Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Sootradhaar

Sudhindra Kumar · 2011/03

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सूत्रधार
हास्य-व्यग्य एकाकियों
का
एक अछूता सकलन

SOOTRADUAAR
(A Collection of satırıcł one act plays)
by
SUDI DRA KUMAR
Rs 5 00
চালুঠী সাহা
এs
"
545 যিয গার্কি, যু খােয়ল
অং সা, বিলী-i10007 (গান)

सूत्रधार सुधीन्द्र कुमार

मूल्य
सपिकार
पैतालीस रुपये
सुपीन्द्र कुमार
सस्करण
प्रथम 1991
आवरण
प्रकाशक
तेजर कम्पोजिंग
पतनदास
कादम्बरी प्रकाशन
5451 शिव मार्किट,
न्यू पन्द्रावल जवाहर नगर
दिल्ली 110007
साकेत फोटो टाइपसेटर्स
97 सुन्दर ब्लाक शकरपुर
दिल्ली 110092 दूरभाष 2240182
नव प्रभात प्रिंटिंग प्रेस
बलबीर नगर शाहदरा दिल्ली 110032
आफसेट मुद्रण
ISBN 81-85050-29-5

निवेदन ललित साहित्य का एक प्रेरक अनुभव होता है । विशेषकर समाजोन्मुदी साहित्य में साहित्यकार के सामाजिक अनुभव प्रतिबिम्बित होते हैं । समाज का परिदृश्य जैसा होता है, सामाजिक साहित्य उसे वैसा ही प्रतिविम्बित करता है किन्तु प्रतिबिम्बन ही उसका एकमात्र लक्ष्य नहीं होता, उसमें साहित्यकार का स्वन भी जुडा हुआ होता है क्योंकि साहित्यकार अपने स्वप्न को साकार करने के लिए, अपनी इच्छा को प्रकाशित करने के लिए अपनी भावना को शब्दों में बाँपकर प्रस्तुत करता है । समय ललित साहित्य में केवल नाटक ही ऐसी साहित्य विधा है, जो अपने दृश्य और श्रव्य गुणों के कारण सामाजिक की चितवृति को अधिक तीव्रता के साथ प्रभावित और प्रेरित करता है। इस विद्या का चाक्षुष माघारफलक जितना सीमित होता है, उसकी विषयवस्तु जितनी गभीर होती है और प्रस्तुति जिवनी त्वरायुक्त होती है, दर्शक के हृदय में उतनी हो गहराई वक प्रभाव प्रक्षेप करता है। एकाकी नाटक साहित्य की ऐसी ही विधा है। हास्य व्यग्य एकाकी हँसी हंसी में गहरी बात कह जाने में निपुण होते हैं । केवल हास्य जगानेवाले एकाकी काँच पर की भाप की तरह अस्थायी छाप डालते हैं। वे मनोरजन अवश्य करते हैं, गुदगुदाते भी खूब है, आँखों से आँसू भी यहा देते हैं। लेकिन वे पेट में दर्द करते हैं जबकि व्यग्य एकाकी दिल में दर्द जगाते हैं। उससे पनपी मुस्कराहट कभी कभी हास्य बनकर गले से किलक स्वर भी निकाल देती है, पर उसके गले में पीडा की दीस होती है, इसलिए उसका प्रभाव दीर्घजीवी होता है । "सूत्रधार' ऐसे ही एकांकियों का सकलन है। इन एकोकियों में समकालीन समाज की व्यग्योन्मुखी प्रवियों है और इन छवियों में बड़ी विविधता है। इस सकनन में किशोरों से लेकर बुजुर्गों तक की छवियों आपको मिलेंगी । इन छवियों के पीछे किसी की विवशता दिखलाई पडेगी वो किसी की व्यप्रवा, किसी की आतुरता मिलेगी वो किसी का शोषण मिलेगा किसी का बहुरूपियापन झलकेगा तो किसी का दर्द । मतलब यह कि इस एकाकी सकलन में सबके मतलब की बातें हैं। इन बातों में उपरेश नही झलकियाँ हैं जिनसे कोई मन दहलाना चाहे वो, सीखना चाहे वो सिखाना चाहे तो और 'टाइम पास करना चाहे तो अलवा निराशा किसी को नहीं होगी। कान्तासम्मित उपदेश उपदेश नहीं होता, मनुहार होता है जिससे भले आदमी पिघल जाते हैं और

इन एकांकियों में महिए और दैथिए । मार सूत्रधार पर अपय मूक
प्रख मात्र ।
फिन्तु केवल एक निवेदन अश्य मन सीनिए इन एकफि धारिया
का उपयोग करने से पहले मुझे सूचित अवश्य कर गए।
री 3ए/20 बी जनकपुरी
यी दिल्ली 110058
सुपीन्द्र कुमार

अनुक्रम
9
27
38
अंतिम पड़ाव का दर्द
अभिनन्दन
कवि की दुनिया
गिरगिट
दायरे के भीतर बाहर
दीवारें
48
62
81
न्याय
91
यन्त्रयुग
104
लाइलाज बीमार
113
शोध विधाता
122
साक्षात्कार
132
143
सूत्रपार
हँसी हंसी में
155

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अतिम पडाव का दर्द आशा सिंह तलविन्दर कार বান सुमन पत्नी पडोसी शर्मा की पत्नी [बैठक में एक ओर डाइनिंग टेबल, कुर्सियों, फ्रिज और दूसरी और सोफे, मेन, दीवान, दूत, कैसेण्डर, री वी यथास्थान रखे हुए हैं। सामने की दीवार पर गुरु गोविन्द सिंह का भव्य विव टंगा हुआ है। उसके नीचे रखे दीवान पर पातथी मारे पैंसठ वर्षीय आशा सिंह देठे हैं। उनके हाप की माता उँगलियों के बीच धूम रही है और उनके होठ हित रहे हैं, जिससे लगता है कि वह जप कर रहे हैं। थोड़ी देर बाद उनकी पली तलविन्दर कोर ट्रे में पाम के हो प्याले लेकर आती है और सेप्रत टेबल पर रख देती है। वे दोनों पमपम कर गतचीत करते हैं।] तलक लो जी चाय पी लो । (आशा सिंह के पासदाले सोफे पर बैठ जाणी है। आशा सिंह माला पूरी होने पर माये से लगाते हैं और उसे थैली में रख देते हैं। यह खिसक कर सेन्ट्रल टैदल की और आते हैं, तभी तलविन्दर उनको एक प्याला थमा देती है। आशा सिंह कुछ देर तक घाय सुडकते रहते हैं ।) प्रीतम सिंह की कोई चिट्ठी नहीं आई। कहीं यह बीमार तो नहीं हो गया १ (माशा सिंह निरुत्तर चाय सुडकते रहते हैं ।) उसका बड़ा काका पवग उड़ाते वक्त छा से गिर गया था ! प्रीतम सिंह ने चिट्ठी में लिखा था कि उसके बहुत चोट आई है । गुर किरपा से वह बच गया है। चाय के सग विस्कुट लोगे?

10/ सूत्रधार आशा० तस० माशा तत० आशा० : आशा० तल० आशा तत्त० नर्स (कर) तुम्हारे दर्द का क्या हुआ? (घुटनों पर मय फेरती हुई। अब तो कुछ कम है। गोलियों यइस से बाती रहोगी, वभी दर्द बन्द होगा। अब क्या बन्द शेगा। यह वो शरीर के साथ ही जायेगा। फिर भी (चाय का घूट लेकर) आज माई नहीं आई? नहीं, मैंने उसे हटा दिया है। क्यों? पामें काम ही कितना है? हम दो ही वो परानी है। जब तक देह में दम है, यसक में कर लूँगी । बाद में माई लगा लेना। तुम्हारी मल तो, लगता है, घास धरने गई है। अरे भई, काम कितना ही कम सही, काम है वो । तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं रहती। लडप्रेशर हाई रहता है, जोड़ों में गठिया का दर्द रहता है। जब वर खाँसी बुखार हो जाता है। यह सब सो चलना ही है। काम कसे, घाहे ना कसें । काम से जरा खामखों की बात सोचने से छुटकारा मिल जाता है। तुम तो कितायें लिख पट कर वक काट लेते हो, मैं कैसे काढू ? सारी उमर काम किया है। अब भी करती रहूँ, यो अच्छा है। पता नहीं, लोग खाली कैसे बैठ रोते हैं। मुझसे तो बैठा नहीं जाता। ज्यादा कयास मत करो । माई को रख लो । मुझे पता है कि तुम्हारा शरीर काम के लायक नहीं रहा । ऐसे ही, अर्जनसिंह ने एक लड़का भेजा था कि वह पर के काम में तुम्हारा हाय बैा देगा तुमने उसे भी कुछ दिनों के बाद वापस भेज दिया। (प्याल्य ट्रे में रखकर) हाँ अर्जन ने हम पर बडी मिहरबानी करी थी कि लड़का मेन दिया । उस लड़के का खरच भी भेज दिया होता, तो में जानती। रोज किलो आटा खा जाता था। हम भले ही सूखी रोटी खाएँ, उसे चुपड़ी रोटी घाहिए पी। सूखी रोटी उसके हलक से नीचे नहीं उतरती थी। रुपए की सब्जी लाका पादो की बताता था। हमें दूप मिते कि न मिले उसे सुबह शाम दूप पीने की आदत थी। आशा० तत आशा० : तस अर्जन ने कभी यह भी देखा कि हमारा घर से पा रहा है, गुजारा कसे हो रहा है। सड़का भेज दिया, बड़ा फरजोनिया दिया जर पक वह तुपियने में रहा, तब तक वो यह महीने दो महीने में- एक बार हालचाल देख ही जाता था। अब अमरीका पला गया है, वो हमारे हालवाल, खर्व गुजारे के बारे में कैसे जान सकता है? . रहने भी यो । म खूप जानती हूँ तुम्हारे अर्जन छो । उसे इमारी फिकर होती तो अमरीका जाने से पहले हमसे मिलकर नहीं जा सफदा था? दिल्ली आया, पालम के पास होटल में ठहरा और दूसरे दिन फुर्र से उड़ गया। जाने से पहले अपने बालबच्चों के साप 'परीपणा' करने नहीं आ सकता था? बड़ा घालाक लड़का है यो । अमरीका जाकर चिट्ठी से माफी मांग ली कि यहाँ आने के लिए उसे वक्त नहीं मिल पाया । मैं खूब जानती हूं उसे । खाक जानती हो उसे । विनिोममैन है। वह अपना बिजिनेस देखे कि तुम्हें देखे। हौं, हम मुड्ने हुड्डों से उसे अब क्या मिलना है। विजिनेस यो उसे लाखों रुपया देगा। अब रहने भी दो।ज्यादा बोलने से सडप्रेशर बढ़ जाएगा! बट जाने दो। जल्दी खेल खत्म हो। इस जिन्दगी में अब घरा भी क्या है ? सुबह से शाम तक उमर कैदियों की तरह इन्हीं कमरों में घूमते फिरते, उठते बैठते खाते पीते, सोते जागते रहो। हु । मुझे तुम्हारी फिकर न हो, तो मैं कोई दवाई-गोली न खाऊँ। इसके अलावा और क्या कर सकते हैं ? तुमसे कितनी बार कहा है कि पुरपाणी पढा करो, पर तुमने कभी मेरी बात मानी हो, तब यासा० तस० आशा तत० पाशा तस० आशा० मेरा जी नहीं लगता। मन में क्लेस हो, तो फैन कैसे मिल सकता है। सिलाइयों उठाकर अपना स्वेटर बुनने लगती हैं।] . देखो, तुम माई को रख लो। तुम लेटे बैठे के काम कर लिया करो। मैं माई नहीं रख सकती। घर का खरच कितनी मुश्किलों से चल रहा है, यह तुम्हें क्या मालूम । तुम्हारी पेशन से वो राशन भी नहीं ततः 12/सूत्रपार आशा० तल० आशा० आ पाता । अगर तुम्हारा दामाद देखभाल न करे, तो हमें खाने के भी लाले पड जाएँ । भगवान भला करे हमारी कुड़ी का । वह देवारी कभी खुद, कभी अपने आदमी को भेज कर इमारी खोज खबर तो लेती रहती है और देख जाती है कि यहाँ किसी सामान की कमी चो नही है । कुछ भेजती ही रहती है । इतने लड़कों से तो हमारी यह एक लड़की ही लाप दरजे अच्छी है । शादी से पहले भी वह हमारी देखभाल रखती थी, नौकरी के साप साप घर के काम भी सभालती थी और अब शादी के बाद भी हमारा ख्याल रख रही है। तुम तो जब बोलने पर आती हो तो बोलती ही चली जाती हो। बोलूँ नही, तो क्या करूँ ? मैं जानती हूँ कि तुम अपने बेटों के खिलाफ कुछ सुन नहीं सकते, इसलिए तिलमिला रहे हो। (मुस्करा कर) में तितमिला नहीं रहा हूँ। मैं तो यह मानता हूँ कि हमें किसी से कुछ उम्मीद नहीं करती चाहिए। हमने जिन्दगीभर अपना फर्ज निभाया, अब दूसरे अपना फर्ज निभा रहे हैं। अ हा हा हा 1 दूसरे बडा अपना फरज निभा रहे हैं। या तो पुराने जमाने में वो कौन था ? हाँ, वो सरवन कुमार या सो यो पैदा हुआ या या अब तुम्हारे बेटे हुए हैं, जो अपना फरण पहचानते हैं। तुम कैसी बातें कर रही हो । सबकी अपनी गृहस्थी है, सबकी अपनी परेशानियों हैं। क्या कहो उनकी गिरस्ती के, क्या कहने उनकी परेशानियों के । कभी तुम्हारी भी तो गिरस्ती थी, तुम्हारी भी परेशानियों थीं । तुम्हारे तीन बच्चों पाँच गाजे भॉजियों और तुम्हारी विधवा बहन के साथ तुम्हारे माता पिता का मो किस तरह थियान रखा था। तब तुम्हें कुल जमा सात सौ रुपए मिलते थे जिसमें से मैं महीने का बरव चलाती थी। उसी आमदनी से हमने आठ बच्चों को पढ़ाया लिखाया न्याह किए । तुम समेत पार बड़ों की सेवा की पर कभी तुमने मेरे चेहरे पर शिकन देखी ? तुम्हारी अम्मा भी कुछ साल पहले मुझे असीसें देकर ही मरी है। तत० आशा० अतिम पड़ाव का दर्द/13 आशा . आशा० तत० आता तत० आशा० तत्त० उन बातों को बार बार दुहराने से क्या फायदा? मैं जो कह रहा है, दह धो सुनती नहीं हो। क्या? : यही कि तुम माई रख लो। देखो जी, साफ कहना, सुषी रहना । माई पैसे बढाने दो शह रही थी। सारे काम के अस्सी रुपये मांग रही थी। साठ से एकदम अस्सी। : हो, और धाय नाश्ता अलग मांग रही थी । जितनी तुम्हारी पेंशन आती है, उसमें उसकी तनखा बाना और चाय नाश्ता देना मुश्किल है। और कोई देख लो। . कोई मरी सीधे मुंह पाव ही नहीं करती है। इनके दिमाग सातवें आस्मान पर चढ़ गए हैं। जिससे साठ रुपये लेने की बात करो, वही फटाक से कह देती है कि बीबी जी हमें तनखा नाश्वा मत दो, हमारे बच्चों के लिए एक टैम का खाना दे दिया करो। (हंस फर) बड़ी अच्छी पेशकश है। देख लो । इस पर भी तुम कहते हो कि माई रख लो। मैं तो तुम्हारी सेहत का ख्याल करके कह रहा हूँ। और मैं तुम्हारे पैसों का ख्याल करके कह रही हूँ। [आशा सिंह अखबार उठा लेते हैं और तलविन्दर जुनाई में लगी रहती हैं। (इपर उपर देखने के बाद) मेरा चश्मा कहाँ है ? (सलाइयों स्वेटर एक ओर रखकर उठती हुई, झुकी कमर पर दोनों हाथ रखकर कराह उठती है ) हाय रबा, इस कमर का दरद तो जैसे जान लेकर ही छोड़ेगा। (उठने से रोकते हुए) तुम रहने दो, मैं ले लूंगा। रहने भी दो । तुमने अपने हाथ से कभी कोई काम किया भी है, जो अब करोगे। आशा० तत० आशा तलक आशा० तल० . आशा० तत० 14/ सूत्रधार आशा० तलक तभी तो मैं कहता हूँ कि माई रय लो। उठा बैग जाता नहीं है पर का काम कैसे करोगी। तुमने तो बस एक ही रट लगा रखी है - माई रख लो माई रख लोमरी यह बात तुम्हारे कानों में नहीं घुस रही है कि उसे देने के लिए पैसे नही है। (कालबेल बजती है। तलविन्दर धीरे धीरे दरवाजे पर जाकर एक पत्र ले आती है) लो जी, लगता है प्रीतम की विट्ठी आई है । मैं कह रही थी ना कि बहुत दिनों से उसकी कोई चिट्ठी नहीं आई है। लो, आज आ देती है फिर चश्मा लाकर देती है। आशा सिंह पश्मा लगाने के बाद पत्र को खोलकर पढने लगते है ) जरा उध्या उच्चा बोल कर पढो जी, की लिखिया है? लिखा है कि (पत्र पटते हैं) उसके काका के पैर की हड्डी टूट गई थी (पत्र आशा सिंह को दे आशा तत्त० उसके प्लास्टर घट गया है। आशा तलक आशा तल० आशा तत्त० वह आप दोनों को याद करता है। जल्दी आ जाइए। काका याद करता है, इसलिए जल्दी आ जाइए । यो खुद भी कमी हमारीपाद करता है? और आगे भी तो सुनो । (पत्र पढते हैं) आपकी बहू के कुछ होने वाला है। न असली बात । कात्र याद नर्श कर रश है, बहू याद कर रही है। अब बिस्तर पर पड़ गई होगी। घर का काम करने के लिए रोटिय यापने के लिए प्रीतम को मेरी याद आ रही है। मुझे नहीं जाना है उस मकार के पास बुढापे में भी मुझे चैन नहीं लेने देवा । बुला ले न अब अपनी सालियों को सतहों को । लाइ ताने को दो साली सलाह, काम करने को मुझे नहीं जाना है उस बेशरम के पास। , तुम्हें गुस्से का जब दौरा पड़ा है किसी को भी नहीं पाती हो आसान तल० - आशा० तलक आशा आशा तलक आशा० तल० আ০ क्यों बख् । मैंने क्या किसी की कमाईखाई हैं। पिcts आखिर वह है तो तुम्हारा बेस । अगर से तो हमारी याद ही करेंगे, और किसकी करेंगे। साली सलहों की करें। अरे, वे तो सुख के साथी हैं। और हम? हम केवल दुख के साथी हैं ? हम माँ बाप हैं। हमारा (हाथ झटक कर)फरज, फरज, फरल । फरज केवल हमारे लिए रह गया है ? उसका कोई फरज नहीं है कि अपने बूढे माँ बाप को अपने पास रखे, उनकी सेवा करे । (झुझलाकर) तुम्हारे सवालों से तो मैं तग आ गया हूँ। और तुम्हारे फरजों से मैं तग आ गई हूँ। (आशा सिंह पत्र पढ़ते हैं) और क्या लिखा है? सुनाने से क्या फायदा ? तुम तो बात बात पर मुझे काटने दौड़ती हो। (आशा सिंह को एकटक देखने के दाद धीरे धीरे सोफे पर बैठ जाती है और स्वेटर उठाकर बुनने लगती है ) ठीक है, तुमको भी मेरी बातें काटनेवाली लगने लगी हैं। अब में कुछ नहीं बोलेंगी । घोड़े दिन और जोना है, फिर तुम्हें कोई नहीं काटेगा। बस, कुछ कह दो, मरने की धमकी । यह नहीं सोचती हो कि बुदामे को किसी तरह सुख चैन से काट ले। इमेशा जली की बातें कहने से तुमको सुख मिलता हो, यो मिलवा हो, मुझे को कम से कम नहीं मिलता । तुम्हें पता ही है कि मैंने कभी किसी की बुराई पसन्द नहीं की । कोई बुरा है तो बुरा बना रहे । हम दो मच्छे रहें। तुम अच्छे बने रहो । मेरे बदन में अब इतनी ताकत नहीं है कि में प्रीतम के घर का काम सभालू और उसकी बहू की सेवा करें। उसके पास पैसा है, पैसे से वह कामवाली रख सकता है और सेवादार भी। तलक आशा तलक 44 - आशा० 16/ सूत्रधार : तो मे लिख दूं वि हम नही आ सकते है ? (तलविन्दर स्वेटर युनती रहती है । आशा सिंह पत्र रखकर अखबार उठा लेते हैं। कालदेल बजती है, तो तलविन्दर उठना चाहती हैं, पर आशा सिंह उसे रोककर स्वय दरवाजे पर जाते हैं। मुस्कराकर )आओ बेटा आओ। आओ बहू, आओ । (बलविन्दर से) शर्मा साब आए हैं । साथ में बहूरानी भी हैं। [शर्मा और उनकी सुमन पली क्रमश आशा सिंह और तलविन्दर के आगे 'प्रणाम' कहते हुए झुकते है और वे दोनों उनके सिर पर हाथ फेर कर 'सुखी रहो', 'खुश रहो' कहते हैं । तल० आओ बैठो । (सुमन तलविन्दर के पास बैठ जाती है और शर्मा आशा सिंह के सामन) अब की बार बहुत दिनों में आना हुआ। सुमा ऐसे ही जरा चक्कर पड गये थे। तल० क्यों क्या हुआ? सुमन पिता जी बाथरूम में फिसल कर गिर पड़े थे। अच्छा। कब? शर्मा पन्द्रह दिा हो गये। अब क्या हाल है ? ज्यादा चोट तो नहीं आई? फूल्हे के बल गिरे थे पर वहाँ कुछ नुकसान नहीं हुआ दर्द मात्र है। न बचाव के लिए उन्होंने हथेली टिकाई थी इसलिए क्लाई की हड्डी टूट गई है। यह तो बहुत पुरा हुआ। फिर? शर्मा कलाई पर प्लास्टर पड़ा है। आशा फिर तो बीस पच्चीस दिन बाद पता चलेगा कि हड्डी जुड़ी है कि नहीं । बुटापे का शरीर है। शर्मा जी हो। (सुमन सै) इसीलिए तुम लोग नहीं आ पाए । तभी तो मैं सोचूं कि क्या हो गया तुम लोग क्यों नहीं आए । पहले दो हफ्ते में एक बार जरूर आये। आशा० आशा० शर्मा आशा० तत * सुमन तत० सुमन Aka ततः सुमन आप दीपाली को तो जानती है । पिका- हमें हाँ, उस चुलबुली को क्यों नहीं करगी लरी ननंद जी हो वही । उसके लडका हुआ था धिहटाइमें से पहले हो गया था इसलिए बडा कमजोर था। फिर? खैर तो है? जी हाँ वह मरते मरते बचा है। डाक्टरों ने रात दिन मेहनत करके उसे बचा लिया है। शुक्र है । रब का लाख-लाख शुक्र है। (तलविन्दर से) की प्रीतम के यहाँ भी ऐसा न हो जाए। उसके यहाँ क्या न हो जाए। उसकी चिट्ठी आई है । उसने लिखा है कि उसकी बहू के बच्चा होने वाला है। बड़ा लडका पहले ही छत से गिर कर टौंग तुडा बैठा तल० आशा० शर्मा आशा० शर्मा और सुमन तल० सुमन (साश्चर्य) अच्छ। हाँ, उसके घर में भी सनीचर बस गया लगता है। पहले उसका एक टरक लुढक गया था, जिसमें उसके डराईवर और कलीनर मारे गए। अब उसका काका गिर गया है। उसकी टाँग पर प्लास्टर चढ गया है। आप देखने गयी थी क्या? [आशा सिंह और तलविन्दर एक-दूसरे को देखकर आँखें घुमा तेते हैं इनका लडप्रेशर हाई रहता है। सदन में दर्द अलग रहता है। इलाज वो पत रस होगा? हो चल रहा है । यह तो पलता ही रहेगा । बुटापे का शरीर है। बूढ़ी देह बीमारी का पर होती है बहू । फिर भी शरीर स्वस्थ रहता है तो मन भी ठीक रहता है। पीमार शरीर में मन बुझ गया है और कुछ भी अच्छा न लावा । ततः सुमन तत० समन 18/ सूत्रपार आशा तल० आशा० तल० सुमन आशा ফাগ आशा शर्मा आशा० शर्मा हाँ बहू, तू ही इसे समझा ले । यही बात मैं कहता हूँ वो इसे अपील नही करती। तुम भी क्या आदमी हो जी । सबके सामने एक ही दुखडा ग्रेने बैठ जाते हो। फिर तुम मेरी बात क्यों नहीं मानती ? तुम्हारी बात मानते मानते सारी जिन्दगी बिता दी है। अब आकर एक बात नहीं मानी है तो सबसे कहते फिर रहे हो। (शुपलाकर सिर अटकती है।) माता जी । एक दात मेरी समझ में नहीं आती । आपके दो पाते पीते मैटे हैं आप लोग उनके पास क्यों नहीं रहते ? तिलविन्दर आशा सिंह की और देखती है। भाशा सिंह शर्मा से बाते करते रहते हैं। और क्या चल रहा है? पिछले दिनों मैं एल०टी०सी० दूर पर था। फेमिली के साय? जी हाँ सबको लेकर गया था। पेरेट्स को भी ले गये थे? जी हो उनको भी । उनका मन था कि रामेश्वरम् जाएँ, इसलिए मैंने दक्षिण भारत का दूर बनाया था। बडा अच्छा किया । साउथ बहुत अच्छी जगह है । 'सादा जीवन उच्च विवार उपर ही दिखाई देते है । उपर के मन्दिरों का तो कहना ही क्या । आस्मान तक ऊँथे । कन्याकुमारी भी गये ये क्या? जी हों, यहाँ से सीधे मद्रास फिर रामेश्वरम्, मदुरे कन्याकुमारी, त्रिवेन्द्रम, ऊटी मैसूर, बगलौर गए और वहाँ से वापस आ गए। ओह लगभग सारा साउथ देख लिया । विळपति नहीं गए? उपर अगली बार जायेंगे । अब विपति हैदराबाद, भबई, गोमा का प्रोग्राम बनायेंगे। बात सुन्दर । बहुत अच्छा किया कि एल०टी०सी० श सही इस्तेमत किया । बहुत से लोग तो एल०टी०सी० का पैसा पर दै आशा० शर्मा शर्मा आशा० अंतिम पडाव का दर्द। 19 शर्मा आशा जी हो, इन ट्रास्पोर्ट कंपनियों ने दस पन्द्रह परसेण्ट लेकर जाली रसीद देने का पन्या जब से चालू किया है, तब से यह करप्शन बहुत मट गया है। पता नहीं, लोग कैसे ऐसा कर लेते हैं । मोरल वेल्यूज से ऐसे लोगों का कोई सरोकार ही नहीं रह गया है । गवर्नमेण्ट ने एक सुविधा दी है कि लोग अपने देश को देखें समझें, पर लोग हैं कि रुपया देखते ही बेईमानी की तरफ झुक जाते हैं । पता नहीं देश का क्या बनेगा। ऐसे लोग अपने बब्दों के सामने न जाने कौन सा आदर्श रख रहे तत० आशा० तत० आशा ऐसे ही लोग सुखी रह रहे हैं आजकल । आदर्श की पातें करनेवाले एक आप ही बहुव हो । सारी जिन्दगी आदर्श की मातें करते रहे हो, उसी का फल है कि बेटे हमें कौडी को पूस्ते नहीं है और हर गलत सही तरीके से पैसा कमा रहे हैं। एक हम पे कि तेरह जनों की गिरस्ती चलाई और अब हमारे थे बेटे हैं कि हमें सहारा देने को वैयार नहीं है। (सकोय) तुम भी ऊलजलूल बोलने से बाज नहीं आती हो । बिलकुल सठिया गया हो। मेरे सठियाने में वो अभी पांच साल और हैं। धुप कर। (चलविन्दर से) यह किसका स्वेटर बना रही हैं ? प्रीतम की बहू के होने वाले बच्चे का । बहू देवारी को तो गिरस्ती के काम से वक्त नहीं मिलता होगा, सो धना नहीं पाई होगी । मैंने सोचा कि मैं खाली बैठी रहती हूँ तो बैठे बैठे उसके बच्चे के लिए एक स्वेटर ही सुन डालूं। ठीक है । खाली समय है और बैठे बैठे का काम है। आपकी बहू भी खुश हो जाएगी कि सास जी ने प्यार से चीज बनाकर दी है। (कोष के स्थान पर धीरे धीरे मुस्कराहट लाकर) मुझसे तो तुम कह रही थी किसी पोसिन के लिए बना रही हूँ। सुमन ततक सुमन आता० 20/ सूत्रधार तलक आशा (मुस्कराकर) पिछले दिनों लुधियाणे से मलहोत्रा आया था न ? वह मुझे बता गया था कि जनवरी में प्रीतम की बहू को कुछ होने वाम है। मैं तभी से बुनाई में लग गई थी। तुमको इसलिए नहीं बताया कि तुम मुझ पे हँसोगे कि एक तरफ तो बेटों को जली कटी सुनाती रहती है और दूसरी तरफ उनके बच्चों के लिए सर्वेटर बुन रही है। मुझे पता है कि तुम लुधियाना भी जाओगी। अब क्या करूँ, मुझे तो बहुओं पर दया आती है । चारी मरदों का मुंह देखकर बात करती हैं, वरना हैं बहुत अच्छी । लुधियानेपानी और अमरीकावाली दोनों ही अच्छी कुडियाँ है । मेरा और इनका बहुत पियान रखती हैं। पुलक के साथ) जब भी मुझसे मिलती है या बिछुडती हैं तो सध्ये आँसू गिराती हैं। मैं जब भी उनके पास से आती हूँ मेरी टैची के तले में नोट भर देती हैं। अमरीकावली तो, जब भी कोई अमरीका से आता है उसके हाथ कोई न कोई सामान पैसे और एक लम्बी पिट्ठी भेज देती है। विट्ठी में हमेशा लिखती रहती है कि कोई जरूरत हो तो लिखना। यह तो आपकी खुशकिस्मती है कि आपको ऐसी बहुएं मिली हैं। सच बिलकुल तुझ पर गई है। [सुपन दृष्टि का लेती है] तुम इन्हें बातें ही यात पिलाओगी या कुछ नहीं, पाऊ जी | माता जी को कोई तकलीफ हम नहीं देंगे । हम लोग यहाँ आने से पहले एक और पर में गये थे। उन लोगों ने भरपेट पिला पिला दिया है। आप उनको जानते ही है सुमन तत० आशा० शर्मा आशाक शर्मा (जैसे याद आ गया हो) अरे हो, कुलपूषण जी । ई भने आ भी हैं। कभी कभी यहीं पी आ जाते हैं। हमारा बहुत ध्यान रखते हैं। हौं उनके यहाँ आन गृह प्रवेश पा । खूप पट्रिया घाना पिलाया। हो यो हमें भी दुलाने आपे थे।पाप हो जानते ही हो शर्मा कि इनकेनप्रेशर दे मारे हमारा की आ जाना। आशा - अंतिम पडाव का दर्द/21 , तल० -- m आशा तल० आशा सुमन आशाक सुमन तुम घले जावे । वह बुरा मानेगा । तुमने मुझे पहले नहीं सताया। इतनी देर में मुये कौन सी मौत लिवा ले जाती । सगुन देकर पले- आते। मुझे पता है कि मुझे क्या करना चाहिए, क्या नहीं। खाक पता है । वारे लोग इतनी इज्जत से बुलाने आते हैं और तुम हो कि मेरा नाम लेकर यल जाते हो। तुम नहीं जाओगे तो तुम्हारे यहाँ कौन आयेगा? सबको पता है कि हमारी क्या मजबूरियाँ हैं । तुम इन लोगों को कुछ तो पिलाओ। (खडी होकर) हमें केवल पानी पीना है, वह मैं ले आती हूँ । क्या आप लोग भी पीयेंगे? नहीं, ऐसा अच्छा नहीं लगता । कुछ तो ले लो। (हाथ जोडकर) नहीं सचमुच हमारी कुछ भी याने पीने की इच्छा नहीं है । यस पानी पीयेंगे । मैं लेकर आती हूँ। (रसोई की ओर मढवी है) अरे, फीका पानी क्या पीना । (सुमन मुडकर देखती है) फ्रिज में सोश की बोतलें रखी हैं, जो पीना हो वह पानी में मिला लाना। जी, अच्ा । (रसोई में चली जाती है) (आशा सिंह से) आपका दिनभर क्या कार्यक्रम चलता रहता है ? हमारा क्या कार्यक्रम चलेगा। रिटायर्ड आदमी हैं । सारी जिम्मेदारियाँ चुक गई । सवेरे नाम सिमरन चलता है, दुपहर को सोना, शाम को कभी इस कमरे, कमी उस कमरे में टहलना और रात को किताब पढते हुए सो जाना। आप लिखने पढने का कोई काम ले लिया करें । अच्छा समय कट जाता है और साथ में कुछ पैसा भी बन जाता है। भई शर्मा, अब न तो हमें पैसे की कोई हस रह गई है और न किता पढने में जी लगता है। घोडा अखबार पढ़ लेते हैं जिससे घोड़ा वक्त के साथ जुड़े रहते हैं या फिर तुम्हारी इन माता जी से अगड़ा कर जी बहला लेते हैं। तलक सुमन शर्मा आशा शर्मा आशा 22/सूनयार शर्मा आशा० तल० आशा० तल० आशाव शर्मा तल० क्या अब भी आपका झगडा हो जाता है? क्यों नहीं । आखिर इनको भी दो समय काटना है। क्यों मुझे बदनाम करते हो। मैं क्या प्रगडातू हूँ। नही, तो क्या मैं झगडालू हूँ ? तुम कुछ न कुछ ऐसा काम कर देती हो कि मुझे भगड़ा करना पड़े। जैसे आज तुमने बैठे रिटाए माई को ही निकाल दिया। (शर्मा से) आज सवेरे से मेरे पीछे पड़े है कि मैंने भाई को क्यों निकाल दिया है। (शर्मा से) क्या मैं गलत कह रहा हूँ। इन्हें लडप्रेशर है, गठिया है, कई बीमारियों हैं। इन्हें आराम की जरूरत है, लेकिन नहीं, पर को काम ये खुद करेंगी, इसलिए माई को हटा दिया है। नही माता जी यह तो में भी कहूँगा कि आपने ठीक नहीं किया। याऊ जी ठीक कह रहे हैं। अब आपको आराम की जरूरत है। बेटा, मैं इनकी तरह नहीं हूँ कि सबके आगे घर का दुखड़ा रोऊँ । इनको बता चुकी हूँ कि मैने माई को क्यों हटाया है। (सिर हिलाकर) रहने भी दो। (कुछ देर तक सोचने के बाद) अगर आप लोग पुरा न मानें तो क्या एक बात पूछ सकता हूँ? क्या? अप दोनों की उस अब आराम की है। आप अपने पेयें के पास क्यों नहीं रहते हैं? (वलविन्दर की और देखने के बाद) बेटे, बात यह है कि हमने जिन्दगीपर ईमानदारी से कमाया-खाया है। हमारे बेटे जिस तरह कमा खा रहे हैं, वह हमें पसन्द नहीं है। आँखों देखी मक्खी नहीं निगली जाती । उनके पास जाकर रहते हैं तो उनकी कमाई के चौर तरीके हर्षे पसन्द नहीं आते और । इन्हें कार पार येकना पड़ता है। ये आदर्थ की बाते करते है। को उन्हें भावी नहीं है। आशा० शर्मा तलक शर्मा आशा सत आशा० कन तलक आशा - और उन धानो पीना भी मास मच्छी वाला है। घर में अफसरो और दोस्तों को बुलाकर शराव उडती है । हमारी वजह से उनके सामने समस्या खड़ी हो जाती है और भी बीसियो पाते है। सब बवाने से क्या फायदा। बहुएँ मेरी टैची में रुपये रख देती है तो मना करती हूँ कि मत रखो। इन्हें ये रुपये अच्छे नहीं लगते तो क्सम खाकर कहती हैं कि ये रुपए उनके मायके से मिले हैं, वहीं दे रही हैं। और अगर निकाल भी दूं तो वे रोने लगती है। बहुएँ हमें दोनों ही बढ़िया मिली हैं। उन घरों में वे घेवारी वैसी ही रहती है, जैसे कीचड़ में कमल होता है। बेटे अपने होकर भी अपनी आदतों से पराए लगवे है और बहुएँ दूसरे घरों से आकर भी (बलविन्दर की ओर संकेत कर) इनकी कोख से पैदा हुई लगती हैं। दोनों ही चिट्टियाँ लिखकर बुलाती रहती है। अमरीकावाली की चिट्ठी कुछ दिन पहले आई थी। उसने अमरीका बुलाने के लिए टिकट भेजने की बात लिखी है। ये ही वीसा और पासपोर्ट नहीं बनवा रहे हैं। क्यों नहीं बनवा रहा हूँ यह भी वो बताओ। [सम्म ट्रे में चार गितास शर्बत बनाकर से आती है और सबके आगे ट्रे घुमाती है । सब एक-एक गिलास उठा लेते हैं। सुमन अपना गित्तास तेकर खाती ट्रे मेज पर रख देती हैं। फिर तत्तविन्दर के पास बैठ जाती है। इसलिए न कि अर्जन सिंह माँस-शराब खाता पीवा है? नहीं। इसीलिए न कि उसने अपने लड़के के केस कटवा दिये हैं ? नहीं । इसलिए क्योंकि यहाँ सी बहुत पड़ती है और सर्दी से तुम्हारे हाथ पैरों में सोजिश मा जाती है। मेरी वजह से क्या तुम सबसे रिश्वा तोड़ लोगे? हमेशा घर में घुसे रहवे हो । अमरीका तो क्या जाओगे तुम पड़ोसियों के यहाँ भी वो नहीं जावे हो। आशा तत्स० आशा ततः आशा० 24/ सूत्रधार आशा इस क्लर्क-बस्ती में कौन किसे जानता है । वर्किंग डेज में लोग सुबह से निकलकर शाम को पके-हारे लौटते हैं । छुट्टी के दिन में बच्चों को घुमाने निकल जाते हैं और रात को टी वी के आगे बैठ जाते हैं। तल० आशा० शर्मा हौं, अब दो जमाने चो रहे नहीं जब कि लोग एक दूसरे से कोई न कोई नाता रिश्ता जोडकर बात करते थे, इज्जत करते थे, सुख दुख में साथ देते थे। अब तो दो जमाना आ गया है, जब अपने बेटो को अपने मां-बाप भी बोझ लगते हैं। बस, यही मैं कहना चाह रहा था । हम किरी पर बोझ न बनें इसीलिए हम किसी के पास नहीं रहना चाहते। आप दोनों एक ही बात को कन्फर्म कर रहे हैं और यह बात है जैनेरेशनमैप की । यह गैप मेरी राय में दोनों ओर से पच किया गया है। माफ कीजिए, अभी आप कह रहे थे कि आप अखवर इसलिए पटवे हैं कि आप वक्त के साथ जुड़ सकें, पर अपने सड़कों के साथ रहने की बात मावे ही आप पक से कट जाना चाहते है। आप युजुर्ग : रामनपर है। आपको समझाना शोभा वो नहीं देता पर जो कुछ समझता है, उसे कहे देता हूँ। आज के समय में समझौते करके पलना होता है। एडजस्टमेण्ट्स करने पड़ते हैं। हर आदमी एक धास उप में आजाद रहना पाया है, पर समाज में रहने के लिए सबको किसी न किसी स्वर पर, लेवन पर आपस में गुड़ना ही पड़ता है। कोई भी अफेला नहीं रह सकता। हम रह रहे हैं। कहाँ रह रहे हैं? आप मतानी से जुड़े हुए हैं। माना मी आपसे सुडी हुई। मापसे जुड़ा हुआ हूँ, मसानी से मुहा हो पीला से गुश हुआ । जीन और माता मुनसे आपसे जुड़े हुए है। हमने कोई है दो का सके कि रिकुत सम अपने बतरे पर पास नए राम्या हूँ। अपने बलपूरे पर पायेने के लिए भी फ्यूचरूरत होती है। शर्मा आशा सुमन वह तो ठीक है पर एक बात मैं भी जोहूं । हम पति पली से परिवार बनता है। प्रति और पत्नी को आपस में भी बहुत सारे एडजस्टमेण्ट्स करने पडते. है । तब परिवार चलता है । समा दीलिए. छोटे मुंह बड़ी बात है। आप और माता जी आपस में कितनी बार नहीं झगड़े होंगे, पर आज भी आप दोनों के सम्बन्य कितने मजबूत है, क्योंकि आप दोनों का भगड़ा अपने अपने लिए नहीं, दूसरे के भले की चिन्ता के कारण होता है। इसी तरह आपको अपने देये के साथ निभाना पडेगा और बेटों को आपके साथ। मैं वो निभाने को तैयार हूँ पर बेटे तो नहीं हैं। देटों को क्यों बदनाम करते हो जी ! लौ, अभी तक तो अपने बेटों की बुराई कर रही थी अब बेटी की तरफ से गोलने लगी। गाशा तत्त० आता माँ जो हैं। सुमन आशा तस० आशा आशा० (षड़ी देखकर) तुम्हारी दवाई का यइम हो गया । या लूँगी। खा लूंगी नहीं, बालो। (उठती हुई) ओह | उठा ही नहीं जाता । बड़ा दरद है । (झुकी कमर पर हाथ रखकर अदर चली जाती है) (लविन्दर को जाती हुई देखकर) ऐसी हालत में तुम्हारा लुधियाना जाना मुश्किल है। (मन्दर से) अगर नहीं जाएंगे, ये वे लोग सोचेंगे कि हमें उनकी परवाह नहीं है न आने का बहाना बना लिया है। उन्हें सोचने थे। उन्होंने कौन सी तुम्हारी परवाह की है, जो हम करें। (शर्मा से) तुम्हारी गाव सोलझें आने सव है, पर तुम देख ही रहे हो कि (पत्र दिखाकर) इस चिट्ठी में प्रीवम ने अपो घर के सब शल लिख दिये है, पर हमारे बारे में कुछ भी नहीं पूर्ण है। हम दोगों के लिए मस परीपणा' लिखा है। तत. आशा 26/ सूत्रपार आता विठक 4 भाती हुई) तुम ठीक कहते हो। मेरा लुधियाने माना मुश्किल लग रहा है। कमर में महुत दरद है। लगता है, लडप्रेशर भी एट गया है। रिठ पाती है। यही दो मैं कह रहा हूँ। अब तुम अपनी फिकर कणे, दुनिया की चिन्ता छेडो। हमने दुनिया के लिए बहुत कुछ कर दिया । कोई साद नहीं रखता कि किसी ने उनके लिए क्या क्या किया है। (शर्मा से) बेटे । तुम भीतम को एक तार दे दो कि हमारा लुधियाना आना मुस्किल है क्योंकि तुम्हारी माँ की हालत अच्छी नहीं है । (पत्र देते हुए पवा इसके पीछे लिया है। [शर्मा पर्व से लेते हैं। मेरी हालत के बारे में कुछ मत लिखना । बैवारी बहू पपड़ा जाएगी। तो मेरी हालत खराब है, यह लिखवा हूँ? (कानों को हाथ लगाकर) हाय मैं मर जावा । तुम्हारी हालत क्यों पराव हो? तुम जो चाहो, सो लिखवा दो। मैं कुछ नहीं बोलती। [शा और सुमन बड़े हो जाते हैं। (शर्पा से) दुम वही लिख देना, जो मैंने बताया है । पैसे और लेते जाओ। जी नहीं, अभी पैसे रहने दीजिए । रसीद देने आऊँगा, तब देखा ततक आशा० तत्त० आशा जायेगा। आशा० शर्मा जावे-जाटे जग डॉ सक्सेना से कह देना कि वह आकर इनका चैक मा कर लें और हों, तुम्हारे यहाँ कमला काम करने आयेगी उसे यों भेज दैना । घर का काम इनके बूते का नहीं है। ठीक है। अच्छा हम घलते हैं। मैं तार दे दूंगा और डॉ सक्सेना और कमना को भेज दूगा प्रणाम। शर्मा और सुफल आशा सिंह और तलविन्दर के परों को प्रय तमाकर घने जाते हैं। आशा सिंह और तत्सविंदर आशीर्वाद की मुद्रा अप उयये रहते हैं।"

अभिनन्दन
डॉ० प्रसादी लाल त्रिवेदी
नरोत्तम
विश्वविद्यालय में विभागाध्यक्ष
शिष्य
शिष्य
शिष्य
प्रकाशक
चरणदास
डॉ० पवन
प्राध्यापक
[मॅक्टर प्रसादी सात त्रिवेदी का भव्य कत । कर की सजावट
सुरुचिपूर्ण रॉक्टर महोदय दो शिष्यों के बीच सोफे पर बैठे हुए
है। कमरे में अनेक साहित्यकारों के बीच उन के चित्र सगे हुए
विवेदी । (एक दार्टी और बैठे शिष्य से) तो नरोत्तम ! तुमने कार्यक्रम के
अनुमार ही सारी व्यवस्था कर ली है ना?
नरोत्तम : जी, डॉक्टर साहब ! मैंने आपके अभिनन्दन समारोह की तैयारी
पूर्ण कर ली है। आपके जीवन और कृतित्व के सम्बन्ध में लेख
लिखवाये जा चुके हैं और अब मैं उनको भेंट रहा हूँ ताकि सुन्दर
और आपके अनुकूल सामग्री ही प्रेस में जा सके।
त्रिवेदी किस किस के लेख आ गये हैं?
नरोत्तम लगभग डेढ सौ लोगों ने लेख भेजे हैं, जिनमें डॉ० चरितनाय यवन,
डॉ० लखपति 'सुप्त', डॉ० मेघनाथ, डॉ० भगवानस्वरूप 'पायल'
आदि भी है।
त्रिवेदी (कुते के बटन पर एक सप की उँगलियाँ फिराते हुए) उमाप्रिय
निवेदी और रापादास वाजपेयी ने कुछ नहीं भेजा ? (दूसरे शिष्य की
ओर देखते हुए) क्यों मुकुन्द मैंने तुमसे इन दोनों के पास जाने और
उनके लेख लिखवाकर लाने को कहा था-- उसका क्या किया?

28/ सूत्रपार त्रिवेदी त्रिवेदी जी जी, मैं उन दोनों के पास बनारस और सहारनपुर गया था, लेकिन उन्होंने तो आपका सन्देश सुनते ही ऐसा मुंह बना दिया, जैसे कि मैंने उन्हें कुनैन खिला दी हो। (उठकर कुर्सी पर बैठते हुए) सठिया गये हैं स्साले । अपने आपको सबसे बड़ा आचार्य समझते हैं । (मुकुन्द से) मैंने तुम्हें इन दोनों स्थानों पर जाने के लिए जो किराया दिया था, सब बराबर कर दिया होगा? (जेब से रुपये निकालकर डॉक्टर त्रिवेदी की ओर बढाते हुएजी नहीं, सारा खर्च मैने किया है, आपका एक पैसा भी नहीं लिया। लीजिए अपने रुपये। (रुपये लेकर जेब में डाल लेते हैं) हाँ 1 तुम तो जानते ही हो, अभिनन्दन अप और समारोह पर लगभग दस हजार रुपये खर्च हो जायेंगे । सोच समझ कर खर्च करने में ही बुद्धिमानी है। अच्छा, मैं तुम लोगों के लिए चाय बनवाता हूँ (अन्दर चले जाते हैं) (कुछ क्षण तक नरोतम की और देखकर) इस भागदौड़ में मेरे सौ रुपये उड गये और उन्होंने चुपचाप ही रुपये अपनी जेब में सरका लिए। (पास खिसकते हुए) भाई जान लेक्चररशिप भी तो तुम्हें ही लेनी है। जितनी सेवा करोगे उतनी मेवा मिलेगी। मैं तो पाज आया ऐसी सेवा से । जब से अभिनन्दन की बात चली है, तब से अब तक मै पाँच सौ रुपये सर्व कर चुका हूँ और अपी न जाने कितना और करना पड़ेगा। तो फिर इस विषय में एम०ए० और पी-एच०डी० क्यों की? किसी और विषय में जाते तो यह सब न करना पड़ता । पहले यो बिना सोचे समझे ओखली में सिर दे दिया अब मूमलों से डर रहे हो। ये भूपल तो असम है। सप क्या है? इनका व्यवहार ? आवार ? स्वभाव ? इनका धरित्री कुछ भी तो नहीं लेकिन ये विश्वविद्यालय में विभागाध्यक्ष और यहाँ की मान्तरिक राजनीति में प्रभावशाली स्थान रखते। नरोतम मुकुन्द नरोतम नयेतम है नरोत्तम मुकुन्द नरोत्तम इसलिए सब कुछ मुस्कराकर सहना पड़ेगा । ची, गन्ने की चूसी हुई गडेली की तरह थूक दिये जाओगे a और मैं क्सिलिए अपना तन, मन, धन इस अभिनन्दन में लगा रहा हूँ ? जानते हो ? नहीं तो सुन लो । मुझे अपनी पुस्तक पाठ्यक्रम में लगवानी है, डी०लिट्० के शोधप्रबन्ध पर अच्छी रिपोर्ट लिखवानी है, और अन्त में रीडरशिप प्राप्त करनी है । लेक्चरर भी मैं यों ही नहीं बन गया था। उसके लिए मुझे सैकड़ों रुपये का आँख मूंद कर प्रसाद चढ़ाना पड़ा था । रुग्ण होने पर दवा और फल खिलाने पड़े थे और स्वस्थ होने पर दावतें । (आँखें फाड़कर) सच ? और लो, तो मैं क्या झूठ बोल रहा हूँ | विश्वास न हो तो पता कर लो विभाग के दूसरे लेक्चररों और रीडरों से कि उन्होंने कैसे वे स्थान प्राप्त किये हैं। अरे भैया, अगर कुछ लेना है तो उसके लिए कुछ देना भी होता है। प्रत्येक सफलता सघर्ष के पश्चात् ही प्राप्त की जा सकती है। मैं समझता था कि (अन्दर की ओर देखकर चुप हो जाता) [हाप में कागजों का बडल लेकर त्रिवेदी जी का प्रवेश । उनके पीछे चाय लिये हुए नौकर आता है । जब तक त्रिवेदी जी सोफे पर बैठकर हाप के कागजों को खोलकर उलटते-पलटते हैं, तब तक नौकर प्यालों में चाय डालकर सरको देता है और बाहर चला जाता है। तीनों बातचीत के बीव पाय पीते रहते हैं।] देखो नरोत्तम, तुम भी सुनो मुकुन्द मैंने अपने जीवन और कृतित्व के उल्लेखनीय पक्षों पर कुछ नोट्स तैयार किये हैं। अधिक समय नहीं मिला इसलिए पूरे लेख नहीं लिख सका । तुम दोनों मिलकर इन नोट्स के आपार पर जरा सुन्दर ढग से दो लेख लिख डालो। उनपर अपने नाम दे देना। जी, अच्छा । (त्रिवेदी जी से कागत लेकर देखने लगता है।) त्रिवेदी नरोत्तम 30/सूत्रधार त्रिवेदी त्रिवेदी त्रिवेदी नरोतम क्यों मुकुन्द, तुम बनारस में प्रालिका प्रसाद मित्र से भी मिते हो? (लापों पर दोनों कुहनियों टिकाकर भय मतमा हुमओ) जी, मिता था। यह कह रहे थे कि में लेख लिखकर डाक से भेज दूंगा। कम वक? जी जी यह वो मैने पूम न:। (सकोय) पूण नहीं कौन सा ऐसा काम तुमने किया है जो पूरा हुआ हो ? सुप तो बिलकुल प्रकार के आदमी हो। [मुकुन्द नरोत्तम की ओर देखता है। नरोत्तम उसकी ओर कनधियों से रोष प्रकट करता है। (मुकुन्द की ओर दृष्टि फेरे हुए) कल शाम को ही तो तुम कह रहे थे कि मित्रजी 20 तारीख तक लेख भेज देंगे। (जैसे दूपते को विनके का सहारा मिल गया हो, त्रिवेदी जी से) हौं, हाँ, जी हो, वह कर रहे थे कि मैं त्रिवेदी जी सारा सुझाये गये विषय, त्रिवेदी जी की पारित्रिक महत्ता पर लेख लिखकर 18 तारीख को डाक से पेज दूंगा। (सपत होकर) हौं, यह हुई न कुछ बाद । मैं तो भई, सिद्धान्त का आदमी हूँ । जो काम करना होता है, ईमानदारी से करता हूँ। मैं चाहता हूँ कि दूसरे व्यक्ति भी ऐसे ही हो । पुस्तकों में से सूक्तियों तो छौट ही ली होंगी। जी हो । कल रात को मैंने उन्हें क्रमस सप भी दे दिया है। आज शाम को आपको दिखा दूंगा। ठीक है । (नरोतम से) मैंने तुम्हें अपनी विनोदप्रियता के सम्बन्ध में कुछ प्रसग सुनापे और लिखाये थे, उनको ठीक तरह से लिख लिया त्रिवेदी तुमने मेरी त्रिवेदी नरोत्तम जी हाँ आप जब कही भी लिखा दूंगा। कुछ तण सोचकर] एक बात सुनाऊँ ॲक्टर साहब । मैंने आपकी विनोदप्रियता के कुछ अश कल रात की एक साहित्यगोष्ठी में सुनाये, तो सोम हसवे इसवे लोटपोट हो गये । एक दो सम्जन बाद में मेरे पास विवेदी नरोत्तम त्रिवेदी नरोत्तम त्रिवेदी आये और बोले कि कुछ प्रसग हमें लिखा दीलिए हम कर्मयुग में प्रकाशित करवायेंगे । (त्रिवेदी का मुख प्रसत्रेत से खिल जाता है। मैंने तो उनसे कह दिया कि यह सामग्री में अभी नहीं दे सकता। पहले गुरु जी का अभिनन्दन अप छप जाय, उसके बाद दे सकूँग। (प्रसत्रता उड़ जाती है) दे देते। कोई बात नहीं थी। तुम तो जानते ही हो कि यह विनापन का युग है। जी अच्छा, मैं आज ही दे दूंगा । आप आज्ञा दें तो मैं खय भी कुछ पत्रिकाओं में पेज हूँ। हाँ, हौं, भेज दो। एकप मुकुन्द के नाम से भी भेज देना । जी, अच्छा । (मुकुन्द की ओर देखता है, वह फीके ढग से मुस्करा देता है।) [एक छात्र का प्रवेश । वह त्रिवेदी जी के चरणस्पर्श कर घड़ा रहता है। (नरोत्तम और मुकुन्द से) अब तुम दोनों जाओ और बताया हुआ काम आज रात तक पूरा कर लेना। (खड़े होकर) जी, अच्छा । (क्रमश त्रिवेदी जी के घरण स्पर्श कर बाहर निकल जाते हैं।) आओ धरणदास, देगे । (चरण दास एक कुर्सी पर बैठ जाता है) सुनाओ, क्या समाचार ? मैं पत्रावास में गया पापी मन दो पर्वा पलायी थी जी कि हम लोगों को मिलकर त्रिवेदी भी कर स्वागत समारोह करना चाहिए अभिनन्दन समारोह हौं, जी, अभिनन्दन समारोह मैंने सभी लड़कों से कहा पाणी कि हम लोगों को त्रिवेदी जी के स्वागत में अभिनन्दन समारोह करना चाहिए । सो बहुत से सड़के बोले जी कि हमें अभिनन्दन करके उनसे क्या लेना है । जिनको कुछ लेना हो, वे करें अभिनन्दन । मूर्ष है। दोनों त्रिवेदी परण त्रिवेदी त्रिवेदी 34 / सूत्रधार त्रिवेदी बसत त्रिवेदी हैं, कोई नहीं खरीदता । दो तीन साल बाद उनको औने पौने भाव में निकालना पडता है। यह आप क्या कह रहे हैं? अपने विभागाध्यस काल में मैंने आपकी इतनी पुस्तकें कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में लगवायी है । उनमे अब तक आप लाखों रुपया कमा चुके होंगे। वह तो ठीक है डॉक्टर साहब लेकिन हमें तो अपने व्यवसाय में लाभ की दृष्टि से हर कदम उठाना पडता है। इस बात की आप चिन्ता न करें पीस पच्चीस प्रतियों में अपने मित्रों में बाँटने के लिए खरीद लूंगा, सौ के लगभग मेरे शिष्य खरीद लेंगे और पवास-साठ प्रतियों में पुस्तकालयों में बिकवा दूंगा। दह तो आपकी कृपा है, लेकिन यदि आप यह आज्ञा देते कि मेरी इतनी टीकाओं कुंजियों और पाठ्यक्रम में लगाई जाने वाली पुस्तकों को प्रकाशित करना है, तो वह सादर सिरमाये थीं । अमिनदन अथ को छापना बडे खतरे का काम है। उसमें घाटा ही पाटा है। घाटा क्यों है ? लगभग पांच सौ पृष्ठ धगे । उसका मूल्य पाँच सौ एक रुपये रख देना । जो दो सौ प्रवियाँ मैं विकवाऊँगा, उनसे आपका सारा पैसा निकल आएगा और शेष बिकने में आपको लाभ ही लाभ है। अच्छा --यह बताइए कि आप क्या लेंगे ठडा कि गर्म (हाथ जोड़कर) कुछ नहीं । पन्यवाद । आपका ही खा रहा हूँ। नहीं सो कैसे हो सकता है । कुछ तो होना ही चाहिए । (बसत को कुछ बोलने का अवसर दिये बिना अन्दर की ओर) अरे भोला ! जरा कुछ पल काट ला और दो पोतलें फ्रिज में से निश्चल ला । (बसत से) और यह सब क्या मेरा है ! आपकी और अपने शिष्यों की वजह से ही तो मैं आर्दिक और मासिक रूप से निश्चित होकर साहित्य सेवा कर पाता हूँ। मरे हो एक सत यो पताइए । मैंने प्रेम त्रिवेदी बसत त्रिवेदी अभिनदन/35 बसत . प्रताप भट्ट की लिखी जिस पुस्तक के लिए भूमिका लिखी थी, उसके मुखपृष्ठ पर आपने पहले मोटे अक्षरों में मेरा नाम सशोधक और भूमिका लेखक के रूप में क्यों दे दिया है ? आपको पता है कि मैंने उस पुस्तक का पहला पृछ तक नहीं पढ़ा है। (दृष्टि नीचे झुकाने के बाद ऊपर उठाकर) हैं हैं डॉक्टर साहब, आपको भी पता है कि बड़े आदमी की छाया में सभी काम आसानी से हो जाते हैं | उस भट्ट को कौन जानता है ? उसका नाम पढकर तो कोई भी उस पुस्तक की एक भी प्रति नहीं खरीदेगा, इसलिए किसी न किसी रूप में आपका नाम देना आवश्यक हो गया। सभी नये लेखकों की पुस्तकें हम इसी शर्त पर छापते हैं कि या तो वे अपनी पुस्तक पर रायल्टी न लें या फिर उस पुस्तक पर किसी बड़े लेखक की भूमिका या नाम देने की स्वीकृति दें। दूसरी स्थिति में हम लेखक और उस प्रसिद्ध लेखक के बीच जिसका नाम पुस्तक पर छपता है, रायल्टी का फिफ्टी फिफ्टी बँटवारा कर देते है। तो क्या उस पुस्तक की आपी रायल्टी आप मुझे देंगे? नौकर फलों की तश्तरी और बोतले लेकर आता है। अवश्य । कितनी ? (फलों की तश्तरी लेकर बसत की और बढाते हुए) लीजिए, फलाहार कीजिए। (एक फाक उठाकर मुँह में रखता हुआ) धन्यवाद । वह तो पर निर्भर है। कापी मोटी रकम मिल जायेगी। (एक बोतल बसत को पमाकर दूसरी बोतल स्वय ले लेते हैं) हौं, सौता बुरा नहीं है । इस तरह तो मुझको आपको और भट्ट को तीनों को लाभ ही लाभ है। अजी, हम तो चाहते हैं कि साहित्य की वृद्धि हो चाहे उसके लिए कैसा भी मार्ग अपनाना पडे मेरी तो यही मगल कामना है। [नौकर अन्दर चला जाता है। त्रिवेदी बसत त्रिवेदी बसत विवेदी 36/ सूत्रधार बस, त्रिवेदी बसत त्रिवेदी बसत त्रिवेदी पवन त्रिवेदी आपकी कृपा चाहिए। लोग कहते हैं कि हिन्दी में परा ही क्या है। हमें ऐसे लोगों का प्रमजाल तोडना है। अवश्य । तोडना ही चाहिए । (पीते हुए) तो फिर अभिनन्दन ग्रय का क्या रहा? डॉक्टर साहब मैं आपको स्थिति बता हो चुका हूँ । हो, यदि आप कुछ आर्थिक सहयोग देने को तैयार हो तो में बाद में आपके रुपये लौटा सकता हूँ। [डॉ० धवन प्रवेश करते हैं । त्रिवेदी और बसत उठकर 'नमस्कार' के साथ स्वागत करते हैं और तीनों बैठ जाते हैं। पवन कुछ चिन्तातुर हैं। (बसत से) मैं तैयार हूँ । इस बारे में फिर बात करूँगा थोडी देर पवन साहब से शात कर लें। अवश्य अवश्य । (सोफे पर आराम से अपलेटा हो जाता है।) कहिए पवन साहब, वह लेख लिख लिया आपने? डॉक्टर साहब आपका लेख तो अब विधाता स्वय लिख रहा है। (सावधाा की मुद्रा में) क्या मतलब ? (पवन बसत की ओर देखते हैं । त्रिवेदी बसत की ओर देखने के बाद पवन से) कोई बात नहीं । ये भी अपने ही हैं। कुलपति महोदय ने आपके विरुद्ध शिकायतों की जांच के लिए एक समिति का गठन किया है। (भौचक) समिति का गठन ! क्या मतलब ? कैसी शिकायतें ? कुलपति के पास आपकी बहुत सी शिकापर्ने पहुंची हैं, जिनमें कुछ (जेब में से कागज निकालकर पढने लगते हैं) (1) आपने पिछले छह वर्षों में विश्वविद्यालय से एल०टी०सी० लेकर रेल गाड़ी की द्वितीय श्रेणी में यात्रा की और प्रथम श्रेणी का किराया वसूल किया । (2) आपने अपने पी एच०डी० के छात्रों से शोधकार्य करवाने की बजाय व्यक्तिगत कार्य करवाया और सिफारिशी पत्र धवन त्रिवेदी धवन अभिनदन/37 त्रिवेदी पवन त्रिवेदी लिखकर उन्हें पी एच०डी० की उपाधि दिलवायी। (3) आपने अपने शोषछात्रों से उपाधि मिलने तक भेटें ली और अन्त में दक्षिणा के नाम से सोने की अंगूठियाँ जजीरें बिजली के अनेक प्रकार के सामान तथा अन्य ऐसी ही अनेक कीमती वस्तुएँ ली (4) विभाग और कॉलेजों में अपने अपने प्रिय व्यक्तियों को रीडर और लेक्चर लगाया तथा अपने व्यक्तियों को रखवाने के लिए अपने प्रभाव का दुरुपयोग किया (कोप में तमवमाकर खड़े हो जाते हैं) सब दकवास है । सब झूठ है। आप बकते हैं। (खडा होकर) में अपनी आर से कुछ नहीं कह रहा । ये सब बातें तो कुलपति के व्यक्तियों ने मुझे बतायी हैं । कल तक शायद आपको नोटिस भी मिल जाये। (हाथ पटकते हुए) मैं सबको देख लूंगा । उनको भी जिन्होंने मेरी शिकायतें की हैं। (उठता हुआ) समा कीजिए डॉक्टर साहब, मैं आपका अभिनन्दन अथ किसी हालत में नही छाप सकूँगा । कहीं आपके मामले में मैं भी न फैंस जाऊँ । अब मुझे भय हो गया है कि कहीं मेरे द्वारा छापी गयीं आपकी पुस्तकों की विकी ठप न हो जाय। हाँ हाँ जाइए आप सब । मैं देख लूँगा सब को। (हाथ जोड़कर) एक बात और कह दूं चलते चलते । जब जनता ने आपका अभिनन्दन करने का निश्चय किया है तो वही आपका अभिनन्दन अच भी छपवा डालेगी। अच्छा, नमस्कार । बतत निकल जाता है। धवन भी सिर झुकाए चल देते हैं । त्रिवेदी कोय और चिन्ता में वायी हवेती पर दायें हप की मुट्ठी मरते हैं। बसत त्रिवेदी

कवि की दुनिया
कवि
कवि पत्नी
कवि मित्र
डारिया
दो दुकानदार
झुनियाँ
[घर उपर विघरी हुई पुस्तकें । एक टीती-सी पुरानी खाट पर
दुरते-पतले कवि बैठे हुए कुछ लिख रहे हैं। गाय और रसोई
है, जिसके दरवाजे पर चादर सटका कर पर्दे का काम लिया गया
है। अन्दर से बर्तन उठाने रखने की आवाज आ रही है। दायी
और बाहर से आने-जाने का दरवाजा है।
कवि
पत्नी
कवि
(अवानक उछल कर) अनी सुनती हो । जरा इथर तो आओ।
(रसोई से) क्या काम है जी ? इपर खाना बनाऊँ कि तुम्हारे पास
आऊँ।
ओफ, तुम जरा देर के लिए ही आ जाओ। (हाथ के कागज की ओर
देखकर) देखो, मैंने कितनी सुन्दर कविता लिखी है । वाह, वाह क्या
कहने । (गुनगुनाते है)
मेरे पास फालतू कामों के लिए टैम नहीं है । अपने आप पढ के
अपने आप पुश हो लो।
ओफ्फो, थोडी देर को आ जाओ । खडी खड़ी सुन जाओ, फिर
पका लेना खाना।
[कवि पत्नी आटा लगे हाथों रसोई से बाहर आती है। स्वस्थ
शरीर, मामीण वेश
पत्नी
कवि

पत्नी कवि पली कवि पली कवि पत्नी तुम्हारे मारे मेरी जान आफत में है। अपने अपने किसी की चलने दोगे। सुनाओ, क्या लिखढेर कागजे बिगाह तुम इसे कागज बिगाडना कहती है जो न जाने कितने लोग दीवाने दने फिरते है फिरते होंगे सिरफिरे लोग । सुनाओ तो, क्या लिखा है। सुनो । (खंखारकर कर) विषरी अलके, उठती साँसें हैं दिखा रही तडपन दिल की। प्रिये ! यह 'प्रिये कौन है जो? मैं देख रही हूँ कि तुम दिन रात किसी न किसी औरत पर कविता लिखते रहते हो। (मुँह विगाड कर) तुम वो बात बात में शका करने लगती हो । पर छायावादी कविता है, किसी औरत पर नहीं। घरे रहो अपने इस छायावादी को, मेरी तो रोटी जल गई। रिसोई में घुस जाती है (कविता एक ओर फेंककर) भैंस के आगे बीन बजाओ, मैंस पड़ी पगुराय । तुम क्या समझो कि कविता किसे कहते हैं। (एकदम बाहर आकर) यह भैंस किसे कह रहे हो जी ? जरा जशन सभाल कर बातें किया करो मने तो कहावत बोली है। क्या जरूरत थी कहावत बोलने की ? मुझे मैंस की तरह समझते हो, तभी तो ऐसी बात कह रहे हो। (खाट से उतरते हुए) तुमसे कौन मगग मारे । जाओ, खाना बनाओ। मैं नहीं बनाती । तुम्हें खाना हो तो बनाओ। [वहीं बैठ जाती है] मत बनाओ, में बना तूंगा । जब देखो, तब देकार का मगड़ा भोल लेने बैठ जाती है। कवि पत्नी कवि पली कवि पली 40/ सूत्रधार कवि मित्र कवि मित्र कवि मित्र कवि मित्र (हर से) कवि जी अन्दर है क्या? [कवि-फ्नी पूंपट कादकर प्रटपट रसोई में धती जाती है] आओ भाई ! अब के दो बडे दिनों में दर्शन दिए ? (अन्दर आकर) आज जरा अवश मिल गया इसलिए परा आपा। देसे क्यों ? (हंसकर) अरे, सो कोई बात नहीं है। यह भी अपना ही घर है। आमओ रेलो। हमें तो भई तुम जानते ही हो औघड़दानी कवि हैं, इसलिए कुर्सी दुर्सी तो है नहीं । इसी घाट पर विराजो । हो, हो इसी पर बैठे लेवा हूँ । वैसे तुम्हें आए गए के लिए कुर्सियों का प्रबन्ध कर ही लेना चाहिए। खाट की पाटी पर अटके रो बैठता है, जिससे वह टूट जाती है। नित्र उपक कर घा हो जाता है] अरे रे ss हमारे यहाँ एक ही तो घाट थी, उसका भी आपने क्रिया कर्म कर दिया। [कवि-पली योड़ा-सा पर्दा हटाकर प्रॉकती है फिर बहराकर अन्दर हो जाती है। घलो फर्श पर ही बैठे लेते हैं। लाओ एक चादर विधा ते । (कवि कुछ क्षण उसकी ओर देखकर एक चादर पक्डा देते हैं। चार विणकर बैठता हुआ) आओ बैठो। (पाट उठाकर दीवार के सहारे रखते हुए कहिए, कैसे आना कवि मित्र कवि हुमा? मित्र कवि मुझे एक कवि सम्मेलन में आना उसी सम्बन्ध में मैं आपके पास आया हूँ। बिठते हुए) वैसे आप अकारण आवे ही कब है ? आप किसलिए आए हैं, यह मैं जानता हूँ। आप एक कविता लेने आए हैं ना ? हो ही ही आप अन्दर की सब बातें जानते है इसीलिए तो मैं आपका लोहा मानता हूँ। मित्र कवि मित्र कवि मित्र कवि मित्र कवि की दुनिया /41 मुझे खेद है कि मैं इस बार आएकी सेवा न कर सकूँगा। वाह मित्र ! अगर आप ही ऐसी बात करेंगे, तो हम किपर के रह जायेंगे ? वैसे तो मै जाना ही नहीं चाहता परन्तु लोग भूत की तरह पीछे पड़ जाते है 'नही भाई । आपको अवश्य आना पडेगा। आपके बिना कवि सम्मेलन की शोभा ही नहीं है। वास्तव में यह मेरी नहीं, आपकी ही प्रशसा है। ऐसी प्रशसा जाय जहनुम में ! यह कौन जानता है कि यह कविता मैंने लिखी है? आप कविता पाठ करते हैं तो सब आपको ही उसका रचयिता समझते हैं। नहीं मित्र ! ऐसा मत कहो । अब मैं दो एक कवि सम्मेलनों में आपको भी आमन्त्रित करवाने वाला हूँ। (प्रसर होकर) अच्छा ! कब? (काम बनता देखकर चेहरे पर चमक आ जाती है) बस थोडे दिन और प्रतीक्षा कीजिए। लेकिन एक शर्त है शर्त भी क्या है, एक मामूली सा प्रस्ताव है। वह क्या? अगर आपको कविता पढने के लिए पचास रुपये मिले तो दस रुपए मेरे रहेंगे। आप भी कैसी बातें करते हैं। अब तक आप मेरी न जाने कितनी कविताएँ ले जा चुके हैं और उनका पारिश्रमिक हडप कर चुके है। मैंने कभी आपसे इस तरह का हिसाब किताब किया है ? वह तो ठीक है, लेकिन आप सोच लीजिए । मैं बीस प्रतिशत ही तो ले रहा हूँ, बाकी सब आपके । मैंने आपके साथ रियायत की है, और लोग तो 'फिफ्टी फिफ्टी करते है । आप अपने आदमी हैं यह सोचकर मैंने इतना कर दिया है। अच्छा भई, यही सही । अपनी दाल रोटी तो चले। [डाकिया हाथ में दो मनीआर्डर लेकर प्रदेश करता है। उसके पीछे दो दुकानदार 'दिल' लेकर आते हैं] कवि मित्र कवि मित्र 42/ सूत्रधार डाकिया पहला दु० दूसरा दु० कवि पहला दु० दूसरा० कवि पहला दु० दूसरा दु० डाकिया कवि डाकिया कवि हाकिया दाबू जी ! आपके मनीआर्डर है। [कवि जी एकदम उठकर आते हैं। यह कपड़े का रिल' है। यह परचून का बिल' है। (मुंह लटकाकर) कितना कितना है? तीस रुपये पच्चीस पैसे। मेरा पचास रुपये पचपन पैसे का है। कुछ दिन बाद ले जाते तो अच्छा था। नहीं साव। दो महीने हो गए। आपने अभी तक एक फानी कौड़ी भी नहीं दी है। आगे से हम आपको उधार सौदा देना बन्द कर देंगे। बाबू जी ! मुझे देर हो रही है। (झल्लाकर) भाड में गया बाबू जी ! पहले दस्तखत करके रुपये ले लीजिए, फिर इनसे निषट लीजिए। (मनीआर्डर फार्म लेकर) कितने रुपये हैं ? एक अखबार के तो पच्चीस रुपये है और दूसरे के पन्द्रह रुपये पचहत्तर पैसे। कुल मिल कर चालीस रुपये पचहतर पसे हैं। (रुपये निकाल कर गिनता है) (हस्ताक्षर करक पार्म लौटाते हुए लो भई । (उसके हाप से रुपये लेना चाहते हैं) (पीछे हटकर) ठहरिए भी । पहले गिन तो लेने दीजिए । दुवारा रुपये गिनवा है।) [दोनों दुकानदार और की सतृष्ण दृष्टि से देखते रहते है। डाकिया कविको रुपये देकर चलने लगता है। (डाकिये का हाथ पकड़कर) रे भई, पैसे तो और दे। बाबूजी ! सिम्ले त्योहार पर आपने वनीश नहीं दी थी। को दस मीरा पसे ले ले । म माता है कि पचहतर पैसे কোন? कवि प्रकिया प्रक्रिया डाकिया कवि की दुनिया/438 (हाथ छुड़ाकर) आप भी कैसे आदमी है साहब ! ये सुननेवाले क्या कहेंगे 'कैसे कजूस आदमी हैं। (किल जाता है। कवि कुछ सण उसे देखता रहता है।) हाँ सा'ब ! मेरा 'बिल' चुकता करा। पहला दु० कवि पहला दु० तुम्हारा कितना है? दूसरा दू० कवि पहला दु० दूसरा दु० पहला दु० कितनी बार और पूढेंगे? कह तो दिया तीस रुपये पच्चीस पैसे हैं। मेरा भी हिसाब साफ कीजिए । मेरा 'रित पचास रुपये पवपन पैसे का है। किसको पहले दूं? पहले मुझे। मेरा पूरा चुकता हो जाएगा। वाह रे वाह, पहले मुझे दीजिए। तुझे क्यों दे ? मैं इनके यहाँ अब वफ पपास चक्कर लगा चुका हूँ। पहले मुझे मिलने चाहिए। अबे, तूने तो पचास चकर ही लगाए हैं, मेरे तो जूते के क्ले ही पिस गए हैं। उठा लाया होगा किसी कबाडी के यहाँ से। जबान सँभाल कर बात कर। अरे भई लड़ते क्यों हो? लड़ना ही है तो माहर जाकर लड़ो। बाहर क्यों जायें ? हमने क्या कोई चोरी की है ? लाइए, रुपये दूसरा दु० पहला दु० दूसरा दु० कवि पहला दु० दीजिए। कवि दूसरा दु० पहला दु० अच्छा, दोनों दस दस रुपये ले लो। बाकी फिर वाह, यह भी कोई हिसाब हुआ 1 लाइए, चालीस रुपये मुझे दीजिए । दस रुपये बाद में दे देना । पचपन पैसे माफ किए। लाइए तीस मुखे दीजिए । पच्चीस पैसे मैंने माफ किए। लो, बीस बीस ले जाओ। बाकी के फिर । (दोनों को रुपये देते हुए) अब रह गए, दस तुम्हारे और तीस तुम्हारे। और पैसे? वे तो तुमने माफ कर दिए थे ना? कवि दोनों दु० कवि 44/सूत्रपार दूसरा कवि अनियों कवि झुनियों कवि-पत्नी झुनियाँ पूर रुपये देने, तय माफ परते। अब वो पैसे भी हिसार में लगेंगे। {दोनों निकत नाते हैं (मय चाल से मित्र के पास बैठो हुए) देख लीजिए, यह है हम कवि लोगों की दुर्दशा । दो रचनाओं के पैसे आए थे, वे झट उड़ गए। ये दुकानदार गिट की वरह डाकिये को ये ताकते रहते है कि यह कर रुपये लाए और वित्त' लेकर चलें। (प्रवेश कर, दरवागे से) यापू जी ! आज पहली तारीख है। तो मैं क्या ? करना क्या है, पैसे निकानो। तीन महीने से एक पैसा नहीं दिया है। बताओ मला यह भी कोई बात है ? (शीता से बाहर आकर) क्यों गला फाड रही है ? देखो, बीबी जी तीन महीने से पैसे नहीं मिले हैं। बताओ मला, यह भी कोई बात है? जा, कल मिलेंगे। माज नहीं हैं। मैंने जाती है कि नहीं? मैं कल से काम पर नही आऊँगी । काम करवाने को तो ये कहेंगी "शुनियों ! जरा यहाँ झाडू लगा दे। धुनियों, जरा यहाँ भुलाई कर दे। जब पैसा देने का बखत आवे है, तो 'कान लेना। फिर लेग। बताओ मला यह भी कोई बात है। (शाडू उठाकर) अब जाती है कि नहीं ? मत आना क्ल से काम पर जा । (झुनियाँ रडबडाती हुई चली जाती है । मित्र की ओर घूमकर) कहिए मित्तर जी ! आप कैसे बैठे हैं ? (सकपकाकर) नमन्ते भाभी जी ! किवि पवाकर कभी मित्र की ओर और कभी पली की ओर देखते हैं। नमस्तेमाल कैसे बैठे हैं? वैसे ही। कवि जी से एक कविता लेने आया हूँ। पली लनियों पली झुनियाँ -- पली मित्र परी पत्नी मित्र पली कवि पली मित्र पली मित्र पत्नी मित्र पली कवि की दुनिया /45 अब तक आप देरों कविताएँ ले जा चुके हैं, आपने कितनों का मेहनताना चुराया है ? क्या मतलब? (झाडू एक ओर फेंककर) मतलब यह है कि आप अब तक जितनी कविताएँ ले जा चुके हैं उनका कितना पैसा इन्हें दिया है ? यह तुम । (कभी मित्र को, कमी पत्नी को देखते हैं) (झिड़ककर) तुम चुप रहो जी । हाँ मितर ! कितना पैसा दिया है आपने अब तक? एक भी नहीं । (खिसियाहट भरी हंसी से) भाभी जी ! आप भी खूब मजाक पसन्द हैं। मैं मजाक नही कर रही । निकालो रुपयै । पहली कविताओं के पैसे दो, तब और माँगना । मेरे पास घुले रुपये नहीं हैं। कितने का नोट है ? लाओ, बाकी पैसे मैं दूंगी। (कवि की ओर देखकर) इस अपमान का क्या मतलब है ? इसमें अपमान की क्या बात है ? अब तक तुम इन्हें बहुत मूड़ चुके हो । अब मैं देखती हूँ कि तुम कैसे इनको मुफ्त में दुहते हो, और हाँ, यह खाट तुमने तोड दी है, इसके पैसे कौन देगा? यह तुम क्या कर रही हो? तुम्हें बोलने की कोई जरूरत नहीं है । हाँ, महाशय जी, निकालो रुपये। मैं नहीं देता । (खडा हो जाता है) मैं कहती हैं, दे रुपये । (पास आती जाती है) (कोप से घीखकर) मै एक पैसा नहीं दूंगा। कैसे नहीं दोगे ! हेकडी तो देखो जरा । एक तो चोरी ऊपर से सीनाजोरी । (मित्र के दोनें हाथ पीछे की ओर पकड़कर, कवि से) निकालो इसकी जेब से (हाथ पीछे कर) मैं तो नही निकालता ! कवि पली मित्र पली मित्र पत्नी कवि 46/सूत्रधार पली मित्र पली मित्र पली निकालता है या नहीं? [कवि राहम कर मित्र की ओर बढ़ते हैं । मित्र जोर लगाकर अपने हाथ छुड़ाना चाहता है, लेकिन कवि पत्नी की मजबूत पकर से नहीं छुड़ा पाता। देखो, मेरी जेब में हाथ मत डालना । यह क्या दिनदहाड़े लूट मचा रखी है? चुप होता है कि नही, या लगाऊँ झाडू मुह पर ? तू बडा रात में लूटने आता है ! निकालो जी, इसकी जेब से पैसे । [मित्र हाथ छुड़ाने की असफल चेष्टा करता है। कवि उसकी जेब से दस-दस के कई नोट निकालते है] (चीख कर) ये अनाथालय के रुपये हैं, इन्हें मत छुओ। (हाथ नचाकर) अ हा हा, बडा आया अनार्यों पर रहम खानेवाला । अनाथालय के नाम से न जाने कितनों की जेब से रुपये उडा लाया है और घर जाकर गुलछरें उड़ायेगा। (कवि से) कितने हैं जी ये! (गिनते एक दो, तीन चार पाँच छह,सात,आठ नौ दस, ग्यारह,बारह, एक सौ बीस। (मित्र का हाथ छोडकर रुपये लेती हुई) जाओ मित्तर ! घर जाकर आराम करो। (हाथ सहलाता और आँखें बचाता हुआ) रुपये वापस दे दो, नीं दो नहीं तो क्या? क्या कर लेगा? क्या फाँसी पर घटवा देगा? चल निकल भाग यहाँ से। मैं कहता हूँ (झाडू उठाती हुई) 'मैं कहता हूँ के बच्चे जाता है कि नहीं ? ठीक है। मैं अभी पाने कर रिपोर्ट लिपाता हूँ कि तुम लोगों ने मुझे सूट दिया है। ठीक है । लिखा दे। आने द पुलिस को भी कह दूंगी कि हमारे पर में चोरी करने के लिए पुरण पा। कवि पत्नी मित्र पली पनी मित्र पत्नी 143 A- कदि पली कवि को दुनिया 147 मित्र गर्दन पटककर पता जाता है ] : यह तुमने क्या कर अला? फाँटे से ही काँटा निकलता है जी । तुम्हारी तरह नहीं है, जो लुटेरों से लुटती रहूँ। मेरे घर में तुम्ही एक दानी करण बहुत हो। वह पुलिस को लिवा लायेगा तब? ले आए पुलिस । मैंने बडे बड़ों की हेकड़ी मिट्टी में मिला दी है। मेरे याप ने इन जैसे सैकडों को यों चुटकी से उड़ा दिया है। घलो जल्दी से विस्तर, पर्वन बाँपो । (रुपये आँचल में बाँप लेती है) बहुत फर ली कविताई । यहाँ अपने आप तो फटेहाल रहोगे ही, मुझे भी भूखा कवि पली भारोगे । कवि पली क्या मतलब? तुम्हें भी मतलब समझाना पडेगा। सीधी तरह से गाँव चले चलो। वहाँ अपने खेत हैं, उनसे अपनी जिन्दगी मजे में कट जायेगी। तुम्हारी इस कोरी कागजी दुनिया से पेट नहीं भरने का । तुम बाँपो बिस्तर, मैं बर्तन बापती हूँ। खाना मैंने बना लिया है, उसे स्टेशन पर खा लेंगे। [कवि कपड़े समेटने लगता है और कवि-पली रसोई में घुस जाती है]

गिरगिट
प्रदीप
पिता
रजना का प्रेमी
रजना का पिता
[साधारण साजसजावाला कमरा । कुछ कितारें मेज पर, कुछ
कुर्सियों पर, कुछ दीवान पर निखरी हुई। दीगार पर एक केतेष्टर
जिसकी ओर देखती हुइ जना देख रही है]
जना
आज पाँच तारीख हो गयी । बहुत इतजार था इस दिन का । आज
इटरव्यू है । (मुड़कर दीवान की ओर आदी हुई) हुन, इटरव्यू क्या,
तमाशा होता । किसको लिया जाना है, यह पहले से ही तय होता
है। फिर भी तैयारी तो करनी ही है। (वठकर एक किताब उलटती
है। अचान जैसे कुछ याद हो आता है, उठकर खड़ी हो जाती है)
अरे, सम्जी जल गयी।
[अन्दर चली जाती है। अन्दर से करतुल पलाने की आवार
आती है।
(धर उधर देखता हुआ प्रवेश करता है) शायद सनी जल गयी।
(अन्दर से) अरे, आ गये तुम । बैठो तुम सभी जलने की बात
करते हो । यहाँ जो हमारा दिल जल रहा है उसे भी कोई देखता
प्रदीप
रजना
प्रदीप
हिंसकर दीवान पर बैठवा हुआ) आजकल दिल विल जलने की शव
करना दिलकुल एक्कास है । किसी की जतन देखने की किसको
फुर्सत है।
अब तो इस आग में झुलसना ही हमारी नियवि है, ऐस भैय
विश्वास जमता जा रहा है।

गिरगिट/49 प्रदीप प्रदीप प्रदीप जमाओ जरूर जमाओ अपना विश्वास । फिलहाल एक कप चाय पिलाओ । (एक किताब उठाकर देखने लगता है) ये किताबें क्यों विखरा रखी है? आज दो बजे इटरव्यू की औपचारिकता निभाने जाना है। उसी की तैयारी कर रही थी। [चाय लेकर कमरे में मा जाती है। अरे हाँ, आज वो तुम्हें इटरव्यू देने जाना है । तभी तो मैं कहूँ कि आज तुम फिलासफर की टोन में क्यों बोल रही हो । दिल और आग की तपिश का कारण अब मेरी समय में आया चाय ले लेता है और सुड़कता रहता है। निराश आदमी ही शायद सबसे अधिक फिलासफी झाडता है। तुम निराश क्यों होती हो ? पहले इटरव्यू तो दो । क्या पता, आशा लेकर जाओ तो अच्छी खबर लेकर लौटो। (सूषी हँसी के साथ) हुआ हमेशा उल्य है। मैं अब तक आशा लेकर इटरव्यू के लिए जावी रही हूँ और निराशा लेकर लौटी हूँ। तुम कहवे हो कि मैं आशा लेकर जाऊँ । मुझे तो इटरव्यू के ये तमाशे अब बहुत दुरे लगने लगे हैं। लेकिन बिना इंटरव्यू के नौकरी भी तो नही मिलती । अनएम्प्लायमेण्ट की बडी भारी प्रॉब्लम है। यह जानते हुए भी तुम्हारी शर्त है कि मैं कोई अच्छी नौकरी पा लें, तभी मुझसे शादी करोगे। (किताबें व्यवस्थित करने लगती है) (रुक रुक कर) तुम जानती ही हो रजना, कि आजकल सारे सुख पैसे से ही खरीदे जा सकते हैं और पैसा कमाने के लिए पति पत्नी दोनों का कमाना बहुत जरूरी है। (प्रदीप की ओर घूरती हुई) तुम्हारे लिए पैसा ही सब कुछ है, भावना का कोई मूल्य नहीं है। क्या पैसे से प्यार भी खरीदा जा सकता है ? गृहस्ती का सुख भी खरीदा जा सकता है ? रजना प्रदीप रजना प्रदीप रजना 50/ सूत्रपार प्रदीप . रजना प्रदीप रजना देखो रजना, ज्यादा भावुक होने की जरूरत नहीं है। मैं क्या चाहता हूँ, यह तुम अच्छी तरह समझवी हो । जिस तरह तुम इटरव्यू को बकवास समझती हो, उसी तरह मैं भावुकता को मकवास वीज समझता हूँ ! बी प्रैक्टीकल लाइफ इज नाट ए बेड ऑफ रोजेज । मैं जीवन में पुशहाली के लिए पैसे का महत्व समझता हूँ, भावुकता का नहीं। शायद तुमने नौकरीपेशा महिलाओंवाले परों में झोंककर नहीं देखा कि किस तरह की टूटन पकावट विडविडापन और अव्यवस्था उनके घरों में बिखराहट भर देते हैं । लेकिन तुम्हें तो समझाना बेकार है । (किताबें उठाकर मेज पर सावी है) (पा होकर) विलकुल । मैं यहाँ उपदेश सुनने के लिए नहीं आया हू। (कप प्लेट को नीचे रख देता है।) (एक कुर्सी पर बैठ जाती है) पिताजी ठीक ही कहते थे कि प्रदीप के चकर मैं मत पडो । वह तुमसे ज्यादा पैसे को प्यार करता है। तो फिर क्यों नहीं पिता जी की सलाह भानी ? इस धरती में में ही एक लडका थोड़े ही हूँ। तुम्हारे लिए मेरे दिल में फिर वही दिल । मेरे लिए दिल का मतलब मौस के एक टुकड़े के सिवाय कुछ भी नहीं है। दिल से ज्यादा दिमाग से काम लो । (रजना स्तथ सी प्रदीप को देखती है, तभी घड़ी लिये हुए, टोपी पहने उसके पिता का प्रवेश । रजना खड़ी हो जाती है। पिता पहले रजना की और्षे, फिर प्रदीप क्ष गम्भीर मुँह देखने के बाद अपनी छड़ी टिकाने के लिए स्थान टूटने और छड़ी को दीवान पर रखकर एक कुर्मी पा रयकर एक कुर्सी पर बैठ जाते हैं। टोपी उतारकर जोध पराप रे है।) (गप डा) नमस्ते पिता जी ! प्रदीप रजना प्रदीप प्रदीप गिरपिट/51 पिता पिता प्रदीप जना प्रदीप (प्रदीर को दिना देखे रतना से क्या बात है रजना, रोकर धुरी हो क्या? नहीं पिराजी ऐसी कोई बात नहीं है। आज इटरव्यू है यारी कर रही थी। शायः इसीलिए मेरी ऑपे तार हों। बैठो प्रदीप रेया, पड़े क्यों हो? बस पिानी जब चलवा हूँ। अम्री देर ो गई है। अरे बैठो भी । अब में आया है तो कुछ देर तो बैठो । (प्रदीप बरबस सा दीवान पर बैठ जाता है) रजना बेटा, दो कप ाय तो बना लाओ। (अन्दर गने को यत्पर) भव्य पिताजी। नहीं पिताजी, मैं नहीं पिऊँगा। मैंने अभी चाय पी है। तो क्या हो गया । एक कप मेरे साथ भी सही। ले देकर हम पाय ही वो पिला सकते है, बेटा । रिटायर होने से पहले और बात थी। तुम वो अच्छी तरह जानते है। जिना अन्दर चली जाती है। जी हो, लेकिन 1(आगे बोलने के जैसे शब्द नहीं मिल पाते) चौराहे पर राष्ट्रीय कोलेज के मैनेजर मिल गये थे। उनसे देर तक बातें होती रहीं। उन्हें मालूम था कि मेरी भेटी उनके कॉलेज में इटरव्यू के लिए जा रही है। (जैसे बात करने को शद मिल गये हों) वो फिर क्या हुआ? झेना क्या था । वह अपने आप ही कहने लगे कि एक बहुत बडे आरमी का एक केण्डीडेट के लिये फोन आ गया है, मैं अब कुछ नहीं कर सकता। अच्छा । (कुछ क्षण माद) लेकिन आप वो कर सकते हैं। यया? प्रदीप पिता 52/ सूत्रधार प्रदीप आपके पटापे हुए कई लोग मन्त्री हैं या बड़े ऑफीसर लो हुए हैं। आप भी किसी से टेलीफोन करके या मिलके पिता (खडे होकर अपनी टोपी कैलेण्डर की कील पर टॉगते हुऐ रस, यही तो मुझसे नहीं हो सकता । मैंने जीवनभर अपने शिष्यों को ईमानदारी, सचरित्रता और आदर्श की शिक्षा दी है । मुसीबत में भी किसी के आगे हाय नहीं फैलाया । अपना सिर ऊँचा कर रहा हूँ और हमेशा ऊंचा रखकर चलना चाहता हूँ। प्रदीप (एक पैर दूसरे पैर पर रखता हुआ) ये सब पुराने जमाने की कार्वे हैं। आउट ऑफ डेट। पिता तुम मुझे पुराना कह लो या आउट ऑफ डेट । मेरे विश्वास अपने ई और तुम्हारे विश्वास तुम्हारे । मैं किसी हालत में अपने आदर्शों की हत्या नहीं कर सकता। [कुछ क्षण मौन । रजला चाय के प्याले पिता और प्रदीप को पमा कर अन्दर चली जाती है। प्रदीप बुरा मत मानियेगा पिताजी । आजकल सीये और ईमानदार आदमी ही आदर्श और सिद्धान्तों को मरे बच्चे पाली बदरिया की वह अशी से विपशये पूम रहे हैं। ये सब जगह दुत्कारे जा रहे हैं या उपेक्षा के शिकार हो रहे हैं। पिता पूरकर प्रदीप को देखते हैं लेकिन प्रदीप माले की ओर देखता हुआ बोलता रहता है) इस तरह न तो रजना को कमी नौकरी मिल सकती है और न आप रिता । देखो प्रदीप । (पाप सुइकार ) रजना को नौकरी मिले का न मिले, ८ बात साफ है कि मैं उसके लिए किसी के आगे हाथ नहीं फलाऊँगा । रजना अपने पताडूते पर हमेशा टॅप काठी रही है। लोशिप लेकर उसने पी एचडी।मुझे यह परादिश्यत किराना पीन कभी वो उसके आरोप ३ प्रदीप पिता गिरगिट /,53 ये सब डे ड्रीप्स हैं, दिवास्वन हैं। बिना तिकडम और आजकल कोई काम नहीं सपता। तुम कुछ भी कहो । (रजना तैयार होकर बाहर आती है) अच्छा रजना बेटी, तुम इटरव्यू के लिए तैयार भी हो गयीं ? शुभकामनाएँ । (प्याला नीचे रख देते है।) मैं शायद जल्दी ही लौट आऊँगी पिताजी ! रसोई में खाना तैयार रखा है। आपके साथ प्रदीप भी खा सकते हैं । (बाहर चली जाती प्रदीप पिता खाने पाने का चकर छोडिए पिताजी मैं भी अब जाना चाहता हूँ। (प्पाला नीचे रख देता है और खड़ा हो जाता है।) अरे बैठो भी । बडे दिनों बाद आये हो । (खडे होकर प्रदीप के कये दबाकर बैठा देते हैं और रसौई से खाना उठा लाते हैं। प्रदीप अनुत्साह के साथ बैठ जाता है। दोन्गे खाते खाते बातें करते रहते है) लगवा है, आज सब्जी जल गयी है। हौं, जब में आया था, तब जल रही थी। (मुस्करा उठता है।) बेचारी अकेली जान, इटरव्यू की तैयारी करे और खाना भी पकाए, पर की सफाई करे और कपड़े भी पोये । अकेनी जान को सौ झमेले पिता प्रदीप पिता प्रदीप पिता वह तो सब महिलाओं को करना पड़ता है। विदेशों में क्या स्त्रियाँ घर और बाहर का काम नहीं करती ? तुम लोगों में यही एक बड़ी कमी है कि तुम लोग महिलाओं की नौकरी के मामले में कोई समझौता करने का दैयार नहीं हो लेकिन उनके आराम और पादात्मक सुख के बारे में सोचने की फुर्सत तुम लोगों को नहीं है । विदेशों में--विदेशों से तुम लोगा का मतलब इलैंड, अमरीका से ही ना? दहा नौकरीपेशा महिलाओं के 54/ सूत्रधार आराम के लिए घर और रसोई के इतने सारे उपकरण है, घूमने मनोरजन करने की जिवनी सुविधाएँ हैं, उन तुम लोग यह दे सध्ये हो? हमारे पास अधिक पैसे हो, तो ये सारी सुविधाएं खरीदी पा सकती प्रदीप पिता प्रदीप पिता (पानी पीकर गिलास नीचे रख देते हैं) पैसे से हर चीज नहीं खरीदी जा सकती, प्रदीप । पके हुए पति का पली द्वारा मुस्कराहट के साप किया जानेवाला स्वागत तुम पैसों से नहीं खरीद सकते । बन्यो को दिया जानेाला प्यार तुम पैसों से नहीं खरीद सकते । नौकरी के कारण पैदा होनेवाले तनाव को तुम पैसों से दूर नहीं कर सकते और यहाँ मैं आपसे सहमत नहीं हूँ पिताजी ! समा कीजिए, जिन परो की महिलाएं नौकरी नहीं करती क्या वहा पली का प्रेम, बों को प्रॉपर प्यार और तनाव का अभाव मिलता है? तुम लोगों को तो समझाना ही बेकार है । स्वार्थ के आगे भावना का कोई मूल्य नहीं है तुम्हारे लिए। यही भावना, यही दिल रजना को पुष देते हैं, यही आएको। हमें वो तुम दुख देते हो और कोई नहीं देवा । में आप लोगों को दुष देता हूँ तो आप लोग मुझे छोड़ क्यों नहीं देते? यही वो मेरी मुश्किल है। मगर रजना बीच न होती तो मैं तुम को । वैसे तुम भी रजना को छेड़ना नहीं चाहते, हालोंकि उसका कारण दूसरा है। वह क्या ? (हंसता है, खाना छोड़ देता है और पानी पीता हुआ पित के देखता रहता है) मह यह कि रजना रे तुम भविष्य में सोने का अण्डा देनेवाली मुसी समान में और मैं यह बात अशी वरह समझता हूँ कि जिस दिन प्रदीप पिता प्रदीप पिता प्रदीप पिता गिरगिट/55 प्रदीप पिता प्रदीप तुमको यह भरोसा हो जायेगा कि रजना तुम्हारे लिए पैसे कमाकर नहीं दे सकती, उसी दिन तुम उसको छोड़ दोगे। (हंसकर खड़ा होता हुआ) आप भी क्या बात करते हैं (गिलास रख देता है।) (गिलास उठाकर पानी पीते हुए) ठीक कहता हूँ। देखिए पिताजी, मैं जैसा भी हूँ, अन्दर बाहर से एक सा हूँ। मेरे भी कुछ आदर्श हैं, कुछ सिद्धान्त हैं। (ठहाका लगाते हुए) तुम्हारे भी कुछ आदर्श हैं ? कुछ सिद्धान्त है ? (हंसते हुए गिलास रखकर, दीवान पर मसनद का सहारा लेकर तिरछे लेट जाते हैं) क्या? नहीं हैं ? क्या मैंने दहेज न लेने की प्रतिज्ञा नहीं कर रखी पिता प्रदीप पिता प्रदीप पिता (बैठकर दीवार से पीठ टिकावे हुए) मैं तुम्हारी प्रतिज्ञा के दोंग को अच्छी तरह से समझता हूँ। दहेज लेने की इस प्रतिज्ञा के साथ क्या तुमने यह प्रतिज्ञा नहीं कर रखी है कि जब तक रजना की नौकरी नहीं लग जाती, तब तक तुम उससे शादी नहीं करोगे? प्रतिज्ञा तो नहीं, हौं, शर्त जरूर है। वो प्रविना और शर्व में अतर क्या रहा? मैं तुम्हारी इस धतुराई को अच्छी तरह समझता हूँ। तुम जानते हो कि दहेज मांगने पर तुम्हें क्या मिलेगा दस हजार, बीस हजार, तीस हजार या मेरे जीवनभर की कमाई, मेरी जायदाद और मेरी कुल जमा राशि । लेकिन रजना तुमको इससे ज्यादा कमाकर दे देमी और मेरी जमीन जायदाद, जमा रुपया तो रजना श्री मार्फत तुमको अपने आप मिल ही जायेंगे। आप भी क्या बात करते हैं, पिताजी ! मैं इतना नीष नहीं हूँ। . (त्र की ओर देखते हुए, व्यगात्मक स्वर में) हा, इतने नीच नहीं प्रदीप 56/ सूत्रधार प्रदीप पिता प्रटीप पिता 1 प्रदीप प्रदीप पिता (तमतपाकर) आप मुझे गाली देते हैं। (हंसकर) में नहीं, तुम्ही अपने आपको गाली दे रहे हो। में जा रहा हूँ। फिर कभी इस घर में कदम नहीं रचूंगा । रजना से कह दीजिये कि नाराज मत हो य मेरी कमजोर नज तुम्हारे हाथ में है, इसलिए तुम कुछ भी कह सकते हो । तुम इस पर मैं कदम नहीं रखोगे तो मुझे तुम्हारे पर में कदम रखना पड़ेगा। क्या मालब? मतलब यह बेटा, कि रजना मेरी कमजोर नाज है और रजना न जाने क्यों तुम्हें चाहती है। मैने तो राना से नहीं कहा कि वह मुझे चाहे। यही तो इन हिन्दुस्तानी लड़कियों की खराबी है कि ये एक बार जिसे अपने मन में बसा लेंगी, उसे फिर निकाल नहीं सकी। (जैसे कुछ सोच नहीं पा रहा कि वह जाये या रुके, कुछ टहलकर) देखिए पिताजी, में रजना की इसी बात के कारण रुका हुआ है, नहीं तो मैं कब का किसी और सड़की से शादी कर चुका सका। इतना रडा लेखक हूँ, बड़ा ऑफीसर हूँ। लड़कियों की मेरे लिए कमी नहीं है। कई लड़कियों और उनके बाप मेरे पायें ओर मैडराते रहते है। अब मेरा मुँह ज्यादा मत खुलवाओ। तुम जैसा मादमी कब से किसी की भावना को समझने लगा? आपने मुझे समान क्या रखा है ? आप सरासर मेरा अपमान किये जा रहे हैं। क्या आप समझते हैं कि मैं झूठ बोल रहा हूँ? (खड़े होते हुए) तुम सरासर झूठ बोल रहे हो मैं तुम्हारे ही दोस्तों से सुन चुका है कि लड़कियों को दुम पानी का लिास समझते हो। जब प्यास लगने पर दूसरा गिलास उठा लिया। इसी तरह एक बार झूम करके छोड़ा गया गिलास तुम दुवारा अपने होठो से नहीं प्रदीप पिता प्रदीप गिरगिट/57 प्रदीप आई फील आप पिता लगाना चाहते यह वाव न उन लड़कियों को मालूम होगी और न उनके पिताओं का, जो तुम्हारे चारों ओर मेंडराते रहते हैं। अब तो बस, हद हो गई । (खडे होकर) मुझे मोस्ट इन्सल्टेड। आश्चर्य है कि आप पिछले दो सालों में मुझे इतना इस रूप में पहचान पाये हैं। आपकी रजा क्या मुझे यों ही चाहती है ? या तो रजना बेवकूफ है या या (दोनों हाथ पीछे टिकाकर दीवान पर बैठते हुये तुम कुछ भी कहो । बेवकूफ कहो या कुछ और । मैं तुमको रजना से भी अधिक जानता हूँ । रही तुम्हारी पड़े लेखक होने की बात, सो तुम्हें कौन कितनी घास डालता है या तुम किसके आगे पीछे कितना घूमफिरकर छप पाते हो, या तुम अच्छी तरह से जानते हो। रहा कम्पनी में बड़े आफीसर होने का सवाल, सो मैं राष्ट्रीय कॉलेज के मैनेजर से तुम्हारा सारा चिट्ठा सुन चुका हूँ । वही तुम्हारी कम्पनी में तुम्हारे बॉस है ना? (अशक्र सा कुर्सी पर बैठता हुआ) जी । वह मेरे अच्छे मित्र है, यह तुम अच्छी तरह जानते हो? जी! मैं उनसे सुन चुका हूँ कि तुम ऑफिस के काम से ज्यादा ऑफिस की लडकियों पर ध्यान देते हो। जी जी यह सब दिलकुल गलत है, बकवास है। गलत हो या सही राष्ट्रीय कॉलेज के इटरव्यू के बाद तुम्हारी कम्पनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की आज बैठक हो रही है। उसमें तुम्हारा केस आ रहा है क्या क्या? क्या दुबारा बताऊँ? प्रदीप पिता प्रदीप पिता प्रदीप पिता प्रदीप पिता 58/सूत्रमार प्रदीप नहीं। प्रदीप पिता प्रदीप मिता [कुछ भाग स्तन्यता आपने मेर डायरेक्टर से कुछ कहा नहीं ? (सीये बैठकर) क्या करता? रही कि प्रदीप मेरा होनेवाला दामाद है। यह तो आपके गहरे दोस्त हैं। हिंसकर ) होनेवाले दामाद हो हुए तो नहीं हो । होनेवाले और हुए में तो बड़ा भारी फासता होता है। क्या पता यह फासला कभी पूरा हो किन हो। (पापलूसीमरे स्वर में) वाह पिताजी, होगा क्यों नहीं ? रजना और में एक दूसरे को चाहते हैं पसन्द करते हैं। (खड़े होते हुए) वाह, तुम वो बडी जल्दी गिरगिट लेते हो । कुछ देर पहले वो अपने आगे पीछे घूमनेवाली लड़कियों और उनके बालों की चर्चा करके रजना के प्रति वैराग्य दिखा रहे थे अब केवल रजना को चाइने की बात करने लगे। (वर्तन उठाने तगते हैं, तभी प्रदीप तपकर बर्तन थाम सेता प्रदीप पिता तरह रग बदल प्रदीप रजना लाह मन्दर रख आता हूँ। आप क्यों कष्ट करते हैं ? नहीं। तुम ठो, मैं रख आता हूँ। [प्रदीप नर्तन लेकर अन्दर चला जाता है। (प्रवेश करके पिता से लिपटती हुई) आइ पिाजी ! मेरा सलेक्शन हो गया । (अन्दर से आते हुए प्रदीप को देखकर अलग खड़ी हो जाती है। पिता प्रसत्रतापूर्वक और प्रदीप भावहीन दृष्टि से रजना को दखने लगते है) आप तो कह रहे थे कि किसी बड़े आदमी का फोन आ गया है, इसलिए मैनेजर मेरे लिए कुछ नहीं कर सकते। . हिंसकर) मैने प्रदीप की प्रतिक्रिया देखने के लिए यह वाव बनाकर कही थी। शिा गिरगिट159 . पिता पिता जना प्रदीप जना प्रदीप जना प्रदीप पिता कोई और केण्डीडेट मेरी योग्यता की टक्कर का था ही नहीं । और हो, जय भैरा इटरव्यू हुआ तो मैनेजर उठकर जा घुके थे। मैं तो बड़ी एयरा रही थी और निराश भी, लेकिन पता नहीं कैसे जो जो सवाल मुझसे पूछे गये, मैं फटाफट उनके उत्तर देती गई और इटरव्यूअर बार-बार 'वैरीगुड' कह उठते थे। वैरी गुड । लेकिन रजना । एक बुरी बात हो रही है। वह क्या? तुम्हारे सलेक्शन के दिन ही प्रदीप की नौकरी से छुट्टी हो रही है। अच्छा हुआ। गुड न्यूज । आज एकसाथ दो अच्छी खबरें । (तिलमिलाकर) रजना। अब मेरा तुम्हारा कोई सम्बन्ध नहीं है। क्या कह रही हो? सुनाई नहीं दिया? पिताजी, रजना को आप समझाइए न कि मैं तो इसे दो साल से समझा रहा हूँ । अब यह अपने आप समझ रही है, वो और अच्छा है। पहले मेरी बुद्धि पर पर्दा पड़ गया था, आज मैंने उसे उतार फेंका है। रजना तुम्हें हो क्या गया ? नौकरी मिलते ही मुझसे आँख फेर बैठीं। हाँ क्योंकि यदि मुझे आज नौकरी न मिली होती तो तुम मुझसे आँखें फेर लेते और यदि प्रमिला को मिल जाती तो उससे गाँठ जोड लेते। जना प्रदीप रजना । प्रदीप पिता बना यह प्रमिला कौन है? प्रमिला नाम की एक लडकी भी आन इटरव्यू देने आई थी। वह उदास थी इसलिए बातचीत में मैंने उसकी उदासी का कारण पूछा तो उसने क्या उत्तर दिया ? जानते हैं आप?

60/ सूत्रधार पिता प्रदीप रजना प्रदीप रजना तुम्ही बताओ। विचन सा) रजना, तुम भी क्या बेकार की बातें ले बैठीं । उसने इन साहब का नाम और पद बताते हुए कहा कि इन्होंने उसे नौकरी मिलने पर उससे शादी करने का वायदा कर रखा है। ऐसी तो बीसियों लड़कियों मेरे चक्कर लगाया करती हैं, मैं किस किस से शादी कर सकता हूँ? मैं उनको टरकाने के लिए कोई न कोई बहाना बना देता हूँ 1 मैं तो केवल तुम्हें मेरा नाम तुम्हारी जबान पर फिर कभी नहीं आना चाहिए । समझे? दिल तुम्हारे लिए मांस का टुकड़ा है, भावुकता ही तुम्हें मुझसे ज्यादा । अब मैं तुम जैसे आदमी से कोई सम्बन्य नहीं रखना चाहती । (कमरे को व्यवस्थित करने लगती है) पिताजी यह मेरी लाइफ का सबसे बड़ा सवाल पैदा हो गया है। (मुस्कराकर) यह सवाल जना के कारण पैदा हुआ है या अपनी नौकरी जाने के कारण? (कुर्सी पर बैठकर) दोनों के कारण । बिलमुल गलत । मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि तुम रजना को लेकर कभी सवालों से नहीं घिरे हो । उल्टे मैं और रजना तुम्हारे कारण सवालों से उलझे हैं। मैं तुम्हारी नीयत अच्छी तरह से जानता हूँ। पूणे, तो बताऊँ। प्यार प्रदीप पिता प्रदीप पिता क्या? प्रदीप पिता तुम्हारी नीयत यह है, मुझसे साफ साफ क्यों कहलाते हो, कि तुम अब एक पत्थर से दो शिकार करना चाहते हो । रजना से शादी करके तुम उसकी कमाई पाना घाइते हो और मेरे दामाद बनकर अपरी नौकरी पचाना चाहते हो। हर तरह से तुम्हें अपनी चिन्ता है, हमारी नहीं। [प्रदीप चिन्तित मुद्रा में पहलकदमी करने सगता है] पिताजी आप इस आदमी की जिवनी पाते उपेड़ते हैं, उतना ही मुझे डर लगने लगता है।

गिरगिट 161
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प्रदीप
पिता
रजना
प्रदीप
रजना
प्रदीप
रजना
[पिता मुस्कराते रहते हैं।
रजना, विश्वास करो। मैं अब भी तुमको
रिजना छड़ी उठाकर पिताजी को देती है।
(छडी पकडते हुए) इसका मैं क्या करूँ ?
साम, दाम, दण्ड और भेद में से तीन का प्रयोग तो आप कर चुके
है दण्ड का प्रयोग अभी तक आपने नहीं किया है । इस भूत पर
अब इस चौथे उपाय का प्रयोग और कर देखिए
यह मेरा अपमान है।
तुम्हारा आदर, तुम्हारा सम्मान था ही कब जो आज अपमान होगा।
देखो रजना, मैं फिर कभी इस घर में कदम नहीं रखूगा ।
रखने ही कौन देना चाहता है ? (पिता से छडी लेती हुई) लाइए
पिताजी, मैं ही इसका प्रयोग करके देखू ।
[प्रदीप झटके से निकल जाता है । पिता और रजना एक-दूसरे
की ओर देखकर ठहाका लगाते हैं।)

दायरे के भीतर-बाहर पिता माता माधुरी अमित मिटू खन्ना रिक्शा वाला कुली ताँगे वाला रामकिशोर रामकिशोर की पत्नी रामकिशोर की बहू रामकिशोर का बेय रामकिशोर का पौता रामकिशोर का नित्र दिन चलने की ध्वनि पिता देखो ! तुम्हारे कहने से मैं दिल्ली जा रहा हूँ। अगर मुझे लगा कि मेरा थोड़ा सा भी तिरस्कार हो रहा है तो मैं वापस घला आऊँगा। माता जरूर चले आना। पिता : (स्वगतकपन) अमित को बिना घबर किये जा रहे है । वह हमें देखकर दुखी होगा या खुश कौन कह सकता है ? यह जाकर ही पता चलेगा। लेकिन ऐसी नौबत ही क्यों आने दी जाय ? (ककर में भी क्या करें, अमित की माँ मानवी ही नहीं थी । बार बार कहती थी [हल्का संगीत माना अमित को देखे हुए बहुत दिन हो गए । चलो कुछ दिन उसके पास रहा। अकेले पड़े पड़े जी जय गया है। जी ऊन गया है वो चले जाओ उसके पास । भने का मना किया माता पिता में अकेली जाऊंगी ? तुम क्यै नहीं चलवे ? मेरी इच्छा नहीं है। - दायरे के भीतर-बाहर/63 माता पिता माता पिता माता पिता माता क्यों झूठ बोलते हो ! जब वव तो कहते रहते हो कि घर में पडे-पडे ही नहीं लगता। चलो, कहीं घूम आयें। मैं कोई दिल्ली जाने को थोडे ही कहता हूँ। तो कहाँ जाने के लिए कहते हो? बस, यों ही कहीं । जहाँ तुम्हारा जी चाहे । वाह, यह भी खूब रही। एक तरफ यो मेरो इच्छा पूस्ते हो, दूसरी तरफ मेरी इच्छा पूरी करने से इन्कार कर देते हो। तुम कहीं नहीं जाओगे । इस चारदीवारी में पडे पडे एक तो मै वैसे ही परेशान रहता हूँ, ऊपर से तुम मेरे प्राण खाये जाती हो । मेरी यह चारदीवारी मेरे लिए स्वर्ग है । तुम्हें जहाँ जाना हो, जाओ। दुनिया में और लोग भी रिटायर होते हैं, लेकिन कोई भी तुम्हारी तरह सारी दुनिया अपने में समेटकर घर में बन्द नहीं हो जाता । न कही आना, न जाना । न मिलना, न जुलना । न सी, न यात हर समय चिड़चिडाते रहते हो। : हाँ, हो, मैं चिड़चिड़ाता रहता हूँ। विड़चिड़ाऊँगा । तुम्हें क्या? हो मुझे क्या ? मेरी तो कोई हस्ती ही नहीं है । मुझे तो सुष दुख का अनुभव होता ही नहीं है, केवल तुम्हें होता है । मैंने तुम जैसा स्वार्थी आदमी नहीं देखा, जो केवल अपनी ही सोचता रहता है, दूसरों की पसन्द नपसन्द को देखकर भी अनदेखा करता है। [सगीत समस्त क्या सोच रहे हो। कुछ नहीं। . कुछ दो। कुछ खास नहीं । यही सोच रहा कि आजकल जमाना बड़ा खराब आ गया है। कोई किसी की परवाह नहीं करता I भाई भाई की परवाह नहीं करता, बेटा बाप की नीं और बेटेकी नहीं। पिता माता माता पिता माता पिता माता 64/ सूत्रपार पिता माता पिता माता पिता माता पिता क्या मतलब? मुझे मालूम है कि तुम अमित को दिमाग में रखकर ये सारे सिद्धान्त बधार रहे हो। बेटा लाख कोशिश करके बाप को खुश रखना चाहे, लेकिन तुम्हें उसकी क्या परवाह । तुम्हें तो उन बड़े बूढो बा प्यारी लगती हैं, जो अपनी कमियों न देखकर केवल अपनी सन्तान में कमजोरियाँ खोजने और बजानने के आदी होते हैं। (खीझकर) तुम चुप रहो । तुम्हें अभी तक इतनी तमीज भी नहीं आयी कि कौन सी बात किस जगह पर की जानी चाहिए, इसका ध्यान रखो। ठीक है, तुम्हें तो बहुत तमीज है। [गाड़ी रुकने और रेलवे स्टेशन का शोर, जो नीचे के सवादों के साप-साय कम होता जाता है) किससे चलें? टैक्सी या बस से? टैक्सी कर लो । बस से इतनी दूर जाना बड़ा मुश्किल होगा। (कुछ क्षण ठहरकर, कुछ कड़वे स्वर में) बस से जाना पड़ा मुश्किल होगा । बस, हिला दी बोलेभर की जीभ । क्या मुश्किल होगा ? दो कदम पर ही तो बस स्टैण्ड है और आप पौन घण्टे में कोई न कोई बस मिल ही जाएगी। मेरे पास इतना पैसा नहीं है फिजूलखची के निए । टैक्सी में जाने की इच्छा थी वो बुला लिया होता अपने बेटे को। देशो जी तुम्ही ने पूछा था कि टैक्सी से चलें कि बस से । जैसी तुम्हारी मर्ग हो वैसा करो मुझसे क्यों पूछते हो ? मेरा क्या है में तो पैदल भी जा सकती हूँ में तुम्हारे आराम के लिए कह रही थी, लेकिन तुम बसों में पके खाने से डर नहीं लगवा तो मुझे क्या ? चलो, मस से घलते हैं। माबूजी ! रिक्श ! कहाँ चलग है ? फुहारा फतहपुरी, लालकुआ, जामा मस्जिद। न भैया रिको में नहीं जाना। रिक्शावाला पिता पिता का tuns तगेवाला सेठ जी ! तोंगे में चलेंगे। नहीं। बुली सामान सिर पर ले चलूँ सा'ब? पिता तू मुझे सिर पर ते चल। बोल, कहाँ ले चलेगा? माता अनी, इसपर क्यों बिगड रहे हो। चलो न यहाँ बाहर । यहाँ खडे रहोगे वो दस आदमी पूगे ही। पिता चलो। [सड़क का शोर] पिता देखो, बचकर चलना । देख के। अरे ओ तोगदाले । दीखता नहीं है क्या? सिर पर चढा चला आ रहा है। तांगेवाला मैं कहाँ सिर पर चदा चला आ रहा हूँ। आप ही घोडे के आगे चले आ रहे हैं। पिता (सकोय) क्या कहा ? मैं क्या पागल हूँ ? अन्या हूँ, जो मुझे दीखता नहीं है। तांगेवाला मुझे क्या मालूम ! माता अरे ओ भैया बागेवाले । तू जा । (पति से) तुम तो बेकार ही सबसे उत्तझने लगते हो। देखो वह बस जानेवाली है। जरा जल्दी चलो। सैमल के । देखो, केले का मिलन पड़ा है। रसट न जाना । लो बस में चढौ।यह सीट खाली है उसपर बैठ जाओ। पिता : तुम बैठो । मेरा क्या है मैं तो बड़ा खड़ा भी जा सकता हूँ मर्द आदमी हूँ। तुम घार दिन पहले ही बुखार से उठी हो। माता नहीं, तुम बैठो। पिता मैंने कहा ना पैठ जाओ। माता तुम दो, बस, अपनी जिद के आगे किसी की घलने घोड़े ही दोगे। लो, में ही बैठ पाती हूँ। जब खडे खड़े पक जाओ तब पता देना। (कएक्टर की सीटी के साप बस पतने की आवाज़, जो पीरे-परि मन्द होती जाती है। मद सगीत उभरता है।) मारी मोरे, माजी पिया आप अगाय:

66/ सूत्रधार माता मापुरी माता माधुरी माता मापुरी माता मापुरी माता पिता सुखी रहो। आप लोग कैसे आए ? बस से या ट्रेन से? ट्रेन से आए हैं। अमित कहाँ है ? ऑफिस गए हुए हैं। और बच्चे? सुधा को हमने पिलानी भेज दिया है। वहाँ होस्टल में रहकर पदवी है। आपको हमो लिखा भी था । मिटू स्कूल गया है, तीन बजे तक आएगा। आप लोग आराम कीजिए। आपका कमरा खोले देवी हूँ और अभी चाय बना कर लाती हूँ। अरे इसकी क्या जरूरत है ! नहीं। ऐसा कैसे हो सकत है ? [अल्प विराम] तुम घुपचाप कैसे हो मुझे बहू का यह पूछना अच्छा नहीं लगा कि आप कैसे आये, क्यों आये। मैं पहने ही कहता था कि दिल्ली मत चलो। आप तो बस बाल की खाल उतारने में माहिर है । बहू ने कब पूछा कि क्यों आये ? उसने यही तो पूण है कैसे आये बस से या रेल मैं आदमी की नस नस पहचानत हूँ। मैं आदमी की शक्ल से ही उसका मन पढ सकता हूँ। वह तो मैं जानती हूँ कि आप दूसरों के भीतर से दोष ढूंढ निकालने में बहुत माहिर है । बडे बने ज्योतिषी पडित ज्ञानी आपके आगे पानी भरते हैं। मेरी बात को मजाक में मत उडाओ । अभी तो यह शुरूआत है। पहला ही दिन है । रेवती जाओ किसका क्या रुख रहता है। मैं किसी के दुल्डों पर पलने की इच्छा से यहाँ नहीं आया हूँ। मैं रिटायर हो गया हूँ तो क्या हुआ ? मेरे पास अपनी उम्र काटने के लिए काफी पसा है। कोई यह न समझे कि मैं लाचार हेकर याँ आया हूँ। माता पिता माता पिता दायरे के भीतर बाहर/67 पिता मापुरी माता मापुरी माता मापुरी है भगवान् ! कौन तुम्हें लापार समझ रहा है ? कौन तुम्हें टुकडे देने की बात कह रहा है ? देखो, मैं कहे देती हूँ तुम हर-एक पर शक करने की अपनी इस गन्दी आदत को छोड दो वरना तुम्हें तो, बस, केवल मुझमें ही दोष नजर आते हैं और बाकी सब दूष के पुले लगते हैं। (पास आती हुई) आप यह चाय पी लीजिए, फिर दूध गर्म करके देती हूँ। आप सुबह-सवेरे के घर से चले हैं और अभी तक नाश्ता भी नहीं किया होगा। पहले हाय मुँह तो नही पोना है? नहीं, हम लोग आपरा से फारिग हो कर चले थे। तो मैं आपके नहाने के लिए पानी गर्म कर दूं। अरे नहीं बहू । हम ठंडे पानी से नहा लेंगे। अभी सर्दियों नहीं आयी हैं। लेकिन पिताजी तो गठिया की वजह से हमेशा गर्म पानी से नहाते हैं। मैं उनके लिए पानी गर्म किये देती हूँ। कपडे धोने के लिए पानी गर्म होने रखा है। पहले आपका पानी रख दूं। [अप विराम देखो तुम बेकार बहू पर शक कर रहे थे। तुम्हारा कितना प्यान रख रही है। अभी तो पइला दिन है। दश लेना, थोड़े दिनों के बाद क्या रुख रहता है। [सगीत] ममी, दादा नी और दादी जी कब आये? चुप अभी पाना पाकर गये हैं। तू अपने कपड़े दल और कुछ पाना हो तोचा ले। दादाजी मेरे लिए कुछ ताये हैं ? जब उठ जाएँ, सर पूछ लेना। अभी तो कपड़े न, कितने गन्दे कर सपा है। सिमीत] माता पिता मिळू माधुरी मापुरी 68/ सूत्रपार । गाता बहू ! माधुरी ! अभी तक सिट्टू नहीं आया क्या? मापुरी आ गम है माता जी, लेकिन आप दोनों को सोते देखकर खेलने चला गया है। माता अमित कितने बजे आता है। मायुरी करीब छह बोवक आते हैं। कभी कभी बस मिलने में देर हो जाती है तो सात आठ भी बज जाते हैं। माता इतने साल हो गये उसे नौकरी करते, कोई सवारी क्यों नहीं खरी लेबा? मापुरी स माताजी यों ही। वे कहते है कि दिल्ली में बस से यात्रा काना ही सुरक्षित है। माता सो तो है। मिट्टू ओ हो दादीजी, नमस्ते । मेरे लिए क्या लायी हो? मापुरी बस घर में घुसने की देर नहीं हुई कि माँगना शुरू । दादीजी क्यों ताएँ । तू दादीजी के लिए कुछ ला । फर्स्ट डिवीन में पास हुआ है। मिळू मैं क्या नौकरी करता हूँ, जो कुछ लाऊँगा। मायुरी तो क्या दादीजी नौकरी करती है? मिळू ठीक है मैं दादाजी से मांग लूंगा। वे वो नौकरी करते हैं। मापुरी नीं उनसे भी कुछ नहीं मांगना । तेरे पापा आगे तो कुछ लेकर आयेंगे। बेट मिट्ट, तू फर्स्ट डिवीजन में पास हुआ है तो इथर आ । तुझे पुची देहूँ। विमने की यानि नर्स पदीजी कोरी पुच्ची नहीं चलेगी। शाम को मैं वैरे लिए कुछ मॅगया दूंगी। बोल क्या उपड़े। बिलौने? माधुरी , नर्स गवारी इसे कुछ नहीं चाहिए। सब कुछ तो है इसके पास । वै लेकिन हम लोग बाहर से आये हैं वो कुछ लेकर ही आना पहिया माता ? मिठाई7 दापरे के भीतर परर/69 माता पिता माता पिता माता रिता माता पिता माता अजी सुनपी से? क्या है? इयर माना। भोलिए क्याप है? मिळू क्या कह रहा था? कुछ नी । बस गुमने वो आज हमें पुका दिया । आगरा से यहाँ माये हैं और मध्ये के लिए कुछ लेकर नहीं आये। मक्या कमाई करवा हूँ, जो सामान खरीद कर लाता । पर बच्चे के क्या पता कि तुम्हारी नौकरी पास हो गयी है। पाह ! मैं रिटायर हो गया और मिठू को पता ही नहीं पता । अमित और मापुरी के बीच मेरे रिटायरमेण्ट के बारे में क्या कभी बात नहीं हुई होगी। इसका मवतर यह है कि मेरे रिटायरमेण्ट को इन लोगों ने गम्भीरता से नहीं लिया है। तुम बैठकर मानव निकालते रहो, मैं पली बहू के पास । (दूर जाती हुई) तुम्हें इन लोगों को राजी खुशी पूछने की न तो उत्सुकता है और न फुरसत ही। मैं वो कम से कम पूल तूं। दावनी, प्रणाम । मेरे लिए क्या लाये हैं आपरे से? रेय ! मैं जल्दी में भूल माया । लो पर पैसे । बजार में कुछ या पी लेना। दस पैसे में आजकल क्या आता है दादाजी । पप्पा ऑफिस जावे समय मुझे ऐज एक रुपया देते हैं। पूठहरा अमीर बाप का बेटा । हम तो माई, गरीब आदमी हैं। ॐ हूँ। मैं नहीं जानता । मुझे एक रुपया दीजिए. दादाजी ! मिळू ! पल, बाहर मा । दादाजी को क्यों परेशान कर रहा है ? अरे उसे एक रुपया दे दो ना ! खाली हय घले आये हो फिर भी बच्चे को एक रुपया नहीं दे सकते। नी माती, इसकी यह आदत बड़ी खराब है। कोई भी घर में आ जाय, सबसे वीर्जे मांगता है। मिट्टू पिता पिट्टू भापुरी माता माधुरी 70/ सूत्रधार माता अमित माता बच्चा है । हमसे नहीं माँगेगा तो किससे मांगेगा । लो, अमिव आ गया। अरे माताजी ! प्रणाम । आप कब आयी ? पिताजी कहाँ हैं? सुखी रहो । वे अन्दर हैं । मिठू से उलझ रहे हैं। [अल्प विराम प्रणाम पिताजी ! आप लोग कब आये? दोपहर को आ गये थे। किस ट्रेन से ? जी टी से? अमित पिता अमित पिता अमित पिता अमित माता मिट्टू आपने आने से पहले मुझे क्यों नहीं लिख दिया ? मैं स्टेशन से आपको ले आता। कोई बात नहीं । मैंने सोचा कि तुम बहुत व्यस्त आदमी हो । हम ठहरे बेकार आदमी । अपने आप पहुंच जाएँगे । बस में बैठे और चले आये। आप टैक्सी में आते मापुरी टैक्सी भाडा दे देती। येतो, अमित अब सठिया गये हैं 'सठिया क्या होता है पप्पा ? मैंने तो सुना था कि दादाजी को गठिया का रोग है। यह सठिया' कौन सा रोग होता है ? [सब हँसते हैं] मिछ, तुम बाहर जाओ। तुम्हारे क्रिकेट के साथी तुम्हारा इन्तजार कर रहे हैं। अच्छा पप्पा 1 मैं जाता हूँ। मापुरी 1 में पिताजी को घुमाने ले जा रहा हूँ। जब तक हम लोर्ट तुम तब तक खाना तैयार कर लेना । तुम्हें तो मालूम ही है कि पिताजी शाम को जल्दी खाना खाते हैं। माताजी आप भी घूमने घलिए। अथा लेकिन जरा जल्दी घूम के लौटिए । नहीं अमित, तुम दोनों भले जाओ । मैं बहू के काम में अप बैा लूंगी। अमित मिठू अमित मापुरी माता दायरे के भीतर बाहर/71 स्तिा किसके यहाँ घूमने पलोगे? अमित . जिसके पहों माप घलना चाहें । मेहता सा'ब, शर्माजी, सुब्रह्मण्यम् । पोलिए, किसके यहाँ चलेंगे। पिता मुझे किसी के घर में घुसकर बैठ जाना पसन्द नहीं है । घर में बैठे बैठे टांगे अकड गयी हैं। कहीं घूमने चलना हो तो चलो, किसी के पर नहीं जाना चाहता। अमित वमी तो मैंने आपसे कहा कि जहाँ आप जाना चाहें, चलें । आपने पूछा कि किसके यहाँ जाना है तो मैंने नाम गिना दिये । पिता मुझे की नहीं जाना । तुम लोग घूम आओ । मुझे तो स्वाध्याय पसन्द है । कुछ पत्र-पत्रिकाएँ दे दो, पढता रहूँगा। [सगीत] मापुरी पिताजी के स्वभाव में एकदम कितना परिवर्तन आ गया है। हालाँकि खर्च के मामले में पहले भी बचतशील थे लेकिन जब से रिटायर हुए हैं तब से, कहना चाहिए कि आत्मकेन्द्रित हो गए हैं । माताजी का स्वभाव तो पहले जैसा ही है। अमित पिताजी में तुम्हें जो कुछ परिवर्तन दिखायी दे रहा है, यह रिटायरमेण्ट का स्वाभाविक परिणाम है । असुरक्षा भय, चिन्ता भले ही वे बेबुनियाद हों ऐसी हालत में आदमी को सताते ही हैं। मापुरी मैं दोपहर से ही देख रही हूँ कि पिताजी जरा जरा सी बात पर कडवे हो उठते हैं। पहले तो हंसकर बात कर भी लेते थे, लेकिन अब चेहरे पर मुस्कराहट तक नहीं आती । जरा मिट्ठू को कम्बल उदा देना, आज कुछ सर्दी हो गयी है। लो। तुम भी ओट लो। आजकल की रावें ठडी हाने लगी हैं। माधुरी देखो ना ! मिठू ने अपनी आदत के अनुसार पिताजी से पूछा मेरे लिए क्या लाये हैं दादाजी, तो उन्होंने उत्तर दिया है कि हम तो गरीब आदमी हैं तुम अमीर बाप की सन्तान हो। आप ऑफिस से आये तो हालचाल पूछने का मौका तो दिया नहीं, अपने रिटायरमेण्ट खर्व आदि का सवाल उठाकर बेकार का तनाव पैदा कर दिया। अमित 72/ सूत्रपार अमित पिता माता पिता माता पिता चलो, छोड़ो । अब सो जाओ। रात बहुत हो गयी। [सगीत क्यों ? सो गयी क्या? नहीं तो। क्या सोच रही हो? कुछ नहीं। माता पिता माता पिता माता प्तिा माता वाह ! कभी ऐसा भी हो सकता है ? हरेक आदमी का दिमाग जागते में कुछ न कुछ सोचता है और सोते में सपने देखता है। तुम क्या सोच रहे हो? मैं सोच रहा था कि हमारा यहाँ निभाव होगा कि नहीं। क्यों? यह सोचने की क्या जरूरत पड़ गयी। यह सोचना बहुत जरूरी है। सावधानी से देखते रहना है कि कहीं हम लोग इन्हें भार तो नहीं लग रहे हैं। ये लोग हमें भले ही भार न समझें, लेकिन आप ऐसा जरूर सुचवाकर रहेंगे। क्यों? मैं क्यों ? जब से यहाँ आए हो तब से अब तक की अपनी करतूतों पर ध्यान दो तो तुम्हें खुद पता चल जायेगा । मिट्ठू को तुमने उदास का दिया। अमित को बिना बात के दुधी कर दिया । हर बात में तुम शक करने लग जाते हो । तुम ही क्लेश पैदा करते हो। हाँ में ही सारे झगडों की जड़ हूँ । बहू ने आते ही पूरा कि कैसे आए। मिटूो मुनसे कुछ मांगा और मैंने नहीं दिया वो रहू नाराज होकर मिट्ठू को डाँटने लगी । वह डॉट वास्तव में मुझपर थी। अमित से जरा मैने कह दिया कि मैं किसी के घर नहीं जाऊँगा तो उसने दुबारा घूमने के लिए नहीं कहा । इन बातों पर तुम घोड़े की ध्यान योगी । अब तो तुम भी मुझे भार समझने लगी हो । हमेशा अपोबा बेटे के पक्ष में बोलोगी। पिता दायरे के भीतर बाहर/73 माता पिता माता हाय राम | तुम पड़े पड़े ये सब सोच रहे हो? बहू ने तो वैसे ही मिळू फो रोका था, गुस्सा कहाँ दिखाया था ? बात का, वह भी विशा बात का, मतगड़ बनाना तो कोई तुमसे सीखे । तुम केवल अपनी सोचते हो और चाहते हो कि सब लोग केवल तुम्हारे बारे में सोचें । न कोई चौका बर्तन करे, न कपड़े धोए, न घर की सफाई करे, न बाजार से सामान लाये, न ऑफिस स्कूल जाए, केवल तुम्हें खुश रखने में लगा रहे । जब तुम घूमना नहीं चाहते, तो अमित क्यों पीछे पडे ? आखिर वह भी तो ऑफिस से पका हारा आया है, यह भी तुमने सोपा ? मैं कब कहता हूँ कि सब लोग मेरी चिन्ता करें । मेरा क्या है, मैं तो रिटायर्ड आदमी हूँ, बेकार हैं, फालतू हैं । तुम लोग चाहते होगे कि मैं जल्दी मर मरा जाऊँ। तुम लोगों का भार हल्का हा। . (तल्खी के साय) तुम्हारे मुँह से कभी अच्छी बात नहीं निकलती है। कौन कहता है कि तुम फालतू हो, बेकार हो ? यों ही बोले जा रहे हो? कहने की जरूरत क्या है ? प्रत्यक्ष के लिए प्रमाण नहीं चाहिए। सबका आचरण मैं पढ सकता हूँ। भगवान् ने थोडी बहुत अकल दी है। अच्छी तरह समझ सकता हूँ कि कौन क्या चाहता है। खाक अकल दी है । तुम्हारा वो बुराई खोज निकालने का स्वभाव ही बन गया है। कोई तुम्हारी सुख सुविधा के लिए चाहे जितना कर ले, तुम्हारे आगे उसकी कुछ भी कीमत नहीं है। मैं तो, सच, तग आ गयी हूँ तुम्हारी इस आदत से। तग आ गयी हो तो छोड दो मुझे। मेरा क्या है । किसी तरह काट लँगा अपनी जिन्दगी । मैं तुम्हारे भरोसे थोडे ही जी रहा हूँ। तुपसे तो बात करना भी मुश्किल है। न जाने क्या ऊलजलूल यक देते हो । कुछ मला बुरा नहीं सोचते हो, फिर कहते हो भगवान् ने मुझे अकल दी है। सोना हो तो सो जाओ, नहीं सोना है तो सोचते रहो । मेरी नींद मत खराब करो। [सगीत] पिता माता पिता माता 74/ सूत्रधार माता पिता : (स्वगतकपन) अब वो सब मुग्ने उपेशा की निगाह से देखने लगे हैं। यहाँ धक कि मेरी पली भी कहने लगी है कि वह मुझसे तग आ गयी है। ठीक है, हूबते सूरज को कौन प्रणाम करता है ? सारे सम्बन्ध स्वार्थ के है। जब तक में नौकरी करता था, तब तक मेरी लल्लो पप्पो, अब अपने बेटे की खुशामद करती है। अब वेश होकर कहती है मैं तो वग आ गयी हूँ तुमसे । (प्रकट) हुँह ! भाई में जाओ तुम और तुम्हारे बच्चे। किसको भाड़ में भेज रहे हो इस अंधेरी रात में? पिता किसी को नहीं। माता तो फिर सोते क्यों नहीं ? बड़बड़ा क्यों रहे हो ? कम्बल उढ़ा हूँ? कुछ ठड हो गयी है। पिता ऐसे ही ठीक है। [यत की प्रकार का सगीत] [पक्षियों की कलरव-पनि के शद स्त्री-पुरुषों के बात करने और बच्चों के खेलने-हंसने की धनि] अमित आइए पिताजी ! इयर अच्छी पास है, यहाँ बैठते हैं । मिट्टू । टोकरी में से चादर निकालकर यहाँ बिछा दो और अपनी मम्मी को बुला लाओ न जाने किससे बातें कर रही है। मिळू अभी बुलाकर लाया। लाओ, मैं चादर बिण दूं। अमित नहीं । आप रहने दीजिए । मैं विगए देता हूँ। लीजिए. आप लोप बैठिए, मैं फल लेकर आता हूँ। बड़ा अच्छा पार्क है। पिता (चुप) माता देखो, वह बच्चा अपने दादा को घोड़ा बनाए पूम रहा है। (चुप) क्या सोच रहे हो? पिता अमिव बहुत खवीला है। यहाँ हम लोग बस से भी आ सकते थे, लेकिन वह टैक्सी माता . माता माता .

दायरे के भीतर बाहर/75 माता वह हमारे सुख-आराम के लिए टैक्सी में लाया है, यह थोड़े ही सोचोगे। पिता माता पिता ये सब पीले घोचले दिल्ली में ही है, आगरे में टैक्सी नहीं चलती है तो क्या हम लोग कहीं आते जावे नहीं हैं ? तो फिर तुम आगरे में ही रहो, क्यों दिल्ली आ गये? में कब आ रहा था ? तुीं पीछे पड़ी थी कि चलो, लड़के के पास चलें। यहाँ अकेले तबीयत नहीं लगती। आँ हाँ, तुम्हारी तो बड़ी वबीयत लग रही थी । बार बार कहते घे लड़के की कोई चिट्ठी नहीं आयी । मिट्टू की बड़ी याद आती माता पिता अच्छा, रहने दो, तुमसे वो बात करना बेकार है। माता (स्वगतकयन) इतना अहकार भी किस काम का । पैसे अपने आपको बड़ा साधु सन्त दिखाते हैं और घर में सबके सामने अपनी नाक टेढी किये रहते हैं। मायुरी (निकट आती हुई) माताजी, पार्क के दरवाजे पर जो औरत मुझसे बात कर रही थी, वह पिताजी को जानती है। वह कह रही थी कि उसके ससुर और हमारे पिताजी एक साथ नौकरी करते थे। वह अभी अपने ससुर को यहाँ भेज रही है। पिता तुमने क्यों बता दिया कि मैं यहाँ आया हुआ हूँ। माधुरी । (सभीत) उसने आपको पार्क में देखकर अपने आप मुझसे कहा । वह हमारी पड़ोसिन है, इसलिए हम सबको जानती हैं। पिता : (स्वगतकथन) बडा मूर्ख है, अमित भी। मुझे यहाँ क्यों ले आया ? मिळू दादाजी यह लड़का अपने दादाजी की पीठ पर घूम रहा है, आप भी घोड़ा बनकर मुझे घुमा दीजिए। पिता (सक्रोप) भाग जा यहाँ से ! गया कहीं का। मायुरी जाओ बेटा उपर बच्चों के साथ खेलो। माता क्या बात है, बच्चे पर क्यों बिगडते हो? पिता (स्वगतकयन) कहीं यह खन्ना तो नहीं आ रहा ? यह दिल्ली में कहाँ से आ मरा (प्रकट) आओ खत्रा साहब ! दिल्ली कब आये?

761 सूत्रधार घना पिता यत्रा माता खन्ना माता मापुरी पिता घबा इनो रामसिर । गुम कम भाये ? कता। टी से। नमस्के, भाभी जी। नमस्ते। यह क्या आपकी बहू है? हॉजी। नमस्तेजी। चिरजीव हो । फलो फूलो । सास ससुर की धूब सेवा करो। दो, आप सब लोग पिकनिक मनाने आये हैं। लड़के ने कहा कि आज इववार है । चलो, पार्क में पिकनिक मना आयें। मेरी तो इच्छा नहीं थी, लेकिन वह जबर्दस्ती ले आपा है। जबर्दस्ती ले आया तो उसने कौन सा अपण्य कर दिया ? अरे मई, रिलायर्ड आदमी का मनोरजन यही है कि वह अपनी फेमिली में पुशी के मौके पैदा करे, धूमे फिरे । क्यों भाभी जी ? नर्स भाई साहय, यह तो घाइते हैं कि दिन रात घर में घुसे रहे। नई भडू की वरह घर की चारदीवारी में बन्द रहना चाहते हैं। (हंसते हुए) आजकल की बहुएं इतना सो नहीं शर्माती । जिता ये रिटायर होकर शमति है । (हसती है) मैंने को। सी चोरी की है, जो शर्मा। चौर भी शर्माते हैं, यह तो आज ही पता चला । हिंसते हैं) रामकिशोर ! मैंने सुना है कि जा से रिटायर हुए हो, तब से सबसे मिलना-जुलना छोड़ दिया है। (स्वरवकथन) नसर अमित ने बताया होगा या बहू ने शिकायत की होगी। क्या जरूरत थी यह सब रवाने की? और एक हम है कि जब से रिटायर हुए है, बस मिलना तुलना शादी ब्याह और पार्टी पिकनिक में जाना और बढ़ा दिया है। माई साइन, इन्हें भी कुछ समझाइए । मैं क्या कोई बच्चा हूँ? माता अचा माता पिता बना स्तिा छत्रा माता पिता मापुरी नीजिए, आप लोग चाय पीजिए। (आदाज लगाकर) मिठू ! । आओ, चाय पीओ। (दूर से) अभी आया। मिळू पत्रा मापुरी बत्रा लाओ बहू तुम्हारा नाम क्या है बेटी? माधुरी। वाह कितना मपुर नाम है माधुरी । चाय के साथ कुछ खिलाओगी या कोरी चाय ही पीनी पडेगी? [पिता के अतिरिक्त सभी हंसते हैं] (हंसती हुई) क्यों नहीं । विस्कुट हैं, लीजिए । वे भी आ गये शायद केले ला रहे हैं। 'वे' यानी तुम्हारे पतिदेव ? समकिशोर । ये तुम्हारे साहबजादे माधुरी खत्रा पिता अमित पत्रा घना हाँ, यह अमित है, और अमिव ! ये पत्रा साहब हैं । हम दोनों एकसाथ एक ही पोस्ट पर काम करके रिटायर हुए हैं । ये भी आपरे के रहने वाले हैं। जी हाँ, मैं जानता हूँ। पडौसी जो हैं। नमस्ते । नमस्ते बेटा | आओ। बैठो। निकाली केले। [पिता के अतिरिक्त सब इंसते हैं।] रकिशोर भाई, तुन क्यों अरस्तू के अवतार बने बैठे हो ? क्या लिसी डॉक्टर ने हंसने से मना कर दिया है ? इनकी इसी वो इनकी नौकरी के साथ ही चली गई है। पेय अमित ! तुम इन्हें प्रसन्न रखने की कोशिश किया करो। जी। इन्हें कोई प्रसत्र नहीं कर सकता । देखिए, पार्क में कितने बूढ़े, बच्चे और नौजवान लोग हैं, सब इस खेल रहे हैं। हरियाली गयी है। फूल खिले हैं। वितलियों उड़ रही हैं। विड़ियाँ चहक रही हैं। इन सबकी तरफ इनका कोई ध्यान नही है। इनको तो बस, यह सदमा बैठ गया है कि लड़का हम सबको एसी में बैठार क्यों लाया है। माता पत्रा अमित माता 78/ सूत्रधार पिता फिजूलखी क्यों कर दी? यह क्यों कह दिया ? यह श्यों कर दिया? (स्वगतकथन) यह औरत, न जाने क्यों हाथ धोकर मेरे पीछे पड़ी है। मूर्ख कहीं की है। भई रामकिशोर, तुम्हारी यह एप्रोच ठीक नहीं है। तुम चाहते हो कि तुमने सारी जिन्दगी पैदल घसीट ली तो तुम्हारा लडका भी वैसा ही करे । तुमने हमेशा घर का पका खाना खाया, इसलिए तुम्हारा लड़का होटलों में न खाये । तुम रिटायर हो गये हो तो सब हँसना बन्द कर दें। नहीं भई यह नहीं चलेगा । जिन्दगी एडजस्टमेण्ट से ठीक लाइन पर चलती है। ऐसा नहीं करोगे तो खुद तो दुखी रहोगे ही, दूसरों को भी दुखी रखागे। मैं कय कहता हूँ कि सब लोग दुःखी रहें ? लीजिए पिताजी, चाय पीजिए। कहने से कोई थोडे ही दुखी होता है देखो से भी तो होता है। रिटायर तो मैं भी हुआ हैं, लेकिन स्पोर्ट्समैन्स स्पिरिट से मैंने सारी हालत को संभाल लिया है। मेरे लड़के, मेरी यह मेरे पौवे पोतियों से जाकर पूछे उनमें से किसी को भी मुझसे कोई शिकायत हो तो मैं अपनी भूछे मुडदा दूंगा। दो बैठे हैं, जाकर पूछ लो । मैं यहीं बैठा पिता माधुरी बना पिता पिना उसकी क्या जरूरत है 7 होगा ऐसा ही। होश नहीं है। (स्वगतस्पन) तुम्हारी बात दूसरी है । तुम मस्त आदमी हो । मुसीबत में भी मुस्कराते हो । दूसरों को पता तक नहीं चल पाता यहाँ तक कि तुम्हारे बच्चों तक को नहीं कि तुम किसी परेशानी में हो लेकिन मैं शायद अमित की मौ टीक ही कहती है कि में ही समस्याएं पैदा कर देता हूँ। समस्पाएँ मेरे पास कम आती हैं, मैं स्वय उनके पास पहुँचने की कोशिश अधिक करना हूँ। मैं क्यों नहीं बना का स्वभाव अपना पवा? शायद मेरे सस्कार दायरे के भीतर बाहर/79 ही ऐसे हैं। लेकिन सस्कार या स्वभाव बनाना आदमी के अपने हाय में भी तो होता है - यह मैं क्यों नहीं सोचता? मिळू मेरी चाय? मापुरी पहले इन्हें नमस्ते करो। पिता । नमस्ते नहीं, इनके पैर छूओ। ये भी तुम्हारे दादा जी हैं। मिळू परनाम दादा जी ! जिओ धेटा, सुषी रहो । किस क्लास में पढते हो? मिळू चौथी में । हमेशा फर्ट आता हूँ। खमा अच्छा ! लो, इनाम में एक टाफी खाओ। बत्रा बैंक यू। माता बना पिता आप अपनी जेब में हमेशा यमियों भरे रहते हैं क्या ? हाँ, पहू के बव्ये जब कभी पिट जाते हैं तो वे मेरी गोद में आ जाते है और मेरी टाफियों उनके रोने पर ब्रेक लगाती है। [सद हसते हैं] (स्वगतकथन) में मिट्ठू के लिए कुछ नहीं लाया, यह मेरी बड़ी गलती है । उसे एक रुपया दे देता, तो मेरा क्या घट जाता ? बेकार बच्चे का दिल दुखाया और दूसरों की नजर में गिरा । चाचा जी, खाना खाइए। नहीं बेटा, मेरा खाना मेरी यह लायी है। क्या कोई स्पेशल चीज है? हा, पीर है। चलो रामकिशोर तुम्हें भी तो खीर बहुत अच्छी लगती अमित मापुरी खन्ना माता पिता : तभी ये ऑफिस से लौटकर कहते थे कि खजा साहब की बहू खीर बहुत अच्छी बनाती है । (स्वगतमयन) मेरी बडू क्या खत्रा की बहू से कम है ? मेरी कितनी चिन्ता करती है। अमित मेरी प्रसनता के लिए क्या क्या नहीं भाड में जाय मेरा शक्की स्वभार । करता

80/ सूत्रधार
चना
पिता
तो आइए, आप सब उपर ही चलिए । आप हमारी बहू के हाथ की
खीर खाइए और हम आपकी बहू के हाथ का खाना खाएँगे । क्यों
रामकिशोर, क्या ख्याल है?
ख्याल तो नेक है।
[सब हंसते हैं।
और शाम को बस से घर वापस चलेंगे।
बस से क्यों टैक्सी से चलेंगे। बस में आप लोगों को तकलीफ होगी।
हाँ टैक्सी में आराम रहता है।
बिलकुल, दिलकुल । यही तो मैं तुमसे सुनना चाहता था। मुझे बड़ी
खुशी हुई तुम्हारे मुंह से ऐसा सुनकर ।
खत्रा
अमित
पिता
खन्ना
[सगीत]

दीवारे
लता
पिता
माँ
सोमनाथ
लता का प्रेमी
किमरा । एक आरामकुर्सी पर माथे मूंदे सता के पिता कुछ सोच
रहे हैं। दोनों हाथों की उगतियों एक-दूसरे में फंसाकर सिर के
नीचे दना रखी हैं और पैर फैलाकर एक छोटी मेज पर टिका रखे
हैं। सोफे पर बैठी लता की माँ खेटर बुन हैं। एक ओर विछे
दीवान पर बैठी लता अपने पिता को देख रही है, शायद उनकी
आँखे मुलने की प्रतीक्षा में हैं। उसकी आँखें पिता की आँखों
और कताई पर बँधी घड़ी के बीच भटक रही हैं]
लता
पिता
(पिता की आँखें खुलने पर) दिवानी इन दिनों मुझे कुछ ऐसा लगता
है कि आपको कोई ददी चिन्ता सता रही है। न आप पहले की तरह
हंसते है, न मुस्कराकर बात करते हैं, और कभी कभी ता ऐसा
होता है कि मैं या माता जी आपसे कुछ कहते हैं और आप कुछ
सोचते ही रहते हैं, जवाब नहीं देते।
क्या बताऊँ थैदी । बस, कुछ ऐसी ही बातें हैं । तुझे बताने से क्या
लाम?
पर नीचे टिकाकर सीपे बैठ जाते है।
: हो सकता है, मैं आपकी चिन्ता दूर करने में कुछ सहायक हो सकें।
नहीं बेट नहीं । ऐसी कोई बात नहीं है।
देखो ना मा, पिताजी हर समय कुछ न कुछ सोचते ही रहते हैं।
सोय चोये से रहते हैं। पतारी अशिस में कैसे काम करते हैं
तता

82/ सूत्रधार तता माँ लता पिता तता रात में तो मैं इन्हें करवटें बदलते देखती हूँ। हर समय चिन्ता जैसे पुन की तरह इन्हें खाये जा रही है। मैं कारण पूती हूँ तो कह देते हैं कि तुझे बताने से क्या लाभ । अब में बच्ची थोडे ही है. एम०एस-सी० में पटती हूँ। मिसनद का सहारा लेते है] तू बच्ची होती तो चिंता किस बात की थी। बड़ी हो गयी है, इसी बात से ही तो ये परेशान हैं। (विराम के बाद) क्या मतलब ? तेरी शादी की चिंता है इन्हें। क्या ? (सीयी बैठ जाती है) अरे, इस बेचारी को क्यों परेशान करती हो। यह बडी हो गयी है तो इसके लिए यह क्या करे ? यह तो एक दिन होना ही था। शादी वादी की चिन्ता वो हमें करनी है, उसे नहीं। पिता ी, इतनी जल्दी क्या है ? अभी वो मुझे एम०एस सी० करनी है, नौकरी की तलाश करनी है, अपने पैरों पर खड़ा होना है। वह सब भी हो जाएगा । आजकल अच्छे लडके आसानी से नहीं मिलते । मिलते हैं तो उनके यापों के मुंह फटे हुए है । कोई काम पटा लिखा है तो कोई व्यसनी । किसी का परिवार अच्ण नहीं है तो कोई कुरूप होता है। नहीं पिवाजी, मुझे कोई जल्दी नहीं है । आप मेरी चिन्ता श्रेड़ दीजिए। मुझे अपना भला बुरा स्वय सोचने दीजिए। तुझे सोचने से रोक कौन रहा है? तेरे भले के लिए ही तो में परेशान हैं। नहीं माँ, मुग्ने ऐसी मलाई नहीं चाहिए, जिससे किसी को परेशानी हो। पो कैसी भलाई चाहिए ? आखिर तुघाइती क्या है? धाती हूँ कि मुझे पटाई में ध्यान लगाने दीजिए। अच्छी डिवीजन के बिना नौकरी नहीं मिलती और डिवीजन पाने के लिए दिमाग की शन्धिपदिए। पिता तता मौ सता मो दीवारें/83 पिता सत्ता मो तू अपनी पढ़ाई करती रह । मैं अपना काम कर रहा हूँ। तू अपना काम कर। नहीं पिताजी । यह मेरे कैरियर का सवाल है। आप मेरी शादी की चिन्ता मत कीजिए। मैं कुछ साल तक शादी नहीं करना चाहती । हाय राम ! कैसी कैंची की वरह जबान लडा रही है। शरम तो नहीं आती। शर्म किस पाव की? (चिढाने के स्वर में) शरम किस बात की। (थोडा रुककर) मुझे अपना भविष्य बनाना है और आप लोगों को अपना भार उतारने की पड़ी है। आप निश्चिन्त रहिए । मैं आप लोगों पर भार बनकर नहीं रहना चाहती । जैसे ही पढ़ाई पूरी कर लूंगी, कोई नौकरी तलाश लूंगी और अगर शादी करनी होगी, तो तता मा तता माँ पिता शादी कर लेगी । देखा तुमने । तुमने ही इसे सिर पर चदा रखा है। कल की छोकरी, आज की दादी । कैसा जमाना आ गया है । शरम हया नान को भी नहीं है। छोडो भी तुम बेकार जमाने को कोसने बैठ जाती हो । आखिर वह यूनीवर्सिटी में पढती है। पीस तरह के लडके लडकियों से मिलती है। अधबार कितादें पढती है । आजकल लडके लडकी का फर्क घत्म होता जा रहा है। यही बात तुम्हारे किसी बेटे ने कही होती, वो तुमको शायद इतना बुरा न लगता । ठीक है बेटी तुम जैसा चाहोगी वैसा ही होगा। तुम भी कैसी बाते करते हो जी । रवि लडका है, कुछ गड़बड काम करे वो दुनिया कहेगी कोई बात नहीं, लड़का है और अगर यह कुछ ऐसी वैसी दात कर बैठे वो जिन्दगीमर के लिए दाग लग मा कुछ विदकर) तुम घुप रहो। तुम्हें इतना भी भान नहीं है कि किस समय क्या भाव कनी चाहिए । लता, तुम जैसा चाहोगी, पैसा ही 84/ सूत्रपार लता पिता लता पिता तता पिता तता पिता लता होगा । बेटी के जवान हो जाने पर पिता का चिन्तातुर होना नेवुरत है स्वाभाविक है। तुम अपनी पढ़ाई में दिमाग लगाओ । कोई अच्छा लड़का मिल जाएगा तो मैं तुमसे पूछकर ही ध्याह करूंगा । तुई पसन्द आये तो करना न आये तो मत करना । पिताजी । क्या ? (विराम) क्या बात है? मैं में मैं हाँ, हो, कहो। मेरा परिचय एक से है। क्या? तुम घुप रहो जी । हों तो फिर? मैं उन्हें दो साल से जानती हूँ। बहुत अच्छे हैं ? कौन ? तुम्हारे प्रोफेसर? नहीं। वो साफ साफ कहो ना। हिचकिया क्यों रही हो? मैं डरती हूँ कि आप मेरी पसन्द का विरोध करेंगे। क्या किसी से ? कौन है यह? मैंन कहती थी तुम जरुर हरदात में बैंग अड़ाओगी। कभी तो अपने मुँह को बन्द रखा करो। हों लता, कौन है यो? उनसे मेरी मुलाकात अपने प्रोफेसर गागुली के घर हुई थी। वो भाभा इन्स्टीट्यूट में सीनियर रिसर्च आफीसर है । हम दोनों दो साल से एक दूसरे को जानते हैं। उनका कहना है कि मैं एम०एस सी० पूरी कर लें. फर्स्ट क्लास ले आऊँ वो बम्बई में कोई अच्छी नैकरी मिल सकती है। तो तुन । (अपने पति से) फिर तुम कहोगे कि में पहुन बोनती हूँ। इससे कुछ नहीं कहोगे, जो जिससे जी में आया उसी से गोठ जोड़ने को तैयार की है। पिता लता पिता पिता दीवारें।85 पिता माँ पिता तता पिता सता माँ वो क्या बुरा कर रही है। इतना अच्छा लड़का इसको मिल रहा है कि मैं सपने में भी नहीं सोच सकता था। मैं ढूँढता कोई आफिस का कलमपिस्सू । सारी जिन्दगी 10 बजे से 5 बजे के बीच घर से माफिस के बीच पैण्डुलम बने घूमना और घर का खर्च चलाने के लिए ओवर टाइम काम करना । जिसके घर का पता, न जात का। परस का पता, न ईमान का। जिससे जरा नैन मटका हुआ, उससे ब्याह रचा लिया । मुझे तो नहीं पसन्द यह सब आखिर जात-गोव-दस भी तो देखना होता है। है, लता। कुछ इसका भी पता किया ? पिताजी, आजकल कौन देखता है इन चीजों को और क्या जरूरत है इन बातों की 1 फिर भी दुनियादारी के लिए यह जरूरी है। समाज में रहना है तो समाज की परपराओं को मानना ही पड़ेगा। क्या जाति है उसकी ? यह आप न पू तो अच्छा रहे। (स्वेटर एक और पटककर) बताने में क्या हर्ज है ? तेरे माप को सब कुछ तो पसन्द आ गया है, अब जाति भी पसन्द करा दे। (फुद्ध दृष्टि के साथ) तुम्हारी तलवार तो हर समय म्यान से बाहर रहती है। उनके पिता व्यापारी हैं। यानी कि बनिया है? नहीं, बत्री हैं। स्तिव्यता तू माझण है, यह कात्री है यह शादी जरा मुश्किल है बेटी और फिर हम लोग यू पी के हैं और वह पजाबी हैं। में जानती थी पिताजी कि आप थोडे प्रगतिशील थोड़े रूढिवादी हैं। उनसे परिचय की घनिष्ठता के साथ साप मेरा भय भी बढता रहा पा कि आप केवल जाति के आधार पर मेरे फैसले का विरोध कर सकते हैं। प्रात का तो मैंने सोचा ही नहीं पा कि यह समस्या भी सामने आ सकदी है। पिता तता पिता सता पिता 86/ सूत्रपार मिता पिता सता पहजो देखना ही पड़ा है सग । समाज की मर्याओं के मानला ही पड़ता है। आधिर बोसियों शवों में हमें समाज समय सेन होता है। आपने समाज मादाओं को मानकर ही भैया की शादी एक ऊंचे ग्रामण कुल में की थी। मैं बड़ी पलाश के बाद हुवे जाति गोत्र यश की बहू लपी थी इस पर में 1 परिणाम क्या हुआ? भाभी और मैया में कभी बनी ? न जाने कितने लोग भाभी के मित्र पेजो शादी के बाद भी मित्र बने रहे और एक दिन एक ठाकुर के साप वह भाग गी । आप तो जानते ही है पिताजी कि गुण तो व्यकि में होते हैं, जावि गोत्र या वश में नहीं । यी बात मात के मामले में कही पा सकती है। वो पनादी है धो क्या हुआ ? उनकी सारीफ में खुद क्या करूँ आप जाकर मेरे प्रोफेसर मागुली से पूछ लीजिए। मेरी बात को आप शायद भावुकता मानें। वह तो ठीक है लेकिन फिर भी अब में आपको क्या समझाऊँ पिताजी ! तर्क दूंगी सो आप सौर्ची कि मैं अपनी बात को सही सिद्ध करने की कोशिश कर रही हूँ। लेकिन मैं कोशिश नहीं करना चाहती हूँ केवल कहना चाहती हूँ कि जिन बातों ने आदमी आदमी के बीच दीवारें खड़ी कर दी हैं उन्हें तोडने की बहुत जरूरत है आज । यह सब पट तो मने भी रखा है लेकिन हम लोग परपराओं से इतने अधिक टीक है जो तुम ठीक समझती हो वही मुझे मजूर है। (गदगद होकर खड़ी हो जाती है) पिताजी, आप कितने अच्छे हैं। यानी कि तुम अपनी इस लाडली की बातों में आ गये । शास्तरों, पुरानों में जो लिखा है वह झूठ और जो तुम्हारी बेटी कहती है, वह सच। [खड़ी हो जाती है पिता जुड़ गये है कि तता माँ दीवारें/87 1 माँ पिता तता पिता मेरा ख्याल है कि तुम भी जब पढाई लिखाई शुरू कर दो बाकि तुम्हारे दिमाग के बन्द दरवाजे खुले और उसमें कुछ रोशनी घुसे, कुछ ताजी हवा जाये । जाओ, मेरे लिए एक गिलास पानी ले आओ। ताजी हवा तुम्हें ही मुबारक हो। [असतुष्ट-सी गर्दन मटकाकर अदर जाती हैं, तभी बाहर की घटी बजती है। पिता उत्सुक दृष्टि से लता को देखते हैं और सता अपनी कलाई घड़ी को। जा बेटी, देख वो कौन आया है ! वो ही होंगे। पाँच बजे आकर आपसे बात करने का वायदा किया था। (खडे होकर) अरे तो जा बुलाकर ला I मैं भी देखू, कैसे हैं तेरे 'यो' (लता सकुवित सी जाती है ! पिता अपने कपडे ठीक करते हैं। कुछ बिखरी चीजों को तरतीब देते हैं। माँ पानी का गिलास लेकर आदी है) देखो, लता जिस लड़के के बारे में बात कर रही थी ना, वह आया है। तो मैं क्या कसै? (मल्लाये स्वर में) करना क्या है जरा चाप का पानी रख दो और तुम अपना रूप ठीक बना आओ, फिर बैठो और लडके को देख समझ लो । (पानी लेकर पी लेते हैं) (गिलास लेकर अदर जावी हुई) रूप तुम्हारी बेटी बनायेगी या मैं बनाऊँगी? (बुदबुदाते हैं) हो, तुम्हें रूप बनाने की क्या जरूरत है। तुम्हारी भौहें और आखें हमेश पनुषवाण सी रहती हैं और जुबान कयरी की तरह चलती है । (तभी लता और सोमनाय को आया देखकर मुस्कराते हैं ) आओ बेटे । बैठौ । (सोमनाथ से हाथ मिलाते हैं और कन्ये पर हाथ रखकर सोफे पर बैठाते हैं। स्वय आरामकुर्सी पर बैठ जाते हैं। दिवा सोमनाथ और लता कुछ क्षण एक दूसरे की पिता माँ पिता 88/ सूत्रधार सोमनाथ पिता सोमनाथ पिता सोमनाथ पिता ओर देखते हैं कि कौन सव शुरू करे) मकान दूंटने में कोई तकलीफ तो नहीं हुई बेट क्या नाम तूं तुम्हारा? सोमनाप । बहुत सुन्दर 1 लवा ने पता ठिकाना श्वनी पकी तरह और नक्शा बनाकर समझा दिया था कि भूलने की गुजाइश ही नहीं थी। शायद यह जासूसी उपन्यास पटने की शौकीन है। [सब व्हाका सगावे है। तता अन्दर चली जाती है ] (पात का छोर दूंटकर) कहाँ रहते हो? जी, मैं तो भामा इस्टीट्यूट के पास ही एक प्लेट में रहता हूँ। माता-पिता अम्बाला में रहते हैं। वैरी मुड । (भीतर की ओर) अरे लता की माँ ! तुम भी आकर यहाँ बैठो ना क्यिा कर रही हो? (भीतर से) अभी आई । (सामने आती है तो सजी संवरी दीखती ह) (खडा होकर) नमस्ते माताजी ! (कनधियों से सोमनाप न्ने देखकर) नमस्ते (दीवान पर बैठ जाती है) (पली का चेहरा पध्ने हुए, सोमनाथ से) इस्टीट्यूट में कब से हो ? लता ने आपको कुछ नहीं बताया ? उसने कहाँ बवाया है। उसने तो तुम्हारे बारे में ही अभी, तुम्हारे आने से योडा पहले ही बताया है। (हंसते हैं। सोमनाथ मुस्कराता है और माँ सोमनाप को गभीरतापूर्वक देखती रहती है। पत्नी से) लता कहाँ गई? क्या कर रही है ? सोम के आने से पहले तो इवना चपड़पड़ कर रही थी कि 1 मुझे नहीं पता था कि वह इतनी शर्मीली भी है। (सोमनाथ से) तुम दोनों एक-दूसरे को कम से जानते हो? सोमनाथ माँ पिता सोमनाय पिता दीदारें/89 सोमनाव पिता सोमनाव माँ पिता स्ता प्रोफेसर गागुली के घर चार पाँच महीने पहले हम दोनों मिले थे। उनका स्टूडैण्ट रह चुका हूँ और लवा उनकी स्टूडैण्ट है। (पीठ टिकाकर) उनको तुम दोनों के इस नये रिश्ते के बारे में जानकारी है? जी हाँ । वह हमें आपके बाद आशीर्वाद देने को तैयार हैं। वैसे उन्होंने शुभकामना प्रकट कर दी है। भी लता प्रोफे सर गागुली से इनके बारे में पूछ लेने को कह रही थी। अरे हाँ, शायद वह सब कुछ हमें बताने में सकुचा रही थी, इसलिए हमें प्रोफेसर गागुली के पास तुम्हारे बारे में बात करने के लिए भेज रही थी। चलो, अब तुम ही आ गये हो तो हमारे जाने की जरूरत नहीं रही । (भीतर की ओर) अरे लता ! जल्दी से चाय लाओ ना, बेटे। (भीतर से) अभी लाई, पिताजी ! द्वि में चाय का सामान लाती है और मेज पर रखकर माँ के पास बैठ जाती है। एक कप में चाय बनाकर पिता को देती है । सब पाय का बनना और देना देखते रहते हैं। इससे तता का सकोच रेता जाता है, जिससे हार काँप उठता है और एक चम्मच पीनी चाय में अलने की बजाय ट्रे में फैला देती है। पिता और सोमनाथ लता की ओर देखकर हंस पड़ते हैं। (चम्मच लता के हाथ से लेकर) ला, मैं चाय बना हूँ। नहीं माँ , मैं बनाये देती हूँ। (चाय वैयार करके सोमनाथ को देती हुई, लता से) तू बात कर । [कुछ क्षण स्तन्यता । स्वब्यता तोड़ने के लिए पिता और सोमनाथ चाय सड़कते हैं। वा, अभी तो तू सोमनाप के बारे में इतना चहक रही थी अब क्या हो गया? पहले मैं इनके स्वागत का मैम्पाउण्ड तैयार कर रही थी। तता ,

90/ सूत्रधार
पिता
(हंसकर) अच्ण । (सोमनाथ से) देखा, कितनी चतुर है हमारी
बेटी 1 तुम्तो आने से पहले बारबार पड़ी देख रही थी, लेकिन यह
नर्स बताया कि तुम्हारा वजार कर रही है। पहले कर रही थी कि
मैं शादी नहीं करना चाहती लेकिन जैसे ही हश को अपने अनुकूल
बहते देपा, झट से तुम्हारी प्रशसा के पुल बाँपने लगी । (वष्य
सुडकार) भई, मैं वो कम से कम लता की चतुराई, समझदारी और
चुनाव का प्रशसक हो गया हू। (मली से) कहो, तुम्रा क्या विचार
माँ
पिता
सोमगध
पिता
(अनिर्णय की मुद्रा में) मैं क्या बताऊँ ? (सोमनाथ, लता और पति
पर दृष्टि पुमाकर) आप सब समझदार हैं।
(चाय का प्याला मेज पर रखते हुए भई वाह, लगवा है, तुमने
अपने दरवाजे खोल लिए, दीवारे दहा दी और ताजी हा पुरा ली।
[माँ नीचे देखती हैं।
कैसे दरवाजे कैसी दीवारें? कैसी हवा?
[लता और हंस पडते है।
कुछ नहीं । ये हमारी घरेलू बाते हैं । अब बेटा, ऐसा कयै । अपने
माता पिता का पता बताओ । तुम और लता भले ही आपस में
फैसला कर लो हमें तो तुम्हारे माता पिता से शुरूआत
पड़ेगी।
(खड़ा होकर हाथ जोडता है) जी। (जेब से कागज निकाल कर पिन
को देवा हुआ) यह लीजिए। मैं पहले से ही लिख लापापा।
[सर खड़े हो जाते हैं पिता हसते हुए, मां रखकी ओर देखती
और स्ता मों से विपटती हुई1)
करनी
सोमनाप

न्याय युवक का पिता प्रोट युवक किसान टोपीधारी प्रौढ का पुत्र प्रौढ का पेत कर्मचारी मत्री [गाँव के मकान की एक बैठक । एक कुर्सी बापी दीवार से लगी भेज के पास। मेन पर कुछ पुस्तकें और एक पेड़ । एक कुर्सी बैठक । दार्थी दीवार के साथ विछी एक चारपाई। सामने की दीवार में खूटियों लगी हैं। एक बूंटी पर पैंट-कमीज, दूसरी सूंटी पर कुर्ता-योती । चारपाई पर एक प्रौढ़ और मेजवाली कुर्सी पर एक युवक बैठे हैं] प्रह युक्क मोद युक्क प्रोड़ (पीड़ी मुलगाकर) तो तुमने कसम खा रपी है कि रिश्वत नहीं लोगे? . जी। और यह भी सोच रखा है कि किसी को रिश्वत नहीं लेने दोगे? जी। फिर तो तुम कर चुके नौकरी । या तो किसी जमाने में एक सत्यवादी हरिश्चन्द्र हुए थे या इस जमाने में तुम हुए हो। लेकिन थेट अगर आज के जमाने में हरिश्चन्द्र पैदा हुए होते वो उनको साँस लेना भी दूभर हो जाता आत्महत्या कर लेते थे। मैं हरिश्चन्द्र होने या बनने का दावा नहीं करता लेकिन मेरे कुछ आदर्श है, लक्ष्य हैं जिन्हें में पाना चाहता हूँ। बस । युक्क 92/ सूत्रधार किसान पुकम किसान पुक्क प्रोड़ को टीक है । जिन्दगी में कुछ टोकरें चने के बाद ही ठीक से रचना सीप जाओगे | अगर मुग्ने पता होगा कि पा लिवकर ये सयान सरीयोगे तो तुरे पढ़ने के लिए कभीर न भेगा। एक किसान का प्रवेश जुहार मकुर र [प्रो किसान की ओर प्यान नहीं देता (कुर्सी की और सरेख कर) आओ प्यारेलाल, बैटो। (गिड़गिड़ाता साप जोड़कर) अरे भईशप, आप ठाकुर हो, में घमार । आपके परामर कसे बैठ सकता है ? हम तो सिटी है मिट्टी में ही अशे लगते हैं। (फर्श पर बैठ जाता है) अब यह पुराना जमाना नहीं रहा प्यारेलाल | ऊंच नीव का जमाना गया । तुम लोग कुछ तो आत्मसम्मान सीयो । (कुछ कोय से) यै पाठ तुम अपने शहर में ही पाना । शहरों की मदगी गाँवों में मन फैलाओ। (साश्यय) इसे आप गन्दगी कहते हैं। आदमी को आदमी समझना गन्दगी है ? सबको परामर समझना गन्दगी है? आप तो यह मानते हैं कि सर मनुष्यों को ईश्वर ने बनाया है, फिर एक ही ईश्वर की सन्तान ऊँची नीची कैसे हर समय तक करना ठीक नहीं है। तुम नहीं समझोगे ये सब बातें। छोड़ो। क्यों प्यारेलाल? (हाय जोड़कर) जी मालिक । हम तो अनपट , इतनी ऊँची बाते हम क्या जाने ? सब अपने कर्मों का फल भोगे है हजूर । भेटे ठाकुर सहर में पड़े हुए हैं सो वहीं का सी बाते भी करे हैं। कोई मात शहर या गाँव की नहीं होती प्यारेलाल 1 समझधरी की बात किसी गति में नहीं, बुद्धि में जन्म लेती है। तुम : कोष से) या तो तू अपनी बकवास बन्द कर, नहीं हो फिर में ही जाता हूँ यहाँ से। पुक्क प्रौद किसान युक्क लोग। प्रोद किसान मोड़ किसान किसान मोद किसान प्रौद [पारपाई से पैर लटकाकर पप्पत पहनने तप्ताहानिहाय जोड़कर खड़ा हो जाता है। युवक टिकर चला जाता है प्राद बैठा रहता है] जाने दो ठाकुर साय | जवान आदमी को अपनी जबान पर काबू नहीं होते है। (युवक के जाने की दिशा की ओर देखता हुआ) मैंने इस लडके की पढ़ाई लिखाई पर कितना रुपया सर्व किया है। अजी, पानी की तरह। जो माँगा, सो दिया । जो कहा, सो माना। वह तो है ही। और आज यही मेरी हर बात का विरोय करने पर तुला हुआ है। जमाना बड़ा खराब आ गया है, हजूर । जमाना कहता है-जमाना तो आदमियों के हायों से बनाया विगाड़ा जाता है। सच कहते हैं हजूर । (तमवमाकर) पौन सच कहता है ? क्या सच कहता है ? (कुछ भूल हुई जानकर थरथराने लगता है) कुछ नहीं कोई नहीं [एक कुर्ता-योती-टोपीधारी का प्रवेश । मोढ़ हाथ जोड़ता हुआ खड़ा होता है। दोनों के चेहरे पर औपचारिक मुस्कराहट] आइए मत्री जी । नमस्कार। नमस्कार । (एक कुर्सी पर बैठ जाता है) (खाट पर बैठता हुआ) आज आप ? अचानक ? हाँ, इपर का दौरा बनाकर घला आया हूँ। भतीजी की शादी है ना । दौरा बनाकर? हाँ और क्या । आजकल अधिवेशन चल रहा है । मुख्यमत्री जी ने कहा कि कहीं बाहर मत जाना, सो इधर के साम्प्रदायिक दर्गों के किसान प्रौद किसान मैने नहीं कहा हजूर प्रौद टोपीपारी प्रौड़ टोपीधारी प्रौद्र टोपीधारी 94 / सूत्रधार प्रौद कारण जानने के बहाने दौरा बना लिया। परसों शादी है, उसके बाद वापस चला जाऊँगा। इथर तो कोई दगा नहीं हुआ है । और फिर, इस इलाके में इतने मुसलमान वोटर्स भी नहीं है कि कोई उन्हें भड़काकर अपना उन्न सीधा करना चाहे। वह तो ठीक है। मैंने इसीलिए तो कहा कि मैं बहाना बनाकर आया टोपीधारी प्रौढ़ टोपीधारी प्रौढ टोपीधारी प्रौद टोपीधारी प्रौद टोपीधारी . कुछ क्षण स्तयता मेरे योग्य कोई सेवा? हाँ मुझे आपक लडके सत्यदेव के बारे में कुछ भात करनी है। (उत्सुकता के साथ) क्या ? उससे कोई गड़बड़ी हो गयी क्या? आजकल बहुत ईमानदारी भी बडी गडबड़ी पैदा कर देती है। [प्यारेलाल की ओर देखता है। प्रौढ़ संकेत समझ जाता है] क्या सत्यदेव को बुलयाऊँ ? हो उसको कुछ समझाना जरूरी है। (प्यारेलाल से) जा, सत्यदेव को बुला ला । पारेलाल हाथ जोड़कर चला जाता है] आप तो जानते ही हैं कि आजकल सब काम पैसे के लिए किये जाते हैं। पैसे के लिए हम लोग चुनाव लड़ते हैं। आप लोगों को डाकुओ को पुलिस को युश रखते हैं। प्रचार के लिए जी लेनी होती है, इसलिए पैसेवालों, विकास अधिकारी, तहसीलदार और दूसरे सरकारी अफसरों को खुश रखते हैं सब कहीं जाकर धुनाव जीत पाते हैं। जी को यह सब दो करना ही पड़ता है। आपका लड़का सत्यदेव इतने दिन बेरोजगार बैठा रहा । आपके को पर मैंने आपसे बिना कुछ लिगे उसे विनस प्रकिकरण में इजीनियर सगश पा । और कोई होता वो इस नौकरी के लिए पाँच दस हजार से कम न लेता और उससे कई पर सपपला प्रौढ़ टोपीपारी न्याय/95 प्रौद टोपीपारी प्रौद टोपीपारी प्रोद टोपीयारी लेकिन आप अपने आदमी है यह सोचकर मैंने आपका काम मुफ्त में कर दिया। वह तो आपकी दड़ी कृपादृष्टि है मुझपर ! मैं सत्यदेव को कई बार समझा चुका हूँ कि आदमी को अपना हित पहले देखना चाहिए, पर यह तो समाज और राष्ट्र की पाव ज्यादा करता है, अपनी कम । भैया, समाज और राष्ट्र की बात हम क्या कम करते हैं ? समाज और राष्ट्र अलग चीज है, अपना स्वार्थ अलग चीज । अपना स्वार्थ सापते हुए अगर समाज और राष्ट्र की सेवा भी होती चले तो इससे अच्छी और कौन सी बाव हो सकती है? यही तो मैं उसे समझाता रहता है लेकिन वह है कि चिकने पड़े की वरह मेरी एक पाव सहन करने को तैयार नहीं है। अभी गर्म खून है। थोड़े दिनों में उसने क्या गड़बड़ी की है? अरे, गडबडी वो नहीं की, लेकिन वह होनेवाली गडबड़ी को रोकना चाहता है । इससे बड़ी गडबड़ी हो गयी है । विकास प्राधिकरण के द्वारा मिडिल और लो इन्कम ग्रुप के मकान बनाने का प्लान मैंने वैयार करवाया है। और सच्ची बात तो यह है कि मेरा एक मानला और एक भतीजा खाली बैठे बैठे रोटी तोड़ रहे थे, सो उन मकानों को बनाने का ठेका मैंने उनको दिलवा दिया है। अब आपसे क्या छिपाना । आपका सत्यदेव और मेरे मानजे भतीजे में कोई फर्क पोड़े ही है, इसलिए मैं आपसे खुलकर बात कर सकता हूँ । अगर उन मकानों को बनाने में ईमानदारी बरती जाय, तो ठेकेदारों का दीवाला ही पिट जायेगा क्योकि आजकल हर चीज ब्लैक में मिलती है। मकान बनाने के लिए पोसियों धीजें याहिएँ । उनको पाने के लिए बीसियों दफ्तरों के घर लगाने पड़ते हैं। दफ्तरों से काम करवाने के लिए रुपया खर्च करना पड़ता है। इतना सारा सर्व करने के लिए पैसा चाहिए, जो मानों में कम या घटिया सामान लगाये बगैर निकल नहीं सकता । यह आपका लडका रोडा अटका - 96/सूरपार मोड़ टोपीमारी प्रौद किसान पोद रश है पिना पीना यो दूर, यह इस पाने पर पर्दा डालने की संगप मुमनत्री के पास शिप्रय लिया र रहा है। मुख्यमन्त्री जी कर रहे थे कि इस सइके ग्रे समझाकर आगे वर्ग तुम्हारी और मेरी रही पनानी रागी मुख्यमन्त्री नी का सड़या भी लो मेरी स्कीन में हनियर साहुआ है। यह बहुत दिया प्रम कर रहा है गरे सय बिलों और कागजों पर ऑष , का दरायत पर देता है। (पहावे के सर में) पता नहीं, मेरे घर में या नालायक कहाँ है पाहो गया है। [किसान के साथ युक्त का प्रवेश । युवक टोपीपारी के अभिवादन कर घड़ा रहा है (खानी कुर्सी की ओर सरेरा कर) आओ बेटा देठो। [युक्क दैठ जाता है। कहो प्यारेलाल, गुम्हें कुछ पाप है ? जी प्या? बात यह है मालिक कि मेरा लडका बिजली डिपाटमेंट में लैनिस्पैहर लगाएका था। मुझे मालूम है । योखापड़ी के आरोप में उसे नौकरी से निकाल दिया गया है। (पी ₹सी के साय) सही बात है हार लेकिन इन मन्त्री जी का गांव में आना सुनार में आपके पास चला आया। तो मैं क्या कर सकता हूँ ? उसो जैसा किया, वैसा भर रहा है। कई गांवों के घरों और ट्यूब वैलों के भीटरों में गडवडी करके हजारों रुपये कमाता रहा। सरकार को घाखा देता रहा। जब पाप का पण भर जाना है, तब ऐसा ही होता है। जाओ मैं ऐसे आदमी के बारे में कुछ नहीं कह सकता। प्रौढ किसान मौद न्या/91 किसान रोपीधारी युक्क टोपीपारी (हाथ जोडे हुए मुककर) बच्चों से गलती हो ही जाते है हजूर मैं माफी चाहता हूँ। आइन्दा वह ऐसा नहीं करेगा । मैंने तो उससे कहा पा कि चलकर मत्री जी और ठाकुर साहव से माफी माँग ले लेकिन वह सरम के मारे नहीं आवे है। और हजूर, आपके कहने से भी तो उसने कई लोगों के काम बिना कुछ लिये दिये करे हैं। अव्य, तुम थोड़ी देर बाद आना । तुम्हारी यात मैं सुनूँगा । जाओ। [किसान 'अच्छा मालिक' कहकर प्रणाम की मुद्रा मे निकल जाता है] मुझे किसलिए याद किया गया है ? (मुस्कराहट फेंकता हुआ) तुम याद करने लायक हो इसलिए । (मुस्कराहट का प्रत्युवर पाने के लिए युवक की और देखता रहता है, लेकिन उसके गम्भीर बने रहने पर) में यह जानना चाहता था बेटा, कि तुम हमसे नाराज क्यों हो? किसने कहा ? मैं आपसे क्यों नाराज होने लगा? तुमने फकीरचन्द और भीखनलाल की बीसियों शिकायतें लिखकर मुख्यमत्री जी के पास भेजी है कि नहीं ? लेकिन आप वोइन दोनों में से कोई नहीं है? (वनिक क्रोप) इससे क्या हुआ ? ये दोनों मत्री जी के घर के लोग मुक्क टोपीमारी युक्क प्रौद वो है। टोपीपारी प्रौद टोपीपारी आप शान्त रहिए ठाकुर साहब । अच्छ, मैं आपके चायपानी का बदोवस्त करता हूँ । (उठकर बाहर चला जाता है।) (कुछ गर्मी के साप) देखो, तुम ठाकुर साहब लडके हो । ठाकुर साहब मेरे शुभचिन्तक हैं, इसलिए मैं भी तुम्हारा शुभचिन्तक हूँ। यही धारण है कि मैंने तुम्हें नौकरी दिलवायी है और इस नौकरी से निचलने वक्त भी मुझमें है। आप मुझे धमकी देने आये हैं ?

98/ सूत्रधार टोपीपारी युक्क टोपीपारी नही समझा रहा हूँ। तुम मुख्यपत्री जी तक शिकायत पहुँचाओ का प्रधानमंत्री जी तक, तुम्हारी इन शिकायतों से कुछ होना जाना नर्स है। प्रशासन में ऊपर से नीचे तक एक ऐसा जाल बुना हुआ है कि उसमें तुम जैसे लोग ही फंसते हैं, हम जैसे नहीं । मकड़ी को कभी तुमने अपने जाल में फंसते देखा है? इन सब मकड़ियों के जाल साफ करने की हिम्मत मुझमें है। मैं ऐसी थमकियों डर जानेवाला व्यक्ति नहीं हूँ। मैं और ऊपर तक शिकायतें ले जाऊँगा । अभी मैं मुख्यमंत्री के उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। (मुस्कराकर) मुख्यमी जी का उत्तर तो तभी आयेगा जब में राजयानी पहुँचकर तुम्हारे खिलाफ इन्क्वायरी कमेटी लाने की सिफारिश करूँगा । और ऊपर शिकारते कहाँ ले जाओगे ? सयुक्तराष्ट्र सय में ? प्रधानमत्री तक ही तो शिकायतें करोगे ? उनका सचिवालय तुम्हारी शिकायतें हमारे पास ही सो भेजेगा या हमसे यावचीत करने के बाद ही तो उनका कोई फैसला होगा? (पापका सा) आपका मतलब है कि में कहीं से भी न्याय पाने की आशा नहीं कर सकता। न्याय अन्याय की बात छोड़ो। आदमी को जीवन में प्रश्टीकल होना पहिए. व्यावहारिक होना चाहिए । तुम जैसे आदर्शवादी हरिश्चन्द्र पोड़े समय में ही दूट जाते हैं। आदर्श और सिमान्त की बाते कहने में ही अच्छी लगती है। जो आदमी उसको पूरी तरह से अपने जवन में उतारना चाहता है मह जीवनमर असफल ही रहता है । यामा तो समाज के एक कोने में पड़ा रहता है या पागल कहलाता है। (सुवक नीये देयता रहता है) पाव मानौ पेटा हम हे तो ने जीवन में कुछ देया सपा है वही तुमसे कहते हैं। तुम से नजदनों में गोश बहाता है, होश कम, इसलिए तुम स्वयं हे दुधी रहो हो हो सच में पिता को भी दुधी रपवे हो। तुम्हारे युवक टोपीमारी न्याय/99 युक्क टोपीपारी पिता ने कितने अरमान से तुम्हें पाया लिखाया है ताकि तुम आराम से नौकरी करो और अपने आपको सुखी बनाओ। लेकिन आप मुझे समझने की कोशिश क्यों नहीं करते ? मैंने आपके रिशोदारों की शिकायत अपना पर भरने के लिए तो नहीं की है। वे लोग तो सभी नियमों को ताक पर रखकर खस्ता मकान तैयार कर रहे हैं। जनता से जितना पैसा उन मकानों के लिए वसूल किया जा रहा है, उसका आधा हिस्सा भी उन मकानों पर खर्च नहीं किया जा रहा । सीमेंट और लोहा मकानों में लगाने के बजाय न्नेक में बेच रहे हैं। आप मुझे समझाने की बजाय उन लोगों को क्यों नहीं समझाते? न वै गलत काम करेंगे, न मुझे शिकायत होगी। बेटा, व्यापार और राजनीति की गहराइयों को तुम नहीं समझते, इसलिए ऐसी बातें कर रहे हो । अगर मैं और मेरे साथी अपने रिश्तेदारों को ठेके, लाइसेंस, परमिट न दिलाएँ, कमाई न करवाएँ तो धुनाव का पर्व कौन देगा, मेरी पार्टी को लाखों रुपया चन्दा कहाँ से मिलेगा ? क्या तुम जैसे ईमानदार फटीचर लोग कुछ देंगे? (घोड़ा रुककर) में यहाँ तुम्हें राजनीति की यारीकियों समझाने नहीं आया हूँ। मैं तुमसे दो-टूक उत्तर चाहता हूँ। दोलो, मेरा कहना मानते हो कि नहीं ? अगर तुम्हारा उत्तर 'नहीं' में हो तो उसका परिणाम भी सोच लेना। (आगोश के साप) ठीक है । मेरा उत्तर 'नहीं है। देखता हूँ कि आपका प्रष्ट प्रशासन जीतता है या मैं । जरा यह भी देख लें कि आदमी की आत्मा कहाँ तक मर चुकी है। (कोष में खड़ा होकर) आत्मा गई भाड में और साथ में गये तुम । अब तो तुम्हें कोई नहीं बचा सकता । गीदड की जब मौत आती यो शहर की ओर भागता है। यहाँ बड़े बड़ों को सीधा कर दिया है, तुम्हारी तो हस्ती ही क्या है? (शान्त स्वर में) आर इतना भौंक क्यों रहे हैं । जाइए, जो कुछ करना है कीजिए। युक्क रोपीपारी 100/सूत्रपार फायदा? [टोपीपारी तमतमाता हुआ चला जाता है । युवक मैन के पास की कुर्सी पर बैठ जाता है और मेज पर रखे पैड को खोत कुछ लिखने लगता है। कुछ सोचता है, फिर लिखने लगता है। कुछ क्षण अन्यकार, फिर प्रकाश । युवक कुछ सोच रहा है। प्रौढ़ का प्रवेश ] प्रौद क्या लिख रहे हो? युक्क मैं इस मत्री के सारे घोटाले की रिपोर्ट प्रयानमत्री के पास लिखकर भेज रहा हूँ। प्रौद युक्क फायदा क्या होता है ? (क्रोध के कारण स्वर तीखा हो जाता है) आर वो हर जगह फ़ाया देखना चाहते हैं, चाहे दूसरों का कितन्न ही नुकसान क्यों न शे जाय । आप जैसे लोगों ने ही तो ऐसे धातू और बेईमान नेताओं का दिमाग खराब कर रखा है। प्रोड़ (कोप रोककर) बेटा, जवानी के जोश में जलजलूल बक देना असा मात है समझदारी का व्यवहार करना और बात है। पुक्क तो क्या गलत बातों का विरोध करना नासमझी है ? अपने कर्वम को पहचानना मूर्खता है ? अष्टाचार का विरोप करना उलगडून बकना है? (अपना कुर्ता उतारकर एक बूंटी पर डंगते हुए तुम पहले अपना गुस्सा शात कर लो फिर बात करूँगा । गुस्से में तुम मेरी हरकत का विरोय करते रहोगे उसपर विचार करने की कोशिश न. करोरे। (चारपाई पर लेट जाता है) युक्क : (सयत स्वर में) विपार क्या करूँ ? आप इस मत्री के हर मुला काम का समर्थन मुझसे करवाना चाहते है और में ऐसा कर नई सकता । पइ खुद सीमेंट व्यापारी है, फिर भी करता है कि सीटक में मिलता है। अपने रिश्तारों की आड़ में बुध मशान का ठेकेयर है और कम सीट कम सोहा सगाकर सात रागन में बेका है। अटपट से मशगेका सय .

न्याय/101 प्रौद युक्क प्रौद किसान प्रोद किसान नक्शा बनवाया है कि मकान बनाने की लागत कम से कम आये, फिर भी अनाप-शनाप रेट बढाकर जनता को लूट रहा है। प्रशासन के सारे ढाँचे को ऐसे लोगों ने ही प्रष्ट बनाकर रख दिया है । और आप? आप फिर भी मुझसे उसका समर्थन करवाना चाहते हैं। किसान जल्दी-जल्दी अन्दर आता है] तुम चाहे जितना आदर्शवाद बघारो, समाज को तो जिघर जाना है उधर ही जायेगा (खडा होकर) में प्रधानमत्री के पास शिकायत लिखकर अवश्य भेजूंगा । देखता है, वहीं से क्या जवाब आता है, क्या कार्यवाही होती है। विठता हुआ) होगा क्या ? शिकायत ऊपर से नीचे आयेगी और रफादफा हो जायेगी। साथ में तुम्हारी नौकरी भी चली जायेगी। (किसान से) कहो प्यारेलाल ! बात की मत्री जी से अपने लड़के की नौकरी के बारे में? हो हजूर । लेकिन काम बनवा नहीं दीखै है। क्यों? ये मंत्री जी बड़े नीच आदमी हैं। [प्रौढ़ और युवक एक-दूसरे के मुँह की ओर देखते हैं] क्या हो गया? कर रहे थे --प्यारेलान । तू सत्यदेव के पिता की जमीन पन्द्रह बीस साल से जोत रहा है। मैं पटवारी और तहसीलदार के कागजों में वह सारी जमीन तेरे नाम करदाये देता हूँ। (भौचक) क्या? हाँ, हजूर, सच ! यह सुनकर मोक्का रह गया, तो वो कहने लो - हाँ, सच कह रहा हूँ। अगर वह मुकदमेबाजी करेगा तो मैं तेरी सझयवा करूंग और तेरे लड़के को भी फिर से नौकरी दिलदा दूंगा। बड़ा नीच आदमी है। युवक की ओर देखता है। वह मुस्कराता है) प्रोद किसान प्रौद किसान प्रौद 102 / सूत्रपार किसान किसान युक्क प्रोद लेकिन मैंने वो कानों को हाय लगाकर फौरन कह दिया कि यह धान मुझसे नहीं होगा । बीस साल से ठाकुर सा'ब का नमक पा रहा है, मैं नमकहरामी नहीं कर सकता। (खड़ा होकर) फिर क्या हुआ ? जो होना था ठाकुर सा'ब सौ हो गया । मेरे लड़के की नौकरी गये, वो जाये । आखिर मुझे भी तो परमात्मा के दरबार में जवन देना पड़ेगा। मुझसे यह नीचता नहीं हो सकती। (सुस्कराकर) अब मत्री जी तुम्हें परमात्मा के दागर में भी नहीं पहुँचने देंगे, स्वर्ग के दरवाजे के सन्तरियों की मुट्ठी गर्म कर देंगे। (किमान बात को समझ न पाने की मुद्रा में देखता है । प्रौढ विन्तिव होकर टहलता है। परमात्मा भी तो इन लोगों की बनामी हुई चारदीवारी में कैद रहता है। (रुककर युवक से) यह सब तुम्हारे कारण हो रहा है । न तुम ईमानदारी दिखाते, न यह सब होता । देखो, प्यारेलाल ! आप से तुम मेरे नौकर की तरह रहकर येत का काम करना चोद कर सकते हो। मैं तुमसे हर महीने तनखा की रसीद लिया कसँग पता नहीं साला यह भी कब मुझे कगाल बना दे। (पौवा सा) यह क्या कह रहे हैं ठाकुर सा'ब । धेत आपका, माएका । मैं भला आपसे गद्दारी करेगा? यह तो ठीक है, लेकिन सावयानी के लिए मैं पेश कर रहा हूँ। आदमी का दिमाग पलटते क्या देर लगती है। कल तक पह भी मैरी वितम भरा करता था आज मरी हो जड़ योद देना परवा है। खुद दो लोगों के गिरवी रखे हुए सैकड़ों बीमा क्षेत्र काये बय। और मेरा खेत औरों से मिनवा देना चाहता है। धौर कर्स का। लेकिन में दो चोर नहीं हूँ। में तुम्हें कहाँ बता रहा हूँ ? किन में इला की काय होरी से ही पास न फटकने देने में शिकस करता हूँ। पुक्क फिर तिखना प्रारम्भ कर देता है।) किसान में किसान न्याय/103 किसान प्रोड़ किसान प्रौढ किसान प्रौद युक्क आप मालिक हैं । जैसा चाहें, करें। (कुछ सण रुककर) एक घबर और आपको देनी थी क्या? सत्यदेव भैया को मत्री जी अपने आदमियों से पिटवाना चाहते हैं। [युक्क और प्रौद चकित दृष्टि से किसान को देखने लगते हैं] तुम्हें कैसे मालूम ? मैंने जब उनकी बात नहीं मानी दो गुस्से में मुझसे वहाँ से चले जाने को कहा और अपने पास बैठे कुछ आदमियों से बोले कि कन सत्यदेव नौकरी पर आये तो उसकी जरा अच्छी तरह सेवा कर देना। (युवक से) कल, तुम नौकरी पर मत जाना, भैया ! यह मत्री है कि गुडों का सरदार ! पिताजी ! मैं सोचता हूँ कि ऊपर शिकायती पत्र लिखने की बाय नौकरी से ही इस्तीफा दे दूं। मैं पहले ही सोच रहा था कि ऐसे घुटनभरे वातावरण में मेरा टिक पाना मुश्किल है और इसीलिए मैं (पड दिखाकर) यह इस्तीफा लिख रहा हूँ । भाड में जाए इजीनिपरी। मैं अगर अपने खेत को फार्म बनाकर काम करता, तो इस दलदल में फैसने की जरूरत ही न पड़ती । प्यारेलाल ! अब तुम मेरे साथ हमारे फार्म पर काम करोगे। ठीक है ना? (प्रसत्रतापूर्वक हाथ जोडकर माथे से लगाता हुआ) जो आप ठीक समझें। मैं वो हर हालत में आपकी ही सेवा करते रहना चाहता हूँ। और तुम्हारा बेटा भी? बहुत अच्छा हजूर । वह तो पहले से ही तैयार बैठा है। [प्रौढ़ चिन्ता की मुद्रा में बैठ जाता है। युक्क लिखने लगता है।] किसान किसान यन्त्रयुग सैनिक वैज्ञानिक नागरिक पत्र सैनिक कम्प्यूटर पालिव सैनिक पत्र मिव प्रकाशयुत धौकोर कमरा, जिसकी तीन दीवारें टी से बनी हैं । सामने की दीवार से तगी दो कुर्सियौं । एक पर एक शिथिलगात्र सैनिक य है जो वास्तव में सैनिक है। दूसरी कुर्ती पर सैनिक-वेश में एक वैमानिक है। सैनिकों के कपड़े फटे हुए और रक्तरंजित है। दूसरे कोने में दो मशीनगर्ने, कुछ हयगोते तथा कारतूसी पेरिया रखी है। सैनिक किस देश के हैं। यह उनके चेहरे से पता नहीं चलता। आगे आनेवाला सैनिक वास्तव में कम्प्यूटर- पातित यत्र-सैनिक होगा। इसके अतिरिक्त एक अन्य पात्र का भी प्रदेश होगा, दो नागरिक है।मव के एक ओर छोटा गोल दरवाया है, जिसमें से सब पात्र प्रवेश करेंगे । सैनिक वैज्ञानिक (यगल में लटके अलास्क के खोतकर पानी पीता है) आह, सारा शरीर दर्द के मारे टूय जा रहा है। तुमने किन शब्दों में धन्यवाद । भाई ! तुम कौन हो ? किस देश के हो? मुझे कहाँ से उठाकर लाए हो? (लंगड़ाकर कमरे में टहलने लगता है। भाई में गया मैच देश, भाड़ में गया मैं भाड़ में गयी यह जगह जहाँ से मैं तुम्हें बेहोशी की हाल में उठाकर लाया हूँ। रस यही समझ लो कि में बर्दर हूँ, मेरा देश पर है और वह स्थान परवा के क्षेत्रका मैचन है नौ से तुझे उठाकर लाया हूँ।

यन्त्रयुग/105 कुछ क्षण शान्ति । सैनिक पतास्क बन्द कर देता है। दैनिक : विश्वयुद्ध चल रहा है? वैज्ञानिक (खड़ा हो जाता है। विकृत हंसी सता है) विश्वयुद्ध चल रहा है? हैं । अब कहाँ चल रहा है? कौन चला रहा है? जव चलानेवाले नहीं रहे तो घलेगा क्या? (साश्चय) क्या ? युद्ध समाप्त हो गया ? (घेहरे पर प्रसन्नता की मलक) वैज्ञानिक (आकर कुर्सी पर बैठ जाता है) हौं, सब कुछ समाप्त हो गया। अब वो बस बचेखुचे सैनिक या तो तड़प रहे हैं या हमारी तरह अपनी जान बचाते फिर रहे हैं। सैनिक (शिथिल होकर) सद समाप्त हो गया | आदमी ने आदमी को खा डाला । आदमी ने आदमी को छेद दिया, कुवल दिया । ओफ्फ । इवनी भयकर लड़ाई मैंने अपने जीवन में कभी न देखी न सुनी । ऐसे ऐसे नये हथियारों का प्रयोग किया गया है, जिनकी कि कल्पना भी नहीं की गयी थी । हम सैनिक है, लेकिन हमें भी नहीं पता कि ये नये हथियार कौन से ये । सैनिकों की पौत की पाँत झुलसती गयी और उनके गोलाबारूद उनके ही शरीरों को फाड़ते गये । पीठ पर ये गोले, कन्पे पर लटकी कारतूसों की श्रृंखला स्वय फट पड़े। पलक झपकते एक नि शब्द यान आता और सभी सैनिक न जाने कैसे विषड़े चिथड़े होकर बिखर जाते ! आश्चर्य है ! न जाने में कैसे बच गया । वे पान किस देश के ये? वे क्या कर जाते थे? सभी सैनिक उनके आते ही कसे विथडे चिपड़े होकर बिखर जाते ये? (छत की ओर देखकर) मेरी समझ में कुछ नहीं आता। आश्चर्य करने की कोई आवश्यकता नहीं है । सभी देश गुपचुप सैनिक तैयारियों में लगे हुए थे । वैसे तो सभी चिल्ला चिल्लाकर विश्वशान्ति के पैगम्बर बन रहे थे लेकिन इन्हीं पैगमरों के परों में महाविष्वस की तैयारी चल रही थी । कम्प्यूटरचालित पानों का निर्माण हो रहा था जो प्रकाश की गति से चलते थे। कम्प्यूटर ही वैज्ञानिक 106/ सूत्रधार सैनिक . वैज्ञानिक सैनिक वैज्ञानिक उनका नियत्रण घालन और निर्देशन करते थे। प्रकाशमति से देव उड़नेवाले उन पानों से सेना पर लेजर किरणें की जाती थी पर्स किरणों के प्रभाव से सभी सैनि के हथियार उन्हें ही पाह असते थे, उनके अगरतक अस्त्र उनके ही अगलक न जावे थे। (मय से खा लेने का प्रपल करता है, लेकिन सड़बनाकर किरके जाता है) ऐ ! सच ! तुम्हें कैसे मालूम? घबराओ मत, बैठे रहो । तुम्हरे पर झुलस चुके हैं। (वीषकर) लेकिन तुम्हें कैसे मालूम कि वे यान कम्प्यूटरचालित थे। वे विमान प्रकाश की गति से तेज चलते थे और लेजर किरणे मेड़ने यह सब तुम्हें कैसे मालूम? इन बातों से तुम्हें क्या लेना देना ? आराम से बैठो । बाद में बताऊँगा । (बदहवास नागरिक प्रवेश करता है । वैज्ञानिक खा से जाता है) कौन है? (निसे अधेरे में कुछ सूझ नहीं रहा है, पिग्मी बैंप माती है। ई ई विहोश होकर गिर पड़ता है) अरे । बेहोश ले गया बेचारा, पदराइट का माय । (पलास्क खोलकर पानी छिड़कता है और नागरिक के चेहरे की प्रतिक्रिया देखता है।) (धीरे धीरे होश में आकर) में मैं आप कौन हैं? (नागरिक को सहाय देकर बैठाता है) डरो मत । हम तुम्हारे दोस्त नागरिक नागरिक वैज्ञानिक नागरिक वैज्ञानिक नागरिक नहीं नहीं । (चीख पड़ता है) वे लोग मुझे मारने आ रहे हैं। कोरी : (लडखडावा खड़ा हो जाता है) कुछ सैनिक है। वे लोग बचेखुचे नागरिकों को चुन-चुनकर मार रहे हैं। मैं उनसे पचता हुआगर रहा था । एक गड्ढे में छिपने के लिए घुसा तो मुझे यह कोठरी सी यन्त्रयुग/107 दिखाई पडी, सो मैं घुस आया । (सय जोडता है, फिर ऊपर उठा देता है) में निर्दोष है, मुझे मद मारना। वैज्ञानिक अरे भाई, कह तो दिया कि हम से मत हो। हमें अपना दोस्त समझो। सैनिक कौन दोस्त ? किसका दोस्त ? इस युद्ध से पहले सभी देश आने आपको एक दूसरे का दोस्त कहते-कहते नहीं थकते थे और ज्व युद्ध छिडा तो सबके मुखौटे उतर गरे। सबके सिद्धान्त मारूद की तरह उड गये । अब तक के इतिहास में इससे अधिक और भयकर युद्ध की नहीं हुआ। (कराहकर) ओह ! मेरे पैरों में और सारे शरीर में भयकर दर्द हो रहा है। नागरिक (फर्श पर बैठकर) चारों ओर दर्द ही दर्द है । माँव के-गांव, शहर के शहर वीरान पड़े हैं। खेत सूने हैं, पेड़ों के नाम पर केवल ढूँठ खडे हैं । वनस्पति और जीवन का नाम वो, ऐसा लगता है, पृथ्वी पर रहा ही नहीं । कुछ लूटमार करते सैनिक ही जीवित घूम रहे हैं। पता नही कैसे, मैं बच गया हूँ। वैज्ञानिक यह सब लेजर किरणों का ही प्रभाव है। जो उनकी चपेट में आ जाता है, जीवित नहीं बवता, ध्वस्त हो जाता है। निर्जीव पदार्थ पच जाते हैं, सजीव मर जाते हैं। लेकिन इस भयकर अस्त्र का निर्माण किस देश ने किया है? वे सैनिक कैसे बच गये हैं? किस देश के है? विज्ञानिक इपर-उपर देखने लगता है। नागरिक : (उदास आवाज में) मेरा तो सब कुछ लुट गया । बीवी बच्चे सप जल गये। बच किसका पया है ? सभी तो नष्ट क्षे गये हैं। वह तो ईश्वर की कृपा हो गयी, जो इन महोदय ने वैजनिक की ओर संकेत करता है) समय पर मेरी जान बचा ली, लेकिन मेरा पीना भी अब क्स जीना है। न देश स्था, न साथी, न घर । मेरा शरीर भी बेघर हो सैनिक सैनिक 108/सूत्रपार नागरिक सैनिक वैज्ञानिक नागरिक गया है । लगता है, दोनों पर झुलस गये है, इस कारण कटपाने पड़ेंगे। विज्ञानिक कमरे में टहलने सगता है] (उठने का प्रपल करता है, लेकिन उठ नहीं पाता । एवराई आज में) मेरे पैरों को क्या हो गया। मेरा शरीर शिथिल क्यों होता जा रहा है? हाय क्यों नहीं उठ पाते? धियों को उठाने का प्रयल करता है, किन्तु केवल कन्ये उपककर रह जाते हैं। सैनिक असमय-सा बैठा देखता रहता है और वैज्ञानिक पास आकर नागरिक की नन पामकर हूँ की पनि निकालता है। क्या हो गया इसे? विषैली गैसों का प्रभाव पड़ गया है। (नागरिक से) क्या बाहर बम भी गिरे थे? (परराई दृष्टि से देखता हुआ) हाँ, एक बम गिरा था और उससे सारे शहर की हवा में कड़वाइट भर गयी थी बस, यह उसी बम की विषैली गैस का ही प्रभाव है। अब तुम नहीं बच सकते। (चौककर) क्या? हों, यहाँ से हजारों किलोमीटर दूर से राकेट द्वारा यह बम मच गया है? तुम्हें कैसे मालूम? (चीखता है। मुझे किसी तरह बचा लो भैया 1 में मरना नहीं चाहता। मैं जीना चाहता हूँ। (शन्त स्वर में) इस धरती पर मरना कौन चाहता है? यहाँ तो मारा जाता है। राजनीति का विषभरा दात सद पर चोट करता है, किसी को समा नहीं करता। मुझे तुम्हारे दर्शन शास्त्र तुम्हारे राजनीति शास्त्र पर भाषण नहीं सुनना। - वैज्ञानिक नागरिक वैज्ञानिक सैनिक नागरिक वैज्ञानिक नारिक यन्त्रयुग/109 वैज्ञानिक सुनना कौन चाहता है, सुनाया जाता है । सैनिक तुम्हें अचानक यह क्या हो गया है मेरे भाई ? वह बैचारा मौत की घड़ियाँ गिन रहा है और तुम प्रवचन देने में लगे हो। वैज्ञानिक मौत की घड़ियों कौन नही गिन रहा? इसे अब मरना है तो मरना ही है। अब मैं क्या कर सकता हूँ? नागरिक (गिड़गिड़ाकर) अरे, किसी डॉक्टर को बुलाओ । मुझे अस्पताल पहुंचाओ। वैज्ञानिक : (मुस्कराता हुआ) डॉक्टर ? अस्पताल ? अभी तो तुम कह रहे थे कि गाँव के गाँव, शहर शहर वीरान पड़े हैं, तो डॉक्टर और अस्पताल क्या अब तक साँस ले रहे होंगे? नागरिक (लेटकर) हाय, अब मैं क्या करूँ ? (रोता है) हे भगवान् । सैनिक विज्ञानिक से) तुम बड़े निर्दयी हो यार ! [विवित्र शरीरवाले यत्र-सैनिक का प्रवेश । उसके कपों पर विचित्र हथियार लटके हैं। वह वैज्ञानिक के सामने सावधान की मुद्रा में बड़ा हो जाता है । सैनिक और नागरिक की ओर देखता हुआ वैज्ञानिक यत्र-सैनिक का अभिवादन तेता है। सैनिक आश्चर्यवकित होकर वैज्ञानिक और यत्र-सैनिक की ओर देखता है । नागरिक थोड़ी गर्दन उठाकर फटी आँधों से सबकी ओर नता रहा है] वैज्ञानिक कहिए । प्या समाचार है? पत्र-सैनिक श्रीमन् ! मुख्यालय से आदेश आया है कि नये हथियारों और गैसों का प्रभाव देखने के लिए यहाँ से कुछ नमूने भेजे जाएँ । उन नमूनों का वैमानिक परीक्षण होगा। (सनिक और नागरिक की ओर संकेत करके) ये दोनों प्रकार के नमूने है जिन्हें कम्प्यूटर मानव की सवा से मैंने पणे इकट्टा किया है। मेरा काम अब समाव हुआ। नागरिक : (धीखकर) क्या हम परीक्षण के एि नमूने हैं ?

110/सूत्रपार सैनिक बैज्ञानिक यश-सैनिक (कॉप जाता है) यह क्या कह रहे हो ? तुम पूर्त हो ! तुम कपटी शे 1 तुमने पार पार पूछने पर भी मेरे प्रश्रों का उत्तर प्रायद इसलिए नहीं दिया कि तुम स्वय हमलावर हो । मैं तुम सबको मार डा-गा। (कोने में रखे हथियारों की ओर हाप बसता हुआ गिर पड़ता है। वैवानिक हथियारों को उठा लेता है। यत्र सैनिक सैनिक की और राइफल तान लेता है लेकिन वैज्ञानिक वर्जना का संकेत करता है) तुप नीच हो। हमें विश्वास में लेकर मत करते रहे और अब तक चिकनी चुपड़ी बातों से लुभाते रहे। (हंसवा है) तो राजनीति और किस चीज का नाम है ? राजनीति में तो साम, दाम दण्ड, भेद चलता ही है। श्रीभन् । ठीक चौदह दने चन्द्रग्रह से पृथ्वी की ऑक्सीजन नष्ट करने के लिए बम छोड़े जायेंगे । अब पाँच मिनट शेष है। मुख्यालय से आदेश हुआ है कि पृथ्वी के सब वैज्ञानिक और हमारे बड़े सैनिक अधिकारी चन्द्र ग्रह की ओर रवाना कर दिये जायें। कम्प्यूटर और लेजर किरणों के आपके आविष्कारों ने अब मानव सैनिकों की आवश्यकता समाप्त कर दी है, इसलिए उनके समेत संग व्यकि पृथ्वी पर ही समाप्त कर दिये जायेंगे। (कलाई पड़ी देवकर) ठीक है। अब में पलता है, तुम इन दोनों को तेकर आओ । (सनिक से यह जो सैनिक तुम देख रहे हो, पड़ हमारे पैसा मनुथ नहीं है, कम्यूटर यत्र है। इस पर किसी किरण और मैस का प्रभाव नहीं पड़ता। ये कम्यूटर, ये लेजर किरणें और से मेरे विधर है । समझे ? तुम बार बार प्रश्न पर प्रस किये जा रहे थे, अब तो तुम्हें सदा उत्तर मिल गया ? तुम मेरे देश अनार मानना चाहते थे, सो अब बताना देकार है। मिनट बाद में चन्द्र प्रत्यासी हो जाऊँगा। अपने अविश्व के धोन धपाधने के लिए यहाँ ठहराएमा था और अब तुम ऐन के अपने गप ले सकर अपने अधिकारों का तुम्हारे पीयें पर पहेम या परीक्षा करना। वैज्ञानिक . ?

यन्त्रयुग/111 क्या तुम हम पर परीक्षण करोगे? मार डालोगे? 1 नागरिक यह सुनते ही बेहोश शेजाता है ] सैनिक : तुम बहुत दूर हो । क्या तुममें मनुष्यदा छ कण मात्र भी नहीं है ? क्या तुम यत्र के पास बनकर सारी सृष्टि का विनाश करने में जरा भी नहीं झिझकते ? विजी के साथ तुदककर वैज्ञानिक के दोनों पर अपने हाथों में लपेट लेवा है) मैं तुम्हें यहाँ से नहीं जाने दूंगा। (पत्र सैनिक प्यारा सैनिक की ओर निशाना लगाया जाता देखकर) नहीं । इसने मत मारो । क्या मुख्यालय ने इसको मारने का आदेश दिया है। पर-सैनिक नहीं। मानिक : इसको जीवित ही ले जाना है, इसलिए मारना नस घाहिए । मित्र-सैनिक प्रथयार नीचे कर लेता है। वैज्ञानिक सैनिक को हटाने के लिए पर घटकता है, लेकिन यह नहीं छोड़ता। नहीं, मैं तुम्हें नहीं जाने दूगा। बर-सैनिक मुख्यालय से आदेश आया है कि आप जल्दी से इस कमरे को खाली कर दीजिए और राफेटयान में बैठ जाइए । हमें मादेश हुआ है कि इन दोनों व्यकियों को राकेटमान में पहुंचा दिया जाय । राकेटयान के पालक कम्प्यूटर ने यान के पत्र पाडू कर दिये हैं। (झुककर सैनिक ये अलग हटाने का प्रयत्न करता हुआ) छोडो, वैज्ञानिक भेडो मुझे। (और अधिक फसवा हुआ) नहीं घेईन । यदि मरना ही है वो तुम्हें मारकर क्यों न पर्स जिसने बिना सोचे समने अपनी बुद्धि पत्रों के अयों में रुपये है। सारे विश्व के ग्राम हरकर अब अपने प्राण पाना धाश्वे हो ? मैं ऐसा न होने दूंगा। पर निरु : मुख्यालय से आदेश आया है कि रकेटशन मेक समय पर पृथ्वी से पत पड़ेगा और उसके रवाना होने पन्द्रह से वे राफेट पर 112/सूत्रपार शानिक सैनिक - सैनिक वैज्ञानिक सैनिक पड़ेंगे, जिनमें पृथ्वी की ऑक्सीजन समाप्त करनेवाले बम रखेप हैं, आप जल्दी कीजिए। (पदराकर पैर खींचना चाहता है, पर गिर पड़ता है। यों से सैनिक के हाथ हटाना चाहता है। असफल होने पर सैनिक की पीठ और सिर पर मुझे जमाता हुआ) छोड़, नीष 1 मूर्ख नहीं छोडूंगा। मुख्यालय का आदेश नहीं है, वर्ना इसे गोली मार देता। (विवशता के शान्त स्वर में) छोड़ दो भाई ! मैं तुम्हें यवन देवा है, चन्द्रग्रह पर मैं तुम्हारा बाल भी मौका न होने दूंगा। (व्यग्यपूर्वक) आ हा हा ! अब बड़ा माईवारा सून रहा है। अच्छी तरह जानता हूँ कि तुम कितने बड़े झूठे और अभिनेता में। मैं तुम्हारे नाटक को अच्छी तरह समझ रहा हूँ। मनुष्य के पर अपने प्राणों पर बीतती है, तब उसे या धर्म की बाते सुभती । तुम चाहे मुझे मरवा ही क्यों न डालो, मैं तुम्हें नहीं छोड़नेवाल। श्रीमन, आपके बिना ही राकेटयान चल पड़ा है और पन्द्रह से से बमयुक्त राकेट चल पड़े हैं। (पदराकर खड़ा हो जाता है और पानी में महाये कुत्ते की तरह सो शरीर को शुरचय देता है, फिर भी पैरों के न धूटने पर) सो, अर तुम तो मरोगे ही और मुझे भी मरवाओगे । ओ, अपये कम से कम छोड़ दो। [भाहर पाका झेता है । यहाके के साथ में वैज्ञानिक सिर पर सैनिक तथा वैज्ञानिक कार कर रहा है, फिर शान्त हो जाते हैं। यह-निक अभिवादन की मुद्रा में सता है] पत्र सैनिक वैज्ञानिक लाइलाज बीमार श्याम प्रसाद गुशीला सत्येन्द्र सुया करोडीमल डाकिया श्याम प्रसाद की पत्नी श्याम प्रसाद का लड़का श्याम प्रसाद की लडकी श्याम प्रसाद का मित्र [एक कमरा । कमरे के बीच में धार-पाँच कुर्सियों और एक मेज रखे हैं। बाय दीवार के कोने में एक स्टूत पर पमा पल रहा है, निसकी हवा बाी दीवार के सहारे सोफे पर बैठे श्याम प्रसाद को तग रही है जो समाचार-पत्र पढ़ने में तल्लीन हैं। उनकी अवस्था संगभग पचास वर्ष, वेशभूषा सादी है । सामने दीवार पर घड़ी नगी है, जिसमें आठ दज रहे हैं।] श्याम सुशीला श्याम सुशीला श्याम सुशीला (अचानक अपनी नाड़ी पर हाथ रखते हुए धीरे धीरे दृष्टि उठा कर) मरे, सत्येन्द्र की माँ ! (अन्दर से) अभी आई । (कमरे में आकर) कहो अब क्या मुसीबत आ गयी? तुम इतना रूखा क्यों बोलती हो ? मुसीबत नहीं, बुधार आ गया है। किसे? मुझे, और क्या तुम्हें । तुम्हें तो कौरा बहम है । चौबीसों घण्टे कुछ न कुछ कहते ही रहते हो। कभी तो चैन से बैठने दिया करो। बस, तुम्हें तो हर वक्त वहम हो दीखता रहता है। तब कहोगी, जब मैं श्याम 112/सूत्रधार वैज्ञानिक सैनिक यत्र-सैनिक वैज्ञानिक सैनिक पड़ेंगे, जिनमें पृथ्वी की ऑक्सीजन समाप्त करनेवाले सर है, आप जल्दी कीजिए। (पदराकर पैर धींचना चाहता है, पर गिर पड़ता है। यों है सैनिक के हाप हटाना चाहता है। असफल होने पर सैनिक की पीठ और सिर पर मुके जमाता हुआ) छोड़, नीच ! पूर्व ।। नहीं छोड़ेगा। मुख्यालय का आदेश नहीं है वर्ना इसे गोली मार देता। (विवशता के शान्त स्वर में) छोड दो भाई ! मैं तुम्हें वचन देता है, चन्द्रग्रह पर मैं तुम्हारा बाल भी बांका न होने दूंगा। (पग्यपूर्वक) आ हा हा ! अथ मड़ा भाईचारा सून रहा है हमें अच्छी तरह जानता हूँ कि तुम कितने बड़े झूठे और अभिनेता थे। मैं तुम्हारे नाटक को अच्छी तरह समझ रहा हूँ । मनुष्य के पर अपने प्राणों पर बीतती है तब उसे दमा पर्म की बातें सूझती है। तुम चाहे मुझे मरवा ही क्यों न डालो, मैं तुम्हें नहीं छोड़नेवाला। श्रीयन्, आपके बिना ही राकेटयान चल पड़ा है और चन्द्रा से थी समयुक्त राकेट चल पड़े हैं। (যয় হ্রহী তারাই জীয় ভাব সাইফুর হত যা शरीर को झुरमुरा देता है फिर भी पैरों के न छूटने पर) लो, और तुम तो मरोगे ही और मुझे भी मरवाओगे । अरे, अब के कम से कम छोड़ दो। शहर पडाका होता है। मड़ाके के साप वैज्ञानिक गिर पता है । सैनिक तय वैज्ञानिक धीकार करते हुए कुछ देर तापते है। फिर शान्त हो जाते हैं। यत्र-सैनिक अभिवादन की मुद्रा में रहता है] पर-रौनिक वैज्ञानिक लाइलाज बीमार श्यामप्रसाद गुशीना सत्येन्द्र सुपा करोडीमल डाकिया श्याम प्रसाद की पत्नी श्याम प्रसाद का लड़का श्याम प्रसाद की लडकी श्याम प्रसाद का मित्र [एक कमरा । कमरे बीच में चार-पाँव कुर्सियों और एक मेज रखे हैं। बायीं दीवार के कोने में एक स्टूत पर पखा चल रहा है, निसकी हवा बायी दीवार के सहारे सोफे पर बैठे श्याम प्रसाद को तग रही है जो समाचार-पत्र पढ़ने में तल्लीन हैं। उनकी अवस्था लगभग पचास वर्ष, वेशभूषा सादी है । सामने दीवार पर घड़ी तगी है, जिसमें आठ बज रहे हैं] श्याम सुशीला श्याम सुशीला (अचानक अपनी नाड़ी पर हाथ रखते हुए धीरे धीरे दृष्टि उटा कर) अरे, सत्येन्द्र की भौं । (अन्दर से) अभी आई । (कमरे में आकर) कहो, अब क्या मुसीबत आ गयी? तुम इतना रूखा क्यों भोलती हो ? मुसीबत नहीं बुखार आ गया है। किसे? मुझे, और क्या तुम्हें । तुम्ई वो कोरा वहम है । चौबीसों घण्टे कुछ न कुछ कहते ही रहते में।कभी तो चैन से बैठने दिया करो। स, तुम्हें वो हर वक्त वहम ही दीखता रहता है । तब कोगी, जब मैं सुशीला 114/सूत्रपार श्याम बस, हर समय सुशीला (उनके मुँह पर हाथ रखती हुई) धुप भी रहो। कैसी दुरी बात मुंह से निकालते रहते हो ! लाओ दिखाओ हाथ । (नाडी देखकर) कहाँ है बुखार? हाथ तो ठडा पड़ा है। तुम क्या जानो, आजकल कई तरह के बुखार चल गए है अदर बुखार रहता है और बाहर शरीर ठडा मालूम पड़ता है। सुशीला (मुस्कराकर) ये बुखार किस कम्पनी ने चलाये हैं ? श्याम (अखबार एक कुर्सी पर फेंकते हुए तुम्हें चुहलबाजी ही सूझती रहती है। मेरी कुछ भी चिन्ता नहीं है। सुशीला तो मैं क्या करूँ? क्या चाहते हो? करोगी क्या, चार गोलियाँ कुनैन की और साथ में रखी हुई पुडियों ले आओ। दुश्मन को सिर उठाने से पहले कुचल देना अदा होता है। सुशीला (आश्चर्य से) हाय राम ! एक साथ चार गोलियों ! बुखार न तो हो जाय। मैं जो कुछ कह रहा हूँ, वह करें। सुशीता तुम जानो, तुम्हारा काम जाने ।(अन्दर चली जाती है) कुछ समझो न बूझो बेकार यंग अड़ाने बैठ जाती हो । तुम्हारी राय मानता था, वो ये दिन जीना मुश्किल हो जाय । [सुभीला पानी-परा गिलास और दवा लेकर आती है। सुशीता . लो निगलो। [स्याम प्रसाद पानी के साथ गोलियों और पुड़ियों की दस निपत जाते है] सत्येन्द्र (गहर से प्रवेश कर) पिताजी ! सुबह जब आप सो रहे थे, तब आपसे मिलने करोड़ीमल जी आए थे। पसर किसी मतलब से आया होगा। बिना अपने स्वार्य के माजकत कौन किसी के पहावा जाता है। छौं, सभी आप की तरह है ना। : (मुभीता की और और चोरते हुए) तुम चुप रहो जी ! सरीता ऑखें तोरकर अदर चली जाती है। श्याम अशीसा लाइलाज बीमार/115 सत्येन्द्र श्याम सत्येन्द्र श्याम पिताजी, मैं जरा बाजार हो आऊँ? क्यों? क्या काम है? मुझे एक किताव लानी है। में खूब समझता हूँ तुम्हारी बानेाजी । बाजाल लोडों के साथ फिरने जा रहे हो ना? (कोप दबाकर) पिताजी, मैं क्या कोई दो साल का बच्चा हूँ जो अपना बुरा भला नहीं समझ सकता । आप इतना वहम क्यों करते (कोप में भरकर) फिर वही बात । मरे, मैंने यूप में बाल सझेद नहीं किए हैं। मैंने तुम से ज्यादा दुनिया देखी है । (सत्येन्द्र बाहर निकल जाना चाहता है अरे, सुन दो सही। सत्येन्द्र (रुककर) नी । करोड़ी क्या कह रक्ष था? कह रहे थे कि उन्होंने मैनेजर और प्रिंसीपल से बात कर ली है और में कल से कॉलेज में लैक्चररशिप संभाल लें। (प्रसनवापूर्वक) सप ! तो तूने उन्हें रोका क्यों नहीं ? मुझे उठा लेता। सत्येन्द्र । वे कहने लगे कि उन्हें जल्दी है। अरे, सत्येन्द्र की माँ ! तत्वेन्द्र : मैं गाजार जा रह हूँ। कुछ किताबे खरीदनी हैं । (निकल जाता है।) सुशीला (प्रवेश कर) क्या है जी? कभी ये 'टैम्परेचर डाउन कर लिया करो । लो, मैं तुम्हें एक खुशखबरी सुनाऊँ क्या? देख लो, हमारा ऐसा रोष है। कोई ऐसा आदमी जो मेरा गैव न माने? अपनी के नामो कि कुछ को भी । सत्येकीलेबमें नौकरी लग गई है। करोड़ीमल ने मचाई होगी।

116/ सूत्रधार श्याम श्याम (पकर) अरे ss, वह क्या लगवायेगा । मुझसे कोई काम निकालना चाहता होगा, नहीं तो भला कौन मुफ्त में किसी का श्रम करने लगा। तभी तो सबेरे ही सबेरे मुझसे मिलने आया होगा । सुशीला अपके साथ वो भलाई करना भी बुरा है । मैं ही हूँ जो अट्ठाइस साल से भुगत रही हूँ। और कोई होती तो अब तक कुल कुट कर मर गई होती। श्याम (कुर्ते के बटन खोलते हुए) कुदनेवाले तो मरते ही हैं [बाहर से डाकिया एक लिफाफा अन्दर फेंक जाता है । श्याम प्रसाद उसे खोलकर पढ़ने लगते हैं] सुशीला कहाँ से आई है? (पदकर) कोई नहीं जायेगा। सुशीला कहाँ? श्याम जगदीश की लड़की की शादी है, उसका यह निमन्त्रण पत्र है। [लिफाफा मेज पर फेंक देते हैं] सुशीला आप भी अजीब बात करते हैं। अपने भाई की लड़की की शादी में नहीं जाओगे तो दुनिया क्या कहेगी? भाड़ में जाये यह दुनिया । मेरे पास इतना पैसा नहीं है कि बेकार लुटाता फिसें । यहाँ अपना ही पूरा नहीं पड़ता। मुशीला (सोफे पर बैठती हुई) अच्छा | शायद आप यह सोच रहे हैं कि में आपसे शादी के लिए रुपये मांगेंगे। और क्या ! मुशीला देखिए, एक बात कहूँ। वहम की दवा विषाता के पास भी नहीं है। मला इतना मालदार आदमी अपनी इकलौती लड़की की शादी में लिए आपसे रुपया मगेगा। ओ, तुम क्या जानो । आजकल अमीर ही ज्यादा गरीब बन । और गरीब, अमीर। सुशीला (उठती हुई) आपके साप कौन मगज अपए। : (कुर्ता उतारकर एक कुर्सी पर टग देते हैं। एक कुर्सी पये के सामने रखकर बैठते हुए) गुरसा फिर हो लेना पहले मेरा हात देखो। एन श्याम श्याम लाइलाज बीमार/117 सुशीला गर्मी लग रही है । (पखा तेज कर रूमाल से पसीना पोछते है) बड़ी घुस्की लग रही है। पेट में पता नहीं कैसी आग जैसी लग रही है। मैंने कहा था ना कि दिना बुखार के चार कुनैन की गोलियों नुकसान करेंगी, पर आप किसी की सुनें, तब ना ! सित्येन्द्र हार में पुस्तक लिए हुए अन्दर आता है। श्याम प्रसाद देवन होकर कमरे में टहलते हैं। क्यों, क्या हुआ? सत्येन्द्र सुशीता सत्येन्द्र सुनीता सत्येन्द्र श्याम सुशीला भने मना किया था, लेकिन मेरी क्यों सुनने सगे। कुछ बात भी बताओगी? इन्होंने इकट्ठी चार गोलियो कुनैन की और न जाने किस चीग की से पुड़ियाँ निगल ली हैं। (मुस्कराहट दबाकर) डॉक्टर को बुला लाऊँ । (सोफे पर लेटवे हुए) रहने दो, अभी ठीक हुआ जाता हूँ। ये डॉक्टरी दवाइयाँ सिवाय जहर के और कुछ नहीं होती । जरा पये को मेरी तरफ तेज कर दे। [सत्येन्द्र वैसा ही करता है] बड़ा शान सून रहा है, लेकिन चमड़ी जाये, पर दमडी न जाये । जा सत्येन्द्र, डॉक्टर को लिवा ला । [सत्येन्द्र पुस्तक मेज पर रखकर बाहर निकल जाता है। (उठकर बैठते हुए) जरा और तेज करो इसे । (सुशील पपा तेज करती है) और करो (रूमाल से शरीर पोछते हैं) इस पखे में इससे ज्यादा चलने की ताकत नहीं है। आप भी बेकार की मुसीबत बैठे ठाले पाल लेते हैं। पानी लाऊँ? शरत बनाऊँ? [श्याम प्रसाद बेचैनी से कमरे का एक पकर सगाकर फिर पखे के सामने बैठ जाते हैं] पर में दूप है? नहीं। (कुछ देर सोचकर) घर में कुछ भी नहीं होता समय पर । जाओ, बाजार से किलो दो किलो दूध ले आओ अच्छा रहने दो । बेकार श्याम सुशीला श्याम सुभीता श्याम 118/ सूत्रधार (उनकी ओर पूमकर) आपके मुंह से कभी शुभ वचन भी निकलते पैसे क्यों डाले जायें न जाने किस किस और ऊपर से बाडाने का पानी मिलाकर बेचते हैं। (लेटवे हुए अभी तक सुध नहीं आई? [सुशीला माये पर लय रखकर वहीं कुर्सी पर बैठ जाती है। तुम उछलती हुई बाहर से अन्दर प्रवेश करती है] सुथा (प्रसन्नता से) अहा, पिताजी-- (लेकिन श्यामप्रसाद को येवर देखकर चुपचाप खड़ी हो जाती है) श्याम (सुधा को देखकर तेज आवाज में) तू कहाँ गई थी ? सुधा (सहमकर) अपनी सहेलियों के पास । मुझे तेरा यह आवारापन बिलकुल पसन्द नहीं है। मैंने तुझे कभी था में बैठे नही देखा । क्यों गई थी उनके पास? सुया (बुने स्वर में आज हमारा रिजल्ट' निकला है, उसे देखने गई यो। ले आई न थर्ड क्लास 1 सुशीला श्याम श्याम सुशीला विपा उदास बैठ जाती है। आपके लिए तो कोई खाना पीना छोडकर बगुले की तरह समाधि लगाकर बैठ जाये तो पटाई है, नहीं तो खेलकूद । जब से इसने पन्ना शुरू किया है, तब से आप पिल्लावे आ रहे है कि यह कुछ नहीं पटती । इस बार हो जाएगी। लेकिन यह मेट 'फस्ट' आई है। एक आप है कि कभी शाबासी प्रशद मुँह से नई निकाला । दह खुशी खुशी अपना रिजल्ट' बने आई ये सो उसे फटकारने। तो मैं कुछ मुरी बात तो नहीं कह रहा। ऐसा न मा पिता है को अपनी सन्तान को सबसे अच्म नहीं देखना चाहवा? हमारी सन्तान में कौन सी दुराई है? ऐसे बेटा बेटी आप सोर कर ला तो दें, जो हरेक दात सबसे अच्छे होमियों से प्रेम पर्ने करना वो जैसे सोध्य ही नहीं जाने किस पूनोदसिय ने आपको मनोविज्ञान में एम०प० डिग्री दे दी है। (उठकर पुष्य के सिर पर हाप फेरती है) तुम तो भई जरा सी बात पर तिला वाडग्य देती है। श्याम सुशीला स्पाम लाइलाज बीमार/119 सुशीला सत्येन्द्र (सुधा को अपने पास सोफे पर बैठाकर) तिल का वाड तुम बनाते हो कि मैं बनाती हूँ ? एक दिन की बात हो तो भुगतूं । यहाँ तो भरने तक यही बक अक करते रहना है । (सुधा से) हाँ बेटी । मुझे बता, कौन सी डिवीजन आई है ? (सुपा के उत्तर न देने पर सात्वना भरे स्वर में उसके सिर पर हाथ फेरती हुई) अब मत दुःखी हो । इनकी वो शुरू से ही ऐसी आदत रही है। तू ही देख, विना दुधार के चार कुनैन और दो पुड़ियाँ पाकर अब पधे की हवा से अपनी गर्मी शान्त कर रहे हैं । कुछ कह दो इन्हें तो और गर्मी धढती है। हो, बता तो सही, क्या रिजल्ट रहा ? (अखबार वषा मिठाई का डिब्बा हाथ में लिए हॉफता हुमा प्रवेश कर) ममी ! सुपा की यूनीवर्सिटी में 'फर्स्ट पोजीशन' आयी है। मैं डॉक्टर के पास से लौटकर आ रहा था तो मुझे प्यान आया कि आज बी०ए० प्ररिजल्ट' निकलेगा। मैंने फौरन अखबार खरीदा और देखा कि सुया का नाम सबसे ऊपर लिखा है। मैं खुशी के मारे दौडता आया हूँ । (सुथा से) सुपा रानी । (उसे उदास देखकर) रो क्यों रही हो? शायद किसी ने गलत खबर दे दी है कि तुम फेल हो गई हो? क्यों यही बात है ना? यह बात नहीं है। बेचारी खुशी-खुशी अपना रिजल्ट सुनाने आई तो उन्होंने झट से कह दिया (नकल करती हुई) ले आई न बर्ड क्लास? (सत्येन्द्र पिता की ओर एक दृष्टि डालता है) लोई पूछे या न पूछे, अपनी भविष्यवाणी झट से कर डालते हैं, जैसे कि कोई बड़े भारी ज्योतिषी हो। अच्छा बाबा, गलती हुई। खुश ! हम तो घुथ ही खुश हैं। अगर तुम्हारा वहम चैन लेने दे, तब ना । खामखाँ सुपा को नाराज कर दिया। (सुफ का चेहरा ऊपर उठाने की चेष्य करता हुआ) अच्छा, जाने थे। हो, सुपा ! जरा भुस्कराओ यो । हाँ, हँसी आई, आई हँसी, ए sss, इस गई। (सुधा मुस्कराकर सत्येन्द्र का हाथ हटा देती है) बड़े लोगों की बात का बुरा नहीं मानना चाहिए। सत्येन्द्र 1 डॉक्टर ने क्या कहा? मैंने उन्हें सारी बात बताई तो वे हंस पड़े और बोले चिन्ता की कोई बात नहीं है। बस हटकर दूध और पानी पिलाए जाओ।' मों, सुशीला श्याम सुशीला सत्येन्द्र सुशीला सत्येन्द्र 120/ सूत्रधार आज मैं ही सुधा के बदले सबने पिठाई पिलाऊँगा । पितानी दूध और पानी पीएंगे और हम सब मिठाई उडाएँगे । (मिठाई का डिब्बा खोलता हुआ) लो सुपा, जल्दी-से मिठाई खा लो, नहीं तो अभी तुम्हारी सहेलियाँ आकर सारा पर सिर पर उठा लैंगी। [सुधा मिठाई उठाकर बाती है और एक-एक टुकड़ा माँ तथा सत्येन्द्र को बिलाती है। डॉक्टर बकवास करता है। किस उल्लू के पास गया था? राम चाचा के पास। (मुस्कराकर) तुम्हारे खास भाई के पास । [सत्येन्द्र और सुपा बाहर चले जाते हैं। तुम्हें जरा भी तमीज नहीं आयी । बच्चों के सामने ऐसी बात करती श्याम सत्येन्द्र सुशीला श्याम सुशीला श्याम सुशीला श्याम सुशीला श्याम सुशीला श्याम यह तमीज तुममें है? छोडो भी । सारा जीवन ऐसी ही दकयक में बीजेगा लगता है। मुझे भी लगता है। तुम्हारे पास कोई काम नहीं है? तुम्को पास ही कोई काम नहीं है। खाली दिमाग शैतान का पर! हो, मैं शैतान हूँ। तुम दलो यहाँ से । तुम्हारे पास आना ही कोन चाहता है ? तुम्ही हो, जो एकात पाकर सबको दुलाने के लिए कुछ न कुछ करतब कर लेते हो। (हाथ जोड़कर याथै से लगाते हुए अच्छा बाबा, माफ को 1 मे हार्ट फेल हो जायेगा वो भी नहीं बुलाऊँगा। फिर वही (प्रवेश कर) पिताजी, करोड़ीमल ने क्या काम बताया है? सिशीला और सत्येन्द्र एक-दूसरे का मुंह देखने लगते हैं। फिर पड़ी में उनकी पूछन । गया तो उन्होंने मुझे बताया कि उशेने मेरे लिए सुशीला सत्येन्द्र सुशीता बत्येन्द्र लाइलाज बीमार/121 श्याम सत्येन्द्र श्याम सुशीला श्याम सुशीला सत्येन्द्र मालूम है, मुझे मालूम है । मुझे बताकर गया है कि उसने तेरे लिए नौकरी की बात कर ली है। (कुछ क्षण रुककर) आपमें सुनने का पैर्य क्यों नहीं है ? बता, क्या नयी बात उसने कही है ? तुम दो मिाट चुप रहना सीख लो तो घर में बडी शान्ति हो जाय । नहीं, मैं हमेशा के लिए खामोश हो जाऊँ तो हमेशा के लिए शान्ति हो जाय। तुम्हारे मुँह से कभी कोई शुभ बात नहीं निकलती। आप लोग लडते रहिए, मैं जा रहा हूँ। कहाँ ? कितनी बार जायेगा । सारे दिन बाहर धूमता रहता है। और क्या करूँ ? घर में शान्ति हो तो रहूँ। यही तो मैं कहती हूँ। तुमने ही सारा माहौल बिगाड रखा है। मैं अशान्ति का कारण छ, तो में ही घर से चला जाता हूँ। (खड़े हो जाते हैं।) हौं, जाओ थोड़ी देर बाद कुछ और करामात करके लौट आओगे । हाँ सत्येन्द्र, क्या कहा लालाजी ने ? (जेब से लिफाफा निकालकर) उन्होंने मेरे लिए यह अपॉइण्टमेंट लैटर मैंगवा दिया है। कल से मैं लैक्चरर हो जाऊँगा। हो, यो घुमफिरकर लैक्चररशिप जाओ, तुम बाहर घूम आओ । ताजी हवा मिलेगी तो दिमाग स्वस्थ सत्येन्द्र सुशीला सुशीला सत्येन्द्र श्याम मुशीता रहेगा। सुशीला वो तुम समझती हो कि मेरा दिमाग में कुछ नहीं समझती । चलो सत्येन्द्र, हमी घूम आते हैं। [दोनों बाहर निकत जाते हैं] शोध-विधाता ভাঁ০ আয়ুল মামা फणीन्द्र अनूप उमा उमा के पिताजी किमी विश्वविद्यालय में शोध निर्देशक शोध छात्र शोध पत्र प्राध्यापिका पद की प्रत्याशी किालीन तया सोफों से सुसज्जित कमरा । सामने खिड़की, दायी-बारी और दरवाजे । तीनों पर नीले रंग के पर्दे सटके हैं। एक कोने में लैम्प शेड रखा है। सामने की दीवार पर प्रकाशित ट्यूर लगी हुई है । एक-दो साहित्यकारों के वित्र भी कलात्मकता के सापटी हुए हैं। कमरे के रीच में रही मेत्र पर टेपरिकार्डर से एक सौकगीत की तय निकतकर गूंज रही है । कुर्ता, पोती, चश्मापारी फणीन्द्र लोक-गीत की पक्तियाँ लिखता जा रहा है । दायें द्वार से मोती-कुर्ता पहने डॉ. मधुसूदन शर्मा का प्रवेश डॉ शर्मा फणीन्द्र म. शर्मा फणीन्द्र में० शर्मा कहो, फणीन्द्र ! कितना नोट कर लिया? टिप रिकार्डर बन्द कर पड़ा होता हुआ) जी अभी तो अरे, बैठने बैठौं । अपना काम किये जाओ और पाते भी किय जाओ। किवना लिख लिया ? (बीच के सोफे पर बैठ जाते है) विठकर) जी अभी आपा और रह गया है। कौन सी पक्कि घल रही है ? जरा सुनवाओ तो। [फणीन्द्र परिकार का बटन दबाता है, जिससे सोकगीत की ये पकिया कितती है शोध-विधाता /123 बँक शर्मा फणीन्द्र डॉ० शर्मा फणीन्द्र हम्मे हम्बै कि लैंगुरिया रे ! तेरी पनि खाइ लई कारे नाग नामक कछु खाई, कधु डसि लाई । अरु का भारी फुसुकारि ! लगुरिया रे। तेरी पनि खाइ लई कारे नाग नै। (अन्तिम पंक्ति समाप्त होने से पहले) बस, बस । (फणीन्द्र टेपरिकार्डर का बटन दबाकर बन्द कर देता है। इन पंक्तियों का अर्थ तो समझ में आ ही गया होगा? जी, कुछ थोड़ी सी अरे, इसका अर्थ समझने में क्या कठिनाई है ? साफ है - अरे लैंगुरिया, तेरा धन काले नाग ने खा लिया । यह लोकगीत है। अनपढ़ लोगों के गीत हैं, इसलिए इसकी भाषा व्याकरण की दृष्टि से अशुद्ध है। नोट करो। यह नोट करने लायक बात है। थीसिस के भाषा शैली वाले अध्याय में यह बात अवश्य लिखना । (कुछ सकोच के साथ) लेकिन डॉ० साहब ! मैं तो इस पंक्ति का अर्थ कुछ और समझता हूँ। क्या? यही कि अरे लगुरिया ! तेरी स्त्री करले नाग ने काट ली । आगेवाली पंक्तियों से भी इसी अर्थ की पुष्टि होती है। (लापरवाही से) हाँ ss, यह अर्थ भी चल सकता है। वैसे भैरा अर्थ गलत नहीं है। यह तो आलोषक पर्म है कि वह ऐसा अर्थ खोन निकाले, जिससे आलोच्य पंक्तियों का लेखक भी चमत्कृत और मुग्प हो जाए । मैंने यही सोचकर अर्थ किया पा भई, सचाई तो यह है कि सारा काम तो शोध छात्र को ही करना होता है, निर्देशक तो केवल निर्देशन के लिए होता है। निर्देशक के पास बीसियों शोय छात्रों की भीड़ होती है। उसे बीसियों विषयों पर शोप कार्य करवाना होता है । उन सब विषयों को उसे जानकारी हो ही, यह आवश्यक नहीं है। सो तो है ही। (मुस्कराइट दबाकर) डॉ० साहब ! मुझे डो० विनोद प्रकाश मिचल मिले थे। वह कह रहे थे कि आप उनसे एक मिनट के लिए मिल आयें। मेव शर्मा फणीन्द्र शर्मा अच्छा, पैर।

124/सूरपार ० शर्मा अनूप डॉ. शर्मा अनूस? अनूप क्यों ? क्या बुरा और भी कहा था? लियों में फस तथा गत में पाते और पुस्तकें लिए हुए अनूप का प्रवेश सामान एक ओर रख देता है। ( शर्मा के घरण धुकर) प्रमाण, गुरुजी। (परदान की मुभा में हाथ उठाकर) पिरीय रहो । इय अपे बेटा, कल रात को ही आ गया था, गुरुनी । ट्रेन सेट हो गयी, इसलिए रात को साढ़े ग्यारह बजे पहुंच पाया । आप सो सो चुके होंगे, यह सोचकर मैं सीया छात्रावास घना गया था। ओ अरे, तुम तो बड़े मूर्य हो। म रात के एक बजे तक अध्ययन करता है यह तुम्हें मालूस नहीं है ? मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था। रात को पाना पनवाकर रखा था और आज दिन में भी बनवाया, लेकिन तुम्हारे न आने पर सारा का सारा भोजन पर्व हो गया। अब भी खाना खाकर आये होगे? हो, जी पाकर आया हूँ। (बड़े होते हुए) अच्छा । दो। मैं अभी डॉ विनोद प्रश से मिलकर आया। न जाने क्यों बुलाया है। [बाहर निकल जाते हैं। अनूप सामनेवाले सोफे पर रेठ जाता म.शर्मा अनूप डॉ० शर्मा अनूप फणीन्द्र (फणीन्द्र की पीठ पर धपत जमावा हुआ) क्या हो रहा है। (मुस्कराकर) गुरुवर की बुद्धि परीक्षा ले रहा था। अभी टैपरिकार्डर पर एक लोकगीत तुम्हारे गुरुजी को सुनाया तो वह मुझे उसकी उल्टा सीपा अर्थ बताने लगे। मैंने ठीक अर्थ बताया तो कहने लगे कि (नकल करता हुआ) हा, यह अर्थ भी चल सकता है। (हंसता हुआ) भाई गुरु तो तुम्हारे भी हैं केवल भैरे तो नहीं। नहीं भई, नहीं । गुरु तो वह केवल तुम्हारे है। जब आते हो तो फल लाते हो और बड़े भक्तिभाव से धरणस्पर्श करते हो। और यह कोने में रखा टेदिल लैम्प यह दीवार पर लगी ट्यूब यह कालीन किसने दिये हैं? अनूप फणीन्द्र अनूप शोष विपाता / 125 फणीन्द्र (पता हुआ) है भई, क्या करें। न दें तो पी एच० डी० कैसे मिले? अनूप । यस, मैं और किसलिए ले दे रहा हूँ ? रही भक्तिभाव की मात, सो तो तुम जानते ही हो कि असलियत क्या है । जैसी जाकी कौमरी, से शाके गीत । गुरु अपने ज्ञान का, अपने प्रेम का प्रदर्शन करते हैं तो हम भक्तिभाव का । मुझे पता था कि डॉ मधुसूदन शर्मा उस मिट्टी के बने हुए नहीं हैं जिसमें प्रेम, दया अथवा ज्ञान के कीडे रहे हो । मेरे लिए रात के एक बजे तक जागना, मेरे लिए खाना बनवाना- सब बकवास । दो साल हो गये हमें इनके घर आते जाते कभी एक चाय का प्याला भी पिलाया है ? फणीन्द्र यार, तुम तो मुझपर ऐसे बरस रहे हो जैसे मैं ही तुम्हारा निर्देशक অনুৎ कल्पीच फणीन्द्र अनूप (हिंसकर सोफे पर अपलेटा सा हो जाता है) नहीं, मैं तो एक बात कह रहा हूँ | इन्ही डों शर्मा से एक शोध छात्र उलझ गया था | वह अपने विषय को इनसे अधिक जानता था, इसलिए इनकी बात जब तब काट देता था। उसका फल उसे क्या मिला? जानते हो? वह अभी पांच साल बीत जाने पर भी पी एव०डी० नझै कर पाया है। उसे लटका रखा है। अशा, तुम हीरालाल हण्डू की यात कह रहे हो। हो, वही । वह भी एक नम्बर का स्वाभिमानी लड़का है। अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ विश्वविद्यालय के आवासक्षेत्र में ही जमा हुआ है और उसने अपने लिए अस्थायी और अपनी पत्नी के लिए स्थायी नौकरी भी खोज ली है । देखें, उसका सपर्ष कर फलदायी होता है। यार, उसका शोध प्रबन्ध तो अच्छा है। मैंने स्वय पढकर देखा है। लेकिन तुम्हारे पढने से उसको पी एच०डी० की उपापि तो नहीं मिल जाएगी। यहाँ तो सारे कुएं में ही भांग श्या, अफीम ही पड़ी हुई है। यहाँ के हैड, रीडर, लैक्चरर सभी बेताज के बादशाह हो रहे फणीन्द्र अनूप 126/ सूत्रधार हैं। आपस में तो मिलकर रह ही नहीं सकते । एक दूसरे की डंग खीचने के अवसर ताकते रहते हैं और इन मैसों की लड़ाई में रिस जाते हैं हम बेचारे शोध छात्र । ये लोग एक दूसरे के शोय छात्रों भी पी एच०डी० न होने देने का प्रयत्न करते रहते हैं। इनकी राजनीति हमें व्यर्थ ही पीसती रहती है। फणीन्द्र (जैसे कुछ याद आ गया हो ) हाँ, तुम इलाहाबाद गये थे अपने परीक्षक से मिलने, क्या रहा? [डॉ० मधुसूदन शर्मा का प्रवेश] डॉ० शर्मा (आकर एक सोफे पर बैठते हुए) हाँ, क्या रहा ? डॉ दीपचन्द वर्मा से मिले थे? अनूप (उदासी के साय) जी, गया तो पा, लेकिन काम नहीं मना । डॉ० शर्मा (चीककर) क्यों ? (जेब से सिगरेट का पैकेट निकालकर एक सिगरेट होठों में ददाते हैं। अनूप जेब से लाइटर निकालकर जलाता है और आगे बढ़ाता है। डॉ शर्मा उससे सिगरेट जलाकर धुएँ का एक गोला ऊपर हवा में उगल देते है। अनूप लाइटर बुझाकर हाथ में घुमाता रहता है।) क्या तुम भी सिगरेट पीते हो ? अनूप जी नहीं, मैं यह आपके लिए इलाहाबाद से लाया हूँ। डॉ० शर्मा (एक हाथ आगे बढ़ाकर) दिखाना । अनूप (लाइटर देवा हुआ) लीजिए. आप रख लीजिए । मैं आपको देने की वाला था। मे० शर्मा : (लाइटर जेब में डालकर) हो, फिर क्या हुआ ? तुम्हारी बात ये अपूरी ही रह गयी। अनूप : गुरुनी, पब में इलाहाबाद मेंडों दीपवन्द से मिला तो वह अपने शोध छात्रों से घिरे बैठे थे। में० शर्मा । मैं, एक सौ बोन लोगों को पी एच०डी० करा रहा है, मगमा लगा मेहबोगा। फिर क्या हुआ। अनूप भने एक नौकर के भयो आपका पत्र उन तक पहुंचाया ले उन्होंने उस नौकर केमरा कस दिया कि शाम श्रेआना शाम को मया शोय विधाता /127 फणीन्द्र शर्मा तो सुबह आने को कहला दिया । दूसरे दिन सवेरे गया वो दरवाजे पर खड़े खडे ही बातचीत की। वह कहने लगे कि तुम्हारे गुरुवर मेरे मित्र डॉ कमलसिंह शर्मा को सुपरसीड कर यूनीवर्सिटी के हिन्दी विभागाध्यक्ष बनना चाहते हैं। पॅर्मा (साश्वय) उसे कैसे पता चल गया? कमलसिंह शर्मा ने उन्हें पत्र में लिख दिया होगा, या वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय के गुजरावी के बोर्ड आफ स्टडीज के सदस्य के रूप में अभी कुछ दिन पहले गये थे, तब कह आये होंगे? (फणीन्द्र की ओर देखते हुए) हो, यह हो सकता है । बड़ा बदमाश आदमी है। अनूप इतना ही नहीं, वह दिदोरा भी पीट आये हैं कि वर्तमान हिन्दी विभागाध्यक्ष पाण्डे जी उन्हें पुत्रवत् मानते हैं और उन्हीं को अपने वाद हिन्दी विभागाध्यक्ष बनाना चाहते हैं, लेकिन आप अनेक षड्यन रचकर उन्हें बदनाम करते रहते हैं ताकि वह विभागाध्यक्ष न बन पायें। कौन उस मूर्ख को विभागाध्यक्ष बनाना चाहता है, वैसे ही फूक लेता फिर रहा है। तुम लोग तो अच्छी तरह जानते हो कि पाडे जी उसकी शक्त तक देखना पसन्द नहीं करते, लेकिन वह छाया की तरह जबर्दस्ती उनके पीछे लगा रहता है। अपने घर की खिड़की से मॉकवा रहता है कि कब पाडे जी की कार गैरेल से निकले और वह लपककर उसमें बैठे। पांडे जी के बेवारे उसके बाद ही अपनी कार में बैठ पाते हैं। उनके कार में घुसने के लिए झुकते ही यह बत्तीसी धमकाकर 'आइए, आइए कहता है, ताकि पाडेजी उससे कुछ कहें नहीं । पांडेजी ठहरे भोले बाबा । उसकी घाटुकारिता का आशय समान नहीं पाते । समन भी पाते होंगे तो सम्जनतावश धुप रहते हैं। उसकी वजह से ही तो पांडेजी आग पदनाम हो रहे हैं कि वह कालसिंह को भती से विपकार किरते हैं। का । 0 साहब 1 पांडेजी का ड्राइवर मासिंह के ऐसे-ऐसे चरित्र है कि सुनकर हैरानी होती है कि आदमी इतना अधिक में० शर्मा उचाइमा नीच भी हो सकता है।

128 / सूत्रपार पी एच०डी० करना चाहते हैं। उनके पास इतना समय नहीं है कि लिख दो। (फणीन्द्र से) अनुप के पास आजकल कोई कम नहीं। मिलती ववक तुम लोग उनकाशेयप्रबन्यही लिख डालोमा फणीन्द्र एकाप बात बताओ तो डॉ० शर्मा जाने भी दो । उसके दुश्चरित्र की गाथाएँ लिखने के लिए यदि ब्रह्मा भी उतर आयें तो नहीं लिख सकते । इससे अधिक और क्या दुश्चरित हो सकता है कि अपने बीदी बच्चों को आगरा भेड रखा है और यहाँ छह कमरों के मकान में अकेला रहता है, जी उनके शिष्य शिष्याएं आकर अहर्निश सेवा करते हैं। (फपीन्द्र सिर झुका लेता है) हाँ, तो, अनूप । तुम्हारा जाना व्यर्ष ही रहा अनूप जी हो, लेकिन वह कह रहे थे कि यदि आप कमलसिंह शर्मा का विषेप करना छोड़ दें तो वह मेरे अनुकूल रिपोर्ट तुरन्त भेज दें। डॉ० शर्मा कौन कह रहा था। अनूप वही डॉ दीपचन्द। डॉ० शर्मा अच्छा । (कुछ गण सोचकर) यदि वह मुझसे और तुमसे सैकमेड करना चाहता है तो यही सही । तुम्हारी रिपोर्ट आने तक में पुर रहता हूँ, बाद में कमलसिंह की खाल खींचूंगा । भई, तुम लोग मेरे पुत्र के समान हो, इसलिए तुम्हारा हित दो मुझे सौचना ही हो। भले ही मुझे कितनी ही हानि उठानी पडे । (कुछ क्षण चुप्पी के बाद हाँ, तुम लोगों को पता ही है कि में अभी डॉ मित्तल से रिसका आया हूँ? फणीन्द्र जी हाँ। डॉ. शर्मा यह सस्कृत में पी एच०डी० है और अब हिन्दी में भी मोय पोया स्वय लिख सके, इसलिए चाहते हैं कि तुम दोनों निका और तुम्क्षरा कार अब समाप्तप्राय है। जब तक नको मी रहोगे और कुछ आमदनी भी हो जाएगी 145 पर्व करने की देवर है। मैंने उनसे पांच जारी की है। पन्द्र पन्द्रह सौ गुन अनूप और शेष-विपाव/129 डॉ० शर्मा दोनों के लिए और दो हजार अपने लिए तय कर आया हूँ। ठीक है ना ?(अनूप और फणीन्द्र एक-दूसरे की ओर देखकर सिर झुका लेते हैं। इसमें सोष या सोचने की कोई दत नीं है। बहुत से लोग ऐसा व्यापार कर रहे हैं। तुम समझ से कि मानकत कोई तुम्हारी तरह परिश्रम करके ही पी-एच०डी० ले जाता है? ना यदि ऐसा समझते है तो तुम प्रम में है। मूल्जीसी० की कृपा से अब तो दस पन्द्रह हजार तक रेट पहुंच गये हैं। वह मेरे मित्र है, इसलिए उनके लिए यह रियायत कर ये है। लेकिन डों साहब अरे भई, इसमें शर्म की अश्या जनुनय की कोई आवश्यकता ही नहीं है। मैं तुझे उन पीसिसों के नाम बता दूंगा, भी अभी छपी नहीं है और न कमी छप सकती है, क्योंकि परीयों ने उनके प्रकाशन की अनुमति नहीं दी है। उनके एक एक अध्याय निकालकर जोड दोगे वो भी शोषप्रवन्य तैयार हो जायेगा । (दर्य द्वार से उमा का प्रवेश । उसे देखकर फणीन्द्र और अनूप एक-दूसरे की मोर देखते है और सिर झुका लेते हैं।ळे शर्मा की ना खिल जाती है। आइरो उमाजी, बैठिये । (अपने पास बैठने का संकेत करते है। उमा सकुचाती हुई सोके के एक और पर बैठनाती है सुनाइये, सब कुशल से वो है। (उमा क्रमश फमीन्द्र, अनूप और डॉ शर्मा की ओर देखकर सिर झुका लेती है।डॉ शर्मा जैसे सब कुछ समझ गये हो) अच्म फणेन्द्र और अनूप ! तुम लेप अब जाओ। कल सवेरे आना । (फणीन्द्र टैपरिकार्डर समेकर उठा लेता है और अनूप के साथ प्रणाम' कहकर निकल जाता है।डों शर्मा उमा की ओर थोड़ा खिसक माते है। अब सुनाओ। जबरन मुस्कराती हुई) जी, ठीक है। कल इटरव्यू है। आपका आशीर्वाद लेने आई हूँ। आप यदि पाण्डे जी से मेरे विषय में कुछ कहो मेरी नियुक्ति निश्चित है। (उमा की ओर खिसकते हैं। बड़ी ले जाती है) अरे बैठो। खड़ी क्ये सेगीं । तुम को अपनी बेटी के समान से, मुझसे कैसा मा शर्व 130/ सूत्रधार उभा ० शर्मा उमा डॉ० शर्मा सकोच ? मैं आजकल जरा ऊँचा सुनने लगा हूँ, इसलिए तुम्हारे पास खिसक रहा था । (उमा लाचार सी बैठ जाती है) हाँ, मैं तुम्हारी सहायता नहीं करूंगा तो कौन करेगा, किसकी करूँगा? तुम तो अपनी हो । पूरी सहायता करूँगा । विशेषज्ञ कौन कौन आ रहे हैं? (दृष्टि झुकाए हुए डॉ शिरीष और आचार्य विपिन बिहारी लाल। अरे, ये दोनों तो अपने लंगोटिया यार हैं। ये वो अपनी मुट्ठी में हैं। (आशान्वित होकर डॉ शर्मा की ओर देखती है) बस मैं इसीलिए आपके पास बड़ी आशा लेकर आयी हूँ। दो साल से मेरी प्रथम श्रेणी और पी एच०डी० कोई नौकरी नहीं दिलवा सके हैं, अब शायद काम बन जाए। बनेगा क्यों नहीं। (विजली चली जाती है लेकिन खिड़की में से सड़क का प्रकाश आता रहता है। बिजली चली गयी । कोई बात नहीं । अभी आ जायेगी । इटरव्यू के बारे में चिन्ता मत करो। [कुछ सण स्तमता] (पदराई आवाज मैं) यह क्या करते हैं, डों साय ! अरे, बैठी रहो। पदरती क्यों हो? (कुछ तीखे स्वर में) डॉ साय ! [खिड़की के पीछे से फणीन्द्र और अनूप की आयाएँ उभरती है। बैठे भी। मैं क्या तुम्हें खा जाऊँगा? नौकरी ऐसे ही मिल जाती है क्या ? (आवाज में कम्पन ) दैठ जाओ। थोड़ी देर में बिजली आ जायेगा (चीखती हुई) छोड़िए, मुग्ने छोड़िए । पिताजी ! जल्दी आइए । [विनती आ जाती है। खड़ी हुई उमा कपड़े ठीक करती है] (सकपकाकर खड़े हो जाते हैं) क्या तुम्हारे पिताजी भी आये हैं। तुमने पहले क्यों नहीं बताया ? छिड़ी हाथ में लिये उमा के पिताजी का प्रवेश] क्या बत है? क्या हुआ? उमा ० शर्मा उमा मैं० शर्मा उमा i० शर्मा स्तिाव

शोय विपाता | 131
उमा
म० शर्मा
पिताजी
[कभी डॉ शर्मा और कमी उमा की ओर देखते हैं। फणीन्द्र
और अनूप खिड़की से एक और हो जाते है]
(आँखों में आंसू आ जाते हैं। डॉ शर्मा की ओर संकेत करती
ये
(पिताजी के कन्ये पर
माथा टिकाकर फफक उठती है)
(मुस्कराहट, घबराहट और सकपकाहट के सम्मिलित भाव से)
आइए, आइए । उमाजी ने मुझे बताया ही नहीं था कि आप
आप बैठिए ना।
(उमा को एक ओर हटाकर आगे बढ़ते हुए) कुत्ते, नीच
कमीने (साय की धड़ी काँपने लगती है) तू इसी बलबूते,
इसी घरित्र पर यूनीवर्सिटी में रीडर बना हुआ है?
(वेहरे पर पसीना झलक माता है) अरे, आप तो व्यर्थ ही
पाली गलौज करने लगे। आपको कुछ गलतफहमी हुई है।
(गड़ककर) मुझे गलतफहमी हुई है? कमीने, हरामी 1 आ, तुझे
बताऊँ कि गलतफहमी किसे हुई है।
[फणीन्द्र और अनूप मुस्कराते हुए फिर खिड़की से झाँकने सगते
है और ज्मा के पिताजी मारने के लिए छड़ी उठा लेते हैं।
धीरे-धीरे मच पर अपकार बढ़ने के साथ-साम घट-घट की
आवार और शर्मा की पराई आवाजें उमरती है .-'अरे,
सुनिए तो सही', 'ओ हो, हरिये तो सही', 'यह आप क्या कर
मर्या
पिताजी
-
.
.

साक्षात्कार
साक्षात्कार मंडल के सदस्य
अध्यक्षा
इजीनियर
कालू
कृपाशकर
दीनानाप
परमिन्दर कौर
चपरासी
सेनेटरी इन्स्पैक्टर पद के लिए प्रत्यारी
"
मिव के बीच में दो कुर्तियों पर अपना और जीनियर बैठे हुए
है। उनके सामने एक मेज रखी है, जिसपर कुछ कागज पत्र रखे
हुए हैं। मेज के सामने प्रत्याशियों के बैठने के लिए एक कुर्ती
रखी है । कालू आवश्यकतानुसार दरवा ये आता-जाता रहा
है और आवश्यकतानोने पर बाहर घड़ा सा है)
अथवा . इजीनियर साहब स्पा समय हो गया?
पजीनियर (पड़ी देवकर) साढ़े दस हो गये।
अप्पा । कोई पाव नहीं । इटरव्यू का समय हमने दस पोरया कप
पष्ट ही दो सेट एए है। अब तक गो फैण्डिडेट्स आई म॥
बनीनियर परा पता दो सगइये कितने हैंडिडेट्रा आ गये?
अपवा . सीजिए. अभी पवा सायी हूँ। (पष्टी यावी 8) अतू
कार । (वेश कर) जो मठम ।
जरा देशरवो आमो सिने सोग इटरन्यू देने आम है?
क्यतू । भी, मी देशका सबपिन वा है)
नपर राय ! आप कम है?
जनियर का?
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साक्षात्कार/133 इजीनियर अध्यावा इजीनियर अध्यक्षा इजीनियर अध्यक्षा . मजीनियर अध्यक्षा अधिकतर इटर और बी०ए० हैं। इतना ही नहीं, एक एम०ए० ने भी एप्लाई किया है। अच्छा। हो। और पप्लिकेंट्स कितने थे? यही कोई एक हजार ! (ऑर्षे घाडकर) एक हजार ! आपने बुलाया कितनों को है ? यही बीस एक को । (थोड़ा रुककर) इजीनियर साहब, हद हो गई। देरोजगारी इस कदर घट रही है कि क्या कहा जाय । इसी पोस्ट की बाव लीजिए। मैं कभी सोच भी नहीं सकती थी कि इस पोस्ट के लिए लडकियों भी एप्लाई करेंगी । किन्तु लड़कियों ने भी एप्लाई किया है। अच्छा, आई सी। जी हाँ, और हमने दो तीन को बुलाया भी है। (अन्दर आकर) सा'ब ! हो, तो कितने लोग आ गये है ? तीन हैं । (एक कागज देकर) मैं नाम लिख लाया हूँ। यह लीजिए । (साश्चर्य कागज लेकर नाम पढती हैं ) बस । ठीक है, तो इजीनियर साहब, बुनाया जाय न अब इन लोगों को ? हाँ, हो, जल्दी काम निबट जाय, वही अच्छा है। अच्छा, कालू ! जाओ, (कागज पर देखकर) कृपाशकर को भेजो। प्रेसिडेण्ट जी, आप कैंडिडेट्स से योग्यताओं के विषय में प्रश्न करें और में अनुभव तथा हाबीज के विषय में पूडूंगा। ठीक है। (प्रवेशकर) नमस्ते, सर ! आइए, कृपाशकर जी, तशरीफ रखिए। जी पन्यवाद । (कुर्सी पर बैठ जाता है) तो आप एम०ए०है? अध्यता कातू इंजीनियर अध्यक्षा इजीनियर अध्यक्षा कृपाशकर कृपाशकर अध्यक्षा कृपाशकर जी हो। एम०ए० में आपने कौन सा डिवीजन प्राप्त किया था?

134/ सूत्रधार कृपाशकर अ अध्यक्षा कृपाशकर अध्यक्षा कृपाशकर इजीनियर कृपाशकर इंजीनियर थर्ड डिवीजन, मैडम । जरा ऐसा हुआ, मैडम, कि परीक्षा के दिनों में मुझे जरा जुकाम हो गया था। हाँग-कौंग फ्लू की शुरूआत समझिये परीक्षा भवन में दनादन क परक आ रही थीं। जो याद था न, सब भूल गया, वर्ना अपनी तैयारी तो फर्स्ट क्लास थी। अच्छा अच्छा, कोई बात नहीं, हमें आपसे पूरी सहानुभूति है। तो, आप को यह वो पता ही होगा कि यह सेनेटरी इन्स्पेक्टर की पोस्ट है? जी हाँ मुझे पता है। तो आपको यह भी पता होगा कि इसमें काम क्या होता है ? जी हाँ, मुझे यह भी पता है। गली मोहल्लों में सफाई कर्मचारियों के काम को देखना मालना गदगी रोकना, प्रदूषण पर नजा रखना आप एम०ए० होने के बावजूद यह काम करना पसन्द करेंगे? लाचारी है सर। किन्तु इस पोस्ट के लिए धुनाव तो हम योग्यता एवं अनुभव आधार पर करेंगे, लाचारियों तो सबके पास हैं। (थोड़ा सकार) इस काम के अनुकूल कोई अनुभव आपको है ? इस पोस्ट का अनुभव वो खैर, साहय, तभी होगा, जब आप यह नौकरी मुझे दे देंगे, मगर यदि आप ठीक इसी तरह के काम को अनुभव मानें तो मैं कह सकता हूँ कि ऐसा काम मैंने काफी दिनों तक किया है। क्या ? आपका मतलब यह है कि आपने सेनेटरी इन्स्पेक्टर छ काम पहले भी किया है? जी, मैंने अर्ज किया है कि सेनेटरी इन्स्पेक्टर का काम तो नहीं किया, पर कुछ ऐसा ही काम किया है। दरअसल में सोशल वकी रह पुका हूँ। और आप जानते ही है कि इसमें सफाई का काम भी करना होता है। समाज सेवा केस में अनेक मुहल्लो की समाई कर घुआ हूँ। के कृपाशकर अध्यता कृपाशकर साक्षात्कार/135 अध्यवा कृरासकर इजीनियर कृपाशकर अप्यता कृपाशकर अभ्यता कृपाशकर आई सी। (कुछ उत्साहित होकर) जी हाँ, मैंने अनेक समाजसेवी सस्थाओं की ओर से अनेक बार श्रमदान में भाग लिया है। लेकिन इस पोस्ट पर तो श्रम करना नहीं, करवाना होता है। आपको कुछ आर्गनाइजेशन का भी अनुभव है ? (उत्साह से) जी हाँ, कालेज के दिनों में मैंने कई बार स्ट्राइक्स आर्गनाइज की थीं। लडके मेरी मुट्ठी में इस तरह रहते थे कि कालेज के प्रिंसिपल और लैक्चरर्स मुझसे घबराते थे। आपको अगर कोई जुलूस निकलवाना हो, स्ट्राइक करवानी या तुडवानी हो, या ऐसा ही कोई काम करवाना हो तो मैं अपनी पूरी योग्यता प्रमाणित कर सकता हूँ। (सुस्कराकर) इजीनियर साहब ! यह तो बडे प्रतिभावान व्यक्ति हैं। अच्छा कृपाशकर जी, पन्यवाद । अब आप जा सकते हैं। जी, तो फिर मैं आशा लेकर जाऊँ ना? हम डाक से अपना निर्णय भेज देंगे? अच्छा जी लेकिन आप मेरे पस में ही निर्णय लीजिए। मैं बड़े काम का आदमी हूँ। अच्छा, नमस्कार । (उठकर चला जाता है) यह तो दडा भयकर लड़का है। पहले कह रहा था कि जुकाम और हाँग काँग फ्लू की वजह से सब कुछ भूल गया, इसलिए फर्स्ट क्लास लेते लेते रह गया। शायद इन्हीं खुराफातों की वजह से थर्ड क्लास आयी होगी। लीडरी के शौक ने साहबजादे को कहीं का नहीं रखा है। (हँसकर) बिलकुल ठीक कहा आपने । आदमी को लगाकर हमें करियों में हाँग काँग फ्लू नहीं फैलाना है। ( दोनों की सम्मिलित কন্তু (प्रवेश कर) जी साब! दीनानाथ को बुलाओ। (कालू निकल जाता है) यह शायद बी०ए० पास लडका है। (कागज पर देखकर) जी हाँ। इजीनियर अध्यक्षा हैंसी) कालू अध्यक्षा इजीनियर अध्यवा 136/ सूत्रपार दीनानाव अप्यदा दीनानाप अध्यावा दीनाना दीनानाथ अय्या दीनानाथ जी (अन्दर मात्र हुआ) नमस्के मैडम, नमस्ते सर ! आइये, बैठिए। अच्छ मैडम, मम सर ! (ठ जावा है) तो आपने बी०ए० किया है? जी मैडम, जी हाँसर । बी०ए० में कौन अन से विषय ये आपके ? भी हिन्दी सस्कृत और अंग्रेजी । आपने सस्कृव पटी है 'जय अपने नाम के अलग अलग हिन्ले करके बताइये कि उसका अर्थ क्या है? (ऊपर मुंह उठाकर सोता हुआ) जी म अ दी ना पहले पबाद में दी नाना पप्पह । पती ही अर्थ रैमा । ना, ना थप्पड़ क्यों दी ? नाना का अर्थ है --नाना साप । मेय स्याल है मेरे नाम का अर्थ शै सकता है--ाना पाली दी। दी-ना ना वरावर पाती थी, यानी दीनानाने पाती। [अभ्यता एव इनीनियर की सम्मिलित हंसी) वाह वाह आपकी बुद्धि तो कमी केल है। श्री सर, जी मैडम, यह आपकी दया है वर्ग में सिर झुका नेता है) यह सर-मैडम क्या बला है। दब से देख रहा हूँ, आप सर के साथ मैडम और मैडम के साप सर जरूर कहते है। आखिर वा क्या पाव माने पाली या दीनानाव (पकर इजीनियर दीनानाथ भी सर, (संकेत कर) सर वो आपके लिए और मैडम, मैडम के दीपाव ओ, आईसी। (हंस्या हुआ) देखा मुझे वो आप दोनों शखयाल रखना है ना? मोहा काजरा अपनी सदी के बारे में और क्वाइये।

साक्षात्कार /137 दीनानाथ इजीनियर दीनानाथ इजीनियर दीनानाथ अध्यक्षा दीनानाथ इजीनियर हाबीज, यह क्या होता है सा'ब? रुवियों, आपकी रुचियों क्या है? आपका मतलब पसन्द से है ? जी हाँ। जी, मुझे हिन्दी की फिल्में बहुत पसन्द हैं। कभी कभी अग्रेजी की फिल्म देखने भी चला जाता हूँ। हमारा शहर छोटा है ना जी, सो यहाँ एतबार की एतबार अग्रेजी की फिल्में आती हैं, इसलिए हफ्ते में एक ही अंग्रेजी फिल्म देख पाता हूँ। हिन्दी की फिल्में हफ्ते में तीन बार देखता हूँ। इतनी फिल्में देखने के लिए पैसा कहाँ से मिल जाता है? मेरे पिताजी दुकानदार हैं मैडम ! दिन में एक दफे तो मुझे दुकान पर जाना ही पड़ता है। मैडम । वहाँ पर जब कोई नहीं रहता तब म अच्छा, अच्छा ठीक है । जरा यह वो बवाइए कि आपने सेनेटरी इन्स्पेक्टर की पोस्ट के लिए एप्लाई किया है। जब आपकी इतनी चलती हुई दुकान है तो आपने यह नौकरी क्यों पसन्द की ? जी दात यह है कि जब तब पिताजी मुझे मारते हैं और कहते हैं कि अपनी कमाई करके फिल्में देखा कर, इसलिए मजबूरी में ही मुझे यह नौकरी करनी पड़ेगी, वर्ना मैं तो ऐक्टर बनने लायक हूँ। मैंने रामलीला में कई बार अगद का पार्ट किया है । अगर मेरे हाथ बहुत सारा पैसा लग जाता तो मैं बम्बई जाकर जरूर ऐक्टर बन जाता। अब तो पैसे के बल पर भी एक्टर बन जावें हैं। अच्छा, आप जाइए । यदि आपका चुनाव हो गया हो तो डाक से आपको खबर कर दी जाएगी। अच्छा जी, मुझ गरीब पर दया जरूर कीजिए । अगर बम्बई जाने लायक पैसा इस नौकरी से बटोर पाया तो आपको भी बम्दई ले चलूंगा। (हाथ जोड़कर चला जाता है) (हंसकर) बड़ा मूर्ख आदमी है। दीनानाथ अध्यक्षा दीनानाथ इजीनियर 138/सूत्रपार कातू अभ्यता इजीनियर अध्यक्षा परमिन्दर अध्यक्षा परमिन्दर अभ्यता परमिन्दर अध्यत्रा (हंसकर पटी मगाती कालू ! (प्रवेश कर) जी साव। परमिन्दर जे बुलाओ । (कालू घला जाता है) अगर सभी कैंडिडेट इसी तरह के हुए तो सलेक्शन बड़ा मुस्कित हो जाएगा ! एम०ए० और बी०ए० तो परख लिये, अब यह कैंडिडेट क्या है? इटर है। (प्रवेशकर) नमस्ते जी। [कृपाशकर और दीनानाय नीचे के सवादों के बीच-बीच में भीतर झांकते रहते हैं। आप कौन हैं? परमिन्दर कौर, जी। लेकिन आपको तो हमने लड़का समझकर बुलाया था। क्यों जी | लड़कों ने क्या इस नौकरी का टेका ले रखा है ? नहीं, बात ऐसी है कि इस नौकरी में हमें लड़का ही लेना है, यह काम ही ऐसा है। परे करो जो लड़कों को । आज के जमाने में भला ऐसा कौन सा काम है, जिसे लड़कियों नहीं कर सकी ? हमारी पराइम मिनिस्टर को ही देख लो।दूर क्यों जाएं आप भी तो कमेटी की परेसीडेंट है और बढ़िया काम कर रही हैं। वह तो ठीक है, लेकिन सेनेटरी इन्स्पेक्टर का काम तो पुरुषों के ही बलबूते का है। राख डालो जी पुरुषों पर । क्यों परेसीडेण्ट जी । ऐसा कौन सा काम है जिसको हम औरतें नहीं कर सकी ? क्या हम लोग हजारों साल से सफाई का काम नहीं करती आ रहीं? जमीन से लेकर जैवों तक साफ करने में हम माहिर है। (मुस्कराकर) यह तो ठीक है लेकिन (उत्तेजित होकर) लेकिन वेकिन क्या कहती हैं जी । आप पुरुषों से डरती क्यों है? आज जमाना कहीं से कहीं पहुँच धुका है। परमिन्दर इजीनियर परमिन्दर अध्यक्षा परमिन्दर साक्षात्कार/139 परमिन्दर आप साशासार देने आई है कि बहस करने ? परमिन्दर यह क्या होता है। अध्यक्षा , इटरव्यू। परमिन्दर (सपत होकर) में बोलो ना । अगरेजी क्यों बोल रही है ? इटरव्यू देने जी। अध्याता : वो फिर जो पूण जाय, केवल उसी का उत्तर दीजिए। अच्म जी। अप्पता : इंजीनियर साहय | आप पूछिए । बजीनियर आपकी हाबीज क्या है? परमिन्दर : सीना पिरोना, कटाई भुनाई और नावल पढ़ना । इजीनियर प्रेमवद का कोई उपन्यास आपने पढ़ा है? परमिन्दर परेम धन्द ! यह कौन जी? गुरुदत्त का कोई उपन्यास पटा है? परमिन्दर : गुरुदत्त का कोई नावल तो नहीं पटा, हो, उसकी फिल्में जरूर देखी है। बहुत बढ़िया ऐक्टर था। मेरा फेवरिट हीरो था । क्या कमाल की एक्टिंग करता था। हाय, वह सो कब का चल बसा । (समाल आँखों से लगावी है) कितना भोला था। बजीनियर (मुस्कराकर) अच्छा, अच्छा, रोइए नहीं । यह बताइए कि अगर आपको सेनेटरी इन्स्पेक्टर बना दिया जाय तो आप सफाई कर्मचारियों से काम कैसे लेंगी? परमिन्दर खूब कसकर काम लूंगी। अगर कोई काम नहीं करेगा तो ऐसी झाडू लगाऊँगी उसके मुंह पर कि सिट्टी पिट्टी गुम हो जाय । अध्यक्षा अगर कभी सफाई कर्मचारी हड़ताल पर उतारू हो तो आप क्या पजीनियर करेंगी? परमिन्दर हड़ताल करने की हिम्मत ही कैसे होगी जी उनकी? उनकी चटनी बनाकर न रख दूंगी। . आपको हर काम में जोर जबरदस्ती दिखाने के सिवाय और कुछ भी आता है? अध्यक्षा 140/सूत्रपार परमिन्दर जी? इंजीनियर आप कालू (अन्दर आकर) सा'ब ! वह जो लडका आपके सामने आया पान किरपाशकर? अप्यता कालू वह यह कह रहा है कि आप लोग इस लड़की को नौकरी दे देंगे, इसीलिए इतनी देर तक उसे रोक रखा है। इजीनियर एं? परमिन्दर उस मरे की इतनी हिम्मत ? ठहर, मैं देखती हूँ उसे । (खडी हो जाती है) अध्यक्षा अरे, कहाँ जाती हो ? क्या करना चाहती हो ? परमिन्दर अरे परेसीडेण्ट जी आप नहीं जानती कि इन मरदों को कैसे ठीक किया जाता है। ये लोग औरतों की उन्नती से जलते हैं। अभी उस किरपाशकर को ठीक करके आती हूँ। अध्यक्षा अरे कालू । इस लड़की को रोको । बड़ी भगड़ालू है। कानू (दरवाजे और परमिन्दर के बीच दीवार बनकर) ठहरिए जी। परमिन्दर अरे, हट परे। [पका देकर बाहर निकल जाती है और कृपाशकर को मैतर ते पकड़कर भीतर से आती है। पीछे-पीछे दीनानाथ माता है। परमिन्दर (कृपाशकर से) क्यों भाई साहब ! आप क्या कह रहे थे? कृपाशकर कुछ भी वो नहीं। परमिन्दर झूठ बोलते हो। कृपाशकर मन्यों झूठ मेनूंगा? परमिन्दर तुम नहीं कह रहे थे कि ये लोग मुझे नौकरी दे दी इसलिए मुझे इवनी देर तक रोक रखा है? कृपासकर : हो, कह रहा था तो कौन सा पाप कर रक्ष था? परमिर तुने झूठ बोलते हुए शरम नहीं आती ? अभी कर रहा था कि कुछ नहीं कह रहा था और अब कह रहा है कि हमें कामया साक्षात्कार/141 कृपाशकर देखिए बहन जी, जबान समाल कर बात कीजिए । मुझे तू तड़ाक सुनने की आदत नहीं है। परमिन्दर वो तू क्या कर लेगा मेरा ? (निकट आ जाती है) दीनानाथ बड़ी दीठ हैं आप। परमिन्दर ओ, तू चुप कर । तू क्यों बीच में टौंग अड़ाता है ? तेरे से कौन बात कर रहा है? कातू (बीच बचाव करता है) देखिए बहन जी, माई साहब । यहाँ झगडा मत कीजिए। परमिन्दर (पका देकर) ओ, परे हट । बडा आया मजिस्ट्रेट बन के। अध्यक्षा आप लोग नगड़ते क्यों हैं ? इटरव्यू देने आये हैं कि झगडा करने? कृपाशकर आये तो हैं हम इटरव्यू देने लेकिन जब यहाँ खुली घायली चल रही है तो धुपचाप कैसे बैठे रह सकते हैं ? अध्यक्षा क्या घोपली हो रही है यहाँ? कृपाशकर आपने इस लड़की को इतना समय क्यों दिया इटरव्यू में ? साफ है कि आप इसे काम पर लगाना चाहते हैं। हो, साफ है। परमिन्दर (चिढ़ाने के स्वर में) हाँ, साफ है । ये मुझे काम पर लगाना चाहती है वो तुम लोगों को क्यों जलन होती है? जो इस नौकरी के लायक होगा, उसे ही तो रखा जाएगा। कर : दीनानाथ से ) देखा, मैंने ठीक कहा था ना कि ये लोग इस लड़की को काम पर रखना चाहते हैं। देख लो खुद सुन लो- यह लड़की क्या कह रही है। या वो आप लोग शान्त शे जाइए, वर्ना यह इटरव्यू पोस्टपोन कर दिया जाएगा । (सब धुप होकर अध्यक्षा को देखने लगते हैं) न तो अभी किसी लड़के को रिजेक्ट किया गया है और न इस लड़की को सलेक्ट किया गया है। आप सबका इटरव्यू हो जाने के बाद डिसीजन होगा। डिसीजन अपी होगा, यहीं होगा और मेरे फेवर में होगा। अगर मुझे न लिया गया वो में भूख हड़ताल कर दूंगी, पेराव कर दूंगी। बीनानाथ अध्या परमिन्दर 142/ सूत्रधार अध्यक्षा कृपाशकर दीनानाथ परमिन्दर कृपाशकर परमिन्दर कृपाशकर इंजीनियर ऐसी पमकियों से वश में नहीं हो सकती में। कैसे कर देगी भूख हडताल घेराव । तुझे उठाकर बाहर फेंक देंगे। हाँ, फेंक देंगे। अशा तुम्हारी इतनी हिम्मत ? जरा हाथ लगाकर तो देख मुझे। [और निकट आ जाती है। जा, जा । तू लडकी है, इसलिए छोड़ देता हूँ, वर्ना वरना तू क्या कर लेता मेरा? अच्छा, यह बात है ? (परमिन्दर की ओर बढ़ता है) अरे, अरे, यह क्या कर रहे हैं आप लोग ? वहरो परमिन्दर, कृपाशकर । यह अच्छी बात नहीं है। [अध्यक्षा सड़ी होकर कृपाशकर को पकड़ लेती है। छोडिए मैडम मुझे छोड़ दीजिए। हाँ, हाँ छोड़ दीजिए । यह मुझे हाप लगाकर वो देखे। ओफ्फोह। नगडना बन्द करते हो कि नहीं? आप, यस सुप रहिए। हो, हाँ, आप क्यों टपकते हैं बीच में? [अप्यता और इजीनियर आपस में कानाफूसी करते हैं, फिर प्रत्याशियों को देखते हैं] हम लोगों ने यह इटरव्यू कैंसिल करने का फैसला किया है, इसलिए अब आप लाग पहाँ से जा सकते हैं। [तभी प्रत्याशी एक-दूसरे की प्रतिक्रिया देखते हैं। कृपाशकर परमिन्दर इजीनियर अध्यक्षा कृपाशकर परमिन्दर अभ्यता सूत्रधार गौरीशकर दुपुआ राकेश बनर्जी कालीचरण जोशी सिपाही नेता नेवा का नौकर छात्र नेता प्रिंसीपल सेठ, मिल-मालिक पुलिस इस्पेक्टर [एक स्त्री हुई बैठक । सोफे, मेज और मेज पर टेलीफोन । खहर के पर्दे दरवाजों और खिड़की पर ये हैं। बहरयारी गौरीशकर दोनों पैर समेटकर एक सोफे पर बैठे अखबार पढ़ रहे हैं। टेतफोन की घटी बोलती है । गौरीशकर एक हाथ में अखबार पामे फोन उयते ।] गौरीशकर देऽयो अच्छा कालीचरण जी नमस्कार, नमस्कार। सुनाइए. क्या हाल है? में, कस पी एम ने पार्टी में दुनाया था। वहाँ भी आपके बारे में सारी पार्वे फाइनेन्स मिनिस्टर से कर ली थी। एक लाख रुपये से बात नहीं बनेगी। यह वो है ही। जिवना बड़ा काम, जने दान। यह दस लाख का रहे थे, मने पाँच लाख तक मना लिया है। अरे भैया! वह तो अपने सामने गिनकर घरवा लेनेवाला आदमी है । बीफकेस में रखकर धले आने से काम न. घलेगा। वह बड़ा की आदमी है। क्या पता, आप पाँच हजार रख सायें और पाँव साख बवायें। हो, हो आप . आप ऐसा कीजिए कि श्रीफकेस में पूरे रुपये भरकर मुझे दे जाना पहुंचा 144/ सूत्रधार दूंगा । फिर सामने गिनने की जरूरत नहीं पडेगी । हाँ, आप इपर आ जाइए। बाकी बातें भी यहीं कर लेंगे। ठीक है नमस्कार भैया । (फोन रखकर) सुपुआ। पुआ गौरीशकर उपुआ गौरीशकर युपुआ गौरीशकर उपुआ गौरीशकर (आकर) जी मालिक ! (सोफे पर बैठते हुए) आज इतदार है। कई लोग आयेंगे । बाजार से कुछ खाने पीने का सामान ले आओ । बीवी जी तो घर में है नहीं, जो मेहमानों के लिए अन्दर से कुछ बनकर आ जायेगा। जी। पासी हलवाई के पास जाना । कहना कि हमने मिठाई और नमकीन मैंगवाया है। जी! जी, जी क्या ? जाओ। सा'म । पैसे। पैसे किसलिए? घासी से हमारा नाम लोगे तो वह बिना पैसे लिए दे देगा । आखिर उसे हमने इतनी पार्टियों के आर्डर दिलाये हैं। अच्छा सा'ब ! मैं अभी लाता हूँ। (बाहर निकल जाता है । कुछ क्षण पश्चात् राकेश के साथ लौटता है) मालिक, ये आपको पूछ रहे थे। विपाक से उठकर एकेश से हाप मिलाते हुए) इल्लो राकेश भाई, अय के दो बड़े दिनों में दर्शन दिए । (बुयु से) तू जा । इषुआ के घले जाने पर) आओ बैठो। कैसे भटक गए आज? आप तो जानते ही हैं कि आप के पास बिना मतलब के तो कोई आता नहीं है। दोनों बैठ गते । (मुस्कराकर) को यह यो ठीक है । बताइए. में आपकी क्या सेवा कर सकता ? इपुआ ----- गौरीशकर राकेश गौरीशकर सूत्रधार / 145 राकेश गौरीशकर राकेश गौरीशकर राकेश हम अपने कालेज में स्टूडैप्ट्स यूनियन की ओर से हड़ताल करना चाहते हैं, उसमें आपके सहयोग की आवश्यकता है। ऐसी क्या बात हो गई? आपके सामने झूठ बोलना बेकार है, क्योंकि आप, बकील आपके , चेहरा देखकर ही आदमी के दिल की बात जान जाते हैं। हाँ, वह तो है ही। बात यह है कि परीक्षा में कल करते हुए सुपरिटेंडैण्ट ने हम घार लड़कों को पकड़ लिया । हमने सोचा कि कुछ ले देकर काम बन जाए, लेकिन वह साला दडा काइयाँ निकला । साफ मना कर दिया और हमारी कापियाँ छीने लगा । हमने कहा कि हम नही देते । इसपर उसने पुलिस को बुला कर हमें हॉल से निकलवा दिया । हम लोगों ने प्रिंसीपल से जाकर कहा तो उसने भी साफ कह दिया में इश मामले में नहीं पोंड़ शोका । हमने बहुत कहा कि हम माफी मांग लेंगे, आप सुपरिटेंन्डैप्ट से कह तो दीजिए । इसपर वह उठकर चल दिया और बोला मेरा कोई अधिकार नहीं है । आप लोगोन को आपनी कॉरनी का फॉल तो मिलना ही चाहिए ।' अब हम चाहते है कि हम तो तीन साल के लिए गए ही इस प्रिंसीपल को भी कालेज से निकलवा कर छोड़ें। यूनियन के प्रेसीडेण्ट और सेक्रेटरी तो अपने शारों पर नाचते ही हैं, हम प्रिंसीपल को निकलवाने के लिए हड़ताल क्यों न करवा दें। (सोदकर) देखिए, मेरी आप लोगों से जितनी मित्रता है, उतनी ही प्रिंसीपल से भी है। और फिर यह तो मुझे पता है। परन्तु इतना आप भी जानते हैं कि आपके काम जितने हम लोग आर्यगे, उतना यह प्रिंसीपल नहीं आयेगा । इम आपके कितने काम आते हैं 1 आपके हर काम के लिए हम तैयार रहते हैं। बस, आपके इशारों की आवश्यकता होती है। और धुनाव भी तो आप हम जैसों की समता से ही जीत हैं। गौरीशकर राकेश 146/ सूत्रपार गौरीशकर राकेश गोरीशकर राकेश गौरीशकर सो मैं सब समझता हूँ। आप लोग अपने आदमी है इसीलिए तो काम पड़ने पर हम एक दूसरे के पास आवे जाते हैं। बिलकुल। तो दीक है आप लोग हडताल करखा दीदिए । मगर किसी को पता नहीं चलना चाहिए कि इस हडाल का सूत्रपार रेन है। बिलकुल नहीं सार आप भी क्या बात करते हैं। हमें वो बस आपके आशीर्वाद की जरूरत थी, वह हमें मिल गया। [पनी प्रवेश करते हैं। (उठकर हाथ मिलाये हुऐ आइए प्रिंसीपल साहब आप से मिलने की मेरी कई दिनों से इब्ध हो रही थी। आइए, बैठिए। हमनी राकेश पर एक चतती दृष्टि फेंककर बैठ जाते हैं ] (उठकर) अच्छा जी, में चला हूँ। नमस्ते । (निकल जाता है) (बैठकर) कोई सेवा। यह किशलिए आया था? अरे साहब, क्या बताऊँ । आजकल के लंडे बड़े अनुशासनहीन सेवे जा रहे हैं। यह मुझे बताने आया पाकि आपने इन्हें कालेज से निकाल दिया है। ये लोग हॉड़ताल करने पर तुले हुए हैं, क्योंकि शुपरिटेण्डेण्ट ने इन्हें नकल करने के कारण एनामिनेशन बल से निकाल दिया है और यूनिवर्शिटी तक इनकी शिकायत पहुंचा दी है। शिकायत। हाँ शिकायत । यह शायद हॉडवाल के मामले में आपकी शलाह लेने राकेश गौरीशकर बनर्जी गौरीशकर बनर्जी गौरीशकर बनर्जी आया था। गौरीशकर बनर्जी (घबड़ाकर) लेकिन, मैंने तो आपसे यह नी कहा। आपने नहीं कुछ लॉड़कों ने मुझे रिपोर्ट दी है कि ये लोंडके कालेज गल करवा कर मुझे निकोलवाना चाहते हैं। दुम कुछ भनक तो मेरे कानों में भी पड़ी है। मैंने तो इसने यह लवाड़ पिलाई है कि बब्बू का मुँह फीका ले गया । आपने देखा था गौरीशकर सूत्रधार /147 বন गौरीशकर बी मौरीशकर बनर्जी ना ? (व्यग्यपूर्वको ये भारत के भावी कर्णधार है। इनको सिवाय सड़ाई-अगडे और पुरेबाजी के और कोई काम नहीं सूझता है । मने भी शोष लिया है कि इनकी हॉडताल का शामना करूँगा, चाहे कुछ छ जाए । आखिर इन लोगों ने शमझ क्या रखा है ! ऐसा करना ही चाहिए । नहीं तो आपको कालेज से निकलवाने की धमकी दे रहे हैं तो कल सारे स्टाफ को निकलवाने की यमकी देंगे। प्रशासन इन लोगों की सलाह से थोड़े ही चल सकता है। आप मेरे ऑपने आवरण मित्रों में से हैं आप की क्या राय है? (सोचने के बाद) मेरी राय तो बनर्ग साहब, यही है कि इन लोगों को हडताल करने दीजिए, आगे मैं निपट लूंगा। एस०पी० मेरे हाथों में है । इन दादाओं को जेल में न डलवा दिया तो मेरा नाम गौरीशकर नहीं। महों पर अप फेरता है] पश, मैं यही चाहता हूँ। पहले आप इन लोगों को शमशाने की कोशिश कीजिए। न मानें, तो चारा ही क्या है ? मैं नहीं चाहता कि मेरी प्रिंसीपलशिप में कोई हॉडवाल बॉड़ताल हो। हाँ, जो काम समझौते से, शान्ति से हो सके उसे क्यों न किया जाय? आप मैफिक रहिए, आपका कोई नुकसान नहीं होगा। मेरा क्या नुकसान हो सकता है ? मरे साहब, ये लड़के बड़े गुण्डे हैं। कहीं छुरेबाजी कर बैठे तो। इन सड़कों के पिता कोई साधारण हैसियत आदमी तो है नहीं। ज्यर वक इन लोगों की पहुंच होती है। जमानत दे दिला कर छूट जागे। हमारी और आपकी इसियत ही क्या है? मेंशन भुगव तूंगा । देखें कोई मेरा क्या बिगाड़ता है। आप मेरे परम मित्र है, इसलिए आपको यह सलाह दे सकता हूँ कि आप अपनी मोर से पहल करके समझौता कर लें। में शमझौता अपनी और शे क्यों कर्स? मेरा शर्मे क्या दोश है ? गोरीशकर बनर्जी गौरीशकर बनर्जी गौरीशकर बनी 148/ सूत्रधार गौरीशकर बनर्जी वह तो ठीक है, लेकिन आप कालेज में नौकरी करते हैं । कानेन आपका नहीं है। प्राइवेट कालेजों में तो झुककर चलने में ही भलाई है। ये लोग मैनेजिंग कमेटी में अपना प्रभाव रखते हैं । काला को चन्दा देते हैं । अगर हडताल होने पर कुछ तोड फोड़ हुई, अथवा लडाई झगडा हुआ, तो सारा दोष आपका ही माना जाएगा । (पनी सोचने लगते है) प्रिंसीपल साहब, मैंने दुनिया देखी है। आजकल न्याय और योग्यता की कोई पूछ नहीं है । जी हुजूरी से काम निकलता है और फिर स्टूडैण्ट्स यूनियन के लड़कों का किसी न किसी राजनैतिक दल से गठवन्यन होता है। आप मेरे दोस्त हैं। दोस्ती के नाते आपको पहले ही समझाना या सलाह दे देना मेरा कर्तव्य है , वर्ना मुझे क्या पड़ी है कि बात तो आप ठीक पाहते हैं लेकिन मैं भी देखना चाहता हूँ। कौन श राजनैतिक दल हॉडताल फरवाता है या कौन शा रईश मुझे कालेज से निकॉलवाता है । (उठकर) अच्छा, मैं चलता हूँ। कुछ जलपान तो कर लीजिए । (खडे होते हैं) पन्यवाद । अब मैं चलूँ। (खाली हाथ प्रवेश कर) मालिश लाला ने कहा (गौरीश्कर धुप रहने का सकेत करते हैं लेकिन वह कहता जाता है) कि आपने उसे पार्टियों के ठेके दिलवए हैं तो कौन सा अहसान किया है। कमीशन के नक्द रुपये भी तो लिए हैं (क्रोपित स्वर में) पुप गये । पहले पूरी बात तो सुन लो मालिक, उसने फिर कहा उन्होंने नकद रुपये नहीं लिए क्या? यह क्या कह रहा है ? रुपए नकद लेने की कौन सी बन है जिश पर आपको गुश्श आ गया ? (पदड़ाहट और क्रोष का भाव छिपते हुए गया है। होगा लेकिन बात क्या हुई? आपसे उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। यह पागल है। गौरीशकर बनर्जी . गोरीशकर उपुआ बनर्जी : गौरीशकर बनी गौरीशकर सूत्रधार /149 बनर्जी गौरीशकर राकेश गौरीशकर राकेश गौरीशकर मुझे तो ऐशा मालूम नही पडता । अच्छा, मेरी बात का ध्यान रखना। (निकल जाते हैं) (गुस्सा पीते हुए यह अच्छा मूर्ख नौकर पल्ले पड़ा है । बेवकूफ को कितनी बार समझाया है कि ! तू निकल जा मेरे घर से। (प्रवेशकर) यह प्रिंसीपल क्या कह रहा था? (मुस्कराकर) आप अभी तक यही हैं? मैंने सोचा कि प्रिंसीपल यहाँ आया है जसर हमारे बारे में बात करने आया होगा, इसलिए मैं बाहर घूम रहा था। डर के मारे भागा भागा फिर रहा है । मुझसे कह रहा ण कि कुछ सहायता कीजिए । मो तो साफ साफ कह दिया है कि मैं इस मामले में आपका पम नहीं ले सकता । दोष आपका ही था । आपने अपने कालेज के लडकों की सहायता क्यों नहीं की ? यह सुनकर वह भीगी बिल्ली बना चला गया है । (चिन्ताभरे स्वर में) वैसे मामला पड़ा टेढा पड़ गया है ।(बुधुआ से) खड़ा क्यों है ? साहब के लिए पानी लाओ। जी मालिक । (अन्दर चला जाता है) क्यों? क्या हो गया? वह कह रहा था कि यदि लड़कों की हड़ताल हुई तो वह तुम लोगों को पुलिस द्वारा पकरवा कर जेल भिजवा देगा। जब तक आप है, हमें कोई खतरा नहीं है (जेब में हाथ डालकर) अगर आपको रुपये पैसे चाहिएँ तो हम से कहिए । हाँ, वह दो कहना ही पड़ेगा । एस०पी० और दूसरे अफसरों को देने के लिए रुपयों की जरूरत तो पड़ेगी ही। (जेब से नोट निकालकर देते हुए) हम सबने यही अन्दाज लगाया था। इस समय सौ रुपये लीजिए. पकी फिर दे गाऊँगा । स्टूडेण्ट्रस यूनीयन का फूड और किस दिन काम आयेगा? (पानी के दो गिरास लेकर आता है) लीजिए, मालिक ! उपुआ राकेश गौरीशकर राकेश गौरीशकर राकेश युमा 150/सूत्रपार गौरीशकर (राकेश से रुपये लेते हुए) कोई बात नहीं । ऊपर से मेरे भी कुछ लग जाएं तो परवाह नहीं । अपने ही आदमी हो, फिर आ जाएं। आप निश्चिन्त हो जाइए, मैं सब सुलट लूँगा। [राकेश निकल जाता है] मालिक। तू चुपचाप घलाणा यहाँ से। अच्म महाराज, में घता तो जाऊँगा, पर मेरी एक पाव को सुन लीजिए। उयुआ गौरीशकर उपुआ क्या है। गौरीशकर বুজ गौरीशकर जब मैं घासीराम की दुकान पर पहुंचा मैं कुछ नहीं सुनना पाहता । जा, भाग। ( सेठ कातीवरण हप में ब्रीफकेस सैकर प्रवेश करते हैं। गौरीशकर उन्हें आदरसहित कुर्सी पर बैठाते हैं । अपुआ गितास अदर रख आता है और कपना साकर सफाई करने सगता है। कभी-कभी उन दोनों की बातचीत सुनने के लिए सा हो जाता गौरीशकर कालीचरण आइए, सेठ जी । सुनाइए. क्या समाचार हैं? अरे साहब, क्या बताऊँ । बुरे समाचार है। इन मजदूरों के मारे तो मेरी जान आफ्त में हो गई है। रोज कोई न कोई अगडा टण्टा उठाए रखते हैं। कभी अपने देवन बदलाने की बात करते हैं और कगी फ्री क्वार्टर, अस्पताल और स्कूल बनाने की मांग रखते हैं। कभी ग्रेच्युटी, कमी लिपट कभी गिफ्ट । मैं तो इन रोज की मांगों से तग आ गया हूँमैंने विजिनेस में इतना साग्र रुपया जैसे केवल इनको पालने के लिए ही लगा रखा है। हाँ सेठ जी कुछ नेता टाइप लोग ही पर्दे के पीछे से इन लोगों को भड़काते रहते हैं। ये मजदूर अन्यों की तरह उनके बताये रास्ते पर घलने लगते हैं, चाहे इससे उनका अपना कितना ही नुकसान क्यों महोजाय। गोरीशकर सूत्रधार /151 कातीवरल . गौरीशकर कालीचरण कालीचरल ब्दी हो, लेकिन मैंने भी अब सोच रखा है कि बिना कडा रुख अपये श्रम घलेमा नहीं। आफ्नै ठीक सोचा है। इसके लिए मुझे आपकी सहायता चाहिए। (प्रस्नवा ) अजी साहब, क्यों नहीं। मैं सत्य और न्याय की रक्षा के लिए सदैव तैयार हूँ इसीलिए वे आपके पास आना पड़ा । आप मेरी सहायता कीजिए। अगले चुनावों में मुझसे आपकी जो सेवा बन पडेगी, वह मैं करने को तैयार है। सो वो आपकी दय है सेठ जी ! आप जैसे भले आदमियों के भरोसे ही तो मैं इस शहर में टिका हुआ हूँ, वर्ना यह शहर मुझ जैसे आदमियों के योग्य है नीं। सो वो है। मच्छ, वो जरा मेरा काम सुन लीजिए। गोरीशकर कातीचरण मौरीशकर कालीचरण बात यह है कि मजदूरों ने मेरे सामने कई मांगें रखी है, जैसे वेतन में बढोतरी, चैनस उनके बच्चों की मुफ्त शिक्षा का प्रबन्ध मुफ्त मकाना मा पूरी न होने पर वे हड़ताल करने की धमकी दे रहे हैं। माप जानते है कि हमारे पास तनखा आदि घाँटने के बाद घोडा-स रुपया रका है, जिसमें से हमें सारे टैक्स चुकाने होते हैं, हिस्सेदारों को देना होता है चन्दे देने होते हैं। और फिर अपने घर खर्च भी वो कानहीं है। जी में मजदूरों की मांगें बिलकुल अनुचित हैं। मैं डी सी के आफिसर और मजिस्ट्रेट से मिलूँगा आप चिंता न करें । अगर मादुरों ने कुछ तोड फ्रेड की तो पुलिस की गोलियों से भुनवा दूंगा इन्होंने समझ क्या रखा है ? (फकेस उठाकर मौरीशकर की और बढाते हुए) बस, मैं इसीलिए यो सारा इस प्रीफकेस में गौरीशकर . कालीचरण

152/ सूत्रपार
गौरीशकर : (युआ से) तुम्हारा काम यत्म नहीं हुआ ? जाओ, सेठ जी के लिए
पानी लाओ।
[पुआ अन्दर चला पाता है
कालीचरण अगर आपको और जरूरत हो तो, पेखटके कह दीजिएगा । मैं
आपकी सेवा में और रुपये पहुंचा दूंगा।
गौरीशकर अरे सेठ जी, आप चिन्ता मत कीजिए । (बीफ केस ले लेते हैं।बुधुआ
एक ट्रे में पानी के दो गिलास ले आता है) में रखे लेता हूँ। इससे
काम चल जायेगा तो ठीक है वर्ना
कालीचरण ठीक है । आजकल तो इसके बिना कोई काम ठीक तरह से हो ही
नहीं पाता । (उठते हुए) अच्छा, अब मैं चलता हूँ। (एक गिलास
उठाकर पानी पी लेते हैं और पाली गिलास ट्रे में रख देते हैं)
उपुआ अजी साहब ! आप कुछ जलपान तो कर जाए।
गौरीशकर (खड़े होकर) हाँ युपुआ ! सैठ जी के लिए कुछ ले आ।
कालीचरण अजी इसकी क्या जरूरत है।
पुआ ट्रि को मेज पर रख कर बाहर जाता हुआ ) जरूरत तो है साय !
आप बैठिए तो सही। (निकल जाता है)
कालीचरण (हंसकर बैठते हुए) आपका नौकर तो बड़ा होशियार है।
गौरीशकर (पीरे धीरे बैठते हुए) जी हाँ।
कालीचरण एक बात और है, नेता जी !
गौरीशकर क्या?
कालीचरण आप मुझे नयी मशीनरी के लिए कुछ परमिट और फारेन एक्स्चेंज
दिलवा दें तो बड़ी कपा होगी।
गौरीशकर
यह बड़ा मुशिकल काम है । परमिट और फारेन एक्स्वेज पर
सरकार ने बहुत प्रतिबन्ध लगा रखे हैं, यह तो आपको मालूम ही है।
कालीचरण अरे साहब ! आपके लिए क्या मुशिकल काम है ? आप चाहे को
आज ही रिलवा सकते है। आपका तो सब जगह प्रभाव है।
मिनिस्टर तक आपके आगे सिर हुनते हैं।
गौरीशकर वह तो ठीक है लेकिन

सूत्रधार /153 कालीचरण । लेकिन देकिन कुछ नहा । जो कुछ पूर्व आप माँगेंगे में देने को तैयार हूँ। गौरीशकर कातीचरण गौरीशकर उपुआ गौरीशकर पुआ गौरीशकर उपुआ आप तो (आगे कहने के लिए जैसे शब्द नहीं मिलते) पस टीक है दस परसेण्ट आपका रहा। आप तो, सेठजी, मुझसे जबर्दस्ती काम करवा लेते हैं । मैं आपसे 'न' भी तो नीं कह सकता । (बुधुआ का प्रदेश) तू फिर आ गया? घल बाहर । कुछ लेकर नहीं आया? लेकर आया हूँ। क्या ? पुलिस। पुलिस? क्यों ? (जेब से परिचयपत्र निकालकर दिखाते हुए) आई एम जोशी इस्पैक्टर सी०आई०डी०। [गौरीशकर और कातीचरण सकपकाकर एकदम खड़े हो जाते हैं और एक-दूसरे का मुंह देखते हैं। क्या कहते हो? कुछ नहीं। गौरीशकर कालीचरण मौरीशकर जोशी गौरीशकर जोशी गौरीशकर (जोशी से) क्या ? क्यों ? हम आपको गिरफ्तार करने आए हैं। (विस्मय से मुझे ?क्यों ? मेरा क्या अपराय है ? आपके कई अपराध हैं। एक हो तो बताऊँ। (खोखली हंसी से ) आप भी खूब मजाक करते हैं, इन्स्पेक्टर साहब! आइए, बैठिए । चाय पीएंगे या कॉफी या कुछ और पन्यवाद । चलिए, आपके घर में तो कुछ है नहीं । जो कुछ पीना होगा, थाने में ही पीएंगे (कालीचरण से) और सेठ जी ! आपको भी थाने चलकर रिपोर्ट पर दस्तखत करने होंगे। यह ब्रीफकेस आप मुझे दीजिए । (इन्सपैक्टर श्रीफकेस ले लेता है) ? जोशी

154/ सूत्रपार
गौरीशकर
जोशी
लेकिन मेरा अपराप तो पताइए।
आप उपने कितने अपराय जानना चाहते है? आपके अपण्य
बहुत-से है और उन सदके प्रमाण हमारे पास है। अभी उस लड़के
को अपने हडताल के लिए उकसाया है और उससे सौ रुपए लिए
हैं। अभी इन सेठ जी से रुपए ऐंठे हैं। इसका प्रमाण सेठ जी और
यह ब्रीफकेस है। आपको हमारे पास और भी रिपोर्ट है, लेकिन
अभी इतना ही काफी है। बाहर जीप खडी है। आप दोनों पाने
चलिए । (गौरीशकर सिर झुका लेता है। कालीचरण घेहरे पर रुमाल
फेरते रहते हैं) चलिए।
[सब बाहर जाने के लिए कदम बढ़ाते हैं]

हँसी-हँसी मे पिता नारायण सुषाकर मीरा पुत्री [ एक मध्यवर्गीय परिवार का दृश्य । मीरा एक कुर्सी पर बैठी कोई पुस्तक पढ़ रही है] सुषाकर (प्रवेश कर) भीरा I पिताजी कहाँ है ? मीरा क्यों ? क्या काम है? सुधाकर तू क्यों बीच में दाग अड़ाती है ? मैं जो कुछ पूछ रहा हूँ, उसका उत्तर दो। मीरा मुझे नहीं पता। (पुस्तक पढ़ने लगती है) सुधाकर (चापलूसी के स्वर में) मीरा रानी ! बता दोगी तो कुछ पट नहीं जायेगा । मीरा ! मुझे तग न को हाथ जोड़ता हुआ घोड़ा सा झुककर) बहिन जी । भैरे अपराध को क्षमा किया जाय । अब तो बताओ। मीरा (पुस्तक एक ओर रखकर, मुस्कराती हुई) हौं, ऐसे । अब आ गए न राह पर। गुसकर : विसे ही हाथ जोड़े हुए) जी, आ गया। लेकिन मैं कुछ पूछ रहा था! मीय : (रोब की आवाज में सब कुछ पता लग जायगा । (एक कुर्सी की और इंगित कर) पहले वहाँ बैठिए । (सुयाकर बैठ जाता है ) हौं, अब पूधिए। : मुझे जितनी जल्दी है, तुम इतनी देर लगा रही हो। मीय । (मुस्कराहट दवाकर) फिर ऊटपटाग बातें अच्छा, अच्छा, मैं जानना चाहता था कि पिताजी कहाँ है? मीरा : लेकिन आप यह पूछ क्यों रहे हैं? नुवाकर ! मीरा 1 तुम भी अजीब हो । मुझे आज एक कवि सम्मेलन में 158/ सूत्रधार । मीरा सुपाकर भीय सुपाकर मीरा सुपाकर मीरा सुधाकर मीरा सुपाकर मीरा हरि भजन को, ओटन लगे कपास । (सोचकर) अच्छा, यह कैसे मार्ने कि वह यहाँ ठीक होने के बाद यहाँ भी ठीक रहेगी? यहाँ आप ठीक करते रहेंगे। बस मैं समझ गया । पिताजी मेरे लिए मुसीबत मोल लेने गए हैं। मुसीबत नहीं उसे (खड़ा होकर) क्या मतलब? यह भी कोई पूने की बात हुई 1 पिताजी उसे मोल लेने गए हैं। अर्थात् वे उसे घरीदकर घर में लागे ! क्यों यही बात है ना ? जी हाँ । (हंसी रोकती है) पिताजी को मेरे लिए और कोई अच्छी लड़की नहीं मिली। (हाँसा हो जाता है) (मुस्कराकर) मिल तो जाती, परन्तु पिताजी नहीं चाहते। क्यों ? क्यों नहीं चाहते ? न जाने पिताजी को क्या हो गया है। आपके मले के लिए हो तो वह यह सब कर रहे हैं और एक आप है कि उनपर दोष पर दोष लगाये जा रहे हैं। और क्या उनकी प्रशसा फसे? मैं समझ गया पिताजी चाहते हैं कि वे उसे खरीदकर लायें और अपने वश में रखें। वह आपके भी यो वश में रहेगी। हम सबके दबाव में रहेगी। मुझे नहीं चाहिए ऐसी पत्नी । पिताजी इतने पढ़े लिखे हैं, फिर भी इस टग से काम करना चाहते हैं। मुझे दासी नहीं, पली पाहिए। मैं वो बाहर जा रहा हूँ। कह देना कि मुझे यह शादी नहीं करनी है। [बाहर जाना चाहता है] (बाहर देखकर) लो, पिताजी आ गए । अब आप स्वय मना कर सुपाकर मीरा सुपाकर मीरा दीजिए। नारायण मीरा नारायण (पके से प्रवेश कर कुर्सी पर बैठते हुए) हे राम 1 में दो पक गया। मीरा जरा एक गिलास पानी तो पिला। (अन्दर जावी हु) पिताजी ! यह आपको पसंदतो आ गई ना? ई। वह पुरानी पसर है पर बिलकुत नई सी लगती है। दाम भी ज्यादा नहीं है - केवल सवा सौ रुपये मांगवा है। (अन्दर से) कम तो ठीक है। या इतने दिनों से पीछे पड़े थे, अब मीय इसी हँसी में/159 - । पुश शे जायेंगे। नारायण इसीलिए वो मुझे और जल्दी थी । आज एक आफ्त से छुटकारा मिला । (सुपाकर से) तुम कहीं जा रहे हो क्या ? हपाकर जो हो, एक कवि सम्मेलन में जा रहा था नारायण : पो गये क्यों नहीं? [मीय पानी-भरा गिलास साकर देती है। वे पीने सगते हैं। सुपाकर : मैं आपसे भीय (बीच में ही) में बताऊँ पिताजी ! ये आपसे आज्ञा लेने आये थे। लेकिन जब मैंने आपके वहाँ जाने की बात मेरा मतलब है, उसे देखने जाने की बात सुनाई तो नहीं गये। नारायण हों, पाव ही खुश होने की है । मन में सड्डू फूट रहे होंगे। लेकिन तुमने यह पेइरा क्यों लटका रया है ? (गिलास एक ओर रख देते 8) मीरा लड्डू नहीं, बम फूट रहे हैं पिताजी ! आप उसे साथ क्यों नहीं लाये, इसलिए। सुपाकर नहीं पिताजी | यह बात नहीं है। नारायण वो क्या बात है? सुपाकर मात यह है कि इस बारे में आपको मेरी सलाह लेनी चाहिए थी। नारायण इसमें सलाह लेने की क्या बात थी? तुम ही दो महीनों से पीछे पड़े ये कि सुपावर : मने आपसे इस बारे तो एक शप भी नहीं कहा । आप मुझसे बिना पूछे ही बातचीत कर आये और वह भी भाव वाव करके। नारायण वो क्या कोई मुफ्त में ही दे देगा। अखिर उसने भी दो खरीदी ही थी। उसे किसी ने मुफ्त में दे दी होती तो वह भी हमें मुफ्त में पकडा देता। भीर वह कोई पेड़ पर थोड़े ही लगती है। सुषाकर पिताजी ! आप खरीदी हुई बहू साकर मेरी जिन्दगी बर्बाद कर देना चाहते हैं (आँसु पोता है। मीरा निधिला कर हँस पड़ती है) (आश्चर्य से) खरीदी हुई बहू ! यह तुम क्या कह रहे हो? सुधाकर आप मेरे लिए, बहू खरीदने नहीं गये थे? नारायण - 160/ सूत्रधार नारायण सुपाकर नारायण मीरा सुधाकर मीरा सुधाकर तुम्हें किसने दवाया? मीरा ने। (मीरा से तुमने ? - मोक्य बताया? तुमने नहीं बताया था कि पिताजी मेरे लिए बहू खरीदने गये हैं ? मैंने ऐसा कब कहा? झूठ बोलती है । तूने नहीं कहा था कि पिताजी एक तलाकशुद्ध को देखने और परीदने गये हैं जिससे वह सदके दाय में रहेगी और सबके काम अपयेगी? मै क्यों झूठ बोलने लगी? तुने नहीं कहा था कि पिताजी उसे देपने गये हैं और उसके कुछ पुणे टीले हैं, जिन्हें ठीक करवा लेंगे? मैंने ऐसे नहीं कहा था। मैंने कहा था (हाथ उगार) लगाऊँगा एक झापड । मूड पर झूठ बोले जा रही है। (मुस्कराकर हापों पर वार रोकने की तैयारी करके) मैंने कहा मीरा सुधाकर मीरा सुपाकर मीरा था नारायण सुपाकर नारायण मीरा (हंसकर) ओह अच्छा ! लगता है मीरा ने तुमको दुडू बनाया है ? (हाप उटापे हुए) क्या ? कैसे ? (धीरे पीरे हाप नीचे लाता है) क्यों मीरा, तुमने क्या कहा था ? (अपने हाप नीचे करती हुई) मैंने केवल इतना कहा था देखने गये हैं और भैया ने अपने आप रिक्त स्थान की पूर्ति करते हुए कह दिया कि क्या बटू देखने गये हैं ? मैंने कह दिया हो। (खिलखिला फर) बहुत खूब ! बहुत अच्छे । अच्छा मजाक रहा। भैया को शापद बहू की चिन्ता लगी रहती है, इसलिए इन्हें कुछ नारायण मीरा और - नहीं सूझता। सुपाकर मीरा नारायण चुप । देवकूफ वेवफूफ कौन है ? मैं या तुम? बेवकूफ तो तुम बन गये । अरे येय, मैं इहू नहीं तुम्हारे लिए साईकिल देखने गया था। सैकण्डहेण्ड साईकिल । [नारायण और मीरा हंसते हैं। सुपाकर पता है

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डॉ. सुधीद्र कुमार
2861940
स्यान मुयर (आगरा)
शिक्षा एम० ए०, पी एच० डी० (हिन्दी)
सम्प्रति
रीडर हि दी विभाग पत्राचार पाठय
श्रम विद्यालय दिल्ली विश्वविद्यालय,
दिल्ली-110007
कृतियां रीतिकालीन शृगारभावना के सात,
सयास स पूर्व चारदीवारी के पार
अपनी अपनी गह वैदिनी हिंमा हिमा न
भवति बद कली की गुशबू हिली साहित्य
का इतिहास परिप्रेश्य और प्रवतियां,
पर्यायवाची काश अभिनव पत्रकारिता
सन्दभ-कोश, मूत्रधार
समाप्ति साहित्य सगम दिल्ली द्वारा सम्मानित
मा 3 ए/20 वी जनकपुरी
नई दिल्ला 110058
शिवास

Sootradhaar

Author
Sudhindra Kumar
Title
Sootradhaar
File name
Sootradhaar
Text
OCR done
Citation
1962
Published
2011/03
Publisher
Kadambari Prakashan Jawahar Nagar Dehli
Language
Sanskrit
Pages
162
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551009
Barcode
4990010031792.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
Uaro1pJins4
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