Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Chumbak

Pandit,saligaram · 2011/01

PDF Proofread

Front matter

No text on this page.

।
विज्ञान-मन्थमाला-
सल्या
देश - चिनिया
सो..
T)
चुम्बक
L
2 लेसर
पं० सालिग्राम , भार्गव, एम एस-सी.
-
.
सम्पादक
गोपालस्वरूप भार्गव, एम. एस-सी.
--
प्रकागक
विज्ञान-परिषद प्रयाग
।
मधमयार]
१६७४
[मुल्य 10)

विषय सूची
१
१५
३३
.-
१-भूमिका
२-चुम्बक के गुण
३-चुम्बक बनानेकी रीतियां
४-चुम्बककी प्रबलताकी जांच
५-चुम्बकमें चुम्बकत्व कहां रहता है ?
६-आकर्षण और निराकरणके नियम
-शक्ति
-त्रिकोण मितिकी निपपत्तियां
8-चुम्बकीय हटाव तथा दिक सूचक
१०-चुम्बकीय झुकाव और झुकाव सूचक
११--पृथ्वीका चुम्बकत्व
१२-चुम्यकीय नाप तौल
१३-परिशिष्ट
(१)शक्ति के अवयव
(२) विपरीत वर्ग का नियम
६५
६६

भूमिका
विज्ञान ग्रन्थमालाकी यह चौथी पुस्तक है।
उसमें चुम्यक और तत्सम्बन्धी विषयका प्रति-
पादन विश लेखकने अत्यन्त सरल और सुबोध
भाषामें किया है । यह पुस्तक इस वातका प्रत्यक्ष
प्रमाण है कि हिन्दी भाषामे गूदसे गूढ वैज्ञानिक
विषय सुगमतासे लिखे जा सकते है। भारतीय
विश्वविद्यालयोकी एफ० ए० परिक्षाओं में चुम्वक
विषयके जितने ज्ञानकी आयश्यकता होती है वह
इस पुस्तकके पढ़नेसे हो सकता है। कई शोंमें यह
पुस्तफ अपने कोटिकी अंग्रेजी भापाकी पुस्तकोंसे
उत्तम है। लेखकने इस पुस्तक लिखने में बडा
परिश्रम किया है। इसकी सामग्री एकत्रित करते
समय उन्होंने इगलैण्डके प्रसिद्ध वेज्ञानिक पत्रों में
प्राविधकर्ताओंके लेखोंको पढा है और उसमें
अनेक पसी घातों और प्रयोगोंका समावेश किया
है जो अप्रेजी भाषाको साधारण पाठ्य पुस्तकोंमें
भाय. नहीं पाये जाते।
पुस्तक इस ढगसे लिखी गयी है कि विज्ञानसे
अनभिज्ञ पाठक भी आसानीसे विषयको समझस.

२ कते ह । त्रिकोणमिति ओर गतिविद्याके आवश्यक आरम्भिक सिद्धान्त, जिनके जाने विना प्रतिपा- दित विषयका समझना असम्भव है, सक्षिप्त परन्तु पूर्ण रीतिसे अलग अध्यायोंमें दे दिये गये है, जिससे इन विपर्यासे अनभिश पाठक भी सुग मतासे पुस्तकको पढ सके और लाभ उठा सकें। विपयको सझानेकेलिए अनेक प्रयोग दिये गये है, जिनको पाठक यदि चाहे तो अल्प परिश्रम और थोडे खर्चसे स्वयं भी कर सकते है। इसीलिये पुस्तकमै ६८ चित्र दिये गये है जिनसे प्रयोगोंक- लिए सामग्री तैयार करने में बडी सहायता मिलेगी। पुस्तक रोचक हो इसलिए पुस्तक लिखने में यथासम्भव बहुत कम गणितसे काम लिया गया, है, परन्तु जो लोग विषयको पूर्ण रीतिसे अध्य- यन करना चाहते हे या कालेजके विद्यार्थी है उनके लिए गणितका अश पुस्तकके अतमें परि- शिष्टमें दे दिया गया है । श्राशा है कि यह हर कोटिके पाठकोंका मनोरन्जन करेगी। गोपालस्वरूप भार्गव .

चुम्बक ग्रन् १-भूमिका थ्वीपर सैकडों जगह और भारत- वर्षमें कहीं रही, विषेशत पृ गवालियर गज्यमें, एक प्रकार- का काला पत्थर मिलता है जिस- में यह शक्ति होती है कि लोहेकी चीजोको अपनी और पीच लेता है, जो जाफर उससे चिपट जाती है। चिपटी हुई चीजोंको छुडानेसे यह स्पष्टतया ज्ञात हो जाता है कि लोहेकी चीज उस काले पत्थरकी और बिंची जा रही है । इस काले पत्थर- को जिसमें लोहेकी वस्तुओको अपनी ओर खींचने- की शक्ति है लोहचुगा अथवा चुम्वक कहते है। इस समय में यह नहीं बतला सकता कि भारतमें पहले पहल चुम्बक किसने और कहां पाया, पर ऐसी बातें बतलायी जा सकती है कि जिनसे पाठक कुछ अनुमान कर सस्ते हे । गुजरातमें प्राचीन कालका बना दृश्रा एक मन्दिर था जिसमें ठाकुरकी प्रतिमा हवामें लटकी हुई थी। जर मन्दिरपर श्राघात हुश्रा और मन्दिर तोडने चुम्बक और मूर्ति खडित करनेकी इच्छासे चार कोनों मेंसे एक कोना गिराया गया तो मूर्ति भी पृथिवीपर गिर पड़ी। इससे केवल इतना ही नही प्रतीत होता हे कि जिस समय मन्दिर बना उस समय चुम्बक मिलता था किन्तु यह भी प्रतीत होता है कि बनाने वाले यह भी जानते थे कि चारों ओर चुम्बक किस प्रकार लगाव कि लोहेकी वस्तु हवामें लटकी रहे। उस समयके भारतवासियोका चुम्बक-सम्बन्धी ज्ञान वडी उच्च कोटिका था, और यदि इस शाख- में बरावर उन्नति होती चली आती तो वर्तमान समयमै न मालूमावह कितनी उन्नत दशामें होता। परन्तु किसी कारणसे इस विषयमें अधिक गवेषणाए नहीं हुई। भारतवासियोको केवल इतना ही मालुम रहा कि चुम्बक लोहेको अपनी ओर खेच लेता है। कभी कभी कोई बालक अपनी चतुराई दिखानेकोलिए एक सुई थाली में रस और एक छोटासा, चुम्बक उँगलियोंके बीचमें छिपा थालीके नीचे इधर उधर चलाते हैं, जिससे सुई भी थाली में इधर उधर चलने लगती है। यह सेल दिखलाकर वालक कहते हैं कि उनकी उगलीमें अद्भुत शक्ति है जिसके कारण सुई उनकी उगलीके साथ साथ चलती है। इससे यह स्पष्ट है कि ३ चुम्यकके गुण टेशको प्रचलित वाताको बच्चे शीघ्र ही जान जाते हैं जिससे उनकी शिक्षाम वडा सुभीता होता है। चीनका इतिहास देसनेसे ज्ञात होता है कि ५००० वर्ष पूर्व भी वहाके मुसाफिर एक स्थानसे दूसरे स्थानको जानेकेलिए दिशाका पता इसी चुम्बकसे लगाया करते थे । यह हम धागे वतावेगे कि इससे दिशाका पता कैसे चलता है । यूरोप- वाले अाजकल भी जहाजोपर इससे ही दिशाका पता चलाते है । हिन्दू जो बडे ज्योतिषी थे दिशा- का पता तारासे लगा लेते होगे। यूरोपके इतिहासमें चुम्बकका उल्लेस ११ वी शताब्दी में मिलता है। इसके पश्चात् वहाके लोग उसके गुणोफी सोजमें लग गये और उससे असीम लाभ उठाया। २-चुम्बके गुण फिसी कागजके टुकडेपर एक चुम्बक रस दो और लोहेका बुरादा अथवा लोहेके यारीक तारके छोटे छोटे टुकडे उसपर चुरक दो। चुम्बकको हाथ- में उठालो और उसे उलट दो जिससे कि उसका वह तल जिसपर आपने लोहेका बुरादा डाला था चिन न०२ - T चुम्बक नीचे अथवा पृथ्वीकी और हो जाय । वुरादा चुम्बकके वीचके भागसे गिर जायगा और इतना भाग छोड शेप चुम्बकपर दोनों छोरोंतक लगा रहेगा। बुरादा अधिकाश सिरोपर ही चिपटा रहेगा जिससे यह प्रतीत होता है कि सबसे अधिक आकर्षण शक्ति सिरोपर है, इसीलिए इन को चुम्बकीय शक्तिका केन्द्र अथवा केन्द्र कहते हैं। एक तागेके सिरेपर इस प्रकारके दो फंदे वनाओ कि उनमें रखा हुआ चुम्बक सीधा लटका रहे जैसा चित्र न० २ में दिसलाया गया है । योडी देरतक चुम्बक इधर उधर घू. मता रहेगाफिर इस प्रकार ठह- रेगा कि उसका एक सिरा उत्त- रकी और और चित्र न०२ की ओर होगा | जो सिरा उत्तरकी ओर हो उसपर लाल स्याही, पेन्सिल अथवा रेतीसे पक चिन्ह बनादो जिससे यह पहचान लिया जाय कि कौनसा सिरा उत्तरकी ओर रहता है । इस प्रकार दूसरा दक्षिण

चुम्बकके गुण
प्रकार चिपट जायगे जैसे चुम्बकसे चिपटते हैं।
बीचमें विलकुल नहीं होगे, सिरोपर अधिक चिपट
जायेंगे और चुम्पफके हटानेसे पृथ्वीपर गिर
जायगे । यदि चुम्बक और लोहके टुकडोको
पृथ्वीपर ही रसते तो यह बात न दिखाई देती।
छडके पास चुम्बक लानेसे लोहेके टुकडे उससे
फिर चिपट सकते हैं किन्तु चुम्बक हटानेसे वे
फिर गिर जायगे।
यह मुलायम लोहेका टुकड़ा उस अस्थिर
चित्तवाले मनुष्यकी तरह है जो जातक सतसगमें
रहता है अच्छे काम करनेको उद्यत रहता है परन्तु
जैसे ही सतसगसे हटा कि सद्विचारोंको भी त्याग
देता है। परन्तु कडा लोहा और फोलाद इस मुला-
यम लोहेकी तरह नहीं है । चुम्बक हटालेनेपर भी
इनफे टुकडोमें कुछ चुम्यकत्व रह जाता है ।
वास्तवमें मुलायम लोहेमें भी कुछ न कुछ
चुम्बकत्र बच हो रहता है, पर यह बहुत ही कम
होता है। लोहे और फौलादमें केवल दरजेका ही
अन्तर है।
यदि लोहेकी छडके पास चुम्यफका उत्तरी
सिरा हो तो इसके उस सिरेके पास जो
चुम्यकसे दूर हे एक दिक्-सूचक लानेसे मालूम

चुम्नक सिरके पास लामो तो देखोगे कि लटके हुए चुम्म कका उत्तरी निरा उससे दूर हटने लगता है। यदि दक्षिणी सिरा लाया जाय तो लटके हुए चुम्बक- का उत्तरी सिरा उसकी ओर खिंचेगा। इसी प्रकार लटके हुए चुम्बकके दक्षिणी सिरेके पास दूसरे चुम्बकका दक्षिणी सिरा लानेसे वह हटेगा, और उत्तरी सिरा लानेसे वह खिचेगा। इन प्रयोगोंसे यह मालूम हो गया कि समान (सजातीय) सिरे एक दुसरेको हटाते हैं और असमान (विषम जातीय ) सिरे एक दूसरेको खींचते है। यदि किसी लोहेको जांचना हो कि चुम्बक है या नहीं तो उसको किसी दिक्सूचकके पास लाकर देखना चाहिये कि वह उसके किसी सिर-को हटाता है कि नहीं । हटाना (निराकरण) ही चुम्बककी पहिचान समझना चाहिये क्योंकि चुम्बक लोहेकी ओर भी खिंच पाता है। चुम्बकका एक और गुण यह है कि जो लोहे- का टुकड़ा उसके पास रखा जाता है वह भी चुम्बक बन जाता है। चुम्बकको एक लकडीके टुकडेपर रसिये, और उसके पास एक मुलायम लोहेकी छड़ उतनी ही ऊचाईपर रसिये। लोहेके छोटे छोटे टुकड़े इस छडके पास लानेसे उसी ।

।
चुम्बकके गुण
१३
जो पहले दक्षिणी था वह दक्षिणी ही रहा पर
उत्तरी केन्द्रवाले टुकडेका दूसरा सिरा दक्षिणी ओर
दक्षिणी केन्द्रबालेका दूसरा सिरा उत्तरी हो गया।
लोहेका धुरादा डालनेसे मालूम होगा कि प्रत्येक
टुकडेके सिरेपर बुरादा लग गया है और मध्य
भाग साली है । चुम्बकके दो टुकडे करनेसे उसके
जैसे दो चुम्यक पैदा हो जाते हैं, इसी प्रकार
तोड तोडकर चुम्बक्के कितने ही टुकडे क्यों न
करलें प्रत्येक भाग चुम्बक ही मिलेगा। इससे यह
समझा जाता है कि चुम्बकका प्रत्येक अणु
चुम्बक है। लोहेके प्रत्येक अणुको भी चुम्नक ही सम.
भना चाहिये क्योंकि केवल चुम्बक फेरनेसे लोहा
चुम्बक हो जाता है। उसके स्वभावमें इतना बडा
परिवर्चन अवश्य हो जाता है जिन्तु टुकडेको
चुम्बक वनानेके पहले और पीछे अच्छेसे अच्छे
काटेमें भी तोलनेसे उसके बोझमें कोई अन्तर नहीं
मिलता है। रासायनिक विधियोसे इस लोहेके
टुकडेकी जॉच करनेपर मालूम होगा कि चुम्बक
बननेके बाद भी वह ऐसा ही लोहा है जैसा पहले
था। इसलिए मानना पड़ता है कि लोहेका प्रत्येक
अणु वास्तवमें चुम्बक ही होता है। जिन
रीतियोंसे साधारण..
चुम्मक वनाते हैं,

चुम्चक ४ बनेटी की शकलका चुम्बक । (चित्र ६) चित्रन०६ ५ घोडेकी नालकी तरह मुडा हुआ अथवा नाल-चुम्बक । (चित्र १०) अब आप किसी प्रकारका चुम्बक लेकर मोजे वुननेकी सुई अथवा दूदी घडीको कमानीके टुक- डेको चुम्बक बनाले या चना बनाया पतला चुम्बक जिसको तोड सके ले ले । इसके योचमें कोई शक्तिका केन्द्र नहीं है । श्रम यदि चुम्बकको दोनों हाथोंमें ऐसे थामें कि दहने हाथम उत्तरी और वाऍमें दक्षिणी केन्द्र हो और वीचमेंसे तोडे तो श्राप यह समझेगे कि केवल उत्तरी केन्द्र दहने चित्र न०१० हाथमें और दक्षिणी केन्द्र वाएँ हाथमें रह जायगा । परन्तु प्रत्येक टुकडेके सिरोको दिक्सूचकके पास ले जानेसे ज्ञात होगा कि हर एक टुकडेमें उत्तरी और दक्षिणी सिरे हैं। जो सिरा पहले उत्तरी था वह उत्तरी ही रहा और n

1
चुम्मकके गुण
जो पहले दक्षिणी था वह दक्षिणी ही रहा पर
उत्तरी केन्द्रवाले टुकडेका दूसरा सिरा दक्षिणी और
दक्षिणी केन्द्रवालेका दूसरा सिरा उत्तरी हो गया।
लोहेका बुरादा डालनेसे मालूम होगा कि प्रत्येक
टुकडेके सिरेपर बुरादा लग गया है और मध्य
भाग साली है । चुम्बकके दो टुकडे फरनेसे उसके
जैसे दो चुम्बक पैदा हो जाते है, इसी प्रकार
तोड तोडकर चुम्बकके कितने ही टुकडे क्यों न
कर लें प्रत्येक भाग चुम्बक ही मिलेगा। इससे यह
समझा जाता है कि चुम्बकका प्रत्येक अणु
चुम्बक है। लोहे के प्रत्येक अणु को भी चुम्बक ही सम.
भना चाहिये क्योंकि केवल चुम्बक फेरनेसे लोहा
चुम्यक हो जाता है। उसके स्वभावमें इतना वडा
परिवर्तन अवश्य हो जाता है किन्तु टुकडेको
चुम्बक यनानेके पहले और पीछे अच्छेसे अच्छे
काटेमें भी तोलनेसे उसके गोझमें कोई अन्तर नहीं
मिलता है। रासायनिक विधियोसे इस लोहेके
टुकडेकी जॉच करनेपर मालूम होगा कि चुम्यक
चननेके बाद भी वह ऐसा ही लोहा है जैसा पहले
था। इसलिए मानना पडता है कि लोहेका प्रत्येक
श्रणु वास्तवमें चुम्बक ही होता है। जिन
रीतियोसे साधारण लोहेको चुम्बक बनाते हैं,
प

१४
'चुम्बक
उनका प्रभाव केवल लोहेके अणुओको एक विशेष
क्रमसे लगा देना है। यह सिद्धान्त नीचे दी हुई
परीक्षा करनेसे शीघ्र समझमें आ जायगा । एक
लोहेका चौपटा बनाओ जिसके चारों वाजू बरा-
वर हों और अलग अलग हो सकें। चारोंको चुम्बक
बना लो फिर चारोको इस प्रकार जाडो कि एकका
उत्तरी और दूसरेका दक्षिणी सिरा मिला रहे जैसा
चित्रमें दिसलाया गया है। इस चौखटेके चारों
टुकडे चुम्बक हे पर इस प्रकारका
द चौखटा साधारण परीक्षाओंसे चुम्बक
न मालूम होगा * 1 इससे यह सिद्ध
द हुआ कि साधारण अवस्थामें लोहेके
अणु-चुम्बक इस प्रकारसे जुडे रहते है कि
मालूम न हो किन्तु चुम्बक इन अणुओंको इस
प्रकार फेर देता है कि उसमें चुम्बकत्व दीख जाता
है । जव चुम्बकत्व आ जाना केवल अणुकी
रचनाका वदलना ही है तो एक अवस्था ऐसी भी
श्रा सकती है जिसमें रचनाका पूरा परिवर्तन हो
• यदि बहुतेसे चुम्बक लेकर इस प्रकार जोडे जाय कि
उनका एक चक्र बन जाय तो घुम्बकत्व विलकुल मालूम न
होगा, सम्भव है कि केवल चार चुम्नक ही लेने से कुछ
चुम्बकत्व मालूम हो।
उ

चुम्बक बनानेकी रीतियां १५ जाये और उसके पश्चात् और अधिक चुम्वफत्व लोहेमें न खाया जा सके । जब लोहा इस अवस्था- को पहुँच जाय तो उनको अवस्थाको परिपूर्ण श्रयस्था कहते है। ३-चुम्बक वनानेकी रीतियां पहले श्रव्यायमें हम यह बतला चुके है कि यदि कोई फौलादका टुकडा किसी चुम्रकके पास रस दिया जाय, तो वह चुम्बक बन जाता है। पर इस रीतिसे उसके चुम्मक बनने घडी देर लगती है और वह बलवान चुम्बक नहीं बनता। अतएव चुम्नक चनानेकी अन्य रीतियोपर विचार करना श्रावश्यक है। पहिली राति-जिस लोहेके टुकडेको चुम्बक यनाना हो, उसे जमीनपर या मेजपर रक्सो श्रोर उसका एक सिरा वाए हाथके अंगूठेसे दबायो अव दाएँ हाथमें किसी चुम्बकको पकड- कर उसका एक छोर लोहपर अगूठेके पास रखो, तदनन्तर उसे सीचकर लोहेके दूसरे छोरतक ले जाओ। फिर चुम्नकको पहिलेकी भांति लोहेपर रसकर दूसरे छोरतक सींचो । दस बारह बार

चित्र न०११
चुम्बक
चुम्बकको इसी भांति लोहेपर फेरो, पर यह
ध्यान रहे कि चुम्बकका वही छोर हर बार अंगूठे
के पाससे लोहेके दूसरे
छोरतक सीचा जाता है।
श्रय लोहेको उलट दो।
पहलेवाला छोर ही
अगूठेसे दवाश्रो और
चुम्बकका पहलेवाला छोर
ही पहलेकी भांति लोरेपर फेरो। [देखा चित्र ११]
इस रीतिमें लोहेके टुकडेके प्रत्येक भागपर
चुम्बक एक बार फेरा गया है, इसलिए इस रीति-
को एक स्पर्शकी रीति कहते हैं । यह रीति फोला.
दके छोटे छोटे तारोकेलिए, जैसे सीनेकी सुइया,
बहुत अच्छी है । परन्तु जो प्रत्येक बार चुम्बक
एक ही प्रकार न फेरा जावे तो कभी कभी सिरोंके
अतिरिक्त चुम्बकीय केन्द्र वीचमें भी उत्पन्न हो
जाते हैं।
दूसरी रीति-यह रीति स० १७४५ में निकाली
गई थी। इस रीतिसे चुम्बक बनाना हो तो दोनों
हाथोंमें एक एक चुम्बक लेकर उनके विषम
जातीय सिरे (केन्द्र) लोहेके टुकडेके (जिसे चुम्बक
बनाना है) बीचमें रखो और तदनन्तर प्रत्येक

चुम्बक बनानेकी रीतियाँ
चुम्बकको लोहेसे स्पर्श कराते हुए, लोहेके उस
सिरेतक ले जाओ, जो उसके निकटवर्ती हो । जय
चुम्बक लोहेके दोनों छोरोतक पहुच जाय, तो
फिर उन्हें लोहेके मध्यमें पहलेकी भांति लाकर
रखो। तदनन्तर पहले की भाति सीचकर लोहेके
दानों छोरोतक ले जानो और फिर लोहेके मध्यम
लाकर रखो। इस प्रकार दस बारह वार फेरनेसे
लोहेका टुकडा चुम्बक बन जायगा। देखो चित्र १२]
चिन न०१२
इस रीतिसे लोहेके बडे बडे टुकडे भी अच्छे
चुम्बफ बनाये जा सस्ते थे, अतएव इस रीतिमें
उन्नति करनेकी चेष्टा की गई । जो परिवर्तन इस
रीतिमें किया गया, वह नीचे दिया जाता है।
दो चुम्बक लो और उनको इस प्रकार एक
रखामें रखो कि उनके विपम जातीय सिरे थामने
सामने हो । इन दोनों सिरोंपर वह लोहेकी छड
रखो जिसे चुम्बक वनाना है। अपदो और चुम्वक
लेकर, उनको दोनों हाथोंमें पकड,और उनके विपम
जातीय सिरे मिलाकर, लोहेके टुकडेके बीचमें

चुम्बक रखो, पर यह ध्यान रहे कि इनके विपम जातीय सिरे उसी क्रमसे रये जायं जैसे नीचेवाले चुम्व- कोंके रखे है, अर्थात् यदि दाईं तरफ रखे हुए नीचेवाले चुम्बकका छोर उत्तरी हो तो दाएँ हाथमें थामे हुए चुम्बकका भी उत्तरी हो (यहा पर चुम्यकोंके उन्हीं छोरोंका विचार है, जो लोहे- से स्पर्श करते है)। चुम्कोंके रसनेकी विधि चित्र १३ से स्पष्टतया समझमें श्रा जायगी। चित्र न० १३ ऊपरके चुम्बकोका झुकाव दो या तीन अशके करीव होना चाहिए । यद्यपि झुकाव न्यूनाधिक हो तो भी लोहा चुम्बक अवश्य बन जायगा, पर प्रयोगोंसे सिद्ध हुना है कि दो या तीन डिगरीका ही झुकाव रखनेसे चुम्वक अच्छा बनता है। बडे और चौडे टुकडोफेलिए यह रीति बहुत अच्छीहै परन्तु उनकी मोटाईचसे अधिक न हो। जितना कड़ा फौलाद होता है उतना ही प्रवल

चुम्यक बनानेकी रीतिया
चुम्बक होता है । इस रीतिमें एक भागपर एक
चुम्बक फेरा जाता है और दूसरे भागपर दूसरा
इसलिए इस रीतिको पृथक् स्पर्शवाली रीति
कहते हैं । इस रीतिसे वीच बीचमें केन्द्र (गौण
केन्द्र) बन जानेका कोई भय नहीं है। इसी कारण
दिक्सूचकके चुम्नक इस रीतिसे बनाये जाते है।
तीसरी रीति-यह सब तरहके छोटे बडे
चौडे और मोटे टुकडोकेलिए उपयुक्त है। दो
चुम्बको विषम जातीय सिरोंके बीचमें लफडी
या कागके चौथाई इच मोटे दो टुकड या इतनी
ही मोटी एक लकडीको पट्टी देकर बाघ लो
जैसा चित्र १४ में दिसलाया गया है । इस जुट्टको
लोहेके टुकडेपर रखकर एक
- सिरेसे दूसरे सिरेतफ ले
जाश्रो, फिर दूसरे सिरेसे
द लौटालकर पहले मिरेपर ले
प्रायो। इसी प्रकार दस या
बारह दफे फेरो। लोहेका टुकड़ा चुचक बन
जायगा, पर बहुत ही अच्छा चुवक बनानेकेलिए
इस रीतिमें यह परिवर्तन करना पडेगा -लोहेको
दूसरो रीतिको नाई दोचुम्बकोपर रखकर जुट्टको
लोहेके वीचमें रखो, बीचसे किसी एक सिरेतक
उ
चिन न०१४

२० चुम्बक ले जानो, वहांसे दूसरे सिरेतक लौटाल लाओ, फिर दूसरे सिरेसे चीचतक लामो और बीचमै पहुचनेपर जुट्ट सीधा ऊपर उठा लो। थोडी देर वाद फिर वीचमें रखकर, वीचसे एक सिरेतक एक सिरेसे दूसरे सिरेतक और दूसरे सिरेसे बीच- तक फेरो । प्रत्येक बार उठाने और रखनेके बदले बीचसे एक सिरेतक इससे दुसरेतक ओर दूसरेसे फिर पहलेतक--इस प्रकार दस या बारह चार एक सिरेसे दूसरे सिरेतक ले जाकर, दूसरे सिरसे वीचमें लाकर सीधा ऊपर उठा लो । इस प्रकार यह जुट्ट प्रत्येक भागपर उतनी ही बार फेरा जावेगा। दो चुंबकोंके जुट्टके बदले नालचुंबकसे भी काम लिया जा सकता है। बहुत ही प्रवल चुंबक बनानेकेलिए लोहे- के टुकडेको दो चुवकों 12 पर रसनेके बदले विद्यु- चुम्बकके सिरोपर रस- दो और नालचवक लेकर उसपर उसी प्रकार चित्र १५-इममें चार फेरो जैसा ऊपर बत- लोहेके टुकडे एक सीधी लाया गया है । इस रस कर चुम्बक बनाये रीतिसे बहुतसे टुकडे गये हैं। यरावर रखकर एक ही बार चुम्बक बनाये जा मा । चित्र न० १५ चुम्बक बनानेकीरीतियां सकते हे जेसा चित्र १५ में दिसलाया गया है। बीच- वाले छड प्रवल चुपक यनते है और किनारे- वाले दुर्बल होते है । इसलिए आपसमें एक दूसरेकी जगह बदलकर वोचवालोंको किनारपर और किनारेवालोको बीचमें बदलकर रसनेसे सब परिपूर्ण चुबक बन सकते हैं। क्योंकि वोचके भागमें सिरोके भागसे अधिक चुवकत्व होता है इस रीतिसे ऐसे चुंबक नहीं बनाये जाते है जिनके प्रत्येक भागमें समान चुम्बकत्व होना चाहिये जैसे दिक्सूचकोंके चुम्बक । उन सब लोहेके टुक- डोको, जिन्हें चुम्बक बनाना हो, एक सीधी लकी- रमें न रखकर चौखटकी शकलमें रख सकते है। एक कोनेसे नालचुम्बक फेरना प्रारम्भ किया जावे और दस बारह चकर उस चौखटके चारों और लगाकर प्रारम्भमें जिस स्थानपर था, वहा लाकर उठा लिया जावे। यदि नालचुम्बक अच्छा हो तो इस रीतिसे बहुत अच्छे चुम्बक बनते हैं। चुम्बकोको अलग करते समय उनके जोडोंपर एक लोहेका टुकडा दोनों चुम्बकोपर रखकर अलग किया जावे। अलग करते समय बहुत सा चुम्बकत्व जाता रहता है, परन्तु इस उपायसे बहुत कमी नहीं होती। ७ २२ . चुम्बक कुलम्ब बड़े वैज्ञानिक हो गये हैं। उनके काम- से भागे चलकर हमको अधिक परिचय होता जायगा। उन्होंने भी अपने प्रयोगोंकेलिए चुम्बक बनाने में कुछ परिवर्तन सहित इसी रीतिका अय लम्बन किया। उनके चुम्बक इस प्रकारसे पडे नही थे जैसे ऊपर परन्तु कुछ टेढे रस्खे गये . चित्र न०१६ थे जैसे चित्र १६में दिखलाये गये है । एक लकडीके टुकडेको इन दो चुम्बकोंसे दबाकर बीचसे सिरे- तक और सिरेसे दूसरे सिरेतक इत्यादि दस बारह वार फेरकर बीचसे उठा लेते थे। छडोंको दूमरी रीतिकी नाई दो चुम्बकोपर रखते थे। चित्र में यह भी दिसलाया गया है कि वे एक चुम्बककी जगह चुम्बकोंके जुट्टसे काम लिया करते थे। यह जुट्ट इस प्रकार बनाये जाते थे जैसाकि चित्र १७ व १८ में दिखाया गया है। इनके सिरोंपर लोहके टुकडे लगा दिये जाते हैं और ऊपर नीचेके दोनो चुम्बकोंके चीचमें एक ऐसा चुम्बक रखा जाता है जो दानांसे चुम्बक बनानेकी रीतिया ૨૨ लम्बा हो । मोटे चुम्बक नहीं लिये जाते हैं । दो चुम्बको साधारण जुहकी प्रबलता उनकी प्रवल- तात्रोके जोडके बराबर नहीं होती इसलिए ही यह युक्ति निकाली गई । इन सब चुम्यफोंके उत्तरी सिरे एक और रहते थे और एक लोहेका टुकडा उनके सिरोपर पेचोसे फस दिया जाता था। चुम्बकाका जुट्ट एक दूसरी रीतिसे भी बनाया जा सकता है । एक समान चुम्बकोको सीढियों BENEF चित्र न०१७ चित्रन०१८ [चित्र १७ म १२ चुम्बकोका एक जुट्ट दिखाया है। चार चार चुम्बकोको तीन. तह है। उपरसे देसनेमे जुह ऐसा दिपाइदगा जैसा चित्र १७ के अपरके भागम दिखाया है। वरापरसे देखनेपर, नीचे दिये हुए चिरक समान दिखाई देगा। पीचके चारों चुम्बक उपर और नीचेकी तहोंके चुम्बनोसे अधिक लम्बे है।] की तरह जोड देते ह जैसा चित्र १८ में दिखलाया गया है। एक को छोडकर एकका सिरा थोडा सा आगे निकाल दिया जाता है। ऐसा समझा जाता है कि इस जुट्टमें एक सिरेका दूसरेपर

चुम्बक
कम प्रभाव पड़ता है। एक उत्तरी सिरा दूसरेके
उत्तरी सिरेमें दक्षिणी सिरा उत्पन्न करता है
जिससे उस सिरेकी प्रबलता कम हो जाती है।
नालचुम्बक भी इन्हीं रीतियोंमें थोडा सा
परिवर्तन करनेसे बनाया जा सकता है। उस
लोहेकी नालको जिसे चुम्बक बनाना चाहते
हो किसी जगह रखो। (अच्छे चुम्बक बनाने
केलिए १०॥ इच लम्बी, १॥ इंच चौडी और
इच मोटी छड लो और उसे इस प्रकार मोडो
कि ६॥ इच लम्बी नाल बन जाय । दोनों बाजु
ओमें ॥ इचका अन्तर हो)। श्रव (१) दोनों
सिरोंपर एक लोहेका टुकडा रस दो (देखो
चित्र १६) या (२) इस नालके एक सिरेके
।
चित्र न०१६
ल-लोहेका टुकडा
सामने एक चुम्बकका उत्तरी सिरा और दूसरे
सिरेके सामने दूसरे चुम्यकका दक्षिणी सिरा

4
चुम्बक बनानेकी रीतियाँ
रेको उत्तरी बनाना चाहो उसके
रा हो और दूसरेके
। फिर
म्बक हायमें लेकर
nX
त्तरी),सिरा
1)
.
بال
।

२८ चुम्बक इन तीनों रीतियों में चुम्बक बनानेकेलिए एक, दो अथवा अधिक चुम्बकोंकी आवश्यकता पडती है किन्तु विना चुम्पकके भी घुम्बक वन सकता है। सडी या उस दिशामें रखकर जो धागे बतायी जावेगी इस छडके ऊपरी सिरेपर हथोडे. से दस बारह बार चोद लगाओ । यदि इस छडके नीचे लोहेका टुकडा रख लिया जावे तो और भी अच्छा हो । उन देार्म जो भूमध्यरेखाके उत्तरमें है नीचेका सिरा उत्तरी और ऊपर का सिरा दक्षिणी हो जायगा किन्तु उन देशोंमें जो भूमध्यरेखाके दक्षिणमें हैं नीचेका सिरा दक्षिणी और ऊपरका उत्तरी होगा। इससे यह फल निकाल सकते हैं कि पृथ्वी स्वयं ही चुबक है और इस पार्थिव चुवकका दक्षिणी सिरा उत्तर- में और उत्तरी सिरा दक्षिणमें है। (देखो चित्र २२) ऊपर दी हुई रीतियां वही मनुष्य काममें लायेगा कि जिसके पास बिजली नीचे छड और ऊपर हतौडा है। उत्पन्न करनेका उपाय चित्र न० २२

२६
चुम्बक बनानेको रोतिया
न हो अथवा जो बिजलीके गुणोसे अपरिचित
हो । विजलीकी धारासे चुम्बक बनानेकी रोति
सबसे सरल और निर्दोप है।
रई या रेशमसे ढके हुए ताचेके मोटे तारोंकी
एक छोटी सर्पिल बनायो और प्रवल विद्यद्-
धारा उसमें वहाश्री (चिन २३) । इस सर्पिलमेसे
चित्र न० २३
एक ही बार वीरे धीरे निकालनेसे लोहेको छड
परिपूर्ण चुम्नक बन जायगी दो या तीन बार
निकालनेसे तो अवश्य ही। इस रीति में सर्पिल
सडा रसना पडेगा किंतु पडे सर्पिलोको लिटा
देते हैं और छडॉको उनके अन्दर रस देते हैं।
यदि सर्पिल खडा हो और इसके प्रत्येक चक्करमें
धाराका प्रमाह वापसे दाहिनी ओर होता हो तो
। छडका नीचेका सिरा उत्तरी और ऊपरका
. सिरा दक्षिणी होगा।
यदि बिजलीसे नालचुम्बक बनाना हो तो रुई
या रेशम लिपटा तावेका तार इस नालपर लपेट
- देंगे और इस तारमें विद्युद्धारा बहावेंगे। यह

३२
चम्यक
कि इसका दक्षिणो सिरा उत्तरकी और हो तो
पृथ्वो उसे उत्तरी सिरा बना देनेका यत्न करती
रहेगी जिसके कारण चुम्बकका चुम्बकत्व घटता
जावेगा। इसलिए दो दड चुम्बक एक यक्समै
इस तरह रखते हैं कि एकका उत्तरी और दूसरेका
दक्षिणी सिरा पक और हो और दोनों ओर दो
लोहेके टुकडे उनके विषम सिरोको जोडते हुए रख
देते है जैसा कि चित्र २६ में दिखलाया गया है।
नालचुम्बकके सिरी-
को भी एक लोहेके
टुकडे जोड देते है।
चवकको पृथ्वीपर या
श्रार किसी चीजपर
गिराना नहीं चाहिये
चित्र न० २६
न उसको कभी हतोडे ल-लोहेका टुकड़ा।
या और किसी चीजसे ठोकना चाहिये । और कभी
बहुत गरम भी नहीं करना चाहिये। यदि १०००
श तक गरम किया जाये तो उडा होनेपर फिर
अपनी पहली अवस्थापर श्रा जावेगा किंतु इससे
अधिक गरम करनेसे चंबकत्व सदाकोलिए कम
हो जाता है । यदि किसी चुवकका चुंबकत्व
दूर करना हो तो उसको (चुम्बकीय) पूर्व पश्चिम

चुम्नककी प्रवलताकी जाच दिशामें रखकर तपाकर लाल कर लो और फिर उसी दिशामें रखकर उसे उडा कर लो, चुम्ब- कत्व बिलकुल फूच कर जायगा। ५-चुम्बककी प्रबलताकी जांच चुम्बक बनानेकी रीतियों में यह बतलाया गया है कि एक रीतिसे दुसरीकी अपेक्षा अधिक यसवान चुम्बक बनते है, किंतु इस पातकी जाच करने की कोई विधि नहीं चताई गयी। बिना जाचके यह कह देना उचित नहीं है कि एक रीति दूसरी रीतिसे अच्छी है । प्रपलताकी जाच तीन रीतियोंसे हो सकती है। यहा केवल उनका वर्णन किया जायगा और आगे चलकर यह बतलाया जायगा कि इन रीतियोंसे प्रगलता गोकर जाची जा सकती है। पहिली रीति-एक लकडीका ऐसा चौकोर यक्स लो जिसमें कमसे कम एक तरफ शीशा लगा हो श्रोर जिसका ढरना शीशेफा हो। इस ढकते के बीच- में एक छेद होना चाहिए । इसके पेंदेमें एक ऐसा कागज चिपका लो कि जिसमें डिग्रिया वनी हो। ढकनेके छेदमें एक पीतल, तावे या शीशेकी एक नली लगा, लो। इस नलीके ऊपरके सिरेपर एक ३ . . । 'चुम्बक तक पहुच सकता है । इस (सूचक) से चुम्बककी जगह मालूम करने में बडी आसानी होती है। टोपी को घुमाते जाओ,जबतक कि चुम्यक अपनी पहली जगहसे ५ या १० डिगरी हट जाय और टोपीके चकरोको भी लिख लो । टोपीपर निशान होने के 'कारण ई, चकर भी मालूम हो जायगा। तागेकी ऐंठन निकाल डालो और रकायमें दूसरे चुम्बकको रखो और इसको भी ५ या १० डिगरी हटानेकेलिए जितने चक्कर टोपीको देने पडे उनको लिख लो । यदि पहिलेकी वरावर चक्कर देने पर्डे तो दोनो चुम्बक एक समान बलवान है । यदि दुसरेकेलिए पहलेकी अपेक्षा दुगने चकरोंकी आय- श्यक्ता हो तो दूसग चुम्बक करीव करीब दुगना बलवान है। इसी तरह चक्करोंकी दूसरी सरयाको पहली सरयासे भाग देनेसे दूसरे चुम्बक्की प्रबलता पहलेकी अपेक्षा करीब करीब मालूम हो जायगी। दूसरी रीति-वक्सके अन्दर रावमें एक चुम्बक रखो और उन दोनों चुम्बकोमेंसे जिनकी प्रबलताकी तुलना करना हो एक चुम्बकको इस यक्ससे थोडी सी दुरीपर रकाववाले चुम्बकके

चुम्बकी प्रबलताकी जाच
पूर्व या पश्चिमं उतनी ही ऊँचाईपर इस प्रकारसे
रसो कि रकाववाले चुम्बकके अक्षके साथ इस
चुम्बकका अक्ष समकोण बनाये, जैसा चित्र २७ में
दिसलाया गया है। वास्तवमें आसानीकेलिए.
लकडी या पीतलका गज इस वरसमें इस प्रकारसे
जड़ देते है कि यक्सके अन्दर तो गज नहीं रहता
चित्र न० २८
ग-गज, घ-घोडी, स-सूचक,
-
किंतु उसके दोनो तरफ बाहर निकला रहता है और

1 चुम्बक इसी गजपर एक घोडीसी होती है जिसपर चुम्वक रख दिया जाता है। इस यत्रको चुम्बकत्व मापक कहते हैं । चुम्बकके पास होनेसे वकसके भीतरका चुम्बफ घूम जायगा और किसी दूसरी स्थितिमें ठहरेगा। बाहरका चुम्बक इतनी दूरीपर रखना चाहिए कि भीतरवाले चुम्बककी दोनों स्थितियों में पाच या दस डिगरीसे अधिक कोण न हो। इस कोएको देखकर लिस लो। यह कोण इस चुम्बक द्वारा विचलन ( Deflection ) हुआ । अब घोडीपरका चुम्यक हटाओ, देखोगे कि अव लटका हुआ चुम्बक फिर उसी जगह श्रा- कर ठहरता है, जहां पहिले घोडीवाले चुम्बककी अनुपस्थितिमें ठहरा था । दूसरे चुम्बकको घोडीपर रखकर उसके द्वारा जो लटके हुए चुम्बकका विच- लन हो देख लो। यदि दोनों विचलन बराबर है तो दोनोंकी प्रबलता बराबर है और यदि बरावर न हो तो दूसरे विचलनको पहले विचलनसे भाग देनेसे दूसरे चुम्बककी प्रवलता पहलेको अपेक्षा मालूम हो जायगी। तीसरी रीति-ऊपरकी दोनों रीतियां कठिन हैं। उनमें बहुत सीसामग्री इकट्ठी करनी पडती है,परतु उनसे चुम्बकोंकी प्रवलताकी तुलना करना सुगम .

. चुम्यककी प्रबलतासी जांच ३६ है। इस तीसरी रीतिमें सामग्री विशेषकी श्राव- श्यकता नहीं होती, परतु दो चुम्बकोंकी प्रबलता- की तुलना करना कठिन है। इसकी सरलताके कारण हम पतला देना ही उचित समझते हैं। एक बक्समें चम्बक लदका लीजिए या एक मामूली बोतल (चित्र ३६) लेकर उसका पैदा अलगकर लीजिये,तदनन्तर उसके मुंहपर एक छड रखिये, जिसमें डोरो बान्धकर चुम्बक बोतलके अन्दर लटकाया जा सके। डारेके निचले छोर- पर कागजकी एक रकार बनाकर लटका दीजिये और उस रकायमें चुम्मक रप दीजिये । इसको कम्पन वक्स कहते हैं। ऊपरके प्रयोगोंके रकावमें रफ्से हुए चुम्यफके पूर्व या पश्चिममें चुम्यफ या लोहे का टुकडा लाने और हटानेसे चुम्बक क्षितिज धरातलमें इस तरह हिलने लगेगा जैसे कि किसीघडीका पहिया (sheel)क्षितिज धरातलमें या घटेका लटकन ऊर्ध्व तलमें ठहरनेके स्थानके दाई श्रीरवाई और हिलते नोट-पदि विचलन १० या १२ हिंगरीसे अधिक होतो एक पोणको स्पर्श रेखाको (tangent) दूसरे कोणके tangent) म्पर्श रेखासे भाग देना पड़ेगा।

४० । चुम्बक रहते है। जिस प्रकार घटेके लटकनके प्रत्येक झोटेमें (अर्थात् दाएँसे वाएंको या वापसे फिर दाएको जानेमें ) सदैव एक बरावर ही समय लगता है,उसी भांति क्सिी चुम्बकके प्रत्येक झोटेम भी उतना ही समय लगेगा। चुम्बक्के १०, २० या और भी अधिक झोटोंमें जो समय लगे उसे निकालकर झोटोंकी सख्यासे भाग देकर एक भोटेका समय निकाल लो । इसी प्रकार दूसरे चुम्बकके भी एक झोटेका समय निकाल कर पहले चुम्बकके समयके धर्गको दूसरे चुम्बकके समयके वर्गसे भाग देनेसे दूसरे चुम्बरकी प्रबलता पहले की अपेक्षा मालुम हो जायगी। उदाहरण-यदि पहले चुम्चकके २० झोटोंमें १ मिनट लगे, तो उसके एक भोटेका समय ३ से. हुना और यदि दूसरे चुम्बक्के २० भोटीको ४० सेकंड लगेंतो इसके एक भोटेका समय २ सेकंड दूसरे चुम्बककी प्रबलता हुआ। पहले चुम्बककी प्रबलता अर्थात् दूसरा चुम्बक पहलेसे २३ गुना बलवान है। इस बातका ध्यान रहना चाहिये कि जिन कंड २ ३ D .

चुम्बककी प्रवलताकी जांच । चुम्बाकोंकी जॉच की जा रही है, वह एफसे लम्बे । चौडे और मोटे हो। नीचे हम एक सूची देते है जिसमें कई : रीतियोसे बनाये हुए चुम्बकोंके झोटोंका बनाया गया १ किस रीतिसे चुम्बक एक झोटेया धापेक्षिक प्रवलला समय सेकड़ों में १-दूसरी, रीनिसे, २० घार स्थिर चुम्बक एक पृष्ठपर फेरे गये २२१३ २-दूसरी रीतिसे, चुम्बक चारों पृष्टापर फेरे गये १४८७ (२२ १३) ३२-२२१ ३-तीसरी रीतिसे (१४८७)२ दो चुम्बक लेकर ३६५ ४-तीसरी रीतिसे, नालचुम्बक लेकर ४७१ ५-तीसरी रीतिसे विद्युत् चुम्बके सिरों- १०१६ पर रखकर नालचु- म्बक फेरनेसे ઉપર જર चुम्बक समय निकाला गया है और उस समयसे उनकी प्रवलताकी तुलना की गई है। इससे स्पष्ट है कि जो रीति २०वें पृष्ठपर चतलायी गयी है उसीसे बहुत प्रवल चुम्बक । बनते है। Ahe । ५-चुम्बकमें चुम्बकत्व कहां रहता अब यह प्रश्न उठता है कि चुम्बकमै चुम्बक- त्व कहां रहता है और शक्तिका केन्द्र कहा होता है। लोहेका बुरादा धुरककर कुछ ठीक ठीक पता चलना कठिन है। जो रीति नीचे दी जाती है उससे पूरा पूरा पता चल जायगा । एक मुलायम लोहेकी नोकीली कील या छड तो। इसको तराज- के उस कुन्देसे जिसमें पलडा लटकाया जाता है एक तागेके टुकडेसे बांध दो। दूसरे पलडेमें बांट रखते जाओ जबतक कितराजूकी डडीसीधी न हो जाय । तराजू बहुत अच्छी होनी चाहिये जिससे हलकी चीजें बहुत शुद्धतासे तोली जा सके जैसी प्रयोगशालाओं में काममें आती हैं। इस लोहेकी कीलके नीचे एक लकडी- की तिपाई इस प्रकार रखो कि पलडेसे न

चुम्बकमे चुम्बकत्व कहा रहता है
लम्बाईकेलिए १ इन्च रखा हे जैसे नकशोंमें सो
सौ मीलोकेलिए श्राधा आधा चोथाई चौथाई
इन्च रसते हैं । परिमाण, इससे भिन्न भी माना जा
सकता है । १,४,८ इन्च लम्बी लकीर भी ली जा
सकती थी। बडा चित्र बनानेकेलिए यडा परिमाणु
और छोटा चित्र बनानेकेलिए छोटा परिमाण लेते
है । इस चुम्बकके सिरेसे ३,१, १६, २ इच इत्या-
दिकी दूरीनाली जगहके ऊपर कील रसने-
से जो उसके बोझमें अधिकता प्रा गई थी, यह
मालूम कर ली गयी है ।।' इस अधिकताका
भी एक परिमाण मानकर हर जगह एक
एक लम्ब खडा कर लो । एक हिस्से में लम्ब
ऊपरकी और हो और दूसरेमें नीचेकी
और, क्योंकि एक ओर उत्तरी चुम्बकत्व है
और दूसरी ओर दक्षिणी । यदि इन लम्बोके
सिरोंको जोडती हुई एक रेसा संची जावे तो वह
ऐसी होगी जैसी कि चित्र २६ में बनी है। इसको
चम्बकके चुम्बकत्वका चक्र कहेंगे । यह वक्र हर
कोलके बदले एक लोहेको गोली लेते है और
प्रत्येक भागमे छुपा देत हैं और जो बोझ
मालूम करते हैं।

४६
चुम्बक
चित्र न०३०
-
चित्र न० ३१
देक
HI
चित्र नं. ३२

चुम्बकमें चुम्बकत्व कहा रहता है
चुम्बककेलिए भिन्न भिन्न आकारका होगा ।
किसीकेलिए चित्र ३० का सा और किसीकेलिए
चिर ३१ का सा हो सकता है। जिसकेलिए चक
चित्र ३२ का सा हो उसको साधारण चुम्बक
-
क
0
चित्र न० ३३
कहते हैं। जिस चुम्बकका चक्र चित्र ३१ का
साहो उसकेलिए यह कहा जा सकता है कि इसका
चुम्बकत्व केवल दो ही जगहा है। जिन चुम्यकों-
में गौण केन्द्र होते है उनके चुम्बकत्वके चक्रका
आकार चित्र ३३ का सा होगा।
-
चित्र न० ३४
ऐसे वक्रके आकारसे यह तुरन्त पता चल
जाता है कि चुम्बक ठीक ठीक बना है या नहीं।
दिक्सूचकके चुम्बकत्वका वक्र चिन ३२ का सा

-
-
४.
चुम्बक
होना चाहिए । छोटे चुम्बकोका वक्र ऐसा ही
होता है।
चित्र न० ३० और ३१ में क और ग के बीचके
भागको उदासीनताका भाग कहते हैं। ऐसा मालूम
पडता है कि इस भागमें चुम्बकत्व है ही नहीं।
चित्र ३२ वाले चुम्बकमें उदासीनताका भाग वडा
नहीं है परन्तु • पर उदासीनताका भाग है।
कूलम्बने अपने प्रयोगोंकेलिए जो चुम्यक
बनाये उनके वक्र ३० और चित्र ३१ के समान थे।
एक चुम्बकके साथ दूसरा चुम्बक
जोड़नेसे
जुट्टका वक्र दोनोंके वक्रसे भिन्न होता था । इस
जुट्टके वक्रो उदासीनताका भाग कम होता था।
चुम्बकाकी संख्या बढानेसे कम होता चला जाता
था जबतक कि चिन न० ३२ का सा (साधारण चुम्बक
का सा) हो जाता था । इसके पश्चात् सख्या
चढानेसे जुट्टका चुम्नकत्व बढ़ता नहीं। और
चुम्बक जुट्टमें जोडना केवल लोहा खराव करना
है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि बहुत ज्यादा
चुम्वकोके जुट्ट बनानेसे कोई लाभ नहीं-एक
विशेष सख्या ही लेना उचित है।
-अबतक केन्द्रका प्रयोग जरूर किया परन्तु
,
-

चुम्यक चुम्यफत्व कहा रहता है ४४ कोई परिभाषा नहीं दी। वास्तवमें ठीक ठीक परिभाषा घोके घनानेके पश्चात् ही दी जा सफती थी। वक्र और उस रेसाफे, जो चुम्यक- को सूचित करती है, बीचमें जो जगह अथवा क्षेत्र हे उसको गरुत्व केन्द्र नियालकर, इस विन्दु- से चुम्वर चाली रेखापर एक लम्ब डालना चाहिय । जहा यह लम्म चुम्यफवाली रेसासे मिले उस विन्दुको चुम्वफत्वका केन्द्र कहना चाहिये। यदि चक्रका श्राकार टेढा मेढ़ा न हो परन्तु बहुत सीधा हो, जैसा साधारण चुम्ब का चित्र ३३ में दिखलाया गया है, तो केन्द्रका निकालना सुगम है। यहा वक्र और चुम्बकवाली रेखा मिलकर एक त्रिकोण बनाते है। त्रिकोणका गरुत्ववेन्द्र उस रेसा- पर होता है जो एक कोणसे सामनेवाले भुजके मध्य विन्दुमेंसे होती हुई सेंची जाये। यह रेखा चित्र ३५ में खेंची गयी है। इस रेसाके ३ भाग कर लो भुजसे पहले भागका जो विन्दु य है वही त्रिकोणका गुरुत्वकेन्द्र है। इससे वल एफ लम्ब क० पर गिराया गया है। यह क० के साथ स पर मिलता है, ल ही चुम्बकत्वका केन्द्र हुआ। चित्र ३५ में ल फी दूरी ० से नाप लो और परिमाणके हिसायसे जो दूरी निकले उसको चुम्बकके मध्य - चुम्यक भागसे नापकर ल का स्थान चुम्बकपर निकाल लो। चुम्बकके चुम्बकत्वका केन्द्र मालूम हो जायगा। रेसा गणितके नियमोंके अनुसार यह चुम्यककी आधी लम्बाईकी तिहाई दूरीपर चुम्बक- के सिरेसे होना चाहिये। व क ल चित्र न० ३५ क-सिरा, • एक चुम्बकका मध्य, म-कग का मध्य विन्दु ऐसा चुम्यक जिसका चुम्बकत्व सिरेसे लेकर मध्य स्थानतक फैला हुआ न हो किन्तु एक स्थानपर ही एकत्रित हो जैसा कि चित्र ३२ वाले वकसे मालूम होता है, चुम्बकोंके आकर्षण और निराकरण के नियम मालूम करनेके काम आता है। यह मोटाई और चौडाईकी अपेक्षा यहुत

चुम्बकमै चुम्बकत्व कहां रहता है
लम्बा होता है। यदि गोल हो तो यह कहाजासकता
है कि उसकी लम्बाई सदैव मोटाईकी ४०० गुणी
या इससे अधिक होगी परन्तु कम नहीं। ऐसे
लम्बे चुम्बकोको विद्युतधारासे बनाना आसान
और सम्भव है। और किसी रीतिसे बनाना तो
यात ही कठिन होगा।
दूसरी रीति-उपरोक्त रीति सरल अवश्य हे
किन्तु आजफल काममें नहीं आती, क्योंकि
और रीतिया इससे भी अधिक सरल है।
इन दो रीतियों से जिनको अभी हम घर्णन
करेंगे, पहिली रीति तो बहुत आसान है परन्तु
दूसरीकेलिए कुछ सामग्रीकी आवश्यकता होगी
और उसके समझने में भी कुछ कठिनाई पड़ेगी।
तो भी हम पाठकोंकी सुविधाकेलिए इसका
थोडासा वर्णन यहां दे देंगे, जिससे उनको इस
सम्वन्धके सय प्रयोग एक ही स्थानपर मिल
जाय।
जिस प्रकार कि चुम्बकको प्रवलता निकालने-
केलिए तीसरी रीतिमें चुम्बकको एक बक्समें या
वे पेंदेकी बोतलमें भूलनेफेलिए लटकाया था उसी
प्रकारसे एक चुम्बक किसी वक्समें लटका लो

५२ चुम्बक और इसके एक झाटेका समय निकाल लो। इस बोतलके याहर एक चगुलमें (clamp) उत्तर ओर जिस चुम्बकके चुम्बकत्वका चक्र निकालना हो इस प्रकार - लगाया कि ऊपर नीचे सिस काया जा सके, पर उसकी दूरी लटके हुए चुम्मक से उतनी ही बनी रहै। अब इस चुम्बकका निचला सिरा लटके हुए चुम्बकसे समतल रख कर, लटके हुए चुम्यकके एक झोटेका समय निकाल लो। उत्तरी सिरासामने होनेसे यह समय बढ जायगा और दक्षिणी सिरा सामने होनेसे घट जावेगा। पहिले समयके वर्गको दूसरे समयके वर्ग- से भाग दो । उत्तरी सिरा यदि नीचे हो तो इस क ब -- चित्र ३६ कहा, च, चुम्बक च-लटका हुआ चुम्बकीय-वोतल

चुम्बकमे चुम्बकत्व कहां रहता है ५३
भजन फलको १ मेसे घटा लो और यदि दक्षिणी
सिरा नीचे हो तो इस भजन फलमेंसे १ घटा दो।
इस वाकी निकालनेसे जो सख्या मिलेगी वह
चुम्बकके उस भागके चुम्बकत्वकी सूचक होगी
जो लटके हुए चम्बकके सामने था। इसी प्रकार
प्रत्येक भागको लटके हुए चुम्बकके सामने लाकर
उस भागके चुम्बकत्वका अदाजा निकाल लेना
चाहिए और फिर ऊपर दी हुई रीतिके अनुसार
चम्बकत्वका वक्र खीच लेना चाहिए।
उदाहरण-यदि लटके हुए चुम्बकके एक झोटेका
समयरसेकड हो ओर किसीचुम्बकका उत्तरी सिरा
चोतलके बाहर लटके हुए चुम्बकके सामने रखनेसे
उसके झाटेका समय २५ सेकड हो जावे तो घर
सख्या जो चुकम्यकत्वकी सूचफ होगी इस प्रकार
निकाली जाती है।
(२३)-२२
-
२

१४
चुम्बक -
२५
ܒܬ
।
॥
२५
४
7
४
11
-
॥
२५
-
r
pan
यदि अब कोई दूसरा भाग चुम्बकका- लटके
हुए चुम्बकके सामने लाया जाये तो उससे
झोटेके समयमें अवश्य ही अन्तर हो जावेगा।
मान लो कि यह समय २९ सेकंड हो गया तो इस
भागके चुम्बकत्वकी सूचक सख्या
इस प्रकार
निकोलो।
-
+
२१
Pla
-

चुम्बकमें चुम्बकत्व कहा रहता है
५५
%
3D
इसी प्रकार हरएक भागको उस लटके हुए
चुम्बक्के सामने लाकर उसके भाटेका समय
निकालकर यह सख्याएँ निकाल ला जिनसे धक
सेंचा जा सकता है। इस बातका ध्यान रहे कि
चुम्बक ऊपर नीचे खिसकाते समय, लटके हुए
चुम्यकसे, उसफी दूरीमें कोई फरक न श्रावे ।
तोसरी रीति-एक छोटी धिर्नी या रील (जैसी
कि तागमें लिप्टी हुई चाजारमें मिलती है)
जिसका छेद इतना बडा हो कि चुम्बक आसानीसे
जा सके लो। एक पतला रेशम या रुईसे लिपटा
हुया तावेका तार लेकर इसपर तागेकी नाई
लपेट लो। इसके दोनों सिरे दो छेदांमसे बाहर
निकले रहने चाहिएँ जैसे कि प्रायः छेद करके
तागेका सिरा बाहर निकाले रहते हैं जिससे
तागा खुलने न पावे । १०० या ५० लपेटोंसे अधिक

५६ चुम्बक लपेट देने की आवश्यकता नहीं है। तारके दोनों सिरोंको तो विद्युद्धारामापक के (धारामापक) दोनों सिरासे जोड दो । धिर्नीको चुम्बक के बीच में रखकर दाई (बांई) और इच खिसकाओ। १ ध O - चित्र ३७-ध-धिर्नी, त-तार, च-चुम्बक, ध-धारामापक । धारामापककी सुई अपनी स्थिर जगहसे थोडी सी हट जावेगी और लौटकर अपनी स्थिर जगह पर श्रा जावेगी। हटावको लिख लो और धिर्नीको फिर बीचमें रखकर बीचसे १ इञ्च खिसकाओ। धारामापककी सुई पहिलेसे ज्यादा हटेगी। इस हटायको भी लिख लो। इसी प्रकार धिर्नीको प्रत्येक बार यीचमें रखकर ज्यादा ज़्यादा खिस- काते जाओ और धारामापकके हटाधको लिखते

चुम्यफमें चुम्बकत्व कहा रहता है
जाओ। जब इसी प्रकार करते करते सिरेतक
पहुच जानी तब फिर दुसरे भागकी भी इसी
प्रकार जाच कर लो। जैसे कीलके बोभायी अधि-
कताको लेकर वक्र सेंचा था, उसी तरह श्रय धारा-
मापय की सईके हटाचको लेकर पक खंच लो।
उदाहरणमें एक चुम्बकत्वका वक़ देते हैं
कि जो हमारे मित्रोंने एक गोल दड चुम्बक का
इस रीतिसे निकाला है। साथ ही एक सूची भी
देते है कि जिसमें धारामापककी सुईका हटाव जो
पिनीको चुम्बक्के प्रत्येक भागपर खिसकानेसे
मिला है दिया हुआ है। सरल और निर्दोष होनेके
कारण बहुधा भाजकल यही रीति काममें आती है।
-
एद
--
चित्र ३०

। . - T । ५. चुम्बक धिनका खिसकाना धारामापककी सुईका हार (१) चीचसे उत्तरी सिरके और १ली बार १ इञ्चके लगभग री चार २ इञ्चके लगभग १२ अंश ३री ३ ३० ॥ ४थी ५३ ।। पूवीं ५ (२) दक्षिणी सिरेकी और १ली वार १ इञ्चके लगभग श्री ૨ १४ ॥ ३री ३२ ४थी ५७ पूवीं ५ ५ . १०६ । 1 -- . 3 " " " . । " " 1 लिया गया चुम्बक १० इच लम्बा था वक्र साधारण चुम्बकके चकसे भिन्न है परन्तु बहुत कुछ मिलता हुश्रा सा है । साधारण चुम्यकके चक्रमें "म" हिस्सा एक सीधी लकीर होता परन्तु इस वक्रमें थोडासा भुकाव लिए हुए है । (देखो चित्र ३३) इसके पश्चात् यह भी बतला देना हम उचित समझते है कि चुम्बकत्व स्थिर चुम्बकमे केवल ।

श्राफर्पण और निराकरणके नियम ५६ "अष्टपर ही रहता है क्योंकि यदि चुम्बकको शोरे- के तेजावर्म रसकर उसका ऊपरका थोडासा हिस्सा गला डाले तो जो कुछ यचेगा उसमें चुम्म- कत्व बिलकुल न होगा । एक और रीतिसे भी इस बातकी जाच की जा सकती है । एक लोहेफी नली ले लो उसके भीतर एक ठीक ठीक आती हुई छड रख दो। छडके अन्दर होते हुए इस नलीको किसी रीतिसे चुम्बक बना लो । छड अन्दरसे निकालकर जाचा इसमें चुम्बकत्व बिलकुल न होगा किन्तु सब चुम्बकत्व नलीमें ही मिलेगा। इसी कारण कभी कभी खोकले चुम्बक भी काममें लाये जाते हैं।नलीकी दीवारोफी मोटाई इस प्रयोग- को सफलताकेलिए चुम्बक बनानेकी रीति और 'नलीफे लोटेपर निर्भर है। किसीरीति और लोहे- । केलिए। इसे फेवल एच और किसी रीति और लोहेफेलिए इससे अधिक होना पड़ेगा। ३-श्राकर्पण और निराकरणके नियम जर कीलकी मददसे चुम्बकके भिन्न भिन्नः भागोंका चुम्बकत्व निकाला था, उस समय यह बतलाया था कि लटकी हुई कीलको प्रत्येक भागd मा

“६०
चुम्बक
-
-
"पर तोलो। इससे अभिप्राय यह था कि कोल
'प्रत्येक भागसे समान दुरीपर रहे।' इसी प्रकार
जब कम्पन-बक्समें एक 'चुम्बक रखकर और
दूसरे चुम्बकका प्रत्येक भाग उस लटके हुए चुम्म
कके सामने लापर उसके एक झाटेके समयमै न्यूना,
धिकता मालूम करके उसके हर एक भागके चुम्ध
कत्वका अनुमान लगाना बतलाया था, उस समय
भी यह कहा था कि चुम्बक ऊपर नीचे खिसकाते
समय अपने स्थानके दाएँ वाएँ न हो जावे जित
का उद्देश भी यही था कि चुम्बकका प्रत्येक भाग
लटके हुए चुम्बकसे एक समान दूरीपर रहे।
स्वतत्रता पूर्वक घूमते हुए चुम्बकके विचलनसे दो
चुम्बकोके चुम्बकत्वकी तुलना करते समय भी यही
कहा गया था कि दोनों चुम्बकों को एक ही दुरीपर
रखना चाहिए । इन सब बातोंका फल यही निक
ला कि हमने दूरीको घटने बढने नहीं दिया। अब
प्रश्न यह उठता है कि दूरीके घटने और बढ़नेसे
हमको इतना डर क्यों लगता था। इसका कारण
केवल इतना ही था कि दूरीके घटने और बढ़नेसे
चुम्बकके आकर्षण और निराकरणकी शक्ति भी
भेद पड़ जाता है। यदि एक भाग चुम्बकका १
इचकी दूरीपर हो और दूसरा २ इचकी दूरीपर

आकर्षण और निराकरणके नियम तो दोनों भागोंके चुम्बकत्वको तुलना नहीं हो सकती। सूर्य और चन्द्रमा प्राकारमें बराबर ही दिख- लायी पडते हे । सुर्य चन्द्रमासे कई हजार गुना वडा है । उनका वरावर दीख पडना केवल दूरीके ही अन्तरके कारण है। यदि उनकी दूरीपर ध्यान न देकर यह मानले कि दोनोंका आकार समान है तो बडी भारी भूल होगी। इसी प्रकार यदि चुम्बकके प्रत्येक भागकी दूरी हमारे जाचने- वाले यत्रसे भिन्न भिन्न हो तो हम उसके भागोंके चुम्बकत्वका कोई अनुमान नहीं लगा सकते। दूरीके घटने बढनेसे दो चुम्बकोंके सजातीय सिरोंमें निराकरण और उनके विपमजातीय सिरों में श्राफर्पणको शक्ति किस प्रकार घटती बढती है-इम वातकी पहले पहल कूलम्बने जाच की थी और उन्होने अपने प्रयोगों द्वारा यह नियम सिद्ध किया था चुम्बके सिरोंम श्राकर्पण या निराकरणकी शक्ति दुरीके वर्गके साथ विपरीति सम्बन्ध रखती हैं। अर्थात् दो चुम्बक लेकर और उनके दो सिरे एक नियत दूरीपर रसकर यदि उनमें आकर्षण या निराकरणकी शक्ति निकाली जावे तो दूरी

चुम्बक
आजतक इस नियमके विरुद्ध कोई बात मालम
नहीं हुई। इससे बढकर इसकी सत्यताका प्रमाण
नहीं दिया जा सकता। परतु यह रिलकुल
निर्दोश रीति नहीं है। क्योंकि चुम्बकका दूसरा
सिरा अपना कुछ न कुछ प्रभाव लटके हुए चुम्बक,
पर अवश्य ही डालता है। कूलम्बका चुम्बक बहुत
बडा नहीं था जिससे
दुसरा सिरा इतनी दूर था कि उसका असर
यहुत ही कम पड़ता था। इस दूसरे सिरेका असर
विलकल उड़ा दनेकेलिए प्रयोग इस प्रकार करना
यह कहा जा सके कि
पडेगा।
.
ऐसा चुम्बक लो कि जिसकी लम्बाई, उसकी
मोटाईकी ४०० गुनी हो, जिससे कि चुम्बकके
केन्द्र उसके सिरोंके पास हो। चुम्बकका मोटा
होना आवश्यक नहीं है। एक सूत मोटा लिया
जा सकता है। एक सूत मोटा चुम्बक कमसे
कम २५ इच लम्बा होना चाहिए । तीन, और
तीनसे भी अधिक फुट लम्बे चुम्बकोंसे प्रयोग
किया गया है, पर हमारी समझमें एक सूत मोटा
और २ फुट लम्बा चुम्बक, जैसा हमने अपने
प्रयोगमें लिया था, काफी होगा। इस चुम्बकको
चुम्बककत्व मापकपर डटेके सहारे इस
.

श्राकर्पण धार निराकरणके नियम ६६ इसकी जांच भी पहले पहल कूलम्बने ही की और यह सिद्ध किया कि दो चुम्बकोंके सजातीय सिरों- में निराकरण और विषमजातीय सिरोमें श्राकर्पण- की शक्ति उनके सिरोंके चुम्बकत्वको प्रचलताओके गुणनफलपर निर्भर है। इसका अर्थ यह है कि यदि प्रत्येक चुम्बककी प्रबलता पहलेसे दुगुनी हो तो उनमें शक्ति चौगुनी हो जावेगी। इन दोनों नियमोंको मिलाकर शक्ति मालूम करनेका सूत्र इस प्रकार लिप सकते हैं- - पप श (निराकरण अथवा भाकर्पणकी शक्ति) पहा एक चुम्बकके सिरेकी प्रबलता प और दूसरे चुम्बकक सिरेकी प्रबलता प१ मान ली है और उन दोनोके बीचमें द के वरावर दूरी है। इसी सूत्रसे प्रयलताके नापनेको इकाई भी निकाली 'गयी है । यदि दो समान प्रलताके सिरेलिये जावं अर्थात् पप, और इकाई दूरीपर (अर्थात् द=२) रस्खे जानेपर एक दूसरेको इकाई शक्ति (अर्थात् श-१) से हटाचे या खीचें तो उनकी प्रबलता एक है।

७०
-
चुम्बक
जिस पद्धतिमें लम्बाई नापनेकी इकाई एक
शतांशमीटर (सेंटीमीटर) है उसमें शक्तिकी इकाई
१ डाइन है। इस पद्धतिके अनुसार प्रयलताको
इकाईकी परिभाषा यह होगी-
उस घुम्वकके सिरे की प्रवलता १ है जो अपने जैसे, ।
शताशमीटरपर रखे हुए सिरेको १ डाइनकी शक्तिसे हटाव ।
जव उत्तरी सिरेकी प्रबलता बतलानी होगी तो
प्रवलता सूचित करनेवाली सस्याके पहले या तो
का चिन्ह लिख देंगे या कोई भी चिन्ह नहीं लगा
चेंगे। दक्षिणी सिरेकी प्रबलता सूचित करनेवाली
सस्याके पहले-का चिन्ह अवश्य ही लगाया
जावेगा । हटाव अथवा निराकरणकी शक्तिको
से सूचित करेंगे या कोई चिन्ह भी नहीं लगायंगे
और खिंचाव अथवा नाकर्षणकी शक्तिको-से
सूचित किया करेंगे।
यदि ऊपरवाले दो सिरोंमेंसे एककी प्रबलता
इकाईके घराबर हो तो दोनों में निराकरणकी शक्ति
के बरावर होगी।
इस सख्याको 'द' दूरीपर 'प"प्रबलतावाले
चुम्यककी शक्तिका प्रभाव ( intensity) कहेंगे।
बडा महत्व इस संख्याका यह है कि चुम्बककी
.la
.

शक्ति प्रबलता और उसकी दूरी मालूम न होनेपर मी यह सख्या अर्थात् उस चुवकको शक्तिका प्रभाव एक नियत स्थानपर मालम किया जा सकता है । जैसे पार्थिव चुम्बकके सिरेकी प्रबलता और उस सिरेकी दूरी अापके स्थानसे आपको मालूम न हो किन्तु पार्थिव चुम्बककी शक्तिका प्रभाव श्राप अपने स्थानपर मालूम कर सकते है। इस सस्याका महत्व आगे और भी स्पष्ट होता चलेगा। इसके नापनेकी इकाई गौस (gauss) कहलाती है। जिस स्थानपर इकाई प्रवलतावाला सिरा ? डाइनकी शक्तिसे निचे या हटे उस स्थानपर चुम्बकीय शक्तिका प्रभाव (intensity) एक गौस- के बराबर है। ७--शक्ति सम्भव हे कि पाठक शक्ति नापनेकी इकाई अर्थात् डाइनसे अपरिचित है। इसलिए इसका और इसके सन्धी और चीजोका जिनसे काम पडेगा सक्षिप्त वर्णन यहा दिये देते है । सच चीजोंके नापनेकेलिए दो पद्धितिया प्रचलित है। एकमें लम्बाई नापनेकी इकाई फुट, मात्रा नापनकी इकाई पांड और काल नापनेकी इकाई

કર
चुम्बक
सेकंड है, इसको सक्षेप में फ प स पद्धति
कहेंगे । दूसरीमें लम्बाई नापनकी इकाई एक
शतांश मीटर (सेंटीमीटर ), मात्रा नापनको
इकाई ग्राम और काल नापनेकी इकाई सेकड ह ।
इसको सक्षेपमें श ग.स पद्धति कहेंगे । वैज्ञानिक
ससारमें यह ही पद्धति अधिक प्रचलित है क्योंकि
इसमें बडी बडी चीजोंके नापनेकी वडी बडी
इकाइया छोटी इकाइयोकी १०, १००, १०००
गुनी और छोटी छोटी चीजोंको नापनेके
लिए छोटी इकाइया दसवां, सौवां, हजारवा,
इत्यादि इकाईके भाग होती है। छोटी रेलकी
पटियोंके बीचकी दूरी एक मीटर होती है, इसीर
सौ भागको शतांश मीटर कहते ह । फ्रास
की राजधानी पेरिसमें (Pur) परिमाणा के
दफतरमें (Burelu or standnds) रखे हुए एक
छडके ऊपरके दो चिन्होंके वीचकी दूरीको श
पर मीटर कहते हे । ग्राम उस बांटका
हजारवा हिस्सा है जो उसी दफतरमे रखा हे
और किलोग्राम ( kilogn im) कहलाता है । यह
रेलवालोंका किलो है और अपने सेरके लगभग
है । जब आप किसी वस्तुको अपनी ओर सेचना
चाहते हैं, तो आपको कुछ शक्ति लगानी पड़ती है।
,

से अपनी पार खोचती है। पृथ्वीतलके प्रत्येक स्थान- 1 शक्ति "पृथ्वी प्रत्येक वस्तुको अपनी ओर खीचती है और । इसी कारण चीजें हाथसे छोडनेपर पृथ्वीपर गिरती है । पृथ्वी भी वस्तुओंको किसी शक्तिसे खींचती है । इसी शक्तिसे शक्तिकी इकाई निकाली गई है। मान लो कि धापने हाथमें १ ग्रामका बांट थाम रखा है, उसे हायमें थामे रखनेकेलिए शक्ति लगानी पड़ती है। जितनी शक्ति आप लगाते हैं, वही १ ग्राम भार या ग्रामका योग कहलाता 1 1 1 - - T ---- बर वित्र न. ४२-ग्लिोग्राम है । पृथ्वी भी इतनी ही शक्तिसे इस ग्राम-घाटको पर यह वाम एक्सा नहीं है। इसका हाल पाठक

७६
चुम्बक
म
घ
श
1
चित्र न० ४३
चित्रवाले युगलका घूर्ण शल हुश्रा । ल को युगलका
भुनदण्ड कहते है । जिन दो युगलोका पूर्ण वरावर
है उनका असर भी वरावर ही होता है चाहे उनकी
शक्तियां बरावर हो या न हो । चित्र में ख और घ
स्थानोंपर जो क और ग की अपेक्षा म से श्राधी
दूरी पर है २श और - २श के बरावर शक्तियां
श, श, शक्तियोंकी दिशामें लगानेसे वही असर
हाग जो श के वरावर, शक्तियां क और ग पर।
लगानेसे हुआ है। इसकी जाच एक बहुत साधा
रण यंत्रसे, जिसका चित्र नीचे दिया जाता हे हो
सकती है। एक तार लो जिसका एक सिरा एक
चुटकी में ( clamp) इस प्रकार दवा हो कि धूम
न सके, और जिसका दूसरा सिरा एक वेलनके
सिरेके वीचमें फसा दो । बेलनपर एक छोटी कील

शक्ति
।
त
चित्र न०४४
च-घुटयो। स-सूचा । क-दिगरियोंवाला कागज़।
चनिया। प-पेलन।
।
३

चुम्बक
लगी होनी चाहिए जिससे एक डोरा इस प्रकार
लपेटा जा सके कि वेलनके चकर खानेसे दोनों
और डोरा खुले। तारमें एक सूचक ( pounter) भी
लगा रहना चाहिए । इस सूचकके नीचे एक ऐसा
घेरा लगा लो जिसमें कोण वने हो । डोरके सिरों-
को दो चकरियोपरसे होते हुए नीचे लटकने दो।
स्थिर दशामें सूचकका स्थान देख लो। डोरके
दो सिरोंमें दो समान वांट (एक एक या दो दो
तोलोके बरावर) लटका दो। वेलन थोडासा
घूम जावेगा, सूचकका यहनया स्थान देस लेनेसे
घुमाव मालूम हो जावेगा। यहां शक्तियोंकी रेखाए
बेलनको स्पर्श करती है, इसलिए युगलका भुजदण्ड
(व
१
चित्र न०४५
बेलनके ध्यासके बरावर हुआ । युगलका घूर्ण हुआ
बव के बरावर, यदि ब बोझ और व वेलनका
व्यास हो। आधे व्यासका वेलन लगाकर पहलेके
।

शक्ति ७६ घरावर धुमाव पैदा करनेकेलिए दुगना बोझ लगाना पडेगा । इस प्रयोगमें यह भी देखनेमें आया कि बेलन चरावर घूमता नहीं रहता, किंतु तारमें ऐंठन पडनेसे ठहर जाता है अर्थात् तारकी ऐंठन इस युगलकी तुलना कर लेती है। कभी कभी युगलकी दो शक्तियों से एक गुप्त होती है, जैसे यदि एक डाडी डड श्र स्थानपर एक अक्ष- के ऊपर तुली हो तो एक तरफ एक छोटासा बोझ न रखनेसे घूम जावेगी और कक, स्थानपर श्रा ठहरेगी-यहा एक ही शक्तिसे डाडी घूम गई । घास्तवमें अक्षपर दुसरी शक्ति विरुद्ध दशामें अपने आप पैदा हो जाती है और यह दोनों मिलकर एक युगल बना लेती है। इस युगलका घूर्ण पद के बराबर है यदि "" बोझ अक्षसे द दूरीपर चियन०४६ रक्खा हो । ऐसी अवस्थामें इस गुणकको 20 चुम्बक युगलका पूर्ण न कहकर शक्तिका पूर्ण कहते हैं। एक दुसरा बोझ च, अक्षके दूसरी ओर रखकर डांडीको सीधारख सकते है । वह वोम ऐसी दूरी द, पर अक्षसे होना चाहिए कि इसका धूर्ण व,द, पहले वोझके घूर्णके बराबर हो अर्थात् वद, - ये द युगलोकी तुलनासे तो काम बहुत पडेगा पर थोडा सा काम शक्तियोंकी तुलनासे भी पडेगा। इसलिए उनके सबन्धी बातें भी यहां बतला देना उचित समझते हैं । यदि दो शक्तिया एक ही विन्दु पर लगाई जा तो उनका अमर उतना ही होगा जितना कि उस तीसरी शक्तिका हो सकता है जो उस समानान्तर चतुर्भुज के कर्णको (diagamal) दिशामें और प्रमाणानुसार उसके बराबर है जो दो शत्तियोको सूचित करने वाली रेखायीको दो भुज मानकर खेंगा गया है। इस नियमकी जांचकेलिए यह, प्रयोग करना चाहिए । एक डोरा.लेकर उसके धीचमें एक गांठ -लगा लो और एक सिरेपर ३ तोलेके बराबर और दुसरे सिरे पर४ तोलेके बराबरयोझ बांध दो । एक तखतेमें दो चक्रियां च, च, लगाकर वोझांको इस प्रकार लटकाओ कि एक चोझ एक चक्रीके एक ।

त्रिकोणमितिको निपपत्तिया मालूम हो जाती है और स्पर्श रेखासे कोण मालूम हो सकता हे । कोण मालूम होनेसे दिशाका पता चल जाता है। -त्रिकोणमितिकी निषपत्तियां थोडेसे त्रिकोणमिति के नियमोकी भी विज्ञानके पाठयोको आवश्यक्ता पडेगी उनको हम यहां सक्षेपमें दिये देते हैं जिससे पाठकोको सुविधा हो जाय। प स ग एक त्रिभुज लो जिसका क ख ग कोण समकोण हो । क ग, क स और स ग त्रिभुजके कर्ण, आधार और लम्ब पहलाते है। (चित्र ४८) क कोणका ज्या (sine) कहलाता है। गख फर क कोणका कोज्या (cosme) " गर क कोणका स्पर्श रेखा (tingent)" पत्र गर क कोणका कोटि स्पर्श रेसा (cotangent) कहलाता है। क कोणका छेदन रेसा (secint)" ८२ चुम्बक असरमें उन दोनों शक्तियों के बराबर है और विरुद्ध दिशामें होनेसे गांठको चलने नहीं देती है, अर्थात् दोनों शक्तियोंका असर कर्ण के बराबर वाली शक्तिके असरके वरावर और इस कर्णकी दिशा में है। इस शक्तिको दोनो शक्तियोका लन्ध कहते है। जब दो शक्तियां एक दूसरेसे सम कोण बनाती हो तो लब्ध और लब्धकी दिशा निकालना आसान है। यदि इसी चित्रमें घग फ कोण समकोण होता तो ग ख- ग+ग क' (रेखा गणितके नियमानुसार) गध=३ और गक =४ इसलिए गख-3/8+१६ 3५ गरा ( लब्ध) और ग क ( एक शक्ति ) के बीच में जो कोण य ग क है उसकी स्पर्श रेसा D सक गक - गघ 'गक (और इस उदाहरणमें) = %D दूसरी शक्ति एक शक्ति अर्थात् शक्तियोंके भाग फलसे 'स्पर्शरेखा

त्रिकोणमितिको निषपत्तिया
मालूम हो जाती है और स्पर्श रेखासे कोण मालूम
हो सकता है। कोण मालूम होनेसे दिशाका पता
चल जाता है।
-
-त्रिकोणमितिकी निपपत्तियां
थोडेसे त्रिकोणमिति के नियमोकी भी विज्ञानके
पाठकाको आवश्यक्ता पडेगी उनको हम यहां
सक्षेपमें दिये देते है जिससे पाठोको सुविधा
हो जाय।
क ख ग एक त्रिभुज लो जिसका क स ग कोण
समकोण हो । क ग, क ख और ख ग त्रिभुजके कर्ण,
आधार और लम्ब कहलाते हैं। (चित्र ४८)
क कोणका ज्या (sine) कहलाता है।
गख
कग
कर
क्ग
गर
कस
क कोणका कोज्या (cosine)
क कोणका स्पर्श रेखा (tangent)"
क्ख
क कोणका कोटि स्पर्श रेखा (cota.
ngent) कहलाता है।
क कोणका छेदन रेसा (secunt)"
कग
कख

स । चुम्बक अथवा क खत ग कग गर क कोणका कोरिच्छेदन रेसा (cosecunt) कहलाता है। इन निपपत्तियोका महत्व यह है कि त्रिकोण चाहे कितना बडा करा क ख गर छोटा क्यों न हो यह निपपत्तिया सदैव एक ही होंगी, जबतक कोण न बदले इसलिए प्रत्येक कोणकेलिए यह निकालकर एक पुस्तकमें जिसे गणित सारिणी कहते हैं छाप दी गयी है । इन की सहायतासे किसी समकोण वाले त्रिकोण ख ख, खर चित्र ने०४८ का एक भुज और कोण मालूम होनेसे तीनों भुज मालूम हो सकते हैं। उदाहरणकेलिए मान लो कि एक वुर्ज या पहाडीको उचाई मालूम करना है, व बुर्ज है जिसकी च चोटी और द दामन है। दामनसे एक नियत दूरीके स्थान स पर खडे होकर च स द कोण नाप लो। - चुम्बकीय हाय तथा दिक्सूचक । संचना सुलभ है। ध्रुव अपनी जगह बिलकुल स्थिर रहता है परन्तु सूर्य २२ मार्चसे २३ सितम्बरतक सायनके उत्तरमें और २३ सितम्बर- से २२ मार्चतफ सायनके दक्षिणमें रहता है । २२ मार्च और २३ सितम्बर को भी जब सूर्य सायन- में होता है केवल भूमध्य रेसावाले स्थानोपर पूर्व पश्चिम रेसा खेंची जा सकती है। पर उन स्थानापर जो भूमध्य रेखापर नहीं है विना इस यातके जाने कि वह कितने उसके उत्तर या दक्षिणमें है यह ऐसा नहीं खेची जा सकती। उत्तर दक्षिण दिशाचाली रेखा कोई भी मनुष्य इस प्रकार अपने स्थानपर सेंच सकता है। एक बारीक छेदवाली नली या दूरवीन न को एक उ में इस प्रकार लगाओ कि वह ऊर्वतलमें धुमायी जा सके। इसमेंसे ध्रुव तारेकी और देयो, इसको इसी ही दिशामें रक्खे हुए इसके विलकुल नीचे एक रेसा सद खेंच लो यह उत्तर दक्षिण दिशा वाली रेखा हुई। यह अक्षके चिन न० ५० का (

L
चुम्बक
ह-चुम्बकीय हटाव तथा दिक सूचक ।
पाठकोंको याद होगा कि चुम्बक का चुम्बकत्व
दूरकरनेकेलिए यह बतलाया गयाथा कि उसको
गरम करके चुम्बकीय पूर्व पश्चिम दिशामें रखकर
ठंडा कर लो। उस समय उनके चित्तमें यह प्रश्न
अवश्य ही उठा होगा कि यह चुम्बकीय पूर्व
पश्चिम दिशा कहांसे आयी । इस परिच्छेदमें
उसका उत्तर देना चाहते हैं।
पूर्व पश्चिम उत्तर दक्षिण चार दिशाओमेसे
दो-पूर्व और उत्तर दिशाओंमें एक एक चीज
ऐसी है जिसके देखनेसे दिशाका पता चल जाता
है-पूर्व में सूर्य और उत्तरमें ध्रुव । दोनो दिशा
ओका पता चलानेकी तो आवश्यकता नहीं हे
केवल एफके पता चलनेसे चारोंका पता चल
जाता है, इसीलिए सूर्यको दिनमें और ध्रुवको
रात्रिमें लोग काममें लाते हैं। यदि एक स्थानपर
दो रेखाए एक उत्तर दक्षिण और दूसरी पूर्व
पश्चिम दिशामें सेंची जावें तो वह एक दूसरेसे
समकोण बनायेंगी, इसीलिए यदि दो रेशाओमें
से एक खेंच ली जावे तो दूसरी भी खेंची जा
सकती है। इनमें से उत्तर दक्षिण दिशाकी रेखाका

खुम्पकोय हटाव तथा दिक्सूचक । सूचना सुलभ है। ध्रुव अपनी जगह दिलकुल स्थिर रहता है परन्तु सूर्य २२ मार्चसे २३ सितम्बरतक सायनके उत्तरमें श्रीर २३ सितम्बर- से २२ मार्चतक सायनके दक्षिणमें रहता है । २२ मार्च और ३ सितम्बरको भी जब सूर्य सायन- में होता है केवल भूमध्य रेखावाले स्थानॉपर पूर्व पश्चिम रेखा खेंची जा सकती है। पर उन स्थानों पर जो भूमध्य रेयापर नहीं हैं विना इस चातके जाने कि वह कितने उसके उत्तर या दत्तिणमें हैं यह रेसा नहीं उँची जा सकती। उत्तर दक्षिण दिशावाली रेखा कोई भी मनुष्य इस प्रकार अपने स्थानपर पेंच सकता है। एक पारीक छेदवाली नली या दूरवीन न को एक में इस प्रकार लगाना कि वह तलमें धुमायी जा सके। इसमेंसे ध्रुव तारेकी ओर देखो, इसको इसी ही दिशामें रक्खे हुए इसके बिलकुल नीचे एक रेखा उ द वंच लो यह उत्तर दक्षिण दिशा वाली रेखा हुई । यह पृथ्वीके अतके समानान्तर होगी और उस ऊर्ध्वतल- चित्र नं० ५० का (यामयोत्तर) पृथ्वीपर चिह्न है * वास्तवमें ध्रुवके पास एक ऐसा तारा है जो विलकुल अचल है, तो कुछ चनता है।

चुम्बक
जो उस स्थान और पृथ्वीके दोनों ध्रुवोंमसे गुज.
रता है। इस रेखासे समकोण बनाती हुई जो रेखा
खेची जावेगी वह पूर्व पश्चिम दिशामें होगी।
है
चुम्बक्के दोनो केन्द्रीको जोडती हुई रेखाको
चुम्बकीय अक्ष कहते है । स्वतन्त्रतापूर्वक घूमने
वाले चुम्बक्का चुम्बकीय अक्ष सदैव एक ही
दिशामें रहता है। उस उर्वतलको जिसमे यह
रेखा है चुम्बकीय यामयोत्तर कहते है । इस रेखा-
की दिशाको चुम्बकीय उत्तर दक्षिण दिशा कहते
। इस रेखासे समकोण बनाती हुई जो रेखा
संची जाये उसे चुम्बकीय पूर्व पश्चिम दिशाकी
रेखा कहना चाहिये । चुम्बकीय उत्तर दक्षिण
दिशावाली रेखा और उत्तर दक्षिण दिशावाली
रेखा कोई कोई स्थानोपर मिलती है और बाकी
स्थानों पर भिन्न होती है। इन दोनों रेसाके
वीचके कोणको चुम्बकीय हटायका कोण कहते
है। वहीं यह हटाव पूर्वकी ओर होता है और
कहीं पश्चिमकी ओर। प्रयागमें यह पूर्वकी ओर
है और हटावका कोण १०२५' है। इस हटायके
मालूम होनेसे चुम्बक्से दिशाका पता हर समय
और हर ऋतु वडी श्रासानीसे लग सकता है।
चुम्बक्से चुम्बकीय उत्तर दक्षिण दिशाका पता

चुम्बकीय हटाव तथा दिक्सूचक । E चला और हटाव मालम होनेसे उत्तर दतिण दिशाका पता चल गया । यह हटाव स्थिर नहीं है किन्तु प्रतिदिन प्रतिवर्ष बदलता रहता है। कुछ कालतक एक स्थानपर पूर्वीय रहता है फिर पश्चि- मीय हो जाता है। ऐसा समझा जाता है कि यह इटाव ६६० वर्ष में एक और पूर्व या पश्चिम महत्तम दिशासे चलकर दूसरी ओर (पश्चिम या पूर्व) भो उतना ही होकर फिर पहली और उतना ही हो जाता है। इसकी जाचका अभी अवसर नहीं मिला है क्योकि इस सम्बधमें वैज्ञानिकोको काम करते हुए केवल ३०० चर्य हुए है। चुम्बको चुम्बकीय अक्ष घडे भारी महत्वको चीज है। यह चुम्बकके अक्षसे बहुत धुम्यको- में भिन्न ही मिलेगा और प्रयोगोंद्वारा निकाल- ना पडेगा इसीलिए वह प्रयोग जिससे यह मालूम हो सकता है नीचे दिया जाता है। घ चित्र न०५१

६०
.
। चुम्बक
पग
घ
एक चुम्बकको डोरेसे लटकाओ और उसीके
आकारका एक चित्र सलसे बिलकुल नीचे एक
कागजके दुरडेपर बना लो (चित्रमें क स ग घ
बनाया गया है)। फदेमें चुम्बकको इस प्रकार लौट
दो कि ऊपरका पृष्ट नीचे और नीचेका पृष्ट उपर
हो जावे और फिर एक दूसरा चित्र बनालो
(चित्रमें
कर
बनाया गया है।
पहले चुम्बकका श्रत क ग दिशामें था और अब
क, ग, में है। इन दोनों दिशाओंके वीचके कोणको
दो वरावर भागों में विभक्त करनेवाली रेखा चुम्ब
कीय अक्षकी दिशामें होगी। चुम्बकको सीधा
(उलटा) रखकर यह कागजका टुकडा उसपर
इस प्रकार चिपकाया जावे कि चुम्बक पहले चित्र
के विलकुल नीचे हो और चुम्बक फिर कीलीपर
रख दिया जावे इससे हर जगह दिशाका पता
चल जाया करेगा क्योंकि यह रेसा सदा चुम्बकीय
उत्तर दक्षिण दिशामें रहा करेगी। इसी कागजपर
चुम्बकके वीचमेसे होती हुई और इस रेखा से स
मकोण बनाती हुई जो रेया खेंची जावे वह पूर्व
पश्चिम दिशामें होगी। ऐसा कागज़ लगा हुआ
चुम्बक, जिसमें दिशाओंके चिन्ह बने हो दिक्
सूचकका काम करता और दिक्सूचक कहला

Antra
चुम्बकीय हटाव तथा दिक्सूचक ।
ता है। ऐसे दिकसूचक प्राय जहाजोंमें यात्रा
करने में बडी मदद देते है। जहाजी दिक्-
सूचक ऐसे सरल नहीं होते । इनका वर्णन नीचे
AMANNS
Cline
HAMARA
Panta
चित्र न० ५२
दिया जाता है। वीचमे एक टोपी है जिसका चदवा
किसी कीमती पत्थरका है ओर याड पीतलकी,
इसके एक अत्यूमोनियमका छजा लगा है जिसके
किनारेपर ३२ छोटे छोटे छेद बने है । एक अल्यू-
मीनियमको १० इच व्यासकी चपटी चूडी जिसके
अन्दरके हिस्सेमें भी ३२ छेद बने हैं रेशमफे मजबूत
डोरोसे टोपीके साथ व धी रहती है। ६ या : छोटे
छोटे चुम्बक दो रेशमके डोरोंसे सीढीके डडोंकी

१२
चुम्बक
तरह घांधे जाते है। दोनों डोरोंके चार सिरे चार
डोरोंसे इस प्रकार बांध दिये जाते है कि श्राधे
चुम्बक केन्द्रके (टोपी) एक और और आधे
दूसरी ओर रहें। चूडीके वरावर कागजका घेरा
काटकर चूडीपर चिपका दिया जाता है और
इस कागजपर दिशाओंके चिन्ह बना दिये जाते हैं।
१० इचसे थोडे ही बडे व्यासका एक पीतलका
प्याला लेकर उसके पेदेमें कीली लगाकर उसपर
यह चुम्बकोंका जुद्द क्षितिज धरातलमे स्वतत्रता-
पूर्वक झूलनेकेलिए रस दिया जाता है। ऊपर
नीचेकी दिशावाले अक्षपर रखा हुभा चुम्बक
जहाज जैसे चलने हिलने और घूम जानेवाली
चीजके अन्दर स्थिर नहीं रह सकता
इसीलिए इसके प्यालेको दो चूडियोंके अन्दर
इस तरह रखते है कि यह प्याला उत्तर दक्षिण
और पूर्व पश्चिम दिशावाले दो श्रापर घूम सके।
इसका असर यह होता है कि प्याला ही घूमकर
रह जाता है चुम्बक बहुत कम घूमता है। अगरेजीमें
इन दोनो चूडियॉको जिम्बल (gambals) कहते
है। यह जिम्बलोंपर रखा हुआ दिक्सूचकका वपस
उचित रीतिसे जहाजमें लटका दिया जाता है। यह
केलविनका ( Kelkin) जहाजी दिक्सूचक कह

चुम्यकीय हटाय तथा दिक्सूचक ।
लाता है। इन्होंने इसे दस घर्पकी महनतसे
पनाया । दिक्सूचकके चुम्यकका पहला गुण तों
यह होना चाहिये कि उसका चुम्बकीय अक्ष
-
चित्र न०५३
सदेव एकही दिशामें रहे । इसकी दिशा बदल
जानेसे कार्ड के दिशाके चिह्न झूटे हो जाते है और
दिशाका पतामी चलना असम्भव हो जाता है।
इसलिए चुम्बक कई शलोंके बनाये गये उनमेंसे
एकभी सतोपजनक नहीं निकला । दूसरे,
कीली और टोपीके चदवेमें कुछ न कुछ रगडे
अवश्य ही रहती है जिसके कारण एक बार हट

६४ । चुम्बक जानेपर चुम्बक फिर लौटकर अपने पहले स्थान- पर नहीं पाता था। इससे भी दिशाके जानने में भंग पड जाता था । के लविनके जहाजी दिक्- सूचकके सब हिस्से इतने अच्छे बने है कि चुम्बक हिलनेके वाद १/४° से अधिक कभी नहीं हटता है। केन्द्रकी प्रवलता और दोनो केन्द्रोंकी दूरीका गुणक चुम्बकका चुम्बकीय घूर्ण कहलाता है। जितना यह वडा होता है उतना ही रगडका हटाव भी कम होता है । साधारण दिक्सूचक्के चुम्यक दीर्घा- कार मिलते है क्योंकि इनका चुम्बकीय घूर्ण वरावर बोझवाले गोल या चौकोर चुम्बकोंके चुम्ब- कीय घूर्णसे २५ प्रतिशत अधिक होता है। तीसरे जहाजके चक्कर खानेके समय चुम्नक बहुत झूलना नहीं चाहिये । जहाज़के चक्कर साने. केलिए १८ सेकड लगते हे चुम्बकके झाटेका समय इससे जितना कम या इसके बरावर होता है उतना ही चुम्बक ज़्यादा हिलता है। इसलिए भोटेके समयका वड़ा होना भी श्रावश्यक है। केलविनके दिकसूचकके चुम्बकके झाटेका समय ४२ सेकडतक होता है इसलिए जहाजके चक्कर खानेके समय यह बहुत कम हिलता है। पृथ्वीके मुख्य मुख्य स्थानोंका चुम्बकीय

चुम्बकीय मुकाव और झुकाव सूचक
हदाय निकाल लिया गया है और ऐसे नकशे
बनाये गये है जिनमें समान हटाववाले स्थानों-
को मिलाती हुइ रेखाए सेंच दी गयी हैं। इनसे
जहाज चलानेवालाको बडी मदद मिलती है।
इनकी सहायतासे उनको प्रत्येक स्थानपर दिशा-
का पता चल जाता है। बहुतसे स्थान ऐसे है
जहा हटाव विलकुल नहीं है । अर्थात् चुम्बकीय
अक्ष उत्तर दक्षिण दिशामें रहता है ऐसे स्थानों.
मेसे जो रेसा ची जाती है उसे चिना हटावकी
रेया कहते है।
१०-चुम्बकोय झुकाव और झुकाव सूचक
दिरसूचकका चुम्मक उर्ध्व अक्षपर क्षितिज
घरातलमें रहता है । परन्तु चुम्बकमें टोपी न
लगाफर एक गोल तारका
टुकडा ढोकलें और इसको
एकश्रापार पर इस प्रकार
एसें कि यह तार क्षितिज
अक्षका कामदे श्रार घुम्नक
उर्वतलमें स्वतत्रतापूर्वक
घूम सके (जैसा चित्रमें
दिखलाया गया है) तो
आप देखेंगे कि यह चुम्बक
चित्रन०५४

चुम्बक सीधा कभी नहीं रहता किन्तु थोडासा मुका हुश्रा ठहरता है। इसका कारण अक्षका बीचों चीच न लगाना नहीं है, चुम्बक बनाने के पहले अक्ष लगाकर अच्छी तरहसे देख लो कि यह सीधा रहता है । चुम्बक वनानी और आधारपर रक्खो अब सीधा नहीं रहता। चुम्बके वीचमसे जो क्षितिज रेसा संची जावे उसके और चुम्बकके चुम्बकीय अक्षके घीचमें जो कोण होता हैउ से चुम्बकीय मुकावका कोण कहते है। प्रयागमें झुकाव ४६ है । जैसे हटावका कोण प्रत्येक स्थानपर एक नहीं होता है उसी प्रकार यह झुकावका कोण भी हर एक स्थानपर एक ही नहीं होता है। कुछ स्थान पृथ्वीपर ऐसे हैं जहां झुकाव विलकुल नहीं होता है उन स्थानोंको जोडती हुई जो रेया नकशेपर सेंची जाती है उसे चुम्बकीय भूमध्यरेसा कहते हैं। समान झुकाव- चाले स्थानोंको जोडती हुई जो रेखाएं सेंची जाती हैं उनको चुम्बकीय शरसमानान्तर रेखा कहते है । चुम्बकीय भूमध्यरेखा और शरसमानान्तर रेखाए भूमध्य और शरससमानान्तर रेखाओंकी तरह सीधी नही होती हैं किन्तु टेढी मेढी होती है। चुम्बकीय भूमध्यरेखाके उत्तरमें उत्तरी सिरा 7

.
hary
चुम्बकीय मुकाप ओर झुकाय सूचक
नीचे और दक्षिणी सिरा ऊपर रहता है पर इस
रेखाके दक्षिणमें उत्तरी सिरा ऊपर और दक्षिणी
सिरा नीचे हो जाता है। जिस स्थानपर यह मु-
काव सूचक चुम्बक बिलकुल सीधा खडा हो जाता
है और उत्तरी सिरा नीचे होता है उस स्थानको
पृथ्वीका उत्तरी चुम्बकीय ध्रुव कहते हैं और जहा
दक्षिणी सिरा नीचे होता है उसको पृथ्वीका
दक्षिणी चुम्बकीय ध्रुव कहते हैं । उत्तरी ध्रुवपर
सर जेम्स रोस (Sir James Ross) स. १८८७ में
पहुंचे। इस ध्रुवके देशान्तर ८६°४३पू और शर
७३°३३' 3 है। दक्षिणी ध्रुवपर सर अरनेस्ट
शेकल्टन ( Sir Pincst Shackleton ) स०
१६६५ विक्रमीको पहुचे। इस ध्रुवके देशान्तर
१५५° १६'पू और शर ७२° २५'द है। इससे
स्पष्ट है कि दोनों ध्रुव पृथ्वीके व्यासके सिरेपर
नहीं है । उत्तरी ध्रुवका शर ७३°३१ उ की बजाए
७३° उ मान लें और इसी प्रकार दक्षिणी
ध्रुवका शर ७२°२५ द फो बजाय ७३°द मान ले
तो ७३°उ और ७३°द को जोडती हुई जो रेखा
सेंची जावे उसे चुम्यकीय अक्ष कहेंगे और पृथ्वीको
चुम्बकीय पक्ष और अक्षमें १७° का कोण होगा।
झुकावमापक चित्र ५५ में दिया जाता है-
4

चुम्बक सीधा कभी नहीं रहता किन्तु थोडासा मुका -हुश्रा ठहरता है। इसका कारण अक्षका बीची चीच न लगाना नहीं है, चुम्बक बनाने पहले अक्ष लगाकर अच्छी तरहसे देख लो कि यह सीधा रहता है। चुम्बक वनाओ और श्रीधाग्पर रक्खो अव सीधा नहीं रहता। चुम्बकके वीचमसे जो क्षितिज रेसा पेची जावे उसके और चुम्बकके चुम्बकीय अक्षके वीचमें जो कोण होता हैउ से चुम्बकीय मुकाबका कोण कहते है। प्रयागमें झुकाव ४६° है । जैसे हटावका कोण प्रत्येक स्थानपर एक नहीं होता है उसी प्रकार यह मुकावका कोण भी हर एक स्थानपर एक ही नहीं होता है। कुछ स्थान पृथ्वीपर ऐसे हैं जहां झुकाव विलकुल नहीं होता है उन स्थानोंको जोडती हुई जो रेसा नकशेपर सेंची जाती है उसे चुम्बकीय भूमध्यरेसा कहते हैं। समान झुकाव- वाले स्थानों को जोडती हुई जो रेखाएं सेंची जाती है उनको चुम्बकीय शरसमानान्तर रेखा कहते है । चुम्बकीय भूमध्यरेसा और शरसमानान्तर रेखाए भूमध्य और शरससमानान्तर रेखाओंकी तरह सीधी नही होती हैं किन्तु टेढी मेढी होती है। चुम्बकीय भूमध्यरेसाके उत्तरमें उत्तरी सिरा

दुम्बकीय मुकाव ओर मुकाव सूचक ६७
नीचे और दक्षिणी सिरा ऊपर रहता है पर इस
रेखाके दक्षिणमें उत्तरी सिरा ऊपर और दक्षिणी
सिरा नीचे हो जाता है। जिस स्थानपर यह मु-
काव सूचक चुम्बक बिलकुल सीधा सडा हो जाता
है और उत्तरी सिरा नीचे होता है उस स्थानको
पृथ्वीका उत्तरी चुम्बकीय ध्रुव कहते है और जहां
दक्षिणी सिरा नीचे होता है उसको पृथ्वीका
दक्षिणी चुम्बकीय ध्रुव कहते है। उत्तरी ध्रुवपर
सर जेम्स रोस (Sir James Ross) स० १८०७ में
पहुंचे। इस ध्रुवके देशान्तर ६६°४३ पू और शर
७३°३१' उ है। दक्षिणी ध्रुवपर सर अरनेस्ट
शेकल्टन ( Sir Ernest Shachleton ) स०
१६६५ विक्रमीको पहुचे। इस ध्रुवके देशान्तर
१५५° १६'पू और शर ७२° २५'द है। इससे
स्पष्ट है कि दोनों ध्रुव पृथ्वीके व्यासके सिरेपर
नहीं है । उत्तरी ध्रुवका शर ७३°३१ उ की बजाए
७३° उ मान लें और इसी प्रकार दक्षिणी
ध्रुषका शर ७२°२५ द की बजाय ७३°द मान ले
तो ७३°उ और ७३°द को जोडती हुई जो रेखा
सेंची जावे उसे चुम्यकीय अक्ष कहेंगे और पृथ्वीको
चुम्यकीय अक्ष और अक्षम १७° का कोण होगा।
झुकायमापक चित्र ५५ में दिया जाता है-
७

-
चुम्बक
इसमें चुम्बक क्षितिज अतपर रक्खा हुश्रा ऊर्च
तलमें धूम सकता है। एक ऊर्ध्व घेरा है जिसमें
कोण बने है । चुम्बक औरघेरा एकही ऊर्ध्वतलमें
है और वकसके अन्दर चन्द है। बकस एक ऊर्ध्व
अक्षपर घूमता है। क्षितिज अङ्कित घेरा(कोणवाला)
बकसके नीचे लगा हुआ है । इस धेरैपर वकसमें
लगा हुआ एक सूचक धूमता है जिससे बकसके
स्थिति जाननेमें सुभीता होता है।
.
.
D4
Lilin
चित्र न० ५५

पृथ्वीका चुम्बकत्व
१०१
मिलते है वही ध्रुव होते है। परन्तु सब यामयोत्तर
एक स्थानपर उत्तरमै और दक्षिणमें न मिलकर दो
दोयामयोत्तर एक एक स्थानपर उत्तर-(दक्षिण)
में मिले। इनके मिलनेके स्थानाको मिलाती हुई
जो रेखा खेंची गयी उसने एक बद चक्र बनाया
जिसका केन्द्र ध्रुव माना जा सकता था।
गौसने (Gauss) इसके बाद यह सावित
किया कि पृथ्वीके दो उत्तरी और दो दक्षिणी ध्रुव
तो नही हो सकते । यदि एफसे अधिक हो तो
भी तीन होने चाहिए और यह तीसरा धृव उन
दो के बीच में होना चाहिए और एक ध्रुवका स्थान
भी रोसके पहुचनेसे पहले अपने सिद्धातसे
निकाला। उनके निकाले हुए शर ीर देशान्तर
नीचे दिये जाते है।
शर
देशान्तर
७३ ३५ उ
६५°३६' पू
दक्षिणी"
७.३५'द
५२०३०प
यह ध्रुवोके असली स्थानासे कितने मिलते
जुलते हैं।
उनका सिद्धान्त तो बहुत कठिन है और
मी और समय रखा जावेगा
जानना श्रावश्यक है क्योंकि
उत्तरी ध्रुव

१००
चुम्बक
भागोंपर मुकता है और सिरोपर विलकुल सीधा
सडा हो जाता था। लोगोंका मत था कि दिक्सू
चकका चुम्बक उत्तर दक्षिण दिशामें इसलिए रहता
है कि ध्रुव तारा उसको खेचता है । डाकर गिलबर्ट
के इस प्रयोगसे यह मत बदल गया और पृथ्वीके
चुम्बकत्वकी खोज अधिक होने लगी। स० १८५७
में हेलीने ( Halley ) पहले पहल सम हटाव
वाली रेखाए नकशेपर सेंची, इनकी शकल देखकर
हैस्टीनने ( Hansteen) यह फल निकाला कि
पृथ्वीके चार ध्रुव हे, दो उत्तरी और दो दक्षिणी।
इनमेंसे दो प्रवल और दो दुर्वल हैं। उनके स्थान
हेस्टीनके निकाले हुए नीचे दिये जाते है।
देशान्तर
प्रवल उत्तरी ध्रुव ७०°५' उ E8° ७५' पू
दुर्वल
८५°२१'उ ११:३६' पू
प्रवल दक्षिणी ध्रुव ६६°२६' द
दुर्बल
७७°१७' द
१२°५७'प
समहटाववाली रेखाएँ जहाजके चलानेवालेको
लाभदायक है किन्तु पृथ्वीके चुम्बकत्वका हाल
इनसे ठीक ठीक नहीं मालूम हो सकता।
इसलिए ध्यु परेने (Duperry ) चुम्बकीय या.
म्योत्तर सेंचे । जिन स्थानोपर सब, याम्योत्तर
१३८३५'प

पृथ्वीका चुम्बकत्व १०३ रक्खो। छोटे चुम्बकके सिरॉके पास एक बारीक सलकी नोफसे दो विन्दु बना लो जैसा चित्र में दिखलाया गया है । छोटे चुम्बकको इस स्थानसे हटाओ और दूसरे स्थानपर इस तरह रक्यो कि उत्तरो सिरेके सामनेवाला चिन्ह दक्षिणी सिरके सामने हो जाये। इस स्थानपर चुम्बकको रसकर उत्तरी सिरेके सामने एक चिन्ह बना लो। चुम्बक- को दक्षिणी सिरेकी श्रार हटाते चलो और इस तरह रखते चलो कि उत्तरी सिरे के सामनेवाला चिन्ह दक्षिणी सिरके सामने आता जावे। जब रक्खे हुए चुम्मकके दक्षिणी सिरके निकट पहुच जाओ, छोटे चुम्बकको उठा लो और चिन्होको जोडती हुई रेखाएँ खंचा। इसके बाद इन छोटी छोटी रेयानाके चीचके विन्दुपर स्पर्श करती हुई एक रेखा खेचो यह शक्तिकी रेपा हुई। श्रव इसकी परिभाषा इस प्रकार दी जा सकती है। शक्तिकी रेखा ऐसो रेसा भाती है जिसके प्रत्येक विन्दुपर की म्पशरेखा शक्तिकी दिशा बतलाती है। शक्तिकी बहुत सी रेखाएं क्षेत्रमें सीची जा सकती है जैसा कि चित्रों में दिखलाया गया है। उत्तरी सिरा दक्षिणकी ओर और दक्षिणी सिरा उ त्तरकी ओर बदलनेसे इनका आकार बदल जावेगा।

चुम्बक
उनसे बहुत काम पड़ता रहता है। उसके तत्व थे
शक्ति और अवस्था की ( potenthal ) रेखाएँ ।
किसी स्थान पर रखे हुए चुम्बकका असर
जितनी हदतक और चुम्बकोपर पडे उस हदके
अन्दरकी जगहको चुम्बककी चुम्बकीय शक्तिका
क्षेत्र कहते हैं । इस क्षेत्रके अन्दर जो रेखाएँ इस
प्रकार खेंची जावे उनको शक्तिकी रेसा' कहते हैं-
चुम्बकको एक बडे कागजके टुकडेपर चुम्बकोय
उत्तर दक्षिण दिशामे रक्खो। या तो तागेसे लटका
हुआ एक छोटासा चुम्बक या एक छोटा दिक्सचक
चुम्बकके उत्तरी सिरेके पास एक स्थानपर
H
hvi
उ
चित्र ५६

पृथ्वीका चुम्बकत्व १०५ इन रेसायांसे समकोण बनाती हुई जो रेखाए सेंची जावे उनको अवस्था रेसाए (potential lines) कहते है। छोटे छोटे 'दिक् सूचकों में जोइन रेखायो. के खेचनेके काममें आते है बहुधा छोटासा सूचक चुम्बकसे सम- कोण बनाता हुश्रा लगा देते चित्र ५८ है। जेसे चुम्ब- कसे शक्तिकी चित्र ५६-इस उत्तके भीतर वख रेसाए ही है।

.
१०४
चुम्बक
[चित्र ५८] वास्तवमें इन रेसाका श्राकार
जरासे परिवर्तनसे बदल जाता है [चित्र ६०]।
एक लोहेका टुक्डा पास लानेसे कुछ और हो हो
जावेगा। [चित्र ५६]
दाक्षण:
चित्र ५७
.
चित्र ५६ में छोटी छोटी रेखाएँ शक्तिकी
रेखाकी स्पर्श रेखाए और जिस विन्दुपर रॉची
गयी हैं उसपर शक्तिकी दिशाए. सूचित करती है।

पृथ्वीका चुम्बकत्व इन रेसानोसे समकोण बनाती हुई जो रेखाएं खंची नावें उनको अवस्था रेखाए (potential lines) कहते है। छोटे छोटे दिक् सूचकों में जोइन रेखायो- के , खेचनेके काममें आते हे बहुधा एक चिन ५८ छोटासा सूचक चुम्बकसे सम- कोण बनाता हुश्रा लगा देते है। जैसे चुम्ब- कसे शक्तिसी राम। चिर ५६-इस रत्तके भीतर बल रेखाए नहीं है।

१०६ चुम्यक रेखा खेचते है उसी प्रकार सूचकसे अवस्था रेखाएं संचते हैं। चित्र ६१ में 'अ' अवस्थाकोऔर 'श' शक्तिकी रेखाए हैं। चित्र ६० इन रेखाओंका पूरा पूरा महत्व तो बिना डाइ- नमो और मोटरोंकी बनावटका हाल जाने नहीं मालूम होगा। यहा इनके महत्वके सबंध इतना पृथ्वीका चुम्मकत्व हो कहना काफी हे कि इनकी सहायतासे गोस पृथ्वीके ध्रुवोंका स्थान पहलेसे बता सके। ऐसा माना जाता है कि यह शक्तिकी रेखाए उत्तरी सिरेसे हवामें निकलती है और दक्षिणी सिरेसे “चुम्बकके अन्दर जाती है। यह कभी टूटती नहीं यह बद और चे सिरोवाली मानी जाती है। जैसे Learantinenepal.net चित्र ६१ चित्र ५६ में इसे लेकर तक हिम्सा बाहर और २ से लेफर १ तक हिस्सा लोहेके अन्दर है । चीचके थोडेसे हिस्सेपर रेखाए हे ही नहीं । यह हिस्सा चुम्बकत्व रहित मालूम पड़ता है । जेसा पहले देख चुके हैं इस हिस्सेमें लोहके छोटे छोटे टुकड़े नहीं चिपटते है । जव यह रेसाए बाहर निक-

१०.
चुम्बक
लती हैं तव चुम्बकत्व जान पडता है। रेखानीके
निकलनेको उनका विकीरण कहते है। बीचके
हिस्सेमें विकीरण नहीं होता हे।
उत्तरी या दक्षिणी सिरके पास लोहेका
टुकडा रखनेसे जो रेखाए बहुत फैली हुई होती हैं
इकट्ठी हो जाती है और यह टुकडा चुम्बकके
जितना निकट होता है उतनी ही अधिक रेखाए
इकट्ठी अर्थात् घनी होती है [चित्र५६] | जो चार
चुम्बकौका एक चौसटा उनके विषमजातीय सिरे
मिलाकर बनाया था और यह बतलायाथा कि ऐसे
चौसटेमें चुम्बकत्वका पता नहीं चलेगा , इसका
कारण यह है कि ऐसे चौसटेमें बहुत कम शक्तिकी
रेसाए बाहर निकलेंगी। वह एकसे दूसरे दूसरेसे
तीसरे तीसरेसे चौथेमे और चाथेसे पहलेमें चली
जावेगी और जिस चूडीम रेसाए अक्षके समाना
न्तर हाँ उसमें तो चुम्बकत्वका पता चलना
विना काटे विलकुल ही असम्भव है।
लोहेके टुकडेको चुम्बकके स्पर्शसे चुम्बक
बनाते समय उस टुकडेके घेतरतीय अणु चुम्ब
कोंको चुम्बककी शक्तिकी रेखाओंसे उनकी दिशामें
फेर देते हैं और जितनी रेसाए घनी होती है
उतना ही चुम्भक प्रवल और जलदी बनता है।
,

पृथ्वीका चुम्रकत्व
१०६
'पृथ्वीसे चुम्नक बनानेकोलिए लोहेके टुकडेको
झुकायसूचककी दिशामें रसफर हथोडेसे ठोकना
चाहिए पयोंकि मुझावसूचक शक्तिकी रेसाकी
दिशामें होता है और इस दिशामें छड रखकर
ठोकनेसे अणु चुम्बक बहुत जल्दी शक्तिकी दिशामें
श्रा जायेंगे।
ऊपरी दी हई रीतिसे एक एक रेखा सेंचनी
पडतीहै और जब क्षेत्रमेंबहुतसी रेवाएं खिच जाती
हे तव उनका हाल मालूम होता है परन्तु एक
शीशेके बडे टुकडेपर चुम्पक रखकर और लोहेके
छोटे छोटे टुकडोंको उसपर युरफकर एक ही दममें
सयका अनुमान हो सकता है । यह छोटे छोटे
टुकडे शक्तिकी रेखाए बनाकर चुम्बकके चारो
और जम जाते हैं यदि शीशेको गरमकर कर जरा
मोम उसपर फेला ले तो ठडे होने के बाद यह
टुकडेशक्तिकी रेखाओके स्थानांमें जम जायेंगे और
सदेवकेलिए रेसाए यन जावेगी।
जो स्थान उत्तरी सिरेके निकट हवामें होते हैं
वह उञ्चधवस्थाके (at highen potential) माने
जाते हैं और जितने उससे दूर होते जाते हैं उतनी
ही उनका अवस्था (potential) गिरती जाती है,
यहां तक कि जो स्थान अनन्ततापर (Infinity)

चुस्यक
होता है उसकी अवस्था मानी जाती है। जितना
काम एक इकाई प्रचलतावाले सिरेको अनन्ततासे
एफ स्थानपर निराकरणके मुकाविलेमें लानेमें करना
पडता है वही उस स्थानको अवस्थाका माप होता
है। हमको यहुधा दो स्थानोंको श्रवस्था भेदसे काम
पडता है। किसी स्थानकी अवस्था जानना बहुत
आवश्यक नहीं। दो स्थानोंको अवस्था भेद उस
कामके घरावर है जो एक इकाई प्रचलतावाले
उत्तरी सिरेको एक स्थानसे दूसरे स्थानतक
निराकरणके मुकाबिले करना पडता है।
१२-चुम्बकोय नाप तौल ।
चुम्यकत्व
के बारे में जितना ऊपर दिया
गया है, उसमें केवल कुछ प्रयोग देकर यह
यतला दिया गया है कि उनके द्वारा जाची हुई
वातीसे चुम्बकीय नाप तौल कैसे की जाती है,
पर यह नहीं बतलाया गया है कि किसी प्रयोग
से कोई विशेष परिणाम क्यों और किन सिद्धान्तों-
के अनुसार निकाला जाता है। यहापर इन
मौलिक सिद्धान्तोंका उरलेख ही उद्दिष्ट है जिनको

1 , चुम्बकीय नाप तौल 'समझकर प्रयोगोंके सब अनुष्ठान समझमें आ जायगे। स्वतन लटके हुए चुम्वकपर क्या प्रभाव पड़ता है। जय किसी चुम्बनको किसी प्रक्षपर भारूढ़ कर देते हैं और उसके निकटसे अन्य चुम्बक या लोहेके टुकडे हटा लेते है, उसपर केवल पृथ्वी की चुम्बकीय शक्ति ही प्रभाव डालती है। इस शक्तिका पूर्ण रूपसे प्रभाव चुम्बकपर तभी पड सकता है जव चुम्बककी चुम्बकीय अक्ष भुकाव- सूचकके समानान्तर हो । यदि अक्ष समानान्तर न होगी तो पूर्ण रूपसे प्रभाव नहीं पड़ेगा, जैसे यदि अक्ष समतल या ऊर्ध्व हो तो पृथ्वीकी शक्ति- के केवल समतल या ऊर्ध्व अवयवका ही प्रभाव पडेगा। पृथ्वीके चुम्बकत्वके समतल श्रनयवका महत्व चुम्बकको इस प्रकार रखना या लटकाना सुगम है कि उसकी चुम्बकीय अक्ष सम्- तल रहे । श्रतएव पृथ्वीको चुम्बकीय शक्तिके सम- तल अवयवसे ही काम पडता रहता है और इसी- का मालूम करना भी हमारे लिए आवश्यक है। समतल अवयवसे पृथ्वीको पूर्ण चुम्बकीय शक्ति निकालनेकी निधि दूसरे त्रिकोणमितिके नियमोंकी सहायतासे प्राय चुम्बक इस समतल अवयवके मालूम होनेसे ऊर्ध्व अवयव और पूर्ण शक्ति भी मालूम हो सकती हैं। मान लो पूर्ण शक्ति श है और ज इसका क्षितिज और व ऊर्ध्व अवयव है। श और ज के बीचका कोण झ झुकावका कोण हुआ। यह मुकाव सूचकसे मालूम किया जा सकता है। [देखो चित्र ६२] चित्र ६२ %3D कोज्या झ ज कोज्या झ -जxछेदनरेखा म इस समीकरणसे पूर्ण शक्ति निकाली जासकती है। ऊर्ध्व अवयव निकालनेके लिए- स्पर्शरेसा म व-जxस्पर्शरेखा क (१) चुम्बकीय प्रभावके समतल अवयवके नापनेकी रीति- मान लो कि चुम्बकत्वमापकका चुम्बक ब, द, है। यदि इसके केन्द्रकी प्रबलता प, मान व + १ चुम्बकीय नाप तोल लें और पृथ्वीफी चुम्बकत्वके प्रभावका समतल अवयव की बराबर हो तो चुम्बकके प्रत्येक सिरेपर प, प्रशक्ति काम करेगी। इनमेंसे एक की दिशा उत्तर और दूसरेकी दक्षिण हे, श्रतएव यह वरावरकी दो शक्तियां विपरीत समानान्तर दिशाओं में काम करती हुई युगल बनाती है ! इसका प्रायोगिक प्रमाण यह हो सकता है कि एक पीतलके बड़े प्यालेमें पानी भरफर उसमें एक काग छोड दो,काग पानी में तैरता रहेगा। इस फाग पर एक हलका चुम्बक रखो जिससे काग चुम्बक सहित तैरता रहे । यदि चुम्बककी दिशा उत्तर द- क्षिण न होगी तो काग घूमकर केवल उत्तर दक्षिण दिशामें था ठहरेगा परन्तु अपनी जगहसे तनिक भी न हटेगा। दूसरे, चुम्नक बनानेके पश्चात् लोहे के छडके बोझमें कोई भेद नहीं पड़ता। इसलिए जितना एक सिरा सिचता है उतना ही दूसरा हटता है। यदि एक छोरपर दूसरेकी अपेक्षा अधिक शक्ति काम करती तो चुम्बकका बोझ बढ जाना चाहिये था। यदि इस चुम्बकके दोनों केन्द्रोंके अन्तरको द, मान लें और चुम्बकको घुमाकर इस प्रकार

म
११४
चुम्बक
रख दें कि इसकी अक्ष शक्तिकी दिशाके साथ सम
कोण बनावे तो उस युगलका घूर्ण जो इसको
शक्तिकी दिशामें घुमाकर लानेका यत्न करेगा
५१
के बराबर होगा। पर द. ५१
प, चुम्बक
का चुम्बकीय घूर्ण है इसलिए
इस युगलका घूर्ण =zx चुम्बकीय धूर्स
प्रभावका समतल अवयव
xचुम्बकीय पूर्ण
यदि प्रभावका समतल अवयव इकाईकी बरा
घर हो तो युगलका घूर्ण चुम्बकीय घूर्णके बराबर
होगा । इसलिए चुम्यकीय घूर्णकी परिभाषा इस
प्रकार दी जा सकती है।
चुम्बकका चुम्बकीय घूर्ण उस युगलके घूर्णके बराबर है
जो इकाई प्रभावके क्षेत्रम स्वतत्रतापूर्वक घूमनेवाले चुम्बकको
क्षेत्रको दिशासे समकोण बनाता हुया ठहरा सकता है
यह परिभाषा पहले दी हुई परिभापासे
बहुत ही उत्तम है, क्योंकि इस युगलके घूर्णका
नापना, केन्द्रोंके पता चलाने और उनकी वीचकी
दूरी नापनेसे बहुत सुगम है। चुम्बकत्वमापकके
गज़ पर उसके दिक्सूचकके पूर्व अथमा पश्चिममें
बद एक चुम्बक जिसके केन्द्रोंकी प्रबलता प
प की बरावर और उनके बीचकी दूरी २ ल के
-

चुम्बकीय नाप तौल यरावर हो इस प्रकार रखो कि उसकी अन पूर्व पश्चिम हो। मान लो कि दोनो चुम्बकोके मध्य विन्दुओंकी दूरी द के बरावर है । इस चुम्बकके रखनेसे दिक्- सूचकका चुम्यक थोडासा हट जायगा । (चुम्बक इतनी दूरीपर रखना चाहिए कि यह हटाव ५° या ७° से अधिक न हो।) मान लो कि दिक्सूचक स्थानमें ठहरा है और हटावका कोण क के घराबर है। इस हटी हुई जगहमें दिक्सूचकपर- दो युगल लगे हुए है । इनमें से एक पृथ्वीके चुम्ब- कत्वके कारण पेदा हुआ है और दिसू०को पहले स्थानपर लाना चाहता है । दुसरा इस चुम्बकके रखनेसे उत्पन्न हुआ है और दिसू० को उसकी जगहसे हटाता है। दि००के ठहरनेपर इन दोनोके घूर्ण वरायर होने चाहिएँ । पृथ्वीवाले युगलका धूर्ण परावर हे प.म उम = प, xix द, x ज्याक, क्योंकि उ म = द, xज्याक] = न ४ च, ज्याक , जहा च, चुम्बकीय पूर्ण- केलिए लिखा गया है, जो पर और द. के गुणन फलकी यराबर है। [देखिये चित्र ६३] %3D

चुस्धक
२ चच४८
४ कोज्या व
-
और यदि द के मुकाविले ल छोटा हो तो
२ च च, ४द
-
कोज्या क
२च च१
-कोज्या क
जैसा कि ऊपर कह पाये है दोनों युगलोके
घूर्ण वरावर है, इसलिए च, म जया =२
x कोज्या क , समीकरण (१) और (२) से
च, दोनों तरफ होनेसे कट जाता है इसलिए
ज्या क द३
म
२'कोज्या क
अथवा ईद स्पर्श क =
इस समीकरणके वांई तरफ वाली सय
राशिया मालूम है इसलिए दाई तरफवाली दो
राशियोंमेंसे एक मालुम होनेसे दूसरी मालुम हो
सकती है।

चुम्बकीय नाप तौल
यदि चुम्यकीय धूर्ण मालूमन हो तो एक दूसरा
समीकरण इस प्रकार निकाला जाता है। कम्पन
धक्सके अन्दर झूलते हुए चुम्बकके झाटेका
समय इस समीकरणसें निकलता है।
स (समय) - शा
माना पूर्ण
च और म चुम्बकीय चूर्ण और क्षेत्र के प्रभावके
लिए लिखे गये हे और मात्राका घूर्ण चुम्बफके
आकार और झूलनेकी अक्षपर निर्भर है। यदि
चुम्बकका आकार चौकोर दडका सा हो और
मोटाईके समानान्तर अक्षपर झूलता हो तो उस.
के मात्राका पूर्ण
( लम्वाई )२+ (चौडाई)२
चुम्बकी मानाx--
और यदि चुम्बकका आकार गोल दडका सा हो
तो-
(लम्बाई)२
(व्यास)२
चुम्बककी मात्रा
+
म से मात्राके घूर्णको सूचित कर के इस
समीकरणको इस प्रकार लिख सकते है।
स=210
-

१२०
चुम्बके
श्रथवा स = ४२
म
X
चम
+
शाम
अथवा च प्र%3.
P
इस समीकरणको तीसरे समीकरणसे
भाग देनेसे "म" निकल आता है।
च शाम
१ द स्पर्शक
चम
यहां च तो कट जायगा और
२
स्पर्श क
-
इन दोनों समीकरणोंको गुणा करनेसे न कट
जायगा और च२ निकल श्रावेगा। इस प्रकार
चुम्बकीय धूर्ण और शक्तिका प्रभाव निकल
भाते है।
1
(२) ऐठनतुमासे चुम्बकोकी प्रवल तानोंकी तुलना करना
ऐठन तुलासे चुम्बकोकी प्रचलताओंकी तुल
ना करने के लिए एक चुम्बकको पहले रकायमै
रयकर तारका ऊपरको सिरा घुमाया जाता है
जयतक कि चुम्बक थोड़ासा हट न जावे । मान ले

चुम्बकीय नाप तौल चुम्बकको क', अश हटानेकेलिए ऊपरवाले सिरेको क श घुमाना पडा तो तारमें क-क १ ऐठन रही । इस ऐंठनके युगलका घूर्ण = (क-क, ) ४ स (१) [इन समीकरणों में से एक स्थिर सख्या है।] और हटी हुई अवस्था, पृथ्वीवाले युगलका घूर्ण = च प्र ज्या कर (२) जहां चुम्बकीय चूर्ण च के बराबर और शक्ति- का प्रभाव म के परावर है। इसी प्रकार यदि दूसरे चुम्बकको क, हटानेकेलिए तारके सिरेको , तो इसके सम्बन्धी युगलोंके घूर्ण = (क.क.) प्रज्यो क, जहां इसका चुम्ब- कीय घूर्ण च, के बराबर है। इनमेका प्रत्येक चुम्बक अपने नये स्थानपर साम्यावस्थामें है इसलिये प्रत्येकपर लगे हुए . दोनो युगलाके घूर्ण बराबर होने चाहिये। x स- च, 'ज्या क, (३) २ घुमाना पड़े x स और (क-4)x + १२२ और [क'-क,] x सच प्र ज्या क १ (३) को (४)से भाग देने से १ क-क चुम्बकीय घूर्णीकी तुलना इस प्रकार हो सकती है। यदि दोनो चुम्बकोंके केन्द्रोंके चोचकी दूरी एक ही हो तो प्रबलताओंका भी यही सम्ब- न्ध होगा। (३) चुम्बकत्वमापकसे प्रचलताशोंकी तुलना करना किसी चुम्बकको चुम्बकत्व मापकपर रखनेसे यह समीकरण मिलता है, जैसा पृष्ठ ११- पर सिद्ध कर चुके हैं- दस्पर्श क = और इसी प्रकार दूसरेको (यदि बरावर लम्बा चौडा हो)रसनेसे मिलता है। द स्पर्श क, - (२) (१) को (२) से भाग देनेसे चुम्बकीय पूर्णांका सम्बन्ध मालूम हो जाता है। r म

चुम्बकीय नाप तौल
श
--
व
१
स्पर्श क
स्पर्श क.
(४) चुम्बकोंको प्ररलताओंका मुकारिला झोटोंका समय
निकाल कर करना।
एक चुम्बकके झोटेका समय
T
१
स-२ चम
यदि "म" इसके मात्राका धूर्ण और च चुम्यकीय
घूर्ण हो तो। इसी प्रकार दूसरेके झाटेका समय
J मर
च, यदि म, दूसरे चुम्यकके
मात्राका पूर्ण और 'च, 'इसका चुम्बकीय पूर्ण हो।
(१) को (२) से भाग देनेसेस, /
म.
यदि दोनों चुम्बकोशी लम्याई चौडाई और
बोझ बराबर हो तो म र म, यरायर होकर
कट जायेंगे और च और च, की तुलना हो
जावेगी।
(५) दो सिरामें शार्पण, अथवा निराकरणको शक्ति
दूरोके वर्गके साथ विपरीत सबंध रखती है।
१

द
उद चुम्बक , २१ द. -दिक् सूचक है, द-दूरी है। उ ६२
१२४
चुम्बक
चुम्बकत्वमापकसे इस नियमकी जांच करते
समय चुम्बकको इस प्रकारसे रखा था कि उसका
एक सिरा क्षितिज धरातलमें था और
दूसरा दिक्सूचकके चुम्बकके बीचके ऊपर । जो
युगल दिक्सूचकके चुम्बकको हटा देता है जिससे
वह उन द स्थानमें जाकर ठहरता है उसकी
है,
-दिक सूचक की नई स्थिति।
चित्र ६५
पप
शक्तियां:
और
हैं जहाप प, चुम्मकों-
दर

और चुम्बकका
।
चुम्बकीय नाप तौल
૨9
के केन्द्रोंकी प्रबलताएँ है
उत्तरी सिरा चुम्बकत्वमापकके केन्द्रसे द
दूरीपर है
इस युगलका पूर्ण
= 2 xcx कोज्या क जहा क विचलनका कोण है
और ल दिक्सूचकके केन्द्रोंके वीचकी दूरी है।
पृथ्वीवाले युगलका घूर्ण = प, म ल ज्याक
इन दोनो युगलोकघूर्ण वरावर ह इसलिए
पप,
४ ल ४ कोज्याक = प१ ४ प्रल ज्या क ,
२१
और ल कट जाते है। इसलिए
प
द' ४ स्पर्श क
पीर तो दूरी यदलनेसे बदलते ही नहीं
है, इसलिए इस नियमको सत्यताकेलिए यह
आवश्यक है कि दूरीकेवर्ग और विचलनकेकोणकी
स्पर्शरेयाका गुणनफल एक ही रहै । यह उस
प्रयोगमें साबित कर दिया गया था । जिस
प्रकार नीचे रगे हुए सिरेसे क्षितिज धरातलमें
युगल उत्पन्न हो जाता है, उसी प्रकार ऊपर वाले
सिरेकी उपस्थितिसे अयतलमें युगल उत्पन्न

१२६ चुम्यक होता है, जिसका क्षितिज धरातलमें कोई असर नही होता है। यही इस रीतिका सबसे बडा उपयोग है। १३-परिशिष्ट शत्तिके अवयव यह हम पहले बतला चुके हैं, कि यदि दो शक्तियां गच और गक एक विन्दु ग पर मिलती हो और उनका परिमाण तथा दिशाए गफ और गच रेखाओसे सूचित की जाय, तो उनका लब्ध- परिमाण तथा दिशाम-गर द्वारा सूचित किया जायगा। क गर का परि माण निकालना बहुत सुगम होता है, यदि कगच कोण सम कोण हो। श्रव सोचिये कि ग पर एक शक्ति लगी हुई है, जो परिमाण चित्र ६५

परिशिष्ट
तथा दिशामें गर द्वारा सूचित की जाती है। इस
शक्ति का प्रभाव गच या गक दिशाओं में क्या होगा?
स्पष्ट है कि जब गर, गच और गक का लब्ध है,
तो गर का प्रभाव गच और कग के बराबर होगा।
इस प्रकार हम किसी शक्ति का प्रभाव किन्ही
दो दिशाओंमें, जो एक दूसरेसे समकोण बनाती
हो, सहजमें ही निकाल सकते हैं।
मानलो कि कर शक्तिके अवयव कत ओर क्ल
दिशा में निकालने ह।
यदि कोण व कत =
ल
कर, तो क का अग्यव
फत दिशाम
कर कोज्या कर
चित्र ६६
मत
इसी प्रकार कल
दिशामें कर का अवयव
मव
कव ज्या कर
यदि केवल एक ही दिशामें किसी शक्तिका
अवयव निकालना हो तो, शक्तिको उस कोणके
कोज्या से गुणा करना चाहिये, जो शक्ति और उस
दिशाके वीचमें हो।

चुम्बक
यदि एक विन्दु पर दो से अधिक शक्तिय
लगी हों और उनकी दिशाए मालूम हो तो शक्तियो
के अवयव दो दिशाओमें, जो एक दुसरेस
।।
वा
चित्र ६७
-
समकोण वनाती हो, निकाल कर उनके लब्धका
परिमाण और दिशा निकालना सुगम हे । मानला
एक विन्दु वे पर चार शक्तिया श, शर, शर, श३
लगी हुई हैं। उनकी दिशाए चित्रमें दी हुई है।
शकी दिशाको तो एक नियत दिशा और वम को
जो उससे समकोण बनाती है दूसरी दिशा मान
लो। अब

परिशिष्ट १२६ । . । यश दिशामें श का अवयवश -- कोज्या कर + 21 [फर कोज्या " " = श, कोज्या [ कर + कर + ] इन सब अवयवों का लब्ध इनके जोडके परा- बर है क्योंकि यह सर एक ही दिशामें है । मान लो कि इनका जोड =ज, व म दिशा में श का अवयव =श कोज्या १० =शx.30 - " " =श ज्या का . " " =श , श. ज्या [क, +F.] श ज्या [, + कर +1 इन सय अवयवोका लब्ध इनके जोडके बरा. यर है, क्योंकि सब एकही दिशामें हैं। मानतो इनका जोड-ज, न, औरण की दिशाओंफे बीचमें ; समकोण है। इसी कारण उनका लब्ध-ज . ज - - ।

- स्पर्श क% - - चुम्बक और यही चार शक्तियोंका लब्ध हुआ। मानलो श की दिशा और इस लब्ध की दिशा में क कोण हे तो -शक्तियोंके लन्धका परिमाण और उसकी दिशा दोनों मालूम हो गयी। ' (२) । विपरीत वर्गका नियम हम पहले घतला चुके है कि दो चुम्बकीय सिरोंमें श्राकर्षण और निराकारण की शक्ति पप पर दो सिरों की प्रबलताए है और द उनके चीचकी दूरी है । परन्तु हम यह भी बतला देना आवश्यक समझते है कि यह नियम तभी लागू है जब दोनों सिरे शन्य अथवा हवा या और ऐसे पठा थों में रसे हो जो अचुम्बकीय है अर्थात् जो चुम्बकसे आकर्षित नहीं होते, जैसे सोना चांदी तीवा इत्यादि । विसमथ एक मौलिक है जो चुम्ब- कफे पास लाये जानेपर दूर हटता है । इस प्रकारके पदार्थोंको विचुम्बकीय कहते हैं । लोहेके अतिरिक्त कोबाल्ट, निफल, और कई मिश्रित, जो हसलर' मिश्रितके नामसे विख्यात है चुम्यक द्वारा चेखी पर से सूचित होती है । [प और

पप
परिशिष्ट
१३१
जा सकते हैं। यदि दो सिरोके बीच अचुम्बकीय
पदार्थ न होकर कोई चुम्बकीय पदार्थ हो तो
उनके बोचको शक्ति इस सूत्रसे निकाली जाती है।
प
शक्ति
अर्थात् अ-चुम्बकीय पर्दाथमें रखे होने
पर जो सिरोंकी शक्ति होती है उसको चुम्बकीय
पदार्थकी ग्रहण शक्ति 'ग' से भाग देते है।
चुम्बकीय पर्दाथोमें गृहण शक्ति धनात्मक मानी
जाती है और वि-चुम्बकीय पदार्थ में ऋणात्मक
वास्तवमें पदार्थोके दो ही भाग करने चाहिए ।
उस मागके पर्थोके को जिनमें 'ग' धनात्मक
हो चुम्बीय कहना चाहिए और दूसरों को जिनमें
यह ऋणात्मक हो वि चुम्बकीय । लोहेके लव
रूपोंमें से स्थाई चुम्बरको लिए वह रुप सबस
उत्तम है जिसके पक धन शताश मीटरकी वाधा
(Resistance) सबसे अधिक हो । पदार्थके एक
शतांश मीटरको वाधाको उसकी विशिष्ट बाधा
कहते है । इसीलिए इस बात को यों भी कह
सकते हैं कि वह लोहा स्थिर चुम्यकोको लिए
सबसे उत्तम है जिसकी विशिष्ट बाधा पोरी से
अधिक हो।

-
1
.
3
l'rimted by C Y Chintamani at the
Lender Press Allahabad
ک
1
1
++

शार्यभापामें एक मात्र सचित्र मासिकपत्र । विज्ञान वार्षिक मूल्य ३) प्रति कापी ।। जिस विज्ञानके बलसे ससारको कायापलट- सी हो रही है, उसे ही सीधी सादी, भापामें समझाना, सिखाना, इस पत्रका काम है। 'विज्ञान' हिन्दी क्या,भारतीय सभी भाषाओं- में अपनी श्रेणीका पहला पत्र है। मगवाइये, पढिये, मित्रों को दिखाइये, गृहदेवियो और बच्चाको पढाइये । विज्ञानका प्रचार हो, और भापा और देशका उपकार हो। विज्ञानकी पुरानी जिल्द शीघ्र मगवाइये। सुअवसर न खोइये । इनके रखनेसे आपके पास वैज्ञानिकविश्वकोष सदा यना रहेगा। भाग ३, ४ ओर ५-प्रत्येकका मूल्य १॥ विज्ञानके ग्राहकोसे केवल ११) फुटकर श्रङ्क -- - L । विशारद, विज्ञान परिपद् ग्रंथमाला- विज्ञान प्रवेशिका (भाग १)-ले० रामदाम गौड़, एम ए. तथा सालिग्रान भार्गव, एम, एम सी, D विज्ञान प्रवेशिका (भाग २)-ले० महावीरमसाद, ची एस सी , एल टी, मिफताहउल फनून-(विज्ञान प्रवेशिका भाग १ का उर्दू अनुवाद)-अनु० अध्या० सय्यद मुहम्मद अली नामी, D ताप-ले० मेमचरलम जोपी, ची एस-सी D हरारत-(तापका उर्दू अनुवाद )-अनु० प्रो० मेहदी हुसैन नासिरी विज्ञान ग्रंथमाला पशुपतियोंका द्वार रहस्य-ले० सालिग्राम या ) ज़ीनत वहश व तैर-(उपरोक्त पुस्तकका उर्दू अनुवाद) केला-ले० प० गगाशर पचोली स्वर्णकारी- चुम्बक-ले० सालिग्राम भार्गव, एम एस-सी गुरुदेवकी ससार यात्रा-रो० यसीश्वर सेन०, अनु० महावीरप्रसाद, वी एस सी, एल टी विशारद, . 1 4 J " " " 19)

Chumbak

Author
Pandit,saligaram
Title
Chumbak
File name
Chumbak
Text
OCR done
Citation
1952
Published
2011/01
Publisher
Vigyan Parishad Priyag,
Language
Sanskrit
Pages
119
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546340
Barcode
4990010024825.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
UbHuKGxkjJA
Download PDF

Chumbak