपयोगसे, बाठ गुण अपया वाठ कौक मेसे, नर तलाक मेदसे पौर दश स्पामकसे गोषका निरूपण किया गया है ।। १८-१९ ॥ मातिय स्थितिषप, बनुभागबप और प्रदेशपस सर्वया मुळ ऐनसे गीर ठागमन करता है। ससार अपना कर्मापस्था बीच निशाको छोड़कर अन्य दिशा में गमन करता है। कंप, स्कपदेश, रूपरेश भौर परमाणु इस वर पुनस-अस्तिरायके चार भेट जानन चाहिये ।। ७१॥ सकस समस्त क्षमासेको स्कम, ठसके मारे भागको देश, उसके मात्रै मागको प्रवेश, और निसका कई माग न हो सके, उस परमाणु कहते हैं ॥ ७२ ॥ बार और सूक्ष्म परिणमनको प्राप्त स्कोंमें पूरण (बदमा) मौर गगन (कम होना ) समाव होनेके कारण परमाशु पुटके नामसे कहा गाता है । उसके प्य भे है, उससे प्रोप उत्पन होता॥७३॥ सर्व कंपोंका वो सबसे अन्तिम मेर कहा यह परमाणु है। प सद, मसत्, पफ, मम माग वीर मर्द होता है !
भीमद् राजबन्द [. तमाम यो विश्वासे मन है और चार भानुमोका कारण है, उसे परमाणु समम्मा पाहिपे । परिणमन-समापसे मुच, सर्य शम्दहित है परन्तु शम्दाय कारण है ॥ ७५ ।। संभसे शम्द उत्पन होता है । बनत परमाणुभोंके मिगप ( सघात) के सम्इको कम करते । इन स्कयों परस्पर स्पर्श होमेसे ( सपर होनेसे ) निषपसे शम उत्पम होता है ॥६॥ पर परमाणु नित्य है, सपने मप भारि गुणोंको वाफारा (आमप) प्रान करता है, सर्प एकप्रदेशी होनेसे एक प्रशके बाद काकाशको प्राप्त नहीं होता, दूसरे ब्रम्पको (वाकाशकी क्य) बाकाय प्रान नहीं करता, कंषके मेका मण है, रूपक साका कारण , काका कर्ण ? पौर कामके परिमाण (माप) बौर सम्मा (गणमा) ख॥७॥ वो एक रस एक वर्ण, एक गंर वौर दो स्पर्शसे युक्त है, भयको टापटिका कारण है, एक प्रदेशामक शादरहित है, जिसका पहप परिणमन होनेपर मानो उससे मिम है, उसे परमाणु समसमा पारिये ॥ ७८॥ जो इन्द्रियोंधरा उपमन्य है तथा या मन बौर कर्म मारियो नो वनंत वमूर्त फ्याय, उम समको पुङ्गमम्य एमझना चाहिये ॥ ७९ ॥ भस्तिकाय इम्य बरस, गवणे, वगप, वशम्द और मस्पर्श है, सफा डोक-प्रमाण है, तपा प, विस्तीर्ण और बसत्पात प्रदेशामक ॥८॥ पर निरंतर करत जगुरुलभु गुणरूपसे परिगमन करता । गति-दिसामुक्त पदार्थोको कारणभूत है, स्पं कार्यरहित । वर्षात् या प्रम्य किसासे भी उत्पन मही होता ॥ ८१ ॥ बिस तण ममको गमन करनमें ज० उपकारक होता है उसी तय गो मात्र बौर पुनक प्रम्पकी गतिध उपकार करता है, उसे धर्मास्तिकाय समझना चाहिये । ८२ ॥ भैसे पमस्तिकाप प्य है, उसी तय अवर्मास्तिकम्प मी सतत्र ब्रम्प र प्रणाली तर स्पिति-किपाल बीच और पुनको कारणभूत है ॥ ८ ॥ धर्मास्तिकाप और बपर्मास्तिकापसे मेक बणेकका विभाग होता है। ये धर्म और अधर्म इम्प अपने सपन प्रयोकी अपेक्षा शुदे दे, पं हम पन फियासे ररत है, और छोक- प्रमाण ॥ ८॥ पर्मास्तिकाप ममपान और पुनको स्वयं घशाता है, यह बात नही है। परन्तु बाल पुद्र स्वयं ही गति करते है उनें के सहायकमात्र होता है । ८५॥ यो सब गांवोंको और शेष पुराने सम्पूर्ण मा प्रान करता है उसे मोना काते८ ॥ मोर पुसमा, पर्म और बर्मयम्य कसे बमिम, बत् ये मेको । मोकने गाहर नही है। बाकाश कसे मी माहर है वीर पहनत है उसे वोक का॥८॥ परिपाकाश गमन बौर स्थितिका कारण होता तो धर्म और वधर्म प्रम्मकेबमानके कारम सिनमगवान्का बोकमे मी गमन हो जाता ।। ८८॥ इस चरण सच पौरमादेवने सिनमगवान् स्पान कर्मसोको क्मे बताया है। इस परणकाएको गया और सानका कारण नहीं समतना पाहिसे । ८९॥
पंचास्तिकाप]
विषिष पन मादि संप्रह-पो वर्ष
यदि गमन षयमा स्थानका हेतु बाकाच होता, तो बडोकको हानि हो पाती और लोकके
बतकी पदि हो जाती ॥१०॥
इस कारण धर्म बौर अधर्म दम्य ही गमन वौर स्थितिके कारण है, वामान मही । इस सय
सह वीतरागने योता जीवोंको गेरके समाएका भणन किया है॥९१ ॥
धर्म, मर्म और अकाकाश अपृथक्मत (एक क्षेत्रावगाही ) और साश परिणामपाले हैं । ये
सोनों प्रम्प नियस पृपा पृषक् उपपम्प होते हैं, और अपनी अपनी सत्तासे यते है। इस
वय इनमें एकता वार अनेकता दोनों है ॥ ९२ ॥
षाकाश, काम, जीव, धर्म और अधर्म द्रम्प अमूर्स है, और पुनर ब्रम्प मूर्त है। उनमें गोव
दम्य पेवन है ।। ९५ ॥
बिस तर बीव और पुद्गर एक दूसरेको क्रिया के सहायक है, उस तय दूसरे दम्य सहायक
मही है । जीन पुनमग्यके निमित्तसे क्रियावान होता है। काउके कारण पुनम भनेक स्परूपसे
परिणमन करता ॥ ९ ॥
चौबका बो इन्द्रिय-माम विषय है वह पुनष्यन्य मूर्त है, बाकी सब ममूर्व है। मन अपने
विचारके निमितमपसे दोनोंको जानता है ।।९५॥
काठ परिणामसे उत्पम होता है। परिणाम कारसे उत्पन्न होता है। दोनोंका ऐसा समान
है। निश्पकासे क्षणभगुरकार होता है ॥ ९६ ॥
कास शम भपने नस्विका बोधक है। उसमें एक नियो और दूसरा उत्पाद और
म्पयबाग ॥१७॥
कास, आकाश, धर्म, अधर्म वौर पुगत तथा गोप इन सबकी ट्रम्प संशा है। काठकी स्तिकाप
संबा नही है ।। ९८॥
इस प्रकार निर्मथके प्रवचनके यस्पत इस पपास्तिकापके सरपके संशित विरेचनको
पपार्परूपसे गमकर, यो राग-रेपसे मुक होता है पर सर्व दुमसे मुफ हो पाता है ॥९९ ।।
इस परमार्थको मानफर जिसने मोहका माश कर Pपा है, निसने राग-देपको त कर पा
है, बीच मसारकी दीर्य परम्पराका मारा करके पुर मामफ में गन हाता है ॥१०॥
इति पपास्तिकाय प्रथम वप्पाप
ॐ जिनाय नमानमः मीसदगुरपे
मोक्षके कारण प्रौभगवान्महावीरको मर्षिक नमस्कार करके उस भगवान्फे करे हुए
पाकि मेरुप मोके मार्गको कावा ॥१॥
दर्शन हान तपा राग-परित पारिख, मौर सम्पयदि मिसे मात , एमे मम्प योगको
माशमार्ग होता है॥२॥
सत्ताको प्रतीति सम्पम उन मात्रका जानना भान है और पिप-माकि प्रतिशत
मारमा पारिप ॥१॥
" भीम पन्द्र बीब, बार, पुष्प, पार, वामय, समर, निर्नय, या और मोश ये नौ पर्या नाव दो प्रकारके होते हैं। स्पारी और वसंसा। दोनोंका सश्रण ठन्पोपयोगी। ममी नल देशसहित और ससार देहरहित होते ॥५॥ प्रपिषी अम, ममि, मायु और वनस्पति पे जीवोसे पुन मायाको मोका प्रमता पता है, और उनें स्पर्शन इन्द्रियके विषयका बान मौर राता है। उनमें तीन प्रकार के बीच स्थावर हैं। मप योगबासे वरिकाप वर वायुप जीव गम उन साको मनके परिणामसे गित एकेन्द्रिय गान समझना चाहिये ॥७॥ पे पापों प्रकार के बार मन-परिणामसे रमित मौर एन्निप, ऐसा सवन का है ॥ ८॥ निस तय भणे, पचाका गर्म मता है, निस तय मनुष्यके गर्मम मर्णागत वास्पा होनेपर भी गांव मौर है, उसी तरा एकेन्द्रिय जीवोंको मी समझना चाहिये ॥ ९॥ मूक, प्रस, सौप कमि हमार गो गांव रस भौर स्पर्शको जानते है, सरेंगे इलिम पार समझना चाहिये ॥ १ ॥ व, मका, घोटी, विच स्यादि, और वनेक प्रकारके दूसरे मी बोश्रो रस स्पर्ध और गरको बानते है, उनें वीन इन्द्रिय बीच समझना चाहिये ॥ ११ ॥ गैस मम, मक्सी भ्रमण, ममर, पमा स्पादि यो रूम, रस गप बोर स्पर्शको मानते है, सने पार इन्द्रिय गौष समठना चाहिये ॥ १२ ॥ देव मनुष्प नारक, तिर्पच (उचर, स्पाचर मौर सेपर ) मे वर्ण, रस, और धम्को चानते हैं। ये बयान पाँच इन्द्रियोबारे बीच ॥१२॥ देवतामोंके पार निकाय होते है । मनुष्य कर्म बौर वर्मभूमिके मेदसे दो प्रकार के हैं। निपंच वनेक प्रकार है। नरकी नौवोंको जितनी पूपिणी-पोनिया, उतनी ही उनकी गातियों है ॥१॥ पूर्वमें दोषी वायुफे सीण हो जानेसे गीर गति नामकर्मक सण नासु बौर पाले पछ होकर दूसरी देह में गाता है ॥ १५॥ स तय देहावित बीबकि सस्मके विचारका निर्णय किया | उनके मम गौर बमम्पके मेबसे भेद देरीत सिपभगवान् ॥ १५ ॥ गो सब कुछ मानता है देखता है, इस माय करके सएको रकम करता है पुम और माम कर्म करता है और उसके फरको भोगता है, इनार ॥१७॥ माकाय, काठ पुल मौर धर्म धर्म इम्पमें नौकत गुण नदी में बचेतन करते है। और गतिको सचेतन यते॥ १८ ॥ मुम्बुका पेदन दिमें प्रति, महिमें मोति ये तानों का विसे नहीं, उसे सपा मरमुनि बाम ते ॥ १९॥ संत्पान संपात, वर्ग रस स्पर्श गए और पद इस वय पुङ्गम्यम्पसे उत्पम होनेवाली बनेक गुण-पर्याप है ॥२॥ सर्ग, गंग पंस्विकार] विविध पप मादि सप्रह-बों वर्ष . T बरस, मरूप, वर्गध, बन्द, वनिर्दिए सस्यान, और बबनके गोघर निसका पैतन्य गुण है,पार ॥२१॥ पो निमपसे संसारमें स्थित नीब है, उसके दो प्रकारके परिणाम होते हैं। परिणामसे कर्म सत्पम होता है, और उससे पचा और पुरी गति होती है ॥ २२ ॥ गतिकी प्राप्सिसे देह उत्पन होती है, देहस इन्द्रियों धार इन्द्रियोंसे विषय प्राण होता है, और उससे राग-रेप उत्पन्न होते है ॥ २३ ॥ ससार चक्रनामें उन मानोंसे परिभ्रमण करते हुए बीमि किसी मानकर समर बनादि-सांत है, वौर किसीका मनारि-बनत है-ऐसा भगवान् समाने कहा॥ २०॥ मिसके मामि जवान, राग, देव भोर चित्तको प्रसमता रहती है, उसके मुम-बधुम परिणाम - होत ॥ २५ ॥ श्रावको सुम परिणामसे पुण्य होता है, और बाम परिणामसे पाए रोतारे | उसमे घुमा- धम पुनसके प्राणस्म कर्माचस्पा प्राप्त होती है॥ २६ ॥ आपातरको, सुधातुरको, रागीको बपया वस्प किसी इसी पिचमा जीवको, उसकेसर करने के उपापकी क्रिया करनेको अनुकपा काते हैं ॥ २७ ॥ नौसको कोष, मान, मापा, और छोमकी मिठास सुमित कर देती है, और गा पाप मावकी उत्पति करती है।॥२८॥ पाठ प्रमादबाजी क्रिया, पित्तको मसिनता, इन्द्रिपके विपोंमें सुम्धवा, दूसरे गायोंको दुस्स देना, उनकी निन्दा करनी इस्पादि वापरोसे बीच पापाक करता है। २९॥ पार सहा, पण बादि तीन पायें, इनियाभीनय, वार्ड और पद प्पान, और दुरमामाली नियामोंमें मोह होना—यह मा पापा है ।।१०।। जातको इन्द्रियों च्याप और सहाका चप नेपाल कम्याणकारी माग बिस काम्पमें पता है, उस कामें गौवको पापामरूप लियका निरोन हो जाता है, ऐसा मानना पाहिये ॥ ३१ ॥ से किसी मी दम्पके प्रति राग हेप और मान मही राता, ऐसे मुम्भ ममें समारिके सामी मिन्य महरमाको मम मम वामन मही होय ॥ ३२ ॥ पोगका मिरोभ करके जो तपचर्या करता है, या मिषपसे गात प्रफारके मौकी निर्णय करताnan जिस संपमाको रिस समप योगमें पुष्प-पारको प्रति नहीं होता, उस समय उसे मुम बोर पशुम फर्मक कलकर भी सर-निष-हो जाता है । यो अमापका सारन करनेवाला, संरपुछ होकर, बामपसका नाम प प्पान करता है, पर महमा साधु कसको हार ॥३५॥ बिसे राग, रेप, मोर और पोगका पारा नहीं यता, उम गुम्म पर्मो जार मम्म पर देनेवाली म्यानम्पी बम प्रगर होती है । ३५ -- r [.. भीमद्रासचन्द्र जो, दानमानसे भरपूर और न्य दम्पके ससर्गस हित ऐसे ध्यानको, निराके से करवा र महारमा समावसहित है।॥७॥ जो संवरयुक्त होकर सर्व कर्मोको निर्जरा परतावा मेदनीय और बासुकर्मस पित होता है, र महात्मा ठसा भबसे मोल पाता है।॥ १८ ॥ जारका समान अदित हान-दर्शन है। उसके वमिमस्म वाचरण करने (पुर निपपमप स्थिर स्वमालको ) सब पीतयणदेवने निर्मठ चारित्र कहा ॥ १९ ॥ पखत बास्माका सभात्र निर्मग हो, परन्तु गुम बौर पर्यापपुक होकर उसने पर-समय परिणामसे बमारिस परिणम्न किया है, इसलिये यह निर्मम है। पदि र वात्मा स्व-समयको प्राप्त कर तो कर्म-पसे रवितो माप ॥१०॥ जो पर-सम्पमें शुम मपपा मसुम रण करता है, नौब स चारित्रसे भा होता है, और पर पर परिपका भापरण करता है, ऐसा समझना चाहिये ॥१॥ जिस मानसे बाहमाको पुष्प और पापापकी प्राप्ति हो, उसमें प्राति करनेवाम माया पर पारिबमें माचरण करता है, ऐसा मौतरग सपने कहा है ॥ १२ ॥ यो सर्व सगसे मुफ होकर, ममिप्रस्मसे बारम समावमें स्थित है, निर्मल बाबा राय है, या जोर स-पारिता वापरण करमेषामहै।। १५ ।। परसाम्पमें मासे रहित, निकम्प शन-दर्शनमय परिणाममुख गोवामा , बस पारित भाचरण॥१॥ मिसे सम्परतबारम्बान, राग-रेपसे रहित चारित्र और सम्यमुनि मा Q गई है, ऐसे मप्य गौरको मोधमार्ग होता॥१५॥ उत्तम प्रतीति होना सम्पाल। पार्यका हान होना जान , और विपके मोहपुठ मार्गक प्रतिशतमात्र होना चारित्र ११ ॥ धर्मास्तिकाय मादिक सपको प्रतीति होना सम्पत है, माय बंग और बौदा का जानमा जान, तपा सपा मारिमें प्राठि करना म्पपार मोपमार्ग|| १० ॥ जहाँ सम्यान शाक्षिसे एयरमावध माम मामा, एक महमारे सिचय सम्म पुरा मौ मही करती, रेल अभिष मारमामय ही पता है, वहाँ सहीतरागने निथप प्रेममार्ग का ||१८॥ गो मामा बाम-समारमप हान-दर्शनका अमेसिपसे पाचरण परती, यसर्पही नियप इन दर्शन और बारित है॥ १९॥ गोहण सबको गानेगा और देगेगा प मम्मामा बनुमा करेगा। इन भागों प्रनीति मम्मोहीतीमयको नही होती ॥ ५.॥ पनि पान और पारिप्र परमोधमार्ग है। उस सेन बरनेसे मोर प्रमि है, और (बमा पारणमे ) उसमे र मी होता है, मा मुनियों ने प्राn १ ॥ भात, मिर, और प्रपन, गग और में महिमाम गरगल पुग्यका उरान करता है, पर पपपमहीरता ५२॥
विविध पत्र मारिसमा-१०पाँप - विसके हइयमें पर-ब्रम्पके प्रति वणुमात्र मी राग यता है, पर यदि सब बागमाका जानने पता हो वो मी पर स-समयको नहीं जानता, ऐसा गानना चाहिये ॥ ५५ ॥ इसठिय सम असि नित होकर निसग मौर निर्ममत्र होकर को सिदस्वरूपकी भकि करता निर्माणको प्राप्त होता है॥ ५९॥ परमेष्ठीपदमें बिसे तत्वार्यको प्रतातिपूर्णक माह है, वौर निसकी बुद्धि निर्भप प्रबनमें कपि- पूर्वक प्रमिए ईद, तपा गो सपम-उपसहित माचरण करता है, उसे मोक्ष कुछ मी दूर नहीं ॥५५॥ गोमांतकी, सिवकी, पैस्यको बौर प्रपचमका मलिसहित तपश्चर्या करता है, वह निपमसे देखोकको प्राप्त करता है।॥ ५६ ॥ इस कारण इच्छमात्रको निति करो। कही मी किभिन्मात्र मी राग मत करो। क्योंकि बावराग मर-सागरको पार हो जाता है ॥ ५५ ॥ मने प्रमचनको महिसे उत्पम प्रेरणासे, मार्गको प्रमानाके म्येि, प्रवचनके यस्पभूत पंचा- स्तिकापके सम्हम इस शासकी रचमा की है ॥ ५८ ॥ इति पचास्तिकाम्प समात . ७०१ सागोजा, फरमान बदी ११॥ मंगल १९५५ संवत् १९५३ को फागुन वदी १२ भौमवार- मिन मुत्स माचार्य सित पदति धर्म चतरस पहिंसा मुस्स किंगादि पवार मिनमुद्रा-सूचक मतांवर समावेश धावरस प्रधान कापकत्र धर्ममाति छोकवादि सरूम- सशपकी निति-समाधान बिन प्रतिमा कारण मुछ गृहम्पहारको शांत करके परिगृह मादि कापस मिहोना चाहिये। अप्रमत गुणस्पानतक पचना चाहिये । सपा भूमिपाच सहमपरिणामी प्यान- मिन । ७०२ भागमा, सगुन पदी १२ मौम १९५५ भीमद्रामचन्द्र-स्स आस्मशाप्रकाश था ! इस दिनको पम्य , यो बर्ष शान्ति गात है। इस वर्षको बास्पा पर पारा रससित ई और उइप-कर्मध गर्व र ऐ गपा । बहा ! इस मिधे पाप है ॥१॥ बत मामो गया रेमपूर्व सतप्राग, बर्गागर मनी प
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प्रीम पचन्द्र
संवत् उमौससौ इकतालीसमें पूर्व क्रम प्राप्त हवा और उभाससौ बियाधिसमें वहत सम्प-
धारा प्रकाशित हई। महास दिनको धन्य है ॥२॥
समत् मीससौ सेतामसमें सब समतिका प्रकास rमा अतका अनुभव, बस्ती । दमा
और निवस्वरुपका मास मा। यहा। इस दिनको पम्प है॥३॥
स समय एक भयानक उदय माया । उस उदपसे परिमा कार्य के प्रवमें पाना पला । मों
भ्यों उसे भाका मारकर भगाते पे, त्यो त्यों पर ठम्य माता दी माता पा चौर रचमात्र मी कम म
होता था। या । इस दिनको पन्म ॥१॥
इस तय या दशा कमसे बदती परी गई। इस समय यह र पीप मारम होती है। मनमें
ऐसा मासित होता है कि य क्रमसे कमसे रहो मापगी । बा ! इस दिमको पन्प है ॥ ५ ॥
जो कारणपूर्वक मनमें सत्यधर्मके उदार करनेका भाव है, या इस देशसे भस्य रोगा-ऐसा
निधय हो गया है। वहा! इस दिनको धन्य है॥६॥
महा! यह कैसी बपूर्ण गति है इससे अप्रमत्तयोग होगा, और गमग केवभूमिकाको
स्पर्श करके देशमा वियोग होगा। इस रिमको घन्म है।॥ ७ ॥
धर्मका नो भोग बाकी या है, उसे वास हा मोगमा।सभरण एक ही देश पारण
करके निमस्म निनदेशको गाउँगा । पहा! इस दिनको धन्य है॥८॥
७०३
यामीमा, क्षेत्र पुदी । रवि १९५५
रहस्पष्ठि अपमा समिति-विचार
परममातिसे स्तुति करनेवाले के प्रति भी निसे रग मही, वौर परमपसे परिपा-वपर्ण
करने वाले प्रति बिसे रेप मही, उस पुरुपरम भगवान्को बारम्बार नमस्कार !
हेपरित पतिसे प्राधिकरमा पप धारण रम्ना चाहिये ।
भोमनाथ मे एमाले भायो भपूर्व अनुबर
भोमनी ने दाम मा वम पाराम ।।
मोगली ने तुम्वा समरित प्रभसरे
जन मनुमा पनी रण निमास भवमटरे।पम ॥३॥
सामानोरेगस कारमी पापा का प्रचा
अमएमए, हेमनी एसय Iril
पर एमाले र मई,
कमे मानेको पम मो मनमरेशम ॥५॥
समापिनी, पर्मनी मर
पोबार भाषी एमपी मिराराम
भाग भाईचि मो मो भामच बरे
पालाम्य बन सम्पनर रिग्रेगरे । 1.4
मारकर्मनी मेगाभरारे
गराने बसम्म तरेप राम ॥८॥
५ यसी] पिदिप पर मादि सपा-३०यौ वर्ष (१) शका-मुनि- 'को बाचाग पाते हुए शाई कि साधुको दार्षशका नादि करणोंमें भी बहुत सप्स मार्गका प्रहमण देखने में माता है, तो ऐसी ऐसी नाप क्रियाओंमें मी-सनी, वधिक सख्ती रसनेका क्या कारण होगा। समाधान - सतत वसर्मुस उपयोगमें स्थिति रसना ही निर्भयका परम धर्म है।-एक समय मी उस उपयोगको पहिर्मुस न करना चाहिये, यही निर्मपका मुल्य मार्ग है। परन्तु उस सपमफे लिये जो देशमादि साधन बताये हैं, उनके निरके लिये सहन ही प्रधि भी होना उपित है। सपा उस उसकी कुन मी प्रति करते हुए उपयोग गहिर्मुस होनेका निमित्त ऐ गाता है। इस कारण उस प्राधिके इस तर प्रहण करनेको बाता दी है कि बिससे पह प्रतिवन्तर्मुस उपयोगफे प्रति या करे । यपि कपट और सार अन्तर्मुल उपयोग तो मुस्पतया केवटमिका नामके, तेय गुणस्पानमें ही होता है, किन्तु बनिर्मक विचारपाराको प्रबक्तासहित वतर्मुस उपयोग तो सावों गुणस्थानमें भी होता है। वहाँ यह उपयोग प्रमादसे स्सवित हो जाता है, और यदि यह उपयोग पाँ विशेष मशमें स्वाचित हो जाय तो उपयोगके निधेष बहिर्मुश हो जानेसे उसकी असपम-मारसे प्रति होती है। उसे म होमे देनक लिये, और देह वादि सापोक निर्वाहको प्रति भी एसी है बो दी नहीं जा सकती इस कारण, मिससे वा प्रावि भन्तर्मुस उपयोगसे हो सके, ऐसी बहुत सकलनासे उस प्राधिका उपदेश किया है। इसे पौष समिति के मामसे कहा जाता है। मिस एमाला की है उस पर भाषाके उपयोगपूर्वक चम्ना परे वो लम्ना मिस वयवाहा की है उस पर बाधापूर्वक बोना पड़े तो बोधना, बिस वर बारा की है उस तव माहाके उपपोग पूर्वक माहार वादि प्रहण करना जिस तए भाषा की है उस तर वाघाके उपपोगपूर्वक पत्र बारिको सेना रसना, बिस वर वादा की है उस वर वासाके उपयोगपूर्वक दीका बानि स्याग करने योग्य शरीरके मछका त्याग करना–स प्रकार प्रापिझप पाप समितियों की सयममें प्राति करनेके मो मो दूसरे प्रकारोंका उपदेश दिया है, उन सबका इन पांच समितियोंमें समावेश हो पाप है। वर्षात् को कुछ नियको प्रति करमेको बाबा को पनिस माविका स्पाग करना वास्प है, उसी प्राणिको करनेको वधा की है। और प इस प्रकारसे की है कि जिस तय मान्य, वयो वतर्मुस उपयोगी उसमें वस्सचित माप ये। पर इसा वण प्राति की जाय तो उपयोग स्तत गाव य सस्ता है, वौर निस निस समय गानको बितनी बितनी शान-शक्ति और बार्प शठित परसब अप्रमत्त ए सकती है। दोपर्शका वादि किसानोंको करते हुए मी मिससे बप्रमत संपमाधि विस्मृत म हो नाप, इसलिये उन सन्त निसामोका उपदेश किया है, परन्तु वे सत्पुरुपको पि बिना समझमें नही,पणी । पर इस्पापि संक्षेपमें लिसी है, उसपर बपिवधिक विचार करमा बारिसे । किसी भी किया प्रापि करते हुए इस रएिको स्मरणमें रसनेका स रखना योग्य है। गो गो बानीको बास किया है, उन सब पाम परिपारप मारसे प्राति की नाप तो यामममा उपयोग होनेष साधन है । इस बाशययुक इस पत्रका पो ग्यों RTI ANK कगे, पों स्पों वपूर्ण का उपदेश मिष्या। । 1 भीम प्रसाद (२) हमेशा यमुक शाखाप्ययन करनेके पचात् इस पाके विचार करनेसे स्पर कान हो सकता। (१) कर्मपत्यका बाचन करना चाहिये । उसके पूरे होनेपर उसका फिरसे मारपिपूर्णक वनप्रेक्षण करमा पोम्प है। ७०४ बवाणांचा, पैन मुदी १, १९५५ (१) १ एकेन्द्रिय गानको बो मनुछ स्पर्श वादिको बम्पतरूमसे प्रियता है, पर मैपुनस्सा है। २ एकेत्रिप पारो यो दर गौर देहक निर्गरमादि सापनों वम्पक मुर्भ, म परिमा संवादबनस्परिकापिक एकेनिप नावों में यह सवा कुछ विशेष म्पत है। (२) (१) तालों प्रकार के समकिसमें से चाहे किसी भी प्रकारका समस्ति बानित हो, तो भी बकि से अधिक पदय भवमें मोक्ष से पाती । और पदि समकिव होने के परमात् बार उसका बम्ब पर रे तो उसे बनिकसे अधिक वर्षपुरम्परावर्तनतक ससारमें परिभ्रमण गोकर मोक्ष हो सकती है। (२) तीर्थकरके निर्मप, निथिना, मात्रक और माविका-इन सबको ना-वावका बाल पा, पसमिप उन समनित काणे, यह बात मही है। उनमेसे गम्से गांवों को पो केक सबै बतरग मासे वोपकर बौर उनके उपदेश दिए गए मार्ग प्रतीति पी, इस कारण मी ठर्ने सममित का। इस समनितके प्राप्त करनेके परमात् गोपने पदि उसे बमन न किया हो तो वधिकसे बधिक उसके फ्रण मम होते । मितिमें अनेक स्वपर पपार्थ मोक्षमार्गको प्राप्त सम्पुम्सको पपार्य प्रतिसे हो समषित करा। इस समरिसके उत्पम ए बिना जानको प्रायः भाग वर वावका पपा बान मी नही हो । बीर वर बारके शान प्राप्त करने मुख्य मार्ग हो। (1) मतितान मुबान विज्ञान, मनापर्यवधान, केपमान, मति मान, अत बान मोर निमगवान, इन बायको मारके उपपोगसम होनेस कापी मा।बान बौर बान इम रोमो खना हो मुल्य मतर है कि वो शान समकितसहित वाम , पर यो बाम मिपावसहित हैरकानपत' दोनों ही शान। (0) हानापरणाप कर्म गौर बझान दोनों एक नही है। मानावरणीय कर्म शानको बालरम- स्वरूपी और कान पानावरणीय कर्मफे स्पोपशमस्वरूप वर्षात् बावरण रोस्प है। (५)महान शमका वर्ष साधारण माना जात होता है-उदाहरणके पि या पानसे बिव का माता है। परन्तु निर्मप-माषामें तो मिप्यावसारित हानका नाम महान बाद उस रिसे महानको मम्मी पारे। (५) यहाँका सस्तो पर बम बरूपी तो फिर इसमें माना परिपे । उसच समाधान इस प्रकारसे है।मिम्मानसहित इनको दोशन । उससे मिप्पा मम्रो मानेसे जान पाक पत्र माता है। हाल सम्पूर्ण मयतासरित सिमावान्में पता विषिष पर मारि समा-या पर्व ६७१ । है। सिरका केवलानीका और सम्पारिका बाम मिथ्यावरहित है । मौवको मिप्पाल भतिस्वरूप है। उस मांतिके यपार्थ समझमें वा मानेपर उसकी निधि से सकती है। मिय्याच दिशाको प्रतिरूप है। राफा:- झान गीतका स्वभाव है इसठिये पमरूपी है, वौर शाम जबतक विपरीतरूपसे माननेका कार्य करता है, सबतक उसे बहान हो करना चाहिये, ऐसौ निर्मपकी परिमापा है। परन्तु यहाँ हानके सरे नामको वान समझना चाहिये । -पदिबानका हो सरा माम बड़ाम हो तो बिस तय मानसे मोक्ष होना कहा है, उसी तय कामसे मी मोक्ष होनी चाहिये । तया बिस तब मुक्त गांवों में जान बताया गया है, उसी वर उनमें चबान मी करना चाहिये । समाधान:- जैसे कोई गेरा गाँठके पडनेसे उताबा और गाँठके सुर मानसे उठान- ररित कहा जाता है, पपपि देसा गाप तो मेरे दोनों ही है, फिर भी गाँठके परने और सुगमानेकी वफेक्षा ही उनें उत्साहमा और उन्धनरहित कहा जाता है, उसी तय मिप्पाधानको बान और सम्पमानको 'शान' कहा गया है। परन्तु मिप्यालाम छनौमौर सम्यवान चेतम, यह बात नहीं है। जिस तय गोठमाछा रोरा और बिना गाँठका गेरा दोनों ही परे है, उसी तय मिग्माकानसे संसार-परिभ्रमण और सम्पम्हानसे मोक्ष होती है। वैसे यहाँसे पूर्व दिशामें दस कोसपर किसी गाँवमें मामेके म्पेि प्रस्थित कोई मनुष्प, पदि दिशाके भमसे पूर्वके बदले पश्चिम दिशा पछा चाप, तो पूर्व दिशाबास गाँवमें मही पॉप सकता; परन्तु इससे यह नहीं कहा जा सकता कि उसने कुछ पम्मे- रूम हो किया नहीं की, उसी तरा देह और बाहमाके मिम मिम होनेपर मी, निसने दो मौर बाहमाको एक समय लिया है, जीव दो-मुनिसे समर-परिभ्रमण करता है। परन्तु उससे पहनही करा पा सकता कि उसने कुछ माननेहप ही कार्य नहीं किया। उळ भाग नो पूसि परिधमकी बोर गपा–पर मिस तय पूर्वको पधिम मान भेनेरूप मम है उसी तर देर और नामाके मिम मित्र होनेपर भी दोनों को एक मानना मम है। परन्तु पधिमकी भोर गावे एए-ए- बिस तरह चलनेहप समात्र तो पता ही है, उसी तय देह गौर वारमाको एक समाप्ठनेमें मी पामनेरुम समान तो यता हो । गिस तर यहाँ पूर्वको नगर पश्चिमको ही पूर्व मान नेकप भो प्रम है मा भ्रम, पारूल सामग्रके मिटमेसे समधर्म का मानेसे ना पूर्ण पूर्ण समसमें बाता है और पचिम पथिम समझमें माता है, उस समय र हो जाता है, वीर पयिक पूर्णकी मोर पम्ने गता है। उसी तण मिसने देह भौर भास्माको एक मान रक्या है, मह पर उपदेश वादि सामौके मिन्मेपर, पण या बात पयार्प समझमें भा गाती है कि ये दोनों मिम मिम है, उस समय उसका भ्रम दूर होकर मामाके प्रति शानोपयोग होता है। मंसे भममें पूर्णको पश्चिम बौर पश्चिमको पूर्व मान लेने पर भी, पूर्व पूर्व हो पा और पधिम पधिम हो पा केवछ भमके कारण हो पा विपरीत मासित होता पा; उसी तर बहानमें भी, देह देह और भामा वाहमा होनेपर मी ने उस तय मासिव महाहाते, पर विपर्यत शान है। उसके पयार्प समझनेमें बानेपर, ममके निार हो जाने से दो देह मासित घेवी और बारमा ७२ मीम पवन वारमा मासित होता हैऔर भो माननेम्प स्तमाल विपरीत-मालको प्राप्त होता था, मानब सम्पकमालको प्राप्त होता है। जिस तर मास्तबमें दिशा-भ्रम फुय मी बस्तु नहीं है, वौर बस गमनरूप घिसम्से पर गाँकी प्राप्ति नहीं होता। उसी वर पास्तबमें मिप्यास मी कोई चीन मही है, और उसके साथ माननस्म समान मी यता है परन्तु बात इतनी कि सापमें मिम्पलरूप भ्रम होगसे निक सहपभावमें परम स्पिति नहीं होती । दिशा भमके दूर हो जानेसे इटिया गावकी भोर किरनेके बाद मिपाच मी दूर हो जाता है, और निजस्वरूप पर जानामप में स्पिति हो सकती है, इसमें किसी भी सम्दोको कई वकाश नहीं है। ७०५ बदामीमा, क्षेत्र मुरी ५ १९५१ वानों समक्तिमेसे किसी भी एक समफिसको प्राप्त करनेसे चीप अधिकसे वधिक पदरा ममें मोच प्राप्त करता है। वर कमसे कम उसे उसी मामें मोम होती है और परि पा उप्स समतिका मन कर दे तो वह वधिसे अधिक वर्मपुत्रम्-परावर्तन कास्तक ससार-परिभ्रमण परमे मोक्ष प्राप्त करता है। समकित प्राप्त करनेक पश्चात् अधिकसे बधिक गर्भपुगसम्परानन ससार होता है। पति छयोपशम क्या उपशम समरितो तो चीर उसका बमन कर सकता है, परन्त परिक्षापिक समक्ति हो तो उसका यम्म मही किमा माता । भायिकसमकिती चौब उसी मासे मोक्ष प्राप्त करता है यदि म मषिक मप करे तो तीन भव करता है, और किसी को अपेक्षा तो कभी चार मग मी होते हैं। पुगम्पिोंको भामुके पंष होनेके पश्चात् पनि वापिक समषित सपनामा पो सो चार मनोने समय है -प्राय किसी गानको ही ऐसा होता है। भगवान्के सापकर निर्मप मिपिनी, माक्क बोर बालिकाको कुछ समको । पाच-बीका जान पा, और इस परण उमें समकित कहा है, पर शाहका अमिप्राप नही है। उनमें मासे गांवोंको तो, तोर्पकर सो पुरुप है स्पे मोक्षमाकि उपदेश , और में मिस तप का मोक्षमार्ग उसी तय ऐसा प्रतीतिसे ऐसी सपिसे मौवाकरके मापसे और मिश्रलपसे सममित करा गया है। ऐसी प्रतीति, ऐसौ रुपि वौर ऐसे मामरका तपा ऐसी बाबाका मे निमय र मी एक तरह से गान क्यानबान है। पुरुष सबै मिले और उमको प्रतीति मी ऐसा सबारे विस क्य मे परमापास करते है, मोषमार्ग ठसा तराई–मोक्षमार्ग उसी व्य हे सकता है। उस पुस्पके स्मण मारमा बौतरता सिद्धि करते है। तथा भो भीतराग होता है पपुस्प पपार्प पच्छ होता है और उसी पुरुपको प्रतीतिस मोबमार्ग साधर किपा मा सकता है' ऐसा विचारणा मी एक तबसे गौणरूपसे गौम-मयाबका कान है। उस प्रतिसे उस रबिसे भौर ससु बामपसे बाद में मोबावका स्पर विस्तारसहित गर्नु शमसे शान है। पारूप पुस्यको बधाको उपासना करमसे मायका मम ऐकर बावराग- पशा होती । वाम सपुस्पा पक्ष पोग हुए बिना यह समलित ऐना कठिन है। इस पुस्प बबनरूप ग्राओंसे पूर्वमें बाकि किसी गीतको समक्ति ऐना समपद बपना को कई प्राचार्य प्रपतस्पसे उस पचमके कारणसे पिसा मागको समकित प्रत कराते हैं।
विविध पत्र मादि संग्रह-यावर्ष ७०६ जवाणीमा, चैत्र मुटी ६ पुष १९५९ शम्पामें उपरको पटक-मटक न रखते हुए योग्य सादगीसे बना हो वाम है। पटक- मटक रसनेसे कोई पाँचसौके वेतनके पॉपसौ एक नहीं कर सकता, और योग्य सादगीसे गनेसे कोई पाँचसौके पारसी निन्यानवें महीं कर सकता । (२) धर्मका ठोफिक पप्पन, मान-माहवको इच्छा, यह धर्मका दोहरूप है। धर्मक माने धनार्य देशमें गाने अपवा सूत्र बादिके मेननेका निपेष करनेवासेनगारा बनाकर निषेप करनेवाले वहाँ अपने मान-महत्व परप्पनका सवाल माता है यहाँ, इसी धर्मको ठोकर मारकर, इसी धर्मपर पैर रसकर इसी निषेधका निषेध करते हैं, या धर्मदोह ही है। उनै धर्मका महत्व तो केवर हानेरूप है, और सार्पसबपी मान वादिका स्वाग ही मुख्य समार है-पह धर्ममोह है। पीरपद गांधीको बिगपत मेवन वादिके विपपमें ऐसा माहै। चन धर्म ही मुख्य रग हो तव बहोमाम्प है। (२) प्रयोगके बहाने पशुबध करमेवाग, या रोग-दाम-को दूर करे तो तबकी बात तो तब यही, परन्तु इस समप तो पर विचारे निरपराधी प्राणियोंको पांका पहुँचाकर महानतावश कर्मका उपार्जन करता है! पत्रकार मी विवेक-विचारके बिना ही इस कार्यकी पुष्टि करने के लिये छिस मारते हैं। ७०७ बाणीजा, पैत्र सुदी १० सोम १९५५ १ वौषध वादि, मिस्नेपर, सुतसे रोग आदिके उपर बसर करती है। क्योंकि उस रोग बादिके देशका कुछ कर्म-अप उस तएका होता है। बौपच बारिक निमिचो र पुस स्वारसे फैसकर गया दूर होकर वेदनीयके उदयके निमितको छोड़ देता है। यदि उस रोग वारिका उस तय मित होने योग्य कर्म भ न हो तो उसके उपर भोपप आदिका वसर मही होता, अपना गौपम मादि प्राप्त नहीं रोती, पण वोपम मिळे मी तो सम्पन भोपप गादि प्राप्त नहीं होती। २ भमुक कर्म-किस प्रकारका है, उसे पपाय दानशिके बिना मानना कठिन है। वर्षात् भोपभ मादि प्यभारको प्राविका एकांतसे निपेप नहीं किपा गा सकता । परन्तु परि अपनी देके संघबमें कोई परम भरम-शिबाग पुरुष उस तय मापरण करे, बर्षात् वह वौषम सादि प्राण न करे तोप पोप है। परन्तु दूसरे सामाम्प बोर मी पर उस तय पम्ने में तार एकतिक रवि होनेसे कितनी हो हानि पहुंचानेवाया है। फिर उसमें भी अपने नामित जीवों के प्रति अप इसरे किन्ही गाबों के प्रति पेग वादि कारणोंमें उस तयका उपचार करनके म्पहार प्राकिजा सकती है, फिर भी पदि कोई उपचार बानि के भरनेकी उपेक्षा करे तो यह अनुकपा-मार्गको छोड़ देना असाही होता है। क्योंकि कोई भीब चाहे कितना ही पीडित सकिर मी पनि उसे PMHI देने तथा औषम बादि देनेके म्पबहरको न फिपा गाप, पोप उसे मापानके देख होने जैसा माता है । गृहस्थ-म्यगारमें एसी एफातिक पटि करनेसे मात दिरोष भPart | २४ मीमद पवाद [ ३ त्याग म्पबहारमें मी ज्ञानाने एकातसे उपचार मादिरा निषेध नहीं किया । मिम्पको पर स-परिमीत राम रोग मादि हा गाय, तो वोपय मादिके प्राण करमेके सबमें ऐसी मसाल ममता भाभ्यान उत्पन न होने पोम्प प्रमिगे, तबतक वोपन नादि ण न करना चाहिये। और परिमापय प्राण करनेका कोई विशेप कारण दिखाई दे तो निरषय वौषध बादि महम करमेसे मानाका प्रतिभम नहीं होता, अपना पयानुम वौषष मादि प्रहण करनेसे माहाका पतिम नमो होता । तया दूसरे निपको यदि शरीरमें रोग भादिमा हो तो माँ उसको पारस्प बारिक कर नेकन क्रम प्रदर्शित किया है, हाँ मी उसे इसी तर प्रार्शित किया है कि मिससे कुछ विशेष अनुपा बादि परिये । बर्षात् इससे यह बात समझमें भा जायगी कि उसका गास्प-पचारमें एकातसे स्याग करमा वसमत है। 2 वीपष नादि यदि कुछ मी पाप-कियासे उत्पन गई, वो मिस तम ये अपने वोपप बादिके गुपको बिना दिखाये नहीं पती, उसी वय उसमें होनेवाली पाप किया मी कपने गुणो विमा विसापे नहीं पती । बर्षात् निस तय औपष बाधिक पुगेंमें पेग बानि पुनर्गक परामन करनेका गुण मौजूद है, उसी तप उसके लिपे की बानेवाणी पापत्रिपामें मी पापरूपसे परिणमन करमेका गुण मौयू ।। वीर उससे कर्म बन होकर पपानसर उस पाप-निमाका फस उदयमें आता है । उस पाप क्रियावास मौषम मारिके करनेमें, कराममें और अनुमोदन करनेमें, उस प्राप्त करमेना गाक्की बेसी देह मादिके प्रति मर्म है, नैसी मनको बाकुलता पालाता है, जैसा मार्तमान है तमा उस गौपप बादिको बैसी पाप किया सस वपने अपने स्वमानसे परिणम्न कर पपानसर फल देते हैं। जैसे रोग बादिका कारणरूप कर्म-, पैसा बपना समाव होता है उसे मैसा ही प्रदर्शित करता है, गौर से गोषभ पादिक पुसपने ससमावको हिसाते है। उसी तरा गौपष वादिको उत्पति वारिमें होनेवाम लिया उसके काकी शान बादि पि, तथा उसके प्राण करनेवाले से परिणाम है, उसका पैसा हान बादि है, कि तनुसार उसे अपने समावका प्रदर्शित करमा योम्प ।। तपारूप पुम नमस्कासे और गुम वामस्वरूपसे फम्यापक होता है। ५. गास्प-म्पसारमें भी अपनी दो में रोग वादि हो जानेपर चिक्नी मुस्स नामशीरा सके उतनी रनी चाहिये, वीर यदि पोम्प रशिसे देख्नेसे भाश्य ही मार्गप्पानका परिणाम वाने पोल्प रिसाई दे तो, नया बाप्पान उत्पन्न वा मा दिवाई दे तो मोवर बादि म्पपारको प्राण करते र निरपप (निपाप ) बौषध बारिकी चि रखनी चाहिये । तपा परित् सपने पापके किसे अपना अपने भामित अपना अनुरूपान्योन्य किसी दूसरे गोरे रिपेयदि सापच मौषम माविका प्राण हो तो पास रसना उचित है कि उस सावफ्ना निस-पूर-परिणाम हेतुके समान, बपना गर्म मार्ग पोषण करनेवाग न होना चाहिये। ६ सब गालोको रिपरी ऐसौ पानी-पुरुषको बाणा सी मी एकतरिसे प्राण करके उसे बहिवकारी में न उतरनी चाहिये इस उपयोग निरवर स्मरणमें रस्ना उचित है। - विविध पत्र मादि संग्रह-पों वर्ष । ७०८ बवाणीवा, चैत्र पुदी १५शनि १९५२ १ बो बीपध वेदनापके ऊपर मसर करती है, मह वौषध वास्तबमें बेनायक बधको ही निात कर सकता है ऐसा नहीं कहा है। क्योंकि यह वौषम यदि फर्मरूप वेदनीयका नारा करमेवारी हो पो फिर बघुमकर्म ही निष्फरोजाय, मथना स्वय मौपच ही शुम कर्मस्प कही माय । परस्तु यहाँ पर समाना चाहिये कि पहबशुम पेनीपर्म इस प्रकारका है कि उसका वम्यपामाव होनेमें लौषध वारि निमित-कारणरूप हो सकती है। मद मपया मप्यम और शुम वमा बम बघको किसी स्मातीप कर्मके निकनेसे वह ठकर बप भी हो सकता है। सपा मिस तब मद मयमा मप्पम बधि हुए किसने शुम बपका किसी बन्नुम कर्मविशेषके परीभबसे बशुम परिणमन होता है, उसी तय उस वाम बषका किसी शुभ कर्मक योगसे बुम परिणमन मी होता है। २ मुत्यरूपसे तो वष परिणामके अनुसार ही होता है । उदाहरण के लिये यदि कोई मनुष्य किसी मनुम्पका ताज परिणामसे नाश करनेके कारण निकाषित कर्म पंधि, परन्तु बातसे बचाव के कारणोंसे वौर साक्षी मादिके ममावसे, गमनासिक नियोके भनुसार, उस कर्मको करनेवाण मनुष्प यदि एट बाप, तो या नहीं समझना चाहिये कि उसका पर निकाचिप्त नहीं होता । पोंकि वस्फे विपाकके उदयका समय दूर होने के कारण भी ऐसा हो सकता है। तया गातसे अपराधोंमें राजनीतिक निय मानुसार जो दर होता है मामी कळके परिणामके मनुसार ही होता हो, या एकातिक बात नहीं है। वषमा या दर किसी पूर्णम उत्पम किये ए मधुभ कर्मके सदयसे भी होता है, और वर्तमान कर्म- पर सपा पा यता, यो यथायसर विपाक देता है। ३ सामान्यरूपसे वसस्प बादिको अपेक्षा हिंसाका पाप विशेष होता है। परस्त विशेषरूमसे तो हिंसाको मपेक्षा असत्य बादिका पाप एकावरूपसे कम हो, पह नहीं समझना चाहिये, मयमा पा वधिक ही है, ऐसा मी एकतसे म समझना चाहिये । हिंसाके इन्य, क्षेत्र, काम, मात वीर उसके कतकि सम्प, क्षेत्र, कास वोर मावका वपनन मेकर ही कर्ताको उसका म होता है। इसी तरह असाप मादिक संबध भी यही समझना चाहिये । फिसी ममुक हिंसाको अपेक्षा किसी वमुक वसाप बारिका फल एकगुना दोगुना अपना अनंतगुना विशेषतक होता है। इसी तय किसी मसाप माविकी अपेक्षा किसी हिंसाका फक मी एकगुमा दोगुना क्या बनतगुना विशेषतक होगा। त्पागको बारम्बार विशेष शिासा होनेपर भी, स्सारके प्रति विरोप उ सानता होनेपर मी, किसी पूर्वकर्मक प्रावत्पसे गो बीच गृहस्पासासको नहीं छोड़ सकता, पर पुस्प गृहस्पानासमें कुद्धमा बादिके निरके रिपे जो कुछ प्राप्ति करता है उसमें उसके जैसे जैसे परिणाम रते है, उसे क्दनुसार ही बंप आदि होता है। मोरके होनेपर मी अनुकंपा माननेसे, अयमा प्रमाद होनेपर मी उदय मामनेसे कर्म-संच पोसा मही साता । उसका तो परिमामके यमुसार होता है। कर्मके सूक्ष्म मेदोंका यदि बुद्धि ANR न कर सके तो मी शुम बौर मशुम कर्म तो फमसहित होता है, इस निषयको गोलको भूगमा नहीं चाहिये। ५. बांदके प्रत्यक्ष परम उपकारी होनेसे तथा उनके सिम्पदके प्ररूपक होने के कारण मी सिवको मरेभा मईको प्रपम ममस्कार किया है। . - 101 प्रीमत् पामचन्द्र ७०९ बमामामा क्षेत्र बदौ ५, १९५१ मापके स्वामकी मी स्वरुपकी पिसे प्रीति करनेसे और विचारनेसे शाम ही होता है। • यह नार किस शासे वाया है, इस पाम्पसे शामपशि अध्ययनका बारम किया है। स्वरले मुम्से उस पारम-चाम्पके वारापको समानेसे समस्त शाका यस्य समझना पोम्प है। हाम्में तो ओ वाचाग पारिका बाँपन करो, उसय बधिक बनुप्रेक्षण करमा । मा बक्से उपदेश-पति उपरसे सारमें ही समधमें पा सकेगा। सब मुमुभुमोको प्रणाम पनि। ७१० सापम, वैशास सदी १५, १९५१ मिपाल, वविति, प्रमाद, कपाप और पोग पे धर्मपके पाँच कारण है। किसी स्पडपर प्रमादको बार बार के पार ही कारण बताये , वो वहाँ प्रमादक तार मिष्पाप अमिति वार कयायमें ही किया गया है। शावको परिमापानुसार प्रदेशबंधक पर्प निम्नरूपसे है-परमाणु सामान्यरूपसे एक प्रदेश- पगाती है। उस एक परमाणुके प्राण परनेको एक प्रदेश कहा जाता है। गार्म-रसे बनव परमाणुमोको प्राण करता है। परमाणु यदि फैले हों तो कनवप्रदेखी हो सकते है, इस कारण बनत प्रदेशोजन कहा गाता है। उसमें भी मह बनंत भारिसे भेद माता है, बाद नहो कर प्रदेशबष कहा होगा परमाणु तोक्नंत समाने चाहिये, परन्तु उस बनतका समनताको साप समाना चाहिये । तया पदि उससे विशेष पिक विशेष म्यिो ममतताको सपन समधनी चाहिये । पण मी माकुरा म होते हुए भाविसे ततक कर्मपा बाँधना चार करमा पोम्प है। ७११ ईर, पैशास बदौ १२ मुक. १९५२ तपास्म ( पपार्ष) वातका-मोक्षमार्गके लिये मिसके विश्वासपूर्वक प्राति को पा सके ऐसे पुरुषका बीचको समागम होने कोई पुष्पा तो समझते हैं। तपा उसकी पहिचान होने मी महान् पुण्य ही समझते हैं और उसकी मम्बा मदिसे माचरण करनेमें वो महान् माम् पुग्म समसते है-ऐसे धानाचे मो पचन ने सो प प्रापन्न अनुमसमें माने जैसी बात है। पबपि तपारूप मातपुस्पके बमान जैसा ए का पारा, तो मी बामापी बोरको सप्त समागमको म करते हुए उसके नमामें भी वस विविस्थानकके बम्पायका बधा करमा चाहिये। ७१२ मर, शाल भदौ १२ एक. १९५६ सपा निपोमानेसे चालको ससमागमका प्राप्त समागम भी शिपिगोमाता। ससमागः बमाक्य सेद रखते हुए भी यो ससमताम मा पा परम पुष्पका योग मिग है। सरिसे सभा पागका योग बननेता माल गास्यावासमें पना तबतक उस प्राविको मौलिक पर ०१.] पिविष पन मादि संप्रार-धों वर्ष साप साप, कुछ सावधानीपूर्वक, परमार्पम पति उसाइसहित प्राचि करके निमित्तानका निम्म ही पम्पास करते गना चाहिये | बई, म्पेष्ठ पुदी १९५३ ७१३ स्वमाप-जाप्रतवशा . पिमसारी न्यारी परमक न्यारौ सेन न्यारी, पादरि भी न्यारी दर्गा मूठी मेरी पपना । मवीत अपस्या सैन निद्रामाहि फोन पै न, विधमान पसक न पॉम अब एपना ॥ स्वास भी सुपन दोक निद्राकी मसंग इम, सौ सप भंग सस्सि मावम दरपमा । स्यागी भयो पतन अधेतनवा मार स्पागि, मासे ष्टि सोसि समासे स्प मपना ॥ (२) भनुभव-उत्साहपशा मेसो निरभेदम्म निरपे मवीव हुवो, वैसो निरभेद भव भेद कौन कौगो। दीसे फर्मराव सरिव मुस्ल समापान, पापो निमपान फिर पारि न बोगी। कई कदापि अपनी इमाम स्पागि करि, राग रस गपिक न परवस्तु गोगी । ममगन भान विपमान परगट भयौ, याही भावि मागम अनवकास रोगी । स्थितिषशा एक परिनामके न करता दरप दोर, दो परिनाम एक दर्द न परत है। एक करदवि दोइ दर्य करई म करे, दोर करत्ति एक दर्य न करत है। भीप पुदगस एक खेत-मममाही दोर, अपर्ने मपर्ने स्प दोर कोउ म टरत है। ना परिनामनिको करवा है पदगस, चिदानन्द पेवन समाप भावरत है। (१) ॐ सर्वज्ञ वारमा सन्पमापसे रहित है, निसे सपा इसी तयका बनुमब रहता है मुहै। निसे जम्प सब ब्रम्पसे, क्षेत्रसे, कासे वीर मावसे सर्वथा भसगता रहती है, मामुळहै। भटस अनुभवस्वरूप बाहमा गासि सब इम्पोसे प्रत्यक्ष मित्र मासित होनहास मुख्दशा एती है। पुरुष मौन हो जाता है, या पुस्प वप्रतिवर हो जाता है, पर पुरुष बसंग हो जाता है, मा पुरुष निर्विकल्प रो गाता, मौर का पुस्प मुक्त हो गाता है। मिमोंने इस तराको संगदया उत्पम की है कि तीनों का में देह बा से मपमा कोई मी पन था, उन मगवानुरूप स्थापोंको नमस्कार है। विपि मादिक शिकस्पको छोड़कर निन विचारमें माचरण करमा कर्दम्प ।पुर समान बमलरूप भीमद् पसवान [... ७१४ कमाई, भ्येष्ठ ८ मौम १०५१ मिसे किसी प्रति राग मोर देप नहीं रहा, उस महास्माकी नमस्कार ! १ परमपोगी मोडपमदेव मारि पुस्प मी मिस देरका रझम नहीं कर सके उस में एक विशेषता यह है कि बक नाचको उसका संबंध ये तबतक जीप अमाव-निर्मोहीपना-मास फरफे, भवाप्प अनुमणस्प निगतरूपको जानकर अन्य सब मासे म्माच ( मुफ) होगा चाहिये, जिससे रिसे जन्म-मरणय मावागमन म थे। २ उस देश मेरते समप जितने बर्मे वसगता-निर्मोहीपना-पपार्य समरसमार यता है, उतना ही मोक्षपद पासमें पता है, ऐसा परमशाला पुरुषका निभय है। ३ इस देश में करने योम्प कार्य तो एक कि किसीके प्रति किचित् मी राग और रेप म ऐ--सत्र सम-शा होणे-पी कम्याण मुस्स निषय है। १० भी मन पबन मोर कापाके योगसे पाने या मिना माने कोई अपराभ हुमा हो तो उस निनफ्पूर्वक धमा माँगता --वापरत मनमानसे क्षमा माँगता । बमई, म्पेठ बी र रचि १९५१ परमपुरुष पशा-वर्णन १ कापसौ फमक माई नीचसौ नरेस पर, मीपसी मिवाई गरमाई माफ गारसी । मारसी भोग-मावि पारसी करामावि, पारसी हौस पुदगम परिणरसी ॥ भाससौ नग विकास मातसौ पनपास, कामसौ टुपकाम सोक-साम सारसी । सीठसौ सनम माने बीउसो पस्वत मामै, ऐसी भाकी रीवि वादी बैदव बनारसी ।। मो कचनशे कोचर के समान मानसा है, राजगदीको नौचपदके समान समठता है जिससे मित्रता करनेको मरणके समाम समहता पापनको प्रपने गोकरके समान मानता है, कामिन बादिको बो गरके समान गिनता सिनि मादि ऐवर्पको रो वसाताके समाम सममता , बम में पूम्पदा होने माविकी विसको बनर्पक समान गिनता है पुगको सबि ऐसी बौदारिक पारि कपाको रसके समान समझता है जग मोग-विकासको चंगारके समान मानता है गापासको मारके समान समझता है कुलुम्म कर्पको काम-मृत्यु के समान गिनता को पय माने रको मुएको गरके समान समझता है कीर्तिमको नाकके मैसले समान समता, और पुष्पके व्दपको जो विपके समान समझता है ऐसा बिसको गति है उसे बनारसीदास ममतार करते। २ सिमे पुस निकाम्प न करते र बसंगमान दोरम्नामों पों के समरमाने पचा प्रति हेंगे क्यों न्यो उसको मातापूर्वक उनकी मस्पि-ममा रंगी बापगी, स्पो त्यों में स्त्र अनि नाम-प्रपागचे पुगमतासे प्राप्त करेंगे-समें दोनों है।
विविध पन मादि संपा-यो वर्ष सधे बत करणसे मिशेष सम्समागमके वाम्रमसे नीषको उस दशा मी गुत पारे समयमें ही प्राप्त हो जाती है। ३ म्यबहार बयवा परमार्पसबधी यदि कोई मी नीवकी रति हो तो उसे शमन करके, सर्पया बसग उपयोगपूर्णक वयमा परम पुरुषको उपरोक दशाके अवमानपूर्वक, वारमा स्पिति करना चाहिये, यही निवेदन है। क्योंकि अन्य कोई भी विकल्प रसना उचित नहीं है। मो को सबत करणसे सपुरूषके पचनको ग्रहण करेगा वह सत्यको पापेगा, इसमें कोई सशप मही, चौर घरीरका निर्वाह पादि म्पबहार सबके अपने अपने प्रारम्पके अनुसर ही प्रास होना योग्य है, इसस्पेि तत्सर्वपी कोई मी विकल्प रसना उचित नहीं। उस विकल्पको यपि तुमने प्राप शान्त कर दिया है वो मी निधयक्री प्रबख्ता के लिये यह रिसाहै। . सब पीयोंके प्रति, सम माफि मति, बसा एकरस मीतम्गदशाका रसना ही सर्व शासका । वास्मा, गुरचैतन्य जन्म जरा मरणरीत बसगस्वरूप है। इसमें सर्व शानका समावेश हो माता है। उसकी प्रतिमें सर्व सम्यग्दर्शमका समावेश हा नाता है। वामाको बसगसरूमसे मो स्वमानशा पना है, पप सम्पकमारित्र उत्तर सपम वौर बीवरगदशा है । उसकी सम्पूर्णताका फल साहु सोका थप रोजाना है, यह बिलकुल सदरहित है-विपुल सदहरहित है।यो प्रार्थमा है। ७१६ बर्मा, ज्येष्ठ पदी १२ शनि १९५३ आर्य पासोमागक मरणके समापार फकर मात सेदावा । ग्यों ग्पों उनके बनेक बहुत गुणोंके प्रति धि नाती रे, स्यों स्पो अधिकाभिक से होता है। नीबकने देशका सबम इसी तबसे है । ऐसा होनेपर भी जीत मनाहिसे देहका स्पाग करते समप से प्राप्त किया करता है, और उसमें प मोहसे एकमात्रकी तय रहता है। यही जन्म मरम वादि संसारका मुख्य भीम है । मीसोमागने ऐसी देहको छोड़ते हुए, महान् मुनियोंको मी दुर्सम ऐसी निमा बसगतासे निग उपयोगमय दशा रखकर षपूर्ण हित किया है, इसमें सशप नही । उनके पूम्प होनेस, उनका तुम्हारे प्रति बहुत उपकार होमेसे, तपा उनके गुणोंकी पलुस्ताके कारण, उमका विपोग तमें पविक खेदकारक हुमा है, और होना योग्य मी है। तुम उनके प्रति सांसारिक पूम्पमायके सेदको विस्मरण कर, उनाने तुम सबके किप गो परम उपकार किया रो, तपा उनके गुणोंकी ना तुममें बहुतता माइम हई , उसका कारम्बार स्मरण करके, उस पुरुषका योग रो गया है, इसका मतरमें खेद रसकर, उन्होंने वाराधना करम पोग्य गो गो बबन और गुम तापे हो उनका स्मरण कर, उसमें अम्माको प्रेरित करनेके रिपे हो तुम सबसे प्रार्थना है। समागममें बाये गए मुमुमुखोंको मोसोमामका स्मरण सहन ही वधिक समयतक रमे मोम्प है। गिस समय मोहके कारण ले उत्पम हो उस समपमें मी उनके गुणों की मठवताको स्मरणमें मकर, उपम होनेवाले लेनको शान्त कर, उनके गुणोंको मतताका वियाग हो गया है, इस पर पर करना योम्प है।
श्रीमद् पासवान इस क्षेत्रमें इस काम में मासोमाग से पुस्प पिरो मिते है या में बारमार मासित होता है। धौरमपूर्वक सोंको का शान्त करना, और उनके मव गुणों और उपकी सपनोंका वामप मेना हो पोम्प है । पीसोभाग मुमभुवोदारा विस्मरण किये जाने योग्य नहीं है। जिसने ससारके सस्मो पारपसे नान किया है, उसे उस स्सरके फार्पको प्राप्ति अपय मप्रापिसे हर्ष-योक होना योम्प नहीं है, तो मी ऐसा बान पाता है कि अमुक गुणस्थानक उसे माँ सपुरुपके समागमकी प्राप्तिसे कुछ दर्प, और उसके वियोगसेस सेद सकता है। बामसिद्धि प्रपके विचार करनेको इन तो विचार करना । परस्तु उसके पदिक परिवार बहुतसे पचम और स्मन्पोका विचार करना बन सके, तो वाहमसिदि प्रम उपकारका व अंगा, ऐसा मायम होगी। मोसोमागको सम्ता, परमार्पसमा निषय, मुमुमुबोंके प्रति परम उपकारित वादि गुण बारम्बार दिपार करने पोम्म । शातिशति शांति ७१७ बर्थ, मापात मुदी । रवि १९५१ मीसोभागको ममस्कार १ पासोमागको मुमशुदशा तपाबानाके मार्गक प्रति उनका पात निधप बारम्बार स्पलिमें भाषा करता है। २ सब गोल मुसीम करते हैं, परन्तु कोई निरन ही पुस्प उस पुरके सपा सस्- पको समस्या है। जम्म मरण पादि बनत शासक वास्पतिक (सपा) थप होमेका उपाप, पानको बनानिमाम्स माननेमें नही मापा। जो पवि उस उपापके मानने और करनेको सची या पप होनेपर सत्पुपके समागमके सममको प्रस करे तो या उस उपापको समझ सकता, और उस उपायको उपासना करके सबसे मुछ हो जाता है। पैसो की रम भी प्रापा सके गालको सपुस्पके समागमसे ही प्राप्त होती है। बेसा समागम, उस समागमको पहिचान, बतार ए मार्गको प्रताति बार उस व्यापरण करनेको प्रालि होना भागको परम दुर्गम है। मनुष्यता जामौके पचनो प्राण मिना उसकी प्राप्ति होना, और उनके बाप को rए मामि प्राधि होना परम दुर्सम है -पर उपप श्रीपर्वमानसमामीने उचाप्यपनके नाम पम- पनमें किया है। प्रत्पश्च स पुस्पन समागम और उसके बाभयमें विचरण करनेवाले मुमभुमोको मोश्चर्सरपी समस्त साधन प्रापा (बहुत परक)मप प्रयाससे मोर बाप ही कामे सिरोगाते है । परन्तु उस सम- गम योग मिलमा बहुत दुख है । मुमधु गोल रिच निरन्तर बसी समागम होगमें पता है। उम्पन योग मिना तो बीको स्व कामें दुर्गम है। उसमें भी ऐसे हुपमकाउमें तो पत्र.१..१८,१९] चिदिप पत्र मादि संप्रा-बों वर्ष पायोग रचित् ही मिझता है । सत्पुरुप रिसे ही विचरते हैं। उस समागमका अपूर्व साम मानकर चौवको मोक्षमार्गकी प्रतीति कर, उस मार्गका निरन्तर घारापन करमा योग्य है। नब उस समागमका योग म ऐ तब वारम परिमाकी बोरसे पिको हटामा चाहिये, बौर सत्तासका विशेषरूपसे परिचय रसना चाहिये । यदि म्यापहारिक कार्योकी प्रति करमी परती हो वो मो मो जीप उसमेंसे रविको मद करनेको इम्य करता है, वह नीत उसे मद कर सकता है, गौर या सत्याबके परिचयके लिये अधिक सकाश प्राप्त कर सकता है। मारंभ-परिमाके उपरसे बिनकी बचि सिम हो गई है, अर्थात् उसे नसार समझकर जो नीष उस्से पीछे हट गपे हैं, उन जीवोंको सत्पुरुषोंका समागम और सुशासका भत्रण विशेपरूपसे हितकारी होता है। तथा निस चौत्रको वारम-परिमाके उपर विशेप पति यती हो, उस बीवमें सपुरुपके पचनोंका और सुधारका परिणमन होना कठिन है। पारंम परिमाके उपरसे रविको कम करना वोर सत्ताबके परिचय गघि करना प्रपम वो कठिन माम होता है, पोकि नीमका जनादि-मस्तिमाव उससे मिम हो, तो मी निस्ने पैसा कर नेका निधय कर मिया है, वह उसे करनेमें समर्थ नाहै। इसध्येि विशेष ठस्सार रसकर उस पर चिको करमा चाहिये। सब मुमुक्षुओंको इस मातका निभय और नित्य नियम करना पोम्प है। प्रमाद और बनिय- मितताको दूर करना चाहिये । ७१८ सवे पान के बिना और सबै चारित्रके बिना बावका कस्पाण नहीं होता, इसमें स्देह नहीं है। सपुरपके बचनका प्रवण, उसकी प्रतीति, और उसकी मात्रा पन्नेवाले बाल पारिको प्राप्त करते हैं, या निस्स्दो वनुभव होता है। पादि योगवासिष्ठ पुस्तक भेजी है, उसका पाँच-सात बार फिर फिरसे पाचन और पारम्बार विचार करना योग्य है। ७१९ ई, पापा की १ गुरु १९५२ (१) मेमसे भगाकर थैलेसीकरणवक मिस पानीको सस क्रिया माय है, उस बानीके पचम स्पराम्पका निषेप नहीं करते । इतमा ही नहीं, किन्तु स्याग पैगम्पका साधनमूत नो पहिले स्पाग-राम्प बाता है, तो उसका भी निपेष मही करते । (२) कोई पा-क्रिया प्रापि करके जानाके मार्गसे विमुख हवा हो, वा मुनिको महताके कारण उबदशाको प्राप्त करते हुए म पाता हो, अपना सिने असत् समागमसे मति-म्पामोर प्राप्त परफे कम्पपा त्यागराम्पको ही सबा त्पाग-परम्प मान लिया हो, तो परि उसके निपेप करने के लिये पानी पोम्प सपनसे फम्णा बुधिसे उसका पित निषेप करता हो, तो म्पामायुक न ऐकर उसका सोख समातकर, पपार्य स्पाग-रम्पको बतर तपा बाम शिपामें प्रापि करना उचित है। ८५
१८२
भीमद् पम्पन्न
[पर.२ .११.२२,०१५
७२० बम्बई, मापात बदर गुठ. १९५१
* सफल ससारी इदियरामी, सनि गुम भावमरामी रे,
मुमपणे में भावमरामी, दे दिये निकामी रे।
(२) मुनियो। हमें वार्य सौमागको अंतरदशाको वौर देह-मुछ समयको दशाकी,
बारमार वन्प्रेक्षा करना चाहिये।
(३) मुनियो । प्रम्पसे, पेत्रसे, काम्से वीर माक्से-बसगभाषसे-विचरण करने के
सतत उपयोगको सिद करना चाहिये ! जिसने जगतके पुस दशाको जोड़कर जाना के मार्गका
बाप माण किया है, पबश्य उस बसग उपयोगको पाता है। जिस पुतसे वसंगता उसित
हो उस भवका परिचय करना पोग्य है।
७२१ बर्ग, नापास दी ११ वी १९५६
परम संपमी पुरोचे नमस्कार से
सारभूत म्पमारको सारभूत प्रयोगनको तय करनेका उदय मौजद पनेपर मो मो पुरुप
उस उदयसे धोम न पाकर सनमान-सममम नियमासे , उम पुरुपोंके माम-सका
हम बारम्बार स्मरण करते।
७२२ ब भाषण सरी । रवि १९५१
(१) परम सत्तर स्पम दिनके सपमें निरस्तर या करता है, उन सपुरमौके समागमका
निरंतर पाम है।
(२) प्रतिसित ( निर्मप)म्पसारकी श्री की मिशासासे मौ वर्मतगुण विशिः सिसा
यता है । उदय के सम्मान और इन किये बिना बठा होनेसे, बतरग सेवा समतासहित बम
करते है । दोर्षकाको भापत सम्पमालमें गाने के प्यानमें बर्तन करते हैं।
(१) पपार्थ उपकारी पुस्पको प्रत्यक्षतामें एकबभावना बामविका सहा करती है।
७२३ एवं मातम सदी १५ गुरु १९५५
(१) विसका दमाचस्पति है, उसे को स्थितिम छाकर कि कोका
भय किया है उन महात्माचे ममस्कार!
(२ माचरण मय और ससम्ममममें प्रभार नहीं करना चाहिये ।
भ1ि
फा १४, २५, २६.२.] विविध पत्र मादि संप्रा-बौं बर्ष ७२४ पई, श्रामण सुदी १५ गुरु १९५२ (१) मोक्षमार्गप्रकाश प्रथका मुमा बीचको विचार करना योग्य है। उसका अवलोकन करते हुए यदि किसी विचारमें कुछ मप्तर जैसा माश्म हो तो म्यापुरत न होकर उस स्यम्को मनिक मनन करना चाहिये, क्यवा उस स्पलको सम्समागममें समझना चाहिये । (२) परमोकर स्फममें स्थितिको वात तो दूर हो, परन्तु उसके सरूमका सिपार होना मी कठिन है। - ७२५ बर्मा, प्राण मुदी १५ गुरु १९५३ 'क्या सम्यमटि बमस्य वाहार कर सकता है यादि यो प्रभ मिले। उन प्रमोंके को विचारनेसे करना योग्य होगा कि प्रथम प्रश्नमें किसी को मेकर गीचको शुर परिणामको हानि करनेके ही समान है। मतिको वस्थिरताले गीत परिणामका विचार नही कर सकता। पपपि किसी जगह किसी प्रथमें भेणिक बादिके सवधर्म ऐसी बात कही है, परन्तु पर किसीके बारा माचरण करमेके लिये नहीं कही तपाप बात उसी तर यथार्थ है, यह मात मी नही है। सम्पपछि पुरुपको बम्पमात्र मी व्रत मही होता, वो मी सम्यग्दर्शन होनेके पचात् उसका पति जीव गमन न करे तो यह गरिकसे वधिक पदद मबमें मोक्ष प्राप्त कर सकता है, ऐसा सम्यग्दर्शनका पळहै-इस से कही गई बातको कम्पयारूपमें न जानी चाहिये । सत्पुरुपकी पाणी, लिपय कौर कपापके अनुमोदमसे अपना राग-रेपके पोषणसे शित होती है-पा निथप रमना चाहिये। पौर चाहे कैसा मी प्रसग हो उसका उसी पिसे वर्ष करना उचित है। ७२६ मई, मारण यी ८ मुक १९५५ (१) मोमदर और ममिरनमाला इन दो पुस्तकोंका हाम बाँचनेका परिचप रखना । इम दोनों पुस्तकोंमें मोहके सहपके क्या भारम-सापनके वात्से उच्म मे पता है। (२) पारमार्पिक करणाहुनिसे निप्पक्षमासे कल्याणके साधमके उपरेश पुरुषका समागम, सपाम्ना और उसकी मात्रा माराधम फरमा पाईये । तया उस्त समागमके योग म्यामका बुद्धि-बनुसार परिचप रसकर सदाचारसे महचि करना ही पोम्प है। ७२७ बी, मावण ही १० मि १९५३ मोशमार्गप्रकाश भवन करनेकी बिन निजामुमोको पभिगा है, उनको उसे भत्रण करना- बधिक परीकरणपूर्वक मौर पौरपसे मान करना । मोत्यको पदि किसी स्पउपर नशेष संशय होतो उसका समाधान करना उचित है। तया किसी स्थानपर पदि समाधान होना बसमर मा मास हो तो उसे किसी महामाके संपोगसे समानेके दिये फरकर प्राणको रोकना नही चाहिये। तया उस संग्रयो किसी मामाके सिगप पप किसी स्थानमें पूछनेसे का विशेष भमय ही कारण होगा, और भीम रामचन्द्र [पा ०२८.२१, उससे निस्सन्देह अषण किया हुमा मागका गम म्पर्य हो पा जायगा । मा परि यदि गोताको हो बाप तो वह वधिक हितकारी हो सकती है। ७२८ समई, मारण यी १२, १९५५ १ सय भूमिकामें स्थिति नेतक, भुनानक बळमान कर सम्पुरुष मी स्त्रमा स्पिर र सकते है, ऐसा बो सिनमगवान्का ममिमत है, ए प्रस्पक्ष सम दिखाई देता है। २ सोहर भूमिपर्यंत मुबान (शानो-पुरुपके पचम) का अपान जब जब मंद पाता, तब तब म्पुस्प मी कुछ कुछ स्थिर हो जाते है, तो फिर सामान्य मुमधु गौच ममा किन विपरीत समागम-विपत भुत वादि वर्षाबन-पते बापे । उमें दो बारम्बार विशेष वति विशेष अस्थिरता हामा संभव। ऐसा होनेपर मी गो मुमुक्षु, ससमागम साचार कर सशाब विचारलप बाम्नमें निवास करते है, उमें सोहम भूमिकापर्यंत पाँच बाला कठिन नी-कटिम छनेर मी कटिन नही है। ७२९ बमई, प्रावण बदौ १२ दुष १९५१ ट्रम्पसे, सेपसे, काम्से और भावसे मिन पुरोको मविप नही, पन सत्पुरुपोंको नमस्कार ! ससमागम सत्यार और स्मारमें स निवास होना पा वामया होनेन प्रबर मरम्बन है। पापि ससमागमका पोग मिना दुईम है तो मा मुममुभोंको उस योगको तीर मिशासा रजनी चाहिये और उसकी प्राप्ति करना चाहिये। तथा उस मोगके बमानमें तो गावको मपस ही सवाल स्म विचार सम्पनसे सदाचारको नागति रम्नी पोम्प है। ७३० बर्थ मधपद सदौ १ गुरु १९५१ परम पाठ पूम्प मौपिवागी! वामतक मैंने पापको जामा मविनय नमवि वपचा पपाव किपे , वो में दोनों आप मोरकर मला नमाकर घर बताकरमसे समा मँगता है। हपा करके बाप क्षमा प्रान फरें । अपनी मातेश्वरीसे मी में इसी तरबमा मंगता । इसी प्रकार अन्य दूसरे साथियों के प्रति मी मने गरि किमी मी प्रमच पण अपना बनिनप-बाने या बिना गाने-दिये दो, तो उनकी मोहर मन्त परणसे ममा माँगता पा करके स्वधमा करनागी।
प.११,११,११,१४] विविध पत्र मादि सपाह-बाप ७३१ वई, माफर मुदौ ९ रवि १९५३ १ बायक्रिया गौर गुणस्थान मादिम एनेवाग त्रिपाके सम्पकी पर्चा करना, सबमें प्राप' अपने वीर परके लिये उपकारी महीं होगा । २ इतना ही करीप है कि तुम मतमतांतरपर रपि न राउते हुए, वसतिका निरोष करनेके म्पि, मोरको सत्शासके परिचय और विचारमें होस्पिति करनी पाहिये । ७३२ बर्थ, भास्पद बदौ ८ रवि १९५५ चीनको परमार्थ प्राप्त करमेमें वपर बतराय है, उसम मी इस कामें तो बतायोंका वर्ण माम बस यता है। शुभेच्छासे गाकर कैनापपर्यंत भूमिकाके परचनेम नगर जगह ये बयप देश- नेमें माते हैं, और ये बतराय चौबको बारम्बार परमासे पुत कर देते हैं । पात्रको महान् पुष्पके उदयसे पदि सरसमागमका पूर्व मम या करे, तो पह निप्रितया कैवल्यपर्यंत भूमिकाको पाँच जाता है। समागमके वियोगमें जीवको बारमबठको विशेष नामत रसकर मशाम बौर शुभेच्छा- सपम पुरुषोंक समागममें हो राना उचित है। ७३३ बर्ग, मावप' पदी १५ म १९५९ १ घरीर बादि बळके घनेसे सब मनुष्योंसे सर्पया Pिगमरमाचिसे रहते हुए चारित्रका निर्वाह मही रो सकता, इसलिये वर्तमानका से कामें चारित्रका निर्वाह करने के लिये, बानसरा उपा फिया हया मर्यादापूर्वक घेताम्बरपिसे गो पाचरण है, उसका निषेध करना उचित नहीं । वया इसी वय पसका वास रसकर दिगम्बरपतिका एकात निषेध करके पा-मूळ मानि कारणोंसे पारिकों शिपिस्ता करना भी उचित नहीं है। दिगमारत्व और भेताम्मरल, देश काल और अधिकारीके सपसे ही उपकारके कारण है। माद यहाँ बानाने मिस प्रकार उपदेश किया है, उस तर प्रापि करनेसे वारेमाप ही होता है। २ मोश्चमार्गप्रकाशम, भेताम्बर सम्प्रदायकाय माम्प समान निनगमका जो निषेप किया है, मा निषेप पोम्प नही । यपपि वर्तमान भागोमें अमुफ स्मठ बधिक संदाम्प, परम् सापुस्पकी ररिसे देसनेपर उसका निराकरण से गाता है, इसलिये तपशमरिसे उन मागमाफ अपोषम करने में सराप करमा पित नहीं है। ७३४ गर्ग, मासोर ८ रवि १९५५ (१) सपुलोंके बगार गमार स्पम नमस्कार !
भीम राजन [पर.१५.१ (२) वषिषम परिणामसे किन्होंमे काट निको पी किया है, ऐसे प्रोसम भार परम पुरमा नमस्कार ! (१) जो परिणाममें तो बसत हो, परम्त प्राथमिक दया वो काट विपकी तय माकर कर देता है, ऐसे मौसपमको ममस्कार हो। (.) उस भानको उस वनको और उस चारित्रको बारम्बार ममस्कार हो! (२) निन मलि निकाम है ऐसे पुमोका सग अपना दर्शन महान् पुष्पस्प समाना चाहिए। - (२) पारमार्थिक परिशेपसे पत्र वादिका रिसना नहीं हो सकता । (२) यो बनित्य है, जो वसार और भो मारणरूप है, इस जीपको प्रवातिया कारण क्यों होता है। इस बातका रात-दिन विचार करना चाहिये। (१) कापि वार पानीको प्रशिको पूर्व वौर पबिम नितना र बानाकी पी प्रपम तो निराम्मा हो होती है, या मंचि उत्पम मही करती, और नीमको प्रतिको बदर मही वाता) और इस कारण बाल उस शिम रुपियुक्त नहीं होता । परन्तु निम बालोंने परिवा साम करके पोरे स्मयतक मी उस रिका बाराधन किया है, उन्होंने सर्व लोक अपरूप निर्माणको माप्त किया है उन्होंने उसके उपापको पा लिया है। नारको प्रमादमें पनादिसे रति है, परन्तु उसमें रति करने योम्प तो कुछ दिखाई देता मा0 ७३५ बई बसोब पुरा ८ रवि १९५६ (१) स्व मीकि प्रति हमारी तो धमाधि हो। (२) पुस्पा योग तपा सत्समागमका निम्ना पत कठिन है इसमें सम्देह नही। प्रेम के तापसे तस प्राणाचे प्रति को प्रपाको तय, मुमुसु गीतको म्पुरुषका पोम सपा ससमागम उपारा । सब शाखा उप्स योग मिमा दुरीम ही कहा गया है। (१) तपारस और पोगरपिसमुचय प्रपोजनासमें विचार करमा । ७३६ मा बसोग दो ८ वि १९५६ ॐ (१)मशेष उप मित्रको प्रक्ष मुमुक्षुमोको मी सपुस्पोध योग नपा समागम बापार भूत पता है इसमें संदेह मही। निधिमान इम्प, क्षेत्र, पास वीर मारक योग बम से गौर उचरोचर उप भूमिपये प्राप्त करता है।
पर 10.10] विषिष पभ मादि संप्रारब्बों यर्प (२) नातिमान भाग परिणाम-नोनेके किये जीको नितिमान प्रम्प क्षेत्र और काठको प्राप्त करना उचित है। अब बुषिसे रहित इस बीचको किसी भी योगसे अमेष्ठा-कल्याण कारमेकी इमा--प्रास ऐ, पौर निस्पृह परम पुस्पका योग मिरे, तो ही इस नीरको भान मा सकता है उसके वियोगमें उसे सत्यास और सदापारका ही परिचप करना चाहिये-जाप करना चाहिये। ७३७ वई, वासोजगदी ७, १९५२ (१) उपरकी भूमिकाओंमें भी बरकाश मिस्नेपर मनादि बासनाका सक्रमण हो जाता है, धौर पर बारमाको बारम्बार वाकुल-म्याकुल बना देता है । बारम्बार ऐसा ही हुमा करता है कि वन ठपरको भूमिकाको प्राप्ति होना दुर्गम ही है, दौर बर्वमान भूमिका मी उस स्थितिका रिसे होना दुर्टम है। जब उपरकी भूमिका मी ऐसे वरुप पन्ताप-परिणाम होते है, तो रि घुम रा वादि मूमिकामें पैसा हो, तो यह कुछ मापर्यकारक नहीं है। (२) उस अन्तरापसे खेद न पाकर मामापी चीत्रको पुरुषाप-नारि करमी पाहिपे वीर हिम्मत रखनी चाहिये हितकारी दप्प क्षेत्र वादि पोगको सोग करनी चाहिये, शामका विशेष परिचप रखकर बारमार हटपूर्वक मी मनको सविधारमें प्रविष्ट करना चाहिये । तया मनके दुर्मापसे बाकुल-म्याकुल म ऐकर पैसे सरिचारके पपमें नानेकर उपम करते हुए अप होफर उपरको भूमिकाको प्राप्ति होती है, और अनिक्षेपमाष होता है। ३ पोगारिसमुषप बारमार अनुप्रेझा करमे पोम्प है। . ७३८ बमई, मासोय बर) ११ रवि १९५३ ७३८ मोहरिमनापार्पने पोगररिस्मुबय नामक प्रयको संतवमें रचना की है। राहोंने योग बिन्दु नामके योगके दूसरे प्रपको भी बनापा है। हेमचन्द्राचार्पने योगशम्स मामक प्रप बनाया है। भौहरिमाात योगादिसम्बपका अनुसरण करके भोपशोपिनपने गुगपती भाषामें साप्पापकी पना की है। उस अपमें, गुमेप्यासे छगार निर्माणपतय भूमिधाम मुमुझ गौरको बारबार अाम करने मोपचार करने योग्य और स्थिति करने पाप भाशपस पोर-तारतम्य तपा शास्त्रि-समार तारतम्य प्रकाशित किया है। यमसे व्यासर सम्पधिपर्यंत मग योगके दो मा-क माग पादिका निरोपम्प बोर मरा आमममा-परिणाम। योगशिसमुपपमें नामस्तमा परिमामनप योगका ही मुस्प पिपप है। उसफा बारमार निवार करना चाहिये।
३१वों वर्ष
७३९
बर्ग, धर्षिक १९५१
वनत मारमदम्प
केसम्यान स्वरूप
शकिहमसे
मिसे सम्पूर्ण प्रगट गपा है, क्या प्रगट होने के
मार्गको बिन पुरुषोंने प्रत किया है,
उन पुरुषोंको बस्यत मधिसे नमस्कार !
७४०
बम्, चर्तिक दी १ दुष १९५१
यो मार्य इस समय सम्म क्षेत्रमें रिदार करनेके बाममौ । उनको, विस क्षेत्रमें अंतर
प्रधान लिये, निापिमान इम्य क्षेत्र का और मातका लाभ मिले, पैसे क्षेत्र में विचरना उचित है।
७४१
बर्मा, कार्तिकदी पनि १९५१
सर्वथा वतर्मुख होने के लिये सम्पुरपोका मार्ग सब हुसोले सय ऐनेन उपाय है, परन्तु
किसी किसी भी हो समठमें जाता है। मात्पुप्पके योगसे, विधर युनिसे, तम पराम्पसे और
सम्पुरुष समागमसे उस उपापको समझना उचित है।
उसके समझने कसर एकमात्र यह ममुष्प दो, और भी अनियमित का
मस्से मस्त है और उसमें भी प्रमाद होता. यासे और मारपर्यो।
७४२
बर्मा, कातिकमा १२ १९५९
मात्मवाको प्राप्त कर यो निईनामसे प्रारम्पक मनुसार विचरते है, ऐसे महामामाका
जालको सपोग मिमा दुर्गम है।
सपा उस पोगके निम्नपर गांवको उस पुरुषको परीमा म होता, और पपा परत
मिना उस महामाले प्रतिपदाम्प नहीं होता।
सपा मक्तक मामय पन तबतक उपदेश नहीं गवा, मोर उपदेशो मे बिना
सम्पनिय योग महीनता ।
१०४,४४,४५,४५] विपिप पम मावि सपा-पो यर्प तया सम्पमशनकी प्राप्तिके बिना जन्म मादि दुःखकी वास्पन्तिक निवि नही हो सकती। ऐसे महरमा पुरुपका योग मिलना ता दुर्घम हो, इसमें संशय नहीं, परन्तु वामापी जीयोका मी योग मिथ्ना कठिन है, तो मी मित् चित् पर्वमानमें यह योग मिल सकता है। ससमागम बार सदासका परिचय फरमा चाये। ७४३ बई, मंगसिर मुटी ५ मि १९५१ 3A १ क्षयोपशम, उपशम, क्षायिक, पारिणामिक, बी पिक मोर सामिपातिक इन म मावोंको क्षमें आत्माको उन भास बनुप्रेक्षण करके देसनेसे सद्विचारमें शेष स्पिति होगी। २ जान दर्शन और पारिन नो आरमसमागमप है, उन समझनेझे ठिये उपरोक मात्र विशेष अवलंबनके कारण है। ७४४ बई, मगसिर मुरी ५ रवि १९५४ से म करते हुए, हिम्मत रमकर, हामीफे मार्गसे बसनेसे मोक्ष-नगरी मुसम हो। निस समय दिपप कपाप वा विशेष विफार उत्पन्न करके निकट हो जोप, उसममय रिचार पानको भपनी निर्यिता देखकर बात हो मेर शेता है, और यह अपनी बारमार न करता मिर फिरसे अपनेको तिरस्कारको रसेि सकर, रिस महान पुरुषोंके परित्र वार मापोर बागन प्रहण कर, arमाम शोर्य उत्पम कर, उम विषय आपिक विरुद्ध बापत घर करफ, उहादेता है तबतक वह हिम्मत हारकर नहीं बैटना, तथा पर फेवल दो मे करफ भी नही रफ जाता। नामापी गोषोंने इसा पति अपठबनका ग्रहण किया , भार बामें उन्होंने इमामे जप प्राम की है। इस बातको सब मुमभुओको मुम्पमार्गसे रपमें पिर करमा पाहिये । ७४५ बमई मगमिर मुरी५ी १९५४ (१) कानसे गुगोंक भगमें मानस पपापम्पम मागानुसारग्ना पहा जा सरना है। (२) कौनम गोरे अगमें भानम पापमसे सम्पगरिमा का मा सम्मा। (३)पौनमे गुणों मग भानमे धुतदान केनगन दो मरना है। (१) तथा कोनमी ना हानेम सान यथार्थमएम दाता है या ा ामा ! पेस पारपाना दिससार। ७४६ सम्मा पारी १.५५ "म अमा मगर निभाश्मे ही गालि बाय मिनामा रामराम आ. न म नीnि में द भीम पत्रम [पर .neurs रोगी, वर्षात् यस्ता परम्पावहारिक पियेगी, तबतक यह समझना कप बामरिको किने सम्मान प्रतिष और स्वम मी उस प्रतिवरमें नया गाय, इस मातका मा रमना । हममे गो यह मनुरोप किपा है, उसके उपर तुम पधाराकि पूर्म विचार परमा और उस पिक को ही बतरसे सर्वथा निात कर देना । पपा समागमका गम मिलना समय है। यह बात शियिमारिसे नही परत उत्सापिसे मस्तकपर पानी उचित है। ७४७ वानन्द पौन वदी १५ गुरु १९५१ (१) मोसोमागको मौदगीमें कुल परिम् श्चित करना पा, और हाम्में पैसा नहीं बना- ऐसी किसी मी कामि गाना उचित नहीं । ( २ ) अपिषममात के बिना हमें मौ वर्षपताके लिये दूसरा कोई विकार मही है । मौन यमा ही पोय मार्ग है। ७४८ मोरबी माघ सुदी । पुष १९५१ अमेछासे व्याकर धौणमोहतक सस्त और ससमागमका सेवन करना हो याम्य है। में इस साधनको नामको कठिनता है। उसमें किर यदि इस तयके कामे मा कठिनता थे, तो इमकार और रंगवसर्पिणी नामका वाचस्प ब्लुमबसे प्रत्यक्ष परिगोचर होता है। बाम- कम्पाणके एक पुरुषको उससे शोम न पाकर, बारम्बार उस योगपर पैर रखन, समुत सत्समागम और सतिको बम्माम बनाना उचित है। ७१९ मोरवी मार दी दुष १९५१ ममतमा निर्मम्ता होने के लिये मुमश्च बाब दो साधनों का समय ही सेवन करपा चाहिये:- 11-एक सवार सरा सामगम । प्रत्ययस पुरुषों समागम गोषको कमी कमी ही प्राप्त होता है, परन्तु मा पनि सस्मिान हो तो पतके मत समपके सेक्नसे होनेवाले ममकी, प्रत्यक्षसम्पुस्पक समागमसे पात जम्पसमें प्राप्त कर सकता है। क्योंकि या प्रत्यन गुणातियपपान निर्मक चेतन प्रमायुत पचन बार सविध सप्रियता पता है। गोषने विससे उस समागमात्र पोग मिसे उसका विशेष प्रकार परमा चाहिये। उस पोगके अमानमें मतका मामय वाम परिचय ममा चाहिये । बिसमें शतरमा मुम्पत है, शासक से शिसव समस्त उपरेसी और मिसमें समस्त रस शतरसमित है-ऐसे शापक परिचपको समुतन परिबप कहा।
पा.५ ] पिविष पत्र मादि समाह-पों पर्प ६९१ ७५० मोरबी, माघ मटी १ मुष १९५१ (१) समुतका परिचय गोषको वश्य करना चाहिये। (२) मा निक्षेप पोर प्रमाद, उसमें बारम्बार लम्तराप उत्पम करते हैं। पोंकि उनका पाकासे परिचय है, परन्तु यदि निमय करके उनके परिचय करनेकी प्रापि को नाप तो पारोमा संभव है। (१) यदि मुख्य मन्त्राय हो तो पर गीतका निधय है। (२) १ बामस्मरूपके निर्णय होनेमें मनादिसे गोषको मूछ होती मादी १, इस कारण प्र मूल बन मी हो, वो इसमें भाचर्य नही माझ्म घेता। २ वास्महानके सिवाय सर्व देशास वौर सब दुमोंसे मुक होने का दूसरा कोई उपाप मही है। सहिषारके बिमा भारमशान मही होता, वौर बसरसगके प्रसगसे गौत्रका विचR- प्रापि नहीं करता, इसमें बरा मी साय नहीं है। १ वाम-परिणामको सस्पताका भौताकर समाधि करते हैं। वारम-परिणामको वस्तस्पताको श्रीवाकर बसमाधि करते है। नाम-परिणामकी सहन-सरूपसे परिणति होगेको भीतीपंकर धर्म करते है। भारम-परिणामको कुछ मी पर प्रति होमेको भीतीपार कर्म करते है। १ मौगिनतीर्थकरने बैसा बंप और मोश्चका निर्णय किया है, वैसा निर्णय दात बादि दर्शनोंमें एमिगोचर नहीं होता । तपा श्रीनिममें जैसा पयार्य-वस्तत्व देखने वाता ,स्य पपार्प पातृत्व किसी बाप दर्शनमें देखनेमें नहीं पाता । ५ बामाके तापारके (घुम बम परिणामाराके) अनुसार ही बा-मोक्षको म्पबस्था है, ए शारीरिक चेयके अनुसार मही है। पूर्वमें उपार्जित वेदनीय कर्मक उदपक मनुसार रोगबार उत्पन्न होते है, और तदनुसार निर्मर में, मान, ठप्प शीव बादि शरीरको पेय होती है। २ मिशेप रोगके उदयसे अपना शारीरिक म बम्से जानाका शरीर कम्पित हो सकता है, निर्वछ सकता है, मगन हो सकता है, म समता है, म माश्म हो सकता है, नपा उसे प्रम वादिका उदप भी हो सकता है, परन्तु जिस प्रमागर्मे गामें मोच और राम्पको बासना हुई है, उस प्रमाण ही बाब उस प्रसग प्राय करके उस पेगका पेदन करता है। किसी मो जीतको अविनाशी देहको प्राप्ति हुई–पा कमी देसा नही, जाना नहीं पौर ऐसा समय भी नहीं भोर पत्पुका बागमन तो अवश्य होता है-पार वनुमर ता प्रस्पक्ष सामत है। ऐसा होनेपर भी यह गौर उस बावको फिर रिसे मूल नाता है, पर वाय। ८ मिस सह पौतरगमें मनंत सिद्धियां प्रगट हुई पी, उस वीतरागने भी इस देरको मनिष्प समता है, तो फिर दूसरे सील तो इस देशको किस तप निस्प बना सकेंगे!
भीमद् रामचन्द्र [पत्र .५१.५१.५३ ९ श्रीजिनका वमिमत है कि प्रत्येक व्रम्प अर्मत पर्यायोंसे पुछ है। यौको मंत पर्याप है । परमामुको मी ममत पर्याय । जीवके वेतन होनेके कारण उसको पाप मा चेकम है, पौर फरमायुके बचेतन घेनेस उसकी पर्याय मी बचेतन है। बावको पर्याय बचेसन नमी, गौर परमाणुको पर्याप सचेतन मह ऐसा योगिनने निश्चय किया है तथा वैसा ही योम्प मी है। पोकि प्रस्पच पदार्थका सम्प मी विचार करमेसे पैसा ही प्रतीत होता है। ७५१ पाणीबा, माघ वदी १ गुरु १९५४ इस बीमको उचापनाका मूह या तपा उस निविपों नहीं होती बोर , निति किस तय रो सकती है। इस प्रसका विशेषरूपसे चार करमा योम्य-अतरमें उतरकर विचार करमा योम्प है। जबतक इस क्षेत्रमें यमा हो तबतक पिचको बरिकप बनाकर प्रापि करना चाहिये । ७५२ मोरयो माघ वदी १५ १९५१ मिस तय ममापि प बने उस तय करो |हर जाने वपना मिस होमका कोई कारण नही । ना नानको दुर्गम योग हो मिस गया तो फिर पोरेसे प्रमाके मेर देनेमें उसे पाने जैसी मयमा निरास होने जैसा पुग मी बात नही है। ७५३ .म्पाल्पामसार १ प्रथम गुणत्पानक नो प्रपि है उसका मेदन किये बिना, नामा भागेके गुणस्पानकमें माही मा सकती। कभी योगामुपोगके मिझनेसे गाव अकामानिरा करणमा बागेमा और मंपिभेद करनेके पास बाता है। परम्नु पहाँ प्रपिको इतनी अधिक प्रबनता है कि मात्र या प्रपिभेद करनेमें शिपिक रोकर-असमर्प हो जाने के कारण-मापिस लौर बातामा हिम्मत करके मागे पाना चाहता है, परम्त मोहनीयके कारण विपरीताप स्मधमें मानेसे प ऐसा समझता है कि सर्प प्रपिमेद कर या यमित उम्टय पर उस क्य समानरूप माइके कारण मंपियनहिता दो करता है। उसमस फोर्स मांग दी पागानुपोग प्राप हानेपर अामनिर्मण करते हुए, मति बतबाम एकर, उस प्रधिको शिक्षित करके सपना बहान करके मागे मता है। यह अविरतसम्पारि नामक चौपा गुणस्पान है। पों मोधमार्गको समतौति होती है । इसका दूसरा माम बोधगीन माहै। यहाँ बारमाके बनुभपकी मुस- बात होती. अर्थात मध होनेके बीजका यही सरण होता है। २ इम बोरमान गुणत्पानक (चौपा गुणम्पानक) से तेरो गुणस्थानकता वरमानुमा पप गासनेमामान मन् १९५४ में सर महान र महमा बत् १९५५५ मेरमा कामर ए म मरेले का बना हैसारभेत मा मानि सिनिय राम रिमामय माहै। -अमुचार ७५१ मसानसार] मिविप पत्र मादि संप्रह-३याँ वर्ष । एकसा यसा है। परन्तु पानाकरणीय कर्मकी निराधरणताके अनुसार जानकी कम ज्यादा मिलता होती है, और उसके प्रमाणमें ही बनुमकका प्रकाश होना कहा ना सकता है। ३ पानावरणका सब प्रकारसे निराधरण होना केषमान-मोक्ष-है। यह कुछ पुदियम्से कामेमे नही माता, पाबनुभनके गम्य है। . पुदिप से निश्चय किया हवा सिद्धांत, उससे विशेप मुसियस मना सके शरा कदापित बदर भी सकता है, परन्तु पो बस्तु अनुमवगम्य (अनुभक्से सिद्ध ) हो गई है। तीनों का मी मही बदल सकती। ५ वर्तमान समयमें चैनदर्शनमें वपिरतिसम्यग्दृधि नामक चतुर्थ गुणस्पानकसे वप्रमच नामके सातवें गुणस्यानकतक बाहमानुभक्को स्पष्ट स्वीकार किया है। ६ सातसे स्योगकेवठी नामक तेगवें गुणस्थानकताका समम वतमार्वका समय है। वेय गुणस्पानकाका समप कदाचित् छया मी होता है।पाँतक वामानुभम प्रतीतिस्म राता है। ७ इस कामें मोक्ष नहीं, ऐसा मानकर गौच मोक्षकी कारणभूत कित्सा मही कर सकता। और उस मान्यताके कारण नविकी प्राति जन्यपाहपसे ही होती है। ८ जिस सर पिबरे कद किया इषा सिंह पपि पिचरेसे प्रत्मक्ष भिम होता है, तो मी पर बाहर निकम्मेकी सामस रहित , उसी तय कल्प वायुके कारण अपवा सानन मादित्य साधनोंके अमापसे भारमानपी सिंह कर्ममपी पियरे से बाहर नहीं वा सकता-पदि ऐसा माना जाय तो या मानना सकारण है। ९ स बसार ससारमें चार गतिो मुख्य पे कर्म-अपसे प्रम्स होसी ।पके बिना के गतियाँ प्राप्त नहीं होती । बषीत माक्षस्थान, बंसे होनेवाले चतुर्गतिरूप संसारमें नहीं है। पर तो निश्रित है कि सम्पक्स मपमा पारिप्रसे बघ मही होता, तो फिर पारे किसी भी कामें सम्पमत्व वपमा पारित प्राप्त करें, यहाँ उस समय बम नहीं होता और यहाँ बम नहीं को संसार मी नही है। १. सम्यक्त भौर चारित्रमें बारमाको पुर परिणति रहती है, किन्तु उसके साय मन भवन वौर परीरका शुम योग यता है। उस पुम पोगसे शुम बम होता है। उस बंधके कारण देश मारि गतिरूप ससार करना पाता है। किन्तु उससे विपरीत मामबारे सम्पास और पारिन मितने बोम प्रास होते हैं, उतमे होशोंसे मोध प्रगट होती है। उनका फल के देव नादि गतिका प्राप्त होना ही मही। तथा जो देव नादि गति प्राप्त यो उपर को ए मन वचन और शरीरके योगसे होई। और जो पपरहित सम्पमत और चारित्र प्रगट हुना है, यह कापम यकर, उससे फिर मनुप्पभर पाकर-फिर उस मागसे संपुछ होकर-मोक्ष होती है। ११ चाहे कोई मी कारो, उसमें कर्म मीमर रहता है-उसका बंप होता है, और उस पको निर्मगोती और सम्पूर्ण लिएका नाम ही मोक्ष है। १२ निर्मणके गेम-सकामनिर्मण वर्षात् सातु ( मोशको कारणभूत ) निर्जरा, पोर यामनिरा बर्षात् विपापनि ।
- भीमद् रामचन्द्र [.५ मसल १३ बामनिरा मौदमिक मापसे होती है। इस निराको गोपने जनताबार दिपा । और पर्म-बमकी ही कारण है। १. सकामनिर्गय धापोपशमिक मालसे होती है। यह कर्मक वाधका कारण है। मितले मंगों में सफामनिर्भय (बायोपशमिक मालसे ) होती है उतने हो वोंमें भारमा प्रगट होती है। परि काम (लिपाल ) निर्बरा हो तोह बौदायिक मापसे होती है, और यह कर्मचका कारण है। यहा मी कर्मकी निर्भरा तो होती है, परन्तु उससे वारमा प्रगद महीं होती। १५ धर्मवयर चारित्र प्राप्त करनेसे बो मिरा, वौपिक मापसे (बो माग बपरहित मो)ी मायोपसमिक भावसे नहींई। पदि पक्षापोपामिक भासे हुई होती, तो इस तय भटकना म पड़ता । १५ मागे दो प्रकार है -एक गैविक मार्ग दौर दूसरा कोचर मार्ग । पे दोनों एक दूसरेसे विम्ब है। १० मैकिक मासि विम्ब छोपेतर मार्गक पाम करनेसे उसका फर गैनिक नहीं होगा। पैसा रूप होता है सा हो उसका फल होता है। १८ इस संसारमें जीनों की सम्पा बनत कोटी है। पगार मादि प्रसगी बर्मत गाय कोष मादिसे प्रति करते । पता रामा मादि कोष मादि मागासे समाम करते है, और ना मनुपाचपात करते है, तो मी उनमेसे किसी किसीको तो उसी कामें मोक्ष। १९ गोप, माम, मापा और गेमको बोलको कमायके नामसे कहा बा । पर साम बापत झोपादिवाम है। यदि र वमत कपाप स्सारका कारण होकर बनवानुमायो कपाप होची हो, तो फिर करता लादि अनंत ससार न होनी चाहिए, और इस हिसासे तो वनत संसार म्पतीत होनेके पनि उने किस तर मौन हो सकती है। यह बात विचारने योम्प है। २ प्पा मिस कोष बाविसे नमत संसारको दोपही बनतानुषी कषाय प मी मिसदो। इस हिसाबसे उपर कार कोष बारिको बनतामुखी महीमा बा सकता । सकिने बनतानुभाको चौतारसा बन्य प्रकारसे ही होना समय है। २१ सम्पन्चान दर्शन पार चारित्र इन तीनों की एकताको मोक्ष प्राते। सम्पमा दर्शन चारित्र, नांतरागान दर्शन पारित है। उससे बनत संसारसे मुळिती है। मामीतमा पान कर्मर बर्षका कारण है । बौतरमाके मासि चम्ना अपना उन बावामुसार पम्ना भी मप ही कारण है । रसके प्रति यो कोष बादि कपाप हो उनसे निमुछ ऐना, पी बनत संसारसे बतिस्पसे मुल होना है अर्थात् पदो मोक्ष। मिस्से मौससे विपरीत ऐसे बर्मत स्सारको दि होती है, उसे मर्मवानुबंधी मा गावा और बात मी ऐमी हो । पगमार्गस भोर उनकी भावानुसार पम्नेवाका प्रमाण होता है। ऐसा जो बारसे गारोको सम्पाणकारी मार्ग है, उसके प्रति कोष बादि मात्र (गो महाविपतिताके परनेवा) होमर्मतानुसभी कपाप। २२ प बार माल होगमें भी निपानी गावे, तपा उनसे मौतयगाय प्रस्क्ति पांतरणानका मोवर्मन अपना सत्पर्मका न करना, अपना उमके प्रति तोर मारि से .
०५५ म्पासावखर] पिविष परमादि समार-पाँव मासेि झोप बादि मात्र होते हों उन मासे, बनतानुबधी कापसे बम होकर मरिष्यमें मी बनत संसारको पनि होती है। २५ पनुमपका किसी भी कामें ममात्र महा है। परन्तु मुशिवम्छे निमित की गई को अप्रत्यक्ष वाव है, ससका कचित् अमात्र मी हो सकता है। २१ क्या केवम्झान ठसे करते हैं कि जिसके द्वारा कुछ मी मानना शेप नहीं गया। भपपा बामप्रदेशोंका चो स्वमाव है, उसे केवमान करते है ! (ब) वास्मासे उत्पम किया हुआ विमावपरिणाम, वौर उससे वा पाक सपोगहमसे ऐनेवारे वावरणपूर्वक को कुछ देखना और जानना होता है वह इन्द्रियों की सहायतासे हो सकता है। परन्तु सर्पषी यह विधन नहीं है। या विषचन तो फरणानसामी है। वा) विमावपरिणामसे होमेवाठा को पुननास्तिकापका समय है, पर मामासे मिम है। उसा, पपा निवना पुनका सपोग हवा है उसका, न्यायपूर्णक नौशान-अनुभक-दोता है पर सब अनुभवगम्यमें ही समाविय होता है, और उसको कर मो समस्त ठोकले पुगोका इसी तयका निर्णय होता है, या विषसमें समापिए होता है। उदाहरण के पि बिस बाकाशके प्रदेशमें अपना उसके पास गो निमा मुल बारमा स्पित है, उस भाकाशके प्रदेशके उपने मागका लेकर नो वरुप बमेप मनुमन देता है, पर बनुमबगम्पमें समाविष्ट होता है, और उसके पपात् बाकीके वाकायको गिसेल केपणानाने मी वनत-विसका बंत माही-कहा, उस बनत वाकाशका मी तदनुसार होगुण होना चाहिये यह दुविषमसे निर्णय किया जाता है। (३) बारमझान उत्पन हो गया है अपना बारमान हो गया है-यह बात अनुमनगम्प । परन्तु उस सामानके उत्पम होनेसे मरमानुमत्र होनेके पचात् क्या क्या होना चाहिये, या जो का गया है, पर बुद्धिवम्से ही कहा है, ऐसा समझा जा सकता है। (६) इन्द्रियों के सपोगसे जो कुछ देना चानना होता है, उसका पपि बनुमपगम्पमें समावेश हो नाता है, यह ठीक है, परन्तु यहाँ तो बारमतत्तसपी अनुभवगम्पकी बात हो यहाँ तोगिसमें इन्द्रियोंकी सहापता अपया संपकी वापकता नहीं, उसके अतिरिक किसी दूसरेक समपको ) बात है। केवण्यामी स्मन ही देश और नान ये है, अर्थात् उन्होंने मोकके सब पापोंका पनुमन किया है-ऐसा जो कहा मावा है, सो उसमें उपयोगका सरम सतार । कारण कि शालाले १३याँ गुणस्पानक दौर १ौ गुणस्थानक इस तरह दो दिमाग किये गये हैं। उनमें १२ गुण- स्थानमा भयानक योग पता है, पर स्पर है और जहाँ पर बात है वहाँ उपयोगको सास चहरव बार यहाँ उपयोगकी खास बात यहाँ मुनिबरा है, यह करे बिना पहनही सकता। तया को यह बात सिर होती है, वहाँ अनुमको साप साथ पुषिठ मी सित होता है। (उ) सतए उपयोग के सिद्ध होनेसे बाहमाके पासमें गगे जा पाई है, उसका तो अमुमत्र होता है, परनु यो पदार्थ पासमें नहीं है जिसका संबम नहीं है-उसका अनुमा करनमें कठिनाई वाती है और उसकी साथ हो'मी पार्प बनुमषगम्प नहीं है। ऐसा करनेसे केजरदानके प्रचलित । । प्रीमद रामम [.५५ मारना अपमें विशेष बाता है । इस कारण यह सिद्ध हो कि वहाँ दुनिबसे हो सब पदार्योका, सर प्रकारसे, सब कामका हान होता है। २५ एक काके कम्पित यो मनत समय है, उमके कारण वनंतकाल का गाता है। तथा उसमें वर्तमानकामे पहिले यो समय म्पतीत हो गये, फिरसे गैठकर वानेपछे नही यह बात न्याययुत, फिर यह समय अनुभक्गम्य किस तय हो सकता है। यह विचारणीय है। २५ अनुभवगम्प जो सम्प हो गये है उनका मो सस्प है, उस स्वरूपको छोरकर उन कोई सय सम्म नहीं होता और इसी तरह बनादि अनतकारक नो दूसरे साप है उनका मी पैसा हो सरूप है—पा मुशियम्से निणात मा माश्म होता है। २७ स कालमें शान कोण ऐ गया है, और शान के क्षीण हो बानेसे अनेक मतमेद हो गमे है। मों मोबान कम होता है पो त्यों मतभेद माते है और म्ों ग्यों शाम मढ़ता है त्यो स्पों मतमेद कम होते है। उदाहरण के लिये, मो ग्यों पैसा पटवा है पो त्यो । बहता है और याँ पैसा पनाकिश कम हो जाता है। २८ शामके बिना सम्पफलका विचार नहीं सूझता। मतमेव मुच उत्पम नहीं करमा, या बात जिसके मनमें है, जो समाचता वोर ममता है हम उसको फम्दापक ही होता है। मतभेद बारिके कारणको मेकर शान-प्रवण मादि फम्यापक नहीं होते। २९ जैसे रास्ते पर किसी भावमाके सिर पाहा कोटमे उस गाय, और उसकी मुसाफिरी बमी बाकी ही हो तो पहिले तो गाँतक ने उसे कॉटोंको इटम्मा चाहिये किस पनि कॉोंने दूर करना संभव न हो तो उसके लिये यहाँ प्रारकर, समर पी न बिता देनी चाहिये परन्त पाका महामेरकर भागे बठमा चाहिये । उसी तय निनमार्गक सरूप और उसके सस्पको समझे बिना अपना उस विचार किये बिना भेटी छोटी कामों में ही बैठ जाना और मागे मसमा ठषित महो । निममार्ग वास्तविक प्रविसे रेसनेसे तो जौको फोक पप करमेश उपाय है, परन्तु गौच तो बने मतमें गुया जाए। गाल प्रथम गुणस्पानसे निकलकर प्रयिमेद होनेतक बनतबार मापा, वौर बसि पी फिर गपा। ११ गानको ऐसा मान यता कि सम्पत्त नापास हो वा माता होगा, परन्तु या प्रयास (पुस्पार्थ) से बिना प्राप्त मही होता । १२ कर्म प्राप्त १५८ है । सम्पावके वाये बिना उनसे कोई मी प्रति समूह आप मही होती । गौर ममानिस मरा करता है परन्तु ममसे तो एक मौ प्रतिपय नहीं होती ! सम्पत्वमें ऐसी सामर्थ है कि प प्रातिको मूलसे हो पर कर देता है। प स तप किग अमुक प्रतिक पय सनेके परमात् पाता और गौर यदि बयान होता तोप पारे पोरे सप प्रतिरोध पपस देवा। १५ सम्यान सबका माम्म दो गाप पर बात नहीं है। इसी तराबर किसीको मी माम म पर पह बात भी नही । रिचारपानको मा माश्म पर जाता है।
०५१ मामानवार] विविध पत्र मादि सपा-पाँ पप ३९ नीषको समझ ना जाय तो समझ जाने के बाद सम्यक्ष पात सुगम हो जाता है। परन्तु समास वानेके लिये जीपने बानतक सबा सबा पक्ष नहीं दिया । बाबको सम्यक्त्व प्राप्त होनेका मम अम योग मिला है, तब तब उसने उसपर बराबर ध्यान नही दिया । कारण कि मीरको भनेक मतपय मौजूद हैं। उनमें मतसे अन्तराप तो प्रत्यक्ष है, फिर मी ने बाननेमें नहीं पाते। यदि कोई उने बतानेवाण मिल जाय तो मी अतरापक योगसे उनका पानमें मना नहीं बनता । तपा बहुतसे वतराय बम्पक है, जिनका प्यानमें वाना भी मुस्किल है। २५ सम्यक्त्वका सरूप केवल बचनयोगसे हो कहा बा सकता है। यदि यह कम कहा जाय तो उसमें गोषको उन्य हो भान माश्म होने लगे, सया सम्पमतक उपर ठन्टी वापि हो चाय । परन्तु यदि यही स्त्रम्म अनुक्रमसे ज्यों ज्यों दशा बढती जाती है, क्यों स्पों का जाप, अपना समझाया गाय तो मा समसमें जा सकता है। ३६ इस कामें मोक्ष -यह दूसरे मार्गामें कहा गया । यदपि बैममार्गमें इस कामें वमुक क्षेत्रमें मोक्ष होना नहीं कहा बासा, फिर मी उसमें यह कहा गया है कि उसी क्षेत्रमें इस कालमें सम्पन्न हो सकता है। ३७ शान दर्शन और चारित्र ये तीनों इस कारमें मान्द्र है। प्रयोमनम्त पदार्थोके नान नेको शान करते हैं । उसकी मुप्रीतिको दर्शन करते है, और उससे होनेवाम बो नित्या है उसे चारित्र करते हैं। यह पारित्र इस कामे चैममामि सम्पक्त होने के बाद सात गुणस्पानवक प्राप्त किया जा सकता है, यह स्वीकार किया गया है। २८ कोई सातवेंतक पांच चाय तो मी यही बात है। ३९ पति को सातवेंसक पच गाप तो उसमें सम्पात समाविष्ट हो जाता है, और यदि कोई तक पहुँच जाय तो उसे विपास हो जाता है कि भागेकी दशा किस तएकी है। परन्तु साततक पापि बिना वागेकी बात ध्यानमें मही पा सकती । १० यामती हुई दशा होती हो तो उसे निपध करनको सहरत नहीं, बौर पनि मताई दशा मरो तो उसे माननेकी जरूरत नहीं । निपेष किये बिना ही बागे बढ़ते मामा पाहिये । ११ सामायिक मौर बाठ काटिका विवाह देनेके पश्चात् नकोटि बिना नही हाता, पौर बन्तमें नबकोठिसेमी पति छोड़े विमा मोम महो। १२ म्याय प्राविप अप किये बिना सामायिक नहीं पाता । रिसे सामायिक होता है उसकी दया तो मत होती । वासि नाप को सात और बाचे गुणस्थानमें नाता है, भार पास दो घाम मोक्ष हो सकती है। १३ मोक्षमार्ग सम्भारको भारके समान है, अर्थात् इ एकवाय--एकप्रमहप-है। वानों का मो एफपाण्से बर्यात् एक समान ये गा मोशमा , प्राइमें पो बसर पही मोत्रमार्ग है। ११ पहिले दो बार करा पा चुका है फिर मी पर तीसरी बार प्रा नाता है कि करी मी मीमद् रामचन्द्र [०५५ मापन बादर और बाध क्रियाका निषेध नहीं किया गया | कारण कि माय भास्मा मह भाव कमी मी स्ममें मा अपम नहीं हो सकता । १५. स्वापान गाँठ मिप्पाल षषमा कमायका सूचन करनेवासे क्रिपाबोके संबममें करा- चित् किसी प्रस्गपर कुछ कहा गया हो, सो को क्रियाके निवेष करने के लिये तो कुछ भी नहीं या गया है। फिर मी पनि पा कपन किसी दूसरी तर ही समधमें वापा हो तो उसमें समामे- पासको वफ्नो मुश्की हो गई समझनी चाहिये । १६ मिसने पायमाबका छेवन कर डाग है, प ऐसा कमी मी नहीं करता जिससे कपापभाषका ऐक्न हो। १७ चमतक हमारी तरफसे ऐसा मा कहा गया हो कि अमुक किया करनी चाहिये, तबतक या समधना चाहिये कि पा सकारण ही है, और उससे यह सिर नहीं होता कि निमा करनी चाहिये। १८ शाळमें यदि ऐसा कहा बाप कि अमुक किया करनी चाहिये और पछिसे देश कामे अनुसार उस कियाको दूसरे प्रकारसे करनेके लिये का भाप, तो इससे श्रोताके मनमें शंका से सकता है कि परि तो इस तरह का माता पा वोर मा इसी तय का नाता है परन्तु ऐसी सय करनेसे उसका श्रेप होने के बदले अमेय ही होता है। १९ माग गुणस्पान के अन्त प्रमयतक मी जानीको बाहानुसार चम्ना पाता है। उसमें सन्मभाव माश हो जाता है। ५० सभासे निवात करमेसे पियों शान्त नहीं होता, उम्टी तम्मत हो होता , और उससे भुत होमेका सम्प बाता है, और यो म्पों मागे जानेके परमात् पतन होता है स्पों त्यों उसे गोरकी पटक गती है-इससे माय वधिक गहराई में जाता है वर्षात् मा परिमें जाकर पाता है। श्वना ही मही विस्त उसे चोरको पटक लगने के कारण उसे जोमात समपतक पो एना पाता है। ५. यदि बमी मी शाका करना हो तो करो परन्तु इतना ये निश्चपसे अवाम करना चाहिये कि गोबसे गाकर मोक्षतकके स्थामक मौदो वीर मोक्षका उपाय मौ है, इसमें कुछ भी असाय नहीं । पर निर्णय करने के पश्चात् उसमें तो कमी मी शका न करना चाहिये, और इस प्रकार निर्णय हो मानेके परमात् प्राप शका नही होती । पछि फवाचित् शंका हो मी तो पर एक- देश का होता है और उसका समाधान हो सकता है। परन्तु यदि म में ही बत् यांसे मेकर मोधतक स्पानको ही अपना उसके उपापमें ही शंका हो तोप एकदेश का नहीं, परस्त सरिष्ठ छका है और उस शकासे प्राय पतन होता है और पतन इतना अधिक बोरसे रोता है कि उसकी बात गोरको फरक मता। ५२ या महा दो प्रकारको है-एक बोध और दूसरी विचारपूर्वक । ५६ मतिशाम भोर भुतभानसे जो कुम माना जा सकता है उसमें अनुमान सापमें बता है। परत उससे भाग और अनुमान विमा हो शुलपसे बानमा पर मन पर्मशानचा विषय है। वर्षात् मूमें तो मति भुत और मन पर्यशान एक है परन्तु मन पर्यनमें अनुमान के बिना भी मतिको निर्मम्तास पुरस्मसे जाना जा सकता है।
। ०५५मासानसार] पिविष पर मादि साहब पर्प ५. मतिकी निर्मम्ता सयमके बिना नहीं हो सकती । गतिको रोकनेसे सपम होता है, और उस स्पमसे मतिको शुसता होकर अनुमानके बिना शुद्ध पर्यायको नाननेका नाम मन पर्यशान है। ५५ मतिबान किंग-चिह-सै जाना आ सकता है, और मन पर्पवमानमें लिंग भयवा चिरको भावश्यकता नही यती । ५६ मतिधामसे जाननेमें बनुमानकी गावश्यकता पती है, वौर उस वनुमानी सहपतासे गोहान होता है, उसमें फेरफार मी होता है। परन्तु मन पर्यवशानमें पैसा फेरफार मही होता । क्योंकि उसमें वनुमानको मापताको नहरत मही है । शरीरको पेशसे कोष आदिको परीक्षा हो सकती है, परन्त मिस्से कोषादिका म्पसहप ही माश्म न हो सके, उसके लिये पदि विपरीत घेय की गई, सो उसके ऊपरसे कोष वादिको परीक्षा करमा कठिन है। क्या यदि शरीरका किसी मी तरकी श्रेय म की गई हो, तो पेशाके रखकुछ देले विना हो कोष बादिका मानना बहुत कठिन है, फिर मी उसका साम्राकार हो सकना मन पर्यशानका पिय है। ५७ लोगोंमें भोपहखासे प्रचलित हरिके अनुसार यह माना जाता है कि हमें सम्यक्त है या नही इसे तो केपछी बाने निश्चय सम्परत्व होनेकी बात तो केवगैगम्प हो।' परन्तु बनारसीदास मौर उस दशाके वन्य पुरुप ऐसा करते हैं कि “हमें सम्पनत्व हो गया है, यह हम निमपसे करते है।" ५८ शानमें वो ऐसा हा गया है कि निथप सम्पका या नहीं, उसे काम जाने' सो यह बात अमुक नयसे ही स्पो । तथा केरमानीसे मिल बनारसीदास कौरने भी गो अस्प- सपसे ऐसा कहा कि "हमें सम्यक्त है, मस्सा हमें सम्यक्त्व प्राप्त हो गया है, " यह कपन मी सुस्प है। कारण कि मो निथप सम्यक्त्व है उसे तो प्रस्पेक यस्पा पर्यापसहित फेमली हो चान सकते हैं, वपना यहाँ प्रत्येक प्रपोमनमत पापक व महेतुको सम्पूर्णरूपस केसीके सिंघाप बन्य कोई रस नही मान सकता, पहाँ निभय सम्पमतको केवलौगम्य कहा है। तथा उस प्रयोमनमूत पदापक सामान्य वपना स्यूलरूपसे हेतु यतका समझ सकना मी समय है, और इस कारण बनारसी- दास वगैरने वपनेको सम्यमत्व होना कहा है। ५९ समयसारमें मनारसी सकी बनाई ई कवितामें कहा कि हमारे अयमें गोपनीय उत्पम हो गया है,' अर्यात् उनहोंने कहा कि हमें सम्पत है। ६० सम्मान प्रप्त होनेके पपात् बधि से अधिक पश्य मबके मीतर मुछि हो पाती है, और पनि भाव पास युत हो पाता है तो गर्भपुरम्परावर्तनमें मुक्ति होती है । परि इस कामो वर्ष पुन-परावर्तन गिना नाम तो मी यह सादिसस्तके मगर्ने वा नाता है-पर बात शंकाररित है। ११ सम्यक्त्वके सण १ पापको मयता, पपणा उसके रसको मयता । २ मोक्षमार्गको मोर इति । १ ससारका बषमझप माना या उसका सारा अपना महारूप माझम होगा। ५ सम प्राणियों के कार दयामान; उसमें पिशेप करके कपमी मारमाके उपर दयामात । ५. सदेव सपर्म गौर सके उपर भास्था ।
.. । भीमद् रामान १२ आत्मज्ञान मपमा बारमासे मिम पसरूम वच्या पुनसास्तिकाय बगैरका नो मिघ मित्र प्रकारसे, मिम मिन प्रसगपर अत्यन्त सूक्ष्ममे सम्म पोर बसि विस्तृत सम्प मा प्रकाशित हुवा है, उसमें कोई हेतु गर्मित है या नही ! नौर पर गर्मित है तो वह कौनसा है। उस सभमें विचार करनेसे उसमें सात कारण गर्मित मायूम पाते है-स्मतार्यप्रकारा, उसका विचार, उसकी प्रति, गोच-सरक्षण बगैर । उन सात हेतुका फस मोश्चकी प्राप्ति होना है । तपा मोसको प्राप्तिका नो मार्ग है। इन ऐतुर्मास सुप्रतीत होता है। ६२ फर्मक बनत मे । । उममें मुस्स १५८ है । उनमें मुख्य पाठ कर्म प्रातियों का वर्णन किया गया है। इन सब कौमें मुम्स म मोहनीय है। इसकी सामर्प दूसरों की अपेक्षा कर्पत है, बार उसकी स्थिति मी सबकी अपेक्षा गरिक है। ६१ पाठ कमाम चार कर्म पनघाती है । ठम बारे में मी मोहनीय भापत प्रारूपसे पन- पाती है। मोहनाप कर्मके सिमाप मोबाकाके सात कर्मो मोहमाय कर्मके प्रतापसे ही प्रत हो हैं। यदि मोहनीय र ो गाय तो दूसरे कर्म मी निर्मल हो गते । महानायके दूर होनेसे सरोका पैर नहीं टिक सकता । १५. र्मवपके चार प्रकार है-प्रकृतिबष, प्रदेशव स्पतिवध बौर रसबभ । उनमें प्रदेश स्थिति मोर रस इन तीन घोडे ऐक्यका नाम प्रविष रमस्य गया है । वामा प्ररे सोका साथ पुरस्के जमान-संयोग-को प्रदेशमा करते हैं। उसको प्ररहता नहीं होती उसे ए करना जो वो दूर कर सकते है। व्या मोहके कारण स्थिति और रसका बंष पाया है, वो उस स्थिति तपा रसका गोबर उसे सील परिम्ना पाहे तो ससका पछा गाना मसम है। ऐसे मोरके कारण इस स्पिति वीर रस्छ प्रमता है। ६६ सम्पब क्योकिसे वफ्ना पण बताता है मुखे प्राण करनेके बाद पति प्रण करनेवाली छा न हो तो भी मुझे उसे बम्पूर्वक मोक्ष के ही गाना पाता है। इसध्येि मुझे महण करने पहिले पा रिचार करना चाहिये कि परि मोक्ष मानेको पाये बदना होगा तो मी पछि काम बानेपाली नहीं। क्योंकि मुझे प्राण करमेके पधात् मोरे समपमें मुछ उस मोक्ष पाँचाना ही चाहिये । यदि प्राण करनेवाम पापित शिकिहोगाप, जे मी हो सके तो उसी मवमें भौर नही तो परिकसे अधिक फाय मयोंमें मुझे उसे मास मोश पाँचाना चाहिये । परि काचित् पर मुझे छोड़कर मेरैसे मिस्त वावरण परे अपना अर्पत प्रक्स मोहको धारण कर ले, तो मी अर्धपुत्रम् मानतम के मौतर तो मुझे असे वास्स मेक्ष पाँचाना चाहिये ही--पह मेरी प्रधिारे । बर्षात् यहाँ सम्पालाकी महचा बताई है। ५७ सम्पानमानसे पता लनातक र सकता !R चोरको मोध परमार, भौर तू उससे पुरा विशेष कार्य नदी पर सरता ! तो मिररे मुकार मुज मिस बातकी म्यूनता है। इतना ही नहीं मितु तुठे प्रासरनेमें मेरी रात पता है। - मामानसार] विपिप पत्र मादि सपाइ-३१यों व ७०१ - २८ किसी प्रम बादिका वोधन गुन करते हुए, पहिले मगलाचरण करना चाहिये, और उस मथको फिरसे बाँचते हुए क्या चाहे काहीसे मी उसका पाचन शुरू करनेके पहिसे मगलाचरण कर नेकी शामपरति है। उसका मुख्य कारण यह है कि वामहिमसे भारमाधि करना है, इसलिये पैसा फरमेमें प्रपम शतिमात्र करनेकी जरूरत है, और तदनुसार प्रथम मगणवरण करनेसे शांतमान प्रमेश करता है । बाँचन करनेका नो क्रम हो उसे ययाशकि कमी मौ न तोड़ना चाहिये । उसमें जानीका त मेनेको नसरत नहीं है। १९ वारमानुम-गम्य अपवा बारमबनित मुस दौर मनमुस ये सब एक हो । मात्र शम्द अदा हुदाई। ७० शरीरके कारण वत्रा इसरों के शरीरको अपेक्षा उनका शम विशेषतावाण देखने वाता है, कुछ इसलिये केवमानी केवमानी नहीं करे बासे । तथा पर केवमान मुछ शरीरसे फैजा है, यह बात भी नहीं है । यह तो वारमाद्वारा प्रगट किया गया है। इस कारण उसको शरीरसे विशेषता समचनेका कोई हेतु नहीं है, और विशेषतावाला शरीर लोगोंके देसनेमें नहीं पाता, इसलिये मेग उसका पस माहारम्प मही बान सकते । ७१ बिसे मतिजान दौर मृतहानकी मशसे मी सवर नहीं, यह जान पर केवमानके स्वरूपकी गानभेको इया करे तो पर किस तरा बन सकता है। वर्षात् मही बन सकता। ७२ मतिके स्फुरापमान होनेसे गो शान उत्पन्न होता है यह मतिबान है और प्रमण होनेसे जो बान उत्पम होता है प श्रुतान है और भुवानका मनन होकर आ उसका पनुमा होताम पौडे मतिधान हो जाता। वपना उस युवज्ञानका अनुमप होने के बाद यदि पर सरेको कहा जाप, वो उससे कानेवालेको मन्तिहान मोर मननेवाको मुस्वान होता है । तथा युवान मतिके विना नही सकता, भौर नही मतिपूर्वक मत समझना चाहिये । इस सरह एक सरेका कार्यकारण सबध है । उनके अनेक मे है। उन सब मेको भैसे पाये वैसे हेसपूर्वक वो समझा नहीं- स्पोंकि हेतुपूर्वक बानना समझना कठिन है, तथा इसके अतिरिक वागे पम्फर ममी फार्थीको जाननेपाछे बनेक भेदयुक्त अधिकानको, और रूपी पायोको बामनेपामे मन पर्यशामको बानमे समसको मिसको किसी वासे मी शाकि नहीं, ऐसे मनुष्प पर और धरूपी फ्याकि समस्त मापसे मानमेवा केवमानके विषयमें माननेका-समझनेका प्रश्न करें, तो वे उसे किस तय समय सकते । बर्यात् नही समझ सको। ७१ पानीके मार्गमें चम्नेपाडेको फर्मबंध नही है । तथा उस हानीको वादानुसार पने- पाकेको मौ कर्मवप न होता | पोंकि कोष, मान मापा, डोम माविका यहाँ ममाल है और उस ममायके कारण कर्मबंध नहीं होता । तो मो इरियापप' में बम्नेसे बानीको परिमापयको किया होती है, और बानीको वातानुसार पम्नेवासेको मी मा क्रिया होता है। ७२ मिस विषासे मात्र कर्म भापता है, उसी विकासे गोब कर्म मेरवा मारे। ७५ उसी विधाका सांसारिक हेतुके प्रयोम्नसे विचार करनेसे गाव कर्मबप करता है, और मोर मा उसी का इम्पके सरूपको समझने के प्रयोजनसे विचार करता है जोय कर्म गोवता।
૨ भीमद रामचन्द्र [.५२मानकर । ७६ क्षेत्रसमासमें क्षेत्रसवधी यो नो बा । अनुमानसे माननी चाहिये । उनमें बनुमा माही होता । परन्तु उन सबका कारण ही वर्णन किया जाता है। उसकी विपासपूर्वक या रसना चाहिये । मग प्रदामें फेरो गानेसे वागे चलकर समझनेमें ठेठतक मूग पग पाती है। से गणितमें यदि पहिसे मूम हो गई तो यह भूग अन्ततक चली जाती है। ७० शान पाच प्रकारका है। कान यदि सम्यक्त्वक बिमा, मिप्यावसहित हो तो पति मान भुत मान पौर कापि मान कहा जाता है । ठमें मिपाकर शान के कुरा बाठ मेद होते हैं। ७८ मति मुव वौर पनि यदि मिपावसहित हों तो वे महान है, और सम्पत्तिसहित तो बान है । इसके सिपाप तन कोई दूसरा मेद नहीं । ७९ चौल एग बाकि जो 39 मी प्रति करता है, उसका नाम कर्म है। मुम वपना बगुम अप्पासापबारे परिममनको कर्म करते है वौर शुद्ध बम्पबसायमान परिममन धर्म मही किन्तु मिरा है। अमुक वाचार्य ऐसा करते है कि दिगम्बर मापापीको मान्यता है कि गागो मोश नही होती, किन्तु मोक्ष समझमें माती है। यह इस कप कि सौर उरस्वरूपपाम, इसलिम मन उसे प ही महीला, तो फिर उसे मोक्ष कासि हो सकती है। परन्तु जीपने पा मान रक्सा है ' में पाया है। यह मान्यता शुवस्वहम समझ से मही यता-मात् मोश समहमें मा गाता है।' परन्तु यह बात शुरनयको बपया निमपनयको हो। पदि पर्यापारिक मपमा स नपमें संम्म यर वाचरण रें वो उमें मटक मटक कर मरना है। ८१ गांगामें कहा गया है कि बीब, अनान, पुष्प, पाप, मालप, संगर, निर्मग, और और मोच ये पार्प सद्भाव रे, अर्पात् उनका अस्तित्व मौसूर है उनकी कुछ कम्पना की गई हो पागात नही। ८२ दात इनप-मामासी है। स्नपामास मतबारे निवपनपके सिंचय किसी दूसरे मयको-म्पहारनमको-ही मानते । निनन भनेकास्तिक-स्पास है। ८५ कोई नवतत्वोंको कई पदयों की, कोर्ष पट्पदोंकी और कई दो प्रशिकी बात करता ६, परम्तु पर सब और अब इन दो राशि-दो तलोंमें दो इम्पोंमें ही गर्मित हो जाता है। ८१ निगोदमें मनात गार पते है इस बातमें तया करम में साथ मोक रितने सूक्ष्म मागमें वनंत गौर राते हैं इस बात, शका मही करना चाहिये । नामे वैसा सा रे सादी पा। और, गोत्पल गरे प्रमाण होकर पता है, और रिसे अमी मी अपना निगका सम्प समझ महा माया उसे ऐसी माम मा समौ न माने तो या सर है। परतु उसमें पाका करनेका कोई कारण नही है। इस बात में इस तरह समझना चाहिपा- समामेरे समय मिमी गौरहे बाय मागमे यो गुतसी हरिपातील माती , उस पोमा तपागमें भी जर जर्मत गौर तर पदि इस तपोभर गाजराचार करतो जो संसार प्रमगध बनुभव न होनेपर मी उसय बुदिवासे विचार करनेसे उरान तमा .५१मासानबर] विविध पत्र मारि समाह-पर्प समय हो सकता है । फदमूह मादिमें मनसपना समय है। दूसरी हरियाछीमें गर्मवफ्ना समय नहीं, परत कदमूलमें भनतपना भटता है। तथा कदमलके यदि योदेसे मागको मी काटकर भगाया जाप तोप उग जाता है, इस कारण मी उसमें गीयोंका वाभिस्य यता है। फिर भी यदि प्रताति म होती हो तो बात्मानुभव करना चाहिये । बारमानुमब होनेसे प्रतीति होती है। मातक धारमानुमग मही होता, तबसक उस प्रतीतिका होना मुश्किल है। इसलिये यदि उसको प्रतीति करना ऐ तो प्रथम बारमाका भनुमबी होना चाहिये । ८५ जबतक बामावरणीयका झयोपशम नहीं था, तबतक सम्यक्त्वकी प्रालि होने का इशा रखनेवालेको उस पातकी प्रतीसि रहकर वासानुसार ही चम्ना चाहिये । ८६ बागमें सकोच-विस्तारको शक्तिरूप गुण रहता है, इस कारण का सूक्ष्म स्यूछ शरीरमें के प्रमाण स्थिति करता है। इसी कारण माँ पोरे बसकाशमें मौका मिशेयसपसे सकोषफ्ना कर सकता है, यहाँ बीच सकोषपूर्वक यता है। ८७ ज्यों म्पों मोब कर्म-मुझकों को अधिक प्रहण करता है स्यों त्यों पर अधिक निवित होकर वनेक देशोंमें यत्ता है। ८८ फाम अचिस्प शक्ति है। कोई भी पार्थ स्पने धर्मका त्याग नहीं करता। एक एक चीनमें परमगुरूपसे प्रण किये गये अनत कर्म है। तया ऐसे बनत गांग, निनको साप बनतानत कर्मरूपी परमाणु सक्द, निगोरके वायसे पोरेसे बरकाशमें पते हैं या बात भी शका करने मोम्प नही । सापारण गिनतोके अनुसार तो एक परमाणु एक माकाश-प्रदेशका वरगाइन करता है, परन्तु उसमें मचिस्प सामर्प है। उस सामर्प-ससमानके कारण पोरेसे वाकाशमें मी ममत परमाणु यते। जैसे किसी दर्पणके स्मुस यदि उस दर्पणसे किसी बात बड़ी बस्तुको रक्सा चाप, तो मी उसका उतना माकार उस दर्पममें समा जाता है तथा से यमपि मॉस एक छोटीसी बस्त फिर भी उस छोटीसी बस्तुमें सूर्य चन्द्र वादि यो बड़े पदार्थीका सहम Pसाई देवा , इसी तय वाकाश पपपि एक बसा विशाल क्षेत्र है, फिर भी वह माँसमें श्यरूपसे समा गाता है, तथा गाँस जैसी छोटीसी वस्तु मरे बरे पातसे पगेको देख सकता है। यदि योड़ेसे वाकाशमें बचिस्प सामपर कारण बनत परमाणु म समा सकते हों, तो फिर बोससे उसके परिमाण मितना ही वस्तु दिखाई देनी नाहिये, उसमें उससे अधिक मोटा मग म दिखाई पड़ना चाहिये । अपना दर्पणमें भी बहुतसी घर माधि भी मरी बस्तोंका प्रतिबिम्ब नहीं पा सकता । इस कारण परमाणुको बरिस्य सामर्दी है, मौर इस कारण पोरेसे पाकाध भी मानत परमाणु समा सकते। ८९ इस तर परमाणु बादि द्रम्पोंका चो सूक्ष्ममावसे निरूपण किया गया है, पर यमपि परमानका विवेचन है, फिर भी कारण है और पा जपूर्वक ही किया गया है। ९० चित्तके स्पिर करमेके लिप, अषणा पतिको बार म जाने देकर उसे अतरंगों से जाने के लिये, परद्रम्प के स्वरूपका समाना उपयोगी है। ९१ परम्पके सरूपा चार करमेसे पति बाहर न गाकर बतरंग; दो यती है, और भीम रामचन्द्र [.५५ मामानवार सिबलरूप समाप्स लेने के पचात्, उससे प्रादुर्भुत बालसे उसका यही विषय ऐ धानेक कारण, सपना ससे जमुक बध समछनेसे उसका उतना ही विषय एनेके कारण, पि बम्पूर्णक बाहर निकाकर परफदापी रमण करने के लिये दौर जाती है। उस समय बाने र परम्पच फिरसे सूक्ष्ममापसे समानते आए पतिको फिरसे अंतरगमें गना पाता। और इस तर ससे बतरगमें जानेके पचात् उसका विशेषरूपसे स्वरूप समझनेसे, जानके शरा उसका वह उतना ही विषय हो जानेके कारण, पति फिरसे बाहर दौरने भगती है। उस समप जितना समझा हो उससे भी विशेष सूक्ष्ममावसे फिरसे विचार करते ए ति फिरसे बरगमें प्रेरित होता है। इस तय करत करते तिको बारम्बार अतरंगमाघमें साफर पंत की जाती है और इस तर तिको वतरंग, गवे साते कदाचित् बास्माका भनुभन मी हो पाता है। वीर मग पावनुभव हो जाता है तो पति फिर बाहर नही पाती; परम्त मारमा पुर परिणतिरूप होकर परिणमन करती है। वीर तदनुसार परिणमन करनेसे बाप पर योका दर्शन साग हो माता है। इन कारणोंसे परखम्मच विवेचन उपमोगी वयातमूत होता है। ९२ जीवको मापने बापको गो जस्मान होता है उसके शरा पर बो बोय पाक्ति स्वरूपको जाननेकी इस करता है, सो या कैसे हो सकता है। मर्पात् नहीं हो सकता । यस पौत्रको प्रेम पदार्षीक स्वरूपका काम नहीं हो सकता, तो यहाँ पीर अपने कम्पबानको तसे न समा सफनेका कारण न मानता हवा, नपनेसे बोय फामें दोप निकाताहै। परन्तु सीधी तबसे इस सफ्नी पताको, उसे म समझ सको कारण नहीं मानता । ९३ गौष जय पपने ही ससम्मको नहीं मान सकता तो फिर पामो परके स्वरूपको जानने की पणा करता है, उसे तो पा किस तय मान (समझ) सकता है। और पबतक र समाम नही माता तबतक पहशो गुपा यकर ऐमयमान पुमा करता है। यकारी निगसम्मका बन जबतक प्रगट नहीं किया तबतक परम्पच चाहे कितना मी बान प्राप्त कर लो फिर मी या किसी कामका नहीं। इसकिये उत्तम मार्ग तो दूसरी समस्त पाताको कोषकर अपनी बामाको परिचालनका प्रपान करना हो । जो सारभूत है उसे देखने के लिये, 'या बारमा समाबमा, कर्मका कचा' और उससे (कर्मस ) उसे पप होता है, 'मष किस तय होता है, जब मिस तरह नित हो सस्ता र' और उस वंधसे निवत हो जाना ही मोक्ष -स्पारिक निफ्पमें बारम्बार और प्रत्येक क्षणमें विचार करमा योग्य है, और इस तय बारम्बार विचार करमेसे विचार परिंगत होता है और उसके कारण निजपरुपा वश से अनुभव होता है। पर्यो म्पों निक सम्पका अनुभव ना । स्यों स्यों इम्पको मन्त्यि सामर्प जानके अनुममें माता गाती है। इससे उपर बसई शशोंके ( कारण पोते नाका भनत मला सा पाना मपमा उममें बनत पुट्स परमागुभोका समामा ) करनेच बाकामा मही पता, और उनकी पपार्यता समझमें भाती है। होमेपर भी यदि उसे म माना जाता हो वपरा ठसमें शका करमेका कारण पदव हो तो जाती करते हैं कि उसने हए पुरुषार्थ करनेसे अनुमस सिम होगा। .. और मो फर्म करता है या देहस्पिन बाकाश यनेवासे सूक्ष्म पदों में से दो माण करता र बाहरसे समर कोको महाँ पापता !
.५५ मारमानवार ] विपिप पत्र पारिसप्रह-यौं वर्षे . ९५ माकाशमें चार राज् लोकमें पुनर-परमाणु सहा मरपूर है, उसी तरह शरीरमें बनेगाले वाकाशमें भी सूक्ष्म पुग-परमाणुलोंका समा मरा हुआ है। मोव वहसि सम्म पुरतों को प्राण करके कर्मवध करता है। ९६ पहाँ ऐसी शका की ना सकती है कि यदि बारिसे दूर-परत दूर-नेपा किसी पाक प्रति मीन राग-रेप करे, यो कि पुद्गल ग्रहण करके मा काम करता है, वह किस तरह करता है। उसका समाधान यह है कि मह राग-रेप परिणवि तो वात्माकी निमावदप परिणति है, और उस परिणतिके करमेवारी वारमा है, और यह शममें यकर ही उसे करती है। इसठिये शायरमें एनेबारी गो मारमा है, यह विस क्षेत्रमें , उस क्षेत्रमें एनेबारे पुग-परमाणुओंको ही प्राण करके पर उनका पप करता है या उने महण करनेके लिये कहीं बाहर नहीं जाती। ९७ यश-अपयशकीर्सि नामकर्म-नामकर्मसंघ विस शरीरको सेकर , यह शरीर महावक रखता है-यहींक पछता है, वह आगे नहीं चलता। नीर अब सिद्धावस्थाको प्राप्त हो जाता है वयमा निरतिमापको प्राप्त कर मेवा है, उस समय वह संघष मही यता सिमास्यामें एक बारमाके सिपाप दूसरा कुछ मी नहीं है, और मामकर्म तो एक तबका फर्म है, तो फिर बह: यश-अपयश वादिका समप किस सय घट सकता है। तथा अविरविमानसे नो कुछ पापक्रिया होती है, पाप तो चार राता। ९८ रिति अर्यात् 'मुटाना', अपना भो रतिसे विरूद है उसे विरति करते हैं। अविरतिमें तीन शब्द है --++ रवि मही + १ = विरुद्ध + रति = प्रीति-मोह, मात् चो प्रीतिरी-मोर-विम्य नहीं ह वविरति है। विरति बारा प्रकारको है। ९९ पाप इन्द्रिय, हा मन, वया पाँच स्पापर मीय, और एक प्रस गौर पे सर मिठकर उसके बाण मेद होते हैं। १.० सिबात यह है कि कर्मके बिना जीवको पार नही हगता । उस कर्मको अतफ पिरति नहीं की तबतक मविरतिमारन पाप गता है-समस्त पर राम् छोकमसे उसको पाक्रिया पार पती है। १.१ कोई जान किसी पार्पका पार करके मरणको प्राप्त हो जाप, वार उस पर्यशा शिकार इस प्रकारका हो कि पर विचार किपा एमा पदार्थ असतक रहे, तबतक उससे पापिया करता है, तो तबतक उस बौनको बापिरतिमारकी पापक्रिया पार रहता है। पपरि जाने इस पाप धारण करने के पहिवेकी पर्यायके समय, निस लिस पदायका रिचार किपा है, उसी उसे सार नहीं है तो मी, तपा वर्तमानको पयापके समपर्म का और उस रिचार किपे पy दिया नही करता वो भी, गाँतक उसका मोइमा पिरनिमारको प्राम नही हुमा तबतक उसकी अप्पसमापसे किपा पार हो रहती है। १. इसलिये वर्तमानको पर्याप समपमें उसे नमी वानिनामा हाम नही मिल सकता । बम बीब समझना चाहिये था कि इस पासे सनराठी किवायला बापम दगी तक उससे - मीमद् रामबाट [.५१ मारून ११९ एक गुरुके सन्यात माग--का-प्रदेश--एक वगुरमें बसपात होते है। सोको मी वस्त्यात प्रदेश होते हैं। उन्हें चाहे किसी भी शाकी समोणीसे गिनो वेबसम्मान हो होते हैं । इस तद एक के बाद एक सय तीसरी समश्रेणीच पोग करनेसे गो पोगफस जाता है एकगुना, दोगुना, तीमगुना, पारगुना होता है परन्तु वसमातगुना नहीं होता। किन्तु एक सम- भेणी-यो मसम्यात प्रदेशमाठी है-उस समयेणाको दिशामासी समस्त समवेणियोंको-यो असे मपातगुणी है-परेकको असम्पातसे गुणा करमेसे; सी ठप सप विक्षाको समभेणीका गुणा करनेसे, और इसी तस उठ प्रतिसे तीसरी निशा समश्रेणीका गुणा करनेस असम्मात होते है। म असमपातके भागोंका जबतक परस्पर गुणाकार किया जा सके, तबतक वसायात होते, वर या उस गुणाकारसे कई गुणाकार करना बाकी न थे, तब असत्यात पूरे हो नानेपर उसमें एक मिला देनेसे सफ्याविषम्य बनत होते है। १२ मय प्रमाणका एक पारे। जिस मयसे धर्म कहा गया है उतना ही प्रमाण है। इस नपसे जो धर्म कहा गया है उसके सिवाय, पलमें गो दूसरे और धर्म में उनका निषेध नही किया गया । पोंकि एक ही समय बाणासे समस्त धर्म मही करे ना सकते । तपा मो मो प्रसंग होता है, उस उस प्रसंगपर यहाँ मुम्ल्पक्या हो धर्म करा जाता है। उस उस स्फापर उस उस भपसे प्रमाण समठना चाहिये । १२१ मपके सहपसे र पार वो कुछ छा गाता है यह मय मही; परस्त नपामात और जहाँ नपामास है यहाँ मिपाल यरता है। १२२ मप सात माने हैं। उनके उपनप सातसी है, और रिशेप भेदोंसे रे बनतो भर्पात् मितने परम १२ सब नप हो । १२१ एन प्रहण करने का समद गरको परपसे होता है, और एक माण करनेसे मान्तिकमाल होता है। उसे न होने देने पे इस नपा सतप सा गया है। इसके समक्ष गानेसे गार एनमारको प्राण करता एषा स्फकर मप्पस्य रहता है, और मप्पस्थ पनेसे मास्तिकताको आमा मही मिल सकता। १२. मप से करने में माता सो मप सर्प कोई कसर नहीं है। परन्तु बस्तुप सरूप समम्ने सपा उसम्र मुमतीति न ये व प्रमाणका मश। १२५ परि जमुम मपमे कोई बात भी साप, तो इससे पह सिराहा कि दूसरे नपसे प्रतीत हानबारे धर्मम अम्तिरहीमही है। १२६ जान वर्षात् मात्र म हाइम मिात्र मा छ मदी| उसमें भ्य भए भी गर्मित नही होता | मार्माया सई प्रभारसे पग-पय क्षप हो जाय उसी समप केसान या गातारापति किमी रामे प्रगता पर पारिखमोदनाय कारण होते है। गा लिने भरा एमी वहां टन्ने हो भनाइम कारण र जलानमें गर्मित महीमान भाव रे पान महारो। मक प्रतिभागापान । हो पग-२१ मही, पपा गौ रागस चोरेशान है।
.५३ मामानबर पिविष पर मावि संग्रह-पों ७०१ १२७ गुण और गुणी एक ही है । परन्तु किसी कारण वे भिम मा है। सामान्य प्रकारसे वो गुणोंके समुदायको ही गुणी करते, वर्षात् गुण गुणी एक ही, भिम मिम वस्तु नहीं । गुणीसे गुण मिन नहीं हो सकत । जैस मिश्रीका टुकड़ा गुणी और उसकी मिठास उसका गुण मिम नहीं ऐ सकते । गुणी मित्री और गुण मिठास दोनों साप साथ ही राते है, मिठास उससे कुछ भिम मही होती । तथापि गुण वौर गुणी किसी मासे मिल भी है। १२८ फेबमानीकी पारमा मा दाम्यापक क्षेत्रमें वषगायुक्त है। फिर भी पा कोकाठोकके समस्त पदार्पोको मा, यो देहसे दूर है, एकदम जान सकती है। १२९ स्व और परको भिम करमेनाग मोशान हैमही बान कहा जाता है। इस हामको प्रयो- अनमूत कहा गया है। इसके सिवाय पाकीका सब हान महान है । जिनमगवान् शुर आरम शामप स्त है। उनकी प्रतीतिको जिन-प्रतिविम्ब सूचन करती है। उस शांत दयाको पाने के लिये चा परि मति, अनुकरण, वयवा मार्ग है उसका नाम मैनमार्ग है। इस मार्गपर बम्नेसे नैनत्व प्राप्त हाता है। १५. यह मार्ग वामगुणका रोकनेवाग नहीं, परन्तु उसका योपक 02-र्यात् यह वास्मगुणको प्रगट करता है, इसमें कुछ मी सशप महीं । यह बात परोक्ष नही, किन्तु प्रत्यक्ष है। प्रीति करनेकी इच्छा रखनेवाको पुरुषार्य करनेसे सुप्रतीति होकर यह प्रत्यक्ष अनुभवका विषय होगा। . १२१ सूत्र और सियत ये दोनों पुदा है । सिद्धान्तोंका रक्षण करने के लिये ठमें सूत्ररूपी सन्दूको रस्सा गया है । देश-काका अनुसरण करके सूत्रों की रचना की गई है। वौर उनमें सित मुंपे गये हैं। सित किसी मी काल वोर किसी मी क्षेत्रमें मही बदसते, वयमा सरित मही होते; और यसिरितो बाप तो सिमान्त मही। १२२ सित गणितको तर प्रत्यक्ष है, इसलिये उनमें किसी तयफी भूख अपना पूराफ्न नहीं बता । अपर यदि कम्न-मात्रापरित हो पो मनुष्प उन्हें सुधारकर बच सकता है, परन्तु पनि कोंको सो मूह हो जाय, तो फिर हिसाब ही गळती हो गाता है। इसलिये अफ कान-मात्रापरित नहीं होते। इस प्रान्तको उपदेशमार्ग और सिवातमा पर घटाना चाहिये । १५२ सिदाल, चाहे मिस देशमें पाहे विस भाषा, और पाहे बिस काठमें लिखे गयरों तो मी ने मसिमत नहीं होते। उदाहरणके म्पेि दो और दो पार ही होते हैं । फिर चाहे थे गुर यता, संस्कृत, प्राक्त, चीनी, वरबी, परशियन और इगलिश किसी भी भापामें स्पों म लिने गये हो । उम वोको पार किसी भी नामसे बोला गाप, तो मी दो और दोका मोड़ पार होता है, परमात प्रत्यक्ष है । बैसे मौको नौसे गुणा करनेसे किसी भी देशमें, किसी मी भाषा, सके ममें पपरा वरेरी ग्रतमें कमी मी मिनो ८१ ही होते हैं-कमी मी ८० अपपा ८२ नही होते इसी पर सिदातक विषपमें मी समाना चाहिये । १२१ सित प्रापक्ष है मामाके भनुमा विश्य है। उसमें अनुमान काम नही माता । बनुमान तर्फका विषय है, और तर्क बागे बानेपर कितनी ही बार झूटी मोहो बाती है। परन्तु प्रश्पन्न सो मनुमनगम्प है उसमें बुध मा भून मही होती। ।
भीमद् पवन [.५५ मारना पापक्रिया पार ऐगी । उस पिचार किये हुए पदार्यस पम्पहरूपसे भी होनेवाग यासे पनि मुक होमा सेतो मोहमाल छोड़ना चाहिये । मोह औरनेसे मर्यात् विरतिमान करनेसे पापभिसा बंद माटी है। उस विरतिमाको पनि उसी ममें प्राण किया गाय तो मह पापद्रिया, बस जीत मितिमाको प्राण करे, तमासे बाती रुक जाती है। यहाँ नो पापकिया गती या चारित्रमोहनीपक कारणसे होगती, बोर मनमायके पप होनेसे वाटी रूक नाती है। १०१ किया दो प्रकारको होती है---एक म्पक वर्षात् प्रगट, और दूसरी अम्पक माद बप्रगट । सम्यकरूपसे हानेवाही क्रिया पपपि सम्पूर्णरूपसे मही मानी जा सकती, परन्तु इसलिये का ऐतीही नहीं, यह बात मही है। ११ पानी यो मरे-हिरे-उठती रम्यक्तरूपसे मायम होती है, परन्तु उस पानीमें पदि गषक सपना कस्तूरी गादी हो और पपानी शात स्पामें हो तो भी उसमें दो गयक बमा कस्तुरीको किया है, यह पपपि सई नहीं देती तापिय उसमें सम्पतरूपसे मात्र यतीही ।स तय बम्पवरूपसे रोनबाली क्रियाका यदि भान म किया चाप बोर केषा म्यछम क्रियाका हो मान हो तो निसमें बहिरतिरूप किया नहीं होती ऐसे बानीको क्रिमा, गौर नो म्पळस्मसे कुछ भी किपा नही करता ऐसे सोते पुए मनुष्पकी क्रिया, पे दोनों समान ही ऐ गोपगी । परन्त पास्तबमें देखा जाय तो या बात नहीं । सोते गए मनुम्पको सम्यक क्रिया यती हो पा सी क्यमो मनुष्प (गो बाल ) चारित्रमोहनापकी मन सो गा है, उसे बम्पस क्रिया म यती हो, पा पास नहीं है। परि मोहमालका बप हो गाय पो हो पिरतिरूप पारित्रमोहमीप पा र होती है। उससे पहिले पहा नहीं होती। किपासे होनेवाम बंष मुस्पतमा पाँच प्रकारका है मिण्यात बपिरति योग १२ १५ १५ जातक मिपातको मौम्दगी हो तस्तक विरतिमात्र निर्मग महा होता-मन नही होता । परन्तु यदि मियानभाव र रो माय तो बनितिमात्रको दूर होना ही चाहिये इसमें सो न । कारण कि मिम्मानसहित पिरतिमापका प्राण करनेसे मोरभाव र नही होता । तपा ममतक मोहमान कम्पम है तबतक बम्पर निरतिमात्र नहीं होता है और मुस्यरूपसे बनेपाले मोहमायके नास नेसे बर्पतर अतिरतिमात्र नहीं रहता, मोर मपपि गाल बनितिमालका रण न किया गया हो तो मी जो बम्पतर है या सहम ही बाहर बा बावा है। १६ बम्पत्तर बिरतिमापके पास होने पथात् उदपाचीन बापमापसे कोई निरनिमाका प्राण न कर सके तो भी अब उत्यका सम्पूर्ण हो बाप उस समप सहमहानिरतिमान यता है। क्योंकि मयंतर निरसिमात्र तो पहिस्से से प्राप्त है। इस पण नब मनिरतिमाय नहीं है, यो बनिरतिमालकी क्रिया कर सके। १७ मोहमालको कर ही मिष्पाप है। मोहमालका पहरो गानेसे मिप्पालका प्रतिपक्ष सम्पमात्र प्रगट होता है । इसलिये वहाँ मोहमात्र से हो सकता है। वर्षात् मही होता । कपाप प्रमर ०५१ मासानमार] विविध पत्र मादि संप्रा-याँ वर्ष १०८ यहाँ ऐसी शका की जा सकती है कि यदि पाँच इन्द्रियों बार छा मन तपा पाँच स्थावरकाय और छड्डा प्रसकाय इस तर बारह प्रकारसे विरनिका प्रण किया जाय, तो लोकमें एनेबाले चीत वीर मजीव नामकी राशिफे नो दो समय है, उनमेंसे पाँच स्थावरकाप और छा प्रसकाय मिटकर जीवराशिका तो विरति हा गई परस्तुगेको भटकानेवाली वा अनीपराशि है, जो जीवसे मिम है, जबतक उसके प्रति मौतिकी इसमें निति नहीं जाता, सबतक उसे विरति किम तर समझा जा सकता है ! इसका समाधान यह है कि पाँच इन्द्रियाँ और ' मनसे जो पिरति करना है, उसके पिरतिभाबमें पीपयशिकी भी विरति आ जाती है। १०९ पूर्व में इस जीवने बानीकी वाणीको निययरूपसे मी मी नहीं मना, अपवा उस बाणाको सम्प प्रकारसे सिरपर पारण नहीं किया ऐसा सर्व शनि कहा। ११. सहारा उपनिए यथाळ सयमको पाउते हुए-मुहमी आनासे घसते हुए-पापसे विरति होती है, और जीव गमप स्मार-समुद्रसे पार हो बाठाह । १११ बस्तुम्वरूप कितने ही स्थानको माहासे प्रतिनित है, और कितने ही स्थानकोंमें यह सरिचारपूर्वक प्रतिष्ठित ह। परन्तु इस दुपमकाप्टको इतनी अधिक प्रसता है कि इससे लागेके क्षणमें मी विचारपूर्वक प्रतिष्टित हानेके लिये और किस तय प्राति करेगा, यह जाननेफी इस काठमें शाति नाही माश्म होती इसलिये यहाँ माशापूर्वक ही प्रतिष्टित पना योग्य है । ११२ हानीने कहा है कि 'समप्टो ! क्यों समाते मही! फिर पमा भामर मिटना दुर्लभ है।' ११३ मोफमें प्रितन मी पाप है, उनके धर्मोफा, रेवाचितवन, अपने नाममें मासित होनेके कारण, पपाथ वर्णन किया ह। पार्थ पुरा ठन पौसे बाहर कर नहीं रहत । अर्थात् जिस तरह पानीमहाराजने उमें प्रकाशित किया है, उसमे मिम प्रकारसे ये नहीं पते । इस कारण व पानीको वानुसार ही प्रपति, पमा कहा है। कारण कि बानीने पाथका सा पर्म पा उसे उसी तर कहा है। ११. काठ मूठ तम्य मही, पह औपचारिक दम्प है भीर र गार पानी (वाग्में मुम्यतया पुनमानिकायमें विशपम्पसे ममममें भाता) मेमे उरम होता है। अपना गीताबीज को पाप-अम्या ही फार है। रेफ द्रम्पके अनत धर्म है। उनमें प्रियप और लिपर- प्रषय मामले मी दो धम, और का निर्याय नहीं है, उसमें पपठ उप्यापप हो । ११५ ठार्षप्रचपसे पाम जो धर्ममा उद्भव होता है, उस धर्मका निर्यसपपस सिर उसी समारंश हो जाता है | काठक समपा तिर्पपचप नहीं ६, इस कारण से समप पा गया र ति पाडे मही पाता। १२९ गिमरमतफे मनुमा काम्पके ठोध्में असम्शत मा। ११७ हरेक दम्प अर्मत धम है। उनमें कितन ही धर्म पर है, कितने । वप्पत है, तिने दो मुम्प है, कितने ही सामान्य है और कितने दी है। ११८ ममपातको जमुम्पानमे गुण परमेशर मी भर्मपात दी , अदि माया- उस ममम्पात मे।
भीमद् रामचन्द्र [.५१ मानस ११९ एक बगुम्ने पर्सयात माग-श-प्रदेश-एक बगुल्में वसासात होते हैं। जोकके मी बससात प्रदेश होते हैं। उन्हें चाहे किसी मी Pसको सममेणीसे गिगोरे वसंमपात हो होते हैं । इस तर एकके बाद एक दूसरी तीसरी समभेणीच पोग करनेसे बो योगफर पाता है। एकगुना, दोगुना, तीनगुना, चारगुना होता है। परन्तु बसपातगुना नहीं होता। किन्तु एक सम प्रेमी-जो वसमपात प्रदेशवाली है -उस सममेणीको Pशाग समस्त समणिपोको-मो बस स्पातगुणा-हरेकको असल्यातसे गुणा करनेसे इसी तय इस दिशाको समप्रेणात्र गुणा करनेसे, और इसी तय तक रीतिसे तीसरी निशाकी समभेणीका गुणा करमेस बसम्पात होते हैं। म बसम्मातके मागोंका तक परस्पर गुणाकार किया जा सके, दबतक वर्सल्यात होते; और भय उस गुणाकारसे कोई गुमाकार करना बाकी न ये, तर वसत्पात रे गानेफर उसमें एक मिम देनेसे बन्यातिजन्य वनंत होते है। १२ नय प्रमाणका एक बश है। मिस नपसे गो धर्म कहा गया है की उतना ही प्रमाम है। इस नपसे यो धर्म कया गया है उसके सिमाप, वस्तुमें गे दूसरे और नर्म में उमका निषेध नही किपा गया । पोंकि एक ही समय मागासे समस्त धर्म नहीको गा सकते । तथा यो नो प्रसंग होता है, उस उस प्रसगपर पहा मुस्पतमा यही धर्म करा पाता है। उस उस स्पम्पर उस उस मापसे प्रमाण समसमा चाहिये । १२१ मपके सवपसे र बाकर जो कुछ कहा जाता है यह नप नहीं है। परम्त नयाभास है और यहाँ नपामासोब मिप्यान मरता है। १२२ रुप सात माने है। ठमके उपमप सावसौ है, और विशेष भेदोंसे थे वनव पात् मितने बचन रे सत्र मय हो। १२५ एकांत प्राण करनेका साना गारको विशेषम्मसे होता है और एक्त प्राण करनेसे नास्तिकमाल होता है। उसे न होने देमके पि इस मयका स्वरूप प्रा गया है। इसके सम्म मानेसे गोव एकतमानको प्राण करता मा मकर मप्यस्प यता है, और मम्पस्प एनेसे नास्तिकताको बपाच मही मिड सकता। १२९ नप नो मेमें माता मो नय सय कोई वस्तु नही है। परन्तु वस्तुका सरूप समाने तया उसकी प्रतीति होनेके लिये यह केस प्रमाणका क्यो। १२५. पर मुक नपसे ये बात कही माप वो इससे पह सिर नहीं होता कि मे मपसे प्रतीत होमेबारे धर्मका अस्तित्व ही महा। १२६ केरमान वर्षात् मात्र शान हो इसके सिवाय दूसरा कुछ नहीं । फिर उसमें कप कुछ भी गर्मित नही होता । बसपा सर्व प्रकारसे एग-पन्न भप हो नाप उसी सम्म केव्यान मा पाता है। पर किसी परासे एगोप हों तो र चारित्रमोहनापो कारणसे होते हैं। गहाँ मितने से एग रेप का उदने हो बशसे महान है। इस कारण २ नमानमें गर्मित मही हो सकते; वर्षात् वे केवगानमें नहीं होते । ने एक दूसरेके प्रविधी हैं । केशान है मो पाप नाही, अपना यो रगतप माँ विमान नही है।
.५३ मारपानधर] विपिप पत्र मावि ममाह-वार्य ७०९ १२७ गुण और गुणी एकही। परन्तु किसी कारण से भिम भी हैं। सामान्य प्रकारसे तो गुणोंके समुशायको हो गुणी काते, अर्थात् गुण गुणी एक ही हैं, भिम मिम बसु मही । गुपीस गुण मिम नहीं ह सकत । जैस मित्रीका टुकड़ा गुणी भौर उसकी मिटास उसका गुण भिम नही हो सकते । गुणी मिश्री और गुण मिटयस दोनों साथ साए ही एते, मिराम उससे कुछ भिन्न मही होसी । वयपि गुण भौर गुणी किसी वासे मिम भी है। १२८ करसहानीकी मामा भी देहम्यापक क्षेत्रमें अबगाइयुक्त र फिर मी बह रोकायक समस्त पायोको मी, जो देहसे दूर है, एकम जान सकती है। १२९ स्व भर परको भिम करनेवाला जोशान ६ वही शान कहा जाता है। इस धानको प्रया- बनभूत कहा गया है। इसके सिवाय बाबीका सब कान अह्राम है। जिनमगवान् पुर वाम शामरा त हैं। उनकी प्राप्तिको दिन-प्रतिविम सूचन करती है। उस शस्त दशाको पानके पि जा परि गति, अनुकरण, वयका मार्ग है उसका नाम मैनमार्ग है । इस मागपर पख्नेसे जैनत्व प्राम हाता है। १३. यह मार्ग आग्मगुणका रोकनेबाठा नहीं; परन्तु उसका बोध हो?-अपात् यह बारमगुणको प्रगट करता है, इसमें कुछ मी सशय मही। यह बात परोध नही, किन्द प्रापन है। प्राति करने की इच्छा रम्हनेवासेको पुस्पार्य करनेसे सुप्रतीति होकर पर प्रत्यक्ष अमुमनका पिप होता है। १३१ सूत्र और मियात ये दोनों जुदा है। सिदान्तोंका रक्षण करमेक रिपे उमें मूत्रम्पी सन्दूको रसमा गया है। देशमाउका अनुसरण फरके सूत्रोंकी रचना की गई है और उनमें सिद्धांत गुपे गप है। सिद्धांत किसी भी कार धौर किसी मी क्षेत्रमें नही पात, भयमा मारित नहीं होते। और पारित हो जाय तो ये सिमान्त मही है। १३२ मिदात गगितको तर प्रत्यक्ष है, इसलिये उनमें किसी तरहको भए अपना अप्रापन मही पता । अभर या कान-मात्रालित हों तो मनुप उन्हें सुधारकर बाँच सकता, परन्तु परि अकोको ही भूम हो बाप सा सिर हिसाब हो गठनी हो जाता है इमरिपे अफ कान-मात्रारदित नही हो। इस तफा उपगमार्ग बार मितिमार्गपर पाना चाहिस । ११५ सिनि, पाहे प्रिसदामें पार विस मागा, और पाद निम पाउमें लिए गय हो, ता मी ने अमित नहीं हाते । उगाहरणके उिय दा भार । चार हात । सिर चाह रे गुन ली, मत, प्रारत चीनी, परवा पशियन भोर इगलिस रिमी मी मापा पो न गि से । उन भोको पाहे किसी भी नामसे बाग गाय ता भी आर का बाद पार ही दाता है, पर बात प्रम्पक्ष है । म मौका नाम गुणा करनेम किमी मीरे गमें, सिमी मी माग, मानमें अपामारी रातमें, कभी भी गिना ८१ हात-भी मी ८. मपरा ८२ नदी को मा तय सिमारे रिशपमें मी समसना चाहिये। १३० मिटर प्रपा है-पानीके वनुमा विजय है। उममें बनुमान काम नहीं पाता । अनुमान तच रिप है, और नई माग पनर निनाh बार शो मा दा गती प्रपा बनुमवगम्य है उसमें कुछ भी मन नही होती। ।
भीमद् पसर [.५५ मानव १३५ मिसे गुणा और गोषका सान हो गया है, प करता कि नौको नौ गुना करनेसे ८१ होत है। परन्तु मिसे नोद मौर गुणाका शान नहीं पूषा-अपोपशम नहीं हुषा-नुमानसे वपमा तकसे यदि ऐसा करे कि नौच नौसे गुणा करनेसे काचित् ९८ होते हों, तो उसको कौन मना कर सकता है!' तो इसमें कुछ वापर्य महीपकि उसे शान न होने के कारण पर ऐसा को तो या स्वाभाविक ही है। परन्तु पनि उसे गुणाको प्रतिको मग मम्मग करके, एकसे मौतक का बताकर नौ मार गिनापा बाय, तो उसे वनुमबमें मापानेसे ९४९-८१ही बोते , या सिन हो माता है। कदाचित् उसन पयोपशम मद होनेसे गुणाको मपवा बोरको परतिसे ०४९-८१ होते हैं, पा उसे समझमें न मी गावे तो मी मौका नौस गुणा करनेपर तो ८१ होते है, इसमें कुछ परफ नहीं है। इसी तर यदि सित मी बावरणके कारण समझमें न वाने, तो सित पति- शांत नहीं हो जाते-इस बातकी निभय प्रतीति रसना चाहिये । फिर मी पनि प्रावि करमेको बहरत हो तो सितके को वनुसार पम्नेसे प्रतीति होकर र प्रत्यक्ष पनुभवका विषय होता है। ११९ गबतक प बमुमवका विषय मो तबतक उसकी मुप्रतीति रमनेकी बसरत है, और मुमतातिसे कम कमसे पवनुमबमें ना जाता है। ११७ सिमांतके त - (१)मा-देनसे पप होता है।' (२)षिका षम होनेसे मुजि होती है। परिस सिमान्तकी मीति करना हो तो राग रेप छोको । यदि सब प्रकारसे रागीप एट जाय तो मामाकी सब प्रकारसे मोक्ष हो गाती है ! वात्मा बपनके परण मुक्त नहीं हो सकयो । माँ मषन इटा कि मा मुक हो । बरन होनेके कारण राग-रेप है। यहाँ राग रेप सब प्रकारसे स्टे कि मामाको बमसे छटो हो समधनी चाहिये । उसमें कुछ भी प्रभ वपमा एच नहीं पाती। १५८ मिस समप निसके राग-रेप सपा सप हो जाते , उसे दूसरे समपमें केरमान हो जाता है। ११९ गौर पहिले गुणस्थान से मागे नही चाता--भागे मानेका विचार नहीं करत्म । तपा परिसे भागे किस तय मा पा सकता। उसका क्या उपाय किस तय पुरपा करमा पाहिये ! उसय पर विचारतक मी नहीं करता, मौर सब बातें करने बैठता है तो ऐसी ऐसी बावे करता है कि इस क्षेत्रमें इस में वर्षा गुणस्थान प्रा नहीं होता। ऐसी ऐसी गहम बातें गो मपनी शफिके बाहर । उमें मा किस तब समझ सकता है। वर्षात् बिकना अपनेको भमोपशम ऐ उसके बादको बातें पदि कोई करने बैठे तो मी मी स्मसमें नहीबा सकती। यो पहिले गुणस्पानकमें प्रपि है उसका मेश्म करके बागे बाकर ससारी बार पि. तक नही पापा। कोई कोई और निर्मरा परनेसे उब मानोंमें बाते हुए, पशि से निकलने विचार करके प्रयिमदके समीप जाता है, परन्तु बाँपर उसके उपर प्रपिका इतना अधिक गोर होता है र प्रयिमेद फरमे शिपिक होर क माणा है, और सतया शिपिकर मापिस मागास .५१ मासानवार] पिपिप पर मादि संग्रा-१वा वर्ष है। इस तर मीर बनतोषार प्रयी भेदके पासमें माकर वापिस फिर गया है । कोई मीत्र ही प्रबस पुरुषार्थ करके निमित कारणोंका योग पाकर, पूर्ण शक्ति लगाकर प्रविभेद करके मागे बड़ता है, और नहाँ यह प्रपिमेद करके वागे वहा कि यह चौयेमें था नाता है, और जहाँ चौथैमें पाया कि उस मानको ऐसी छाप पाती है कि बव बागे पीछे मोश हो ही वायगी । १११ इस गुणस्पाम फका नाम बधिरतसम्यगरि यहाँ विरतिभावसे रहित सम्यमान दर्शन होता है। ११२ करनेमें तो ऐसा वाता है कि इस काठमें इस क्षेत्रमे तदा गुणस्थानक प्राम नहीं होवा, परस्तु पर कामेवाले पहिले से मौ निकलते नही । यरिने पहिसे निकलकर चौथेतक बा वीर यहाँ पुरुषार्थ करके सात अप्रमत्ता गुणस्थानक पहुँच जाय, ता मी यह एक महीसे बड़ी बात है । सातवेंतक पापि मिना उसके बादको सुप्रतीति हो सकना मुश्किल है। ११३ वात्मामें चो प्रमादरहित नामदशा है मही साता गुणस्यानक है । वहाँतक पांच गानेसे उसमें सम्पप समावि हो जाता है। मीत्र चौपे गुणस्पानको बाफर नहाँसे पाँच देशनिरत, मे सर्पविरत और साले वामचविरतमें पहुंचता है। यहाँ पहुँचनेसे आगेकी दशाका बशसे धनु मा नपवा उसकी सुप्रीति होती है। पौया गुणस्थानकाला जीत्र सात गुणस्थानको पहुँचनवारकी दयाका यदि विचार करे तो उसकी किसी भशसे प्रतीति हो सकती । परन्तु यदि उसके पहिलेके गुणस्थानकराठा मोर उसका विचार करे तो उसकी किस तरह प्रतीति हो सकती है। कारण के बाननेका साधन को वापरणरहित होना है, मा पहिसे गुणस्पानपाके पास नहीं होता । १११ सम्पत्र प्राप्त बीचकी दशाका स्वरूप मिम ही होता है । पहिसे गुणस्पानवासे दशाको चो स्पिति भयका मात्र है, उसकी अपेक्षा चौपे गुणस्थानकके प्राप्त करनेत्रामीकी दशाकी स्थिति अपवा मार मिम ही देसनेमें वाते भर्षात् दोनों मिम भिम दशाका वाचरण देसनेमें माता है। १०५ पहिसको शिपिठ करे तो भोपेमें ला गाप, पह फेवल कपनमात्र है । चौधेमें वानेमें यो वर्तन है, पापिय विचारणीय है। ११६ पहिले १, ५, ६ वौर ७ गुणस्यानक्की नो बात कही गई है, पर कुछ कपनमात्र और श्रवणमात्र ही है, यह बात नहीं, उसे समझकर उसका मारमा पार करना योग्य है। १०७ यथाशक्य पुस्पार्य करके बागे पाना भाव यक है। १९८ प्राप्त करनेमें कठिन ऐसा परिय, सहनन, वायुकी भपूर्णता इत्यानिके नमासे, कहा- चित् सात गुणस्थानकके ऊपरका विचार न मी मा सके, परम्त उसकी समीति तो हो सकती है। ११९ से सिंहको परि सोहेके किसी गस्त पिंमरेमें बद कर Pिया नाप ता बह सिंह मिस तर वपनेको मातर बन्दामा समानता है-अपनेका पियरेमें बद समझता है-बार प पियरेको भूमिकने मी देसता है, केवठ हेके मनन्त सीकबोकी बाइके कारण ही वह बाहर नहीं निकल सकता, उसी तण सात गुणस्पानका उपरके विचारको प्रमाति हो सकती है। १५. या हो मानेपर मी मतमे वारिक कारण बरककर जीव मागे नही पा सकता ।
७१२ भीमद् रामचन्द्र [.मामाकर १५१ मतमे वपना स्मी मारि निनाव बाते है, मर्यात् उनमें मोघ मही है। इसलिमेसो प्रफारसे सपकी प्रतीति करने की माश्यकता है। १५२ धमाधुम पर पुष्टर परिणामों पर समस्त वापार राता है। मेटो भेटी बातोंमें मी यदि दोष माना बाप तो यहाँ मोच नही होती । कोक-सी मपना होम म्पचार पा पला मात्र को मोहतत्वका यस्प नहीं जान सकता, उसका कारण यही है कि उसमें सरिय माप मेसभाका माहात्म्म मौजूद है। इससे बाहर क्रियाका निषेध महा किया जाता । यो गीत म करते पर एकम वनर्य । बर्य किया करता है उसके लिये वादर किया उपयोगी है। तो मी उस्से पर कानका मी बमिप्राय मही है कि बादर क्रियास मागे न मना चाहिये। १५६ गोको वमी चतुर्व पोर मरमौके अनुसार चम्ना मनको प्रिय गता। परन्तु या मोक्का बुरा करनेवाण बस्त। इस दोष दूर करनेके सिपेशनाचा उपदेश है कि मापन किसीसे सपोश नहीं देना चाहिये परन्तु पहिसे तो स्क्य हो उपदेश ऐनेको बसरत है । जिसमें रागीप म हों, उसका सग ए विमा सम्पमत प्राप्त नहीं सकता । सम्परत्व प्राप्त होनेसे और पण माता-गोवर्ष दशा मा माती। वर्षात् वह प्रतिक हो तो चतुरू हो माती है। मिनमगवानकी प्रतिमा (तमाम किये ) का दर्शन करनेसे सक्ने गुणस्थानमें रहनेपाली जामीको मो शांतनशा है, उसी प्रीति होता है। १५९ चैनमार्गमें वर्तमानमें अनेक गण प्रचलित हैं। उपहरणके लिये पगम, बक गल, कागच्छ, सरतरगण इस्पा । ये प्रस्पेठ गम ममेसे भिन पक्षबालेको मिप्पाला समस्ले हैं। इसी तर सरे मकोटि वारकोटि स्पादि यो विमाग है, सब मानेसे मिमकोटिपायो मिप्पाची मानते हैं। पास्तबमें देखा जाय तो नौकोटि चाहिये । उसमेटे निवनी कम हों उतमा । कम समाना चाहिये। और यदि उससे मी मागे गाय तो समसम भातानासोटिक मी मी चिना रास्ता नगरे। १५५ वापर पारि यो मार्ग प्रामु किया बर मार्ग पामर मी सांचा मोहा मी मग रेगा पा अस्पत कटिन पाता है तो फिर बाल महान और महामारत मोपमार्गको किस तय प्राण पर सकेगा। पाविचारणाम है। १५६ मिप्पान प्रातिके आप किये बिना सम्पमत्व माही भाता से सम्पमत्व प्राप्त हो गाय उसकी ना मत पती। वहसि ५ ७ौर ८ में में पाकर दो पलाम मोक्ष सी है। एक सम्पपत्र प्राप्त करनेसे कैसा महत र्म बन गाता है। इससे सम्पालको माल बपना उसमा माहात्म्प लिसी बशमें सुमहमें जा सकता है। १५. दुर्धर पुरुषास प्राप्त करन पोग्य मोसमा नापास 0 प्रातही हो पाता | बाम शाम नपा मोश्चमार्ग किसीके शाफ्स मप्राप्त नहीं होते अपना किसीके मासे प्राप्त महासे माते । पुस्पापक अनुसार ही होते है इसलिये पुस्पार्यको बहरत है। १५८ सूझ-सिमात-पास पुस्प रपदेशक बिना परमही देवे। बोफेरोमा .५१ म्मासानवार ] विविध पर मादि सपा-वर्ष हार मार्ग हो । मोशमार्ग तो फेरफारररिस है यह एक ही है। उसे प्राप्त करनेमें शिपिम्ताका मिपम किया गया है। यहाँ हिम्मत रसनी चाहिये । बीचको पीरहित करना हो जहर है। १५९ विचारवान पुरुषको म्पबहारके फेरफारसे म्याकुल न होना चाहिये । १९० उपरको भूमिकामाम मीधेकी भूमिकामालेकी बराबर मही है । परन्तु नाचेकी भूमि कावासे यह कहै।चीन रूप मिस म्याहारमें हो, उससे यदि दूसरेका म्पहार पा देसनेमें बाये, तो उस उप म्पबहारका निपेप नहीं करना चाहिये । क्योंकि मोक्षमार्गमें कुछ मी फेरफार नहीं है। तीनों कास्में किसी मी क्षेत्रमें मो एक ही समाम ये वही मोक्षमार्ग है। १५१ पसे पम्प निति करनेमें भी बीपको ठा माश्म होती है, तो फिर सी वर्गत प्रासिमोसे को मिप्पाच होता है, उससे निति प्राप्त करना यह कितना दुर्धर होना चाहिये। मिप्यालकी नाति ही सभ्यस्त है। १६२ जीपाजीवको विचारस्पसे तो प्रतीति की न गई हो, और कपनमात्र ही मौजामीन है—यह करना सम्पस्म नहीं है । तोर्यकर भादिने भी इसका पूर्वमें भारापम किया है, इसस ठवें पहिसे ही सम्पपल होता है। परन्तु इसरोको कुरा अमुक पुरस्में, ममुक माविमें, अमुक वर्गमे अपना अमुक देशमें वसार सेनेसे कमसे ही म सम्पन्न होता है, यह बात मही है। १६३ बिचारके बिना भान नहीं होता । धानके बिना मुप्रति वर्षात् सम्पन्न नहीं होता । सम्पपलके बिना पारित्र महीं होता और अबतक पारित न हो तबतक जीव फेवण्यान प्राप्त नहीं करता, मोर पबतक बीब केजबान नहीं पाता तबतक मोक्ष नहीं यह देखनेमें माता .१५१ देवका वर्णन । तल । जीरका समप । १५५ कर्मरूपसे बनेगा परमाणु केवगानाको स्य होते है, इसके अतिरिक उनके लिये और को निमित नियम नहीं होता । परमावधिबाडेको मी उनका स्प होना समय है, और मन पर बानीको उनका वमुफ देशस स होना समय है। १९५ पाय बनत धर्म-गुण-माPि मौग्छ यते हैं। उनका मनंवर्गा माग बमनसे कहा मा सकता है और उसका बनता भाग सूत्रमें उपनिबर किया जा सकता है। १५७ पाप्रातिकरण, अनितिकरण भौर अपूर्णकरणके बार पुगनकरण वार गुणकरण होते है । पुमनकरणका गुणकरणमे इय किया जा सकता है। १५८ पुननकरण भपात् प्रातिको योगन करना । तपा वात्माका गुण मोबान , उससे दर्शन, और दर्शनसे चारित्र हाना गुणकरण है। इस गुणकरणसे सुजनकरणय क्षय किया जा सकता है। अमुक अमुक प्राति गो अहमगुणकी निरोधक है उसका गुमकरणसे आप किया जा सकता है। १६० कर्मप्रावि, उसके मूमसे सूक्ष्म भाव, भार उसकेगा, उदय, उदारणा, संक्रमण, सता, बार क्षयमासका यो वर्णन किया गया है, उसका परम सामर्थक बिना वर्णन मही किया जा सकता। प्रमका वर्णन करनेवाला कोई नारकोरिका पुस्प नही, परम्त ईपरमरिका ही पुरुष होना चाहिये, पर सुप्रतीति होती है। पामा वा मुलासमोरुना-मनुषार भीमद् रामचन्द्र [.५३ मामला जिस किस प्रहतिय किस रस्से क्य होना पाहिम ! किस प्रकृतिमें सच! किसमें वदप होतो कौन सन्मणसे। स्पादिका रचनाको कानेपाने, उपर कोचनुसार 'प्रकृतिक सरूपका माप तोमर होको'स उनको परम्यानको बावको यदि एक मोर रस मी, या तो नियम होता है कि कपन करनेवाम ईबरकोटिका ही पुस्प होना चाहिये । १७१ बाविस्मरणान मन्तिानके पारणा नामक मे में गर्भित होता है।पहिले मबको जान सकता है। पतक मिले भक्में बनाफ्ना म बापा , पर या बागे पड सकता है। १७२ (१) तापकरने बाहा म दी हो, और गोर बफ्नी पस्तुके सिवाय परवस्तुका जो कुछ माण करता है, तो मा परका छिपा वा वीर बदल गिना नाता है। उस वक्षसे वार्षकरने परवस्तुको जितना हम करनेका छौ, उसको परवस्तु नहीं गिना जाता । (२) गुरुको बनानुसार पे गये वाचरण के समय में बदत्त मही गिमा माता। १७५ उपदेशके मुरूप पार भेट (१) इम्पानुपोग (२) परणामुपोग (३) गणितामुयोग बौर (१) पर्मकपानुपोग (१) मोकौ बनेका म्य, उनका सरूप, उनके गुण, धर्म, ऐठ बोत, पप्प मधी मनंतानत प्रकाश मिसमें वर्णन है, पर इम्यानुयोग है। (२) इस दम्पानुपोगका स्वरूम समचौ बानेके बार, जिसमें आचरणसम्बन्धी वर्णन हो पर परमामुपग है। (१) दम्पानुपोग तपा परणानुपोगकी गिनती प्रमाणका, तपा ठोकौ यनेपा पार्ष, क्षेत्र र बारिकी गिनती के प्रमाणका यो वर्णन गणितानुपोग है। (2) सत्पुरुषोंकि धर्म-परिकको कपा-निनच माप मेनेसे गिरनेवाले गौरको गा. समानकरी होती है-धर्मपानुयोग है। १०० परमाणु हमेवाठे गुण समान बादि तो कापम यते है, और पापों को फेरफार होता है। उदाहरणके लिये पानीमें बनेबा शांत गुणमें फेरफार मही पता, परन्तु पानीमें गो तरंगें उठती है, उन्हाम फेरपार होता है। वर्षात् वे एकके बाद एक उठकर उसमें सम्पती पती है। इस तय पर्यपावस्थाका हो मास्पातर हुमा करता है परन्तु इससे पानी में पनेबाली शीतमतामें पाना में परितन मही ना, तोपम ए पते है। वौर पर्यापहप रंगों परिवर्सन एगा करता है। वपा उम गुमा हानि दिनप गे केफर मी पाय हो। उसके विचारसे प्रनालि, प्रतसिसे स्पाग, और त्यागसे बात है। १०५. मस और फार्माण परीर त्या देहके प्रमाण है। तेजस शरीर गरमी करता, और बह माहारके पचानेका काम करता है। परफे मुरूममुक भगके परम्पर रगानेसे गोरे गरम मास है, सो वे तेजसके पारण हो माझम हाते है। वपा सिरके उपर प्रत वादि गार सपर परीधा करमेकी मी गोन्दो प्ररित है, उस वर्ष भी यही है फिर पारर स्पून ये है अपरा मही ! मात् परामर ग्लून शरीरमें गाको तह सम्त शरीरमें पता। माल, पमा सब .५१ मास्मानवार] विविध पत्र मादि समा-पौ वर्षे - १७९ कार्माण शरीर मी इसी सरह है। तैमसको अपेक्षा सूक्ष्म है। सभी बसको वरा यता है । स्पूछ शरीरके मौतर बो पापा होती है, वपत्रा यो कोष भादि होते है, यही कार्माण शरीर है। कार्माणसे कोष वादि होकर तेगोरेश्या वादि उत्पन होती है। यपपि बेदनाका वनुमष गांव से करता है, परन्तु जो वेदना होती है, यह कार्माण शरीरके कारण होती है। कार्माण शरीर गोषका सपनाम है। १०७ उपर को ए पार वनपोगोंके तथा उनके सूस्म मारोंके स्वरूपा नीमको विचार करमा योग्य है--समझना योग्य है । यह परिणाममें निर्मराका हेतु होता है, अपना उससे निरा होती है । चितकी स्थिरता करमेके लिये ही या सब कहा गया है। कारण कि गौरने परि सम्मसे सूक्ष्म स्वरूपको कुछ समझा ए तो उसके लिये वारवार विचार करना होता है, और उस विचार के करनेसे पीबकी बामणापि न होकर, पर विचार करनेतक मौतरको मीतर ही समाई यती है। १७८ यदि जीवको मतर्विधारका सापन न हो तो बीवको चि गाम बसके उपर चाकर, उससे तय तबके घाट घटे जाते है। क्योंकि जीवको कोई जानम वो चाहिये । उसे साठे बना ठीक मही माता, उसे ऐसी हो भादव पड़ गई है। इस कारण पनि उक्त पदार्पोका जान मा हो तो उसके विचारके कारण, सपिचति बाहर निकलकर गाने के बदले, मौतर समा जाती है, और ऐसा होनेसे निरा होती है। १७९ पुन्नत परमाणु और उसकी पर्याप वादिका सूक्ष्मताको, मितना या पचनका निपयो सकता है, उतना कहा गया है। पर इसलिये कि ये पार्ष मूर्णिमान है- अमाधमान मही। पे मस्मिान होनेपर मी इतने सूक्ष्म है कि उनका पारम्बार विचार करनेसे उनका सरप सममें बाता है, भार उनके उस तय समझमें मानस, उससे सूक्ष्म बरूपी बारमार्सबपी शान करनेका काम सरसहो जाता है। १८० मान और मतामा मे मार्गप्राशिम स्तमरूप है । वमका त्याग नहीं किया ना सकता, और इस कारण समात मी नाही माती । तपा समक्ष मानेमें विनय मक्तिको पहिले जरूरत पाती । प्रपा पर मक्कि मान-मतामाके कारण प्राण नहीं की जा सकती। १८१ बाँचना, गना, पारम्बार पिचारमा, पिच निपय मना और पकया । वेदान्तम मी पण मनन और निविभ्यासन ये मेद बताये है। १८२ उपसम्पफ्नमें धर्मक मुस्स चार अंग को है:- (१) मनुष्पता (२) म्पुरुपके वचनोका भाण (१) उसको प्रतान्ति वौर (0) धर्मक्य वाचरण करना-पे चार बस्तुयें दुर्लभ है। १८३ मिप्यालक दो भे-म्पल और पम्पऊ। उसके तीन मे मा किपे गये वतर मध्यम और नफ्स्य । जबकि उत्तर मिथ्याल राता है तबतक बार पहिले गुणापान मेसे गाहर नहीं निकसता । तपा जबतक उरए मिप्यार होता है, वबतक प मिपाच गुणस्पानक मौ मादी माना गावा । गुणस्पानक मारके वापसे होता है।
७.५ धीमद् पत्र [.मामान १८१ मिपावके हारा मिप्पात म पाना, बोर इस कारण यहाँ नरा बागे केले कि चार तुरत ही मिथ्या गुणस्थानको मागता है। १८५ गुणम्पानक वामाके गुणको ठकर ही होता है। १८६ मिप्याचमेस जोन एकदम न निकला हो, परन्तु यदि पोहा मी निकल गया हो, तो भी उससे मिष्पाप मंद पाता है। यह मिपास मी मिप्यापक रामद होता है। मिप्याल गुमपानक, मी मिप्पासका वश मो कपाय होती है, उस बसे मी मिथ्यालमसे मिप्पाल गुण स्थानफ एमापा जाता है। १८७ प्रपोजनमत बालके मूहमें पूर्ण प्रतिम-उसी तयक मिलते गुसते अम्प मार्गी समाता भासे साताप प्रालि हाना मिभगुणस्पानक है। परन्तु वमुक दर्शन सत्प है, और अमुक र्शन मौ सय है, इस तरह दोनोरे उपर एकसी प्रताति रमना मिभ नही, किन्तु मिप्यात गुमस्पानक है । तपा अमुक दर्शनस अमुच दर्शन अमुक बमें समान है- --पर करने में सम्पन्न पापा मही पाता । कारण कि यहाँ तो अमुक निको मरे गमका साप समानता करनेमें पहिया न ही सम्पूर्णम्पसे प्रतालिम्प होता है। १८८ पहिसे गुणम्पानसे मरेमें मही जात, परम्नु पास पीछे किरते हुए सब पहिसमें नाना पता है, तब बीचमा अमुक काउ मप गुणस्पामक कहा जाता है। उसे परि भोपेके या पोरा गुगापानक माना जाप, तो गास बोयसे पोचमें पर माया भीर पो तो सम्पादनको चौथमे पतित एमा माना गया भर्पान् बर मारे उत्तरता पुमा दोहै, उसे पापों नही पाया सकना इमरिये ठमे मरा ही मना टी है। १८. नाराण मोग। यह बात त सदरहित । इमै अता पर भार Pगप्पर दोनों हो पाती । परम्भापरणरो साथ लेकर स्थन करनेमें एक इमरेमें कुछ योगामा में भाषा है। १. गियर करते है कि देशात सचानप नही, परम्नु राहिलपमे यता है। १.१ पनि राता और सानिमा मापाप अर्पक, परम्त रिशा धिमे उसमें उपोषामा । १.२ सम्पमे भोप मापामे Rपारपूर मापाममे चारसहित मास्या' । १.१ तोपका मे मी गंमार शाम र सपदि सामी परि मी उरे स्पाग पानेही मन मोहिर मप गोमोमोमा करने माप रेमे पुकारा । राना है। .. मग । प्रसार - बार और इमरा अर्पतर । बाय पाग भापकर (पा मारी (पार माग पर भी ममिरिमरिता पोशिप पर। पिग)। १.५.गादेगा मममी पर रामा और में लग करने मार rki mm र मगा पण पर भारमा सामे भरा मानिसमा रेमा भी मौसममा और गामिरगा गमा भार .५१ प्रसानR ] विविध पत्र मादि संग्रह-३वों पप शियिस-परिणामी होकर मर पर गाता । इसलिये धीरे धीरे इस बातकी जॉप और परिचय करना पाहिये कि त्याग करते समय परिणाम कैसे शिथिल हा गाते है! १९६ बाँस गौम आदि इन्द्रियोंकी एक एक अंगुस जगह गौवनी भी बिसे मुश्किल हो गाती है, अथवा उसका मौतमा बसमा हो जाता है, उसे यदि महान् पराक्रम करनेका वपा महान् क्षेत्र बीतनेका काम सौंपा हो तो यह किस तर बन सकता है। इसलिये 'जब एकदम त्याग करनेका समय भायेगा तबकी बात तब हो'-स विचारको ओर गश रसकर, हातमें तो धीरे धीरे स्पागको कसरत करनेकी ही बरत है। उसमें मी प्रथम शरीर मौर शरीरके साय संबध रणनेपाले सगे समधियोंकी नाँच करनी चाहिये, वौर शरीरमें मी प्रथम बास गौम नीर उपस्प इन पौन इन्द्रियों के विपयको देश देशसे त्याग करनेकी मोर मप करना चाहिये, और उसके अम्पाससे स्पाग एकदम सुगम हो जाता है। १९७ इस समय बाँच करनेके वीरपर वश वरासे नितमा पिवना स्पाग करना है, उसमें मी शिथिलता न रसमा चाहिये । तपा स्पीका अनुसरण करके त्याग करमा मी ठीक नहीं। मो कुछ स्पाग करना मह शियिठतारहित शर-दरवानेपित हो करना चाहिय, क्या पPि कुछ घर-दरगामे रसनेको यरूरत हो तो उ. मी निश्चितरूपमें सुठे हुए रखना चाहिये । परन्तु उन्हें इस तर म रखना चाहिये कि उसका मिस समय जैसा बर्थ करना हो जैसा बर्ष सके। जिस समय जिसकी बहरत पा, उस समप उसका अपनाइणानुसार अप हो सके, ऐसी पवस्था ही स्पगमें म रसनी पाहिये । यदि इस तपकर म्पवस्या को नाप कि मनिधितड़पसे मर्यात् जब बदर परेता मना- ति वर्ष हो सके तो गान शिथिल-परिणामी होकर माग किया हुआ सब कुछ निगाई गमता है। १९८ पदिषशसे मी त्याग करनाहा तो उसकी पहिसेस ही निपपरपमे म्याम्पा पॉपकर साक्षी रसकर स्याग करना चाहिये। सपा स्पाम करने के बाद अपनेका मनजित अय मही करमा चाहिये । १९९ संसारमें परिभ्रमण करनेवाली क्रोध, मान, माया मीर ओमको पोकामनए कपाप है। उसका स्वरूप भी समझना चाहिये । उममे मी बो मनतानुवर्मा कपाप है पर बनत ससारमें मट कानेवाली है। उस पापके य होनका क्रम सामान्य गतिसे इस तप है कि पहिले प, फिर मान, रि माया और फिर छोमका क्षय होता है, और उसके उदय होनेका कम सामान्य गतिसे इस तय कि पहिले मान, और फिर अमसे छोभ मापा बौर पर उन्य होता है। २.. इस कपके मस्पिात भेर है । जिस सपने कपाय होती है उसी रूपमें जान संसार परिभमणके लिये कर्मांध करता है। कपायोंमें मासे पका बप भननानुगंधी फपापकायो पतर्मुइनमें सतर कोकोही सागरकी वायुको बारती है, उन बनवानुवधी साप मी जान है। ए इस वय कि क्रोध, मान, मापा और ठोम पे पार, मिप्पासमोहनला रामारो बराबर मात्र पानासे सपके मन्य मागमे एपकर उसकी रक्षा करते है और दिस मुमप जिसकी बरत होती है उस समय बह बिना पुछापे ही मिरपालमानीयको सेवामान गुर पाता है । इसके पथात् उसरा मोरापनप मा परिवार है। पापके अप्रमाग एकर मिपातमाहनोपको ग्मामी करता है, परन्तु पर मब एसाठी करते हुए मी मही प्रेमी करापका दो काम करता है। मकाने भीम प्रसाद [.५३ मामानकर भाग तो कयाय ही है, और सस कयायमें मी वर्नतानुषी कपापके चार पोदा तामात ही मार कर नेपा है। इन चार योगायोके बीच में कोपा समाष दूसरे कप तानकी योषा कुछ अन्दो मारम हो माता है। पोकि उसका स्वरूप सपकी पोला मादी ही माश्म ऐ सकता है। सतप जा किसीका स्वरूप मादी माश्म हो जाय, तो उस समय उसकी साप टाई करनेमें, कोषाको प्रति हो बानेसे, पानेकी हिम्मत होती है। २.१ पनमाती चार कर्म-मोहनीय, भानावरणीय, दर्शनावरपाय और बताय-बो बामाके गुणों को पावरण करनेवाले हैं, उनम्ध एक तप धप करना सरल मौ है । वपा मेदनीप भारि कर्म पपि मनपाती मही, तो मी उनका एक तरह से अप करना दुफर है। यह इस तरा कि पर वेदनीय कर्मन उदय माने तो उसका क्षय करने के लिये उसे मोगना ही चाहिये । उसे म भोगनेश्वरम हो तो मी पापा निरुपयोगी हो?-पोंकि उसे वो मोगना हो चाहिपे भौर पदिशानावरगापा उदय हो तोप प्रयत्न करनेसे भय हो जाता है। उदाहरण के लिये, कोई श्मेक पदिानावरमापक उदयसे पार न पता हो तो उसे दोबार भारमार, वाळवार, सोमवार, मगर, चौसठपर, सौबार, मात् उसे अधिकार पाद करनेसे पानावरणीयका क्षयोपशम अपना पप कर प सोक पा रहा है। बात मान होने के कारण कानावरणीयका उसी ममें अमुक अंग अप किया मा सकता है। यही मात दमिवरणीय कर संबंषमें मी समझनी चाहिये । महावामान मोहनाप कर्म भी इसी तय शिपिक हता है-उसका तुरत हो क्षय किया जा सकता है। जैसे वसा मागमन-प्रमा-भानेमें पर्मस्ती उसी तय मादासे र मी हो सकता है। मोहनीय कर्मा तोय होता है, तो मी पप प्रदेशप म होनेसे उसका तुरत होप किपा पा सकता है। सपा नाम बापु वादि कर्मका यो प्रवेशच दस्ता, केपणान तत्पन होनेके पचात् मन्ततक भोगना परताना मोहमीप बादि चार फर्म उसके परिशी पप हो जाते है। २ २ उन्मत्तता पहचारित्रमोहनापको मिलेष पर्याप है। पवित् स्प, कचित् शोक पित् रति अपित् नाति, पवित् मप, वौर सचित् मुगुप्साहपसे माम होती है। से उसका बानावरगापर्मे मा समावेश होता है। स्वममें विशेषरूपसे बानापरणाय पर्याय ही माम ऐती है। पर पाना माग है । परम् परिणादा मेमप्रतिमें गर्मित होती है। माहारसा वेदनापमें गर्मित होती है, और मयसमा मपप्रातमें गर्मित होती है। २०१ बर्नत प्रकारकर्म मुस्स बाठ प्रकारसे प्रति नामसे कर बाते हैं। बसवय कि ममुक अमुक प्राति अमुक अमुक गुणस्पामकतक होती है। इस तर माप सोन्दर समावस्ने इसके समझाने की स्पूनमस उसका विवेचन किया है। उसमें से कितने ही तय कर्म मात् धर्मप्राति का समावेश होतापात् बिस प्रकृति के नाम कर्मपमें नहीबाते कर प्रतिस्पर पतई प्रतिको विशेष पप्प है, अपना प पर बताई गई प्रतिमें गर्मित हो गती ।। २५ निमाका बर्ष लिम्यमान नग्री किन्तु उसका बर्व दिशेपमान होता है। मामा को मात्मास्मसे परिणमम रती माल बा समान है। सपा सभामा भौर सफा स्पोग .५३ (१)] विषिष पर मादि संपा-सों वर्ष होनेसे वात्मा स्वमाषको छोपकार धागे गाकर विशेषमापसे परिणमन करती है, यह विमान है। इसी व्य नरके किये मी समझना चाहिये । २०६ फालके भणु होक-प्रमाण असत्यात । ठसवणुमे रुस अथवा स्निग्ध गुण नहीं है। इससे एक मणु दूसरेमें नहीं मिल माता, भौर हरेक मुदा पुदा यता है । परमायुके पुन्नसमें पप गुण होनेसे मूरसताके मौजूद रनेके कारण उसका- -परमाणु-मुन्नम्मा-रूप होता है। (२) उत्पाद. म्यय -यह मात्र एक परमें एक समयमें है। तुष जीव भौर परमाणुभोंका परमाणुमान मान परमाणु " " " संयोग | कोई नीव एकेन्द्रियरूपसे पर्यापी दो इन्द्रियरूपसे है तीन इन्द्रियरूपसे है वर्तमानमान पार इम्पिरूपसे पाँच इन्द्रियरूपसे , संधी बसंधी वर्तमानमार पर्याप्त वपास पानी वर्तमानमान वधानी मिप्पातर वर्तमानमाल सम्पाचन एकश कोष यात बनत परा कोष सिदभार धर्मभानभात एम. भीम मचाम्य [.५३ (१) प्रश्न:- । वारम्बान समदर्शिता, विचरे उदयप्रपेग, वपूर्ववाणी परमभुत, सहरु रक्षण पोम्प । (१) सनुस्के पोप ये पक्षण मुस्पक्या कौनसे गुणस्पानको समर। (२) समदर्शिता किसे करते है ! उत्तर --(१) सम्झे पोम्प नो इन पक्षणों को बताया है,वेक्षण मुस्यतया-विशेषरूपसे- उपदेशक वर्षात् मपकाशक सहरके ही प्रभाव को तपा उपदेशक गुणस्पानकावर वेग है। मानके सातसे पाहतको गुणस्पान पकाता मात् उनमें उपदेशक प्रापि समन माहीहै। मार्गोपदेशक प्राति से बार्रम होती है। को गुणस्थानको संपूर्ण पोतरगदसा और केरमान नहीं है, तो तेयमें वीर पपानत् मोपदेशकल तो तय गुणस्पानमें गनेपाले सम्पूर्ण मौतयग और काम्पसंफ्म परमसवर मी- बिनवाकर वा में पता है। पापि मे गुणस्थानमें पनेपाल मुनि, जो सम्पूर्ण मातरगया और सम्पदसाका उपासको सिको उस दशाके मे ही प्रापि-पुरुषार्थ-ग्रता, बिसने उस दशाको पपि सम्पूर्ण रूपसे नहीं पाया फिर भी जिसमे उस सम्पूर्ण दशा पानेके मार्गसाधनको, सर्प परम सहर माताकर वादि वासपुस्पके मामयपचनसे बामा है-उसको प्रतीति की, मनुमन किया है और इस मार्ग-साधनको उपासमासे मिसको पप उत्पेवर दशा विशेष प्रगट होती जाती है। वषा मिसके निमित्तसे भागिनतीपंकर बानि परम समुस्की और धमके स्वरूपाचे पहिचान होता है- उस सहरमें मी मार्गोपदेशकब बनिरोपटपसे पता। उम्से नाचे पाचवें और चौपे गुणस्पानको तो मार्गोपदेशाकल समय मही । क्योंकि हाँ मौकी, महमात्र, तत्वको मोर मानकी पहिचान गरी, प्राति मी, तपा सम्पविरति मी और पर पहिचान-प्रतीति-और सम्पविरति न होनेपर भी उम्को प्ररूपणा करना, उपदेशक रोना पर प्रगट मिम्पाल गुस्पना मोर मार्गका तिरोररूप है। चौथे पाच गुणस्पानमें पप पहिचान-प्रति-पती, भौर को यात्मज्ञान मावि गुण मंशसे होयते । और पांच देशपिरतिमात्रको डर पपपि पीपेको पेषा नियक्ता है, तपापि पाँ सपिरतिके गितमी लिपि नहीं। माममान समर्शिता वावि गो पण क्वापे है उमें मुस्सतासे संपतिधर्ममें स्थित, मातरम दशकि सापक, उपदेशक गुणस्पानमें एनेवाले सद्गुम्फोम करके ही बताया है। और उनमें से गुण बहुत पोंमे पते भी हैं। तथापि रे क्षण साग-संपूर्णरुपसे-तो तेग गुणस्थानमें यमेवाले सम्पूर्ण पातर ग भौर केवम्परंपम जीवामुक्त स्पोगकेपी परमसद्गुरु भौमिन मयत तापपरमें पते है। क्योंकि उनमें बहमवान अर्थात् सम्पस्पिति संपूर्णरूपसे पता। यो उनको बानदा भर्पात् सानाविशयका सूचन करता है। सपा उनमें सम-शिवा सम्पूर्णरूपसे रहती है, जो उन तराण चारित्रमा मात् अपायागमाविशयको सूचित करता है । तपारे सम्पूर्णहासे इसमशित । इसधिप उन विचरने भादिको निक भादि पोगक्रिपा पूर्वप्रारम्भका देदन करनेके लिये पर्पत हो, पर .५६ (३)] विविध पत्र मादि संप्रा-पर्प २१ " इसलिये " निघरे उदय प्रयोग " ऐसा कहा है । सम्पूर्ण निव अनुभवरूप उनकी वाणी, भज्ञानाको गाणीसे मिष्मण और एकांत वामार्पको गोधक है, इस कारण उनमें वाणीको पपूर्णता कहा है, जो उनके पचनातिशपको सूचन करता है । मागाधर्ममें रहनेवाम शुत मी उममें ऐसी सापेक्षयासे पता है कि निससे कोई मी मप सरित म होयह उनके परमभुत गुणको स्पित करता है, और जिनमें परमभुत गुण यता है, पूमनाय है, इससे उनके पूमातिशय गुणका सूचन शेता। ये भीमिन बरिणत तीपकर, परमसद्गुरुकी मी पहिचान करानेवाले विपमान सर्वविरति सद्गुरु है, इसलिये मुख्यतया इन सद्गुरुको छाप करके ही इन सभोंको बताया है। (२) समदर्शिता अर्थात् पदार्थमें इप्यनिएणुविरहितपमा, इचाहिवपना और ममत्वरहितपना । समदर्शिता पारिखदशाका सूचन करती है। राग-परीत होना या चारित्रदशा है। इसनियादि ममत्व और मात्रामाषका उत्पम होना राग-पहै।' यह मुझे प्रिय है, यह मुझे वय माता है, यह मुझे अप्रिय है, यह मुझे क्या नहीं गा '—ऐस भान समदर्शी मही होते । समाशा माग पदार्पोको बौर उनकी पर्यायोको, वे पार्य और पर्याप विस माव सते, उनें उसी मावसे देखता है, चामता है धौर करता है, परन्तु वह उन पदामि अपना उनकी पर्यापोंमें ममम वपया इयनिमुनि नहीं करता । भारमाका स्वामानिक गुण देखना-बानना है, इससिमे बह रेप पार्यको देखती पानती है; परन्तु मिस मामाको समदर्शिता प्रगट हो गई है, वह बारमा उस पश्र्पको देसते जानते हुए भी, उसमें ममत्वबुद्धि तादाम्पमार मौर इसनिम्मुदि नहीं करती । विषमररि मरमाको हो पायम वादाम्पापिहोती?-समपि वाहमाको महोती। कोई पदार्थ काठा हो तो समाशा उसे काला ही देखता जानता वीर फाता है। कोई पदार्थ सर होगा उसे वैसा ही देखता मानता और करता है।कई पदार्य प्रगभित हो तो उसे पहसा ही देखता जामता और कहता है, कोई दुर्गचित हो तो उसे गए वैसा ही देखता मानता और प्रता है। चाहो, कोई नीचा हो, तो उसे यह वैसा ही देखता जानता और करता है। मह सर्पको सको प्रहतितपसे देसता जानता वोर करता है और वापको बाघकी प्रातिरूपसे देसता जामता बोर कहता है । स्पादि प्रवरसे बस्तुमात्र निस सपसे बिस मासे होती है, सम या उस उसी रूपसे, वसी मानसे देखता मानता और करता है। पर हेय ( छोड़ने योग्य ) को ऐसलपसे दसता बानता बार पता और उपाय (प्राण करने योग्य) को उपाइपरपसे देसता जानता और पाता है। परम्त समाशा- उन सबमें अपनापन, श्यनिएपुदि और राग-रेप नहीं करता । मभ देगर यह उसमें प्रिपता नहीं करता, दुर्गध देसकर १८ उसमें मप्रियता-ग-मही फरता । म्यादारमें कुछ म मिना जाता एमा देशकर, 40 ऐसी दयादि (पग-रति ) मी करता कि पा मुधे मिठ गाय ता टोकदै । तपा म्यवहारमें कुछ सराब समठा बाता मा देसार, ए ऐसी मनिप्छानुद्धि (पचरति ) मही करता कि यह मुत म मि तो टीक है । प्राय स्थिति में संपोगमें-हा-नग, बाम्-प्रविस, इयनिएपुद्धि, माकुरता पालना न करते हुए, उसमें समातिमे, मात् अपने निर समासे, यगोप-रदित मारसे दमा हो समता है।
२२ भीमद् रामचन्द्र [पा.५५ (३) .१४ साता-असाता, मौवन-मायु मुगम-दुर्गध, मुस्तर-दस्सर सप-प, सौत-उष्ण वादिमें हर्ष- शोक, रति-मरति, जानिएबुनि और बातम्पान न गना ही समर्शिता है। समदशा में हिंसा वसस्य वचन मैथुन वौर परिमाका स्याग माश्य होता है। परि बहिसानि ब्रत न हो तो समशिता समत्र नहीं । समदशिता और परिसादि मनोज कार्यक्रमण, वपिनामाषी र बम्पोपामयसबर है। परि एक न तो दूसरा नहीं होता, और यदि दूसरान होतो परिण नहीं होता। समर्शिता हो तो वहसा बादित होते है। समता महोठो प्रविमा भावि नहीं होते। मरिसा बारित न हों तो समर्शिता नहीं होती। बरिसा बारित हों तो समशित होती है। मितने में सम-शिवा होता है, उतने ही बशमें वरिसा बादि प्रत होते है, और जिग्ने बोंमें हिंसा मादिगाव होते। सतने ही पशम समर्शिता होती है। सहरमोम्प झणम समदर्शिता तो मुस्पतया सचिरति गुप्मस्थानको हो । बादले गुणस्पानकोंमें प उत्तरोत्तर वर्षमान होती जाती है विशेष प्रगट होती गाती है । तपा ज्ञापमोर गुणस्थानमें उसकी पराकाष्ठा, और बा में सम्पूर्ण बौतरगता होती है। समातिाप न किसमाव समानमात्र बमेइमान, एकसमान पुनि और निसिमफ्ना नहीं है।वर्षात्कार मौर रे दोनोको एकमा समाधना, नपा समुप और समुवमें समानमान मानना, अपना समर्म और वसमर्ममें अमेर समझना पपमा सार और बसम्में एक्सी बुनि रसना, अपक्ष सदेव नार बसमें निशिचमाल रिसा-अर्यात् ऐनोंको एकसमान समझना इत्पानि समानातिको समदर्शित मही काते, यह तो मारमाको झापा, पिता, और निकलता है। समदया सत्को सत् बानता है सत्य बोष करताअसत्का बसत् मानता है बसपा निपेष करता है, समुतको समुत समझता है उसका पेप करता है तो मत पानता है, उसका निपेष करता है सार्मको स्पर्म मानता र उसका बोध करता है सबमरे वसाधर्म बानता है, उसका निपेच करता है। सरचे सहा समस्या उसच बोध करता है पसाम्फो क्सहरु समाव? उसका निरेष करय है। सदेषको सोच समझायो उसमा मोष करता है। मसोमको बसदेव ममतता है, उसका निपेच करता है स्पादि यो पैसा होता है मो उसे पैसा होता है मानता है उसका प्ररूपण करता है और उसमें समरेप स्वनिमुद्धि नहीं करता, उसे समगा सपाना चाहिपे । ७५४ मोरबी पैदा १२ रवि १९५४ (१)कर्म-प मोप्पटमार शव बादिसे सतक विचारने योप। (२)पमा प्रा राम्प लिबमाम है। तो मी माग निश्चपसे सम्पुरती वाचा पति भगाकर, यो पुरुप बगुम बार्पसे सम्मान दर्शन और पारिता उपासना परमा पाते। उने परमप्रतिय मार्ग बमी मी प्राप्त सकता।
सर परपस हित .५५,५६.५०.५८] विविध पम मादि सग्रह-पों वर्ष રી ७५५ नमः फेपरज्ञान- एकदान र सततमूद है सत्य माकि सससे रहित एकति गुमान निरापरण स दम्प क्षेत्र का भाषा सब प्रकारसे एक भेदरहित है उस फेसबानका हम प्यान करते हैं निर्मिफस्स है मिबसमानरूपी सर्वमाषका उत्तर प्रकासको समयमें पान ७५६ मैं वदानस्वरूम है- -पह सम्पन प्रवीत होता है। से होमेके हेतु सुप्रतीत है। सर्व इन्द्रियोका स्यम कर, सर्म परोसे मिनस्वरूपको पाइच कर, योगको मना कर, उपयोगसे उपपोगको एकता फरमेसे केवमहान होता है। ७५७ आकाशवाणी सपकाये। तप करो । मुख चैतन्यका म्यान करो । मुख पैतन्या पान करो। ७५८ एक गर्म परमास मुकमैं कान्यात प्रदेशामक निन बनगाहमा प्रमाण है। मैं वान्म, मगर, भमर, शाल है। मैं ससश्याय-परिणामी समपामक है। में शुर पैतन्पसरूप मात्र निर्भिकम्प प्रण। जार तन्य सर्व शुभ गसे विमान अत ४२५ मीमद् पचय [पर ५ . ७६४ समई, बापत महा ११ गुरु १९५१ वनंत तराप होनेपर भी पीर राकर मिस पुरुपने अपार मोहगो पार किया, उन श्री भगवान्को ममकार है। वनंतकारसे को पान ससारका हेतु होता था, उस ज्ञानको एक समपमारमें चातर परके, मिस्ने उसे भवनिाविरूप किया, उस कन्याणन्ति सम्पादनको नमस्कार है। नितियोगमें ससमागमको गति रसना पोम्य है। ७६५ मोहमपी, भाषण मुदा १५ सोम १९५० १ मोधमार्गप्रकार प्रपके विचारनेके बाद वर्मप्रप विचारनेसे मनु परेगा। २ गम्र सम्प्रदायमें दम्पममको बाठ पासीका मातामर सम्प्रदापमें उस बातकी विशेष पर्श नही। योगशासमें उसके अनेक प्रसंगहै। समागममे उसका सहम जानना उगम हो सकता है। ७६६ कविठा, भाषण प १२ शनि १९५१ ॐनमः तुमने अपनी पि हा समागममें मानेके सबमें प्रगट की, उसमें तु, अंतराप पैसा हमा स्पोंकि इस पत्र पपने पहिले होगोंमे पप्पणम प्रारंभ मा समझा जायगा । इस कारण तुम पर इस मोर मामी को गुण-गुणचार किये बिना ही मतादी लोग निदा करेंगे, और उस निमितको प्रण कर, ये गलसे गोगोंपने उम निम्दाARI परमार्पको प्रामि होने ताप उत्पा करेंगे। इस कारण जिससे पैसा न हो उसके छिपे, , हारमें तो पपनमें बाहर म निकसमेसंग्मी होरपतिकी दो रक्षा करना चाहिये। राम्पराना भान पनीबीसी, मारमारोप भारि पुस्तकों शिवमा बाँधमा रिचारना बन, उतना माविका प्रम टेमा । प्रमा' और छोक्परतिमें ही पासको सपा पा गुमा देना या मुमधुनी नभन मही। (२) (१) मयुर बम्पाप नही करते । सगुप प िपाप करें ता इस गल्में बरसात शिमो पिपगी। मर्प सिके ये प्रायशित दगा पापु किसके लिये ग्रेगा। (२)बामा फैमा गर्ग यामुहै। बता रहती है-सेवामा - शरीर मी साना । बामा पारे समान है। चेतन निकल जाता है और शरीर मुर्न तारपार पाने उगता है! (१) नापति बार पुराना पहिये । हर्मल पानेक बार उसमेंगे ( सवाम-गरप शनेमा...---- पत्र .५५,७१.] विविध पत्र मावि सपा-३१वों वर्ष ७.७ । - (0) पुण्य पाप गौर नाम ये एक दूसरेको नहीं दिये जा सकते । उन्हें हरेक अपने वाप ही मोगता है। (५) सदसे, अपनी मतिकी कापनासे वौर समुस्की मात्राके विना प्यान करना तरंग स्म, वौर उपदेश म्पारपान करना नमिमानरूप है। (१) देहधारी मारमा पपिक है, और देश है। इस देहरूपी पक्ष (सके नीचे) जीवस्मा पथिक-पस्तागिर-पिमान्ति सेने बैठा है। वह पथिक यदि हमको ही अपना मानने लगे तो यह कैसे बम सकता है। (७) संदरविणास संदर-श्रेष्ठ-प्रय है। उसमें वहाँ कही कमी-मूह उसे हम मानते है। उस कमीको दूसरेको समझाना मुश्किल है। उपदेशके म्पि या प ठपकारी है। (८) यम दर्शनोंके उपर पन्त - भिम मिम वैपोंकी दुकान कमी है। उनमें एक वैप सम्पूर्ण सपा है और यह सब रोगोंको उनके कारणों को गौर ठमके दूर करने के उपार्योको चामता है। तया उसका निदान चिकित्सा सवी होनेसे रोगीका रोग निर्मल हो जाता है। वैच कमाता मी बाहै। यह देखकर इसर पोच कुपैच मी अपनी अपनी दुकान सोरते है। परन्तु मतिक उनके पास सबै पके घरकी दवा होती है, गाँतक तो ये रोगीका रोग दूर करते हैं; चौर गावे वपनी अन्य किसी कम्पनासे अपने घरको दगा देते है, तो उससे उम्टा रोग बह चाता है । तपा ने सस्ती दवा देते हैं, इससे मेमके मारे छोग उसे नेके लिये शुत मचाते है, परन्तु उससे उने उम्टा नुकसान ही होता है। इसका उपनय पाई कि सपा पैक चौतरम्गदर्शन है। मो सम्पूर्ण सत्यप्तरूपमा मोडरिषय बारिको राग-रेपको भौर रिसा भाविको सम्पूर्णरुमसे दूर करनेके मिये करतारे जो बात पराधीन रोगांको महगी पाती है वो नहीं पाती । तपा नो मय पोच पुष है, से कुदर्शन है। माँतक पातरगके परकी बातें करते है, हातक तो उनको रोग दूर करनेकी बात ठीक है, परत साप साप से गो सा भादि धर्मक माने, मोहको संसार-दिको वौर मिप्पालकी बातें करते है, पर उनकी अपनी निजी कम्पनाकी ही बात है। और यह संसाररूप रोग दूर करमेके बदरे उसको पनिका ही कारण होता है। लिपपमें रचे-पचे पामर ससाराको मोहको बातें मीठी गती है-सस्ती पाती है इसरिये या कुनैपकी तरफ भाकर्षित होता है, परन्तु परिणाममें या अधिक ही रोगी परवा। पोखरागदर्शन शिबपके समान है- रोगीको दूर करता है, निरोगीको रोग होने के लिये दवा देता नही, मोर मारोग्यकी पुष्टि करता है। वर्षात् पर मौवका सम्पर्शनसे मिप्याप दूर करता है, सम्यगानसे गोषको रोगका मोग होनेसे बचाता है, गौर सम्पचारित्रसे सम्पूर्ण शुद्ध तमाम भारोम्पको पुति करता है। ७६७ क्सो (गुगरात), प्रयम बाब पुदी सुप १९५४ १ मीमत् गीतराग मारतोंका निचित किया हुवा वपिनप चिन्तामणिस्वरूम परम हित- AURY मीमद् पसचन्द्र ७५९ बबाणीमा स्पेष्ठ १९५० १दोसे मिन स्वपप्रकाशक परम म्पोतिस्वस्म ऐसौ स बाहमा निमम रोगो । हेमार्परनो ! वतर्मुस होकर, स्थिर होकर, उस पात्मामें हो यो, तो वनंत पर मानना अनुमब करोगे। २ सर्व गत्के बाल कुछ नए पाकर पुस पानेको होइन करते है। ममान् पार पता रामा मी मातेर मन मोर परिमाके सकम्पमें प्रयानगोड गते है और ये उसके प्राप्त कर मेमे हो मुस समानते हैं। परन्तु वो शानियोंने तो उससे निपीत हो पुसका मार्ग निर्णय किया है कि विचित् मात्र मी मरण करना यही पुसका नारा है। ३ विषपसे मिसको इन्द्रियों ना है, उसे शीतस वाम्मुस मालमत्त मा सकता है। १ परमधर्मस्म चन्द्र के प्रति ण से परिमासे अब मैं विरक्ति केनेकी होम करता है। हमें परिणाम क्या करना हमें उसका कुछ भी प्रयोयम नहीं। ५ यो समोर शुदिहाँ सोकर सिदिहै'- वार्यरनो! तुम इस परम बाम्पका बारमरूपसे वनुमन कये। कासि प्रतिम ७६० बवाणीमा म्पेष्ठ मुरा १ शनि १९५५ १ सर्व इम्पसे, सर्व क्षेत्रसे, सर्व कापसे गौर समापसे गो सर्व प्रकारसे वप्रतिक्र होकर निमत्तलपमें स्थित हो गये उन परम पुरुषों नमस्कार हो । २ रिसे पुछ प्रिप मही, मिसे कुछ अमिप नहीं, जिसका कोई नु नहीं; मिसन को मित्र नहीं निसने मान, अपमान, गम बलाम, ल शकि, बग्म, मत्यु भादिके पाबमान पर, मुर न्यस्तरपमें रिपति पाई है पायो वीर पायेगा उसपन मति र परम भागदसमित भरपर्प उत्पन करता है। ३के पति पैसा पसका संबध, जैसा ही मामाके प्रति बिसने के सर्वपको पातप्प गा से म्यानके प्रति तपारघ सबर है वैसा ही के प्रति रिसमे मामा के संबंधको रेप है तथा जिसने भारपाको बबर-सर-मनुमान किया है उन महान पुरुषों को जान और मरण नो समान है। ५ मो मरिमप दम्प गुरमितिसमए पति, परम प्रगट होकर उसे बक्षिस्य करती है, गरिनप इप्प सदर सामारिक निरसन ऐसा मधप निम परम स्पा सपुराने प्राशित किया उसका अपार उपरार है। ५. पम् भूमिका प्रकारा करता है-उस किरणोंगो कति प्रभारसं समस्त भूमि क्षेत aut, परन्तु पर भी मौ भूमिप नही होता। इसी तर समस्त जिसका प्रकाशक भामा सभा भी लिए ही हानी सु-स-नयम ही रहती है। और गे भन्दु मानतापरी पान्ति है। - पर ०५१ ०६२, ०५१] विविध पत्र मावि सपा -१याँ वर्ष २२५ ६ निस तय नाकारा पिसका प्रषेश मही-वाकाश स मानोंकी वासनासे रहिस ही, उसी तय सम्पमरि पुरुपोंने, सई द्रोसे मिम, सर्व अन्य पर्यायोंसे रहित हो वामाको प्रत्यक्ष देखी विसकी उत्पति पम्प किसी भी प्रन्यसे नहीं होती, उस बामाका नाश मी कहाँस हो पिको मात कर, ८ वाानसे दौर निवस्वरूपके प्रति प्रमावसे, भारमाको केरठ मम्युकी भांति ही है। उस मान्तिको निहत्त कर, शुद्ध चैतन्य निबन्नुमक प्रमाणस्वरूपमें परम बापत होकर, शानी सा ही निर्मप पता है। इसी सहपके पक्षसे सब चानाक प्रसि साम्पमात्र उत्पन होता है, वौर म परदम्यासे मास्मा शारहित समाधिको पाता है ९ परमसुखस्वरूप, परमोराए शांत, अरपतन्यस्वरूप समाधिको निसमे सर्व काठके लिये प्रास किया, उन मगवान्को नमस्कार हो! उस पदमें निरंतर पक्षरुप जिनका प्रवाह, उन सापुस्पोको नमस्कार हो। १० सम्से सब प्रकारसे मैं मिम, में एक के शुद्धतम्यस्वरूप, परमोता अभिस्यमुस- साप, मात्र एकांत पुरखनुभवरूप हैं। फिर हो विश्वेप क्या ! बिकम्प स्पा ! मप क्या है कपा ! इसरी नमस्या क्या ! मैं शुद्ध पुर प्राए पुर परमशान्त मैन्य , में मात्र निर्विकल्प है। निमसरसमय उपयोग करता तन्मय होता शिति शांति शांति । ७६१ पबामीमा ग्पेष्ठ पुरी ६ गुरु १९५१ महान् गुणनिष्ठ स्थविर मा भीईगर म्येष्ठ पुती ३ सोमबारको रात्रिको नौ बजे समाधिसहित दो-मुख हो गये। ७६२ बमाई ग्पेष्ठ वदी १ दुध १०५१ ॐनम जिससे मनको ति पुर भौर स्थिर हो, ऐसे सासमागमका प्राप्त होना बहुत दुर्गम । तथा उसमें मी या दुपमाठ होनेसे गोषको उसका विशेष मतपय है। विस जोषको प्रत्पप ससमागमका विशेष लाभ प्राप्त हो १५ मइत्पुण्यवान ।। ससमागमके वियोगमें साशामका सापारपूर्वक परिचय माप करना चाहिये। ७६३ बर्मा, म्पष्ठ बी ११ शनि १९५९ नमो वीतरागाप मुनियोंके समागममें अनापर्यत हण करनेके सर्वपमें पयामुग प्रति फरमा, प्रविसंघ मही। मुनियोंघे निस्मरण पारे।
४२५ भीमद् पचन [पा.१४ १५ १६ ७६४ बम्बई, बापात पदरी ११ गुरु १९५१ बनत बतराप होनेपर मी पौर यकर बिस पुरणने पार मोबासको पार किया, उन की- मग को नमस्कार ! नंतकाम्मे चोहान संसारका हेतु होता था, उस बानको एक समयमा मात्र करो, जिसने उसे भवनिालिस किया, उस कपाणमूर्ति सम्यग्दर्शनको नमस्कार है। निरपियोग सहसमागमको चि रखना पोम्प है। ७६५ मोहमपी, भाषण मरी १५ सोम १९५४ १ मोक्षमार्गप्रका पके विचारमेके बाद कर्मप्रप विचारनेसे अनुक्स पोगा । २ दिगम्बर सम्प्रदायमें बम्पमनको वाठ पासीका का है। वेताम्बर सम्प्रदायमें उस बातकी विशेष पर्चा नहीं की। योगसाममें उसके भनेक प्रसग । समागममें उसका सस्म जानना मगम सकता। ७६६ काविन, प्राण बल १२ शनि १९५१ ॐनमः तुमने अपनी पि शाळमें समागम, बामे सबमें प्रगट की उसमें गई ताप वैसा इमा स्पोकि इस पत्रके पचिनेके पहिले हो गोमें पऍषण प्रारम इमा समझा गापगा । इस कारण दम पदि इस मोर भागो, वो गुण-अवगुणका विचार किये बिना ही मतामही ग निदा करेंगे, और उस निमिचको प्राण कर वे गवसे गानों को उस निन्दाबारा परमार्थको प्राप्ति होनमें वयम उत्पा करेंगे। इस कारण निससे पैसा न हो उसके लिये, तु, हामें तो पर्युषणमें बाहर न निकलनेसभी गेकपतिकी हो पा करमा चाहिये । पैगम्पशतक, वानरपानीबासी, भानाबोध वादि पुस्तकों मितना बाँचना विचारला बने, उतना निधिका बम सेना । प्रमाद और गेमतिमें हो काको नपा पा गुभा देना या मुमुक्षु बीपका व्यण नाही। (२) (१)म्पप गपाप ना करो। सपुस्प पदि पाप करें तो इस जगदमें परसार सिमो डिसे पगी ! सूर्य किसके लिये प्रमाणित होगा ! पास सरे किसे योगी ! (२)बामा केसी सर्व वस्तु है ! बबतक पर पती-महोपा बारों मर्प ऐ-तबतक वापर नही साता । वामा पारेके समान है।पेतन मिल पाता है और शार मुर्श रोगावा है और बरसाने ध्यता है। (१) नागमें भापति और पुस्पार्प चाहिये । पामे मा उसमेंसे ( सामेसे-उदप मानेरे परिटे) एना हो तो ममानामा पूर्ण होनेतक एय मा समता है। ।
पर.१५,...] विधिप पत्र मादि संप्रह-ौ पर्प (१) पुष्प पाप मौर मासु ये एक दूसरेको महाँ दिये गा सकते । उने हरेक अपने पाप ही भोगता है। (५) स्वच्छदसे, अपमी मतिकी कल्पनासे वीर सहरको बाबाके बिना म्यान करना परग- रूप, वौर उपदेश म्यान्मान करमा अभिमामरूप है। (६) दोधारी मारमा पथिक है, और दो पक्ष | इस देहरूपी इसमें (एसके नारे) गौतहमा पपिक-पस्तागिर-मिश्रान्ति मेने बैठा है। यह पथिक यदि इसको ही अपना मानने गे वो यह कैसे बम सकता है। (७) मुदरविणस मुदर-श्रेष्ठ-अप है। उसमें गाँ कही कमी-मू+ उसे हम मानते है। उस कमीको दूसरेको समझाना मुश्किल है। उपदेशके पि यह मय उपकारी है। (८) म दर्शनों के उपर प्रान्त -प भिन मिम बैचोंकी दुकाम गौ है। उनमें एक *प सम्पूर्ण सबा है, भौर पर सब रोगोंको, उनके कारणोंको और उनके दूर करनेके उपायोंको मानता है। तपा उसकी निदान चिकित्सा सबी होनेसे ऐगाका रोग निम्स हो पाता है। रेप कमाता मी बठा है। या देखकर दूसर पोष कुच मी अपनी वपनी दुकान सोन्ते है। परन्तु नातक उनके पास सपे वैपके परको दबा होती है, यहाँतक तो रे रोगीका रोग दूर करते हैं, और चव ने अपनी जन्य किसी कम्पमासे अपने घरकी दवा देते हैं, तो उससे उम्टा रोग या जाता है। तथा ये सस्ती दवा देते हैं, इससे गोमके मारे छोग उसे मेनेके लिये बात पहचाते , परन्तु उससे उमें उन्टा नुकसान ही होता है। इसका उपनप या है कि सबा पैप बौवण्गदर्शन है, जो सम्पूर्ण सरपस्सप है। वह मोहतिपय बादिको राग-रेपको और हिंसा नाशिको सम्पूर्णम्पसे दूर करनेके लिये करता है, वो बात पराशन रोगीको महगी पाती है-बी नही माती । तथा नो पम्प पॉप अप है, ये पुदर्शन है। महातक बीतरागके परकी बातें करते है, दाँतक तो उनको रोग र करनेकी बात ठीक है, परन्तु पाप साप ये नो हिंसा वादि वर्मक यहाने, मोहका ससार-सादिकी और मिप्यालको बातें करते हैं, पर उनकी वफ्नी निमी काफ्नाकी हो पात है और यह समारम्प रोग दूर करनेके मदमे उसकी मिका ही कारण होती है। विषयमें रखे-पचे पामर ससाएका मोरकी बातें मी प्रगती है--सस्ती पाती है। इसलिये । औपकी तरफ बाकर्षित होता है। परम्त परिणाममें वर बभिक ही रोगी पाता। वीतरागदर्शन विपके समान है या रोगीको र परता, निरोगी रोग होनेके लिये दमा देवा नहीं, और बारोम्पको पुरि करता है। वर्षात् पर गौरका सम्पार्शमसे मिप्पाच दूर करता है, सम्पगानसे जीवको रोगका भोग होनेसे बचाता है, और सम्पचारित्रसे सम्पूर्ण पुर पेमारप भारोपकी पुएि करता है। ७६७ पसो (पुरात) प्रपम भासार पुष १९५४ १ भीमत् पीता माताका निषित किया हुमा भचिन्त्य पिताममिस्तनप, परम रित- ૨૮ भीमरावत [...८ कारी, परम भात, सर्व सोका नि:सशप पायतिक आप परमेवाम, परम अमृतपस्म ऐसा सः- तर शामत धर्म नयर्यत पों, निकाह बयबत हैं। २ टन श्रीमत् बनत चतुण्यस्पित मगतका और उस नपर्वत धर्मध माभप सदैव करना चाहिये। मि सरी कोई सामर्प मही, ऐसे बनुष वीर मराठ ममुर्पोने मी उस बामपके यम्से परम मुसकेतु मत फको पापा , पाते हैं और पागे । इसलिये उसका थप और बाप बाप ही करमा चाहिये, वपारमसे बेद नहीं करना चाहिये। १ चितमें देर नादि मपत्र निक्षेप मी करमा उचित मही। नो पुरूष देहादि सर्वधीहर्ष-विपार मही करते, वे पुस पूर्ण शशांगको सभेपमें समझे है-ऐसा समझो । पाही रशिकम्प है। 'मैंने पम पापा नहीं, मैं धर्म कैसे पाउँगा !' इत्यादि सेवन करते हुए, पोतरामा- पुरुपोंका धर्म देहा िसंबपी हर्ष-विपाद तिको बकर मामा बसग पुरक पखरूप है' ऐसी को ति सच निधप और मामप प्राण रूप, ससी बातिन या रसना और रण म पनि होती रोहा भातगपुस्योंकी दक्षाका स्मरण करना, और उस बहुत चरित्रपर रधि प्रेरित कर छिको अप्रमच करना, या सुगम और सोकर उपकारक तपा कम्पाणारूप है। निम्पि १ ७६८ भीषसो मासोग मुरी ७ १९५१ ७-१२-५० १२-११-२२ इस वयाम्पतीत होने देना पौम्प नदी । प्रत्येक समय पास्मोपपोगको उपकारी कर निविदोने देना उचित है। बहो इस देहको रचना ! मान! हो उसकी सामर्थ ! महो बानी। भो उसी गषेपणा! दो उमका मान ! महो तम समाधि। यो उमय स्पम! वो उनका ममत माल! वो ठमको परम जागृति ! मो उनका पीतरगस्लमाष! यो उनका मिरारण जान बहो उनके योगको शति। वो बचन बादि योगच उत्प। है मारमन् ! यह सब तो सुप्रतीत हो गया फिर वामतमान क्यों! मद प्रयत्न क्यों । माप मर जागृतिस्पों! शिपिसता पों। घायर स्पों ! वतपय व पा' अप्रमच हो, अप्रमत्त हो। परम यरत स्वमारको मा परम शामत समानको मा। --१९५४ मर्ग का दिन पाँमा मोर ५४ा नाम-भाग मुरी • १९५४| सच-११-१२ वर्ष मात्र १मा मात और १५ रिल-मई माहोम 0 •पर १९५४ लश्रम या मौत २१ मिने। -ममुपए .५९,..] पिपिच परमादि मप्रह-पो थप ७६९ तीन राम्प, परम जाम, बाधाम्पतर त्याग याहारका जप वासनका जय निद्राका चय पोगका चप बारमपरिमपिरति, प्रसवपके प्रति निवास एकस्वास वरंगयोग सम्पप्यान वारमा बारमोपयोग म्ह भारमोपयोग अप्रमत्त उपयोग कण्ठ उपयोग केबस मारमा बचिस्प सिदस्वरूप *७७० बिनभितम्पप्रतिमा सर्वांगसंपम एकांतस्पिरसंयम एकतारसपम केपट बाघमावनिरपेक्षता भारमतत्वविचार. गवतत्वविचार मिनदर्शनतत्वविचार यदर्शनवलविचार समाधान धर्मसुगमता मेकानुपम परति पपास्थित पुर सनातन सर्वोस्कर नयक्त धमका उदय पति उमापन " -सोम्नाका ठोस यह मालूम होता है एकातररयम, एमममम" और "प्रामानिराला" पूर्वक सागठबम प्राप्त कर उसके व्य नितम्बावमास्प" रोकर, भवान् भरोड भामाश्रय पाप, मले गौकिकम्पब ने मर्यत् मामले पुनार से प्रतिपरना पणीमा दि"मोर एममारे उनमें प्रपम पिमा। पने सच मा म्या बम्परिपतएव उनाउन सोकर पक्व वर्मन उप प्रना पर। उसे पारित करना चाहिये ! इसके चरम मा गवा लिमको बम मुममता और सानुम्म भी हो"बाद इस पि और पसिना परिवाम मा रो! इसके समाधान माना 10 बारमालविचार, समानत्तपिचा, निरन वाचविचार मोर ममानवताविचार" जाये का मापानना। मा... (मीचे)मा म्या: पण्या कामकारबति ए मी प्रथम सम्पन्नमषिमा दो वनिप्रतिमा रो"- मारते मी या बात नाकानी। को यस कारण भीमन् सम्बकी गुती मारपिक मणेषा भीममालाई पनी मेहतार गोगमापार वामपा। १२ 10 भीमद् रामचन्द्र [.१.२.my सपर परमोपकारक परमार्यमप सस्पर्म अपर्वत पर्चा वामपनमक मेव पर गये हैं। पित है। सम्पूर्ण करने के साषम कठिन मास्म होते है। उस प्रमाण मान् तरप है। देश-काम वादि पर प्रवि। गातो मत प्रतिक हो गया है। समास भो मेग उसे मानते , उनके में भी यह प्रतीत माम नहीं पा सपा के न्पमतको ही बातरागोका मत समझकर प्राति करते हैं। यपार्य पातरकि मत समझने उनमें पोम्पवाको पाव कमी है। पिरागका प्रयास राज्य सिपमान है। वेप बादि म्पपहार की लिसम्बना पर बीच मोक्षमार्गका तप कर बैठा है। तुप पामर पुरुष विरामक पिके यात मप्रमाग गते । मित् सप बाहर माते हुए मी उमें प्रापोंके घात होने के समान दुस माम होता है, ऐसा दिखाई देता है। ७७२ फिर म किसधिये उस धर्मच उबार करना चाहते हो! परम पाराम समापसे उस समर्मक प्रति परम मालिसे ७७३ पराममा परमारम्पत्ति करते हुए मी मपम पैतन्पमिनमविमा हो, पवन्पमिनमविमा हो क्या कैसा हो। उसमें मिकिप हो। पा सा क्षेत्र योग है। सोचका । पपासा पराक्रमाप्रमच शूरवीर बन । क्या उतमा वायुमारे क्या क्या करें। मन्तर्मुस उपपोग करके देस । शनि शांति शांति ७७४ रे कामो मानसगउदय ! हे पचमणामो मोरया!
six, ..., 14, 6. पिपिप पत्र मावि संप्रा-वों पर्प ७३१ हे शिपिछता! तुम क्यों बतराय करा हो। परम अनुपा कर बन वनुकूल हो! मनु हो! ७७५ हे सोहा मुसके तमूत सम्यम्दर्शन ! तुझे वापत महिसे ममस्कार हो। इस कनादि अनंत ससारमें बनसानत नाम रे भाभय बिना मनतानत दुमका अनुभव करते हैं। तेरे परम मनुप्रासे निजस्वरूपमें रुचि होकर, परम वीसरग समायके प्रति परम निषय हुमा, स्तरस्य होनेका मार्ग प्रण हुआ। हे मिनातवग ! तुम क्स्पत भक्तिसे नमस्कार करता हूँ। तुमने इस पामरके प्रति बनतानत उपकार किया है। फुटकुद मादि वाचार्यों ! म्हारे पचन भी निजस्वरुपकी सोय करमेमें इस पामरको परम उपकाराए, इसठिय मैं तुमें अतिशप मलिसे नमस्कार करता है। हे ग्रासोमाग | मेरे ससमागमके अनुपासे वामदशाका स्मरण एषा, इसलिये मैं तुझे नम- स्कार करता हूँ। विसतय भगवान् गिनने पदापोका सल्म निरूपण किपा है, उसी तय सब पापोंका सस्प है। मगवान् निनके उपदेश किये हुए नास्माके समाधिमार्गको नौगुरुके नमुमासे जानकर, उसकी परम प्रयानसे उपासना करो । ७७७ मीवसो, मासोम १९५९ याणांगसूत्रमें नीचे बताया इमा सूत्र क्या उपकार होने के लिये सिसा है, उसका मबार करो। *एगे समणे भगवं महागीरे इमीसणे (इमीए) मोसप्पीणीए परमीसाए विस्पपराणं परिम तिस्पयरे सिबे पुदे मचे परिनिम्मुरे (माव) सम्पदुसपहीणे । (२) कार कराक! इस बासर्पिणी पासमें चौबीस ताफर र । उममें बन्तिम तीर्यकर प्रमण मगपानमहापौर दीक्षित मी मकेसे ए ! उन्होंने सिदि मी सकेसे हो पाई । परन्तु उनका भी प्रपम उपदेश निपस गया! समान अपमानम्मान एकापस माया पास्मे पोलान मे मन्तिम तीर, मिरर मुवा प्रनित भर उनके मान परिवार मे..
भीमर समय उपायसहित समस्त पदोको, मोसमात मीनको, तया गीत बनी वादि सम पलों स्वीकार किया है। मोक्ष की सपथा रापता है। क्या पंच बरके शरण मात्र, पुण्य-पाप कर्म, और बनाम निस्य अविनाशी मारमाकीमोक्षकी, मोषके मार्गकी, संपरा, निवौर पके कारणोंक दूर करनेहप उपापच अपेक्षा रखता है। किसने मार्ग देसा पाना और अनुमय किया है, या नेता हो सकता है। वर्षात् 'मोसमार्गका मेता' पर उसे परिमाप्त ऐसे सर्वत्र सर्वशी बातमणको साधार किया है। इस तर मोक्षमार्गक नेता ' इस विशेषणसे गौर बाल बादि म तलम व्रम्प, वाहमा वस्तिस्य वादि स पर, और मुक्त पारमाको सकरपा गया है। मोक्षमार्गक उपरेश करनेका उस मार्ग से गाने कार्य देहपारी साकार मुक्त पुष होकर सकता है, परीत महार बात नहीं कर सकता। पर कारतर या पित किया है कि मामा स्प परमात्मा हो सकती है मुछ हो सकती है। तया इसस यह सूचित किया है कि ऐसे दावारी मुख पुरुप हो बोध कर सकते हैं इससे दाहित वपीरपेय बोरघ निपेश किया गया है। कर्मवपी पतके मेश्न करमेनाम 'छार पर सूषित किया कि कप पतक मेइम करनेसे मोश होता है। वर्षात् गोलने कर्ममय पर्वतोंका समर्म य देहपारूपसे मेदन किया और उससे पर पारमुक्त होकर मोक्षमार्गका नेता-मोक्षमार्गका बतानेबालारामा । इससे पा पित किया है कि पार गर देह धारण करनेका बम-मरणरूप संसारका कारण यो धर्म है, उसके समूह मशन करनेसे--माश करनेसे–चीनको किर देगा मारण करना नहीं पता । इससे पर बवापा कि मुफ पात्मा शिरसे भतार मही शेती। निषततका हाता -समस्त ब्रम्पपप्पामा मेकाडोकका विका–पाननेवाग-- कार, मुळ वात्मका बबालपर मायकपना बताया है। इससे पह एपित किया है कि मुछ बाहम्म सामरूप है। यो इन गुमासे सहित है, ससे उन गुणोंकी मासिके लिये मैं मन करता '-पा का कर प सचित किया कि परम बाप्त मोक्षमार्गक किसे निवास करने पोग्य वंदन करने योग्य, मलि फरमे योम्प तपा बिसको बाधापूर्वक चम्नेसे न सराप मोक्ष प्राप्त होती है उनको प्रगटए गुणोंकी प्राप्ति होती है गुण प्रगट होवे हैं-ऐसा बो कोई मौत में उसे बदम करता है। इससे या सुपित किपा कि उक्त गुमाँस सहित मुख परम वास करमचे योप है --उन बापामा का मोक्षमार्ग । मोर सनकी मजिसे प्रेक्षकी प्राप्ति होती है तथा उनकी बाधापूर्वक बनेपाले मपिमानको उनको गो गुण प्रगट एके गुण प्रगट होते हैं। गरे मार्गकी उपासना करनी चाहिये। ७८० वनक्षेत्र उत्तरहराम बासोगनदी९पि१९५१ ॐ ममा मो मिणरिसापग्मा, पिची साइम देसिपा। मोफ्ससारमोग्स्स, साहस्स पारणा n .८१,१] विरिप पर मादि संप्रह-पौ पर्व --भगवान् गिनने मुनियोंको बारचर्यकारक निप्पापति (बाहारण)का उपोश किया है। ( मी किसलिये ।) केवल मोक्षसाधनके ठिये-मुनिको बो देशको मालश्यकता है उसके धारण करने के लिये, (दूसरे मप किसी मी हेतुस उसका उपस नहीं किया )। मही णिर्ष कम्म, सपनिमादि मम्मि । भाप सज्जासमा विची, एगम प मोपणं ॥ -सर्व बिन भगवंताने मारपर्यकारक (बहुत उपकारमूत) तपकर्मको निस्य हाँ करनेके रिपे उपदेश किया है । ( इस वय कि) संपमके रक्षण के लिये सम्पापिसे एक समय महार लेना चाहिये। -दशकारिकसूत्र प्रयारूप मसंग निर्मपपदके बम्मासको सतत बहावे यना । प्रश्नम्पारण दधकारिक और भारमानुशासनको हासमें सम्पूर्ण पक्ष रसकर विचार करना। एक शाबको सम्पूर्ण बॉब नेपर इम्प विधारना। ७८१ बनक्षेत्र, लिबासोब म १, १९५१ ॐनमा सर्व निकम्पोका, वर्कका स्पाग करके ममका कायाका जप करके इनिपका वापारका निद्राका निर्षिक परपसे वंतर्मुखचि करके बामम्यान करना चाहिये । मात्र मिरामाप अनुमवस्वरूपमें छीनता होने देना चाहिये। दूसरी कोई चितनाम करना चाहिये। चो चोकवादि उठे, उनै पर्म कातक न करते हुए शान्त कर देना चाहिये । ७८२ बाम्पतर मान वायूत, बिसीबत, बिनकम्पारत, सन परमार और मापसे म्पा, निगस्तमात्र मानसहित, नरपतबद्, विदेहरित, मिनरम्पारद विरत हुए पुरुष मगनाम् सरूपका पान करते है।
७३२ भीमद् प्रपत्र .०८ ७७८ १ बो सर्व पासमात्र पर करे यह म्यासी । नो इद्रियोंको पशमें रस्से पोसई । गा संसारसे पार पर यति (पति)। २ समकिता को बाठ मदों से एक मी म नहीं होता। ३ (१) वविनय (२)फर (२) वर्धदग्धता-अपने शान न होनेपर भी अप- मेको पानी मान बैठना, और (१) रससम्पवान पारसे से एक मा दोष हो, उस गानको समक्ति मह ऐता, ऐसा माठाणगसूत्रों का है। ० मुनिको यदि म्यान्मान करना परवाणे, तो ऐसा मात्र रम्फर म्यान्मान करना चाहिप कि सर्य समाप स्वाप्पाप ) करता है। मुनिको समेरे सन्मापको बाबा र मनमें की पाती है। उसके बदले म्याम्यानरूप सापको, ॐ सरसे मान, पूना, सत्कार, बाहार माविकी अपेक्षा बिना, केस निकामधिसे बामापक ये ही करनी चाहिये । ५ कोष वादि कनापका पब उदप हो, तब उसके सामने होकर उसे बताना चाहिये कि दो मुझे समादिकास हैरान किया है। मैं इस तण व्यपान चल्ने दूंगा । देस, में बन तेरेसे पुर करने बैठा। ९ निदा नावि प्राति और फोन बाहि बनादि के प्रति मत्रियमासे गना चाहिये, सनका अपमान करमा चाहिये । यरिने फिर मी न मानें, तो उमें पूर होकर उपयंत करना चाहिये । पदि फिर भी ये म मानें, तो उन्हें सपालमें ( उपयोगमें ) रसर, समय पानेपर उन पर राना चाहिये । इस तण पूर परिपस्वमासे पना चाहिये पिस्से पैरीका परामय होकर समाधि सुख प्राप्त हो। 0 प्रमुभी पूगामें पुप पहा पाते हैं । उसमे मिस गृहस्पको हरियामा पिम मही बामपने कारणसे उनका उपयोग कम करके प्रमुको श बना सकता है। पानी मुनिको तो पुष्प चदाने मपला उसके उपदेशका सर्वपा निषेध है। ऐसा पूर्वाधापाका प्रबचन । ८ कोई सामान्य मुमुसु मर्दान साधन विषयमें पूछे तो उसे पे साधम बताने चाहिये - (१) सात म्पसमा स्पाग (१) सनादेश मा 'परमगुरुको (२)हरिपाका स्पाग पाँच पाँच मामलोंका जाप (१) करम्य स्पग (७) मठियस्पोराचा पठन-मनन (१) बमापका स्पाय (८)xक्षमापनाका पाठ (५) निमोपनका म (५) ससमागम मौर सधान सिन्तति ' युग्मति, मुक्ति परिणिमापति' और 'सम्पदुस्थानमा करेंति इन शौक यस्यका विचार करना चाहिये। सिमति बत् सिख है। उसके बादमें गुसंनि भात् मोबसवितानसहित-होते हैं। बहमारे सिर होनेके माद कोई उसकी . १४ ७७९] विषिष पत्र भादि समाह-पों पर्प शूम्प (पानीत ) दशा मामते है, उसका 'मुस्मति से मिषेध किया गया है। इस तर सिद और खुद होने के बाद ' मुबति ' अर्थात रे सर्पकमसे मत होते हैं, और उसके पश्चात् 'परिणिमा- पति ' वर्षात् में निर्माण पाते है-कर्मररित होमेस वे फिरसे बम्म-मरतार-पारण ना करते। मुक्त गाव कारणमिशेषसे भरतार धारण करता है'स मतका 'परिणिमासिकार निषेप किया है। कारण कि भनक कारणभूत कर्मसे दो सपा मुळ हो गया है, यह किरस मा धारण मही करता) पोंकि कारणके विना कार्य मही हाता | इस तय निर्माण-प्राप्त जीव ' सम्बदुक्साणर्मत करेंति'-वर्या सर्व सोका क्त करते हैं उनके हुसका नया वमान हो जाता है- साव सामाषिक पुस बानन्दका बनुमष करते है या करकर ' मुक्त बारमानोंको केबस ए-पता हो, मानम्द नहीं' इस मतका निषेध किया है। ७७९ + इणमेम निर्गय पारपर्ण सर्व मणुचरं फेनसिप परिपुष्णं संमद अयाज्यं सहा- वर्ण सिटिमर्ग मचिमम्न निमाणमग्गं निम्माणमर्ग अपितामसंदिर्द सम्पदुक्सप्पीणमर्म । एवं ठिपा जीपा सिम्झति पुति सपंति परिणिमावि सम्मपसाममय रेवि । वमा गाए बरा गम्छामी तहा घिद्वामी वा णिसीपामा वहा सुमामो परा मामोता मासामा वा अम्गहामी वा उडाए रहमाचि पाणार्ण भूपार्म जीपाण ससाणं समर्मणसममामाचि। (२) १ भवानतिमिराम्पानो सानोमनशसाकया । नेममुन्मीसिन पेन वस्मै भीगरसे नम ।। --बो बहामरूपी तिमिर (वकार ) से वंभरे, उनके मेत्रों को मिसने शानहपी मनको सईसे सोठा, उन भीसारुको नमस्कार हो । २ मोक्षमार्गस्प नैतार मैचारं कर्मस्मृताम् । पावार विनवस्पाना मंदे बहुगसम्पये ॥ --मोचमााकि मेवा ( मोश्चमार्ग सामेवा ), कर्मन्पी पर्वतके मेवा ( मेदनेवाले ) वीर समम तत्वक हाता ( जाननेमा ) को, मैं उम गुमोको प्राप्ति के लिये ममस्कार करता । यो । मोश्रमार्गके नेता ' कहकर, बारमाके अस्तित्वसे लगाकर उसके मोक्ष वार मोमो + मा निमपावन है भनुपर सम्मान, पूर्ण ! मत्व एमापन गरी पारने पर समान विमा मार्ग है किका मर्म है. भावगमनन एनेस म ममा मसरिय है और सर्व परि एक प्रोन मार्म है। इस मार्ग सिन और नि पाते ने मुनि पाते। मौरन एलोभ त म । मापी गरम में रीप उर्व कप खो हो । उठी पोटो । र्ष वय । सी वरा मेन उली तप यो । उटी रुप सावपापले प्राति से और उसी व्प उटपे । तया उत्त तय रोए तिले प्राण-स्व-र-पाधी रिंग न है। ऐत संगमका मापन -मनुसार ४ . भीमा परचम्द्र [ उपापसहित समस्त फोको, मोमप्राप्त गीतको, सपा मोर मोर वादि सब तलोको साकार किया है। मोक्ष की पपेठा रखता , सपा बर मपके कारण मात्र पुष्प-पाप कर्म, और पमेपास निस्प बानिमामा बारमाकी, मोशको मोशके मार्गकी सबरकी निराकी और बपके कमाके र करमेकप उपायको अपेक्षा रखता है। किसने मार्ग देसा गाना मीर बनुमा किया है, पर मेवा हो सकता है। अर्पात् ' मोसमार्गका मेवा' कर उसे परिमस ऐसे का सर्वशी गोवरगो समांकार किया है। इस पर मोक्षमार्गक नेता' इस मिशेपणसे गाव भील बार नव पत्तम इम्प, मामा बस्किम बादिप पर, मोर मुख मामाको स्वीकार मया गया है। मोशमाकि ठप करनेका उस माम मानेका कार्य पारी साकर मुळ पुरुष ही कर सकता है, दाखव निराकार गौर नीकर सकता । या प्रकर या सूचित किया है कि बामा सर्य परमात्मा हो सकती है-मुच हो सकती है। सपा इसस पर सुपित किया है कि ऐसे दोषारी मुळ पुरुप ही बोर कर सकते हैं, इससे हरदित पौरपेय पोषका पेप किया गया। 'कर्मरूपी पीतक मेग्न करनेग्रम' पर पा स्थित किया है कि कर्माप पतिक भेइम छमेसे मोव होता है। वर्षात् भागमे कर्मरूपी पोंका समर्प रा देहपारूपसे मेदन किया, बार उसस या गोन्मुक कर मोझमार्गका नेता-मोजमार्गका बतानेबामामा । इससे यह सूचित किया है कि बार बार देर पारण परनेच बम्म मरणास ससारका कारण मो कर्म, उसले समूह महन करनेसे—नाश करनसे-पीबको फिर देहका पारण ममा नहीं पता । इससे या रताय कि मुछ बामा फिरसे वरतर मही लेती । हिमतालका वाता'-मस्त इम्पपापात्मक होकागेक्का-विसापानमेषाला- करकर, मुख बाराक बता सपर अपकपना बताया है। इससे यह सूचित किया है कि मुक्त बामा - मा इन गुणोंसे सहित है, उसे उन गुणोंछ प्रासिक लिपे में मदन करता है'-परब कर सचित लिया. परम पाप्त मोक्षमार्मके लिये पास करने पोम्प दिन करने पोम्प, मफि करन पोम्प तथा बिसय बाबापूर्वक चम्नेसे निःसंशप मोस प्रास होती है उनको प्रगट ए गुणोंध प्राप्ति होती है गुण प्रगट होते हैं--ऐसा कोई मी ऐ, मैं उसे मग्न करवा । इसे या पूपित किया है कि उस गु से सरित मुछ परम बास पंदन के पोप हैजमचा बवापा पुमा प मोधमार्ग है, और उनकी मलिसे मोक्षको प्रति होती है, ता उन बाधाकि कमेपाठे मजिमानको उनको भी गुण प्रगा ये गुण प्रगट होते हैं। ३मक मार्गको उपासना करना चाहिये। ७८० बरन उत्तरराम बासोर१९५१ ॐ ममः मी निरिमापरमा, रिची साइम रेसिया। मोपमसारगोम परस्म भारणा ॥
.८२,...] विविध पम मादि संप्रापयाँ पर्प ७५ --भगवान् बिनने मुनियों को वारपर्यकारक निप्पापरचि (माहारमाण) का उपरेश किया है ( मी फिसलिये !) केवळ मोक्षसाधनके लिये मुनिको मो देशको वाश्यकता है उसके पारण करने के लिये, (सरे बन्य किसी भी उसे उसका उपदेश नहीं किया )। मो णि सो कम्म, सम्पमिण पण्मिय । माय सजासमा विची, एगमर्च व भोयर्ण ॥ सर्वपिन भगवाने मारपर्यकारक (अनुत उपकारमूत)वपकर्मको निस्य ही करने के लिये उपरेश किया है । (यह इस तब कि ) सपके रक्षण के लिये सम्पतिसे एक समय थाहार लेना चाहिये। -दशकालिकसूत्र उपाम्प बसग निर्मपपरके भम्पासको सतत बहाते बना । प्रत्तन्याकरण दशकालिक वीर भारमानुशासनको हाम्में सम्पूर्ण सम रसकर विचार करना । एक शामको सम्पूर्ण पाप नेपर सरा विचारमा। ७८१ बनक्षेत्र, वासोर पुस १, १९५९ ॐनमः सर्व विकापोंका, तर्कका त्याग करके मनका पचनका कायाका जय करके निकपतपसे वतर्मुसापि करके मामम्मान करना चाहिये। मात्र निरामा बनुमवस्वरूपमें सीनता होने देनी चाहिये। दूसरी कोई रितनान करना चाहिये। मो गोतवार ठठे, उन दोर्ष काश्तक म करते हुए शान्त कर देना चाहिये । ७८२ वाम्येतर मान माता पिदेहीपत, निनकम्पोचव, सर्व परमार और रिमापसे म्पारण, नियतमात्र मानसहित, भरपनाए, विदोलित, दिनकम्परित रचले पुष भगान् तरुपका प्यान करते है।
moteinwirny ७८८MARAT यो त पूरी गसीर होगा। muan main 2010 उस पर न किया जाना नम (मा Ranan A TET Rky HAMARinxnt marat TRETIRE -" NITINENTAMरे। अममा पोगपेरेता साहै। uuntali Ram Prasad, तमा नराम अनुमा समापित है। ७९० र १५ ग. ES हरपालिमाम मारण (१)सोम प्राण किए यमानुसार जाम को पाकर पोशाकरिता रामबना कर गेभीर पीको जिरेस इम करने मारा तिन महो। (२) परि रोका गया हो तो उस भापयित भी - मुनि मावि समीप पोप है। (1) मुमशनोको उम गुनियों के समीप मिपमारिका परम करमा चाहिये। मासिका AARNA I सग भीर मोह-पाशको साइना (बशप कठिन होते पर भी उसे वोगमा, क्योंकि दूसरा पाप गयी। माशंका-औ अपमेपर स्नेह रमता , उसके प्रति रेसीपूर तसे सर्पग परना या करानमा निर्भपता महो। मामा- ७९२ मोरली. पाप नदी र सोम (स) १९ कर्मको प्रति बा। सममें बार बाविकी और और बार पत्र .१५, १४] विविध पत्र भादि समह-३२याँ पर्प पर धातियोंका धर्म बारमाके गुणका पाठ करना है, अर्थात् उनका धर्म उठ गुणको वापरण करनेका, उस गुणके पठार्यको रोकनेका, भयमा उसे विकल कर देनेफा है; और इसठिये उस प्रह- विको पातिसबा दी। चो मारमाके गुण हान और दर्शनको बावरण करे, उसे अनुमसे धानावरणीय दर्शनावरणीय माम दिया है। मंसराय प्रकृति इस गुणका भाषरण नहीं करती, परन्तु वह उसके भोग उपमोग वादिको-- उसके गार्य-पठको-रोकता है । इस जगह अामा मोग निको समझती है, जानती-देखती है, इसलिम उस बावरण नहीं गता। परन्तु उसके समझते हुए भी, र प्रकृति माग बाPिमें मिन- बंतराय-करती है, इसचिप उस आवरण म कहकर भवराप प्राति कहा। इस तरह धामभाविको तीन प्रतियों हुई । घातिकी चौथी प्राति माइनीय है । यह प्रति बावरण नहीं करती, परन्तु बारमाको ममित कर-मोरित कर-उसे विफल कर देता है भान-दर्शन होनेपर मी-पतराय म होनपर मा-मामाको पा कमी मी निकल कर देती है, उस्ला पा बमा देती है, म्पाकुस कर देती है, इसलिये इसे मौहनीय का। इस तरह ये चारों सर्वपातिकी प्रकृतियों कही। दूसरी चार प्रवियों, यपि मारमाक प्रदशोंके साथ समय है, ने अपना काम किया करती है, और उदयानुसार बेदम की जाती है, क्यापि वे उस मारमाके गुणको आवरण करमेरुप, अपना अंतराप करनेरूप, मयमा उसे रिकस फरनेवप घातक महीं, इसलिये उन्हें अपाविको ही प्रति कहा है। ७९३ मोरबी, फागुन सुरी १ रवि १९५५ अनम (१) नाकेरूप निम्ता-इस परणका वर्ष पतिरागमुका भूपफ । । गपागोकर रिसे स्थिरता प्राप्त होने पर सहपाठकिन सिमें मी सुगमता होता है।दनमोहका बमुभाग पानेसे समपाक्सोकन पति होती है । मइयरुपोंका निरन्तर अपना विशेष समागम, पतिरागभुतचितान, वीर गुण-विज्ञासा, ये दर्शनमारके भनुमाग घटनेफ मुम्त्य हेतु है। उससे सम्पादि सपनमें tudies (२) गौत्र परि शिथिलता पाने का उपाय करे तो पर सुगम है। बीतरगतिका सम्पास ७९४ बवागामा, फागुन पदी १० दुध १.५५ भामार्थी बाप का फलीमन से सम्मा है, इस मार स्पिर वितसे रिपारना पाहिये, म ममुक असहातियोरा प्रपम समय ही निरोध करना चाहिये । इस निरोप रेखा एनामे अनुसरण करना चाहिये। उसमें प्रमार करना योग्य नही।
७३८ भीम परचम्म [.८८,(rs). (११) ११ ७८८ ईर, मगसिर कटी १५गुरुवार को सरे१९५५ ॐनमः नस्पतिसमभी स्पागमें, अमुक इससे पाँच वनस्पतियों की राय छन रसकर, बाकी सग बनस्पतियाँस रित होनेस बाबाका बतिकम नहीं। सदेव, सद्गुरू, सावको मति बममतदपसे उपासनाय । श्री ७८९ में प्रत्यक्ष निन अनुमत्रवरूपइसमें सशम ही स्पा । उस अनुभवों को पोषविषयक न्यूनाधिकता होती है, यह पदि दूर हो बाप तो फेल असंगर सानुभम स्पिति थे। अप्रमत्त उपयोग कैसा हो सकता है। अप्रमत्त उपयोग होनेके सुप्रतीत है। उस तप न किया नाता है, पर प्रमा सुप्रतीत है। बैसी वविवि पाये, वो मत मत बानसस्प वनुमन सुस्पर समपस्थित रहे। ७९० ईम पोप फुदी १५ गुरु १९५५ (१) सोमें प्राण किये हुए मिपमानुसार कोहरियाग विरतिमापसे बापरण करना चाहिये। दोनों पार करनेके नियमको शागरिक उपनियम के बिना हमेशा निगाहना चाहिये। गे और पाको शारिक खसे मरण करनेमें बाबाका वतिकम नहीं। (२) परि पुस दोष भा गया तो उसका प्रापपिच की मुनि वादि समाप मा - पोग्य है। (१) मुममुमोको उम मुनियों के समाप नियमादिका प्राम करना चाहिये । प्रापिके काम्पोंके प्रति मिति । सग और स्ना-पाशको तोड़ना (अतिशप कठिन होते हुए भी उसे दोग, क्योकि दूसरा को उपाप मा। माध-या अपनपर स्नेह रखता है, उसके प्रति एसी कर रिसे न करना, क्या सतमा नया नियता नही। समाधान:- ७९२ मोरयो माघ दो सप्रेम (रात) १९५५ कमको मूल प्रास्ता बाट। उनमें पर पातिको बौर और चार नमाविको को बचा है।
पत्र ०९१,७९४] पिविष पत्र भादि सपा-३२पौ वर्ष ७५९ - पार घातियोंका धर्म मारमाके गुणका घात करना है, अर्थात् ठमका धर्म उस गुणको बावरण करनेका, उस गुणके बमर्पिको रोकनेका, भपका उसे विकास कर देनेका र वौर इसलिये उस प्रा- सिको धातिसवा दी। गो भारमाके गुण वान और दर्शनका बावरण करे, उसे अनुकमसे हानावरणाप दर्शनावरणीय नाम दिया है। वंतराय प्राति इस गुणका बावरण नहीं करती, परम्तु वह उसके भोग उपभोग आगिको--- उसके वीर्य-वसको-रोकती है। इस जगा वरमा मोग बादिको समसती , मानती-देखती है, इसलिये उसे वापरण नहीं यता । परन्तु उसके समझते हुए भी, यह प्रति भोग आनिमें मत- अंतराय करती है, इसलिये उसे भावरण न कहकर भवराय प्रकृति का है। इस तर वामपातिकी तीन प्रातियों हुई । पाविकी चौपी प्राति मोहनाप है। यह प्रकृति पावरण नहीं करती, परन्तु बारमाको मषित कर-मोहित कर उसे विकस कर देती है बान-दर्शन होनेपर भी-भवराय न होमेपर मी-आस्माको यह कमी मौ विकस कर देता है, उन्ठा पा बा देतो, म्पास कर देती है, इसध्येि इसे मोहनीय छ। इस तरह पे चारों सर्वधाविका प्रावियों कही। दूसरी पार प्रहतियाँ, पापि बास्माके प्रयोके साप सक्र है, वपना काम किया करती है, और उदपानुसार मेदन की जाती है, तापि ये उस बारमाके गुणको बावरण करनेहप, बना बतराप करनेस्म, मपा उसे किस करनेसप घातक नही, इसलिये उम वनातिकी ही प्रावि का है। ७९३ मोरबी, फागुन सुदी १ रवि १९५५ नम (१) नाकेस निरानता-इस चरणका अप बीतयगमुधका सूचक है। सपापोकन रिसे स्थिरता प्राप्त होनेपर स्वहारावलोकन रिमें भी भुगमता होती है। दर्शनमोहका बनुमाग पटमेसे समालोकम रहता है। मारूपोंका निरन्तर वपका विशेष समागम, गीतरागभुतिन पौर गुण-विासा, ये दर्शनमाइके क्नुमाग पटनेके मुरूप हेतु है । उससे सम्पादि सहममें ही होती है। (२) बीच परि शिपिता पटाने का उपाप करे वो पर मुगम है। वीतरागपिका बम्पास रखना। ७९४ चाणामा, फागुन बी १०तुष १९५५ मारमायीको पोष का फलीभूत हो सकता है, इस माबो स्थिर चितसे विचारना चाहिये, पर मूबसस्म है। अमुक मातियों का प्रपम बनस्य ए निरोध करना चाहिये । इस निरोषके हेतुका पतासे अनुसरण करना चाहिये। उसमें प्रमा करना योम्प मही।
७० भीमद् सपन्द्र [पत्र ०१५ .९९ .९. - ७९५ बबागांमा फागुन वदी १५ १९५५ xचरमापर्च हो परमकरण वपा, मपरिगति परिपाक रे । दाप टने ने रष्टि सुखे मसी, पापवि प्रश्चनपाक रे ॥१॥ परिचय पाविकपातक साघुर्ग, भाषस भपचय घेव रे । ग्रंप ममावम भरम मनन करी, परिसीम्न नप देव रे॥२॥ सरप मुगम फरी सरन सलग, सपन मगम मनूप रे । देनी फवापिव सरक यापना, मानंदपनरसस्स रे ॥ ३ ॥ समपविम-स्तवन " -आगमन ७९६ माणाभा क्षेत्र सुदी १, १०५५ उपसंवस्तीममोहो, मग्गे निणमासिदम समुरगदो णापाणुममापारी, निमाणपुरं पजदि पीरो॥ निसका दशनमोर उपत भयमा मण हो गया है, ऐसा पीर पुरुष मौतयोंश प्रदर्शित मार्गको अंगीकार कर, शुद पैतन्पसमाव परिणामी होकर मोधपुरीको माता । ७९७ थामीमा म सुदरी ५, १९५५ सम्पानुपोग परम गमीर और सूक्ष्म , निच प्रवचमका यस्प है, और इम्प्पानका मनाप कारण है। पानसे केरणाम समुत्पर होता है। महामनपसे हो उस प्रम्पानुपोगकी प्राप्ति होती है। दाममोहका बमुभाग पटनेसे अपना नारा होनेसे विषयोंके प्रति उदासीनवासे, और महान् पुरुषाके परम-कमसको उपासनाक बसे दम्पानुपाग फल देता है। म्पों म्या सपम पर्वमान होता है, त्यो स्पो ट्रम्पानुयोग पपा फल देता है। सपमकी इपिका कारण सम्पदर्शनको मरता है। उसका कारण मी प्रम्पानुयोग होता है। सामाम्पम्पम इम्पानुपोगका पोम्पठा प्राप्त करना दुर्गम है। बारमाराम-परिणामी, परम गग रिंग और परमभमंग ऐसे महरमा पुरुष उसके मुम्प पार। मे (मष भोर भनर मा गये) HARA प्रमनपरनेच मन्तिम यमपणा है अनम मपूर्व और मनाति मामले परम ले मौन सी मालिका परिपाप हो गया। बनी नमम पारने रचाकी परीय प्रवच-पानीकी प्रतिरोती॥ पग्रेस माग परनेवासे तापु भाषा बीस पर वित्त मातम माणसाचतत्र ऐसा रोने जमा नरने मगन विचार परत दुर मगगन सम्पन भने मारमाराप्ती समान प्रकार नारमा मानिtton भेन योग भगवती सेवा मुपम न उमरान त पानुपा सरको नाम मौर मालविरेभानरस्मरणाम सारभरमार मनपाना! पापामा पत्र ०९.(.९९)] विपिर पर मारि संग्रह-यो पर्व ७४१ किमी महापुरुषके मननके लिये पमानिकायका सशिम ममप विमा या, उसे मनन करनेके निये इसके साय मेगा। हे वार्य द्रम्पानुयोगका फल सर्वमावस रिराम पानरूप सपम है-इस पुरुषक इस बपनका कमी मी अपने बतरणमें शिविष्ठ न करना। अधिक स्या' समाधिका यम्प यही है। सर्व दुसोंसे मुक रोनेका उपाप यही है। 1 ७९८ पबाणीना, मैत्री गुरु १९५५ हवार्य । बैसे रेगिस्तान उतर कर पार हुए, उसी तरह भव-स्सयभूरमणका तर कर पार होगा। ७९९ सपर उपकारके महान् कार्य अब कर ले | चीप्रवासे कर ! अप्रमत्त हो-अप्रमत हो। स्या बार्पपुरुषोंने कारका क्षणमरका मी भरोसा किया है। हे प्रमार !! जब त् बा, गा! प्रापर्य! बाप्रसम हो, प्रसन हो हे म्यमधरोदय ! वर प्रबसता उदय वाकर मी पति हो, श्यत । हे दीर्घसूबा ! द मुविचारके, धीरनके और गमारताके परिणामकी पों इस करती है। हे बोमबाग ! तू मस्पत हस्वामएकात् प्राधिकार प्राप्ति कर । रेशान ! दमा दुर्गमको भी सुगम समाबमें गफर रस ! हे चारित्र। परम बनुमा कर, परम अनुसार कर! है योग ! तुम स्पिर होमो, स्थिर होगो ! हे पान ! निजस्वमायाकार हो निमस्त्रमावकार हो। हे म्पमता ! दर से जा ऐ हेक्प अयका मप्प क्य कपाप ! मन तुम ठपशम हरायो ! क्षीण होमो ! हमें तुम्हारे प्रति को चि मी यो! हे सहपद ! पपार्प सप्रतीतिरूपसे तू एयमें प्रवेश कर। रेवसग निम्रपप दिसामाविक म्यवहाररूप । हे परमकरणामप सन परम तितके मूस गौतमगधर्म ! असम हो, प्रसन्न ! है तू निजस्वमायाघार इति । अभिमुम्मा हो, बमिमुख !* हे पनसमिति को कापस्थिरता !रे एचबास ! पौर वस्गता 1 तुम भी प्रसम्म हरायो, प्रसन होमो। समग मचाताई गो बाम्पवर वर्गणा है, या तो उसका सम्पतर ही पेन कर मेना चाहिये मयमा उसे सप पुट देकर उसका उपयम कर देना पारिप । म्पो म्पों निरस्ता पम्पान हो, स्पों खो प्यान मलमान हो सकता है, कार्य यसबान हो सकता है। भारमन् ।
भीमद् रात्र [पत्र ८०० मोरवा पैत्र पौ ७, १९५५ (१) विशेष हा सके तो बच्छा। बानियोंको सावरण मी प्रिय है। विकल्प करमा पाग्य मही। (२) बाविस्मरण' हो सकता है। पूर्वमा गाना मा सकता है । अाविहान है। (१) तियि पालना चाहिये । (१) बसेको तैसा मिकता है। जैसेको तसा बा गता है। * पारे पर परने, मधुकर मासती मोगी रे । विम मपि सहनगगे होमे, नचम निमिचसमोगी रे ॥ (५) x परमारो परमकरण तया, ममपरिणति परिपाकर। दोप टने ने घष्टि से मति मसी, मापति प्रमपनराकरे ॥ ८०१ मोरया, क्षेत्र नदी ८, १९५५ । (१) पवनसमुखप वौर तलार्पसूत्रका वाकन करना । योगशिसमुबय (सम्माम) को मुखाम कर विचारना योग्य है । ये गियो बामदशा-मापक (धर्मामीटर ) पत्र है। (२) को सास समझनेबारे मूस करते हैं। शास वर्षात् शास्ता पुरपके वचन । इन पचनोंको समझने के लिप रि सम्पा चाहिये। मैं बान 1, मैं मम । ऐसा मान मनसे, ऐसा विमनसे, यूप मही हो जाते । तप होनेके लिये स्थान मालिका सेवन करमा चाहिये । (३) सदुपयको गत बहरत है। समुपदेश्यको बात गल्पत है। (0) पोचसो-गार श्योर कटस्प करनेसे परित मही बन जाते । फिर मी पोका मान- कर गतका ढोंग करनेवाला परितोष टोटा नही। +५) नुको सन्निपात हुमा है। मोरबी, क्षेत्र रही ९ गुरु १९५५ ८०२ (१) नमा (१) आमक्षित पनि दुर्सम है-पेमा मानकर रिपारपान पुस्प उसी वामरामारसे उपासना करते हैं। (२) माचाएंगम्बके एक मापके सबंध पर्चापत्र भादि देने है। बात करके योगे हिनो किमी साकी तपसे उसका समाधान प्रकट होगा। भसर पम्पपाता। ममम मालपो चाला रखी वय मानगुप रचम लीग मका अधिरेमो.९५! + १९५३ मारनामा-गुचरण पा. १४] विविध पत्र मावि संप्रह-३२पौ वर्ष (२) पदि परमसत्को पोका पाँचती हो, तो पैस विशिए प्रसगके उपर देमला गेग रक्षण करते हैं, प्रगटरूपसे मी वाते हैं। परस्तु गुत हो यो प्रसगोपर । पोगी नया वैसी विशिए शशिबाला उस प्रसगपर सहायता कर सकता है, परन्तु बाबानी तो नहीं है। नागको मतिकल्पनासे ऐसा माश्म होता है कि मुझ देवता के दर्शन होत , मेरे पास देवता माता है, मुझे उसका दर्शन होता है। परन्तु देवता इस तय दिलाई मही देखे । ८०३ मोरबी, चैत्र वदी १०, १९५५ (१) सरेके ममकी पर्याय बानी ना सकती है। परन्तु यदि अपने मनको पर्याय बानी या सके, तो दूसरेके मनकी पर्याय चानना मुषभ है। किन्तु अपने मनकी पाप गानमा भी मुश्किल है। यदि खमम समप्समें वा चाय तो पवश हो सकता है। उसके समझनेके सिये सरिपार और सक्त एकाप उपयोगकी नसरत ।। (२) बासनजसे (स्थिर वास्न ख करनेसे ) उत्पानातिका उपशमन होता है उपयोग पपल्तारहित हो सकता है, निदा कम हो सकती है। (३) सूर्यके प्रकाशमें जो बारीक बारीक सूक्ष्म रबके समान माम होता है, ये अणु नहीं, परन्तु ये बनेक परमाणु के बने हुए कम है। परमाणु चक्षुसे नही देखा जा सकता । वा पमु इन्द्रिय०म्बिके प्रय क्षयोपशमपाले मीच अपवा दूरदेशीलम्पि-सफा योगी वपना केन्छाको दो दिखाई पा सकता है। ८०४ मोरबी, चैत्र वदी ११, १९५५ १ मोसमासा हममे सोम परस पाँच मासको सस्यावीन दिनमें बनई पी। ९ पाटके उपर स्याही गिर मानसे, उस पाठको फिरसे सिडना पका था और उस स्थानपर 'पा पुष्पफेरा पुनपी' इस समय तालिक विचारका काम्प सिसा पा। २ उसमें जैनमार्गको पपार्प समधानेका प्रपास किया है। उसमें मिनोहमार्गसे कुछ मी म्यूनारिक नहीं करा । विससे पीतांगमार्गपर बापागारको रुचि हो, उसका सम्प समसमें मारे, उसके बीरफा दपमें रोपण हो, इस हेतुसे रसको बाममोचरस योजना की है। उस शेती सपा इस मोपत्र मुसरण करने के लिये यह एक नमूना उपस्पित किया है। इसका प्रशालाप मामफा भाग मिम है, उसे कोई बनानेगा। १ इसके सपने में सम्म होनेसे प्राहकोंकी माकुलता दूर करने के लिये, उसके बार मानापोष पकर, उसे प्रारको उपहारसल्म दिया था।
१ भीमद् राजमान (१८५ कोण ! यी पयो ! सम्प के मा ला! कोना सब कम्गणा के ! राई के प पबिह' --सपर मीन मिचार करे, तो उसे नौ तत्वोंका-सयाानका-सपूर्ण बाप प्राप्त हो जाता है। इसमें उत्सानका सम्पूर्ण समावेश हो पाता है। इसका शांतिपूर्वक किसे चार करना चाहिये | ५ बाट यो ठी सेससे कुछ जानकी-विचाकी-तुम्ना मही होती । परन्तु सामान्परपसे जीयों को इस तुम्नाका चार महीन। ६ प्रमाद सा पान है । सके तो जिममरिरमें निपमित पूरी करने जाना चालिम । तमें मोजम न करना चाहिये । बदरत हो ता गरम मचा उपयोग करना चाहिये। ७ फाप, साविप वपना सगीत बा का पति वामापके लिये न हो, तो ये कल्पित हो है । कम्पित वर्मात् निरर्पक-बो सापक न हो -पाजीली कम्पनामात्र है।यो मधि प्रयोगम रूप अपना बारमापके लिये म हो पा सब कल्पित है। मोरबी, नयी १२, १९५५ प्रश्न -भीमद् वाम दमनजाने श्रीमजितनापनाके स्तवनमें कहा है- तरतम योग रे वरवम पासमा रे, मासित पोप मापार । पंपरी -सच क्या मर्प है। उधर -पो म्ों पोगको ( मन पचन कापाको ) तरतमा वर्षात् अधिकता होती है। पों स्यों पासना मी अधिकता होती है -या तरतम योग रे तरतम बासना रे'कामरे मात् यदि कोई पुरुप मम्मान योगमासा हो उसके मनोबल बचनमा वारि सान हों, और का किसी पपको पसाता हो परन्तु जैसा बसमान उसका मन पचम बादि पोग है उसको पैसा मिलान अपोको मनमानेकी पूमा कराने मान सत्कार मष वानिको बाना ,गे उस पासनालाका बोष सित बोप एमा--कपाफ्युठ बोपमा लिपप बादिको छाम्सापाला बोध हमा- मानके लिये बोन वा-यामार्पके लिये प पोप न मा । भीमानंदपनगी मामपितामुका स्तन करते हैं कि प्रमो ! ऐसा मापारम्म दो बासित बोनप मुझे मही चाहिये । मुझे तो कपाप- बित मामासपम वीर मान मार बासनात बोषक वरूरत है। ऐसे पपकी गवेषणा में कर पा। मन बचन पानि मान योगमा अदे दे पुस्प बोषका प्ररूपण करते बामे है और प्ररूपण करते । परत के प्रमो ! वासनाके कारण या बोष पारित है, और मुझे तो बासनारमित मोमको बरूरत हैवासनावियप माप माविनेबा मिन बावण्ग अपितदेव ! ऐसा बोध तो देश हो । उस तेरे पयका मैं सोम या!-दस या माधार मुझे चाहिये । (२) मान पनाको पीपीसी उम्प करने पोय है। उसका बर्ष विचनपूर्वक लिखने पोम्प है। सो लिखना। • मजान कति भागा, मवन्य लमला मिलेन मापसे का गरेको बदाम पर.पा.
पर विपिप पत्र मावि संप्रह-स्पो वर्ष - ८०६ मोरपी पत्र परी ११, १९५५ ॐ धीहेमचन्द्राचार्यको हुए बाय्सौ बरस हो गये। श्रीमानंदपननीको दोसौ बरस हा गये। श्रीहेमचन्द्रापार्यने ठोकानुग्रहमें बामसमर्पण किया। भीजानदघननीने बारमहित-साधन-प्रतिको मुम्प बमाया | मीहेमचन्द्राचार्य महाप्रमालक बलवान अयोपशमनाने पुरुष थे । वे इतने सामर्थ्यवान् पे कि चाहत तो एक ही पप पठा सकते थे । उनोन तीस हवार घरोंको प्रावक बनाया । तीस हजार घर अर्थात् मा छाससे गलास मनुष्यों की समस्या हुई। मीसानानन्दगीके सम्प्रदायमें फुल एक पस बाइमा होंगे । जब एक मारके समासे सहनानदबीने अफ्ना सम्प्रदाय पाया, तो मोहेमचन्द्राचार्य चाहते तो गलास वनुयायियों का एक गुदा ही सम्प्रदाय पा सकत थे। परन्तु श्रीहेमचन्द्राचार्पको स्मा कि सम्पूर्ण गीतराग सर्पङ्ग तापकर ही धर्मप्रवर्तक हा सकते हैं। हम ता केस उन तापकरको मायासे चमकर उनके परमार्षमार्गको प्रकाश करने के लिये प्रयत्न करनेवास हैं। मीहेमचन्द्राचार्यने वावरणमार्गक परमार्थका प्रकाश करनेरूप लोकानुग्रह किया । पैसा करनेकीजन- रत मी दी। वीतरागमार्गक प्रति निमुसता बौर पम्पमार्गको तरफसे विषमता ईर्ष्या आभारंभ से पुके थे। ऐसी सिपमतामें छोगोंको गीतरागमार्गकी बोर गिराने, भोपकार करने तथा उस मार्गक रमण करनेको उमें बम्परत माश्म ई। हमारा चाहे कुछ भी , इस मार्गका रक्षण होना ही चाहिये । इस तरह उन्होंने अपने आपको अर्पण कर दिया । परन्तु इस पर उन जैसे होकर सकते है- से भाग्यवान, माहात्म्पपान, क्षपापशमबान हो कर सकत है। मुना गुना दशनोंको यथावत् तोमर नमुक दर्शन सम्पूर्ण सस्पस्वरूप है गो ऐसा निश्चय कर सके, ऐसा पुस्प होछोकानुमा पर माप्रकाश वीर मरमसमर्पण कर सकता है। भीमकदाचार्यने बात किया । मायामग्नबी उनके रासी बरस बा में हुए । इस सी परसके भीतर से दूसरे हेमचन्द्राचार्यकी मारत पी । विषमता म्माप्त होती ना हो यो । काउ उम्र रूप धारण करता जाता था । मौषहभाचार्यने शृंगारपुष्ट धमका प्रमण किया । योग अंगारपुल धर्मका गोर मिरे—उसमोर आकर्षित हुए । पौतरागपर्मक प्रति नमुनता बरती गई । गग मनादिसे ही शृंगार बादि विमानमें मप्र प्राप्त फर गा, उसे वैराग्पके स्मुस होना मुश्किल है। यहाँ फिर पर उसके पास भगारको हो धर्मम्पसे रस्सा जाप तो फिर यह पम्पकी जोर किस तर मिर सकता है। इस तरह गीतरागमार्गको विमुखता बड़ी । महाँकिर प्रतिमा-प्रतिपक्ष समाप ही बनधर्म, महा हो गया। उसम, प्पानका कार्यभार सम्पका पारण ऐसा दिन-प्रतिमाके प्रति सामों पग रि-विमुख हा गप | पीतरागशान कस्थित मधमे नियमित --कितने तो समूह हो संरित किये गये । इस तद इस एहमी बरसफ वराछमें पतियगमार्गके रक्षक दूसरे हेमवाप्राचार्यको नारत पीबापाय तो वन्य मी बहुतम र २ परन्तुबमीहमपत्राचार्य वैसे प्रभावशाली नहीं हुए मर्यात् रिफ्मता सामने नहीं कि सके । विषमता बढ़ती गइ। उस- समप दोसौ बरस पूर्व भीमानन्दपनगराए । पीवानापनजाने सपर-दितमुरिसे छोपकार प्रति भारभ की । उन्होंने इस मुम्प प्रातिम मामरितको गाग किया। परम्न वीतरागधर्म-विमुगुवा-पिषमता-पानी अधिक गई पीक १५८ भीमद् राजघन्य [८११,(८११) ८१५ (८१४) ८१५ पारम्गुणों के प्राप्त करनेका परिकार उत्पन्न होता है। परि इस प्रथम नियमझे उपर म्यान रस्सा नाय, और उस नियमचे माप सिद्ध किया जाय तो कपाय बाP समासे में पाने योग्य हो जाती है, भपना बानाका माग बाम-परिणामी होता है। उसके उपर प्यान देना योग्य है। हर, बैशाप बी २ मगठ १९५५ उस क्षेत्रों पर नितिका विशेष योग हो, तो चर्तिकेयामुप्रेक्षाका बारपार निम्मिान करना चाहिये—ऐसा मुनिमाको विनयपूर्वक कहना योग्य है। निन वासाम्यतर बर्सगता प्राप्त है, ऐसे महामायाको संसारका जव समापी-पेस निम्म्दवानाका निधय है। ८१२ सन चारित्र वशीभूत करनेके लिये, सर्व प्रमर दूर करने के लिये, बारमा अपंगति राने सिपे मोमवयी सब प्रकारके सापनोंच जय करनेके सिये, अमचर्य व अनुपम सरकारी है, वा बभूत है। ८१३ र, वैशाख पदी १. शनि १९५५ किसन सास्त कियाोप मामक पुस्तक मिली होगी । उसका मादिसे ज्याकर ततक अम्पयन करने पहचात् सुगम माना एक तदिपप निबध सिनेसे रिशेप अनुप्रेक्षा होगी और बसी किपाका बावरण मी सुगम या स्पस्ता होगी, ऐसा संभव है। रामनगरमें परम तत्तरित प्रसंगोपात्त उपदेश का पाउसे मप्रमस चिचसे बारबार पर- पोगमें स्मरण करना उचित है। ८१४ नमः सा पीतरागदेर मम्य क्षेत्र का मारम्न म प्रामम सामनेवाला और रमा रेप भारि मानिस और दो गप बह ईयर है। पर पर मनुष्यतामें माल हो सकता है। मो सम्पूर्ण पतिराग कर सम्पूर्ण ना होता है। सम्पूर्ण बालगग मामा सकता है, पेमे हेतु सप्रनोत होते है। मीिपार पेठ १९५५ पर भोपप मरी, नपी पाप पमाप । पीतरागाणी पिना भवर न र पाप ॥
८१५ ८१०८१८,८१९ ८२ विविध पत्र मावि सग्रह-यावर ८१६ बम्बई, म्पेठ १९५५ में हो सत्पुरुषके पवनामृत, मुदा बार एसमागम ! माम चेतनका नाप्रत करनेवाले पतित होती ई पतिको स्थिर रमनेबारे दर्शनमात्रसे मी मिप वपूर्ण समाबके प्रेरक सम्प प्रतीति, वपमच सयम और पूर्ण गीतराग निर्षिकम्प स्वमारके कारणभूत, वीर मन्तमें बयोगी समान प्रगर कर, बनत अभ्याबाप सरपमें स्थिति करामेबा। निकाय चपरंत बों !शान्ति शान्ति ८१७ स, पेष्ठ मुदी ११ भौम १०५५ (१) मरि मुनि बम्पपन करते हों तो योगप्रीप अषण करना । काचिकपानुप्रेक्षाफा योग में बात करक मिलेगा। *(२) मना फार किंकर यई रपी, मृगप्पामस साफ । नीम्प पन्य तानु । दासी माया पिशापी यो , कामकोप तेली सा ।। नीम्पु० । दीसे मावा पीता पोसता, नित्से निर्गमन निराकार ॥ नीम्प० । माणे सव ससाणा तान, मेन होय एसी अरतार || मीम्यु० । मगपापनकर वे भवता, मन्य मावउदरना मार ।। जीम् । तेन पौद लाकर्मा पिपरवा, अंदराय काप नर पाप || नीम्प० । रिपिसिपिमो दासिया यह रही, सामानव र न समाय ।। मीम्पु० । ८१८ बर्थ म्पेष्ठ को २ रवि १९५५ प्रिम विषयको पर्चा पमती है या शान है। उसके साथ पयारमरो प । ८१९ बनाई ग्पष्ट वर्ग ७ पुक्र १०५५ म्यपहार-प्रतिषषसे विशेष न पार, धैर्य रमकर उत्साहमान वीर्यसे सम्पनिष्ठ चिफरना योग्य है। ८२० माहमयी भाषा र १०५५ १ इससे सरख सा कियाकोर नहीं । विदोष वाकन करनस सयर्य दोगा। +MR गया है और समोर मृयपाले सो नमान मारमा उनम ना भाणपरिणधिनी रानी मौर म पानीपम उमाना है। मा परि नाम पाशा भोर रोश्वाम्म दिला देता है परन से मन मोर मयसीमाना म॥ उन महीना बानो मोर उनका यह मानब मा उमार्थना ॥ समन म्परम पवित्र परेमा यो पाली समानारे उदरक मारम्भ 1 उप मीना ना और रिवरप प्रो ए दी मेरा मोठा उमाना ॥ उमसी दिन पनाम, मोर रसोरमार नौ समाश, माना है।
भीम सिमान्य मेग धर्मको भपमा मानदफ्नयाको पहिचान न सके समक्षम सके। मन्तमें भीमानदधननीको म्या कि प्रारूपसे म्पात विषमताके योग कोपकार, परमार्थप्रकाश करममें असरकारक नहीं होता, वार मामहित गौण होकर उसमें पापा पाता है। इसलिये पात्महितको मुम्य करके उसमें ही प्रापि करमा पोम्प । इस विचारणासे बम्तमें वे मेफसगने भरकर नमें पम दिये । पनमें विचरसे दर मी ने अप्रगटरूपसे गर चौरासप वादिक धारा कोकोपकार तो कर हो गये। निझारण छोकोपकार या महापुरुषोंका धर्म है। प्रगटरूपसे योग भानंदपनीको पहिचान न सके । परत मानदफ्नमी भप्रगट गकर उनका रिवही करते थे। इस समय तो भीआन पनमाके समय अपेक्षा मा मरिक विषमता-पतरागमार्ग विमुसवा-प्पास होगी। (२) भीमानंदघननीको सितिबोध तीन था। शाम्पर सम्प्रदायर्मे थे । यदि पूरनि भाग्य सभा निर्पकि, रचि परंपर मनमबरे स्पादि पञ्चागीका नाम उनके मानमिनापनी के स्तवनमें नवाया रोता, तो यह मी सबर न परतो कि सेतामर सम्प्रदायके थे या दिगम्बर सम्प्रदापके! . ८०७ मोरबी पैकी १५, १९५५ 'इस भारतवर्षी बमोगति चैनधर्मस - ऐसा महीपतराम सम्म करते पे—निसते थे। करीब दस बरस हुए उमा वामदाबा में मिगत मा तो उनसे पण प्रश्न ---माई । मधर्म क्या नहिंसा, सत्प, मेड, म्पाप, नीति, भारोम्पप्रद बाबार पान, बम्पसन, बौर उपम बादिका उपदेश करता है। उतर.-1 ( महीपतरामने उत्तर दिया )। प्रभा-भाई । चैनधर्म क्या हंसा, बम्प, चो र पाप, मनौति, निसन बाबार- हिर, लिपपमल्सा, बास-प्रमाद बानिका निषेध करता है। माफ्तराम प्रश्न -देशका मधोगति किसते हाती या हिंसा स्प, मेग, म्पाप, भौति, सपा को मापेम्प प्रदान करे और उसकी रक्षा करे ऐसा र सादा बार-पान, और बम्पसन उपम मारिस देशको भयोगति होती है। मपमा उससे विपरीत Rसा समय, छठ पाय, बनीति, तथा को भारोपको विगारे और शरीर-मनको शक को ऐसा विस वादार-मार, और म्यसन, मौन शोष, मायस-प्रमा' बादिस देशको वपोगति देता है। उत्तरा-सरेसे बर्षात् विपरीत हिंसा बसप, र, प्रमाद यादिसे ! म --तो रिस्पा इनसे उल्टे नरिसा, सत्प, मे बम्पसन, उपम भारिसे देशको उमति होती! उत्तरा। प्रभा-तो क्या मैनधर्म ऐसा उपदेश करता है कि जिससे देशको अधोगति । पाप ऐसा उपदेपा करता है कि मिससे देशकी उमति हो। .
८.८१,८१] विविध पत्र मादि समा-३खों वर्ष उचर ---भाई ! में कबूछ करता है कि जैनधर्म ऐसे सावनोंका उपश्श करता है जिससे देवकी उमति ।। ऐसी सूक्ष्मतासे विनापूर्वक मैने विचार नहीं किया या। हमने ता बालकपनमें पारियोंकी पाठशालामें पके समप पा र सस्कारसि, मिना विचार किये ही एसा कर दिया था- जिस मारा था । माहीपवरामने सरम्तासे कमूळ किया । सस्प-शोषनमें सरलताको बहरत है। सस्यका मर्म मेनेके लिये निवेकपूर्वक मर्ममें उतरना चाहिये । मोरबी, मैशाख पुरी २, १९५५ ग्योतिपको कम्पित समझकर उसको हमने स्याग पिया है। छोगोंमें नरमार्यता बहुत कम हो गई है— महीकी तरह गई है। इस सबध सार्प हेतुसे छोगोंने हमें कर देना शुरू कर दिया । इसलिये विससे बारमार्थ साप्प म हो ऐसे इस विषयको कत्पित-प्रसार्यक- समझकर हमने गौण कर दिया, उसका गोपम कर रिया । २ सोग किसी कार्यको तथा उसके कर्ताको प्रसा करते है, पाठक है। यह सव फायका पोषक तपा उसके कत्तकि उस्साहको बढ़ानेवाग है । परन्तु साय सापमें इस कार्प, मो कमी दो उसे मी विवेक और अभिमानरहितमापसे सम्यतापूर्वक बताना चाहिये, मिस्से फिर कमीका अवकाश न ये, पौर वह कार्य म्यूनतारहित एकर पूर्ण हो जाय । केवल प्रसा-गान करनसे ही सिदि नहीं होगी। इससे तो ठम्टा मिप्यामिमान की बढ़ता है। बचमानके मानपत्र भादिमें या प्रथा विशेष है।कि पाहिये। ३ परिमापारी पत्तियोंका सम्मान करनेसे मिष्यास्त्रको पोपण मिता --मार्गका विरोष होता है। दाशिम्प–सम्यता को भी रक्षा करनी चाहिये । मीनको स्पाग करना मण्या मरी भगता, इस करना मना नहीं पाता, और उसे मिप्या होशिपारी होशियारीकी मा रमा , मान छाना मही। उससे परमार्थ सिद्ध नहीं होता। ८०९ मोरवी, शास मुत्रौ ६ १०५५ ॐ प्यान सुतके उपकारक साधनबाले चाहे विस क्षेत्रमें चातुर्मासको स्थिति हानेस बाधाका भतिकम नही-ऐसा मुनिधी पारिको सपिनप काना । मिस समुतको बिासा है, न भुत पौथे दिनोंमें प्राप्त होना समय है-ऐसा मुनियाको निवेदन करना। पांतराग-समार्गकी उपासनामें पार्पको उत्साहमुक्त करना । ८९० पाणीया पैशाम्ठ पुदी ७ १९५५ गृहवासन रिसे उत्पमता पापदि किसी मौ शुभम्पानको प्रामिका या करता हो, तो उसके मूल हेतुभूत बमुफ सावरणपूर्फ एना पोप है । उस अमुफ निपममें 'न्यापसम्म बागी विकादि प्यपार ' इस पहिठे नियमको साम्प करना पोम्प है । इस नियमके साम्प होनेसे पतसे .
भीम राजधम्म [ ८११ (८१२) ८१५ (८१४) ८१५ बामगुणों के प्राप्त करनेका अधिकार उत्पन हाता है । यदि इस प्रपम नियमके उपर पान मसा वाय, बौर उस नियमको वश्य सिद किया गाय तो काय माहि स्वमावसे मापाने गोम्प हो पाती है, अपना मानाका मार्ग माहम-परिणामी होता है। उसके उमर म्यान देमा योग्य है। और, शास दी ६ मगर १०५५ उस क्षेत्रमें पवि निहारिका विशेष पोग हो, तो कालिकेयानुप्रेक्षाका बारम्बार मिदिम्पायम करना पाहिये-ऐसा मुनिमाको विनयपूर्वक कहमा योम्प । दिनोंने पायाम्पतर क्सगता प्राप्त की है ऐसे महामाजोंको ससारका बत समाप है ऐसा निस्सन्दोवानीका निमप है। ८१२ स चारित्र पशामत करके किये सर्व प्रमाद र परमेरे लिये, वाहमा बसंगति यमेके लिये मोबासंबपी सब प्रकारके साधनोंका बय करनेके न्येि, 'प्रपपर्प' बत अनुपम सायरी बपना मूगभूत है। ८१३ हर वैशाख पदी १० शनि १९५५ किमानदासाहत हिपालोप नामक पुस्तक मिण होगी। उस मारिसे भगाकर अंततक मम्पयम करनेके परचात् पुगम मात्रामें एक तद्विषपक निबध सिनेसे विशेष मनुप्रेमा ऐगौ वीर सी क्रिया माचरण मी मगम हैया पता होगी, ऐसा समय है। रावनगरमें परम तत्वारिका प्रसंगोपात उपदेश वा था उसे वप्रमच पिसे वारवार एकर योगमें स्मरण करना उचित है। ८१४ नमा सना पीवरागदेष सर्व दम्प क्षेत्र काम भाका सर्व प्रकारसे बाननेपाम, और गरेप मास विमान मिसके माण हो गपे पर ईयर है। पप मनुष्योग में प्राप्त हो सकता है। पो सम्पूर्ण पांतरणा हो पर सम्पूर्म सना होता है। सम्पूर्ण पाँतरग सा गा सकता है ऐसेतु प्रतीत होते है। मषिपार पेष्ठ १९५५ ८१५ मंत्र मंत्र मौपप नहीं, मेथी पाप पसाय । दीवरागपाणी पिना भवर न कोई पाप ॥
८१५८१.८१८,८१९८२ विविध पर मादि समा-३२वा वर्ष जट ८१६ मई, ग्येष्ठ १९५५ ॐ बहो सत्पुरुपके बचनामृत, मुदा बार सत्समागम ! समान चेतनको नामत करनेवाले पतित होतीप्रतिको स्पिर रस्नेवाले, दर्शनमात्रसे भी निर्दोष वपूर्ण स्वमारके प्रेरक सस्त प्रतीति, अप्रमत्त सयम और पूर्ण वीतराग निर्मिकल्प समायके कारणमूत, और वन्तमें मयोगी स्वभाव प्रगट कर, नत अभ्यागाष स्वरूपमें स्थिति करामेबारे । त्रिकाठ चपर्यत पों! शान्ति शान्ति पई, म्येष्ठ मुदी ११ भौम १०५५ (१) यदि मुनि बम्पयन करते हो तो योगप्रदीप प्रवण करना । कार्तिकेयानुप्रेक्षाका योग तौ पात करके मिगा। . (२) मेनो फानते किंफर र्या रमी, सुगनुप्णामस सोक ।। मीम् पाप वाई। दासी माशा पिशापी पी सी, कामकोप दे दी साक ।। मीम्पु० । दीसे सावा पीवो पोसा, नित्से छे निर्गमन निराकार ॥ मीप० । जाणे संत ससोणा तेहने, मेने होप ऐसी अपवार ॥ भीम्यु० । मगपापनकर वे मरतो, मन्य मावन्दरनी मार ।। मीम् । वेने पौद सोकमा विचरवा, मंतराप कोये नम पाप ।। मीम्पु० । रिपिसिपियो दासियो पा रही, प्रमामद हे न समाप ॥ मीम्यु० । ८१८ बम्ब, ज्येष्ठ बी २ रमि १९५५ बिस विषयका वर्षा पस्तीमान है। उसके समपमें पपावसरोदय । ८१९ वई म्पेष्ठ बदौ ७ पुक १९५५ म्पहार-प्रतिषपसे निक्षेप न पाकर, भैर्य रखकर तत्सम्हमान वीर्य स्वरूपनिष्ठ सति करना योम्म है। ८२० मोहमपा, भापत मुटपि १५५ १ इससे सरप दूसरा किपाकोप नहीं । विशेष वरमोकन करनेस स्पार्प होगा। • पाकिर होमपा है, और किले मे ममापारे बहो समान मान्म होता है उसका बीना तकी भाशाली मिणपिनी है और काम पनि माग । उपना परे। बेबी साना पीना मोर पोल्दा मा रिहाई रेला रे, मन्तु पे नित्य निरन और निराकार उसनमाना पर उठे तमैनाबानो मार रातका पर भारुम मा उसका सीना पम्प || उसने बम पवित्र ने ममवार मानीटोमवार मारभून हो। उसय मैना से चोदा मेम सिरप प्रो ए किती र भवराव महा रोष उतम ना पर उसी की सिविल पाठयाँ दो गौर सकसमें मानन मा समावा, उन्म की कम है।
भीमद् रामचन्द्र [८११ ८२२ ८२३ २ शुद्र वामस्पितिक पारमार्षिक मत बीर इन्द्रियनय ये दो मुल्स वपम्पन है । उनको मुस्तापूर्वक उपासना करनेसे उनकी सिदि होती है। हे वार्य ! नियणक समय महारमा पुस्पोका बहुत पारित्र स्मरण करने योग्प है। उमासित पर्यिमान, परमवापकी उपासना करमेका मुस्स अधिकारी है। ३ वप्रम समाला पारमार म्मरण करते हैं। शान्ति ॥ ८२१ बम्बई, बापाल दो ८ रवि १९५५ मुमुक्षु तया दूसरे जीवोंके उपकारके निमित्त यो उपारशीस माम प्रयापकी सूचमा- यिनि-की, पबपना दूसरे कई कारण किसी मपेक्षासे उपकार होते हैं। हामें से प्रापि-समाके प्रति उपशात पचिहै। प्रारम्बयोगसे बो बने र मी पुर समायके अनुसमानपूर्वक ही होना पोत्य है। मारमाोंने निष्कारण करणासे परमपदका उपदेश किया है। उससे पा माश्म होता 38 उपरेशका कार्य परम महा हो। सत्र गायोंके प्रति पाए दयामें भी कामत बनेका बिसके पोगका समान है, उसका बामस्वमात्र सम नागोको परमपदके उपदोशका बाकर्षक हो-पैसा निफारण करुणावाम हो पाया है। ८२२ कर्ण, बाल ८ रवि १९५५ नमा बिना मफ्त पाने मही, बिना नयनकी बात इस बापका मुस्प हेतु नामासिवनी है। यह पाप स्वामायिक उत्पापक छिपे है। समागमके पोगमें इसका सय समझमें वा सकता है। नपा दूसरे प्रश्नों के सम्मान के लिये हासमें बात होप माति पता है । स्समागमके योगमें उमका सगो समाधान हो सकता। 'बिना मपन बाहि गाम्पका अपनी नियमापनासे कुछ मी विचार न करते निस्से मुद वन्पाशिक प्रति मो तिमपि प्रास न करे, इस तय वापरण करना चाहिये । कार्तिकेयानुप्रेचा भपता एमे सशाब मात करके पोहे समपमें मिमी । इम पास है बासु बाप है, ससमागम दुर्गम है मामानों के प्रत्पक्ष पप घरण और माहाका योग मिलना कठिन है। इस कारण बछवाम प्रमच प्रपान करना चाहिये । कति बपना ८२३ बी प्रावण पदी. १९५५ " परमपुरुषको मुमय मधि ऐसे सदाचरणसे प्राप्त होती है जिससे उत्प्रेचर गुणों सदि। चरणपतिपति (पुरमाचरणी उपासना ) प सदाचरण बानो मुस्प बादा है। जो भाका परमपुरुपये मम्प मदि।
पत्र ८२४ ८२५ ८२५] विषिप पत्र मादि संपा-खाँ वर्ष उत्तरोतर गुणों की पति होनेमें ग्रहमासी बनोंको सदुषमरूप वाशीविका म्यवहारसहित प्रति करना योम्पहै। पातसे शाम मोर वाक्पोका भम्यास करते हुए मौ, चीन यदि पानी-पुरुपोंकी एक एक बाबाकी उपासना करे, तो तसे शारोंसे होनेवाण फर सहबमें ही प्राप्त हो जाय । ८२४ मोहमयी क्षेत्र, भाषण मुदी ७ १९५५ ॐ प्रौपानन्दि शासकी एक प्रति, किसी भने भादमीके हाप, निससे क्सो क्षेत्रमें मुनिमीको प्रान्त हो, ऐसा करना। बलान निविषाले दम्य क्षेत्र मादि योगमें उस शारका सुम बारम्बार मनन चौर निदिध्यासन करना । प्रतिमा इम्प क्षेत्र मादिमें उस शासको बाँचना योग्य महौं । जब तीन पोगको मल्प प्रालि हो- मी सम्यक् प्रापि हो- तव महान् पुरुपके मचना मृतका ममन परम श्रेपके मूमको प करता है—ा क्रमसे परमपदको प्राप्त करता है। चिको विक्षेपरमित रसकर परमशांत भुतका अनुप्रेक्षण करना चाहिये । ८२५ मोहमयी, प्रावण सुदी ७, १९५५ मगम्य होनेपर मी सरस ऐसे महान् पुरुपोंके मार्गको नमस्कार ! १ महान् माम्पके उदयसे मपवा पूर्वक बम्पस्त योगसे मीषको सबी मुमुक्षुता उत्पम होती है जो मति दुर्गम है । यह सबी मुमता प्राय महान् पुरुपोंके चरणकमको वपासनासे मात होती है, जपमा वैसी मुमुक्षुतावाली बारमाको महान् पुरुषके योगसे वात्मनिष्ठमान होता है-सना- तन ममेत हानी पुरुषोंशय उपासित समार्ग प्राप्त होता है। सभी मुमुक्षुता गिसे प्राप्त हो गई हो, उसे भी हानीका समागम और बावा, वप्रमत्तयोग करते हैं। मुख्य मोधमार्गका कम इस तय माश्म होता है। २ नमानकामें ऐसे महान् पुस्पका पाग अति दुर्सम है। क्योंकि उधम कासमें मी उस पोगकी दुभता होती है । ऐसा होनेपर भी निस सबी मुमुक्षुवा उत्पम हो गई हो, मत दिन नाम पाण होमेका तपाइप पितन या करता हो, पैसे पुरुपको ऐसा योग प्राप्त होना सुम्म। ३ वामानुशासन हायमें मना करने पोम्प है। शान्ति ८२६ सर्थ, मारपद मुदी ५ति १९५५ सबिन बोको माया, प्राय पोरे समपमें प्रास होंगे। इपिनिमाके बम्पासपूर्वक समत वौर समागमकी निरंतर उपासमा करनी चाहिये । शाणमोरपयत बानाकी माहान जयन्दन परम हितकारी है भाग दिनतक तुम्हारे प्रति क्या तुमारे समीप एनेपाय बईयों वौर माईयों के प्रति योगके प्रमत्तस्वमानसे गो पुण्यपा एमाले, उसके लिये मप्रभावसे समाको याचना है। धमम्, भीम परवद्र [4.८२. (२) नो बनबासौ-मात्र ( मी पानन्दि पचपिशति ) मेना है, र प्रा मिपिके योगमें संपत इन्द्रियम्मसे मनन करनेसे अमृत है। ८२७ बी, वासोग, १९५५ - बिनबानी-पुरुषोंका देशमिमान दूर हो गया है, पपि उने फुट करना बाकी मही या, तो मी उर्ने सर्वसंगपरित्याग मावि सम्पुरुषार्पताको परमपुरुपने उपकारमूव कहा (२) भी के प्रति पर सिमाते हुए सूचित करना 'मिशार करफेवामदाबाद स्थिति करमेमें ममको कोई मय, तोग अपपा मोम नहीं है। परन्तु बितनुनिसे निपार करनेसे हमारी में यह बाता है कि हाम्मे उस क्षेत्रमें स्पिति करमा योम्प नही । मनि बार करेंगे तो उसमें बामदिराको क्या बापा होती है, इस बातको विनित करेंगे; और उसके लिये भाप करेंगे तो उस कमें ममागममें गायेंगे । वामदामा का पत्र पाकर भाप गेगों को कोई मी रोग अपना क्षोम न करना चाहिये-समभाग की रसना चाहिये । सिनेमें यदि कुछ मी बनप्रभाव एषा हो तो भमा करना । पदि रत ही उनका समागम होनेवाला हो तो ऐसा करना कि "बाप भार करनेके संभपमें नो सिसा सो उस विषयमें वारका समागम होनेपर जैसा बाप करेंगे वैसा करेंगे " और समागम होनपर काना कि ' पावपेषा परि सपममें लिपिम्ता की ऐसा नापको मारम होता तोपाप ठसे बता मिससे उसकी निधि की जा सके और पविबापको पैसा म माम होता होता हो, वो फिर पदि कोई बीच विषममायके वाभान होकर वैसा करे, तो उस बातके प्रति न गाकर, बार- मालपर ही बाकर, प्राधि करना पोप है । ऐसा गानकर शामें नामशाबाद क्षेत्रमें मामेका ति हमें पोम्प नही गती । स्पोंकि (१) रगरिपुत गोलके पत्रको प्रेरणासे, और (२) मामको रखा किसे उस क्षेत्रमें गामे पैसा होता है जो बात बारमा परितकी कारण है। राभित् माप ऐसा समावे कि जो छोग नसमम बात करते हैं उन गोंकि मनमें ठमको मफ्नो निमको मूग मास पोगी, और धर्मका हानि होती हुई मनायेगी, तो मा एक हेतु is । परन्तु उसके रक्षण करमेके दिमे परि उपरोक्त दो दोष न बाते में तो किसी भरोसासे गेगोका भूम दूर करने के लिये बिार करना उचित है। परन्तु एक बार तो भविषमभानसे उस पातको सहन करके, मनुक्रमसे सामानिक विहार होते रोते उस क्षेत्रमें बाना बने और किन्ही डोगोंको याम हो तो बिससे महम निहत हो पाय, ऐसारमा बाहिये । परन्तु रगपरिवानपचनोको प्रेरमासे तपा मानकी रमाके किये अपना भविष मता न पनेसे उसे रोकी मूठ मिठामेघ निमित्त मानमा, र बामहितकारी दी । इसटिपे रानमें इस बावको उपशात कर मार बतामो विपरित गैर मुनियोंक लिपे किसीने समारो, तो उससे में मुनि रोपके पात्र हो । नमके समागममें मानेसे सिमेगोंको पैसा सर होगा, पर सहम दोनच हो चापगा, अपना किसी समसको रेसे संशोपा दूसरा कोई ।
पर ८१८ ८11] पिरिम पर मादि सपा-३२ वर्ष स्पक्षके मानके लिये सदेह उपस्पित करे, तो यह नियम मार्ग इस कारण विचारवान मुनियोंको यहाँ समदशा होना ही योग्य है में पितमें कोई बोम करना उचित नहीं। बाप ऐसा करेंगे तो हमारी वास्माकर, तुमानास्माका, और धर्मका रक्षण होगा। इस प्रकार पैसे उनकी चिमें बैठे, पैसे पोगमें बातचीत करके समाधान करना, भौर हातमें जिससे वहमगाद क्षेत्रमें स्थिति करमा न बने, ऐसा कपेग तो यह मागे परकर विशेष उपकारका है। पैसा करते दुए मी यदि किसी मी प्रकारसे "म माने तो आमाबाद क्षेत्रको भी हिार कर गाना, पौर स्पमके उपयोग साबचेत एकर भाचरण करना । तुम बविषम बना। ८२८ मोहमयी क्षेत्र, कार्तिक सदी ५वान पचमी १९५५ १ परमात ध्रुवका मनन निस्प नियमपूर्वक करना चाहिये । शान्ति । २ परम पीतरगोशप मारमस्य किये हुए पपाल्याचारिसे प्रगट ई वसगताको निर म्वर म्पन्यस्मस स्मरण करता हूँ। ३ इस दु पमकालमें सस्समागमका योग मी बति दुर्गम है। वहीं फिर परम सरसंग गार परम पसगवाका योग कहसि बन सकता है। १ परमशांत शुतके विचारमें इन्द्रियनिम्हपूर्णक मामप्रापि रसनेमें स्वरूपस्थिरता वापसे प्रगट होती। समागमका प्रतिबंध करनेके लिये कोई को, तो उस प्रतिवनको न करनेको इपि बताना, मह योग्य है-पचार्थ है। तनुसार बर्तन करना । ससमधामका प्रतिबंध करना योग्य नहीं । तपा सामान्परपसे बिससे ऐसा बर्तन छ कि ठमकी साय सममान पे, पैसा हितकारी है। फिर से उस सगमें विशेप आना म हो, ऐसे क्षेत्रमें चरना योग्य है-विस क्षेत्रमें नामसाधन पुसमतास हो सके। मार्या बादिको यपाशक्ति को उपर कहा है, प्रपन करना योग्य है । शान्ति । ८२९ मोहम्पी, कार्तिक ५, १०५६ में प्रापिम्पबहार ऐसा है कि जिसमें रविका पपातमात्र रमना मसमब पैसा कोई मिण हानी इसमें शांत सहप नैष्टिक य सकता इतना मात कटिनवासे बनना समा। उसमें बम्प मयमा सामाप मुममुरारिक मात्र शांत सके, सबफ्नैष्ठिक एसके, ऐसा ययानप नहीं, परन्तु अमुक वसे मी होमेके लिये, गिस कम्याणम्प पपानको भावस्पकता है, उसका समाधमें बाना, प्रतीति होना और वमुक समावसे मामामे स्पिति दाना मी कठिन है। पनि पैसा कोई पोग बने तो, भार मात्र पनि शुद्ध मैष्ठिक हो तो, शविका मार्ग प्रप्त हो सकता है, यह नियम है। प्रमत समान जप करनके लिये प्रपान करना योग्य है। इस समार-रणमिमें उत्पमकायाप प्रीमके उदपके पोगका पेम न करने की स्थितिका पिरसे नालीबम्पास करत है।
श्रीमद् पबचान [ पर ८५ ८३१ ८३० मरमपी, कार्तिक सदी ५, १९५५ मिससे बमिरोष और एकवा ये पैसा करना पाहिये और इन सबका उपकारका मार्ग समन है। मित्रता मानकर प्राधिकरनेसे बाप सन्टा चम्पासावमें तो मिलता है-एकता है–समें सहम समसका फेर होनेसे हो तुम मिमता समझते हो, ऐसी उन बीमाको पनि शिक्षा मिले, तो समुसात्ति हो सकती है। बम्तक परस्पर एकताका म्पबहार ये तबतक पार्मथा फरम्य है। । ८३१ मोहमयो क्षेत्र, कार्तिक मुदौ १० गुरु १९५५ हामें में बमुक मासपर्यंत यहाँ बनेका विचार रसता मपमेसे बनता पान रंगा । अपने मनमें निरंत पना। फेमस ममापन हो तो भी मार है । परन्तु म्ममाप्रतिक मनुप्पको कुछ सपागों कारण पोरामात चाहिये, इसमिप या प्रयत्न करना पका है । सकिये धर्मकीर्तिपूर्णक पासपोग पातक उदयमान हो तबतक गितमा बन परे उतना बात है। में मानसिक पिसे बात हो प्रतिक मार्गमें प्रभास करना पाहै। तमापसे और हत मामासे सहम करनेमें हर्ष मानता । शान्ति । (२) ईडर, पौष १९५५ मा सम्मर मा रखा मा गुस्सा इनिामस्पेस । पिरमिष्ण नर पित्त पिपिचमाणपसिदीए । पनतीससीएप्पणपन्दुगमगं च भया पारा। परमेटिवाषपार्ण म प एसएसेण ॥ ---परि तुम स्थिरताको हम करते हो तो प्रिय अपा वप्रिय बस्तुमें मोर म करा, राग म करोरेपन करो। भनेक प्रकारके प्पानको प्रासिके लिये पैतीस, सोय, म, पाँच चार, गौर एक-स तय परमेछापर वाचक मोक्षध बपक पान करो। इसका विशेष तस्म भीगुरुके सपरेपसे समठमा चाहिये । *किपिपि पिवंती भिरीपिची से भदा सास्। मदनप एपच दशा वस्स गिप्प साम् ।। -प्यानमें एकामादि रसार यो साधु निस्थानातिमान् वर्षात् स प्रकार इसम रहित होता है, उसे परमपुरुष नियम प्यान कहते है।
३३वाँ वर्ष ८३२ बम्बई, कार्तिक पूनम, १९५६ १ २ नगद, गुरु गणपर गुणपर मषिक, मपुर परंपर और । प्रवतपपर वन मगनपर, मंदीप सिरमौर ।। विपयके निक्षेपमें स्वरूपरिमातिसे वियान्ति नहीं पाता । ३ बनत अम्पापाप मुसका एक वनम्प ठपाप स्तम्पस्य होना ही है। यही हितकारी उपाय पानियोंने देश है। भगवान् निनने शास्गोका इसीलिये निरूपण किया है, और इसी ठप्पतासे पर पामित, जयबत है। १ जानाके वामपके अषणसे उन्मसित हुमा चीन सन-नाको यपार्परुपसे मिमस्वरूप प्रतीत करता ह, अनुमत्र करता है—अनुक्रमसे सम्पस्थ होता है। पयावस्थित मनुमन होनेसे मह सहपम्प हो सकता है। ५. दर्शनमोहका मारा होनेसे शामीके मार्ग परममति उत्पम होता है-उत्प्रतीति सम्यक् अपसे उत्तम होती है। ६ तत्वप्रवीतिसे गुर तम्पके प्रति पतिका प्रमाह फिर माताहै। ७ पुर पंतपके अनुमबके लिये पारिप्रमोहका माश करमा योग्य है। ८ पारित्रमोद चैतन्यो-नामी-पुरुपक-सन्मार्गके मेठिकमावसे नाश होता है। . मसंगतासे परमारगर वनुमा हो सकता है। १० मार्य मुनिबरो । इसी भसंग शुर पैतम्पके लिये वर्सगयोगको वहनिया करते है। मुनिबरो ! जसंगका अभ्यास क्रो। ११ को महामा बसग पैतन्यमें न हुए है, होते हैं मोर होंगे, उन्हें नमस्कार दो। शास्तिः। (२) है मुनियो । सातक फेरठ समत्रम्पानाप सहस्पिति सामाविक न हो उम्प, तबतक तुम प्पान और साप्यापमें सीन हो! जोर जब कपल सामाविक स्पिनिमें स्थित दो गाप, ता यहां कुछ रमा मामी नही पा। गो गरके परिणाम वर्धमान-रीपमान पुरा करने गो ध्यान करना चाहिये। बाद पानमें टीनमापसे म बानाप्प परिचपसे विमति पाझर निवसपके टसमें एना उचित है। उदपके परेमे पर प्यान जब जब गाप, तब सब उमा गत से अनुसंधान हरमा चाहिये।
भीमद् रामचन्द्र [८. बोचके कारमें स्वाध्यापमें मौनता करमी पाहिये । सर्व पर प्रपोम एक समप मी उपयोग सगको न पाने, बब ऐसी दशाका मौष सेमन करता है, तब केवमान सत्पम होता है। परम गुणमय चारित्र पारिपे । सम्मान बग बार स्वमार परम मिर्दोष परम प्रताति १ मा शेषता २ माकि प्रारमसे भगाकर ततककी महत समाना। १ निर्विवाद- १ मुनिधर्म प्रकाश ५ गास्थधर्म-प्रकाश निय परिमाण निधि ७ अक्समुन्द्र-प्रदेशमार्ग परम पमम परम इनिपल्य ८३३ (१) वीतरागदर्शन-संक्षेप माणपरण-पद पदको ममस्कार. भूमिका-मोक्षप्रपोजन उस दुके दूर होने के लिये मिस मिल मतोत्र पथकारण करके देखनेसे उसमें पीतराग- दर्शन पूर्ण और बनिस, ऐसा सामान्य कपन, उस दर्शनका स्वरूप उसको बोनको बप्राप्ति, भौर प्रासिसे बनास्था होने के कारण मोश्चामिणती गानको उस दर्शनकी से उपासमा करनी चाहिये । बास्पा उस बास्पारे प्रकार वार हेत विचार—उस विचार प्रकार और त विधि- उस वितिके प्रकार गौरव मम्पस्प पनेके स्पानक उसके कारण बोरगके स्थानक उसके कारण उसके कारण पतित होने के स्थानक उसके मण उपसंहार धात्या पापको मपिता पुनिमें पापोर, कामशेष शंसके स्थान पत्र ८१४, ८३५] विविध परमादि मंगा-याँ वर्ष (२) स्वरूपयोष पोगनिरोप सर्वधर्म-स्वाधीनता धर्मति सर्व प्रदेश सपूर्ण गुणारमकता स्वांग सपम लोकके प्रति निष्कारण अनुपा ८३४ बम्बई, कार्तिक बदी ९, १९५६ (१) अवगाहना अर्थात् जागाहमा । वगाहनाका मर्य कर-भाकार-नही होता । कितने ही तत्वके पारिमापिक शम्द ऐसे होते है कि बिनका मर्य दूसरे शम्दोंसे म्पक नहीं किया जा सकता मिनके अनुरूप दूसरा कोई शब्द नही मिसा, तपा को समझे तो जा सकते हैं, पर म्यक नही किये गा सकते। बगहना ऐसा ही धन्द है। बहुत बोपसे विशेष विचारसे पह समझमें मा सकता है। वगाहना क्षेत्रको अपेक्षा है। जुरा यनेपर मी एकमेक होकर मिठ गाना, रि मी पुरा राना-पस तय सिदारमाको मितनी क्षेत्र म्यापकता है या उसकी अवगाहना कही है। (२) जो बहुत मोगा जाता है, ए बात क्षीण होता है। समतासे कर्म भोगनेपर उनकी निर्भय होती क्षीण होते है । शारीरिक विषय मोगते हुए शारीरिक शजि क्षीण होती है। (१) बानीका मार्ग सुसम होनेपर मी उसका पाना कठिन है। पहिले सबा हामी चाहिये। उसे पहिचानना चाहिये, उसी प्रवाति जानी चाहिये । परमें उसके पचनपर अशा रखकर निक पासे चम्नेसे मार्ग मुग्म है, परन्तु दानीका मिम्मा और उसकी पहिचान होना विकट (दुर्सम है। ८३५ बई, कार्तिक पदौ ११ मगर १९५६ • जाने चाप बने द्रम्प तो स्वमात्र मिल सुप्रतीतपणे बने ने समनाप के समास घेतन नियमा छे सर्वधमात्र, मया ते शेयपण (न) परन्याय । एको अनुमानो प्रकाश उष्ठासित पयो, नापी उसो तेने मामहति पाय ऐ; पानी पिसाप माषा सरपे मापा एका निर्मपनो पप मा भानो उपाप । •पा मोर गप ऐनॉग समाप मित मिश्राइन रोनौग मुनीति पर मातम भोले व मा साटन ! भोर गरेर पम्पमा नागने पर इम्म गति इस मनुमएम भिमा मालित मा । ती गाने उजन पिराचा भाममा चिरोटी गयी या विस्मात्परगे मगन हो यो । ऐने Aषाको भरमा समपनगर।
भीमद् पचन [१९८५ (२) x देश चीन एकरसे मासे मान बरे, क्रियानी प्रवृति पण तेपी तेम पाप के जीवनी उत्पत्ति बने रोग शोक तुम मृत्यु, दोनो समान नागपदमा पणाप छ । एमो ने वनादि एकहानो मिथ्यालमान, शानिनोचन दो रई गार थे। मासे गा मैतम्पनो प्रगट समार मिन, बने इम्प लिय निनरूपे स्थित पाप के। * जम बरा मे मुस्पु मुस्ल्स हुसमा हेतु । कारण तेमा ये का रागद्वेष भणहेतु ॥ + बचनापत वीतरागना परम शांतरस मूळ । मौषम में मबऐगा, परने प्रतिळ । प्रामामा का रक्षक, वन और हितकारी, पदि ऐसा कोई उपाप हो वो पापीतरागधर्म है। संतजनो ! मिनेनपने मेक बादि को समय वर्णन किया है, एकातिक मावा पोगाम्पास और लोक मादिके स्वरूपका निरूपण है। प पूर्ण पोगाम्पासके बिना भानगोबर नही से सकता । इसम्पेि तुम अपने वपूर्ण जानके माधारसे पतिरागके पापोंका विरोध करनेवाले नाही, परन्त योगा बम्पास करके पूर्णतसे ठस सरूपक जाता होगा । ८३६ बई, कारिक यो १२ १९५५ (१)ोम्युशन—महामारीका टीका । टोकेके नामपर देशो गल्टरोने या दफान सभा किया है। विचारे पोरे बादिको टीकेके झामे वे नवासे मार करते है, हिंसा करके पापा पोपम करते है–पाप उपार्जन करते है । पूर्व पापानुबया नो पुष्प उपार्यन किया है उसके योगसे होने वर्तमानमें पुम्पको मोगते । परम्त परिणाममें वे पाप होइसा करते है--सका विचार सरोवर मी मही है। टोप बगानेसे पब रोग दूर हो नाप तबकी बात तो सयो, परन्तु इस समय तो उसमें हिंसा प्रगट है। टीका गानेसे एक रोग दूर करते हुए दूसरा रोग मौसा जाता है। xt भोर र भमनने पक्षम्म मधिोरममा मचि मानवी शरी मी मोर ऐप णेशात मातुमबो पत्र समापा माले पदम माम ऐच। पेण ये मनपान र मोर ग एम मानने मिनालमन यापनौके पनरो वा । म स्त समयमा मौर कपालमा मिमिव मातम होने watौर रोना मनसे नमसम्मम दिसतोयो। •सम्म पीपल को मारमा रोकन + पीपणा वचनापत रएम सावरणे समक्पेनकी मौत काम पुनको प्रतिसेची।
पर 1.04.] विपिप पर मावि संप्रह-श्यों पर्प (२) प्रारम्प वौर पुस्पार्य शम्द समझने योग्य है । पुरुषार्थ किये बिना प्रारम्पकी सार महीं पा सकती । यो प्रारम्धमें होगा पो पेगा, यह कहकर पेठे यनेसे काम नही पता । निष्काम पुरुषार्थ करना चाहिये । प्रारम्बको समपरिणामसे बेदन करना-भोग लेना-त्या बा पुरुया है। सामान्य जीव समपरिणामसे विकल्परहित होकर यदि प्रारम्पका बेदन न कर सके, तो विषम परिणाम बावा ही है। इसलिये उसे न होने देनके लिये-कम होनेके म्येि-उपम करना पाहिये । सममान और विकल्परहितमाव सत्सगसे बाता और पाता है। ८३७ मोहमपी क्षेत्र, पोप बदौ १२ रवि १९५६ महारमा मुनिषक भरणको, सगकी उपासना और सत्शासका अप्पयन मुमुखोंकी मारम- पको दिका सदुपाय है। यो म्पों इदिय-निमा होता है, यो म्यों नितियोग होता है, पों स्पों का सत्समागम दौर मशात अधिकाधिक उपकारी होता है। ॐ शान्ति शान्ति शान्ति । धर्मपुर, बैत्र वदी १ रवि १९५६ • पन्प वे सनिबरा ने पासे सममाने, मानव शानिए मठवा वनमनरपने सापा । दम्पमाम सपा ने मासे सापी मिननी पापा, पन्य है मनिसरा न पासे सममारे ॥ (२) बाप वौर स्तर समाधियोग यता है। परम शान्ति । (२) माननासिदि ८३९ श्रीधर्मपुर, क्षेत्र पदी १ पुष १९५६ ॐ समस्त ससारी चीन कर्ममशसे साता वार मसाताके उदयको अनुमन किया ही करते है। उसमें मी मुख्यतया तो वसाताका ही उदप अनुभवमें वाता है। कचित् वपना किसी किसी दो संयोग पपि साताका उप मषिक भनुमबमें माता दुजा माम होता है परन्तु पस्तुत ही मी पदोह ही प्रमितावा करती है। पूर्णशानी भी जिस वसाताका वर्मन कर सकने योग्य पधम योग पारण नहीं करते, सी पनतान्त बसाता इस बीचको भागनी है, और यदि ममी भी उनके कारणों का नाश न किया जाय तो ये मोगनी पड़ेंगी ही, या मुनिश्चित है-ऐसा नानकर चारपान उत्तम पुस्प उस वारुप साता भार मापायंतर सोश-पमिलपसे प्रमाणित वसाताका नास्पतिक • उम मनिपतचे समभावपूर्वक यो । तर मानत है और शानिति मिन्है। मिरे मन पचन भोर कार सवे। तब ब्रमा मात्र को पानी बोने पर निममयान्सपी मापीरी। म मिस्र्यमे कम बोसम्मानपूर्वक पवे ।।
भीमद पवन [पर ८५९ रियोग करके मार्गको गवेषण करनेके लिये तत्पर हुए, और उस समार्गका गोषण कर, प्रती- तिकर, उसका यपायोम्प वारापन कर, वप्पाबाष BOसाप मामाके मन मुम समावस्म परम पमें न हो गये। साता असावाका उदप अपना मुमप प्राप्त होनेके मूह फरणोंकी गवेषणा करनेवाले ऐसे उम महान् पुरुपोंको ऐसा विभक्षण सानद मारपर्यकारक पि व्दत होती पी कि साकी अपेक्षा असताका उदय प्राप्त होमेपर, और उसमें मी तामास उस उदप प्राप्त होनेपर, ठनका पाप पोप रुपसे मारत होता था, उमासित होता था, मौर यह समय अधिकतम्से कायाणकारी समक्षा गाता था। कितने ही चरणविशेषके योगसे म्ममहारदरिस, रे प्राण करमे पाम्प भौषध मादिको बाममर्यादामें राकर प्राण करते थे परम्त मुल्यतया ये उस परम उपशमको हासोहर बौपषस्मसे उपासना करते थे। (१) उपयेाग म्हणसे सनातन हरित ऐसी बाहमाको देहसे (मस और कामणि शरीरस) मी मिम मममेकम करमेकी रधिको साम्प कर (२) पामक स्वमान-स्मा-निरतर देशक समामाली होनेसे मापदशाको रक्तक प्राप्त न हो, तबतक सात-सातास्म बनुमनका बेदन ए बिना यमेवामा नहीं यह निश्चय कर, (१)निस मुभाशुभ परिणाममात्यको परिणतिसे यह पता बसाता बप करती है उस पाराके प्रति उदासान होकर; (१) देश बाविसे मिम और सस्प- मर्यादा पमेवासी उस बारमा बो पर समानरूप परिणाम पारा है, उसका बापंचिक विपोग करनेका सम्मार्ग प्राण र, (५) परम पुर चैम्पत्तमान प्रधशम्प पर बारमा कर्मयोगसे यो सकर्मक परिणाम प्रदर्शित करता है उससे सपाम प्राप्त कर मिस तय सपशमयुक्त मा गाप उस उपयोगमें और उस स्वरूपमें स्पिरमा माय बचठाणा पाप, ही म्बा, यो भावमा, प्रो पित्तना और यो सहर परिणामहप समान करना उचित है। मामानों की बारम्बार यही शिक्षा है। उस मार्गको गोषणा करते गए, प्रतीति करमे दमा करते हुए, उसे प्रस करने इम करते र, बाहमापी जनको परमातामहप देव, सरूपनैष्ठिक निस्पर निर्मपरूप गुरु, फ्रमदपास पम्पहार वौर परमतरस रास्पबाम्पमय सम्म स्मार्ग सम्पूर्णता पनेतक, परम मजिसे उपासना करने योम्प में दो बात्माके कस्त्यामधा परम कारण है। मीसम नरयाए, लिरिपर्माप देवमणुपगई। पचोसि विमादुम्स, भापरि मिणमारणा नीम ॥ --मयर नरातिमें विपंचगतिमें बार बुझेर तपा ममुप्पगतिमें है गाने टीम एमको पापा, इसपिप बब बिनमा नाका (बिनभाषान् बो परम शांतरससे परिणमकर समस्प हुए उस परमशतस्वरूप मिलना) मा नकर-पितान कर (बिससे उन मर्मत रोध भास्पतिक योग होकर परम बम्पाबाप मुस-सम्पति प्रास हो)। शांति प्राति सति । (२) गाँ बनावि मसावित मासे संमत्र होती हो और यहाँ नितिक योग्य विशेष कारण हो ऐसे में महान् पुरको पिार पातुर्मासस्म स्पति करना चाहिये । पति ।
पत्र ८१.] विषिष पत्र मादि समा-पाँवपे ११ १ उपशमश्रेणी में मुख्यरूपसे उपशमसम्यक्त्व सभव है। २ बार धनघाति कोका क्षय होनेसे मतण्य कर्मको प्रहविका मी क्षय होता है, और उससे दानातराय, कामांसयप, मीयांतराय, भोगांतराय मौर उपमोगान्तराप इस पोच प्रकारके तरापका क्षय होकर, अनंत दानधि, बनत सामसपि, वर्नत पौर्यउम्धि नौर जनत मागउपमेगामि मत होती है। इस कारण गिसका बरा वसराय फर्म क्षय हो गया है, ऐसा परमपुरुष बनत दान वालि देनेको सम्पूर्ण समर्प है। तयापि परमपुरुप पुनरु द्रम्पहपसे इन दानारि उम्भिोंकी प्रति मही करता। मुम्यतया वो उस सम्भिकी प्राप्ति मी मामाकी स्वरूपभूत होते, क्योंकि यह प्राप्ति क्षायिकमावसे होती है, गोपिकमारसे नही इस कारण वह बारमस्वमारकी स्वरूपभूत ही है। सपा को मारमा मनत सामर्थ्य ममादिसे पाकि- रूपसे मौम्ट थी, उसके पक्क होनेसे मारमा उसे निजस्वरूपमें छा सकती है--तड्प पुर समापसे पर उसे एक समावसे परिणमा सकसी है—उसे वनंत दामउम्धि करमा चाहिये । इसी तरह बनत बामसाममेकी प्रातिमें किंमित्माघ मी वियोगका कारण मही या, इसउिपे उसे मनत खामधि करना चाहिये । तया बनत वास्मसामग्रंकी प्राप्ति सम्पूर्णरूपसे परमानंदस्परपसे अनुमपमें माती है। उसमें भी किचित्मात्र मी नियोगका कारण नहीं या, इस कारण उसे बनत मोगउपमोगम्धि करना चाहिये। इसी तरह अनत वारमसामयेकी प्राप्ति पूर्ण होनेपर, जिससे उस सामपके बनुमबसे भारमशति पक नाप, उसकी सामर्यको म उठा सके, न न कर सके, अपना उस सामर्पको किसी भी प्रकारके देशकासका मसर होकर, किंचित्मात्र मी म्पूनधिकता कराये, ऐसा कुछ भी पाकी नहीं रहा, सस स्थमा पानेको सम्पूर्ण सामर्प विकास सम्पूर्ण बससहित एना है, उसे वनंत पार्यसमि समझना चाहिये। क्षापिकमावकी शिसे देखनेसे उपर करेगनुसार उस अधिका परमपुरुषको उपयोग यता। तपा ये पोच सधियों हेतुविशेषसे समताने मास्ते ही भिम भिम बताईमही तो मनस्ताप सम्भिमें मी उन पांचोंका समावेश हो सकता है। भामामें ऐसी सामर्थ्य है कि मा सम्पूर्ण गोर्यको प्राम रोनेसे, इन गो मुधियोंन पुगस प्रम्पला उपपोग कर सकती है। पारितस्य परमहरमें सम्पूर्ण पौवा समार होनेके घाण का उपयोग संमा नही । भौर उपरेबाकि दान-पसे जो उस स्वाप परमपुरुषको प्राति है, यह पोगाश्रित पूणिरके अप हानेस ही है, ममतमारके पित् मी शितमारसे मदी। इस तर संक्षेपमें उचर समधमा । निखिमय भामर प्राप्त कर अधिकाधिक मनन करन विशेष समापन और निर्यप होगी। सोहाग विमानाको अनुपा करमसे बरत कमा पप सेवा है।न्ति शान्ति शान्ति:
भीमद् राजबम्ब [पर ८४ , ८४१, ४१ ॥ ८४० महमदाबा भीममाप वैशास सुदी ६, १९५६ (१) वाय त्या वारिके सबध बो कहा है, वीर गोगारोपण किया है, उस मा मत राना सफल होगा। (२) एक शोक पलते हुए हमें हग शामका मान होकर उसमें उपयोग किर गाता है। (२)'चतुरंगत गसे मिग-पा मागे जाफर समयमें मारेगा । ८४१ मोरबी, पेशास मुदौ ८, १९५६ भगम्हातामें पूर्वापर-निरोध है, उसे देखने के लिये उसे भेजा है। पूर्वार-मरोध स्या है पद मागेका करनेसे माश्म होगा । पूर्वापर-मनिरोग दर्शन और पूर्वापर प्रविरोष बचन तो बातम्गके हैं। मगमताके पर विषारण्य स्वामी, कामेमरी वालिका बनेक माय-टीकापें रखी गई है। हरेक कोई भपनी मनी मान्यताओंके ऊपर से गये। पिपासोमाणी टोका भो तमो मेनी है, पवधिक स्पर। मणिलाम नमुमईने (गीताके ऊपर) चिनप्प टीका करते हुए गुत मिभण कर पाहै-- सिपी बना दी। विद्वत्ता और दानको एक नहीं समझना पाहिये- एक नही विचारों सकती है फिर भी शान महो। सथी बिश्ता तो यह रेपो वास्माके ये हो जिससे बारमार्य सिरो, माण्मतत्व समझमें मापा प्राप्त हो । यहाँ मामार्थ होता है पाबान होता है, यहाँ विचाहो मी सकती है माही मी। मणिमई (पदर्शनसमुपपको प्रस्तावमा ) आते है कि हरिमस्त्रिको मेदांतको मार म पी। पPि में बान्तको समर होती तो ऐमा मुशाम दिया हरिमारि बैनवर्धनका बोरसे अपनी बपिको फिराकर बेदाती कर बाते' । मणिमाकि पे पचन गत मठाभिनिषेासे निकले है।हरिभवमूरिको वेदांतको भर पो पा नहीं-स गातको मणिमानि पदि दरिमवसरिकी पाणी देसी होती तो उनें सबर पा बाती । हरिमनस्किो दाँत वादि समस्त नोंकी सबर पी। उन समस्त दर्शनों पर्यावनापूर्वक हो उन्होंने मैनदर्शनको पूर्वापर-बविरोध प्रतीति की पौ । या अवलोकनसे माम परेगा। पानसमुपपके मापातरमें दोष होनेपर मी ममिमाईने मापावर ठीक किया।या सुमारा ना सकता है। - ८४२ मोमोरबी, शारी. १९५६ ॐ वर्तमानकामें क्परोग निरोप मापौर माता जाता है इसका मुम्स कारण प्रामपकी कमी भावस्प और निफ्प बाविकी बासहि। पपरोग मुस्प सपाय सध सेवन, धम सालिक मार-पान और नियमित मर्दन । ८४३ पपाणीवा पैशाख १९५५ १. पपा बादशा सम्पयशा बौर उपशमदसाये तो जो पपा मुममु गीत सम्पुस्पके समागममें भाव मानता है।
11] पिविष पत्र मापि संप्रह-वों व उपर बिनके उपदेशसे पैसी दशाके भश प्रगट हुए हों, उनकी अपनी निनकी दशा मे गुण कैसे उत्तर गने चाहिये, उसका विचार करना मुगम है, और जिनका उपदेश एकांत नयात्मक हो, उससे कैसी एक भी दशा प्राप्त होनी समष नहीं । पुरुषको पाणी सर्व नपारमा गती है। २ दूसरे प्रश्नों का उत्तर (१) प्रश्न'-क्या बिन-बादा-बारावक स्थाप्याय-प्यानसे मोक्षी या और किसी सय । उत्तर – तपारूप प्रत्यक्ष सहरुके योग, अषका किसी पूर्वके छ माराधनसे अप गिनाडा पपार्प समझ जाती है, उसकी यपार्थ प्रतीति होती है, चोर उसका पधार्थ माराधना होता, तो मोक्ष होता है, इसमें सदेह नहीं । (२) प्रश्न -बान-प्रशासे सर्व वस्तुमोंको बानकर, जो प्रत्यारूपान-प्रशासे उनका परसाण करता है, उसे पति का है। --मह यथार्थ है। मिस शानसे परमावके मोहका उपशम अथवा क्षय न मा हो, उस शानको मान करना चाहिये। अर्थात् शानका लक्षण परभावके प्रति उदासीन होना ही। (३) प्रश्न --या एकांतवान मानता है, उसे मिप्पाची कहा। उपर ---पायपाएं। (१) प्रश्न -जो एकातक्रिया मानता है, उसे मिष्याची कहा है। उत्तर ---यह पपार्थ है। (५) प्रश्न ---माक्ष मानेके चार कारण करे । तो क्या उम चारमसे किसी एक कारणको छोगार मोक्ष पाते , अपवा चारोंके स्योगसे मोक्ष गाते है ! उत्तर -म, दर्शन चारित्र और सप ये मोक्षके चार कारण वे हैं, उनके परस्पर मविरोषमासे प्रास होनेपर ही मोक्ष होती है। (२) प्रस्न -समक्ति वप्पाहमको शैठी किस तरह। सत्तर --पपार्थ समझमें मानेपर परमावसे वायविक निधि करना यह बयारममार्ग है। नितमी मितनी निति होती है, उतने ठसने ही सम्यक् षश होते है (७) प्रश्न -प्रससे रातो रो-स्पादिका क्या मर्ष है। उचर --मुहम्में बासक्ति होना मिप्पालमान है। (८) प्रस्त --बतररमा परमामाका प्यान करे 'स्त्यादिका स्पा वर्षहै। उत्तर -अतरारमहपसे वो परमात्मस्वरूपका ध्यान करता है, पर परमारमा हो जाता है। (९) प्रश्नःमें कौनसा स्थान हतारे स्पादि । उत्तर -सहरुके वचनको बारम्बार विचार कर, अनुप्रेक्षण कर, परमासे वात्माको मसग करमा। (१०) प्रश्न: -समकित माम रखा कर, विषप भाविको बाशा और पुरष्माके सेवन करने में कोई भाषा नही, गौर हमें च मही है-ऐसा गो कहता है, क्या या पपार्थ करता है। मानाके मार्गको ररिसे देसनेसे तो पा मात्र मिष्याही कपन कातामो0- - - ७१७ भीमर्पमचन्द्र [पा 40 ४५ मापसे तो मोग करते जाना और काना किबामाको धर्म गते नही, वो पानीको सपिका पचर माही- केर वचनमानांकन हो पपन है। (११) मन मैनदर्शन करता है कि पुन्नम्मानके कम होनेपर बारमप्पान फमैमूत होगा, तो क्या यह ठीक है। उत्तर -पा पपार्य करता है। (१२) प्रश्न -समानशा सा कर देती है। उच्च -पर पारूप सम्पूर्ण हो तो मोष होती है। (१३) प्रश्न विमाक्दसा क्या फल देती है। उत्तर -जम्म, नय मरण मा संसार । (१०) प्रश्न पतिरागको मायासे यदि पोरसाको स्वाप्याप करे तो उससे क्या फल होता! उत्तर --तपास्म हो तो यावत् का मोक्ष होती है। (१५) प्रश्न वीतरागको बाबासे पर xपोरसौका पान करे तो क्या फल होता है। उत्तर - तपाइस हो तो पावत् का मोक्ष होती है। -स तब तुम्हारे प्रश्नोंका संक्षेपसे उत्तर डिसवा ।। १ लिकमाष मेहकर, बनवान मेकर कल्पित भिनिषेपका स्पागकर, यो गाव प्रत्यक्ष शानीको मात्राका बाराषम कर, तपारूप उपदेश मेकर, पास्म मास्मार्पमें प्रधि करता, उसका जप कम्पाण होता है। निमकाफ्नासे पान रर्शन पारित्र मारिध स्वरूप को मिस वर समझकर, अपचा निय- पाहमा यो सासकर, गो सम्पमारके गोप करनेमें प्राधिकरे, उससे बाहमाका कम्पाम होना समय महो। ममा कम्पित म्पसारके राममे रके रखकर, प्राति करते हुए मी चौरका सम्पाण होना संभव मही। - म्याम्पा में पोप वहां समन तेह। स्पस्पते बापरे गामापी मन ।। एक क्रिया-परसमें अपना पकात पुफानसे बापका कम्पान नहीं रोष । ८४४ समालोमा, पैशाख पदी ८ मगड १.५६ * प्रमत्त मस्र्पत प्रमत्त ऐसे बारको गौर , र परमपुलले बप्रमत्तमें साम मामादि कही। सम्मेि उस पिरोपके शांत होनेके हिप परमपुरुप समागम-परमध पोग-की परम हितकारी।शान्ति ८४५ माणीमा वैशाख पदी दुष १९५६ ॐ मोघमागमें प्रदातर पपन प्रसंगारिशेपमें कोई पापार करनेको पति हो तो करना । उपोटात बादि रिसनेको चिोपो विसना बारमचरित्रवि उपतरमा । पए प्रभार परिष। इसमें प्रथम सपा मोम भारमान माना।
पब ८४६, ८.] विषिष पन मावि सपा-पों पप उपादातसे पाचकको, श्रोताको, माय वन्य मातरको दृति विस्मृत होकर, निस्से हानी पुरुपोंके बारमस्वभावरूप परमधर्मक विचार करनेकी स्फरणा हो, ऐसा सामान्पत सम रसना । यह साग सूचना है। शान्ति ८४६ पाणीमा, वैशाख वदी १५ शनि १९५६ ॐ नहाँ मात विरोधी गृहमासीमन अफ्षा यहाँ बाहार आदिका बनसमका सकोषमाष यता हो, यो चातुर्मास करना योग्य नहीं, मही तो सब क्षेत्र भेयकारी है। पाहमापाको निक्षेपका क्या हो सकता है। उसे तो सब समान ही है। वाममारसे विचरते हुए ऐसे कार्य पुरुपोंको धम्प है। शान्ति । - ८४७ वाणीमा, वैशाख पदी १५ सोम १९५६ (१) से वार्य मुनिवरकि जिप पनिोपभाव संभव है। विनयमलि यह मुमसुमोका धर्म है। बनाविसे चपल ऐसे मनको स्पिर करना चाहिये । प्रथम मह वापतहमसे सामने होता हो तो इसमें कुछ बापर्प मही । क्रम क्रमसे उस मनको महामार्योन स्थिर किया है-रान्त किया है- क्षय किया है-यह सचमुच बारचर्यकारक है। (२) -सायोपशमिक असरप, लायक एक मनप-अप्यारमगीता मनन और निदिप्यासन करमेसे, इस पारपसे गो परमार्य अतस्मातिमें प्रतिमासित हो, उसे पपाशचि सिमा पोम्प । शान्ति * पपार्यरूपसे देखें तो शरीर मेनाका मूर्ति है । समप समपपर जाप उसके हा माझा ही बनुभव करता है। चित् साता मीर मही ता प्राय पर बसावाफा पेन करता है। मानसिक बसावाको मुस्यता होनेपर मी या सूक्ष्म सम्पपरिको मादम हो जाती है। शारीरिक बसाताफी मुस्पता त्यूस रविानको मी माश्म हो जाती है । गो वेदना पूर्वमें मर भनसे नौतन बाधा, उस बेदनाके उदय रोनेपर उसे इव, चन्द्र, नागेन्द्र अपना गिनेत्र मी ऐफमको समर्थ नहीं । उसका उदप चारको पेन करना चाहिये । महामष्टि जीव उसका मेस मेदन करें, तो मी कुछ पद ऐमा पटती मही, अपना होती कती महो। तपा सस्पारिवान गौर प. उस तमासे पेन करे, तो पर वेदमा वा नही पाती । , यह नवीन पपका मही होती-उससे की बडसन निरा होती है। मामापीको पही पम्प है। •बामणमा मरमस मनु रिमाप एक और मनमोरा।
४ भीमद् रागवान [पत्र men मानसे तो भोग करते गाना भौर करना कि नामाको कर्म ठगते नही, पाशानाय रसिका वचन मही-पप बचनमानाका दीपचन है। (११) प्रश्न -बनदर्शन कहता है कि पुगठमाके कम होनेपर बामम्मान फसाम्त होगा, तो क्या पद! उत्तर -यह यथार्य करता है। (१२) प्रश्न --समारसा क्या फळ देती है। उत्तर - तपास्म सपूर्ण मोश होती है। (१३) प्रश्न --विमापदशा क्या फल देती। उत्तर ---साम, सरा मरण बादि ससार | (१) प्रश्न ---पीतरागको वापसे पार पोरसीको स्वाप्पाय करे तो उससे क्या फल होता! उचर - तपारूप हो तो पावत् कस मोक्ष होती है। (१५) प्रत-तण्गकी बादासे यदि xपोरसीका प्यान करे तो क्या फल होता है। उचर -- तपारप हो तो पावत् का मोश होती है। --इस पर मारे प्रश्नोंच संक्षेपसे उच्चर रिसता । १ लौकिकमान भेरकर, पचनशान छोपकर, कम्पित विधिनिषेपका स्यागकर, नो मान प्रत्यक्ष मानाची वाहाका वाराधन कर, तपारूप उपोशडेकर, तपाइप मामा, प्राति करता उसप माप कास्पाम होता है। मियफम्पनासे बात दर्शन चारित्र मादिका सरूप पाहे बिस व्य समाकर, अपना निय- पात्मक मोड ससकर यो दम्पहारके मेप करनेमें प्रापि करे, उससे बहमात्र त्याण ऐना समन महा। नपना कम्पित म्पयहारके दुममें से एकर, प्राधि करते हुए मा गोमा कपाम होना समय नहीं। • म्याम्पाने में पोम्प थे, वह एमग तेह। स्पोत्पते बाचरे, बात्मापी बन एर।। एकच दिया-सप्तमें अपना एकच प्यानसे बौनका कपाल मही हावा । ८४४ स्वामीमा शायदा ८ मंगळ १०५६ प्रमत्त बापत प्रमच ऐसे मायके जान बौर परमपुरपनि वाममें सहग पाहमतिमा। इसथिये उस निरोपके शांत होनेके लिये परमपुरुष समागम-चरणका पोग-की परम बिकारीहै।शान्ति ८४५ सानोमा शादीशुष १९५५ ॐ मोघमाध्यमें शदातर नवा प्रसगतिशेषमें कोई पापांवर पानेको पिहो तो करना । ठपोबाट बादि भिमे पिहोतो मिसना । मोवनचरिको चिउपत करना । x एक प्रमाण पतन ।म प्रम रखा ममान सम मा वा।।
पर ८१,८५२,८५५ ८५४] पिपिप पत्र मादि संप्रह-शायर्प समयके अनुसार मनुप्यकी प्रकृति न हो तो मनुष्यका बबन नही पाता । या बननरहित मनुष्य इस जगत्में किसी कामका नहीं । अपनेको मिर्गा मनुप्पदेह भगवान्की मकि और मछे काममें म्यतीत करनी चाहिये । मनुप्पता, ८५१ पाणीपा, म्येन यी १०, १९५६ पत्र मिडा । शरीर प्रकृति ससस्थास्तस्य यती , विशेष करमा योग्य मही। हे बाप । मर्मुस धनेका वम्यास करो । तिः । ८५२ माणीषा, ज्येष्ठ महा १५ पुष १९५६ * परम पुरुपका भभिमत अम्पवर मार माघ दोनों सममका उष्ठासित मक्तिस नमस्कार ! मोश्चमालाफ सबध नसे तुमें मुम्न हो रेसा करो । मार्यसा, पानी के पवनोंका श्रषण, उसके प्रति बास्तिस्यमार, सयम, उसफ प्रति वीर्यप्रवृत्ति, प्रतिकूल योगोंमें भी स्थिति होना, बतपर्यंत सम्पूण मागरण समुद्रका पार हो जाना- उत्तरोतर दुळम और वायत कटिन है इसमें प्रदेश नहीं । शारीर-याति कपित टीक देसमें भाती है, भौर कचित् उससे पिपरीत मी देखने में बाती है। इस समय कुछ बसाताको मुमयता देखनमें जाता है। शान्ति (२) ॐ चायाको समस्त सपतिको अपेक्षा मी बिसफा एक समयमात्र मी मशप मम्पवान है, एसी इस मनुष्योहकर, भौर परमार्थको अनुकून पाग प्रान रोनेपर यदि गम मरणसे रहित परम- पाच पान न रहा, तो इस मनुप्पप्रन्मका अभिष्टित इस मास्माको जनतबार विहार ।। विहोंने प्रमाका जय किसा, उन्होंने परमपरका जय किया । पति . शरीर प्रातिको अनुहल-प्रतिकूलताक आधीन उपयोग करना उचित नहीं । शान्ति ८५३ रिसमे ममपिता प्राप्त हो, उस मगिकोरितामगि का है। यह यही मनुष्पक बिस देह-योगमें-भापनिक सबा अप करनेका चितन किया हो ता पार पानी हा विसका अधिन्स्य माहाम्प है, मा मसंगरपी कम्पार प्राम दोनपर भी गौर दरिद्र बना दे, यो इस नगमे यह ग्यारहला भामर्प है। बागीमा बास और गुरु १.५६ ॐ दो समप उपदेश बार एक समय माहार-मादा, तया निटा समपका पाकर गापाका भीम राष्ट्र [१८४८५ में शरीर नहीं, परन्तु उसमे मिल सापक भास्मा , मार निस्य शस्त | या वेदना मात्र पूर्णकर्म है, परन्तु या मरा सम्प ना करने समर्थ नहीं। इसलिए मुझे क्षेप नहीं करमा चाहिये-नस नए वास्माका अनुप्रेक्षण होता है। ८४८ पवामीत्रा ग्येष्ठ मुरी १२, १९५५ आर्प निमुवमके अम समपमें शापिसे दोसर्ग करने लार मुमी। मुठ मुमुमुने मप स्पान ग्रहण किया। गावर विविध प्रकार मुम्य स्थान है। दरको इन्द्र त्या सामान्य प्रतिशत मादि स्थन हैं। मनुप्पोममें पकाती बामप, बाप, तपा मालिक मानि शान है। तिर्योंमें भी कहा इस मोगम्मि बार स्पान । उन सब स्पानोंको बीच छोगा इसमें स्सर नही। ये गाति, गोती और मधु मादि इन सबक जना पत यनिय बास शान्ति ८४९ पाणीमा, ग्पेष्ठ मुग ११ सोम १९५६ ॐ मुनियोंमे पातुर्मासमंत्री मिसि । सफता है। निप क्षेत्रको सिभिसे बारे सिकाता कोई सबल ही नहीं। निर्मश्च मामाओंका दर्शन पर समागम मुक्तिको सम्पर प्राति कराते हैं। पास महामाभों एक धार्प पचनका सम्पाप्रकारस मापारण हानसे यावर माउ मोश होती है मा श्रीमान् वायरन बहादह पपाप।इस जीवमें तपासण पायवाचनासम्ता शान्ति । (२) * पर भार समयमारको प्रति मित्री । फुटकुटावापान समयसार मय है। इस कपमा गुगर और अन्य विषय भी है। नप उतम । मा त्रिभुवनकी सामग बरमको गदर मि उममे को मार पपाप है। पमे का जाई विमुम्म जैसे मुमरि है। दिन प्रतिनि नासपा बसी रमा सर-मस्ति सा माती पीता गामनाम NिR कर, लिप्पिामन कर बामाका सनुपापी परिणनिका गिम गेरा- उमा माप उपा। उसकी शिर बापु पाती तो र मुमुक्ष परिक Kuीम परमपिआय प्राधिकरता । राति पनि सति सागोगा भाग-१.५५ म्पमा पानेगा भार नियमो गनगे मपम । पगममे सपा गान अपमान र म मन पर होगतारामगरम हार और परोरा पम्पा एक गला।
पत्र ८५६, ८५०, ८५८] पिविष पर मादि सप्रह-लों वर्ष पपनन्दि, गोम्मटसार, मारमानुशास्न, समयसारम्छ श्यादि परमशांत मृतका मम्पयन होता होगा । बारमा के मुद् स्वरूपका स्मरण करते है । शान्ति मोरयी वापर सुरी १९५६ १ मनमरसनिमर्ष राष्टियुग्मं प्रसन, पदनकमसमा कामिनीसंगभून्पः । करयुगमपि यसे प्रससरंपपर्य, सदसि नगति देयो पीठरागस्स्पमेन ॥ -वेरे दो मेत्र प्रशामरममें सूखे हुए हैं-परमशत रसका अनुमब कर ये है। तेरा मुसकमठ प्रसन-उसमें प्रसमवा म्पाप हो। तेरी गोदी बीके सगसे रहित है। तेरे दोनों हाय शमसे गत है, वर्षात् तेरे हायोंमें शम नहीं है-इस तद देव ! जगत्में ही बीतराग है। देव कौन । वीतराग । दर्शनयोग्य मुद्रा कौनसी ! यो बीतगगता सूपन करे । २ स्वामीकार्तिकेयानुप्रेक्षा राम्पका उत्तम प्रप है। ब्रम्पको-वस्तुको-पपावत् मधमें रसकर, इसमें पैराग्यका निरूपण किया है । गतवर्ष मद्रासको बोर गाना मा पा । कार्तिकस्वामी इस मूमिमें मात बिपरे है । इस बोरफ माम, भम्प, उसे और वगेड पिसे सो हुए पहा देसकर, स्वामी कार्तिकेय मादिकी बहोम राम्यमय दिगम्बरपत्ति याद माती यो । नमस्कार हो राम स्वामी अलिकेय भाविको! ८५७ मोरनी प्रावण बदी . मगछ १९५६ ॐ संकटके भम्पासके पोगके सबध ठिसा परन्तु जबतक मारमा पुज प्रतिज्ञा प्रति म फरे तबतक बाबा करनी मफ्कर है। निम निपोमें अतिचार बार सगे हों, उनका पास भौमुनियोंसे पपाविधि प्रापस्चत सेकर वारमादि करना उचित है नहीं तो मा मयकार तौर पका है। निपममें सोमठाचारसे प्रवर्तन करनेकी वफेशा मरना मेयस्कर है-ऐसी मान् पुरुषों को वानाका कोई मी विचार नही रस्वा सो फिर ऐसा प्रमाद भारमाको मपकर क्यों न हो। . मेरो माषण M५ मुष १९५६ ॐापित् पदि निति-मुम्प स्पडको स्थितिके उदयका बतराप प्राप्त हो, तोबा । तुम भाषण पदी ११ से भाम्पर मुहर १५ तक सा सरिनप परम मिापिको इस तर सेवन करना कि बिससे समागमवासी मुमुभुमों तुम विशेष उपकारक होमो; और व सब नितिभूत सन्निपोका सेवन करते हुए समान-सम्पपन बादिमें एकाप हों, पपाशकि प्रत निफ्म गुणके प्राण करने में। शारीर-प्रतिमें सबठ बासातनाके उदपसे परि निहरि-मुस्य स्पडका भवराप मास रोगा, तो यहाँस प्राप तुम्हारे अप्पयन मनन वादिके डिपे योगशाम पुस्तक मेफेंगे, जिसके चार प्रकाश एसरे मुमा मईपोको मौ भत्रम करानेसे परम ठाम होना समय है।
। - प्रीम पवन [पब ८५५ पाश मुस्पतपा वामनीभारमें, पपमन्दि नादि शायोंके बगेकनमें, मौर वामप्पानमें पतात करना उचित है। कोई गई पा मई कमी कुन प्रस्न बादि करें तो उनका उचित समाधान करना चदिपे, विससे उनकी मामा त । वपुर क्रिया के निपक पम उपदेवरूपसे न करते पर, मिस तय पर निपामै मेगकी कपि बड़े, उस व्य क्रिया कराते राना चाहिये। उपकरण के लिये, जैसे कोई मनुष्य क्पमा स्पोके बनुसार सामापिकात करता है, तो उसका निषेप न करते हए, जिससे उसका , सम्प उपदेशके भवणमें, सशसके वप्पयनमें अपना कम्पास म्पतीत से, उस तरा उसे उपदेस करना चाहिये । किपिलमान बामासस्पसे भी सामा- पिकमत माविक निपेष लयमें भी न बरे, उसे ऐसी गंमीरवासे एक किसाकी प्रेरणा करनी चाहिये। स्पर प्रेरणा करते हुए मा क्रियासे रहित होकर गांव तम्मत हो जाता है अपना तुम्हारी का बिरसा बराबर मही'--तमा कामेसे मी में दोष देकर ए उस क्रियाने गोर देता है-ऐसा प्रमत गायन समान है और मेगोंकी रसिमें ऐसा जाता है कि तुमने से क्रियाका निरेप किया। किसे मतमेदसे र पर, मध्यस्यात् सकर, अपनी वात्माका वित करते हुए, न्यों म्यों इसकी बामाका हित हो, स्पों त्यो प्रापि करनी चाहिये और मानकि मार्गका, बाल-किमाका समापय स्थापित करना चाहिये यही मिर्मराका सन्दर मर्ग। स्वामहिम बिससे प्रमाद न हो और दूसरेको परियोपमासे मास्तिस्यचिन, पैसा उसका मरण हो, क्रियाको पनि हो, तपा कम्पित मे दम हो, कौर कपना और परको वामाको शान्ति हो इस तय प्राप्ति करानेमें उनामित पि रमना । FAN प्रति बिससे सपियरे स्प करना । शान्ति (२) १ x 1 माटे चमा पर मोग, मिनबर मागन करिये रे। समयचरग सेवा राय देनो, मेम मानरपन मरिये ॥ २ मुमक्ष भाईयोंको मिस तय सक्ती महो उस तय वर्षक किये गमन करनौ बातिकमहीपाति . मोरवी, बापत यी ९ क १९५५ १ सम्पन प्रकारसे मेरमा सहन करमेस्म परमपुस्पोने परमधर्म कशी। २ वाल पेदनाका अमुमन मते हुए सरूम-मधिन यही सम परिणय मार्ग है। 1 उपशम सि शानका मूत है उस शानम पण देना परम निर्जरा मासने पोप है।शस्ति (२) भाषा विकासातची गे मिथिए मा समाप इषा, उसी ममता षमा माँगता। मग तो म८५ पर ८९१,८५२] पिविष पम मादि मप्र-पयाँ वर्ष योग्य है । शानोके मार्गको प्रतातिम निससे नि मशयमा प्राम हा, भोर उत्तम गुणात, निपम शौठ भार गुरु धर्मको मतिम पाप परम उप्ठामित होरर बन करे, ऐसी मुदता करमी योग्य है, और यही परम मगटकारी। ३ यहाँ स्पिति करा यहाँ अपना पसा वर्जन रमना कि जिससे समागमपासपोको जानक मार्गको प्रताति मुरस हो, और रे वप्रमतमानसे मुशीलको दि फरें । शान्ति मोरबी, भाषण १०, २०५६ ॐान योगशाम प्रत्यको सम्म भेगा रिया ।। मुमुझोंके अध्ययन और प्रवण मननके लिये थापग से ११ से माप मा १५ तक मुक्त, नियम भौर आर निति-परापणताके से इस प्रन्यका उपयाग करना चाहिये। ममत्तमारसे इस जीरका पुरा करनेमें कोई म्यूनता नहीं रम्मी, तयारि इस जीवको निव हितका उपयोग मही, पहीले कारक है। र आर्प । दाउमें उस अप्रमतमावको उप्लासित पार्यौ मा पर मशीप्रमाठि स्तर मप्ययन कर निहरिमे वारममावशा पोषण करना । ८६२ मोरबी, धारण १०, २०५६ श्रीपप्पण आरापन १ एफस पागस्प प्रभातमें-(१) गुरुफी उफाट ममितिमे मारामाझे पान दो पीस पार पीतक ठपतन (२) श्रुत-पप्रननि मा िवप्पपन, प्राग मन्याहमें-(१) र परी उनि मन (२) भत-कर्ममप अपन, भाा मुश्ििग आधि पोरा अम्पपन मगर-(१) माम्नाय पार (२) दो पकी उन ()मरिकशनपर्या मर प्रसार गरिमारन माग IT समका मानिस छ गमय . परमारे नि पो, vr etia मी पाग में पिता मो 4मरना। गिपा म्याग (म)। पिप-निगाने भरमम 230 श्रीमद् पमबद्र [११ ८५९ ८५ हे बार्य ! मम्पवायुमाझे तुपमकासमें प्रमाद करमा योग्य मही; तयापि नारावक नीलाको गत् मग उपयोग गता है। भरमकावीनतासे पत्र लिसा है।शान्ति । ८५९ मोरबी, प्रामण बदौ ८ १९५६ (१) पदर्शनसमुश्य, योगपरिसमुचयका मातर गुबरातीमें करना पत्य है, सो करना । मदर्शनसमुत्रयच मातर का है, परन्तु उसे घारकर फिरसे करना उचित है । पोरे पोरे होगा घरमा । बानरमनपौवासाका वर्ष मी विचमके साथ किसना । (२) नमो दुररामादिपरिवारमिपारिने । माते योगिनापाप महापीराप वायिने ।। भावेमचत्राचार्य योगशाबकी रचना करते हुए मगचरममें गीतरागस बयित योगिनाप महापारको सुतिस्मसे नमस्कार करते है। मो रोके कम नहीं सकते, बिनका रोकना बहुत बहुत मुस्किर है, ऐसे रागदेप कानपी मनुके समापो मिसमे ऐका-जीता-जो पीतरण संवाया पोतराग सना होकर गो मांद पूमनीय हवा मोर बावराग वईत होकर, जिनका मोसके लिये प्रवर्तन है ऐसे मिम भिम पोगियोंका मो नाप मा—नेता इवा) और इस तय नाप रोकर नोगत्का नाप–तात-साता एमा, ऐसे महानोरको नमस्कार दो। यहाँ सबके अपापापगमातिश्य, सामाशिम, पचनाविश्य वौर पूमातिशयका सूचन किया है। इस मगन्तरिम समम योगशाखा सार समाविश कर दिया है, सरसका निरूपण किया है, समम पस्तस्यरूप-तमामका-समावेश कर दिया है। कई सोग करनेवामा चाहिये । (१) मैफिक मे में सिको चरा करनेबारे प्रसंग विशेष होते हैं। सभा मेसा तो सत्संगची। ऐसे मेले में तिकी परमता कम है-र ऐती है। इसलिये शानियोंने ससंगके मेका पराम किया है-उपदेश किया है। ८६० मोरबी भाषण बदौ ९ १९५९ 2 जिमाय नमः १(१) परमनितिका मिरम्तर सेवन करना चाहिसे यही पानीको प्रधान वा। (२) तयारूप पोगवसमर्पता हो, तो नितिका सदा सेवन करना चाहिये अपना (१) सामर्पिको मिाये बिमा, मितमा मने उक्ना मावि सेफ्म करने योग्य नम प्राप्त कर, मामाको वप्रमय करना चाहिये यही जाना है। मम्मी चतुर्दशी भावि सिपिपोंमें ऐसे बारापसे नियमित पचनसे प्रति करने बाबा की गई है। २ बिस स्पसमें धर्मका सपना हो, हाँ बाय दी ११ से भारफर पूर्णिमायक स्थिति करना पर ८५१,८५२] विविध पप मादिमप्रर-३यों पर्प योग्य है । बानीके मार्गी प्रतातिमें विसमे नि मशपमात्र प्राप्त हो, और उत्तम गुणात, नियम पास धार देस गुरु धर्मफी भक्ति में वर्षि परम उहामिव होरर बर्थन करे, ऐसा मुसता करनी योग्य है, और यही परम मगरकारी है। ३ जहाँ स्थिति करा यहाँ अपना एसा बर्तन रमना कि जिससे समागमवासियोंको बानाक मार्गको प्रतीति सुरस हो, भौर ने अप्रमपमानमे मुशीयसी पदि करें । ॐ शान्ति ८६. मोरबी, मावण १०, १९५६ ॐ आज योगशाम मयको गफम भेजा Pया है। मुमुक्षुओंके भम्पयन और प्रवण मननफे लिये धापण बी ११ से मारप सुरी १५ तक सरत, नियम और भार निति-परायणता हमे इस प्रन्या उपयोग करमा पाहिये । ममतभावसे इस बारका बुरा करनेमें कोई न्यूमता मही रम्मी, पारि इस जीतको निर दितका उपयोग नहीं, यही कारक है। हे वार्य । दाउमें उस मप्रममावका उष्ठासित पौर्यसे मपरके मुशाउसहित सप्तका सम्पपम पर निरिसे आग्ममापा पोषण परना । ८६२ मोरगी, भाषण १०, १०५६ श्रीपयूपण आरापन १ एक पगरपल्में प्रभातमें-(१) दा गुरुपी उपर मसिमसिमे बारामा ध्यानपूर्वक दोपदी पार पदक उपशांतत (२) भूत-पमननि मा मम्पपन, मा मध्याहमें-(१) पार पी उपकन बत (२) मत-धर्मपम्पमा अध्यापन, प्राग मुगिरगिरी आरिया पारा पपन मका में-(१) मारनाम्य पार (२)पी उपल (२)मपि तानप २ गप FITS रात्रिमाउनघमाग गफ मो मामिर न सपर भरना पगार मि, प, नीरा मी पाग । र यिनिनादो गो ATTI सग। तग ( भागेनि)। TV-दिने भमराम, पर भीम गापाद ८५मारमानलार-प्रमापन ८६३ xम्पासम्पानसार और प्रभसमापान मोरया, मापन सुदी १ र १९५६ १जान रम्पके साप, और पैराम्य दानके साथ होता है-अप्रेम नहीं होता। २ बरम्प शृंगारफे साथ नही पता, भौर भंगार भैरम्पके साप नही पता। ३ वीतराग-पचनके बसरसे गिसे इत्रिप-मुख निरस ना, उसे जानाके वचन कानमें । परे नाही, ऐसा समाना चाहिये । हामीके पचम विषयके विरेचन रामेवा है। ५ छमस्प वर्धात् वावरणपुक्त । ६ शेषशीकरण (र-पशि-महान् ) गतिमि महान् मेरके समान बचा-बग्ग | ७ बर्षप गुणवाा मन बचन कापाके योगको स्थिरतामाण ८ मोक्षमें महमाके बनुभएका यदि नारा होता हो तो फिर मोच किस कामका ! ० वारमा ठपवमान है बदनुसार बारमा प्रपम उपी गाती कदाचित व सेशितक भटक जाती है, परन्तु कर्ममा बोजा होने या फिर माचेवा गाठी से पाएमा मनुष्प माला सेनेसे एकवार उपर बाता है, परन्तु फिर नाचे हो चला जाता। (२) बापान मुदौ ५ सोम १९५६ १ न मामाका सरूप है। उस सरूपके (धमक) प्रवर्गक भी मनुष्य ।। समाहरण पे वर्तमान अवसर्पिपीकाममें अपम बादि धर्मके प्रवर्तक पे। इससे पुस में अनादि वामधर्मका विचार न पा-पह बात न पी। २ गमग दो हगर बसि अधिक हुए नयति शिखरसरि बाचार्यने योको बत्रियों के सप मिठा दिया। २ स्कर्ष मकर्प भौर संक्रमण ये सलाम गनेवाय कर्मप्रालिके ही हो सकते है-उपमें गईई प्रहस्ति नही हो सकते । १ वात्पुस्मा मिस प्रकारस बप होता है उस प्रकारसे देशस्थिति पूर्ण होती है। ५ गोसाक बोरपाक गातिके गपूत। ५ वरमें म रेसना, या एकांत दर्शनावरणीप फर्म मा गाय, परम्न में सम्मा- परणीय कामाता है । मस्या निमित्त और तेरा भान ठसाको लेकर होता है। - दर्शनके एकोपर जाम रम बात है। ८ देपो मानने के लिये शानको माना चाहिये । जैसा बन जैसे ही बाट । xन् १९५९ मलि समय माग गर ताम उस समय म मालान सिस म्यानीमन एक मोचन मम्मी सहित भगत निमिपा, सदीका मन बना लिए मना है।
८५४ पास्सानसार-प्रभसमापान] विपिप पत्र मादि सपा-पों पर . । - ९ से परमागुकी शकि पप्प प्राप्त करनेमे सती जाती है, उसी तरह पैतन्यदम्पको शाति गुताके प्राप्त करनेसे पाती माती है । काँच, पासा, दुरबीन भा पहिसे (परमाणु) के अनुसार और वाधि, मन पर्यव, केपछडान, सम्धि, शादि वगैरह दूसरे (चतन्यदम्प) के अनुसार है। बाराष्ट्र मुदी ६ माम १०५६ १ यापशमसम्पालको पेटफसम्यमत्व भी कहा जाता है। परन्तु पोपममेंमे शापिफ पोनको सपिके समयका जो सम्पक्स है, वही वास्तविक तिस वेकसम्पात्र है। २ पाँच स्थायर एफेन्द्रिय पार और सूक्ष्म दोनों है। बनस्पतिके सियाय पाकीके पारमें मसम्पात मूरम कहे जाते हैं। निगोद सूक्ष्म अनत हैं, और पनस्पतिके भी सूश्न मनत , पदों निगा में ममम बनस्पति घमी है। ३ धीतीर्थकर ग्यारह गुणस्पानका स्पर्श नहीं करते, इसी समय पहिल, सरे तथा तीसरेका मी स्पर्श नहीं करते । ५ पर्धमान, हीपमान और स्थित ऐसी गे तीन परिणामोशी धारा ३, उसमें दीपमान परिणामकी सम्पत्यसबंधी (दर्शनसभा ) भाग चीतार्थकरेगको नहीं होना; और पारिग्रमबंधा पाकी भगना हामी है। ५ नहीं क्षायिकचारिन है बड़ी मोहनापका अभाव है। गौर रहीं मोहनीपका ममार, दी पहिठा, दूसरा, तीसरा और ग्यारहों इन चार गुगरपानोको सर्शनाका मार । ६ उज्य दो प्रकारका र-पफ प्रशाप और दूसरा विरामोप । विशेप पास (गिता ई) तिरी भदन रिया गाता है, और प्रदेशाप मातरमे येन प्रिया माता। ७ मायुधर्मका बस मातिके बिना नही होता, परम्नु पेन्नीयका हाता है। ८ आपुप्राति पफ ममें पेन्म की जाती है । इम0 प्रानिपा उस भयमें और दूगर मरमें भाग्न की जाती। • पार विस भपसी भायुप्रातिका भाग करना बरसमम मा फरमादि। उस प्रारिमाप लौरो आपुका आरम मा मे गिना जाता है । म त म भग भानुपाति उपमें, उगमें मरमा, उत्कर्ष बरफ आदी मरन। १० भापुर प्रानि मरे भाने मही मोगा गाती । ११ गी, गति, दिति, AN भागार (शरीरममा) और रण) अमु कामे अमुर प्रम में भाग बार बाकी अर है। उINP रिमी मनुभाग माग उप1 और उममें मारे लगे भापुरे मा र नारिग na रएम भोग ग ! पोलिस नि, नी, Fria, In सर Anfani12-Amit R UTTमहार लागिगि मा उम ग रामे उता in भाना मानो गानो पा रही गाना - - श्रीमद पवाद [८५४ पासानसार प्रमतमावान १२ सक्रमण कपकप उस्कर्ष वादि फरणका नियम, बरतक वसुकर्मवर्गणा सत्ता हो, तर तक गगू' हा सकता है। परन्तु उत्यका प्रारंभ होने के बाद मह जगू नहीं पा सकता । १५ मायुकर्म पृत समान है, और दूसरे फर्म नसके समान हैं ( पनि पुमा हो तो पक्ष होता है। ११ वायु दो प्रकारका-सोपक्रम बौर निरुपक्रम । इसमेंसे गिस प्रकारको वायु गाँधी हो, उसी तरकी वायु मोगी जाती है। १५ उपशमसम्पास स्पोपशम होकर पायिक होता है। मोंकि उपशम सचा है इसलिये एतदय पाकर क्य होता है। १६ पा दो प्रकारको होती है भानचक्षु और धर्मच । जैसे धर्मचक्षुसे एक वस्तु निस स्वरूपसे दिखाई देता है, प बस्तु दुरगाम सूक्ष्म-दर्शक नादि यत्रोंसे मिम स्वस्मसे ही दिखाई देती है। जैसे ही बर्मचझुमे पा मिस सरूपसे दिखाई देती है, पानचक्षुसे किसी मिमरूपसे । दिसाई रती है और उसी तरह की जाती है। फिर मी ठसे वफ्नी ऐशियारीसे-कमालसे न मानना, या पोय नही। (१) बापत दी ७,पुष १९५६ १ मोमान् उदकुन्द माचार्यने वापार (वापारत) की रचना की है। प्रारतोंके मेष दर्शनप्राप्त बानप्रापत चारित्रप्राप्त इत्यादि । दमप्रापतमें मिनभानका सरूप बताया है। शासकर्ण काते है किम्प मानोंको हमने, तुमने और देवाधिदेषोतको पूर्वमें सेवन किया है, वौर उससे कार्य सिम नहीं वा । इमम्पेि बिनमायके सेक्न करनेको जम्परत है। बा भिमभाव शांत है, बारमा का धर्म है और उसके सेवन करनेसे हो मुकि होती है। २ चारित्रप्रापत १ नहीं द्रम्प और उसकी पर्याय मही माने गावे हो उसमें किम्प होनेसे सम्मन हो गाता है। पर्यायों को न माननेका कारण उक्ने वंशको नही पांचना हो। • प्रम्पकी पर्याय । यपि पर सास किया जाता है परन्तु यहाँ प्रम्पका स्वरूप समासमेमें विकम्प एनेके कारण समान हो जाती है और उससे । मटकना होता है। ५ सिपद इम्प नहीं है परन्तु बाहमा एक पुर पाप है। प पद पहिले पब मनुष्य पा देवपद था, उस समय यही पाप पी । इस तब इम्म मत पकर पापातर होता है। ५ शान्तमाल प्रास करमेसे वान मता। - वामसिविके ये एगीनगाम करते आए मात उमप बग गाता है कि एक मात्र मातभारके एवन करनेसे पर तुरत ही प्राप्त हो जाता है। ८ पापका स्वरूस सम्बनेके लिये मौतर्षिकरदेखने रिपद (उत्पाद म्यप और धीम्य) समसापेरें। इम्म पुग-समातम है। पाप उत्पादम्पुछ। PROमाचका।मजाक ।
८५४ मास्मानसार-प्रसमान] पिपिम पत्र मादि सपा-यो वर्ष । o . ११ छहों दर्शन एक नर्शनमें समाविष्ट हो गासे है। उसमें मी चैन एक दर्शन है। पौर-मणिकवादी-पर्यापरूप सत् है । वेदान्त-सनातन दम्परूमसे सत् है । पाक-निरी- वरवा - नमतक नामाकी प्रतीति नहींई तबतक उसे पहिचाननेमप सत् है। १२ (वारमा ) पर्यायके दो भेद -जीपाय ( ससाबस्थामें ) और सिवपर्याय । सिदपर्याप सौ टनके सोनेके समान है, और जीवपर्याप सोटसहित सोनेके समान है। १५ म्पन्नपर्याय ११ मर्यपर्याय १५ विषयका माश (बेका मात्र) क्षायिक चारित्रसे होता है। चीये गुणस्थामको विपकी मदता होती है, और नबमें गुणस्थानकातक मेदका उदय होता है। १६ गो गुण अपनेमें नहीं है, ये गुण वफ्नमें -ओ ऐसा करता अपना ममनाता है, उसे मिप्याडएि समतना पाहिये । १७ मिन और जैम शन्दका अर्थ पट पर अंतर मिन पसे, पट पर मंवर जैन । मसि-मदिराके पानसौं, मतमारा समझे न ।। ( समयसार ) १८ बारमाका सनातम धर्म शांत होना-विराम पाना है समम्त साम्गीका सार मी नही है। वह पदर्शनमें समा बाता है, पौर का पर्शन चैनदर्शनमें समाविए होता है। १९ बीतरागके वचन लिपयका विरेपन करानेगा। २० मैनधर्मका बाशय, गिम्बर तया खेसाबर वाचायोका भासय, और शरागीका वाशप मात्र वाल्माका समातन धर्म प्राप्त करानेका हैऔर हो सारनप है। इस बावमें किसी प्रकारसे शानियोंको किम्प नहीं । ही तीनों कामें हानियोंका कपन है, पा, नौर होगा। २१ बाध लिपपोसे मुक्त होकर म्यों पों उसका विचार किपा माप, स्यों सो मारमा परत हाती नाती है-निर्मल होती जाती है। २२ भगमाग्में पाना मही पाहिये । मात्र मामाको शतिका चार करना योम्प है। २३ बानी छोग यपपि पैसों की तय हिसाबी होते हैं (पैश्योंकी पर कसर न सानेपान होते है-अर्पत सूक्ष्मरूपसे शोपनकर तत्वोंको साकार करनेवाले होते हैं, तो मी वातिर तो साधारण गंगों से ही गेग (किसान मारि-एक सारम्त बातको ही पकाकर रसनेबारे) होते है। वर्षात् पत्तमें चाहे कुछ मी ऐ गाय परन्तु ये एक शतिमालको नहीं छोड़ते वीर समस्त शाशगका सार मी पहा है। २१ बाली उदपको मानता है, परन्तु प साता बसावामें परिणाम नहीं करता । २५. इन्द्रियोंके मोगसे मुक्ति नहीं। वहाँ इत्रियोंका भोग है यहाँ स्मार है और वहाँ ससार है यहाँ मुक्ति नहीं । २६ बाय गुणस्थानकासकमानीच बामप सेना चाहिसेनानीको बासे वर्तन समा मागि।
किया माठा, भीमद् रामचन्द्र मासानधार-प्रभामापान ८५४ २७ महान् बाचाय और सामियोंमें दोप तपा भूमें नहीं होता । वामी समसमें नहीं, वाता, इसलिये हम उसे भूत मान मे है । तपा जिससे अपने को समझने वा बाय बैसा अपनेमें शान नहीं, इसलिये पैसा दान प्राप्त होनेपर गो बानाका माशय मूळमाग गता है, यह समधर्म भा गापगा, ऐसी मानना रमनी चाहिये । परस्पर भाचापोंके विचारमें यदि किसी जगह कोई भेद देसनेमें बाये तो पक्षयोपशमके कारण ही समय है, परन्तु वस्तुतः उसमें किस्प करना योम्य नही । २८ बानी योग बहुत चतुर पे । वे विपप-सुस भोगना जानते थे । पाँची इन्द्रियों उनके पूर्ण पी (पाचा इन्द्रियों मिसके पूर्ण हों, वही बाचार्य-पदवीके योम्प होता है, फिर भी इस संसार और निय-पुरले निर्मात्प मानेसे तथा वारमाके सनातन धर्ममें प्रेप माम होनेसे, ये दिपप-मुखसे रिक होकर मामाके सनातनधर्म संख्म हुए है। २९ बर्गतकाम्से बीय मटकता है, फिर मी उसे मोक्ष नहीं अब महामाने एक बवामें ही मुक्ति बताई है। १० गोल हानीको बहानुसार तमानमें कचरे तो बतमाम मुक्त हो माता है। ३. समुफ पस्त म्पबोर हो गई है, ऐसा कामेमें माता है परन्तु उसका पुस्मार्प नही पौर इससे पर कहा जाता है कि म्परा हो गई। यदि उसका सथा (पैसा चाहिसे पैसा ) पुरुषार्थ हो तो गुण प्रगट हों, इसमें संशय महा। वने उपम किया तो कारगरी तपा एम्प प्राप्त किया, और दिनुस्तानबाग ने उबम म किया तो वे उसे प्राप्त न कर सकेइससे निपा (हान) का पद होना नहीं जा पा सकता। १२ विषय पय महाए, फिर भी भो गौच अपनेमें वर्तमानमें गुण मान बैठे हैं, उन मानक समान भमणा न करते हए उन विपर्योक पप करने के लिये ही पक्ष देना चाहिये । बापार सुदा ८ गुरु १९५६ १ धर्म वर्ष काम और मोष इन चार पुस्पामि मोध पहिरो तानसे मकर । मोक्षके छिपे हो बारीक वानों। २ मास्माका धर्म इसरूप है, ऐसा प्रतीत होता है। पर सोनेके समान र है ३ कमसे मुसहस सहन करते हुए मी परिपा उपार्जन करमे तथा उसके रक्षण करनेका साप्रपन करते हैं। सब पुमको बाहते , परन्तु ये परवप्र । तपा परतत्रता प्रशंसनीय नही है। . पर मार्ग (मोस) रामायको बाराषमासे सब कमौका थप होनेसे प्राप्त होता है। ५ बारा निकपण किये हुए पोंका पपाप घोष होमा सम्पमान है। ६ गौर, जमाल वामन, सबर निर्मग, पप और मोम पे तत।(यहाँ पुष्पपापको मामलमें गिना है)। ७ जायके दो मेन -सिख और संसारी- मित्रा-शिबको बतानन पार्य भै मुख पे समात समान है। फिर भी मनंतर परंपर होनेहा उनके पनर भेट निम से कम है।- ।
८५४ मास्पानसार प्रमतमापान] विविध प मारिसमा-षौ वर्ष - (१) तीर्य, (२) अतार्थ, (३) तीर्थकर, (१) अतीपंफर (५) स्वययुन, (६) प्रत्येकयुद, (७) मुरबोभित (८) बोरिंग, (९) पुरुपरिंग, (१०) नपुसकलिंग, (११) धन्यडिंग, (१२) बैमलिंग, (१३) ग्रहस्पलिंग, (११) एक, और (१५) भनेक । ससारी -ससारी बीच एक प्रकार, दो प्रकार स्पानि अनेक प्रकारसे करे हैं। सामान्यसपसे उपयोग क्षणसे सर्व ससारी जीव एक प्रकारके हैं। अस स्थापर, अयमा म्पबहारराशि मम्यबहारराशिके भेदसे चीन दो प्रकार है। सूक्ष्म निगोदमेंसे निकलकर मिसने कमी प्रसपर्याय प्राप्त की हैप व्यवहार राशि है। तथा चनादिकारसे सूक्ष्म निगोदर्मेसे निकलकर, निसने कभी मी प्रसपर्याप प्राप्त नहीं की, पवम्पबहारपशि है। स्थत बसपत गौर सयसासपत, मनाली पुरुय वौर नपुंसक इस तए नीबके तीन प्रकार ।चार गतियोंकी अपेक्षा चार भेद । पाँच इन्द्रियों की पेक्षा पाँच मेद है । पृथ्वी, वा तेबस्, पायु, बनस्पति और प्रस इस तद छ मेद ।हण, नौर, कापोत, तेच, पप, पुरु पौर परेशी ( यहाँ पौदा गुणस्थानबाछे मौर मेने चाहिये, सिर म लेने चाहिये, क्योंकि यह संसारा गानको म्यास्मा है), इस तर बावके सास मेद है। मान, पोतम, चरायुन, स्वेदन, रस्म, स्मन, उदिम भौर उपपादके मेदसे गीपके बाठ भेद समझने चाहिये । पाँच स्यावर, तीन बिकळेविय और पचेन्द्रिय इस तर बीवके नौ प्रकार समझने चाहिये । पाँच स्थावर, तीन विकन्द्रिय और स्त्री तथा बसही पवेन्द्रिय इस तर बीवके दस भेद समासने चाहिये । सूक्ष्म, बादर, तीन विकलेन्द्रिय, पीर पंचेन्द्रियोंमें जकचर, पलपर, नमघर, तया मनुष्य, देव वौर मारकी इस तर बीतके ग्याय मेद समझमे चाहिये । प्रकापके पास भौर अपर्याप्त इस वर जीवके गाए मेद समझने पाहिये । उक्त सम्पबहारिकले बारा भेद, तपा एक असम्पपहारिक (सूक्ष्म निगोदका ) मिगकर देय मेद होते। पौधा गुणस्पानोंके मेदसे, वपत्रा सूक्ष्म बादर, तीन विकछेत्रिय तया सहा मसी इन सार्वोके पर्याप्त और कपासके मेदसे गौरके पौरभेद होते हैं। इस पर पुतिमान पुरुषोंने सिद्धारका अनुसरण कर जीवके भनेक मेद (विषमाम मायके मेद ) को। भाषात मी शुक. १९५६ १ गाविस्मरण शानके विषयमें गो का यती है, उसका समाधान निम प्रकारसे होगा:- बैसे बाल्यावस्था को कुछ देश हो नपवा अनुभव किया हो, उसका पातसोको पयावस्पामें स्मरण होता है और एक्सोको महीं होता। उसी तण गहुक्सोको पूर्वमयका मान यता है और मातसोको मी यता । उसके म एनेका कारण यह है कि पूदिहको मेरते हुए गीत बाम पदामि सम्म होकर मरण करता है, और नई दर पाकर यह उसमें बासळ पता है। इससे उन्टी गतिसे पम्नेषाको (जिसने बरकाश सा हो उसे) पूर्वमय बनुमबमें भाता है। २ गाविस्मरण हान मतिद्वानका मेद है । पूर्वपर्यायको छोड़ते हुए पेदमाके कारण, मई देश पारण करते ए गर्मावासके कारण बाणावस्पामें माता के कारण, पूर्वपापको स्मृति करमेका अाकाश ही नहीं मिमता । त्यपि मिस तय गर्मागास वौर पाल्पाचस्पा स्पतिमें मही पते,सकारण होते ही नहीं, यह मही कहा जा सकता, उसी तर उपर्पक कारणों को और वर्तमान देहमें ठानता के कारण, १८ भीमद् रामबम्ब मामनगर समाधान ८५४ २७ महान् भाभार्प और हानियोंमें दोष तपा में नहीं होती । बम्नी समहमें नही, बाता, इसलिये हम उसे मूठ मान लेते हैं। तमा बिससे अपनेको समझ मा माप पैसा बपने में जान नही इसलिये कैसा हान प्राप्त होनेपर यो बानीका माण्य मूग्णाला लगता है, वह समझमें बागापगा, ऐसी भावना रमनी पाहिये । परस्पर बावापोंके विचार पर किसी पगहोई मेद देनमेमें बाये तो यह अपोपशमके कारण ही समय है, परन्तु वस्तुतः ठसमें विकास करमा पोग्य नहीं। २८ बागडोग पात चतुर थे। रेपिप-मुस मागना पानते । पापों इन्द्रियों उनके पूर्ण पी (पाँचौ इन्द्रियों जिसके पूर्ण हों, यो बाचार्म-परपीके योग्य होता है फिर भी इस संसार और इन्द्रिय-मुसके निर्माल्य गनेसे तया मामाके सनातन धर्ममें भेप माइम होनसे, विषय-मुससे निरक होकर बामाके समातनभर्मम सम्म हुए हैं। २९ बर्मतकाम्से नाव मटकता है फिर भी उसे मोझ नही जब कि हानीने एक कतर्ममें मुक्ति पता है। १० बाप हानाको भावानुसार शांतमानमें पचरे तो तमाम मुच हो जाता है। ॥ अमुक वस्तु म्पबम्मेद हो गई है ऐसा करने में बाता है। परम्त उसका पुस्मार्य नही दिपा बाता मोर इससे या कामाता है कि ये परपोर हो गई है। पदि उसका सबा (पैसा चाहिये वैसा ) पुस्पार्प हो तो गुण प्रगट हों, इसमें संशय नहीं । बप्रेोंने उपम किया तो गरी तया एम्प प्राप्त किया, पर हिन्दुस्तानवाने उधम म किया तो रे उसे प्राप्त न कर सके। इससे रिपा (बान) चम्परोद हामा महीना वा सकता। १२ विपय सपनही ए, किर मी नो गौच मफ्लेमें वर्तमानमें गुण मान है उम बागोडे समान भ्रमणा म करते हुए उन विषयों के पप करनेके किये दक्ष देना चाहिये । (५) बारात मुदौ ८ गुरु १९५६ १ पम वर्ष काम मौर मोशन चार पुस्पामि मोक्ष पहिले तानसे मार है। मोक्षके लिपे को बाफीके तनों है। २ बास्माका धर्म पुसम्म है ऐसा प्रतीत होता है। सोनेके समान पर है। ३ कर्म मुसद् स म करये हुए मा परिपा उपान करने वा उसके रक्षण करनेका सब प्रपन करते । सब मुखको चारते है, परन्तु रे परपत्र । तपा परतता प्रमानाप नही। प मार्ग (मोस) लापको बारापनासे सब कमका षय होनेसे पास होता है। ५. हामी निरूपण दिए यथार्ष पोप होना सम्पान है। ६ गौर वरील बाब संवर मिर्मग, बंप मौर मोझ पे पल(पहाँ पुष्पपापको मामसमें गिना )। ७ पोरके दो मे -मित और संसारी--- सिम-सिपको बनबान दर्शन पार्य और पुस मे समान समान है। फिर मी नंतर परंपर मेरूप उनके पत्रा मे निम प्रकारसे करे।
} भीमद् पत्रमाद्र [24 मास्पानसार-यमनमाधान कर पूर्वपाय सखिम नहीं हो, इसलिये पोती ही नहीं--पा मही या मा समता । निस प्य याम मादि सोको कसम को गाती है, तो उसमें पदि सानुमता होती है तो मा भगती है उसी तरा पनि पूर्णपर्यापकी स्मृति करनेको सानुकूमता (पाम्यता) हा तो चातिम्मरण शान होता है। पूर्वसका अपम होनी चाहिये । पर्साका मन ना जानेस आतिस्मरण पान नही होता । ३ मामा । मामा नित्य है। उसके प्रमाण (१) बालकको दूध पीते हुए क्या थुक नुक' शद करना कोई सिखाता है! यह तो पूर्ण जम्पास हो। (२) सर्प दौर मोरका हापी पौर सिंहका पो मार विहीका सामाविक और है । उन्हें उसे कोई भी नही सिसाता । पूर्वमाके बैरकी सामाषिक संवा है-पूर्वहान है। . सगता या पनवासाचा विपप हैऐसा धानिर्मोने याप सत्य है। जिसमें दोनों म्ययार (सांसारिक मोर बसारिक) होते हैं, उससे नि संगतामही होगी। ५ संसारके छोर बिना मनमत्त गुणस्थानक मही। मप्रमच गुणस्यानकको स्थितिकतर्मका है। . हमने समझ म्पिा। हम शत?'ऐसा जो करते है रे ठगापे गाते। . प्रसारमें एकर सात गुणस्पानके उपर नहीं पा सकते इससे सारी गोषको निधन होना चाहिये परत ठसे याममें रखना चाहिये । ८ पूर्वमें स्पतिमें वाईई पस्तुको फिर सातमापसे पार करे तोप पयास्थित पार पाती। ० प्रपिके दो भेद है-एक दम्पवासन्धि (चतुष्पर, रिपद अपर स्यादि)। दूसरी मार--बम्पतरपि (माठ स्पादि)। सम्पन प्रकारले सो दोनों प्रपियोंसे निवृत्त हो, मा निर्मप है। मिथ्याल मान, विरति आदि मात्र निसे गोषमे ही नहीं, उसके पबका माग हो, तो मी पारदौकिक कपाण मा करेगा। ११ सक्रिप बारको मात्र अनुष्ठान हो ऐसा कभी मनता ही नहीं । ( क्रिया होनेपर भाप गुणस्पाना नहीं होता। १२ मा मादि दोषोंका अपहोनेसे उनके सहकारी कारणों का पय होता है मतका मा सम्पूर्णरुमसे प्य नही होता तबतक मुमा गोल सतोप मामकर मही बैठता । १५ ग मादि दोष और उनके सहकारी कारणों के जमात रोनेपर पर न होता । राग मादिके प्रपोगसे कर्म होता । उनके बमानमें सब जगह का अभाव हो समाना पारिपे । १५ बायुमी- (4) अपस्न-शेष पका हो तोप कर्म पोरहो में बेदन किया जा सकता है। इसका कारण पूर्वका सा को इससे इस प्रकारसे उपमें जाता है-मोगा माता है। (मा)'टू गपा शाम्पका बर्ष मावसे मोग रो माग होनाते है परन्तु उस बर्ष पैसा नही ।निस वय कर्ग द गपा पर वर्ष पूर्ण उतर गया-फर्मा २ शिया 'वा है, उसी तण बाप ट गई' एम्बका बाप समझना चाहिये।
.६४ पासानसार-पसमाधानपिषिय पन मादि प्रह-पों पर्प (३) सोपक्रम-शिपिम्-निसे एकम भोग लिया जाय । (६) निरुपम-निकाचित । देव, नरक, युगछ, तरेसठ शाकापुरुष और परम- शरीरीको होता है। (ठ) प्रदशोदय प्रदेशको मुसके पास गाकर मेटन करना, वह प्रदेशोप है। प्रशोपसे बानी कर्मका क्षय वतमामें कर देते हैं। (3) अनपवर्तन और अनुरणान दोनोंका मर्य मिलता हुवा। क्यापि दोनोंमें भवर यह कि उदारणाम मामाकी शक्ति है, और मनपाठनमें कर्मको शक्ति है। (ए) भापु घटती है, भर्यात् यो कारमें भाग ली जाती है। १५ वसताके उदयमें बानकी कसौटी होती है। १६ परिणामकी पारा परमामीटरके समान है। (७) जापान मती १. शनि १९५५ १ (१) असमममता-अनिर्मउ मात्र (वस्परता) (२) विषम वैसे तैसे (1) वार्य उत्तम । मार्य शम्द मीनिनेपरके, मुमुक्षुके, तथा कार्यदेशके हमेगावाक लिये प्रयुक्त होता है। (१) निक्षेप प्रकार, मे, विभाग | २ मपण-भयसे पार फरमेबाम गरण देनेवाठा । ३ हेमचन्द्राचार्य पधुकाके मोह मेश्य थे | उन मामाने कुमारपाल राजासे अपने मुटुमके लिये एक क्षेत्रतक मी न मांगा था । तपा स्वप भी राम-समका एक प्रासतक मी न लिया था-पह गाव भीकुमारपासने उन मास्माके ममिदाह के समय कही थी। उनके गुरु देवचन्द्रमरि पे । (८) वापार पुदी ११ रवि १९५६ १ सरस्वती मिनबाणीको पारा २ (१) बॉपमेनाग, (२) पिनेके त, (३) बधन बार (१) बनके फसमे समस्त संसारका प्रपंच रहता है, ऐसा भीनिमेन्द्र ने कहा है। ३ बनारसीदास भीभागराके दशानीमागीय थ । वापाई सुदी १२ सोम १०५५ १ मीपशालिजपनीने पोगरि मधमे- 'काताशि में बताया है कि मौतरणसम्पके बिना कही भी म्पिरता महीना सकती गीतरागमुमके मिवाय मरा सब मुम नि सम्म गता है-- लाहमरम्प गता है। पानी 'पिराशि' में बताया है कि बीरगमम प्रियकर गवा। वारा पगरि में बतापाकि परमारगासम्पान होता है। यहाँ केरसधान होगा। २ पानगपागप कचाको समस्त प्रात महीं हुमा पा, परन्तु हरिमारिने उमें मागा- मुमारी मामा है। २ हरिमारिने उम रिपोग्न प्रयापम सप्तमें पर्णन रिपा है। मोर उमर परमे पोरिपती महारामन उदासपस गुजराना निगा है।
। भीमद् पंजाब [८५४ मारमानवार-प्रमवमापान मेकर पूर्वपर्याप स्मृतिम महा पती, इसलिये ए होती है नही–पा नहीं कहा जा सकता । गिस तरह बाम पाखिोकी कम की नाती है, तो उसमें पदि सानुकूमता होती है तो होम गती है, उसी तरा पदि पूर्वपापको स्मृति करनेका सानुकता (योम्पता) ऐतो चाप्तिस्मरण पान होता है। पूर्वसहा कायम होनी चाहिय । मसपाका भव वा बानेस जातिस्मरण शान मही होता। २ महमा है। भारमा निस्प है। उसके प्रमाण - (१) पाकको पूष पीते हए क्या थुक जुक' सम्म करना कोई सिध्यता । तो पूर्वध अम्पास हो। (२) सर्प और मोरका हापी और सिंहका और मिशीका खाभाविक और है । उनें उसे कोई मी नहीं सिखाता । पूर्वमाके मैरकी स्वाभाविक संहा है-पूडान है। • निसगता पर बनबासी लिपप है-ऐसा शानिर्मोने या है, यह सस्प है । मिसमें दोनों म्पपार (सोसारिक मोर बसोसारिक) होते है, उससे नि सगता नहीं होती। ५ ससारके मेरे बिना अप्रमत्त गुणत्पानक नहीं। पप्रमत गुणस्पानकको स्थिति अन्तर्मको। ६ 'हमने समझ लिया है, हम शान्त है ऐसा जो करते हैं ये उगाये जाते हैं। ७ ससारमें यार सात गुणस्थामके ऊपर नहीं पा सकते इससे ससारी बागको निराश न होना चाहिपे--परन्तु उसे प्यानमें रखना चाहिये । ८ पूर्णम स्मृतिम बाई पस्तुचे फिर शोधमापसे पाद करे तोप यथास्पित पाद पाती। ९ प्रषिके दो भेद है-एक ब्रम्प-बामपन्थि (पाप, विपद वपर स्पादि) सरी भाग- अर्पतरप्रंथि (माठ कर्म पा)। सम्यक् पकारसे वो दोनों मंथियोंसे निश्च हो या निर्मप है। मिप्पाल मान, मविरति मादि भाव मिसे छोड़ने ही माही, उसके बसका त्याग हो, तो मी पर पारलौकिक कम्पाण स्पा करगा। ११ सक्रिप औषको अवधका मनुष्ठान हो ऐसा कमी बनता ही नही । ( क्रिया होमेपर म गुणस्थानक नहीं होता )। १२ राग बादि दोपोका पप होनेसे उनके सहकाएं कारपोच बप होता, जबतक उमय सम्पूर्णसम्स अप नहीं होता, तबतक मुमुक्षु गीत संतोष मानबर नहीं बैठता । १५ एग मादोर भोर उनके सरकारी कारणोके बमात्र हानेपर 4 मही होता। राग भारिक प्रयोगस कर्म होगी। उनके बमानमें सब जगह धर्मका अमातही समसमा चाहिये। ११ मार्म (4) पान-विशेष कासम होतोय कर्म थोर हो पामें मेरन किया जा सकता है। मरा परण पूरा सा है इसमे इस प्रसारसे उसमें माता-मोगा सागरे। (मा) ह गपा' पम्ममा मप मानस होगदा माग होना' करते है। परन्तु उसका अप मा कही जिस तर कर्म टूट गया। एक अप कर्म उतर गपा-फा दे दिया 'का है, मी तरह भापु टूट गई वामका भाराप समष्ठना चाहिये। १ ४ाम्प्रनसार-प्रमनमाषान] विषिष पत्र मादि संप्रदयों व (१) सासक्रम-शिपिस-जिसे एक्दम मोग लिया जाय । (६) निरपक्रम निकाचित । दर, मरक, पुगठ, तरेसर शलाकापुस्प भौर परम- शरीराका होता है। (उ) प्रयोपयोशको मुमके पास छ याकर बेदन करना, पर प्रदेशाइय है। प्रशोग्यसे बानी फर्मका रूप भतमु कर देता है। (3) जनपवर्धन घोर अनुरणा-इन दोनों का अर्थ मिसता मा। तपारि दोनों कवर या कि उदारणाम बारमाकी शक्ति है, और अनपवनमें कर्मकी शक्ति है। (ए) वायु घटती है, भर्यात पारे कामें भोग भी मासी है। १५ वसावाके उत्यमें शानकी कसौटी होती। १९ परिणामकी पारा परमामाटरके समान है। जापान मनी १. शनि १९५५ १ (१) बसमयसता निर्मठ मात्र (अस्पया) (२) विषम पैसे तैसे (३) बार्प-उत्तम । आर्य शब्द प्रीमिनेपरके, मुमुक्षुके, तथा कार्यदेशके सनेवाखोंक लिये प्रयुक्त होता है। () निक्षेप- प्रकार, मेद, दिमाग । २ भयाण-मयमे पार फरमेवाम शरण नेवासा । ३ हेमचन्द्राचार्य घधुकाके मोर पेश्प पे | उन महामामे फुमारपाठ पगास वपने मुटुमके लिये एक चमतक भी म माँगा पा । तया स्वप भी राम भमका एक प्रासतक मान लिया था--पर बात श्रीकुमारपाउने उन महात्माफे अमिताह के समय कही थी। उनके गुरु वाचन्द्रसरि पे । पापा मुदी ११ रवि १९५२ १ सरम्मतीविनवाणीको पारा २ (१) बाँधनेमाला, (.) बाँधनेके छ (३)बंधन वौर (१) पनके पम्स समस्त ससारका प्रपंप रहता , पेमा भाभिमेन्द्रमै फदा है। २ बनारसास भीआगराक दशाभीमासी पैश्य पे । बापा ॥ १२ सोम १९५६ १ मापशाविसपीने योग प—'ता' में बताया है कि बीतरगसरपके ना कहा मी परवा नही हा सकतीपौवरागमना सिवाय इस सब मुग नि मस्त गाt- बामप गता। पापणी पिगम में बताया कि बीतरागमुग प्रिपपर गता है। पापी 'परामि' में बताया है कि परमातगासम्पप होता है, पहाँ समान होता है। २ पानापागके काका सम्पाप मन मही हमा पा, पर हरिमहिने उन्हें मागा- मुमारी माना है। १ हरिमग्नेि उन सियोमबमामा म भरान वर्गम किपा भीर उमा कामे परिजनी महारामन उमेदापम गुजरानाम हिमा है।
७८० भीमद् पत्रचन्द्र [८१४ मापानवार-पवमापान १ योगररिमें सो माया (बौदपिक, मौपशमिक, क्षायोपामिक, धापिक, पारिणामिक और साविपातिक ) समावेश होता है। ये म मात्र नायके सतलभूत है । ५ बबतक पपार्प शान न हो तबतक मौन एनाही सबक है। नही तो मनापार पोष भगता है। इस विषयमें उत्तपन्यपनस्त्रमें बमाचारनामक अधिकार है। ६ हानीके सितमें फेर नही हो सकता । ७ सूत्र नाममात्र वधर्म पास करने के लिये बनाये गये है परन्तु उन एस्स पपार्प समझमें ही बाता, इससे फर माश्म होता है। ८ दिगम्बरमतके तत्र चोंके कारण पुश पस्प समझ वा सकता है । सेवामपरमतको शिषिमताके कारण रस होता गया । ९ मसिस' यह पद मरको बसाता पताके मिपे प्रमुख होता है। राध सविरके उससे मिमता धुम्वा होता है। माक्से संसारा-मारमा उस परस्प है। बाहमा परमापसे (वप्पपसाप छोकर ) मंदनबमके समान है। १० मिनमुना दो प्रकारको है -कापोत्सर्ग और पपान । प्रमा दूर करने के लिये दूसरे बनेक मान किये गये है, किन्तु मुस्मत ये दो ही वामन हैं। ११ मधमरसनिमर्म परिपुम प्रस पहनकमसमंक कामिमीसगशून्पा । करगमपि यचे धावसंपतंय, तदसि नगवि देवो भीवरामस्स्पमेव ।। १२ कप ब्क्ष करनेवालेको परिवारी। १३ तार्प पारनेका मार्ग । १९ बदनाप प्रमुकी स्तुति माहारमा बादपनीने की है। सीवानदपमनीका दूसरा नाम सामानव था । तपगमें हुए है। १५ वर्तमानमें गोगोंको बान तपा पति के साथ स्वप नही या मताचाने मार राम है। १६ x मापय मानदपनवमी, मवि गंभीर पदार । पासकार पसारि मिम पिपिस्वार । १७ चिरान तीन प्रकारसे माना जाता है (१)जा गरूपसे यत्व है। (२) बसन्प-संसारी जान-विमानरूपसे पाते हैं। (३) सिमपुर रैम्पमासे पते । वापाल पदी १२ मौम १९५६ १मगक्ताबारापना जैसी पुस्तके मध्यमा-मारके महामामोद तपा मुनियों योम्प है। ऐसे पोंदी सससे दस पापी (पोस्पता ) बाहे साधु भाषकको देनेसे PORता होती है। सरें उससे उस्य मुकसान ही होता है । सबै मुमपुबोको हो पा ममकम्प है। २ मोक्षमार्ग अगम्य तपा है। बगम्प —मात्र निमावदशाके मरण मतमेद पायानेसे किसी भी जगह मोक्षमार्ग ऐसा नही या गो स्माटमें ना सके) और इस चरण माममें पगम्य है। मनुम्पके मर पानेक फरवाद भारमन माण मति बमर मर मममी तिवमानमार मास सिख परमीयम्पमा।
मासानवार-प्रमतमापान] पिपिप पत्र मादि संप्रा-श्यों पर्प मानशरा माड़ी पकाकर दवा करनेके फसकी मराबर ही मतमेद पानेका फस हुआ है, और उससे मोधमार्ग समहमें नहीं माता । सर मतमेदकी मायापपीको दूरकर, यदि भामा चौर पुगएका पृपमरण करके शतभावसे अनुमब किया गाय, सो मोक्षमार्ग सरल है, और ना र मही। २ मनेक शाम है। उनें एक एकको वॉचने के बाद, पदि उनका निर्णय करने के लिये बैठा गाय, ता उस हिसाबसे पूर्वमादिका बान और केवड़ान कमी भी प्राप्त न दो, अर्थात् उसको कमी भी पार न पो, परन्तु उसकी सकसना है, और उसे प्रागुरु बताते है कि मारमा उसे वतमम ही प्रास कर लेते है। १ इस नीमने नषपूर्णतक बान प्रप्त किया, तो मी को सिदि महोई, उसका कारण विमुष्ठ दशासे परिणमन करना हो। यदि बीच सन्मुसदशासे धन से वो महतरक्षण मुक्त हो जाता । ५. परमशांत रसमय भगवतीमाराधना मैस एक भी शाबका यदि वी तय परिणमन मा हो बस। ६ इस बारे (काल) में सपयण मछे नहीं, वायु कम है, और दुर्मिक्ष महामारी से सपोग परमार भाते है, इसलिये वायुको कोई नि चपपूर्वक स्थिति नहीं, इसठिये पैसे बने से बामहितकी पाव तुरत ही करनी चाहिये । ठसे स्थगित कर देनेसे बीच मोठा मा बैठता है। ऐसे कटिन समपमें तो तयारी कठिन मार्ग (परमशांत होना) को प्राण करना चाहिय । उससे ही उपशम, क्षयोपशम और क्षायिक भाव होते है। ७ काम वारि कमी कमी हो मप से हार मानते हैं महाँ तो मात बार तो वे अपनेको होपपा मार देते है। इसलिये हातक हो, जैसे बने पैसे, वरासे उसे छोड़नेके लिये मप्रमारी होना चाहिये-- विस वय नसामा माप उस तरह रोना चाहिये । शूरवीरतासे पैसा तुरत हुभा जा सकता है। ८ पर्तमानमें हरिरागानुसारी मनुष्प विशेषरूपस है। ९ पर सवे पकी प्राप्ति थे तो दहका निधर्म सहममें ही नौपरिक द्वारा विधर्ममसे निकलकर सधर्म पकर हता है। उसी तर पनि सचे गुरुको प्रापि तो आरमाकी शांति बस ही सुगमतामे और सारमें ही होगाती है। १ क्रिया परमेमें तत्पर वर्षात् अप्रमादी होना चाहिये। प्रमास उम्ट्रय फापर मदाना पाहिये। ११ सामायिक-म्पम । प्रतिक्रमणमामाकी क्षमापना-बारापना । पूमा-भक्ति १२ दिनपूगा, सामायिक, प्रतिक्रमण पानि किम बनुनमसे करमे वारिप-पार करनेसे पकके बा एक प्रश्न उठते है, और उनका किमी वय पार पानबाठा नहीं । सानी भावानुमार, शानीराय करे अनुसार, पाहे गाव किसी भी क्रिया प्रति करे तो मी ५ मोसो भागमे ही है। १३ हमारी भावास पसनेसे या पाप गे, तो उसे हम अपने मिरपर वाहते हैं। कारण सि से मनमें कॉट परेवोपमा मानकर कि वे फिमीने ओंगे, मार्गमै राता मा फोमामी उन्हें यहाँसे उठाकर, किसी ऐसी मी एका जगहमें रण मिगहों पे किमाको न छग, तो पर एम्पन गुनाह नहीं कहा जाता, उमी तय मोशन पोत मार्ग बतानेसे पार रिम तद एय सका।
भीमद् रामचन्द्र [८५४ मागवार-ममतमापन ११ पानीको मायापक पकते हए बानी-गुस्मे क्रियाको पचास, अपनी पायतानुसार किमीकी कुछ बताया हो, और किसीको कुछ बताया हो, तो उससे मार्ग बरकता महो। १५ पपार्य सम्मके समझे बिना, अपना 'नो स्वर्ग बासता है, परमार्पसे पपार्यो अपना मही,' इसके माने बिना समझे बिना यो मका होता है, वह धनत समार माता है। इससिपे नातक पा समभनेको शक्ति न हो पातक मीन एना ही उत्तम है। १९ बका होकर पक मी गायको पपार्य मार्ग प्राप्त करानसे तीर्थरगोत्र पता है, और उससे उम्टा करनेसे ममामोहनीय कर्म पता। १७ पपपि हम इसी समप तुम सबको मार्ग कसा , परन्तु मरतनके अनुसार हा वो बस्तु रस्सी जाती है। महाँ ता निस तरह के परकममें मारी बस्तु रख देनेसे बरतनका नाश हो बास है ठसा तप यहाँ भी की बात होगी। १८ में किसी तरह ररने बैसी बात नहीं है। कारण कि तुम्हारे साथ हमारे पैसे हैं । तो का मान तुम्हार पुरुषार्पक वापान परि तुम पुरुपाप फरा तो मोक्ष दोना दूर नहीनिहोंने मोश्च प्राप्त किया के सब महामा परिवपने से मनुष्य ही थे और समान पान के बाद भी (सिम होने पहिले) देह वो नही की ही रहती है। दो फिर अब उस परमेसे उन महामानोंने क्या मिका राम पर समसकर हमें भी उसे निकास राम्ना है। ठप्प र किसका पविषाद पपमा मतमेव किसका ! मात्र पातमापसे ही उपासनीय है। (११) बापार सदी १० गुष १९५६ १ प्रथमसे मापुधका पबिना बार उपयोगमें गाना सौरे , वो प सापक समप काम जाता है। उसी तय मपमसे हो पा राम्पदशा प्राप्त की हो, तो यह अबसर जानेपर काम माती -बारापना हो सोहै। २ पशोविजपनीने मप सिसते हए स्तमा व उपयोग रस्सा पाक में प्रायः किसी नगल भी न मूठे थे । तो मी उपस्थ मनस्याके कारण मेसोगापा स्तपनमें से सागसूत्रकी गो वासा दोमा मिस्ती नहीं। प भीमगक्तानी पाने शतकको पप रके दो ईमाश्म होती है। इस बगा वर्षचनि रासमति चर्प पातुस्प गिना है, परन्तु उसका वर्ष ऐसा नहीं । रासम- ति वर्षात् जैसे गरेको र शिक्षा दी हो वो भी नातिस्लमानके कारण प्रा देखकर उसका होट बानेच मन हो जाता है उसी तय पर्वमानकामें बोलते हर मविप्पकामें करने की बात बोली बावी है। १ मगमतीमरापनामें रेश्मा बरिकारमें हरेकको स्पिति मगर वली तय बताई। १ परिणाम वान प्रसार है-पापमान, वर्षमान और समबस्पित । प्रपमकेने यस्पो होते हैं और मन्तिम समबस्पित (पासपोरेशीकरण ) केरवानाको होता है। ५ व्या गुणत्पानी खेपा तथा योगका चम्चामान किरहों सम्बस्पित परिणाम किस क्यो सकता है। उसका नाराय-सक्रिय गानको बांध बनटान नहीं होता।
८५४ म्पामपानसार-प्रसमामान पिविष पन मारि सपा--३३वा घर्ष हमें गुणस्थानफमें केवडीको मी योगके कारण सक्रियता है, और उससे बंध है, परन्तु न बघ धबध घ गिना जाता है । चौदावें गुणस्पानकमें पास्माके प्रदेश नमक होते हैं। उदाहरण के लिये, जिस तय सिमरेमें रस्सा हुबा सिंह बाटोको स्पर्श नहीं करता, मा स्थिर होकर बैठा रहता है, और कोई क्रिया नहीं करता, उसी तरह यहाँ आत्मा के प्रदेश भक्रिय यते । वहाँ प्रदेशकी वपछता है महाँ बक्रियता मानी जाती है। ६ बई सो पंप [पो-योगका चापमान होना बघ है। योगका स्पिर होना सबध है। ७ ब ववष हो उस समय जीव मुफ पुथा कहा बाता है। ८ उसर्गमार्ग पर्यात् यथाख्यातचारित्र-यो निरतिचार है। सम तीन गुप्तियों गर्मित होती है। मपमादमें पांच समितियों गर्मित होती है। उस बक्रिय है। नपमा सक्रिय है । नसर्गमार्ग उत्तम है, और उससे जो उतरता हुमाया नपबाद है। पौदार्यो गुणस्थान उस्सर्ग है उसस नीचेके गुणस्पान एक दूसरेका भपेक्षा अपवाद है। ० मिप्यास्य, वविरति, प्रमाद, कपाय, और योगसे एकके बाद एक बनुक्रमसे बघ पाता है। १० मिप्यात मात् मो ययार्य समझमें नहीं भाता । मिथ्यालसे पिरतिमात्र नहीं होता। मिरतिके समान कपायसे होती है कपापसे योगकी चचस्ता होती है। योगकी पचमता वाय, चौर उससे उल्टा स्वर है। ११ दर्शनमें भूल होनेसे पानमें भूछ होता है। जैसे रससे बानमें मूग होती है, वैसे ही मात्माका वीर्य स्फुरित होता है, और उसी प्रमाण र परमाणु प्रहण करती है, वौर पैसा ही पाता है और उसी प्रमाणमें लिपाक उदयमें भाता है। उँगलीमें उँगली राठ देनेरुप-अंटीनप- उदय है और उनको मरोजमेप भूर है, उस भूससे दुम होता है, मर्यात् बघ पता है। परन्तु मरोडनेरूप भूम दूर हो गानेसे उनकी परस्परको वटी सहनमें पाक देकर चा नाती है, और मया बंध नहीं होता। १२ दर्शनमें भूत होती है, उसका ठहरण -जैसे मका बापक शाममें तया सरेके बानमें देहको अफेक्षा एक ही है अन्यथा नहीं परन्तु बाप उसे नो अपना पका करके मानता है वहाँ भूत है।वही दर्शनमें भूत है, और उससे यपपि शानमें फेर नहीं तो मी पर मूस करता है, और उससे उसको अनुसार बन पाता है। १५ परि उदयमें मानेके पहिसे रसमें माता कर दी माय, तो बामप्रदेशसे फर्म सिरकर निर्मग हो बाप, भपका म रससे उदय बाते। ११ पानी सोग नई भू मही करते इसलिये वे पपरहित हो सकत है। १५ शानियोंने माना है कि देश मपनी महीप रहनेपाली मी नहीं कमी म कभी उसफा वियोग तो होमवाला ही-स मेद विज्ञानको ठेकर मानो हमेशा नगारा बर या हो, इस तरह पानीके कान में सुनाई देता है, और मामाके कान बहरे ऐते है इसलिये उसे जानता महरा। १५ दानी देहको नारामान समझकर उसका वियोग हमिपर उसमें खेद नहीपरता । परन्तु निस तय किमीको से ली हो, और बादमें पारिस देमी परे, उसी तद दहको परामसे प सौंप देता है-अर्पाट पहरोमें परिणति नहीं करता ।
और उसका मीमद् पनवम्द्र [८५४मासानकर-प्रमतमान १७ देह और मामाच भेट करना मेदान है। पानीका मात्र है। उस तेमालसे देश और वाहमा नदी शुदा ऐ सकती है। उस विज्ञान के होने के लिये महामामोंने समस्त शाब रमे। जिस तय तेजाबसे सोना और उसका सोट नग मध्य हो जाते है, उसी तर बानाके मेव निरूप तेमासे स्वामाविक मामयम्प भगुम्म्मु समावबाग होकर प्रयोगी दम्पसे फुदा होकर प्सपर्ममें वा पाता है। १८ दूसरे उदपमें वाये गए कर्माका वामा पाई मिस तय समापन कर सकती है, परन्त बेनाप कर्ममें पैसा नही हो सकता, और उसका पारमप्रदेशास वेदन करना ही चाहिये देवन करते हए कठिनाई का पूर्ण अनुमत्र होता है। यहाँ पर मेदान सम्पूर्ण प्रगट न वा सेतो वात्मा देहारसे परिणमन करती है बर्यात् दोको वपना मानकर बेन करती है और उसके कारण मात्माको प्रति मग हो जाती है। ऐसे प्रसगमें मिमें मेवान सम्पूर्ण हो गया है ऐसे शानियों को बसातादका बेदन करनेसे गिरा होती , और यहाँ पानीको कसौटी होती है। इससे बम्प दर्शनवाने याँ ठस तय नहीं Pक सकते और हामी इस तय मानकर टिक सकता है। १९ पुन्नमाम्पको अपेक्षा रक्सी पाप, तो मी पर कमी न कभी तो नाश हो जानेवाण है। पौर मो भपमा नहीं, यह अपना होनेवाम नहीं; साम्पे लाचार होकर दीन बनना किस कामका ! २. भोगापपरिपदेसा-योगसे प्रति भौर प्रदेश संभ होवे है। २१ स्पिति सपा अनुमागवप कापसे बचते हैं। २२ बाठ तपसे, सात वयसे, म तपसे, मौर एक तबसे बम गाँधा जाता है। (१२) वापत मुदौ १५ गुरु १९५६ १ शानदर्शन पर यथास्यात चारित्र, ससका फल निर्माण, और उसका फरममावाम सुनो। वापारी शुरु १९५५ १ वागमस्तोत्र महात्मा सर्मतमायाम (निसा शब्दार्थ होता है कि मिसेप्रपाम माम्पो ) बनाया है, और उसके ऊपर विगमर और ताम्बर माचापौने टोका है। महामा दिगमाराचार्य पे फिर मौ उनका बनाया मा उक्त स्तोत्र शेताम्बर मात्रामाको मा मान्य है। इस स्तोत्रमें प्रपम लोक निम्न प्रकार है- देवागमममीपानचामरादिपियूषपः । मापारिमपि ते नावस्वमसि मा महाम् ।। स शोषत्र मात्रा पर कि देवागमन (देक्वायका बागमन होता हो), बाकारागमन (वाप्रशमै गमन होवा हो) चामरादि विभूति (चामर गय विभूति होती हो समयसरण ऐसा हो स्पादि)-ये स्त्र मापानियोंमें भी देखे जाते है (पे मायासे बर्षात् इपिसे मी हो सकते है) सकिये उतने मासे हो बाप हमारे मातम न (उत्तमे मासे पाकर वषा मिनेन्द्रदेव मस्तित्व मा माना पा सका । ऐसी विमति माविका हमें कुछ मी प्रयोजन नहीं । हमने तो उसमस्याग कर दिया है) स भावाने मानो गुफामेसे निकम्ते हुए तापपरा बाप पालम तर्पण निरपेचमासे बचन हो–पा माशप यहाँ पताया गया है।
८५५ मारपानसार-प्रनसमापन विषिष पर मादि संप्रह-पो वर्ष ७८५ सरत मर्य . - २ माठ के अयपा परमेघरके सक्षण कम होने चाहिये, उसक सवपमें तपासूत्रकी टोकामें परिटी गापा निमरूपसे है मोसमार्गस्प नेवार भेचारं कर्मस्मृताम् । मावारं विश्ववस्वाना मंद वगुणसम्पय ।। - मोक्षमार्गस्य नेवार ' मोक्षमार्गको के गाने बाठाया कानसे मोक्षका वस्तित्व, मार्ग, मौर बानेपामा इन तीन बातोंको स्वीकार किया है। यदि मोश है तो उसका मार्ग मी होना चाहिये, और यदि मार्ग है तो उसका द्रय मी होना चाहिए और बो द्रष्ट्य होता है की मार्ग में बा सकता है । मार्गमें से बानका कार्य निराकार नहीं कर सकता—साकार ही कर सकता है।बर्यात् मोधमार्गका उपदेश, साकार हो कर सकता है; साकार उपदेश हरी-निसने हस्पितिसे मोक्षका अनुभव किया है उसका ठपोश कर सकता है । ' मेचार कर्मम्मताम्-कर्मरूप पर्वतका मेन करनेवाला अर्यात् कर्मस्पी पर्वताक भेग्न करनेसे मोन हा सकती है, मर्षात् भिसने देस्थितिसे कर्मरूपी पर्वतोंको मेदन किया है, वही साकार उपदेश है। पैसा कौन है । यो वर्तमान देहमें जीत ग्मुख है। जो कमलपी पर्वतोंको तोड़कर मुक हो गया है, उसे फिरसे कर्मका बस्तिल' महीयता। इसलिये जैसा यातसे मानते हैं कि मुक्त होने के बाद गो देह धारण करे पहनीमुक्कर, सो ऐसा गोन्मुक्त हमें नहीं चाहिये । हावार नियतत्वाना '-पिसके तत्तोंको गाननेवाला-कानसे पा बताया कि बात कैसा चाहिये कि यो समस्त विश्वका माता हो । 'बंदे समयम्पये '-उसके गुणों की प्राप्तिके लिये में उसे बदन फरता है-जर्यात् यो इन गुणों से युक्त हाही बाप्त है, और यही पदनाप है। ३ मोक्षप समस्त पैम्पोकोही सामान्यपपसे चाहिये, एक चीनको मपेशासे नहीं है, मर्याद पा पत पका सामान्य धर्म है । यह एक गीतको हो हो बौर मरे नीतको म हो, ऐसा माता। , भगवतीभारापनाके उपर सतामर वाचानि नो टीका की, या मी उसी नामसे नावातीहै। ५. करणानुपाग भयना दम्पानुपोगमें गिपर भौर सेताम्बरों के बीचमें कोई नम्तर नही, मात्र बाय म्यारमें ही मन्तर है। ६ करणानुयोगमें गणिवापसे सिदान्त रस्मे गये है। उसमें फेर होना समन नही। ७ कर्ममय मुम्पपमे करणानुपागमें गमिव होता। ८ परमा मप्रकाश Pगम्बर वाचार्यका नापा एमाहै। ठमक उपर टीका है। ९ निगाठता मुहै। सकम्प गुम। १. कापड तप करते हुए मी महामुनिको निराकरता बर्षात् सम्पका देशन में जाती है। माछा पारिसे उप बानिका भावश्यकता है, और उसम बात मा कापासा करता है, रिमी पहसारप्पइशारा मनुमन करता तो सिर रिसे प्रयास करना बाकी नहीं पा, में सिवमगवान्से निराकुलता कैसे ममत्र महो! ११ देहको अपना विम्य विमुल पर है। जैसे देशमधर्म देनमेमें माना है, मे हो
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८५१ म्पाफ्यानकार-प्रनसमापान ] विविध पम मादि सपा-वाँ वर्ष ७८७ २ भास्माको मतीतिके छिये सकलनाके प्रति प्यन्त —न्द्रियोंमें मन मविष्टाता है, और पाकीकी पाँच इन्द्रियों उसकी भावानुसार घसनेवाली है। और उनकी सकलना करनेगाम मी एक मन है। यदि मन न होता तो कोई भी कार्य न बनता । वास्तवमें किसी इन्द्रियका कुछ भी नहीं परता । मनका । समाधानका होता है। यह इस तरह कि कोई चीज मॉससे देसी, उसे पाने के लिए पैसे घसने लगे, वहाँ जाकर उसे हायसे उठा ली दौर उसे सा ग स्यादि । उन सम्म क्रियाओंका समाधान मन ही करता है, फिर भी इन सबका माघR वरमाके हो उपर ह । । निस प्रशमें पेदना अधिक हो, उसका गए मुख्यतया पेदन करता है, वौर बाकीफ प्रदेश उसका गौणसपा वेदन करते हैं। १ जगत्में बमम्य नीर बनतगुने है। उससे वनतगुने परमाणु एक समयमें एक मील प्राण करता है। ५ द्रम्प, क्षेत्र, काल और मानसे नाम और वम्तर परिणमन करते हुए परमाणु, जिस क्षेत्रमें पेनापसे उदयमें माते है, यहाँ इकडे होकर वे वहाँ उस रूपसे परिणमन करते हैं, और यो मिस प्रकारका मध होता है, उदयमै नाता है। परमाणु पदि सिरमें इको हो गॉय, पोमे यहाँ सिरके दुसाने के बाकारसे परिणमन करते है, और वोसमें भारतको बेदनाके भाकारसे परगमन करते है। ६ पाका यही चैतन्य भीमें बीहपसे और पुस्पमें पुरुषरूपसे परिणमन करता है, और मुराक मी तयाप्रकारके भाकारसे हो परिणम कर पुएि देती है। ७ परमागुको परमाणुके साय शरीरमें लाते हुए किसीने नहीं देखा, परन्तु उसका परिणाम- विशेप बानने वाता है। जैसे गरकी दवा परको रोक देती है, इस बात को हम माम सकते है। परम्त मौतर क्या क्रिया Tई, इसे नहीं मान सकते—स बहादसे कर्म होता हुमा देम्सनेमें नही माता, परदा उसका त्रिपाक देखनमें वाता है। ८ भनागारबिसे नतम वपना नहीं । ९ बमगार पररहित । १० समिति-सम्पन् प्रकारसे मिसकी मर्यादा है उस मर्या सहित, पास्थितमानसे प्रकृति करनेका बानियोंने जो मार्ग कहा है, उस मार्गके अनुसार माफ्तोरसहित प्राति करना। ११ सवागत-उपशम । १२ श्रमणमगपाम्-साधुभगवान् अथवा मुनिमगवान् । १५ अपेक्षा-मयरत-नडा । १५ सापेश-सरा कारण-हेतुकी बहरतकी इच्छा करना । १५ सारेभष भएरा मपेशामे सरेको कर । (१५) मापार बदौ २ रवि १९५६ , पाधिपार यो सत्तासे इजा हो। २ अनुपम-यो सभा नहीं; सिर म हान योग्य ।
भीमद् जिचा [८५३ मामनधर-प्रस्नम्मान पनि भरमगुणधर्म देखनमें गाये, तोरेरके उपरका राग ही नए बाय-बारमाति विद्यार होकर दूसरे दम्पके स्पोगसे बामा देहरूपसे ( विमाक्से ) परिणमन करती ई माट्रम हो । १२ बैतन्यका स्पन्त स्थिर होमा मुक्ति है। १३ मिष्याल, अविरत, कपाय और योग बमापसे जामसे योग स्पिर होता है। ११ पूर्वक सम्पास के कारण यो होस वा नाता पर प्रमाद। १५ योगो वाकर्षण करनेवाग न होनेसे बह लय ही स्थिर हो जाता है। १६ मा बौर देप यह वाकर्षण ।। १७ संक्षेपमें जाना या कहना है कि पुम्से चैत्यका वियोग कराना पर्यात रागरेफ्से बाकर्षणको दूर हटाना है। १८ गाँतक वप्रमच हुवा चाप पहातक गात ही गना चाहिये । १० निनपूग आदि अपचा मार्ग है। २ मोहनापकर्म मनसे मौता गाता है परन्तु वेदनापकर्म ममसे नहीं बता पाता । तोपर बादिको मी उसच वेदन करना परता, और या दूसरेके समान कठिन मी अगता है। परन्त उसमें (वामधर्मम ) उनके उपयोगकी स्थिरता होकर उसको निरा पाती है और दूसरेको- निाको पाता है। भुपा वा पा मोहमाय नाही, किन्तु वेदनीय कर्म है। भी पुमान परपन परै, सो यपरापी मा। मो मपनो पन म्पोहरे, सो पनपति धर्मः ॥ -औबनारसीदास २२ प्रापनसारोदार पकवीसरे मागमें गिनकम्पका वर्णन किया है। पा सेतामाप स्प है। उसमें पाकिस्स कम्पको साघमेवाको निम गुणोनाम महारमा होना चाहिये। १ संपपण, २ पारब, भुत, १ पौर्य और ५ मस्गता । २१ दिगम्बररिमें यह दा साठचे गुणस्थानवता पोषकी है। दिगम्बररिके बनुसार स्थचिरफापी और बिनकम्पी पे नम होते है और होत्यारों के अनुसार प्रथम मर्यात् स्थविर नम नहीं छते। इस कम्पको सामनेवालेका मुबान इतना अधिक बनपान होना चाहिये कि उसकी पि मुतखानाकार हो बानी बाहिये-विषयाका चि न होनी चाहिये । दिगम्बर करते है ना दशा बाक्षेपही मोक्षमार्ग है बावोस ठग्मत मार्ग-मगो निमोपसमग्गा पा य समम्गया सम । तया मागो ए बार शारी मायो -सात् ना बरसे मी मभिक बढ़कर है--स कहालतके अनुसार या यशा बारशाहको मी पम्प है। २५ चेतना तीन प्रकमको १-१ कर्मपतना-फेन्द्रिय गौर भनुमा करत । २ कर्मचाना-कोशिप तथा पन्द्रिय अनुभव करतेशानपेना-सिपाप वनुमा करता है। २५ मुनियोको पि बमैथिक हानी चाहिपे, परन्तु ससक बरठे हा या मैत्रिक देखने बाटो। (१०) बापत पहौ २ शनि १९५१ १ पाठोधन-एक बच सौ तर विचार करना।
८६५ मामानगर-मानसमाधान ] विषिष पत्र मादि सप्रह- पर्प २ वास्माको प्रतासिके लिये सफरनाके प्रति एयन्त बान्द्रियोंमें मन वरिष्ठाता है, और वाकीको पाँच इन्द्रियाँ उसकी भावानुसार चरनेवासी है, वौर उनकी सकमना करनेवासा मी एक मन हो। यदि मन न होता वो कोई भी कार्य म बनता । वास्तवमें किसी इस्त्रियका पुन्छ मी नही पम्ता । मनका ही समाधानका होता है। यह इस तरह कि कोई पाम बोससे देखा, उसे पानके लिए पैसे चल्ने लगे, यहाँ नाकर उसे हायसे उठा ली और उस सा सी इत्यादि । उन सब क्रियाओंका समापान मन ही करता है, फिर भी इन सवका बाघार नामाके ही उपर है। ३ निस प्रदेशमें वेदना वधिक हो, उसका वह मुख्यतया घेदन करता है, और माफीके प्रदेश उसका गौणतया वेदन करते हैं। १ जगत्में बमम्प गौर अनतगुने हैं। उससे बनतगुने परमाणु एक समयमें एक गोष माण करता है। ५ दम्य, क्षेत्र, काम और मारसे गाय और मम्यंतर परिणमन करते हुए परमाणु, जिस क्षेत्रमें बेदनारूपसे उदयमें जाते है, वहाँ को होकर वे वहाँ उस रूपसे परिणमम करते है, और वहाँ निस प्रकारका बध होता है, या उदयों नाता है। परमाणु परि मिरमें इको हो नाप, दो मे यहाँ सिरके दुसानेके आकारसे परिणमन करते है, वौर मोसमें मौसकी पेदनाके वाफारसे परिणाम करते? ६ वहाँका ही पैन्य भीमें भीमपसे भौर पुरुप पुरुषरूपसे परिणमम करता है, वौर मुराक मी तथाप्रकारके धाकारसे ही परिणम कर पुटि देती है। ७ परमाणुको परमाणु के साथ शरीरमें मदते हुए किसीने नही देखा, परन्तु उसका परिणाम- विशेष नानमेमें भाता है। भेसे ग्यरको दवा परको रोक देती है, इस बातको हम जान सकते हैं परन्तु भातर क्या क्रिया हुई इसे महा गान सकते—इस CUPEस कर्म रोता दया देखनमें मदो माता, परता उसका विपार देखनमें भाता है। ८ अनागारनिसे तमें अपना नही । ९ भणगार-घररहित । १० समिति सम्पन् प्रकारसे जिसकी मर्यानी उस मर्यादा समित, ययास्थितमारसे प्रति करनका शानियोंने जो मार्ग कहा। उस मार्गके अनुसार मापवोसमाहित पति परना। ११ सचागत-उपशम । १२ भ्रमणमगवान्-साघुमगवान् उपचा मुनिमगवान् । १३ बरेना-समरत-पा। १० सापेभ-मरा कारण-हेतुकी बरातको इप्डा परमा। १५ सारेस नपा पोशाक सरेको हेर । (१५) मापार वर्गरम १९५६ १ पाकिस-या मुलासेमा हो । २ अनुपपमा समर नहीं, मिट म दान पोप ।
भीमद् पसबाद [८५मानवार-प्रनम्मापन, . गत भारफकी मफेवासे परास्याग और अन्य ब्युबतक सबमें- १ म्तक मृषा और परमीका स्याग न किया गाय, तबतक सब किपा निफर तबतक भारमा छ कपट हानेसे पर्म फलीभूत नहीं होता । २ धर्म पानेकी या प्रथम ममिका है। ३ जबतक पाप्पाग और परस्पाग गुण न हों, तबतक बच्छ तथा श्रोता नहीं हो सकते। १ सपा र ऐ जानेसे बातसा वसाप प्रति कम होकर, मितिका प्रसंग पाता है। उसमें साइन बातचीत करते हुए मी विचार करना पाता है। ५ भषा बोम्नेसे अम होता है, ऐसा कोई मियम महो। यदि ऐसा होता है तो सच योजनेबाकी अपेक्षा जगत्में नो बसप बोम्नेवाले पात होते है उनें अधिक मम होना चालिसे परन्त पैसा छम दसनेमें मही वाता। तपा बसस्प बोक्नेसे काम तो कर्म एकदम सो जॉय और शमी कोटे पर माय । ६ सपको हो जय है। उसमें प्रपम तो मुक्तिक मास ऐवा, परन्तु पासे सायका प्रमान होता है, और उसका सरे मनुप्प तपा सर्वध भानेपा के ऊपर वसर होगा। ७ समसे मनुम्पको वारमा स्फटिकके समान हो पाती है। जापान यदी : सोम १९५९ १ गिमार सम्प्रदाप पाता है कि मामा केयान शपिकपसे पता। २ वेताम्बर सम्याप केयानको सगरूपसे गनेको स्वीकार करता है। ३ शक्ति शम्पका बर्ष सत्तासे अधिक गौण होता है। १ महिमसे वर्षात् मारणसे का वा मही । म्पों म्यों शक्ति बढती गती मात् उसके ऊपर म्पों म्पों प्रयोग होता गाता । त्यो त्यो काम पिपुर होकर फेशबान प्रगट होता। ५. सत्ता वर्षात् वावरणमैं , ऐसा का भाता है। ९ सचा धर्मप्रति पोर पा ठदपमें मात्र, पा शजिसप नहीं करा पाता । ७ सजा केक्नान दो और वावरणमें न हो ऐसा महीं होता । मगवतीमारापमा देसमा । ८ कान्ति, पति, शरीरका गाना सुरास पचना सूनका फिरना, उपके प्रदेशों का नाचे माप उपर गाना (निशेष कारगसे समुद्रात बानि बोना) रमता र माला ये सब तैमस परमाणुको शिपाय है ! तपा सामान्य प्रतिसे मामा प्रदेश मो से नीचे जमा करते -पाप- मान पते हों पर मी विस परमशसे ही होता है। ९ कार्माण शरीर उसी जगा वामप्रदेशों को अपने बालरण म्पमापसे रवाता है। १. मामाले माठ सबक फ्रोश वफ्ना स्थान नही मदम्ते । साम्प प रतिसे स्पूम्नपसे ये बाट प्रदेश माभिक को पाते है–सम्मम्मसे हो ससातों प्रदेश को पाते हैं। ११. एक परमाशु एकमा नेपर मौ म दिशानोको स्पर्श करता है (धार रिशमें तपा एक हर्ष और एक बयो सब मिटर मदिशायें होती। । माना, ८५१मासानसार-प्रासमाचान षिविष पर मादि संप्रह-३५वों पप ७८ . - । १२ नियाणु वर्षात् निदान १३ बाठ कर्म सब वेदनीय है, क्योंकि उन सपका वेदन किया जाता है। परन्तु उनका बेदन मोक-प्रसिद्ध न होनेसे, मेक-प्रसिद केदनीय कर्मको असग मिना है। १० कार्माण, बस, माहारक, क्रिपक और बौदारिफ इन पांच शरीरके परमाणु एक जैसे हो अार एक समान है, परन्तु ये मारमाके प्रयागके अनुसार ही परिणमन करते है। १५ अमुक अमुक मास्तिककी नसे दबानेसे क्रोष, हस्प, उमक्ता उत्पन हाते है । शरीरमें मुन्स मुल्य स्पछ मीम, माक स्पानि प्रगट माश्म होते हैं, इससे उन्हें हम मानते है, परन्तु ऐसे सूक्ष्म स्थान प्रगट माश्म नहीं होते, इसठिये हम उन्हें नहीं मानते, परन्तु मे है बबर । १६ वेदनीयकर्म निराहप है, परन्तु दवा इत्पाद उसमेंसे दिमाग कर देती है। १७ कानाने ऐसा कहा कि बाहार मेते हए मो हुस होता हो और छोड़ते हुए मी दुस होता रो, सो माँ सरसना करनी चाहिये । उसमें मी अपवाद होता है । शानियोंने कुछ मामपात करनेका उपदेश नहीं किया । १८ जामीने बर्नत बौपपियाँ बनत गुणोंसे सयुक देसी । परन्तु कोई ऐसी नौषमि देसनेमें मही नई भो मौतको दूर कर सके । वैप मोर वोपधि केपट निमितरूप है। १९ बुरदेवको रोग, दरिद्रता, दावस्था और मौत इन पार पार्वोके ऊपरसे परम्प उत्पम या था। (१८) बापाढ़ बदी ५ भीम १९५६ १ चक्रपतीको उपदेश किया जाय, तो बह एक पदामरमें राम्यफा स्पाग कर दे। परन्तु मिभुकको बनत तणा होनेसे उस प्रकारका उपदेश उसे मसर नहीं करता । २ पदि एक बार नामामें अंतापि स्पर्श कर बाप, तो वह वर्षपुरम्परागनतक यता है, ऐसा तीपंकर बारिने या है। बताईति ज्ञानसे होती है। मपि होनेका बामास सर्पही (समावसे ।) मामामें होता , और पैसा होने की प्राति मी स्वाभाविक होती है। वर्षात् वारमा परमामीटरके समान है। पर होनेकी और उतर जानेको पाँच घरमामीटर कराता । पपपि परमामीटर परको भारति मही बताता फिर मी उससे उसकी जाँच होती है । उसी तब भईत्ति होनेकी भारुति मा इम नही होती, फिर भी बतति ऐसी मामाको पाँच हो पाती है। जैसे वापभ माको मम सय उतारती है, इस बातका प नहीं बताती, फिर मी भोपपसे मर र दो गाता है--सी आँच हाती है। इसी तय बताईचि होने की स्वप ही माँच होता है । यह प्राति परिणामप्रताति है। ३ नीयकर्म + १ निरा बसम्पातगुना उत्तरोतर प्रम है। शिसने सम्यान प्रारमही रिया, म मिपारि गौरकी भपेशा सम्पमाएि वर्नतगुनी निरा करता है। +गानमारनार पर्म समान प्राशीम मम्मा त परत पाली बिरेने पर अपरे गरपनन भयो। मसमें भीमाने मम् मा AIR रानो सिm:- भीमद् पदवन [८५मारपानबर ममसम्मान ५ वाकर वारि को गृहस्थाममम पनेपर मी गात क्या वगा सम्पास होता है। ६ गत वयमा अपगात एक कहा गाता है। कासीको परमाबगार सम्पास होता है। ८ बीपि गुपस्पानमें गर अपना भगत सम्पत होता है। ९ पाकिसम्पत्र अपना गाद लगाव एम्पत एक समान है। देव गुरु, ताल वयका धर्म अपका परमार्थको परीक्षा करनके तीन प्रकार है-कप बोर ताप । इस तय तीन प्रकारको सोगी होती है। यहाँ सोने कसोगीका यन्त हना चाहिये (धर्मबिन्दु मन्यमें है)। पहिम और दूसरा प्रकार किसी दूसो मी मिक सकते है। परम्त तापको विशुद्ध कसोटीसे नो तुम गिना बाय, पो देव गुर और धर्म सवा गिमा जाता है। ११ सिप्पको यो कमियाँ होती है, जिस उपदेशको प्यानमें नही वाती उसे उपदेशका न समयमा चाहिये । वाचार्य एस पाहिये मो सिप्प सम्पदोपको भी मान सके और उसका पपा- समय पोप मी सके। १२ सम्पारि गस्थ ऐसा परिपे रिसको प्रवाति बुमन मी करें-ऐसा शामियोंने कराई। तात्पर्य यह कि ऐसे मिकक धर्म पाम्मेवार पहिये । रात्रि १ विज्ञान और मन पर्पशानमें कतर । २ परमाणविज्ञान मन पर्पानसे मी चा भाता है और पा एक अपवादरूप है। (२) वापन M७ पुष १९५९ १ बापमा पोमेके लिए समस्त मुततान है और उस बाराधमाका वर्णन करनेके म्पेि मुतकेसी भी पाप है। २ बाम ठथि भ्यान दौर समस्त बारापनाका प्रकार मी ऐसा है। १ गुणी वतियता ही प्रपी और उसके वाधीन पम्पि पिनि पारिबार चारित्र समय करना यह उसका पिवि।। १ दसपैकासिकको पहिमै गापा- + पम्मा मगसामिद, मीसा मयमो नमो। देवारिस नसति, बस्स पम्मे सया मनी ।। समें समरिधि गर्मित हो बाता है। परन्तु ममुक पि ऐसी नही कही गई, इससे पर समझमें जाता है कि स्परस्मसे विवि माही बताई। समोर-मासान मोर मनमानीमनगममें उले मित्र कान मपी मायमाम ऐजा मने मा । म ( मापान)को पन्हापान समाये पुनस्वयम मौजवा एमेर ममता पतिला मनालय एल्य (मनमोल पर मनम पानी प्रवरपरमार एक मिदमोके समान मौर मप्रमरोहीन्या है-एपनि उनि मुल मुलबहर गये। +र्म-मारना बम और कम-सामचिमचम र मन से मी नमस्मर-मनुवारक ६५मारतानमार-प्रसापान विविध पत्र मादि मप्रह-३२वा वर्ष , । ५ (भमाके ) गुणातिशयमें ही चमत्कार ह । ६ सर्वोकिए शान्त समाव करनेसे परस्पर बरबासे प्राणी अपने पैरमाएको रकर शान्त हो करते है, एसी प्रीतीयकरका अतिशय है। मो कुछ सिदि लम्ब झ्यादि है ये बामाके नाप्रतमानमें मर्यात् वाम्माके वप्रमच खमाबमें है। समस्त शख्यिा मारमाके वाधीन है। वरमाके बिना कुछ नहीं । इन सबका मूल सम्पज्ञान दर्शन और पारित है। ८ भन्यत प्रश्मामुद्धि होने के कारण परमाणु भी घर होते है, यहाँ सालिक असालिकमक्षके नौधे बैठनेसे बानेवाले असरका पन्त मेना चाहिये । ९ स्मि सिदि सबी वीर निरपेक्ष महरमाको प्राप्त होती है—योगी बैरागी पैसे मिप्यालीको प्रत नहीं होती । उसमें मी बनत प्रकारके अपवाद है। ऐसी शक्तिया महामा प्रगट नहीं माते-सा बतासे मी नहीं । जो बैसा करता सा उसके पास नहीं होता। १० लम्बि क्षोमकाप वार चारित्रको शिपिठ करमेवाली है। धि आदि मार्गसे युक्त होने के कारण है। इससे हानीको उनका तिरस्कार होता है। पानीको नहीं म्धि, सिदि वादिस मुत होना सम्म होतात, हाँ वह अपनस विशेप बामाके वायकी शोर करता है। ११ मामाकी योग्यताके बिना यह अति नहीं माठी | बारमाने अपना अधिकार बटा सेनसे पावाती। १२ जो देह छटती है या पर्याप फूट जाती है, परन्तु बारमा मास्माकारसे अमर वस्थित पती है उसका अपना कुछ नहीं जाता, जो जाता है अपना मही-बतक ऐसा प्रत्पक्ष धान न हो, तबतक मृत्युका भय म्गता है। गुरु गणपर गुमपर भपिफ (सफर), मजर परंपर भीर । प्रववपपर तनु नगनवर, मंदी पप सिरमौर ॥ -सामीकार्तिक । • प्रधुर-अलग भग पिरछे । इप-प्रम । सिरमौर=सिरका मुफुट । ११ मागा-ममन्त । परमागाप-उहाएसपसे मजबूत । भगाह-एक परमाणु परेशको रोके-पास हो। मायकवानाके सपनोंका भोता-मानीके नफा प्रवण करमेबाठा । दर्शन पानके बिना क्रिया करते हुए मा, श्रुतदान बाँचते हुए मी, मानक साधु नही हो सकता । आपिक- भाषसे ही पालक सापु कहा जाता है, पारिणामिकमापसे मही कहा जाता । स्पषिरम्परा १५ स्थविरकमसमा साधु र हो गये हैं उनै गासका मर्यादासे वर्तन करनेका-बनेका- धानियोंशय मुकर किया हुमा–बाँधा हुआ—निमित किया हुआ पिनमार्ग या नियम । १५ दिनसम्पएका चिरनेवाले साधुओंके लिये कम्पित किया हुमा-पाँधा हुना-मुकर्रर किपा हा विनमार्ग पा मिपम । भाइदा ८ गुरु १९५६ १ सब धर्मोको मपेशा नैनधर्म उकय त्याप्रणात है। जैसा यार स्पारन उसमें किया * मधुरका प्ररि मर्ग बहु' रोग और सुगमन होगा। , -मनुवादक भीमद् रामचन्द्र [८५३म्पसानसार-समसमापन. गया है, पैसा किसी इसे धर्ममें मही है। मारने कोही मर गम्नेको स छाप वापकने वामामें 'मा 'है। इस बगा उपदेशक पचम मी बारमा सरकर वसर करते है। प्राधिनकी उावीमें मानो सामरिसाके परमाणु ही न हो, ऐसा मीनिनका बहिंसाधर्म है। लिप्तमें दया नही होती, त्रिम माही हो । नोंके हापसे सून होने की घटना मी प्रमाण पगा। यो बैन होता है या बसप नहीं बोला। २ चैनधर्मके सिवाय दूसरे धोके मुकार में बरसा मर्म मी चा पाता है। मानों को यह बात सिक-नियात्राका मारा मी बोगिनने और बुझने ही किया है बात कापम है। ३ मामयोंने पा वादि सिक धर्मबाले होनेसे ओशिनको तथा मौसको सप्त शब्दों का प्रयोग करणे पिकारा।यह पपा है। १ प्रमोंने सार्पदिसे पर Rसक क्रिपा दासिल की है। मानिनने तपा श्रीबुरने स्वय बेमवका त्याग किया था। इससे उन्होंने निवार्थ युनिसे दयाधर्मका उपदेश कर, Rसक-कियात्रा विभोर किया । अगत्के पुसमें उनकी न पौ। ५ हिम्दुस्पानगग एक समप किसी विधानवम्पास इस तर मेरे देते हैं कि उसे फिरसे प्राण करत दुए उन्हें बाचिरा जाता है। योपियन छोगोंमें इससे सस्टी हो पात है। उसे योग नहीं देते, परन्तु बाही रसते है । हो, प्राधिके कारण म्यादा कम वम्पास हो सकता हो, पह बात बगहै। (२२) पति १ पेदनीय कर्मको गम्य स्पिति बारह मुकी है। इस कारण श्रम स्पिविका मन मो कपा- पके बिना एक समपका पाता है, दूसरे समप बेदन होता , मोर तीसरे समप निर्माण होगाती है। २यपपिको किपा सम्मेकी क्रिया। १ का समपमें सात वपना भार प्रातियोंका पहोवा पाँ मुराम तथा रिस्का पन्त सेना चाहिए । बिस तप पुराम पफ गहसे की जाती है, परन्तु उस रस रेशनिपको पर चला है और हरेक हप अपनी अग्नी शक्ति अनुसार उसे मरणार उस एमे परिणमन करती है। उसमें बनर मही पाता। उसो तापदि को विपासना किमांडो सर्प कपट हे तो बह किया तो पर जगह दो पानु उस ममर विपनपसे हरेक विषय हुदे उसे प्रकारसे समस्त बारीरमें ता है। इसी तप कर्म करते समय मुम्प उपयोग ता एक ही प्राविन रोता है। परन्तु उसमर भपात पाप हम सब प्राणियोंके परस्पर संपकर मिना है। असम रस पैसा ही उसम पदम बाता है। निम माग साईश होना है, दम मागचे परिपाट गग जाप, दोपहर मही पहा मी तर प प्रालिका एम प्रिया बाप तो साता मासपोर उसके कारण गरी प्रातिकमे करारा पाना मा क PIt | गेम्म प्रयोगसे पहरा मानिस पारिस उतर ८६३म्पास्मानसार-प्रभम्माषान] विषिष पर मादि सपा-कौ वर्ष चाता है, उसी तय प्रातिका रस मद फर दिपा नाय, तो उसका बल कम हो जाता है। एक महति च करती है और दूसरी प्रतियाँ उससे माग छेती है-सा उनका स्वभाव है। . मूल प्रकृतिका क्षय न हुआ हो और उत्तर कर्मप्रातिका वन-विनर हो गया हो, तो मी उसका बप मम प्रातिमें यनेवासे रसके कारण पड़ सकता है -यह भाषय सा है। ५ बनतानुवपी कर्मप्राविकी स्पिति पाठीस कोडाकोडीकी, और मोहनाप (दर्शनमोहाय ) को सत्तर कापाकोदीकी है। (२६) धापार बी ९ मुक्र १९५६ १ आरमा, वायुका बप एक भागामी भवका ही कर सकता है, उससे अधिक भयोका बम नहीं कर सकती। २ कर्ममन्यके अपचको बो वाठों कमप्रवियों बता है, उनकी उचर प्रानिर्यो एक गौरकी वपेक्षा, अपवार के साथ, बप उदय बादिमें हैं, परन्तु उसमें मायु पश्चादम्पसे है। इस वह कि मिथ्याल गुणस्पानबती जीपको चार मापुको प्राविका (वपमाद) बताया है। उसमें ऐसा नही समाना चाहिये कि जीव मौजूद पर्यायमें चारों गतिकी वायुका बन करता है, परन्तु इसमा मर्प पहा है कि वायुका मम करनेके लिये वर्तमान पोपमें इस गुणस्पानकाता नीवको चारों गतियों सुखी है। उसमें बह चारमेंसे किसी एक गतिका ही पत्र कर सकता है। उसी तय नाव जिस पर्यायमें हो उसे उसी अायुका उदय होता है। मक्सत्र पर कि पार गठियों से बर्तमान एक गतिका उदय हो सकता है, और उदारणा भी उसीको हो सकती है। ३ को प्रति उदयमें हो, उसके सिवाय दूसरी प्रतिको उदीरणा की जा सकती है, भौर उतने समय उदयमान मावि रफ गाती है, और पपासे उदपमें जाती है। १ सचर कोकाकोषीका मामे बड़ा स्पितिवध है। उसमें बम्पादों मन होते है। तथा माइमें वैसेका वैसा ही क्रम कसमे बन पाता जाता है। ऐसे बनतबरकी वपेचाम्से बनवों मर करे नाते हैं, पर मरका बष पहिले कहे अनुसार ही पाता है। (२१) बाप १० शनि १.५६ १रिशिष्ट मुम्पतया मुन्यमारका बाचक शम्द। २ पानापरणाप, दर्शनावरणीप, और बतराप ये तीन प्रतिया उपममाबमें कमी नहीं हरा सम्ती-ये पाशममाषसे ही होती है। ये प्रति पनि उमाममा में तो आमा वापर हो गाय और किपा मी म कर सो भपका उसमे प्रति मी न हो सके । शानका काम जाननेका दर्शन फाम देखनेका, और बीयका काम प्रवर्तन करनेछ। पर्प दो प्रकारसे प्रति कर सकता है-१ ममिसपि २ अनभिमार। बभिसधिारमा प्रेरणाले पर्मिको प्रति होना । मनभिषिपाप बाकी मापि होना। जाननमें भून नहीं होती ! परम्नु उपभाषसे यमेबाट दर्शनमाइके कारण मूठ होनस मर्याद पौरका और माइम होनेसे, बीपको प्रावि विपतमात्रमे पता है दिवा सम्पमारसे तो पार .
। भीमद् रामचन्द्र [८मामानवामनमापान सिवपर्याय पा गाम । बारमा कमा भी किसाफे मना नहीं हो सकता । जबतक योग एते है तबतक मात्मा पो किया नती है वपनी पार्यशहिसे ही करता है। प्रिया देस में नहीं बाता, परन्तु पा परिणामके उपरले बानमेमें माती है। जैसे सई खुराक निग्राम पच माता है-पा समेरे उनसे मात्म होता है। यदि कोई करे कि निदा वजी माई पी, तो पा होनेगारी किया समसमें बानेसे होबा गाया है। उदाहरणके पिये किसाको परि पास बरसकी उनमें एक गिनमा बाने, तो इससे या नहीं माया सकता है कि उससे पहिले बक ही नहीं । इसना कहा पायगा उसको उसका दान न पा । इसी तय बानदर्शनको समाना चाहिये । बारमा बालदर्शन और पार्य पोरे यात मी मुळे यनेसे वारमा क्रिया प्राति कर सकता है। वो हमेशा चार या करता है। कर्मय बाँचमेसे विशेष स्प होगा । इतने मुगासासे बात ठाम होगा। १ पीपमाल हमेशा पारिणामिकभालसे है। इससे गाव गारमावसे परिणमन करता है, और सिदत्व पापिकमानस होता है। क्योंकि प्रकृतियोंके अप करनेसे दो सिवपर्याप मिझती है। १ मोरनीयकर्म बौदामिकमावसे होता है। ५ स्य मेग कानमात्रारहित बक्षर लिखते है परन्तु कोको कानमात्राशत नही मिलती उन तो बात स्पररूपसे मिलते हैं। उसी तरा कपाम्योगमे शानियोने काचित् का काममात्रापति मिहा हो तो मरे हो परन्तु कर्मप्रहातिमें तो निषित होक। उसमें परा मी मेर मीबाने दिया। (२५) बागा बदी ११ र १९५६ हान, गेरा पिरोई हुई के समान है. ऐसा उत्तयम्पयनस्त्र में कहा । मिस तय गेरा पिई सोई नही पाती, उसी तरबान होमेसे ससारमें पोसा महाँ खाते । (२६) बापान दी १२ सम्म १९५६ १ प्रतिधारशपिंकरका धर्मरम्पच बतानेवाण । प्रतिहार परवान । २ मिस तयत्पूल, भापम्यून, उससे मी स्थूग, तूप, रसे दूर, उससे मी र पदार्यो बान होता है। उसी तय सम्म सम्म सम्म बादि शान मी सिसाको होना सिख ऐ सकता है। नयाममन। १ उपरताप गया । अनुपहरानगी मारा गया । उपामगन्यापारमूत । वनिधेम मो पस्नुपर्मस या मा सके । पाठान्तर-एक पाठको बगर (सरा पाठ । मातर-कानेका बदा पाना । शिवप-यो पपापोप न हो-फेरफारा-कम मादा । नामदम्प पा सामापरिक्षेप उम्पामा समान है। सामान्य वनमा दर्शन है। सीनशेष भेलसजन है। ५. सतासमुन्तसम्पक प्रचारसे सत्ताका उदयमूव होना-प्रकाशित होना, परित ऐना-पास होना। २ दर्शन-मगरके मिसा मी पदार्पका मेदाप रसगपत निराकार प्रतिविम्मत होना उसका पति माम होना निर्विकम्पकपसे करे इस तरबारसा समयके समाम साममेके पदार्पण भास ऐना, एनिभरपा मकस ऐताहाँ शान ऐ।
८५१ म्यास्पानसार प्रमसमाधान ] विपिप पर भावि संप्रा-पों वर्ष । . ७ दर्शनावरणीय कर्मके वावरणके कारण दर्शनके बगरूपसे बात होनेसे चेतनमें मुड़ता हो गई और यहीसे शून्यवा भारम्म हुआ । ८ वहाँ दर्शन रुक जाता है यहाँ जान मी रुक भाता है। ९ दर्शन और जानका विभाग किया गया है। शानदर्शनके कुछ टुको रोकर ने पुदे दे पर सबसे हो यह बात नहीं है । ये आरमाके गुण है। निस तद एक रुपपेमें दो वठमी होता है, उसी पर भाट वाना दर्शन और माठ भाना हान होता है। १. तीर्थकरको एक ही समय दर्शन दान दोनों साप होते हैं, इस पर गिमर मसके अनुसार दो उपयोग माने है, खेताम्बर मतके अनुसार नहीं । १२ में गुणम्यानक शामावरणीय, दर्शनावरणीय और बतराप इस तरह तीन प्रतियों का एक साथ ही क्षय होता है, और उत्पन होनेवाली डम्नि मी सापमें ऐसा है। यदि पे एक ही सम्पमें न होते हों, तो उनका मिम मिम मातियोंसे अनुमय होमा चाहिये। स्वेताम्बर करते है कि जान सत्ता यमा चाहिये, स्पोकि एक समयमें दो उपयोग नही होते । परन्तु दिगम्बरोंकी उससे जुदी मान्यता है । ११ शून्यवाद=कुछ मी नहीं' ऐसा माननेवाला। यह पौरधर्मका एक मेद है। मायतन= किसी मी पदार्पका स्पस-पात्र । फूटस्प-अपलको पछापमान न हो सके। घटस्थ किनारेपर- उस स्पम् । मध्यस्थ पाच । (२७) वापात बदौ १३ भौम १९५६ १ योपचप-याना बाना । परन्तु प्रस्गवश उसका वर्ष वाना पाना-गमनागमन होता है। यह मनुष्पके गमनागमनको मा मही परता-सासोमास झ्यादि सूक्ष्म क्रियाको । मगू परता है। पविषय-याना बाना । २ मामाका शान सब विवामें रुक बावा है, उस समय नपे परमाणु प्राण नहीं सकते, वोर मोठे नए हो जाते हैं। उससे शरीरका मान घट जाता है। ३ मीनापारगसूत्रके पहिले शानपरिक्षा वप्पयनमें वौर भौपदर्शनसमुचयमें मनुप्प और जनस्पतिके धर्मको तुम्मा कर बनस्पदिमें वास्माका वस्तिस्व सिद्ध किया है। पर इस पर कि दोनों उत्पम होते है, दोनों ही बहते है, वाहार केले, परमाणु सेते हैं, छोरते है, मरते स्पादि। (२८) भाषण मुरी रवि १९५६ १ साधु सामान्परूपसे गृहबासका स्यागी मूम्गुणोंका धारक । पति-प्पानमें स्पिर होफर भेमा माग्नेवाला । मुनि=पिसे भवधि मन पर्यवज्ञान तथा फेरगान होता है। ऋषि-मो बात प्रतिभा । पिके चार भेदः -राम्य, मान, देव पौर परम | गर्षिअदिवाला । ब्रह्मर्पि-महान् असिवाम । देवर्षि आकाशगामी देव । परमर्षिकैरमानी। (२९) मात्रणमुरी १० सोम १९५६ १ नमम्प गौर वर्षात् जो मीन उत्कट रस्से परिणमन करे और उससे कर्म बापा करे, मौर मिसे उसके कारण मोक्ष न हो सके। मम्प मर्यात् जिस गौत्र वीर्य पतरससे परिममन करे और उससे नपा कर्मबध न होनेसे निसे मोक्ष दो बाप । रिस जीपी पति उस्फर रस्से परिणमम करती -पा सबेरे उठनेसे । भीमद् रामचन्द्र [८५५प्पामानवस्यान्मापान सिवपर्याप पा बाप । वारमा कमी मी कित्याके बिना नहीं हो सकती । मबतक योग रहते है तबतक मारमा को किया करता है मममी पार्यशजिसे होकरती है। प्रिया देसनेमें मही माती, परन्तु पा परिणामके ऊपरसे माननेमें वाता है। जैसे साई सुराक निद्रा पच जाता है- माम होता है। यदि कई करे कि निदा मन्म माई पी, तो या होनेवाण किया के समक्ष बानेसे कहा जाता है। उदाहरण के लिये किसीको पदि भासीस बरसकी उममें पक गिनमा माने, तो ससे पह नहीं कहा जा सकता है कि उससे पहिले वो नही । ना ही कहा जायगा कि उसको उसका पान न पा । इसी वर पानदर्शनको समाना चाहिये । बात्मामें शानदर्शन और पौर्य घोरेपात मी सुरे यनेसे वाहमा क्रिया प्रतिकार सकता है। वार्य हमेशा पलावर या करता ।।कर्मप बोचनेसे विशेष स्पा होगा । इतने मुखासासे बात हम ऐगा । १ पाश्वमाव हमेशा पारिणामिकमानसे है। इससे पीत नावमासे परिगमन करता है, वीर सिदत्व धायिकमास होता है, क्योंकि प्रकृतियोंके लय करनेसे ही सिपर्याय निम्ती है। १ मोहमीपर्म बौदायिकमावसे होता है। ५ प छोग कानमात्रारहित मभर दिसते है, परन्तु कोको कानमाताहत नही मिलते) उने तो बात स्पररूपसे किससे है। उसी तर कपानुमोगमें ज्ञानियोंने कदाचित् पुल कानमात्रारक्षित सिमा ऐ तो मरे हो परन्तु कर्मप्रतिमें पे मिथित ही बक सिहै। उसमें भय भी भेद मोवाने शिपा। (२५) बापार बदी ११ रवि १९५६ जान गे पि सके समान है-ऐसा उत्तराष्पपनसूत्रमें कहा है। जिस तरह मेरा पिरो हम सोई माही नाती, उसी तरा बान होनेसे संसारमें पोसा मही साते । (२५) बापाती १२ सोम १९५६ १ प्रतिहार फरका धर्मराम्परत बतानेवाला । प्रतिद्वार इबान । २ जिस तरह स्पून, बस्परपृछ, उससे मौ स्थल, दूर, रसे दूर, उस्से भी दूर पदापोका मान होता है। ठसक्य सूक्ष्म, सूक्ष्मसे सूक्ष्म नारिका जान मा किसानो रोना सिर हो सकता है। ३ मायामना । १ उपात मारा गया । मनुपश्त नहीं मारा गया । उपरमम्म्प-आपरभूत विभिपन जो पस्तुभमसे कहा जा सके । पारस्तर-एक पारी जगह दूसरा पार । वतर-कामेका पाल पाना । विषय-यो पपायोग्प म दो-फेरफारपाटा-कम पारावामाम्प पर स्त्रमा परिशेष उभपामा सवानाम है। सामान्य चेतनसचा दर्शन है । समिप चेतनसला मान है। ५ सतासमुहत सम्पर प्रकारसे सत्ताध उत्पभूत होना-प्रकाशित होना, परित होना–मास होना। दर्शन-जगत् मिसा मी पापा भेदाप रसगपति निराकर प्रतिबिम्पत रोमा उसमा बस्तिन माइम राना निमपसे कुछ दम पर भारसाको शहरके समान सामने पाघ मास ऐना, दर्शन है। यही कप तादी शान होता है।
८५१मासानसार-प्रमसमपान] पिपिप पत्र मादि संप्रा-पापों व । ७ दर्शनावरणीय कमरे वावरणके कारण दर्शनके अवगरूपसे बात होनेसे चेनमें मूहता हो गई और वहाँसे शून्यवाद भारम्म हुभा । ८ महाँ दर्शन रुक नाता है यहाँ जान मी रुक जाता है। ९ दर्शन और प्रानका दिमाग किया गया है । हानदर्शनके कुछ टुकड़े होकर वे शुदे दे पर सकते हो यह बात नही है। ये वामाके गुण हैं। जिस तय एक रुपयेमें दो वठमी होता है, उसी त बार बाना दर्शन और माठ वाना हान होता है। १. तार्थकरको एक ही समय दर्शन प्रान दोनों साप होते हैं, इस तर दिगम्बर मतके वनुसार को उपयोग माने है, शेताम्बर मतके अनुसार नहीं । १२ में गुणम्यानक पानावरणीय, दर्शनावरणीय और भतराय इस तरह तीन प्रतियोका एक साप होक्षप होता है, भार उत्पन होनेवाली छम्धि भी साप होती है। यदि ये एक ही समयमें न होवे रों, तो उनका मिम मिम महतियोंसे बनुमष होना चाहिये । सेताम्बर करते है कि हान सत्ता यना चाहिये, क्योंकि एक समयमें दो उपयोग मही होते । परम्त दिगम्बरोंकी उससे जुदी मान्यता है। ११ शून्यवाद='कुछ भी नहीं' ऐसा माननेवाग्मा या बौदधर्मका एक भेद है। वापवन= किसी भी पदार्पका स्पर-पात्र । टस्प अचम–बो पणापमान न हो सके। तटस्प किनारेपर- उस स्यळमें । मप्यस्प-बीच में । (२७) वापान बी १३ भौम १९५६ १ पयोपचय-बाना बाना । परम्त प्रसगवध उसका वर्य बाना बाना गमनागमन होता है। पा मनुष्पके गमनागमनको छा नहीं पड़ता—सासोस इस्पाति सूक्ष्म क्रियाको ही मम् पड़ता है। चमिचय-याना बाना । २ बाहमाकाबान पब पितामें एक बाता उस समय नपे परमाणु महण न सकते। मौर गो होते है ये नए हो जाते हैं, उससे शरीरका गगन पर नाता है। ३ श्रीमालागसूत्रके पहिये शासपीखा वप्पयनमें वौर प्रौपदर्शनसमुचपमें मनुप्प और परस्पतिके धर्मको सुसमा कर बनस्पतिमें वाहमाका अस्तित सिर किया है। वाइस तय कि दोनों उत्पन्न होते है, दोनों को मते हैं, बाहार लेते हैं, परमाणु छेते हैं, छोड़ते है, मरते है स्पादि । (२८) घालण मग रवि १९५६ १ साघु-मामाम्पस्पसे गृहलासका स्पागी मूपगुणोंका पारक । यति पानमें स्थिर होकर ग्रेणी माग्नेबाम्म । मुनि-निसे माधि मन पर्यशान तया केवगान होता है। इपियो मात ऋदिधारी।पिके बार मे --एम्प ब्रम, देव मौर परम। गर्षिअनिवामम । प्रमर्पि-महान् प्रदिपाश्म । देवर्षि आकाशगामी देन । परमपिसवानी । (२९) भाषणमुदी १० साम १९५९ १ बमम्प बात बर्यात् यो जीव वाकर रसमे परिणमन करे और उससे कर्म गोपा करे, वीर पिसे उसके कारण मोश्च म रो सके । मम्य मर्यात् मिस गोत्रका वीर्य शांतरसमे परिणमन को पौर उससे नया कर्मभ म होनेसे जिसे मोश हो माप । जिस जीवनी पति उत्कर रसमे परिणमम करती १ भीम एमबद्र [सामानवामान हो, उसका माप उसी प्रमाण, परिणमन करता है। इस कारण कानाके शानमें बमम्प दिखाई दिये। मामाकी परमशांत दशासे मोह बौर तत्कट दशासे बमोष होता है। जानौने ब्रम्पके समारको अफ्ठा मम्प बमप्प मेद फो। बाबका कार्य ठाकर रससे परिणमन करते हुए सिवपर्याप नई पा सकता, ऐसा बानियोंने कहा है। मामा-शसे ऐती है -पाती भी नही भी होती। पंच- मन, वचन कायासे) व्गमेगा । (२०) माम बदौ ८ शनि १९५६ कम्मदमेहि सम, संमोमी गोदई बीपस्स । सो पो गापम्पो, वस्स रियोगो भो मोक्ती ।। -कर्म दम्पकी वर्षात् पुनसम्मको साप मानका संबध होना बंध है। तथा उसका नियोग हा मामा मोक्ष। सम-बम तय सबंध होना-वास्तविक रीतिसे समय होला। यो त्यो कम्पनासे सप रोना नही समस मेना चाहिये । २ प्रदेश और प्रतिबंध, मन बघम वौर कापाके मोगसे होता है। स्पति वार अनुभाग पप पास होता है। विपाक वर्षात् अनुमागसे फलको परिपकता होना । सन काँका मूल बनुमाग है। उसमें पैसा तात्र, तोतर, मद, मतर रस पका पैसा उपप पाता है। उसमें फेरफार बना मूग मोहोती । यहाँ निवासी कुतियामें पैसा, म्पपा, सोमेकी मोहर भादिक रहनेका पन्त लेना चाहिये। जैसे किसी मिका निपामें गात समप पदिय पपा, पैसा, सोनेको मोवर सत्तो हो, तो उसे मिस समय निकामे पा सा भगा उसी बातुनपसे निभाती है उसमें जगाका और उसकी स्पितिका फेरफार नही पता वर्षात् पैसा पपा नहीं हो पाता, वीर रूपया पैसा महो हो बावा उसी प्रया पापा या सम्म, घर का और माके बनुसार ही उदयमें जाता है। बारमा बस्तिव में बिसे खोप पाका पाता है। ५ तेग गुणस्पानको तोर्पकर वाविको एक समयका मंध होता है। मुस्पवया राषित ग्पाप गुणस्पानमें पापीको मी एक समयका पर हो सकता है। १ पान पानाको निर्मकताय मग नही कर सकती, परम्त उसे पमपमान कर सकती है। उसो तब मात्माले शानम कुछ निर्ममता कम नी पोवा, परन्तु को योगाकीचता है, उससे रसके मिमा एक समयका बप कहा। ७ पबपि कपाका रस पुम्प पपा पापस्म है, वो मी उसका समान माना। ८ पुण्य मी सससे ही होता है। पुण्यका बाठाणिया रस नही, पोतिनो एकांत सम्ता उदप मह) । कपापके दो मे प्रभस्वयग धौर मप्रशस्तराग । पापके बिना बंध महाता। ९ मार्गप्पानका समावेश मुस्मत्या कायापमें सकता है। प्रमादपरिप्रमोहमें वीर योगका नाममम समावेश समता। १. शाम पानी परके समान है। यह बाता है और वा जाता है।
१८५मासानपार-समसमापान] पिविष पब मादि समा-वर्ष , ११ मनन करमेसे छप पैठ गाती है, और निदिध्यासन करनेसे प्राण होता है। १२ अधिक भषण करनेसे मननशक्ति मद होतीई दसनेमें जाती है। १३ प्राशतकम्प मर्यात् छौकिक वास्प-पानीका बाम्य नहीं । ११ वात्मा के प्रत्येक समय उपयोगयुछ होनेपर मी, बरकाराको कमी अथवा कामके बोके कारण, उसे मारमसमभी विचार करनेका समय नही मिल सकता—ऐसा करना प्रान्तमन्य शैकिक पचन है । जो साने पामे सोमे इस्पादिका समय मिठा बौर उसे काममें छिया-जब पा मी वास्माके उपयोगके बिना नहीं हुआ, तो फिर मो सास मुसकी नाश्यकता है, और जो मनुप्पयन्मका कम्य है, उसमें समय न मिल, इस बधनको हानी कमी मी सपा नहीं मान सकता । इसका मर्य इतना ही है कि दूसरे इन्द्रिय वादि मुसके काम तो बहरतके सगे है, मौर उसके बिना दुसी छनेके ररको काफ्ना पती है, तया 'वारिमक मुसके विचारका काम किये विना वनों काल दु स मोगना पडेगा, वौर बनत संसारमें भ्रमण करना पड़ेगा'. या पात बहरी प्रगती नहीं ! मतम या कि इस चैतन्पको कृत्रिम मान रस्सा है, सपा नहीं माना । १५ सम्यग्दधि पुरुष, मिसको किये बिना म परे ऐसे उदयके कारण कम्पपहारको निर्दोष रूपसे सनित करते हैं । प्रावि करते बाना चाहिये, उससे धुमासुम बैसा होना होगा वैसा होगा, ऐसी र मान्यता के साप, या उपर ऊपरसे ही प्राधिकरता है। १६ दूसरे पदार्थोके उपर उपयोग दे तो वास्माको शक्ति बानिर्भूत होती है। इसलिये सिदि पनि वादियका करने योम्प मही। जो प्राप्त मही होती उसका कारण यह किनारमा निरा- परण नहीं की जा सकती। यह शक्ति सब सी है। पैतन्यमें चमत्कार पारिये; उसका शुद्ध रस प्रगट होना चाहिये । ऐसी सिदिपाठे पुल वसताको साता कर सकते हैं। ऐसा होनेपर मी ने उसकी अपेक्षा नहीं करते । रेवेदन करमेम । निर्मरा स्मरते हैं। १७ तुम नीनोंमें उठासमान मार्य भपना पुरुषार्प नहीं। तथा यहाँबाप मंद पग पहा उपाप मही। १८ बब बसाताका उदय न हो तब काम कर लेना चाहिये-ऐसा बानी पुस्पोने जीवको वसामर्थ्य देकर कहा है, जिससे उसका उदय भानेपर उसकी पार म बसाये । १९ सम्पमरि पुरुपको नहायके कमाणरको तय पान विस्व होनेसे जहारको फिराकर रास्ता बदरुना पाता है, उससे थे ऐसा समाते है कि स्वयं माण किया एला मार्ग सबा न।। उसी तब पानी-पुरुष उदयविशेपके कारण म्पहारमें मी अंतरात्माए नहीं पूजते । २० उपाधि उपापि रसना चाहिये । समाविमें समाधि रसना पाहिये। मोंकी वय कामके समय काम, और वारामके समय बायम करना चाहिये। एक दूसरेको परस्पर मिला म देना चाहिये। २१ म्पपहारमें वारमकर्तव्य करते पना पाहिये । पुस दुख, पनकी प्राप्ति वप्राप्ति यह समाशुभ तपा छामतिरापके उदयके उपर वापार रसता है। मुमके उदपछी साप पहिमेसे वमुमके उदयको पुस्तक पाँची हो तो शोक नहीं होता। हमके उश्यके समप शत्रु मित्र हो गाता है, और वानुमके उदपके समय मित्र शत्रु हो जाता है। मुसका सपा कारण कर्म है। कार्तिकेयानुप्रेनाम कहा कि मनुप कर्ज लेने माने वो उसे कर्म का देनेसे सिरपरसे मोशा प्रमाणे गानेसे ७२८ मीम परचन्द्र [पा ८५४ मैसे होता है। उसी तरा पुद्रप इम्पस्मी शुमागम कर्म, मिस काठमें उदयमें बा बाप, उस कालमें उसे सम्पन प्रकारसे वेदन कर चुका देनेसे निर्मप हो पाती है, और नपा का ना होता । इससिपे पानी पुरुषको मनसे मुछ होनेके किये हर्पयुक्त मापसे तेम्पार एमा चाहिये । पोंकि उसके चुकाये बिना पूरा महो। २२ मगर स नो इम्प क्षेत्र का मानमें उदय वामा हो, उसमें इन्द्र पाहि मी फेरफार करनेमें समर्प नही। २३ परणानुयोगमें बानाने बतमा मारमाका वमत उपयोग मामा है। २९ करणामुपोगमें सिमान्तका समावेश होता है। २५ चरणानुयोगमें दो म्पसारमें वापरम पिया बाय उसका समावेश किया है। २६ सर्मविरति मुनिको प्रमचर्यवतकी प्रतिया शानी देता है, परणामुयोगको क्यासे । करणानयोगको अपेक्षासे नहीं । योकि करणामुयोगके मनुसार नक्में गुणस्पानको वेदोदयका रूप हो सकता है-तबतक नही हो सकता । ८६४ परमाण पैम्प मारपद पदी १९५६ (१) मोघमाअ पाठ हममे माप माप कर मिले हैं। पुनधि के समंधों से पुएरोसा करना । बायोकि मांचे (र गइन) पाईन की, पैसा करमा जरूरी नहीं। मोता-मानको पपावधि अपने बमिप्रापपूर्वक प्रेरित न करमेका म रसना चाहिये । प्रोता-पानको रूप हो मभिप्राय उत्पम होने देना चाहिपे । सारसारके तोमन करनेको पाचक-प्रोताके सुरके ऊपर मेग हेमा पहिये । हमें उने प्रेरित कर उने सपं सत्पम हो सकनेबारे, वभिप्रापको रोक न देना चाहिये। प्रावोध भाग मोधमाके १०८ दाने हो मिसालेंगे। (२) परम समुतके प्रचाररूम एक पोगमा सोची है। उसका प्रचार होनसे परमार्प मार्गका प्रयाश होगा। (२) भीमीभमासा प्रमाणापमागकी संकमना १पापको प्रेरमा ८ प्रमादके स्वरूप शेप ११ महामामॉकी पर्सगता. २ बिनोग पिचार १५. सोय सिति ९ तन मनोरण १६ बनेको प्रमाणता . रया ही परमधर्म। चार मुराराप्पा १० मनमाति ५.सबामणाल ११ म्पादारिक गालोंके मेर १८दप मरादिपार मारना १२ तीन मामा १९हान २ दिया २ निर्णय १ ATTIT TO TY पर ८५४] विविध पत्र मादि संप्रा-श्वों वर्ष २१ मारम परिम्हकी निरपिके उपरानोशारा दिया जा मार २२ दान २३ नियमितता २१ मिनागमस्तुति २५ नवलका सामान्य सक्षेप स्वरूप २९ सार्वजनिक ग्रेप २७ सगुण १० तारिय अप्पपन ११ सपोगकी बनिस्यता १२ महामावोंकी बनत समता १३ सिरपर न पाहिये ११ (धार) उदयादि भग १५ निममत मिराकरण १६ महामोरनीय स्पानक ४७ सीर्यकरपद प्राप्ति स्थानक १८ माया ४९ परिपावय ५० पीपल ५१ सहरस्तुति ५२ पच परमपदविषयक विशेप विचार ५५ अपिरति ५१ अध्यात्म ५५ मंत्र ५६ पट्पद निमय ५७ मोक्षमार्गकी विरोषता ५८ सनातन धर्म ५९ सूक्ष्म तत्वप्रतीति ६ समिति गुमि २८ देशपर्मविषयक विचार २९ मौन शर २१ पुमर्जम्म २२ पंपमाहातविषयक विचार २५ देशबोप २. प्रसस्वयोग २५ सरता २५ निरमिमानापना २७ बमपर्यकी सहायता ११ कर्मके नियम ५२ ममापुरुषोंकी मनस दया ६३ निर्जराक्रम ६१ वाकांक्षा स्थामको किस तरह राना चाहिये। ६५ मुनिधर्मयोग्यता ६६ प्रत्यक्ष वौर परोक्ष ६७ उम्मचता ६८ एक वतर्म ६९ दर्शनस्तुति ७० विभाग ७१ रसास्वाद ७२ माँसा और स्पध्दता ७१ कम्पशिषिष्तासे महा- दोपका मन्म ७१ पारमार्षिक सस्य ७५. वाममापना ७६ बिनमात्रमा ७-२० महत्पुरुप परित्र ९१-१.. (मागमें रवि) ११-१६ हितार्थ प्रम १०७-१.८ समाति वासर. ३ ३९ समाभिमरण - सातकरी पापद्यमिताने मंपची नामकाजमहीभी पता भीमद् रामचन्द्र [ पर ८६५ ८५६ ८. ३४या वर्ष ८६५ कठमाण कैम्प, कार्तिक ५रवि १९५० ॐ पर्वमान दुपमकाल यता है। मनुष्यों मन मा हुपम ही देसमें भाता है। प्राय करके परमासे पकवत करणबासे परमार्थका साब करके सेपासे भाचरम करते है। ऐसे समपमें किसम्म संग करना, जिसके साथ कितना काम निकालना, किसकी साप कितना बोना, और किसकी साप वपने कितने कार्य म्पबहारका सस्म विनित किया जा सकता है-पासन मसमें रसनेका सम्प है। नहीं तो स्वविधान् गाक्को ये सब कारण शनिकारक होते हैं। सन्ति । ८६६ बर्व मानुगा मगसिर १९५७ माशांतमुधारसका भी फिरसे विवेचनरुप मापातर करना योग्य है, सो करना । ८६७ पा शिष, मगसिर कहा १९५७ देपागमनमोपानपामरादिपियूबपा। मायाविप्यपि रसन्त मावस्स्वमसि मो महान् ।। स्तुतिकार मौसमतमवसरिको पोतरागदेव मानो करते हैं कि समतमा ! इस हमारी का पाक्षिार्य मादि निमतिको त रेस-हमारा महत्व देख । इसपर, जिस तय सिंह गुफार्मेसे गंमार फारसे नाहर निकलकर गर्मना करता है, उसी तय मौसमवमवसरि गर्जना करते हुए करते हैं देवताओं का बागमन, बाबसमें विचरण चामर वादि नितिका मोग करना, चामर बारि मासे रोग पाना-पा तो मापानी गाझिये भी बता सकते है। तेरे पास देवोत्र वागमन होता है, सपना तू बाकाय विचरता है, अपना र चामर छत्र वादि तिमतिका उपभोग करता t, क्या इसम्मेि हमारे मनको मान है। नौ मही, कमी नहीं। कुछ इसध्मेि हमारे मनको मान् नही । उतमेसे ही सेरा महल नहीं । ऐसा महल तो मापाती जाम्पिा मी दिला सकते है। तो फिर देक्का वास्तविक महत्व स्पा है। तो करते है मातरागता । इसे पे मौसमतभरि वि स दूसरी शताविमें हुए थे। सेताम्बर दिगम्बर दोनोंमें एक सोने सन्मानित है । उसोने देवागमस्तोत्र ( पर मो में राति इस स्तोत्रका प्रथम पद) भातमीमांसा (ची है। तवापसू के मगगचरणको टीका करते हुए पा स्तोत्र (देवागम) गपा है, और उसप्प भएससी टी तपा चौपसी हजार स्कप्रमाण गपहस्तिमहामान्य न रिमसामकिन म त्वाय तमतम्ले पानी मेन रवाना माना गया है म लामो समयको किती मे रिगम्बर मिनी मस पार । समाने लाम्य स्तम्- पाच १५ -१४१ म पी एम म त समय में माल पाली पत्रमा भोकमतला नाति पानी माया हो। पंचमी पत्ताली ॥ बगे बताते है। सरपी गई है।
८०१ पा ८५८,८१] पिविष पन मादि सह-सौ वर्ष मोक्षमार्गस्प नवार मेचार फर्मम्मृवाम् । सातारं विश्ववस्वानां दि वगुणसम्पयं ।। यह इसका प्रपम म्गस्तोत्र है। मोक्षमार्गक नेता, कर्मल्मी पर्वतके मेवा (मेवन करनेवाल) मार विश्व (समम) सबके बाता (माननेवारे) को, उन गुणोंकी प्राप्ति के लिये में मदन करता है। बातमीमांसा, योगबिन्दु बौर उपमितिमवप्रपथकयाका गुजराती मातिर करना । योगविन्दुका मासिर हुआ है उपमितिमवप्रपचका होगा। परन्तु उन दोनोंको फिरसे करना योग्य है, उसे करना । धीमे धीमे होगा। छोक करपाण हितरूपी वीर बह कर्वश्य है। अपनी योग्यताको म्यूनतासे और नोसमदारी म समय सकनेसे बपकार महो बाप, यह मी म्म रमना पाहिए । ८६८ बम् शिव, मगासिर पी८, १९५७ ॐ मदनरेसाका अधिकार, उत्तराम्पयनके ममें वप्पयनमें जो नमिराज इयिका चरित्र दिया है, उसकी टीका है। प्रपिभमपुत्रका परिकार मगमतासूत्रके पातकके उदेशमें पाया है। पे दोनों बधिकार वपया दूसरे से पातसे अधिक बारमोपकारी पुरपके प्रति पदमा वादि मतिका निरूपण करते हैं। परन्तु बनमारके कस्पाणका विचार करते हुए बैसे विषयकी चर्चा करनेसे तुमें दूर । एना पोग्य है। वसर मी पैसा ही है। इसलिये तु इन बधिकार बारिकी पर्चा करमेमें एकात्म शान्त राना चाहिये । परन्तु दूसरी तण, विस तर उन लोगोंकी तुम्हारे प्रति उपम म्गम भयका मानना , पैसा पर्जन करना चाहिए, नो पूर्णपर बनेक गायक हितका ही होगा। माँ परमार्पके निवास पुरुपोंका मेल हो यहाँ शबप्रमाण बादिको पर्षा करना योग्य मही तो प्राय ठससे प्रेप नहीं होता । पा मात्र छोटी परिपा है । पोग्य उपापसे वर्णन करना चाहिये । परन्तु उसयुत पित्त न रखना चाहिये। ८६९ बाबाण कैम्प, फागुन मुशी ६ मि १९५७ ॐ यो परिकारी संसारसे विराराम पाकर मुनिमाके चरणकमलके सपोगमें विचरनेकी इच्छा करता है, उस बभिकारीको दोशा देनेमें मुनिमाको दूसरे प्रतिवमका कोई हेतु नहीं। उस बधिकारीको भने बोका संतोष सपादम कर भावा प्राप्त करनी पोप है, जिसमे मुनि मीर परमकमठमें दीक्षित होनमें मप पिन । इस अपवा दूसरे किसी अधिकारीको ससारमे उपरमाधि हो, मार पर मापको साधक है, ऐसा माझ्म होता हो, तो उसे रोझा देनेमें मुनिवर अभिनरी । मान स्पाग [नेपालेको और त्याग देनपाटेको भेया मार्ग दिमान ये, ऐसी पिसे यह प्राति करनी चाहिये।
भीम परवद्र [ प ८५५ ८५५, ८. - शवों व ८६५ कठमाण कैम्प, कार्तिक सती ५प १९५७ ॐ पर्वमान दुषमकार गता है। मनुष्योंका मन मा हुपम हो देसनेमें बाता है। प्रायः करके परमापसे पुकमत करणबारे परमार्थका रिसाव करके स्वेच्छासे वाचरण करते हैं। ऐसे समपमें किसका संग करमा, किसके साथ कितना काम निकम्मा, किसकी साप किराना योजना, और किसकी साथ अपने किसमे कार्य म्पगारफलस्म दित किया जा सकता है-पासम या रस्नेका सम्प है। नही सो समत्तिवान् भीषको ये सब कारण हानिकारक होते हैं । शास्ति' । ८६६ बर्गा माटुगा मगमि १९५७ मीरातमधारसका मी फिरसे विवेचनरूप मापांतर करना योग्य है, सो करना । ८६७ बम्बई शिव, भंगासिर बी १९५० देवागमनमोपानपामराविपिस्वपः। मापाविष्वपि पन्ते नावस्वमसि मो महान् ।। स्तुतिकार मौसमतमानसूरिको विरागदेव मानो मते हो हे सर्मतमा 1 इस इमारी का मासिधार्य मा विमतिको र देस-मारा मात्र देख । इसपर, मिस तय सिंह गुफा से गमार पसे बाहर निकलकर गर्जना करता है, उसी तय मोसमतमसरि गर्नना करते हुए करते हैं। देवताओंकन वागमन, माका विवरण, चामर मादि निम्तिका मोग परमा, भामर बारि मासे टोम्म गाना-पा तो मापानी गालिये मी बता सकते हैं। तेरे पास मौका बागमन होता है, अपना दू बाकाय विचरता है, अपना तू चामर छत्र वारि विमतिका उपभोग करता t, स्पा इसरिपे त् हमारे मनको सान है। नहीं नहीं, कमी मही। का सम्मेि हमारे मनको महान् मही । सतमेसे ही तेरा महत्त नहीं। ऐसा महल मापाती एवमाविया भी दिखा सकते। तो फिर मदेवका वास्तविक मात क्या है! तो करते है तरागता । इसे भागे बताते है। पे मौसमतमबसूरिन से दूसरी शताब्दिमें गए । वे स्वेताम्बर दिगमार दोनोंमें एक ससे सम्मानित हैं । भोंने देवनामस्तोत्र (उपर की स्तुति इस क्षेत्रका प्रथम पद है) अपना भाप्तमप्रमासा रही है। सत्ताईस्के मगसाधरणको टीका करते ए पर स्तोत्र (देवागम) मिसा गया है और उसपर असरमा टोन तपा पौरासी हजार प्रमाण पास्तिमहामाप टोकन रची गई है। म रिसम्बर र मोनाम लाम मतमा मलीकानवाचा मना मन म मी मोर पसीपमयमतमाने नामकी भी मोबारकी की पात्र परमात्मा पत्ताको मन त मे स्मिम मम होता। समोर ने नो लामो सम- परिचप' ११ -१४४ में पानी र रेकर पा दबवापर सम्पमतमालाची सामाग्री मनु मनावि 40 मामलमानकी बम्पन पलायनको पोलो मात्र वापरली एम्चीमापार.११-४१ - पत्र ८५८, ८५.] विषिष पत्र मारि सम्रा-वों वर्ष ८०१ मोसमार्गस्य नेवार मेधारं कमस्मृवाम् । मातारं पियवस्वाना मैदे वगुणसम्पये ।। यह इसका प्रपम मगठस्तोत्र। मोक्षमार्गके नेवा, कर्मम्मी पर्वतके मेचा (भेदन करनेवाले) मार विश्व (समप्र) पलके वाता (गाननेवाले) को, उन गुणों की प्राप्ति के लिये मैं बंदन करता हूँ। माप्तमीमांसा, योगविन्दु बौर उपमितिमवप्रपचकयाका गुजराती मापातर करना । पोगविन्दुका मापातर हवाई उपमितिमत्रप्रपचका हो रहा है। परन्त उन दोनोंको फिरसे करना योग्य है, उसे करमा । धीमे धीमे होगा। पोक-मम्याण विसरूम है और पा करम्प है। अपनी पोम्पताकी म्यूनवासे और मोसमदारी न समझ सकनेसे मपकार महो वाय, यह मी पक्ष रसना चाहिए । पई शिव, मगासिर पदी ८, १९५७ ॐ मदमरेसाका अधिकार, उत्तयम्पयनके नबमें भम्पयममें मो ममिराम पिका परित्र Pया है, उसकी टीका है। प्रपिमनपुरका अधिकार मगरीमूत्रके शतकके उदेशमें वाया है। ये दोनों बधिकार वपना दूसरे से पशुतसे बभिकार वारमोपकारी पुरुपके प्रति बदना मादि मतिका निरुमण करते हैं। परन्तु जनमाडके कात्पाणका विचार करते हुए पैसे विपपकी पर्चा करनेसे तुमें दूर ही यमा पोम्य है। वसर मी पैसा ही है। इसलिये हमें इन अधिकार नारिको पर्चा कर में एकदम शान्त राना पाहिये । परन्तु दूसरी तया, जिस तर उन लोगोंकी तम्हारे प्रति उत्तम मगन भयका मानना हो, पैसा पर्जन करना चाहिए, जो पूर्णपर बनेक नामोंके हितका ही हेतु होता है। पहा परमार्थक निकास पुरुषोंका माग हो रहा धाचप्रमाण बादिको पपा फरमा पोम्य है, नहीवो प्राय उससे घेय नही होता। पर मात्र छोटी परिपा है। योग्य उपापसे वर्णन करना चाहिये । परन्तु परेमयुट चितम रहना चाहिये। . ८६९ मबाण कैम्प, फागुन मी शनि १९५७ ॐ सो परिकारी सारसे विराम पाफर मुनिमौके परणकमठो सपोगमें घिरनेकी या करता है उस अधिकारीको दोभा देने में मुनिमाको दूसरे प्रतिबपन्न कोई देख मही। उस अधिकारी अपने पड़ों सतोर सा न कर बारा प्रा करनी पोप है जिसमे मुनि भौर परणामसमें दौशित होने में माहिर मये। इस बपना दूसरे किसी अधिकार्यको ससारसे उपरामापिई हो, और पह, वामायकी साधक है, ऐसा माश्म होता हो, तो उसे दीक्षा देनमें मुनिवर भरिका । मात्र त्याग एनेबाडेगो और त्याग देनेगाडेको मेयमा मर्ग दिमान ये, ऐसी शिमे वा प्राधिकरनी चाहिये।
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परिशिए (१) । । परिशिष्ट (१) मीमद् राजचन्द्र में आये हुए अन्य प्रन्पकार भावि विशिष्ट शपॉका संक्षिप्त परिचय मकार- वावरका पूरा नाम बबुल् फतेह अलसरीन मुहम्मद वकवर या । इनका मम सन् १५४२ में अमरकोट इला पा । सन् १५५६ में वकबरको एम-सिंहासन मिला । वकबर बात उपमशाल और बुद्धिमान वाशाह था। उसने अपने कौशसे धीरे धीरे अपना राम्य गात मा म्यिा, धौर बनुक्से पोगों को अपना सम्पी बना दिया था। उसने वनेक पुर भी किये, जिनमें उसे सफलता मिगे। मकवर मात सहिष्णु थे। ये गोमांस इत्यादिसे पपेर करते थे। बकवरमे हिन्दु धौर मुसल्माम योमोंमें ऐस्प और प्रेमसंघ स्पापित करनेके लिये 'दौनामहोपर्मको स्थापना की थी। इस धर्मके हिन्दू और मुसम्मान दोनों ही अनुयायी पे । अकबरमे यमुक दिनोंमें गोपरिसा न करनेकी मी अपमे राम्यमें मनाई कर रस्सी पी। अकबरको विचाम्पासका बहुत शौक था। उन्होंने रामायण महामारत पानि प्रपोंके फारसा बनुनाद कराये पे । कबरकी सभामें हिदु विशनोंको भी बात सम्मान मिलता पा । मकवर पो म्पों पर होवे गपे, पो त्यो उनकी विषय-छोएपवाका हास होता गया। वकपर सोते भी वात कम थे। करते है दिमत मिला कर ये कुल तीन पटे सोते थे। मकवर मात मिताहारी पे । वे दिनों एक ही बार मोरम करते थे, और उसमें भी अधिकतर दूध, भात और मिठाई ही थे। बफारका पुत्र सौम हिन्दुरानी गोपामाईक गर्मसे पैदा इमाया । गणपन्द्रनीने वकारफे मिताहारका उल्लेख किया है। भखा- असा गुजराती साहित्यमें एक मरितीय मम्पकान करि माने जाते हैं। इनका जन्म सन् १६१९ में बहमदाबा में सोनी गान्तिम [मा या। पे बक्षपमगतके मामसे मी प्रसिद्ध है। बमाका गोषप्रधान कविताका बड़ा माग सातसौ छियालिस गप्पा है, निस्के सब मिलाकर पीस वग हैं। पाके पतिरित, वयाने वसेगीवा, बनुमवनिम्तु, कैरमगाता, पितविचारसना, पंचीकरण, गुरुशिप्पसबाद तथा पावसे प वादिको भी रखमा को है। भसाको दम पौर. पाता के प्रति मापात विरस्कार पाताने शासके गूक सिद्धान्तोंको कपन्त सरस भाषामें मिसानसा एक बनुमा विचारोग चतुर कार पे | होने ससंग, सहरु, प्रमरस बादिको जगह जगह महिमा गई। सानी पाणी' नामक पुस्तक 'मस्तु साहित्य-वर्षक कार्यारुप से स्न् १९२१ में प्रकाशित ई है। इनके अन्य प्रत्य तया पद कायदोहनमें छपे है । गगचन्द्रयाने वसाय मार्गानुसारी बाते पर उनके प्रन्यों मनेका वनुरोप किया । उन्होंने बसाके पर भी उड़त किपे हैं। मध्यात्मकसदुम- बप्पारमकप्पाम बैरम्पका बहुत उत्तम प्रत्य है। इसके कत्ता सेताम्बर मन् मुनिमुरमूरि है। मुनिसुरसरि सासामधानी पे । कहा जाता है कि तपके प्रमावसे पापती बारि देवियों - भीमरसम्म [पा.८.१,00 प्रास करके माग रायकोट गामा होगा। प्रपचनसार पंप मिसा मावा, पपानसर प्रास हो सकता है। शान्ति । ८७० परकोट, फागन हो । शुरु १९५० बात वासे प्रवास पूरा करना पाहा बीच संहराका मस्स्फा वा गया। सिरपर एत बोसा पा, उसे प्रारमतीस मिस तय बज्पका बेदन कर सिया बाप, उस तरा म्पबस्था रतेपुर पनि मिकापित उदयमान विमाम प्राण किया । यो सहपरिपपा नहीं होता, 40 मत मापर्य है। वम्पावाप स्पिरता है। प्राठि उदयानुसार पु बसावाका मुम्मत वेदन कर साता प्रति । शान्ति । ८७१ रामकोट फागुन १५ सोम १९५७ परसबधी इस बार वाम प्राप्त कम गुरू मा। शानियोंका सनातन समर्ण अपर्वतों। ८७२ गरकोट, चैत्र सुदी २ स. १९५७ में अनंत पविमति चन्द्रममस्वामीचे नमो नमः पेवनापको तपाइप उदयमानपनेसे बेदम करनेमें शोक क्या! धान्ति । ८७३ एपफोट, 4 सदी ९, १९५० मंतिम संदेश परमार्ममार्ग जया गुर बामपवप्रकाश भीमिनपरमात्मने ममा (१) मिस मनत पुससम्मको पोगायन राम करते हैं, यह मूल पुर वामपद सपोगी निमसरस ॥१॥ प्रभास्मसमाव जगम्पमा मना बापार है। उस सससके प्रकारचे मिमपदसे बताया गया ॥२॥ बिनपद मौर निम्पर दोनों एक है, इसमें कोई भी ममान नहीं । उसके माहोनेके रिसे सापक पास रचे गये ॥३॥ । मन्तिम समेण (१) रोम मत मुबलकम । मशरमासापर यमी मित्तम "n शामलम्ब मयबहेमन भादरा बिनपरी एपिलेला प्रकार ||२|| नियर र एमरमा नाकाबलनमोपमा ॥
८१ मंतिम ] विविध पर मादि संप्रार-पाँवर्ष निन प्रबधन मात दुर्गम है, उसे प्राप्त करनेमें दुविमान योग मी पक जाते हैं। श्रीसमुस्के मापनसे ही सुगम और सुसको सान ॥ १ ॥ यदि मिनमगवान्के चरणों की अतिशय मणिसहित उपासना हो, मुनियोंकी संगतिमें संपम- सहित बसन्त रति हो-॥५॥ यदि गुणोंमें वतिशय प्रमोद ये मार वतर्मुस योग ये, तो भीसगुस्से बिनदर्शन समझा गा सहवा॥६॥ मानो समुद्र एक विन्दुमें ही समा गया हो, इस तर प्रवचनकपी समुद्र पौदा पूर्वकी सम्मि सप विन्दुमें समा जाता है॥७॥ जो पिप विकारसहित मतिके योगसे यता है, उसे परिणामोंकी विषमता रहता है, और उसे योग मी वयोग हो पाता है॥८॥ मंद विषम, सरम्ता, नागापूर्वक मुविचार तथा कम्प्पा कोमस्ता बादि गुण या प्रथम मूमिका है ॥ ९॥ मिसने शम मादि विषयको रोक लिया है, वो स्पमके साधनमें राग करता है, जिसे मारमाके किये जगत् इस मही, या महामाम्प मप्पम पात्र है ॥१०॥ रिसे जीनेकी तृष्णा नहीं, बिसे मरणके समय सोम नही, या मार्गका महापात्र है, मह परम योगी है, वौर उसने गेमको जीत लिया है ॥ ११ ॥ (२) विस तय नम सूर्य सम देशमें बाता है वो छाया समा जाता है, उसी तप खमाबमें मानेसे मनका स्वरूप भी समा जाता है ॥१॥ यह समस्त स्सार मोनिकापसे उत्पन होता है। अंतर्मुस पिसे देसनेसे इसके नाश घेते हुए देर नही गती ॥२॥ (३) बो बनत मुसका धाम , विसको सन सग या परते है, जिसके म्यानमें से दिन स्त तीन गते। चो परमति है, बनत सुपामय है-उस पदको प्रणाम करता है, यह मेनु है, उसकी सप हो ॥१॥ समाप्त किन अपचन पूर्णम्पय बारे मवि मविमान । अपचन माल्गुर नुपम मने मुससाय ॥४॥ सपना मिरपनी मपिणन मरिमात । मुनिजन पनि तिमपि संपम योग परीव ॥ ५॥ गुपप्रम्बेर मविप ये पे मेवर्मुस मोप । पशि पीसगुषो निर्णन मनुपोग ॥ ॥ प्रकपन समापिम्प गाठी (उज्य) भावे एम । पूर्व पोस्नी बगिर्नु उपारण पर देम || ।। मिस सिमरदीव बेगम माना गा परिचामनी विषमय देने योगबोम || मेर पिपने तख्ता पमाण क्विार | करा कोमस्तारि गुग प्रयम मूमिन पार ॥ ९॥ पेला पारि पिपर बम धवन एप | बमवरानी भामकी मपया महामाब॥१ ॥ नही पा सम्वणी माप मेम नहीं ओम मायवे मार्यना परम पेग बिनम ॥११॥ (२) मामे पर सरणमा मग पप सम्र । पाने ऐम समावर्मा मन तार पर गई॥१॥ उपमे मासपी समयमा तार | मर्नु मबोरा पिय पवा न पार |॥३॥ (१) नुपम नत व पहिरन पर ये सरप्पानमयो । पणात मनव मुपामर प्रम पर हैरा॥
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परिशिए (१) । परिशिष्ट (१) भीमद् राजपन्द्र में भाये हुए अन्य प्रन्पकार भावि विशिष्ट शब्दोंका संक्षिप्त परिचय मकार- वकारका पूरा नाम बबुर फर नछामीन मुहम्मद मकबर पा । इनका जन्म सन् १५९२ में अमरकोट मा पा । सन् १५५६ में नकवरको राप सिंहासन मिला। अकबर पात उपमशाल और मुद्धिमान पादशाह पा। उसने वपने कौशबसे धीरे धीरे अपना पम्प बात पहा लिया, बोर मातसे लोगोंको अपना साथी बना लिया था। उसने बनेक मुद्र मी किये, मिनमें उसे सफलता मिण। वकार यात समिणु थे। वे गोमांस श्यादिसे परहेज करते थे। मकबरने हिन्दु बौर मुसम्मान दोमोमें ऐस्य और प्रेमसंबंध स्थापित करनेके म्येि 'दौनाही धर्मकी स्थापना की थी। इस धर्मक हिन्दु और मुसम्मान दोनों ही अनुयायी पे । मकबरने अमुक दिनॊमें पीबहिंसा म करमेकी भी वपमे राम्यमें मनाई कर रही थी। कबरको विचाम्यासका गुत शौक था । ठम्होंने रामायण महामारत भादि प्रपोंके फारसीमें बनुवाद कराये पे । मकबरकी समामें हिन्दु विशनोंको मी गात सम्मान मिम्ता पा । वकार म्यों म्यों पर होते गये, पो त्यो उनकी विषय-सोलपताका हास होता गया। वफार सोपे मी गात कम पे । प्रते। दिनमत मिडा कर ने पुल वान घटे सोते थे। अकबर पात मिताहारी थे। वे दिनमें एक ही बार भोजन करते थे, और उसमें मी वधिकतर ष, मात और मिरई होते थे। अकबरका पुत्र सर्गम हिन्दुग्नी चोधामाईक गर्भसे फैश एखा पा । रामचन्द्रनीने मकपरके मिताहारका उमेस किया है। मस्सा- यसा गुबराती साहित्पमें एक वरितीप मध्यकालीन कपि माने जाते हैं। इनका जम्म सन् १९१९ में वामदाबाइमें सोमी गातिमें हुआ था। ये बयपमगतके माम्से मी प्रसिद्ध है। क्साको गोपप्रधान कविताका पहा माग सातसौ छियाछिस एपा है, जिसके सब मिलकर पपास भग है। एप्पाके अतिरिक, वक्षाने बसेगता, वमुमबबिन्दु, कैक्सगोता, पितविचारसंवाद, पंचीकरण, गुरुशिप्पस्मार तथा बहुतसे पर माP की मी रचना की है। मसाको दम और पासा के प्रति वफत तिरस्कार या । होने शामके ग्रह सिमान्तोको पत्पन्त सरह भाषामें मिला है। वहा एक वमुमची विचारशीस चतुर कवि थे ।ने सम्सग, समुरु, प्रमरस वादिको बगह जगह महिमा गई है।क्सानी पाणी' नामक पुस्तक 'सस्त साहिस्प-वर्षक कार्याम्पस सन् १९२४ में प्रकाशित है। सके मम्प प्रन्य तपा पद काम्पोरनमें छपे । रामचन्द्रगाने मसाधा मार्गानुसा बताते पए ठमके प्रयोक पानेका अनुयम किया है। उन्होंने वसाके पद मा ठाव किये हैं। मम्पास्मफरसनुम- पप्पामकम्पम राम्पका बहुत उचम प है । इसके कर्ता शेताम्बर विशन् मुनिमुदरात्रि । मुनिसंपरसूरि सहसावधानी पे। का नाता है कि तपके प्रमासे पालत वादि देवियों ।
भीम परापन प्रत्यक्ष दर्शन दिया भरती यौ । मुनिसंदरसूरिमे पपने गुम्वेष सदररिकी सेवामें एकसौ भार एप सम्बा एक मितिपत्र भेजा था, मिसमें उन्होंने माना तबके को चित्र वीर नारों काम्प लिये पे। मुनिमदरसरिने सोपा चिसहित उपदेशरत्नाकर, भयानंदचरित्र, शाकिस्तात्र बादि बनेक प्रयोग रममा परे। मुनिसुदरहि खेतासर बानापमें पत प्रमसात कनि गिने जाते है। ये सं० १५.१ में सर्गस्प हए । बयानकायशुममें सोम परिकार है । प्रम्पका विस्तृत गुरफ्ती विचम मोतीचन्द गिरधरमत कापरिपाने किया है, जो बैनधर्मप्रसारक सभाको बोरसे सन् १९११ में प्रकाशित एमा। मध्यात्मसार (देशो पशोखिमप) अनायदासमी- माम पवार वनापदास कोई गात पडे ती पे। होमे गुजराती निधारमाठा मामक प्रप बनाया है। इस प्रपके ऊपर टीका मीहै। बचनमाने इस प्रथा कोकन करने के बिम्पे मिहा। उपदेशपामें मनाय एक पधन मी गवचनाने उड़त किया है। बमबमकाण (पक्षपातरीत वनुमवप्रकाशा)- इस प्रपके कर्ता लिएकामन्दनीने गास्पाश्रमके त्याग करनेके पचात् पत समपतक रेघाटन किया, वौर तत्पश्चात् में पाकेश वाकर बने कमो । ये स्वस्त पुरुषोंने समागममें गवे पए प्रमविपारमें मम यते पे । पिनुमानपनीने पाकेश यार नाना प्रकारके फर उठाये । सोने कारवाके सेठ सूर्यमम्माको प्रेरित कर देश समक्षेत्र माधि मौ स्थापित किपे, जिससे पाँ पभेषाले सत सापुमोको पात माराम मिन्न । विभुशमन्दगीको किसी धर्म या पके लिये काई माय म पा । ये फेलर दो कमी रमठे थे। मनुमनप्रकाशका गुजराती मात्रातर सम् १९२७ में बाहरी प्रष्ट मा है। इसमें बाठ सा है, मिनमें मेवातविषयका वर्णन है । प्रहारमाश्यान ताप सामें माता। ममपाइमार (देयो प्रस्तुत प्रप, मोक्षमाम पाठ १०-१२) भगाराममी- xमम्मामी और उनकी पुस्तकले सर्वपमें रामचनयी हिस्ते हैं-"हमने इस पुस्तकमा पातसा माग देश । परन्तु में उनमा सिरान्तहानसे बराबर ठती ई नही मागम होती। और ऐसा है पापि उस पुरुपयशा मष्ठी है। मार्गानुसारी सौ है ऐसा तो कर सकते वपा " धर्म हो जिनका निवास , बमी उस भूमिकामे नही माये ।" भपवइमार- इसके बापाचस्पा मोक्ष प्राश करनेका रामचनले मोक्षमाला वहस किया है। इनकी कपा भगवतीमत्रमें बाती है। मएक (देशो परिमय) मापार (देखो प्रदाद) xमपाले नम्ररी सिम माल निवासी एक मातम मम्ममारिमार ।
परिधिर (१) ८०७ अष्टसासी- पिपानन्दस्थामांकी बारामासापर पिसी हुई टीकाका माम बरसाती है। इस प्रत्यमें बात प्रौदताके साप चैनदर्शनके स्पाइाद सितिका प्रतिपादन किया गया है। वरसहनाके उपर श्वेताम्बर विद्वान् उपाप्पाप पशोपिनपनीने मम्पन्पायसे परिपूर्ण टौका मा सिसौ है। विधानाद मादिमें पाखण पे। उमका मीमांसा बौर वादि दर्शनीका पास वा अन्ययम था। वे अपने समयके एक पाव अच्छे कुशल पादी गिने माते थे । विद्यानन्दचीने तत्वार्यसूत्रके ऊपर सत्तापक्यासिक नामकी दार्श- निक टीका मी लिसी है, जिसका चैनसाहित्पमें उबस्थान है। इसके अतिरिक्त इनहोंने बापरीक्षा पत्रपपेक्षा बादि वर मी महत्वशासी अन्य लिखे हैं। वासपरीक्षामें विरफत वादि सितिका विद्वत्तापूर्ण विवेचन किया गया है। इनका समप ईसवी सन् ९ वीं शताम्दि माना जाता है। माया- बयापक समतिके गर्भस उत्पम हुए थे। इनके पिताका नाम कहो या। एक दिन भरावक जम गर्ममें पे, कहोर भफ्नी पत्नीके पास बैठे हुए वेदका पाठ कर ये थे। वेदपाठमें उनकी कही मूल हो गई, मिसे गर्मस्थ शिशुमे बता दिया । इसपर शोषको याप्त क्रोध माया, वौर ठनोंने गर्भस्प शिमसे कहा कि पव सेरा समाव बमासे इतना बक्र है, तो बागे जाकर न माश्म तू क्या करेगा । बतएव था, मैं उसे शाप देता कि तू मायक होकर सम्म प्राण करेगा | करते हैं इसपर शिनुका शरीर पाठ गइसे टेदा हो गया, वौर उसका नाम नमक पा । बादमें पम्फर इनके पिताने भरापासे प्रसन्न होकर इनें समगा नदीमें स्नान कराया, मिससे मायनककी वक्रता तो दूर हो गई, पर नाम इनका फिर मी नही रहा । भयका जनकके गुरु थे। उनहोंमे गो समकको उपदेश दिया, पर बालगीतामें दिया है। भाषासंग (वागममप)-सका रामचनगीने मनेक स्पर्मेपर उल्लेस किया है। मास्मसिदिसास (देखो प्रस्तुत प्रप प ५८५-१२२ ) भास्मानुशासन- मात्मानुशास्नके की दिगम्बर सम्प्रदापमें गुणभद्र नामके एक मात प्रसिद्ध विराम हो गये है। ये वादिपुराणके कर्ता मिनसेनस्थामीके शिष्य थे। पे दोनों गुरु शिष्प बमोपवर्ष महारारक समकान पे । गुणमा सामाने उत्तरपुराणकी मी रपना की है, जिसे उन्होंने शक संवत् ८२० में समान किमा था। गुणमा म्याप काम्य मादि विषयों के बहुत बड़े निशान थे । भारमानुशासनकी कई टीका मी। इनमें ५० टोरमनीकी हिन्दी टोका पत प्रसिद्ध है। इसका गुमस्ती अनुसार मा एमा। इस बप्यात्मने प्रपको दिगम्मर और खेताम्मर दोनों भात भाषसे पाते। मानन्दभारक-- बानन्द प्रावकको कथा उपासकदशासूममें माता है। एक बारकी बात कि गीतमस्तामा मिक्षाके छिपे मारे ५ । उने एना कि महापौरके शिष्य बानम्म्ने मरणान्त सरेसमा सीकार की। गौतमने मानइको देसमेका विचार किया । भानम्इमे गौतमस्तामाको नमस्कार करके पूण कि मगमन् ! या गृहस्पारस्पामें वाभिधान होता है। गौतमने प्राता है। इसपर पानन्दने 1 ८ धीमर्यपत्र कि मुझे इतना सामर्पका मशिहाल हो गया है कि मैं पोमसौ योजनतकके रुसी पार्यो पान । गौतमस्वामाने इस बात निषेध किया, और मानन्दको मालोचना फरमेको कहा। बादमें महापरके पास गये । गीतमको अपनी मूस माम भार उम्होंने वानरसे क्षमा माँगी । दिपन- भामर पानी एक महान् गप्पामा योगी पुरुप हो गये हैं। इनका दूसरा नाम घामार्मर सोने दिली मिमित गुरपती पोलीस मिममगमान्की स्तुविरुप पानीस स्तवनाची रचना है, मो पानम्दपन चीबासी नामसे प्रसिद्ध है। भान दफ्नयाकी दूसय सहर रचना बाम पन मानंदफ्नमात्र बाणी मार्मिक और वनुमकानसे पूर्ण है। इनकी रचनामोंसे माम होता है कि ये चैनसिहतके एक बरे बनुमची मर्मा तपे। मानन्दपनमा गए मत स्पानिका बहुत विरोध करत पे। पहोंने पदर्शनों दिन पान्का बग बताकर मों दर्शनोंका सुन्दर समाप किया है। बामन्दपनी मामानुमपकी [ दशमें विवरण किया करते थे। मानन्दपमनीका पोलिसपासे मिलाप मा एमा पा, बातको पचोविसपनीमे अपमा बनाई गई वापसमें किया है। चन्द्रमा बानदफासीको पात म्मानको इण्सेि रेस्ते है। उन मुदगुद वीर भन्नाचार्यको कोरिमें पाकर रखते है। मानन्दपनीको हेमचम्मापासे तुलना करते ए ते 1- मावानंदपमनाने पर-नीतमुदिसे होकोपकार प्रापि बारंभ की। उनोंने इस य प्राप्तिमें बामहित गौण किया । परम्त परतण्णवर्मरमुखता -निपमतामा कम गई पी मेग धर्मको अपना बानदफमजीको पहिचान म सके-समझ न सके। आन्तमें पादपानीको कि प्रबहफ्से म्यान विपमताके योगमें गोपा, परमार्थ प्रकाश करनेमें असरकारक मही पा, मोर वात्महित गौण होकर उसमें बाधा माती, इसलिये बामरितको मुरूप करके उसमें से ति करना योग्य है । स चारणासे मन्तमें ये मेकमानेोरकर बनौ पछये । बनमें परते हुए मी वप्रगटस्मसे एकर बांस पद पानिकारा सोकोपकर तो कर हो गये। कारण चेपकार पा महापुस्पोट धर्म है। रामचन्द्रमाने बानदपम चौमासीका दिन मी स्ना बारम निमा था, जो मंक ३९२ में ग्पा है। तामसीए- ईसामसीह ईसाई धर्म माविसस्पारक पे। ये कुमारी मरियमके गर्म पाए । वा बचपनसे हो गर्मप्रति बप्पपन करनेमें सप्प समप बिताया करते थे। इसके पूर्व मिस्तान र मरण नादि देशों में पानीचर्मका प्रचार पा। पदो पारी मेग धर्म हाने यो मनमाने स्पानार लिया करते पे उनके निम ईसामसहमे प्रषण मादोन मचाया । सामसाइपर इदिपोंने सूब बानमम से, बिससे पने चैम्सम माग गाना पड़ा। पापर मी इनपर बार से गपे । परियोने में पाकर मद कर लिया, और में कॉयका मुफट पहनाकर स्मैपर या शिपा । विस समप इनके हार्यों परों को होगी गई उस समय मा इमका मुख प्रसन्नतासे वाया और ये पफ्ले करनेवाली मानताको समा करनेके लिये परमेश्वरसे प्रार्थना परिशिए (१) ८०१ । करते थे। ईसाने अपने धर्मम सेना, प्रेम, दया और सहानुभूतिपर अधिक मार दिया है। ईसाई होग ईसाको ईश्वरका मवतार मानते हैं। गाविसमें उनके उपदेशोंका समह है। ईसाके चमत्काका गाविसमें वर्णन वाता है। रामचन्द्रगाने ईसाईधर्मका विशेष बप्ययन नहीं किया था । महामा गांधी प्रभाका उत्तर देते हुए रामचन्द्रमाने पञ्चक ११७ में ईसाई धर्मके विषयमै धपने विचार प्रकट किये हैं। आप्तमीमांसा (देखो सर्मतमद ) इन्द्रियपरामपतक- या वैराग्यका अत्युत्तम भेटासा प्राक्तका क्रय है। पके कर्वा कोई श्वेताम्बर निधन है । इसके उपर सं० १६६१ में गुणविनय ठपाप्यापमे सतत टीका लिया है। इसका गुजराती मापानर हमा है। हिन्दी फ्यानुसार मुछाल श्रावने किया है, यो बम्बईसे प्रकाशित हुआ है । इन्दिप परामपशतक प्रफरणरनार मी छपा है । रामचन्द्रनाने इस प्रपके पानेका अनुरोध किया है। उपराप्ययन (भागमान्य)-इसफा रावचंद्रयाने अनेफ स्थापर ठहस किया है। उचमविमय- उत्तमबिनय ताम्मर भाम्नायमें गुजरातीके परे फवि हो गये हैं। इनके सपमणी- स्वषनर्मेसे रामचन्द्रमाने दो पद उक्त किये है। उस स्तन प्रकरणरनाकरमें प्रकाशित एमा। उपमितिमममपंमा कपा- उपमितिमवप्रपंचा या भारतीय साहित्यका सस्तफा एफ विशाउ नपक अप (allegory) माना जाता है। या ग्रंथ साहित्यको पिसे बहुत उब कोटिका है। इस प्रपफे बनानेवाले सिर्पि नामफे एफ प्रतिष्टित नाचाप हो गये हैं। सिमर्षि हरिमद्रसूरिकी बहुत पम्पमापसे सति करते हैं। ये हरिमयसरि सियर्पिको धर्ममारके देनेवाले थे। सिदर्षि प्रारत और सततके बहुत अरे विद्वान् थे। उन्होंने उपरेशमासा नादि प्रास्तके प्रपोपर सतत टीफायें छिपी है। सोने सिद्धसेन दिवाकरके म्पापायतारपर भी टीम मिली है। सिर्षिका रिस्कृत वर्णन प्रभावकारितमें भाता है। उपमितिभवप्रपचा फपाको सिमर्पिने सं० ९५२ में समाप्त किपा पा । इस मपक अनुसार करनेके लिये रामचन्द्रमाने रिसी मुमभुको शिया या । - मामु समाफा बणन महाभारतमें आता है । " पुराणमें हम पाके पुत्र ने सनसे निमुखाम साम स्पिा पा । पुसम्यपुत्र निाय इनके शिष्य थे । ५ बतिय कार्पनराम पे। लाने इनके रप और मम्गणको पोभित किया था, जिसस एनुरोकर एन इनफे माता पुन पापन प्रमान फिया "--दिसागर । "ऋभु रामाने कटयर तर करके परमारमामा मापन रिपा । परमामाने रस्ते देवपाक रूपमें दर्शन पे, मोर पर मगमके ठिप कहा। सर अनु रामाने पर मोगा कि दे मगन् । मापने नामी राम्परासी मुझे दी ३, एलिम भी टॉमही । पर मेरे उपर तरा बनुमा दातो पारोमि परिसपफी साधनगर इमरापहामी. लोप अपरामपगाराने सावर मन नही पिा समसारमारा गये।" मीमा सचान्द्र का फिरसे मुझे रूप मी म हो । परमात्मा माचर्यचकित होकर वयात' करकर सपामको पधार --भीमा रामचन्द्र' १ २११ प्रपिमद्रपुष-- सिमपुत्र वामिका नगरीके एनेबा पे। पे ममोपासक थे। इस नगरीमें और मी पातसे प्रमणोपासक गते पे । एक बार उन अमजोपासकॉम रेगाँध स्पितिसंबंधी पुल पर्चा पाठी। पिमपुत्रने वासपी ठीक ठीक बात प्रमणोपासकोको कही। परन्तु उसपर की प्रमणोपासने माया न , वर उन ग्रेगोने महावर मगवान्से उस प्रश्नको फिर नाकर पूछ । मगवान् महापरिमै कश कि यो अपिमन करते है, सपा पर सुनकर ये भ्रमणोपासक उपिमानपुरके पास वाये, वौर उन सबभे अपने दोपोंकी क्षमा मांगी । ये ऋषिमापुत्र मोधगामी पौष पे। यह कपन भगपती- एनके ११ घातको १२ में ठोसमें जाता है। कपिस ( सनि ) ( देशो प्रस्तुत प्रप, मोबमाण पाठ ४६१८) पिस (प्रापि )- फपिस प्रपि सासमतके माचप्रणेता को गाते हैं। कपिको परमर्षि मी करते है। इनके समपके लिपपमें विद्वानों में बात मतमेद है । कपिट मध-ऐतिहासिक म्पति माने जाते है। कबीर- कबीर साहना जम्म सबत् ११५५ में शुमा पा। ये गुम थे। कहा जाता है कि ये विषमा मणके गर्मस उत्पन्न हुए थे। कबीर स्वामी रामानंद शिष्प पे। कबीर मापनसे हो यो बर्मपरायण थे। परे मिले तो न थे, परम्ठ ननोने ससग पर किया पा! उमके इसमें दिनु-मुसम्मान किसी के लिये रेपमाष न था। बारका मा हिन्दु मुसम्मान दोनों ही कबारपथके क्नुपापी पाये जाते है। कबीर साहम्ने सप कोई पुस्तक मही सिपी । ये सासी बोर भवन बनाकर हा करते थे कि उनके बेटे कठस्प कर लिया करते पे । कबीर महिमाके कार निरोगी थे। कार पातिपतिको म मानते थे। एक पर हुए बानी पे। उनकी मापा विविध मापाक हाम्द मिलते हैं। भारको बाणामे मगाध ज्ञान और भी शिक्षा मा र साहित्पमें कबीर साहका स्पान बात धा माना जाता है। कबीरमे स १५७५ में देहत्याग किया। पीर रगतमाप कबीर बात मर्शको को बाणिपोंका कोनी और फारसीम भी बनुपादावा।। गौरको रामचन्द्रमाने मार्गानुसार मा । उमको मत्तिक विपमें किसते है- महात्मा पौर पपा नरसी मेहताको मति मान्य बौकिक, बहुत बार पोतप पी, ऐसा होनेपर मी पर नियर पी। ऐसी दुसी स्पिति होनेपर भी उसने स्वपमें भी मामविषयके लिप-म्पबहारके किये- परमेवरके प्रति दौलता प्रष्ट नहीं की । पपपि दोनता प्रकिये बिना परेशानुसार म्पपहार पस्ता गाउपापि उनकी दरिमालत्पा मासतक बम्पसिर आभार पपी उनका समय माहाम्प है। परमा-मामे नव पिरषा पूरा किया है बार इन मोंकी या विस माकर किपा है। क्योकिसी मध महावी, और यदि ऐसा रहा हो तो उमें भक्ति यस्प- प्रामि भी को।
परिशिए (१) - , . कर्कटी राससी- कर्कटी रापसी हिमाच्य पर्वतके शिखरपर या करती थी। एक बार उसकी इच्छाई कि में जम्धपके सपूर्ण नावोंका ममण करके तृप्त हो । यह विचार कर यह पर्वतको गुममें एक टॉगसे सोरो, मुगोंको उचा कर, बॉयोको बाकाशको बोर स्थिर कर तप करने एगी । इस दशामें उसे हजार वर्ष बीत गये। तब वह: प्रमाजी आये और उन्होंने उससे पर माँगनेको कहा। रामसीने कहा कि मैं चाहती हूं कि मैं सोहेको वर पाधिका हो, और मीयोंके इयमें प्रवेश कर सई । पानीने या बरदान स्वीकार किया, और कहा कि दुराचारियोंक दपमें तो प्रमेश कर सकेगी, पर गुणमानों के हइयमें तरा प्रवेश न होगा । तदनुसार कर्फटीका शरीर सूक्मातिसूक्ष्म होने भगा । इस प्रकार का राक्षसी कितने ही पपोतक प्रापाषष करती हो। परन्तु इससे राक्षसीको पाव दुमजा, आर यह अपने पूर्ण शरीरके लिये बहुत बहुत पचाताप करने सगी । ठसन फिरसे वप करना आरम किपा चौर उसे फिर मार वर्ष घोर तप करत दुए से गये। इससे सात साक सापमान हुए। इसपर प्रमाजाने फिर कर्कटीको दर्शन दिये, और बर माँगनेका कहा। ककटीने उधर दिया, 'अब मुझे किसी भी बरकी कामना नहीं बत्र में निर्षिकस्य शांतिमें स्थित हो गई। स्पर प्रधानीने उसे राक्षसीके शरीरमें ही मीन्मुक होकर विचरमका वरदान दिया, वौर कहा कि पापी बालोंका मन्नण करती हुइ विचर, वार रिसे पूर्ण शरीरको प्राप्त कर | कुछ समय बाद कर्कटी हिमालयपरसे उतर कर किरातदेशमें पहुंची, भौर उसने कहा किरात शके रामाको अपन मत्री भौर को साय यात्राके लिये बाते हुए दमा। उसने सोचा कि ऐसे मनु शानियोंको मक्षण कर पाना एक है, क्योंकि इससे पोककी रक्षा होती है। बस राशसा उन्हें देख गर्नना करने सगी, और उसने अपना मोम्प बनानेके रिपे स्कारा । इसके बा- किरात याके रामा मंत्री भार राक्षसांके पावसे प्रमातर इए । रामसी परम शान ८ गई और उसने जीव-सफा पाग किया । या वर्गन पोगवासिष्टक उत्पतिप्रकरणके ६८और ७७-८३ सगाम आता है। धर्मग्रन्य- जा महल गिम्मर सम्प्रदायमें गाम्मरसार मा सिवयोंका है, वही महरा वापर मामापमें कमप्रापका है। इस मम्पके फर्मविपाक कर्मस्तत्र बरस्वामिन, पानीतिक पातक और समविका ये छ प्रफरण है। ये क्रमसे पहप, दूसरा, तीसरा चाया, पोरगा और एट्य कमान्य माममे प्रसिद्ध कमप्रत्यके कता पवापर शिम् देवेन्द्रमूरि। इनफा बम्म गमग म० १२०५ में हुआ पा । देवमूहि चैनगमके प्रखरता और मत प्राय अमापारा परिनु प । इनके गुरुका नाम जगपन्धमूरि या । नामे मादग्नित्यममाति, मिदपचाशिकामूत्रादि मुन चरित बावनेफ पोंकी रचना 1चम्द्रले पत्रक ११७ में मूगरदन कमान्य' पाने के लिये किसी मुमुक्षुको वनुरोध किया है । माइम हा इसमे उनका वापय मूल पमपमे हो। गनपत्राने अनेक म्पोंपर फर्मप्रएक पटन-मनन करना उल्हेम किया है। +मीपुत रमन मामाल निरम पर हरित एमिनो - मसीमा मन्ना मोगुम्नेमनी मारा गया हो मनापासरे। स्वामी नयापम कमरियर परिषप 'पासमान परमेशामा उमाने (परमाने) मात्र नेमलिना रोगा। नर ८१२ भीम प्रसाद धमदेव भापक (देरो प्रस्तुत प्रय, मोक्षमाछा पाठ २२) मासिकपानुर्भमा- यह वप्पामा मत्य दिगम्बर विशन् स्वामी कार्तिकेय (कार्तिकस्वामी ) का बनाया जा है। ये का हो गये। बार कही यनेपाळे ये स्पादि बातोंका पुस ठीक बैंक पवा मही चम्ता । रामपन्द्ररी मिलते 1-"गठवर्ष मद्रासको भोर साना वा पा । चर्तिकलामा इस मूमिमें बहुत बिचरे है। इस भोरके मन मम्प, 3 और बगेर पिसे सोए पहार देसकर सामा कार्तिकेय माविकी गोस पैराम्पमय दिगम्बर पि याद बाती है। ममस्कार से उन कार्तिकेय मानिको । पतिकपानुमेक्षाके ऊपर ई टीका मौ ।। या प्रन्य प० अपचनीकी पचनिकासहित बसे म्मा है । ६ उपमनमाने दिगम्बर विवान् अमचन्द्रमांकी संस्कृत टीका भाषारसे या निका सिसीहै । रामचन्द्रमाने कार्तिकेयानुप्रेक्षाले मनम-निरिप्यासन करनेका कई मगा उठेश किया है। रिप्सनदास (सिंहO ( देसो किपाकोप) कुणरीफ (देसो प्रस्तुत पंप मालनाबोध प ११८) " मुम्दकुन्द वाचार्य Pगम्बर मामापर्ने बात मान्य विशन् हो गये हैं । कुन्दकुन्दका सरा माम पप्रनन्दि मा या । इनके पियौ तर तराको दम्ठकया प्रचमित है। इनके समपके विपपमे मो विशनोंमें मतभेद है । साधारणत कुन्दन समप ईसमी सफी प्रपम प्रताम्दि माना जाता है । कुन्दकुद पानाके नामसे बसे मंप प्रचलित है, परम्त उनमें पचास्तिकाय प्रवचनसार xसमपसर और मरपार पे पात प्रसिद्ध है। इनमें बाविक खान कुन्दकुन्दपाके मामसे प्रसिद्ध है। वालोंको अमृतचन्द्राचार्यो सात टीका मी किती है। इन मेयोपर वोर मी विशनोंच सात-हिनी टीका है। हिन्दी टोकामों में समपसारके उपर बनारसीदासमा हिन्दी समपसारमाटक मपत र है। से समाने बमृतचन्दके समपसारकसशाके बापरसे हिन्दी करिता किताहै। उस तीनों ही प्रथ अम्पास्मो वय कानिफ मप माने जाते है। कुन्दकुदको ८१ पार (प्राम) का मी कर्ण माना जाता है। इनमें दर्शन, चारित्र, सूत्र बोष, माष मोष सिंग बोर शील मामक बाट पार छप चुके हैं। रामचन्द्रवीने प्रस्तुत पंपमें एक स्थानपर सिमप्राप्तका उता किया है और उसकी एक गापा उदत है। यह सिमप्रापत उक बार पाएसे मिम । पा पारमपदके प्रसिद्ध पारोसे को पार होना चाहिये । रामचन्द्रमाने कुमुमो प्रपोंका तूब मर्मपाल किया पापुमुदनादि बापापछि प्रति स्यता प्रकाश करते ए रामचन्द्रमी लिखते है- रेपसन्द बादि वाचार्यो 1 तुम्हारे बचम मी निवतरूपकी बोग कर में इस पामरको परम उपका ए है इसरिये मैं तुमें अतिशप मदिसे नमस्पर करता है। रामचीन पचामित्रपका मातिर मी किया वो वक. में दिया गया है। पस पर भारतमानपरिक विससमे भी तयार नामा नाut मारे बारसे मिपासना पाने मम्पिकालो परिशिप (1) ८१३ इमारपास (देसो हेमचन्द्र) फसीस्वामी- केशिगौतमीप नामका अधिकार उचगम्पपनसे २१ में अधिकारमें वाता है। फेशी भगवान् पार्थमायकी परम्पराको मानमेवा पे, और गौतम गणधर महावीरको पराम्पराके उपासक थे। एक बार दानोंका पापस्ता नगरीमें मिगपाआ। एक ही धर्मक मनुयायौ दोनों सघाँके मुनियोंक शिष्य मिम मिम प्रियाओंका पाम्न करते थे। यह देखकर फेशीमुनि और गौतम गणषरमें बहुतसे विपयों- पर परस्पर चर्चा , और पाका समाधान के बाद कशीमुनि महावीर मगवानको परपरामें दीक्षित हो गये । केशीमुनिकी अपेक्षा यपपि गौतम ठोटे पे, फिर मा केशीमुनिने परिणामोंकी सरसताके कारण उनसे दीक्षा प्राण करनेमें कोई कोध म किया । फ्रियाकोप- कियाकोपके कर्ता किसनगिर सांगानेरके एमेवाळे सणेडबाठ थे। क्रिपाकोष स. १७८१ में रपा गया है। इसकी रचना छन्दोमन ।। किसनहिनीने मचाईचरित्र और रात्रिमोनमकपा नामकी बम्प पुस्तकें मी टिसी है। क्रियाकोष चारित्रका मन्य है। इसमें मापाचारसम्मषी क्रियाजोंका मा बिस्तारसे वर्णन है। यह प्रय सन् १८९२ में शोलापुरसे प्रकाशित वाहै। गममुङमार (देखो प्रस्तुत प्रप, मोम्माम पाठ १३) गीवा- गीता वेदव्यासको रचना है। इसमें रणमगवान्ने पर्जुनको कर्मपोगका उपदेश दिया है। इसके सात, हिन्दी वप्रेमी भादि ससारकी प्राय समी माषाओंमें वनेक मनुवाद विरेचन माए है। गीताके कत्लके विषयमें रामचन्द्रगीने बो बिभार प्रकट किये हैं, वे महात्मा गावाके प्रमोंके उत्तम पाक १२७ में उपे है । गीतामे पूर्वापरनिराध होने का रासनमाने बक ८११ में उस किया है। गोइसपरिष- पर कोई परिप्रप्रय मालूम होता है। इसका उमस पक १० में किया गया है। गम्मिटसार- गोम्मसार कर्मन्यका एक उप कोटि दिगमरीय प्रध। इसके गोवघड धौर कामाचा दो दिमाग है, जिनमें भी वार कर्मच मैनपतिसे विस्तृत वर्णन किया गया है। इसके कर्ता मेमिचन्द्र सिवातपाता है। नेमिचन्द्रने सम्बिसार, धपणासार, नियोकसार मागिन्य मी सितियोंकी रचना की है। नेमिचत्र मरने विषयके मसाधारण छिन् थे, गणितशासपोरे पणित पे। इनके पिपमें मी पावसी किंवदन्तिया प्रसिद्ध है। नमिचन्द्रने भपने शिष्य चामुणयपके उपदेशके ठिपे गोम्मसार बनापा था । गोम्मटसारका दूसरा नाम पचसम्र मी है। गोम्मरमारके x पाने पिनभिः स्पनर मिरान मामका उप यि पर पिसाबारची सिननिराला श्रीमापबन्द्र उपर कई दिगम्बर निदानोंको टीका है। मेमिधानका समप ईसाकी ११ वा ताम्दि माना बाबा है। रामचन्द्रगले गोम्ममारके पन करनेका मुमुक्षुबाको अनुरोध किया है। गौशाम- भैनसायोंके ननुसार मंसलिपुत्र गोशाल महापौर मगवान्के शिम्प पे। किसी बात को भर गोशाक मोर महागारमें मतभेद ऐ गया । गोशाकने महातारके सेफ्को छोर दिया पार तम्होंने अपना निगरी सप स्पापित किया । गोपाल वफ्मेको 'मिन ' कहा करते थे। एक बार मापारके किसी शिपमे महापौर मगवान्सेमा कि गोशाल वपनेचे जिन करते हैं। महानारने का गोपाल दिन महा। बस वातको गोशाकको सवर गौ तब दे पात कोभित इए, मौर उन्होंने महावीरको सामन्त बाकोरापूर्ण पचन को सर्मानुभूति और पुमपत्र नामके मुनियोंने गोशाकको पात समझाया, पर उन्होंने उन दोनों को अपनी तेगोत्यासे या गण । गोसाम्मे भगवान् महापारके उपर मी सपना तेगोपात्र प्रयोग किया पा । गोशाका विस्तृत वर्णन भगवताके १५ हातको १५ उदेशमें Pया है। गौवम (कीि)- गौतम अपि पापदर्शनके पाचप्रमेता माने जाते हैं। म्यायसूम के मापे पुए म्पापसूत्रोंकी रचनाकारके विपमें निशाना गात मतभेद है । कुछ होगा ईसवी एन्के पूर्णका रचना मानते है, और कुछ ग म्यापसूको ईसमी सन्के बादका मिसा इवा मानते हैं। गौवम ममपर-गौतम इन्वन्ति महासारफे ११ शिष्यों से मुरूप शिष्य पे। ये भाग में मामण पे। इनमें गौतम इच्छन्ति चौर एधीको मोरकर भाकीके गणधरोम म्हावार भगवान्की मौदगीमें निर्वाप्प पापा था । नशाबोंमें गौतम गणधरका माम अगह जगह वाता है। गौतम गणभरके शिर्पोको समान प्राप्ति हो गई थी, परत स्वयं गौतमको, मगवान् महावीरके ऊपर मोर यनेके कारण केवमान महीमा--पा कपन मोक्षमागमें वाताहै। पारिवसागर- परख पदमय मय मास होता है। इसका रस पत्रक ११० में है। चिदानन्द- चिदानन्दगीका पूर्ण नाम पिनप पा । पे सकेगी साधु थे । इनके विषपमें बातमी किन्द दिपा सुनी पाती है। विवादमी कई यो विशन् मापयासी म पे कि प एक मारमानुमपी बमामी पुरुष पे। निशानन्दगीने मिश्र हिन्दी भाषामें बयानातियों बनाई है। विशम्दाने वरोरणानकी मा रचना की है। इसकी माषा हिन्दी मिमित गुमराती है। इस पंपमें की को विशेष टोपटाप नही है। शरीरमें दो पाँच वयक पान होती यह पवन सि तप, कर निम्ती है और किसकासि निकटनेसे स्पा फर होता है, स्पानि सरसबपी मोघ सश्य- बानमें वर्णन है। मोम गराइने सपेरान येचन मिसना बारम किया था । उसका मो भाग मित्रता है प्रस्तुत प्रप के नीचे दिया गया है। समते है कि पिशमन्दनी ।
परिशिए (१) ८१५ । सतत् १९०५ तक मौजूद थे। उनकी रचना मनुमवपूर्ण और मार्मिक है । राजक्दयी चिदानन्दयों के समधमें रिसते है- ठमके जैनमुनि हो पाने के बाद अपनी परम निर्षिकन्य दशा जानेसे उनमें चान पहा कि वे वर क्रमपूर्वक द्रम्म, क्षेत्र, काल, मावसे यम नियमोंका पाछन न कर सकेंगे। तत्पानियों की मान्यता है कि गिस पदार्थको प्रालि हानेके लिये यम नियमका प्रमपूर्वक पालन किया गाता है, उस वस्तुको प्राप्ति होने के बाद फिर उस भेणीसे प्रति करना अपना म करमा दोनों समान हैं। निसको निर्मप प्रमचनमें वप्रमच गुणस्थानपा मुनि माना है, उसमें की सर्वोपम चातिक म्येि कुछ भी नहीं कहा जा सकता । परस्तु के उनके मनोका मेरे मनुमनामके कारण परिचय होनेसे ऐसा कहा जा सका है कि प्राय मध्यम अप्रमत्त दशमें थे। फिर उस दशामें यम-नियमका पालन करना गौणतासे मा चाता है। इसलिये अधिक वात्मानदके लिये उनोंने पह दश स्वीकार की। इस समयमें ऐसौ दनाको पहुँचे हुए बहुत ही थाने मनुप्पोंका मिलना भी बड़ा कठिन है। इस परस्पामें मप्रमचताविषयक बातको असमावना वासानीसे हो जायगी, ऐसा मामकर उसने अपने बावनको पनिमतपनेसे वौर गुप्तरूपसे विवाया । यदि ये ऐसी ही दशामें ये होते तो पातसे मनुष्य उमके मुनिपनेकी शिथिलता समझते और ऐसा समापनेसे उनपर ऐसे पुरुपको ठन्टी दी छाप पाती। ऐसा हाकि निर्णय होनेसे उन्होंने इस दशाको स्वीकार की। पैसावीपुर- पतीपुत्रका जीव पूर्वमबमें यहादेव नामका मामण था। र चारित्रको सुगुप्साके कारण रानगामें पनाह सेठको पिठाती नामकी दासीके यहाँ पैदा हवा, और उसका माम पिछीपुत्र (गतापुत्र ) पा। गतीपुत्रको पूर्णमाको सीने मी पनाह मटके पर उसकी कम्यारूपसे चम्म छिया । पेषातीपुर सेटको कन्याको बहुत प्यार करता पा । एक दिन सेटमे पेसाती पुत्रको अपनी हकीके साप कापसे कुषेश करते देस उसे इसि निकाल दिपा । पर दासापुत्र चोरोंकी मामें जा मिा, वीर गोरोंफा वभिपति बनकर बने सगा । एक दिन वह अपने साथ भोक साप पनाह सेठके पर भापा । पोर पातसा धन वीर सेटको कम्पासो लेकर परत सर बोर उसके कर्मचारियोंने चायका पीछा किया । घेतातीपुर सेटको कन्याका सिर काटकर उस सिरका छेफर माग गपा । उसने भागे जाकर एक मुनिको देखा वोर मुनिसे उपदेश माँगा | मुनिने विचार किया कि पपपि यह जीव पापिठ है सर मा या उपदेश हो सकता है। यह प्रफर मुनिन कहा-"तु उपशम, पिबेफ धौर सबर करने चाहिये । " यह इनकार चेठातीपुत्रको बाध परा इवा, भार पर ही कापोत्सर्गमें स्थित हो गया । चेसातीपुप्रने भदाई दिम कोर तप रिया भीर पर मरफर देवठोक गया । पर फया उपरेशमाया मादि बैन कपायोंमें माता है। टम- होम शानो पुरुष पे। पे गुमरातके एक मक माने जाते हैं। इनका जम्म पेरमाणे पास मोनिश्च प्राम मगदर्शक स. १८५८ में गाया। गोरम बाल सरठ मोर वात प्राके थे। मान अपना होमको वाचा तो पी ही नहीं होने गेम्पसिस्मेिं मानेको फभी भी मा - स - भीमद्रासबन्न नही की । छोटम गत कम बोलते, और कम वाहार करते । छोटम बालपमपारी थे । सोने पपना समस्त गोपन अपात्ममें हो म्पतीव किया पामेटमने प्रथमम्मी मामके सापुछ वपना गुरु बनाया था। मेटमने अनेक प्रपोच रचना की है। इनमें प्रमोचरस्नमाम, धर्ममकिमानपान, पोषितामणि, सम्पमिपसार, दातविचार वादि मुल्य है। मेटम ७३ वर्षको स्पा समाधिस्प पुर। मरमरव- एक समय या भरत मरले किनारे बैठे पर बोकारका नाप कर थे । यो एक गर्मिणी हरिणी पानी पीने के लिये बई । इनमें दो सिंहके गर्ननका घम्ह पुनाई पड़ा दौर हरिमाने परके मारे मदीको फौद बाने प्रयत्न किया । फळ यह मा कि उसका गर्म नदीमें गिर पा बार प नदी के उस पार पहुंचते ही मर गई। रामर्षि भरत मी मारे बैठे बैठे या घटना देस ये पे। मरतनीका रुप दयासे म्याकुल हो उठा । ये ठठे और पगशावको नदीके प्रवाहमसे निकाल पर बपन बाभमको गये । ये नित्पप्रति उस पन्चेकी सेवा-सस्था करने लगे। कुल सम्प बाद मरताको तस हरिणके प्रति बपन्त मोह दो गया । एक दिन का मग तमक पाससे कही माग गया और अपने मुण्डमें गा मिम । इसपर मरतनाको अस्पत शोक एमा, और वे ईरागवमासे मर हो गये । इस मापन्त पगमारसनाने कारण मरतनाको दूसरे मम्ममें मगन शरीर धारण करना पड़ा। भरतमीको मगनन्ममें अपने किये हुए कर्मपर बात पचापाप मा, भौर के पास बसंगभाषसे यने सगे । सम्पमात् पाप मरत मृगके शरीरको पाकर मामणके पर तत्पम इए। मरतमाता या वन्तिम सरीर था और इस शरीरको मेमने के बाद से मुछ हो गमे । मरतग बपने पहिले भनेको मूझे न पे सरिये दे बसंगमावसे हरिमजिक वपना गौचन बिताते थे । साधारण भेग मरतनी- को जा गंगा पा बधिर समसकर उनसे बेगार गेम कराते थे, और उसके पो त सहा सूख बन दे देते थे। या गामरतका वर्णन मागपत के पाठ-मबमें वभ्यायमें बाव।" मुझे समरत पौर निदेही बनकको दशा मात्र होमो "-'मोमय् रामचन्द्र । १२१ नन- जनक सानुराम पमा निमिके पुत्र थे। ये मिपिणो एमा पे । राजा जनक अपने समय- के एक परे पोगी थे, और वे संसारमें ममममी तय मिसि पते थे । पनक विदेश मामसे मी को गाते थे । यमक के पोगी ही नहीं, परन्तु परमशानी और मायान्के भत मा पे । अपि पावरम्प इनके पुरोहित तपा मंत्र । तपा मुम्देश बाहि बनेक इमियोंने जनवरीसे ही उपस लिया था। गीता मी मनकके निष्काम कर्मयोगी प्रशंसा की गई है। उनकी पुत्री सीताका विचार रामचनगाँसे प्रभा पा । बमकका वर्णन भारत, महाभारत रामायण मादि मयोंमें मिलता है। मम्मदीपममति- बमासि घेतामर साहित्यके १२ उपगमिसे B उपग माना गाता है । इसमें जम् का Rस्तारसे पर्मन किया गया है। पर बैन भूगोस्तीपक मप है। इसमें एमा भरतकी कपा पबपि 'वीर परिनिए (१) ८१७ पिम्तारमे वाती है । इमार नेन भाचायोने वनेफ टीका टिप्पणियों टिगी है। इस प्रयमें इस कामे माश न दानेका उम्लेग जाता है। नम्बस्तापी- जम्म्वामी PIम्बर बार सामर दोनों सम्प्रदायोंमें अन्तिम फेवठी हो गप है। महावीर मामाले निकागके पमात् गातम, सुधर्मा पार बम्यूस्वामी इन वान फाठियोंका होना दोनों ही सम्प्र- दापोंको मान्य है । इसके बाद ही दोनों सम्प्रदायोंकी परम्परामें भेद सरिगोचर होता है। दिगमर और वापर दोनों विशनोंने सम्पत, गुजराती वीर हिटीमें उम्स्वामीफ बनेफ परित यस बार किसे हैं। पताम्बर विधामोंमें हमचन्द्रमूरि और अपशेखरमूरि, और निगममें उतरपुराणक कर्चा गुणमद्रमूरि और परित राजमठ माफिा नाम AT उलेमनाप है। पं० राप्रमठका जम्मूस्वामी- परित मभी दाउमें इस खेगफारा संगति होकर माणिकपन जैनम्त्यमाला समईकी बोरसे प्रकाशित हुआ। ठाणांग (बागमप) इसका परचटाने अनेक स्पोवर उप रिया है। रंटसी गापाका स्तपन (देशो पशोपिजप) वस्वार्थम्भ- वसायमप्रमें रैनधर्मके सिद्धांतों सूत्रोंमें दिया गया है। मान दंगको मैनसाहित्पमें पर प्रयम ही रमना उपबम्ब होती है । इस प्रयके कर्वा उमास्वाति है, जो दिगमर और श्वेताम्बर दोनों से समापोदारा पम्प माने गाते हैं । तरवायसूत्रका मी दोनों सम्प्रदायोंमें समान वादर है, पौर दोनों ही वामापोंके विशन् इस सारगर्भित मेपको टौमा टिप्पणियाँ सिमेमें प्रेरित हुए हैं। वाम्बर परम्परा के अनुसार उमास्वातिने तत्तार्पसूत्रके उपर लय भाप्पको भी रचना की है, मिसे Pगमर निधन नही मानते । खेतामरोंके अनुसार उमास्माति प्रशमरति मारकप्राप्ति बादि प्रपोक मी कर्ण करे जाते । उमास्वाति पाचकमुम्पके नामसे फरे बाते है। दिगम्बर साहित्पमें इनका नाम समास्यामि मी वाता है, और पे कुन्दकुन्द भाचापक शिप्प वपना पशम मान जाते हैं । मध समप ईसवी सन् मपम शतादि माना जाता । वत्तार्यस्त्रक मंगाधरणका पमपन्द्रनीमे शिवचन किया है। पिपासफी- पियोसम्मधर्मकी मूमप्रवर्गक मैडम सोट्काका म्म सन् १८११ में अमेरिकामें इबा पा । इनका निबार १० वर्षको भवम्यामें अमेरिकाले एक गर्मरके माय एमा। बादमें पकार सैक्ट्री ने इस संबंधा मिश्छेद कर लिया, गौर देशाटमके विचारसे ने रम्दुस्तान बाई । सोने तिमत सम मादि देशोंमे मा भ्रमण किया | गोट्कीने कर्नेठ बालक साहसकी मदसे सम् १८७१ में पिपोमुक्तिकास सोसापटीको स्थापना की। पे सन् १८०९ में फिर हिंदुस्तान वर्ष, बौर यो यो धारोंमें गाकर अपने सिमतिका प्रचार करने भगी। पिपोसमीपर्म सब पौत्र समवय करता है, और प्रत्येक वर्मक मछन् पुरुपोंको प्रमाणिसे देखता है। दिन, मुसम्मान, पारसी भीम प्रसाद मादि समी सोग इस धर्मक वनुपापी । वेट्स्कीफे बाद श्रीमती एनौबिसेन्टने इस सोसायटीको उपविके लिये बात सयोग किया । पियोसोका गीताफा गुरयता मिषन फ्पिोरिक सोसायटी बम्मसि सन् १८९९ में प्रकाशित हुना। दमकासिक ( आगमनप)- दशकामिकको कुल गापावोंका रामचन्द्रनीने अनुवाद किया है, जो कक ३१ में व्या है। दयानन्द--- सामी दयानन्दका बन्म स १८८१ में मोरपी राम्पके मन्तर्गत कारा गाँवक एक पनी भानेमें आ पा । स्वामी दयानन्द के पिता एफपर प्रामण पे । दयानन्द स्वामी बारेमसे ही सक्न दुमि पे और मिप्या अप पारिका विरोध किया करते थे। अब स्वामीमी पाईस पके हुए तो उनके बिमाह के बातचीत । विवाहको सब हैप्पारियों मी हो गई, पर दयानन्द इस समाचारको धनते ही की माग गये, मोर गेरपे रंगके पस पहिनकर यने गे । दयानन्दगीको सहस्की वागशमें पर उपर पात ममनेने पचात् पनावमें स्वामी विरजानन्दनांके वर्णन इए। दयानन्दमे अपने गुरुके पास बाई मरस गकर संसहत और दोन व अभ्यास किया । विवाष्पयमके पश्चात् सामी दयानन्दने प्रशिकमर्मका दूर दूर मार प्रचार किया । काशीमें भाकर पाने कि पंरितोंसे भी शार्प किया । सामानाको प्रतिमा और असाधारण पुलिफौरा देखकर पातसे ोग ठमके बम- पापा होने मगे । स्वामी दयानन्दने सं १०३२ में बम्म बार्पसमावकी स्थापना की। स्मामामी ने उदयपुर, दौर, पापुरा बादि रियासतो मी प्रचार किये प्रमण किया । सन्त रे पोषपुरके मनारमाके यहाँ पने सगे। याँ कुछ गेग उनके मात विरोधी हो गपे, मौर उमके रसेवसे उने विष दिवाकर मरवा गम । स्वामीभाने संवत् १९१ में दिमागके दिन देहत्याग किया। इसके मार स्वामी महानन्द सा अमपतराप पारिने बार्यसमाजका काम किया। स्वामी दयानन्दमे रिदमें सस्पार्यप्रकाश मामक पुस्तक लिखा है, मिसमें सब धर्मों को समापना की गई। दयाराम- कवि दयारामका मम सन् १४०० में आ पा । ने पनागरी लिपिके वििरक बम मर्थ लिपि न भाती थी । इहोंने गुजराती, हिन्दी पनामी, मराठी, संसात और फारसी मापार्ने करितार्य है। उनके एक शिप्पके कम्नानुसार दपारामने सब मिनार ११५ मन्पोका रममा कोहै। इसके अतिरिक्त उन्होंने बाक्से पर पानी बगेर मी किम दयाराम कृष्णके गत मट घे, और होने पपीताके वातसे रसिक पद गय पिसे । पारामने गोकुल, मधुप, काशी शिक्न प्रौनापी बार सत्र पामोक्ने सात बरस घूमकर यात्रा को पी। इनके शिल्प पारामको नरसिज मेहता मातार मानते थे । इमका मरण सन् १८५२ में हमा। रामचनमाने इनके पद उदृत से। दासप (मो समय) देवपदमी-- पायोफा बन्न मारपमें संगत् १०१५ में माथा। सपनगी सेवामार बाम्नाय । - परिशिप (1) एक पास व अभ्यारमवेचा कवि हो गये है । महोंने वेताम्बर साहित्यके बिगार अप्पयनक साप पाय गोम्मटसार वादि दिगम्बर प्रन्योंका भी बचा वम्यास किया पा । देवचन्द्रगाने सरूत, प्रास्त, नम और गुजराती माषामें बनेफ कृतियां बनाई। इहोंने दस वर्षकी ववस्यामें दीक्षा के छी थी, पौर नीवनपर्यस प्रमचारी यकर साहित्य सेवा की । देवचन्द्रनीफी रचनाओं में वन्यप्रकाश, नयचक्र, हानमगरीटीका, विचाररस्नसार, अध्यात्मगीता, चतुर्विशतिमिनस्तबन वादि प्रत्य मुख्य है। रामचन्द्रनीने वन्यात्मगीता दौर चतुर्विशतिनिनस्तवनके पच उदृत किये है। देपचन्द्ररि (देसो हेमचन्द्र) देवागमस्वोप (देमो समतमद ) पारी (देसो प्रस्तुत प्रप, भावनावोध पृ ११९-२०) पनामद-वालिमद्र- पनामद शाहिमको कथा सेताम्बर साहित्यमें मात प्रसिप है। यह कया सूत्रयोंमें भी जाती है। स० १८१५ में बिनकालिसरिने सरकत धन्यचरित्रमें पह कपा विस्तारसे दी है। इस सस्त चरित्रके ऊपरसे प० दिनविनय महाराबने सूरतमें रहकर भमाशारिमद्रका रास लिसा है। यह यस चार तालमें है। चौथी ढामें पनामद और शासिमरके सयम प्राण करनेका उम्लेस है। पनामद दौर शासिमद मोक्षगामी गौर पे । उक रसको मामसिंह माणेकने सम् १९०७ में प्रकाशित किया है। xपरमधी (परमसिंह) मनि- घरमशी मुनिका बम नामनगरमें हुमा पा । इनके गुरुका नाम गिवनी ऋषि था। पे गेका- गटका शिपिसाचार देसकर उससे क्सग हो गये पे, और सबत् १५८५ में उन्होंने दरियापुर- सम्प्रदायकी स्थापना की थी। ये भत्रभान मी करते थे। भरमशी मुनिने २७ सूत्रोंपर 'टप्पा'को रचमा की है। इनोंने बौर मी प्रत्य निसे हैं । इनका विशेष परिपप "मैनधर्मनो प्राचीन संक्षिप्त इतिहास" पुस्तकमें है । यह पुस्तक स्थानकवासी जैन काष्प महमामा से प्रकाशित । पर्मपिन्दु (देसो हरिम) पर्मसंग्रहणी ( देवो हरिमन) नदिम्म (भागमान्य)-इसका गरमाने एक स्थळपर कविता उहेश किया है। ममिरामर्पि ( देसो प्रस्तुत प्रप, भावनाबोध प १०३-) नरसिंह (सी) मेहवा- नरसिंह मेहता गुजरात के उप टिके मन कति माने जाते हैं । इनका जन्म नागदमें हुमापा। इनका जन्मफाल संवत् १५५० से १६५ के मांवर माना जाता है । इनको हारसोरा, सरवर्समाम, पसष्टी मादि रचना गुजराती साहिस्पमें बहुत प्रसिर । नरसिंह मेहता कणके बापत मळ पे। उनकी करिता कोमल और मकिमानसे परिपूर्ण है । सोझा है कि ममिह मेहताको प्रमु x पर मुना मुसे मेरे मित्र भीपुत्र रमनुनमाई मासीपने है।गर । सरह, ८२. भीमन् परचम प्रत्यक्ष दर्शन दिया करते थे, तपा सकटके समय स्वयं कृष्ण मगमान्ने इनको हरी जुका पौ । हा जाता हैनरसिंह मेहताने स्व मिगकर स्वा स पद बनाये है। मरसी मेहता पौर कारको निस्पृश् मक्षिका रामचन्द्रनाने गात गुणगान किया है। मपवण- नपतावप्रकरणका घेताम्बर सम्प्रदायमें बहुत प्रपार है। इसमें चौदा गापामों में ना तत्तों स्वरूप ध प्रतिपान किया है। नवतनके कर्ता देवगुताचार्य है। सोने सवत् १०७३ में मतल- प्रकरणको रचना है। नपतलप्रकरणके ऊपर बमयदेवरिने माप्प पिसा है। इसपर और मी अनेक टीका टिप्पणियाँ है। नारदमी (देखो नारदमधिसूत्र ) मारद (देखो प्रस्तुत पंथ, मोक्षमाग पाठ २३) नारदमकिसन- नारदमातिसूत्र महर्षि मारदनीकी रचमा है। इस प्रथमे ८१ सूत्र है । प्रपकारने इसमें मलिकी सोलापता प्रतिपादन किया है, और उसके म्येि कुमार, बेदम्पास, एकदैव वादि मणि-मामायाको साधी दी है। प्रपकारने बताया है कि मोंमें जाति कुरा बादिका कोई भेद नहीं होता, वौर मष्ठि गेको स्वारको तह निर्वचनीय होता है। इसमें गोपियोंको मतिको प्रभसा की गई है। मक मोग पाएनोंकी त मलिको साता दर्शन मामते है । उळ पुस्तक हनुमानप्रसाद पोदार के लिये बनसहित गोवा प्रेस गोरसपुरसे प्रकाशित ईमारवगाने मागता नारदस्पति वादि कम्प मी प लिसे। •निसानन्द- निकुहानबाजी सामानारपण सम्प्र-पके सापु थे । इनके गुजराती भाषामें बहुतसे काम है। ये काठियावाब एवे थे, और सं १८४७ में मौम्य पे। निफुलानन्दगीके पूर्व भाभमान माम पाठमी पा । इनकी कविताका मुरूम बंग राम्य है। इन्होने मच्छवितामणि उपोशपितामणि, पौरगाम्यान, निफुमानन्द काम्प तपा बम्प बनेक फोकी रचना की है। रामपनजाने निपुलान दके पौरमापानमें से पर उस्त किये हैं। नीराव- मारत मळ मातिसे पाटील पे। इनका मरण सन् १८१५ में मुताराबस्पा, हुमा पा । इनको पिता शम्यान और रणमतिक उपर है। ये तम्सी पर हर पूर्णिमाको पार जाया करते थे। परते। एक बार इन्हें रास्ते में कई मुसम्मान मिठा, और उसने कार तो तेरे ममदार दे, दहापौ तुसमी ऐकर उसे क्या पता रिताहै।' इसपर मारतको मान उत्पम हुमा और उन्होंने मुसम्मान गुरुको प्रणाम किया। उसके बा उमपातको भोर भरिक एकाप हुमा भीर उनका नाम्पान उचचर गाता गा। गायाने इन योगी (परम पोग्यतापग) ।
परिशिए (१) ८२१ समाद नेपोसियन- नेपोम्पिनका जन्म १५ अगस्त सन् १७६९ में कार्सिका दीपमें हुवा था । इन्होंने १६ बर्षको भवस्थामें ऐफ्टिनेंटका पद प्राप्त किया । नेपोलियनने मस, वास्ट्रिया और इगडाके साय बहुत समपतक वफ्न देश फ्रांसको रक्षाके किये युद्ध किया, और विनयी होकर अपनी बसाधारण प्रतिमा बौर पीरताकी समस्त विमके ऊपर छाप मारी । नेपोलियन असाधारण पार था, उसमें साहस तो इट फूट कर मरा हुवा था। यह कया करता था कि कोपर्मेसे 'बसमय' शब्दको हो निका गसना चाहिये, पोंकि उपमके सामने कोई मी काम कठिन मही। परन्तु मनुष्पकी दशा सा एकसी मही रावी । सन् १८१४ में इंगळे, मस और वास्ट्रियाकी सगस्ति सेनाके सामने इसे हार मानमी पी, और इसे एस्लामें जाकर रहनेको वादा हुई। मैपोठियन दुर महीने एस्लामें यहा। बादमें इसने पहसि निकसकर फिर मांसपर अधिकार कर लिया। परिणाम पाया सन् १८१५ में इसे फिर समस्त युरोपके सम्मिसित दलका सामना करना पड़ा । इस समय इसे इसके साथियोंने पोसा दिया । फठत नैपोपियनकी बाटरपके पुरमें हार ई और नेपोलियन सदा के लिये सो गया । नेपोलियनने मागकर वगैजी सडेकी शरण छो। यहाँ इसे बरी कर लिया गया और इसे सेंट हेसनामें सबके लिये निर्वासित मीचन म्यतीत करनेको भाताई। यहाँ भोलिपमने पाच वर्ष अतीर काटप वरपामें मिताये । यहाँ उसके साय अस्पत मन्याय वौर नीरतापूर्ण वार किया गया। क्न्तमें नेपोलियन धीरे धीरे मत निर्वस हो गया, वीर उम पीर सैनिकने ५ मई सन् १८२१ में अपने प्राणोंका त्याग किपा । "पर सवामें मस्त हो तो नपोलिपन बोनापार को दोनों स्पतिसे स्मरण कर "-'श्रीमद् रावपन्द्र '२ पर्वमलि-- पोगाचार्य पतंजलि का हुए और कहाँक पनेवाले थे, इस्पानि बातोंके समंध कोई निमित पता नही गप्ता । पछि माधुनिक पोगोफे म्यवस्थापक माने जाते हैं। कुछ विद्वानोका मठ है कि पाणिनायम्पाकरणफे महामाप्प भौर परकसरिताके रचयिता मी ये ही पावलि है। इन विशनोंके मतमें पतनडिका समप इसवी सन्के पूर्व १५० वर्ष माना जाता है। पातजपागम्पर बनेक माप्य टीकार्य बादि है। इनके सबमें राजचन्द्रनी शिमते है-" पातासयोगः पाया सम्पन प्राप्त महीमा था, परन्तु हरिमद्रमरिमे उन्हें मार्गानुमारी माना है।" पपनन्दिपपरिमतिफा- इस प्रथके फर्ण पपनन) आचार्य है। जैन सप्राप पपना नाम भनेक मिशान हो गप है। प्रस्तुत पमन गिम्पर जैन न् पे। इन्होंने अन्य प्रयों मा रचना की है। पमना प्रास्तके बदुत परिन । होंने इस प्रपमें पौरनन्दाको ममम्बर दिया है। इनके समपा पुग्छ निपत पता नही एणना । पानन्दिपपविशति चैन समाइमें गत मारमे पहा नाता है। इस अपने पास प्रकरण है। रमपरा पद मयुम प्रप है। म मय एक दम्मानित सात टीम भी है। इस प्रपो परन करमा गापाले पई नगर उम्ग किया। ।
२२४ . वयात्मपर्म में यते पे| आपमें तो पातक माह पे चारों मान रोकर बनेको भीमद् समान वारंम किया, और अपने सात मित्रों की सहायता से पूर्ण किया था। कहते है कि सर मोगमनमा अपने मामा के ठाकुरको पुत्री सुगनवा साप प्रेम हो गया था, और इस प्रेमको इन दोन बत समयतक निवाहा । प्रवीणसागरमें राजकुमारी गुबनवा (प्रवीण ) ने मोरामणी ( सागर ) से समोपन करके, और महेरामणगने रामकुमायको सपोधन करक कवितायें उिमा है । गगनरी खिसते है.-"प्रीमसागर समापूर्वक पता गाय तो पर दयता देमेपाडा पंप है, ही तो पर वप्रशस्त रागरंगों को बढ़ानेपामा प्रथ है"। महादनी (देसो बनुभवप्रकाश) प्रभम्याकरण (बागमय)-सव कई जगह यमदीने उठेश किया है। प्रदापना (बागमप्रप) सच मी प्रस्तुत प्रपमें टम्सेय बाता है। प्रीतमदास- पे मत कति मार बातिके थे, और ये सन् १७८२ में मौद थे। पे साधु-संतान समागममें बहुत कार बिताते थे । इनकी करिता मी वन्य मध्येकी तरह तबान पर प्रेममनिसे पूर्ण है । प्रतिमदासो 'चरोतर ' का एन कशा नाता है। इनके यो पप गीता और मागताना ११ स्कंध । इसके बतिरिक्त प्रीतम सने बन्प मी बासे पर गरमी स्यादि किसे हैं। प्रीतमदानो को ' गुजराती में बहुत प्रसि । श्रीमद् रामचम् वने महसे इसे पने लिम कहा करते थे । उनाने प्रौतमको मार्गामुसाय कहा। प्रीतमदासने गोनिदरामयी नामक सापुत्र बात समपतक सहवास किपा, मोर ठनें अपना गुरु बनापा पा । फरते है कि प्रीतमदासत समय बरे हो गये थे। पे उस समय मी फा-रचना करते थे।गुजराती साहित्यमें इनकी करिताबों नारसीदासगी बागराके पनेबारे भीमाम पेत्य थे। इनका कम से० १५१३ में मौनपुरमें हमा पा । बनारसीबाप्तमीका मूल नाम लिकमायात था। इनके पिता पार्बमापके ऊपर मार्फत प्रीति थी, इसलिये उनाने इनका नाम बनारसोरम्स रमसा पा । नारसीवसमाको पौवन कामें का बामाका बात करो गया पा । होने शृगारके ऊपर एक प्रप भी रिसा पा, निसे बाइमें लाने गोमती नदीमें बहा दिया पा । नारसीदासमीको बास्थामें पीरे धीरे पात परिवर्तन रोता गया । इलें जलाईन बाचापी बप्पाहमरसके प्रप पानेको मिले और ये निवपनपको मार एके । लोमे भिमपनपको पुरा करनेवाली कानपचासौ थानवचीसी बम्पपीसी बाहि लियों की रचना की । नारसीदासगरी प्रमाण, उदपकरण, पानमम्मी बादि वने मित्रसहित मुनि मान कर रहा करते थे । इसी कारण मापक जोग बनारसबासको बोसरामती करने मे बमारसीदास्योकी पह एकदशा सं १९९२ तक हो । बा में इनको इस शापर बात कर गा, और हनन पट उस गया । इस एप पे गागरा पं रूपचन्द्र के समागममें पापे, और । बात बावर। बनारसीदास-
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भीमद् पवन इन दोनों समझामन थे। दोनों होने अपने धर्मका मार माम्तसे प्रचार पारम किया । पुर गवान्के देशी विदेशी भाषामोंमें वनेक नोक्नचरित्र मिसे गये। प्राकम्प र फेदसमें एक सूत्र माना जाता है। इसके कला भवमास्वामी है। सरकार नर बमेक टीम निप्पणियाँ हैं।नय सूत्रोंमें साधु साथियों के वाचार किया भाविक सामान्य नियम-मार्गाके प्रतिपादनके साथ सप, इम्प क्षेत्र मा मात्र उत्सर्ग अपनाद मादि मार्गी मी समपा- नुसार बनी। इसलिये पे या वस्त्र अपवादमार्गक स्त्र माने जाते है। पूकम्पमें मह उरे बाक हैं । इस सूत्रमें साष साथियों के बाभRका वर्णन है । इसमें बा कार्य कर्मक हेतु भौर स्परके बाधक, उमा निषेध करते हुए, संयमके साषक स्थान, म, पात्र माविका वर्णन किया है। इसमें प्रत्परिपच वारिका मी वर्णन है। । प्रमदद पहावी था। एक समपकी बात कि एक बामणमे माकर अपत पक्रावास कालो परी ! वो मोबन तू सप साता है उसे मुझे मी सिम । प्रमदचने प्रामणको उत्तर दिया कि मेरा मोबन बात गरिष्ठ बार उम्मP कार्य । परम्त मामणने ना पहनाको रुपण वावि पामसे विमा, तो मदतमे प्राधपको कुटुंबसहित वपना मोमन लिया। मोजन करने के पश्चात् गरिमें पापण और उसके मुटुको महा उन्माद आ, और यह मायण मपने पुत्रसशिस माता पहन बानि सबक साप परी तय रमण करने मा। जब पुवाई तो माधण वौर उसके गानोको म्या मालमा प्रामणको अपदस पापक ऊपर यात कोण बापा मार मा श्रेषसे घरसे निकल पड़ा। कुछ दूरपर मामपने एक गरियको पापले पोंपर ककरें फेंककर पो को फमते हुए देखा । बामणने गपरिपसे कहा कि यो पुस्प सिरपर श्वेत पत्र और घमर धारण करके गमेन्द्रपर मैठकर पासि निकले, तू उसकी दोनों बाँसोको ककसे फोरम गारियेने दिसावकी वोट सोकर हापीपर बैठकर गाते हुए सदसकी दोनों बार फोर दी। बामे पक्राको माझम मा कि उसी प्राधणने इस वनस्पको कराया है। प्रदत्तको बामण गति के उपर बहुत रोष माया । उसने उस मणको उसके पुत्र, पंधु और मिसहित मरमा सान। कोषान्ध प्रसव चारचा अपने मत्रीको सब पापणों को मारकर उनके नेत्रोस दिया पाक मरकर अपने सामने जानेको बाबा दी। मत्राने मातक फासे पार मरकर सनारे सामने रक्सी । ब्रह्मवत उस पामें पपेर फर्मको नेत्र समसकर उन्हें पार मार हापसे स्पर्श करता और बहुत इति वा करता था। तमें प्रसानमन्मी परिणामोंसे मरकर पा सात मरफमें गया । यह कमा विपरिगणकापुरुषचरित वादि पापा बाती। मगमवीर (बागमप)-सका रामनगीने वनेक स्पानोपर उस किया है। भगवतीमाग्रपना- पण प्रत्य दिगम्बर सम्प्रदाय, पात प्राचीन प्रव माना जाता है। पं मापूपमा प्रेमात्र मना है कि सो पाप माम माम वापील पा शिशोटि पा बाक्से मेग इमको समंद्रमा भाचार्म प्य मानते परत पाक नही मान्म होता । परम्प प्रधानत्त्या परिशिए (१) ८२७ मुनिधर्मका प्रत्य है, वौर को मनेक गाथा मेताम्बर मन्थोंमें भी मिलती है। इस प्रपके उपर चार दिगम्बर विद्वानों की सस्कृत टीकायें मौ है। वभीतक इसके ऊपर कोई ताम्बर विवान्की टोका देसनेमें नहीं पाई। प० सदासुसीने यो पेसाम्बर टीकाका उल्लेख किया है, सो उनि अपराचितरिकी गम्बर जैकाको ही श्वेताम्बर टीका समसकर उल्लेस किया है । माझ्म होता है कि सदामसमीके इस कपनके उपरसे ही रामचन्द्रगीने मी भगवतीमाराधनापर खेताम्बर विवान्की टीका पाये मानेका उल्लेस किया है। इस प्रयके कर्णक समयके विषय, कुछ निश्रित नहीं है, फिर मी यह मन्य यास प्राचीन समठा बाता है। मरव (देसो प्रस्तुत प्रन्य, मोक्षमाण पाठ १७, तपा माझ्नामोघ पृ १०८-१११) मर्धारि- ये उनके राजा विक्रमादिस्पके सौतेले भाई थे। महरिको अपनी एनीको दुधरिश्ता देसफर पैराम्प गया । महरि महान् पोगी माने गाते हैं। क्होंने शूगार, नौवि बौर वैरम्य इन तीन शतकोंकी रचना की है। इनका फ्रेंच, छेटिन, वप्रेनी बौर जर्मन भाषामोंमें मी अनुवाद हो चुका है। इस शतकमे बैरम्पशतक पास मुन्दर है। यग्यशतक गुबरावी बोर हिन्दी पपानुबाद सहित सन् १९०७ में वामदामादसे प्रकाशित इला है। महरिके पैराग्यशतकके वतिरित जैन विद्वान् पभानन्दकवि बौर धनरान (धनद) मे भी रेराम्यशतक मामक प्रय मिसे है। पमानन्द फरिका रेराग्यशतक काम्पमाग ससम गुको प्रकाशित पाहै। माश्म होता है गयन्द्रमाने मतरिके पैराम्पशतकका हो अगेफन किया था। मागपक- मागवतका हिन्दु समाजमें मस्पन्त बादर है। बाबा भी बगह जगा भागवतमी कयामोंका पापम होता है। भीमद्भागक्तको पुराण, वेद वौर उपनिषदोंका सार कहा जाता है। इसमें बोबो गूड विषयों को गत सरतासे रस्सा गया है। इसमें रम्यके वर्णनमें मी मगवतिको ही मुल्य मानकर उसकी पुटि की है। इसमें स्पान स्पानपर फ्लमका प्रतिपादन किया गया है। भागवतके गुमस्ती हिन्दी वादिनुपाद हो गये हैं। मागक्तके कर्ता म्पासगी माने जाते है। इसमें पाए स्कम है। मागरतमे रुण वीर बगोपियों का विस्तृत वर्णन है। इसका रामचन्द्रमान सूप पाचन क्रिया था। माषनागोप (देसो प्रस्तुत पंप ४ ९१-१२०) मावार्यमाप-- पह मन्य किसका बनापामा है, फिस मापाका है इत्यादि बातोंका कुछ पता नहीं ग सका। इस मपके विषयमें रामचनीने हिस्सा है-" उसमें सम्प्रदापके विवादका कुछ कुछ समाधान हो सके, ऐसी रचना की है। परन्तु तारतम्पसे पपास्तविक मानमानकी रचना नहीं, ऐसा मुझे पता है। मोना--- मोगा भगत यम्म फारियाबाइमें बेतपुर के पास मुनी गातिमें एन् १७८५ में हवा पा। मोमा भगतके पासा गुजयतीमें बहुत प्रसिद्ध है।मोजा भगत पाटियाचाही थे, इसरिये उनी माया गुजरातीसे कुछ मिल पाती है। उनकी काम्पसमधी रतियाँ मिम भिम प्रकारका है। माप उमका प्रीमन् परवद्र दुम दोनों समकालीन थे। दोनों होने अपने धर्मका विहार प्रान्ससे प्रचार वारम किया । गुर भगवान के देशी विदेशी भापायोंमें भनेक मोरमचरित्र लिखे गये है। - परकम्प म छेदसूत्रोंमें एक सूत्र माना जाता है। इसके कच्चा मावास्थामा है। हमारा पर कमेक टीका टिप्पणियों में न प रस्त्रोंमें साधु साथियोंके वाधार क्रिया मादिके सायाम निपम-मागति प्रतिपादन के साथ साथ, द्रव्य क्षेत्र काम मात्र उम्सर्ग वपमा वादि मागाका मी समया- नुसार बगान है। इसलिये ये मास्त्र अपवारमाकि सूत्र माने जाते है। पाकम्पमें छा उरे शकइस सूत्रमें साधु साथियों के वाचारका वर्णन है। इसमें पा पदार्थ धर्मके और सपमके पापक है, उनका निपेष करते ए, सपमके सापक स्पान पल, पात्र मादिका वर्णन किया है। इसमें प्रायश्चित्त बादिका मी पर्पन है। प्रमदच सदच पापा । एक समयको वात र कि एक प्राक्षणमे वाकर मदच पक्रासि काको पाता। वो मोअन द स्वर्य साता है उसे मुझे मी सिमा सदरमे गाभण उत्तर दिया मेरा मोबन बात गरिष्ठ बार रन्मावकारी । परन्तु माधने का कारण वादि शमोसे निकाय, तो मदच्ने प्रापण मुटुक्सहित वपना मोनन सिमपा। मोमन करनेके पचात् पनि प्रापण और उसके पुट्रको महा उम्माद एमा, बार या मापण मफ्ने पुप्रसहित माता मन पापि सबके साप पकी हत्या रमण करने गा। पर सुबह वो बाथम और उसके गानोंको बा ज्या माम हुई। प्रामणको प्रमत नकि ऊपर बात क्रोष वाया भौर मापसे भरसे निपा। सरफर नाममने एक गगरियेको पीपक पोंपर ककरें फेशकर पोंको फाइते हुए देखा । मामाने गरियेसे कहा कि नो पुस्प मिपर भेव और पमर पारण करके गमेन्द्रपर बैठकर यासि निकगे, व उसकी दोनों बायोका कानसे फोगा। गरियेने दिवाझी बोटमें सोकर हापापर बैठकर माते ए मदतकी दोनों पा फोड़ दी। पादमें परतीको माम मा बि सी प्रामणमे इस दुकपको करापा है। अमदत्तको प्रामण नाविक ऊपर बहुप कोष बापा । उसने उस मायणको उसके पुर, और मित्रसरित मरवा सम्म । कोषाव ममदत्त पासताने बपने मत्राको सब बामणोको मारकर उनके मेनोसे विश पाठ मरकर अपने सामने धानेको बाधा दी। मान लेम्मानक से पास मरकर रानाके सामने हो । प्रदर उस पाचौ एक्सेए पोको मेत्र समसार ठरें बार बार हापसे पर्श करता मोर मात हर्षितामा करता था। मन्तमें हिंसनाची परिणामोसे मरकर व सात मरकमें गया | पा कमा सिसिमाकापुस्मचरित वादि व्याप्रमों में बाटी है। ममवतीमत्र (बागमप)-सका याद्रीने वनेक स्पानोपर उस विमा है। ममवतीमारापना- पप गिम्बर एमापने मात प्राचीन प्रत्व माना माता है । प मापामग्री प्रेमीका पनारे क इसके प्रपदाच बसम माम भापति या शिवकोटि पा । पावसे प्रेग इसको समंता बापाका शिम्प मानते है परन्तु एक मही माम होता । या प्रम्प प्रभामतमा परिधिए (१) - में उत्पनामा था, यहाँ वाया। यह म नरेलाको उसके पुत्रसे मिलानेके वास्ते से गपा । मदनरेलाके क 'का नाम ममि पा । ये ममि ही कागे चलकर नमिराजर्षि हुए। बादमें मदनरेसाने मौ क्षा प्राण की। महीपतराम रूपराम- ये गुजरातके प्रसिद्ध साहित्यकार से गये है। महीपतराम रूपराम अपने समय के बहुत अच्छे सुधारक थे । नोने गुबम्तीमें पातसी पुस्तकें जिन्सी है । एकवार इनका साथ राजचनाका या मदाबादमें मिलाप बा । उस समय 'क्या मारतवर्षको अधोगति बैनमाम्स ई!' इस विषयपर जो - दोनोंमें प्रमोचर हुए ये व ८०७ में Pये गगे। मनोहरदास- मनोहरदास गाविसे नागर प्रामण थे । पे भावनगरके गनेवाले थे। नोंने फारसीका नया पम्पास किया पा, और प्रपम फारसीमें ही उपनिपकि बनुवादको फाकर उपनिषदोंकर कान पास किया पा । बादमें इन्होंने माकरण वौर म्यापको मी पछी योग्यता प्रात की । सात् १८९१ में मनोहर दासगीने चतुर्ष माश्रम स्वीकार किया, वौर मफ्ना माम बदएकर सविधानन्द जयतीर्थ रक्सा । इस समप शो मेदान्तयस्प-गर्मित एकाध सात प्रपोको भी रचना की। मनोहरदासजीने मनारपरको गुजराती और हिन्दी पो रचना की है। इन पर्गेमें कुछ पोंके क्न्तमें 'मनोहर' और मुझे भन्दमें ' सविनालन्द बम' नाम मिम्ता है। इन प िमनोहर समाने पैराम्पपूर्वक ईश्वरमतिका निरूपण करते आए पार मौर ढोंगका मार्मिक वर्णन किया है। मनोहरा सनीने महामारतके कुछ माग वीर गौताके उपर मी गुजराती टीका बार मिली है। पहोंने पुरातन कपा वीर पत्रकापामा बगेर मयोंकी मी रचना की है। ये प्रत्य वमा प्रकाशित नहीं हुए। मनोहरदासगी सबत् १९.१ में देहमुक्त हुए । रामचन्नबीने मनहरपरके उ प उदत किये हैं। मागेवास- ये कोई माती थे । इनका एक पर पनपद्रवीने उदत किया है, जिसमें ससगकी महिमा गई है। मीरापाई मीरमई गोधपुर मेहताके राठौर रतनसिंहजीकी इकलौती बेटी पी। इनका रम संवत् १५५५ के ष्यमग माना जाता है। संगत् १५०३ में इनका विवाह हा । पे दस बरसके मातर ही विधा हो गई। मापन के पदों पता लगता है: रैदासका वफ्ना गुरु मानती थी। मीराबाईक एपमें गिरिभर गोपाळके प्रवि की मति पी से उनके प्रेममें मतपमे गती यी, और पपने फुलको लोकगर छोकर साधु संतों की सेवा करती थी। अब मारागय मन विधी म म्गा वा मन्दापन वर्ग गई। पि फिर घर पणे गई । मौराबाईक यम अगाध प्रेम और कि मकिपी । मौराबाई सक्कत मी गानती पो । उसोने गावगोविनको मानारपमें टीम मिमी है।मरसोगका मायरा और एगगोपिद भी उनके रपे हुए पछे जाते हैं। मागगर्दी कविता एमपूवाती मोशी मिमित हिन्दी माया है। गुजराती, मी मायबईने मधुर कपिल मिमी है।
८१८ भीमद् पत्रपत्र कविता बोधवान मनिक पापा पाता है। मोनाने पम्मान और बगुझे मोका सब उपहास लिया है। मोना भगत वफ्नौ मकि वौर योगशक्षिके लिप बात प्रसिर थे। इनका अनुमर वौर परीषकमि बाट तीज धी। इन्होंने ६५ पर्पको वास्थामें देहसाग किया । मणिरस्नमासा-- मणिग्नमाण तुम्सीदासगीको सात रचना है। इसमें मूल मेक कुछ ३२ है। ये बचौस रोक प्रश्नोत्तररूपमें से गये है। मणिग्नमागके उपर गुमरातके जग वन नामके मामणको संवत् १६७२ में रपी ई टीका मी मिस्ती है। इसमें वनामा और वास्माका पात पुर मतिपादन किया गया है। यह प्रप भैरम्पप्रधान है। मणिरनमाछाका एक लोक निम प्रकारसे है कोपा दखिोशितृष्ण मामरिन को पस्प समस्ति तोप' । जीक्मृतो कस्तु निरुपमो प. को वामृता स्पास्मुन्दा निराशा ॥५॥ वर्ष----दरिद्री कौन है ! मिसको तृप्मा विशाल है। मीमान् कौम है! नो सतोपी है। गांव दुए मी पत कौन है! यो निरुपमा है। मस्तके समान मुख्यापक कौन है ! निण्या । मणिमास नरमाई- पे मारयाद के गनेवाले थे। मणिशास ममुभई गुरगतके व साहित्यकार हो ममे।। नहोंने पार्शनसमुषय बादि योंके बनुवा किये हैं, वीर गौतापर मोचन मिसा।शके पर दनिसमुपपके वनुवारकी बौर गौताके वनको रामचन्द्रगीने समालोचना की है। मदन- गपालचिमें इनके वॉका संपर प्रकाशित एमा। मनरेखा- पुर्यनपुरके मणिरप गया भुभाता पुगवा पीका माम मदमरेसा पा। मदनरेसा मापात एंव पी । उसके अनुपम सौंदर्यको देसकर मणिरय उसपर मोदिव दो गमा, और उसे प्रसन्न करने लिपे नाना प्रकार के पच्युप वादि मेयने पगा। मश्नरेसाको मा परमात माश्म ई तो उसने रामाको बहुत सिमारा, पर इसका मनिरपपर कोई असर नामा | वामा राग किसा तय भने डोटे माई मनरेमाके पति पुगवाहुच मर गम्मेको पातमें पने गा । एक रिन मदनरेता और पुगवार लेनी उपान मा करने गपे हुए थे। मभिरप मी बम हाँ पापा । धुगमाहुको जग अपने इस माईक पाने समाचार मिले तो या उससे मिख्ने बापा । अगामे कर मईक परपोका सर्श स्पिा । इसी समय ममिरयमे वसर सामहर किया । मदनरेलाने पतिको मरमासन गरफर उसे धर्मका पार पनि मर गानेसे मश्नरेखाको भरने म बोरसे मत मप भा। मन्मरेमा गर्भपती थी। १६ उमा समय किसी गमें निकलकर पग गई और उसने बानी पी पुत्र पमर किपा । नाम ५ मिमी विपापरके हाप पही। यह भी उसपर मोरित होकर उसे अपनी सौ बनामी पण करने गा । मरमरमाने रिपावरसे उसे मंदार चलने का बाहर लिपी मुनिन रिपार पदारसंतोष त प्राण परापालनेमें मनरेगा के पवित्र और गो भरकर परिशिप (1) ८.१ पशोभिवपनीका बम्म सवत् १९८० के लाभग एषा था। यशप्रेपिनयनाने सपा-बठारा पर्पतक विधाम्यास करके पीनपर्यंत साहिस्पसर्वनमें ही वफ्ना समय म्पतीत किया। बापने न्याय, योग, मध्यात्म, दर्शन, कथाचरित, धर्मनीति बादि समी विषयोंपर वफ्नी प्रौड़ छेसनी पाई है। पशोरिजपाने पैदिक यौर मौरयोका गहन बम्यास किया था । तोंने नैनदर्शनका न्य दर्शनों के साथ समन्वय करनेमें मी वापत भ्रम किया है। पशोषिजयकी कृतियाँ बान भी बात-सी मनुफ्टम्य है, फिर मी गो कुछ उपरम्प, यशोविनयनीका नाम सदा के लिये वमर रस्सनेके सि पर्यत है । उमाने संस्कृतमें भम्पारमसार, उपदेशवस्म, शासनासिमुपपटीका म्पाय- सरनसाय, चैनतर्कपरिमापा बादि पारसे प्रथ लिखे हैं। गुबरम्तीमें इनोंने खसी गापाका स्तवन, योगाष्टिनी समाय, मापासरास, समाधिशतक बादि प्रथ बनाये हैं। यशोविजयजीने हिन्दीमें भी कवितायें लिसी है। ये स० १७१३ में स्वर्गस्प हुए । रामचन्द्रमाने पशाविजपजीके बप्पास्मसार, गसौ गापाका स्तमन और योगाष्टिमी सन्यायका उठेस किया है, तथा उपदेशयास्प, पोगरष्टिनी साय, श्रीपाछरास, समाविधतक गैरके मनेक पप भादि उक्त किये है । पशोलिनयनाके उम प्रशसक होनेपर मी राबधदमीने एक स्पकर ठमको उमस्य वास्पाका दिग्दर्शन कराया है। योगकरपतुम- या कोई पेदान्तका प्रेय मालम होता है। इसके पटन करनेका राजबानीने किसी मुमुक्षुको अनुरोध किया है। इसका धक ३५७ में उसहै। योगप्टिसमुचप (देखो हरिमन) योगधष्टिनी सम्झाप (देशो यशोविनय ) योगमदीप (देसो परिमद) योगबिन्दु (देशो हरिमा) योगवासिष्ठ- मारतीय साहित्यमें पोगवासिष्ठ बिसे महारामापण मी का पाता है, का स्थान यात चा है। पोगवासिष्ठके कर्चा पसिष्ठ इपि माने जाते । पोगवासिपमें बचीस नार पक, जिनमें नाना फया उपकथाओंशरा बारमविपाका वस्पस्त सुन्दर वर्णन किया है। इस मायके छ प्रकरण है, वोर हरेक प्रकरणमें कई कई अन्याय है। योगवासिष्ठके बनेक सस्करण प्रकाशित पर है। अमी एक सशोषित संस्करण निर्णयसागरसे प्रकाशित हो याहै। इसक हिनी गुजराती बार में भी अनुवाद हुए है। बंपनीमें एक विचापूर्ण म्पासा माननीय प्रो० मिक्सममा बाप एम० ए०, १० मिट्ने मिली है। पोगवासिष्ठकी रचना के समयके विषयमें निशानोंमें बहुत मतमे है। प्रो० बाय इस मथको रथमाका समप सभी सन्धी गठी शवालि मानते हैं। रामग्रगाने पोगमासिएका सूप मनन बोर निविण्यासन किया पाकिसते हैं-- उपाधिका वार शमन करनेक लिये पर शीतल चंदन है। इसके पड़ते हए भाषिम्पाधिका वागमन सभा नहीं । पपदयाने बनेक स्पठोपर योगवासिष्ठको भैरम्प और ठपशमन्त्र कारण बताकर उसे पुन पुन पानेका मुमुभुजोंको अनुरोध किया है। योगवासिष्ठके पराम्प और मुममु नामले वारिके दस प्रकरण वा मी प्रयाशितार है। " भीमन् पश्चन्द्र । मकानन्द ये काठियावारफे गनेवाले साधु थे। मुनन्दनी सं. १८६४ में मौनद पे । सोने उगीता, धर्मास्यान, धर्मामत तपा बहुतसे प पोहो रचमा को है। रामचन्द्रयाने उरक- गीताका एक प. उस्त किया है। मगापुत्र ( देसो प्रस्तुत पंप, माक्नाबोध पृ ११२) मोहमदर- मोहमार स्वामी शकराचार्यका बनाया आमा है। यह पराम्पका वायुचम प्रय है। इसमें मोरके स्वरूप वोर मामसाधनके बहुतसे उत्तम मे बताये है। यह प्रप केवधर्मसमा बम बोरसे गुगरातो टीकाप्तहित सन् १८०४ में प्रकाशित एमाहै। रामचनगीने इस प्रपर्मेसे सरकार एक परम उखत दिया है। इसका प्रपम भोक निम प्रकारसे है मुह यहाँहि षमागमतृष्णा कुछ तनुरे मनसि विवर्णा । पछमसे निकोपात विन दिनोदय वित्तम् ।। - मुटु ! भमप्राक्षिका पृष्णाको छोड़ो कम युदिना ! ममको सृष्णादित कर । तपा मो धन अपने फर्मानुसार मि, उससे पित्तको प्रसन रस । मोसमार्गमपप- मोहमार्गप्रका के रमपिता टोडरमली है।५० टोडरममनी माधुनिक कामे गम्मर किसानों में बहुत बछे निजाम हो गये हैं । म मन्म सत् १९०५ के भगमग जयपुर ना था। ५० टोरमसनी नैनसितके एक गठ मार्मिक परित गिने जाते हैं। सोने भेमिचन्द्र सिमिचक्रपतकि प्रसिद पप गोम्मटसार, थिसार, धपणासार वौर खिोकसारपर विस्तृत हिन्दी पनिका पिता है । इसके अतिरिळ साने वात्मानुशासन पुस्पार्पसिमिठपाप मावि प्रपोंपर भी विपन दिया है। मौसमार्गप्रकाश टोडरमम्मीका सता प्रप।। या बग है। इसका शेचा भाग मचारी गौतमप्रसादाने विसकर पूर्ण किया है। इस मंप, टोडरमणाने नपर्मक प्राचीनता, वन्य मोका संग्न, मोशमाका मरूप बादि विपनपात सरप माषा वर्मन किया है। ५० टोडरमामी दिगम्बर जैन विशनों इम्तिम्प समझे जाते हैं। टोडरमलनी १५-१५ की मापासे ही अप-पना करने लगे थे। पं. टोरमम्मीने लेताम्बरोदारा मान्य पर्वमान दिनागममा निषेप किया है। इस मिरयमे रामरावजी बिसते है..- मोश्चमार्गप्रकाश सेवामा सम्म पारा माम्प पर्वमान बिनागमा जो निषेध किपा है, निषेध पोम्प महा। पपपि पर्वमान भागममें अमुक स्थठ मषिक सरेशाम है, परन्तु सुपुरी परिसे देरानेपर उसमा मिरामण से पापसाय उपसम-पिसे उन मागो बगेका परमेमें सराप करना उरित मही। पीसपासा (देगो प्रस्तुत प्रेप ११ -.) पगारिनप- पचोरियप योमर परगरा भएने समपके एकममा प्रतिमाशाली प्रगर न हो गये हैं। इन रचनायें रामत प्रान गुममोर हिन्दी चा मागायोंमें मिकता र विशिरोमणि । - परिधिए (१) 41 चना की है। रामानुबने बहुतसे शालार्थ मौ किये । ताने १२० - - चन्द्रमाने लिसी है। इसमें साससौ बचोका सपा है। पह सम्म (मद् रामचन्द्र ' को पाँची गुजराती बातिके प्रथम भागके ८३ जीने वचनस्सन्नताको पुन पुना स्मरण रसनेके लिये लिखा है। बनायोष पृ ११०) मुराईत ) के प्रतिष्ठाता एक महान् आचार्य हो गये हैं। इनका फन्म होंने अनेक दिगम मिशनोंको शामार्यमें चौता वौर बाचार्म पदवी गादि समस्त तीयोंकी यात्रा की थी। इनाने स० १५५६ में ममें भी की । यह मचि बर मेवाइमें है, और इसके लिये मोगमें मरों रुपमा 'मषक प्राय: सभी तीर्थ मौर देवस्या में पठमाचार्यको बैठक है। बह- निी टीका, मयस्त्रपर मणुमाप्य, गौवापर टोका तया काय अन्योंकी रचना पार्य परया वा गये थे, और वे सबत् १५८७ में भगवत्मामको पपारे । शेषकर गुजरात, मारपार, मधुरा वौर न्दाफ्नमें पापे पाते। कापि हो गये है। ये अम्बेके चौपे मणके वधिय सूके वय थे। त बछे तत्यानी माने चाहे है। इनका वर्मम उपनिषदोंमें माता। विकाम्प रामायणक का। बाल्मीकिन २१ हजार में रामायणकी होने उत्तरकाणमें मो कुरा टिम दिया या उसीके अनुसार से । मामाफि राजा बमकसे मईका नावा मानते थे, और राना दारपसे माकिनीने समस्त रामायमको रामचन्द्रमाको सारे वीस Pममें गाकर के समझानेपर ही रामचन्द्रयाने म भोर कुश नामके अपने पुत्रोंको वगीकार पिको बम्मम्मि प्रमागके पास बताई जाती है। इनके बाभमके निकट बोसारित पर्णशालायें बनाकर एते थे। रामायण सायका बार पुम्दर म सन् १८१९ में एमी मूक मार की पत्नी मेरी माके गर्भसे प्रारमसे उप शिक्षा दी गई पी। सन् १८९० में विक्टोरियाने । लोरियाने परत दिनातक गम्प किया। उन्हें धन, प्रमुता, मुहाग, - ८२ भीमद् पत्र योगशास (देखो हेमचन्द्र) रानेमि-रामीमवी- पनमि वफा बरिनेमि समुत्रवियप रागाके पुत्र पे । उनका निवास समसेनको पुत्री रानी- मतासे दाना निश्चित हुवा था । एनेमिने ना माने गाबेके साप वपने ससुर-गृहको प्रस्पान किया, पो रास्ते में गाते हुए उनाने मासे पाए पछ पक्षियोंका माक्दन मना । सारपीसे पुग्नेपर उन माम एला कि पशु वायतके अतिपियोंके किपे पप करनेके सिये एकत्रित किये गये है। इसपर भेमिनापको भात पम्प हो माया, मोर उन्होंने उसी समप दीक्षा पारण करनेका निश्चय किया। उपर गब रामीमती पास मेमिनाया दीक्षाका समाचार पहुँचा तो या कार्यत म्यास, वीर उसने मी नेमिनापकी अनुगामिनी हो जानेका निश्चय किया । दोनों दीक्षा मारण करगिरनार पर्वतपर तपाचरण करने मगे। एक मारको पात है, मेमिनापने रामीमा मग्न समस्या देसा, और उनका मन गायोल हो गया । इस समय रानामवीमे पायत मार्मिक बोष देकर नेमिनापको शिरसे स्पममें स किया । पर क्या उत्तयप्पफनके २२ में रपनेमाप वप्पपनमें मात्र है। "कर्षे रानीमती जैसा सम्म प्राप्त होमो।"-'माम रामचंद्र' १२९ रामदास- स्वामी समर्थ रामास यम औरगाबाद रिमें सन् १५०८ में वा पा । समर्प सपास पहिसे ही पत्र वीर वीरतुदि थे। अब ये बात पकाए तब इनके विवाहको बातचीत हाने म्गी । इस सबरको सुनकर रामबास माग गये वोर वात दिनोंतक हो ये । मोटो भलस्पामें है रामासमीन कोर तपस्पा की। बा में पे देशाटनके हिपे मिले और काशी प्रयाग, पानाप, रामेबर बादि तपस्यानो यात्रा की । शिवानी रामदासको भरना परम गुरु मानते थे, और इसके उपदेस बौर प्रेरणासे हो सब काम करते थे।सन् १६८ में जब शिवायंका पपुई तो पमहासयको बहुत दुसमा । श्रीसमर्प केबऊ बहुत परे विद्वान् गौर मामा दोन थे, परम् से रामनीति, गरि और ये अनुमयी मापे । उनको विविध विपश्चात बम बन पा । उन्होंमे पाक्से पंप मनापे हैं। उनमें दासबोध मुस्प है। या प्रत्य मुस्सत भप्यामसपी है, पर इसमें म्यापारिक बातोंका मी मान सन्दर विदर्शन कराया गया है। इसमें पिपमानाके उपर ना मार दिया है। मूह पन्य माटीमें है। इसके हिन्दी गुनरावी बनुवाद मा हो गये हैं। रामानुग-- रामामुग भाचार्य मौसम्प्रदापळे वाचार्य माने भाते हैं। इनका नाम सनी सन् १०१० में कार्णको एक प्रमणके पर हवा या । रामानुगने १९ वर्षकी बास्पा बारों वेद काठ बर किये थे। इस समय रामानुराम विवाह कर दिया गया। रामानुजने म्याकरण, म्याप, दांत वादि विषा- मोमें निपुणता प्राप्त की पी । इनकी सास समात गार पा इसध्येि तोंने उसे उसके पिता म पाँचाकर सप संपास पारण कर लिया । रामानुस सामाने शुत दूर दूरत देशों की यात्रा की पीमि मरतके प्रधान वीर्यम्पानोंमें अपने मठ स्पषित किये और भरिमार्गका प्रचार दिसा । पमानुर शियौपके संस्थापक माने जाते है ।होने पेशवसूत्रोंपर प्रौमाम्प, दन्तप्रदीप, बेगन्त- ।
परिधिए (१) A । सार, गांवामान्य मादि मन्पोंकी रचना की है। रामानुनने बहुतसे शाबार्थ मी किये । होने १२० बर्षकी बलस्थामें देशस्माग किया । बपनससपती- यह स्मशती स्लप रामचन्द्रनामे मिली। इसमें साससौ बचनोंका समा है। पर सपा हेमपत्र टोकरशी मेहताको श्रीमद् रामचन' को पाँचवीं गुजराती बारपिके प्रथम भागके ८३ पृष्ठपर दिया गया है। रावचम्बामे पपनसप्तशतीको पुन पुनः स्मरण रखनेके लिये सिसा है। बमसामी ( प्रस्तुत न्य, माननायो पृ ११९) बलम- पसमाचार्य पुरिमार्ग (पुरावेत) के प्रविणवा एक महान् बाचार्य हो गये है। इनका भग्म स्वत् १५२५ में खा पा । दोंने वनेक दिग्गय विद्वानोंको शामार्पमें माता और वाचार्य पदमी प्राप्त की। वहमने रामेचर वादि समस्त ताकी यात्रा की थी। इनोंने सं० १५५६ में प्रबमें मी- मापनीको मन्त्रिको स्थापना की । या मूर्ति मब मेवार में है, और इसके म्मेि मोगमें छारों रुपया वार्षिक म्यय होता है । मारतर्पक प्राप सभी तीर्प और देवस्थामा पठमाचार्यको बैठके है । बह- मामामे भागवतपर सबोधिनी टीका, ममसूत्रपर क्णुमाष्प, गीवापर टीका तथा अन्य प्रन्पोंकी रपमा को है । मत सम्प बलमाचार्य का वा गये थे, वौर सबत् १५८७ में मगपत्यामको पधारे । समसम्प्रदायके अनुपापी मिशेषकर गुजरात, मारमा, मपुरा और दापनमें पापे धाते है। पशिष्ठ (देसो योगवासिष्ठ) बामदेव- मामदेव एक वैदिक ऋपि हो गये है। ये इमेदके चौपे मणके अधिकांश सूक्त के प्रय थे। ये वैदिक परम्परामें एक एव बने तत्वानी माने जाते हैं। इनका वर्णन उपनिषदोंमें जाता है। पास्मीकि- मामीकि अपि वारिकाम्य रामायमके का है। बामीकिले २१ हजार भोकोंमें रामापणको रचना की है। काा पाता है किहोंने उत्तरकाणमें जो कुछ टिस दिया पा उसके अनुसार रामचन्द्रजाने सब काम किये । माम्मीकि रामा बनफसे माईका नाता मामते पे, और रामा दशरपसे भी उनकी मित्रता पी। बात्माकिनीने समस्त रामापणको रामचन्द्रमाको सो तीस दिनमें गाफर सनई पी। बास्मकि ऋषिके समझानेपर रामचन्द्रगाने ठा और कुश नामके अपने पुत्रोंको अंगीकार किया था। पाश्मीकि ऋषिकी मग्मभूमि प्रयागके पास बताई जाती है। इनके वाममके निकट बनेक मुनि अपने बालोसहित पर्णशाग बनाकर यते थे। रामापण संमतका बहुत सुन्दर काम्प माना गावा। विस्येरिया- एमी विक्टोरियाच मन्म सन् १८१९ में एर्मा मूक मा केन्टकी पत्नी मेरी मात्रा गर्भसे हमा पा । विक्टोरियाको बारमसे हो उस शिक्षा दी गई थी। सन् १८९० में विक्टोरियाने प्रिन्स एपर्टस शादी। विक्टोरियाने बहुत दिनोतक गम्प किया। उन्हें धन, प्रभुता, पक्षण,
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परिशिः (१) । -1 पीरचन्द गांधी- पौरचंद गोपीका पन्म काठियावामें सन् १८६१ में गया था । इहोंने भारमारामा सरिके पास नतत्कानका अध्ययन किया वोर विकागोमें सन् १८९१ में मरनेवाली विसमर्म परिपर्दो जैनधर्मक प्रतिनिधि होकर भाग लिया था। वीरचद गाँधीको उक्त परिषद, नो सफलता मिल्म, उसकी कमेरिकन पत्रोंने मी प्रशसा की थी । पौरपद गांवीको वहाँ सर्णपदक मी मिसे थे। अमेरि कासे छोटकर बीरबद गांधीने इगममें भी बनधर्मपर म्यास्पान दिये । पादमें भी पीरपद गांधी दो मार अमेरिका गये । जाने बमेमी भाषामें बैन फिलासफी वादि पुस्तके मी मिली है । मीरचन्द सन् १९०१ में स्वर्गस्थ हए। परिषद गांधीको विहायत मेमनेका कुछ लोगों ने मिरोग किया था | उसके सपघमें रावचन्द्रमा मिसते है--"धक बहाने बनार्य देशमें जामे षषमा सूत्र बादि मेमनेका मिपेम करनेवाले–मगारा पमाकर निषेध करनेवाले यहाँ अपने मान पाईका सवाल वाता है, वहाँ इसी धर्मको ठोकर मारकर, इसी धर्मपर पैर रसकर इसी निषेधका निषेप करते हैं, यह धर्मोह होरे । उनै धर्मका महत्व तो केवल हानेहप है, और सार्सबमी मान वारिका सवाल ही मुख्य समा। परिषद गांधीको विलायत मेजने वादिफे विषयमें ऐसा का है।" राग्यशतक ( देसो भरि ) म्पास-दम्पास- म्यास महर्पिक नामसे प्रसिद्ध है। ये बेदविपामें पारगत पे, इसठिये इन्हें दम्पास मी कहा मापनका दूसरा माम बापरापण मी है। ये ही रणद्वैपायनके मामसे मी करे बावे है। प्यासनीने पारों वेदोंका समर करके उन मेणापर किपा था। म्पासी को मायै नमज्ञानी, इतिहासकार, सूत्रकार, भाष्पकार और सतिकार माने जाते है। इनके चैमिनी मैशम्पायन वादि २५००० शिष्य थे । महाभारत, भागवत, गौता, मौर केशवसूत्र तो म्यास पिके रचे ए माने दाते है । मास इपिका माम हिन्दुपयों में बात बधिक सन्मानके साय लिया जाता है। करापार्य- शकराचार्य बरतमतके स्पापफ महान् भाचार्य थे। इनका भन्म केरक प्रदेशमें एक प्रामणके पर हवा पा | करापार्यमे भाठ वर्षको स्वस्थामें सम्पास पारण किया, भौर के मावि निपानोंका बम्पयन किया । सकारावामि बोबो शामायोंमें विजय प्राप्तकर सनातन धर्मको चायें वोर गया । शंकाराचार्यने अपने मतके प्रचारफे पि मारतवर्षको पायें दिशाओंमें चार बड़े परे मठ स्थापित किये थे । शंकराचार्यने नमसूत्र, दस उपनिषतोपर भाप्प, गौतामाप्प वादि अप किसे हैं। इसके अतिरिक्ष शंकराचार्यको विवेकपूरामणि मोहमुद्गर बादि अनेक रतियाँ भी बहुत प्रसिब । मो के. वी. पाठकके मतानुसार पाकराभार्य ईसवी सन् ८ या दाम हए । शवयपा २२ वर्षश्च परस्या समाधिस्थ हुए। शंकराचार्यजीको रामचन्द्रगने महात्मा करकर सबोधन किया है। पावसपारस- पातम्पारसके का निपतिनपी, हारपियय सरिक चिप्प कार्सिपियपके शिष्य थे। दिन- मिजपनी सेताम्बर वानापमें एक प्रतिमा निन् गिने जाते हैं। विमपलियमयीने मस्ति और भीमद पवद्र म्तति, स्वास्थ्य बादि सब कुछ प्रा पा । ईसपी सन् १८७७ में विक्टोरियाको राजिन्द (Emprers of India) का सिताब मिम । इनको प्रेरणासे ग सफरिनने भारतमें जमाने मस्पताल सोडे थे । बिस्टोरियाको इंगम के सबकोशसे २४१८०. पर बार्षिक मेतम मिकता या। सिक्टोरियाका मजिस गाने के कारण सन् १९१ में देहात हुमा । रिचारसागर-~- विचारसागर मेदान्तशाखका प्रवेशप्रप माना जाता है। इसके का निश्चमासा मम पबाबमें स १८१९ में बाट बातिमें जमाया। निरपासनाने यात समपतक काश पर विचाम्पास किया । निश्वमदासमी अपने प्रपमें दादुमाको गुरुहमसे स्मरण करते हैं। सोने और मुरदासीने दापपको पात पति की । निश्चमदासयौको बसाधारण विश्चासे मुग्भ होकर हाक राना रामसिहमे उमें वपने पास पुगकर रस्सा और उनका बहुत बार सत्कार किया पा। विचारसागर बार तिप्रमाकर मिश्चमदासांके प्रसिद्ध परेका जाता है कि होने सप्तासमें ईशावास्प उपनिषट्पर मी टोमा मिसा है, और कशासन मी को प्रप नापा है। इनका समान्तक २७ अस झोकोंका किया एमा समय इनके गुरुवार में मत्र मी विषमान बताया माता है। विचरसागरको रचना सबत् १९ ५ में पी। इसमें वेदान्तको मुम्स मुफ्स प्रक्रियाका बात सरतापूर्वक प्रतिपादन किया है। यह मान्य हिन्दीमें है। इसके गुनपती, बंगाली, योगी बादि मापामोंमें भी बनुमा हुए हैं। निरपवासमी ५ वर्षको बलस्पा रिकामे समाधिस्थ पर। विचारसागरके मनन करनेके छिये रामचन्नीने मुमुसुमोको कनेक स्पयेपर अनुरोप किया है। विचारमामा (देखो बनायास), विदुर- विदुर एक बहुत पो मागे मीतिय माने गावे । विदुर बो बानी विशन् गौर चतुर थे। महापम पर सपा प्रत्यड्ने क्रमशः अपमा मत्री बनाया । ये महामारतके पुरम पापों बोरसे म्मे। बतमें तो पतराने नन्ति सुनई, वौर उन्होंके साप नको घर गये और माँ वधिमें जम मरे । उनका विस्तृत वर्णन महामारतमें बात। सत्पुरुष विदुर करेनुसार ऐसा हल्प करना कि एतमें पुससे सो सके। -माम रामचन' ५ ५ विपारम्पस्सामी- विचारपस्तामाके समय के विषपमें निश्चित पता नहीं पता । निनोच बनुमान है कि से १३९१ केप विधमान विचारप्पस्वामामे छोटी गवस्था हो स्पास मिपा पा । ने पदों के माम्प, शवपप बादि सफाया माथ्य उपनिषदोको टीका, जोता, सर्वदर्शनसम्म शकरदिम्बिय पदशी मादि ममेक महातपूर्ण प्रपोच रचना की है। विचारण्य सामी स शावक महान् पणित थे । इन्होंने बौतमतका नाना प्रकार पुछि महिमोसे सदर प्रतिपाम किपा। विहार न्दावन- या रामचन्द्रमाने एक पर उपत किया है । इसके लिपपमें लिप बात मी ऐसप। .
वास्पाम समाधिस्थाए। शंकराचार्यगीको गन्द्रमाने महारमा काकर सबोपन फिया है। मेनका निपध करनेवाले- गायो। नच दूसरा माम बादरायण मीहै। येही हपापायनके नामसे भी कहे जाते हैं। प्यासनाने पारों वेदोका संग्रह करके उमें प्रेणावर किया था। म्यासमी बो मारी प्रमदानी, विवासकार, सूत्रकार, माष्यकार और स्मृतिकार मामे गाते हैं। इनके चैमिनी वैशम्पायन वादि पाने माते।म्पास इपिका नाम हिनुमत्पमि बहुत अधिक सन्मानके साप दिया जाता है। अप्पान किया। शंकराचार्यन बडेबो शमापोंमें वियप प्रासकर सनातन धर्मको चारों वोर फेसपा शंकाराचार्पन अपने मतके प्रचारके लिये मारतवर्पको चारों दिशामा चार बोयोमा स्पास्ति किये पेशकण्यापन प्रससूत्र, दस उपनियत पर माय गीताभाष्य वादि प्रप पिये। कवतिरिक शंकराचार्यकी विषयूगमणि मोहमदर बादि अमेक पवियाँ भी बहुत प्रसिद्ध है। प्रो.के बी. पाठकके मतानुसार शंकराचार्य सिवी सन् ८ वी सदी ए हैं। शंकराचार्य ३२ स्वमुपारसके मनपत्रिपा, हारविजय सरिक शिम्प कारिपिम्पके शिप पेशनिय- पिम्पनीक्षेवामार मानापमें एक प्रतिभाशाली शिन गिने पाते। नियमनमानीने 12. परिशिप (1) गीरचन्द गोपी- परिवद गावीका बम्म काठियावाइमें सन् १८६१ में पुजा पा । इन्होंने वहमारामयी सूरिके मस नतत्याना अध्ययन किया और विकागोमें सन् १८९३ में मरनेवाची विधर्म परिपर्दो नवर्मक प्रतिनिधि होकर भाग लिया था। परिषद गांधीको ठक परिपमें चो सफम्ता मिली, उमा बमेरिकन पत्रोंने भी प्रशसा की थी। बीरपद गांधीको वहाँ स्वर्णपदक मी मिले थे । अमेरि असे भेटकर वीरपद गांधीने में मी जैनधर्मपर न्यायान गये । वाइमें मी वीरपद गांधी दो घर वमेरिध गये । सोने वप्रेमी भाषामें मैन मिलाकी बादि पुस्तके मी लिसी है। बीरचन्द सन् १९०१ में स्वर्गस्य ए। पौरपर गांवीको निमायत मेननेका कुछ मेोंने विरोव किपा पाटसके समधमें रामचन्दनी सिते.-"भर्मक यहाने अनार्य देशमें गाने वपना सूत्र मावि मगारा वमकर निपेष करनेवाले यहाँ अपने मान गाईफा सबाल बाधा है, हाँ इसी धर्मको ठोकर मारकर, इसी धर्मपर पैर रसकर इसी निपेषका निषेध करते हैं, मोर ही है। धर्मका महतो केवा महामेरूप है, और सार्थसबधी मान वारिका ही मुख्य समान है। पौरपद गावाको विडम्पस भेजने वादिक विषयमें ऐसा होना है।" म्पास वार्षिक नामसे प्रसिद्ध । मे बेदभिषामें पारगत थे, इसडिपे दम्याप्त मी कहा शिष्य पे । महामारत, मागवत, गीता, भौर क्वान्तसूत्र इसी म्पास पिके रहए रायचार्य वरैतमतके स्पापक महान् बाचार्य थे। इनका स्म केरठ प्रशमें एक प्रामणक मामा या । शकराचार्य वाट वर्षकी अवस्थामें सम्पास पारण किया, पौर पे मावि वि । राम्पमतक (देसो मरि) मास-दम्पास- - रापार्य- पावसपारस- मीमद् पयवान पैराम्पका पात सुन्दर वर्णन किया है। दिनपरिमयीने शासमुपारसको संपत् १७२३ में लिया है। इसके अतिरिक मापने मेकप्रकाश, नपणिन, कपस्त्री यासोपा टीकासहित हेमन्पुप्रक्रिया वादि बनेक प्रयोंकी रचना की है। विनयपिनयमाने भोपामायाका एस मी गुमरातामें जिया है। पर रास गुमराती मायाका एक मदर काम्प माना जाता है। लिमयवियप इस एसको वपूर्ण हो छोप गये, और बादमें पशोभिनयमाने इसे पूर्ण किया । रामचन्द्रमाने मीपासपसमेंसे कुछ पद वदत्त किये है। रामचन्द्रनीने हातपारसके मनन करमेका कई जगह मुमुमुमोको अनुरोध किया है। इसका मौपुत् मनमसराम कारतचंदद्वारा किया पूजा गुनगती विवेचन बमी डॉ० भगवानास मनमुसामने प्रकाशित किया है। शौविनाप- तिनाप भगवान् नैनोंक १५ में तापकर माने जाते है । पे पूर्णमबमें मेघरप रागाके बार पे । एकबार मेपरप पौपर कर बैठे हुए थे। इनमें उनकी गोदामे एक कबूतर पाकर गिरा । उम्होंने उस निरपराध पक्षको बालासन दिया । इतने में यहाँ एक पान पापा, और उसमे मेपरपसे अपना कबूतर पापिस माँगा । रामामे बामको बहुत उपदेश दिया, पर या न माना । बन्तमें मेपरव राना कानूवर नितमा अपने शरीरका माँस देने को तैयार हो गये । कोटा मगाया गया । मेपरप बाप माँस काट काट कर तराग रसने लगो, परस्तु कबूतर मननमें माता गया। यह देखकर यहाँ उपस्पित सामंत डोगोंमें हाकार मच गया। इनमें एक देव प्रगट या और उसने कहा, महाग दोनों पक्षियोंमें अपिटित होकर भापको परखाके सिमे पापा पा । मेरा अपराध मा करें। ये ही मेपरप एना बागे गाकर मतिनाप ए । या च्या विपशिणकापुम्पपरित ५ पाकिसे सममि बात है। पाविपकप- ममा गाता कि राजमार्गके समप स्पानकवासियों की बोरसे शमिश नामका कोई पा निकम्ता पा। मासिमद्र (देचे पनाम) विसरमरि- रामचन्द्रबीने प्रस्तुत प्रथमें ! ७७२ पर चैमपति शिखरहरि पाचार्यका महेश किया, मिमोने मगमग दो हजार वर्ष पहिले यो कत्रिपति साप मिश्म दिया था। परन्तु मापसे दोहगार बर्ष परिण शिवरस्ति नामके किसी भाचार्यक होनेका उस पानेमें नहीं मापा । , एनप्रभाचा नामके वो एक भाचार्य हो गये हैं। शिक्षापप- पर प णसम्प्रदाप अर्पत प्रसित है। इस प्रपमें ११ पत्री, हरिरापरीने बपने मुनाता गोपेखानाचे सातमें दिखेपे । हरिरापा णपसम्प्रदायमें बात बने महात्मा हो गमिफ्ना समस्त मौषम उपदेश और मगरसेवा में गाया था। पे महात्मा सदा पर पार की मुसाफिरी करते थे और कमा किसो गर या शहरके मावर मुकाम मीरये हम , परिशिए (१) 40 पे। सदा मगपति वीर भगवविचारमें ही बन रते थे। गोपेश्वरजीने इस प्रन्यकी टीका की है। पाप पुरिमार्ग मपारगमें सन् १९०७ में पड़ोदासे प्रकाशित हवा है। पीकमरि- शीकरि सेसापर सम्प्रदायमें एक बछे और मिशन हो गये हैं। इन्होंने सं०९२५ में दश हगार लोकप्रमाण प्राकृत महापुरुपचरिय नामका प्रप बनाया है। शीर्मकत्रिने बाघारंग चौर सूफ- मांग सूत्रोंके उपर सस्कृतात्तिकी रचमा की है। इसके अतिरिक्त, कहा जाता है कि शायकत्रिने बाकांके नौ सूर्योपर मी ठोकायें मिसी पी । ये विपिन हो गई, और बादमें वमपदेवरिने इम सूत्रों को नपान टीकाय लिखा । शीर्मक आचार्यन और भी बनेफ बनायें की है। सेताम्बर विश नोंने शीर्थक भाचार्यका गुरम्बके गुरु और चारों विपायोंका सर्मनकार उसार कवि कहकर उस किया है। शुष्देप- शुकदेवजी वेदम्यासनीके पुत्र पे । ये बाल्यावस्थामें हो सम्पासी हो गये थे। इन्होंने वेद-वेदांग, इतिहास, योग वादिका खूब वम्यास किया था। इनाने रागा बनकके पास जाकर मोक्षप्राभिकी सापना सीसी, और बादमें जाकर हिमालय पर्वतपर कठोर तपस्या की । गुफोपनी बात परेशान योगी माने जाते हैं। इन्होंने रामा परीक्षितको शाफ्काम भागवतकी कथा सुनाकर उपदेश दिया पा। इफदेवनी बीवन्मुक्त और चिरगांनी महापुरुप माने जाते हैं। भीपापरास (देखो विनयविनय वीर पयोधिनय) अमित- भेणिक पमा नैन साहित्पमें बहुत समसिम है। इन्होंने मैनधर्मको प्रमामाके लिये बहुत कुछ किया है। इनके बनेकपरित बादि दिगमर और सेताम्बर विशोमे लिये है। एक श्रेणिकचरित मामका महाकाम्प बेताम्बर विद्वान् निमप्रभत्रिने लिखा है। इसका गुजराती भनुवार गभर्म मिपाप्रसारक वर्ग पारिताणासे सम् १९०५ में प्रकाशित हुआ है। पवर्मनसमुचय ( देशो हरिमासूरि ) सम्मविवई (देसो सिदसेन) सनस्कमार (देखो मोक्षमाछा पाठ ७.७१) समपसार (देखो कुन्दाद और बनारसीस) सपापांम (भागमप )-सका रामबम्बमाने प्रस्तुत प्रयमें उस दिया है। समन्वमन- सामी समतमका माम दिगमर सम्प्रदशपमें बात मासका है । भैमे सिरसेन घेतामा सम्प्र- पापमें, पैसे । समंतभद्र गियर सप्रापमें मारितिकार ने जाते है । समतमदने बातमीमांसा (देवागमस्तोत्र), स्नकरण्डभावकाचार, बहरस्तपमम्तोत्र मादि महतर्ण प्रन्योकी रचना की है। सिरसेन चौर समतमदको कृतिपोंमें कुछ सोफ समानम्पसे मी पाये जाते हैं। प्राय सिरसेनके समकालीन माने जाते हैं। सर्मतमदमूरि पाने समपझे एक प्रसंग फि थे । इनाने मुमनमः मायसादी- रितार्थ फरके मैनपर्मको धमापवान फाराई पी। ये परीक्षाप्रपामा । HARोरा समतभएका माम पुत महमके साप दिया गया है। रामचद्राने MENTोपन पिसा है, और उसके मापातर करनेका किसी मुमुक्षुका नुपेच katha परिसमहाभाम्प टीका विषयमें देखो पृ ८०० फा करना। TOP 14 स्यापक सामानंद स्वामी अपने समयके महान् पुम्पोंमें गिने गाते। गाnt 10८१ मा पा, ज्ञान सन् १९५० दोस्याग किया। इनके गुरुका माम स्वामी CONTROIN बतफ गुमस्त, भठियापार और फार्म घूम घूमकर -गरिदु समस्त print एनाया । हान पिचरिके उपर सबसे अधिक मार दिपा, और छगोरे साग, अमचर्यका पाउन, या निसाका निपेष, त सयमका पाम्न स्यादि लपरासर गुमा पर पापा । marath। इनमें शिधापत्री अधिक प्रसिप है। शिक्षापत्रीमें २१२ मोक भोसल wu, वा, प्रमचारी, साधु भारिक कम्पधर्म बाविका विचम किया है। ममममतका समय गुजफ्ती मापाच एक एन माना जाता है। सामानन्द dमसिनामय संप्रदाय के उपर किशोरी मशरूपाळक्ने गुगमतीम पुस्तक मिली। पा(गोमपम्प) PAPERIर क्षेताम्बर वाम्माम्पमें प्रमाणरायके प्रतियता एक महान् बाचार्य हो गये। haiमाला उन्च टिके स्वतंत्र प्रातिके माचार्य पेनि उपयोगवाद, मार HPUSमधर्मको पचमित मापतास भिमापसे ही स्थापित किया था। सिखान समे गी बहुत सम्मानको परिसे देखे जाते हैं। सिरसेनमे सम्मतित, पापा तिरुम शनिवात्रिविध बादि प्रपोकी रचना कर मैनसाहित्यको महान् सेना MuftAUनिशिफामें होंगे बेद, बेरोनिक, सांस्य वादि दर्शनोपर परिशिका रचकर सब WANA ।सियसेन दिवाकरके संबंधमे बावसी सिदन्तिपी प्रसियाका समप RCH ताम्दि माना जाता । समवितर्क पापका यात उत्तम प्रपा। इसपर ANTी।से प्रपका विचापूर्ण सम्पादन प मुस्कान वौर पेचरदासबोबे सिपा पापीठसे निकला है। रामचन्द्रनाने मतितकापन किपा था। हमा मोक्षमाम पाठ ११) भीमदासवान सपनानन्द सामीकी शिक्षापत्री, धर्मापत बौर के पिपता पं० टेकचन्दगी दिगम्बर विज्ञान हो गपे। पानि १८५८ में भद्र को मिसन स्मात किया था। सापितरगिणाम १२ पकिसमें मपकिसिमको । भागा यात जो तय समतापा गया है। इस प्रपद्ये पार २१५ में पाया माम प्रभावित किया है। सपी- . र बानिय मन् १.७८ में रासाउन पुरा नाब २१ I परिशिए (१) संगम- सगम देवताने नो महावीरस्वामीको परिपड गिये, उनका वर्णन हेमसम्मके विपटिशलाका- पुरुषपरित (१०माँ पर्य) बादि क्योंमें आता है। मदरदास- मुरदास नातिके पनिये ५। इनका जन्म स० १९५३ में जयपुर राम्पमें जा था। एफ समय दादयाउ इनके गाँवमें पधारे । प उनके शिप्प हो गय भार उनकी साप रहन यो। सुरासनी उमीस बरस काशीमें रहफर सम्मत, पेशतर्जन, पुराग भागिका अप्पपन करते रहे। मुसबीका स्वमात्र बहुत मधुर वार बाकपा पा । बाठफोंसे ये बहुत प्रेम फरसे ५। ये बामनचारी थे । सम्झताको ये बहुत पस' करते थे। सरासमीकी फपिताफा दिली साहित्पमें बातम्मान । इनकी कवितासे प्रकट होता है कि ये अप्ठ हानी बार फाम्प-पासाके मर्मज्ञ थे। होने वेतपर मछी कविता को ह । इहोंने मुरविसास, मुर बरफ, ज्ञानविठाम धादि सब मिगर १० प्रयोकी रचना की है। मुलासभीने सं० १७१६ में मांगानेरमें दारीर-स्याग किया । परमादाने पुरसबीके पप उदृत किये हैं। राबपन्द्रजी उनझे पिपमें लिगते है- में मौसमीर मुदणाम वा साधुबन आमाथी गिने जान योग्य है, और शुभेछारा उपरफा मुमिफाओंमें उनकी स्थिति साना समप है। संदरी ( मोसमाग पाठ १७) मुम्म ( माशमाछा पाट २५) म्यगररांग (आगमनप) इसका राजपत्रमान पर जगह उष्टेग दिया | परिम- हरिमसूरि भताम्बर सम्प्रायमें उप कोरिफे एफ मार्मिक रिदा गपे पानी पान और प्रानमें वनफ उधमाधम दानिफ वीर धार्मिक प्रयोगी रपना गान पानि समुपमे पदो दर्शनोनिश समारोपमा पो है। हरिभदरिफा गादिप पहन । पदोंने प्राय रेफ वियपर पुउ म पुरा गिमा ही है । अनेनगा प्ररे, मनातवपनाग, परस्पारण, TRमा समुपप, पदर्शनगमुपप, धर्ममिन धमर्गमा पागपिन्द्र पोगादिगमुपग, र, नरपनिणप धम्ममासमा, गमरादगमा आइना मुज्य पंपरिम-गी एन गरस और साम्पादित गन् परेननर रिपोरा भी पर मान; स स्मरण सदरमा माम जैन पर बनेक सिन दो गपे है । प्रानुन पारिनानुभ नरमाय मोती माय माना जाता है। परपन्न 'स, मरिन्दु धर्म-1, En सीन्द्र, पोगानिसमुपप, और पदानसनुपरम्म प्रान प्रा में उपदिय गमुप गरन म नि मी मुना गुजराती 13 | गरम rrk रयर पहनसनुपपन रिमे माता नराश्मिी मुनपुर अनुगमन ऐसचर परामे मा भाni RIP म भyn परद-
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परिशिर (२) परिशिष्ट (२) 'श्रीमद राजचन्द्र में आये हुए उद्धरणोंकी वर्णानुक्रमसूची पृष्ठ लाम xमखे (से) पुरुश (ख) एफ बरसो (१)। [ एक सवैया ] १५०-२८ अमाहोतयं (ननैर्यराव्य) [शतपयजामण । २७-२३ मपुर बसाप्पमि संसार (र) मि दुरूस्त (स ) पठरार । कि नाम दुष्पतकम्मप (ब फम्म) जेणा दुग्गई (1) नगठेम्या (म गमिमा ) [उचराभ्ययन ८-१] ९९-१ अनुक्रमे सपम स्पर्शतोगी पाम्यो क्षायफभाव रे । सयममणी कोनी पून पद निप्पाल रे॥ [सपमश्रेणास्तपन १-२ परित उचमनियपत्री प्रकरणरनाकर भाग २ प ६९९] २७५-१,११ न्य पुरुपको परिमें नग म्पबहार मसाप । राम बब बग मही कौन (को) म्पयहार बताय ! [विहार सम्दापन] १८८-१९ चम्स नाम धुनी जगी गगनमें मगन मया मन मेरानी। मासन मारी मुरत स्वषारी दिया बगम पर डेरामी ॥ दरम्पा पम्स देदारानी। [छोटम-चप्यारममग्नमाछा पद १२१ १९,कहानमी पर्मसिंह बम्बई, १८९७] २२६-१९ बपि वप्पणोनि देहमि नापरति ममार्य । १०२-१८ वानिय बधिको प्रेम म्याने जोगानक घटमा (महि) जगापे । कल्पाहार भासन पपरे नपनयको निद्रा पपरे । [स्वरोदयवान ९८, पृ २१ निदानन्दगी, मामसिंह माणेक बर्च १९२०] १२९-९ बहो बिणविसावरमा विचि (पी) साा (३) ण देसिर्प (या)। मोस (स) साहण्ठस्स सादहस्स पारणा ॥ [ दशवकाभिसूत्र ५-१-९२ प्रो वम्पकरणारा सम्पादित १९५२ ] ७३१-२१ हो नि (णि) तो कम सम्बनिणेहि पनि (णि ) प । पात्र (प) म्यासमा मिति (ची) एगम र मोत्यम ॥ [दशकालिका २-२०१५-१ मानतिमिरम्भाना बानाबनशम्मकया । पृष्ठ पर ४ मम पुस्प एक है। • ममें यजमाने मगोपने पाठ रन है। बस पाठ रखना चाहिये । परमी यास। [ ] मीमा परचम हेमपन्द्र पाण् विपाभोंके समुद्र पे, वौर ने कझिापाके मामसे प्रख्यात पे । करा गावात हेमचन्द्र वाचार्यम सब मिलाकर सारे तीन करोष ओकोकी रचना कोमचानने म्पारण, कर्क, साहित्प, द, पोग, नौति वादि विविध विषयोंपर पनी मेमनी पर पैन साहित्यके गौरमको महाया है। हेमचन्द्रने गुजरातकी रामपानी बणपुर पारणमें सिदराब अपसिंहको समामें मात समान प्राप्त किया था, और सिरानके वापसे गुजरात के म्येि सियोमशम्दामुग्रस्न मामक प्पाकरणको रथमा को पो। सिदरानके उपराधिकारी राना कुमारपास मचन्द्रको प्रमगुरुको तय मानते थे। रामचन्द्रमा मिसते --" माहेमचन्दाचार्य महाप्रमावक बम्माम क्षयोपशमबारे पुरुष थे। ये इतने सामर्पवान् पे कि पाहते तो एक या दो पथ पा सकते थे। उनोंमे तास हमार परको भाषक स्नापा । पास हमार पर वर्षात् सपा पासे ये पास मनुष्योंकी संख्या है। मौसागमन्दनीके सम्प्रदायमें कुल एक गाय वामी होगे । सब एक कामे समासे सहमानदाने अपना सम्प्रदाय चम्मपा तो मोहेमचन्नाचार्य पाहते तो मे समानुपापियोंका एक शुदा ही सम्प्राप चम्म सकते थे । परन्तु मोहेमचन्द्राधापको भगा कि सम्पूर्ण बातया सर्व ताकर धर्मप्रको सकते है । हम तो बस उन तीकरों की मालासे पकर उनके परमार्पमार्गको प्रकाश करनेफे लिये प्रपन परमेवा है। मोमबम्दाचाफ्ने बतरागमार्गक परमार्थका प्रकाश करनेरुप कानुमा किया, 'पसा करनेको नरूरत भी पी । मौतरागमार्गके प्रति विमुख्ता वीर वापमार्गकी तरफसे विपमा ईर्पा भारिबारम हो चुके पे । ऐसी सिपम्वा गोंको पोतराग मार्गको बोर फिरने, स्मेकोपकार करने तथा उस मार्गके रक्षण करनेकी ठने बस्मत मादम ई। हमारा पार कुल भी हो, इस मार्गका रक्षण होना ही चाहिये । स तय उमान वपने बापको बर्पण कर दिया । परन्तु इस व्य उन जैसे ही कर सकते है जैसे मारपवान महापान, क्षयोपशमसान हो कर सकते ₹ । गुग मुदा दर्शनोंको पपाल तोमर नमुक दर्शम सम्पूर्ण सत्यस्वरूप है, जो ऐसा निभप कर सो, पेसा पुरुष दो मेकानुपा परमार्यप्रकाश वा बारमसमर्पम कर सकता है।" रामनगीने हेमचन्द के योगशस्तके मागचरण सिंचन मी दिया है। समसमास-- क्षेमामासो र सेताम्बर सम्प्रताप चैनसितके प्रसर निशान निनमद्रगणि घमाममण है। इनमा मन्म स १.५ में इला था। सोने विशेपावत्यकमाप्य विशणवी बादिक्नेक महत्वपूर्ण कपोंकी रचना है।मिनमदगणिक प्रामासके उपर मम्पगिरीको टोका। प्रफरपरनाकरमें एनशेमसरिस्त यपुशेम्ममास भातर सहित छपा है। पानपरी- शानघर मागम म १९३२ में एमा पा । इनके पिताने स्म्यासी होमर पामें गरस्थानम धारण किया पाहिनेपर महाराबने मानापपिझा मामक मरायमें गीताको म्पाप्या मिली, गोदशिणमें बात उठ भेना मानी जाती है। पर प्यास्पान तामसे पूर्ण है। पानेरी महाराने इस प्रत्यको १५२ मे पिमा है।मेघरमे बतानुमन नाममा एकमेका प्रए भी शिला है। इसके अतिरिक्त पदोंने बम्प अमेक परमभंग भारिपेशानेपरने २१ मापाने जमिन समाधि मानेर गीता हि गुनपणी अनुवाद भी है।
परिशिर (२) . परिशिष्ट (२) 'भीम राजघन्द्र में आये हुए उदरणोंकी वर्णानुक्रमसूची पृष्ठान xक्से (8) पुरुश (ख) एक वरसो (है)। [ एक सवैया ] १५०-२८ ज्यबाहोतम्य (बर्यष्टयं) [शातपय प्रमण!] २५-१३ अधुषे वसास्यमि ससार () मि तुस्स (क्स) पठराए । कि नाम दुपतकम्मय (राज कम्म) मेणाह दुग्गर (1) नगछेप्या (म गम्मिा) उचराप्पयन ८-१] वनुकमे सपम स्पर्शतोगी पाम्यो सापकमाव रे । सपमणी झमेगी पून पद निप्पात्र रे ।। [म्पमप्रेणास्तवन १२ परित उत्तममिनयमी, प्रकरणरनाकर माग २ प ६९९]२७५-१,११ बम्प पुरुषको परिमें जग म्पहार साय । पदावन नब जग नहीं कौन (को) म्पबहार यताय । [विहार इन्दावन] १८८-१९ बम्स नाम धुनी मी गगममें मगन मया मन मेरागी । मासन मा पुरत तथा दिपा वगम पर रेसमी दरश्या बज्म देदापनी । [छोटम-वप्यारममननमाग पद ११२१ १९, कहानजी धर्मसिंह पमई, १८९७] २२६-१९ वनिप्पणोनि देहमि मापरति ममइप । ४०२-१८ वार्मिश वधिको प्रेम गारे गोगानए मारि (महि) जगाये । वन्पाहार बासन सघरे मपनपको निद्रा पयरे ॥ [सरोदमहान ९८, पृ २६ चिदानन्दगा; भीमसिंह माणेक बई १९२५] १२९-९ महो मिडियामा पिचि () सा! (5) म रेसिपं (या)। मोस (क्स) साइण्ठस्स सास्स भारमा । [दशकाफिसूत्र ५-१-९२ प्रो बम्पकरारा सम्पत्ति १९१२] ७१४-११ बहो नि (गि) व तो कर्म सम्ममिति बमि (गि) यं । जाल (4) सामासमा मिति (नौ) एगम च मापण ! [दपायनिकसूत्र १-२११७३५-४ पानतिमिरधान मानावनासाकपा । पृट समन xमाप पुरण । पूनम रामानने 'मसावमपर रिसोपारनना सामाmom..., । با R प्रीमद् परवान्द्र पृष्ठमान मेमुग्मि (म्मी) मितं पेन तस्मै श्रीगुरवे नम ॥ ७३१-१८ [पर स्मेक दिगम्बर लेताम्बर दोनों संप्रदायोंके प्रयोम वाता है। दिगम्बर छन् मानसेन परिषदेवमे कातको टीका इस श्लोकको मगरमचरमरूपसे Pपाt] बागाए पम्मा वागार मो [ उपदेशपद-हरिमवसर ]x २२८-१३ बातममालना माल गाव मे फेरान रे [ १५२८ [सुगमा पुवो पाम वाया बनने, चोर निकाम सकाम रे। वान पो पवळा ठळ्या 10 वायु सौने ते मझापाम रे । [पौरमात्मान कर ५५ निफुलानन्द--कायदोहन २५ ५९९ २१८-१७ बाय बानदषमतणो मति गम्मार उदास । बाक पसाराम ( पसारि मिम) को उदधि विस्तार । [बानदयनचौबासीक मन्तमें शानबिमारिका बाप मैनमर्मप्रसारक समा १ १९२ ] ७८०-२२ णमेव निगप्प (ग ) पारयण सर्प गुरं फेरविय परिपुण (ण) समर पाठयं सलकपर्ण सिदिममा मुतिमा बि (नि) मागमा निमाणमा भविठामसंवि) सम्पास्वप (प्प)ोणमा । एप्पं (4) ठिमा बीना सिमंति हार्य (स) वि मुम्पति परिमिया (म्पा) पति सम्म दुम्ला (ग) गर्मत कर (३)ति । (त) मामाए तदा गामो हा विमो तहा मिसि ( सौ) यामो तहा मुफ्लमो (पामो) तदा मुंगामो वा मासामो सामु (म्म ) प्रमो ताटार डोमोति पाणार्ण भूयाणे नावण सवाणे संगमेम सममामोति। [ सूचकांग २-.-११ १ १२५-७ वईमतप्रमाकर पूना १९२८ ) ०१५-१२ मपत्रिीनेन सर्वत्र समनतसा । मगधादिमुकेन प्राय मागमती गति । [भागवत ३-२०-१७ म्यास] २०८-३ इमनिष परपी मन विसरामी बिनवर गुण मे गाये रे । नियंपुनी मोर मबरपी मानदफन फर पाये ऐ॥ [बादमधीबीसी महिनापमिनस्तवन ११, १९ ] उंच माधमो बतर नयी समस्या ते पाम्या साति। [प्रातम ! ] २०९-२० उपमेध ( वप्पमे मा) लिम्मेवा (पिगमे पा) पुसा (मुपदा)। [भागम] ८५-२९,२० उपवाणमोहो ममो विणमासिदेन (ग) समुबाशे। गाणाशुममाचारी निवाण पुरै (निम्मापपुर ) पनाह (बदि) बारो॥ [पचास्तिकाप. पृ १२२ एयदनशाबमाग बर्थ, # १९.२ ४५नाबमामी। + समापनामा राम.....
परिशिए (२) छाइन उपम मिनेघर प्रौतम माहरो वोर म पारे कत । रिझयो (यो ) साडिव संग न पहिरे रे, मगि सादि बनत ॥ उपम० । [वानन्दन चौमासी उपमदेवमिनस्तवन १, पृ १] ११५१ एक बहानीना कोटि वभिप्रायो छे, बने कोटि बानीनो एक अभिप्राय है। =एक बहानीके करोष बमिप्राय है, धौर करोड शानियोंका एक अभिप्राय है। [बनाथदास ] ५२५-२० एक देसिये बानिये [ रमि रहिये इकठौर । समय बिमछ म विधारिये यो सिनि नहि ौर ॥] समपसारमाटक गोवार २०, पृ ५०-५ बनारसीदास, पैनमन्परनाकर कार्याम्प, बई] २११-१० एक परिनामके न करता दर (4) दोप (दोर) दोप (0) परिनाम एक दर्य (4) न घरत है। एक करवति दोई ) दर्य () काहों • म करै दोई () करसूति एक दर्व () म करता है। बीच पुदगठ एक सेत-अवगही दर्द (ठ) वपमे अपने प (सम) दोट कोउ न ट। या परिनामनिको (को) करता है पुदगछ विदानद घेतन सुमाव वापरत है। [स्मपसारनाटक ककर्मक्रियाशर १. ९. ] ६७-१८ एगे सममे मगर्न महावीरे इमीसेर्ग (मीर) ऊसप्पि (बोसप्पीगीर चठमीस (पटम्यासाए) वियपरार्ण परिमतित्यपरे सिमे पुरे मुचे परिनिपुरे (बाल) सम्पदुस्स (स) प (प) होणे । [ ठामोगसूत्र ५१ १ १५, भागमोत्यसमिति ] ७११-२२ एन स्वो जो दर्सन पामे रे मन म पढे बोये मामे रे पाप णमो केश प्रसंग रे तेने न गमे स्मारनो संग रे॥१॥ इसव रमन प्रगट हरी देईरे माई गौ सफळ तन मेरे। मुहानदनो नाप विहारी रे भोपा गोपनदो बमारी रे॥२॥ [ उबगता ८८-२-३ ८७-७-मुन्नास्वामीमहमदाबा १८९१] २१२-१२ [ निगपारिय परिस्सामि ] एव पुचा (पुणे) हासुई। [सम्मापिठरि जणुभामो नहर महिं बो] ॥ [उपराम्पयम १९-८५]११५-११ [छोको रे मुठ साहिब जगतनो छो।] पीपाळमो राम करता हान बमवरस पुश्पो (यूटो) २॥ मुर । [ भोपाम्पस सं १,१ १८५-दिनपरियय-यशोविनय ] १५३-1 २००-२ भीमा पत्रमा [ पृष्ठमा कम्मरसम्म (म) संगोगो यो क्षेई पोषस्स । ५००-२ सो वयो ना (णा ) पमो तस्स नियोगो मब (6) मोस्सो (सो) ॥ ५२५-१७ ] ७९६-७ करमा फकीर (0) क्या मिगीरी सदा मगन मन ये () नामी । हर पर मेटमहत कौरतनमामा पृष्ठ १२ पर दिया इमा) २२०-२ कर्ण मटे तो छ्टे धर्म ए के महा मनमो मर्म । जो तुम तो कर्ण बरोबो शिल तो बस्तु सरी। तु छो गारने तो नाय एम कहाँ बसे घटस्पा राप । [बय] २६७-२१ किंवामा समाया रगाोवा गुपियति (गोवाणु तिम्पिति)। बता स्टीव (पपरिवाय) एसा पामा नौण (विणि) दाणम् ॥ [ उपदेशयस्प पशोविनयी] २८-२८ चिसो (सौ) कनक नाफे (1) नीच सो ( सौ) नरेश (स) पर मौचसी मिणा (ता) गर (क)बई गारे (के) गारसी । सहरसा बोग-बानि (लि) फारसा कराम (मा) ति पारसी हाँस (हौस) पुदगमामी (B) गारसी । साम्सो (सी) बग-विमस मासो ( सौ ) मुक्नमास काम्सो (सौ ) मुटुंबकार मेवामा छारसी । सौटसो (सी) पुरस गाने को (बी) सो (सी) बसत माने ऐसी गाको पत्ति नाही व (4)दत बनारसी n [समपसारमारक बछर १९, १२५१-५) ९०८-११ कोई समरस्ना मोगी कोई बमरसना मोगी। माणे कई निरम बोगी कई प्रमरसना मोगी ॥ [संभव है या पर सप रामचन्द्रबीने माया हो।] २१५-१० गुरु गणपर गुपपर भधिक प्रबुर परपर भीर । न पर वनु मगनप (व) र पीप सिरमो (मी) र॥ [सामी शक्पिानुप्रेक्षा- चपचहत अगुवाइका मंगाधरण । ७५५-५ बैनप्रपरनार काठय पई १९.] गुरुणा हाच (शगुचि) ] ५९१-११ +लमा चुक्ताना एक परमप्रमाने-मरन पोमेरे पापा ।
परिशिए (२) घट घट वर मिन बसे (से) घट घट बतर बैन । पृष्ठ लाइन मत (ति) मदिराके पानसे (सौं) मतधारा समनै (समुहै) म ॥ [समपसारनाटक मपसमाप्ति वौर मन्तिम प्रशस्ति ११, ५३८ ] ७७५-१५ परमारी हो परमकरण तपा मबपरिणति परिपाफ रे । दोष टळे मन (८)छि सुळे (2) मग प्रापति प्रवचमबाफ रे ॥ १ ॥ परिचय पात (ति) कपातक साधुध कुशल वपचप घेत रे । प्रय वयातम अपण मनन करी परिशीम्न नय हेत रे ॥२॥ मुगध (ग्ष ) मुगम करी सेवम रेलवे सेक्न बगम बन्प रे । देनो कदाचित सेवक पापमा वामदफ्नरसरूप रे ॥३॥ ७००-२१ [वानदफ्न चौमासी समवनाप निनस्वक्र ३, ४, ६, पृ १६, १७, १९] ७१२-९) धर्म सो भे (घो) [ मगवती!] ७८३-१ चाहे कोर ते चदने मधुकर मारती भोगी रे । सेम (तिम ) भनि सहगुणे होगे उत्तम निमिचसमोगी रे ॥ [माठ योगनिमी स्वाभ्याप १-११, १ २३१] ७०२-७ घिसारी म्पारो परचक म्पारो (रौ) सेन न्यारी पादर (R) मी न्यारी शेन (५) ठी मेरी पफ्ना । बतीत मास्था सेन मिदा यही (मिहापाहि) कोउ पैन (पै म) विपमान फरक न पामें (मैं)बर छपना । वा (स्वा) स बी मुफ्न दोउ (3) मिद्राको वग मुझे (मूछ) सूझे सब बंग सी (सि) मातम दरपना । मागी मयो (यौ) चेतन बचेतनता मात्र त्यागी (गि) मासे ()पि सोधिने (के) समा (3) रूप मपना । [समयसारमाठक निराधार १५, १७६-७] ६७०-५ माम्प पूर्णि (पूर्मि माम्प सूत्र नियुकि), रचि परंपर अनुमन रे । [वानदपनभोगीसी ममिनापयिनस्तान ८, ५ १६१] ७१६-१२ बाण ब(गीण दिसंप्य सत) तग दिर्स मपरिमये। [ भाचाग ! ] १९८-२ चबहि वयात) नव(चेतन) विमाषसौ(सौं) उमटि मापु समो(म) पईवफ्नो(नौ) पुमान गरि सानो(नी) है। तहिते (तमहात) मो मो मेन गोग सो सो सब जानो (नौ) यो यो त्यागनोग सो सो सब सजि) दोनोरनी) है। हो ()को (क) म यी टो (टी) र स्पायडो (2) माही और पाहा ताों (यों) कारन () मानो ( मानी)।
भीमर पवन्द्र (३-११ पृष्ठम्म सग पानी (क)बग स्पापी (1)चम तरंग त्यागी । मन त्यागी (1) मुनि त्यागी (ग) वापा (सद कानो (नौ) ॥ [समपसारमाटक सर्वविभुमिवार १९, पू २७७-८] २८२-५ गारिस सिवसाचो वारिस हालो सम्मनीषाण । तमा सिमपर्म कापण्या मनावरा [सिरप्रापत-अन्दफुप ] ६३९-११ दिन प (1) बिनने में भाप ते सही (8) मिनपर हो रे। में (4) गो मकाने चटकारे ते म (संगी मग बोकेरे। [मानंदपाचौलासा-जमिनायविनस्वन १, पृ १५०] १२०७-१८ निनपूगा रे ते निवपूमना [२ प्रगटे बचपणि । परमा निकासी बनुमचे रे देरभन्न पद प्यति [म्पस्तान ७-देवचम्मनी) ६२६-१८ सिस्ने गारमा जान छी उसमे सब कुछ नान किया । [ये एगे पार्ण से सम्म वार्म] [माचाग १-१-१-१२२] १ -१ चार (मन) बाद शोपना घरे । कृष्णमे परषु होय से करे । गौर (पिच) सौद शोचना घरे कृपने कई रेय ते करे । [दयापम पद ११, १ १२८दपारामात भगिनीतिकाम्पसमा बहमदाबाद १८७१] २१५-१६ जोग मरि पुग्गी व पुरगम का पुम्गमधार मही खास रंगी। पर मेघ मी मपर ऐसता परत धर्मे कदा न परो । [ मुमतिबिनस्तान ६ देवयानी] २७९-१५ सो (पा) वामिय मदिरा दारी बाई (२) टक चोगे परना। पनि (६) साम्पसन (सात विसन ) (1) मई दुरित मूग दुर्गति (दुरगति ) के माई ( मा॥ [समपसारमारक साम्यसाधकार २०११०४] १८२-4. मै बमुरा महाभागा बोरा समचारिणो । अमर सि (R) दक्षत सरहदै समसो॥१॥ जे प बुरा महामागा पौण सम्मासिनो । मुर्द तेति परत यो समसो ॥२॥ [भाग १-८-२२,२११ १२] १९१-१. (२) पाई से सर्प बाम। ये सब गार्ण से पर्ग बाण । [ भाभाग १-३-१-१२२] २५३-१.
परिथिए (२) ७ पृष्ठ साम ना (इ) वयिते दमगुणपश्महि य । सो चाणई (३) नियवपा मोहो अमु माईय (ब) स प ॥ [प्रवचनस १-८० पृ १०१-कुन्दफुरदारा;रायचद्रनशासमाग१९३५] ६३५-२२ नेनो काळ ते किंकर पई रयो मृगवणामह प्रमेक (लोक) ॥ मीM धन्य तेनु । दासी बाशा पिशाची पई यो कामक्रोम ते फेदी लोक ॥ जौम्यु० । (दीसे ) साता पौळ बोलतां नित्ये के निरचन निराकार ॥ मौर्यु । गाणे सत सक्षणा ( समेणा ) सेहने बेने होय छेलो (लो) अपवार ॥ मीम् । चगपाक्नकर ते अमतर्या आप मावठदरमो भार || बौध्यु० । सेने पौर गेकमा विचरतराय कोईर ( कोये ) मब पाप । बोम्मुः। लि ( घि) सिदि ते (नियो ) दासियो पई ही प्रमानद दे म समाय | नौम्यु० ॥ [ ममहरपद पर १५-२९, ३१, ३६, ३७, ३८, २९, ५ १५–मनोहरवासात, सस्त साहित्पवर्षक कार्याम्प, बम्बई स १९१९] ७१९-- मे (बो) पुमान परधन रे सो वपरभि (घी) न। जो मफ्नो (नौ) घन वियर (म्पोहरे ) सो धनपति धर्म ॥ [समयसारनाटक मोक्षधर १८, २८५] चेम निर्मळता रे रान स्फटिकतमी रोमन नौवस्थमाव रे । से निमपीरे रे धर्म प्रकाखियो प्रबळ कपाय धमाव रे ॥ [ नपहस्प श्रीसीमधरनिमस्तान २-१७ प २११-पशोविजय ] १११-१९ जैसे कभुकायागसे बिनसत नही मुमग । रोत्यागसे जीव पुनि से रात बमग ।। स्वरोदयशान १८६१९२-चिदानन्दी] १२८-२५ जैसे पग मच पादित्यको सपति (6) माही (R) तुपात मुपागम कारण (न) षटत है। से मागासी मायाहीसों ( सौं) हित मानि मानि अनि ठानि भम भूमि ( मम ) नाटक नठा है। मागेको (बागैको) । (घु) कत पाप (३) पा (पी) बटा घराप (बार) पैसे ( मैन ) हीन नर गरि (4) ट है। से मह चेतन सात करदम्ति करे ये (ये)क्त (1) सत फल सोबत घटतु है। [समयमारनाटक बपद्वार २५, २०२] १२८-१५ सो (सी) निरभेदम निरचे (4) मीत मुंतो (हुतो) सो (सी) निरमेद वा मेदकोन (भेद कौन) ग (क) () गो (गी)।
भीमद् रामचन्द्र पृष्ठ पर सग त्यागी (गि) का स्पागो (ग) पचन तरग त्यागा (गि) मन पागी (गि) मुनि त्यागी (ग) बारा E (साद कोनो (नौ) है ॥ [समपसारनाटक सतिशुनिशर १९, २७०-८] २८२-५ गारिस सिदसहरालो तारिस स्वामो सम्मावाण । या सिनताई कायम्मा मममीदेवि । [सिरप्राप्त कुकुन्द] ६३५-११ जिन पई (३)बिनने चे बारा ते सही (R) मिनवर होरे रे। में (4) गौ ईमकाने पटकाने ते में (मोगा मग बोवे रे ॥ [वानदमनचौबीसी-ममिनापनिनस्तक्न , पृ १९०] २०७-१८ बिनपूमा रे वे निमपूर्वमा [रे प्राटे पपछि । परमानंद किसी मनुभो रे देवचन्द पद पणि]n [पासपम्पस्तवन ७-देवबन्दी] २१५-१८ निसने वारमा पान ही उसने सब कुछ मान लिया । [मे एग बाई से सर्व गाई] [ वाचारग १-३-१-१२२ ] १०-१ गौर (मन) शोर शोचना भरे । रणने कर्ख होप ते करे । चार (पिच) सीद शोचना परे । रणने कर होप ते करे । [दयापम पर ३१, १२८ दपारामात महिनातिकाम्पसमा वहमाबाद १८७६) २१५-१६ गौर नदि पुमाठी नैव पुमाए कदा पुमावापार न वास रगी। परमोश मर पर ऐसर्यता बस्तु धर्मे का म परस्मी । [समतिबिनस्तम्म ६ देसचम्बनी] २.९-१५ सो (1) बानिय मदिरा दी मारे (से) टक चोरी परमाए । (६) सक्षम्यसन ( सात निसन ) । (इ) दई दुरित मूठ दुर्गति (दूरगति) गई (मई) ॥ [समपसारनारक साप्पसापकसर २७१ १४४] १८२-३० ने बदुवा महाभागा पाप बसमईसियो । नमुदं वेल (स) परबतं सोई सयसो ॥१॥ ने पपुरा महाभागा व सम्मसियो । मई टेसि पर भास होइ सयसो ॥२॥ [स्मातांग १-८-२२ २३१ १२] १५१-१. () पर्ग गाई से सम्म गाई। जे सर्व गाई से गं बाई । [भाचा १-१-१-१२२] १५१-१.
परिशिप (२) ८७ . पृष्ठ काम बाई (३) वायसे दम्पगुणफम्बवेहि य । सो नार्मा (1) नियश्या मोहो सछ गाईय (बाइ) तस्स उप ॥ [प्रवचनसार १-८०५ १०१-मन्दकुदाचार्य, रापचन्द्रनशाखमाला १९५५] १३५-२२ नो काळ ते किंकर प रयो मृगतृष्णानस ठोक (लोक) ॥ नौम्यु घन्य शेहनु । दासी वाशा पिशाची पई यो कामक्रोष से केदी क ।। माम् । (दीसे ) सात पात बोलता नित्ये से निरंजम निराकार ॥ गा०। बाणे सत सठणा ( सगेणा ) तेहने ने होय गेडो (डो)मवतार ॥ नीम्म । चगपावनकर ते वववर्या वन्य मावठदरमो मार ॥ बी० । वेने चौद का विचरत वतराप कोईए (कोये) मब पाय ॥ सौम्पु० । रवि (घि ) सिदि ते ( थियो ) दासिपो पायी प्रमानद ले म स्माय ॥ बोम्मु०॥ [ ममहरपद पर १५-२९, ११, १५, ३७, १८, १९, पृ १५–मनोहरदासात, सस्त साहित्यपर्षक कार्याम्प, बाई सं १९६९] ७१९-२ ने (बो) पुमान परमन हरै सो वपराधि (पी) वा। नो वफ्नो (मौ ) धम विषहरे (म्पोहरे ) सो धनपति धर्ममा [समपसारनाटक मोक्षधर १८, ५ २८२] ७८६-१६ चेम निर्मळता रे रस्त स्फटिकतणी सेमग चौरम्पमाव रे । वे मिनपरि रे धर्म प्रकाशियो प्रबळ कपाय ममान रे ॥ [ मपयस्य श्रीसीमपरमिनस्तवन २-१७ प २१४-पाविजय ] १०१-१९ जैसे कचुकायागसें बिनसत नहीं मुनंग । देहत्यागसे नीर पुनि सें यत बमग । सिरोपान ३८६४९२-पिशनन्दना] १२८-२५ जैसे संग म पादिस्यको पत्ति (1) मही (हि) तूपानंत भूपामक कारण (न) धतु है। वैसे मयबासी मायाहाँसों (सौं ) Rत मानि मानि ठामि ठानि भ्रम मूमि (प्रम ) नाटक मटा है। मागेको (वागैको) (Y) कस पाप (६) पा (पी) छे बगरा पाप (चार) पैसे ग् (नन ) होन नर परिव (4) है। वैसे मह चेतन महत रति करे (ये)बत () मत छ सोबत सटा है। [समपसारमारफ पार २७, १ २१२] ३२८-१५ सो (सी) निरमेदाप वा (4) बात वो (हुती) सो (सी) निरभेद मब मेदकोन (मेद कौन) ग (क)(6) गो (गो)।
भीमद् रामचन्द्र पून दोसे (0) कर्मयो (R) मी (R) पुस समाधान पापो (पौ) निरपान किस बाहिर (माइरि) न बहेगे (बहेगौ)। फा (३) पदाधि वफ्नो (नौ) माउ (ब) त्यागिकी राग रस राधिके (*)न परममा गहेगो ( गहेंगी)। ममठान बान विधमान परगट मयो (पौ) याद (0) मति बागम बनतकात देगो (दैगी)। [समयसारनाक सबिपिशर १०८,१ १.६-0] पो (यो) गा फ्परिपपेशा (पोसा) [दि मनुभागा फसायो होति] [इन्यसपह] ७८१-१५ किषित चितवो पिण्डरिकी सेना सा। गणप एपत्त वा तस्स गिउप (विषय) ग्माण (साग) ॥ [दम्पसम्म ७५१-२५ जगममा शुक्ति तो में गाणिसे समीप ये पण शरीरनो मही सग यो । एकाचे वारे एका मासमे भूख ( मेस 1) पड़े तो पडे ममनम्मे मंग हो। बोपनी बबळा ते साधन यु करे ।। [ बोरवीने संदेसो गरबी ३-३-पुनापास गई, सं १९५१ ) १९९-२. समति पासा (1) मोमति पासा (0)। [अमोणेति पासा त सम्मति पासा । ) [बाचारग १-५-१) ५९८-१ [मर सिन्ध परो निणसामगे पर विपपणे] नगार ( पप्पो ) मास (मोस्ट ) मम्गो शेपा (सेसा) य उमगपा समे॥ [सामनातिसम्म सूत्रप्रापत २१-गुदगुस्व माणिक प्रपामा बम] ७८९-२५ तरतम पोगरे तरतम बासना रे बाधित बोन वाधार । पयगे । [बाल मचायासी वजितनापस्तवन ५, १२ ] ०११-१३ तदा पाणं सममार्ण [ मगावी ] ६०५-१८ [ पम्मिगि भूतापामनाभूद्धिमानत ] हर का मोदः क शोर: एकतमनुपयन ॥ [ ईशाप उपनिषत् ७ ] २१३-२० माटे उमारोही बिनसर बगळ पहिये। रामपपाण सरा घर जो उम बान-पम पदियेरे॥ ५३.-10 [ भान परागसी ममिनापरिनम्नान ११ १ १९४) ७६८-२. गि सरमा नप भारमिजमारे। निरीमने सीम्नीसह परागर॥ [पर योगात्रिी साप्पाप १-१, १२ । गुरसाहित] २०५-११ परिशिप (२) ] - -- ] दर्शन ने पयां पूना ते बोध नगरमे फेरे रे । पृष्ट सदन धरि पिराधिक सेहमी समकित छिने हेरेरे ॥ [पाठ पोगपिनी स्वाम्याप १-५, ३ पृ ३३.] २७५-१५ देखत मूझ टळे तो सर्प दु सनो क्षय थाय । [ १७०-२ देवगमनमोयानचामरादिविभूत्य । ७८०-२५) मायाविपपि पते नातस्वमसि नो महान् ॥[बातमीमांसा १-समतमा ] ८००-११ देहामिमाने गछिते बिहाते परमात्मनि । पत्र पत्र मनो याति तत्र तत्र समाषप ॥ २१२-१८ दुळ देने मास उपवासी गो मायारग रे । तो पण गर्म वनवा रेशे यो पोज गरे । [ ५३२-९ धम्य ते मुनिबराचे चाहे सममाने बामगत शामिनु मळतां तनमनपपने साचा । दम्पमात्र सुधा ये मासे साधी बिनमी भाचा धन्य ते मुनिबरा में पाछे सममात ॥ [मितियस्प सीमपबिनस्तान १५-३, पृ २८३पशोविश्यमी] ७५९-११ षम्मो मगमुविस बहिसा सपमो तयो । देवानि त नमसंति बस्स पम्मे सया मणौ ॥ [दघकालिकसूत्र १-१॥ प्रो अभ्यकरशारा सम्पारित १९३२ ] ७९०-२५ धार दरवारमी सोहरी दोरण चौरमा मिनतणी परणसेवा । पारपर नाचता देश बागगरा सेवना पारपर ये म देवा । इमानदघन चौमीसी वर्मतनापविनस्तान १, पृ ८६] १५२-१२ नमो निणाण विभवाम ३९०-100 x [से स्थानकासियोंके स कोटिके 'ममोम में बोलने की परम्परा है] १५०-२० नमो तुपरिणगारिरिपारनिवारिणे । माति पोगिनापाप महापरम्प तायिने ।। [ योगशाम १-१, हेमचन्दाचार्य; जैनधर्मप्रसRक समा मापनगर १९७१] माकेदम निहाळता ] ७१०-२ मागरम पामर नी () जागे बम पुस म कुमारी । पदमपविण तेम म्यानता मुस कोण गाणे मर नारी [बाट मोगारिनी स्वाध्याय -३, २१९] ३०५-१. मिश्नमें मा मिले हीरो बैकुट धाम | सतरपा पाईप सो हरि सबसे ठाम । मिरामि गयिामि वपार्ण बोसिरामि । [प्रविश्मणसूत्र] ५१२-९ Xपर बना मुखमा मि।-सम्पादक ७७०-८ । [ माणेकास ] ५१३-२२ भीमाबत [णि सेवा यसपमा या समा मुहम्मा समाण से। 1 मान मिमाणसेठा (मा)स्पषम्य [ म मापपुचा परमपि नाणी ] ॥ [सूहाग १-५-२०] १००-१ निशदिन नैनमें मीरम बारे मर तमति मारापन पाने । [सदरदास ] १७५-१८ पसे पार पाममो मिटे म मनको बाघ (पही पार को पाचनो (!) मिटयो न मनको चर) यो (यों ) कोयुको (कोलके ) येण्डू (सको ) पर है (B) कोश हगार । [ समाभिधवक ८१ १ १०१-पशोवियफ्नी, गुर्नरसाहित्पसपा प्रपम विमाग मुई सं १९९२] २५०-२१ पक्षपातो न मे पोरे नीषा कपिमदिछ । पुतिमा धर्म यत्प क्स्प झाः परिणा ॥ [ोतलनिर्णय २८-परिमयसरि ] १५२-२१ [मु नानु पर्म बनी वारो पभिर्मदन रस गति हो मित ] पावनुमप त्यागपी करपी मच (E) परतत हो। (वमिमन्दमबिनाति १-देखनमानी ) ५३-१९ पुम्से खोये। [ ] १५-२१ प्रमु मयो नाति समो पो परोपकार । ] ९९-२१ प्रसमरसनिमम रिपुम्म प्रसनं पवनकमसर्मक कामिनाम्गम्य । ०५९-२० फरमुगमपि यो शवमर्प वदसि गति देवो बौठरागस्त्वमेव । [घनपाठ] ७८.-१५) पाळ बनेकात मेषम म देसे पळ बोकाव किरिया बापम पो चार गतिमदि मेरे। [वानंदमनचौरीसी ममतनापविमस्तान २, ८७] ५१२- मदिापतिमुक दिन सिरिममाणमिणपदं । हम कुछ समासमो बसामि ॥] [ धर्मप्रत्य वाम १ देबसरि बागरा ] ५२५-११ मौसम मरपगर र तिरिमगड () ए देवममुपगड (ए) पोसि वीर (विम) इस मापति विममारणा धीर ।। [ पट्मास्वापिसा मावप्रापत ८ १ १२२ ] ०१०-२० मोगे पेगमप मुले तिमपं रिच स्पामाप । माने दैम्पमर्थ यो पुमय से तम्म्या मय । शामे पादमपं गुमेम कम्पे सवर्य सर्व बस्तु मपानि मुलि नु मेरम्पमेधभपा [मरिकातरम्यश्तक ३४-मरि९०-२२ परिशिए (२) H - मन महिलानु माग उपरे वा काम करत १०५-१२,२१] म अतर्मे मन छ घरे हामाक्षेपकवत रे ।। ३०६-२,११ [बाठ योगएिमी साप्पाय ६-१ ३३८ ] २०९-२०) मात्र बौपध नहीं मेयो पाप पाय | पीतरागवाणी विना पर म कोई उपाय n { वगाससे प• गुणमदगी सूचित करते है कि यह पप स्क्य रामचन्द्रबीका है]०१८-२८ मा मुम्मा मा रम्नह मा इसा (तुस्सा) इनिायो (त्ये)। पिरमिटहि (९)मा वित्त विचितरमाण (साण ) पसिबीर ॥ पणासमोसमप्पणपठदुगमेग प अप मा (घा) । परमेष्विाचयाणं वप्प गुरूपरसेण ।। [इम्पसपह] ०५१-१७ मारे काम कोष सब (मिनि ) होम मोह पीस पारे विध (नाऊ ) तठ करी कियो रजपूतो (को) है। मार्यों महामच मन मारे (मार्यो) बहकार मार मारे मद मम ( मन्म) ऐसो रमरु (रू) तो है। मा वाशा ( सा ) तृष्णा पुमि ( सोठ ) पापिनी सापिनी दोउ (6) सबको प्रहार करि निर पद ( फ्य) पूती (पानी) है। सदर करत ऐसो साधु कोई (ऊ) (स ) वार और (2) मारिके निर्षित होई (६) सूता (तो)है। [ संदरणिय शूरातनको मंग २१-११ सदरदास, बम्बई, १९५१] १८१-९ मोक्षमार्गस्प मेला मेरा कर्मभूपताम् । ७५२-२२) पातार विचतत्वाना दे तहणम्पपे ।। [ तत्वार्याचा ७८५-4 पोग बसंस गिम मा पठम0 (R) रिम दाक्षी रे । मवपद वेमय गाणमो बातमराम के सम्सी रे । [पए सक समृदिनी पठमावि श्री दासी रे। तिम नवपद वियागनो मातमाम ऐ सासा रे ॥ योग बसम्म सिम कमा मषपद मुस्स ते गामोरे । र तमे वरम्यने वावमम्पान प्रमाणो रे॥ [भापास चतुर्पसा क्लियविनय-पशोबिजयी । १८१-५ मामसिह माणिक बर्ष १९०५] १०८-२ भीमद् पसबम्यू [खिम से सबसचमा पा सभा मुहम्मा प समाण सेघ ] | पून निष्पाणसेठा (सेम) मा समबम्मा [ म नापपुचा परमरिय मामी ] || [सूनहग १-६-२४] १.-1 निशदिम नैनमें माह म बाचे मर तबहि मापन पारे । [सदरमास ] १०५-१८ पडे पार कहा पामयो मिटे म मनको वास (पटरी पार का पालनो (!) मिटयो न मनका चार ) माँ (ओं) कोयुकों (कोतके ) देश (भैठको) भर R () कोश हार । [ समाविशतक ८१ १ १७६-यशोविनयमी गुरसाहित्पसपा प्रपम निमाग मुंबई स १९९२] १५०-२१ पक्षपातो म मे पोरे मोप कपिशारिस । मुहिमपर्म पस्प तस्प कार्य परिमन ॥ [गेकतत्तमिर्णप १८-रिमयसरि १५२-२१ [स्पु गाणु मु बनी वारो बमिनदन रस रीति हो मित] प्रमठ बनुभव त्यागपी हरपी मा (8) परताव । (बभिमन्दनविमहाति १- देवचन्द्रना) ५१-१९ पुद्रसे ये रे। ] १५-२१ प्रमु पयो नाति समो परठो पोपकार । [ ] ९९-२१ प्रसमसनिमम रिपुमं प्रसन्न कामकममक कामिनासंगरपि । करयुगमपि परे शरणप्य तदसि प्रगति देवा गीतरागस्त्वमेव । [पनपास] ७८०-१५) फळ बनेकांत मोचन न देसे फळ बनेकत किरिया बापग सो पार गतिमाहिये। [सामान चौरासी वतनापनिमस्तान २,५८७] ५१२-2 पनिहारिमुक दिव सिरिसमापविणचंदं । [गमईस दुर्ग समासयो पसामित्त ॥ ] [कर्माप तीसरा १ देवेन्दसूरि बागरा] १२१-१४ मौसम नरपगा () एसिरिफा ( ए कुक्षेपम्शुपगइ (ए। पोसि तीक (तिम) माती मिपमानमा बोला [ पट्मास्ताविसंग्रह मा प्राप्त ८ प १३२ ] मोगे रोगम के अतिम दिने सुपाल्पाप । माने दम्पमर्प यो रिपुमय स्मे ताम्पा मप । शार पदमर्य गुणे समय कापेइतपूर्य समस्त मयान्वित मुनि गुणा पराम्पमेवामप! [महरितकएपमतर १०-मरि९-२२ ७१ -२० परिशिए (२) सिरिवार निण पदिन कम्मविवाग समासबो दुष्छ । कार्य मिएण हेठीण तो मण्णए कम्म ॥ [प्रथम कर्मन्य १-देवेन्द्रसरि, वागरा १९१८] ६२५-१५ [समें विपाद वसै विषामें विवाद बसे कायामैं मरन गुरु वनमै होमवा । मुचिम गिणमि बसे प्रापत्तिमै रामि यसै मैं हरि दर दसामै छवि छीनता ॥ रोग पस मोगमैं सबोगमैं वियोग बसै गुममैं गरब बसे सेवालि दीनत्य और बग ति चेसी गर्मित वसावा सेती] सुसको सोलो (0) अकेली उदासीनता। [समयसम्माटक १५-६] १६०-२५ पम्पास्मनी बननी ते उदासीनता । [ यह पद स्वयं गपचन्द्रनाका बनाया हवा हो सकता है] १६०-२५ सप दुः (O सस्प करमफल बाणो निश्चय एक वान्दो रे । पेतनवा परिणाम न चूके वेतन को निनदो रे ।। [वानवम चौबीसी पाठपूम्यबिनस्तवन १, पृ ७७ ] २८१-२२ मसना सिंषु पौसानार्मदनी नगमि (जी) मके (16) जगवदगी । धरणागतमा सदा मुसकंदनी परमनोही मे () परमाननजी [पीरबाल्पान १-निफुलानन्द काम्यदोहन माग २, ५ ५५९] २५०-२२ सहयोग फ्यु (इ) बमार्रमी, वमहबोर्ग प (1) पवापभी पयरमा तदुमपारमा । [भगवती] १९१-२१ [गोई बिग म्यान घरनातमम बैठि ठौर भयौ निरदौर पर वस्तुको म परसै ] 8 (1) वा नपारे पान () तामें फेठी करे (१)। (स) यता पिर मे (4) सवष बरसे (बरसे)। [त्यागि वन कास्पर वर करमको करि पाम मर मर कर गौर करसे खोती निकम्प दिई वम्मका महि त्यागी मौ पिभाम निरपान फ परसै ] २८३-२ [समयसारनाटक ' ३८२] २६१-१ सो धम्मो नष्प (त्प) दया वसादोसा न बस्स सो देो । मो गुरु (रु) यो नाणी वारंमपरिमगड (G)परवो ॥ [ ] १९६-७ सास (8) हा बतलो माणुसच दल (ए) मय बारिसेण षडमो । एगेव दुलो (से) गरिए बगेर सफम्म (म्मु ) पा विपरिपास विति (विप्परिपा सा॥ [ सूमाग १-+-२२, १ ३९] १९९-२० ८५२ श्रीमद् राजयन्द्र पोगमा चीन र प्रहे बिनबर पुर प्रणामोरे । पृष्ठान भाषापारय सेनमा मत्र उद्वेग मुममो रे । { बाठ योगप्रष्टिनो स्वाप्पाप १-८,१ १२१] २७५-१० रपिके (६) उपो (यो) त मस्त होत दिन Pन प्रति अमुठीके (*) जीवन व्यों (म्यो ) बीवन घटा (6)है। फालके (के) प्रसत नि लिन होत ठान सन पौरके (बारेकै ) वम्त मानो कायसो (सौ) का है। एते परि मूरस म सानै परमारयको (को) स्वारपके (क) मम मारत कटतु (तु) है। म्पो (गो) फिर सौगनिसा (सौं) पम्पो (ग्यो) परि (पर) मोगनिसों ( सौं) विपरस मोगनिसों (सी) नेफन हटत ॥ [समपसारनाटक बंगार २६,५२१११२८-८ संग रूम मा गए पण सात मरतारपाय तो मोर्टम ने सपारे । [गेकोजि] १५२-२१ गेको (कों) म यो टये (ठौर त्यागिनेकी (त्यागिकों ) मा (0) और । पाच कहा उबों (पी) का नीनो (मानौ ) tn [मपसारनाक विविधर १०९, १ ३७५-८] २८३-१२ [ परिमा तगमग उ ] (44) ग प परिमा (पनिम्मा)। [ मसिमा सनुपयायो तेम धम्मो दुराकमो ॥] [उचराष्पपन २१-२५] म्सपारनी माळ पारे पनि परबळी । बनाम ग्याँठो पम यो मरि गाय पमायो रे । पप्पतरू ठपम ते पामे सपम ठाण नो मायो रे ॥ गापो रे गायो म पर बगत गुरु गापो। [सपमणानन १३-५ ठत्मनिवपरी; प्रकरणरनाक्न माग २,पृ.१०] ७t-१५ सकस सारी इनिपरामा मुनि गुण वासमरामा रे । ५२९-२५) मुम्सपमे थे बातमराम्ते कीये नियामी रे ॥ [मानवमाधानासा मेयांसनापयिनस्तमन २, ५ ७०] समता रमता ठ (ठ) पता द्वापकता मुहमास । पैदकता ताफ्ता एम मानवियस ॥ [स्मपसारमाटफ सत्यामिका २६ प २१] ३१०-१) समन्मा ते सामाई गया समना ते समाई रमा । [ ]01,८ [इसगो ग बोसवितुए पो विषयमाणए । एवं म्णपाप गाविप ] समर्प गोपम मा पमापर | [उत्तरापपम १०-२] ५१-१९ [ १५१-३ ९८२-२) १५८-१०० परिशिप (२) पृष्ठ सदन सिरिमारिण गदिम कम्मविवाग समासमो दुछ। कार्य बिएण हेठी मेण तो मण्णए फम्म ॥ [प्रयम फर्मप्रन्थ १ देवेन्द्रपि, वागरा १९१८] १२३-१५ [समें विपाद बसै बिधा दिपाद बसै कायाम मरम गुरु पर्यनमें हीनता । मचिम गिमनि बसे प्रापतिमै पनि बसे मैं घरि मदर दसामै छपि छीनना ॥ रोग से मोगमैं समोगमें योग बसे गुममै गरव बसे सेवाहि दीनता वीर ग राशि देती गर्मित वसावा सेवा] सुसकी सहेली रे (बग उदासीनता। [समयसपनाटक ' ११५-६] १६०-२५ बप्पास्मनी मनमी ते उदासीनता । [यह पद सय रुपचन्द्रयीका बनाया मा हो सकता है] १६०-२५ सम्म दु ( सरुम फरमास माणो निश्चय एक वानदो रे । क्नता परिणाम न के पेवन करे मिनपदो रे ॥ [वानवपनचीबासी पासपूम्पनिनस्तवन १, १ ७७ ] २८१-२२ मुन्ना सिंधु धौसममानदमी गगमि (मी) बनके (ER) भगवनी । घरमागतना सा ससक मी परमस्नेही छो () परमानन्दनी ॥ [पोरगारमान १--निशानाय काम्पोरम माग २, ५ ५१९] २५४-२२ सहयोग फ्यु (1) बणारंमी, मानोग पतु (1) पनापार्रमी परारमा तदुमपारमा । [ मगरती] १९०-२१ [गोई बिग म्पान परमातम मेठि र मपौ निरौर पर वस्तुको न परसे ] 8 (1) सता विचार पाठ (स) अता देती करे (३)। पु (1)रता पिर )अस्तपारा बरसे (बरसे) । [पागि वन कसर पर करमकी की पान मा भर की पौर कास सोचौ विकलय विर्य कापकाक महि त्यागी मी विधान निरपान पर परसे ] २८५-२१ [समपसारनाटक २८२] २९१-१॥ सो पम्मो नष्प (त्प) दपा सासा म अस्स सो देवो । सो गुरु (1) नो नाणी पारंमपरिग्गा (हा) रियो । J१९६-० समास (स) मतमो माणुसत बद्ध (सं) मर्प वाभिम बर्वभो । एर्गनु उसे () अरिए व मेए सकम्म (म) णा विपरियाह निति (पिपरिया हो । [स्त्राग १-५-२२, १ ३९] १९९-२०
भीमद् पश्चन्द्र
--
पृष्ठाइन
हम परदेशी पसी साड, वीर देखके माई रे। [
२५९-२
सा रहयो (ए) धम्मो (म्मे) वारस दोप (स) विमलो (बभिर) देयो (३)।
निर्माये परपणे सपरणे ()() सम्मत (स)।
[ पट्मास्तासिया मोक्षप्राप्त ९०, १ ३९७ ]
१९५०
[ महिमा गतमसमवरण तानाचममतिशपरफ्यम् । ]
क्षममपि सम्मनसगतिरेका मनति मलार्णवतरणे मौका ॥ [मोहमदर -शकण्याप] २०३-१
क्षायोपशमिक वसम्म सापक एक समय (वन)।
[सम्पामगाता १-१ ११ देवगन्दगी, वम्यात्मवानप्रसारकममा १९०५] ७६५-२९
परिशिए (३) परिशिष्ट (३) भीमद् राजपन्द्रक विशिष्ट शबोंकी वर्णानुक्रमाणका पति पृष्ठ पक्ति मार पृष्ठ ४ ३५ मानरपन १ ५ १८ -(मम मात्र) जवाबी मममम :: 14 २८५ १७ मनापास्नी ५४१ २८१ ११ . om m५ पाकमार ७ भानरमाचीतीची ११ om .. भाग (प्राय) ७४ भानरमापक भासमीमाज माप ५} २८ १९ मार समस्यमयटक ईख (बिमीर) ४ रतपमान २ १ . ५४ (७ १ 117 ०५५ १२ २॥ 11
भीमर पवन
]
हम परदेशी पसी साधु, और देश के नाहि रे। [
२२९-३
हिंसा रियो (ए) पम्मो (म्मे ) भारस दोप (स) विरहियो (पमिए) देवो (के)।
निम्मधे पायगे सरमे ()() सम्मत (प)
[पमापताविसमा पक्षप्राप्त ९०, १९७]
६१६-०
[मकिनावमगतमामवरण वानीवनमतिपमपमम् । ]
क्षणमपि मनसगतिरेका मपति भवार्णवतरमे मौका | मोहमदर -शुक्राचार्य] २.१-१
भापोपशमिक संम्प सायक एक मनाप (बनुष)।
[बप्पामगीता १-६१. ११ देवचन्दगी, बम्पत्यानप्रसारकममा १९७५] ७६५१६