Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Nyayakos

Pandit Mahamahopdhyaya · 2011/07

PDF Proofread

Front matter

--- सूचना. - पाटक गणों! इस पुस्तकका पठन श्रवन करते किसी भी तरहका संशय समुत्पन्न होवे तो उसका खुलासा ग्रन्थ कर्तासे कीजी. प्र- सिद्ध कर्ता गुण दोष विषय जुम्मेदार नहीं हैं.

अय ए ॐ - मुत्तिसोपानकी-प्रस्तावना. गाथा-काव्य सो तव्वस्स सव्स दुहस्स मुक्को । जवाहइ सययंजन्तुमेयं ॥ दोहामयं विप्पमुक्को पसत्यो । तो होइ अञ्चन्त सुही कयत्यो॥१॥ अणाइ काल पभवस्स एसो । सव्वस्स दुक्खस्स पमोख्वमग्गो वियाहि ओज समु विसत्तच्चा । कमेण अञ्चन्त सुही भवन्ति॥१११ उत्तराध्यायन अ०३२ इस जगतालय निवासी सब प्राणीयों उन्नति केही इच्छक हैं, उन्नति करो ! २ऐसा निर्घोष चारोंही तरफ हो रहा है. कोइ स्वय शरीरकी उन्नति करने उद्यमीहै. कोइ स्वय कुटुम्बकी उन्नति करने पर्यनी है, कोइ स्वय जातिकी ग्राम की देसकी उ नात करने पर्यास करते हैं. ऐतेही कितनही विद्याकी. जानकी, धर्मकी. समाज-सम्म दायों की उन्नति करने कोसीश करते हुवें भी दृष्टि आते हैं. इत्याद इन सर्व प्रकार की उन्नति करने का मुख्य उद्देश अत्मोन्नति करने काही है. अयात्-सर्व प्रकारकी उन्नतिके अन्तिम उन्नति जो करने की है, वो अत्मोन्नति ही है. इसलिये अन्य मर्व प्रकार की उन्नतियों है सो अत्मोन्नतिके सोपान पंक्तिये रूप है. अत्मोन्नति साय है २ - / 3 -- और अन्य उन्नतियों साधन है अर्थात् ऊपरोक्तादि उन्नतियों होनेते ही आत्मोन्नति हो सकती है. और आत्मोन्नति करना येही साधको का मुख्य कृतव्यहै. क्योंकि अ- स्मोन्नति हुवे वाद फिर किसीभी प्रकारकी उन्नति करना वाकी नहीं रहता है. अत्मो- नति करताने सर्व प्रकारकी उन्नति करली/इसलिये वो कृत्या कृत्य कृतार्थ हो गये. अर्थात वो सर्व दुःखासे मुक्त हों परमानन्दी परमसुखी बन जाते हैं !! ऐसी जो सर्व उन्नति मे अत्युतम शिखरी आत्मोन्नति है सो होनी बहूत ही मु शकिल है, क्योकि सर्व से ऊंच है और सर्व के अन्तिम की है. जो सहजही होताहो तो हरेक कोइ कर सके, परन्तु आत्मोन्नति कर्ता महात्मा तो इस संपूर्ण जगत् केज न्तुओं की संख्या में से बहुतही थोडे-विरलेही निकलते हैं. जो कोइ आत्मोन्नति कर सके हैं वो आत्मोन्नति कर्ता-कि जो उत कृतव्य को साध्य कर उसके पुक्त भोभी- थें बन गये हैं, उनके सरोध को श्रवन मनन पूर्वक गृहन कर पालन किया है उसी से कर सके हैं. और जो अब आत्मोन्नति करना चहाते है वो भी जब उन पूर्वजोके आत्मोन्नति कर्ताओं के फरमान पर चलेगे तवही कर सकेंगे. जहां तक सत्यमेव-तहा भी वो फरमान न मिला, जथार्थ न जाना, यथा विधि न पाला वहांतक कदापि आ स्मान्नति होने वाली नहीं. जो जो इस कार्य मे पश्चात पड रहे हैं उसका मुख्य येही सवर्वहै, इसलिये आलोन्नति इच्छकोको आत्मोन्नति कर्ताओंकी जाच करना अब्बल फरहै. सो तो इस वक्त यन मकती मुशकिल है, क्योंकी इसकली कालमे इस वर्त- मान जमाने-पञ्चम आरे में पूर्ण तोरसे आत्मोन्नति कर परमात्मा बन गये ऐसे महान पुम्प कोड रहे नहीं. और बन सकेभी नहीं. तब तो यह सद्भोध मब व्यर्थ ही हुवा ! क्योंकी जो काम बनती नही तो फिर कहनेते-सुननेते फायदाही क्या? परन्तु ऐसा नही समझीए. क्योंकी कभी कोड हीन शक्तिका धारक किती दुरस्थल प्राप्त करनेका इच्छक एक दिनमें न पहोंच सके तो भी मध्य में विश्राम ले उसे प्राप्त करता है. तै- मेही आत्मोन्नति का इच्छक आत्मोन्नतिके सस मार्ग मे लगा है वो कदापि इस जन्म में कार्यार्थ नहीं साध सके तो आगमिक भवमें तो जरूरही साध सकेगा. ऐसा जान आत्मोन्नति इच्छकों को आत्मान्नातके मार्ग में जरूरही प्रवर्त होना उचित है. वो आ- त्मोन्नति के मार्ग के प्रकाशक परमात्मा अभी नहीं हैं तोभी कुछ हरकत नही, क्यों- कि उनके ही फरमाये हुवे मन्यास्त्र अभि मोजूद है. उनमें आत्मोन्नतिका मार्ग बहुतही ?

101 रमाया है। खूबीके साथ कथा गया है. उस कथन प्रमाणे परवृत कर अनन्तात्मो ओं उन्नति दि- शा परमात्म पदको प्राप्त हुवे हैं. जिससे खातरी होती कि जिनेन्द्र प्रणितही आत्मोन्न तिका मार्ग तहा सत्य है निशांकित है, परमादरानिय है तवही उपरोक्त गाथामें फ- इस संसारका अति गहन दीर्घ पन्य जिनमें जीवो अनादि काल से परि भ्रमण कर रहे है. वो जीरो जो समय धर्म (जिन गणित मुद्रानुसार प्रतिका कम्यूक प्रकारते) पालन करते है वो अनुक्रमसे सर्व दुःन्द्रो ने मुक्त हो असन्त परम मुख के भुक्ता बनते है. यह आत्मोन्नति (मोक्ष) का मार्ग अनादि कालसे इम जगता लप में प्रस्त रहा है जिसे आराध अनन्त जीवों मुक्ति प्राप्त करी है. वृतमान में महा- विदेह भेद से संख्याते जीदों इसी मार्ग को आराध कर मोक्ष प्राप्त कर रहे हैं. और आगलिक कालले इमी मानके प्रभावसे निर्वाण पावेंगे अर्थात्-मोक्ष के मार्ग दोनही है. एकही है "वोही आत्मोन्नति (मक्ति) का नव न्याय मार्ग इन "म- क्ति-पोपान-गुणस्तारोहण अढीशत द्वारी" नामक ग्रन्थ में अनुक्रमने चउदह गु णस्थान द्वारा दर्गाया है. इने पठन श्रवण कर पूर्ण श्रद्धा पूर्वक यथाविधी आराध- पाल आत्मोन्नति के उच्छको इप्टार्थ सहज से साध नके इमही उम्मेद मे रम अन्य को प्रमिट्टी में लाने की मुख्य फरज समझ. आत्मोन्नतिके इच्छको के कर कमलमे म. विनय समर्पण कर कृतज्ञता समझताहूं. :- - लाला सुखदेव सहायजी-ज्वलाप्रसाद. ३ यह ग्रन्थ निमार्ण होने का मुख्य प्रयोजन. परम पूज्य पहित राज स्वीवरेन्द्र श्रीनिलक पिजी महाग हल लिन्दिन दो पवों (पाने) मुझे दक्षिण देगाने धर्म परिचार करने में मुख्य अविवान्पिी गतिथि:- रोमणी महामनीजी श्री गम परजी के. पानने क ११०६ मारहवे. नि ? ही गुणस्थानों पर ७२ सहा दावा दाग नलिने थे.वोद- से ही रूपमें.

प्रस्तावना १४ गुणस्थान. १. २ ३ समा नामदार मिथ्यात साचादन मिश्र अवाति देश विरति दृष्टि ३तत्वखोटा किंचित धर्म ७ प्रकृति ११.म. माने स्पर्श भद्रिकभावी उपशमावे | उपशमावे २लक्षणद्वार -- शस्थितिद्वार ज.उ.दआ ज. उ. अ-ज.अ.उत्कृज.अ.उ. ३ प्रकारकी वली ७ समे न्तर मूहूर्त | ६६सागर क्रोड पूर्व २४इर्यावही २३ मिथ्या २४मिथ्या, २२ अत्र टली त्वी. टली व वधी ४ क्रियाद्वार २३ द्वजापर तटली कर्म की सत्ताद्वार ८ कीतत्ता एवं एवं एवं एवं कर्म वन्ध द्वार ८ बन्धे ८ वन्धे |७ अऊटल ८वन्धे एवं कर्म वेदे द्वार ८ वेदे ८ कर्म उदयद्वार ८ उदय ८ ८ ९ कर्म ऊदीरणा द्वार ७ तथा ८ एवं ७ आयुटला ७ तथा ८ एवं १० कर्म निर्जरा द्वार ८ निर्जर ८ ३ ११ भाव ५द्वार एवं एवं ५ उ.खे.प. ५ मि अ. ४ मि टला १२कारण द्वार म.क. जो. ५ पुर्वके ३ अब्रटला| ३ एवं प्रस्तावना ६ ९ १० ११ १२ १४ ममत संयति वादर | वादर सम्पराय न्त मोहलीणमोह क्षीणमोहस्योगी अयोगी अप्रमत नियटी अनियटी मूक्ष्म | उप शा, संयति केवली केवली १५ प्रकृात ५ प्रमाद अपूर्व कार१प्र. २७क्षयो २८.उ २८ म. १० वो ज्योल उपशमावे रखपावे रण करे योपशमाप शमाचे पशमावे खपावे | लपाये पावे ज.अ.उ.ज.१ ममय ज. ममन.१मम न.१ समज. एकान.उ.अंत ज.अंतरज.३५ क्रोडपूर्व | उ. अन्तर यउअन्त उस्कृ अंतायउ.अतर उ. क्रोरर मृहूर्त उ.क्रोडपलघुअल. २ आरंभी परिग्र २. मायावती १ एवं | १ एवं १ एवं १ एवं इर्यावह १ एवं ४ एवं एवं एवं एवं मोहटल ७ एवं पनिटले ४ एवं एवं एवं ७ अयु एवं एवं दमोह १ सता एवं एवं पचनही टला टला | वेदनी ७ मोह ८ . ७ एवं ४ यानीटले ४ एवं टला ८ मोहटला मोहटला पातीटले १६ एवं भायुटला एवं एवं ५ तथा ५ तथा मो.ट./२ अ.ट एवं गोव नहीं ८ চীনা एवं पादी ४ एवं N द ८ . काटला ३ एवं समाग २ एवं २ एवं २ . दोन एवं दो प्रस्तावना १४ गुणस्थान. १ २ ३ ४ ३ १३ मारगणा द्वार २ २ नहीं ३-४ ४.५ १ ३ १४उपमार्गणाद्वार १ १. नही १ १ ४-३ २.१ १५परिसहद्वार २२ पावे २० वेदे एवं एवं एवं एवं १६आत्माद्वार ज्ञा. ८ ६ ज्ञा. चाटली | ज्ञानटली चाटली |चारिटली ६३ बी २ मन्त्री १४ अ. अस २/ सन्नीमज प्र. अ. १७जीवकाभेद द्वार १ १. सन्नी भ. नागद्वार १.३ आहा २ नथी। १३ एवं १० रवै. १.३ आहा १८ २ आ १२ कार नहीं १ कार्म २ नही ६ ६ ७ ६ ६ .. - १९ उपयोगद्वार . ज्ञा ३ अ.३ द. एवं -- - द.३ द. ३ द.३ २० लेश्याद्वार ६ ६ द ६ ६ ४ उ.ख २१ममाकत द्वार नही १ मेस्वा नहीं वे. क्षा. ४ एवं चरिव द्वार नहीं नहीं नहीं नहीं संयमा संयम २३ वेदवार ३ ३ ३ ३ * प्रस्तावना - or ९ ११ १२ १ १४ १ १ १ G.. १ ८ नहीं १ १३ मोन २ १०११-१२ १४ २ २ २ नहीं २ १-४ नही नहीं २ ८.४ १-४ १०.४ १४ वे एवं एवं एवं एवं एवं एवं /११ वे बेटे 9 ८ 9 जो गी कपाटली नांदनी १ एवं १ १ १ १ १ १ १ नांभर १४ ८ मन १४ मि. १ का. नह.. नम नी 8... . एवं २ एवं ७ A.G " . .. " मा ८ एवं एवं एवं हा .. एवं ६ १ . ' एवं वं राम एवं नदी ४ एवं • एवं एवं ई ५ एवं 19 हे. प. यथा ३ नही नही भी श्री मुक्ति सोपान १ १४ गुणस्थान १ २ ३ 20 ५ २४/ध्यानद्वार आ.४ रौ ४ ८ एवं | ९ धर्म १२० घ.२ ११ ध. ३ २५सज्ञाद्वार ४ ४ २६ गतिद्वार ४ ० १ दव १ ५० २७हेतुद्रार ५५ आहार २टले ५ मि ४ अनं ३ मि ४० ४अ. ३ मिश्रा का. वा. बद्ध अ.ट. टल २८ शाश्वता गुणस्थान शाश्वता अशाश्वत एवं शाश्वता एवं “१२ २९ शाश्वतायोगद्वार १३ आ.२/ टला १. श्वे १३ अमार ११ उ.मि १का. टला मि. ट. ३० सन्नी असनद्वार २ २ १ सनी २ १ सनी ३१कर्म प्रकृति बन्ध ११.० १०१ ७४ ३२ कर्म प्रकृति उदय ११७ १.११ १०० १०४ ३३ कर्म प्रकृति ऊदीरणा | ११७ १११ १०० १०४ ८७ ३४ कर्म प्रकृति सत्ताद्वार १४८ १४७ १४७ १४८ ३५/आयुकर्म के भाने २८ २८ २६ २० १२ ९ प्रस्तावना १३ १४ ८ ९ १ अ.४ एवं शु. २१ शु. ३१ शु. ४ १२ धं. ४ ९ एवं ९ एवं ९ एवं ३. ४ शु.?. एवं एवं एवं एवं तो. सन्या. एवं एवं एवं १ १ १ नहीं | मोन १ १ २७.४५ ११अ.८-२२४ शनि. २२.१.१६.दहा वेदारसं.लो.. । २ तथा नहीं आहाथ १ आ. सादिटलिसजा. भटला एक जोग. एवं अशाश्वत एवं एवं एवं एवं एवं शाश्वत अशावत ...प्र. नहीं १२अहा. ९.४ म. वाधा ४५. का. ९ एवं ९ एवं २ एवं ९ एवं १ एवं २१.१.का नोमन्ना सन्ना १ एवं एवं १ एवं १ एवं १ एवं १ एवं १ एवं १ एवं नहीं २८-५०/२२-२१ १७ १ १ २६ 09-५५ ८१ ७२ ८२ ६० द: ....२ ०नश नहीं --- १४८ १४८ १४८ १४८ १८ ५.८८ -- द ६ १ १ । - १२ श्री मुक्ति सोपान १ १४ गुणस्थान १ २ ३ ४ ४८ गातिअगतिद्वार ४ गत '८ आगत १गत.३आ.४गत.४आ.गत.९.आ.गत.३आ. ज.१ कभवमे स्पर्शना ज.उ.२ ज.१ उ.म.ज.१.उ.म.ज.उ.प्र. हजार संख्या हजार गाभव स्वीता ज.२उ.अ. जि.२ उ.५ अमंख्य संख्या एवं ज.२ उ.प्र हजार ८१कानदार काल करे एवं काल नहीं काल करे एवं जाये जावे नहीं जावे परभाले जाने द्वार नहीं ज अंगु. अ. हजा.यो एवं एवं एवं अत्रयगाद्वार ज.१अंगु.उ 2.हजार यों १.२.३-४ २-३-४-५] १ पचेद्री एवं एवं न्द्रिय द्वार . दरक द्वार 12.६३विक्कं. ११५म्य.ट. टले. १६ एवं २ मती असंख्या- १० असं. ७ असं. त गुण १० अनंत अन्या भल्या बहमदार गुण ज. अनंत ज. अं. उ. जीव श्रीमन्नाद. पा., अर्थ पु. ज.एक.मम गान प्रान्तर पर नहीं इ. पल्पक अ.भाग एवं एवं एवं एवं अतर नहीं अंतर नहीं लिंग ट्रिार निजगनहीं एवं एवं अमंख्यात गण एवं प्रस्तावना १३ ur ७ ८ ९ ११ १२ ३ गत गत २ आगत ६आ। एवं ४ गत २ गत १ गत? गत मोड २आ। १ आ आ आ आ २ आ ज.१.३.. एवं एवं एवं न.३२.ज.उ.१ ज.उ.१ ज.उ. ज.२ ज२३२. एवं एवं ज... उ.न.उ.? २० ज.उ.१ एवं एवं काल एवं एवं एवं कालनहीं एवं कालकरे IC नहीं नहीं नहीं नहीं नहीं नहीं | नहीं | नहीं न.हायच २०० धनु एवं जहाज ०१०५. एवं एवं एवं एवं एवं एवं एवं एवं एवं एवं एवं | एवं एवं नोइन्दि एवं १ मप्प १ एवं १ एवं? एवं | १ एवं | १ एवं | १ एवं | १ एवं १ एवं आठवानव वा संख्यान संख्यात वाला महोमाहे गवा गुग नंख्यात गुण | तुल्य १मदमे अम.टमंख्या ११अनंत थोडे गणत गण गुण एवं एवं एवं एवं अंतरनहीं नहीं नहीं उ.श्र.२ एवं एवं एवं अंतर नहीं अन्तर नहीं वर्षग्यता एवं मांन एवं एवं एवं उपनाम सपक अंतर अन्तर वर्प मांग नहीं नहीं एवं एवं एवं एवं एवं श्री मुक्ति सोपान १ १४ गुणस्थान १ ३ ४ ४८मतिअगतिद्वार ४गत ८ आगत १गत.आ.गत.४आ. गत...आ.दगत.आ. ४९एक भवो स्पर्शत ज.१ उ.१०० ज.१.२ ज.उ.म.ज.अ.म.ज.१.उ.प्र. हजार संख्या हजार ५ घणाभवने स्पर्शना ज २ उ. असंख्य ज२९.अ. ज.२ उ.५ संख्या ज.२ उ.प्र एवं ५१.कालद्वार काल करे एवं काल नहीं काल करे एवं ५२परभवलेजाने द्वार जावे जावे नहीं जावे नहीं ५३ अवयेणाद्वार जअंगु. अ. उहजा.यो एवं एवं एवं ज.१अंगु.उ १हजार यों १६ एवं १-२-३-४ ५४ इन्द्रिय द्वार २-३-४-५] १ पचेद्री एवं एवं ५ १६३विकं. ५८ दंडक द्वार १९५स्थ.ट. टले. २ मती २२ अनंत ८असंख्या असंख्या- १० असं. ७ असं. ७.६भल्पा बहुमहार যুগ त गुण ज. अनंत ज. अं. उ. एकजीव पाधीअन्तर उ. १६ मा. अधं पु. एवं एवं एवं ज. एक.सम घगानीव आत्रीभन्तर अतर नहीं उ. पल्पक एवं अतर नहीं अंतर नहीं अ. भाग असंख्यात एवं गुण भनिर्जग आश्रीद्वार र्निजरानहीं एवं एवं प्रस्तावना ७ ८ ९ ११ १४ ३ गत विगत २ आगित हुआ। २ आ एवं ४ गत २ गत | १ गत |' गत मोल २ आ. १. आ। १ आ| १ | १ आ ज.१ उ.४ एवं एवं एवं न.२.जर.१ | ज.उ.१ ज.उ.' ज. २ ज.२ १०६ ज२३२. एवं एवं ज.२.ज. उज.उ.१ ज.उ.१ एवं एवं काल एवं एवं एवं कालनही एवं कालबारे नहीं नहीं नहीं | नही नहीं नहीं नही नही नहीं ज.वाय २०० धनु एवं जहाज २११ध एवं एवं । एवं एवं एवं एवं एवं एवं एवं एवं एवं एवं एवं नोटन्दि एवं १ मनुष्य १ एवं १ एवं' एवं | । एवं | १ एवं |' एवं ' एवं १ एवं आठवानव वाह दरख्यात | भख्यान वाला महोनाहे | शवा गुग नग्यात गुण | तल्य एवं एवं एवं मदने अम.भियान थोडे गणनगण ग एवं एवं नहीं नहीं नदी उपनाम-पल अंतर क नदी भनर नहीं अन्तर नही परत एवं मांन एवं एवं एवं एवं एवं एवं एवं प १४ प्रस्तावना १४ गुणस्थान. १ २ ३ निरन्त्र गुण द्वार मल्यक असं आवलकाके एवं एवं एवं ख्या भाग असं. भाग देवलोक २६ मर्यादा | २१ स्वर्ग| १२ स्वर्ग| मोनही १२देवलोक १२ देव ६२ आयुप्यवन्ध द्वार गतिकवंध ३नर्कटली नही बन्धे गति म.दे. देवगति २ इलाड १३चडपड ४ गति द्वार | २दा दुर 2. परनाल ४ ही ३इलाड पर. नाल उलाल उलाल वन्धाके भाङ्गे४ उकाल ६४ (२भांग १२२भांगा १२ आश्री १०क्रम प. ध० एवं एवं एवं ६५वेदनी आश्रीभांगा २भांगा?२] एवं एवं एवं एवं मोहनी आश्री भांझा भांगा?२/ एवं एवं एवं एव ४ ६७आयुष्य आश्री ४ ४ १-२-३-४१-२-३-४/२.२.३-४ ४ १-२-३-४ ३-४ १८संघयणद्वार ६ ६ ६ ११ ७ भजना ६० पट्टी उद्धार १.१. ७० मिट म्पर्शनाद्वार निमा ७१/पाटममछटाणडीयावा,टाण वडी. तीर्थकरस्पर्श द्वार नहीं तीर्थकर गांववन्ध नहीं ७४ पट्टी द्वार १८.१४रत्न १ मंड. भाव द्वार छटा नहीं नहीं ११ २ एवं नीमा भजना छटा नही स्पगे नही नहीं वन्ध १५नी.च.वी.२ श्रा. मा. वा. म. मा. बध एवं ३५ ३८ १५ प्रस्तावना ५१ ९ ६ ११ । १२ १३ समय स्थि एवं एवं एवं एवं एवं एवं ति तक एवं २६ स्वर्ग एवं एवं एवं एवं एवं अनुत्त. एवं मरे नहीं मरे नहीं मोल अवन्ध | एवं एवं एवं एवं एवं एवं एवं एवं एवं एवं एवं ४ही २परनाल उलाल १इलड एवं गत नहीं एवं एवं एवं एवं एवं एवं एवं १ चौथा एवं एवं एवं एवं एवं भांगा २भांगा १ भांगा एवं चौथा २४ एवं एवं एवं एवं एवं २ भांगा एवं १ मांगा चौथा एवं ४ एवं २ २ २ ३-४ २ ३-४ १-४ १-२-४ १-४ १.४ १-४ 10 द प्रथम १ प्रथम १ १ २ नीमा छठा स्पर्गे वन्ये २ नीमा छठा स्पर्श गन्ये एवं २ एवं छठा सर्गे नही एवं २ २ २ २ ४ एवं एवं भजना नीमा | नीमा नीमा छटा तुला तुला तुला तुला तुला स्पग स्पगें। नही. स्पगें. स्पर्गे स्पग नहीं नहीं नहीं नहीं नहीं एवं एवं मा.म४ती.मा-४ एवं ४ एवं स. २२ । २२ क्षी. सा. २८ १६ इस मुजव संक्षेपित ७५ द्वारोंका यन्त्र मिला मो कण्ठाग्र कर लिया. पान्तु इस मे के तत्व गम्य गुढ ज्ञानकी मुझेपूरी समान न होनेसे मन बहूतही मुरझाने लगा. मई तरहसे खुलाप्ता जानने अति उत्कन्ठा जगी उसवक्त थोडेही अरमे वाट प्रकरण र- नाकर ' ग्रन्थ का चौथा भाग मुझे मिला जिसमें रहे हुवे ही ग्रन्योका अग्रन्त प. उन दत्त वित्त से करने में कर्म वन्ध उदय उदीरणाकी प्रकृत्तियों का खुलामा कु- छ २ होने लगा. कुछ ममझा और कुछ नहींभी ममझा परन्तु उनको माग्श रूप य- न्त्र एक पान पे लिख मेपास रक्खा और वारम्बार अणुमेहा युक्त पठन मनन कर- ते २ इच्छा हुइकी इस गुणाग द्वार थोकडे के पुरे १०० द्वार होवे तो बहूतह । अ- च्छा, इस विचार ही विचार मे वहूत वर्ष चले गये परमगानुपत हैद्राबाद आना हुवा. और सीकंद्राबाद वाले गणेशमलजी समदरीयाको धर्मके शोकीनजान समायिक प्र- तिक्रमण थोकडे सूत्रादिका अभ्यास कराया ज्ञानके शोकीन बनाये तब उनका भी क- हना हुवाकी इस गुणस्थानाद्वार के १०० द्वार तो पूर्ण जारही करना चाहिये ! एसा सुन मनमे निश्चय तो हुवा की कैसेभी कर १०० द्वार पुरे करूं. परन्तु ऐसा गहन ज्ञा- नका अन्य मेरे जैसे स्वल्प मातवाले को बनाना बहूतही वीकट मालुम होने लगा तो भी निश्चय खण्डन नही किया ओर नवे २ ग्रन्थोका पठन मनन करते २ जो जो बात ध्यान मे जचती गइ उसकी नोट करते २ ९० द्वार पूरे किये. उसवक्त वाघली (खानदेश) के निवासी धर्म पिय ज्ञान रासक मुकण्ठी भाइ रत्नचन्दजी चोरडीया द- शनार्थ हैद्राबाद आये. और यहां स्थापन हुवा “ज्ञान बृद्धि खाता" का अवलोकन कर ज्ञानवृद्धि करने की उत्कण्ठा जगी और रु १०० रनचन्दजी, दोलतरामजी चो- रहीय वाघलीवाले, रु.१०० संचालालजी उदारामजी मूथा जामडी वाले, रु. १०० इन्द्रचन्द्रजी वच्छराजजी रांका वाधलीवाले, रु. १.० ० रत्नचन्दजी रामचन्दजी कांक रीया वाघलीवाले और रु. ११० खेमचन्दजी हंसराजजी वम्ब वार कुण्डे वाले. यों पांचो सद् ग्रहस्थों मिल ५०० रुपे ज्ञानखाते मे अर्पण कर सविनय कहने लगे कि कोइ अभिनव अत्युत्तम ग्रन्थ इस खरचेसे प्रसिद्ध हुवा तो वडा उपकार होगा. उसव क्त मेरे मन मे घोटाती हुइ वात अनयास कहवा गइ कि " गुणस्थाना रोहण शतहा " ग्रन्थ जो मे नवा वनानेका विचार कर रहा हूँ सो कहो तो इस खरचसे प्रसिद्ध हो सकेगा. यह उजोने सहर्ष स्वीकार किया और उसी वक्त "परमात्म मार्ग दर्शक" अन्य प्रसिद्ध होने वाला था उसेम जाहीरात भी देवा गइ वश फिरतो यह वात पुक्त १८ -- --- होगइ तब मुझे वडाही फिकर हुवाकी है प्रभु ! ऐसे गहन ज्ञानकी पुस्तकको में केसै प्रसिद्धीमें घर सकुंगा. आगेक्या होगा इत्यादि. उसवक्त सुयोगसे जिनके फरमानसे परमात्म मार्ग दर्शक ग्रन्यकी रचनाकी इगथी और जो मुझे ज्ञान दि के काम में ग्रन्थों और सलहा द्वारा वारम्वार सहा यता कर मेरपर महान उपकार करता कच्छ देश को पावन करने वाले आठकोटी माटीपा समुदायके परम पूज्य श्री कर्म सिंहजी महाराजके शिष्यवर्य ज्ञानानंदी कवी श्वर श्री नागचन्द्रजी महाराजके करकमल मे परमात्म मार्ग दर्शक ग्रन्य गया उसमें 'गुणस्थानारोल्ण शतद्वारी की सुशखवर पडते ही गणस्थानाद्वारका एक ग्रन्थ मेरेपा म भेजा. "भद्रपुरुषो विना प्रेरे स्वभाव सेही उपकार करते हैं उसमें १०० द्वारोंका अवलोकन करतेही मेरे रोम २ विकश्वर हो गये और हिम्मत बन्धीकी अव१०द्वार सहलाइने लिख सकंगा कच्छसे आये गुणस्थान द्वार.१०४द्वारथे जिसके नाम-नाम द्वार. २ लनगार. : फिरियाद्वार. ४ कारणद्वार. ५ हेतुद्वार. ६ इव्यप्रमाण ७ अ- कर्पा.८ स्थिनि. ९ कर्मबन्ध, १० कर्मउदय. ११ कर्मदीरणा. १२ कर्मसत्ता १३ कर्मवेदना. १४ कर्मनिर्जरा. १५ गति. १६ आगति. १७ दण्डक १८ अहारकअना हारक. १२ मूलवादर. २० वमस्थार. २१ गति. २२ जाति. २३ दण्णक २४ भा पकभाषक. २५ परितऽपरित. २६ चर्मऽचर्म. २७ पदमऽपहम. २८ पञ्चखाणऽपञ्च- खाग, २९ नरागीवीतरागी.. वीर्य. ३१ काल. ३२ परभवगमन. ३शाश्वतऽशा श्वत. ३४ विरहकाल. ३२ क्षेत्र. ३६ स्थानक. ७ परिणाम. ३८ ध्यान. ३१ ध्या नकेपाये. ४० भन्य-भव्या. ४१ छमस्त केवली ४२ मंयता-संयति ४६ ममोह-स- मोह मरण. ४४ विग्रहा-विग्रगति. ४९ भवसंख्या. ४६ मिजीव स्पर्शना ४७एकम मयमेजीय. ४८ एकममय में कितनेचवे. ४९ जीवकभेद, ५० गुणस्थान. ५१ जोग ५२ उपयोग. ५: लेगा. २४ पर्याप्मा-पर्याप्ता. ५५ छःप्रजा. ५६ मामान्यजोग ५७ सामान्य उपयोगः ५८ ज्ञान. ५१ अज्ञान. ६. दर्शन. ११ तीर्थअतीर्थ. ६२कल्य ६३ रिङ्ग, ६४ वेदीऽवेदी. ६५ गरीर. ६६ अबघणा. १७ भयपण १८ मंटाण. ५९ क पाय. ७० कप.यप्रकृति. ७१ महा. ७२ इन्द्रिय. ७३ नमुन्यात ७४ वेद ७ प्राण ७६ आहारदिशी. ७ आहारओजादि. ७८ आहार मचेतादि. ७२ दृष्टि, ८० भाव ८१ प्रणामी. ८२ निवत्ति. ८: फरण. ८४ पुन्यमचिन्य. ८२ पाप प्रवृत्तिवन्य ८६ वन्धीकभाऊ. ८७ भार्गणा. ८८ अरोह अवरोह. ८९ गति दृष्टिन्न. ९. श्रेणी ।

-- - विचार सार प्रकरण ९१ परस्पर फर्शना, १२ आत्मा, ९३ सम्यक्त्व, ९४ संयम,९५ नियंठा, ९६ परि सह, ९७ वन्धकी प्रकृति, ९८ उदयकी प्रकृत्ति, ९९ ऊदीरणाकी प्रकृत्ति, १००स ताकी प्रकृत्ति, १०१ पुण्यवन्ध पापवन्ध, १०२ पुण्यपापउदय, १०३ इर्यावहीकेभा. ड्रे, और १०४ मार्गणाद्वार. यह १०४ द्वार थे. पूर्व के ७५ और यह १०४ दोंनोंमें से छाटकर १२५ द्वार के नाम लिखें और एकेक गुणस्थान पर १२५ द्वार उतारने सुरू किया १२५ पृष्ठका लेख होते ही विचार वदल यह पद्धती पसन्द नही पडतेही उन १०० पृष्ट रद्दी कर पुनः द्वितीया वत्ति लिखनी सुरू करी उसके ५० पृष्ट लिखा य कि उसी वक्त कच्छ देश से श्री नागचन्द्रजी महाराजकी तरफसे नामक ग्रन्थकी प्रसादी प्राप्त हुइ, उसमें किसी अन्यही ढव से चउदह गु- णस्थानो ८ कर्मा की प्रकृत्तियों पर ९४ द्वारो उतारे थे जिनके नाम ? चारवन्धद्वार और २ मूलबन्धद्वार, ३ उत्तर वन्ध द्वार, ४ ज्ञानावरणीयबन्ध, ५ दर्शनावरणीयद्वार ६ वेदनयिवन्ध, ७ मोहनीयवन्ध, ८ आयुवन्ध, ९ नामवन्ध, १० गोववन्ध, और ११ अन्तरायवन्ध. यह १० बन्ध के द्वार ऐसेही १० उदयके द्वार. ऐसेही १० ऊदीरणा के यह ३१, और ३२ मूलसत्ता, ३३ उत्तारसत्ता, ३४ आठकर्मकीसत्ता, ३५ जीव, केभेद, ३६ गुणठाणा, ३७ योग, ३८ उपयोग, ३९ लेश्या, ४० मूलहेतु, ४१ मि- थ्याल हेतु, ४२ अविरत हेतु, ४३ कपायहेतु, ४४ योगहेतु, ४५ समुचय हेतु, ४६ अल्पाबहुत, ४७ मूलभाव, ४८ उत्तरभाव, ४१ औदिकभाव, ५० औपशामिक भाव- ५१ क्षयोप शामिकभाव, ५२ क्षायिकभाव, ५३ परिणामिक, ५४ सन्नावाइ, ५५ वि शेप जीवभेद, ५६ नर्कभेद, ५७ तिर्यंचभेद, ५८ मनुष्यभेद, ५१ देवभेद, ६० समु- चयभेद, ६१ समुदघातं, ६० ध्यान, ६३ ध्यानके पाय, ६४ वेद, १५ दन्डक, १६ योनी, ७ कुलकोडी, ६८ ध्रुववन्ध, ६९ अधुववन्ध ७० ध्रुवोदय ७१. अध्रुवोदय ७२ ध्रुवसत्ता ७३ अध्रुवसत्ता. ७४ मघातिक, ७५ देशघातिक, ७६ अघातिक, ७७ पुण्यप्रकृति, ७८ पापप्रकृति, ७१ परावर्त, ८० अपरावर्त, ८१ क्षेववीपाक, ८२ भव विपाक ८३ जीवविपाक, ८४ पुद्गलविपाक, ८५ मोह नमिकभा), ८६ दर्शना वरणी के भाने, ८७ वेदनीकेभारे, ८८ गोवकेभाने, २. अन्तरायकेभाङ्गे, ९० नामकेभाड़े ९१ आश्रवकेभेट, ९२ मंवरकेभेट, १.३ निर्जराकेभेद, ९४ वन्धतत्व, यह ९४ द्वारों य. अवलके द्वारोंके लिष्टमें इन १.४ मेंसे छाटकर द्वारो मिलानेसे २२५ द्वार परे कि ये. और फिर कर्म ग्रन्थ में से कुछ गोमट सारके कर्म काण्ड से लिये हुवे कुछ स्वक- ल्पित यों मब मिलाकर २०२ द्वारो हुवे. उनके नाम.

१९ + २० परस्पर मार्गणा १ नामदार २ अर्थद्वार ३ प्रश्नोत्तरद्वार ४ प्रवेशद्वार २१ परस्पर उपमार्गणा २२ अरोह अवरोह X x २३ चडाचडगति ५ लक्षणद्वार x २४ अन्तरकाल ६ दृष्टान्तद्वार x २५ विरहकाल २६ एकभवमें स्पर्श %3D x X २७ बहूत भवमें स्पर्श X Our २८ परस्पर स्पर्श X २९ पहमापढम गुणद्वार ८ अवघेणाद्वार ९ उत्पतिद्रव्यप्रमाण १० पावतीद्रव्यप्रमाण ११ खपतीद्रव्यप्रमाण १२ क्षेत्रमाण * ! १६ शेवस्पर्शना १४ काल (स्थिति Gad ३० शाश्वता शाश्वत ३१ परभवगमन GG ३२ भवसंख्या + २३ अल्पा बहुत X १५ कालमाप्त ३४ किरया १६ भाव प्रमाण X x ७ निरन्त्रगुण १८ मार्गणा ११ उपमार्गपादार ३५ मूलहेतु कारण ३६ मिथ्यात्व हेतु ७ अविरत हेतु ३८ कंपाप हेतु SAR t २० 4 ॥ ५८ देशातीमा ३९ योग हेतू ४० समुचय हेतू 2 अाति re ४१ चार बन्ध १० अगानिकर्म का ४२ ममुचय कर्म वन्ध 57 'पुग जर्मन - ४३ ज्ञानावरणीयबंध १२ गत मकान का . ४४ दर्शनावरणीयबंध पाप कर्मा . ४५ वेदनीयवंध ६४ पाप कर्म प्रति बना ० ४६ मोहनीय वन्ध ६५ परावर्तमान कर्म वन ११ ४७ आयुप्य बन्ध १६ परावर्तमान ममतनि- ४८ नाम कर्म वन्ध ६७ अपगवर्तमानकर्म बंध ४९ गौव कर्म वन्ध ६८ अपरावर्तमानकर्मप्रकृति -- । ५० अन्तराय कर्म बन्ध ६९ - भूयस्कार कर्म बन्ध ५१ धुवकर्मवन्ध •. भूयस्कार कर्म प्रकृति ७१ अल्पतर कर्भ बन्ध ५२ धुवकर्म प्रकृति वंध ܀ : ५३ अध्रुव कर्म वन्ध ७२ अल्पतर कर्म प्रकृति ५४ अध्रुव कर्म प्रकृति बंध - - ७३ अवस्थित कर्म बन्ध ५५ सर्व घाति कर्म वन्ध ७४ अवस्थित कर्म प्रकृति . ७५ अव्यक्त वन्ध ५६ सर्व धाति कर्म प्रकृति ५७. देश घाति कर्म वन्ध . ७६ समुचयकर्मप्रकृति बन्ध ११. ७७ कर्म वन्ध व्यछेद ९६ शवविपाक कर्मोदय ९७ क्षेवाविपाककर्मप्रकृतिउ ७८ कर्मप्रकृति बंध व्यछेद ७९ समुचय कमोदय द्वार । . ८. ज्ञानावरणी उदयद्वार ८१ दर्शनावरणीय उदय ८२ वेदनी उदय द्वार . ८३ मोहनीय उदय द्वार ८४ आरय उदय द्वार . ८५ नाम उदय द्वार ८६ गौन उदय द्वार ८७ अन्तराय उदय द्वार २८ भव विपाक कर्मोदय ९१ भवाविपाक कर्म प्रकृतेि. १०० जीवत्रिपाककर्मोदय १०१ जीवविपाककर्मप्रकृति १०२ पुलविपाक कर्मोदय 18 | १०३ पुतविपाककर्ममनिट १०४ , सर्व याति कर्मोदय १०५ मर्ववातिकर्मप्रकृतिउदय १०६ देगघातिक कोदय २०७ देशघातिकर्मप्रकृति उ. १०८ अघातिकादय द्वार १०९ अघातिकर्मप्रकृति उदय ११० नमुचयकर्मप्रकृति उदय १११ कर्मोदय व्यच्छेद ११२ कर्मप्रकृति उदयव्यछेद ११३ . ममुचय उदारणा ११४ ज्ञानावरणी कर्म उदीर । स . ८८ ध्रुवकर्मादय ८९ ध्रुवकर्म प्रकृति उदय ९० अध्रुव कर्मोदय द्वार ९१ अ व कर्म प्रकृतिउदय ९२ पुण्य कर्मोदय द्वार ९. पुण्य कर्म प्रकृति उदय ९४ पाप कर्मोदय द्वार . ९५ पाप कर्म प्रकृति उदया ।

११५ दर्शनावरणीकर्म उदीर. ११६ वेदनीय कर्म उदीरणा ११७ मोहनीयकर्म उदीरणा ११८ आयुकर्म उदीरणा १११ नामकर्म उदीरणा १३४ युवकर्म सचाद्वार १३५ बुवकर्म प्रकृति मत्ता १३६ अब्रुवकर्म मत्ताद्वार १३७ अध्रुवकर्मप्रकृति सत्ता १३८ मर्वयातिककर्म मत्ता १२० गोवकर्म उदीरणा ० १३९ सर्वघातिककर्मप्रकृतिम- १४० देशघातिक कर्म मत्ता २४१ देशघातिकर्मप्रकृतिमता x . १२१ अंतरायकर्म उदीरणा १२२ समुचयकर्मप्रकृति उदी. १२३ कर्मोदीरणा व्यच्छेद १२४ कर्मप्रकृतिटीरणा व्य १२५ समुचय कर्म सत्ताद्वार ० १४२ अघातिकर्म मचा - X X १२. ज्ञानावरणी सत्ताद्वार ० १२५ दर्शनावरणी मत्ताद्वार ३ १२८ वेदनीय मत्ता द्वार १४३ अघातिकर्मप्रकृति मत्ता १४४ ममुचयकर्म प्रकृतिमत्ता १४५ कर्ममत्तान्यछेद द्वार. १४६ कर्मप्रकृती सत्ताव्यछेद १४७ ममुचकर्म भंग द्वार १४८ ज्ञानापरणी भङ्ग द्वार १४१. दर्शनावरणी मन १५० वेदनीयभद्रद्वार १५१ मोहनाय भङ्ग द्वार १२२. मोहनीय मत्ताद्वार •. १३० आयुकर्म सत्ताद्वार १३१ नामकर्ममत्ता द्वार १३२ गावकर्म मत्ताद्वार १३ अन्तगयकर्म भत्ताद्वार •. * . १६२ यायु भन्न द्वार १९३ नाव भङ्गद्वार x १७२ पा-गति द्वार १५४ गावभंग द्वार x १७. जागति द्वार १५२ अन्तराय भङ्ग द्वार १७४ आजातिद्वार 1. १७२ पाजाविद्वार १२६ बन्धित भागे १५७ इर्यावही के भाने १७६ जा-जातिदार १२८ नुल भाव द्वार 0.0 २७७ आकायादार १५२ औदायिक भारद्वार x १७८ पाकायाद्वार १६१ उपनामिक भाव १७२ जाकायादार १६१ भयोपगामिक १८. आदइकतार १६२ भाविकभाव x १८, पादंडार १६: परिणामिक भाव १८२ जाडस दार १६४ मनीपातिक भाव x १८. मानन्य भी भेट १६. ममुचर भारद्वार १८१ विरगंट द्वार . १६६ श्रेणीद्वार x १८० जीगोनीदार x १६७ वर्षदेद्वार १८६ कुलगेटी द्वार । १६८ कर्म विर्जगद्वार १८७ टरदार X sonu ८८ म्यानमार १८ मा तीदार x. ११ जना द्वार । २४ X X १११ आहारकनारक १९२ भोजादि आहार x २१० स्वर्गकी मयांदाद्वार २११ पटस्थानहानीवृद्धि २१२ मूल उपयोगद्वार 60 १९३ मचितादि द्वहार द्वार १९४ दिशी आहार २१३ अज्ञान द्वार + २१४ ज्ञानदार ११५ पर्याप्त अपार्याप्त १९६ पर्याद्वार २१५ दर्शनद्वार + x १९७माणद्वार २१६ समुचय उपयोग द्वार २१७ दृष्टिद्वार + १०.८ इन्द्रियद्वार x २१८ भव्या भव्यद्रार ܀܀ १०० इन्द्रिय विषयद्वार 60 ३१० चरमा चरम द्वार x 200मनाद्वार २०० परिता परित द्वार - x २०१द द्वार + २२१ परिमह द्वार + ००० पाय द्वार ००० आत्मा द्वार + 303लटयादार X ००३ ध्यान द्वार ०४ योगदार ०२४ ध्यानके पाये द्वार - '२०५गर द्वार X पटद्रव्य द्वार नवयण द्वार परिणामदार २०७मंटागटार याय द्वार २०८ मांगदार २०० विग्रहगतिहार बिहार 14 - ग । २४८ निर्जरा भेट द्वार २२२ सम्यक्त्वद्वार २३. मयता संपति दार २४२ करणी फल द्वार २३१ लिङ्ग द्वार २२ तीर्थकर गौवोपार्ज २३२ चारित द्वार २५१ तीर्थकर सर्ग २. निया द्वार २२२ पाबदार GM २६४ कल्पद्वार २५ परिमह द्वार - و مرا २३६ अमानद्वार .. २३७ मरागी वीतरागीदार २३८ पडवाइ अपडगई २६९ छमस्त केवलीद्वार २४० ममुदयात द्वार -- २४१ देवदार om २४२ परिणामी द्वार २४३ कारपद्वार २४४ निहाति द्वार X २४५ आश्रद्वार २४६ मवरद्वार २४७ निर्जगदार २६ जिस द्वार के अंक की पीछे + ऐसा चिन्ह किया है वो द्वारों बहूतस्थान लिखें पाये. जिसके पीछे x ऐसा चिन्ह किया है 'श्री तिलोक ऋपिजी महाराजके ह स्त लिखित पत्र में से लिये हैं. जिसके पीछे ऐसा चिन्ह किया है वो द्वारो श्रीना गचन्द्रजी के भेजे हुवे गुणठाणाद्वार" में से लिये हैं. जिसके पीछे * ऐसा चिन्ह, किया है वो द्वारा श्री नागचन्द्रजीके भेजे हुवे चिचार सार प्रकरण ग्रन्थ मेंमे लि ये. जिसके पीछे = ऐसा चिन्ह किया वो द्वारों छे कर्म ग्रन्थ " मेंसे लिये हैं. जिसके पीछे • ऐसा चिन्ह किया वो द्वारो गोमठ सारके कर्मकान्ड " से लिये है. जिसके पर छे - ऐसा चिन्ह किया है वो प्रकरण संग्रह मेंसे लिया. और जहां ० ऐसा चिन्ह किया है वो पूर्वापर अपेक्षासे स्वमति से लिखे हैं. यों सब २५२ द्वारोंकी नोटकर ग्रन्थ लिखना फिर तीसरी वक्त शुरू किया. और ६०० पृष्ट में पूर्ण कर पुनः शुद्धाटात लिखनेका विचार करते संकल्प हुवा कि इ स ग्रन्थको मूल कान्ड और अर्थ कान्ड में दो विभाग में विविक्षित कर २५२ द्वारों को गुणनिप्पन्न चारों व डों में अलग २ बाट लिखनेसे खुलासा अच्छा होगा. तदनुसारी शुद्धाटात लिखी जिसके ८०० पृष्ठ हुवे. जैन तत्र प्रकाश, परमात्म मार्ग दर्शक ध्यान कल्पतरु इसादि ग्रन्थों तो फक्त तीन चार महीने जितनी मुदत में ही लिव सकाथा परन्तु इस ग्रन्थको लिखने ॥ वर्षका मुम्मार लग गया जिमका मवय- अव्वल नो इस ग्रन्थ का विषय बहूतहा गहन है. उ. में स्पष्ट करने जितनी टममें मगन मारी करनी पड़ी वैमी अब्बल किसी भी पुस्तक लि ग्वने नहीं करनी पड़ी थी. नाभी इसमें बहुतमे विपयोंको तीन २ चार २ वक्त लिखते ही मनकी पूर्ण ग्वानरी न हुए नव फक्त मूल प्रमाणे उताग करनाही उचित समझा. मेही किया. और दुमरी जवर अन्नराय का उदय होनेमे मुझे आत्मसाधन में और ज्ञानवृद्धि और कार्य में पूर्ण महायता के कर्ता-विधन विपनी के हर्ता परम पूज्य तपश्वीराज श्री केवल ऋपिजी महागजके शरीग्म श्रमाता वेदनीयका प्रबल उदय होनेमे मव प्रकारकी महायता बन्ध पड़ी और अन्य कार्य मन्यना भाग पडा,व्याख्यान आहारलाना आ पोपचार र आने वालोंक माय वान्तालाप बंगग कार्य मेरेही करनेके होनमे उधर लाकी प्रेग्ना अधिक होने लगी. लिपने अपूर्ण विषय को लोट आट,२ दिनतक उ मालोकन करनकामी अवमा प्राप्त हवा न निमम उम विषयक अनुसन्धमेकी वि मरान हाने मे बोगया हो गया बट्टन मापीयो ग्रगट नव विचार होता है की महार है २७ ज के आगम हुने वाद द्वितीया हात लिखकर कच्छ पंजाब मालवा काडीया वाडमें क्चिरते पाण्डित मुनिराजोंके निघानीचे निकला थुदि बृद्धि के साथ फिर हाथ से लि खे बाद छपवाऊंगा. इत्यादि विचार ही विचार में रहगया और भव्यतव्यता योग म हाराजश्रीका आयु अन्त हो गया. फिर विना कारण एकस्थान रहना होवे नही. एक विन पूर्ण चित्त की स्थिरता और अन्य अनेक ग्रन्थों सहायता नही. जिससे ज्ञा. न बृद्धि के कार्य में आगे बढना अटका और जो वाकी ३॥ महिने का चौमास का काल वाकी रहाया. उसमें लिखने और छपने प्रारंभ किये हुवे ग्रन्यो जपसेण वीजय सेणं चरिव, वीरसेण कुसुम श्री चरित्र. सम्वेग मुग चरिव. मर्म बोध मराठी पुस्त क की द्वितीया वत्ति इत्यादिको समप्त करना. पुरुष सुधारना. श्री केवल ऋपि महा- राजका चरिव रचना तथा व्याख्यान और साधुकी नियमित किरिया का करना व गैरा कार्यों गन्यने से इस ग्रन्थ की यों त्यों समाप्ति करी. और अपना धर्मका प्रेस आजमेरे भेजनेका विवार था परन्तु अवल दिया हुवा जयतेण चरित्र के पांच महिने में कल पांच ही फारम छापकर दिये वोभी बहुत अशुद्ध जिको मन हट गया. और सन्मुख ही यह काम होता अच्छा जान यहांके नवीन हुवे 'शारदाप्रेम कै उत्साही मैनेजरको जलदी और शुद्ध कार्य करने का करार कर दिया. पुत्र मे करक्शन का रते भी कितनेक स्थान शाद्ध वृद्धि करी है तोभी इस ग्रन्थ में बहूत अशुद्धियों और खामीयों रह गइ है यह में निश्चय में करता हूं. उसके लिये ऊपर दर्शाई हुइ मेरी ला चारी पर रहम कर पाठक गणो श्रम वकलेंगे ? और जैनशास्त्रज्ञ पान्डन महात्मा ओं उसका शुदिपव बना कर जो वकमीम करेंगे तो सभार स्वीकार द्वितीया वत्ति उपा. नेका प्रसङ्ग हुवा तो योग्य सुधारा जबर ही करना चाहता हूं नी. मैं अल्पज्ञ बहुत दोषी हूं। यह ग्रन्थ है महान ॥ मिथ्यालाप दुप्कृत्य करूं । सुधार जो विद्धान ।। उन्नत आत्म का दाम. अमोलख ऋषि.

२८ H . समर्पण पत्र. स्वर्गस्य-पूज्य पाद परमुपकारी तपस्वीराज श्री केवल शापिजी महागज माहेव की परम पवित्र सेवाम. जिनोंके कुलमें सगुप्तन्न हो जैन धर्म पागा, जिनकी गग्य मय मुद्रा बैग- गी बनाया. जिनकी हरकत रह मे पूर्ण महायता मिलने मे मदान प्राप्त कम्पका और उसका लाभ अन्यको टेनेको जो मेरी फरज थी वो कुछ बजा सका. इत्यादि जो जो कुछ योग्य कार्य कर जनके चारों तीर्थंका और अनेकोका कृपा पान जो मे री पामर आत्मा वनाहे मो मय पुण्य प्रताप आपश्री काही है. इत्यादि महणो से म नाकर्षण हो यह 'मुक्तिमोपान गुणस्थानारोहण अढीशत द्वारी' नामक ग्रन्थ आप- श्रीजी की सेवामें ही समर्पण कर कृतज्ञता समझता हूं. शिक्षु-अमोल ऋषि. उपकार पत्र. कच्छ देश पावन कर्ता आठकोटी मोटी पक्षी के परम पूज्य स्याद्वाभो निधी कर्म सिंहजी महाराज के शिष्य वर्य पण्डित प्रवर कवीराज श्री नागचन्द्रजी म- हाराज की सेवा में:- इस ग्रन्थ के पूर्ण १०० द्वार भी लिखने अशक्त हुवे को २५२ द्वार लिखने । शक्ति की वकसीस आपके कृपा दान किये हुवे गुणस्थान द्वार" और सार प्रकर्ण" ग्रन्थों के पठन मनन सेही हुइहै. ऐसे ही तर आपने परुपकार आज ७ वर्ष से उत्साह और सहायता दान दे ज्ञान दान रूप परम साभ मु दिला रहे हो. यह आपका उपकार अकल्प है जी. कृपाभिलाषी-अमोलऋषि. .

ग्रंथ कर्ताका संक्षिप्त जीवन चरित्र. मारवाड देगके मेडने गहरके रइम, मंदरमार्गी पडे माथ ओसवाल कांसटीया गोतके, भाइ कस्तुरचंदजी व्यापार निपित्ते मालवाके आमटे (जोदपूर) ग्राममें आर- हेथे. उनका अकस्मात आयुष्य पूर्ण होने में उनकी मुपनी जवारावाइने बैंगन्य पाकर ४ पूनोंको छोड माधवानी जैन पंथ में दिक्षा ली. और १८ वर्षकि मंयम पान. माता पिता व पत्री वियोगकी उदासीसे नेटकेचलंचाही भांगन गहर में पागहे और पिनाके धर्मानुसार महीन पार्टीयोंके पंच प्रतिक्रमण मग. पूजा आदि कंटाग्र किये. उगवत. श्री कंवरजी ऋपिजी महागज भोपाल पां. उनका सा- ख्यान मुन्नेको पाइजी धांडीवाल केवलचंदजीयो जबरदान गये. मग गज श्रीने गायगांगी सबको चतुर्थ उद्देगसी कामी नामाप्रा. नित म उनको व्याख्यान भनिदिन गननेकी ने तीन बोलका थोक त्यादि अश्याम करने २ विधामा भाग ली कर्यके जोरने उनके मिवोन जबरदस्तीने गमावर गदा दिया. दो पुत्र को लोड वो भी आएप्प पूर्ण कर ग ... मी की मरणाने तामरी पत्ता प्यार करने के लिये मान्दार गने र श्री मागरजी महागज के दर्शन करने को पनाम को सदन मो. गुवानी मे मजोर पीलत धारण करने वाले भाइ बन्नारदजी याद को मिल. वो उनको काने लगे दि.. 'दिपा पनी निगर को भन्नेको पो नपान होते तो पो दाने उन्हो पर.. पपीने करा:-'एर दत्ता वैगनी एनसे. अनेक एमाल्यादि परनो मन वेयरहरीराम विचार सानोको धर्माचा पर रानीतिक मानसीभरममा टी रे परी नापिनीनगद सिक मी.........................' .

३० केआगारसे करी, और इसके सिवाय छः महीनेतक एकान्तर उपनाम वगग बहन नप किया. तथा पूर्व, पंजाब, मालवा, गुजरात काठीयावार, मालबार, मोनार, मेनार, मारवाड, तेलंगाणा, दक्षिण, वगैरा बहुत देश स्पश श्री वलचंदजीके ज्येष्ट पुत्र अमोलख चंदनी पिताकी साय ही दिक्षा लेने- को तैयार हुवे, परन्तु बालवयके सत्र से स्वजनोंने आमा नहीं दी और मोमाल में पहुंचा दिया. एकदा कवीवर श्री तिलोक ऋपिजी महाराज पाटवी शिष्य पंडित श्रीरवीपजी महाराज और तपस्वी श्रीकेवलऋपिनी महाराज इन्छारर ग्राम पधारे. वहांसे दो कोस खेडी ग्राम में मामाके यहां अमोलख चंदजी थे वो पिताके दर्शनार्थ आये. दर्शन से वैराग्य पुनः जागृत हुआ. और ११ वर्ष जितनी छोटी प्य में (म- म्वत १९४४ फाल्गुण यदी २ को दिक्षा धारन करली. श्री अमोलस ऋपिजी श्री केवल रुपिजी के शिष्य होने लगे, परंतु उनोंने कहा कि मेरा अभी शिप्य करने का इरादा नहीं है. तब पूज्य श्री खुवारुपिजी महाराज के पास लेगये. पूज्य श्रीने अ- मोलख रुपिजीको अपने ज्येष्ठ शिप्य श्री चेना ऋपिजी महाराजके शिष्य बनाये. थोडे ही कालमें श्री चेनाइपिजी और श्री खवा रुपिजीका स्वर्गवास होनेसे श्री अ- मोलख रुपिजीने श्री केवल ऋपिजीके साथ तीन वर्प विहार किया. फिर श्री केवल ऋषिजी एकल विहारी हुवे. और श्री रत्नत्रपिजी दुर ग्राम रहे, इसलिये अमोलख ऋपिजी दो वर्पतक श्री भेरु ऋापिजी के साथ रहे, उसवक्त मं. ११४८ के फालगुन में ओसवाल ज्ञाती के पन्नालालजी नाम के ग्रहस्थने १८ वर्ष की उम्मरमे दिक्षाधा- रन कर अगेलख ऋपिजीके चेले हुवे. उनको साथ ले जावरा ग्राममें आये, वहां श्री कृपारामजी महारानके शिष्य श्री रूपचंदजी गुरु के वियोगसे दुःखी हो रहे थे. उनको संतोप उपजाने पन्ना ऋपिजी को समर्पण कर दिये, देखिये! एक यह भी उ- दारता? पीछे श्री रत्नपिजीका मिलापहोनेसे उनके साथ विचरे. इन महापुरुषने उ- नको योग्य जान, बहुत खतसे शास्त्रभ्यास कराया, जिसके प्रसादसे गद्य-पघमें कि- सनेक ग्रंथ बनाये, और बना रहे हैं. तथा अनेक स्वमति-परमतियों को सत्य धर्ममें द्रद किये और कर रहे हैं. श्री अमोलख ऋपिजी के, संवत १९६५ में मोती प्रापिजी नाम के एक शि- ष्य हुए, कि जिनोने वंयइ में काल किया. हमारे मुभाग्योदय से स. १९६२ से तपस्वीराज श्री केवल ऋषिजी महारा 2151 न रस्ते में क्षुधा वषा आदि अनेक दुहर परिसह सहन कर यह क्षेत्र पारन लिया और बृद्ध अवस्थाके कारण से अशक्त शरीर होने से यहां विराजमान हुवे थे. और इनकी सेवामें पंडित प्रवर बाल ब्रह्मचारी श्री अमालख ऋषिजी महाराज यहां वि- राजते थे. मुनि श्रीके सद्बोधसे आजतक ५४००० पुस्तके अमूल्य सर्व हिंदमें और ब्रह्मा अमेरिका, आफरिका, आदि देशोंतक दिये मये हैं. इससे तुला मालुम होता हैकि विद्वान मुनिराजों और उदार प्रणामी श्रावकोका सम्बन्ध मिलनेसे समयानुसार मति करने से जग जीवाको कैसा लाभ मिलता है. अव हम आत्यन्त अपसोस से कहते हैकि हमारे इस क्षेवको धर्म मार्ग में प्रसिद्ध लाने वाले और ज्ञान दान का अमुल्य दान दिला सर्व हिन्द के धर्मात्माओंको तोष ने वाले तपस्वीराज श्री केवल ऋपिजी महाराज वि. सं. १९७१ की चेत सुदी प्रति पढासे वीमारी बहुत ही वडगइ तव सावण वद्यर को मर्व साय अत्यन्त नम्र भावने खमनखमना करीये.और नवमी के दिन आलोयगा निन्दना कर अन्नाहारक त्याग किये और १३ मंगलवार के दिन १०॥ बजे अपने मुखसे संथारा कर १॥ वजे देहोत्सर्ग हुवा !! और श्री अमोलख ऋपि जी उग्रह विहारी हुवे. जिससे जमे राजा विना रइयत मुनि तैसेही सब यहां का होकर शान खाता वन्ध पदा है जी. F- हमारी नम्र विनंती हैकि जैसा प्रयाम ज्ञान वृद्धि का वाल ब्रह्मचारी मुनि श्री अनोलख ऋषिनी ओर इन के सदोष से यहां के करा अन्पग्राम के श्राव कोने किया है. इससे भी अधिक म हिन्दके साधु मार्गीयों से होने की अत्यन्त आ वश्यकता है, जो मर्द मंघ इस प्रत्या दासले को ध्यान में लेकर, ज्ञान वृद्धि-सम्प- वृद्धि वमैरा माधुमार्गी धर्मोन्नाने के एकेक कामों का स्वीकार कर पया शक्ति प्रकृति करेंतो यह पूर्ण शुद्ध धर्म पुनः पूर्ण प्रकाश मय होवे ! धोमति इच्छक राजा वहादुर लाला-सुखदेव सहायजी ज्वालाप्रशाद.

- ३० केआगारसे करी, और इसके सिवायाछः महीनेतक पकान्तर उपवास बंगरा बहुत नप किया. तथा पूर्व पंजाब. मालवा, गुजरात काठीयावाड, मालवाड, मोबाड, मेवाड, मारवाड, तेलंगाणा, दक्षिण, वगैरा बहुत देश स्पश श्री वलचंदजीके ज्येष्ट पुत्र अमोलख चंदजी पिताकी साय ही दिक्षा लेने- को तैयार हुवे, परन्तु वालवयके सबब से स्वजनोंने आशा नहीं दी और मोमाल में पहुंचा दिया. एकदा कवीवर श्री तिलोक ऋपिजी महाराजके पाटवी शिष्य पंडित श्रीरवऋीपजी महाराज और तपस्वी श्रीकेवलऋपिजी महाराज इच्छावर ग्राम पधारे. वहांसे दो कोस खेडी ग्राम में मामाके यहां अमोलख चंदजी थे वो पिताके दर्शनार्थ आये. दर्शन से वैराग्य पुनः जागृत हुआ. और ११ पर्प जितनी छोटी व्य में (म- म्वत १९४४ फाल्गुण यदी २ को दिक्षा धारन करली. श्री अमोलस ऋपिजी श्री केवल रुपिजी के शिष्य होने लगे, परंतु उनोंने कहा कि मेरा अभी शिष्य करने का इरादा नहीं है. तब पूज्य श्री खुवारुपिजी महाराज के पास लेगये. पूज्य श्रीने अ- मोलख रुपिजीको अपने ज्येष्ठ शिप्य श्री चेना ऋपिजी महाराजके शिष्य बनाये. थोडे ही कालमें श्री चेनापिजी और श्री खुबा रुपिजीका स्वर्गवास होनेसे श्री अ- मोलख रुपिजीने श्री केवल ऋपिजीके साथ तीन वर्प विहार किया. फिर श्री केवल ऋषिजी एकल विहारी हुवे. और श्री रत्लपिजी दुर ग्राम रहे, इसलिये अमोलख पिजी दो वर्पतक श्री भेरु ऋापिजी के साथ रहे, उसवक्त सं. १९४८ के फालगुन में ओसवाल ज्ञाती के पन्नालालजी नाम के ग्रहस्यने १८ वर्ष की उम्मरमे दिक्षाधा- रन कर अगेलख ऋपिजीके चेले हुवे. उनको साथ ले जावरा ग्राममें आये, वहां श्री कृपारामजी महाराजके शिष्य श्री रूपचंदजी गुरु के वियोगसे दुःखी हो रहे थे. उनको संतोप उपजाने पन्ना ऋपिजी को समर्पण कर दिये, देखिये! एक यह भी उ- दारता? पीछे श्री रत्नपिजीका मिलापहोनेसे उनके साथ विचरे. इन महापुरुषने उ- नको योग्य जान, बहुत खतसे शास्त्रभ्यास कराया, जिसके प्रसादसे गद्य-पधमें कि- सनेक ग्रंथ बनाये, और वना रहे हैं. तथा अनेक स्वमति-परमतियों को सत्य धर्ममें द्रद किये और कर रहे है. श्री अमोलख ऋपिजी के, संवत १९६५ में मोती प्रापिजी नाम के एक शि- ष्य हुए, कि जिनोने वंयइ में काल किया. हमारे मुभाग्योदय से स. १९६२ से तपस्वीराज श्री केवल ऋषिजी महारा न रस्ते में क्षुधा वषा आदि अनेक दुकर परिसह सहन कर यह क्षेत्र पावन लिया और बृद्ध अवस्थाके कारण से अशक्त शरीर होने से यहां विराजमान हुवे थे. और इनकी सेवामें पंडित प्रवर बाल ब्रह्मचारी श्री अमालख ऋषिजी महाराज यहां वि. राजते थे. मुनि श्रीके सद्बोधसे आजतक ५४००० पुस्तके अमूल्य सर्व हिंदमें और ब्रह्मा अमेरिका, आफरिका, आदि देशोतंक दिये मये हैं, इससे खुला मालुम होता हैकि विद्वान मुनिराजों और उदार प्रणामी श्रावकोका सम्बन्ध मिलनेसे समयानुसार प्रति करने से जग जीवाको कैसा लाभ मिलता है. अव हम आत्यन्त अपसोस से कहते हैकि हमारे इस क्षेवको धर्म मार्ग में प्रसिद्ध लाने वाले और ज्ञान दान का अमुल्य दान दिला सर्व हिन्द के धर्मात्माओको तोप ने वाले तपस्वीराज श्री केवल ऋपिजी महाराज वि. सं. १९७१ की चेत सुदी प्रति पढासे वीमारी वहुत ही वडगइ तब सावण वद्यर को सर्व साय अत्यन्त नम्र भावसे खमतखमना करीये.और नवमीके दिन आलोयगा निन्दना कर अन्नाहारक त्याग किये और १३ मंगलवार के दिन १०॥ वजे अपने मुखसे संथारा कर १॥ वजे देहोत्सर्ग हुवा !! और श्री अमोलख ऋषि जी उग्रह विहारी हुवे. जिससे जैसे राजा विना रइयत सुनि तैसेही सव यहां का होकर शान खाता वन्ध पढा है जी. - हमारी नम्र विनंती हैकि जैसा प्रयास ज्ञान वृद्धि का वाल ब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलख ऋषिनी ओर इन के सद्धोध से यहां के त्या अन्यग्राम के श्रावे कोने किया हैं. इससे भी अधिक सर्व हिन्दके साधु मार्गीयों से होने की अत्यन्त आ वश्यकता है, जो सर्व संघ इस प्रत्यक्ष दादले को ध्यान में लेकर, मान बृद्धि-सम्प- वृद्धि वमैरा साधुमार्गी धर्मोन्नति के एकेक कामों का स्वीकार कर यथा शक्ति प्रति करेंतो यह पूर्ण शुद्ध धर्म पुनः पूर्ण प्रकाश मय होवे ! धर्मोमति इच्छक, राजा वहादुर लाला-सुखदेव सहायजी ज्वालाप्रशाद.

2 | पृष्ट. ओली २ आश्रय ८ १२ भोजन २२ ६ लाभ ३२ दी मुक्ति सोपान-गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारीका शुद्ध पत्रम् पाटक गणों? प्रथम निम्न लिखित अशुदियोंको शुदकर फिर यनासे पढीये, पृष्ट. ओली. अशुद्ध. अशुद्ध. 'शुद्धः ३ . २६.. नतव्य भव्यतव्य ६.४ ३ प्रमाण प्रमाण १३ चिविक्षित विविक्षित | ६५ आश्रंव ४ अवघेण अवघेणा ८ परमतु घु खलु ११. गौवकर्मद्वार गौवकर्मभंगद्वार ६९ २ तंत्र व्रत १२ २५ समुठ घाए समुघाए ७१ ३ भागवन भोगवने २३ ९ सयय संजय भाजन १७ ११दोस्थानीरसका ८१ ९ प्रतिमा परतिमा २६ रणघात रसंघात १८ वाम वाङ्ग २५ २५ सज्वला संज्वल ८४ २५ चारिक उपचारिक २६ लोभ ९२ ११ आयप्य आयुष्य २८ रण करण १२ मूखरवस्थान मुखस्थान २८ १० सम समय ९४ २६ रूप और पारम क.मु.कि ३ करीना करना १ पत तप १५ विराय विराम २७का कर ४१ २३ ल ल ९१ २५ को की ७ संघयण संघयण २४ को को की २२ अठक अटक १०३ ३ त्व(छाल)चा वचा(छाल) २० शास्त्रवसे शास्त्रमे व जीवोंगे जीवाने ८चोदाणावाकरहाजावे . ४५ १४कालका शालाका १७.मा मारे २३ मरिता परिता १८ देवगेरें देवंगे ४ को क्रोड १ मिथ्यात्व मिथ्यात १२.. १८ ना इन १५दी दीप १२२ १० परिवार परिवारमे २५ रीतराग वीतराग १२३ ३-४दक्षिण १८ पात्र माव १.२४ ४ बोजन योजन गुड १२ घाव घात अपा २१ प्रवर्य वर्वत ६० १६ मंरमणान में रमणता 11०८ १.६ ७ और ४३ . ११४ ܦ݁ܳܐܴ ?; ४ मुघा और ८ स्वभा २४ वस . २०० ५वत ३३ १४ कथनयाकरे कथनकर १६ वर्वणा वर्गणा १३२ २० अय अन्य १९० १ अनाति अनन्ति १३३ २२ रुप रूपी १८ वर्गणा १३५ १६ और सो ५ धाता बंधाता ३ उपचासे उपावसे १९५ १५ सो यों १६ मान मन ६ थीद्ध थीणद्वी १४१ स्वभाव १३ मिलेता है मिलता है १२ ऐपिन्ड ऐसे पिंड १२ ओ और ११९ २८ अद्रेत अद्गत १५ ऽर्म-मूर्क ऽर्क-मूर्य तव ११ चडे जडे २०१ १० गावकमे गौव कर्म १४७ १६ आताम आवाप २०२ १९ प्रति प्रकृति १५५ १२ (धल) २१२पृष्टांक २०२ २१२ ९ संयमा संयम २१२ १६ तथा तथा १६४ ८ वोध वन्य २१४ १० सोने से होनेसे २५ होवाहै होताहै. १२ वो वे १६५ ५का २५ सूयकीमभाव सूर्यको प्रभा १६८ १४ अंतिप आतिम २१५ १६ सो स हारय हांस्य १२ इयावर स्यावर १६९ नोट भी केए नोट और भी और कभी ४ स्थानवर स्थावर २२० पमश उपशम २२१ क्षय १७० १५ संक्तोष संतोष ... फेवल केवल १७ अस्थिपटक अस्थिर पटक २२३ मंयोग संयोगी १७२ ५ वेधन बंधन २२५ नोट संगव संभव १८ प्रकृति शचका शक्ता १७६ तव २२६ पृष्टांक १३६ २२६ २१ ख्यानी १ कमक कर्मके १७८ २ थीण विक यीणद्वी विक १८असाताभयका आसाताकाक्षय १७२ १४ जरगति नरकगति २२७ ४२२कारका, २२कारका १७ अध्यायसाय अध्यवसाय १८२ १२ संघयण संघयण १ और २ १८४ नोट विवमन्न विमान १. जघस्य जघन्य २२८ इस पृष्टमें गडबडबहुतही होगड है FREEEE " भी एक १४ शुभ ११ भय ५ प्रकृति का १८ वत २७का, १७का. और २ में का इस ३४ में २ नर्क ४ हाइन इन २६६ सत्ता ७ " मोव्य २६८ २२० ५ गपावे खपावे २०२ २नक नर्क में .१० सत्तान २७ और ३१का और ३१ १९ वाकीकेके वाकी के १७८ नरक २३० नो६ प्रत्याख्यानी अप्रत्याख्यानी २६? ७ समान नहीं स्थानही २३१ २ जनन्ता अनन्तान १२ स्यार स्थान ५ पूवाक्त पूर्वोक्त १० लसा २३२ २२ स्य २ हांस्य १६. १० चाप्य मनुष्य १६नका इनको २३५ १८ और दे और दो १७ ७८ मत्ता ७८ की सत्ता २३६ १४ सन्त सत्ता १२ जनते प्रवर्तते २४१ ४ संज्वसल संज्वल नो५ यनके इनके २४३ ६ तियचायु तिर्यचायु योग्य १३ सात ७ १९ करो कर २४४ १३ जानवाले जानेवाले १४ यदय उदय २४७ ७ नद्योत उद्योत २६१ नोर भांह भाङ्गे २४७ २६ अस्रि आस्थिर वाकी के २५० २ सूक्ष्मपर्याप्ता मुक्ष्म अपर्याप्ता १७२ १८ जिनन्त जितना नो४ जितन जितनी १७३ ६ एकेद्रियान्हक एकेंद्रियादिक १७ का, का, का, १७१ १५ जैसा शमिक ओपशामिक नो१ कार्यसे १८१ ३ गात्र गौत्र अरै और ५ कर्म होतेहै कर्मके होते हैं २ अय: अयशः १८३ ४ पश्रु पद्म ७ सति रति ७ उदयावसी उदयावली १० उदमें १७ नने होने ४ योते है. होते है. २८२ २ परिमाण परिणाम नोट दौर्घाग्य दौर्भाग्य २११ १० खुसासा खुलासा २५७ ६ इस ओलीभी गडवड होगया १६ उत्कष्टण उत्कृष्ट मनुष्य २५ अपकर्वण अपकर्षण २११-भाया १ भागा २९२ २ कणों करणों २४ तीर्थंकर के तीर्थकर के ५ दही दोही २५८ २ और २२ ७ चपकर्ष अपकर्ष १९ २ पचेन्द्रिय ३ पचेन्द्रिय खुलासा यहां १४ फरसीफरसी फरसी ८ वैक्रय २ वैक्रय १५थता तथा " वावीके २६१ कायसे २५२ १८७ २५५ उदय में १५ सनुष्य और १२ २२ यह ११ झूलासा २६ निर्जरा ७कर १४ निर्यच " ܕܘܕ ५६ १७ सति २७ काले १७ वर्व १७ मनुष्य २८ जुड ३५ २९३ १९ सम्दग सम्यग ७ टासस्स ठाणस्स निर्जरा ३४६ १५ औदायक कुछ औदयिक २९६ ६ गुरुमिथ्यात्व पुरुगनीमध्यात १५ नन मन ३५४ ४ (अचारी) (अचौरी) २१८ तिर्यच १५ प्रकार प्रकार १८ कैशल्यता कौशल्यता २ १२ पुष्क पुप्प १५ पूर्य पूर्ण सात ३५७ १३ गमन गमन ममनागमन वाले १० सो मोह सो भीण मोह ४ यादव कण्डया १३ मिथ्यात मिथ्यात ६ रतमा रसया रसया-रसमें ३६७ १६ वीसरे तीसरे पूर्व १६ जघस्य जघन्य ३०५ १४ क वित पायला २ औ और धनुष्य ३ तथा तथा जुड़े ६ अनन्तांत अनन्तानन्त ५ एणधर गणघर १० क्ररेड कोड ७ आढारिक औदारिक ५अनन्तात अनन्तानन्त ७२ २० तिजय विजय १८ हडीयों हडीयों ७४ ९ मुहुर्त ३१२ ७ वड पड १० गमत प्रमत ३१४ ८ यथार्थ सयथार्थ ३ मुदूर्त मुहुर्त ४व्युछिवकिरित्तन्युनिकिरिया३७६ पृष्ठांक ७६६ ७६ ३१८ ६ पहते १८ जाम जाव ५चवन्य जयन्य ३७७ १२ वेजावे वेजावे. और ३२३ ४ अतिवार अतिचार वारवे जावे. २८ १० होता है तेहै २५इसपृष्टकी पांचवी ओलीभीवडेअक्षरमें १८१ जघन्य जघन्य १ १२८ ८ खीपरिसह ८४ १७ अठातीसवा अडतीसवा ३२७ दूर १ कौर और युप्य ९ मिथ्यात्व ३२८ ५३ सागर ३ पल्योपम ८८ १० संपनि संपति १२ कोड पूर्व देशउणाक्रोडपूर्व ३८९ द्वितीय ३३० २० (इन वचन (इन मन वचन:११ ३ १९अणप२० १९अणाभोगव ४ कुद्धि बुद्धि अनाभोगा तिया २०अणव पंकवतीया. कंपतिपा. ७ मूत्र : १७ मुप्प C ५प्रथम १३ प्रकृति प्रकृति वन्ध ४८२ ज्ञानदर्शन ४८४ २११ ३६ . ११बन्ध वघ ४६५ १२ इक्कासवाकर्मइक्कीसवाकर्मसता ४६६ ४ आविरतिमें आविराति मे ४४.४ १५ आगे पाग अङ्गोपाङ्ग ४६८ १२ सत्ता साता ४०५ ८ होता है. होतहै.आगे गौ ४६९ १८ सत सत्ता वकर्मका बंधनहीं ४७३ ९ तिर्यचाकायु तिर्यचायुका ४०६ १४ का ३१ ३१ का १४ तियेचु तिर्यंचायु ४०७ ९३ज्ञान ३ अज्ञान ४०९ ८ ११ १२ ११.३ दर्शन ४१० ७ अठाय अठारा १३ हेडिंगरहगया समुचयभावद्वार ४११ ८ कर्म बन्ध कर्मप्रकृतिवन्ध ४८८ ४ नेलवन्धि न वन्धि ४१५ ५२ ४८९ १४ और भी और ४१ वा २ ४९१ ११ साववा सातवा ४१७ २० श्रमी मिश्र ४१९ १६५३ ५३में ४९४ १० अपर्याप्त अपर्याप्त ४३० ३ नस्कात नरकानु ४९५ इस पृष्ट में दोद्वार छापने रहंगये १ झीण क्षीण २०० हडिगके नीचेके ओली उपरचाहि ३लोभ३३विनका-लोभविना३३का ५०१ लेशा ८३६१ ११ मरणद्वार स्वर्गमर्यादद्वार ४४२ २२ अघाति २०६ १३ सयरेगी सयोगी ४४५ १६ केवली केवली केवली के ५०९ पायेचार ४४७ १२ ११२ ११३ ५११ ४ ततितीर्था तीर्थातीत ४५८ स्वर्ग ५१४ अप्रमाद प्रमाद ४५९ ७ और २१८ ४६१ चउदवा ५२१ १५ निर्जरा निर्जरा २१ संयोगी संयोगी इस सिवाय औरभी बहुतसी अशुद्धियों इ- २२ सालवा सोलवा स पुस्तक में रहगइ है. जिसका मुख्य सब ४६२ २१'संत्तापाती सत्ताद्वार व विहार करने से पुरुपका करक्सन वरोव ६ अं र न होना तथा बहुतही जल्दी से काम पू '८मागमें 'भोगमें रा कराने का है इसलिये नम्र विनती है- कि जो जो अशुद्धिया दृष्टि आवे उसे जानावोगे तो संभार स्वीकार द्वितीया ति छ पने के प्रसंग आनेसे सुधारा किया जायगाजी. अमोल ऋषि. १० लेश . ४४० ० १० पायेचा . नोट स्य ६ ८चउदवा .

५२ ७४ कर्म बन्ध १६ ६९ श्री मुक्ति -सोपानका अनुक्रमणी. मङ्गलाचरणम् अवघेणा, उप्तति, पावति. भपति. औ परिशिष्ठ र द्रव्य परिमाण इन द्वारो के खुलासे मवेशीका के लिये प्रमाण बोध कहा है जिसमें नाम खण्डानुक्रमणी और अर्थद्वार अर्थ १३डाला पाला के दृष्टांत से गणित वि- प्रश्नोत्तर और प्रवेश द्वार अर्थ. १०भाग दर्शाया है उपशम श्रोणिका खलासा. १व स्पर्शना और क्षेत्र प्रमाण के खु- रुपक श्रेणिका खुलासा २लासे के लिये अलोक का और लो- लक्षणद्वार और ३४ मिथ्याल. ४४कमे रहे मुरस मेवों का स्वरूप बताया वोध दर्शन का स्वरूप. दीतिय खण्डानु क्रमणी नैयायिक कान का स्वरूप नीव कर्म का स्वरूप और सन्वध १२८ वैज्ञानिक और सांख्य दर्शन गाना दरणी कर्म और ५ ज्ञानका ,. १२९ मीनान का स्वरूप चार्वक दर का स्वरूप ना पुरणी कर्म और ९ मति १३४ ५९दिनी और मोहनी कर्म २८ प्रकृति १३६ चौथा गु. ा अर्थ नवतत. आयुप्य के १६ कारण १४० पांचवे गु. ना लक्षण ११ प्रतिमा. नाम कर्म की ९३ प्रकृति अर्थ युक्त १.४१ व्रत और अतिचार गोत्र कर्म और अन्तराय कर्म १५१ छठे गु. लाग'' महाप्रत आगे कर्म की १४८ प्रकृति का यंत्र १०२ सातवे गु. सण ५ प्रमाद किरिया द्वार का अर्थ २५ क्रिया १५५ छठे दृष्टान्त द्वारका खुलासा : पारवंडी ५ समवाय calतुद्वार ५७ हेतुका बलामा कृष्ण वासुदेव श्रेणिक महाराज प्रकृति वन्ध कर्म वन्ध के कारण कर्म बन्धके ४ प्रकार ८ ही कोमर १६.४ दश श्रावको का यंव विवेचन उत्तर प्रतियो पर ४ ही वन्य धन्नावा मार्थ वाही की कथा आचार्य धर्म घोपजी की कथा स्थिति दन्ध के ४ भांडे आठों ही क धम्ना अणगारकी कथा धर्मकी और १४८ प्रकृति की ज उ. स्थिति. १७१. मेघ कुमर की कथा. प्रसन्न चन्द्र राज ऋपिजी की कथा उत्कृष्ट न्धिनि वन्ध के श्वान रकेगी दल अपि की कथा २४ मनभान (ग्म) वन्य चौटाणी आदि १७१ गोतम गणधरका कथा जयन्य ग्म बन्ध के मामि सुडरिक पुंडरिक की कथा १०१ रन बन्ध के स्वामि १८८ खन्धक मुनि की कथा १.न इन्ध के चार प्रकार मारि श्वानी काया १०देश बन्य कर्म वर्गमा वा मुगमा ८ गजनुकुमालजी की कथा जोशी दालघरी भल्या बात मातवा गु. का अर्थ पहल परान १७ वध की महति का ये अव वन्यजी वर्मप्रन्किा अर्थ " ८१ ८५ ८६ १८१ १६१ १८ २०८१२ उपयोगका खुलासा २१.८ पट ४२१ . २८० ३८ घातिक अघातिक प्रकृतिका अर्थ २०३मरण, विग्रहगति, स्वर्ग मर्यादद्वार ३१.१. पुन्य पाप प्रकृति का अर्थ २०५ चतुर्थ खण्ड. परावर्तमान अपरावर्तमान प्रकृति २०६ धर्मारोहणके ३३ द्वारों का खुलासा ३१३ भूयस्कारादि चारों वन्धका अर्थ उदय द्वारो और चारों विपाककाअर्थ२१४ दृष्टि, भव्याभव्य, चरमाचरम, परिता ध्रुवोदय अध्रुवोदय को प्रकृति २१६/ परित, पद्वीद्वार, इनका खुलासा ३१४ उठीरणाके द्वारों का अर्थ २१ आत्मा, ध्यान ध्यान के पाये ३१६ मत्नाके द्वार और ध्रुवा ध्रुव सत्ता पट द्रव्य द्वार कमांक भड़ द्वारो का अर्थ २१९/परिणाम, वीर्य, तीर्थ, सम्यक्त्व द्वार ३१८ ज्ञानावरणी-दर्शनावरणी के भांग २२३ संयति, लिंग, चारिव द्वार वेदनीय कर्म के भागे २२६नियंठा द्वार ६ निग्रंथार्थ ३२२ मोहनीय कर्म के भागादि २२७ कल्प और परिसह द्वार ३२४ भायुप्य कर्म के भागादि भमादद्वार ५ प्रमाद ३२५ नाम कर्म के भाले १४ गुणस्थानपर २६० मरगी वीनरागद्विार ३२० गौत्र कर्म के भाई पडवाइ, छगस्त, समुत्यातद्वार ३२७ अन्नमय कर्म के भाई २८ देवद्वार ५ देवोंके बोल ३२८ बली के और इयाही के भाने २८ परिणामी, करण, निटत्तिद्वार ३२१ पां भावोंका मुनामा २८२ आश्रव और संवर के भेद ३३० पाचा भावों के भेद मृव मे २८४/निर्जरा और करणी फल द्वार ३३२. दाकरण द्वार का गुलामा २९ हयादि, तीर्थकर गौत्र वन्ध २० वोल३३२ गणश्रेणीका ग्युला २१.३ तीर्थकर स्पर्म और मोक्ष द्वार ३३३ तृतीय खण्ड. इति अर्थकांडानु क्रमणी. मंमागगेटणक ४० दागंका ग्चुलामा२९१ मामान्य १४ विशेर ५१३ जीव भेद ०१.१. अथ मूल खंडानुक्रमणी. जावायांनी और कल कोडी ३०१वंगीका बम म्यावर र मन्त्री मन्त्री मूल ३०द्वारोंके नाम, १. नाम ३३६ भाषक. आहारक-नादि-मचिनादि- दुमगअर्थदार ३३७ दिनी आहार. पर्यामादागर्य ३० नीमग प्रश्नोत्तर द्वार ३३० ३० चाया प्रवेश द्वार इन्द्रिय विषयवार लामा पांचवा-चक्षण द्वार मंदा-ट-कपाय दार मुन्टामा टा-दृष्टान्नदार देवादार श्रीर जोग दार मुलामा 'मानवा-गुगदार गद्वान्का विद्यार्य १०८ धाटन अवघेणा द्वार मवयनद्वारका मचामा नववा उन्पनि दव्य परिमाण मागाद्वार. इन्द्रियदार ३६८ ३९ दशवा पावति द्रव्य परिणाम ३७०/६० अघातिक कर्म प्रकृति बन्ध ४११ इग्यारवा खपति द्रव्य परिमाण ३७६६१ पुष्यर्कमबन्ध ६२ पुग्यप्रकृति .. ४१२ वारवा क्षेत्र परिमाण तेरवा स्पर्शना ३७२६३ पाप कर्म वन्ध द्वार चदवा कालपरिमाण (स्थिति) द्वार ३७६४ पाप कर्म प्रकृति वन्य ४१४ पन्दवा काल प्राप्त द्वार ३७२/०५ परावर्तमान कर्म प्रकृति बन्ध मोलवा भावपरिमाण' सतरावा निरं १६ पराव मान कर्म प्रकृति बन्ध ४१६ नर गुण, अठरावा मार्गणा द्वार ३७६/६७ अपरावर्तमान कर्म और ६८ अ उन्नीसवा उपमार्गणा द्वार ३७७परावर्तमान कर्म प्रकृति वन्य द्वार ४१७ वीसवा परस्पर मार्गणा द्वार ३७८६९ भूयस्कार कर्म बन्ध और ७० भू इलीसवा परस्पर उपमार्गणा द्वार ३७१ यस्कार कर्म प्रकृति वन्ध द्वार ४१८ २२ज्वरोह अवरोह: २३चडाचडगात ३७४/७३ अन्पतर कर्म बन्ध. ७२ अल्पतर चौबीमवा अन्तरकाल द्वार ३८२ कर्म प्रकृति बन्ध. ७: अवस्थित कर्म २५ विरह २० एकभवमें स्पर्गना ३८वन्ध. ४२१. २७ बहुतभवमे स्पर्गना २८ परस्पर :८४७४ अवस्थित कर्म प्रकृति बन्ध, ७१ २१ पदमापहन. ३० शाश्वताशाश्वत ८० अभक्त कर्म वन्य ७६ ममुचय कर्म ३१ परभगमन :२ भवमंख्या और पनि बन्ध. तेतीमवा अल्पा ददुतद्वार ३८७७७ कर्म और ७८ कर्म प्रकृति बन्ध चोतीनवा किरियाद्वार ३९ वृच्छति. तीनवा मूलत (कारण) द्वार ३११/७१ कवियर दागेके नाम ११६ ३६ मिथ्यात्व हेतु :७ अविरत ३९२ समचयकोदय. ८ जानावरणादय ४१७ ३८ कपायहेत. १९ योग हेतु ३९८१ दर्शनारणी उदय. ८२ वेदनी ४० ममुचर हेतुद्रार ३१ उदय. ८ मोहनीयोदय द्वार ४१ चार पन्ध ४२ समुचय बन्ध ३९९८४ आयप्योदय ८ नामोदय द्वार ४१० ४१ झानावरणी ४४ दर्शनावरणी ४४०८६ गोव कर्मोदय द्वार ४५ वेदनीय. ४६ मोहनीय वन्ध ४०१८७ अन्नगयो दय' ८८ मुकर्मोदय ४७ अयप्य कर्म प्रकृति वन्य ४.२८९ ध्रुवकर्म मतियों द्वार ४८ नाम कर्म प्रति इन्ध द्वार ४० अदरम. ९१ अर प्रमाति : ४९ गोवकर्मबन्ध... अन्तगयन्य १२ पुन्य पर्नेदय द्वार ५१ शुवकर्मवन्ध १२ भुवनहनिबन्ध : पुम्प प्रतियों दय २१ अवकर्मवन्ध ५४ अनुमति ४०६९४ पार कर्मेदय द्वार ५५ सर्व घानिक कर्म च द्वार ४.८५ पार कर्म महानिगे दर ५६ मई पानिन महान पंध ४२९१ द सिरदय, क्षेत्र ५७ देशवानिक बन्द.८ देश विपति. १८ भाविनाम : पातिक कर्ममति बन्ध १९ अपील ४१० १२४ ८१८ शविर ४४२ ४०७ ४०८ ४७६ ४० १०० जीवविपाक कर्मोदय द्वार ४३८,१३९ सर्वघातिककर्म भकृतिसत्ताद्वार ४६१ १०१ जीवविपाक प्रछातियोदय ४३८१४० देशघातिक कर्म सत्ताद्वार ४६१. १०२ पुद्गल विपाक कर्मोदय द्वार ४३९/१४१देशघातिक कर्मकातिनत्ताद्वार ४६२ १०३ पुद्गल विपाक कर्मप्रकृतियोदय४३१/१४२ अघातिक कर्म सत्ताद्वार ४६२ १०४ सर्व घातिक कर्मोदय द्वार ४४०१.४३अघातिकर्म प्रकृति सत्ताद्वार ४६२ १०५ सर्व घातिक कर्म प्रकृतियोदय ४४११४४समुचय कर्म प्रकृति सत्ताद्वार ४६३ १०६ देशघातिक कर्मोदय द्वार ४४११४५ कर्म सत्ता व्युच्छतिद्वार १०७ देशघातिक कर्म प्रकृतियोदय ४४२१४६ कर्म प्रकृति सत्ता व्युच्छति ४६५ १०८ अघातिक कर्मोदय द्वार कर्म भङ्गादि १२ द्वार. १०१ अघाति कर्म प्रकृतियोदय ४४२१४७ समुचय कर्म भंग द्वार .१० समुचय कर्म प्रकृतियोदय ४४५/१४८ ज्ञानावरणीय कर्म भंग द्वार ११.१ समुचय कर्मोदय व्युचत द्वार ४४५१.४१ दर्शनावरणीय कर्म भंग द्वार ४६१ १.१.२समुचयकर्ममकृतियोदयव्युच्छति४४५/१५० वेदनीय,१५१ मोहनीय भंग ४७० कर्म उदीरणाके १२ द्वारो. १.५२ आयूकर्म भंग द्वार ४७२ ११३ समुचय कर्म उदीरणा द्वार ४४७१५३ नाम कर्म भंग द्वार ४७५ ११४ ज्ञानावरणी,१.१५दर्शनावरणी ४८४१५४ गोत्रकर्म भंग द्वार १.१६ वेदनीय, ११७ मोहनीय उ० ४४९/१५५ अन्तराय कर्म भंग द्वार ११८आयकर्म, १११ नामकर्म उ० ४५०/१५६ बन्धी के भंग द्वार १२०गोवकर्म, १२१अंतरायकर्म उ. ४५११५७ इर्यावही के भंग द्वार १२२ ममुचयकर्म प्रकृति उदीरणा ४५१ भावादि १३ द्वार. १२३ कर्म उदीरणा व्युच्छति द्वार ४५३/१५८ मूल भाव द्वार १२४ कर्म प्रकृति उदारणा व्युचत ४४३१५१, औदयिक भाव द्वार ४८१ कर्म सत्ताके १२ द्वार. १६० ओपशामिक भाव द्वार १२५ ममुचय कर्म मत्ताद्वार ४५८१६१ क्षयोपशामिक,१६२क्षायिक भा४८२ १२६ ज्ञानावरणी कर्म मत्ता द्वार ४५८१६३ परिणामिक भावद्धार १२७ दर्शनावरणीय, १२८वेदनीयस१५६/१६४ सन्नी पातिक भावद्धार ४८३ १२९. मोहनीय कर्म मत्ताहार ४५६/१६५ समुचय भाव भेद द्वार ४८४ १३. आयुज्य कर्य मत्तादार ४.७१.६६ श्रेणीद्वार ११ नाम.१३ गोव, १३३ अन्तराय४५८१६७ कर्मवेद, १६८ कर्म निर्जरा ४८७ १३४ ध्रव कर्म मत्ता द्वार ४५११६९ दशकरण,१७० गुणश्रेणीद्वार४८७ व कर्म प्रकृति मत्नादार ४५९/१७१ आगतिद्वार ४८९ :: अधव कर्म मत्ता द्वार ४६०७२ पागति, १७३ जागति?.७९आ- १३ अध्रुव कर्म प्रकृति मत्ताद्वार ४६०/ जाति, १७२ पानाति ३८ मघातिक कर्म मनाहार ४६१/१.७६ जाजाति,१८७आकाया, १७८ ४७७ ४७८ ४७९ ४८० ४८१ ४८३ . ४८६ ४०८ वीर्य द्वार. ५१३ कायादार ४९१२१७ दृष्टि, २१८ भन्यामव्य. २१९ १७९ जाकाया. १८० आदंडक. चरमाचरम, २२० परितापरित, २२१ १८१ पादंडकदार- १९२ पदी द्वार १८२ जाडंडक. १८३ जीवभेद, १९३२२२ आत्मा. २२६ ध्यानधार, १८४ विषश जीव भेदद्वार ४९४२२४ ध्यानके पाये द्वार, १८५ जीबायोनी. १८६ कुलकोडी. ४९५२२५ द्रव्य. २२६ परिणाम, २२७ १८७ मूक्ष्म वादर. १८८ वसस्थार: ५१० १८९ मन्त्रीअसन्नी हार ४२६२२८ तीर्थातीर्थ, २२९ सम्यक्त्व, १९० भाषक अभाषक. १९१ अहारक २३० संयतासंयति. २६१ लिंगद्वार ५११ अनारक. १९२ ओजादि आहार ४९७२३२ चारित्र. २३३ भव्यामव्यद्वार ५१२ १९३ सचितादि आहार द्वार. १९४ २३४ कल्प. २३९ परिसह. दिशी आहार द्वार. ४९८२३६ प्रमाद. २३७ सरागी, वीतरागी १९५ पर्याप्ता अपर्याप्ता द्वार १२३८ पडवाइ अपडवाइ ५१४ १९६ पर्याद्वार ४९८२३९ छमस्त केवली. २४० समुदया १९७ प्राणद्वार ४९९त. २४१ देवद्वार. १९८ इन्द्रिय. १९९ इन्द्रिय विषय, २४२ परिणामी द्वार, ५१६ २०९ सज्ञाद्वार. ५००२४३ करण द्वार २०१ वेदद्वार. २०२ कपाय द्वार. २४४ निति द्वार २१८ २०६ लेशाद्वार. २०४ योग द्वार. ५०१२४५ आश्रव द्वार ५१९ २०५ शरीर. २०६ संघयण, २०७ २४६ संवर द्वार ५२० संटाण २०८ मरण द्वार ५०२२४७ निर्जरा. २४८ निर्जरा भेद २०९ विग्रहगति, २१० स्वर्गकी मर्या द्वार, २४९ करणी फल द्वार दा. २९१ पटस्थान २०३२५० तीर्थकर गोवोपार्जना, ५२१ २१२ मूल उपयोग द्वार ६.६तीर्थकर स्पर्शना, और २५२ मोल ५२२ २१३ अज्ञान. २१४ ज्ञान. २१५द- इनके २५२ द्वारों के संक्षेपित यंव. र्शन, २१६ समुचे उपयोग: ५०६इति मुक्तिसोपानकी अनुक्रमणी. ८१७ ग्रंथ प्रमिद्र कर्ताका संक्षिप्त जीवन चरित्र. * + , * । m J भ * + A . में 1: ... कानपगा) भार नित करने ।। - ITI TI:गा ना--निर्णिमानता "It ग पर गमनागमणनी का नना। • 1 - १ . [ पर सपा महामनीका 11 १ 13, गणारागारनी का जना TT नमानीन मनाननन धर्म ....... पण श्री पानी पानी १२ माग गादीन नही १५५ 11 in Erifi नागा !!" : 1.11 1 4 : :: प नही A , है - -1 4 non T 4 1 } } } } tie. hit , -11-1}.15 m at 2.11.1: i... . 2. A .... 2 }-11.11...'/11 hti . 1111 12 11.}} }}} }} }}} ..' 4 * - ₹ + . + . 1 tif{ ... HERE • . . . . . . { 1. . है . . . . W 1- 1 १५ का भी ना : ir y sachi 6 में द - - . २ 3 ४३ १४ अप्रेल १९१३ को सिकन्द्राबादमें भाराइ जिसमें रु. २१. . - माइपय कि- या, और ७४०० रुपे देकर स्था. कान्फरन्स आफिस को व पर सामानो युत बना दिया. और भी हजारों रूपका सदव्यय कर हैदराब हो एको वक्त चा रो सत्पूरुवोंकी दिवा उत्सव किया. तैसे ही प्रथम अपने देशपे भी केइयोके दिक्षा दिराइ है. ऐसे और भी गुप्त दान अवसर उचित कर यथा अवसर यथा उचित द्रव्य व्यय कर रहे है. यों तन धन मन कर यथा शक्ति धर्म दीपा रहे हैं, यह लालाजी साहेब की धर्म फैलाव की उत्कंठा हरेक श्रीमंतोंको अनुकरण करने जैसी है. ऐसे उ दार कृत्यों से धर्म दीपता है. सदज्ञान के प्रसारसे अपने भी ज्ञान वर्णीय कर्म क्षय होते हैं. और पहनेवाले को सुगने वालेको, यो एकेकसे आगे अनेक जीवों को महा लाभ मिलता है. इसलिये यह बात सब ध्यान में ले यथा शाक्त धर्मी वृद्धि करेंगे.इस हेतुसे ही यह संक्षिप्त जीवन चरित्र यहां दिया है. गुणानुरागी, सेक्रेटरी-ज्ञान वाद्धि खाता.

No text on this page.

(अ.) इस ग्रन्धके प्रसिद्ध कर्ता सदग्रहस्थोंका संक्षिप्त जीवन चरित. १ दक्षिण (खानदेश) के 'वाधली' ग्राममें कूचेरे (मारवाड) से आकर निधाम करने वाले शेठ दोलतरामजी चोरडीया की सुपनी गुलाब कवरवाइ की कुंख से सं- वत १९३१ के कार्तिक शुद्ध १ मंगलबारको रतनचन्द्रजी नामक पुत्र की प्राप्ति हूइ. अन्तरायोदय से रनचंद्रजी की ४ वर्ष की उम्मर मे माताका और आठ वर्ष की उ- म्मर मे पिता का विजोग होने से इनकी दुसरी माताने इनको मदर से में बैठाकर वि. द्याभ्यास कराचा. तेज बुद्धि कर इनने कूल १५ वर्ष की उम्मर में मराठी. गुजरायी. उर्दु, इंग्रेजी और नारवाडी लिखने का अच्छा अभ्यास कर अपने व्यापार कार्य मे संलम हो संसार व्यवहार साध ने लगे. सं० १९५२ का चातुर्मान-प्रमिद्ध वक्त श्री चम्पालालजी महाराजका मनमा- ड (नाशीक) ने था तब रतचन्दीको इन महात्माका व्याख्यान श्रवन का लाभ होते ही धर्म के ऐसे शोकीन वनगये कि-सामायिक प्रति क्रमण स्तवनादि कण्ठाग्र कर व्याख्यानादि प्रसंग में एकत्र हुने जन ममोर मे सुल्ले दिलमे मुनाने, लगे इनका मज्जल स्वर होने श्रोतागण इनकी वाणी को प्रेम पूर्वक ग्रहण करने लगे. = और यह साधु आर्जिकाजी जी अत्याग्रह विनंती कर अपने ग्रान मे चातुर्मान भी कराने लगे. मं. १९६: के चातुर्मास मे सतीजी श्री जडावांजीने ६१ उपवास किये. और सं. १९६२ के चातुर्मान मे तपश्चीजी श्री केशरीमलजी महाराजने ७१ उपनाम कि- ये इनके दर्शनार्थ हजारो नरनारी आये जिनकी वडे उत्लाहमे भक्तिकर मर्वप्रिय बन सं. १९६२ का चातुर्मान तपस्वीजी श्री केवल अपिजी माहाराज का इगत पुरी (नाशीक ) था तब भाइ रनचदंजी कितनेक भाइयो के माथ दर्शनार्थ गये थे. वहां वाल ब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलख अपिजीका व्याख्यान मुन मोहित हवे जिम मेम के आकये हुवे पुनः नं. १९६९ के चातुमासमें कितनेक भाइयों के माथ यहां हैदराबाद आये और यहां के ज्ञान वृद्धि ग्वाने का काम देख इनका मन आकर्पाया तब आप खुदने रु. १००) और चार भाइयों के (जिनका जीवन चन्दि आने लिम्ब अभी यह भाइ अपने ग्राम में मायुका चातुर्नाम न होवे नव या लन खर्च आदि अन्य ग्राममे जाते है नब अनेक नर नारीयों की परिपदा में अनेक दस्तयन लावणी चोपाई का आदि मुनाकर श्रोगण को मोहित करते है % 3D

No text on this page.

# मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी. * जीवों श्री आचारांग सूत्र के प्रथमाध्याय के कथनानुसार 'महसम्मी मइयाए अर्थात् स्वानुभव (जाति स्मरणादि ज्ञान) से जानकर. या 'परवागरणाणं' अर्थात्-तत्वज्ञोद्वा- रा श्रवण कर. 'अन्नर्सि अन्ति एवा सोचा' अर्थात्-किसी का सहज वचन श्रवणकर या अन्यों में पठन कर इत्यादि सम्बन्ध से परमात्माके परम सुख के ज्ञाता-जान : कार हुवे हैं. उन को परम मुख प्राप्त कर ने की जिज्ञापा-अभिलापा होवे यह स्वभा विक ही है. उनकी जिज्ञपा-इच्छा पूर्ण कर ने जो आत्मा सर्वज्ञ-सकार परमात्मा पद को प्राप्त हुई हैं उनोने स्वानुभव द्वारा निश्चयात्म पूर्वक परम परमात्मा पद को प्राप्त कर ने के अन्तान्त गुणों को ज्ञान कर जाने हैं. परन्तु वचन द्वारा अनुक्रम से वागर ने - सपनाने और उन गुणों में जीवों को लगा कर मार्ग में प्रवर्ता कर परमपद मा । प्त करने जितना काल - समय निज पर का न होने से कार्य का असाध्य जान परम कृपालु अहेत - सर्वन देव ने मुमुक्षुओंपर अत्यंत करुणा दृष्टि कर परमात्म पद प्रा- प्ति के कार्य को सहज साध्य वना ने -स्वल्पज्ञों को समझा ने उन परमात्मा पद प्रा- प्ति के अनंतानंत गुणों का समावेश कुछ स्वल्प (थोडी) भंख्या में करना उचित स. मझा कि जिन से सर्व मुमुक्षुओं - परमात्म पद के इच्छकों महज में ममझें और पर मात्म पद प्राप्ति के मार्ग में प्रवृत्ति कर परमात्म के परम मुख के भुक्ता वनें. हेतु से उन अनंत गुणों का शिर्फ चउदह (१४) वातों मेंही ममावेश कर दिया और उनका नाम 'चउदह गुणस्थान' या 'चन्दह जीवस्यान' स्थापन किया. इतनी थो- डी संख्या में होने से मुमुनुओं शीघ्र ममज जावें परमात्म स्थान को प्राप्त कर ने. उत्साही बने. प्रयत्त शील हो पर्यान करें. और परमात्मा वन अनन्त मुष को भुक्ते. उन १४ गुणस्थान के नाम इस प्रकार हैं: मिच्छे सासण मिस्ते । अविरय देसे पमत्त अपमने ।। निअट्टि अनिअट्टि सुहुम । व सम खीण सजोगी अजोगी गुण ।। अर्थ-"प्रथम मिथ्याल गुणस्थान"-जगन निवामी प्रायः मबी, जीवों का मूलस्थान अनादि मे यही है. को स्वी मा मेघ घटा मे अच्छादिन हुवा चैतन्य चंद्र मुर्छित - वे भान दिशा में पड़ा हुवा काल लब्धि पनि पक्ष होते-व्याधि वेदनादि सहने मे - कुछ कर्मन पनले पडने मे - सबभाव मे - अनन्य नाके योग्य नाज- ही उंचा आता है - वो पुण्यांश की नकलना कर अहान नपश्चपादि के प्रभाव में उहीमवा वर्ग (नववी प्रयोग ना जाता है. इस स्थान में ही दूर आलटनने । इम २ 1 परिशिष्ट १३ र चारित्र इन तीनों सार पदार्थ रत्नों समान धर्मका प्रति पूर्ण पर्ने यथातथ्य (ज- सी तरहसे करना चाहिये वैसीही तरहसे) आराधना-पालना-स्पर्शना-अन्त तक कर ने से प्राप्त हुवा है. इसलिये, उस मुख का 'अनियण'-अर्थात् कदापि नाश नहीं होता है-अन्त नहीं आता है-ऐमा अनन्त है. और 'मवावाह'-अर्थात् उस सुख में कदापि किसी प्रकार की किञ्चित मात्र ही व्याधी, विकल्पता मिश्रता या किञ्चित मात्र नुन्यता-कभी पता होताही नहीं है. ऐसे परम मुख को जो " अणु हवांत "- अर्थात् अनुभव लेते हैं-भोगवते हैं, उन सिद्ध परमात्मा को मेरा त्रि-करण त्रियोगकी विशुद्धि से वारम्बार वन्दना नमस्कार होवो? * परि शिष्ट यह विश्व अनन्तान्त जीवों से प्रति पूर्ण भरा हुवा है, वे सब जीव गुणकी अपेक्षा से अनन्त प्रकार के हैं, जैसे-ज्ञानादि गुणों में सब से हीन गुण के धारक- और चैतन्यतादि लक्षणों में सब से हीन शक्ति के धारक सूक्ष्म निगोद के जीवों है उन जीवों में से कभी कोइ एक जीव एकाध अंश अधिक गुणकी वृद्धि होने से ऊंच दिशाको प्राप्त होता है, यों अन्त गुण पुण्याधिक होते सूक्ष्म निगोद से निकल बादर (वडे) निगोद मय शरीर को प्राप्त होता है, वहां भी अनन्त गुणाधिक पुण्य होने से प्रत्येक एकेन्द्रिय-पृथ्व्यादि स्थावर काय में आता है, यों अनुक्रम से अन्तान्त गुण पुण्याधिक होते वेन्द्रिय-तेन्द्रिय-चौरिन्द्रिय-असज्ञीय पचेन्द्रिय-सज्ञीयपचेन्द्रिय-नरक-देव मनुप्य-पर्याय तक प्राप्त करता है. यहां तक आकर कोइक जीव सर्व दुर्गुणों का सवांश नाश कर संपूर्ण गुण मय जब आत्ला वन जाता है तब सर्वज्ञतादि गुण प्रगट होते हैं, उस आत्मा को साकारी (शरीर धारक) परमात्मा कहते हैं. और कुछ काल सकार रहेबाद शरीरादि सर्व संयोगों का सर्वाश साग होते निजात्म के स्वास निज एकही स्वरूप मय जब आत्मा हो सिद्ध स्थान को प्राप्त करता है, उस आत्मा को परम परमात्मा कहा जाता है. वोही आत्मा मंगलाचरण में कथन किये मुजव अनो- पम निरावाध परम मुखका अनुभव करता है, सुख भुक्तता है. और उपरोक्त कथन मुजब जो जीवों सहज स्वभाव से निपजते हुवे पुण्याधिकतासे आकर्पा कर सही पर्या य नक आये हैं ज्ञानादि गुण कुछ विशेपाम जिनकी आत्मा में प्रकाश हुवे हैं, वो- के -- -- -- * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अढीगतद्वारी. * जीवों श्री आचारांग सूत्र प्रथमाध्याय के कथनानुसार महसम्मी मझ्याए' अर्थात् स्वानुभव (जाति स्मरणादि ज्ञान) से जानकर. या ‘परवागरणाणं. अर्थात्-तत्वज्ञोद्वा- रा श्रवण कर. 'अन्नसि अन्ति एवा सोचा' अर्थात्-किसी का सहज वचन श्रवणकर या ग्रन्थों में पठन कर इत्यादि सम्बन्ध से परमात्माके परम सुख के ज्ञाता-जान । कार हुवे हैं. उन को परम मुख प्राप्त कर ने की जिज्ञापा--अभिलाषा होवे यह स्वभा विक ही है. उनकी जिज्ञपा-इच्छा पूर्ण कर ने जो आत्मा सर्वज्ञ-सकार परमात्मा पद को प्राप्त हुवे है उनोने स्वानुभव द्वारा निश्चयात्म पूर्वक परम परमात्मा पद को प्राप्त कर ने के अन्तान्त गुणों को ज्ञान कर जाने हैं, परन्तु वचन द्वारा अनुक्रम से वागर ने - समझाने और उन गुणों में जीवों को लगा कर मार्ग में प्रवर्ता कर परमपद मा प्त करने जितना काल - समय निज पर का न होने से कार्य को असाध्य जान परम कृपालु अर्हत - सर्वन देव ने मुमुक्षुओंपर अत्यंत करुणा दृष्टि कर परमात्म पद प्रा- प्ति के कार्य को सहज साध्य वना ने -स्वल्पनों को समझा ने उन परमात्मा पद प्रा- प्ति के अनंतानंत गुणों का समावेश कुछ स्वल्प (थोडी) भख्या में करना उचित स- पझा कि जिन में सर्व मुमुक्षुओं - परमात्म पद के उच्छकों महज में समझें और पर मात्म पद प्राप्ति के मार्ग में प्रवृत्ति कर परमात्म के परम मुख के भुक्ता बनें. उम हेतु मे उन अनंत गुणों का शिर्फ चउदह (१४) वातों मेंही ममावेश कर दिया और उनका नाम 'चउदह गुणस्थान' या 'चउदह जीवस्यान' स्थापन किया. इतनी थो- डी संख्या में होने से मुमुलुओं शीघ्र नमज जावें परमात्म स्थान को प्राप्त कर ने. उलाही बने. प्रयत्न नील हो पर्यान करें. और परमात्मा वन अनन्त मुग्न का भुक्ते. उन १४ गुणस्थान के नाम इस प्रकार हैं: मिच्छे सासण मिस्से । अविरय देसे पमत्त अपमत्ते ।। निअट्टि अनिअट्टि सुहुम । व सम खीण सजोगी अजोगी गुण ।। अर्थ-"प्रथम मिथ्यात्व गुणस्थान" जगन निवामी प्रायः मबी, जीवों का मूलस्थान अनादि मे यहीं है. कनों स्त्री महा मेघ घा मे अच्छाडिन हुवा चैतन्य चंद्र मुर्छिन - वे भान दिशा में पता दुवा काल लब्धि पनि पक होने-च्यायि वेदनादि महने मे - कुछ कर्मान पतले पड़ने मे - स्वभाव मे - स्तव्य नाके योग्य मान- ही उंचा आता है वो पुज्यांग की नकलना कर अज्ञान नपश्चग्नादि के प्रभाव में इक्कीमत्रा वर्ग (नववी प्रयोक तक ले जाना है. मन्यान में ही हु आन्ग इतने - परिशिष्ट १ र चारित्र इन तीनों सार पदार्थ रत्नों समान धर्मका प्रति पूर्ण पर्ने यथातथ्य (ज- सी तरहसे करना चाहिये वैसीही तरहसे) आराधना-पालना-स्पर्शना-अन्त तक कर ने से प्राप्त हुवा है. इसलिये उस मुख का 'अनियण'-अर्थात् कदापि नाश नहीं होता है-अन्त नहीं आता है-ऐमा अनन्त है. और 'मवावाह'-अर्थात् उस मुख में कदापि किसी प्रकार की किञ्चित मात्र ही व्याधी, विकल्पता मिश्रता या किञ्चित मात्र नुन्यता कमी पता होताही नहीं है. ऐसे परम मुख को जो " अणु हवति"- अर्थात् अनुभव' लेते हैं-भोगवते हैं, उन सिद्ध परमात्मा को मेरा त्रि-करण त्रियोगकी विशुद्धि से वारम्बार वन्दना नमस्कार होवो? परि शिष्ट का यह विश्व अनन्तान्त जीवों से प्रति पूर्ण भरा हुवा है, वे सब जीव गुणकी अपेक्षा से अनन्त प्रकार के हैं, जैसे-ज्ञानादि गुणों में सब से हीन गुण के धारक- और चैतन्यतादि लक्षणों में सब से हीन शक्ति के धारक सूक्ष्म निगोद के जीवों है उन जीवों में से कभी कोइ एक जीव एका अंश अधिक गुणकी वृद्धि होने से ऊंच दिशाको प्राप्त होता है, यो अन्त गुण पुण्याधिक होते सूक्ष्म निगोद से निकल वादर (वडे) निगोद मय शरीर को प्राप्त होता है, वहां भी अनन्त गुणायिक पुण्य होने से प्रत्येक एकेन्द्रिय-पृथ्व्यादि स्थावर काय में आता है, यों अनुक्रम से अन्तान्त गुण पुण्याधिक होते वेन्द्रिय-तेन्द्रिय-चौरिन्द्रिय-असज्ञीय पचेन्द्रिय-सज्ञीय पचन्द्रिय-नरक देव मनुप्य-पर्याय तक प्राप्त करता है. यहां तक आकर कोइक जीव सर्व दुर्गुणों का सवांश नाश कर संपूर्ण गुण मय जब आत्मा बन जाता है तब सर्वज्ञतादि गुण प्रगट होते हैं, उस आत्मा को साकारी (शरीर धारक) परमात्मा कहते हैं. और कुछ काल सकार रहेवाट शरीरादि सर्व संयोगों का सर्वाश साग होते निजात्म के खास निज एकही स्वरूप मय जब आत्मा हो सिद्ध स्थान को प्राप्त करता है, उस आत्मा को परम परमात्मा कहा जाता है. वोही आत्मा मंगलाचरण में कथन किये मुजव अनो- पम निरावाध परम मुखका अनुभव करता है, सुख भुक्तता है. और उपरोक्त कथन मुजव जो जीवों सहज स्वभाव से निपजते हुवे पुण्याधिकतासे आकर्षा कर सशी पर्या य नक आये हैं ज्ञानादि गुण कुछ विशपांस जिनकी आत्मा में प्रकाश हुवे हैं, वो- के -- - - * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी.* तीवों श्री आचारांग सूत्र के प्रथमाध्याय कथनानुसार 'महसम्मी मइयाए' अर्थात् बानुभव (जाति स्मरणादि ज्ञान) से जानकर. या 'परवागरणाणं' अर्थात्-तत्वज्ञोद्वा- 1 श्रवण कर, 'अन्नसि अन्ति एवा सोचा' अर्थात्-किसी का सहज वचन श्रवणकर या ग्रन्थों में पठन कर इत्यादि सम्बन्ध से परमात्माके परम सुख के ज्ञाता-जान कार हुवे हैं. उन को परम सुख प्राप्त कर ने की जिज्ञापा-अभिलापा होवे यह स्वभा वेक ही है. उनकी जिज्ञपा-इच्छा पूर्ण कर ने जो आत्मा सर्वज्ञ-सकार परमात्मा पद को प्राप्त हुवे हैं उनोने स्वानुभव द्वारा निश्चयात्म पूर्वक परम परमात्मा पद को प्राप्त कर ने के अन्तान्त गुणों को ज्ञान कर जाने हैं, परन्तु वचन द्वारा अनुक्रम से वागर ने - समझाने और उन गुणों में जीवों को लगा कर मार्ग में प्रवर्ता कर परमपद प्रा त करने जितना काल - समय निज पर का न होने से कार्य को असाध्य जान परम कृपालु अर्हत - सर्व देव ने मुमुक्षुओंपर अत्यंत करुणा दृष्टि कर परमात्म पद मा- प्ति के कार्य को सहज साध्य वना ने -स्वल्पज्ञों को समझा ने उन परमात्मा पद मा- प्ति के अनंतात गुणों का समावेश कुछ स्वल्प (थोडी) संख्या में करना उचित स- मझा कि जिस से सर्व मुमुक्षुओं - परमात्म पद के इच्छकों सहज में समझें और पर मात्म पद माप्ति के मार्ग में प्रवृत्ति कर परमात्म के परम मुख के भुक्ता वनें. इस हेतु से उन अनंत गुणों का शिर्फ चउदह (१४) वातों मेंही ममावेश कर दिया और उनका नाम 'चउदह गुणस्थान' या 'चउदह जीवस्यान' स्थापन किया. इतनी थो- डी संख्या में होने से मुमुक्षुओं शीघ्र समज जावें परमात्म स्थान को प्राप्त कर ने, उल्लाही वने. प्रयत्न शील हो पर्यात करें, और परमात्मा वन अनन्त मुख को भुक्ते. उन १४ गुणस्थान के नाम इस प्रकार हैं: मिच्छे सासण मिस्से । अविरय देसे पमत्त अपमत्ते ।। निअट्टि अनिअट्टि सुहुम । व सम खीण सजोगी अजोगी गुण ।। अर्थ-"प्रथम मिथ्यात्व गुणस्थान"-जगत निवासी प्रायः सबी जीवों का मूलस्थान अनादि से यही है. कमों रुपी महा मेघ घटा से अच्छादित 'हुवा चैतन्य चंद्र मूर्छित - वे भान दिशा में पडा हुवा काल लब्धि परि पक होते-च्याधि वेदनादि सहने से - कुछ कर्माग पतले पड़ने मे - स्व स्वभाव से • मतव्य ताके योग्य माज- ही ऊंचा आता है - वो पुण्यांश की प्रबलता कर अज्ञान तपश्चरणादि के प्रभाव मे इक्कीसवा स्वर्ग (नववी ग्रयवेक नक चले जाना है. इस स्थान में ही हुइ आत्ग इतने ४ परि शिष्ट ऊंचे दरजे को प्राप्त कर शकती है इसलिये इसे प्रथम गुण का स्थान - गुणस्थान कहा है. . २ 'सा स्वादन गुणस्थान'-मिथ्यात्व गुणस्थान को छोड ऊंचा जाकर फिर वो आत्म कर्मों के धक्के से गिर कर-पडकर मिथ्य गुणस्थान को आता है परंतु मि- थ्यात्वी नहीं बनता है वहां तक मिथ्यात्व से कुछ-उज्वल-अच्छाही होता है इसलिये इसे दूसरे दरजे के गुणस्थान में स्थापन किया है. ३ तीसरा “मिश्र गुणस्थान " इस स्थान को प्राप्त हुवा जीव सत्य को और असत्य को दोनों को एक रूप-एकता जान ने लगता है, सद्गुणों दुर्गुणों की गडबड होजानेसे इसे मिश्र-मिश्रित कहा है. परन्तु प्रथम गुणस्थान वाला तो असत्य को सत्य, और सत्य को असत्य मानता था, और यह दोनों को एक सा जाल ने लगा इतने गुणों की इस में आधिकता होने से इसे तीसरा दरजा मिला है. ४चौथा “विरति-सम्यग दृष्टि गुणस्थान'-इस स्थानको प्राप्त हुवा जीव सम्यग दृष्टि वन जाता है अर्थात् यह आत्म सत्य को सत्य और असत्य को असत्य यों य- थातथ्य (जैसा होवे वैसाही) जान ने लगता है इस महान गुण की आधिकता होने से इसे चौथा दरजा मिला है. (परन्तु यह कर्मोदय की प्रबलता से कुछ व्रत नियम कर सकता नहीं हैं) ५ पांचवा 'देश विरति गुणस्थान' को प्राप्त हुवा जीव सम्यग् दृष्टि युक्त कुछ देश से-थोडे व्रत-नियम धारण कर सकता है, सो श्रावक कहा जाता है. इस गुणकी अधिकता होने से इसे पांचवा दरजा मिला है. ६छट्ठा 'प्रमत संयाति गुणस्थान -इस गुणस्थानको प्राप्त हुवा जीव सर्व विरति- संयति-साधु होता है. इस गुण की अधिकता होने से इसे छट्टा दरजा मिला है. (परंतु यह प्रमादी आलसी होता है जिस से सर्व विरति पन बहुधा लगते हैं उनका भु। ते है) ।' इस र हुवा जीव सर्वथा आळस-प्रमाद का त्याग की गयाहै. ( में अनेक प्रकार के मूक्ष्म वादर (छोटे वडे) ७ सातवा कार्य में .. है इस .. होने ५ # मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी. त्यक्ष मे देखाती हुइ विषय कपाय से निवृत्ति पाता है, इस गुण की अधिकता होनेसई से आठवा दरजा दियागया है. ९ नववा "अनयट्टी वादर गुणस्थान"-इस स्थान में आया आत्मा सूक्ष्म वाद र सर्व विषयों से और तीनांश कपाय से निहताता है, इस गुणकी अधिकता होनेसे इसे नववा दरजा मिला है. १० दशवा-"सूक्ष्म संपराय गुणस्थान" इस स्थान को प्राप्त हुवा आत्मा मूक्ष्म किञ्चित लोभके सिवाय सर्वथा विषय कपाय से नितता. है इस गुणकी अधिकताहो नेसे इसे दशवा दरजा दियागया है. ११न्यारवा-"उपशांत मोह गुणस्थान"-इस स्थानमें आने वाद सूक्ष्म लोभरु- प शल्य रहाथा सो भी सर्वथा वजाता है-वीतराग अवस्था को प्राप्त होताहै, इस गु- ण की अधिकता होनेमे इसे इग्यारवा दरजा दियाहै (इसने मोह-कपाय कोदवाया है, पन्रत भय नहीं किया है जिससे पडवाइ होता है.) १२ वारवा-"भीणमोह गुणस्थान"इस गुनस्थान मे आया हुवा आत्मा सर्वथा मोह-कपायका जड मूलसे नाश करता है. यह पीछा पडता नहीं है, इस गुणकी अ- धिकता होनेसे इसे वारवा दरजा दिया गया है. १३तेरवा सयोगी केवली गणस्थान" इस स्थान को प्राप्त होनेस आत्मा सर्वस- 4 दर्शी साकारी परमात्मा बन जाताहै इस गुणकी अधिकात होनेसे इसे तेरवा दरजा दिया गया है. १४ चउदवा 'अयोगी केवली गुणस्थान इस गुणस्थान को प्राप्त हुवे बाद आत्म परम परमात्मा वनजाता है-सिद्ध अवस्था को प्राप्त होता है. यहां सर्व गुणों संपन्न होने से-फिर कोई भी कार्य वाकी नहीं रहने से इमे अन्तिम-सर्व से ऊंचा व- उदवा दरजा दिया गया है. मुमुक्षुओं? ऊपरोक्त चउदह बातों का जरा दीर्य दृष्टि मे ख्याल कीजिये कि । महान तत्वत्ता सर्वज्ञ परमात्नाने अपने ऊपर कैमा जदर प्रशाद किया है अति गुढ-गहन विषय को कैसा मुलभ महज कर मनाया है. इन में अल्पाभी तुर्न मम- झजाय और ऐमा सहज काम जान इम में प्रवर्त ने उत्सुक बनें! परन्तु मुझे यहां संशय होता हैकि उपरोक्त वदह गुणस्थान का ऐम मुल्ले- सहज अर्थ को पडकर कदाचित कोई स्वल्पज विचार करेंगे कि अहो उसमें क्या. यह .

प्रवेशीका ढीशतद्वारी" नामक ग्रंथ को दो काण्ड और चारों खंड के २५२ द्वारो कर कहता हुँ सो दत्त चित्त से पठन कर मोक्षानु गामी वानिये. गाथा-नामऽत्थ पणवागरणा । पव्वेसा लक्षण दिठन्त ॥ गुण अवघेण दव्य । लद्ध खय खेत्त खेत्त पम्माण ॥२॥ ठोइ काल भाव गुण - सया मग्ग चउ अवरोह गइ दिठन्ते। अन्तर विरह फासा - तीओ पढम सासय गमण भव अप्पा बहु॥३॥ अर्थ-प्रथम मूल खंड के ३३ द्वारो के 'नाम' कहताहूं -प्रथम नाम द्वार 'ऽत्य- केहतां दूसरा अर्थ द्वार, 'पण वागरणा'-कहतां तीसरा प्रश्नोत्तर द्वार, 'पव्वेसा' कह- तां-चौथा प्रवेश द्वार, 'लक्षण' कहतां पांचवा लक्षणद्वार, 'दिछन्त' कहतां छहा दृष्टां- त द्वार. 'गुण' क० मातवा गुणद्वार, 'अवघेणा' क०-आठवा अवघेणा द्वार, ‘दव्य" क. नववा द्रव्य (जीव) प्रमाण द्वार, लट्ठ' क० दशवा द्रव्य पावती द्वार 'खय' क० इग्यारवा जीव खपती द्वार, 'खेत्त' क० वारवा क्षेव परिमाण द्वार, 'खेत्र पसणा क० तेहरवा व स्पर्माना द्वार, 'टीद' क० चउदवा स्थिती द्वार, 'काल' क० पंदरव काल प्राप्त द्वार, 'भाव' क० मोलवा-भाव परिमाण द्वार, 'गुणसया' क० मत्तरवा-नि रंतर गुण द्वार, 'मग्गचउ' क० मार्गणा के चार द्वारः-अठारवा-मार्गणा द्वार, उन्नीसवा उपमार्गणा द्वार, बीमवा-परस्पर मार्गणा द्वार, 'इक्कीमवा'-परस्पर उपमार्गणा द्वार. अवगेह' क० बावीमवा-उवरोह अवरोह द्वार 'गइ दिटत' क० तेवीमवा-गतिदृष्टांत द्वार, अंतर' क. चौवीमवा-अनर द्वार, 'विग्रह' क. पच्चीवा-विरह द्वार, 'फामनीओ' क. म्पर्शना के तीन द्वारः- छब्बीमवा एक-भव आश्रिय स्पर्शना द्वार, मत्तीवालवा - बहुत भव आश्रिय म्पर्गना द्वार, अट्ठावीमवा-परम्पर स्पर्गना द्वार, 'पढम' क. उन्नतीमवा प्रवमा प्रथम द्वार, 'मामय' क. नामवा गाश्वता शाश्वत द्वार 'गमण' क. इकतीमवा पर भव गमन द्वार. 'भव' क. बनीमत्रा भव मंग्व्या द्वार, और 'अप्पाबहु' कहतां-ने- नीमवा अन्या बहुत द्वार गाथा-किग्यिा कारण हेड-पंच चरबन्ध नव कम्म बन्ध ओ ॥ घुव बउ बाइ छक, पुण्ण पाव दुग्ग परावत्त चउ ॥४॥ भृयकार अप्प अवट्टि दुग्ग अवक बन्ध विछह दुग्गं । कम्मोदय नव आ, धुन्च चउ पुण्ण पाय दुग्गे आ ॥५॥ - .

९ - मुक्ति सोपान श्री गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी. विवाग अट्ठघाइ - छक्क - उदय विच्छ हो दुग्गे ॥ ऊदीरणा दह विच्छोहदु,धुब्बचउ सत्तानव घाइ छक्क विच्छोह दुग्गे।६ भङ्ग नव वन्ध इरिया । भाव सेणी वेए निज्जरा ॥ करण गुग सेणीओ । कम्म सत्त भाग ती सत्त सतदारा॥७॥ अर्थ-कम्म सत्त भाग तीअठ सत्तद्दारा कहतां-दूमरा कर्मारोहण खंड के सा- तो प्रकरण के मिल १:७ द्वारः-(१) कर्मोलत्ति प्रकरण के ७ द्वारः-किरिया कहतां प्रथम-किरिया द्वार. कारण क• दूसरा मूलहेतु (कारण) द्वार. 'हेपंच कव्हेतुके पांच द्वारः-तीमरा-मिथ्यात्व हेतु द्वार. चीया अविरत हेतु द्वार. पांचवा कपाय हेतु द्वार. छठा-जोग हेतु द्वार, मातवा-समुचय हेतु द्वार. (२) कर्म बंध प्रकरण के ८ द्वार:-'घर वंध' का प्रथम चार बंध द्वार:- “नव कम्न बंध ओ" क. कर्म बंध के ९ द्वारः - दूमरा-समुचय कर्म बंध द्वार. तीरा-ज्ञानावरणीय कर्मबंध दार- चौथा दर्शनावरणीय कध द्वार. पांचवा वेदनीय कर्मबंध द्वार. छटा-मोहनीय क- म बंध द्वार. मातवा आयु कर्मबंध द्वार. आठवा नाम कर्मबंध दार. नवमा-गोव कर्म बंध द्वार. दशवा अंतराय कर्म बंध द्वार. 'धुन्च चकं" ध्रुव बंध के चार द्वार.:-ग्या : रवा-ध्रुवकर्म बंध द्वार. वारवा-ध्रुव कर्म प्रकृत्ति पंध द्वार. तेखा-अब कर्म बंध द्वार. चउदवा-अध्रुव फर्म प्रकृति बंध द्वार. 'घाड उद्द' का पानिक कर्म के छे द्वार:- पंद- रखा-पर्व धातिक कर्म बंध द्वार. मोलवा-गर्व घानिक कर्न प्रकृति बंध द्वार. मनग्वा देश घातिक कर्म बंध द्वार. अटारवा-देश पानिक कर्म प्रवृत्ति बंध द्वारा उनीमबा-अ- घातिक कर्म बंध द्वार. 'पुण्य पात्र दुग्गे क पु-यके दो और पापरे दो द्वार-दहीन- वा-पय कर्म बंध द्वार. वाबीनवा-पुन्च कर्म प्रवृत्ति बंध द्वार, नेवीनवा-पाप कर्म कर द्वार. चौवीनवा-पाप कर्म प्रवृत्ति दंध द्वार. पनवन वर कः पगवर्तमान वर्म दं. घ के चार द्वारः-पचीनवा-पगर्न मान कर्म य द्वार. नीमचा-यगवर्तमान धर्म महान बंध द्वार, मत्ताबीनबा-अपग मानव द्वार, प्रारीवा-भगवर्नमन र्म मत्ति र द्वार. "भपकार अन अमटी दुले ६.भुपमा दे दो. अन्य दो. और अवस्थित दे दो दोरे द्वार:-सबीनवापार वर्ग र दार. नीम- वा-भुपकार प्रतिबंध द्वारा स्वीना • अन्नाद्वार.नीमा अत्तर कर्म महरिश द्वार. तीन वन्धित शद्वार. नीना-मामि ।

। . प्रवेशीका म मनि ना दार. पनीमता अन्यक्त कर्म बंध द्वार. 'वन्य क० छत्तीसवा-समु- दार. 'विनोह दुगेका लिन्छोहके दो द्वारः-सेंतीसवा कर्म बंध विच्छेद पानीमा कर्म पनि निन्छेद द्वार. (३) कर्मोदय प्रकरण के३० द्वार Ti"क' कांग के द्वारः-प्रथम-मुन्न कोर्दय द्वार, दूसरा-झानावर- 4. नीलग-नागणीग कोदय द्वार, चौथा-वेदनीय कर्मोदय द्वार, मोगदार. सा-मागु कर्मोदय दार, मातवा- नाम कर्मोदय द्वार, THEr. नागा भागय कमांदग दार. 'ध्रुव चउ' क० ध्रुव कri TT :-- पा कांदय द्वार. इग्गाग्गा ध्रुव कर्म प्रकृत्तियोदय ". ITTER पर नाभा कर्म प्रकृनियोदय द्वार, "पुण्ण पाय- Mir पादा गा चार द्वार-चादया-पुण्य - कर्मोदय द्वार, 1. Tiगदार मालगा-गाप कमांदय द्वार, मत्तग्वा- पाप क- 17 लिाग अहक चार विपाको के ८ द्वार:-अठार- 35: दार. नीना व शिपाक कर्म प्रानियोदय द्वार, बीगया "7 द्वारा मा पा कर्म प्रकृनियांदय द्वार, यावीमया ग द्वारनीना - जी पिE कर्म प्रकृतिगांदय द्वार, .... कांदय दार. पनीरवा - गुदल पिपात कई प्रकानियांदगद्वार, दय . क द्वारा चीनवा-ग घानिक कमंदिय द्वार, ग T: शनिवादय दार, प्रतापगया - देग पानिक कर्मादय 4 • जाम कर दिगोदय द्वार, नीमया • अचानक कांदय पानियोदय द्वार. 'उदय' क वनीगा- मपचय क दानंद दादय मिटर पं. दो दा:-नीपा कर्मा हर ट द वा-2 दिनदय विद द्वार, (4) कप पागणाप्र. * ', या नदीगा के द्वार:- म. 7 दर दम्प डायवरणीय सनदीयाद्वार, नागग-दी- 27 नवंदनीय टोणार. पाना • मदनीय 2 - द्वार. on नायव दा. 77 2-2 मा. 7. काट + T . "07 m Aap - गमाप ११ - :- मुक्ति मोपान-श्री गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी.* उदीरणा व्यच्छेद द्वार. वारवा-कर्म प्रकृति उदारणा व्यच्छेद-द्वार. (६) कर्म सत्ता प्रकरण के २२ द्वारः –'सत्तानव' क.कर्म सत्ता प्रकरण के.९ द्वारः- पहिला समुचय कर्म मत्ताद्वार. दुसरा-ज्ञानावरणीय कर्म मत्ताद्वार. तीमरादर्श . नावरणीय कर्म सत्ताद्वार. चौथा-वेदनीय कर्म मत्ताद्वार. पांचवा - मोहनीय कर्म सत्त- द्वार छठा-आयु कर्म मत्ताद्वार. मातवा-नाप कर्म मत्तादार. आया-गोव कर्म स- ताद्वार. नववा अंतराय कर्म मत्ताद्वार. 'धुन्चवार क. ध्रुव कर्म मत्ताके ४ द्वारः-दशवा ध्रुव कर्म सत्ताद्वार. इग्यारवा-ध्रुव कर्म प्रकृत्ति मत्ता द्वार. बारखा अनुव कर्म मत्ता र्मद्वार. तेरवा अध्रुव कर्य प्रकृति मत्ता द्वार "घाइ छक्कं"क घातिक कर्म प्रकृति मत्ता के ६ द्वार: ‘चढवा म घातिक कर्म प्रकृति मना द्वार. पंढरखा - पर्व घातिक कर्म प्रकृत्ति सत्ताद्वार. अठारखा-अघानिक कर्म मनाद्वार. उन्नीसवा - अयातिक क में प्रकृति मत्ताद्वार. 'मत्त कवीनवा - ममुचय कर्म प्रकृनि मनाहार, "विशोर दुग्गे" क० कर्म मत्ता विछेद के दो द्वार:-रवीना - कर मन विद द्वार. या. वीमवा कर्म प्रकृति मचा विच्छेद द्वार. (6) कर्म भग प्रकरण १ दार :- "भंग नव" कमों के भांगके २ द्वार पहिला - समुचप कर्म भंग हार. नाग-दानावर- णीय कर्म भंग द्वार, तीसरा ' दर्शनावरणीय वर्म भग द्वार. नीया वेदनीय काम भंग द्वार पांचरा मोहनीय कर्म भंग द्वार. या आयु वर्ग भंग द्वार माना नाम कर्म भंग द्वार. आठवा गोव कर्म द्वार. नववा अगर वर्ग भर द्वार. बारीक दशवा दधी भंग द्वार. 'परिया' का इल्यान्दा पनिी न द्वार. (७) भागदि । करण के १ः हारः-- भवट भाव के ८ द्वार:-पहिल भाटार, दमा उदय भाव द्वार. तीनरा उपमान भावहारचौपा पोषन भारद्वार. पहा - हादिर भाव द्वार, उटा परिणामिक भार हार. मातम मनीमा "- हार. ' क.. आठवा श्रेणीवार, 'वेद' व नवादार, निजग दाता नि जरा वार. 'करण' का त्याग्दा दहा दापसार, मेट:-बाबरी दर यह मद कर्मनाप रहर द्वार ई. गाथा-गइ जाइ काप दण्डग । नित्तिो जीप दुर गेनी लो!! सहुम तल सन्नी । भाग आहानिर पाय दुणे ।। पाण इनद्रिय नना । ए बनाय लेना रोगी॥

प्रवेशीका -real- - 4 मंचयण मंठाण मन्त्रु । विग्गह सग्ग दव्य संसार दारा ॥९॥ riकीनगमलागरोहण ITS के ४१ द्वारः-'गइ जाइ काय दण्डग तित्तिओ' गामात कागा और इक इन नारों के तीन तीन द्वार होनेते ? २ द्वार : --- भागनि दार. दुमग पागनि द्वार, तीमरा-जागति द्वार, चौया orm. पारा-पानानि दारा - जाजाति द्वार, माता- आकाया द्वार, rr. ना बाकायागर. दशा भावटकतार, इग्यारवा-पादंडकार, rrrrrrr. “ मीन नी दो दाग:-तेरसानामान्य जीवके भे- wr Tria नीमार. गरमा गोनी' क जीवा गोतवारगोल- Ar: "म' 1. गापा - गा नादर द्वार; 'तम्मक० अठार- * * Tr: नी. ' नीमा गनी मानीनगर; 'भानग' पीलवा-भाषक पाम' • माहाना:- मीमया-आहारक अगाहारक T! आत प्राधार नपा-पिनादि आहारदार चांगलया दि- .'' , दाग' पाक दो बार : --पीनवा- पर्या द्वार; छवीगया ... TET 'गण'. मनाया-पाणार 'इन्दिय दुग' ईदियो दो ... तर उनीमादिय विदार. गन्ना' का तीनमा-गजादा- शानदार. 'हाय', पनीरवा-पाया. या क० में- मा' नानीमा - यांग द्वार. 'गगर' का पतीमा- + य क - नीवणार. मटाण'कनीमग-म्या- , 'x girया माय मरण दार. 'x' के उनादी- En 'm' , नालीमार्ग की पटादार, और दवा एक . 75 M - - दिट्टी । नत्र नाम पम्ति पयवा आया । दलका बीयनिय ममन मंजाय ॥१०॥ रन का प्रतिसाद परमाय गाय ।। । कनियाना|| पल नियमन नित्य पाग!

१० . * मुक्ति मोपान-श्री गुणस्थान राहेण अहीशतद्वारी. १ मोक्षस कारण ओ । ए एक चालीस धम्मदारा ॥१२॥ अर्थ-धर्मारोहण खण्डके ४१ द्वार :--'उवओग पंच 'क० उपयोग के पांच द्वारः-प्रथम-मृल उपयोग द्वार, दुसरा-अजान द्वार, तीसरा-ज्ञान द्वार, चौथा-दर्शन द्वार. पांचवा-समुचय उपयोग द्वार. दिठी' क० छट्टा दृष्टिद्वार, 'भव' क० सातवा म- व्याभव्य द्वार 'चरम का आठवा-चरमाचरम द्वार, 'परीत' क० नववा-परितापरित द्वार, ‘पयवी का दावा-पद्वीद्वार, 'आया क० इग्यारवा-आत्मा द्वार' झाण' का वारवा-ध्यान द्वार, पाय क० तेखा-ध्यान के पाये द्वार 'दव्य' क० चउदवा-पट द्रव्य द्वार. 'परिणाम क० पंदरखा-परिणाम द्वार, 'वीय क० सोलवा वीर्य द्वार, 'तित्य' क सत्तरखा-तीर्थातीर्थ द्वार. 'समत्त का अठारवा-सम्यक्त्वद्वार, 'सयय' क० उन्नी- सवा-संयता संयति द्वार. 'लिंग) क० वीसवा-लिगद्वार, 'चरित्त' का इक्कीसवा-चरित्र । द्वार. 'नियंठेकदावीसवा - नियंठा द्वार. 'कल्प' क० तेवीसवा-कल्पद्वार, 'परिसह । क. चौवीसवा-परिसह द्वार. पम्नाय क० पञ्चीसवा.प्रमाद द्वार, 'रागी' क० छब्बीस वा-सरागी वीतरागी द्वार. पडित', क. सत्तावीसवा-पडवाइ अपडवाइ द्वार 'छउम क० अठावीसवा-अस्त वीतरागी द्वार० 'समुधा' क० उन्नतीमवा-समुद घात द्वार, 'देव' का तीसवा-पांच देव द्वार. परिणामी' क इकतीसवा-परिणामद्विार, 'करण' का बत्तीसवा-करण द्वार, निवत्ती क० तेंतीसवा-निवृत्ति द्वार, आसव' कहतां चो- तीसवा-आश्रव द्वार, 'संवर' क० पेंतीसवा-संवर द्वार, 'निज्जरादु' क० निजरा के दो द्वार:-छत्तीसवा-निर्जरा द्वार सेंतीप्तवा-निर्जरा भेटद्वार, 'फल' क० अडतीसवा फल द्वार. 'तित्थगोय' क० उन्नचालीसवा-तीर्थंकर गोव वन्ध द्वार. 'तित्य फास' चालीस वा- तीर्थकर स्पर्शना द्वार. और 'मोक्ख' कहतां इकतालीसवा-मोन द्वार. गाथा-इमाओ चउ खण्डे । सव्वे दारा भवन्ति अदीसत ।। चउदहस्स गुणठाणे । मूल मूल अत्थ अत्थओ ॥११॥ अर्थ-ऐसी तरह से चारों खण्ड में सर्व २५२ द्वारों की रचना कर इसका - ल मतलब तो मूल काण्ड में चउदेही गुणस्थानोपर वत,या है. और उसका विस्तार के साथ अर्थका खुलासा समझाने अर्थ कान्ड किया गया है. ------ "श्री गुणस्थाना रोहण अढीशतद्वारी" प्रथम-“अर्थ काण्ड." प्रथम-खण्ड-“मूलद्धारारोहण का अर्थ" प्रथम नाम द्वारका-अर्थ. इस सम्पूर्ण विश्वालय में रूपी अरूपी द्रव्य मय सचेतन अचेतन अनन्त पदार्थ गुण और पर्याय कर के अनेक भाव में परिणमते हैं. उन सवोंकी पहिचान नाम स- ज्ञा सेही होती है. इसलिये प्रथम नाम द्वार कहा, और उस में अनुक्रम से गुणों की बुद्धि होते जीवों चडते हैं जिनके चौदह मुख्य भेद कर अनुक्रमसे १४ ही गुणस्था- नोंके नाम और अपर नाम वताये हैं. २ दुसरा-अर्थद्वार का अर्थ. नाम ३ प्रकार के होते हैं:-(१) यथार्थ नाम' (२) अयथार्थ नाम और (३) अर्थ शुन्य नाम. (१) जो गुण निप्पन्न नाम होवे, अर्थात जैसा जिस पदार्थका नाम होवे वैसाही उसमें गुण पाता होवे - जैसे जीवका नाम - तीनों ही काल में अमर होनेसे-जीवता रहने से जीव कहते हैं. चैतन्यता युक्त होनेसे चेत्यन्य कहते हैं, द्रव्य प्राण और भाव प्राणका धारक होने से प्राणी कहा जाता है. इत्यादि नाम रक्खें सो यथार्थ नाम. (२) जिन वस्तु का जैसा नाम होवे वैसा उस में गुण नहीं पावे. जैसे जीवका नाम धूला, कचरा, हीरा, मोती इत्यादि रक्खे सो अयथार्थ नाम.

* मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी. र - H . (३)जिसका कुछ अर्थ नहो होवे जैसे-हँस ने का अवाज छींकनेका शब्द वनिंत्र काअवाज इत्यादिअर्थ शुन्य नाम इन तीनों प्रकार के नामों में से यथार्थ नामही प्रमाण भूत सर्व मान्य होता है. सोही चतुर्दश गुणस्थान के जो प्रथम द्वार मे नाम कहे सो यथार्थ : नाम हैं. अर्थात जैसा जिनका नाम है वैसेही उनोंमें गुण पाते हैं सो दूसरे द्वार मे । बताया है. ३-तीसरा-प्रश्नोत्तर द्वारका अर्थ. किसी वस्तु के नाम के अर्थ दो तरह के होते हैं: १ व्यवहारिक सो लोक रूही प्रमाणे, और २ निश्चयिक सो परमार्थिकः-व्यवहारिक से आधिक मान- निय निश्चयिक नामार्थ होता है. इसलिये १४ ही गुणस्थानों के निश्चयिक नाम हैं. इन का व्यवहारिक रीति से कोइ उलट अर्थ भाप होवैतो उमका निर्णय तीमरे प्रश्नो त्तर द्वार में किया गया है. ४-चौथा-प्रवेश द्वार का अर्थ. ऐसे जो गुणों के भंडर रूप जो शुभस्थान है. उन में प्रवेश कर ने गुणन और गुण वृद्धिक जम्र ही इच्छेगे. उनकी इन्छानुसार कार्य मिद्ध कर ने की रीनि-अर्थात । उन गुणस्थानो में प्रवेश करनेका उपाव चौथे प्रवेश द्वार में कहा है. इम द्वार का सम्पूर्ण खलामा बार स्वरूप ममजाने के लिये उपगम श्रेणी औ- र क्षपक श्रेणी दोनो श्रेणीयों का स्वम्प मनजाने की बहूनही आ ट्यकता है. हम लिये 'मप्तातिका नामक पष्टम् कर्म ग्रंथानुनार जरा विस्तार में दोनों श्रेणीयोंका स्व- रूप यहां दर्शाया जाता है:- "उपयोगो लक्ष्णम्"रम नवार्य मूव के फरमान मुहब जीवता जो निज बाम लक्ष्ण गुण है मो "उपयोग" है. अर्थात् अनादि काल में आग हान दीन रूप मत लक्षणों की धारक है. परंतु यह दोनोंती गुणों अनादि में अपने स्वभाव में कमों कर अन्डादित तो रहे हैं हका रहे है. जिन के योग में यह मा भ्रमित हुवा निगोद तिपंच नरक देव और मनुप्यों की गति नाना पगार काम्प भग्न कर-ध-निकाचिन-उदय नया निर्मग दी मना रखने वाले पुन्य पार ले पनों का अनेक प्रकार भे अनुभव लेना.वोरुपगेन दान दर्शन गरेममम - . -

No text on this page.

M * मुक्त सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अहीगतद्वारी. पूर कर के. दमरा स्थिति बंध करना मुरु करे, मो पीहले २ के स्थिति बंध की आपेक्षा से पल्योपम के मंख्याते भाग कमी स्थिति को कर के बंधता है. ऐमीही तरह जोजो आगेको स्थिति बंध करे वो वो पहिले २ के स्थिति बंध मे पल्यापम के असंख्यात } भाग कमी २ करता दुवा स्थिति का बंध करता है. यों करण काल के अंतर मुहर्त पर्यत रहकर फिर अनुक्रम मे अलग : अंतर महत प्रमाण के तीन करणों करना है. जिनके नाम-१ यया प्रवृत्त करण २ अपूर्व करण. : अनिवृत्ति करण. और चाया उपगांन अधा होता है. मोभी अंतर ; मुहूर्त का ही जाणना १. प्रथम-यथा प्रवृत्ति करण का स्वरूप :-या प्रवृति करण में प्रवेश कर ता हुवा पाणी प्रति समय अनंत गुण विशुद्धि की वृद्धि को करना है. और उपगेन प्रकृत्तियों मे से शुभ प्रकृत्तियों के बन्धादि दो ग्यानी म का नाम्पानीय ग्म को दो स्थानीयां कर बंध करना है.परंतु या तथा विधी नत्लोर विमान के प्रभार कर १ स्पिनि घात २ रमघात.ाणश्रेणी और ४ गण मंत्रमान लागे कामों में का. का भी काम नहीं कर सकता है अनेक जीवो की अपेक्षा कर एन वन में मनरेगा ले जीवोके अभख्यान लोकाकाय प्रदेश प्रमाण अपवनार के म्यानक. मय (म मय में होते। वो भी ऐम्यान पतित होते. पहिली मार दे अपना मा. नक मे दमरे ममय के अध्ययनाच म्यानक विभपापित होने पोटी दमाममा के अध्यवसाय स्थानक में तीसरे समय के अपना मात्र अर्पित होना ३ मे चोये ममय के अधिक होवे दो परिमाप मे आने-मन प्र. पवनय चानक विशेषाधिक होते. जिनही जोरदापि नही बचना :- नो पिपर पतारा देव वा निरंन होला नी महानि :. न्तिम समय तक अनाकार करना चहाचे दान दिवी अपेक्षा कर के रनर मन हान-मी पापोने मादागान कार किया मई जन्म दिला की मानसिक बनाया मानसिक RE :::: - . नार एक Ram- ----- H १८ प्रथम काण्ड है, उस से उसही पुरुष के फिर दुसरे समय की जघन्य विशुद्धि अनन्त गुणी अधिक होती है. उस से तीसरे समय की जघन्य विशुद्धि अनंत गुणी, यों अनंतानंत विशु- दि की वृद्धि करता हुवा इस यथा भत्ति करण के असंख्याते भाग व्यतिकृन्त करता है. तब जघन्य पद विशुद्धि वाले पुरुष की जो अतिम जघन्य विशुद्धि हुइ उम से दूसरे पुरुपकी प्रथम समय की उत्कृष्ट विशुदि अनंत गुणी अधिक होती है. और उस से भी जगन्य विशुद्ध के स्थानक से निवृतता था उसकी उपरीतन जघन्य विशु- दि अनंत गुणी, उत्त से दूसरे समयकी उत्कृष्ट विशुदि अनंत गुणी, उस से तीसरे समय की जघन्य विशुद्धि अनंत गुणी, उस से भी उसके आगेके समय की उत्कृष्ट विशुद्धि अनंत गुणी अधिक. यों ऊपर के और नचिके एकांतर विशुद्धि के स्थानक अधिक २ करते दोनों जीवोंके यथा महात्ति करण के अंतिम समय मे जघन्य स्थान होबे वहां तक कहना. उसके बाद उत्कृष्ट विशुद्धि के स्थानक निरंत्र अन्तिम समय पर्यंत अनंत गुण वृदि लिये कहना. यह यथा प्रवृत्ति करण जाण ना. २ दुतरे अपूर्व करण का स्वरूपः-अपूर्व करण के प्रति समयोंमें जो अध्य-वसाय के स्थानक होते हैं वो असंख्यात लोकों के जितने आकाश मदेश होते हैं, उतने होतेहैं और प्रति समय छः स्थान वृद्धि तथा छः स्थान हानी युक्त होते हैं, सोही कहते हैं:- के उत्कृष्ट विशुद्धि के स्थानक से दुसरा विशुद्धिका स्थानक विशुद्धि की अ पेक्षा कर जो हीन (कमी) होवे तो-१ अनंत भाग हीन होवे, २ असंख्यात भाग ही- न होवे, और ३ संख्यात भाग हीन होवे. यह भाग आश्रिय तीन स्थान हीनता के कहै. तैसेही-१ संख्यात गुन हीन होवै.२असंख्यात गुण हीन होवै, और अनंतगुनहीनहोवे यह तीनो स्थानों गुण आश्रिय हीनता के जानना यों ६हानी के स्थानों होते हैं.और जो प्रथम के अध्यवसाय का स्थानक से विशुद्धि की अपेक्षा दुसरा अध्यवसाय का स्थानक बृद्धिलिये होवे तो-अनंत भागाधिक होवे, २ असंख्यात नागाधिक हो और ३ संख्यात भागाधिक होवे. तैसेही-१ संख्यात गुणाधिक होवे, २ असंख्यात गुणाधिक होवे, और३अनंत गुणाधिक होवे. यो परस्पर(आपस में)वृद्धि के और ६ हानी के मिले १२ अध्यवसायके स्थानक होते हैं, यहां अपूर्व करण के प्रथम सम- य में जघन्य विशुद्धि सब से कमी होती है, वोभी यथा प्रवृत्ति करण के चरम (अ. तिम) समय की उत्कृष्ट विशुद्धि स्थानक से अनंत गुण अधिक जानना. उस से प्रथम समय की उत्कृष्ट विशुद्धि अनंत गुण अधिक जामना. उस से दुसरे समय की जघन्य १ भयम . * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी र १९ विशुद्धि अनंत गुण अधिक होती है. और उनसे भी दुसरे समय की उत्कृष्ट विशुद्धि अनंत गुग अधिक तेती है. ऐसे अपूर्व करण के अंतिम समय लग कहना. इस अपू- करण में प्रवेश करने वाला प्रथम समय मेही:-स्थिति घात. २ रसयात. : गुण- श्रेणी. ४ गुण संक्रन और ५ अन्यस्थिती वंच. यह ५ कामों एकही वक्त इकडे कर- ता है. इनका स्वल्प खुलासा वार कहते हैं: १) स्थिति धान का स्वपः-जो क्रोधादि कपाय की स्थिती भोगवनी वा- की रही होवे. उलेमत्ता में ने अग्रभाग की स्थिति को उमेरे अर्थात्-उनकी स्थिति भाग का अग्रस्थान उत्कृष्ट तो बहुत मागनेर प्रमाणे होता है, और जयन्य मे पल्योपम के असंख्यात वे भाग प्रनागें होता है. उन भिति के पंड (दकडे ) करे. उसे करना कहते हैं. ऐनी तन्ह उकेर कर उनके लिये (नग) जो नीकी आय स्थिति खंड करने की रही है उन दल में उन दलियों को मात कर. या अंतर मु. (न कालतक उन स्थिति खंड को उकरे. चोी जो फिरवारी स्थिति को उनके ; अग्रभाग ने पल्यापम के अख्यानवे भाग प्रमाण नियति करने उमादल परिने की तरेती अंतर मुहूर्त वाकी रौ उसे नीचे की स्थिति मिनई. को अंतर मुन की स्थिति में उमका दल मिलाते • अपूर्व करण के कारक हजागे मिति रंवंड खप जाते हैं. तर जो अपूर्व करग के मथन नाप लिनी की मिति मत्ता थी उन मे ख्यान गण कर नियति नत्तागी मोमिनियन. (२) न घातवा वरूपः-जो अन पर्म का न दिन भोगाइका ना? उन रन का अनंतवा भाग लोरपार. वानी ने अनुभाग र मुद्दत में - पावे . दिसाय कर, फिर जो अनंत भाग दावीमान वाट कर वापसी हे अनुभाग के मद भानों को अंतर म. सिरा जो अनंना भाग का भी अन्ना भाग कर दी है भारत, को अंदर साल में पपावे. पो अनुभा. रव्य निने और उन दिने र अब ना में काट देवा मिति का काल न ट . बसपा सापालन अधिक (तीवान:- मिति की रानी दा . nataka २० प्रथम काण्ड की स्थिति में समय २ में असंख्यातगुण २ चडता हुवा दलिक सक्रमावे - मिलावे. वो ऐसी.तरह कि-प्रथम समय-स्तोक, उससे दुसरे समय में असंख्यात गुण अधिक, उस से तीसरे समय में असंख्यात गुण अधिक, यों जावत अंतर मुहूर्त के अंतिम स- मय पर्यंत कहना. यह अंतर मुहूर्त अपूर्व करण और अनिवृत्ति करण के काल से कुछ अधिक काल जानना. यह तो पहिले समय में गृहण किया उस दल का निक्षेप करने की विधि बताइ. · यो दुसरे समय से लगा कर अंतिम समय पर्यंत समय २ गृहित दलका भी निक्षेप कर ने की विधि-रीति जाणना. अर्थात्-जो समय २ दलिक गृहण करे वो सब अलग २ अंत मुहूर्त के सब अलग २ समय के दल मिलावे, यों अपूर्व करण के समय अनिति करण के समय अनुक्र में कम होते २ वाकी रहे उन में गुण श्रेणि दलिक का निक्षेप शेष वाकी रहे उस में होवै. उस से आधिक - वहें नहीं. (४) गुण संक्रम का स्वरूपः-जो अपूर्व करण के प्रथम समय में विना वं- धाती ऐसी जो अनंतान वंधि अदिक अशुभ प्रकृति यों है उनका दल वंधती हुइ ऐसी जो संञ्चलादि प्रकृत्ति उस में समय २ में असंख्यात गुण अधिक मिलावै, मिला कर फिर पर प्रणति रूप में परिणमावे, उसे गुण संक्रम कहते हैं. सो पहिले समय सर्व स्तोक (सव से थोडा) संक्रमावे उस से दुसरे समय असंख्यात गुण अधिक संक्र- मात्र, यों ममय २ में असंख्यात गुणाधिक २ वृद्धि पाता हुवा दलका संक्रमण करै. (५) अन्य स्थिति वंध का स्वरूप:-~-अपूर्व करण के पहिले समय में जो कर्म बंध कहा उसकी अपेक्षा से अपूर्व करण के दुसरे समय में जो दुसरा स्थि तिबंध का प्रारंभ करे वो स्तोक (कमी) जाणना. इसलिये इसे अपूर्व स्थिति बंध कहते है. यहां स्थिति बंध और स्थिति बंध का काल बरावर ही जानना. इन दोनों का एकही वक्त प्रारंभ होता है. और एकही वक्त में पूरा करते हैं. यों ऊपारोक्त पांचोंही कामें अपूर्व करण में होते है. है. अनिवृत्ति करण का स्वरूपः-अनिवृति करण में एकही वक्त प्रवेश करने वाले मर जीवोंके प्रथम ममय में एकमाही अव्यवमाय का स्थान होता है. अर्यात्-अपूर्व करण के प्रथम समय में जो जीव वर्तता है और जो पहिले वर्ते हैं औ. र जो आगे को वर्नेगेः उन मवोंका अध्यवमाय स्थानक एकसा-एक रूपीही होता है और प्रयप ममय के अध्यवमाय स्थानक मे दूसरे ममय के अध्यवसाय स्थान अनंत -- " 1- ।

* मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी. २१ गुणे अधिक विशुद्धि लिये होते हैं. यों जितने समय अनिवृत्ति करण के हैं उतने समय के अध्यवसाय स्थानक पीछे के अध्यवसाय स्थानक से आगे के अध्यवसाय स्थानक विशुद्धि की अपेक्षा अनंत गुणें अधिक होते हैं- इसका अनिवृत्ति करण ऐसा नाम देने का मतलब यह है कि-जो इसमें प्रवेश करते हैं. उन सबोके अध्यवसा- य स्थानक का परस्पर निवृत्ति और व्यवृत्ति न होती है. इसकी अपेक्षा से अर्थात्- भेदन होवे सबोंके एकसे अध्यवसाय होवें इसलिये अनिवृत्ति कहा है. यहां समय २ प्रति एकएक अध्यवसाय स्थानक उसके होतेहै उसकी स्थापना मुक्तावलीकी माफिक(०-०-० -०)ऐसी करना. और यहां भी प्रथम समयसे ही स्थिति घातादि पांचोही काम एक ही वक्तमे अपूर्व करणके जैसेही होते हैं. यों अनिवृति करणका असंख्यातवा भाग गये वाद वाकी एक भाग रहे तब अनंतान बंधीकी नीचेकी उदयावली की माव स्थिति को छोड कर वाकी अंतर मुहूर्त प्रमाणसे संक्रमा कर भोगवता है. जैसे मनु. प्य गति मे वाकी की तीनों गति को संक्रमा कर अजोगी केवली भोगवते हैं. उमेही स्तिबुक संक्रम कहते हैं. अन्त करण को अभिनव स्थिति बंध के काल प्रमाणको अंतर मुहूर्त का कहते है. अर्थात् वो अंतर मुहूर्त नवीन स्थिति बंधाद्वा ममा- न जानना. वो अंतकरण के दलिक को उकेर कर पर प्रकृति बंधाती है उसमें संक्रमावे और प्रथम स्थिति का दलिक आवलिका माव मो वेद्यमान उढयावत्ति पर प्रकृत्ति में स्तिबुक संक्रम कर संक्रमावे. x अब अन्तकरण किये वाद दूमरे ममय में अनंतान वंधि की ऊपर की स्थि- तिका दलिया उपशमाना शुरु करे. वो ऐमी तरह कि-पहिले ममय में स्तोक उपग मावे. दुसरे समय उन मे अमंख्यात गुणा उपशमावे. उमे मंक्रमा कर भोगवे. जमे मनुप्यगति मे वाकी की तीनो गति को मंक्रमा कर अयोगी केवली विचरम ममय में भोगवते हैं. तैमे यहां भी जानना यों ममय २ में अमख्यान २ गुण अधिक चढता हुवा उपशम करता हुवा अंतर मुहर्त के अंतिम समय अनंतान वंचिका मर्वदल उपशमित होता है. जैसे धूल के ज को पाणी की बून्दों मे मीच पर बनार्दिक मे कूट २ कर सूक्ष्म-(बारीक.) करे. वो ऐना बारीक करे कि उसे कोट ग्रहण +ो अनुदपी प्रतिमा दन् है उनको दामने है. हानि- कुन स्त्रन नहते है. ܚ 1 २० , प्रथम काण्ड की स्थिति में समय २ में असंख्यातगुण २ चडता हुवा दलिक सक्रमावे - मिलावे. वो ऐसी तरह कि-प्रथम समय स्तोक, उससे दुसरे समय में असंख्यात गुण अधिक, उस से तीसरे समय में असंख्यात गुण अधिक, यों जावत अंतर मुहूर्त के अंतिम स- मय पर्यंत कहना. यह अंतर मुहूर्त अपूर्व करण और अनिवृत्ति करण के काल से कुछ आधिक काल जानना. यह तो पहिले समय में गृहण किया उस दल का निक्षेप करने की विधि बताइ. यों दुसरे समय से लगा कर अंतिम समय पर्यंत समय २ गृहित दलका भी निक्षेप कर ने की विधि-रीति जाणना. अर्थात्-जो समय २ दलिक गृहण करे वो सब अलग २ अंत मुहूर्त के सब अलग • समय के दल में मिलावे, यों अपूर्व करण के समय अनिति करण के समय अनुक्र में कम होते २ वाकी रहे उन में गुण श्रेणि दलिक का निक्षेप शेष वाकी रहे उस में होवै. उस से आधिक - वढें नहीं. (४) गुण संक्रम का स्वरूपः-जो अपूर्व करण के प्रथम समय में विना वं- धाती ऐसी जो अनंतान वंधि अदिक अशुभ प्रकृति यों है उमका दल वंधती हुइ ऐसी जो संज्वलादि प्रकृत्ति उस मे समय २ में असंख्यात गुण अधिक मिलावै, मिला कर फिर पर प्रणति रूप में परिणमावे, उसे गुण संक्रम कहते हैं. सो पहिले समय सर्व स्तोक (सव से थोडा) संक्रमावे उस से दुसरे समय असंख्यात गुण अधिक संक्र- मावै, यों समय २ में असंख्यात गुणाधिक २ बृद्धि पाता हुवा दलका संक्रमण करै. (५) अन्य स्थिति बंध का स्वरूपः-अपूर्व करण के पहिले समय में जो कर्म का स्थिति बंध कहा उसकी अपेक्षा से अपूर्व करण के दुसरे समय में जो दुसरा स्थि ति वंध का प्रारंभ करे वो स्तोक (कमी) जाणना. इसलिये इसे अपूर्व स्थिति वंध कहते है. यहां स्थिति वंध और स्थिति बंध का काल बरोवर ही जानना. इन दोनों का एकही वक्त प्रारंभ होता है. और एकही वक्त में पूरा करते हैं. यों ऊपारोक्त पांचोंही कामें अपूर्व करण में होते हैं. ३. अनिवृत्ति करण का स्वरूपा-अनिवृति करण में एकही वक्त प्रवेश करने वाले सब जीवोंके प्रथम समय में एकसाही अव्यवसाय का स्थान होता है. अर्थात्-अपूर्व करण के प्रथम समय में जो जीव वर्तता है और जो पहिले वर्ते हैं औ- र जो आगे को वर्तगे, उन मयोंका अध्यवसाय स्थानक एकसा-एक रूपीही होता है और प्रयम ममय के अध्यवसाय स्थानक से दूसरे समय के अध्यवसाय स्थान अनंत * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी. ५ २१ गुणे अधिक विशुद्धि लिये होते हैं. यो जितने समय अनिवृत्ति करण के हैं उतने समय के अध्यवसाय स्थानक पीछे के अध्यवसाय स्थानक से आगे के अध्यवसाय स्थानक विशुद्धि की अपेक्षा अनंत गुणें अधिक होते हैं- इसका अनिवृत्ति करण ऐसा नाम देने का मतलब यह है कि-जो इसमें प्रवेश करते हैं. उन सबोके अध्यवसा- य स्थानक का परस्पर निवृत्ति और व्यवृत्ति न होती है. इसकी अपेक्षा से अर्थात्- भेदन होवे सबोंके एकसे अध्यवसाय हो इसलिये अनिवृत्ति कहा है. यहां समय २ प्रति एकएक अध्यवसाय स्थानक उसके होतेहै उसकी स्थापना मुक्तावलीकी माफिक(०-०-० -०)ऐसी करना. और यहां भी प्रथम समयसे ही स्थिति घातादि पांचोही काम एक ही वक्तमें अपूर्व करणके जैसेही होते हैं. यो अनिवृति करणका असंख्यातवा भाग गये वाद वाकी एक भाग रहे तब अनंतान वंधीकी नीचेकी उदयावली की माव स्थिति को छोड कर वाकी अंतर मुहूर्त प्रमाणसे संक्रमा कर भोगवता है. जैसे मनु- प्य गति मे वाकी की तीनों गति को संक्रमा कर अजोगी केवली भोगवते हैं. उसेही स्तिवुक संक्रम कहते है. अन्त करण को अभिनव स्थिति बंध के काल प्रमाणको अंतर मुहूर्त का कहते हैं. अर्थात् अंतर मुहूर्त नवीन स्थिति बंधाद्वा समा- न जानना. वो अंतकरण के दलिक को उकेर कर पर प्रकृति बंधाती है उममें । संक्रमावे और प्रथम स्थिति का दलिक आवलिका मात्र सो वेद्यमान उदयावत्ति पर । प्रकृत्ति में स्तिबुक संक्रम कर संक्रमावे. x अव अन्तकरण किये वाट दूमरे समय में अनंतान वंधि की ऊपर की स्थि- तिका दलिया उपशमाना शुरु करे. वो ऐमी तरह कि-पहिले ममय में स्तोक उपश मावे. दुसरे समय उस मे असंख्यात गुणा उपशमावे. उमे मंक्रमा कर भोगवे. जमे मनुप्यगति मे वाकी की तीनों गति को मंक्रमा कर अयोगी केवली विचरम ममय में भोगवते हैं. तैमे यहां भी जानना. यों ममय २ में अमंख्यात • चढता हुवा उपशम करता हुवा अंतर मुहूर्त के अंतिम ममय अनंतान वधिका मर्वदल उपशमित होता है. जैसे धूल के पुंज को पाणी की बून्दों मे मीच २ कर बनादिक से कूट २ कर सूक्ष्प-(वारीक.) करे. वो ऐना बारीक करे कि उमे कोर ग्रहण +जो अनुदयी प्रकृतिजा दर है उस को उदयायते प्रकृति में मिलते है. उसे ही लि- बुज संकम कहते है. - गुण अधिक में उस से वढें नहीं. २० प्रथम काण्ड की स्थिति में समय २ में असंख्यातगुण २ चढता हुवा दलिक सक्रमावे - मिलावे. वो ऐसी तरह कि-प्रथम समय-स्तोक, उससे दुसरे समय में असंख्यात गुण अधिक, उस से तीसरे समय में असंख्यात गुण अधिक, यों जावत अंतर मुहूर्त के अंतिम स- मय पर्यंत कहना. यह अंतर मुहूर्त अपूर्व करण और अनिवृत्ति करण के काल से कुछ आधिक काल जानना. यह तो पहिले समय में गृहण किया उस दल का निक्षेप करने की विधि बताइ. यों दुसरे समय से लगा कर अंतिम समय पर्यंत समय २ गृहित दलका भी निक्षेप कर ने की विधि-रीति जाणना. अर्थात्-जो समय २ में दलिक गृहण करे वो सब अलग २ अंत मुहूर्त के सब अलग २ समय के दल में मिलावे, यो अपूर्व करण के समय अनिीि करण के समय अनुक्र में कम होते २ वाकी रहे उन गुण श्रेणि दलिक का निक्षेप शेप वाकी रहे उस में होवै. आधिक (४) गुण संक्रम का स्वरूपः-जो अपूर्व करण के प्रथम समय में विना वं- धाती ऐसी जो अनंतान वंधि अदिक अशुभ प्रकृति यों है उनका दल वंधती हुइ ऐसी जो संज्वलादि प्रकृत्ति उस मे समय २ मे असंख्यात गुण अधिक मिलावै, मिला कर फिर पर प्रणति रूप में परिणमावे, उसे गुण संक्रम कहते हैं. सो पहिले समय सर्व स्तोक (सव से थोडा) संक्रमावे उस से दुसरे समय असंख्यात गुण अधिक संक्र- मावै, यों मपय २ में असंख्यात गुणाधिक २ वृद्धि पाता हुवा दलका संक्रमण कर. (५) अन्य स्थिति बंध का स्वरूपः-अपूर्व करण के पहिले समय में जो कर्म का स्थिति बंध कहा उसकी अपेक्षा से अपूर्व करण के दुसरे समय में जो दुसरा स्थि ति वंध का प्रारंभ करे वो स्तोक (कमी) जाणना. इसलिये इसे अपूर्व स्थिति बंध कहते है. यहां स्थिति बंध और स्थिति बंध का काल वरोवर ही जानना. इन दोनों का एकही वक्त प्रारंभ होता है. और एकही वक्त में पूरा करते हैं. यों ऊपारोक्त पांचोंही कामें अपूर्व करण में होते हैं. ३. अनिवृत्ति करण का स्वरूपः-अनिवृति करण में एकही वक्त प्रवेश करने वाले मव जीवोंके प्रथम ममय में एकसाही अध्यवसाय का स्थान होता है. अर्थात्-अपूर्व करण के प्रथम ममय में जो जीव वर्तता है और जो पहिले वर्ते हैं औ- र जो आगे को वर्तगेः उन मवोंका अध्यवमाय स्थानक एकमा-एक रूपीही होता है और प्रयम ममय के अव्यवमाय स्थानक मे दूसरे ममय के अध्यवसाय स्थान अनंत ~ । * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी. ११ २१ । गुणे अधिक विशुद्धि लिये होते हैं. यो जितने समय आनिवृत्ति करण के हैं उतने समय के अध्यवसाय स्थानक पीछे के अध्यवसाय स्थानक से आगे के अध्यवसाय स्थानक विशुद्धि की अपेक्षा अनंत गुणें अधिक होते हैं- इसका अनिवृत्ति करण ऐसा नाम देने का मतलब यह है कि-जो इसमें प्रवेश करते हैं. उन सबोंके अध्यवसा- : य स्थानक का परस्पर निवृत्ति और व्यवृत्ति न होती है. इसकी अपेक्षा से अर्थात्- भेदन होवे सबोंके एकसे अध्यवसाय होवें इसलिये अनिवृत्ति कहा है. यहां समय २ प्रति एकएक अध्यवसाय स्थानक उसके होतेहै उसकी स्थापना मुक्तावलीकी माफिक(० क)ऐसी करना. और यहां भी प्रथम समयसे ही स्थिति घातादि पांचोही काम एक ही वक्तमे अपूर्व करणके जैही होते हैं. यों अनिवृति करणका असंख्यातवा भाग । गये वाद वाकी एक भाग रहे तव अनंतान बंधीकी नीचेकी उदयावली की माव स्थिति को छोड कर वाकी अंतर मुहूर्त प्रमाणसे संक्रमा कर भोगवता है. जैसे मनु- प्य गति में बाकी की तीनों गति को संक्रमा कर अजोगी केवली भोगवते हैं. उसेही स्तिबुक संक्रम कहते है. अन्त करण को अभिनव स्थिति बंध के काल प्रमाणको | अंतर मुहूर्त का कहते हैं. अर्थात् वो अंतर मुहूर्त नवीन स्थिति बंधाद्वा समा- न जानना. वो अंतकरण के दलिक को उकेर कर पर प्रकृति बंधाती है उसमें संक्रमावे और प्रथम स्थिति का दलिक आवलिका माव मो वेद्यमान उदयावत्ति पर प्रकृत्ति में स्तिबुक संक्रम कर भंक्रमावे. x अब अन्तकरण किये वाद दूसरे समय में अनंतान बंधि की ऊपर की स्थि- तिका दलिया उपशमाना शुरु करे. वो ऐमी तरह कि-पहिले समय में स्तोक उपश ; मावे. दुमरे समय उस से असंख्यात गुणा उपशमावे. उमे मंक्रमा कर भोगवे. जैसे । मनुप्यगति में वाकी की तीनों गति को मंक्रमा कर अयोगी केवली विचरम समय में भोगवते है. तैमे यहां भी जानना. यों समय २ में असंख्यात २ गुण अधिक चहता हुवा उपशम करता हुवा अंतर मुहूर्त के अंतिम समय अनंतान वंधिका मर्वदल उपशमित होता है. जैसे धूल के पुंज को पाणी की बून्दों मे मीच २ कर घनाटिक से कूट २ कर मूक्ष्म-(वारीक.) करे. वो ऐमा बारीक करे कि उमे कोड ग्रहण + ले अनुदयी प्रतिमा दल है उस को जयाने प्रकृति में मिलते हैं, उन्हीति- कुन स्कम कहते हैं. . - - २० प्रथम काण्ड की स्थिति में समय २ में असंख्यातगुण २ चडता हुवा दलिक सक्रमावे - भिलावे. वो ऐसी तरह कि-प्रथम समय स्तोक, उससे दुसरे समय में असंख्यात गुण अधिक, उस से तीसरे समय में असंख्यात गुण अधिक, यों जावत अंतर मुहूर्त के अंतिम म- मय पर्यंत कहना. यह अंतर मुहूर्त अपूर्व करण और अनिवृत्ति करण के काल से कुछ आधिक काल जानना. यह तो पहिले समय में गृहण किया उम दल का निक्षेप करने की विधि बताइ. यों दुसरे समय से लगा कर अंतिम समय पर्यंत समय २ गृहित दलका भी निक्षेप कर ने की विधि-रीति जाणना. अर्थात्-जो समय २ में दलिक गृहण करे वो सब अलग • अंत मुहूर्त के सब अलग २. समय के दल में मिलावे, यों अपूर्व करण के समय अनिशी करण के समय अनुक्र में कम होते २ वाकी रहे उन में गुण श्रेण दलिक का निक्षेप शेप वाकी रहे उन में होवै. उस से आधिक - वढें नहीं. (४) गुण संक्रम का स्वरूपः~जो अपूर्व करण के प्रथम समय में विना वं- धाती ऐसी जो अनंतान वंधि अदिक अशुभ प्रकृति यों है उनका दल बंधती हुइ ऐसी जो संज्वलादि प्रकृत्ति उस मे समय २ में असंख्यात गुण आधिक मिलावै, मिला कर फिर पर प्रणति रूप में परिणमावे, उसे गुण संक्रम कहते हैं. सो पहिले समय सर्व स्तोक (सव से थोडा) संक्रमावे उस से दुसरे समय असंख्यात गुण अधिक संक्र- मावै, यों समय २ में असंख्यात गुणाधिक २ वृद्धि पाता हुवा दलका संक्रमण करे. (५) अन्य स्थिति बंध का स्वरूपः-अपूर्व करण के पहिले समय में जो कर्म का स्थिति बंध कहा उसकी अपेक्षा से अपूर्व करण के दुसरे समय में जो दुसरा स्थि ति बंध का प्रारंभ करे वो स्तोक (कमी) जाणना. इसलिये इसे अपूर्व स्थिति बंध कहते है. यहां स्थिति बंध और स्थिति बंध का काल वरावर ही जानना. इन दोनों का एकही वक्त प्रारंभ होता है. और एकही वक्त में पूरा करते हैं. यों उपारोक्त पांचोंही कामे अपूर्व करण में होने हैं. ३. अनिवृत्ति करण का स्वरूपः-निवृति करण में एकही वक्त प्रवेश करने वाले सब जीवोके प्रथम समय में एकसाही अध्यवसाय का स्थान होता है. अर्थात्-अपूर्व करण के प्रथम समय जो जीव वर्तता है और जो पहिले वर्ते हैं और र जो आगे को वर्तेगे: उन सवोंका अध्यवसाय स्थानक एकसा-एक रूपीही होता और प्रथम समय के अध्यवसाय स्थानक से दूसरे समय के अध्यवसाय स्थान अनंत मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी और अब दर्शन मोहनीय विकको उपशमाने की रीति कहते हैं:- मिथ्यात्वकी उपशमना तो मिथ्यात्री के तथा क्षयोपशम सम्यक्त्वी के इन दोनों केही होतीहै, और सम्यक्त्व तथा मिश्र मोहनीय की उपशमना अयोपशम मम्यक्त्ती के ही होती है इसमे मिथ्यात्वी के तो ग्रन्थिभेद करते प्रथप उपशमसम्यक्त्वा की प्राप्ति करने वाले मिच्यात्व की उपशमना जैसे होती है उसकी रीति कहते हैं- कोइ मन्नी पंचन्द्रिय पर्याता करण काल के पहिले अन्तर महूर्त काल पर्यन्त समय २ मे अनन्त गुणाधी गत विशुद्धि मे प्रवर्तता ऐमा अभव्य मौधिक जीवकी विशुद्धि की अपेक्षा अनन्त गुण विशुद्धिवन्त ऐमा मति अज्ञान, श्रुति अज्ञान और विभंगज्ञान इन मे के किसी भी माकार उपयोग युक्त और मनादि तीनो जोगो में से किसी भी जोग युक्त प्रवर्तता जघन्य परिणाम मे तेजुलेश्याम. मध्यम परिणाम में पद्मलेश्या में और उत्कृष्ट परिणाम मे शुक्ललेश्या में प्रवर्तता. मिवाव दृष्टि चागें गतिमे भे किमी भी गति वाला. कुछ कम एक कोडाकोडी मागरोपम की स्थिति मानों कर्माकी वाकी रहे. इत्यादि सर्व पहिले कीही तरह जहां तक यथा मान करण और अपूर्ण । करण यह दोनो मिथ्यात्व उपशमाने को पूर्ण करे तहां तक कहना. परन्तु यहां टन- ना विशेष कि-अपूर्वकरण में गुण मंक्रमण करना नहीं है. फक्त-निविनिधान, ग्मयान मुणश्रेणी. और अन्यस्थिति बन्ध यह चारो कामी प्रथम में प्रारंभ करता है. और गुणश्रेणी दालक रचना भी उदय ममय मे लगाकरही जानाना. और फिर अनिवाने करण में भी ऐमेही कहना. फिर अनिवति करणडा के भयाने भाग गये वाट श्रा- र फक्त एकही संख्यातवा भाग रहे नव निथ्याव की नीचे की प्रथम स्थिति भानना न पन्धि की तरा अन्तर महर्न मात्र नीचे छोड कर. पन अन्तर महर्न गाव अनि- नव स्थिति बन्ध के अन्तर मन जितनी ( पहिती मिति के अन्तार्न मन आधिक ) आभिना निधति के वन्य के चार सी. रोमी निथ्यावत्री अन्नपाडा करे. वो अन्नरस वाला कन्दर को पहले मिति में मिली. श्री- र कल दमी परती मितिमे निवे. वां पहिली मिति: नानीर जाहीरणाग प्रयोग र पथम दिनका दादा वसाईसमा आकर्ष पर दया बलिया में मिले इटीमा बग्ने । और दा दि. नि के ननोर जोजा भयोग द इन दादर सन्दिशा-भोरे. सर और होगा कि दर - २६ A - - . " . प्रथम अर्थ काण्ड का- प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड र तक अप्रत्याख्यानी और प्रत्याख्यानी मान का उपशम न होवे वहांतक मंचल के मान का उदय पावे. ऐसेही संज्वल की माया के उदय में श्रेणी का आरंभ करे उन ! के जहातक अप्रत्याख्यानी और प्रत्याख्यानी माया का उपशम न होवे वहांतक भं- ज्वल की माया का उदय होवे. और ऐभेही भंबल के लोभ के उदय में श्रेणी आ- रंभ करे उस के अप्रत्याख्यानी प्रत्याख्यानी और भंबल के लोभ का उपशप न होवे वहां तक वादर संज्वल के लाभका उदय पावे. यों अपने • उदय काल की अपेक्षा से उस के उदय मे प्रवर्तता श्रेणीका आरंभ करे वो जो कपाय अथवा जो वेद के उदय मे श्रेणी का आरंभ करै वो कपाय अथवा वो वेदका उदय काल थाकता हुवा उस के उतने काल की उतनी प्रथम स्थिति होती है. और दुमरे मब की आवलिका मात्र स्थिति प्रथम स्थिति होती है. यहां जितने काल में स्थिति घात करे तथा दुसरे काल का अब स्थिति बंध करे उत ने काल में अन्त करण भी । करे. यह तीनो ही साथ करे अर्थात् एकही वक्तमे आरंभ करे और एकही वक्तमे पूर्ण- करे. परंतु उसका काल प्रथम स्थिति से असंख्यात गुणा अधिक होता है. अब अंत- करण का दल प्रक्षेपने की विधि लिखते हैं:-जिस प्रकृत्ति का जहा बंध और उदय । दोनो हैं, उस प्रकृत्ति का अंतकरण सत्कदल कुछेकतो प्रथम स्थिति में मिलाना और कुछेक दूसरी स्थिति मे मिलाना. जैसे पुरुष वेद के उदय में श्रेणी का जारंभ करे, उस के पुरुष वेदका बंध होवे और उदयतो हेही, इसलिये पुरुप वेद का अन्त- करण दल दोनों स्थिति में मिलाना. और जिस प्रकृत्ति का उदय तो है परंतु बंध नहीं है. उसका अंतकरण का दल प्रथम स्थिति मेही मिलाना. जैसे-स्त्री वेदका तो उदय है परंतु बंध नहीं है, उस न स्त्रीवेद के उदय मे जो श्रेणी प्रारंभी वो अंतकरण सत्कदल अपनी प्रथम स्थिति मेंही मिलावै. और जिस प्रकृत्ति का जहां उदय नही है, और बंध है. उसका अंतरकरण दल दूसरी स्थिति मे मिलावे परंतु प्रथम स्थिति मे नही मिलावे. जैसे-संज्वल क्रोध के उदय में श्रेणी आरभी वो वाकी तीन संज्वल की कषाय का वध करता है, वो उसका अन्तकरणदल दूसरी स्थिति मे मिलावै. और जिस प्रकृत्ति का बंध तथा उदय दोनो नहीं है, उस का अन्तकरण दल अन्य प्रकृत्ति मे मिलावे. जैसे-दुसरी अप्रत्याख्यानीय और तीसरी प्रत्याख्या- नीय कपाय का अंतकरण दल संज्वल अन्य प्रकृत्ति है उस में मिलावे. यो अंत- रण कियेवाद प्रथम नपुंसक वेदका उपशम करे. वो प्रथम समय मे थोडा दल उपश- * मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अहीनतद्वारी. मावै. दुसरे समय उस से असंख्यात गुणा यो समय २ मे अभख्यात गुणा वधता उ पशमता हुवा अन्तिम समय में सर्व उपशांत होवे. वहां प्रथम समय मे लगाकर द्वि • चरम समय पर्यत जो दल उपसमाया है उस मे अख्यात गुणा दल अन्य प्रकृत्ति में मिलावेः और अंतिम समय में निम प्रकृति में मिलावे उन मे असंख्यात गुण उ- पगमावे. यो नपुंसक वेद उपशमाने मे पहिले की अनंतान बंधेि चौकडी तथा दर्श- न त्रिक इन मातो महित आठो मोहनीय की प्रकृति का उपगांत होवे. फिर ऊप- रोक्त विधि में अंतर मुहून पर्यंत स्त्रीवेदको उपशमावे. फिर हॉस्यादि छेओं प्रकृत्ति योको अन्तर मुहुर्न पर्यन उपशमारे. फिर मत्र माथही मोहनीयकी वाकी रखी १५ प्रकृति का उपमांन होवे. उस वक्त पुरुप वेदका बंध उदय और दीरणा का वि. होवे. और उनकी प्रथम स्थिति का भी विन्छेद होवे. जब पुरुप वेट की प्रथम स्थिति दो आवालि. बाकी रहे पूर्वोक्त आगे न होवे उस वक्त मार्गदल विभपदल हवा इसलिये वहां हांस्यादिक हेओ प्रकृति का दल पुम्प वेद मे नो मिले नही. नय उन हांस्यादि हेओका दल मचल के नोधादिश मे मिन्गवे. यों हांन्यादि देओं प्रकृत्ति उपगमारे बाद एक समय कम दो आवलि पुरुष वेद उपागवे. योभी, प्रथम समय मे मद में थोडा. उस मे दुसरे सम्य असंख्यान गुणा अधिक उपनामावे' यों ममय २ मे अग्यात २ गुणा अश्कि • उपगस्ता हुवा. एक समय कम दा पार- लिका र वहांतक कहना. और कितनाक दर दुसरी प्रकृति में यथा प्रवन भंकन कर नक्रमावे परंतु प्रथम नम्र में विशेष हीन दुसरे समय में मंत्रनारे यां ममय • कम • मंगाना वा शाके पास सन्द कर जायः पनी नन्द पाप वेद का अपमान हुवे दाउ मोहनीय दी १६ मनियोका उपमांन हो। फिर जिस समय होम्यादि हेओ प्रनि का माहौवं. हम मर में पुर. प केकी अपर स्थिति का भय होके ना अपार मानी और भोर अन्या- पानी मोष, नया भवन का मोर इन तीन गोंदी नानी वो प्रवक्तीति ने पालते हुवे जिन इन मंगल री प्रय: नियति मगर दम नीन आंवली बाजी में मल अन्यामनन और प्रयागर्नया न टोने प्रोपावन जल पीन. पनदिन मिलने पोरन वीन विहीसा लीगाई : दिमी भी मनाने का दायरानो होना है. क म मरी जान . .

- 1 २६ * प्रथम अर्थ काण्ड का- प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड ५१ तक अप्रत्याख्यानी और प्रत्याख्यानी मान का उपशम न होवे वहांतक संबल के मान का उदय पावे. ऐसेही संज्वल की माया के उदय में श्रेणी का आरंभ करे उन के जहातक अप्रत्याख्यानी और प्रत्याख्यानी माया का उपगम न होवे वहांतक में- ज्वल की माया का उदय होवे. और ऐसेही भंज्वल के लोभ के उदय में श्रेणी आ- रंभ करे उस के अप्रत्याख्यानी प्रत्याख्यानी और मंज्वल के लोभ का उपशप न ! होवे वहां तक वादर संज्वल के लाभका उदय पावे. यों अपने • उदय काल की । अपेक्षा से उस के उदय मे प्रवर्तता श्रेणीका आरंभ करे वो जो कपाय अथवा जो वेद के उदय में श्रेणी का आरंभ करै वो कपाय अथवा वो वेदका उदय काल थाकता हुवा उस के उतने काल की उतनी प्रथम स्थिति होती है. और दुमरे मव की आवलिका मात्र स्थिति प्रथम स्थिति होती है. यहां जितने काल में स्थिति घात करे तथा दुसरे काल का अन्य स्थिति बंध करे उत ने काल में अन्त करण भी करे. यह तीनो ही साथ करे अर्थात् एकही वक्तमें आरंभ करे और एकही वक्तमें पूर्ण- करे. परंतु उसका काल प्रथम स्थिति से असंख्यात गुणा अधिक होता है. अब अंत- करण का दल प्रक्षेपने की विधि लिखते हैं:-जिस प्रकृत्ति का जहा बंध और उदय दोनो हैं, उस प्रकृत्ति का अंतकरण सत्कदल कुछेकतो प्रथम स्थिति में मिलाना और कुछेक दूसरी स्थिति मे मिलाना. जैसे पुरुप वेद के उदय में श्रेणी का जारंभ करे, उस के पुरुष वेदका बंध होवे और उदयतो हेही, इसलिये पुरुष वेद का अन्त- करण दल दोनों स्थिति में मिलाना. और जिस प्रकृत्ति का उदय तो है परंतु बंध नहीं है. उसका अंतकरण का दल प्रथम स्थिति मेही मिलाना. जैसे-स्त्री वेदका तो उदय है परंतु वंध नहीं है, उस न स्त्रीवेद के उदय में जो श्रेणी प्रारंभी वो अंतकरण सत्कदल अपनी प्रथम स्थिति मेंही मिलावै. और जिस प्रकृत्ति का जहां उदय नहीं है, और वंध है. उसका अंतरकरण दल दूसरी स्थिति में मिलावे परंतु प्रथम स्थिति में नहीं मिलावे. जैसे-संज्वल क्रोध के उदय मे श्रेणी आरभी वो वाकी तीन संज्वल की कपाय का वन्ध करता है, वो उसका अन्तकरणदल दूसरी स्थिति मे मिलावै. और जिस प्रकृत्ति का बंध तथा उदय दोनों नहीं है, उस का अन्तकरण दल अन्य प्रकृत्ति मे मिलावे. जैसे-दुसरी अप्रत्याख्यानीय और तीसरी प्रत्याख्या- नीय कपाय का अंतकरण दल संज्वल अन्य प्रकृत्ति है उस में मिलावे. यो अंत- : रण कियेवाद प्रथम नपुंसक वेदका उपशम करे. वो प्रथम समय में थोड़ा दल उपश- -- * मुक्ति मोपान श्री गुणस्यान रोहण अदीजनहारी.* मावै. दुसरे ममय उस मे असंख्यात गुणा यो समय २ में अभख्यान गुणा वधता उ पशमता हुवा अन्तिम समय मे सर्व उपनांत होवे. वहां प्रथम समय मे लगाकर दि चरम समय पर्यन जो दल उपशमाया है उस मे अख्यान गुणा बल अन्य प्रकृत्ति मे मिलाये और अंतिम समय में जिन प्रकृात्ते में मिलावे उस मे असंख्यात गुण उ- पशावे. यो नपुंसक वेद उपगलाने से पहिले की अनंतान बंधि चौकडी त्या - न त्रिक इन मानों महिल आटो मोहनीय की प्रकृति का उपगांत होवे. फिर ऊप- रोक्त विधि में अंतर मुहूर्न पर्यंत स्त्रीवेडको उपगमावे. फिर हॉम्यादि छेओं प्रवृत्ति योको अन्तर मुहुर्त परेन उपगलावे. फिर मव मायही मोहनीयकी वाकी रही १२ प्रकृति का उपनांत शेवे. उस वक्त पुरुप वेढका बंध उदय और डीपणा का वि. होते. और उनकी प्रथम स्थिति का भी विन्छे हो. जब पुरुष वेद की प्रथम स्थिति को आवलि वाकी रहे पूर्वोक्त आगे नवे उन वक्त नगढ, विभपदल दुवा इनलिये वहां हास्यादिक हेओ प्रकृति का दल पम्प वेट में नो मिरे नहीं. ना उन हास्याहिओका दल रंजन के क्रोधादिक में मिलावे. यों हांयादिओ प्रकृत्ति उपगमाये वाद एक समय कम दो आवति पुग्प वेद सामावे. वोभी, प्रथम समय में मव में थोडा. उम मे दुमरे सभ्य अनन्यात गुणा अधिक. उपसमावे'चों समय - मे अभयान : गुणा अधिक • उपास्ता हुवा. एक समय कम दा भाव- निकाह वतनक करना और कितनाक कर दुनी प्रवृति में यया मतं मंटन कर नमसावे. परंतु प्रथम साम्प मे विनेप हीन दुनो मार मंटनावे. यो मगर कम : मंत्रमता हु अव वाले वसनन्दन गायः देनी नन्द पाप वैद वा पतन हुने पार नीच की १६ प्रनिदान होने फिर जिस समय होम्पादिओ महानि का काम होई. इन मन्त्र में पुर. परवी पर निपनि वा भय हवे. नान्तर अलानी और प्रा. पानी कोष नया मसला बदननीने में गर्म का दो दान निकाले हुई कि इन जारी प्रय-लितपक्ष मकर सनीग कोमीने. मदन अपार माया दोनो गजकर नाटिक दिन. योनी निजी नईहा किसी भी मसाले न ददायर की दी जान २८ प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड. र के दलका समावेश नहीं होता है. और उसकी दो आवली वाकी रहे तव तहां आगे विच्छेद होता है. और एक आवली वाकी रहे तव संज्वलका क्रोध का बंद उदय ऊदीरणा का विच्छेद होता है. और अप्रत्याख्यनी प्रत्याख्यानी क्रोध उपशांव होता है. तव १८ प्रकृत्ति यों का उपशांत होवे. फिर संज्वल क्रोध की प्रथम स्थिति एक आंवलि का कादल और दो आंवलि एक समय कम यहां बंधा जो ऊपरकी स्थिति का दल उसविना सव उपशांत होता है उस के बाद जो संचल के क्रोध का प्रथम स्थिति का एक आंवली का दल सो सं- बल के मान में स्तिवुक संक्रम कर संक्रमावे. और समय कम दो आंवलि का व- न्धका ऊपर की स्थिति का दल सो पुरुप वेद उपशमनाधि कारके प्रस्ताव में उपाव बताया उसही तरह से उपशमावे, तथा अन्य प्रकृत्ति में संक्रमावे. यों समय सम दो आंचलि संचलन क्रोध की ऊपर की स्थिति उसे उपशमावे. यों मोहनीयकी १९ प्रकृत्ति योंका उपशम हुवा. जिस वक्त संज्वल के क्रोधका बन्ध उदय उदीरणा का विच्छेद हुवा, उस ममय से लगाकर संचल के मान की दुसरी स्थिति मे से दलको आकर्प कर उसे प्रथम स्थिति कर वेदे, वहां उदय समय में तो स्तकोक प्रक्षेपता है, और उस से दूसरे समय में असंख्यात गुण अधिक प्रक्षेप करे, यों समय २ असंख्यात गुणा अधिक चडता हुवा प्रक्षेप करे. सो यावत प्रथम स्थिति के अन्तिम समय तक मक्षेप करे, प्रथम स्थिति करण के प्रथम ममय मे लगाकर - अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्याना- । वरण और मंचल इन तीनों मानों को एक साथही उपशमावे. वो वैसेही जिस वक्त मंचल के मान की प्रथम स्थिति समय कम तीन आवली का रहे उस वक्त पहिले क हे मुजवही मंचल के मान में अन्य प्रकृति का पतद ग्रह न होने से उस वक्त प्रत्या- । ख्यानादि मान का दल मंञ्चलकी माया मे मंक्रमात्र, ऐमेही अर्थात् क्रोध की तरह ही मान के उपशमानेकी विधि जानना. यों अप्रत्याख्यानी प्रत्याख्यानी मानको उपशमा तब मोहनीय की २१ प्रकृत्ति का उपशम होता है. के मान के वंघ उदय उठीरणा विच्चेद हुवे बाट संचल के मानकी माफि एक आवलिक में उपशावे. तब २२ प्रकृत्ति उपगमी और जिम समय में मं- के मान का बंध उदय उदीरणा का विच्छेद होये उमके प्रथम मे लगाकर सं. । माया की दुमरी म्यिान में मे दलको आकर्प कर पहिले कहे मुात्र प्रयम . है २९ मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी. १९ स्थिति गत करके वेदे. उसही समय से लगाकर तीनों माया का उपशम करने लगे वोभी मान की तरह एक आवली रहे संचलकी माया का बंध उदय उदीरणा वि- च्छद होवे उस समय अप्रत्याख्यानीय प्रत्याख्यानीय माया उपशांत होवे तब. मोहनीय की २४ प्रकृत्ति यों का उपशांत हुवा. उस वक्त संचल की माया का प्रथम स्थिति गत एक आवली तथा समय कम आवलिकाद्रिक में बंधा हुवा जो उपर की स्थिति गत दलिक उसको छोड कर वाकी रहा सर्व उपशांत होवे. फिर प्रथम स्थिति गत एक आंवालका को स्तिबुक संक्रम कर संबल के लोभ मे संक्रमावे. और समय कम दो आवालिका बंधे हुवे द- लिक को पुरुष वेदमें उपर कहे मुजवही उपशमावे, यो संक्रमावे. फिर समय कम दो आवालिका संचल की माया उपशांत होवे तब मोहकी २५ प्रकृत्ति का उपशांत हुवा. जिस वक्त संचल की माया का बंध उदय उदीरणा का विच्छेद हुवा तदनं- तर दुसरे समय में ही संचल के लोभ की दुसरी स्थिति में से दलका आकर्पन कर प्रथम स्थिति को रचे उस प्रथम स्थिति लोभ वेदनाद्वा के तीन विभाग दो प्रमाण से करे-उस में प्रथम विभाग का नाम - अधकरणाद्वा और दूसरे विभाग का नाम - किट्टि करणाद्वा. प्रथम अश्वकरणाद्वा विभाग में वर्तता आत्मा पूर्व स्पर्दक में से दल गृह- ण कर अपूर्व स्पर्द्धक करें. उस स्पर्द्दकी उपरकी वर्गणा के रस विभाग से एक रस विभाग ज्यादा या दो रस विभाग ज्यादा. रस विभाग सहित यों जावत सव जीवों से अनंतगुणा पर्यंत से एक रस विभाग कम रसोपेत कर्म स्कंध दल नही मिलता है. * स्पर्द्धक का स्वल्प-जीव अनन्त कर्म प्रमाणु से निष्पन्न स्कन्ध उसे कर्म पणे गृहण करता है, वहां एकेक कर्म स्कन्ध में जो सबसे जघन्य रस है उस के दो विभागकी केवल ज्ञानी भी कल्पना नहीं कर सकें. ऐसा बारीक छेदता हुआ सब जीवों को रस ना विभाग देता है. और ऐसेही बरोबरी के जवन्य रस के कर्म स्कन्ध दल उसका समुदाय उसे वर्गगा कहते हैं, उस से एक रस विभाग चडता कर्म स्कन्ध की दूसरी वर्गणा. उस से दो रस विभाग चडते कर्म स्कन्धकी तीसरी वर्गणा. यों एकेके रस विभाग चडनी २ वर्गगा करता अभय से अनन्त गुणी अधिक और सिद्ध से अनन्त गुणहीन प्रमाण वर्गणा का सा मुदाय उसे स्पर्क कहते है. -- २८ के प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड. १९ दलका समावेश नहीं होता हैं. और उसकी दो आवली वाकी रहे तव तहां आगे विच्छेद होता है. और एक आवली वाकी रहे तव संज्वलका क्रोध का वंद उदय ऊदीरणा का विच्छेद होता है. और अप्रत्याख्यनी प्रत्याख्यानी क्रोध उपशांत होता है. तव १८ प्रकृत्ति यों का उपशांत होवे. फिर संज्वल क्रोध की प्रथम स्थिति एक आंवलि का काढल और दो आंवलि एक समय कम यहां बंधा जो ऊपरकी स्थिति का दल उसविना मव उपशांत होता है उस के बाद जो संचल के क्रोध का प्रथम स्थिति का एक आंवली का दल सो सं- खल के मान में स्तिबुक संक्रम कर संक्रमावे. और समय कम दो आंवलि का व- न्धका ऊपर की स्थिति का दल सो पुरुप वेद उपशमनाधि करिके प्रस्ताव मे उपाव बताया उसही तरह से उपशमावे, तथा अन्य प्रकृत्ति में संक्रमावे. यो समय सम दो आंवलि संज्वलन क्रोध की ऊपर की स्थिति उसे उपशमावे. यों मोहनीयकी १९ प्रकृत्ति योंका उपशम हुवा. जिस वक्त संज्वल के क्रोधका वन्ध उदय उदीरणा का विच्छेद हुवा, उस समय से लगाकर संचल के मान की दुसरी स्थिति मे से दलको आकर्ष कर उसे प्रथम स्थिति कर वेदे, वहां उदय समय में तो स्तकोक प्रक्षेपता है, और उस से दूसरे समय में असंख्यात गुण अधिक प्रक्षेप करे, यो समय २ असंख्यात गुणा अधिक चडता हुवा प्रक्षेप करे. सो यावत प्रथम स्थिति के अन्तिम समय तक प्रक्षेप करे, प्रथम स्थिति करण के प्रथम समय से लगाकर - अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्याना- वरण और संञ्चल इन तीनों मानो को एक साथही उपशमावे. वो वैसेही जिस वक्त संज्वल के मान की प्रथम स्थिति समय कम तीन आवली का रहे उस वक्त पाहिले क हे मुजवही संज्वल के मान मे अन्य प्रकृति का पतद ग्रह न होने से उस वक्त प्रत्या- ख्यानादि मान का दल संज्वलकी माया मे संक्रमावै, ऐसेही अर्थात् क्रोध की तरह ही मान के उपशमानेकी विधि जानना. यो अप्रत्याख्यानी भत्याख्यानी मानको उपशमा वे तव मोहनीय की २१ प्रकृत्ति का उपशम होता है. संचल के मान के वंघ उदय उदीरणा विच्चेद हुवे वाद संचल के मानकी माफि एक आवलिक मे उपशमीवे. तव २२ प्रकृत्ति उपशमी और जिस समय में सं- के मान का बंध उदय उदीरणा का विच्छेद होये उसके प्रथम से लगाकर सं- माया की दुसरी स्थिति में से दलको आकर्प कर पहिले कहे मुझव प्रथम मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी. १९ २९ स्थिति गत करके वेदे. उसही समय से लगाकर तीनों माया का उपशम करने लगे वोभी मान की तरह एक आवली रहे संघलकी माया का बंध उदय उदीरणा वि- च्छद होवे उस समय अप्रत्याख्यानीय प्रत्याख्यानीय माया उपशांत होवे तब. मोहनीय की २४ प्रकृत्ति यों का उपशांत हुवा. उस वक्त संबल की माया का प्रथम स्थिति गत एक आवली तथा समय कम आवलिकादिक में बंधा हुवा जो उपर की स्थिति गत दलिक उसको छोड कर वाकी रहा सर्व उपशांत होये. फिर प्रथम स्थिति गत एक आंवलिका को स्तिबुक संक्रम कर संचल के लोभ में संक्रमावे. और समय कम दो आवलिका बंधे हुवे द- लिक को पुरुष वेदमें उपर कहे मुजवही उपशमावे, यो संक्रमावे. फिर समय कम दो आवलिका संबल की माया उपशांत हो तब मोहकी २५ प्रकृत्ति का उपशांत हुवा. जिस वक्त संबल की माया का बंध उदय उदीरणा का विच्छेद हुवा तदनं- तर दुसरे समय में ही संञ्चल के लोभ की दुसरी स्थिति में से दलका आकर्पन कर प्रथम स्थिति को रचे उस प्रथम स्थिति लोभ वेदनाद्वा के तीन विभाग दो प्रमाण से करे—उस में प्रथम विभाग का नाम - अधकरणाद्वा और दूसरे विभाग का नाम - किट्टि करणाद्वा. प्रथम अश्वकरणाद्वा विभाग में वर्तता आत्मा पूर्व स्पर्द्धक : में से दल गृह- ण कर अपूर्व स्पर्द्धक करें. उस स्पईकी उपरकी वर्गणा के रस विभाग से एक रस विभाग ज्यादा या दो रस विभाग ज्यादा. रस विभाग सहित यों जावत सव जीवों से अनंतगुणा पर्यंत से एक रस विभाग कम रसोपत कर्म स्कंध दल नहीं मिलता है. ’ पई का स्वल्पजीव अनन्त गर्न प्रमाणु से निष्पन्न स्कन्ध उसे कर्म पगें गृहण करता है. व्हां एकेन नन स्कन्ध में जो सबसे जघन्य रस है उस के दो विभागकी केवल ज्ञानी भी कल्पना नहीं कर तनें. ऐसा बारीक छेडता हुवा तत्र जीरों को रस ना विनाग देता है. और ऐतेही बरोबरी के जवन्य रस के कर्म स्कन्ध दल उस्मा स्मुदाय उसे वर्गगा कहते हैं. उस से एज रस विभाग चडना नर्म रूध नी दूसरी वर्गा. उस से दो रन विभाग पडते नर्म रूपनी तीसरी वर्गा. यों एक रस निग चडनी २ वर्गमा करता अनन्य से अनन्त गुणी आर्थिक और स्टि से अनन्त गुणहीन प्रमाण वर्गणा काम मुनाप उसे हर्क कहते हैं.

२८ * प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड. १ के दलका समावेश नहीं होता हैं. और उसकी दो आवली वाकी रहे तव तहां आगे विच्छेद होता है. और एक आवली वाकी रहे तव संज्वलका क्रोध का बंद उदय ऊदीरणा का विच्छेद होता है. और अप्रत्याख्यनी प्रत्याख्यानी क्रोध उपशांत होता है. तब १८ प्रकृत्ति यों का उपशांत होवे. फिर संज्वल क्रोध की प्रथम स्थिति एक आंवलि का कादल और दो आंवलि एक समय कम यहां बंधा जो ऊपरकी स्थिति का दल उसविना सब उपशांत होता है उस के बाद जो संचल के क्रोध का प्रथम स्थिति का एक आंवली का दल सो सं- बल के मान मे स्तिबुक संक्रम कर संक्रमावे. और समय कम दो आंवलि का ब- न्धका ऊपर की स्थिति का दल सो पुरुप वेद उपशमनाधि करिके प्रस्ताव मे उपाव वताया उसही तरह से उपशमा, तथा अन्य प्रकृत्ति में संक्रमावे. यों समय सम दो आंवलि संज्वलन क्रोध की ऊपर की स्थिति उसे उपशमावे. यों मोहनीयकी १९ प्रकृत्ति योंका उपशम हुवा. जिस वक्त संज्वल के क्रोधका वन्ध उदय उदीरणा का विच्छेद हुवा, उस समय से लगाकर संञ्चल के मान की दुसरी स्थिति में से दलको आकर्ष कर उसे । प्रथम स्थिति कर वेदे, वहां उदय समय में तो स्तकोक प्रक्षेपता है, और उस से दूसरे ममय में अमंख्यात गुण अधिक प्रक्षेप करे, यों समय २ असंख्यात गुणा अधिक चडता हुवा प्रक्षेप करे. सो यावत प्रथम स्थिति के अन्तिम समय तक प्रक्षेप करे, प्रथम स्थिति करण के प्रथम समय से लगाकर - अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्याना- वरण और संञ्चल इन तीनों मानों को एक साथही उपशमावे. वो वैसेही जिस वक्त मंचल के मान की प्रथम स्थिति ममय कम तीन आवली का रहे उस वक्त पाहिले क हे मुजवही मंचल के मान में अन्य प्रकृति का पतद ग्रह न होने से उस वक्त प्रत्या- । ख्यानादि मान का दल मंचलकी माया मे मंक्रमांव, ऐमेही अर्थात् क्रोध की तरह ही मान के उपशमानेकी विधि जानना. यों अप्रत्याख्यानी प्रत्याख्यानी मानको उपशमा वे नव मोहनीय की २१ प्रकृति का उपशम होता है. मंचर के मान के बंध उदय उटीरणा विच्चेद हुवे बाद मंचल के मानकी माफि मी एक भावनिक में उपशावे. तब २२ प्रकृत्ति उपगमी और जिस समय में मं. के मान का बंध उदय उदीरणा का विच्छेद होये उसके प्रथम मे लगाकर सं- की मया की दुसरी स्थिति में मे दलको आकर्प कर पहिले कहे मुअब प्रथम STAR * मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी. * स्थिति गत करके वेदे. उसही समय से लगाकर तीनों माया का उपशम करने लगे वोभी मान की तरह एक आवली रहे संञ्चलकी माया का बंध उदय उदीरणा वि- च्छद होवे उस समय अप्रत्याख्यानीय प्रत्याख्यानीय माया उपशांत होवे तब. मोहनीय की २४ प्रकृत्ति यों का उपशांत हुवा. उस वक्त संचल की माया का प्रथम स्थिति गत एक आवली तथा समय कम आवलिकाद्रिक में बंधा हुवा जो उपर की स्थिति गत दलिक उसको छोड कर वाकी रहा सर्व उपशांत होवे. फिर प्रथम स्थिति गत एक आंवालका को स्तिबुक संक्रम कर संचल के लोभ मे संक्रमावे. और समय कम दो आवलिका बंधे हुवे द- लिक को पुरुष वेदमें उपर कहे मुजवही उपशमावे, यो संक्रमावे. फिर समय कम दो आवलिका संचल की माया उपशांत होवे तब मोहकी २५ प्रकृत्ति का उपशांत हुवा. जिस वक्त संबल की माया का बंध उदय उदीरणा का विच्छेद हुवा तदनं- तर दुसरे समय में ही संञ्चल के लोभ की दुसरी स्थिति में से दलका आकर्पन कर प्रथम स्थिति को रचे उस प्रथम स्थिति लोभ वेदनाद्वा के तीन विभाग दो प्रमाण से करे-उस मे प्रथम विभाग का नाम - अश्वकरणाद्वा और दूसरे विभाग का नाम - किट्टि करणाद्वा. प्रथम अश्वकरणाद्वा विभाग में वर्तता आत्मा पूर्व स्पर्दक : में से दल गृह- ण कर अपूर्व स्पर्द्धक करें. उस स्पईकी उपरकी वगणा के रस विभाग से एक रस विभाग ज्यादा या दो रस विभाग ज्यादा. रस विभाग सहित यों जावत सब जीवों से अनंतगुणा पर्यंत से एक रस विभाग कम रसोपेत कर्म स्कंध दल नहीं मिलता है. * स्पर्धक का स्वल्प-जीव अनन्त कर्म प्रमाणु से निष्पन्न स्कन्ध उसे कर्म पगें गृहण करता है. वहां एकेन कर्न स्कन्ध में जो सबसे जवन्य रस है उस के दो विभागकी केवल ज्ञानी भी कल्पना नहीं कर सकें. ऐसा बारीक छेदता हुवा सब जी को रस का विभाग देता है. और ऐसेही बरोबरी के जवन्य रस के कर्म स्कन्ध दल उत्तका स्नुढाप उसे वगंगा कहते हैं. उत्त से एक रस विभाग चडना नर्म स्कन्ध को दूसरी वर्गणा. उस ते दो रन विभाग चडते कर्म स्कन्धनी तीसरी वर्गणा. यो एक रस विभाग चडी २ वर्गमा करता अभय से अनन्त गुणी आधिक और सिद्ध से अनन्त गुणहीन प्राण वर्गणा का सा मुदाय उते सद्धर्क कहते है.

२८ * प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड. ११ के दलका समावेश नहीं होता हैं. और उसकी दो आवली वाकी रहे तव तहां आगे विच्छेद होता है. और एक आवली वाकी रहे तव संज्वलका क्रोध का वंद उदय उदीरणा का विच्छेद होता है. और अप्रत्याख्यनी प्रत्याख्यानी क्रोध उपशांव होता है. तब १८ प्रकृत्ति यों का उपशांत होवे. फिर संज्वल क्रोध की प्रथम स्थिति एक आंवलि का कादल और दो आंवलि एक समय कम यहां बंधा जो ऊपरकी स्थिति का दल उसविना सब उपशांत होता है उस के वाद जो संज्वल के क्रोध का प्रथम स्थिति का एक आंवली का ढल सो सं- ज्वल के मान में स्तिवुक संक्रम कर संक्रमावे. और समय कम दो आंवलि का व- न्धका ऊपर की स्थिति का दल सो पुरुप वेद उपशमनाधि कारके प्रस्ताव में उपाव वताया उसही तरह से उपशमावे, तथा अन्य प्रकृत्ति मे संक्रमावे. यों समय सम दो आंवलि संज्वलन क्रोध की ऊपर की स्थिति उसे उपशमावे. यों मोहनीयकी १९ प्रकृत्ति योंका उपशम हुवा. जिस वक्त संज्वल के क्रोधका वन्ध उदय उदीरणा का विच्छेद हुवा, उस समय से लगाकर संचल के मान की दुसरी स्थिति में से दलको आकर्ष कर उसे प्रथम स्थिति कर वेदे, वहां उदय समय मे तो स्तकोक प्रक्षेपता है, और उस से दूसरे समय में असंख्यात गुण अधिक प्रक्षेप करे, यों समय २ असंख्यात गुणा अधिक चडता हुवा प्रक्षेप करे. सो यावत प्रथम स्थिति के अन्तिम समय तक प्रक्षेप करे, प्रथम स्थिति करण के प्रथम समय से लगाकर - अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्याना- वरण और संञ्चल इन तीनो मानों को एक साथही उपशमावे. वो वैसेही जिस वक्त संज्वल के मान की प्रथम स्थिति समय कम तीन आवली का रहे उस वक्त पाहिले क हे मुजवही संज्वल के मान में अन्य प्रकृति का पतद ग्रह न होने से उस वक्त प्रत्या- ख्यानादि मान का दल संञ्चलकी माया मे संक्रमावै, ऐसेही अर्थात् क्रोध की तरह ही मान के उपशमानेकी विधि जानना. यो अपत्याख्यानी प्रत्याख्यानी मानको उपशमा वे तब मोहनीय की २१ प्रकृत्ति का उपशम होता है. संचल के मान के वंघ उदय उदीरणा विच्चेद हुवे वाद संचल के मानकी माफि एक आवलिक मे उपशमीवे. तव २२ प्रकृत्ति उपशमी और जिस समय मे सं- के मान का बंध उदय उदीरणा का विच्छेद होथे उसके प्रथम से लगाकर सं- माया की दुसरी स्थिति में से दलको आकर्प कर पहिले कहे मुझव प्रथम * मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अहीयतद्वारी. २९ स्थिति गत करके वेदे. उसही समय से लगाकर तीनों माया का उपशम करने लगे चोभी मान की तरह एक आवली रहे संचलकी माया का बंध उदय उदारणा वि- च्छद होवे उस समय अप्रत्याख्यानीय प्रत्याख्यानीय माया उपशांत होने तव. मोहनीय की २४ प्रकृत्ति यों का उपशांत हुवा. उस वक्त संघल की माया का प्रथम स्थिति गत एक आवली तथा समय कम आवलिकाद्विक में बंधा हुवा जो उपर की स्थिति गत दलिक उसको छोड कर वाकी रहा सर्व उपशांत होवे. फिर प्रथम स्थिति गत एक आंवलिका को स्तिबुक संक्रम कर संचल के लोभ में संक्रमावे. और समय कम दो आवलिका बंधे हुवे द- लिक को पुरुष वेदमें उपर कहे मुजवही उपशमावे, यों संक्रमावे. फिर समय कम दो आवलिका संचल की माया उपशांत होवे तव मोहकी २५ प्रकृत्ति का उपशांत हुवा. जिस वक्त संज्वल की माया का बंध उदय उदीरणा का विश्छेद हुवा तदनं- तर दुसरे समय में ही संचल के लोभ की दुमरी स्थिति में में दलका आकर्पन कर प्रथम स्थिति को रचे उस प्रथम स्थिति लोभ वेदनाद्वा के तीन विभाग दो प्रमाण से करे-उस मे प्रथम विभाग का नाम - अश्वकरणाद्वा और दृमरे विभाग का नाम - किहि करणाद्वा. प्रथम अश्वकरणाद्वा विभाग में वर्तता आत्मा पूर्व स्पर्द्धक में मे दल गृह- ण कर अपूर्व स्पर्द्धक करे. उस स्पर्द्दकी उपरकी वर्गणा के रम विभाग मे एक रम विभाग ज्यादा या दो रम विभाग ज्यादा. रस विभाग महिन यों जावन मव जीवों से अनंतगुणा पर्यंत से एक रम विभाग कम रमोपेत कर्म स्कंध दल नहीं मिलता है. स्पर्शक का स्वरूप व अनन्त कर्म प्रमाणु मे निम्पन्न जन्य उने पट करता है. व्हा एजेन स्वन्ध में कोदने वन्य म है उसके दो दिन भनी भी कल्पन्न नहीं कर सकें. ऐन वर्गक हेदना कन्द देवानेही रोदरी के पन्य स ज बन्द दल नुदायक करते हैं, उसमे जलगि महल म बन्द दृ . मम कलमब अनल गुनी ककरहित मान साप मेल्स बदले है. --- २८ * प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड. के दलका समावेश नहीं होता हैं. और उसकी दो आवली वाकी रहे तब तहां आगे विच्छेद होता है. और एक आवली वाकी रहे तव संज्वलका क्रोध का बंद उदय ऊदीरणा का विच्छेद होता है. और अप्रत्याख्यनी प्रत्याख्यानी क्रोध उपशांव होता है. तब २८ प्रकृत्ति यों का उपशांत होवे. फिर संज्वल क्रोध की प्रथम स्थिति एक आंवलि का कादल और दो आंवलि एक समय कम यहां बंधा जो ऊपरकी स्थिति का दल उसविना सव उपशांत होता है उम के बाद जो संज्वल के क्रोध का प्रथम स्थिति का एक आंवली का दल सो सं- बल के मान में स्तिबुक संक्रम कर संक्रमावे. और समय कम दो आंवलि का व- न्धका ऊपर की स्थिति का दल सो पुरुप वेद उपशमनाधि कारके प्रस्ताव में उपाव बताया उमही तरह से उपशमाये, तथा अन्य प्रकृत्ति में संक्रमावे. यों समय सम दो आंचलि भखलन क्रोध की ऊपर की स्थिति उसे उपशमावे. यों मोहनीयकी १९ प्रकृत्ति योंका उपशम हुवा. जिस वक्त संचल के क्रोधका वन्ध उदय उदीरणा का विच्छेद हुवा, उस ममय से लगाकर संचल के मान की दुसरी स्थिति मे से दलको आकर्ष कर उसे प्रथम स्थिति कर वेदे, वहां उदय समय मे तो स्तकोक प्रक्षेपता है, और उस से दूसरे ममय में अमंख्यात गुण अधिक प्रक्षेप करे, यों समय २ असंख्यात गुणा अधिक चडता हुवा प्रक्षेप करे. मो यावत प्रथम स्थिति के अन्तिम समय तक प्रक्षेप करे, प्रथम स्थिति करण के प्रथम ममय मे लगाकर - अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्याना- वरण और मंचल इन तीनों मानों को एक साथही उपशमावे. वो वैसेही जिस वक्त मंचल के मान की प्रथम स्थिति ममय कम तीन आवली का रहे उम वक्त पहिले क हे मजकी मंबल के मान में अन्य प्रकृति का पतद ग्रह न होने से उस वक्त प्रत्या- । न्यानादि मान का दल मंञ्चलकी माया मे मंक्रमावै, ऐमेही अर्थात् क्रोध की तरह ही मान के उपशमानेकी विधि जानना. यों अप्रत्याग्यानी प्रत्याख्यानी मानको उपशमा वे नव मोहनीय की २१ प्रकृत्ति का उपशम होता है. मंबल के मान के वंघ उदय उदीरणा विच्चेट हुवे बाद मंचल के मानकी माफि कही एक प्रावलिक में उपशावे. तब २२ प्रकृत्ति उपदामी और जिस समय में मं- ! मन के मान का बंध उदय उठीरणा का विच्छेद होये उसके प्रथम मे लगाकर मं- अमकी माया की दुमरी स्थिति में मे दलको आकर्ष कर पहिले कहे मुनव प्रयम 1-~- -- " .

* मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी. शमावे. अन्तिम समय में संज्वल के लोभ का उपशांत होवे, उसही वक्त-५ झानावर- णीय की ५ अंतराय की. ४ दर्शनावरणीय की, उँच गौव और यशः कीर्ति इन१६ प्रकृत्ति यों के बंधका व्यवउद करे. उस वक्त वाद दुसरेही समय में उन महात्मा ओंको उपशांत कपायी कहे जाते हैं क्यों कि यहां ही मोहनीय की सर्व २८ही प्रकृ त्तियोंका सर्वतः उपशांत होता है. वो उपशांत कपायी महात्मा जघन्य से तो एक समय ही रहै, और उत्कृष्ट अंतर मुहूर्त पर्यत रहै. फिर तो जरूरही पतन को प्राप्त होते हैं. वो पतन दो तरह से होता हैः- एक भव से और दुसरा काल से. (१) जिसका आयु पूर्ण होजावें उसवक्त मनुप्य भवका भय होने से मरकर अनुत्तर विमान में देवता होवे. वहां प्रथम समय मेंही बंध सक्रमणादी आगे कारणों फिर उदय प्रवावे. वो मीधाही इग्यारवे गुणस्यान से चौये गुणस्थान परही आकर ठेहरता है. परंतु बीच में के गुणस्थानाको विलकुलही स्पर्शता नहीं है. और उपशम सम्यक्त्वसे पडकर उसही समयमें वेदेक सम्यक्त्ती होताहै. सोभव क्षय पडवाइ जानना- और (२) इग्यारवे गुणस्थान का जो अंतर मुहूर्त का काल है सो पूर्ण भोग कर उ- पर जाने के रस्ते के अभाव से वो वहां से पीछे पडे, हो जहां २ बंध उदय उदीर. णा की प्रकृत्ति का व्यवच्छेद हुवा है तहार से पीछा करता जिस तरह से चडेये वै सीही तरह पीछा पडे, वो पडते हुवे कोइ प्रमत होवे, कोइ अविरति होवे और कोइ- सास्वदानी होकर मिथ्यात्व में भी आते हैं. यह उपशम श्रेणी एक भव में उत्कृष्ट दो वक्त करते हैं, परंतु जो दो वक्त उपशम श्रेणी करते हैं वो निश्चय से उम भव में क्षपक श्रेणी नहीं करते हैं. परंतु ए क वक्त उपशम श्रेणी कर दुसरी वक्त भपक श्रेणी करलेवें तो कुछ ना नहीं है.

३२ प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड. क्षपक श्रेणी. क्षपक श्रेणी में प्रवर्त ने वाले महात्मा मनुष्य की-आठ वर्ष से अधिक उम्मर, वज वृप नारच संघयण, शुद्ध ध्यान वंत, अविरति-देश विरति-प्रमत संयति अप्रमत संयती इन में से कोई भी होवो, परंतु इतना विशेप कि-जो केवल अप्रमत संयति ही होवेतो पूर्वके जानकर होवे, और शुक्ल ध्यान उपगत होवे. और दुसरे सब धर्म ध्यान उपगत होते हैं. ऐसे जीव शुभ योगमें वर्तते क्षपक श्रेणीका आरंभ करते हैं. वो प्रथम अनंतान वंधि चौककी विसंयोजना कर खपावे, इस विसंयोजना करनेकी विधि पहिले कह आये हैं वैसेही जाणना तदनंतस्-तीनों मोहनीयको क्षपाने प्रवर्त होवे. वहां यथा प्रत्ति आ- दि तीनों करणों पहिले कहे वैसीही तरहसे करे. परंतु इतना विशेप जो अपूर्व करण के पहिले समय मेही अनुदिन मिथ्यात्व और मिश्रका दल वो उदय वन्त सम्यक्त्व मोहनीय में गुण संक्रमण कर संक्रमावे, और उन दोनों का उद्बल अर्थात् संक्रमण करना शुरु करे. उस वक्त प्रथमतो बडे २ जो स्थिति खण्ड हैं उन्हकों उबेले. उस से दुसरा स्थिति खण्ड बहुत कम उवेले. उस से भी तीसरा बहुत कम उवेळे यों अपूर्व करण के अंतिम समय पर्यत उवेलना करे. इम में जो अपूर्व करण के पहिले समय जो स्थि- नि का मत्तावन्त होवे उस से असंख्यात गुण कम स्थिति का सत्तावंत होवे. तदन्तर दुमरे समय में अनिटति करण में प्रवेश करे, वहां भी स्थिति घात आदि मर्व पूर्वोक्त विवि प्रमाणे ही कर ते हैं. अनिटत्ति करण के प्रथम समय में दर्शन त्रिक का भी देशोपशमना निदति निकाचनाका व्यवच्छेद करे; वहां प्रथम समय मे दर्शन मोहनीय विककी स्थिति मत्ताका घात करता २ महों गम स्थिति खण्ड गये वाद, वाकी जिम वक्त अमन्त्री पचेन्द्रिय की स्थिति सत्ता मामन स्थिति रहे. फिर उतनेही स्थिति बण्ड के महधों गम गये बाद चारिन्द्रिय की स्थिति ममान मना रह, फिर उतनेही स्थिनि ग्वण्डके महयों गम गये वाद, तेन्द्रिय की स्थिति म- मान मत्ता रहे, फिर उतने ही स्थिति खण्ड के महनों गम गये बाद बेन्द्रिय की थिनि जितनी मत्ता रहे. फिर भी उननेही स्थिति पण्ड के महों गये वाद पल्यो- पन के अमंग्यानवे भाग प्रमाणे दर्शन विक की स्थिति सत्ता रहै, तदन्तर तीनो द. शन गेहनीय का भी प्रत्येक एकेक मंग्व्यातवा भाग छोड कर वाकी की मर्व स्थिति मगार तदन्नर फिर भी पाकी छोडा हुवा भख्यान भाग का एक संख्यात वा भाग * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अदीशतद्वारी. *र छोडकर वाकीकी सर्व स्थिति की घात करता २ स्थिति घात के बहुत सहश्र अति- क्रमें उसवक्त मिथ्यात्व के असख्यात भाग का सन्डन करे और मिश्र मोह तथा स म्यक्त्व मोह का संख्यातवा भाग का खण्डन करे. उस के वाद यों बहुत स्थिति खण्ड गये वाद, जिसवक्त मिथ्याल का दल आंवलिका माव रहे, और मिश्र मोह तथा सम्यक्त्व मोह का दल पल्योपमके असंख्यातवे भाग प्रमाणेही रहता है. अब स्थिति खण्ड के दल को खण्डन करने की प्रत्येक विधि कहते हैं :- रखण्डन किये हुवे ऐसे मिथ्यात्व के दल उनका मिश्र और सम्यक्त्व दोनों में प्रक्षेप करे. और मिश्रका दलतो फक्त सम्यक्त्व मेही प्रक्षेप करे, और सम्यक्त्व का दल सम्यक्त्व अपने नीचे की स्थिति में प्रक्षेप करे, उसके बाद जो मिथ्यात्व का दल आवालि मात्र रहा है. उस भी स्तिबुक संक्रम कर सम्यक्त्व में संक्रमावे. तब मिथ्या- त्व क्षीण होवे. उसके बाद मिश्र का तथा सम्यक्त्व का असंख्याते भाग कर के उस के खण्डमे वाकी एक भाग रक्खे. फिर उस के भी असंख्यात भाग कर एक भाग वाकी रक्वे. और सवों का खण्डन करे. यो कर ते २ कितनेक स्थिति खण्ड गये वाद, मिश्र मोहनीय एक आवलिका माव रहै, उस वक्त सम्यक्त्व मोहनीय की स्थि ति सत्ता आठ वर्ष प्रमाण की रहे उस वक्त निश्चय नय के मत से तो सर्व विघ्नोका नाश हो गया ! इसलिये इसे दर्शन मोहनीय का क्षपक (भायिक) सम्यक्त्वी) कहना तदनन्तर-फिर भी सम्यक्त्व के स्थिति खण्ड को अंतर मुहूर्त प्रमाण उकेरे उसका दल उदय समय से आरंभ कर सर्व स्थिति सत्ता समय २ संक्रमावे, उस में भी उदय समय सब से थोडी संक्रमावे. उस से दुसरे समय असंख्यात गुण अधिक उस से तीसरे समय असंख्यात गुण अधिक, यो समय २ असंख्यात गुण आधिक २ संक्रमाता २ इस गुण श्रेणी के मस्तक पर्यंत जाणना. उसके बाद ऊपर तो वि- शेप २ हीन जहां लग स्थिति का अंतिम समय होवे वहां लग मंक्रमावै, यों अंतर मुहूर्त २ प्रमाण अनेक स्थिति खण्डों को उकेरता है. और निक्षेपण भी करना है, वो स्थिति दल में संक्रमाता द्विचरम स्थिति खण्ड पर्यंत जावे. उम द्वीचरम स्थिति खण्ड से अन्तिम खंड असंख्यात गुणा करेः वो अन्तिम स्थिति खण्ड जिम वक्त उकेरे उसे भपक कृत करण ऐमा नाम कहना. उम कृत करणाद्वा में बता ऐमा जीव. किमी पूर्व आयुका बंध किया होतो वो आयु भय हुवे मरकर चागें गति में की कि- सी भी गति में अवतार लेलेता है. और लेण्या के विपे पहिले नो शुक्र लेण्या में था ३४ * प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोणह खण्ड * और वर्तमान में तो अन्य हलकी लेश्या में जावे, इसलिये सप्तक क्षय का शुरु करने वाला प्रस्थापक होकर मनुष्य निष्टापक होता भी चारों गति में का जीव कहा है, और जो पूर्व वधे हुवे मनुष्य वाला क्षपक श्रेणी शुरु करे, और अन्नतान बंधि चौ- कडी को खपाकर फिर मृत्यु होणे के संभव से श्रेणी से विरमें तो भी अनंतान वं- घि का बीज भूत मिथ्यात्व है उसका नाश हुवा नहीं इसलिये फिर भी कदाचित अनंतान वंधि सजीवन करते प्राप्त होते. परंतु जिसने मिथ्यात्व का क्षय किया है वो मिथ्यात्व के विनाश से फिर अनंतान वंधि का बंध नहीं करे. क्योंकि वीज विना अंकूर की प्राप्ति नहीं होती है. और इन सातों प्रकृति को क्षय कर जो चढते परि- णाम में मृत्यु प्राप्त होवे तो अवश्य देवगति मेंही उत्पन्न होते. और जो पतीत परि- णामी होवे तो अनेक प्रकार के परिणामों के संभव से जैसे परिणामकी विशुद्धि में प्रवर्तता मरण करे तैसी गति में जावे, और जिस ने पूर्व आयुका बंध किया है, ऐसा जीव जो उस वक्त काल करै नहीं तो भी सात प्रकृत्ति के क्षयसे निश्चय उन के वैसे हि परिणाम रहे, परंतु आगे की दुसरी चारिख मोहनीय की प्रकृत्ति खपानेका उद्यम करे नहीं. और क्षीण सप्तक पूर्वायु बंध के सववसे मुक्ति नहीं पावे. तो भी तीसरे अथवा चौथे भव में तो जरूरही मोक्ष पावे; क्योंकि जिम ने देवायु या नरकायु का बंध किया हो तो वो देवता अथवा नरक का भवकर वहां से मनुप्य होकर तीसरे भव में मोक्ष पावे. और जो मनुष्य अथवा तिथच का आयु बंध किये वाद सप्तक क्षय करे, वो नियमा से अमंख्या वर्षायुतका बंध करे. (परन्तु जिसनें अवल संख्यात वर्षायु के स्थान में जानेका बन्ध किया हो तो वो सप्तक का क्षय नहीं करता है.) और वो मरकर निश्चय से युगालियाही होवे. ओर वहां तो भव प्रत्यय निश्चय मे दे- वायुकाही वंध है, इमलिये वो देवगति मै जावे, और देवगति में भव प्रत्यय सम्यक्त्व होने के मवव मे मनुष्यायु काही बन्ध करे इसलिये वहां से चक्कर मनुष्य होवै, औ र वहां फिर आयुर्वन्ध करे नहीं, फक्त चारित्र गृहणकर वाकी रही २१ चारित्र मो- हनिय की प्रकृनि का क्षय कर मुक्ति पद प्राप्त करे इम अपेक्षासे क्षायिक सम्यक्त्वी चौथे भव मे मोक्ष प्राप्त करता है. (इन मातों प्रकृति का क्षय तो अविरति सम्यक् दृष्टि गुणस्थान में ही होता है. और जो करतो देशाविरति, अमन मंयनि, अप्रमत मंयनि उन में मे कोइभी कर मना) 1 -- । * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी..* और जो आय विना बन्ये भपक श्रेणीका आरंभ करै तो वो अबल इम मप्त- क का भयकरे तो वो नियमा मे अनुपरत परिणाम बन्न पडते परिणाम में आगे चारित मोहनीय की प्रकृत्तियों को पाने उद्यम कर. तब-यया प्रवृत्ति आदि ती नो करणों ( उपशम श्रेणी में कहे मुझवही यहां ) करै. यहां अप्रमत गुणस्थान मे य था प्रवृत्ति करण. अपूर्व करण गुणस्थान में अपूर्व करण और अनि गृत्तिवादर गुण. स्थान में निशात्त करण करे. वहां अपूर्व करण में स्थिति घान आदि कर अपत्या- ख्यानी चौकडी और प्रत्याख्यानी चौकडी की आटों कपायों को ऐमी तरह मेररूपा वे किन्यो अनिहात्ति करणारा के प्रथम समय मेंहीं उम कपायाष्टक की पन्योरमके असंख्यातवे भाग प्रमाण माव स्थिति बाकी हे. फिर-वाण टिविक. नरक दिक. नि यंच द्विक. पहिली चार जाति. स्थावर नाम. उग्रोन नाम. मृस्य नाम. साधारण नाम नरगात और निर्यचगति तन्मायोग नाम कर्म की १: मनि. नया प्रोक्त श्रीपाद विक मो दर्शनावरणी की या मव १६ प्रकृति को दो बदन ना कर प्रति ममय उवेल २ जा पल्यापम के अमंख्यानवे भाग जितनी मी मिति वहां तब उन १६ मत्तियों को प्रतिनमय बन्धनी हुए अन्य मानिस कर जमा २ कर क्षीण करता २ अनिवृत्ति पादर गुपन्मान के मसाले भाग गरे वाट वाकी एकही भाग रहे नब उन मद मातियो का रुप हो. (यहां आचार्या के दो मत है:-१) अमन्याजानी बटी र मला ख्यानी चौकी जो पहिले पानी का करी थी परन्त अपना रहाकम के बीच में परिलती उन ६ प्रहनियोका जप किया. और निको का भय कन्नी वक्त ही तीच में न आबा महानि का दस दिरह. तने आपापोंका परमान है। आट पामोरे दमय बादेशाद अन्नादर सी चौकी दान कर लिक दही की मिन दर वन्ने की यि मी साना को. हे गटा: - असानो भान नर मानिसले नेपाली हुन का मंजमदार जावे. पोदा कमाई सी दी किले का दम कोदेम. मानहान- ३४ * प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोगह खण्ड और वर्तमान में तो अन्य हलकी लेश्या में जावे, इसलिये सप्तक क्षय का शुरु करने वाला प्रस्थापक होकर मनुष्य निष्टापक होता भी चारों गति में का जीव कहा है, और जो पूर्व वधे हुवे मनुष्य वाला क्षपक श्रेणी शुरु करे, और अन्नतान बंधि ची- कडी को खपाकर फिर मृत्यु होणे के संभव से श्रेणी से विरमें तो भी अनंतान वं- धि का वीज भूत मिथ्यात्व है उसका नाश हुवा नहीं इसलिये फिर भी कदाचित अनंतान वंधि सजीवन करते प्राप्त होते. परंतु जिसने मिथ्यात्व का क्षय किया है वो मिथ्यात्व के विनाश से फिर अनंतान वंधि का बंध नहीं करे. क्योंकि वीज विना अंकूर की प्राप्ति नहीं होती है. और इन सातों प्रकृति को क्षय कर जो चढते परि- णाम मे मृत्यु प्राप्त होवे तो अवश्य देवगति मेंही उत्पन्न होवे. और जो पतीत परि- णामी होवे तो अनेक प्रकार के परिणामों के संभव से जैसे परिणामकी विशुद्धि में प्रवर्तता मरण करे तैसी गति मे जावे, और जिस ने पूर्व आयुका वंध किया है, ऐसा जीव जो उस वक्त काल करै नहीं तो भी सात प्रकृत्ति के क्षयसे निश्चय उन के वैसे हि परिणाम रहे, परंतु आगे की दुसरी चारित्र मोहनीय की प्रकृत्ति खपानेका उद्यम करे नही. और क्षीण सप्तक पूर्वायु वंध के सववसे मुक्ति नहीं पावे. तो भी तीसरे अंथवा चौथे भव में तो जरूरही माक्ष पावे; क्योंकि जिस ने देवायु या नरकायु का बंध किया हो तो वो देवता अथवा नरक का भवकर वहां से मनुष्य होकर तीसरे भव में मोक्ष पावे. और जो मनुष्य अथवा तिर्थच का आयु बंध किये वाद सप्तक क्षय करे, वो नियमा से असंख्या वर्षायतका वंध करे. (परन्तु जिसनें अवल संख्यात वर्षायु के स्थान में जानेका वन्ध किया हो तो वो सप्तक का क्षय नहीं करता है.) और वो मरकर निश्चय से युगलियाही होवे. ओर वहां तो भव प्रत्यय निश्चय से दे- वायुकाही बंध है, इसलिये वो देवगति मै जावे, और देवगति में भव प्रत्यय सम्यक्त्व होने के सवव से मनुष्याय काही वन्ध करे इसलिये वहां से चक्कर मनुष्य होवै, औ र वहां फिर आयुर्वन्ध करे नहीं, फक्त चारित्र गृहणकर वाकी रही २१ चारित्र मो- हनिय की प्रकृत्ति का क्षय कर मुक्ति पद प्राप्त करे इस अपेक्षासे क्षायिक सम्यक्त्वी चौथे भव से मोक्ष प्राप्त करता है. ( इन सातों प्रकृति का क्षय तो अविरति सम्यक् दृष्टि गुणस्थान में ही होता है, और जो करतो देशविरति, प्रमत संयति, अप्रमत संयति इन में से कोइभी कर सक्ता है) - -" * मुक्ति मोपान-श्री गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी. और जो आयु विना बन्ये क्षपक श्रेणीका आरंभ करै तो वो अबल इस सप्त- क का भयकरे तो वो नियमा मे अनुपरत परिणाम वन्त बडते परिणाम में आगे चारित मोहनीय की प्रकृत्तियों को पाने उद्यम कर. तव-यथा प्रवृत्ति आदि ती नो करणों ( उपगम श्रेणी में कहे मुग्नवही यहां ) करै. यहां अममा गुणस्थान मे य था प्रवृत्ति करण. अपूर्व करण गुणस्थान में अपूर्व करण और अनि गृत्तिवादर गण. स्थान में अनियति करण करे. वहां अपर्व करण में स्थिति घान आदि कर अपत्या- ख्यानी चौकडी और प्रत्याख्यानी चौकडी की आठों कपारों को ऐमी तरह मेरमा वे कि-बो अनिहात्ति करणाडा के प्रथम ममय मेंहीं उम कपायाष्टक की पन्योपसके अमंल्यात भाग प्रमाण माव स्थिति वाकी है. फिरवीण द्विविक. नरक दिक. नि बैंच ट्रिक. पहिली चार जाति. स्थावर नाम. उयोन नाम. मध्य नाम, माधारण नाम नरगाति और नियंचगति तत्मायोग नाम कर्म की १: प्रनि. नया पूर्वोत्त थीमादि विक मो दर्शनावरणी की चों मव १६ प्रति चों को दल ना मंत्रमार पनि समय उवेल २ जब पल्यापम के अमंग्ख्यात भाग जितनी भी स्थिति में तब उन १६ मत्तियों को प्रतिनमय बन्धती र अन्य प्रानि में रमण कर में व्रमा २ कर क्षीण करता २ अनिवात दादर गणम्थान मंग्याले भाग गये वाट वाकी एकही भाग रहे तब उन मद मात्तियों वा हप करे. (यहां आचार्या के दो मन :-(१) अमलाग्दानी बरती और मा. स्थानी चौकडी जो पहिले पानी हार की थी परन्तु अभीनी कम के दीच मे पहिलेही न १६ महत्तिपोदा र विचा. और यही का भय करनी पत्ता ही च मे उन आठों निकाय दिलि. तनेक आचादोंका फरमान है. आर या गोले व पाच पद अन्ना ने इजर की चौरही दा अन्न व . सिनमा दो दिर खेने की विधि मी साना होने का इंत:- अनंतात भाग समिति के महानिदर महाकावे. पोकामा र दीनी दी किले का दो दर : नोके द. अन्दर सन : - " प्रथम अर्थ काण्डका प्रथम मूल द्वारा रोगह खण्ड और वर्तमान में तो अन्य हलकी लेश्या में जाये, इसलिये सप्तक क्षय का शुरु करने वाला प्रस्थापक होकर मनुष्य निष्टापक होता भी चारों गति में का जीव कहा है, और जो पूर्व वधे हुवे मनुष्य वाला क्षपक श्रेणी शुरु करे, और अन्नतान बंधि ची- कडी को खपाकर फिर मृत्यु होणे के संभव से श्रेणी से विरमें तो भी अनंतान वं. धि का वीज भूत मिथ्यात्व है उसका नाश हुवा नहीं इसलिये फिर भी कदाचित अनंतान वंधि सजीवन करते प्राप्त होते. परंतु जिसने मिथ्यात्व का क्षय किया है वो मिथ्यात्व के विनाश से फिर अनंतान वंधि का बंध नहीं करे. क्योंकि वीज विना अंकूर की प्राप्ति नहीं होती है. और इन सातों प्रकृति को क्षय कर जो चढते परि- णाम मे मृत्यु प्राप्त होवे तो अवश्य देवगति मेंही उत्पन्न होवे. और जो पतीत परि- णामी होवे तो अनेक प्रकार के परिणामों के संभव से जैसे परिणामकी विशुद्धि में प्रवर्तता मरण करे तैसी गति में जावे, और जिस ने पूर्व आयका बंध किया है, ऐसा जीव जो उस वक्त काल करै नहीं तो भी सात प्रकृत्ति के क्षयसे निश्चय उन के वैसे हि परिणाम रहे, परंतु आगे की दुसरी चारित्र मोहनीय की प्रकृत्ति खपानेका उद्यम करे नहीं. और क्षीण सप्तक पूर्वायु वंध के सववसे मुक्ति नहीं पावे. तो भी तीसरे अथवा चौथे भव में तो जरूरही माक्ष पावे; क्योंकि जिम ने देवायु या नरकायु का बंध किया हो तो वो देवता अथवा नरक का भवकर वहां से मनुष्य होकर तीसरे भव में मोक्ष पावे. और जो मनुष्य अथवा तिथच का आयु वंध किये वाद सप्तक क्षय करे, वो नियमा से असंख्या वर्षायतका वंध करे. (परन्तु जिसनें अवल संख्यात वर्षायु के स्थान में जानेका बन्ध किया हो तो वो सप्तक का क्षय नहीं करता है.) और वो मरकर निश्चय से युगलियाही होवे. ओर वहां तो भव मत्यय निश्चय से दे- वायुकाही बंध है, इसलिये वो देवगति मै जावे, और देवगति में भव प्रत्यय सम्यक्त्व होने के सवव से मनुष्याय काही बन्ध करे इसलिये वहां से चक्कर मनुष्य होवै, औ र वहां फिर आयुर्वन्ध करे नहीं, फक्त चारित्र गृहणकर वाकी रही २१ चारित्र मो- हनिय की प्रकृत्ति का क्षय कर मुक्ति पद प्राप्त करे इस अपेक्षासे क्षायिक सम्यक्त्वी चौथे भव से मोक्ष प्राप्त करता है. ( इन सातों प्रकृत्ति का क्षय तो अविरति सम्यक् दृष्टि गुणस्थान में ही होता है, और जो करतो देशविरति, प्रमत संयति, अममत संयति इन में से कोइभी कर सक्ता है) * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी.. और जो आयु विना बन्धे भपक श्रेणीका आरंभ करै तो वो अवल इस सप्त- क का भयकरे तो वो नियमा से अनुपरत परिणाम वन्त-चडते परिणाम से आगे चारिव मोहनीय की प्रकृत्तियों को पाने उद्यम कर, तब-चया प्रवृत्ति आदि ती नो करणों ( उपशम श्रेणी में कहे मुझवही यहां) करै. यहां अप्रमत गुणस्थान मे य था प्रवृत्ति करण. अपूर्व करण गुणस्थान में अपूर्व करण और अनि गृत्तिवादर गुण. स्थान में अनिवत्ति करण करे. वहां अपूर्व करण में स्थिति घात आदि कर अप्रत्या- ख्यानी चौकडी और प्रत्याख्यानी चौकडी की आगे कपारों को ऐसी तरह सेरूपा वे कि-बो अनिवात्त करणादा के प्रथम समय मेंही उस कपायाष्टक की पल्योपमके असंख्यातवे भाग प्रमाण माव स्थिति वाकी रहे. फिर-वीण द्विविक. नरक द्विक. ति यच द्विक. पहिली चार जाति. स्थावर नाम. उद्योत नाम. मूक्ष्म नाम. साधारण नाम नरगाति और तियेचगति तत्मायोग नाम कर्म की १: प्रकृत्ति. तथा पूर्वोक्त थीणाद विक मो दर्शनावरणी की यों मव १६ प्रकृति यों को उद्दल ना भंक्रमकर प्रति समय उबेल २ जब पल्योपम के असंख्यातवे भाग जितनी सी स्थिति वहां रहे तब उन १६ मत्तियों को प्रतिनमय वन्धती हुइ अन्य प्रकृत्ति में गुणसंक्रमण कर में क्रमा २ कर क्षीण करता २ अनिवृत्ति वाटर गुणस्थान के मंख्याने भाग गये वाद वाकी एकही भाग रहे तब उन मव प्रकृत्तियों का क्षय करे. (यहां आचार्या के दो मन हैं:-(१) अप्रत्याख्यानी चौकडी और प्रत्या- ख्यानी चौकडी जो पहिले खपानी शुरु करी थी परन्तु अभीतक भय हुड नहीं. उम के बीच में पहिलेही उन १६ प्रकृत्तियोंका भय किया. और (२) यह १६ प्रकृत्तियों का क्षय करती वक्त ही बीच में उन आठों प्रवृत्ति का भय कर दिया ऐसाभी कि- तनेक आचायोंका फरमान है.) आठ या गोले कपाय म्हपायेवाद अन्नर मुहूर्त में ९ नो कपाय और मंचल की चौकडी का अन्न करण कैरे. फिर नपुंसक वेद की ऊपर की नियति वाला दल उबलने की विधि मेही नपाना शुरू करे. वो अंतर मुहूर्त में खेलना २ पल्यापन के अमक्यानवे भाग प्रमाण जब स्थिति रहे नव वरती हुइ प्रवृत्तियों उनका दल गुण भक्रमकर मंक्रमाचे. यों करते अंतर मुहूर्नमें उनका ना नाग होते. फिर वो नमक वेट की नीचे की स्थिति का दल जो नमक कटके उदय में प्रेणीका नाम किया हो तो वेद २ कर पात्र. अन्यया हो आपरी मात्र हे नव ने उदयान्न वदनान प्रह - प्रथम अर्थ काण्डका प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड 12 तीमें स्तियुक संक्रमकर संक्रमावे यों नपुंसक वेद क्षय किये वाद, अन्तर मुहूर्त में स्त्री वेदको भी ऐसी तरह में खपावे. फिर हांस्यादि छेओं प्रकृतिका एकही वक्त में साथही क्षय करीना शुरू करे, उन नो कपाय का उपर की स्थितिकी दल पुरुष वेद मे पतद गृह न होवे इसलिये उस का पुरुप वेद में संक्रम नहीं करता हुवा भंज्वल के क्रोध में पूर्वोक्त रीति से संक्रमावे. यों कर ने से अन्तर मुहूर्त में उन छेओं नो कपाय का क्षय होवे, उस ही समय में पुरुप वेद का बन्ध उदय ऊदीरणा का विच्छेद होने और एक समय कम दो आवलीका बन्धाया जो पुरुप वेदका दल वो छोडकर वा- की सव क्षय होवे. उस समय में अवेदक होवे. यह पुरुप वेद में श्रेणी करे उनकी विधि कही, और जो नपुंसक वेद मे श्रेणी का प्रारंभ करे बो वो पहिलेही त्रिवेद औ. र नपुंसक वेद दोनों का एकही वक्त क्षय करे, उस भय के समयमें ही पुरूप वेदका वन्धादिका विच्छेद होवे. उसवक्त अवेदक हुवा पुरुष वेद का और हॉस्यपटक का एकही वक्त में क्षय करे. और जौ स्त्री वेद के उदय में श्रेणि आरंभे तो पहिले नपुंसक वेदखपाचे उ- सके क्षय की वक्तही पुरुप वेदके वन्धादिका विच्छेद होवे फिर नपुंसक वेद और हां स्य पटक का एक वक्तमे क्षयकरे. और जो पुरुप वेदमें श्रेणीकी आरंभकरे तो वो पुरुपवेदी क्रोधको वेदेता हुवा क्रोधके तीन विभाग करे-१ जो घोडे के कान के जैसे छोटे छोटे पुद्गलो के खण्ड करे इसालये उसे अश्वकरणादा कहते हैं. २ उस रसरहित दल को कूट २ कर कि- टिकी तरह अत्यन्त मूक्ष्म करे उसे दूसरा किहि करणारा कहना. ३ वो किष्टि कर- णारा किये वाद उस किहि को वैदे उसे तीसरा किम्वेिदनादा कहीये. उस में से प्रथम अश्वकरणारा में वर्तता हुवा समय २ में अनन्त अपूर्व स्पर्द्धक सज्वलकी चौक डी के अन्त करण की ऊपर स्थिति मे करे; अर्थात् सज्वलंकी चौकडी के अन्तकर णकी उपरकी स्थिति के प्रति समय अनन्त अपूर्व स्पर्द्धक करे. (स्पर्द्ध करन की विधि पहिले कही वैसीही जाणना) और इस अश्वकरणादा में वर्तता पुरुष वेदका भी सम- य कम दो आवालिका रूप काल कर के क्रोध में गुण संक्रमण कर के संक्रमाता हुवा अन्तिम समय मे सर्वतः संक्रमावे. यों यहां पुरुप वेद का क्षय होवे. और अश्वकरणा: द्धा की भी समाप्ती हुइ. फिर किट्टि करणारा में प्रवेश कर संचलकी चौकडी की ऊपर की स्थिति गत दलिक की किहि कर, वो कह परमार्थ से तो अनन्त है, तो * मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी. १९ ३७ भी अल्पड़ों को समजाने स्थूल भेद की अपेक्षा-अमत् कल्पना से एके क कपाय की तीन २ कल्पना कल्पनी तब १२ किहि होने. यह तो क्रोधसे भपक श्रेणी आरंभे उस आश्रिय कहा. और जो मानोदय में श्रेणि प्रतिपन्न होवे तो उमे उठूलन अनेक प्रकार की वि धिकर क्रोधका क्षय कियेबाद बाकी रही तीनो कपाय की ऊपरोक्त विधिमे ९ किष्टि करे. और जो माया के उदय में श्रेणिका आरंभ करतो क्रोध और मान इन दो. नों को उद्वलन विधिकर खपाने से वाकी रही दोनों कपाय को ६ किटिकरे. जो लोभके उदय में श्रेणिका आरंभ करतो क्रोध मान माया इन तीनों को उदलन विधि- कर उबेलकर खपावे. वाकी रहे एक लोमकीही किष्टि करे. यह किट करने की विधि कही. यह किहि करणाद्वा पूर्ण हुवे वाद किहिवेदना अदा में प्रवेणीरावा जो मो- ध में श्रेणीका आरंभ करे तो वोक्रोध की दूसरी स्थिति में नहा का प्रथम किटिका द- लिया दृमरी स्थिति में से आकर्प प्रथम स्थिति गन करके वो जहां तक एक समय अ. विक एक आंवलीरहे वहां तक वेदताहै. फिर उनके अन्तर मम्पमें उपली दमग स्थिान में रहा हुवा दमरी किहि का दल उनको भाकर्पकर प्रथम स्थिति गन करके वाभी एक समय अधिक एक आदली रोवतां तक देदे. फिर ऊपर की स्थिति नीम- री किहि के दल को आकर्षकर प्रथम धिनि गन कर वेदना है. दो नीनो रिहिट- नाद्वा में ऊपर की स्थिति के दालक को ग्ण भक्रम कर प्रति समर अमलान गुम वृद्धि युक्त मंचल के मान में प्रक्षेप करे. यों नीनी विहि के अद्वारे भन्नि मन में मंबल के क्रोधका बन्ध उदय दीरणा दा माथही पडेट होनाई. न तामे भी अन्तिम समय कम दो आवल्किा या हवा दल रहा है मनिवार दाग नी है. यो वि. मय प्रक्षेपमान में होगया है। उने आगे मरी दम री स्थिति मे में प्रथम विकिा दर वर्ष का प्रयन पिनि हाई प्रदान केने है. वहां को जोपया दर दाबी गाने एज माप दोभाका: पनाम दरममावे और भन्निन माद नईम कर जनपटां प्रोध का भय वा. दी गनदीप सिकार पनि किन? एन मार अधिक एक आदी पती का किरन प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड. ११ १६ प्रकृत्ति की सत्ताकी स्थिति सर्व अपवर्त मान से अपवर्तन कर अर्थात-घटा कर क्षीण कपाय के अद्धा जितनी करे, परन्तु निद्रा द्विक की स्थिति स्वरुप की अपेक्षा मे एक समय कम करे, और कर्म रुपसे वरावर होवे. सो कपाय अदा अमीभी अन्तरमु- हूर्त प्रमाण है. उस वक्त उन १६ प्रकृत्तियों के स्थिति घातादि विराम पावे. परन्तू जो दूसरी वाकी रही स्थिति है उसके स्थिति घातादि कायम है. इन १६ प्रकृति की उदय ऊदीरणा करके वेदते २ एक समायधिक आवली माव वाकी रहे वहां तक वे दे. फिर ऊदीरणा से भी विराम (निटत्ति ) पावे. उस वक्त एक आवली माव फक्त उदय करके ही वेदते हैं. वो भी क्षीण कपास के द्विचरम ४ समय पर्यन्त फिर उस द्वि चरम समय में-छद्मस्त (ढकी हुइ) अब स्याही निद्रा और प्रचला कानाश क- रे-सत्ताकी अपेक्षा से क्षय होवे, फिर-५ ज्ञानावरणीय, ४ दर्शनावरणीय "अन्तरा- य इन १४ प्रकृत्ति का छद्मस्त अवस्था के अन्तिम समय में घात करे. यों इन १.४ प्रकृत्तिका क्षय होतेही दूसरे समय व्यवहार नय मतानुसार सयोगी केवली भगवन्त होते हैं ! और निश्चय नय के मतानुसार तो उसही समय में के वली गिनेजाते हैं ! उस केवल ज्ञान रुप महादिव्य जगत्-चक्षुकर लोकालोक के सर्व द्र- व्य क्षेत्र काल भाव और भवो को सर्वांश कर देखते जानते हैं. इस वक्त जो पर म पुण्यात्मा जीव तीर्थकर गौत्र का उपार्जन कर के आये होते हैं उनके यहां *अष्ट प्र- तिहार्य, ३४ अतिशाय, ३५वाणी गुण. इत्यादि गुणों की माप्ती होती है. यह सामान्य केवली के नहीं होते हैं. यह जघन्य तो अन्तर मुहूर्त पर्यन्त उत्कृष्ठ देशऊणा (८ वर्ष कम) क्रोड पुर्व पर्यन्त भूमण्डल में सुखसे विहार करके सत्य धर्म को पूर्ण प्रका- श में लाते हैं. इन केवल ज्ञानी भगवन्तों मे से जिनके आयु कर्म थोडा होवे और वेदनीय क म अधिक होवे तो ८ समयमें समुदघात हो वो कर्म बरोबर होजाते हैं. समुदघात हुवे वाद अन्तर मुहुर्त वाद व उत्कृष्ट ६ महीने वाद मुक्ति प्राप्त करतेहैं. और बहुत से केवली भगवन्त विना स मुद् घात कियेही मुक्ति प्राप्त कर तेहै. फिर दोनों प्रकार के केवली भगवन्त भी भवोप गृही कर्मों के क्षय करने के में x अन्तिम समय के पहिले के समय को “ द्विचरम " कहा जाता है * सामान्य केवली के और तीर्थकर के फक्त इन गुणों की ही न्युन्याधिक ताहै वाकी तो सर्व गुण बरोबर होते है.

. * मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अदीशतद्वारी. ११ ४१ लिवे-लेश्यातीत, अत्यन्त अप्रकम्य. परम निर्जरा का कारण ऐसा शुक्थ्यानका तीसरा पाया ध्याते हुवे योगोंका निरूंधन करना शुरु कर तेहैं. प्रथम बादर वचन जोग का निरुधन करने को भवते. वहां वादर काया योग कर के वादर मन योग का औ- र सुक्ष्म मन योग कर के वादर वचन योग को रंधन करे. फिर सूक्ष्म काया योग कर वादर काया जोग का रूंधन करे. फिर उसही कर के सूक्ष्म मन जोग का रुंधन करे, फिर सूक्ष्म वचन जोग का रुंबन करे. फिर सूक्ष्म काया जोग का रंधन करते मूक्ष्म क्रिया अप्रतिपाती नामक शुक्ल ध्यान के तीसरे पाये करके उदारीक शरीर के अन्दर रहे हुवे प्रदेशो के छिद्रो को आत्म प्रदेशों को घन रुप कर पूर्ण करे (खड्डे-बुरे) तब दो भागके प्रदेशो घन होने से मूल शरीर से तीसरे भागके जितनी अवघेहना उ- न आत्म प्रदेशो की घन रुप होकर रहजाती है. इसही ध्यान में प्रवर्तते हुवे स्थिति घातादि कर सयोगी केवली गुणस्थिान के अन्तिम समय-एक आयुष्य विना वाकी के तीनो कमों को अयोगी गुणस्थान की अवस्था है वैसे स्थिति वन्त करे; परन्तु इत ना विशेष-जिनकों का अयोगी गुणस्थान में उदय नहीहैं. उन कमों की स्थिति स्व- रुपापेक्षा करके समय मात्र कम करे. कर्म स्वरुप की अपेक्षा से अयोगी अवस्था जितनी कैर. उस अयोगी केवली गुणस्थान के अन्तिम समय में: २ औदारिक द्विक, ४ ते जस-कार्मण शरीर, १० छे स्थान, ११ प्रथम संघयण १० वर्ण चतुप्क, १६ अगुरु लघु नाम, १७ उप घात नाम, १८ पराघात नाम २० शुभ-अशुभ विहायो गति.२१ प्रत्येक नाम, २२ स्थिर नाम, २३ आस्थिर नाम, २४ शुभ नाम. २० अशुभ नाम. २६ निर्माण नाम. २७ मुस्वर नाम, २८ दुस्वर नाम २९ उशाश्चम और " दोनो वेदनी- य में की एक वेदनीय, इन : प्रकृत्ति की उदय और ऊटीरणा का विच्छेद होता है. तब दूसरे समय में अयोगी केवली होने हैं; यहां फक्त पंच लघु अक्षर (अ. इ.उ. ऋ. ल.) उचार करने में जितना काल लगता है. उनने काल तक रहते हैं. मम्यान को प्राप्त होतेही व्यपरित क्रिया -अप्रतिपाती नामें शुम ध्यान का चोथा पाया मान होता है. इम गुणस्थान में स्थिति पानादि कुछभी नहीं हैं. फक्त जितनी उदय पति - कृत्ति है उनको वेदता हुवा-सपावे. और जिन प्रवृत्तिका उदय नहीं फक्त मत्नामें ही उनके दलिये उने स्तिबुक मंक्रम कर उदयानि प्रवृत्ति में मंक्रमा कर वेद कामपा- . onam ४२ * प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड र वे. यों अयोगी गुणस्थान के द्वि-चरम समय पर्यन्त कर तेहैं. अब यहां जो स्वभावसे प्रकृत्तियों का नाश होता है उनके नामः-२ वैक्रय आहारक • शरीर, ४वैक्रय आहारक बन्धन, ६ वैक्रय आहारक संघातन. ८ वैक्र- य आहारक अंगोपांग. ९ देव गति, १. देवानु पूर्वी, यह १० प्रकृत्तियों देवगति के बन्ध की वक्त में वन्ध ती है। इसलिये इने देवगति सहचारीणि कही जाती है. इनका भी द्विचरम समय में नाश करते हैं. फिर ३-औदारिक - तेजस - कार्मण यह तीनों शरीर, ६ इन तीनों का वन्धन, ९ इन तीनों का सघातन, १५ छे खंघयण, २१छे संस्थान,२२ औदारिक अंगोपांग, २६ वर्ण चतुष्क, २७ मतुष्यानु पूर्वी, २८ पराधात नाम, २९ उपघात नाम३०अगुरुलघु नाम, ३२ शुभा शुभखगति, ३३ प्रत्येक नाम, ३४ अपर्याप्ता नाम, ३५ उश्वास नाम, ३६ स्थिर नाम, ३७ अस्थिर नाम, ३८ शुभनाम, ३९ अशुभनाम, ४० मुस्वर नाम, ४१ दुस्वर नाम, ४२ दुर्भग नाम, ४३ अनादय नाम, ४४ अयशीति नाम, और ४५ निर्माण नाम. यह ४५ प्रकृत्ति योंका यहां उदय नहीं होने से द्विचरम समय में इनका भी विच्छेद होता है. अव द्विचरम समयमें खपाया जो साता असाता में का एक वेदनीय २ मनु- प्यायु, ३ मनुष्य गति पचेंन्द्रिय की जाति, ५ वस नाम, ६ वादरनाम, ७ पर्याप्ता- नाम, ८, सुभग नाम, ९ आदेय नाम, १० यशर्तीि नाम, ११. उंच गौव यह ११ ही प्रकृत्ति मनुष्यगति सहगत है, अर्थात् मनुष्यगति में यह प्रकृत्तियों जरूर पाती है, इसलिये मनुष्य शरीर के साथ इन ११ प्रकृत्ति का उदय तो सामान्य केवली में पा ता है, और १२ तीर्थंकर नाम सहित १२ प्रकृति का उदय निर्थकर में पाता है, इन १२ प्रकृत्ति का चउदवे अयोगी केली गुणस्थान के अन्तिम समय में सवांश क्षय कर त हैं. “कृतस्न कर्म विम मोक्षो मोक्षः" अर्थात्-सर्व कर्मों के वन्धन से मुक्त होना- छूटना उसीको मोक्ष कहते हैं. यो क्षपक श्रेणी प्रतिपन्न महात्माने अनुक्रम से सर्व कोका नाश करते हुवे चउदवे गुणस्थान के अन्तिम समय सर्व कर्माश रहित होतेहैं उसही वक्त वो मोक्ष हुवे समजना. सूत्र-पूर्व प्रयोगाद् आविद्ध कुलाल चक्रवद्, ऽसङ्गत्वाद् - व्यपगतलेपा लाम्बुवद्, * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी. १ बन्ध छेद् , एरण्ड वीज वद्, तथा गति परिणापच - ऽमिशिखावच्च ॥ तदन्तर मूर्द्ध गच्छत्या लोकान्तात् ॥ तत्वार्थ सूत्र. अ. १० ॥ अर्थात्- “तदनन्तर" उन कमों के सर्वाश से छूटे वाद-(२) जैसे - कुम्भार का घुमाया हुवा चाक, छोडे वाद भी पूर्व के प्रयोग (धक्के) से बहुत कालतक घूमा (फिरा) करता है, तैसाही अनादि से परिभ्रमण करने का जो जीव का स्वभाव क- म भाव करके हो रहाथा सो उन कर्मों से छूटे बाद भी मुक्ति स्थान में जाने तक की गमन क्रिया करता है. तथा बहुत काल से मुक्ति गमन के लिये तप संयमादि किरिया कर रहे थे उस प्रयोग से मुक्ति में जाते हैं. (२) जेसै-मट्टी से छाया हुवा तुम्बा पानी में डूबा हुवा सो वो मट्टीका का लेप गलनेसे उस संगत से रहित होने से स्त्र स्वभाव से पाणी के उपर अन्त में आ- कर ठहरता हैं, तैसे ही आत्मा रूपतुम्बा जो कर्म रूप मट्टी से लेपाय हुवा संसार स- मुद्र मे डूब हुवा था वो अनेक - अकाम सकाम निर्जरा रूप पाणी के प्रयोग से गल ने से उस वजन से मुक्त हो हलका हुवा लोकान्त में मुक्ति है वहां जाकर ठहरता है. (३) जैसे गोहे-डोडे में (फलमे) एरंडी का वीज बन्धा था वो फल सूक कर गोहा फटतेही एरंड वीज उछलकर उपर जाता है, तैसेही आत्मा कर्म रूप वन्ध से छूटतेही उपर को उछलता :- जाता है. और (४) जैसे अग्नि से प्रज्वलित मशाल को जो कभी उलटी भी कर दी तो भी उसकी बाला (झाल) उर्द्ध-उंची दिशाकोही स्वस्वभाव से गमन करती है, तैतेही संमार में झुकाने वाले कर्म रूप पवन का अभाव होनेसे आ- त्मा स्वस्वभाव कर उर्द्ध-मोक्ष को जाती है. प्रश्न-जो आत्मा का बन्ध से छूटे वाद उर्दू गमन करनेका ही स्वभाव है तो फिर मोक्षस्थान मे जाकर अटक क्यों जाती है? टेहर क्यों जाती है? आगे को क्यों नहीं गमन करती है? उत्तर-"धर्मास्ति काय अभावात् "-अर्थात् जमे मछलीको गमन शक्ति पाणी की सहायता मे है. तैमेही आत्मा और पुदलों का गमन धर्मास्ति काय नामक लोक व्यापी एक द्रव्य की महायतामे है. अर्गन धर्मास्तिके महायमे ही आत्मा और पूद्गल गमन कर शक्ते हैं. उस धर्मास्तिका लोकाग्रके आगे अलोक में अभाव- नास्ति ४४ * प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड, र होने से आत्मा आगे को नही जा सकती है. वहां ही लोक के अन्त में स्थिरी भूत होकर ठहर जाती है. श्लोक-दग्धे बीजे यथायन्ते । प्रादुर्भवति नाङ्करः । कर्म बीज तथा दग्धे । नारोहति भवाकरः ॥८॥ अर्थात-जैसे दग्ध किया-अग्नि कर जला हुवा पीज से अंकर का प्रादर्भाव होता है. अर्थात-जले हुवे वीज से अंकूरा नहीं फूटता है, ऐसेही संसारके बीज भूत सर्व कर्मो रूप वीज भस्म भूत होनेसे वो जन्म रूप या किसी प्रकारकी व्याधी- दुःख रूप अंकूर उत्पन्न नहीं करसकते हैं. जिस से सिद्ध परमात्मा सदा काल अचल और अव्यावाध हैं. श्लोक-संसार विषया तीतं । मुक्ता नाम व्ययं सुखम् ॥ अव्या बाध मिति प्रोक्त । परमं परमार्षिभिः ॥२०॥ अर्थात्-चो मोक्ष स्थान में संस्थित रही हुइ आत्मा-संसार के सर्व विषयों से पर -अर्थात् श्रेष्ट और अव्या वाध अर्थात्-सर्व प्रकार की वाधा ओंसे रहित, अनन्त का ल तकही न्युन्या धिकता रहित एकसी ही बनी रहती हैं, ऐसे निरुपम-अत्युत्तम सुख के भुक्तती है. (५) पांचवा लक्षण द्वार का अर्थ. ऐसी तरह से जो अनुक्रम से गुणस्थाना रोहण करते हैं-जों जो आगे २ के गुणस्थानों में बढते जाते हैं, त्यों त्यों उनके आत्म गुण भी अधिक्यता विशुद्धता को लेते हुवे बृद्धि होते हैं. वो गुण कौन से और कैसी तरह बृद्धिपाते है, यह स्वरुप द शीने के वासते पांचवा वा "लक्षण द्वार" कहा गयाहै. प्रथम मिथ्यात्व गुणस्थान के लक्षण में जो शास्त्रवसे अन्यन्य ग्रन्थों से संग्रह क र के मिथ्यात्व के ३४ भेद लिखे गयहैं जिसका अर्थ. (३४) मिथ्यात्व सामान्य प्रकार से मिथ्यात्व के दो भेद-१ अव्यक्त मिथ्यात्व. और २ व्यक्त मिथ्यात्व. १ अव्यक्त मिथ्यात सो-जैसे चन्द्रहांस्य मदिरा का सेवन करने से मनुष्य * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी. १ वे भान हो मूञ्छित हो पड जाताहै. उसे अपने पराये अच्छे बुरेका कुछभी भान न- ही होताहै,तैसेही सूक्ष्म निगोद से लगाकर असन्नी तिर्यच तक तो यह एकही मिथ्यात निश्चय से पाता है, और वाकी के दंडको के जीवों में से बहुत से जीवोगे यह मि- थ्यात्व मे पाताहै. इस मिथ्यात्व के वशमे पडेहुवे जीवों ज्ञानावरणी आदि कमों का अति तीव्र रस चन्द्रहास मदिरा जैसा प्ररिंगमने से वो धर्म अधर्म पुण्य पाप अच्छा बुरा इ- त्यादि कुछभी नहीं समझते हैं. फक्त सुख दुःख रुप होती हुइ वेदना वेदने सिवाय दू- सरा कुछभी ज्ञान उनमें न होनेसे अव्यक्त मिथ्यात्वी कहे जातेहैं. (२) “व्यक्त मिथ्यात" मो-जैसे-किसीको पीलीया का रोग होने से वो श्वेत वस्तु को भी पित (पीली) देखताहै. तैसही यह मिथ्यात्व एक सन्नी पचेन्द्रिय मेही पाताहै. इसमिथ्यात्वके वश्य में पडे जीवको कर्मरुप पीलीये के रोगसे ग्रासित हुइ वि- परीत वाद कर सर्व पदार्थों विपरीत-उलटेही भाप होते हैं. सत्य को असत्य. असत्य को सत्य न्यायको अन्याय, अन्यायको न्याय, इत्यादि सब उलट जानते-श्रद्धतेहैं. सो व्यक्त मिथ्यात्वी. आगेजो मिथ्यत्वके भेद किये जायेंगे उन सवोंका समावेशइसमें होताहै. मुख्यत्व मिथ्यात्व के पांच प्रकार भी कहे हैं:- (१) "अभिग्रह मिथ्यात्व" सो-जो जीवो-हट ग्राही कदाग्रही होते हैं. वो अपने ध्यान में जो वात जची सो सव सच्ची, वाकी की सब झूठी जानते हैं. कैसेभी सद्बोध -सदुपाय से उने समजाने कोइ भी समर्थ न होवे. और वो सत्संग भी इसही डरके मा- नहीं करतेहैं, कि रखे उन ज्ञानी महात्मा के पास जाउंगा तो मेरी श्रद्धा पलटा देवेंगेरे कभी कोइ उनको उसके धर्मकी असत्यता भी बतादेवे तो वो सीधा यह उत्तर प्रदान करें कि इस मजव में ऐसे २ विद्वान श्रीमान लोक हैं सो वो क्या मूर्खहैं ! वश-हमारे आगे यह पंचायत निकालाही मत करो ! ऐसा जो गर्दभ पुच्छग्रही * कीमाफिक- दुराग्रही होवे सो अभिग्रही मिथ्यावी. * किसी एक अनाज का व्यापार करने वाले व्यापारीने फजर होतही अपने पुत्र से कहा कि तूं आगे चलकर दुकान लगा' में भी पीछेसे आताहु. परन्तु याद रखना नि-पाहले ग्रा- को खाली मत जानदेना." यह हुकम पुत्र प्रमाण कर दुकान पर आया दुकान लगाइ. उस वल-एक गद्धेने आकर अनान में मुह डाला. तब दूमग दुकान दार उमे भगाने लगा. तब वो वाणक पुत्र संतत हो बोल कि-खबर दार : इने भगाना नहीं. खान्नदो, फिर हि

No text on this page.

* मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अदीशतद्वारी. सा जो होताहै सो अनाभिग्रही मिध्यावी. (३) अनाभि निवेशिक मिथ्यात्व' सो-किसीको सत्संगतके प्रसादसे. सत्शास्त्र के श्रवन पडन से. या सन-चलन वलन वाले सत्पुरुषों के दर्शन से; अपना मान नी- य मजव अन्तः करणमें सभात् असत्य-झूठ प्रतिभाष होने लग जावे. परन्तु मिथ्या मोहके प्रवलोदय कर उस गृहन किये हुवे असत्य मत का त्यागन नहीं करसके! और श्रीवीतराग के मार्ग को सत्य पथ्य तथ्य न्यायरुप जानता हुवा भी ग्रहण नहीं कर स के !! विशेपत्त-मिथ्यानुराग में मतवाला वनकर अपने असत्य पन को स्थापन कर- ने. वीतराग का न्याय पन्थ का उत्यापन करने सत्शास्त्रों के कथनोको लोपे गोपेउ . त्यापे या विपरीत प्रगमावे. उत्सूत्र की परुपणा से-या कपोल कल्पित खोटे ग्रन्थों रा- स चोपाइ आदि की रचना रच. वेचारे भोले जीवों को भरम रुप फासमे फसा कूमा में लगावे, सन्मार्ग छोडावे. अपडूबे अन्य अनेकोकों डूबावे. ऐसी तरह जो फूटी ना- वा का सङ्गाती होवे सो अभिनिवेशिक मिथ्यावी. दृष्टान्त-श्रीपार्श्वनाथ भगवन्त के कितनेक * संतानीया साधुओं गोशाले के मत में मिलकर श्रीमहावीर स्वामीजी की निन्दा कनरे लगे. तब श्रीमहावीर स्वामी के श्रावको ने उनसे पूछा कि-आप श्रीपार्श्वनाथ भगवान की परुपणा को भी जानतेहो, और श्रीमहावीर भाभीजीकी परुपणा को भी जानतेहो. तैतेही गोतालाजी की परुप- णा को भी जान गयेहो. इन तीनों में से सत्य परुपना किनकी है सो फरमाइये? तब वो माधुओं वोले कि-हां हम जानते हैं. जैती परुपणा श्रीपार्श्वनाथ भगवान की थी वैखीही परुपणा श्रीमहावीर स्वामीजी की है। परन्तु हमने जो श्रीगोशालाजी का पक्ष घारन कियाहै. इसलिये हमारा वश पहोंचेगा वहां तक हमतो इन मतकी स्थापना कर- नेमें और महावीरके मतकी उत्थापना करनेने कच्चाम नही रक्खेंगे!! हमदुर्गति से नहीं डरतेहैं. यह सुनतेही श्रावको उनके मिथ्यामोहका प्रवल उदय जान चुपचाप उठकर चलेगये ! ऐसे मिथ्याट ग्राही जीवों को अभिनिवेशिक मिथ्यात्वी जानना. (४) संशयिक मिथ्यात्व"सो-कितनेक पुण्याला जीव श्रीजेन धर्मको तो पाये हैं, परन्तु सत्सङ्ग और सत्तास्त्र अभाव तथा कितनेक मलंग औरम- शास्त्रका पठन करभी अपनी दुर्बुद्धि के ( मोहकी प्रवल नाके ) प्रभाव मे. या अन्य पटन में * प्रति निष्प-ज्यान-शिष्य के मिष्य को स्तनपा न्हते हैं. ।

* प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड. ११ मतावा लम्बियों की संगति उनके ग्रन्थों का पठन कर-चीतराग प्रणित सत्कथन में में शाय वनतेहैं-चैमलाते हैं, और असत्कल्पना करते हैं कि मूह अग्र भाग जितनी थोडीसी जगह में कन्द के अनन्त जीवोंका समावेश, लक्खों योंजन की अवयेणा, प्राचीन श- हरों में क्रोडों घरों की वस्ती, अनन्त सिद्धहोते हुवे भी संसारी जीवो की राशी का नहीं घटना, वगैरा. ऐसी कितनी बातों प्रत्यक्षतामें झूठी दर्शाती है. इत्यादि ऐमीवातों मे संशय करे सो संशयिक मिथ्यात्व. दृष्टान्त-महा वैराग्य वन्त जामलीजी साधु के शरीरमे अकस्मात् महा वेदनी उत्पन्न होते शिष्यों को वीछोना करने का हुकम दिया, औरथोडी देर बाद पूछा कि -" वीछोना हुवा क्या ?" शिष्याने कहां कि-कररहे हैं; यह मुनतेही मन में विचा- र हुवा कि भगवन्त फरमाते हैं कि-"करमाणे करे" अर्थात्-काम करना शुरु किया उसे कियाही कहना. और में यहां प्रयक्ष देखता हूं कि-"करे माणे अकरे" अर्थात्- काम करना शुरुकिया उसे किया नही कहना, परन्तु काम पूरा किये वादही किया कहना, इसलिये “करे माण करे" यह महावीर का वचन झूठा है. मिथ्यात्व मोहोदय कर ऐसी शंका उत्पन्नहो तेही सम्यक्त्वका नाशकर किलविपी देवहुवे.यह संशय मिथ्यात्व. (4)"अनाभोग मिथ्यत्व" सो-कर्मोकी प्रबलता कर, तीव्रमोहके उदय, कर जी वों अज्ञान दिशा से चेतन्य हो अचेतन्य रुप होरहै हैं, जिनको अपना पर का विल कुलही भान नहीं है. ऐसे अजान अज्ञानी चारो गति के जीवों को स्वभावसे सहजही यह मिथ्यात्व लगता हैं. और भी जैन ग्रन्थ में तीन प्रकारके मिथ्यात्र कहे हैं.-१ लोकीक मिथ्यात्व, २ लोकोत्तर मिथ्यात्व. और ३ कूपरावचनी मिथ्यत्व. इन एकेक मिथ्यात्व के-१ दे- व. २ गुरु, और ३ धर्म इन तीनो से अलग २ तीन तीन भेद करने से १ भेद होते हैं सो अलग २ कहते हैं। (१) "लोकीक देवगत मिथ्यात्व"-जिनो में देव के-भगवन-परमात्मा के जो गुणों हैं वो तो पावे नहीं. औ अनेक दुर्गुणों प्रत्यक्ष में देखने में आवे ऐसे किसी म- नुष्य को देवको या उनकी मूर्ती को देव करके भगवान करके माने सो लोकीक दे- व गत मिथ्यात्व कहा जाताहै; जैसे-१ जिनके पास माला-स्मरणा है, वो प्रत्यक्षही अ ज्ञानी वा अल्पज्ञ देखातेहैं, क्योकि-गिनती-संख्या ध्यान में न रहने सेही स्मरणा रक्खी जातीहै. २ जो "अह ब्रह्मसमी" अर्थात हमही व्रम्हहैं, हमारी पूजा करने से मुक्ति मि- * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अदीशतद्वारी. ४९ लेगी, वगैरा अहंता के भरेहुवे शब्दोचार करते हैं तो प्रत्यक्षमेंही मधान्ध भाश होते हैं इजो विनूल खङ्ग चक्र आदि शख के धारक हैं वो प्रत्यक्ष ही क्रोधाग्नि से मन- लित भाष होतेहैं. (४) जो कहते हैं कि मेही कर्ता हर्ताहूं, मेरे हुकम विन पत्ता भी नही हल स- कता है, मेही सर्व सामर्थ्य हूं वगैरा शब्दोंसे प्रत्यक्ष में अभी मानी देखाते हैं. ५ जो दगल बाजी ठगाइ करते हैं, छिपकर या रुपबदल कर दूसरे को छलते है जैसे मोह- मी का रुप वना भ्रस्मा सुर को भस्म किया ऐसे मायावी गिनेजाते हैं. ६ जो लोभी -लालची होवे. नारेल डोडी जैसे निर्माल्य वस्तु के लोभ में पड शबूओं के नाश जै- सा जुलम कर डाले वगैरा. को लोभी कहते है. ७ यह मेरा घर कुटुम्बैह यह मेरे रा ज्य सेनाहै. यह मेरे ऋद्धि सिदि है ऐसे ममत्ती को रागी कहते हैं. ८ तैमे यह मेरा दोषी दुशमन, शव निन्दक है, इसका नाश हो ! एसे भाव वाले द्वेषी गिनेजाते हैं. ९ जो शोक चिन्ता फिकर करते है. हाय विलापात करते हैं रोतेहैं, शिरउर कूटतेहैं, वगैरा सो शोकीहैं. १०जो कहते कुछही हैं और करते कुछही हैं. मनमे कुछही. और व- ताते कुछही ऐसे झूठ बोलने वाले. पापके हिलाके शास्त्रों का स्थापन कर कुमत का प्रसार करते हैं. ११ दूसरे के वस्त्र भूपण के हरण कर्ता. स्त्री पुवादि को भरमा कर उडाने वाले, इत्यादि चोरी करने वाले होवे १२ रखे यह मेरेसे अधिक होजावे. मेरा राजपाट हरण करलेवे. इत्यादि मत्सर भाव धारण कर अपलरा आदि के पास सेउ नके तप का भङ्ग कराने वाले वगैरा सोमत्सरी कहे जातेहैं. १३ संग्राम करने वाले, शीकार खेलने वाले. यज्ञ होमादि द्वारा-धर्मके नाम से मनुष्य पशु या किसी वस्तु का होम-हवन कराने वाले. भेंते बकरे मुर्गे आदिके घातिकसो हिंसक कहे जाते हैं. १४ स्वस्त्री के या परस्सी के लम्पटी. पुवी और पशु के साथ भोग करने वाले, ऐसे जवर कामी. धुप दीप पुप्फ फल सुगन्ध. शीतोपचार. उप्णापचारके कर्ता कराता. स्वगरी र स्वकुटुम्बादि के प्रेम में रक्त राममंडल खेलना. नाचना नचाना विपय राग गाना. स्त्रीयों के पीछे मारेर फिरना. वाजिव वजाना वज वाना. वगैरे क्रिडा के करने वाले जगत् जीवों को मुखी दुःखी करना. शरापया आशीर्वाद देना इत्यादि अनेक दुर्गुण जिनो में पाते होवे. वो प्रत्यक्ष कुदेव के लक्षण हैं. एमे देवों को तरण तारण दंग्य निवारण जानकर बन्दे पूजे सो लोकीक देवगत मिथ्यात्व. (२) "लोकीक गुस्गत मिथ्यात्व" मो-जिनों की आत्मा में गुरु के (मायु) के ५० में ३ प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड. गुण पावे नहीं, ऐसा को गुरु करके मानेसो गुरु गत मिथ्यात्म. जैसे-जो-सचित्त (स जीव) मट्टी-पाणी-आग्नि-हवा-वनस्पति और वस (हलते चलते जीवों) इन छजीवों की कायका वधकरने वाले, चकारम कारादि गालीयों असत्य वचन के बोलने वाले. वि. नादि वस्तु लेवें चोरी करने वाले, स्वस्त्रीया परस्त्री मे गमन के करने वाले, धन धा- न्य चौपद दुपद आदि परिगृह के रखने वाले, रावी भोजन के कर्ता, मदिरा मांस- कन्द-मूल इसादि अभक्ष वस्तु के भक्षण करने वाले. गांजा तमाखू चडस भांग आदिनशा के सेवन करने वाले, स्नान मंजन तेल अतर सुरमा छापा तिलक वस्त्र भू- पणादि से शरीर को शोभा करने वाले, साफ नग्न रहे वारंगी वेरंगी अनेक तरहके व स्त्र धारण करने वाले, मुंड मुडाना जटा वडाना, भभूत रमाना इसाादि अनेक रुप धा रण कर उदर पूरना करने वाले. इसादि अनेक तरह के गुणविना कोरा आडम्बर- पाखण्ड रचकर जो गुरु तरीके जगत् पूजा रहैं. उनको तरण तारण दुःख निवार- ण जानकर जो वन्दन नमन पूजन करेसो लोकिक गुरु गत मिथ्यात्व. ३ " लोकीक धर्म गत विथ्यात्व" - जो दुर्गति में पडते जीवों को धर-पकड रक्खे - पडने नहीं देवे, ऐसा जो परम लक्षण धर्म का है सो जिस में नहीं पाता, है, फक्त-नाम मात्र धर्म हैं-जैसे देवालयादि वन्धाना, तीर्थ स्नानादि करना, धूप दी यज्ञ हवन दव आदि करना, फल फूल पत्र द्रोव कुंपल छाल आदि तोडना मोडना, पट मलमुर्गे भेंसदि जीवों का वध, इत्यादि कर्मो में धर्म का मानना. तया होली राखी आदि मिथ्या पर्यों का मानना. एकादशि आदि तप नाम धारण कर कन्द मूल पक्कान मिष्टानादि भोगवना. ऋतु दान कन्यादानादि देना, पंच धूनी तापना इत्यादि अनक जो ढोंगी कृत्व्यो है, उसे तरण तारण दुःख निवारण जान पालमा स्पर्शना सो लो- कीक धर्मगत मिथ्यात्व. ४ "लोकोत्तर देवगत मिथ्यात्व" सो जिन-तीर्थकर ऐसा नाम तो धारण कि- या, परन्तु जिनो में तीर्थकर के गुण नहीं, गोशालावत्-उनको तीर्थंकर देव कर माने धन पुत्र स्त्री यश सुख की प्राप्ति के अर्थे-ग्रह दोष निवारन के अर्थे तीर्थंकरो का नाम स्मरणादि करना इसादि इस लोक परलाकेके द्रव्यीक सूखार्थ जो रीतराग तीर्थ करों का स्मरन वंदन नमन पूजन करेसो लोकोत्तर देव गति मिथ्यात्व. ५ "लोकोत्तर गुरुगत मिथ्यात्व"-सो जैन साधुका लिग भेष तो धारण कि या, परन्तु साधुके गुण जिनों में नहीं पाते होवें. पांच महा व्रत पांच समिति तीन मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी. ५१ गुप्ति रहित होते. ही जीव काया का आरंभ करते होवें. इत्यादि अनाचारी होवें उनको गुरु माने. तथा इस लोक परलोक द्रव्यीक मुखार्य सुसाध ओको दान दे बंद न पूजन सत्कार सन्मानादि करे सो लोकतर गुरुगत मिथ्यात्व. ६ "लोकोत्तर धर्मगत मिथ्यात्व" सो-जैन धर्म तो नाम है परन्तु जिनेश्वर के आज्ञानुसार जिस मे करणी नहीं. देव गुरु धर्म निमिन छेही काया का चध, धूप दीप फूल पान फल का चडाना भोगोप भोग लगाना, नाचना बजाना वगेरा हो उसे में धर्म माने. तथा इस लोक परलोक के द्रन्यीक मुखार्थ संवर करणी सामायिक पो- पा आविल उपवास अष्टमादि तप करे सो लोकोत्तर धर्मगत मिथ्यात्व. ७-९"कृमा वचनी देव गत मिथ्यात्व" सो हरी हरादि कुठेव को. "कुमा वचनी गुरुगत मिथ्यात्व" सो-बाबा जोगी आदि कगुरुको, और "कुमा वचनी धर्म- गत मिथ्यात्व सो-यन्न होम स्नान तीर्थव वगैरे धर्म क्रियाको मोक्ष प्राप्ती की इच्छा से मानना वन्दन नमन करना इनहे मोन दाता जानना सो कुमावचनी देव-गुरु- धर्म गत - मिथ्यात्व. और भी-जिनेवर प्रणित शास्त्रों में-१ ओछी-कमी. २ आधिकी-ज्यादा और : विपरीत-अनमिलती श्रद्धनाजानना. पल्पना-कहना. और फर्शना कर ना सो भी तीन तरह के मिथ्यात्व गिने है:-जैसे १ तीस गुप्ताचार्य ने आत्मा को एकही प्रदेशी मानी मो. तया कतनेक मताव लम्बियों आलाको - जवार के दाने जितनी. या दीपक पात्र या अंगुष्ट मामान व- ताते हैं सो. और कितनेक-अपने पर आवेरेलो. तो वात को परीटेलो' इम महवन मुजव गाव के वचनों को लोपेगोपे छिपाचे या अन्य रूपमें परिणामावे इसादि ओछी करे मो पन्पणा मिथ्यात्व. २ 'ऐमेही कितनेक कहते हैंकि"- एकही आल्ग मर्व ब्रह्मान्ड माव पक (भरी) हुइ है. तथा धर्म रक्षणार्थ शुद्ध उपकरण रखने वाले माधु को परिगृह धारी कहना. शास्त्र में श्री महावीर स्वामीके ७०० केरल ज्ञानी चले हैं और १.७॥ तापम को केवल ज्ञान प्राप्त हुवा दनाना वगैरा सर्व प्रपीत नबोंने अधिक परपणा मिथ्यात जाणना. : ऐमेही जितनेक श्री मद्र प्रणि गानों मे विपरीत मन मिलती प्रत्यादि प्रमाण द्वारा मिथ्या जानाती वालों को जो मन्द मने मनाव-एमा कपोल कल्पित व्या- ५२ * प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड ११ मन माने मत चलाने वाले ६ प्रकार के मंत इस वक्त में प्रवर्त रहे हैं. जिनका संक्षे- पित वर्णन ;- (१) बौध दर्शन का - स्वरूप. वौध मति-१ बुद्धि देव, २ संघ (उनके सर्व मतावलम्बि) और ३ धर्म, इन तीनों को 'रत्न वय' मान ते हैं. 'तारा' नामक देवी को उन के शासन (मत) की रक्षक जानते हैं, इन के धर्म गुरुओं-शिर मुंडाते हैं, चरमासनपर वैटते हैं, धातु रंग के वस्त्र रखते हैं, कमण्डल रखते हैं. उने भिक्खु नाम से वोलाते हैं. यह जिस पात्र में भिक्षा लाते हैं, उस में जो पडे उसे शुद्ध समजकर मांस का भी अहार करलेते है. परन्तु ब्रम्हचर्यादि अपनी क्रिया में वडे ट्रह होते हैं, इन की चार शाखा ओं है :- योगाचार, २ सोत्रिक ३ वैभाषिक और ४ मध्यमिक. वौध मतावलम्बि के माननीय चार तत्वों:-१ दुःख, २ समुदाय, ३ मार्ग, और ४ निरोध. इनका खुलासा इस्तरे हैं: पहिले-दुःख को पांच स्कन्ध रुप मानते -१रुप विज्ञान, रस विज्ञानादि निर्विकल्प जो विज्ञाहै सो "ज्ञानस्कन्ध" २ सुखा दुः खा अदु:ख सुखा. यह "वेदना स्कन्ध" पूर्वोपार्जित कर्मों से हुवा बता तेहै. ३ स- विकल्प ज्ञान को "सज्ञा स्कन्ध" कहते हैं. ४ पुण्य अपुण्यादि समुदाय से "संस्कार स्कन्ध" मानते हैं. इसके प्रवोध से पूर्वानुभावका स्मरण होना कहते हैं. ५ पृथ्वीधातु तैसेही रुपादि को "रुप स्कन्ध" कहते हैं. इन पांचों स्कन्धो सिवाय आत्मादि कोइ भी पदार्थ नहीं हैं और यह पांचोही तत्व है सो निसभी नहीं रहते हैं. इन की क्षी- ण २ में प्रवर्ती होतीही रहती है, ऐसा कहते हैं इन दुःख तत्व के कारण भूत दुसरा समुदाय तत्वहो ताहैं:-सो ऐसे है कि-जगत् में राग द्वेप का समोह उत्पन्न होता है जिस से यह में हूं. यह मेरा है, यह दूसरे काहै यह दूसरा है, ऐसा जो भा- * कितनेक अज्ञ मनुष्यों जैन मत को बोध मत की शाखा जानते है, जिसका मुख्य सबब-जैन के चौवीसवे तीर्थकर श्री महावीर श्वामी, और बौध मत के स्थापक बुद्ध देव यह दोनों सम काल में होने का; तथा महावीर स्वामी की ज्ञाती और पिताका नाम बुद्ध देव जैसा होने का जाना जाता है. परन्तु जैन के २३ अवतार बुध के पहिले होगये है, इस लिये जैन मत बहुत प्राचीन है यह बात अब पश्चिमात्य विद्वानोंने भी अनेक प्रमाण से सि- द्ध कर वताइ है.

- -- * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अदीशतद्वारी. ११ व उत्पन्न होता है, सो समुदाय तत्व कहाजाता है. इन दोनो तत्वों कोही संसार की प्रवत्तिके हेतु रूप मानते हैं. इन दोनों तत्वोसे विपक्षीभूत-मार्ग और निरोध तत्वहै, जि- स का स्वरुप ऐसाहै कि-सर्व पदार्थों क्षीणमाव रहकर नाश को प्राप्त होते हैं. कि-उ सीवक्त दूसरी क्षीण मे उसके जैसेही दूसरे पदार्थ उत्पन्न होजाते हैं. पूर्व ज्ञानमें उत्प न हुइ वासना को उत्तर ज्ञान तक ठेरहनेकी शक्ति है और क्षीणक परम्परा पूर्वक जो मानसी पातीत होता है उसका नाम 'मार्ग है. और यह मार्गही निरोध का कार ण है. अर्थात्-चित्तकी निलेश अवस्था सो निरोध है. और सोही मोक्ष है. और भी वोधमति १२ पदार्थ मानते हैं:-श्रोत चक्षु प्राण रस और स्पर्श. यह पांचो इन्द्रियों, और इन पांचो के पांच विपय यों १०. और चित्त तया शब्दा यतन. इन १२ आयतनो की भी श्रीणीक मानते हैं. बौधमतिय-आत्मा को नहीं मा- न ते हुवे फक्त टूटा का अनुनन्धन ज्ञान क्षणों कोही मानते है. इस से यह वात सि- द होती है कि-क्षुधा और को लगी. भोजन अन्य ने किया. और तृप्ति अन्य कोही आइ. तैसेही औषधी अन्य को दी. रोग अन्य का गया. ऐसेही अनुभव और को हु- वा. स्मरण और को हुवा. वन्ध अन्य के हुवा. और मोक्ष अन्य हुवा. तपादिक्लेश कि मीने भोगा. और स्वर्गादि प्राप्ति किसी अन्य कोइ ! यह सब बातों प्रत्यक्ष में अ- न्य मिलती हुइ देखाती हैं. और रात्री भोजन तथा मांस आदि अभक्ष का भक्षण यह प्रत्यन मे अधर्महे इत्यादि अनमिलते बनावसे इसे विपरीत परुपणा मिथ्यात्र कहा जाताहै. (२) नैयायिक दर्शन का स्वरुप. नैयाकै मति-शिवको देव मानते हैं. गोतमामुनि को गुरु मानते हैं. इन के धर्म गुरुओ वडी कोपीन पहनते हैं. कम्बल औहते हैं. जटा रखते हैं. जटामें लिंग रखने हैं. शरीर को भस्म रमाते हैं.बगलमें तम्बी और हाथ में दन्ड रखते हैं. निरम आहार और वनवास पसंद करते है. अतिय पूजा वही प्रियलगती हैं. कन्द मूल फूल फलादि का आहार करतेहे और कितनेक स्त्री रखनेहं. कितनेक नहीं भी रखतेहैं. जो स्त्री नहीं रखनहें वो उत्तम गिने जाने हैं. वृद्धवस्ता प्राप्त होते कितनेक हंमत्ति (ननपना ) धान्न क- रते हैं. शिवजी तिवाय अन्य देव को नमन करने में पाप बताते हैं. उनके भक्तों : नमो मिवाय इम शब्द मे नमस्कार करते हैं. नव वो "नमो शिवाय" इन गल मे आशीर्वाद देते हैं. इनों का मुख्य उद्देश यह हैं. कि-किमीने भी १२ वर्ष पर्यन्त - व दिक्षा का पालन करलिया. फिरखो उसे छोड़ देवे तो भी मोन पाना है. उनकी- -- 1 ) - ५४ * प्रथम अथ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड. ११ १ शैव, २ पाशुपत, ३ महाव्रत धर, और ४ काल मुख यह चार शाखाओं है. औ- र गोतम मुनि ( अक्षपदमुनि) कृत-'न्यायमूत्र.' उद्योत कर मुनिकृत न्यायवृत्ति भा- पा, सर्वज्ञकृत-न्यायसार वगैरा सूत्रों को यह मानते हैं. नैयायिको-१अवल तो कहते हैं कि-सत्तायोग से सत्व है, और फिर कहते हैं कि-सामान्य, विशेष, समवाय, यह पदाथों सत्ता के विनाही सत्तहै. २एक स्थान क- हा है कि-ज्ञान ज्ञान को आप जानता नही है, क्यों कि-अपने में आपही के क्रियाका विरोध होता हैं, और दूसरे स्थान कहाहै कि-इश्वरका ज्ञान आप आपको जानताहै, और स्वात्मा में क्रिया विरोध नहीं है. ३ आकाश को निरवयवी कह कर फिर कह ते हैं कि आकाश का गुण शब्द है (तो अवयव विना शब्दोत्पत्ति कहां से हुइ!)सोभी एक देशमे शुन्यता है सर्वतः नहीं है, और भी यह १६ पदार्थो मानते हैं, उसमें भी बहुत विरोध भाप होताहै. तैसेही इश्वरको कर्ता यह मानते हैं,यह भी बडी विरुधता है. क्यो कि-जो कर्ता हैसो भुक्ताहै, और कृत कर्म फल भोगवनेसे अन्य मे और इश्वरमें क्या तफावत? तथा किसी भी वस्तुकी इच्छा होती है तब वो वस्तु निपजाताहै. और इच्छा है मोही दुःख है, अर्थात्-नन्यता मेही इच्छा होती है, जो इश्वर होकर ही दुः ग्खी हुवा तो फिर इश्वर कायका ? इत्यादि सवव से विपरीत परुपक गिने हैं. (1) वैशेषिक दर्शन का स्वरुप. वपिक पति का श्रद्धान विशेष कर नैयायिक मति जैसाही है, फरक फक्त इननाही है कि-वगैपिक दो ही प्रमाण मानते हैं, और कहते हैं कि-शिवजीने उल्लुका रूप धारण कर कणाद मुनिको वंशपिक मतका स्वरुप बताया है, इसलिये इम मनका नाम " औलुक्य " भी है, यह-तर्कशास्त्र, वैशेषिक मृत्र, प्रसस्तकर भाप्य, किरणा- बची. लीलावती आदि को मानते है. नैयायिक की तरह इन को भी विपरीत परुप जानना. [2] सांख्य दर्शन का स्वरूप. मांख्यमति के-देव-नागयण, और गुरु-त्रिदन्डीये होते हैं. इन के धर्म गुरुओं- कोपीन पहनते है धानुग्ग के वस्त्र रखते हैं, किननेक शिरमुन्डांत है, कितनेक शीखा रखते हैं. और कितनेक जटा बढाते है. मृग चर्म का आमन रखते है, फक्त ब्राह्मण. । के घर काही अन्नवाते हैं. जिम में किननेक तो फक्त पंचग्राम (५ कबल) मात्र ग्वा- - । , -- * मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी. करही संतोष करते हैं, और काष्ट की मुहपति भी रखते है. इसका सबब यह ऐसा बताते हैं कि चाशो च्छास से जो जीवो हिंसा होती है वो इस से बचती है "यह पाणीकी जीवानीकी यत्ना बहूत करतेहै, कहते है कि-"पाणीकी एक सूक्ष्म विन्दूमें से एकेक जीव निकल कर जो भ्रमर जितना वडा शरीर बनावे तो तीनो लोक मे समा- वे नहीं ! इतने जीव एकही विन्दू में हैं ? और इनो मे कितनेक एकेक महीने तक उपवासभी करतेहैं. इनके मतकी मामा इनके "मठार शास्त्र में ऐसी तरह लिखीहै- श्लोक हंस विपच खाद मोद।नित्यं भुक्त्वच भोगान यथाऽभिकाम। यदि विदित कपिल मतं । तत् प्रप्स्यास मोक्ष सौख्य मचिरेण ॥ पंच विंशति तत्वज्ञो । यत्र यत्रा श्रये रतः ॥ शिखी मुन्डी जटिवापि । मुच्य ते नात्र संशयः ॥ अर्थात् कपिल मुनिके फरमाये २५ तत्वो को जानने वाला फिर वो हमे ख- ले खावे पीवे सदा खुशीरहै. चाहे किसी भी आश्रम में रहै शिखा धारी हो या मु- ण्डित हो जैमी रुची होवे वैमार है. तो भी वो सर्व उपाधी मे मुक्त हो अल्प काल में मोक्षपाता है. इसमें संशयही नहीं है. सांख्यमत के माननीये २५ तत्वों का स्वरूप. १ प्रकृत्ति तत्व.-(१) सत्व गुण का मुख लक्षण, चिन्ह प्रसन्नता. प्रमाद-- द्वि-लाघव-आश्रय-अनभिसंग-अद्वेष-प्रीसादि. मत्त गुण के कार्य-लिंग-आर्जव-मार्दव सस-शौच-लज्जा-बुद्धि-भमा-अनुकम्पा.-प्रमादादि. जिमभे मुग्बोनपति होती है. लो क निवामी देवताओं में प्रधानतामे मस गुणकी ही अधिक्यता है. (२) रजो गुणक दुःख लक्षण है. चिन्ह-मंताप-ताप-शोप-भेद-चलिन चित्त-स्तंभ-उदेगादि. यह ग्जो गुण कार्य लिग-द्वेप-द्रोह-मत्सर-निन्दा-वचन-बन्धन-तपादिस्थान है. जिममे दुःग्बोन्प- श्लोक-ते प्राणाद तु यातेन । श्वासे नकेन जंतवः ॥ हन्यते शत सो ब्रह्म । नणु मातानर वादिना ।। अर्थ-मुसहके बिना भागोधाम लेनेमे व अणुमाव गन्दोचार करने मे ह- जारो प्रम्हका ( हजारों प्रापीका ) नाग होता है.

५६ प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड. ति होती है. अधो लोक तिर्यचनरक में प्रधानता से रजो गुण अधिक्य है. (३) ती गुण-मोहलक्षण, चिन्ह दीन पणा. दैन्य-मोह-मरण-अमादन-बीभत्सा-ज्ञान-गौरवादि तमो गुणके कार्या लिंग है. अज्ञान-मद-आलस्य-भय-दैन्य-कृपणता-नास्तिकता-विपा- द-उन्माद-स्वप्नादि तमो गुणके कार्यहैं, मध्यलोकके मनुष्योमें प्रधानतामे तमो गुण अ- धिक है. इन तीनो गुणोकी सम अवस्थाको प्रक्रत्ति कहते हैं; प्रधान, अव्यक्त, प्रक्र- त्तिके नाम है, यह प्रकृत्तियों उत्पन्न और प्रलय रहित स्थिर होनेसे नित्य मान ते हैं. और अन्वय असा धारणी, अशब्दा, अपर्शा, अरसा, अगंधा, अव्यया, इन गुण मय प्रकृत्ति को कहते है.२ प्रकृत्तिसे महान नामे दुमरा तत्त्र अत्पन्न होताहै, इसे बाद भी कहते हैं. जिससे जड चैतन्य मनुष्य पशुका भेद मालुम पडता है. इस के-(१) धर्म, (२) ज्ञान, (३) वैराग्य और (४) एश्वर्य, यह ४ साविक बुद्धि के रूप; और (2) अधर्म, (२) अज्ञान, (३) अवैराग्य, और (४) अनैश्वर्य, यह ४ तामसी बुद्धिके रूप यों ८ रूप हैं. ३ इस बुद्धि तत्व से अहंकार नामक तीसरा तत्व उत्पन्न होताहैं. (अ- हंकार से १६ गुण उत्पन्न होते हैं) ४ स्पर्ग, ५ रस, ६ घ्राण, ७ चक्षु, ८ श्रोत्र, (इन पांचों को ज्ञानेन्द्रिय कहते हैं, क्योंके यह अपने विषय को आप जानती है.) ९ वायु (गुदा), १० उपस्थ, (पुरुष चिन्ह स्त्री चिन्ह), ११ वच (शब्द), १२पाद(पग) १३ हाथ (इन पांचो को कर्मेन्द्रिय कहते हैं, क्योक यह काम देती है), १४ मन(यह जव ज्ञानेन्द्रिय से मिलता है तव ज्ञान रूप बन जाता है और कर्मेन्द्रिय से मिलता है तव कर्म रूप वनजाता है क्योंकि इस कि संकल्प वृत्ति है,) १५ रूप तनमात्र से-शुक्ल कृष्णादि वर्ण, १६ रस तन मात्र से तिक्तादि रस १७ गन्धं तन्माव से-मुरम्बदि गंध. शद्र तन्मात्र से भज्जुलादि शब्द विशेप, ११ स्पर्शतन्माव-से-मृदु कठिनादि स्पर्श (यह १६ गुण अहंकार से होते हैं) २० रूप तन्मात्रसे-अग्निकी उत्पत्ति होती है. २१ रसतन मात्र से-पाणी उत्पन्न होता है, २२ गन्ध तनमात्र से-पृथ्वी उत्पन्न होती है, २३ शब्द तन्मात्र से-आकाश उत्पन होता है, २४ स्पर्श तन्माव से-वायु उत्पन्न हो- ता है (यो ऊपर कहे पांचों तन्मात्र से पांचो भूतों कि उत्पत्ति होति है) और २५ वा "अकर्ता विगुण भोक्ता" अर्थात-अकर्ता आत्मा विपय सुखादि के लिये पुण्यादि का कर्ता नहीं है, इसलिये अकर्ता है, क्योकि आत्मा वण मात्र तोडने समर्थ नहीं हैं, इसलिये कर्ता प्रकृति ही है, क्योकि प्रकृत्ति में प्रवृत्ति का स्वभाव है. “विगुण"-आ- सत्वादि गुण रहित है, क्यो कि-सत्वादि गुण प्रकृत्ति का धर्म है. “भोक्ता" * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान राहणे अढीशतद्वारी. ११ आत्मा भोक्ता भी नहीं है. परन्तु प्रकृत्तियों के वीकार भूत उभय मुख दर्पणाकार जो बुद्धि है उस मे संक्रमण होनेसे निर्मळ आत्म स्वरूप के विष सुख दुःख प्रति वि- म्बित होनेसे उदय मात्र भोक्ता कहलाता है. जैसे स्फटिक मणी के पास जैसे रङ्ग का पदार्थ होता है वैसेही रङ्ग मय वो मणी प्रति भाप होती है, यह सांख्य के २५ तत्वोंका स्वरूप संक्षेप में हुवा. सांख्य मति-सत्व रज और तमो गुण से उत्पत्ति मान ते हैं सो अन मिलतीहै. क्योंकि-गुनी से गुन उत्पन्न होते हैं, परंतु गुनसे गुनी की उत्पत्ति कदापि नहीं होती है; जैसे मट्टी से घडा बनता है, परन्तु घडे से मट्टी कदापि नहीं बनती है. तैसेही आ स्माको अकर्ता अभोक्ता मानना सो भी रिथ्या है. क्योंकि आत्म शक्ति की सत्ता विना किसीभी जड पदार्थों में वस्तु उत्पन्न करने की और सुख दुःख रूप कर्म फल वेदने की शक्ति नहीं हैं. इत्यादि सबब से यह भी विपरीत परुपक गिने जाते हैं. (५) मीमांस दर्शनका स्वरूप. मीमांस मत का दूसरा नाम 'जेमिनीय' भी कहते है. इनके देव ब्रम्हा, और गुरु वेदो कोही मान ते है, अन्य किसी को भी गुरु नही मानते हैं. इन के धर्मावल- म्बियों-सांख्यमति की तरह ही-कोइ एक दन्डधारी. कोइ विदंड धारी होते हैं. धातु रङ्ग के वस्त्र पहन ते है, मृगचर्म के आसन पर बैठते हैं. कमन्डल रक्खते हैं, शिर मु- न्डाते हैं, यज्ञोपवित को तीन वक्त धोकर पानी पीते है. शूद्र जातिका अन्न नही खा ते हैं. अपन को 'सन्यस्त' कह कर वोलाते हैं, ब्रम्हको अद्वैत मानते है, और सब शरीर मे एकही आत्मा मानते हैं. और आत्मा में लय हो जाने कोही मुक्ति मान ते हैं. अन्य-मुक्ति की नास्ति बताते है. मीमांस मत की दो शाखा है-१ पूर्व मी मांम और उत्तर मी मांम. इन पूर्व मीमांसी तो बहुतकर गृहस्थाश्रमीही रहते हैं, और उत्तर मीमांभी ओंकी ४ मा * श्लोक-एक एवहि भूतात्मा । भूते भूते व्यवस्थितः ॥ एकधा बहुधा चैव । दृश्यते जल चन्द्रदत ।। अर्यात्-जैसे पानीके भरे हुवे अनेक घडों में एकही चन्द्रमाका प्रति विम्ब अलग २ दिखता, तैसेही एक परमात्मा नर्व आत्मा में व्यापे हमे हैं.

" # प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड ११ खा है:-१ विदन्डी, सशिखा, २ ब्रम्हमूवी. ३ गृहत्यागी, और ४परिगृही. इनमें- एकही वक्त पुत्र के घर में भोजन कर ने वाले, कुटि में रहने वाले, इने 'कुटिचर' कहते हैं. २ पूर्वोक्त लिंग युक्त विम के घर का निरस आहार करने वाले, नदी के किनारे रहने वाले, को 'बहुदक' कहते हैं. ३ ब्रम्ह मूव, शिखा सहित, कपायवस्त्र, दन्डधारी, ग्राम मे एक रावी और नगर में तीन रात रहने वाले, ब्राह्मण के घर में धूम्र रहित अग्नि हो तब भोजन करने वाले, तपश्चर्यामे शरीर को मुकाने वाले, जो देशों देश फिरते रहते हैं, उनको 'हस' कहते हैं. इन को जब ज्ञान उत्पन्न हो जाता है तव चारो वर्ण के घर का आहार कर ते हैं, और शरीर विलकुल अशक्त हो जा- ता है तव अनसन कर देह त्याग ते हैं. और ४ वेदान्तक एकाध्यायी को 'परम हं. स' कहते हैं. यह कहते हैं कि-"हिसा गार्यत्" अर्थात् जो हिंसा इन्द्रियोंको और व्यश्न- पोपने को की जाती है वो हिसा गिनी जाती है. परन्तु वेदोक्त-अश्वमेध, गौमेध, नर- मेध, अजामेध, मधु सपर्क, और पिन तृप्ति के लिये जो हिंसा की जाती है वो हिंसा नहीं गिनी जाती है. और इनही के वेदोंकी स्मृति में ऐसा लिखा है :- श्लोक-श्रुयुतां धर्म सर्वस्वं । श्रुत्वा चैव धार्यतां ॥ आत्मानः पतिकूलानि । परेषां न समाचरेत् ।। अर्थात्-धर्म श्रवण कर धारन करने का येही सार है कि-किसी आत्मा के भी प्रतिकूल (दुःख प्रद) कृतव्य कदापि नही करे! श्लोक-अन्धे तमास मज्जाम । पशुभिर्ये यजा महे ॥ हिंसा नाम भवे धर्मों । न भूतोन भविष्यति ॥ अर्थात-वेदान्ति का कथन हौक-यज्ञ निमित पशुका वध करने वाला अन्ध और तामसी मनुष्य है, क्योकि हिंसा करने से धर्म न कदापि नहुवा और न होगा!! तथाच तत्व दर्शिनः पठन्ति :- श्लोक-देवो पहार व्याजेन । यज्ञ व्याजेन वाथवा ॥ घ्नन्ति जन्तुन् गत घृणा | घोरान्ते यान्ति दुर्गति ।। अर्थात्-देवो की तृप्ति के निमित और यज्ञ के निमित जो पशु का वध करते - मुक्ति मापाने-श्री गुणस्थान रोहण अडीगतद्वारी.* हैं वो घोर (अति दुःख पद) दुर्गति में जाते हैं. ऐसे बहुत से दाखले दया धर्म की- पृष्टि के उनोके शास्त्रोंमें होते हुवे भी यज्ञ और पिवादि नियत हिंसा करनेमें दोष न- ही मानते हैं. वल्के धर्म मानते है. इमालिये यह भी विपरीत पम्पक मिथ्यावी गिने हैं (६) चार्वाक दर्शन का स्वरूप. चार्वाक मत का दूसरा नाम नास्तिक मत भी कहलाता है. इन के न तो कोई देव है. और न कोई गुरु हे फक्त कोड २ देवीको मानते हैं. इनके गाव में ऐना लिया है :- श्लोक-पृथ्वी जलं तथा तेजो । वायु र्भूत चतुष्टयम् ।। आधारो भूमिरे तेपां । मानं त्वन जमवहीं ॥१॥ पृथव्यादि भूत संहत्या । तथा देह परिणतः ।। मदशक्तिः सुरांगे भ्यो । यद तद विदात्मनि ॥२॥ अर्थ-पृथ्वी. पाणी. अनि और वातु इन चागे भनी के आगर मेरी मां श्रे. टि. और जमे-गुड मत्वा पाणी और आग्निहन चागे के मंचोन मग । दार । नामक पदार्थ उत्पन्न हो उन्मादका कर्ना होता. ने नही उमगेन बागानो के मंगे ग मे आत्माजीव उत्पन्न हो अनेक देवा करता है. औदन चार्गे मिया बिनाग मे आन्याका भी बिना होता है. इन चागे मनो विचार माद में दम- न कोड पदार्थ की कही न कोह जीव है और न वोह पुल पार है. नोकिए. प्य पाप के फल भुत्ता ने के लिये गन्ध और तो होरटी वने यानोको निटर दनमान महंगामी पानीमा नी. और मनोने बारेमाने में उत्तर दिन पर दिन नदिन न में पा सब भेले होमी वो सीएनजी का की गर मार्ग काली पन आदि का त । गर्व धना मे विन्द विपीन पदे रिका और भी वामांगनी धम्म मा" भाव-को दे द::: जन्म नो पाप -- - A Here- प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड. * सूत्र-जेय अतीता जेय पडुप्पन्ना जेय आगमिस्सा अरहन्त भगवन्तो ते सव्वे वि-एवं माइक्खन्ति एवं भासन्ति एवंपण्णवन्ति एवं पवेति-सब्बे पाणा सव्वे मुया सव्वेजीवा सव्वे सत्ता-गहन्तवा, ण अजवेयव्वा, णपरिघातब्वा, णपरिता वेयब्बा, ण उद्दबयवा, एस धम्मे सुद्धे णितिए सासए, समेचलोयं खेयन्नेहिं पवेतित्त. अर्थ-मुधर्मा श्वामी फरमाते हैं कि-अहो जंबु ! जो तीर्थकर भगवन्त-गये का ल में हुवे, दर्तमान में हैं और आवते काल में होंगे उनसवों का एक यही फरमान है कि-"सर्व प्राणी (वेन्द्रिय तेन्द्रिय. चोरीन्द्रिय ) सर्वभूत (वनस्पति) सर्व जीव (प- चेन्द्रिय) और सर्व सत्व (पृथवी-पाणी-अग्नि-हवा ) इनको मारेनहीं, परिताप उपजावे नही, बन्धन मे डाले नहीं, उपद्रव्य करे नही, किसीभी तरहसे कदापि किंचित माव दुःख देवे नहीं, सोही दयामय धर्म शाश्वता सनातन है; ऐसा खेदज(पर दुःख के जा- न) श्री जिनेश्वरो भगवन्तों का फरमान है. ऐसे दयामूल शुद्ध पवित्र धर्म को अधर्म श्रद्धे सो द्रव्य से धर्म अधर्म श्रद्वान हुवा, और निश्चय मे आत्म स्वभाव ज्ञानादि गुणों सं रमणात से जो धर्मोत्पत्ति होती है, उसे भूल पुद्गलानन्द जड पदार्थो से धर्मोत्पत्ति समझे सो धर्म अधर्मसज्ञा मिथ्यात्व. २ "अधम्म धम्मसन्ना" अधर्म को धर्म श्रद्धे, अर्थात् यह जीव अनादि से अ. धर्म मार्ग में रमण कर रहा है, इसलिये अधर्म मार्ग मे सहज रुची होतीहै, उस स्वभाव का घेरा हुवा हिंसा आदि पांचो आश्रव के सेवन में-अश्वमेघादि यज्ञों में, हिंसक पू जा, तीर्थस्नानादि. या वकरीईद जैसे कृतव्यो में धर्म माने सोअधर्म धर्म सज्ञा मिथ्यात्व. ३ "साहू असाहू सन्ना" कितनेक भोले जीवों साधुके गुणो से विलकुलही अ वाकिफ होकर सब मनुष्यों जैसेही साधु ओं को जानते हैं-साधु संसारी के भेद भाव में नहीं समझें, तथा जगत मे सत्पुरुष तो थोडे हैं, और पाखण्डियों मुडचीरे बहुत हैं, उ नको देख उनके जैसेही-शान्त दान्त ज्ञानी व्यानी तपी जपी आदि गुण सागर मुनि वरों को समझते हैं, तथा किननेक कुमत पक्ष में तने हुवे अपने पक्षक (सम्प्रदायके) * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थाम रोहण अढीशतद्वारी.* साधुओं को छोड़ कर और अन्य सब साधुओं को असाधु समझते हैं, ऊपरोक्त गुण संपन्न मुनिवरोंको निंदक लप्पक भगवन्त के चोर आदि कहेसो साधु असाधु सजा मिथयत्न ४ "असाहू साहू सन्ना "-अर्थात्-असाधुको साधु श्रद्धे जैसे कितनेक कुल परापरा से चले आते मत में फसे हुवे साधु के गुण अवगुण जानने की विलकुल ही दरकार नहीं रखते हुवे सारंभी. सपरिगृही, विषयी, कपायी. ग्रहस्य जैसेही कृत- व्योंके करने वाले मन्वादि से भरमाकर. सरापादि से डराकर जो पेट भराइ कर ते हैं. मिथ्या अडम्बर वडाते हैं. ऐसे ढोंगी धूतारों को जो साधु माने सो असाधु साधु सज्ञा मिथ्यात्व. ५ "जीव अजीव सन्ना"-अर्थात्-जीव को आजीव श्रद्वे, जैसे कितनेक चार वाक-नास्तिक मतीयो-पंच भूत वादीयों, पृथव्यादि के संयोग से ही जीवोत्पत्ति और भूतोंके वियोग से जीव की नास्ति कहते हैं. कितनेक अद्वैतवादी अनेक जीवोंसे भरे हुवे इस विश्व में फक्त एकही आत्मा व्यापक वहाकर सब जीवों की नास्ति कर ते हैं. कितनेक असंख्य जीवोंका पिण्ड जो मट्ठी पाणी अग्नि हवा है और अनन्त जीवोंका पिण्ड जो वनस्पति है, इनको निर्जीव मानते हैं. कहते होंके यह तो भोगोप- भोग के लिये स्वभाविक ही उत्पन्न हुवे हैं. ऐसे ही कितनेक कीडी मकोडी आदि हलन चलन करते हुवे कोही निर्जीव बताते हैं. ऐसे ही कितनेक जैनीयों भी सूका अनाज विगैरे में निर्जीव-चित्त सज्ञा धारन कर ते हैं, सो सर्व जीव अ. जीव सझा मिथ्यात्व जानना. ६ "अजीव जीव सन्ना"-अर्थात् अजीवको जीव माने. जमे कितनक धातु पापण वख काष्ट आदि की बनाइ हुइ मूर्ती को साक्षात मनुप्य या पशु तुल्य समज ते हैं. देवता के वैक्रिये किये पुप्पादि को मजीव कहते हैं. इत्यादि जो श्रद्वे मो अ- जीव जीव सज्ञा मिथ्यात. ७ "मग्ग उमग्ग सन्ना"-अर्यात्-मार्ग को उनमार्ग श्रद्धे, जैमे ज्ञान, दर्शन, चारिक, तप. दान. शील, क्षमा. दया. शरलना. निर्लोभतादि जो सीधा मत्य मोक्ष का मार्ग सर्वन ने प्रकाश किया है. उमे मंमार परि भ्रमण करने का कारण बतावे । वगैरा श्रद्धेमो मार्ग उन्मार्ग महा मिथ्यात. ८ "उमग मन्ग मन्ना"-अर्थात उन्मार्ग को मन्मार्ग श्रद्धे. मे-क्रिडा कितु- हुल लीला नाचना गाना बजाना यह होमादि करना. इत्यादि धूम धाम को मोक्ष प्रत्यक्ष में " ६२ प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल दाग रोहण सण्ड. मार्ग समजे सो उन्मार्ग को सन्मार्ग सज्ञा मिथ्यात. ९ "रुखी अस्वी सन्ना"-अर्थात् रूपी वस्तु को अम्पी माने, जैसे प्रमाण पु. द्गल, कर्म वर्गणा, वायु काय आदि रूपी पदार्थ होकर भी दृष्टि गोनर नहोनेसे अम्- पी माने सो मिथ्यात्व. ११ "अख्बी म्वी सन्ना"-अर्थात् अरूपी पदार्थों को रूपी माने, जमे धर्मास्ति काय आदि पंचास्ति काय जो अरूपी है उने, रूपी कहे, मिद्ध भगवन्त जो अवर्ण अगंधादि गुण संपन्न हैं. उनको रक्त वर्णादि को स्थापना करे, जो जीवों मोक्ष प्राप्त हो अरूपी अवस्था धारण करी है उन्हे पुनः अवतार धारण कर रूपी हुवे बतावे. आकाश जो अस्पा है उसे शब्दादि गुणमय कहे. परमात्मा जो अम्पी है, उन में श्रेष्टि रूपी की उत्पत्ति कहे, वगैरा अम्पी को रूपी सज्ञा मिथ्याल. और भी ७ प्रकारके मिथ्यात्व जैन ग्रन्योंमें कहे हैं सोः- १. "अविनय मिथ्यात्व"-अर्थात्-श्री जिनेश्वर के, सदगुरुओ के, शास्त्रों के वचनों को उत्यापे; भगवन्तको भी भूले-चूके वतावे; चतुर्विध संघका ज्ञानी ध्यानी तपी जपी त्यागी वैरागी इत्यादि गुणवन्तों की निन्दा करे-अवर्ण वाद बोले, इत्या- दि आवनय करे सो मिथ्यात्व. २ "अशातना मिथ्यात्व" अर्थात्-३३ अशातना करे, गुणोवृद्ध, वयोवृद्ध मान्यवन्त सत्पुरुषोका सत्कार सन्मान नही करे. संताप उपजावे, या ताडना तर्जना- दि आशातना करे सो मिथ्यात्व. अकिरिया मिथ्यात्व"-अर्थात्-कितनेक तो आत्मा को आक्रया ही मा- न ते हैं, अर्थात्-आत्मा न तो शुभाशुभ कर्म की कर्ता है और न भुक्ता है, और कि तनेक आत्मा साधन का उपाय जो यम नियमादि क्रिया की जाती है. उसे व्यर्थ-निर्थ क बताते हैं. कितने फक्त एक ज्ञान सेही सिद्धी मानते हैं. क्रिया का साफ निषेध करते हैं. वगैरा यह सब अक्रिया वादी मिथ्यात्वी में गिने जाते हैं. ४"अज्ञान मिथ्यात्व"-अर्थात्-जहां अज्ञान है वहां नियमासे मिथ्यात्व होताही है क्योंकि अज्ञानी धर्मा धर्म-शुभाशुभ कृतव्योंको और उनके फलसे अविज्ञ रहकर, फक्त अन्यके देखा देखी क्रिया करते हैं, और फक्त उस क्रिया से ही मोक्ष मानते हैं. यह ज्ञान का निषेध करते है, इसलिये अज्ञानी मिथ्यात्वी हैं. ५ “परिवर्तन मिथ्यात्व"-अर्थात्-सम्पत्ती तो हैं, परन्तु सुशामदी से ला- سر * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी.* लच वश हो मिथ्यात्वी के मिध्याकृतव्यों में सहाय करना मिथ्यात्वीयों से मिलकर रहना. मिथ्यातीयों के जैसे कृतव्यों करना. सो परि वर्तन मिथ्यात. ६ "परिणाम मिथ्याव"-अर्थात्-व्यवहार में तो सम्यक्त्त का पालन कर ते परन्तु अभ्यन्तर में मिथ्यात्व मोहका उपशम न होने से परिणामों से मिथ्यात्व का सेवन होता है सो परिणाम मिथ्याल. ७ "प्रदेश मिथ्यात्व"-अर्थात्-जो अनादि काल से मिथ्यात्व के दलिये खीर नीर की तरह आत्म प्रदेशों के साथ मिल रहे हैं. डो भायिक सम्यक्त की प्राप्ति होनेसे ही दूर होते है. जहां तक क्षायिक सम्यक्त्व की प्राप्ति न होवे वहां तक प्रदेश मिथ्यात्व गिना जाता है. (इसकी सत्ता इग्यारवे गुणस्थान तक पाती है. क्योंकि वो पडबाइ हो मिथ्यात्व तक आजाते हैं) यों शाखों और ग्रन्थों के आधर से मिथ्यात्व के ३४ भेद लिखेगये हैं. यह लक्षणों जिनों में पाते होवें. उन्हें मिथ्यात्वी जानना. दुसरे और तीसरे गुणस्थान का अर्थ मूल मुझवही समझना कुछ विशेप न हो नेसे न लिखा. चौथा अविरति सम्यक दृष्टि गुणस्थान के लक्षण:- जीवादि नव तत्वों के द्रव्याथिक और पर्यायार्थिक नय कर बताया निश्चय और व्यवहार कर द्रव्य से क्षेवमे कालसे और भाव से जाने सो कहते हैं; १ "जीव तत्व"-सदा जीवता रहे. चेतना लक्षण युक्त;, दश द्रव्य प्राण और चार भाव माण का धारक, प्रदेश आत्मक. ज्ञान दर्शन स्वभाव. द्रव्यार्थिक नय से निस. पर्यायार्थिक नय मे अनिस. परिणामी द्रव्य. व्यवहार नय में कर्म का कर्ता और भोक्ता. निश्चय नय से शुद्ध चित्त पर्याय का कर्ता. निज स्वल्प का भोक्ता. उदयीक भाव के मिलापक रूप. उमन्तके चेष्टादि लिंग गम्य. केवली के प्रसन श- रीर प्रमाण. अम्पी मो जीव द्रव्य. और (१) दव्य मे निश्चय नय के मन मे सर्व एक रूप हैं. व्यवहार नय के मत मे-नरक नियंत्र मनुप्य देवादि में अनेक रूप धारण करते हैं. (२) भेव मे मर्व जीवो असंख्यात प्रेर्दशा लोक व्यापी हैं. (३) का. से निश्चय नय के मत से धोव्य आनादि अनन्त. व्यवहार नय के मनने चान गति । में शरीर धारण की अपेक्षा उत्पात व्यय होताही रहना है जिम मे. मादी मान्न है. : (४) भाव मे-निश्चय नय के मन मे नव जीवों परिणामिक भाव में-अपने २ स्वभाव ; - - - प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड. मे प्रवृतते हैं. और व्यवहार नय के मत से मंमारी जीवों शुभाशुभ भाव मे परीण मते हैं. २ "अजीव तत्व"-सदा निर्जीव रहे, जड लक्षण, प्रमाणड आल्पक पुद्गला प्रदेश आत्मक, धर्मास्ति आदि तीनों द्रव्य- ट्रव्यार्थिक नय मे नित्य, पर्यायार्थिक नय से अनित्य, घट पदादि रूप पलटता रहै, परिणामिक द्रव्य, और (१) द्रव्य मे-धर्मा स्तिके द्रव्य का चलण सहाय गुण, अधर्मास्तिके द्रव्य का स्थिर महाय गुण, आ- कास्तिके द्रव्यका विकागदान गुण, काल द्रव्य का-पर्याय परावर्तन गुण, पुद्गल द्रव्यका पूर्ण गलन. (२) क्षेवसे-धर्मास्ति अधर्मास्ति और पुदालास्ति लोक व्यापक, असंख्या प्रदेशी, आकाश लोकालोक व्यापक, अनन्त प्रदेशी. काल व्यवहारसे अढाइ द्वीप-समय क्षेत्र व्यापक वर्तनसे सर्व लोक व्यापक अप्रदेशी, (३)कालसे द्रव्य नय की अपे- क्षासे तो पांचों ही द्रव्य अनादि अनन्तहैं. और पर्याय से देश प्रदेश आश्रिय या अगुरू लघु आश्रिय धर्मास्ति अधर्मास्ति उत्पाद व्यय आश्रिय काल, पूर्ण गलन आश्रिय या स्कन्ध परमाणु आश्रिय पुद्गल सादि सान्त हैं. (४) भाव मे चारों द्रव्य तो वर्ण गंध रस स्पर्श रहित हैं, और पुद्गल वर्णादि सहित है. ३ "पुण्य तत्व"-किये कृतव्यों का पुनः शुभ फल दाता सो पुण्य, मुखदा ता लक्षण, पुद्गालिक पदार्थ, आत्मोन्नति कर्ता. साता वेदनीय आदि शुभ प्रकृत्ति का भोगवना सो द्रव्य पुण्य, दान दयालुता, सराग संयम, शुभ परिणामों की प्रवर्ती सो भाव पुण्य. और (१) द्रव्य से-पुण्य के ४२ भेद. (२) क्षेत्र से-पुण्य पुद्गल लोक व्यापी, (३) कालसे-अभव्य आश्रिय संतति अनादि अनन्त, भव्याश्रिय अनादि सां- त, (४) भाव से १ प्रकार से १ प्रकार से पुण्य उपार्जन होवे. ४ "पाप तत्व"-जो अवनति दिशा में आत्मा को प्राप-पटके सो पाप, दुः- ख दाता लक्षण, पद्गालक पदार्थ, मिथ्यावादि कर्म प्रकृत्ति सो द्रव्य पाप, मिथ्यत्वा दि के उदय से उपहत मलीन परिणाम सो भाव पाप. और (2) द्रव्य से भोगवने के ८२ भेद, (२) क्षेत्र से-पाप पुद्गल लोका व्यापी, (३) काल से-अभव्याश्रिय अना दि अनन्त, भव्याश्रिय अनादि सान्त, (४) भाव से-१८ प्रकारे पापो पार्जे. ५ "आश्रव तत्व"-कर्म पुद्गल आनेका मार्ग सो आश्रव पुद्गलिक प्रणति रूप, उदायक भाव की प्रणति रूप सो भाव आश्रव, तसनिमित रूप कर्म दलका आग- म सो द्रव्य आश्रव. और (१) द्रव्य से पुण्य पापादि रूप दलिक का संचय करना ६५ ६ मुक्ति सापाने-श्री गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी. सो, (२) क्षेव से-लोक व्यापि. (३) काल से-अभन्याश्रिय अनादी अनन्त, भव्या- श्रिय अनादि सान्त. (४) भावाश्रिय-पुन्य पापका उपार्जन करना सो आश्रय. ६"संवर तत्व"-आते हुवे कर्म पुद्गलों को रोक देवे-आत्मा को लगने न देवे सो संवर, आत्म परिणती रूप. निरुपावि लक्षण, भायिक क्षयोपशमादि भाव रूप, भाव संवर, उस निमित प्रवीतो द्रव्य संवर. और(१) द्रव्य से संवरके ५७ भेद. (२) क्षेत्र से चउदह राजू लोक (वस नाल) प्रमाणे. (३) कालसे-क्षायिक भाव आश्रिय सादि अनन्त, और भयोपशर्मिक भाव आश्रिय सादि सान्त. (४) भाव से अपने स्वरूप-ज्ञानादि गुणों में रमण करना सो सम्बर. ७ "निर्जरा तत्व"-आत्मा से सम्बन्ध पाये हुवे कर्म पुद्गलों का झडना सो निर्जरा. संयम तपादि जनक भाव सो भाव निर्जरा. और उससे जोजो कर्म पुद्गल आत्माभे दूर हुवे सो द्रव्य निर्जरा. और (१) द्रव्य से-निर्जरा के १२ भेद, (२)क्षे- वसे-चउदह राजु लोक (वस नाल) प्रमाणे. (३) काल मे-मादी सान्त. (४) भाव से सर्व इच्छाका निम्धन कर सम भाव मे प्रवर्तन होवे सो निर्जरा. ८ "वन्ध तत्व"-शुद्धात्म गुणो के प्रतिकूल जो कयाय विषयादि गुणों है उ- नमे आकर्ष कर जो कर्म पदलों का आत्मा प्रदेशोंके साथ सम्बन्ध होवे सो बंध. कर्म को ग्रहण करने रूप जो चिक्कणाम लिये सत्ता है सो भाव वन्ध, उसके जोग से जो कर्मों के दलीकोका जमाव होकर ठेहरे सो द्रव्य बन्ध, और (१) द्रव्य मे वन्ध के चार प्रकार. (२) क्षेव भे-लोक प्रमाण. (1) काल मे-सादी मान्न. (४) भाव से राग द्वेप अजानता रूप चीक्काम मो बन्ध. (२) मोन तव"-ममूल कर्मों का नाश कर आत्माका छुटकारा होना मो मो- भ. क पडलों के दूर होने मे स्वानुभव होना सो भाव मान. जिनानुभव मे कर्मोके वन्धन से छूटना मो द्रव्य मोन. और (१) द्रव्य मे मोक्ष माधन के ४ कारणों, तथा केवल बानी मो द्रव्य मोस. (२) क्षेवभे-अदाइदीप प्रमाण. (३) काल मे-मर्व मिढों आश्रिय अनादि अनन्त. एक निद्ध आश्रिय मादि अनन्न. (४) भावमे मई को मे निर्मुक्तो मिद क्षेत्र में जो मिद्ध भगवन्न अनन्त ज्ञानादि गुणयुक्त विगनने हैं मो भाव मोभ. यों यह नवों पदार्थो-न्यार्थिक नय मे निन्य.. पर्यायार्थिक नयने अनिन्य है. निश्चय नय मे अभिन्न हैं. व्यवहार नय मे भिन्न है. नामान्य नपसे एक. विशेप नर ।

६६ . . प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्राग गहण गण से-अनेक, मान नयमे ज्ञेय, क्रिया नयम-हेयोपादेय, परम्पर मा पेक्षा, अनन्न धर्मा त्म कथंचित-उत्पन्न, कयंचितादि नष्ट. कान्त धीच्यः यों विरुप एकही ममयमें श्रद्धे और भी इने नय निक्षेपे प्रमाण आदि द्वारा जिनेन्द्र प्राणिन मूबानुमार श्रद्धने की :- ची रक्खे सो चतुर्थ गुणस्थान वर्ती धर्मात्मा जानना सम्यक्त्ती के ६७ लक्षणों का अर्थ मूल प्रमाणेही जाणना. पांचवे गुस्थान के लक्षण. "श्रावककी १.१ प्रतिमा." आर्य-श्रावक पदानि देव । रेकादश देशितानिय पुखतु ।। स्वगुणाः गुणैः सह । संत्तिष्टन्ते क्रम विवृद्धा ॥१॥ अर्थ-श्रीजिनेश्वर भगवन्त ने श्रावकों को गुणवृद्धि करने के इग्यारे स्थानक फरमाये हैं, उनमें श्रावको प्रवर्त तेहुवे जो जो योग्यता को प्राप्त होते, त्यों त्यों पाछे के गुणों में कायम रहते हुवे आगे को गुणों की वृद्धि करते जाते हैं. आर्या-दसण वय साझाइय । पोसह सचित्त राइ भत्तेय ।। वंभारंभ परिग्गह । अणुमण उदिट्ट देश विरदोय ॥२॥ अर्थ-उन ११ स्थानक के नाम-सम्यक्त्व, २ व्रत, ३ सामायिक, ४ पोप- ध, ५ राविभोजन त्याग, ६ साचित त्याग, ७ ब्रम्हचर्य ८ आरंभ त्याग, १ परिगृह साग, १० अनुमति विरत, और ११. उदिष्ट विरति देशविरति. इस प्रकार से अनुक्र- में गुणों वृद्धि करते हैं. आगे इन १.१. ही स्थानक कोंका अलग २ विस्तारसे स्वरूप कहत हैं:- आर्या-सम्यग् दर्शन शुद्ध । संसार शरीर भोग निर्विएण ।। पंचगुरू चरण शरणं । दर्शनिक स्तत्त्व पथ गृह्य ।। ३ ॥ अर्थ-देश विरति-श्रावक का पद प्राप्त करने का अबलही पंक्तिया सम्यक्त्व है, जिसका विस्तार से वर्णन चौथे गुणस्थानमें कियागया है. उनगुणों संयुक्तही नी- व इन पञ्चम गुणस्थान में प्रवेश कर यहां सम्यक्त्व की विशेपशुद्धि करते हैं. अ- र्थात-संसार से शरीर से और भोगों से विरक्त भावी होते हैं. संसारिक कुटम्बको * मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी. १ ६७ - तो मतलबी जान धायमाता (दूध पिलाने को रक्खी हुइ धाय) बच्चेको लाडलडाती हु इ भी विरक्त रहे त्यों ममत वन्धसे विरक्त रहै. व्यापारी ज्यों लाभोपार्जन की इ- च्छा से द्रव्य व्यय करते हैं. त्यों शरीर को धर्म करणी करने पोपते हुवे विभूपादिसे विरक्त रहै, और ज्यो व्यश्नी अफीम को जहर जानते प्रमाण युक्त भोगवते है, त्यों भोगोपभोगका प्रमाण कर विरक्त रहते हैं. अहन्तादि पंच परमैष्टि केही शरण भूतजा नते हुवे अन्य का शरण स्वम मावमे भी नहीं वांछते है, और सर्वज्ञ प्रणित तत्वों के ज्ञान को पथ्य (रुची कारक ) आहार की माफि गृहणकर परिणमाते-पचातेहै. सो दर्शनिक-सम्यक्त रूप प्रथम स्थानक मे प्रवर्तक देशविरती श्रावक कहे जाते हैं. "शट्टा काला विचिकित्सा ऽ न्यदृष्टि प्रशंसा संस्तवाः सम्यग्दृष्टे रतीचारा" अर्थात्-१ श्रीजिनेश्वर भगवन्त के अतिगहन समुद्र जेसे वचन अपनी अल्प लोटे जै- सी बुद्धि में न समानेसे ग्राह्यमें न आने से शङ्का-चैम लावे. २ धर्म करणी-फलकीया अन्यमतकी वांछा करै. : साधुओके या रोगी ग्लानाके मलीन गाव देख दुर्गछा क- रे. याकरणी का फल होगा कि नहीं ऐसा सन्देह करे. ४ पर (दूसरे) पाखण्डियों की परशंसा (माहमा) करे. और ५ पाखाणडयों का संस्तव (सदा) परिचय सङ्गति करे. तो सम्यक्त्व में अतिचार (दोप) लगता है. एसा जान सम्यक्त्ती श्रावक इन पांचोंही कामोंसे दीर्य उपयोग युक्त सदा बचाव करते ही रहते हैं. सम्यक्त में दोष लगने नहीं देते हैं. ऐमीतरह मे जब दर्शन-सम्यक्त्व में निश्चलात्मक बन जाते हैं. तब अधिक वैराग्यकी वृद्धि कर ने दुमरे व्रत नामक स्थान मे प्रवेश करते हैं. जिसका स्वन्प कहते हैं, आर्या-निरति क्रमण मणुव्रत । पंचक मपि शील सप्तकं चापि । धारयते निःशल्यो । यो सौ व्रति नामतो व्रतिकः ॥ ४ ॥ अर्थ-"निःशल्योति"-इस मूवानुसार प्रथम-हृदय रूप क्षेत्र(खेतको) तीनो श- ल्यों से निकन्ट-विशुद्ध करतेहैं अर्थात्-प्रथम माया शल्य का निकन्दकर - अभ्या- न्तर-अतारीक चित्तत्तिको गरल (डोंगकी अभिलापा रहित ) बनाते हैं, मरे नि- याणा-निदान शल्यका निकन्द कर ऋत-धर्म करणी के इहलोक परलोक मम्बन्धि फ- लकी वांच्छा नहीं करते. विरवांछक (अनररी) करणी कर उसका महान लाभ प्रा.

* प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड. त करते हैं. और तीसरा मिथ्यादंशण-कुमत श्रद्धान का शल्य का निकन्द कर जिन वचनों के युक्त आस्तिक्य वन, की हुइ व्रतादि करणी को निर्मळ-निर्दोष रक्खते हैं. इन तीनो शल्य रहित हृदय क्षेत्र को बना फिर सम्यक्त्व युक्त व्रत वीजारोपण कर- ते हैं सो कहते हैं:- सूत्र-हिंसा नृतस्तेया ब्रह्मपरि ग्रह भ्यो विरति व्रतम् ।। दिग्दे शानर्थ दण्ड विरति । सामायिक पौषधोपवासो भोग परिभोगाऽतिथि संविभाग व्रत सम्पन्नश्च ॥ अर्थ-हिमासे, झूठसे चोरीसे, मैथुन से, और परिग्रह से, पांचों से जो नित्तते हैं- ने छोडते हैं सो पंच व्रत कहे जाते हैं. इन से नित्ति दो तरह से होती है:-"देश स व तो अणु महती" अर्थात्-जो सर्वथा प्रकारे इन पांचोही कामों का साग करते हैं. सो महारती ( साधु ) कहे जाते हैं. और इनों की अपेक्षा से जो देश-थोडा सा साग करते हैं मो देशवती (श्रावक ) कहे जाते हैं. + और दिशावत, पेशत्रत, अनर्था दण्डव्रत उपभोग परिभोग परिमाण सामायिक पोपध उपवास, और अतिथी संविभाग, इन ७ को शीलवत कहते हैं, या १२ व्रतों के धारक श्रावक कहे जाते हैं. और "व्रत शीलेषु पञ्च पञ्च यथा मम्" अर्थात् उपरोक्त पांचों वनों और * माधू तो (२०) बीम विश्वा दया पालते हैं, और श्रावक (१) सवा विश्वा दया पाल गते हैं. निमका हिमाव इम नरह मे है:-साधुतो उस और स्थावर दोनों प्रकारके जीवों की हिमा से निवृते हैं. और श्रावक फक्त त्रम की हिंसा से निवृते, इमलिये १० विश्वे क- मी हवे. साधृतो आरंभिक और सकास्यिक दोनों तरह से त्रम की हिंमा से निवृते हैं, और श्रावक के आरंभ में बम की हिंमा निपन जाती ही है, परन्तु सकल्य कर (जानकर) मा रंत नहीं हैं. टमालये ८ विश्वाही दया रहीं. साधु तो स अपगधी और निरपराधी दो- नॉकी हिंमा मे निवृने हैं. और श्रावक तो फक्त निग्पगवा की रिमा से निवृते है. इसलिये २॥ अटाट विश्वाही दया रही, और माधुता आकोटी अणाकोटी दोनों प्रकार त्रस की हिमा निते हैं. और श्रावक नो फक्त आकांटी (देख कर) जावं मारने से निवृत है इमलिये "म्ब विश्वाही दया जो उतकृष्ट श्रावक होते हैम पार सकते है. - । i - । । * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी.* ६९ सातों शीलों के पांच २४ अतिचार हैं सो अनुक्रम मे आगे कहते हैं:- "तब और अतिचार" १ "थूलाओ पाणाइ वायाओ वेरमणं" अर्यात्-वडेजीबों जो हलते चलते प्रस- भ में दृष्टि गोचर आतैऐसे निरपराधीको जान कर देखकर दोकरण और तीन जो ग कर घात करे नहीं. इस व्रतके ५ अतिचारों: "वन्ध वध च्छेदा-तिभार रोपणा-नपा ना निरोधा" अर्थात्-मनुष्य पशु पक्षी आदि किमी भी वम जीवों को-१ मजबूत व- न्धन मे वान्धे. २ चाबूकादि से मारे. : अवयव-या चर्मका छेदन करे. ४ शाक्त मे ज्यादा काम लेने. और' खान पान का निरोध करे- तो हम वन में दोप लगता है. . ऐमा जान इन ५ कामोंको नहीं करे. २ "थूलाओ मूमा चाया ओ वेरमणं" अर्थात् स्थूल वडा मृट-जिन राना का दन्डका और लोकों का निन्दाका पाव वनें ऐसा पृट दो करण और नीन जोग मे नही बोले. इम ब्रत के ५ अतिचारों:-"निथ्योप देदा गोभ्याग्यान फूट टेख क्रिया-न्यामापहार-माकार मन्व भेदा:"-अर्थात-१ दोब-इटा उपदेगा देवे. २ गुप्त कर्म प्रगट करे. ३ खोटा खत लिखे. ४ अन्यका द्रव्यादि सिलावदावार ५ चुगली करे. तो इन व्रत मे दोप लगे. ऐमा जान पह, कार न्याने : "थूलाओ दिन्ना-नाणाओ वेरमण" अर्थात-बडी चोरी मिलेग दन्द का और लोकों के निन्दा-अविश्वास का पाव बने ऐमी पोशा दोश्र नीन जोग मे त्याग करे. इन व्रत के ' अतिवारः-"लेन प्रयोग नदारदान निद्र राज्यानि क्रम. हिनाधिकमानोन्मान. प्रतिस्पर व्यवहागः" - चोरो:- पर देवं. २ चौरका माल लेये. : गा दी आजा रे ? नेले म ज्यादा खरे. और नत्मनि म्प पन्त (हल्की निदेव को रस : दोपन्ने ऐना जान इन : दामहा मान करे. - है. --- -------- A- प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड. ४ "सदारा संतोस अवससे मेहूणाओ वेरमणं" अर्थात्-जिस स्त्रीका पाणी (हाथ) ग्रहण किया है, उसे सतोप उपजे उस उपरान्त सर्वथा मैथुन सेवन करने का एक करण तीन जोग से त्याग करे. इस व्रत के ५ अतिचार:-पर विवाह करणे त्वरिकापरि गृहीता-ऽपरिगृहीता गमना-नङ्ग क्रीडा काम तोशाम निवेशा" अर्थात्- १ दुसरे का विवाह करावे, २ पाणी गृहण की हुइ छोटी उम्मर की स्त्री का सेवन करे, ३ स्वस्त्री विना पाणी गृहण (लग्न) की हुइ का सेवन करे, ४ योनी सिवाय दुस- रे अंगो से क्रीडा करे, और ५ भोग में लुब्धता रक्खे तो इस व्रत में दोप लगे. ऐसा जान इन ५ कर्मों का त्यागे करें. ५ "थूलाओ परिग्गहाओ वेरमणं" अर्थात स्थूल वडी इच्छा से निवृत्ते धन धान्य आदि की मर्यादा करे कि इतने उपरान्त द्रव्य एक करण तीन जोग से नही रक्खंगा. इस व्रत के ५ आतचार:-"क्षेत्र वस्तु हिरण्य मुवर्ण धन धान्य दा- मी दान कुप्य प्रमाणाऽतिक्रमा" अर्थात्-१ खेत घर आदि भूमिका, २ चान्दी सोना दि धातु का, ३ धन (नाणा) धान्य (अनाज) आदि द्रव्यका, ४ दासी दास आदि मनुप्योंका, और ५ जो घरादि के अनेक कार्यों में वस्तु वापरने में आवे उसका प्रमाण एक करण तीन जोग कर (मर्याद) किया है, उससे आधिक मस्तु रक्खने से इन व्रत में दोप लगता है, ऐसा जान अधिक रक्खे नहीं. ६"दिशी प्रमाणवत"-अर्थात्-पूर्व,पश्चिम, दक्षिण, उत्तर, और नीची ऊची इन छेओं दिशा में गमन कर ने का (जानेका) प्रमाण एक करन तीन जोग करें इन वृतके ५ अति चारः-"ऊर्धावास्तिर्ग व्यतिक्रम क्षेववृद्धि स्मृत्यान्तरा धानानि" अर्थात्-१-२-३-ऊंची नीची तिरछी (चारों) दिशी का जो प्रमाण किया है उसके आगे जाये. ४एक दिशीके क्षेवका प्रमाण दुमरी दिशीमें मिलावे. और याददास्ति भलने मे याद न आवे वहां तक आगे जावे तो इस व्रत में दोप लगता हैं, ऐमा जान कामों का त्याग करे. ७ "उपभोग पम्भिोग पग्मिाण व्रत"-अर्थान-आहार आदि जो वस्तु एकही वक्त भोगवणे में आवे मो उपभोग, और वस्त्रादि वारम्वार भोगवणे में आवे मो परि भोग इन दोनों प्रकार की वस्तु की जावत् जीव पर्यन्त भोगवणे का प्रमाण(मर्यादा) एक कग्न तीन जोग कर करे. इस व्रत के ५ अनिचार:-"मचित्त सम्बन्ध मम्मि. श्राभिपव दुःपकाहाग" अर्यात- निसका याग किया ऐमी मात्र (मनीव) वस्तु * मुक्ति सापाने-श्री गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी. का, २ सचित्त मिली हुइ अचित्त वस्तु का, ३ मिश्र वस्तु का,४नशेकी (केफी) वस्तु का, और ५ पूरी पकी न होवे एसी वस्तु का या पक कर विगड गइ हो एसी वस्तु को भागवने से इस व्रत में दोष लगता है. ऐसा जान इन पांचों प्रकार की वस्तु का त्याग करे. और भी इस व्रत के धारक १५ कर्मदान सागते हैं. अङ्गार वन शकट भाटक स्फोट जीविका । दन्त लाक्ष रस केश विष वाणिज्य का निच ॥ यन्त्र पीडा निलान्छन मसंयति दोषण तथा । दव दान सरः शोष इति पञ्च दशत्यजेत् ।। अर्थात्-आग्नि के आरंभ का. २ वन कटाने का, ३ गाडे आदि वाहन बेचने का, ४ वाहन भाडेदेने का, ५ दांतोका, ६ लाखका, ७ पृथव्यादि फोडनेका, ८ रसक, ९ केश (पश) का, १० जेहर का. ११ यन्त्र (मीलों) का, १२ अंग भंग कर का, १३. दासादि का, १४ वस्तु जलाने का. और १५ निवाणों से पाणी नि- काल ने का. यह १५ प्रकार के व्यापारका भी त्याग कर ते हैं. ८ "अन्नत्य दन्ड विरमाण दूत"-अर्थात्-जित से अपना या दूसरे का कुछ भी मतलब निकलता न हो ऐसे अनर्थ दन्ड (पाप) कामों का एक करन एक जोग से त्याग करे. इस व्रत के ५ अति चारः--"कन्दर्प कौत्कुच्य मौखा समीक्ष्याघि करणो - भोग परिभोगानर्थ क्यानि" अर्थात् १ काम जागृत होवे ऐमी कथा करे, २ अंगकी कुचेष्टा करे. ३ न्या प्रलाप करे (विना काम वोले) ४ पाप कारी वस्तु का संयोग मिलावे, और ५ भोगोप भोग में वृद्धि करे, तो इस व्रत में दोप लगता है, ऐसा जान पांचों कामों का त्याग करे. ऐसी तरह मे दुसरी व्रत प्रतिमां में ऊपरोक्त आटों प्रतों को धारण कर. उन के जो जो अतिचारों कह है उनको सर्वथा प्रकारे टाल ते-त्यागते हुवे गुढ पालने हैं; सो व्रत धारी दुमरे पक्तिये पर प्रवर्त ने वाले देशवाने (श्रावक) कहे जाते हैं. * ने * देखोये उपगक दमांग मात्र आनन्द आदि . ही धोने भगवन्नी भर आठेही व्रत धारन कियेहैं मो.

७२ * प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड. ऐसी तरह से व्रत प्रतिमा में मवर्त ते जव व्रतों में निश्चलात्मक बन जाते हैं, और आधिक वैराग्य की वृद्धि होती है, तव सर्व वति (साधुपना) लेने को असमर्थ हुवे. साधु पनेकी वानगी चखने के वास्ते, तीसरी सामायिक प्रतिमा धारन करते हैं. चतुरावर्त त्रितय । श्चतुः प्रणाम स्थितो यथा जातः । सामायिकोदि निपद्य । स्त्रियोग शुद्ध स्त्रिसन्ध्याममिवं॥५॥ अर्थात्-सम-समभाव, आय-आवे, इक जिस वक्त. अर्थात्-जिस वक्त अ- पनी चित्त वृत्ति की सम भाव में प्रवृती होवे सो सामायिक व्रत यह द्रव्य तो सावध (हिसक) जोग (मन वचन काया) से और भाविक राग द्वेष से निवृते, सम भाव में प्रवृत्तिका इस की आराधना करने के वास्ते कम से कम एक मुहुर्त (४८ मिनीट) काल तक का प्रमाण वन्धा है, और विशेष तो आपनी इच्छा होवे वहां तक इस व्रत की आराधना श्रावक जन कर सकते हैं. सामायिक व्रत आराधन कर ने की विधी इस मुजव हैकिः-जहां छेही कायका आरंभ विक्रम श्रवन दर्शन न होवे ऐसे एकान्त स्थान में, इर्या पन्थ सोधन पूर्वक जाकर यना पूर्वक गृहस्थ का जो लिंग (भेप-कपडे) हैं, उसे छोडकर, साधु के जैसे पहर ने ओढने के वस्त्र की प्रति लेखना कर-धारन करे, पूंजनी-गुच्छक से जमीन पूंज, एक पट वस्त्र श्वेत रंग का एकही मनुष्य सुख से वैठ सके एसे आसन को विछा-मुहपति मुखपर वान्ध, देव गुरु को तिखुत्ता के पाठ से वंदना कर, इतनी धर्म क्रिया करते किसी प्रकार की विराधना हुइ हो उसकी निवृत्ति अर्थ-इर्यावही का सूत्र रूप पाठका उच्चारन कर, उस दोपकी विशुद्धि के लिये-तमुत्तरी का सूत्र पाठ कह, कायुत्सर्ग (कायाको एक स्थान स्थिर) कर, मन में इर्यावही सूत्र का अर्थ का चिन्तावन कर, लगे पापके पश्चताप पूर्वक का युत्सर्ग की समाप्ति कर, दोप निवृत्ति की खुशाली के लिये चौवीस्तव (लोगस्त का) मूत्र कहे. सामायिक वृत धारन करे, फिर नीचे वैठ डावा घुटना ऊभा रक्ख कमल डोडी वत दोनों हाथों को जोड गोडे पर स्थापन कर तीन आवर्तन युक्त - अर्हन्त को सिद्धको और गुरुको नमुत्युणं मूव से स्तवन कर, ३२ दोप राहत + तीनों यो- + दशमन के दोपः-१ सामायिक कीविधी और फलका अजान होवे. २ सामायिक कर कीर्ती-यशःकी वाछकरे. ३ "करुंगा सामाइ तो होवेगा कमाइ" इत्यादि इसलोक के लाभ- की इच्छा करे, ४ में बड धमात्माहू शुद्ध सामायिक करने वालाहूं इत्यादि गर्वकरे. ५ राजा .

* मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी. १९ ७ गो को रक्ख, शास्त्र श्रवण पठन मनन स्मरण स्तवन आदि धर्म ध्यान में रमण करे- जिसे मामायिक व्रत कहते हैं. "योग दुः प्रणि धानानादार स्मृत्य नुपस्थानानि"- अर्थात-मन के वचन के और काया के योगों को दुमति ध्यान-खोटे कार्यों में पर- वृतावे. आदर रहित सामयिक करे, और सामायिक स्मृति यददास्ति भूल जावे तो सामायिक में अतिचार लगता है-ऐसा जान इन पांचों दोपों से साफ दूर रहकर सामायिक करते हैं, ऐसी तरह की शुद्ध सामायिक कमसे कम एक फजर एक दो पहर के और एक श्याम को यो तीन तो जरूर ही करे. ज्यादा करने का अवसर • वक्त मिलेतो लाभ को गमावे नहीं! ऐसीतरह से तीसरी भूमीका में प्रवृत ते हुवे जब श्रावकजीको कुछ२ आत्मा- नु भवका अनन्द चख ने का एक प्रहर के अवकाश में जो मजह प्राप्त होता है. उस कुटन्व आदिके डर से सामायिक करे. ६ सामायिक के फल का नियागा करे. ७ सा मायिक के फल का सन्देह करे (होगाकी नहीं! ) ( क्रोध मान माया लेभ के वा सामा यिक करे. ९ गुरु महाराज का और धर्मोप करण का बहुमान नहीं करे. १० दूसरो का अपमान का चिन्तवतन करे. दग वचन के दोप.-१ झूठ बोले. २ विनविचारा बोले. ३ श्रद्धाका भङ्ग होवे ऐसा वचन वोले.४असम्बन्ध-अन मिल्ना बोले. ५नवकार मन्त्रादि सूत्रका पूरा पाठ उचारन नहीं करे. ६ लेग उत्पन्न होवे ऐसे मर्मिक वचन बोले. ७ टहा-मस्करी-हॉनी निनुहल करे. ८ वी- को भोजन की. देशजी. राजाजी. चोरजी. आरंभजी इत्यादि विजया करे. १ दूसरे की निन्दारे-अवरण बाद बले-और १० सूत्र पाठ इदि गडबड कर नदी कारह नापा के दोप-१ ज्योग्य असन से बैठे २ अस्थिर अमन ने बेटे. : दृष्टिनी चपल्ला करे. ४ पापके सहार के काम करे, भलादे का देश लेकर टे. ६ बरकार शरीर को सकोचे प्रसारे. ७ जालप-प्रद करे, गन्गेडेकरड रे. २ मा का मेर उतारे १० चिन्नो असनने बेटे-१, निद्रान्वे. और - पावन जगावे-टायर दवावे. यो १ मनके. १० वचन और १२ कापा नेम्म २ दोन देतो मनपिनक से युद्ध सानपिक कहो की है. - ७४ - मथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड १९ ही मजह के रसीले वने, वो मजह अधिक विलसने की उत्कृन्ठा जागृत होती है, उसे तृप्त करने अधिक काल परमार्थिक वृति में गुजार में चौथी भूमि का 'पौषध' नामक है, उस में यथा विधि से प्रवेश कर ते हैं सो- कहते हैं:- पर्वादिषु चतुष्वी । मासे २ स्वशक्ति मनी गुह्या ॥ प्रोषध नियम विधायी । प्रण धिपरः प्रोपधानशन ॥६॥ अर्थात्-जो स्वात्माको ज्ञानादि विरत्नों की यथा विधि आराधना कर और छेही जीवों की काया को अभय दान देकर पोपते हैं-पाल ते हैं-तृप्त करते हैं, उसे पौषधवृत कहते हैं. यह पौषध व्रत सामायिक व्रत की माफि कही यत्ना पूर्वक एकान्त स्थान में सुकुमल पूंजणी से पूंज चार हाथ लम्बा और एक हाथ चौडा विछोना प्रति लेखकर विछावै, मुहपति मुखपर वान्ध कर, हाथ में रजुहरण ग्रहणकर-लघु भीती, बडी नीति, पित आदि के लिये भोजन और स्थान की प्रति लेख स्वासन पर सामायिक व्रत मे कही हुइ विधी मूजव प्रति लेखना के दोष की निवृत्ति के लि- ये 'इर्यावही सूत्र' कायुत्सर्ग आदि करे. फिर-"पौषध व्रत" ग्रहण करने के लिये यही विधि कर पोषध ग्रहण करे. फिर थोडे से थोडे चार प्रहर विशेप यथेच्छा प्र- माणे १८ दोष रहित आत्मा + ध्यान में काल गुजारे. * वस्त्र पात्र स्थान आदि में कोइ जीव जन्तु होवे उनको सूक्ष्म दृष्टि से देखकर उन्हे तक लीफ नहोवे, ऐसी तरह से एकान्त में स्थापन करे उसे प्रतिलेखना कहते हैं. + पोपद के १८ दोप पोपा के पहिले दिन वर्जना चाहीये-कल पोषा करनाहै इस लि- येही-आज. १ स्नान करे २ अब्रह्म (भैथुन) सेवन करे. ३ पोपा के निमितही सरस और ज्यादा आहार करे. ४ पोपाके निमित वस्त्र धोवावे. ५ शरीरको सिणगारे, और ६ वस्त्र रगावे [ यह ६ काम पोपाकिये के पहिले दिन करे तो दोप लगे ] और पापालिये बादः-१ अ- बात ( जिसने सवर सामायिक न कियाहो उस) का आदर सत्कार करे, बैठने को विछोना देवे, यावच्च करे, २ अपने शरीर की विभूपा करे. केश-बाल सवरे. वस्त्र सजावे, वगैरा.३ अपने शरीर का या दूसरे के शरीर का मेलउतारे. ४ अधिक निद्रालेवे-अर्थातू-पोपेमें दिन- को तो सोनही नहीं चाहिये. और रात्रिको पहला छेला प्रहर छोड बीचके दोपहर से अधि क निद्रा लेव ५ गोछा रजुहरण आदिसे शरीर को पूजे विनाही खाज कुचरे, ६ स्त्रीयोंके मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अदीशतद्वारी.* इस व्रत के ५ अति चार :- "अमत्यवेभिता ऽप्रमार्जितो-त्सर्गादान संस्त रोप क्रमणा-दर स्मृत्यनुप स्थानानि" अर्थात-बैठने सोने का स्थान वस्त्र लघुनीतिका भाजन भूमीका आदि जोजो वापर ने (उपयोग) में आवे. उन को-१ दृष्टि कर देखे नहीं. २ पूंजनी कर पूंजे नहीं. तैभे ही. ३ विना देखे विना पूंजे हाथ पग आदि श- रीर विछोना संकोचे प्रसारे. पूंजणीयादि उपकरण ग्रहण करे. ४ अनादर से-वेगार टालने जैसा व्रतो में बहुमान-पूज्य दृष्टि रहित पौप करे. और ५ पौप करे के पौपाकी स्मृति शुदि भूल जावे. जिस में पोपा के अयोग्य कृतव्यों को ममावरे तो पोपा में दोष लगे. ऐसा जान पांचों काम वर्जते हैं। उत्सर्ग मार्ग में उपरोक्त विधि प्रमाणे कम से कम एक महीना में छे पोपत्तो जरूर करेः-दोनो अष्टमी के दो आठ पेहरके और उदश पूर्णीमां का दो नया च. उदश अमावास्या का दो देला करे के गोलह प्रेहरका पोपा करे. और ज्यादा बन आवेतो बहुत अच्छा. अपवाद मार्ग में-जो चारों अहार का त्याग कर प्रति पूर्ण पोपा कर ने की शक्ति नहीं हो तो. देशावकाशिक व्रत. ऊपर कही पापे की विधि माफ कही धारण कर. निरारंभ निर्ममन्त्र व्रति मे प्रवतें. इन खून में जो तिबीहार के पञ्चबाण पूर्वक उ- पवास व्रत धारण करे तो-भानुक-निर्जीव उप्ण आदि पाणी ग्रहण करने हैं. और रोग या वृद्धावस्यादि प्रसङ्ग ने इतनी शक्ति न होवे नो भिना वृत्ति में निर्दोप आ. हार लाकर उपाश्रय (धर्म स्थान) में भोगरते हैं. या आहार निपजे वाद अचिन्तकि निगमार की राज के युद्ध आदि 'मोन दिनिने विनय उनने बद भी देगदेगानों के लिरिज की किस भेग निन्दा-जयनी. दय: करे ७ जिना प्रपोज्न. नि देग, दोडत नेहेरे उम्र में निजी ?. पाई दिन र वचन बेरे ८ ले देवमादी. इसी तेरे.मानन्द को रवाटे. १: दिक गरीर अनुर टने निडे . ११ मिने. - किन उन्हें दो विर काही मजे में करे - सदन पोरे २-२. नको - -- -- सीभी गृहस्थ के * प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड. घर को जा फ्राशुक आहार पाणी का, जोग वने वो, या हलवाइ आदि दुकान से सीधा निपजा हुवा मोल गृहण कर के भी भोगव लेते हैं. परन्तु इन ६ दिनों में संसारिक सर्व प्रकार के कामों से अलग रहते हैं. यों चौथी भूमीका में प्रवृत्तते जब अडोल वृत्तिवन्त बनते हैं, और आधिक वैराग्य की वृद्धि होती है तब तप और धर्म की अधिक हाद्ध करने वासते पांचवी 'नियम' भूमि का में प्रवेश कर उपरोक्त नियमों युक्त नियमों में विशेषता करते हैं. आर्य-अन्नं पानं खाद्यं । लेां नाश्राति यो विभावर्या ।। सचरात्रि भुक्ति विरतः । सत्वेष्वनु कम्पमान मनः ।। अर्थात्-प्रथम उपरोक्त ६ दिनों से भी अधिक तप धर्म की वृद्धि करने के लिये विचार कर ते हॉकि-खाते २ अनन्तान्त काल व्यतीत हो गया जगत् के सर्व पदार्थों अनन्तान्त वक्त भोगव आया, तो भी अभितक तृप्ति नहीं आइ, और एक दम मर खान पान छोडूं ऐसा अवसर तथा शक्ति भी नहीं, इसलिये महा अनर्थका हेतु अन्या पाना-गविको अन्न पाणी पकान मेवा तंवोल फलादि सर्व पदार्थों को भोगवने (ग्वाने) के नाव जीव पर्यन्त न्याग करै, जिस से बारह महीने में छेx महिने के तपका फल प्राप्त कर सकें! और शरीर की ममत्व घटाने-अशाच निवृत्ति उपरां- त सर्व शरीर के स्नान का, हजामत करा ने का, इन्द्रियो निग्रहार्य-दिन को अत्रम्ह (मैथुन) मेवनका, और धोती की दुमरी लांग लगानेका इन पांच कामोंका त्याग करे. यों पांचवी भृमीका में तपकी वृद्धि और ममत्व की हानी करते २ जब विप- याँका निग्रह करने मन पर पूग काबु पुगाने ममर्थ बने, तब छटी फ्रेम्हचर्य भूमिका में प्रवेश करने है. आर्या-मल, बीजं मलयोनि । गलन्मलं पूत गन्ध बीभत्सं ॥ पश्यनं गमनंगा । दिग्मति यो ब्रह्मचारिसः ॥ + श्लोक-यः गो सर्वतः आहारं । वर्जयति सुमेधस्य ।। तेषां पक्षोप बामेन | फल मांसन जायते ।। अर्थात-जो एक महीने तक रात्री को मर्व आहार पाणी भोगवने का त्याग करताई उम-एक महीने १. उपवाम का फल प्राप्त होता है:-पहा भारत.

७७ * मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी. * अर्थात्-देखतेही चिनता-भूग की उत्पन्न कर ने वाली, पारु रुद्र मूव कर पू. रित. दुगन्धा ऐसी स्त्रीकी योनी का सेवन और नव तथा इग्यारे द्वारों से सदा अशु ची का झरना ऐसे शरीर से आलिंगन में मुख का मानना यह प्रत्यक्ष अज्ञानताका दर्शक, और असंख्य असन्नी मनुष्य तथा नव लक्ष सन्नी मनुष्यों का घमशान कर ना यह महानिर्दयी--अधर्मी कृतव्य. ऐमा मैथुन को महा अधर्म--अनर्थ पाप का हेतु जान सर्वथा प्रकार से त्याग कर, + नव वाड विशुद्ध ब्रम्हचर्यव्रत का स्वीकार करते हैं. ऐसी तरह से से ब्रम्हचर्य भूमीका में प्रवर्ती करते विना अन देखाते हुवे जीवों की हिंशा से निहते तो फिर देखाते हुवे स्थावर जीवों का भी भोग क्यों कर- ना? ऐसा करुणा सिन्धु हृदय जब श्रावकजी का होता है. तब मातवी 'साचित त्याग भूमीका में प्रवेश करते है. आर्या-मूल फल शाख शाखा । करीर कन्द प्रासुन वीजानी ॥ नामानि योनि सोयं । सचित्त विरतो दया मूर्ती ॥७॥ अर्थात्-दया मूर्ती श्रावकजी विषय वासना रहित हुवे पुनः उधर मनकी प्रवृ- त्ति न होवे और अनाथ स्थावर जीवो को अपने कमों कर पीडाने हुवे देव अन्नः करण में 'रे' उत्पन्न होवे तब उन के भोगोमे अपने गरीर को निवार ते हैं. अर्थात विनापका अनाज भाजी फल फूल पव निमक मिरच या पाणी आदि मर्व मचित्त पदार्थ खाने का मोगन करते हैं. और आग्नि आदि गाव मे निर्जीव हुवा अन्न भाग्य पाणी आदि के भोगने क्षुधा तृपा वेदनीको मान्न कर दया धर्मके आराधक बनने तरह जब अपना शरीर जो अपनी आत्मा को मुम्ब के माधन रूप या उसके लिये ही आरंभ कर ने की बात करली नो फिर जो मतलंबी बनन परजन है. उन के लिये आरंभ कर व्यर्थ कर्म वन्धन क्यों करना ऐमी दयामय वैगन्य पूर्ण उत्मीयों उछलने लगे. तब उनको मान्न करने आठवी 'आणाभ' प्रतिमा स्वीकार करते हैं. +विकर उन बरे-१. सन.२ न.: य.४ अन्न: प्रन.. चिन्तन. भार, सोहर नगर इनमें से कर वाचन है:- ७८ प्रथम अर्थ काण्डका प्रथम मूल द्वारा रोहण खाण्ड. ११ आर्या-सेवा कृषि वाणीज्य । प्रमुखदारंभतो व्युपारमति ॥ पूणातिपात हे तोर्यो । सव्वारम्भ भी निवृत्तते ।। अर्थात्-इस संसार में कर्म भूमी मनुष्यों के क्षेत्र में तीन तरह के कमों कर उप जीबी का चलाते हैं:-१ हथीयार वान्धकर-क्षवी सिपाइ प्रमुख, २कृषी-खेती वाडी कर, कृपान प्रमुफ और ३ मसी-लेख कर वाणिज्य व्योपारी प्रमुख इन तीनों कर्मों में बहुदा छे जीवों की काया का घात का प्रसङ्ग आता है, और इस पाप क- मों कर उपार्जन किया हुवा द्रव्यका हिस्सा कर्म कर्तासे भी अधिक स्वजन आदिके भोगोप भोग में लगता है, तथापि उन पाप कर्मो का समपूर्ण फल भोगवने का अ- धिकारी तो वो कर्ता ही होता है. अर्थात द्रव्य का हिस्सा लेने वाले बहुत हैं परन्तु कर्मों का हिस्सा लेने वाला कोइभी नहीं है। ऐसा जान श्रावक जी परार्थ भी आरं- भ-छेही कायकी हिंसा का त्याग कर निरारंभी वनते हैं. अपने अर्थ और परार्थ क- दापि किंचित मात्र हिंशा नहीं करते हैं. यो स्वार्थ और परार्थ हिसा से निवृत कर जिनका हृदय दया कर कोमल वन गया है, वो फिर उन के सन्मुख होते हुवे कुटारम्भ को दृष्टि कर देख सकते नहीं हैं. अर्थात् अपने सन्मुख होते हुवे घातकी कृतव्यों को देख उनका हृदय ऋद न करने लगता है, तब वो घात की कृतव्य न दृष्टि में आवे, और न उनकृतव्योंका आदेश करना पडे, ऐसा पाप से वचने रूप अपना आत्म साधन करने के लिये न- ववी पेसारंभ प्रतिमा का खीकार करते हैं:- आर्या-वाह्यपु दश सु वस्तु । ममत्व मुत्सृज्य निर्ममत्व रतः।। स्वस्थः संतोपः परः । परिचित्त परिग्रही दिरतः ॥९॥ अर्थात्-निरारंभी और निष्परिग्रही वृति का मजाह भोगवने के लिये आरं- भ और परिग्रह से युक्त जिसे अपना घर मान रक्खा था उस स्थान का त्याग कर, शरीर के रक्षणार्थ कुछ वस्त्र वरवन आदि ग्रहण कर वाकी का सव - दश प्रकार का बाह्य परिग्रह की ममत्व मूर्छाका त्याग कर - धर्म स्थान - उपाश्रय में जाकर निवास करते हैं. और ऊपर जो आठों भूमीका में आत्म धर्म साधन की किरिया व- ताइ है उसका पालन अन्तः करण की स्थिर वृत्ति कर करते हैं. ज्ञान दर्शन च- ७२ * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी. * रिता चरित रूप धर्म से आत्मा को पोपते हुवे - ज्ञान के ध्यान में सदा निमग्न रहते हैं. कोई भी किसी प्रकार की आरंभिक सम्मति मांग ने आवे या अपन शरीरार्थ कदापि आरंभी काम करने का किनी को आदेश नहीं देते हैकि तुम अमुक प्रकारसे यह कार्य करो, आरंभी कार्य में मौन धारण करते हैं. क्षुधा प्राप्त हुवे आपने स्वजन के घर में जो भोजन निपजा हो उसे भोगव आते हैं. सदा धर्म ध्यान में काल गुजारते हैं. जो निजार्थ और परार्थ आरंभ करना और कराना इन पापों से निवृत्त ते हैं. उन की पाप कार्यों में सहज अरुची उत्पन्न होजाती है. अर्थात्-फिर उनको पा- पारंभी वो उत्पन्न हुवा काम अच्छा नहीं लगता है. तब अनुमोदन-अच्छा जानना और व्याख्यान करना इस से निवृत्ति करने दशवी 'उदिष्ट कृत प्रविमा ' धारण करते हैं:- आर्या-अनुमती रारंभ । व परिग्रहे वैहिकेषु कर्म सुवा । नास्ति खलु यश । समाधीर नुमति विरतः मन्तव्य ॥१०॥ अर्थात–उपरोक्त भूमीका में दर्शाये मुझव आत्म साधन करते २ जब मनपर पूरा काबु जमाता हैं. तब मनकी सांरभी कार्य के अन्मोदन से सहज निवृत्ति होनीहे. वो - अर्थात्-घर के और परके, आरंभी और सपरिगृही जो कामों सुनने में देखने में जानने में आइ हुइ वातो की, तथा आरंभ से निपजी हुइ वस्तु आहार व- स्वादि जो भोगव ने में आवे उन की-परसंस्या गुणानु वाद करने मे-मन कर उम कार्य को अच्छा जान ने मे निवृतते हैं. आप हाथ से आरंभ करते नहीं. दुमरे पास कराते नहीं, और उन के वास्ते किनी ने कुछ आरंभ कर कोई वस्तु निप- जाइ होवे तो वो उसे ग्रहण करते नहीं भोगवते नहीं. शुद्ध निर्दोष फामुक वक्त मिर जो आहार पाणी वखादि मिल जावे. उसे ग्रहण कर धर्मार्थ शरीर का निर्वाह करे सदा आत्मानन्द में तल्लीन बने रहते हैं. ऐसी तरह प्रवृत्ति करते जब मन पर पूरा कवू पहाच गया. नव निश्चय हो- गया कि-अब में साधु वृत्ति • मुनि धर्म का मुख मे निर्वाह कर पार पहोंचा महंगा ऐसा निश्चय होते प्रथम नाघु धर्म को अजमाने इन्पारामी "ममण भए" प्रतिमा में- साधु तो नहीं परन्तु माधु जैसे (नकली नाथे) वनने हैं.

८० * प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड. र आर्या-गृहतो मुनिवत् मित्वा । गुरूप कण्ठ व्रतानि परिग्रह्या ।। भैक्ष्याशन स्तपस्य । नुत्कृष्ट श्वेल खण्ड धरः ॥११॥ अर्थात्-समण भूत बनने के लिये श्रावक गृह लिंग (गृहस्थका रूप दर्शक वस्त्र का) त्याग कर, चोल पट्ट पहन ते हैं, पछोवडी चद्दर ओडते हैं, मुखपर मुहपति वन्धते हैं, उघाडी दन्डी का रजुहरण डावी बगल में दवाते हैं, काष्टपाव-झोली में स्थापन कर इर्या समिती पूर्वक स्वज्ञाती के घर मे भिक्षार्थ जाते हैं. ४२ दोपो रहित शुद्ध-आहार ग्रहण कर उपाश्रय में आकर ममत्व-मूर्छा राहत फक्त धर्म वृाई अर्थ शरीर को सशक्त टिका कर रखने विल में सर्प प्रवेश करे त्यों स्वाद नहीं लेते भोगव ते हैं. इच्छा होतो ग्रामानुग्राम विहार करते हैं, क्षुधा तृपा-शीत-ताप-ताडन-मारन आदि सब परिसहों को सम भाव सहन करते हैं. शिरके दाडी मूछो के वालों का लोच करते हैं. यों आत्मा को निडर बनाते हैं. फक्त यह साधु नहीं है, ऐसी पहचा- न अन्य को होने के वास्ते शिरपर शिखा (चौटी) रखते हैं, इनको कोई साधु जान नमस्कार करे तो आप खल्ला कह देते हैं कि में साधु नहीं हूं-मे तो सम्ण भूत प्रति माका वाहक श्रावक हूं. इस प्रतिमा के धारक उत्कृष्ट श्रावक कहलाते हैं. श्रावक उपरोक्त ११ गुण श्रेणी की वृद्धि के कर्म से आत्म शक्तिको अजमा ते ज्यों२ वैराग्य की वृद्धि और आत्म की शक्ति प्रबल होती जाती है त्यों त्यों वडते हुवे साधु भूत वन जाते हैं. इन इग्यारे प्रतिमा में कहे हुवे स्थान के किसी भी मध्य के स्थान का नीचे के स्थान में रहा श्रावक आराधन करे तो कुछ हरकत नहीं. परन्तु ऊपर चडे हुवे श्रावक तो नीचे के स्थान के गुणों में पूक्त पणे काय रहते हैं. किसी भी गुण की नुन्यता कदापि नहीं करते हैं. इन एकादश श्रावक की पडिमा में श्रावक के इग्यारे व्रतों को स्पर्शने का वरणन का ममावेश हो गया है. और वारवा जो अतित्य मम विभाग व्रत है, अर्थात् तिथी (दिन) के नियम विन जो अचिन्त्य भिक्षार्थ साधु गृहस्थ के घर में प्रवेश कर शद्ध आहार ग्रहण करते हैं. उन के भोजन की वक्त अपने सन्मुख प्राप्त हुवे आहार का हिम्मा करना. अर्थात्-भोजन करती वक्त हमेशा विचार करे कि जो इस वक्त कोड माधु आजाय तो इम भोजन में का इतना हिस्सा उच के पाव में डाल कर्तार्थ * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अढीशतदारी. १ ८१ वनू! और उसवक्त साधु आवेतो उलट भावसे दान देवे ऐसे दानार्थि श्रावकको इस वृत्त के आराधन निमित ५ अतिचार वर्जने चाहीयेः-"सचित्त निक्षेपा-पिधान पर व्यपदेश मात्सर्या कालातिक्रमा :-अर्यात्-जो वस्तु फासुक-निर्दोष-साधु को देने जै- सी होवे उसे सचित्त वस्तुपर रक्खे. २ सचित्त वस्तु कर के. ३ आप देने योग्य हो दुसरे पास दान दिरावे. ४ दान दिये पहिले या बाद मत्सर भाव धारन करे, और ५ काल अतिक्रमे-उल्लंघे तो इस व्रत मे दोप लगे. ऐसा जान सुपाव दानार्थि इन पांचों कामो को वर्जते हैं. यह वारखा व्रत सर्व स्थानो में जीवों के आदरनीय हैं. इस लिये प्रथम प्रति- मासे लगाकर इग्यारवी व्रतिमा के धारक भी अतिथी सम विभाग व्रत का अवसरसे आराधना करते हैं. इन सिवाय और पांचवे गुणस्थान के लक्षणों का संक्षेपित अर्थ तो मूलपर से ही समझ में आवे जैसा है, विशेपार्थ जानने के लिये जैन तत्र प्रकाश आदि ग्रन्थों को देखीये. छडे - प्रमत संयति गुणस्थान के लक्षण. पांच महावृत-२५ भावना युक्त. सलं पाणाइ वाया ओ रमणं"-अर्यात-सर्व-मूल्म-वादर. वम-स्यावर जीवों की हिंसा से विकरण विजोग से निवृत-त्यागे. इस व्रत की रक्षा के लिये ५ भावनाः"-बामनो गुप्ती र्यादान निक्षेपण समित्या लोकित पान भोजनानि पञ्च" अ- र्थात्-१-२ मनको और वचन को पापके कामों से गोपे (छिपा ) कर रक्वे. ३-६ चलती वक्त उपकरण शरीर को धरते उठाते और आहार आदि भोगवनें यन महि- त प्रवृतने मे महिमा व्रत शुद्ध पलताहै. (२) " मन्वं मुमा वायाओ वेरमण" अर्थात-किमी को अप्रिय कारी. और मपा-झूठा वचन बोलने मे विकरण त्रियोगमे निवृते. इन वन के रक्षागार्य पांच भा- बनाः-"कोष लोभ भीस्व हास्य प्रत्याख्यानान्य नुवीचि भापण पंच" अर्थान- १.५ जोर का लोभ का-भयका-हास्यका उदय होवे नव बोलना नही-मौन धारण क रना. और ५ बोलने पहिले वचन का फल विचारना. चों पांचों यत्रा युक्त प्रवृतने मे सस व्रत शुद्ध पानाहे. (३) " मलं अदिन्न दाणाओ वेरसगं "अान-पालक के दिये विना याम- - * प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड.83 न विना छुपा के लेना जिसे चोरी कहते हैं, उस से निवृते. इस व्रत के रक्षाणार्थ ५ भावनाः-"शून्यगार विमोचिता वास परोपरोधाकरण भैक्ष्य शुद्धि सधा विसंवा- दाः पंच." अर्थात्-१. सूने घर में मालक की रजा से रहे, २ पहिले रहते को निका ल कर न रहे, ३ कोइ मना करे वहां न रहे, ४ आहार आदि शुद्ध ग्रहण करे, और ५ धर्मात्मा से तो क्या परन्तु किसी के साथ भी विसंवाद (झूठ-झगडा) नहीं करे. यो प्रतने से दत्त व्रत शुद्ध फलता है. ४ "म मेहुणा ओ वेरमणं" देवता मनुष्य और तिर्यंच की स्त्रीके साथ या. नपुंमकके माथ मैथुन करने से निवृते. इस व्रतके रक्षणार्थ ५ भावनाः-"स्त्री राग क- था श्राण तन्मनोहगह निरीक्षण पूर्वरत्तानुस्मरण वृष्पेष्टरस स्वशरीर संस्कार त्यागा- पंच" अर्थात्- १ विकार उत्पन्न होये ऐसी कथा सुणे नहीं, २ गुप्त अंगोपांग निरखे नहीं, पहिले की हुइ क्रिडाको याद नहीं करे, ४ कामो तेजक आहार करे नहीं. और ५ मिणगार मने नहीं. यों रहने से ब्रह्मचर्यव्रत शुद्ध पलता है. • "मन्च परिगहाओ बेरमणं"-अर्थात्-सजीव निर्जीव किसीभी तरह का पग्ग्रिह (द्रव्य )ग्यवे नहीं, इमके रक्षणार्थ ५ भावना "मनोज्ञामनोझे न्द्रिय विषय रागद्रेप वनानि पंच” अर्थान-मनोहर-शब्द रूप गन्य रम स्पर्श पर राग करे नहीं. और मगर पर ट्रंप कर नहीं. तोही निप्परिग्रह व्रत शुद्ध पलता है. पांच ममिति - तीन गुप्ति. "टा भापपणा दान निक्षेपोन्मर्गः मामिनयः"-अर्थात्-१ इर्याम मिती मो (१) द्रव्य मे-॥ हाय आगे की जमीन देखकर चले, (२) क्षेत्र मे-पम्ता छोड चले नहीं. (1) कालम-दिनको प्रकागिक म्यान में आँग्यो मे देवकर, अमकामीक स्थान और गत को पुंज कर चले. (४) भाव मे-पांचो इन्द्रिय की विषय का और कि- मी भी बात का चिन्नवन रम्ने चलना करे नहीं. - भाषाल मितियो-(१) दत्र्य मे दुप और गग द्वैप उत्पन्न हो ऐमा वचन बोट नहीं. (चन्द्रन रम्न चलता विगप वानालाप कर नहीं, (३) काल में पहर रात्रि गये बाद जोर से बोले नहीं. और (2) भाव म-विना विचाग गट नहीं उचारे, सा मानतिमी-(१) द्रव्य में पामुक निदाए बादार ग्रहण करे, (९) भवदी कोश में आन आहार लेनाय नहीं. (१) कालम पाहिल पटरका याया पा. --

मुक्ति सापाने-श्री गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी.
हार चौथे पहर में भोगवे नही. और, (४) भावसे-अच्छे बुरे आहार वस्त्र मकान पर
रागद्वेप नहीं करे.
४ आदान-निक्षेपना समिति सो-उपकरणो-(१) द्रव्य भे यत्ना से गृहण करे
और रक्खे, (२) क्षेत्र से-गृहस्थ के घर रक्खकर अन्य ग्राम जाय नही. (३) कालसे
दोनो वक्त प्रति लेखना करे. और (४) भाव से-ममत्व मूर्छा रहित उपयोग मे लेवे.
५ परिठावणिया समिति सो-लघुनीत वडीनीत अयोग्य आहार उपदी आ-
दि-(१) द्रव्य-यनसे परिठावे (डाले) (२) क्षेत्र से-ग्रहस्थ निन्दा करे ऐसे स्थान परि
ठावै नहीं, (३) कालसे-दिन को देखकर रात को दिने देखी भूमीकामे परिठावे,और
(४) भाव से शास्त्रोक्त विधि से परिगवे.
"सम्यग्योग निग्र हो गुप्तिः"-अर्थात्-मन को वचन को और काया को
संरम्भ सम्भारम्भ और आरम्भ से सम्यक प्रकार से रोक रक्खना-कु कौमे प्रस्ता
ना नहीं सो तीनो गुप्ति है.
पांच आचार.
१ ज्ञाना चार सो-ज्ञान को-(१) अकालकी वक्त गृहण नहीं करे, (२) अवि-
नय नही करे. (३) वहूत मान पूर्वक गृहण करे. (४) यथा विधि ग्रहण करे. (५)
ज्ञान दाता का उपकार न छिपावे. (६) अशुद्ध उच्चारन न करे. (७) विपरीत अर्थ
नहीं करे. और (८) पाट और अर्थ को प्रमाण भूत जाणे.
२ दर्शनाचारः (१) जिन वचनो में शंका नहीं लावे, (२) अन्य मत की
वांच्छा नहीं करे. ३ करणीका फलका वैम नहीं लावे. (१) मूह समान धर्माधर्मका अ-
ज्ञान न होवे. (५) स्वधर्मीयों की भक्ति करे. (६) धर्म से डिगे को स्थिर करे. (७)
चारों संघकी वत्सलता करे. और (८) जैन धर्म की उन्नति करे.
३ चारिवा चारसो. ममिति : गुप्ति युक्त सदा प्रवृते.
४ तपाचारमो - १२ प्रकार का विशुद्ध तप करे.
५ विर्याचार सो - धर्मार्थ आप उद्यम करे. दुमरे पामकरावे.
सत्तर पूकारका-संयम.
पुढवी दग अगणि मस्य । वणसइ खिति वर पणिन्दि अजीव ॥
पहुप्पेहा पमजणा । परिठवणा मणो वय काय संयमे ॥ १ ॥

- * प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड १ अर्थात्-१९-मी-पाणी-अग्नि-हवा-वनस्पति-चेन्द्रिय-तेन्द्रिय-चौरिन्द्रिय और पचन्द्रिय इन ९ प्रकार के प्राणीयों कि-किंचित मात्र ही घात होना तो दूर रहा, प- ग्न्त दुःख उपजे ऐमा काम करे नहीं करावे नहीं और करते होवे उन्हें अच्छा भीन ही जाने. १०. अजीव काय संयम सो वस पात्र आदि निर्जीव वस्तु भी जितने काल नक चले वहां तक चलावे-फाडे तोडे नहीं ११ प्रेक्षनासो-सव वस्तु ओंको देख क- र उपयोग में ( काम में ) लेवे. १२ ममार्जना सो-योग्यस्थान वस्त्र पात्र पूंज करवा पं. १ : उपेक्षा मो-हितोपदेश से धर्मोन्नति करे, सर्व कार्य उपयोग पूर्वक करे. १.४ 'पग्टिारणा मो अयोग्य वस्तु को यत्ना से परिठावे. १५-१७ मन वाणी और शरी- र को अधर्म मार्ग गनिवार धर्म मार्ग में प्रस्ताव सो संयम. बारह प्राकार का तप अनशनाव मोदय्यं वृतिपरि सङ्ख्यान रसपरित्याग ।। विविन शय्यामन काय केशा वाह्यं तपः ॥ प्रायश्रित विनय वयावृत्य स्वाध्याय व्युत्सर्ग ध्यानान्युत्तरम्। श्रयान-, अनगन तपमा-टो घडी में लगाकर जावन्जीव पर्यन्त आहार का त्याग कर. • उनादरी तपमा--भृप हार जिममे कम आहार कर, दया बय पाव कम ग्यप, ? पनि पम्मिंग्या नपमो-मिल उमीपर निर्वाह चलाये, हम नपा मग नाम भिल्या चाग भी है मा-निवद्य मिक्षा वृनि से आहार आदि पण को, द ग्मपग्न्यिाग-दूध दही घी नेल मीटा ग्याग इन छपिद एक दोका या. नया का त्याग करे, काया उगमा. निर्जग के लिय जान कर मीन नाप आदि मदन कर जांच कर. विहार कर बंगग.. पति मलीनता मो-दद्रियों कपायोंजी गों का निग्रह को भी नप का दुमग नाम 'विविक्त सत्यागन' हमा-मी पगु नमक रहने हो म म्यान में नहीं, यह है वाहा (प्रगट) नपर. , पायचिन मंगे पार को अलग का ने तप आदि कर. ८ पिनय मा-(१) झान दर्गन चारित्रको आदर भाव में रहा कर मां मुख्य विनय. और दानादि के आगमक प्राचार्यादि कामवासन वंदन नमन क मा नानिक, विनय, या अन्य मा-(1) पाद जाई दान में काया नाजनक बनायन. र) बम पात्र आहार आदि :- विन्द्र देव मोपावन जना यापन. १० माया मृवादि माप पं . - - -- * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी. न्य को पढाव धर्मोपदेश देवेसो. ११ ध्यान सो-चित्त वृत्ति का निगृह कर किसीभी शुद्ध विचार में रमन कराना सो. और १२ काउत्सर्ग-काया को एक स्थान कर स्थिर रहे. तथा इस तपका दुसरा 'व्युत्सर्ग' भी नाम है सो वाह्य अभ्यान्तर परि- गृह का त्याग करे. सातवे अप्रमत गुणस्थान के लक्ष्ण. पांच - प्रमाद. आर्या-मद विषय कषाय । निन्दा विकहा पंचम भणीया ॥ ए ए पंच पम्माया । जीवा पडन्ति संसारे॥१॥ अर्थात्- मद. २ विषय, ३ कषाय ४ निन्दा और ५ विकया इन पांचों प्रमादों के वश में पड़ने से जीवों संसारे में पड़ते हैं. १ मद ८ प्रकार से होता है।-(१) जाति-माताके पनका. (२) कुल पिता के पनका. () वल-पराक्रम (ताकद) का. (४) रुव-शरीर के तेज दमक पने का. (५) तव-तपश्चर्याका. (6) मुय-मूव-विद्या का. (७) लाभ-द्रव्यादि की प्राप्ति का. और (८) इस्सरी-इश्वरी-परिवारादि की मालकी का. इन आठों आभ मान को जीतें. २ विपय २३ के विकार २४० होते हैं:-(१) श्रोतेन्द्रिय की (३) जीव शब्द. (२) अजीव शब्द, और. (३) मिश्र शब्द. यह तीनों विषय. इन को शुभ अ- शुभ से दुगने करने से ६ होते हैं, और इन को राग द्वेष से दुगने करने से श्रोतेन्द्रि- के १२ विकार होते हैं. (२) चक्षुरेन्द्रिय की-(१)कृष्ण. (२) हरित. (क)रक्त (४)पित और (५) शुक्ल. यह पांच रङ्ग रूप पांच विकार होते हैं. इनको सचित्त अचित्त मिश्र इन तीनों से ती गुणे करने से १५ होते हैं. इन १५ को शुभ अशुभ से दुगुणे करनेसे ३० होते हैं. और इन ३० को राग द्वेप मे दुगने करने मे चक्षु इन्द्रियकेद, विकार होते हैं. (३) घणेन्द्रिय की- (१) मु(गन्ध, और (२) दुर्भागन्ध, यह दो विषय. इनको मचित्त अवित्त और मिश्र इन तीनों मे तिगुण करने में होते हैं. और इन ६ को राग द्वेष मे दुगुणे करने से घणेन्द्रिय के १२ विकार + होने हैं. +ोन्द्रिय के १२ विकार को सुन सुन ने दुगुने जर २४ मिले हैं.

* प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड. * (४) रसेन्द्रियके १ कटु, २मधु, ३क्षारा,४तीखा और ५कपायला, यह ५ विषय. इन को सचित्त अचित्त और मिवसे तीगुने करनेसे १५होते हैं. इन १५ को शुभ अशुभसे दुगुने करनेसे३० होते हैं. और३० को राग द्वेषसे दुगुने करनेसे रसेन्द्रियके ६० विकार होतेहैं। (५) स्पर्शेन्द्रिय गुरु, २लहू, ३ शीत, ४ उष्ण, ५ रुक्ष, ६ चीक्कन, ७ सुकुमाल, ८खर दर. यह ८ विषय. इन ८ को सचित्त, अचित्त और मिश्र से तिगुने करने से २४ होते हैं. इन २४ को शुभ अशुभ से दुगुने करने से ४८ होते हैं, और इव ४८ को राग द्वेप मे दुगुने करने से स्पर्श इन्द्रिय की ९६ विकार होते हैं. यों पांचों इन्द्रियों के ३३ विपय और २४० विकारों का निग्रह करे. ३ कणय प्रमादतो क्रोध, २मान, ३ माया और ४ लोभ, इन चारों कपायों को बहु ही पतली संचल नमात्र उपशान्त रक्खे. ४ निन्दा के दो अर्थ होते है। -(१) जो दर्शनावरणीय कर्मों दय कर आत्मा के चेतना लक्षण गुण हैं उस पर आवरण आकर प्रवश्य-मृत्यु तुल्य वना दे- वे मो निद्रा कही जाती है. इस जेहर को निकालते-कमी करते हैं. और (२) निन्दा सो अवगुणों को यवर्ण वाद बोलकर प्रकट करना उसे निन्दा कहते हैं, आत्म मु- ग्वार्थी जन अपनी आत्मामें दुर्गुण होवे उने जान-प्रकट कर निकालनेका पर्यन्त करते है. दुमरा कोई अपने दुर्गुण बतावे निन्दा करे तो आप सम भाव से-श्रवण कर उप- कार महित स्वीकार अन्तर दृष्टि कर आत्मा में अवलोकन करते हैं; जो वो दुर्गुण आत्मा में पानावे तो उमे निकाल ने का उपाव करते हैं. और नहीं पाये तोभी बुरा नहीं मानते हैं, क्योंकि उम ने तो उम अवगुणी की निन्दा करी है-मेरी नहीं करी, ऐमा विचारदे हैं. और अपने मुख मे दृमरे की निन्दा कदापि नहीं करते हैं. अर्थात् पाप की निन्दा करते हैं परन्तु पापीकी निन्दा कदापि नहीं करें. क्योंकि शास्त्रों में निन्दा का नाम "माम मक्वी" कहा है. अर्थान-दुमरे की निन्दा करनी मो मांस मक्षण करने जमी अपवित है. ऐमा जान मुनि मौन रकाबने हैं. IF आगे आठवे गुणस्थान मे लगाकर चौदवे गुणम्यान का अर्थ मव मूल में कहे मुझदही ममझना चाहिये. ठट्टा - दृष्टान्त द्वार का खुलासा. पावण्डियाका बम्प ममझाने प्रथम ५ ममवाय कहते है। १ कालवादी-कहना किम जगत का कर्ता काल ही है. उत्पत्ति प्रलय - * मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अदीशतद्वारी. आदि सब कालाधीन है, प्रत्यक्ष देखीये! योग्य काल (वय) को प्राप्त होते स्त्री ऋतु माप्त होती है, उसे योग्य वय के पुरुष के संयोग सेही गर्व रहता है. और नियमित काल पूर्ण हुवे ही पूर्ण पूत्र की माप्ति होती है. वो लडका योग्य काल जाते ही वोल ता चलता खाता पढता द्रव्योतप्ति कुटुम्वोत्पत्ति कर वृद्ध हो मरजाता है. ऐसा काल का सम्राज वस स्थावर सर्व प्राणीयों पर और जडोंपर अखण्ड प्रवृतता है. २ स्वभाव वादी-कहता कि-जगतात्पत्ति आदि सर्व काम स्वभावाधीन है, काल से कुछ भी नहीं होता है. जो होता होतो योग्य काल संयोग हुवेही वन्ध्या के पुत्र क्यों नहीं होता है? स्त्रीके दाढी मूछ क्यों नहीं आती हैं? इत्यादिसे प्रत्यक्ष जाना जाता है कि वो उनका स्वभाव नहीं है. हँसमें शरलता, गले में वक्रता, कोकीलाका मधुर स्वर, कागका कटुक स्वर, सर्प के मुख मे जहर मणी में अमृत, पृथ्वी-कठीण. पाणी प्रवाही, आनि उष्ण, वायु चलन, इत्यादि सर्व श्रेष्टी के पदार्थो स्वभाव सेही प्रवृत्त रहे प्रत्यक्ष दिखते हैं! ३ नियत (होनार) वादी कहता हैकि-जगत का सव कार्य होनार मुझव ही होता है. जो काल और स्वभाव से होता होतो-अम्ब वृक्ष का काल पके स्वभाव से मोर (फल) तो वहुत आते है, परात फल तो होनहार जितने ही लगेंगे! देखीये! नि- यत कैसा प्रवल हौक-रावण को भविष्यण ने मन्दोदरी ने बहूत ही समझाया, परन्तु होनहार के सवव से किसी काभी नहीं माना, और मारा गया! इत्यादि अनेक दाख- लेसे जाना जाता हौके-सव होनहार मुझवही होता है. ४ कर्म वादी–कहते हैकि-जगत् के सब कामों कृत कर्मानुसारही होते हैं. जो काल स्वभाव और नियत प्रमाणे होते होतो- काल स्वभाव नियत एकसा मि- ले पुवोत्पत्ति होती है, फिर वो अच्छा बुरा. मुखी दुःखी तो कमों प्रमाणे ही होता है. प्रत्यक्ष ही देखीये धनाढ्य. दरिद्री मूर्ख पण्डित इसादि विचिव ता पशु मनुप्य और देवों मे भी देखी जाती है सो सब कर्मों जनित ही है! ५ उद्यमवादी-कहता होक-जगत् के मव कार्यों उद्यम प्रयाम कियेमेही निपज- ते हैं. जो काल स्वभाव नियत और कमों मे होनाहो तो-तोता अश्व आदि एकही कालादि प्रमाणे उत्पन्न हो उद्यम करने मे गायर नृत्य आदि अनेक कला में प्रवीन हो वडे २ इन्द्र नरेन्द्रों के मन हरण करते है, और प्रत्यक्षही दिखता कि- आहार वख भूपण मकान आदि कल उपयोग में आने हुवे पदार्थों विना उद्यम के नहीं ही . .

८८ * प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड ११ होते हैं, पत्थरोमेसे रत्नों मट्टी में से सुवर्ण आदि निर्माल्य वस्तु में से अमूल्य पदार्थों उद्यम से ही प्राप्त होते हैं, किंबहुना सर्व दुःखों का नाश कर निरामय मोक्ष स्थानके अनन्त मुख का देने वाला एक उद्यम ही है !! ऐसी तरह से इन पांचों वादीयों का विवाद अनादि से चल रहा है, यह पाचों ही एक एक वात को गृहण कर अपने २ पक्ष को तान ते हैं इसलिये मिथ्या वी कहे जाते हैं. इन पाचों से ३६३ पाखण्ड हुवे सो कहते हैं:- १. क्रिया वादी के १८० भेदः-ऊपर पांच समवाय कहे, उन्हे स्वात्मा और परात्मा से दुगुने करने से १० भेद हुवे, इन को नित्य और अनित्य से दुगुन कर ने से २० भेद हुवे. इने (१) जीव, (२) अजीव, (३) पुण्य, (४) पाप, (६) आश्रव, (६) संवर, (७) निर्जरा, (८)वन्ध, और (९)माक्ष, इन ९से९ गुने करने से२०४१% १८० हुवे. यह क्रियावादि-आत्मा का और क्रिया का अनादि अनन्त सम्बन्ध मानते हैं, क्रियासे ही गतागति कर पुण्य पाप के फल भोगवना मानते हैं, इन को मिथ्या- व में लेने का सबब यह हैकि-आत्मा को अनादि अनन्त सक्रिया मानने से मोक्षकी नास्ति होती है. और यह फक्त क्रियासे ही मोक्ष मानते हुवे ज्ञान की उत्थापना करते हैं. + २ अक्रिया वादिके ८४ भेदः-उपर कहे सो पांच समवाय और छहा-यह- च्छवादी + यह ६ स्वात्मा से और परमात्मा से दुगुने करने से १२ होते हैं, इनको ऊपरोक्त ९ तत्व में से पुण्य पाप * कमी कर ७ तत्व में ७ गुणे करने से १२४७ + श्रीभगवति सूत्र के समव सरण शतक के पहिसे उदेशे में क्रिया वादिको १४ वे गुणस्थान तक बता कर बहूत उत्तम दर्शाया है. सो वो क्रिया करतूत को मान ने वाले जान ने. परन्तु मिथ्यात्वी नहीं है. यह इच्छावादी कहते हैं कि-कार्या कारण भावका कुछ नियम नहीं है, क्यों कि- जैसे मरे मेंडक से भी मेंडक उत्पन्न होते हैं, और गोबर से भी मेंडक होते है. आमि से भी आग्नि उत्पन्न होती है, और अरणीकी लकडी से भी अग्नी होती हैं, ऐसे अनेक वस्तु होने से कार्य कारण नियम मान ना उचित नहीं है, जो होता है सो सब यट्टइच्छा से होता है. यह पर लोक की नास्ति कर्ता होने से पुण्य पाप की नास्ति करते है. चे - ८९ * मुक्ति मापाने-श्री गुणस्थान गेहण अहीशनद्वारी. =८४ भेद होते हैं. यह कि कहते हैकि-जगत के पर्व पदार्थो क्षीण २ मे पराष्टत पाने दृष्टि आते है. पदार्थों की अस्थिरता के सवव मे उनको क्रिया नहीं लगती न कर्म बन्ध होता है और न उन के फल भुक्तना पडता है. अज्ञानवादीके भेदः-(१) मत-क्या जीव सत्य है? (२) असलं क्या अ. सत्य है?(३)सदसतं क्या सत्यासत्यौ? (४) अवाच्यत्वं-जीवको सत्य कैसे कहना? (५) सवाच्यत्वं-असत्य कैसे कहना? (८) 'असदवाच्यत-सत्यासत्यभी कैमे कहना? औ र (७) सदा सदा वाच्यंत्व-सत्य भी नही असत्य भी नही. यह विकल्पों जीव के किये, तैसे नव पदार्थ के करने से ७४१=६२ भेद हुवे, और सत्व, २ अमत्व, ३ सदत्वं, ४ अवाच्यत्वं यह x मिलाने से ६७ भेद होते हैं. यह कहते हैंकि-"जानेसो ताने" यह अच्छा, यह बुरा, ऐसे राग द्वेप में ज्ञानी फस मरते हैं. अपन अज्ञानी अ- च्छे हैं जो किसीकी के झगडे में न फसे, न पाप को जानें, और न पाप लगे. ४ विनरवादी के ३२ भेद : (१) मूर्य, (२) राजा, (३) ज्ञानी, (४) ज्ञाति, () स्थविर, () धर्मी. (७) मावित्र, और (८) गुरू, इन आठोंको-(१) अच्छे जान ना, (२) मुणानुवाद करना, ()नमस्कार करना, और (४)गचित दान देना. इन ४से चौगुन करने से ८४४-३२ भेद होते हैं, यह कहते हैंकि-सव को अपने से अच्छे जान वंदन नमन आदि विनय करने मे ही सब मुख की माप्ति होती है. यों चारों वाढीयों के मिलकर ३६३ मत भेद होते हैं. कृष्ण वासुदेव श्रेणिक महराज. सोरठ देश में देवताकी वसाइ हुइ देव लोक भूत द्वारका नगरी में तीन खन्ड राज के भुक्ता ४२०००, हाथी, ४२००० अश्व, ४२००० रथ ४८०००००००, पायदल, श्री समुद्रविजय आदि १० दशारमहराज, वलभद्रजी प्रमुख ५०० महावीर, पशुमन ममुख ३५००००००० कुमर, संव प्रमुख ६००००० दुर्दन्त, महासेन प्रमुख ३६००० बलवन्त. वीरसेन प्रमुख २१००० वीर, उग्रसेन प्रमुख १६००० मुकट वन्य राज चाकर, ऋक्रमणी प्रमुख १६१०० राणीयों, अनंगसेना प्रमुख अनेक ह- जारों गणीका, ५६००००००० जादव का परिवार, और भी महा ऋदि सिद्धि के x यहा कितनेक संख्य, २ वेद, ३ शिव, और विष्णव यह ४ मिलता है.

* प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड.५ धारक वावीस वे तीर्थकर श्रीरिठनेमी भगवन्त के शिप्य 'श्री कृष्ण वासुदेव' नामक महाराजा थे. और मगधदेश की राजगृही नगरी में १७१००००० ग्राम, के ३३०००हाथी, ३३००० अश्व, ३३००० रथ, ३३००००००० पायदल, चेलाणजी प्रमुफ ५०० राणीयों, अभय कुमार प्रमुख २३ कुमर, मगध और अंग दोनों देशका मालक चौ- वीसवे तीर्थंकर श्री महावीर भगवन्त के शिष्य श्रेणीक नामें महा मंडलीक राजा थे. इन दोनों महाराजाओंकी सम्यक्त्व की द्रढता विषय शक्रन्द्र देविन्द्र ने पर सं- स्या करी, जिसे सहन न करते मिथ्यात्री देवने व्यभीचारी साधु साध्वी का रूप वनाकर धर्म को ढोंग बताने के वास्ते व और भी सब १०८ तरह से परिक्षा करी. परन्तु इन के परिणाम लवलेश भी चालित न हुवे. और इनों ने अपने राज में जाहिर किया था कि जो दिक्षा ग्रहण करेगा उनका महोत्सव और कुटुम्ब का पालन हम करेंगे. ऐसा सुन कर इन की प्राणप्रिय पटराणीयों और पाटवी पुत्रों वगैरा जो जो दीक्षा लेने तैयार हुवे उनको सहर्ष आज्ञा दे स्वत; बडे आडम्बर से उत्सव कर दी- क्षा दिलाइ. अपने राज में अमरी पडह वजवाया, जैन धर्मीयों का दाण-हांसल माफ किया, और हरेक तरह से धर्मोन्नति कर धर्म को विश्व व्यापी-सर्व मान्य बना दि- या था. मानो इनोंने अपने तन मन धन जन आदि सर्व स्वय धर्मापण कर विदेही वत - दृष्ट्वाभूत हो राज्य करते थे. इसादि इनों के सद्गुणों समोह से आकर्पा कर खुद परमात्मा श्री तीर्थकर भगवन्त वरम्बार इन के ग्राम को पावन करते थे, और धर्म वाद ज्ञान वृद्धि संघ वृद्धि कराते थे. ऐसा महान् पुप्य की प्रबलता रूप वृद्धि कर इन दोनों महाराजाओं ने श्री तीर्थंकर गौत्र की उपार्जना की है, अर्थात् यह दोनों पूर्वो पार्जित पाप का बदला भुक्त ने फक्त एकही खुलक (छोटा-थोडे आयुका) भव नरकका भव कर अनन्तर आगे के भव सुद तीर्थकर-परमात्म पद को प्राप्त कर सर्व जगत्के परम माननिय परम पूज्यनीय हो महन् धर्मकी वृद्धि कर, आयु अन्त अनन्त अक्षय मोक्षके मुखके भुक्ता बनेंगे! में * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी. १ दश श्रावको का वरणन. है संखा श्रावकों केनामइनकीखीकेनामा रहनेका ग्राम पास द्रव्य पास गौसख्य. ४०००० २ ६०००० ८०००० ६०००० १ | आणन्दजी | शिवानन्दा वाणीया ग्राम १२ क्रोड काम देवजी | भद्रा भार्या चम्पा नगरी १८ कोड ३ | चूलणी प्रिये सोमा भार्या | वनारसपुर २४ क्रोड सूरदेव धन्ना भार्या | वनारसपुर १८ क्रोड चूल शकत बहुला भार्या | आलंभीया १८ कोड ६ | कुंडको लया पुस्सा भार्या कपिल पुर १८ क्रोड सकडाल पुत्र आमि मिवा सलाम पुर 3 जोड महा शकत वंतीआदि राज ग्रही . ६०००० ७ १०००० २४ मोड ८०००० ९ नन्दन मिय अश्वनी भार्या सावत्थी १२ कोड १० तेतली प्रिय फाल्गुनि भार्या मावत्थी १२ कोड यह दोंही श्रावकों चौथीमवे तीर्थंकर श्री महावीर स्वामीजीले गिप्यों थे. इनोंने पहिली कही हुर श्रावक धर्म में प्रवेश करने की न्यान्ही भूमिका- गुण श्रेणी का अनुक्रम मे यथा विधि शुद्ध सम्पूर्ण आराधन किया है. व्रतों की मर्यादा में जि- वनी अपने पान ऋद्धि थी उन उपरान्त नया इच्छा का निधन दिया है. टन : हीने कुल २० वर्प नक शावक धर्म का पालन किया. जिन में निम आयुप्य के । ५॥ वर्ष पन्त को घर धन परिवारका न्याग कर. एकान्न धर्म स्थान में हम एक महीने तक एकान्तर उपवान. फिर दो महीने ना देले २ पारणे फिर नीन पटीने तक तेले २ पारणे. पों पहने जावत न्यारे महीने तक इत्यारे सावाना- . 1 ९२ * प्रथम अर्थ काण्डका प्रथम मूल द्वारा रोहण खाण्ड. रण ने कर श्रावक की इग्यारेही प्रतिमा का अधिकाधिक विशुद्धी से आराधन किया और आयु का अन्त नजीक आया जान सलपेण युक्त संथारा किया-मरे वहांतक चारों अहार के त्याग कर एकस्थान स्थिर रह धर्म ध्यान में निर्मम हुवे, जिस से ज्ञानावरणीय कर्मदल पतले पड़ने से उपर प्रथम स्वर्ग नीचे प्रथम नरक और चारों दिशीयों पांचसो २ योजन तक देखें ऐसा अवधिज्ञान उत्पन्न हुवाहै. शक्रेइन्द्र महारा जने इन की परसंश्या करी तव देवताओं इनको डिगोने आये महा विकराल रूप व- नाकर महा दुःख दिया, तीव्र भयंकर वेदना उपजाइ, कितनक श्रावकों के पुत्रों का रुप बना कर उनके सन्मुख लाकर मारे, घरका धन हरण किया, वगैरा अनेक परि- सह उपनाये, परन्तु यह धर्म से किञ्चित मावही चलित नहीं हुवेहै. ऐसी तरह से द्र- ४ श्रावक व्रतों की आराधना कर दशोंही प्रथम स्वर्ग के अरुण नामे विमाण में चार यल्योपम के आयप्य वाले देवों हुवे. वहां से चक्कर दशाही महाविदेह क्षेत्रमें उच- म मूखखस्थान में जन्म लेकर संममले करणीकर कर्मखपा मोक्ष पावेंगे. धन्नावा सारथवाही का दृष्टान्त. राजग्रही नगरी के प्रभूत धनी धन्नावा सारथ वाही की भद्रा भार्या के नागदे- व की मान्यता लिये वाढ एक पुन हुवा जिसका “देवदत्त" नाम रक्खा. उसे शेठ का विश्वासू पंचक दाम शिणगार सजा क्रिडा के लिये बाजार में लेगया, बहुत बच्चों में खेलना छोड आप सोगया. वहां तस्कर कला में कौशल्य " विजय " चोर उसदे वदत्त को निरिम देख उठलेगया- उमके भूषण लेकर उमेमरकर अन्धारे कूवेमें डा- ल आप वृक्षोंकी कच्छा में छिप गया, पाछे दाम जागृत हुवा बच्चा नहीं मिलने से म्दन करता शेट मे कहा, शेठने राज में इत्तलादी, राज भटों मृत्युक पुव को और चोर को टुंढलाये. गेट मपग्विार अत्यन्त शोकमे पीडित हो पुव का मृत्यु कार्य कि- या; और चोर को गिरकार ने काटके ग्बोड में केट किाय. कितनेक दिन बाद गेट जी दाण की चोरी कर गना के गुन्हेगार हुवे., उनको राज भटने जिन बोडे में वि. जय चोर का पांव फमाया या उमी ग्वाडे के एक छिट में गेट के पग को फमाया भोजनकी वक्त गेटाणी ने पंचक टाम के हाथ गेट के लिये तस्कर शाळा में भोजन पटाया. उमे गेट भोगवने लगे तब वो चोर बोला की इम भोजन का कुछ हिस्मा मुझे मी दीनीये. परन्तु गेटने उसे अपने प्यारे पुत्र का यानिक जान भोजन नहीं

No text on this page.

९४ * प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड र मुनि ने नाम बता कर कहा कि नाना करते एकही दम सब शाख डाल दिया. गुरु- जीने किंचित शास्त्र जवान पर रक्खा तो हलाहल जेहर सा कदुक लगा, तब हुकुम दिया कि ऐसे आहार से तुम प्राणमुक्त हो जावोंगे इसलिये इसे निर्वद्य स्थान परिठा आवो. हुकुम प्रमाणकर कुम्भार के निभाडे में आ परिक्षा निमित एक विन्दु डालकर देखा तो तुर्त अनेक कीडीयों उसे खाते ही मरगइ! मुनिने विचारा कि-किंचित आ. हार से इतनी हिंसा तो सब डालने से तो महा जुलम हो जायगा. और गुरु जी का हुकम तो निर्वद्य स्थान परिठाने का है. इसलिये निबंध स्थान तो मेरा पेट है, कदा- पि इस से में मरभी गयातो कुछ फिकर नहीं. क्योंकि मेने संयम दया निमंतही लि- या है, लेखे लगेगा! यों सोच तुर्त खीर सक्कर की माफिक उस शास्त्र को खा गये!! कि तुर्तही अति दारुण व्याधि उत्पन्न हुइ, गुरुजी के पास आने अशक्त हो और आयु अन्त समिप्य जान पदोप गमन संथारा कर सर्वार्थ सिद्ध नामें महा विमान में ३३ सागरोपम के आयु वाले उत्कृष्ट मुख के भुक्ता एकावतारी देव हुवे ! आचार्यजी ने धर्म रुची को गये बहुत देर हुइ जान चौकस करने दुसरे साधु को भेजे, वो देख आये और अकाल मृत्यु के हाल दर्शाये. सुन कर गुरुजी कोपाय- मान हुवे और साधुओं को हुकम दिया कि वीच वजार में खडे हो पुकार कर कहो कि हमारे तवश्वी साधु को नागश्री ब्राम्हणी ने जेहर देकर मारडाले है! साधुओंने वैसाही किया. नाग श्रीके कुटुम्ब ने यह वात सुन उसको घरमें से निकल दी. उसके भी शरीर में कुष्ट रोग प्रगटा और महा निन्दा महा विडम्बना सह कर नरकमें गइ! मतलव-साधु को किसी के मर्म प्रकाश ने नहीं यह उत्सर्ग मार्ग है, परन्तु अन्य लोक जानेगें कि साधुओं में लडाइ हूइ जिस से एक साधु को जेहर दे मार डाले-या जेहर खा मरगया-इत्यादि धर्म का कलंक दूर करने धर्म घोपाचार्य ने अप- वाद मार्ग का आचीर्ण कर नाग श्री की फजीती कराइ. या छट्टे गुणस्थानी उत्सर्ग और अपवाद दोनों मार्ग में यथा अवसर प्रवृत्ति करते हैं. धन्ना अणगार का दृष्टान्त. काकन्दी नगरी के घना शेठ ने ३२ क्रोड सोनयें (मोहरों) का द्रव्य और ३२ मुन्दर स्त्रीयोंका त्याग कर दिक्षा ले निरन्तर छट २ (वेले २) रूप और पार ने मे लूखा मुका आहार कि-जिसे भिख्यारी भी गृहण न भोगवा. ऐसे दुक्कर * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहेण अढीशतद्वारी. * पत से ८ महीने में जिनका शरीर मूककर रक्त मांस राहित फक्त हड्डीयों का पिंजरा रह गया. जिनके-पांव-चुके वृक्ष की छाल जैसे, पांव की अङ्गलीयों-मूकी मूंगकी फ- ली जैसी, पीन्दी-कागले की जंघा जैसी, डचण-काग जंघा वनस्पति की गांठ जैसी, कम्मर बुढे वेल के पांव जैसी, पेट चमडे की सूकी मशक जैसा, पांसलियों कांच के ढग जैसी अलग २ दिखें, छाती पत्ते के पंखे जैसी, वाहां-अगधीये की फली जैसी, हथेली-वड के मुके पत्ते जैसी, हस्तांगुली मूंगकी सूकी फली जैसी, गरदन-कमन्डल के गरदन जैमी, जिव्हा-पलासके मूके, पचे जमी, होट-मूकी इमली जैसे, नाशीका अम्ब की मूकी गुटली जैसी. आंख वीणाके छिद्र जैसी, कॉन प्याज के पत्ते जैसे, मस्तक-मूके तुम्ब फल जैसा. ऐसी तरह मर्व शरीर मूक गयाथा ! तोभी-मझाय ध्यान भिक्षा प्रति लेखना आदि माधु की मर्व क्रिया ओंका यथा विधि वक्तोवक्त बाराधन-पालन करते थे, तब ही खुद श्री महावीर परमात्मा ने श्राणक राजा के म. न्मुख १४००० माधुओं मे उत्कृष्ट करणी के कर्ता धन्ना' अणगार कोही बनाये यह एक माम का मंधारा कर कुल नव महीने की करणी मे मर्थि मिद्ध विमान में एकावतारी देव हुवे हैं. मेघ कुमारका दृष्टान्त. राजग्रही नगरी के श्रेणिक राजा की धारणी नामक गणी के अङ्ग में उत्पन्न दुवे मेघ कुमार आमन्दर स्त्रीयो और दहुन ऋद्धि का त्याग कर श्री महावीर या माके मामिप्प-दीक्षा ली. नब से छोटे हीने के मकव मे अन्तिम विहान पर मने. रावि के स्वध्याय ध्यान परिटावणीपा आदि निया के लिये मुनियों के प्रधानमनने और पनले विछोने मे जमीन चवने निद्रा नहीं आइ. नव पीछा कर जाने विचार कर भगवन्त मन्मुख आकर रजा लेने. मानगये. नव भगवन्न ने फन्नता दिदी मेघ मुनिः हममे पहिले तीने भव में तुम देनाट पनि के नजीक र नापती. पों के मालक वेगवाले कर नाने गजमान थे. एकदा त पानी पीने को नल्लाव में मवेश करने दीचर में पन गरे. न दुनग दी जाने पर को दोनों में पहुन भनजिन मेमन् दिनमा विशारी क पुनः मातमोरमणीयों के मामलेगाना :- उपाय में दाने एरु पारद न्दन ::- 1 1 -- प्रथम अर्थ काण्डका प्रथम मूल द्वारारोहण · खाण्ड. ष्ण. काल में वन में दव, (अग्नि) लगी तब तुम सपरिवार उस मन्डल में आ खडे रहे, उसवक्त और भी अनेक वनवासी पशुवों वहां खीचो खींच भरा गये. उसवक्त तुमने खाज कुचर ने पांव उठाया, उस पांव की जगह एक सुसलीया आगया, पांव रखते कोमल स्पर्श लगने से नीचे मुसलीये को देख तुमने विचार किया कि वेचार लायसे वचने मेरे शरण आया और जो में पांव रखदूं तो इसकी तो यहांही लाय हो जाय! यों करुणा भाव लाकर तीन दिन पांच ऊचा रक्खा, जब अग्नि शान्त पड़ने से सर्व जीवों भाग गये तब पांव वादी में अकडा हुवा नीचे रखते तुम गिर पड़े, और मर- कर दया प्रभावे श्रेणिक राजा के पूर्व हुवे. सोचीये! तीसरे भव में निर्थक महा कष्ट सहा जिसका कुछ भी फल न हुवा और दुसरे भव में दया निमित थोडा भी कष्ट सहा तो यह ऋद्ध और संयम तक प्राप्त कर सके! तो अब यहां कितनाक कष्ट सहना है ! सम भाव से प्राप्त वक्त का लाभ लेवोगे तो आत्माका कल्याण हो जायगा. ऐसा जिनेंद्र का सद्रोध श्रवण कर मेघ मुनि ने फक्त दया निमित दोनों ऑ खो की संभाल करने का आगार रक्खा, वाकी सब शरीर मुनिराजों की सेवा में स- मर्पण कर-तहामन से खूब विनय वैयावच्च ज्ञान ध्यान तप कर विजय विमान में ३२ सागर के आयुवाले एकावतारी देव हुवे. प्रसन्न चन्द्र राज ऋपि का दृष्टान्त.. राजग्रही नगरी के श्रेणिक राजा गुणशील वाग में विराजे श्री महावीर भग- वन्त के दर्शन करने जाते, रस्ते में प्रसन्न चन्द्र ऋपि को सूर्य के तापमें अडोल ध्या- नाबद्ध देख आश्चर्य चकित हो भगवन्त को नमस्कार कर पूछा कि-महाराज! दुक्कर ध्यानी मुनि मरकर कहां जायगे? भगवन्ते फरमाया कि-जो अभी मरेतो पहिली नर- क में जाय. श्रेणिक-हैं, पहिले नरक! भगवन्त-नहीं दूसरी नरकमें, श्रेणिक है दुसरी!! भगवन्त-नहीं तीसरी. यों श्रेणिक आश्चर्य चकित हो प्रश्न करता गया, और भगवंत चौथी पांचवी छही जावत् सातवी नरक में जानेतक का फरमादिया. श्रेणिक ने फिर भी पूछा किनोने महा मुनि मातवी नरक में जाय? तब भगवन्त ने फरयाया कि-न- ही छी में यों, फिर भी श्रेणिक आश्चर्य चकित हो पूछता गया और भगवन्त-पांच- बी चौथी तीमरी दूसरी पहिली भवनपति वाणव्यातर जोतिषी देवलोक ग्रीवेक ९७ * मुक्ति सेापान श्री-गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी. ११ और अनुत्तर विमान का नाम फरमाते ही देव दुंदभी का नाद मुणाया, तब श्रेणि- ने पूछा कि-यह दुदभी क्षों वजो भगवन्त ने फरमाया कि प्रसन्न चन्द ऋपि केवल ज्ञानी हुवे हैं. यों सुण श्रेणिक वडाही आश्चर्य चकित हो पूछा कि-बडी ताजुब की वात है, अबी सातवी नरक ओर अभी केवल ज्ञान, इसका सबब क्या? तब भगवन्त ने फरमाया कि-तुमारे साथ के एक भटने उन मुनि को देखकर कहा कि-यह साधु वडा निर्दयी है. वेचारे नादान बच्चे पर सब राज भार डाल साधु बन गया, उसे पर. चक्री सता रहे हैं. इतना सुनतेही राज ऋषि कोपित हो परचक्री के साथ मनोमय सं ग्राम सुरु किया (उसवक्त तुमारा प्रश्न करना हुवा) अनेक नरों का संहार कर शव को मारने चक्र लेने जब शिरपे हाथ डाला (उसवक्त सातवी नरक के दलिये भेले किये) तो रूंड मूंड मस्तक पाया, उस वक्त चौंक गये, और भान आयाक-मेंने सा- धु होकर यह क्या जुलुम किया! या विचार करने लगे (उसवक्त संचित कर्मों के द. लिये खपने लो) त्यों त्यों उंचे चडते गये और शुद्ध ध्यान में एकाग्रता लगने से घन घातिक कर्म नष्ट कर केवल ज्ञान पाये! यो मुण श्रेणिक राज वडे खुशी हुवे, और भगवन्त को तथा राज ऋपि को नमस्कार कर स्वस्थान गये. यों परिणामो की धाराओंके उतर चड पणे श्रेणी में उत्तर चड होती हैं. हरकेशीवल ऋषिका दृष्टान्त. पूर्व भव में जाति का और रूप का अभिमान करने से चण्डाल को जाति में उत्पन्न हुवे, हरा काला रंग का बलिष्ट विदूप गरीर होने से 'हरकेशी वल' नाम पाये, कुरूप के अपमान से घबराकर पहाड पडकर मरती वक्त मुनि के दर्शन होते ही मुनि ने उनको अकाम मरण मे वचा कर मकाम मरण मरने का वोध किया, जिमे सुन वैराग्य प्राप्त हो दीक्षा धारन करी. और निरन्तर मांस २ तप करने का अभिग्र ह धारन कर वनारसी नगरी के वाहिर या के मन्दिर में ध्यान धारण कर रहे उन के उग्र तप के प्रभाव से तिदुक (टीवरह) वृक्ष का वामी देव मुनि का भक्त हुवा. उ- सवक्त वनारमी पुरीके राजाकी भद्रानाम महा दिव्य रूप की धारक कन्या महेली- यों के सङ्ग उस यज्ञ के अन्धरे देवालय में क्रीडा करने आइ, और मुनि को विद्रूप देख मुह फिराकर थूक दिया. उनी वक्त यनने उमका मुद्द बॉका करदिया. पुवीका दुःख मुन राजा देवालय में आया तब यन मुनि के शरीरमें प्रवेश का बोला कि यह से * प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड. कन्या मुझें देवोंगे तोही आराम पावेगे मुनिके शापसे राज डरकर मुनिके साथ उस भद्राका पाणी ग्रहण कराया कि-उसीवक्त वो यक्ष-मूनिके शरीरमेंसे निकल गया. तब मूनिने भद्रासे कहा वाइ! साधूसे दूर रहे-छीना नहीं. भद्र वोली-अभी आपने मेरापाणी ग्रहण कर मुझे दासी बनाइ, और अव यह क्या फरमाते हो! साधु बोले-में यह न जानताहूं. में तो कन्क कन्ता का त्यागी साधु हूं यों कहते चलपडे. कन्या रुदन कर ने लगी. राजा आदि बहुत से लोको मुनि के आडे फिर बहूतही समझाए, परन्तु मु- नि मेरु की माफिक अडोहो वहां से दूर जा अन्य एकान्त स्थान में ध्यान धरा. कन्याकी यह दिशा देख राजा खेदित हो पुरोहितजी से पूछा कि अब इस कन्या का क्या करना लोभी पुरोहित जी वोले कि ऋषि पनि ब्रह्म पनि हो शक्ति है, भोले राजा ने उस भद्रा को पुरोहित जी को देदी. पुरोहित सहर्ष लम करने यज्ञा का आरंभ किया. उसवक्त मुनि यज्ञस्थान की तरफ पारणा (आहार) लेने पधारे, वहां एक अ- ध्यापक वच्चोको पढा रहाथा, व वोला कि-रे विकराल रूप और मलीन वस्त्रके धारक भिक्षु! इधर से चलाजा. यों सुनकर मुनि फिरने लगे. तब वो तिन्दुक यक्ष मुनि के शरीरमें प्रवेश कर कहने लगा कि-में परार्थ किया हुवा विर्वद्य-निर्दोष भोजन का ग्रहण करने वाला सा धु हूं, यहां बहुतसा आहार निपजा देख लेने आया हूं. ब्राह्मण वोला-वेदों के जानने वाले विमों सिवाय यह यज्ञा में निपजा हुवा भोजन दुसरे को कदापि नहीं दिया जाता है, यक्ष वोला-जैसे कृपी ऊंच नीच दोनों प्रकार के क्षेत्र में वीज डाल कर लाम प्राप्त करता है. तैसे ही कैसीभी श्रद्धा से मुझे दीजीये. ब्राह्मण वोला-उत्तम क्षेत्र ब्राह्मणोंकाही है, उन सिवाय दुसरेकोभी नहीं दिया जायगा. क्यों वकवाद करता है. चलाजा. यक्ष बोला-विपय कपाय युक्त विमों का क्षेत्र अलाभ करी है, में ब्रह्मचारी निप्परिग्रही हूं जो मुझे न दोगे तो यज्ञ का फल कैसे प्राप्त करसकोगे? इतना मुनतेही अध्यापक क्रोध में आ छत्रों को हुकुम दिया कि ब्राह्मणों के निन्दक अभिमानी इस भिक्षुको मारकर निकाल दो-कि एक दम छवों मुनिको मार ने खडे हुवे. उनका कोलाहल सुन भद्रा देख कर बोली-अरे यह क्या जुलम करते * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी. १९ में हो! मेरा वमन आहारकी तरह त्याग कर जाने वाले, दोविन्द्र नरिन्द्रके पूज्य, इन महा हु भाग को सत्ताकर क्यों दुःखी होते हो, यह कोपेंगे तो सब को जलाकर भस्मकर देंगे, ऐसे भद्रा के वचन को जब उन कुमारों न नहीं माना. तब यलने उनको जमी- न पर पछाड रुद्र वमन करते हुवे सुला दिये! और मुनि के शरीर में से निकल आ. काश में खडा तमाशा देखने लगा. यह अनर्थ निपजा देख यज्ञ कर्ता ब्राम्हणों दोड आये, और मुनिको नमस्का र कर कहने लगे. अहो आमा समण मुह वालकों पर इतना कोप करना उचित नहीं हैं. अपराध माफ करो. और इस यज्ञ शाला में से इडित आहार ग्रहण कर हमे कृतार्य करो. मुनि बोले-मेरे मन में किञ्चित ही क्रोध नहीं है. परन्तु मेरी वेयावच के लि- ये यक्ष ने यह किया दिखता है. फिर मूनि शुद्ध आहार ग्रहण किया वहां देवों ने पंच द्रव्य की वृष्टि करी. देव दुभी वनाइ. और अहो दान महा दान ऐसा शब्दो- चार करते अकाश नृत्य करने लगे. आश्चर्य चकित हो ब्राम्हणों आपश में कहने लगे कि- तप का फल तो यह प्रत्यक्षं ही दिखता हैकि-चाण्डाल जाति में उत्पन्न हुने मुनि देवों से पूजिन हो रहे हैं. और यझका फलवो कुछ भी दृष्टि नहीं आता है. तब मुनि वोले कि-अहो ब्राम्हणों वाह्य शुद्धि मे और हिंमक जय मे किमीभी प्रकार का कल्याण होणे वाला नहीं है. जो आत्म कल्याण चाहाते होवो तो धर्मनी- 2 के ब्रम्हचर्य रूप दह में नान कर. जीव रूप कुंड में तप प अनि प्रचलिन कर कर्म रूप इन्धन को जलातो. मई जीवों गान्ति रुप मन्त्र का पठन कर पवित्र बनो! माम्हणों ने यह वोध महर्प धारण किया. मुनि बहुत वर्प मंयम पाल बहुत जी वोंका उद्धार कर मोक्ष प्राप्त किया. सारांश यह हकि-नीच कुट, कुल्प. बलवन्न. नन की प्राप्ति के लिये मरण सन्मुख हुवे. ऐमों को अत्युत्तम कुली दिव्य मुन्दराङ्गी राज ऋद्धि आदि मन्पूर्णजी वित तक के सर्व द्रव्य मुन्नों को मामि वलकार (अप्रह) मे होते ही. उनका विटाकी माफिक त्याग कर निजात्म मुग्न में रमण किया :: ऐमे निर्षिपची निठिक हो सो निशचि करणी जानना.

" १०० प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड. * श्री गौतम गणधर का दृष्टान्त. गोवरधन ग्राम के गौतम गोत्री वसु भूति विप्र की पृथ्वी मामे स्त्रीने इन्द्र म- वन का स्वामा देख, सुवर्ण वरण वलिष्ट शरीर धारक पुत्र प्रसवा, जिसका इन्द्रिभू- ति नाम रक्खा, वो योग्य वय प्राप्त होते चार वेद छे शास्त्र चउदह विद्या आदि व्यवहारिक विद्या में महा प्रवीन पांचसो छत्रों के मालिक होने से जगत् में जबर प्र- तिष्टथा पाये. वो मध्य पापापुरी नगरी के सोमल ब्राम्हण के यज्ञ मण्ड वहुत स- न्मान से आकर यज्ञ क्रिया के अग्रभागी कर्ता बने. उसवक्त ऋजु वालका नदी के कण्ट पर गोदु आसनस्थ श्री महावीर भगवन को केवल ज्ञानी की प्राप्ति हुइ जिनके समवशरण की रचना मध्यपापपुरी के वाहिर देवताओंने रची. वहां क्रोडों गम देव यज्ञशाळ ऊपर हो समव शरण में जाने लगे, यह देख इन्द्र भूति बोले कि-देवों भरम मे पड यज्ञ स्थान उल्लंघन कर कहां जाते हैं ? तव किसीने कहा कि ग्राम वाहिर ती- थकर समवसरे हैं, उन के दर्शनार्य देव जाते हैं. यह मुन अभिमान मे उन्मत हो वि- वाद कर तीर्थकर का परांजय करने पांचसो छत्रों के परिवार से समवशरण में आ- ते ही जिनेन्द्र की विभूति पेख दिग मुढ बन गये. और विचार ने लगे कि जो मेरा सन्देह निवारे तोही यह सर्वज्ञ. तब भगवन्त ने फरमाया कि अहो इन्द्र भूति वेद में तीन दकार हैं. जिसका क्या अर्थ होता है? यह तुम्हारे मन सन्देह है, जिसका अर्थ दया दान और दम होता है. इतना सुनते ही संवेग प्राप्त हुवा, पांच से छत्रों सहित दीक्षा धारण कर एक मुहूर्त मान में १४ पूर्व के पाठी हुवे. जाव जीव वेले २ पार- णा का तप धारण किया, चार ज्ञान के धारक हुवे. सदा प्रभूकी सामिप्य रहकर अ- नेक गम प्रश्नोत्तर किये. एक वक्त विचार हुवा कि-मेरे पीछे से दीक्षा लेने वाले अ- नेक केवली होगये, और मुझे अभी तक केवल ज्ञान प्राप्त न हुवा, सो करण क्या? यह भाव जान भगवन्त गोतम + को अपने पास बुलाकर कहने लगोकि-अपन गये साथ रहे हैं. और आगे भी बरोदर होंगे, छोटे बडे होतेही रहते हैं. परन्तु तु- म्हाग मेरे पर प्रेम है, यह मोह आभरणही केवल ज्ञान को को रोक रहा है. यों मुण गोतम खुशी हुवे, और तप संयम से अपनी आत्माको भावते विचरने लगे. . भव + नाम तो इनका इन्द्र भृती था, परन्तु गोतम गोत्र होनेके सबब से भगवन्त इनको 'गतम' नाम से ही बोलतेथे.

* मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी र १०१ भगवन्त महावीर स्वामी अपने आयुप्य का अन्तिम अवसर जान गोतवामी को देव समन ब्राम्हण को मात बोधने भेजे, और फिर आधी रावी को मोक्ष पधार गये. देवगमके आवागमन से भगवन्त निर्वाण प्राप्त हुवे यह समाचार गो तम स्वामी को मालुम होतही मुरछा खाधरती पर पड गये, और सावध हो कहने लगे कि-हे भगवन् ! मुझे अन्तिम अवसर में दूर किया क्या में-आपका पल्ला पकड रोकता कि ज्ञानका हिस्सा मांगता. वगैरे शोक करते २भान में आ विचारने लगे कि- वो वीतराग सर्वज्ञने जैसा देसा वैसा किया. रे आत्मान् ! तूं रागीद्धपी वन क्यों कर्म वन्ध करता है. वगैरा शुभ ध्यान ध्याते चारो धन घातिक कोका क्षय कर केवल ज्ञान पाये, और १२ वर्ष वाद मोक्ष पधारे. सारांश-श्री भगवन्त समान परम विशुद्ध पदार्थपरही धर्म प्रेम भी केवल ज्ञान को आवरण भूत होता है !! कुंडरिक पुंडरीक का दृष्टान्त. जम्बु द्वीप की पूर्व महा विदेह की पुष्कलावती विजयकी पुण्डरीकणी राज्य ध्यानी के पद्मनाभ राजा के कुंडरीक कुंवर ने परम सम्वेगी वन दीक्षा धारण कर अ त्यन्त दुक्कर तप क्रिया के आचारण से शरीर को कष्ट-शुष्क करडाला. एकदा अप ने छोटे भाइ पुण्डकि को राज्य मुख भोगवता देख मन ललचाया-संयम से परिणा- म पडित हुवे, और गुप्त गुरुजी का संग छोड मेहल के पीछे की आशोक वाडी आकर बैठे. पुंडरीक राजा यह खवर पातेही तुर्त मुनिके पास आये और मन विग्रह देख प्रश्न करने से मुनिने राज्य वैभवकी परसंस्या करी. जिस से भाइ मुनि का मन पडित देख, अपना राज्य भेप (पोशाक) मुनिको दिया. और मुनिका-उतारा हुवा भे- प आप धारन कर तीन दिन के उपवास से गुरूजी के दर्शन कर मामुख लुक्खम मुक्खम शुद्ध आहार मिला मो खाने से एकदम शरीर में महावेदन प्रगटी और आ. युप्य पूर्ण कर सर्वार्थ सिद्ध विमान में देव हुवे. पीछे कुण्डरीक राज्य भोग में लुब्ध हो ताकत वढने मदिरा मांम का मेवन किया, जिस से अत्यन्त असाय वेदना उत्पन्न हुइ सोभी तीन दिन में मरकर सातवी नरक में गये !! सारांश-शुदाचार पाल पडवाइ होने मे भी मिथ्यात्वी होजाते हैं.

१०२ प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड. खन्धक मुनिका दृष्टान्त. सावत्थी नगरी के कनक केतु राजा की मलया राणी के अङ्ग से उत्पन्न हुवे खन्धक कुपर विजय सेनाचार्य का उपदेश श्रावण कर दीक्षा धारण करी, एकल विहारी हो मास २ खमण तप करते कुंतिनगरी में गौचरी के लिये पधारे. यहां इन के वेनोइ पुरिपपेण राजा गोख में मुनन्दाराणी के सङ्ग चोपड खेल रहे थे, उसवत्त राणी ने मुनि को रस्ते से जाते देख अपने प्यारे भ्रात का स्मरण होते ही आँखो से आशु टपकने लगे. यह हाल राणी के देख निघापर से राणी के चित्त का चोर मुनी को जाण, एक दम क्रोध तुर हो नीचे आ भटों को हुकम दिया कि इस मोडीये को मशाण मे लेजा इस के शरीर की तमाम चमडी निकाल डालो! मुभदों दोड कर मु. नि को थक्के लगाने लगे तब क्षमा सागर मुनि ने सवव पूछा, भटोने राजा का हुकुम सुणाया. जिससे मुनिराज विलकूल ही नहीं घबराते भटों साथ मशाण में आ आलो यणा निन्दणा कर सुमेर ज्यों अडोल ध्यानस्य खडे हुवे. ज्यों मूतार काष्ट को छोल ता है, त्यो भटोंने मुनि के सब शरीर का चर्म तीक्षण पासणे से निकाल कर अलग किया! मुनि राज नरक निगोद की वेदना का विचार करते और अपूर्व मुक्ति प्राप्ती का सहज अवसर प्राप्त हुवा जान किंचितही द्वेप भाव धारण नहीं करते. सहर्ष सर्व वैर वदला चुका मुक्ति गये. जिस वक्त खन्धक कुमर दीक्षाले एकल विहारी हुवे थे, उत्सवक्त इन के पिता ने गुप्त रीति ५१० सुभटों रक्षा निमित इन के साथ रक्खे थे. वो यह वनोइ का गाम जान वेफिकर हो हजामत स्नान भोजनादि कर्यमें लगे. और थोडा दिन रहतेही मुनि को पलट कर नही आये देख सब गाम में चौकस करते फिरते थे, उन को राजा की एक दासीने पैछान कर पूछने से उनने मुनि का हाल कहा, दासीने राणी से कहा, राणी ने राजासे कहा. सुनतेही राजाके ऑखमें से ऑश्रु टपकने लगे. तव राणी अ. त्यन्त अग्रह से पूछने से होनहार कह दिया. सुनते ही राणी मार्छत हो पडगइ, हवा साथ वात नगर में पसर गइ, ५०० सुभटों सुन अत्यन्त क्रोधातुर हो राजा को मारने महल घेर लिया. घर हानी जन हॉसी देख राजा बडा ही घवराया. दाने शाने मनुष्यों ने युक्ति से सवकों समझा कर सुस्त किये. उसवक्त वहां केवली भगवान पधारे, राजा राणी ५०० सुभट वगैरा बहुत प- * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी रिपद के मध्य भगवन् ने फरमाया कि-अहो हितार्थिओं! " कड्डाण कम्मा न मोक्व अत्यि" अर्थात्-कृत कर्म का फल भोगवे दिन छूटका नहीं! सो प्रत्यक्षही देखीये कि सन्धक मुनिके जीवने तेरह१३ कोड भवके पहिले एक काचरे फलकी त्व(छाल)चा उतारी थी वोही काचरा यहां पुरिप सेण राजा होकर मुनि की खाल उतारी!! ऐसा जान कर्म वन्ध से डरो! इत्यादि वोध श्रवण कर राजा राणी और ५०० सुभोंडे दीना धारण करी. करणी कर स्वर्ग प्राप्त किया. सारांश-सब शरीरकी खाल उतार डाली तोभी नाक में शल्य और मनमें ट्रेप किंचित माव ही नहीं लाये. ऐसी तरह जो कपाय ज्वाला को बुझाकर शान्त करतेहैं सो क्षीण कपायी कहे जाते हैं. श्री महावीर स्वामीका दृष्टान्त- भवी कुण्ड ग्राम के सिद्धार्थ महाराजाकी मुलक्षणी मला देवी को १४ महा स्वप्न को दे. दशवे स्वर्गमे चक्कर अवतरे. अत्युत्तम ऊंच ग्रहोके संयोगमे जन्मे. छ- पन्नादिग् कुमारि का और चौमठ इन्द्र आदि देवो ने जन्म उत्सव किया. पग के अ- गुंटे के दवाने मे लक्ष योजनका मेरू पर्वत हलाने 'महावीर नाम पाये. जन्ममेही तीन ज्ञान युक्त होने से विद्याभ्यास की कुछ जरूर नहीं . युवावस्यान में यगोदाजी नामक स्वीके सथ पाणी ग्रहण किया. जिसमे एक पुवीकी प्राप्ति हुड; मात पिता स्व- मस्थ हुवे वाद नंदीद्धन भाइ को मताप ने ब्रह्मचादि नियम युत्त घर में रहे. फिर वारह महिने तक-३,८८.८०.००,००० इत ने मोनैये का दान दे मंयमलिया. उमी- वक मनः पर्यव ज्ञान की प्राप्ति हुइ. फिर कमों का भय करने माही बाग वर्ष और १५ दिन तक अति दुकर तप किया. इतने दिन मे फक्त न्यारे महीने उनीम दिन आहार लिया और फक्त दो घडी ही निद्राली. देव मनुप्य तिर्यच मम्बन्धि अति दुः स अनुकुल प्रतिकूल परिमह महे. जहां २ परिमह उत्पन्न होने का जाना वहां सम्मुख होगये. और परिमद दाताओंपर पुनः उपचार करवल्य वोर में वर्ग गामी बनाये. ऐसे समा गर अह भगवन्त चागे वन यातिन का नमूल नाम कर. केवल मान. देवल दर्शन. चौंतोन अतिगप. आदि महान मार्टमाद हो द्वादम जाति की परिपद में दोन गुणयन दिन द्वानी मान लिया. जिन महान् मनाप ने अभीतक धनदीम रोता है. अनिन भावाय का मोर पधारे.

१०४ प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूलद्वारा रोहण खाण्ड ११ गजसुकुमाल मुनीजीका दृष्टान्त. सोरठ देश द्वार का नगरी के वसुदेव महाराजकी देवकी राणी के अंगसे उत्पन्न हुवे, हाथी के तालुवे जैसे रक्त और मुकुभाल शरीर के धारक मज सुकुमाल कुमर कृष्ण वासुदेव के साथ नेमीनाथ भगवान के दर्शनार्थ जाते, रस्ते में महा दिव्य रूप. वति सोमल ब्राह्मण की सोमा नामक पुत्री को कृष्णजी देख कर गजकुमालजी के पाणी गृहणार्थ कुंवारे अन्तेवर में पहोंचा कर, भगवान के पास आये सविधी वन्दन कर व्याख्यान श्रवन कर गज कुमाल जी वैरागी वने. अत्यन्त अग्रह से माता पि- तादि की आज्ञाले दीक्षा धारण करी. और भगवन्त से पूछा की जलदी मुक्ति मिले ऐसा रस्ता मुझे वताइये. सर्वज्ञ प्रभु वैसाही होतब जान हुकम किया कि महाकाल मशाण में १२वी भिक्षुक प्रतिमा का आराधन करने से शीव मुक्ति मिलेगी. उसी व- क्त भगवन्त को नमस्कार कर महाकाल मशाण में एकही पुद्गलपर अनिमेष-एकाग्रह- ष्टि रक्ख ध्यानस्थ खडे रहे. उसवक्त लग्न सामग्री लेकर पीछा आता सोमल ब्राह्मण मशाण में गज सुकुमाल मुनि को ध्यानस्थ देख कोपातुर हुवा. रे पापी ! विना का रण मेरी पुत्री को वाल विद्वापना दे साधु हुवा, तो अब देख मझा. ऐसा कह त- लाव के किनारे की चिकनी मठी की मुनिराज के शिरपर चौगिरदा पाल वान्ध ज- लते मुरदे की चिता में से खेरके झग २ ते अङ्गारके खीरे ठीकरी में ले मुनि राज के शिरपे भर दिये. और अपने घरको चले गया. उस वक्त मुनिराजकी खोपरी जलने लगी, शरीर की नशों तड २ टूट ने लगी, इत्यदि अत्यन्त तीव्र महादारुण प्रवल वेदना उत्पन्न हुइ. मुनि ने शिर हिलाना तो दूर रहा! परन्तु नाक में शल्य भी नहीं डाला विचारा कि-मेरो खुसरेने मेरे शिरपर मुक्ति गमन रूप पाघ वन्धि है. इसे नीचे डाला अनेक जीवों के घात के साथ संयम और प्राप्त होते मुक्ति सुख का गमाने वा- ला कदापि नहीं वनूंगा! यह अलभ्य महा लाभ कदापि नहीं गमावूगा. इत्यादि नि- श्चय से राग द्वेप रहित शुद्ध भावना भावते सुमेरे गिरी की माफिक तीनो योगों को अडोल स्थिर रक्ख महा परिसह सम भाव सहन करते आठोही कोका समूल नाश कर मक्ष पधारे. वाद शरीर ने धरणीशरण धारन किया!! सारांश-यों योगों की स्थिरी भूतता होने से मोक्ष मिलती है. ७ सातवा गुणदारका अर्थ.

१०५ • मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी. पुद्गल परावर्नन का स्वरूप. से १ द्रव्य से. २ क्षेवसे, ३ काल से, और ४ भाव से में यह ४ मूक्ष्म, ४ बादर, यों ८ तरह से पुद्गलों का परावर्तन होताहै और किसनेक स्थान भावसे के स्थान भव पद्दल परावर्तन के दो भेदरक्त है. और फिननेक स्थान उन८ में भवसे के दोभेद मिलाकर १० भेद पुद्गल परावर्तन के किये है. सो अलग २ यहां कहते हैं: १ द्रव्य से वादर पुद्गल परावर्तन सो-(१) औदारिक, (२) वैक्रिय (३) तेज- स, (४) मन. (५) भापा. (६) कार्मण, और (७) वाशोचास, इन ७ प्रकार के पुन लोंके सर्वलोक व्यापी प्रमाणुओं को भेद संघात तथा वादर मूक्ष्म परिणमन कर स्व- स्व वर्गगा योग्य परिणत स्कन्ध औदारिकादि नो कर्म पणे जितने काल में एकजीव अनन्त भव भ्रमण करता परिणमाकर-ग्रहणकर स्पर्श कर-छोडे. उसे वादर द्रव्य पु- द्गल परावर्तन कहना. इस में जो एक वक्त ग्रहण किये हुवे पुइलो को दूसरी वक्त ग्रहण करे उसे ग्रहीत ग्रहणी द्वार कहना. तथा पहिले कितनेक ग्रहण किये और कि. तनेक विना ग्रहण किये ऐसे दोनों तरह के मिले पुनलो ग्रहण करे उसे मिश्र ग्रहण द्वार कहना. और पहिले ग्रहण नहीं किये ऐसे पुद्गलों को जो ग्रहण करे सो अ- ग्रहीत ग्रहण द्वार कहना. इन तीनों में से ग्रहित ग्रहणद्वार और मिश्र ग्रहण द्वार इन दोनों तरह के पुद्गलोंको छोड कर. अग्रही ग्रहणाद्वार जो पुद्गलों ग्रहण करे, वो पुद्ग- लों ही यहां गिनती में आते हैं. बाकी के गिनती में नही लेना. यों एक औदारिक पणे, दुसरे वैक्रिय पणे, जावत सातवे वाशोश्वास पणे सात परिणाम एकेक अणु के होते हैं. यों सर्प वर्ती द्रव्य सात परिणमत् एक जीव पूर्ण करे तब वादर द्रव्य पु द्गल परावर्तन पूर्ण होता है. + २ द्रव्य से सूक्ष्म पुद्गल परावर्तन सो-सर्व लोक वर्ती अणुको औदारिकादि पणे परिणमावे. परन्तु इतना विशेष. जो औदारिक पणे परिणमावते वीचके भवों में जो जो वैक्रियादि पणे पुद्गल ग्रहण करे वो यहां गिनती में नहीं लेना. यों अनन्त + इस में आहारिक गरीर ग्रहण नहीं किया. इस का यह सवत्र हैकि-एक जीव आहा रक शरीर चार वक्त से अधिक नहीं करता है, इसलिये इसके सब पुद्गलों के साथ परावर्त- न होता नहीं है. इसलिये गिना नहीं.

१०६ EX प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड १ भवों कर सर्व लोकके अणु औदारिक पणे परिणमा कर-ग्रहण कर स्पर्श कर-छोडे, उस वक्त प्रथम औदारिक सूक्ष्म द्रव्य पुद्गल परावर्तन होवे. फिर ऐसीही तरह लोक के सर्व अणु के वैक्रिय पणे परिणामावे. ग्रहण कर छोडे तव दुसरा वैक्रिय, सूक्ष्म द्र- व्य पुद्गल परावर्तन होवे. ऐसे ही तेजस शरीर पणे जावत् सातवा श्वाशोधास पर्यव पणे तक सव पुद्गलों ग्रहण कर स्पर्श कर छोडे, इस में सब से कार्मण पुद्गल पराव- र्तन का काल अनन्त है, परन्तु दुसरे की अपेक्षासे स्तोक (थोडा) जाणना. उस से तेजस पुद्गल परावर्त काल अनन्त गुणा, उस से औदारिक पुद्गल परावर्तन काल, अनन्त गुणा, उस से श्वाशोश्वाल पुद्गल परावर्तन काल अनन्त गुणा, उस से मन पु- दल परावर्तन काल अनन्त गुणा, उस से भापा पुद्गल परावर्तन काल अनन्त गुणा, उस से वैक्रिय पुद्गल परावर्तन काल अनन्त गुणा. अब इस अल्प बहुत का सवव क हते हैं: कार्मण पुद्गल परावर्तन सव भवों में ग्रहण करता है, जिससे जलदी भरा जाता है. उस कार्मण से तेजस अनन्त गुण हीन है,क्योंकि उस से अनन्त गुण आधिक का ल में भरावे, यों सवोंकि अल्प बहुतता अपनी बुद्धि से विचार कर लेना चाहिये. गये काल में एक जीव के अनन्त वैक्रिय पद्गल परावर्तन हुवे. उस से अनन्त, अधि- क भाषा पुद्गल के परावर्तन हुवे. उस से अनन्त गुण मन पुद्गल के परावर्तन हुवे, उस से अनन्त गुण श्वाशोश्वास पुद्गल के परावर्तन हुवे, उस से अनन्त गुण औदा- रिक शरीर के पुद्गल परावर्तन हुवे, उस से अनन्त गुण तेजस पुद्गल के परावर्तन हुवे अनन्तगुण कार्मण पुद्गल के परावर्तन हुवे. ऐसे के परावर्तन हुवे, ऐसे सब पुद्गल परावर्तनों एक जीवने अतीत (गये) काल में कर के छोडे हैं. * ३ क्षेत्र से वादर पुद्गल परावर्तन सो-सर्व लोक के आकाश प्रदेशों जो घनां- और उस से * कितनेक आचायोंका यह मत है कि-औदारिक वैक्रिय तेजस और कार्मण इन चारों शरीर पणे सर्व लोक वर्ती प्रमाणुओं जो गृहण करता है वो गिनती में आते हैं. यों कर के सर्व प्रमाणुओं चारों शरीर पणे परिणमा कर छोडे सो बाद द्रव्य पुद्गल परावर्तन. और अनुक्रम से एकेक शरीर पणे पारणमावे, ऐसी तरह सर्व अणुक एक शरीर पणे परि- णमा रहे, फिर दूसरे शरीर पणे परिणामावे. परन्तु औदारिक परावर्त में वैक्रियादि पुद्गल प्रहण करे वो गिनती में नहीं आवे. यों अनुक्रम से चारों ही प्रकारकी सर्व अणुक पारण- से सूक्ष्म द्रव्य पुद्गल परावर्तन होता है.

१०७ मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी.* गुल आकाश खण्डके प्रदेशों का समय २ प्रते हरण करते असंख्यात काल चक्र वीत जावे, ऐसे मूक्ष्म आकाश के प्रदेश हैं. उन सर्व लोक के आकाश के प्रदेशों को जि- स वक्त एक जीव अनेक भवकर स्पर्शे अर्थात्-सर्व आकाश प्रदेशों पर मृत्य पावे, उस में जिस आकाश प्रदेश पर एक वक्त मृत्यु पाया, उसही आकाश प्रदेश पर दु- सरी वक्त मरण पावे, वो गिनती में नहीं. यों सर्वाकाश प्रदेश को मरण कर स्पर्शे x जिसे वादर क्षेव पुद्गल परावर्तन कहना. ४ क्षेत्र से सूक्ष्म पुद्गल परावर्तन सो-अनुक्रम से अर्थाद-जिस आकाश प्रदेश की श्रेणीपर एक वक्त मृत्यू पाया, उस ही आकाश प्रदेशपर किंचित ही अन्तर नहीं छोडता नजीक दूसरी वक्त मृत्यु पावे, यो मरण कर एक आकश श्रेणी पूर्ण स्पर्श, फिर दूसरी आकाश श्रेणी इसही तरह से मरण कर सम्पूर्ण स्पर्श, इस में प्रथम मर- ण किये स्थान में दुसरी वक्त मरण करे सो गिनती में नहीं, यों अनुक्रम से श्रेणि व- न्ध प्रतर वन्ध प्रदिशों मरणकर स्पर्शता हुवा सर्व लोकके सर्व (असंख्यात) आकाश प्रदेश स्पश्ये सो क्षेत्रसे सूक्ष्म पुद्गल परावर्तन. ५ काल से वादर पुद्गल परावर्तन सो-वीस क्रोडा कोडी सागरोपम प्रमाण काल चक्रहै. उसके सब समय मरण कर जीव स्पर्श, अर्थात्-जव काल चक्र शुरू होवे उस के आदि समय से लगाकर अन्तिम समय तक के सब समयों में मरण करे, जि स समय एक काल चक्र में मरण पाया उसी समय बहुते काल जत्रों में मरण पाया वो गिनती में नहीं आते हैं, परन्तु अन्य दूसरे तीसरे चौथे आदि अन्तिम समयतक मरे सो ही गिन्ती में गिने जाते हैं. सव काल चक्रे के समयों को मरण कर स्पर्श सो काल से वाइर पुद्गल परावर्तन. ६ काल से मूक्ष्म पुद्गल परावर्तन सो-एक काल चक्र के प्रथम समय में मरण कर फिर दुसरे चक्र के दूसरे समय में मरण करे, फिर तीसरे चक्र के तीसरे समय में मरण करे, या एकेक काल चक्रका एकेक समय ही गिनती में आता है, परन्तु वीच के संख्यात असंख्यात जावत अनन्त काल चक्र तक मरण करे सो गिनती में नहीं आता है. यों असंख्यात मरण में भी अनन्त चक्र वीत जाते हैं. क्योंक पहिला x यद्यपि जीवात्म असंहलात प्रदेशी है सो असंख्याकाश प्रदेश अवगहा रहा है. तद्य- पि कार्य की मुख्यताकर एक प्रदेश ही लिया है. - है १०८ * प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड र दूसरा तीसरा यों अनुक्रम से समयों में मरण करे सोही गिनती में लिये जाते हैं. ऐ से काल चक्र के अन्तिम समय तक मरण कर स्पर्शे सो काल से मूक्ष्म पुद्गल परा- वर्त न जानना. ७ भाव से वादर पद्गल परावर्तन सो-रस वन्ध हेतु कपायादि अध्यवश्याय स्थानक मन्द मन्दतर मन्दतम इन के भेद अंसंख्यात लोकाकाश प्रमाण है, जिस वा- स्ते सीत्तर (७०) क्रोडा क्रोड सागरोपम के समय प्रमाण स्थिति स्थानक में असं- ख्यात रस वन्ध हेतू अध्यवंश्पाय स्थानक हैं, वो सव अध्यवश्या स्थानक अनुक्रम से मरण कर स्पर्श, अर्थात्-इन रसवन्ध के स्थानक किसी वक्त मंद मदतर, मदनमः तीनं, तीव्रतर, तीव्रतम. ऐसे स्थानक में मरण करे, जिस वक्त एक जीव सर्व स्थान- क स्पर्य कर पूर्ण करे सो भाव से वादर पुद्गल परावर्तन. ८ भाव से मूक्ष्म पुद्गल परावर्तन सो-पहिले जघन्य अध्यवसाय में मरण पा- कर, फिर किसी कालान्तर में उस चडते दुसरे अध्यवसाय स्थानक मे मरण पावे फिर उस से चाडते तीसरे अध्यवसाय स्थानक में मरण पावे यों एकेक चढते स्थान- क मे मरण पावे सो ही गिनती में आते हैं, परन्तु वीच में ज्यादा कम अध्यवसाय स्थानक में घरे सो गिनती में नहीं. यों अनुक्रम से निरन्तर पने जघन्य से लगाकर उत्कृष्ट अध्यवसाय के स्थानक मरण कर स्पध्र्ये उस के वीचमें वोही अध्यवसाय त. था सान्तर अध्यवसाय स्थानक में मरण करे. वो भी गिनती में नही आते हैं. पहिले के अध्यवसाय से चढता स्थानक ही गिनती में आता है. सोभाव से सूक्ष्म पुद्गल परावर्तन. ८ स्पर्य (७-८ प्रकारान्तर से कितनेक आचार्य-५ वर्ण, २ गन्ध, ५ रस, और २ अगुरु लघु इन २२ वोलों के एक गुण से लगा कर जावद अनन्त गुणतक जितने पदल लोक में हैं उन सवोंको मरण कर स्पर्श कर छोडे सो भाव से यादर पुद्गल परावर्तन, और प्रथम एक गुन काला फिर दो गुन काला यों अनुक्रम से जा- वत अनन्त गुण काला जितने प्रमाणुओं हैं उने स्पर्श. फिर एक गुण हरा दोगुण हरा जावत अनन्त गुण हरे प्रमाणुओं को अनुक्रम से स्पर्शे. ऐसे ही फिर लालके, फिर पीलके, फिर श्वेतके, योंही २ गंध के, ५ रस के, ८ स्पर्श के, और अगुरू लघु के सर्व प्रमाणुओं प्रथम एक गुण से लगाकर अनुक्रम से अनन्त गुण तक मरण कर स्पर्श कर छोडे. (इन के बीच में कमी ज्यादा गुण के वर्णादि के प्रमाणुओंको स्पर्श I मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी १०९ सो गिनती मे नहीं.) ऐसे २२मकारकपुद्गलो स्पर्शे सो भाव से मूक्ष्म पुद्गल परावर्तन) स जो आचार्य भाव के स्थान भर को कहकर ८ वोल पूरे, करते हैं, अ- थवा भव के दो बोल अधिक कर १० वोल कर ते हैं तो कहते हैं:- ९,भवसे वादर पुद्गल परावर्तन-कोइ जीप नरक गति में जघन्य १० हजार वर्ष आयुष्य से लगाकर एक समय अधिक दो समय आधिक यों एकेक स. मय वेदाता ३३ सागरोपम के आयुप्य सक, और ऐसे दश हजार वर्ष से एकेक स- मय आधिक २ करता ३१ सागरोपम देवता का आयुष्य तक. तया जघन्य : २५६ आंवलीके एक क्षुलक भव से ऐकेक समय आर्थिक लगाकर ३ पल्योपम तियेच के आयुष्य को. और जघन्य अन्तर मूहूर्त से लगाकर एकेक समय अधिक करता ३ पल्योपम पर्यन्त मनुष्य के आयुप्य को. यो चारों गति के आयुप्य को मरण कर स्पर्शे सो भव से वादर पुग़ल परावर्तन. १० भव से सूक्षा पुगल परावर्तन सो-प्रथम नरक दश हजार वर्षाय भोग मरे. फिर एक समय अधिक दश हजार वर्ष आयुप्य भोग मरे. फिर दो समय अधि क यों अनुक्रम से एकेक समय आधिकरता नरक का ३. सागरोपम का आयुप्म पूर्ण करे. बीच में अन्य गति का तथा नरंक काही ज्यादा कमी आयुष्य भोगवे मो गि- नती में नहीं. फिर ऐसेही तिर्यचका. फिर ऐसेही मनुष्य का और फिर ऐसेही देवता का जघन्य आयुष्य से समय २ अधिक आयुप्य पाकर मरण कर स्पर्शे सो भव से सूक्ष्म पद्गल परावर्तन. यह ऊपरोक ८ प्रकार का या १० प्रकार कर के जो पुद्गलों का परावर्तन होन का वरणन् किया सो विशेषत्व जाणना. परन्तु सामान्य प्रकार से तो मब मि लकर एक ही पुदगल परावर्तन गिना जाता है. ऐसे अनन्तानन्त पुल परावर्तन मं- सार निवासी सब जीवोंने इम मंमार में किये हैं. जो जीवों मिथ्यात्व गुणस्थान का एकही वक्त त्यांग कर देते हैं. वो ज्यादा मे ज्यादा अर्थ पुल परावर्तन से अधिक संसार में परिभ्रमण नहीं करते हैं. इतने काल वाद तो जरूरही मोक्ष पाते हैं. ८-१२ अवघेणा, उत्पति-पावति और क्षपति, द्रव्य परिमाण इन चारों द्वारों का अर्थ बताने प्रमाण-बोध कहते हैं. प्रमाण दो तरह के हैं। लौकिक. और २ लोकोत्तर. इम मे प्रथय लौकिक " ११० प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूलद्वारा रोहण खाण्ड ** प्रमाण सो तो जो जगत में-एक, दश, सो, हजार, जावत पराई, तक अठारा अंककी संख्या जो अभी प्रचलित है सो, इस सिवाय और भी,४३२००००००० इजने सो र्य वर्ष (३६५ दिन, १५ घडी ३१ पल, ३१ विपल) का एक ब्रह्मका-दिक (कल्प) गिन ते हैं. इनत में १४ मनु और १०१० महा युग होने का बताते हैं, वगैरा लौ- किक प्रमाण कहा जाता है. और लोकोत्तर गणित का स्वरूप लौकक गणित से कुछ विलक्षण ही है, क्योंकि लौकिक गणित से स्थूल और स्वल्प (थोडे) पदार्थों का प्रमाण किया जाता है. और लोकोतर गणित से तो सूक्ष्म और अनन्त पदार्थों की हीनता अधि- कता का प्रमाण का बोध कराया जाता है, लोकोत्तर गणितके दो भेद हैं:-१ संख्यामान, और उपमामान, इससे सं- ख्यमानके मूल ३ भेद हैं:-१ संख्यात, २ असंख्यात, और ३ अनन्त, इस में-सं- ख्यात का एकही भेद, और असंख्यात ३ भेद हैं:-१ परितासंख्यात, युक्तास- ख्यात, और ३ संख्यातसंख्यात, ऐसे ही अनन्त के भी ३ भेद होते हैं;-१ परि- तानन्त, २ युक्तानन्त, और ३ अनन्तानन्त. यों सब मिल संख्यमान के ७ भेद हुवे. इन सातों को, १ जवन्य (छोटा) २ मध्यम (वीचका) और ३ उतकृष्ट (बडा) यों तोगुने कर ने से संख्यमान प्रमान के २१ मेद होते हैं. इनका खुला से वार स्वरूप समझाने लिये आगे कल्पित उपाय उपमामाव शस्त्रानुसार लिखते हैं- १. अनव स्थित, * २ शालका, ३ प्रतिशलका, और ४ महा शलका. इन चारों नामके चार टोपले. जम्बुद्वीप प्रमाणे एक लक्ष योजनके लम्बे चौंडे (गोल)और एक हजार आठ योजनके उंडे, इनमें से पहिले अनवस्थित टोपलेमें शरशोंके दाणे शिंखाऊ (जमीन पर किये हुवे अनाज के ढंम की तरह) भरे. उस में सव १९१७११२१३८ , ३५ इतने दाणे का समावेश होता है, फिर एक भरा और तीनों खाली ऐसे चारों टोपलों को कोई देवता उठाकर, उस भरे टोपाले मेंसे-एक दाणा जम्बुद्वीप में दुसरा * अनवास्थत उसे कहते हैं. जो सदा एकसा न रहे, अर्थात् पीछेके तीनों टोपले तो एक से लक्ष योजनके सदा बने रहते हैं. और अवस्थित तो जहां खाली होता है उसी स्था- नकी सूची प्रमाणे (जितना बडा द्वीप व समुद्र होवे उतना) वडा बनाते हैं.

* मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान राहेण अढीशनद्वारी. १११ दाणा लवण समुद्र में, तीसरा दाणा घातकी खण्ड में, यों एकेक दाणा अ- नुक्रम से आगे के द्वीप समुद्रों में रखता हुवा पला जावे. जब उस अनव स्थित टोप- ले में एक दाणा वाकी रह जावे तब उस दाणे को दुसरे शाल का नामक टोपले में रक्खे, और जिस स्थान वो प्रथम टोपला खाली हुवाथा उस स्थान (द्वीप व समुद्र की सूची प्रमाणे लम्बा चौडा (गोल) और एक हजार आठ योजन का ऊंड उस अनव स्थित टोपल को वनाके. सरशों के दाणो से शिखाऊ भरे, और फिर आगेके द्वीप समुद्र में एकेक दाणा रखता जावे. जब उस अनवस्थित टोपल में दुसरी वक्त एक दाणा वाकी रहजावे, वो दाणा वाकी रहा जावे, वो दाणा उठा कर प्रथम प्रमाणे उस दुसरे शालाका टोपले में रक्खे, शाला का मे दो दाणे हुवे. और जिस स्थान वो अनवस्थित टोपला खाली हुवा. उस स्थान की सूची प्रमाणे तीसरी वक्त उस अनवस्थित टोपले को वनाकर सरशों के दाणों से शिखाऊ भर कर फिर एकेक दाणा आगे के द्वीप समद्रों में रखता हुवा जावे. उस में एक दाणा वाकी रह जाव तब वो दाणा लेकर फिर दुसरे शालाका टोपल में रक्खे; यों शाला का में तीन दा- पे हुवे. एसीह तर अनवास्थित टोपल में वाकी रहे एकेक दाण कर काल का नामक टोपले को सम्पूर्ण शिखाऊ भरे. और फिर उस शालका नामक पाले (टोपले) को उठाकर पूर्वोक्त रीति प्रमाणे ही एकेक दाणा आगे के द्वीप समुद्रों में रखता जावे, जव उस शाला का में एक दाणा वाकी रहजावे. तब वो दाणा लेकर तीमरे म तिशलका' नामक टोपले में रक्खे. और शलाका को वाजू रक्खकर. फिर उसही स्था- न की सूची प्रमाणे अनवस्थित टोपला पहिला वनावे. और सरगों के दाणों से शि- खाऊ भर, आगेके द्वीप समुद्रों में एके क दाणा रखता जावे. जब के उसमें एक दा. मा वाकी रह जाये तब उस दाणे को लेकर दूसरे शलाका नामक टोपले में रक्खे. ऐमेही पूर्वोक्त रीतिमे अवस्थित टोपले के एकेक दाणे कर शलाका को प्रतिपूर्ण शि खाऊ भरे. और फिर दूनरी वक्त शलाका को उठाकर आगेके द्वीप ममुद्रों में एकेक दाणा रखते आगे जावे वो शलाका में एक दाणा रह जावे तव, उम दाणे को 'प्र- + द्वीप व समुद्र की गोलाइ के एक तट से दुरे माने के तटकी लबाड के प्रमाण प्रमाग को सूची जहते हैं. जैने वा नन्द की सूची ६ लक्ष थोजन की. और धात की खण्ड दीप की सूची २९ लख जन की. ।

११४ प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड. ३१ . मिालकर जो राशी (दग) करी थी, और उस में से एक दाणा निकाल लियाया, वो दाणा पीछा उस राशी में डाल देने से-(१) जघन्य पारता असंख्यात होते हैं. और इस जघन्य पारिता असंख्याते की राशी को रास गुणाकरे x फिर उसमें से एक दाणा निकाले कम करे सो-(३)उत्कृष्ट परिता असंख्याता. और जघन्य परिता असं- ख्याता से एक अधिक, तथा उत्कृष्ट परित असंख्याता से एक कमी उसे (२) मध्यम परिता असंख्याता कहा जाता है. फिर उस उत्कृष्ट परित असंख्याते की राशीमें से वो निकाला हुवा-कम करा हुवा दाणा पीछा उस राशी में डाल देवे सो (४)ज- घन्य युक्ता असंख्याता. (इतने एक आवली का के समय होते हैं। फिर इस जघन्य युक्ता की राशी को राशगुणा करे, और उस में से एक दाणा कम करे-निकाल लेवे सो (६) उत्कृष्ट युक्ता असंख्याता, और जघन्य युक्ता असंख्याता से एक आधिक उत्कृष्ट युक्ता असंख्याता से-एक कमी सो(५) मध्यम युक्ता असंख्याता. फिर उत्कृ- ष्ट युक्ता की रासी मेंसे निकाला हुवा दाणा डाल देवेसो-(७) जघन्य असंख्यात अ- संख्याता. और इस जघन्य,असंख्यात असंख्याते की राशी को राश गुणा कर, एक दाणा कम करे सो-(१) उत्कृष्ट असंख्याता, (इतने धर्मास्ति, अधर्मास्ति, लोकाका- स्ति. और जीवास्ति के प्रदेश हैं.) और जघन्य असंख्यात असंख्याते से एक आधि- क उत्कृष्ट असंख्यात असंख्याते से एक कमी सो-(८) मध्यम असंख्यात. असंख्याते. यह असंख्याते के १ भेद हुवे. अब अनन्त के ९ भेद कहते हैं:-फिर उत्कृष्ट असंख्यात असंख्याते की रा- शी में से निकाला हुवा दाणा पीछा उस में मिला देवे सो (१) जघन्य पारिता अन- न्ता (इत ने अभव्य जीवों है) फिर इस जघन्य परिता अनन्ते की राशी को रास गु- णाकर, उस में से एक दाणा निकालने से, जो रहे सो-(३) उत्कृष्ट परिता अनन्ता, और जघन्य परिता अनन्ता से एक आधिक, उत्कृष्ट परित अनन्त से एक 'कम सो, (२) मध्यम मारता अनन्ता. फिर उत्कृष्ट परिता अनन्ता की राशी में से निकाला हु- x जैसे ४ को ४ गुणा करने से १६ होते हैं. तैसेही जितने दाणे की वो राशी है उन सब दाणो को अलग २ एकेक बिखेर कर, उस एकेक दाणे के ऊपर पहिलेका रासी जितना एकेक ढगला करे, उने दाणे जितने सब टगले को भेलें करे उसे राशगुणा कहा जाता है.

* मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अटीशतद्वारी. १ वा दाणा पीछा उस में डाल देवे सो-(४) जघन्य युक्ता अनन्ता, और जघन्य युक्ता अनन्ता की राशी को राश गुणा कर उस में से एक दाणा निकाल लेवे सो (8)उ- स्कृष्ट युक्ता अनन्ता. और जवन्य युक्ता अनन्ता से एक अधिक, उत्कृष्ट युक्त अन- न्ता से एक कमी सो (५) मध्यम युक्ता अनन्ता जाणना, फिर उत्कृष्ट युक्ता अनन्ता की राशी में से निकाला हुवा दाणा उस राशी में पीछा मिलावे सो (७) जघन्य अ- नन्त अनन्ता कहते हैं. अब आगे केवल ज्ञान के आभेगम परिछदों के प्रमाण स्वरूप बताने उत्कृष्ट अनन्ता न्तका स्वरूप कहते हैं:-जयन्य अनन्ता अनन्त राशी को राश गुणा करने से जो राशी उत्पन्न होने वहा अनन्तान्त का मध्य भेदहै. इस राशीम-जीव राशीके अनन्तवे भागे सिद्ध राशी.सिद्ध राशीसे अनन्त गुणी निगोद राशी-वनस्पति काय राशी, जीव राती से अनन्त गुणी पुद्गल राती. पुद्गल सेभी अनन्त गुणे तीन काल के समय. और अलोका काग के प्रदेश. यह ६ राती मिलाना और इस में धर्म द्रव्य के अगुरु लघु गुणके अनन्तान्त अविभाग प्रतिच्छेद मिलाकर जो राशी होवेसो(८) मध्यम अ- अनन्ता अनन्त. इस राशी को केवल ज्ञान के आवभाग प्रतिछेदों के समोह रूप रा- शी में से घटाना. और जो शेष बचे उस में पुनः वही महा राशी मिलाने से केवल ज्ञान के आवभाग प्रति छेदों का प्रमाण स्वल्प उत्कृष्ट अनन्तानन्त होता है. उक्त महाराशी को केवल ज्ञान में मे घटाकर फिर मिलाने का सबब यह है कि-दुसरी रा. सी से गुणाकार कर ने पर भी केवल ज्ञान के प्रमाण से बहुत कमती रहता है. इस लिये केवल ज्ञान के आविभाग परिछेदों का प्रमाण का महत्व दिखलाने ऊपर युक्त विधान किया है. इस प्रकार से संख्यामान के २१ भेदोंका कयन समाप्त हुवा. अब उपमा प्रमाण के ९ भेद कहते हैं:-१ पल्य, २ मागर. ३ च्यांगुल. +अनन्त के दूसरे दो भेद होते हैं - १ साझय अनन्त. और अक्षय अनन्त यहां तक जो संख्या हुइ सो साक्षय अनन्त की हुइ. अब इसके आगे जो भेद कहते हैं तो अक्ष्य अ- नन्त के जानना, क्योंकि इस उपरोक्त महाराधी में आगे ले रागी अक्षय अनन्त की मिलाइ जाती है. नवीन बृद्धि न होने पर भी खर्च करते २ जित रागीका अन्त पार नहीं आने उसको अक्षय अनन्त कहते हैं. - - ११६ * प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड १९ 7 ४ मतरांगुल, ५ घनांगुल, ६ राज्जू, ७ जगच्छेणी, ८ जगत्परतर, और ९ लोक. इन नवोंका अलग २ स्वरूप कहते हैं:- १.पल्य-पाला, किसी भी वस्तु भरने का स्थान (पियु-खो-कोठार - प्रमुख) या ठाम (पायली-कोठी) होवे उसे पल्य कहते हैं. उस के मपतीसे किसी का प्रमाण समझाया जाय सो-पल्योपम प्रमाण. इसके ३ भेदः-(१) व्यरहार पल्य, (२) उद्धार पल्य, और (३) अद्धापल्य- (५) व्यवहार पल्य का स्वरूपः-परमाणु परम-उत्कृष्ट अणु-पतला, जो सब से वारीक होवे, जिसके दो विभागकी केवल ज्ञानी भी कल्पना नहीं कर सकें, उ- से परमाणु कहते हैं. ऐसे अनन्त मूक्ष्म परमाणु का स्कन्ध (पिण्ड) का ? वादर(न्य- वहारिक) परमाणु होता है. उसे देवता भी आति तीक्षण शास्त्र कर छेद सके नहीं, अग्नि में जले नहीं, पाणी में भीजे नहीं. ऐसे अनन्त वादर प्रमाणु के स्कन्ध का-एक उष्ण श्रेणिया (गरमीका) पुद्गल होता है, ८ उष्ण श्रेणियाका-१ शीत श्रेणीया (श- रटी-उन्डका) पुद्गल. ८ शीत श्रेणियकी-१ उर्द्धरेणु (तरवर में उडे सो रज) ८ उर्द्ध- रेणकी-१ त्रसरेणु (वस कायका शरीर) ८ वस रेणुकी-१ रथरणु, (स्थ चलते उडे सो रज) ८ रथरेणु जितना जाडा-१ देवकुरू उतरकुंरू क्षेवके मनुष्य के वालाग्र. ८ देवकुरु उत्तरकुरु मनुष्य के वालाग्र जितना-१ हरीवास,रम्यक वास क्षेत्रके मनुप्यका वालाग्र. ८ हरीवास रम्यकवास के मनुष्य के वालाग्र जितना-१ हेमवय हिरणवय क्षेव के मनुष्य का वालाग्र, ८ हेमवय हिरणवय मनुप्य के वालाग्र जितना-१ पूर्व महा विदेह पश्चिम महाविदेह क्षेवके मनुष्य का वालाग्र. ८ महाविदेह क्षेत्रके मनुष्य का वालाग्र जितना-१ लीख, ८ लीखकी-१ सरसों, ८ सरसों का-१ जौ, और, ८ जी- का-१ उत्मेद अंगुल. (चारों गति के जीवों का शरीर का माप इम अंगुल से किया जाता है.) ५०० उत्सेध अंगुल का-१ प्रमाण अंगुल (अवमार्पिणी के प्रथम तीर्थंकर का अंगल) कहा जाता है (इम से नरकावासे-भवन-देवनगर-विमाण-द्वीप-ममुद्र-पर्वत- नदी इत्यादि का प्रमाण बताया जाता है) और भरत एरावत क्षेत्र में जो मनुष्यों हो वे. उम वर्तमान काल में जितना वडा अंगुल होवे, उमे आत्म अंगुल कहते हैं.(इम मे चक्रपति राजा के १४ रत्नादि ऋदि का, तथा आरी थाल कटोरे आदि संसार में काम आती वस्तुओं का प्रमाण बताया जाता है) ६ प्रमाणु अगुलका-१ पर (मु- थी.) • पका-१ बिलस्त, • विलम्तका-१ हाथ, • हाथकी-१ कुच्छ, २ कुछका-१ * मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अदीशतद्वारी १ ११७ घनुष्य, २००९ धनुष्यका-१ गाऊ (कोश), ४ कोशका-१ योजन. ऐसे प्रमाणांगुण से निप्पन्न एक योजन का लम्बा-एक योजन काही चौडा (गोळ) और एक योजन का झंडा गोळात (कुवे) में-देव कुरु उत्तर कुरु क्षेवके युगल मनुष्य के ७ दिन के बच्चे के वालाग्र-ऐसे वारीक कतरे कि-जो आँखों में डालने से खट के नहीं (काजल जैसे) उन से उस कूवे को ठसोठस भरे कि-जिसपरसे जो कभी चक्रवर्ती राजा की सब सेना निकल जायतो भी वो बिलकुल दवे नहीं. गंगानदी का पूर उस पर से निकल जायतो उस में पाणी प्रवेश कर सके नहीं. उस कूचे मे- ४१३४५२६३०३०८२०३११७७७४९५१२१९२०००००००००००००००००० इतने वालाग्र समाये. इन में से सो सो वर्ष में एकेक वालाग्र निकालते वो कूबा साफ खाली होजाय. एकभी वालाग्र नहीं रहे, उतने वर्षोंका-१ व्यवहार पल्यापम होता है. (इस पल्योपम से देवता नरक और युगलीयों का आयुका प्रमाण किया जाताहैं.) (मो वर्षका प्रमाण-शीघ्रतासे) ऑख मीच कर उघाडे (ऑख टमकावे) इतने में अंमख्यात समय वीत जातेहै. ऐसे असंख्यात (जघन्य युक्ताप्रमाण) ममय की-आ- वलिका, ४४४६ झाजेरी (कुछ ज्यादा) आवलीकाx-वाशोचास.७श्वासोश्वामका एक थोव. ७ धोव की-१लव (घांस काटते एक वक्त में जितना काल लगे उतना काल) ७७ लवका-१-मुहूर्त. ३० मुहूर्त की-१ अहो राव (दिनरात) १५ अहो राव का-१प क्ष. २ पक्षका-१मास. २ मामकी-ऋतु (ग्रीपमादि) : ऋतु की-अयन (दक्षीणा यन-उत्तरायन). २ अयन का-१ वर्ष, ५ वपका-१ युग. २० युगके मो वर्ष होते.) (२)अव ऊपरोक्त व्यावहार पल्योपमके वोंको अंमख्यान कोटी वर्पोकेममयों गुणा कार करने से-१ उद्धार पल्योपम के वर्षों का प्रमाण होता है. (इम उद्धार पल्य के समयों को २५ क्रोडा कोड (२५ क्रोडको २९ होड मे) गुणा करने मे ; जितने समय होवें. उतने मव द्वीप समुद्रों हैं.) ४ २५६ अक्रीका क.- बुल्ल भन (निगोड़ने में -१ ) हक है. ६५५३६ भव-१ अन्न मुहुर्त होता है. इसमें २०६ को ६०५६ मे मुस ने-१६७७७२१६ इतनी सजा होते है. इसमें जनसभा साथ भन देने से ४४४६ कोन न. १५८ अन न रही है. इने :७७: नहीं है. १ के. ७७? भाग करनेने २४५८४५१६ ते हैं. ही सन्नी. से . - - -- । -- ११८ * प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूलद्वारा रोहण खाण्ड ५१ (३) उद्वार पल्य के वर्षों को असंख्यात कोटी वोके समयों से गुणाकार करने से-१ अद्धा पल्य के वर्षों का प्रमाण होता है, (इस अद्धा पल्योपम से कर्मोकी स्थिति का प्रमाण किया जाता है !!) दशकोडा क्रोड व्यवहार पल्योपम का-१ व्यवहार सागरोपम, दशक्रोडा को उद्धार पल्योपम का-१ उद्धार सागरोपम और दश क्रोडा क्रोड अद्धा पल्योपम का १ अद्रा सागरोपम होता है. ३ अद्धा पल्य की अर्द्धच्छेद राशी को रास गुणा करने से जो संख्या आवे उसे शूच्यंगुल कहते हैं (एक प्रमाणंगुल लम्बे और एक प्रदेश चौडे- ऊंचे आ- काशमे इतने प्रदेश हैं.) ४ सूच्यंगुल के (सूच्यंगुल को सूच्यंगुलसे गणे.) वर्ग को प्रतरांगुल कहते हैं. खूच्यं गुल के घन को घनांगुल कहते हैं. ६ एल्यकी अर्द्धच्छेद राशाक असंख्यातवे भागको घनांगुल से रास गुणा कर नेसे-१ राजूका प्रमाण होता है. + ७ सात राजूकी एक जगच्छेणी (आधी बसनाल) होती है. ८ जगत्च्छेणी के वर्गको जगत्परतर कहते हैं. और ९ जगत्च्छेणी के घनको लोक कहते हैं. (यही तीनों लोक के आकाश प्रदे- शों की संख्या है.) यह उपमान प्रमाण के १ भेदों का कथन हुवा. इतना जरूर ध्यान में रखना कि-१ जहां द्रव्य का प्रमाण कहा जाय, वहां उतने अलग २ पदार्थ जानना. जहां क्षेत्र का प्रमाण कहा जाय, वहां उतने प्रदेश 15-पाठको। जरा ध्यान दीजीये, कोंकी स्थिति के लिये कितना जबर प्रमाण दिया गया है ! । कर्म बन्ध करना सहज है, परन्तु भोगवते बहुत ही मुशीबत मोगवनी पडती है! जरा लक्ष में लीजीये !! + ३११२७१७० इतने मणका-१ लोहेका गोला, ऐसे १००० गोले को भेले करने से १ भार बजन कहते हैं. ऐसा ? भारका गोला कोइ देवता ऊपर से डाले, वो ६ महिने, ६दिन, ६पहर, ६घडीमें जितना क्षेत्र उलंघकर नीचा आवे, उतने क्षेत्रको एक राज्जू आया कहना.

m * मुक्ति मोपान-श्री गुणस्थान रोहण अहीशनद्वारी. और १११ ---- . - .. " जानना. ३ जहां कालका प्रमाण कहा जाय. वहां उतने समय जानना. और ४ जहां भाव का प्रमाण कहा जाय, वहां उतने अविभाग प्रतिच्छेद नागना. यह लोकोत्तर (अलौतिक) गणितका का हवा. १२-१३ क्षेत्र फर्शना और क्षेत्र प्रमाण द्वारका अर्थ: लोकालोक का स्वरूप मोपने लोकालोक का स्वरूप इतना मेरे:- अलक-भीनोक-ति- लोकन देखने जना. अर्थात-अन्लोक मे पत्त. एक आहान पोनारोती। भी नहीं है. इनलिये अलोक कता जाना है. नो अनन्नाल-भारम्बार-मान- न्यू रहित है. इन अलेक के अन्यन्त मध्य विभाग में पानी मिनी पर तक १४ गड का कम्बा और. नीचे मान गज चौहान : गरबा.६. रके अर्भ विभाग- राडू चौज. ऊपर अन्न में 1-7 बाकी. लटा. उनपर दुमन दीवा मुन्टा और कपर एक नामी सका. दार ३४६ राज धनाकार मपनि सपन दगपर पानी कानाकर तीन विभाग कल्पे :- अधो-नीचालोक. रच-बीकानो , चानोक न तीनोका अलग मिले:- । नीचा वाप:-अबोलके पर नारदार नन्याय के तीनो की नई पदारमत नाज मं. ने : अल में पोजनके नये. जिनः नर्मद दि । रिट अन्न रद जी मेलामा निर: की चौती और एक सोच, नाम: बाप-: राजारामा महाका १. किन हरिजनन : "जा पोवनी. निको पात मी निन्दा पनुरा:: मी महक हजादी. ४ मा १२० प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड. ११ घनाकार विस्तारमें है. जिसके मध्यमें-१लक्ष१६००० योजन जाडा, और श्राजू लम्बा चौडा पृथ्वी पिण्ड है, जिस में एक हजार योजन उपर एक हजार योजन नीचे छोड कर वीच में १ लक्ष १४ हजार योजनकी पोलारहे, जिसमें ३ पाथडे, २ आन्तरे, ५ कम १ लक्ष नरकावासे में असंख्यात नेरीये हैं-जिनका ३५० धनुष्य शरीर और २२ सागर का आयुष्य है. जिसपर पांचवी रिठा नरक-पांच राजूकी लम्बी चौडी, एक राजू की जाडी ३४ राजू घनाकार में है. जिसके मध्य-१ लक्ष १८ हजार योजनका पृथ्वी, पिण्डहै, जिस के एक हजार योजन ऊपर एक हजार योजन नीचे छोड वीच में १ लक्ष १६ हजार योजन की पोला रहे, जिस में पांच पाथडे, ४ आन्तरे, ३ लक्ष नरका वासे में असंख्यात नेरीये रहते हैं, जिनका १२५ धनुष्य का शरीर, और १८ सागर का आयुप्प है. जिसपर चौथी अजंना नरक-चार राजू की लम्बी चौडी, एक राजूकी उंची- २८ राजु के विस्तार में है. जिसके मध्य में १ लक्ष २० हजार योजनका पिण्ड है, जिसके एकेक हजार योजन उपर नीचे छोड के बीच में १० लक्ष १८ हजार योज, न की पोलार है, जिसमें ७ पाथडे, ६ आतरे, १० लक्ष नरकावासे असंख्यात नेरीये है. जिनोंका ३२॥ धनुप्यका शरीर, और? सागरोपम का आयुष्यहै. जिमपर तीसरी मीला नरक तीन राजूकी लम्बी चौडी एक राजूकी उंची२२ राजू के विस्तार में है. जिसके मध्य में ' लक्ष २८ हजार योजनका पृथ्वी पिण्ड है, एकेक हजार योजन उपर नीचे छोड बीच में ? लक्ष २६ हजार योजनकी पोलार है, जिम में १ पाथडे ८ आंतरे, १५ लक्ष नरकावासे में असंख्यात नेरीये हैं, जिनके ११ धनुप्य का शरीर और ७ सागरका आयुष्य है. जिमपर दुसरी वंमा नरक-दो राजुकी लम्बी चौडी, एक राजू की उंची, १६ राजू घनाकार में है. जिमके मध्य ? लक्ष, ३२ हजार योजन का पृथ्वी पिण्ड है, जिमके एकेक हजार योजन उपर नीचे छोड बीच में-१ लक्ष ३० हजार योजनकी पोलारहै, जिसमें-११ पाथडे, १० आन्तरे, २५ लक्ष नरकावासे है में असंख्याते नेरीये हैं. जिनका १५॥ धनुप्य १२ अंगुल का देहमान और ३ सागर की आयुष्य है. जिमपर पहिली घम्मा नरक-एक राजूकी लम्बी चौडी, और १ राजूका उ- ची, १० गज बनाकार में हैं, इनके मध्य १ लक्ष ८० हजार योजन का पृथ्वी पि.

-- * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अदाशतद्वारी * १२१ ण्ड है, जिसमे से एकेक हजार योजन ऊपर नाचेका छोडा वीच में १ ला ७८ हजार योजन की पोलाड है, जिसमें १३ पांथडे, १२ आन्तरे ३० लक्ष नरक, वासेमें असंख्यात नेरीये हैं. जिनकी ॥ धनुष्य ६ अंगुल का शरीर, और उत्कृष्ट १सागर का आयुष्य है. सातों नरक के-४२ आन्तरमें से प्रथम नरक के १०अन्तर छोड वाकीके स- व खाली पड़े हैं. और ४१ पांथडे हैं सो सब पोले हैं. जिन में ८४ ला नरकावासे हैं उन में नेरीये रहते हैं. पहिली नरक के दश अन्तरमें ११ हजार ५ सो ८३ योजन कुछ झाजेरी ज- गह है. जिसमें १ क्रोड ७१ लभ भवन हैं. उन में असंख्यात, भवन पति देवों जाति के रहते हैं. जिनका ७ हाय का शरीर और एक सागरका आयुष्य है. २ तिरछा लोकका वरणन्-एक राजू का लम्बा चौडा गोळ. १८०० योजन का ऊंच १० राजू घनाकार में तिरछा लोक है. पहिली नरकके उपर जो १००० योजनका पृथ्वी पिणु छोडाहै, उसमें १०० तो योजन नीचे छोडना. जो नीचे लोककी हद्दीमेंही हैं. और ११० योजन उपर छोडना, वीचमें८०० योजनकी पोलारमें आठ जातिके व्यन्तर देवोके असंख्यात नगरेहैं. और उपर१० योजन छोडे उसमेंके?? योजन उपर छोडना, और? योजन नीचे छोडना,वीच मेंट योजनकी पोलारहे जिसमे ८ जातिके वाण व्यन्तरके असंख्याते नगरे हैं. नई दोनों स्थान में रहने वाले देवोंका हायका शरीर और एक पल्योपमका आयुप्य है. १० योजनके छोडे हुवे पिण्ड पर समभुमी है. सो एक राजू की लम्बी चोडी है. इस के वस्तही मध्य भाग में मुदर्शन मेरु पर्वत मलस्यंभ जैसा गोळ नीचे १० हजार योजन चौडा. और कम होता २ उपर गिखरपर १ हजार योजन चौडा रह गया है. और मूल में मे शिखरतक १ लन योजन का उंचा है. इन के मूल में समभूमी पर तो-१ भद्रशालवन है, २५०० योजन उपर नंदनवन है, १२५. यो- जन उपर सोमानस वन है. और ३६००० योजन उपर पडंग वन है. (यहां तीर्थंक- रॉका जन्माभिपेक इन्द्रादि देव करते है) इन वनके मध्यमें ४० योजन की उंची चूली का (चोटी जैसी डोंगरी) है. इम मेरु पर्वत के चारों तरफ चूडीके आकार फिरना हुवा १ ला योजनका लम्बा चौडा गोळ जम्बुद्वीप है. मेरु पर्वत पाम पूर्व पश्चिममें महा विदेह क्षेव है. जे- - १२२ * प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा राहणे खण्ड 23 सके १६ विजय पूर्व में, और १६ विजय पश्चिम में मिलके ३० विजयों है-एकक वि- जय २२ सो १२ योजन झाझेरी लम्बी है, ११ हजार ८ सो ४२. योजनकी चौडी है, एक महा विदेह के पास वरसारापर्व और एक के पास अन्तर नही होनेमे १६ व- खारा पर्वत ५०० योजन .चौडे, और १२. नदी १२५ योजन चौडी दोनों विजय प्र- माणे ही लम्बे हैं. महाविदेह क्षेत्र में २४ वी नलीनावति विजय १००० योजन जमीनमे उतरती हुइ उंडी चलीगइ है, इसे अधोगामिनी विजय भी कहते हैं. इस के १०० योजन नी- चेके नीचे लोकमे गिन जाते हैं. महा विदेह के मध्य भाग में पूर्व मे सीता और पश्चिम मे सीतोदा नामे महा- नदी है सो १९ लक्ष १४ हजार नदीयोके परिवार समुद्र गइ हैं. महा विदेह क्षेत्र के मनुष्यों का ५०० धनुप्य का शरीर, और क्रोड पूर्वका आयुप्य सदा चौथा आरा (सत्ययुग) मवर्तता है. मेरू पर्वत के पास दक्षिण मे देवकुरु क्षेत्र + और उत्तर में उत्तर कुरु क्षेत्र ११ हजार ८ सो ४२ योजन झाजेरा है, इसमे सदा पहिले आरे जैसी रचना है, गल मनुष्य होते हैं, तीन गाउ का शरीर तीन पल्योपम का आयुप्य होता है. देव कुरु क्षेत्र के पास दक्षिण में नीपध पर्वत और उत्तर कुरु के पास उत्तर ये नीलवन्त पर्वत ४०० योजन उँचे, ९४१५६ योजन पूर्व पश्चिम मे लम्बे, १६८४२ योजन २ कला उत्तर दक्षिण में चौडे है. निषेध पर्वत के पास दक्षिण में हरीवास क्षेत्र और नीलवन्त पर्वत के पास उ- त्तर मे रम्यक वास क्षेत्र ७२९०१ योजन १७ कला लम्व, और ८४२१ योजन ? कला चौडे है. इन मे सदा दुसरे आरे जैसी रचना रहती है. यहां के युगल म- नुप्यो का दो गाउ का शरीर और दो पल्योपम का आयुप्य होता है. हरि वास क्षेत्र के पास दक्षिण मे महा हेमवन्त पर्वत और रम्यकवास क्षेत्र के + देवकुरु क्षेत्र मे रत्नोका जम्बु नामक वृक्ष १२ योजन का ऊचाहै. उसपर अणाढी ना म जम्बू द्वीप का मालक देवता के रहन के भवनहै, वहा देवता रहने से इसद्वीप का नाम जम्बुद्वीप कहा जाता है. १ योजन १९ के भाग करने उसमे के १ भाग को ? कला कहते हैं. - -- . मुक्ति भोपान-श्री गुणस्थान रोहण अडीशतद्वारी. और पास उत्तर में रूपी पर्वत-२०० योजन उंचा. ५४१२२ योजन १६ कला लम्बा. ४२१० योजन १० कला चौडा है. मा हेमवन्त पर्वत के पास दक्षिण में हमेश्य क्षेव और रूपी पर्वतके पान - क्षिण में एरणश्य क्षेत्र : ७६७७४ योजन १६ कला लम्बा. और २१५५ योजन ५ कला चौडा है. इसने तीसरे आरेकी रचना सदा रहती है। यहां के युग मतुप्योका ? गाउका गरीर. और १ पल्योपम का आयुप्य होता है. हेम्वय क्षेत्र के पान नक्षिण में चूल हेम पर्वत और एरणवय केवके पान उत्त र मे गिरी पर्वत-१०० योजन उंचा. २४९२५ योजन लम्बा और १००२ योजन १२ का पैज चूतम पर्वत के पास दक्षिण भरत क्षेत्र और मिनरी पर्वत के पान उत्तन्ने एतवन क्षेत्र-१४४७१ योजन लम्सा. ५२० योजन ः कला बांधा. इनसे मार नर्पिणी का केटे मार : आरे सर्दिनी काल मदा पारे निर पर्न तेरे. जिन से शरीर और आयुप्य आरा मागे इन भन एनवन क्षेत्र के पीलापन ०९ पोना. कला रम्बा. ५० योजन बोटा. और योग नमायोजन जावे व योजन चौटी पनि जिनी पीती विवर: दाक्षिण में और उन दो पर और भी ना पोजन जानानियो पल देवता बने। इसी र भट गुफा १२ योजन चौरी और पर्व निकामी... मारने को आने जाने- जम्बुद्वीप चौनिया जाति के.:: :::: प्प ॥ अाग गद लिद. म जति दे पान पनि निता कि का है. विहिता नर चोग्न नारा कम्पनी , ~ 1 १२४ * प्रथम अथ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड १ ५६वीपे हैं. इनपर युगल मनुष्य रहते हैं, उनका८०० धनुष्यका शरीर ऊंचा, और प- ल्यके असंख्यातवे भाग आयुष्य है. लवण समुद्र के मध्य में चारों दिशा में-वडवा, युग, केतु और इश्वर नाम के चार पातल कळशे १ लक्ष ढोजन उंडे, वीच मे ५० हजार योजन चौडे, मुख औरत ला १ हजार योजनका चौडा, वायुका, पाणी वायु मिश्रित, और पाणी का, ऐसे ३ कान्ड युक्त, दुसरे ७८८४ छोटे कळशके परिवारसे है. लवण समुद्र के मध्य में १६ हजार योजन उंचा और ११ हजार योजन चौ- डा चारों तरफ फिरता पाणी का डगमाला (हग) है. गौतम द्वीपा, वेलन्धरके द्वीपा चाद्र मूर्यक द्वीप आदि हैं. लवण समुद्र के चारों तरफ फिरता बलियाकार धातकी खन्ड द्वीप चार लक्ष योजनका चौडा है. इस्के मध्य दक्षिण और उत्तर में दो इपुकार पर्वत ५०० योजन उंचे, और धातकी खन्ड जितने लम्बे पड़ने से पूर्व घात की खन्ड और पश्चिम घात की खन्ड ऐसे दो विभाग होगये हैं. एकेक धातकी खण्ड में जबुद्वीप में कहे मुझव सब पदार्थ-क्षेत्रों पवर्ती नदयों वगैरा है. दोनो धातकी खण्ड में दो मेरु पर्वत और सव जंबुद्वीप से दुगने पदार्थ हैं. धातकी खण्ड के चारों तरफ वलीया कार ८ लक्ष योजन का कालोदधी स मुद्र है, यह इस किनारे से उस किनारे तक एकसा हजार योजन का फंडा है. कालोदधासमुद्र के चारों तरफ वलीयाकार पुष्कराध द्वीप १६ लक्ष योजन का चौडा है, इसके मध्यवीच में वलीया कार चौतरफ फीरता मानुषोत्तर पर्वत १९२१ योजनका उंचा है, इसके अन्दरही मनुष्यों की वस्ती है, धात की खन्डद्वीप की तरह इस में भी दो मेरू प्रवर्व और क्षेत्र पर्वत नदी वगैरा सर्व वस्तु है. इस अ- डाड द्वीप मनुपोत्तर पर्वत के वाहिर के पुष्करार्थ द्वीप में व आगे मनुष्यों की उत्पत्ति वस्ती, वादर अनि, नदी, द्रह, बदल, विजली, गरिव, वर्षाद, खड्डे, दुप्कालादि नही हैं. फक्त देवता और तियेचो रहते हैं. पुष्कर द्वीपे के चौतरफ वलयिाकर पुष्कर ममुद्र ३२ लक्ष योजन का है, जि मके चौफेर वारुणी द्वीप ६४ लक्ष योजनका, जिसके चौफेर वारुणी समुद्र (मदीरा जैमा पाणी वाला) १२८ योजन. यों आगे एकेक मे दुगुणे-क्षीर द्वीप, क्षीर समुद्र, घृत दीप. वृत ममुद्र, इस द्वीप, क्षु ममुद्र, नंदीश्वर द्वीप, नंदीश्वर समुद्र, आदि अ- -- । 1 . - * मुक्ति सापान श्री-गुणस्थान रोहण अढीगतद्वारी १२५ संख्यात द्वीप और असंख्यात समुद्र है, अन्तिम मयंभु रमण समुद्र. एकही अर्थ राजू प्रमाण चौडा है. उस के आगे १२ योजन अलोक है. मेरु पर्वत के पास सम भूमी से ऊपर ७९० योजन तारा मंडल है उसपर योजन सूर्य है, उसपर (० योजन चंद्रमा है. उपर ४ योजन नभव माळ. उपर ४ योजन ग्रह माळ, उपर ४ योजन बुद्ध, उपर तीन योजन शुक्र. उपर तीन योजन - हस्पति, उपर तीन योजन मंगल. उपर तीन योजन गनी, यो १० योजन में जो- तिपी चक्र है. उंचा लोकका वरणनः-शनिश्चर के विमान मे ॥ राजु उपर. १९॥ राजू के विस्तार में जम्बु द्वीप के मेक मे दक्षिण की तरफ नो पहिला सुधर्मा देवक १३ मतर ३२ लक्ष विमानों असंख्यात देव युक्त है. और डगर में मान देवलोक १? प्रनर २८ लक्ष विमान, असंख्यात देव युक्त है. दोनों देवलांक के देवताओं ७ हाय का शरीर, और २ नागरोपम का आग्रुप्य है. इन दोनों देवलोक की हार के उपर-१ गज़ चाम में और ५६॥ गन पना- कार में मेरा से दक्षिण में तीसरा 'मनकुमार' देवलोक वारे मतर. - Pा विमान, उत्तर में चौथा मरेन्द्र देवलोक १६ मता. ८ का नि. नगन्यात देर युक्त है. दोनो देवलोकोंके ऐदका ६ हाका शीरऔर मागम का आयो. इन दोनो देव लोककीद मे आधा राज उपर... गड पनागर है. पर रोवर पांचवा देदक ६ प्रतर, और ४ का विमान में अनजान देवों माय का शरीर और १० मागर के आए दागने. पांचवे देवलोक की नमी अनिष्ट महर दे पाम. टाल दिला अटक. रज रानी पृथ्वी परिणाम म्पसार वर्ष की है. नि किन दिली में और एक विमान मर में दो दिन में.. लेनिम देव दे । परिवार मे. आपका समीर और "गोदानिका नाममा " इम माननार-मर्द देदोका अदमागमा आएर दिशा ३ असर देवाने. पानी देवलोब पोरम " - - " 1 ------ घनाकार मे १२६ * प्रथम अथ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड. * र मे छहा 'लान्तक देव लोक' ५ प्रतर और ५० हजार विमान में असंख्यात देवों ५ हाथ शरीर और १४ सागर आयुवाले रहते हैं. छठे देवलोक के पाव राजू उपर वरोवर सातवा महा शुक्र देवलोक [ राजू घनाकार मे ४ प्रतर ४० हजार विमान असंख्यात देवों ४ हाथका शरीर, और १७ सागर आयुवाले रहते हैं. सातवे देवलोक के पाव राजू उपर वरोवर आठवा सहसार देवलोक ७ राजू चार प्रतर और ६ हजार विमान में असंख्यात देवों चार हाथ का शरी- र और १८ सागर आयुवाले रहिते हैं. आठवे देवलोक के उपर पाव राजू दक्षिण में नववा आण देवलोक, और उ- तर मे दशवा पाण देवलोक १२॥ राजू घनाकार में दोनों के चार प्रतरो और चार- सो २ विमाणो में असंख्यात देवताओं तीन हाथ का शरीर, और नववे मे १९ सा- गर, दशवे मे २० सागर आयुवाले रहते हैं. इन दोनों देवलोक के उपर आधा राजू दक्षिण में इग्यारवा अरण देवलोक और उत्तर में वारवा अचुत देवलोक १०॥ राजु धनाकार में चार २ प्रतरों के ती- नसो २ विमाणो मे असंख्यात देवों ३ हाथ का शरीर और २२ सागरोपम का आ युंप्य वाले रहते हैं. यहांतक के देवलोको को कल्प कहते हैं, इनों में-इन्द्र सामानीक, लोकपाल, वायविशक, आत्मरक्ष, परिपद, अनिका, आदि अनेक प्रकारके देवो हैं. वो इन्द्रकी आज्ञा प्रमाणे चलते हैं. और आगे सव कल्पातीत-अहमेन्द्र देव हैं. इन दोनों देवलोकोके उपर १ राजू एकके उपर एक-भद्दे, मुभद्दे सुजाय, सु- मान से, मुदंशण, पियदंसण, अमोए, पडीभद्द और जसोधर, यह नवग्रीवेक के ३१८ विमाण आठ राजू घनाकारमें हैं, इनमें देवोंका २ हाथका शरीर पहिली ग्रीवेक में २३ सागर आगे एकेक सागर वढता २ नववी ग्रीवेक में ३१ सागर का आयुप्य है. नवग्रीवेक से एक राजू उपर विजय विजयन्त जयन्त अपराजित यह चारों विमान तो चारों दिशा में हैं. और सर्वार्थ सिद्ध विमान इन चारों के मध्य में, यों पांचों अनुत्तर विमान ॥ राजू घना कार में हैं. इन में देवों का एक हाथ का श- रीर, और सागर का आयुप्य है. सर्वार्थ सिद से १२ योजन उपर मिद शीला सीधे छवके संस्थान में श्वेत मु -- --- * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अढाशतद्वारी * १२७ वर्ण की ४५ लक्ष योजन की लम्बी चौडी गोळ है. सिद्ध शिळा के उपर सिद्ध क्षेत्र एक योजन उपर और सब ११ राजू के वि- स्तार में है. यहां उपर के ३६३ धनुष्य ३२ अंगुल जितने जाडे और ४५ लन योजन जितने लम्बे चोडे स्थान में अनन्त सिद्ध भगवन्व परमात्म हैं. उन सबों- का सिर आलोक से लगा है. यह संक्षेप में लोकालोक का वर्णन् समाप्त हुवा. - काल प्रमाण द्वारका खुलासातो पीछे कहे प्रमाण वोधसे जाणना. वाकी के आगे कहे सब द्वारोका खुलासा मूल मुझवही जाणना. तथा उपरोक्त द्वारोंके सुलासे से जाणना. परम पूज्य श्री कहानजी ऋपिजी महाराज के सम्प्रदाय के वालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलख ऋपिजी महाराज रचित मुक्ति सोपान श्री गुणस्थान रोहण अटीशतद्वारी प्रथम अर्थ काण्ड का मूल द्वारा रोहण का अर्थ नामक प्र.ख.समाप्तम् TATALA ॐन: * द्वितीय-कर्म द्वारा रोहण खण्ड. * प्रथम मूल द्वारा रोहण खंडमें गुणस्थाना रोहणकी विधी विविध द्वारों कर वता- इ, सो गुणस्थानारोहण तो कर्मों की हीनता से होता है. अर्थात् ज्यों ज्यों कर्मदल आत्म प्रदेशसे पतले पडते जातेहैं-झडते जातेहै, त्यों त्यों आत्म लायवत्व (हलके पने) को प्राप्त हो उंचसे उंच दिशाको प्राप्त करतीहै, सोही गुणस्थानारोहण जाणना. इसाल- ये गुणस्थानारोहण-गुण वृद्धि के इच्छकों को कर्मोंको पतले करने उनके स्वरूप का जान जरूरही होना चाहिये.और इससिये ही कर्मा रोहण खन्ड कहते हैं. जैसे मट्टीका सुवर्ण का अनादि सान्त सम्बन्ध है, तैसे ही जीवका और कर्म का अनादि सान्त सम्बन्ध है, वो कर्म सामान्य प्रकार से तो एकही और विशेष प- नेसे (१) जो कर्म पुद्गलोंका पिण्ड सो द्रव्य कर्म, और (२) कार्य में कारण का व्यवहार होने से उन पुद्गलोके द्रव्य में फल देने की शक्ति उस से उत्पन्न हुवा अनादि परिणाम सो भाव कर्म, तथा-(१) ज्ञानादि आत्मा के गुणों का घात करे सो घातिक कर्म, और (२) जो पुद्गल प्रणति रूप आत्मा, के साथ परिण में परन्तु गुणों की घात नहीं करे सो अघातिक कर्म. ऐसे दो भेद भी होते हैं. और घातिक कर्म के ४ भेद, तथा अघातिके भी चार भेद, दोनो मिलकर ८ भेद भी होते हैं. इन की १४८प्रकृत्तियों हैं, इसलिये १४८भेदभी होते हैं. असंख्यात लाके व्यापि कर्म पु- गलों होने से असंख्यात भेद, कर्म पुगलोंके स्कन्ध अनन्त होनेसे अनन्त भेद, और १२९ । * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी. * जगत में अनन्त जीवों हैं, एकेक जीव अनन्त कर्म पुद्गल की वर्गणा कर घेरा हुवाहै इसलिये अनन्तानन्त भी कमोंके भेद होते हैं. यहां मुख्यत्व ८ कोंकी १४८ प्रकृत्तियों कहते हैं. इह नाण दंसण वरण । वेअ मोहाउ नाम गोआणी। विग्धं च पण नव दु। अठवीस चउ तिसय पण विह।।गोमठसार अर्थ-१ झानावरणीय कर्म की ५ प्रकृत्ति. २ दर्शनावरणीय कर्म की ९ प्रकृ त्ति. ३ वेदनीय कर्म की २ प्रकृत्ति. ४ मोहनीय कर्म की २८ प्रकृत्ति. ५ आयुष्य कर्म की ४ प्रहात्त. ६ नाम कर्म की ९३ प्रकृत्ति, ७ गौव कर्म की २ प्रकृत्ति.और ८ अन्तराय कर्म की ५ प्रकृत्ति. यो ८ कमों की १४८ प्रकृत्तियों होती है. इन स- वोंका सुलामे वार आगे वरणन करते हैं:- ज्ञानावरणीय कर्म. जिनसे वस्तु का स्वरूप जाना जावे सो 'ज्ञान' यह आत्मा का निजगुण है. सब गुणों में अव्वल दरजे का गुग है. इसलिये यह पूज्य होनेसे प्रथम ग्रहण कियाहै. जीव रूप लोकालोक प्रकाशी सूर्य को केवल ज्ञानावरणीय स्प बलोंने ढका है. तो भी अलर का अनन्तवा भाग मब जीवों के उघाडा रहता है; + वो बदलों पतले पहते हैं त्यों सूर्य का प्रकाश वहता है. तैमेही ज्ञानाभरण कम होने मे मति श्रुति आदि ज्ञान प्रगटता है. और बदलों जाडे होनेसे नूर्यका तेज आवरता कमी पडताहै. तैसे ही ज्ञानाभरण से पंचज्ञान की मन्दता होती है. मोही ज्ञानावरणीय की ५ प्रकृत्ति. १ मति ज्ञानावरणीय'-पांचों इन्द्रिय और मन कर जो भाव जानने में आवे सो मति ज्ञान. इसके दो भेदः-१) व्यंजनावग्रह और (२) अर्थाव ग्रह. व्यंजे-प्र- . + यहा त केवल जन साधारण पक्षर रेना. मन्ये भय बन्नु स्वर्णय है, औरै जनाभिधेप बल्ल धनले पर पांच है. और केवल नाले अनामि धेच अभिप दोन पाय हैं. दो दोनों हन के पद एक होते हैं. पक्षा का नन्नान भाग नट ते श्रुत केस के हेते है. जदयगनिद में बहार स्वाद ना सहन है. ने कर्मी नाटक जप ने बंद केल्या. भाव से बहाने लाल पन्त र होन्ही नही है.

प्रथम अर्थ काण्डका-द्वितीय कर्म द्वारा राहणे खण्ड ११ काशे+अवग्रह-मिलकर. अर्थात्-जिन इन्द्रियों का ज्ञान दूसरे पदार्थ को मिलकर, आप में उसे प्रणमा कर फिर उसका स्वरूप ग्रह-जाने उसे व्यंजनावग्रह कहते हैं. यह अवग्रह-श्रोत, धाण, रस और स्पर्श, इन चारों इन्द्रिय से होता है, क्योंकि इन चारों इन्द्रियोंके विषय पदार्थ शब्द गन्ध रस और स्पर्य, आकर इन्द्रियों को लगते हैं, तवही वो उनके गुणको समझती है. और चक्षु इन्द्रिय तथा मन इन से यह अत्र- गृह नहीं होता हैं, क्योंक-यह दोनोंही अपने से दूर रहे हुवे विषय रूप-रंग को औ- र अन्य के भाव को ग्रहण करते हैं. जो कभि यह विषय को स्पर्श के ग्रहण करतो अग्नि देख भस्म होजावे,और कॉचकी सीसीमें छिद्र होजावे, वगैरा इसलिये दोनोंकेव्यंजना वग्रह नहीं है, वाकी की चारों इन्द्रियोंकही है. सोही व्यंजनावग्रह के चार भेद कहे जाते हैं. इसकी स्थिती-जघन्य आवलिका के असंख्यातवे भाग की, उत्कृष्ट पृथक्त्व श्वास प्रमाणे-तीसरे मिश्र गुणस्थान जितनी जाणना. (२) 'अर्थावग्रह' जो पदार्थोका अर्थ-मतलव का अवग्रह-ग्रहण करेसो, इस के ४ प्रकार हैं:-(१) पांचों इन्द्रिय और मन के विपय! जब अपने २ स्थान को प्राप्त होते वो उन्हे ग्रहण करे अव्यक्त ज्ञान से सो-'अवग्रह' इसकी स्थिति-एक समयकी,(२) अव्यक्तं पने ग्रहण किये छेही विष- यो का निर्णय करने विचार करे कि यह क्या है? सो 'ईहा', इसकी स्थिति अन्तर मुहूर्त की, (३) विचार ते पूर्ण निश्चयात्म वनजाने कि-यह येही है, सो 'अपाय. इसकी स्थिति अन्तर भूहूर्त की. (४) और उस निश्चय किये अर्थ को, वासना सं- स्कार पूर्वक बहुत कालन्तर तक धार रक्खे, दुसरी उसके जैसी वस्तु देखने से सुनने से उसका ज्ञान हो आवेसो 'धारणा.' इसकी स्थिति असंख्याते कालकी, क्योकि-जाति स्मरण ज्ञान भी इस धारणाके पेटेमें है. x यो इन अर्थाव ग्रहे के चारों भेदोंको पां- चो इन्द्रिय और छटा मन से ६ गुना करने से २४ भेद होते हैं, और उपरोक्त व्य- जनावग्रहके ४ भेद इस में मिलाने से २८ भेद मति ज्ञान के होते हैं: २ श्रुति झान-से अक्षर जाने इसके १४ भेदः - यह निर्णय-निश्चय छत्ते धर्म से सो सम्यग ज्ञान. और अछत्ते धर्म का करे सो 'मिथ्या ज्ञान है. x जाति स्मरण ज्ञान से पिछले ९०० भव जो सन्नी के लगोलग किये होवैतो देख सकता है, बीच में असन्निका भव हुवा हो वहासेही आगे दिखना बन्ध होजाताहै.

मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी. (१) अक्षरश्रुत-पदादि पर लिखे सो-'सज्ञानर, मुखसे उच्चारन करेसो 'व्य- जनानर', यह दोनों द्रव्य श्रुत. और इन से अर्थात् पढकर-देखकर, या मुनकर इ. न्द्रियावरण की भयोपशम लन्धिद्वारा अनाभिदेय पदार्थ के अनन्तवे भाग आभिधेय पदार्य को जाने सो-'लब्धालर', यह भाव श्रुत. इन तीनों प्रकारके अमरो को जाने सो अक्षर श्रुत.. (२) 'अनभर श्रुत-अनर के उच्चार विना खाँसी छकि डकार वगासी आदि किसी भी चेष्टासे मतलब समझे सो अनभर श्रुत. (क) 'सजीवत'-विचारे, निर्णय करे, समुचय अर्थ करे, विशेष अर्थ, चिन्तये और निश्चय करे. यहन्योल सन्नी में पाते हैं. इन वोल सहित मूव धारेसो सजीभुत (४) 'अलज्ञी श्रुत ऊपरोक्त : वोल विना पूर्वापर अलोचविना पढे पहावे मुने मुनाचे सो अमज्ञी श्रुत. (५) • सम्यग श्रुत'-सर्वज्ञ या दश पूर्वतक पाढे हुवेके वचनोको या कथित मूव ग्रन्योको यथा तथ्य श्रद्धे सो सम्यग श्रुत (e) मिथ्यात्रुत-अज्ञानता से मन कालत कयनया करे रचे हुवे काम शखा जोतिष वेडके आदि पाप शास्त्र हैं सो भिथ्यात. (७-११) नादि. अनादि. शान्त, और अनन्त. इनो चारों ध्रुनका अर्थ, द्रव्य क्षेत्र, काल. और भाव कर बताते हैं:-(१) द्रव्य मे कोइ जीव मिथ्याव को छोड मम्यक्त्व में आया तब श्रुत ज्ञान की आदि हुइ. और पडवाइ हो पीछा मिथ्यात्व में गया तब अन्त हुवा. तथा केवल ज्ञान पाया तब अन्त हुवा. और वहून जीवों आ- श्रिय अनादि अनन्त है. क्योंकि ऐमा वक्त कदापि नहीं था और न होगा कि जब भुत ज्ञान नथा और न रहेगा. (२) क्षेवने-भरत ऐरावत क्षेत्र में तीर्थ की प्रकृति हो- वे तब श्रुत की आदि होवे. और तीर्थ का व्यच्छेद होवे तव श्रुनका अन्त होते. और महा विदेह आश्रिय अनादि अनन्त है. (क) कालने-उलार्पणी अवमर्पिण काल मे तीमरे आरे के अन्त तथा आदि में श्रुतकी आदि होनी है. और छह आरे की आदि में ’ पथार्थ जानने के मन में स्वगटे को मिलान में सम्पन्न पणन जना है. और काटी होने कब ने मिलाइटेरे नामीति हे. पन्न .

१३२ प्रथम अर्थ काण्डका-द्वितीय कर्म द्वारा रोहण खण्ड र श्रुतका व्यच्छेद होता है. और (४) भाव से भव्य जीवों श्रुतकी प्राप्ति करे तव आ- दि होव, और केवल ज्ञान पावे तव अन्त होवे. और अभव्य के श्रुति अज्ञान हैसो अनादि अनंत है. (१२) 'गमीश्रुत' द्रष्टी वाद की माफिक लड बंध पाठ होवे सो गमी श्रुत. (१२) 'अगमी श्रुत'-एकादशांगी तरह आगे पीछे पाट होवे सो अगमी श्रुत. (१३) अंगपविठ श्रुत सो-आचाराङ्ग आदि शास्त्र. (१४) अंगवाहिर श्रुतसो-दशवकालिकादि शास्त्र. मतिज्ञान से श्रृंतिज्ञान भिन्न होने के कारण:-(१) मविद्वान श्रुतिज्ञान का का- रण है. और भाव श्रुतज्ञान कार्य है. (२) मतिज्ञान निरक्षार है श्रुतिज्ञा साक्षर है.(३) मति ज्ञान-अभापक मुक्काहै. श्रुतिज्ञान भापक है. (४)और "श्रुति मति पूर्वक" इसत- वार्थसूत्रानुसार-मतिज्ञान हुवे वादही अतिज्ञान होताहै. इसलिये श्वामि, विषय, प्रमाण परोक्षता, और सधर्म के वास्ते पहिले मतिज्ञान कह कर फिर श्रुतज्ञान कहाहै. मति श्रुतिज्ञान का सम्बन्धः-(२) मति और श्रुति इन दोनों ज्ञान का क्षीर नीर की तरह सम्बन्ध है. (२) मति अतिज्ञान विना कोइ भी जीव नहीं है. सम्यग दृ ष्टि के ज्ञान को ज्ञान कहते है, और मिथ्या दृष्टि के ज्ञान को अज्ञान कहते हैं. उत्कृष्ट मति श्रुति ज्ञानी सर्व-द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव का जानने से श्रुतकेवली कहातेहैं. ऐसे जो श्रुतज्ञानें है उस ढके प्रकाशन नहीं देसो श्रुताशना वरणीय. (३) अवधि ज्ञान-मर्याद युक्त रुपी पदार्थ जाने इसके ८ भेदः- (१) भेद:-अवधि ज्ञान दो तरह से होवे, (१) नरक स्वर्ग में और तीर्थ करों को स्वभाबसे जन्म से ही होता हैं, (२) अय मनुष्य या तिर्यचके क्षयोपशम करणी. करने से होता है, (२) 'विषय-नरकके जीवो जघन्य आधाकोश उत्कृष्ट ४ कोश अबाध ज्ञान से देखे. देवताओं संख्यात वर्षायुवाले २५ योजन, पल्योपम के आयुष्य वाले-संख्या त द्वीप समुद्र, और सागरोपम आयुष्यवाले-असंख्यात द्वीप समुद्र देखे-तिर्यंच जघन्य अंगुलके असंख्यातवे भाग, उत्कृष्ट असंख्यात द्वीप समुद्र देखे, मनुष्य जघन्य अंगुल के असंख्यातवे भाग, उत्कृष्ट सम्पूर्ण लोक और लोक जैसे अलोक में असंख्यात खण्ड देखे * * अलोक में अवधी ज्ञान से देखने जैसा पदार्थ तो हेही नही फक्त सत्ता बताइ - है.

* मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी र १३३ (३) 'संगण'-नरक-त्रिपाई के, भवनपति-पाला के, व्यन्तर-पडह के, जोति- पी-भालरके, देवलोकके देव-मृदंग के, प्रीवकेके देव-फूलचंगेरीके, अनुत्तर विमान के देव-कंचूकीके, और मनुष्य तिर्यत्र जालीके आकार से नानामकारसे देखते हैं. (४) 'वायभ्वन्तर'-नरक देव के अभ्यन्तर अवधी ज्ञान, तिर्यंच के वाह्य अ. वर्षि ज्ञान, मनप्यके चाह्य अभयन्तर दोनों तरह का अवधि ज्ञान. (८) 'अणुगामी-अणाणगामी'-जो ऑखो की तरह जहां जावे वहां साथ रहे, और चारों तरफ देख सो अणुगामी अवधि ज्ञान. यह चारों ही गति के जीवों को होता है. और जो स्थापित-दीवेके जैसा उत्पन्न होवे उसी स्थान से या हरेक एक दो दिशीमें विक्रम से देखे सो अगुणाणुगामी अवधिज्ञान, यह मनुष्य तिर्यंच दोनों गति में होता है. (६) 'देशसे सर्वसे-जो मर्याद सहित देखे सो देशसे. और सर्वलोक तथा कु- छ अलोक देखे सो सवसे. नरक देव तियेच के देशसे अवधिज्ञान. मनुप्य के देशसे सर्व से दोनो तरहका अवाधिज्ञान. (७) हायमान वृद्धमान अवस्थितः-परिणामोंकी संक्लेशता कर घटता जाय सो 'हायमान, विशुद्धता कर वढता जाय मो बृद्धमान, मध्यस्ताकर उपजे उतनाही बना रहे सो 'अवस्थित, नरक देव के अवस्थित अवधीशन, और मनुष्य तिर्यचके दोनों तरहका. (८) पडवाइ अपडवाइ'-जो उपजकर चलानावे सो पडवाइ, और जन्मान्ततक या आगेके भवों तक बना रहे सो अपडवार, नरक देव के अपडवाइ, मनुप्य तिर्यच के पडवाइ अपडवाइ दोनों तरहका. अवधि ज्ञानी-(१) द्रव्य से जघन्य अनन्त में भाग रूपी द्रव्यको जाने देने, उत्कृष्ट-सर्व रूप द्रव्य जाने. एकेक प्रमाणुओं चडने अनन्त द्रव्यों हैं, यों द्रव्यविधि के अनन्त भेद होते हैं. (२) क्षेत्र मे जघन्य अंगलके अमख्यानवे भाग क्षेत्र मे लगा कर प्रदेशाधिक होते उत्कट मंपूर्ण लोफे और लोके जमे अलोक में अमंख्यात गंड वे देखे-चों क्षेवसे असंख्थान भेद होते हैं. () कालमे-जयन्य आंवलीका के. अम- ख्यात भाग से समयाधिक होकर उत्कृष्ट अनीत अनागत असंख्यात काल चक्रनक जाने यों, कालसे भी अमख्यात भेद होते हैं. और (४) भाव मे-जयन्य अनन्त भाव उत्कृष्ट अनंत भावाको जाने. या भाव मे अनंत भेद ऐने अवधि झान का आवरण- १३४ प्रथम अयं काण्डका-द्वितीय कर्मद्वारा रोहण खाण्ड ढक्कन करे सो अवधि ज्ञानावरणी. ४ मन पर्यव ज्ञानावरणीय के दो भेद-१ ऋजमात और विपूलमति (१) क- जुमति सो-सामान्य पणे, स्थूल पणे इसने घटलाने का चिन्तवन किया ऐसा मनोगत भाव जाने, (२) विपुलमति-विस्तीर्ण पने बहुत पर्याय सहित जाने, जैसे इसने घटलाने का तो चिंत वन किया है, परतु-अमुक धातुका अमुक-वर्णका आकारका परिमाणका वगैरा सव विस्तार से जाने. मनः पर्यव ज्ञानी-(१) द्रव्यसे-ऋजुमति मनो वर्गणा के अनंत द्रव्य को जाने. उस से विपुलमाति बहुत प्रदेश के अति सूक्ष्म मनो द्रव्य को जाने. (२) क्षेत्र से-ति- रछा अढाइ द्विपतक, उंचा जोतिपीके उपर के तले तक, नीचे उंडी विजय- रत्न प्र. भा पृथ्वी के खुलक प्रतर तक, यों १८०० योजन में रहे सन्नि पचेन्द्रिय के मनोगत भाव को जाणे, विपुलमति-इस से अहाइ अंगुल क्षेत्र अधिक और विशुद्ध पणे जाणे. (३) कालसे ऋजुमति वाला पल्योपम के असंख्यातवे भाग अतीत अनागत में चिन्त- वन किये व करेगा उसे जाने. विपुलमति वाला कुछ अधिक जाने. और (४) भावसे ऋजमात चिन्तवन किये हुवे असंख्यात पर्याय को जाने, विपुलमति कुछ विशेष जा- ने. ऐसे मनः पर्यव ज्ञान का जो आवरण करे सो मन पर्यव ज्ञानावरणी. ५ केवल ज्ञान-इसका एकही भेद है. केवल ज्ञानी-(१) द्रव्य से रूपी अरूपी सर्व द्रव्य को जाने, (२) क्षेत्र से-लोकालोक का सब क्षेव जाने. (३) कालसे-सर्वाता विपय जाने. और (४) भाव से-सव गुण पर्याय विषय है. एक रूप-शुद्ध-निरुपाधी- अमतिपाति-शुद्धात्म सम्पूर्ण गुण-सर्व विशप प्रकाश रूप सो केवल ज्ञान. इसका आ- वरण-हक्कन करे सो केवल ज्ञानावणीय. यों पांचों ज्ञान को आवरण करने वाली ज्ञानावणीय कर्म की पांच प्रकृत्ति. २ दर्शनावरणयि कर्म. अव्वल ज्ञान हुवे से तुर्त ही दर्शन होता है, अर्थात्-ज्ञानको साकर उपयोग क हा है सो पदार्थों का आकर जानने वाला विशेप रूप सो ज्ञान, और जो सामान्य नि- राकारोपयोग रूप वस्तुका अववोध जाति गुण क्रियादि विशेषण रहित धर्मीमाव वि- पय करे, सो निर्विकल्प रूप अवबोध उसे दर्शन कहते हैं. जैसे आँखपर पट्टा वान्धने मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी. से किसीभी वस्तुको देख सकता नहीं है और उस पट्टे में छिद्र होने से कुछ प्रतिभा- प होता है, और मर्वया पट्टा दूर होनेसे पुर्ण प्रकाश होता है, त्यों दर्शनके भी चार प्रकार होते हैं.-(१) आँखों से पयादि पदार्थ का सामान्य रूप देखा जावे सो चतु दर्शन. उसे नहीं देखने देवेसो चक्षु दर्शनावरणीय. (२) आँखोविना चारों इन्द्रियों से तथा मन से जो शब्दादि अर्य का मामान्य बोध होता है. तथा परभव से आते हुवे रस्ते में द्रव्येन्द्रिय की सहायता विना जो बोध होवेसो अचक्षु दर्शन. इसका जो आ- वरण दक्कन करे सो अचक्षु दर्शनावरणीय. () द्रव्यादि की मर्याद सहित जो रूपी पदयों हैं, उनको देखे सो अवधि दर्शन. इसका आवरण करे सो अवधि दर्शनावरणी य. (४) सर्व द्रव्योंका सामान्यंश का बोध होवेसो केवल दर्शन-इसका-निधन-आव- रण करे सो केवल दर्शनावरणीय. और निद्राले सर्व दर्शनोंका घात होनेके सववसे निताको भी दर्शनावरणयिका उदय कहा जाता है. और कर्मों की मन्दता कर शब्दादि से जाग्रत होता है. प्रवल- ता कर मुर्छित होता है इस कारण मे निद्राके पांच भेद कहे हैं. (१) जो मद खेद आदि दूर करने मोबना. मोवतेही तुर्त निद्राका आना. शब्द माव मे तुर्त जाग जाना, उने निद्रा कहते हैं. (२) जो लोट पलोट आदि अनेक दुःख ने आवे. बुलन्द आ वाज शरीर घुणयुणादि अनेक दुःख मे जागावे तो भी मुशकिल मे आँम्ब ज्यडे, मो · निद्रा निद्रा' (:) उभे २ वैठे २ निद्रामे झोके. खावे कुत्ते की तरह निद्रा में अंगका वचन का चलन होवे मो 'प्रचला :-(४) अत्यन्त चिन्नामे नशे ने निद्रा के पश बिल्कूल वे सावधानी रहे. अंगपछाडे या घोडे । की तरह रस्ते चलना ये ४ सो प्रचला प्रचला. ५ जो-१) निद्राके - बल चिन्नयन किया कार्य निद्रामें करे मो योनी न्द्रिा. (२) स्थान-एकम्यान गृह-न्ध होना. अर्थात्- आन्नानी ऋद्धिको एक स्थान रोक अचेत बनाइना नो +नने दिय चिन्तन निपा दिशेर रूहेल है नन्नः प न बर्मन नहीं है. और तिन मन न हो। जन देवदहे हैं. xहते हैं. योहा दोरून नदार रन नंदक प्रथम अर्थ काण्डका-द्वितीय कर्म द्वारा रोहण खण्ड 'स्त्यान गृद्ध' निद्रा. इस निद्रा में अर्थ चक्रवर्ति का वल प्राप्त होता है, * जो इस निद्रा में मरेतो नरक गति ही होती है. यह ४ दर्शन और ५ निद्रा मिल दर्शनावरणीय कर्म की ९ प्रकृति हुइ. ३ वेदनीय कर्म. उपरोक्त ज्ञानावरणीय और दर्शनावरणीय के तीन आभरण के उदयकर अ- ज्ञानताके योगसे तीव्र विपाक भोगवते हुवे(१)जो नरकादि गतिमें दुःख की प्राप्ति हो वे-वेदे-भोगवे, सो असाता वेदनीय कर्म, और (२) तीव्र क्षयोपशम के योग्य से मूक्ष्म अर्थ जानते जो देवादि गति में साता सुख वेदनेमें आवे सो सातावेदनीय. जैसे मधू (सहेत) लिप्त खङ्ग धारा को जिव्हां कर चाट ने से प्रथम तो मीठा रसका सवा- द आता है, और फिर जिव्हां कटने से दुःख होता है, ऐसे ही साता वेदनीय के क्ष- यसे असाता का उदय होता है और असाताका क्षय से साता का उदय अनुक्रम से वना रहता है. ४ मोहनीय कर्म. जैसे मादरा पान करने से मनुष्य वावला हो जाता है, तैसे मोहनीय कर्म के उदय कर जीव अपना हित अहित कुछ समझ सकता नहीं है। कदाचित समझ भी जायतो कर सकता नहीं है. इस के दो भेदः-(१) जैसे बुखार के जोर से पथ्य आ- हार पर रुचि नहीं होती है, तैसे 'दर्शन मोहनीय के उदय कर शुद्ध-देव-गुरू-धर्म पर रुचि नहीं होती है, और कु-देव-गुरू-धर्म पर रुचि जगती है. (२) जैसे बंधी खाने में पड़ा हुवा मनुष्य इच्छित भोग भोगवने समर्थ नहीं होता है, तैतेही "चारित्रमोह- नीय" के उदयकर जीवों-धर्म तप संयम का आचरण कर सकते नहीं है. मथम कही दर्शन मोहनीय जिसके तीन भेदः-(2) जैसे नशा का पदार्थ भो भवने से मूञ्छित हुवा जीव मात की विकलता होनेसे पदार्थों को विपरीत देखता है, तैसे-मिथ्यात्व मोहनीय" के उदय चौठाणीया तीठाणीया दोाणीया रस सहित अ. नुपहत सर्व घातिक रस तत्व सद्दहणा में विपर्यास का करने वाला होता है. (२) जै- * कमबल वाला हो तो भी दुगुना तीगुना बल आजाता है.

मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अढाशतद्वारी * १३७ से उस मादक पदार्थका आधा नशा कमी होने से-विकलता कम होती है जिससे मु- कार्य करता २ कुकार्य भी करने लग जाता है. तैसे "मिश्र मोहनीय" के उदय कर दो ठाणीया रस रहने से कुछ सम्यक्त्व के कार्य करता २ मिथ्यात्व का भी, कार्य करने लगजाता है, और उन दोनोंको एकसा-अच्छा श्रदान करता है. (३) जैसे सा- फ नशा उत्तर गये वाद उसकी खुमारी यत्किर्चित रहती है जिससे जरा विचार उ- चार आचार में तफावत आजाती है, तैसे ही "सम्यक्त्व मोहनीय" वालेने मिथ्याल के दलको यया प्रवृत्ति करण, अपूर्व करण और अनिवृत्ति करण कर मन के परि. णाम उचल कर चौठाणीया त्रिगणीया और दो ठाणीयां रसको निवार कर फक्त एक ठाणीया रस वाकी रखा है वो जीव, जीवादि की परिक्षामें मुरझाय तो नहीं, प- रन्तु आत्म स्वभाव रूप उपशम क्षायिक सम्यक्तकी उन के प्राप्ति होवे नहीं. सूक्ष्म पदायों में विशेषादेश शकित हो सम्यक्ल में मेल लगालेता है. (२) चारित मोहनीयकी २ प्रकृतिः-(१) कषाय, और (२) नो कपाय, इसमें कपाय की १६ प्रकृत्ति और नोकपाय की ९ प्रकृत्ति, दोनों मिल चारिव मोहनीय की २५ प्रकृत्ति होती है. सो कहते हैं:- कप-रस+आय-आवे. जिससे संसार का कप आकर आत्म प्रदेशोंपर जमें और जिससे संसार परि भ्रमण का कार्य निपजे सो कवायचार प्रकार की होतीहै:- १ क्रोध. २ मान. ३ माया और ४ लोम. इन चारों को अनन्त वन्धि, अप्रत्याख्या- नावरणीय, प्रत्याख्यानावरणीय, और संचलन इन चारों से चौगुने करने से १० भेद होते हैं, सो आगे दृष्टान्त युक्त कहते हैं. (१) अनन्तान वन्धि कपाय सो-अनन्तान अनन्त संसारकी अनुवन्धि वृ. दि करे, इस कपायवाला कदाग्रह रूप कुयुक्ति मे बुद्धिके शुन्य पणे कर-एकान्तवा- दिकी रुचि टले नहीं. अन्यमतपर रागयुक्त. मन्मतपर द्वेषी. ऐसाजीवं वाह्य शचि कर कदापि कपायोदय मन्दभी देखाय तो भी युक्ति हीन पनपाति को नियमा से अन- - + अनन्तान वन्धि चौक और नीना दर्मन मोहनीय इन ते श्रद्धान में फरक पडला है, इसाल्ये इन सातों प्रकृति को नर्गन मोहनीपमें गृहगकी जाती है. और यहां जो २६ प्रकृति को चारित मोहनापकी नही है से फक्त सन्नास ज्ञानर मानना. निश्चय नवले तो अनन्तान बन्दै चौग दिना २१ हो प्रकृते चारित्र हनीपी है. .

प्रथम अर्थ काण्डका-द्वतानि कैम द्वारा रोहण खण्ड र [नो कपकाय उसे कहते हैकि जो कपायको उत्पन्न करनेका मूल कारण होवे, जैसे कहवत् हौक--" झगडेका मूल हाँसी, और रोगका मूल खाँसी." ऐसेही नवों का जानना उन ९ नवों का नाम कहते हैं:-] (१)' हांसी सो' : भांड चेष्टादि सकारण से तथा विना कारण से हंसना आवसो. (२) 'रतिसो'. इन्द्रियों को अनू कूल सामग्री मिलने से या विना कारण मन में मुख वेदेसो. (३) अरति' सो-इन्द्रियोंके प्रतिकूल संयोग मिलने के कारण से तथा विना कारण म- न में उद्वेग होवे सो. (४) 'भय'-दुष्ट मनुष्यादि देखने से भय होवे-सो एह लोगभय, सिंह सदि देखनेसे भय होवै सो परलोग भय, चोरादि वस्तू का हरण करनेसे भय होवे सो आदान भय. विद्युतादि से अचिन्त्य भय उपजे सो अकस्मात् भय. उदर पूरण का भय सो आजीवका भय, मरण भय, पूजाश्लाघा भय ,यह ७ प्रकार से ड- रकी प्राप्ति सो. (६) 'शोक'-इष्ट वियोगादि कारण विना कारण जिस कर्मोदय कर शोककी प्राप्ति होवे. (६) 'दुर्गच्छा'-सो दुर्गन्ध कुरूप आदि वस्तू देखे या विना देखे मत्सर-'ग्लानी आवै सो (इन ६ ही प्रकृत्तियों को 'हांस्य पटक' कहते हैं) (७) 'स्त्रीवे. द'-जो पुरुप के दर्श स्पर्श की इच्छा होवे सो. इसकी विषय वकरीयों की लेंडी की भग्निके जैसी छेडे त्यों ज्यादा होवे. (८) पुरुपवेद'-जो स्त्रीके दर्श स्पर्श की अभिला- पा करेसो-इसकी विपय सूके घांसकी आग्निके जैसी प्रज्वलित हो तूर्त शान्त पड जावे. और (९) 'नपुंसक वेद'-स्त्री पुरुप दोनोंका दर्श स्पर्शकी इच्छा होवेसो-इसकी विषय दवाग्नि के जैसी सदा प्रचलित रहे.( यह ३ देद मिल ९ नो कपाय हुवे) उपरोक्त दर्शन मोहनीय की ३ प्रकृति और चारित मोहनयि २५ प्रकृत्तियों सब मिल मोहनीय कर्म की २८ प्रकृत्ति हुइ. आयुष्य कर्म. जैसे अपराधी पुरुष को राज पुरुप काष्ट के खोडे में कब्ज कर देते हैं, उस की जितने कालकी मुदत होती है उस के पाहिले वो उस खोडे में से निकल सकता नहीं है. तैसे ही कर्म के अपराधी आत्म ने नरकादि गति रूप खोडमें जितनी मुदत (आयुप्य) वन्य कर प्रवेश किया है, उस मुद्दत पहिले निकल नहीं सकताहै. इस कर्म की ४ प्रकृत्तियों-१ महा आरंभ, महा परिग्रह, पचेन्द्रिय का वध, और मदिरा 'मांस का आहार करने से जीवों नरक गति का आयुप्य वान्ध कर नरक में जाकर रहे मो 'नरकायु, २ माया, मत्सर झुट बोलना, खोर्ट माप तोल करने से जीवों ति- * मुक्ति मोपान श्री-गुणस्थान रोहण अदीशतद्वारी १४५ बन्धन मे वन्धि होवे. परन्तु हाड पट्टी और हाड स्वीली दोचें नहीं होवे मो "मारव संघयण."(४)एकही तरफ मर्कट वन्ध होरेमो "अर्धनारावधयण."(२) फक्त इट्टीयों की मन्धि मिली रो-केन वृक्षकी तरह नुर्न नम जारे-मो कीलिका मंचयण. और(द) जिमके शरीर की हड्डीयों एकेक हड्डीके आधार मे रही होते. जराक बड़ा लगने से अलग हो जावे. मो-'विद्या संघयण." कहा जाता है. ८ "मस्थान नाम कर्म"-जो प्रत्यन में मार्गका आकार देखने में आने उमे 'मम्यान करते हैं, जिसके 6 प्रकार :-(१) ममचनुग्म मंन्यान-पर-गेवर चतु =चारों तरफ के अरबोनें. अर्थात पदामन लगाकर रे बार-नोनों घटने और दोनों स्कन्ध के बीच के चारों तरफ के अन्नर अन्नर की बोरी वगवर आवे मो-ममुनत. रस रम्यान ' (२) जमे (निग्रोथ-वड) के वृक्ष का उपका भागने बना देगाता- है. और नाचेका विभाग नरें आदि के मवर मे रखगवानगी मिना. रीर का नाभी ऊपर का भाग विलक्षणों पेन पूर्ण प्रमाण बनव. और नीने का माग घरोवर न होवे मो "निग्रोथ पग्मिन्टल मंग्यान "गानी रसीका झार नीचे तो गाग्वा मनिशासादि कर अन्ना देणता ?. सटा निराकर रवराव देखाना है. ननही जिगयो शरीरका नाभी नीदा भात माहोरेर उसका आकार अदा नहोवे विदप गोवमो-'मादि मंन्धान दिन तयार पार्ट अट एलोवे. और हत्यार नपा पुटपर हावा पिष्ट निकम होती जयन (२) जिनके पत्ताधटे होते. पाबीचा मोर को टेंगा तेदे मो-"वाना मसान" और ( जिरेई डोह अपनी हो । मल्लिा मनमानाईको ". ९ 'द नारद:--सागर में विकास पुर" पद रोमो वर्ष नामदेव: -कांपले देनी-"ET वर्ष ई. का .:. F -::-::: राई- १४४ * प्रथम अयं काण्डका-द्वितीय कर्मद्वारा रोहण खाण्ड हण कर नो तेजस शरीर का बन्ध करे सो "तेजस बन्धन." और (६) कार्मणके यु- गलों ग्रहण कर कार्मण शरीर का वन्धन करे सो "कार्मण बन्धन." इन ५ के पहिले के तीनों शरीरका तो देश बन्ध और सर्व बन्ध दोनों होवे हैं. और तेजस कार्मण के देश वन्ध तो है परन्तु सर्व बन्ध नहीं है, क्योंके-यह दोनों अनादि सम्बन्धि हैं. "संघातन नाम कर्म"-जैसे विखरे हुवे तृणों को बुहारी से बुहार कर ए- कत्र करते हैं और फिर उसका भारा वान्धते हैं. तैसेही संघातन नाम कर्म के उदय कर औदारिकादि के विखरे हुवे जगत् में के पुद्गलों को एकत्र करता है, तब उसका शरीर रूप भरा वन्धता है-बन्धन पडता है. इस संघातन के ५ भेदः-(१) औदरि- क शरीर के विखरे पुद्गलोंका जो संघात करे-मिलावे सो-"औदारिक संघातन," (२) वैक्रिय के पुद्गलों का संग्रह करे सो-क्रिय संघातन (३) आहारक पुद्गलों का संग्रह करे सो--"आहारक संघातन.” (४) तेजस के पुद्गलों का संग्रह करे सो"तेजस सं- घातन," और (१) कार्मण के पुद्गलों का संग्रह करे सो-“कार्मण संघातन" संघयण नाम कर्म"-आस्थि-हड्डीयों का साधना-मिलाकर जमाना-मज- बूत करना उसे संघयण कहते हैं:-यह संघयण ६ प्रकार के होते हैं:-(१) दोनों त रफ के दोनों हाड मरकट वन्ध से कन्धे होवें, उसपर तीसरा हाड पट्टे की माफिक वींटा होवै, उसपर उन तीनों हडियोंको भेदे-ऐसी वज़मय खीला होवे जो उ. न हडीयोंमें ठोका हुवा होवै, जिससे सव हडीयों स्थिरी भूत होगइ होवे. ऐसा जिनका मजबूत शरीर होवेसो "वजू ऋपभनारच संघयण." + (२) दोनों तरफ की हडीयों मर्कट वन्ध कर मजबूत वन्धी होवे, उमपर हाड पट्टा भी विष्ठित होवे. परन्तु उनके बीच खीली न होवे. सो-"ऋपम नारच संघयण"(३) दोनों तरफसे हडीयों मर्कट + दोनों हडीयों को स्थिर करने पट्टे जैसी तीसरी हही उसपर वेष्टित हो. उसे पट्टा कहते- हैं. और दोतीन हडायों को भेट कर जो सन्धि को दृढ करे जो चौथी हड्डी खाली रूप हो- वे उसे बन कहतेहैं, और दोनों हडीयोंके आंकडे मिले पीछे छूटे नही उसे नारच कतहेहैं. जैसे बन्दरी फाग भरती हैं तब उसका बच्चा उसके हरय को दृढ गृहण करता है, तैसे ह डा, के बंधन को मर्कट बन्य कहते है.x सवयम हडीयोका होताहै. देवता के और नाकी रकी के वकिय गरीर में हडीयाने होनेसे असमयी कहे जातहै. म । * मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अटीशतद्वारी कर १४५ बन्धन से वन्धि होवे. परन्तु हाड पट्टी और हाड स्वीली दोनों नहीं होवे सो "मारच संघयण."(४)एकही तरफ मर्कट कन्ध होवेसो "अर्धनाराचसंघयण."(२) फक्त हड्डीयों की सन्धि मिली हो केल वृक्षकी तरह तुर्त नम जारे-सो-कीलिका संघयण. और() जिसके शरीर की हड्डीयों एकेक हड्डीके आधार से रही हो, जराक पता लगने से अलग हो जावे. सो-'छवटा संघयण." कहा जाता है. ८ "संस्थान नाम कर्म"-जो प्रत्यन में शरीका आकार देखने में आवे उसे 'संस्थान' कहते हैं. जिसके ६ प्रकार:-(२) समचतुरस संस्थान-सम-चरोवरचतु चारों तरफ के अम्म-खोनें. अर्थात् पद्मासन लगाकर बैठे वाद-दोनों घटने और दोनों स्कन्ध के वीच के चारों तरफ के अन्तर की डोरी वरावर आवे सो-समुचत. रस्र संस्थान. (२) जैसे (निग्रोध-बड) के वृक्ष का ऊपरका भागतो अच्छा देखाता. है, और नाचेका विभाग चहें आदि के सत्र से खराब लगता है, तैसेही जिमके श- रीर का नाभी ऊपर का भाग विलक्षणों पेत पूर्ण प्रमाण युक्त होते. और नीचे का माग वरोवर न होवे सो "निग्रोध परिमन्डल संस्थान."(5) जैसे सुरमाणी इमन्दीका झाड नीचे तो शाखा प्रतिशाखादि कर अच्छा देखाता है. और ऊपर टूटा निकलनेमे खराव देखाताहै. तैलेही जिसके शरीरका नाभी नीचेका भाग अच्छा हो और उपरका आकार अच्छा नहोवे विद्रूप होवेमो- सादि संस्थान (५)जिनके हाय पेर मुख ग्रीवाद अङ्ग । मुन्दर होये. और हदरपर तथा पृष्टपर हट्टीका पिण्ड निकला होवमो.-कुम्न संस्थान.' (६) जिनके फक्त हाथ पर छोटे हो. वाकीका मब गरीर बरोबर होवे-जो ठेंगणा । होवे मो-"वावना संस्थान." और (इ) जिसने मई अड्रोपाइ अमोभनीक होते. अध प्रजाटित मरटे के जैना भयंकर देखाता होरे मो "हुंड मस्थान." ९ वर्ष नाम कर्म-शरीर के विषय पुदलों का वार रूप में रह परिणाम होवे मो वर्ण नाम' इसके । भेना-१) कोपले पा काजल जना गरीर का दावा रब होवे मो-"कृष्ण वर्ण नाम." (२) नवे की पंच जमा हरे रह का गीर होत मो-"नील वर्ण नामः" (3) हिंगल के जैना लाल का होबो मो "रत्तव नाम.. (४) ताजा पीर गागर होने मो- "नि वर्ग नाम."(भार चन्द्रकोण जैसा गौर वर्षमानेर होमो देव ना." १० "गर नारदर्भ"-पोन्द्रिय प्राराने पोन्द वामदान के पुदला होने मो गन्य नान.नके दि:-) र दीनी दी .

१४६ प्रथम अर्थ काण्डका-द्वितीय कर्म द्वारा रोहण खण्ड र मुवास आवे सो-"मुरभि गन्ध नाम", (२) लशणादि जैसी कुवास आवे सो-“दुर्भि- गन्ध नांम." ११"रस नाम कर्म"-रसेन्द्रिय के पारीक्षत-रस मय शरीरके पूगलों परिणमेसो रसनाम कर्म, इसके भेदः-(१)लींचके जैसा कडवा रस हो सो "कदुरसनाम." (२) मृठ के जैसा वीखा रस होसो तिक्त रसनाम,"(३) हरडेके जैसा कपायला रस होसो "कपायला रस नाम." (४) इमली जैसा खट्टा रस हो सो “आमलन रस नाम" और (८) सक्कर जैसा मीठा शरीर होवे सो-"मधुरसनाम.' १२ "सपर्यनाम"-स्पश्यन्द्रिय के ग्रहण करने योग्य जो पुद्गलों शरीर भाव को प्राप्त हुवे हो सो स्पर्य नाम-इसके भेदः-(१) लोहेके जैसा भारी शरीर होवेसो "गुरु स्पर्य नाम." (१) अर्कतुल (आककी रूइ) जैसा हलका शरीर होवेसो- "लघु स्पर्श नाम." (३) मक्खन जैसा कोमल शरीर होवेसो-"मृदु स्पर्श नाम." ( ४ ) गौ- जिहां के जैसा खरदरा शरीर होवे सो-“वासट स्पर्श नाम." (५) हीम के जैसा शी- तल-ठन्डा शरीर हो सो-"शीत स्पर्श नाम." (६) अग्नि के जैसा उष्ण स्पर्श हो सो- "उपण स्पर्श नाम."(७)तेलके जैसा चिकना शरीर होवेसो "स्निग्ध स्पर्शनाम." और (८) रायके जैसा लुक्खा शरीर का स्पर्श होवे सो "रुक्ष स्पर्शनाम कर्म." ८ वर्ण, २ गंध, ५ रस, और८ स्पर्श, सब मिल २० बोलों की व्याख्या यहां अलग २ शरीको ग्रहण कर की गही है सो मुख्यता में जानता हुवा एकही वर्णादि व्यवहार मे धारण किया है. निश्चय नय करी गोणता रूप तो प्रत्येक एक २ शरीर में अलग वीमही बोल पाते हैं. १३ "आणू पृर्वी नाम कर्म"-जमे रम्मी से खेचा हुवा थैल उन्मार्ग गया भी मन्मार्ग आ जाना है, नमे-चक्र गति में जानि हुइ आत्मा को वेचकर नियमित गतिमें - - इन २० दोगे में मे-१ काला और २ नीला, यह २ वर्ण. १ दुर्गध, १ कटु और २ दिन यह सम. १ गुर २ रक्ष ३ खरखरा औरट गीत यह ४ म्पर्ग. यह १ प्रा- ति लेको में अनिष्ट लगनेने अशुभ गिनि जातीहै. टम लिये पाप प्राति कहते हैं, और-१.र. रू. पित. : और वेत, यद : दर्ग, । मुगभगन्ध, १ कपायला २ अचान और मधु ग्न. और , लघु, निबाट उण यह ४म्पर्श, यह प्रति लोसमें अश्ली गने में गुन लिन प्रलं है, इसलिये उदही पुण्य प्रति कहते हैं, १ * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थाना रोहण अदीशतद्वारी १४७ खेचकर लेजाय उसे अनुपूर्वी कहते हैं। इसके ४ भेदः-(१) जीव को नरक गति में सेंच करले जावे सो"नरकानुपूर्वी"(२)तिर्यंच गतिमें खेंच करले जावे सो- "तियेचानुपू (B)मनुष्य गतिमे रेचकर लेजाये सो मनुष्यानुपूर्वी.(४)और ४ देवगति खेंचकर ले जाचे सो देवगतियानुपूर्वी. १४ विहायोगति नाम कर्म."-विहायो-आकाश में या अवकाश में * गति गमन करे सो विहायो गति (इस में आकाश नाम आने से इसे 'खगति' नाम से दोलाते है:-) इस के दो भेदः-(१) राजहंस. सिंह. हस्ती आदि जैसी शुभ चालसे चलेसो - शुभ विहायोगति. और (२) गर्थव ऊउ आदि जैसी खराव चालसे चलेसो अशुभ विहायोगति. + यह सामन्य से १४ तथा विशपसे ६५ पिण्ड प्रकृत्ति कही. अब प्रत्येक प्रकृत्तियों अर्थात जिसके दो भेद नहोवे. एक अपने रूपमें ही बनी रहे.जिसकेट भेद:-(१) पराघातनाम"सो-जिसके सन्मुख वोलते हुवे वडे सामर्थ भी शंक लावे, उम के शब्द मावमे शवुओं फम्पाय मान होजावे, जो बडी राज शभा में भी बोलता हुवा डरे नही.सोपराघात २ उवाश नाम' सो-शरीर के अभ्यन्तर का वायु मुखद्वारा और नाकद्वारा मुख से आगमन होवे. ऐसा लब्धि x वन्त जीव होवेमो--उश्वास नाम (8) 'आताम नाम'-सूर्यके विमानके जो रत्नहैं वो वादर एकेन्द्रिय पर्याप्ता पृथवीके जीवहैं. उनके शरीरका स्वभाविक स्पर्श तो गीतहै. तोभी उनका प्रकाश उप्ण पडता है.येही आताप नामकर्म.x() उद्योतनाम कर्म'-उपर कहा आताप नामकर्म उमका सूर्य जमा उप्ण प्रकाश जानना. और यह जैसा चन्द्रमा ग्रह नलव ताराओंके विमानका शीलन प्रका- श, तथा देवताओं वैक्रिय रूप वनावे. लब्धि वन्त मुनि वैक्रिय रूप बनावे. तया - + पहिले जो ४ गतिका वरणन कहा सो-परभव गमन आपा जानना. और यहा प्र. कार की गति कहाँसो-इस भव आश्रिय ना. गोनट सो जग में गमन कर्ता- ही विहायो गति नहीं है. * गोमट सर के बन काड में रिहै जिनीव ग. नन्ड दाट, टे नयों के परीर में दून्रे जे गरीर में पान होते है. सन्नेि उने पर घत नाम ना. x मास में पोपान की है। प्रमादिक मन्दहे. विरार- कल्ले सजिम में है. नाविनापनेपेज होती है ये काम झयोमान्नि करने में कुछ हाजत नही.

१४८ प्रथम अर्थ काण्डका-द्वितीय कमै द्वारा रोहण खण्ड ५५ गीया नामक चौरिन्द्रिय जीवके उडते प्रकाश पडे. इत्यादि के शरीर का शीतल प्र- काश पडता है सो सव 'उद्योतनाम. (६) "अगुरु लघू नाम"-जिनोका शरीर ऐसा भारीभी न होवे जो आपका शरीर आपसेही संभले नहीं, और एसा हलका भी न होक-वायु से उड जावे, ऐंसा मध्यस्त 'शरीर होवे सो-अगरु लघू नाम. “(६) ती. थंकर नाम कर्म"-तिथंकर नाम उपार्जन करने वाले प्राणी प्रदेशोदय से ज्ञान एस- र्यता, अन्य प्राणीयों से अधिक होवे, तीर्थंकर के भव में अवतरे तब पञ्चकल्याण (चवन, जन्म, दीक्षा, केवल और मोक्ष) का महोत्सव चौसठ इन्द्रादि असंख्य देवों व- गैरा करते हैं:-१ उनको अहार निहार करते चर्म चक्षु देख सके नहीं, २ पसीना मेल रज रोग रहित महा दिव्य प्रकाशी सुन्दर शरीर होवे. ३ मुगन्धि श्वाशाश्वास, ४ रक्त मांस गौ दुग्ध जैसा उज्वल और मधुर. यह ४ अतिशय तो जन्मसे ही होते हैं, और भोगवाली कर्म भोगे वाद सर्वारंभ परिग्रह को त्याग दिक्षा ले दुक्कर करणी से चार धनधातिक काँका क्षय कर केवलज्ञान केवलदर्शन पावें. साधू साध्वी श्रा- वक श्राविका इन चारों तीर्थकी स्थापना करे. तथा समवसरणकी रचना, तीस अति- शय वगैरा महान पुण्य प्रताप का प्रकाश होता है, महान उपकार कर सर्व कर्मोका क्षयकर मोक्ष पधारनेहैं. सो तीर्थक नाम(७) निर्माण नाम' -जैसे-वढाइ(मुतार)काष्टके हाथ पांव मस्तक आदि अङ्गोपाङ्ग अलग२वनाकर, फिर यथा योग्यस्थान उन सबको जमा कर, 'सुन्दर पुतली' बनाते हैं, वैसे जीवोंके शरीर के अङ्गोपाङ्ग नाम कर्म उत्पन्न क- र्ता है, और फिर इस निर्माण नाम कर्मोदयकर वो अङ्गोपाङ्ग सव निज स्थानमें २यथा योग्य रीति से जम जाते हैं. उसे निर्माण नाम कहते हैं,(८)"उघपात नाम कर्म" जै- से रोज नामक पशुके सींगोका बहुत फेलाव होने से किसी वक्त झाडी में शिर फस नेसे मरना पड़ता है, अर्थात् उसका शरीर उसीकी घातका कर्ता हुवा. ऐसे ही पड- जीभी, चौदन्ता आदि दुःख दाता अङ्ग होवे सो “उमघात-नाम कर्म." यह ८ प्रत्ये क प्रकृत्तियोंका नामार्थ कहा. * प्रश्न-आनके भी उष्ण प्रकाश पडताहै तो क्या उसकेभी आतप नाम कर्मका उदय समझंणा? समाधान-आग्नके आताप नाम कर्म का उदय नहीहै, क्योंकि आग्ने काय के शरीर का स्वाभा- वि कही उष्ण प्रकाश है, सो नजीक रहने से अधिक उष्णता मालुम पडतीहै और दूर रहने से कम उष्णता मालुम पडती है, और सूर्यतो दूर रहाभी एकसा प्रकाशताहै, तथा आग्नि काय का शरीर स्वभाविकही रक्त प्रकाशी है. तैसा सूर्यका नहीं इसलियेअग्निमें आतापनाम नहीं हैं.

* मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थाना रोहण अहीशतद्वारी १४९ १ अव "त्रस दशका"-अर्थात् वस आदि दश प्रकृत्ति कहते हैं:-(१) "वस नाम"-जो दुःख से वास पावे. नुख से संतोष पावे यह उनके भाव प्रत्यक्ष में देखने में आवे. शीत उष्णादि दुःखमद स्थान को छोड मुख स्थान में जावे, इत्यादि लक्षण युक्त वेद्रिय. तेद्रिय. चौरिनद्रिय. पचेन्द्रिय. में उत्पन्न होवे सो वस नाम. (२) 'वादर नाम-जिन जीवो का शरीर सवों के देखने में प्रत्यक्ष आवे ऐसा शरीर होवे सो-वा- दर नाम. (३) पर्याप्ता नाम-पुद्गल के उपचय से हुवा जो पुद्गल परिणमन हेतू श- क्ति विशेष १ जो जीवो पुद्गलों को ग्रहण करे खल रस अलग अलग करे. मो "आहार पर्याप्ति."२जो शक्ति विशेष रस हुवा उसे सात धातु पणे परिणामावेसो 'श- रीर पर्याप्ति'. ३ उस घात् को द्रव्येन्द्रिय पणे परिणमाने की जो शक्ति सो 'इन्द्रिय पर्याप्तिः, ४ श्वाशोचास वर्गणादल ग्रहण कर श्वाश पणे परिणमावे सो 'वाशोश्वास पर्याप्ति'. ५भापाके द्रव्य ग्रहण कर भाषा पणे परिणमावे सो 'भाषा पर्याप्ति'. और । मन के द्रव्य ग्रहण कर मन पणे परिणमावे सो-"मन पर्याप्ति." इन ६ पर्याप्ति में से- एकेन्द्रिय मे पहिले की चार पर्याप्ति होती है. वेन्द्रिय तेन्द्रिय चौरीन्द्रिय और अस- नी पचेन्द्रिय इन में मन विना पांच पर्याप्ति होवे, और मन्नी में ६ ही पर्याप्ति होवेहैं. इनमें से जिनमें जितनी पर्याप्ति होब वो प्रथम समय सब पर्याप्ति का आरंभ एक सा- यही करे. फिर एक समय में आहार पर्याप्ति पूर्ण करे. फिर अन्तर मुहूर्त में शरीर पर्याप्ति पूर्ण करे, फिर औदारिक शरीर वाला तो अन्तर मुहूर्त २ अन्तर से बाकी रही पर्याप्ति पूर्ण करे. और वैक्रय तथा आवारक गरीर वाला मश्य २ के अन्तर वा- कीकी पर्याप्ति पूर्ण करे. आगे दो पर्याप्ति मूहमहै, इमलिये कालका फरक पडजाताहै, यथा दृष्टान्त-छे स्त्रीयों मूत कानना एकही ममय मुरू किया. उममें से जो स्थूल जा- डा मूत कातै सो गीधू पूर्ण करे. और बारीक काते तो देने पूर्ण होते. यों-१ आ- हार पर्याप्ति. २ शरीर पर्याप्ति. ३ इन्द्रिय पर्याप्ति. यह पर्याति पूर्ण किये पहिले कोइ भी जीव कदापि मरता नहीं है. इनलिये इनः पर्याप्ति पूर्ण करे उमे 'करण प- प्तिा' कहना. और जिनके जितनी पर्या है उतनी पुर्ण करे उमे लब्धि पर्याप्ता कह तेहैं.(४)"प्रत्येक नामक मो-एक गरीरमें एकही जीव रहे. ऐमेगरीर रहेको प्रत्येक नाम (५) स्थिर नाम कर्म"-डीयों दॉनों नगों अडोपाड़ मब स्थिर होते. अव्यय व इह होवे सो स्थिर नाम. (६) "शुभ नाम कर्म" (6) जिनके अङ्ग ना पर्म दुमने .. - १५० प्रथम अर्थ काण्डका-द्वितीय कर्म द्वारा रोहण खण्ड ५१ को होने से हर्प उत्पन्न करें जैसे नाभी के उपर के अङ्गका किसी को संघय होने से बुरा नहीं लगता है, सो शुभ नाम. (७) सोभाग्य नाम" पर उपकार किये विना या स्वजनादि सम्बन्ध विना सब जन को इष्ट कारी लागे, मुबाहु कुमारकी तरह, सो सो भाग्य नाम" (८) "मुस्वर नाम सो" कोकिला जैसा मुस्वर होवे. (२) “ आदेय नाम सो-जिसका वोला हुवा कैसा भी वचन सब को मन्योंग लगै. शुभ शकुन की तरह ग्रहण करे सो आदेय नामी जाणना और (१०) "यश; कीर्ती नाम"-जो एक देश में विस्तरे सो कीर्ती, चारों दिशा में फैले सो यशः, यह दोनों जिस के होवे सो यश कीर्ती नाम. अब ‘स्थावर दशका'- अर्थात् स्थावर आदि १० प्रकृत्ति कहते हैं;-(१) 'स्थावर नाम"सो जो पृथ्व्यादि पांचो स्थावर स्ववशते हलन चलन नही करसकेसो. स्थावर २सूक्ष्म नाम:-जिनोंके असंख्यात शरीर का समागम होनेसे भी जो दृष्टि न- ही आवे सो सूक्ष्म माम. (३) "अपर्याप्त नाम" सो पूर्वोक्त छे पर्याप्ति में से-पहिलेकी तीन पर्याप्ति पूर्ण नहीं करे वहां तक-करण अपर्याप्ता. और जितनी जिस स्थान पर्या वान्धने की है. वो पूर्ण वन्धे नहीं वहां तक लब्धि अपर्या कहना. (४) साधारण नाम वनस्पति-निगोदकंद मूल आदि में एकेक शरीर में अनन्त २ जीवो हैं, उन में रहे सो साधारण नाम. (५) अस्थिर नामलो-जैसे कान भापण केश इत्यादि सब हि- लेते रहे, ऐसे अस्थिर अव्ययव होवे सो अस्थिर नाम. (६) 'अशुभ नाम' जैसे नाभी के नीचे का किसीभी अग का किसी को संघटा हो जावे तो वो बुरा मानता है, तैसे अशुभ अङ्गोपाङ्ग होवेसो अशुभ नाम.(७) दौर्भाग्य नामसो' विना वैर विरोध और विना नुकशान कियेही जो दुसरेको अप्रिय-अनिष्ट लगे सो-"दौर्भाग्य नाम"(८)दुस्वर नाम- काग मंजार आदि की तरह जिसका स्वर अनिष्ट खराव होवेसो. दुस्वरनाम. (१) "अनादेय नाम" जो अपने जान में सव को अच्छे लगे ऐसे वचन वोले, तोभी उस के वचन किसीकोभी अच्छे नहीं लगे, आप शकुन समझे सो अनादेय नाम. (१०) और 'अपयश; कीर्ती नाम' सो-उत्तम काम करते भी जिसका अपयश होवे, लोको अवरण पाद वोले सो अपयश नाम: यह १५ पिन्ड प्रकृत्ति, ८ प्रत्येक प्रकृत्ति, १० बस दशका, और १० स्थावर दर का सब मिल १३ नाम कर्म की प्रकृत्ति होती है.+ + जो मूल प्राप्ति गरीर बन्धन ५ है. उसके जो १५ भेट पीछे किये है वो बन्धकी मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थाना रोहणःअढीशतद्वारी * १५१ ७ गौत्र कम. जैसे कुंभकार-कुम्भ कळश आदि उत्तम वरतन निपजावे तो वो अक्षत धूपा- दिसे पूज्य होतेहैं, और मदिराका घट वतावेतो मदिरा निकाले वाद भी दुर्भिगन्ध कर दुगंच्छनीय, निन्दनीय होतेहैं. ऐसेही गौन कर्म के भी दो भेद होते हैं:-(२) इलाग, उप्र राज भोग आदि महाजनोंके कुलमें जन्म लेवे सो ऊंच गोत्र. और (२) भिक्षुक चन्डाल आदि नीच कुल में जन्म लेवेसो नीच गौव. ८ अन्तराय कर्म. जैसे राजा ने भन्डारी को हुकम दिया की इसे लक्ष रूपे इनाम के देवो. परन्तु वो रुपे देना भन्डारी के इक्त्यार है, तैसे वस्तु तो सब प्रकार की प्राप्त होगइ परन्तु उनका लाभ लेने देना यह अन्तराय कर्म टूटके इक्त्यार है, इसके ५ भेद :- (१) 'दानान्तराय'-पान में देने योग्य शुद्ध द्रव्य भी पास है, लेने वाले शुद्ध पावका भी. योग्य है. देने के भाव भी हैं, इतना सब योग होकर भी दान नहीं दिया जावे मो दानान्तराय. (२) चहा जैसी वस्तु उस के पाम है. वो दातार है. देनेके भाव भी , तोभी उस वस्तु की प्राप्ति न होवे, तथा बहूत होंश्यारीमे व्यापार करते भी उम में लाभ की माप्ति न होवे सो 'लाभान्तराय.' ३ असन पान खाढिया स्वदिम इत्यादि सव भोग के पदायोंका जोग मिलाई, भोगवनें की तीव्र इच्छाभी है, परन्तु भोगवे नहीं जावे सो ‘भोगन्तरायः' (४) वस्त्र भूषण आमन शैया आदि, मव उप भोगकी इच्छित सामग्री मिली है, भोगवने की तीव्र इच्छाभी है, परन्तु भोगव मके नीं मो- 'उपभोगन्तराय'-और () मिथ्याल की क्रिया करने ममार्य होकर वो क्रिया नहीं कर सके सो वालवीर्यान्त गय–तथा मावु श्रावक मोलकी क्रिया नानादि वीरत्न की आराधना करने समर्थ होकर भी आराध नहीं मके मो पंडित वीर्यान्नराय. १० प्रहाते इस में मिलने से नाम जन की प्रकृते नव होने है.

* प्रथम अर्थ काण्डका-द्वितीय कर्म द्वारा राहणे खण्ड ११ -- -- कर्म और कर्म पत्तियोंका संक्षेप में नाम बताने वाला यन्त्र. - १ ज्ञानावरणीय कर्म. की ५ पकात्ति. ४ मोहनीय कर्म की ना. नं. २८ प्रकृत्ति. १ २ ३ ३ ४ ४ 1 ८ १० " 7 पनिडानापरणीय १७ मिथ्यात्य मोहनार्य भीमानारणीय १८ मिश्र मोहनीय अपमानावरणीय १० सम्यक्त्व मोहनीय ४ परगा तानावरणीय २० अनन्तान वन्धि क्रोध कर जानागाणीय .? अनन्तान पन्धि मान २० अनन्तान वन्धि माया লাথি পা ०३. अनन्नान वन्धि लोभ २४ अप्रत्याग्यानी कोष १. प्रऋति. ५. अप्रत्याख्यानी मान 2 अप्रत्याग्यानी माया का वीनापरणीय २७ अप्रत्याख्यानी लोभ • पाय 26 प्रत्याग्यानी बोध दर्शनाणी " प्रन्याग्यानी मान दीनावणी 3. प्रत्याख्यानी माया 3. मन्याग्यानी लोम न्दिा निद्रा 37 मंचलन क्रांच १३ मसलन मान ३५ गादन माया १८ ईया ३. पनाम वदनीय कर्मकी प्रकृति. 3 पनि १८ भागने दर ११ १० १३ भन्दा . । १ १. सात १ दाम है MAMANmammindamrate * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अडीशतद्वारी.* 20 २१ २२ २४ २५ २६ २७ २९ -- ३ ४२ स्त्रीवेद २६ ६७ वैक्रिय बंधन ४४ पुरुप वेद ६८ आहारक बंधन ४४ नपुंसक वेद २८ ६९ तेजस बंधन ७० कार्मण बंधन ५ आयुष्य कर्म की ४ ७१ औदारिक संघातन प्रकृत्ति. ७२ वैक्रिय संघातन ७३, आहारक संघातन ४५ नरकका आयुष्य ७४ तेजस संघातन ४६. तिर्यंचका आयुष्य ७२ कार्मण संघातन ४७ मनुप्यका आयुष्य ७. वज़ वृषभ नाराच संघयन ४८ देवता का आयुष्य ७७, ऋपभ नारच संधयण ७४ नारच संघयण ६ नाम कर्म की ९३प्रकृत्ति. ७१ अर्थ नारच संघयण ८० केलिक संघयण नरकगति ८१ छेवटा संघयण ४९ तिर्यंच गति ८२ ममचतुरस्त्र भंस्थान गति ८. निगोद पारमंडल संस्थान ८४ सादिया भंस्थान ८५ बावना भस्थान ८६ कुवडा भंस्थान ८७ हुंड मंस्थान ८८ क्रप्ण वर्ण ८९ नील वर्ण ५८ औदारिक शरीर ९. रक्त वर्ण ५१ वैक्रिय शरीर ११ २१ पित पर्ण ३. प्राहारक शरीर ९२ चेत वर्ण ६१ तेजस शरीर ९. मूरभीगन्य ६२ कार्मण गरीर १४ १४ दुर्भिगन्ध ६. औदारिक अङ्गोपाङ्ग ९. दुक रन ६४ वैनिय अङ्गोपाङ्ग ९६ तिक्त म १५ आहारक अङ्गोपाङ्ग ९७ पापला न १३ औदारिक बन्धन १८ अन्लान म ५१. ननुप्य ५२ देव गति ५. एकन्द्रिय जाति ५४ वेन्द्रिय जानि ५५ तेन्द्रिय जाति ५६ चौरिन्द्रिय जाति ५७ पचेन्द्रिय जाति 000 १५० ४२ १३ . ४७ ४८. १ १५४ प्रथम अय कारका-द्वितीय कर्मद्वारा गहण साण्ड १२ ७१ ८.. ९२, मधुर रस १०० कर्कश स्पर्श १०१ मृदु स्पर्श १०२/ गुरू स्पर्श १०३ लघु स्पर्श १.०४, शीत स्पर्श १०५) उप्ण स्पर्श १०६ स्निग्ध स्पर्श ८३ ८४ ५१ १२७ शुभ नाम ५२ १२८ सोभाग्य नाम ५३ १.२० मुस्वर नाम ५४ १३० आदेय नाम ५८ १३१/ यश की नाम ५०१.३२ स्थावर नाम ५७ १३३ मूक्ष्म नाम ५८ १३४/ आपर्याप्ता नाम ५२॥ १.३० माचारण नाम 601 १.३० आस्थर नाम ६१ १३७ अशुभ नाम ६२/ १३८ दीर्नोग्य नाम ६३ १६२) दुसर नाम १४ १४० अनादेय नाम ६५ १४१ अयशकीर्ती नाम १०७ कक्ष स्पर्श ८८ ८९ ९० ९१ ९३ १०८ नरकानु पूर्वी १०२/तियचानु पूर्वी ११० मनुप्यान पूर्वी १११/ देवानु पूर्वी १.१२ शुभ विहायोगति ११.३/ अशुभ विहायोगात १.१.४ पराघात नाम ११५/ उश्वाश नाम ११.६ आताप नाम ११७ उद्योत नाम १२८ अगुरु लघु नाम ११९/ तीर्थकर नाम १२० निर्माण नाम १२१ उपधात नाम १२२वस नाम १२३/ बादर नाम १२४ पर्याप्ता नाम १२५ प्रत्येक नाम १२६ स्थिर नाम गोत्र कर्म की प्रकृत्ति. ६८ ६२) १४२ ऊंचा गोत्र ७०/ १४३ नीच गांव २ अंतराय कर्मकी ५प्रकृत्ति. or ७१ ३ १ २ ७४ १४४ दानान्तराय ७५ २४५ लाभान्तराय ७६/ १४६/ भोगान्तराय ७७ १४७/ उपभोगान्तराय ७८ १४८ वीर्यान्तराय r " द्वितीय कारोहण द्वारार्थ. ३४-प्रथम क्रियाद्वार का अर्थ. मूल कर्मोत्पति का कारण क्रियाही है. अर्यात्-मिध्यात्व, अविरति. प्रमाद, कपाय. योग इन पांचों में-उठाण कम्म वल वीर्य पुरुषाकार पराक्रम उन पांचोंकासं- योग होने मे क्रिया निपजती है. वो किरिया इस विश्व में भरे हुवे कर्म वर्गणाके अ- नन्तान्त पुद्गलोंका परावर्तन होरहा है उन्हे खेंच कर आत्ल प्रदेशोंके साथ सम्बन्ध करतीहै. "सकपाया कपाययोंः साम्परायिक व्यथपो" इन तत्वार्य नृवके वचनानु- मार क्रिया दो प्रकारकी है:-सकपाइ जीवोंके जो क्रिया लगती है उसे मम्पराय क्रि- या कही जाती है. वो कपाय के योग से वन्ध स्थिति प्राप्त करती है. और कपायर- हित महात्मा को जो फक्त जोगों मत्ति कर क्रिया लगती है मो इविही क्रिया क. ही जाती है. मो कवाय रूप रस-विकास के अभाव ले वन्य स्थिति नहीं पाती है. काँच पर लगी रज (एल) की तरह तुर्त दूर होजाती है. इम में प्रथम सम्पराय क्रिया कही जिन के २४ भेद कहते हैं. १ काडया क्रिया. उसके दो भेदः-(१)काया-गरीर पर ममत्व भाव धारन कर बत प्रत्याख्यान नर संयम करता डरे. कि रखे धर्म करने मे मेरा शरीर दुर्वल हो- जायगा. और गरीर के पोपणार्थ ठेही काया का कुटरम्ब करना डरे नहीं मो अणा उत काया दिया. (२) उठते वैटने हलन चलनादि करने यन्ना नहीं रकबे मो दुपयु क्त काझ्या क्रिया. २ आहीगरणीय क्रिया-गस ने लगे जिनके दो भेदः-(१) मा की धाग तीक्षण करावे. छाया आदि लगावे मो नंयोजनाधि करणी. और (8) नवीन मनु निपजानो निहताधि करणी. ऐनेही उनके वचनामश्री दो भेदः-स्ना नंग-सपा या क्लेश जीरेनो योजनाधेि करणी. और (नवा लेग कोनो निवनावि वाणी --- १५६ प्रथम अर्थ काण्डका-द्वितीय कमै द्वारा रोहण खण्ड १९ ३ 'पाउसीया क्रिया'-ट्रेप परिणामों से लगे. इसके दो भेट:(१) सजीव व स्तु मनुष्य पशु क्षुद्री जीवोंपर द्वेप करेसो जीन पाउसीया,(-)शीत ताप विष पापणा- दि निर्जीव नस्तुपर द्वेष करनेसे लगेसो अजीव पाउसीया. ४ 'परीतापनिया क्रिया'-परिताप (दुःख) उपजाने से लगे, इस के दो भेदः- (१) जीवको दुःख दे सो जीव परितापनीय, और(२)अजीवका निकारण छेद न भेद- न करे सो अजीव परिता पनिया किरिया. ५'पाणाइवाइ क्रिया'सो जीव काया अलग • करे, इमके दो भेदः-(१)अपने से दुसरे की घात करे, तथा आप घात करे सो सहत्य पाणावाइ, और (२) दुसरे के हाथ से दुसरे को मरावे, या दुसरेके हाथसे घात करावे सो परहत्य पाणाइवाइ क्रिया. ६ आरंभीय क्रिया-किसी भी पाप कार्य का प्रारंभ करे, इसके दो भेदः- (१) पृथव्यादि छही जीव काया का मर्दन करे सो जीव आरंभी, और (२) साकट वाहन मुशलादि करावे सो अजीव आरंभी. ७ परिग्गाहीया क्रिया-ममत्व भाव से लगे, इसके दो भेदः-(१) दो पद चौपद मणी आदि पर ममत्व करे सो जीव परिग्गहाहीया, और (२) वस्त्र भूषण म- कानादि की ममत्व करे सो अजीव परिग्गहाहयिा. ८ 'मायावतिया क्रिया'-कपट करने से लगे, इसके दो भेद:-(१) ऊपर शुद्धाचारी रहे और अन्दर अनाचार्ण सेवन करे सो अभ्यन्तर मायावतिया, और (२) खोटे-तोले-मापे रक्खे सो वाह्यमायायावति याकिरिया. ९मिथ्या दंशणवत्तिया क्रिया"-बोटी श्रद्धा से लगे, इसके,३ भेद:-(१-३) जिनाज्ञासे, कमी ज्यादा, विपरीत श्रद्धे परूपे स्पर्शे. तथा(१-३)कुदेव-कुगुरू-कुधमका सत्य श्रद्धान करे. ११ 'अपञ्चखाणीया क्रिया'-अविरति पने से लगे इसके दो भेद:-(१) सजी व वस्तु भोगवने के पञ्चखाण न होणे से उसकी अविरति आवे सो सचित्त अपञ्चखा णीया. और (२) अचित-निर्जीव वस्तु भोगवनेके पञ्चखाण नहोनेसे अविरत आवे सो अचित अपञ्चखाणीया किरिया. १.१ 'दीठीया क्रिया' देखने से लगे, इस के दो भेद-(१) गज वृषभ अश्वादि सजीव वस्तू को देख हर्प विपवाद उत्पन्न होवे सो जीव दीठीया. और (२) भवण भूपणादि अजीव वस्तु के देखने से हर्ष विपवाद होवेसो अजीव दीठीया क्रिया.

* मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी ११ १२"पुठियाक्रिया" स्पर्शने से लगे-इस के दो भेदः (१) स्त्री पुरुष धान्य आ- दि संजीव वस्तु का स्पर्श करने से लगे सो जीव पुठिया. और (२) वस्त्र आभरण आदि स्पर्शने से लगे सो अजीव पुठिया. १. “पाडोचिया क्रिया"-बुरा चिन्तवने से लगे. इसके दो भेद- (१) भयंकर र सिंह आदि सजीव वस्तु का बुरा चिन्तवे सोजीव पाडोचिया; और (२] अशुची मलादि निर्जीव का बुरा चिन्तवे मो अजीव पाडो चिया क्रिया. १४ सामन्तवाणिया क्रिया नजीक की वस्तु से लगे. इसके दो भेद-(१) स्व- किय मनुष्य पशु पक्षी मकान भूषणादि की पर संस्था नृणकर प्रमोद पावे सो जीव मामन्तवणीया. और (२) दूध तेल आदि प्रवाही पतले पदार्थ उघाडे रखने लगे सो पर मामन्तवाणिया. १५ निमयीया क्रिया-निक्षेप करने मे-डालने मे लगे, उसके दो भेद-१] पृथ्वी पाणी आदि मजीव वस्तु अयत्ला मे डालने मे लगे सो सजीव निमधीया. और [२] तीर गोळा आदि फेंकने मे-डालने मे लगे मो अजीव निमधीया. १६ "सहत्यिाया क्रिया" अपने हाथ मे लगे, उनके दो भेद-(२) मिहमर्प खान मंजार गौ अश्यादि का तथा अपने शरीर का वध बन्धनादि करने मे लगे मो- जीव महत्थिया. और ( मोनार लोहकार कुंभकार आदि कूटन पीटन करेमो अ- जीव महत्थिया. १७ आणवणीया-आजादे काम कराने मे लगे. उनके दो भेद-१ दान आ- दि को आझादे काम करावे मो जीव आणवणीया. और (२ वादि की महाय ने कामलेवे मो अजीव आणणीया. १८ विनारणीया क्रिया-चन्नु के विदारने-फोड तोड करने में लगे. इसके दो भेदः-मट्टी पुप्य फलाद मनीव वन्नु को विदारे मो जीव विज्ञारपीग. औग) धातु काष्ट वखादि का छेदन भेदन करेनो अजीब विदागर्गया. मिणगारिक म.वि. भलरम. हर रन. आदि कुरनों में प्रीत कया गणादि कर विपय रूपाय की प्रेग्णा. मे दूसरे का हृदय विदारे नो भी विवरणीय दिया. १२ जना भोग दिया-चिन भोगवटी निया लगे. जिसके दो भेद-(१) हान्य चित्त-अमापथान पजे स्मिी भी वस्तु को प्रदान करे नित नो अनामीनी. और () अन्य के वार भोग देख मुग ने जार भोगवन की अभिलाषा मेनो - १५८ * प्रथम अर्थ काण्डका-द्वितीय कर्म द्वारा राहणे खण्ड ३१ वस्तु अणा भोगी. २० "अणाव कंखवति क्रिया-नइच्छने लायक काम करने से लगे. इसके दो भेद-[१) दुर्व्यश्नादि सेवन करे सो लोकीक अणाव कंखी और (२) हिंसा धर्म स्थापे, तथा इस लोकार्थ धर्म करे सो लोकोत्तर अणाव कखी. २१ अनापयोगीक्रिया-निर्थक काम करने से लगे, इसके दो भेद-(२) मन - चन काया के योगो को अयना से वीवे सो योग अनापयोगी(२)और कारीगरों के पास हिंसक कृतव्य करावे सो पर योग अनापयोगी. २२ समुदाणिया क्रिया-बहूतों के समागम से लगे-इसके दो भेद-(१)बहुत म- नुप्यों का समुदाय मिलकर शूली फासी नाटक तमाशा आदि देखे सो जीव सामुदा. नी. और (२) अजायव घर, वाग, दुकानादि, में बहुत वस्तुओंका संग्रह किया सो देखे सो अजीव मामुदाणी. २३ पेजवतिया क्रिया-राग भावसे लगे-इसके दो भेद:-(१)माया-दगल वाजी करे, मो पेजवाति. और (४) असा-तृष्णा वाछां करे सो लोभ पेजवतीया. २४ दोपवतिया क्रिया-द्वेप भाव से लगे. इसके दो भेद:-(१) क्रोध कपाय क र स्वात्म पगत्म को प्रज्वलित करै सो क्रोध दोपवति, और (२) अभीमान अहंता क ग्ने मेलंग मो मान दोपवतिया. यह २४ सम्पनयिक अर्थात् कर्मों के वन्य करने वाली क्रिया. जानना और- २५ इर्यावही क्रिया-फक्त योगों की मटत्ति से लगे इसके भी दो भेदः-(१) इ ग्याग्व उपमान्त कपायी और वारचे क्षाण कपायीको योगोंके मकम्पपणेने लगे मो छनम्नीक इर्या वती, और (२) तेचे गुणस्थानी केवली भगवन्त के शुभ योगों की म वर्ती में लगे मो केरल इयरही. यह इयर्यावही क्रिया में माता वेदनीय कर्म प्रदेश में वन्य ते. मो कपाय के अभाव में स्थिति और अनुभाग को प्राप्त नहीं होते, उमही वक अर्थात जिम ममय बन्य करे उसके दूसरे समय में बंद (भोगये) और वो तीसरे ममय में-निजदा करदेते हैं. ३५ दितीय कारण दारका अर्थ. ऊपर कडे मुझव क्रिया तो कर्म-प्रकृति दल का मध्य-मंग्रह करनी. और उनका वन्य कारण मे होता है मा कर्म वन्य के ५ कारण हमो करते है, १. "मिथ्याव"-तत्वार्य की असाचे तया विपरीत सचिहावे, कुपक्ष का कदान- । T मुक्ति सोपान-श्री गुणस्याना रोहण अदीमतदारी र हन्दद करे मो निध्यात. २ बरिरात तृप्ताका अपरिमाण-इच्छाका अनिलंघन छूटा पणा. आरंभ औ र विषय में लोलता मो अविरनि. ३ "प्रमाद" मत्सवात्त में नित्यमी. अमात में महाक. वाचाल. आन्सी पणानो प्रभाव ४ "कपाय" प्रकृति-समाव की वक्रता मो कपाय. ५ "योग" मन वचन नाया की मीनता नो योग. ३६ तीसरे से सातवे-तक-हेतुद्धार का अर्थ. पर जो कारण नर्म बन्ध के कहे सो सामान्य सूत्र. और आगे जो देन कहते हैं मो इनही ५ कारणों में ने तीसरा प्रमाद कारण छोड कर + वाली के ४ कारणों के विशेषार्थ नप २७ भेद होते हैं. उन्हे कर्मों के हेतु (कनों का कार्य साधने वाले मजन कहते हैं:- प्रथम मिथ्याल ज्ञारण से पांच हेतु हुवे- अभिप्रही निध्यातवीला. २ अ नाभि ग्रहोमिथ्यात्व भोला. ३. अभिनिवेगिक निल्यान्व-कामही, ४ मांगपिन निथ्या ली. और ६ अना भोग मिथ्याव-अजान.(इन पांचों निध्याल ज्ञ कयन निथ्या व गुणस्थान के लाप. लाग द्वार में विशाले कियाई.) द्वितीय अविगति के कारण ने.१२ हेतु के-१ मनकी २ श्रोत इन्द्रियकी. : इन्द्रिय की. ४ बजेन्द्रिय की. ५ रनेन्द्रिय की. इसन्द्रिय की. पृथ्वी काय- की. ( अपनाया की. ६ नेउजायकी. ११ वायुझायजी. ११ वनरूति कायकी श्री २ १२ बमकायानी अर्या-मन को पांचों इन्द्रियों के विषय में और चाय के आ- भने प्रवन नेहवेतो रोके नहीं. परन्तु हा कोडवे-मर्यादित रहेको अविरति तीय काय के कारण मे २ हेतु हु.--४ अनन्ताधी चैक- जिनका अनन्त नहीं आने ऐनेहोष मान नाया लोभः :-८ अनन्या स्याना बरणी चौक-जो व्रत प्रत्याल्यानने निर्जरा रूप लगे न होने ऐनेत्रोष मान. माया. लोभ.९१२ मोना मे.... निति चनने में कु. - ४ करने ही ६७ हेतु नि है.

१६० प्रथम अर्थ काण्डका-द्वितीय कर्म द्वारा रोहण खण्ड १९ प्रत्याख्या नावरणीय चौक-जो सर्व विरति-संयम के फल को नष्ट करे ऐसे क्रोमम न माया लोभ. १३-१६ संज्वलन चौक-जो थोडासा प्रचलितहो शान्त पडजावे ऐसे क्रोध मान माया लोभ (१६ कपाय हुइ) १७ हॉस्य, १८रति, १९ अरति, २० भय- २१. शोक, २२ दुगंच्छा, २३ स्त्रीवेद, २४ पुरूपवेद, और २५ नपुंसक वेद, यह ही सर्व कर्मों का वध करने कप-रस+आय-आवे. अर्थात् रस प्रगमा कर उस व न्ध को मजबूत-पक्का करे सो कपाय कहीजाती है. चतुर्थ योग कारण से १५ हेतु हुवे-१ सयमन योग-प्सस विचार, असस म. न योग-झूठा-कूकर्मों का विचार, ३ "मिश्रबचन योग',-सस अलस दोनों तरहका चार. ४ विवहार मन योग-सच्चा भी नहीं तैसे झूम भी नहीं ऐसा विचार, (यह ४६ न के) ऐसेही-५ सत्य वचन योग, ६ असत्य वचन योग, ७ मिश्रमन योग, ८ वित्र हार वचन योग. (यह ४ वचन के) ९ औदारिक योग - हड्डी चरम आदि का मनुः प्य तिर्यंच का शरीर, १० औदारिक मिश्रयोग-औदारिक शरीर उत्पन्नहोते पुरान- होवे वहां तक. यालब्धिमयय औदारिक शरीरि जब वैहिय करता है और वो वैमि करे, सो, नहीं निपजता है तब तक मिश्र गिना जाता है. ऐसेही ११ वक्रिय योग-शुभ २४ दोपवतिया न हुवे देवो का शरीर और अशुभ पूगलों सेवना नरक का शरीर र स्वात्म परात्म को प्रज योग सो वैक्रिय उत्पन्न होते वा उत्तर वैक्रिय बनाते पूर्ण नहोवे वहां रने से लगे सो मान दो यह २४ सम्पवे सो. १३ आहारक योग चउदह पूर्व पाठी मुनिवरों संशय से निट २५ इर्यावही समवसरण की विभूति का अवलोकन करने लब्धिके प्रभाव से वशरीर ग्यारवे उपशान्त कपरका पूतला निकालेसो. १४ आहारक मिश्रयोग सो आहारक शरीर व छमस्तीक इर्या वही, पाते मिश्रता पावेसो. और १५ कारमण यांग मो फक्त वलाउ रुप पर वती से लगे सो केवरसाथ रहै मो. ( यह ५७ हेतु हुवे.) वन्ध तेहैं, सो कपाय वक्त अर्थात् जिस सर समय में-निजरे-दुर ऊपर कहे मुझव उनका वध कारण से होत १ "मिथ्यात्व"-तत मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी. १९ बन्धातीहै. । ४ अनन्तान वन्धि चौक. ४ वीच के चार संस्थान, ५ पहिले पांच संघ- यण. १अशुभ विहाय गति. १दौर्भाग्य नाम.२ तिर्यंच निक, ३ मनुष्य विक, २ औ. दारिक द्विक. १ त्रीवेद. १. नीच गोव, इथीणही त्रिक, १ उद्योत नाम, ४अप्रत्या- ख्याना वरणीय चौक. यह प्रवृत्ति का मिथ्याल गुणस्थान में हो तो मिथ्यान प्रसय कन्य होये, और मिथ्यालके आगे अत्रत करके भी इन प्रवत्तियोंका बंध होता तथा निथ्यात और अत्रत दोनोंके कारण से भी इनका बन्ध होता है, परन्तु वा- की रहै तीन कारणों कर इन्का बन्ध नहीं होताहै ज्ञानवरणीय ५, दर्शनावरणीय- ६. अनातावे दनीय? मोहनीय १५ (जिन नाम. और आहारक द्विक छोड कर) ना म कर्म की :२. ऊंचगौव १. और अन्तराय की ५. इन+६५ प्रकृत्ति का मिथ्यात अविरति और कपाय इन तीनो में के एक कारण के सेवन से या दोनों तीनों कार गोंके सेवन ने बन्ध पडतात, परन्तु फक्त केले योग करकेही बन्ध नहीं पडताहै। ए- क माता वेदनीय का बन्ध चारोंही कारण कर होता हैं. क्यों कि इमझा वन्ध तेरखे गुणस्थान तक होता है. । अहारक द्विकका वन्य निवर्य योग मराग संयम कर होता है । और "दर्शन विद्धि. विन्यस्पन्नना. शील तेवन्ती चारों.ऽ भाषण बानो पयोग. संवेगौ. शक्ति तस्त्यान. तपसी साधू समापि वैचारस करण, मदाचार्य बहुश्रुत प्रव चन भाक्त रावश्यकता परिहाण. मार्ग प्रभावना. पनवन वललव, मिति तीर्थंकर त्वस्य. अर्थात-निर्मळ सम्यक्त्व पालने मे. विनय-नम् भाव रस्त्वने मे. शील अदि मर्व व्रतों आतिचार दोप रलि पालने मे. वारम्वार ज्ञान में उपयोगका रमण करणे मे. वैरान्य भाव रखने से वशन्यानुसार उलट भाव दान देनेमे. दुसर नपश्चर्या करनेमे. मायु के चितको समाधी शान्ती प्राप्त होने ऐनी तरह वैवात्य भाक्त करने मे. अहेत आ- चार्य बहुमुत्री शात्र उनो की भक्ति करने मे. दोनों वक्त के प्रतिक्रमण में हानी नहीं डालने भे अर्थात् दोनों वक्त प्रतिक्रमण करने मे जैन मार्ग की भावना माहेमा की वृद्धि और जिन वचनों कीवनलना करनेने नीर्य कर गौच का उपार्जन होताहै. और आहारक गरीरका बन्ध अनसनकायुक्तही होना(यह उत्तर प्रवृत्ति के कारण.) +ने देग विगत गुल्मानन इन द . दहां न औरत देनीप पह प्रहन नहीं है.

१६२ प्रथम अथ काण्डका-द्वितीय कर्मद्वारा रोहण खाण्ड र तीर परिणाम श्चारित मोह." अर्थात्-जब कपाय का उदय होवे-क्रोधादि प्रणति में परिण में उस वक्त अपना स्वभाव (भान) भूल कर तीव्र कपायी वन जावे, दीर्यकाल तक कपायमें राच रहै, तो चारित्र मोहनीयका बंध होवे ४ “वह्यारम्भ परिग्रहत्व. नार कस्यायुषः " अर्थान्-महा आरंभ, महा परिग्रहः पचेन्द्रिय का वध, और मांस मदिरा का भोग करने से नरक गति के आयुष्य का बन्ध होता है.। “माया तैर्यग्यो न स्य"अर्थात्-दगलवाजी, करे झूट बोले ताले मापे खोटे रक्खे, और मत्सर भाव सेतिय च गातिके आयुष्य का वन्ध होता है.! “अल्पारंभ परिग्रहत्वं स्वभाव मार्दवच मानुप्य स्य" अर्थात्-अल्प-आरंभ परिग्रह, शरल-निष्कपटता, दयालुता और विनय करनेसे मनुष्यगति के आयुष्यका वन्ध होतोहै. और "सराग संयमा संयमा संयमऽ काम नि- जरा वाल तपांसि देवस्य" अर्थात्-शिष्य शरीर आदि पर ममत्व रखने वाले साधु, श्रावक, विना मन कष्ट सहने वाले, अज्ञान तप करने वाले, देवगति का आयुक्न्ध क रते हैं, ओर “सम्यक्त्रं च" अर्थात् सम्यक्त्वी के देवायु काही वन्ध होता है. ६ यो ग वक्रता विसंवादनं चाशुभस्य नाम्न "अर्थात-मन वचन काया के योगों की कुटिल ता रखे, दूसरे के साथ झूठे झगडे करे तो अशुभ नाम कर्म कावन्ध होता है. और "तद्विपरीतं शुभस्य" अर्थात-मनादि वियोगों की शरलता शुद्धता रखे, धर्म चर्चा क- र धर्मोन्नति करने से शुभनाम कर्म का वध होता है. ७ "परात्मनिन्दा प्रशसे सद सद्गुणों च्छाद नोगावने च नीचै गोत्रस्य" अर्थात् दूसरे की निन्दा करे, अपनी प्रशं सा करे, दूसरे के गुणोंके ढांके-छिपावे, अपने गुण प्रसिद्ध करे, दूसरे के दोप प्रसि द करे, अपने दोप ढाके तो नीच गौवका वन्ध होताहै और "तद्विपर्ययो नीचेटत्यनु स्मेको चोत्तरस्य,, अर्थात्-गुणवातों के गुणानुवाद करे, अपणी निन्दाकरे, गुणीजनो के गुणों प्रसिद्ध करे, अपने गुण ढांके; दूसरे के दोपों छिपावे, अपने दोप प्रसिद्ध क रेतो ऊंच गोवका वन्ध होता है, और ८ "विनकरण मन्तरायस्य" अर्थात-किमीको दान देने में, भौगोप भोग भोगने में, लाभोपर्जन करनेमें, और धर्म उद्यम करने में अ न्तराय देनेसे-विघन करने मे अन्तराय कर्म कावन्ध होता है. उत्तर प्रकृत्ति बन्ध के कारण. पहिले वन्ध के चार कारण- (मिथ्या अमृत कपाय योग) कहै, उने १२० व- न्य की प्रकृत्तियों पर उतार तेहैं:-३ नरक विक, ४ पहिली चार जाति, स्थावर ना- म, सूक्ष्म नाम, अपर्याप्ता नाम, साधारण नाम, हुंड संस्थान, आताप नाम, नपुंसकवेद छेवटा संघयण, और मिथ्याल मोहनीय, यह १८ प्रकृत्तियों एक मिथ्यावो दय कर -- मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अटीशतद्वारी. र वन्धातीहै. । ४ अनन्तान वन्धि चौक. ४ वीच के चार संस्थान. ५ पहिले पांच संघ- यण. १अशुभ विहाय गति. दोर्भाग्य नाम.२ तियेच निक. ३ मनुप्य विक. २ औ- दारिक हिक, १ स्त्रीदेद. १. नीच गोव. इथीणदी त्रिक. १ उद्योन नाम. ४अप्रत्या- ख्याना वरणीय चौक. यह प्रकृत्ति का मिथ्याल गुणस्थान में होवे तो मिथ्यात्र प्रलय बन्ध होवे, और मिथ्यावके आगे अन्न करके भी इन प्रहनियोंका बंध होता है. तथा मिथ्यात्व और अत्रत दोनोंके कारण में भी इनका वन्ध होता है, परन्तु वा- की है तीन कारणों कर इनका वन्ध नहीं होना जानवरणीय ५. दर्शनावरणीय- ६. अमाता दनीय? मोहनीय १२ (जिन नाम. और आहारक ट्रिक छोड कर) ना म कर्म की :२. ऊंचगाव १. और अन्तराय की .. इन+६. मत्ति का मिथ्याव अविरनि और कपाय इन तीनो मे के एक कारण के भवन मे या दोनों तीनो कार णोंके मेवन मे बन्ध पडतात, परन्तु फक्त इकेले योग करकती वन्य न पडताह । ए. क माना वेदनीय का बन्य चारोंही कारण करोता. या किसका बन्च नेग्ने गणम्धान नक होताहै. । अतरक दिकका पन्य निवर्य योग मगन मंचन करता । और "दर्शन विशुद्धि. विनयस्पन्नता. शील नेप्पनती चाने.ऽवासन मानो पयोग. भंवेगौ. शक्ति तम्याग. तपपी माधु नमाधि पास करपदाचार्य बात पत्र चन भात गवश्यका परिमाण. मर्गिप्रभावना. मनवन दानमिति नजिवन्य. अर्थान-निभळ, सम्यक्त्व पालने मे. विनय-नम् भाव रखने मे. नीर आदि म बनो अतिचार दोप नि पालने मे. वारम्बार तान में उपयोगका मामे बैगन भाव रयम्वने मे. स्वगम्यान्मार उन्ट भाव दान देन.दुहा काची नेम. मार के चितको ममाथी मान्नी मानो ऐनी नाम पाहवम वादन. ना. चार्य यानुत्री माइनो की भाति बन्न ने. दोने इन्द्रिमान डालनेने अर्थात दोनी वत्त निदान करने में ही नही साद और जिन ददनों दीवाना बन्ने नया मोबा । आगरकरीदा दम नमानेही होलाइनानि -::- Pr - Immu- ३ * प्रथम अर्थ काण्डका - कर्म बंध प्रकारण का अर्थ. ३१ प्रकृति बन्धके चार प्रकार. १ पहिले थोडी प्रकृत्तिका बन्ध कर फिर वहुत प्रकृत्तिका वन्ध करे. उसे- "भूयस्कार वन्ध" कहते हैं. २ जो पहिले बहूत प्रकृति का वध कर फिर थोडी प्र- कृत्ति बंध स्थानको जावे उसे-"अल्पतर वन्ध" कहते हैं. ३ जो वन्ध एकही संख्याके स्थान में रहे, अर्थात् जितनी प्रकृत्ति पहिले वन्धि उतनीही प्रकृत्ति का निरन्त्र आगे वन्ध करे सो-"अवस्थित बन्ध." ४ और जो साफ अवन्ध होकर फिर एकादि प्रक- त्ति वन्ध सो-अव्यक्त वन्ध" इन चारों का खुलासा कहते हैं. आठों कर्मोंपर ही प्रकार के बोध १ "भूयस्कार वन्ध"-(१) प्रथम ज्ञानावरणीय कर्म से लगाकर जो आठवे अ- तराय कर्म तक आठों कर्मो जिस वक्त वन्ध करे सो आठों का वन्ध स्थान-यह फक्त अन्तर मुहूर्त पर्यन्त रहता है. क्योंक-आयुष्य का बन्ध एक भव में एकही वक्त अ- स्तर मूहूर्त पर्यन्त होता है। यह वन्ध पहिले गुणस्थान से (वीचका तीसरा गुणस्थान छोड कर) सातवे गुणस्थान तक होता है. (२) आयुप्य विना सात कर्मोके वन्ध का स्थानक प्रथम गुणस्थान से नववे गुणस्थान तक पाता है, इसकी स्थिति-जघन्य अ- न्तर मूहूर्त, उत्कृष्ट-पूर्व क्रोडीका तीसरा भाग आधिक छे महीने कम ३३ सागरोपम पर्यन्त जानना. क्योंकि-पूर्व क्रोडी दर्पके तीसरे भाग में देवार का वन्ध करे, वो स- वार्थ मिद में ३३ सागरोपम के आयुष्य पणे देवता होवे, वहां सहस ६ महीना आयुष्य वाकी रहे तव आगेका दुसरे आयुप्य का वध करे, इसलिये. (३) आयुप्य और मोहनीय यह दो कर्म छोड वाकी के छे कामोंका बन्ध दशवे गुणस्थान में होता है. सो फक्त अन्तर मुहूर्त पर्यन्त रहता है. (४) भागे उपशान्त मोहनीय आदि गुण- स्थान में. एक वेदनीय कर्मका बन्ध होता है. इसकी स्थिति जगन्य अन्तर मुहूर्तकी उत्कृष्ट देश ऊणी (कुछ कमी) पूर्व कोडी वर्ष की. कवली के अपेक्षा कर. इन के ब- न्य स्थान तीन प्रकार के होते हैं.-(१) एक वेदनीय का बन्ध किये वाद छ काँका वन्ध करे सो प्रथम ममय प्रथम भूयस्कार. यह बंध इग्यारवे गुणस्थान (उपशम श्रेणि) मे पड़ते होता है. और दश गुणस्थानमें ६ कर्मका बन्ध कर नववे गुणस्थान में ७ कर्म का बंध करे, मो-दुमरा भूयस्कार. (३) और येही जीव मातवे गुणस्थान में आयप्य महित आठों कों का बंध करे मो प्रथम समय तीसरा भयस्कारहे.

* मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थाना रोहण अढीशतद्वारी र १६५ २ अल्पतर वन्ध-आयुष्यका बन्ध किये वाद- पहिले समय ७ कर्म का वध करे सो प्रथम समय प्रथम अल्पतर वन्ध. और नववे गुणस्थान के प्रान्त मे सात क- मों का वन्ध कर दशवे गुणस्थान के प्रथम समय मोहनीय हीन कर छे कर्मोका बन्ध करे सो दूसरा अल्पतर वन्ध. और छे कर्मो के आगे उपशान्त मोह क्षीण मोहमे ए- क वेदनीय कर्म का का वन्ध करते तीसरा अल्पतर वन्ध, ३ "अवस्थित बन्ध;"-आठ कर्मों का वध किये वाद सात कर्मों का वन्ध क रे तब प्रथम समय अल्पतर वन्ध, और फिर उसस्थान में जीव जितने काल रहे ता- हलग पहिला अवथित वन्ध. इन सात के पीछे छे कर्म का वन्ध करे तब प्रथम समय अल्पतर बन्ध. और फिर दूसरा अवस्थि बन्ध. और ६ कर्मों वान्धे बाद एक का व- न्ध करे तब प्रथम समय अल्पतर बन्ध, और फिर तीसरी अवस्थित बन्ध. और सात कर्मों का वन्ध किये वाद आठ कमों का बन्ध करते प्रमथ समय भूयस्कार, वन्ध औ र फिर चौधा अवस्थित वन्ध. ४ "अव्यक्त बन्ध-मूल प्रकृत्तियोका सर्वथा अवन्धक पणातो चउदवे अयो- गी केवली गुणस्थान मे होता है, और फिर वहां से कोइभी जीव कदापि पडताहीन ही है. इसलिये चौथा जो अव्यक्त वन्ध है सो कही भी पाता नहीं है. 8 उत्तर प्रकृत्तियों पर चारों प्रकार के वन्ध. 8 १ज्ञानावरणीय, २ वेदनीय, : आयुप्य. ४ गोव. और अन्तराय, इन पांचो कोका एकही वन्ध स्थान है. क्यो कि ज्ञानवरणीय और अन्तराय यह दोनों को तो ध्रुव वन्धि हैं. इन लिये दश गुणस्थान तक इन दोनो कमोंकी पांच २ प्रकृत्ति का साथही वन्ध होता है वहां भूयस्कार और अल्पतर बन्ध नहीं होता है. और वे- दनी. आयुष्य, गोव इन तीनो कोंकी प्रकृत्तियों वन्ध विरोधनी है. इमलिये एक म मय मे एकही का बन्ध होता है, और इसहि लिये इन तीनों कर्मों का बन्ध स्थान भी एकही होताहैः भूयरकार अल्पतर बन्ध नही होता है. और वेदनीय तो नेवे गुणस्था- न तक बन्ध तो इनलिये इन बिना बाकी रहे चारों कर्मों की प्रवृत्तियों का फक्त अव्यक्त वन्ध एक होता है क्योंकि-इग्यारवे गुणस्थान में अबन्धहो फिर पन्ध करने प्रथम समय में अव्यक्त वन्ध जानता. और फिर अवस्थित वन्ध जाणना. अब वाकी रहे दर्शनावरणीय. मोहनीय. और नान रनों तीनों कों की उत्त- र प्रकृत्तियों पर चारों प्रकार के स्थान बन्य उतारते हैं:- १.६६ प्रथम अर्थ काण्डका - कर्म बंध प्रकारण का अर्थ. . दर्शनावरणीय कर्म के-९ का, ६ का, और ४ का, यह ३ वन्ध स्थान हैं (१) इस में दर्शनावरणीय की सव नवोही प्रकृत्तिका वन्ध पहिले और दूसरे गुणस्थान में होता है, जिप्तकी जघन्य स्थिति अन्तर मुहूर्त की और उत्क्रष्ट स्थिति अभव्य की अ पेक्षा से अनादि अनन्त, भव्य की अपेक्षा से अनादि सन्त, और पडवाइ की अपेक्षा सादि सान्त होती है. (२) नवप्रकृत्तियों में से थीगद्वी विक का बन्धका व्यच्छेद क- रनेसे मिश्रादि गुणस्थानमें प्रकृत्तिका वन्धहोताहै, सो जघन्य तो अन्तर मुहूर्त औ- र उत्कृष्ट ३३ सागरोपम पूर्वक्रोडी प्रथक्व झाजेरा जाणना. । (३) छे में से निद्रा द्वि क अपूर्व कराण के पहिले भाग में वन्ध का व्यच्छेद होने से आठवे गुणस्थान के वा- की रहे भागोमें और नववे दशवे गुणस्थान में चारों प्रकृत्तियों का वन्ध जानना, सो जघन्य एक समय, श्रेणीमें मृत्यु होवे उसकी अपेक्षाले; और उत्कृष्ट अन्तर मुहूर्त प्र- माण जाणना. । इन वन्धों में भूयस्कार दन्यदो, अल्पतर वन्ध दो, अवस्थित बन्ध ती न, और अव्यक्त बन्ध दो होते हैं, सो कहते हैं:-(१) उपशम श्रेणी से पड़ते हुवे-आ ठवे गुणस्थान के दूसरे भागमें आते हुवे-दर्शना वरणीय की चारों प्रकृतियों का व- न्ध करते हुवे पहिले निद्रा द्वीक का व्यच्छेद कियाथा उसे पुनः बन्धे, तव ६ का व. न्ध होवे; उस समय प्रथम भूयस्कार वन्ध जानना. फिर नवका बन्ध करते दूसरा भु- यस्कार. ( यह दो भूयकार वन्ध ) ऐतेही (२) प्रथम १ का वध कर फिर ६ का वन्ध करे उस समय प्रथम अल्पतर बन्ध अपुर्व करण गुणस्थान के प्रथम समय छे प्रकृत्तिका बन्ध कर फिर निद्राद्विक का वध व्यच्छेद होने से चार का बंध करे, उ स समय दूसरा अल्पतर बंध. ( यह दो अपल्तर बंध) (6) और इन तीनों वन्ध स्थान मे दूसरे समय से लगाकर उनस्थान के अन्तिम समय तक तीनों अवस्थित व जानना. और (४) इग्यारवे गुणस्थान में दर्शनावरणीय का अबंधक हो वहां से पडते दशवे गुणस्थान में चार प्रकृत्तिका बन्ध करे उसे समय पहिला अव्यक्त बंध. और जो जीवो इग्यारवे गुणस्थानमें आयुक्षय होनेसे मरकर अनुत्तर विमान में देवता होवे वहां : प्रकृत्तिका बन्ध करे उस समय दूसरा अव्यक्त वन्ध. यों दर्शनावरणीय कर्म के उपर ४ प्रकारके बंध कहेजाते है. मोहनीय कर्म के-१० वन्ध स्थानः-मोहनीय कर्म की २८ प्रकृत्ति है, जिसमें से सम्यक्त्व मोहनी और मिश्रमोहनीय इन दोनों प्रकृत्तिका बन्ध होता नहीं है. इस- लिये यह दोनों छोडकर वाकी २६ प्रकृत्ति बन्ध के योग्य होती हैं। इसमें भी एकही * मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी कर १६७ इन दोनों समय में-तीनों वेदों में से एकही वेद का बंध होता है. तथा (१) हॉस्य और रति. (२) शोक और अराति. युगल में से एक: वक्त एकही युगल का बंध हो- ता है. क्योकि यह प्रकृत्तिये बंध विरोध की है. इस लिये १ मिथ्यात्व गुणस्थान में २२ का बंध होता है, जिनकी स्थिति अभव्य आश्रिय अनादि अनन्त. भव्य आश्रिय अनादि भंत, पडवाइ आश्रिय सादि संत जाननी. २ फिर मास्वादन गु- णस्थान में मिथ्यात्व मोहनीय का बंध नहोनेसे २१ प्रकृत्तिका बंध होता है. इसकी स्थिति जघन्य १ ममय उत्कृय ६ आंवलीका ३ फिर मिश्र और अविगत गुणस्था न में अनंतान पंधि चौक का इंध नहीं होने से १७ प्रकृत्तिका बध होता है. इम की स्थिति जयन्य अंतर मुहूर्त उलट तीन सागर पृथक x पूर्व कोडी वर्ष अपि क; क्योकि अनुत्तर विमान वासीदेव चवकर जहां लग विरति पणा आङ्ग कार नती करे जहां तक यह वंध स्थान रहता है. । ४ फिर देगविरनि गुणस्थान में अमत्या- ख्यानी चौक का बंध नहीं होने ने तेरे मत्तिका स्थान होतो. इनकी कि- ति जघन्य अंतर मुहूर्त उत्कृष्ट पुर्व बोडी दर्प । ५ फिर अमन और असन्त गुमाया न में प्रत्याख्यानी चौक का वध नही होने मे २ महातका दय होता है. हमकी स्थिति जघन्य एकही समय की क्योकि कोई जीव फत्त एक समय माव परिणाम मे मर्व विरति पणे में रह कर दूसरे समय मे मर जाताहै. हम अमेझाने और नही नो जयन्य अन्तर गहून उत्सए देगळणा पूर्ण मोडी दर्प की. । ६ फिर नारे गुणम्यान में होस्य, रति. भय, और दुगडा. र चारों पत्तियोंश पन्ध नही हान्ने पनि का पन्धस्थान. ! ७ इन मे में पुरप देगका बंधन पच्छेद होने ४ महानता द धं स्थान ॥ ८ इन में चल से मोका दंघ व्यच्छेद होते पति का म्यान, । ९ इन मे ने मबल सामान वा पंध दउंद होने पनि का. घ स्थान. । और १० इनमे मे भी बलवी पापा पार होते. हानि का इंध स्थान. । मेगा दमंत्र स्थान ना ही चन्द बिनित व -::.:::.:: - - - dowmniuniauntinuwaowle- में प्रथम अर्थ काण्डका-दितीय कर्म द्वारा रोहण समार की, और उत्कृष्ट स्थिति अतर मुहुर्त की जानना. गोंकि-कोडक जीन श्रेणि में वे स्थान एक ही वक्त स्पर्श कर मरण पाने, इस अपेक्षा मे. ॥ इन ? स्थानों में भयस्कार, ८ अल्पतर. १. अवस्थित, और • अव्यक्त का होने को कहते हैं जीवों औपशम श्रेणि चडकर इग्यारखे गुणस्थान में अंतर गर्न रहकर पडकर दशो गुणस्थान में आने वहां भी मोहनीय का अपर रहे, यहां में पडता नववा गुणस्थान के पांचो भाग में एक मंचल के लोभका बंद कर ती वक्त प्रथम समय पहिला अव्यक्त पंध, और आयुक्षय होने मे-दम्याग्ये गुणस्थान मरण कर अनुत्तर विमान मे देवता होवे मो प्रथम १७ प्रकृति का बंध करे. उस के पहिले दुमरा अव्यक्त बंध. (यह दो अव्यक्त बंध) नयो गुगस्थान के पाच भाग से पड़ते चौथे भाव में संघलकी माया के माथ दो प्रकृति का धंध करते मथम मम- य प्रथम भूयस्कार, तीसरे भाग में मंचल के मान के साथ तीन प्रकृति का बंध करते प्रथम समय दुसरा भूयस्फार, दुसरे भाग मे संचल के क्रोध के साथ चार प्रकृति का बंध करते.तीप्सरा भूयस्कार, प्रथम भाग में पृरुप वेद महित पांच प्रकृतिका बंध करते चौथा भूयस्कार. वहांते आठवे गुणस्थान के अंतिय भाग मे हांस्य, रति, भय, दुगंच्छा सहित नव प्रकृति का बंध करते पांचवा भूयस्कार. वहांने देश विराति गुण- स्थान में प्रत्याख्यानबरणीय की चार प्रकृत्ति सहित तेरा प्रकृत्तिका बंध करते छठा भूयस्कार, वहां से चौथे गुणस्थान में अप्रत्याख्यानावरणीय चार कपाय सहित सत्तरे प्रकृत्ति का बंध करते सातवा भूयस्कार, अनंतान वन्धिकीचार कपाय सहित २१ प्रकृत्ति का बंध करते आठवा भूयस्कार. मिथ्यात्व मोहनीय सहित बावीत प्रकृत्तिका बंध करते नववा भयस्कार, (यह भूयस्कार वंध) मिथ्यात्व गुणस्थानमें बावीसका बंधकर चौथे गुणस्थानमे सत्तरेका वध करते प्रथम अल्पतर, फिर सतरे से तेरे प्रकृत्ति का बंध करते दुसरा अल्पतर, यो उपर भूयस्कार बंध सब उलट कहने. इस में विशेष . तना हैकि-इक्कीस प्रहात्त का अल्पतर बंध नहीं होता है, क्यों कि-मिथ्यात्व गुणस्था न से सास्वादन में कोई भी जीव नहीं आता है. सा स्वादन गुणस्थान तो नियमासे सम्यक्त का पडवाइ ही पर्शता है. इसलिये २२ के बंध से २१ के बंध में आनेका अल्पतर बंध नहीं होता है, वाकी के ८ होते हैं. (यह ८ अल्पतर बंध)। और उपर जो मोहनीय बंध के दशास्थान कहे उसमेसे प्रथमका छोड कर वाकांके अंतिम समय पर्यत रहे सोही दश अवस्थित बंध जानना.

* मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थाना रोहण अहीशतद्वारी * १६९ नाम कर्म के ८ वन्ध स्थान:-(१) मिथ्यात्वी जीव मनुप्य तियेच अपर्याप्ताए- केन्द्रिय. प्रायोग्य-१. वर्ण. २ गंध, : रस. ४ स्पर्श. ५ तेजस. ६ कार्माण, ७ अगु रुलघु, ८ निर्माण. १ उपयात. १० तिर्यच गति. ११ तिर्यंचानु पूर्वी. १२ एकेन्द्रि य जाति. १३ औदारिक गरीन. १४ हुंड संस्थान. १५ स्थानवर नाम. १० बादर, नाम. अथवा नृत्म नाम, १७ अपर्याप्ता नाम, १८ प्रत्येक नाम. अथवा-साधारण नाम. १९ अस्थिर नाम. २० अशभ नाम, २१ दौर्भाग्य नाम. २२ अनादेय नाम, और २३ अयगाकीर्ति नाम. इन २३ प्रकृत्तिका प्रथम वन्ध स्थान. (२) इन २३ में पराघात नाम और उचश नाम यह दोनों प्रकृत्ति मिलाने से और अपर्याप्ता के स्या न पर्याप्ता कहने से यह २५ प्रवृत्ति पर्याप्ता एकेन्द्रिय प्रायोग्य मिथ्यात्वी देव मनुप्य तथा तियेच वान्ध तेहैं: (B) इन २५ प्रवृत्ति मे आताप नाम. अथवा उद्योत नाम इ न दोनो में से एक नाम मिलाने से २६ प्रकृत्तिका इन्ध पर्याप्ता एकेन्द्रिय प्रायोग्य तीनो गार्तिके मिथ्यात्वी जीवों वान्ध तेहैं. (४) २ देव द्विक. : पचेन्द्रिय जति. (४) वैक्रिय गरीर. ५ वैविय अगो पाङ्ग. ६ सम चतुरस्र नंस्थान. ७ पराघात नाम. ८३ ज्वान नाम. २ शुभख गति. १० वस. नाम ११ वाटर नाम. १२ शुभ पर्याप्ता नाम. १. प्रत्येक नाम. १४ स्थिर अयवा अस्थिर नाम. १५ शुभ अथवा अशुभ नाम.१६ याकीर्ति अथवा अयशःकीर्ति नाम. १७ मुभग नाम. १८ मुस्वर नाम १२ आदय नाम. २३ वर्णचतुक. २४ तेजन गरीर. २० कार्मण शरीर. २६ अगझलघु नाम २७ निर्माण नाम और २८ उपयात नाम. यह २८ नत्ति देवगति प्रायोग्य मिथ्या स्त्री तथा मम्यन्वृष्टि मनुप्य और निर्यच वान्ध नेहैं. और ऐमेही नरक गति प्रयोन्य भी २८ काही वन्ध होता है, जिनमें विशेष इतना है कि-देव द्विक के स्थान नरक द्विक कहना. समचतुरस्र भस्थान के त्यान हुंड स्यान कहना. और अपरावर्त मान म कृत्तियो अशुभ गृहण करनी. यह २८ प्रवृत्तियों का चौथा स्थान हुवा. (६) नम्य- सष्टि जिन नाम महित देव प्रायोग्य २८ का वध करते २९ का वन्य स्थान होना है. अयवा २ मनुप्य द्विकपचेन्द्रिय जानि. ५ औदारिक दिक. : छेभषयग में का एक भषयण. ७ छेस्थान में का एक संस्थानः ८ वन. १ वादन. १. पर्याप्ता...' प्रतेक. १२ सिर अवज्ञा अत्यिर. १६ गुम अयवा. अशुभ. १४ मौभाग्य अ- जहां दोशे सत्तेने तय नान या प्रचय कर लिईहै वहां नमन.

१७० * प्रथम अर्थ काण्डका-द्वितीय कर्म द्वारा राहणे खण्ड र थवा दौर्भाग्य, १५ मुस्वर अथवा दुस्वरें. १६ आदये अथवा अनादेय १७ यश की. ति अथवा अयश-कीर्ती १८ शुभख गति अथवा अशुभ खगति, १९ पराघात, २० उच्छास, २४ वणचतुष्क, २५ तेजस शरीर, २६ कार्मण शरीर. २७ अगरू लघु, २८ निर्माण, और२९उपघात, यह२९प्रक्रत्तिका मनुष्य प्रायोग्य, बंधस्थान होता है.६ देवगति प्रायोग्य २८ प्रकृत्तिके साथ आहारक द्विक सहित ३० प्रकृत्ति का बंध अ- प्रमत साधु के होता है और मनुष्य मायोग्य २१ प्रकृति का जिन नाम सहित ३० म कृत्तिका बंध सम्यगदृष्टि देवता के होता है. (७) जिन नाम सहित देव प्रायोग्य ३० प्रकृत्ति बांधते ३१ प्रकृत्तिका बंध अप्रमत व अपूर्व करण गुणस्थानी मुनिके होता है (८) और आठवे गुणस्थान के छट्टे भाग में नाम कर्म की ३० प्रकृत्ति का बंध वि- च्छेद कर फक्त एक यश-कीर्ति काही बंध करे. । इन ८ बंध स्थान में भूयस्कार बंध ६, अल्पतर बंध ७, अवस्थित बंध ८, और अव्यक्त बंध ३, होते है सो कहते है:- (१) प्रथम २३ का बंध कर तथा विधि शिद्धि कर २५ प्रकृतिका बंध करे सो प्रथ- म भूयस्कार बंध मिथ्यात्वी के होता है. (२) इन २५ प्रकृति को आताप अथवा उ- द्योत दोनों में की एक प्रकृत्ति सहित २६ प्रकात्ति बांधे सो दूसरा भूयस्कार. (३) वि शुद्धया तोप परिणामों से देव प्रायोग्य अथवा नरक प्रायोग्य २८ प्रकृत्ति का बंध करते तीसरा भूयस्कार. (४) देव प्रायोग्य २८ प्रकृत्तिका जिननाम सहित २१ का वं- ध करे मो चौधा भूयस्कार. (५) ३० प्रकृति मनुष्य प्रायोग्य अथवा देव मायोग्य वां- धे सो पांचवा भूयस्कार. (६) देव पायोग्य ३० प्रकृति को निन नाम सहित ३१ का बंध करे मो छट्टा भुयस्कार (यह ६ भूय कार) और (2) अपूर्व करण गुनस्थान में देव गति योग्य-२८-२१--३० ---और ३१ का बंध कर श्रेणि चडते हुवे इस वं घ का व्यच्छेदकर एक यशाकीर्ति काही बंधन करे सो प्रथम अल्पतर बंध.(२) कोइ आ हारक द्विक और जिन नान सहित देव प्रायोग्य ३१ प्रकृत्तिका बंध करते मरकर देव. लोक में जाये वो वहां प्रथम समय मनुष्य प्रायोग्य ३० प्रकृत्ति का बंध करे तब दूस- रा अल्पतर. [३] देवलोक में चयकर मनुष्यपणे उत्पन्नहो जिन नाम महित देवगति प्रा योग्य २१ का बंध कर उसके प्रथम समय तीसरा अल्पतर बंध [४] कोइ मनुष्य देवग- ति प्रायोग्य २१ प्रकृत्ति का बंध करता विशुद्ध परिणामों कर देवगति प्रायोग्य २८ का बंध करे उमके प्रथम ममय चीया अल्यतर बंध. () इनही २८ का बंध करते संलग परिणाम कर एकेन्द्रिय प्रयोग्य २६ का बंध करे सो पांचया अल्पतर बंध. ६ यही २६ मुक्ति सोनार-श्री गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी.* वाला २५ बांधे सो छहा अल्पतर, (७) और २५ वाला २३ का बंध करे सो सातवा अल्पतर बंध. (पह ७ अल्पतर बंध) और ऊपरोक्त आठों बंध के त्यनक में दूसरे समय से लगा कर अन्तिम समय तक आगेही अवस्थित बंध जाणना. ( यह ८ अवस्थित बंध ) और [१] श्रेणिसे पडते हुवे. नाम कर्म का सर्वथा अबन्ध होकर. फिर यश कीर्ति नाम का बन्ध करे उसके पहिले समय पहिला अव्यक्त वन्ध. [२] उपशान्तमोह गुणत्यान में आयुप्प पूर्ण कर अनुत्तर विमान में देवता होने वहां प्रथम समय मनुप्प से मनुष्य प्रयोग्य २१ का बन्ध करे सो दूसरा अव्यक्त व- न्ध. और (३] वाहांही जिन नाम सहित ३० प्रत्तिका बन्ध करे सो तीसरा अव्यक्त दन्ध. [ यह ३ अव्यक्त पंध। ॥ इति प्रकृति बंध. ॥ स्थिति-बन्ध. स्थिति बंध के ४ भाद्रेः-ऊपरोक्त प्रवृत्ति पंचमें मूल प्रकृत्तिा तो जयप ए- क का वन्ध है. उत्कृष्ट ८ का वन्ध है. और उत्तर महत्ति का जघन्य एक का न्य है. उत्कृष्ट ७४ का दन्ध है इसमेः-१ अनादि. २ सादि. : अनन्त. और ४ सान्त; यह ४ भागे कहते है। मूल प्रकृत्ति पन्ध का ओघमे (समुचय ) एक मादि सान्त भांगा पाता है. क्योकि-भवो भवमे एकही वक्त आयुप्य का वन्ध होता है. पह (८) का वन्ध कहा. और वाकीके कालमें सात प्रकृत्तिका बन्ध होताहै. और उत्तर प्रवृत्तिमें । ज्ञावनावरणीय और दर्शना वरणीय का ऐके का इन्त्र स्थान. वेदनीय का-रक काव । न्ध. मोहनीय का २०का बन्ध, गौवका एक करन्य, और अन्तरायका पांच कारन्ध. इन वन्धो में-१ अभव्यकी अपेक्षा अनादि अनन्त भांगा. २ भव्यकी अपेक्षा अनादि सन्त भांगा, और : पडवाइ की अपेक्षा नादि मान्न भांगा. यों तीन भांगे मिलने हैं. और वाकी रहे मर्व प्रवृत्तियों के स्थान में फक्त एक मादि मान्त भांगा पाता है. अों कमोंकी स्थितिः-१.२) ज्ञानावरणीय. दर्गना वरणीय. और अन्नगर इन तीनों कमों की जयन्य स्थिति अन्नर मुल को दश गुणस्यान के प्रान्त में हो- ती है. और उत्कृष्ट तीन कोडा कोडी मागगेपन की उत्कृष्ट महेना परिणामां मिथ्या वी के होती है. (३) बेनीय कर्म की जयन्य स्थिति १२ पुर्न की मो न्यावा. वारचा और तेखा इन नीना गुणस्थानों को छोड वाकी के नरागी गुणस्यानो मेंपा- ती है. क्योंकि-न तीनों गुजस्थानों में कपापयोदय नहोने में स्थिति वन्य और म पन्ध नहीं होता है. फक्ष पोग मत्यय प्रदेश वन्य नया मगति दन्य पाता है. नोभी ।

-- १७२ प्रथम अथ काण्डका-द्वितीय कर्मद्वारा रोहण खाण्ड ११ प्रथम समय में वन्धे, द्वितीय समय में वेदे ( भोगवे ) और तीसरे समय में वीनाशही पाजाताहै. और उत्कृष्ट स्थिति तीस क्राडो क्रोडी सागरो पमकी (४) मोहनीय कर्मकी जयन्य स्थिति अन्तर मुहूर्त की. वादर सम्पराय नववे गुणस्थान के प्रान्त में होती और उत्कृष्ट स्थिति ७१ क्रोडा क्रोडी सागरोपम की, महा संक्लिष्ट परिणामी मिथ्य- स्त्री के होती है. [५] आयुष्य कर्म की जघन्य स्थिति अन्तर मुर्त की पहिले दुसरे गुणस्थान में होने, और उत्कृष्ट ३३सागरोपम की मिथ्यात्वी अत्यन्त सक्लेश परिणाम से नरकायु वान्धता है, और प्रमत अप्रमत मुनि विशुद्ध परिणामों कर देवायु बन्धते हैं (६-७] नाम कर्म और गौव कर्म की जघन्य स्थिति ८ मुहूर्त की सो सूक्ष्म साम्प- राय गुणस्थान के प्रान्त में बन्धे, और उत्कृष्ट २० क्रोडा क्रोडी सागरोपम की. आठोंही कर्मों की १४८ प्रकृति की अलग २ स्थिति कहते हैं :- १ ज्ञानावरणीय कर्म की-पाचों प्रकृति की जघन्य स्थिति अंतर मुहूर्त की भू- क्ष्म स्मपराय युणस्थात के प्रांत में परिणामों की विशुद्धता से होती है, और उत्कृष्ट तीस क्रोडा क्रोडी सागरांपम की मिथ्यात्री के होती है. २ दर्शनावरणीय कर्म की - चक्षु दर्शनावरणीय आदि चारों प्रकृति की.स्थि ति जघन्य अंतर मुहूर्त की सो सूक्ष्म सम्पराय के प्रांत में. पाचों निद्रा की-एक सा- गर के सात भाग करीये जिस में के दो भाग उस में पल्योपम के असंख्यातवे भाग कम जाननी, एकेन्द्रिय की अपेक्षा से, उत्कृष्ट १ ही प्रकृति की ३० क्रोडाक्रोड सागर ३ वेदनीय कर्म की-साता वेदनीय की जघन्य स्थिति १२ मुहूर्त की, असाता वेदनीय की एक सागर के सात भाग करीये उस में के दो भाग जिस में पल्योपम का असंख्यातवा भाग कम. और उत्कृष्ट. साता वेदनीय की १५ कोडा क्रोडी सा- गरोपम, असात वेदनी की तीस क्रोडा कोडी सागरोपम की. ४ मोहनीय कर्म की-मिथ्यात्व मोहनीय की-जघन्य स्थिति-एक क्रोड सागरो म में पल्योपम के असंख्यातवे भाग कम की. अनंतानबंधी, अपत्याख्यानि, प्रत्या- 4. इन तीनों चौक के १२ कपाय की एक सागर के सातीये चार भाग की.सं • के क्रोध की नववे गुणस्थान के दुसरे भाग में चरम वध दो महीना का संज्वल मान का नववे गुणस्थान के तीसर भाग में चरम बंध एक महीने का, संज्वलकी का नववे गुणस्थान के चौथे भाग में चरम वैध १५ दिनका, संज्वल के लोभ नववे गुणस्थान के पंचवे भाग में चरमं बंध अंतर मुहूर्त का, पुरुप वेदका नववे - '... " " * माक्त सोपान-श्री गुणस्थाना रोहण अहीशतद्वारी र गुणस्मानके प्रथम भागमें चरम बंध ८ वर्ष का. वीरेदजा एक सागर के चौदवे-तीन भाग का. नपुंसक वेदका एक सागर के चोदवे दोभाग का. हांस्य और रनिका एक सागर के सातीया-एक भाग का. अरति भय शोग दुगंच्छा का एक सागर के साती ये दोभाग का. यह २६ प्रकृत्तिका बन्ध हुवा. सम्यक्त्त्व मोहनीय और मिश्रमोह- नीय का वन्ध पडता नहीं है. इसालेये गिना नहीं है । और उत्कृष्ट स्थिति निथ्यात मोहनीय की ७० नोडा क्रोडी सागरोपम, चारोही चौकडी की १६ कपाय की ४० कोडा क्रोड सागरोपम. पुरुष वेदकी १० कोडा ब्रोड सागर. विदकी१५ पन्दरको डमोड सागर. नपुंसक वेदकी २० जोडा मोड सागर. होस्य और तिकी १० नो- बोड सागर. अरति भय शोक दुर्गच्छा की २० नोडा मोड सागरोपम की उत्कृ ह स्थिति जानना. ५आयुप्य कर्मकी-नरकाय देगर की जघन्य स्थिति दशहजारीप. उत्कृष्टः३ सागारोपन. मनुष्य तियंत्र की जयन्य अन्तर महूर्त उत्कृष्ट तीन पल्योपम (जगलीये आश्रिय.) ६ नाम कर्म की-जयन्य स्थिति जिन नाम की अन्तर मुहूर्त की. २ + आता रक गरीर. : आहारक अनो पाग. ४ आहारकयातन. आहारक बन्धन. ६ आ- हारक तेजस वधन. ७ आहारक कार्मण पंधन. ८ आहारक तेजन कर्मण बन्धन.इम आहारक सप्तककी उत्कृष्ट स्थितिने अख्यात गुण हीनी. नोभी अन्तर महतकीय । शाकीर्ति की ८ मुहर्न की. १३ वम चतुक. ११ अस्थिपक. २१ औना- रिक द्विक. २ निपैच विक, २४ एकोन्द्रिय जाति. २५ वषगान. २६ निर्माण. २७ आताप. २८ उद्योन. २१ स्थावर. ३ तैजन, ३१ जाण. ३२ अगुल्लयु.::. पधात. ३४ उच्छवान. १९ हुंडनंस्थान. ३६ छेवना भययणः वृष्णवर्ण..८ ती- परम.४२ अशुभ स्पर्य चतुष्क.४ः दुगंध. और ४४पगघात नाम इन४४ प्रति की जयन्य स्थिनि एक नागर के नाती दोभाग की. ११ नम दिन. ५० कि. न्द्रिय दिक. इन ६ की एमागर के पैत्रीनी (६५) ये ६ भाग की. १ यि ५२ शुभ, ५६ सुभग. २४ मुखर. ५५ आदेय. ५६ अपमानित हुनुभन गात... . -~- - - र नान के देने से इन को मत होते है बिहान " ना वचन दे दे मगलेले -- , १७४ प्रथम अथ काण्डका-द्वितीय कर्म द्वारा रोहण खण्ड १२ प्रथम संघयण, ५१ प्रयन संस्थान, ६० शुलवर्ण, ६१ मिष्टरस, ६५ शुभ स्पर्शचतुष्क इन १५ प्रकृत्तिकी-एक सागर के अठावीसीये ५ भागकी. इन सिवाय और जिस ना म सर्व की स्थिति २० क्रोडा कोड सानर की है, उनकी जघन्य स्थिति सागरोपम के सातीये तो भागकी जाननी. जिनको स्थिति दश क्रोडा कोड सागरोपमकीहै उनकी भाग पिम के सातीये एक भाग की. जिनकी पन्दरह क्रोड क्रोड सागरो पमकी है उनकी जघन्य सागरोपम के चौदवे ६ भाग की, जिनकी उत्कृष्ट १८ क्रोडा क्रोड सागरोपम की है उनकी जयन्य सागरोपम के पेंत्रीसये १ भागकी की जानना. परन्तु सर्व स्थान पल्योपम का असंख्यातवा भाग हीन (कमी) लेना. एसी तरह नाम कर्म की. जघन्य स्थितिका प्रमाण करना । अब उत्कृष्ट स्थिति कहते हैं:-१ सूक्ष्म, २ साधार- ण, ३ अपर्याप्ता, ६ विक्लेन्द्रियत्रिक, इन ६ प्रकृत्तिकी १८ क्रोडा क्रोड सागरोपम की ७ बज्रषभ नाराच संघयण, समचतुरस्र संस्थान इनदोनों की दश क्रोडा क्रोड सा गरोपम की, १ न्यग्रोध संस्थान, १० ऋपभ नाराच संघयण इन दोनों की १२ क्रो डा क्रोड सागर. ११ नाराच संघयण, १२ सादि संस्थान इनदोनों की १४ क्रोडा क्रोड सागर. १३ अर्धनाराच संघयण, १४ वामन संस्थान, इन दोनों की १६ क्रोडा क्रोड सागर. १५ किलिक संघयण, १६ कुन्य संस्थान, इन दोनों की १८ क्रोडा क्रो ड सागर. १७ छेवटा संघयण, १८ हुंड स्थान इन दोनों की २० कोडा क्रोड सागर १९ मृदुस्पर्श. २० लवुस्पर्श, २१ स्निग्धस्पर्श, २२ उप्णसर्श, २३ जुर्भिगन्ध, २४ श्वे तवर्ण, २५ मधुर रस, इन ७ प्रकृत्तिकी १० क्रोडा कोड सागर. २६ हरावर्ण, २७ अम्लान रस, की साडी वारा क्रोडा क्रोडी सागर. २८ रक्तवर्ण, २१ कपायलारस- की १५ क्रोडा क्रोडी साघर. ३० पितवण, ३१ कटुरत की साडी सतरे कोडा कोड सागर. १२ श्यामवर्ण, ११ तीक्षण रसकी २० कोडा कोडा मागर. ३४ शुभ विहाय गति, ३५ देवगति, ३६ देवानुपूर्वी, ३७ स्थिर; ३८ शुभ, ३१ सौभाग्य, ४० सु- स्वर, ४१ आदेय, ४२ यश कीर्ति, इन ९ प्रकृत्ति की-१, कोडा कोड सागर. ४३ मम्प्य गति, ४४मनुष्यानु पूर्वी की १५ कोडा कोड सागर,४५ पवैक्रिय शरीर,४६ वैक्रिय अङ्गो पाग, ४७ वैक्रिय संघातन, ४८ वैक्रिय वैक्रिय वन्धन, ४१ वैक्रय ते जस बन्धन, ५२ वैक्रय कार्मण वन्धन, ५१. वैक्रिय तेजत कार्मण वन्धन. ५२ तिये- चगति, ५३ तिर्यंचानु पूर्बी, ५४ औदारिक शरीर. ५५ औदारिक अङ्गो पाङ्ग, ५६ औदारिक संघातन ५७ औदारिक औदारिक बंधन, ५८ औदारिक तेजस बंधन, पाङ्ग, * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्याना रोहण अढीशतद्वारी र १७८ ५९ औदारिक कार्मण बंधन, ६० औदारिक तेजस कार्मण वंधन, ६१ नरक गति ६२ नरकानु पूर्वी, ६३ तजस शरीर, ६४ कार्मण शरीर, ६५ अगरुलघु ६६ निर्मा- ण. ६७ उघात, ६८ तेजस संघातन, ६९ कार्मण संघातन, ७० तेजस तेजस बंधन, ७१ कार्मण कार्मण वेधन, ७२ तेजस कार्मण वंधन, ७३ अस्थिर, ७४ अशुभ ७५ दोर्भाग्य, ७६ दुस्वर, ७७ अनादेय,७८अयशःकीति, ७१ वस,८० वादर, ८१. पर्या- प्ता, ८२ प्रसेक, ८३ स्थावर, ८४ एकेद्रिय जाति, ८५ पचेन्द्रियजाति. ८६ अशुभ विहायो गति. ८७ उच्छवास ८८ आताप. ८१ पराघात ११ गुरु स्पर्श, १२ कठोर स्पर्श, ९३ रुक्षस्पर्य, ९४ शीत स्पर्श, और १५ दुर्गन्ध, इन ५० प्रकृत्ति की २० क्रोडा क्रोड सागर. ९६ तीर्थ कर नाम. १७ आहारक शरीर, ९८ आहारक अङ्गो ९९ आहाराक संघातन १०० आहारक आहारक बंधन, १०१ आहारक ते- जम वैधन. १०२ आहारक कार्मण बंधन, १० : आहारक तेजस कार्मण वंधन. इ न ८ प्रकृत्तिकी-एक क्रोडा क्रोड सागर की स्थिति. ७ गोव कर्म की जघन्य स्थिति ८ मुहूर्त की. उत्कृष्ट ऊंच गोत्र की १० क्रो- डा कोड सागर की और नीच गौव की २० क्रोडा क्रोड सागर की. अंतराय कर्म की पांचों अंतराय की-जघन्य स्थिति अंतर मुहूर्त की, उत्कृष्ट- तीस कोडा कोड मागर की, यह १४८ प्रकृत्ति जघन्य उत्कृष्ट स्थिति जाननी. उत्कृष्ट स्थिति बंधके पानी-पहिले नरकयुका वध किया हुवा मनुप्य भयोपश- म सम्यक्त्व प्राप्तकर तीर्थकर नाम कर्म की उपार्जना करे.! और फिर पूर्व बंधानुनार नरक मे गमन करते सम्यक्त्व का वमन करता अंतिम समय में तीर्थकर नाम की उ- त्कृष्ट स्थिति का बंध करते है. और आहारक द्विक का उत्कृष्ट स्थिति बंध अप्रमत गुणस्थान चरम वंध मुनि के होता है. क्योंकि-इम बंध में येही अति मंलिटहै. औ- र देवायु तो प्रमत गुणस्थान में आयु वंध का आरंभ कर अपनत गुणस्थान में च- डते हुवे साधु के होता है. क्योंकि शुभ आय संघ के स्थानक में येही अनि विशुद्ध स्थानक. है इन चारों प्रकृत्ति निवाय पाली की प्रवृत्तियों का उत्कृष्ट स्थिति बंधन- ही पर्याप्ता मिथ्यात्व दृष्टिक होता है. क्योंकि मनुपाय और निर्यचाय बिना बाकी की मव प्रकृचियों का उत्कृष्ट स्थिति बन्ध उत्कृष्ट लेग परिणान में होता है, और मिथ्याली से अधिक जोड़ संलश परिणामी होता नहीं है. उमलिये. उन में भी अम- .१७८ प्रथम अर्थ काण्डका-द्वितीय कर्मद्वारा रोहण खाण्ड १९ हैं. जिसकी यह संक्षेप व्याख्या है. जगन्य रस वन्ध के श्वानी कहते हैं:-३ थीण विक, ४ अनन्तान वन्धि की क, और १ मिथ्यात्वमोह. इन आठों प्रकृत्तिका मन्द रस वन्ध ( अत्यन्त जघन्य रस वन्ध ) के अधिकारी चारित्र के सन्मुख हुवे ( आगे सम्यक्त्व युक्त चारित्र की प्राप्ति करेंगे ऐसे) अनिवृत्ति करण के चरम समय में वर्तते मिथ्यात्वी मनुष्य जानना, क्यों कि-इन आठो प्रकृत्तियों के वन्ध केलिये इतनी विशुद्धता दूसरे स्थान में नहीं मिल- ता है, जो कदापि मिथ्यात्वी से सास्वादनी के परिणाम विशुद्ध हैं, तथापि सास्वाद- नी तो पडवाइही होता है. इसलिये संक्लिष्टही कहा जाताहै. और यह ८ आठोंही पाप प्रकृत्तिहै, इनका मन्द रस वन्ध विशुद्धि मेंही होता है. और वो विशुद्धावस्याय ग्र- न्थी भेद करते होता है, उसमें भी सम्यक्त्व सहित चारित्र गृहण करने वालेकी वि- शुद्धिं किमविक्तही होती है. इसलिये इन्हे गृहण कियाहै. और सम्यक्त्व गृहण किये वाद तो इन ८ प्रकृत्ति का अवन्ध है. या चारित्र गृहण करने के अधिकारी मनुप्य ही होते हैं, इसलिये यहां मनुष्यही कहे हैं परन्तु देवतादिक नाही कहा. । अप्रसा- ख्याना वरण चौक के जघन्य रस बन्ध के अधिकारी जो आगे को संयम अङ्गीकार करेगें ऐसे आविरति सम्यग् दृष्टि जानना. क्योंकि इसके बन्ध में इस से अधिक वि- शुद्ध और दूसरा स्थान नहीं है + । प्रत्याख्याना वरणीय के मन्द रस करने वाले- संयम सन्मुख हुवे देशविरति (श्रावक) जानना. अविरति से देशविरति,की विशुद्धि अनन्त गुण अधिक है.। अरति और शोक मोहनीय के जघन्य रस वन्धने वाले प्रम- त गुणस्थान वी साधु जो आगे को अप्रमत होवेंगे सो जानना. अप्रमन में इन दो- नों का वन्ध नहीं है. । आहारदिक के बन्धाधिकारी अप्रमादि साधु अममत गुण- स्थान को प्रप्ता होने वाले संक्लेश परिणामी जानना, क्योंकि-यह दोनों पुण्य प्रकृात्ते है, इनका मन्द रस बन्ध संक्लेश परिणामों सेही होता है. अप्रगादि जीवों इससे विशु- द होने के सवव से गृहण नहीं किये. । निद्रा, प्रचला, निद्रा निद्रा. अशुभ वर्ण चतु- क, हांस्य, रति, दुर्गच्छा, भय, और उपघात. इन १२ प्रकृत्ति में भे १० प्रकृत्ति + यहां कितनेक देशावरति संयम के सन्मुग्व दुवै को बताते हैं, परन्तु देशाईरा के सन्मुख होनेमे सर्व विरति के सन्मुख होनेकी विशुद्ध आर्थिक होनेके सबब से यहां ग्रहण किया है. तब केवली गम्य.

* मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थाना रोहण अढीशतद्वारी र १७२ का जघन्य रसवन्य तो आठवे गुणस्थान के सात भाग में से छठे भाग के प्रान्त सम- य में जानना. और निद्रा तथा प्रचलाका जघन्य रस वन्य आठवे गुणस्थान के प्रथम भाग में अपणे बन्ध के प्रबन्ध व्यावछेद से प्रथम समय होता है, यहां उपशम श्रेणि प्रवर्तक गृहण करना. यद्यपि उपशम श्रेणिसे भपक श्रेणी की विशुद्धता अधिक है, परन्तु जघन्य रस वध सादि सान्त होता है. और क्षपक श्रेणी प्रवर्तक सादि अनन्त होतेहैं (क्योंकि पडते नहींहैं) इसलिये गृहण नहीं किये पुरुष वेद और संचलका चौ क इन पांचो का जघन्य रसवन्ध नववे गुणस्थान के पांचों भाग में अलग २ होता है, अर्थात्-पहिले भाग में पुरुपवेद का. दुसरे में संचलके क्रोधका, तीसरे में सचल के मानका. चौथे में संचल की माया का और पांचवे में संज्जलके लोभ का. यों अलग २ बंध विच्छेद करने के अन्तिम समय अपने २ वंध के अंतिम वंध में जघन्य र- स बंध होता है. । ६ ज्ञानावरणीय, ४ दर्शनावरणीय. ५ अंतराय इन १४ का ज- घन्य रसवन्ध दशवे गुणस्थान वर्ती क्षपक श्रेणि प्रतिपन्न अपने बन्ध के अन्तिम स- मय करता है. मूक्ष्म. अपर्याप्ता. साधारण. तीन विकेन्द्रिय, चारोंगतिका आयुप्य, वैक्रिय शरीर. वैक्रिय अंगो पांग, देवगति, देवानु पूर्वी. नरगति, नरकानु पूर्वी इ- न १६ प्रवत्ति का मन्द रसबन्ध मनुष्य और तिर्यंच तत्मायोग्य विशुद्ध संक्लेश में व तते होता है. इन १६ में मे ७ तो पुन्य प्रकृत्ति हैं, उनका मंद रस मलीन परिणा मों से होता है. और ९ पाप प्रकृत्ति हैं जिनका मन्दरस बहूत विशुद्ध अध्यायसाय. से होता है. इन १६ प्रवृत्ति में मे मनुप्यायू, तियेचायू छोडकर १४ प्रकृत्तिका बंध तो देवता तियेच के भव प्रत्यय नाही. और मनुष्य तियेचायुका जघन्य स्थिति बंध करते मंद रम होता है सो भी भुलक भव देवता नरक के नही होता है. इसलिये इ- न १६ प्रकृतिके मंदरस बंध श्वामी मनुप्य तिर्यंचही है. उद्योत नाम, औदारिक श- रीर. औदारिक अङ्गो पाङ्ग, इन तीनों प्रकृत्तिका रमबंध मिथ्यात्वी देवता और ना- रकी नियेच प्रयोग्य वन्धते संक्लेश परिणाम कर करते हैं. मनुप्य और तिवचपचे. न्दिय ऐसे प्रायोग्य कर नरक प्रयोग्य का बंध करे परन्तु नरक मे यह प्रकृचियों न- ही है. इसलिये नहीं कही. । तियेच गति. तियेचानु पूर्वी. और नीच गोत्र. इन प्रक त्तिका जयन्य रत वन्ध सातवी नरक के नेरीचे सम्यक्त्व सन्मुख हुवे मिध्यत्व के च रम समय में वर्तते होता है. क्योंकि-ऐने प्रायोग्यमें वर्तते देवता या दूसरी नरक हो। तो वो मनुप्य प्रपोप वान्यते हैं. और सातवी नरक वालों के तो भवप पत्यय मनु- F १८० प्रथम अथ काण्डका-द्वितीय कर्म द्वारा रोहण खण्ड र ज्य और ऊंचगोत्र का वन्ध नहीही होता है. । तीर्थकर नाम कर्म का जघन्य रस व ध अविरति सम्यक दृष्टि मनुष्य नरकायु बंध किये वाद अयोपशम. सम्यक्त्व प्राप्तक र कथंचित् फिर भी नरक में जावे तब सम्यक्त्व का वमन करते अन्तिम समय कर- ते हैं.। एकेन्द्रिय जाति और स्थावर नाम का जघन्य रसंबंध नरक गति विना बाकी तीनों गति के जीवों मिथ्याली मध्यम परिणाम में प्रस्तते त्रसका बंध कर स्थावरका वंध करते, पचेन्द्रिय जाति का वंध कर एकेन्द्रिय जाति का वध करते यों घोल के परिणामों में प्रतते हुवे करते हैं. क्योकि अवस्थित परिणाम में वैसी विशुद्धि नहीं हो ती है. और नारकी के भवप्रत्यय एकेन्द्रिय का बंध न होनेसे उने छोड दियेहैं। आ- ताप नाम कर्म का जघन्य रस वध भवन पतिसे लगा इशान देवलोक तक के देवता देवी मिथ्यात्वी अतिसंकिलिष्ट परिणामी एकेन्द्रिय मायोग्य वांधते हुवे करतेहैं.! साता असाता वेदनीय, स्थिर,आस्थिर शुभ अशुभ, यश अपयश, इन आठों प्रकृत्तिका मन्द रस बंध मिथ्याली गुणस्थानसे लगाकर प्रमत गुणस्थान तक महत्तते हुवे अन्तर मुहूर्त साता अन्तर मुहूर्त असाता. यों घोलके परिणामो में प्रतते अध्यवस्याय स्थानक अवस्थित पणें रहते एक साथाही वध करते हैं.। बस, वादर, पर्याप्ता, प्रत्येक. शुभ- वर्ण चनुप्क, तैजस, कार्मण. अगुरुलघु, निर्माण, मनुष्य द्विक, खगति द्विक, पचेन्द्रि य जाति, उन्धाश, पराघात, ऊंचगाव, छेसंघयण, छेसंस्थान, नपुंसकवेद, स्त्रीवेद, मु- भग, दुभग. मुस्वर दुस्वर, आदेय, अनादेय, इन ४० प्रकृति का मन्द रस बंध चारों गति के मिथ्याली जीवों वान्धते हैं. इसमें, बस बादर, पर्याप्ता, प्रत्येक, शुभर्वण चतु- प्क, तैजस कर्मिण, अगुरुलघु, निमार्ण, पचेन्द्रिय जाति, पराघात, और उश्वाश, यह १५प्रकृत्ति तिर्यच मनुष्य मिथ्यात्वी तत्सोयाग्य संक्लेश परिणाम नरक प्रायोग्य नामकी २८ प्रकृत्तिका बंध करते मंदरस बन्धते हैं. यह पुण्य प्रकृत्तिका है इसलिये इनका मक्लेश से रस बन्ध होता है. और नारकी तथा सांत कुमार से सहस्रारांत आटवे स्वर्ग पर्यन्त के मिथ्यात्वी देवता संक्लेशसे तिर्यंच गति मायोग्य नाम कर्म की २१ प्रक त्ति का बंध करते भी इन १५ प्रकृत्ति का मंद रस बंध करते हैं. और इन १५ में मे-पचेन्द्रिय जाति और वस नाम विना वाकी की १३ प्रकृत्ति के मंद रस बंध भ- बनपति देवमे इशान देवलोक तक के देवता देवीपों मिथ्यात्वी एकन्द्रिय प्रायोग्य बंध करतेवक्त बांधतेहैं. और वस नाम तथा पचेन्द्रिय जाति यह दोनों प्रकृत्तियाँकुछक उ समे भी अधिक विशुद्ध अध्यवसाय से पचेन्द्रिय प्रायोग्य वान्यते हुवे मन्द रम से वा- मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी र १८१ न्धते है. यों १५ प्रकृत्ति के मन्द रसके श्वामी चारों गति के मिथ्याली होतेहैं, और स्त्री वेद तथा नपुंसकवेद का मन्द रस चारों गति के मिथ्यात्वी जीवों सम्यक्त्व सन्मु ख हुवे विशुद्धि से करते. हैं क्योंकि यह पाप प्रकृत्ति है । मनुष्य गति, मनुष्यानु पू- नी, शुभख गति छे संघयण. छे संस्थान, शुभग, दुभग. मुस्वर, दुस्वर, आदेय अनादेय, और उँच गोव. इन २३ प्रकृति का मन्द रस वन्ध-मिथ्यात्त्री जीव घोल के परिणा- मी परावर्त इस के विरोध की प्रकृति का बन्ध करते ऐसे चारों गति के जीवों जान- ने क्योंकि सम्यक्त्व दृष्टि देवता और नारकी तो मनुष्य प्रायोग्य वान्धते तियेचादि विरोधी प्रकृत्ति का बन्ध नही करते हैं. और ऋषभनाराचादि मंघयन भी नही वा- न्धते है. और सम्यक् दृष्टि मनुष्य तियेच देवता प्रयोग्य बान्धते समचतुरस्र संस्था नका बन्ध करे वाकी के पांचो संस्थानो का वंध नहीं करे. इसलिये सम्यक्त्व की वि रोधकी प्रवृत्ति के साथ प्रावर्तते बंध नहीं होताहै, और इसही लिये वो मन्द रस - ध के अधिकारी नहीं हैं. और मिथ्यत्ती भी अति भलिष्ट पारणामसे वीस कोड को- ड मागरोपम प्रमाण स्थितिबंध अध्यवसाय स्थानक वर्तते तियेच द्विक, नरक द्वि- क. हुंड संस्थान. छेवटा भंघयण. अशुभत्र गति. और नपुंमक वेदादि प्रकृत्तिका नि- रन्व पणे उत्कृष्ट बंध करे. वहां से भी और १८ कोडा क्रोड मागरोपम की स्थिति बंध अध्य बनाय स्थानक होवे तब कुन संस्थान. किलिक मंघयण. परावर्त हुंड भ- स्थान और छेवटा संघयण का बंध करे बद मन्द रम बन्ध. और १५ क्रोडा कोड सागरोपम की स्थिति बन्धाधवकाय स्थानक. मे तियेच टिक का मनुप्य द्विक नाथ परावर्ति वन्ध करे, तैसेही नपंसक वेदका स्त्रीवेद के माथ परावर्त कर बन्ध करे. औ- र १० नोडा क्रोड मागर स्थिति बन्धाधवमाय स्थानक बाद दोग्य विक. मोमा- न्य विक. के माय परावर्त कर वध करे. वहां मे क्रोडा कोड मागर कुछ कमी तक परावर्त कर बन्ध होवे. इसलिये हीन स्थिति बंधाधवमाय स्थानक में फक्त मनुप्यादि क. वञ्पभ नारच मंघयण, ममच तुरव नस्यान, शुभ विहायो गनि. मामान्य वि. : क. पुपस्वेद इन प्रकृत्तियों का निरन्व बंध करे यरंतु वहां मंद ग्ममय बंध नही, होता है. क्योनि विरोध की प्रकृत्तियों के नाथ परावर्त कर बंध करते मंद रन हो- ता है. (यह जघन्य रम बंध के स्वामी कह.) अब उत्कृष्ट रन बन्ध के स्वामी कहने हैं:-एपेन्द्रिय नानि. न्यावर नाम. श्री. र आताप नाम रन तीनों प्रकृत्तियों का तीन (चीवायां) न वन्य भवन पनि. . , १८२ प्रथम अर्थ काण्डका - कर्म बंध प्रकारण का अर्थ.* व्यन्तर जोतिषी, सोधर्म और इशान इन पांच स्थानको के मिथ्यात्वी देवताओंके हो ता है। इस में जो आताप नाम पुण्य प्रकृत्ति है, उसका बन्ध भी मिथ्यात्री के तत्सा योग्य विशुद्ध परिणाम से पडता है. और दोनों प्रकृत्ति का वन्ध अशुद्ध परिणाम से पडता है. क्योंकि ऐसा जो संक्लेश परिणाम मनुष्य तियेच के होतो नरक भायोग्य वन्ध करे, और नरक के जीवों के यह तीनों प्रकृत्ति नहीं है. और सनत कुमार श्वा र्ग के ऊपर के देवों भी तीनों प्रकृत्तिका वन्ध नही करते हैं, इसलिये ऊपरोक्त पांच स्थान को सिवाय तीनों प्रकृत्तिका उत्कृष्ट रस बन्ध नहीं होता है । सूक्ष्म, अपर्याप्ता, साधरण, तीन विक्लेन्द्रिय, नरक विक, तिर्यवायु, और मनुप्यायु, इन ११ प्रकृत्तिका उत्कृष्ट रस वन्ध सन्नी पर्याप्ता पचेन्द्रिय, मिथ्यादृष्टि संख्यात वर्षायुबाला, तत्मायो- ग्यो संक्लेश वर्तते ऐसे मनुष्य तियेच के होता है. क्योंकि इनमें की पहिली १ प्रकृत्ति का वन्ध तो देवता नारकी के भव प्रत्यय तो नहीं होता है, और मनुष्य तियेच का आयुष्य जो देवता नरकी वन्धते हैं. तोभी इसकी उत्कृष्ट स्थिति तीन पल्योपम की वन्धती वक्त उत्कृष्ट रस वन्य होता है. ऐता वन्य देवता नारकी और जुगलीयों के नहीं होता है, इसलिये नहीं वान्धते हैं. और सास्वादन गुणस्थान में भी घोलके परि णाम होने से और उपर के गुणस्थानों में इन का वन्ध नही होने से इतनी स्थिति व न्धती नहीं है, इसलिये मिथ्यात्वीही उत्कृष्ट रसबन्ध के अधिकारी होते हैं, । तिर्यच गति, तिर्य वान पूर्जी, और छेवटा संघयण, इन तीनों प्रकृत्तिका उत्कृष्ट रसवन्ध अति संक्लिष्ट परिणामी सनन्त कुमार देवलोक से सहस्रान्त देवलोक तक के मिथ्यात्वी दे- बता के और नरक के होता है; क्योंकि सक्लिष्ट परिणामी मनुष्य तिर्यच तो नरक भायोग्यही वन्धते हैं, सम्यक दृष्टि के यह वन्ध नहीं होता है. और भवन पतिसे ल- गा इशान देवलोक तक के देवता मिथ्यात्व युक्त सकिष्ट परिणाम में परिणामते एके न्द्रिय प्रायोग्य नाम कर्म की प्रकृत्ति वान्धे हैं, परन्तु छेवटा संघयण का अनुकृष्ट रस बंध होताहै. इसलिये इने नालये । वैक्रिय शरीर, वैक्रिय अड्रो पाङ्ग, देवगति, देवा- नु पूर्वी, आहारक द्विक, शुभखगति, शूभवर्ण चतुष्क, तैजस, कार्मण, अगुरु लघु, निर्माण, तिर्थकर नाम, सातावेदनीय, ममचतुररस्र संस्थान, पराघात, सदशका. प- *न्द्रिय जाति, श्वाशो छवास, और उंच गोत्र. यह२३ पुण्य प्रकृत्तिका उत्कृष्ट रसबंध श्रीण में चडने वाले मनुष्य के होता है. इस में भी साता वेदनीये, उंचगाव यशः कीर्ती, इन प्रकृत्ति का उत्कृष्ट रस बंध सूक्ष्म सम्पराय के चरम भाग * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अहशित द्वारी * १८३ वर्ती भपक के होता है; क्योंक-इन प्रकृति के बंध के लिये येही अत्यंत विशुद्ध स्थान है, और इन विना वाकी रही जो २९ प्रकृति उनका उत्कृष्ट रस बंध अपूर्व करण के सात भाग में के छठे भाग में ३० प्रकृति का वंध विच्छेद होता है वहां-एक उपघात विना वाकी की २९ प्रकृति के चरम बंध में क्षपक के अत्यन्त विशुद्ध परि- णाम परवर्तते चौठाणी रस बंध होता है. उपशम श्रेणि में भी यह गुणस्थान है, परं- तु धपक जितनी विशुद्धि नहीं होने से उत्कृष्ट रस बंध के अधिकारी नहीं है, और देवता नरक तिर्यच मे तो यह गुणस्थान हेही नहीं. तो इन प्रकृति यों का उत्कृष्ट रस वंध होवे कहां से. । उद्योत नाम कर्म का उतकृष्ट रस बंध सातवी नरक के जी- वो अकाम निर्जरा कर कर्म भय करते विशुद्ध परिणाम कर सम्यक्त्व प्राप्त करने के लिये आनटात्ते करण कर मिथ्याव की स्थिति के दो भाग करे. उस अंतकरण की प्रथम स्थिति के चरम समय उद्योत नाम का उत्कृष्ट रस बंध करे. और दुसरे नरक के या देवता के जीवों तो ऐसे परिणाम में प्रत ते मनुप्य प्रायोग्य का बंध करते हैं. सो वंध इस सप्तम नरक मे नहीं है. फक्त तिचायु ही बांधते है, इसलिये तिर्यंचायु की सहकारी उद्योत नाम कर्म का उत्कृष्ट रम बंध यहां ही होताहै. मनुप्य- द्विक. औदारिक द्विक. वज़ ऋषभ नाराच मंघयण, यह ५ प्रकृति मनुप्य गति प्रायो- ग्य अतिहि गुद सम्यक दृष्टि देवता-जिनाख्यान श्रवण करते. जैन नोन्नति का का- र्य करते. सम्यक्त्व उज्वल ते. चारों संघ की भक्ति करते उत्कृष्ट रम बंध करते हैं. मनुष्य जो ऐसी विशुद्ध में प्रवर्ते तो देवायु वधे. और देवता में यह प्रकृनियों है नहीं. इसलिये यहां सम्यक्त्वी देवही लिये हैं. और नरक के सम्यक दृष्टि को इन वंध के कारणों का अभाव होने मे उत्कृष्ट रम बंध नहीं कर मकने है. देवायु का उ- त्कृष्ट रस वंध सागरोपम का प्रमत गुण स्थान मे अप्रमन गुणस्थानान्ढ होने हुवे साधु आति विशुद्धि कर बंधने हैं. क्योंके देवायु में अति विशृद्धि का स्यानक येह ही है. उपर कही प्रकृत्तियों मे मे शेप वाकी रही मो-२ ज्ञानावरणीय. ९ दर्ग- नावरणीय. १८ कपाय. १ मिध्यामोहनी. ९ नो कपाय. प्रथम मंघमण विना में- घमण. प्रथम मंस्थान विना पांच मंस्थान. अभ वर्ण चतुप्ज. अस्थिर पटक. उप- घात. कु मगति. नीच गांव और पांच अंतराय. या ६८ प्रकृतिका उत्कृष्ट रनबंध चारों गति के पंचोन्द्रिय पर्यामा निध्यात्र दृष्टि जीगक होता है. इम में मध्य के मंघ- यण और मध्य के चार संस्थान. सी. पुम्पद. धान्य गति. इन १२ मति वि.

१८४ प्रथम अयं काण्डका-द्वितीय कर्मद्वारा रोहण खाण्ड * ना वाकी रही सो ५६ प्रकृति यों का उत्कृष्ट रस बंधाधवसाय स्थानक में जो अत्यं- त मलीन संक्लिष्ट अध्यवसाय स्थानक होवे वहां ही उत्कृष्ट रस बंध होता है, और हॉस्य तथा रति का उत्कृष्ट रस बंध मध्य मक्लेश स्थानक में बंध ते हैं, क्योंकि उत्कृ- ट संक्लेश तो नपुंसक वेद शोक और अरति का बंध करता है, और हुंड संस्थान त- था छेवटा संघयण का उत्कृष्ट रस बंध ते हैं. इसलिये इन १२ प्रकृति का उत्कृष्ट रस मध्यम संक्लेशी चतूर्गति के जीवों जानना. रस वंध के चार प्रकार-१ जिसमे हीन-कमी कोइ रस बंध न होवे सो 'जय- न्य रस बंध. २ और इस इस सिवाय दूसरे सब अजघन्य रस वध. (इन दोनों भेदों में सब बंध का समावेश हो जाता है) तथा-१ जिस से अधिक दुसरा कोइ तीव्र रस बंध नही होवे सो 'उत्कृष्ट रस वंध.' २ और उस मे एकादि रन विभान हीन- कम ऐले सर्व रस वन्ध सो-'अनुत्कृष्ट रस बंध. (इन दोनों में भी सब का समावेश होता है) इन चारों को कर्य प्रकृत्तियो पर उतारते हैं. तेजस कार्मण, अगुरु लघु, निर्माण, और शुभ वर्ण चतूष्क इन ८ उत्तर प्रक ति का उत्कृष्ट रस बंध अपूर्व करण नामक अथम गुणस्थान के छठे भाग के प्रान्तमें अपने चरम वंधों एक उत्कृष्ट रस स्थानक होताहै. और उस विना सब अनुत्क्रष्ट रस वंध स्थानक जानने. और जिनको इस स्थानक की प्राप्ति नहीं हुइ, उन को सदा अ- नुत्कृष्ट रस बंध स्थानक जानना. सो अनादि जाणना. और जो जीव उमशम श्रेणे में उत्कृष्ट रस बंध कर फिर वहां से पडता हुवा हीन रस बंध करे, वहां अनुत्कृष्ट रस बंध की सादि जाणना, और अभव्य को यह स्थानक प्राप्त होता नहीं है. तथा उ- स्कृष्ट रस बंध करना नहीहै इससे उनके अनुत्कृष्ट रस वध अनंत जाणना. और भव्य जीव होवेगा वो श्रेणि प्रतिपन्न हो उत्कृष्ट रस बंध करेगा वहां अनुत्कृष्ट रस बंध का सांत पणा होता है. साता वेदनीय ओर यश कीर्ती इन दोनों शुभ प्रकृति का उत्कृ रस वध क्षपक के दशवे गुणस्थान के अंत समय में पाता है. इसलिये उस स्थान- को जो नहीं भात हुवे उन के अनुत्कृष्ट की अनादि, और जो इस स्थानक को होकर पीछे पडे, उन के फिर बंध होती वक्त सादि, अभव्य के अनंत, और को उत्कृष्ट रस वंध करेगे इनलिये अनुत्कृष्ट रत वन्धका सांत पणा. और इन प्रकृत्ति का उत्कृष्ट बंध क्षपक के अपूर्व करण में होवे, उस ने प्रथम बंध कर- सुरु किया इसलिये सादि बंध एक समय होता है, परंतु आगे नहीं होता, इसाल * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थाना रोहण अहीशतद्वारी * १८५ ये सांत दुसरा भांगा. तथा यह आठों शुभ प्रकृति है इसलिये इनका जघन्य रस स- वरेत्कृष्ट संक्लेश में वर्तते मिथ्यात्त्री जीव सझी पर्याप्त बंध करता है, सो एक अथवा दो समय पर्यन्त. फिर अजयन्य बंध वाचता है. फिर कालांतर में सर्वोत्कृष्ट संक्लेश को प्राप्त हो जयन्य रस बंध करे. यों जयन्य अजघन्य में फिरता जीव को सादि और लांत यह दो भागे पाते हैं । उपर कहे तेजस चतुप्फ विना वाकी रही जो-ज्ञा- ना वरणीय ५. दर्शनावरणीय १. कपाय १६. मिथ्यात मोहनीय १. अंतराय ५. भय १. दुगच्छा. उपघात. और अगूम वर्ण चतुष्क, यह ४३ प्रकृति ध्रुव बंध की है. सो अशुभ है. इनका जयन्य रस बंध विशुद्धि कर के अपने चरम बंध में होता है. और उस स्थानक को जो प्रात नहीं हुवे उन के अजयन्य रन बंध की अनादि,और जो इस श्रेणि में पड़कर फिर बन्ध करे उनके सादि. और अभव्य जघन्य रस वंध नहीं वंधता है. उसने उनके अजयन्य रसंबंध अनन्त और भव्य जीव मम्यक्त्वकी प्रा- ति करेगे तब उन स्थान को प्रात हो जयन्य रसंबंध करेगे वहां अजयन्य रमबंध का मान्तपणा. ज्ञानावरणीय. दर्शनावरणीय. मोहनीय और अन्तराय यह चारो घातिक कर्म है इन में में मोहनयि का तो नव वे गुणस्थान के प्रांत में. और तनिों कमा का दश वे गुणस्थान के प्रांत मे जघन्य रस बंध होता है. बाकी रहे सर्व स्थानों में अ- जवन्ध रम बंध होता है. . इसके चार भॉगः-१ जिन के जघन्य रम वंध न हुवा उस के अजयन्द रम व अनादि. २ जो जयन्य रम बंध कर फिर श्रेणि मे पडते अजयन्य रन बंध करे तहां नादि, ः अभव्य के अजयन्य रम बंध अनंत. औरटम- व्य के अजवन्य रम बंध सान्त. इन चारों कमों के अजयन्य रम विना वाकी के तीनों बन्ध मे सादि नान्त भागा पाता है. गोत्र कर्म के अनुत्कृष्ट तथा अजन्य इन दोनों रन बंध में चार भांगेः-नीच गौव का जवन्य रन बंध मानवी नरक में ग्रंथी भेद कर निथ्यत्व के अंतिम समय में बंध करे. उन स्थानक को जो प्राप्त नहीं हुवे उनके अनादि का अजयन्य सा होता है. २ जो एक नमय में अजयन्य ग्म बंध कर फिर अजयन्य रन बंध करे उनके मादि. : अभव्य जीव उन स्थानक को कदापि नहीं सन्चे इमलिये उन के अनन्न. और भव्य जीव जयत्य ग्म वन्य करेंगे और रन बंध का विच्छेद भी होगा इसलिये मांत. ऐनेहीच गौव का विद्याधना से उत्कृष्ट रसबन्ध दावे गुपस्यान के मान्न में होता है. उस विना और गर अनुक घस बंध जानना. वहां निम ने श्रेणि नहीं की उम ने उन्टमबंध नही रिण १८६ प्रथम अर्थ काण्डका-द्वितीय कर्म द्वारा रोहण खण्ड ११ उसके अनुत्कृष्ट रम बंध अनादि; और श्रोर्णसे पड ते उत्कृष्ट रम बंध कर फिर अनुत्कृष्ट रस बंध करे तहां सादि, अभव्य के अनुत्कृष्ट रस बंध अनंत, और भव्य को अनुत्कृष्ट रस का सांत, इन ध्रुव बंध की ४७ प्रकृति मिवाय वाकी रही सो- औदारिक, वैक्रिय, आहारक-यह तीन शरीर, और इन तीनों के अड्रोपाइ तीन, छ संघयण, छे संस्थान, ४ गति, ५ जाति, खगति द्विक, अनुपूर्वी चतुप्क, जिननाम उद्योत, आताप, पराघात, सदशका, स्थावर दशका,(यह५८नाम कर्मकी प्रकृति वेद- नी द्विक, गौत्र द्विक, तीन वेद, हास्यादि युगल द्विक, और ४ आयप्य, यह ७३ अध्रुव वन्ध की प्रकृति के उत्कृष्ट अनुत्कृष्ट, जघन्य, अजघन्य, यह चारों बंध-सादि और सांत यह दो भागे पाते हैं. क्योंक-इन प्रकृतियों का बंध कभी होता है, कभी नहीं भी होता है. जब हाये तव सादि, और न होय तव सान्त जानना. (इति अनु- भाग वन्ध.) प्रदेश-बन्ध जैसे किसी "कुची कर्ण" नामक गाथापति के गौशाळ में बहूत गाइयों होने से उनकी सुख से गिनती लगाने जो वर्णादि गुणकर मिलती हुइ गाइयो के अलग २ टोले बंधे. तैसेही ज्ञानी महान पुरुषोंने अनन्त पुद्गल स्कन्धो को अलग २ देख उनके भेदान्तर मुख से जानने में आवे इसकेलिये प्रमाणुओं की संख्या के सरीखे २ स्क- धों के टोले वधे उनका नाम "वर्गणा" ऐसा स्थापन किया. जैसे १ जगत् में छुट्टकर एकेक प्रमाणुओं हैं। उनका टोळा सो प्रथम वर्गणा. तैसेही दोप्रमाणुओ एकत्र मिलने से जो स्कन्ध हुवा उसे द्वणुक कहना. उसका टोला सो दूसरी वर्गणा. तैसेही तीन प्र माणुओं से निष्यन्न स्कंध सो 'वणुक.' उसका टोला मोतीसरी वर्गणा. यो एकेक प्र. माणुओं अधिक होते स्कंध के वरोवरी के टोळे उसकी वर्गणा. अधिक २ होती जाती है. २ यों अधिक होती २ अभव्यजीवों से अनन्त गुण अधिक और सिद्धके जीवों के अनंतवें भाग प्रमाणे प्रमाणुओंसे निप्यन्न जो स्कंध सो औदारिक शरीर निपजाने ला- यक होवे. इसलिये वो स्कंध औदारिक शरीर को गृहण करने योग्य होवें. इसलियो वो. औदारिक के गृहण करने योग्य जघन्य वर्गणा होती है. इससे एक प्रमाणु कम स्कंध वर्गणा पर्यंत सव अगुहण योग्य वर्गणा. कहना. क्योकि-वैसे स्कधंसे शरीर की निष्य- ति नहीं होती है, । अव वो जघन्य औदारिक शरीरं आरंभक स्कथं वर्गणा उससे ए- मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी र केक प्रमाणु अधिक स्कंध की ऐसी दूसरी-तीसरी-चौथी-पांचवी यों बढते २ अन- न्त वर्गणा. औदारिक शरीर-गृहण योग्य पणे होवे. उस औदारिक शरीर गृहण योग्य जघन्य वर्गणा. से अंनतवे भाग अधिक औदारिक शरीर गृहण योग्य उत्कृष्टि वर्गणा होवे. वो अनन्त वा भाग भी अनंत प्रमाणु रूप जाणना. इसलिये औदारिक के ग्रह- ण करने योग्य भी अनन्त वर्गणा. होती है. इ औदारिक शरीर की उत्कृष्ट वर्गणा- से एकेक प्रमाणु अधिक स्कन्ध की वर्गणा. सो औदारिक की अपेक्षा से बहुत प्रदे. शोपचित तथा मूक्ष्म परिणाम पारणात. उससे औदारिक के अग्रहण योग्य और वै- क्रिय शरीर आरंभक स्कन्ध की अपेक्षा से अल्पप्रदेशोपचित तया वादर परिणात, इसलिये वैक्रिय शरीरके भी अगृहण योग्य.यों एकेक प्रदेश अधिक होते स्कन्ध अनंत की अभव्यसे अनन्त गुण और सिक्के अनन्तवे भाग प्रमणा इतनी वर्गणासो वैक्रिय शरीर के अगृहण योग्य जाणना. ४ उससे एक प्रदेश अधिक स्कन्ध की वर्गणा सो वैक्रिय शरीर आरंभ करते जघन्य ग्रहण योग्य वर्गणा जाणना. योंही और एकेक म देश वहते स्कन्ध की अनन्ती वर्गणा वैक्रिय शरीर निप्पादक होती है, वोभी जयन्य वैक्रिय गृहण योन्य वर्गणा से अपने अनन्तवे प्रमाण अधिक वैक्रिय शरीर के गृहण योग्य उत्कृष्ट वर्गणा होती है. इसलिये यह भी अनन्त वर्गणा जागना. ५ उस वैकि य गृहण योग्य उत्कृष्ट वर्गणा से एक प्रदेश अधिक स्कन्ध की वर्गणा सो वैक्रियदल की अपेक्षा में बहुत प्रदेश निप्पन्न तथा सूक्ष्म पारणात होती हैं. और आक्षक श- रीर प्रायोग्य दल को अपेक्षा अल्प प्रदेशी तथा वानर परिणात होती है. उनलिये वे- क्रिय तथा आहारक इन दोनों शरीर के कान में नहीं आये. इसलिये वो अगृहण यो- ग्य वर्गगा जाणना. वो भी एकेक प्रदेश आर्थिक होते २ स्कन्ध की अभय मे अन- न्त गुण और निको के अनन्तवे भाग प्रमाग अनन्त वर्गणा जाणना. ( यह अनन्नि अगृहण योग्य प्रदेश की वर्गणा होती है ) ६ फिर उनमें भी एक प्रदेन अधिक स्क: न्ध की वर्गणा उन करके वो आतरक गरीर की निप्पति हो. इनलिये वो आहार क प्रायोग्य जवन्य वर्गणा होनी है. वोमी एकादि नन अधिक होते. अनन्त स्वन्ध की अनन्नी वर्गगा होती है. वो जपन्य वर्गणा के अनन्न वे भाग प्रमाण प्रदेश मेव ढती ऐनी उत्कृष्ट आहारक शरीर के गृहण करने योन्य वर्गणा अनन्नी होती है. ७ उस आहारक गृहण योग्य उत्कृष्ट वर्गगा में एक प्रदेश अधिक कन्च कीवर्गणामो आहारक की अपेक्षा बहुन प्रदेशिक तथा नल और नेजन की अपेका अन्य नदेगि . - ।

૧૮૮ * प्रथम अर्थ काण्डका-द्वितीय कर्म द्वारा रोहण खण्ड र क वादर परिणत इसलिये दोनों शरीर के गृहण करने योग्य नहीं ऐसी जघन्य वर्ग- णा उससे एकाधिक प्रदेश बढती यावत् अभव्यसे अनन्त गुण वर्गणा इन दोनों श- रीर के अगृहण करने योग्य होवे, इसलिये अगृहण वर्गणा कहीं. ८ उस उत्कृष्ट अ- गृहण योग्य वर्गणा दलसे एक प्रदेश अधिक स्कन्ध की वर्गणा सो तैजस शरीर मो- योग्य जघन्य वर्गणा जाणना. फिर उससे एकेक प्रदेश दिहोते स्कन्ध की यावत् जघन्य तैजस शरीर वर्गणाके अनन्त भाग जो अनन्त प्रमाणु उससे अधिक ऐसीउ स्कृष्ट तैजस शरीर के गृहण करने योग्य वर्गणा अनन्त जाणनी. ९ उस तैजसे शरीर के गृहण करने योग्य उत्कृष्ट वर्गणा के स्कन्धसे एक प्रदेश अधिक स्कन्ध सो तैज- स की अपेक्षा से बहुत प्रदेशिक सूक्ष्म और भापा दलकी अपेक्षा से अल्प प्रदेशिक वादर होताहै इसलिये वो दोनों शरीर के काम में नहीं आने से गृहण करने को अ. योग्य ऐसी जघन्य वर्गणा जाणना. यों एकेक प्रदेश अधिक होते स्कन्ध की अभव्य से अनन्त गुणी और सिद्ध के अनन्तवे भाग प्रमाण इतनी वर्गणा अगृहण योग्य हो- ती है. १० उस उत्कृष्ट गृहण करने योग्य वर्गणा से एक प्रदेश अधिक स्कन्ध सी भाषा के दल के काम आवे इसलिये वो जघन्य भापा गृहण योग्य वर्गणा होती है. उससे भी और एकाधिक प्रदेश अधिक होती यावत् जघन्य भाषा वर्गणा के अनन्त वे भाग जो अनन्त प्रमाणूओं, तहां बढते स्कन्धकी ऐसी अनन्त वर्गणा भाषा के गृ- हण योग्य होती है. ११ उस भाषा के गृहण करने योग्य उत्कृष्ट वर्गणा से एकादि- क प्रदेश वृद्धि होते यावत् अभव्य से अनंत गुण प्रदेश पर्यन्त बृद्धि होते अनन्त व णा सो सर्व भापा शरीर की अपेक्षा से बहुत प्रदेशीक सूक्ष्म और, श्वाशोछास की अपेक्षा से वादर अल्प प्रदेशिक स्कन्ध, इसलिये वो वर्गणा दोनों के शरीर के गृह- ण योग्य ऐसी अनती जाणनी. १२ और उससे एक प्रदेशाधिक स्कन्धकी वर्गणा उससे श्वाशोवास निपजे इसलिये ऐसे स्कन्ध समुदाय सो श्वासोवास ग्रहण योग्य जघन्य वर्गणा जाणना. इस से एकादिक प्रदेश वृद्धिपति यावत् जघन्य वर्गणा के अ संख्यातवे भागमें जितने प्रदेश तत्ममाण उतने प्रदेश वृद्धि जो वर्गणा सो श्वाशोछवा स की गृहण करने योग्य उत्कृष्टि वर्गणा जाणनी, १३उससे एक प्रदेश अधिक स्क- घकी अगृहण योग्य वर्गणा. पूर्वकी तरह श्वाशोवास की तथा मन को भी अगृह ण योग्य तैसी एकादि प्रदेश वृद्धि पाति यावत् अभव्य से अनन्त गुणी वर्गणा अ- गृहण योग्य जाणनी. १४ ऐसाही तरह और भी उस वर्गणा से एकादि प्रदेश अधि.

* मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अहीशत द्वारी * क स्काय उस करके द्रव्य मन उत्पन्न होवे. इसलिये वो जघस्य मनो द्रव्य गृहण यो- ग्य वर्गणा जाणना. उससे एकादि प्रदेश अधिक रस्कन्ध सो यावत् निज जघन्य वर्गणा स्कन्धके अनन्त वे भाग जो प्रदेश होवे उतने प्रदेश वृद्धपाति उत्कृष्टि मनो गृहण योग्य वर्ग- णा होवे. १५ उससे एक प्रदेश आधिक पुद्गल स्कन्ध की वर्गणा सो मनो द्रव्य की अपेक्षा से बहुत प्रदेशी मूक्ष्म जाणना. और कर्म दलकी अपेक्षा से अल्प मदेशिक वा दर जाणना. इसलिये दोंनो शरीर के गृहण करने योग्य नहीं ऐमी अभव्य से अनत गुणी वर्गणा जाणना.१६ और भी उससे एक प्रदेश बृद्धि होते पुद्गल स्कन्ध की व गणा सो कर्म दल गृहण योग्य होती है. इसलिये सो कर्म प्रायोग्य जघन्य वर्गणा जा- णना. उससे भी एकादि प्रदेश वृद्धि पति यावत् अपनी जघन्य वर्गणा के अनन्त भाग प्रदेश प्रमाण प्रदेश से बढ़ती उत्कृष्टी कर्म ग्रहण योग्य पुइल की वर्गणा जाण नी. उम करके कर्म दलमे कर्म प्रकृत्ति का वन्ध होता है। एक कर्म की जघन्य और उत्कृष्टी के बीच में मध्यम अनन्त वर्गणा होती है. तैसे दल कर कर्म प्रकृत्ति का ब- न्ध पडता है. इसलिये इसे कर्म गृहण योग्य वर्गणा कही जाती है. उपरोक्त वर्गणा सो जीव को गृहण करने योग्य पुइल है. जीवके आश्रित रह तेरे इसलिये उपचार से उसको मचित्त वर्गणा कहना. और इसमे एकादि प्रदेश अ- थिक पदलो का स्कन्ध जिसे जीवो गृहण करे मकै नहीं इमलिये उमे अचित्त वर्वणा कहना. वो अचित्त वनणा भी सब जीवोमे अनन्त गुण अधिक है. इन वर्गणा का स्व रूप नहज मे समझाने के लिये कल्पित दृष्टान्त कहते है:-जने एक मे लगाकर दशप- र्यन्त प्रमाणु निप्पन्न अगृहण योग्य वर्गणा जाणना. उनमे ११-१२-१३ प्रमाणु नि- प्पन मो औदारिक गृहण योग्य वर्गणा जाणना. उममे १४-१५-१६-१७-१८-११- और २० पर्यन्त अग्रहण योग्य वर्गणा जाणना. फिर २१.२२-२६ पर्यन्त वैदियश रीरके गृहण करने योग्य वर्गणा जाणना. यों आटों वर्गणा गृहण योग्य, और वीचर की आठो वर्गणा अगृहण जोग. या १६ वर्गणा मारत होती है. १ यह उपरोक्त उत्कृष्ट कर्म वर्गणा मे एकादि प्रदेश अधिक स्कन्ध की नई जीव ने अनन्त वर्गणा. मो निरन्व-हमेगा मिलती है. परन्तु वैमे स्कन्ध की वर्गणा. जीगे के गृहण करने योग्य नहीं होती है. इसलिये उमे ध्रुवाचित जयन्न वर्गणा क- हना. उन जयन्य वर्गणा में उत्कृष्ट वर्गमा के प्रदेश अनन्न गुणें होते हैं. में उन्न- दृ धृवाचित्त वर्गणा कहना. २ उमने और भी एकजादि प्रदेश अधिक स्कन्नी वर्ग " १२० * प्रथम अर्थ काण्डका-द्वितीय कर्मद्वारा रोहण खंड. ११ णा अनाति, सब जीवोंसे अनन्त गुणी, ऐसे पुद्गल स्कन्ध कभी निरन्व भी होते हैं, और कभी सांतर पणे भी होता है, इसलिये अवैवाचित्त वर्गणा कहना. ३ उससे ए- कादि प्रदेश अधिक पुद्गल स्कन्ध की वर्गणा नहीं मिलती है, परन्तु आगेकी वर्गणा कंध का महत्व पणा बताने कही है, ऐसे भी अनती शून्य वर्गणा होतीहै, उससे ज- धन्य वर्गणाके प्रदेश क्षेत्र पल्योपमके असंख्यातवे भाग प्रमाणा प्रदेशकी राशीमे गु- णाकार करना तब उत्कृष्ट वर्गणा होती है. ४उससे एक प्रदेशाधिक स्कन्ध वो साधा- रण तो नहीं परन्तु प्रसेक जीवके औदारिकांदि पांचो शरीर के प्रदेश, उत्तमेंके एक प्रदेश सर्व जीवोंसे अनन्त गुणा विश्रला परिणात सूक्ष्म पुद्गल स्कंध का नाम प्रसेक वर्गणा कहना. वो भी जवन्य वर्गणा से उत्कृष्ट वर्गणा क्षेत्र पल्योपम के असंख्यातवे भाग रुप असंख्याता प्रदेश गुणाकार करने से वो भी अनंती वर्गणा जाणना. ५ उ. ममे अनंत शून्य वर्गणा प्रदेशोत्तर कल्पिए. वोमी जवन्य वर्गणा से लगाकर उत्कृष्ट वर्गणा पर्यन्त अनन्त वर्गणा जाणना. ६ उससे भी एकादि प्रदेश अधिक पुद्गल की वर्गणा सो वादर निगोदिये जीव के तीनो शरीर प्रदेशों के आश्रित अनन्ता पुद्गल स्कन्ध विश्रसा होते हैं, उसकी भी एकादि प्रदेश वृद्धि पाती अनन्त वर्गणा जाणनी, वोभी जघन्य वर्गणा से उत्कृष्ट वर्गणा प्रदेश संख्यात असंख्यात गुणा होता है. ७ उससे भी और असत्कल्पना से अनन्ति शून्य वर्गणा पहिले की तरह जाणना. ८ उ ससे भी प्रदेशाधिक स्कन्ध वर्गणा सो सूक्ष्म निगोद शरीर प्रदेशाश्रित अनन्त पुद्गल स्कन्ध विश्रसा परिणत उसकी वर्गणा अनंती वर्गणा जाणना. वो भी जघन्य वर्गणा से आवली के असंख्यात वे भाग प्रमाण समय की राशिसे जघन्य वर्गणा को गुणा करते उत्कृष्ट वर्गणा होती है. १ उससे भी और एकादि प्रदेशाधिक ऐसी असत्कल्प ना से अनन्ती वर्गणा होती है. १० उससे भी और प्रदेशाधिक मिश्र स्कन्ध जिसका सूक्ष्म पणा से वादर पणा प्राप्त करने आभमुख सो मिश्रस्कन्ध की वर्गणा अनन्ति जाणना. ११ उससे अचित्त महास्कन्ध जो पर्वत कूटादिक को विश्रसा परिणामें अ- श्रित अनन्त प्रदेशात्मक पुद्गल स्कन्ध जो विश्रता परिण में (१) दंड, (२) कपाट, (३) मंथन, (४) अन्तर पूर्णादि करता केवल समुत्यात की तरह आठ समय का अ- जीव समुत्यात होता है, वहां चौथे समय सर्व लोका प्रमाण स्कन्ध होता हैः अजिता दि जिनश्वर के बारे में त्रस जीवो की उत्पति अधिक होती है, उस वक्त वो स्कन्ध थोडे होते हैं, और जिस वक्त वस जीव थोडे होते हैं उस वक्त वो स्कन्ध बहूत होते मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी १९१ हैं, यह लोकस्थिति की वर्गणा भी अनन्ती जाणना. १२ इस से भी अधिक प्रदेश स्कन्ध पन्नवणाजी सूव में फरमाये हैं. और एकाणकादिक द्वणुकादिक अर्थाव-एक प्रमाणु की दोप्रमाणु की व- गणा, आदि शब्दसे तीन चार पांच जावत् संख्यात असंख्यात और अभव्य से अ. नन्त गुणी अधिक और सिद्धक्के जीवों के अनन्त वे भाग प्रमाणु की वर्गणा सो औ- दारिक शरीर के गृहण करने योग्य होती है. ऐसी अनन्त वर्गणा जाणना. इससे भी एकादि प्रमाणु अधिक वहती ऐसहिी अनन्त सो औदारिक शरीर के अगृहण करने योग्य जाणनी. ऐसेही दूसरी क्रिय, शरीर के गृहण करने योग्य. तीसरी आहारक शरीरके ग्रहण करने योग्य. चौथी तेजस के ग्रहण करने योग्य, पांचवी भापा के ग्रहणे योग्य. छट्टी श्वाशाश्वास के ग्रहणे योग्य. सातवी मन के ग्रहणे योग्य, और आठवी कार्मण के गृहणे योग्य. इन आठों वर्गणा का अनुक्रम से अवकाश क्षेत्र ए- केक से एकेक का मूक्ष्म होता है. अर्थात्-औदारिक गृहण योग्य वर्गणा का अवगा हना क्षेत्र से औदारिक अगृहण योग्य वर्गणा का अब गाहना क्षेव सूक्ष्म. उस से वैक्रिय गृहण योग्य वर्गणा का अवगहना भेव सूक्ष्म. यों अनुक्रममे आठों का जान ना. यद्यपि इन आठों वर्गणा का क्षेव अंगुल के असंख्यातवे भाग है. तद्यपि एकेक से एकेक की अवगाहना छोटी होती है. क्योंके ज्यों विशेष पुदलों के प्रमाणुओं स मुदाय मिलता है त्यों विशेष मुक्ष्म परिणाम होता है. जैने कपास (रुड) के थोडे प्र- देश भी विशेष क्षेत्र को रोकते हैं. और पार के बहुत पुद्गल थोडा क्षेव रोकते हैं. प्रश्न-अमूर्ती आत्मा को मूर्तीमंत कमों से उपघात कैसे होता है ? उत्तर-जैसे मूर्तीमन्त मदीरापान करनेसे अस्पी ज्ञानका उपघाता होता हुवा-चावलाप- ना प्राप्त होता हुवा. और सारस्वत चूर्ण का सेवन करने से ज्ञान वृद्धि होती हुइ प्र- त्यस दृष्टि आती है, तैमे ही अगुरु लघु पुदल द्रव्य कर्म दल का अगुरु लघु आत्म द्रव्य के साथ सम्बंध होता है. उस से ज्ञानादि गुणों का उपघात होता है, और जिन नामादि शुभ कर्म कर एश्चर्य पूजादि अनुग्रह भी होता है. उपरोक्त आठ वर्गण में से-१ औदारिक वर्गणा, २ वैक्रिय वर्गणा. आहारक वर्गणा, औरै ४ तेजस वर्गणा. यह ४ वर्गणा में-५ वर्ण, २ गंध. ५ रस और ८ स्पर्श यह २० गुण पाते हैं. इसलिये गुरु लघु द्रव्य कहे जाते हैं. और-१ भापा व. गणा, २ श्वाशोश्वास वर्गणा, : मन वर्गणा, और ४ कर्म वर्गणा. इन ४ वर्गणा में.

११२ * प्रथम अर्थ काण्डका-द्वितीय कर्मद्वारा रोहण खाण्ड पर ५ वर्ण, २ गंध, ५ रस और ४ स्पर्श यों १६ गुण पाते हैं. इसलिये इने अगुरू लघु द्रव्य कहे जाते हैं. क्योकि-शीत, उष्ण, रुन, और स्निग्ध, यह ४ स्पर्श अगुरू लघु द्रव्य हैं. एक प्रमाणु में तो-१ वर्ण, १ गंध, १ रस और २ स्पर्श यह ५ गुण पाते हैं, क्योंकि रुक्ष और निग्य प्रमाणु के परस्पर बंध होता है, इसलिये छुट्टै सर्व प्रमाणुओं में तो इन दोनो मे का एकही स्पर्श जरूर पाता है, + तैसे ही शीत और उष्ण मे का भी एक स्पर्श पाता है. और अनन्त प्रदेशी यह सूक्ष्म परिणत स्कंध में काइ प्रमाण लिग्ध शीत, कोइ निग्य उष्ण, कोइ रुक्ष गीत और कोई रुक्ष उष्ण, यो चार जाति के प्रमाणुओं मिलते हैं. व भापा, श्वाशोश्वान, मन, और कर्म, इन चारों के दल में चार स्पर्श मिलते हैं. सर्व जघन्य रस से युक्त जो पुद्गल उसका रस x केवल ज्ञानी की प्रज्ञा कर छेद्यमान सर्व जीवो से अनंत गुण रस विभाग को देता है, वो विभाग अति भूक्ष्म- ता के योग्य से दुसरे भाव के अभाव से निरंश अंश अगुकहे जाते हैं. * उस रसा- णू के प्रति स्कन्ध सर्व प्रमाणुओ मे सर्व जीवो से अनंत गुण वर्त ते हैं. ऐसे रासाणु युक्त पारंगत कर्म स्कंध दलिक को जीव ग्रहण करता है. वो जैते गौ घांस को खा; ती हुइ दुग्धादि मिष्ट रस उत्पन्न करती है, और सर्प दुग्ध पान करता गरल (विप) उत्पन्न करता है, तैसे ही कर्म दल के अनंत प्रदेशी स्कंध के प्रदेश २ प्रते अलग २ अनन्त रसाणु (अनुभाग) युक्त कर्म पणे जीव ग्रहण करता है, वो स्कंध भी अभव्य से अनन्तगुण सिद्ध के अनंत भाग वर्ती हैं. जिन आकाश प्रदेशो को आत्म प्रदेश ने आवगाहे उन ही आकाश प्रदे- शो को कर्मो के पुद्गलो ने अवगा हे हैं. जब जीव रागादि परिणति में परिणमता है तव वो कर्म पुद्गल दल आत्म प्रदेश से लिप्त होते हैं, परंतु अनंतर परंपर प्रदेशस्थ + पाठान्तर चारों वर्गणा स्कन्ध में मृदु लघु स्पर्शतो जरुर होता है. और रुक्ष त्रिग्धर्मका एक तथा शीत उष्ण में का एक, यो ४ स्पर्श पाते है. ऐसी भी किसा आचर्य का मतहै. x यहा रसाणु का अर्थ जीवके कषायी का अध्यवसाय जानत आनन्द विषाद हेतु शुभा- शुभ कर्मों का विपाक इष्टानिष्टपणे कर मिष्ट और कडुवारस जाणना. परन्तु पाचों रस में के किसी भी रसकी विवक्षा नहीं करनी. यहा तो भाव रसही कहना चाहीये. * रसाणु-रसविभाग-रमपल्छेिद-भाव प्रमाणु यह सब इसके पर्याय वाचिक नाम है. - ११३ * मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी र कर्भ पुद्गल द्रव्य के गृहण करते नहीं हैं. जैसे तीव्र अग्नि के ताप में तपता हुवा-उकल ता हुवा पाणी अपरका नीचे नचिका उपर आताहै. तैसे रागादि प्रणात केयोग्य कर आत्मा के असंख्यात प्रदेश + (आठ रूचक प्रदेश विना) आत लेते हैं. दो आत्म प्रदेश कपायिक अध्यवसाय रूप चीकणता कर कर्म म्प रज सहित क्षेत्र में आर्वत करते हुवे-जैसे तेल लगा हुवा शरीर कचरे में लोटने से कचरे कर लेपाता-धंवाता है, तैसे कर्म रज कर असंख्यात प्रदेश लेपाते-बांधते हैं. परन्तु ऐसा नहीं है कि-एक दोही प्रदेश लेपावें. क्योंक-जीव के असंख्यात प्रदेशों का श्रृंखलावय की तरह पर- सर सम्बंध है. इसलिये जब एक प्रदेश कर्म दल गृढग करने प्रवते तब सब प्रदेश प्रतते है. जैने हास्त (हाय) कर किसी वजनदार वस्तु को उठाते नव शरीर की श- क्ति का उपर आकर्षण होता है. इतना विशेष पंजे पर जोर ज्याल लगता है. उन. से भुजपर कन उनने खम्भे पर कम. उनसे अन्य शरीर पर कम. तेही कर्म गृहणके सम्बध मे नकिके प्रदेश के विशेष कर्म लगते हैं और दूरके प्रदेशोंके थोडे कर्म ल- गते है. परन्तु लाते मव प्रदेशों के हैं। अब जिस वक्त जीव आयु कर्म का वन्ध करता है उन वक्त अन्तर मुहूर्न प- चन्त मनय २ जो कर्म दल गृग करे उनके आठ विभाग कर आटों कर्मों को वॉट देताहै. और जिस वक्त आयु कर्म विना मात कोका बन्ध करे तब मान कमको वॉ- टदेता है. दसवे गुगस्मानो आयुज्य और मोहनीय दिना छे कर्मेका बन्न करेनव हे को बॉउदे. और जब एक वेदनीय का दन्यकरे नव उमरा हिस्सा भी एकही रहता इनमे नव भे थोडे अंश आयुका जाणना. क्योगि-दूसरे कनकि अपेक्षा मे आयुष्य कर्म की स्थिति थोडी है. इसलिये थोडे दालमे भोगवकर पृगको. उनसे नाम और गाव का भाग परम्पर नुल्य आयस्य ने अधिश, क्योकि इनकी स्थिति वीन वोडा कोड मारोपन की है. आर कर्म मे नग्ल्यात गुण अधिक है. मान्य. + उनमें - भाग मन्त्र -"- नट देशों मन x एन. रेन्दन १९४ प्रथम अर्थ काण्डका-द्वितीय कर्म द्वारा रोहण खण्ड ५९ ज्ञानावरणीय, दर्शना वरणीय, और अन्तराय इन तीनों कोंका हिस्सा आपसमें तु- ल्य, और नाम गौव से विशेषाधिक, क्योंकि इन तीनों की स्थिति तीस क्रोडा क्रोड सागरोपमकी है. इससे मोहनीय कर्म का हिस्सा विशेषाधिक क्योंकि-दर्शन मोहनी- य की स्थिति सीत्तर कोडा क्रोडी सागरोपम की है, और चारित्र मोहनीय की स्थि- ति चालीस नोडा क्रोडी सागरोपम की है. जैसे लूखा आहार (रोटे-राव प्रमुख ) आधिक होवे तोही क्षुधा का उपशम हो ता है, और चिक्कणा आहार (शीरा-मावा प्रमुख) थोडा भोगवने से क्षुधाका उपशम होजाता है. तथा पाषाणादि बहुत द्रव्यसे मृत्यु प्राप्त होताहै. और विप (हला हल) थो डासा ही मृत्यु प्राप्त करता है, तैसेही वेदनीय कर्मका अधिक भाग होने सेही अनुभव गौचर होता है, क्योकि इस कर्मका दल मंदरस वाला अघातिक है, इसलिये इसके मं दरस होते है. और मोहनीय कर्म कादल तीव्ररस वाला हैसो थोडा होवेतो भी आ- त्म गुण का घातिक होता है. इस में स्थिति की विशेषता नही लेनी. वाकी वर्स स्था- न ६ ही कर्मों में स्थिति की विशेष जाणना. अर्थात-जिसकी स्थिति ज्यादा उसका भाग भी ज्यादा और जिस की स्थिति कम उस का भाग भी कम होता है. और उत्तर प्रकृत्ति आश्रियः-प्रथम ज्ञानावरणीय कर्म का मूल भाग प्राप्त हु- वा उसमें से स्निग्ध सरस दल थोडा होवे ऐसे अनन्त वे भाग दलतो केवल ज्ञानावर णीय पणे परिण में, और वाकी दल रहासो मति ज्ञानावरणी आदि चारों प्रकृत्ति दे श घातिकहे उस पणे परिण में. । दर्शना वरणीय का जो मूल भाग प्राप्त हुवा उस का अनन्तवा भाग असन्त सरस दल तो पांचों निद्रा और केवल दर्शना वरणीय य ह ६ प्रकृत्ति त घातिक है इस पणे परिण में और वाकी रहा जो निरस भाग सो चक्षुदर्शनावरणीयादि तीनों देशघातिक है उस पणे परिणमें. । माता और असाता यह दोनों प्रकृत्ति वन्ध विरोधकी है इसलिये एक समय में एकही का वन्ध होता है, और इमहीलिये इसका भागभी नहीं पडताहै.मोहनीयका मूल भागजो प्राप्त होवे उसके अतन्त वे भाग मरस दलके दो विभाग होतेहैं-(१)दर्शन मोहनीयका और (२) चारित मोहनीयका. चारित मोहनीयके विभागके फिर१२भाग करना वो अनन्तान वन्धि चौक को चार, अप्रत्याख्याना वरणीय चौकको चार, और प्रत्याख्यानीवरणी चौकको चार यो १२भाग वॉटदेना. और वाकी रहै जो देशघातिक रस वन्त दल उसके दो विभाग १९५ * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थाना रोहण अदीशतद्वारी र कर(१) कपाय और (२) नो कपाय को वाँट देना. उसमेंसेभी कपाय का भागतो सं- ज्वल के चौक की चारों प्रकृत्ति को देना. और नोकपाय का एकवेद, एक युगल ( भय और दुगंछा ) इन पांचों प्रकृत्ति को वाँट देना. । आयुष्य कर्म की भी चारों प्रकृत्तियों बन्ध विरोधनी है क्योंकि एक वक्त में एकही गति के आयुष्य का वन्ध हो ता है इसलिये इसका भाग-हिस्सा भी नहीं होता है. । नाम कर्म का मूल भाग प्राप्त होवे उसको २१ हिस्से में वॉट देना;-१ गति. २ जाति, ३ शरीर, ४ उपाङ्ग, ५ व- न्धन. ६ संघयण. ७ संस्थान. ( अनुपूर्वी. १२ वर्ण चतुष्क, १३ अगुरुलघु. १४ उपघात. १५ उश्वाश. १६ निर्माण, १७ जिन नाम. १८ आताप, १९ शुभा शुभ विहायो गति, २९ बस दशाका. अथवा + स्थावर दशका. इन २९ में से जितनी का बन्ध पडता हो उतनेही भाग में बॉटदेना. और इसमें भी जो शरीर नाम की प्रकृत्ति है उसके तीन या चार भाग करना. उसमें वैक्रिय, आहारक, तेजस, और कार्मण, इ- न चारों का बंध होवे तब चार भाग करना. तथा औदारिक तेजस कर्मिण.या वैकि य तेजत कार्मण. इनका वंव होवे तव तीन २ भाग करना. और बंधन नाम के ७ त था ११ भाग करना. उसमें मनुष्य और तियेच पायोग्य वंधते औदारिक के बंधन चार. और तेजन कार्मणके बंधन तीन, सो सात भागते वंच होवे तब सात भाग में वॉ ट देना. और देव प्रायोग्य नाम कर्म की ३१ प्रकृत्ति का बंध करते वैक्रिय के बंधन तया आहारक का बंधन चार. और तेजन कार्मण के बंधन तीन, यों ११भाग से बंध करे तब इग्यारे हिस्से में वॉट देना. और वर्णनाम के ५ भाग. गंधनाम के २ भाग. रम नामके ५ भाग. सर्श नाम के ८ भाग, यो २० भाग होते हैं. और वाकी रही प्रकृत्तियों उनका भाग, होता नहीं है. क्योंकि वो सब प्रकृत्तियों बंध विरोध की है-एक वंध होते दूसरी का बंध नहीं होता है. जैसे एक गतिका बंध करते वाकी की तीनों गतिका बंध नहीं होता हैं. ऐतेही जाति मघयण संस्थान आदि. तया वसादिक दशका वंध करते स्थावाद विरोध की प्रकृत्तिका वंध नही पडे. ऐसे मवस्यान जा- नना. । ऐमेही गोत्र कर्म का भी भागीदार दूसरा नहीं होता है. क्योंकि-एक ममय चार: + त्रस दशके का भाग होवे तब स्थावर दशके का नहीं और स्थावर का होवे तत्र त्रत का नहा क्योंकि यह बन्ध विरोधकी प्रवृत्तियों है.

१९६ प्रथम अर्थ काण्डका-द्वितीय कर्म द्वारा रोहण खण्ड अंच या नीच दोनोंमेंस एकही गोत्रका बंध होताहै। और अंतराय कर्मका मूल भाग जो प्राप्त होवे उसे अन्तराय के पांचो भागो में बाँट देना. जिस प्रकृत्तिका बंध होता हो वो अपने २ प्रदेश दलिक भाग को प्राप्त होती है, और बन्ध विच्छेद होते उसका भाग जो दूसरी सजाति प्रकृत्तिका बन्ध होता हो उसे माप्त होता है. और कभी सजाति का बन्ध नहोता हो तो वीजाति को भी हिस्सा मिल जाता है, जैसे थीणद्ध विक का बन्ध विच्छेद होते उसका भाग निद्रा और,प्रच ला को मिले, और निद्रा प्रचाला का वन्ध विच्छेद होते उसका भाग चक्षुदर्शना. वर जीयादिक को मिले, और दर्शना वरण का बन्ध विच्छेद होते उसका भाग विजाति प्रकृत्ति वेदनीय है उसका वन्ध उसही गुणस्थान मे होवे, इसलिये उसे हिस्सा मिले. और मिथ्यात्व मोहनीय के बन्ध विच्छेद से इसकी सजाति दर्शन मोहनीय प्रकृत्तिका भी वन्ध नही होता है इसलिये विजाति चारित्र मोहनीय की प्रकृत्तिको इसका भाग मिले. उममें भी सरस दल मर्व धातिक प्रकृत्ति के योग्य होता है इसलिये सर्व घाति की बारही कपायों को उसका हिस्सा मिलता है. कर्म प्रकृत्तियों के उत्कृष्ट पदसे प्रदेश (कर्म दलिक ) की अल्पा बहुत्व:-? ज्ञानावरणीयः-(१) मव से थोडे केवल वरणीय के उत्कृष्टपद से कर्म दल, (२) उस मे मनः पर्यव ज्ञानावरणी के अनन्त गुणे. (३) उसमे अवधि ज्ञानावरणीय के विशेषा हीये. (४) उनमें श्रुतज्ञानावरणीय के विशेपाहीये. और (८) उममे मात ज्ञानावरणी- य के विशेषाधिक. । २ दर्शना. बरणीयः-(१) सर्व से थोडे प्रचला के. (२) उम मे निद्राकं विशंपके. () उममे प्रचना प्रचलाके विशपाहीये. (४) उममे निदा निद्रा के विशपाहीये. (६) उममे थाणद्री निद्रा के विशेषाधिक. (६) उममे केवल दर्शना वर- पीय के विगपाधिक, (७) उममे अवधि दर्शना वरणी के अनन्त गुणे. (८) उम में अचक्षुदर्शना बरणी के विगपाटय. और उनमे चक्षुदर्शना वरणीय के विशेपाहीये. बदनीय कर्म-(१) मवमे थोडा अमाता वेदनीय का भाग. (२) उम में मातावदनीय का विभपाधिक. । ४ मोहनीय कर्म-(१) बम मे थोडा अपत्याख्याना वरणीय मान (२) उममें अमन्याख्यानावरणीय क्रोध विशेषार्थिक, (३) उम मे अमत्याख्या नी माया विशेष, (४) उम से अप्रत्याग्यानी लोभ विशेष. (८-८) ही प्रन्या- ख्यानासनीय चागें की और (~10) अनन्तान दी चाग की अन्पा बहुन जापना. (१३) उम में-दुगंधार अनंत गुणे. (१५) उमभ भयके निगेप.(१६-१७) में . मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थाना रोहण अहीशतद्वारी १९७ उससे हांस्य और शोक के विशेष. और आपस मे तुल्य. ( १८-१९) उससे रति और अरतिके विशेष. और आपस में तुल्य. (२०-२१ ) उससे स्त्रीवेद और नपुंस- क वेदके विशेप और अपस मे स्वस्थान तुल्य. (२२) उससे संचल के क्रोधके विशे पाधिक. (२३) उसमे संचल के मान के विशेषाधिक. (२४) उससे पुरुषवेद के विशे पाधिक, (२५) उसने संचल की माया के विशेपाधिक और २६ उससेसंज्वल के लो भ के विशेषाधिकः । ४ आयुष्य कर्म की चारों पत्तियों के दलिक अपने २ स्थान तुल्य 1 ५ नाम कर्म (गति आश्रिय ) (२) सब से थोडे देव गति और नरक गति के दल. आपन में तुल्य (8) उनमे मनुष्य गति के विशेष. (४) उमसे तियेच गति के विशपे. ( जातिआश्रिय ) (१-४) सब मे थोडे वेन्द्रिय तेन्द्रिय चौरिन्द्रय औ र पचेन्द्रिय. आपस में स्वस्थान तुल्य. (८) उससे एकन्द्रिय जाति के विशेष (शरीर आश्रिय )-(१) सब से थोडे आहारक के. (२) उसमे वैक्रिय के विशेष. (B) उमसे. औदारिक के विशषे. (४) उससे तेजन के विशेष. और (५) उममे कर्मिण के विशेष (चोंही पांचों संघातन की भी अल्पा बहुत जानना.)-( उपाङ्ग आश्रिय)-(१) मरमे घोडे आहारक के. (२) उममे वैक्रिय के विशेप. और (३) उममे औदारिक के वि. शेप. ( इन्धन आश्रिय ) (१) सर्व से थोडे आहारक आहारक कथन. (२) उमने आ हारक तेजन इन्धन के विशेष. (6) उसमे आतरक जामण वन के विशेष. (४) 3. ससे आधारक तैजम कार्मण बन्ध के विशेष. (६) उनमे दैनिय बेत्रिय बन्ध के विदो प. (६) उसमे वैक्रिय तेजम पन्ध के विशेष. (१) उसने वैद्रिय कानन दध के वि- शेष. (८) उसमे दैक्रिय नेजन कार्मण इन्ध के विशेष. (९) उममे औदानिक औदा- कि वन्ध के विशेष. (१०) उनमे औदारिक जम बन्ध के विशेष. (११) उममंत्री दारिक कार्मण इन्ध के विशेष. (१२) उममे औदारिक जम कर्मणय के विशे. प (१३) उसने तेजन तेजन वयके विशेष. (११) उममे नेजन वा कन्वरे शिप और (१५) उनने कार्मिण कार्मण पन्य के विमपाधिद. ( मन्यान आश्रिय (..) मे यो निग्रोध, मादि. दापन हम इन चार मन्मान के और भारत में नुन्य उनले (६ नमवत्रत्व मम्मान के विशेष. और (६) जमने दंड भन्मपि. (घयन आश्रिय (4) मन मे थोटे पज पर नाच. सपन नावनग्न - धनारर और निन्दियपण के (६ जनने छटेचपन के दिन (मात्र य)(१) नर्व मे थोडे वर्ग के अन् इदान दे जिर.) मने पल . सव m -- १९८ प्रथम अर्थ काण्डका-द्वितीय कर्मद्वारा राहेण खंड. ५९ वर्णके विशेप, (४) उससे पित वर्ण के विशेष, और (५) उससे शुक्ल वर्णके विशेष, [ गंध आश्रिय ] [2] सब से थोडे सुर्भिगन्धके, (२) उससे दुर्भिगन्ध के विशेप. (र- स आश्रिय) (१) सब से थोडे तिक्त रस के. (२) उससे कटुक रस के विशेष, (३) उससे कपायले रसके विशप, (४) उससे आम्ल रसके विशेप, और (६) उससे मधुर रसके विशेष. ( स्पर्श आश्रिय ) (१-२) सब से थोडे करकश और गुरु स्पर्श के, आपस मे तुल्य. [३-४] उससे मृदु और लघु स्पर्शके विशप और आपस में तुल्य. (५-६) उससे रुक्ष और शीतके विशेप आपस में तुल्य. (७-८) और उससे स्निग्य और उष्ण स्पर्श के विशेष आपस में तुल्य. (आनुपूर्वी-आश्रिय) (१-२) सब से थो डे देवानुपूर्वी नरकानुपूर्वी. आपस में तुल्य. (३) उससे मनुष्यानुपूर्वी विशेष. और (४) उससे तिर्यचानुपूर्वी विशेप.(खगति-आश्रिय)?सब से थोडी शुभ विहायगति(२) उससे अशुभ विहाय गतिके विशप. ( वप्त और स्थावर आश्रिय ) सव से थो- डे त्रस दशके के (२) उससे स्थावर दशके के विपाधिक. । सब से थोडे बादर उस से सूक्ष्म विशेष. । सब से थोडे पर्याप्त. उससे अपर्याप्त विशेप । एसे प्रसेक साधारण दोनों । एसे ही आताप उद्योत सम और परस्पर तुल्य । निर्माण, उश्वास, पराघात उपघात, अगुरु लघु, और जिननाम. इनकी अल्पा बहुत नहीं है. ॥ गोव कर्म-सर्व से थोडे नीच गोवके उससे ऊंचगोत्र विशेष ।८ अन्तराय कर्म (१) सब से थोडे दाना न्तराय के(२) उससे लाभान्तराय के विशेष(३)उनमे भोगान्तरायके विशप(४) उससे उपभोग अन्तरायके विशेप. (५) और उससे वार्यान्तराय के दलिक विशेप. ॥इति॥ कर्म प्रकृतियोंके जघन्य पदसे अल्पा बहुत॥१.ज्ञानावरणीय (१)सव से थोडे के वल ज्ञानावरणीय के(२)उससे मनः पर्यव ज्ञानावरणीयके अनंत गुणे(३)उमसे अवधि ज्ञानावरणीके विशेष.(४)उनमे श्रुत ज्ञानावरणीय के विशेप ५और उसम मति ज्ञानावर गाय केविगप॥२ दर्शनावरणीय(१)मत्र से थोडे निद्राके(२)उसमे प्रचलाका भाग वि- शेप(३) उममे निद्र निद्रा का भाग विशेप(४) उममे प्रचला प्रचला का भाग विशेप, () उममे थाणवी का भाग विशेप, (6) उममे केवल दर्शनावरणका भाग विशेष, (७) उसमे अवधी दर्शनावरणयिका अनंत गुणे. (८) उसमे अचक्षु दर्शनावरणि का विशेष. (2) उममे चक्षु दर्गनावरणिय विशेप ३ वेदनीय कर्म-(2) मब से थोडे अमाना वेदनीय के. २) उममे माना वेदनीय के विशम. । ४ मोहनीय कर्मः-(१) मरने थोडा अप्रत्याख्यानावरणीय मान. (२) उसमे अप्रत्याख्याना वरणीय क्रोधक 1 मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान राहेण अहीशतद्वारी* १९९ विशेष. (३) उससे अमत्याख्याता वरणीय माया के विशेष. [४] उससे अप्रत्याख्या- ना वरणीय लोभ के विशेष [५-८ ऐसेही प्रत्याख्याना वरंणीय चौक और (९-१२) ऐसेही अतन्तान बन्धि चौक. (१३) उससे मिथ्यात्व का जघन्य भाग विशेष. (१४) उससे दुगंडाका अनन्त गुणा. [१५] उससे भयके विशेष. [१६] उससे हंस्य के औ- र शोक के विशेष. परस्पर तुल्य. (१९) उससे रति और अरतिका विशेष, परस्पर तुल्य. (२२) उससे तीनों वेदो का भाग विशेष. २६. उससे संज्वलका चौक विशेष ॥ ५ आयुप्य कर्म १-२ मब मे थोडा तियेचायु नरायु. (३४) उसमे देवायु नरका यु असंखेज गुणा. ॥ ६ नाम कर्म [ गति आश्रिय ] (१) सब से थोडा तियेच गति का. (२) उसमे मनुष्य गतिका विशेष. (३) उनसे देवागति का संख्यात गुणा (४) उसने नरक गति का संख्यात गुणा (जाति विषय ) (१-४) मव मे थोडे वेन्द्रिय. तेन्द्रिय. चौरिन्द्रिय पचन्द्रिय और आपममें तुल्यः (२) उसमे एकेन्द्रिय विशेष. । (श रीर आश्रिय) (१) सब से थोडे औदारिक शरीर के. (२) उसने बैंक्रिय के विशेष. (क)उसमे कार्मण शरीर के विशेष(४)उममे तेजसके संख्यातगुण (५) उममे आहारक शरीर के नख्वान गुणे ऐमेही ' मंघातन का और १५ बन्धनका उत्कृष्ट पढके जमा कहढेना. । (अङ्गो पाङ्ग आश्रिय) (१) सब मे थोडा औदारिक अङ्गो पाङ्ग (२) उ- ममे चैक्रिय अङ्गो पाङ्ग के अमंख्यान गुणे. (३) उममे आदारक के मंख्यात गुणा (अनुपूर्वी आश्रियो (२) मर्व से थोडा नरकानुपूर्वी देवानुनी. परम्पर तुल्य (३) उससे मनुष्यानु पूर्वी विशेष(४)उमने नियंचानु पूर्वी विशेष(वन विनंति विषय)(१) सब से थोडा वन दशका (२) उममे स्यावर दशका विशेष । यो बादर मूल्म । यो ही पर्याप्ता अपर्याप्ता । यही प्रत्येक माधारण । और बाकी का ४२ प्रवृत्ति की ज- धन्य पदको अल्पा बहुव उत्कृष्ट पदकी नरहही कहेना ॥ ७ गोव कर्म (१) मई मे थोडा नीच गोव. (२) उसमे उंच गोव के विशेष. १८ अन्नगय कर्म (8) मर्व मे थोडा दानान्तराय के. (२) उनमे लाभान्तराय के विनर (क) उममे भोगान्तगय के विशेष. (४) उममे उपभोग अनन्नराय के विशेष. और उसमे वीर्यन्नगय । के विशेष. - प्रत्यादि चानें कन्धों के कयन के गहन ज्ञान न्प मिन्धु में दर्षि वष्टि मे गो ता लगाने जीवकी गति की अविन्दना. और पुदलो के परिणामों की विविधता का अवलोकन करने आत्मा में जिनेश्वर के ज्ञान का अहुँन चम्कार मान होता है: २ - २०० " प्रथम अर्थ काण्डका-द्वितीय कर्मद्रारा रोहण खाण्ड ११ ४२-५० दूसरे से दशवेतक वन्ध द्वारों का अर्थ जैसे-लोहका और धातु का, फूलका और अतर का, पत्थर का और अग्निका अनादि से स्वभावि कही वन्ध है. तैसेही कर्म वर्गणा के दलके अनादि से जीव का सम्बन्ध है. ऐसे सकर्मी जीवों जब मिथ्यात्वादि आश्रब का सेवन कर क मों कर पुनः बन्धातेहैं वत ऊपर जो आगे कर्मों की१४८ प्रकृत्ति कही उसमें भे१२० प्रकृत्ति का बन्ध आत्मा के माथ होता है. क्योंकि शरीर नाम कर्म में अपना २ वन्य और संघात दोनों अविना भावी है अर्थात्-शरीर के विना यह दोनोंही होसकते न- ही है. इस कारण ५ बन्ध, और ५ संघात यह ? प्रकृत्तियों वन्य तथा उदय रुप नहीं है, अर्थात कर्म बन्ध के अवस्था में यह मत्तियों अलग नहीं गिनी जाती है. और वर्ण, गंध, रस, स्पर्श, इन चारके ५ वर्ण, २ गंध, ५ रस और ८ स्पर्शयों,२० भेद होते हैं. परन्तु इनकी अभेद विवक्षा से इन २० भेदों में से बन्ध स्थान १ वर्ण, १ गंध, १ रस और ? स्पर्शयों ४ ही प्रकृत्ति लेना. बाकी की १६ प्रकृत्ति नहीं ले ना. यों-१०+१६-२६ प्रकृत्तियों अभेद विवक्षा से वन्ध अवस्था में नहीं है. फक्त नामकी ६७ प्रकृत्ति बंध रुपहोती है. और मोहनीय कर्मकी २८ प्रकृत्ति में से सम्य- क्व मोहनीय, मिश्रमोहानय इन दोनों प्रकृत्तियों का भी वन्ध नहीं पडता. इसलिये दो यह घटी,यो २८ हुइ. सब कर्मोंकी १४८ प्रकृत्ति में से इन २८ को कमी करने से १२० प्रकृत्तिही वन्ध रुप गिनी जाती है. ५१-५२ ध्रुव बन्ध कर्म प्रकृत्ति दारोंका अर्थ जिस कर्म वध का मूल हेतु मिलने से उस कर्म का अवश्य वन्ध पडे, परन्तु उसके स्थान दूसरी प्रकृत्तिका बन्ध नहीं पडनेदे, उसे ध्रुव वन्ध की प्रकृत्ति कहते हैं. सो-१ ज्ञानावरणीय की ५.२ दर्शना वरणीय की ९, ३ मोहनीय की १२, ४ ना- मकी ९, और५ अन्तराय की ५ यों ५ कर्मों की ४७ प्रकृत्तियों ध्रुव वन्य की कही जाती है। जिसका सबका-ज्ञानावरणीय कर्म की ५ प्रकृत्ति और दर्शना परणीय की १ प्रकृत्ति, इन १४ प्रकृति का आवरण-ढक्कन सब जीवों के अपना २ वन्ध विच्छे द स्थान पर्यन्त अवश्य वन्य होता है, इसलिये ध्रुव वन्ध की जानना.: और भ- य मोहनीय तथा दुगच्छा मोहनीय यह दोनों वन्ध विरोध की प्रकृत्ति नहोंने से ध्रुव वन्धीही कहना. और मिथ्याल मोहनीय का भी निज हेतु मिथ्यालो दय के मद्भाव * मुक्ति मोपान श्री-गुणस्थान रोहण अहीगतद्वारी र २०१ .. ..- - से अवस्य बन्ध पड़ता है. और अनन्तान पन्धि कपाय के उदय में अनन्तान पनिध -क्रोध-मान-माया-और लोभ इन चारों का अवस्य बन्ध होता है. तैसेही अप्रत्या ख्यानी के उदय में अमत्याख्यानी क्रोधादि चारों का. मत्याख्यानी के उदय में प्र. त्याख्यानी क्रोधादि चारों का. और मंचल के उदय में संचल की क्रोधादि चारों कपायों का यों १६ ही कपायों और तीनों मोदनीय मिल ११ ध्रुव वन्य की प्रकृ. त्ति हुइ. और १ वर्ष. १ गंय. १ रन, १ स्वर्ग, १ तेजर शरीर. १. कर्मिण शरीर. १ अगरु लघु नाम. और १ निर्माण नाम. यह १ मञ्चत्ति नाम करें की. चारों गति- के मव जीवोंके अवश्य पाती है. क्यों कि-या २ प्रजाति गगरिक च की है. और एमे ही अंतराय कर्म की भी ५ प्रकृति नगवे गुणचान नक मत्र जीयोंके अवश्य होती है. यों मब ४७ महति ध्रुव बंधी जानना. (वेदनीय आंरे गाव की मूल मक- ति की अपेक्षामे तो ध्रुव बंध में लेने में कर रकन नहो. परंतु का प्रतियों पुत्र पंधी न होने से यहां नहीं गिनी- ५३-२४ अध्व बंध कर्म प्रकृति दागेका अर्थ. जो प्रकृति अपना पंधरेन का गंध मिलने पर भी कभी न करे नौर कभी वंध नही भी करे. तथा उनके स्थान उमकेध दिगपनी प्रकृति काश पर जोर सो अनुव इंध की प्रहाति कहना. :-वेदनीर दी २ . मंटनीर की : आ पृप्य की ४. ४ नामकी ५८. और 'गोवकी २. दो दर्जे की माने अ. ध्रुव बंध की होती है. जिनका नवरा-काता और अनाना दोन देवनय कार ए. वही माय नहीं होता है. इनलिये अब पी जानना. और हान्न निका। संथ होतीवक्त शोक और अनिका इंध दो होगा नया मोड़ और अगलेश देर होनी वत्ता न्यि और निदा दंध नही होती इन्देि पानी अवशी मति ? गुणस्थान तक होतो और इन आने 'निन्दन होनेरे अदा की ही की मी पुरस निसन बान देशों से बन की मात टेट पता ननका पेट नो निका. वेदनादन म.. आरे निर पुरुष वेदवती लामी : अनुवा गन्न बहाय. विचार का इनाम मा एन भने कोही. आयुष्य का पीर ह.

२०२ प्रथम अर्थ काण्डका-द्वितीय कर्म द्वारा रोहण खण्ड १ ति अधुव बंध की जानना.। औदारिक शरीर, वैक्रिय शरीर, आहारक शरीर. इन तीनों के अङ्गोपाङ्ग, यह ६ मनुष्य तिर्यच के तो औदारिक होती है, नारकी देवता के वैक्रिय होतीहै और फक्त साधुजी के आहारक होतीहै इसलिये अधुव वंधी कहना, और ६ संघयनों में का एक ही संघयन एक वक्तमे पाता है, सोमी मनुष्य तिर्यच गतिका बंध करते ही पाता है, परंतु देव नरक के बंध में नही. पाता है. औरसंस्थानोमें का एकही सस्थान एकवक्त मिलता है और एकेन्द्रिय वेन्द्रिय तेन्द्रिय चौरिन्द्रिय, पचेन्द्रिय इन पांचो जाति मे से एकही वक्त में एकही जाति का बंध पड- ता है. ऐसे ही चारों गति में से एक वक्त में एक ही गति का बंध होता है, तैसे ही शुभ विहायो गति और अशुभ विहायो गति, इन दोनो गति में से एक वक्त में एक ही गति का बंध होता है, तैसेही चारों गति की चारो अनुपूर्दी मे से एक वक्त में एकही अनुपूर्वी का बंध होता है. जिन नाम का बंध फक्त सम्यक्त्वी के ही होता है सो भी कोइक वान्धते है, वाकी वहुत से नहीं वांधते हैं. उश्वाश नाम भी पर्याप्त मायोग्य वांध ते वक्त बंधता है. अन्य वक्त नहीं. उद्योत नाम भी तियेचाय वांध ते कोइक वांधता है. आताप नाम भी पृथ्वी काय प्रायोग्य वंध ते कोइक वांधता है, पराघात नाम भी पर्याप्ता प्रायोग्य कोइक बंधता है, वस दशका और स्थावर दशका यह २० प्रकुतियों भी बंध विरोधकी है, यों ५८ प्रकृति नाम कर्म की, आरै नीच गौन का बंध होवे तब ऊंच गौव कावंध नहीं होवे और ऊंच गौत्र का होवे तव नीच गौव का बंध न होवे यह दोनों बंध विरोधकी प्रकृत्ति है. यों सब ५ कर्मों की ७३ बंध की होती है. इन दोनों वधो पर चार भाग:-१ आमें ही कर्मों की प्रकृतियों पहिले नहीं था, नवाही बंध हुवा ऐसा कदापि नहीं होता है, इसलिये प्रथम अनादि भङ्ग, २ जिस प्रकृति का अनुबंधक पना हुवे वाद पहिले बान्धे सो सादि भङ्ग, ३ जिस प्र- कृति का बंध विच्छेद न होवे वहां तक अनंत, और ४ जब बंध का अंत करे तव सान्त इन चारों भागमे से अनादि अनंत, और अनादि सांत यह दोनों भांगे एक मिथ्यात्व मोहनीय विना वाकी की २६ धुवोढयी प्रकृति आश्रिय मिलते हैं. क्योंकि अभव्य के निर्माणादि २६ की आदि नहीं है, नसे आगे गुणस्थान चडने के अभाव से उदय विच्छेद भी नहीं है, इमलिये अनंत जानना. और भव्य जीवों की, अपेक्षा मे इन २६ प्रकृतियों की आदि तो नहीं है, परंतु-१२ वे, १३ वे, १४ वे, गुणस्थान प्रति अधुव -- २०३ -- मुक्ति मोपान-श्री गुणस्थाना रोहण अढीशतद्वारी र में अंत होवेगा ॥ और ध्रुव बंध की ४७ प्रकृति बंधकी अपेक्षामे ३ भागे होते है। १. जो अभव्य जीवों अनादि काल में इन धुरव बन्ध की प्रकृत्तिका बन्ध करते हैं. इमलिये अनादि. और आगे गुणस्थाना रोहण के अभाव मे बन्ध व्यच्छेद कदापि नहोने का इमलिये अनन्त. २ भव्य जीवों अनादि मे मिथ्यात्वी हैं. और आगे गुण स्थाना रोहण कर प्रकृत्तियो का घात करेगे मो अनादि सान्त. : और भव्य जीवो इग्यारवे गुणस्थान मे इन प्रकृत्तियों का अबन्धक हो पीछे पड़ते हुवे बन्ध करे में सगाद मान्त. । मिथ्यत्व मोहके बन्ध में और उदय में भी तीन २ भाग:-१ अभ- व्य आश्रिय अनादि अनन्त. २ भव्य आश्रिय अनादि मान्न, पडवाड आश्रिय सादि सान्त, चौथा अनादि अनन्तका भांगा शून्य जानना ५५६०,घातिक अघातिकर्म प्रकृति के दागे का अर्थ. जो प्रकृत्ति आत्मा के गुणों को आवरे-अन्लादे-के दो यानिर प्रकृतिक रते है. जिसमें सर्व घातिक प्रकृत्ति के रम पर्द्धक नो नाग्न पत्र के म हिट हिन और रफटिक की तरह निर्मल. द्राक्षकी तरह वृक्ष्म. मार प्रदमों पर पहल गरना ले रोते है. इसलिये सर्व घातिक प्रकृत्तिके प्रदेश पोटे होते हैं. नोभी वार्य अधिक शोना है. जिनके नामः-१ केवल ज्ञानावरणीय और केवल दर्शना वपीय या दोनों प्रकृत्ति जैसे सूर्य महामेघ के परलो कर आना-जाता है. न. चैतन्य के. शान दर्शन गणो को मांश मे आवरना है. नपारि महादेव में दवा हवा मर्या - पटल दिन रावी के विभाग को दर्शाता है. जिनमे जन जाता है रि-ल अंगा ना छादित है. तेही जीवके शानादि गुणो मर्च पानिक महानिदोंन द है. दोनी जट और चैतन्य का विभाग जानने में आता है. इतना साहा है. अपने निद्राभी मर्व पातिव गिनी चोषि-देवल दर्शन गरी मे पटा हा नं शको भी मांग में अनजादित करती है. पांच सन्दिप लागी ? .. लिये सर्व शानिक व यहां भी उपगेन नवल मन्दिा भी बार प्रदेशांश दुला जाता है. निममीजी न्ट अटेज हो ने. और मन्नान पद का नो मन्दरतारन काट? अमन्यानपानी संपादिमी का काम करे .. पपानी र मनन विगत पार टन कर. .

२०४ * प्रथम अर्थ काण्डका-द्वितीय कर्मद्वारा राहेण खंड. * हलके दृष्टान्त मुजब-कितनेक मिथ्याची अनेक प्रकारके तप करतेहैं विराति भी मांस आहार आदि का त्याग करते हैं देश विरील सर्व विरति होने की इच्छा करते हैं तो भी इन १२ प्रकृत्तियों को सर्व घातिकही गिनी है. और मिथ्यात्व मोहनीय भी तत्व र्थ श्रद्धान गुणों का सर्वतः घात करे है. इसलिये यह भी सर्व धातिक है. यों १ झा- नावरणीयदर्शना वरणीय,१३मोहनीय की सर्वमिल२० प्रकृत्तियों सर्व घातिक होताहै देशघतिक प्रकृत्तियों:-देश घातिक प्रकृत्ति के रस स्पर्श स्थूल-सछिद्र रहे की तरह, मध्यम छिद्र-कम्बल की तरह, और सूक्ष्म छिद्र-वस्त्र की तरह गिने जाते हैं. स्थूल प्रदेश निरस असार बहुत प्रदेशी अल्पवीर्य वन्त होते हैं. जिनके नाम:- १ मति मानावरणीय, २ श्रुतिज्ञानावरणीय, ३ अवधि ज्ञानावरणीय, ४ मनः पर्यव मानावरणी, (यह ४ बानावरणीय की) ९ चक्षुदर्शना वरणीय ६ अचक्षुदर्शना व- रणीय, ७ अवधि दर्शना वरणीय, ( यह ३ दर्शना वरणीय की, ) यो ७ प्रकृत्तियों देश घातिक है, केवल झानावरणीय केवल दर्शना वरणीय, के अच्छादन हो- ने पर भी अनन्तवा देसांश भाग मान दर्शन का खुल्ला रहाथा जिसका आवरण इन सातों प्रकृत्तियों ने किया है, इसलिये इने देशघात कही है. और संज्वल का चौक भी सर्व विरति गुणों का देश से घात करते है. अर्थात्-देश से आतिचार लगाते हैं. इसलिये देश घातिक कहा है, और हॉस्यपदक तथा तीनों वेद यह नो कपाय भी देश घातिक है. क्योंकि-यह भी चारित्र में अतिचार उपजाती है, परतु अनाचार करता नहोने से देश घातिक गिनी हैं. और अन्तराय कर्म की पांचों प्रकृत्ति भी देशवाति- क होती है, क्योंके पुद्गल द्रव्य का अनन्तवा भाग-दान लाभ भोगादि में होता है. अर्थात् गृहण करने जोग जो पुद्गल हैं वो पुद्गल द्रव्य के अनंत वे भाग में हैं. उस में भी सवका दान लाभ उपभोगादि कर नहीं सकता है अकर्म नो कर्मादि तथा आहार आदि दान लाभ भोग आदि सब जीवके होता है, सब जीवों को इसका क्षयोपशम- जरूरही होता है. यद्यपि जो वीर्य अन्तराय का सर्व घातिक रस होतो जीवका सर्व वीर्य का अच्छा दान होनेसे जीवों के काष्ट की तरह निचेष्टित होजावे, फिर आ- हार आदि ग्रहण करना और परगमाना भी नवने इसलिये इसे भी देश घतिक जान ना. यह २५ प्रकृत्तियों देश घातिक होती है. और नो उदय की अपेक्षा से गिनी तो मिश्रमोहनीय और सम्यक्त्व मोहनीय यह दोनों प्रकृत्ति भी देश घातिक होती होती है. यो २७ प्रकृत्ति देश पातिक की हुइ. .

* मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थाना रोहण अटीशतद्वारी र २० सर्व घातिक और २७ देश घातिक यों दोंनो मिलकर ४७ प्रकृत्ति घा- तिक कर्मों की होती है. अघातिक कर्म प्रकृत्ति-ऊपर कहीमो ४७ घातिक प्रकृति. वाकी रही १०१प्रकृत्ति सो सब अघातिक जानना. क्योकि यह १०१ ही प्रकृत्तियों से आत्मा के ज्ञानादि गुणों का कुछ घात नहीं होता है. फक्त जैसे चोरो की संगती से माहकार भी चोर गिना जाता है. तैसेही यह १०१ प्रकृत्तियों भी घातिक प्रकृत्तियों की साथही वेदने में आ ती हैं. इसलिये घातिक कही जाति हैं. ६१-६४ पुण्य पापकर्म प्रकृत्ति द्वारों का अर्थ. पुण्य प्रकृत्तिका बन्ध-शुद्ध परिणाम मे होता है. संक्लेश परिणमों से मन्द र- स बन्ध पडताहै. और विशुद्ध परिणामों से तीव्र रम बन्ध पडता है, उसका उदयमी- ठे-मधुरे-मनोज्ञ रम में होता है. उमे वेदता जीव मुख मानता है. उसे पुण्य प्रकृत्ति कहते हैं. सो ४२ हैं:-१ माता वेदनीय ( यह १ वेदनीय कर्म की) २ देवाय. : मनुप्यायु. ४ नियचायु x ( यह : आयु कर्म की प्रकृतिका वन्ध भी पुण्योदय में होता है. जिस से आगे इन : गति में नुखकी विशेपता है.) ५ मनुप्य गति. : म. नुप्यानु पूर्वी. ७ देवगति. ८ देवान पूर्वी. ९ पचेन्द्रिय की जानि. १०-१४ पांच गरीर १५-१७ तीनों शरीर के अङ्गो पाग. १८ वज अपभ नारच मंययण, ११ म मचतुरख भंस्थान. २१ शुभवर्ण (श्वेत. पित) २१ शुभ गन्ध (शुभॊ गन्ध ) २२ शुभरन (निष्ट. अम्ल, कपायला ) २३ शुभ स्पर्श (लहु, कोमल. चिक्कणा. उष्ण) २४ अगुरु लघु नाम. २५ पराधान नान. २६ उवाम नाम. २६ आनाप नाम, २८ उद्योत नाम. २९ शुभ चलनेकी गति.:. निर्माण नाम. १ वन नाम. २ बादर नाम.. पर्याप्ता नाम. प्रत्येक नाम. ५ स्थिर नाम .. शुभ नाम. ७ मो. भान्य नाम..८मुस्वर नान. ३१आदेय नाम, ४ यमो कीनि नाम. ४१नीय कारनाम, (यह ७ नाम कर्म की ) और ४२ उंच गोत्र. यह ४ कर्मकी नव ४० प्रनि जी- वों को मुख दायक होने मे पुन्य प्रति गिनी जाती हैं. पाप प्रभात वन्ध-अशुभ परिणामें मे होता है. मला परिणाने में नीन ग्न - + जुगलले दिवे ने पुन्हा. - २०६ प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूलद्वारा राहणे कान्ड ५. बन्ध होता है, जिसका उदय कडवे रस मय दुःख दायक होता है, उसे पाप प्रकृत्ति कहते हैं. सो ८२ हैं: ज्ञानावरणीय, १ दर्शना वरणीय, १ असाता वेदनीय, १ मिथ्यात्व मोहनीय, और २५ कपाय ( यह मोहनीय की २६) १ नरकायु (अयुष्य की १) १ स्थावर, १ मूक्ष्म, १ अपर्याप्ता, १. साधारण, १ अस्थिर, १ अशुभ, १ दौर्भाग्य, १ दुःस्वर, १ अनादेय, १ अयशः कार्ति. १ नरक गति, १ नरकानु पूर्वी १ तिर्यंच गति, १ तिर्यंचानु पूर्वी, ४ पहिली चार जाति, १ अशुभ विहाय गति, १ उपघात नाम, १ अशुभ वर्ण (कृष्ण हरित ) १ दुर्मिगन्ध, १ अशुभ रस (ती-' खा, कड़वा ) ? अशुभ स्पर्श (गुरु, क्षरखर, लुस, शीत) ५ पीछेके पांच संघयण,५ पीछे के पांच संस्थान, ( यह ३४ नाम, कर्म की) १ नीच गोत्र और ५ अन्तराय की, या आठों कर्मो की८२प्रकृत्तियों दुःख दायक होनेसे पापप्रकृत्ति गिनी जाती है. For बन्धकी प्रकृत्तितो सब १२०है, और यह पुण्यकी ४२ पापकी ८२ मिल कर १२४ हुइ सो ४ प्रकृत्ति वडने का सवव यह है. कि-वर्णादि ४ चारों प्रकृत्ति को शुभ अशुभ दो भेद कर दोनों में ( पुण्य पाप में ) गिन ने से ४ प्रकृत्ति वढ गइहै. ६५-६८ परावर्त मान अपरावर्त मान कर्म प्रकृत्ति द्वारो का अर्थ. जिन कर्मों की प्रकृत्ति अपने विरोधी प्रकृत्तियों के वन्ध को और उदय को रोक कर-दूरकर अपनाही वन्ध और उदय प्रत्यक्षमें देखातीहै, और जिन प्रकृत्ति यों का उदय अलग २ वक्त में होता है. अर्थात- उदय में दूसरी का उदय और वन्ध नहीं होवे, उनको “परावर्त मान" प्रकृत्ति कही जाती हैसो ११प्रकृत्तियों %-१ निद्रा,निद्रा निद्र, ३प्रचला,रामचला प्रचला, और ५वीणद्वी निद्रा, यह पांचों दर्शना वरणीय की प्रकृत्ति उदय और वन्ध का विरोध धरान्याली है, अर्थात्-एक 'निद्राका वन्ध और उदय होता है. उस वक्त दूसरी निद्रा का बन्ध और उदय नहीं होता है. तेही-६ साता वेदनीय और ७ असाता वेदनीय इन दोनों वेदनीय कर्म की प्रकृत्तियों का वन्ध और उदय भी अलग २ वक्त में ही होता है. अर्थात्-जत्र माता वेदनीय का वन्ध पडता है. और उदय होता है. तब असाता का नही. और जब माता का बंध और उदय होता है तब साता का नहीं. तसेही - अनंतानबंधी आदि चारों चौक की क्रोधादि १६ ही कपाय का उदय और बंध भी विरोधी है. -एक के २०७ # मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान राहेण अहीशत द्वारी अर्थात्-जब एक जीवके एक समय में-एक क्रोध का उदय होता है तब-मान माया लोभ इन तीनों कपाय का उदय नहीं होता है. और जब मानका उदय होता है तब क्रोध माया लोभ इन तीनों कपाय का उदय नहीं. ऐसे ही सोले ही कपार्यों का जान ना. तैसे ही २४ होस्य. और २५रति. तथा २६ शोक और २७ अरति. यह चारों प्रकृति भी बंध विरोधनी है. क्योंके-हांस्य के वक्त शोक नहीं, और शोक के वक्त हाँस्य नहीं. तैले ही-रति के वक्त अरति नहीं और अरति के वक्त रति नहीं.। तैसे ही ३० तीनो वेदों भी उदय और वंध विरोधी हैं. एक जीवके एक वक्त में एकही वेद का बंध और उदय होता है. यह मोहनीय कर्म की २३ प्रकृति) तैसे ही-३१ नरकाय. ३२ तिर्यंचाय.:: नरायु. और ३४ देवायु. यह आयु कर्म को चारों प्र- कृति भी उदय और बंध विरोधी है. क्योंके-एक ही वक्त में एक जीव एक ही आ- यु वन्धता है और भोगवता है. तैसे ही-८ चारों गति, ४: पांचो जाति. ४६ प- हिलेके तीनों शरीर, ४१ तीनों शरीर के अगोपाइ. ५५ ठेही संघयण, ६१ छे सं, स्थान. ६३ दोनोगति. ६७ चारों अनुपुर्वी. ७७ वम दशका. ८७ स्यावर दशका- + ८८ उद्योत नाम, और ८१ आताप नाम, यों नाम कर्म की .५ प्रकृति यों भी उदय और वंध विरोधनी है. और तैमे ही-२० ऊंच गौवें और २१. नीचे गौव, यह दोनों गोव कर्म की प्रकृति भी वन्ध विरोधनी है. यों मब ९१ प्रकृतिका उदय औ. र बंध का विरोध होनमे परावर्तमान की कही जाती है. और अपरा वर्तमान महति मो इम से उलट स्वभाव वालीजानना अर्थात्-जिम । का पंच तथा उदय दुमरी प्रकृतियोमे विरोध नहीं रखते दृमरी प्रतियोंका बंध और उदयको विना रोके ही अपना वंध दीपावे अर्थात् अन्य प्रकृतियों का बंध पडनी वक्त उनका वध पडे और अन्य प्रकृतियों के उदय में उनका उदय पावे अन्या दे. रखने में आवे ऐनी प्रकृतियों २९ है: को ज्ञानावरणीय की ०. दर्गनावरणीय की ४. यों दोनों कमों की ९ प्रकृतियों व पन्ध की है. उनका बंध करते कोड शुभ प- रिणाम विशेष दुमरी प्रकृति का वन्य नहीं भी डाले नो भी रन बंध में भवों की म- । न्दना करती है. न ही-१८ भद. ११ दुर्गच्छा. और मिथ्याव मोहनीय. यह ? - -- - - २०८ प्रथम अर्थ काण्डका-द्वितीय कर्म द्वारा रोहण खण्ड मोहनीय कर्म की, और १३ वर्ण, १४ गन्ध, १५ रस, १६ स्पर्श, १७ तेजस श रीर, १८ कार्मण शरीर, १९ पराघात नाम, २० निर्माणा नाम, २१ उपघात नाम, २२ अगुरु लघु नाम, २३ उश्वास नाम, और २४ तीर्थकर नाम, (यह १२ नाम कर्म की) और २१ पांचों अंतराय. यह२१प्रकृति यो ध्रुव बंधकी है, अर्थात् इनका उदय प्रायः सब जीवों को सर्वदा पाता है. और एकेक बंध में दूसरीका बंध पडता हैं. तथा एकेक उदय में दुसरी का उदय भी कायम रह जाता है. जैसे कृष्ण वर्ण का पदार्थ सुगन्धी मीठा और हलका है. यह चारो प्रकृति की एकही वक्तमें एक स्थान में पाजाती है तैसे, ही सब जानना, इसलिये इन में अविरोधी पना होने से 'अपरावर्त मान' की प्रकृति इने कही जाती है. परावर्तमान की ९१ और अपरावर्त मान की २१ मिलकर सब१२० प्रकृतियों वन्ध की होती है. ६९-७५ भूयस्कारादि चारों बन्धपर कर्म प्रकृति द्वारोंका अर्थ. १. ज्ञानावरणीय कर्म का-एक ही वन्धस्थान होने के सवव से भूयस्कारादि किसी भी वन्ध का संभव नहीं है. २ दर्शनावरणीय कर्म के-१ का, ६ का और ४ का, यह तीन वन्ध स्थान होते हैं; इस में दर्शनावरणीय की सब ९ ही प्रकृतियों का बंध पहिले और दुसरे गु- णस्थान में होता है जिसकी-जघन स्थिति अन्तर मुहूर्त की और उत्कृष्ट स्थिति तो अभव्य की अपेक्षा से अनादि अनन्त, और भव्य की अपेक्षासे अनादि सान्त होती है, तथा पडवाइ की अपेक्षा से सादि सान्त भी होती है. २ ऊपरोक्त ९ प्रकृतियों में से-(१) थीणद्वी निद्रा, (२) निद्रा निद्रा, और (३) प्रचला प्रचला, इन तीनों का बंध विच्छेद होनेसे मिश्रादि गुणस्थान में ६ प्रकृतिका वंध रहता है, जिमकी स्थिति जघन्य अंतर मूहुर्तकी, और उत्कृष्ट३३सागरोपम ऊपर पूर्व कोटी पृथक्त्व झाझेरी. ३ इन मेमे निद्रा और प्रचला इन दोनों प्रकृतियोंका बंध विच्छेद आठवे अपूर्व करण गुणस्थानके पहिले भागमें होनेमे, अपूर्व करणका वाकी रहे मर्व भागोमें और नववे दशवे गुणस्थानमें ४ प्रकृतिका बंध रहताहै, जिमकी स्थिति-जघन्य एक ममयकी श्रेणिमें मृत्यु पावे जिमकी अपेक्षा मे और उत्क्रप्ट अंतर मुहूर्त की जाणना. । इन धंधों में भूय- स्कार और अल्पतर बंध तो दो दो होतेहैं. अवस्थित बंध तीन होते हैं. और अन्य क्त बंध भी दो होते है सो कहते हैं.-१ उपशम श्रेणि से पडते हुवे आठवे गुणस्या- * मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अडीशतद्वारी २०९ न के दुसरे भाग में आते हुवे दर्शनावरणीय चार प्रकृति का वन्ध करता हुवा-बंध से विच्छेद की हुइ निद्रा और प्रचला का फिर बंध करे तब ६ प्रकृति का बंध होवे,सो प्रथम समय प्रथम भूयस्कार. २ और फिर नवका बंध करे सो दुसरा भूयस्कार वंध. (यह २ भूयस्कार) और नवके वंध मे से ३ का वंध विच्छेद कर ६ का बंध करते प्रथम समय पहिला अल्पतर बंध. और फिर अपूर्व करण गुणस्थान के प्रथम ६ प्र. कृति का वंध कर फिर निद्रा और प्रचला का विच्छेद कर चार का बंध करे सो प्रथम समय दूसरा अल्पतर बंध. (यह २ अल्पतर बंध) और इन चारों के मध्या मे तीनों बंध स्थान में दुसरे समय से लगाकर उन २ वंध के स्थानों में अन्तिम समय पर्यन्त तीनों अवस्थित बंध जाणना. और इग्यारवे गुणस्थान में दर्शनावरणीय का अबंधकहो वहां से पड़ते दशमे गुणस्थान में चार प्रकृति का बंध करे नेके पहिले समय पहिला अव्यक्त बंध, तथा उपशांतमोह गुणस्थान में आयनय होने से मरकर अनुत्तर विमान में देव हो छे प्रकृतिका बंध करे उस के पहिले समय दुसरा अव्यक्त वंध. : मोहनीय कर्म के १० वन्ध स्थानः-मोहनीय की यन्ध की २६ प्रकृत्ति है, इममें भी एक समय में तीनों वेदों में का १ वेद. हांस्य और रति. गोक और अर- ति उन दोनों युगल में का एक युगल काही वन्ध होता है. क्योंकि यह प्रकृत्तियों व. न्ध विरोध की है. उमालये- मिथ्यात्व गुणस्थान में २२ का बन्धहोता है. जिसकी स्थिति-अभव्य आश्रिय अनादि अनन्त. भव्य आश्रिय अनादि मान्न. और पडवा इ आश्रिय सादि मान्त. २ फिर मास्वादन गुणस्थान में मिध्यात मोहनीय का बन्ध नहीं होने से २१ प्रवृत्ति का बन्ध होता है. जिसकी स्थिति जयन्य एक ममय की उत्कृष्ट ६ आंवलिका की. २ फिर मिश्र और अविरानि मम्यक् दृष्टि गुणम्यान में म नन्तानु पन्धि चौक का वंध नहीं होने मे १७ प्रकृति का बंध होता है. निमकी म्धि ति-जयन्य अंतर मुहूर्न की. उत्कृष्ट मागगेमप पृथक्त्व पूर्वकोडी अधिककी. क्यों : कि-अनुत्तर विमानवानी देवताओं चकर जहां तक विति पणा धान्न नहीं करेंन हां लग यह गुणस्थान रहता है. 1 ४ फिर देग विरनि गुणम्यान में अपन्याग्यानी चौक का बंध नहीं होने मे १ः प्रतिका वध होता है, जिनकी स्थिति जयन्य प्र. तर मुहूर्न की. उत्तृष्टि पूर्व दोडी वर्षकी । २ फिर मन और अन्त गुणभ्यान में पत्याख्यानी चौक का दंघ नहीं होने मे ९ मचि ग य होता है. निमकी दि- २१०० प्रथम अर्थ काण्डका-द्वितीय कर्मद्वारा रोहण खंड * तिं जघन्य एक समय की क्योंकि-कोइ जीव एक समय मात्र सर्व विरतिरहकर दूसरे समय मरण प्राप्त हो जाता है. ऐसे परिणामों की अपेक्षा से जाणना. नहीं तो जघन्य अन्तर मुहूर्त की, उत्कृष्ट देऊणा पूर्वकोडी वर्षकी. ६ फिर अनिवृत्ति वादर गुण- स्थान के पहिले भाग में हांस्य रति भय और दुगंछा का बन्ध विच्छेद होने से ५ प्रकृति का बन्ध होवे, । ७ दुसरे भाग में पुरूष वेद का वन्ध विच्छेद होने से चार प्रकृत्तिका बन्ध होवे, ८ तीसरे भाग में संज्वल के क्रोध का वन्ध विच्छेद होने से तीन प्रकृत्तिक वन्ध होवे. ९ चौथे भाग में संज्वल के मान का बन्ध विच्छेद होनेसे दो प्रकृत्ति का बन्ध होवे. ! १० फिर पांचवे भाग में संज्वल की माया का बन्ध वि च्छेद होने से एक प्रकृत्ति का बन्ध होवे. इन ६ से लगा कर १९ वे स्थान तक की जघन्य स्थिति एक समय की, उत्कृष्ट अन्तर मुहूर्त की, ऊपरोक्त मोह के १० वन्ध स्थानों में-९ भुयस्कार, ८ अल्पतर १० अवस्थित, और २ अव्यक्त वन्ध हो- ते हैं सो कहते हैं:-१ जो जीव उपशम श्रेाणसे चडकर इग्यार वे गुणस्थान में अ- न्तर मुहूर्त रह कर पडे, दशवे गुणस्थान में आवे वहां भी मोहनीय का अवन्ध रहै, वहां से पड नववे गुणस्थान के पांचवे भाग में आकर १ संज्वल के लोभ का बन्ध करे उसके प्रथम समय पहिला अव्यक्त वन्ध होवे. और इग्गयारवे गुणस्थान मेंही आ युक्षय होने से मरण कर अनुत्तर वीमान में देव हो १७ प्रकृत्ति का बन्ध करे, उस समय दूसरा अव्यक्त वन्ध, ( यह २ अव्यक्त बन्ध ) और नवने गुणस्थान के पाच वे भाग से पडकर चौथे भाग में आकर संज्वल की माया के साथ दो प्रकृत्ति का व न्ध करते प्रथम समय प्रथम भूयस्कार, तीसरे भागमें संज्वलकी मायाके साथ तीन प्रक त्ति का बन्ध करे उस समय दूसरा भ्यस्कार, ३ दूसरे भाग में संज्वल के क्रोध के साथ चार प्रकृत्ति का बंध करे सो तीसरा भूयस्कार, ४ प्रथम भाग में पुरुपवेद स- हित पांच प्रकृत्ति का बंध करे सो चौया भूयस्कार बंध. ५ वहां से भाटवे गुणस्था- नके अन्तमें हांस्य रति भय दुगछा इन प्रकृत्ति सहित ९ प्रकृत्तिका बंध करे सो पां- चवा भूयस्कार. ६ वहां से देश विरति गुणस्थान में प्रत्याख्याना वरणीय चौक स- हित १३ प्रकृत्ति का बंध करे सो छटा भूयस्कार. ७ वहां से चौथे गुणस्थान में अम त्याख्याना वरणीय चौक सहित १७ प्रकृत्ति का बंध करे सो सातवा भूयस्कार. ८ वहां मे दूसरे गुणस्थान में अनन्तानु बंधा चौक सहित २१ प्रकृत्ति का बंध करे सो आठवा भूयस्कार. और वहां मे प्रथम गुणस्थान में मिथ्यात्व मोहनीय महित २२ प्र कृत्ति का बंध करे सो नववा भूयकार. ( यह ९ भूयस्कार बंध) और ? मिथ्यात्व २११ मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अदीशतद्वारी * गुणस्थान में २२ प्रत्तिका बंध कर चौये-गुणस्यान में १७ प्रकृति का बंध करे सो प्रथम अल्पतर बंध, २ फिर १३ प्रकृति का बंध रहै सो दूसरा अल्पतर बंध. योज- परोक्त भूयत्कार धंध सब उलट कहना. इसमें विशेष इतनाही है. कि-२१ प्रकृति का अल्पतर वन्ध नहीं होता है. क्यों कि-मिथ्यात गणस्यान भेसास्वादन गुणस्या न में कोडभी आता नहीं है. बाकी के ८ अल्पतर वन्ध होतेहैं। और ऊपर मोह बन्ध के दास्यान कहे सो दूसरे समय से लगा कर अन्तिम समय पर्यन्त दशोही अवस्थि तबन्ध जानना.॥ ४ नाम कर्मके ८बन्धस्थान-१ मिथ्यावी जीव मनुष्य तियेच अपर्याप्ता एके- न्द्रिय प्रायोग्य- वर्ण, २ गन्ध. ३ रम. ४स्पर्श. ५ तैजस. ६ कार्मण, ७ अगुरुलघु ८ निर्माण. १ उपघात. १० तियेच गति. ११ तिर्यंचानु पूर्वी. १२ एकेन्द्रिय जा- ति, १३ औदारिक शरीर. १४ हुँड भंस्थान. १५ स्यावर नाम. १६ वादर नाम अ- थवा नृाम नाम. १७ अपर्याता नाम. १८ प्रत्येक नाम अयवा माधारण नाम. ११ अस्थिर नाम. २० अगुभ नाम. २१दौर्भाग्य नाम. २२ अनाव नाम. और २३ अ. यश; नाम. इन २३ प्रकृतियों का प्रथम बंध स्थान.। २ उन २३ में-१ पगपात ओर २ उछवास यह दोनों प्रकृतियों मिलाने से. और अपर्याप्ता के स्थान पर्याप्ता कहने से २५ प्रकृति का मंत्र पर्याप्ता एकोन्द्रिय प्रायोन्य मिथ्यावी देवता और मनु- प्य के होता है. 1 ६ इन २० प्रतिमें आताप अथवा उद्योत दोनों मेमे एक प्रकृति मिलाने मे २६ प्रकृति का बन्ध पसा एकेन्द्रिय मागन्य नीनों गतिके मिथ्याती जीवोंके होता है. । ४ फिर देव द्विक, पचेन्दिय जाति. ४ वैकिप गरीर, . वैनिय अगोपाइ. ५ ममुचतुरत भस्यान. ७ प्राचात नान. ८ उभाग नाम. १० भ खगति... अस नाम. १६. दादर नान १२ पर्यामा नान. १. प्रत्येक नाम. १? स्थिर अथवा अस्थिर. १५ शुभ अयश अशुभ. १६ यमः अथवा अया; १७ मुम : ग. १८ नुसार. १९ आदेच. २ वर्ष चतुक. २४ जन. २. कार्मन. २६ अपुर लय. २७ निर्माण और २८ उपचार. यह २८ प्रति देवनि प्रायोन्य मिथ्यावी तथा मन्यरत्ती मनुष्य और निर्यच धने हैं. ऐने ही नाल पनि प्रायोन्य भी .८ काही बन्द होता है. वहां जना विगप कि-देश हित के मान नाद द्विक करना. और मसुचतुरन मन्थान के स्थान हुँनस्यान करना. और अगगन प्रकृति यों अभ गृहन करनी. या २८ प्रजाति का चौथा वन्य स्थान हुवा. ॥ ९ गया - ...

, २०२ प्रथम अर्थ काण्डका-द्वितीय कर्म द्वाराराहणे कान्ड र दृष्टि जिन नाम सहित देव प्रायोग्य २८ का बन्ध करते २१ का बंध स्थान होवे. अथवा २मनुष्य द्विक, ३पचेन्द्रिय जाति, ५ औदारिक द्विक,८छे संघयणोमें का-एक संघयण, ७ छे संस्थानों में का-एक संस्थान, ८ वस, १ वादर, १० पर्याप्ता, ११ प्रत्येक, १२ स्थिर अथवा अस्थिर, १३ शुभ कथवा अशुभ, १४ सोभाग्य अथवा दौर्भाग्य, १५ सुस्वर अथवा दुस्वर. १६ आदेय अथवा अनादेय, १७ यशः अथवा अयशः १८ शुभ खगति अथवा अशुभ खगति, १९ पराघात, २० उश्वाश, २४ वर्ण चतुष्क, ५ तेजस, २६ कार्मण, २७ अगुरु लघु, २८ निर्माण, और २१ उप- घात. यह २१ का मनुष्य प्रायोग्य बंध स्थान होता है. । ६ देवगति प्रायोग्य २८ प्रकृति के साथ आहारक द्विक सहित वन्ध करते ३० प्रकृति का बन्ध अप्रमत साथ के होता है, और मनुष्य प्रायोग्य २१ प्रकृति को जिन नाम सहित ३० प्रकृति का वन्ध सम्यग् दृष्टि देवता के होता है.। जिन नाम सहित देव प्रायोग्य ३० प्र- कृति का वन्ध करने ३१ प्रकृति का बन्ध अप्रमत और अपूर्व करण गुणस्थान व ती साधु के होता है. । ८ आठवे गुणस्थान के छठे भाग में नाम कर्म की ३० प्र- कृति का वन्ध विच्छेद कर एक-यशः कीर्ती का वध करे. इन ८ बन्ध स्थानों में-भूयस्कार बंध ६, अल्यतर बंध ७, अवस्थित बंध ८, और अव्यक्त बंध ३ होते हैं सो कहते हैं:-१ प्रथम २३ का बंध कर, तथावि घि विशुद्धि कर फिर २५ का बंध करते प्रथम समय प्रथम भूयस्कार, मिथ्यात्वी के होता है. । इन २५ को आताप अथवा उद्योत सहित २६ का वध करते दूसरा भू. यस्कार. । विशुद्धया संक्लेश परिणामों से देव प्रायोग्य या नरक प्रायोग्य, २८ काव न्य करते तीसरा भूयस्कार, । देव प्रयोग्य २८ इने जिन नाम सहित २१ का बन्ध करते चौथा भूयस्कार । येही ३० प्रकृत्ति मनुष्य प्रायोग्य अथवा देव प्रायोग्य वा न्धते पांचवा भूयस्कार । देव प्रायोग्य ३० और जिन नाम सहित ३१ का बन्ध करते छटा भूयस्कार. ( यह ६ भूयस्कार वन्ध ) और अर्व करण में देवगति प्रायोग्य-२८-का,-२१-का, ३० का, और ३१ का वध कर श्रेणि चडते हुये सब बन्ध का विच्छेद कर एक यशः कीर्ती काही वन्ध करे सो प्रथम अल्पतर । कोइ आहारक द्विक और जिन नाम सहित देव प्रायोग्य ३१ का वध करना मृत्यु पाकर देव लोक में जावे वहां प्रथम समय मनुष्य प्रयोग्य ३० प्रकृति का वंध करे मो दूमरा अल्पतर । देवलोक से चव मनृप्य पणे उत्पन्नही जिन नाम १ - * मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी सहित देवगति प्रायोग्य २१ का बंध करे उस वक्त तीसरा अल्पतर. । कोइ मनुष्य देवगति प्रायोग्य २९ का बंध करते परिणामों की विशुद्धि कर देवगति प्रायोग्य २८ का बंध करे उस समय चौथा अल्पतर. । इनही २८ का बंध करते सक्लिष्ट परिणामों से एकेन्द्रिय प्रायोग्य २६ का बंध करे सो पांचवा अल्पतर. । वोही २६ वाला २५ का बंध करे सो छठा अल्पतर. और २५ वाला २६ का बंध करे सो सातवा अ- ल्पतर. ( यह ७ अल्पतर बंध हुवे ) और ऊपर कहे सो आठों बंध के स्थान कों में दूसरे समय से लगाकर आन्तम समय पर्यन्त आठो अवस्थित बंध होते है ( यह ८ अवस्थित वंध) और श्रेणिमे पडते हुवे नाम कर्म का सवर्था अबंध होकर फिर य- शः कीर्ती नाम का बंध करे उसके पहिले समय पहिला अव्यक्त वंध. और २ उपशा न्त मोहगुणस्थान मे मर कर अनुत्तर विमान में देवता होवे, वहां प्रथम समय मनुप्य मे मतुप्य प्रायोग्य २९ का बंध करे सो दूसरा अव्यक्त. और वहां ही जिन नाम स हित ३० का वध करे सो तीसरा अव्यक्त बंध ( यह ३ अव्यक्त वंध.) ऊपरोक्त इन तीनो कर्मों सिवाय वाकी रहे सो-१. ज्ञानावरणीय. २ वेदनीय, ३ आयुप्य. ४ गोव. और ५ अन्तराय, इन पांचो कमों का एकही बंध स्थान है. क्योकि-ज्ञानावरणीय और अन्तराय यह दोनों कर्म तो ध्रुव बंधी हैं इसलिये दश- वे गुणस्थान तक इन दोनों की पांच पांच प्रकृत्ति का सायही बंध होता है जिस से इनका भूयस्कार और अल्पतर बंध नहीं होता है. फक्त एक अवस्थित बंधही मढा वना रहता है. और वेदनीय आयुप्य गोव इन तीनों कर्मों की प्रकृत्तियों बंध विरोध की है. इमलिये एक समय में एकही का बंध होता है. और बंध स्थान भी एकही हो ता है. जिससे इन का भी भूयस्कार और अल्पतर बंध नही होता है. और वेदनीय का बंधतो तेरवे गुणस्थान तक होता है. इसलिये इस दिना बाकी के चारों कर्मों का व्यक्त बंघ एकही होता है. क्योंकि इग्यारवे गुणस्थान में अबंधक हो फिर बंध क रते प्रथम समय व्यक्त बंध होता है. फिर अवस्थित बंध जाणना. ऊपरोक्त वंध में मूल प्रवृत्ति का जयन्य एक का बंध है. और उत्कृष्ट ८ का बंध है. । और उत्तर प्रकृत्ति का जघन्य एक उत्कृष्ट ७४ का बंध होता है. इम ने-१ अनादि. २ मादि । अनन्त. और ४ सान्त इन चारों भांगों को विचारने हैं मूल प्रकृत्ति के बंध स्थान में और मे : सादिकान्त भांगा पाना है. क्योंकि-भवों भव में एकही वक्त आयु का बंध होता है. यह आठ का दंघ. और बाकी के काल २१४ प्रथम अर्थ काण्डका-द्वितीय कर्म द्वारा रोहण खण्ड में मात का बंध होता है..। और उत्तर प्रकृत्ति में ज्ञानावरणीय और दर्शनावरणीय का एकेक बंध स्थान, वेदनीय का एक बंध. मोहनीय का २२ का बंध, गोत्र का ए कका बंध, और अन्तरा का पांच का बंध. इन बंधोंमें ? अभव्यकी अपेक्षा से अना दि अनन्त भांगा. २ भव्य की अपेक्षा मे अनादि मान्त भांगा, और ३ पडवाइ की अपेक्षा से सादि सान्त भांगा यों तीन भांगे मिलते हैं. और वाकी रहे बंध स्थानों फक्त एक सादि सान्त ही भांगा पाता है. सो स्थिति मान जानना. ७७-१११ उदय दारोंका अर्थ. जैसे मादिरा पान किये वाद कालान्तर से नशा का प्रभाव प्रत्यक्ष होता है.- आत्माको विवहाल बना देता है, तैसे ही वन्थे हुवे कर्मों का अबाधा काल परी पक सोने से वो कर्म तीत्र, मन्द, घातीया, अघातीया, कटु, मिश्र इत्यादि विपाक रूप उनका प्रभाव प्रत्यक्ष आत्मा पे होवे उनको आत्मा से वेदे--अनुभवे--भोग वो उसे उदय कहते हैं. इसकी १२२ प्रकृतियों है; सो १२० तो बंध मे कही सोही जानना, और यहां सम्यक्त्व मोहनीय और मिश्रमोहनीय यह २ प्रकृति आधिक ग्रहण करना, क्याोके इन दोनोंका उदय मिथ्याव मोहनीय से कुछ अन्यही रूपमे देखताहै. उय के ३४ द्वारों में से ८ विपाकोदय के द्वारो और ध्रुवो दय अध्रुवोदय छोडकर वाकीके द्वारोका खुलासा तो वन्धके द्वारोमें कहे मुजवही जानना. और वीपा- कोदय का खुलासा यहां करते हैं. चार विपाक द्वारोंका अर्थ. यद्यपि सर्व प्रकृतियों अपना २ विपाक जीव कोही देखाती है, तो भी कित- नीक १ क्षेत्र को मुख्यता कर देखाती है, सो क्षेत्र विपाक की कही जाती है. २ जी भव की मुख्यता कर विपाक देखाताहै सो भव विपाक की, ३जो वाद्य शरीर पर वि- पाक देखातीहै सो पुद्गल विपाक की. और ४ जो इन तीनोकी अपेक्षा विना आत्मा मेही साक्षात विपाक वतावे सो जीव विपाक कि प्रकृति जानना. इसका स्वरूप यहां कहते हैं. १ जीव विपाकः-जैसे सूय की प्रभाव का अच्छादन बद्दल करते हैं. तैसे- ही आत्मा के ज्ञान, दर्शन श्रद्धान, चारिव, और दानादि लब्धि इन गुणोंकाअच्छा- * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान राहेण अहीशत द्वारी २१५ दन करने वाली जो - ज्ञानावरणीय की ५. दर्शनावरणीय की ९, मोहनीयकी २८ औ अन्तगय की ५, ऐते चारो घन घातिक कर्मों की ४७ प्रकृतियें शरीर पद्गलकी अपेक्षा विना अपना विपाक जीव कोही देखाती है, तैसे ही ४८-४१ साता और अ साता वेदनीय. तथा-५०-५१ नीच और ऊंच गोव, यह चारो प्रकृतियों सुखी दाखी व ऊंच नीच जीव कोही वनाती है. और ५२ तीर्थकर गोव के उदय से परम एश्चर्य पुजातीशय वचनातीशय और अपयागमतीशय यह चारो अतिशय जीवके ही होते हैं जिससे जीवती तीर्थंकर परमात्मा कहलाते हैं. ऐसे ही-५३ वस. ५४ स्यावर, ५५ सूक्ष्म, ५६ वादर. ५७ पर्याता. ५८ अपर्याप्ता. ५९ सौभाग्य. ६० दौर्भाग्य. ६१ सुस्वर. ६२ दुस्वर. ६३ आदेय, ६४ अनादेय, ६५ यश कीर्ति. ६६ अयश कीर्ति. यह सब प्रकृतियों जीवके ही प्राप्त होतीहै. जिस प्रकृतिके नाम मुझव ही (वम स्थाव- रादि नामने) जीव को बोलाया जाता है. ६७ श्वाशोङ्वात्त. यद्यपि पुद्गल रूप है. पर न्तु यह लब्धि जीवको ही होती है. ६८-७२ एकेन्द्रिययादि पांचों जाति, ७३-७६ नरकादि चारों गति. ७७-७८ दोनों संगति. यह भी जीव परही प्रवर्तती है. इसलिये मव ७८ प्रकृति जोर विपाक की गिती जाती है. २ भव विपाककी प्रकृति फक्त एक आयुप्य कर्म की ही चारों गिनी जातीहै क्योंक-देवतार्दिक का भव प्राप्त हुवे बाद भवके प्रथम समय से लगाकर अन्तिम सो मय तक निरन्तर अपनी शक्ति बताती है. आत्मा का सोडे की तरह निरुधन करती है. परभव में जाने नहींदेती है, और जब उन प्रकृतियों का भय करते हैं तब पर भव का आयुका उदय होनेसे परभव में जीव जाता है. इमलिये भव की मुख्यता कर के १ नरकायु. २ तिर्यंचायु. नरायु. और ४मुरआयु. इन चारों प्रकृतिको भव विपाक की जानना. और दुमरा कारण यह भी हैकि-चरम शरीरी जीव वाकी रहे तीनों ग- ति के दलिये को मनुप्य गति के एक आयुप्य में मंक्रमा कर-उदयावली में लाकर वेदकर आयकरे. क्योंके प्रदेश मे कर्म वेटे विना छूटका नहीं होता है. और आयू- का संक्रम किये बिना मोन भी नहीं होती है. इस लिये आयका संक्रम किये वाद फिर उस के किसी भी प्रकार का परभव का आयुप्य का उदय नहीं होनेसे स्वभा- काही उदय रहा है. इमलिये आयुप्यकी चारों प्रकृति भव विपाक की जानना. ’ पुद्गल विपाककी प्रकृति-जो अपनी शक्ति शरीरादि पुदलों में देखावे उन. मकृतियों से हुवाहुवा गुण दुर्गुण अनुग्रह उपयात गरीसाद नो कर्म पहलों में होने २१६ प्रथम अर्थ काण्डका-द्वितीय कर्म द्वारा रोहण खण्ड र ऐसे नंपुल विपाक की फक्त १ नाम कर्म की ३८ प्रकृतियों हैं:-१निर्माण, २ स्थिर, ३ आस्थर ४, शुभ, ५ अशुभ, ६ तैजस, ७ कार्मण, ८वर्ण, १ गंध, १० रस, स्पर्श, १२अगुरुलघु, इन १२ के अङ्गोपाङ्ग नो कर्म पुद्गल के जिसस्थान चाहिये वहांही जो देना, हाड दांत आदि कर्म पुद्गलों का स्थिर वन्धन, लोही लाल आदि कर्म पुद्गलों का अस्थिर बन्धन, तैसे ही मस्तकादि शुभ, पग' प्रमुख अशुभ, शरीर के वर्ण गंध रस स्पर्शादि पुद्गल के होते है. ऐतेही १३-१५ तीन शरीर, १६-१८ ती- नों शरीरके अङ्गोपाङ्ग, १९-२४ छे संघयण, २५-३० छे संस्थान, यह प्रकृतिभी श- रीरके पुद्गल पणे परंगमी है. ३१ उपघात नाम अंगुली प्रमुख अधिक होवे, सो भी पुद्गल विपाक की है. ३२ साधारण नाम भी शरीर पर्याप्ति पूरी किये वाद उदय होनेसे एक शरीर में अनेक जीव रहते हैं. ३३ ऐसेही प्रत्येक नामभी शरीराश्रित ही है. ३४ उद्योत नाम, ३५ आताप नाम, ३६ पराघात नाम यह भी शरीरके ही होते हैं. यो सब ३८ प्रकृति पुद्गल विपाक की होती है, ४ क्षेव विपाक-जो आकाश के प्रदेशों में जिसका मुख्यता कर उदय होवे अर्थात्-जब जीवों परभव को जाते दो समय या तीन समय की वक्र गति रूप श्रे- गि करे उस जीवको जो जैसे वेल को नाथ (रस्सी) खेचकर रस्ते पर लाती है त्यों जीव को जिस गति मे जाना होवे उस गति के रस्ते लगावे उन्हें क्षेत्र विपाक की प्रकृति कही जाती है, सो फक्त १ नाम कर्म की चार प्रकृति है:--- नरकानु पूची २ तिर्यचानुपूर्वी, ३ मनुश्यानु पूर्जी और ४ देवानु पूर्वी. यह चारों अनुपूर्वी नामक प्रकृति रस्ते भूल जीवों को खेचकर अपने नाम जैसी गति मे-क्षेत्र मे ले जाती इमलिये क्षेत्र विपाक की प्रकृति कहीजाती है. ध्रुवोदय अध्रुवोदय कर्म प्रकृत्तियों का अर्थ. वोदय प्रकृत्ति-५ पांच ज्ञानावरणीय, ४ दर्शना वरणीय, और ५ अन्तरा य. इन१४ प्रकृति का उदय वारखे गुणस्थान तक रहताहै. १५ मिथ्यामोहनी का उ- दय अभव्य के सदा रहता है. और १६ निर्माण, १७ स्थिर, १८ अस्थिर ११ अ- गुरु लघु. २० शुभ, २१ अशुभ. २२ तेजस २३ कार्मण, और २४ वर्ण चतुष्क, य- ह नाम कर्म की १२ प्रकृति का उदय भी तेरवे गुणस्यान तक है, इसलिये चागेंग- * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्याना रोहण अहीशतद्वारी * २१७ ति के जोवो के सदा पाता है. इसमें जो-स्थिर अस्थिर तथा शुभ अशुभ यह चारों प्रकृत्ति आपसमें विरोध की है. सो बन्ध आश्रिय जानना. परन्तु उदय आश्रिय नहीं अर्थात् इन चारोंका एकही वक्त वन्ध नही, पडता है. परन्तु उदय रहता है जैसे रक्त मूव आदिका आस्थिर वन्ध अस्थिर कोदय से होता है. और हाड दांत आदिका स्थिर वन्ध स्थिर कमोदय कर होता है, तैते मस्तकादि शुभ अंग की प्राप्ति शुभ कमों दय कर होती है. और पादादिक अशुभ अंगका उदय अशुभोदय से होता है. और चारोंही वस्तु एक शरीर में सदा देखने मे आतीहै जिससे ध्रुवोदय की कही जातीहै अध्रुवोदय की प्रकृत्तिः-दर्शना वरणीय कर्म की पांचों निद्रा का उदय कि सी वक्त होव किती वक्त नहोवे. ऐसेही दोनों वेदनीय x मिथ्यात्व मोहनी विना २ प्रकृत्ति : मोहनी की. चारों आयुष्यको. ४ गति. ५ जाति. ३ शरीर. ६ संघयण, ६ संस्थान: दोनों खगति. चारो अनुपूर्वी जिन नाम. उद्योत, आताप. अपघात प- रावात. वत दशका इयावर दशका और उपयात नाम. यो नाम कर्म की ५५ और गोव की २. यो सब १५ प्रकृत्ति उदय विरोव की होने के सवव से अब उदय की गिनी जातीहै. ११:-१२४, ऊदीरणा दारों का अर्थ. जो कमों अभितक अवाया काल परिपक नहोने मे उदय अवस्था को-फल देने को समर्थ नहीं हुवे हैं. ऐसे कनों को अपना करण वार्य की विशेषता कर उन्हें आकर्ष कर-संचकर उदया वली में लाकर अनात काल में भागवे-जैसे वृनके अपरि पंक फल को आनके व घांस ( पराल) के जोग मे पाका कर भोगवते हैं. उसे - ४ सम्यक्त्र मेहना उदय वेदज्ञ सम्यक्त्री के होता है और मिश्र मेह दोनों के मायने होता है. इसरिये यह दोनों प्रकृति ध्रुव गिनि जाती है सोव्ह कपाय. १७ भप. १८दुगंछा, यह १८ मेहनीय कमंत्री प्रकात अवोदय ने गिनी है. क्योंनि-क्रोध के उदय में मनदिन का जय नहीं होता है. योन्द प्रहनियों उदय विरोधी होने के कारण से स्त्रोदय में गिनी हैं. परन्तु बन्ध विरोधी नहीं हैं. और भय त्या दुगठाक उदय सन्र है. र्थात् नी हेवे और भी नहीं भी होवे, मिने अपनी गिनी है.

२१८ प्रथम अर्थ काण्डका-द्वितीय कर्म द्वारारोहण कान्ड ११ दीरणा करी कही जाती है इसकी भी उदय की माफक १२२ ही प्रकृत्तिये हैं इसके १२ द्वारों का खुलासावार अर्थ वन्ध के द्वारों के माफक ही जानना. १२५-१४६ सत्ता के दारों का अर्थ. जीवका और कर्मों का सुवर्ण मट्टी की तरह अनादि सम्बन्ध है, इसालेये वो कर्मदल आत्मा के प्रदेशों पर बना रहै-दूरन होवे अथवा दूसरी प्रकृत्ति में संक्रमें न ही निधान की तरह रहे वहां तक उसकी सत्ता गिनी जाती है. वो कर्म कैसे हैं? तो कि-उनके वन्ध से तथा संक्रमण से प्राप्त हुवा है आत्म लाभ मतिज्ञानावरणीय आ दि आत्म स्वभाव जिससे ऐसे कर्म अर्थात-सजातीय उत्तर प्रकृत्ति में निज स्थिति रस दल का परिकमावना, जैसे देव गति मनुष्य गति में संक्रमा कर सत्ता में रहना ऐसी सत्ता की प्रकृतियों सब १४८ ही हैं इसके २२ द्वारो में से ध्रुवा ध्रुव सत्ता के ४ द्वारों छोड कर वाकी के द्वारों के अर्थ का खुलासा तो बंध के द्वारों मुझवही जा नना. ध्रुवा ध्रुव सत्ता का खुलाशा यहां करते हैं. ध्रुवा ध्रुव कर्म प्रकृत्ति सत्ताका अर्थ. झानावरणीय की ५, दर्शना वरणीय की ९, इन का बन्ध ध्रुव है. तो सत्ता तो जरुर ही होय. वेदनी की-२ दोनो प्रकृत्ति का परस्पर सक्रान्तदल की अपेक्षा से ध्रुव है. मोहनीय कि-१६ कपाय. ?. भय, ' दुंगछा, १ मिथ्यात्व. यह धुव बंधी हो नेमे तुव सत्ता वली जरुर होती है ३ तीनों वेदाका उदयतो अध्रुव है परन्तु एक वेद के उदय में तीनों वेदों की सत्ता पाती है. और हांस्य और रति, तथा शोक और अ रनि इन दोनों जुगलों की सत्ता भी क्षपक श्रेणि में नववे गुणस्थान तक सय जीवों के रहती है, ( यह मोहकी २६) नाम की १० वस दशका, या १० स्थावर दशका, और वर्णादि २० सद शरीर धारीकेही होते है ! तेजस शरीर, कार्मण शरीर, तेजम संघातन, कार्मण मंघातन. तेजम बंधन कार्मण बन्धन. ( यह दोनों शरीर मर्य स्थान पाने मे ६ प्रकृत्ति मदा पाती है, औदारिक शरीर, औदारिक अनो पान, औदारि क संघातन, औदारिक बन्धन, इनकी मत्ता भी सर्वाटा पाति है, क्योंकि-मनुप्यति यंच के नो इनका उदय है. और नारकी देवता के मत्ता है-( मर कर इमी में आन वाले ) निर्यच गति और नियेचानु पूर्वी इन दोनों की सत्ता प्राथम मर्व जीवों के सदा होती है. क्योंकि बहुत काल इमी में गमाया है. तया दूमरी गान में भी इम कार पाता है. निर्माण, उपचाद, भगुरुल, रथास उधोत, आताप, पगपात, - . मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थाना रोहण अढीशतद्वारी २१९ जाति. ६ संघयण, ६ संस्थान, और २ खगति [ यह नाम कर्म की ७८] १.नीच गोव की अध्रु सत्ता तिर्यच में गाते नियमा से होवे, और ५ अन्तराय की सत्ता सव जीवों के सर्वदा पाती है. यों ७ कों की १२६ प्रकृति ध्रुव सत्ता वाली जानना. अध्रुव सत्ताकी प्रकृत्ति उसे कहते हैं. कि-जिसका उदय कभी होवे कभी न होवे ऐसी२२प्रकृत्ति है-१ सम्यक्त मोहनीय और मिश्र मोह नीय इन दोनों की स- त्ता अनादि मिथ्याल की होती है यों सम्यक्त का वमन कर जो मिथ्याल गुणस्था न मे आया हो उसके होता है. अन्य के नहोने से अध्रुव गिनी जाती हैं. और चारों गति के आयुष्य की सत्तामें से किसी जीवके एक गति के आयुष्य की सत्ता होती है किसी के दो गतिके आयु की सत्ता होतीहै परन्तु सबों के एकसी सत्ता न होने से आयुष्य की प्रकृत्ति अध्रुव गिनी है. मनुष्यगति और मनुष्यानु पूर्वी इन दोनों प्रक त्ति की तेड और वायु में बहुत काल रहने वाला उबेलना करता है इसालये उनकी सत्ता मे नहीं पाने से अध्रुव गिनी जाती है. वैक्रिय शरीर, वैक्रिय अङ्गो पाङ्ग, वैक्रि य संघात, वैक्रिय वन्धन, देवगति. देवानु पूर्वी. नरक गति, नरकानु पूर्वी. इन ११ प्रकृत्ति की सत्ता अनादि निगोदीये जीवों के बन्ध के अभाव से नहीं होती है, तथा ज्वेलते भी नही हैं. इसलिये अधुव है. जिन नाम की सत्ता भी जो सम्यक्त्व प्र त्यय वन्धन कर फिर मिथ्यात्व में जावे जिसके अन्तर मुहूर्त लग होती है दूसरे के नहोतीहै इसलिये अध्रुव गिनीहै. आहारक शरीर अहारक अङ्गो पाङ्ग आहारक संघा तन आहारक बन्धन. इन का अप्रमत गुणस्थानी विशुद्धा चारी मुनि वन्धन कर फिर सक्लेश परिणामों से मिथ्यात्व में जावे उनके सत्ता में होताहै दूसरे के नहोने से अभव गिनी है, और ऊंच गोव की सत्ता भी अधुव है, क्योंकि ते ३ और वायु में रहे हु वे जीव ऊंच गोत्र की उवेलना करते हैं. उस वक्त उसके ऊंच गोव की सत्ता नहीं. रहे तीहै इसलिये अर्भुव. ऐसे मिध्याव गुणस्थान में वर्तते भी जिन प्रकृत्तियों की स ता किसी के होवे किमी के नहोवे ऐमी यह २८ प्रकृत्ति अध्रुव सत्ता की जाणना. १४७–१५५ कमों के भङ्ग दारों का अर्थ. वन्ध उदय. और सत्ता इन तीनों की प्रकृत्तियों के स्थान बताते हैं:--मूल आठ प्रकृत्ति वन्ध की अपेक्षा से-८ का. ७ का. ६ का. और १ का. यह ४ स्थान होते हैं. और उदय की अपेक्षा मे-८ का, ७ का. और ४ का. यह तीनो स्थान हो २२० प्रथम अर्थ काण्डका-द्वितीय कर्म द्वाराराहणे कान्ड ११ ते हैं, और सत्ता की अपेक्षा से-८ का, ७ का और ४ का, यह तीनो स्थान होते' है. सोही कहते हैं जिस वक्त जीव सव कमों का वध करता है तब आठ प्रकृत्ति के बन्ध का स्थान होता है, सो. जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर मुहूर्तही रहता है. । जव आयुष्य का वन्ध नहीं होता है तब सात प्रकृत्ति का बन्ध स्थान होता है यह जघन्य अन्तर मुहू त. * और उत्कृष्ट ३३ सागर में ६ महीने कम और अन्तर मुहूर्त कम पूर्व कोटी व प का तीसरा भाग अधिक इतना होता है. + । और जब आयुप्य मोहनीय विना छे कर्म का बन्ध दशवे गुणस्थान मे होता है वो जघन्य १ समय में उत्कृष्ट अन्तर मुहू त ! क्योंकि-इसकी स्थिति इतनी है । और १ वेदनीय कर्म का बन्ध इग्यारवे और * कोइ अन्तर मुहुर्त आयुष्य वाला जीव अपने आयुष्य का तीसरा भाग बाकी रहे तब परभव के आयुष्य का बन्ध करे, तब आठों कर्म का वध कर फिर सात प्रकृति के बध स्थान मे आवे. वहा फिर कुछ कम अन्तर मुहूर्त के तीसरे भाग पर्यन्त सात प्रकृति के बन्ध कर्ता सात प्रकृति के बन्ध स्थान में रहकर फिर मृत्यु पाकर अन्तर मुहुर्त के आयुष्य के स्थान में अवतरे वहा भी उस आयुप्य के दो भाग पर्यन्त सात प्रकृति का बन्ध करे, फिर तीसरे भाग के धुर में आयू बन्ध करे तब आठौंक बन्धे स्थान को प्राप्त होवे इसलिये अन्तर मुहुर्त का जघन्य काल कहाहै. + कोइ पूर्व कोटी वर्ष के आयुष्य वाला अपना आयुप्यक तीसरा भाग रहे तब अन्तर मुहुर्त पर्यन्त ३३ सागर का देवताका आयूका बन्ध करे वहा ८ प्रकृति का स्थान मे रहकर फिर पूर्व कोटी वर्ष का तीसरा भाग मे अन्तर मूहूर्त कम रहे वहा तक सात प्रकृति के ब- ध स्थान में रहे, फिर वहा से चव कर देवता होवे वहा भी तेतीस सागर ६ महीने कम पर्यन्त तो ७ प्रकृति काही बन्ध करे. फिर छे महीना बाकी आयुष्य रहे तब परभव का आयु'य बन्धे, तब आठ प्रकृति के वध स्थान मे आवे. इस अपेक्षा से उत्कृष्ट इतने कालका संभव है. कोइ जीव पमश श्रेणिकर दशवा गुणस्थान एक समय लग स्पर्शे वहा भव क्षय से मरण पाकर अनुत्तर विमान में देवता होने वाह फिर अब्राति सम्यक दृष्टि पने सात प्रकृ- तिका बन्ध करे इस अपेक्षासे जवन्य एक समय जानना- * दशवे गुणस्थानकी स्थिति अतर मुहुर्त कीहीहै वहाभी छे प्रकृतिका बन्ध होता है. - मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अनोगत हारी ११ २२१ तेरवे गुणस्थान में होता है. जिसकी स्थिति-जघन्य १ समय की. + उत्कृष्ट देश के णा क्रोड पूर्व की । यह चार बन्ध २। यह चार बन्ध के स्थानक ॥ आयुप्र कर्म का बन्ध करते ए क आठ कमौका पन्ध करने का स्थानक होता है. मोहनीय कर्न का बन्ध करते-एक आठ का और दूसरा मात का यो दो बन्ध स्थान होते है. वेदनीय कर्म का वध क रते-आट का.मात का छेका और एक का यों चार कन्ध के स्थानक होते है. वा- की रहे-ज्ञानवरणीय. दर्शना वरणीय. नाम गोद और अन्तराय इन पाचों कोंका बन्ध करते आठ का. मातका और छेका यह तीन कर्मों के बन्न के स्थान होते है। २ उदय के तीन स्थानक कन्ने है:- आठों कोंका उज्य का पाला स्थानक. यह अभन्यकी अपेक्षा अनादि अनन्त. भव्यती अपेना अनादि मान्न. और र पडबाड की अपेक्षा नादि नान्त. इनकी स्थिति-जयन्य अन्तर मुहूर्त की. उ. स्कृष्ट देशऊनी आधा पुङ्गल परावर्तन की ४ । मोरनीय निना मान कनों का दूसरा उदय स्थानक इग्यारवे वारवे गुणस्थान में होता. जिनकी स्थिति जयन्य एक समय की. और उत्कृष्ट अन्तर मुर्त की (!)। और चारों घानिये कों का भय कियेवाद. वेदनीय आयुप्य. नान और गोव या चानें भोप ग्रानी कनों का उदय तेरवे चढवे गुणन्यान में होता हैं जिनकी स्थिति-जयन्य अन्तर मुल. कष्ट देग जणी क्रोडपूर्व ॥ इनमें मोहनीय कर्म का उदय एकी आमाति के उदय ज्यान + स्पान्या गुणस्तान को १ व नत्र मानव होना जोड क्रोड पूर्व के अयुब दल मात्र महीने ह के सलेमें चार प्रहन करे, मन भनटकर बनन करे - अशा में जानना. * कोड पर - जामाने :- --.. - हर -- (') : मन :: मदन d वे १२२ प्रथम अर्थ काण्डका-द्वितीय कर्म द्वारारोहण खण्ड पर होता है; ज्ञानावरणीय, दर्शना वरणीय और अन्तराय, इन तीनों कर्मों का उदय आठ के और सात के दोनों स्थानों में होता है. वाकी के चारो कर्मोका उदय दश- गुणस्थान तक आठों के उदय होता है, इग्यावे वारवे गुणस्थान में मात के उ दय स्थान में होता है, तेरखे चउदवे गुणस्थान में चारों के उदय स्थान में होता है. ३ तीन सत्ता के स्थानकः--आगे कों का मत्ता का स्थानक तो इग्यावे गुणस्थान तक पाता है, सो अभव्य की अपेक्षा अनादि अनन्त, और भव्यकी अपे क्षा अनादि सान्तः । मोहनीय कर्म का क्षय कियेबाद मात कर्मों का सत्ता स्थानक- वारवे गुणस्थान में अन्तर मुहूर्त पर्यन्त पाता है.। और चारो घातिये कर्म भय कि- येवाद, चारो अधातिये कर्मों का सत्ता स्थान तेरवे चउदवे गुणस्थान मे जघन्य अ- न्तर मुहूर्त ५ उत्कृष्ट देशउणा कोड पूर्व लग पाताहै. ॥इसमें-एक मोहनीय की सत्ता मे आगे कर्मों का सत्ता स्थानक, मोहनीय विना तीलो घातिये कर्मों की सत्ता मे- आठका और सातका यह दो स्थानक पाते हैं. और चारों अघातिक कर्मों की सत्ता में आठका सातका और चारका यह तीन सत्ता के स्थानक पाते हैं. अठों कों का वन्ध उदय और सत्ता का सम्बेध कहते है:-अष्टविधि बन्धक सप्तविधि बन्धक और पडावीध वन्धक, इन तीनो बन्ध मे अलग १ आठ कर्मों का उदय और सत्ता होती है, जिसके तीन भाङ्गे है:-१ आठों का वन्ध आठों का उद य, और आठो की सत्ता; यह प्रथम भग, आयुवन्ध के वक्त अन्तर मुहूर्त प्रमाण मिथ्यात्व गुणस्थान से लगा मत संयति गुणस्थान तक पाता है. १ सात का वध आठ का उदय और आठ की सत्ताः यह दूसरा भङ्ग आयुवध के अभाव से जघन्य अन्तर मुहूर्त, उत्कृष्ट छे मनहीने कम तेतीस सागर पूर्व कोडीका तीसरा भा ग अधिक, मिथ्यात्व से लगा कर आनटात वादर गुणस्थान तक पाता है, ३ छ: का वन्ध, आठ का उदय, और आठ की सत्ता; यह तीसरा भग, सूक्ष्म, सम्पराय गुणस्थान में जघन्य एक समय, उत्कृष्ट अन्तर मुहूर्त प्रमाण जाणना. क्योकि यहां मोहनीय का बन्ध नहीं है, ॥ एक वेदनीय के बंध के तीन भागे होते है:-२ एक का बंध सातका उदय और आठ की सत्ता, यह प्रथम भङ्ग-उपशान्त मोहके स्थान जघ न्य एक समय उत्कृष्ट अन्तर मुहूर्त लग मिलता है, क्योकि यहां मोहका उदय तो यह अन्तगड केवली की अपेक्षासे जानना. ३ ५ - * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अबीगतद्वारी नहीं है, परन्तु मत्ता हैं. २ एक का बंध. मात्त का उदय और मात की सत्ता यह दूमरा भङ्ग भीणमोह गुणस्थान अन्तर मुहूर्त लग पाता है. एक का बन्ध. चारका उदय: और चारकी मत्ता यह तीसरा भङ्ग मंयोग केवली गुणस्थान में जघन्य अन्त र मुहुर्न, उत्कृत्त देशऊणा क्रोड पूर्व वर्ष पर्यन्त पाता है. २ और वन्ध के अभाव मे चार का उदय और चार की मत्ता यह एकही भङ्ग अयोगी केवली गुणस्थान में पाता है. निमकी स्थिति पांच लघु अमर की । यो मत्र आठ मूल प्रकृत्तिके ७ भांगे होते है. कमों की उत्तर प्रवृत्तियों पर बन्ध उदर और मना का मेवेध. ज्ञानावरणीय और अन्तगय इन दोनो कर्मों की पांच २ प्रकृनि होने मे वन्य उदय और मत्ता का संबंध एकना है. समलिये यहां दोनोंती माधही करने दोनों की पान २ प्रकृत्नियो ध्रुव बन्धक लिये पांचो का बन्य भी ध्रुव पर भी प. भौर म- ना भी जाणना । अब न दोनों का सम्वेध याने:-१ माननीय और अन्तगर बन्ध की बत्ता पाचो प्रवनिका दन्य. पांची कार और पांचां कीम ना यह प्रथम भङ्ग दावे गणस्थान तक पाता है. इन दोन , यर अभाव : पाचो का सच और पांचों दी मना पर दृना भइ-११.१. गुणस्थान में पाना. दर्शना वरणीय का नम्बेच भड़ादि दर्शनावाणीव वीनमान:: नमानि मामान भर दनोपन्यान में पाना है, मो-अभवती भोका में अदि अन्य पंक्षा में अनासन्न. और पवार की अपेक्षा माईनान्नाना है. ! ईन । यति का दान निधपम्पान में आई दापन पत्रा १. नो जयन्य अन्तर न दष्ट र ग x ! :न्दिर नि चार प्रगान मामान अई काम ट 1 - २२४ * प्रथम अर्थ काण्डका-द्वितीय कर्म द्वारा रोहण खण्ड ११ गुणस्थान तक पाता है सो जवन्य एक समय : और उस्कृष्ट अन्तर सुहूर्तः ॥ दर्श ना वरणीय के सत्ता के तीन स्थान:-१ नवका सत्ता का स्थानक-अभव्य की अपे क्षा अनादि अनन्त, और भव्यकी अपेक्षा अनादि सान्त होता है। यह स्थान उप- शम श्रेणिकि अपेक्षा से तो मिथ्यत्व गुणस्थान से लगाकर उपशान्तमोह गुणस्थान तक पाता है, और क्षपक श्रेणिकी अपेक्षा से मिथ्यात्व गुणस्थान से लगा अनिति वादर गुणस्थान के पहिले भाग तक पाता है. यहां थीणाद्वि विक का क्षय होने से- । २ छ; प्रकृत्ति का सत्ता स्थान अनिवृत्ति वादर गुणस्थान के दूसरे भाग से लगा कर बारवे गुणस्थान के द्विचरम समय लग पाता है, इसकी स्थिति अन्तर मुहूर्त की । ३ और पारवे गुणस्थान के अन्तिम समय-निद्रा और प्रचला का क्षय होने से चा रों प्रकृत्तिका मत्ता स्थानक एक समय तक रहै. ॥ दर्शना वरणीय के उदय के दो स्थानक:-१ चक्षुदर्शना वरणीय, अचक्षुदर्शना वरणीय अवधि दर्शना वरणीय और केवल दर्शना वरणीय इन चारों प्रकृत्तिका ध्रुवोदय मिथ्यात्व से लगा क्षीणमोह गु- णस्थान तक होता है. । २ और इन चारों के साथ जब निद्रा का उदय होवे तब च के उदय का दूसरा स्थान जानना. + अब दर्शनावरणीय कर्म प्रकृत्ति का बन्धादि का सम्वेध कहते है:-दर्शनावर णीय में-नवका स्थान मिथ्यात्व और मेस्वादन गुणस्थान में होता है, इस में- चादर्शनावरणी आदि चारों के उदय स्थान होवे, और २ पांचो निद्रा में की एक वक्त में एक हीनिद्रा का उदय होनेके पांचका उदय स्थान होवे इन दोनों भांगेमे मत्ता का स्थान तो प्रवृत्तिका ही होता है. अर्थात-१ नवका बंध चारका उदय और १ की सत्ता यह प्रथय भङ्ग, २ नवका धंध पांच का उदय, और नक्की मत्ता यह दु- - x बोई जीव आठवे गुणम्यान में मरकर देवता हाय दहा ६ प्रकृति का बब करे हम अपेक्षाने. पानी निद्रा अत्रोटय की प्रति है, उमलिये रदय विधी , अर्थात-पात्रा में किही कत, वही निद्रा का उदय होता है. टुमर्गका नहीं होता है. और जब निद्राका स्टर नहीं होर तब चक्षु दनावरण आदि चावा उटय सना शमलिय निद्रिस्य अवस्या पाच के उदय का भागा पाता है नही ना चारका मागा पाता. दो भागे 3. -- .

* मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थाना रोहण अढीशतद्वारी * सरा भङ्ग, + ऐसे ही निश्चय से छेके वंध मे और चारक बंध मे वी दोदो भोंगे होते है सो कहते हैं:-१ छ का वंध, चारका उदय, और नवकी सत्ता; २छे का बंध पांचका उदय, और नवकी सत्ता. यह दोनों भागे तीसरे गुणस्थान से लगाकर आ- ठवे गुणस्थान के प्रथम भाग तक पाते हैं. क्योंकि-तीसरे गुणस्थान से थीणद्वी वि- क की नास्ति होती है. और उदय तो चारका ध्रुव होता है और जिस वक्त निद्राका उदय होवे उसवक्त पांचों प्रकृति का उदय पहिले कहे मुजब जानना और सत्तातो नवकी ही होती है. और क्षपक साधु के आठवे गुणस्थान के प्रथम भाग मे-छे का बंध, चार का उदय, और छे की सता यह एकही भांगा पाता है. परिणामो की अ- त्यत विशुद्धता से निद्रा का उदय होता नहीं है. + ऐसे ही चार के बंध में भी तीन भांगे जाणनाः-१ पांचों निद्रा विना-चार का बंध, चारका उढय. और नवकी सत्ता जब निद्रा और प्रचला दोनों में से एक का उन्य होवे तव चार का वन्ध, पांचका उदय और नवकी सत्ता, यह दोनों भाने आठवे गुणस्थान के दुमरे भाग से लगा- कर इग्यारवे गुणस्थान तक तो उपशम आण मे पाते है. और क्षप के तो निद्राके अभाव से पहिले कहे मुजब एकही भागा पाता है. ॥ और चार के बन्ध में नववे गुणस्थान के दुमरे भाग से थीणवी विक नववेके प्रथम भाग में प्रोपे उस वक्त छ की सत्ता होती है उत्सवक्त चार का उदय औरछे की सत्ता पाती है यह भाग दश वे रागस्थानके अन्तिम समय तक क्षपकमे पाता है। फिर बंधले निवृते वाद इग्यारखे गुणस्थान में चार का उदय और नवकी मत्ता. १ तथा पांच का उदय और नव की सत्ता. यह दो भाने पातेहै * और वारवे गुणस्थान के अन्तिम ममय के पहिले समयतक-चार का उदय और छेकी मत्ता, और अन्तिम समय में चार का उदय ४ दूसरे भागे में ऐकन वक्त पाचों निद्रामे से एकेक निद्रा उदय होवे उनका नाम ले अल्ग २ भागे कहने से दूसरे भागे के पाच उत्तर भागे होनाते है. x कितने आचार्य बारवे गुणस्थान का निद्रा का उदय मान कर आपक को भी निद्रा का उदय फरनाते है. परन्तु यह बात मिलनी कम है. + क्योकि-उपमान मोह वाले के निद्राज जद भी समय है. इसलिनका उत्पी निर मनना है. और सत्ता तो नत्र कही है. - १२६ * प्रथम अर्थ काण्डका प्रथम मूल द्वारा रोणह खण्ड र और चार की सत्ता + ॥ यह सब मिल कर (११) भाने दर्शनावरणीय कम क होते हैं. = ॥ वेदनीय कर्म के भंगादि वेदनीय कर्म की-साता वेदनीय और असाता वेदनीय यों दोनों प्रकृति वन्ध विरोधकी है. अर्थात्-एक समय में दोनों में से एक काही बन्ध पडता है. तैसे ही उ दय विरोध की भी हैः-अर्थात एक समय में उदय भी एक काही होता है. साता का तव असाता का नहीं और असाता कातवसाताका नहीं इसलिये बन्ध काऔर उदयका एक एकही स्थान होता है और सत्ता स्थान तो दो काभी होता है और एक का भी होता है. । वेदनीय कर्म के ८ भाङ्ग:-१ असाता बन्ध, असाता का उदय और सा ता असत्ता दोनों की सत्ता. २.असाता का वन्ध साताका उदय और साता असाता दोनों की सता. ( यह दोनो भाङ्गे मिथ्यात्व गुणस्थान से लगा कर प्रमत गुणस्थान तक पाते हैं, फिरे आगे असाता का वन्ध च्छेिद होता है फक्त एक साताही का वन्य रहै तव ) ३ साता का वन्ध असाता का उदय और दोनो की सत्ता ४ साता का वे ध साताका उदय और दोनों की सत्ता. ( यह दोनो भाङ्गे मिथ्यात्व से लगाकर सं योगी केवली गुणस्थान तक पाते हैं. । फिर आगे वन्ध के अभाव से) ५साता का उदय और दोनों की सत्ता, ६ असाता का उदय और दोनो की सत्ता ( यह दोनों भांगे अयोगी गुणस्थान के द्विचरम समय तक पोत हैं । फिर (७२ प्रकृत्ति मे जिनों ने असाता क्षयका किया उन के) ७ साता का उदय और साता की सत्ता यह भाडा अयोगी गुणस्थान के अन्तिम समय मे पाता है । और (जिनोने साता का क्षय कि- * द्विचरम समय में निद्रा का और प्रचला का क्षय होता है, इसलिये चारही--की सत्ता रहती है. और जो क्षपक श्रेणि मे निद्रा का उदय मानते है उनके मत से-१ चार का बन्ध, पाच का उदय छेकी. सत्ता. यह भागा नववे दशवे गुस्णथान वृत्ति क्षपक में पाताहै और बन्ध के अभाव से पाच का उदय छकी सत्ता यह भागा गीण मोहके द्विचरम समय तक पाता है. यों यह दोनो भागे बढने से दर्शना वरणीय के १३ भाग भी होजाते है. और भी ज हा जितनी निद्रा का उदय होवे वहां उतनी निद्रा को अलग २ कहने से २५ भागे होजाते हैं .

* मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अदीशतद्वारी. २२७ या उनके ) ८ असाता का उदय और असाता की सत्ता ( यह भागा भी अयोगी गुणस्थान के अन्तिम समय पाता है ) यह वेदनीय कर्म के ८ भाङ्गे मोहनीय कर्म के भङ्गादि. मोहनीय के २२ का, २२ का २७ का, २६ का. ९ का. ५ का. ४ का, ३ का. २ का. और १ का यह २० बन्ध स्थान हैं:---२ प्रथम २२ प्रकृत्ति का बन्ध स्थान मो मोहनीय की सब २८ प्रकृति मे से १ मिश्रमोह और २ सम्यक्त्व मोहका तो बंध पडताही नहीं है. और तीनो वेदो मे से एक वक्त मे एकही वेढका बंध पडता है तथा हांस्य और रतिशोक और अरति इन दोनो युगलों मेसे एक वक्त मे एकही का बंध पडता है या २ दोमोहनीय. २ वेद और २ एकयुगल की मिल ६ प्रकृति कमी होने से एक वक्त मे २२ ही प्रकृति का बंध पडता है. यह बंध मिथ्यात्व गुणस्थान में पाता है. मो-अभव्य की अपेक्षा अनादि अनन्त. भव्य की अपेक्षा अनादि सान्त और पडवाइ की अपेक्षा सादि सान्त. । इन २२ मे से जब मिथ्यात्व मोहनीय का वन्ध नहीं होवे तब २१ प्रकृत्ति का दूमरा न्य स्थान सेस्वादन गुणस्थान मे पाता है. मो जयन्य एक समय. उत्कृष्ट आव लि का ४ । पूर्वोक्त २२ प्रवृत्ति मे मे—अनन्तान वन्धि चौक और मिथ्यात्व मोह नाय का बन्ध नहोवे. तब मिश्र गुणस्थान में. १ का अविरति गुणस्थान में तीसरा १७ प्रकृत्ति का बन्ध स्थान जयन्य अन्तर मुहूर्त. उत्कृष्ट । मागार माजेरा काल तक पाता है .। उन २७ प्रवृत्ति में मे-जिमवक्त अप्रत्याख्याना वरणीय चौक का वन्ध नहीं होता है तब २३ पत्ति का चौथा बन्ध स्थान देशविरति गुणस्थान में जयन्य अन्तर मुहूर्त उत्कृष्ट देशऊणा क्रोडपूर्व पर्यन्त पाता है । इन २३ में मे ज व प्रत्याख्याना वरणीय चौक का वध नही होता है तब प्रमत अप्रमत और अपूर्व करण गुगस्थान तक ९ प्रकृति का पांचवा वन्य चौथे वन्ध जितने काल x यहां नपुंज का ब्न्ध नहीं है तो भी. विवेद पुरपवेदका तो है. स्पोने-अनुत्तर विमान में देना चक्कर नहांतक विराते पना न पावे वहांतक इन बन्ध स्थान रहते हैं.

प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड की चौवीसी भी तीन होती है. । उपरोक्त चारोंमेसे भय और दुगछा, तथा भय औ र सम्यक्त्व मोहनीय, तथा दुगंछा और सम्यक्त्व मोहनीय-यों दो दो प्रकृत्ति को मिलाने से-तीन प्रकार से छे का उदय होता है. वहां भी भाङ्गे की चौवीसी तीन हो ता है. । आरे ऊपरोक्त चारो में-भय, दुगंछा, और सम्यक्त्व मोहनीय यह तीनों म कृत्ति साथ मिलाने से-सात प्रकृत्ति का उदय होवे वहां भी भाओं की चौनीती ? होती है. यों नवके बन्ध के चारो उदय स्थानों की भाड़े की चौवानी ( हुइमो. चा र तो क्षायिक और उपशम सत्राकिति की और चार वेदक ममकिति की. ॥ पांच प्र कृत्ति के वन्ध में-दों प्रकृत्ति का एकही उदय स्थान होता हैं। संचलके चौक में की १. कपाय, १ वेद, इने दोनों प्रकृत्ति का उदय स्थान हो. यहां भांङ्गे १२ होते हैं. क्योंकि-यहां हांत्यादिक का उदय नही है, इमलिये भाड़े की चौवानी नहीं होगाक्त है. फक चारों कपायों की तीनों वेदो के माथ गिनने मे १२ भाङ्गे होते हैं. यह १२ भाड़े नववे गुणस्थान के पांच भागो मे के पहिले भान ने पाते हैं. ॥ ऊपर कहा पा च का बन्ध म्यान उसके आगे पारका बन्य, तीलका बन्ध, दोका बन्ध, और एक का वन्ध. इन चारो बन्ध स्थानो ये-रकेक प्रकृत्तिका उदय स्थान नर्वस्थान पातो, मो कहते हैं। यहां पुरुप वेदका बन्ध विच्छेद हुवे बाद-जल के चौत काही बन्ध रहा और पम्पवद के बन्ध के माथ उदय भी टया, इसलिये चारों बन्ध में एकही मां गा पाताहै. क्योंकि-संज्वल की चारो कपायो भने-किनी को फोका उद य, किमी को फत्तमान का उदय किनी को फक्त मायक्षा और कितीको फक लो भ का उदय होने मेही चार भारु उदय के अन्टित्ति करण गुणस्थान के दुनो भा में पाने हैं, * । उसके बाद मंचल के क्रोध का विच्छेद होने में अनिटात करण - यहा कितनंर आचार्य चदार्थ बन्ध के मंक्रमण काल में नीना बंदा में के का बेटे का उदय भी मान ने है, टमाश्ये उन के मतने चतुर्विध वन के मंत्रमग काम मंचल का चीक और नानी बेटी के माय गिनने-१० भाडे विकोटग के यहा भी होते है. और पाच विध वय में भी द्विकांदय के बारे मागे होते. या दोनों कोदय मगि प्रधान कार में होते हैं. उनके बाद चतुर्विध वय कोदय के चार HAMAR- +meraman Amma . * मुक्ति सापान श्री-गुणस्थान रोहग अहाशतिद्वारी. ११ के तीसरे भाग मे-विविध बन्ध होता है. तहा एक का उदय होते. जिसके माने ती न बनते है. । फिर चौये भाग मे-नोके बन्ध मे संचल की माय तय लोभ इन दो नो ने एक उज्य मे दो भाले होते हैं. । ओर एक मंचल के लोभ के बन्धस्थान में-एक नंबर. लोन का उदय होते. उदयका एक भांगा नववे गुणस्थान के पांचवे भाग में होता है. ॥ फिर वन्य विना फल उदय का एक भागा हो. सो कहते मोदनीय कर्म बन्धक अभाव मना-मन सम्पराय गुणस्थान मे-एक संन्चलके लोभका उज्य स्थानहो. वहां एकी भाजाजाना. यों चारके बन्ध स्थानमे भाजा चार तीनके बन्धस्मान्ने भो तीन बोके वधस्थान भाड़े दो एकके वंश स्थानमे भांगा एक और बंध के शुन्य स्थान से माजा एक. स्त्र मिल भा) ११ एकेक के उदय में शेते ।य यपि यहां जल के क्रोधादिक के उन्य में विशेष नही है। तथापि कन्ध स्थान के दिशेरल कर विशेष जानता. ॥ फिर उदय के अभावने भी उपशान्त मोह गुणस्थान मे पाय उपशन किया परन्तु मचा है इमलिये मनानु पेन यह भी एक भागागृ हण करना. परन्तु यहां वन्ध और उदय के भवेध मे सत्ता का भागा कना सोनि कारण है. और वीणो मे तो सत्ता भी नहीं हैं. मद भागो की संख्या करते है। - दशके उदय की-१ चैविली. २ नवके उदय की । चविामी. : आट के उन्य की ११ चौवीनी. ४ मान के उदय में द. गौशनी. हे के उज्य मे ७ चौथीनी. पांच्के उदयन-चार चैविनी. औरचा रके उदय मे एक चौबीनी-यों मब मिल भाड़े की ४० चविखनी चों हुआ. और दे के उदय के १२ भाले एक के उदय के ११ भाङ्गे रुब मिल चालिम चविामी के नो ४०+२४ =२६० ओर ११+१२-२ यों १८३ भाड़े होते है। इन मव यो के भाड़े मे का एक भाड़ा जघन्य एक समय रहे और उत्कृष्ट अन्नर मुहूर्त पर्यन x रहता है. + वान्तर में होने दर में ४ भने हे हैं उनके मन में ११ कमी में २८४ भाग होते हैं. x दन्य स्थान निरन्तर उदयान्न कन्ने म. गुस्न्यान के भेट = दोदय - जुगलज अन्ना हुन में कन्या हो है. - न हटे हैं. दाने दर में नई सगुनका २३६ प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड * अब सत्ता स्थानक का सम्बेध कहते हैं:-२२ प्रकृति का वन्ध मिथ्यावीके होता है, वहां- ७ का, ८ का, ९ का और १० का यह चार उदय स्थान पाते हैं, (२) सात के उदय में एकही अठावीस का सत्ता स्थान होता है. क्योंकि सातका वन्ध अन्नतान वन्धिये के अभाव से होता है. वोभी सम्यक्त्व युक्त अनंतान बांधी- की उदीरणा की हो, वो जिसवक्त मिथ्यात्व में जावे उस वक्त फिर मिथ्यत्व मत्ययी अनन्तानुवन्धि चौक बन्धना सुरु करे. उस मिथ्यात्वीके वन्ध आवलिका तथा संक्र- मावलिका लग अनन्तान वन्धिये के उदय रहित सत्ता उदय होता है, वहां निश्चय से उसके २८ की सत्ता होती है. (२) आठ प्रकृति के उदय स्थान में २८ का, २७ का, और २६ का यह नीन सत्ता स्थान होते हैं। जिसके अनन्तान वन्धिये रहित ८ का उदय होता है. वहां पूर्वोक्त युक्ती से एक २८ का स्थान होता है, और अ- नन्तान वन्धिये सहित जो ८ का उदय होवतो-उस मे तीन सत्ता स्थान होते १ जहांलग सम्यक्त मोहनीय की ऊदीरणा नहीं करे तहांलग २८ का सत्ता स्थान २ सम्यक्त्व मोहनीय उदेरे वाद २७ का सत्ता स्थान. ३ मिश्र मोह उदेरे वाद २६ सत्ता स्थान अनादि मिथ्यात्वी में पाता है. योंही में भी तीन सत्त स्थान पाते हैं.। और दशका उदय तो अनन्तान वन्धि सहित होता है इसलिये वहां भी येही तीनों सत्ता स्थान जानना. ॥ २१ के वन्ध मे-७ का, ८ का और ९ का यह तीनों उदय स्थान में भी एक अठाइस का सत्ता स्थान होता है. । १७ के बन्ध में-२८ का, २७ का, २४ का, २३ का, २२ का, और २१. यों ६ सत्ता स्थान होते हैं. १७ प्रकृति का वन्य तीसरे चौथे गुणस्थान में होता है. वहां ६ का, ७ का ८ का और ९ का. यह ४ उदय स्थान सम्यक दृष्टि के होते हैं. जिस में का उदय नवके उदय नेसे १० चौधीमी होवे रेमेही . के उदय में ६ चौबीसी की-१४६ ५४ होवे. आटके के उदय ११ चौवामी की ८x११-८८ होवे. सात के उदय १० चौबीसी के 9x10 290 हावे. छेके उदय ७ चौवीसी के ६४७-४२ होवे पाचके उदय चौवीसीओ५४४ -२० होये, चारकं उदय चोवीमी ४ होये, दो के उदय एक चौबीमी के २ हो, यो १.० -२४-८८-१०-१३-२०-४-२१० मब मिलके चौबीसी दृट. दनको २४से गुना कर ने मे २१.०४२४६१.६० टन भागे होते हैं. इम में एकादय के ११ भागे मियने ११.७१ टनने पद वृन्द मांक हात टनने विकल्पों कर ममारी नाव मार्छन होन्ह है।

मुाक्त मापाने श्री गुणस्थान रोहण अहाशतद्वारी : स्थान तो धायिक सम्यक दृष्टि के और क्षयोपशम सम्यक दृष्टिके होता है. और सायिक सम्यक्त्ती के २१ का मत्ता स्थान होता है.- और उपशम सम्यक्त्ती के प्र थम ग्रन्यीभेद करते ओपगम सम्यक्त्ती प्राप्त होते तथा उपशम श्रेणिमें जिनोंने अन- न्तान बन्धि का उपशम किया हो उनके २८ का मत्ता स्थान होता है. और जिनोंने अनन्तान दन्धि की विभयोजना कर श्रेणिका आरंभ किया हो उनके २४ प्रकृत्ति का मत्ता स्थान होता है. यों दो मत्ता स्थान उपगम मम्यवती के पाते है. यह १७ के बन्ध के और के उदय के मव मिल-२८ का २४ का. और १ का. यानी- नों मत्ता स्थान हुवे. । मिश्र दृष्टिक-७ का ८ का. और १ का. य. तीन उदय २८ का. २७ का. और २४ का. यह नीन मना म्यान हानेको ८ को मता वाला मिश्र गुणस्थान में प्रवृत्ते उनके २८ की मना होती है. और जिपने मियाय होने मम्बन्ध की जहीरणा की हो और मिश्रपणा वीरमाना किया हो वो सम्यक्त्व उदेर मिथ्माव मे निटन फिर परिणाना कर दिया, ना.. की मना होनी है । चाये गणस्थान में १७ . बन्धन-नार-८ का. २४ का. २. का. २० का और १ का. य. मनाबाद पानी-- १८ का. नो उपगनिक और वेदक नम्यकाटि होता है और जानात बाकी वियोजना किये वाट ४ काxम्मान भी इनदोन दशहाने । चित्रकार मे--: का मत्ता म्यान । मिल्याल और मिश्र दोनो के परमानना था समान पणाम :- सम्पद मिरी :.. སམ་ rསསནྣཏྭཱ་ག. - -- -- प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम खूल द्वारा रोहण खण्ड र न ( यह दोनो वेदक सम्यक हाटके होते हैं. ४) और २१ की सत्ता तो क्षायिक सम्यती के होती है. ॥ ८ के उदय मे मिश्र गुणस्थान की सत्ता के उदय की त- रह-२८ का, २७ का, और २४ का. यह तीन सत्ता स्थााक होते है. और अविर ति सम्यक दृष्टिक जो-9 के उदय में पांच सजा स्थान का कैलाही तर० ५ मत्ता स्थानक आडके उदय में भी कहना. ॥ तेसेही १ का उदय भी अविरति वेदक सम्य काष्टक होता है-को क्षयोपशम समाति केलिये-२१ और २७ इन दोनो मत्ता स्थानक चिला वाकी का २८ का २४ का २३ का और २० का यहचार सत्ता स्था नक होते हैं, तो परि की तरह कहना. और १३ के बन्धन तथा ९ के बन्धे में अ लग २-२८ का, २७ का, २४ का, २३ का, २२ का, ओर २१ का, यह पांच मत्ता के स्वाकते है. इसे-१३ का. वन्य देश विरति के होबे उतके टोमट -(१) निवनाश्रिय जोर २ मनुष्याश्रिय. इससे नियचके-५ का, ६ का, ७ वा. और ८ का, इन चारो उदय रमाने में-२८ का, और २४ का, यह दो सत्ता स्था नति-य. के. के. और ७ के. उदय में ओपनधिक नम्यक दाष्टक २८ का मचा निा कोटा ग्रन्थी भेट कर सम्यक्त्व युक्त देश विरति पा आदरे जिसकी अक्षमता और भयोपथिक सम्यक धितियच के-६ का ७ का ओ २८ का, यः नानी उपय २४ की सत्ता में होता है-मो आन्तानबीन्ध नारों की वियोजना, पहिले नानानि से करी है उन अपेक्षा, और हरे-3 का, २२ का जायः ३ मा स्थानक देश विरतिनियय केही होते और दे ४ थका-नगान का व चौक और रिव्याच तया मिश्र मार टन प्रति को क्षय कर सम्पन्न मो.नं. पाना उम मि समय-नाम में हलता बाट पूर्व मन्त्रायु जीव वहाही युर नाचाने गात मी किती रक गति में जाने माग्य २० का मत की गति में पानी. क्योकि... अं. यह दोनो मना स्थान भाषिक मन्यात उपन्न होती या पवित्र कि समय की प्रालि हानी नही, किगायक मम्मात्रीने पति दि.८८ अन्य हा विच होनी मा अमापान आय वार (ये,म उपगे, उम विहानी, नया अमान्यात क का भय ब दिय बाद - - -- गुक्ति मापाने श्री गुणस्थान रोहण अागतद्वारी , शविरनि मप्र के के उज्य में २१. का. २४ का. और २८ का यह तीन तसा स्थानक पाते है. तथा : के ओर ७ के उदय में ५ मत्ता स्थान होते हैं. और ८ के उदय मे-२१ के सत्ता स्थान विना. बाकी के चारों मत्ता रथ र पाते हैं क्यों कि ८ का उदय सम्यक्त्व मोहनीय के साथ होता है. वहां २१ का. सत्ता स्थान न राता है. बाकी के ४ होते हैं. मो भी वेदक सम्यक दृष्टि मा प्य के देश विरती गुणस्थान पर के उदय मे-२८ का. २४ का. और का. यः : मत्ता स्था । न पाने . ओके उदय तश६ उदय जोम विरति मे को वहीं ५ सत्ता स्थान में हैं. और के अन्य २१ की सत्ता दिन बाकी के ४ सत्ता स्थान क होते है तो भी पहिले की नसीहता. !! : दर में और के कन्ध में अन्न ताम्राकोने है. उनसे-२८ और २४का यादो रत्ता स्थान । क नो पिसे उपजामिक नायक ष्टि के तेते हैं. पां जिम कब पल्या न के अनन्तातु वन्धि चौत की वियोन की उनके ४का लत्ता म्यान. १ का सत्ता स्थान तो-सायिक सम्पनी के किना सपाधि जहां नर-अमन्याख्यानी चौक और प्रत्यास्पानी चल ८- पाय काय ती हो न नकाना स्णन होता: ओर ८ पाय - पारे वारी कन्ध --का मत्ता स्थान रहता है. इसमें एंकको खपाये वाद की सत्ता जीवेद वपाय बाट ११ की पत्ताः पुस्प देवता बन्ध करते हान्यादि ६ नहत्ति का जयदती होना लिये तं पांचादि का सत्ता स्थान होता है. ॥ ४ के कद-का-४ का. ओर २१ का. या तीन मत्ता म्या तो उपम श्रेणि पहिलेकी नाही जानता. वानि के-: दत्ता न्या न अपक श्रेणिमे हैन लो करनेकोड जीवोदय नगार- क श्रेणि प्रारंभ करी दोबी और नमक दोनो दो को नारही पार. जनता ही पुरुष के वन्य का विच्छे होर. पिर पुरन और हान्यादि चर 2 त्ति माथही रूपाये. और जिहोंने ही दो उयो श्रेणि प्रारंभ कीको पहिरन . .. - देनाले दि.२१. कपीमिन्ह न है. का सत्तास्थान नहीं होते है. .

प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड ११ क वेदका क्षयकरे, फिर अन्तर महूर्त वाद स्त्रीवेद का क्षयकरे, उसके साथाही पुरुष वेदका बन्ध वीच्छेद होवे, और पुरूप वेदका वन्ध छेदकिये वाद, पुरुषवेद और ६ हांस्यदि इनका सायही क्षय करे, यह जहां लग क्षय नहोवे वहां तक इन दोनों स्था न मे-वार के पन्ध में वेदोदय रहित एकोदय वर्तते को ११ प्रकृति का सत्ता स्था. न होना है और पुरुष वेद ६ हास्यादि इनका साथही क्षय हुवे वाद चार प्रकृत्तिका सत्ता स्थान होते. यों ५ सत्ता स्त्रीवेद में और नपुंसक वेदमें श्रेणि मारंभे उनके हो. ये. और जो पुरुषवेद में खपक आणि प्रारंभे-उनके हांतादि ६ के क्षयके साथ पुरुष वेद का बन्ध टले-इसलिये उनके चतुर्विध वन्ध वक्त ११. का सता स्थान होव. पु. रुपोद विना हांस्पादि ६ वर्षे उसवक्त ५का सता स्थान होवे, वो दो सयम कम दो आपलिका तक रहे. फिर पुरुष वेद का क्षय हुवे वाद चार का सता स्थान रहे. वो भी अन्तर मृहत रहे. इसलिये इनके भी ११ का सता स्थान छोड वाकी के ५ मता म्यान होव, यो ४ के बन्ध मै : सता स्थान पाते है ।वाकी रहै ३ का, का, औ- र का इन तीनों बन्ध स्थानों में अलग २ पांच २ सता स्थान होते हैं. वहां-3 के वन्य में ८ का २४ का२०,४ का, और ३ का यह ५ सता स्थानक पाये. इसमें के पहिले तीन मना स्थान तो उपगम श्रेण में होते हैं. वाकी के-४ का और का यह दो मना स्थान पक श्रेणि में होते :-चल के क्रोध की अन्तः करण म. थम मिनि-एक आवलिका मात्र बाकी रहे. उमका बन्ध उदय और उदारणा एक- वी वक्त विच्छेद हर उस वक्त पानादि तीनों का वध हो. उमवक्त मंचल के को घका प्रसि.नि नन आपलिका पात्र और दो समय कम दो आंचलिका बन्ध म. ना छोडकर और मव भय हुवा और उन क्रोधकी मना भी दी ममय कम दो आंध कि काटायगी वा जमाया न जा नहां संग विरिधि बन्य चार प्रकृतिक जना में होते. श्राा उम मंचन के ब्रायका भय ये बाद तीन प्रकृति का मना म्या- नवली अन्तर पहन लग जाणता. द्विविधि बन्ध में ८ का...काकार था.य: पांच मनाम्यान हात टमन का नीन नी पदिले की नग्ह उपगम श्राणि में करना और दोश्रोगकदनामा पृक्ता बायकीनही मान का भी आवटिकामात्र प्रथम मिति गत को नर मचल के मान की भी बच उदय उटीपणा का मावही पिन ददात्र, नर दिविधि र हाव. यहां दी ममय कम दा पावलिकाना मंडल कीम नाना नान पनि का मना म्याना नागना. बार फिर मान के ?य मे.

२४१ * मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी * न्तर मृहूर्त पयत दो प्रकृत्ति का सत्ता स्थान जाणना. । और एक के बंध स्थान मे, भी पांच सत्ता स्थान जानना. उसमें से तीन तो पहिले की ही तरह उपशम श्रेण में कहना. और भपक श्रेणिमे कहने. सो कहते है:-जिसवक्त संज्वल के माया की म थम स्थिति आवतिका मात्र रहे उस वक्त संज्वसल की माया का बन्ध उदय और उदीरणा का सायही विच्छेद होवे. तव-एक का बंध स्थान रहता है, और दो समय कम दो आवलिका तक माया की सत्ता रहती है. इसलिये दो की सत्ता होवे । उस के बाद अन्तर मुर्न पयात एक लोभ की सता होवे यह व्याक्तव्य सब नववे गुण- स्णन वर्ती की जाणना. ॥ अब बंध का विच्छेद होने से मूक्ष्म सम्पराय गुणस्थान- न मे-२८ का. २४ का. २१ का. और १ का. यह ४ सता स्थान होते हैं. उसमे से तीन तो पहिले की तरेही उपगम श्रेणिके कहना. और एक संज्वल के लोभ की स- ता का स्थान भपक श्रेणि मे पाता है और बंध नथा उदय के अभाव से उपशान्त मोह नामक ११ वे गुणस्थान मे-२८ का, २४ का, और २१ का, यह तीन सत्ता के स्थानक होने. यह भी पहिले की तरही कहेना यो उशम श्रेण और धपक श्रे णि का सम्बधन जानना ।। यह सब १० बंध के, १ उदय के. १५ सता के स्थान इनके अलग २ भाड़े और बंधोदय सनाका सम्बंध युक्त प्रकृति स्थान मोहकर्मकहे. आयुय्य कर्म के भाले आयुष्य कर्म का सामान्य प्रकार भे एकही बंध स्थान होता है, क्योकि चारो गतिक आय का बंध विरोधी है-उमलिये एकही वक्त में दो आयु का बंध त- था उदय होता नहीं है और सता स्थान तो कभी एक का और कभी दो का भी पाजाता है:-जैन जहां लग आगे के भवका आयुका वन्ध पड़ा न हो वहां तक ए- की आयु वर्तता है. उनकी सत्ता जाणना. और परभव के आयुके बन्ध के कालमें तथा वान्धे बाद वहांतको आयुकीमत्ताततीहै आयुका संवधः-आयुकी तीन अवस्था होतीहै? परभव का आयु वन्धे के पहले की अवन्ध अवस्था. २परभव का आयु वा- ये उसवक्त की पसन्ध अवस्था. और : आयु वन्ध किये वाद की परा अवस्था इ- न तीन अवस्था के अनुमार भाजा करते हैं नरक गति आश्रिय ६ भाले- १. नरकायुका उदय और नरकायुकी मत्ता. यह प्रथम भागा परभव के आय वन्य पहिले वन्य के अभाव से प्रथम के चार गुणस्थान में पाना है. २ जो वर्तमान में तो , २४० मथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड १२ क वेदका क्षयकरे, फिर अन्तर महूर्त बाद स्त्रीवेद का क्षयकरे, उसके साथाही पुरुष वेदका वन्ध वीच्छेद होवे, और पुरूप वेदका वन्ध छेदकिये वाद, पुरुषवेद और ६ हांस्यदि इनका सायही क्षय करे, यह जहां लग क्षय नहोवे वहां तक इन दोनों स्था न मे-चार के पन्ध में वेदोदय रहित एकोदय वर्तते को ११ प्रकृत्ति का मत्तास्था- न होता है और पुरुष वेद । हांस्यादि इनका साथही क्षय हुवे वाद चार प्रकृत्तिका सत्ता स्थान होते. यो ५ सत्ता स्त्रीवेद में और नपुंसक वेदमें श्रेणि प्रारंभे उनके हो. वे. और जो पुरुषवेद में खपक श्रेण प्रारंभे-उनके हांतादि ६ के क्षयके साथ पुरुष वेद का वन्य टले-इसलिये उनके चतुर्विध वन्य वक्त ११ का सता स्थान होवे. पु- रुषवेद विना हांस्यादि ६ वर्षे उसवक्त ५का सता स्थान होवे, वो दो सयम कम दो आंचलिका तक रहे, फिर पुरुष वेद का क्षय हुवे वाद चार का सता स्थान रहे. वो भी अन्तर मूहूर्त रहे. इसलिये इनके भी ११ का सता स्थान छोड वाकी के ५ मता स्थान होवे, यो ४ के बन्ध मै सता स्थान पाते है ॥ वाकी रहै ३ का. का, औ. र १ का इन तीनों बन्ध स्थानो में अलग २ पांच २ सता स्थान होते हैं. वहां-३ के वन्ध में २८ का २४ का२१,४ का, और ३ का यह ५ सता स्थानक पावे. इसमें के पहिले तीन सता स्यान तो उपशम श्रण में होते हैं. वाकी के-४ का और का यह दो मता स्थान क्षपक श्रेणि में होते हैं:-संचल के क्रोध की अन्तः करण :- थम स्थिति-एक आवलिका मात्र वाकी रहे. उसका बन्ध उदय और उदीरणा एक- ही वक्त विच्छेद होवे उस वक्त मानादि तीनों का वन्ध होवे. उसवक्त संज्वल के क्रो घका प्रथम स्मिति गत आवलिका मात्र और दो समय कम दो आंवलिका वन्ध स- ता छोडकर और सव क्षय हुवा और उत क्रोधकी सता भी दो समय कम दो आंच लिक काल में योगी वो जहां लम न जावे तहां लग विविधि बन्ध चार प्रकृतिके लता में हो. और उस संचल के क्रोधका क्षय हुवे बाद तीन प्रकृति का सता स्था- न होवें.मो अन्तर मुहूर्त लग जाणना. | द्विविधि बन्ध में २८ का, २४ का २१ काऔर २ का,यह पांच सत्ता स्थान होते हैं. इसमें के तीन तो पहिले की तरह उपशम श्रेणि में कहना और दोक्षपश्रीणमे कहना मो पूर्वोक्ता क्रोधकीतरही मान को भी आवालेका मात्र प्रथम स्थिति गत करे तब संज्वल के मान की भी वन्ध उदय उदीरणा का सायही विच्छे द होवे. तर द्विविधि वंध होवे. वहां दो समय कम दो आवालिका तक संचल कीस त्ता है तब तीन प्रकृत्ति का सत्ता स्थानक जाणना. और फिर मान के क्षय से अ- २४७ ३ * मुक्ति मोपान श्री-गुणस्थान रोहण अही शतद्वारी र ५७६+२-११५२ हुवे. इने आदेय अनादेय से दुगुने करने से-११५२+२-३०४ हुवे. इने यश और अयशः से दुगुने करने से-४६०८ भाङ्गे हुवे. यह भाङ्गे सन्नि प- चेन्द्रिय तिर्यच गति प्रापोग्य-२९ प्रकृत्तिके बन्ध स्थान में होते हैं। इसमें विशेष-से, वादन आश्रिये वन्धते हुंडक संस्थान और छेवटे संघयण को वन्ध नहीं गिरते,फक्त पांचही से २५ होते हैं. जिनको उपरोक्त रीति से फलाने से (७ वक्त दुगुने करने से ) सब ३२०० भागे होते है, परन्तु यह भा) ४६०८ के अन्दर के होने से अल गे नही निने. 1 और २१ प्रकृत्ति मे नद्योत नाम मिलाने से ३० प्रकृत्ति के बन्धस्था न के भाङ्गे भी ४६१८ होते है सो २९ के बन्ध की तरही करना. यों पचेन्द्रिय के तीनों स्थान के मिलकर ९२१७ भाने होते हैं. ॥ मनुप्य गति प्रायोग्य वन्ध करते- २५ का.२२का और का यहम्वन्ध स्थान होते है जिनके भाले कहने हैं:-२५ क बन्ध स्थान अपर्याप्ता मनुप्य प्रायोग्य वान्थे. वहां भागा एकही होता है. नियंच के २५ के बन्ध स्थान की तरह कहना. विशेष इतनाही की निर्यच के म्यान मनुप्य का नाम लेना. । २९ प्रकृति का बन्ध स्थान मो प्रथम के चारों गुणस्थानों में होता है. इनमें मिथ्यात्वी और में स्वादनी तो चारो गतिके जीवो बन्ध तेहै. और मिश्र न था अविरति मम्यक दृष्टि सो देवता तथा नरक जीवो वन्धने हैं. उसमें भी जमे-प- चेन्द्रिय तियेच पायोग्य २१ प्रकृात्त के वन्ध स्थान में-४६०८ भाड़े कहे नेनेही क हना. परन्तु इतना विशेष कि-मेस्वादनी के :२०१ भाने कहना. और मिश्र दृष्टि तथा मम्यक दृष्टि–नारकी और देवता के-९ नाम कर्म की व प्रकृति १० मनप्य गति ११ मनुप्यानु पूर्वी. १२ पचेन्द्रिय की जाति. १४ औदारिक द्विक.' बन्न- ऋपभ नारच मंघयण. १६ ममचतुरस भंस्थान, १७ पगवान १८ उवाग.१० शुभ विहाय गनि २० घन. २१ दादर. २२ पर्यामा. प्रत्येक. २४ मि अस्थिर में । का-एक. २१ गुभा शुभ में का-एक. २६ मुभग. २७ मुम्बर. ८ आदेय. और १९ या; अपरा में एक.. एन.१ महति के बय में-भाड़े ८ उपनते है. क्योंनि -यहां अपम मंघयण और प्रथम मंथनन विना बाकी के पांच पांच नही है. और ग्वगनि. दोभान्य. दुःखा. अनादेय का भी दन्य नहीं है. इनलिये इन विस्न्य मा नै उपजने ही है. और वाकी वी-गम अगम के साथ परे द. स्मिा अमिमा थ दो दो. और यहा अपपा के माय चार • यो भाट आठ भाई जम्मान में होते है. नोनी पहिले कहे ४६०८ माने के तीनोंदनि में -- २४६ प्रथम अर्थ काण्डका प्रथम मूल द्वारा रोहण कन्ड ११ ड्रे आस्थर के यो ४ हुवे. यह ४ यशः के और ४ अयश के गिनने से ८ भाङ्गे हो. ते हैं। और इन २१ प्रकृत्ति में-उद्योत नाम मिलोन से--३, प्रकृत्ति का बन्ध स्था न भी पर्याप्ता वेन्द्रिय प्रायोग्य मिथ्याती के होता है. यहां भी ऊपरोक्त रीति मे ८ भाङ्गे निपजते हैं. । यो सब मिल बेन्द्रिय प्रायोग्य तीन भङ्ग स्थान के-१७ भाद्रे हो- ते हैं ॥ ऐतही तेन्द्रिय प्रायोग्य में भी यही ३ बन्ध स्थान और १.७ भाड़े कहना, वि शेप मे बेन्द्रिय के स्थान तेन्द्रिय जाति कहना ॥ और ऐमेही चौगिन्द्रय प्रायोग्य भी तीन वन्ध स्थान के १७ भाङ्गे कहना. विशेष-तेन्द्रिय के स्थान चौरिन्द्रिय कहना.॥ यों विलन्द्रिय के ५१ भाड़े हुवे. ॥ पचेन्द्रिय प्रायोग्य बन्ध करते-२५ का. २१ का और ३० का, यह ३ वन्य स्थान होते हैं. इसमें से-२५ का वन्धतो अपर्याता पचे न्द्रिय तिर्यच प्रायोग्य मिथ्यावी-तियव और मनुष्य के बन्यता है. इन २५ प्रकृत्ति के नाम तो अपर्याप्ता वेन्द्रिय प्रायोग्य की तरह ही कहना. पर तु विशेपत्त इतना की वेन्द्रिय के स्थान पोन्द्रय का नाम लेना. यही एकही भागा अशुभ का पहिले की तरह ही जानना. और २ तिर्थव द्विक, ३ पवेन्द्रिय जाति, ५ ओदारिक द्विक ६ ते जप्त. ७ कर्मिण, ८ छ संवयणो मे का-संवयग. १ छे संस्थानों में का-१ संस्था- न, १३ वर्ण चतुष्क, १४ शुरु लघु, १५ उपघात, १६ पराघात १७ उश्वास, १.८ दोनो ने की एक खगति. १९ वत. २० वादर २१ पर्याप्ता २२ प्रत्येक २३ स्थिर अस्थिर मे का एक, २४ शुभ अशुभमें का एक, २५ सौभाग्य दुर्भाग्यनेका एक,२६ मुखर दुस्सर में का एक, २७ आदेय अनादेय में का एक. २८ यश अपशः में का एके, और २१ निर्माण. इन २१ प्रत्ति का वन्ध पर्याप्ता तियेच पचेन्द्रिय प्रायोग्य मिथ्यात्वो और सेस्वादनी चारो गति के जीवो के होता है. जिसमें इतना विशेष कि -जो सेवादनी है उनके पांच २ में का कहना. क्योंकि-हुंड संस्थान तथा छेवटा से घयण का वन्ध से स्वादनी के नही होता है. इसलिये इनस्थान में भा) ४६०८ उ- पजते है सो अलग २ बताते हैं:, छे संघयणों में से-एक संघण के साथ २१ प्रक ति का वध करने से-१ मांगा होता है, ऐसे ६ संघयण केदभाङ्गे इन को एकेक सं स्थान से ६ गुण करने से-६x६-३६ हुवे, इन को शुभा शुभ दोनो खगति से दुगु ने करने से-३६+२-७२ हुवे- इन को स्थिरा स्थिर से दुगुने करने से-७४२-१४ ४ हुवे. इनको शुभा शुभ से दुगुने से-१४४+२-२८८ हुवे. इनको सुस्वरदुःस्वर से दुगुने करने से-२८८४२-५७६ हुवे. इनको सौभाग्य दुर्भाग्य से दुगुने करने से- २४७ * मुक्ति मोपान श्री-गुणस्थान रोहण अदी शतद्वारी * ५७६+२-११९२ हुवे. इने आदेय अनादेय से दुगुने करने से-११५२+२-३०४ हुवे. इने यश और अयश; से दुगुने करने से-४६०८ भाङ्गे हुवे. यह भाङ्गे सन्नि प- चेन्द्रिय तियेच गति प्रापोग्य-२१ प्रकृत्तिके बन्ध स्थान में होते हैं । इसमें विशेष-से, स्वादन आश्रये वन्धते हुंडक संस्थान और छेवटे संघयण को वन्ध नहीं गिरते.फक्त पांचही मे २५ होते हैं. जिनको उपरोक्त रीति से फलाने से (७ वक्त दुगुने करने से ) सब ३२०० भागे होते है, परन्तु यह भा) ४६०८ के अन्दर के होने से अल गे नहीं निने. । और २१ प्रकृत्ति मे नद्योत नाम मिलाने से : प्रकृत्ति के बन्धस्था न के भाड़े भी ४६०८ होते हैं सो २१ के वन्ध की तरहही करना. यों पचेन्द्रिय के तीनो स्थान के मिलकर ९२१७ भागे होते हैं. ॥ मन्प्य गति प्रायोग्य बन्ध करते- २५ का.२९का और का यह वन्ध स्थान होते है जिनके भाले कहते हैं:-२५ क वन्ध स्थान अपर्याप्ता मनुप्य प्रायोग्य वान्थे. वहां भागा एकही होता है. नियंच के २२ के बन्ध स्थान की तरह कहना. विशेष इतनाही की नियेव के म्यान मनुष्य का नाम लेना । २९ प्रकृति का वन्ध स्थान मो प्रथम के चागे गुणस्थानों में होता है, इसमे मिथ्याती और मे स्वादनी तो चारो गतिके जीवो बन्य ते. और मिश्रत था अविराति मम्यक दृष्टि मो देवता तथा नरकके जीवों वन्धते है. हममें भी जैसे-प चेन्द्रिय तियेच प्रायोग्य २१ प्रकृति के बन्ध स्थान मे-४६०८ भाड़े कहे नही क हना. परन्तु इतना विशेष कि-वादनी के :२०१ भाने कहना. और मिश्र दृष्टि तथा मम्यक दृष्टि–नारकी और देवना के-९ नाम कर्म की भूत्र प्रति १० मनप्य गति ११ मनुप्पानु पृ. १२ पचेन्द्रिय की जाति. १४ औदारिक द्विक..' बन्ज- ऋपम नारच मंघपण. १६ ममचतुरस भंस्थान. १ पगवान १८ श्वास. १५ दाभ विहाय गति २०वन. २१ वादर. २२ पर्याप्मा.. प्रत्येक. २४ धिर अम्बिर में का-एक. २. शुभा शुभ में का-एक. २६ मुभन. २७ मुखर. २८ आटेय, और १९ यमः अपया में एक. इन १ महानि के वन्य में-भाड़े ८ अपने क्योंकि -यहां परम मंघषण और प्रथम मंथनन विना दादी के पांच पांच नहीं है. और ग्वगति, दोभान्य. दुःखर, अनादेय का भी बन्न नहीं है. इनलिये इनके विल्ममा 5 उपजते नही ई. और वाकी दी-गम अग्भ हे माय एवंद. यि अमिमा थ दो दो. और या अपपा के नाप चार : पो आट आमाहे परम- में होते है. मोनी पहिले हे ४३०८ मानक तीनोन्नति में कर - २४८ प्रथम अर्थ काण्डका प्रथम मूल द्वारा रोहण कन्ड र नाम मिलाने से ३० प्रकृतिका वन्य मनुष्य प्रायोग्य देवता तथा नारकी के सम्यक दृष्टि जीवों के होता है. यहां भी भांगे ८ होते हैं. क्योंके तार्यकर नाम का यन्ध प- हिलेके तीनों गुणस्थानों में नहीं होता है. इसलिये ३० के वय में ज्यादा भांगे नही होते हैं. यो मनुष्य गति पायोग्य तीनों बन्ध के मिलकर ४६१७ मव भांगे हुवं. ॥ देवगति प्रायोग्य -२८ का, २१. का, ३० का और ३१ का यह ४ बन्ध स्थान होते हैं. सो पचेन्द्रिय तिर्यच तथा मनुष्य वान्धते हैं. इम में: -२ देवादिक, ३ पचेन्द्रिय जाति. ४ वैक्रियधिक, १४ नत्र प्रकृति ध्रुव बन्धकी, १५ समचतुरस्र संस्थान, १ शुभ खगति, २० बस चतूष्क, २१ पराघात. २२ उश्वास, २३ स्थिर अथवा आस्थि र, २४ शुभ अथवा अशुभ २५ मुभग, २६ भुस्वर, २७ आदेय. २८ यशः कीर्ती अथवा अयश कीर्ति, इन २८ प्रकृति का वन्ध स्थान निथ्यावसे लगाकर देश विर ति गुणस्थान तक मनुष्य तिर्यंच के होता है. इसके आगे छठे गुणस्थान में फक्त मनुष्यकेही होता हैं. यहां स्थिर और अस्थिर, शुभ और अशुभ, यशः और अयश इनके परावर्त से- ८ भांगे होते हैं. और अमनत तथा अपुर्व करण गुणस्थान में बंध होता है, स्थिर शुभ और यशः काही बन्ध होता है इसलिये भागा एकही पाता है वोभी आठ के अन्दरकाही है. इसलिये अलग नहीं गिना. । उपरोक्त २८ में जिन नाम मिलानेते-२१ का वन्ध देव प्रायोग्य चौथे पांचो और छठे गुणस्थान में होता है, वहां भी स्थिर अस्थिर, शुभ अशुभ, यशः और अयशः से परावर्त करते ८ भाड्ने होते हैं. और इन २१ का वन्ध फक्त स्थिरादिक शुभ प्रकृति कहीत अप्रमत और अपुर्व करण गुगस्थान में होता है, यहां भी एकही भागा होता है सो इसके अन्तर भूत जानना. । ऊपराक्त २८ में-आहारक द्विक मिलाने से ३० प्रकृति का वन्ध देव गति प्रायोग्य अममत और अपूर्व करण गुणस्थानी कहते हैं. यहां भी स्थिर शुभ और का ही वन्ध करते हैं. इसलिये-एकही भागा पाता है. । इन ३० मे जिन नाम मिलाने से-३१ प्रकृति का बन्ध-देवगति पायोग्य अप्रमत और अपूर्व करण गुणस्था नी वान्यते हैं. यहां भी शुभ प्रकृतियोका ही वन्ध होनेके सवव से भागा एकही पा- ता है. सब मिल देवगति प्रायोग्य चारो वन्य स्थानोंके-१८ भांगे हुवे. ॥ नरकगति प्रायोग्य वान्धने वाले जीवोके एकही-२८ प्रति का वन्ध स्थान होता हैं-नरक द्विक, ३ पचेन्द्रिय जाति, ५ वैक्रिय द्रिक, ६ हुंड संस्थान, ७ पराघात, ८ उभास २ अशुभ विहायोगति, १० वन, ११ वादर, १२ पर्याप्ता, १३ प्रत्येक, १४अस्थिर, # मुक्ति मोपान श्री-गुणस्थान गेहण अढीगतद्वारी ११ २४१ १५ अशुभ. १६ दौर्भाग्य, १७ दुसर. १८ अयश कीर्ति. १९ अनाडेय, और २८ नव प्रकृति का ध्रव बन्ध की. उन २८ प्रकृति का बय पचेन्द्रिय तिर्यंच तथा मनुष्य मिथ्यात्व गुणस्थान वाले के होता है. यहां नव परावर्तने की अशुभ प्रकृतियोंका ही बंध होने विकल्प न होते एकही भांगा पाता है, । देवगति मायोग्य बंध विच्छेद होने भी-अपूर्व करण के मातवे भाग मे लगाकर सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थान के अंत पर्यन्त-एक यशः कीर्ति नामका धंध मनुप्य करता है, वहां भी एकही भांगा लेना.॥ अव बंध स्थानके भांगे की संख्या कहते-अपर्याप्ता एकेन्द्रिय प्रायोग्य २३ प्र. कृात वन्ध के ४ भांगे. २५प्रकृति वन्धके२० भांगे वेन्द्रिय प्रायोग्य?, तेन्द्रि-प्रायोग्य १.चौरिन्द्रिय प्रायोग्य १, पचेन्द्रिय तिर्यच प्रायोग्य?,मनुष्य प्रायोग्य?यो २५३वधमें २५ भांगे एकद्रिय प्रायोग्य २६ के बंध में-१६ भागेः देव प्रायोग्य २८के बंध के८ भांगेः नरक प्रायोग्य २८ के बंध का १ भांगा. यों २८ के बंध के १ भांगेः वेंद्रिय प्रायोग्य ८. तेंद्रिय प्रायोग्यचौरिन्द्रिय प्रायोग्य ८, पचेंद्रिय प्रायोग्य ४६०८, मनु- प्य प्रायोग्य ४६०८ ओर देव प्रायोग्य ८, यो सब मिल २१ के बंध के १२४८ भांगे. वेंद्रिय प्रायोग्य ८, तेंद्रिय प्रायोग्य ८, चोरिद्रय प्रायोग्य ८ पद्रिय प्रायोग्य ४६२८, मनुष्य प्रायोग्य ८, और देव प्रायोग्य १, यो सब मिल ३१ के वध के ४ ७४१ भांगे होते हैं. और ३१ का बंध स्थान में देव प्रायोग्य ', यो नाम कर्म के आगेही बंध स्थानोंके सब मिलकर १३१४५ भांगे होते हैं. नाम कर्म के १२ उदय स्थानः-२० का, २१ का २४, का, २५ का, २६ का, २७ का. २८ का, २१ का. ३१ का. ३१ का, ९ का और ८ का इन १२ही उदय स्थानोंको अलग २ वताते है। इसमें से एकेन्द्रिय के-२१का, २४ का, २५का, २६ का और २७ का, यों ५ उदय स्थान होते हैं सो कहते है:-१ तैजस, २ कार्म ण. अगुरुलघु, ४ स्थिर, ५ अस्थिर, ६ शुभ, ७ अशुभ, ८ वर्ण, १ गंध, १० रस, ११ स्पर्श, और १२ निर्माण. (इन १२ प्रकृति का ध्रुवोदय होता है, क्योंकि यह १२ प्रकृति १३ वे गुणस्थान पर्यन्त उदय आश्रिय सब जीवों के होती है. इसलिये इनको सर्व स्थान लेनी.) १३ तिर्यंचद्रिक, १४ स्थावर, १५ एकेन्द्रिय जाति, १६ वादर अथवा मूभन, १७ पर्याप्ता, अथवा अपर्याप्ता, १८ दौर्भाग्य, ११ अनादेय, ओर २० यशः अथवा अयशः, इन २० प्रकृति का उदय एसेंद्रिय जीवोंके भवके के २५० प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड १ अन्तराल में वर्तते = पाता है. यहां भांगे ५ उपजते हैं:- १ सूक्ष्म पर्याप्ता के साथ २१. उदय, सूक्ष्म पर्याप्ता के साथ २१ उदय, मूक्ष्म अपर्याप्ताके माथ २१ उदय, ३ वादर अपर्याप्ताके साथ २१ का उदय. अपर्याप्ता. यह तीन भाड्ने तो फक्त अयश साथ होते हैं, क्योंक-यहां यशःका उदय नहीं है. और ४ वादर पर्याप्ता के साथ यशः सहित-२१ का उदय, तथा अयशः साथ २१ उदय. । फिर उस शरीरस्थ के ऊपरोक्त २१ प्रकृति के उदय में-१ औदारिक शरीर, २ हुंड सस्थान, ३ उपघात, प्रत्येक अथवा साधारण, इन चारों प्रकृति को मिलाना, और १ तिर्यंचानुपुर्वी कमी करना तब २४ प्रकृति की उदय रहता है. और प्रथमोक्त ८.भांग को प्रत्येक और साधारण के साथ दुगुणे करने से-१० भांगे होते हैं, इस में एक भांगा वैक्रय- का मिलाना - क्योंक-वादर प्रत्येक पर्याप्ता और यश, कीर्ती के साथ एकही भा. ड्रा होता है. x यों २४ प्रकृति के उदय में सब ११ भागे हुवे । फिर उस शरीर पर्याप्ताके-२४ के उदय मे पराघात मिलाने से २५ का उदय होता है. सो शरीर प- र्याप्ती पूरी किये वाद पाता है. इसे वादर पर्याप्ता के साथ और प्रत्येक तथा साधार ण के साथ गिनने से दो भाने होते हैं. इने यशः और अयशः से दुगुने करते ४ भा ड्रे होते है. इने वादर के स्थान मूक्ष्म के साथ प्रत्येक साधारण मे विकल्प करने से ६ भागे होते हैं, + । और, वादर वायु काया के वैक्रिय करती वक्त शरीर पर्याप्ति - पूर्व भवका शरीर छोडे बाद जहा तक दुसरा शरीर धारण नहीं करे उसे भवका अन्तराल कहते हैं, * जिस के जितन पर्याय है उतनी सब पूरी करेगा उसे लब्धि पर्याप्ता कहा जाता है. क्योंकि बाढर वायुकाय पक्रिय शरीर करती हैं वहा भी २४ का उदय होता है, परन्तु इतना विशेष की औदारिक के स्थान पक्रिय शरीर कहना. x क्योंकि- तंउकाय और वायुकाय के साधारण तथा यशः कीर्ति का उदय नहीं है. इसलिये १ भागा. + यह दोनों भागे फक्त अयशः कीर्तिमही मिलते है; परन्तु यश कीर्ति में न मिलने से मांगा न गिनना. .

मुक्ति सापाने श्री गुणस्थान रोहण अहाशतद्वारी २ २५१. पूरी हुवे वाद पराघात का उदय मिलाने से भी २५ का उदय होता है वाहां भी प्र- थमोक्त रीति से-१ भागा पावे. यों सब २५ के उयद में ७ भाङ्गे होते हैं । वाशो श्वास पर्याप्त पूरी किये वाद २५ के उदय मे श्वासो श्वास का उदय मिलाने से २६ का उदय स्थान होता है. यहां भी पहिले की तरह ६ भाङ्गा पाते हैं. अथवा शरीर पर्याप्ति पर्याप्ता के स्वागो श्वाश के अनुदय से + वादर और उद्योत सहित २६ के उदय में प्रत्येक के साथ एक भाडा साधारण के साथ दूसरा भागा, यह दोनों यशः और अयशः से दुगुने करने ४ हुवे. । और उद्योत के साथ आताप का उदय मिला ने से भी २६ का उदय स्थान होता है, वहां प्रत्येक के यशः और अयश से दोभां गे ४ । और वादर वायु काम को वैक्रिय करते श्वाशो श्वाशः पर्याप्ती कर पर्याप्ता हुँ वे-२५ प्रकृत्ति में उन्चात का उदय मिलाने से २६ का उदय होता है. यहां भी भा झा १ ही होता है. क्योकि वायु काय के आताप उद्योत और यश किर्ती का उद- य नहीं है. में २६ के उदय में सब १३ भाङ्गे हुवे । श्वासो श्वास पर्याप्ति कर पर्या सा श्वाशो श्वास सहित २६ के उदय आताप तथा उद्योत इन दोनो में का एक मिलाने से-२७ का उदय होता है. यहां पुरोक्त रित से २६ भाङ्गे पाते हैं. । यों ए- केन्द्रिय के उदय स्थान में-२१ उदय ५. २४ के उदय ११ २५ के उदय ७, २६ के उदय १३, और २७ के उदय ६ यों ५ उदय के मिल ४२ भातें होते हैं. ॥ न्द्रिय में-२१ का, २६ का, २८ का, २१ का, का, ३० का, और ३२ का यह ६ उदय स्थान हैं. इसके भाङ्गे कहते है। इसमे-२ तियेच द्विक, : वेन्द्रिय जाति, ४ त्रस, ५ वादर, ६ पर्याप्ता, ७ दौर्भाग्य, ( अनाढय, १ यश कीर्ति अथवा अयश कीती, यह ९ और इसमे ध्रुवोदय की २२ पत्ति मिलाने मे२२ प्रकृत्तिका उदयवि में + क्योंकि-आताप पृथ्वी कोमेसे ही होता है. इसलिये २ प्रत्येक ही लिया है, और उद्योत पृथ्वी तथा वनस्पति दोनों में होता है. इसलिये यहां प्रत्येक और साधारन दोनों लिये. और आतापका तथा उद्योतका उदय बादर के ही होता है. परंतू मन के नहीं इस लिये यहां सूक्ष्म का उदय नहीं लिया. = जहातक श्वासो श्वास पर्या पुरी न कर वहां तक-उश्वास के उदय विना द्योतका उदय नहीं होता है.

२५० प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड अन्तराल में वर्तते = पाता है. यहां भांगे ५ उपजते हैं। १. मूक्ष्म पर्याप्ता के साथ २१. उदय, सूक्ष्म पर्याप्ता के साथ २१ उदय, सूक्ष्म अपर्याप्ताके माय २१. उदय, वादर अपर्याप्ताके साथ २१ का उदय. अपर्याप्ता. यह तीन भानें तो फक्त अयश के साथ होते हैं, क्याोकै-यहां यशःका उदय नहीं है. और ४ वादर पर्याप्ता के साथ यशः सहित-२१ का उदय, तथा अयशः साथ २१ उदय.। फिर उस शरीरस्थ के ऊपरोक्त २१ प्रकृति के उदय में-१ औदारिक शरीर, २ हुंड संस्थान, ३ उपयात, ४ प्रत्येक अथवा साधारण, इन चारों प्रकृति को मिलाना, और १ तिर्यंचानुपुर्वी कमी करना तब २४ प्रकृति की उदय रहता है. और प्रथमोक्त ८ मांग को प्रत्येक और साधारण के साथ दुगुणे करने से-१० भांगे होते हैं, इस में एक भांगा वैक्रय- का मिलाना - क्योकि-चादर प्रत्येक पर्याप्ता और यश; कीर्ती के साथ एकही भा गा होता है. x यो २४ प्रकृति के उदय में सब ११ भाड़े हुवे । फिर उस शरीर पर्याप्ताके-२४ के उदय में पराघात मिलाने से २५ का उदय होता है. मो शरीर प. याप्ती पूरी किये याद पाता है. इसे वादर पर्याप्ता के माथ और प्रत्येक तथा माधार ण के माथ गिनने मे दो भाड़े होते हैं. इने यशः और अयशः मे दुगुने करते ४ भा है होते हैं. दने वाटर के स्थान मूक्ष्म के साथ प्रत्येक साधारण मे विकल्प करने में ६ भाद्र होते है, + । और, वाटर वायु काया के वैक्रिय करती वक्त शरीर पर्याप्ति - पूर्व भवका मगर छोडे बाद नहा तक दुमग शरीर धारण नहीं करे उमे भाका अन्गल कहते हैं * जिम के नितन पर्याय है उतनी मब पृग करेगा उमे लब्धि पर्याता कहा - म्यो, बाटा वायुकाय बक्रिय गागर करनी है वहा मी ४ का उदय होना, सन्द टन्न विटारिक के स्थान पक्रिय मगर कहना ४ कोक काय वायुकाय के मावारण नया यमः काति का उदय नम है, तो १ न. + रोग नया ही मिल पान या में द मिश्र .

. * मुक्ति मापाने श्री गुणस्थान रोण अढागतद्वारी ५ पूरी हुवे वाद पराघात का उदय मिलाने मे भी २५ का उदय होता है वाहां भी प्र- थमोक्त गति से-१ भागा पावे. यों सब २५ के उयद में ७ भाड़े होते हैं । श्वाशो वास पर्याप्त पूरी किये वाद २५ के उदय में श्वासोश्वास का उदय मिलाने से २६ का उदय स्थान होता है. यहां भी पहिले की तरह ६ भागा पाते हैं. अथवा शरीर पर्याप्ति पर्याप्ता के स्वागो श्वाश के अनुढय से + वादर और उद्योत सहित २६ के उदय भे-प्रत्येक के साथ एक भाडा साधारण के साथ दूसरा भागा, यह दोनों यशः और अयशः से दुगने करने ४ हुवे. । और उद्योत के साथ आताप का उदय मिला ने से भी २६ का उदय स्थान होता है, वहां प्रत्येक के यशः और अयश से दोभां गे ४ । और वादर वायु काम को वैक्रिय करते श्वाशो श्वाशः पर्याप्ती कर पर्याप्ता हुँ वे-२५ प्रकृत्ति में उश्वान का उदय मिलाने से २६ का उदय होता है. यहां भी भा झा १ ही होता है. क्योंकि वायु काय के आताप उद्योत और यश किर्ती का उद- य नहीं है. यो २६ के उदय में सब १३ भाङ्गे हुवे. । श्वासो श्वास पर्याप्ति कर पर्या प्ता श्वाशो श्वास सहित २६ के उदय में आताप तथा उद्योत इन दोनो में का एक मिलाने से-२७ का उदय होता है. यहां पुरोक्त रित से २६ भाङ्गे पाते हैं. । यों ए- केन्द्रिय के उदय स्थान में-२१ उदय ५, २४ के उदय ११ २५ के उदय ७, के उदय १३. और २७ के उदय ६ यों ५ उदय के मिल ४२ भाङ्गे होते हैं. ॥ वे न्द्रिय में-२१ का, २६ का, २८ का, २१ का, का, ३१ का. और ३२ का यह ६ उदय स्थान हैं. इसके भा) कहते हैं। इसमे-२ तियेच द्विक, ३ वेन्द्रिय जाति, ४ त्रस, ५ वादर, ६ पर्याप्ता, ७ दौर्भाग्य, ८ अनादेय, १ यश कीर्ति अथवा अयश कीती, यह १ और इसमें ध्रुवोदय की २२ पकृत्ति मिलाने से२२ प्रकृत्तिका उदयवि " . २६ + क्योंकि-आताप पृथ्वी का से ही होता है. इसलिये २ प्रत्येक ही लिया है, और उद्योत पृथ्वी तथा वनस्पति दोनों में होता है. इसलिये यहा प्रत्येक और साधारन दोनों लिये. और आतापका तथा उद्योतका उदय बादर के ही होता है. परतू सूक्ष्म के नहीं इस लिये यहां सूक्ष्म का उदय नहीं लिया. = जहातक श्वासो श्वास पर्या पुरी न करे वहा तक-उश्वास के उदय विना उद्योतका उदय नहीं होता है.

के में श्वास के विना उद्योत २५२ प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड पर ग्रह गति में प्रतते भवके अन्तराल गति में-बेन्द्रिय जीवों के होता है. यहां अपर्या ता साथ अयशः कीर्ती मिलाने से मांगा-२ होता है. और पर्याप्ता के साथ अयः तथा यश; दोनों अलग २ मिलाने से भांगे दा होते हैं. यो सव ३ भांगे होत है। फिर उस वेन्द्रिय को स्वस्थान में अवतरे वाद, उपरोक्त २२ के उदय में से तियेचा नु पूर्वी निकालने से और-२ औदारिक द्विक, ३ हुंड संस्थान, ४ छैचटा संघयण, ५ उपघात और ६ प्रत्येक, यह ६ प्रकृत्ति मिलाने से २६ का उदय स्थान होताहै, यहां भी ऊपरोक्त राति से भाले ३ ही होते हैं । फिर पर्याप्ता पूरी हुवे. वाद-२परा घात, और २ कूखगति यह २ प्रकृत्ति मिलाने से-२८ प्रकृत्तिका उदय स्थान होता है. यहां यश. और अपयशः कर भागे दो होते हैं. = फिर श्वासो श्वास पर्या पूर हुवे वाद, श्वाशो श्वास अधिक होने से २१ के उदमे भी ऊपरोक्त २ भांगे होते हैं. अथवा शरीर पर्याप्ति पर्याप्ते को उस-२८ के उदय उदय का उदय मिलाने से-२९ का उदय स्थान होवे, यहां भी भांगे २ होते हैं. यो २१ के उदय के सब ४ भांगे होते हैं, । इन २१ के उदय में—सुस्वर दुस्वरमें का-एक मिलाने से ३० का उदय स्थान होवे, इसके यशः अपयश; से भाङ्गे दो, और मुस्वर दुस्वर से भांगे ४ होते हैं । और श्वाशाश्वास करके पर्याप्ताने जहांतक भाषा पर्याप्त पुरी नकरी होवे वहांतक-दोनों श्वरके उदय विना उद्योतका उदय मिलानेसे भी३०का उदय स्थान होता है. यहां यशः और अयश; कर दो भांगे होते है. यों सव मिल ३० के स्थान के ६ भांगे होते हैं । और स्वर महित ३० के उदय में-उद्योत का उदय मिलाने से-३१ उदय स्थान भाषा पर्याप्ता कर पर्याप्त जीव के होता है, यहां यशः, अयशः सूस्वर और दुःस्वर कर ४ भांगे होते हैं. । यो २१ उदय के ३, २६ के उदय, ३, २८ के उदयु के २, २९ के उदय के ४, ३० के उदय के ६ और ३१ के उदय के ४, सब मिल वेद्रीय के उदय के २२ भांगे होते हैं. । ऐसे ही ते. न्द्रिय के उदयके २२, । ऐसेही चौरिन्द्रिय के उदय के २२, यों तीनों विक्लन्द्रिय के मिलकर सब ६६ भांगे होते हैं. । सामान्य से तिर्यच पचेन्द्रिय के-६ उदय स्थान होते हैं. ॥:-२१ का, २६ का, २८का, २९ का, ३० का और ३१ का. ॥ इस म-२ क्योंकि-अशुभ विहाय गति (कु खगति) में अपर्याप्ता नामका उदय नहीं होता, इस- लिये पहिले कहे तीनों भागे में से यह १ भागा कम हुवा. बाकी के-दो भागे पाते हैं.

* मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी १९ २५३ तिर्यच द्विक, ३ पचेन्द्रिय जाति, ४ बस, ५ वादर, ६ पर्याप्ता. ७ सौभग्य तथा दौर्भाग्य, ( आदेय तथा अनादेय, ९ यशः तथा अयशः १. यह १ और १२ ध्रुवोदय की मिल २१ का उदय स्थान-तियेच पचेन्द्रियके पहिले का शरीर छोडे बाद रस्तेमें विग्रह गति करता होवे तब पावे. यहां जो पर्याप्त नाम के उदय वर्तता होये तो-सुभग दुभग के उदय में भांगे दो, आदेय अनादेय के विकल्प से भांगे चार, और यशः अपश; सभांगे ८ होते हैं. और जो अपर्याप्ता नाम के उदय वर्तेतो-सुभग आदे य. और यश; के आभाव से अन्य भागा न उपजते एकही भागा होता है. यों २ भाते हुवे. * वोही पचेन्द्रिय तिर्यच शरीरस्थ अवतरे वाद-२१ के उदय में से तिये- चानु पूची का उदय निकाले और-२ औदारिक द्विक. : छे संघयण, मे का १सं घयण, ४ छे संस्थान में का एक संस्थान ५ उपघात और ६ प्रत्येक. इन ६ का उ दय मिलाने २-२६ का उदय स्थान होता है. इने पर्याप्ता के माय ६ सधयण से गि नो से ६ भाड़े होवे. इने ६ संस्थान से ६ गुने करने मे ६ ४६-३६ भाले होते. इ ने सौभाग्य दौर्भाग्य से दुगुने करने से-:६x२=७२ भाड़े होवे. इने आदेय अनादे य लेदो गुने करने से-०२४२=१४४ होवे. इने यशः अयगः मे दुगुने करने मे-१४ ४+२-२८८ भाने होते हैं. । और अपयाप्ता के टुंडक संस्थान. छेवटा मंधयण, दो र्भाग्य, अनादेय और अयश; इनही का उदय होने से एकही भागा होता है = यों २८१ भाद्रे हुवे. । यो पर्याप्ता हुचे वाद-१ पराघात. २ दोनों में की एक खगति. ड न दोनों को मिलाने मे २८ का उदय होवे. इनके पहिले कहे २८८ भाड़े को शुभा शुभ विहायो गति से दुगुने करने मे-७२ माड़े होते हैं - 1 और ऊपरोक्त ०८ में - यहाँ कोड आचार्य करने होके शुभग का और अदेय का वही वन उदय होना है, तने ही दुभगा और अनादेय का भी उदय यहाँ वन होता है. इसलिये इन दोनों के साथ दो भागे हने पर और 14 से दुगुने करनेने भागे ते पर हो- ता है. और १ अपाता ना भाषा में हुई. में मुगु दु देव. नदेन में भी मतान्तर से परम होन है मोबई में विचरना. अपमान न काही उदय होता है, परन्तु भादप करने में * यहां मन न होने के उपरान नहीं है.

Artme- में पर प्रथम कादका मन दाग गेग का भागोमाश पति से पता के-भाग नाम का 3:वाने मे-२" का उज्य होता है, यहां भी प्रयोक्त गति में मारे होते हैं. जपा-शरीर पति मे. प्तिा के सामान लिन एक उमीन का उपग पाहिले की नगद २८ में मिलाने २२. का उदग स्थान होता है. गहां भी जगमोक्त गति में मारे १० होने हैं. यों उदय में गा भा) ११५० होन हैफिर भाषा पनि पर्याप्त हो वाद- २२ में मुस्वर या दासर में में एक मकति मिलाने मे-37 महति का उदय स्या न होता है. यहाँ पहिले कहे हुने लाशोधाश के-९७० मा को सुसर दुखर दुगने करने से-९७६-२-११५० भाले होते. भगा-भाशो भाम पर्याप्ति मे घ. याप्त के स्वर के उदय दिन उन्योत का उदय प्रथमोक २, महाति में मिलने में भी ३० प्रकात का उदय होते है. यहां भी प्रथमोक गति में मारे ८७० होने हैं. सब मिलकर ३० प्रकृति के उदय स्थान के १७२८ भाद्रे होते हैं। और श्वर मनि त ३० के उदय में उद्योत का उदय मिलाने से-३१ का उदय स्थान होता है, यहा पहिले स्वर महित ३० उदय में-११५२ भानें कहेथे उतनेही जानना. यों तियेच प चेन्द्रिय के ६ उयद स्थान के मब मिलकर ४१०६ भाद्ने होते। और तिर्यंच प. चेन्द्रिय के बैंक्रिय करते-२५ का, २७ का, २८ का, २९ का, और ३० का यह पा च उदय स्थान पाते हैं. इसमें-२ वैक्रिय द्विक, ३ समचतुरस्त्र संस्थान, ४ उपधात ५ तियेच गति, ९ वस चतुष्क, १० पचेन्द्रिय जाति, ११ सौभाग्य अथवा दौर्भाग्य १२ आदेय अथया अनादेय १३ यश, कीर्ति अथवा अयशः कीर्ती, इन १.३ प्रकृत्ति में ध्रुवोदय की १२ प्रकृत्ति मिलाने से-२५ प्रक्रात्त को उदय हेता है. जिसके-सौ- भाग्य दौर्भाग्य से २ भाङ्गे, इने आदेय अनादेय से दुगुने किये८ भाङ्गे होतेहैं, और इनको यशः अयशः से दुगुने किये ४, भाङ्गे और इसको आदेय अनादेय से दुगनेकि ये ८ भाङ्गे होते हैं. = । फिर वैक्रिय शरीर की पर्याप्ति पूरी हुवे वाद १ पराघात २ शुभ विायो गति यह दोनों मिलने से-२७ का उदय होता है यहां भी भांगे ८ जानना. फिर वैक्रिय शरीर की श्वाशोधास पर्माति पुरी हुवे बाद उश्वाश का उद- यहां वैक्रिय शरीर होनेके सबब से सघयण तो होता नहीं है, और संस्थान फक्त क समचतुरस्र पाता है. इसलिये इनके भागे न होनेसे विशेष भागे नहीं पाते हैं.

मुक्ति सोपान श्री गुणस्थान रोहण अदर्शितद्वारी ४ २५५ य मिलाने से २८ का उदय होता है. यहां भी वोही ८ भाड्ने जानना. अथाव शरीर पर्याप्ति के के उश्वाश के अनुदय में उद्योत का उदय मिलाने से भी २८ का उदय होवे वहां भी येही ८ भाङ्गे जानना. यों २८ के उदय के सब मिल? ६ भाद्ने योते हैं. । वैक्रिय शरीरी के भापा पयाप्ति पर्याप्ता के सुस्वर के उदय को पू वोंक्त ऊश्वाश सहित २८ प्रवृत्ति में मिलाने से २१ का उदय होता है वहां भी भां ८ होते है. यो २९ के उदय के भी सब १६ भागे होते हैं. । और मुस्वर सहित २१ के उदय में उद्योत का उदय मिलाने से ३० का उदय होता है. यहां भी भाड़े ८ होते है. यो सब मिल तिर्यंच पचेन्द्रिय के ४९६२ भाने होते हैं. और एकेन्द्रिय या दि सब तियच के भाङ्गे मिलाने से-५०७० भाङ्गे होते हैं. ॥ अव मनुष्य के मामा न्या पने २२ का, २६ का, २८ का, २९ का, और ३० का यह ५ उदय स्थान हो ते हैं. इन पांचाही उदय स्थान के भाड्ने तियेच पचेन्द्रिय की तरह ही कहना, परन्तु इतना विशेष तियेच गति और तिर्यचानु पूर्वी के स्थान मनुष्य गति और मनुष्यानु पूर्वी क.ना. तथा २१ महात्ति का उदय उद्योत महित कहा है मो नहीं कहना. इ सालये २१ के उदय के ५७६ भागे होते है. और : के उदय के भी-११५२ भ ड्रे होते है. परन्तु ज्यादा नही होते हैं क्योति-क्रिय और आहारक गरीर करती वक्त फक्त साधु केही उद्योत का उदय होता है. इनलिये मनुप्य के मब २००२ भ डेती होते हैं.। और मनप्य के वैक्रिय करती दक्त-२५ का २७ का. २८ का २१ का. और ३० का यह ५ उदय स्थान पाते है. इसमें मनुप्य गति. २ उपचान ना म : पचेन्द्रिय जाति, ५ वैक्रियाहक. ६ मचा रन्न स्थान १० वम चतुष्क. सौभाग्य. अथवा दौर्भाग्य. १२ आदेय अचार अनादेय. १ः याः अथवा अयश्री र १२ प्रकृत्ति ध्रुवोदय की या २५ का उदय होता है. यह भी नियंच में कटे मारि क ८ भाने पाते है । फिर वैश्यि शरीर मा के पगवान और शुभ मगति के 3 दर २७ का उदय होता है. यहां भी ८ भाड़े जापना कर भागो भाग पामि पृ री किरे वाद-२७ को उदय में उवाग का उदय मिलाने के उदय भीम भाटे । जापना. अपवा माधु के वैदिय कन्नी दन्त गरीर पति पूरी रिप बाट भागोम सा के जय विना उपोन का उदय मिलने मे ८ का उदय होता है. यहां परही भाड़ा होता है-दो २८ से डर र भाड़े होने । मुमा महिन :.. - द ...

२५६ प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्डर के के उदय में उद्योत का उदय मिलाने मे ३१ का उदय स्थान होता है. यहां भी प हिले के तरह साधु के एकही भागा जाणना. यों सब वैक्रिय के पांचों स्थानको के २५ भाङ्गे होते हैं. । और संयति के आहारक शरीर करती बक्त-वैक्रिय मनुष्य के कहै वोही ५ उदय स्थान पाते हैं. परन्तु इतना विशेष वैनिल द्रिक, के स्थान आहा- रक द्विक कहना, और सब प्रसस्त प्रकृत्ति ही लेना उपलिये २५ के उदय में एक- ही भागा जाणना. । फिर शरीर पर्याप्ता पर्याप्ता के-पराघात और शुभ खगति मि- लाने से २७ का उदय होता है. यहां भी एकही माने होता है फिर प्राणापान (श्व शोश्वाश ) पर्याप्ता के श्वाशोधाश का उदय मिलाने से-२८ के उदय में भी एक ही भागा होता हैं. अथवा शरीर पर्याप्ति पर्याप्ता के-उश्वान का अनुदय और उद्यो- ' त का उदय मिलाने से भी २८ प्रकृत्ति का उदय होता है. यहां भी एकही भागा। यों २८ के उदय के दो भाङ्गे होते हैं । फिर भापा पर्याप्ति पर्याप्ता के उश्वाश सहि त २८ के उदय में स्वर का उयद मिलाने से २१ का उदय स्थान होता है. यहां भी एक भाड़े अथवा श्वाशोश्वाश पर्याप्ति के सुस्वर अनुदय और उघोत के उद य में भी २९ का उदय स्थान होता है. यहां भी एक भागा यों २१ के उदय में२ भातें। फिर भाषा पर्याप्ति पर्याप्त के मुस्वर सहित २९ के उदय में उद्योत का उद य मिलाने से ३० का उदय होता है. यहां भी एक भागा । यो आहारक शरीर के पांचों उदय स्थान के ७ भाङ्गे होते हैं. । अब केवल ज्ञानी मनुष्य के-२० का, २१ का, २६ का, २७ का, २८ का, २९ का, ३० का, ३१ का, ९ का और ८ का, यह १० उदय स्थान होते हैं, इसमे-१ मनुष्य गति, २ पचेन्द्रिय जाति, ३ नस, वादर ५ पर्याप्ता ६ उभग, ७ आदेय, ८ यशः कीर्ति और १२ ध्रुवोदय की प्रकृति । मिलाने से २० का उदय होता है. सो केवल समुत्यात करती पक्त वीच के ३ समय पर्यन्त कार्मण जोग वर्तते के होता है. यहां भांडां ही होता है. और तीर्थकर के- चल ज्ञानी के तीर्थकर नाम. युक्त-२१ का उदय होता है, यहां भी भागा एक होता है. । और ऊपरोक्त २० मे-२ औदारिक द्विक, ३ छे संस्थान में का एक संस्थान, ४ प्रथम-संघयण, ५ उपघात, और २ प्रत्येक, यह २ प्रकृत्ति मिलाने से.२२ काउ सामान्य केवली के समुद्र घात करते, दूसरे, छट्टे और सातवे इन ३ समय रक मिश्र जोग वर्तते होता है. यहां ६ संस्थान से २ भाने होते हैं, परन्तु सामा मनुष्य आश्रिय होने से गिनती में नही लिये.। ऊपरोक्त २६ मे-तीर्थ कर नाम ४ औ मुक्ति सोपान श्री गुणस्थान रोहण अदशितद्वारी ५ मिलाने २७ का उदय तीर्थकर के समुदयात होती वक्त दूसरे तीसरे और सातवे स- मय में होता है. यहां भांगा १ ही । अपरोक्त २२ में-१ पराघात, २ उचास, ३ शु भ अथवा अशुभ खताग ४ सुस्व अथवा दूस्वर. यह ४ प्रकृत्ति मिलाने से-३० का उदय सामान्य केवली के-औदारिक काया जोग वर्तते होता है. यहां २ संस्थान से २ भांगे. इने दोनो विहाय गति से दुगुने करते १२ भांगे और इने सुवर दुस्तर से दुगने करते २४ भांगे होते हैं. परन्तु सामान्य मनुष्या मिश्र होने से नहीं गिने । ऊ परोक्त ३० प्रकृत्ति में तीर्थकर नाम मिलाने से ३१ का उदय स्थान तीयेफर के स- योगी केवली के औदारिक काया योग वर्तते होता है. यहां ममचतुरच संस्थान शु भ विहाय गति, और सुस्वर का उदय होने से एकही भांना होता. । इन १३ मे से औदारिक काय योगका निलंबन करे तब वचन जोगका भी निरुधन हो जिससे स्व रका भी निधन होवे. इसलिये स्वरके उदय बिना ३० का उदय स्थान रहै. यहां भी एक भांगा तियेकर के जानना.। फिर उवाश रुथे तब २१ का उदय है. वहां भी एक भांगा तीर्थकर के जानना. । और मामान्य केवली पूरोक्त ३० मे मे वचन जोग का निलंबन किये २१ का उदय रहै-यहां २ संस्थान और विहायो गति में- १२ भांगे होते हैं. परन्तु सामान्य मनुष्य के होने में गिने नहीं । इन २१ में ने उश्च स का निलंबन करने मे २८ का उदय रहै यहां भी २ संस्थान और २ वितपो गति से १२ भांगे होने है. मामान्य मनुष्य के होने में नहीं गिने । और १ मनुप्र गतिर पचेन्द्रिय जाति : वन. ४. वादर ५ पर्याप्ता. • सुभग . ७ आदेय. ८ यगः कीनी और १ तीर्थकर नाम. इन ९ प्रकृत्ति का उदय तीर्थकर अयोगी केवली के चरम म मय वर्तते होता है. यहां भी ' भांग । उन ९ में मे तीवकर नाम निकालने में का का उदय सामान्य अयोगी केवली के चरम नमय होता है वहां भी १-या यों के वली के १० उदय स्थान के मिलके १० भांगे होने हैं. जिनमें- का. १ का. २७ का. २१ का. ३० का. ३१ का. ९ का. और ८ का. इन ८ न्यानों में नोप केकी भांगा पाना है, जिनमे दो स्थान मामान्य केवली के और ६ थान नविकर है लोतो निने है. और वाकी के २४ मांग मानान्याश्रिय होने ने उन भांग के अ. तर भृत मनाचे जिमने अलग नहीं निने यो मनुष्य मनबन्धि नव विका भांगे होने है । अब देवता के २२का. २. का. २७ का. २८ वा. २१.का.भीर ३० का. यह ६ उदय स्थान पाने है इसमें-- देवदिर. पचन्दिय माति. 2 कप १ २५८ प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड १ ५ वादर, पर्याप्ता, ७ मुभग, दुर्भग में का एक, ८ आदेय अनादेय में का एक, ९य शः अयशः में का एक और २२ ध्रुवोदय की प्रकृत्ति मिल २२ का उदय भवके अ तराल गति में वर्तते देवता कहेता है. यहां सुभग, आदेय अनादेय. यशः और अ यश; इनके साथ गिनने से ८ भांगे होते है. x | फिर वो शरीरस्थ हुवे वाद ऊपरो । क्त २२ प्रकृति में-२ वैक्रिय द्विक, ३ उपघात, ४ प्रत्येक, ५ समचतुरस्त्र संस्थान. यह ५ प्रकृत्ति मिला वे, और देवानु पूर्वी निकाले तब २५ प्रकृति का उदय रहै,य हां भी पहिले की तरह ८ भांगे होते हैं.। फिर शरीर पर्याप्ति प्रर्याप्ता के-१ पराघा- त, और प्रसस्त विहायोगति यह दो प्रकृति विशेष होनेसे-२७ का उदय स्थान होवे यहां भी. ८ भांगे * फिर प्राणापान पर्याप्ता के उश्वास का उदय आधिक होनेसे- ९८ का उदय स्थान होता है. यहां भी ८ भांगे, अथवा शरीर पर्यासाके उचास के अनूदय और उद्योत के उदय में भी ९८ का उदय होता है. यहां भी ८ भांगे, यों २८ के उदय में सव १६ भांगे होते हैं. ॥ फिर भाषा पर्याप्ति पर्याप्ताके सुस्वर का उदय अधिक होनेसे - २९ का उदय स्थान होता है. यहां भी ८ भांगे होते अथवा श्वाशश्वास पर्याप्ति से पर्याप्ताके मुस्वर के अनुदय और उद्योत के उदय २१ का उदय होता है. यहां भी ८ भांगे, ॥ यो २१ के उदय के सब १६ भांगे हुये. फिर भाषा पर्याप्ति पर्याप्ता के सूस्वर सहिन २९ के उदय में उद्योत का उदय मिलने मे ३० का उदय होता है. यहां भी ८ भांगे, यों देवता के ६ उदय स्थान के मब मिल ६४ भांगे होते हैं. ॥ अब नारकीके २१ का, २५ का, २७ का, २८ और २९ का, यों ५ उदय स्थान होते हैं. । इस में-२ नर्क द्विक, २ पचेन्द्रिय जा- नि. ४ बम, ५ बादर ६ पर्याप्ता, ७ दुर्भग, ८ अनादेय, ९ अयशः कीर्ति और १२ ध्रुवोदय की प्रकृनि. यो २१ प्रकृति का उदय-विग्रह गति में वर्तते नर्क के जीवोंके होते हैं., यह भांगा एक ही होता है = ॥ फिर १८ में ८ वैक्रय विक, हुंडक - में x दौर्भाग्य अनादेय, और अया का उदय पीगाचाटि हीन जानके दबोंके होता है. * देवताके अशुभ विहायो गतिका उदय नहीं होने मे भागे वढे नही. + क्योंकि बता दम्वर का उदय नहीं होता है. -उना वक्रिय करने देवता के उद्यान का उदय होता है. उनके जीवोंके प्रावनमान प्रकृति की अगुन प्रकृतिबाही उदय होनेने विकल्प उटना नहीं है निमम भागा बदना नहीं है म * मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी ** २५९ संस्थान. ३ उपघात ५ प्रत्येक , इन ५ प्रकृति का उदय मिलाने से और पूर्वी का उदय कम करनेते २५ का उदय स्थान नक में उत्पन्न हुवे वाद शरीरस्य के पाता है. यहां भी भांग एकही होता है. फिर शरीर पर्याप्ति पर्याप्ता के पराघात और अ- शुभ खगति इन दोनों का उदय वढने से २७ का उदय होता है. यहां भी भांगा ए कही । फेर प्राणा पाना पर्याप्ति पर्याप्ता के श्वाशो वाश का उदय वढने से २८ का उदय होता यहां भी भांगे १ । फिर भाषा पर्याप्ति पर्याप्ता के दुस्वर का उदय वढनेसे-२१ का उदय होता है, जिसका भांगा एकही होता है. यों नर्क के ५ स्थानोके ५ भांगे होते हैं. और चारों गति के सर्व उदय स्थानोंके मिल सव १७११ भांगे होते हैं तो कहते हैं. उदय स्थानों के सत्र भागो की संख्याः-२० प्रकृति के उदय स्थान में-१ भांगा केवली के होता है. २१ प्रकृति की उदय स्थान मे-एकेन्द्रिय के ५ विक्लन्द्रिय के ९. पचेन्द्रिय तिर्यंच के ९ मनुप्य के ९, केवली का १, देवता के ८, और नर्क का १. यो तब मिल ४२ होते हैं, २४ प्रकृतिक उदय स्थान में-एकेन्द्रिय के ११, भांगे होते है, २५ प्रकृति के उदय स्थान में-एकेन्द्रिय के ७ चौक्रय तियेचके ८, वैक्रिय मनुष्य के ८, आहका १, देवता के ८ और नर्क का १, यों सब ३३ भांगे होते है. २६ प्रकृति के उदय में एकेन्द्रिय के १३, विलेन्द्रिय के ९, पर्चेन्द्रिय तिये- च के २८९, और सहज मनप्य के २८९, यो सब ६००० भांगे होते हैं, २७ प्रकृ- ति के उदय में-एकेन्द्रिय के ६, वैक्रिय तियच के ८, वैक्रिय मनुष्य के ८, आहार- क का १. केवली का '. देवता के ८, और नर्क का १, यो ३३ होते हैं. २८ के उदय में-विश्लेन्द्रिय के १. पचेन्द्रिय तिर्यंच के ५७६, मनुप्य के ५७६, वैक्रिय ति- यैच के १६ वैक्रिय मनुष्य के ९, आहारक के २, केवली का ? देवता के १६ और नर्क का ?, यों सब १२०२ भांगे होते हैं. २९ प्रकृति के उदय में विलन्द्रिय के १२ पचेंन्द्रिय तिर्यंच के ११५२. मनुप्य के ५७६, वैक्रिप तियेच १६ वैक्रय मनु प्य के ९ आहारक के २. केवलीका २ देवता के १६ और नर्क का १ यों सब १७८५ भांगे होते हैं; ३० प्रकृति के उदय में विल्लेन्द्रिय के १८ तिर्वच पवेन्द्रिय के १७२८. मनुष्य के ११५२. वैक्रिय तिर्वच के ८. वैक्रिय मनुप्प के ?, आहारक का १. केवली का १. देवता के ८.चों मब २९१७ मांगे होते हैं. और १ का प्र कृति के उदय में-बिलेन्द्रिय के १२, पचेन्द्रिय तियेच के १.१५२, और वेकलीका + । .- - प्रथम अर्थ काण्डका प्रथम मूल द्वारा रोहण कन्ड र १, यो सब ११६५ भांगे होते हैं. यों ९ ही उदय के सब मिलकर १७११ भ होते है. अब नाम कर्म के सत्ता स्थानक कहते हैं:-१ नाम कर्म की मर्व प्रकृति समुदाय की सत्ता होवे तब ९३ की सत्ता, २ इस में से जिन नाम की सत्ता न होवे तब ९२ की सत्ता, ३-१३ वेमें से- (१) आहारक शरीर , (२) आहारक । ड्रोपाग, (३) आहारक बन्धन, और (४) आहारक संघातन, इन चारों की सत्ता ही होये तब ८९ का सत्ता स्थान, ४ इस में से- जिन नाम की सत्ता न होवे । ८८ का मत्ता स्थान, ५ इस में से-देव द्विक, या नर्क द्विक की प्रकृति कमी करें व-८६ की सत्ता. ६ तथ्य ८८ मेंसे-तेउ और वायु में वैक्रियाष्टक वेलकर ८१ ६ मत्ता वन्त हुवा पचन्द्रिय पना पाकर देव गति योग्य वन्ध करे तो देव ,द्विक वैक्रिय चनुप्फ बन्ध में ८६ का मत्ता स्थान होवे. तया पचन्द्रिय योग नरक गायो ग मान्य नो नग्क द्विक और वैक्रिय चतुप्फ बन्ध में भी ८६ का सत्ता स्थान हो ७ फिर नरक द्विक और वैक्रिय चतुष्क का निकाल होनेसे का सत्ता स्थान फिर मनुष्य टिक उबलनेमे ७१ का सत्ता स्थान होता है. यह सातों सत्ता स्थान भ. पक छोडकर दुसरे जीवों के होते हैं. इम में अभव्य के तथा पहिले मम्यक्त्व पात न करी हो उन के-७८ का. ८० का, ८६ का, और ८८ का, या चार मत्ता ग्यान पाते हैं। अब अपक के-६ मत्ता स्थान कहते हैं:-१३ में से ८ नरक विक, ४ नि पंच द्विक. ८ प्रथम की चार जाति. ५. स्थावर, ' आताप, ११. उद्योत, १२ सूक्ष्म और १ : माधारण इन १३ प्रकान का भय होनेम-७१ की मत्ता पानी है. और । में दपाने में 96 की मना, और ८८ में मे-१३ क्षपाने मे-3 की गना. और-८ मनुष्य गनि. . पचेन्द्रिय जाति, ३ वम, ४ वादर, ८ पर्याप्ता, ६ मुभग, आदर, ८ यताः और नीर्यकर नाम दन १ की म्यतः और इन 8 में मे-नविकर नाम कमी कम्न मे ८ वी मना: यह ८-० के दोनों मत्ता म्यान अयोगी केवलाने अ.. निम समय में होती है यह नाम कर्म के १२ मना म्यान हुवे. अब नान कर्म के अन्य उदय और मना म्यान का गबन करते हैं: २१ का कर पाना पदिमायोनही होता है, दमक दन्धन बाल-कटिय. सिन्दिर । दिन पन्दिय और मनुष्य होते हैं. इनक-१ का, २४ का, का.२६ का, - -- .

* मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी कर २६१ २७ का, २८ का, २९ का, ३० का, और ३१ का यह ९ उदय स्थान होतेहैं इसमे के हरेक उदय स्थानमें वर्तते एकेन्द्रिय प्रायोग्य-२३प्रकृत्तिका वन्ध स्थान करता है, वहां २१ उदय तो विग्रह गति में वर्तते-एकेद्रिय विल्लेन्द्रिय, तिथंच पचेन्द्रिय और म नुष्यक होता है. वहां सत्तास्थान-१२ का,८८ का. ८६ का, ८. का. और ७८ का यह ५ स्थान सब जीवों के पाते हैं. परन्तु मनुष्य के ७८की सत्ता नही होती है, क्यों कि-७८ की सत्ता मनुष्य द्विक उवेलने सेही होती हैं, इसलिये मनुष्य के चार सत्ता स्थान नहीं होते हैं. । और २४ का उदय एकेन्द्रिय पर्याप्ता अपर्याप्ता दोनो के होता है. वहां भी ऊपर कहे सो ५ सत्ता स्थान होते हैं. परन्तु इतना विशेप-जो वायु का य वैक्रिय करे तो-२४ के उदय मे वर्तते को ८० का, और ७८ का यह दोनों स- त्ता स्थान पाते हैं. क्योकि उसके वैक्रिय पटक और मनुष्य द्विक निश्चय से पाताहै, + इसलिये ८० का और ७८ का स्थानक छोड कर-२२ का, ८८ का और ८६ का यह ३ सत्ता स्थान पाते हैं. । और २५ के उदय में वर्तते एकेन्द्रिय वैक्रिय ति- पंच और बैक्रिय मनुष्य के होता है, तहां तेउ और अक्रिय दायु के जो पांच सत्ता स्थानक हैं दोही ५ सत्ता स्थानक कहना. क्योंकि-७८ की सत्ता उसीकेही है, अन्य के नही ४ । और दुसरे पर्याप्ता के ७८ की सत्ता विना वाको के ४ सत्ता स्थानक वैक्रिय तिपच मनुष्य के वन्धते हैं. और २५ का उदय होता है. । और २६ का उद य पर्याप्ता एकेन्द्रिय तथा पर्याप्ता अपर्याप्ता वेन्द्रिय तिर्यंच पचेन्द्रिय और मनुप्य के हो ती है. वहां भी पहिले की तरह ही ५ सत्ता स्थानक. उसमें से ७८ का स्थानक तो तेड तथा वैक्रिय वायु की अपेक्षा से लेना. और वाकी रहै ४ सत्ता स्थानक दसरेजी + क्रिय तो साक्षात अनुभव रहा है इसलिये उसे उबेलता नहीं है, और उसके उवे- ल विन नरज विक तथा देव हिक नहीं होता है, समकाल ही वैक्रिय पठक उवेलता है, और वैक्रिय पटक बेले वाद मनुष्य द्विक उबेलता है. परन्तु उसके पहिले नहीं उवेल्ता xक्योंक-दूसरे तब पर्याप्ता जावों मनुष्पट्टिक का बन्ध करते है. और एकोन्द्रिय के विकेन्द्रिय, निर्येच पचेन्द्रिय जो तेर वायु से आकर अवतरते हैं वो जहांतक मनुष्य डिक का बन्ध नहीं करे वहातन अपर्याप्ता अवस्था में उनके ७८ की सत्ता होती है. मालिये ५ सत्ता स्थान पाते हैं.

२६२ प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड ११ वों आश्रिय २३ के बन्ध में और २६ के उदय में लेना.। और २७ का उदय तेउ वायु छोड कर पर्याप्ता वादर एकेन्द्रिय तथा वैक्रिय तिर्यच मनुष्य के होते है. वहां ७ ८ बिना वाकी रहै ४ सत्ता स्थानक जाणना. = । और २८ । और २८ का, २१ का, और३० का यह तीनो उदय स्थान पर्याप्ता विक्लेन्द्रिय तथा तिर्यच पचेन्द्रिय और मनुष्य के हो ता है.। और ३८ उदय स्थान पर्याप्ता विलन्द्रिय तथा तिर्यच पचेन्द्रिय मिथ्यात्वी के होता है, यहां मनुष्य द्विक की सत्ता होता है. इसलिये एक ७८का सत्ता स्थान छोड वाकी के ४ सत्ता स्थान पाते हैं, यो २३ के बन्ध के योग्य १ उदय स्थानक के स व मिलकर ४० सत्ता स्थान होते है. । और २५ के, २६ के बन्ध में भी योही नव नव उदय स्थान में सत्ताका सम्बध ४०-४० स्थान सामान्य आदेशसे जाणना. औ- र विशेपा देशमे पर्याप्ता एकेन्द्रिय प्रायोग्य २५ का बन्ध करने वाले देवता के-२१ का, २० का, २७ का, २८ का, २९ का, और ३० का, इन ६ उदय स्थान में-7 का. और ८८ का यह दो सत्ता के स्थानक अलग २ होते हैं. और पर्याप्ता विकन्द्रिय तथा अपयाप्ता नियंच पचेन्द्रिय और मनुष्य प्रायोग्य २५ प्रकृति का नाके बन्ध नहीं है क्योंशि-अपयोता देवता में उपजता नहीं है. इसलिये २३ का, २५ का, और बन्ध स्थान सब १ उदय स्थान के मिलकर १२० सत्ता स्थार मि- थ्यावीक ही होते हैं। और २८ के बन्ध में-२१ का, २५ का, २६ का, २७ का, २८ का. ." का, ३० का, और ३१ का यह ८ उदय स्थान होते हैं, और ९२ का. ८८ का, ८६ का, नया ८० का यह ४ मत्ता स्थान एकेक के उदय मे होते है यह-८का बन्य दो दान होना:- देवगनि प्रायोग्य और रनर्कगति प्रायोग्य उममें दंवगान प्रायोग्यास बन्धया उदय म्यान अनेक जीवा आश्रिय होत. औग्न गनि पायोग्य ८ के वन्य में-30 का और ३१ का यह दो उदय स्थान होते हैं, जिम में देवर्मात दे पायोग्य २८ के बन्ध में १ का उदय क्षायिक सम्यक्त्वी अथवा क्षः । योगामक मम्यक दृष्टि पचेन्द्रिय नियच नया मनुष्य की भवन्नगल गति में हारे देव में । =2 अ उद्योग का उदय नहीं, टमलिये उन ० अरमन, अंट वन्य दिन' ५८ की मटा दमा किमी पनि. न ही गय मा मान पत्र - -- Prammar.in मुक्ति सोपान श्री गुणस्थान रोहण अहीगतद्वारी तव पावे. परन्तु मिथ्यात्वी के नहीं पाये. क्योंक-मिथ्यात्व दृष्टि देवगति प्रायोग्य २८ का बन्ध नहीं करता है. मिथ्यात्वी तो सब पर्याप्तिमे पर्याप्ताही देव गति प्रायो- ग्य २८ सन्धता है x इस देव गति प्रायोग्य २८ के बन्धक २१ के उदय में वर्त ते को- ९२ का और ८८ का यह दो सत्ता स्थान होते हैं. परन्तु यहां जिन नामकी सत्ता नहीं है. = और २५ का उदय आहारक माधु वैक्रय तियंत्र और सम्यक दृष्टि मनुप्य इन तॉने के होता है. तथा मिथ्यात्व ष्टि के भी होवे वहां मानान्यमे यह दो सत्ता स्थान होते हैं. परन्तु इतना विशेष जो आहारक के धारक हैं. उनके आहारक चतुष्क जरूर होता है. इस लिए उनके-एक-९२ काही सत्ता स्थानक होते हैं. बाकी के दुनरे जीवों के दो सत्ता स्थान होता है. यह २८के बन्ध के २५ के उदय के दो लत्ता स्थान जानना.। और२८के उदय भाचिक और भयोपनमाम्बक बधि शनीरस्त पवेन्द्रिय तिर्यच और मनुप्य के २८ का पन्ध देव गति प्रायोग्य होता है. यहां ९२ और ८८ का यह दो सत्ता स्थान होते है । और २७ के उदय आहाक माधु त- था वैक्रिय तिर्यच मनुष्य सम्यक दृष्टि तथा निध्या दृष्टि के पोती दोनों मना के । स्थानक जाणना. तेरे ही-२८ के २९ के उदय मे भी अनुक्रन ने शरीर पति प- प्तिा-८ का उप होता है। और शाशोधान पप्ति कर पाताले--का उद य होये नो भपिक तवा वेदक नम्यक दृष्टि के. आतारक माधु. वैकि निच मनु. च के देवगाने प्रायोग्य २८ का बन्ध होव नहां भी ९२ और ८८ के दोनों मत्ता स्थान पावे. । और का उदय पचेन्द्रिय निर्वच मनुप्प सम्मक दृष्टि के. निव दृष्टि के. आहारक करते माधुके नया वैक्रिय करने माधु के होता है. यहां नागन्ने * पह को जन जोर जाइन चिन्नुस- के. करल नई निका... दरका जन्धिीय टीम न. पल .

.ua . २६४ * प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड र ९२ का, ८९ का, ८८ का, और ८६ का यह ४ सत्ता स्थान होते हैं। और विशेष से—पचेन्द्रिय तिर्यच मनुष्य मिथ्यात्र दृष्टि के नर्कगति प्रायोग्य २८ का बन्ध करते ३० के उदय-१२ का, ८१ का, ८८ का, और ८६ का यह चार सत्ता स्थान होते हैं. इस में १२ का और ८८ का तो प्रथमोक्त रीति से कहना. और ८९ की सत्ता सो-किसी जीवने नर्कायु वन्ध किये वाद सम्यक्त्व प्राप्त कर के तीर्थकर नामका बन्ध किया, वो जीव नर्क जानेक सन्मुख हुवा. तब सम्यक्त्तका मन कर मि- थ्यात्व में गये वाद तीर्थकर का बन्ध है इसलिये तीर्थकर नाम की मत्ता होवे, परन्तु तीर्थकर की सत्ता होते भी आहारक की सत्ता मिथ्यात्वी के नहीं होती है वहां, ८९ की सत्ता पाती है. अब ८६ की सत्ता का स्वरूप कहते है:-कोइ सर्व पर्याप्ति से पर्याप्ता ऐसा तिर्थच पचेंद्रिय अथवा मनुष्य वो तीर्थकर नाम, आहारक चतुष्क, वैकि. य चतुष्क, देवधिक, नरकद्विक, इन १३ प्रकृति बिना ८० की सत्ता में वर्तता सक्लि. ट परिणाम से नरक गति मायोग्य २८ का बन्ध करते वैक्रिय चतुष्क और देवाद्विक का अवश्य बन्ध करता है, तब ८६ का सत्ता स्थान होता है. यों २८ के बन्ध में, ३. के उदय में, ४ सत्ता स्थान होते हैं। और ३१ के उदय मे-१२ का, ८८ का, ८६ का यह तीन सत्ता स्थान होते हैं, यहां ८१ की सत्ता नहीं होती हैं + । यो २८ के बन्ध में ८ उदय स्थान के मिल चार सत्ता स्थान के संबंध से १९ भाड़े पाते हैं. ॥ २१ के बन्ध में और ३० के बन्ध में अलग अलगः-२१ का २४ का, २५ का, २२ का, २७ का, २८ का, २९ का, ३० का, और ३१ का, यह १ उ. दय म्यान होते हैं. और-१३, का, १२ का, ८१ का, ८८ का, ८६ का, ८० का, और ७८ का, यह ७ मत्ता स्थान होते हैं. । इम में पचेन्द्रिय तिर्यच और मनुष्य प्रायोग्य. २१. का बन्ध करते पर्याप्त अपर्माता ऐसे एकेन्द्रिय, विक्लन्द्रिय तिर्यच पचे न्द्रिय मनुष्य देवता और नर्क विग्रह गति में-२१ का उदय होता है उस में-९२ का.८८ का, और ७८ का यह ५ मत्ता स्थान होते हैं. परन्तु ८३ का, ८१ का, +क्योंकि ३१का उदय तिर्यच के होता है और उस निर्यचमें नीर्थकर नामकी मत्ता न. ही होती है, और ८१. की सत्ता तो तीर्थकर नाम माहत ही होतात, इसलिये ८१ छोड़कर वर्मा के तीनों मत्ता म्यान पाते है. .

* मुक्ति सोपान श्री गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी २६५ इतना विशेष कि-वायुकाय विना दुसरे पयाप्ता एकेन्द्रिय, विल्लोन्द्रय, तिर्यच पचेन्द्रिय मनुष्य देवता और नार की इन के ७८ विना वाकी के ४ सत्ता स्थान पाते हैं. (इ- सका कारण प्रथमाक्त) ऐसे ही-२४ के, २५ के और २६ के उदय में भी येही पांच २ सत्ता स्थान जानना. इसमें जो २३ के बन्ध मे उदय सत्ता सम्वेध के भागे कहेसो ही यहां भी जानना, परन्तु इतना विशेष कि यहां २५ के उदय में मिथ्या स्वी देवता और नार की के २९ का वन्ध होता है. । और २७के उदय पर्याप्ता ए- केन्द्रिय देवता. नारीकी. वैक्रिय तिर्यच मनुष्य मिथ्यात्वी की, विलोन्द्रिय के तिर्यच मनुष्य के प्रायोग्य २९ का पन्ध वान्धता हुवे–१२ का. ८८ का. ८६ का और ८० का यह चार सत्ता स्थान पाते हैं। और २८ का २९ का उदय मिलेन्द्रिय. तिर्यच पचेन्द्रिय, चनुष्य, वैक्रिय तिर्यच पचेन्द्रिय. मनुष्य देवता, और नारकी २९ का बन्ध करते होता है. यहां भी वोही चारो सत्ता स्थानक पाते है. । और . का उदय-विलोन्द्रिय. तिर्यच पचेन्द्रिय, और मनुष्य के; तथा उद्योत के उदय में देवता के होता है. । और १ का उयय-विल्लेन्द्रिय और तिर्यच पचेन्द्रिय के उद्योतके उ- दयमे होता है वहां मनुप्प गति पायोग्य २९ का वन्ध करते चार मत्ता स्थानक-एके- न्द्रिय विल्लन्द्रिय और तियेच पचेन्द्रिय होते हैं. । और तिर्यच गति मनुप्य गतिके प्रायोग्य २९ का वन्ध करते नको अपने २ उदय स्थान में यथा योग्य पने वर्तते को भी ७८ का सत्ता स्थान होता है. क्योंकि-मतुप्य द्विक होते ७८ मत्ता नही होती है इसलिये वोही चारों सत्ता स्थानक पाते हैं. और देवता नारकी पर्चेन्द्रिय निर्वच नया मनुप्र प्रायोग्य २१ का बन्ध करते अपने अपने उदय में वर्तते-१२ का. और ८८ का यह दो सत्ता स्थान होते है. वहां मिथ्यात्यो नर्क को निधार नाम कर्म होने मनु- प्य गति मायोग्य २९ का इन्ध अपने २ उदय में यया योग्य पने इतने को एक ८९ का मत्ता स्थान होता है. क्योकि-निध्याती के आधारक चतप्क जिन नाम होने भी नहीं पाता है। क्लिोद्रय और तियेच पचेन्द्रिय के येही चागें मत्ता बान करना. जैसे २३ के इन्धमें है मेन स्थान जान्ना. परन्तु इतना विशेष जो मनुष्य गान प्रायोग्य २१ का वन्ध करे उसके ७८ विना चार मत्ता स्थान होते हैं. । नियंच गाने प्रायोन्य२१ के बन्ध में पांचों मत्ता स्थान पाने हैं.। और देवगति प्रायोन्यनका. बन्ध करते अपिरति मम्यक्त्व वृष्टि के-का, २६ का. २८ का. २६. ग. और ३० का. यह ५ नया आहारक और वैदिप कन्ने ना के-सा. २७ का. ०८ ४६६ प्रथम अर्थ काण्डका प्रथम मूल द्वारा रोहण कन्ड र का, और ३० का यह ५ उदय स्थान होते हैं. । और देश विराति मनुष्य के वैक्रिय करते उद्योत का उदय नहीं होवे इसालये ३० के उदय विना अन्य चार उदय स्थान होते है. वहां देवगति प्रायोग्य तीर्थकर नाम सहित २९ का वध करते-१३ का और ८९ का. यह दो सत्ता पांचों उदय स्थान महाँ ती है. । और आहारक साधु के देवतगि प्रायोग्य २१ का बन्ध करते एक १३ का, सत्ता स्थान होता है. यों सामान्य पने २१ के बन्ध में ९३ के उदय कर सव२४ भां गे होते हैं. । और ३० के वन्ध स्थान में-जैसे तिर्यच गति प्रायोग्य २१ का बन्धका न्धते-एकेन्द्रिय, विक्लन्द्रिय, तिर्यच पचेन्द्रिय, मनुष्य, देवता, और नारकी के जैसे उदय स्थानक कहै तैसे उद्योत सहित तिर्यच गति प्रायोग्य ३० के बन्ध में-एकेन्द्रि, या दिक के भी उदय और सत्ता स्थान का सम्वेध कहना. ॥ और मनुष्य गति पा योग्य तीर्थकर नाम सहित ३० प्रकृत्ति का बन्ध करते देवता नारकी के जो विशेष होता है. सो कहते हैं:-देवता के २१ के उदय में व्रतते-१३ का और ८९ का दो सत्ता स्थान होते हैं. और नारकी को २१ के उदय में प्रस्तते-मनुष्य गति प्रायोग्य ३० प्रकृत्ति का वध करते-एक ८९ प्रकृत्ति का सत्ता स्थान होता है. परन्तु नार- की के ९३ की सत्ता नहीं होती है .। और २५ का, २७ का, २८ का, और ? ९ का इन चारों उदय स्थानो में भी देवता के ऊपरोक्त दो दो सत्ता स्थान होते हैं. जिम नारकी के ३० का उदय स्थान होता है उत्त नारकी के उद्योत का उदय नहीं होता है. यों मामान्य पने ३० के बन्ध में २१ के उदय में-२४ के उदय में ५ और २० के उदय में 9, २६ के उदय ४, २७ के यदय ६, २८ के यदय ६,२१ के यदय ६, ३० के यदय ३, और ३१ के नदय ४, यो सब मिल ३० के बन्ध के क्योंकि तीर्थकर नाम तथा आहारक चतुष्क इन दोनों की सत्ता नारकी के भेली नहीं होती है. x नाम कर्म की एकही या. कीनिी प्रशीन का बन्ध अपूर्व करण के मानव भागमे लगाकर दसवे गुणम्यान तक होता है. वो अति विशुद्ध है. इमलिये आहारक और यौकिय करने नही र यनके दृमेर २५ आदिक उदय स्थान क्रियटिक की पर्यानिक पाय दी है. न ही ३७ प्रथा का दय स्थान होता है, - AR २६७ * मुक्ति सापान श्री-गुणस्थान रोहण अदीशतद्वारी * ९ उदय के ५२ भांगे होते है. और ३१ के बन्ध में १ उदय स्थान और १ सत्ता स्थान होता है. क्योकि-देवगति प्रायोग्य जिन नाम तथा आहार द्विक सहित २१ का बन्ध स्थान अममत और अपूर्व करण गुणस्थान में होता है. वहां वैक्रिय और आहा रक शरीर का कारण नहीं है. इसलिये इन विना-अन्य-२५ का. २६ का इसादिक्ष ल्प प्रकृत्ति का उदय नहीं होता है. और औदारिक शरीर की तो सब पर्याप्ता कर पर्यता है. इसलिये उनके ३० काही उदय होता है. वहां एकही ९३का सत्ता स्थान पाता है. दूसरे सत्ता स्थान नहीं है. क्योकि-३१ का वन्धतो आहारक चतुष्क जिन नाम सहित होता है. । और एक यशः कीर्तीके बन्ध में भी एक ३० प्रकृत्ति काही उदय स्थान होता है. और वहां ९३ का. १२ का. ८९ का, ८८ का. ८ का ७१ का ७६ का. और ७५ का यह ८ मत्ता स्थान होते है. इसमें के-१३ का. ९२ का (९ का. और ८८ का. य ४ तो उपशम श्रोणिकी अपेक्षा से होते हैं. और भपक श्रे णि में भी जहां तक-नित्ति वादर के प्रयन भान में जाकर-१ स्थावर २ सूक्ष्म. ४ नियेच द्विक. ६ नरक द्विक. १० जाति चतुष्क, ११ साधारण १२ आताप, और २: उद्योत. इन १३ प्रत्तियो का भयकरे वहां तक अनेक जीवों की अपेक्षा से- ८० का. ७९ का. ७६ का. और ७५ का. यह ४ स्थान रूपक श्रेणि में होते है. इ. सके ऊपर वचन के अभाव से-२० का. २१ का. २६ का. का. २७ का. २८ का. २९ का. ३० का. १ का. ९ का. और ८ का, यह १० उयद के स्थान और १३ का. ९२ का. ८९ का. ८८ का. ८० का. ७१ का, ७६ का. ७. का. ९ का. औ र ८ का. यह १० स्थान होते है. । इसमे केवली के-आठ समय का. समृदयात करो ते वीच के तीसरे चौथे और पांचवे ममय पर्यन्त कार्माण जोग वर्तते-१ पचेन्द्रिय जाति. ४ वत विक. ५ मुभन. ६ आदेय. ७ यशः कीती. ८ मनुप्य गति. और १२ प्रवत्ति ध्रुवोदय की यों २० प्रवृत्ति का उदय होता है. वहां-मत्ता स्थान ७१ का, तथा आवारक चतूक विना ७२ होता है. । और तीर्थकर के समुद्घात करते ऊपर- तीच तीनों ममय मे तीर्थकर नान महित २७ का. उदय स्थान होता है. और वो जिन नाम युक्त होने से-८० का. और ७६ का यह दो नत्ता स्थान पाने हैं श्री र केवली नमुन्यात करते औदारिक मिश्र योग बनने-२ औदारिक द्विक. : व पभ नारच संघयण. ४ छे संस्थान में का १ मंस्थान. ५ उपयात. और प्रत्येक य- ह ६ मञ्चत्ति उपरोक्त २० में मिलाने मे २६ का उदय स्थान होता हैं. मो-दुमरे छ । .

२६८ प्रथम अर्थ काण्डका प्रथम मूल द्वारा रोहण कन्ड ८८का है, और सातवे समय पर्यन्त ७१. का, और ७५ का, यह दो स्थान होते हैं. और तिर्थकर को इसी स्थान में जिन नाम सहित २७ के उदय में-८० का, और ७६ का यह दो सत्ता स्थान होते हैं. ऊपरोक्त २६ में-१ पराघात, २ उश्वास,३ दानों में की १ खगति, यह ४ प्रक्रत्ति मिलाने से ३० का, उदय औदारिक योग वर्तते केवली के अथवा इग्यारवे गुणस्थान भी होता है. यहां-१३ का, ९२ का, ८१ का, ८० का, ७१ का, ७६ का और ७५ का हय ८ सत्ता स्थानों मे से पहेले के ४ तो उपशम श्रेणि की अपेक्षा से और पीछेक ४ क्षीण कपाय के सयोगी केवली के, और तीर्थकर के होते हैं यहां आहारक चतुष्क की सत्ता सहित तीर्थकर के८० का,और अतीर्थकर के७१का आहारक चतुष्क छोडकर तीर्थकर के७६का और अतीर्थकरके७६ कायह दो सत्ता स्थान पाते हैं और३१ के यदय८०का और७६कायह दोसत्ता स्थान तीर्थकर केवलीके जानना क्योकि-सामान्य केवली केतो २१ का उदय नहीं होता है. यन ३१ में से-तीर्थकर के वचन जोग कारंधन होन से २१ का यदय होवे वहां ८० का और ७६ का यह दो सत्ता स्थान होवे । और सामान्य केवली के औदारि क योग वर्तते ३७ का यदय और ७१ का, ७५ का, यह दो सत्ता स्थान । इन३० में से वचन जोगका निरंधन करने से सामान्य केवली के २९ का उदय होता है, वहा-७१ और ७५ का यह दो सत्ता स्थान पाते हैं. और तीर्थकर के वचन जोग का निरुंधन होने से ३० प्रकृति रहै, और ३० में से भी, श्वाशोश्वास का निरुधन होनेसे २९ का उदय होता है. वहां-८० का और ७६ का यह दो सत्ता स्थान पा- ते हैं यों २९ के उदय में चार सत्ता स्थान पाते हैं.। और सामान्य केवली के वच. न जोगका निरुंधन होनेसे २९ का उदय रहै, और उस में से श्वाशोश्वाश का उदय कमी कर ते २८ का उदय होता है उस में-७९ और ७५ का दो सत्ता स्थान पावे, और ९ के उदय में तिर्थकर के अयोगी गुणस्थान में ८° का, ७६ का और अ. न्तिप समय में ९ को यह ३ सत्ता स्थान पाते हैं, और सामान्य केवली के के उद- य में-अयोगी केवली गुणस्थान के द्विचरम समय तक, ७९ का और ७५ का अया अन्तिम समय ८ का यह ३ सत्ता स्थान पाते हैं. ॥ यों नाम कर्म के सम्बंध के भाङ्गे ३० होते हैं.

* मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अहीगतद्वारी पर २६९ चउदह गुणस्थान पर नाम कर्म के भांगे. १ मिथ्यात्व गुणस्थान में-२३ का. २५ का. २६ का. २८ का, २९ का. ३" यह ६ वन्ध स्थान होते हैं. सो कहते हैं:-(१) अपर्याप्ता एकन्द्रिय प्रायोग्य २३ का वन्ध करते-चादर मूक्ष्म प्रसेक और माधारण इन ४ पदमे ४ भाले होतेहैं. (२) पर्याप्ता एकेन्द्रिय प्रायोग्य २५ का वध करते २१ मांगे होते हैं. ( 3 ) :- प्तिा एकन्द्रिय प्रायोग्य २६ का वन्ध करते १६ भाडे. ( ४ ) देवगति मायोग्य३६ का. वन्ध करने ८ भाङ्गे. नरक गति प्रायोग्य २८ का बन्ध करते । भाजा यों २ भारु २८ के बन्ध के होते है, । और पार्याप्ता थेन्द्रिय तेन्द्रिय चनिन्दिर प्रायोग्य२२ का बन्ध करने. अलग २ आठ २ भागे होते हैं. पर्याता नियंच पचेन्द्रिय प्रायोग्य २० का इन्ध के ४६०८ भाड्ने पर्याप्ता मनुप्य गति मान्य २१ का बन्ध करने ४६०८ भाड्ने यो २१ के बन्ध के मब ९२४०भारे होत x। और पर्याप्मा नीन विल्लेन्द्रिय प्रायोग्य ३० का वन्ध करते अलग २ आट २ भाद्. नियर रचेन्द्रिय मा योग्य :" का बंध करते ४६०८ भाङ्गे. यो ३० केन्च के मब ४३: भाग हो- ते है. और नबी बन्ध स्थान के मिलकर-१३१०६ हुवे ॥ मिथ्याव गुणम्या न मे-२१ का. २४ का, २० का. २६ का. २७. का. .८ का...वा.का और १ का. यो ९ उदय स्थान होते है. जिनके कब ४१+१xx६०+: १४११११+१.७८१+२९१४४११७४-७५७ भाड़े होने हैं. | मिथ्याय गुग. , * या तीर्थकर नाम हिल देवगति प्रावी . .: आहारन हिज महत:. केबदमन पोन्द : के बर के. ८.६८ १७ है. :- सीरम मिनी. + समयमा १९९१-ने--: ८. जे. रेप मा. उदेन है : :::::::: -- में अपतर पर्याप्त भये प्रथम अर्थ काण्डका प्रथम मूल द्वारा रोहण कन्ड स्थान में-६ सत्ता स्थान होते हैं:-जिनमें से-१२ की सत्ता तो सबजीवों के होती है. और किसी वेदक सम्यक दृष्टि जीवने प्रथम नर्कायुका बन्ध किया हो वो आयुके अन्तमें सम्यक्त्व का वमन कर नर्क मे जाता है. उसके अन्तर मुहुर्त पर्यन्त ८९ की सत्ता पाती है. फिर अन्तर मूहुर्त वाद वो सम्यक्त्व की प्राप्ति करता है. * 100 का सत्ता स्थाना भी चारों गति के मिथ्यात्वी में पाता है. । ८६ का सत्ता स्थान- एकेन्द्रिय में देवगति प्रायोग्य तथा नर्कगति प्रायोग्य उवेलने से पाता है, ८० का स त्ता स्थान तो-१३ वे में से-१ तीर्थकर नाम, ५ आहारक चतुप्क, ११ वैक्रिय पष्ट क, १३ नरक द्विक, इन १३ प्रकृत्तियों को उवेलने से-एकेन्द्रिय में पाता है. फिर एकेन्द्रिय मे से निकल विल्लेन्द्रिय तथा तियेच पचेन्द्रिय मनुष्य वाद भी अन्तर मुहुर्त तक उसमें का स्थान पाता है. अन्तर मुहूर्त बीते वाद अ- वश्य क्रियादि का वन्ध होता है. और उन ८० में से मनुष्य गति और मनुष्यानु पूर्वी उवेले वाद तेउ वायु में ७८ की सत्ता पाती है,। और तेउ वाय में से आकर विश्लेन्द्रिय होवे वहां ७८ की सत्ता अन्तर मुहूर्त पर्यन्त पाती है, वो पर्यात हुवे वाद अवश्य मनुष्य द्विक का, बन्ध करे तब ७८ की सत्ता नहीं पाये. । यो सामान्य प्र. कारे १२ सत्ता स्थान मिथ्यात्व गुणस्थान मे पाते हैं. ॥ अब इनका सम्वेध कहते हैं -मिथ्याती के अपर्याता एकेन्द्रिय प्राणग्य २३ का वन्ध करते सब ९ उदय स्थान का सभव होता हैं, परन्तु उसमे २५ के उदय में देवता के भाड्ने ८, नार्क का भाग १, यो १, और २७ उदय देवता के ८, नर्कका ?, और २८के उदय देवता के ?.६ नर्क का, १ इतनही २१ के उदय में ३० के उदय देवता के ८, यो सब ६० भा ले २३ के बन्ध मे नहीं पाते हैं, क्योकि-नर्क तो एकेन्द्रिय में जातेही नही है. अप- प्तिा देवाता भी और एकीट्रय मे जाते नहीं है, इसलिये इनके ६० भाड्ने छोडकर वाकी के ७७१३ उदय के भाने २३ के बन्ध में पाते है. यहां ९२ का ८८का,८६ का, ८० का, और ७८ का, यह ५ सत्ता स्थान तो-२१ का, २४ का, और २६ का, यह ३ उदय स्थान प्रत्यय होते हैं. उसमे २५ के उदय में जो तेउ वायु उद- * यहा आहारक चतुष्क और जिन नाम कर्म इन दोनों की एकही वक्त में नरकमें सत्ता नहीं होती है इमलिये २३ का सत्ता स्थान नर्क में पाता नहीं हे - * मुक्ति सोपान श्री गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी २७१ य सत्ता भाङ्गे है. तहां ७८ की मत्ता. परन्तु दूसरे भाड़े नही होते है. और दुसरे- २७ का. २८ का. २९ का. ३० का. और ३१ का. इन ५ उदय में-७८ विना वा- की के चार २ सत्ता स्थान होते है. यो सब २३ के वन्य में ४० सत्ता स्थान होते है परन्तु इतना विशेष-जो पर्याता एकन्द्रिय प्रायोग्य २५ के बन्ध में अपने उदय में दे वता के भी भाङ्गे पाते हैं. इसलिये ७७३८ माङ्गे इन दोनों बन्ध स्थान में पाते हैं.फ क्त नर्क के २ उदय के भारु नो पाते हैं. और देवता जो एकेस्टिय प्रायोग्य २२५ कृत्ति का. बन्ध करे. क्रेकि-इन साधारण और अपर्याप्त में देवता उपजते नहीं । और २८ के बन्ध में भी मिथ्याली के :" का और १ का यह दो उदय स्थान होते हैं. उनमे :० का तो पवेजिय तियेच तया मनुष्य के होते है. और ३१ का बन्ध पचेन्द्रिय नियंच के होते. ३० के उदय पजेन्द्रिय तिच अश्या मनुष्य दे- कराते प्रायोग्य तथा नरक गति प्रायोग्य २८ का न्योता है. बाकी विश्लेन्द्रिय के ३. भाङ्गे उदय के नती होते है. इन दोनो उच्च के निलकर ४:४८ भाङ्गे २८ के पन्ध मे होने हैं. उनमे- के उदय में-२२ का. ८२ का. ८८ का. और ८६ का य. ४ मत्ता होती है. और १के उदय ८९ की सत्ता नहीं होती है. तीर्थकर ना- म सहित ८९ की मत्ता होती है. मोतियच मे नही पाती है. इनलिये ३ ती मत्ता होती है. और ३० उदय मे भी जो वेदक सम्यक्त्त का वमन कर जिन नान महित मिथ्यात में गया उनके नर्क प्रायोग्य २८ का न्य करते भी ८१ की मत्ता होती में २८ के बन्ध मे ७ मत्ता स्थान होते हैं. । देगति प्रायोग्य विना दूनरी मनुप्य तिच गति प्रायोन्य २१ के बन्ध मे २. का. ९ का. और ८ का.इन: उदयवि ना नव उदय स्थान पाते हैं. और १२ का. ८१ का. ८६ का. ८० का. और ७८ का. यह बता स्थान होने है. यहां २१ के उदय नना स्थान होते है. मो कह- ते है. जिन नाम का वध कर फिर मम्यक्त्वजा वमन कर जोन में जाने उनके दीचमें २१ का उदय तेता है. तहां ८९ की नता होती है. और १२ का त्या ८८ का. यह दोनों नता म्यान चारो गति के जीवों के विग्रह गति में के उदय में होने हैं. और ८६ ना ८० यह दोनों ना देना नई दिना इन जीवों के होनी और ७८ की मना देव नर्क और मनुनविन वृतरे जीनों के होती है. वो से उदय में ६ मा स्थान पाने है.। और ४ सय में एक दिन की सत्ता स्थान एकदिव केचने है. हमरे जी के दर जय नही और . द .

२७२ प्रथम अर्थ काण्डका प्रथम मूल द्वारा रोहण कन्डर उदय मे ६ सत्ता होते हैं. २६ के के उदय ८१ की सत्ता विना वाकी केस त्ता स्थान होते हैं. क्योंकि-८९ की नारकी के होती है. उनके २६ का उदय स्था हेही नही. और २७ के उदय ७८ विना ५ सत्ता स्थान होते हैं, सो २१ के उदर । की तरह कहना. क्योंकि-तेउ वायु में २७ का उदय नही है. बाकी के एकेन्द्रिय क के भी पर्याप्ता अवस्था में यह उदय होता है. वो मनुष्य द्विक, का बन्ध अवस्यः । रता है. इसलिये ७८ की सत्ता यहां उदय में नहीं होती है. और २८ के उदय में । सत्ता स्थान होते हैं. उसमे ८६ की सत्ता विल्लेन्द्रिय तिर्यच पचेन्द्रिय मनूष्य की अ पेक्षा से लेना- और दूसरे तरह स्थान पाहिले की तरह ही कहना. और २१ के. य में भी यही ५ सत्ता पहिले के तरह ही कहना. । ओर ३० के उदयमें ८९ दिन वाकीके वोही चार सत्ता विल्लेन्द्रियद तिर्यच पचेन्द्रिय और मनुष्य की अपेक्षासे है ती हैं. ८१ की सत्ता तो जिन नाम का वध कर सम्यक्त्व का वमन कर नर्कमें। वे ऐसे मिथ्यात्वी नारकी के होती है. वहां ३० का उदय स्थान नहीं होता है. वोही ४ सता स्थान ३१ के उदय में भी मनुष्य विना ३१ के उदय में भी मनुप विना दूसरे जीवों के होती है. क्योकि-३१ का उदय सामान्य मनुष्य के नहीं केवली के होता है. यो सब २९ के बंध मे ४५ सता स्थान होते हैं. ॥ देवर्गा प्रायोग्य ३० के वन्ध विना विल्लोद्रिय तथा पचेद्रिय प्रायोग्य ३० के बन्ध में सामा- न्य मे-२१ का, ८ का. और ९ का, यह ३ उदय स्थान विना वाकी के-९ उदय गुणस्थान हो, वह ८१ विना ५ सत्ता स्थान होये, क्योकि-तियच गति में जिनना म की मता नही पाती है. तहां १का, २४ का, २५का, और २६का, इन चारों उ दय मे पांच २ लता स्थान होते हैं. और दुसरे पांच उदय में ७८ विना चार २ स. त्ता स्थान होते हैं. यों १ उदय के मिल ४. सत्ता स्थान होते हैं. यहां ८१ काम- त्ता स्थान तो देवगति प्रायोग्य, अहारक द्विक सहित ३० केबंध मे और जिन नाम सहित मनुष्य प्रायोग्य ३० के बंध में होता है. यह दोनों मिथ्याली बांध ते नहीं है, • मिथ्यात्व गुणस्थान में ६ बंध स्थान के नव उदय स्थान मिलकर २१२ म. -- न होने हैं. २ मास्वादन गुणस्थान में-२८ का, २२ का और ३० का यह बंधायान मो कहते हैं:-देवगति पायोग्य २८ के ८ भाद्ने मास्त्रदन में बंधते हैं. उम पने वाले पचेन्दिर तिर्यच तथा मनुष्य होते हैं. और नर्क मायोग्य २८ का बंध ।

* मुक्ति सोपान श्री गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी तो मिथ्यात्व प्रत्ययि है इसलिये सस्वादन मे नही है. तिर्यच पचेद्रिय प्रायोग्य और मनुष्य प्रायोग्य २१ प्रकृति बंध के माङ्गे ६४०० का बंध-एकैद्रिय, विलोद्रिय, तिर्य- च पचेंद्रिय मनुष्य देवता नारकीकों इनो के सास्वदन गुणस्थान में होता है. यहां- डक संस्थान और छेवटा संघयण का वध नहीं होनेसे पांच संघयण और पांच सं- स्थान तथा सात युगलो के विकल्यो कर ३२०० भाड्ने प्रत्येक मनुश्य तिर्यचच गति प्रायोग्य २१ के बंध मे होते हैं. दोनोंके ६४०० भागे होते है. और पहिला कहा जो एकद्रियान्हक के सास्वादन में उद्योत सहित ३. का बंध तिर्यच पचोद्रय प्रायो. ग्यही करते है वहां भी ३२०० भागे होते है. इन का विस्तार साहित वरणन पहिले ही करदिया है. सो जानता. यों सव बंध के भागे १६०८ होते हैं. ॥ सास्वादन गु णस्थान में २१ का. २४ का. २५ का. २६ का, २१ का. ३० का. और ३१ का, यह ७ उदय स्थान होते है. तहां नर्क विना तीनों गति के जीवोकी अपेक्षासे-२१का उदय दो गति की के बीच मे रस्ते चलते जीवोके होता है. वहां उदय के भाने ३२ होते हैं. यद्यपि-२१ के उदय में सब ४२ भागे कहे थे. परंतु उस में १ अपर्या- प्ता के, एक मुक्ष्म पर्याप्ता का. एक नरक का, और १ केवली का यो १० भागे इस गुणस्थान में नहीं पाते हैं.। और २४ का उदय तो एकेद्रिय के उत्पन्न होते ही होता है. यहां भी वादर पर्याता अपर्याप्ता के यशः अपयशः के विकल्प से दो भाड़े सास्वादन गुणस्थान मे पाते हैं. वाकी के सूक्ष्म साधारण के भाते नहीं पाते है. औ र वैक्रिय वाला भाडा तो वायु काय केही होता है. नो भी मास्वादन में नहीं पाता है.। और २५ का उदय तो देवगति मे उत्पन्न होनही होता है. तथा किसी के नही भी होता है. वहां देवता के ८ भाङ्गेः-नुभग दुभग. आन्य अनादेय. यशः अयश मे उपजते हैं. । और २६ का उदय विक्लेन्द्रिय तियेच पचेन्द्रिय मनुप्य में उत्पन्न हो तेही पाता है. वहां अपर्याप्ता का एकेक भागा छोडकर विलिय पर्याप्ता के ६ पचे न्द्रिय तियेच के २८७. मनुप्यके भी २८८. यो ५८२ भाड्ने २६ के उदय में पाने । और २७-२८ का. उढय तो मास्वादन में होता ही नहीं है. क्योंकि-यर दोनों स्थान उत्पन्न हुवे. मे-अन्तर मुहून वाद पाते है. और नास्वदन तो आवलिकामा ठेरी मावही होता है. इमालये यह भी पावे. और २१ का उदय देवता नागकी के प प्तिा अवस्था में प्रथम प्रात नम्यक्त्व ने पड़ते हुवे होता है. वहां देवता के ८. और नर्क का १. यों १ मांगे पाने है. । और • का उदय निर्वत्र पवेन्द्रिय मनुप्य के २७४ १ प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड र सर्व स्थान पर्याप्ति पूरी किये वाद औपशामिक मम्यत्व मे पडते हुवे होता है. तया उत्तर वैक्रिय करते हुवे देवता के उद्योत के वक्त में होता है. वहां मनुष्य और तिय च के अलग अलग ११५२ भाड्ने होते हैं, और देवता के ८ भाने होते है. यों मई मिल २३१२ भां। उदय के होते है,। और १ का. उदय पवेन्द्रिय तिर्यच पर्याप्त के प्रथम सम्यक्त्व का वमन करते पाता है, वाहां भाङ्गे ११५२ होते है. यो मव ७ उदय के ४०९७ भांगे मास्वादन गुणस्थान मे पाने हैं. साखाउन में ९२ का और ९८ यह दो सत्ता स्थान होते है. और ८८ की सत्ता तो चारों गति के सास्वदनी के पाती है. ॥ अव सम्वैध कहते हैं.:-२८ के वन्ध मे मास्वादन में ३१ का और का, यह दो उदय स्थान होते हैं. क्योंकि-देवगति प्रायोग्य २८ प्रकृात्त का, बंध अपर्याप्ता के होता है, इसलिये दूसरे उदय स्थानक इसके नहीं होते है. वहां मनुप्यत्र न्धक की अपेक्षा से ३० का उदय और ९२ की ८८ की सत्ता स्थान होते हैं. औ. र तिर्यच के उपशम श्रेणि होती नहीं हैं. इसलिये उपशम श्रेणि के पड़ने के अभाव से-९२ की सत्ता नहीं पाती है. फक्त ८८ की सत्ताही पाती है. और तियेच मनुप्य के प्रायोग्य २९ का वन्ध करते सास्वादनी के ७ उदय स्थान होते हैं. वहां अपने २ उदय स्थानो मे एकेक ८८ का सता स्थान पाताहै. और मनुष्य के ३० के उदय मे वर्तते-१२ का और ८८ का. यह दो सत्ता स्थान पाते हैं. वाकी के सब के फक्त ८८काही सत्ता स्थान पाता है. ऐसे ही ३० के वन्ध का भी सम्बेध कहना. यो सब मिलकर सास्वादन गुणस्थान मे १८ सत्ता स्थान पाते हैं। ३ मिश्र गुणस्थान मे--२८ का और २९ का यह दो सत्ता स्थान होते वहां मिश्र दृष्टि तिर्यच मनुष्य के देवगति प्रायोग्य २८ का वन्ध होता है. वहां भाने. ८ पाते हैं और मनुष्य प्रायोग्य २९ का वन्ध मिथ्यात्व दृष्टि देवता नर्क के होवे वहां स्थिर अस्थिर, शुभ अशुभ, यशः अयशः के विकल्प से भागे ८ होते हैं. दुसरे जो छे स्थान कादि के विकल्प से भाड़े. उत्पन्न होवे. वो यहां नहीं पाते है. (यों आगे के गुणस्थान मे भी जानना) सव बन्ध के भाड़े १६ होते हैं. ॥ मिश्र गुणस्थान मे २९ का. ३० का. और १ का यह ३ उख्य स्थान पाते है. तहां २९ के मे देवता भाओं ८. और नर्फ वा भांग १. यो १ भाड्ने पाते है. और ३० के उदय तिर्यच रद्रय के १७२८ और मनुप्य के ११५२ यो लव २८८० भाङ्गे : के उदय मे है। और ३१ के उदय पचेन्द्रिय तिर्य के होता. ११९१ भाड़े पाते है.

* मुक्ति सापान श्री गुणस्थान रोहण अढीगतद्वारी ७२५ यो सब सर्व मिश्र गुणस्थान मे उदय के ४०४१ भाङ्गे पाते है । यहां सत्ता स्थान ९२ का और ८८ का यह दोही होते है ॥ अव सम्धेध कहते हैं-२८ के बन्ध में मिश्र दृष्टि के ३० का और ३१ का यह दो उदय स्थान है. उस मे अलग अलग ९२ का और ८८ का यह दो सत्ता स्थान होते है और २९ के बन्ध के एक २९ काही उदय स्थान होता है. वहां भी वोही दो सत्ता स्थान होता हैं. ४ अविरति सम्यक दृष्टि गुणस्थान में-२८ का, २१ का. और ३० का यह बन्ध स्थान होते हैं. वहां तिर्यच मनुष्य के चौथे गुणस्थान में देव प्रायोग्य का व न्ध करते २८ का बन्ध होता है. वहां भाङ्गे ८ उपजते हैं, और मनुप्य के देवगति प्रायोग्य जिन नाम सहित वन्ध करे तो. २९ का वंध होता है वहां भी ८ भांगे. और देवता तथा नर्क के चौथे गुणस्थान में मनुप्य गति प्रायोग्य २० का बंध करते भाने ८ होते है. देवता नारकी के सम्यक्त्व प्रत्यय ३१ जिन नाम सहित मनुष्य प्रायोग्य ३° का बंध करते भी भांगे ८ होते हैं. यों बंध के सब ३२ भांगे होते है. ॥ चौंये अविरति सम्यक्त्व दृष्टि गुणस्थान मे-२१ का. २५ का. २६ का. २७ का. २८ का. २१ का. :' का. और ३१ का. यह ८ उदय स्थान पाते है. इन में २१ के उदय में देवता के भाग ८. मनुष्य के ८. तिर्यव पद्रिय के ८. x नर्क का १. यो २५ भांगे २१ के उदय के होते हैं. (टीप है भायिक मम्यक दृष्टि पूर्व आयु वन्ध वाला. चारों में उपजता है और पुरा पर्याप्ता होता है. इस मे अपेक्षा भे - २१ उदय ग्रहण करना. २० का तथा २७ का उदय देवता के नर्क के और वैक्रिय-नि- र्यच मनुष्य के होता है. इन मे नर्क के जीवो तो झायिक तथा वेदक मम्यक दृष्टि जानना. और देवती तीनो मम्यक्त्वी होते है । और २६ का उदय पचेन्द्रिय नियंत्र मनुश्य वेदक तथा धायिक मम्यक दृष्टि के होता है. = । और २८ नथा २का - + अदिति सम्पक दृष्टि साता ने मना नहे है यान पुगनग जरनंह होनहै इस पता का भागा कमी हानने वाले ८ ही पदे x सन्न. योग और शपिज, यह को मानव पान - सनाटी निपैच रे मनुष्य में जज नदी की - क सन्ज नटिनो न्हे २८ जीबह होते.

२७६ प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड ११ यह दोनो उदय नर्कतिर्यच और देव के होतेहै।३ का उदय नर्क विनातीनों गतिमें होताई और३१का उदय पचेंद्रिय तिर्यंचके होताहै. यहां सर्व स्थान अपने अपने उदयके भांग ग्रहण करना.॥चौथे अविरति सम्यक दृष्टि गुणस्थानमें चार सत्ता स्थान होतेहैं: अप्र- मत और अपूर्व करण गुणस्थान मे आहारक द्विक और जिन नाम सहित देव प्रायो ग्य ३१ का वन्ध कर पडता हुधा मरकर देवता होवे, उस अपेक्षा से १३ की सत्ता जानना और आहारक चतुष्क का वध कर फिर परिणामों प्रवर्ति से मिथ्यात्रीही चारों गति में से किसी गति में उत्पन्न होकर फिर सम्यक्त्व प्राप्त करे, उसके १२की । सत्ता पाती है. यह सत्ता देवता और मनुष्य के मिथ्यात्व मे गये विना भी पाती है, इसलिये यहां ग्रहण करी है. और ८९ की सत्ता तो-देवता नारकी और मनुष्य अ. विरति सम्यक दृष्टि के जिन नामका वन्ध है इसलिये पाती है. और ८८ की सत्ता चारो गति के सम्यक दृष्टि जीवों के पाती है. ॥ अव सत्ता का सम्बेध कहते हैं- अविराति सम्यक दृष्टि पचेन्द्रिय तिर्यच मनुष्य देव प्रायोग्य २८ के वन्ध मे ८ उदय स्थान होते हैं, तहां २५ का और २७ का उदय वैक्रिय तिर्यंच मनुष्य के होता है, दुसरे ६ स्थान सामान्य से पाते हैं, उन एकेक उदय में-९२ का और ८८ का यह सत्ता स्थानक पाते हैं. यों आठो उदय के १६ सत्ता स्थान होते हैं। और २१ का वन्ध एक देवगति प्रायोग्य,दुसरा मनुष्य गति पायोग्य होताहै,वहां देवगति प्रायोग्य, जिन नाम सहित२९का बन्ध मनुष्यके होताहै, परन्तु तिर्यचके नही होताहै, उनके ३१का उदय विना सात ही उदय स्थान होते हैं, क्योकि-मनुश्य के ३१ का उदय नहीं है. उन एकेक उदय में १३ और ८१ यह दो दो सत्ता स्थान होते हैं, और मनुष्य ग- ति प्रायोग्य २१ का वन्ध देवता नर्क के होता है वहां-२१ का, २५ का, २७ का, २८ का, २९ का, यह ५ उदय स्थान होते हैं, एकेक उदय मे-९२ का और ८८ का, यह दो दो सत्ता स्थान होते हैं. और मनुश्य गति प्रायोग्य जिन नाम सहित ३० का वन्ध भी देवता नारकी के होता है वहां-२१ का, २५ का, २७ का, २८ का, २१ का, और ३० का, यह ६ उदय स्थान होते हैं. उन मे अलग अलग ९३ का और ८९ का यह दो सत्ता स्थान होते हैं, क्योकि-नरक मे जिन नामकी सत्ता होते आहारक की सत्ता नही होती है, इसलिये ९३ की सता होती है, और ३? के उदय में दो सता होती है. यों सब मिल ५४ सता स्थान होते हैं. ५ पांचवा देश विरति गुणस्थान में-२८ का और २१ का यह दो वन्ध स्या मुक्ति सोपान श्री गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी २७७ न होते हैं. वहां मनुष्य तियेच देश चिरति देवगति प्रायोग्य २८ का बन्ध करे उसके ८ भाङ्गे. और येही जिन नाम सहित २९ का बन्ध मनुष्य देश विरति करे (परन्तु तिर्यच के नही होवे ) जिसके ८ भाङ्गे. सब १६ भाङ्गे । देश विरति गुणस्थान में सामान्य-२५ का. २७ का. २८ का. २१ का. ३१ का. और ३१ का, यह ६ उ- दय स्थान होते हैं. वहां २८ के वन्ध मे पहिले के उदय तो वैक्रिय तिर्यच मनुष्य के हो. इनका एकेक भाजा करने से चार भागे होवे. और २८ का. २९ का. यह दो नों उदय सामान्य तिर्यच मनूष्य के होवे. तथा वैक्रिय के भी होते. वहां उदय के भ होते है. और इ० का उदय तियेच मनुष्य के होवे. वहां संघयण ६. संस्था के विकल्प से ३६ भाङ्गे होवे. इने सुस्वर दुस्तर से दुगुने करने से ७२ होवे. इने शु भा शुभ गति से दुगने करने से १४४ होवे. इनमें अलग २ एकेकका. उदय होताहै. या दौर्भाग्य अनादेय और अयगः कीर्तिका उदय यहां गुण प्रत्यय करके नहीं हो- ता है. और वैक्रिय तियेच के उदय में भाड़ा-१. यो मब मिल २८९ भाङ्गे होते हैं। और १ का. उदय तिर्यंच के होता है, वहां भाड़े १४४ होते हैं. और मवमि ल ४४३ भांजे २८ के बन्ध मे पाते है. ॥ और २९ के बन्ध में मनुप्य के-२५ का २७ का. २८ का. २९ का. और १ का. यह ५ उदय स्थान होते है. इसमे पहि- ले के चार उदय स्थान तो वैक्रिय के हैं.. उनका भांगा एकेक. और ३० के उदय में भांगे १४४, यो निलकर १४८ भांगे होते हैं. और मव उदय स्थानके ५११ भा गे होते. ॥ देश हिरति गुणस्थान में ९३ का. ९२ का. ८२ का. और ८८ का. यह ४नत्ता स्थान होते है. उनमेने जो अप्रमत अपूर्व करण वाले-नीर्थकर नाम तथा आ- हारक का बन्धन कर पाते हैं. उन परिणामो मे देग विरति होवे उनके ९:की म- त्ता होती है. और बाकी की मब थे अविरति गुणस्थान की तरह कहना. ॥ अव सम्बेध कहते है: देश विरति मनुप्य के २८ के बन्ध में-२५ का. २७ का २८का २९ का. और ३० का. ग्रह ५ उदय म्यान होते हैं. नहां अलग अलग १२का. औ र ८८ का. यह दो दो मना स्थान होवे. नैने नियैच के भी-१ महिन : उदय में दो दो सत्तास्रान होवे. और २९ का दन्य देग विराति मनुष्य केही होता है. वहां २२ और : वाले उदय स्थान पहिले को मोही. पांचों उदय स्यान कहना. और वतं १३ का. नया ८९ का. यह दोनों नता धान होते हैं. देग विगति में नव नि- ल२२ मत्ता स्थान होते.

१७८ बन्ध में . प्रथम अी कारका प्रथम मल दाग गहण कन्द ६ प्रमत भगति गुणस्थान का, ननादि सम्मा कहते-:-अमन गार के २८ का. और २० का. दोनों बन्ध स्थान देग गिनिकीता काना. यहां अन्नगर मनुष्य के आठ भांगे मिला भांगे होते हैं। और का, का०८ का. २१ का, और ३० का, यह पान • उदय स्थान बने. इममें के पाहिले के चागं उदय तो आहारक और वैक्रिय करने वाले माधु की अपेक्षा मे लेना, वहां २५ के और २७ के उदय में दो दो भांगे वैक्रिय करने वाले मात्र की अपेशाम लेना, वहां -२५ के और २७ के उदय में दो दो भागे. और ०८ नया २० के उदय में चार २ भांगे, ३० के उदय में महज मलप्य के होने, यहां दो भागे आहारक और वैक्रि. य के यों, १४४ महज के मिल १४६ मन मिल एकेक बन्ध में १५८ भांगे करते ३१६ उदय के भांगे होते है वहां का, १२ का. का. और ८८ का. यह १ सत्ता स्थान पाते हैं. ॥ अब मम्ध कहते -२८ के बन्ध में ५ के उदय ९२ का, और ८८ का यह दोसत्ता होती है, इनमें आराक केकी मता होती है, ओर नि न नाम की सत्ता होवे तब २८ का बन्ध नही होता है. इसलिये १३ का और ८९ का यह दो सत्ता २१ के बन्ध में पांचो उदय स्थानक में अलग होती है, इसलि ये २१ का, बन्ध जिन नाम बान्ध तेती होता हैं, यो सब मिलकर२० सत्ता स्थान छ प्रमत संयति गुणस्थान में पाते हैं, ७ अप्रमत संयति गुणस्थान में-२८ का. २९ का, ३० का, और ३१ का, यह चार वन्ध स्थान होते हैं. इसमें के पहिले दोनों स्थान तो छहे गुणस्थान का तर ह ही कहना. और आहारक द्विक सहित वन्ध करते अनुक्र मे-३० का और ३१ का वन्ध होता हैं. इन चारो वन्ध स्थानों में अलग २ एकेक भागा होने से चर भाने हो ते हैं. क्योंकि-अप्रमत के-अस्थिर अशुभ अयशः का बन्धनही होता है. और इन ए केक बन्ध स्थान मे-२१ का, और ३० का, यह दो उदय स्थान होते हैं, इसमें जो प्रमत पणे वैक्रिय तथा आहारक का आरंभ कर अप्रमत में आते हैं, उनके उद्योत का उदय होने से-२१ का उदय होता है, तथा ३. का उदय सहज होता है. उन लग २ उदय में एक भाङ्गा वैक्रिय का और एक आहारक का यो दोनों उदय भेदो भांगे और सहज शरीर से अप्रमत के ३० के उदय मे पहिले देश विरति के स्थान १४६ भांगे कहे सोही होते हैं. यह सब मिलकर एकेक बन्ध में उदय के १४८ भा- गे होते हैं. चारों वन्ध के मिल ५९२ भांगे उदय के होते हैं. वहां २८ के बन्ध में * मुक्ति सोपान श्री गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी दोनों उदय में अलग अलग २८ की सत्ता होती है. और २१के बन्ध के दोनों उदय में अलग अलग ९२ की मता होती है. और ३१ के बन्ध में दोनों उदय में अलग अलग १३ की सत्ता होती है. = यो सब ८ सत्ता पाती है. ८ अपूर्व करण गुणस्थान मे-२८ का. २१ का. ३० का. ३१ का. और १ का. यह पांच वन्य स्थान होते हैं. इसमें के चारों तो अप्रमत की तरह ही कहना. औ र १ यशः कार्ति का बन्ध सो सातवे भाग में देवगति प्रायोग्य बन्ध कर विच्छेद क- रत है. वहां अलग २ एकेक भागा होता है. सब मिल बन्ध के ५ भागे होते हैं. इ- न प्रत्येक बन्ध स्थानो मे १ काही उदय स्थान होता है. यहां । संवरण से ६ सं. स्थान के विकल्प कर ६ भांगे होत है. इने शुभा शुभ खगति मे गिनने मे-१२ भां गे होते हैं. इने मुस्वर दुस्वर से गिनने मे २४ भांगे हाते है. + मब पांचो उदय में ६. भागे होते है. इनमे पहिले के चारो बन्ध स्थान में : के उदय में अनुक्रम मे ८८ का, ८१ का. ९२ का. और ९६ का. यह एकेक मत्ता स्थान होता है. और? के बन्ध में ३० के उदय में यह चारो मत्ता स्थान पाते है. मब ( म्यान. ९.१० अ निहात्ति वाटर और नत्म सम्पराय गुणस्थान मे-१ यश. कीती का बन्ध और . का. उदय इनमे अपक के भाड्ने २४ और औमशमिक के नीनों भवरणों के विकल्प मे ७२ भांगे उदय के होते हैं. और ९: का. ९२ का. ८९ का. ८८ का. यह चार सत्ता स्थान पाते है. ११ उपशान्त मोह गुणस्थान मे-बन्ध के अभाव मे ३० का १ ही उदय च्या न होता है. यहां भांगे ७२ होते हैं. और १३ का ९२ की. ८५. का. और ८८ का, यह चार मत्ता स्थान पाते हैं। १२ क्षीणमाह गुणत्यान -एक : प्रवृत्ति का उदय स्थान होता है. यहां भी तीर्थंकर नाम महिल के स्थानादिक मन प्रसन्न होते है. इसलिये ८० का. मना +पारबाज धर बन्ने अन् रई -मेगा , २८० . SAP प्रथम अर्थ काण्डका प्रथम मूल द्वारा रोहण कन्ड र और ७६ का, मत्ता स्थान तीर्थंकर के और ७१ का, और ७ का, सत्ता स्थान में तीर्थकर होते है, यो ४ सत्ता स्थान इस गुणस्थान में पाते हैं. १३ सयोगी केवली के-२० का, २१ का, २७ का, २८ का, २९ का, ३१ का, और ३१ का, यह ८ उदय स्थान होते हैं. जिसके ६०० भांगे पहिले सामान्या देश मुझवही कहना. यहां सत्ता स्थान ४ क्षाणमाह गुणस्थान मे कहै सोही पाते हैं. १४ अयोगी केवली गुणस्थान में-१ का, और ८ का, उदय स्थान होते हैं। जिसके २ भांगे, और ८० का, ७१ का, ७६ का, ७५ का, 2. का, और ८ का, यह तीन सत्ता स्थान पाते है. इसमे तीर्थकर के ९ का, उदय और ८० का, ७६का और ९ का, सत्ता स्थान, और सामान्य केवली के ८ का, उदय में-७१ का, ७५ का और ८ की सत्ता पाती है. गोत्र कर्म के भाङ्गे- गोत्र कर्म की दो प्रकृत्तियो में से सामान्या प्रकार से एक वक्त मे एक का, वन्ध और एककाही उदय होता है. क्योंकि-दोनो प्रकृत्ति वन्ध और उदय विरोध कीहै. और सत्ता एककी तथा दोनोंकी पाती है. जैसे-जिस वक्त तेऊ काय और वा यु काय में रहता हुवा जीव ऊंच गोव को उवेल कर सत्ता से निवारे, तब तेउ वायु में अथवा वहां से मरकर दूसरे जन्म में जहां तक ऊंच गौव का वन्ध नहीं करे, वहां तक एक नाच गोद की सता जानना. और अयोगी केवली गुणस्थान के चरम सम य एक ऊंच गोब की सत्ता जानना. यो बन्ध का और उदय का स्थान एकेक औ र मता के स्थान दो होते हैं. अब इसके भांगे कहते हैं:-१ नाच गोव का बन्ध, नीच गोव का उदय और नीच गोत्र की सता यह प्रथम भांगा तेउ वायु में उंच गों के उवेले वाट पाताहै.२नीच गोत्र का बन्ध ३नीच काही उदय और नीच तथा उंच दोनों की सत्ता ३ नीच का बन्ध उंच का उदय और उच नीच दोनों की सता, य- मरा तीसरा भांगा-मिथ्यात्व और सेस्वादन इन दोनों गणस्थान में पाताहैं क्यों कि-आगे के गुणस्थान में नीच गोव का वन्य नहीं है. ४ उच गोत्र का बन्ध नीच का उदय और दोनो की मत्ता यह भांग मिथ्यात्व से लगा देशविरति गुणस्थान तक पाता है. क्योंकि-आगे के गुणस्थान में नीच गोत्र का उदय नहीं है. ५ उंच का व sho २८१ * मुक्ति मोपान श्री-गुणस्थान रोहण अढीगतद्वारी ११ न्य उंच का उदय और दोनो मत्ता. यह भांगा दशवे गुणस्थान तक पाता है. उंच गोद का उदय और उंच नीच दोनो की मत्ता. यह भांगा इग्यारवे गुणस्थानमे लगा चउदवे गुणस्थान के विचरम समय पर्यन्त पाता है. उंच गाव का. उदय. र उंच की ही मता यह भांगा अयोगी केवली गुणस्थान के अन्तिम समय पर्यन्त पा. ता है. यह ७ भांगे गौव कर्म होते हैं. अन्तराय कर्म के मांगे. अन्तराय कर्म की पांचों पचत्ति ध्रुव बंध की है अर्थात्-एक ही माथा पांचें। का ही बन्ध होता है. और उदय भी ध्रुव होता है. और मत्ता भी ध्रुव ही पाती है इमलिये-१ अन्तराव कर्म की पांचो प्रकृति का बन्ध. पाचों का उदय, और पांचों की मत्ता. यह एक ही भांना होता है. मो दशवे गुणस्थान पर्यन पाता है. और आ गे बंध के अभाव मे-२ पांचो प्रहात का उदय और पांचों की मना यह दुमरा भा गा इग्यारवे वारवे गुणस्थान तक पाता है. वन्धिके भागों का खुलासा. १ पंधि वंचिन्ति वधति मो-गन कालम कर्म बांधे. वर्तमानमें कर्मबंधना. औ. भारत काल में बन्धन करेगा मर्व भनारी जीवो.२ वन्धि. वन्यन्ति नान्यति. मोगत कार में वे वर्तमान में बंधना है. भविप्य में नहीं बंधेगा-चरम गरीरी. : बंधि.न- घ. दन्धिान्ति, गत काल में बंधे. वर्तमान में नहीं थे. आगे को धेगा. वर्ग मान ! होने वाले मुनि. और ४ वषि. नवंधति. नश्यनि. अनित काल में बंध किन. प्रन्युा. न में बंध नहीं करते है. और अनागत में भी वन्य नहीं करेंगे. मो केवल नानी. इर्यावही के मांगे का दलाना. १ देषि दधति. धनि मो-गत वाल्मे उपयाम आणि त्याचा पाया स्पर्य उपकिरी का बन्द कर पडा. के. और दनमान दाल में (दन वन नि: उगम श्रेजी र न्यानवे गणमान जाविता बाको लिवहां फिर पडेगे. और फिर तीनो दन मनन श्रेणी मे या अपर प्रेमी में वर का । इविही का दन्य ने. वषि, देवति. नोति. कोन काल में प्रेमी 7 २८२ * प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड र इर्यावही का बंधकर पडवाइ हुवे, वर्तमान में तेरवे गुणस्थानमें है सो इर्यावहीका बन्ध कर रहे हैं. आवते काल में चउद वे गुणस्थान में जायंगे तब फिर इर्यावही बंधन होगा. ३ वंधि, नवंधे, वैधेती सो-गत काल में श्रेणी कर पडे, वर्तमान में श्रेणी नहीं करते हैं, परन्तु आगमिक काल में श्रेणि कर चढ़ेंगे इर्यावही का बंध करेंगे. ४ बंधि नवंधे, नवंधेति, सो गये काल में तेरवे गुणस्थान में इर्यावही का बन्ध किया, वर्तमान में चउदवे गुणस्थान में है सो वंध नहीं करते हैं. आगमिक मोक्ष जावेंगे मो भी बंध नहीं करेंगे.५नवन्धि, बंधती बंधति सो-गये काल में कभी श्रेणी चडा नहीं, वर्तमान श्रेणी चढ वन्धन कररहे हैं. आगमिक तेरवे गुणस्थान को प्राप्त हो बंध करेंगे. ६ न बंधि, बंधे, नबंधेति सो-गये कालमें श्रेणी चढे नहीं, वर्तमानमें चडताहै. परन्तु आगाम काल मे श्रेणी चडेगा नहीं, यह भांगा शुन्य है, कही भी नहीं मिलता है. ७ नवधि, नवंधति, वंधेति सो-गये काल में श्रेणी चडा नहीं, वर्तमान में चढे नहीं, परंतु आग- मि काल में चडकर इर्यावही का बंध करेगा. और ८ नवंधि, नवंधे, नवंधेति गये का ल मे बंधे नही, वर्तमान में भी वंधे नही, और आवते काल मे बंधेगे नहीं यह भांगा अभव्य आश्रिय जानना. भावद्वार का खुलासा. उवसम खय मिसोदय, परिणामा दु नव ठार इगवीसा।। तिअ भेए सन्निवाइय, सम्मं चरणं पढम भावे ॥१॥ बीए केवल जुअलं, सम्मं दाणाइ लद्धिपण चरणं ।। तहए से सुव ओगा, पण लद्धि सम्म विरइ दूग्गं ॥२॥ अन्नाण मसिद्धता, संयम लेसा कसाय गइ वेआ ॥ मिच्छे तूरिए भव्वा, भव्वत्त जिअत्त परिणामि ॥३॥ १. औदायिक भाव के २१ भेदः-(१) अज्ञान-मिथ्यात्व मोहनीय के उदय कर जो मिथ्यात्वी का ज्ञान है मो अज्ञान. = (२) असिद्धत्व-अष्ट कर्मोदय करजीव = जैसे-अनाचार, अगील आदि शब्दो चार से आचार की और गील की नास्ति न २८३ * मुक्ति सापान श्री-गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी १९ सिद्धावस्था को प्राप्त नही करलके-संतारीही बना रहै सो आसेदव.(३) अविरत-अ : प्रत्याख्यानारवगीय कपायोदय कर जी वृत प्रत्याख्यान नही कर सके-सो (अविर- * ति (४-२) छेलेश्या जिन अध्यवसायो कर आत्मा लेपाय सो-कृष्ण-नील-कापुत , -तेजो-पशु-और शुक्ल-यह छे प्रकार की लेश्या है. x (१०-१६] चार कपाय- मोह कमोदय कर जिस प्रणतिसे ससारका कस-रस आवे सो-क्रोध-मान-माया और लोभ यह चार कपाय. (१४-१७) चारगति-जो नाम कर्मोदय कर जीवों गमनागमन करे ऐसी-नर्क-तिपैच-मनुष्य और देव चारों गति. (१८-२०) जो मोह कर्मोदय से विपयाभिलापा प विकार को वेदे सो-त्री पुरुष नपूंमक-यह तीन वेद हैं. और २१ - मिथ्यात्व मोह भी मोह कर्म के उदय से होता है. २ ओप गमिक भाव के दो भेदः -(१) ओपशम सम्पक्व मो अनंतान वं- धि चौक और तीन दर्शन मोहनीय इन सातो प्रकृति यों-रमोदय और प्रदेशोदय को प्राप्त न होवे सो उपशम भाव. और उस से जो प्रगट हुइ तत्वों की रुचि मो उ- पशम सम्यक्त्व. और. (२) जो वाकी रही २१ चारिख मोहनीय की प्रकृतियो उपशम होने जो स्थिरता रूप चारिव होवे सो ओपशमिक चारव ९ क्षयोपशामक भाव के १८ भेदः-४ चार ज्ञान (केवल विना) ७ तीन अ. ज्ञान. ११ तीन दर्शन किंवल दर्शन विना) १० पांच प्रयोगम लब्धि छद्मम्तकी. १६ भयोपशम सम्यक्त्व. १७ श्योपशम चारिव. और १८ मयमासंयम. (इन का खुलामा इस में मात बानावरणीय. श्रुति ज्ञानावररणीय. चक्षु दर्शनावरणीय. अचा दर्शनावर •. ही मन्झ ते-कु अचार और कुमील समा जाता है. तैस ही यहा अडानका कुहान जानना तो अनादि और स्वभाविक होने औदविज भाव में गृहण जिया है. ४ (१) जो आचार्य अट कादव ने लेपाको मन ने है. उनके मन ‘लेल्या औ दायिक भाव में है. (२) जो जापादेय मे लेया ने उनले मन में हवा पिज मन में या और जो. - (३) योगेको प्ररने में लेगा मने उन ने मे नान* अदा मात्र पो केन मन हैं.

ह २८२ * प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड * इर्यावही का बंधकर पडवाइ हुवे, वर्तमान में तेरवे गुणस्थानमें हैं सो इविहीका कर रहे हैं. आवते काल में चउद वे गुणस्थान में जायंगे तब फिर इर्यावहीं बंध में होगा. ३ वंधि, नबंधे, वैधती सो-गत काल में श्रेणी कर पडे, वर्तमान में श्रेणी न करते हैं, परन्तु आगमिक काल में श्रेणि कर चडेंगे इर्यावही का बंध करेंगे. ४ नवंधे, नबंधेति, सो गये काल में तेरखे गुणस्थान में इर्यावही का वन्ध किया, वर्तमान में चउदवे गुणस्थान में है सो बंध नहीं करते हैं. आगमिक मोक्ष जावेगे मो भी । नहीं करेंगे.५नवन्धि, बंधती वंधेति सो-गये काल में कभी श्रेणी चडा नहीं, वर्तमान श्रेणी चढ बन्धन कररहे हैं. आगमिक तेरवे गुणस्थान को प्राप्त हो बंध करेंगे. ६३ वधि, बंधे, नबंधति सो-गये कालमे श्रेणी चढे नहीं, वर्तमानमें चडताहै. परन्तु आगाम काल मे श्रेणी चडेगा नहीं, यह भांगा शुन्य है, कही भी नहीं मिलता है. ७ नधि, नवंधति, बंधेति सो-गये काल में श्रेणी चडा नहीं, वर्तमान में चढे नही, परंतु आग. मि काल में चडकर इर्यावही का बंध करेगा. और ८ नवंधि, नवंधे, नवंधेति गये का ल में बंधे नही, वर्तमान में भी बंधे नही, और आवते काल में बंधेगे नही यह भांगा अभव्य आश्रिय जानना. भावदार का खलासा. उवसम खय मिसोदय, परिणामा दु नव ठार इगवीसा।। तिअ भेए सन्निवाइय, सम्मं चरणं पढम भावे ॥१॥ वीए केवल जुअलं, सम्मं दाणाइ लद्धिपण चरणं ॥ तहए से सुव ओगा, पण लद्धि सम्म विरइ दूग्गं ॥२॥ अन्नाण मसिद्धता, संयम लेसा कसाय गइ वेआ ॥ मिच्छे तूरिए भब्बा, 5 भव्वत्त जिअल परिणामि ॥३॥ १ औदयिक भाव के २१ भेदः-(२) अज्ञान-मिथ्यात्व मोहनीय के उदय कर जो मिथ्यात्वी का ज्ञान है मो अज्ञान. = (२) असिद्धत्व-अष्ट कर्मोदय कर जीव । - - जमे-अनाचार, अगील आदि शब्दो चार से आचार की और मील की नाम्नि न २८९ * मुक्ति पान श्री-गुणस्थान रोहण अढीगतद्वारी १९ ५ परिणा मिक भाव के : भेदः-(१) मुक्ति जाने जोग जीव का स्वभाव सो भव्य पना. ( २ ) मुक्ति कदापि नहोवे ऐसा जीव का स्वभाव सो अभव्य पना. और (3) द्रव्य तथा भाव माणो का स्वभाव ही धारण करने वाला मो जीव प- 1. यह तीनों सभाव अनादि अनन्त उत्पन्न और नाश रहित सो परिणामिक भा. : जानना. यों-पांचो भावो के-सब मिल ५३ भेद होते हैं. ज्ञानावरणीय. दर्शनावरणीय और अन्तराय. इन तीनो कमों मे एक ओपशामि भाव विन चारों भाव पाते हैं. वेदनीय. आयुष्य नान और गोव इन कमों मे-१ नोदयिक. क्षायिक और परिणामिक यह तीन भाव पाते. और मोहनीय कर्ममे फ त एक ओपनिक भाव पाता है. पांचों भावों के विशेष भेद सूव ते. १ ओदयिक भाव-जैने धतुरा का भक्षण करने मे पेत रङ्ग की वस्तु पीले र इ मय देखाती है. तेनेही जीवनो शुद्ध नि ममान है. परन्तु अष्ट कर्म रुप धतुरे के गे के जय कर जीव कर्न स्वभाव मे परिण मे मो ओनयिक भव. और जैने सुवर्ण रामक धातुतो एकही है. परन्तु नुर्पण कार मञ्चके मंयोग मे मुकट कंडल हारादि अ क रुप मे परिणनाव तैने ओडपिक भाव के स्वभाव मे आत्मा अनेक रुप में परिण जैने-अहंस्त्री. अंपुरुप. अंकग. अंदं शुल. अंस्थलं. अंकृत्य इत्यादि. इन उ इय भावके दो भेदः- जिसने आठो कोका उदय होनो उदय और उदय निप्यन्न इनके दो भेड:-१ जीव उदय निप्यन्न और २ अजीय उदय निप्यन्न. इनमें जीव उद में =मास्तिकापामानि कपालमास्तिगाय काल न्यऔर पुनि का प.पट् पात्रो द्रव्य अनादि परिणामी भर में परिकम है. अपने लाय में ही रन रहे है. बदाम पर न्या में मन नहीं करने में अनादि परिमी भाव में गिने जाते है. हन दर बनाई मन्द माजिद ने पोना है. नदी जनत प्रती जन्य जगन्न अवापिस में लिने बने हैं. दकि-- हर जल के दो हर दिन की करने सारित ने के लिये दिन हले है. इस अनन्न देगी स्कन्ध जर्मनी में आप भ.. - - २८४ और २१ चारित्र मोहनीय की सर्व प्रकृतियो के क्षय होनेसे सर्व जीवाको प्रकटे. यह ९ भेद क्षायिक के. यह क्षायिक भाव सो क्षयकी हुइ प्रकृतियो को पछि, प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल दाग गेहण खण्ड घर णीय, इन चारों का उदय वारवे गुणस्थान पर्यन्त देशवातिक होता है. उमर वली प्रविष्ट रस के क्षयसे अप्रविष्ट रम के अनुदय रूप उपशम में, और किन स्पर्दकके उदय से उदयानविध क्षयोपशामिक होते हैं. और अबावि ज्ञाना वरणीवन पर्याव ज्ञानावरणीय, और अवधि दर्शनावरणीय इन के पर्व धानिक रम के पट्टी के उदय से फक्त उदय भाव होता है. और निमवक्त विशुद्धायव माय में देश र तिक पने परिणाम के मंदरस कर उदयावली प्रविष्ट अंग के भय मे तथा प्रविष्ट उपशम से और वर्तमान के उदय मे जो आषि, मनः पर्यव. चक्षु दर्शनादि गुण भर सो क्षयोपशामिक उदयानु विधि होतीहै. और मोहनीयकी प्रकृत्ति जो१२ कपाय. भा १३ वा विथ्यात्व मोह सर्व घातिक है, उसका रनोदय होते हुवे क्षयोपशम नहीं है, सो प्रदेशो दय में होता है. रम उन प्रदेशों को वेदते देशवातिक रत में लाकर वेदते हैं जिस से सर्व घातिक नहीं होते हैं. बाकी रती मोहनीय की प्रकृत्तियों रमा दय. प्रदेशोदय होते भी क्षयोपशमिक अविरोध पने होता है. जिस से सब जीवों का पांचो लब्धि क्षयोपशमिक भाव से होती है. और तीनो अज्ञान भी मती श्रुति-अवनि ज्ञानावरणीय के क्षयोपशम विशेप कर होते हैं. अनन्तान वन्धि चौक मिथ्यात्व मोह नाय के क्षयोपशम से होता है. और सम्यक्त्व मोहनीय के उदय मे बदते है. तब दे दक सम्यक्त्व पाती है. देशविरति पना अप्रत्याक्यनावरणीय के क्षयोपशम से होता है. और सामायिकादिक तीनो चरित्र प्रत्याख्यानियादिक के क्षयोपशम से होता है, इसलिये इन १८ ही भेदो को क्षयोपशम भाव में लिये हैं. ४ क्षायिक भाव के ९ भेदः केवल ज्ञानावरणीय और केवल दर्शनावरणीय इन दोनो सर्व घातिक कमोंका सर्वथा नाश होनेसे आत्मा के सर्व गुण रूप केवल ज्ञान और केवल दर्शन प्रकट हुवा, अन्नतानू बन्धि चौक और तीनो दर्शन मोहनीय का का क्षय होने से आत्मा में अक्षय तत्वरूची रूप गुण प्रगट हुवा सो-क्षायिक म म्यक्त्व, अभय देने रूप जो गुण प्रगट हुवा सो यथाख्यात चारित्र, और अन्तराय की दा नादि पांचों प्रकृति के क्षय होनेसे-१ अनन्त दान लब्धि, २ अनन्त लाभ लब्धि, ३, अनन्त भोग लब्धि, ४ अनन्त उपभोग लब्धि, और ५ अनन्त वलवार्य लब्धि, गुण उदयादिक भावको कदापि प्राप्ति नहीं होने देता है.

२८२ ... मुक्ति मापान श्री-गुणस्थान रोहण अहीगनकारी र ५ परिणा लिक भाव के : भेनः--(१) मुक्ति जाने जोग जीव का स्वभाव भव्य पना. ( २ ) भक्ति कदापि नहोवे ऐसा जीव का स्वभाव मो अभव्य पना. गर ( ) द्रव्य नया भाव प्राणों का समाव ही धारण करने वाला मो जीव प- . यः तीनों समाव अनादि अनन्न उत्पन्न और नाग हिन मो परिणामिक भा- न जानना. यो-पांचो भावो के-मय मित्र भेट होते हैं - ज्ञानावरणीय. दर्गनावरणीय और अन्तगय. इन तीनो कमों में एक ओरगामि । - भाव विना गानें भाव पाने है. वेदनीय. आसुप्य नान और गोब इन कमों से- मोदयिक. सायिक और परिणामिक यानीन भात्र पाने.. और मोनीय कफ न एक ओपनिक मार पाना है. पांचों भावों के विशेष भेद सब ने. १ ओदयिक भाव-जन धतुग का भक्षण नन्ने ननद की वन्नु पनि इमय पानी.. नती जीवनो युद्ध नि समान: पान अमान नंग के जय सर जीव कार में परिजनी अंतिम नामक धानना माती पन्त :णि कार सवयोग: पनि नमसर पनिगाव तैसे ओमविका भाव के मानना मेजन-भत्री, अंपरप. अ.ग. ल. अं...:. दन दय भारत को भदः- जिसो आयो कमोका केना भेट:-१ जोर र नियन और अजी सर निप्पल - .

प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड र य निष्पन्न के-३६ भेदः-४ गति, ६ काय, ६ लेश्या, ४ कपाय, ३ वेद ( एवं २३ और)२४असन्त्रीपणा, २५ अज्ञानी पणा, २०मिथ्यात्व पणा, २७ अविरति पणा,२८ आहारिक पणा, २१ संसारिक पणा, ३० छमस्त पणा, ३१ सयोगी पणा, २२ अ. केवली पणा, और ३३ असिद्ध पणा.। और दूसरे अजीव उदय निप्पन्न के ३० भेद -५ वर्ण, २ गन्ध, ५ रस, स्पर्श, ५शरीर, और पांचों के परिण में प्रयोग से पुद्गला २ ओपशमिक भाव-जैसे राख कर टकी हुई अग्नि किसीभी वस्तु को दग्ध न. ही कर सक्ति है. परन्तु अभ्यन्तर में दग्य करने की सत्ता वनीहै वो वायु आदि संयो ग से प्रकट होती है. तैसेही-जीवके परिणाम अन्तमुहूर्त काल शुद्ध परिण में-ज्ञान दर्शनादि शुद्ध उपयोग में प्रते जिससे मोहनीय कर्म की शक्ति का अच्छादन (ढक्क- न) है।वे सो उपशम भाव, इसके दो भेदः-१ अनन्तान वन्धी चौक और तीनों मोह नाय इन सातों प्रकृत्तिका रस और प्रदेश नही होता है. उसे उपशम कहते हैं. और उससे तत्वकी रूाचे प्रगटे सो उपशम सम्यक्त्व. वाकी रही २१ प्रकृति के उपशम से जो चारित्र मे स्थिर भाव होवे सो ओपशमिक चरित्र. + ३ क्षायिक भाव-जैसे पाणी करके साफ वुझाइ हुइ अग्नि पीछी प्रचालित न- ही होती है. तैसेही जघन्य मोह कर्म की ७ ( अनन्तान वन्धी चौक और दर्शने वि- क) प्रकृत्ति, उत्कृष्ट२८ ही प्रकृत्तिका ऐसा क्षय करे कि पीछी वो कदापि परगट नहीं होव सो क्षायिक भाव. इसके २ भेदः-१ मथम मिथ्यात्व मोह, फिर अनन्तानु वन्धि चौ फिर प्रयाख्यानी चौक, यों अनुक्रम से क्षय करे सो क्षायिक, और २ क्षायिक, नि- ष्यन्न इसके ९ भेदः-१ ज्ञानावरणीय कर्म के क्षयसे अनन्त केवल ज्ञान प्रगट हुवा, २ द र्शनावरणी के क्षयसे अन्नत केवल दर्शन प्रगट हुवा.३ अनन्तान वन्धि चौक ओर तीनों मोहनीय के क्षयसे अनन्त क्षायिक सम्यक्त्व प्रगट हुवा. ४ मोहनीय की वाकी रही २१ प्रकृत्ति के क्षयसे क्षायिक यथाख्यात चारित प्रगट हुवा. ( और अन्तराय कर्म की पांचों प्रकृत्तियो के क्षयसे प्रगट हुइ पांचों लब्धियों अर्थात् ) ५ दानान्तराय | क्षयसे अनन्त दानलब्धि प्रगटी, ६ लाभान्तराय के क्षयके अनन्त लाभ लब्धि प्रगटी का . के + पाठान्तर-उपशम भाव के ११ भेद-४ कपाय, ५ राग, द्वेष, ६ दशनमोह, । ७ चारित्रमोह, ८ दर्शनलब्धि, ९ चारित्र लाब्ध, १० छमस्त और ११. वीतरागी. .

२८७ * मुक्ति सोपान श्री गुणस्थान रोहण अढशितद्वारी ७ भोगान्तराय के क्षयसे अनन्त भोग लब्धि प्रगटी, ८ उप भोगान्तराय के क्षयसे अनन्त उपभोगा लब्धि प्रगटी, और ९ वीर्यान्तराय के क्षयसे अनन्त बलवीर्य लन्धि प्रगटी. + ४ क्षयोपशामक भाव-जैसे बद्दलोंकी गहरी घटासे अच्छादित हुवा सूर्य का तेज, वायु के प्रयोग्य से ज्यों ज्यों वद्दल पतले पडते जाते हैं. त्यों त्यों तेज-प्रका श अधिक बढता जाता है ? तैसेही कर्म रुप बद्दलों से अच्छादित हुइ आत्मा ज्ञानादि गुणो रुप तेज के मन्दता में स्थित, शुभ परिणाम रुप वायु के प्रयोग्य से-उदयावसी रस के क्षयसे, अप्रविष्ट रसके अनुदय रुप उपशम से और कितनेक स्पर्द्धक के उद- य से उदयानुविधि क्षयोपशम होता है. सो फक्त चारों घातिये कमों काही होता है. अघातिये का नही. इसलिये जो घातिये कर्म उदयमें आयेथे उनको तो क्षयकिये.बा. की के कर्म सत्ता में रहै वोभी पतले पड़गये, ऐसी मिश्रता होनेसे इसे मिश्र भाव तथा क्षयोपशम भाव कहते हैं, इसके दो भेद'-१ ऊपरोक्त विधिसे चारों घन घातिक क मों क्षयोपशम करे सो-क्षयोपशम और क्षयोपशम निष्यन्न कर्मो का क्षयोपशम होने से ३२ गुण प्रगटे-प्रथम ज्ञानावरणीय कर्म के क्षयोपशम होने से८ गुणों की प्राप्तिहो वैः-१ मतिज्ञान, २ श्रुतिज्ञान, ३ अवधि ज्ञान, ४ मन पर्यव ज्ञान, ५ मतिअज्ञान, ६ हुतिअज्ञान, ७ विभङ्ग ज्ञान, और ८ आचाराङ्गादि सूत्रका जान पना. । दूसरा दर्श नावरणीय कर्म का क्षयोपशम ोने से ८ गुण प्रगटेः-९ चक्षुर्दर्शन, १० अचक्षुदर्शन ११ अवधि दर्शन, १२ श्रोतन्द्रिय का जानपना. १३ चक्षुइन्द्रियका जान पना. १४ घणेन्द्रिय का जान पना. १५ रसेन्द्रिय का जान पना. और १६ स्पर्शेन्द्रिय का जा न पना. । तीसरे मोहनीय कर्म के क्षयोपशम से ८ गुण प्रगट हुवेः-१७ सम्यग दृष्टि पना. १८ मिथ्यात्व दृष्टि पना. १९ सममिथ्यात्व दृष्टि पना. २० सामायिक चारित्री पना. २१ छेदो स्थापनीय चारित पना. २२ परिहार विशुद्ध चारित पना. २३ मू- x पठान्तर. क्षायिक निष्पन्न के ३७ भेदः-५ ज्ञानावरणीय की, ९ दर्शनावरणी- यकी, २ वेदनीय की, ८ (क्रोध, मान, माया, लोभ, राग, द्वेष, दर्शनमोह और चारित्र मोह यह ८) मोहनॉय की, ४ आयूष्य की, २ नामकी, २ गोत्रकी, और ५ अन्तरायकी, गों आठों कमोंकी सब ३७ प्रकृत्तियों का क्षय-सर्वथा नाग करे सो क्षायिक निष्पन्न माव, २८८ प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड क्ष्म सम्यराय चारित्र पना. और २४ यथाख्यात चारिन पना. । चौये अत्तराय कर्म के क्षयोपशम से ८ गुण प्रगट हुवे, २८ अयोपगम दानलब्धि, २६ अयोपगस लाभ लब्धि, २७ क्षयोपशम भोगलब्धि, २८ धयोपगम उपभोग लब्धि, २२ अगोदाम व . लविर्य लब्धि, ३० वाल वीर्य, ३१ पण्डित वीर्यः और ३२ बाल पण्डित वीर्य + || ; + यह क्षयोपशम भाव सम्यगदृष्टि और मिव्यात्त्र दृष्टि दोनेके ही होता है. क्योंकि- चारो धातिये कर्मोकी-देगसे निर्जरा होवे उसे क्षयोपगम भाव कहते है:-यह निन्नग दो- नो प्रकार के जीवो कर शक्ते हैं. जिस में सम्यग दृष्टिके ज्ञानावरणी आदि कमों का न्यो पशम होनेस मति ज्ञानादि चारों ज्ञान की प्राप्ति होती है. और मियात्र दृष्टि के डानावर- णीय कोका क्षयोपशम होनेसे मति अज्ञानादि तीनो अज्ञानकी प्राप्ति होती है. क्योकि-मिध्या स्त्रीने ज्ञानावरणीय कर्म का तो क्षयोपाम किया. परन्तु भिव्यात्व मोहनीय का उदय प्रवर्त- ता है. और सम्यक दृष्टिने दानो का क्षयोपशम किया है. ऐनही क्षयोपगम दानादि लब्धि मे भी जानना. सम्यग दृष्टि पात्रापात्र का विचार कर दान कर्ता है. और मिथ्यात्री समझे नहीं. और भी कितनेक ग्रन्थों मे-क्षयोपशम काब्धि के-५ भेद किये है:-१ क्षयोपशम लाब्धि सो जैसे निगोद मे जीवो जन्म मरण कर रहे है. वहा मोहनीय कर्म की वर्गण अका म निर्जरा से कूछ पतली हुइ, तब वहा से निकल पृब्यादि पाचो स्थावरों में आया, फिर वहा भी कर्म पतले पडे तव त्रस पनापाया, योही कर्म वर्गणा पतली पडते २ तेन्द्रिय, चो रिन्द्रिय, असज्ञी पचेद्रिय, सज्ञीपचेन्द्रिय, नर्क, देव जावत मनुष्य पर्याय को प्राप्त हुवा. यो ज्यो ज्यो उज्वल होता गया त्यो त्यो ऊचा आता गया, सो भयोपशम लब्धि. २ विशुद्धता लब्धिसो-क्षयोपशम लाच मे जो विशुद्धता करिथी उस से अधिक विशुद्धता होनेसे-सम्यका । की प्राप्ती तो नहीं कर सका परन्तु मतिकी विशुद्धताकर जिनेश्वरका और जिनेश्वर के मार्ग मे प्रव्रतक चारो तीर्थो का भक्तिवन्त बना. दानादि धर्मा राधन करने लगा. त्याग वैराग्या दि भाव भी प्रवर्ते-यथा शाक्त किये भी-स्वत जिन वचनो का पठन मनन करे, दुसरे से करावे. नर्क निगोदादि के दुख से कम्पाय मान होवे, परन्तु आत्म पुद्गलो का भेद विता- न न होवै. । जिससे पुद्गलोंपर से ममत्व घटे नहीं. वाचलेकी माफक तप संयमका आचरण कर नवग्रीवेग तक उत्पन्न होवै, परन्तु एक भी भा ठटावै नहीं. अभव्यवत्. सो विशुद्धता लब्धि. । ३ उपदेशना लाब्ध सो-विशुद्धता लाब्ध से अधिक विशुद्ध होने मे-तीयकर के- -- २८९ * मुक्ति सोपान श्री गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी ५ परिणामिक भाव-जो जीव अजीव के परिणाम परिणने सो परिणामिक भा व, इसके दो भेदः-१ मादि परिमाण मो पलटे उसे कहते हैं. जिसके अनेक भेदः- : 114 वली गणवर साधु सावी श्रावक श्राविका सम्यक दृष्टि से मुख से निवन्य प्रवचनों का ध- वण कर तवज बने, तन्यत्र को प्राप्त करे, महोदयकी प्रबलता से पीछा पड़े, वो स्कृष्ट परावर्तन बाद अम्प सम्यक्त को प्राप्त करें, सो उपदेगे लावे. ४ प्रयोग्य ल. बिसे-उपग लब्धिसे ना आयेक विशुद्ध ता होनेसे-संसार घठावे-१७प्रभार सयम पाले १२ प्रकरता करे. २२ परितह सम भावसहै. तया-श्रावक के-१२ व्रत, ११ प्रतिमा आइरे पाले. जिस से अनन्त न वर्गणाकी निर्जरा होवे, परन्तु महोग्य कर-निन्दब, एका न वादि जमार्गक्त होते. कुछ संसार भ्रमण वागी रहेसो प्रयोन्यसा लाब्वे और ५. करण लब्धि सा प्रोग्य लब्धि से भी परिणानों को अधिक विशुद्धता होने से जविकी भवस्थिति काल स्थिति परिपक हो तब मिथ्याव अन्यी का भेद कर, उसवक्त तीन करण होतेहै तो कहते है (१) अब करण तो-सआयुष्य विना सातों कनोंकी स्थिति एक कोडाकोड सागर कुछ जन होवे तब अब करण होता है. उस वक्त सन्यत्र और मिथ्यात्वीकी तुल्यना हो अन्तर मुहूर्त पर्यन्त रहे. तव मिथ्याव महेका क्षय करने प्रवर्तता सम्यक्त्व दर्गने योग्य बने, जैते कृरी क्षेत्र को स्मारकर बीज डाल्ने लायक बनावे. त्यों आत्म बोध वीज ग्रहग जरने योग्य बने से अब करण. यह करण भन्य अभन्न दोनों के होता. बहूत से जीवों यहा तक आकर पीछे पडनाते है. और कितनेक जीवों आगे चडने है. तब-(२) अपुर्व करण जो प्राप्त होते है. जैती परिणानेजी उमलता पूर्व करण में होती है वैली पहिले क. दादि नही हुइ इमलिये इने अपूर्व करण नहने है. यहा अन्तर मुहुर्त माल रहे वाद-(8) अनिति करण होना है -जैर से पीछा निवृतना नहीं होता है. अर्थात् य- आये बाद सन्यन्त्र जल्दही मन है. भेद बिन की प्रानि होती है. अन्ना और पुहले का निन २ करूजा अनुभव होता है. निम्मे पुल प्रगति मे इन्द्रियों के विषय की लेलुना कट जाता है-मुख्वृत्ति बन जति है. अनुभव होता है. नव भव भमन घटाने का न करता है. यहां सन्यन्त्र रन की प्राति होती है. यह देने का निद ने होते है सेही चतुर्थ गुरसान न का है. मन्यत्री कहा जाता है. ॥ यह पत्र ल. वियोमी भयोग मात्र में मानी है. - २९० प्रथम अर्थ काण्डका प्रथम मूल द्वारा राहण कन्ड र जैसे जीवके परिणाम-गति जाति कपाय, लेश्या, इत्यादि पलटे सो, और अजीव केप रिणाम वस्तु के विषय उत्पात व्यय क्षय होव सो. और अनादि परिणाम-सो कदापि पलटे नहीं जिसके ३ भेदः-१ जीव परिणामी, २ भव्य परिणामी, ३ अभव्य परिणा भी. यह तीनों शाश्वते भाव हैं. ६ सन्नीवाइ भाव सो-जैसे दही के और सक्कर के मिलने से दोनों का एक र स हो श्रीकरण नाम का पदार्थ वनता है. ऐसेही-एक दो तीन चार या पांचो भावों एकस्थान संयोग होवे उसे-सन्नीवाइ भाव कहते हैं. जिसमें दो भावों का मिलाप हो. वे सो द्विसंजोगी भङ्ग कहा जाता है, जिसके-५० भाने होते हैं:-१. उदय उपशम २ उदय क्षायिक, ३ उदय क्षयोपशम, ४ उदय परिणामी, ५ उपशम क्षायिक, ६ उपश म क्षयोपशम, ७ उपशम परिणामी, ८ क्षायिक क्षयोपशम, ९ भायिक परिणामी, और ११ क्षयोपशम परिणामी. । ऐसेही तीन भाव मिलने से तीन संयोगी भी १० भाड़े होते हैं:-१ उदय उपशम क्षायिक, २ उदय उपशम क्षयोपशम. ३ उदय उपशम परि णामी. ४ उदय, क्षायिक, क्षयोपशम. ५ उदय क्षायिक परिणामी. ६ उदय क्षयोपश म परिणामी. ७ उपशम क्षायिक क्षयोपशम, ८ उपशम क्षायिक परिणामी. ९ उपशम क्षयोपशम, परिणामी. और १० क्षायिक क्षयोपशम परिणामी. । चार भाव मिलने से चउ संयोगी ५ भाने होते हैं:-१ उदय उपशम क्षयोपशम परिणामी. २ उदय उपश- म क्षायिक परिणामी. ३ उदय उपशम क्षयोपशम परिणामी. ४ उदय क्षायिक क्षयोप शम परिणामी. ५ उपशम क्षायिक, क्षयोपशम और परिणामी. । और पांच संयोगी- एकही भागा होता है:-१ उदय उपशम क्षायिक क्षयोपशम और परिणामिक. । यो पांचों भावों के सब मिल २६ भाने होते हैं. इन २६ भागो में से २० भाने तो शु. न्य है. कंही मिलते नहीं. और ६ भाड़े मिलते हैं. सो कहते हैं:-१ द्विक संयोगी न- ववा भाद्रा क्षायिक और परिणामिक भाव वाल सिद्ध भगवन्त में पाता है. २ वीसं- योगी पांचवा भाङ्गा उदय क्षायिक और परिणामिक भाव वाला केवली भगवन्त में मिलता है. ३ और वियोगी छटा भाङ्गा उदय क्षयोपशम परिणामिक वाला-दुसरा गुणस्थान छोड पहिले गुणस्थान से दशवे गुणस्थान तक-क्षयोपशप सम्यक्त्वी में मि लता है.४ चौसंयोगी का तीसरा भागा-उदय उपशम क्षयोपशम परिणामिक भार वा ला उपशम सम्यग् दृष्टि में मिलता है, ५ चौसजागी चौथा भागा-उदय क्षायिक क्ष योपशम परणार्मिक भाव वाला-क्षायिक सम्यक्त्वी में मिलता है. और ६ पांच संयो. - * मुक्ति से पान श्री-गुणस्थान रोहण अदीशतद्वारी * २९१ १. भाङ्गा इग्यारवे गुणस्थान में मिलता है. 1 श्रेणिद्वार का बहुतही विस्तार से खुलासा प्रयम खण्डके वे लक्षण दरा में किया है सो सब यहां जानना वेदे द्वार सो उदय में आये हुवे कर्म पुगलों का शुभा शुभ परिणाम को आ. त्म प्रदेशों कर चैतन्यता-उपयोग युक्त अनुभवे सो वेदना जानना. इसका विशेष सु लासा अन्य स्थान मेरे देखने में न आया इसलिये यहां संशेप मेंही लिखाहै. परन्तु र चना विशेषत्व उदय द्वार के जैसी देखाती है. ऐमेही निर्जरा का भी खुलासा विशेष नकर सका परन्तु रमकी रचाना विषे- व ऊदीरणा द्वार जैसी जानना. दश करण द्वार का खुसासा वन्धुकट करणं । सं संकम मोकद दीरणा सत्तं ॥ उदयुव समा मणिधत्ती । णिकावणा होदिपडि पयडी।। गोम्मट मार कर्म कान्ड गो. १४७ १ कर्मों का सम्बन्ध होना अर्थात्-मिध्यात्वा परिणामों मे जो पृट्टल दन्य का ज्ञानवरणीयादि रुप होकर परिणमन करने मे झानादि को आवरण कग्ना मो बन्द करण है. २ कमों का स्थिति तथा अनुभाग का बहाना मो - उत्कटन करणे है. : बन्ध रुप प्रकृत्ति का दुमरी प्रकृति रुप परिणमना मो मंत्रमण करण है. ४ स्थिति । तथा अनुभाग का कम होना मो . अपकर्पण करण " है.. जिनके उज्य का अ. भि ममय नहुवा. ऐने जो कर्म ट्रम्प उनको अपकर्ष के परमे या वली दल मा. । प्स करना मो-"जहीरणा करण" है. ६ जो पहल दम्पन्हे नो मना करण है. जो कर्म अपनी स्थिी को माप्त होते. अर्थात-फलदेने के समय को नाम होवं. मो उदय करण "है. ८जो वर्म ज्दपावली में नाम नहीं दिया जाय. अर्थात-उदी. रजा अवस्थाको माल नहीं होगके. मो "समान्त काप..है. कोटयाव- दी में भी माम नरोनके. और मंद्रमा अवता भी नाम नो मरे ने " निगन करण .... और निर्मदीदीला हान. उत्तर .. पर चारोही अन्याओं नो मरेमो-निशदिन काम. अनबन . 1 २९२ प्रथम अर्थ काण्डका प्रथम मूल द्वारा राहण कन्ड ११ इन दशोही करणों मे से-आयुप कर्म मे तो संक्रमण करण विना नब करण पाते है. और वाकी के सातोही कणो मे दशोही करण पाते है. । इसका विशेप खुलामा यह है कि-उपशान्त कपाय गुणस्थान मे-मिथ्यात्क और मिश्र मोहनीय का संक्रमण क- रण होता है, अर्थात्-इन दोनो के कर्म प्रमाणुओं सम्यक्त्व मोहनीय रूप परगम जा.' ते हैं. और वाकी की प्रकृत्तियों का संक्रमण नहीं होता है. वही करण होते हैं. ! व न्ध करण और उत्कर्पण करण यह दोनों प्रकृत्तियो अपनीर वन्ध व्युच्छितिके स्था न होती हैं और प्रकृत्तियों अपनी २ जाति की जहां बन्ध से बुच्छिति है. वहां संक्र. मण करण होता । अयोगी के ८५ सत्ता की प्रकृत्तियो का, सयोगा के अन्त समय तक अपकर्षण करण होता है. तथा क्षीण कपाय गुणस्थान में सता से व्युच्छेद १६ प्रकृत्ति. और सूक्ष्म स्म्पराय गुणस्थान में सत्ता से व्युच्छेद रुप हुवा जो सूक्ष्म , लोभ,यो२७प्रकृतियो काक्षय देश पर्यन्त अपकर्पण करण जानना. बोधयदेगकाल यहा पर एक समय अधिक आवली मावहै. क्योकि-यह १७ प्रत्तियो स्वमुखो दयाहै.४। देवायु का अपकर्षण करण उपशन्त कपाय पर्यन्त है. मिथ्यात्वादि तीनो अनिटत्ति, करण में क्षय हुइ १६ प्रकृत्तियो इनके भय देश । ( अन्त कान्डा के अन्त का- ली पर्यन्त अपकर्पय करेहै. और लपक अवस्था मे-अनिद्यात्त करण मे क्षय हुइ जो ८ कपाय से लेकर २० प्रक्रत्तिया है, उनका भी अपने २ क्षय देश पर्यन्त अप क- पर्ण करण है. । उपशम श्रेणि में उपशान्त गुणस्थान पर्यन्त मिथ्यात्वादि तीनो दर्श- न मोहनीय और नर्क द्विकादि १६ इन मक्रत्तियो अपकर्षण करण है. तथा ८ कपा यादि को का अपने २ उपशम करने के स्थान तक अपकर्पण करण है. । अनन्तानु वन्धि चौक का असंयतादि चारो गुणस्थानो में यथा संभव जहां वितंयोजना (अन्य रुप परिणमन ) होवै, वहां तकही अपकर्पण करण है। तथा नर्कायु के असंयति गु- ४ प्रकृीतयो दो प्रकार की होती हैं.-१ स्वमुखोदयी सो-अपनेही रूप उदय फल देकर नाश होजाय. इमका काल एक समयाविक आंवली प्रमाण है, वही क्षय देग-अय होनेका स्थान है. और २ परमुखोदयी सो- जो प्रकृति अन्य प्रकृति रूप उदय फल देकर नष्ट होनाय इसके अन्न काण्ड की अन्तफली सो क्षय देश है. जिम स्थान में क्षय हवा हो सो क्षय देग होता है.

२१३ मे मुक्ति सोपान श्री गुणस्थान रोहण अहशितद्वारी + णस्थान तक और तिर्यंचायु के देश संयति गुणस्थान तक-ऊदीरणा, सता, उदयय : है तीनो करण प्रसिद्ध हैं. क्योकि-पहिले कहे हैं. । उपशम सम्यक्त्व के सन्मुख हुवे जीवके-मिथ्यात्व गुणस्थान के अन्त एक समयाधिक आंवली काल पर्यन्त मिथ्या जल प्रक्रत्ति का उदीरणा करण होता है. उतनेही काल तक उसका उदय है. और मू क्ष्म लोभका मूक्ष्म सम्पराय मे ही ऊदीरणा करण है, इसके आगे उदय नही. ॥ जो कर्म उदया वलीमे प्राप्त नही किया जावे अर्थात्-जिसकी निर्जरा नहोसके जो ऊदी F|| रणा रुप भी नहोसके और सक्रमण रुप भी नहो सके उत्कर्पण और चपकर्प मी न- : हो सके, चारो किरिया नहो सक्ति हो एसे क्रमसे उपशान्त करण विधत्ति करण औ निका चित करण यह तीनो करण अपूर्व करण गुणस्थान तक ही होते हैं. इसके ऊपरयथा सभव उदयावली आदि प्राप्त होनकी सामर्थ वलेही कर्म प्रमाणू पायेजातेहै. .. र गुण श्रेणीका झूलासा । जैमे कोइ दुर्वल रोगिष्ट अतिबृद्ध अवस्था कर जीर्ण शरीर को प्राप्त हवा पुरु प बोठे कुहाडे से खेरके वधूल के काष्टा को महा परिश्रम कर थोडा भाग छेद मक्ता है. जौर कोड जन्म से अरोग्य प्रवल तरुण पुरुष तीक्षण फरमी फरमी कर मूके हुवे आकडे के थता एरन्ड के काष्ट को थोडेही परिश्रम मे और थोडेही काल में बहुत क ट डालता है. चकना नूर कर डालता है. तैमेही जो मिथ्यात्वी जीवों है. वो कर्म में प रोग की प्रवलता का वीर्यहीन-जीर्णहुवे अपने अत्यन्त चीकने कर्म म्प काष्ट को वाल तपश्चरणादि वोटेशस्त्र कर बहुत काल तक महा कष्ट महन करही अल्प-योडेक मों की निर्जरा कर सक्ते है. और जो मम्दग दृष्टि जीवों हैं. ज्ञानादि आन्मांक नि- ज गुणों कर वलिष्ट हुवे. शुभ परिणामों की प्रद्धि रमघान स्थिनियान कर. नि:मान हुचे कर्मों को अपूर्व करणादि तीक्षण शखकर थोडे काल में और थोडेट्टी नयामक वहुत कर्मों का चकना चूर कर डालने है. वो कैमी तरह मे कौन : जीरो हीनानि कों को निर्जर कैमी तरह से करते है. जिमका स्वरप अनुक्रम में अनि में दर्शाया है मो यहां कहते हैं: १. प्रथम मम्पक्व के निमित प्रन्धि भेट कन्ने नया दृमग मकान करने -स्थिति घात रमयात गुणोणे और अपूर्व वन्यन इन बातें कामो कान-प्रति । H1 प्रथम अर्थ काण्डका प्रथम मूल द्वारा राहण कन्ड १९ समय असंख्यात गुणि निर्जरा की वृद्धि होती है. तैसेही अपूर्व नित्ति करण में भी जानना. और सम्यक्त्व प्राप्त हुवे वाद भी सम्यक्त्व प्रसय कर अन्तर मुहूर्त प्रमाणे बाकी रहै कर्मों के दलको खपाने गौपूच्छ के संस्थान जैसी दलोंकी रचना करे सो प्रथम सम्यक्त्व गुण श्रेणि जाणना. यह आगे कहेगे उन दूसरी श्रेणियो की अपेक्षा कर सम्यक्त्व प्रत्यायक मन्द विशृद्धि वेदने के वासते दीर्घ अन्तर मुहूर्तमें वेदने ला- यक और अल्य पदेशों की गुणश्रीण होती है. २ इससे देशविरति निमित अपूर्व करण करता पहिली गुणश्रेणि के संख्यात गुणहीन ऐसे अन्तर महूर्त वेदने लायक और पूर्वकी श्रेणिसे संख्यात गुणाद्ध प्रदे- श दलकी रचना से देश विरति गुण प्रत्याये श्राण सो प्रथम गुणश्रेणि की र्निजरा से असंख्यात गुण निर्जरावन्त दुसरी श्रेणी है. ३ उस देश विराति गुणसे अनन्त गुण विशुद्धि में वृद्धि पाते सर्व विराति की लब्धि निमित अपूर्व करण करता सर्व विरति गुण प्रसायिक देश विरति गुणश्रेणि के अन्तर मुहूर्त से संख्यात गुनहीन ऐसी अन्तर मुहूर्त में वेदने योग्य असंख्यात गुण द्धि प्रदेशात्मक अंमख्यात गुण निर्जरा हेतु ऐसी सर्व विरति रुप तीसरी सर्व विरति गुण आण होता है. ४ इनमे अनन्त गुण बृद्धि अनन्तान वन्धि कपाय की विसयोजना कर्ता सर्व विरति गुण श्रेणि के अन्तर मुहूर्त से संख्यात गुणहीन अन्तर मूहूर्त वेढने लायक अ. मंख्यात गुण वृद्धि दलिक ऐमी चौथे गुण श्रेणि जाणना. ५ इममे भी अत्यन्त विशुद्ध परिणाम से पहिले की गुण श्रेणी के अन्तर मु. हुर्न के मंख्यात गुण हीन अन्तर मुहूर्त में वेदने लायक असंख्यात गुण वृद्धि दलिक नीनों दर्शन मोहनिय खपाने के लिये गुण श्रेणिकरे मो क्षायिक मम्यक्त्व प्रत्ययिक अमंग्यात गुण निर्जरा रूप पांचवी गुण श्रेणि होती है. ६ इससे भी मंग्यान गुणहीन ऐमी अन्तर मुहूत वेदने लायक असंख्यात गु० ण वृद्धि दलिक अमंग्व्यात गुण निर्जरा हेतु चारिच मोहनीय को उपगमाने अपूर्व क रण अनिवृत्ति करण गुणम्यान छट्टी गुणश्राणि करे. ७ इममे अनन्त गुण विशुद्धि उपशान्त मोह प्रत्यायक मंख्यात गुणहीन मृटूः न में वेदने योग्य अंमब्यान गुण वृद्धि दलिक उमशान्त मोह गुण श्रेणी. ८ इममे भी अनन्न गुण विशुद मंग्च्यात गुणहीन मुहूर्तमें बैठने योग्य अमः, * मुक्ति सोपान श्री गुणस्थान रोहण अढीशत द्वारी २९५ ख्यात गुण ब्रद्धि दलिक असंख्यात गुण निर्जरा से वृदि पाते चारिख मोहनीय ख पाते आठवे और दशवे गुणस्थान मे दलिक रचना करे. ९ इससे अत्यन्त विशुद्ध संख्यात गुनहीन अन्तर मुहूर्त में वेदने योग्य असं- ख्यात गुण वृद्धि दलिक क्षीणमोह गुणस्थान प्रत्यायि की करे. १० इससे संख्यात गुणहीन अन्तर महूर्त मे वेदने लायक असंख्यात गुण वृद्धि दलिक सयोगी केवली के असंख्यात गुणी निर्जरा हेतु दलिक रचन करे सो दशवी श्रेणि. और ११ इससे भी इतर अयोगी केवली गुणस्थान कर्म खपाने निमित संयोगी गुण- श्रोण के अन्तर मुहूर्त से संख्यात गुणहीन अन्तर मुहूर्त वेदने योग्य असंख्यात गुण वृद्धि दलिक कर्मदल रचना करे मो ११ वी गुण श्रेणी. यो इग्यारेही गुण श्रेणिकी. रचना कर बहुत काल में वेदने योग्य कमों की थोडेही काल में निर्जरा कर डालते हैं. अर्थात्-गुणा कारसे कर्म दलको बेदकर निर्जरा अर्थ कर्म ढलको व्यवस्थासेस्था- पन करना. उपर की स्थिति से उतार २ कर उदयावली स्थिति के समय २ स्थिति में असंख्यात गुण बृद्धि पाता संक्रमावते जोदल श्रेणीसो गुणश्रेणि कहना.' यो थोडे काल में बहुत कर्मदल निर्जरता है. । इसमें प्रथम गुण श्रेणि का काल अपूर्व करण और आनित्ति करण के काल से किंचित विशेष अन्तर मुहूर्त प्रमाणे जाणना. उस वेद्यमान अन्तर मुहूर्त से उपर की स्थिति के दलिये उतार २ कर वेद्यमान स्थिति के उदय प्रति समय असंख्यात गुण २ बृद्धिपाता अन्तिम ममय तक संक्रमाता है अर्था त्-ऊपर की स्थिति का उतारा दुवा जो दल उसमें पहिले समय थोडा संक्रमावे. समे दूमरे समय असख्यात गुणा मंक्रमावे. उमसे तीसरे समय असंख्यात गुणा संक्र- मावे. यों ममय २ असंख्यात गुण वृद्धि कर्ता अन्तर मुहूर्त के अन्तिम ममय मर्वोत्कृ ट संक्रमाकर-भोगवकर खपावे परन्तु गुणश्रेणि के काल में वृद्धि करे नही. ऐमी त- रह से सब गुण श्रेणी का स्वरुप जाणना. परन्तु एकेक मे श्रेणिका अन्तर मुहूर्त में ख्यात गुण हीन २ पहिले की श्रेणिके अपेक्षा से होता है. और कर्म दल असंख्या- त बहता होता है. इसमें देश विराति और मई विरति पणा प्राप्त कर्ता तो दो करण करे परन्तु तीसरा अनिवृत्ति करण नही करे. तया देश विरति मे सर्व विरति भेष भोग पडा और फिर जो देशहात्ति अङ्गीकार करे. उम वक्त भी दो करण करे. और अनाभोग पडातो उन करणों के किये विनाही पडता है इन दोनो करणों कर देना- *- २९६ प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड ११ व्रत गुण प्राप्त करेतो वो जीव अवश्य वृद्धमान परिणामी होवे वहां वृद्धमान परिणाम में किसी वक्त संख्यात गुण अधिक किसी वक्त असंख्यात गुण अधिक किसी वक्त संख्यात भाग अधिकी, कभी असंख्यात भाग अधिक दलकी रचना करे, और जोहा य मान परिणाम होवे तो इन चारो की हायमान दलिक रचना करे. और तुल्य परि णाम में तुल्य दलों की रचना होती है. परन्तु अपनी २ गुणश्रेणि का अन्तर मुहूर्त एकसाही होता है. और अनन्तानु वन्धिकी वासयोजना देवता मनुष्य और देवता प याप्त अविरति सम्यग दृष्टि देशविरति और सर्व विराति यह सब तीनो करणों कर करते हैं. जिसमें अपूर्व करण अनिटत्ति करण के काल में गुणश्रेणि करे. इसमे प्रय- म की हीनों गुणोण सम्यक्त्वी देशविरती सर्व विरति सहसात्कारे पडता हुवा तनेक काल में मिथ्यात्व गुणस्थान मे आवे. ऐमी तरह गुणश्रेणि की रचना जानना, 3 इति कर्मा रोहण नामक द्वितीय खण्ड कि- 13TH Gri. समाप्तम् 1 1 ,

.
* तृत्तिय खण्ड-संसारा रोहण *
संसारा रोहण के ४१ दारोंका अर्थ.
१-३ गतीद्वार जिसमें जीवो गता गत (जाना आना )करे सो गति चार हैः
-(१) "नर्क"-अन्धकार मयस्थान है. सो "नर्कगति" (२) तियेच तिरछे बहुत
वढे या तिरछे लोक में अधिकांश पावे सो तिर्यंच. () मनुष्य मनकी होंग पुरी क-
रसकै सो मनुप्य गति. और (४) "देव" दिव्य प्रकाश वन्त सो देवगति. इन चारो
गति में मे किसी एकगति में दुसरे स्थान भे आकर जीवो उत्पन्न होवे सो " आगति
उत्पन्न हुवे उसिगति मे स्थिर बने रहे सो " पागति " और मरकर आगे दूसरे स्था
न जावे मो " जागति " यह गति आश्रिय ३ द्वार. ४-६ .. जाति द्वार" जिममे
जीवो का स्वपरु जाना जावे मो जाति-५ है:-(१) जिसके फक्त एक स्पर्शेन्द्रिय
चारों गति का स्वन्प गोमटमार ग्रन्थ के जीव कान्ड में ऐमा बताया है.
गाथा-गरमन्ति जदो णिचं । दम्ब खेतय काल भावय ।।
अणोण हिय जम्हा । तम्हा ते णारया भणिया॥१४६।।
अर्थ-जो जीवों को एमा उन्न क्षेत्र काल और भाव का संयोग बना हैकि जि-
ससे उनका नन रमण नहीं करता है. अमन्योग लगते हैं. और मदा जहां अन्धकार
मय स्थान है सो नर्क गति कही जाती है.
गाथा-तिरियंती कुटिल भावं । सुविउल सणाणि गिहःमणाणा,
अचन्त पाव वहला । तम्हा तिरिच्छया भणिया ॥१४७॥

२९८ प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड र होवेसो-'एकेन्द्रिय जाति' (२) जिस के-रसेन्द्रिय और स्पशेंद्रिय, दोनो होवे सो-वे- न्द्रिय जाति. (३) जिसके घ्राणेन्द्रिय, रसौद्रिय, और स्पर्शेन्द्रिय, तीनो होवेसो तेन्द्रिय जाति. (४) जिसके-चक्षुरेन्द्रिय, धणेन्द्रिय, रसेन्द्रिय और स्पगेंद्रिय, चारों इन्द्रिय होवैसो चौरोन्द्रिय जाति. और !५] जिसके श्रेतद्रिय, चक्षुद्रिय, घणोंद्रय,रसोंद्रय और स्पर्शेन्द्रिय यह पांचोंही इन्द्रिय होवे सो पचेंन्द्रिय जाति. इसके ३ द्वार. ७-१ 'काया द्वार'-जिस आकार में जीवोंका शरीर परिणमे सो काया ६ है:-[१) जिस का क- ठिण शरीर हो सो 'पृथ्वी काय.' (२) जिसका-पतला गरीर हो सो अपकाय. (३) उष्ण शरीर होसो 'तेउकाय.' (४) जिस का सूक्ष्म शरीर होवै सो 'वायु काया.' (५) जिस का विचित्राकार का शरीर होवे सो वनस्पति काया. और (६) जिस को. वास (दुःश्व) हुवा प्रसक्ष जान ने में आवे सो 'वस काया.' जाति मुझव काया के भी ३ द्वार जानने. १०-१२ दन्डक द्वार-बहुत जीवों का समोह होकर जहां रहे सो दन्डक २४ हैं:- = सातो नर्क का ? दन्डक, दश भवन पति देवों के १० दन्डक, पाचों . अर्थ-निर्यच वक्र (वॉके) स्वभाव वाले. हेय उपादेय ज्ञान रहित. मायावी-फ- क्त स्वार्थीये पाप कार्य पर प्रीति वन्त. सो तिर्यंच गति जानना.' गाथा-मणन्ति जदोणिचं । मणेण णिउणा मणुकूडा ॥ जम्हा मणुशवाय सब्वे । तम्हाते मणुसा भणिया ॥१४॥ अर्थ-हेय उपादेय पदार्थोंको मनन पूर्वक जाने ऐसा निपुण कला कैशल्यत वन्त. इच्छा होसो कार्य कर सके सो मायुष्य गाथा-दिव्वति जदोणच्चं । गुणेहि अठे हिय दिव्य भावेहि।। भासन्त दिव्व काया । तम्हाते भणिया देवा ॥५५॥ अर्थ-दिव्य-अच्छी क्रिडा सदा करे, अणीमादि अष्टसिदीयोके धारक होवे. महा ऋद्धि वन्त होवे, जिनके शरीर का दिव्य प्रकाश पडता होवे, रोगाद दोप र हित होवे सो देव गति जानना. = दण्डक द्वारका और सामान्य जीव भेद के द्वारका खुलाशा विशेष जीव के भेद 'द्वार से जानना.

A मुक्ति मोपान-श्री गुणस्थान रोहण अडीशत द्वारी २१९ स्थावार जाति के ५ दन्डक. तीनों विक्लन्द्रिय जीवो के : दन्डक, तियेच पचेन्द्रिय का ? दन्ड मनुष्य का ' दन्डक, वाण व्यन्तर देवका १ दन्डक, जोतिपी देवका? दन्डक, और विमानिक देवका ' दन्डक. १३ मामान्य (संक्षेप में ) जीवके भेट १४ हैं:-१ मूक्ष्म एकेन्द्रिय, २ वादर एकेन्द्रिय. ३ वेन्द्रिय. ४ तेन्द्रिय. ५ चौरिन्द्रिय, ६ असजी पचेन्द्रिय, और ७ सजी पचेन्द्रिय. इन सातों के अपर्याप्ता और पर्याप्ता यों १४ भेद. १४ विशेप (विस्तार मे ) जीवों के ५६भेद होते ते हैं सो कहते हैं नर्क के १४ भेदः-9 नर्क के नाम [१] घम्मा. [२] वंशा. (३) शीला (४) अंजना (५) रिट्टा. [६] मया. और [ ७ ] माधवइ इन सातों के गोत्र-(१) रत्नप्रभा. ( २ ) शर्कर प्रभा. ( ३ ) वालु प्रभा. ( ४ ) पंख प्रभा, (५) धुम प्रभा (6) तम प्रभा. ७) तमतमा प्रभा. इन मातो का पर्याप्ता और अपर्याप्ता. यो १४ न- के के भेद । तियेच के ४८ भेदः-प्रथवीकाय. अपकाय. तेउकाय, वायुकाय. इन ४ को भूक्ष्म वादर पर्याप्ता और अपर्याप्ता इन चारों से चौगुने करने से ४+४=१६ भे. द हुवे. वनस्पति के ६ भेदः-मूक्ष्म. साधारन, और प्रत्यक. इन तीनों का पर्याप्ता और अपर्याप्ता. यों एकेन्द्रिय तिर्यंचक २२ भेद हुवे. । वेन्द्रिय. तेन्द्रिय. चौरिन्द्रिय इ न तीनों विल्लेन्द्रिय के पर्याप्ता अपर्याप्ता यों ः भेद. तिच पचेन्द्रिय. के जलचर. थ लचर. खेचर. उरपर. और भुजपर. यह ५ सन्नी और ५ असज्ञी यों. १० इन १०, के पर्याप्ता. और १० का. अपर्याप्ता यों २० भेद होते हैं. । सब तियैच के ४८ भेद हुवे. ॥ मनुष्य के ३१३ भेद करते है:-१ भरत. १ ऐरावत, १ महा विदेह. यह ती नों कर्मा भूमी मनुप्य के क्षेत्र जंबु द्वीपमें हैं. २ भरत, २ ऐरावत, २ महाविदेह. यह ६ व कर्मा भूमीके धातकी खन्ड द्वीप में है. और ऐसेही ६ क्षेत्र कर्म भूमीके पूप्क राई द्वीपमें हैं. यों १५ भेव कर्मा भूमीके है. । १ हेमवय. १ एरणवय. १ हरीवास. १ रम्यकवास. १. देवकुरु. १ उत्तरकुरु, यह ६ व अकर्म भूमी (युगल) मनुप्य के जंबू दीपमें हैं. और येही दो दो क्षेव यों १२ क्षेत्र धातकी खण्ड द्वीप में है. और ये ही १२ क्षेव पुश्कराध द्वीप में हैं. यों ३० भेव अकर्म भूमी मनुप्य के हैं. और जंबु द्वीपमें भर्त भेव की मर्यादा का करने वाला चूलहेम वन्त पर्वत. ऐरावत क्षेव की म- यादा का करने वाला शिखरी पर्वत, इन दोनों पर्वतो के दोनों खूनो से दो दो दा निकली है. यों दोनों पर्वतों. की ८ दाहो हैं. और एकेक दाहों पर सात द्वीप ( डों- है प्रथम अर्थ काण्डका प्रथम मूल द्वारा राहण कन्ड र गरीयों) हैं, यो ५६ द्वीप भी अकर्म भूमी मनूष्य हैं. सव १५+३+५६+१०१ क्षेत्र मनुष्य के है, इनके पर्याप्ता और अपर्याप्ता यों २०२ भेद, और इनी १०१ मनुष्य के १४ स्थान कों में समुर्छिम जीव उत्पन्न हो सो, अपर्याप्ताही मरण पाते हैं १०१ भेद यों ३०३ भेद मनुष्य के ॥ और देवताके १९८ भेदः-१ असुर कुमार २ना- ग कुमार, ३ सुवर्ण कुमार, ४ विद्युत कुमार, ५ अग्नि कुमार, ६ उदधी कुमार ७ ७दि शा कूमार, ८ द्वीप कुमार, ९ पवन कुमार, १० स्थनित कुमार, ( यह १० भवन प ति देव ) ११ अम्बे. १२ अम्ब रसे, १३ शाम, १४ सवल, १५ रुदे, १६ महारुद्दे, १७ काल, १८ महाकाल, ११ अस्तीपत्त, २० धनुए. २१ कुम्भीए, २२ वालु, २३ वेतरणी, २४ खरस्वर. और २५ महाधोष ( यह १५ परमाधामी देवभी भवन पतिकी असुर कुमार जातिमें समावेश होता है.) २६ पिशाच, २७ भूत, २८ यक्ष, २१ रा- क्षस, ३० किन्नर, ३१ किंपुरुष, ३२ महोर्ग, ३३ गन्धर्व, ३४ इसीव, ३५ भुइव.३६ आणपन्नी, ३७ पाणपन्नी, ३८ कन्दिय, ३१ महाकन्दिय, ४० कोहड, ४१ पहंदेव. ( यह १६ वाण व्यन्तर देव) ४२ आण झमक, ४३ पाण झमक, ४४ लेण झमक, ४५ सेण झमक, ४६ वत्थ झमक, ४७ फल झमक, ४८ फूल झमक, ४१ फल झमक ५० आभि पतिया झमक, ५१ वीज झमक ( यह १० विझमक देवों का भी वाण व्य न्तर देवों में समावेश होता है.) ५२ चन्द्र, ५३ सूर्य, ५४ ग्रह. ५५ नक्षेत्र, ५६ ता रा. और ५७-६१ येही ५ स्थिर ( यह १० जोतिषी देव ) ६२ तीन पलिये, ६३ तीन सागरीये, ६४ तेरे सागरीये. (यह ३ किलविपी देव ) ६५ साइच, ४६ आदि- त्य, ६७ वरण, ६८ वन्हि , ६१ गदतोय, ७० तुषित, ७१ अरिठ, ७२ अगिच्छ, ७३ अव्या वाध. ( यह ९ लोकान्तिक देव) ७४ सुधर्मा, ७५ इशान, ७६ सनत कु मार ७७ महेन्द्र ७८ ब्रह्म, ७९ लान्तक, ८० महशुक्र, ८१ सहसार, ८२ आण ८३ पाण, ८४ अरण, ८५ अचुत, [ यह १२ देवलोक ] ८६ भद्दे, ८७ सुभद्दे, ८८ मु जाये, ८१. मुमान से, ९० मुदंशण, ९१ प्रियदंशण, ९२ आमोए, ९३ पडीभ३.९४ जसोधरे ( यह ९ ग्रीवेक ) ९५ विजय, १६ विजयन्त, ९७ जयन्त, ९८ अपराजि- त, और ९९ सर्वार्थ सिद्ध. ( यह ५ अनुत्तर विमान) यो सव ९९ जातिके देवता ओं है. इनके पर्याप्ता और अपर्याप्ता यों दुगुने करने से सब ११८ देवताके भेट होते हैं.। और मव मिल ५६३ जीवों के भेद होते हैं. ॥ १५ जीवाणेनी द्वार सो-जिसका वर्ण गन्ध रस स्पर्श एकसा मिलताआ मुक्ति मोपान-श्री गुणस्थान रोहण अहोगन द्वारी वे सो योनी एक और भिन्न हो सो योनी दूसरी. ऐमी सब जीवे के उत्पन्न होनकी माता पनकी सब ८४२११०० (चोराती लख ) योनी है. मो कहते हैं:-पृथवीकाय कीयोनी ७००००० (मात लाब) अरकार की योनी ७००१००० ( मान लाख) तेकाय की ७०१०००० (मान लाख ) वायुकाका ( मात लाख ) प्रत्येक वनस्पति की ( दशलाख ) माधारण वनस्पति की १.४०.०१ ( चटदलाव ) बेन्द्रिय की २०.००० (दोलाख ) तेन्दिर की २००११० (दोलाव ) चौरिन्दिर की २.०० (दोला ख) तियेच पचेन्द्रिय की ४०००१ ( चार लाख ) नई की ४०००० ( चार ला व ) देवता को ४०००० (चार लाव ) और मनुष्यों के उत्सन होने की योनो १.४०८००० ( चउत लाख.) १६ कुल कोडी द्वार-जो भ्रमर जानिके चौन्दिर पती को बेनी नोए कही गिनी जाती है और एक भंग पुप्फ का. एक कार का. एक गोवर का, योकु ल अलग २ गिने जाते है. मो नव जीवों के पिता पक्ष कुल एक नोड माडी मता परे लाव कोड {१११५०० कूल होने हैं. मो करने :-ग्यमी काप के १२००००००००००००० { वारह लाख क्रोड अपाय के १०००० (मात लाग्य कोड ) तेक कार के २००००० (नी न नाव नोड ) वाय काप के ७०००००००००० (मति गरोन ) वन- सती के २८.22.22 2 ( अाइन नाव कोड ) देन्दिर के 5 : : cor.2070 (मान याद मोड ) तेन्दिर के ८ . . . . . अटार =ोर ) चोसिनर के २. ( नाद गेह) २ ( माडो दाग लाद ) पर दाई । (नमगाव नोड ) देवर के १२ बाद लाड बोह। पर । दान में नजर ( नागमोड नई । पीर । देव ( उमीन र * दे (मार नब मोडल लहाने.. १६ पारद्वार-में च। नी । अंगे में निया में नहीं आ ऐसी नदी - ₹ ३०२ प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड ११ कमें काजल की कूपली की तरह ठगो ठस भरे हैं. सो मुक्ष्म कहे जाते हैं. और जो आंखो देखने में आवै ऐसे बडे शरीर के धारक छही काया के जीवों है. सो वादर कहे जाते हैं. ज- १८ त्रस स्थावर द्वारः-जो " अडय"-अडे में उत्पन्न होवे-पक्षी प्र- मुख “ पोयया"-कोयली में से निकले हाथी प्रमुख. जराउया " जडले होवे गौन मुख, " रसमा "-रसया उत्पन्न होवे की प्रमुख, “संसयया" पशीने से उत्पन्न होवे ज्यं प्रमुख, "समुछिपा"समुर्छिम (महजी)उत्पन्न होवे मक्खी प्रमुख, "उम्भीया", मीन फोडकरनिकले तोड प्रमुख, "उववाइया"उत्पन्नही होवे नर्क देव यह सब वस जीवो. इनके लक्षण:-अपने शरीरको-संकोच सके प्रसार सके, रुदन करे. भय भीत होव, वा- स पावे. भग जावे, इत्यादि लक्षण जिनके देखने में ओर सो वस जीवों. और जो एकस्थान स्थिर रहे पृथवी, पाणी, अग्नि हवा + वनस्पति, यह पांचों स्थावर जीवो जाणना. १९ सनी असन्त्री द्वारजिन जीवो का शरीर मात पिता के संयोग से नर्क के दिलों में x और देवता की सैय्या में उत्पन्न होवे सो सज्ञी जीव इनके मन (ज्ञान ) होता है. और जो समुर्छिम ( महजही ) उत्पन्न होवे पांचो स्थावर तीनों वि क्लेन्द्रिय और ऐसे पचन्द्रिय तिर्यच मनुष्य को असन्नी जीवों जानना. इन के मन नही होता है. + श्री उत्तराध्यायन जी सूत्र के ३६ वे अन्याय मे चालत गुणानुसार तेउ और वा- यु को भी त्रस कहे है. x कोई नर्क के बिलों में और कोई नर्क की कुंभीयों में नर्क के जीवों की उत्पति फरमाते है. मनुष्यके शरीर से उत्पन्न हुवे-उन्चार-बडीनीत, (विष्टा) पासवण-लघुनीत(मूत्र) खे- ल-खेकार, सवेण-सेढा (नाकका मेल) उत्तें-उलटी, पित्ते-पित,सूए-राट, पुए-रक्त, सुक्के-वीर्य, मुक्के पुगल पडी सारे-वीर्य आदे पुद्गल सूक कर पीछे भांजे उस में. मृत्युक शरीर, पुरुष के संयोग, नगर के नाले. और लोक में रहे सर्व अशुची स्थानों में अन्तर मुहूर्व बाद असख्यात समुर्छिम (असन्नी) मनुष्यो उत्पन्न होते है.

।. -- EX मुक्ति सोपान-श्री गणस्थान रोहण अदीशन द्वारी २० भापक अभापक द्वारः-जो पर्याप्ते विक्लेन्द्रिय तियेच पचेन्द्रिय मनु- प्य नर्क देव बोली है. सो भाषक कहे जाते है और सब अभापक जानना. २१ आहरक अनाहारक द्वारः-जब जीवों एक शरीर छोडकर दुसरे श- रीर मे जाते है. तब रस्तमें केवल समुत्यात करती वक्त चौर्य पांचवे समयमें और मो- ध के जीवो तो अनाहारिक ही रहते हैं. वानी के सब जीवो आहारिक ही होते हैं. २२ ओजादि आहार द्वार:-जो उपजति वक्त में जीवों आपने नजीक मे रहे हवे शुभा शुभ अनार गृहण करते हैं. जैसे सजी मनुष्य तियच माता का रुद्र और पिता का शुक्र भोगवे.सो ओज आचर.२जो शरीर धारी जीवों समय प्रति वा- यु आदि स्पर्मादि होते पदार्थे को गृहण परे. लो रोम आहार. और जो असन पा- नादि मुख द्वारा आहार गृहण करे सो कवल आतर किया जाता है. ऐसे तीन प्रका र के आशर होते हैं. २३ सचितादि आहार द्वारः-१ पृप्फ फल वीजादि सजीव वस्तु का अ. हार किया जावे सो सचित्त आहार. २ निर्जीव किये हुवे अन्न पाणी आदि भोगनेमे आवै मो अपित्त आहार. और कुछ मचित कुछ अचित ऐसे दोनों प्रकारके मिले पदार्थो भोगवने (खाने) में आवे मो निश्र आहार यह भी : आहार. २४ दिशी आहार द्वार:-ई-ऊंची. अधो-नीची. और चारो तरफ की दिशाओं तिरछी. यों भी तीन दिशी गिनी जाती है और वृर्व. पश्चिम. उत्तर दक्षिण ऊंची. और नीची यो ६ दिशी भी गिनी जाती है. इममेमे पांचों स्थावरो भूक्ष्म, जो मर्व लोक मे उनोउन भरे है. उनमें के कितने लोक के अन्त में एक कोन में रह है वो लोक के तरफ की तीनों दिशामें रहे पलों का तो आहार गृहण करते हैं परन्तु अलोक की तरफ भे आहार गृहण नही करते हैं. क्योंकि-अलोक में पढ़ल हेही नहीं इम अपक्षा से जयन्य तीन दिनी आहार गृहण करे. और उन्कृष्ट लोकके मध्य रहे सर्व मसारी जीवो डेही दिशी का आहार न करते हैं. २०-२६ पर्याप्ता पर्याप्त द्वार- प्रथमही आकर जिनस्थान में जीवों - त्पन्न होते है वो नजीक में रहे शुभा शुभ पदलों को आधार कप मे गृहण करते हैं. मो आतर पर्या. २ वो गृहण किया दुवा आहार नेत्री गरीर का वन्य-आकार होता । है. मो शरीर पर्या. : एकन्द्रियादि जिन जानि में उत्पन्न हुवा हो उतनी इन्द्रियों का जिनमे आकार कन्धे मो इन्द्रिय पर्या. ४ उन इन्द्रियों के द्वार (छिद्रों द्वारा जो वा- ܙܫ •i. m न्नी तियेच पचेन्द्रिय के १२ योजन की अर्थात्-इतनी दूरका शब्द गृहण कर सकते । ३०४ * प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड र यु का आवा गमन होवे सो श्वाशोश्वाम पर्या. ५ मुखेन्द्रिय द्वारा व्यक्त अव्यक्त श- दो चारण की शक्ति सो भाषा पर्या. और ६ विचार शक्ति सो मन पर्या. इन प- पर्या में से अहार, शरीर, इन्द्रिय, और श्वाशोश्वास, यह ४ पर्या तो एकेन्द्रियों के होती है, मिक्लन्द्रिय के और असन्नी पचेन्द्रिय तिर्यच के भाषा पर्या अधिक होने से पांच पर्या होती है. और सन्नीपचेन्द्रियकेव्ही पर्या होती है. परन्तु नर्क और देव मन और भाषा का वन्ध साथही करते हैं, इसलिये पांच पर्या कहते हैं, तोभी छेही पर्या पाती है. । इनछे पर्या में से जितनी पर्या जिसमे पाती है, उतनी पूरी नहीं वन्धे वहां तक अपर्याप्सा कहना. जो पर्या वन्धता पूरी पर्या किया विना अपर्याप्ता ही मरजावे उसे लब्धि पर्याप्ता कहना. और जो पूरी पर्या वान्चल उसे पर्याप्ता कहना. अपर्याप्ता तो फक्त अन्तर मुहूर्तही रहता है. फिर इन्द्रियाद प्रगट नहोवे तो भी सत्ता रूप स- व होजाती है. २७ प्राण द्वार:-जिसके आधार से जीव रहे उसे प्राण कहते हैं. सोद श प्राग है.--१ श्रोतेन्द्रिय वलमाण, २ चक्षुन्द्रिय वलमाण, ३ घणेन्द्रिय वलपाण, ४ रसेन्द्रिय वलमाण, ५ स्पर्शन्द्रिय वलमाण, ६ मन वलमाण, ७ वचन वल प्राण, ८ कायावल प्राण, ९ श्वाशो श्वास वल प्राण, और १० आयुष्य वलमाण, २७ इन्द्रिय द्वार:-१. अगोचरी, २ गोचरी, ३ दुम्बइ, ४ चरपरी, और ५ अनमनि. ( यह पांचों इन्द्रिय के नाम ) और १ श्रोतेन्द्रिय, २ क्षइन्द्रि, ३ घणे न्द्रिय ४ रसेन्द्रि, और ५ स्पर्शेन्द्रिय, ( यह पांचों इन्द्रिय के गोव) [ ? ] जो अ. गोचर-विनदेखे पदार्थों के भावको गृहण करे. सो अगोचरी और श्रुतज्ञान की बृद्ध करे या श्रीव छिद्ररुप होवे जीवका अजीवका और मिश्र शब्द ग्रहण करे सो श्रोते न्द्रिय. इसकी अभ्यन्तर अवघेणा अङ्गलके अंख्यातवे भाग और वाह्य संाग कदम के पुप्प जैता. इसकी विषय असन्नी तिर्यच पचेन्द्रिक ८०० से धनुप्य की, और स- --- x प्रथम की तीनों पर्य पुरी किये विना तो कोड मरताही नहीं, क्यों कि-आहार शरी र और इन्द्रिय पर्या पुरी हुवे बाद ही परभव का आयुट्य बन्ध होत है. और आयुबन्ध हुवे वाद ही जीव मरता है. इसलिये चौथी पर्यायवन्द तेही अपर्याप्ता मरता है.

* मुक्ति मोपान श्री गुणस्थान रोहण अटीशन द्वारी 3 • धनः हैं. । (२) गोवरी जो देखे तुरे पदार्थों को गृहण करेने मे आंखो का नाम गोचरी हैं. अन्तः करण ला ममुत्पन्न करे मो कृप्ग नील रक्त. पिन. शुक्ल वर्णको ग्रहग करेमो चन:न्द्रिय गोवरैमकी अभ्यन्तर अवेधणा अंगुलके अख्यानवे भाग और वाच मंस्था न चन्द्रमा व मसूर की दाल जैना. यह इन्द्रि बोरिन्द्रिय और पवेन्द्रिय बानोक होती हैं. जिनमें चौरिन्द्रिय की चन्द्रिय की विषय २१५४ धनुप्यकी. अनन्नी पवेन्द्रिय की ५९०८ धतुप्यकी और मन्त्रीपचेन्द्रिय की ४७२६० योजन की. अर्थान इतनादुर का र गृगह करे ३ : दुम्मड-जिनके दो मुम्ब ( दोस्वर ) है. इसलिये नाकका नाम दु. और जो घाण दुर्गच्छा ममत्पन्न होवमी प्राणेन्द्रिय गौव है. यह मुगन्ध दुमय दोनों को गृहण करे.इनकी अनन्तर अवघेणा अगले अंग्याना भोग.औ- र वहा भरपान धनग जैने यह इन्द्रिय नेन्द्रिय चोनिन्दिर और पपेन्दिराती.. जिनमें-नेन्द्रिय की घनेन्द्रिय की विषय १८० धनुन की चनिन्द्रकी प. की अपनी पचेनिन की ४० • धरुपकी और मन्त्रीपतिपकी १० पाजन की. अनि-इतने दर में वान नृणा करे माने है । ( ४ ) जो वापर का नया नका नाम चरपी और कटु मधु तक्षिण अमट करिन नर को गोली मोती. च गोव. इनकी अन्धन्तर अमवेगा अगर के अल्पात भाग. गौर वा नम्थान : हरपले (उम्रे ) जैना. यः इन्द्रिय पेन्द्रिय नेन्द्रिय चन्द्रिय और पीटर पा. नी. इमने देन्द्रिय की मान्द्रिय की विषय ६४ मनुप्र की नेन्दिर २८ पनु प्र. नौनिन्दियी धनप्प. अनन्त्री पन्दिपकरी पर अनन्दियी १२ योजन की अर्शन इतनी दूर रहना वा पदार्थ का बाद मजि. मो मानती रो ऐने सरीर का नाम अनमी. औरत. मावीक म. कठिन. गुर नपा वो एप वर करने मगलिद ही जान पर । नयान विवि प्रकार का है. यानिय केन्दिरमा पदोन्नत नारी दो देती है. एकोन्दर दी मन्दिरका विपद १. प. देन्दिर ८. बाप्पनवदी १६० : पप निन्दिरकी काअन्न पोनर दी ६४. धनप्प. और मन्दिर की पंन्न. नीदर कावी. नि, पिप :- प्रदर.. में दो . . ।

३०६ प्रथम अर्थ काण्डका प्रथम मूल द्वारा राहण कन्ड है. और इन ६ को राग द्वेष से दुगुने करने १२ वीकार होते हैं. (२) चाहीन्द्रय की कृष्ण, हरित, रक्त पित और श्वेत यह ५ विषय. और इन ५ को सचित्त अपि त मिश्र इन तीनों से तोगुने करने से १५ और इन शुभ अशुभ से दुगुने किये ३० और इन ३१ को राग द्वेष से दुगुने किये ६० वीकार होते है. (३) धणेन्द्रिय की सूभिगन्ध, दुर्भिगन्ध, येह २ विपय. इन २ को सचित अचित्र मिश्र इन तीनों से ती न गुने करने से ६, और इन ६ को, रागद्वेष से दुगुने करने से १२ वीकार होते हैं. (४ ) रसेन्द्रिय की कटू मिष्ट, तीक्षण, आम्लन, क्षारा, यह ५ विषय. इनको सचित्त आचित्त और मिश्र से तोगुने करने से १५ और इन १५ को शुभ अशुभ दुगने किये ३०, और इन ३० को रागद्वेष से दुगुने करने से ६० वीकार होते है, (५. स्पर्शेन्द्रिय की गुरु, लघु, शीत, उष्ण, रुस, चीकन, कठिण, सुकुमाल, यह ८ वीपय इन ८ को साचत आचत मिश्र से तागूने करने से २४ हुवे, और इन २४ को शुभ अशुभ से दुगुने करने से ४८ हुवे, और इन ४८ को रागद्वेष से दुगुने करने से १६ वीकार होते है, ५ इंद्रियकी सर्व २३ विषय और २४ वीकार होते हैं. ३० सज्ञा द्वारः-१ आहार सज्ञा-४ कारण से उत्पन्न होवे:-(१) सशक्ति से. (२) क्षुधा वेदनी के उदय, (३) आहार का स्थान देखने से और (४) आहार की बात सुनने चितवने से. २ भय सज्ञा ४ कारण से उत्पन्न होवेः-(१) अशक्ति से.(२! भय मोहनीय के उदय, (३) भयके स्थान गये. और (४) भयकी बात सुने चिन्तवे में ३ मैथुन सज्ञा ४ कारण से उत्पन्न होवेः-(१) रक्त मांस की पुष्टि से, (२) मैथुन मोहनीय के उदय, (३) मैथन के स्थान गये, और (४) मैथुन की बात मुने चितो. और ४ परिग्रह सज्ञा ४ कारण होवे-(१) परिग्रह के संग्रह से, (२) परिग्रह मोहनीय उदय. (३) परिग्रह के स्थान गये. और (४) पारिग्रह की बात सुनने चितवने से.! नर्क में भय सज्ञा आधक । तियच में आहार सज्ञा आधिक । मनुष्य मे मैथुन सझा णधिक और देवता मे लोभ सज्ञा आधिक होती है. ३१ वेद द्वारः-१ जिस के योनी कुचादि अङ्गो पाङ्ग होवै, और जो पुरुष का मगम इच्छे सो स्त्रीवेद. २ जिस के लिङ्ग मूछ आदि अङ्गोपाङ्ग होवे. और स्त्रीके सङ्गम की इच्छा करे सो पुरुप वेदे. ३ जिस के स्त्री चिन्ह व पुरुप चिन्ह नि- वीज हो और, स्त्री पुरुप दोनों के संयोगकी इच्छा करे सो नपुंसक वेद. ३२ कपाय द्वार:-जिन परिणामों द्वार कोका कप (रस) आवे सो कपाय ! के * मुक्ति सोपान श्री गुणस्थान रोहण अहीशत द्वारी ३०७ चार प्रकार कीः-(१) प्रकृति को कमर वनावे सो क्रोध कपाय. (२) जो प्रकृति को करडी नावे सो 'मान' कपाय. (8) जो प्रकृति को वक्र (वॉकी) बनाये सो मा या कपाय और (४) जो प्रकृति को विस्तारे फैलावे सो 'लोभ' कपाय. ३ लेशा द्वारः-जिन परिणामो कर आत्मा कमों कर लेपावे (भरावै) सो ले शा ६ प्रकार कीः-(१) कृष्ण वर्ण. दुर्गंध, कदुरस तीक्षण स्पर्श सो द्रव्य कृष्णले- श्या. और पांचो आश्रवो आप सेवन करे. दुसरे के पास सेवावै. तीनों जोगों और पांचों इन्द्रियो को ययेन्छ छुट्टी प्रवर्तने दे. तीव्र परिणामो से आरंभ करे, हिंसा क. र्ता अवकाय नहीं. शूद्र परिणामी. दोनो लोक के दुःख से डरे नही. इत्यादि लक्षण वाले को भाव कृष्ण लेशी जानना. (२) हरावर्ण दुर्गन्ध तीखारस और खरखरा स्प- र्श सो द्रव्य नील लेण्या. इविन्त, दूसरों के गुणों को सहन कर सके नहीं. आप त- पश्चर्या करे नहीं. दुसरों को करने देवे नहीं, तैसे ही ज्ञानाभ्यास भी आप करे नहीं दूसरों को करने देवे नहीं. नीवड कपटी. लज्जा रहित, रस गृद्धि, महा आलसी, फ क्त आपहीका मुख चहावै इन लक्षणों युक्त होवे सो भाव नील लेशा वाला जानना, (३) ऊदावर्ण, दुर्गंध. रन कपायला और स्पर्श कठित सो द्रव्ये कापूत लेश्या, और वॉका बोले. वॉका (स्वेच्छा) चले, अपने दर्गुणों को ढके, दुसरे के प्रकट करे. कठोर वचनी. चोर. दूसरों की सम्पती देखकर यूरे इन लक्षणों काले को 'भाव' क- पोत लेशी जाग रा.(४) वर्गरक्त. दुगंध. रम खट मिठा, स्पर्श नरम सो द्रव्य तेजु ले श्या ओर न्याय वन्त, स्थिर स्वभावी, शरल, किंतुहल रहित, विनीत, ज्ञानी, दमित इन्द्रिय, दृढ धर्मी. प्रिय धर्म, पाप करते हुवे उसके फल भुक्त ने का डर रखे सो भा व तेजु लेगी जानना. (५) पीत वर्ण, मुगंध, मोठारस और कोमल स्पर्श सो सो द्रव्य पद्म लेश्यो और. चारो कपायों पतली करे सदा उपशांत चित्त रहे. वि- योगों स्ववश में रक्खे. थोडा बोले, इन्द्रियों का दमन धर्म मार्ग में करे. सो भावे प- झलेशी जानना. और (६) शुक्ल वर्ण, मुगंध, मधुर, रस और मुकुमाल स्पर्श होय सो द्रव्ये शुक्ल लेश्या और. आर्त ध्यान रौद्रव्यान को छोड धर्म ध्यान शुक्ल ध्यान को ध्यावे, राग द्वेष को पतले किये या सर्वथा निहते. इन्द्रियों को स्ववश में कर, ममिता समता गुप्ति गुप्ता रहे, सरागी तथा वीतरागी चरिव वंत. इन लक्षणों वालों को भावे शूल लेगी जानना, ३४ जोग द्वारः-जो दुसरों से संबंध करे-जुड मो जोग तीन प्रकर के है:-१ प्रथम अर्थ काण्डका प्रथम मूल द्वारा राहण कन्ड ५९ जो अंत करण में विचार उत्पन्न होवे सो मान जो वचन बोले सो वचन और जो प्र प्रत्यक्ष में दिखे शरीर रूप होवेसो काया जोग जानना. ३५ शरीर द्वार;-औदारिक शरीर सो-औदर-प्रधान श्रेष्ट अर्थात्-(१) इम की भव धारनीय शरीर की अवयेगा सब शरीरोंसे बडी है. (२) तीर्थकर चक्रवर्ति वलदेव वासूदेव घणधर केवल ज्ञानी, साधु श्रावक इत्यादि उत्तम पुरुषों इसी शरीर मे होते हैं. (३) और मोक्ष भी इसी शरीर से पाते हैं. इत्यादि गुण निप्पन्न इसका नाम आदारिक शरीर-उत्तम शरीर दिया है. यह शरीर हाड मांस स्थीर मूव में- ज नाशे आदि सप्त धातु का पूतला होता है, मनुष्य तिर्यचही इस शरीरके श्वामी हो ते हैं. (नर्क स्वर्ग के जीवोंके यह शरीर नहीं होता है) यह शरीर के छे संघयण औ- र छेही प्रकार के संस्थान में होता है, इसकी अवघेणा भवधार नी की जघन्य अङ्गल क असंख्यातवे भाग. उत्कृष्ट १००० योजन झाजेरी होती है. और उत्तर विक्रय + करे तो जघन्य अङ्गल के संख्यातवे भाग, उत्कृष्ट १००००० योजन की कर सकते । हैं. और इस शरीर धारी जीवो है तो सर्व लोक में भरे हुवे परंतु चारण मुनिवरो ते रवे रुचक द्वीप तक जा सकते हैं इसलिये इसकी विषय रुचक द्वैस्पतक ही गिनी जा- ती है. और इस का प्रयोजन मोक्ष साध ने का है. २ वक्रिय शरीरः-एक रूप के अनेक रूप और अनेक तरह के रूप वनावे इसलिये इस का नाम वैक्रिय शरीर है. इस शरीर के श्वामी नरक और स्वर्ग के जीवों होते हैं. नरक के जीवों का शरीर दुः धि विद्रूप अशुभ पुद्गला पूतला होता है. और देवता का शरीर महा दिव्य तेज- स्त्री सुरूप सुगंधि पूतला होता है. यह शरीर = असंघयणी और प्रथम अन्तिम सं- स्थानी होता है, इसकी भवधारनीय शरीर की अवघेणा जघन्य अङ्गल के असंख्यात भाग, उत्कृष्ट ५०० धनुष्य x की, और उत्तर वैक्रिय करे तो जवन्य अङ्गाल के +जिनको तपादि के प्रभाबसे लाब्ध उत्पन्न हूइ हो यो मनुष्य तिर्यच पौक्रिय शरिब ना शकते है. जवाचरणा और विद्याचरण चारण मुनि दो तरह के होने हैं. संवयण हडीयोका होता है, और नरक देव के शरीरमें हड्डीयों नहीं होनेसे अमघय णी कहे है. परन्तु है महापरक्रमी. देवताके समचतुरस्त्र संस्थान आर नर्क के हुंड संस्थान है. x सातमी नरक में ५०० धनुष्य की है.

* मुक्ति सोपान श्री गुणस्थान रोहण अटीशत द्वारी संख्यातवे भाग उत्कृष्ट १००००० योजनकी इसका विषय असंख्यात द्विप समुद्रों त- क है, और इस शरीरका प्रयोजन इच्छित रूप बनानेका है. ३ आहारक शरीर:- यह शरीर आहारिक (आहार करने वाले) जीवों के होता है इसलिये आतरक श- रीर कहा जाता है. यह एक हात भरका पुतला प्रथम संस्थानवन्त अत्यन्त सूक्ष्म दि. न्य पुद्गलोंका होता है. इसके श्वामी चउदह पूर्वधारी मुनीराज होते हैं. इसकी विषय अदद्धिप प्रमाणे और प्रयोजन संशय छेदन व समव शरण के दर्शनका. ४. तेजस शरीरः- तेज अनिके जैसा दाहक-पाचक गुणका धारक गृहन किये हुवे आहारा- दि पदार्थों को पचाकर रस बनाता है इसलिये तेजस शरीर कहा जाता है, इसका प्रयोजन अहार पचानेका है. और ५ कार्माण शरीर सो जिन पुगलों का तेजसने रस बनाया है. उन पुद्गलोंको द्रव्ये तो धातु अदिका जैसा शरीर होवे उस पणे और भा वे ज्ञानावरणी आदि कोंकी प्रकृति पणे परिणयावे-परगमावे-हिस्सा कर बाटें देवे सो कारमण शरीर. इनका प्रयोजन संसारमें रुलानका. यह तेजन और कार्मण इनदो- नो शरीरके स्वामी सर्व संसारी जीवों है. और यह दोनो सूक्ष्म-अन्तिरिक शरीर हो नेसे इसका वाह्य मे कुछ संघयण संस्थान नहीं होता है. परन्तु इन दोनों शरीरके धा- रक पाणीयों ठेही मंघयण और छेदी संस्थानों युत्त होते हैं. इन दोनों की अवधे- णा जघन्य अङ्गल के असंख्यातवे भाग की उत्कृष्ट सर्व लोक प्रमाणे : और विषय भी सम्पूर्ण लोक प्रमाणे जानना. ३६संघयणद्वार वजू पम नारच संघरण-जो दोनों हडियोंकी सान्ध स्थिर करने पटीये जैसी तीसरी हडी होती है उसे परिवोष्टित पट्ट वजू कहतेहैं. और उन तीनों हडीयोंका कर सन्धिकों दृढ करे ऐमी चौथी हडी कील रुप होवे उसे ऋषभ कहते हैं. और जि स स्थान दोनों हडियों एकेक हडी के साथ ऑकडी से ऑकडी मिलावे वो फिरक सी उपाव से टूटे नहीं ऐमा दोनों हडीयों का आपान में दृढ बन्धन करने वाला म- केवल सनुद बात होती व चौथे समय में केवली भगवन्त सम्पूर्ण लोक व्यापी बनते हैं. तब तेजस और कार्मण दोन गरि के धारक होते है. इनलिये दोनों गरीर की अश्वेणा सम्पूर्ण लोक प्रमाग कही है.

- प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड ११ रकट बन्ध होवे - सो नारच,+ ऐसी तरह से जो संयुक्त हडीयों होती है जिसे स- घयण. “सो दोनो तरफ की हडीयो मरकट वन्ध कर बन्धि होवे, उसपर ऋषभ नाम क हड़ीने वेष्टित किया हो, उस में इनतीनों हडीयों भेदी हुइ कीली होवे, जिस से स. व गरीर अत्यन्त स्थिर वलकट मजबूत बंधा हुवा होवे सो वन ऋषभ नारच भंघय. ण. २ "ऋपभ नारच संघयण" सो जिप्त मे उपरोक्त सर्व रचना होवे फक्त वजू की कीली नही होवै.३ "नारच संघयण" सो पटीया और कीली दोनो नहोवे, फक्त मर- कट बध से हडीयों बंधी, होवे'४"अर्थ नारच संघयग" सो आधा-एकही तरफ मरक ट बंध होवे, और दुसरी तरफ सादी कीली होवे ५ "कीलीक संघयण" फक्त सादी कीलीयों से ही हडीयों की सन्धि का मिलाप होवे और "डेवट संघयण" सो किली विना फक्त एकेक हडी के आश्रय मे दुसरी हडीयो रही होवे. धक्का लगतेही छुटाल ३९ 'संस्थान द्वार":-जित आकार में शरीर परिणमा हो उसे संस्थान हैं मो ६ प्रकार हैं:-१. 'सम चउरस संस्थान' सो सम-चरोवर, चउ-चारो, अते खोने, अर्थात-पद्मासन से बैठे हुवे का शरीर दोनो पगों के घुटने का अन्तर दोनो स्कन्धों का अन्तर इन चारों का अन्तर मध्य भाग बरोबर होवे, और सा क शास्त्र के कथनानूमार प्रमाणोपेत उत्तम लक्षण व्यंजन युक्त होवे मो सम चउ स मंस्थान २ "न्यगोध परि मंडल स्थान" सो न्यग्रोध नाम बड के झाड के जैम्, उपर का मवंग मुंदर प्रति पूर्ण शोभित होवे और नीचे वडवाइयों छूटने से अशो' निक दिग्वे. तमे कम्मर के नीचे के गरीर का विभाग विद्रूप होवे. ३ म्थान" मादि-आदि नीच का शरीर उत्तम प्रमाणो प्रेत होवे, और कम्मर के उपर का शरीर अशोभनिक होवे. ४ "कून भस्थान" कु-खराव, वज-तरह, अर्थात् जिम । के हाथ पग पेट ग्रीवा इत्यादि गरीर के अवयव उत्तम होये, और हृदय पृष्ट पेट ही न होवे पीठपर छानी पर कुन्ज-हडीका टेकरा होरे सो कुन्न संस्थान. ५। 'वाचन मस्थान':-१२ अगल प्रमाणे टेंगणा गरीर हावै, मध्य का गिर टीक हो और सादि मं. जमे बन्दग का बच्चा बन्दर को फलाग भरती वक्त उस के हृदय को दृढ प्राण कन्क है. नेमा ही जिन हर्टयों द्रट बन्धन हा उम मारकंट बन्ध कहा जाता है. मरकट नाम बन्द का है. +न-ऋपन-नारद-यह तीनों शब्द ममय भाषा के हैं निमका मा अर्थ होता है: - मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अहीशन द्वारी * हाथ पांव छोटे हो सों वावत स्थान. और ६ 'हुंड संस्थान' सो जिस के सब अङ्गो पाङ्ग खराब आधे जले मुरदे जैसे खराब हो मो हुंड संस्थान. ३४ मरण द्वारः-भरती वक्त में आत्म प्रदेश दो तरह से निकल ने हैं-१ जो कीडीयो की नाल की तरह समय २ धीरे २ थोडे २ प्रदेशों निकल कर जिस गति में जाना हो वहां का ताना वाना वान्धे. पीछे मे ८ रुचक प्रदेशों के साथ आत्मा गमन करे उसे समोया कहते हैं. और २ जो वंदक के भडाकेकी माफिक एकदम स व प्रदेशों साथ ही निकल जावे उसे असमोया मरण कहते हैं. ३१ विग्रह गति द्वारः-मरकर प्रथम शरीर त्याग जीवों दुसरि गति में दो त. रह से जाते हैजो जीव प्रथम शरीर को छोडे बाद ताधाइ एक समय माव में नि बनाभेत गति मे जाकर उत्पन्न हो जावे भो ऋजु गति. और २ जो शरीर छोडे बाद वेशा भूलकर इधर उधर चल जावे वो जीव जयन्य एक मोड, मध्यन दो मोड और मो कृष्ट तीन मोड तक खाता है. जितनी मोड खाता है. उतने ही समय अनाहारिक नोता है. फिर अनुपूर्वी नानक कर्न उसे खेचकर नियमित गति में ले जाते हैं. उसे नग्रह गति करते हैं. ४. सो मोड द्वार:- (ढा लोक) २६ है:-१ सुधर्ना, २ इशान, ३ सनत कुमार. ४ महेद्र. ५ ब्रह्म. ६ लान्तक. ७ महाशुक्र. ८ सहसार, १ आग. पाण. ११ अरण. और १२ अचुत (इनको देवलोक या कल्प कहते हैं, क्योकि इन में रहने वाले देवताओ के मालक-राजा इन्द्र हैं. उन ने कल्प मर्यादा वन्धी उस मर्याद प्रमाणे सर्व देवताओ चलते हैं. इसलिये इन १२ को कल्प भी कहते है.) १३ भहे. १४ सुभहे. १५ मुजाये. १६ मुमान मे, १७ मुदंगणे. १८ मियदसणे, ११ आमोह. २० नुपडिभहे. २१ यशोधरे. (इन ९ को ग्रीवेक करते हैं क्योंक यह स्थान पुरुषाकार लोक के ग्री-ग्रीवा-गरदन के स्थान है) २२ बिजय, २३ विजयन २४ जयन्त. २५ अपराजित. और २६ सर्वार्थ निद्ध. (इनों को अनुत्तर विमान कह- ते है. क्योंकि यहतव वीमाणों मे अनुत्तर-प्रयान-श्रेष्ट हैं. और उपर के १४ स्वर्ग को कल्पतीत कहते हैं. क्योंकि यहां देवता के शिरपर कोई मालक-इन्द्र नहीं है. इमलि ये यह स्वच्छा चारी हैं परन्तु यहां फक्त जैन लिङ्गी सावू ही उत्तन्न होने हैं इसलिये यह अमर्यादित कृतव्य कदापि नहीं करते हैं.) स १० नहोवे पीटपर छानी पर कुब्ज-हडीफा टेकग होके मो कुब्ज मंस्थान. ५ . 'वायन प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड १ रकट वन्ध होवे - सो नारच, + ऐसी तरह से जो संयुक्त हडीयो होती है जिसे स- घयण. “सो,दोनो तरफ की हडीयो मरकट वन्ध कर वन्धि होवे, उसपर ऋषभ नाम क हड़ीने वेष्टित किया हो, उस मे इनतीनों हडीयों भेदी हुइ कीली होवे, जिस से स. व शरीर अत्यन्त स्थिर वलकट मजबूत बंधा हुवा होवे सो बजू ऋषभ नारच भंघय- ण. २ "ऋपम नारच संघयण" सो जित मे उपरोक्त सर्व रचना होवे फक्त यज़ की कीली नहीं होवै.३ "नारच संघयण" तो पटीया और कीली दोनो नहोवे, फक्त मर- कट बध से हडीयों बंधी, होवे४"अर्थ जारच संघयग" सो आधा-एकही तरफ मरक ट बंध होवे, और दुसरी तरफ सादी कीली होवे ५ "कीलीक संघयण" फक्त सादी कीलीयो से ही हडीयों की सन्धि का मिलाप होवे और "छेवट संघयण" सो किली विना फक्त एकेक हडी के आश्रय ने दुसरी हडीयों रही होवे. धक्का लगतेही छुटाल ३२ 'भंस्थान द्वार":-जित आकार मे शरीर परिणमा हो उसे संस्थान हैं मो ६ प्रकार हैं.-१ 'सम चउरसा संस्थान' सो सम-चरोवर, चउ-चारो, अते खोने, अर्थात-पद्मासन में बैठे हुवे का शरीर दोनों पगों के घुटने का अन्तर दोनो स्कन्धों का अन्तर इन चारों का अन्तर मध्य भाग बरोबर होवे, और सा- 'क शास्त्र के कथनानुसार प्रमाणोपेत उत्तम लक्षण व्यंजन युक्त होवे मो सम चउके म संस्थान २ "न्यगोध परि मंडल स्थान" सो न्यग्रोध नाम वड के झाड के जम् उपर का सर्वंग सुंदर प्रति पूर्ण शोमिन होवे और नीचे वडवाइयो छूटने मे अशो निक दिग्वे. तमे कम्मर के नीचे के शरीर का विभाग विद्रूप होवे. ३ "सादि में. म्यान" मादि-आदि नीच का शरीर उत्तम प्रमाणों प्रेत होवे, और कम्मर के उपर का शरीर अशोभनिक होवे. ४ "कून भस्थान" कु-खराव, वज-तरह, अर्थात जिम के हाथ पग पेट ग्रीवा इत्यादि गरीर के अवयव उत्तम होये, और हृदय पृष्ट पेट ही 1 मंग्यान':- अगल प्रमाणे टेंगणा अगर हाँव, मध्य का निर टीक हो और - ने बन्दी का बन्ना बन्दर को फलाग भरती बक्क उस के हृदय को दट प्रहाण कन्ना है.मा ही जिन हईयां दरवन्धन हा उम मारकंट बन्च कहा जाता है. मरकट - . नाम बन्दर का है. - + बन ऋपन-नान्द-यह नाना मन्द ममय भा केनिमका दमा अर्थ होता है।

वे * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अहीशन द्वारी हाय पांच छोटे होवे सो वावत स्थान, और ६ 'हुंड संस्थान' सो जिस के सब अङ्गो पाग खराब आधे जले मुरदे जैसे खराब होवै मो हुंड संस्थान. ६० मरण द्वारः-भरती वक्त मे आत्म प्रदेश दो तरह से निकल ने हैं;-१ जो कीडीयो की नाल की तरह समय २ धीरे २ थोडे २ प्रदेशो निकल कर जिस गति में जाना हो वहां का ताना वाना वान्धे, पीछे से ८ रुवक मदेशो के साथ आत्मा गमन करे उसे समोया कहते हैं. और २ जो बंदक के भडाकेकी माफिक एकदम स व प्रदेशों साथ ही निकल जाये उसे असमोया मरण कहते हैं. ३१ विग्रह गति द्वारः-भरकर प्रथम शरीर त्याग जीवों दुसार गति में दो त. रह से जाते है: १ जो जीव प्रथम शरीर को छोडे बाद साधाइ एक समय माव में नि चनागत गति में जाकर उत्पन्न हो जाये भो ऋजु गति. और २ जो शरीर छोडे बाद र भूलकर इधर उधर चल जावे वो जीव जयन्य एक मोड, मध्यन दो मोड और मोकृष्ट तीन मोड तक खाता है. जिती मोड खाता है, उतने ही समय अनाहारिक नोता है. फिर अनुपूर्वी नानक कर्न उने सेंचकर नियमित गति में ले जाते हैं, उसे नग्रह गति कहते है। ५. सौ नोट द्वार:- (डेप लोक) २८ हैं:-१ सुधर्ना, २ इशान, ३ पनत कुमार. ४ महेंद्र. ५ ब्रह्म. ६ लान्तक. ७ महाशुक्र. ८ सहनार, ९ आग. १० पाण. ११ अरण. ओर १२ अचुन (इन१२ को देवलोक या कल्प कहते हैं, क्योंकि इन में रहने वाले देवताओ के मालक राजा इन्द्र हैं. उन ने कल्प मर्यादा वन्धी उस मर्याद प्रमाणे मई देवताओ चलते हैं. इसलिये इन १२ को कल्प भी कहते हैं.) १३ भहे. १४ मुभहे. १५ मुजाये. १६ मुनान मे. १७ मुदंशणे. १८ प्रियदसणे, ११ आमोह. २० नुपडिभदे. २१ यगोचरे. (इन ९ को ग्रीवेक करते हैं क्योंक यह स्थान पुरुषाकार लोक के ग्री-ग्रीवा-गरदन के स्थान है) २२ विजय, २३ विजयंत २४ जयन्त. २५ अपराजित. और २६ सर्वार्थ निद्ध, (इनों को अनुत्तर विमान कह- ते है. क्योंकि यहसव वीमाणों में अनुत्तर-प्रयान-श्रेष्ट हैं. और उपर के १४ स्वर्ग को कल्पतीत कहते है. क्योंकि यहां देवता के शिरपर कोई मालक-इन्द्र नहीं है. इसलि ये यह स्वच्छा चारी हैं परन्तु यहां फक्त जैन लिङ्गी मात्र ही उत्पन्न होते हैं इसलिये यह अमर्यादित कृतव्य कदापि नहीं करते है.) १८.

--
प्रथम अर्थ काण्डका प्रथम मूल द्वारा राहण कन्ड
४१ पटस्थान हानी बृद्धि द्वार;-यथा दृष्टान्त असत्य कल्पना मे जैसे-पाव भर
गुड, शेर भर शकर और मण भर मिश्री. इन पदार्थों में भाग (वजन) की अपेक्षा मे
गुड मख्यात गुण, शकर असंख्यात गुण, और मिश्री की अपेक्षा अनन्त गुणा. तै.
माही गुण (मिठात) में-गुड संख्यात गुण मिष्ट, शक्कर असंख्यात गुण मिष्ट और मि
श्री अनन्त गुण मिष्ट. यह ३ वोल भाग आश्रिय और ३ गुण आश्रिय मिलकर ६
बोल वृद्धि आश्रिय कहै. ते ही इन ६ योलो को उलट गिन ने से ६ हानी के बोल
होते हैं. यो यड गुण हानी वृद्धि के १२ वाल जानना
इति संसारा रोहण नामक तृतीय खंड
-
lette
marwadi
समागम
Edu
।

चतूर्थ खड-धर्मा रोहण धर्मा रोहण के ३३ द्वारोंका अर्थ. ॥ १. मूल उपयोग द्वार:- मूल उपयोग दो हैं:- १ साकार बहुता" सोना- न. अर्थात्-अकारादि स्वर और क कारादि व्यंजन मे अवर श्रूत रूप आकार होवे और जो वस्तुका वाह्य स्वरूप आकार जाने, इस विषेश बानको साकार बहुता कह ते हैं, और १ अनाकार बहुता सो दर्शन. अर्थात् ज्ञानने जानी हुइ वस्तुका सामान्य रूप गुण का जो अन्तःकरण में भाप होवे सो दर्शन निराकार उपयोग है २ विपेश उपयोग १२ हैं. जिसमें सकार बहुताके ८ भेदः- १ मतिज्ञान सो बुद्धि निर्मळ होय । २ श्रुतिझान सो शाख मम्बन्धि जानपना. ३ अवधिज्ञान - र्याद प्रमाणे दूरवर्ती पदार्थोंको देखे. ४ मन पर्यवज्ञान अढीद्वपके अन्दरके जीवोंके स- नकी वात जाने. और केवल झान सो सर्व द्रव्य क्षेत्र काल भावको जाने (पह ज्ञान) और अवल कहे तीनों झानोंनो मिथ्यामति कर विपरीत भाष होणे लगे इमलिये उन तीनोंको मतिअज्ञान, २श्रुतिअदान, विभङ्गशान, कर बोले जाते हैं. यह पांच का न और तीन अडान मिल सकार बहुता उपयोगके ( भेद हुचे. ।। और अनाकार . हुताके चार भेदः- १ आखोंमे देने हुचे पदार्थके गुण अन्तःकरण में भाप होवे नो 'चक्षु दर्शन ' २ आखॉबिन चारों इन्द्रियोंमे और मनद्वार गृहण किये पादार्यका अ. न्तःकरण में भाश होवे मो 'अचलु दर्शन' अवधी ज्ञानमे ग्रहण किये पदायाँका ।

३१४ र प्रथम अर्थ काण्डका प्रथम मूल द्वारा राहणे कन्ड ५ गुण अन्तःकरण में भाप होवे सो अवधी दर्शन, और केवल ज्ञानसे गृहण किये पदा थों का गुण भाष होवे सो केवल दर्शन. ( यह १२ उपयोग हुवे.) ६ दृष्टिद्वार:जिससे पदार्थो स्वरूप प्रतिभाप होवेसो दृष्टितीन प्रकारकीः? जैसे शुद्ध नेत्रोंवाले को जैसे रङ्गका पदार्थ होताहै वैसाही प्रति भाप होता है तैसेहि जीगादि न वोहि पदार्थोंका. स्वरूप यथा तथ्या [ है जैसा] जाने श्रद्धे सो 'सम्यग् दृष्टि.',२ जै से पीलियेके रोगीको स्वेत स्स्तुभी पीत(पीलेरंगकी) भाप होतीहै तैसे जिसको मिथ्या महोदय कर जीवादि पदार्थोका विपरीत पणे भाप होवेसो मिथ्यातृ'दृष्टि और३ भोले मनुष्यकी तरह अनसमझ से पदार्थोंका स्वरूप कुछ यथार्थ समझे कुछ यथार्थ श्रद्धेसो मिश्र दृष्टि. ७ भव्याभव्य द्वार:- जैसे अनाज अग्नि पाणी और भाजनका संयोग मिलनेसे सीझता-पकता है. फिर वो अंकूर समुप्तन्न करने जैसा नहीं रहता है. तैसहि जो ज्ञान दर्शन चरित्रकी पूर्णता को प्राप्त हो सर्व कोंक विवंश कर सीझते हैं मोक्ष प्राप्त क- रते हैं उन्हें भव्य जीव कहेजते हैं और २ जैसे मूंग मोठ अदि कितनेक अाज में कू चीर कोरडू अनाजके दाणे निकलते हैं, वो मणोंबन्ध पाणी अग्निके संयोग में वर्षों- वन्ध सीझानेमे भी सीझते-पचते नहीं हैं परन्तु अंकूर समुप्तब हो बृद्धि पाते हैं, तैसेहि जो जीवों व्यवहार ज्ञान दर्शन चरित्र की क्रोड पूर्व तक अनन्त भवमे पालन करके भी भव घटानेकी रसायण न निपजासके, मोक्ष प्राप्त कर सके नहीं. अनन्त भव भ्र- मण कराही करे सो अभव्य. "चरमाचरमद्वारः"-- ४ गति, २४ दंडक, ८४००००० जीवायोनी और १.१७५००००००००००० कुलोमे से एकही गति, एकही जाती ए. कहीं योनी, या एकही कुलका चरम पणा कर देवे, अर्थात् फिर उसमे कदापि उप्तन्न होवो नहीं सो चरम. और जिसने एकभी भव कमी नही किया हो. हाल सवस्थान जन्म मरण कर स्पर्श ना वाकीरहा होवे सो अचरम. ९ परितापरितद्वारः-जो जीवों अनन्त कालसे ससारके सन्मुख मुख करके प. रिभ्रमण कर रहे थे, वो जीवों कमशि पतला पडनेसे मिथ्यात्र गुणस्थानका त्याग कर संमारके तरफ पीठकर मोक्षकी तरफ मुखकिणवो कटापि सम्यकत्वसे पडवाउभी होगये तो भी पीछ चडकर जरूर मोक्ष पायेंगे. इसलिये उन्हे परत कहना, और .मोक्ष मन्मुख नहीं हुवा मो अपरत. १० पट्टीद्वार:- पट्टीयों २३ होती है, जिसमें ७ एकन्द्रिय स्खकी ७ पचन्द्रिय 40 8 मुक्ति सोपान श्री गुणस्थान रोहण अहीशत द्वारी ३१५ रनकी, ओर १ मोटी पद्धि. इनका स्वरूपः १ चक्र रन सो. छेहो खण्ड साधणे का रस्ता वतीव. २ 'छत्ररत्न' १२ योजन में छांहकरे शीत ताप पाणी से वाव. ३ 'दण्डरन' बेताड पर्वत की गुफाके कमाड खाले, रस्ता सम करे- ४“ खड्गरत्न हजारो कोश दूर रहे शत्रुकी भी घातकरें [यहचारों चक्रवतिकी आयुध शाळामें उत्पन्न होते है.] ५ 'मणिरत्न' वारह योजनमें चन्द्रमाके, जैसा प्रकाश करे. ३ कांगुणीरत्न सोनारके ऐरण के जैना चारों तरफ चार २अङ्गल होता है, इससे तमस गुफाम आर खण्ड मापात गुफामे एकेक योजनके अन्तरसे गोलचन्द्रमा जैसे मण्डल अलखते हैं. जिससे चक्रवती जीते रहे, वहांतक उत रस्तमे प्रकाश बना रहता है, और ७ 'चरम- रत्न गंगा सिन्धु जैते वडी छोटी नदीयो मे डालनेसे१२ योजनकी नावारूप बन जाता है जिसमें सव सेना युक्त चक्रवर्ती स्वारहो पार हो जाते हैं. तथा खेतरूप वन सर्व पं दार्थ निपजा देता है ( यह तीनों लक्ष्मी भंडारसे उपजते है ) (यह ७ एकेन्द्रियरन) ८ 'सेनापतिरत्न' भरत क्षेत्र मे के वीचमेके दोनो खण्ड छोडकर वाकीके चारों खण्डो का साधन करे. १ 'गाथापति ' चरम रनको खेतस्वरुय वना उसमे अनाज मेवे म- शाल वावे. वो एक प्रहर में सव तैयार हो जावे, उने दुसरे पहर मे रान्ध कर-पका कर तीसरे पहर मे सब सेना को जीमा, देवे. १० 'वढाइ रत्न'-चक्रवर्ती का जहां प- हाव होवे वहां वारह योजन लम्बा नव योजन चोडा राज मेहल पोपध शाळा सहित एक मुहुर्त मावमें नगर वसा देवे ११ 'पूरोहित रन'महूर्त शकुन स्वप्न फल सामुद्रिका, दि वता वे. शान्ति पाठ पहे. (यह चारो रन चक्रवर्ती की नगरी मे उत्पन्न होते हैं.) १२ स्त्री रव'-श्री देवी-वेताड पर्वत पर उत्तर दिशा की विद्या धरों की श्रेणि मे राज कन्या महा दिव्य रूप वन्त परमाणों पेत उत्तम लक्षण व्यजन सम्पन्न होती है, कुमारी का की तरह सदा योवन वन्वि रहती है, १३:१४ अञ्च रन और गज रत्न दोनों वेताड पर्वत के मुल मे उत्पन्न होते हैं. खुद चक्रवर्ती को सवारी में काम आते हैं. (यह ७ पचेन्द्रिय रत्न (यह ३४ ही रवा चक्रवर्ती-राजा के होते है. इनकी ए- केक के एकेक हजार देव अधिष्टायक होते हैं.) १५ 'तीर्थकर' चारों तीथोंके स्थाप क सर्व जगतके पूज्य महन धर्म गुरू सर्वज्ञ सर्व दर्शी होते हैं. १६ . 'चक्रवर्ती सपूर्ण भरत क्षेत्र के श्वामी, हजारों देवों के पूज्य. महा ऋदि वन्त महाराजा होत हैं. १७ 'वामदेन' आधे भरत के स्वामी चक्रवर्ती से आधी साई वाले होते है.१८ वलदेव' व. नृडेव के बडे भाइ होते है. पत्तृ सद्धि आधीन पाते है. (यह ४ उत्तम पुरुप) ११ - ..

प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड र केवली' सर्वज्ञ सर्व दर्शी, महाज्ञानी महात्मा. २० 'साधु' २७ गुण युक्त. २१ श्रारक ११ गुणयुक्त. २२ 'सम्यक दाष्टि-शुद्ध श्रद्धावन्त और २३ मंडलिक राजा-एक देश का अधिपति. (यह ९ महा पवी.) १२ आत्मा द्वार:-जो खुद जीव द्रव्यहै सो द्रव्यात्मा. २ उसकी क्रोधादि क. पाय मम प्रणति परिण में सो कषायात्मा, ३ मनादि जोग में प्रणति परिण में सो जोगात्मा. ४ शुभाशुभ उपयोग में परिण में सो उपयोगात्मा. ५ ज्ञान में परिण में सो मानात्मा, ६ दर्शन देखने में पारण में सो दर्शनात्मा. ७ चारिख रूप परिणमा परि ण में सो चारित्रात्मा. और ८ शुभाशुभ कृत्यों में वीर्य वन्त उद्यम वन्त होवे सो 'वी र्यात्मा. १२ ध्यान द्वार:-सो ध्यान ४ प्रकार के होता है:-१ अर्त ध्यान, २ रौद्रः ध्यान (यह दोनों ही खराब हैं. सो छोड ने योग्य हैं. और) ३ धर्म ध्यान, ४ शुरु ध्यान (यह दोनों अच्छे हैं मो आदरणीय है.) १३ ध्यान के पाये द्वारः-चारों ध्यान के १६ पाये होते हैं: प्रथम आर्त ध्य. न के ४ पाये:-(१) अनिष्ट के संयोग से. (२) इष्ट के वियोग से, (३) रोग के उद्भव ने से. और (४) भोग की इच्छा से जो विचार होवे सो आर्त ध्यान +.| दुसरा है, ध्यान के ४ पाये-(१) हिंसा की (२)झूठकी(३) चोरी की और (४) विषय के संरक्ष प की इन चारों की अनुमोदना कर ते जो विचार होवे सो रौद्र ध्यान. ४ । तीसरे धर्य ध्यान के ४ पाये:-(१) आणा विचयः-जिनाज्ञा में रहने का, (२) अपाय विचय कों के नाश का, (३) विपाक विचय-कोंके फल का. और (४) संस्थान विचय- + आर्त ध्यान के ४ लक्षण-१ भाक्रन्द करे, २ शोग करे, ३ रुदन करे, और ४ विलापात करे. रौद्र ध्यान के ४ लक्षण-१ थोडा दोष लगावे, २ बहुत टोप रगावे.3 अज्ञानी, ४ अविचारी. x धर्म ध्यान के ४ लक्षण-१ जिनाज्ञा आराधने की, श्रुत चारित्र धर्म आगधनेकी ३ शास्त्र श्रवणकी औरट उपदेश ग्रहण करनेकी-उन चागेकी रूची वाग होवे । धर्म ध्या नी के ४ आलम्बन- मूत्रादि धर्म प्रन्यों का पठन करे, २ मंशय नियार ने प्रश्न पूछे. ' मम्मानित करने पर्यटना करे, भार ४ धर्म वृद्धि करने धर्म कथा कहे, धर्म ध्यानी की ? - से मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अहीशन द्वारी * लोक के संस्थान का. वीचार होवे सो धर्म ध्यान । चौथा शुक्ल ध्यान के ४ पाये (१)पृथक्त वीतर्क-अलग २ पर्यायों को वीतर्क सहित विचारे, (२)एक्त्व वीतर्क-एक ही पर्याय को वीतर्क सहित विचारे विचार-पलटे नहीं. (३) मूक्ष्म क्रिया अप्रति पाति फक्त इर्यावही क्रिया. और अपडवाइ होवे. और ४ 'व्युछिव किरित्त अनिवात्त ध्या. ता सर्व क्रिया रहित मात्र मार्ग में अखण्ड प्रवर्तक. १४ 'द्रव्य द्वार द्रव्य मकर के:-१ धास्ति. २ अधर्मास्ति, ३ आकास्ति ४ काल.५ जीवास्ति. और ६ पुद्गलास्ति. गाथा-परिणाम जवि मुत्ता । सपएसा एग खित्त, किरियाए । णिचं कारण कत्ता । सव्व गइ इयर अपवेसा ॥१॥ अर्थ-व्हो द्रव्यों में से परिणाम जीव और पुल अन्य द्रव्यों में परिणन ने से परिणानी हैं. और चारों द्रव्यों निज स्वभाव मे ही रहनेसे अपरिणामी हैं. 'जीव जीवतो चेतन्यादि लक्षण युक्त जीव है और पांचों निर्जीव है. 'मुत्ता'-पृढ़ल देखने में आते हैं नो मूर्ति है. और पांचो अमूर्ती है. 'सपएना काल है सो अनदेशी है' और पाचों समदेशी है. जिस में आकास्ति और पहल आस्ति तो अनन्त प्रदेशी है. वाकी तीनो अख्यात प्रदेशी हैं. 'एगे-छहो द्रव्यों मे धर्मास्ति अधर्मास्ति और आ- काशस्ति यह तीनो एक एक द्रव्य हैं. और काल जीव पुइल अनन्त है. 'खेत्त-आ- काश तो मब जीवों को अवगता (स्थान) देता है. इसलिये भेव हैं. और पांचों द्रव्य आकाश रूप क्षेत्र में रह ने में क्षेत्री हैं. किरियाय जीवके और पुग़ल के मंयोग मे अनुप्रेश-१ पुदल्कि वस्तु निच जाने. २ स्तर का सम्बन्ध जमार बने. : अल को एकही जाने, और ४ संसर को दुख का कारण जने. र पानी के ४ -१ पास अन्यन्नर स्पोग से म्दा अन्ग है. राग द्वेष नाम को पातले बरे. ३ तनों पागों को स्थिरी भूत बरे .४ म्वया मेटना नाश , र पानी के ४ लिन - मान्न तन्वी होवे. २ नि होवे. ३ शल स्वभावी होने. ४ निम्निी हो । हुक्त पानी की ४ अनुद- पचों प्रप को मापन कारन को. २ अन्तरजीहत ने निकाले. ३ हुन उपनले दूर है. और ४ पूदलें। पत्र में रमने नहीं.

। - प्रथम अर्थ का"डका प्रथम मूल द्वारा राहणे कन्ड हरेक किरिया निपजती है. और चारों द्रव्य अक्रिय हैं. 'णिचं पुद्गलों की पर्यायका पन्या होता ही रहता है । जिन में अनित्य है. और पाचों द्रव्य नित्य है. कारण'- जी के पनि द्रव्य काम मे आने इसलिये पांचों कारणी, जीव अकारणी. "कत्ता'- जी मान युक्त है इसलिये मत्र कार्यों का कर्ता है. पांचों अफर्ता है. "सव्यगइ इगा " और मन स्थान एक आकाश द्रव्य भारा " परिणाम द्वार'-गो जो घटते जाने-पढ़ते जावे उसे हायमान परिणाम के हो जो गाने नारेमा गृन्द्रमान. भोर जो मदा काल एकसे बने रहै घटे यद्वे गई। गोगा पारगाम. १६. गर्ग दार-जो भगानी अप्रति जीपों उद्यम करते. पराका पादन, ६. मी पायी जा श्रापक ना काल धर्म मार्गमें और कुछ मंमार मार्गम दोनों त. ITTER पंजाबाट पनि वीर्य. और जो मुनिगनों एकान्न धर्मार्थ १ .. . क्षम । 3 १ " नाना दा'-जा मार गमद के किनारे आहे. पण मोक्षगाणी गा श्रा आमाका नारी की जान है. चांग मियाय जो जीत है। 7: जान गाय :- उपमन, . . . . . ... महापार ( . किमी पनि +Fi नाजीर काली पनि ममा । - 7:27. धान कम पिना मानी मालिनि । ..... ::::, या माग कामको मार कटारिन 41 :::;, अशा पाल्यादान का 7 ८५.६.. ५ ५ मा राना मान । पताजी ::...144 का; 2,72 TriziHE7 7.! ; : 27.744:24 712 27 11:५९, ५ • 27 mr. -- ran - k * -- है 7 * - - A मुक्ति मोपान-श्री गणस्थान रोहण अहशित द्वारी ३१२ जै वृद्ध पम्प आश्रय निमित्त जैष्टिका लकडी गृहण करना हैं परन्तु उभे द्रह भी गृहण नही कर गक्ता हैं. और छोडताभी नहीं है. तैही इस माम्यकत्व वाले तीनों त- वों की शुद्ध श्रद्धा नो रवते परन्तु इम लोकके मुखाई उनका भजन मेवन करें पद लिक मुख की वांछा करे. इनने मिथ्यात्वकी वर्गणा उदय में आइ उनका भय किया परन्त मन्यकत्व मोहरूप कछ अंश रहगया मो भयोपशम सम्यकली. (३) मास्वादन मम्बकवी नो- उपरकही हुइ उपशम और श्योपगम सम्यकत्व बनने अनन्तान व- न्धिका उपशम कियाथा उनका पुनः उदय होनेने निथ्यात्वकी तरफ जीव गमन करें. वो अन्तगलबनी रहे वहा तक मास्वादन मम्यकत्र गाती है. (१) वेदक सम्यकत्व अयोपशम सम्यक्त्व में उपगमाइ हुइ प्रकृनियों पर्वथा भयकर आगे बडे. और क्षायि क सम्बस्त्र प्राप्त नहीं कर सके उनके बीच में उन मनों पतियों को पाने के लिये १ ममय माद चेदं को वेदक सम्यक्ष. () धायक सम्पवय' पगेत माना प्रकृति का नया नाम होनेमे सर्व दोपो रहित अन्यन्त विशुद्ध निर जो गुणाती प्राप्ति होवे मोक्षायिक मम्यक्त्व. यह मादि अनन्न नी । १९ "मयता भयनि द्वारः"-जो सर्व विगत माय गोवे मो मंथति जिनके का। नबन हो और कुछ आगर होवे मो श्रावक भयानामपति. और जिनके कुलसी प्रत नोवेमा अयति. २. लिङ्ग द्वार:-जिम भेप को देख लोगो को पस्तीत होरी पर जब हस्थ या माध) पुरुष है. उने लिङ्ग-चिन कहा जाता है. नो नीन मजा होत:: -~~-१ जो रजहरण महपाने आटे जैन मुनिक भपरे धारकमा मानिइगोनिया वा भगवे वरम् आदि दादा जोगी भेपके धारक. मो अन्य लिङ्ग. और पनडी भाग- ग्दा आदि का भेप मो शान्डि १ चारित्र द्वार-दागे गनिने द्वारा अली पभमान - रोचावे नया पारो तापाय भाला में स्टार र मान्न दान दिन चान्ति के प्रकार:- मानादिर सन्दिर मे नाक्य पार गरी मानि और भावने गम मन्रो परिपानो में मदद मिटन:- मानसीमादि मोसमापद सादि. ईदीदः- 57::: नीम के नीदने मदिरसन्दिर निवा.. सनीने .: r ३२० प्रथम अर्थ काण्डका प्रथम मूल द्वारा रोहण खन्ड र में आरोपण किये जाते हैं. सो 'इतरीय सामायिक चरित्र' x और (२) मध्यके २२ तीर्थकरों के साधु जाव जीव पर्यन्त सामायिक चारित्र वन्तही रहते हैं. मो अवकाही यु सामायिक चारित्र. २ छेदो स्थापनीय चारिवसो जैसे छिदे फटे हुवे वस्त्र को जो . ड कर (सीकर) वरोवर करते हैं, तैसेही चारीवीयों दोपित आत्मा को फिर विशुद्ध करे सो छेदोस्थापनीय चारित्र इसके दो भेद;-१ प्रथम चरम तीर्थंकरों के बारेमे के साधुओं मूलगुण पंच महाव्रतों उत्तर गुण समिती गुप्ति प्रत्याख्यानादमे अना चीर्ण लगाकर धातिक होवे उनको पुनः संयम में स्थापन करने ननिर महाव्रतों का आरो पण करे, जितते पूर्व पर्याय का विच्छेद होवे सो सप्रतीचार छेदोस्थापनी. और इ- तरीये सामायिक चारित्रीये को किसी भी दोप के विन सेवन कियेही ७ वे दिन ४ महीना या ६ मीने मे जो महाटतों का आरोपण किया जावे मो तथा तीर्थंकरोंका : सासण का संक्रमण होत अवस्थित कल्प से स्थितित कल्प अङ्गिकार करे नियो को भी छेदोस्थापनी किये जाते हैं. + मो निरती चार छेदोस्थापनी ३ परिहार वि शुद्ध चारित्र मो उत्तम तप, उत्तम परिणाम, उत्तम पर्याय मे सदा शुद्ध व्रति रहे में परिहार विशूद्ध चारित्र, इसके दो भेदः-(१) परिहार विशुद्ध चारित्र में प्रवेश के रते मुनिको निरविप्तमान कहते हैं यह और (२) तपसे निवृत हुवे मुनिको निराविटका य कहते हैं, यह परिहार विशुद्ध चारित्र प्रथम और अन्तिम तीर्थकरो की वक्तमे ती थकर विराज मान होते हैं उसही वक्त होता है. २२ तीर्थकरों के बारे में महाविदेह ! क्षेत्र में या तीर्थकर मोक्ष गये वाद यह चारित्र नहीं होता है. और जिनोने पहिले प , रिहार विशुद्ध चारित्र अनि कार किया हो उनही के पास दुसरे परिहार विशुद्ध अ. ङ्गिकार कर सक्ते हैं. दुसरे के पास नही यथा दृष्टान्त जैसे १ साधु ओ परिहार वि. शुद्ध चारित्र पालने प्रवर्त हुवे. उनमे से एक साधुतो कल्पास्थित होते. उनके समि- त्य आठों साधु समाचारी का वाहन करे, उन आठ साधुओमे से चार साधु तप करे ४ कितनेक आचार्या गृहस्थ की सामायिक को इतरीय सामायिक चारित्र कहते हैं. और साधु की सामायिक का अवकाहीय सामायिक चारित्र कहते हैं. + जैसे श्रीमहावीर श्वामी के सासण की प्रवर्ति हूवे बाद पार्ध नाथजी के संतानीये केशी श्रमणको गोतम स्वामी ने छे दो स्थापनीय चारित्र दे भेल किये.

मुक्ति मोपान श्री गुणस्थान रोहण अमित द्वारी मो परिहारिक मात्र के जाते हैं. और चार माधु उनकी वैयावच करें मो अपरिहा- रक माधु कहे जाने हैं. ६ महीने हुवे वाद पनिहारिक (नपत्री) माधु ओं नो अपरि- हारिक बयावची बनते हैं. और अपरिहारिक परिचारिक बनते हैं. फिर छ महिने दुवे वाद जो पहिले एक माधु कल्य स्थिन रहेथे वो पनिहारिक बनते. और आगजनी वैयाक्च करने अजो पनिहारिक माध नप करते है वो उपण ऋतु में चयन्य घ. (१ उपवास) मध्यम छह बेला उत्कृष्ट अटर नेला गीत कन्या (वेला) मध्यन अटम ने या उकृष्ट कामाचीला और मा मध्यन दगमा शेकटानगम पचोला)कर.ओरजी अराग्दिनः 1. आारिक ने है. नगप आदेत का है. यो : ८ काम: पवान, पर पुनः नपरुंग. और की नो पो गरिन.. परिवार विद चान्ति का जाना चाग्दि ना. दुर्म के नहऔर "पं की बनी कि- पं की वय वाद नादिरा को : स्थिवर पणा प्राप्त होये नमी पगितार विधि . वसम अचान पतली. नकार दपाय. 'भ ग्प कपार गाल दवाये गप काना हमको भर .) RITE - हा गुणग्यान में आये उनके {म सम्पनी को जान है :- पमान में आयी. एक- अन्ना मतदार : सामान पागि : आमा पार . हिमानी :: 1. . . :

. सो सो. ३२२ प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड र पीछे कदापि पडे नहीं लो अपडवाइ यथाख्यात चारिवि. २२ नियंठा द्वारः-कर्म रूपी ग्रन्थी-(गॉठ) से छुटने वाले होवे सो निग्रन्थ ६ प्रकार के होते हैं.-१ 'पुलाक निग्रन्थ'-यथा दृष्टान्त-जैसे खेत में से शाली नामक धन्य के वृक्षों को काट कर एकस्थान हग किया, उस में-धान्य-अनाज तो थोडा औ र कचरा (घांस) वहत होता है. जिन में चारित्र के गुण तो अनाज जैसे थोडेही पा. ते हैं. और दोप बहुत बड पाये हैं. ऐसे निग्रन्थ के दो भेदः-(१) लब्धि पुलाक जो पुलाक लब्धि के योग से कोपायमान हुवे चक्र ति की सेना का चूर्ण कर डा- ले, और (२) दुसरे प्रति सेवना पुलाक के दो भेदः-(१) मूल गुण पुलाक महा व्रत का भङ्ग करे, और (२) उत्तर गुण पुलाक के ५ भेदः-एक-ज्ञान पुलाक ज्ञान की विराधना करे, दुसरे दर्शन पुलाक सो-सम्यवत्व का भङ्ग करे, तीसरा-चा. रिव पुलाक सो-दश पञ्चखाण समिति गाप्तिका भङ्ग करे. चौथा-लिङ्ग पुलाकसो साधु के वेप का पलटा करे, और पांचवा-यथा सूक्ष्म पुलाक सो-अन्तः करण में कपायदि की प्रवलता रहै. । २ वुकस नियंठा सो-यथा दृष्टान्त-उस शाली वृक्ष के ढग मे से घास-पराल निकाल अलग डाले तब भी उस शाली के ढग में पूर्व की अपेक्षातो क- चरा बहुत कम होगया तो भी अनाज से कचरा ज्यादा है, तैसे ही गुण थोडे और दुर्गुणों की विशेप ता होवे सो वुकस निग्रन्थ-इनके दो भेदः-(१) शरीर बुकस हाथ पांव पखाले, शरीर की विभूषा करे. और (२) उपकरण बुकससो वस्त्र पत्र शु. शोभित रक्खे. और भी बुकस निग्रन्थ के-५ भेदः (१) अभोग बुकस मो-जानके दो प लगावे. (२) आना भोग बुकम सो-अनजान मे दोप लगावे (३) सबुड बुकस सो छिपकर दोप लगावे. (४) असबुड बुकस सो-प्रगट दोष लगावे. और (५) यथा सूः क्ष्म वुकस सो-अन्तः करण में कपाय की तीव्रता रक्खे. यों अतीचारो कर संयम गु. णों को कावरे वनावे सो वुकस निप्रन्थ जानना. । ३ प्रति सेवना निग्रन्थ सो यथा दृष्टान्त-जैसे उस शाल के ढग को खले में डाल वेलोके पग से चगदा हवा मे उडा. उफण उस में का कचरा दूरकर शाल का एक तरफ ढग करे, उस में किंचित मट्टी, कुछ फोंतरे आदि कचरा होनेसे अनाज की और कचरे की तुल्यता होतीहै, तैसे ही जिन मुनि के गुण अवगुण की तुल्यना होवेसो-मति सेवना निग्रन्थ इन के दो भेदः १) प्रति सेवना कुशील सो किचित दोष सेवन करे, जिस के ५ भेदः-(१)ज्ञान प्रति सेवना सो ज्ञान के १४ आतिचार लगावे. अल्प ज्ञाताके योग से हीनाधिक ठन उ. सो .

- मुक्त सोपान श्री गुणस्थान रोहण अदीशत द्वारी चारन करे, (२) दर्शन प्रति सेवना सो-स्वपरका मन रखने हिनाधिक परुपणा करे, (1) चारित भात मेवना सो-प्रमाद के वश उत्तर गुणकी खन्डना करे,(४) लिङ्ग प्र. ति सेवना सो-लोकीक साध ने वस्त्रादि की शोभा करे, और (५) यथा सुक्ष्म मति से चना सो-उबस्तता से मुक्ष्म आतिचार लगावे. ४ कपाय कुशील निग्रन्थ सो-यथा - धान्त जै-उस ऊफाणे हुवे शाल ध्यान्य को ऊखली में कूटकर उसके फोंतर-छिलटे अलग कर फक्त चांवल ही रक्खे, उस में धान्य ज्यादा और कचरा थोडा, तैसे है। जिनों में गुण ज्यादा और अवगुण थोडे होवे व्यवहार को शुद्ध रख कर स्वपर के सुधारे के लिये क्रोध भी करे. मताभिमान धर्माभि मान भी रक्खे. शाशन के मुधारेके लिये. वादीयोंके विजय के लिये. मायाका भी सेवन करे. शिष्य सम्प्रदाय शास्त्र ध. मोप करण वृद्धि का लोभ भी करे. इत्यादि निमित से दोप लगाने की इच्छा विना भी दोष लगायेनो कपाय कुगोल निग्रन्य, इन के ५ भेदः-(१) ज्ञान कपाय कुशील (२)दर्शन कपाय कुशील.(३)चारिख कपाय कुशील.(४)लिङ्ग कपाय कुशील और( यथा नून कपाय कुगील. इन पांचों का अर्थ प्रति सेवन नियंठे मे कहा मुजब जान ना. विशेष इतनाही की यह किंचित संज्वल के लोभ के वंशहो किचित ढोप महनही लगात है. तो भी सदा शुभ योगों की प्रव्रती में दोपों में आत्माको बचाने का यत्न करते है. ८ निग्रन्य नियालो यया दृष्टान्त जैसे वो ऊबलीमें कूटके माफ किये चां वलो सुपने इरक कंकर बीन शुद्ध करे तब उनमे मेल रूप कचरा तो जरामा र. हा.और आज विशेपधिक होवे.नेही निग्रंथ निबन्ध मोहकर्म रूप लाली रहित कर्म ग्रन्थ रहित भकपायो भायिक भाश वीतरागी होने इनके ५ भेद:-(१)वीतराग भा- व प्राप्त हुने उनी समय पहन सनय निग्रन्य (२) नन्तर अन्तर मुहूर्त तक रहे मो अप हर समय न्निन्य (:) इसस्थान की अन्तिम अवस्था सो चरम समय निग्रन्थ (४)इ मस्थान के अन्निन समय के पहिले ममये मो अचरन समय निग्रन्य. और (५) इमु. स्थान की वनी मो यथा मूक्ष्म निप्रन्थ । ६ तातक निग्रन्य मो यथा दृष्टान्त जैने साफ किये चांवलों में से सन्डित चांवलों को अलग कर अवण्ड चांवलों को पाणोने धोकर रज मेल कलंक हित शुद्ध पचिव निर्मल जिये. फक्त धान्पही रहा कि चित भी कचरा नहीं ही नर्व चातिक कोंके दोपरहिन उजद परिणामी शुलल्या नी होरेमो मनानक निनन्य इनके ५ भेटः-(१) जोगों का निस्चन कियानो अच्ची (२) भनिवार रूप मेल रहित हुवे मो असबल (क) बनयातिक कर्मों के अंग गहन र.

३२४ प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड * वे मो अकर्माश (४) शुद्ध ज्ञान दर्शन के धारक अहंत जिनेश्वर केवली हुवे मो संसु द नाण दमण धरे अरहा जिण केवली और [२] मर्व योगों का निरुधनहोने से स. व कर्मो का आना रुक गयासो अपरी सबी हुवेसो निग्रन्थ. २३ कल्पद्वार-मर्यादा कायदा सो कल्य ५प्रकारके होते हैं:-स्थिति कल्प सो प्रथम और चरम तीर्थकर के वारे के साधुऑको सामायिक चरित्र की पर्यायका वि. च्छेदकर छेदोस्थापनिय किये जावे सो स्थिति (मर्यादित) कल्प. २ अस्थिति क- ल्पसो- वीचके २२ तीर्थ करोंके वारके साधुओं सदा सामायिक चरित्र में रहेसो. ३. जिनकल्पसो' वनवासी साधु, मूंढ हात कापना और तीन हातका लम्बा बखे, उससे ग्रामये जावे तव गुप्ताङ्ग ढकलेवे, और ग्रामसे निकले वाद उसे दूर रक्ख दें. एक पावा, ओगा, मुहपति, झोली, गणना, इन सिवाम और उपकरण रखे नहीं. सिं ह. मर्प, कांदा प्रमुख मन्मुख आये तो आप टले नाही. रोगादिका उपचार करे नहीं. यों ६ महिने पर्याय पालकर फिर स्थिवरकल्प में जावे' और २ कल्पातीत सो कल्प का करता श्री तीर्थकर जो स्वइच्छा से सर्वोत्तम आचर पालते हैं. सो कल्यतीत सर्व कल्प से रहित होते हैं. ८ २४ परिमहद्वारः- मृव "मार्गाच्यवन निर्जराथ परिपोढव्याः परिपहाः" अर्थात- मंयम धर्म रुप मोक्ष मार्ग में प्रवर्त ते उनमें विधन करने जो दूसरों की तरफ में अर्यात चार+कों की उदय रूप प्रेग्ना होनेमे दुःख सकट आकार पडे उन्हे + २२ परिमह चार कर्म के उदय से होते हैं.-"ज्ञानायर णा" प्रज्ञाज्ञान २० वा प्रज्ञा परियह, और २१ वा अनान परिपह ज्ञामावरणीय कर्म के उदय से होवे. "दर्शन मोहन्त गयको दर्शन लाभो." मम्यक्ष मोहनीय के उदय २० वा दंमण परिसह, और अन्तगय क- म के उदर मे १५ वा अगम परिमह, “चारित्र माह नाग्न्य गति स्त्री निषद्या भोग याचा मकार पुम्मा".-चारित्र मोहनीय के उदय मे : अचेल, ७ वा अगति, ८ वा स्त्री, १० वा निमेज,१० बा अक्रोग, १४ वा याचना, और १८ सकार पुष्कर यह ७ परि- मद, "या वैदानमा " और बाकी रहेमो-१ क्षुधा, • तृपा, शीत, ४ उग्ण, ५ दंग मचा.. चगया. ११ गया, १३ वध, १६ रोग, १७ तृण म्पस, १८ मामल, यह ११ पारभद्र वेदनीय कर्म के उदय मे होय.

-- माक्त मोपान श्री गुणस्थान रोहण अहीशत द्वारी अपन धर्म मार्गमें स्थिर और उदयमें आये कोंकी निर्जरा करने-श्रय करने जो वि. कल्प गहन मम भाव मे मना करना उमे परिमह जय कहते हैं. सो परिसह २२ हैं: सूत्र-क्षुत्पिपासा शीतोष्ण दंशमसक नागन्यारति ।। स्त्री चा निपद्या शय्या क्रोश वधांचा लाभ ॥ रोग तृण स्पर्श मल मत्कार पुरस्कार प्रज्ञा अज्ञान दर्शनानिः- अर्थ सुधा परिसह निदाप आहारका जोग नहीं मिलनेते सदोष अहारकी वांछा नही करे. २४परिमह अचित पाणी नहीं मिलनेमे सचित पाणीको छीनेकीभी वांछा नहीं करे. शीनारिसह-शीत (ठन्ड) लगने अधिकवस्त्र रखनेकी व तपानेकी वांछा नही करे ४ उष्णपरिनहः- उष्णता (गरमी) लगनेमे गीतोपचार नहीं करे. ५ दंसमसपरिसह डांस मच्छर पटमल आदि जीवो का दंश समभाव सहे. उने अलग नहीं करे. ६ अचे ल परिसह-वस्त्र रहित होजाये तोभी सदोष बत्र बांछे नहीं. ७ अरति परिसह-संयम में संकट पडे तो आरति चिन्ता नही करे. ८ स्त्री आदि को देख विषय बाछा नही करे- ९ चरित्या परितहः-विहार (गमन) कर्ता घबराय नहीं १० नितिजा परिसहा बैठने वि- मम भूमीका मिले तो क्लेश नहीं करे. ११ शय्या पलिहा-अमन्योग मकान रहने को निलने से खेद नहीं करे.१.२अन्नोश परिसहः कठिन वचन सुनद्वेप नहीं करे. १३ बन्ध परिसहा-मत्ताड मम भाव नहे.१४ याचना परिमहः-आहर वस्त्रादि याचता मांगता श- रमाय नहीं. १५अलाभ परिमहा इच्छित वस्तु नही मिलतो देष नहीं करे १८ रोग प- रिसहः-रोग उत्पन्न हुवे समाधी भाव रक्खे मचित औषधी नहीं करे. १७मृण स्पर्शप- रिमुहा-तृणाकी शैय्या के स्पर्श से कोचवाय नहीं. १८ जलमल परिसहः-पशीने और मेल से घबराय नहीं. १९सत्कार पुरस्कार परिमहः-सत्कार सन्मान वांछे नही.२० प्रज्ञ परिसहः-पण्डित हो प्रश्नोत्तर करते घबराय नहीं. २१ अज्ञान परिसह -विशेप ज्ञानकी प्राप्ति नहीं होवेतो खेद नहीं करे. और २२ दंशण परिमहः- सम्यक्त्व में शंका के खा दी दोष नहीं लगावे. २५ प्रमाद द्वारः–पर परिणति का मद में आला को परिणमा मो प्रमाद पांच प्रकार के हैं- गाथा-मद विषय कषाय । निदा विगहा पंच भणीया।

A-4 - - PM ३ स प्रथम अर्थ काडका प्रथम मूल द्वारा रोहण खन्ड ५ ए ए पंच पम्माया । जीवा पडन्ति संसारे ॥ १ ॥ पा-१ मा-मामीग के नशे मे मनुष्य के भान होते हैं तैले ही-(१) ज. रिम.. (२) कल मा. (३) बल मा. (४) रूपमद, (५) तप मद () मूत्र मद,(७) म. ८) मा इन मद में एक मद मे छका हुया भात्म वे वश्यहो जा नागोजी नामा छा जाना है उगुती क्या दशा ! । २ विषय जैसे- finit मागी अाठ पत्य निपगत है. सो (१) श्रुत इन्द्रियकी ३ ITTER बान्दियलिग (३) धणेन्द्रिय की विषय (४) सेन्द्रिय ८ विषय (.) मणिय गं , इन्द्रियों की २३ विषय में किसी भी एक भी HTTE .:: अप गणी की अफाट मृत्यु होती है, तो जो २३ ही विषय FE IF या दया ? 3 'कपाय, जो कमी के कप रमको बन कर अ पाया और पापा को गरु (मारी) बनाकर भगार में इयाय ETITI) र (') मान ) माया (४) लोभ, इन चारों ... TET पाय में ग्पण करने वाला आत्मा मार में ट्रय जाता है, तो . गत उनमा क्या दमा:। निन्दा जो निन्दनीय वानु पाक 'निद्रा कवा में मान्मा का हानाह. और(२) दादा, र, प्राण वाट बालन न मी मात्रा मा म विगाव होता ... Hit : का कार्य वाता। चार प्रकार की हानी (मीयों की श्रृंगा. , 77 बनाने की पाद की कया (3) गजानीकनमा पा " श्रर देना के पानी कथा. इन नाग F: दत्र कपटीन का परत पाना. नाना नागदा- : :: पानी प्रसाद के समय पर प्राधा मागम - भावना पत्र प्रदान ग में याद म. दार-मय परिय: Ur *-:-:-mittari कान, गला ", I tarrin दे दी श्री र - itah .. प *- -- ? --- * मुक्ति सोपान श्री गुणस्थान रोहण अहीशत द्वारी २७ पडवाइ अपडवाइ द्वारः-जो गुणस्थानारोहण कर (चड) पीछे पड जावै सो पडवाइ, और पडे नहीं सो अपड वाइ जानना. २८ छमस्त केवली द्वार:-जिनके ज्ञानके ज्ञानादि आत्मिक गुण कर्मो कर अ- च्छादित होवे सो छद्मस्त और (२) जिनो के घन घतिक कर्म रूप अच्छादन (ढक्कन) दर होने से पूर्ण तोर से आत्मीक गुण प्रगट होवे सो केवली. २१ समुदघात द्वारः-जो आत्म प्रदेशों का मथन हो किसी प्रकार के गुणाव गुणका घात होवे सो समुदवात ७ है:-१ वेदनी समुदघात असाता वेदनीय का उदय होने से जीव हायवाहा करे सो.२ कपाय समुदघात क्रोधादि उत्पन्न हुवे पतलेसे मनु- प्य को ५-७ मनुष्य संभाले तो भी संभले नहीं सो. मरणातिक सम्दघात सो मरती वक्त आत्म प्रदेशो निकलकर जिस स्थान उत्पन्न होना होवे वहां जमे और फिर आ- त्मा८ ऋचक प्रदेश के साथ जावे नव क्रोडा क्रोड गुणी वेदना होवे मो, ४वैक्रयम- मुदघात नो एक रुपके अनेक रुप बनाते प्रदेशो का मथन करेनो. ५ तेजन समुठ्या, त सो तेजुलेशा प्रगट कर उत्कृष्ट साडी सोल देश वालकर भस्म करेमो, ६ आहारक समुद्यात सो चउटे पूर्वके पढे हो मुनि राज आहारक लब्धि वन्त मन्देह निवारने या समवसरण की रचना देखने आत्म प्रदेशका पुतला बनाकर तर्यिकर व केवल ज्ञा- नी के वहां भेज इच्छा पूर्ण करेसो. और केवल सपुढघातमो केवली भगवन्त के आ- मुष्य कर्म रहे थोडे और वेदनीय कर्म रहे ज्यादा. तब दोनो को बरोबर करनेके वा- स्ने आठ समयने सनुयात होती है। प्रथम समय आत्न प्रदेश का मातवी नर्क कना- चे मे लगा ऊपर मोक्ष नक लम्बा दण्ड रुप होवे दूसरे ममय वो दण्ड के पूर्व पश्चिम में कपाट रुप होवे. तीसरे समयमें उन पटीयों का उत्तर दक्षिणमें मथन चरा रूप होवे- चोये समय में सर्वलोक में अन्तर पूरे (तब सर्व जगत् व्यापी बने पांचवे ममय में अ. न्तर लक्षार (भेला) कर पुनः मधन रूप वन जावे. छट्टे मयममें मयन महार कपाट रूप वनजावे सातवे स्मयमे कपाट महार दण्ड स्प वनजावे और आठवे म्मयमें दन्ड महार कर मूल रूप (अबल थे वै।) वनजावे. उन्के वाद कितनेक नो अ: उल इन पां चो अक्षरे के ऊचार मे जितनी देर लगे उनने काल बाद मोक्ष पधार जावे और कि- तनेक उत्कृष्ट : महीने बाद तो जगदी मोक्ष पावे. x * दी मम्मी के नर्थ नत्र की टीम में निक हैनि-जिनमा सय गन. .

३२८ प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा गेहण खण्ड ५ ३० देवद्वार:- श्री भगवति मूत्रके शतक उदेशामें ५ प्रकारके देव फरमाये हैं. १. 'भवीद्रव्यदेव'- जो जीवों मनुष्य तिर्यंच के भवमें देव गतिका आयुषन्ध कर बैठे हैं (मरकर देवता होवेंगे) वो भवी द्रव्य देव कहे जाते हैं. यह जुगलिये मनुष्य तिर्यव और मर्वार्थ सिद्ध के देवता सिवाय+सर्व स्थानसे आकार उसन्न होते हैं. और मरकर देव गति मेंही जाता है. इनकी स्थिति जघन्य अन्तर मुहूर्न की उत्कृष्ट ३३ मागरकी होता है. २'नरदेव' चौरामा २लक्ष हाथी घोडे रथ. लिन्न क्रोड पायदल सम्पूर्ण भरत क्षेत्र के महाराज चहाती होते हैं, मो नरदेव कहे जाते हैं. यह चारों जातिके देवता और प्रथम नरकसे आकर उप्तन होते हैं और मरकर नर्क में जाते हैं। इनकी स्थि- ति जघन्य ७०० वर्ष की, उत्कृष्ठ ८४ लक्ष पूर्वकी होती है. ३ 'धर्मदेव' पाच महाव्रत पालक साधुजी महाराज सो धर्म देव कह जाते है, यह छही मातवी नर्क, मनुष्य तिर्यच युगलिया, तेउवायु इन स्थान सिवाय सर्व स्थानके आये हुवे होते हैं. और मर कर देव लोक में तथा मोक्ष में जाते हैं. इनकी स्थिति जघन्य अन्तर हुहूर्त की उत्कृष्ट क्रोड पूर्वकी होती है. ४ 'देवाधिदेव' जो अनन्त चतुष्ठयके धारक सर्व जगत् के पूज्य श्री तीर्थकर भगवन्त सो देवाधिदेव. यह प्रथमकी तीन नर्क और वीमानीक देवता के आकर उप्तन्न होते हैं और मोक्ष पधारते हैं. इनकी स्थिति जवन्य७२वर्षकी उत्कृष्ट८४ लक्ष पूर्वकी होती है. ५ 'भावदेव' जो भवनपति, वाणव्यन्तर, जोतिपी, वीमानी, इन चारों जातिके देवों (जो देवता के भाव में विराजमान हैं उन) को भाव देवि कहे जा- ते है. यह सज्ञी मनुष्य तिर्य व पंचेन्द्रिय से आकर होते हैं. और मरकर प्राथ्वी पाणी वनस्पति मनुष्य तिर्यच में जाते है. इनकी स्थिति जघन्य दशहजर वर्षको उत्कृष्ट ३३ सागर की. इन पांचो देवों मे से सब से थोडे नरदव १२ ही होते हैं. इनसे देवाधिदेव सख्यात गुणें क्योकी २४ होते हैं. इनसे धर्म देव संख्यात गुणा क्योकी उत्कृष्ट नव- महीनेही बाकी रहा होय उनको केवल ज्ञान की प्राप्त होवे, वोही समुद घात करतेहैं. अन्य नहीं. परन्तु यह बात मिलती नहीं. क्योंकि तीर्थंकर के भी हेती है क्योंकि-युगलिया मरकर तो फक्त देवताही होते है. और सर्वार्थ सिद्धके देव मनु- श्य हो मोक्ष में ही जाते है. + चकवर्ती जो सयम लेवेतो स्वर्ग मोक्षमें जाते हैं. परन्तु तब नर देव नहीं रहतेहै. धर्म देव या देवाधी देव होते हैं.

५ज्ञान,
मुक्त सोपान-श्री गणस्थान रोहण अडीशन द्वारी *
हजार क्रोड होते हैं. इनसे भवीद्रव्य असख्यात गुणे क्योंकी असंख्यात मनुष्य तिर्यंच
देवायुबन्ध कर रहे हैं. और इनसे भाव देव असख्यात गुण क्योंकी चारो जातिके दे.
वता असंख्याते है.
३१ जीव परिनामी द्वारः- जिसवक्त जीव निज स्वभाव में परिणमें उसवक्त
परिणाम शुद्ध होवे. ओर परस्वभावमें परिणमें उसवक्त.अशुद्ध होते. जिससे जो भाव
जीवोंके उप्तन्न होवे उसे जीव परिणाम है. ( यहां कारण को मुख्यतामे कर कार्य का
उपचार किया है ) इसके भगवति मूव में ३५ बोल कहै.
गाथा-गइ इन्दिय कपाय । लेसा जोए उव ओगे ॥
णाणा णाण दिट्ठी । चरित्त वेए परिणामि ॥
अर्थ-४ गति. ५ इन्द्रिय. ४ कपाय. ६ लेश्या, : जोग. २ उपयोग.
३ अज्ञान. २ दृष्टि. ५ चारिव और ः वेद.
३२ 'करण द्वार'-जो जीवों के कर्म संयोगों में कारय भूत होगे सो करण के
भगवती सूव में ५५ बोल कहे हैं.
गाथा-दब्ब सरि इन्दि । मण वयण क साय लेसा ॥
समुघााइ सान्ना दिट्ठी । वेय असाव पंच (करण)॥
अर्थ-द्रव्य भेव काल भाव और भव यह ५ द्रव्य. ५ गरीर. ५ इन्द्रिय. ४
मन के योग. ४ वचन के योग. ४ कपाय. ६ लेश्या. ७ समुवात. ४ सज्ञा. : दृष्टि,
३ वेद और ५ आश्रव.
३३ निवृत्ति द्वार-जिन वावतोंमे आत्मा निवृति भाव को प्राप्त होने
सो नित्ति जिसके भगवतीजी नूव में ८२ वाल फरमाये हैं:-
गाथा-कम्म सरीर इन्दि । भासा मण कसाय वणादि ।
संगण सन्ना लेसा । दिठी णाणा गाणे जोग उवोगे ।
अर्थ-८ कर्म. ५ शरीर. ५ इन्द्रिय. ४ भाषा के योग. ४ मनके योग, ४ क.
पाय. ५ वर्ण. २ गन्ध. ६ रस. ८ पर्ग. ६ मंठाण. ४ मजा, : लेना. : दृष्टि, ५
झान. ३ अद्भान. : जोग और २ उपयोग.
१६...

३३० प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड र ३४ आश्रय द्रार:-जिस रस्ते कर जीवों को कर्म आकर लगे उने आश्रय क- हे जाते है, जिस के ४२ भेद फरमाये हैं:-4 अवत, ५ इन्द्रियों का अनिग्रह, ४ क पाय की प्रति, और २५ किरिया. ३१. वे, ३२ वे, ३३ वे और ३४ वे द्वारों में कहे हुवे सब बोलों का खुला- सा पीछे होगया है, इसलिये यहां सक्षेप में ही लिखे है, ३५ संवर द्वार:-जो कर्म आने का रस्ता है उसे रोक सो भवर के ५६ वोल मूव मे कहे हैं:-१ इर्या समिती-रस्त में चलती वक्त आगे धनुष्य देखे, रस्ता छो- डकर चले नहीं, रात को विन कारण स्थानक के वाहिर जावे नही, पांचों इंन्द्रिय की विषय का ध्यान, और पांच प्रकार की सज्झाय - करे नहीं. २ भाषा समिति-कर्क- स, कठोर, छेदक, भेदक, दुःख कर्ता, सावध, हिंसक, मिश्र इत्यादि वचन बोले न- ही, पहर रात गये वाद दिन उगे वहां तका जोरसे बोल नहीं. सदा उपयोग युक्त वोले, ३ एपणा समिती. आहार वस्त्र पाव और स्थानक ४२ दोप टाल गृहण करे, आहार दो कोस से ज्यादा लेजाकर भोग नहीं. पहिले पेहर में लाया चौथे पेहर में भोगवे नहीं. पांच मन्डल के दोप टाल आहार करे, ४ आदान निक्षेपना सामती-भंड पात्रे उपकरण वस्त्र पाट आदि यत्नासे गृहण करे और यना रक्खे, गृहस्थ के घर र- क्खकर विहार करे नहीं. दोनों वक्त (शुभे शाम) प्रति लेखना (देखा) करे, और ५ 'परिठावणिया' सामिती':-विष्टा पेशाब मेल नख केश शरीर आदि वस्तु यनासे परि- ठावे. दुर्गच्छा निन्दा होवे वहां परिठावे नहीं. दिनको देख के और दिनको देखी भू मि का मे रातको परिठावे. (यह ५ समिती) ६ मन गुप्ति ७ वचन गुप्ति ( कायागुप्ति (इन वचन काया के योगो को सारम्भ समारम्भ आरम्भसे निवारेसो तीन गुप्ति)- ३० वावीस परिसह पीछे कहे सो) ३१ खन्ति-क्षमा, ३२ मुर्ति-निर्लोभता, ३३ अन्न व-शरलता, ३४ मद्दव-निर्भिमान, ३५ लाघव-लघुत्व, ३६ सच्चे-सत्य, ३७ संयम-आ- त्म टिनह.. ३८ तवं-तप, ३० चेइए-ज्ञाना भ्यास, और ४० बंभ-ब्रह्मचर्य. (यह १० यति धर्म) ४१ आनित्य भावना-पुद्गालक पदार्थ सर्व अनित्य (विनाशीक) जाने. ४२ असरण भावना इस संसार मे कोइ भी शरण दाता नहीं है. ४३ संसार भावना-अनं- " वाचना, पूछना, फेरना, याद करना, और धर्मोप देश देना. यह ६ सझाय, - मुक्ति सोपान-श्री गणस्थान रोहण अढीशन द्वारी त संसार परि भ्रमण किया है,४४ एकत्वभावना'-आत्मा सदा एकली है. ४५ अन्य- व भावना-शरीर से आना अलगहे. ४६ 'अशुचि भावना' शरीर अशुची का भंडार ४७ आश्रव भावना-आश्रव से कर्न आते हैं. ४८ संवर भावना-संबर कर्म को रो- कते है. ४१ निर्जरा भावना-निर्जरा से कर्म क्षय होते हैं. ५. लोक भावना-लोक मुपइठ पुरुषाकार है. ५१ बोध भावना-बोध वीज सम्यक्त्वकी माप्ति होनी दुर्लभ है. और ५२ धर्म आवना-धर्म ही तारण शरण है. (यह १२ भावना और ५३-५७- पांच चरिव (इन का वरणन् पीछे होगया है.) ३६-३७ निर्जरा द्वारः-जो श्री वीतरागके आज्ञा वाहिर सूव से विधिसे रहि- त स्ववश या परवश पणे धर्मार्थ या संसारार्थ कष्ट सहे. उससे अकाम निर्जर होती है. जिसका फळ मोली (काष्ट काट कर वेचने वाले) व्यापारी के जैसा कष्ट तो बहुत और लाभ थोडा, तैता होता है. और २ जो वीतराग की आज्ञा रहकर मू. व विधिके अनुसार निर्वद्य करणी मोक्षार्थ करे जिस से सकाम निर्जरा होवे. जिस का फल जोहरी के व्यापार जैसा होता अर्थात् कष्ट थोडा और नफा वहुत. सकाम निर्जरा दो तरह से होती है. (१) वाह्य (प्रगट) और (२) अभ्यन्तर. (गुप्त) इस में- (१) 'असन) आहार के त्याग, (२) ऊगोदरी-आहार उपाधी कम रक्खे. (३) भि. क्षाचरी-गोचरी कर वस्तु ला भोगवे. (४) रस परित्याग-दूध दही घी तेल मीग के त्याग करे. (५) कायालेश-धर्मार्थ कायको कष्ट दे, (८) प्रति सालिनता-इन्द्रियो कपा- य योग का निलंबन करे. (यह ६ बाह्य तप) और (७) प्रायछिर-पाप निवारने तप करे, (८) विनय-सदा नम्र हो रहे, (९) वैयावच्च-भक्ति करे. (१०) सज्झाय-शास्त्र के मूल पाठ की स्वध्याय करे, (१२) ध्यान-मूवार्थ का चिन्तवन करे. और (१२) कउ सग्ग-का युत्सर्ग करे. ( यह ६ अभयन्तर तप) यो १२ भेद तपसे निर्ज राहोती है. ३८ करणी फल द्वारः-पुन्य रूप मिष्ट फल और पाप रूप कटु फल दो नों संमार वृादेके कारण है, मो सफल करणी कही जाता है सम्रक्व दृष्टि यह चहाते नहीहं. और मोक्षार्थ जो करणी करते हैंमो अफल गिनी जातीहै. नुयगडांग जी मूव मे फरमाया है. गाथा-जेय वुद्धा महा भागा । वीराऽसम्मत दंसीणो ॥ अशुद्ध तेर्सि परिकत्ता । सफल होइ सब सो ॥१।।

प्रथम अर्थ काडका प्रथम मूल द्वारा रोहण खन्ड र जेय बुद्धा महा भागा | वीरा सम्मत दंसीणो । सुद्धं तेसिं परिकत्ता । अफल होई सब्बसो ॥२॥ अर्थ-जो निर्बुद्वी हत भागी कू-कार्य में वीर मिथ्यात्वी हैं उनको अशुद्ध की हुइ करणी सर्व सफल होती है. और जो कुद्वि वन्त महा भाग्य मू-कार्य मूरवीर स- म्यक्त्वी सत्पुरुप हैं उनकी की हुइ शुद्ध करणी सर्व अफल होती है. ३१ हेय ज्ञेय उपादेय द्वार- हेय-सो त्याग ने छोडने योग्य, ज्ञेयमो-जान ने योग्य, और उपादेय मो-आदरने योग्य. ४० तीर्थकर गोत्र वन्ध द्वारः-जो प्राणी वीस बोलों में से किसी भी एक दो चार या अधिक वोलों का आराधन करता है, और उसकी परमोत्कृष्ट रमायण आती है तब तीर्थंकर गोत्र की उपार्जना होती है-ऐसा श्री ज्ञाताजी सूत्र में फर- माया है. गाथा-अरिहन्त सिद्ध पव्वयण । गुरु थेरे बहूसूए तवसीसु ॥ वच्छलाय ते सिं । अभिख नाण मुवगये ॥१॥ दंसण विणय आवसय । सीलवय निरायारो ॥ खिणालव तव चेइए । वेयावच्च समाहीए ॥२॥ अपुव्व नाण गाहणे । सुयभत्ति पव्वणे पभावणए ॥ एत्थेही कारणे ही । तित्थयरे तं लहे जीवो ॥ ३ ॥ अर्थ-१ अरिहन्त, २ सिद्ध, ३ शास्त्र, ४ गुरू, ५ स्थिवर, ६ बहुसूत्री, ७ तपश्वी-इन सातों के गुणानुवाद करनेसे, ८ ज्ञान में वरम्बार उपयोग लगानेसे, ९ सम्यक्त्व निर्मल पालने से. १० गुरूवादि पूज्य जनोंका विनय करनेसे. ११ सदा दोनों वक्त प्रतिक्रमण करने से, १२ शील आदिवत निरति चार पालने से,१३ स- दा निवति भाव रखनेसे. १४ वारा मकार तप करने से, १५-सपात्र दान देने से, १६ गुरू रोगी तपश्वी नवी दिक्षीत की वैयावच करनेसे. १७ क्षमा करने से, १८ अपूर्व ज्ञान पढनेले. १९ जिन वचन बहुमान पूर्वक सुण ने श्रदनेसे और २० जैन ध- को तन मन धन कर दीपानेसे. , मुक्त सोपान-श्री गणस्थान रोहण अहीशन द्वारी ४१. तीर्थकर गुणस्थान स्पर्शनाद्वार:- श्री तीर्थकर भगवान गत भवसे चौ- था गुणस्थान सेही ओते है. इसलिये पहिले के तीन तो यह छुटे. और पंचचा गुण. स्थान कायर नरोंका है. जो संयम लेने समर्थ न होसो) इमलिये उत्तम पुरुषों पाच- वा गुणस्थान भी स्पर्शते नहीं हैं. और इग्यारवा गुणस्थान नो पडवाइ होता हैसो स्प र्शत है. श्री तीर्थकर भगवान पडवाइ नहीं होते हैं. इसलिये १.२.३.५-११ इन:पाचों गुणस्थान स्पर्शन की मना है.वाकीके९ गुणस्थान स्पर्शने है. ४२ मोनद्वारः-चारो वावतो की अनुक्रम मे आगधना करने में मोम मिल- दी है:- १ प्रथम सम्यक ज्ञान करके जीवोंका यथार्थ सम्पका जान होवे. २ नन्नर जीवादि पढायों को जैसे जाने है. वैमेडी सम्यक दर्शन कर उनको वर्ग श्रद्धे. ( यो नान और दर्शन का जोडा है. अर्थात यह दोनोंही माही बने हैं): जो जीवादि पदार्थों को सम्यग ज्ञान कर जाने, सम्यग् दर्शन कर श्रद्ध उनमे जीव अनीव पुण्य तीनको जाने पाव अव बन्ध इन तीनोंको मचा त्यागे. और भंवरनिर्मग मोक्ष रन तीनो को पूर्ण पणे ममाचारे मो मम्पग चरिव. और जैनी नर मम्पस चम्वि दाग तीनो चावतो ममाचारी है वैमी तरह जावो जीव नावे. उमर ना पूर्ण नाग्म आगध पाले स्पर्श मो मम्पग तप. जमे मान दर्शन वा जोडा है नैमेटी चान्त्रि नपका भी जोहा है. इन चारो का यथा विधी अनुक्रम मे आग पालन पनजाबो जीवनक करने में आत्मा पमानन्दी परम सुखी होता है. x * प्रथम अर्थ काण्डका-प्रथम मूल द्वारा रोहण खण्ड परम पूज्य श्री कहान जी ऋषिजी महाराज के स- म्प्रदाय के महन्त मुनिश्री खूबाऋषिजी म- हाराजक शिष्यवर्य आर्य मुनिश्रीचे- न। ऋषिजी महाराजके शिष्य श्री केवल ऋपिजी महाराज के आश्रित बाल ब्रम्हचारी मुनिश्री अमालेख ऋषि जीमहाराज रचित मुक्ति सोपान गुणस्थान रोहण अढीशत द्वारीका प्रथम अर्थ काण्ड समाप्तम . Yि ॐ FREE Hos सुरक्षी-सोपान रोहण अढीशतद्वारी श्री गुणस्थान द्वितीय-सूल काण्ड. 14 प्रशीका गाथा-वंदामि सिरि जिणवर । भणामि वितीय मृल बण्ड ॥ वउदश गुण टाणस्न । गेहण अमित दाग ॥१॥ अर्थ-श्री जिनेश्वर भगवन्त को नमन्कार कर के “मुनि सोपान."-"शुगस्थाना रोहण अदीशत डाग अन्यका दृमग मूल खण्ड कहता हूँ इम में अर्थ काण्ड में कहे हवे २५२ धागे को अ- व मूल उदेही गुणन्धानो पर अलग २ नंप ने उता ने प्र- थम अर्थ काण्डके पन में नव डागे का अर्थ-मतलब नमन में आगया जिनने मकान १४ गुणन्यानों पर उतारे हदे २५२ हारकी समझ मुलभता में हो नकेगी.

. * मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी. प्रथम खन्ड-मूल द्वारा रोहण मूल ३२ हारों के नाम १ नाम द्वार, २ अर्थ द्वार, ३. प्रवेश द्वार, ४ लक्षण द्वार,५ दृष्टान्त द्वार, ६ गुण द्वार, ७ अवघेणा द्वार, ८ उत्पति द्रव्य प्रमा- ण द्वार, ९ पावति द्रव्य प्रमाण द्वार, १० खपति द्रव्य प्रमाण द्वार ११ क्षेत्र प्रमाण द्वार, १२ क्षेत्र स्पर्शन द्वार, १३काल प्रमाण (स्थि- ति) द्वार, १४ काल प्राप्त द्वार, १५ भाव प्रमाण द्वार, १६ निरन्तर गुण द्वार, १७ गति मार्गणा द्वार, १८ अगति मार्गणा द्वार, १९ परस्पर गति मार्गणा दार, २० परस्पर अगति मार्गणा द्वार, २१ अवरोह उवरोह द्वार, २२ चडपड गति दृष्टान्त द्वार, २३ अन्तर द्वार, २४ विरह दार, २५ शाश्वता श्वत द्वार, २६ पढमापढम द्वार, २७ एक भवाश्रिय स्पर्शना द्वार, २८ बहुत भवाश्रिय स्पर्शना द्वा- र, २९ परस्पर स्पर्शना द्वार, ३० परभव गमन द्वार, ३१ भव सं- ख्या द्वार, ३२ अल्पा बहुत द्वार. अब आगे इन तेंतीस ही दारों का चउदह गुणस्थानोंपर पृथक २ (अलग२) विवेचन (वरणन्-उत्तरा) किया जाता है. १ पहिला 'नाम द्वार" * चउदे ही गुणस्थानों के नाम-१ पहिला-मिथ्यात्व गुणस्था- * इस द्वारके खुलासे के लिये देखिये अर्थ काण्डके पृष्ट १४ वा.

* द्वितीय मूल काड-प्रथम खण्ड मूल द्वारा रोहण * न, २ दुसरा-सा स्वादन गुणस्थान, ३ तीसरा मित्र गुणस्थान, (अपर नाम) सम मिथ्या गुणस्थान, ४ चौथा-अविरति-सम्यग ह ष्टि गुणस्थान, ५ पांचवा देश विरति (श्रावक का) गुणस्थान, ६ छा प्रमत-संयति (साधु का) गुगस्थान, ७ सातवा अप्रमत संय- ति गुगत्यान, ८ आठवा नियटि वादर गुणस्थान, (अपर नाम) अपूर्व करग गुगस्थान. ९ नववा अनियटि बादर गुणस्थान (अपर नाम)अनिवृति करगगुगम्यान,१०दशवा मूम-संपराय गुगस्थान.?? इग्यारवा उपशान्त मोहनीय गुगस्थान. १२ वारखा वीण मोहनीय गुणस्थान, १३ तेखा संयोगी-कवली गुगम्थान. १४ च उदवा अ- योगी केवली गुणस्थान. और इस के आगे अन्तिम नाम मुक्ति- स्थान मोक्षस्थान-सिद्धि स्थान. दुसरा-अर्थ द्धार* चउदेही गगन्धानों के नाम का अर्थः- १ भि-या लोटे+गग का+धान-ठिकाणा. अर्थात जो बोटे. '. गुग (दुर्रागों) के रहने का निवासस्थान होवे नाही मिथ्यात्व गुण स्थान. २ माघम के+द न्धान की+आदन-आव. अर्थात-- हिले गुगम्यान को पीछा आने वाला ( न्नागिः) नो नान्वादन गुगस्थानी ३ भिधम्दानों को मिलाकर गुमन्यान. अर्थत-मि ध्यात्व की और नन्यस्वी एकत्रता-मन मैले हो ना मिश्र - . पस्थानी. सवादद? -

No text on this page.

द्वितीय मूल काड-प्रथम खन्ड मृल द्वारा रोहण र सो नियटी बादर गुणस्थानी और इसही गुणस्थान का दुसरा नाम अनिवृति-निवृते नहीं करण-कषाय की मन्दता से अर्थात्-जोक पायों की मन्द (कमी) करने श्रेणी प्रारंभ की है. उस से पीछे टे नहीं आगे बढ़ते ही जाय, सो अनिवृति करण गुणस्थानी. १० सूक्ष्म-बहूत ही थोडी सम्यगय-कपाय. अर्थात् फनसं ज्वलन के लोभ रूप यत्किंचित मात्र सांभी वहन पतली कपायका उदय सो सूक्ष्म संपराय गुणस्थानी. ११ उपशान्त-उपशमाया (दका)xमांह-मोहनीय कम. अ- र्थात् मोहनीय कर्म की सर्व २८ ही (क.पायों) प्रशानियों को नर्व- था प्रकार से उपशमन किया-दर दिया लो अपमान्त मोह. गण- स्थानी. १२ क्षीण-क्षय कियाxमोर मोहनीय कर्म. अभीत-मोहनीय कर्म की २८ ही प्रजातियों का सर्वधा क्षय-नाना किया ना भी मोह गुणस्थानी. १३ सयोगी-योग मारित बंदी दलमानी.भीनम- न बचन कायावे. राम अदलम्बन दन्त देवल हानी नमः संयोगी केवली गणम्पानी. अयोगी-योग हिल देवली रेवल हानी. अर्थात मनादि चांगों जो कर्म पुन रूप वर्गमा दोहा कत का आ- स्म प्रदंगो का परिचन्द (बल्न नहित. माकलन वे. धान्द ना सपोनी की गुमगनी. ३ तीसरा प्रश्नोत्तर हार - •- - . - - Ir नटर ३४० मुक्त सोपान श्री गुणस्थान रोहण अढीशत द्वारी १ प्रश्न मिथ्यात्व को भी गुणका स्थानक कहने का क्या सवव? उत्तर (१) जो इस जगत में अचैतन्य (जड)पदार्थ हैं. उस से ऊंच पक्ति का अनन्त ज्ञानादि गुण का धारक-अधिक शक्ति वन्त चैतन्य जीव का रहना का यह मूल स्थान है, यह ही इसमें गुण है, (२) बहूत से जीवों इस ही स्थान में रहे हुवे-मिथ्या-ज्ञान- दर्शन-चारित्र-तप का आराधन पालन कर अनेक गुणवन्तों के भी परम पुज्य बनते हैं. यों व्यवहार की भी शाद्ध होनेसे यह गुणका स्थान है. (३) अभव्य जीवों सदा इसही स्थान में रहते हैं वो द्र- व्ये ज्ञानादि गुणों का पालन कर नववी ग्रीवेग (२१वे स्वर्ग) तक जाते हैं. यह भी गुण है. (१) और भी कितनेक व्यवहार तो मि- थ्यात्वी देखाते हैं. परन्तु अन्तर में मिथ्यात्व मोहनी आदि प्रकृति यों का उपशम होगया सम्यक्त्वादि गुणों का स्पर्श किया है. तो भी मिथ्यात्वी कहे जाते हैं. इत्यादि गुण इस स्थान में पाने से इसे मिथ्यात्व गुणस्थान कहा जाता है. २ प्रश्न-सास्वादन गुणस्थान वाले तो पडवाइ होते हैं, उसे गुणका स्थान कहने का क्या सबब? उत्तर-इस गुणस्थान का स्पर्श ने वाला जीवने कर्म ग्रन्थी का भेद कर सम्यक्त्व का स्पर्शन कि- या है इसलिये यह पडवाइ है तो भी उत्कृष्ट अर्ध पुद्गल परावर्तन संसा र परि भ्रमण कर निश्चय से सम्यक्त्व का स्पर्शन कर मोक्ष पावेगा. इसलिये यह गुणका स्थान ही-गुणस्थान है. ३ प्रश्न-मिश्र गुणस्थान में मिथ्यात्व का और सम्यक्त्व का * मिथ्यात्व गुणस्थानं सो खोटे गुणका स्थान एमो अर्थ अर्थ धारमे किया है, परन्तु जो मिथ्यात्व गुणस्थान को मिथ्यात्व ही गुणका स्थान ऐमा अर्थ करते हैं, उनके समाधान लिये यह प्रश्रोत्तर है ३४१ द्वितीय मूल काण्ड-प्रथम खण्ड मूल द्वारा रोहण पर सेल भेल (गडवड) है उसे गुण का स्थान कैसे कहा जावे? उत्तर क्यों नहीं कहा जावे, जो सत्य को असत्य और असत्य को सत्य जानता था वो सत्य को तो सत्य जान ने लग गया. तो कभी असत्य को असत्य भी जानने लग जायगा. ४ प्रश्न-जो सम्यक् दृष्टि हो व्रतों के फल को जान कुछ व्रत धारे नहीं आवरति सस्यग दृष्टि ही रहे तो उस से क्या फायदा ? उत्तर-जो जानेगा कि इस मकान में उपद्रवी व्यन्तर देव (भूत) रह ता है. और उस में कभी जाने का प्रसङ्ग भी आगया तो वा डरेगा. ऐसेही सम्यग दृष्टि भी पाप करते डरेंगे जिससे जिन के चिकन कर्म वन्ध नहीं होगा. यथार्थ जानना ही मुशकिल है. कहा हैकि “सद्धा परम दुल्लहा.” जाना येही वडा गुन है. ५ प्रश्न-जो संसार सम्बन्धि आरंभ के अनेक कृतव्य कर यदि यत्किंचित व्रत धारण करभी लिया तो उस से क्या फायदा? उत्तर-देश विरति शब्द तो साधुओं के सर्व विस्ती पने की अपे- क्षा से है, परन्तु किंचित व्रत नहीं जानना. क्योंकि इनोंने सर्व लो- क के महारंभ महा परिग्रह की क्रिया का निरंप कर, फक्त यत्किं- चित अटकते कार्य को चला ने जितनी ही छुट्टी रखी है, और सो भी सर्वथा त्याग ने अभिलापी हैं, इसलिये. तथा परिणामों से सर्वथा अव्रत की क्रिया उत्तर गइ है, येही जवरफायदा है. इसलिये यह गुणस्थान है. ६ प्रश्न-जो संयति (साधू) होकर ही प्रमाद का सेवन करे तो फिर क्या फायदा? उत्तर-बड़ा फायदा तो यह हुवा कि-अ- विरत की क्रिया साफ रुक गइ, और यद्यपि अप्रमादी ही सदार- हने का खप करते हैं. तद्यापि कर्म की प्रबलता से जो कुछ प्रमाद 7 ३४२ * मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अहीगतद्वारी १ मय परिणती परिणमतीहै. उसे रोककर भी ज्ञान ध्यान तप आदि वृद्धि कर लाभापार्जन करते हैं, सो फायदा ही है. प्रश्न-जव पांचोंही प्रमादोंका क्षय किया नवसव दुर्गणाका क्षय हुवा, फिर यहां ही केवल ज्ञान की प्राप्ति क्यों नहीं होती है.' उत्तर-इनने वाह्य वृत्ति में पांचों प्रमाद का अभाव करने से अप्रमदी बने हैं. परन्तु अन्तर करण में तो एक मद प्रमाद का तो सर्वथा अभाव हुवा है, और यत्किंचित बने हैं सो भी आगे नाश करने परिव्रत हुवे हैं वो सब नाश होंगे जव ही केवलज्ञान पावेंगे इस से अप्रमादी कहना. प्रश्न-निवृति वादरका क्या अर्थ होताहै? उत्तर-वादर(वडी) कषायों से निवृति पागये. चपालता का अभाव हुवा. ९ प्रश्न-आठवे का नाम निति बादर और नववे का नाम अनिवृति बादर यह भी कैसा आश्चर्य गुण वृद्धि के बद्दल उलट गुणहानी के दोषारोपण होता है.इसका क्या सवव? उत्तर-आठवे गु- णस्थान में श्रेणी प्रारंभ होती है, इसलिमे यहां उत्तेजन देने का सं- भव हैकि अब कषायों से निवृते हो इसलिये शीघ्र आगे बढो, और इस स्थान में सावधान-किया है कि होंशार रहो!जो थोडा भी विषय कपाय का अंश रहा है वह छल नहीं लेवे ! और आठवे गुणस्थान में तो १७ कपाक का नाश किया था यहां २१का नाश किया है. इ- सलिये गुणाधिक ही जानना. १० प्रश्न-सूक्ष्म सम्पराय का क्या अर्थ उत्तर सब क्रिया २५ हैं, जिस में २४ सम्परायिक क्रिया है सो कर्मों का बन्ध करने वाली है, इस गुणस्थानी २३ क्रिया का तो सर्वथा अभाव कर दिया और पेजवती किया है उस के दो भेद (माया और लोभ) जिस में से द्वितीय मूल काण्ड-प्रथम खन्ड मूल द्वारा रोहण मायाका भी नाश कर दिया और लोभ के चार भेद में से फक्त एक अन्तिम संज्वलका ही लोभ रहा सो भी अत्यन्त सुक्ष्म, इस- लिये सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थान कहा है. ११ प्रश्न-उपशान्त मोह गुणस्थान में मोहकी सर्व २८ ही प्रकृति का उपशम किया. और उन प्रकृतियों का प्रगट होने का भी कारण नहीं हैं, फिर पडवाइ क्यों होते है। उत्तर इस स्थान में प्रकृतियों का क्षय नहीं हूवा है, इसलिये वो अन्दर रही हूइ प्रकृति यों वाष्फकी माफक उछाला देने से और इस स्थान से आगे व- ढने के रस्ते के अभाव से पडवाइ होते हैं. १२ प्रश्न-क्षीण मोह गुणस्थान में सर्वथा मोहका क्षय हुवा फिर यहां ही केवल ज्ञान की प्राप्ति क्यों नहीं होती है; उत्तर-का- रणसे कार्य निपजता है. इस स्थान घातीये कर्म का नाश होता है तब आगे केवल ज्ञान की प्राप्ति होती है. परन्तु निश्चय नयके मतसे तो यहां ही केवल ज्ञानी गिने जाते हैं. १३ सजोगी केवली कहे सो केवल ज्ञानीके योग क्या काम आते हैं? उत्तर-अनुत्तर विमान के देवों को प्रश्नका उत्तर देने द्रव्य मन, देशना देने में द्रव्य वचन जौर जिन पुदलों को स्पर्शने वा- की रहे हैं उने स्पर्श ने काया के योग की प्रवृत्ति होती है. इसलि- ये सयोगी हैं, परन्तु निश्चय से तो अयोगी समझना-स्योंकि-वो इच्छासे-ऊपत कर योग की प्रवर्ती नहीं करते हैं. - पांचों अनुत्तर विमान वामी देवों अपने स्थान में ही रहे हुवे मविनय प्रश्न पुछतेहै. उनको केवल ज्ञानी प्रश्नका उत्तर मनके द्रव्य पणे प्रगमा कर देन. क्योंक ज्ञान अम्पी है उमे अवयी ज्ञानी ग्रहण नहीं सकते है. और मन रूपी ची फग्मी है. उमे ग्रहण कर लेते हैं. D ३४२ * मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अहीगतद्वारी ११ मय परिणती परिणमतीहै. उसे रोककर भी ज्ञान ध्यान तप आदि वृद्धि कर लामोपार्जन करते हैं, सो फायदा ही है. ७पश्न-जब पांचोंही प्रमादोंका क्षय किया नवसव दुर्गणाका क्षय हुवा, फिर यहां ही केवल ज्ञान की प्राप्ति क्यों नहीं होती है. उत्तर-इनने वाह्य वृत्ति में पांचों प्रमाद का अभाव करने से अप्रमदी बने हैं. परन्तु अन्तर करण में तो एक मद प्रमाद का तो सर्वथा अभाव हुवा है, और यत्किंचित बने हैं सो भी आगे नाश करने परिवत हुवे हैं वो सब नाश होंगे जव ही केवलज्ञान पावेंगे इस से अप्रमादी कहना. प्रश्न-निति बादरका क्या अर्थ होताहै? उत्तर-बादर(बडी) कषायों से निवृति पागये. चपालता का अभाव हुवा. ९ प्रश्न-आठवे का नाम निवृति बादर और नववे का नाम अनिवृति बादर यह भी कैसा आश्चर्य गुण वृद्धि के बद्दल उलट गुणहानी के दोषा रोपण होता है.इसका क्या सबब? उत्तर-आठवे गु- णस्थान में श्रेणी प्रारंभ होती है, इसलिमे यहां उतेजन देने का सं- भव हैकि अब कषायों से निवृते हो इसलिये शीघ्र आगे बढो, और इस स्थान में सावधान-किया है कि होंशार रहो!जो थोडा भी विषय कपाय का अंश रहा है वह छल नहीं लेवे ! और आठवे गुणस्थान में तो १७ कपाक का नाश किया था यहां २१का नाश किया है. इ- सलिये गुणाधिक ही जानना. १० प्रश्न-सूक्ष्म सम्पराय का क्या अर्थः उत्तर सब क्रिया २५ हैं, जिस में २४ सम्पराायिक क्रिया है सो कर्मों का बन्ध करने वाली है, इस गुणस्थानी २३ क्रिया का तो सर्वथा अभाव कर दिया और पेजवती किया है उस के दो भेद (माया और लोभ) जिस में से ३४३ द्वितीय मूल काण्ड-प्रथम खन्ड मूल द्वारा रोहण ५ मायाका भी नाश कर दिया और लोभ के चार भेद में से फक्त एक अन्तिम संज्वलका ही लोभ रहा सो भी अत्यन्त सुक्ष्म, इस- लिये सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थान कहा है. ११ प्रश्न-उपशान्त मोह गुणस्थान में मोहकी सर्व २८ ही प्रकृति का उपशम किया. और उन प्रकृतियों का प्रगट होने का भी कारण नहीं हैं, फिर पडवाइ क्यों होते है। उत्तर इस स्थान में प्रकृतियों का क्षय नहीं हूवा है, इसलिये वो अन्दर रही हूइ प्रकृति यों वाष्फकी माफक उछाला देने से और इस स्थान से आगे ब- ढने के रस्ते के अभाव से पडवाइ होते हैं. १२ प्रश्न-क्षीण मोह गुणस्थान में सर्वथा मोहका क्षय हुवा फिर यहां ही केवल ज्ञान की प्राप्ति क्यों नहीं होती है; उत्तर-का- रणसे कार्य निपजता है. इस स्थान घातीये कर्म का नाश होता है तब आगे केवल ज्ञान की प्राप्ति होती है. परन्तु निश्चय नयके मतसे तो यहां ही केवल ज्ञानी गिने जाते हैं. १३ सजोगी केवली कहे सो केवल ज्ञानीके योग क्या काम आते हैं? उत्तर-अनुत्तर विमान के देवों को प्रश्नका उत्तर देने द्रव्य मन, देशना देने में द्रव्य वचन जौर जिन पुद्गलों को स्पर्शने वा- की रहे हैं उने स्पर्श ने काया के योग की प्रवृत्ति होती है. इसलि- ये सयोगी हैं, परन्तु निश्चय से तो अयोगी समझना-गोंकि-बो इच्छासे-ऊपत कर योग की प्रवर्ती नहीं करते हैं. पांचो अनुत्तर विमान वामी देवो अपने स्थान में ही रहे हुवे मविनय प्रश्न पुरतेहै. उनको केवल ज्ञानी प्रश्नका उत्तर मनके द्रव्य पणे प्रगमा कर देन. क्याोक ज्ञान अरूप है उसे अवयी ज्ञानी ग्रहण नहीं सकते है, और मन रूपी चौ फरमी है. उमे ग्रहण कर लेते हैं. - ३४४ * मुक्ति सोपान श्री गुणस्थान रोहण अदीशत द्वारी ? १४ अयोगी गुणस्थान स्पर्शने बाद ही योगों का निधन होता है फिर इस स्थान को अयोगी कैसे कहना? उत्तर-भगवन्त का फरमान हैकि-“करे माणे करे” अर्थात जो काम करना सुरु किया उसे किया ही कहना, वो योगों का निरंधन तुर्त ही कर डालते हैं. और यहां ही योग रहित हो फिर मोक्ष पधारते हैं. प्रश्न-योग राहत हुवे बाद मोक्ष जाने की क्रिया कैसे कर ते है ? उत्तर-पूर्व के प्रयोग से कुम्मार के चक्रवत, कर्म सङ्ग रहि- त होने से निलेप तुम्बीवत्, प्रति बन्ध छेद होनेसे एरण्ड बीजवत्, और जीवका उर्द्ध गमन के स्वभाव से अमि शिखावत् मोक्ष में पधार ते हैं. प्रश्न-जव जीव का उर्द्ध गमन स्वभाव है तो फिर मोक्ष स्थान के आगे क्यों नहीं जाता है ? उत्तर गति में सहायता कर ने वाली धर्मास्ति काया का आगे अभाव होने से अलोकमें आ- त्मा गमन नहीं कर सकती है. ४ प्रवेश द्वार * १ प्रायः सर्व संसारी जीवों का प्रथमस्थ येही स्थानहे, ओं- र सम्यक्त्व व चारित्र से पड़े जीवोंमी मिथ्या स्थानमें प्रवेश करतह २ आगे कहेंगे उस चतुस्थान में प्रवृत ता हुवा जीव क्षयो- पशम तथा उपशम सम्यक्त्व में घुनः लगने से अर्थात् अनन्तान # बन्धि कपायों का उदय होनेसे भ्रष्टाहो नीचे पड़कर मिथ्यात्वकी तरफ आने लगा उसके मिथ्यात्व का तो उदय नहीं हुवा, परन्तु -- दम द्वारके बुलाने के लिये देखिये अर्थ काट का पृष्ट १५ वा.

sarmilion Angrue-Imantrka--- द्वितीय मूल काण्ड-प्रथम खण्ड मूल द्वारा रोहण र मिथ्यात्व की सह चारिणी (साथ रहने वाली) अनन्तान बन्धि क- पाय का उदय हुवा है, सो सास्वादन में प्रवेश करते है. ३ मिथ्यात्व की पर्याय हायमान होती जाती है-घटती जा ती है, और सम्यक्त्व की वृद्धमान होती है बढ़ती जाती है, सो जीव मिश्र गुणस्थान का प्रवेशी जानना. ४ चौथे गुणस्थान में दो तरह से जीवों प्रवेश करते हैं:- (१) निसर्ग से अर्थात्-स्वभाव से और (२) अधीगम से अर्थात- गुरु के सबोध से. (१) जो भव्य जीवों सन्नी पचेन्द्रिय पर्यासाव- स्था की पर्याय को प्राप्त हवा सो पहिले अनन्तान बन्दि चौकडी का प्रथम यथा प्रवृति करण से, फिर दूसरे अपूर्व करण में स्थिति घात-रस घात-गुणश्रेणी-गुण संक्रम और अन्य स्थिति बन्ध से ती सरा अनिवृत्ति करणसे, और चौथा उपशान्त अद्धासे, दर्शन त्रिक- मिथ्यात्वमोहनीय-मिश्रमोहनीय और सम्यक्त्वमोहनीय युक्त उपशम कर-उपशम सम्यक्त्व क्षयोपशमकर-क्षयोपशम सम्यक्त्व और क्षयकर भाषिक सम्यक्त्व इन तीनोंमेंसे किसी एक सम्यक्त्वकी प्राप्ति करताहै, सो अधीगम से प्रवेशी जानना. (२) और निश्चय से तो अधी- गम हवे ही, व्यवहार में-आर्य क्षेत्र-उत्तमकुल-दीर्घायु-पूर्णोन्द्रय-नि- रोग्यता-सुखोप जीवी इत्यादि सुसामग्री युक्त को सद्गुरू-निग्रन्थ का संयोग मिलने से सर्वज्ञ प्रणित धर्म श्रवण कर तत्वार्थ का श्र- द्धान होवे सो निसर्गः से प्रवेशी जानना. ५ पांचवे गुणस्थान में तीन तरह से प्रवेश करते हैं:-चौथे गुगस्थान में अनन्तान वन्धि चौकडी और दर्शन त्रिक इन ७ स सम्यक्त्व मोहनीय की प्रकृतियों का योपशम करने से प्रवेश हु- वा, और इस गुग स्थान में सात तो वोही और अप्रत्याख्याना- vie ..

३४६ * मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अहीगतद्वारी. वरणीय कषाय की ४ चौकडी ( यह ४ चारित्र मोहनीय की प्रकृति) यो ११ प्रकृतियों में सें-(१) सातों प्रकृतियों का क्षय करे और चारों प्रकृतियोंका क्षयोपशम करे,सो क्षायिक प्रवेशी.(२).सातों प्रकृतियों का ओपशम करे और चारों का क्षयोपशम करे.मो ओ- पशमिक प्रवेशी. (३) और दों प्रकृतियोका भयोपशम करे और र एक सम्यक्त्व मोहनीय का उदय रहे सो भायोपशामिक प्रवेशी, तथा दशों प्रकृतियों का प्रदेशोदय और सम्यक्त्त पोह का विपा- कोदय रहे सो भी क्षयोपशामिक प्रवेशी जालना. ६ छठे गुणस्थान में भी तीन तरह से प्रवेश करते हैं:-उप र कही सो ११ प्रकृतियों और प्रत्याख्यानावरणीय चोकडी यों१५ प्रकृतियों में से यथा प्रवृति करण कर-(१) सात सम्यक्ष मोहनी- य की प्रकृतियों का क्षय करे, और ८ चारित्र मोहनीय की प्रकृ- तियों का क्षयोपशम करे सो क्षायिक प्रवेशी (२) पन्दरेही का उ- पशम करे सो उपशम प्रवेशी, (३) और ७का उपशम करे और८ औदयिक रहे सो क्षयोपशामक प्रवेशी जानना. ७ सातवे गुणस्थान में भी छठे की तरह ही १५ प्रकृतियों और संज्वलका मान यो १६ प्रकृतियों को (१) क्षय, (२) उप- शम, और (३) क्षयोपशम कर तीनों तरह प्रवेश करते हैं. विशेष पांच प्रमाद-मद-विषय-कषाय-निन्दा और चिकथा इनका त्यागीही इस गुणस्थान का प्रवेशी जानना. ८ आठवे गुणस्थान में दो तरह से प्रवेश होता है:-(१) उप शम श्रेणिगत, और (२) क्षपक श्रेणिगत. (१) उपशम श्रेणि प्रवेशी क सो उपर कही सो १६ प्रकृतियों और संज्वलकी माया यों १७ प्र- कृतियों को अपूर्व करण कर उपशमावे, जो बन्ध में नहीं आवे ऐ- २४७ द्वितीय मूल कान्ड-प्रथम खन्ड मूल दाग रोहण ५ सी अशुभ प्रकृतियों को प्रावृत (पलटा) कर अपूर्व गुण संक- म और अपूर्व करणदा का संख्यात्वा भाग जाने बाद निद्र और प्रचला यह दोनों दर्शनावरणीय की प्रकृतिका व्यच्छेद होते बहूत स्थिति खन्ड का सहयोंका अतिक्रम करते वाकी एकही भाग र- हे तव स्थिति खन्ड प्रथक्त्व जावे तव उपशमश्रेणि प्रवेशी जानना. ।' यह इग्यारवे गुगस्थान तक जाकर हायमान परिमाण परिणमने से के तो पड़ता है. या मरता है, परन्तु आगे नहीं चडता है) और (२) रुपक श्रेणि प्रवेशिक सो-८ वर्ष से अधिक वयवाला. व वृ पभ नारच संघयणी. भायिक सम्यक्त्वी. विशुद्ध संयमी, चौदह पू का पाठी शुक्ल ध्यानी होता है, सोही क्षपक श्रेणि में प्रवेश क र सकती है. यह चारोत्र मोहनीय की २१ प्रकृतियों का क्षय करने का उद्यम यहां से सुरु करता है. (आगे के गुणस्थनों में क्षय कर ता है.) यया प्रवृति आदि तीनों करणों को फिर से सुरु करताहै, और ऊपर कही १७ ही प्रकृतियों की ऐसी तरह क्षय करताहै कि । जिसकी स्थिति अनिवृति करण अद्धा के प्रथम समय में ही प- ल्यापम के असंख्यातवे भाग मात्र रह जाय, सो भपक श्रेणि प्रवे शी. (यह वृद्धमान परिणामी अण्डवाइ (पडता नहीं) इग्यारवा गु णस्थान को छोड़ सीशही उपर जाता है और निश्चय से मोन 4 पाता है.) ९ नववे गुगस्थान में भी दोनों तरह ही प्रवेश करता है:- (१) उपशम श्रेणिगत और (२) अप श्रेणिगत. आठवे गुणस्थान में कही सो १७ प्रकृतियों और संज्वलका लोभ तथा तीनों वेद- । यो २१ प्रकृतियों के अनिवृति करण कर, जिन प्रकृतियों का उ- दय काल होवे वहा ही से श्रेणि आरंभ कर प्रकृतियों का उदय ३४८ घर मुक्त सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अहीशन द्वारी तो नहीं है परन्तु वन्ध है उनका अन्त करण दल और जिन का उदय तथा बन्ध दोनों ही नहीं है उनका अन्त करण दल पहिले की स्थिति में नहीं मिलाते-दुसरी स्थिति में मिलाकर, उपशम श्रे- लि बाला ती उपशय के अन्त में अश्वकरणद्धा और किट्टि करण दा इन दोनों कर उपशमावे, और आपक श्रेणि वाला-अश्वकरण- द्वा किष्टिकरणदा और किहि करण वेदना कर क्षय करे-सो नव- ये गुणस्थान का प्रवेशी जानना. (आठवे गुणस्थान में जो उपशम श्रेणि करी हो वो यहा भी उपशम श्रेणि करता है और क्षपक श्रेणि करी होसो क्षपक श्रे- णि करता हे.) १० दशवे गुणस्थान में भी दो ताह से प्रवेश होता है:- (१) उपशम श्रेणिगत, और (२) क्षपक श्रेणिगत. जो उपर कही हूइ २१ मोहनीय की प्रकृतियों और हाँस पटक (हॉस-रति-अर- ति-भय-शोक-जुगुप्स।) इन २७ प्रकृतियों को सूक्ष्म सम्परांय अद्धकर वेदकर उपशम श्रेणि वाला उपशमावे और क्षपश्रेणि वा- ला खपावे सो ही दशवे गुणस्थान के प्रवेशी जानन। ११ इग्यारवे गुणस्थान में एक ही तरह प्रवेश करता है, द- शवे गुणस्थान में कही हुइ २७ प्रकृति यों और संज्वल को लोभ यों सब मोहनीय कर्म की २८ ही प्रकृतियों का सर्वथा प्रकार से उ- पशम करने वाला-ढक ने वाल उपशांत मोह गुणस्थान का प्रवे शी जानना. १२ बार वे गुणस्थान में एक क्षपक श्रेणी वालाही प्रवे- श करता है, इग्याखे गुणस्थान में कही हुइ मोहनीय की२८ ही प्रकृतियों का सर्वथा क्षय किया फिर बाकी रहे-ज्ञानावर- द्वितीय मूल काड-प्रथम खन्ड मूल द्वारा रोहण णीय, दर्शनावरणीय, और अन्तराय इन तीनों कर्मोंक। स्थिति घात-गुण श्रेणि और गुण संक्रमण कर पहिले की तरह उस क्षीण कषायद्धा के संख्याते भाग जावे वहां लग प्रवृति करेसो क्षीण क- पाय गुणस्थान का प्रवेशी जानना. १३ तेरखे गुणस्थान मेवाखे गुणस्थान के प्रथम समय तो सर्वथा मोहका नाश किया, और अन्तिम समय बाकी रहे तीनों घन घातिक कों का नाश किया. यों चारों घातिक कमों का नाश होतेही सयोगी केवली गुणस्थान में प्रवेश करते ही सर्वज्ञ सर्व दर्शी होते हैं. १४ चउदवे गुणस्थान में-तेखे गुगस्थान में प्रवृता हूवा सू- क्ष्म क्रियना में शुक्ल ध्यान के तीसरे पाये की समाप्ति होते व्युप- ति क्रिया अप्रति पाति नामे चौथा पायकी प्राप्ति होवे अयोगी केवली गुणस्थान में प्रवेश होता है. और चउदवे गुणस्थान के अन्त में वाकी रहे चारों अघा- तिय कर्म वेदनीय-आयु-नाम-और गौत्र का नाश कर शुद्ध-हल- की आत्मा वन-१ धनुष्य मुक्त वाण वत्-पूर्व संयोगसे, निलेप तु- म्बीवत असंगी होने से, ३ एरन्ड बीजवत्-वन्धन मुक्त होने से- और ४ अग्नि शिखावत्-स्व स्वभाव से उर्द्ध गमन कर लोकके अ न्तिम भाग में जो मुक्ति स्थान है उसमें प्रवेश कर परम परमात्म वन अनन्त काल तक स्थिर रहते हैं. पांचवा लक्षण द्वार* इन द्वारके सुलाने के लिये देविये अर्थशाह का पृष्ट ४४ वा.

* मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अदीशतद्वारी ११ मि १ पहिले मिथ्यात्व गुणस्थानी के लक्षणः-१ अव्यक्त मि- थ्यात्व, २ व्यक्त मिथ्यात्व, २ आभिग्रह मिथ्यात्व, १ अनभिग्रह- भिथ्यात्व, ५ अभिनिवेशिक मिथ्यात्व, ६ संशयिक मिथ्यात्व, ७ अनाभोग मिथ्यात्व, ८ लोकीक देवगत मिथ्यात्व, ९ लोकीक गु रुगत मिथ्यात्व, १० लोकीक धर्मगत मिथ्यात्व, ११ लोकोत्तर देव गत भिथ्यात्व, १२ लोकोत्तरगुरु मिथ्यात्व, १३ लोकोत्तर धर्मगत मिथ्यात्व, १३ कुप्रावचनी देवगत मिथ्यात्व, १४ कुप्रा बचनी गुरु गत मिथ्यात्व, १५ कुप्रा बचनी धर्मगत मिथ्यात्व, १६ सर्वज्ञ प्राण त सूत्रों से कमी परूपणा मिथ्यात्व, १७ सर्वज्ञ प्रणित सूत्रोंसे अ- धिक परुएणा मिथ्यात्व, १८ सर्वज्ञ प्रणित सूत्रों से विप्रित परुणा मिथ्यात्व; १८ धम्म अधम्म सन्ना मिथ्यात्व,१९ अधम्म धम्म सन्ना मिथ्यात्व, २०साहु असाहु सन्ना मिथ्यात्व,२१असाहू साहुसन्ना थ्यात्व,२२जीव अजीवसन्ना,मिथ्यात्व,२३अजीव जीवसन्ना मिथ्यात्व २४मग उमग्गसन्ना मिथ्यात्व,२५उमग्ग मग्गसन्ना मिथ्यात्व२६रुवी अरुवी सन्ना मिथ्यात्व, २७अरुवी रुवी सन्ना मिथ्यात्व, २८ अवि- नय मिथ्यात्व, २९ असातना मिथ्यात्व, ३० अकिरिया मिथ्यात्व ३१ अज्ञान मिथ्यात्व, ३२ प्रवर्तन मिथ्यात्व, ३३ परिणाम मिथ्या व, और ३४ प्रदेश मिथ्यात्व. इन ३४ मिथ्यात्वों में का किसी भी प्रकार का मिथ्यात्व सेवे सो मिथ्यात्वी. २ दुसरा सास्वादन गुणस्थान का लक्षण-मोहोदयि, आत रौद्र ध्यानी, हायमाल परिणामी, मूर्छित मति, दुर्मति, विषयी, क- प.यि, प्रमादि, पडवाइ इत्यादि लक्षण का धारक सो सास्वादन गुणस्थानी. ३तीसरे मिश्र गुणस्थानीके लक्षण-मिश्र गुणस्थानी सर्वज्ञ प्र * द्वितीय मूल कान्ड-प्रथम सन्ड मूल द्वाग रोष्ण र णित तत्वोंको भी माने और, अज्ञानीयों कथित वातों को भी मा- ने, दोनोंही के वचनों तत्व रूप माने-आस्तिस्य बने. मिश्र मोह- के उदय कर सत्या सत्य का निर्णय करने की दरकार ही नहीं र- क्खे सो मिश्र गुणस्थानी. ४ चौथा अवति सम्यग् दृष्टि गुणस्थानके लक्षण-"तत्वार्थ नद्धानं सम्यग दर्शनम =अर्थात- १ जीव, २ अजीव. ३ पुण्य, पाप, ५ आश्रव, ६ संवर, ७ निर्जरा. ८ बन्ध. और ९ मोन. इन नवों ही तत्वों को द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक नोकर तथा नि- श्चय और व्यवहार के श्वरूप कर सर्वज्ञ प्रणितानुनार द्रव्य क्षेत्र काल भाव से भिन्न २ यथा बुद्धि, जानकर श्रद्धान करने वाले. और व्यवहार सम्यक्त्व के ७७ लक्षण युक्त होते हैं:-? ए रमार्थ के जान की संगति करे. २ परमार्थ का जान होवे. ३ म- म्यक्त्व-धर्म का वमन किये की संगति नहीं करे. और 2 पावंडि वों का परिचय नहीं करे. (यह ४ श्रद्धान) ५ विषयानगगी की। तरह जिन वचन का अनुगगी होवे. ६ क्षुधाता इष्ट भोजन का । आदर करे त्यों जिन वचन का आदर करे. और ७ विद्यार्थि की । तरह जिन वचन ग्रहण करे (यह ३ लिंग) ८-१-अन्हित-मिद्ध- । आचार्य उपाध्याय स्थविर्ग:-कुलं-गण-मंघ-न्वधनी-और नियावन्न- । इन दशों का विनय को (यह १० विनय) १८.२० अईत धर्मानु- याचियों को-मनने अछे जाने वचन में कानी करे और काया में १ फुट पाले. पाना-पीन बीमा : : एक गुर के पात सिप्पो मार पोपुर : म अट मा काली-भाविद माविका नसाहेब मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी १९ १ पहिले मिथ्यात्व गुणस्थानी के लक्षणः-१ अव्यक्त मि- थ्यात्व, २ व्यक्त मिथ्यात्व, २, अभिग्रह मिथ्यात्व, ४ अनभिग्रह- मिथ्यात्व, ५ अभिनिवेशिक मिथ्यात्व, ६ संशयिक मिथ्यात्व, ७ अनाभोग मिथ्यात्व, ८ लोकीक देवगत मिथ्यात्व, ९ लोकीक गु रुगत मिथ्यात्व, १० लोकीक धर्मगत मिथ्यात्व, ११ लोकोत्तर देव गत भिथ्यात्व, १२ लोकोत्तरगुरु मिथ्यात्व, १३ लोकोत्तर धर्मगत मिथ्यात्व, १३ कुमावचनी देवगत मिथ्यात्व, १४ कुमा बचनी गुरु गत भिथ्यात्व, १५ कुप्रा बचनी धर्मगत मिथ्यात्व, १६ सर्वज्ञ प्राणि त सूत्रों से कमी परूपणा मिथ्यात्व, १७ सर्वज्ञ प्रणित सूत्रोंसे अ- धिक परुपणा मिथ्यात्व, १८ सर्वज्ञ प्रणित सूत्रों से विप्रित परुणा मिथ्यात्व; १८ धम्म अधम्म सन्ना मिथ्यात्व,१९ अधम्म धम्म सन्ना मिथ्यात्व, २०साहु असाहु सन्ना मिथ्यात्व,२१असाहू साहुसन्ना मि थ्यात्व,२२जीव अजीवसन्ना मिथ्यात्व,२३अजीवजीवसन्ना मिथ्यात्व २४मग उमग्गसन्ना मिथ्यात्व,२५उमग्ग मग्गसन्ना मिथ्यात्व२६रुवी अरुवी सन्ना मिथ्यात्व, २७अरुवी रुवी सन्ना मिथ्यात्व, २८ अवि- नय मिथ्यात्व, २९ असातना मिथ्यात्व, ३० अकिरिया मिथ्यात्व ३१ अज्ञान मिथ्यात्व, ३२ प्रवर्तन मिथ्यात्व, ३३ परिणाम मिथ्या त्व, और ३४ प्रदेश मिथ्यात्व. इन ३४ मिथ्यात्वों में का किसी भी प्रकार का मिथ्यात्व सेवे सो मिथ्यात्वी. २ दुसरा सास्वादन गुणस्थान का लक्षण-मोहोदयि, आत रौद्र ध्यानी, हायमान परिणामी, मार्छित मति, दुर्मति, विषयी, क- प.यि, प्रमादि, पडवाइ इत्यादि लक्षण का धारक सो सास्वादन गुणस्थानी. ३तीसरे मिश्र गुणस्थानीके लक्षण-मिश्र गुणस्थानी सर्वज्ञ प्र द्वितीय मूल कान्ड-प्रथम खन्ड मूल द्वारा रोहण र णित तत्वोंको भी माने और, अज्ञानीयों कथित वातों को भी मा- ने, दोनोंही के वचनों तत्व रूप माने-आस्तिक्य बने. मिश्र मोह- के उदय कर सत्या सत्य का निर्णय करने की दरकार ही नहीं र- क्खे सो मिश्र गुणस्थानी. ४ चौथा अव्रति सम्यग् दृष्टि गुणस्थानके लक्षण-"तत्वार्थ नद्धानं सम्यग दर्शनम" अर्थात- १ जीव, २ अजीव, ३ पुण्य, पाप, ५ आश्रव, ६ संवर, ७ निर्जरा, ८ वन्ध. और ९ मोक्ष. इन नवों ही तत्वों को द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक नयोंकर तथा नि- श्चय और व्यवहार के श्वरूप कर सर्वज्ञ प्रणितानुसार द्रव्य क्षेत्र काल भाव से भिन्न २ यथा बुद्धि जानकर श्रद्धान करने वाले, और व्यवहार सम्यक्त्व के ७७ लक्षण युक्त होते हैं:-१ प रमार्थ के जान की संगति करे, २ परमार्थ का जान होवे, ३ स- म्यक्त्व-धर्म का वमन किये की संगति नहीं करे, और ४ पाखंडि यों का परिचय नहीं करे. (यह ४ श्रद्धान) ५ विषयानुरागी की तरह जिन वचन का अनुरागी होवे, ६ क्षुधातुर इष्ट भोजन का आदर करे त्यों जिन ववन का आदर करे, और ७ विद्यार्थि की तरह जिन वचन ग्रहण करे (यह ३ लिंग) ८-१७-अरिहंत-सिद्ध- आचार्य उपाध्याय स्थविर--कुल-गण-संघ-स्वधर्मी-और कियावन्त- इन दशों का विनय करे (यह १० विनय) १८-२० अर्हत धर्मानु- यायियों को-मनसे अछे जाने ववन से कीती करे और काया से १ वृद्ध वयवाले. दहू मृत्री-पृगणे दाभिन इन नीनोंको न्याविर कहते हैं.. एक गुरु के बहूत शिप्यों के समुदाय को कुल कहने : नम्बदाय को गण कह ते हैं. ४ माधु-मानी-श्राविक-श्राविका इन चारों को मंचभी जाते है और नाव भी कह ते हैं। .

। EY मा त मोपान-श्री गुणस्थान रोहण अडीशन द्वारी सुख उपजावे (यह ३ शुद्धता) २१ समभाव रक्खे, २२ वराग्य भा वर. २३ आरंभ परिगृह कम करे, २४ दुःखी की अनुकम्मा को और २५ जिन बबन का पुक्त आस्ति क्य होवे (यह५ लाण) २६ जिन बचन में शंका नहीं करे, २७ परमत की वांछा नहीको २८ करणी के फल का सन्देह नहीं करे, २९ पाखण्ड की महिमा नहीं कंग. और ३० पाण्डिका संग नहीं करे, (यह "दापाल) बन्न. ३१ धोन्नति कर्ता, ३३ धर्मात्म का भनि बन्न. 3. नार नागों के गुन का जान, ३५ चारों तीथाकी मी. (यह ५ भवण) ३६ मर्व शास्त्र का जान, ३७ निश कनाधा. २८ गयाथ मंबाद कर्ता, ३९. अनुमानादि में त्रि- काटा हवे. १० वीकट नापी, ४१ अनेक विद्या (इल्म) का जा- न. ४. प्रमिति में बन पांर, और ४३. कवित्व कर धर्म दीपाचे (यह नाव) १४-2-गाना-ज्ञानि-मावित्र-गुम-बलवन्त-और देव इनका इकलन वर्म विरुद्ध कार्य का आगार्ग ( यह ६ आगार ) '...'.'. बीमामि एक वा बालं. याम्बार बालं, इच्छित वस्तु देवमान कंमाणवाद को, और नमस्कार कर. (यह ६ यत्रा) का मन्या व मूल, जान, ५७ धर्मा भूषण की मम्मकन्य द. ८ वर्म नगरका मम्यकच कोट जान, ५१.धर्म मंह ल, मल्लल पाया जाने, ६० धर्म पदार्थों का सम्यकच काटा पहन का सम्यक्त्व भाजन जान. (यह म्या नमा आम्ति मान, आत्मा माधनि मान, ६४ बनन... आत्माको ही कम मुना माने, म भनेर दादादित्र को मोक्ष का माधन मा ना) उन २१ ला गुन अविर्गन मग दति . . . प anuaHere द्वितीय मूल काण्ड-प्रथम खण्ड मूल द्वारा रोहण ११ होते है. और शुद्ध व्यवहारी, चतुर्विध संघकी परम हर्ष भक्ति भावसे वत्सलता के कर्ता, मन तन धन कर धर्मोन्नति करता, गुण ग्राही- सर्व जीवों के एकान्त सुख शान्ति के इच्छक सो सम्यग दृष्टि गु- ण स्थानी. ५ पांचवे देश-विरति गुणस्थानी के लक्षण-चौथे गुणस्थान में कहे मुजव सम्यक्त्वी के गुणयुक्त आगे अनुक्रम से योग्यता प्र- माणे इग्यारे प्रतिमा धारण करते हैं:-१ दर्शन (समाकित) प्रतिमा २ विरत प्रतिम, ३ सामायिक प्रतिमा, ४ पौपर प्रतिमा, ५ नि- यम प्रतिमा, ६ ब्रम्हचर्य प्रतिमा, ७ सचित त्याग प्रतिमा, ८ अ- नारंभ प्रतिमा, ९ पेसारंभ प्रतिमा, १० अदिष्ट कृत प्रतिगा. और ११ समण भूय प्रतिमा. इनको अवलके गुणमें कायम रहते हवे आ- गे यथा शक्ति गुणों वृद्धि करत रहें. यह २१ लक्षण धारी होते हैं:-१अक्षुद्र.२ रूपवन्त, ३ शा- न्त स्वभवी, ४ अक्रूर, ५ भीरु, ६ लोक प्रिय, ७ असठ, ८ विच- क्षग,९लज्जालु. १० दयाल. ११ मव्यस्त, १२ मुदीर्घदर्शी, १३ गु- णानुरागी, १४ सूपक्षी. १५ गम्भीर. १६ विज्ञानी. १७ वृद्धभक्त, १८ विनीत (नम्र), १९ कृतज्ञ. २० परहितकारी, और २१ लब्ध- लक्षी-शास्त्रज्ञ. और भी २१ लक्षण-१ अल्पच्छा. २ अल्पारंभी. ३ अल्प परिग्रह ही. ४ सुशील. ५ सुविरती. ६ धर्मिष्ट, ७ धर्म विरती, ८ कल्प उग्र विहारी. ९ महा संवेग विहारी, १० उदासी. ११ वैगग्य. वन्त,१२ एकान्त आर्य. १७ सम्यग मार्गी. १४ सुसाधु. १ मुपात्र १६ उत्तम. १७ किरियावादी १८ आस्तिस्य. १९ आगधिक, २० -- ३५४ मुक्ति सोपान श्री गुणस्थान रोहण अहीशत द्वारी प्रभावक, २१ अर्हत के शिष्य, यों सब ५३ लक्षणके धारक होवे सो देशविरति गुणस्थानी ६ के प्रमत संयति गुणस्थानी के लक्षण-१ अहिंसा, २स त्ये, ३ दत्त (अचारी,)४ ब्रम्हचर्य और ५ निष्परिग्रही. (यह ५महा व्रत) ६–१० श्रोतेन्द्रि-चक्षुरोन्द्र-धणेन्द्रि- रसेन्द्रि और स्पशेन्द्रिय इन पांचों का निग्रह करे. ११-१४ क्रोध-मान-माय लोभ-इन चारों क- पाय को जीते, १५-१९ ज्ञानाचार-दर्शनाचार-चारित्राचार-तपाचा- र और वाचार इन ५ आचार को आराधे, २०-२४ इयार्समति, भाषा समिति-ऐषणा समिति-आदान-निक्षेपना समिति और परि- ठगवणीया समिति. इन पांच समित युक्त सदा प्रवृते. २५-२७ मन- बचन-और काया इनको स्ववस्य करे. २८-३६ मकान-कथा-आस- न-प्रेक्षन-सुणन-स्मरण-सरस अहार-अधिक अहार और सिणगार-य- ह नव ही कामें. विषय उत्पन्न होवे वैसे त्यागे. यों ३६ लक्षण के धारक होते हैं. १७ प्रकाा संयम पाले:-पृथवी-पाणी-आमि-पायु-वनस्पति बेन्द्रिय तेन्द्रिय-चौरिंद्रिय-पचेन्द्रिय और अजीव काय इन दशोंकी यत्ना क- रे, प्रेक्षना-पमार्जना-उत्प्रेक्षा-और परिठावणीय यह काम यत्ना निमित करे, मन बचन और काय को धर्म मार्गमें संलग्न करे. १२ प्रकार के तप-१ अनसन, ८ ऊणोदरी, भिख्याचरी ४ रसपरि त्याग ५ काया क्लेश, और ६ प्रति सलिनता (यह ६ वाह्य तप) ७ प्रायाश्चित, ८ विनय ९ वैयावच्च, १० सज्झाय ११ ध्यान और १२ कायू-त्सर्ग. यह १२ प्रकारका तप सदा करे. यह ६५ गुण के नाम कहे ऐसे अनेक उत्तम लक्षण के धार- क प्रमत संयति होते हैं, परन्तु इस गुणस्थान का नाम परमत हो- - ३५५ द्वितीय मूल काण्ड-प्रथम खण्ड मूल द्वारा रोहण र ने से यहा मदः विषय, कषायः निन्दा और वीकथा इन पांचों प्रमा- दोंके निवासस्थान होने के सवव से तथा योगोंकी, दृष्टि की, भाषा की और भावोंकी इन चारोंकी चपलता होनेसवबसे बहुदा कृष्णादि तीनों अशुभ लेश्या परिणती में परिणम ने सै मूल गुणों उत्तर गु- णों में सुक्ष्म वादर अनेक प्रकार के दोषों लगते हैं उन से वच ने सदा प्रयत्न वन्त रहते हैं, और लगे दोपों से शुद्ध होने सदा प्र- ति क्रमण प्रायश्चितादि करते रहते हैं सो प्रमत संयति गुण स्था- नी जानना. ७ सातवे अप्रमत संयति गुणस्थान के लक्षण-यहा पाचों प्रमाद का अभाव होने से यह जीवों-मन्दाभिमानी, मन्द विषयी, मन्द कपायी, सदा उद्यमी, अल्प भापी, गुणानुवादी, गम्भार्य, ए एकान्त धर्म ध्यानी. ज्ञानी शान्त दान्त आदि उत्तम गुण संयुक्त होवे सो अप्रमत संयति गुणस्थानी. ८ आठवे नियटि वादर गुणस्थान के लक्षण-यह वादर दु- सरे के जान ने में आवे ऐसी क्रोधादि कपायों की प्रणति में न- ही परिगमते हैं, अचपल, स्थिर स्वभावी शुल्ल ध्यानी वन पण्डित वीर्य को अवरण-अच्छा दन करने वाली प्रकृतियों को क्षय करने तीन वेगमय परिणामोंकी धारा समय २ प्रति बृद्धि करते हैं. सो अर्व करण गुणस्थानी. ९ नववे निवृति वादर गुणस्थान के लक्षण-इन के सूक्ष्म भी क्रोध मान माय और तीनों वेदों के विकार का अभाव हुवा जिस से-अक्रोधी, अमानी, अमायि, निर्विषयी अनुभव किये हुवे देखाते सुनाते भोगों की संपूर्ण वांया रूप संपूर्ण मंकल्प विकल्प रहित अपने परयात्म स्वरूप के ध्यान में निश्चल एकाग्र परिणम -- * मुक्ति सोपान श्री गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी १९ से क्षीण में क्षय करने में नहीं आती ये वर्ण तथा अवयव रचना का भेद होनेपर भी जो आनिवृति करणी रहतेहैं, सो अनिवृति क- रणी गुणस्थानी जानना. १० दशवे सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थान के लक्षण-किसी के भी जानने में न आवे ऐसे किञ्चित मात्र स्वभाविक ही लोभ अन्तः करण में रहने सिवाय बाकी सर्व विषय कषाय नष्ट होने से यह निष्कषायी, निलोभी महा गम्भीर्य, महा वैरागी, निश्चिन्त स्वात्म रूप परमात्मा के ध्यान में एकान्त एकाग्रता से निर्मम सर्व प्रकार की वांछाते निर्मुक्त महा मुनि सो सूक्ष्म सम्परायी गुणस्थानी, ११ इग्यारवे उपशान्त मोह गुणस्थानी के लक्षण-यह क- षाय को उपशांत कर हायमान परिणामी होनेसे पड़ते हैं, जिसके दो प्रकार:- (१) एकतो भव के क्षय होने से पड़ते हैं सो, और (१) स्थिति के क्षय होने से पडते हैं सो. (१) जो भव के क्षय हो नेसे पडवाइ-पतीत होते हैं सो उन का इग्यारवे गुणस्थान स्पर्श बाद आयुष्य पूर्व होने से उसी वक्त वो मनुष्य भव का क्षय कर मरकर नियमा से पांचों अनुत्तर विमानों में के किसी भी एक वि- मान में जाकर उपजते हैं. वहां उस ही समय वन्ध संक्रमण आदि आों ही कारणो का उद्यम प्रवृति हो इग्यारवे गुणस्थान के पडे हू- वे सीधे चौथे गुणस्थान मे आकर ठहरते हैं. बीच में के गुणस्थान किंचित मात्र ही स्पर्शा ते नहीं हैं, उपशम सम्यक्त्व से पडते वेदक सम्यक्त्व का स्पर्शन कर क्षायिक सम्यक्त्वी बन जाते हैं, सो भव क्षय पडवाइ जानना (2) और जो जीवों इस गुणस्थान की जघन्य एक समय की उत्कृष्ट अन्तर मूहूर्त की स्थिति है वो सम्पूर्ण होने से आगे जाने के रस्ते के स्वभाव के अभाव से तुर्त वहां से पीछे गिरते - - द्वितीय मूल काण्ड-प्रथम खण्ड मूल द्वारा रोहण र हैं और जहां जहां उदय उदीरणा प्रकृतियों का व्यव छिन्न पना हुवा हो उनको पीछी आरंभते अर्थात्-जैसी तरह से उपशमाइ थी वैसी ही तरह से पीछी उदय भाव में लाते वो पडते हवे आठवे गुणस्थान में तो नियमासे आते हैं. उसमें से कितनेक जीवों तो आठवे गुगस्थान में आकर उपशम श्रेणि त्याग कर पीछी क्षपक श्रेणि का प्रारंभ कर नववे दशवे गुणस्थान को स्पर्श वारवे चले जाते हैं. वो निश्चय से उस ही भव में मोक्ष पाते हैं. और कोई क्षायिक सम्यक्त्वी होकर पीछा श्रेणिका आरंभ नहीं करे और आ ठवे में नहीं संभले वो चौथे में आकर ठहरते हैं. इस से नीचे नहीं उतरते हैं. और उपशम सम्यक्त्वी आठवे में नहीं संभले तो सातवे छठे पांचवे चौथे आकर ठरे, और जो कभी चौथे में भी नहीं संभ- ले तो दुसरे होकर पहिले आवे; मिथ्यात्वी बन जावे परन्तु निय- मानहीं. कितनेक नहीं भी आते हैं. ऐसी तरहसे जो गमन गमन करे उनको उपशान्त मोह गुणस्थानी जानना. १२ वारवे क्षीण मोह गुणस्थानी के लक्षण-इन के सर्व कपा- य का भय होने से सर्व कर्मों की प्रकृतियों का संख्यातवा भाग में से वाकी एक ही भाग रहे उस वक्त-५ ज्ञानावरणीय, ९ दर्शनाव रणीय, ५ अन्तराय, और दो निन्द्रा, इन १६ प्रकृतियों की सत्ता की स्थिति सर्व अपवर्तना से अपवर्त कर (घटाकर) भीण कपाय की अद्धा जैसी करे, परन्तु निद्रा द्विक को स्थिति स्वरूप की अपे क्षासे एक समय हीन करे, और सर्व कर्मों रूप से वरावर होवे ज - यह उपनाम प्रेमि और भपक श्रेणि चारिख मोहकी प्रकृतियों को उपटा-: माने खपाने में होती है. परन्तु मम्पचव मोहनी की नहीं.

* मुक्ति सोपान श्री गुणस्थान रोहण अढीगतद्वारी ११ बक्षीण कपायद्धा अनन्तर मुहूर्त प्रमाण रहे. उस वक्त उन १६ प्र- कृति का रसघात विराम पावे (दुसरी बाकी रही प्रकृतियों का रस घात अभीतक विराम पाया नहीं है) फिर इन १६ प्रकृतियों को उदय ऊदीरणादि से वेदते २ एक समय अधिक अवलि का मात्र रह वहां तक वेद, फिर ऊदीरणा से विरामपावे, उस वक्त एक आव- लिका मात्र उदय कर वेदे, वो जावत् क्षीण कषाय के दीx चरम समय तक वेदे, फिर उस दी चरम समय में निद्रा और प्रवला का छद्मस्त पनमें ही घात करे-अर्थात निद्राद्धिक स्वरूप सत्ता की अपेक्षासे क्षय होये फिर ज्ञानावरणीय आदि तीनों कर्मों की १४ प्रकृतिाय का भी धात करे, सो मोह गुणस्थानी. १३ तेरवे सयोगी केवली गुणस्थानी के लक्षण-यह संजो- गी होनेके सबब से इन के वाह्य चलोपकरण-आहार विहारादि कार्यार्थ गमना गमनादि शुभ चेष्टा युक्त होते हैं, और-१ सयोगी २ सशरीरी, ३शुक्ल लेशी, ४ क्षायिक सम्यक्त्वी, ५ यथाख्यात चा- रित्री, ६ पण्डितवीर्य ७ शुक्लथ्यानी, ८ केवल ज्ञानी, ९ केवल द- शनी और १० शेलशी अवस्था को प्राप्त होते हैं, और जो पहिले तीसरे भव में तीर्थंकर नाम कर्म की उपार्जना करी होतो यहां अ ष्ट प्रतिहार्य, ३४ अतिशय, ३५ वणीगुण, मुनिन्द्र-नरेन्द्र-सुरेन्द्र के वंदनीय पूज्यनीय होते हैं. १४ अयोगी केवली गुणस्थानी के लक्षण-यह योग रहित होने से स्थिति घातादि रहित हवे हैं, जितनी उदयवति प्रकृतियों है उन्हे वेदते हुवे-क्षय करते हैं, और, जिन प्रकृति का उयद अन्तिम समय के पहिले समय को दी चरम ममय कहते हैं. .

द्वितीय मूल कागड-प्रथम स्वन्ड मूल द्वारा रोहण नहीं है फक्त सत्ता में रही है उस के दलिक स्तुिबुक + संक्रम कर उदयवति प्रकृतियों है उन्हे वेदे, वेदे कर क्षपावे, यों अयोगिक दि चरम समय लग करने से चारों ही अघातिक कर्म का यहां नाश होता है, वो अयोगी, अशरीरी, अलेशी, परम शुक्ल ध्यानी पण्डित वीर्य, भाषिक सम्यक्त्व, यथाख्यात चारित्र. कंवल ज्ञान. केवल दर्शन इन गुनों सहित होते हैं. सो अयोगी केवली गुण- स्थानी जानना. अन्तिम मुक्ति स्थान के परम परमात्मा के लक्षण केवल ज्ञान केवल दर्शन, निरावाध, भायिक-नम्यक्त्व. अजगमर. अम्प, अगुंरुलघु. अनन्त शक्तिवन्त. येही मिद्धत्व के लक्षण है. । ६ छट्टा दृष्टान्त द्वार. * १ मिथ्यात्व गुणम्धानी-जमे जन्मान्य मनुष्य जन्म मात्र से किसी भी वस्तु के दर्शन न होने से उनका स्वम्प यथा तथ्य जान शत्ता नहीं है. तैसे जीवादि नवों पदाधों को जानने नहीं हैं. और जो कोई जाने तो भी -(२) जैसे चतुग पान करने मे या पीलीये के गेग ने अच्छा दिन हुवा मनुष्य वन्तु को विपर्गन-अ न्य तरह से देखता है. नसे मियानवी जीवा भी नव ही पढायों को विपरीत. अन्य तरह में बढ़ते हैं. ३६३ पानाडियों की मामिल जानना.x नद्वादेहि गिरे ? Fट वाद-पान नरसि । किनाराज विमानत:

३६० मुक्त सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अढीशन द्वारी १ २ सास्वादन गुणस्थानी-(१) जैसे कोई मनुष्य ऊँचे प्रसा द पर चड नीचे देखने से चक्कर आया सो गिरा, परन्तु जमीन तक पहोंचा नहीं. तैसेही जीव सम्यक्त्व रूप महलपर चड परस्वभाव रू प प्रथवी का अवलोकन कर्ता कषायोदय रूप चक आनेते पडा, प- रन्तु मिथ्यात्व तक पहोंचा नहीं सों सास्वादनी. (२) जैसे किसी ने खीर सकर का आहार किया और वान्ती (उलटी)) होगइ, फिर मुह में थोडासा गुलचटा स्वाद बना रहता है, तैसेही सास्वादनी सम्यक्त्व का वमन किया बाद जरा से भाव रहते हैं. (३) जैसे घडीयाल पर डंक्का मारने से अबल बुलन्द अवाज हो फिर मन्द पडता जाता है तैसे सास्वादनी के परिणाम हायमान होते हैं. और (8) जैसे अम्ब वृक्ष से टुटा फल पृथवी पर नहीं आया, तैसे जीव रूप अम्ब परि- णाम रूप डाल, सम्यक्त्व रूप फल, मोह रूप हवा चलने से टुटा, प रन्तु थियात्व रूप पृथ्वी पर नहीं पड़ा सास्वादनी. ३ मिश्र गुणस्थानी-(१) जैसे दही और सक्कर दोनों भेले कर खाने से खट्टा और मीग मिला हूवा दोनों तरहका स्वाद आ ता है तैसे खट्टे समान मिथ्यात्व का भी स्वाद लेते हैं, और मीठे समान सम्यक्त्व का भी स्वाद लेते हैं. (२) कोइ मिश्र दृष्टि मुनि राज के दर्शन करने गया, वहां मुनि राज का अभाव होनेसे बा- व जोगी फकीर जो मिला उस के ही दर्शन कर उतना ही धर्म मान लिया सा मिश्र दृष्टि जानना. ४ अविरति सम्यग् दृष्टि गुणस्थानी-(१) जैसे नदी में पड़ा हुवा फत्थर पानी के आवा गमन से-अन्य पत्थरों रेतीसे अथडा २ कर-घिसा २ कर स्वभाव से ही गोळ साफ-चिक्कणा-चमकदार बन जाता है। तैसे यह जीव संसार रूप नदी में जन्म मरण रूप आ- ३६१ द्वितीय मूल कान्ड-प्रथम सन्ड मूल द्वाग रोहण वा गमन से, क्षुधा तृषा-शीत-ताप-ताडन-भेदन-आदि अनेक कष्टों के सहन करने से, यथा प्रवृति करण कर कोमल बना, अपूर्व क- रण कर उज्वल बना और अनिवृति करण कर-निर्मल बना. सम्य क्वी हवा. (२) जैसे महा मेघकी घाटा से अच्छा दित हुवा सूर्य वायु के प्रयोग से वो बदल पतले पड़ने से कुछ तेज का प्रकाश करता है. तैसे अनादि कर्म पटलों से कर्म पडलों कर अच्छा दि- त हुवा आत्मा का तीनों करण रूप वायु मे कर्म पतले पड़ने से ज्ञानादि ज्योति का कुछ प्रकाश हुवा. जिनमे सर्व प्रणित तत्वों का श्रद्धान हवा, उन तत्वोंकी प्रभावना को देव दानव मानव के किये मरणातिक संकट से भी सम्यक्त्व में परिणाम चलित नहीं क २, द धर्मी प्रिय धर्मी होवे कृष्ण वासुदेव श्रेणिक गजा आदिवत् ५ देश विरति गुगस्थनी-जने अर्काम को जहर जानता हु वा भी व्यश्न का प्रेरा हुवा कार्य साधन कन्ने प्रमाण युक्त भवन करता है. तेसे श्रावक भी आरंभ पग्ग्रिह को वोटा जानते हुवे । भी कर्म रूप व्यश्न के प्रेरे हुवे. आन्म कार्य नाथ ने मयांदकं अ- न्दर मदा प्रवृति करते हैं. (२) जैन पाय माता-उनके वर्ग को स्तनपान कगती-क्रिडा कगनी भी उन बच्चे ने विन भाव न्ह- ती .तेने धावक भी गिर नम्जन का पोषन कन्ने पिन भा वी रहते हैं. दगा श्रावकोदत. ६ प्रमन मंगति गुपन्धानी-(!) जन धनाना शंट अपने ! प्राण प्यारे देव दन पुल का घातिक विजय बोर के नाथ (एकही। । खोटे में) पम पांग फन अपना कार्य गरन हानीन भाव में उने महान दा दिनग दियानर नावनी भान गण के बानि- ६. गिरकर दारद बाद में हनागनादन निर्वध उपदा : --- "

* मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान गहण अढीगतदारी
र से शरीर पोपते हैं. (२) जैसे लाभार्थी व्यापारी, थोडा द्रव्य का
व्यय कर बहुत लाभोपार्जन करने खप करते हैं, त्यों साधु अप-
वाद मार्ग में प्रवृति रूप द्रव्य का व्यय कर, उत्सर्ग मार्ग की प्रवृ-
ति रूप लाभोपार्जन की खप करते हैं, धर्म रूचीजी के गुरू धर्म
धोप जीवत्, या वृतमान साधूओं वत्.
७ अप्रपत संयति गुणस्थानी-(१) जैसे उत्कृष्ट कामाथि अ
पर्ने दुसाध्य कार्य को साध ने तत्पर हुवा, उस के मध्य में आते
हुवे महा विघानो की दरकार नहीं रखता, महा कष्टों को भी शुभ
रूप मान, इष्ट कार्य की तरफ लक्ष विन्दु चौटा कर कार्य साधता
है, तैसे ही अप्रमत मुनिराज भी आत्मार्थ साधन में लक्ष बिन्दू ए
काग्रता से लगा, उपसर्ग परिसहों की दरकर नहीं रखते हुवे आ-
त्म मोक्षार्थ का साधन करने में प्रवृति करते हैं, धन्ना अणगार, मे-
घ कुमर आदि मुनियोंवत्.
८ नियट्टी बादर गुणस्थानी-(१) जैसे अनेक पंथानुगामी
(रस्तागिर) अजान रस्ते में भ्रमित हुवे, पुनः रस्ते के जान होते ही
उसे उत्सहा से उलंघते हुवे, उन में से जो राज पन्थ धारण करता
है सो इष्ट स्थान प्राप्त करता है. और जो छन्डियों (अपूर्ण रस्ते) में
पडता है उसे आगे रस्ता न होने से उसी रस्ते पीछा पलटना पड
ता है, तैसे ही अष्टम गुणस्थान वृति मोक्ष मार्ग में उत्सहासे गमन
करते जो क्षपक श्रेणि रूप राज मार्ग धारण करते हैं वो मोक्षस्था
न प्राप्त करते हैं, और जो उपशम श्रेण रूप छन्डि का मार्ग धा-
रण करते है वो पडवाइ होते हैं, प्रसन्न चन्दजी राज ऋषिवत्.
दुहा-जो समदृष्टि नीवडा । करे कुटुम्ब प्रानपाल ।
अन्तरसे न्यारा रहे । ज्यो ध्याय खेलावेवल ॥१॥

३६३ द्वितीय मूल काण्ड-प्रथम खण्ड मूल द्वारा रोहण र ९ अनियट्टी बादर गुणस्थानी-जैसे क्षार के संजोगसे दूध फट जाने से वो घृत से निराश होता है, फक्त स्वभाविक चिक- णास की झलक रहती है, तैसे नववे गुणस्थान वृति महात्मा के अन्तः करण से निवृति करण रूप क्षार कर के, विषय कपाय रूप घृत से निराश हुवा फक्त स्वभाविक संज्वल के रूप चीकास रही, हरकेशी ऋषिवत्. १० सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थानी-जैसे कासूबे के रंग से रंगति वस्त्र को क्षारादि से धो साफ किये बाद-श्वेत हुवे बाद भी उस में रंग की कुछ मोतीया झलक रहती है. तैसेही दशवे गुणस्थान वं- ती ने आत्म रूप वस्त्र का कपाय रूप रंग को दुर करने चारित्र रूप पाणी. तप रूप अग्नि. और सूक्ष्म करण रूप क्षार (सावन) से धो उज्जल करी है तो भी सूक्ष्म संज्वल लोभ कपाय रूप झल क रहजाती है. ११ उप शान्त मोह गुणस्थानी-(१) जैसे अग्नि के प्रज्व- लित अंगारे को राख कर दुक देने से उस का तेज छिप जाता है. परन्तु उसका कुछ नाश नहीं होता है, वायु का प्रयोग होते ही उपर ढकी हुइ राख दूर होते ही उस अनि का तेज प्रगट होता है, तैसे ही इग्यारवे गुणस्थान वृति ने मोह कर्म रुप अंगार को उपशम भाव रूप राख कर टुकी थी, सो संज्वल के रूप वायु का झपटा लग ने से पुनः जरूर ही प्रगट होती है (जिस से वो पडवारह होता है. (२) जैसे चौतरफ मुद्रित कर एक ही दरबज्जे बली कोटडी में प्रवेश किया हुवा मनुप्य जिस रस्ते से प्रवेश किया था, उसी रस्ते से पीछा वाहिर आना पड़ता है- । सरी तरफ जा नहीं शक्ता है. तसेही इग्यारखे गुणस्थानवति जिन ܝ ३६४ . ? - * मुक्ति सोपान श्री गुणस्थान रोहण अढीशत द्वारी प्रकृतियों का उपशम कर प्रवेश कियाथा उन्ही प्रकृतियों का पी छा उदय होने से पीछे निकलते हैं. अर्थात् पडवाइ होते हैं. कुंड- रिकवत्. १२ क्षीण मोह गुणस्थानी-जैसे प्रज्वलित अग्नि अमोघ मे घ धारा की दृष्टि कर शान्त शीतल होजाती है-साफ बुझ जाती है-फिर जिस मे उत्पन्न होने की शक्ति बिलकूलही नहीं रहती हैं. तैसेही बारवे गुणस्थान वर्ती महात्मा ने मोहनीय रूप अग्नि- का परम शान्ति रूप पाणी की अमोघ वृष्टिसे साफ बुझा कर-नि- रांकुर करी. सो पीछी कदापि उत्पन्न नहीं होती है, स्कन्धक मुनि १३ सयोगी केवली गुणस्थानी-मेघ पटलोंका सर्वथा नाश होनेसे नभ मण्डल में संपूर्ण किरणो कर जाज्वल मान सूर्य का प्रकाश होता है. तैसे ही तेरवे गुणस्थान वर्ती के घन घातिक क- म रूप आभ्रपठलों का नाश होते ही अनादि निधान केवल ज्ञा न केवल दर्शन रूप सूर्य का महान प्रकाश होता है, श्री महावीर स्वामीवत् व, चौवीसी तीर्थकरोवत्. १४ अयोगी केवली गुणस्थानी-जैसे सर्व पर्वतों में बढासु दर्शन मेरु पर्वत एक हजार जोजन की जमीन नीव बाला ९९ ह- जार जोजन का उंचा उसको प्रलय काल होवे ऐसा पवन भी ह- ला नहीं शक्ता है, तैसे चउदवे गुणस्थानी परमात्मा के भी मनादि त्रियोगों निक्रिय हो निष्फन्द स्थिरी भूत होजाते हैं वों कदापि च- लित नहीं होते हैं. गजसुकुमालवत्. अन्तिम-मोक्ष स्थानो प्राप्त करने के रीति-जैसे (१) पूर्व प्रयोग से-जैसे धनुश्य से छुटा हुवा बान पहिले प्रयाग-धके कर आ गे को जाता है, तैसे आत्मा भी पहिले मुक्ति प्राप्त होने के लिये प्र- - .

* द्वितीय मूल कान्ड-प्रथम खन्ड मूल द्वारा रोहण र योग-उद्यम करता था उस प्रयोग के धक्के से मुक्ति तक जाता है. (२) असंग से सो-जैसे माट्ट और सण के लेपसे भारी हुवा तुम्बा पाणी में हवा हुवा था, वो लेप गलकर छूटतेही तुर्त पाणी के उ- पर आजाता है, तैसे ही आत्मा कर्म वर्गणा के लेप कर संसार में डुव रहाथा, वो लेप गल के छूटने से संसार के अन्तिम विभाग में मोक्ष को प्राप्त होता है. (३) वन्ध छेद से सो-जैसे एरन्ड के -फळ में वीज वन्धा हवा था सो फल सूक कर फटते ही वीज ऊं- वा उछल पडता है, तैसे ही आत्म कर्म वन्ध से छूटते ही उर्द्ध लो क को गमन करता है.(१)जैसे पवन रहित अनि की ज्वाला का स्वभाव से ही उर्द्ध गमन होता है. तैसे ही कर्म हित आत्मा भी स्वभाव से ऊंची दिशा जाती है (५) जैसे पांचों ग्मों में मे घृत का किसीभी रस में कथन नहीं कर सके (स्वाद नहीं बता मके) त्यों सिद्ध के सुकों का भी वरणन न होसके. ७ सातवा-गुण द्वार. . १ मिथ्यात्व गुणस्थान वाला-मिथ्यात्व बुद्धि-दुबुर्दि कर असत्य पदार्थों में नत्य भाव धारण कर. दुन्द को मुख रूप मान पुदल परिणति में आपा स्थापन कर. अनेक प्रकार की आधि व्याधी उपाधीसे पिडित होता है. आगे वागें गति न्य बोहंट (ना रस्त) में जीव रूप गेन्द को. कर्म य दंडाका प्रहार का मिल्या- त्व रूप सेलाह मदा परिन्द्रमण कन्ता ही न्हेगा. जहां तक इन स्थान में मंन्थिन रहेगा वहां नक.मनाका अन्न कदापि नहीं पा नद्वारे मुन्दिगि १ श । -- + -- . मुक्ति सोपान श्री गुणस्थान रोहण अडीशन द्वारी यगा-परमात्मा नहीं बनेगा. २ सास्वादन गुणस्थान में आने से कृष्ण पक्षी का शुक्ल पक्षी + हुवा, और आगे उत्कृष्ट अध पुद्गल परावर्तन काल वाद निश्चयसे मोक्ष पायेगा. ३ मिश्र गुणस्थान में आने से मिथ्यात्व कर काला ऊदिड ध्यान्य जैसा था, सो परिणामों कि मिाश्रिता रूप पाणी से धोवाकर मोगर दाल जैसा उज्वल हुवा, कृष्ण पनी का शुक्ल पक्षी हुवा, अ- नादि से उलटा (मोक्ष की तरफ पृष्ट और संसार की तरफ मुख) था सो सुलटा होगया. सम्यक्त्व सन्मुख हुवा. आगे शक्ति की वृद्धि- कर उत्कृष्ट देश ऊणा (कुछ कम) अर्थ पुद्गल परावर्तनमें मोनपावे ४ अविरति गुणस्थान स्पर्श ने वाले सम्यक्त्व उपार्जन कि- ये पहिले, आयू का वन्ध पड गया हो, वो और सम्यक्त्व का वमन किये वाद भी चारों गति में चला जाता है. तो भी देश ऊणे अर्द्ध पुद्गल परावर्तन के अन्दर मोक्ष पाता है, और जो पहिले आयुष्यका वन्ध नहीं पड़ा होवे तो-सम्यक्त्व उपार्जन कियेवाद-१ नरकगति. २ भवनपति देव,३ व्यन्तर देव, ४ जोतिषी देवः ५ तिर्यंचगति, ६ स्त्रीवेद, और ७ नपूंसक वेद, इन सातों स्थानों में उपजने का-मरक र जाने का आयु वन्ध करे नहीं. अर्थात्-सम्यक्त्वी मरकर इन सा- तों स्थानों में उत्पन्न नहीं होता है. सम्यक्त्वी तो फक्त एक ऊंच जा : ति के विमानीक देवों में प्रथम स्वर्ग से बारखे स्वर्ग तक जाकर उ- "त्पन्न होता है, और जो सम्यक्त्व का वमन नहीं करतो निश्चय से + मिथ्यात्र रूप गहु करके चैतन्य रूप चन्द्रमा अनादि से अच्छा दिन, रह- या मो इस स्थान में आने से वो राहुं जरा दूर हुवा जिम से द्वितीया के चन्द्र जैसा ब्रानादि आत्म गुणका प्रकाश दुवा.

- १ द्वितीय मूल काड-प्रथम खन्ड मूल द्वारा रोहण पन्दरे भवों के अन्दर ही मोक्ष प्राप्त करलेता है. ५ देशब्रति गुणस्थान में आने वाले संतोष रूप आनन्दके भुक्ता, सर्व जीवों के विश्वासानिय, माननिय, यशश्वी बनें, और जो व्रतों का भंग नहीं करे तो-जघन्य पहिले देव लोक में उपजे, उत्कृष्ट वारवे देवलोक में उपजे, और जघन्य ३, उत्कृष्ट १५ भवमें मोक्ष प्राप्त करे. ६ प्रमत संयति गुणस्थान वाले- सर्व चिन्ता से निर्मुक्त, शाल संतोष दया क्षमा आदि विभुति से भूपित, तपोधन, नरेन्द्र सुरेन्द्र के वंदनीय पूज्यनीय, ज्ञानान्द के ध्यानानन्द में निर्मग्न रह आयुष्य समाप्ति वाद जघन्य प्रथम स्वर्ग उत्कृष्ट अन्तिम स्वर्ग सर्वार्थ सिद्ध विमान तक जाकर उपजते हैं, और जघन्य ३ उत्कृ- ट १५ भव में मोक्ष पाते हैं. ७-१० अप्रमत संयति से सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थान में प्रवृत ते, अप्रमदित निर्विषयी, निःकपायी आत्म ध्यानके परमानन्द में मग्न हुवे, आप्यु के अन्त कल्पतीत देवों में जाकर उत्पन्न होवे. और उत्कृष्ट बीसरे भव मे मोक्षकी प्राप्ति करे. ११ उपशान्त मोह गुणस्थान वाले चीतरागी-यथाख्यात चा रित्री. परम उपशान्त रस मे निर्मग्न, आत्म ज्ञान के सहाजनन्द सुखों में रमण कर्ता, आयुष्य पूर्ण कर अनुत्तर विमान में उपज- ते हैं. और जघन्य उसी भव में, उत्कृष्ट तीसरे भव में मोन पातह. १२क्षीणमोह गुणस्थान वाले भपकाण नायिकभाव क्षायिक सम्यक्त्व क्षायिक यथाख्यातं चारित्र, करण सत्य, जोग सत्य, भाव मत्य, अमायी. अकपायी. वीतरागी, भावनिग्रन्थ. संपूर्ण सम्बुडः सम्पूर्ण भवीतात्मा. महा तपश्वी महा सुशील. अमोही. अविकारी, महा- ३६८ * मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अहोगन द्वारी ज्ञानी, महा ध्यानी, बुद्ध मान परिणामी, अपडवाइ उस ही भव में मोक्ष पाते हैं. १३ सयोगी केवली गुणस्थान वाले-परमात्मा केवल ज्ञान केवल दर्शन प्रकट होने से सर्वज्ञ सर्व दार्श बने, अर्थात्-सर्व द्रव्य सर्व क्षेत्र, सर्व काल, सर्व भाव और सर्व भवों की परिपाटीको ए- क समय अविछिन्न पनेजानने देखने लगे, सर्व जगत् जंतुओं के माननिय वंदनीय पूज्यनीय हुये. और आयुष्य के अन्त निश्चय समोक्ष पावे. १४अयोगी केवलगुगस्थानवाले सर्व उत्तमोत्तम गुगोंके सा गर सर्वथा कर्म मल रहित, परम पवित्र, अनन्तर, अप्राति पाति, अनिवृति ध्याता,रूपातीत,फक्त पंचलघु अक्षर उच्चारनेमे जितनी देर लगती है उतनी देर बाद में ही मोक्ष प्राप्त करते है। और अन्तिम मोक्ष स्थान को प्राप्त भये हैं. वो परमात्म- जन्म जरा मरण रूप जालम दुःखों सर्व था मुक्त हो आधि व्या- घि उपाधी का जड मूल से नाश कर, निराबाध-अक्षय-अनन्त सु ख के भुक्तावने सिद्ध, बुद्ध, परांगत, परम्परागत , सर्व कार्यार्थ साध, कृतकृतार्थ निष्टितार्थ अतुल सुख सागरें सदा निर्मग्न बने रहते हैं. आठवा अवघेणा हार * मिथ्यात्व-सास्वादन-मिश्र और अविरति इन चारों गुणस्था. न में वर्तने वाले जीवों के शरीर की अवघेणा (ऊंचाइ) जघन्य (थोडीसे थोडी) अंगुल के असंख्यातवे भाग जितनी और उत्कृष्ट . * इस द्वाराके खुलासे के लिये देखीये अर्थ काण्डका पृष्ट १०१ वा. .

.. । * द्वितीय मूल काण्ड-प्रथम खण्ड मूल द्वारा रोहण र (ज्यादा से ज्यादा) एक हजार जोजन प्रमाणे होती है देशवति गुणस्थान वालों की जघन्य ९ अंगुल की, उत्कृष्ट ५०० धनुष्य की अवघेणा होती है. प्रमत अप्रमत गुणस्थान वालों की जघन्य ? हाथ की उत्कृष्ट पांचसो धनुष्य की अवघेणा होती है. अपूर्व करण गुणस्थान से लगाकर अयोगी केवली गुणस्था- न वालों की जघन्य २ हाथ की उत्कृष्ट ५०० धनुष्यकी अवघेणा. और अन्तिम स्थान मुक्ति में जो परमात्माके शुद्धात्म प्रदे- शों है उन की जघन्य एक हाथ आठ अंगुल, मध्यम चार हाथ मोले अंगुल और ऊत्कृष्ट ३३३ धनुष्य ३२ अंगुल की अवघेणा होती है. नववा-उत्पति द्रव्य परिमाण द्वार एकही समय में जीवो उत्पन्न होवे तो मिथ्यात्व गुणस्थान में जघन्य-१-२-३. उत्कृष्ट संख्याते असंख्याते और अनन्ते जीव. सास्वादन, मिश्र, अविरति, और देश विरति-इन पांचों गुणस्था न में जघन्य -१-२-३, उत्कृष्ट-संख्याते असंख्याते. जीवों पावे. छट्टे प्रमत गुणस्थानमें जघस्य १-२-३-उत्कृष्ट प्रत्येक हजार सातवे अप्रमत गुणस्थानमें जघन्य १-२-३, उत्कृष्ट प्रत्येक सो. अपूर्व करण,अनिट्टी वादर, और मृत्म सम्पराय, इन तीनों गुगस्थान मे अलग जघन्य १-२-३, उत्कृष्ट दोनों श्रेणि के मिल : १६२ जीवों पावे. 8: इम द्वारके मुलामे के लिये देखिये अर्थ कांडका पृष्ट १०९ वा. दोसे लगाकर ९ नक की मंख्या को प्रत्येक नाम में बोलते हैं. ।

* मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान राहेण अटीशनद्वारी र उपशान्त मोह गुणस्थानमें जघन्य १-२-३, उत्कृष्ट ५४जीवो औ क्षीण मोह, संयोग केवली अजोगी केवली इन. गुण-। स्थाने में तया अन्तिम मोक्ष स्थान में जघन्य १-२-३, उत्कृष्ट १०८ जीवो उपजते हैं: दशवा-पावति द्रव्य परिमाण द्वार. * हरवक्त-मिथ्यात्व गुणस्थान सें-अनन्तांत जीवों पातेहैं. सास्वादन और मिश्र गुणस्थान में-जघन्य-१-२-३, उत्कृष्ट असंख्याते.आविरत और देशविरति गुणस्थान में-जघन्य थोडे अ- संख्याते उत्कृव वहूंत असंख्याते जीव पावे. प्रमत गुणस्थान में जघन्य दो हजार करेड, उत्कृष्ट ९ ह- जार कोड.अप्रमत गुणस्थानमें-जघन्य दोसो कोडं उत्कृष्ट सो कोड. अपूर्व करण, अनिटीवदर और सूक्ष्म सम्पराइ इन तीनो गु णस्थानों में उपशम श्रेणिके ५४ और खपक श्रेणिके १०८ दोनों भिल १६२. उपशान्त मोह गुणस्थानमें-पूर्व प्रवर्तन आश्रय-जघन्य, १-२-३, उत्कृष्ट प्रत्यक,सो वर्तमान प्रवर्तन आश्रिय जघन्य १-२-३ उत्कृष्ट ५४ जीवोंपावे. क्षीण मोह गुणस्थान में-पूर्व प्रवर्तन आश्रिय जघन्य१-२-३, उत्कृष्ट प्रत्येकसो, वृतमान प्रवर्तन आश्रिय जघन्य १-२-३, उत्कृष्ट १०८ जीवों पावे. संयोगी केवली गुणस्थानमें पूर्व प्रवर्तन आश्रिय जघन्य दोकोड उत्कृष्ट नव कोड जीव पावे, वृतमान प्रवर्तन आश्रिय जघन्य १-२- 3- इस द्वारके खुलासाके लिये देखिये अर्थ कांडका पृष्ट १०१वा. :

द्वितीय मूल काण्ड-प्रथम खण्ड मूल द्वारा रोइश ३, उत्कृष्ट १०८ जीवों पावे. अयोगी केवली गुणस्थान में पूर्व प्रवर्तन आश्रिय जघन्य, १-२-३. उत्कृष्ट प्रत्येक सो जीव पावे. वर्तमान प्रवृतन आश्रिय जघ- 'न्य १-२-३. उत्कृष्ट १०८ जीवों पावे. अन्तिम सिद्धस्थान में सदा अनन्तांत जीवोंका निवासहै. इग्यारवा-क्षपति द्रव्य परिमाण हार. एक समय में जीवोंचवे-न्दप-मरें तो-१ मि यात्व गुणस्थानमे जघन्य १-२-३. उत्कृष्ट-संख्याते असंख्याते अनन्तं. २-५ सास्वादन से देशविरति गुणम्धान वाले जीवों एक समय में चवेतो जघन्य १-२-३ उत्कृष्ट मंग्यात अमंग्यात. ६-७ प्रमत अप्रम गुगस्थान मे-जघन्य १-२-३. उत्कृष्ट प्रत्येक मा. E" x रम द्वारके बुलासा के लिये देखिये अर्थ बांटका पट : वा. * दिगम्बर आमना के सलगपी अन्य में पानी में द्रव्य का परिमाण हस्तरे दान:-पहिले पापन अनन्तान्त जीप दुस-यो (१) प्रोट जीवो पाई. नीना में नोट. चौथे--: मोहोर मोर. १३१८००६. मात.. सारी आपर आई...... नई.... और दानन्द::.म.-. और अपनी भाभि-...... टा.८: भी ५०८. और रजव में भी ८ सद रानी ८.८५ सा.पनि रस - ८...... तो नंद एलीम र पदि.3 किन T .

३७२
* मुक्ति सोपान श्री गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी १३
नों
.
८-१०अपूर्व करण-अनिटी बाद और सूक्ष्म सम्पराय इन ती
गुणस्थान में. जघन्य १-२-३, उत्कृष्ट दोनों श्रेणिके मिल कर
१६४ जीवों.
११ उपशान्त मोह में जघन्य १-२-३, उत्कृष्ट ५४ जीवमरे.
१२-१४ क्षीण मोह,सयोगी केवली और अजोगी कैवली
गुणस्थान में जघन्य १-२-३ जीवों चवे, उत्कृष्ट-१०८ जीवों एक स
मयमें मरे, और अन्तिम सिद्धस्थानमें खपति नहींहै-सदा वृद्धिहीहै,
बारवा-क्षेत्र परिमाण द्वार *
१ मिथ्यात्व गुणस्थान सर्व लोक में पावे.
१-४ सास्वदन, मिश्र, और अविरति यह तीनो गुणस्थान
त्रस नाडी मेंही पावे.
५ देशविरति गुणस्थान-तिरछे लोक में और अधोलोक में,
६-१४ प्रमत से संयोगी केवली तक के ९ गुणस्थान वाले
जीवों अढाइ दीपमेंही पातेहैं.
तेरवा-क्षेत्र स्पर्शना द्वार*
१ मिथ्यात्व गुणस्थान वाले जीवों सर्व लोक स्पर्श.
२ सास्वादनी-नीचे पंडग वन से छठी नरक तक स्पर्श उ.
पर अधोगामिनी विजय से नवनिवेक तकका क्षेत्र स्पर्श.
मिश्र गुणस्थान वाले लोक का असंख्यातवा भाग स्पर्श.
2 अविरति गुणस्थानी-ऊपर अधोगामिनी तिजय से बारा
2 * इम द्वारके खुलामे के लिये देखिये अर्थ कांडका पृष्ट १११ वा.

* द्वितीय मूल काण्ड-प्रथम खण्ड मूल द्वारा रोहण पूर देव लोक तक, और नीचे पडंगवनसे छी नरक तकका क्षेत्रस्पर्श. ५ देश विरति गुणस्थानी-अधो गामिती विजय से १२ दे- वलोक तक स्पर्शे. ६-११ प्रमत गुणस्थानी से लगा, उपशान्त मोह गुणस्थान वाले जीवों अधोगामिनी विजय से लगाकर पांच अनुत्तर विमान तक स्पर्श. १२ क्षीण मोह गुणस्थान वाले लोक का असंख्यातवा भा- ग स्पर्श. १३ सयोगी केवली गुणस्थानी-सर्व लोक स्पर्श. = १४ और अयोगी केवली गुणस्थानी-तथा सिद्ध भगवान लोक का असंख्यात वा भाग स्पर्श. चउदवा-काल परिमाण (स्थिति) द्वार.* १ मिथ्यात्व गुणस्थानकी स्थिति तीन प्रकार कीः-(१)अ- णाइया अपनवासिया" अर्थात-आदि और अन्तरहित मिथ्यात्व अ भव्य जीवों का होता है. अभव्य कदापि सम्यक्त्व नहीं स्पर्शतह. (२) “ अणाइया सपज्जवसीया"-अर्थात् आदि तो नहीं परन्तु अन्त आता है. ऐसा मिथ्यात्व भव्य जीवोंका होता है, किसी भी वक्त मिथ्यात्व गुणस्थान का त्याग कर आगे बढ़ते हैं. (३) मह- या सपज्जवसीया" अर्थात्-आदि और अन्त दोनों सहित. एम ET x इन द्वारके मुलामा के लिये देखिये ये कांडा पृष्ट ११ वा. न लेक केवल नमुद्र याद कन्नी त साने कम momummon -- मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अनीगतद्वारी मिथ्यात्वी पडवाइ + सम्यग् दृष्टि जीव होते हैं. जिनकी स्थिति जघन्य अन्तर मुहूर्तकी, उत्कृष्ट अर्थ पुदल परावर्तन काल जितनी २ सास्वादन गुणस्थान की स्थिति-जघन्य एक समय की और उत्कृष्ट छे आवलि का और सात समय की, फिर मिथ्यात्व में जावे. ३ मिश्र गुणस्थान की स्थिति-जघन्य उत्कृष्ट अंतर ही मुहुर्त की. ४ अविरति सम्यकदृष्टि गुणस्थानकी स्थिति-जघन्य अन्तर मुहूर्त मुहुर्त की, उत्कृष्ट६६ छांसट सागरोपम झाजेरे की (कुछ ज्यादा)x ५-६-१३ देश विरति, गमत संयति और सयोगी केवली इन तीनो गुण स्थानों की स्थिति-जघन्य अन्त मुहूर्त की, उत्कृष्ट- देश उणा (८ बर्ष कम) कोड पूर्व की. x + पडवाइ सम्यक्त्व दृष्टि उसे कहते हैंकि-जो मोहनीय की प्रकृतियोका उप- शम (ढक) कर सम्यक्त्वकी प्राप्तिकरी, और फिर मोहोदय होने से सम्यक्त्व का वमन कर पडा-मिथ्यात्व में गया (यह मिथ्यात्व की आदि हुइ) और फिर भी उन प्रकृतियोंका उपशम क्षयोपशम क्षयकर उस गुणस्थान छोड ऊपर पडा(यह अन्त हुवा) यों दोनो भांगे पाते हैं. जितना व्यजनाव ग्रहका काल (पृथक श्वाश ममाण) होता है, उतनी मिश्र गुणस्थानकी स्थिति है. x यह ६६ सागरोपम यों होते हैं. बारवे देवलोक में २२ सागरोपम की स्थिति उत्कृष्टी है. वहां तीन वक्त उपजे, और वीच मे तीन भव मनुष्यके करेसो झा. जेरा जानना. क्योक देवता मरकर देवता होता नहीं हैं इसलिये वीच मे तीन भव मनुष्यके गिने है. यो छांछट सागर तीन पूर्व क्रोडी मनूष्य भव आश्रिय अधिक पूर कर फिर जो माहादेय होयतो मिथ्यात्व मे चलाजाय. * साधू पना और श्रावक पना विज्ञान वय (८ वर्षकी) हुवे वाद ही ग्रहण

* द्वितीय मूल काण्ड-प्रथम खन्ड मूल द्वारा रोहण र
७-११-३ प्रमत गुणस्थानसे लगा उपशान्त मोह गुणस्थाने
तक पांचोंकी अलग २ स्थिति-जघन्य १ समय, उत्कृष्ट अन्तर
मुहूर्त की.
१४ अयोगी केवली गुणस्थान की स्थिति पंच लघु अक्षर
(अ. इ. उ. ऋ. ल.) इन के उच्चार में वक्त लगे उतनी.
और अन्तिम स्थानी सिद्ध भगवन्त की स्थिति दो प्रकार
की-(१) "अणादिया अपंजवसिया” सो अन्त सिद्धोंका आदि
और अन्त दोनों ही नहीं हैं. क्योंकि अन्त काल वीत गया और
वीत जायगा और (२) “सआय अपज्जवसीया" सो कितनेक
सिद्धों की आदि तो है जैसे महावीर प्रभू कार्तीक अमवस्य को
मोक्ष पधारे परन्तु अन्त नहीं अमर हैं:
पन्दरवा-काल प्राप्त हार
3-१२-१३ तीसरा-मिश्र, बारवा-क्षीण मोह, और तेखा-
संयोगी केवली इन तीनोगुण स्थानों में कोइभी जीव कदापि काल
प्राप्त नहीं करता-मरता नहीं है।
१४ अयोगी केवली गुणस्थान में अवस्य काल करता है-
१-११ वाकी दश गुणस्थानों में काल करने की भजना-
अर्थात् कोइ मरे और कोई नहीं भी मरे- उपर नीचे चला जाय.
और सिद्धतो अमर ही हैं.
कर मकते है, मो कर्म भूमीही ब्रहण कर माने हैं. उनकी उत्कृष्ट उम्पर को पूर्व
की ही होती है.

* मुक्ति सोपान श्री गुणस्थान रोहण अढीशत द्वारी *
सोलवा-भाव परिमाण द्वार.
१-१ मिथ्यात्व गुणस्थान से लगा कर दशवे सूक्ष्म सम्प
राय गुणस्थान तक तीब्र, मन्द,मंदतर, तीव्रतम्ययों असंख्यात स्था
न (समय २ पलटा) होते ही रहते हैं. ११-१४ इग्यावे-उपशान्त
मोह गुणस्थान से चउदवे अयोगी केवली गुणस्थान तक कषायो-
दय नहीं होने के सबब से चारित्र के स्थानमे भेद नहीं होता है,
(परंतु निर्जरा के स्थान में अनेक भेदहै.) सदा एक सेभावरहतेहैं.
सतरवा-निरंतर गुण परिमाण द्वार
१-३ मिथ्यात्व सास्वादन और मिश्र इन तीनो गुणस्था-
नों में पल्योपम के असंख्यातवे भाग के काल जितनी देरतक नि
रन्तर गुण रहते हैं.
४-५ अविरति और देशविरति गुणस्थान में-आंवलि का
असंख्यातवे भाग काल तक निरंत्र गुण रहते हैं.
६–१४ प्रमत गुणस्थान से लगाकर चउदवे गुणस्थानक
समय पर्यंत निरंत्र गुण रहते हैं.
अठारवा मार्गणा द्वार
१ मिथ्यात्व गुणस्थानि के गति मार्ग चार पाहिले गुणस्थान
से-१ तीसरे में जाम, २ चौथे जाय, ३ पांचवे जाय, और ४ सातवे
३
२ सास्वादन गुणस्थान की गति मार्गणा नहीं, क्योंकि पड
होता है.

. + - ३७७ * द्वितीय काण्ड-प्रथम खण्ड मूल द्वारा रोहण ३ मिश्र गुणस्थान की गति मार्गणा तीनः-तीसरे गुण- स्थान से-१ चौथे गुणस्थान जाय, २ पांचवे गुणस्थान जाय, औं र सातवे जाये. ४ अविरति गुणस्थानी की गति मार्गणा दोः-चौथे गुण स्थान से (१) पांचवे जाय और (२) सातवे जावे. ५ देशविरति गुणस्थानकी गति मार्गणा एक-सातवे जावे. ६ प्रमत गुगस्थनीकी भी गति मार्गणा एक-सातवे जावे. ७ अप्रमत गुणस्थानी की गति मार्गणा एक आठवे जावे. ८ अपूर्व करण गुगस्थानीकी गति मार्गणा एक-नववेजावे ९नियटि बादर गुणस्थानीकी गति मार्गणा एक-दशवेजावे. १० सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थान की गति मार्गगा दो इग्यार- वे जावे. ११ उतपशान्त मोह गुणस्थानी की गति मार्गणा नहीं, क्योंकि बडवाइ होता है, १२भीण मोह गुणस्थानीकी गति मार्गणा एक-तेरखे जावे. १२ संयोगी केवली गुणस्थानी की गात मार्गणा एक-चौ- दवे जावे. १४ अयोगी केवली गुणस्थानीकी गति मार्गणा-मोक्ष जावे मोक्ष स्थान से गति मार्गणा नहीं सदा स्थिर रहते हैं: उन्नीसवा उपमार्गणा द्वार १ मिथ्यात्व गुणस्थान में उपमार्ग नहीं,क्योकि-पहिला ही उत्कृष्ट वैराग्य दिशा प्राप्त होतेही सातवे गुणस्थान में चले जाते हैं. और फिर देव भेट की जातरा पूरी हुई" इस दृष्टान्तानुमार वो पडकर छठेमें आते है.

३७८ मुक्ति सोपान श्री गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी ११ २ सास्वादन में उपमार्ग एक-पहिले आवे. ३ मिश्र गुणस्थानी का उपमार्ग एक-पहिले आवे, ४ अविरति गुणस्थानी के उपमार्ग तीन-तीसरे आवे दूसरे आवे, और पहिले आवे. ५ देश विरति गुणस्थानी के उपमार्ग चार-१ चौथे आवे, २ तीसरे आवे, ३ दूसरे आवे, और ४ पहिले आवे. ६ प्रमत गुणस्थानी के उपमार्ग-३ पवे पांचवे आवे चौथे आ- वे, ३ तीसरे आवे, ४ दूसरे आवे, और ५ पहिले आवे. ७ अप्रमत गुणस्थानी के उपमार्ग दो- १ छठे आवे के २ चौथे आवे. ८ अपूर्व करणी के उपमार्ग दो-(१) सातवे आवेके रचौथे आवे. ९ नियटि बादरीके उपमार्ग दो-१ आठवे आवेके २ चौथे आवे. १० सूक्ष्म संपरायिके उपमार्ग दो-१ नववे आवे के २ चौथे आवे. ११ उपशांत मोहीके उपमार्ग दो-१ दशवे आवे के २ चौथे आवे. १२-१४ क्षीण मोहसे सयोगी केवली तक और सिद्धों के उप- मार्ग नहीं पडें नहीं. २० वीसवा "परस्पर मार्गणा द्वार" १ मिथ्यात्व गुणस्थान छोड-चौथे पांचवे और सातवे जावे २ सास्वादन गुणस्थानं छोड-पहिले ही जावे. ३ मिश्र गुणस्थान छोड पडेतो पहिले आवे ओर चडेतो चौधे जावे. ४ अविरति गुणस्थान छोड-चडेतो पांचवे और सातवे जा- * द्वितीय मूल कान्ड-प्रथम खन्ड मूल द्वाग रोहण * वे और जा पड़े तो-पहिले-दुसर-और-तीसरे-आवे. ५ देशविरति गुणस्थान छोड चडेतो-सातवें जावें. और प- डेतो पहिले दूसरे तीसरे और चौथे आवे. ३ प्रमत गुणस्थान छोडे-चडेतो सातवे जावे, और पडेतो पहिले दुसरे तीसरे चौथे और पाचवे आवे. ७ अप्रमत गुणस्थन छोड-चडेतो आठवे जावे, और पडेतो छठे आवे, और काल करेतो चौथे आवे. ८ अपूर्व करण गुगस्थान छोड चडेतो नववे जावे, और पडेतो सातवे आवे, और काल को तो चौथे आवे. ९नियटि वादर गूणस्थान छोड-चडेतो दशवे जावे, और प- डेतो नववे आवे, और काल पूर्ण करतो वौये आवे. १० सूक्ष्म सम्पराय गूणस्थान छोड-चडेतो उपशम श्रेणिवा- ला इग्यारवे जावे. क्षपक श्रेणि वाला वारवे जावे, तथा पडेतो न- ववे आवे और कालपूर्ण करतो-मरेतो-चौथे आवे. ११ उपशान्त मोह गूणस्थान छोड-बडे नहीं. पडेतो दशवे और आवे मरतो चौथे आवे. १२ क्षीण मोह गूणस्थान छोड-तेखे जावे, पडे नहीं १३ सयोगी केवली गुणस्थान छोड-चउदवे जावे. पडे नहीं. १४ अयोगी केवली गुणस्थान छोड-मोक्ष जावे पडे नहीं. और मोक्ष छुटही नहीं. कही जावेही नहीं सदा वाही बने रहैं. इक्कीसवा-परस्पर उपमार्गणा द्वार १ मिथ्यात्व गुणस्थान में दुसरे तीसरे चौथे पांचवे और छट्टे

* मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अढीशन द्वारी *
इन ५ गुणस्थान से आवे.
२ सास्वादन में चौथे पांचवे और सातवे इनगुणस्थानसे आवे.
३ मिश्र गुणस्थान में-पहिला चौथा पांचवा और छटा इन ४
गुणस्थान से आवे.
४ अविरति गुणस्थान में पहिला-तीसरा-पांचवा और जावत
इग्यारवे गुणस्थान तक के कितनेक परिणाम से और कितनेक कर्म
से आते हैं।
५ देशविराति में-पहिला चौथा और छा इन ३ गुणस्थान से आवे.
६ प्रमत गुणस्थान में-फक्त एक सातवे गुणस्थान से ही आवे.
७ अप्रमत गुणस्थान में-? पाहलेसे, चौथे से पांचवे से, छठे से. और
आठवे मे. इन ५ गुणस्थान से आवे.
८ अर्व करण में-बृद्धमान परिणामी सातवे से और हायमा
न परिणामी नववे मे आवे.
९. नीयटि बादर में-वृद्धमान परिणामी आठवे से, और हा-
यमान परिणामी दशवे आवे
१० मृम मम्पगय मे-वृद्धमान परिणामी नववे मे, ओर
हायमान परिणामी इग्यारखे से आवे.
११ उपशान्त माह गुणस्थान में फक्त दशवे गुणस्थान से
ही आवं.
१२ क्षीण मोहगुणस्थान मे फक्त एक दावे गुणस्थान सेही आवं.
१३ नयोनी केवली गृणम्थानमें फक्त एक बारखे गुणस्थान से ही
आव.
११अयोगी कंवली गुणम्थानमे फक्त एक तम्य गुणम्थामही आय.
और मोत म्यान में फन एक चउदये गुगस्थान से ही आवं,
--

द्वितीय मूल काड-प्रथम खन्ड मूल द्वारा रोहण
३८१
बावीसवा-अरोह अवरोह द्वार.
१ मिथ्यात्व गुणस्थान वाले की एक आरोह-चडती गति.
२ सास्वादन गुणस्थानी की एक अवरोह-पडति गति.
३-१० मिश्र गुगस्थान से लगाकर सूक्ष्म सम्पराय गुगस्था-
न वाले-अरोह अवरोह-बडात पडति दोनों प्रकार की गति करें.
११ उपशान्त मोह गुणस्थानी की एक-अवरोह गति.
१२-१४ क्षीण मोहसे संयगी केवली तक एक-अवरोह गति.
और सिद्धस्थान में दोनों ही गति नहीं-स्थिर हैं.
तेवीसवा चडाचड गति दृष्टान्त द्वार
१ दादुर (मेडक.) २ परनाल, ३ ईलड, और ४ उलाल, इन
चारों प्रकारकी गति में से.
१ मिथ्यात्व गु गस्थानी की एक दादुर गति-फदक मारचडे,
२सास्वादन गुगन्थानीकी एक परनालगति-परनाल ज्यों पडे,
३ मिश्र गुगस्थनी की गति दो तरह-१इलड और उलाल.
अविरति गुगस्थानी चारों प्रकारकी गति करतेहैं.
५देश विरति गुगस्थानी तीन प्रकारकी गति को-१ दादुर
परनाल, और ३ उलाल.
६-९ प्रमत गुणस्थान से नियट्टि वादर गूणस्थानवाले तीन प्रका-
रकी गति करे-१ ईलङगति, २ परनालगति, और ३ उलालगति.
१० सूक्ष्म संपराय गुणस्थानी चारोंही प्रकारकी गति करे
११ उपशान्त मोह गुणस्थानी दो प्रकरगति करे-१ परनाल
और २ उलाल.

- * मुक्ति सोपान श्री गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी ५३ १२-१४ क्षीण मोह से संयोगी केवली गुणस्थान वाले तक एक इलड़ गति करतेहैं. और सिद्ध परमात्माके एकही प्रकारकी गति न ही है. मदा स्थिर है. चौवीसावा अन्तर काल हार* एक जीव आश्रिय-मि-यात्व गुणस्थान का विरह पडे तो जवन्य अन्तर महत का उत्कृष्ट ६६ सागर का अथवा १३२ सागर भाजग. मायादन गणमान में लगाकर उपशान्त मोह गुणस्थान नक का चिन्ह पता जघन्य अन्तर मुहर्त अथवा पल्यापमके अ- मध्यान। मागविना क्योंकि इतने काल विना उपशम श्रेणि- का दीया पर नहीं और र अन्तरदेश ऊणा अई पदल' प. ::नन का. श्री मटार अजागी कंवली गुगम्थान का अन्तर पद नहीं. पीछे नही मियान का भी कमा अन्तर परताही नहीं है. PA me द, मला : नियं दयाय अर्थ काण्डका पष्ट १०१. या अन गरकार द्वारा या के अनुसार दर नीमर गुणम्यान का - , पायापन के अव्याना माग का. पाटा नया कागदा के . वर्ष का. श्रीर पर श्राणि या 3 ग्राम वर्ग का. रा. . -- . - -- N 2: ...77; गान it बनाम 2. ITE: TIRE 2 mini + - moryawan. -- * द्वितीय काण्ड-प्रथम खन्ड मूल द्वारा रोहण र पच्चीसवावा-विरह काल द्वार. इस लोकमेंसे-१ मिथ्यात्व, ४ अविरति, ५ देश विरति,न- मत संयति और १३सयोगी केवली इन पांचों गुणस्थानों का विरह कदापि नहीं पड़ता है, यह गुणस्थान लोक में सदाही पाते हैं. सास्वादन और मिश्र का विरह पडेतो जघन्य एक समय का, उत्कृष्ट अन्तर मुहुर्त का. अपूर्व करण, नियटि वादर, सूक्ष्म सम्पराय, उपशान्त मोह क्षीण मोह और अयोगी केवली इन गुणस्थान का विरह पडेतोज घन्य अन्तर मुहर्त का उत्कृष्ट छे महीने का. फिर तो कोई जीव ज रूरही गुणस्थान स्पर्श होताहै. २६वा एक भव आश्यि स्पशना द्वार. एकही भव में-१ मिथ्यात्व गुगस्थान जघन्य ? वक्त. उत्कृ- ४ ९०० वक्त स्पर्श. २सास्वादन गुणस्थान जघन्य एक वक्त. उत्कृ ट दो वक्त स्पर्श. ३-४ मिश्र और अविरति गुगस्थान जघन्य ? वक्त. उत्कृ ट प्रत्येक हजार वक्त स्पशे. ५-७ देशविरति. प्रमत संयती और अप्रमत मंयती गुगम्यान १ जघन्य वक्त उत्कृष्ट ९०० वक्त तशें. ८-१० अपूर्व करण नियतिवाद और नन्म नम्गय गुग- स्थान जघन्य एक वत्त, उत्कृष्ट चारवन मर्ग. ११ उपनान्त मोह गुणस्थान जघन्य वन उन्ष्ट २ वक्त पो. १२-१४क्षीणमोहमयोगी केवली और अयोगी केवली यह नीनों गुण --- m र .

३८४
।
# मुक्ति सोपान श्री गुणस्थान रोहण अढीशत द्वारी
स्थान एक ही वक्त स्पर्श.
और सिद्ध स्थान भी एक वक्त स्पश बाद छूटता ही नहीं है.
सतावीसवा-बहुतभव आश्रिय स्पर्शना.
बहुत भवों में-१ मिथ्यात्व गुणस्थान को जघन्य दो वक्त
स्पर्श. उत्कृष्ट-असंख्यात वक्त स्पर्श.
२सास्वादन गुणस्थान जघन्य दो वक्त, उत्कृष्ट-५वक्तस्पर्श,
३-४ मिश्र और अविरति गुगस्थान जघन्य-दो वक्त उत्कृ-
ट असंख्यात वक्त स्पर्श.
५ देश विरति गुणस्थान जघन्य-दो वक्त, उत्कृष्ट ९०००वक्त स्पर्शे.
६-७ प्रमत और अप्रमत गुणस्थान जघन्य दो वक्त, उत्कृ
ट ९०० वक्त स्पर्श
८-१० अपूर्व करण नियटि बादर और सूक्ष्म सम्पराय गुण
स्थान जघन्य दो वक्त स्पर्श. उत्कृष्ट ९ वक्त स्पर्श
११ उपशान्त मोह गुणस्थान दो वक्त, उत्कृष्ट ५ वक्त स्पर्शे.
१२-१४ क्षीणमोह सयोगी और अयोगी गुणस्थान एकही वक्त स्पर्श
और सिद्ध स्थान भी एकही वक्त स्पर्श.
अठातीलवा-परस्पर इपर्शना द्वार
१ भिथ्यात्व गुणस्थानी-पहिला गुणस्थान तो नियमाही स्प
शें, दूसरे गुणस्थानसे अलगकर इग्यावे गुणस्थान तक स्पर्श ने
की भजना..
कोइ स्पर्शे कोइ नहीं स्पर्से उसे भजना कहते है. और जरूर ही स्पर्शे उसे नियमा
कहते

* द्वितीय मूल काण्ड-प्रथम खण्ड मूल द्वारा रोहण पर २ सास्वादन गुणस्थानी-पहिला दुसरा और चौथा यह ती- नो तो गुणस्थानतो नियमा से स्पर्श. और तीसरे पांचवासे जावत इग्यारवे तक स्पर्शने की भजना. ३ मिश्र गुणस्थानी-पहिला तीसरा और चौथा तो नियमां से स्पर्श. बाकी दुसरा पांचवा छा जावत इग्यारखे तक स्पर्श ने की भजना. १ अविरति गुणस्थानी-पहिला और चौथा तो नियमा से स्पगे. बाकी दुसरा तीसरा पांचवा जावत इग्यारखे तक स्पर्श ने की भजना. ५ देश चिरति गुणस्थानी-पहिला चोथा और पांचवा तो नियमासे स्पर्श. और दूसरा तीतरा छा जावत इन्यारवातक स्पर्श ने की भजना. ६ प्रमत गुगस्थानी पहिला चौथा छा और सातवा यह तो नियमा स्पर्श और दुसरा तीसरा पांचवा आठवा जावत इग्या रखा स्पर्श ने की भजना. ७ अप्रमत गुगन्यानी-पहिला चौथा और सातवा यह तो नियमा स्पा और दूसरा तीसरा पांचवा छठा आखा जावत हु- ग्यारवा सन ने की भजना. ८अपूर्व करण गुगस्थानी-पहिला चौथा छठा मानवा औरआ । ठवा यह तो नियमास स्पो. और दुमग नीनग पांचवा नववाद- शवा और उरचारदा उन ६ गुणन्यान पर्शने की भजना. ९ नियट्टि वादर गुगस्यानी-पहिला चौथा छया मानवा आठ वा और नववा यह तो नियमा ने सगे. और दुनग नीनग पांच वा. दशवा जन्याखा इन केस ने की भजना.

- ३८६ मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अहीशन द्वारी १० सूक्ष्म सम्परायी गुणस्थानी-पहिला चौथा छठा सातवा आठवा नववा और दशवा यहतो नियमासे स्पर्श और दुसरा ती- सरा पांचवा इग्यारवा की भजना. ११ उपशान्त मोह गुणस्थानी-पहिला चौथा छठा जावत इ- ग्यावा यहतो नियमासे स्पर्श, और दुसरे तीसरे पांचवेकी भजना १२ क्षीण मोह गुणस्थानी-पहिला चौथा छठा सातवा आठ वा नववा दशवा वारखा तेरवा और चउदवा यह १०तों नियमाते स्पर्शे और दुसरा तीसरा पांचवा इग्यारवा इन चारों की स्पर्श ने की भजना- १३-१४ सयोगी केवली और अयोगी केवली गुणस्थानि- पहिला चौथा छठा सातवा आठवा नववा दशवा बारवा तेरवा औ र चउदवा यह १० तो नियमा से स्पर्श और दुसरे तीसरे पांचवा इग्यारवा गुणस्थान स्पर्श ने की भजना. और सिद्ध परमात्मा के जीवों ने-पहिला चौथा सातवा आ ठवा नववा दशवा बारवा तेवा और चउदवा इन ९ गुणस्थानका तो निश्चयसे स्पर्श किया बाकी के ५ गुणस्थान स्पर्शनेकी भजना उन्नतीसवा पढम अपढम द्वार मिथ्यात्व गुणस्थान से उपशान्त मोह गुणस्थान तक पढम अपढम दोनो-अर्थात इन की पहिले स्पर्श ने वाला भी स्पशैं औ र पहिली वार भी स्प®. ऊपर के तीनो गुणस्थान एक-पढम एकही वक्त स्पर्श. ३०वा शाश्वताशाश्वत द्वार

~~
HAMPA
Awarraturumasvran
द्वितीय मूल कान्ड-प्रथम खन्ड मूल द्वारा रोहण
मिथ्यात्व, अविरति. देशविरति. प्रमत, कौर सयोगी केवली
यह पांचों गुणस्थान शाश्वते-सदा पावे. बाकी के नव गुणस्थान
अशाश्वते-किसी वक्त पावे किसी वक्त नहीं भी पावे.
३१वा-परभव गमन गर
मिथ्यात्व सास्वादन और अविरति यह तीनों गुणस्थानोंतो
पर भव में जाते हवे जीवों के साथ जानेहें. वाकीके ११ गुणम्यान
स्पर्श होवे वहां ही रहजान है.
वतसिवा भवसंख्या बार.
मिथ्यात्व मिथ्यात्व अनन्नान्त भवनकव माय वना म्ह..
सास्वादन से लगाकर देश विनि गुगम्यान जयन्य :... भवन
क लगोलग प्राप्त होते. उत्कृष्ट मान नया आदभव ना लगलग
प्राप्त होवे. और प्रमत सुगम्यान ने नजार्ग, केबी गुनपान तक
फक्त एकही भव मे ही साथ है.
ततीलवा-अल्प बहुत गर.
सबने थोडे ग्याग्या उपमान नोह गजन्यानमें प्रवर्तनी
वों-यावि. उपनगम प्रणिवं. आभने एक सय ५४ जीबी पन.
हलने-जान्द मीण मोह गलथान बलेनी मलन :
अधित पोवि. धपक श्रषिवाले एक ननद में १०८ मिलने.
हम सदय हनन यि नहीं को समय बितान.
इनम-ग्याबा उसगांतनो काममनव-नानि
और आता सर्व नवीन गान गाने
ददा.

३८८ मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी सम-तुल्य (बरोबर) और वारवे गुणस्थान से संख्यात गुणे अधिक होते हैं, क्योंकि-इन तीनों गुणस्थानों में उपशम और क्षपक दानों प्रकारकी श्रेणि वाले जीवों एक ही वक्त में पाते हैं. इस लिये उ- पशस श्रेणिवाले ५४ और क्षपक श्रेणि वाले १०८, यो दोनोंही मिलकर प्रत्येक गुणस्थानमें अलगर उत्कृष्ट पदे १६२जीवों पातेहैं. इससे-तेखे सयोगी केवली गुणस्थान वाले संख्यात गुणे अधिक, क्योंकि-एक समय में प्रथक क्रोड पाते हैं. इस से सातवे अप्रमत संयति गुणस्थान वाले संख्यत गुण आधिक, क्योंकि-एक समय में प्रथक सो कोड पाते हैं. इस से छठे प्रमत संयनि गुणस्थानी संख्यात गुण अधिक क्योंकि एक समय में प्रत्येक हजार कोड पाते हैं. और अप्रसाद के कालसे प्रमादका काल संख्यात गुणा अधिक है. इस से-उंचवे देश विरति गुणस्थान वाले असंख्यात गुण अधिक, क्योंकि सन्नी तिर्यच पचेन्द्रिय भी यहां पाते हैं. इससे दूसरे सास्वादन गुणस्थान वाले असंख्यात गुणे अ- धिक क्योंकि इस गुणस्थान वर्ति जीवों चारों गति मे पाते हैं. इससे-तीसरे मिश्र गुणस्थान वाले असंख्यात गुणे आधिक क्यों कि-दुसरे गुणस्थान से इस की स्थिति असंख्यात गुणी अधिक है. इससे-चाये अविरउि सम्यग दृष्टि गुणस्थान वाले असंख्यात गुण अधिक, क्योंकि इस की स्थिति बहून ज्यादा है. इससे-वउदय अजोगी केवली गुणस्थामी अनन्त गुणे अ. धिक, क्योंकि-अयोगी की अपेक्षास सिद्ध भगवंत भी इमम लिये. इममे पहिले मिथ्यान्य गुणम्थान वाले जीवों अनन्त गुणे

m
.
मारामार मल नागर
अभियांकि-निगाद के जीवों में भी यह राणम्यान पाताहे.
परम पूज्य श्री कहानी सपिजी महागजही जप
दायक वाल म्हाग पनि श्री अमानन्द
बकिनी महाराज विधित गुणस्थान
गहणअनामनग्रंप प्रथम
मल, काण्ड का प्रथम
मूलदाग रोहण
दण्द.
समाप्तम

मा mex ELLITICALIGUSTTHI AATHVEDEShasRITITISGARLSunnyIES CH" POLITIFIYAT द्वितीय खण्ड-कर्म द्वारा रोहण. प्रथम प्रकर्ण-कर्मोत्पति द्वार. कर्मोत्पति के ७ द्वार के नाम १ किरिया द्वार, २ मूल हेतू दार, ३ मिथ्यात्व हेतू दार, ४ अविरत हेतू दार, ५ कपाय हेतु द्वार, ६ योग हेतु द्वार, और ७ समुचय हेतु द्वार ३४, पहिला-किरिया द्वार. २५ किरिया के नाम-१ कायिकी, २ अधिकरणी, ३ पाउ- मिया, ४ पम्तिावणिया, ५ पाणाइ वाय, ६ आरंभीया,७ परिग्ग- हिया, ८ मायवतिया, ९. अपच्चखाण वतिया, १० मिथ्या दंशण - a दस द्वारके मुलामे के लिये देखिये अर्थ कांडका पृष्ट १५५ वा.

- द्वितीय मूल काण्ड-प्रथम खन्ड मूल द्वारा रोहण. ११ वतिया, ११ दिठीया, १२ पुठिया, १३ पाडचिया, १४ सामंतावणि या, १५ नेसथिया, १६ सहथिया, १७ अणवणिया,१८विदारणिया, १९अणव २०अनाभोगा,खतिया,२१अनापउगी,२२सामुदाणी,२३ पेजवतिया, २४ दोपवतिया, २५ इर्यावहीया किरिया. इन २५ क्रिया में सेः मिथ्यात्व और मिश्र गुणस्थानी के २४ क्रिया लगे, २५ में से-इविही टली. सास्वादनी और अविरति गुणस्थानी के २३ क्रिया लगे, २४ मेंसे भिथ्य देशणवतिया टली. देश विरति गुणस्थानी के २२ क्रिया लगे,२३ मेंसे-अपच्च खाणिया टली. प्रमत संयति के गुणस्थानी २१ क्रिया लगे,-२२ मेसे परि- ग्गहीया टली. अप्रमत संयति से लगाकर सूक्ष्म सम्पराय गूणस्थानी तक के २० क्रिया लगे-उपर २२ कही उससे-आरंभिया किया टली. ' उपशान्त मोह से लगा कर सयोगी केवली गुणस्थान के १ इर्यावही लगे. अयोग केवली गुगस्थानी और सिद्ध भगवन्त के क्रिया विलकूलही नहीं लगे. ३५ दूसरा-मूल हेतू (कारण) बार * कर्म वन्धके मूल हेतू कारण ५ हैं:-१ मिथ्यात, २ अविर- ति, ३ प्रमाद. ४ कपाय, और ५ योग. इनमें से. ET * इस द्वारके खुलाने के लिये देखिये अर्थ सांडका पृष्ट १०७ वा.

३१२ * मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अदीशतद्वारी मिथ्यात्व गुणस्थान में पांचोंही कारण पावे. सास्वादन मिश्र अविरत और देश विरति गुणस्थानी के? कारण, ५ मेसे मिथ्यात्व टला. प्रमत और अप्रमत गुणस्थानी में तीन कारण, ४ मे से अ- विरति टली. अपूर्व करण, नियटी बादर और सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थानी में दो कारण प्रमाद टला. उपशान्त मोह, क्षीण मोह, और सयोगी केवली गुणस्थानी में एक कारण योग. अयोगी केवली गुणस्थानी में और सिद्ध में कर्म बन्ध का कारण नहीं पावे. ३६, तीसरा मिथ्यात्व हेतूद्वार. * ५ मिथ्यात्व के नाम-१ अविग्रह, २ अनाविग्रह ३ अभिनिवे शिक ४ संशयिक और ५ अनाभोग इन में सेः- भिथ्यात्व गुणस्थान में पांचों ही मिथ्यात्व पाये, बाकी सा- स्वादन से लगाकर चउदवे अयोगी केवली गुणस्थान तक मिथ्या त्व नहीं पाताहै. २७, -चौथा-अविरति हेतू द्वार * १२-अदिति के नाम-५ पांच इन्द्रियकी, १ मनकी और ६ कायाकी मिथ्यावसे अविरति गुणस्थानतक १२ प्रकारकी अविरति लगे. * इस द्वारके खुलासे के लिये देखिये अर्थ कण्डका पृष्ट १५१ पृष्ट.

. ३१३ द्वितीय काण्ड-प्रथम खण्ड मूल द्वारा रोहण र देशविरति गुणस्थान में-त्रसकायकी अविरति विना ११ लगे. प्रमतसे अजोगी केवली गुणस्थानाके अविरति नहीं लगती है. ३८ पांचवा-कषाय हेतू द्वार : २५ कपाय के नाम-४ अनन्तान वन्धि चौकडी, ४ अप्र- त्याख्यानावरणीय चौकडी, ४ प्रत्याख्यानवरणीय चौकडी ४ और संज्वलन की चौकडी, यों १६, और १ हांस्य २ रति, ३ अरति, भ य, ५ शोक, ६ जुगुप्सा, ७ स्त्रीवेद, ८ पुरुष वेद, और ९ नपुंस- क वेद. यों सब २५ हुइ. मिथ्यात्य और सास्वादन गुणस्थान में कपाय पावे २५ ही. मिश्र और अविरति गुणस्थान में-कपाय पावे २१, अनन्ता न वन्धिक चौक टला. देश विरति गुणस्थानी में-१७ कपाय, २१ मेंसे-अप्रत्याख्या नावरणीका चौकडी टली. प्रमत अप्रम और अपूर्व करण गुणस्थानी में १३ कपाय, १७ मेंसे प्रत्याख्यानादरणी चौक टला. अनियटि दादर गुणस्थानी में ७ कपाय. १३ मेंसे-हॉस्यादि ६ प्रकृति टली. सूक्षः सम्पराय गुणस्थान मे एक कपाय संज्वलका लोभ. उपशान्त मोहसे अजोगी केवली गूणस्थान तक और सि- द्धों में कपाय नहीं ३९. छठा-योग हेतुधार. * 37 इम द्वारा लामा के लिये देखिये अर्थ कांडका पृष्ट १०१ वा. " .

३९४ * मुक्ति सोपान श्री गुणस्थान रोहण अहीशत द्वारी १५-४मन(१)सत्यमन,(२)असत्यमन,(३)मिश्रमन और (४)व्यत्र हारमन,वचनके(१)सत्यवचन(२)असत्यवचन()मिश्रवचन और व्यवहारवचन(७)कायाके-(१)औदारिक, (२) औदारिक मिश्र,(३) वैक्रिय(४)क्रिय मिश्र(५)आहारक(६)आहारक मिश्रऔर(७)काम -ण, यों १५ योगोंमेंसे. मिथ्यात्व सास्वादन और अविरति गुणस्थान में-१३ जोग पावे, १ मे से आहरिक के दोनों घटे क्योंकि इन में मुनिराज न हीं पाते हैं. मिश्र गुणस्थान में-४ मनके, ४ वचन के, १ उदरिक, १ वैक्रिय, यह १० योग पावे. देशविरति गुणस्थानमें-२ आहारकके दो, और १ कार्मणका इन ३ विन १२ योग पावे. प्रमत संयती गुणस्थान में कार्मण विना १४ जोग पावे. अप्रमत संयति गुणस्थानमें--औदायीक मिश्र,वैक्रिय मिश्र, आहारक कारमण इन ४ विना ११ योग पावे. अपूर्व करण से क्षीण मोह गुणस्थान तक-४ मनके, ४ व- चनके. औदारिक, यह ९ योग पावे सयोगी केवली में-१ सत्यमन, २ व्यवहारमन, ३ सत्य भा- पा. ४ व्यवहार भाष, ५ औदरिक ६ औदरिक मिश्र, और ८ का- मण, यह ७ योग पावे. अयोगी केवली और सिद्धों में एकही योग नहीं पावे. = आहारक और वैक्रिय मिश्र जोगलब्धि फोडती वक्र पाता है और लब्धि फो- डना यह प्रमाद अवस्था है, इसलिये तीनो मिश्र योगो अप्रमत गुणस्थानमें नहीं पा- ते हैं आहारक शरीर निपजे बाद अप्रमत हो जाते हैं.

* द्वितीय मूल कान्ड-प्रथम खन्ड मूल द्वारा रोहण पर ३९५ सातवा समुचय हेतूा दर. ५ मिथ्यात्व. १२ अविरति,+ २५ कषाय. १९ जोग, मिलक ५७ हेतु सब होते हैं, १ मिथ्यात्व गुणस्थान में-५ मिथ्यात्व, १२ अविरति, २५ कपाय और १३ जोग यों ओघ (सब जीवों और सर्वाकाल आ- श्रिय) ५५ हेतू पाते हैं. इसमें से एक जीव की अपेक्षा से-एक स मय में जघन्य १० हेतू पाते हैं:-१ पांचों मिथ्यात्व में का एक मिथ्यात्व. १ छे काया के वध में का एक काया का वध.३ पाचों इन्द्रियों की विषय में की एक की विपय. ४ तीनों वेदों में का? वेद, हांस्य और रति शोक और अरति इन दोनों युगलों में का एक युगल, 7 अप्रत्याख्यानी चौकडी में की एक कपाय, ८ प्रत्याख्या नी चौक में की एक कपाय, ९ संज्वलन चौकडीमें की एक कपा य, १० और ४ मनके ४ वचन के : १ औदारिक, १ और वै- + मूल हेतु ५ कहे और यहां चारों लिये प्रमाद नहीं लिया इमका मवय पांच प्रमाद मे से मटका गमावेश तो मान मे होता है. विषयका ममावेश अविरत में. कपाय मे. निन्दा विकथा का जोग मे ममावेन होना है. = यहां फक्त तीनो कपाय ही लेने का नश्व यह हकि-कोदादिक का उदय विरोधी है अर्थात्-ब्रोध के उदय में मानाधि का उदय नही होता है रमलिये एकही ली.यह और अनन्तान बनध चोकडी छोडनेका मक्व यह कि-उपगम श्रेणि अनं.. तान वन्धि की वीने योजना करने उनकी मत्ता टलनी है. वहांमे पड जो यहां आये वाद मिथ्यात्वो दय भये फिर अनन्नान वन्धि का उदय नहीं होता है. इमलि । ये यहां जन्य पद में फत नीनो पाप का ही ग्रान किया है - मिथ्यात्व गणयान में अनंतान वन्धि के उदय विना मान नहीं होता है. इमलिये अपर्यामा के अभाव में औदारिक निश्र. वैविय मिश्र और राग. वह तीनों लोगों ग्रहण नहीं किये.

मुक सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अढीशन द्वारी क्रिय, इन १० जोगों में का एक जोग, यो १० हेतू पाते हैं. और र उत्कृष्ट १८ पाते हैं:-१० तो उपर कहे सोही. और ११ अन- न्तान बन्धि चौकडी में की एक कषाय. १२ भय, १३ मत्सर, १८ पांचों काया का वध उत्कृष्ट यह १८ हेतू एक जीव के एक सम- य में पाते हैं. २ सास्वादन गुणस्थान में-१२ अवत, २५ कपाय और १३ योग. यों ओघसे (सर्व जीवों और सर्व काल आश्रिय) ५० हेतू पाते हैं. और एक जीव के एक समय में जघन्य १० हेतू पावे ऊपर जो १० हेतु कहे हैं. उस मेंसे १ मिथ्यात्व तो घटाना, और अनन्तान वन्धि चौकडी की १ कपाय बढाना और उत्कृष्ट १७ हेतु पाते हैं:-सो १० तो येही ओर ५ कायाका बन्ध, तथा भय और मत्मर यो उत्कृष्ट १७ हेतू एक जीव के एक समय में पाते हैं. ३ मिश्र गुगस्थान में-१२ अव्रत, २१ कपाय, ओर १० जो- ग, यो आवम ४३ हेतु पाते हैं. और एक जीव के एक समय में जवन्य : तू पावः-उपर १० कहे, उस में से ? अनन्तान बान्धी की कपाय कमी करना. और उत्कृष्ट १६ हेतू पाते हैं उपर कह सो माही ७ अधिक यहां जानना. 2 अविर्गत मम्यग दृष्टि गुणम्थान में-२२ अव्रत, २१ कपा य और १३ योगयों ओबम ४६ हेतु पान और एक जीयक एक ममय में जयन्य और उत्कृष्ट १७ हंतु तीसंग गुणस्थान में कहे मही यहां पान है. ५. देशाविति गुगम्थानमें- ११ अवत, १७ कपाय और १२ योग यो आधर्म १० हेतु पाव-और एक जीव के एक ममय में वन्य उत्कृष्ट १७ उपगंन हेतु पाते हैं. -- .. । ३ my --- ३९७ द्वितीय काण्ड-प्रथम खण्ड मूल द्वारा रोहण * ६ प्रमत संयति गुणस्थान में–१३ कपाय और १४ जाग यों औघसे २७ हेतु पावे. और एक जीव के एक समय में जघ- न्य ५:-तीन वेदों में का १ वेद, संज्वल की चौकडी में की ? कषाय, दोनों यूगल में का ' युगल, और १३ जोग में का? जो- ग, यों, ५ और उत्कृष्ट ७ पावे-आहारक के दोनों योगों वडे. ७ अप्रमत गुणस्थानमें-१३ कपाय, और ११ योगों, यो२१ हेतू औग से पाते हैं, इस में से एक जीव के एक समय में - ५ पाते हैं. छटे गुणस्थानकी माफिकही. विशप इतनाही की यहां ७ योग में का योग लेना. और उत्कृष्ट ६ पाते हैं. १ आहारक योग अधिक हवा. ८ अपूर्व करण गुणस्थान में १३ कपाय और ९ = जाग यों २२ हेतु औघसे पाते हैं. और जघन्य ५ पाते हैं:- अप्रमत में कहेसो ही. ९ नीयटि वादर गुगस्थान में-७ कपाय और ९ जोग यों १६ औघसे पातेहैं. और जघन्य एक जीव की अपेक्षासे दोपा- ते है:-१कपाय और १ योग. १० सूक्ष्म सम्पराय गुण स्थान में-१ कपाय और ९ जोग यों ० हेतु औघ से पावे. और जघन्य दो-पावे ' जोग. 'कपाय. ११-१२ उपशान्त मोह और नीण मोह गुणस्थान में-फक्त जोग के ९ हेतूही और पाते है. और जघन्य फक्त १ जोग ही पाता है. १३ सयोगी केवली गुणस्थान में फत्तः ७ जोन के७ हेतु = पक्त औदारिक जोग गलाही श्रेणिमा काना है. लिये कां दोनों नोगट गये. ..

३९८ it मुक्ति मापान श्री गुणस्थान रोहण अदीगतदारी ही पाते हैं, और जघन्य एक जीव की अपेक्षा-से एक जोगही पाता है. ---- - १४ अयोगी केवली गुणस्थान में जोग के अभावसे हेत् ए ही नहीं. पाता है. ॐ इति कमोन्नति नामक प्रथम प्रकरणस्. है वितीय प्रकरण कर्म वन्ध बार. कर्म वन्म के २७ द्वार के नाम. ? चार वन्ध द्वार, २ समुचय मूल कर्म बन्ध द्वार, ३ ज्ञा नावणीय कर्म बन्ध कार, ४ दर्शनावरणीय कर्म बन्ध द्वार, ५ वे दनीय कर्म बन्ध दार, ६ मोहनीय कर्म वन्ध द्वार, ७ आयुष्य क में बन्ध दार, ८ नाम कर्म वन्ध दार, ९ गौत्र कर्म वन्व द्वार, १० अन्तराय कर्म बन्ध बार, ११ ध्रुव कर्म बन्ध द्वार, १२ ध्रुव कर्म प्रकृति बन्ध द्वार, १.३ अध्रुव कर्म बन्ध द्वार, १४ अध्रुव कर्म प्रकृ ति बन्ध दार१५ सर्व घातिक कर्म बन्ध द्वार, १६ सर्व घातिक कर्म प्रकृति बन्ध दार, १७ देश घातिक कर्म बन्ध द्वार, १८ देश घातिक कर्म प्रकृति बन्ध द्वार, १९ अघातिक कर्म बन्ध द्वार: २० अघातिक कर्म प्रकृति वन्ध द्वार, २१ शुभ (पुण्य) कर्म बन्ध द्वार २२ शुभ (पुण्य) कर्म प्रकृति बन्ध द्वार, २३ अशुभ (पाप) कर्म बन्ध द्वार, २४ अशुभ (पाप) कर्म प्रकृति बन्ध द्वार, २५ समुचय कर्म प्रकृति बन्ध द्वार, २६ कर्म बन्ध व्यच्छेद द्वार, २७ कर्म प्रक ति बन्ध व्यच्छेद दार.

* द्वितीय मूल काण्ड-प्रथम खण्ड मूल द्वारा रोहण *
३९९
---
४१,प्रथम चार बन्ध बार.*
१ प्रकृति वन्धः २ स्थिति बन्ध, ३ अनुभाग बन्ध, और ४
प्रदेश बन्ध. ६ इन में १-१० पहिले मिथ्यात्व गुगस्थान से लगा-
कर, दशवे सूक्ष्म सम्पराय गुगस्थान तक चारों बन्ध पाते हैं.
११-१३ उपशान्त मोह, क्षीण मोह और सयोगी केवली,
गुणस्थानमें दो प्रकार के वन्ध, प्रकृतिवन्ध और प्रदेश वन्ध.
१४ अयोगी केवली गुणस्थानमें वन्ध नहीं.
४२, दुसरा-ससुचय कर्म वन्ध बार.
मिथ्यात्व गुणस्थान से लगाकर अप्रमत गुगस्थान तक बी
चका तीसरा मिश्र गुणस्थान छोड़ कर बाकी के ६ गुगस्थान में
आयुष्य कर्म का वध करे तब आगेही कर्मोंका बन्ध होताहें और
आयुप्य नहीं वन्धे उस वक्त सात कर्मों का वध करे.
मिश्र अपूर्व करण, और अनियटि वादर इन तीन गुगस्थानों
में आयु कर्म का बन्ध नहीं होता है. इसलिये सातही कर्मों वंधतेहें.
सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थान में शुद्ध परिणाम होने से आयुष्य
और मोहनीय कर्मका वन्ध नहीं होताहै. इसलिये छेही कर्मोंका बंध
करते हैं:
उपशांत मोह भीण मोह और सयोगी केवली. इन तीनों गु-
णस्थान में फक्त एक वेदनीय कर्म वन्वतेहैं.
अयोगी केवली गुणस्थान में कर्म बन्ध नहीं करतेहें.
म द्वारोंके स्लाना के लिये देखिये अर्थ कांडका पृष्ट १५१ वा.
r.

४०० ४३ * मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान गहेण अहीमनदारी तीसरा-ज्ञानावरणीय कर्म प्रकृति वन्ध द्वार. १ मतिज्ञानावरणी २, श्रुतज्ञानावरणी, ३ अवधि ज्ञानावरणी ४ मनपर्यव ज्ञानवरणी और ५ केवल ज्ञानावरणी. मिथ्यात्व गुणस्था- नसे लगाकर सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थान तक ज्ञानावरणीय की पांचों प्रकृति का बंध होता है, उपर एक ही नहीं वन्थाती है. ४४, चौथा-दर्शनावरणीय कर्म प्रकृति बन्ध हार १ चक्षु दर्शनावरणीय, २ अचक्षु दर्शनावरणीय, ३ अवविद शनावरणीय, ४ केवलदर्शनावरणीय, ५ निद्रा, ६ निहानिद्रा, ७ प्रच- ला, ८ प्रचला प्रचला, और ९ थिणी निद्रा. इन दर्शनावरणीय के ९ प्रकृति में से, १-२ मिथ्यात्व सास्वादन गुणस्थानमें दर्शनावरणीयकी ९ही प्रकृतिका बन्ध होता है. १-८ मिश्र गुणस्थान से लगाकर आठवे अपूर्व करण गुण स्थान तक थिण्दी त्रिक निद्रानिद्रा अलवा प्रचला और थाणी निँद्र इन३का बन्ध नहीं होता है. इसलिये छेही प्रकृति बन्ध होता है. ९-१० नियटि बादर और सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थान में-१ निद्राका और २ प्रचला का बन्ध नहीं होने से चार ही का बन्ध हो- * इन तीनों निद्रा का वन्ध अनन्तान वन्धि कपायके उदय मे होना है. औ- र यहां इसका उदय नहीं है जिससे टली है.

४०१
द्वितीय मूल काड-प्रथम खन्ड मुल द्वारा रोहण.
ता है, ऊपर इसका वन्ध नहीं होता है.
४५, पांचवा-वेदनीय कर्म प्रकृतिबंधद्वार
वेदनीय कर्म की दो प्रकृतिः-१ सात वेदनीय, औररअसा
ता वेदनीय.
१-६ मिथ्यात्वसे प्रमत गुणस्थान तक दोनों प्रकृति बंधतीहै.
७-१० अप्रमतसे-सू.म संपराय तक एक नंचलकी कयाय
+ और साता वेदनीय बन्धाती है.
११-१३ उपशांत मोह से-मयोगी केवल तक ए माता वे-
दनी ही वन्धाती है.
१४ अयोगी केवली में वंदनीय का वन्य नहीं होता है.
४६, छहा मोहनीय कर्म प्रकृति बंधद्वार
मोहनीय कर्म की २८ प्रकृतिः-१ अनन्तान वन्धि आदि
चागें चौकडी की १६ क.पाय. हाँस्यादि ९ नो कयाय. और मि-
थ्यात्व मोहनीय. इन २६’ में मे.
१ मि यात्व गुगन्धान में २६ ही प्रकृति का वन्य होता है.
२ सास्वादन गुणन्धान- मिध्यान्न मोहनी और नमक वे
। द इन दो विना २४ का वध होता है.
३-४ मिश्र और अदिति गुमन्यन्न -2 अनन्नान बंधि
+ साता देनीव या दन्य मदद दर है. मैं यहां प्राट
नही. जिनने ही
मनद ६ः दीद:८ मत है.
किसीय..
* मन मोनी का है. दरअर का
सांसद
निशाना
"
S

४०२ मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अढीशन द्वारी १ चौकडी और स्त्रीवेद विना १९ का बन्ध होता है. ५ देश विरति गुणस्थान में-अप्रत्याख्यानावरणीय की चौ- कडी विना १५ का बन्ध होता है. ६ प्रमत गुणस्थान में प्रत्याख्यानावरणीय चौकडी विना ११ प्रकृति का बन्ध होता है. ७-८ अप्रमत और अपूर्व करण गुणस्थान में शोक और अति विना ९ प्रकृतिका बन्ध होता है. ९ नियटि बादर गुणस्थान में-हांस्य, रति भय और मत्सर इ न ४ विना ५ का बन्ध होता हे. आगे मोहनीय कर्म का बन्ध नहीं होता है. सातवा आयुष्य कर्म प्रक्रति बंध द्वार आयुष्य कर्म की ४ प्रकृति-१ नरकायु, १ तिर्यंचायु, ३ म नुष्यायु,और ४ देवायु इन ४ मेंसे. १ मिथ्यात्व गुणस्थान में चारों गतिके आयुष्यका बंध होताहै. २ सास्वादन गुणस्थान में-नरक विना तीनों गतिका आ युर्वन्ध होता है. मिश्र गुणस्थान में आयुर्वन्ध नहीं होता है. ४ अविरति गुणस्थान में-१ मनुष्यायु और २ देंवायु दोनों का बन्ध होता है. ५-७ देशविरति, प्रमत, और अप्रमत गुणस्थान में-१ देवा- + मिश्र गुणस्थानी मध्यस्थ परिणामी है. तथा आयुर्वन्ध काल जितनी इन- की स्थिति नहीं है इसलिये यहां आयु बन्ध नहीं हैं.

* द्वितीय मूल कान्ड-प्रथम खन्ड मूल द्वारा रोहण युकाही बन्ध होता है- ऊपर आयु वन्ध विलकूल नहीं है. ४८, आठवा नाम कर्म प्रकृति बंध बार. नाम कर्म की ६७ प्रकृति बन्धाती हैः-४ गति, ५ जाति, ५ शरीर, ३ अंगोपांग, ६ संघयण, ६ संठाण, ४ ४ वर्ण चतु. प्क, ४ अनुपूर्वी, २ विहायोगति, १ पराघात नाम १ उश्वासना- स, १ आताप नाम, १ उद्योत नाम, १ अगुरूलघु नाम, १ तीर्थ- कर नाम, निर्माण नाम, १ उपघात नाम, १ अस नाम, १ वादर- नाम, १ पर्याप्ता नाम, १ प्रत्येकनाम, १ स्थिर नाम, १ शुमनाम, सौभाग्य नाम, १ सुस्वरनाम, १ आदेय नाम, १ यश-कीर्ति नाम, १ स्थावरनाम, १ सूक्ष्म नाम, १ अपर्याप्ता नाम, १ साधारण नाम, १ अस्थिर नाम, १ अशुभ नाम, १ दौर्भाग्य नाम, १ दुस्वर नाम १ अनादेय नाम, १ अयश-कीर्ति नाम. यह ६७ इनमेंसे. १ मिथ्यात्व गुणस्थान में- २ आहारक दिक और तीर्थकर or = आयु वन्य मालम्बीक होता है. अपरके गुणस्थानी निरालम्ब ध्यानी है. नाम कर्म की सब १३ प्रकातेयों हैं. जिप्समेंने वन्य स्थान में ६७ही प्रकृ. तियों ग्रहण करी जिसका सवत्रः-शरीर नाम कर्म में अपना २ वन्धन और संघा- त यह दोनों अविना भावी हैं, अर्थात्-शरीरके विना यह दोनों नहीं होसकते, इम लिये पांच वन्त्र और पांच मंघात यह १० प्रकृतिये वन्य तथा उदय रूप में गरीर के भेली ही गिनी गड है. जुदी नहीं गिनी. और ५ वर्ण, २ गंध. ५ रस, ८स्पर्शयह २० प्रकृतियों का भी.श्वर्ण, २ गंध, ३ रम. और ४स्पर्श इन चारों में ही ममावेश हुवा है क्योंके यह अभेदी है इसलिये वीनोंका चारों में ही समावेश होजाता है. यों १० शरीर की और १६ वर्णादिकी मिल २६ महतियों १३ में से कमी करने से वा. की ६७ महायिका बन्ध की रहती हैं.

१. १ N मुक्ति मोपान श्री गुणस्थान रोहण अहीशत द्वारी नाम इन ३ विना ६४ प्रकृति का बन्ध होता है. २ सास्वादन गुणस्थान में-३ नरक त्रिक, ४ जाति चतुष्क, १. स्थावर नाम, १ सूक्ष्म नाम, १ अपर्याप्ता नाम, '. साधारन नाम आताप नाम, 'हुंडक संस्थान, और १छेवटा संघयण इन १४ प्र- कृति मिथ्यात्वीही बान्धता है, इसलिये इस में बन्ध नहीं होने से बाकी ५० का बन्ध यहां होता है. ३ मिश्र गुणस्थान में- तिर्यचतिर्यचानुपूर्वी, १ अशुभ विहायोग ति, १ दौर्भाग्य नाम, १ दुस्वर नाम, १ अनादेय नाम, ४ वीचके चार संघयण, ४ बचिके ४ संठाण, इन १४ प्रकृति का बन्ध संक्लेश अनन्तान बन्धि के उदय में होता है, सो यहां न होने से बाकी रही ३६ प्रकृति का बन्ध यहां होता है. ४ अविरति गणस्थान में:-ऊपरोक्त ३६ और १ जिन नाम यों ३७ का बन्ध होता है. ५-६ देश विरति और सर्व विरति गुणस्थान में:-१ मत प्य गति, मनुष्यानुवूर्वि, ३ औदारिक शरि. ४ औदारिक आंगे पाग, और ५ बजू वृषभ नारच संघयण, इनके न होता है. क्यों कि यह देवायु ही बान्धते है इसलिये इन ५ विना बाकी रही ३२ प्रकृ. ति का वन्ध यहां होता है. ७-८ अप्रमत और अपूर्व करण गुणस्थान में-अशुभ ना- म, १ अस्थिर नाम और ३ अयश कीर्ति नाम यह तीन, प्रमाद के योग से बन्धाती है सो यहां नहीं होने से यह ३ घी, तब २९ रहे और विशुद्ध परिणाम की अधिकता होने से आहारक और आहार- क अंगोपांग इन दो का बन्ध बढने से ३१ प्रकृतिवन्धेते है. ९-१० अनीयटी वादर और सूक्ष्म सम्पराय में यशः कीर्ती ४०५ .. * द्वितीय काण्ड-प्रथम खण्ड मूल द्वारा रोहण र का बन्ध होता है. ऊपर के गुणस्थानों में नाम कर्म का वन्ध नहीं होता है. ४९, नववा-गोत्र कर्म वन्ध द्वार. गौत्र कर्म की दो प्रकृति-१ उंच गौत्र और नीचे गौत. इसमें सेः- १-२ मिथ्यात्व और सास्वादन गुणस्थानों में दोनों गौत्र का बन्ध होता है. ३-१० मिश्र गुणस्थानसे लगा सूक्ष्म सम्परायतक एक ऊंच गौत्रका ही बन्ध होता है. ५०, दशवा-अन्तरार कर्म वन्ध द्वार. अन्तराय कर्मकी पांच प्रकृति-१ दानान्तगय. २लाभान्तराय ३ भोगत्तराय. ४ उपभोगान्तराय. और ५ वलबीर्यान्तराय, इन ५ अन्तरायमें सेः मिथ्यात्व गुणस्थान से लगाकर सूक्ष्म सम्यगय गुणम्यानत- क पांचों प्रकृतिका वन्ध होता है. ऊपर अन्तराय का वन्ध नहीं. ५१, इग्यारवा-ध्रुव कर्म वन्ध द्वार. तानावरणीय. दर्शनावरणी. मोहनीय. नाम. और अन्तगव यह ५ कर्म ध्रुध बन्धी हे:-इनमें मे. मिथ्यात्व गुणस्थान ते नृम मम्गय गुणन्यानतक पांचों- ही कमौका बंध होता है. उपर के गुणन्थानोंमें ध्रुव बन्ध नहीं. ५२. वास्वा-ध्रुव कर्म प्रकृति वन्ध द्वार. : भूव पन्ध कृति दे पाने लिये देशाट' का.

४०६ a मुक्ति मोपान श्री गुणस्थान रोहण अहीशन द्वारी ज्ञानावरणीयकी ५, दर्शनावरणीय ९, मोहनीय की ? (वा- रों कपायकी चौकडी, भय, मत्सर और मिथ्यात्व मोहनी)नामकी-४ वर्ण चतुष्क, १ तेजस, १ कार्मण, १ अगफलव, १ निर्माण, १ उ- द्योत, येह ९ और अन्तराय की ५ यो सब ४७ प्रकृति ध्रुव वन्धी ! हेतिा है इस मेंसे. मिथ्यात्व गुणस्थान में-४७ ही प्रकृतिका बन्ध होताहै. सास्वादन गुणवान में-मिथ्यात्व मोहनी विना४६प्रकृतिका व- न्ध होता है। मिश्र और अविति गुणस्थान में-अनन्तान बन्धि चौकडी औ र थीणदी त्रिक विना ३९ प्रकृतिका वन्ध होता है. देशविरति गुणस्थान में-अप्रत्याख्यानी चौकडी विना ३५ का बन्ध होता है. प्रमत और अप्रमत गुणस्थान में प्रत्याख्यानी चौकडी वि- ना का ३१ बन्ध होता है. अपूर्व करण गुणस्थानमें-दोनों निद्रा विना २९का बन्ध होता है। अनीयटी बादर गुणस्थान में-भय मत्सर और नाम कर्म ९ + प्रकृति विना १८ प्रकृतिका बन्ध होता है. सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थान में-संज्वल की चौकडी विना १४ प्रकृति का बन्ध होता है. उपर के गुणस्थानों में ध्रुव बन्ध नहीं होता है. अध्रुव बन्ध कर्म प्रकृति के खुलासे के लिये देखीये अर्थ कांडका पृष्ट२०१वा, + वर्ण चतुष्क, ५ तेजस, ६ कार्मण,श्वर्ण चतुष्क, ८ अगुरु लघु, निर्माण ४०७ द्वितीय मूल काड-प्रथम सन्ड मूल द्वारा रोहण ५३, तेरवा-अध्रुव कर्म वन्ध द्वार वेदनीय, मोहनीय, आयुष्य, नाम और गौत्र यह ५ अध्रु- व वन्धि कर्म है. मिथ्यात्व गुणस्थान से लगाकर अप्रमत गुणस्थानतक बीच का मिश्र गुणस्थान छोड वाकीके ६ गुणस्थानों में५ही कर्मबंधतेहै. मिश्र अपूर्व करण, अनियटि वादर. इन तीनों गुणस्थानोंमें आयुष्य कर्म विना चार कर्मोंका वन्ध होता है. सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थान में आयुष्य और मोहनीय विन तीन कर्म का वन्ध होता है. उपशान्त मोह, भीग मोह और सयोगी केवली इन तीनों गुणस्थानवालों के एक वेदनी का वन्ध होता है. अयोगी केवली गुणस्थान में बन्ध नहीं. ५४. चौदवा-अध्व कर्म प्रकृति दार. वेदनीय की २. मोहनीयकी छे३ वेद. ' हांस्य. १ ति. शो क. येह ६. आयु-य की. नामकी ? शरीर ३. अंगोपांग ३. मंघ- यण ६. संठाण ६. गति ४. जाति ५. अणुपूर्वी १. विहायोगति २. श्वाशोश्वास १. आताप १. उद्योत १. पगघात ?. जमदगका ११, स्थावर दाका १०. तीर्थकर नाम '. यह ... ऑर गौत्र की २. यों सब ७३ अध्रुव बंध की प्रजातियों होती है. इसमें में. मिथ्यात्व गुगन्थान में-आहाक दीक और तीर्थकर नान : दिना ७० प्रकृति वन्यते हे. सास्वादन गुगन्यान में-३ नकत्रिक. 2 जाति ऋतुम्की ? १ स्थावर, १ सुभ. अपर्यामा. नायाग्न आताप. छत्र ४०८ १ मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी संघयण और १ हुंड संस्थान, इन १४ विना बाकी रही ५६ प्रकृति बन्धते हैं. मिश्र गुणस्थान में-४ आयुष्य की, ४ बीचके चार संघयण बीचके चार संस्थान, १ अशुभ विहायोगति,१ स्त्रीवेद, २तिर्यच दीक, १ दौभाग्य, १ दुःस्वर, १ अनादेय, और १ नीच गौत्र इन २० विना ३६ प्रकृति बन्धाती है. अविरति गुणस्थान में-१ तीर्थकर नाम और मनुष्यायु, १ देवाय, यह ३ प्रकृति बढ़ने से ३९ का बन्ध होता है. देशविरति और अप्रमत गुणस्थान में-१ बजू ऋषभ नारच संघयण, १ मनुष्यगति, १ मनुष्यानु पूर्वी, १ मनुष्यायु, २ औ- दारिक दिक, यह ६ विन २३ बन्धते हैं। अप्रमत गुणस्थान में-१ शोक. १ अरति, १ अस्थिर, १ अ शुभ, १ अयशः कीर्ति, इन ५ प्रकृति विना २८का बन्ध होता है अपूर्व करण गुणस्थान में-१ देवद्धिक, १ पचेन्द्रियजाति, १ शुभविहायगति, ९ त्रस दशके मे की यशकीर्ती विना नव. २ वैक्रियटिक,आहारक दिक, १ सम चउरंस संस्थान. 'उश्वास, और १ पराघात इन २० विना, ८ का बन्ध होती है. अनीयटी वादर में-१ साता वेदनी, २ यशकिर्ती, ३ऊंच गों त्र और ४ पुरुपवेद यहट बन्धेती है. सूक्ष्म सम्पराय में-पुरुप वेद विना तीन प्रकृति वन्धती है. पशान्त मोहसे सयोगी केवल गुणस्थानतक-१ साता वेदनी बंधे. अयोगी केवली गुणस्थान में बन्ध नहीं. ५५, पंदरवा सर्व घातिक कर्म वन्ध बार १ ४.९ ६५ द्वितीय मूल काण्ड-प्रथम खण्ड मूल द्वारा रोहण र सर्व घातिक ३ कर्मः-१ ज्ञानावरणीय २ दर्शवावरणीय और ३ मोहनीय. मिथ्यात्व से अप्रमत गुणस्थानतक तीनो कर्म बन्धते हैं: और अपूर्व करण से सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थानतक मोहनी विनादो कर्म बन्वते हैं. उपर सर्व घातिका वन्ध नहीं. सोलवा सर्व घातिक कर्म प्रकृति बार १ केवल ज्ञानावरणीय, १ केवल दर्शनावरणीय, ५ निद्रा १२ संज्वलकी चौकडी विना तीनों चौकडी की११ कपाय, और १ मि- थ्यात्व माहनीय. यह २० सर्व घातिक प्रकृति है. इसमें से. मिथ्यात्व गुणस्थान में २० ही प्रकृति वन्धाती है. सास्वदिन में-१ मिथ्यात्व मोहनीय विना१९ प्रकृति बन्धाती है. मिश्र और अविरति गुणस्थान में ४ अनन्तान वन्धि वाक डी और २ थीणदी त्रिक इन ७ विना १२ प्रकृति बन्धाती है. देशविरति गुणस्थान में-अप्रत्याख्यानी चौकडी बिना ८ प्र कृति वन्धती है. प्रमत और अप्रमत गुणस्थान में केवल ज्ञाना- वरणीय, १ केवल दर्शनावरणीय. और दो निद्रा, यह प्रकृति ब- न्धती है. अपूर्व करण गुणन्धान के दृमरे भाग में लगाकर मृम न. म्पराय गुणस्थानतक- १ केवल ज्ञानावग्णीय और केवल, दर्श. नावरणीय २ प्रकृति बन्धानी है. आगेके गुणन्यानों में न वानिक प्रकृति का वन्य नहीं. 1- पाविक यातिर मादरे मन में . . H

४१०
मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अहीशन द्वारी
५७. सत्तरवा देशघातिक कर्म बंध बार
देशघरातिक ४ कर्मः-ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय
और अन्तराय.
.
मिथ्यात्वसे अनीयटी बादर गूणस्थानतक चारोंही कर्म बन्धाते हैं.
सूक्ष्म संपगयके आदि भागमें मोहनीय विना तीनोंकार्म बंधाते हैं
सूक्ष्म सम्परायके अन्तिम भागसे ऊपर देशघातिक कर्मकाबंध नहीं
५८ अठाग देशघातिककर्म प्रकृति बंधवार
देश घातिक काँकी २५ प्रकृति-ज्ञानावरणीय की,
४, दर्शनाव
रणीयकी ३, हांस्य पटक, ३ वेदनीय, ४ संज्वलकी चौकडी, और
अन्तराय की ५, यो २५ में से मिथ्यात्व गूणस्थान में २५ ही प्र
कृति का बन्ध होता है.
सास्वादन गूणस्थान में नपूंसक वेद विना २४ बन्धाती है.
मिश्रसे प्रमत गूणस्थानतक स्त्रीवेद विना २३ प्रकृति बाधाती है.
अप्रमत और अपुर्व करणमें-शोक अरति विना२१प्रकृति बंधातीहैं.
सूक्ष्म सम्पराय में-पुरुषवेद और संज्वलके चौक विना १६ प्रकृति
बन्धाती है.
और सूक्ष्म सम्परायके अन्त में १२ ही का क्षय होनेसे आ
गे बन्ध नहीं होता है.
५९ उन्नीसना-अघातिक कर्मवंध बार.
अधातिक कर्म ४ हैं. १ वेदनीय, २ आयूष्य, ३ नाम औ
र ४ गौत्र, इनमेंसे.

४११ . . * द्वितीय मूल कान्ड-प्रथम सन्ड मूल द्वाग रोहण र मिथ्यात्व गुणस्थान से अप्रमत गुणस्थानतक बीच का मि- श्रगुगस्थान छोड कर वाकीके गुणस्थानों में चारोंही कर्म बंधते हैं. मिश्र, अपूर्व करण, से सूक्ष्म सम्परायतक आयुष्यविन ती. नों कर्म बन्धते है. उपशान्त मोहसे सयोगी केवली गुणस्थान तक एक वंद- नीय कर्म बन्धता है. आयोगी केवली गुगस्थान में वन्ध नहीं. अवातिक कर्म ध बार. अघाति प्रकृति ७५ होती है-२ वेदनीयकी. १ आयुन्यकी, ६७ नाम की, २ गौत्रकी, यो७५ मिथ्यात्व गुणस्थान में आहार- क द्विक और जिन नाम विना ७२ का बन्ध होता है. सास्वादन में ३ नरक त्रिक. ४ जाति चतुक. १ स्थावर. ? सूक्ष्म ? साधारण. १ अपर्याप्ता. १ आताप ? हुंड मंम्यान, १ ठेव टा संघयण. इन १४ विना ५८ वान्धते हैं. मिश्रमें-४ आयप्यकी. २ तिर्यचडीका ४ वीवके वार मंवयण ४ वीवके चार संस्थान. १ अशुभ विहायोगति. १ दार्भाग्य. १ दुः- स्वर. १ अनादे और नीच गोत्र इन १९ विना वाकी की ३९ ६०, बीसवा . का वध होता है. अविगति में- तीर्थकर नाम. और २ गतिका आवृप्य यह ३ वदने मे १२वन्धे. देशविगति और प्रमत के. वन पन नाव नवयण. मनुष्य त्रि- क. और २ औदारिददिक यह ६लनेने ३६ का वन्य होता है. अप्रमतक। अन्यिा. अत्राम.' अयगः नीव गौत्र येह : - 1 ४१.२ * मुक्त सोपान श्री गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी २१ विना. ३२ प्रकृति बान्धते हैं. अपूर्व करणसे सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थानतक-१ यशकीर्ति, १ सत्ता- वेदनीय और १ ऊंच गौत्र यह तीनों प्रकृति बन्धाती है. उपशान्त मोहसे सयोगी केवलीतक-१ सातावेदनीय बन्धाती है अयोगी केवलीके बन्ध नहीं. ६१, इक्कीसवा पुण्य कर्म बंध दार पुण्य कर्म हैं:-वेदनीय, आयुष्य, ३ नाम, ४ और गौत्र. इनमेंसे. मिथ्यात्व गुणस्थान से अप्रमत गुणस्थानतक बीचका मिशृ गुण स्थान छोडकर बाकी के ६ गुगस्थानों में चारों ही कर्मों का बन्ध होता है. मिश्र, अपूर्व करण, अनियटी बादर और सूक्ष्म सम्पराय इ- न चार, गुणस्थानों में-आयुष्य विना तीन कर्मोंका बन्ध होता है. उपशान्त मोह क्षीण मोह और सयोगी केवली में १ साता वेदनीय का बन्ध होता है. अयोगी केवली के बन्ध नहीं. ६२, बावीसवा पुण्य कर्म प्राकृति बंध बार पुण्य प्रकृति ४२ होती है. १ साता वेदनीय, ३ नरकविना तीनो गति का आयुष्य, * १ मनुष्यगति, १ मनुष्यानुपूर्वी, दे- वगति. ' देवानुपूर्वी १ पचेन्द्रिय जाति, ५ शरीर 3 अंगोपांग, १ प्रथम संघयण, '. प्रथम संस्थान, ४ शुभवर्ण चतुष्क, १० जस दशका ? अगुरु लघु, १ पराघात, १ उश्वास ? आताप, १ उद्योत १ शुभ विहायगति, १ निर्माण, १ तीर्थकर नाम और उंच गोत्र. तियेच युगलिये होते हैं. इमलिये तियचायु पुन्य प्रकृति में लिया है. १ rea- * द्वितीय मूल काण्ड-प्रथम खण्ड मूल द्वारा रोहण कर यह ४२ इनमें से. मिथ्यात्व गुणस्थान में-आहारक द्विक और तीर्थकर नाम विना ३९ वन्धते हैं. सास्वादन गुणस्थानमें-आताप नाम विना ३८ प्रकृति बन्धते हैं. मिश्र गुणस्थानमें-तीनों आयुष्य उद्योत नाम विना ३४ वन्धते हैं. अविरतिमें-मनुष्यायू, देवायु, और तीर्थकरन नाम यह ३ बढने से ३७ वन्धते हैं. देश विरति और प्रमत गुणस्थान में-३ मनुष्य त्रिक, औ- दारिक द्विकः और प्रथम संघयण इन ६ विना ३१ प्रकृति वन्धतेहैं अप्रमत गूणस्थानमें-आहारक द्विक बढ़ने से ३२ प्रकृति वन्धते हैं. अपूर्व करणं गुणस्थानके ९ भाग-उसमें से पहिले ६ भागों में- देवायु विना ३२ बन्धे, और पीछले तीन भागों में-उंचा गौत्र. २ सातावेदनीय, और यश-कीर्ति नाम यह तीनों प्रकृति वन्धत हैं. अनीयटी वादर और सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थानीके उपरोक्त ती नों प्रकृति वन्धाती है. उपशांत मोहसे सयोगी केवल तक-१ साता वेदनीय बन्धते हैं. अयोगी केवली गुणस्थान में बन्ध नहीं. ६३, तेवीसवा पाप कर्म बंध बार आठोंही पाप कर्म हैं:-उसमेंसे. मिथ्यात्व और से स्वादन गुणम्थान आठही कर्म वन्धते हैं. मिश्रसे प्रमत गुणस्थानतक आयु और गौत्र विना कर्म बंधते हैं. अप्रमतसे अनियटी वादरतक वेदनीय विना ५ कर्म बंधे. सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थान में मोहनीय विना ' कर्म बन्धे.

४१४ EMEN..... १ * मुक्ति सापान श्री गुणस्थान रोहण अढीगतदारी ५ उपर के गुणस्थानों में पाप कर्म का बन्ध नहीं. ६४, चौवीसवा पाप कर्म प्रकृति बंध बार पाप कर्मकी प्रकृति ८२ होती हैं. ५ ज्ञानावरणीय की. ९ दर्शनावर- णायकी. १ असातावेदनीय, १६ चार चौकडी की कषाय, ६ हास्या दि, ३ बंद, १ मिथ्या मोह, १ नरक का आयुष्य. २ नरक दिक २ तिच दिक ४ जाति चतुष्क, ४ वर्ण चतुष्क, ५ प्रथम संघय ण विनी ५ संघयण, ५ प्रथम संठाण विना ५ संस्थान, १० स्थावर दशका, १ अशुभ विहायगति, १ उपघात नाम १ नीच गौत्र और ५ अन्तराय इन ८२ मेंसे. मिथ्यात्व गुणस्थान में-८२ ही प्रकृत्तिका बन्ध है. सास्वादन गुणस्थान में-३ नरक त्रिक. ४ जाति चतुष्क, ४ स्थाव र चतुष्क, १ छेवटा संघयण ' हूंडक संस्थान. २ मिथ्यात्व मोह, और १ नपुंसक वेद, इन २५ विना ६७ प्रकृति बन्धते हैं. मिश्र और अविरति गुणस्थान में- ४ अनन्तान बन्धि चौं- क, ४ संघयण, ४ संस्थान, २ तिर्यच दिक, ३ थीणदी त्रिक, ? दौर्भाग्य, १ दुःस्वर, १ अनादेय, १ अशुभ विहायगति, १ स्त्रीवेद, और १ नीच गौत्र. इन २३ विना ४४ बन्धे. देशविरति गुगस्थानमें-अप्रत्याख्याना चौकडी विना ४० बन्धते हैं, प्रमत गुणस्थान में प्रत्याख्यानी चौक विना ३६ प्रकृति बन्धाती है अप्रमत गुणस्थानमें-शोक, १ अरति, ' अस्थिर, १ अशु- भ' अयश और असाता वेदनीय इन प्रकृति विना ३० प्रकृति वन्धती है. अपूर्व करण गुणस्थान के ९ भागोंमे से-पहिले के दोनों १ १. १ १ १ १

द्वितीय काण्ड-प्रथम खण्ड मूल द्वारा रोहण
४१५
भागोंमे तो उपराक्त ३० काही वन्ध होता है. तीसरे से लंगा छठे
भागतक दो निद्रा विना २८ का बन्ध होता है. और अन्तिम ती
नों भागों में-श्वर्ण चतुष्क और पराघात नाम, इन ५प्रकृति विना
२३ का वध होता है.
अनियटी वादरके५भागों से पहिले भाग में-हांस्य, रति,
१ भय, और २ मत्सर, इन ५ विना १९ का बन्ध, दुसरे भाग में
पुरुष वेद विना १८ का वन्ध, तीसरे में संज्वल के क्रोध विना२७
का बन्ध चौथे में-संज्वलके मान विना १६ का वन्ध. पांचवे में-सं
ज्वलकी माया विना १५ का वन्ध.
सूक्ष्म सम्पराय में ज्ञानावरणीय. ४ दर्शनावरणीय, और
५ अन्तराय इन १४ प्रकृति का वन्ध होता है.
उपशान्त मोहसे अयोगी केवली गुणस्थानतक पाप प्रकृतिका बन्ध
नहीं होता है.
६५,पच्चीसवा-परावतमान कर्मवन्ध द्वार
दुसरे के बन्धको और उदय को रोककर अपनाही प्रभाव
दर्शाचे ऐसे परावर्तमान कर्म ५ हैं:-१. दर्शनावरणीय. १. वेदनीय
१ मोहनीय, १ आयु, १ नाम और ' गौत्र.
मिथ्यात्वसे अप्रमत गुणस्थान तक ठेही कोंका वन्ध.
अपूर्व करण में दर्शनावरणीय और आयुष्य विना कों
४ का वन्ध होता है.
अनीयटी वादर में वेदनी, नाम और गोत्र इन ' कोका बंध
होता है.
परावर्तमान अपरावर्तमान कर्म प्रकृति के मुतासके लिये देखीये अर्य कांडका
पृष्ट २०९ वा.
4

६ १ ४१६ मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी ५ सूक्ष्म संपरायसे सयोगी केवलीतक-एक वेदनीयकाही बन्ध होताहे. अयोगी केवली गुणस्थान में परावर्त मान का बन्ध नहीं. ६८.छबीसवा परावर्तमान कर्म प्रकृति बार परावर्तमान कर्मोंकी प्रकृति ९१ है:- ५ निद्रा, २ वेदनी, वेद, १ हांस्य, ' रति, १ अरति, ' शोक, १६ चारों चौकडी की कषाय, ४ आयुष्य, ४ गति, ५ जाति, ३ शरीर. ३ अंगोपांग, ६ 'संघयण, ६ संस्थान, ४ अनुपूर्वी २ विहायोगति, १० त्रस दशका १० स्थावर दशका, १३ उद्योत, ' आताप, यों सब २१. मिथ्यात्व गुणस्थान में-आहारक द्विक विना ८९ का बन्ध. सास्वादन गुणस्थान में-३ नरक त्रिक, ४ जाति चतुष्क १ स्थावर १ सूक्ष्म, ' अपर्याप्ता, ' साधारण, १हुंड संस्थान. १ छेवटा संघयण, ' आताप, और नपूंसक वेद इन १६ विना ७४ प्रकृति बन्धः मिश्र गुणस्थानमें-३ थीणदीत्रिक, ४ अनन्तान बन्धि चौ क, १ स्त्रीवेद २ तिर्यचद्रिक, ४ मध्य के चार संघयण, ४ मध्य के चार संस्थान,१अशुभ विहायोगति, १ दौर्भाग्य, १ दूस्वर, १ अ. नादेय, ४ चारों आयु, १ नीच गौत्र, इन २७ विना ४७का बन्ध, अविरति गुणस्थान में-१ मनुष्यायु, १ देवाय, दोनों बढ़ने से ४९ प्रकृति का बन्ध. देश विरति गुणस्थान में-४ अप्रत्याख्यानी चौक, १ प्रथम संघयण, ३ मनुष्यत्रिक, २ औदारिक दिक. इन १० विना-३९ प्र- कृतिका वन्ध पावे. प्रमत गुणस्थान में प्रत्याख्यानी वरणिय चौक विना का बंध १ १. १. १ ४१७ . . द्वितीय मूल कान्ड-प्रथम खन्ड मूल द्वारा रोहण र अप्रमत गुणस्थान में-१ शोक. १ अरतिः १ अस्थिर, १ अ शुभ. १ अयश. और १ असाता वेदनीय इन ६ विना २९का वंध अपुर्व करण में-१ निद्रा और १ प्रवला विना २७का वन्ध, अनियटि वादर में-संज्वलका चौक, १ सातावदनीय. १ य श कीर्ति और उंच गौत्र इन ८ का वन्ध सूक्ष्म सम्पराय में संज्वल के चौक विना का वन्ध. उपशान्त मोहसे सयोगी केवलीतक-१ सातावेदनीयका वन्ध, अयोगी केवली के परावर्तमान प्रकृति का वन्ध नहीं ६७सतावीसा-अपरावर्तमानकर्मवन्धद्वार अपरावर्तमान ५ कर्म-ज्ञानावरणीय. २दर्शनावरणी. ३ मोहनीय ४नाम और अंतराय. मिथ्यात्व गुणस्थान से अपूर्व करण गुणन्थान तक-पांचों काँका वन्ध. अनियट वादर और सूक्ष्म सम्पराय में-मोहनीय और नाम विनाः कर्म का बन्ध. उपशान्त मोहसे अयोगी केवली गुणस्थानतक-अपरावर्तमान काँका बन्ध नहीं होता है. अठासिवा अपरावर्तमानकर्मप्रकृतिबंधंदा अपरावर्तमान प्रकृति २९ हैः-ज्ञानावरणीय, ४ दर्शनावर- णीय, १ मिथ्यात्व मोहनीय, १ भय, १ मत्सर, ४ वर्ण चतुष्क, १ ते- जस. १ कार्मण, १ अगुरु लघु. १ निर्माण, १ उपघात. : पराघात, १ श्वासोश्वासः १ तीर्थकर नाम: और अन्तगय. .. ---

४१८
मुक्त सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अडीशन द्वारी ११
मिथ्यात्व गुणस्थानमें-जिन नाम विना २८ का बन्ध.
सास्वादन और मिश्रमें मिथ्यात्व मोहनीय विना-२७का बंध
अविरतिसे अपूर्व करण तक-जिन नाम सहित २८ का बन्ध.
अनियट्टि बादर और सूक्ष्म सम्परायमें-५ ज्ञानावरणीय, दर्श
नावरणीय, और ५ अन्तराय. यो १४ प्रकृतिका बन्ध.
उपशान्त मोह से अयोगी केवलीतक अपरावतमानका बन्ध नहीं.
६९, उनतीसवा-भूयस्कार कर्म बन्ध द्वार
उपशांत मोह गुणस्थान से पडता हुवा-एक वेदनीय का बन्ध क
र सूक्ष्म सम्पराय में छे कर्मोंका बन्ध करे सो प्रथम भूयस्कार बन्ध,
सूक्ष्म सम्पराय में छे कर्मोंका बन्ध कर, अनियटि बादरमें सात
कर्मोंका बन्ध करेसो दुसरा भूयस्कार.
अप्रमत गुणस्थानमें सात कर्मोंका बन्ध कर प्रमतादि गुण
स्थान में आठ कर्मों का बन्ध करे सो तीसरा भूयस्कार.
७०, तीसवा-भूयस्कार कर्म प्रक्रति
बन्ध द्वार.
सामान्यपने-कर्म प्रकृति के बन्ध स्थान २९ होते हैं.-१ का
१७ का, १८ का, १९ का, २० का, २१ का, २२ का, २६ का,
५३ का, ५४ का, ५५ का, ५६ का ५७ का, ५८ का, ५९ का,
६० का, ६१ का, ६३ का, ६४ का ६५ का, ६६ का. ६७ का, ६८
का, ६९ का, ७० का, ७१ का, ७२ का, ७३ का और ७४ का, इन
२९ स्थानों में से भूयस्कार वन्ध के २८ स्थानक हैं.
भूयस्कारादि चारों बन्धकी कर्म प्रकृतिके खुलासेके लिये देखीये अर्थ कांडका
पुष्ट२०८वा.
,

, द्वितीय मूल कापड-प्रथम खन्ड मूल द्वारा रोहण * १ उपशान्त मोह में-१ वेदनीका बन्ध कर, सूक्ष्म सम्परायमें- ५ ज्ञानावरणीय दर्शनावरणीकी ४, अन्तराय की ५, ऊंच गौत्र?, य शकीर्ती १, यो १७ प्रकृतिका साता वेदनीय के साथ प्रथम समय में बन्ध करती वक्त प्रथम भूयस्कार बन्ध. वहां से पडता अनियट बादर गुणस्थानमें-संज्वल के लोभ युक्त १८ प्रकृति का वध करे सो दुसरा भूयस्कार बन्ध. ३ इसी में संज्वलकी मायाके साथ १९ का बन्ध करसो तीसरा भूयस्कार बंध, ४ इसी में संज्वलके मान के साथ २० का बन्ध करेसो चौथा भू- यस्कार बन्ध, इसीमें संज्वलके क्रोधके साथ २१ का वध करे सो पांचवा भूयस्कार बन्ध, ६ इसीमें पुरुष वेदके साथ २२ का बन्ध करे सो छठा भूयस्कार वन्ध, ७ अपूर्व करण के सातवे भाग में हां स्य, रति, भय, और मत्सर, इन चारों का वध करे सो सातवा भु यस्कार वन्ध. ८ अपूर्व करण के छठे भाग में देवापायोग २८ प्र- कृति का वध करे सो ५३ का आठवा भूपस्कार वन्ध. ९ तीर्थकर नामका वन्ध करे सो ९४ का नववा भूयस्कार बन्ध, १० इसमें से- आहारक द्विक बन्ध करे सो ऊपरोक्त ५३ दोनों मिलाने से ५५का दशवा भूयस्कार बन्ध, ११ इसमें जिननाम का वध करे सो ५६ का इग्यारवा भूयस्कार वन्ध, १२ अपूर्व करण के प्रथम भागमें तीर्थकर नाम घटाकर निद्रा और प्रचला का बन्ध करे सो ५७ का वारवा भयस्कार वन्ध, १३ इस में-तीर्थकर नाम अधिक करनेसे ५८ का तेरवा भूयस्कार वन्ध. १४ अप्रमत गुणस्थान मे-देवायु सहित ५९ का वध करे सो चउदवा भूयस्कार वन्ध, १५ देशविरति गुण- : देव प्रायोग्य पन्ध की प्रकृति २८ है. परन्तु या कीर्ती नाम ऊपर कह देने के मरन से यहां. ne - ४२० मुक्ति नोपान श्री गुणस्थान रोहण अढीशत द्वारी स्थान में देवा प्रायोगकी २८ प्रकृति का बन्ध करते-५ ज्ञानावरणी यकी, ' दर्शनावरणीयकी, १ वेदनीयकी १७ मोहनीयकी, २८ना- मकी, १ गौत्रकी, और ५ अन्तराय की यो ६ प्रक्रातिका बन्धक रेसो पन्दवा भूयस्कार बन्ध. १६ तिर्थकर नाम सहित ६१का बंध करे सो सोलवा भयस्कार बन्ध. १७ अविरति गुणस्थान में आयु अवन्ध वक्त में देव प्रायोग्य नामकी २८ प्रकृतिका वन्ध करते-५ ज्ञानावरणीय की ६ दर्शनावरणीयकी, १ वेदनीयकी, १७ मोहनीय की, २८ नामकी १ गौत्र की और ५ अंतरायकी यों २३ का बन्ध करे सो सतरवा भूयस्कार बन्ध, १८ देवायु सहित ६४ का बन्ध क रे सो अठारवा यस्कार वन्धः १२ तीर्थकर नाम सहित ६५ का वन्ध करे सो उन्नीसवा भूयस्कार बन्ध. २० अविरति में-देवता होवे उनके मनुष्य प्रायोग्य ३० प्रकृति का बन्ध करते ६६ का वन्ध हो वे सो बीसवा भूयस्कार बन्ध. २१ मिथ्यात्व गुणस्थान में-५ ज्ञाना- वरणीय, १ दर्शनावरणीय, १ वेदनीय, २२ मोहनीय, १ आयुष्य, २३ नामकी १ गौत्रकी, और ५ अन्तराय की यों ६७ प्रकृति का बन्ध करे सो इक्कीसवा भूयस्कार बन्ध. २२ इसमें नामकी २५ प्रकृ ति करने से और आयुष्य की १ कमी करने से ६८,का बन्ध होवे सो तेवीसवा भूयस्कार बन्ध, २४ येही नाम कर्म की २६ प्रकृति के साथ,७० का बन्ध होवेसो चौबीसवा भूयस्कार बन्ध, २५ येही आयु- प्य रहित और नाम की २८ प्रकृति साथ ७१ का बन्ध करे सो पच्ची सवा भूयस्कार बंध. २६ येही २९ नामकी प्रकृति साथ बंध करेसो ७२ का छब्बीसवा भूयस्कार बंध, २७ येही आयुष्य सहित १३ का बंध करे सो सत्तावीसवा भूयस्कार बंध और २८ येही नामकी ३० प्रकृति का बंध करते-५ ज्ञानावरणीय, ९ दर्शनावरणीय, १ वेदनीय, २२ मो ५- -- ४२१ * द्वितीय मूल कान्ड-प्रथम खन्ड मूल द्वारा रोइण पर हनीय.१आयुष्य. ३० नामकी. १ गौत्रकी. और ५अंतरायकी यों ७४ का वंध करे सो अठावीसवा भूयस्कार बंध.+ ७१, इकतीसवा अल्पतर कर्म बंध द्वार प्रथनके गुणस्थानों में आयु कर्म का बन्ध करते सात कम का बन्ध करे सो प्रथम अल्पतर वन्ध. सात कमौका बन्ध कर दशवे गुणस्थानके प्रथम समय मो- हनीय विना छे कर्मों का वध करे सो दुसरा अल्पतर वन्ध. और छे कोका बन्ध किये वाद आगे उपशान्त मोह भी- ण मोहादि गुणस्थान में एक वेदनीय का वध करे सो तीसरा अ ल्पतर वन्ध. ७२वत्तीसवा-अल्पतर कर्म प्रकृति वन्धद्वार जो उपर भूयस्कार वन्ध के २८ स्थान कहे हैं, उन्हीको उ- लट पढने से अर्थात्-पहेल २८ वा. फिर २७ वा. फिर २८वा. यों- आगईस उलटाकर पढनासो अल्पतर वन्ध के २८ स्थान जानना. तेंतीसवा अवस्थित कर्म बंध द्वार. प्रथम गुणस्थानोमें आगे कमाका वन्ध किये बाद आगंके गुणस्थान में सात कमोंका वन्ध करे उस वक्त प्रथम समयमें तो अल्पतर वन्ध जानना. और फिर वो वन्ध जितने कालनक. बम. ही स्वरूप में कायम बनान्हे उमे अवन्थिन बन्ध कहते हैं. " N + यह ८ पार पन्नान हे दो भागन्न अट हो । मो माटे मे जरिन.

४२२ मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अहीगतद्वारी ७४,चौतीसवा-अवस्थितकर्म प्रकृतिबंधदार बन्ध के २९ ही स्थानों में जिन २ प्रकृतियों के वन्ध करने का स्वरूप भूयस्कार बन्ध में कहा है. वो प्रकृतियों बन्ध किये वा- द उतनीही उसही स्वरूपमें कायम रहे. उसे अवस्थितिबन्ध समझना, ७५, पैतीसवा अव्यक्त कर्म बंध दार अव्यक्त बन्ध-सर्व कर्मों से अवन्ध-निर्मुक्त हो फिर बन्धक रे उसे कहते हैं, सो किसी भी गुणस्थान में नहीं पाता है, क्यों कि सर्व कर्मोंसे निर्मुक्त अयोगी केवली तुगस्थान के वाद होते हैं, और सीधा मोक्ष में चले जाते हैं. परन्तु पडवाइ नहींज होते हैं. इसलिये यह बन्ध नहीं पाता है. एसाही अव्यक्त कर्म प्रकृति के सम्बन्ध में भी जानना. ७६,छत्तीसवा-समुचय कर्मप्रकृतिवन्धद्वार १ भिथ्यात्व गुणस्थान में-ज्ञानावरणीय की ५ दर्शनावरणी- यकी ९, वेदनीयकी२, मोहनीयकी २६, आयुष्यकी ४, नामकी ६४, गौत्र की २, और अन्तराय की ५, यो सव ११७ प्रकृति का बन्ध होता है. २ सास्वादन गुणस्थान में-ज्ञानावरणीयकी ५, दर्शनावरणी यकी ९, वेदनीयकी २, मोहनीयकी २४, आयुब्यकी ३, नामकी ५१, गौत्रकी २, और अंतरायकी ५, योसब १०१प्रकृतिबन्धातीहै. ३ मिश्र गुणस्थान में-ज्ञानावरणीयकी ५, दर्शनावर णायकी ६, वेदनीयकी २, मोहनीय की १९, नामकी ३६ ४२३ * द्वितीय मूल काड-दुसरा खन्ड कर्म द्वारा रोहण गौत्रकी १, और अंतराय की ५, यो सव ७४ प्रकृति, बन्धाती है. ४ अविरति सन्यग दृष्टि गुणस्थानमें ज्ञानावाणीयकी ५, द- शनावरणीय की ६, वेदनीयही २, मोहनीयकी १९, आयुष्यकी, २, नामकी ३७. गौत्र की १. और अंतरायकी', यो सब ७७ प्र- कृति वंशाती है. ५ देशविरति गुस्थान में-ज्ञानावरणीयकी ५, दर्शनावरणी- यकी ६ वेदनीयकी २, मोहनीयकी", आयय की १, नामकी ३२, गौत्रकी १. और अंतरायसी ५, यो सब ६७ प्रकृति वंशाती है. ६ प्रमत संपति रागस्थान में-ज्ञानावरणीय की ५. दर्शनावर णीय की ६. वेदनीय की २. मोहनीयदी ?१. आयव्य की १. नाम की ३२, गौत्र की? और अंतराय-ही ५. योसवप्रकृतिबंधातीह. ७ अनमत संयति गुणस्पानमें-ज्ञानावरणीय की'. दर्शना- वरणीय की वेदनीयकी १. मोहनीय ९.. आयु-न्य की १. नाम की ३१. गौत्रकी १, और अन्तरायकी' यो सब ९ प्रकृति ब- धाती है. ८ अपूर्व करण गुगस्थान के सात भागों में मे-पहिला भा. ग में ज्ञानावरणीय की ५ दर्शनावरणीय की ६, वेदनीयती ? माह नीयकी ९. नामकी ३१. गौत्रकी १. और अंतगयी . यों भव ९८ प्रकृति दन्धाती है. और दूसरे भाग से लगाकर छट्टे भाग तक मोहनीयकी २ प्रकृति कम होनसे ६ प्रकृति वन्याती है. और मा तव भाग में नामकी ३० विना २६ बन्धाती है. ९ अनिपट्टी दादर गुणन्थान के पांच भागों में मे-पहिल भाग में तानावरणीय की दर्दनावरणीय की 2. वेदनीयकी। मोहनीयकी नामकी : गौत्रकी और अंगकी, योन- .

४२४ x मुक्ति सोपान श्री गुगस्थान रोहण अढीशतद्वारी ५ ब २२ प्रकृति बन्धाती है, आगे प्रत्येक भाग में एकेक मोहनीय की प्रकृति कमी होनेसे-दुसरे भागमें २१ तीसरेमें २०, चौथे में १९ और पांचवे में-१८ प्रकृति बंधाती है. १० सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थान में-ज्ञानावरणीयकी ५, दर्श- नावरणीय की ४, वेदनीय की १ नामकी, १, गौत्रकी १, और अ न्तराय की ५ यों १७ १७ प्रकृति बन्धाती है. ११-१३ उपशान्त मोह क्षीण मोह और सयोगी केवली के एक सातावेदनीय का बन्ध होता है. १४ अयोगी केवली के किसीकाभी बन्ध नहीं होता है. ७७, सैंतीसवा-कर्मबन्ध व्युच्छेद द्वार मिथ्यात्व गुणस्थानसे अप्रमत गुणस्थान तक मिश्रगुणस्था न छोड बाकी ६ गुणस्थानों में कर्म बन्धका युच्छेद नहीं आठों ही कर्म बन्धाते हैं. मिश्र. अपुर्व करण. और अनियटी बादर गुणस्थानों में आ यू बन्ध व्युछेद. सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थान में आयुष्य और मोहनीय कर्म बंध व्युच्छेद. उपशांत मोह, क्षीण मोह और सयोगी केवली इन ३ गुण स्थानों मे एक वेदनीय कर्म विना सातों कर्म बन्धन का व्युच्छेद होता है. और अयोगी केवली गुणस्थानमें सर्व कर्म बंधका व्युछद रहे. ७८,अढतीसरा कर्मप्रक्रतिबंधव्युच्छेदबार सब बंधकी १२. प्रकृति है. उसमेंसेः- ४२५ * द्वितीय मूल काण्ड-दूमरा खण्डकर्म द्वारा रोहण कर ५ मिथ्यात्व गुणस्थानमें-नाम कर्मकी ३ प्रकृति का बंधव्युच्छेद होता है. २ सास्वादन गुणस्थानमें-मोहनीय की २, आयुष्यकी ?, और नामकी १६ यों सब १९ प्रकृतिका बंध व्युच्छेद होता है. ३ मिश्र गुणस्थान में-दर्शनावरणीयकी , मोहनीयकी ७ आयुप्यकी ४, नामकी ३१ और गौतकी ' यों सब ४६ का बन्ध व्युच्छेद होता है. ४ अविरति सम्यग्दृष्टि गुगस्थानम-दर्शनावरणीयको मोहनीयकी १, आयुष्य की २. नामकी ३" और गोत्रकी १ यों सब ४३ का बंध व्यच्छेद होता है. • देशविरति गुणस्थान में-दर्शनावरणीय की , मोहनीय- की ११, आयूष्य की ३ नाम की ३५. और गौत्र की', या मव: का बंध व्युच्छेद होता है. ६ प्रमत गुणस्थान में दर्शनावरणीयकी : मोहनीयकी १५, आयुष्यकी . नामकी ३५. और गौत्रकी ' यो सब ७ का बन्ध व्युच्छेद होता है, ७ अप्रमत गुगस्थान में-दर्शनावरणीय . वेदनीय १.मोह- नीय-१७, आय-य की . नामकी : और गोत्रकी १. यों मवः' । का बंध व्युच्छेद होता है. ८ अपूर्व करण गुणस्थान के मान भागों में पहले भागमें दर्शनावरणीच की. वेदनीयकी १. मोहनीयकी १७ आयुप्यकी ४. नामकी ३६ और गौत्र की . यों नब ६ का वन्य व्युच्छेद होता है. दूसरे भाग ने छे भागनक-दर्शनावग्णायकी वेदनीय- की?. मोहनीय की १६. आय.की. नामकी और गांव की ३ है m ४२३ मुक्ति सोपान-श्री गणस्थान रोहण अहीशन द्वारी १९ १, यो सब ६० का बन्ध व्युच्छेद होता है. और सातवे भाग में नाम की ३० प्रकृति का बंध घटने से ९० का वन्ध व्युच्छेद होता है. ९ अनियट्टि बादर गुणस्थानके पांच भागों में से पहिले भा ग मे-दर्शनावरणीय की ५ वेदणीयकी १, मोहनीयकी २१आयुष्य की ४,नामकी, और गौत्रकोश्यों सब ९८ प्रकृतिका वध त्युच्छे- होता है। आगे चार भागों में मोहनीय की एकेक वधालेले दूसरे भा गमें ९९, तीसरे में १००, चौये में १०१ और पांचवेमें १०२ प्रकृतिका बंध व्युच्छेद होता है. १० सूक्ष्म सम्पराय में-दर्शनावरणीयकी ५, वंदनीयका मो हनीयकी २६ आयुष्की ४, नामकी ८६ और गौत्रकी १, यो सब १०३ का बंध व्युच्छेद होता है. ११-१३ उपशान्त मोह, क्षीण मोह, और सयोगी केवली, इ न ३, गुणस्थानों मे ज्ञानादरणीय की, दर्शनावरणीय की १, वे- दनीय की १, मोहनीयकी २६, आयुष्य की ४. नरमकी ६७ और गौत्रकीरयोंसब ११९का बंध व्युच्छेद होताहै, और अयोगी केवली गुणस्थान में १२० प्रकृति काही बन्ध व्युच्छेद होता है. इति कर्म बंध नामक द्वितीय प्रकरण समाप्तम. तृतीय प्रकरण-कर्मोदय हार. कर्मोदयक-३४ दारोंके नाम. १ समुचय कर्मोदयद्वार, २ ज्ञानावरणीयोयेद्वार, ३ दर्शना- वरणीयोदयद्धार, ४ वेदनीयोदयद्वार, ५ मोहनीयोदयद्वार, ६ आयु ४२७ द्वितीय काण्ड-दुसरा खण्ड कर्म द्वारा रोहण र दयद्वार, ७ नमोदयद्रार. ८ गौत्रोदयद्वार, ९ अन्तरायोदयद्धार. १० ध्रुवकमोदयद्वार. ११ ध्रुवकर्मप्रकृतियोदयद्धार, १२ अध्रुवकर्मोदयद्रा २, १३ अध्रुवकर्म प्रकृतियोदयद्रार, १४ पुन्यकर्मोदयद्वार, १५ पु- ण्य कर्म प्रकृतियोदयबार. १६ पाप कर्मोदयद्रार. १७ पापकर्म प्र- कृतियोदयद्वार, १८ क्षेत्र विपाक कमोंदयद्वार. १९ क्षेत्रविपाककर्म- प्रकृतियोझ्यद्रार, २० भव विराककोंड्यद्वार, २१ भवविपाक कर्म प्रकृतियोगदार. २२ जीवविपाक कोंदयद्वार. २३ जीव विपाकक में प्रकृयोदयदर, २४ पुद्गल विपाक कोदयदार. २० दल वि- पाक की प्रकृतियोदयद्वार, २६ सर्वचानिक कोंदयद्धार. २७ सर्व घातिक कर्म प्रकृतियोदयद्रार. २८ देशवातिक कोंदयटार २१ दे- शचातिक कर्म प्रकृतियोदयद्वार. २० अवातिक कर्मोदयद्धार. ? अघातिक कर्प प्रकृतिशेदयद्धार. ३२ समुचय कर्म प्रकृतियोदयद्रा ३ कर्मोदय व्युच्छेदद्वार और '४ कर्मप्रकृतियोदय व्युच्छेदवार. ७९, प्रथम-ससुचय कर्मोदय बार.= भिव्यात्व शुगस्थान से लगाकर सूक्ष्म सम्पगय गुणम्धान तक आगेही कमीका उदय पाता है. उपशान्त म.ह और भीग मोह गुगन्यान में मोहनीय विना ७मौका उदय पाता है और सयोगी केवली. अयोगी कंवली इन दोनों गुगस्थानों में वेदनीय. २ आयप्य. ३ नाम औन्टगोत्र इन वार कोका उदय पाताहें. ८०. दुसरा-ज्ञानावरणीयोदय बा. चोदि योपत्री विपदा करना होगा दी. उदय द्वारे स्नान के निदेय का काम र. .

४२८
* मुक्ति नोपान श्री गुणस्थान रोहण अढीशत द्वारी
मिथ्यात्व गुणस्थान से क्षीणमोह गुणस्थान तक ज्ञानावरणी
य की पांचों प्रकृति का उदय पाता हैं. उपर ज्ञानावरणीय का उ
दय नहीं.
८१, तीसरा दर्शनावरणीयोदय बार..
मिथ्यात्व गुणस्थानसे प्रमत गुणस्थान तक दर्शनावरणीकी
९ ही प्रकृति का उदय पावे.
अप्रमत से क्षीण मोह के पहिले भाग तक थीणबी त्रिक
विना ६ प्रकृतिका उदय पावे.
क्षीण मोह के अन्तिम भाग में निद्रा द्विक विना ४ प्रकृति
BY-...
का उदय पावे.
उपरके गुणस्थानों में दर्शनावरणीय का उदय नहीं पाता है.
८२, चौथा वेदनीयोदय द्दार.
अनेक जीवों की अपेक्षा कर प्रथम मिथ्यात्व गुणस्थान में अ
न्तिम अयोगी केवली गुणस्थान तक वेदनीय की दोनों प्रकृतिका
उदय पाताहै.+
८३, पांचवा मोहनीय उदय द्वार
मिथ्यात्व गुणस्थान में-मिश्र मोह और सम्यक्त्व मोह x
विना २६ प्रकृतिका उदय.
सास्वादन गुर्गस्थान में-मिथ्यात्व मोह विना २५ प्रकृति
का उदय पाता है.
+ क्योंकि एक जीव एक समय में दोनो वेदनीय मेंकी एकहीं वेदनी वेद शक्ताई.
x क्ययाोंक-मिश्रमोहनीका उदय मिश्रगुणस्थान में पाता है, और सम्यक्त
मोहनयि का उदय अविरति मे पाता हैं.

४२२ द्वितीय काण्ड-दुसरा खण्ड कर्म द्वारा रोहण र मिश्र और अविरति गुणस्थान में-४ अनन्तान बन्धि चौ- क. १ मिथ्यात्व मोह और १ सम्यक्त्व मोह, इन ६ प्रकृति विना १९ का उदय. देशविरति गुणस्थान में-अप्रत्याख्यानावरणीय चौक विना १५ का उदय. प्रमत और अप्रमत गुणस्थान में प्रत्याख्यानावरणीय चौक विना ११ का उदय. अपूर्व करण गुणस्थान में-के सम्यक्त्व मोहविना १० प्रक- तिका उदय. अनियट्टी बादर गुणस्थान में-हाँस्य पटक विना प्रकृति का उदय. सूक्ष्म संपराय गुणस्थानमें-१ संज्वलके लोभका उदय. ऊपरके गुणस्थानोंमें-मोहनीय कर्मका उदय नहीं पाता है. ८४, छठा आयुष्य कर्मोदय द्वार मिथ्यात्वसे अविरति गुणस्थानतक-चारोंगतिके आयुप्य का उदय. देशविरति गुणस्थानमें मनुप्य और तिर्यच इन दोनों आयुष्य का उदय. प्रमतसे अयोगी केवली गुणस्थानतक-१ मनुप्यायु का उदय. ८५, सातवा-नामकमाँदय दार. नाम कर्मकी ९३ प्रकृति में से बन्ध की माफिक उदयकामी ६७प्रकृति का उदय होता है. * सोपा मम्पपत्र हान्न होने मद में मान पानीमा मन्द मनी नहीं ४३० * मुक्ति सोपान श्री-गुणत्यान राहेण अढीशतद्वारी १९ मिथ्यात्वगुणस्थानमें-आहारकदिक, और १तीर्थंकर नाम विना ६४ प्रकृतिका उदय पाता है. सास्वादन गुणस्थानमें-३ सूक्ष्मत्रिक, १ आताप नाम, १ नस्कान- पूर्वी विना ५९प्रकृति का उदय. श्रिमगुणस्थानमें-जाति चतुष्क, १ स्थावरनाम, ३ अनुपूर्वी विना ५१ का उदय. अविरति सम्यग्दृष्टि -४चारों गतिकी अनुपूर्वी अधिक होनेसे५५ प्रकृति का उदय. देशविरतिमें-१ मनुष्यानुपूर्वी, १ तिर्यंचानुपूर्वी, २ वैक्रिय दिक, २ देवक्षिक, २ नरकद्धिक, १ दौर्भाग्य, १ अनादेय, १ अय- - क्योकि ' आहारक द्विक उदय नो चउदय पूर्व धारी मुनिक होता है और तीर्थंकर नामोदय चौथे गुणस्थान से चौदवे तक होता है. २ सूक्ष्मादि चारोंका उदय तो निश्चय से मिथ्यात्वीके होता है, और नरका- नुपूर्दीका उदय वक्र गति कर नरक मे जाने वालेके पाता है और औपशामिक मम्य क्यका वमन करते नरक में नहीं जाता है. फक्त मिध्यात्वके उदय में ही जाता है. मास्वादन वर्ती मनुप्य और तिर्यच जिस वक्त वक्रगति कर नरक में जाता है उसव- क्त मनुश्य होवेतो मनुप्यका और निर्यच होतो नियंचायु का उदय वर्तता है. फिर मम्यक्तका यमन करे बाट नरकान का उदय होता है. और फिर नरकायुका उ- दय होता. उमलिये मिथ्यानी तोकर ही नरक में जाता है. फिर नरकमें पर्याप्ता हुवे वाद उपशम मम्यक की प्राति होती है. फिर उसे वमन करे तब मास्वादन गुणस्था. न पाना है. और उसी वक्त नन्कायु का उदय पाता है. क्षायिक सम्यक्त्वी तो श्रे णिक गजा की तरह मम्यस्व माहित नरक में जाना है. और मास्वादन आपथमिक क्षयोपशामिक मम्यक्त्वका चयन कर नरक में जाता है. इमलिये उनका भी अनुटय?. : यहां आयु वन्य नहीं होनेने अनुपूर्वीका उदय नहीं पाता है. ४ यहां आयु बन्च होनी चागें अनुपूर्वी का उदय पाता है. ८ श्रावक फक्त देवगतिमें ही जाते है. इमलिये यहां दोनों अनुपूर्तीका उदय नहींहै.

४३१ द्वितीय मूल काण्डका-दुसरा खन्ड कर्म द्वारा रोहण शः, इन ११ विना ४४ का उदय. प्रमतभे-१ तिर्यचगति और २ उद्योत नाम, यह २ तो घटाना. और आहारक द्विक बढाने से ४४ का उदय होता है. अप्रमतके-आहारक दिक विना ४२ प्रकृति का उदय. अपूर्व करण से उपशान्त मोहतक-अन्तिम ३ संघयण वि- ना ३९प्रकृति का उदय. क्षीण मोह और सयोगी केवली में-१ वृएम नारच और २ नारच संधैयण विना ३७ रही. और १ तीर्थकर नाम आधिक करने से ३८ का उदय पाता है. और अयोगी केवली गुणस्थान में- ३त्रसत्रिक, ३ शुभग- त्रिक, १ मनुष्यगति, १ पचेन्द्रिय की जाति. और कितनेक जीवों के तीर्थकर नाम इन ९प्रकृतिका उदय रहता है. ८६,आठवा-गौनकदिय द्वार मिथ्यात्व से देशविरति गुणस्थानतक दोनों गौत्रका उदय पाताहै. ६ भव धारणी वैक्रिय शरीर न होने वैक्रिय उदय वर्जा है. ७ देवता और नरक में यह गुणस्थान नहीं पाने में दोनो द्विक वर्जा है. ८ यहां पूर्व धर मुनि होते हैं. जिसमें आहारक शरीर पाता है. ९ आहारक लब्धि फोडने वाले साधुओं उत्सुकता के वस से अवस्य प्रमादी हो ते है. इसलिये यहां आहारक का उदय नहीं लिया है. परन्तु ममत साधूओ आहार क समुद घात किये वाद अप्रमत गुणस्थान मे जाते है. इसलिये किसी आचार्य ने यहां इसका उदय गिना है. १० इन तीनो संघयण वाले श्रेणि पारंभ नहीं करते हैं. ११ इन दोनों संघयण वाला भपक श्रेण नहीं करता है. 2.2

४३२
मुक्ति सापान श्री गुणस्थान रोहण अढीशतदारी र
प्रमतसे अयोगी केवली गुणस्थानतक एक ऊंच गौत्र का
ही उदय रहता है.
८७, नववा-अन्तरयकर्मोदय बार
मिथ्यात्व से क्षीण मोह गुणस्थानतक पांचों अंतरायका
उदय.
सयोगी केवली और अयोगी केवलीके गुणस्थान में अन्त
राय कर्म का उदय नहीं.
८८, दशवा- ध्रुव कर्मोदय द्वार
ध्रुवोदयी ५ कर्मः-१ ज्ञानावरणीय २ दर्शनावरणीय, ३ मो
हनाय, ४ नाम, और ५ अन्तराय.
मिथयात्व गुणस्थान में पांचोंही काँका ध्रुवोदय पाता है.
सास्वादनसे क्षीणमोहगुणस्थानतक मोहनीय कर्मविना चारों को
,
का उदय पावे.
सयोगी फेवली गुणस्थानमें एक नाम कर्म का ध्रुवोदय पावे.
अयोगी केवली गुणस्थानमें ध्रुवोदयतो नहीं फक्त नाम कर्म पाताहै.
८९, इग्यारवा ध्रुवकर्म
प्रकृतियोदय द्वार
प्रयोदयी २७ प्रकृतिः-ज्ञानावरणीयकी ५, दर्शनावरणीयक ?
(निद्रा विना) १ मिथ्यात्व मोहनीय, १ निर्माण, १ स्थिर, ' अ.
स्थिर, ? शुन, ? अशुभ. ४ वर्ण चतुष्क, १ अगुरुलघु, '. तेजम,
'कामग. (यह १२ नामकी) और अंतरायकी ५, या २७.
मिथ्यात्व गुणस्थान में २७ ही प्रकृतिका उदय पावे.
ध्रुव अध्रुवोयट द्वागेंके ग्खलाम के लिये अर्थ कांडका १४ वा पृष्ट दगीय.
१
१.
+

द्वितीय मूल कान्ड-दुसरी खन्ड कर्म द्वाग रोहण र सास्वादन से झीण मोह गुणस्थानतक-मिथ्यात्व मोह विना २६ का उदय. सयोगी केवली गुणस्थानमें नाम कर्मकी १२ प्रकृतिका उदय. अयागी केवलीके ध्रुवोदय नहीं. फक्त नामकी१२प्रकृतिका उदय ही पाता है. ९०, वारवा अध्रुव कर्मोदय द्दार. अध्रुवोदयी कर्म-१दर्शनावरणीय, वेदनीय,३मोहनीय,४आयु ष्य, ५नाम और गौत्र. मिथ्यात्वसे सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थानतक छेही कर्मोका उदय पाताहै. उपशान्तमोह और क्षीणमोहगुणस्थानमें मोहनीय विना पांचों को के उदय पाता है. सयोगी कंवली और अयोगी केवली गुणस्थान में दर्शनावरणीय विना चार काँका उदय. ९१, तेरवा अव कर्मप्रकृतियोदय बार. अध्रुवोदयी १५ प्रकृति-निद्रा ५, वेदनीय २, मोहनीय २७ (मि- ध्यामोह विना) आयुष्य की ४ और नामकी ५५ (६७ में से १२ ध्रुवोदयकी विन) यो सब ९५ प्रकृतिमेसें. मिथ्यात्व गुगस्थान में-२ मोहनीय. २ आहारक दिक,१तीर्थकर नाम इन५ विना ९० का उदय. सास्वादनमें गुणस्थानमें सूक्ष्म अपर्याप्ता साधारण, आताप. नर- कानुपुर्वी इन ५ विना ८५ का उयद. मिश्र-गुगस्थानमें १ अनन्तान वन्धि चाकै. ४ जाति चतुष्क, .

EX मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अहीशन द्वारी
मिथ्यात्वसे उपशान्त मोह गुणस्थानतक आठों कमोंका उदय पावे
क्षीणमोह गुणस्थानमें-मोहनीय विना सातों कर्मों का उदय पावे.
सयोगी अयोगी केवली गुणस्थान में वेदनीय, आयु, नाम,
गौत्र
इन ४ काँका उदय पावे.
९५, सतरवा पापकर्म प्रकृतियोदयद्वार
पाप कर्मों की ८२ प्रकृतियों में से,
मिथ्यात्व गुणस्थान में-८२ ही प्रकृति का उदय पाता है.
सास्वादन में-४ स्थावर चतुष्क, १ मिथ्यात्व मोहनीय इन
५ विना ७७ का उदय पावे.
मिश्र गुणस्थान में-४ अनन्तान बन्धि चौक, ३ बिकेन्द्रिय
त्रिक, १ नरकानुपुर्वी, १ तिर्यंचानुपूर्वी और १ अपर्याप्ता नाम
इन १० विना ६७ प्रकृतिका उदय पावे.
अविरति गुणस्थान में-१नरकानुपूर्वी, १ तियंचानुपूर्वी, इन
२ बढने से ६९ का उदय पावें.
देशविरति गुणस्थान में-४ अप्रत्याख्यानावरणीय चौक, ३
नरक त्रिक, १ तियंचानुपूर्वी, १ दौर्भाग्य, १ दुःस्वर, और १ अय
: कीर्ति इन ११ विना ५८ का उदय पावे,
प्रमत गुणस्थान में प्रत्याख्यानी चौक, १ तिर्यचगति, ?
नेसे २९ उदर्य इन विना ५२ का उदय.
अयोगी केवलीम
नमें-३ थीणदी त्रिक विना ४९ प्रकृतिका उदय.
गुणस्थानमें-प्रथमके तीन संघयण विनाका
९२. चौदणस्थान में प्रथमके
मिथ्यात्व से अयोगी के हांस्य पटक विना ४० का उदय पावे.

द्वितीय मूल कान्ड-दुसर खन्ड कर्म द्वारा रोहण *
सूक्ष्म सम्परायमें-३ वेद और संज्वलन त्रिक विना ३४ प्रकृति का
उदय पावें.
उयशान्त मोहमें-संज्वलनके लोभ३३ विना का उदय पावे.
क्षीण मोहमें-दो संघयण और दो-निद्रा विना २९ का ऊदय पावे.
सयोगी केवलीके-५ ज्ञानावरणीय, ४ दर्शनावरणीय, और
५ अन्तराय. इन १४ विना १५ उदय पावे.
अयोगी केवलीके फक्त दोनों वेदनीयोंमेंसे एकका उदय रहता है.
९६, अठारवा क्षेत्रविपाक कर्मोदय हार.
क्षेत्र विपाकी फक्तनाम कर्म हैसो, मिथ्यात्व सास्वादन, अविरति
तीनों क्षेत्र विपाकी नाम कर्म का उदय है.
मिश्र. देशव्रतिसे जावत् अयोगी केवली गुणस्थान तक क्षेत्र
विपाकी कर्मोदय नहीं है.
उन्नीसवा क्षेत्रविपाककर्मप्रकृतियोदय बार
क्षेत्र विपाक प्रकृति चार सो-चारोंगतिकी अनुपूर्वी जानना
मिथ्यात्व और अविरति गुणस्थानमें चारों अनुपूर्तीका उदय पावे.
सास्वादन गुणस्थानमें-नरकानुपूर्वी विना तीन अनुपूर्वीकार
मिश्र देशवतिसे अयोगी केवली गुणस्थानतक क्षेत्रर नाम,
कर्मकी प्रकृति का उदय नहीं होताहै.
शकीर्तीः १
९८, बीसवा भवाविपाक
भव विपाकी एक आयुष्य कमादय दार
मिथ्यात्वसे अयोगी केवली.गुणम
और ' ऊंच गौत्र

६४३८ * मुक्ति सोपान श्री गुणस्थान रोहण अढीशतदारी * ९९ इक्कीसवा भवविपाक प्रकृतियोदयद्वार भव विपाककी प्रकृति ४ सो-चारों गतिका आयुष्य जानना. मिथ्यात्व अविरति गुगस्थानतक चारों आयुष्य का उदय पावे. देशविरति गुणस्थान में मनुष्य और तिर्यंच आयुका उदय पावे. प्रमत गुणस्थानसे अयोगी केवलीतक-एक मनुष्य आयुका उदय. १००,बावसिवा-जीवविपाकीकर्मोदयबार आयुष्य विना सातोंही कर्मों जीव विपाकी हैं. मिथ्यात्वसे सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थान तक सातोंही कर्मोंका उदय. उपशान्त मोह और क्षीणमोह गुणस्थानमें मोहनीय विना छे कर्मो- का उदय. सयोगी केवली और अयोगी केवलीके वेदनी, आयू, नाम, और. गौत्र इन चारों कर्मोंका उदय. तेवीसवाजीवविपाककर्मप्रकृतियोदय बार जीव विपाकी प्रकृति ७८ होती हैः-५ ज्ञानावरणीय, ९ दर्शनावर णीय, २ वेदनीय, २८ मोहनी, ४ गति, ५ जाति, श्वस,वादर ? पर्याप्ता-१स्थावर, १सूक्ष्म, १ अपर्याप्सा, ' सुभग, १ सुस्वर, १ आ- देयः ' यशः, ' दुभग. १. दुस्वर अनादेय, १ अयशः, १ श्वासो- श्वास, १ तिथंकर, २ खगति, यह २७ नामकी) २ गौत्र की, और ५ अन्तराय की. यों सब ७८ प्रकृतिमेंसेः- मिथ्यात्व गुणस्थान में-१ सम्यक्त्व मोह, मिश्रमोह, और ? १ ४३९ * द्वितीय मूल काड-दुमराखण्डकर्म द्वारा रोहण र जिननाम विना ७५ का उदय. सास्वादन में-१ सूक्ष्म, १ अपर्याप्ता, और १ भिल्यामोह इन ३ वि- ना ७२ का उदय. मिश्र-2 अनन्तान वन्धि चौक, ४ जाति, १ स्थावर नाम यहरटी जा ६३काही उदय रहा. और १ मिश्रमोह वहा तव ६४ प्रकृतिका उदय पाने. अविरति सम्यग्हाटेमें-मिश्रमोह घटा, और सम्यक्त्व मोह बढ़ा तब ६४काही उदय रहा. देशविरति गुगस्थान में-४ अप्रत्याख्यानी चौक. १ नरकग- ति, १ देवगति, १ दौर्भाग्य १ अनादेय, और १ अयशः कीर्ती इ- न ९ विना ५५ का उदय पावे. प्रमत गगस्थान में प्रत्याख्यानी चौकः ? और नियंत्र ग ति इन ५ विना: उदय पावे. अप्रमत गुणस्थान में-३ शीणाद्री त्रिक, विना ४७ का उदय पावे. अपूर्व करंग गुगस्थानमें-सम्मतमोहनीय विना ४का उदय पावे. अनीयटी वादर गुणस्थान में-हांस्य पटक विना '० का उदय पावे. सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थानमें-वेद और संचलन त्रिक इन ६ विना ३४का उदय पावे. उपशान्त मोह गुणस्थान में-चलके लोभ विना २३का उदय पावे. क्षीणमोह गुगस्थान में-निका और प्रवला विना ३१का उदय पावे. सयोगी केवली-५ जानवरखी. ९ दर्गनावरणी. ५ अन्नगय इन , १ विना १७ का उदय पावे. अयोगी केवली के-जाम कमकी प्रकृति पहिले कहीं उनका ही उदय. - ४३८ ' मुक्ति सोपान श्री गुणस्थान रोहण अढीशतदारी* ९९ इक्कीसवा भवविपाक प्रकृतियोदयद्वार भव विपाककी प्रकृति ४ सो-चारों गतिका आयुष्य जानना. मिथ्यात्व अविरति गुणस्थानतक चारों आयुष्य का उदय पावे. देशविरति गुणस्थान में मनुष्य और तिथंच आयुका उदय पावे. प्रमत गुणस्थानसे अयोगी केवलीतक-एक मनुष्य आयुका उदय, १००,बावसिवा-जीवविपाकीकर्मोदयगर आयुष्य विना सातोंही कर्मों जीव विपाकी हैं. मिथ्यात्वसे सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थान तक सातोंही कर्मोंका उदय. उपशान्त मोह और क्षीणमोह गुणस्थानमें मोहनीय विना छे कर्मों का उदय. सयोगी केवली और अयोगी केवलीके वेदनी, आयू, नाम, और गौत्र इन चारों कर्मोका उदय. तेवीसवाजीवविपाककर्मप्रकृतियोदय बर जीव विपाकी प्रकृति ७८ होती हैः-५ ज्ञानावरणीय, ९ दर्शनावर णीय, २ वेदनीय, २८ मोहनी, ४ गति, ५ जाति, १त्रस१,बादर. १ पर्याप्ता,१स्थावर, १सूक्ष्म, १ अपयर्याप्ता, ' सुभग, १ सुस्वर, १ आ- देय, १. यशः, १. दुभग. १. दुस्वर अनादेय, १ अयशः, १ श्वासो- श्वास, १ तिथंकर, २ खगति, यह २७ नामकी) २ गौत्र की, और ५ अन्तराय की. यों सव ७८ प्रकृतिमेंसेः- मिथ्यात्व गुणस्थान में-१ सम्यक्त्व मोह,१मिश्रमोह, और ? १ १ ४३९ . द्वितीय मूल काण्ड-दुसराखण्डकर्म द्वारा रोहण र जिननाम विना ७५ का उदय. सास्वादन में-१ सूक्ष्म, १ अपर्याप्ता, और १ मिथ्यामोह इन ३ वि- ना ७२ का उदय. मिश्र-४ अनन्तान वन्दि चौक, ४ जाति, १ स्थावर नाम यह ऋटी जर ६३काही उत्य रहा. और १ मिश्रमोह बढा तब ६४ प्रकृतिका उदय पावे. अविरति सम्यग्दृष्टिमें-मिश्रमोह घटा, और सम्यक्त्व मोह वढा तव ६४काही उदय रहा. देशविरति गुणस्थान में-४ अप्रत्याख्यानी चौक- १ नरकग- ति, १ देवगति, १ दौर्भाग्य १ अनादेय, और १ अयशः कीर्ती इ- न ९ विना ५५ का उदय पावे. प्रमत गणस्थान में-४ प्रत्याख्यानी चौक, १ और तिर्यंच ग ति इन ५ विना का उदय पावे. अप्रमत गुणस्थान में-३ थीणद्री त्रिक, विना ४७ का उदय पावे. अपूर्व करण गुगस्थानमें-सम्परतमोहनीय विना ४०का उदय पावे. अनीयटी वादर गुणस्थान में-हांस्य पटक विना १० का उदय पावे. सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थानमें-श्वेद और संज्वलन त्रिक इन ६ विना ३४का उदय पावे. उपशान्त मोह शुगस्थान में संजलके लोभ विना २३का उदय पावे. भीगमोह गुगस्थान में-निद्रा और प्रचला विना ३१का उदय पावे. सयोगी केवली-५ ज्ञानावरणी. ९ दर्शनावरणी, ५ अन्तगय इन; १४ विना १७ का उदय पावे. अयोगी केवली के नाम कर्मको ११ प्रकृति पहिले कहीं उनका ही उदय. . .

१
१
* मुक्त सोपान-श्री गुणस्ान रोहण अदीशन द्वारी
१०२,चौबीसवा-पुद्गलविपाकीकर्मोदय बार
पुद्गल विपाकी फक्त १ नाम कर्म ही है.
मिथ्यात्वसे अयोगी केवलीतक पुद्गल विपाकी कर्मोदय होता है.
पच्चीसवापुद्गलविपाककर्मप्रकृतियोदयद्वार
पुद्गल विपाकी प्रकृति ३६ होती हैः-५ शरीर ३.अंगोपांग
६ संघयण, ६ संस्थान, ४ वर्ण चतुष्क, १ निर्माण, १ अस्थिर, १
स्थिर, १ अशुभ १ शुभ, १ अगुरुलघू, १ उपघात, ' पराघात, १
प्रत्येक, १ साधारन यह ३६१ इनमेंसे
मिथ्यात्व गुणस्थान में-आहारक दिक विना ३४ का उदय पावे.
सास्वादन, मिश्र और अविरतिमें-१ आताप, और १. साधारण ना-
म इन विना विना ३२ का उदय पावे.
देशविरति में वैक्रिय द्विक विना ३० का उदय पावे.
प्रमत संयतिमें-उद्योत नाम घटनेसे २९ रही और आहारक दिक
बढ़नेसे ३१ का उदय पावे.
अप्रमत संयति में-आहारक दिक विना २९ का उदय पावे.
अपूर्व करणसे उपशान्त मोह गुणस्थानतक-अन्तिम संघयण विना
२६ का उदय पावे.
भीण मोह और सयोगी केवली के दोनों संघयण विना २४ का
उदय पावे.
अयोगी केवली के शरीर के अभाव से पुदल विपाकी प्रकृति का
उदय नहीं पाता है.
१०४छब्बीसवा सवघातिक कादयद्वार

४४१
द्वितीय मूल का"डका-दुसरा सन्ड कर्म द्वारा रोहण
मिथ्यात्व में सूक्ष्म सम्पराय गुगस्थानतक सर्व घातिक तीनों कर्मों
का उदय पावे.
उपशांत मोह और क्षीणमोह गुणस्थानमें मोहनीय विना दो कर्मों
का उदय.
सयोगी और और अयोगी केवली गुणस्थानमें-घातीक कमों का उ
दय नहीं पाताहै.
सतावीसवासर्वघातिककर्मप्रकृतियोदयवार
बंधमें कहे मुझवही सर्व घातिक तीनों कोंकी २०प्रकृतिहै। उसमेंसे
मिथ्यात्व गुणस्थानमें-२० ही प्रकृति का उदय पावे.
सास्वादन गुणस्थानमें-मिथ्यात्व मोह विना १९ प्रकृतिका उदय पावे
मिश्र और अविरति गुगस्थान में-४ अनन्तान वन्धि चौक विना
१५ का उदय पावे.
देशविरति गुगस्थानमें-अप्रत्याख्यानी चौक विना ११का उदयपावे
प्रमत संयति गुणस्थानमें प्रत्याख्यानी चौक विना-७का उदय पावे.
अप्रमतसे उपशान्तं मोह गुणस्थानतक-धीगदी त्रिक विना ४ का
उदय पावे.
क्षीणमोह गगस्थानमें-निद्रा और प्रवला विना ४ का उदय पावे.
सजोगी और अजोगी केवलीमें-सर्व घातिक प्रकृतिका उदय नहीं.
अठावीसवा देशघातिक कर्मोदय द्वार.
मिध्यात्वसे सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थानतक देश घातिक चारों कोका
उदय पावे.
ऊपशान्त मोह और क्षीण मोह गुणस्थान में-मोहनिय विना तीन
कर्मोका उदय पावे.
सयोगी और अयोगी केवलीके देशघातिक कर्मोका उदय नहीं.

maa ४४२ मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहेण अढीशतद्वारीधर उन्नतीसवादेशघातिककर्मप्रकृतियोदयहा बन्यम कहे मुझवही देशघातिक चारों कोंकी प्रकृति २"हे उसमेसे मिथ्यात्व. और सास्वादनमें-सम्यस्त्व मोह और मिश्र मोह विना २ का उदय पावे. मिश्रगुणस्थानमें-मिश्रमोह अधिक होनेसे २६ का उदय पावे. अविनिमें-सम्यक्त्व मोह बढनेसे और मिश्रमोह घटनेसे २६ काही उदय रहा- देशविनिमे अपूर्व करण गुणस्थानतक-सम्यक्त्व मोह विना २५का - M उदग पावं. - अनियट्ट वादर गुणस्थानमें-हांस्य पटक विना १०का उदय पावे. म:म मंपगय गुणस्थानमं-३ वेद और संज्वलन त्रिक धिना १३ का उदय पात्र. उपमान मांद और शीण माह में-मंचलन केलाभ विना १२का उटय पात्र म्योगी और अयोगी केवली गुणम्थानमें घातिक कर्म प्रकृति का उदय नहीं पाता है. १०८. नामवा अघानिक कादय द्वार. मियादी अयांनी कंवली गगम्थाननक अवानिक चाग कमीका ३. इकतीसवा अघानिककर्म प्रकृतियोदयद्वार दानेन्द्र के पात्रक क्रम कारप्रकृति छांट वाकी १५ है। मी मन अतिक्रमकी प्रति जानन इनमम मियान्य गुण दिन दिननाम विना ५३ का उदय --- - mamme ---- SAPANm-mawatantrumer

४४३
३
द्वितीय मूल काण्ड-दूमरा खण्डकर्म द्वारा रोहण र
सास्वादनमें१सूक्ष्म,१अपर्याप्ता,१साधारण,१आताप, औरश्नर
कानपूवी इन५विना ६८ उदय.
मिश्र गुणस्थानमें ४ जातिचतुष्क, ३ अनुपूर्वी १ स्थावर नाम, इन
विना ., का उदय.
अविरतिमें चारों अनुपूर्वीका उदय बढ़ने से ६४ उदय.
दोशवरति- देवत्रिक, ३ नरकत्रिक, २ वैक्रियदिक, १ मनुष्यानु-
पूर्वी १ तिर्यंचानुवर्ची, १ दौर्भाग्य, १ अनादेय, और १ अयशः
कीर्ती इन १६ विना ५१ का उदय.
प्रमतमें-२ तिर्यद्धिकः १ उद्योत, १ निच गौत्र इन ४ विना
४७ का उदय हा और आहारक दिक वढाने से ४१ का उदय
३
१
पाता है.
अप्रमतमें-आहाक दिक विना ४७ का उदय.
अपूर्व करण से उपशान्त मोहतक अन्तिम तीनों संघयण वि-
ना ४४ का उदय.
क्षीणमोहमें-१ वृपमनारच, और १नारच संघयण विना का उदय
सयोगी केवीके जिननाम अधिक होनेसे ४३ का उदय.
अयोगी केवली के–पहिले कही सोही नामकर्म की १२ प्रवृत्तिका
उदय पाता है.
बत्तीसवा-समुचय कर्मप्रकृतियोदय द्वार.
१ मिथ्यात्व मे-५ ज्ञानावरणीय की, ९ दर्गनावरणीय की.
२ वेदनीय की. २६ मोहनीयकी, ४ आयुप्य की, ६४ नामकी. २
गोत्रकी और ५ अन्तराय की यों मन ११७ का उदय पा.
२ सास्वादन में-५ ज्ञानावणीयकी- ९ दर्शनावणीपी २

४४४ ५ * मुक्ति मोपान श्री गुणस्थान रोहण अदीशत द्वारी वेदनीयकी २५ मोहणीयकी ६ आयुष्य की ५० नामकी २ गोत्रकी और ५ अन्तरायकी यों १११ उदय पावे. ३ मिश्रमें-५ ज्ञानावरणीयकी, ९ दर्शनावरणीयकी, २ वेद. नीयकी. २२ मोहनीयकी ४ आयुष्यकी, ५१.नामकी,गोत्रकी और ५ अन्तरायकी यों १०० का उदय पावे. ४ अविरतिमें-- ज्ञानावरणीयकी, ९ दर्शनावरणीयकी,२ वे दनीयकी २२ मोहनीयकी, ४ आयुष्यकी, ५५ नामकी, २ गोत्रकी और ५ अन्तरायकी यो सब १०४ का उदय पावे. ५ देशविरातिम-५ ज्ञानावरणीयकी ९ दर्शनावरणीयकी, २ बदनीयकी, १८ मोहनीयकी, २ आयुष्यकी, ४६ नामकी, २ गोत्र की और ५ अन्तरायकी यो ८७ का उदय पावे. ६ अमनम-५ ज्ञानावरणीयकी, ९ दर्शनावरणीयकी, २ वेद- नायकी, १४ महिनीयकी, ? आयुष्यकी, ४३ नामकी,२ गोत्रकी, और ५ अन्तगयकी या मब ८१ का उदय पावे. ७ अप्रमतमें-' ज्ञानावग्णीयकी, ६ दर्शनावरणीयकी,२ वे. दनीयको १४ मोहनीयकी, '. आयुष्यकी, ४२ नामकी, ' गोत्रकी और ' अन्तगयकी यों मब ७६ का उदय पावे. ८ अपूर्व करण में ज्ञानावरणीयकी, ६ दर्शनावरणीयकी, बंदनीयी. १ : मोहन यकी, ' आयुग्यकी, ३०. नामका गोत्र की. आर. अन्दायका. यों मब २ का उदय पावे. अनियट्रिवादग्में, - ज्ञानावरणीयका ६ दर्शनावग्णायकी • वंदनीयकी, : मोहनीयकी. , आयुष्यकी, नामकी- 1. गांप की : अन्नगमकी यो मत्र का उदय पावं. १० मृःममन्यगय में-५ जानावनायकी दानाबायकी द्वितीय मूल काग्ड-दुसरा खण्ड क द्वारा रोहण २ वदणीयकी १ मोहनीयकी १ आयुष्य ३९ नामकी, १ गौत्रकी, और ५ अन्तरायकी यों सव ६० का उदय पावे. ११ उपशान्त मोह गुणस्थानमें-५ ज्ञानावरणीकी, ६ दर्श नावरणोरक, २ वेदनीयकी, १ आयध्यकी, ३९ नामकी, १ गौत्र की और ५ अन्तरायकी यों सब ५९ का उदय पावे. १२ क्षीणमोह गुगस्थानमें- ज्ञानावरणीयकी, ४ दर्शनावर- णीयती, २ वेदनीयकी, १ आयुष्यकी, ३१ नामकी, ' गौत्रकी, और ५ अन्तराषकी य ५७ का उदय पावे. ५१ सयोगीवली-२ वेदनीय, ' आयु, ३८ नाम, ' गौत्र, यों ४२ का उदय पावे. १४ अयोगीकेवलीके- वेदनीयके. 'आयुकी,९नामकी ' गौत्रकी, यों २ का उदय पावे. तेतीला-ससुचय कर्मोदय व्युच्छतिहार मिथ्यात्व से साम-सम्परायतक व्यच्छति नहीं आठोंका उदय पाताहे उपशान्त मोह और वीण मोह में-मोहनीय कर्म उदय की व्युच्छति, सजोगी और अयोगी केवली केवली ज्ञानावरणीय, द- र्शनावरणीय, मोहनीय और अन्तराय इन चारों कमाकि उदयकी व्युच्छति होती है. चौंतीसवा-कर्मप्रकृतियोदय व्युच्छतिहार १ मिथ्यात्व से २ मोहनीयकी और ३ नामकी यों का विच्छ २ सास्वादनमें ३ मोहनीयकी और नामकी यो ११उदयन विच्छेद ३ भिधमै मोहनीयकी और' नामकी यो२२का उदय विच्छटहे. अविरतिमें मोहनीयकी और नामकी यो१८का उदय विच्छेद ४४६ ८ * मुक्ति मापान श्री गुणस्थान रोहण अढीगनदारी ४ ५ देशविरतिमें-१० मोहनाय, २ आयु, २३ नामकी, यो ३० का उदय विच्छेद है. प्रमतमें-१४ मोहनीयकी, ३ आयुकी, २४ नामकी, यों ४१ का उदय विच्छंद. ७ अप्रमतमें ३ दर्शनावरणीयकी, १४ मोहनीयकी, ३ आ युष्यकी, २५ नामकी, १ गोत्रकी यों सब ४६ का उदय व्युच्छेद है अपूर्व करणमें ३ दर्शनावरणीयकी, १५ मोहनीयवी, ३ आयुष्यकी, २८ नामकी और ? गौत्रकी यों ५० का उदय व्युच्छे द होता है. ९ अनीयट वादरमें ३ दर्शनावरणीयकी, २१ मोहनीयकी. : आ- युष्यकी, २८ नामकी, १ गौत्रकी, यों ५६ का उदय का व्युच्छेद. १० सुक्ष्मसम्परायमें ३ दर्शनावरणायकी, २७ मोहनीयकी, : आयु प्यकी, २८ नामकी और १ गौत्रकी यो ६२ का उदय व्युच्छेद. ११. उपशान्त मोहमें-३ दर्शनावरणीयकी, २८ मोहनीयकी, ३आ- यूष्य की, २८ नामकी, और ? गौत्र की, यो ६३का उदय व्युच्छे ३ द होता है. १२ क्षीणमोहमें-५दर्शनावरणीयकी, २८मोहनीयकी३आयुष्यको३० नामकी, और १ गौत्रकी यों ६५ का उदय व्युच्छेद होता है. १३ सयोगी केवलीमें-५ ज्ञानावरणीय, ९ दर्शनावरणीयकी, २८ मो हनीय की, ३ आयूष्यकी २९ नामकी, १ गौत्रकी और अन्तरा- की यों सब ८० का उदय व्युच्छेद है. १४ अयोगी केवली गुणस्थानमें-५ ज्ञानावरणीय की, ९ दर्शनावर णीयकी,, १. वेदनीयकी, २८ मोहनायकी, ३ आयुष्यके, ५८ नाम १.

४४७ १ * द्वितीय मूल काण्ड-दूमरा खण्डकर्म द्वारा रोहण र की । गौत्र की और ५ अन्तरायकी. यों सब १० प्रकृति के उद- य का व्यच्छेद होता है. इति काँदय नामक तृतीय प्रकरण समाप्तम्, चतुर्थ प्रकरण-कसुदीरणा द्वार. कर्म ऊदीरणाके १२ दारों के नाम. ससु वय कर्न उदरिया द्वार, २ ज्ञानावरगीय उदारणा बार, दर्शनावरणीयरूदारणादा वेदनीय उरिणाद्वार. 'मोहनीय उदी रणा द्वार. ६ आयुष्य ऊदीरणाद्वार. ७ नामऊदीरणाद्वार. ८ गौत्र ऊदीरणाद्वार. ९ अन्तराय ऊदीरणादार. १० समुत्रय कर्म प्रकृति ऊ दीरणा बार." कर्मऊदीरणा व्युच्छेद दार. और १२ कर्म प्रकृति ऊदीरगा व्युच्छेद द्वार. ११२,पहिला-ससुचय कर्म उदीरणाद्वार मिथ्यात्व, सास्वाद. अविरति. देशविरति. और प्रमत इन गुणस्थानों.. आयुष्य विना सात कमाकी ऊदीरणा होती है. और । कोइक ' आवली मात्र वाकी रहे तब आयु-य कर्म की ऊटीग्णा करतो आठ कनीकी ऊदीरणा होती है. मिश्रगुगस्शन में-तो आयु-च विना नानाही कमाकी उड़ीणा है. क्योंकि यहां मरता नहीं है. अप्रमत. अपूर्व करण और अनिट्ट वादः इन तीनों गुणस्थान- वेदनीय + औ आयुध विना छः काकी जीरणा होती है. - हीरणारेहाने हा नुसता देटिका : *दनोव की बोगी मंग परिमान मे रोग और नम- " ४४८ * मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अढीगतदार्ग सूक्ष्म सन्धराय गुगस्थान में-पहिले तो ऊपोक्त छेही कर्मकी ऊदीग्णा करे फिर एक आवली बाकी रहे तब मोहनीय विन पांच कमाकी उदीरणा करे. उपशान्त मोह गुगस्थान में-उपरोक्त पांचोंही कमी की उदीग्णा होती है। क्षीण मोहक-पहिले मागमें तो उपरोक्त पांचों कर्मोकी अदीरणा हो ती है. और फिर ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, और अन्तराय इन तीनों कर्मोंका उदय होजाने से इनकी ऊदीरणा न होते फक्त ना- म और गौत्र इन दोनों कोशी ऊदीरणा होती है. सयोगी केवली के नाम और गौत्र दोनों ही कोंकी अदीरणा है अयोगी केवली गुणस्थानमें उदारणा नहीं. ४ ११४, दुसरा-शानावरणीय उदीरणाद्वार मिथ्यात्व से तीण मोह गुणस्थान तक ज्ञानावरणीय की पां चों प्रकृति की उदीरणा. सजागी और अजोगी केवलीके ज्ञानावरणीयकी ऊदीरणा नही. ११५,तीसरा-दर्शनावरणीय उदीरणाहार मिथ्यात्वसे प्रमत गुणस्थानतक दर्शनावरणीयकी ९ ही प्र- कृति की ऊदीरणा. स्थान ये अध्यात्मिकता प्रकट होनेसनलेश भावन ही रहते है. फक्त जो उन्यावली में कर्म ला रक्खे है सो उदय ये आते हैं. x यहां करण वीर्यका अभाव है सर्व ग्रास उदय आगया है जो १२ प्रकृति का दल विद्यमानता है. परन्तु अविधा सत्तागत नहीं है कि जिसको आकर्प कर उस की अदीरणा करनी पडे.

११०१
द्वितीय मूल कान्ड-दुसरा खन्ड कर्म द्वाग रोहण र
अप्रमत से क्षीण मोह के प्रथम भागतक थीणद्री त्रिक वि
ना की ऊदीरणा.
क्षीण मोह गुणस्थान के अन्तिम भाग में निद्रा, प्रचला वि
ना ४ की ऊदीरणा.
सयोगी और अयोगी केवलीके दर्शनावरणीयकी ऊदीरणा नहीं होती
११६, चौथा-वेदनीय
ऊदीरणा द्वार.
अनेक जीवों की अपेक्षा कर मिथ्यात्व गुणस्थानसे लगा
कर प्रमत गुगस्थान तक दोनों वेदनीयकी की दीरणा होथे.
अपर के गुगस्थानों में वेदनीयकी उदीरणा नहीं है.
पांचवा-मोहनीयकी ऊदीरणा बार.
मिथ्यात्व गुणस्थानमें सम्यक्त्व मोह और मिश्र मोह विना
२६ की उदीरणा हो.
सास्वादन गुणस्थान में मिथ्यात्व मोह विना २५ की उदीरणा होवे
मिश्र और अविराति गुणस्थानमें ४ अनन्तान वन्धि चोक
१ सम्यक्त्व मोह और १ मिथ्यात्व विना २२ का उदीरणा पावे.
देशविरति गुणस्थानमें-अप्रत्याख्यानीके चौक विना १८की उदीरणा
प्रमत अप्रमत गुणस्थान में प्रत्याख्यानी के चौक विना १४
की उदीरणा होवे.
अपूर्व करण गुणस्थान में सम्यक्त्व मोहनीय विना ११
की उदीरणा होवे.
अनियट्ट बादर गुणस्थान में हांस्य पटक विना ७की उदीरणा होवे
सूक्ष्म सम्पराय में ३ वेद और ३ संज्वलन त्रिक विना ?
की उदीरणा होवे.

-- SN मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अहीशन द्वारी * उपशान्त मोह से अयोगी केवली गुणस्थान तक मोहनी य की उदीरणा नहीं होती है. ११८, छठा-आयु उदीरणाद्वार मिथ्यात्व से अविरति गुणस्थान तक चारो गति के आयु- व्य की उदीरणा. देश विरति में मनुष्य और तिर्यच दोनों आयुष्य की उ-: दीरणा होचे. प्रमत गुणस्थान मैं एक मनुष्य के आयुष्य उदीरणा होवे. अप्रमत से अजेोगी केवली तक आयुष्यकी उदीरना नहीं. + ११९, सातवा-नाम उदीरणा द्वार मिथ्यात्व में २ आहारक दिक और १ तीर्थकर नाम वि- ना ६४ की उदीरणा. सास्वादन में ३ सूक्ष्म विक, १ आतापनाम, १ नरकानुप- वीं विना ५९ की उदीरणा. मिश्र में ४ जातिचतुष्क, ३ अनुपूर्वी, १ स्थावरनाम, इ. न विना ५१ की उदीरणा. अविरति में चारों गति की अनुपूर्वी की उदीरणा बढ़ने + मनुप्याय की उदीरणा प्रमत योग करके होती है, जो बहुत काल मे वेद- ने योग्य है उसे थोडे काल मे वेदकर अप्रवर्तन करण विशेप कर वेदता है, उससे- ही सोपक्रम आयष्य होता है. जिसे अकाल मरण कहते हैं. और अप्रमतादि गुण- स्थान मे अकाल मरण नहीं होता है. और साता वेदनीय असाता वेदनीयकी उदी रणा भी प्रमतपनेही होती है, (उदयतो चउदेही गुणस्थानोमे पाता है. इसलिये पी. छे कहाँसो २ वेदनीय और यहां कहीसो महप्य आयुष्य इन तीनोंकी उढीरणा का सप्तम गुणस्थानसेही व्यच्छेद किया है.

४५१ द्वितीय मूल काण्डका-दुमरा खन्ड कर्म द्वारा रोहण र' से ५५ की उदीरणा. देशविरति में १ मनुष्यानुपूर्वी, १ तिर्यवानुपूर्वी, २ वैकि यदिक, २ देवद्धिक, २ नरकदिक, १ दौर्भाग्य, ' अनादेय १ अ यशः इन ११ विना ४४ की उदीरणा. प्रमत में । तियंच गति और १ उद्योतनाम यह दो तो घ टाना, और आहारक द्रिक बडाना तव ४४ काही उदीरणा होवे. अप्रमत में आहारक द्रिक घटाने से ४२ की उदीरणा होवे. अपूर्व करण से उपशान्त मोह तक थीणी त्रिक विना ३९ की उदीरणा. श्रीण मोह और सयोगी वलीके निद्रा और प्रवलाविना ३७ की उदीरणा. अयोगी केवली गुगत्थान में नाम कर्म की उदीग्णा नहीं होनी १२०. आठ-गौत्र ऊदीरण हार. निध्यात्व से देशविरति गुणस्थानतक दोनों गौत्रकी उड़ीग्णा पाये प्रमत से सयोगी केवली गुणस्थान तक एक उंच गौत्रकी उदीग्णा अयोगी कवी गुगरपान में गौर कर्मकी उदारणा नहीं होनाह. १२१. नाश्व-अन्तराय ऊदीरणा बार. मिथ्यान्द के कोण मोह तक. अन्तगरकी पांचों प्रज्ञानिकी उदारणा सयोगी और अरोगी केवली के अन्नगर की उदीमा नहीं. १२२.दवशा-ससुचयकर्मप्रश्वातऊरिणादार निपाव में ५ कानवालीय. . दर्शनावली. इंदनी- च. २६ मोहनीय. 2 आय-य. ६१ नान. : गौत्र. ओ. . अन्न- - ४५२ * मुक्ति सोपान श्री गुणस्थाना रोहण अढीशतद्वारी .. २ । राय यों सब ११७ प्रकृति की उदारणा. सास्वादन में ५ ज्ञानावरणीयः ९ दर्शनावरणीय, २ वेदनी य, २५ मोहनीय, ४ आयुज्य, ५९ नाम, २ गौत्र, और ५ अन्त राय या १११ की उदीरणा होवे. मिश्रमें-५ ज्ञानावरणीय, ९ दर्शनावरणीय, वेदनीय, २२ मोहनीय ४ आयुष्य, ५१ नाम, २ गौत्र, और ५ अन्तराय. या १००की उ दीरणा होने अविरतिमें-५ ज्ञानावरणीय, ९ दर्शनावरणीय, २ वेदनीय, २२ मोहनीय, ४ आयुष्य, ५५नाम, २ गौत्र, और ५ अन्तरायकी यों १०४ की उदीरणा होवे. देशविरति में-' ज्ञानावरणीय, ९ दर्शनावरणीय, २ वेदनी य, १८ मोहनीय, २ आयुम्य, ४४ नाम, २ गौत्र, और ५ अन्तरा य यो ७८ की उदीरणा होवे. प्रमतमें ५ ज्ञानावरणीय, २ दर्शनावरणीय, ९ वेदनी, १४ मोहनीय, १ आयुष्य नाम गौत्र और ५ अन्तराय यों ? की उदीरणा होवे. अप्रमतमें- ज्ञानावरणीय, ६ दर्शनावरणीय, ४१ मोहनीय:४२ नाम, १ गौत्र और५ अन्तराय यों सव७३प्रकृतिकी उदीरणा होवे. अपूर्व करणमें-५ ज्ञानावरणीय, ६ दर्शनावरणीय १३ मोहनीय, ३९ नाम १ गौत्र और ५ अन्तराय यों सब ६९ की उदीरणा होवे. अनियटि वादरमें- ज्ञानावरणीय, ६ दर्शनावरणीय, ७ मोहनीय, ३९ नाम, १ गोत्र, और ५ अन्तराय यों ६३ की उदारणा होवे. सूक्ष्म सम्परायमें- ज्ञानावरणीय, ६ दर्शनावरणीयः १ मोहनीय-३९ नाम, १ गौत्र, और ५ अन्तराय यों सब ५७ की उदीरणा होवे. ९ ४४ .. . * द्वितीय मूल काण्ड-बूमरा खण्डकर्म द्वारा रोहण * उपशान्त मोहमें-५ ज्ञानावरणी. ६ दर्शनावरणीय. ३१ नाम, गौ- त्र और ५ अन्तराम. यो सब ५६ प्रकृतिकी उदीरणा होती है. क्षीग मोहमे ५ ज्ञानावरणयि, ४ दर्शनावाणीय, ३७ नाम, १ गेंत्र, और ५ अन्तराय यों सब ७२ प्रकृति की ऊदीरणा होवे. सयोगी केवलीके : ८ नामकी और ? गौत्रकी यों की उदारणा : अयोगी केवली के कर्म प्रकृतियों की ऊहीरणा नहीं होती है. १२३, इण्यावा-ऊदीरणा व्युछिद्दद्वार मिथ्यात्वसे प्रमत गुगस्थान तक कर्म उदीग्णा की बुनिछती नहीं. अप्रमतसे सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थानतक वेदनी. और आयु की उदीरणाका विच्छेद होती है. उपशान्त मोह और क्षीण मोह में ? वंदनीय. ? मोहनीय. और १ आयुष्या इन तीनों कमी की उदीग्गा की व्युनिभानी है. सयोगी केवली क ज्ञानावरणीय. दगापणीय. वेदनीय. मोहनी य आयुप्य, और अन्तराय इन ६ कम की उर्दीग्णा की व्याज- ति होती है. अयोगी केवली के आठों कमाकी उदारणा की व्युन्टिनी होती. १२४वारवा कर्मप्रकृतिउदीरणाव्युछिट्टार भिध्यात्व गुगन्धाण में-२ मोहनाय की और नानकी यां ५ प्रकृति का विच्छेद होती है। मास्वादन गन्धान में-३ नौहनीय ही और नाम की गों का दिन्छ मिश्रगणयान में मानायकी और नानी वीजादिद अविराति नन्यदृष्टि गन्गन र मोहनी नानी है .

४५४
EX मुक्ति सापान श्री गुणस्थान रोहण अढीशतदारी ५
यों १८ का विच्छेद.
देशविरति में १० मोहनीय, २ आयुष्यकी, और २३ नाम
कीयों ३५ का विच्छेद.
प्रमतमें १४ मोहनीयकी, ३ आयुष्यकी, २३ नामकी, और
१ गौत्रकी या ४१ का विच्छेद.
अप्रमतमें ३ दर्शनावरणीयकी, २ वेदनीयकी, १४ मोहनी
यकी, ४ आयुष्यकी, २५ नामकी, और १ गौत्रकी, यों सब ४९
प्रकृति का विच्छेद.
अपूर्व करण में ३ दर्शनावरणीयकी, २ वेदनीयकी, १५ मो
हनीयकी, ४ आयध्यकी, २८ नामकी, और १ गौत्रकी यों सब
५३ प्रकृति का विच्छेद.
अनिटी बादरमें ३ दर्शनावरणीयकी, २ वेदनीयकी, २१
मोहनीयकी, ४ आयुष्यकी, २८ नामकी, और १ गौत्रकी, यों सब
५९ का विच्छेद.
सूक्ष्म सम्पराय में ३ दर्शनावरणायकी, २ वेदनीयकी, २७
मोहनीयकी, ४ आय यकी, २८ नामकी, और १ गौत्रकी, यों सब
६५ का व्युच्छेद.
उपशान्त मोह में ३ दर्शनावरणीयकी, २ वेदनीयकी, २८
मोहनीयकी, ४ आयूष्यकी २८ नामकी और १ गौत्रकी यों सब
६६ का विच्छेद.
क्षीण मोह में ५ दर्शनावरणीयकी, २ वेदणीयकी, २८ मो-
हनीयकी, ४ आयुष्यकी, ३० नामकी और १ गौत्रकी, यों सब
७० का व्युच्छेद होता है.
सयोगी केवली मे ५ ज्ञानावरणीय, ९ दर्शनावरणीय, २ वे
१.

-- द्वितीय मूल काण्डका-दुमरा खन्ड कर्म द्वारा रोहण दनीय, २८ मोहनीय, ४ आयुष्य २९ नामकी. १ गौत्रकी और ! ५ अन्तरायकी यों सब ८३ का विच्छेद. इति कर्म उदीरणा नामक चतुर्थ प्रक्रण समाप्तम् पञ्चम प्रकरण कर्मसत्ता द्वार. समुचय कर्म सत्ताधार, २ ज्ञानावरणीय मत्नादार. ३ दर्श- । नावरणीय सत्ताधार. ४ वेदनीय मनाचार.' मोहनीय मनाहार. ६ आयुष्य सत्ताद्वार. ७ नाम सत्तादार. ८ गोत्र मनादार. २ अन्त- राय सत्ताद्वार: १० ध्रुव कर्म सत्तादार. ११ ध्रुव कर्म प्रकति मत्ता- द्वार. १२ अध्रुव कर्म सत्तादार. ? अध्रुव कर्म प्रकृति मत्नादार. १४ सर्व घातिक कर्म सत्ताद्वारः १५ नर्व घानिक कर्म प्रकृति मना द्वार. १६ देश घातिक कर्म सत्तादार. ५७ देश घानिक कर्म प्रकृति सत्तादार. १८ अघातिक कर्म मनादार. १९ अपातिक कर्म प्रकृति सत्तादार. २० समुचय कर्म प्रकृति ननादार. २ कर्म मना व्यत्र तिद्धार. और २२ कर्म प्रकृति मना व्युन्छनि टार. १२५. पहिला-समुचय सला बार मिथ्यात्वसे उपशान्तमोह गुणन्धाननक आग्रही कमी मनावं क्षीणमोह गुगस्थानमें मोहनीय बिना मान कमोकी मना. सपोगी और अयोगी केवली के देवनी. आर. नाम और गौत्र त्र. न कोही ही मुना. १२६. दुसरा ज्ञानावरणीय द्वार. निपान्द ने भी मोहन्यन करना पांचों प्रजाति की मना. ---- ४५६ - मुक्ति मोपान-श्री गुणस्थान रोहण अढीशन द्वारी सयोगी और अयोगी केवली की ज्ञानावरणीय की सत्ता नहीं. १२७, तीसरा-दर्शनावरणीय द्वार मिथ्यात्वसे उपशान्त मोह गुणस्थान तक उपशम श्रणिवाले के ९ प्रकृति की ही सत्ता. अविरति से अनियट बादर गुणस्थान के पहिले भाग तक क्षपक श्रणि वाले के ९ की ही सत्ता. अनियट बादर के दूसरे भागसे क्षीण मोह गुणस्थान के पहिले भाग तक थीणदी त्रिक विना ६ प्रकृति की सत्ता पातीहै. क्षीण मोह के दूसरे भागमें दोनों निद्रा विना ४ की सत्ता. और क्षीण मोह के अन्ति भागसे ऊपर के गुणस्थान में दर्शनाव- रणीयकी सत्ता नहीं है. चौथा-वेदनीय सत्ता बार. मिथ्यात्वसे अयोगी केवलीके प्रथमभाग तक दोनों वेदनीयकी सत्ता अयोगी केवलोके अन्तिम भागमें दोनोंमेसे एक वेदनीयकी सत्ता १२९, पांचवा-मोहनीय सत्ता बार. मिथ्यात्व से उपशान्त मोह गुणस्थान तक उपशमसम्यक्त्व और उपशम चारित्रवाले के मोहकी २८ ही प्रकृति सत्ता के अविरति गुणस्थान से उपशान्त मोह गुणस्थान तक क्षा- यिक सम्यक्त्व और उपशम श्रेणिवाले के अनन्तान बन्धि चौक १२८, * क्याकि उपशम श्रेणिवाला पडवाइ होकर पीछा मिथ्याव गुणस्थानमें आताहे ४५७ -- . -- * द्वितीय मूल काण्ड-दुमरा खन्ड कर्म द्वारा रोहण और दर्शनत्रिक इन ७ विना २१ की सत्ता. ४ और क्षपक श्रोणिवाले के : नववे गुणस्थान के पहिले भा गमें उपरोक्त २१ की ही सत्ता, दूसरे भागमें ४ अप्रत्याख्यानी चौ- क, और ४ प्रत्याख्यानी चोक, यों ८ प्रकृति टलनेमे १३ की स- ता. तीसरे भागमें नपुसक वेदविना १२ की मत्ता, चौथे भाग में स्त्री वेदविना की सत्ता, पांचवे भागमें हाँस्य पटक विना ६ की सत्ता. छठे भागमें पुरुष वेद विना ५ की मत्ता. मानव भागमें स ज्वलन कोष विना ४ की मत्ता. आच भागमें मञ्चलन मान वि- ना ३ की सत्ता. नववे भागमें सवल की माया विना २ की म- त्ता और सूक्ष्म सम्परायमें ? संज्वल के लाभ का मत्ता. उपर मो- । ह की सता नहीं. १२९, छठा-आयुप्य सत्ता दार. भिव्यात्व मे उपशान्त मोह गुणन्गन नक. जो पहिल, आ युवन्ध किया हो तो चारों गतिक आयुरी मता. + र आयम- न्ध न करे तो ? मनुष्याय की मना. अविगत मे अयोगी केवल पन्थान नक सापक श्रेणिया लेके ? मनुप्चाय की नता. » Eसार भार मोनीया रोमन उपम भी आ ཤུ༌དྡྷེ EI, f -- : पद में :- बादिका : कि. .ET: 53 - .

४५८ * मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान राहेण अहीशतद्वारी वालेके ९३ १३१, सातवा-नाम सत्ता द्वार मिथ्यात्व से उपशान्त मोह गुणस्थान तक उपशम श्रेणि- की ही सता. अविरति गुगस्थान से अनियट बादर के पहिले भाग तक ९३ प्रकृति की सता. अनियट्ट बादर के दूसरे भागसे सयोगी केवली गुणस्थान तक १ नरकगति, १ नरकानुपूर्वी. १ तिर्यचगति, १ तिर्यंचानुपू- र्वी, ४ जातिचतुष्क, १ स्थावर, १ सूक्ष्म, १ आताप, १ उद्योत, और १ साधारण इन १३ विना ८० की सता. अयोगी केवली के अन्तिम भागमें १ मनुष्यगति, १ पचे- न्द्रियकी जाति, १ त्रस, १ बादर, १ पर्याप्ता, १ यशकीर्ती, १ आ देय, और १ सोभाग्य. इन ९ की प्रकृति सता रहती है. सत्ता बार. मिथ्यात्व से अयोगी केवली गुणस्थान के पहिले भागतक दोनों गौत्र की सता. अयोगी केवली गुगस्थानके अन्तिम भागमें १ उंच गौत्र की सता. १३३, नववा-अन्तराय सत्ता बार. तीर्थकर नाम कर्म की सत्ता वाला जीव दुसरा तीसरा गुणस्थान नहीं स्प: ता है. और मिथ्यात्र गुणस्थान में तीर्थकर नाम, कर्म की सत्ता फक्त अन्तर मुहूर्त पर्यन्त ही पाने का संभव है. क्याोक किमी क्षयोपशम सम्यक्त्तीने पहिले मिथ्यास्त्र अवस्था में नरकायका वन्ध किया फिर सम्यक्त्व प्राप्तकर तीर्थकर नामकी उपार्जन करी, वो मरण समयमें सम्यक्त्वका वमन करके मिथ्यात्वमें जावे. (परन्तु दुसरा ती. सरा गुणस्थान स्पर्शे नहीं.) वहां अन्तर मूहूर्त रहकर फिर सम्यक्ल प्राप्त करे इस- लिये मिथ्यास्त्र गुणस्थान में तीर्थंकर नाम की सत्ता पातीहै. १३२, आठवा-गौत ४५२ * द्वितीय मूल कान्ड-दुसग खन्ड कर्म द्वारा रोहण र मिथ्यात्वसे क्षीण मोह गुणस्थानतक अन्तराय की पांचों प्रकृति की सता. सयोगी अयोगी केवली के अन्तराय की सता नहीं. १३४, दशवा-ध्रुव कर्म सत्ता बार. आयुष्य विना सतों कर्म ध्रुवसता वाले हैं. मिथ्यात्व से क्षीण माह गुणस्थान तक सातों कर्मों की सता. सयोगी और केवली के वेदनी नाम और अन्तराय तीनोंकी सता. १३५,इग्यारवा ध्रुव कर्म प्रकृति सत्ता द्वार ध्रुवसता की २६ प्रकृति-५ ज्ञानावरणीयकी, ९ दर्शनावर- णीयकी २ वेदनीयकी, २६ मोहनीयकी, (मिश्र मोह और सम्य- क्व मोह विना)तिथंचगति, १ तियंचानुपूी, ५ जाति. १ औ दारिक शरीर, १ तेजस शररि, १ कार्मण शरीर, १ औदारिकका अंगोपांग, ३ वंधन. ३ संघातन, ६ संघयण, ६ संठाण, २० वर्णा- दि, २ विहायोगतिः १ पराघात, १ उद्योट, १ आताप, १ उश्वास, १ अगुरुलघु, ' आपघात, १० त्रसदशका. १० स्थावर दशका,१० १ निर्माण नाम, (यों नामकी ७८)'नीच गौत्र, ५अंतरायये१२६ मिथ्यात्व से उपशांत मोह गुणस्थानतक उपशम श्रेणीवाले के १२६ कीही सत्ता. अविरतिसे अनियटी वादर के पहले भागतक नपक श्रेणिवाले के भी १२६ कीही सत्ता. अनियटि वादरके दूसरे भागमें ३ थीणद्रीत्रिक, १ स्थावर ? सूक्ष्म १ आताप, १ उद्योत. १. साधारण. ' तियचगति. १. तियंत्रानुपूट- वी. और जाति चतुप्क, इन १४ विना ११२ की सत्ता. तीसरे भा- - की सत्ता. र सत्ताके ४ कर्मः-१ मोहनीय, 'आयुष्य,१३ मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थाना रोहण अढीशतद्वारी र गमें-४ अप्रत्याख्यानी चौक, और १ प्रत्याख्यानी चौक विना १०४ की सत्ता, चौथे भाग में नपूंसक वेद विना १० की सत्ता पांचवे भाग में स्त्रीवेद विना १०२ की सत्ता, छठे भाग में-हांस्य घटक विना ९६ की सत्ता. सातवे भाग में-पुरुषवेद विना ९५ की सत्ता, आठवे भाग में-संज्वलन क्रोधविना, ९४ की और नववे भाग में-संज्वल मान विना. ९३ की सत्ता. सूक्ष्म संपरायमें, संज्वलनके लोभ विना ९२ की सत्ता. क्षीण मोह गुणस्थानके दि चरम-समय संज्वलके-लोभ विना ९१ की सत्ता, और अन्तिम समय में निद्रा और प्रचला विना ८९ सजोगी केवली जौर अयोगी केवलीके-५ ज्ञानावरणीय, ४ दर्श नावरणीय, ५ अंतराय इन १४ प्रकृति विना ७५ की सत्ता. अयोगी केवलीके अन्तिम समय १ पचेन्द्रिय की जाति, '. वेद- नी इन २ की सत्ता रहती. एन. १३६, बारवा-अध्रुव कर्मसत्ता द्वार मिथ्या वसे उपशान्त मोह गुणस्थानतक उपशम श्रेणीवालेके चा- रों कादयकी सत्ता. अविरति रेपे अयोगी केवलीतक क्षपक श्रेणिवाले के मोहनीय वि- ना तीनों की सत्ता. १३७, तैरवा-अध्रुव कर्मप्रकृतिसत्ता द्वार। ध्रुव सत्तामें कही उनसे वाकी रही अध्रुव सत्ताकी २२ प्र- कृतिः-मिश्रमोहनीयः १ सम्यक्त्व मोहनीय, चारों गतिका आयु-

४६१
१
१
.
*द्वितीय मूल काण्ड-दुमरा खण्ड कर्म द्वारा रोहण
व्य. ३ तिर्यवानुपूर्वी विन तनिों अनुपूर्वी, १ आहारक शरीर,?
आहारक अंगोपांग, १ आहारक बन्धनः १ आहारक संघातन, १
क्रिय शरीर. १ वैक्रिय अंगोपांग, १ वैक्रिय वन्धन, १ वैक्रिय सं
घातन, १ तीर्थकर नामः ३ गति, ' ऊंच गौत्र, यह २२.
मिथ्यात्वसे उपशांत मोह गुणस्थानतक २२ कीही सत्ता.
क्षीण मोहसे अयोगी केवलीतक १ मनुस्यायु, १ जिननाम और
ऊंचगौत्र, इन ३ की सत्ता.
१३८, चउदा सर्वघातिक कर्मसत्ता द्वार
मिथ्यात्वसे उपशांत मोह गुणस्थानतक-सर्व घातिक तीनों कमों की
सत्ता.
क्षीणमोह गुणस्थानमें मोहनीय विना-दो कमोंकी सत्ता.
सयोगी अयोगी केवली के सर्व घातिक कर्मोकी सत्ता नहीं.
पदरवा-सर्वघातिक कर्मप्रकृतिसत्ता बार.
मिथ्यात्व से उपशांत मोहगुणस्थानतक उपशम श्रेणीमें स
र्व घातिक ३० ही प्रकृति की सत्ता.
क्षपक श्रेणीसे अनियट वादर गुणस्थान के पहिले भागतक
तो .२० ही प्रकृति की सत्ता.
अनिट वादर के दूसरे भागसे सूक्ष्म सम्पगय गुणस्थानतक
३ थीणद्री त्रिक और १ मिथ्यात्व मोह विना १६ की मत्ता.
क्षीणमोह गुणस्थान के अन्त में-दो निद्रा विना १४ की मचा.
सयोयी और अयोगी केवलीके सर्व घातिक की मला नहीं.
१४०, सालवा-देश घातिककर्म सत्ता द्वार
"
।

४६४ मुक्त सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अढीशन द्वारी यकी २१. मोहनीय, २ आयुष्यकी १३ नामकी, २ गौत्रकी और५ अन्तरायकी यों १३१ प्रकृतिकी सत्ता. अविसति से अप्रमत गुणस्थानतक क्षपक श्रेणिगत क्षयोप- शम सम्यक्त्वीके ५ ज्ञानावरणीय की, ९ दर्शनावरणीयकी, २ वेद नीय, की, २८ मोहनीय की ''+ आयुष्यकी,९३ नामकी, गौत्रकी और ५ अन्तरायकी यों १४ की सत्ता. अविरति से अनियंट बादर के पहिले भागतक-क्षपक श्रेणि गत क्षायिक सम्यक्त्वीके-५ ज्ञानावरणीय की, १ दर्शनावरणीयकी, वेदनीय की, २१ मोहणी की, ' आयुष्यकी, *.३ नामकी, २ गोत्र ५ अंतरायकी, १३८की सत्ताः अभियट बादर के-दुसरे भागमें ५ ज्ञानारणीय की ६ दर्शना- वरणीय की, २ वेदनीयकी ,२१ मोहनीयकी, ' आयुष्यकी ८० नाम की, २ गौत्र की और ५ अन्तरायकी यो १२२ की सत्ता, तीसरे भा गमें मोहनीयकी '३ प्रकृति होनेसे ११४की सत्ता, चौथे भागमें-मोह नीयकी १२ प्रकृति होनेसे ११३ की सत्ता पांचवे भाग में-मोहनी यकी ११ प्रकृति होनेसे ११२ की सत्ता. छठे भाग में-मोहनीयकी प्रकृति होनेसे १०६ की सत्ता, सातवे भागमे मोहनीय की ५ प्रा नि होनेमे १०५ की सत्ता.. आठवे भाग में मोहनीयकी ३ प्रक ति होनेमे १०४ की सत्ता, और नववे भाग में मोहनीय की २५- ऋति होने ?-३ की मत्ता.' सुक्ष्म मम्पराय में-५ ज्ञानावरणीय की, ५ दर्शनावरणीयकी २ वेदनीयकी ' मोहनीयकी ' आयूष्यकी, ८० नामकी २ गौत्र क्षपक श्रेणि करने याला निश्चयमे चरम गरीरी होता है. उमने तीनो " निका नायुप्यका अप किया फक ? मनुष्यायु मत्ता में है. १.

४६२
PM द्वितीय मूल कान्ड-दुसग खन्ड कर्म द्वाग रोहण
की और ५ अन्तरायकी १०२ की सत्ता.
क्षीण मोहमे के प्रथम भाग में-२ ज्ञानावरणीय की ६
दर्शनावरणीय की, १ वेदनीय की, १ आयुष्यकी, ८०
नामकी, २ गौत्रका और ५ अन्तरायकी यों १०१ की सत्ता. और
। दूसरे भागमें-दर्शनावरणीयकी . ही प्रकृति पाने से ९९ की सत्ता
सयोगी केवलीमें-२ वेदनीय. १ आयुष्य. ८०'नाम. २ गौत्र'
की यों ८५ की सत्ता.
अयोगी केवली के-आद्य मागमें तो ऊपरोक्त ८५ की ही
सत्ता. मध्य भाग में २ वेदनीयकी, आयुष्यकी, और ९ नामकी
यों १३ की सत्ता. और अन्तिय भाग में-' वेदनीयकी ' आयु-
ष्यकी ९ नामकी, १ गौत्र की यों १२ की सत्ता.
१४५,इक्कासवा कर्म व्युच्छति द्वार
मिथ्यात्वसे, उपशान्त मोह गुणस्थानतक-काँकी व्युच्छति नहीं.
क्षीण मोह गुणस्थान में मोहनीय कर्मकी व्युच्छति होती है.
सयोगी आयोगी केवली गुणस्थानमें-४ घातिक कर्मकी व्युच्छति
१४६,
बावीसवा-कर्म
प्रकृति व्युचति बार
मिथ्यात्व गुणस्थानमें कर्म प्रकृतिकी व्युच्छति नहीं.
सास्वादन और मिश्रमें-फक्त ' तीर्थंकर नाम कर्मकी व्युच्छति.
अविराति से अप्रमत गुणस्थानतक उपशम श्रेणिगत. उपशम और
क्षयोपशम सम्यक्त्वी के कर्म प्रकृति की व्युच्छिति नहीं क्योंकि
(पडता है.)
अविरति से अप्रमत गुणस्थानतक उपनाम श्रेणिगत नायि

३ मुक्ति सापान श्री गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी क सम्यकावी मोहनीय कर्मकी ७ प्रकृति की व्युच्छति और अप- र्व करण से उपशान्त मोहतक ७ मोहनीय की और २ आयुष्य की यों ९ प्रकृति की व्युच्छति होती है. अविरतिमे अप्रमततक चरम शरीरके ३ आयुष्य की व्युच्छति. अविरति से अप्रमततक क्षयिक सम्यक्त्वी चरम शरीरीके-७ मो. हनीयकी और ३ आयष्य की यो १० प्रकृति व्यच्छति. क्षपक श्रेणिगत अपूर्व करण और अनियट बादर के प्रथम भागतक ऊपरोक्तही १० प्रकृति की व्यच्छति. अनियट बादर के दुसरे भाग में-३ दर्शनावरणी, ७ मोहनीय, ३ आयुष्य, और १३ नामकी यों. २६ कर व्युच्छति. तीसरे भागमें मोहनीय की १५ प्र. कृति की व्युच्छति होनेसे २४ की व्यच्छति, चौथे भाग में-मोहनी यकी १६ व्युच्छति होनेसे ३५ व्युच्छति, पांचवे भागे मोहनीयकी १७ व्युच्छति होनेसे ३० की व्युच्छति, छठे भागमें मोहनी-०३ - यति होनम ४. की व्युच्छति सातवे भाग में- मोहनीयकी की व्युच्छति होनम ४३ की व्यच्छवि, आठवे भागमें मोहनीय की" की व्युच्छति होनेमे ४४ की व्युच्छति और नववे भाग में:-माह- नायकी- की व्यच्छति होनेसे ४० की व्युच्छति. रुपक श्रेणिगत सूक्ष्म सम्पगयमें ३ दर्शनावरणीय, २७ मो हनीय, ३ आयुष्य, और १३ नामकी यो ४६ की व्युच्छति, श्रीण माहक प्रथम मागमें दर्शनावरणीय, २८ महिनीय ३ आयुष्य. १३ नामकी यो १७ की व्युच्छति, और दृमर, भाग- में दर्शनावरणीयकी ५ का व्यच्छंद होनम ४०. की व्युच्छति मयोगी केवलीक ५ ज्ञानावरणीय, १. दर्शनावरणीय, २० मोहनीय. ३ आयत्य ? नाम, और ५ अन्तगय यों की . ३ ४६७ द्वितीय मूल काण्डका-दुसरा खन्ड कर्म द्वारा रोहण व्युच्छति. अयोगी केवलीकी प्रथम भागमें तो उपरोक्त ६३ कीही व्यु च्छति मध्य भागमें ५ ज्ञानावरणीय, ९ दर्शनावरणीय. २८ मोह- नीय, ३ आयव्य, ८४ नाम.और ५ अन्तराय यों १३४ की व्यु- च्छति और अन्तिम भागमें ५ ज्ञानावरणीय, १ वेदनीय, २८ मो हनीय, ८४ नामकी १ गौत्रकी और ५ अन्तरायकी यों १३६ की व्यूच्छति होती है. फिर वाकी रही १३ ही प्रकृति यों को शुक्लध्यान के चौथे पाये रुप प्रवल ज्वाला में भस्मी भूत कर अर्थात् सर्व कमोंकी स- व प्रकृतियों का सर्वथा प्रकारसे सवांश क्षय कर साकार उपयोग युक्त सहजानन्द अवस्था को प्राप्त होते हैं. इति कर्मसत्ता नामक पञ्चम प्रकरण समाप्तम् षष्टम् प्रक्रणम् - कर्मभङ्ग बार. १ समुचयकर्म भङ्गद्वार, २ ज्ञानावरणीय भङ्गद्धार, ३ दर्शना वरणीय भङ्गद्धार, ४ वेदनीय भङ्गदार. ५ मोहनीय भङ्गद्धार, ६ आ युष्य भङ्गद्धार. ७ नाम भङ्गद्धार, ८ गौत्र भङ्गधारः ९ अन्तराय भ- ङ्गद्धार, १० वन्धिके भङ्गद्धार, और ११ इयर्यावही भंगद्वार. १४७, पहिला समुचय कर्म भंग द्वार मिथ्यात्व. सास्वदनः अविरति, देशविरति, प्रमत इन ६ गु णस्थानोंमें १ आयुवन्ध के वक्त तो ८ कोका बन्ध. ८ हीका उ । दय और ८ हीकी सत्ता. यह भांगा पाता हैं (२) और आयुवन्ध न होवे उसवक्त ७ काका वन्ध ८ का उदय और ८ की सत्ता. ३

No text on this page.

द्वितीय मूल कान्ड-दुसरा खन्ड कर्म द्वारा रोहण र सयोगी और अयोगी केवली के ज्ञानावरणीय का बन्ध, उदय, सत्ता, तीनोंही नहीं. १४९तीसरा-दर्शनावरणीय कर्मभंगहार मिथ्यात्व और सास्वादन गुणस्थानमें (१) एकाकबन्ध, ४ का उदय, और ९ की सता. (२) ९ का वन्ध, ५ का उदय और ९ की सत्ता यह दो भाङ्गे पाते हैं. मिश्र गुणस्थान से अनीयट बादर के प्रथम भाग तक (१) थीणनीत्रिक विना, ६ का वन्ध, ४ का उदय, और ९ की सत्ता. और (२) ६ का बन्ध, ५ का उदय और ९ की सत्ता यह दो भाङ्गे पाते है. अनियट वादर के आठों भागमें और सूक्ष्म सम्पराय गुण- स्थानमें उपशम श्रेणीमें निद्रा प्रचला का वन्ध विना (१) ४ का वन्ध. ४ उदय और ९ की सता. (२) ४ का वन्ध, ५ का उदय, और ९ की सता यह दो भाङ्गे पाते हैं. अनियठ वादर और सूक्ष्म सम्पराय के भपक श्रोणि में ४ का बन्ध. ४ का उदय, और ६ की सत्ता यह १ भङ्गा पावे. उपशान्त मोह गुणस्थान मे बन्ध के अभाव से (१) चार का उदय, और ९ की सता, तथा ५ का उदय, और ९ की मत यह दो भाड़े पावे. क्षीण मोह गुणस्थान के दी चरम समय में ४ का उदय और ६ की सता और अन्तिम समयमें दोनों निद्राकी सता टल- नेसे ४ का उदय, और ४ काही सता यह २ भाले सयोगी और अयोगी बली के दर्शनावरणीय का बन्ध, .

No text on this page.

४७१
,
द्वितीय मूल काड-दुमरा खण्ड कर्म द्वारा रोहण
मिश्र गुणस्थानमें १७ का बन्धस्थान है, जिसके मांगे दो
होते हैं. और ७ का, ८ का, और ९ का यह तीन उदयस्थान हैं.
जिसके भाई की चौबीसी ५ होती है.
अविरति गुगत्यानमें १७ का वन्धस्थान है. जिसके भाङ्गे
२ होते हैं, और ६ का ७ का. ८ का २ का यह चार उदयस्थान
है, जिसके भाड़े की चौवीसी होती हैं.
देशविरीत गुणस्थानमें १३ का वन्धस्थान है, जिसके भाङ्गे
दो होते हैं और ५ का. ६ का, ७ क.. और ८ का. यह ४ उदय
स्थान है. जिसके भाओं की चौवीसी ८ होती है.
प्रमत गुणस्थानमें ९ का बन्धस्थान है. जिसके भाङ्गे दो होते है.
और ४ का. ५ का. ६ का. और ७ का, यह उदय स्थान हैं. जि
। सके भाड़े कि चौवीसी ८ होती है.
अप्रमत गुणस्थानमें-१ का बन्ध स्थान. जिसका भांगा?xहोता
हैं. और ४ का. ५ का. ६ का. और ७ का यह ४ उदय स्थान है
जिसके भांगे की चौवीसी ८ होती हैं.
अपूर्व करण गुणस्थानमें-१ का वन्ध स्थान जिसका भाङ्गा १. औ
र ४ का. का. ६ का यह तीन उदयस्थान जिसके मांगे चौवीसी
होती है.
अनियट वादर गुणस्थानमें- का. ४ का. ३ का २ का. और
x चौरीनी पनानेकी नीधी नीति-हॉम्प और रतिक युगल मे नीनों वेदके
तीन भाड़े, नही गोक अरनि के यान मे नोन वेदके तीन भाड़े बन्न में भाड़े
होते है. यह ६ नोयने. ६ मानले. ६ गया. और लोगने. या हवं
मो १ चौवीनी विशेष मुलाना अर्थ कांड में देनी.
* यहां मे आगे अपने और मोइन जुगल का अभाव होता है. इसलिये
१ही भांग पाता है.

* मुक्ति सोपान-श्री गणस्थान रोहण अहीशन द्वारी ११ १ का यों ५ बन्ध स्थान होते है. जिसके ५ भांगे अलग अलग होते हैं. और १ का, तथा २ का, यह दो उदय स्थान हैं, जिसमें संज्वलकी चारों कषायोंमें की १ कषाय, और तीनों वेदों में का १ वेद, इन दोनों का उदय होता है. यों चारों कषायों को तीनों वेदों से ती गुणे करने से १२ भांगे होते हैं. और फिर वेद का उ- दय टलने से एक का उदय स्थान रहता है. सो चौ विध, त्रिविध द्विविध, और एक विध, यों१०उदयके भांगे होतेहै. तोभी यहां सा मान्य विविक्षासे-४-३-२ और १ इन चारों वन्ध स्थानकी अपेक्षासे एकेक ही भांगा गिननसे चारही भांगे कहने, यों यहा १६ भांगे होते हैं. सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थान में मोहनीय कर्म का बन्ध नहीं होता है फक्त एक कोटीकृत संज्वल का लोभही का उदय है, जि सका एक ही भांगा पाता है. उपशांत मोहसे अयोगी केवलीतक मोहका लवलेशही नहीं है. मोहनीयके सर्व भाऊ की संख्याः-मिथ्यात्व, अविरति दे- शविरति, प्रमत और अप्रमत, इन पांचों गुणस्थानों में-भाङ्गे की आठ आठ चौबीसीहै, और सास्वादन, मिश्र और अपूर्व करण इन तीनों गुणस्थानामें चार चार चौबीसीहै, सबर२ चौबीसी हुइ जिसके भाले ५२४२४=१२४८हातहैं. और अनियट बादरके १६भाङ्गे, सूक्ष्म सम्परायका एक भागा यह १७ और पहलेके १२४८ मिलकर१२६५ मोहनी के भांगे होते हैं. १५२, छठा आयुष्य कर्म भंग बार आयुष्य कर्मके भाड्के खुलासेके लिये देखीये अर्थ कांडका पृष्ट २४१ वा. - द्वितीय मूल काण्ड-दूमरा खण्डकर्म द्वारा रोहण र आयुष्य कर्म के २८ भांगेः-' नरकायूका वन्ध, नरकायुका, उदय. २तिर्यंचायुका वन्ध, नरकायुका उदय, ३ मनुष्यायुका बन्ध नरकायुका उदय, ४ नरकायुका उदय, और नरक तिर्यचायुकी स- त्ता. ५ नरकायुका उदय और नरक मनुव्यकी सत्ता. ऊपर जिस तरह नरकायु के ५ भांगे किये, तैसे ही देवाय के भी ५ भांगे जानना. विशेष इतनाही की नरकायु के स्थान दे वायु कहना. यों दोनों गति के १० भाङ्गे हवे. १ तिर्यंचायु का उदय, और तिर्यंचायुकी सत्ता. २ तिर्यंचायुका बंध तिर्यचायुकी सत्ता, ३ मनुष्य युका बन्ध, तिर्यंचाकाय उदय, ४ दे- वायुका बन्ध, तिथंचायुका उदय, ५ नरकाय का बन्ध, तिथंचायुका उदय और नरकायु. तिर्यंचायु दोनों की सत्ता ६ एक नियंचायका उदय, और दो तिर्यंचायुकी सत्ता. ७ तिर्यंचायु का उदय ओर तिर्यंचायु मनुष्यायु की सत्ता. ८ तिर्यचारका उदय. और नियंचा ये देवायु की सत्ता. और ९ तियंचायुका उदय और नियंत्रु नर- कायु की सत्ता. ऐसे पड़ी भांगे मनुव्यायुके कहना. यों मब२८ भांगे आयु- प्य के होते हैं. मिव्यात्व गुणस्थान में २८ ही भांगे पाते हैं. क्योंकि-वागेही गति में मिथ्यात्व गुगस्थान पाता है. और मिव्यावी वागेही गनि के आप्रय का वध करता है. सास्वादन गुगस्थान में-नकापु वन्य न होनमे नियंत्र तथा मन-च के आयुर्वन्ध कार अबन्धाके दो भांग बिना २६ भांग पान भिध गुणस्थानमें-यहां किनामी गनिका आपूर्वन्ध न होनेक नदव से-बन्ध काल अवस्थाके देवता के दो. नाक के दो. मनुन्या चार A -

No text on this page.

४७५ द्वितीय मूल काण्डका-दुसरा खन्ड कर्म द्वारा रोहण र और अपूर्व करण से अयोगी केवली गुणस्थान तक क्षपक श्रेणिवाले के मनुव्यका उदय, मनुश्यायु की सत्ता यह १ ही भां- गा पाता है. १५३, सातवा नाम कर्म भंग द्वार मिथ्यात्व गुणस्थान में वन्धस्थान : जिसके भांगे १३९२६ उदयस्थान ९ जिसके भांगे ७७७३ सत्ताके स्थान ६ जिसके स्था न २१२. सास्वादन गुणस्थान में वन्धस्थान ३ जिसके मांगे ९६०८ उदयस्थान ७ जिसके मांगे ४०९७, और सत्ताके स्थान २ जिस- के स्थान १८ होते हैं. मिश्र गुणस्थान में वन्धस्थान २, जिसके भांगे १६, उदय स्थान ८ जिसके मांगे ४०९७, और सत्तास्थान २, जिसके स्थान ६ होते है. अविरति सम्यक दृष्टि गुणस्थान में बन्धस्थान ३, जिसके भांगे ३२, उदयस्थान जिसके भांगे ५२, और सत्ताम्थान जिस- के स्थान ५४ होते है. देशविरति गुणस्थान में वन्धस्थान २ जिसके मांगे १६. उ- दयस्थान ६ जिसके भांगे ५९' और सत्तास्थान ४ जिसके स्थान २२ होते हैं. प्रमत गुणस्थान में वन्धस्थान २ जिसके भांगे १६. उदय रते हैं. आयुबन्ध वाले भपक श्रेणी नहीं करते है क्योंकि वो निश्चयम में मोक्ष गामी ही होते है. ET नाम कर्म के भाङ्गे के गुलाने के लिये देखीये अर्थ कांडका पृष्ट २४ वे भे तथा पृष्ट २६१ वेमे. .

४७६ -- - में 1 * मुक्ति सपिान श्री गुणस्थान रोहण अहीशतद्वारी स्थान : जिसके भांगे ३१६ और सत्तास्थान ४ जिसके स्थान २० । होते है. अप्रमत गुणस्थानमें बन्धस्थानीजसके भांगे उदयस्थान जिसके भाङ्गे .९. और सत्तास्थान ४ जिसके स्थान ८ होते हैं. अपूर्व करण में बन्धस्थान ?, जिसके भांगे ५, उदयस्थान १ जिम भांगे ३६० और सत्तास्थान ४ जिसके स्थान ८ हातह अनियट्ट बादरमें बन्धस्थान १ जिसके भांगा १, उदयस्था न? जिमकं भांग.६ और सत्तास्थान ८ जिसके स्थान ४ होते है. म:म सम्पगयौ बन्यस्थान ? जिसके मांगा १, उदयस्थान ? जगर मांग १६. और मत्तास्थान ८ जिमके स्थान होते हैं. अपमान मोहम-बन्ध स्थान नहीं, उदय स्थान ? जिनके भांग , और मत्ता म्यान १, जिमकं स्थान ? होते हैं. श्रीण माहम-बन्ध नहीं, उदय स्थान १, जिसके मांग २४ आ मला स्थान १, निमक स्थान ४ होते हैं. ग्यांगी कवाक बन्ध नहीं, उदय स्थान ८, जिमकं मांग ६०० मन्ना म्यान 2. जिम म्यान । हांत है. अयोगी कंवलीकं बंध नहीं. उदयम्थान २, जिसके मांग मामला म्यान, जिम मांग ३ हांत हैं.* आटवा-गोत्र कर्मभङ्ग बार. मियान्व-(१) नाच गात्र का बन्ध, नाच का उदय ना नी मल (2)ीचका बन्ध, मारनीव उंच दानों की । - r" : म दि. भ है ४७७ द्वितीय मूल कान्ड-दुसग खन्ड कर्म द्वारा रोहणपुर सत्ता. (३) नीचका बंध, ऊंचका उदय, और दोनों की सत्ता. () ऊंचका बन्ध, नीचका उदय, और दोनों की सत्ता. (५) उं- चका बन्ध, उंचका उदय, और दोनों की सत्ता. यह पांच भांगे पाते हैं. सास्वादनमें-ऊपरोक्त पांच भांगमें से प्रथम भांगा छोडकर बाकी के ४ भांगे पाते हैं. मिश्र अविरति और देशविरति इन तीनों गुणस्थानमें नीच गौ- के बंधके अभावसे चौथा और पांचवा दोनों भांगे पाते हैं. प्रमतसे सूव्म सम्परायतक-(१) ऊंचका वन्ध. ऊंचका उदय और दोनों की सत्ता यह एकही भांगा पाता है. उपशान्त मोहसे सयोगी केवलीतक-बन्धके अभावसे-ऊंचका उद- या और दोनों की सत्ता यह छठा भांगा पाता है. अयोगी केवली गुणस्थानमें-(१) ऊंच का उदय और दोनों की स त्ता यह छठा भांगा विचरम समय पर्यंत पाता है. (२) और ऊंचका उदय ऊंचकी सत्ता यह सातवा भांगा चरम समय में पाता है. १५५, लववा-अल्तराय कर्मभङ्ग बार. मिथ्यात्व से लगाकर सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थानतक अन्तरा- यकी पांचों प्रकृतिका वन्ध. पांचों का उदय और पांचों की सत्ता. ये १ भांगा पाता है. * नीचका वन्य, नीच का उदय और नीयकी मत्ता फक्त तेर काय और वायुका यो होतीहै. और तेउ दायुने चोवाइ दुनरे स्थान अवतरते किननेक काल तक पा- तो है. और तेउ वायु में मन्यत्स देदी नहीं तो पडवाइ होने कडामे उमलिये यह पहिला भांगा नहीं पाता है. - अंतराय कर्मके भांगेके खुलाने के लिये देखीने अर्थ कांड का पृष्ट २८१. वा - ४७८ - + द ॥ * मुक्ति सपिान श्री गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी उपशान्त मोह और क्षीण मोह गुणस्थान में-बन्ध के अभावसे पां- चोंका, उदय, और पांचोंकी सत्ता. यह १ भांगा पाता है. सयोगी अयोगी केवलकि अन्तराय का बन्ध उदय सत्ता तीनों नहीं. १५६, दशवा-बन्धीके भंग द्वार वन्धी के भंग चार:-बन्धी, बन्धति बन्धेति, २ बन्धि, बन्धन्ति, । नवन्वेति, ३ वस्थि नबन्ध, नबन्धेति, और ४ नबन्धि, नबन्धे, नवंती. ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, नाम गौत्र, और अंतराय इन ५ का आश्रिय. भि यात्वंस मःम सम्पराय गुणस्थानतक-पहिला और दूसरा दो भां गे पावे, उपशान्त मोहमेंपडबाइ होता है इसलिये तीसरा भांगा पार. और उपशान्त मोहसे अयोगी केवलीतक एक चोथा भांगा पाता है. वंदनाय की आश्रिय-मिथ्यात्वसे सयोगी केवली गुण स्थानतक पहिलकं दो भांगे पावं, और अयोगी केवली क-१ चौथा मांगा पाता है. मोहनीय कर्म आश्रिय-मिथ्यात्वम अनियट बादर गुणस्थानत क पहिलेके दो भाग पाव, मृथ्म मम्पगय में-उपयांत श्रेणि वाल- नीमग, और भपक श्रेणिवाल के चाथा भांगा पावं, उपमान्न । बन्धी-गये काल में बन्धन किया. धान्न वर्तमान में बचे मो. वयनि म नादान बमो. 4ववि भाई के पटांग लिय देवाय अर्थ दांटका पटाया ४७२ १ द्वितीय मूल काण्ड-दूसरा सण्डकर्म द्वारा रोहण र मोहमें पडवाइ होता है सो तीसरा भांगा पारे. और क्षीण मोहसे अयोगी केवलतिक १ चौथा भांगा पाता है. आयुष्य कर्म आश्रिय-मिथ्यात्व, सास्वादन, अविरति, देशविराति, और प्रमत इन ५ गुगस्थानों में चारों ही भांगे पावे. मिश्र में-आ- यु बन्ध के अभावसे तीसरा और वोया भांगा पावे. अप्रमत से उ- पशान्त मोहतक-तीसरा और चौथा दो भांगे पावे. भीण मोह से अयोगी केवलीतक-एक चौथा भांगा पाये. १५७. इग्यारवा इविहींके भंग द्वार र्यावही भांगे ८:-१ बन्धिः बन्धन्ति. बन्यति. २ बंधि. बन्ध- न्ति. नवन्धेति. ३ वन्धि. नवन्धन्ति. वन्यति ? वन्धि, नगन्य- ति, नवन्धेति. ५ नवन्धि बन्धन्ति. दन्यनि-६ नवन्धि बन्धन्नि नवन्धोति. ७ नवन्धि वन्वन्ति वन्वेति. और ८ नवन्धि नबन्ध न्ति. न वन्यति-उनमें सेः- मिथ्यात्व गगस्थानमें-तीसरा. मातवा. और आवा भांग पावं. सास्वादन सुक्ष्म संपगयतक-तीनग और नातवा भांगा पाव उपशांत मोह गुणस्थान में-पाहिला और पांचवा नागा पावं. भीण मोह और सयोगी केबली में-एक नग नांगा पाद. और अयोगी केवली गुगन्धान में-एक चौथा भांगा पावे. इति कर्म भंग नामक-पटन प्रकरण नामक नमान. 1 * पांच भाव एका दिवस...

४८० * मुक्त सोपान-श्री गणस्थान रोहण अढीशन द्वारी सप्तम प्रक्रणम भावादि बार* भावादि १३ द्वारों के नाम. १ मूल भावदार, २ औदायिक भावद्धार, ३ उपशामक भा- वदार. ४ क्षयोपशमिक भावदार, ५ क्षायिक भावद्धार, ६ परिणामि- क भावदार, ७ सन्नीवाइ भावद्वार, ८ समुचय भावद्धार, ९ श्रेणि द्वार, १० कर्मवेदे द्वार. ११ कर्मनिर्जरा द्वार, १२ दशकरण द्वार, और १२ निर्जरा बृद्धिद्धार. १५८, पहिला मूल भाव बार मूल भाव ५ हैं:-१ औदयिक,२ उपशामिक, ३ क्षयोपशमिक, ४ क्षायिक, और परिणामिक इनमें से. मिथ्यात्व, सास्वादन और मिश्र इन तीन गुणस्थानों में १ औद- यिक, १ क्षयोपशमिक और ३ परिणामिक. यह ३ भाव पाते हैं. अविरति से अप्रमत गुणस्थानतक क्षयोपशमिक सम्यक्त्वी में ? औदयिक, २ क्षयोपशमिक, और परिणामिक, यह ३ भाव गतेहैं क्षायिक सम्यक्त्वी में-क्षायिक भाव बढ़ने से चार भाव पावे. और उपशमि सम्यक्त्वीमे भी चारही भाव. पावे फक्त क्षायिके स्थान उप शम कहना. अपूर्व करण गुणस्थान में क्षायिक सम्यक्त्वी के-उपशामिक वि ना चार भाव पावे, उपशम सम्यक्त्वी के-क्षायिक विना चार भाव पावे और सर्व जीवों आश्रिय पांचों भाव पाते है. अनियट वादर से उपशान्त मोह गुणस्थान तक-उपशम स पांच भाव के खुलासे के लिये देखीयं अर्थ कांडका पृष्ट २७२ वा ३ ४८१ द्वितीय मूल काण्डका-दुसरा खन्ड कर्म द्वारा रोहण- म्यक्त्वीके क्षायिक विना चार भाव पावे. और क्षायिक सम्य क्त्वीक पांचों भाव पावे. क्षीण मोह गुणस्थानमें-उपशामिक विना चार भाव पावे. सयोगी और अजोगी केवली गुणस्थान में औदयिक, २ क्षायि क. और ३ परिणामक यह ३ भाव पावे. सिद्ध भगवंत में क्षायिक और परिणामिक दो भाव पावे १५९. दुसरा औदयिक भाव द्वार औदयिक भाव के २१ भेदः-४ गति, ४ कपाय, लेश्या, : वेद, १ मिथ्यात्व, ' अविरत, ' अज्ञान, और १ असिद्ध. मिथ्यात्व गूणस्थान में-औदयिक भाव के २१ ही भेद पावे. सास्वादन गुणस्थान में-मिथ्यात्व और अज्ञान विना १९भेद पावे. मिश्र गुणस्थान में-मिथ्यात्व विना २० भेद पावे. अविरति गुणस्थान में-अविरत विना २९ भेद पावे. देशविरति गुणस्थानमें- देवगति, १ नरकगति विना भेद पावे प्रमत में- तिर्थचगति. १. असंयम विना १६ भेद पावे. अप्रमत में तीनों अशुम लेश्या विना १२ भेद पावे. अपूर्व करण और अनियट वादरमें-' तेजु, ' पन लेश्या विना १० भेद पावे. सून्न सम्पराय में-- वेद ३ कपाय विना ४ भेद पावे. ऊपशान्त मोहसे सयोगी केवलतिक-लोभ बिना भेद पावे. अयोगी केवली गुणस्थान में-शुक्ल लेझ्या विना २ भेद पावे. १६०. तीसरा उपशामक भाव द्वार

1
३
मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थाना रोहण अढीशतद्वारी
ऊपशमिक भावके२ भेदः-१ उपशम सम्यक्त्व और उपशम चारित्र
मिथ्यात्वसे मिश्र गुणस्थानतक उपशमिक भाव नहीं.
अविगति और देशविरति गुणस्थानमें-एक उपशम सम्यक्त्व.
प्रमतम उपशांत माह गुणस्थान तक दोनों भेद पाते हैं।
भीण मोहमे अयोगी केवली गुणस्थानता-उपशम भाव नहीं.
१६१. चौथा क्षयोपशमिक भाव द्वार
अगोपभिन भावकं १८-भेद-४ ज्ञान, ३ अज्ञान, ३ दर्शन, ५ अ
नगय. ' अयोगगम गभ्यक्त्व ओर १. क्षयोपशम चारित्र. ' संय
मा गंयम.
मियान और मिश्र गणग्थानमें- लब्धि, ३ ज्ञान, ३ दर्शन, यह
"ट पाये.
माम्पादन गगाथान में-लब्धि, ३ दर्शन यह भद पावे.
विगत गगम्थान में ' भांपगम मम्यक्त्व बहन म १२ भद पान
दटावति गगम्थान में मंयमा मंयम बनम १३ मंद पावं.
प्रमन अप्रमत गणम्थान में मंयमा मंयम घटाना और
मनपर्यवज्ञान नया भोपटाम चीत्र वदान में १४ मंद पान.
अव काय म उपशान्त माह गुणस्थान तक १ सयापा-
म्यकद भयोपशम चन्त्रि टन दा विना १२ भद पान.
मनट में अयोनी कवी नकशापदाम भार नहीं है.
१. पांचवा-सायिक भाव हार.
द . भाविक नजिकबर वान, १
और भाविक सय मारना
-d

। द्वितीय मूल काण्ड-दुमरा खण्ड कर्म द्वारा रोनर मिथ्यात्व से मित्र गुणस्थान तक क्षायिक भाव नहीं. अब- ति से उपशान्त मोह गुणस्थान तक १ क्षायिक सम्यक्त्व क्षीणमो ह गुणस्थान में १ क्षायक सम्यक्त्व और क्षायिक चरित्र २ भेद पावे. सयोगी केवली और अयोगी केवली गुणस्थान में ९ ही भेद पाते है. सिद्ध भगवन्त में १ केवल ज्ञान, २ केवल दर्शन, और ३ क्षायिक सम्यक्त्व यह ३ भेद ३ पावे. १६३, छठा परिणामिक भाव द्वार. परिणामिक भावके ३ भेद १ जीवत्व, १ भव्यत्व, १ अमव्यत्व मिथ्यात्व गुणस्थान में तीनों भेद पाते है. सास्वादन से अयोगी केवली तक १ जीवत्व, १ भव्यत्व, १६४, सातवा सन्नी पातिक भाव द्वार मिथ्यात्व सास्वाद और मिश्र गुणस्थानों में उदयिक क्षयो पशमिक और परणामिक यह त्रितंयोगीक मूल १ भांगा पाताहे. और इसको अलग २ वारों गति में गिनने से उत्तर सन्नीपातिक भांगे वार होते हैं. अविरति गुणस्थान में (१) उदयिक, भयोपशमिक, परि- णामिक. यह १ त्रि संयोगी (२) उदयिक उपशामिक, न्योपशामि परिणामिक यह १ चतु संयोगी (१) उदयिक. भयोपनामिक, परि णामिक. यह इत् संयोगी. यों मूल तीन भांगे पाते है. और उन तीनों को चारों गति से चौगुन करने में उत्तर भांगे होते हैं. २वे और १०३ गुपस्थानमें शापिफ चाग्नि स्निनेक आचार्य नहीं भी गर्ने यह २ भेद पावे. १ - ।

४८४ * मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारी ११ देशविरति गुणस्थान में अविरति गुणस्थान के जैसेही मूल भांगे तो तीनो पाते ही हैं. और इन तियेच मनुष्य गीतसे दुगुने करते उत्तर भांगे ६ होते हैं। प्रमत और अप्रमत गुणस्थान में एक मनुष्य गति अश्रि- य तीनों भांगे पाते हैं। अपूर्व करण से उपशान्त मोह तक उपशम श्रेणिवाले के (१) उदधिक, उपशमिक, क्षयोपशमिक, परिणामिक, यह १ चतु- संयोगी भांगा पाता है. और क्षपक श्रेणिवाले के (१) उदयिक, क्षयोपशभिक, क्षायिक, परिणामिक, यह १ चतुसंयोगी भांगा. औ- र समुचय सर्व जीवों आश्रिय, उदयिक, उपशामिक, क्षयोपशमिक क्षायिक, और परिणामिक यह १ पंच संयोगी भांगा पाता है. और क्षीण माह से अयोगी केवली तक उदयिक, क्षायिक परिणामिक, यह ? त्रि संयोगी भांगा पाता हे. ' मिथ्यात्व गुणस्थान में । ओदयिक भावके २१ भेद, २ क्षयोपशामिक भाव के ११ भेद, ओर ३ परिणामिक भावके ३ भे- द, यो तीनों भवों के ३५ भद पावे. • माम्बादन गुणस्थान में , ओदयिक भावके १९, भेद, यांपगमिक भावक , भद, ३ और परिणामिक भावके २ म द, यों नीनों भावों के ३२ भेद, पावे. मिथ गुणस्थान में-१ आदायिक भाव के-२० भद. २ क्ष- यापहीमक भावके " मंद, ३ परिणामिक भावक-भंद. यों ती नोभावों के भंट पावे. 2 अविगत गुणम्थान में-१ अदायक भाव के " भेद.२ ओपशामक भाव का ? भंट, ३ भायिक भावका मंद. १ शयां- - + writy- ४८५ १. द्वितीय मूल कान्ड-दुसग खन्ड कर्म द्वारा रोहण पशमिक भावके १२ भेद. और ५ परिणामिक भाव के दो भेद. यों पांचों भाव के ३५ भेद पावे. ५ देशविरति गगस्थानमें-१ औदयिक भावके १७ भेद, २ ओपशभिक भावका १ भेद, ३ क्षायिक भावका १ भेद, ४ क्षयोप शामिक भावक १३ भेद. और ५ परिणाभिक भावके २ भेद, यों पांचों भावके ३४ भेद पांव. ६ प्रमत संयति गुगस्थानमें- औदयिक भावके १५ भेद.२ औपशभिक भावके २ भेद, ३ क्षायिक भावका १ भेद, ४ क्षयोप शमिक भावक, १४ भेद, और ५ परिणामिक भाव के २ भेद, यों पांचों भावोंके ३४ भेद पावे. ७ अप्रमत संयति गुणस्थान में-' ओदायक भावके १२ भे द, २ उपशामिक भावके २ भेद, ३ क्षायिक भावका-१ भेद, ४ क्ष योपशामिक भावके '२मेद. और५ परिणामिक भावके २ द यों पां चों भावोंके-३० भेद पावे. ८ अपूर्व करण गुणस्थान में-१ औदयिक भावके १० भेदर ओपशमिक भावके २ भेद, ३ क्षायिक भावका १ भेद, ४ क्षयोप गमिक भावके १२ भेद और ५ परिणामिक भावके२ भेद. यों पां- चों भावोंके २७ भेद पावे. ९आनियट वादर गुणस्थान में-१ औदयिक भावके १० भेद, २ ओपशमिक भाव के २ भेद, ३ क्षायिक भावका १ भेद, ४ क्ष- योपशयिक भाव के १२ भेद और ५ परिणामिक भाव के २ भेद यों पांचों भावोंके-२७ भेद पावे. १० सूक्ष्म सम्पराय गुगस्थानमें-१ ओदायक भाव के ४ भेद,२ उपशामिक भावके २ भेद, ३ क्षयोपशामिक भाव के १२ भेद, ४ ४८६ A मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अढीशन द्वारी क्षायिक भावका १ भेद. और ५ परिणामिक भाव के २ भेद यों पांचों भावोंके २१ भेद पावे. ११ उपशान्त मोह गुणस्थान में-१ ओदायिक भाव के-३ भेद, २ ओपशामिक भावके २ भेद, ३ क्षयोपशम शामिक भाव के भेद,४ क्षायिक भावका १ भेद, और ५ परिणामिक भाव के२ भे- दयों पांचों भावोंके २० भेद पावे. १२ क्षीण मोह गुणस्थानमें-१औदायक भाव के : भेद, २क्षा- यिक भावके २ भेद,३ क्षयोपशमिक भावके १२ भेद, और परिण- भिक भावके दो भेद यों चारों भावोंके १९ भेद पावे. १३ सयोगी केवली गुणस्थान में- औदायक भावके ३ भेद, २ क्षायिक भाव के ९ भेद, ३ परिणार्मिक भावके २ भेद, यों ती- न भावके १४ भेद पावे. १४ अयोगी केवली गुणस्थान में १ औदयिक भावके २ भेद, २ क्षायिक भावके ९ भेद. ३ परिणामिक भावके २ भेद, यों तीनों भावके १३ खेद पावे. १६६, नववा श्राणि बार श्रेणी दो-१ उपशम श्रेणी, और २ क्षपक श्रेणी. भिथ्यात्व गुणस्थान से अप्रमत गुणस्थानतक क्षयोपशम स म्यक्त्व होनेसे श्रेणी नहीं करते हैं. अपूर्व करण सुक्ष्म सम्पराय गुणस्थानतक दोनों श्रेणी करते हैं. उपशान्त मोह गुणस्थान में-१ उपशम श्रेणी. क्षीण मोह गुणस्थान में-१ क्षपक श्रेणी = कितनेक स्थान सयोगी अयोगी केवली गुणस्थान में भव्यत्व पणा नही लिया श्रोणिद्वार के खुलासके लिये देखीये अर्थ कांड का पृष्ट १६ वा- PAN ४८७ द्वितीय मूल कान्ड-दुसग सन्ड कर्म द्वारा रोहण सयोगी अयोगी केवली गुणस्थान में श्रेणी नहीं है. १६७, दसवा कर्म वेदे द्वार मिथ्यात्वंसे सूक्ष्म सपमाय गुणस्थानतक आठोंही कर्म वेदतेहैं. उपशांत मोह और क्षीण मो गूणस्थानमें-मोहनीय विनां कर्म वेदे सयोगी और अयोगी केवली गुणस्थानमें, १ वेदनीय, २ आयुष्य नाम. और ४ गौत. इन चारों कर्मोको वेदते हैं. १६८. इग्यारवा कर्म निजग बार भिथ्यात्वसे उपशान्त मोह गूणस्थानतक आगे कौकी निर्जराहै क्षीणमोह गुणस्थानमें-मोहनीय विना सात कोकी निर्जरा. सयोगी अयोगी केवली गुणस्थानमें-ऊपरोक्त चारों कोंकी निर्जरा १६९. बारवा-दशकरण बार. दश करणके नाम वन्ध करण, २ उत्कर्ष करण, : संक्र- मण करण, ४ अपकर्षण करण, ५ उदीरणा करण. ६ सत्ता करण ७ उदय करण, ८ उपशान्त करण, ९ निधित करण, और १०नि- कचित करण. मिथ्यात्व गुणस्थानसे-अपूर्व करण गुगस्थानतक-'ही करण पावे. अनियट्ट बादर और सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थानमें पहिलेकेण्करण पावे उपशांत मोहसे अयोगी केवलीतक-सत्ताऔर उदय यह दो करणपावे १७०, तेवा-गुण श्रेणी द्वारा १ आयु कर्म विना सात कमोंकी निर्जरा-मिथ्यात्व और मिश्रसे शकरणद्वार के सुलाने के लिये देवीय अर्थ कांडका पृष्ट वा

४८८
* मुक्ति सोगान श्री-गुणस्थान राहेण अदीशतद्वारी १९
अविरति सम्यक्त्वीके असंख्यात गुण अधिक होती है.
२ इनसे देशविरातिके असंख्यात गुण अधिक निजरा.
३ इनसे-प्रमत संयतिके असंख्यात गुण अधिक यिर्जरा.
४ इनसे-अनन्तालबन्थि चौक बिसं जोजी जीवके असंख्यात गुणी
निर्जरा.
५ इनम-क्षायिक सम्यक्त्वी के असंख्यात गुणी निर्जरा.
६ इनमे-उपशम श्रेणी वालेके असंख्यात गुणी निर्जरा.
७ इनसे-उपशान्त कपाय बालेके असंख्यात गुणी निर्जरा.
८ इनम-भपक श्रेणी वाले के असंख्याव गुणी निर्जरा.
९ इनमीण कपाय चालेके असंख्यात गुणी निर्जरा.
१० इनम-मयोगी पावली के अमख्यात गुणी निर्जरा.
आर ११ इनगे-अयोगी कंवलीक असंख्यात गुण अधिक निर्जरा.
परम पुज्य श्री कहानी ऋषिजी महाराजकीमम्प्रदायके बाल
ब्रम्हचाग मुनि श्री अमालव ऋषिजी महागज विरचित गुणस्थान
गहण अागताग ग्रन्थक प्रथम मूल काण्डका कर्गद्वारा रोहण
नामक दितीय ग्वाद.
समामम
.
ane
-
---
--
,
-
mauni

२११ ब ॐ नही . Panon- तृतीय खण्ड-संसार हा संसारा रोहण खण्डक, १ आगतिद्वार, २ जागतिहार, द्वार, ५ पाजातिद्वार, ६ जाजातिका द्वार, ९ जाकायादार. १० आदंडाला दंडकद्वार, १३ सामन्य जीव भेदना जीवयोनिद्वार, २६ कुलकोडी डाग. स्थावर दार. ११ सनिअसन्नि द्वार: हारका नाहारकद्धार, २२ ओजादि हार द्वार. २४ दिशी आहारडार :... २७ प्रणबार, २८ इन्द्रियहार - ३१ वेदद्धार, ३२, कपायद्धार.:: रीर द्वार. ३६ संघयण द्वार. 10 र अधिग्रहगति नगर. ४० स्वर्गमा वन नों में चार काया .. १७. प्रथम एकत्रम का गति के तीनों द्वारा 1st पृष्ट २९ near- मुक्ति मापान थी गुणगान गडग गीगना . । - --- ~ । - चारोंही गतिके जीवों मनुष्यगतिमें आकर नउदेही गुणगानों स्पर्श सकते हैं. १७२, दुसरा पागति द्वार. मिथ्यात्वसे अविरति गुणस्थान पर्यन्त चारों गतिक जीव पाते हैं. क्षेशविरति गुणस्थानमें मनुष्य और तिर्यन यह दो गति ही पातहे प्रमत संयातिसे अयोगी केबालीतक-एक मनुष्यगति पाने हैं. १७३, तीसरा जा गति द्वार मिथ्यात्व गुणस्थान नाले-मरकर चारों गति में जाते है. सास्वादन गुणस्थानबाले नरक विना तीनों गति में जावे. मिश्र गुणस्थान बाले मरते ही नहीं है. अविरति गुणस्थानवाले-मनुष्य और देव दोनों गतिमें जाने. देशनिरति से उपशान्त मोह गुणस्थानबाले एक देवगतिमें जावे. क्षीण मोह और सयोगी केवली गुणस्थान बाले मरतेही नहीं है. अयोगी केवली गुणस्थानबाले एक मोक्ष में जावे. १७४, चौथा-आजाति द्वार जाति ५ है-१ एकेन्द्रिय, २ बेन्द्रिय, ३ तेन्द्रिय, ४ चौरिन्द्रिय. और ५ पचेन्द्रिय. मिथ्यात्व गुणस्थानसे प्रमत गुणस्थानतक पांचों जातिका आचै- अप्रमतसे अयोगी केवली गुणस्थान तक एकेन्द्रिय और पचेन्द्रिय दो जाति का आवे. १७५, पांचवा-पाजाति बार छ जातिके तीनों द्वारोंका खुलासेके लिये देखीये अर्थ कांडका पृष्ट २९६ वा. ,

४११
द्वितीय मूल काण्डका-दुमरा खन्ड कर्म द्वारा रोहण र
मिथ्यात् गुणस्थान में पांचों जाति पावे.
सास्वादन गुणस्थानमें-एकेन्द्रिय विना चारों जाति पावे.
मिश्रसे क्षीण मोह गुणस्थान तक-एक पचेन्द्रियकी जाति पावे.
सयोगी अयोगी केवली गुणस्थानमें जाति नहीं-नो इन्द्रिय हैं.
१७६. छठा जा जाति द्वार
मिथ्यात्व गुणस्थान वाला पांचों जाति मैं जावे.
सास्वादन गुणस्थान वाला एकेन्द्रियविना वार जाति में जावे.
मिश्र, क्षीणमोह, सयोगी केवली. इन तीनों गुणस्थान वाले मरेनही
अविरति से उपशान्त मोह गुणस्थान वाले एक पत्रेन्द्रियमें जावे.
अयोगी केवली गुणस्थान वी १ मोक्ष में ही पधारते हैं.
१७७ साववा-आ काया बार.
काया ६ हैं:-पृथ्वीकाय,२अपकाय, ३तेउकाय, ४ वायुकात्र, ५ वन
स्पतिकाय, और त्रसकाय.
मिथ्यात्व सास्वादन और मिश्र इन तीनों गुणस्थानों में
६ काया के जीवों आते हैं.
अविरति से अयोगी केवली तक तेउ वायु छोडकर चार काया
के जीव आते हैं.
१७८ आठवा पा काया बार
मिथ्यात्व गुणस्थान में छेही काया के जीव पाते है.
सास्वादन से अयोगी केवली गुणस्थान तक एक त्रस का
या केही जीव पाते हैं.
काया के तानों द्वारोंके मुलाने के लिये देनीये अर्थ कांडका पृष्ट २२.८ वा.
,
.

म. मुक्त सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अढीगत द्वारी
!
न
११५, नववा-जा काया द्वार.
मिथ्यात्व गुणस्थान वाला छेही काया मे मर कर जावे.
सास्वादन गुणस्थान वाला एक त्रस काया में जावे.
मिश्र क्षीणमोह सयोगी केवली इन तीनों गुणस्थान वाले मरेनही.
अविराति से उपशान्त मोह गुणस्थान तक के एक त्रस कायमे जावे
और अयोगी केवली गुणस्थान वाले एक मोक्ष में जावे.
१८०, दसवा आ दंडक द्वार
दंडक २४ हैं-:१ सातों नरक का एक दंडक, १० दशोभव
नपति देवके दश दंडक, ५ पांचों स्वाथर के पांच दंडक, ३ तीनों
विक्केन्द्रिय के तीन दंडक,तिर्यच पचेन्द्रिय का.?मनुष्यका, १ वा-
णव्यन्तर का, १ जोतिपी का और १ विमाणीक देवोंका यों २४-
मिथ्यात्व गुणस्थान में चौबीस ही दंडक के जीवों आतेहें
सास्वादन से अप्रमत गुणस्थान तक तेउवाय विना २२
दंडक के जीव आवे.
अपूर्व करण से अयोगी केवली तक तीन विक्लेन्द्रिय वि-
ना १९ दंडक के जीव आवे.
१८१, इग्यारवा पा दंडक बार
मिथ्यात्व गुणस्थान में चौबीस ही दंडक पावे.
सास्वादन मिश्र में पांच स्थावर विना १९ दंडक पावे.
अविरति गुणस्थान में तीन विक्लोन्द्रिय विना १६ दंडक पावे.
देशविरति गुणस्थान मे १ मनुष्यका और तिर्यंचका २ दंडक पावे
कि दडक के तीनों द्वारके खुलासे के लिये देखीये अर्थ कांड पृष्ट २०८ वा.

द्वितीय मूल काण्ड-दूमरा खण्डकर्म द्वारा रोहण र प्रमत से अयोगी केवली गुणस्थान तक एक मनुष्यका दंडक पावे १८२ वाखा-जादंडक बार. मिथ्यात्व गुणस्थान वाले चौवीस दंडक में जाते है. सास्वादन गुणस्थान वाले ५ स्थावर विना १९ दंडक में जाते हैं. मिश्र.क्षीण मोह, सयोगी केवली इन तीनों गुणस्थानवाले मरेनही अविरति गुणस्थानी पांच स्थार तीन विक्लन्द्रिय विना १६ दंडक में जावे. देशविरति से उपशान्त मोह गुणस्थान वाले एक विमानी क देव में जावे. अयोगी केवली गुणस्थानी मोक्ष में ही पधारते हैं. १८३, तेवा-सामान्य जीव भेद द्वार सामान्य जीवोंके १४ भेदः- १ सूक्ष्म एकेन्द्रिय, २ वादर एकेन्द्रिय, ३ वेन्द्रिय, ४ तेन्द्रिय, ५ चौरिन्द्रिय, ६ असन्नी पचेन्द्रि य, औरं७ सन्नी पचेन्द्रिय, इनके अपर्याप्ता और७ के पर्याप्ता यों १४ भेद होते हैं. मिथ्यात्व गुणस्थान में जीवके भेद १४ ही पावे. सास्वादन गुणस्थान में : वन्द्रिय. १ तेन्द्रिय. १ चारिन्द्रिय और १ असन्नि पचेन्द्रिय, इनट का अपर्याना और५ मन्नी पचेन्द्रि यका पर्याता और ६ अपर्याप्ता दोनों यों ६ जीवको भेद पावे. | मीगुणस्थानमें-' जीवका भेद मन्नीका पर्याप्ताही पावे. जीवके भेदके दोनों द्वागेका मुलामके लिये देवीये अर्थ तांडका पृट-११वा यहां ९ लोकनिक देव अधिपति दोही ब्रहण कि. नार उनके परिवारली.

४९४ 1. * माक्त सोपान-श्री गणस्थाना राहणे अढाशतद्वारी र अविरति गुणस्थानमें-सन्नीका पर्याप्ता अपर्याप्ता दोनों भेद पावे. देशविरति से अयोगी केंवली गुणस्थानतक-' सन्नीका पर्याप्ता पावे चउदवा-विशेष जीव भेद बार विशेष ५६३ जीबके भेद-१४ नरकके, ४८ तिर्यच के, ३०३ मनुष्य के, और १९८ देवता के यों ५६३ जीव के भेद होते हैं. मिथ्यात्व गुणस्थान में-५ पांच अनुत्तर विमान और ९ लोकान्ति- क देव इन १४ का पयाप्ता अपर्याप्त यों २८ विना१७० भेद पावे. सास्वादन गुणस्थान में-७ नरक के पयाप्ता, + ३ विक्लन्द्रिय, ५ असन्नी तिर्यच पचेन्द्रिय इन ८ के अपर्याप्ते, औरै ५ पांच सन्नि तिर्यंच पचेन्द्रिय के पर्याप्त अपमाप्त दोनों, यो १८ तिर्यचके, १०' समुत्छिम मनुष्यविना २०२ मनुष्य के और ऊपरोक्त १७० देवता के यों ३१७ जीवके भेद पावे. मिश्र गुणस्थान में-७ नरकके पर्याप्ते, " सन्नि तिर्यचके पर्याप्ते १०१ सन्नि मनुष्य के पर्याप्त. ऊपरोक्त १.७° देवताके भेदों में से ८५ भे- दोंमें से ८५ भेद अपर्याप्त के कमी करने से ८५ भेद देवताके यों सव १९८ जीवके भेद पाने. अविरति गुणस्थान में-सातवी नर्कके अपर्याप्ता विना =न रकके १३ भेद, १० सन्नी तिर्यंच पचेन्द्रिय के. १५ कर्म भूमी, देव कुरु, ५ उत्तर कुरु २५ के पर्याप्ता, अपर्याप्ता ५० मनुष्य के, और १५ परमाधामी, ३ किलविषी इन १८ देवताके पर्याप्ता अप- प्ति यो ३६ भेद कमी करने से-१९२ देवता के, यो सब २३५ जी दके भेद पाते हैं. + नरकानुपूर्तीका उदय सास्वादन में न होनेसे अपर्याप्ता अवस्था में नहीं पाता है. = मम्यक दृष्टि मातवीमें जाता नहीं. परन्तु वहां वेदना अनुभवसे समदृपि होजाताह.

४९५ द्वितीय मूल काण्ड-दुसरा खण्ड कर्म द्वारा रोहण देशविरति गुणस्थान में-५ सन्नितिर्यंच के और १५ कर्मा भूमी मनुष्य के यों २० भेद पावे. प्रमतसे अयोगी केवली गुणस्थानतक फक्त-१५ कर्मा भूमी मनुष्य के ही भेद पाते हैं. १८५, पंदवा-जीव योनी द्वार पृथ्वी-अप-उ-बाउ इन चारों की ७-७ लाख यो ७४४ २८, वन- स्पति की २४ लाख. वेन्द्रिय-तेन्द्रिय चौरिन्द्रिय इन तीनों की २- २ लाख यों २४३६ लाख, पचेन्द्रिय तिर्यचकी ४ लाख. नरक की ४ लाख, देवताकी ४ लाख और मनुष्यके १४ लाख. यों सव ८४ लाख जीवोंकी योनी इसमें से. मिथ्यात्व गुणस्थानमें ८४ लाख ही जीवा योनी पावे. सास्वदन गुणस्थानमें-पांचों स्थावरों की ५२ लाख विना ३२ लाख पावे. मिश्र और अविरति में-तीनों विक्लन्द्रियकी ६ लाख विना २ लाख पावे. देशविरति में ४ लाख तिर्यंच पचेंन्द्रियकी और १४ लाख मनुष्यकी यों १८ लाख पावे. प्रमत से अयोगी केवली गुणस्थानतक-१४ लाख मनुष्य की ही पावे. १८६ सोलवा-कुलकोडी बार. प्रथवी कायके १२ लाख कोड अपकायके ७ लाख कोड E जीवयोनी द्वारोंका मुलाने के लिये देखीये अब कांटका पृष्टः०० ग कुल कोडी द्वारका सुन्दामा देखीये अर्य कांडका पृष्ट १ वा. . " ४९६ * मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान राहेण अहीशतद्वारी ५ तेउ कायके ३ लाख कोड वायु कायके ७ लाख क्रोड, वनस्पतिके २८ लाख क्रोड, बेन्द्रियके ७ लाख कोड, तेन्द्रियके ८ लाख क्रोड चौरिन्द्रिय ९ लाख कोड, जलचरके १२|| लाख क्रोड, स्थल चरके १० लाख कोड, खेचरके १२ लाख कोड. उरपरके १० लाख क्रोड, भुजपरके १ लाख कोड, नरकके २५ लाख कोड देवताके २६लाख क्रोड, और मनुष्य के १२ लाख कोड, यो सब १ एक क्रोड साडी संताणवे लाख कोड कुल होते है इसमेंसे. मिथ्यात्व गुणस्थान में-१ कोड ९७॥ लाख क्रोडही कुल पाते हैं. सास्वादन में-५७ लाख क्रोड पांचों स्थावरके विना-१ कोड ४०॥ लाख कोड कुल पावे. मिश्र और अविरतिमें-२४ लाख कोड बिक्लोन्द्रिय विना-१ कोड१६॥ लाख कोड कुल पावे. देशविरतिमें-५३॥ लाख क्रोड तिर्यंच पचेन्द्रियके, और १२ लाख कोड मनुष्य के दोनों मिल ६५॥ लाख कोड कुल पावे. प्रमतसे अयोगी केवलीतक-१२ लाख कोड मनुष्यकेही कुल पावे. १८७, सतरवा-सुक्ष्मबादर द्वार मिथ्यात्व गुणस्थान में सूक्ष्म बादर दोनों तरह के जीवों पावे. सास्वादनसे अयोगी केवली गुणस्थानतक-एक वादर जीव पावे. १८८, अठारवा त्रस स्तावर द्वार मिथ्यात्व गुणस्थान में-त्रस और स्थावर दोनों तरहके जीव पावे. सास्वादनस अयोगी केवली गुणस्थानतक-एक त्रस जीव पावे. १८०. उन्नीसवा सन्निअसन्नि बार > मूक्ष्म वाटर द्वारका मुलामा देखीये अर्थ कांडका पृष्ट ३०० वा. वन म्यावर और मन्नी अमत्री द्वारका खुलामा देखीये अर्थ कांडका पृष्टया

४२७
* द्वितीय मूल कान्ड-दुसग खन्ड कर्म द्वारा रोहण
मिथ्यात्व और सास्वादन दोनों गुणस्थानमें-सन्नि असन्नि दोनों पावे
मिश्रसे क्षीणमोह गुणस्थानतक-एक सन्नीही जीव पाते है.
सयोगी अयोगी केवली गुणस्थान वाले नो सन्नी नाअसन्नि.
१९०, बीसवा भाषक अभाषक द्वार
मिथ्यात्व, सास्वादन, अविरति, और सयोगी केवली इन चारों गु
णस्थानोंमें भाषक अभाषक दोनों प्रकार के जीवों पावे.
मिश्र, देशविरति से क्षीण मोह गुगस्थानतक-एक भापकही होते
अयोगी केवली गुणस्थानी-अभापक होते हैं.
१९१, इक्कीसवा आहारक अनाहारक बार
मिथ्यात्व. सास्वादन, अविरति और सयोगी केवली ४ इन चारों
गुणस्थानों में आहारक अनारक दोनों प्रकारके जीवों पाते हैं.
मिश्र, देशविरतिसे जावत क्षीणमोह गुणस्थानतक-एक आहारक
ही जीव पाते है.
अयोगी केवली गुणस्थान वाले-एक अनाहारक होते हैं.
१९२, वावीसवा-आजादि आहार बार.
आहार ३ प्रकार का. १ ओज. २ रोम. ३ कवल.
मिथ्यात्व, सास्वादन और अविरति इन तीनों गुणस्थानोवाले. ती
नों प्रकार का आहारलेते हैं.
मिश्र. देशबति से जावत सयोगी केवली गुणस्थान वर्ती जीवो
,
भापक अभापक द्वारका मुलामा देवीये अर्थ कांडका पृष्ट वा.
अहारके तीनो द्वारका मुलाना देखीये अर्थ कांडका पृष्टः ना.
xमयोगी केवली केवल ममुदयान करनी वक्त वीचके समय में अनाहारक होने?.
I
१

४९६ ३ * मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान राहेण अहीशतद्वारी तेउ कायके ३ लाख क्रोड वायु कायके ७ लाख क्रोड, वनस्पतिके २८ लाख क्रोड, बेन्द्रियके ७ लाख कोड, तेन्द्रियके ८ लाख कोड चौरिन्द्रिय ९ लाख कोड, जलचरके १२|| लाख क्रोड, स्थल चरके १० लाख कोड, खेचरके १२ लाख कोड. उरपरके १० लाख क्रोड, भुजपरके ९ लाख कोड, नरकके २५ लाख कोड देवताके २६लाख कोड, और मनुष्य के १२ लाख कोड, यो सव १ एक क्रोड साडी संताणवे लाख कोड कुल होते है इसमेंसे. मिथ्यात्व गुणस्थान में-१ कोड ९७॥ लाख क्रोडही कुल पाते हैं. सास्वादन में-५७ लाख कोड पांचों स्थावरके विना-१ कोड ४०|| लांख कोड कुल पावे. मिश्र और अविरतिमें-२४ लाख कोड विक्लन्द्रिय विना-१ कोड१६॥ लाख कोड कुल पावे. देशविरतिमें-५३॥ लाख क्रोड तिर्यंच पचेन्द्रियके, और १२ लाख कोड मनुष्य के दोनों मिल ६५॥ लाख कोड कुल पावे. प्रमतसे अयोगी केवलीतक-१२ लाख कोड मनुष्यकेही कुल पावे. १८७, सतरवा-सुक्ष्मबादर द्वार मिथ्यात्व गुणस्थान में सूक्ष्म बादर दोनों तरह के जीवों पावे. सास्वादनसे अयोगी केवली गुणस्थानतक-एक बांदर जीव पावे. १८८, अठारवा त्रस स्तांवर द्वार मिथ्यात्व गुणस्थान में त्रस और स्थावर दोनों तरहके जीव पावे. सास्वादनसे अयोगी केवली गुणस्थानतक-एक त्रस जीव पावे. १८९ उन्नीसवा सनिअसन्नि बार ॐ सूक्ष्म वाटर द्वारका खुलासा देखीये अर्थ कांडका पृष्ट ३०१ वा. वस स्थावर और सन्नी अमन्त्री द्वारका खुलासा देखीये अर्थ कांडका पृष्ट३१२वा ,

,
द्वितीय मूल काण्ड-दूमरा खण्डकर्म द्वारा रोहण र
२०१, इकतसिवा वेद बार
वेद ३ हैं:-१ स्त्री. २ पुरुष. और २ नपुंसक.
मिथ्यात्व से अनायट्ट वादर गुणस्थान तक तीनों वेदो पावे.
सूक्ष्म सम्पराय से अयोगी केवली गुणस्थान तक अवेदी हैं.
२०२. बत्तीसवा-कषाय द्वार
कपाय ४ हैं:-१ क्रोध. २ मान. ३ माया. और ४ लोभ.
मिथ्यात्व से अनीयट्ट बादर गुणस्थान तक चारों कपाय पावे.
सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थान में एक लोभ कपाय.
उपशान्त मोह से अयोगी केवली गुणस्थान तक अपायी.
तेंतीसवा लेश द्वार
लेशा ६ हैं:-१ कपण. २ नील, कापोत. "तेज. "पन्न, और शुक्ल.
मिथ्यात्व से प्रमत गुणस्थान तक ६ ही लेल्या.
अप्रमत गुणस्थान में उपरकी शुभ तीनों लेल्या पाव.
अपूरे करण से सयोगी केवली गुणस्थान तक ? शुक्ल लेश्या पावे.
अयागी केवली गुणस्थान वर्ती अलेशी होते हैं.
२०४,-चौतीसवा योग बार
योग तीन १ मन, २ वचन. और ३ काया
भिव्यात्व से स्वादन गुणस्थान में जघन्य ?, मध्यम २. उत्कृष्ट ३,
ही जोग पावे
२०३,
; नजावेद शापाप..न नीनों द्वाशामलमा निर देनीगंटका घटना.
और दोनहार लेटवा. दाता मुलाना देनी नई शंका पटवा
:
.

-------- २ २०६ , मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अहीशन द्वारी 2 मिश्रस सयोगी केवली गुणस्थान तक तीनों जोग पावे. अयोगी केवली गुणस्थान वर्ती तो अजोगी ही होत. २०६ पैतीसवा-शरीर द्वार शरीर ५ हैः-१ ओदारिक २ वैक्रिय, ३ अहारक, ४ तेजस और ५ कार्मण मिथ्यात्व से अविरति गुणस्थान तक आहारक विन ४ शरीर पावे प्रमत और अप्रमत गुणस्थान में पांचों शरीर पावे. अपूर्व करणसे अजोगी केवलीतक वैकिय आहारक धिना ३ श- रि पावे. छत्तीसवा-संघयण दार. संघयण ६ हैं:-१ वज्र वृषभ नारच, २ वृषभ नारच, ३ नारच, अर्ध नारच, ५ किलिक, और ६ छेवटा. मिथ्यात्वसे अप्रमत गुणस्थानतक, ६ ही संघयण पावे. अपुर्व करणसे अयोगी केवली गुणस्थानतक-१ बजू वृपभ नारच संघयण. संतीसवा-संठाण बार. संस्थान ६ हैं. ? समचतुरंस,२ निग्रोद्ध परिमंडल, ३ साधिक, वाय न, ५ कुञ्ज, और ६ हूंड. मिथ्यात्वसे अयोगी केवली गुणस्थानतक, ६ ही संस्थान पावे. अडतीसवा-मरण बार 15 शरीर द्वार के खुलामेकं लिये देखीये अर्थ कांड का पृष्ट ३०८ वा. संघयण द्वारोंके खुलामकलिये देखीये अर्थ कांडका पृष्ट३०१वा. मंस्थान द्वारका खुलामा देवीये अर्थ कांडका पृष्ट ३१० वा.

-- द्वितीय मूल काण्डका-दुसरा खन्ड कर्म द्वारा रोहण र मरण २ प्रकार के समोया, और २ असमाया. मिथ्यात्व,सास्वदन अविरतसे अनियटा वादरतक-दोनों माणपावे. मिश्र क्षीण मोह सजोगी केवली. इन तीनों गुणस्थानोंसे गरनहीं, सुक्ष्म सम्पराय और उपशान्त मोह में और अयोगी केवली गुण- स्थान में-१असमाहा मरण पाता है. उनचालीसवा विग्रहगति बार मरण नन्तर गति २ तरह की-१ विग्रह (वक्र). और ऋचारल. मिथ्यात्व, सास्वादन. अविरतिसे उपशान्त मोहतक-दोनोंमति करे मिश्र, क्षीण मोह सयोगी केवली यह तीनो गुणस्थानी मरे नहीं. अयोगी केवली गुणस्थान वर्ती-१ ऋजु गति ही करे. चालीसवा मरण द्वार स्वर्ग २६ हैं-१२ देवलोक, ९ ग्रीवेक, ५ अनुत्तर विनान, मिथ्यात्व गुणस्थान वाले-६ अनुत्तर विमान विना२१स्वर्गतक जावे सास्वादन, अविरति और देशविरति. तीनों गुणस्थानी १२ स्वर्ग तक जावे. मिश्र. क्षीण मोह और सयोगी केवली मरेही नहीं प्रमतसे अनियट वादर गुणस्थानतक-२६ ही स्वर्ग में जावे सूक्ष्म संपराय और उपशांत मोहवाले पांचों अनुत्ता विमानमें जावे और अयोगी केवलीतो मोक्षमें ही पधारते हैं. २११, एकचालीसवा-पठस्थान वृद्धि द्वार IF मरण विग्रहगति और खंगकी मयाद इन तीनो द्वारका बलामा देखीये अर्थ कांडका पृष्टः ११ वा पटस्थान हानी वृद्धि द्वारोंका खुलामके लिये देखीये भई कांडा पृष्ट२१२वा "

--
५०४
मुक्ति सोपान श्री-गुणस्थान रोहण अढीगतदाग १
+----
पंटस्थान-१संख्यातगुण,२असंख्यात, अनन्त गूण, संख्यात भाग,
५असंख्यात भाग और ६ अनन्त भाग.
मिथ्यात्व से अपूर्व करण तक-आपसमें छे स्थान बढीये होते हैं।
अनियट बादर से अयोगी केवलीतक-आपस में तुल्य होते हैं.
परम पूज्म श्री कहानजी ऋपिजी महाराजके सम्प्रदायके बाल
ब्रम्हचारी मुनि श्री अमोलख ऋषिजी महाराज रचित
गुणस्थान रोहण अरशत दारी ग्रन्थका प्रथम मूल काण्ड
का संसारा रोहण द्वार नामक तीसरा खंड
CAMOR
समाप्तम

। TAGE S ॐ चतुर्थ खण्ड-धर्म रोहण धर्मा रोहणके ४१ द्वारोंके नाम. १मुल उपयोगबार २ अज्ञानद्वार. ३ ज्ञानदार, ४ दर्शनद्वार ५ समुचय उपयोगद्वार, ६ दृष्टिबार, ७ भव्याभव्यद्वार, ८ चरमा- चरमद्वार, ९ परितापरितद्वार, १० पद्धीद्धार, ११ आत्माद्धार, १२ध्या नद्वार, १३ ध्यानके पयेद्वार, १४ द्रव्यद्धार, १५ परिणामदार, १६ वीर्यद्वार, १७ तीर्थातीर्थद्वार, १८ सम्यक्त्वद्वार, १९ संजाता संजा. तिद्वार, २० लिंगद्धार, २१ चारित्रद्वार, २२ नियंठादार, २३ कल्प- द्वार, २४ परिसहबार, २५ प्रमादद्वार, २६ सरागी वीतरागीदार, २७ पडवाइ अपडवाइद्धार, २८ छमस्तकेवलीद्धार,२९ समुदघातद्धार ३० पांचदेवद्धार. ३१ परिणामीदार, ३२ करणद्वार, ३३ करणद्वार, ३३ निवृत्तिदार, ३४ आश्रवद्धार. ३५ संवरद्वार ३६ निर्जराद्वार. ३७ निर्जराभेदर र. ३८ करणीफलद्वार- ३९ तीर्थकर गात्रापार्जनदार, ४० तीर्थकर गुणस्थान स्पर्शनद्वार, और ११ मोनद्धार. २१२,प्रथम-मूल उपयोग बार. मूल उपयोग दो- साफर वहृत और अनाकार बहुता. - उपयोग द्वारका मुलाना देवीचे अर्थ कांडका पृष्ट या.

न 1 -- + २ . - - Pr . rometer M " I मुक्ति मोपान-श्री गणस्थाना राहणे अहाशतदारी मियान्वमे आनियट बादर गुणस्थानतक-दोनों उपयोग पावे. साम मगराय गुणस्थानमें-एक साकर बढ़ता उपयोग पावे.x कमाल मोहसे अयोगी केवली गुणस्थानतक-दोनों उपयोग पाने २१, दुसरा अज्ञान द्वार. समान २-१ मनि अज्ञान-२ शुति अज्ञान. ३ विभंग ज्ञान. मान और मिश्र गणम्यान-तीनी अज्ञान पावे. मना गमायानाम-अजान नहीं पावे. २११. तीमग-ज्ञान यार 2. अनिअवधि, ४ मनः पर्यव, और कनन्द जय गणयान में-जान नहीं. मकान चिनि आम्दाधिगत गणम्थानम लिनानी दान प्रमोद गगम्याननक कबर विना चालान. मांगी कवली गणम्थानी में-गक कचल, मान. १. चौथा-दर्शन बार टश अधि. और किया. मंदयाननकल बिना ताना मारपद, अकया गयान में कमी १६. पांचवा समुचय उपयोग कर ":::: ....... i १ T I M । अर . है

32
द्वितीय मूल काण्ड-दुसरा खण्ड कर्म द्वारा रोहण
सास्वादन. अविरति. और देशविरातिमें-ज्ञान.३ दर्शन यह उपयोग
प्रमतसे क्षीण योह गुणस्थानतक ज्ञान दर्शन यह ७ उपयोग.
सयोगी और अयोगी केवलीके- केवल ज्ञान,और २ केवल दर्शन
२१७. छठा, दृष्टि द्वार
दृष्टि है-१समदृष्टि. २ मिथ्यादृष्टि और २ सममिथ्यादृष्टि.
मिथ्यात्व गुणस्थानमें-१ मिथ्यादृष्टि.
मिश्र गुणस्थानमें-' मिश्र दृष्टि.
सास्वादन. अविरतिसे अयोगी केवलीतक-एक समदृष्टि.
२१८, सातवा भव्याभव्य द्वार
मिथ्यात्व गुणस्थानमें-भव्य अभव्य दोनों तरह के जीवों हैं.
सास्वादनसे अयोगी केवली गुणस्थानतक-एक भव्व जीवों
२१९ आठवा चरमाचरम द्वार
मिथ्यात्व गुणस्थान में-चरम अचरम दोनों तरह के जीवों.
सास्वादनसे अयोगी केवली गुणस्थानतक.एक चरम जीवों
२२०. नववा परितापरित द्वार
मिथ्यात्व गुणस्थानमें परित अपरित दोनों तरह के जीवों.
सास्वादनसे अयोगी केवली गुणस्थानतक-एक परत संसारी जीवों.
२२१ दसवा पनी द्वार
पदी २३ है-७ एकेंद्रियरतन, ७ पचेन्द्रियरन, और ९ बडी पद्धी.
मिथ्यात्व गुणस्थान में-७ एकेंद्रियरन, ७ पचेन्द्रियरन' मंडलिक यों
१५ पदी पावे.
.
-
दृष्टि,भन्याभव्य, चरमाचरम परिनापरित, और पदीका खुलामा अर्थ कांडके पृष्ट३'

। - -~- मुक्ति मापान श्री गुणस्थान रोहण अहीशतहारी सास्वदन और मिश्र गुणस्थान में १ मांडलिकराजकी पदिपावे. अविराति में तीर्थकर, चक्रवर्ती, बलदेव, वासुदेव. मंडलिक, गजा. ममदादि यह ६ पावे. विगत में १ श्रावककी और २ समीकी यह २ पड़ी पावे. चामे गम माम्परागतक तिर्थकर, साघ, समदृष्टि यह ३ पत्री पाने पमान मा में ? ममपि ओर २ सयुकी यह २ पत्री पाने. मार में नानार. मान. जोर समष्टि यह ३ पट्टी पाये. मामी और जगांगी कवली में तीर्थकर, केवली, गार, स ":"पापा ., ग्यारवा आत्मा द्वार मा-मामापागामा, जगात्मा. १ उपयांगागा, " ::Tीनामा, " चन्त्रिामा नारदानगर :: :: माणस्थान में बानामा, चन्त्रिात्मा, विना, १ . wtopite--- : . निमाम्यानमें चन्त्रि विना आमा पार नीबानग्लिहान मा आमा पाय THान नक आदींनी आमा पार कवी गास्थानकाय निनामा काय मागविना सामान " चारचा ध्यान द्वार म मात्र 7 - 7 Pantarvasna --- ५०९ द्वितीय मूल काण्ड-दूसरा खण्डकर्म द्वारा रोहण कर भिध्यात्व गुगस्थान में १ आर्त और २ रौद्र ध्यान पावे. सास्वादन और मिश्र गुणस्थान में निश्चयमें २ और व्यवहारमें , अविरति और देशविरति गुणस्थान में शुक्लविना : ध्यान. प्रमत गुणस्थान में आर्तध्यान और धर्मध्यान २ ध्यान. अप्रमत गुणस्थान में एक धर्म ध्यान. अपूर्व करण से सूक्ष्म सम्पराय तक धर्म और २ शुक्ल ध्यान उपशान्त मोह से अयोगी केवली तक एक शुक्ल ध्यान. x २१३. तेरवा ध्यान पाये हार. ध्यानके १६ पाये-आर्तके ४, रौद्रके ४ धर्मके ४, और शु- क्लके ४ यों १६ पायेचा ध्यानके मिथ्यात्व गुणस्थान में आर्तके ४ और रौद्रके ४ यों८ पाये पावे. सास्वादन और मिश्र में धर्मध्यान का १ पाया बढने से ९. पावे. अविरति गुणस्थान में धर्मध्यानके २ पाये होनेसे १० पावे. देशविरति गुणस्थान में धर्मध्यानके ३ पाये होनेसे ११ पावे. प्रमत गुणस्थान में आतच्यानके ४ और धर्मध्यानके ४ यो ८ पावे अप्रमत गुणस्थानमें धर्मध्यानके ४ ही पावे. अपूर्व करण से सूक्ष्म सम्पराय तक धर्मध्यानके ४ और शु क्लध्यान १ यो५ पाये पावे. उपशान्त मोह गुणस्थान में शुक्लध्यान का एक पहला पाया. क्षीणमोह गुणस्थान में शुक्लध्यानका एक दूसरा माया. सयोगी केवली गुणस्थान में शुक्लध्यानका एक तीसरा पाया. + कितनेक स्थान लिखा है गि-साधु विना धर्म ध्यान की नास्ति होनेने पहिलेके पांचों गुणत्यान में पहिले दो ध्यान ही पातेहे. तेने ही आठवे गुणस्यान मे ऊपर ए- क शुक्ल ध्यान ही पाता है. और ऐसे ही पाये आश्रिय भी पाटान्नर है. म

३
३
६१०
मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अहीशन द्वारी
अयोगी केवली गुणस्थान में शुक्लथ्यानका एक चौथा पाया.
२२५, चऊदवा-द्रव्य दार
द्रव्य ६ हैं धर्मास्ति; अर्धमास्ति, आकास्ति, काल, जीवस्ति,
और पुद्गलास्ति.
मिथ्यात्व गुणस्थान से अयोगी केवली गुणस्थान तक छेही द्रव्य,
पावे.
२२६, पंदरवा-परिणाम द्वार.
परिणाम ३ है-१ हायमान, २ बृद्धिमान, और ३ अवस्थित.
मिथ्यात्व गुणस्थानमें तीनों तरह के परिणाम.
सास्वादन गुणस्थानमें एक हायमान परिणाम.
मिश्रगुणस्थानमें-हायमान और वृद्धमान दोनों परिणाम.
अविरातिसे अनियट बादर गूणस्थानतक-तीनों तरहके परिणाम.
सुक्ष्म संम्पराय गुणस्थान में-हायमान बृद्धमान दोनों परिणाम.
उपशान्त मोह गुणस्थान में-एक अवस्थित परिणाम.
क्षीणमोहसे अयोगी केवली गुणस्थानतक एक वृद्धिमान परिणाम
२२७, सोलवा-
सोलवा-वर्य दार.
वीर्य ३ प्रकारके-१ वालवीर्य, २ वाल पंडितवीर्य,और३पंडित वीर्य
मिथ्यात्वमे अविरति गुणस्थान पर्यन्त एक बाल वीर्य.
देशविरति गुणस्थान में-एक वाल पंडित वीर्य.
प्रमतसे अयोगी केवली गुणस्थानतक-एक पंडित वीर्य.
द्रव्य द्वारका मुलामा देखीये अर्थ कांडका पृष्ट ३१७ वा.
परिणाम वीर्य नीर्थ ाग्मम्यक्त्व द्वारोंका गुलामैकेलिये देखीये अर्थकांडका पृष्टः १८

* द्वितीय मूल काण्ड-दूमरा खण्डकर्म द्वारा रोहण र
२२८, सतवा तीर्थातीर्थं बार
मिथ्यात्व सास्वादन, और मिश्र यह तीनों गुणस्थान अतीर्थ में.
अविरति से-सयोगी केवली गुणस्थानतक-तीर्थ में.
अयोगी केवली गुगस्थान-तीर्त तीर्थी है.
२२१, अठाराव-सम्यक्त्व बार
सम्यक्त्व ६हैः-सास्वादन, मिश्र, उपशम, क्षयोपशम. वेदक और
धायिक
मिथ्यात्व गुणस्थानमें-सम्यक्त्व नहीं.
सास्वादन गुणस्थानमें-एक सास्वादन सम्यक्त्व.
मिश्र गुणस्थान में-शक मिश्र सम्यक्त्व.
अविरतिसे अप्रमत गुणस्थानतक-उपरोक्त २ विना सम्यक्त्वपावे
अपुर्व करण और अनियट्ट बादर में-वेदक विणा सम्यक्त्व पाये
सूक्ष्मसम्पराय और उपशान्तमोहमें-उपशम, नायिकरसम्यक्त्वपावे.
क्षीणमोहमें अयोगी केवली गुणस्थानतक-एक नायिक सम्यक्त्व.
२३०८ उनीसवा संयतासंयती द्वार
मिथ्यात्वसे अविरति गुगस्थानतक-एक असंयति है.
देशविरति गुणस्थानवाले-एक संयतामंयति है.
प्रमतसे अयोगी केवली गुणस्थानतक एक मंयति ही हैं.
२३१. वसिवा-लिंग द्वार.
लिंग हैं.१ स्वलिंग. २ अन्यलिंग, और ग्रहलिंग.
यति. लि. और चाग्विक सुन्दारे लिये अर्थ शंना १९ वा पृष्ट देखिये
A

६१०
मुक्त सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अढीशन द्वारी
अयोगी केवली गुणस्थान में शुक्लध्यानका एक चौथा पाया.
२२५, चऊदवा-द्रब्य द्वार
द्रव्य ६ हैं धर्मास्ति; अर्धमास्ति, आकास्ति, काल, जीवस्ति,
और पुद्गलास्ति.
मिथ्यात्व गुणस्थान से अयोगी केवली गुणस्थान तक छेही द्रव्य.
पावे.
२२६, पंदरवा-परिणाम द्वार.
परिणाम ३ है-१ हायमान, २ बृद्धिमान, और ३ अवस्थित.
मिथ्यात्व गुणस्थानमें तीनों तरह के परिणाम.
सास्वादन गुणस्थानमें एक हायमान परिणाम.
मिश्रगुणस्थानमें-हायमान और वृद्धमान दोनों परिणाम.
अंविरतिसे अनियट बादर गूणस्थानतक-तीनों तरहके परिणाम.
सुक्ष्म संम्पराय गुणस्थान में-हायमान बृद्धमान दोनों परिणाम.
उपशान्त मोह गुणस्थान में-एक अवस्थित परिणाम.
क्षीणमोहसे अयोगी केवली गुणस्थानतक एक वृद्धिमान परिणाम
२.५, सोलवा-वर्य दार.
वीर्य ३ प्रकारके-१ वालवीर्य, २ वाल पंडितवीर्य,और३पंडित वीर्य
मिथ्यात्वमे अविरति गुणस्थान पर्यन्त एक बाल वीर्य
देशविरति गुणस्थान में-एक बाल पंडित वीर्य.
प्रमनसे अयोगी केवली गुणस्थानतक-एक पंडित वीर्य.
दव्य द्वारका ग्र्युलामा देवीय अर्थ कांडका पृष्ट ३१७ वा.
परिणाम-वार्य नीर्थ,औरमम्यक्त्व द्वारोंका मुलामेकेलिये देखीये अर्थकांडका पृष्टः १८

द्वितीय मूल काण्ड-दूमरा खण्डकर्म द्वारा रोहण कर
२२८, सतवा तीर्थातीर्थं बार.
मिथ्यात्व सास्वादन, और मिश्र यह तीनों गुणस्थान अतीर्थ में.
अविरति से-सयोगी केवली गुगस्थानतक-तीर्थ में.
अयोगी केवली गुगस्थान-तीत तीर्था है.
२२१, अठाराव-सम्यक्त्व बार
सम्यक्त्व हैः-सास्वादन, मिश्र, उपशम, क्षयोपशम. वेदक और
मायिक
मिथ्यात्व गुणस्थानमें-सम्यक्त्व नहीं.
सास्वादन गुणस्थानमें-एक सास्वादन सम्यक्त्व.
मिश्र गुणस्थान में-शक मिश्र सम्यक्त्व.
अविरतिसे अप्रमत गुणस्थानतक-उपरोक्त २ विना सम्यक्त्वपावे
अपुर्व करण और अनियट्ट वादर में-वेदक विणा सम्यक्त्व पाये
सूक्ष्मसम्पराय और उपशान्तमोहमें-उपशम. नायिकरमम्यक्त्वपावे.
क्षीणमोहमें अयोगी केवली गुगस्थानतक-एक नायिक मम्यक्त्व.
उनसिवा संयतासंयती दार
२३०६
मिथ्यात्वसे अविरति गुगस्थानतक-एक अमंयति हैं.
देशविरति गुणस्थानबाले-एक संयतामंयनि है.
प्रमतसे अयोगी केवली गुणन्धाननक एक मंयति ही हैं.
.:. वसिवा-लिंग द्वार.
लिंग हैं.१ स्वलिंग. २ अन्यलिंग. और हलिंग.
पनि विड. और चाग्दि मुनारे लिये य गंडा :१५ वा पृष्ट देगी

६१० A मुक्ति सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अढीशन द्वारी
अयोगी केवली गुणस्थान में शुक्लध्यानका एक चौथा पाया.
२२५, चऊदवा-द्रव्य द्वार
द्रव्य ६ हैं धर्मास्ति; अर्धमास्ति, आकास्ति, काल, जीवस्ति,
और पुद्गलास्ति.
मिथ्यात्व गुणस्थान से अयोगी केवली गुणस्थान तक छेही द्रव्यः
पावे.
२२६, पंदरवा-परिणाम बार.
परिणाम ३ है-१ हायमान, २ बृद्धिमान, और ३ अवस्थित.
मिथ्यात्व गुणस्थानमें तीनों तरह के परिणाम.
सास्वादन गुणस्थानमें एक हायमान परिणाम.
मिश्रगुणस्थानमें-हायमान और बृद्धमान दोनों परिणाम.
अंविरतिसे अनियट बादर गूणस्थानतक-तीनों तरहके परिणाम.
सुक्ष्म संम्पराय गुणस्थान में-हायमान वृद्धमान दोनों परिणाम.
उपशान्त मोह गुणस्थान में-एक अवस्थित परिणाम.'
क्षीणमोहसे अयोगी केवली गुणस्थानतक एक बुद्धिमान परिणाम
२२५, सोलवा-वीर्य बार.
वीर्य ३ प्रकारके-१ बालवीर्य, २ बाल पंडितवीर्य,और३पंडित वीर्य
मिथ्यात्वसे अविरति गुणस्थान पर्यन्त एक बाल वीर्य.
देशविरति गुणस्थान में-एक वाल पंडित वीर्य.
प्रमतसे अयोगी केवली गुणस्थानतक-एक पंडित वीर्य.
द्रव्य द्वारका खेलासा देखीये अर्थ कांडका पृष्ट ३१७ वा.
परिणाम वीर्य तीर्थ,औरसम्यक्त्व द्वारोंका खुलासेकेलिये देखीये अर्थकांडका पृष्टः १८

द्वितीय मूल काण्ड-दूमरा खण्डकर्म द्वारा रोहण १९
२२८, सतवा तीर्थातीर्थं बार
मिथ्यात्व सास्वादन, और मिश्र यह तीनों गुणस्थान अतीर्थ में.
अविरति से-सयोगी केवली गुणस्थानतक-तीर्थ में.
अयोगी फेवली गुणस्थान-तीत तीर्था है.
२२९, अठाराव-सम्यक्त्व बार
सम्यक्त्व हैः-सास्वादन, मिश्र. उपशम, भयोपशम. वेदक और
क्षायिक
मिथ्यात्व गुणस्थानमें-सम्यक्त्व नहीं.
सास्वादन गुणस्थानमें-एक सास्वादन सम्यक्त्व.
मिश्र गुणस्थान में-एक मिश्र सम्यक्त्व.
अविरतिसे अप्रमत गुणस्थानतक-उपरोक्त २ विना सम्यक्त्वपावे
अपुर्व करण और अनियट्ट वादर में-वेदक विणा मम्यक्त्व पाये
सक्ष्मसम्पराय और उपशान्तमोहमें-उपशम. नायिकरसम्यक्त्वपाव.
क्षीणमोहमें अयोगी केवली गुगस्थानतक-एक क्षायिक मम्यक्त्व.
उनसिवा संयतासंयती दार
२३००
मिथ्यात्वसे अविरति गुगन्धानतक-एक अमंयति हैं.
देशविरति गुणस्थानवाले-एक मयतानंयनि है.
प्रमतने अयोगी केवली गुणन्धाननक एक मंगति ही हैं
::. वीसवा-लिंग द्वार.
लिंग हैं.. म्वनिंग. २ अन्यनिंग. और लिंग
पनि लिइ. और पारिद गला दे दिदगंडका का पृष्ट देगि
-

६१०
.
- मुक्त सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अढीगत द्वारी र
अयोगी केवली गुणस्थान में शुक्लथ्यानका एक चौथा पाया.
२२५, चऊदवा-द्रव्य द्वार
द्रव्य ६ हैं धर्मास्ति; अर्धमास्ति, आकास्ति, काल, जीवम्मि
और पुद्गलास्ति.
मिथ्यात्व गुणस्थान से अयोगी केवली गुणस्थान तक छेही द्र
पावे.
२२६, पंदरवा-परिणाम बार.
परिणाम ३ है-१ हायमान, २ वृद्धिमान, और ३ अवस्थित.
मिथ्यात्व गुणस्थानमें तीनों तरह के परिणाम.
सास्वादन गुणस्थानमें एक हायमान परिणाम.
मिश्रगुणस्थानमें-हायमान और वृद्धमान दोनों परिणाम.
अंविरतिसे अनियट बादर गूणस्थानतक-तीनों तरहके परिणाम
सुक्ष्म संम्पराय गुणस्थान में-हायमान बृद्धमान दोनों परिणाम.
उपशान्त मोह गुणस्थान में-एक अवस्थित परिणाम.
क्षीणमोहसे अयोगी केवली गुणस्थानतक एक बुद्धिमान परिण
२२७, सोलवा-वीर्य बार.
वीर्य ३ प्रकारके-१ बालवीर्य, २ बाल पंडितवीर्य,और३पंडित
मिथ्यात्वसे अविरति गुणस्थान पर्यन्त एकं बाल वीर्य.
देशविरति गुणस्थान में-एक बाल पंडित वीर्य:
प्रमतसे अयोगी केवली गुणस्थानतक-एक पंडित वीर्य.
द्रव्य द्वारका र्दुलासा देखीये अर्थ कांडका पृष्ट ३१७ वा.
परिणाम,वीर्य,तीर्थ,औरसम्यक्त्व द्वारोंका खुलासेकेलिये देखीये अर्थकांडका पृष्ट

।
शादतीय मूल कान्डका-दुमरा खन्ड कर्म द्वारा रोण और २१५
२३९ अठावीसवा छन्नस्त केवली दार
मिथ्यात्व गुणस्थान से क्षीणमोह गुणस्थान तक छमस्त.
सयोगी और अयोगी केवली गुणस्थान वाले केवली है.
२४०, उन्नतीसवा
समुदघात द्वार
समुद्घात ७ हैं ? वेदनीय, २ कपाय, ३ मरणांतिक, ४
वैक्रिय, ५ तेजस, ६ आहारक. और ७ केवली इनमें सेः-
मिथ्यात्व से अविरति गुणस्थान तक पहिली ५ समुद्घात पावे
देशविरति और प्रमत गुणस्थान मे पहिली ६ समुदघात पावे.
अप्रमत से भीण मोह गुणस्थान तक समुद्घात नहीं होती है.
सयोगी केवली गुणस्थान में एक केवल समुद्घात होवे
अयोगी केवली गुणस्थान में नमुद्वात नहीं होतीहे.
२४१ तीसबा देव बार
देव पहैः-१ भव्य द्रव्य देव. २ नग्देव. ३ धर्मदेव र देवा
धीदेव. और ५ भावदेव.
मिथ्यात्व से भिश्र गुणस्थान तक ? धर्मदेव. और २ देवा
धीदेव. विना ३ देव पावे.
अविरति गुणस्थान में धर्मदेव विना ? देव पाव.
देशविरति गुणस्थान में एक भव्य द्रव्य देव पावे.
प्रमत से सम्म नम्गय गुगन्यान तक नग्देव. भाव
देव विना३ देव पावे.
उपनान्न माह गुपन्थान में ? भन्यव्यदेव. ऑरधर्मदेव
यह २ देव पावे.
देव द्वारा मनना पसंद.८६
1.
.

1
३
माके सोपान-श्री गुणस्थान रोहण अदीशन द्वारी
क्षीणमोह गुणस्थानसे अजोगी केवली गुणस्थान तक धर्म
देव और देवाधिदेव यह २ देव पाने
२४२, एकतीसवा-परिणामी द्वार
परिणामिके ४२ बोल १ गति, ५ इन्द्रिय, ४ कषाय, ६ ले-
श्या, ३ जोग, २ उपयोग, ५ ज्ञान, ३अज्ञान,३दृष्टि,५ चरित्र और
र ३ वेद यों ४२ इनमेंसे.
मिथ्यात्न गुणस्थानमें ४ गति, ५ इन्द्रिय, ४ कषाय, जोग, प्ले-
श्या, २ उपयोग, ३ अज्ञान, १ मिथ्याल दृष्टि, और वेद यो३१
वॉल पावे.
सास्वादन गुणस्थान में ४ गति, ५ इन्द्रिय, ४ कषाय,
३ जोग, ६ लेश्या, २ उपयोग, ३ ज्ञान, १ समदृष्टि और ३ वे-
द, यो ३१ बोल पाने
मिश्र गुणस्थान में ४ गति, ५इन्द्रिय, : कषाय, ३ जोग,
६ लेश्या, २ उपयोग, ३ अज्ञान, १ मिश्रदृष्टि, और वेद यो ३१
बोल पावे.
अनिरति गुणस्थान में ४ गति, ५ इन्द्रिय, ४ कषाय, जो
ग, ६ लेश्या, २ उपयोग, ज्ञान, १ समदृष्टि, और तीन बेद यों
३१ वोल पाने.
देशनिरति गुणस्थान में-२ गात ५ इन्द्रिय ४ कषाय जो
ग ६ लेश्या २ उपयोग, ३ ज्ञान, १ समदृष्टि और तीन वेद यों
२९ बोल पाने
प्रमत गुणस्थान में-१ मनुष्यागति 4 इन्द्रिय ४ कषाय, ।
भीर परिणामी कर्ग और निष्ठति द्वारका की गाथा अर्थ कांदके ३२९ प्रष्टमें है.
३
३
३

द्वितीय मूल काण्ड-दूसरा खण्ड कर्म द्वारा रोहण कर जोग, ६ लेश्या, २ उपयोग, ४ ज्ञान. १ दृष्टि, ३ वेद, ३ चा- रित्रयों ३२ बोल पावे. अप्रमत गुणस्थान में-१ गति, ५ इन्द्रिय ४ कपाय, ३ जोग. श्ले- श्या, २ उपयोग, ४ ज्ञान. १ दृष्टि, ३ वेद और ३ चारित्र. यों २९ वोल पावे. अपूर्व करण और अनियट वादर गुणस्थानमें-१ गति. ५ इन्द्रिय, ४ कषाय, ३ जोगः १ लेश्या, २ उपयोग, ४ ज्ञान, १ दृष्टिः ३ वे- द, और ३ चारित्र. यों २७ वोल पावे. सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थानमें-१ गति, ५ इन्द्रिय, ३ जोग, ' लेश्या २ उपयोग, ४ ज्ञान. १ दृष्टि ' सूक्ष्म सम्पराय चरित्र. यों १८ वों १ ल पावे. उपशान्त मोह और भीण मोह गुणस्थानमें १ गती, ५ इन्द्रिय, जोग. १ लेश्या, २ उपयोग. ४ ज्ञान. १ दृष्टिः १ यथाख्यात चारि त्रयों १८ वोल पावे. सयोगी केवली गुणस्थानमें-गति. : जाग. १ लेश्या, २ उपयोग १ केवल ज्ञान. ' द्रष्टि. ' यथाख्यात चरित्र यो १७ वोल पावे. अयोगी केवली गुणस्थानमें-१ गति, २ उपयोग. १ केवलज्ञान, ' १ दृष्टिः १ यथाख्यात चारित्र. यों ६ बोल पावे. २४३, तीसवा करण बार. करणके ५५ वोल-५ द्रव्य ५ शरीरः ५ इन्द्रिय. ४ मन. ४ वचन. ? कपाय-प्लेश्या. ७ समुत्यात. ४ तज्ञा. दृष्टि वेद और आश्रव. यिथ्यात्व गुणस्थानमें-५ द्रव्य. ४ शरीर. ५ इन्द्रिय. ४ मनके, ? वचनके. ४ कपाय. ६ लेप्या. ५ समुदघात पहिली, ४ सजा. १ मि मुक्त सोपान-श्री गणस्थाना राहणे अदागतदारी थ्यात्व, ३ वेदे और ५ आश्रव यों ५० बोल पावे. सास्वादन गुणस्थान में-उपरोक्त ५० बोलही पाते हैं फरक फक्त मिथ्यात्व दृष्टिके स्थान सम्यक दृष्टि कहना. मिश्र गुणस्थानमें भी उससक्त ५० वोल, मिश्र दृष्टि कहना. अविरति और देशविरति में-सास्वादन मुझवही ५० वोल पावे. प्रमत गुणस्थानमें-५ द्रव्य, ५ शरीर, ५ इन्द्रिय, ४ मन, ४ वचन,४ कपाय, ६ लेश्या, ३ समृदघात (केवल विना) ४ सज्ञा, १ दृष्टि, ३ वेद यों. ४७ बोल पावे. अप्रमत गूणस्थान-५ द्रव्य, ५ शरीर, ५ इन्द्रिय, ४ मन, ४ वच न, ४ कषाय, ३ शुभलेश्या. ३ समुदघात, १ दृष्टि और ३ वेद यो ३७ वोल पावे अपूर्व करण और अनियट बादर में-५ द्रव्य ३ शरीर, ५ इन्द्रिय, ४ मन, ४ बचन, ४ कपाय, १ लेश्या, ३ समुदघात, और ३ वेद यों ३३ बोल पावे. सुक्ष्म सम्पराय गुणस्थानमें-५ द्रव्य ३ शरीर ५ इन्द्रिय, ४ मन, बचन, १ कषाय, १ लेश्या, और १ दृष्टि. यों २४ बोल पावे. उपशान्त मोह और क्षीण मोह गुणस्थानमें-१ कषाय विन २३ बो ल पावे. सयोगी केवली गूणस्थानमें-५ द्रव्य, ३ शरीर, २ मन, २ वचन, १ लेश्या, १ समुदघात और १ दृष्टि यों बोल १५ पावे. अयोगी केवली गुणस्थानमें-५ द्रव्य, ३ शरीर, १दृष्टि यों बोल पावे. तेंतीसवा-निवृति द्वार निवृति के ८२ बोले- कर्म, ५ शरीर, ५ इन्द्रिय, ४ भाषा, ४ मन ४ ३ द्विताय मूल काण्डका-दुसरा खन्ड कर्म द्वारा रोहण र ५१९ ४ कषाय, ५ वर्ण. २ गंध, ५ रस. ८ स्पर्श ६ संठाण, ४ सज्ञा, ६ लेश्या ३ दृष्टि. ५ ज्ञान, ३ अज्ञान, ३ जोग और उपयोग सब ८२ मिथ्यात्व मिश्र गुणस्थान में-१ शरीर, ५ ज्ञान, २ दृष्टि इन विना ७४ बोल पावे. सास्वादन अविरति और देशविरति गुणस्थानमें-१ शरीर २ ज्ञान ३ अज्ञान और २ दृष्टि इन ८ विना ७४ बोल पावे. प्रमत गुण्स्थानमें-२ दृष्टि, १ ज्ञान, ३ अज्ञान इन ६ विना ७६ वोल पावे. अप्रमत गुणस्थान में- ३ अशुभ लेश्या, ४ सज्ञा इन ७ विना ६९ बोल पावे. अपूर्व करण और अनियट वादर में२-शरीर, २ लेश्या इन ४ विना ६५ वोल पावे. सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थानमें-३ कपाय, १ उपयोग इन विना६१पावे. उपशान्त मोहमें-१ कपायघटी, और १ उपयोग बढनेसे ६१ही पावे, क्षीणमोहमें-१ मोहनीय कर्म विना ६० वोल पावे. सयोगी केवलीमें ४ कर्मः । शरीर. २ भाषा, २ मन, २० वर्णादि, संठाण. १ शुक्ल लेश्या. १ केवल ज्ञान ३ जोग. २ उपयोग, यों ४५ बोल पावे. अयोगी केवली में ४ कर्म, शरीर २० वर्णादि,६ संठाण? दृष्टि.? ज्ञान और २ उपयोग यों :७ बोल पावे. २४४, चौतीसवा आश्रव द्वार आश्रवके ४२ भेदः-५ अव्रत. ५ इन्द्रियोंका अनिग्रह. ४ कपाय. आश्रव और संवर द्वारका मुलामा देखीये अर्थ कांडका पृष्ट वा. १ m मुक्त सोपान-श्री गणस्थाना राहणे अदाशतद्वारी र और २५ क्रिया. यों ४२ में से. मिथ्यात्वसे मिश्रगुणस्थानतक-इर्यावही क्रिया विना ४१ भेद पावे. अविरति गुणस्थानमें-मिथ्यात्वी क्रिया विना ४० भेद पावे. देशविरति गुणस्थानमें-अविरति क्रिया विना ३१ भेद पावे. प्रमत गुणस्थानमें-५ अव्रत, प्रणाति पात-परिग्रही अनापउगी. पाडु ची, सामन्तवणी नेसत्थी साहत्थी, आणवणी, समुदाणी xइन'४ विना २५ भेद पावे. अप्रमत गुणस्थान में-५ इन्द्रियके आश्राव, और १ आरंभ क्रिया, इन ६ विना. १९ भेद पावे. अपूर्व करण और अनियट बादर में-मायाविति क्रिया विना १८ भेद पावे. सूक्ष्म सम्पराय गुगस्थान में-१ पेजवती क्रिया ही पाती है. उपशान्त मोहसे सयोगी केवलीतक-एक इयर्यावही क्रियाही पावे. अयोगी केवली गुणस्थान में आश्रव नहीं. २४५, तीसवा-संवर बार संबरके ५७ भेदः-५ समिति, ३ गुप्ति, २२ परिसह, १० यति धर्म १२ भावना और ५ चारित्र. यों ५७ भेद इसमें से:- मिथ्यात्वसे मिश्रगुगस्थानतक-संवर नहीं. अविरति गुणस्थान में-१ सम्यक्त्व और १२ भावना यों १३भेदपावे देशविरति गुगस्थानमें-श्वत और २२ परिग्रह अधिक होनेसे ३५ x और कितनेक स्थान पांचों इन्द्रिय के ५ आश्रय भी यहां कमी करते है. कितने क स्थान प्रमत गुणस्थान में और भी आरं मायावतीया फक्त दोही क्रिया कहीये तत्व केवली गम्य.

-- द्विताय मूल काण्डका-दुसरा खन्ड कर्म द्वारा रोहण र ५२१ भेद पावे. प्रमत ओर अग्रमत गुणस्थानमें-१ सुक्ष्म सम्पराय और २ यथाख्या त चारित्र विना ५५ भेद पावे. अपुर्व करण और अनियट बादर गुणस्थान में-परिहार विशुद्ध चा- रित्र विना ५४ भेद पावे. सुक्ष्म सम्पराय गुणस्थानमें-सूक्ष्म सम्परायविना ४ चारित्र, और ८ परिसह इन १२ विना ४५ भेद पावे. उपशान्त मोह और क्षीण मोह गुणस्थानमें यथाख्यात विना ४चा र चारित्र और ८ परिसह विना ४९ भेद पावे. सयोगी और अयोगी केवली गुणस्थान में-पहिला ' चारित्र और ११. परिसह विना ४२ भेद संवरके पावे. छत्तीसवा-निर्जरा द्वार. मिथ्यात्व, सास्वादन और मिश्र गुणस्थान में-अकाम निर्जरा. अविरति से अजोगी केवली गुगस्थानतक-सकाम निर्जरा. २४८ सेंतीसवा निर्जरा द्वार निर्जराके १२ भेदः-१ अणसण २ ऊणोदरी. मिनावरी, ४ रसप- रित्याग. ५ कायाक्लेश. ६ प्रतिसलेना, ७ प्रायाश्चित, ८ विनय, ९ वैयावच. १० सझाय. ११ ध्यान. और १२ का उसग्ग. मिथ्यात्वसे अविरति. गुणस्थानतक-निर्जराक भेद नहीं पावे. देशविरतिसे वीण मोह गुगस्थानतक निर्जराके १२ ही भेद पावे. सयोगी और अयोगी केवली गुणस्थानमें- शुक्ल ध्यान पावे. २४९, अडतीसवा-कारणीफल दार निर्जरा और करणी फन्दागेका सुगनके लिये देखीये अर्थ कांडकापृष्टः २४७ भ ३

५२२
२५०१
१ मक्ति मोपान पी गुणस्थान गण गीदारी
मिथ्यात्व सास्वादन, ओर मिश्र गुणस्थानकी सफल करणी-
अविरतिसे अयोगी केवली गुणस्थानतक निष्फल करणी.
चालीसवा-तीर्थंकर गौत्रोपार्जनद्वार
अविरति देशविगति प्रमत, और अप्रमत इन चारों गुणस्थानों में रहे
जीवों२० बोलोंमेके बोलोंका आगधन कर तीर्थकर गौत्र उपार्जतह.
२५१.एकचालीसवा-तीर्थंकर स्पर्शनावर
अविरति, प्रमत, अप्रमत, अपूर्व करण, अनियट्टी बादर, सूक्ष्म संप
रायः क्षीण मोह, सयोगी केवली, और अयोगी केवली इन ९ गुण
स्थानोंको तीर्थकर महाराज स्पर्शते हैं.
वेंतालीसवा-मोक्ष द्वार
मोक्ष ४ कारण से होवे-'. ज्ञान, २ दर्शन, ३ चारित्र और ४ तप.
मिथ्यात्व गुणस्थानमें मुक्तिका कारण नहीं.
सास्वादन और मिश्र गुणस्थानमें व्यवहारमें मुक्तिका कारण नहीं.
निश्चयसे सत्ता मात्र फक्त ज्ञान दर्शन.
अविरति गुणस्थानमें मुक्तिके कारण-ज्ञान और दर्शन दो है.
देशविरातिसे अयोगी केवलतिक-मुक्ति के कारण चारोंही पावे.
२५२
तीर्थ गौव उपार्जनके २० वोल अर्थ काण्डके ३३२ वे पृष्ट मे है.
छ तीर्थकर गुणस्थान स्पर्शन द्वारमे और मोक्ष द्वारके खुलासेके लिये देखीये अर्थ
कांड का पृष्ट ३३३ वा.

*द्वितीय मूल काण्ड-दूसरा खडे कर्म द्वारा रोहण कर
परम पूज्य श्री कहानजी ऋषिजी महाराजके सम्प्रदाय के
बाल ब्रम्हचारर मुनि श्री अमालख ऋषिजी महाराज
रचित “ गुणस्थानरोहण अदशित द्वारी',ग्रंथ
का चौथा धर्मा रोहन खण्ड
समाप्तम्.
श्री गुणस्थाना रोहण-अढीशतद्वारीका
द्वितीय-मूल काण्ड-समाप्तम्.
समाप्तम

. -

॥ श्री ॥
मुक्ती --- सोपान
श्री गुणस्थान रोहण अटीशतद्वारी
का संक्षिपित यन्त्र

श्री मुक्ति मोपान : १ नाम द्वार मिथयात्व | मास्वादन मिश्र अति देश विराति মমাৱা --- अर्थ द्वार पडवाइ मिश्रित | ममाकित सत्यमें असत्यश्रया श्रावक --- प्रश्नोत्तर द्वार क्या गुणः धर्म स्पर्श |समझोलगातत्वज्ञ हुवा अवतरोकी जावे ४ प्रवेश द्वार गलस्यान धर्म भ्रष्ट भष्ट हानी वृद्धि | निसर्ग ७ प्रकृति आधिगम क्षयोपशमी ५ लक्षण द्वार ३४ मिथ्या आर्त-रौद्र शंकासील ज्ञानी ६७ धर्मोत्साही ध्यानी लक्षण २३ लक्षण त्व सेव ६ दृष्टान्त द्वार प्रसाद-अ सिकरण नदीकाटोल विषयव्यश्नी पाखण्डी |म्ब घडी मोलाजीव अम्र सूर्य २० श्रावक वमन ७ गुण द्वार अनन्त अर्ध पुद्गल शुक्ल पक्षी ७ वोलका ज३-उ-१५ संसारी संसारी अवन्ध वारवा स्वर्ग अवघेणा द्वार अंगु० असं० १००० यो ज०९० २०० धनु. ९/ उत्पति द्रव्य प्रमाण अनन्त | असंख्याते ३ श्री गुणस्थान रोहण अदीशतद्वारीका संक्षेपी यन्वर ७ । ८ | १ ११ । १२ १३ १४ प्रमत संय- अप्रमत अपूर्व अनिवति मुक्ष्म उपशान्त क्षीणमोह सयोगी अयोगी ती संयती वादर सम्पराय, मोह केवली केवली करण सदोष साधुनिर्दोपताधू उत्साहा निर्विषयी फक्त हकदियाभयकिया योगयुक्त योग रहि मूक्ष्म | मोह | मोह / केवल त केवल लोभी ज्ञानी ज्ञानी ही क्यों पडे.क्यागुणः बडी का सर्व विरति प्रमादापाय से विपयन अकपायी नोह उदभाव के-द्रव्ये के मोक्षगा- हुवे निहते भीनिव्रते हुवे बने से | वली | वली मी १.१ प्रकृति १५ प्र० १६ प्र.२१ प्र. २७ प्र. २८ प्र. २८ प्र.पातिकर्म आक्रिय उपगनी सयकरी दया मूर्ति धर्मोधनी पूर्णशील पूर्ण मान्न परम मा मर्व मोक्षान्मा ६५ लक्षण शिर वीर भंतोपीवभावी न्न पंधानु धना शेठ उत्कृष्ट गामी फवादग्ध निरंग कटकी अवाज अ-निर्मट नमेर पर्वत व्योपारी धन्ना अण-मन हरकेगीच गोनन नि कुंड-निम्कंधार्य मटा नमुर सानी | कि मुनि वीर जार मार कल्पातीत दलनीन गनी गनी भवनी भव असुनने मोटा ज०१ हाथ हो हाथ ६०० घ. २१०धनुष .. .. .. .. . ... मन्येक त्यो १६. हजार .. .. 41 + श्री मुक्ति सोपान १ । २ ३ २ १० पावती द्रव्य प्रमाण अनन्त असख्याते ११ खपती द्रव्य प्रमाण अनन्त असंख्याते १२ क्षेत्र प्रमाण द्वार सर्व लोक त्रस नाडी आधो और तिरछालोक १३. क्षेत्र स्पर्शना द्वार सर्व लोक छठी नर्कसे लोक का छठी नर्क अधोवीज ग्रीवेक असंख्यान १२वा स्वर्ग १२वा वर्ग वा भाग १४/ काल प्रमाण (स्थिति) ३ प्रकारकी आंवली ७ समय अन्तर मुहुर्त ज अन्त जअन्त' ६ सागर ऊणा कोड पूर्व १५ काल प्राप्त द्वार मरे नहीं मरे मरे " १६ भाव प्रमाण द्वार असख्य स्थान १७ निरंतर गुण द्वार प्रत्येक असंख्यात अवलियाके असंख्यात वे भाग वे भाग १८ मार्गणा द्वार २ ४ १ . १२ उपमार्गणा द्वार . ४ १ ३ 1. ----paper Pa- श्री गुणस्थान गेरण अहीमनदारीका मोपी यन्त्र भर । ६ प्रत्येक नारत्येक मा ११० अक्रोड . प्रत्येक मा .. अहारदीप .. . सिरमा .. .. अशोवीन अनचरवी मां काली नर्क गई नयान मारमा ज समय . नागर अन्तर मुहर्न नाम नही मरे | मेरे 1 . -- - . - aur अवलिया अरवात m दे भाग aar ३ ३ * श्री मुक्ति सोपान १ २ ४ ५ २० २० परस्पर मार्गणा ३ १ २ ५ २१ परस्पर उपमार्गणा ३ ४ १ ३ २२ अरोह उपरोह १.उवरोह अवरोह २ २ २ २३/ चडाचड गति १ १ २ ४ २४ अन्तर काल द्वार अन्तर मु.पल्याका अ ६६ सा० संखत भाग अध पुगल . २८ विरह काल द्वार एक समय अंतर मुहूर्त २६ एकभव में स्पर्शना १ १ १ १ प्रत्येकहजार २ ९०० २ २ २७ वहुत भव में स्पशर्ना २ असंख्यात २ असंख्यात २८/ परस्पर स्पर्शना १ नियमा, ३ नियमा ३ नियमा २नियमा ३नियमा १० भजना ८ भजन भजन ९ भजन ८ भजन २२ पठमा पहम द्वार २ २ २ २ २ ३ पशाचता शाश्वत शाश्वत अशाश्वत शाश्वत he NAM ८ श्री मुक्ति मोपान १२ १ ३ ३१ परभव गमन द्वार माय जाये नही जावे | माथ जावे नहीं मां ३२ भव संख्या द्वार अनन्त १ ७-८ ३३| अल्या पहृत द्वार १२ b १ अनंत गुणे अमंख्याते असंख्याते असंख्याते असंख्याते ३४ किरिपा द्वार २४ २३ २२ ३५/ मूल हेतु (कारण)द्वार ५ ४ ४ ४ ४ ३६ मिथ्यात्व हेतु द्वार ५ ३७/ अविरति हेतु द्वार १२ १२ १२ १२ ११ ३८ कपाय हेतु द्वार २५ २५ २१ २१ १७ ३८ ३९| योग हेतु द्वार १३ १० १३ १२ ४० समुचय हेतु द्वार ५० ४६ ४० ४१. चार वन्धद्वार ४ ४२ समुचय कर्म वन्ध ७ ८ ८ श्री गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारीका ९ संक्षेपी यस्त्र १० | ११ द ९ १२ | १३ १४ ." १ १ १ १ १ १ १ १ १ C ३ ३ १. ६ ५ ३ २ ४ संख्याते | संख्याते यहतीनो आपनमे संख्याते| सबने संख्यात संख्याते अनन्ते तुल्य थोडे गुण २१ २० २० २० २० १ १ or ३ २ २ २ १ १ १ ० . . ० . . . . . . ० . . १२ ७ . ० ८ . १४ ११ ९ ९ ९ ९ ७ २४ २२ ११ ९ ७ ४ ४ ४ २ २ ८ ७ ७ ६ १ १ . S १० श्री मुक्ति सोपान १ १ ३ ४ ४३ ज्ञानावरणीय बन्ध द्वार ५ ५ ४४ दर्शनावरणी बधद्वार ९ ६ ४५ वेदनीय बंध द्वार २ ४६ मोहनीय बंध द्वार २६ २४ १९ १९ १५ ४७ आयु बंध द्वार ४ ३ २ १ । ४८ नाम बन्धद्वार ६४ ५० ७ ४९ गोव बन्ध द्वार २ २ १ १ ५० अन्तराय वन्ध द्वार ५ ५ ५१ ध्रव कर्म बन्ध द्वार ५ ५ ५ ५२ ध्रुव कर्म प्रकृति बन्ध ४६ ३९ .३ अधुव कर्म बन्ध द्वार ५ ५ ५ ५४ अध्रुव कर्म प्रकृति बंधा ३ ९ * श्री मुक्ति मुक्ति सोपान ६ ७ ९ ११ १२ १३ | १४ ५ ५ ५ . . ६ ६ ४ . २ o1 or १ १ १ ० ११ २ ९ . . ० ० १ १ . . . ० . ३१ १ . १ . ० १ १ १ . ० ५ ५ o ५ ५ ५ २९ १८ १४ . . . ५ ५ ४ ४ १ १ १ २८ ४ ३ १ १ ३ १२ श्री मुक्ति मोपान पर १ ३ ४ ५८ सर्व घाति कर्म वन्ध ३ ३ ३ . ५६सर्वघातककर्म प्रकृति व २० १९ १२ १.२ ८ ५७ देश घातिक कर्म वन्ध ४ ४ ४ देश घातिक कर्म प्रकृति २५ २३ २३ २३ बंध द्वार ५२ अघाति कर्म वध द्वार ४ ४ ४ ३ ६० अघाति कर्म प्रकृति वन्ध ७२ ५८ ४२ ४ ६१ पुण्य कम वंध द्वार ok ३ ६२/पुण्य कर्म प्रकृति बंध ३८ ३४ ३१ ६३. पाप कर्म वन्ध द्वार ८ ८ ६ ६ ६४पाप कर्म प्रकृति वन्ध ८२ ६७ ४४ ४४ ६ ६ द ६६ परावर्तमान कर्म बन्ध ६ ४९ ४७ ३९ ६३ परावर्तमान कर्म प्रकृ. ६६ ८९ ति बन्ध * श्री गुणस्थान रोण अढीगतद्वारीका संझपी यन्त्र ११ . ११ १२ १४ . ३ ३ २ २ 0 २ ४ ४ २ २ २ . 0 ४ ४ ४ ३ २१ १२ . ४ १ १ १ an १ १ १ ४ १. १ . १ " ५ ४ . A ० . ६ ४ ९ १ १ १ .

श्री मुक्ति सोपान ३ ५ ६ अपरावर्तमान कर्मबंधी ५ ५ ५ २७ २७ २८ २८ ६८ अपरावर्तमान कर्म प्रकृत ति वन्ध द्वार ६२/ भूयस्कार कर्म बन्ध १ १ १ . १. १ . ७ भुयस्कार कर्म प्रकृति ८ ४ २ वन्ध ७१ अल्पतर कर्म वन्ध १ १ १ ७२, अल्पतर कर्म प्रकृति जो ऊपर भूयस्कार| बन्ध के बन्ध द्वार स्थान कहे है, ७३ अवस्थित कर्म बन्ध जो भूयस्कार बन्ध पअर तर बन्ध के प्रथम समय ७४ अवस्थित कर्म प्रकृति भूयस्कार बन्ध के२९/ स्थान या अल्पतरके २८स्थानका वन्धद्वार ७६ अन्य कर्म बन्ध . ७६ समुचय कर्म १० बंध ११७ १०१ ७४ ७७ ७७ कर्म वन्ध व्यछेद . ० १ ७८ कर्म प्र बन्ध व्यछेद ३ १९ ४६ ४३ ५३ श्री गुणस्थान रोहण अटीशनद्वारीका मंक्षेपी यन्व * ६ १३ ५ . ३ ३ C . २८ २८ १४ १४ . १ १ १ १ क " १ १ ७ . . . १ १ उनकोडलंब पहने मे अल्पतर दर्म दर्म मदाति परेन २: :- दोबन्ध | गिनने वार कर Kध किये वापिर दो जिताने हारमोनि ब - C ६६ ५६ . .

*श्री मुक्ति सोपान १ १ २ ४ - ७९ सम कर्मोदय द्वार ८ ८ ८ ८ समुचय ८० ज्ञानावरणी उदय द्वार ५ ५ ८१ दर्शनावरणी उदय द्वार ९ ९ ९ ९ ८२ वेदनीय कर्मोदय द्वार २ २ २ २ २ ८३ मोहनीय कमोदय द्वार २६ २५ १९ १९ १५ ८४ आयु कर्मोदय द्वार ४ २ ८०, नाम कर्मोदय द्वार ६४ ५१ ५१ ५५ ५५ ८० गोत्र कर्मोदय द्वार अनन्त २ २ २ २ ५ ८७ अन्तराय कर्मोदय २ ५ ५ ४ ८८ ध्रुव कर्मोदय द्वार ५ २० ८० ध्रुव कर्म प्रकृति उदय २७ २६ २६ २६ ६ ६ ६ द ६ ९० अंध्रुव कोर्दय * श्री मुक्ति सोपान १ . ९ १० ११. १२ १४ ७ ४ ५ ५ ५ . ० ९ ६ द ६ ६ ६ . . २ २ २ २ २ २ २ २ २ ११ ११ १० . ४ १ ० . १ १ १ १ १ १ १ १ १. ४२ २ . ९ १ १ १ १ १ ५ ५ ५ ५ ८ O ४ ४ ४ ४ ४ १ २६ २६ २६ २६ २६ २६ १२ ६ ६ ६ ६ ४ १० श्री मुक्ति मोपान २ . ९१ अध्रुव कर्म प्रक्रति १० ८५ ७८ १२ पुण्य कर्मोदयद्रार ४ ४ ४ ९३एन्य कर्म प्रोत्तयोदय ३९ ३२ ९४ पार कर्मोदय द्वार ८ ८ ९५ पाप कर्म प्रकृचियोदय ८२ ७७ ६९ ५८ ९३ क्षेत्र विपाक कर्मोदय १ १ १ ९७ क्षेत्र विपाक कर्मप्रकृति ४ . ३ ४ ९८ भव विपाक कर्मोदय १ १ १ १ १ ९२) भवाविपाक कर्मप्रकृति, ४ ४ २ ७ १०० जीवत्व पाक कर्मोदय ७ ७ १०१, जीवविपाककर्मप्रकृत्ति ७२ ६४ ६४ १ 900 पुद्गल विपाकी कर्मोदय १ १ १ . .

श्री गुणस्थान रोहण अहीगनद्वारीका मंपी यन्व ११
१०
६
9
२
१०
११।१२
४८
२९
१२
४
४
४
४
द
४
४
--
2
,
.
०६
"
१
१
५
१
६
'?
N

श्री मुक्ति मोपान १ १. ४ १० पद्गल कमप्रकृीत्तयोदय ३४ ३२ ३२ १०४ सर्व घाती कर्मोदय ३ m. ३ ३ ३ १९५/सर्वधानिक कर्मप्रकृतीयो ११ १५ १५ ११. १०६ देश घाति कर्मोदय ४ ४ ४ ४ १०७ द. धा. कर्मप्रकृतियो २५ २५ २६ २० २५ १०८ अधाति कर्मोदय ४ १०२) अ. धा. कर्मप्रकृत्तियो ७३ ५१ ११० समुचेकर्म प्रकृतीयोदय ११७ १११ १०० १०४ २११ कर्मोदय व्यच्छद द्वार २२ १८ ३५ . ११२ कर्म म.उदयवाच्छेद्वार ११३/समुचय कर्म उदीर्णाद्वार ८ ७ ५ ५ १.१४ ज्ञानावरण पिउदीराण .

* श्री गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारीका संक्षेपी यस्व पर २१ ६ ७ ८ ९ ११ १२ १३ २२ २१ २२ २९ २४ . ३ ३ ३ ३ २ २ . ४ ४ ४ ४ ok ४ ४ ४ ४ ३ . ३ २५ २५ २५ १२ १३ १२ . १२ . ४ ok ४ ok ४ ४ ४७ ४४ ४४ ४४ ४२ १२ 26 25 ६६ ६० ५९ ५७ ४२ १२ ४१ ४६ ५० ५६ ६३ ८० ११० . १ १ ४ ४ . ६ ६ ६ ५ . २ ८ . ० 14 २२ श्री मुक्ति सोपान पर १ २ ४ ११५ दर्शना वरणी ऊदारणा १ ९ ९ १ १ ११६वेदनीय कर्म ऊदीरणा २ २ ३ २ ११७ मोहनीय ऊदीरणा २५ २२ ११८ आयुकर्म ऊदीरणा ४ ४ ४ ११९ नामकर्म ऊदीरणा ६४ ५९ ५१ १५ ४४ १२० गोनकर्म ऊदीरणा २ २ २ २२१ अन्तराय ऊदीरणा ५ ५ १२२ समुचयकर्मप्र.ऊदीरणा ११७ १११ १०० १०४ ८७ १२३ कर्मोदीरणा युच्छेद . १२४कर्मम.उदीराव्युच्छेद ५ ११ २२ १८ १२६/ समुचय कर्म सत्तद्वार ८ ८ ८ द १२६/ ज्ञाना वरणी कर्मसत्ता ५ श्री गुणस्थान रोहण अहीशनद्वारीका संझेपी यन्त्र र ६ है १० ११ १२ १३ १४ . १ ६ द ६ ६ 10 द , . . २ . . १४ ११ ७ १ o . . १ . ० 0 o ४४ ४२ ३१ ६६ ० १ १ १ १ १ १ १ . ५ ५ ५ ५ ६१ (७ ५० ५२ २ २ २ o २ ६ ४१ ४१ ५३ ५२ ६५ al ८३ ८ ८ ८ ७ ४ ५ ५ ५ ५ .

* श्री मुक्ति सोपान १ १ ३ १२७दर्शना वरणी कर्ममसा ९. २ १ १२८ वेदनयि कर्मसत्ता २ २ १२०. मोहनीय कर्मसत्ता २८ २८.२१ २८-२१. १३० आयुकर्म सत्ताद्वार ४ ४-१. १३१ नाम कर्म सत्ताद्वार ९ ३ ९ ३ २३ १३२ गोव कर्म सत्ताद्वार २ २ २ १३३ अन्तराय कर्मसत्ता ५ ५ ५ १३४/ धुव कर्म सत्ताद्वार ७ ७ १३५ धुव कर्म प्रकृत्ति सत्ता १२६ १६२ १२६ १२६ १२६ ४ १३०/ अधुव कर्म सत्ताद्वार ४ १३७ अ. कर्म प्रकृत्ति सत्ता २२ २२ २२ २२ १३८|सर्व घाती कर्म सत्ताद्वारा ३ ३

* श्री मुक्ति मापान पर
१४
२
.
२
२
.
८
२
.
२८-२१
"
८
:
१
९३
::
.
1.
101
.
,
1
१.
-
-
.
:
.."
.

श्री मुक्ति सोपान १ १ Ind ५ १३१ स.घा. कर्मप्रकृत्ति सत्ता २० २० २० १४० देशघाति कर्मसत्ता ad ४ ४ १४१ दे.घा. कर्ममछत्तिसत्ता २७ २७ १४२ अयाति कर्म सत्ताद्वार ४ ४ ४ OC १०१. १०१ १४३ अघा. कर्मप्रकृत्तिसत्ता १०१ १०० १०० १.४.४ ममुचयकर्मप्रकृत्तिमत्ता १४८ १४७ १४७ १४८ १.४८ १४५ कर्म व्युच्छनिद्वार ७-१० ७.१० १४६कप्रकृतिव्यच्छतिद्वार १ ७-१८ क्षायिक १४७ ममुचय कर्मभद्रद्वार . १ द १४८ ज्ञानापरणी भद्दार १ १ १ १४ वर्ग- पाणयिभद्रद्वारा १५.०, वेट मङ्गद्वार ८ 'द श्री गुणस्थान रोहण अदीशतद्वारीका संक्षपी यन्त्र र ७ ८ ९ ११ १२ १३ १४ २. २० २० १६ २० २० २० १४ ४ ४ ४ ४ ३ . २७ २७ २७ २७ १२ ० . ४ ४ ४ ४ ४ ४ १०१ १०१ १०१ १०१ ९७ ८४ १११ ८४ :१४८ | १४८ १४८ १४८१०१ १४२ १४२ १४२ १४२ १९ ८३ १४८ १४८ १४२ ८२ ० . . ० ८ ५ ७-१० ९-१० ९ ९-१० 67. ४६ ९ ४२ १:2 २ २ १ १ १ १ r १ १ १ १ १ १ . २ २ ४ २ U श्री मुक्ति सोपान १ ३ ३ २८ २ १ . ६चौ, भां,४चौ, ४मांचौ, २भाटचो, भाटचो, २भां १२ १५शमोहनीय भङ्गद्वार २० १६ २६ २८ १६ १५२ आयु भगद्वार १.६ ४०१७ ५२ १३९२६ २००८ १११३ ४०९७ २१२ ६ १८ २ २ १५३ नामभङ्गद्वार २ ४ ५ १ १ १५४/गोत्र भङ्गद्वार १ १ १ . १.० १० १५५/अन्तराय भङ्गद्वार ८ १० १० २ २ १५६/वन्धीके भी) २ २ ३ ३ ३ १५७इयावही भगद्वार ३ ४ ३ ३ १७ १९ १.८ मूल भावद्वार २० १९ १ १ १५० ओदयिक भावद्वार . ० १२ १६० उपशामिक भावदार ११ ११. ११ १ १६षयोपशामिक भाव द्वार १०मार्यकभावद्वार * श्री गुणस्थान रोहण अढीशतद्वारीका मंक्षेपी यस्वर २१ छ ७ ८ १० ११ १२ १३ १४ . . . ८चौ. १भा८चौ. १भा ४चो' १६भां . २ ६ ६ २ २ १ १ १ १ १ १ ५ २४ ६०० २ १६ ५९२ १ ९६ २१२ १६ ४ ४ ४ ३ १ १ १ १ १ १ १ १ २ १ १ १ १ १ १ ८ ७ २ ५ १. २ २ २ २ २ १ २ १ १ ४ ४ ४ ८ ४ ५ ५ १५ १२ ४ २ २ २ २ २ १४ १२. १ १ AC १ . १ ८ * श्री मुक्ति सोपान १ १ २ ३ ४ ५ १६३/परिणामिक भावद्वार ३ २ २ २ २ १ १ १६४/सन्निपातिभावद्वार १ ४ ४ ४ १२ ६ १६५/समुचयभावभेदद्वार ३५ ३५ ३४ १६६ श्रोणिावर . ० १६७कर्मवेदद्वार ८ ८ १६८ कर्मनिर्जराद्वार ८ ८ १६९ दशकरणद्वार १० १० १० १७० गुणश्रेणिद्वार सकाम निर्जरानही तीसरेसं चौथेसे ख्यातगुणी अंसंख्या १७१/आगतिद्वार ४ ४ ४ ४ १७२पागतिद्वार ४ २ १७३ जागतिद्वार ३ २ १७४/आजातिद्वार १७४/आजातिद्वार ५ # श्री गुणस्थान रोहण अहोशतद्वारीका संक्षेपो यन्वर ८ १२ १३ १४ २ २ २ २ २ २ २ २ २ ३ ३ ३ ३ ३ ३ १ १ २७ ३४ २१ ११ १४ १३ २ २ २ १ ० १ ८ ८ ८ ७ ४ ८ ८ ८ ८ २ २ २ २ पांचवेसे छेवेने मातवेमे आठवेसे नववेसे दशवेसे ग्यारवेसे वारवेसे तेरवेमे अंसख्या संख्यागुणी असंख्या असंख्या असंख्या असंख्या असंख्या असख्या असंख्य ४ ४ ४ ४ ४ ४ १ १ १ १ १ १ . १ १ १ १ - २ २ है r- . ३२ * श्री मुक्ति सोपान र २ ३ ४ ८ १७५ पाजाति द्वार ५ ४ १ १ १ १७६, जाजाति द्वार ४ . १ १ १७७ आकाया द्वार ६ ६ ६ ४ ४ १.७८ पाकाया द्वार ६ १ १. १ १७१/ आकाया द्वार ६ १ १ १ १८०/ आदण्डक द्वार २४ २२ २२ २२ २२ २८१ पादण्डक द्वार २४ १२ १६ २ १८२ जादंडक द्वार २४ १ . १६ १.८३ सामान्य जीवभेद द्वार १४ ६ १ २ १८४ विशेप जीवभेद द्वार १७१ १९८ २३५ २० १८५, जीवायोनी द्वार ८४ लक्ष ३२ लक्ष | २६ लक्ष | २६ लक्ष | १८ लक्ष १८६ कुल कोडी द्वार १ क्रोड १ कोड १ कोड ६५॥ लक्ष | १२ लक्ष ९७॥ लक्ष ४०|| लक्ष १६ क्रोड कोड कोड कोड जोडला * श्री गुणस्थान रोहेण अदीशतद्वारीका संसपी यन्त्र र ६ ७ ९ ११ १२ १४ १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ ० मोक्ष ४ ok ४ ४ ४ १ १ १ १ १ १ o १ १ १ १ . मोक्ष २२ १२ ११ १२ ११ १.१ १२ १९ १ १ १ १ १ १ १ १ १ ० १ १ . मोक्ष १ १ १ १ १ १ १ १ १५ १५ १८ १५ १५ १४ल १४ल १४ल १४ल १४१४ल .. .. .

* श्री मुक्ति सोपान १ २ ३ २ ?स्पारद्वार १ १ १ १ .. ...मगीदार १ १ . Irr माग १ २ . ५. नागर 3 3 ३ ना बागर 3 ३ 3 3 thisiri . ६ ." -- - । 'पार १ " । --- *श्री गुणस्थाना रोहण अटीशतद्वारीका सभपा यस्त्र र ६ ९ १६ १२ १३ १४ १ १ १ १ १ १ १ १ 6 १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ ० १ १ १ १ १ १ १ १ २ १ १ 6 १ १ १ १ २ om २ २ २ २ २ २ २ २ २ AD १ १ १ १ १ १ ० ६ द ur ६ ६ ६ ६ ६ १ 6 १ १ १ १ १ १. ३ ६ (0 ६ ६ द 10 १० १० १० १० १ ५ २ ५ श्री मुक्ति सोपान . २ ३ -- १९९इद्रय विषयद्वार ८से२३ | १३से२३ २३ २३ २०० सझाद्वार ४ 1 २०१ वेदद्वार ar ३ 3 ३ २०२ कपायद्वार ४ ४ ४ ४ ४ २०३लेशाद्वार द ६ ६ ब २०४ योगद्वार ३ ३ ३ ३ २०५ गिग्द्वार ४ ४ ४ ४ ५ - २०६मंघयणद्वार ६ ६ ६ ६ २०७मंटाणद्वार ६ (७ ६ न 6 ००८मरणदार २ २ २ १ -- २० विग्रहगतिद्वार २ . २ २१. स्वर्ग मर्याद्वार श्री मुक्ति सोपान ६ ७ १ ११ १२ २ १४ २३ २३ २३ २३ . ४ . . . o . . . ३ . ३ ० ३ ३ . ४ ४ ४ १ . . . ६ ३ १ १ १ १ १ १ . ३ ३ ३ ३ ३ ३ ३ ३ ३ ६ १ १ १ १ ६ ६ ६ ६ ६ ६ २ २ २ २ १ C १ २ २ २ २ २ २ " १ २६ २६ मोन .

'३८ ॐ श्री मुक्ति मोपान १ १ ३ ४ ५ L- २११/पटस्थानहानीटदि द्वार २ २ २ २१२ मूलउपयोगद्वार २ २ २ २ २१.३ अज्ञानद्वार ३ ३ २१४ ज्ञानद्वार ३ ३ . mr २१५दर्शनद्वार ३ ३ ३ ३ ३ २१६ समुचय उपयोगद्वार ६ 10 द ६ ६ २१७ दष्टिद्वार १ १ १ १ १ २१८ भव्याभवयद्वार २ १. १ १ १ २१९चरमाचरमद्वार २ १ عمر १ १ २२० परितापरितद्वार २ १ १ १ १ व १ २२१ पद्धीद्वार २ ६ ६ २२२ आत्माद्वार ६ श्री गुणस्थाना रोहण अहीगतदारीका संक्षेपी यन्त्र * ६ ९ १० ११ १२ १३ १४ २ २ २ तुल्य २ २ २ २ १ २ २ २ २ . . . . ४ ४ ४ ok ४ ४ १ १ ३ 10 10 ३ १ १ M ७ ७ ७ ७ ७ २ २ n १ १ or १ o1 १ १ १ १ १. m १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ . ३ ७ ८ ८ ७ ४२ श्री मुक्ति मोपान १ १. २ २३६परिसहद्वार ० २२ ० . २३वाप्रमादद्वार ५ ५ ५ ५ २३७सारागी वीतरागी द्वार | सरागी २३८पडवाइअपडवाइ द्वार | अपठ्याइ, पडवाइ २ २ २ २३९छपस्त केवली छपस्त " " २४० समुत्यातद्वार ५ ५ ५ १ २४१देवद्वार oc ३ mr ३ २४२ परिणामीद्वार ३१ ३१ ३१ ३१ २४३ करणद्वार ५० ५० ५० २४४निवृत्तिद्वार ७४ ७४ ७४ ७४ ७४ २४५आश्रवद्वार ३१ ४१ ४१ ४० २४६संवरद्वार १३ ३५ ० .

- श्री गुणस्थाना राहेण अहीशतद्वारीका मोपी यन्वर ४३ ६ ८ १० ११ १४ २२ २२ २२ २२ १४ १४ १४ ११ . . C " उपनाम না নয় २ २ २ २ २ पडवाहापडवाड .. केवरी केवली . . १ ३ २९ ५८ ४७ ७६ ६९ २६ १ ९ - F-

No text on this page.

Nyayakos

Author
Pandit Mahamahopdhyaya
Title
Nyayakos
File name
Nyayakos
Text
OCR done
Citation
1918
Published
2011/07
Publisher
Mumbay.nirnaya Press
Language
Sanskrit
Pages
619
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
DLI number
310973
Barcode
99999990310897.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
UcKB9MGHELW
Download PDF

Nyayakos