Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Sanchar

Charles A. Marshall · 2011/03

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संचार
CIFTED BY
KAJA RAMMOHAN ROY
LIBRARY FOUNDATION
CALCUTTA70006R

नालन्दा पुस्तक सदन, बी-34 पश्चिमी विनोदनगर, मंडावली, दिल्ली-110092

UH
table transmitter-receiver equipment in usc on board the vessel Sharb at
Southampton.

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मानव संसाधन विकास मंत्रालय (शिक्षा-विभाग) भारत सरकार द्वारा स्वीकृत
संचार
चार्ल्स ए. मार्शल
पृथ्वी

केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय (शिक्षा मंत्रालय) द्वारा
प्रकाशकों के सहयोग से कार्यान्वित योजना के अन्तर्गत स्वीकृत।
अनुवादक
डा. सत्यप्रकाश
पुनरीक्षक
के. एन. दुबे
मूल्म
पचास रुपये (50.00)
संस्करण
पहला: 1990
नालन्दा पुस्तक मदन,
मी- पश्चिमी विनोदनगर, मंडावली
दिल्ली-110092
मुहर
गटगं, पारि० नई दिल्ली-11002
Communication
by Charles A. Marshall
Rs.501-

दो शब्द हिन्दी के विकास और प्रसार के लिए शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के तत्वावधान में पुस्तकों के प्रकाशन की विभिन्न योजनाएं कार्यान्वित की पा रही है। हिन्दी में अभी तक ज्ञान-विज्ञान के घेत्र में पर्याप्त साहित्य उपलब्ध नहीं है, इसलिए ऐसे साहित्य के प्रकाशन को विशेष प्रोत्साहन दिया जा रहा है। नश्पों को सामने रखते हुए को योजनाएं बनाई गई है, उनमें से एक योजना प्रकाशयों के सहयोग से पुस्तकें प्रकाशित करने की है। इस योगना के अधीन भारत सरकार प्रकाशित पुस्तकों की निश्चित संख्या में प्रतियां खरीदकर उन्हें मदद पहुँचाती है। प्रस्तुत पुस्तक रसी योजना के अन्तर्गत स्वीकृत है। पुस्तक में विज्ञान के अन्वेषकों का जीवन-धृत्त एवं उनकी उपलब्धियों को सरल भाषा एवं रोचक शैली में प्रस्तुत किया गया है। इसके अनुवाद और कापीराइट इत्यादि की व्यवस्था प्रकाशक ने स्वयं की है तथा इसमें शिक्षा मंत्रालय द्वारा स्वीकृत शनायली का उपयोग किया गया है। हमें विश्वास है कि शासन और प्रकाशकों के सहयोग से प्रकाशित साहित्य हिन्दी को समृद्ध बनाने में सहायक सिस होगा और साथ ही इसके द्वारा ज्ञान-विज्ञान से समन्धित अधिकाधिक पुस्तकें हिन्दी के पाठकों को उपलब्ध हो सकेंगी। आशा है यह योजना सभी क्षेत्रों में उत्तरोत्तर लोकप्रिय होगी। - 하라리스 केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार, नादिस्ती (गोपाल शर्मा) निदेशक

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विषय सूची
1. पृथ्वी के चारों ओर ध्वनि संचार.
2. वायु में
3. सूचनाओं का संचरण कैसे किया जाता है.
4. संकेत और शोर
5. टेलीविजनः आज और भविष्य में,
6. अन्तरिक्ष में संचार
7. संचार सेवा में रोजगार
8. पारिभाषिक शब्दावली (हिन्दी-अंग्रेजी).
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SI
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...1: गेटविक हवाई अड्डे पर मार्कोनी रेडार एरियल। हवाई जहाज का पता लगाने वाला एक 'टोहक'। यह उपकरण अड्डे पर आने वाले हवाई जहाजों का अल्प और दीर्घ परास दोनों प्रकार से नियंत्रण के लिए प्रयुक्त होता है। . 2. संदन हवाई मरे का नियंत्रण कक्षा यावावनिक मापरेटर पावरफ बैठे हैं और उनका ये हवाई जहाज के साथ रेटिमो द्वारा संप है। रेगर आपरेटरमाईमरे के राम आने वाले हवाईजहागेकोरेगररसारस्तेहए नियाई पा रहे है, मातरफ दाता परित धावन पप पर रोशनी शनि है।

3. विस्रो हपाई बडे पर रेडारचित्रण एकका हवाई जहाज की गति इन स्क्रीनों पर सावधानी से अंकित की जाती है, और पाइसर को आदेश भेज दिए जाते हैं। Tara 4. टेलीप्रिंटर सूचनाएं हवाई अड़े का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। तार इस तरफ ग्रहण किया जाता है। यह लड़की छपी सूचनाओं को खाली फार्म पर चिपका रही है।

5. हवाई मढे के अग्निशामक उपकरणों में इस प्रकार का रेडियो उपस्कर होता है। यह पित्र गामी 'अन्दर से लिया गया है। 6. समेट के नियंत्रण फध में। सब बड़े हमाईजहाजों में अल्प और दरपरास रेडियो होता है मार रेरियो नीचालन के लिए जटिल उपस्कर होते हैं। उनमें प्रापः उपकरण उतारने की एपिता और रेगर भी होते हैं।

7. रगयी रेडियो स्टेशन का एक प्रेक्षण का। इसमें यथित है और इन सब का नियंत्रण इसी भवन में स्थित नियंत्रण कक्ष से किया जाता है। सभी मवाप्य और प्रेषित्र के विभिन्न भाग घातु की चादरों से ढके हैं। एक याधुनिक प्रेषण केन्द्र में वास्तव में देखने योग्य कुछ भी नहीं होता। 8. (ऊपर दाएं) आयनमंडल के व्यवहार के बारे में रेडियो अनुसंधान रेडियो चित्रण तंत्र से किया जाता है। यह चित्र उपस्कर की एक कंपोड किरण नलिया से लिया गया था और स्पष्टता के लिए उसके ऊपर एक नकशा भी उतार दिया गया है। केन्द्र पर स्थित प्रेषित्र में एक घूमता हुआ एरियल है जो संकेतों के उत्स्फोट प्रसारित करता है जो आयनमंडल से टकराकर वापिस पृथ्वी पर आते हैं।संकेत का कुछ अंश पृथ्वी से प्रकीर्णित होकर अपने मूल पप पर पापिस जाकर केन्द्र पर रखे ग्राहित्र में चला जाता है। काले धब्ये पृथ्वी के तल के वे भाग है यहाँ से संकेत परावर्तित होकर आयनमंडल द्वारा आते हैं अम इंजीनियर यह पता लगा सकते हैं कि मापनमंडल दिन के विभिन्न समयों पर किस प्रकार का व्यवहार करता

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होनाल्ड कैम्पभेल रिफाई कायम करने वाले सूमई (Blubird) में प्रयुक्त होने वाला चार अति उच्च भापति रेडियो। इस उपरकर से फैम्पपेल, प्लूम की पारी मात्रा के दौरान अपने मुख्य मैकेनिक से यात फरता रहा था। पित्र में मारभिक माप का रेडियो उपस्कर दिशाया गया है ।। आइल ऑफ मैन T.T. दीया एक अधिकारी अपनी मोटरसाइकिल पर लगे पसरेशियो . उपाकर या प्रयोग कर रहा है।

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12. मूनिवर्सिये कानिज लंदन में खोखेले योन नलों में ये एक प्रमर के तरंग गाइड
(Wavrguide) है,रेडियो तरंगों के संचरण पर वनुसंधान हो रहा है। नतदाएं हाथ की
दीवार से होकर जाते हैं, और परीक्षा उपकरण तरंग गाइडकीकार्यकुशलतादर्शाता है।
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the test

13
तार गमने वाले जहाज में समुद्री तार चढ़ाना। बहुत सावधानी रखनी पड़ती है कि उसमें
यहीं मरोड़या गानें न पा जाएं। तार गलते समय उसकी बराबर जांच की जाती रहती है
कि यह कहीं टूटा न हो।

है
Averay
14. यह नया टेलीफोन यंत्र जल्दी ही काम में आने लगेगा। यह पहले मॉडलों से कई बातों में
अच्छा है।
--
15. एक बार टेलीफोन पर कोई नयर घुमाते हैं तो कभी कभी यह जरूरी हो जाता है कि
मानित टेलीफोन केन्द्र में विपुतीय पदों को इस प्रकार के पीर यम के ऊपर
मापनेक्षित कर लिया जाये। महम यास्तव में एक तेज धारा बामा टेपरिकार है।
मुंबकीय मेप डम के सिरे पर होता है। यह म्पक्ति ड्रम पर घुनकीय सी (Magnetic
heads) को व्यवस्थित कर रहा है।

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-
ELES
17. 'टेप पर टैमीविजन भमिसेधन। पह एम्पैक्षा उपस्कर टी पी पित्र के विपुतीय रिक्षा
मभिनेधित करता है और उन्हें तुरंत ही पुनःप्रति किया जा रास्ता है। टेप को मिटाकर
पुनः काम में पाया जा सकता है।

... "III,XIX.One of the many uses of industrial teleton is to help in traffic control. ABOVE. A t.v. ever in the police officer's kiosk shows him traffic Ich he could not normally see approaching round errow bend. RIGHT. At.v. camera covering one of the streets hidden from his view, औधोगिक टेलीविजन के कई उपयोगों में से एक उपयोग यातायात नियंत्रण का है। ऊपर पुलिस अफसर के कदा में रखे एक टीवी ग्राहिय से यह उस यातायात को देख सकता है रिसे मोड़ पर होने के कारण यह सामान्यतः नहीं देख सकता था। दायें टीवी कैमरा से वह गली दिसाई दे रही है जो आड़ में छिप गई थी।

20. एक यंद परिपप टीवी की सहायता से एक पहिया निलंबक (Wheel Suspension) के कार्प की जांच करना। बीच का चित्र प्रयोगशाला की मिल्डिंग में टेलीविजन के स्क्रीन पर प्राप्त हुमा है। भवन और एरियल कार के पीछे दिखाई पड़ रहे हैं। AMIN 44 mins स, इरा व्यक्ति के पास संपूर्ण टेलीविजन प्रेषित और एक कैमरा है। यह स्वयं पूर्ण रेट्रियों से षमता है और इसमें का प्रेषित्र प्रयुक्त होते हैं। सूचना और खेमबद से संवाददाताओं के लिए इस प्रकार का उपस्कर महे महत्व का है।

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24. एक तीन नलिकाओं वाला रंगीन टी वी कैमय, एक नलिका लाल के लिए, एकहरी फेलिए मोर एक मीली के लिए है। पर ये रंग एक साप किसी पर्दे पर पड़ते हैं तो एक पूर्ण रंगीन पित बन जाता है। 25. जैसा कि आप इस चित्र में देख रहे हैं रंगीन टेलीविजन का ग्राहित्रपदा नटिल होता है। यह प्रायोगिक मारल प्रयोगशाला में नएपसियों और युक्तियों की जांच के लिए है। ग्राहिये बाजार में बिक्री के लिए रखने से पूर्व इस प्रकार का बहुत अनुसंधान करना पड़ता है।

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यह छोटा और हल्या उपग्रह-प्रेषित्र दानिस्टरों की महापता से ही बनाया जा सका।
अन्तरिक्षा में उपस्कर भेजकर सुचना प्राप्त करने की एक सबसे बड़ी समस्यामानी
27. पहले रूसी उपग्रह स्पूतनिक पपप से संदेशाधयिका रहे।ऐतिमान
अक्टूबर 1957 में हुई थी। इंग टैट्सपरवाह केन्द्र समापीपतिदेचारे
26
उपकरणों को हल्का मनाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
.....
सन्संधान यरने वाले संसार केमिफसे केन्द्रों में से एक है।
........
~
'

I पृथ्वी के चारों ओर ध्वनि संचार जब आपको डाक्टर की जरूरत होती है तो आप सब से समीप के टेलीफोन पर जाते हैं। यदि कोई मुक्केबाजी का अन्तर्राष्ट्रीय मैच हो रहा है तो आप रेडियो पर उसका आँखों देखा हाल सुनते हैं। यदि मंत्रिमंडल बैंकॉक स्थित अपने राजदूत को कोई सूचना भेजना चाहती है तो बीजांक के रूप में एक केनल भेजती है। पार ऐटलाण्टिक टेलीफोन की सहायता से ज्यूरिक का एक व्यापारी न्यूयार्क के एक बैंक से संपर्क स्थापित कर सकता है। दक्षिणी अमरीका में एक क्रांति होती है और यूरोप के पत्रकार अपने दफतरों में सुरक्षित बैठे बैठे ही दोनों पक्ष के नेताओं से बातचीत कर सकते हैं। मास्को में प्रदर्शित बैले नृत्य को बाकी यूरोप के निवासी टेलीविज़न की सहायता से देख सकते हैं। शंझा में नष्ट कोई जहाज रेडियो से आपातकालीन संकेत भेज सकता है। पुलिस का दस्ता को चोरी की हुई कार दिखाई दे जाती है वह अपने मुख्यालय को खबर देता है और उसका पीछा शुरु हो जाता है। हवा ध्वनियों से भरी पड़ी है। न केवल हवा बल्कि केबिल भी जो पृथ्वी के तल पर और खंबों पर, भूमि के नीचे और समुद्र के नीचे मकड़ी के जाल की तरह फैले हुए हैं। विद्युत्-संकेत लगभग प्रकाश के वेग से चलते हैं--पृथ्वी का एक चक्कर एक सेंकड के सातवें भाग में पूरा कर लेते हैं और चित्रों, संगीत, वाणी और कूट (code) का प्रेषण करते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनका अपने साथियों के साथ संबंध केवल रेडियो से ही होता है-जैसे दूर उत्तर के एकाकी वासी या दूर दक्षिण में गवेषक तथा रेगिस्तानों, जंगलों और पहाड़ों में तेल और खनिज पदार्थों की खोज में संलग्न अन्वेषक। टेलीफोन और तार व्यवस्थाओं के बिना कार्य तो एकदम रुक ही जाएगा। यह पुस्तक आधुनिक संचार से संबंधित है जिसका अर्थ है कि इसका संबंध दैनिक उपयोग की चीजों से काबिल और रेडियो तरंग द्वारा संचार-और भविष्य में प्रत्याशित चीजों से है जैसे कि रंगीन टेलीविज़न, यांत्रिक धनियाँ और उपग्रह रेडियो रिले। मैं यहाँ आपको विस्तार से यह बताने का प्रयत्न नहीं करूंगा कि प्रत्येक 'जुगत' किस प्रकार कार्य करती है जब तक आप स्वयं ही उन्हें बनाना न चाहें तब तक आपको यह जानने की आवश्यकता भी नहीं है। मैं यहाँ आधुनिक ..

संचार की मुख्य मुख्य बातें बता देना चाहता हूँ ताकि आप टेलीफोन और रेडियो इंजीनियरों के सामने आने वाले कुछ सुअवसरों और कठिनाईयों को समझ सकें। संभवतः जब आप आज से बीस-तीस साल बड़े हो जाएंगे और फिर 1960 पर विचार करेंगे तब आप महसूस करेंगे कि उस समय की संचार विधियों कितनी घटिया थीं। इस समय संसार की समस्त सूचना वाहिकाओं (channels) में से अधिकांश भाग यूरोप, उत्तरी अमरीका, और रूस में ही हैं। दक्षिण के बड़े बड़े प्रदेश इस दृष्टि से पिछड़े ही हैं और इन प्रदेशों में जहाँ का क्षेत्र पहाड़ों, जंगलों और सड़कों की कमी के कारण और भी दुर्गम है वहाँ संचार की आधुनिक विधियों की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए अति उच्च आवृत्ति (v.h.) रेडियो जो ब्रिटेन में उच्च कोटि के रेडियो प्रसारण में प्रयुक्त होता है इन प्रदेशों में आवश्यक टेलीफोन सेवाओं के लिए प्रयुक्त किया जाता है। और हमारे लिए उपयुक्त संचार सेवा उपलब्ध है इसलिए हम और भी अच्छी चीजें प्राप्त करने की आशा कर सकते हैं जैसे आस्ट्रेलिया में हो रहे मैच का रंगीन टेलीविज़न पर आखों देखा हाल या ऐसा टेलीफोन तंत्र जिससे आप समुद्र पार सीधे ही डायल घुमाकर बात कर सकते हैं और शायद टेलीवीज़न-टेलीफोन भी। विद्युतीय संकेतन का कार्य वड़ा रोचक और मन लगाने वाला है क्योंकि बड़ी बड़ी दूरियों यहाँ तक कि मंगल तक शब्दों और चित्रों को प्रेषित करने के अतिरिक्त इस से मानव मात्र की भलाई भी हो रही है। 10 II वायु में आधुनिक संचारों में उपयोग में लाए जाने वाले उपस्कर के विभिन्न प्रकारों के बारे में जानकारी प्राप्त करने का एक सबसे अच्छा ढंग एक व्यस्त हवाई अड्डे पर अन्दर जाकर देखना है। लंदन से 20 मील दक्षिण में स्थित 1958 में चालू होने वाले गेटविक हवाई अड्डे पर कार्य करने वाले इंजीनियर इस बारे में गर्व का अनुभव करते हैं कि उनके पास संसार का सब से अद्यतन संचार तंत्र है। हवाई अड्डे के संचार का मूल उद्देश्य बहुत सरल है : यह उद्देश्य हवाई उड़ानों में समय की पाबंदी और सुरक्षा लाना है। अगर आप किसी ऊंचे उड़ते हुए हवाई जहाज़ की तरफ देखें तो वह विशाल आकाश में केवल एक छोटा धब्बा सा ही लगता है। फिर भी हवाई जहाज़ों की टक्कर हो सकती है और ऐसा प्रायः होता भी है। हवाई यातायात का पुलिसमैन भूमि पर ही रहता है : वह हवाई यातायात नियंत्रक है जो आस पास के सारे हवाई जहाज़ों की गति को एक रेडार पर्दे पर देखता रहता है और उनकी परस्पर टक्कर को रोकने के लिए उन्हें संकेत देता रहता है। फिर भी उसे यह सब आवश्यकता से अधिक नहीं करना चाहिए। हवाई जहाज़ किसी उद्देश्य से उड़ते हैं और उसे उन्हें अधिक से अधिक तब रोकना चाहिए अथवा निर्धारित मार्ग से विचलित करना चाहिए जब अत्यावश्यक हो। सब से सुरक्षित और सरल विधि यही है कि एक समय में एक ही हवाई जहाज़ उड़ान भरे परन्तु ऐसा करना बेवकूफाना होगा। यहाँ इलेक्ट्रानिकी और संचार विधियाँ हमारी सहायता करती हैं। उससे हवाई जहाज़ की स्थिति के बारे में विश्वस्त और सही सही जानकारी प्राप्त हो जाने से (और नियंत्रक का वायुयान-चालक से निश्चित और जल्दी सम्पर्क होने की सुविधा से) हवाई अड्डे पर बहुत संख्या में और सब दिशाओं से आने वाले हवाई जहाज़ों का नियंत्रण करने में आसानी रहती है। गेटविक पर अनेक प्रकारों के यातायात को संभालना होता है। वहाँ की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि बिना किसी गुलगपाड़े और मेहनत के, हवाई अड्डे पर सामान्यतः आने वाले कम दूरी के तथा माल ढोने वाले हवाईजहाज़ों और लंदन हवाई अड्डे पर मौसम खराब होने पर जो कई प्रकार के भारी तथा लंबी दूरी के 1 हवाई जहाज़ गेटविक भेज दिए जाते हैं,उन सब का एक दैनिक कार्य के रूप में नियंत्रण किया जा सके। अभी आगे में जिन विभिन्न उपस्करों का उल्लेख करूंगा उनको समझने के लिए,उन्हें पहले हम हवाई अड्डे की एक ऐसे जानदर के रूप में कल्पना करें जिसे अपने झोल में विभिन्न दिशाओं से आने वाले हवाई जहाजों को एकत्रित करना है। सब से पहली चीज यह है कि यहाँ 'टोहक' यंत्र (feelers) होने चाहिए जिससे यह पता लगाया जा सके कि वायुयान कहां है। यह कार्य ऐसे रेडार ऐरियलों से संपन्न होता है जो लगातार चारों दिशाओं का चक्कर लगाते रहते हैं और रेडियो तरंगें प्रस्फोट छोड़ते रहते हैं जिससे आकाश में यदि कोई वस्तु हो तो उसका पता लग सके। यदि इन तरंगों के रास्ते में कोई चीज़ पड़ जाती है तो वो तरंगें परावर्तित होकर पुनः एरियल पर आ जाती हैं और इस तरह वायुयान का पता लग जाता है। हवाई अड्डे से विमान चालकों से बात करना, उनका नियंत्रण करना, टक्करों को रोकना और उन्हें उतरने की अनुमति देना भी संभव होना चाहिए। ये कार्य रेडियो टेलीफोन द्वारा किए जाते हैं। ऐसे साधन भी होने चाहिएं जिससे उतरते हुए हवाई जहाज़ों को धावन पथ (runway) की सीध में आने में सहायता की जा सके। मौसम साफ होने पर विमान चालक धावन पथ को काफी दूर से देख सकता है (रात को बतियों के प्रकाश से देख सकता है) परन्तु मौसम धुंधला होने पर वह धावन पथ को जमीन छूने से कुछ सेंकड पहले ही देख सकता है, इस में भी रेडियो की सहायता की आवश्यकता होती है।. परन्तु यहीं इसका अन्त नहीं है। रेडियो यातायात नियंत्रक अलग-थलग बैठा अकेला नहीं होता। हवाई अड्डे के अन्य अधिकारियों से अन्य हवाई अड्डों से, तथा हवाई अड्डे से बाहर भी- जैसे फायर ब्रिगेड और अस्पताली गाड़ी सेवाओं से क्योंकि उनकी जरूरत कभी भी पड़ सकती है-उसका संपर्क होना जरूरी है। अतएव संकेतों द्वारा संपर्क सारे हवाई अड्डे और सारे संसार भर से भी बना रहता है। यदि आप एक यात्री के रूप में गेटविक हवाई अड्डे पर से गुजरें तो आपको सिर्फ कुछ एरियल ही दिखाई पड़ेंगे। उनमें सब से प्रमुख दो अन्वेषी रेडार होंगे। इन में से एक बहुत यथार्थ होता है और दूसरा हर मौसम में कार्य करने वाला उपस्कर होता है जिसपर वर्षा और धुंध का भी कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता। एक तीसरा रेडार 'परिशुद्ध पहुंच रेडार' (pricision approach radar) होता है जिसकी सहायता से नियंत्रक खराव मौसम में उतरने वाले वायुयानों का तब तक मार्गदर्शन करता रहता है जब तक कि वे धावन पथ के ठीक पास तक न आ जाएं। संचार 12 रेडार वास्तव में एक संचार-तंत्र (communications system) नहीं है क्योंकि उसे सूचना भेजने के कार्य में नहीं लाया जा सकता। इसलिए मैं यहाँ उसका और अधिक वर्णन नहीं करूंगा। मैंने उसका उल्लेख यहाँ इसलिए किया है कि वायु यातायात नियंत्रण में वह इतना महत्त्वपूर्ण है। अन्य दिखाई देने वाले एरियल उपकरण अवतरण पद्धति (instrument landing systems of il.s.) के होते हैं। इस युक्ति से भी विमान चालक को धावन पथ तक सुरक्षित रूप से तथा शीघ्र पहुंचने में सहायता मिलती है। परन्तु यह एक स्वचालित तंत्र होता है-इसमें नियंत्रक को विमान चालक के साथ बात करने की जरूरत नहीं पड़ती। इसमें दो मुख्य एरियल होते हैं एक तो विमान चालक को (या संवभतः उसके स्वचालित विमान चालक को) यह संकेत करता है कि यह अधिक ऊंचाई या नीचाई पर है और दूसरा उसे इस बात का संकेत करता है कि वह मार्ग से दायें या बाएं को विचलित हो रहा है। इन दोनों एरियलों की कार्यविधि इस प्रकार है :- ये दोनों वायुयान की तरफ एक एक रेडियो किरण पुंज भेजते हैं जो तनिक सी तिरछी परन्तु एक दूसरे पर चढ़ी हुई होती हैं। जिस रेखा पर दोनों किरण पुंजों की प्रबलता समान होती है वायुयान को उसी रेखा पर होना चाहिए। यदि उनमें से एक अधिक तीव्र हो तो वायुयान के स्वचालित उपकरण यह निर्दिष्ट कर देते हैं कि वायुयान अपने उपयुक्त पथ से इधर उधर है। (वित्र 1) 'अवतरण पद्धति एक प्रकार से रेडार और सामान्य रेडियो संचार त है। यह हवाई जहाज़ को सरल प्रकार की सूचना भेजता है। अन्य के बीच सही 3 पप --- दो एक दूसरी पर चढ़ी रेडियो किरण पुंज धावन पप धावन द्रीय रेया पप कै . सही उड़ान पथ साथ जमीन से लगने का स्थान केन्द्रीय रेखा चित्र | उपकरण उतारने वाला तंत्र! सबसे ऊपर हवाई जहाज दो रेडियो किरण पुंजों के बीच में मही मार्गदर्शक पथ पर उह रहा है। नीचे वाले चित्र में भी हवाई जहाज योमरी ममान किरण पुओं द्वारा धावन पथ की केन्द्रीय रेखा पर रखा गया है। पायु में 13 रेडियो नौचालन यंत्र (या इंजीनियरी की जटिल भाषा में जिन्हें नैवेड्स-नौयंत्र कह सकते हैं) भी होते हैं जो उ.अ.प. से कहीं अधिक परास तक कार्य कर सकते हैं। उनमें से एक डेका (Decca) कहलाता है जिसमें हवाई जहाजों का सैंकड़ों मील तक मार्गदर्शन करने के लिए रेडियो प्रेषित्रों की श्रृंखला बनी होती है। हवाई जहाज़ में रखा उपस्कर श्रृंखला के विभिन्न केन्द्रों से आने वाले संकेतों की तुलना करता है और एक स्वचालित कलम के द्वारा हवाई जहाज की गति एक चार्ट पर अंकित हो जाती है ताकि विमान चालक उसे देख सके। डेका का एक बहुत लये परास में प्रयुक्त होने वाला रूप डेक्ट्रा (Dectra) है जो हवाई जहाजों का एटलान्टिक जैसे महासागरों के पार तक मार्ग दर्शन करता है। हवाई अड्डे पर लगे संस्थान पर पुनः विचार करते हुए हम उन विभिन्न विधियों पर विचार करेंगे जिनसे उपयुक्त सूचनाएं संचारित की जाती हैं। हवाई जहाज का भूमि के साथ संपर्क स्थापित करने के लिए अति उच्च आवृत्ति (very high frequency) के रेडियो प्रेषित्र और ग्राहित्र होते हैं। इस बारे में काफी सावधानी रखी जाती है कि किसी चीज के खराब हो जाने के कारण हवाई अड्डे का रेडियो संबंध याहरी दुनिया से न टूटे। सारे प्रेषित्र और ग्राहित्र सेट दो-दो की संख्या में रखे जाते हैं और प्रेषण और ग्रहण एरियलों के साथ विभिन्न मार्गों से जाने वाले दो-दो तारों के द्वारा उनको जोड़ा जाता है यदि एक खराब हो जाए तो भी दूसरा चालू रहे, यदि सार्वजनिक विद्युत् सप्लाई बंद हो जाए तो हवाई अड्डे के विद्युत् जनित्र अपने आप ही भार संभाल लेंगे और इस बारे में नियंत्रक और विमान चालक को पता भी नहीं चलेगा कि कुछ गड़बड़ हुई है। नियंत्रक, प्रेषक स्तंभ (Transmitting Tower) से दो मील दूर नियंत्रण स्तंभ में बैठा रेडार चित्रों को देखता रहता है, परन्तु वह जब भी चाहे केवल अपने पैर से एक पैडल दबा कर और अपने माइक्रोफोन में बोला कर विमान चालक से बात कर सकता है। अपने एक ईयरफोन (earphone) से उसका संपर्क रेडियो ग्राहित्र से बना रहता है और दूसरे के द्वारा हवाई अड्डे के टेलीफोन केन्द्र से संपर्क रहता है। इस प्रकार नियंत्रक उस हवाई जहाज़ की दिशा देख सकता है जो उससे संपर्क स्थापित कर रहा है। एक स्वचालित दिशा-बोध एरियल रहता है जिससे एक डायल पर वायुवाहित प्रेपित्र के संकेत आते रहते हैं। नियंत्रक और पाइलेट के बीच होने वाली बात चीत का एक एक शब्द एक चुंबकीय टेप रिकार्डर पर अभिलेखित होता रहता है। यह इसलिए होता है कि यदि बाद में कभी संदेह हो कि उनमें से किसी एक ने क्या कहा था तो प्रमाण मिल जाय। दुर्घटना के बाद तो यह बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। संचार हवाई अड्डे पर पल से वायु के साथ संपर्क स्थापित करने वाले समस्त उपस्कर की देख रेख एक प्रदर तकनीकी अधिकारी करता है जो उपस्कर कक्ष में बैठा रहता है और जहाँ सूचकों से उसे पता चलता रहता है कि सब कुछ सुचारु रूप से चल रहा है या नहीं। हवाई अड्डे के कर्मचारियों के बीच और हवाई अड्डे और बाहरी दुनिया के बीच संचार कई विभिन्न तरीकों से होता है परन्तु मुख्य रूप से मौखिक सूचनाओं के लिए स्वचालित टेलीफोन केन्द्र होता है और लिखित सूचनाओं के लिए इलेक्ट्रानीय संकेत होते हैं। हवाई अड्डे और यहाँ क्रियाशील हवाई यातायात कंपनियों के कार्य में लिखित सूचनाओं का बड़ा महत्त्व होता है। इलेक्ट्रानीय संकेत केन्द्रों पर टेलीप्रिंटर चालक कार्य करते रहते हैं टेलीप्रिंटर टाइपराइटर की ही तरह के होते हैं पर उसमें जब आप एक कुंजी दबाते हैं तो उससे अपने आपएक तार के जरिए स्पन्दों की एक श्रृंखला दूसरी मशीन तक संचारित हो जाती है जो संभव है दसियों हजार मील की दूरी पर हो और वहां पहुंचकर शब्द छप जाता है। आजकल कुछ हवाईजहाजों में टेलीप्रिंटर लगे होते हैं और वे रेडियो की सहायता से अक्षर-स्पन्द प्राप्त करते हैं। गेटविक पर टेलीप्रिंटर संकेत लंदन हवाई अड्डे अथवा न्यूयार्क और बेरूत जैसे दूर के स्थानों से भी क्रायोडन के अन्तर्राष्ट्रीय सिविल विमानन केन्द्र से होकर आते हैं। जैसे जैसे वे आते हैं वे एक चुंबकीय ड्रम पर अभिलेखित होते रहते हैं। मान लीजिए कि चैनल द्वीप समूह से किसी हवाई कंपनी के लिए एक सूचना आरही है कि एक हवाई जहाज देर से आ रहा है और उस सूचना की एक प्रति नियंत्रण स्तंभ को जानी है। इसके लिए चालक केवल एक उपयुक्त बटन दवा देता है। फलस्वरूप सूचना चुंबकीय ड्रम से पुनः हवाई कंपनी के दफतर और स्तंभ में रखे हुए टेलीप्रिंटरों तक पहुंच जाती है। फिर भी हवाई अड्डे पर हर किसी के पास अपना अलग से टेलीप्रिंटर नहीं होता। परन्तु जो भी टेलीप्रिंटर द्वारा सूचना भेजना चाहता है जैसे मौसम-प्रेक्षक, तो उसका संपर्क एक लैम्सन वायु-नली तंत्र (Lamsonair-tube system) की सहायता से टेलीप्रिंटर चालक से कर दिया जाता है। मौसम-प्रेक्षक अपनी सूचना कागज़ के एक टुकड़े पर लिख कर उसे एक छोटे से धारक में लगा देता है जो नली में ठीक कस कर आता है। यह टुकड़ा वायु चूषण की सहायता से खिंच कर टेलीप्रिंटर तक चला जाता है। जब गेटविक पर कोई हवाई जहाज पहुंचता है तो उसे यातायात भवन के समीप कंक्रीट के बने फर्श पर स्थान का आबंटन करना होता है। यह उस अड्डे के नियंत्रक (Terminal controller) का कार्य होता है। उसे अपनी सूचना - 15 18 टेलीप्रिंटर के द्वारा रेडियो मानीटरों से मिलती है जो विमान चालक और हवाई यातायात नियंत्रकों के बीच होने वाली सारी बात चीत को सुनता रहता है। अड्डे का नियंत्रक ही यह निश्चित करता है कि प्रत्येक आने वाले हवाई जहाज को कहाँ कहाँ भेजना है। और वह एक "टेलीटेंप चित्र" की सहायता से अपना निर्णय हवाई यातायात नियंत्रक को भेज देता है। यह एक ऐसा उपकरण है जिसमें कागज का लिपटा हुआ एक फीता होता है। वह फीते पर लिख देता है और उसके शब्द नियंत्रण स्तंभ में रखे हुए उसी प्रकार के फीते पर अंकित हो जाते हैं। अड्डे के नियंत्रक का संबंध एक रेडियो (चलता फिरता रेडियो) द्वारा उस व्यक्ति से भी रहता है जो कक्रीट के फर्श पर खड़ा रहता है और वहाँ भूमि पर चले आ रहे विमान के चालक का पथप्रदर्शन करता है। थल पर अन्य चल रेडियो संपर्क संचार अनुरक्षण इंजीनियरों, (communication maintenance Engineer) हवाई अड्डे की पुलिस और हवाई अड्डे के आग बुझाने वालों से बने रहते हैं। गेटविक पर संचार की संपूर्ण व्यवस्था एक रेखाचित्र (चित्र 2) द्वारा दिखाई गई है। संचार की एक विधि केवल इसमें नहीं दिखाई गई है और वह ऐसी है जिससे सभी यात्री सीधे ही परिचित होते हैं। वह विधि जनता को लाउडस्पीकर द्वारा सूचना देता है जिससे यात्रियों को जहाज की उड़ान से कुछ समय पूर्व हवाईजहाज पर पंहुचने की सूचना दी जाती है। फिर भी, इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रत्येक हवाई जहाज में भी उपस्कर का एक जटिल तंत्र होना आवश्यक है। बड़े हवाई जहाजों को हवाई अड्डों के साथ संपर्क स्थापित करने के लिए एक अल्प परास वाले अति उच्च आवृत्ति रेडियो के साथ साथ लंबे परास वाले रेडियो और विभिन्न नौसाधनों (navaids) से सूचना ग्रहण करने के लिए कई प्रकार के अभिग्राही उपस्करों की आवश्यकता होती है। यह सब उस हवाई जहाज के रेडार या विशेष अंध अवतरण (blind landing) युक्ति के अतिरिक्त जो वायुयानों में होता है, और वायुवाहित टेलीप्रिंटर और डेका चाों, जिनका मैंने उल्लेख किया है,के अतिरिक्त होते हैं। इंजीनियर हमेशा अपने उपस्करों को छोटा और हल्का बनाने की चेष्टा. करते रहते हैं क्योंकि एक पौंड बजन कम होने का अर्थ है कि हवाई जहाज का भारयोग (payload) उतना ही कम हो जाएगा। इसप्रकार हवाई जहाज की इलेक्ट्रानिकी में हमें उपस्करों के 'लघुकृत' रूप के बहुत अच्छे उदाहरण मिलते हैं। संचार 16 यायु में HOOL,की तार परिपय स्तंभ नियत्रण./ PL- हवाई अड्डे का नियत्रण डेस्क रेडियो टेलीफोन टेलीटेप फैक्म टेलीफोन की TACR VI - दूर नियंत्रित +-बोर्ड -चित्रणा पहुच नियंत्रण डेस्क. रेडियो टेलीफोन ACR VI टेलीफोन की बोर्ड ANI चित्रण हामएयर टेलीफोन परिपथ- एयरलाइन AIS दूर नियत्रण andi मोर्टन एयर, ....- सर्विस लैमसन ट्यूब -दूर नियंत्रित मौसम भविष्यकथन आन्तरिक (रिवार्डर, रेडियो प्रशासन और टेक्नीकल दफ्तरों में स्थानीय टेलीप्रिटर केन्द्र मौसम प्रेक्षक प्रेषण टेलीप्रिटर ग्राही टेलीप्रिंटर सेवा GPO ILS केन्द्र उपस्कर TELS उपस्कर मानीटर चुबकीय रिकार्डर BEA मानकलाइन ACR VIY प्रेषण उपस्कर | आँकड़े रैक आंकडे रैक इलेक्ट्रॉनिक स्टोर इलेक्ट्रानिक मवेत केन्द्र हवाई यातायात ILS लोकलाइजर ISL सर्प पथ JLS मार्कर VDF ACR VI एरियल शीर्ष एरियल शीर्ष GCA यातायात साउथैड लदन फैरीपील्ड अन्तर्राष्ट्रीय सिविल एविएशन केन्द्र (CACC) क्रायोडन लिपेन क्रास चैनल केन्द्र लिपेन हवाई अड्डा प्रेषण केन्द्र अभिग्रहण केन्द्र स्वोडिनेविया और आइसलर कालेइस मध्य पूर्व ली टोकियो परिचमी यूरोप ATC TELS पुलिस उत्तरी अमरीका चैनल दीप अग्नि चल केन्द्र 17 चित्र 2. गेटविक हवाई अड्डे की सचार व्यवस्था का सरल रेखाचित्र-कट्रोल यवर और इलेक्ट्रॉनिक संकेत केन्द्र (परिवहन और सिविल एविएशन मत्रालय और ब्रिटिश कम्यूनिकेशन और इलेक्ट्रॉनिक के सौजन्य से) उपस्कर को हल्का और छोटा रूप देने और उसके साथ साथ उनको आसानी से चालू हालत में भी बनाए रखने की एक अत्यधिक महत्त्वपूर्ण विधि है। यह विधि है कि जहाँ संभव हो बोतलनुमा रेडियो-वाल्वों के स्थान पर ट्रांजिस्टरों का उपयोग किया जाए। ये क्रिस्टलों के बने हुए छोटे छोटे वाल्व होते हैं। ये न केवल आकार में छोटे और मजबूत ही होते हैं बल्कि उनके कार्य करने के लिए बहुत कम बिजली की जरूरत होती है। इसका अर्थ है कि हवाई जहाज़ को अपने साथ जो विद्युत् जनित्रले जाने पड़ते है उनका वज़न भी कम किया जा सकता है। एक आधुनिक हवाई अड्डे को चालू रखने के सीमित उद्देश्य के लिए आवश्यक संचार को देखने पर हमें इस बात का कुछ अनुमान हो गया है कि संचार इंजीनियरों को कितने विभिन्न प्रकार के उपस्करों के साथ कार्य करना पड़ता है। अब हम इस पर जरा विस्तार से विचार करेंगे कि सूचनाएं इस प्रकार से और अन्य विधियों से वास्तव में कैसे प्रेषित की जाती हैं।

III सूचनाओं का संचरण कैसे किया जाता है यदि आपको कोई सूचना प्रेषित करनी हो तो आपके पास दो चीजें होनी चाहिए-एक वाहक और एक वाहक को माडुलित (Modulating) करने की विधि। मैं आपको कुछ सरल उदाहरणों से स्पष्ट करूंगा कि मेरा अभिप्राय क्या है। एक सरल सूचना पर विचार कीजिए-मुसीबत में फंसा कोई आदमी चीख रहा है। यहाँ वाहक चीख की ध्वनि है जो हवा में चलकर आसपास के व्यक्तियों तक जा पहुँचती है। परंतु चीख के संबंध में सबसे महत्त्वपूर्ण चीज यह है कि वह शुरू होती है और समाप्त हो जाती है। इसका अर्थ है "मदद करो"। अब सोचिए कि यदि कोई व्यक्ति हर समय दिन और रात चीखता रहे तो वह कैसा लगेगा। तब चीख का मतलब केवल इतना भर रह जाएगा कि "मेरी बात सुनो,मैं वर्षों तक चिल्लाता रह सकता हूँ।" चीख का शुरु होना और समाप्त होना ही उसे माडुलित करके एक अर्थपूर्ण संकेत के रूप में बदल देता है,जिसका अर्थ होता है मुसीबत। इसी प्रकार, यदि आप अपने मित्र को रात के समय टार्च के प्रकाश से या दिन में धूप को दर्पण के द्वारा परावर्तित करके कोई सूचना भेजना चाहें तो प्रकाश एक याहक का काम करेगा; परंतु यदि आप मोर्स या पहले से तय करे हुए किसी अन्य कूट (code) के अनुसार टार्च को जला बुझा न रहे हों तो आपकी सूचना का कोई अर्थ नहीं निकलेगा। जरा ध्यान दीजिए कि जब कोई अफ्रीकी टाम-टाम (Tom- Tom) द्वारा सूचना भेज रहा हो या कोई रेड-इंडियन अपने केबल से आग के धुए को माडुलित करके संकेत भेजने का प्रयत्न कर रहा हो तो तब भी यही सिद्धांत लागू होता है। - लिखित सूचना को भी आप पेंसिल के निशानों से कागज़ की सफेदी का माडुलन मान सकते हैं। यहाँ कागज़ एक प्रकार का वाहक है। झंडों द्वारा संकेतन का भी इसी प्रकार अर्थ निकाला जा सकता है। जब नेलसन के नाविकों ने उसका प्रसिद्ध संकेत "इंग्लैंड प्रत्येक व्यक्ति से कर्तव्य-परायणता की आशा करता है" फहराया और युद्धपोतों की पंक्ति दो भागों में विभक्त होकर ट्रफालगर में विलयनेवे (Vitleneuve) के जंगी बेड़े पर टूट पड़ी थी, तब उन्होंने "विक्ट्री" नामक जहाज के बरांडल (shrouds) पर पड़ने वाली धूप को रायल नौसेना कूट के रंगीन झंडों की सहायता से माडुलित किया था।

यह तो किसी सीधी-साधी चीज़ को अनावश्यक रूप से जटिल रूप में रख कर समझना प्रतीत होगा परंतु हर प्रकार के संकेतन में यही सबसे महत्त्वपूर्ण विचार है और जब हम विद्युतीय संकेतन की अपेक्षाकृत कम स्पष्ट विधियों पर विचार करते हैं तो यह और भी लाभदायक होती है। विद्युतीय संकेत भेजने का सबसे सरल तरीका यह है कि मोर्सकंजी के साथ एक बैटरी जोड़ दी जाती है और फिर उसे एक लंबे तार के साथ अभिग्राहक सिरे पर स्थित बजर (Buzzer) के साथ जोड़ दिया जाता है। दोनों उपकरणों के भूयोजित कर दिया जाता है क्योंकि भूमि विद्युत की अच्छी चालक है और विद्युतीय परिपय को पूर्ण करने के लिए लौटने वाले तार का कार्य करती है। मोर्स कुंजी केवल एक स्विच है। वाहक बैटरी से आने वाली विद्युत धारा है। कुंजी को ऊपर नीचे करके मोर्स कूट (Morse code) के बिंदु और रेखा बनाकर उसका माडुलन किया जाता है। लंबे समय तक लगातार बज (buzz) होने का अर्थ इसके अतिरिक्त संभवतः और कुछ नहीं होगा कि "मैं तुमसे नाराज़ हूँ" या "मेरी मोर्स कुंजी अटक गई है,काम नहीं कर रही है।" (चित्र 3) लम्बा तार मार्स कुंजी बैटरी गुंजक पृथ्वी भूमिगत धातु की प्लेट चित्र 3 दो स्थानों के बीच में भूमि को विद्युत चालक के रूप में इस्तेमाल करके एक सरल संकेतन तंत्र बनाया जा सकता है। गीली भूमि में धंसी धातु की प्लेटें भूमि से अच्छा संपर्क स्थापित करती हैं। एक अच्छा मोर्स तार प्रेषक काफी तेजी से कार्य करता है-वह प्रति मिनट 25 शब्द प्रेषित और प्राप्त कर सकता है। आजकल तार द्वारा मोर्स टेलीग्राफी का स्थान टेलीप्रिंटर ने ले लिया है। जिसका उल्लेख मैंने पृष्ठ 12 पर किया था। इसकी दर 66 शब्द प्रति मिनट होती है। परंतु अधिकांश कार्यों के लिए टेलीफोन ही अच्छा रहता है। टेलीफोन की सरलतम व्यवस्था में दो टेलीफोन यंत्र, एक बैटरी और उनको जोड़ने वाले तार होते हैं। इसमें भी वाहक विद्युत्धारा ही होती है परंतु इसमें माडुलन बड़ा कठिन होता है। जब आप टेलीफोन पर कुछ बात कहते हैं, तो आपके मुख से निकलने वाली 20 संचार ध्वनि तरंगें माइक्रोफोन की धातु डिस्क में कंपन उत्पन्न कर देती हैं : ये कंपन विद्युत धारा की प्रबलता के माडुलन के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं जे दूरस्थित टेलीफोन की कणिका (Earpiece) तक पहुँच जाते हैं। वहाँ इस धारा से एक दूसरी धातु डिस्क कंपन करने लगती है और उससे आपकी ध्वनि श्रोता के कान तक पुनःनिर्मित होकर पहुँच जाती है (चित्र 4) अगले अध्याय में, मैं इस बारे में अधिक विस्तार से बताऊंगा कि इस सरल संकल्पना का आज के विश्वव्यापी टेलीफोन संबंधों को स्थापित करने में किस प्रकार प्रयोग किया गया है। परंतु अब हम सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण संदेश वाहक अर्थात् रेडियो तरंगों पर विचार करेंगे। रेडियो का पुराना नाम बेतार (वायर लैस) था।यह शब्द बेतार (वायर लैस) टेलीग्राफी से लिया गया था। इस शताब्दी के शुरू में युवा गुलीऐल्मों मार्कोनी, हेनरिक हेर्स के कुछ वर्ष पूर्व की खोज का प्रयोग संदेश प्रसारण करने लगा था। वह खोज यह थी कि स्फुलिंग से एक नए प्रकार की चीज अर्थात् विद्युत टेलीफोन माइक्रोफोन का धातु का मंडलक बैटरी ध्वनि तरंगें विद्युत् टेलीफोन के तार चुम्बक तारों में प्रवाहित ध्वनि चर विद्युत धारा मरों कार्बन के कण चित्र4 टेलीफोन में धातु के तनुपट पर पड़ने वाली तरंगें कार्बन के कगों में कंपन उत्पन्न करती है जो तनपट के पीछे पोड़ी सी जगह में सटे सटे रहते हैं। जब कण कंपन करते हैं तो वे तारों में प्रवाहित होने वाली धारा में विचरण उत्पन्न करते हैं। टेलीफोन की कर्णिका में लगा एक विद्युत चुम्बक इस चर धारा को ग्रहण करता है और उसकी धातु का मंगलक कंपन करने लगता है और पुनः ध्वनि तर उत्पन्न करता है। तरंगे उत्पन्न होती हैं जो प्रकाश-वेग से बहुत दूरी तक जा सकती हैं। मार्कोनी के आरंभिक ट्रांसमीटरों में (धातु के दो टुकड़ों के मध्य) एक अंतराल और विद्युत स्रोत था और जब कभी तार प्रेषक मोर्स कुंजी को दबाता था तो अंतराल में एक स्फुलिंग उस अन्तराल को फांद जाता पा अंतराल के एक भाग को भूयोजित कर दिया जाता था और दूसरे भाग को हवा में लटका दिया जाता था। इसीलिए उसका नाम एरियल पड़ा। सूचनाओं का संचरण कैसे किया जाता है 21 आधुनिक रेडियो प्रेषित्र कितने मित्र हैं। यदि आप किसी बड़े प्रेषण केन्द्र में जावें या आजकल कई टैक्सी गाड़ियों में लगे छोटे प्रेषियों को अंदर से देखें तो आपको वहां कोई स्फुलिग अंतराल नहीं दिखाई देगा और आप यह नहीं समझ पायेंगे कि रेडियो संदेश के प्रेपण में वाल्व और अन्य छोटे छोटे टुकड़ों का क्या महत्व है। फिर भी रेडियो तरंगें प्रसारित करने की विधि मूलतः वही है अर्थात एरियल की तार में एक बार इस दिशा में और एक बार दूसरी दिशा में ऊँची आवृत्तियों पर विद्युत धाराएं पैदा करना। आवृत्तियों का आवर्तन प्रति सेकेन्ड (C/S) में व्यक्त किया जाता है : एक आवर्तन का अर्थ है कि धारा एक दिशा में प्रवाहित होना शुरू होती है फिर पलट कर विपरीत दिशा में प्रवाहित होना शुरू होती है और पुनः पलट कर अपनी मूल दिशा में आ जाती है। विद्युत सप्लाई की मुख्य प्रणाली में धारा का प्रत्यावर्तन यूरोप में 50 साइकिल प्रति सैकिंड और अमेरीका में 60 साइकिल प्रति सैकिंड होता है। परन्तु मुख्य प्रणाली से लाभदायक रेडियो तरंग नहीं निकलती। संकेतन और प्रसारण के लिए इसकी अपेक्षा कहीं अधिक उच्च आवृत्तियों की आवश्यकता पड़ती है। हालाँकि आप उसे नहीं देख सकते परन्तु स्फुलिंग में धारा उच्च आवृत्ति पर बारी-बारी से कभी एक दिशा में और कभी दूसरी दिशा में प्रवाहित होती है। इस क्षेत्र में पहले पहल कार्य करने वालों के पास रेडियो संकेतन के लिए उच्च आवृत्ति प्राप्त करने का यही एक तरीका था। तरंग दैर्घ्य दोनों धाराओं की तरंग दैर्घ्य समान होती है तरंग दैर्य -- अभिग्राहक एरियल धाराएं बनती हैं एरियल से रेडियो तरंगें THum प्रेपित्र विद्युत धारा एरियल में ऊपर इस एरियल में छोटे परिमाण की विद्युत नीचे होती है रेडियो तरंगें प्रेषक एरियल के चारों ओर फैलती हैं। जब ये तरंगें किसी अभिग्राहक एरियल के पास से गुजरती हैं तो उसमें अल्प विद्युत धाराएं उत्पन्न हो जाती हैं। प्रेषित्र और ग्राहित्र पर धारा की तरंग दैर्घ्य समान होता है परन्तु प्राप्त धारा बहुत अल्प होती है। चित्र5. संचार 2 । आजकल रेडियो आवृत्तियाँ 100 हजार C/5 (100 किलोसाइकिल प्रति सैकिंड oric C/S) से 3,00,000 लाख C/S (3,000 मेगासाइकिल प्रति सैकिंड or Mels) तक होती हैं। जव एरियल में विद्युत-धारा किसी उच्च आवृत्ति से आगे पीछे दौड़ती है, तो उसके चारों ओर के स्थान में उसी आवृत्ति की रेडियो तरंगें उत्पन्न हो जाती हैं। इसका अर्थ है कि रेडियो तंरगे ऐसे विद्युत प्रभाव होते हैं जो प्रेषित्र के चारों ओर फैलते जाते हैं और इस प्रकार के होते हैं कि जब वे किसी अभिग्राही एरियल से जा टकराएं तो वे उसमें विद्युत धाराएं उत्पन्न कर देते हैं, पर वे विद्युत धाराएं प्रेषित्र के अन्दर की धारा की अपेक्षा बहुत क्षीण परन्तु उसी आवृत्ति की होती हैं। (चित्र 5) यदि आप प्रेषित्र और ग्राहित्र के बीच के स्थान में रेडियो तरंगों के फैले होने की कल्पना करें, तो आप देखेंगे कि वे सागरतरंगों के रूप में होंगी। जो अभिग्राहक एरियल के पास से गुजरते समय समुद्र के किसी कार्क की भांति धारा को एक दिशा में उठा देती हैं और दूसरी तरफ गिरा देती हैं। दो श्रृंगों के बीच की दूरी तरंग दैर्घ्य कहलाती हैं। रेडियो तरंगें प्रकाश वेग से चलती हैं जो 30 करोड़ मीटर प्रति सैकंड है। यदि कोई प्रेषित्र 3,000 लाख C/S (300 Mc/S) पर कार्य कर रहा हो तो उसकी A 200000 1000000000 आवृत्ति 3000 लास साइकिल प्रति सेकंड --300Mc/s-है 1मीटर तरंग दैर्घ्य आवृत्ति 100 हजार साइकिल "प्रति सेंकड-100 Kc/s है। 3,000 मीटर तरंग दैर्घ्य लगभग 2 मील चित्र 6 तरंग दैर्ध्य और आत्ति। यदि हम रेडियो तरंगो को आकाश में ठहरी हुई मानें तब ऊपर वाले चित्र में जो तरंग है उसके दो श्रृंग या गर्त के बीच की दूरी 1 मीटर हो A पर खड़े होने पर हमारे पास से ! सेंकह में 3000 लाख श्रृंग या गर्त गुजरेंगे। इसलिए हम कहते हैं कि आवृत्ति 3000 लाख प्रति सेकड या 300 Mc/s है। नीचे तरंग दैर्ध्य 3000 मीटर है और आवृत्ति केवल 100 हजार साइकिल प्रति सेंकड है। देखिए कि छोटी तरंग दैर्ध्य पर आवृत्ति कितनी अधिक है और इसका विलोम भी सही है। ये चित्र स्केल के अनुसार नहीं बनाए गए हैं। सूचनाओं का संचरण कैसे किया जाता है 23 - तरंग दैर्ध्य एक मीटर होगी (चित्र 6) 100 किलो साइकल प्रति सैकिंड पर तरंग दैर्घ्य 3,000 मीटर (लगभग 2 मील) होती है; पैमाने के दूसरे सिरे पर 30,000 Mc/s पर तरंग दैर्घ्य 1 सेंटीमीटर (आधे इंच से कम) होगी। चित्र (चित्र 7क, ख, ग) से पता चलता है कि आवृत्ति के सभी भिन्न-भिन्न बैंड, जिनसे आवृत्तियों का रेडियो स्पेक्ट्रम बनता है, आजकल किस प्रकार उपयोग किया जाता है। प्रत्यक्षतः रेडियो इंजीनियर के लिए यह जानना सबसे महत्त्वपूर्ण है कि वह अपने संकेतों को कितनी दूरी तक भेज सकता है, चाहे वे प्रसारण के संबंध में हों, चाहे समाचार प्रेषण के संबंध में । एक हद तक, प्रेपित्र जितना शक्तिशाली होगा और ग्राहित्र अधिक सुग्राही होगा उतनी ही अधिक दूरी तक संकेत को "प्रबल और स्पष्ट" सुना जा सकेगा। परन्तु कुछ अन्य इतनी ही महत्त्वपूर्ण बातें भी हैं जिन पर रेडियो इंजीनियर का कोई बस नहीं है। क्षितिज या उससे थोड़ा आगे तक तो रेडियो-संकेत को भेजने में कोई कठिनाई नहीं होती; दूसरे शब्दों में यदि आप अपने रेडियो के अभिग्राहक एरियल से प्रेपित मस्तूल को देख सकते हैं तो यह बात निश्चित है कि संकेत इनके बीच में चल सकते हैं। यदि दोनों मस्तूलों की ऊँचाई 100 फुट हो तो इसका अर्थ है कि उनके बीच की दूरी 20 मील हो सकती है। व्यावहारिक रूप से आप इससे भी अधिक दूरी तक प्रेषण कर सकते हैं, क्योंकि रेडियो तरंगें कुछ सीमा तक भूमि के साथ-साथ भी चलती हैं और ये,जिन्हें भू-तरंगें कहते हैं, पृथ्वी की वक्रता के साथ-साथ चलती हैं। दुर्भाग्यवश एक वार क्षितिज आ जाने पर वे तेजी से क्षीण हो जाती हैं और 50 मील या उसके आसपास के बाद जाकर बेकार हो जाती हैं। इस प्रकार आप ऐटलान्टिक महासागर के पार या आस्ट्रेलिया तक समाचार कैसे भेजते हैं ? मोटे तौर से यह कह सकते हैं कि जो रेडियो तरंगे भूमि के समीप से नहीं गुजरतीं वे प्रकाश किरणावली की तरह ऋजु रेखाओं में चलती हैं और क्षितिज आ जाने पर वे "पलायन" कर जाती हैं क्योंकि वे पृथ्वी की वक्रता के साथ-साथ नहीं चल सकत । यदि प्रकृति रेडियो इंजीनियर की सहायतान करती तो रेडियो तरंगें सीधी अन्तरिक्ष में चली जाती और लंबी दूरी का रेडियो संचार असंभव हो जाता। पहले रेडियो इंजीनियरों को ज्ञात नहीं था कि पृथ्वी के वायुमंडल में बहुत ऊंचाई पर एक ऐमा प्रदेश है जिसकी सहायता से मारकोनी के ऐटलान्टिक महासागर पार पहले पहल संक्त भेजने के प्रसिद्ध प्रयत्न के समय आकाशीय तरंगें एक दर्पण की तरह टकराकर उममे परावर्तित होकर क्षितिज से दूसरी ओर बहुत - संचार 24 100 लबी दूरी के तार प्रेषण KOS MC/S जहाज अवसायिक 200 20 -मानक आवृत्ति 3004 माडला का रेडियो नियंत्रण 'अव्यावसायिक- जहाज और 400 40 नौचलन सहायता 50 5007-मैराइन सकेत आवृति (दार) टेलीविजन प्रसारण 600 60 700 70 दल रोहयो 800 प्रसारण मीग्यिम तरंग चल रेडियो 9004 ०० E.M. प्रसारण|| rum IMCIS 100MIS-दायुचालन सैडिग एड्म, नाविक और सचार 2 200 मैरान और बच्यावसायिक दापुचालन और मैरान टेलीविजन मैराान सकट आवृत्ति (टेलीफोन) ३ 300 (प्रसारण 75M) .-4 अव्यावसायिक जहाज और 400 तटीय केन्द्र चल रेडियो ८-मानक आवृति 500 उपस्कर उतारने घातर अभावमाविक और -वाय नौचालन 5 J टनीविन (प्रसारण 491) 6 600 बायुचालन १ 700 प्रसारण (41M). अम्यावसायिक- 800 हेलीविजन बर जहाज और तटीय केन्द्र प्रमारण (31M) TO vasi. "मानस पति- TOCOMOSE a शि.रेगीसो रदेण्टम यी मातियो का उपयोग (a) 500KC मे 101058610MIS में 100 cm 10COMCIS- निगरानी रेहार-दूरी मापक उपकरण 2000 3000 /- समुद्री रेहार 4000 रेडियो तुगतामापी उपकरण अवतरण तंत्र 5000 ऐमेटियो 6000 १००० 8000 १००० समुद्री रेडार I0ROMC/STI प्रयोगात्मक रेडार इत्यादि लगभग 40,000 Mc/s से ऊपर चित्र 7. रेडियो स्पेक्ट्रम में रेडियो आवृति का उपयोग : 1000 Mc/s से 10,000 Mc/s और उससे ऊपर तका दूर लौटती थीं। इस रेडियो दर्पण को आयनमंडल (ionospere) कहते हैं। जब कोई समाचार, मान लीजिए इंग्लैंड में लंदन से कैलीफोर्निया में लास ऐंजिल्स तक जाता है तो वह पृथ्वी और आयनमंडल से वारी-बारी टकराता हुआ जाता है पर वायुमंडल से बाहर निकल कर अन्तरिक्ष में कभी नहीं जाता (चित्र 8) रेडियो इंजीनियर के लिए आयनमंडल भी उतना ही आवश्यक है जितना कि उसके अपने बनाए हुए उपकरणों से कोई भी एक और स्वभाविक ही है कि विशेष रूप से पिछले वर्षों में आयनमंडल का काफी सावधानी पूर्वक अध्ययन किया गया है। वैज्ञानिक आयनमंडल का अध्ययन करने के लिए विभिन्न आवृत्तियों की रेडियो तरंगे उसकी ओर भेजते हैं और यह मापते हैं कि वहां से टकराकर वापस लौटने में उन तरंगों को कितना समय लगता है। संचार 26 आयनमंडल Im पृथ्वी लंदन लास ऐंजिला चित्र 8 इस चित्र में दिखाया गया है कि एक रेडियो संकेत इधर उधर टकराता हुआ किस प्रकार लंदन से लॉस ऐंजिल्स पहुंचता है। वह कई बार पृथ्वी के तल और आपनमंडल के बीच में इधर उधर टकराता रहता है। आजकल वायुमंडल के ऊपरी भागों की विद्युतीय स्थिति के अध्ययन के लिए रॉकेटों का प्रयोग भी किया जाता है। सूर्य से आने वाली किरणें हमारे सर के ऊपर स्थित गैसों से इलेक्ट्रॉनों के उन्मोचन द्वारा विद्युतमय करके आयनमंडल को पैदा कर देती हैं। इलेक्ट्रॉन परमाणु के खंड होते हैं जिनमें विद्युत आवेश होता है और ऐसे ही असंख्य करोड़ों इलेक्ट्रॉन मिलकर रेडियो तरंगों को परावर्तित कर पृथ्वी की ओर लौटा देते हैं। दिन के समय, आयनमंडल में इलेक्ट्रानों की तीन परतें होती हैं जिन्हें E,F, और F2 परतें कहते हैं। E परत (अर्थात् ऐपल्टन परत) रेडियो स्पेक्ट्रम के निम्न सिरे की तरंगों को परावर्तित करती है और F (अर्थात हेवीसाइड) परतें उच्च-आवर्ती के संकेतों का परावर्तन करती हैं। दोपहर के समय उनकी स्थिति चित्र 9 (ऊपर) में दिखाई गई है। परन्तु जैसा कि आप आशा करेंगे कि पाक आयनमंडल सौर किरणों की क्रिया से बनता है इसलिए सूर्यास्त के बाद उसका स्वरूप बदलने लगता होगा। परतें एक दूसरे में मिलने लगती हैं और नीचे की ओर खिसक आती हैं अर्धरात्रि के समय उनका पैटर्न चित्र 9 (नीचे) जैसा हो जाता है। एप्लटन परत (F) 12 दोपहर 190 मोल हेवीसाइड परत E(असम तल) पिन पृथ्वी 60 मील सूचनाओं का संचरण कैसे किया जाता है 927 अर्धरात्रि एलटन परत (F.) 120 माल हेवीसाइड परत E (चिकना पृष्ठ) प्रेपित्र पृथ्वी 60 मील चित्र 9. दोपहर 12 बजे और अर्धरात्रि के समय परावर्ती परतों की स्थिति। दिन के समय हेवीसाइड परत अनियमित असम होती है और निम्न आवृत्ति के संकेत-जैसे मीडियम तरंग-परावर्तन के बाद विकीर्णित हो जाते हैं। रात के समय परतों केतल चिकने हो जाते हैं और लंबी दूरी तक प्रेषण संभव होता है। लंबी दूरी के प्रेषण से संबधित रेडियो इंजीनियर के लिए एक सीधा और सरल नियम है और उसमें इस तथ्य का भी हिसाब रहता है कि रात के समय आयनमंडल में मुक्त इलेक्ट्रानों की संख्या कम होती है। सूर्यास्त के बाद निम्न आवृत्तियाँ अधिक अच्छी रहती हैं। दिन के समय भी आयनमंडल में इतने पर्याप्त मुक्त इलेक्ट्रॉन नहीं होते कि वे 30 Mc/s (10 मीटर तरंगदैर्य) या उससे उच्च रेडियो आवृत्तियों को वापस पृथ्वी की तरफ परावर्तित कर सकें। यहाँ तक कि 10 Mc/s तक जाने पर भी अच्छा लंबे-परास का संकेत प्राप्त होना निश्चित नहीं होता। यही कारण है कि टेलीविजन संकेत और अति उच्च आवृत्ति (v.h.I) के रेडियो प्रसारण क्षितिज से बहुत दूर तक नहीं जा सकते। आप लंदन के टेलीविजन संकेत को न्यूयार्क की तुलना में चन्द्रमा पर अधिक अच्छा प्राप्त कर सकेंगे। परन्तु फिर भी, कभी कभी टेलीविजन चित्रों का लंबी दूरी तक प्रेषण हो जाता है : उदाहरण के लिए पिछले कुछ वर्षों में लंदन (क्रिस्टल पैलेस) से 45 Mc/s के टेलीविजन संकेत दक्षिणी अफ्रीका में प्राप्त किए गए हैं। परन्तु यह केवल संयोग मात्र है और मुक्त इलेक्ट्रानों के अतिरिक्त बादलों के कारण होता है जिन्हें 'स्पोरैडिक E' कहते हैं। कभी कभी तो आयनमंडल हमें निम्न आवृत्तियों पर भी धोखा दे जाता है। इस प्रकार रुक जाने को 'आकस्मिक आयनमंडलीय विक्षोभ' या 'आयनमंडलीय तूफान' कहा जाता है। इनमें से पहला सूर्य में उत्स्फोट (eruption) के बाद होता है जयकि प्रवल विकिरण (पराबैंगनी या एक्स-किरणे) अत्यधिक बड़ी संख्या में इलेक्ट्रॉनों को उत्पन्न कर देते हैं और इसके परिणाम स्वरूप रेडियो तरंगें आयनमंडल से परावर्तित होने के बजाए उसमें अवशोषित हो जाती हैं। आयनमंडलीय तूफान इस घटना के लगभग एक दिन बाद आता है जब सूर्य के संचार उत्स्फोट से उत्पन्न परमाणविक कण पृथ्वी के चुंबकीय धुवों की तरफ जाने लगते हैं और इस प्रकार ध्रुवीय ज्योति उत्पन्न करते हैं जिसके परिणाम स्वरूप रेडियो 'ब्लैक आउट' कई दिनों तक चलता है। न केवल सामान्य रेडियो संचार ही रुक जाते हैं बल्कि कई प्रकार के मिया . एलार्म (चेतावनी) आने लगते हैं। पानी के जहाजों और हवाई जहाजों के खो जाने की खबरें दी जाती हैं क्योंकि उनसे कोई रेडियो संकेत प्राप्त नहीं होते। रेडियो अनुसधान वैज्ञानिकों के पास आयनमंडल की अवस्था का चित्र बनाने की एक विधि है जिससे व्यावहारिक रूप में उनको इस बात का उत्तर मिल जाता है कि "यदि मैं यहां अभी इस आवृत्ति पर प्रसारण करूं तो मेरे संकेत उक्त स्थान पर पहुँचेंगे या नहीं?"वेएक प्रेषित्र का उपयोग करते हैं जिससे एक किरणावली किसी निर्धारित दिशा में भेजी जाती हैं : रेडियो तरंगों की एक स्पंद चारों ओर फैलती जाती हैं और आयनमंडल से परावर्तित होकर वापस पृथ्वी पर टकराती हैं। स्पंद का एक भाग पीछे अपने पहले पथ के साथ-साथ चला जाता है और इस प्रकार अनुसंधान केन्द्र पर वापिस आ जाता है। इसके लौटाने का समय मालूम करके वैज्ञानिक यह बता सकते हैं कि वह कितनी दूर से होकर आया है (ठीक उस प्रकार जैसे किसी हवाई जहाज की दूरी रेडार से मालूम की जाती है) और सफल प्रेषण एक काले धब्बे के रूप में स्क्रीन पर आ जाता है और इस प्रकार एक नक्शा सा तैयार हो जाता है (देखें प्लेट VIII)। प्रेषक एरियल चारों तरफ घूमता रहता है जिससे रेडियो परिस्थितियों का एक पूर्ण चित्र स्क्रीन पर बन जाता है। आजकल रेडियो इंजीनियर उच्च से उच्च आवृत्तियों का उपयोग करना चाहता है जिसका कारण मैं अगले अध्याय में समझाऊंगा। यहां इतना ही कहना पर्याप्त है कि उदाहरण के लिए टेलीविजन को 40 Mc/s से ऊपर ही प्रसारित करना आवश्यक है। इंजीनियर उन दूरियों से संतुष्ट नहीं हैं जहाँ तक कि अति उच्च आवृत्ति वाले संकेत आजकल विश्वस्त रूप से प्रेषित किये जा सकते हैं, और वे उन्हें क्षितिज के पार तक भेजने के लिए नई विधियों की खोज कर रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में एक विधि खोज निकाली गई है जिसे प्रकीर्णन संचार (Scatter Propagation) कहते हैं। इसमें इस तथ्य का उपयोग किया जाना है कि यदि उच्चतम आवृत्ति उस ढंग से परावर्तित नहीं होती है जिस ढंग से कि शान्त पानी के पृष्ठ से प्रकाश-किरणें होती है तो कम से कम उनके कुछ भाग वायुमंडल की रूक्षता से उसी प्रकार प्रकीर्णित हो जाते हैं जिस प्रकार विक्षुब्ध सागर के सफेद झाग से सूर्य का प्रकाश प्रकीर्णित होता है। 25 Mc/s पर आयनमंडल से परार्वतन अविश्वसनीय हो जाता है, परन्तु फिर भी एक हज़ार मील की दूरी तक कुछ संकेत आयनमंडल के असम निचले सूचनाओं का संचरण कैसे पिया गाता है 29 भाग से प्रकीर्णन के फलस्वरूप आते रहते हैं। इससे अधिक उच्च आवृत्तियों (कई हजार Mc/s) पर निम्न वायुमंडल अर्थात क्षोभमंडल (troposphere) की असमवायु से प्रकीर्णन के फलस्वरूप दो सौ मील की दूरी तक प्रेषण संभव है। फिर भी इसकी एक बड़ी कठिनाई यह है कि संकेत की अधिकांश शक्ति वाहर अंतरिक्ष में चली जाती है। यदि बहुत शक्तिशाली (और मंहगे) प्रेषित्र, भी प्रयुक्त किये जायें तो भी बहुत सुग्राही (और मंहगे) ग्राहियों तथा प्लेट 9 में दिखाए गए एरियल की तरह के बड़े एरियलों की आवश्यकता होती है जो उपयुक्त दिशा में प्रकीर्णित होने वाले उस सूक्ष्म अंश का आभीग्रहण कर सकें। वास्तव में,क्षोभ मंडलीय प्रकीर्णन द्वारा संकेत ग्रहण में दो ग्राहित्र होने जरूरी हैं जिनके बीच में कुछ दूरी हो ताकि कम से कम उनमें से एक तो किसी विशेष समय संकेत का कुछ भाग प्राप्त कर सके। परन्तु फिर भी, विशेष परिस्थितियों में प्रकीर्णन लाभदायक होता है-उदाहरण के लिए, आर्कटिक प्रदेश में जहाँ ध्रुवीय ज्योति होती है और सामान्य संचार व्यवस्था खराब हो जाती है। अति उच्च आवृत्ति के संकेतों को क्षितिज के पार प्रेषित करने की एक और अच्छी विधि 'टूटते तारों' अर्थात उल्काओं की सहायता से है जो पृथ्वी के वायुमंडल में पहुँच कर जल जाते हैं। कैनाडा में, जहाँ धुवीय ज्योति अधिकतर देशों से अधिक होती है, एक विधि प्रयुक्त की जाती है जिसे "जेनेट" कहते हैं। कुछ वर्ष पूर्व जब प्रथम आयनमंडलीय प्रकीर्णन (ionsopheric scatter) हुआ था उसके दौरान ओटावा के एक वैज्ञानिक ने देखा कि कभी कभी कछ सेकंडों की अवधियों के लिए प्रकीर्णन संकेत बहुत प्रबल हो जाता था, और उसने यह निष्कर्ष निकाला कि यह उस समय होता है जब उल्काएं आकाश में उपर्युक्त स्थान पर प्रकट होती हैं। उल्काएं वास्तव में बहुत तेज़ गति से चलते हुए पत्थर या लोहे के छोटे दाने हैं। जब वे वायुमंडल में से होकर गुजरते हैं तो वे अपने मार्ग में अपने पीछे विद्युत्मय गैस के पथ बना जाते हैं-जो छोटे रूप में आयनमंडल ही होता है जो उसी तरह क्षणिक होता है जैसे कि जहाज़ की बनी हुई लीक होती है। युद्ध के दौरान वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि वे टूटते तारे के दिन के समय भी रेडार की सहायता से पता लगा सकते हैं-रेडियो तरंगें आयनित गैस की इन लीकों से परावर्तित हो जाती इसलिए जब कैनेडावासियों ने देखा कि उल्काएं प्रकीर्णन संकेत को जिस प्रकार प्रबल बनाती हैं तो उन्होंने अनुमान लगाया कि प्रकीर्णन द्वारा संकेत प्रेषण के लिए जितनी आवश्यकता होती है वे उससे कहीं कम शक्ति वाला प्रेषित्र प्रयुक्त कर सकते हैं, बशर्ते कि वे सूचना उस समय प्रेषित करें जब उपयुक्त स्थान में एक उल्का-लीक हो जो संकेत को क्षितिज के पार अभिग्राहक सिरे की तरफ परावर्तित कर सके। 30 संचार प्रयोगों से पता चला कि वे औसतन एक घंटे में तीन मिनट के लिए प्रेक्षण कर सकते हैं। इसलिए उन्होंने ऐसी व्यवस्था की कि टेलीप्रिंटर चालक सामान्य रीति से सूचनाओं को टाइप कर देता है और उन्हें सीधे प्रेषित्र में भेजने के बजाए एक कागज़ के फीते पर अभिलेखित कर लिया जाता है। जब उपयुक्त अवसर आता है तो ये स्वयं स्वचालित रूप से फीते पर से चालक के टाइप करने की दर के बीस गुनी दर से पढ़ दी जाती है और उल्का के माध्यम से अभिग्रहीत्र के तीव्र टप अभिलेखीय उपस्कर तक प्रेषित हो जाती हैं जो सूचनाओं को मंद गति से टेलीप्रिटर में भर देता वास्तव में प्रत्येक केन्द्र पर एक प्रेषित्र और एक ग्राहित्र होता है और प्रत्येक बार जब कोई उपयुक्त उल्का प्रस्तुत होती है तो प्रत्येक ऐसी अवधि में एक-एक बार सूचनाओं का प्रेषण और ग्रहण भी होता है। आप यह जानना चाहेंगे कि प्रेषित्र को यह कैसे पता चलता है कि अपनी सूचनाएं कब भेजे इसका उत्तर बहुत सरल है। प्रेषित्र लगातार चालू रहते हैं पर वे केवल समगति रेडियो तरंगें प्रेषित करते रहते हैं जिनमें कोई सूचना नहीं होती। उदाहरण के लिए मान लीजिए कि दो बिन्दुक और ख हैं। अधिकांश समय क पर स्थित ग्राहित्र के प्रेषित का संसूचन नहीं करेगा, परन्तु जैसे ही क का प्रेषित्र उसको संसूचन करता है वह एक परीक्षण इस सीटी को ग्रहण कर लेता है तब ख या प्रेषित सूचना पारेषित कर देता है। इसी प्रकार जब क का ग्राहित्र ख से आने वाली परीक्षण सीटी ग्रहण करता है तो तुरंत ही अपनी सूचनाएं पारेषित कर देता है। यह सब कार्या बिना किस मनुष्य की सहायता के एक सैकिंड के बहुत छोटे भाग में ही हो जाता है। कुछ सैकिंडों के पश्चात उल्का की लीक मन्द होनी शुरू हो जाती है। जैसे ही किसी एक केन्द्र पर प्राप्त होने वाले संकेतों की प्रबलता एक निश्चित स्तर से कम होने लगती है वैसे ही इस केन्द्र का प्रेषित्र एक कूट-सूचना भेजता है जिसका अर्थ होता है 'रुको' और स्वयं भी तुरंत सूचनाएं भेजना बंद कर देता है। बहुत उच्च आवृत्ति के संकेतों को रिले करने की एक अन्य विधि मानचेस्टर विश्वविद्यालय के जोड्रल बैंक वेधशाला के रेडियो खगोलज्ञों ने बताई है। उनका विचार है कि टेलीविजन संकेतों को सफलतापूर्वक चन्द्रमा से उस समय सफलता पूर्वक परावर्तित किया जा सकता है और ऐटलान्टिक महासागर के पार प्रोग्राम प्रसारित किए जा सकते हैं जब चन्द्रमा एक साथ यूरोप और उत्तरी अमरीका से दिखाई दे रहा हो। अब हम अन्तरिक्ष युग में हैं। हम अपने कृत्रिम चन्द्रमा बना सकते हैं और 19 दिसम्बर, 1958 को और उसके बाद अमरीकनों ने एक महत्त्वपूर्ण प्रयोग किया। सूचनाओं का संचरण कैसे किया जाता है 31 एक एटलस राकेट छोड़ा गया और स्कोर नाम का एक छोटे भू-उपग्रह को उसकी कक्षा मे स्थापित किया गया। इस उपग्रह में एक ग्राहित्र, एक प्रेषित्र और एक टेप रिकार्डर था। उपग्रह के एक भू-स्थित स्टेशन के ऊपर से गुजरने के समय राष्ट्रपति का एक मौखिक संदेश उसमें भरा जा सकता था, और दूसरा भू स्थित स्टेशन उपयुक्त आदेश संकेत भेज कर इस संदेश को प्राप्त कर सकता था। इस प्रकर्म में से गुजर कर भाषण में कुछ गड़बड़ी हो अवश्य हुई परन्तु फिर भी उसे पूरी तरह पहचाना जा सकता था। यह प्रथम कदम जो संचार इंजीनियरी में क्रांतिकारी सिद्ध हो सकता है, उपग्रह के उपयोग की अनेक योजनाओं में से एक हैं। इस पुस्तक के लिखे जाने के समय, अमरीकी एक फूल सकने वाला प्लास्टिक का उपग्रह कक्षा मे भेजने का सोच रहे हैं जिसका व्यास 100 फुट होगा और जो धातु की एक पतली परत से ढका होगा ताकि वह रेडियो संकेतों का अच्छा परावर्तक बन सके। और सन् 1960 में एक ऐसा उपग्रह छोड़ने का विचार है जो पृथ्वी से बाईस हजार मील की दूरी पर कक्षा में घूमेगा। इतनी दूरी पर पश्चिम से पूर्व की तरफ जाता हुआ वह चौबीस घंटे में पृथ्वी का चक्कर लगाएगा, वह पृर्श्व के साथ साथ घूमेगा इसलिए वह हमेशा एक ही स्थान पर ठहरा हुआ मालूम पड़ेगा एक ऐसा चंद्रमा जो कभी नहीं छिपता। उस सही स्थित में स्थापित करना आसान नहीं होगा। परंतु ऐसे अनेक स्थिर उपग्रहों की सहायता से जिनमें से प्रत्येक में एक रेडियो ग्राहित्र और जिन संकेतों को वह प्राप्त करे उन्हें पुनः प्रसारित करने के लिए एक शक्तिशाली प्रेषित्र हो पृथ्वी के किन्ही दो भागों के बीच अति उच्च आवृत्ति के रेडियो और टेलीविजन द्वारा संपर्क स्थापित करना संभव हो सकेगा। यह उपग्रह अपनी शक्ति संभवतः सूर्य प्रकाश से ग्रहण करेंगें जो विद्युत उत्पन्न करने के लिए एक प्रकार से सौर बैटरियों का काम करेगा। परंतु एक सुझाव यह भी है कि पृथ्वी से रेडियो तरंगों की एक प्रबल किरण दंड को एक बिल्कुल नई विधि से प्रयुक्त किया जाये यानि उपग्रह को पुनः चार्ज करने के लिए उनमें विद्युत भरी जाये। इस प्रकार संदेश वाहक के रूप में हमारे पास ये भिन्न रेडियो आवृत्तियां हैं। आप रेडियो तरंग को सुन या देख नहीं सकते। सो इस प्रकार यदि आप प्रसारण करना चाहते हैं, उदाहरण के लिए रेडियो पर समाचार पढ़े जा रहे हैं, तो उसके लिए आपको रेडियो वाहक तरंग को ऐसे ढंग से मॉडलित करना पड़ेगा जिससे प्राहित्र उसकी आवाज को पुनःनिर्मित कर सके ठीक उसी प्रकार जैसे एक सरल टेलीफोन तार में विद्युत् धारा का मॉडुलन करता है। वास्तव में आप समाचार पढ़ने वाले के माइक्रोफोन से जुड़े तार से शुरू करते हैं। उसमें विद्युत् धारा होती है जो उसके बोलने के साथ साथ घटती बढ़ती रहती हैं। आप के पास एक प्रेषित्र है जो शक्तिशाली वाहक आवृत्ति उत्पन्न करता है। 32 संचार वाणी संकेत में विभिन्न तरंगों का एक मिश्रण होता है जिनकी आवृत्ति कुछ आवर्तन (साइकल) से लेकर कई हजार आर्यतन प्रति सैकिंड तक होती है। यह ऐसी आवृत्तियां हैं, जिन्हें हवा में वैद्युत कंपनों से पुनः ध्वनि कंपनों में बदलने पर मनुष्य अपने कानों से सुन सकता है। इन्हें श्रव्य आवृत्तियां कहते हैं। श्रव्य का अर्थ है जिन्हें सुना जा सके। याहक तरंग की रेडियो आवृत्ति कहीं अधिक उच्च होती है। उसके बाद आप इन दोनों को एक रेडियो वाल्व में इस तरह मिलाते है कि वाहक तरंग पर अंकित हो जाते हैं। इसकी दो मुख्य विधियां हैं। पहली और पुरानी विधि आयाम मॉडुलन (Amplitude Modulation) कहलाती है। इसका अर्थ है कि वाहक तरंग की प्रबलता में इस तरह विचरण हो कि माइक्रोफोन से किसी क्षण आने वाली धारा जितनी प्रबल हो प्रेषित्र से उत्पन्न होने वाली तरंग भी उतनी ही प्रबल होनी चाहिए (चित्र 10)। 1. माइक्रोफोन पर ध्वनि कोई माइक्रोफोन प्रेषित्र स्थिर 100000000000 रहित संकेत पड़ धारा नहीं वाहक तरंग रहा है। भेज रहा है 2. माइक्रोफोन केल पास माइक्रोफोन धारा प्रेषित्र की वाहक ड्रम बज रहा है। का अधिक्ष्य तरंग प्रबलता माइक्रोफोन के साथ घटती बढ़ती है 3. माइक्रोफोन में मनुष्य माइक्रोफोन धारा में प्रेषित्र की वाहक बोल रहा है। तेजी से विवरण तरंग की प्रबलता. और आयाम में तेजी से विचरण धारा चित्र 10 आयाम मॉडुलन 1. (1) जब माइक्रोफोन पर कोई धनि नहीं पड़ रही हो तो माइक्रोफोन में कोई धारा नहीं होगी अभर प्रेषित्र एक स्थिर वाहक तरंग भेजेगा। (2) म के बजने से माइक्रोफोन धारा में अधिवय होता है जिससे प्रेषित्र से आने वाली वाहक तरंग की प्रबलता में विचरण होता है। (३) मनुष्य के माइक्रोफोन में बोलने से माइक्रोफोन धारा में तेजी से विचरण होता है। वाहक तरंग की प्रबलता और आयाम इन तीव्र विचरणों के साथ साथ घटती बढ़ती है। नई विधि आवृत्ति माडुलन (frequency modulation) अर्थात् f.m की है। इसमें रेडियो तरंगों की प्रबलता में विचरण नहीं होता; इसके बजाय आवृत्ति में परिवर्तन होता है और किसी क्षण माइक्रोफोन से आने वाली धारा जितनी अधिक प्रबल होगी, रेडियो आवृत्ति मूल वाहक आवृत्ति से उतनी ही अधिक भिन्न होगी। सूचनाओं का संचरण कैसे किया जाता है !33 अतिउच्च आवृत्ति प्रसारण सेवाओं में तथा सैनिकों के पोर्टेविल सैटों में यही विधि प्रयुक्त की जाती है। आयाम माडुलन की तुलना में आवृत्ति माडुलन का एक बहुत महत्त्वपूर्ण लाभ है जिससे उस समस्या को दर्शाया जा सकता है जिसका उल्लेख मैं आगे करूंगा : वह है शोर या व्यतिकरण। यदि आपने स्वयं कभी आयाम माडुलन रेडियो की आवृत्ति माडुलन से तुलना की हो तो आपने देखा होगा कि आवृत्ति माडुलन से भाषण और संगीत दोनों ही घंटी की आवाज की तरह साफ आते हैं; आयाम माडुलन में सब प्रकार के अवांछित शोर आते हैं खड़खड़ाहट, गूंजना और कभी कभी पृष्ठभूमि में एक और प्रसारण केन्द्र का प्रसारण सुनाई देने लगता है जो सब से अधिक झुंझलाहट पैदा करता है। चित्र 11 में आप आयाम माडुलन और आवृत्ति माडुलन पर शोर का प्रभाव देख सकते हैं। यदि हम अवांछित शोर को एक दाँतेदार रेखा से व्यक्त करें और आयाम माडुलन संकेत को एक निष्कोण तरंग से जिसकी प्रबलता घटती बढ़ती हो तो आप देखेंगे कि जो ग्राहित्र किसी क्षण तरंग की प्रबलता मापता है वह संकेत और शोर में भेद नहीं कर सकता और दोनों का ही पुनरुत्पादन करता है। ... ISLATICNI STRENGT F THE THE NOI ALSO PICK • AND HEA अवरोध या शोर a.m. संकेत a.m. ग्राहित्र संकेत प्रबलता में विचरण ग्रहण करता है इसलिए शोर का भी ग्रहण होता है और सुना जाता है। अवरोध या शोर I.m, संकेत f.m. माहित्र केवल संकेत की आवृत्ति के विचरणों के लिए सुग्राही होता है ग्रहण नहीं किया जाता। PRES THE VARAN. 1EQUENCY HERAL CNGISE IS -RIAMONT TENGTH TIS NOT CKED UP चित्र 11 इम चित्र से पता चलता है कि आवृत्ति माडलन प्रयुक्त कार्य पर शोर और अवरोध किम प्रचार कम हो जाते हैं संचार 34 अब आवृत्ति माडुलन संकेत पर अवांछित शोर के प्रभाव पर ध्यान दीजिए। याद रखें कि आवृत्ति माडुलन ग्राहित्र प्रबलता में होने वाले विचरणों को ग्रहण नहीं करता केवल आवृत्ति के विचरणों को ग्रहण करता है। यदि ग्राहित्र यथार्थ रूप से ट्यून किया गया हो तो वह अवांछित शोर को ग्रहण नहीं करेगा। आवृत्ति माडुलन के इस गुण धर्म का एक परिणाम यह है कि यदि ग्राहित्र के बहुत पास दो प्रेपित्र बिल्कुल एक ही आवृत्ति पर कार्य कर रहे हों तो ग्राहित्र उनमें से केवल एक का ही पुनरुत्पादन करेगा जो दोनों में अधिक प्रबल होगा। शोर रहित अति उच्च आवृत्ति/आवृत्ति माडुलन होने पर आप उच्च तदरूपता का रेडियो तंत्र बना सकते हैं-यानि जिसमें भाषण और संगीत का इतना साफ पुनरुत्पादन होता है मानो श्रोता भापणकर्ता या संगीतज्ञ के कमरे में ही बैठे हुए हों। परन्तु अच्छा प्रेषण और अभिग्रहण ही काफी नहीं है; दो अन्य बातें भी आवश्यक हैं। पहली बात यह है कि माइक्रोफोन से लाउडस्पीकर तक प्रत्येक अवस्था में ध्वनि के प्रत्येक भाग या उसके वैद्युत तुल्य पर एक समान रूप से ध्यान देना चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि आप एक माइक्रोफोन बनाएं और उसके लिए उतना परिश्रम न करना चाहें तो आप देखेंगे कि वह किसी एक सांगीतिक स्वर पर सब से तीव्र कंपन करता है-इसलिए प्रबलतम संकेत उत्पन्न करता है-उससे ऊपर और नीचे के स्वरों का माइक्रोफोन पर प्रभाव कम पड़ेगा इसलिए उनका प्रेषण उतनी प्रबलता से नहीं होता जितनी से होना चाहिए। यही बात लाउडस्पीकरों पर भी लागू होती है : वे कुछ स्वरों को बाकी सब से पक्षपातपूर्ण तरजीह देते हैं। विद्युतीय परिपथ भी सारे स्वरों के साथ एक समान व्यवहार नहीं करते, जब तक कि उनका निर्माण और डिजाइन बहुत सावधानी पूर्वक न हुआ हो। घरों के अधिकाँश अभिग्राहित्रों में एक टोन कंट्रोल होता है और उसे घुमा फिराकर आप अपनी इच्छा अनुसार वायलिन और बांसुरी या डवल बास और बैसून (double bass and basooms) को अधिक अच्छा सुन सकते हैं। इस से आपको पता चलेगा कि विद्युतीय परिपथ आर्केस्ट्रा के संतुलन में क्या कुछ कर सकते हैं। आप बोलने वाले की वाणी को भी इतना बदल सकते हैं कि वह पहचानी भी न जा सके। उच्च तद्परूपता इंजीनियर को इन सब चीजों का ध्यान रखना पड़ता है। परन्तु एक अन्य बात का भी ध्यान रखना पड़ता है जो वास्तव में इसी समस्या का एक पहलू है। यदि आप मूल ध्वनि का यथार्थ पनुरुत्पादन करना चाहते हैं तो आपको ऐसे स्वरों को कदापि नहीं काटना चाहिए जिन्हें मानव कान सुन सकता हो। आपका कान 50 c/s से 180000/5 तक की ध्वनि कंपनों को ग्रहण कर सूचनाओं का संघरण कर्म किया जाता है 35 सकता है, फिर भी यदि आप केवल 3000c/sतक की श्रव्यावृत्तियों ही सुन सकते होते तो भी आप पूरी तरह समझ सकते थे कि बोलने वाला क्या क्या कह रहा है। कई संचार तंत्रों में उच्च स्वरों को वास्तव में काट ही दिया जाता है। फलस्वरूप हालांकि भाषण और संगीत को पूर्ण रूप से पहचाना जा सकता है फिर भी उनसे यथार्थ पुनरुत्पादन की आशा तो नहीं की जा सकती क्योंकि मूल में कुछ भाग तो काट ही दिया गया है। स्टूडियो में ध्वनि एक माइक्रोफोन या कई माइक्रोफोन को जोड़ कर ध्वनि करने का अर्थ पूर्णवादी (perfectionist) के लिए यह होगा कि आप आर्केस्ट्रा को उतनी यथार्थता के साथ नहीं सुन सकते जितना कि वहाँ वास्तव में उपस्थित होने पर सुनते। इसका कारण यह है कि नापके दो कान हैं और यदि आप स्टूडियो में होते तो आप ध्वनियों को विभिन्न दिशाओं से आ रही के रूप में सुनते। आप ध्वनि की दिशा बता सकते हैं क्योंकि अगर एक पियानो आप के दांई तरफ बजाया जा रहा है तो आप उसे बाए कान के बजाए दौए कान से एक सेंकड के लघुअंश पहले सुनेंगे। ध्वनि के स्टीरिओफोनिक पुनरुपत्पादन में यह प्रभाव माइक्रोफोन विद्युतीय संकेत और लाउडस्पीकरों के दो अलग सेट रख कर पुनः उत्पन्न किया जाता है। परन्तु (यह महत्त्वपूर्ण है) उच्च तद्रूपता और स्टीरिओफोनिक रेडियो के लिए आपको कीमत चुकानी पड़ती है। यह प्रसारण में अधिक स्थान धेरता है। हर रेडियो स्टेशन की अपनी अलग आवृत्ति होती है, इसलिए आप जब चाहें उसे ट्यून कर सकते हैं परन्तु जैसा कि आप अभी देखेंगे, वास्तव में, यह आवृत्ति का एक निश्चित परास या बैंड ले लेता है। यदि आप स्टीरिओफोनिक ध्वनि चाहते हैं तो उसमें आप दो संकेतों को प्रसारित करते हैं और आपको आवृत्तियों के दो बैंड की आवश्यकता होगी; यदि आप उच्च तद्पता चाहते हैं तो आप को श्रव्यावृत्तियों के बड़े परास (15,000 c/s या 15 Ke/s तक) की आवश्यकता होगी, अर्थात श्रव्यावृत्ति के अधिक चौड़े बैंड की आवश्यकता होगी। यदि प्रसारण केन्द्रों की संख्या कम हो तो सब बातों से कोई अन्तर नहीं पड़ेगी। परन्तु ऐसी बात नहीं है। आज सारे संसार में हजारों की संख्या में रेडियो और टेलीवीजन प्रसार केन्द्र, हवायाज (airman) और वायु यातायात नियंत्रक, नाविक, दीपघर संचालक (lighthouse-keeper) तट रक्षक (coast Guard) और हार्बरमास्टर, रेडियो में रुचि रखने वाले अव्यवसायिक लोग, रेडार चालक, रेडियो टेलीफोन और टेलीग्राफ इंजीनियर, सैनिक, पुलिसमैन, आगबुझाने वाले, अस्पताली गाड़ी के चालक, टैक्सी चालक, रेडियो खगोलश, आयनमंडल वैज्ञानिक, अन्वेषक, गवेषक, सर्वेक्षक, राकेट और उपग्रह, सभी रेडियो स्पेक्ट्रम . संचार 36 - का एक भाग अपने लिए अलग से चाहते हैं और उसमें अगर कोई दूसरा व्यक्ति घुसना चाहे तो सख्त शिकायत करते हैं। एक आवृत्ति माडुलन स्टेशन आवृत्तियों का एक निश्चित परास क्यों लेता यह समझना आसान है क्योंकि वह सूचना का संचार आवृत्ति में विचरण द्वारा ही करता है। उदाहरण के लिए, यदि एक स्टेशन 100 Mc/s पर कार्य कर रहा है तो वह अपनी आवृत्ति को 99.925 से 100.75 Mc/s तक के बीच रख सकता है। आयाम माडुलन स्टेशन के लिए वाहक तरंग की एक निश्चित यथार्थ रूप से ट्यून की गई आवृत्ति से अधिक की आवश्यकता क्यों पड़ती है, यह इतना स्पष्ट नहीं है। इसमें आप केवल माइक्रोफोन से आने वाली धारा के विचरणों के अनुसार वाहक तरंग के शक्ति में भी विचरण करते प्रतीत होते हैं। परन्तु यदि आप देखें कि वाहक तरंग की प्रबलता में विचरण कैसे किया जाता है तो आप देखेंगे कि यह इतना सरल नहीं है। यदि आप 100 Kc/s पर कार्यशील वाहक तरंग की प्रबलता को इस तरह बदलना चाहते हैं कि वह 1 Kc/s की सीटी का पुनरुत्पादन कर सके तो इसके लिए आपको वाहक तरंग के साथ-साथ 101 Kc/s की एक अन्य रेडियो तरंग प्रसारित करनी होगी। जितना समय वाहक आवृत्ति की 100 तरंगों को प्रसारित करने में लगता है उतने ही समय में आप दूसरी आवृत्ति पर 101 तरंगें प्रसारित कर लेंगे। इससे सही परिणाम प्राप्त होता है, क्योंकि जब तरंगें शुरू में एक कला में होती हैं तो वे 50 आवर्तनों के बाद विरीत कला में हो जाएंगी और 100 आवर्तनों के बाद पुनः एक कला में होंगी। जब वे एक कला में होती हैं तो एक दूसरे का प्रबलीकरण करती हैं और संकेत प्रबल होगा और विपरीत कला में होने पर एक दूसरे को क्षीण करती हैं और तब संकेत दुर्बल होंगे। इसलिए हर 100 आर्वतनों (यानी एक सेकंड के हज़ारवें भाग में) में संकेत की प्रबलता एक बार कम और अधिक हो जाती है और 1 सेकंड में 1000 बार कम और अधिक होगी-जिसे रेडियो ग्राहिक 1 Kc/s की तीक्ष्ण सीटी के रूप में ग्रहण करता है। अब यदि आप 10 Kc/sतक की सभी श्रव्यावृत्तियाँ संचारित करना चाहते हैं . तो आपको 100 (वाहक आवृत्तियां) से 110 Ke/s तक की आवृत्तियाँ संचारित -- वाहक निर्माडुलिन वाहक प्रेषित केवल 100 Kc/5 ही भेजता है ०० 10OxciS 110 सूचनाओं का संचरण कैसे किया जाता है 37 वाहक जव वाहक में उदाहरण के लिए 10 Kc/s का माडुलन होता है तो प्रेषित दो अतिरिक्त पार्श्व बैंड 110Kc/s और 90 Kc/s पर प्रसारित करता है 110 इसलिए कुल प्रमारण एक आवृत्ति बैंड पर फैल जाता है। १० 100 KCAS निम्न पाश्व बैंड उच्च पाश्र्व बैंड चित्र 12 पार्श्व बैंड संकेत, जो वाहक आवृत्ति के किसी एक तरफ हो सकते हैं, वाहक तरंगे के माडुलन से उत्पन्न किए जा सकते हैं। करनी होंगी। या आप यही परिणाम 10 से 100 Kc/sतक की आवृत्तियों से प्राप्त कर सकते हैं। वाहक का माडुलन करने से लिए उसके दोनों तरफ की आवृत्ति बैंड होते हैं उन्हें पार्श्व बैंड कहते हैं और अधिकतर प्रेषित दोनों बैंड एक साथ ही प्रसारित कर देते हैं चाहे एक पाश्र्व बैंड ही काफी हो। एक और भी बात है जिसके कारण प्रेषित्रों की आवृत्तियों भली प्रकार हटकर रखी जानी चाहिए। जब आप रेडियो सेट को किसी एक स्टेशन के लिए ट्यून कर देते हैं तो आप ऐसी व्यवस्था करते हैं कि वह उपयुक्त आवृत्ति को ग्रहण करे। परन्तु यदि वह वाहक तरंग के अतिरिक्त और कुछ भी ग्रहण न करे तो पार्श्व बैंड (side bands) खो जाएंगे और आपको कुछ भी सुनाई नहीं पड़ेगा। व्यावहारिक रूप से, जब आप रेडियो की ट्यून करते हैं तो आप इच्छित संकेत के पार्श्व बैंड के दोनों तरफ की काफी आवृत्तियाँ भी उसमें आने देते हैं और यदि इस आवृत्ति परास में कोई अन्य स्टेशन हो तो वह भी उसमें आ जाएगा। स्पष्ट है कि प्रत्येक प्रेषित्र को अपनी आवंटित आवृत्ति पर ही सख्ती से पाबंद रहना चाहिए-अन्यथा उससे अव्यवस्था फैल जाएगी। इसलिए अधिकांश प्रेषित्रों में, सही आवृत्ति पर रखने के लिए आजकल क्वार्ट्ज क्रिस्टल का उपयोग किया जाता है। क्वार्टज क्रिस्टल को तबले की भिल्ली की भाँति किसी निश्चित आवृत्ति पर कपित कराया जा सकता है, परन्तु क्वार्ट्स में एक बड़ा गुण यह है कि जब वह कंपन करता है तो उसके साथ साथ उसी आवृत्ति की प्रत्यावर्ती विद्युत वोल्टता भी उत्पन्न करता है और इसे प्रेषित्र के परिचय में लेकर प्रेषित आवृत्ति को परिशुद्धता से मापा जा सकता है क्रिस्टल को बहुत सावधानीपूर्वक काटा जाता है और एक ऐसे बक्स में रखा जाता है जिसका ताप एकसमान रहता हो। - संचार 38 आजकल अभिग्राहित्रों में भी प्रायः क्रिस्टल प्रयुक्त किए जाते हैं और आप अपने सेट को चालू करके सीधा ही प्रेषित्र के लिए ट्यून कर सकते हैं। क्रिस्टल को इस ढंग से चुना गया है कि वह आपकी आवश्यकता के अनुसार एक निश्चित आवृत्ति दे सके। रेडियो इंजीनियर हमेशा ही अधिक परिशुद्ध तथा 'संकीर्ण' ट्यून किए जा सकने वाले ग्राहित्र बनाने की चेष्टा करने रहते हैं ताकि पास पास के दो रेडियो स्टेशन एक दूसरे में बाधा उत्पन्न न करें। इसमें बहुत परिशुद्धता से बनाए हुए क्रिस्टल बहुत लाभदायक होते हैं, विशेषरूप से अति उच्च आवृत्ति भाग में जहाँ पिछले कुछ समय तक ट्यून करने में अनिश्चिता रहने के कारण रेडियो आवृत्तियों का एक काफी चौड़ा बैंड बेकार हो जाया करता था। सूचनाओं का संचरण कैसे किया जाता है 39 IV संकेत और शोर किसी भी अन्य प्रकार की इंजीनियरी की तरह संचार इंजीनियरी में भी बहुत कठिनाईयाँ होती हैं और उसके परिणामों की सीमा मनुष्य और प्रकृति मिलजुल कर जिस सीमा तक अपने साधन जुटा सकते हैं, उसके द्वारा निर्धारित होती है। किसी नदी पर सिविल इंजीनियर द्वारा बनाए गए एक पुल पर विचार कीजिए। वह 'क' बिन्दु से शुरू होकर 'ख' बिन्दु तक जाता है और उसका कितना उपयोग होगा उसका स्वयं पुल से कोई संबंध नहीं है-यह विशेष रूप से उस पुल को मिलाने वाली सड़कों पर निर्भर करेगा। जो भी हो, पर उस पर से गजरने वाले यातायात के भार की दृष्टि से भी और एक घंटे में उस पर से सुरक्षित रूप से गुजरने वाले ट्रकों और कारों की संख्या की दृष्टि से भी एक सीमा अवश्य है। इसके अतिरिक्त भारी कोहरा और अत्यधिक हिमपात होने पर यातायात अवश्य ही धीमा हो जाएगा। और हवा बहुत तेज चल रही हो तो पुल को थोड़ी देर के लिए बंद भी करना पड़ सकता है। संचार इंजीनियर की समस्याएं भी इनसे बहुत भिन्न रहीं है, यद्यपि अधिकांश रूप से उसका संबंध अदृश्य चीजों से ही है। उसका कार्य की सीमाएं उपलब्ध रेडियो आवृत्तियों और संकेत केवलों से वह कितना काम निकाल सकता है, इससे निर्धारित होती हैं। उसके संचार में सौर विस्फुटन के कारण आयन मंडल में गड़बड़ से, या उसके अपने एक केवल के खराब हो जाने से रुकावट उत्पन्न हो सकती है और हर समय उसके सबसे बड़े शत्रु अर्थात् शोर के होते हुए भी उसे अपनी सूचनाएं प्रसारण और बातचीत का संचार करना ही है। मैंने शोर का पहले भी उल्लेख किया है। यदि आप किसी दूर के प्रेपित्र से प्रसारित किए जा रहे रेडियो प्रोग्राम को सुने या टेलीविज़न देखें तो आपको शोर का सामना करना पड़ता है। रेडियो ध्वनि की तीव्रता पेड़ों से सरसराती हुई हवा की ध्वनि की तरह न्यूनाधिक हो सकती है तथा उसके साथ सी-सी गुंजन या चटख (crackes) होंगे। इन्ही सब को शोर (noise) कहते हैं। परन्तु आपको शोर हमेशा सुनाई नहीं देता, टेलीविज़न के परदे पर शोर पर बर्फ के तूफान के रूप में दिखाई पड़ता है जिससे चित्र धुंधला हो जाता है।

संकेत के ठीक-ठीक अभिग्रहण में रुकावट उत्पन्न करने वाले तीन प्रकार के शोर होते हैं पहला रेडियो तरंगों के अन्य स्रोत हो सकते हैं। दूसरा कुछ तरीकों से प्राप्त संकेत स्वयं अवरोध उत्पन्न करते हैं, और तीसरा एक प्रकार का शोर स्वयं ग्राहित्र में भी उत्पन्न होता है। एक ही आवृत्ति बैंड पर कार्य करने वाले अन्य रेडियो प्रेपित्रों के अतिरिक्त मोटर कारों के स्फुलिंग तंत्र (sparking system) विद्युत मोटर और सड़क पर रोशनी करने के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले विसर्जन लैम्प (discharge lamp) भी रेडियो-शोर उत्पन्न करते हैं। इनसे भी वास्तव में उसी प्रकार तरंगें प्रसारित होती हैं जिस प्रकार रेडियो में काम आने वाले स्फुलिंग प्रेषित्रों से होती हैं। प्रकृति के भी अपने स्फुलिंग प्रेपित्र-वादलों की गर्जन है और चूंकि लगभग प्रत्येक क्षण संसार के किसी न किसी भाग में तड़ित होती रहती है, इसलिए यह शोर के सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोतों में से एक है। धुवीय क्षेत्रों में धुवीय ज्योति, बहुत विशाल विसर्जन लैम्पों की भांति, रेडियो तरंगों का उत्सर्जन करती है और उन्हें मनुष्य-निर्मित स्रोतों की भांति दबाया भी नहीं जा सकता। सूर्य से और अन्तरिक्ष की गहराईयों से रेडियो में शोर आता रहता है जिसका रेडियो खगोलज्ञ अध्ययन करते हैं। इनसे भी पृथ्वी पर होने वाले संचार पर प्रभाव पड़ता है परन्तु इसका प्रभाव 30 Mc/s से ऊपर की आवृत्तियों पर ही पड़ता है क्योंकि पृथ्वी के वायुमंडल में आने वाले अपेक्षाकृत अधिक लंबे तरंग दैर्ध्व वाले शोर के लिए अयनमंडल उसी प्रकार अवरोध का कार्य करता है जैसे वह मनुष्य निर्मित रेडियो संकेतों का परावर्तन करता है जो अन्यथा बाहर निकाल कर अन्तरिक्ष में चले जाते। यदि एक रेडियो संकेत से अधिक पथों से ग्राहित्र तक पहुंचता है। तो वह स्वयं एक अवरोध का कार्य कर सकता है और इससे 'मंदन' उत्पन्न होता है। सबसे साधारण घटना यह है कि रेडियो तरंग का एक भाग पृथ्वी तल पर सीधे एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंच जाता है और एक भाग आयनमंडल से परावर्तित होकर पहुंचता है। आकाश की तरफ आने वाली तरंग को कुछ अधिक फासला तय करना पड़ता है इसलिए वह भू तरंग की अपेक्षा कुछ देर से पहुंचती है। इससे दो अलग रास्तों से पहुंची तरंगे या तो एक कला में होंगी या विपरीत कला में होंगी अर्थात् या तो एक-दूसरे का प्रबलीकरण करेंगी या क्षीणन। चूंकि आयनमंडल का पृष्ठ पूर्णतः सम नहीं है, बल्कि एक ऐसे समुद्र के समान है जिसमें तूफान उठा हुआ हो इसलिए तरंगों का कभी समान कभी विपरीत कला में होना लगातार चलता रहता है और इसके फलस्वरूप संकेत की प्रबलता घटती बढ़ती रहती है। एक हद तक आप इसे अपने ग्राहित्र में इस प्रकार की व्यवस्था करके ठीक कर सकते हैं कि जब संकेत दुर्वल आ रहे हों तो आवर्धन अधिक हो और जब प्रबल आ रहे हों तब कम-- यह -- संकेत और शोर , कार्य' स्वचालित तीव्रता नियंत्रक' या 'स्वचालित लाभ नियंत्रक (दोनों का अर्थ एक ही है) से किया जाता है। परन्तु एक चीज जिससे आप बच नहीं सकते और जिससे भाषण या संगीत में बहुत विकृति उत्पन्न होती है, वह यह है कि संकेत के भिन्न-भिन्न तरंग दैर्घ भिन्न-भिन्न समय पर मंद हो जाते हैं। यदि आप टेलीविजन देख रहे हों और पास से एक हवाई जहाज गुजर जाए, तो आपको हवाई जहाज से परावर्तित होकर आने वाली आकाश-तरंग प्राप्त होगी जो सीधे आने वाली संकेत से एक सेकंड से कम देर से पहुंचेगी। आकाश-तरंग वाला संकेत असली चित्र से थोड़ा दाएं एक छल चित्र की तरह दिखाई पड़ेगा। यदि आप किसी ऊंची पहाड़ी के पास रहते हों तो आपको प्राप्त होने वाले चित्र में सदैव ही पहाड़ी से परावर्तित होकर आने वाले संकेत के कारण स्थायी छल चित्र बनता रहेगा। इसके अतिरिक्त शोर स्वयं ग्राहित्र में भी उत्पन्न हो जाता है। दो रेडियो प्रोग्रामों के बीच जो निःशब्द समयान्तराल होता है उसमें भी आपको सी...सी... की आवाज या गुंजन की ध्वनि सुनाई देती रहेगी- यदि आप एरियल को अलग कर दें तो भी यह ध्वनि सुनाई देती रहेगी। इसका कारण यह है कि सूक्ष्म कण अर्थात् इलेक्ट्रान जो तारों और वाल्वों में विद्युत का वाहन करते हैं कदम मिलाकर चलने वाली फौजों की कतारों की तरह नहीं जाते बल्कि एक फुटवाल के स्टेडियम से निकलने वाली भीड़ की तरह होते हैं। यदि आप निर्गम द्वार से प्रति सेकंड निकलने वाले व्यक्तियों की संख्या गिने, तो आप देखेंगे कि उसमें परिवर्तन होता रहता है यह शायद तीन से छः तक होगी और सदैव ही एक दो व्यक्ति अपने छूटे हुए दस्ताने या बच्चों की तलाश में वापिस अन्दर जाने का प्रयत्न कर रहे होंगे। इलेक्ट्रानों का व्यवहार बहुत कुछ इसी से मिलता जुलता है। अतएव, विद्युत धारा कभी भी बिल्कुल समगति नहीं होती। परिवर्ती विद्युत-धारा एक संकेत की तरह होती है परन्तु चूंकि यह संकेत अवांछित होता है इसलिए इसे शोर माना जाता है। स्पष्ट है कि यदि आप किसी बहुत दुर्बल संकेत, जैसे किसी दूर के ग्रह से रेडार प्रतिध्वनि या क्षोभमंडल से विकीर्णित संकेत प्राप्त करना चाहते हो तो आपको उसे ग्राहित्र के शोर में खो जाने से बचाना होगा। इसलिए इस प्रकार के शोर रहित विद्युत उपकरणों के बनाने के लिए बहुत बुद्धि और चातुर्य का उपयोग किया जा. रहा है। परन्तु यदि बाह्य स्रोत से आने वाला शोर बहुत अधिक हो तो ग्राहित्र के अन्दर वाले शोर को दूर करने का कोई अधिक लाभ नहीं होगा। परन्तु मोटे तौर से यह कहा जा सकता है कि आवृत्ति जितनी अधिक होगी, ग्राहित्र का अपना शोर उतनी ही अधिक गड़बड़ी पैदा करेगा। संचार इस में सुधार का एक तरीका यह हो सकता है कि ग्राहिन को ऐसा उिनाईन' किया जाय कि वह ठंडे रेफ्रिजरेटर में कार्य कर सका क्योंकि ताप जितनी कम होगा, इलेक्ट्रानों का व्यवहार उतना ही कम अव्यवस्थित होगाlaire शोर रहित अभिग्रहण यंत्रों में एक बहुत बढ़िया उपकरण, जो अभी पिछले दो तीन वर्षों से ही चल रहा है 'मैसर' (maser) है। यह एक ऐसा उपकरणहै जिसमें विद्युतीय ऊर्जा एक क्रिस्टल में संचित की जाती है और जब एक निश्चित आवृत्ति की रेडियो तरंगें उसमें प्रवेश करती हैं तो यह ऊर्जा उन्मोचित हो जाती है। मैसूर शब्द विकीरण के उत्तेजित उत्सर्जन के द्वारा सूक्ष्म तरंग आवर्धन के ओजी पर्याय (microware amplification by stimulated emmisiion of radiation) के प्रथम अक्षरों को लेकर बना है। चित्र 13 में 'मैसर' को एक ढोलक की तरह प्रयुक्त होते हुए दिखाया गया है। ग्राहित्र में रेडियो ऊर्जा का स्रोत क्रिस्टल में ऊर्जा को भर देता है और क्रिस्टल को एक शक्तिशाली चुंबक के ध्रुवों के बीच में रखकर तथा चुंबक की शक्ति में विचरण करके ट्यून (Tuned) किया जाता है। जब भी संकेत तरंगों का एक प्रस्फोट आता है तो क्रिस्टल से ऊर्जा का और भी अधिक प्रबल प्रस्फोट लगभग उसी आवृत्ति पर उन्मोचित हो जाता है। जब कोई संकेत न हो तो मैसूर से भी लगभग कोई उत्सर्जन नहीं होता-दूसरे शब्दों में, कोई शोर पैदा नहीं होता। अभी तक मैंने रेडियो इंजीनियर की समस्याओं के ऊपर ही ध्यान दिया है। टेलीफोन इंजीनियर के सामने भी जो तारों के द्वारा संकेतों को भेजता है कुछ ऐसी ही समस्याए आती हैं। शोर तारों में भी होता है। तार में जाते-जाते संकेत मंद होता जाता है और केवल रिपीटर की सहायता से लगभग बीस-बीस मील पर उसका आवर्धन करके ही टेलीफोन द्वारा लंबी दूरियों पर बात चीत की जा सकती है। रेडियो टेलीफोनी और आधुनिक टेलीफोनी में जितना अन्तर आप समझते होंगे उतना नहीं है। एक सरल टेलीफोन लाइन में कई श्रव्यावृत्तियाँ भेजी जा सकती हैं, लगभग 300 से लेकर 4000c/s तक की। इसलिए बोला हुआ कोई शब्द दूसरी तरफ सुना जा सकता है। मान लीजिए कि आप एटलान्टिक महासागर के पार टेलीफोन द्वारा बात चीत करना चाहते हैं। तो आप समुद्र की तली में एक केबल डालने की सोचेंगे जिसमें कई सौ जोड़े तार होंगे। परन्तु आपको इस बात का बहुत ध्यान रखना होगा कि तारों में आपस में मिलकर कहीं गड़बड़ न हो जाए इसलिए बात करने वाले लोग एक दूसरे की बात को न समझा पाएं और आपको विशेष रूप से हर तार के लिए अलग अलग रिपीटर लगाना होगा। यह इतनाजटिल होगा कि इसको बनाने की कोशिश करना बेकार होगा। संकेत और शोर 43 महीन तरंग गाइड चकोर तरंग गाइड गुरु क्रिस्टल चित्र 13 ठोस मैसरदोलक का योजना चित्र 1,17500 वाला संकेत चकोर तरंग गाइड के साथ साथ आता है और 9,000 Mc/s वाला संकेत पट्टी तरग गाइड से बाहर निकलता है। यह कुल उपकरण द्रव हीलियम के प्लास्क में डूबा रहता है। जो चुंबक के धुवों के बीच में रखा रहता है। (British Communication & Electronics की कृपा से लिया गया) फिर भी ऐटलान्टिक महासागर के आर-पार एक टेलीफोन केबिल सन् 1956 में चालू किया गया, जिसमें 53 वार्ता लाइनें थीं। टेलीफोन इंजीनियरों को बहुत समय से ज्ञात है कि कई वार्ता लाइनों को एक ही तार में कैसे रखा जाता है, उन्हें एक ही रिपीटरों से कैसे गुजारा जाता है और अन्त में फिर से कैसे अलग अलग कर लिया जाता है। इसको मल्टीप्लेक्स तंत्र कहते हैं। इसका सब से स्पष्ट तरीका रेडियो इंजीनियर की नकल करना है और इसके लिए एक ऐसे केवल का उपयोग किया जाता है जो उच्च आवृत्ति के संकेतों का संचारण कर सके और प्रत्येक संदेश के लिए एक अलग आवृत्ति नियत कर के जाती है। इसे आवृत्ति वितरण मल्टीप्लेक्स (Frequency division multiplex) कहते हैं। टेलीफोन माइक्रोफोन की चक्रावृत्ति धाराएं वाहक आवृत्ति से मिश्रित कर दी जाती हैं। मानो उनका प्रसारण किया जाना हो, और फिर उनको एक साथ केविल में से भेजा जाता है। दूसरे सिरे पर संदेशों का अलग अलग करने के लिए अलग अलग आवृत्तियों पर ट्यून Tuned किए हुए कई ग्राहित्र होते हैं। अभी भी एक अकेले केबल में 18,00 टेलीफोन वाहिकाएं रखना संभव है। उसे संचार काफी सावधानी पूर्वक बनाया जाता है ताकि वह 8 Mc/s से लेकर 4.4 mc/s तक की आवृत्तियों का वहन कर सकें और इतना परास बहुत काफी है। परन्तु जैसे जैसे टेलीफोन वार्ताओं की संख्या बढ़ती जाती है, इस प्रकार की युक्ति से भी टेलीफोन इंजीनियर का काम नहीं चलेगा और उसे दाणी के संकेतों का वहन करने के लिए अधिकाधिक संख्या में तारों और केबलों को या उसके शब्दों में धागों के टुकड़े लगाना पड़ेगा। रेडियो इंजीनियर की भांति, जिसका रेडियो स्पेक्ट्रम उपभोक्ताओं से ठसा ठस भरा पड़ा है, टेलीफोन इंजीनियर भी अभी से परेशानी का अनुभव कर रहा है। इन कारणों से, संचार इंजीनियर को अब अधिक बारीकी के साथ यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि इस संबंध में क्या किया जाना चाहिए। युद्ध काल से लेकर अब तक उन लोगों की खोजों से एक सिद्धान्त निकला है जिसे सूचना सिद्धान्त (Information theory) कहते हैं। या साधारण शब्दों में जिसे 'संकेतों का अंक गणित' कह सकते हैं। इसलिए आधुनिक टेलीफोन सेवा के अन्य लक्षणों का वर्णन करने से पूर्व, हम संक्षेप में "सूचना सिद्धान्त" के कुछ परिणामों का उल्लेख करेंगे। किसी संदेश का सार उसमें निहित सूचना दी है चाहे वह माइक्रोफोन में कहा गया हो, टेलीप्रिंटर द्वारा संचारित किया गया हो, गायक द्वारा गाया गया हो या टेलीविजन कैमरा द्वारा चित्रित किया गया हो। आज कल सूचना को मापा जा सकता है। जिस प्रकार आप दूरी को मीलों में अथवा भारों को टनों में मापते हैं, उसी प्रकार आप सूचना को उसके टुकड़ों के रूप में माप सकते हैं। उदाहरण के लिए किसी प्रश्न के उत्तर में कहा गया हौं' या'ना' में सूचना का एक टुकड़ा निहित है, इसलिए 'बीस प्रश्न' वाले खेल में आपको सूचनाओं के बीस ही टुकड़ों के आधार पर वस्तु के बारे में अनुमान लगाना पड़ता है। अब इंजीनियर जानते हैं कि केबल या रेडियो द्वारा सूचना संचारित करने की तीव्रतम दर दो बातों पर निर्भर करती है: उपलब्ध आवृत्तियों का परास (बैंड की चौड़ाई) और प्राप्त होने वाले स्थान पर शोर की प्रबलता के मुकाबले संकेतों की प्रबलता। इसको संकेत और शोर का अनुपात कहते हैं। उदाहरण के लिए यदि आपको 10 हजार टुकड़ों के संदेश को सुरक्षित रूप में संचारित करना चाहते हैं और आपकी वाहिका में बहुत शोर है तो आप तीन काम कर सकते हैं आप संदेश को बहुत धीरे भेज सकते हैं या आप प्रेषित्र की बैंड चौड़ाई बढ़ा सकते हैं और या आप प्रेषित्र की शक्ति को इतना बढ़ा सकते हैं कि वह शोर से अधिक प्रबल हो जाए। इसके नियम इतने कड़े हैं कि यदि आपके पास 300 से लेकर 3,300c/s आवृत्तियाँ प्रयुक्त करने वाली एक टेलीफोन वाहिका हो और दूसरी तरफ संकेत और शोर 45 3,000,000 से लेकर 3,003,000 c/sप्रयुक्त करने वाली एक रेडियो वाहिका हो और उन दोनों वाहिकाओं के अभिग्रहण सिरों पर संकेत और शोर का अनुपात बराबर हो तो दोनों में सूचना के संचारित होने की अधिकतम दर बराबर होगी। परन्तु इस बात की संभावना बहुत कम है कि सूचनाएं भेजने के लिए इन दोनों में से किसी भी तंत्र से अधिकतम संभव दर प्राप्त होगी। कठिनाई यह है कि मनुष्य की भाषाएं, चाहे वे टेलीप्रिंटर से लिखी जाएं या माइक्रोफोन में बोली जाएं संचार की बहुत की अदक्ष विधियां है। मैं इसे यहाँ कुछ उदाहरणों से स्पष्ट करूंगा। माना कि आपटेलीप्रिंटर में एक संदेश छपता हुए देख रहे हैं। HERE IS THE ANSWER TO YOUR Q....... (आपके प्रश्न का उत्तर निम्न है) अब आप जानते हैं कि इससे आगे के कुछ अक्षर क्या होंगे। वे या तो Question या Very (प्रश्न) होंगे। और इनमें से चाहे कुछ भी हों इसका कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि दोनों का अर्थ एक ही है। वास्तव में, To your Q.... (आपके प्रश्न का) अर्थही है क्योंकि जो भी उत्तर होगा वह किसी न किसी प्रश्न का ही तो होगा परन्तु टेलीप्रिंटर इस पर ध्यान नहीं देता और आगे लिखता चला जाता To your Question..... (आपके प्रश्न का)..... ये सब व्यर्थ के शब्द हैं जिनका सूचना में कोई योगदान नहीं है। यदि आपको इस तार के लिए पैसे देने पड़ते हों तो आप अधिक सावधान होंगे और लिखेंगे Answer follows (उत्तर निम्न हैं).... लेकिन यह भी व्यर्थ है क्योंकि यदि आप शब्दों के बजाए अक्षरों के हिसाब से कीमत चुका रहे हों तो Ans लिखना ही काफी होगा। एक अलग कारण से मौखिक अंगेजी तो इस से भी अधिक अदक्ष है। जब कोई व्यक्ति माइक्रोफोन में बोल रहा हो तो माइक्रोफोन की धारा के विचरण के रिकार्ड को देखने से पता चलेगा कि उसमें कुछ शिखर होते हैं परन्तु अधिकांश संकेत दुर्बल ही होगा। इसलिए यदि आप उसका प्रसारण करें या एक शक्तिशाली रिपीटर से एक टेलीफोन पथ पर उसे रिले करें तो आपका शक्तिशाली उपकरण अधिकांश समय बेकार ही पड़ा रहेगा। क्योंकि उसे भाषण पैटर्न में कहीं कहीं आने वाले शिखरों के समय ही पूर्ण शक्ति उत्पन्न करने की आवश्यकता होती है। - संचार 46 या आपको एक तार प्राप्त होता है जिसमें लिखा होता है । इन सव आपत्तियों के बावजूद मनुष्य की भाषा में संचार इंजीनियर के लिए एक अच्छाई हैं। भाषाएं इतनी मंद गति से सूचना संचारित करती हैं और उसमें वास्तविक रूप से अनावश्यक इतने शब्द और अक्षर होते हैं। उन्हें ऐसे भारी शोर में भी सुना जा सकता है जो उन्हें विकृत र दिया कोन हो टेलीफोन पर किसी को कहते सुन रहे होः We shall die with John at the Plaza Restaurant (हम प्लाजा रेस्तरां पर जौन के साथ भोजन करेंगे। Cadching Lasd Drain Domorrox (कल आखिरी गाड़ी से आ रहा हूँ) तो आप बिना दुबारा पुष्टि किए ही इनका अर्थ समझ सकते हैं। फिर भी टेलीफोन इंजीनियर अपने ढंग से ही कार्य करना पसंद करता है और इसलिए यदि वह एक ही केवल में कई सूचनाएं भरना चाहता है तो वह बात चीत में से बहुत सी अनावश्यक जानकारी को निकाल देना चाहेगा। इसका यह अभिप्राय नहीं है कि वह आपकी वार्ता को सेंसर कर रहा है। वह केवल श्रव्यावृत्ति में काट छांट कर रहा है। शुरू में वह 3.4 kc/s से ऊपर की सभी आवृत्तियों को काट देता है। उसके बाद यदि वह चाहे तो 1.7 और 1.9 kc/s के बीच की आवृत्तियों को भी काट सकता है और इस अन्तराल में वह अन्य टेलीप्रिंटर सूचनाओं को संचारित कर सकता है। टेलीफोन पर बात करने वालों को पता भी नहीं चलता कि उनकी आवाज को इस प्रकार काटा छांटा जा रहा है। या उनके बात करने के साथ साथ टेलीप्रिंटर सूचनाएं भी भेजी जा रही हैं। परन्तु यदि वह चाहे तो इलेक्ट्रानीय टेलीफोन केन्द्र की सहायता से और भी अधिक काट छाँट कर सकता है जिसका विकास आजकल किया जा रहा है। इस समय जिन आधुनिक स्वचालित टेलीफोन केन्द्रों से काम लिया जा रहा है उनमें अनेक चल स्विच होते हैं। जब आप डायल पर एक नम्बर घुमाते हैं तो आप के टेलीफोन के डायल करने वाले उपस्कर से निकलने वाले स्पंदों से ये स्विच चलते हैं।(आप इसे क्लिक-क्लिक-क्लिक की आवाज के रूप में सुन सकते हैं)(चित्र 14) इलेक्ट्रानीय केन्द्रों में ये ही स्पन्द आपका दूर के किसी टेलीफोन से संपर्क स्थापित करते हैं. परन्तु टेलीफोन केन्द्रों में प्रत्येक टेलीफोन काल के लिए अलग अलग तारों के पथ होने के बजाए विभिन्न वार्ताएं एक ही अकेली तार पर से चलती हैं जिसे मुख्य पथ अथवा हाईवे कहते हैं। इंजीनियर यह करता है कि केन्द्र में आने वाली प्रत्येक लाइन के लिए एक संकेत और शोर ।

समय- एक इलेक्ट्रानीय स्विच रख देता है। बात करते समय प्रत्येक वक्ता की आवाज इलेक्ट्रानीय स्विच के द्वारा काट छांट दी जाती है ताकि उसकी वार्ता धाराएं मुख्य पथ पर एक सैकिंड के हजारवें भाग की प्रत्येक अवधि में एक सेकंड के दस लाख भाग तक ही प्रवेश करती हैं। दूसरे शब्दों में, उसकी वार्ता धारा का केवल सौवां भाग ही काम में आता है। मान लीजिए सौ लोगफ़ोन पर बात कर रहे हैं इस प्रकार सौ वक्ताओं को बारी बारी से एक ही मुख्य पथ पर स्थान दिया जा सकता है। इसे -विभाजन मल्टीप्लेक्स (Time division multiplex) कहते हैं। इस प्रणाली का एक बड़ा लाभ यह है कि यदि आपटेलीफोन से दो व्यक्तियों का संपर्क स्थापित कराना चाहें तो आपको केवल उनके स्विचों के तुल्यकालन (Synchronize) करने की आवश्यकता है, अर्थात् उनके स्विच एक साथ ही बंद हों और खुलें ताकि वे आपस में एक दूसरे की ही बात सुन सकें और किसी और की नहीं। इसमें उल्लेखनीय बात यह है कि उनकी बात इतना करने पर भी इतनी अच्छी रहती है कि समझ में आ सके। दूसरे स्विचों को जाने वाले तार दूसरे टेलीफोनों को जाने वाले तार A B C . 1600 घूमने स्विच डायल 'घूमती संपर्क भुजा चित्र 14. एक स्वचालित टेलीफोन केन्द्र की प्रणाली पहली डायल की गई स्पन्द को स्विच A के गिर्द घुमाती है। स्विच B से संबंध हो जाता है और डायल की गई अगली स्पन्द स्विच B की भुजा को घुमा देती है। स्विच से संबंध हो जाता है और डायल की गई अन्तिमस्पंद स्विच c की भुजा को घुमाती है जब तक कि उसका संबंध दूर के टेलीफोन से न हो जाए। वास्तव में, कट-छंट जाने पर भी स्पन्दों में उतनी ही सूचना रहती है जितनी. कि मूल वार्ता धारा में। परन्तु, यहाँ पर एक कठिनाई है कि बैंड चौड़ाई में कोई बचत नहीं होती क्योंकि जब तक कि मुख्य पथ से उच्च आवृत्तियों (कई मेगा साईकलों)का वहन संभव न हो उस पर होने वाली अलग अलग वार्ताएं आपस में मिल जाएंगी। इसलिए यद्यपि इससे टेलीफोन केन्द्रका कार्य सरल हो जाता है पर 48 संचार समय-विभाजन मल्टीप्लेक्स से कुल सूचना में कोई कमी नहीं आती। इसलिए, वार्ता के प्रेषण के लिए बैंड चौड़ाई की आवश्यकता पड़ती है। कम बैंड-चौड़ाई से संतोषजनक रूप में टेलीफोन वातां कराने का एक तरीका यह है कि शब्दों को पार भेजने की ओर ही सारा ध्यान लगाया जाय न कि बोलने वाले की वाणी के स्वरूप की ओर भी टेलीफोन तार द्वारा प्रेषित होनी वाली वातचीत का काफी भाग सूचना में कोई योगदान नहीं देता है बल्कि सुनने वाले कोम केवल बोलने वाले और उसके स्वर को पहचानने में सहायक होता है। परन्तु फिर भी मान लीजिए कि आप बातचीत में से वास्तव में महत्त्वपूर्ण ध्वनियां अलग कर बाकी का बहिष्कार कर देते हैं। ऐसा करने का एक तरीका यह है कि गले में उत्पन्न होने वाली निम्न ध्वनियां और होंठों से बाहर निकलने वाले श्वास से उत्पन्न सी.सी. जैसी ध्वनियों को लेकर उनके तदनुरूप हो आवृत्तियों की प्रबलता में होने वाले विचरणों को तार में प्रेषित कर दिया जाता है। दूसरे सिरे पर रोबोट ध्वनि होती है। उसमें गले और होंठों की ध्वनियाँ दो विद्युत पथों के रूप में होती हैं और वे इयरफोन में सही प्रकार की ध्वनियाँ उत्पन्न कर देती हैं। इन दोनों अवयवों की प्रबलता आने वाले संकेतों के अनुसार बदलती रहती हैं। इससे वार्ता प्रेषित करने के लिये आवश्यक बैंड की चौड़ाई 3,000 c/s से कम होकर लगभग 3000 c/s तक रह जाती है। जिन योजनाओं पर वैज्ञानिक और इंजीनियर आज कार्य कर रहे हैं यदि वे सफल हो जाएं तो बैंड चौड़ाई को और भी कम किया जा सकता है। उदाहरण के लिए अमरीकी इंजीनियर एक ऐसी मशीन बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं। जे एक, दो, आठ, नौ, शून्य आदि यदि टेलीफोन पर बोले जा रहे हों तो उन्हें पहचान सके और जब वह संख्या को पहचान ले तो वह उतने ही स्पन्दों को टेलीफोन तार के जरिए स्वचालित टेलीफोन केन्द्र को भेज दे। इससे यह लाभ होगा कि आप किसी भी संख्या को बोल कर ही कोई भी नम्बर डायल कर सकते हैं मानो कि एक्सचेज पर कोई मानवीय आपरेटर कार्य कर रहा हो। आप भाषा के प्रत्येक शब्द के लिए ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि उनकी संख्या बहुत अधिक है। परन्तु लंदन में वैज्ञानिक एक ऐसी मशीन बनाने का प्रयत्न कर रहे हैं जो 'भाषा' की इकाइयों को पहचान सकती है अंग्रेजी में इनकी संख्या लगभग 40 है। ये भाषा की इकाईयाँ जिन्हें पारिभाषिक रूप से फोनीय कहा जाता है। अक्षर नहीं हैं बल्कि उन्हीं की तरह के हैं। उदाहरण के लिए काट (Cought)शब्द बालने में तीन ध्वनियाँ हैं कर यदि कोई ऐसा टेलीफोन यंत्र होता जो फोनीयों को बारी बारी से पहचान सके (Ker) या (aw) और ट (tar) संकेत और शोर 49 तो वह उन्हें पहचानने के लिए एक स्पंद कूट (code of palses) भेज सकता है और दूसरे सिरे पर ये फोनीय एक कृत्रिम वाणी के द्वारा पुनः संयुक्त हो सकते हैं। तब बैंड की आवश्यक चौड़ाई केवल लगभग 100 c/s ही होगी। या फोनीय अभिग्राहक को एक स्वचालित टाइप मशीन से जोड़ा जा सकता है। जब तक कि आप बहुत मेहनत और खर्च से मशीन के अन्दर एक स्वचालित स्मरण शक्ति लगा दें, तब तक कुछ अजब अजब सी रहेगी। जैसा कि फोनीय अभिग्राहक पर कार्य करने वाले लंदन के प्रोफेसर डेनिस फ्राई ने कहा है वास्तव में वह ऐसा लगेगा जिसे पढ़ना मुश्किल नहीं होगा। (In fact it wood proberblee look somthing like this which is not after all veri dificult to read) संचार V टेलीविजन : आज और भविष्य : जब सन् 1958 में रोम में पोप जॉन का राज्याभिषेक किया गया तो उसे सारे यूरोप भर में दर्शकों ने देखा। युद्ध के बाद टेलीविजन के तेजी से विकास होने के बाद यूरोपीय देशों ने केबिलों और रेडियो रिले केन्द्रों की श्रृंखलाएं स्थापित की ताकि उनके प्रेषित्रों में संबंध स्थापित किया जा सके और उनके टेलीविजन चित्रों और ध्वनियों का आदान-प्रदान हो सके। इस राज्याभिषेक के कुछ घंटे बाद उसके दृश्यों को सान फ्रांसिस्को तक के दर्शकों ने देखा। जो कुछ हुआ वह यह था। रोम से संकेत चलकर इटली और फ्रांस होते हुए इंगलिश चैनल के पार पहुंचे। डोवर पर बी. बी. सी. के उपस्कर द्वारा वह स्वचालित रूप से यूरोप महाद्वीपीय मानकों से ऐसे रूप में परिवर्तित हो गए जो बितानी सेटों के लिए उपयुक्त हों- इसके लिए चित्रों को 625 लाइन वाले ग्राहित्र पर लेकर उन्हें 405 लाइन वाले ब्रितानी तंत्र के टेलीविजन कैमरे से देखते हैं। इसके बाद ये संकेत ब्रितानी तंत्र पर मानचेस्टर तक पहुंचे और ग्रानाडा टेलीविजन स्टूडियो पर उनमें पुनः रूपान्तरण हुआ। संकेतों को 405 लाइन और 50 फ्रेम से 525 लाइन और 60 फ्रेम में रूपान्तरित किया गया क्योंकि उत्तरी अमरीका में उनको इसी रूप में प्रसारित किया जाता है। इसके पश्चात संकेतों को चुंबकीय स्पन्दों की श्रृंखला के रूप में चुंबकीय टेपों की चरखियों पर अभिलेखित किया गया और टेप को जेट हवाई जहाज से एटलान्टिक महासागर के पार भेजा गया। न्यू यार्क हवाई अड्डे पर सी० बी० एस० टेलीविजन इंजीनियरों के पास उपस्कर तैयार था। उन्होंने टेप को पुनः चलाया और तट से तट के प्रेपित्रों के बिछे जाल द्वारा सारे महाद्वीप भर में संकेतों को प्रसारित किया। यह काम तेजी से किया गया था-परन्तु टेलीविजन इंजीनियरों के लिए कोई बहुत तेजी से नहीं हुआ था। जब तक कि वे संकेतों को तुरंत ही दुनिया के प्रत्येक भाग में प्रेषित करने में सफल न हो जायें तब तक वे संतुष्ट नहीं हो सकते। वे अभी उन्हें सीधे महासागरों के पार नहीं भेज सकते इसलिए उन्हें दूसरी सब से अच्छी युक्ति अति तेज जेट विमानों का सहारा लेना पड़ता है। परन्तु यदि आपके जीवन काल में ही यह संभव हो सके कि लंदन से लोग न्यूयार्क में हो रहे मैच को देख सकें या मेलबोर्न में बैठे लोग इंग्लैंड में हो रहे टैस्ट मैच को देख सकें तो यह उन विधियों में से किसी एक से संभव होगा जिनका उल्लेख मैं पीछे कर चुका हूँ अर्थात् नए प्रकार के समुद्री तार से आयनमंडलीय विकिरण केन्द्रों की श्रृंखला से या वाह्य अंतरिक्ष में घूमते हुए कृत्रिम उपग्रहों से रिले द्वारा। आप 'स्तर' 'लाइन' और 'फ्रेम' के बारे में सोच रहे होंगे। इनका संबंध टेलीविजन के बिल्कुल आधार से है। जैसा कि आप स्वयं ही देख सकते हैं टीवी चित्र कई क्षैतिज रेखाओं में विभाजित होता है। ब्रिटेन में 405 रेखाएं होती हैं, अमरीका में 525 और यूरोपीय महाद्वीप में 625 जो एक सतत चित्र की तरह दिखाई पड़ता है वह वास्तव में चल चित्र की तरह होता है जिसमें एक के बाद एक चित्र तेजी से बारी बारी से पर्दे पर आते रहते हैं। ब्रिटेन और यूरोप में, 50चित्र अर्थात् फ्रेम प्रति सेंकड होते हैं जबकि संयुक्त राज्य अमरीका में 60 होते हैं। परन्तु प्रत्येक फ्रेम में रेखाओं की संख्या केवल आधी होती है। एक यदि ऊपर से नीचे की ओर गिने तो एक फ्रेम में केवल सम संख्यक रेखाएं होती हैं। और दूसरे में सारी विषम संख्यक रेखाएं ही होती हैं। ये बुनियादी तथ्य और अन्य तकनीकी बातें मानक कहलाती हैं। जिन्हें प्रत्येक देश के टीवी इंजीनियरों का पालन करना होता है। टीवी चित्रों का उत्पादन, प्रेषण और प्रदर्शन कैसे होता है? टीवी कैमरा और ग्रहित्र दोनों में "कैथोड किरण नलिकाएं" होती हैं और प्रत्येक में एक स्क्रीन एक 'इलैक्ट्रान गन', और विद्युतीय चुंबक होते हैं जो गन से निकलने वाली विद्युत किरण पुंज (इलेक्ट्रान और कैथोड किरण एक ही चीज है) को एक तरफ से दूसरी तरफ तथा ऊपर नीचे ले जाती है और स्क्रीन का सिरे से दूसरे तक क्रमवीक्षण करवाते (जैसे आँख से किताब के एक एक शब्द का निरीक्षण किया जाता है) और टीवी चित्रों की रेखाएं और फ्रेम बनाते हैं। (चित्र 15) टीवी इंजिनियर को जिन बातों का ध्यान रखना होता है उनमें सबसे पहली बात यह है कि ग्राहित्र की क्रमवीक्षण क्रिया कैमरे के क्रमवीक्षण के साथ एक ही चरण में होनी चाहिए। इसलिए इंजीनियर एक बार प्रत्येक फ्रेम के लिए और एक बार प्रत्येक रेखा तुल्यकालिक स्पन्द की एक श्रृंखला प्रेषित करता है। ग्राहित्र में इलेक्ट्रान किरणावली की गति का नियंत्रण करने के लिए जो विद्युत-चुंबक होते हैं, वे चित्र संकेत के साथ पूरी तरह से समयानुकूल होते हैं। कभी कभी आपने देखा होगा कि टी वी चित्र तुल्याकालिक नहीं है। एक कलाकार चित्र के ऊपर वाले भाग के गायब होकर नीचे वाले भाग में दिखाई देने लगता है या चित्र में कई स्थानों पर दिखाई देने लगता है यह उसका चित्र विकृतकारी शीशों में दिखाई देने वाले चित्रों की भांति विकृत लगता है। 52 संचार कैमरा टयूब प्रेषित होने वाला दृश्य लैंस इलेक्ट्रान गन प्रकाशसुग्राही प्लेट मा पर्दा ज किरण को स्त्रीन पर किरो के लिए विद्युत चुंबक तुल्यकालन इलेक्ट्रान किरण वीडियो संकेत . परिपथ प्रयर्धक: वीडियो संकेत की प्रबलता स्क्रीन पर पड़ने वाले प्रकाश पर निर्भर करती है। प्रेषित्र को जाने वाला वीडियो संकेत एरियल वीडियो संकेत प्रवर्धक और पृथक्कारी परिपथ कैथोड किरण चित्र नलिका विद्युत चुंबकीय कंडलियां वह चमकता है। वीडियो टयूनिग और संसूचक संकेत प्रवर्धक परिपथ इलेक्ट्रॉन , पुंज जय स्क्रीन तुल्यकालन परिपप 'किरण पर इलेक्ट्रॉन टकराते है तो इलेक्ट्रॉन गन इलेक्ट्रॉनों की किरण पंज प्रक्षेपित करती है। किरण पुंज की प्रबलता इलेक्टान किरण एंज वीडियो संकेत की प्रबलता को पर्दे पर फिराती हैं। पर निर्भर करती है। चित्र । टेलीविजन प्रेपण ओर अभिग्रहण का सिद्धान्त मरे में एक इलेक्ट्रान किरण पुंज एर प्रयाग मुही प्लेट या क्रमry (Scan) करती है लिप्त पर प्रेपित होने वाला दाय शिप्न पिया जाता है। इसके बाद प्लेट में एक परिवर्ती वीडियो संकेत और तुल्यकालन मरेत पित्र में जाते हैं। भाहित्र में इन मरेनों दो पुतः दो भागों में अलग करते है वीडियो गरेन को पंपोर किरन नलिया में भेज दिया जाता है जहाँ बारहीन के कमीशन परने बाने धने पीति यानिन करता है। मापियर : भार और रियम 53 परन्तु तुल्यकालन तो समस्या का आरंभ ही है। दृश्य चाहे स्टूडियों में लिया जा रहा हो या बाहर के किसी प्रसारण के लिये लिया जा रहा हो, टीवी कैमरे की स्क्रीन पर विम्ब के रूप में फोक्स हो जाता है जैसे साधारण कैमरे में लैंमबिम्बको फोटोग्राफिक प्लेट पर फोकस करता है। जैसे जैसे इलेक्ट्रान किरणपुंज स्क्रीन के एक एक बिन्दु के ऊपर से गुजरती है वैसे वैसे उससे एक विद्युतीय संकेत उत्पन्न होता है जिससे उस बिन्दुपरबिम्ब का दीप्तिमान पता चलता है उदाहरण के लिए यदि किरण पुंज किसी को आँख के चित्र का क्रमवीक्षण कर रही है तो संकेत सफेद स्थान पर प्रब ल और रंगीन पुतली (Tris) पर दुर्बल होगा और आँख के काले नेत्रतारे (Pupil) पर बिल्कुल भी नहीं होगा। संकेत जो बारी बारी से चित्र के प्रत्येक बिन्दु की दीप्ति को व्यक्त करने वाली चर धारा के रूप में होता है वीडियो संकेत कहलाता है (लातिन भाषा में वीडियो का अर्थ है कि मैं देखता हूं) लाइनों की संख्या जितनी अधिक होगी टेलीविजन से चित्र की उतनी ही अधिक बारीकियां प्राप्त हो सकेंगी दूसरे शब्दों में स्पष्टता या स्वरूप अधिक अच्छा होगा। कैमरे में वीडियो संकेतों को उत्पन्न करने की कई विधियाँ हैं। उनमें सब से आसानी से समझ में आने वाली विधि संभवतःवह छोटा कैमरा है जिसे विडीकोन (Vidicon) कहते हैं। स्क्रीन एक ऐसे पाउडर का बना होता है जो विद्युत का चालन उसी समय करता है जब उस पर प्रकाश पड़ता है। जब इलेक्ट्रान किरणपुंज क्रमवीक्षण करती है तो वह पाउडर के पीछे वाले भाग में विद्युत जमा कर देती है। जब स्क्रीन पर सामने से प्रकाश पड़ता है तो जहाँ जहाँ चित्र सबसे दीप्त होता है वहाँ विद्युत का क्षरण हो जाता है, इसलिए अगले फेरे में वे बिन्दु के किरणपुंज से और अधिक विद्युत ग्रहण कर सकते हैं। और लक्षण स्क्रीन जितनी विद्युत ग्रहण करता है वह स्वयं प्रत्येक बिन्दु की दीप्ति को व्यक्त करता है। ग्राहित्र में स्क्रीन ऐसे पाउडर का बना होता है जो इलेक्ट्रान किरणपुंज पड़ने पर चमकता है। चित्र के पुनः निर्माण के लिए इलेक्ट्रान किरणपुंज की प्रबलता आने वाले वीडियो संकेत की प्रबलता के साथ घटती बढ़ती है। अतएव जब संकेत प्रबल होता है तब स्क्रीन का वह स्थान सबसे दीप्त होता है, और जहाँ कोई संकेतन हो अर्थात 'अंधेरा' हो वहाँ इलेक्ट्रॉन किरणपुंज बिल्कुल ही कट जाती है। टेलीविजन प्रसारण रेडियो स्पेक्ट्रम का काफी बड़ा भाग ले लेते हैं। जबकि अधिकांश ध्वनि प्रसारणों के लिए कुछ किलोसाइकिल प्रतिसेकंड की बैंड-चौड़ाई पर्याप्त होती है, टी वी के लिए कुछ मेगा साइकिल अर्थात् उस बैंड-चौड़ाई की सौ गुनी से भी अधिक चौड़ाई की आवश्यकता होती है। इसका कारण समझना कठिन नहीं है। माना कि आपके पास 16 इंच लंबा और 12 इंच चौड़ा स्क्रीन है। इस स्क्रीन के लिए धब्बे का आकार यानी इलेक्ट्रान 54 संचार किरणपुंज का सही व्यास एक इंच का चालीसवां भाग होना चाहिए। एक इंच के चालीसवें भाग तक चलने में चित्र पर धब्बे की दीप्ति बिल्कुल भी बदल सकती है, बहुत दीप्त से बहुत काला तक हो सकता है। चलविन्दको एक लाइन पार करने में एक सेकंड का दस हजारवां भाग लगता है इसलिए साइतेकी दीक्षित प्रत्येक लाइन में 600 बार बदलेगी। इसका अर्थ है कि एक सैकड में चईदस ला परिवर्तन होते हे और इन परिवर्तनों के लिए कई दसलक्ष तिन की भावत्ति का ओपयकेता होती है। Hि इसलिए यदि आप एक टीवी चित्र प्रसारित करना चाहें तो आपको रेडियो स्पेक्ट्रम का एक काफी चौड़ा बैंड लेना होगा, अर्थेवा अंगर आप इस बिल द्वारा भेजना चाहें तो आपको विशेष प्रकार के केबिल का प्रयोग करना होगा जिसे समअक्षीय केबल (coaxial cable) कहते हैं। प्रायः केवल टीवी प्रेषित्र ही केबिल के साथ संबद्ध नहीं होते कि वे टीवी चित्रों का प्रसारण कर सकें बल्कि कई ऐसे तंत्र हैं जिनमें ग्राहित्र केबिल द्वारा सीधे कैमरे से संवद्ध रहते हैं। ऐसां प्रसारण के लिए तो नहीं होता बल्कि फैक्ट्री, वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं और उसी प्रकार की संस्थाओं में कई प्रकार के कार्यों में होता है। औद्योगिक टीवी को चीजों को देखने के काम में तब प्रयुक्त किया जाता है जब कभी स्वयं मनुष्य के लिए उन्हें देखना सुरक्षित या सुविधाजनक नहीं होता। उदाहरण के लिए नाभिकीय बिजली केन्द्र के रिएक्टर के अन्दर कई प्रकार के घातक विकिरण होते हैं। कंक्रीट की बनी विकिरण परिपक्षक के बाहर रखे हुए ग्राहित्र से संबद्ध टीवी कैमरा नाभिकीय इंजीनियर के लिए बहुत लाभदायक होता है। वह यह देखना चाहता है कि केन्द्र के रिएक्टर के अन्दर क्या हो रहा है। औद्योगिक टीवी का दूसरा उपयोग यातायात का नियंत्रण करने वाले उस पुलिसमैन की सहायता करना है जिसको सारा दृश्य दिखाई नहीं पड़ रहा है। टीवी कैमरे और ग्राहित्र की सहायता से वह मोड़ पर आने वाली गाड़ियों आदि को देख सकता है। इसके अतिरिक्त टीवी से लिखित संदेश भी अत्यधिक शीघ्रता से भेजे जा सकते हैं। मोटे तौर पर लिखित संदेश को टीवी कैमरे के सामने रखते हैं और दूसरे सिरे के ग्राहित्र पर फोटो प्रस्तुत होने वाले चित्र का फोटो ले लिया जाता है। अब ऐसी विधियां भी हैं जिनसे संदेश को तुरंत ही छापा भी जा सकता है। टीवी तंत्र लिखित संदेश को मनुष्य में भी अधिक तेजी से पाठन, प्रेषण और पुनरुत्पादन कर सकता है और फिर वह अगले पृष्ठों को भी उसी प्रकार प्रेषित करता चलता है। चूंकि जो पृष्ठ या संदेश-पत्र एक कैमरे के सामने रखे जाते हैं उनका अच्छा रूप चित्र या पुनरुत्पादन प्राप्त हो सकता है। इसलिए इस विधि को आरेखों और रंगहीन नकशों को प्रेषित करने के लिए भी काम में लाया जा सकता है। पिछले - टेलीविजन : आज और भविष्य में 55 अध्याय में हमने जिस जानकारी का उल्लेख किया था उस दृष्टि से यह कहना भी उपयुक्त होगा कि स्पष्ट लेखों अथवा चित्रों की रूपरेखा के प्रेषण में प्रत्येक विन्दु को या तो शुद्ध सफेद या शुद्ध काला माना जा सकता है। इसलिए साधारण टीवी की तरह धूसर की विभिन्न आभाओं (shade) के बारे में संपूर्ण जानकारी की जरूरत नहीं होती। टीवी कैमरे के अन्य बहुत से उपयोग भी हो सकते हैं। वैज्ञानिक के लिए टीवी बड़े महत्त्व का होता जा रहा है। समुद्री जीवों का अध्ययन करने वाले कुछ साहसी अध्येता समुद्र की गहराईयों में रहने वाली मछलियों का निरीक्षण करने के लिए पानी के अन्दर के जहाजों में बैठकर गोता लगाने के लिए कितनी मुसीबत का सामना करते हैं और खर्च करते हैं। इस कार्य को प्रायः पानी के ऊपर के जहाज के साथ केबल द्वारा जुड़े हुए टीवी कैमरा और सर्चलाइट को समुद्र की तट में उतार कर भी उतनी ही निपुणता से किया जा सकता है और किया जाता है। एक जीव वैज्ञानिक को,जो उन जीवित कोशिकाओं का अध्ययन करता है जिनसे हमारा शरीर बना होता है, अकसर माइक्रोस्कोप के जरिए उनको रखने की आवश्यकता होती है जिसमें उसे साधारण प्रकाश के बजाए पराबैंगनी प्रकाश प्रयुक्त करना पड़ता है। जिसे वह आँख से देख भी नहीं सकता। परन्तु टी वी कैमरों को आसानी से पराबैंगनी प्रकाश के लिए सुग्राही बनाया जा सकता है। इसलिए कैमरे को उस स्थान पर रखकर जहाँ उसे अपनी आंख रखनी पड़ती वह अपने टीवी स्क्रीन पर चित्र को देख सकता है। खगोलिकी में भी टीवी एक बिल्कुल भिन्न किन्तु महत्त्वपूर्ण रूप से उपयोगी है। यदि आप किसी चित्र को विद्युतीय संकेतों में परिवर्तित कर देते हैं और उसे वाल्बो के एक उपयुक्त तंत्र में से गुजारते हैं तो आप उसे लगभग किसी भी सीमा तक आवर्धित कर सकते हैं। कुछ तारों और ग्रहों का प्रकाश इतना मंद होता है कि बहुत शक्तिशाली दूरदर्शक की मदद से भी आँख द्वारा ठीक ठाक नहीं देखा जा सकता और उसके लिए फोटो प्लेट को कई मिनटों या घंटों तक एक्सपोज करके ही खगोलज्ञ कुछ महत्त्वपूर्ण अनुसंधान कर सकते हैं। परन्तु आजकल यदि वे फोटोग्राफी प्लेट के स्थान पर टीवी कैमरे को रख दें तो संकेत को बहुत अधिक आवर्धित कर सकते हैं और फिर टीवी ग्राहिय पर बने चित्र को सैकिंडों या उमसे भी कम समय में फोटो उतार सकते हैं। परन्तु जैसा कि आप देख रहे होंगे हम संचार के अपने मूल विचार से दूर हटते जा रहे हैं जिसका अर्थ समाचार को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजना होता है। इस से यह स्पष्ट होता है कि विज्ञान या इंजीनियरी के एक क्षेत्र के अधिकार . किम प्रकार दूसरे क्षेत्र में घुस जाते हैं। 56 संचार मैं टीवी के और महत्त्वपूर्ण उपयोग का उल्लेख करूंगा ससे साविष्य में, बड़ी आशा है। आजकल यदि किसी कंपनी के दफतर और कारखा देशरके' विभिन्न भागों में हों और वह अपने मुख्य प्रबंधकों और इंजीनियरों का एक सम्मेलन कराना चाहें तो उसे उन सब को प्रधान कार्यालय में बनाने की जरूरत नहीं है। उसके बजाए प्रत्येक स्थान पर टीवी कैमरे, ग्राहियों और माइक्रोफोनों को लगातार और डाक-तार विभाग द्वारा लगाए गए समअक्षीय केबलों द्वारा सकता भेज कर वे आपस में सैंकड़ों मील की दूरी पर बैठे बैठे आराम से और स्वतंत्रतापूर्वक बात चीत कर सकते हैं। इससे हम उस विचार पर पहुंचते हैं जिसके बारे में टीवी इंजीनियर बीस वर्ष से चर्चा कर रहे हैं परन्तु जिसके संबंध में कुछ प्रयोगों के अतिरिक्त कोई प्रगति नहीं हुई है। वह विचार है व्यक्ति से व्यक्ति तक का टीवी टेलीफोन। इसका दैनिक उपयोग के टेलीफोन के माइक्रोफोन और ईयरफोन के अतिरिक्त आपके पास एक छोटा टीवी कैमरा और एक ग्राहित्र भी होता है ताकि आप और जिस मित्र से आप बातचीत कर रहे हैं आपस में एक दूसरे को देख भी सकते हैं। कठिनाई यह है कि यह बहुत महंगा पड़ेगा। उपकरण के डिजाइन करने और निर्माण में कोई बड़ी समस्या नहीं है परन्तु वास्तविक कठिनाई तो संकेतों को देश के लिए सिरे से दूसरे सिरे तक लोगों के घर और दफ्तरों में रखे उपकरणों में पहुंचाने की है। यहाँ तक की 70 क्रमवीक्षण लाइनों के बने हुए अस्पष्ट से चित्र के लिए भी 100 किलो साईकिल या उससे भी अधिक आवृत्ति की वीडियो आवृत्ति की जरूरत होगी। जबकि साधारण बातचीत के लिए आवश्यक आवृत्ति 3 या 4किलो साईकिल होती है। प्रत्येक टी वी टेलीफोन को नए और महंगे केबिलों द्वारा एक केन्द्र से जोड़ना होगा और टेलीफोन अधिकारियों के सामने एक कठिन कार्य यह होगा कि उन्हें जनता की बढ़ती हुई संख्या के लिए देश के एक कोने से दूसरे कोने तक पर्याप्त वाहिकाएं उपलब्ध करानी होंगी। यदि टीवी टेलीफोन बहुत महंगे होते हुए भी बहुत प्रचलित हो जाएं तो देश की टेलीफोन वाहिकाएं जल्दी ही जटिल हो जाएंगी। फिर भी वह दिन दूर नहीं है जब ये कठिनाईयाँ दूर हो जाएंगी। अब हम पुनः टीवी सीरियल पर आते हैं। इस संबंध में नई चीज रंगीन टेलीविजन हैं। संयुक्त राज्य अमरीका में नियमित रंगीन टी वी सन् 1953 में शुरू हुए थे परन्तु वे अभी तक प्रचलित नहीं हो सके हैं। यह एक ऐसा उदाहरण है जहाँ कि नई ईजाद की तकनीकि कठिनाइयों के बारे में अधिक चिंता लाखों रुपया लगाने वाली टी वी इंजिनियरिंग कंपनियों से अधिक साधारण जनता हो है। सच बात तो टेलीविजन : आज और भविष्य में 57 यह है कि प्रसारण सेवा के लिए रंगीन टीवी की समस्या अभी संतोषजनक रूप से हल नहीं हो पाई है। रेडियो द्वारा रंगीन चित्र भेजने का अर्थ है कि सामान्य काले-सफेद संकेत में अधिक जानकारी भर देना ऐसी जानकारी जो चित्र के प्रत्येक बिंदुका रंग व्यक्त करती है। यदि मनुष्य में ऐसी रंग-दृष्टि का तंत्र न होता तो यह असंभव नहीं तो अत्यधिक कठिन अवश्य होता। रंगीन टेलीविजन का आधार इस तथ्य में है कि मनुष्य की आँख्को"भम" में डाला जा सकता है जिससे वह उन रंगों को भी देखेगी जो वास्तव में उपस्थित नहीं हैं। मेरा कहने का अभिप्रायः यह है कि यदि आप केवल तीन रंगों (लाल, हरा और नीला) के प्रकाशों को मिश्रित कर दें तो प्रत्येक रंग दीप्ति को घटा-बढ़ा कर आप किसी भी अन्य रंग का आभास उत्पन्न कर सकते हैं जैसे पीला, बैंगनी, नीला सलेटी गहरा भूरा या अन्य कोई रंग। रंगीन प्रकाश का मिश्रण रोगनों के मिश्रण की तरह ही है। इस प्रकार चित्र के प्रत्येक भाग की दीप्ति (काला, सलेटी, या सफेद) का वर्णन करने की बजाएरंगीन टीवी तंत्र को प्रत्येक भारकी दीप्ति को लाल, हरे और नीले रंग के रूप में अलग अलग बतानी होती है। मोटे तौर से आप को पहले से तीन गुनी सूचना की आवश्यकता होती है। बल्कि ठीक तीन गुनी भी नहीं, क्योंकि उदाहरण के लिए शुद्ध नीले प्रकाश में आँख केवल अस्पष्ट ही देखती है। इसलिए नीले संकेत की स्पष्टता कम हो सकती है। यानी सूचना कम और बैंड चौड़ाई भी कम हो सकती है और चित्र भी खराब नहीं होगा। काफी जोड़-तोड़ के पश्चात् इंजीनियरों ने ऐसी विधि निकाल ली है जिस से रंगीन टी वी की बैंड चौड़ाई केवल 3.2 Mc/s है जब कि काले सफेद टीवी के लिए 3.0 Mc/s है। यह एक बड़ी तकनीकी उपलब्धि है। संकेत का प्रेषण अब एक बड़ी समस्या नहीं है और न ही टेलीविजन चित्र लिए जाने वाले दृश्य को रंगीन फिल्टर से लैस तीन कैमरों से देखना कठिन है जिससे एक साथ लाल, हरे और नीले रंग के वीडियो संकेत उत्पन्न किये जाते हैं। जब चित्र को ग्राहित्र के स्क्रीन पर पुनः निर्मित करना होता है, तब बड़ी कठिनाइयां सामने आती हैं। साधारण कैथोड किरण नलिका केवल एक ही रंग-प्रायः सफेद का प्रकाश उत्पन्न करती है। एक प्रकार के रंगीन ग्राहित्र में जिसका परीक्षण किया गया है, तीन छोटी कैथोड किरण नलिकाएं होती हैं जो लाल, हरे और नीले रंग का चित्र बनाती हैं। उनका प्रकाश एक स्क्रीन पर एक साथ प्रक्षेपित किया जाता है और स्क्रीन पर एक रंगीन चित्र बन जाता है (चित्र 16) . 58 संचार स्क्रीन कैथोड किरण नलिका लैंसतंत्र लाल तीन रंगीन (लाल, हरा और नीला) बिम्ब मिलकर रंगीन चित्र बनाते हैं। हरा नीला चित्र 16 एक प्रकार के रंगीन टेलीविजन ग्राहित्र में तीन कैथोड किरण नलिकाएं होती हैं लाल, हरे, और नीले रंग के लिए एक एक। इस बात के अतिरिक्त कि प्रक्षेपित टी.वी. चित्र कुछ घुले घुले से लगते हैं, इसके लिए भी बड़ी होशियारी की जरूरत है कि तीनों छोटे चित्र ठीक एक ही आकार प्रकार के हों और वे दृश्य स्क्रीन पर ठीक एक दूसरे के ऊपर ही प्रक्षेपित हों। अन्य इंजीनियरों ने एक ही कैथोड किरण नलिका में पूर्ण रंगीन चित्र बनाने का प्रयत्न किया है। इस दिशा में अब तक का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रयत्न तथा कथित शैडो-मास्क ट्यूब (shadow-mask tube) है इसी की सहायता से अमरीकनों ने अपनी सार्वजनिक रंगीन प्रसारण सेवा चालू की थी। शैडो मास्क ट्यूब में लाखों की संख्या में पाउडर के छोटे छोटे बिन्दु होते हैं जो तीन-तीन के त्रिकोणीय समूहों में व्यवस्थित रहते हैं। जब कोई इलेक्ट्रॉन उनपर टकराता है तो एक बिन्दु लाल चमकता है, दूसरा हरा और तीसरा नीला यदि आप सामान्य दृश्य-दूरी (Viewing distance) पर बैठे हों तो आप बिन्दुओं को अलग अलग नहीं पहचान सकते और चित्र के प्रत्येक तत्व का रंग प्रत्येक बिन्दु पर पड़ने वाली इलेक्ट्रॉन किरण पुंज की प्रबलता के विचरण के द्वारा पुनरुत्पादित किया जा सकता है। यह जितना सरल मालूम पड़ता है वास्तव में उतना सरल नहीं है। इलेक्ट्रॉन किरण पुंज टी वी चित्र को बहुत तीव्र गति से अंकित करने के लिए बहुत अच्छा है परन्तु स्क्रीन पर फोस्कर के किसी एक विन्दु के यथार्थता से अभिग्रहण के लिए बहुत अच्छा नहीं है। यदि आप एक टी वी सेट को धीरे से घुमाकर उसका सामने का पक्ष दूसरी तरफ कर दें तो चित्र में बहुत थोड़ा सा स्थानान्तरण हो जाता है 'टेलीविजन : आज और भविष्य में 59 क्योंकि किरण पुंज पर पृथ्वी के चुंबकत्व का भिन्न प्रभाव पड़ता है। इसलिए आपको इस बात का ध्यान रखना पड़ता है कि जब इलेक्ट्रॉन किरण पुंज संकेत के एक भाग, उदाहरण के लिए लाल भाग का वहन कर रही हो तो वह केवल लाल चमकने वाले पाउडर पर ही पड़े-अन्यथा उसमें हरे चेहरे और बैंगनी घास दिखाई पड़ेंगे। प्रतिच्छाया पटल लाल 0 . क्रमवीक्षण किरण पुंज 100 0 - 1000 कार_fes 0 नीली दर्शक पटल 1000 चित्र 17 शैडोमास्क वाली रगीन टेलीविजन ट्यूब (टेलीविजन सोसायटी की अनुमति से लिया भाग) शैडो मास्क ट्यूब में तीन इलेक्ट्रान गर्ने होती हैं। एक लाल के लिए एक हरे के लिए और एक नीले के लिए। उनकी किरणपुंज शेडो मास्क में बने छिद्रों में से गुजरकर आती है। शैडो मास्क धातु की छिद्रित चादर होती है और स्क्रीन के पीछे ऐसे ढंग से रखी जाती है कि किरणपुंज पाउडर के ऐसे बिन्दुओं पर ही पड़े जिस पर उसे पड़ना चाहिए। चित्र 17 से आपको इसका अनुमान हो जाएगा। परन्तु जैसा कि उपयोग करने से अनुभव हुआ है शेडो मास्क के रंग-ग्राहित्र को ठीक ठाक चालू हालत में रखना बड़ा कठिन कार्य है और अब भी प्रायः हरे चेहरे और बैंगनी धास दिखाई पड़ जाते हैं। रंगीन टीवी चित्रों के पुनरुत्पादन की हर प्रकार की अन्य विधियाँ भी सुझाई गई हैं और हालांकि इंजीनियर अभी तक कार्य में लगे हुए हैं पर उनमें से कोई भी अभी तक सौ प्रतिशत सफल नहीं हुआ है। हो सकता है कि रंगीन टेलीविजन तब तक कभी भी सफल न हो जब तक कि हमारे सामने काले-सफेद चित्रों के प्रदर्शन की कोई बिल्कुल ही नई विधि मालूम न हो जाए। इस संबंध में दो अन्य विचार हैं। एक यह है कि कैथोड किरण नलिका को चपटे रूप में बना कर अब के मुकाबले में काफी छोटा बनाया जाए जबकि चित्र के 60 संचार आकार में कोई अन्तर न पड़े। संभवतः आगे चलकर इस से भी महत्त्वपूर्ण यह होगा कि कैथोड किरण नलिका और इलेक्ट्रॉन किरण पुंज को बिल्कुल ही त्याग दिया जाएगा। सबसे सामान्य विचार यह है कि पाउडर का एक चपटा स्क्रीन बनाया जाए और तारों का एक ऐसा जाल हो ताकि विद्युत-स्पंदों को स्क्रीन के प्रत्येक भाग तक अलग-अलग तारों द्वारा पहुंचाया जा सके।अभी भी कुछ ऐसे पाउडर ज्ञात हैं,जो विद्युतदीप्त (electroluminesent) हैं अर्थात् जब एक विद्युत स्पन्द उन पर पहुंचता है तो वे बत्ती के तंतु की तरह गर्म हुए बिना ही चमकते हैं। यह कोई भी नहीं कह सकता कि उपयुक्त पाउडर, तारों का जाल, और चित्र के प्रत्येक भाग को बारी-बारी से तेज चाल से स्विच करने के तंत्र को पूर्ण रूप से दक्ष बनाने में कितना समय लग जाएगा। परन्तु जब यह संभव होगा तब आप अपने टीवी को दीवार पर चित्र की तरह लटका सकेंगे। टेलीविजन : आज और भविष्य में 61 VI. अन्तरिक्ष में संचार बहुत दूरियों से उपकरणों और मीटरों के पाठ्यांक लेने के कार्य को वैज्ञानिक टेलीमीटरी कहते हैं। जब एक बड़ा रॉकेट किसी उपग्रह को पृथ्वी के गिरी कक्षा में ले जाता है या किसी अन्वेषक यान को चन्द्रमा अथवा ग्रहों की ओर मोदन करता है तो एक वैज्ञानिक प्रयोग शुरू होता है अन्तरिक्ष यान में रखे हुए उपकरण बाह्य अन्तरिक्ष की परिस्थितियों का अन्वेषण करते हैं। उदाहरण के लिए, वहाँ प्रचुर मात्रा होने वाली प्राकृत परमाणुनिक किरणों की प्रबलता को मापते हैं। यदि वहाँ कोई मनुष्य या पशु यात्री, हो तो उसकी हृदय गति, श्वास दर इत्यादि मापे जाएंगे। ताकि यह पता चल सके कि वह यात्रा के कष्ट को सहन कर पा रहा है या नहीं। यान स्वयं अपने चारों ओर का निरीक्षण कर सकता है, वह पृथ्वी के पृष्ठ को काफी ऊंचाई से देख सकता है या उस चन्द्रमा और ग्रह के तल को देख सकता है जिसकी तरफ वह जा रहा है। यदि यह सारी जानकारी वापस पृथ्वी को न भेजी जा सके तो राकेट को छोड़ने, का ही कोई लाभ नहीं है। यदि अन्तरिक्ष यान को उसके स्वलेखन उपकरणों के साथ वापिस पृथ्वी पर लाया जा सके तो भी रेडियो की आवश्यकता नहीं रहेगी। परन्तु ऐसे सुअवसर विरल होते हैं और यह निश्चयपूर्वक पूर्वानुमान लगाया जा सकता है कि अन्तरिक्ष अन्वेषकों के लिए रेडियो एक महत्त्वपूर्ण साधन बना रहेगा। जैसा कि यह मनुष्य द्वारा ऊपरी वायु में प्रथम राकेट भेजने से लेकर अब तक रहा है। और समस्या केवल वैज्ञानिक जानकारी को वापिस पृथ्वी परप्राप्त करना ही नहीं है। अच्छे से अच्छे अन्तरिक्ष राकेट अधिकतर तीर तुक्का प्रकार के मंत्र ही हैं परन्तु पृथ्वी पर से रेडियो नियंत्रण द्वारा उन्हें अपने लक्ष्य की तरफ जाने में सहायता पहुंचाई जा सकती है। कमान आदेश राकेट के मोटरों को उपयुक्त समय पर चालू कर सकता है और सही चाल और दिशा प्राप्त करने के बाद उन्हें बन्द भी कर सकता है। इसके अतिरिक्त, जब मनुष्य स्वयं अंतरिक्ष में जाता है तो जैसे जैसे वहपृथ्वी से दूर होते हुए अन्तरिक्ष यान में, बहुत थोड़े से स्थान में बैठा हुआ, भयानक और .

भारहीनता की परिस्थिति में होता है तो पृथ्वी के साथ रेडियो संपर्क से उसे पागल होने से बचाने में बहुत मदद मिलती है। परन्तु अन्तरिक्ष यानों के साथ रेडियो संपर्क स्थापित करना आसान नहीं है। इसमें तीन मुख्य कठिनाईयों हैं: भार, गति और दूरी। अन्तरिक्ष में एक पौंड अतिरिक्त भार भेजने के लिए, आपको अपने राकेट का वजन कम से कम आधा टन बढ़ाना पड़ता है। इसलिए राकेट इंजीनियर बड़े और भारी प्रेषित्र और उसको चालू रखने के लिए शक्तिशाली बैटरियों नहीं भेज सकता। जो भी हो, यदि उड़ान लंबे समय तक की हो तोरासायनिक बैटरियों जल्दी ही खत्म हो जाएंगी। इसलिए प्रेषित्र की शक्ति इस बात पर निर्भर करेगी कि अन्तरिक्ष यान सूर्य से कितनी वैद्युत शक्ति एकत्रित कर सकता है जिसके लिए सौर बैटरियां प्रयुक्त करनी होंगी। इनके कारण भी राकेट यान का भर बढ़ जाएगा। इसलिए पहली बात तो यह है कि संकेत बहुत दुर्बल हो जाएगा। इसके अतिरिक्त, अन्तरिक्ष यान पृथ्वी के घूमने के साथ साथ नहीं घूमता। यदि आप उपग्रह या चन्द्र राकेट से संकेत प्राप्त करने के लिए एक अकेला रेडियो केन्द्र उदाहरण के लिए मानचेस्टर में स्थापित करें तो लगातार कई घंटे ऐसे होंगे जब आपको कुछ भी सुनाई नहीं देगा क्योंकि पृथ्वी के घूर्णन के कारण मानचेस्टर और उपग्रह एक दूसरे के सामने नहीं रहेंगे। निरन्तर प्रेक्षण के लिए संसार में चारों ओर स्थित रेडियो केन्द्रों की श्रृंखला होनी चाहिए। इसलिए जब सन् 1958 में जब पायोनीयर प्रथम ने चन्द्रमा तक की एक तिहाई दूरी की अपनी ऐतिहासिक यात्रा की थी, तो जोड्रल बैंक (इंगलैंड) केंब्रिज (अमरीका) हवाई और सिंगापुर के प्रेक्षकों ने उसकी प्रगति देखी थी और अन्वेषक रॉकेट की स्थिति की जानकारी और उसके उपकरणों के पाठ्यांक टेलीप्रिंटर द्वारा लॉस एंजलिस स्थित प्रायोगिक मुख्यालय को भेजे गए थे। उन यानों में, जिन्हें अन्तरिक्ष में करोड़ों मील दूर जाना है, नंद प्रेषित्र लगे रहते हैं, और जब वे बहुत दूर चले जाते हैं तो उनका संसूचन बहुत कठिन हो जाता है। इसका कारण केवल यही है कि उनसे आने वालासंकेत इतना क्षीण होता है कि वह 'शोर' में आसानी से खो सकता है। इन कठिनाइयों का रेडियो इंजीनियर के पास क्या हल है? विभिन्न तंत्रों की आजमाईश की गई है। उनमें एक जो सब से अधिक सफल रहा है माइक्रोलॉक (Microlock) कहलाता है। इसका उल्लेख हम अभी आगे करेंगे। सबसे पहले, मैं सबसे स्पष्ट बात का उल्लेख करूंगा कि यदि अन्तरिक्ष यान आयन मंडल से बाहर बढ़ा चला जा रहा है तो उसे ऐसी रेडियो आवृत्ति पर कार्य अन्तरिक्ष में संचार 63 करना आवश्यक हो जाता है जो आयनमंडल को वेध सके। स्पूतनीक प्रथम 20 Mc/s और 40 Mc/s पर कार्य कर रहा था जो अन्तरिक्ष यान द्वारा प्रयुक्त की जाने वाली आवृत्ति की निम्न सीमा पर हैं। 20 Mc/s वाले संकेत आयनमण्डल को पार तो कर सके परन्तु वे इस प्रक्रम में मुड़ गए थे जैसा कि चित्र 18 में दिखाया गया है। इसका अर्थ यह है कि जब स्पूतनीक क्षैतिज के नीचे था तब भी उसका संसूचन संभव था। अमरीकनों ने अपने बहुत से अन्तरिक्ष प्रयोगों के लिए 108 Mc/s का उपयोग किया है और कई में तो 960 Mc/s तक की उच्च आवृत्तियों का प्रयोग किया है। कुछ खगोलज्ञों का विश्वास है कि मंगल ग्रह का आपन मंडल हमारे आयन मण्डल से भी अधिक सघन है और जो यान उस ग्रह के तल पर पहुंच जाएगा उनके लिए पृथ्वी के साथ रेडियो द्वारा संपर्क स्थापित करना लगभग असंभव हो जाएगा। अमरीकी माइक्रोलॉक तंत्र का सिद्धान्त यह है: यदि आप अपने प्रेषित्र और ग्राहित्र की समस्त शक्ति को आवृत्तियों के एक बहुत छोटे बैंड में संकेन्द्रित कर दें तो आप कहीं अधिक दूरियों तक कार्य कर सकते हैं यहाँ तक कि बहुत कम शक्ति पर कार्य करने वाले प्रेषित्र की भी आप बिना किसी कठिनाई के चन्द्रमा की कक्षा तक संसूचन कर सकते हैं। इसकी क्रिया इस प्रकार होती हैः अन्तरिक्ष यान अपनी सारी की सारी संकेत शक्ति को केवल 10000/s चौड़े बैंड में ही प्रसारित करता है यह 108 Mc/s से 108.00/Mc/s हो सकती है। अन्वेषक यान के उपकरणों से प्राप्त सूचना प्रेषित्र की वाहक तरंग में विभक्त श्रव्यावृत्तियों की दोनों सीटियों और बीपों या जो भी गाम आप उसे दें के रूप में अंकित हो जाती है। ग्राहित्र में एक दिशा-ऐरियल होता है जिसे अन्वेषक यान की दिशा में निर्दिष्ट किया जा सकता है। उसमें आने वाला संकेत दो भागों में विभिन्न हो जाता है। एक भाग परिपथ में चला जाता है जहाँ इस आने वाले संकेत की, ग्राहित्र में अन्दर रखे जनित्र से उत्पन्न विद्युत तंरग से तुलना की जाती है। यदि दोनों संकेत बिल्कुल पूरी तरह से समकालिक नहीं हों तो जनित्र की आवृत्ति उनको ऐसा बनाने के लिए स्वचालित रूप से समंजित हो जाती है। इस प्रकार ग्राहित्र बाहर से आने वाले संकेतों के लिए बहुत सीमा तक सही सही ट्यून हो जाता है। अन्वेषक से आने वाले संकेत के दूसरे भाग को जनित्र से प्राप्त होने वाली तरंग के साथ इस प्रकार मिश्रित करते हैं कि अन्वेषी संकेत का माडुलन करने वाली सूचना टोन (information tone) एक परिवर्ती धारा के रूप में प्रकट हो जाती है। इसको बाह्य अन्तरिक्ष में घूमते हुए उपकरणों में पाठ्याको अंकित करने के लिए एक स्वचालित पेन रिकार्डर को चलाने के लिए उपयोग किया जा सकता है। S संचार 64 मंकेत पथ का प्रायनमंडनमे काय वाम्नविक सैनिज रेगा उपग्रह मायनमंडल 'अभिग्रागा केन्द्र पृथ्वी पित्र 18.जम कि उपग्रह क्षैतिज रेखा के नीचे हो तम भी उससे संकेत प्राप्त किए जा सकते हैं। संकेत पय अपनमंडल में मुक जाती है। इस कार्य का एक और महत्त्वपूर्ण लक्षण भी है जिसका मैं उल्लेख करूंगा। यदि कोई अन्वेषक यान पृथ्वी से दूर, उदाहरण के लिए 7 मील प्रति सेंकड की दूरी से जा रहा हो तो उससे 108 Mc/s पर उत्सर्जित होने वाली तरंग उसके ठीक नीचे पृथ्वी पर रखे ग्राहित्र में लगभग 4Kc/s कम आवृत्ति पर प्राप्त होंगी क्योंकि तरंगे फैल जाती हैं जैसाकिचित्र 19 में दिखाया गया है। इसे डाप्लरप्रभाव कहते हैं ग्थिर अन्वेषक B A अन्तरिक्ष यान के चलने की दिशा ५वी. नांग देभ्यं वही अन्तरित अन्वेषक ननी मालूम पडेगी दर चलता है चित्र 19. डाप्लर प्रभाव। एक अन्तरिक्षी अन्वेषक जो आकाश में A पर स्थिर है पृथ्वी पर वापस संकेत भेजता है। यदि वह108 Mc/s पर प्रेषित करता है तो एक सेकंड में पृथ्वी पर 108 दसलक्ष आवर्तन प्राप्त होंगे। अब यदि अन्वेषक पृथ्वी से दूर जा रहा हो तो इस एक सेकंड में वह A से B तक जाएगा वह इस समय में भी उतनी ही आवर्तन संख्या प्रेषित करता रहेगा इसलिए वे लंबी दूरी में फैल जाएंगी। इसका अर्थ है कि पृथ्वी से प्रत्येक शिखर के बीच में कम दूरी या लंबी तरंग दैर्ध्य दिखाई पड़ेगी। अन्तरिक्ष में संचार 65 और इसका अर्थ न केवल यह है कि ग्राहित्र के लिए अन्वेषी संकेत की आवृत्ति (चाहे उसमें कितना भी विचरण हो) के ताले (Lock on) के साथ ट्यून करना दुगना महत्त्वपूर्ण है बल्कि यह भी है कि आवृत्ति में परिवर्तन के निरीक्षण से यह मापना भी आसान है कि अन्वेषण यान किस दर से अभिग्रहण केन्द्र से दूर हटता जा रहा माइक्रोलॉक तंत्र के साथ कठिनाई यह है कि वह इतनी संकीर्ण बैंड चौड़ाई पर कार्य करता है कि वह जिस दर से सूचना प्रेषित कर सकता है उसे मंद ही कहा जाएगा। उदाहरण के लिए, वह चन्द्रमा या पृथ्वी के मेघ आवरण के अच्छे चित्र पृथ्वी पर वापस भेजने के लिए उपयोगी नहीं है। सूचना सिद्धान्त के सरल विचार को अमरीकन संतरी जैसे उपग्रह पर लागू करना रोचक है, जो पृथ्वी तल के टीवी चित्र लेता है, उनका अभिलेखन करना है और जब वह अपने आधार के पास से गुजरता है तो उन्हें वापिस पृथ्वी पर प्रेषित करता है। मान लीजिए कि आप पृथ्वी के तल को 50 गज चौड़े वर्गों में विभक्त करने की सोचते हैं और प्रत्येक वर्ग की औसत दीप्ति मापते हैं। इसका अर्थ है कि आप शहरों और बड़े बड़े जहाजों को तो पहचान सकेंगे परन्तु राकेट छोड़ने के केन्द्रों या सड़क पर चलने वाली मोटरों को नहीं पहचान सकेंगे। आप बिना किसी कठिनाई के यह हिसाब लगा सकते हैं कि पृथ्वी के तल पर 50 गज वर्ग के 200,00 करोड़ वर्ग बनेंगे। यदि आप एक वर्ष में पृथ्वी का संपूर्ण नकशा तैयार करना चाहें और यदि आप अपने केन्द्र से उपग्रह के संकेत (उदाहरण के लिए) प्रति दिन कुछ घंटे तक प्राप्त कर सकें तो उपग्रह को 40 Kc/s बैंड चौड़ाई का उपयोग कर प्रेषित करना होगा। ध्यान दें कि मैंने दूरदर्शक और टीवी कैमरे की स्थिति के बारे में कुछ नहीं कहा है। चाहे ये कितने भी बढ़िया या घटिया हों आप 40Kc/s से कम में काम नहीं चला सकते। यदि आप समुद्रों के चित्र प्रेषित न करें तो आप इस से आधे में काम चला सकते हैं। यदि आप वास्तव में अच्छा चित्र चाहते हों जिसमें भूमि पर खड़े राकेट तक दिखाई दे तो आपको अपनी आवृत्ति 250 गुनी बढ़ानी पड़ेगी। अर्थात् 5 से 10 Mc/sतक करनी होगी। तब भी मौसम आपके मार्ग में बाधक होगा। आप देखेंगे कि जिन भागों का चित्र आप लेनाचाहते हैं उनमें से बहुत से उस समय मेघाच्छादित होंगे जब उपग्रह उनके ऊपर से गुजरेगा। संचार 66 VII. संचार सेवा में रोज़गार लगातार विकास होने के कारण विज्ञान, गणित, और अंग्रेजी में योग्यता प्राप्त किसी भी जवान लड़के लिए इलेक्ट्रानिकी की किसी भी शाखा में अच्छा रोचक व्यवसाय मिल सकता है। इसका कुछ अनुमान शायद इसी से लग सकता है कि इस समय उद्योग में स्कूल से पढ़कर निकलने वाले तीन हजार लड़के लड़की और एक हजार स्नातक नौकरियों पाते हैं। उद्योग के अतिरिक्त, सशस्त्र सेवाओं और अन्य सरकारी सेवाओं और बी. बी. सी. जैसी संस्थाओं में भारी संख्या में इलेक्ट्रानीय तकनीशनों और इंजीनियरों की आवश्यकता होती है। भविष्य में इलेक्ट्रानीय और उससे सम्बद्ध मापन नियंत्रण और निर्माण उपस्कर के विकास स्थापना और मरम्मत के उद्योगों में प्रशिक्षित व्यक्तियों की मांग काफी बढ़ेगी। चूंकि इलेक्ट्रानिकी उद्योग का क्षेत्र अत्यधिक विस्तृत है और सभ्य जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों में उसका योगदान रहता है इसलिए उसकी व्यवस्था आवश्यक रूप से बड़ी जटिल होती है और उसमें विभिन्न कोटि की दक्षता के दसों हजार व्यक्तियों की आवश्यकता होगी। यदि हम इलेक्ट्रॉनिकी में प्रशिक्षित लोगों तक ही सीमित रहें तो इलेक्ट्रानिकी उद्योग में नए भरती होने वालों के दो वर्गों की आवश्यकता होती है यानी व्यावसायिक इंजीनियरों और स्नातक वैज्ञानिकों तथा रेडियो और इलेक्ट्रानिय तकनीशनों की। जो युवा लड़के और लड़कियाँ इलेक्ट्रानीय वैज्ञानिक या इंजीनियर बनना चाहते हैं। उन्हें 16 या 18 वर्ष की आयु तक सेकण्डरी, तकनीकी या ग्रामर स्कूल तक शिक्षा प्राप्त होने चाहिए और उन्होंने विज्ञान, गणित और अंग्रेजी में अच्छे नम्बर प्राप्त किए होने चाहिएं। यदि वे भाग्यशाली हैं और किसी विश्वविद्यालय में चले जाते हैं तो तीन चार वर्ष में वे बी० एस०सी० की डिग्री प्राप्त कर सकते हैं। इन में से कई कोर्स ऐसे हैं जिन्हें पास कर लेने पर दि इन्स्टीटयूशन ऑफ इलेक्ट्रिकल इंजीनियर्स और दि ब्रिटिश इंस्ट्रीटयूशन ऑफ रेडियो इंजीनियर्स (The Institution of Electrical Engineers and The British Institution of Radio Engineers) द्वारा लिए जाने वाली व्यावसायिक परीक्षाओं में कुछ छूट मिल जाती है। डिग्री प्राप्त करने के बाद इन विद्यार्थियों को इलेक्ट्रानिकी उद्योग की कई कंपनियों और कई सरकारी विभागों में एक या दो वर्षीय ग्रेजुएट प्रशिक्षण कोर्स में प्रवेश पाने में अधिक कठिनाई नहीं होगी। इन पाठ्यक्रमों में प्रायः तीन मुख्य अनुभाग होते हैं: (1) बेसिक वर्कशाप प्रशिक्षण (2) सामान्य मैकेनिकल और इलेक्ट्रानिक प्रशिक्षण (3)विशेष उद्देश्य से प्रशिक्षण। अन्तिम चरण में प्रशिक्षणार्थी को उसकी पसन्द के क्षेत्र में या जिसमें उसकी विशेष रुचि हो उसमें विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। उदाहरण के लिए यह अनुसंधान और विकास, डिजाइन उत्पादन, या तकनीकी विक्रय विभाग हो सकता है। एक दूसरा तथा रोचक मार्ग जिससे कोई लड़का इलेक्ट्रानिकी में ग्रेजुएट या व्यावसायिक स्तर की योग्यता प्राप्त कर सकता है, उन कार्यक्रमों का है जिन्हें 'संक्षिप्त' कार्यक्रम कहते हैं। इलेक्ट्रानिकी उद्योग की कुछ बड़ी कंपनियों ने विशेष प्रकार के संक्षिप्त कार्यक्रम जारी कर रखे हैं जिनसे लड़का तकनीकी स्कूल के शैक्षणिक जीवन का पूर्ण लाभ उठाते हुए उद्योग व्यवसाय में लग सकता है इस योजना के अन्तर्गत प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए चुने जाने वाले लड़के क्रमशः प्रायः 18 वर्ष की आयु में अध्ययन आरंग करते हैं। ये कार्य 5 वर्ष तक चलते हैं जिसमें से किसी स्थानीय कालिज में छ: छः महीने के पूरे समय की कक्षाओं के बाद कंपनी की फैक्ट्रियों में छः छः महीने का औद्योगिक प्रशिक्षण चलता रहता है। पूरे पांच साल के कोर्स के दौरान कंपनी,विद्यार्थी की न केवल कालिज की फीस ही देती है बल्कि उसके रहने के खर्च के लिए भी रुपया देती है। कोर्स के पूरा होने पर उस व्यक्ति को दि इंस्ट्रीटयूट ऑफ इलेक्ट्रिकल इंजीनियर्स जैसी संस्थाओं की व्यावसायिक आवश्यकताओं से छूट मिल जाती है। इसके अतिरिक्त यदि विद्यार्थी कंपनी के साथ ही काम करता रहता है तो उसे वही स्थान प्राप्त हो सकता है जो उस व्यक्ति के लिए हैं जिसने तीन वर्ष विश्वविद्यालय में लगातार दो वर्ष ग्रेजुएट एपरेन्टिस के रूप में खर्च किए हों। परिश्रमी युवक सामान्य प्रकार की एपरेन्टिसशिप से भी व्यानसायिक ओहदा प्राप्त कर सकता है। परन्तु इसके लिए भी उसे किसी तकनीकी कालिज या पोलीटेक्निक में दिन के समय या रात्रि के समय अंश-कालिक कक्षा में जाना होगा। इलेक्ट्रानिकी उद्योग की काफी कंपनियों ऐसी हैं जो दिन में अंश-कालिक कक्षाओं में जाने के लिए भी समय दे देती हैं। कई कंपनियाँट्यूशन और परीक्षा की फीस के अतिरिक्त आर्थिक सहायता भी देती हैं। इसकी योग्यता के लिए या तो वी. एस. सी. की डिग्री होनी चाहिए, या इलेक्ट्रीकल इंजीनियरिंग में हायर नेशनल सर्टीफिकेट होना चाहिए, सिटी एंड गिल्ड्स ऑफ लंदन इंस्टीटयूट की कोई उपयुक्त डिग्री होनी चाहिए। इन परीक्षाओं तथा अन्य क्षेत्रों में अच्छी योग्यता होने से दि इन्स्टीच्यूट अॉफ इलेक्ट्रीकल इंजीनियर्स और दि ब्रिटिश इन्स्ट्रीटयूट ऑफ संचार 68 रेडियो इंजीनियर्स की सदस्यता की आवश्यकताओं में कुछ छट मिली इस में कोई शक नहीं है कि भविष्य में इलेक्ट्रानिक औराम उद्योगों उच्च तकनीकी सेवाओं की अधिकांश संख्या में उन लोगों को रोजाएगा जिन्होंने नेशनल कौन्सिल ऑफ टेक्नोलॉजिक एवाईस Nariomas pegnenel Technological Awards) द्वारा संस्थापित जिम्लामा बालाजी (Diploma in Technology) प्राप्त कर लिया हो। इन कार्यक्रमा मजनम से सबसे अच्छे युवक आते हैं जो नेशनल सर्टीफिकेट कोर्स (National Certificate Course) में उत्तीर्ण हुए हों या जिन्होंने किसी सेकण्डरी स्कूल में सफलता पूर्वक सिक्स्थ फार्म कोर्स कर लिया हो। रेडियो और इलेक्ट्रानिकी तकनीशन अन्य विज्ञान-मूलक उद्योगों की भांति इलेक्ट्रानिकी उद्योग में भी व्यावसायिक इंजीनियरों या ग्रेजुएट वैज्ञानिकों से तकनीशनों की मांग अधिक हैं। यही लोग वैज्ञानिक और इंजीनियरों के विचारों को प्रायोगिक वाणिज्य उत्पाद के रूप में परिवर्तित कर देते हैं। इन लोगों की मांग मुख्य रूप से उत्पादन परीक्षण निरीक्षण (Inspection) संस्थापन और अनुरक्षण विभागों में होती है और उनके लिए कई विभिन्न प्रकार के रोचक कार्य होते हैं। उद्योग के मनोरंजक विभाग में रेडियो और टेलीविजन सर्विस इंजीनियरों की भी बहुक मांग है। रेडियो और इलेक्ट्रानिक तकनीशयन वर्ग के लोग इलेक्ट्रीकल इन्जीनियरिंग में सामान्य और उच्च नेशनल सर्टिफिकेट कोर्स प्राप्त सिटी ऐड गिल्ड्स, ऑफ लन्दन इंस्टीटयूट की उपयुक्त परीक्षा पास, रेडियो ट्रेडर्स ऐक्जामिनेशनल बोर्ड इन रेडियो ऐंड टेलीविजन की परीक्षा पास, और वायरलैस टेलीग्राफी में पोस्टमास्टर्स जनरल्स सर्टीफिकेटस प्राप्त लोग आते हैं। ग्रेजुएट और टेक्नोलोजिस्टों की तरह यहाँ भी इलेक्ट्रानिकी उद्योग की अधिकांश कंपनियाँ इस वर्ग के लोगों के लिए एपरेन्टिस योजनाएं और शिक्षा सहायता देती हैं। उपर्युक्त नोट 'The Directory of Opportunitic for School leaves 1958' Careers in Electronics by C.G. Gee.(कार्नमाकट प्रेस द्वारा मुद्रित) से संक्षिप्त करके लिया गया है। संचार-सेया में रोजगार 169 पारिभाषिक शब्दावली गवेषक चालक expcorer conductor अति उच्च आवृत्ति very high frequency अनुरक्षण maintenance अन्वेषक prospectors अन्वेषी रेडार search radar अभिग्राहित receiving set अभिलेखी recorder अस्पताली गाड़ी ambulance आइरिस iris आभा shade आयन मंडल ionosphere जनित्र जांच जुगत झंझा झोल टेलीप्रिंटर टेलीफोन केन्द्र generator Test gadget galc brod Teleprinter Telephone exchange tone control टोन नियंत्रक आयाम माडलन टोह fceler आवृत्ति माडुलन इलेक्ट्रानिकी ईयर पोन उत्स्फोट एपिल्टन परत एरियल Amplitude modulation frequency modulation Electronics carphone eruption Appleton layer arials हायल dial तकनीशन technician तार संचार telegraph तुल्यकालन syndironise दिशायोघ एरियल direction finding arial दीपपर light house धावन पद runway धुन time धुवीय ज्योति Aurorae एनियाम phonemes नाधिक salilor यमान आदेश वादाचिरक किरणपुज एट पेपिस पोरगिरण नमिया जमीन धोममाम रानिर command signal sporadic beam code cable cathode ray tube scan troposphere mineral नेम तारा नौगाधन परितारिका Իսրել navaids iris शोर पुतली प्रकाश सुग्राही प्रकीर्णन संचरण प्रतिष्टंभ प्रबलीकरण प्रस्फोट प्रेषित्र बजर बरांडल बिम्ब की स्पष्टता बोध गम्य भार योग pupil photo sensitive श्रृंग scatter propagation संकेत reluctance संचार reinforcing संचार तंत्र burst transmitter संस्थापन buzzer समाक्ष shrouds सर्वेक्षक definition सूचक of image सूचना intelligible सूचना सिद्धांत payload feeble सौर विस्फुटन mast स्पद modulation स्फुलिंग main स्मृति स्वचालित तीव्रता maser morse key नियंत्रक noise हारयर मास्टर हेविसाइड परत repeater air traffic राबोट रिले control carrier wave वायुवाहित electroluminescenco 911547 noise crest signaling communication communication system installation coaxial surveyer indicator message information theory solar crnption pube spark memory automatic volume control harbour master Heaviside layer robot relay airborn channel मंद मस्तूल माडुलन मुख्य तार मैसर मोर्स कुजं रव रिपीटर वायुयातायात नियंत्रक वाहक तरंग विद्युत्दीप्त पारिभाषिक शब्दापती

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Author
Charles A. Marshall
Title
Sanchar
File name
Sanchar
Text
OCR done
Citation
1968
Published
2011/03
Publisher
Nalanda Prakashan New Dehli
Language
Sanskrit
Pages
92
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551017
Barcode
4990010031800.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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UZN8X0pmePA
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