Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Chhatrapatisamrajyam (historical Drama)

Yajnik,moolshankar Maniklal · 2012/08

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रचयिता एवं रचना विद्यालय के प्राचार्य पद पर रह कर न्याय, ध्याकरण साहित्य प्रादि समग्न शास्त्रों के जिज्ञासु छात्रो को अपनी वाणी-सुधा-रस-घार से तृप्त पारगत किया। साथ ही दस साल लव महेसाणा के टीजे. हाई स्कूल मे सहायक शिक्षक के रूप मे भी रहे। यहाँ से अवकाश प्राप्त होने के पश्चात् जीवन के शेप दिवम उन्होने नडियाद में व्यतीत किया। और वही १३ नवम्बर १९६५ मे अपनी पांच पुत्रियों को छोड़कर दिवगत हो गये। श्री याजिम जी मी सस्कृत भाषा और साहित्य के प्रति विशेष अभिरुचि थी। अध्यवसाय और मनन के परिणामस्वरूप उसके अधि- कारी विद्वान् हुए यही कारण था कि उनकी विद्वत्ता से प्राकृष्ट होकर बडौदा नरेता महाराज सयाजीराव ने प्रसिद्ध सस्कृत कालेज के प्राचार्य- पद पर आसीन किया था। एव वाराणसी के विद्समाज ने उन्हे 'साहित्यमणि' को मानद उपाधि से विभूपित किया। सरस्वती मोर लक्ष्मी के जन्मजात विरोध के कारण श्री याज्ञिक जी को जोवन-पर्यन निर्धनता से सघर्ष करना पडा। तथापि साहित्य-रचना की उत्कट अभिलापा के फलस्वरूप उन्होने गुर्जर तथा सस्कृत साहित्य को अपनी कृतियो से समृद्ध विधा । गुर्जर प्रदेश के साहित्य सर्जको की दृष्टि नाटक रचना की मोर नही गयी थी, श्री याजिक जी ने अपनी कृतियो से साहित्यिको को प्राकर्षित कर दिया और साहित्यसमाज में एक नमी परम्परा का श्री गणेश हुमा उन के पश्चात् अन्य कई नाटक- वारो पा प्रादुभाव भी हुमा। इनकी संस्कृत कृतियो- १. छत्रपतिसाम्राज्यम् २. सयोगितास्वयम्वरम् ३ प्रतापविजयम् भोर गुजर भापा की कृतिया- १. हदिग्विजयम् (नाटक) २. नेपधचरितम् ३. मुलनारमा धर्म विचार ४ प्रापण् प्राचीन राज्यतन ५. (गुजराती अर्थ सहित) सत्यधर्म प्रकाश । इसके अतिरिक्त विष्णुपुराण पर प्राधारित 'पुराणषपातर गिरणी' मामयः एक पषा पुस्तक भी उन्होने सस्कृत में लिखी थी। गुजराती में भी एक श. कृति 'मेवाहप्रतिष्ठा' है। सस्कृत की नाट्यकृतियों उनके संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य स्व- पाल ( १९२६-१९३३ ) म ही प्रकाश में आ गयी थी। क्रमानुसार सन् १९२८ ये 'सयोगितास्वयम्वरम् १९२६ मे 'छत्रपतिसाम्राज्यम् और १६३१ मे 'प्रतापविजयम्' का प्रकाशन प्रा । नाटकों का सक्षिप्त परिचय निम्नलिखित है- संयोगितास्वयम्बरम्-इसमे प्रसिद्ध हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान पौर राजकुमारी सयोगिता की प्रणय-कथा निबद्ध है। छरपति- साम्राज्यम- इसमें महाराष्ट्र केदारी छत्रपति शिव जीवन और उनके शौर्य पूर्ण कार्यो एव तत्कालीन यवन सम्राट की दुर्नीति के विरुद्ध संघर्ष और अन्त मे स्वराज्यस्थापना की घटनाओं को प्रावद्ध किया गया है । प्रतापविजयम - जैसा कि नाम से ही प्राभासित है, इस नाटक म मेवाड केशरी महाराणाप्रताप सिंह का जीवन प्रसंग उल्लिखित है । यह थानिक जी को नाट्य तियो का संक्षिप्त परिचय है। अब हम मागे 'धनपतिसाम्राज्यम' बाटक के स्वरूप पर नाट्यशास्त्रीय सिद्धान्तों तथा सीमामी को ध्यान में रखते हुए विचार करेंगे । नाट्यस्वरूप-भीमासा एप छत्रपति साम्राज्यम यह याज्ञिक जी को द्वितीय नाट्यकृति है। इसके पूर्व सयोगिता- स्वयम्वरम्' प्रकाशित एव विद्वानो द्वारा प्रशसित हो चुका था । प्रत इस द्वितीय कृति की उत्कृष्टता के विषय म सन्देह नहीं किया जा सकता । सर्वप्रथम हम नाट्यशास्त्रियों द्वारा निरूपित नाट्य लक्षणों पर विचार करें-'अवस्थानुकृतिनाट्यम् (दारूपक-१)-'अवस्था की मनुकृति को नाट्य कहते हैं, दृश्य होने के कारण इसे रूप भी कहते हैं, रूप का प्रारोप हो जाने से 'स्पक' भी इसकी सज्ञा है, और रस के माश्रय से होने वाले दस भेद हैं। दशरूपकवार के अनुसार वे दस

नाटक की कथा वस्तु किसी न किसी इतिहास प्रसिद्ध कपाना पर
आधारित होनी चाहिए। जैसा कि दाल्पककार ने नाटक के विषय में
निरूपित करते हुए उल्लेख किया है '--नाटक का नायक उत्कृष्ट
कोटि के सेवन करने योग्य गुणो से युक्त, धीरोदात्त, प्रतापशाली,
कोनि का मभिलाथी, पत्यात उत्साही, वेदत्रयो की मर्यादा का पोपक
और रक्षक एवं प्रख्यात वश म उत्पन हो, अथवा कोई राजपि या
दिव्य (स्वर्गीय) होना चाहिए। प्रख्यात वृत्त में ऐमी वस्तु अथवा
घटना जो नायक र चरित्र अथवा रस की दृष्टि से अनुचित हो, उसे
छोड देना चाहिए या उमकी प्रस्तुति किसी प्रकार कल्पना के सहारे कर
दे । सारी कथा-वस्तु को पांच भागो में विभाजित करके फिर उन पांचा
भागा को भी खण्डो में विभक्त करना चाहिए | कथावस्तु के इन
विभागो को सन्धि कहते है मुख-सन्धि--- प्रारम्भ नामक
अवस्था मोर 'बीज'मयं प्रकृति का जहाँ सयोग होता है । २ प्रति-
मुख-पधि-प्रधान फल को माधिका क्या-वस्तु जहाँ कभी गुप्त और
१. अधिगम्य गुणयुक्तो घोरादात प्रतापवान् ।
कीतिकामो महोत्साहस्त्र म्यास्त्राता महोपनि ।
प्रख्यातवशोरानपिदिष्यो वायत्र नायक ।
तत्प्रख्यात विधातव्य वृतमधाधिकारिकम् ।
यत्तत्रानुचिन विचिन्नायस्य रसस्य वा।
विरुद्ध सतरित्याज्यमन्यथा वा प्रकल्पयेत् ।
प्रद्यन्तमेव निश्चित्य पञ्चधा तद्विभज्य च ।
खण्डश संघिसजाश्च विभागानपि कल्पयेत् ।।
-देशहपक । ३-२२-२५
૨
अन्तरंकार्य सम्बन्ध
सन्धिरकान्वये पनि ।
मुख प्रतिमुख गर्यो विमर्श उप ति ।।
-सा०६० । परिच्छेद ६

(101) कभी प्रक्ट होनी प्रतीत हो। ३. गर्भ-सन्धि--प्रतिमुख सन्धि का किञ्चित मादिभूत बीज धार-बार प्रकट, गुप्त और अन्वेषित होता रहना है। ४ विमर्श-सन्धि- जब बीज अर्थात प्रथं प्रकृति के अधिक विस्तृत हो जाने के कारण, उसके फ्लोन्मुख होने में व्यवधान पाना है, तो विमर्श-सन्धि होती है । ५ निवहरण सन्धि-- रूपक के समाप्त होते समय जहां पूर्व की सन्धियो तथा प्रवस्थानो के अर्थों का ममाहार होता है, निर्वहण-सन्धि की स्थिति होती है । इसके अतिरिक्त बीज, विन्दु, पताका, प्रबरी और कार्य पांच वर्ष प्रकृतियां एव पाँच अवस्थाएं भी मावश्यक बताया गयी हैं । पाँच अवस्थाएं ये हैं प्रारम्भ-पल की प्राप्ति- हतु जहाँ प्रथम बार उत्सुक्ता दिखायी पढे २ कार्य-सिद्धि न होती दिखायी पड़ने पर तदर्थ जहाँ दीनता-पूर्वक प्रयल किया जाय । ३ प्रात्याशा---प्रयत्न तथा विघ्न दोनो की स्थिति की अवस्था, जहा दोनो के कारण फ्लागम का निश्चय करना कठिन हो जाय । ४, नियताति-जहाँ पल की प्राप्ति का पूर्णतया निश्चय हो जाय । ५. पलागम -उद्देश्य को पूर्णरूपेण प्राप्ति । वस्तुत कार्य कि इन पांच अवस्थाम्रो का नाटक की कथा-वस्तु मै भलीभांति विन्यास करना रचनाकार की परम सफलता है। १ अवस्था और नन्धि कतिरिक्त नाटक की कथा-वस्तु के विन्यास और उसके पालवित होने के प्रसग मे भर्य-प्रवृतियो का विशेष महत्व होता है । प्राधिकारिक पधा-वस्तु के विकास और उसके पाद्योपान्त १. अवस्था च कार्यस्य प्रारस्पस्प पलाषिभिः । प्रारम्पयनप्राप्त्या नियताति फ्लागमः ।। r-सा० ६० । वही परिच्छेद निर्वाह मे ये ही परमावश्यक तत्व है। ये मर्थ-प्रकृतियां पांव हैं- १ पोज-कार्य सिद्धि का हतु जो प्रारम्भ में स्वल्पमात्रा में निर्दिष्ट नाटक के अग्रभाग मे अनेकश विस्तृत होकर पल्लवित होना है ।२ बिन्दु-प्रधान व था के प्रविच्छिन्न बनी रहते। जिसके द्वारा प्रवान्तर क्या पाये बढ़ती है। ऐसा कारण बनकर उपस्थित होनेवाला साधन बिन्दु कहलाता है । ३. पताका-वह प्रासगिक कथा वस्तु जो नाटक मे दूर तक चलती रहे । ४ प्रफरी-प्रासगिक क्या-वस्तु के छोटे छोटे इतिवृत्तो को प्रकरी कहते है। शर्य-जिस फल की प्राप्ति के लिए प्रयत्न किया जाता है और जो साध्य होता है, वह कार्य है। यही नाटक वरतुत' प्रमुख और प्रन्तिम प्रयोजन है। सस्कृत नाटको मे प्रधान कथा बस्तु के अतिरिक्त कुछ ऐसे कथानक, प्रसग प्रथवा घटनाएं भी रचना के उद्दश्य की प्राप्ति में मनिवार्यतः सहायक होते है, परन्तु ये मया के गटन में नहीं पाते, ऐसे तथ्पो का अन्य प्रसगो के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है, इन्हे L- १ २ वीज वि.दु पताका च प्रवरी कार्य मय च । प्रर्षप्रकृतय पञ्च जारवा योज्या यथाविधि ।। -सा. परि०६ फलस्य प्रथमो तुझेज तदभिधीयते । मवान्तरार्थ विच्छे। विन्दुरच्छेदकारणम् ॥ ध्यापि प्रासङ्गिक वृत्त पतामेत्यभिधीयते । प्रासङ्गिर प्रदेशस्प चरित प्रारी मता ॥ -~~-सा०६०।यहो स्वल्पादृष्टस्तु तद्धतीन विस्तायनस्था; पवा-तरार्थ विच्छेरे विन्दुरच्छेदकारणम् ॥ सानुबन्ध पताकास्य प्ररो १ प्रदेशाभार ।। ---दशाहपकीप्रकारा-१

(१२)
भोपक्षेपक कहते है। इन भोंपक्षेपको का सपोजन स्थान,
समय एवं पटना को एक्ता रखने के लिए प्रावश्यक
है, क्योकि संस्कृत नाटको को समस्त कथा वस्तु प्रको मे
विभाजित रहती है, दृश्य विधान होता नहीं। इन प्रर्योपशेपको की
सल्या पांच है---१ विष्कम्भक भविष्य में होने वाली मयवा
भूतकाल की घटना अथवा कथा की सूचना मध्य पपात्रो द्वारा दी
जाती है। प्रवेदार-इसमे होतवाली भयवा बीती हुई कथा को
निम्नश्रेणी के पात्रो द्वारा मूचित किया जाता है। धूलिका-
विमी रहस्य विशेष को नेपथ्य मे चिन किया जाता है । ४.
मकारप--मन को ममामि पर मग्रिमा को प्रारम्भिा कपा का
पात्री द्वारा सरेम कर दिया जाता है।" प्रकावतार--एक भव
को उम कथा या सम जो कथा मरे, मन मे चलती रहती है। इन
प्रयोगक्षेपको म से प्रथम, द्वितीय-विकार और प्रदेश का प्रयोग
प्राप नारको म विशेषायम होता है मौर दोप का प्रयोग न के बराबर
ही हुमा करता है।
१. अर्थोदो पकः मध्य पञ्चभिः प्रतिपादये ।
विषम लिम्पादावतार प्रवेश ।।
विदांव ।
२ वृत्तपमानामयागानी
मक्षेपास्तु वेलम्मो मध्यपातमोजा ॥
सहदेशानुदातीवर नीषपारमयोजित ।
प्रायम्मान दोसायंस्थापसवा ॥
पानजनिमासस्यनिषार्थस्य
पहा राराम पिस्या गृपना।
मानास्याने पोम्पाविभागल. ॥
--रापमा
मूधना।

- नाटक की रचना शैली के सम्बन्ध में भी प्राचार्यों ने भलीमाति निरूपण किया है । नाट्य-रचना प्राय. चार वृत्तियो मे से किसी एक में होती है। वे चार वृत्तियाँ ये है कैशिकी, सात्वत्री, प्रारमटी मोर भारती। वृत्ति का निरूपण करते समय दशरूपकार ने लिखा है'--'नायक के कार्यों के अनुकूल व्यापार को वृत्ति कहते हैं।' व्यापारामिका वृत्ति ---द्वितीय प्रकार) । १. कंशिकी-कशिकी नापक प्रथम वृत्ति उसे कहते हैं जो नृत्य, गीत, विलास इत्यादि शृगारिक चेष्टाम्रो के सयोग से कोमल हो। २. सास्वती यह वृति प्रायः उन रूपको में होती है, जिनका नायक सत्व, शौर्य, दया पोर प्रार्जव श्रादि गुणो से युक्त हो। ३ प्रारभटी---यह वृत्ति उन स्पको मे होती है, जिन में माया, इन्द्रजाल, सग्राम, क्रोध, उद्भ्रान्ति आदि घ्यापारों की सृष्टि हो। ४ भारती-जिन रूपको मे वाधिक अभिनय की अधिकता-दृश्यो, व्यापारी के अनुपात सबाद ही अधिक हो, वहाँ भारती वृत्ति होती है । प्रस्तु परम्परानुसार 'नाटक' और 'भाए' भारतीवृत्ति मे नाटिका 'कशिकी' वृत्ति मे एव डिम 'पारभटी' वृत्ति में लिखे जाते हैं। किन्तु यह एक सार्वभौम सिद्धान्त नही माना जा सकता । पुरातन काल मे प्रदेश विशेष म अपनी नाट्यविधा, रचना-प्रक्रिया का प्रचलन एवं उनकी प्रतिष्ठा थी। तथापि इन वृत्तियों का शस्त्रीय विवेचन तथा वर्गीकरण का नाट्य-रचना मे १ गौतनृत्य विलासाद्य. मृदु. शृङ्गारचेष्टितं । विशोका सास्वती सत्वशौर्यत्यागदयाजवः। सलामोत्थामावस्या साहात्यः परिवर्तकः ।। मायेन्द्रजाल सग्राम लोधोद्धान्तादिचेष्टितं. । भारती संस्कृत प्रायो वाग्व्यापारोनद्राथय । भेदः प्रोचनायुक्तः बीपीनहसनामुख.॥ दापकाप्रकाश २,३ अपना स्थान है । अस्तु । नाट्य-रचना के उपरिलिखित तथ्यों के अतिरिक्त कुछ पारिभाषिक और गौए शब्द भी हैं जो रूपक-रचना में एक प्रकार से प्रावश्यक हो जाते है। प्रस्तावना, नान्दी, नेपथ्य, जनान्तिक, भरतवाक्य मादि का प्रयोग भी प्राय: सस्त रूपको में निश्चित रूपेण किया जाता है। छत्रपतिसाम्राज्यम्-नाट्यवंशिष्ट्य हम ऊपर ही रचना-प्रम में यह निर्देश कर चुके हैं कि यह लेखक की द्वितीय नाट्यकृति है । इसके पूर्व को रचना 'सयोगितास्वयम्वरम्, भारतीय एवं प्रभारतीय विद्वानो द्वरा प्रशसित हो चुकी थी, प्रतः इसके भी वैशिष्ट्य के सम्बन्ध मे दो मत नहीं हो सकता । तथापि हम नाट्य-रचना-विधान के सिद्धान्त पौर रचना-शैली भादि की दृष्टि से इसका विवेवन करें, पावश्यक है। 'छत्रपतिसाम्राज्यम्' का कथानक सर्वथा स्तुत्य इतिहास प्रसिद्ध है । महाराष्ट्र-केशरी पत्रपति शिवराज के शौर्य पूर्ण कार्यों मोर उनके साम्राज्यस्थापनाद्योग को नाट्यरूप प्रदान करने में भी याज्ञिक जी मे पूर्ण प्रयास किया है । इसमे नाट्य-रचना के सभी तथ्य क्या-वस्तु, प्रवस्था, सन्धि मादि का प्रयोग भोर निर्वाह सफलता पूर्वक किया गया है। पूरे नाटक मे १६४६ से १६७४ ता की मिवानो के जीवन- पापों से सम्बन्धित घटनाएं निबद्ध है। लेखप ने वथा-वस्तु के लिए स्टाफ, मर देसाई, ममिलन, श्रोपावशास्त्री और मंगर की पुस्तको पा सहारा लिया है। शिवानी का मुख्य उद्देश्य स्वराज्य सस्थापना ही नाटर या प्रमुख प्रपोजन है। इमका समेत हमें प्रयमा में-'हम भूमि को घमंध्युत, उन्मः चासको के अत्याचार से मुक्त करने के लिए स्वतन--पामाग्य स्थापना के प्रतिरिक्त अन्य .

( १५ ) कोई भी श्रेयस्कर मार्ग नहीं है। (यही से नाटक की मुखसन्धि, प्रारम्भ नामक अवस्था और 'बीज' अर्थ प्रकृति का आभास मिलता है।) द्वितीया में प्रतिमुख-सन्धि' का प्रारम्भ 'सम्प्रति चालीस हजार जन मेरी सेना में सम्मिलित होना चाहते हैं परन्तु धनाभाव के कारण नियुक्त करने का साहम नही हो रहा है ..।' चतुर्था मे तृतीय गर्भ- मन्धि प्रारम्भ होती है- गुरुचरी को शत्रुओ के विषय में पूर्णतः परिचय प्राप्त नरने दो, पदाति, अश्वारोही, प्रादि सेना विभागों के अध्यक्ष उन्हें तैयार करें, दुगों के अधिकारी उनकी रक्षा के लिए निश्चल सावधान रहे, अब हमे अपना पराक्रम दिखाने का अवसर है और शत्रुनो के विनाश का समय पा गया है। सनमात्र में विमर्श मन्धि'इन्ही श्रेष्ठ दुर्गों से प्राज तक हमारी स्वतत्रता की रक्षा होती रही परन्तु भाग्य के परिवर्तन से हम उन्हे सो देने के लिए प्रस्तुत हो गये हैं । फिर भी भाग्य अनुकूल होने पर पुन ये हमारे उद्धतु'मेना परिपीडिता भुव, धर्मच्युतरुन्मदराज सघ । साम्राज्य सस्थापनमन्तरेण, म वर्ततेऽन्याऽर्थ करी प्रतिस्थिा २ कित्यल्पपनो नोत्सहे तान्विनियोक्तम् । अपि च द्वीपालरा- द्विषयार्थ सप्राप्त महान्तं शास्त्रास्त्रायुधसवय साधलक्षणादि ऋतु प्रार्थयते मा फिरङ्गी दणिकपति । प्रच्छन्न परिपन्थिना परिचय कुर्वन्त्यनल्प स्पशा, अध्यक्षा. स्वपदाति सादिनिवहान्सनाहयन्तू द्यता । दुरिणामवने भवन्त्ववाहिता दुर्गाधिपा निश्चला', सनो रोपयितु प्रतापमुदितः कालो द्विपामन्तकः ॥१० ४. परन्तु कालमहिम्ना सप्रति तानेवाहतोक' वय प्रवृत्ता । तथाप्यनुकूले देवे पुनस्त एव भविष्यन्यस्मत्स्वातन्त्र्यसहाया. । ३ स्वातम्य प्राप्ति के सहायक होंगे।' पन्त मे नवमाड़ मे नाटककार ने पाम सन्धि निर्वहण का निर्वाह बड़ी ही कुशलतापूर्वक किया है-' अम्ब मापके पादेशानुसार मैंने यह मै से पांच सह्यदुगों को अधिकार में कर लिया है। इतना ही नहीं साहित्यदर्पणकार के मतानुसार 'कुर्याग्निवहरणेऽद्भुतम्'-लेखक ने मद्भुतरस को भी सफल अभि. व्यक्ति प्रस्तुत की है-'महो इस साधु की मुखाकृति मेरे पुत्र की मुखाकृति से कुछ मशो मे समानता रखती है । इस प्रकार दसवे प्रक म शिवराज का राज्याभिषेक रूप साम्राज्य-सस्थापन उद्देश्य सफल हुआ है। पूरे नाटक मे नाट्य रचना के अन्य नियमो का पालन-विष्कम्भक, प्रवेशक, पताका, प्रकरी, आदि का भी सफल प्रयोग हुा है। प्रकास्य और मकावतार का भी प्रयाग है। प्रमावतार-(एक पक की कक्षा पा वह परा जो पनिमाक मै चले, की सूचना) का प्रयोग-'राज- गरदुर्गमापादपाय रामधानी योग्यताम् । यावत्तस्पिता वय राम- कार्याणि पापेम ' (मीयाक) सूचना के अनुसार तृतीया का प्रारम्भ-(ततः प्रविशति राजगादुगप्रासावापस्थितो मन्त्रि द्वितीय शिवराज सिवराज-मस्मिन्, सुव्यवस्थिते राग्मतन्त्र रुपमद्यापि निति न प्रमति मे अन्तरात्मा ।' से होता है। इसी प्रकार "दिवम्भर' या प्रयोग पूरे नाटक में पाए स्थानों पर किया गया है। द्वितीय के विषम्भव' म निको पापालाप जिराम गत घटनामो पा विवरण, घतार में होने वाले भवानी प्रतिष्ठा महोत्सद को १ स्वददिशानुरोधेन ममारमसाएता पथ्यपा राष्ट्र दुर्गा । २. राममाला-(अविस्मयम् स्वगतम्) पही अनाविदरोन सबदरयस्य मुसम्पतिर्मम बरसस्प मुसन्धविधा । ३ परान्ते मूषित पार्नस्तरस्याविभागत । पोऽस्तरापेपोऽदातार इति स्मृतः ।। साहित्यपंप

( १७ )
सूचना, पञ्चमाक में दो गुप्तचरो की बातचीत के माध्यम से विगत
घटनाम्रो यो सूचना, इसी प्रकार सप्तमाक के विष्कम्भक में पूर्ववृत्त
बताया गया है। पञ्चमांक के विष्कम्भक में शिवराज द्वारा
बघनख के सहारे अफजलवध की घटना गुप्तचर द्वारा बतायी
गयी है। नाटक में 'दूर का मार्ग, वर, युद्ध, राज्य और देश इत्यादि
विप्लव-घेरा डालना, भोजन, स्नान, सुरत, अनुलेपन, वस्त्र का
पकड़ना मादि बातो को प्रत्यक्ष नहीं दिखलाना पाहिए। नियम का
पालन पूर्णतया यहां किया गया है।
'प्राशीनं मस्त्रियारूप . श्लोक : काव्यार्य सूचक । नान्दीति कम्यते'
के अनुसार शिव स्तुतिपरक ललित और भावप्रवण श्लोक
का प्रारम्भ तथा भरतवाक्य से उसकी समाप्ति हमे कालिदास, भास,
भवभूति आदि के नाटकों की रीति-नीति का स्मरण करा देते हैं ।
'भारती' वृत्ति के रीत्यानुसार नटी द्वारा पाऋतु का मनोहर वर्णन
प्रस्तुत कराया गया है। जैसे 'अभिज्ञानशाकुन्तल' म ग्रीष्म का
माटक
दूरावान बघ युद्ध राज्य देशादि विप्लवम् ।
सरोध भोजन स्नान सुरत चानुलेपनम् ।
अम्बर ग्रहणादीनि प्रत्यक्षाणि न निदिशेत् ।।
-दशरूपका ३
२. रमयति रस पति रसा विशाला।
विवनति चपलपयोधरमाला ।।
भवति सपदि जनतापविलयनम् ।
मृग्यति मृगपतिपरि निलयनम् ।।
नमयति तहगणमलमासार..
क्षुम्यति गर्जति पारावार ।
नन्दति मुदितो जनपदलोकः ।
जलदविलोकन विगलितशोक ॥
-प्रथमा

वर्णन प्रस्तुत किया गया है। रचनाकार ने शिवराज के जीवन की पठाईस वर्षों की घटनानी का प्राकलन भौर सयोजन नाटक के दस भको में किया है । दस भको वाले इस नाटक को हम सामान्य लक्षणा. नुसार 'महानाटक' की सज्ञा दे सकते हैं-'पाच अक वाला नाटक छोटा मोर दम पको बाला नाटक बडा कहा जाता है। प्रस्तु इस मक्षिप्त विवेचन से स्पष्ट है कि 'छत्रपतिसाम्राज्यम्' नाट्य-रचना विधान की कसौटी पर सर्वथा सफल एक उच्चकोटि को नाट्यकृति है। नाटक मे प्रधानत वीररस की सफल अभिव्यक्ति हुई है-प्रधमाड़ में ही (उत्तन. ...पिनाकपाणिरवताल्लोसाफिरात शिव.) वीररस के प्रङ्गीरस होने और वीर शिवराज के नायक होने का संकेत रचनाकार ने स्वय दे दिया है । नाटक का सक्षिप्त कथानक इस प्रकार है- पहला पक-इस प्रक में साम्राज्य-स्थापित करने के लिए साधन मोर साधक पर शिवराज तथा उनके वयस्क मित्रो द्वारा विचार किया गया है। प्रक का नाम 'साम्राज्योपत्रम' है । प्रस्तावना के पश्चात शिवराज यपने मित्रो-एसाजी, बाजी भोर तानाजी के साथ मय पर माते हैं। प्रारम्भ मे एसाजी बाजी पोर तानाजी मापस मे यवन शासको को मत्याचारी नीति तथा उनकी कृपा पर जीवित रहने वाले मात्रिय राजापो के व्यवहार के सम्बन्ध में बातचीत करते है-'समी क्षत्रिय नरसा प्रपने स्वार्थ के दशोभूत परस्पर क्लह करके यवन सम्राट की शरण मे ससुख जीवन व्यतीत कर रहे हैं, यही कारण है किमाज हम भारतीय तेज से हीन हो रहे हैं।' बीच में ही शिवराज ने उनके मापसी विवाद को समाप्त करने की दृष्टि से कहा- हमारी इस दवा का कारण यही है कि क्षत्रिय नरेश भी पवनो का साभाव- रण करने लगे है प्रत मित्रों इस घरती को इन मधी, मन्यापी १. पञ्चमाकमेनदयरे दशारे नाटक परम् । -सरपक । तृतीय प्रकास ।

। शासको से मुक्त करने के लिए हमें प्रयास करके स्वतन्त्र साम्राज्य की स्थापना करनी चाहिए अन्य कोई मार्ग नहीं है। उनके अन्य मित्र इस कथन से सहमा सहमत नहीं होते। इसी समय सेवक से समाचार मिला कि भगिनी को साथ लेकर गांव जाते हुए नेताजी को बीजापुर- संनिको ने मार डाला। इस सूचना से शिवराज का रोप द्विगुणित हो गया और उन्होंने तुरन्त कहा--'क्या क्षत्रिय कुल मे उत्पन्न होकर मी हम लोग इस अपराध को क्षमा कर सकते हैं।' कदापि नहीं। हम लोग अब एकमत होकर धर्मराज्य स्थापना के लिए कटिबद्ध हो जाये। अन्ततोगत्वा उनके विचार से सभी सहमत हो गए और सर्वतोभावेन सहायक रहने का वचन दिया। इसी समय यह साम्राज्य स्थापना के प्रयास का समाचार जान तोरसादुर्ग ३ रक्षक ने उपस्थित होकर दुर्ग शिवराज के अधिकार में सौंप दिया । दुर्ग प्राप्त हो जाने से सबको बडी प्रसन्नता हुई। दूसरा अंक--यह निधि प्राप्ति अक है। इसमे सर्वप्रथम चाकण दुर्ग के अधिकार में माने की सूचना है। फिर जो प्रथम अक में नेता जी के मुगल-संनिको द्वारा मारे जाने की सूचना दी थी, उस सम्बन्ध में यह समाचार कि नेताजी को सैनिको ने मृत समझ कर छोड दिया था और वह चेतना प्राप्त कर, माथेरान पती के यहाँ उन्होंने शस्त्रास्त्र विद्या में कुशलता पास कर ली और राजमाची दुर्ग में प्रवेदा किया। बीजापुर-स निको ने उन्हे बन्दी बना लिया। फिर उन्होने यवनवेश धारण कर लोहगडदुर्ग में शिवराज से भेंट को यह विष्कम्भक द्वारा सूचित किया गया। उसके पश्चात् तोरणार्ग में शिवराज भविष्य के कार्यगम पर विचार-विमर्श करते हैं, धनाभाव के कारण शस्त्रास्त्रो के समक्ष पौर संन्य-संगठन में कठिनाई का अनुभव हो रहा है । उन्होने नेताजी के सकेतानुसार भवानी मन्दिर में जाकर उनकी माराधना की। वहां उन्हें माकाशवाणी सुनायी पड़ती है कि "निराशन हो, सहायकों द्वारा प्रभीष्ट सिद्ध होगा। सुनकर उन्हे बडा हपं हुमा। .

वर्णन प्रस्तुत किया गया है। रचनाकार ने शिवराज के जीवन की मठाईस वर्षों की घटनापो का पालन पोर सयोजन नाटक के दस भको मे किया है । दसमको वाले इस नाटक को हम सामान्य लक्षा- नुसार 'महानाटक' की सभा दे सकते हैं-'पाच अक घाला नाटक छोटा मोर दम प्रको वाला नाटक बड़ा कहा जाता है । यस्तु इस मक्षिप्त विवेचन से स्पष्ट है कि 'छत्रपतिसाम्राग्यम्' नाट्य-रचना विधान की कसौटी पर सर्वथा सफल एक उच्चकोटि की नाट्यकृति है। नाटक में प्रधानत वीररस की सरल अभिव्यक्ति हुई है-प्रपमाङ्क में ही (उत्तुङ्ग.....पिनाकपाणिरवताल्लोलाकिरात शिव) वीररस के मनीरस हाने और धीर शिवराज के नायक होने का सवेत रचनाकार ने स्वय दे दिया है । नाटक का सक्षित यथाना इस प्रकार है- पहला प्रक-इस प्रा में साम्राज्य स्थापित करने के लिए साधन पौर साप पर शिवराज तथा उनके वयस्क मित्रों द्वारा विचार किया गया है । मापा नाम 'साम्राग्योपत्रम' है। प्रस्तावना के पश्चात शिवराजपाने मित्रों-एमाजी, बाजी भोर तानाजी के साथ मन पर पाते हैं। प्रारम्भ में एसाजी याजी पोर तानाजी मापम में यवन शासबाबीभत्यापारी नीति तथा उनकी कृपा पर जीवित रहने वाले सत्रिय रामयों के व्यवहार के सम्बन्ध में बातचीत करते है-'समी सविस नरसा पपने स्वार्थ के बीभूत परपर बला पर यवन पसाट की शरण में गमुरा जीवन पनीत कर रहा है, यही कारण है जिपाम हम भारतीय सेम में हीन हो रहे हैं।' घोष में ही शिवराज में उन मामी विवाद को समान बरन की दृष्टि में यहा- हमारी महापापा यही है सित्रिय नरेश भी पाया सा प्राप. जमाने मग पर मित्रों पर परली पाइन मधर्मी, मन्यापी - १. पम्ममारमनदायरे सारे माटा परम् । -वसरपर कृतीय प्रगत ( १९) शाप्सको से मुक्त करन के लिए हमें प्रपात करके स्वतन्त्र सामाजम की स्थापना करनी चाहिए मत्य मोई मार्ग नही है। उनके अन्य मित्र इस कथन से सहसा सहमत नहीं होते। इसी समय सेवक से समाचार मिला कि भगिनी को साथ लेकर गांव जाते हुए नेताजी को बीजापुर- संनिको ने मार डाला। इस सूचना से शिवराज का रोष द्विगुणित हो गया और उन्होंने तुरन्त वहा--'क्या क्षत्रिय कुल में उत्पन्न होकर भी हम लोग इस अपराध को क्षमा कर सकते हैं ।' कदापि नहीं। हम लोग मब एकमत होकर धर्मराज्य-स्थापना के लिए कटिबद्ध हो जाय। अन्ततोगत्वा उनके विचार से सभी सहमत हो गए मोर सर्वतोभावेन सहायक रहने का वचन दिया। इसी समय यह साम्राज्य स्थापना के प्रयास का समाचार जान तोरणादुर्ग के रक्षक ने उपस्थित होकर दुर्ग शिवराज के मधिकार म सौप दिया । दुर्ग प्राप्त हो जाने से सबको बड़ी प्रसन्नता हुई। दूसरा अंक-यह निधि-प्राप्ति प्रक है। इसमे सर्वप्रथम चाकण दुर्ग के अधिकार में पाने की सूचना है। फिर जो प्रथम प्रक म नता जी के मुगल सैनिको द्वारा मारे जाने की सूचना दी थी उस सम्बन्ध में यह समाचार दि नेताजी को सैनिको ने मृन समझ कर छोड़ दिया था पौर वह चेतना प्राप्त कर, माथेरान यती के यहाँ उन्होंने स्थान विधा म कुशलता प्राप्त कर ली मोर राजमाची दुर्ग म प्रवेश किया। बीजापुर-सैनिको ने उन्हे बन्दी बना लिया। फिर उन्होंने यवनवेश धारण कर लोहगडदुर्ग में शिवराज से भेंट को यह विष्कम्भक द्वारा सृमित किया गया। उसके पश्चात् सोरणानुग मे शिवराज भविष्य में वायंगम पर विचार विमर्श करते हैं, धनाभाव के कारण शस्त्रास्त्री के सम्ह पार सन्य-मगठन में कठिनाई का अनुभव हो रहा है । उन्होने नेताजी के ससानुसार भवानी मन्दिर में जाकर उनको मारापना की । यही उन्हे पाकापावापो सुनायी पानी है कि निरासन हो, सहायकों द्वारा अभीष्ट सिद्ध होगा। मुनकर उन्हें वहा । हर्ष हुमा) ( २१ ) से पुष्ट करके उनमे राष्ट्रीय-भावना का समावेश कर रहा हूँ जो भविष्य के रण मे सह यक बनंग । रामदासजी के चले जाने पर वह मत्रयागृह मे प्रवेश करते हैं । घर ने पाकर बताया कि बीजापुरनरेश घा सेनापति बन्दी बनाने के लिए प्रस्थान कर चुका है। उसके पश्चात ही शत्रुपक्षीय दूत कृष्णाजी उपस्थित होते है। दूत ने बीजापुरेश की मोर से सन्धि प्रस्ताव रखा। शिवराज ने प्रजा को दिन कामना से स्वीकार कर लिया। फिर पन्नोजीगोपीनाय को के मन की बात जानने के लिए भेजा । दात्र-द्रत ने यह बताया कि हमारे सेनापति किसी प्रकार प्रापको बन्दी बनान की अपनी प्रतिज्ञा पूरण करना चाहते हैं। शिवराज ने दूत को--- सेनापति से कहो कि एकाकी शिविर म मिलकर मुझे हस्तगत कर सकते हैं । यह सूचित घरो सेना से घिर रहन ये वारण सापके पास पान म शिवराज भयभीत होना है' मम भाया । और दूत की इच्छानुसार अपना दूत भी भेजका ऐसी मूचना दे दी। फिर समय निश्चित हो जाने पर, ठीक समय पर बघनस मादि से सम्मिा शिवराज अगरसर तानाजी के साथ एकान शिविर मे मिलने जाने का निर्णय किया। अपने कुछ संनिको को पर्यंत की उपरयका म पिपर रहने और शूगी ध्वनि के सकेतानुसार मान- मारने मादेश भी कर दिया। - ( २२ ) दुर्गों में प्राश्रय लेलें । कहकर शिवराम राजकार्यो के निरीक्षणा सभाभवन मे चले जाते है। छठवां धक-यह 'छलप्रबन्ध' नामक प्रक है। सिंहगडदुर्ग मे नेताजी घोर मंत्री से परस्पर वार्ता और परक्षित मुगलप्रदेशो के अधिकृत हो जाने की सूचना । फिर शिवराज का प्रवेश और 'मनिगए युद्ध पुन निकट है सका उपस्थित करना। इसी समय दिल्ली नगर से मागत यवन तपस्वी का प्रवेशापौर दक्षिणापथ का राज्यपाल प्रापको बन्दी बनाने पे लिए, पना नगर में बैठकर प्राममण की योजना बना रहा है, यह सूचना देना । शिवराज ने मुगलमेना मे स्थित मराठा सेनापति के पास एक यारान निकालने को मुगलसेनापति से माशापत्र प्राप्त करने के लिए सन्देश भेजा और कहा कि उममे वेष बदलकर हमलोग बाराती रहेो । यवन नपात्री बता जाता है। अपने माय चल पचास मनिक अमात्य और पदाति सेना के अध्यक्ष को रहने का मादेवा (बारात मे) कर दिया। मत्री ने मुगल सैनिको को घासा देने के लिए योजना बनायी लोटने के समय हमारे कुछ सैनिक कामज' के मार्ग में वृक्षा-भागो पर और बैलो बी सीगो पर कपडो की ज्वालाएं जलायें। मुगल सैनिक उधर ही दोहेंगे।' उरामे बाद शियराज राजमाता के दर्शनाप चले गए। सातवां परयह 'मोगलेश-मनुसथान नामक पक है । विम्भर म मुगल सेना में दो सेनापतियो की घातचीत होती है । दूसरे सनापति म यह यतामा विरात्रि में सम्राट के मामा के महल मे शिवराज घुम गया पोर उसकी अंगुलियों को काट लिया। सहायवार्य उपस्थित म पुत्र को शिव अमरक्षा मैनिय ने मार डाला । मुगलसेना ने नागने ए शिवराजमा पीछा किया किन्तु पात्रजमार्ग में प्रकाश स्तरमेना उधर बसी गयी पोर निरास होरर खोट पायी। इससे पर ही गिण गास ने सिहमार्ग पर पेरा गम दिया। नया पेग पप गया, शिवरात्र की मोर्षों उसे परात पर दिया। यह सूचना पाकर राज्यपाल ने समाधिपति के पद पर अपने मामा को तथा सेना का नायक जयसिंह को नियुक्त कर शिवराज को पकड़ने का आदेश दिया है । इसी के साथ शिवराज के दूत रघुनाथपन्त के प्रागमन की सूचना भी है । उसके पश्चात् सेवको सहित शिवराज जयसिंह की सेना के शिविर की ओर प्रस्थान करते हैं। जगन्नाथपत मोर शिवराज की बातचीत भी होती है । निकट पहुँचकर पुरन्दर दुर्ग के मुगलसैनिको द्वारा घिर जाने की जगन्नाथपत शका व्यक्त करते हैं । उसी समय घोडे पर सवार उदयसिंह तेजी से प्राता है और सूचित करता है-'जयसिंह का कहना है कि मेरे आदेश का पालन स्वीकार हो तो मिल सकते हैं प्रन्यथा वापस जायें।' स्वीकृति देकर शिवराज जयसिंह से उसके संन्य शिविर में भेंट करते हैं । विचार- विमर्श के बाद सन्धि-पत्र पर हस्ताक्षर कर देते हैं । जय सिंह युद्ध विराम हेतु उदयसिंह को पदाति सेना नायक को आदेश सुनाने के लिए भेजता है । यवनराज के मादेशानुसार जयसिंह शिवराज को बहुमूल्य वस्त्राभूपए प्रदान करता है। माठवा प्रक-इस प्रयागप्रयाध' नामक मक में शिवराज और अवनराज के समागम का जयसिंह द्वारा प्रबन्ध किया गया । जब शिवराज अपने सभी साथियो-सहित वहां पहुंचे तो उन्हें वही घेर कर बन्दी बना लिया। शिवराज ने मिष्ठान्न ले जानेवाली पचीस टोकरियों खरीदवा कर मंगाया भोर प्रारम्भ में पांच टोकरिया मिठाईयो से भर कर बाहर भेजा, मुगल-रक्षको ने भलीभांति निरीक्षण किया और विश्वस्त हो गये कि कोई छल नहीं है । फिर एक टोकरी मे शिवराज अपने पुत्र सहित बैठकर निकल गये। उनके स्थान पर हीरोजी रोगाकान्त होने का बहाना कर मुगलो को भ्रम मे डाले रहा । मन में यह भी सबके साथ वेश बदलकर निकल गया और प्रयाग के मार्ग में शिवराज से मिला । इस प्रकार सभी सह्यप्रदेश पहुँच गये । प्रातः ( २४ ) मुगल-रक्षक ने शिवराज को शयन स्थान पर न पाकर यह सूचना यवनराम को दी। नयाँ प्रकयह 'दुर्गविजय नामक प्रक है। प्रधानमत्री ने राजमाता को सूचना दी कि छह में से पांच दुर्गों को अधिकार में कर लिया है । उसके बाद कुछ साधु पाते हैं। राजमाता साधुनो से पुत्र शिवराज के समाचार जानना चाहती हैं। प्रधान साधु राजमाता को गगाजल से पूर्ण क्लब देवर कहता है कि अभिषेक के लिए तीर्थों से में ले माया हूँ। उस साधु को मुखाकृति को देखकर राजमाता के हृदय में शिवराज का सन्देह होता है । अन्त में शिवराज प्रकट हो जाते हैं। माता को अपार हर्ष होता है। प्रधानमत्री चाकण मादि दुगों को जीत लेने की सूचना शिवराज को देता है, रल्याण प्रान्त के विजयायं संन्य समूह में प्रस्थान करने का समाचार पोर सिंहगर के विजय की कठिन समस्या बताता है । शिवराज ने सिंहगड के जमार्थ तानाजी ये सेनापतित्व में सेना को प्रस्थान करने का मादेश दिया । दक्षिण के राज्यपाल का दूत उपस्थित होकर सार्वभौम सम्राट का पत्र देता है । मत्री पढ़कर सुनाता है--शिवराज को राजपद पर प्रतिष्ठित कर पड़ोस के दो राज्यो के चतुर प्रहण करने का अधिकार प्रदान करते है। शिवराज ने मत्री को मादेश दिया- राहक सेना द्वारा पीस प्रहण करने के बहाने महाराष्ट्र प्रदेश पो अपने अधिकार में बार लेना चाहिए। इस समय मुगल-रामाद, गान्धार-विजय में व्यस्त है । मैं घर का साह करने के लिए गुर्जर देखा जा रहा हूँ। वापस पाने पर सामाग्याभिषेप-महोत्सव सम्पन्न होण। 'गभी मन से चले जाते हैं। सर्गप्रा-प्रारम्भ में विप्पामा द्वारा निहारमुर्ग में विजय दी गुचना, साप ही उदयभाग और तानाजी पोरोब धीरपद प्राप्त परत मा समाचार प्रात होता है । सारा वालाप दो रामपुर में होता है। गरे रामपुरष ने बताया रिसर शिवराज रा विश्याया - ( २५) फहर उठा । कल्याणप्रदेश को पाबाजी ने, प्रधानमत्री ने माहुलीदुर्ग शो और प्रतापराव ने साल्हेर दुर्ग को मधिकार में कर लिया है, समाचार बताता है। वार्तालाप करते हुए दोनों साम्राज्याभिषेक- मण्डप के निकट पहुँचते हैं । अभिषेक-महोत्सव सानन्द सम्पन्न होता है । विषम्भक के पश्चात् साम्राज्यामिषिक्त शिवराज छत्र-चामरधारी सेवको से सेविन राजो-सहित रत्नसिंहासन पर पासोन मच पर उपस्थित होते हैं । उन्होंने सामन्तो के प्रतिनिधियो को बहमूल्य बम्नाभूपण देने, सभी ब्राह्मणों को लप्स, चौवीस हजार और पाँच हजार मुद्रायो सहित (क्रमश) वस्त्राभूषणो से सम्मानित करने का प्रादेश कर समस्त अन्य ब्राह्मण-स्नातको को वार्षिक-वृत्ति की व्यवस्था की अनुमति दिया। पाठ प्रधानमत्रियो को बहुमूल्य रत्न और धम्याभूषणों से विभूषित किया गया । युद्धभूमि मे प्रात्मोत्सर्ग करनेवाले बोरो के कुल वालो को राज्यकुल-वैभव से सम्मानित करने का मादेश शिवराज ने प्रधानमत्री को दिया । अन्त मे गुरुचरण श्री रामदास ने उपस्थित होकर राष्ट्र-समृद्धि का ममीप पाशीप नाटक के 'भरतवाक्य' कथन द्वारा प्रदान किया । मच से सभी जन चले जाते हैं। साहित्यिक-सौष्ठव एवं मूल्यांकन 'छत्रपतिसाम्राज्यम्' के नाट्य-वैशिष्ट्य तथा रचना-विधान आदि पर हम पहले ही विचार कर चुके । और मब साहित्यिक-सौष्ठव का दिग्दर्शन करा देना भी उचित समझते हैं। वैदर्भीरीति एवं भारती ति मे लिखित इस नाटक की प्राञ्जल-परिष्कृत भाषा, इसके भाव- प्रवण चित्रण हमे अनायास ही एक सफल काव्य-प्रणेता का स्मरण पर देते हैं। रसाभिव्यक्ति मोर मलकारो का प्रयोग सहजत' हुमा है। मर्यानरन्यास, रूपक, दृष्टान्त, अपह्नति, निदर्शना, उपमा, अनुप्रास, मोर विपम मादि मलकारों का प्रयोग विशेषत. देखने को मिलता है । साहित्यिक-सौष्ठव की दृष्टि से नाटक के प्रत्येक प्रक में ( २६ ) आये गीत, प्रकृति चित्रण-सम्बन्धी स्थल, वीररसाभिव्यक्तिपूर्ण छन्दों का काध्यत्व उल्लेखनीय है । प्रस्तावना के पश्चात नाटक का प्रारम्भ वीर-भाव पूर्ण कथनो से होता है। प्रस्तावना का गीत जिसमे वर्षा ऋतु का वर्णन-'विशाल घरती जल का पूर्ण रूप से प्रास्वादन करने लगी, चचल मेघों का दल इधर-उधर घूम रहा है। लोक का ताप नष्ट हो रहा है, सिंह पर्वत के उच्चभाग मे शरण ढूढने लगा। जलबूदो के भार से वृक्ष-समूह झक रहा है, विशाल सागर उफनाने लगा है । बादलों का समूह देखकर, मनुष्य धोक्रहित भव मानन्दित हो रहे हैं ।' कितना स्वाभाविक पोर हृदयहारी है । प्रकृति-चित्रण विषयक वर्णेमो को पढ़ते समय हमारा हृदय बलात् उसके भाबों में रमकर उपस्थित उपादानो के साथ तादात्म्य स्थापित परने के लिए उत्कष्टित हो उठता है मौर हमे वे प्राकृतिक उपादान निर्जीव निसर्ग वस्तु नहीं अपितु जोबस्त-प्रेरणा-स्रोत से प्रतीत होते हैं--'पर्वत के ऊँचे-नीचे दुर्गम मार्ग जो वृक्षो, लतामो, कुलो भीर घासो से ढके रहते हैं प्रयत्न करने पर साध्य हो जाते हैं, इससे सीधे हमे यह शिक्षा प्राप्त होती है कि उपाय द्वारा दुर्गम रास्तो को लापा तथा कुटिल शत्रुभो पर विजय प्राप्त की जा सकती है।'-- (अक ११)। उदय होते सूर्य की रक्तवणं प्रकाश विखेरने वाली किरणों का प्रसार हो रहा है, देखिए- मपास्य दूर मलिना तमस्विनी, क्षन तिर्यक प्रसृत वाशुभिः । प्रसानाम्रनिकुञ्जमण्डिता, दिवाकरेणापरिणता वनस्थली ॥ प्रक २।२ मूर्य ने अपना नव किरणो के प्रसार से क्षणमात्र में ही रात्रि के मलिन अन्धकार को दूर करफे, लता मानमगरी पौर निज से विभूषित चमस्थलो यो रजित कर दिया। तेजस्वी विशाल हृदय पुरुषो की महनीयता भार लोकमगल-मायना के प्रसार का उदाहरण दोपहर के पूर्ण उदित सूर्य से उपस्थित किया गया है- লা।

( २५ ) उद्भाम्य शंसशिखरच्छिन पादान, तेजोनिधिः किमुदितो विरमेद्विवस्वान् । अभ्युद्गतो गगनमध्यपद धाम्ना निजेन निखिल भुवन चकास्ति । मेर, -ग्रंक ३२ पा सूर्य उदय होकर पर्वत की चोटियो पर उगे हुए वृक्षों के ऊपरी भाग को प्रकाशित करके ही विश्राम ले लेता है, नहीं ; वह धीरे-धीरे गगन के मध्य तक पहुंच कर अपनी किरणो के प्रकाश से समस्त जगत को ही प्रकाशित कर देता है।' पर्वत की चोटियाँ, सधन हरित- चुक्षावली, हवा के चलने से बुन-ममूह के पत्तै अपनी शाखानो के साथ घान्दोलित हो रहे हैं, सारा धन जैसे गम्भीर सिन्धु हो, हिलोरें ले रहा हो--'पर्वत के पावं मे वृक्ष, गुरुम और लता-वितान के कारण गहन वन जिसमे सर्वत्र प्राणियो का निवास है, वायु चलने के कारण समस्त बन समुद्र की समता को प्रक्ट कर रहा है।'- (अक ४१२०)। विशालगड दुर्ग अपनी उच्चत्ता मोर दुर्जेयता के कारण कदि के लिए ऐरावत गज के ममान प्रतीत होता है--'यह विशालगडदुर्ग, मपनी विशालता, ऊँचे-ऊंचे गुम्बदी के कारण, उन्नत गण्डस्थल के सदा, सूड़ की भाति अग्रभागवाला, दुराश्मरणीय, विस्तृत पाश्र्वभाग से शोभित इन्द्र के गज ऐरावत की शोभा धारण कर रहा है।-- (पक ०१)। गाँव, नगर की निर्मपता और रमणीयता का दिग्दर्शन देखिए किस मनासक्त भावना से कराया गया है- लुलितपपिकनेने पूरयित्वा रजोमि-- यसनमपहरन्तो सुण्ठकाश्वश्वाता जनपदपुरमार्ग इंध्रमन्तो यथेच्छ, विपदभिमनभीता उरलय ते समन्तात् ।। -प्रक ५११ (२८) वर्षा का समय है । हवा चल रही है। कवि का कपन--ग्राम पौर नगरो के मार्ग में बवण्डर (तेजवायु) स्वेच्छापूर्वक विचरण करता, बादलों से भयभीत-सा चारो पोर से उठकर पाकाश को पोर प्रस्थान कर रहा है, और इस प्रकार यह धवण्डर एक लुण्ठक (लुटेरा) के समान धान पथिक की पाली में धूल झोंकर उसके वस्त्रो का भपहरण कर रहा है। इतना ही नहीं एक स्थान पर पर्वत की उच्च पोटिया, सपन वृक्षावली मोर निमरमादि, कार रेविट में शिवराज के लिए प्रयल दुर्ग सम्म प्रमोन होते हैं-'पर्वन को ऊंची-नीची धरती, बमको गुफाएं, नाना प्रकार की लताओं और वृक्षो से सुशोभित मन, पर्वत के उच्च शिखर से प्रवाहित होने वाले निर्भर, ये सभी भापक लिए सुदृढ़ दुर्ग के रूप में घोर शय के लिए बाधा-स्वरूप स्थित है ।- (प्रक २)। ऐमे घोर भी पनेर स्पन माटम में है जहाँ नास्वकार पूर्णरूपेण कवि के प मे पल्पना और भाव से उद्येलित हो उठा है। प्रकृति-सौन्दयं चित्रण के प्रतिरिक्त नाटषकार होय मिन्नण में सपा सफर है। प्रानि-चित्रण मोर मौर्य दोनों से पूर्ण पह पर दविए- भान्यायोग्यरश्मि जियपनातिभिध्यानमापायद्धि- हमोर्भदिनादः स्तनिरपदहगंधमाघोषद्धिः । पारासंपावमग्न प्रतिमटविटपि व्याकुलोपरान्त, मानान्तो मोदमन्य जलपर नियहैदुगराजः समन्तात ।। - -- ७४ दुर्गपारी पोर मे म्लेट गेना द्वारा पिर गया है। वृदा सो हमारे संनिर वियों की तसवार में काट डाले गए हैं। जैसे वाइस पनो पनी पत्तियों से गूर्य को उप डे है। उसी प्रकार मुगलो नीना हमारा रोनापति पिगमा ६. माइसोपी भीषण गरगना मार नमनाहोंगे निरसठी गई पूर्ण पनि हर दो महिन पर रही है। हमारे निर उसी प्रकार ध्यान से पानी पिरती भारपारा वर्षो ममूह हो मागे हैं।

नाटक के प्रथम श्लोक से ही स्पष्ट है कि इसमें वीररस अगीभूत
होकर अभिव्यक्त हुमा है प्रत सर्वत्र शायं मादि भावो की अभिव्यक्ति
म्वाभाविक है। यही कारण है कि पर्वत के पावं मे स्थित सघनवन
निझर, सरिताएं दुर्ग और विशाल वृक्षो को एक वीर सैनिक के रूप में
स्थान स्थान पर वशित किया गया है । वर्णन पढते समय वीर का
सौर्य युक्त शरीर प्रत्यक्ष दृष्टिगत होन लगता है और हृदय उसके तेज
से प्रकाशित होकर निर्भय हो जाता है। शिवराज के शस्त्र सज्जित
२५ का वर्णन पढकर ही हम उनके स्वरूप का दर्शन करने लगते हैं--
प्रजवतुरंग
कल्पितासनोऽय,
कवघर: करवालकुन्तनः।
महरिणत नयनो रुपा महोग्र,
सरमसमेत्यभितो द्विपा कृतान्त' ।।
--प्रकाहि
तीग्रगामी पोहे पर सवार, कवच धारण किये हुए, तलवार, भाला
लिए, लास-साल, माखो भोर महत्तंज के कारण भयानक, शो के
लिए यमराज चले मा रहे हैं। शिवराज की सेना विजय के लिए
प्रस्थान कर रही है, उसका रूप देखिए---
सुतीक्षण भल्लासिधनु समूजिता,
विशालतूपी परिणदपाश्र्या
स्वानन्यसम्भावनया समेधिता
प्रयान्तु
मे बन्यपदातिसया ।
-प्रंक २०११
तीगा भालौं, पाण, धनुषों से प्रदल, मटि प्रदेश में तुषार
बरो हुए, स्वातम्यभावना से भलीभांति प्रोत्साहित पनवासियों को हमारी
पंस सेना प्रस्थान करे।
पर हम सिरा चुके हैं कि दृष्टान्त उपमा, मन्तिरल्यास, निदर्शना,

मनुप्रास प्रादि मलकारो का समावेश सहज ही हुपा है । यहाँ एक- दो उदारहण प्रस्तुत करना अनुचित न होगा- स्वल्पोऽप्यग्निवल यति न कि कानन शैलसस्थ मत्तीन्द्रान्विदलति न कि लीलया सिंहशावः । बालोऽप्यकर्को विकिरति न कि चान्नमारात क्षणेन सर्ववाप्रतिहतरयस्नेजसा हि प्रभावः॥ --प्रक १३१२ अर्थान्तरन्यास का ममावेश इसमे कितनी सहजता से हो गया है। दृष्टान्त का उदाहरण-'साहाय्यमासाद्य मदनौरसाकृता कबन्यता' (अक १११४) मोर अन्त्यानुप्रास ६T उदाहरण'-सुमसु- कुमार "रमय रमेश मा रसिकेश' (गीत प्रक) रूप का उदाहरणा- "पित्रोगरोश्चाधि केसरिण किशोर' (प्रय ११४) प्रपतति- 'पवेहि नेन"पपुरेय मंतिमत्'--(मक २१६) मोर निदर्शना- लोकप्रकाशन""युगपरसुषमा दधाति' (प्रक ३६१५), प्रादि । उपयुक्त विवेचन से स्पष्ट है कि 'छत्रपतिसाम्राज्यम् में कथा- वस्तु तथा सपटना-विन्यास में नाट्यशास्त्रीय सिद्धान्तो एवं सीमामो का सर्वथा ध्यान रखा गया है । माथ ही साहित्यिक-सौष्ठव की दृष्टि से प्रकृति चित्रस, रसादि की पूर्ण अभिव्यक्ति, मलकारो का समावेश उचित रीति-नीति से हुमा है। 'भारती' वृत्ति, वसीरीति, वीररस की प्रधानता, स्वराज्यसंस्थापना, मगल प्रयोजन, पराजमशाली प्रतापी नायक शिवराज, इतिहासप्रसिद्ध पथावस्तु ये सभी इम कृति को एक घेष्ठ नाटय को सझा दिलाने में सर्वथा समर्थ है। दम को पा यह महानाटक है। श्री याशिक जी नाट्यरचना में पूर्णतया सफल हैं। पिन्तु उनकी नाट्यकला का सम्यक विवेचन 'सयोगितास्वयम्वरम् सपा 'प्रतापविजयम्' के प्रध्ययनोपरान ही उचित होगा। 1

इस नाटक के प्रथम प्रकासन के पश्चात् यह प्रथम बार हिन्दी.
मनुषाद-साहित, द्वितीय प्रकाशन कर 'देवभाषा प्रशासन के अवस्थाक
ने प्रशंसाई कार्य किया है । भाधुनिक सस्कृत नान्य कृतियो का प्रकाशन
साहसिक कार्य है।
दादुर-जयन्ती,
सवत् २०२६ विक्रम
-शिवशङ्कर त्रिपाठी
दारागन,प्रयाग--६

पात्र-परिचयः ch प्रमुखपात्राणि- शिवराज (महाराष्ट्राधिप , नाटकस्य नायक ) एसाजी तानाजी शिवराजवयस्या संतिका बाजी दादाजी मानाजी (कल्याणप्रान्ताधिप ) धीरामदास (शिवराजस्य गुरुचरणा) कृष्णाजी (अवनराजस्य सन्देशहर) जगन्नाथपन्त (शिवराजस्य सन्देशहरा) रघुनाथपत जयसिंह (धवनरास्य सेनानायक) उदयसिंह (यवनसेनाया निको जसवंतसिंह (मुगल सेनापति) गमसिंह (जयसिंह पुत्र) हीरोजी (शिवराजक्यस्य) प्रतापराव (शिवराज कुमार गागाभट (काशीनिवासिन पण्डितवर) राजभाल (शिवराजस्य जननी) राशी (शिवराजस्य राशी) अन्यपानाणि-- प्रतीहार, कच की , गूढचर, द्वारपास ,दुर्गपालाश्च

(-१७)
धर्मप्यसपृतनतान् परधने सुम्पान् मृदो निपान,
मन्दान् विक्रमशालिनि प्रतिभटे पटप्रयोगात्स्टान् ।
विश्वस्तेऽपि वहिलमा हुलयतपयले सोत्सवान्,
गोविप्रेष्यपचारिण पथमिमान् देवद्विष सधये ।।२४
दादाजी -वरस, शिवराज, सम्यगवपारितयवनेशस्वभावमा
स्वामवरोर्ट नोत्सहे। तच्छण मे परम नयवचन पदाथपणेन
निष्प्ररपूग भविष्यन्ति तवाभितार्यसिद्धय । व तावत्
पन्योऽयेागलुयितथिय सप्रयुजन्नपालान्।
प्रोत्सुकाइनचरपतीन् प्रीपयन सिद्धलक्ष्पान् ।
दान निर्मधुरवचन रजयन् लोकदोरान्,
सोलापुलंय जनपदान दुर्जयांचादिदुर्गान् ॥ २५
प्रयोऽयेति-अयोऽन्येपंया कलुपिता धी येषां तान् नरेशान्
प्रमुजा सगमपन्, प्रीते उद्रेक उस तस्मात् हेतो सिद्ध लक्ष्य
का सान् यनचरपतीन् श्रीगधन, दान मानं मधुरवचन लोका:
ये धर्म बिनास मा प्रत धारण किये हुए, परधन ये लोभी, निर्वसों
के लिए र, विरमानी पे सामने नम्र, शिन्तु प्रतिपणी मनितो वे
पाप पल करोवाने, दिवासी लोगों के साथ भी हिंसा-वृत्ति रखने,
दुसयपुमो का प्रपहराण पोर गोब्राह्मणों पर परयाचार करनेवाले,
देवतामारे विपी 1 २४
दादाजीस शिवराज पवने मे स्वभाव को भली भांति जान
भेने में पारा तुम्हें गा शाहश मुझमे नहीं है । प्रत मुनो में
जो नीति बन पहा मरे गहरे परतता मे मभीष्ट सिद्ध
होगा। तुम
पारपरिप से पतुपितर रामानों को एकता गूर में
नापो, सोलापता से पनपारियों को (जा सत्य मापन म मिश
B) प्रशन पर प्राने साप मो, प्रान, पोरों को मान, सम्मान, दान

-सत्रा (१८) कुमार, सर्वत्र मंत्रगुप्स्पधीन एय विजय' । सामन्त्र सबरणे सर्वच त्वया सायघानेन भवितव्यम् । यत मत्रो विहा पशुभिवच गृह्यते, तसंश्च कुड्यै पटनिमाम्यते । समोरणेनापि सुदूरमाते पधिरािजसप्तमनस्तु भियते ॥२६ एप च सुगुतप्तमनस क्षमपतिन्यवृदिनुपतीनापाव स्यानुगान, निदा नपसमिती पसक्तो दृप्ताभिपून्यर्थय। प्रयाजना वीरा विक्रमालिनश्च तान् रजयन् लीलया मुद्धानि लोसायुदानि त जनपदान देशान् दुर्जयान् च महिदुर्गान् जय । साम्नेति क्षत्रियाः पुलिन्दा धनेवरा तेफा वृन्दानि समूहान् नृपतीन् प स्वानुगान् स्यानुपूलान् मापादय पुरु । ततश्प मयमश्रितो वसमत. दप्तान गयितान् रिपून् नि पा घर्षय पात्रमस्य । पूरिष ते परातय. दावश्च विशल्पिते प्रतिविधाने मा स्म प्रमती भप प्रमादमा पुरु दयध । स्वातन्य समुपास्स्व सरिमना भवसम्यस्य एप मित्र मतिभि समन्य निणीस पपं. स एव परम. प्रपान यस्य तार सन् सासारामास्थापय । पौर मपुरवाणी द्वारा सन्तुष्ट पररे, कौतूहस पी मानि पुर बारा मनपा पार दुप दुर्गा पर विजय प्राप्त रो। २५ हमार ! विकी गोतीता पर frमरती है अतः तुम मंत्र की गोपनीयता की पोर पवार सारधान रहना । पोंरि- मंत्र, पशु-पक्षियों द्वारा प्रहण जा सपना, पर्श, दीपार और पारणे गुन परत पाए र तरोग सपना है एवं श्री. कभी पपने ही विश्वस्त जन द्वारा माम मरता है । २९ प्रापर तुम गुम मा द्वारा-रियों तथा पोरों के मगोपाल में मोतिरे सहारे नि होपर मो पग्मत्त पराम। पर साप विधान करने में - .

((१६) पूर्तारातिविकल्पिते प्रतिबिधो मा स्म प्रमतो भव , स्वातथ्य समपारस्व मनपरम साम्राज्यमास्यापय ।। २७ शिवराज - भगवन्नंच उपदेश दिन्तु साक्षादर एव । प्रतो भगवनुपहेसाचिरेण सपादयिष्ये साम्राज्यसिद्धिम् । वादाजी -परस, सफ्ला सतु ते नयोपकमा । (इति निष्क्रान्त) शिवराज--दिष्ट्या गुरुचरणा अयमानुकूला सवत्ता । तामाजी--(दूर विलोक्य) कुमार समपागतोऽय जरानजरिताङ्ग- स्तोरणानुगपाल तोरणागपाल-(प्रविश्य) (शिवराजमुपसृत्य) कुमार, धर्म- सग्यसस्थापनोग्रत स्वां निशम्य तीर्थयात्राप्रवन मरा त्वदायत श्यिते मम तोरणादुगं । स्व तायत्तम स्थित्या प्रवत्तंय तव शासनम् । शिवराज -मदन भवते रोचते। व एयाह तत्र प्रस्थास्ये। भी प्रमाद मत करो, एव अपने भत्रियो द्वारा निश्चित नीति के मार्ग पर चल कर स्वतत्रता की उपासना मोर साम्राज्य की स्थापना परो । २७ शिवराम-भगवन्, यह उपदेश नही सापात् वरदान है । अतः मापके मनुग्रह से मैं पीन साम्राज्य स्थापना की सिद्धि प्राप्त कर लूंगा। बादाजी-वस, तुम्हारी नीति सफलीभूत हो । (चले जाते हैं) शिवराज-भाग्य से गुरुयेष्ठ भी मनुकूल हो गये। तानाजो-(दूर देखकर)कुमार, वृद्धावस्था के कारण जर्जर शरीर यह तोरणादुर्ग का पालक पा रहा है। सोरणातुर्यापन-(प्रवेश पर पौर शिवराज के पास पहुँचकर) पुमार, यह सुनकर कि पाप धर्मराज्य स्थापना हेतु तैयार हैं, मैं तोरगा दुग पार के अधिकार मे सौर रहा है क्योंकि मैं तीर्थ यात्रा के लिए प्रस्तुत है । माप तब तक वहाँ रहकर अपना शासन प्रारम्भ करें। गियराज-जैसी पापको ज्या । पल ही मैं वहाँ के लिए प्रस्थान

.
.( २० )
तोरणादुर्मपाल -वस चिरंजीव । पूरपतु तब मनोरय भगवती
वरदेयता । (इति निष्क्रान्त)
शिवराज -दिष्टया हस्तगतोऽस्माकं तोरणादुगं । एवं
मनायासेन कार्यस्य यस्य सिध्यत्यपक्रम ।
प्रासमाप्त तस्य ध्याधातो नैव कुत्रचित् ।। २६
तानाजी-भवायनुग्रहवा लिनस्ते किमप्यसाध्य नाम ।
एमागी--सोरणायपना तु साम्राज्यनीमन्दिरस्य तोरणमेव स्यया
समासादितम् । मत पर ते भद्रमेय पश्यामि ।
शिवराज- यमस्या , भवतां साहाय्येन सहितं च मम साम्राज्य
सिद्धि । तस्माभिर्महाहापापनयंशीकरण घाएकोण्डने दुर्गपालो
सदधिष्ठितो दुर्गा सपाटनीयो । पहमपि नमैन पुरन्दरदुर्गमास्मसारस्या
दुईस सुपेप्रान्तापिप मातुल निगृह गामि ।
तोरणार्गगत-चिरजीव वा ! भगयती तुम्हारा मनोरप पूर्ण
परें (जाता है।)
शिवराज-भाग्य से तोरणादुग हमारे अधिकार मे पा गया । इस
प्रकारका में प्रारम्भ में यदि बिमा रिसी पठिनाई रेसिदि प्राप्त
होती है तोरपा हो यह पूर्ण होगा, कोई भी विन नहीं हो सकता ! २८
तानाजी-भवाणी प्रमुग्ह गे पार सिए पुष भी पटिन नहीं है ।
एमी-मार, बोरगा दुर्ग में पारने सामाग्य-रूपी
धीमदिरा पिसार ही ग्राम पर लिया है। प्रत मागे भी हम
मापी गरमाही देखते है।
विपराग-मित्रों, पार गरमी राहाया हमारी सामान गिरि
पारा ही सिंह पार पाउादार देशरपा प्रौर कोणतो
पाम सपा में रपर पपिर परे, भीटनीति द्वारा
पुरा गानापिर दुगपारी पान मानुस
मोमपिरारम्रता

(२१)
सर्व-पदानापति कुमार ।
शिवराज.-सापयामस्तायस्वनियोगमनुष्ठातुम् ।
(इति निष्प्रान्ता सये)
समाप्तोऽय साम्राज्योपक्रमनामा
प्रथमोऽ।
सभी-कुमार कोजसी माज्ञा।
शिवराज-चलो, अपने अपने कर्तव्य को पूरा करने का प्रयास
(सभी चले जाते है)
साम्राज्यौपत्रम नामक
पहला अंक समाप्त।

- द्वितीयोऽङ्कः (ततः प्रविशत्येसाजीस्तानाजीश्च) एसाजी.--अप्यभिनन्दितं देवस्याधिपत्यं घाकरणदुर्गपालेन । तानाजी:-अथ किम् । अपि च तस्य राजनिष्ठापरितुष्टेन देवेन पुनः स एव समाधिकारपदे स्थापितः । एसानी:-मयापि स्वामिनियोगानुरोधेन महाहोत्कोचप्रदानेन यशीकृत्य कोण्डनेदुर्गपालं तत्र प्रयतितं महाराजशासनम् । तानाजी:-देनापि परस्परविनाशायोधतान् पुरन्दरदुर्गपालात्मजा. मनुकूलाविकाय रियांश विभागेन च तासंताय स्वायत्तीकृतः पुरन्दर- दुर्गः । अनन्तरं च सहसा विजित्य स्वामिना कारागृहे निक्षिप्तो दुविनीतो निजमातुलः । दूसरा अंक (उसके पश्चात् एसाजी मोर तानाजी का प्रवेश) एसाजी |--क्या चाकरण दुर्गपाल ने देव का माधिपत्य स्वीकार कर लिया? तानाजी-स्वीकार कर लिया । और उसकी राजनिष्ठा से संतुष्ट होकर देव ने पुन. उसे उसी अधिकारपद पर नियुक्त कर दिया। एसाजी- मैंने भी स्वामी की माज्ञा के अनुसार बहुमूल्य उत्कोच (घूस) देकर कोण्डने दुर्गपाल को वश मे करके वहाँ महाराज का शासन स्थापित कर दिया। सानाजी-~देव ने भी, एक दूसरे के नाश हेतु उद्यत पुरन्दर दुर्गपाल के पुत्रो को अनुकूल कर उनकी पैतृक सम्पत्ति को उनमें विभाजित करके पुरन्दर दुर्ग को अपने अधिकार में कर लिया। पौर उसके बाद स्वामी ने सहसा दुविनीत अपने मातुल पो जीतकर कारागार में छोड़ दिया।

(१२)
शिवराज-रेचयंतान्यत्र शिलापट्टे ।
शिल्पिमुख्या '-तथा
[इति पयित्वा निष्कामति]
नेताजी-देव महमूल्यो लक्ष्यतेश्य महानिधि ।
शिवराज -प्रये मैय निधि किन्तु साक्षात् स्वातभ्यदेवतबास्मत्पुरता
समुल्लसति । वीर
प्रयेहि ननं पुरत प्रसारित, हिरण्यरत्नप्रचय महानिधिम् ।
एतत्त्वमोपायुषसचरप्रद, साम्राज्यलक्ष्म्या थपरम मूतिमत् ॥
नेताजी --देव, सवत्र धंयमूलाग्येय भद्राणि ।
शिवराज ---एवमेतद् । क कोत्र भो ।
अङ्गरक्षा -(प्रविश्य) माशापयतु देव ।
शिवराज ---मणिकार द्रष्टुमिच्छामि ।
प्रङ्गरक्षक-तथा ।
(इति निष्क्रान्त)
शिवराज--इस शिलापट्ट पर उ हे खाली करो।
मुख्यशिल्पी-जो प्रादेश (भाण्डो को खाली करके जाता है)
नेताजी-देव बहुमू य महानिधि है यह ।
शिवराज- मोह निधि नही यह तो साशात स्वातत्रय देवी हमारे
सामने प्रकाशित हो रही है वीर
सामने बिखरी हुई इमे हिरण्यरल आदि महानिधि की राशि न
समझो, यह महाशक्तिमती साम्राज्य लक्ष्मी है जो प्रमोघ शस्त्रास्त्री
को एकत्र करने के साधन स्वरूप मूर्तिमान हो उठी हैं।
नेताजी-देव धर्य ही समय मगल का मूल है।
शिवराज- हाँ यही । कौन है यहाँ
मङ्गरक्षक-~-(पहुँचकर) मादेश कर, देव ।
शिवराज--मणिकार को बुलायो ।
अङ्गरक्षक-जैसी माता।
(कहकर जाता है)
7

( २४ ) एमाजी:-विक्रमकरसा हि तेजस्विनामपक्रमाः। सामाजी:--सतदय स्वामिप्रवृत्तिमुपलभ्य यवनवेशपर सोऽति- घम्यारातिसेनानिवेश लोहगडदुर्गाय स्थितेन स्यामिना समग्रताभयञ्च सद्य एवं स्वामिनो विधम्मभाजनम् सप्रति ससु हिमाप्यहानि तेन सह किमपि मनपमारपस्तस्मिन्नेय तिष्ठतेस्मन्महाराजः । एसाजी:-विष्टया प्रतिक्षणमे पते स्वामिनः प्रभाय'। तानाजी:-(जाय दिलोयय) प्रही प्रभाता रजनी। साययाम- स्तायस्त्रास्त्रपरिचयं कारपितुं नवसैनिकान् । एसाजी:-तथा। (हति निष्क्रान्ती) इति विष्कम्भक (तत प्रविशति तोरणादुर्गोपवनस्थित शिवराजः) शिवराज-महो, एसाजी-तेजस्वी जन का कार्य विक्रम ही से प्रारम्भ होता है। तानाजी- उसके बाद स्वामी का समाचार मालूम होने पर वह पघनवेश मे शत्रु-शिविर पारफर लोहगडदुर्ग में स्वामी से भेंट की, शीघ्र ही उनका विश्वासी बना। इस समय दो अथवा तीन दिनो से उसी के साथ घुल मन्त्रणा करते हुए महाराज दुर्ग में स्थित हैं। एसाजी-भाग्य से स्वामी का प्रभाव क्षण-प्रतिक्षण बढ़ रहा है। तानाजी-(ऊपर देखकर) प्रोह, प्रभात हो गया। घलो नये सैनिको को शस्त्रास्त्र का परिचय करायें। एसाजी- ठीक है। (दोनो चले जाते हैं) विष्कम्भक समाप्त (इसके बाद तोरणदुर्ग के उपवन मे शिवराज खटे हैं ।) शिवराज-प्रहो, ( २५ ) मपास्य दूर मलिना तमस्विनी, भन तिर्यक प्रमृतांशुभिः सतावतानाम्रनिकुन्जमण्डिता, दिवाकरेगापिता धनस्थली ।।२ त्यंव स्वातंत्र्यसूर्यापि रजितानि सह्माचल निवासिना मावत-- जमाना मनासि । संशति सेषां चत्वारिंशत्सहस्राणि प्रविविक्षन्ति मम सेना निवहम् । फिदवल्पधनो नोत्सहे तान्विनियोक्तम् अपि च द्वीपा- ताराद्वित्रयायं संप्राप्तं महान्तं शस्त्रास्त्रायुषसत्य सार्थसणाऽपि कतुं प्रार्थयते मा फिरङ्गी बणिपतिः । यदृच्छयोपेतोऽयमवसरो मया कप महोतव्यः । महो स्वातन्यपाह्निन्वलितः समन्तत , सह्माचलो मोदयते मनो मे । घनेचरान संन्यगणे नियोक्तम चास्म्यल ता िनतरादुनोति ।। ३ (परतो विलोषय) एष गृहीतसके तो वोर इत एवाभिसर्पति । । सूर्य ने अपनी तिरछी किरणो के प्रसार क्षणमात्र में ही रात्रि के मलिन मन्धकार को दूर करके लता, माघ्रमजरी परि निकुज से विभूषित वनस्पली को रजित कर दिया।२ उसी प्रकार स्वातग्य सूर्य द्वारा सह्याद्रि निवासी मावलो का हृदयं हपित हो उठा है, सप्रति उनमे से चालीस हजार जन मेरी सेना मे सम्मिलित होना चाह रहे हैं । परन्तु पनाभाव के कारण उन्हें नियुक्त करने का साहस नहीं हो रहा है । और दूसरी और द्वीपान्तर (विदेश) से मागत फिरगी वणिकराज डेढ़ लाख रुपयो मे मनेकानेक महान् पाखास्त्र क्रय करने के लिए निवेदन कर रहा है । मैं इस शुम भवसर, का कैसे लाम चार महो- स्वसत्रता की अग्नि से प्रदीप्त सह्याद्रि निवासियों का हृदय, (सहा द्रियासी जिनका हृदय स्वावश्य प्रकाश से चमक उठा है) मेरे मन को एक मोर हर्पित कर रहा है। दूसरी मोर मावलो को अपनी जना में सम्मिलित करने को मेरी मसमर्पता मुझे सन्तच कर रही है । (सामने देखार) सकेतानुसार यह धौर यहीं भा रहा है।

नेताजी:-(प्रयिश्य) विजपता देवः । शिवराज:-अपि चिन्तितारवया धुर्मसंतरणोपायः। नेताजी:-प्रपम झापयाविशतु देयो मा राजमाचीदुर्ग प्रस्थातुम् । मत्परपि भटरहं नाशयिष्यामि तद पिरोपकगणम् । शिवराजः-धीर संप्रति तुकपमपि शस्त्रास्त्रपरिषयेणाधिष्ठानवसं संनाह्य तदजाय विधातुं स्यापतोकृतानां च दुर्गा प्राकारपरिणा- विभिप्रांवामापादयितुमतीयोत्कण्ठितोऽस्मि । मेताजी:--देव युगपत्समुपस्थिताना व्यवसापानांमेणवोपपन्नो विनियोगः । तत्पूर्व राजमाचौरमण एव तावदात्मानमभिनिवेशयतु देयः । एवमुत्तरोतरविजयेन भविष्यति देवस्य सानास्पासिद्धिः। । नेताजी-(पहुँचकर) विजय हो देव । शिवराज-क्या तुमने दुर्ग को विजय करने का उपाय सोचा ? नेताजी-देव । पहले मुझे राजमाचीदुर्ग की मोर प्रस्थित होने का पादेश दें। कुछ ही सैनिकों की सहायता से दुर्ग के अवरोधको को मष्ट कर लूगा । शिवराज-बीर सम्प्रति तो मैं येनकेन प्रकारेण अपनी वर्तमान संन्य-शक्ति को सुदृढ़ और शस्त्रास्त्र क्रय कर उसे दुर्जेय बनाने के लिए अत्यन्त उत्सुक हूँ। और अपने अधिकार में पाये हुए दुर्गों को चहारदीवारी और खाई मादि के निर्माए द्वारा दुलंधनीय बनाना चाहता हूँ। नेताजी-देव, समुपस्थित कार्यों को एक एक करके सम्पन्न करता हो उचित है। पहले राजमाचीदुर्ग की रक्षा का उपाय करने की मोर ध्यान दें। इस प्रकार उत्तरोत्तर विजय द्वारा पाप एक साम्राज्य स्थापित कर लेंगे।

( २ )
शिवरान--(निश्वस्म) सर्वथा साधनधिकलस्य कुतो मे साना-
समसस्थापनसामाग्यम् । यत
बिना भूति भृत्यगणा प्रिया मे विनाऽनभित्ति प्रबराच दुर्गा ।
विना बल मे प्रबलोतरात्मा सर्वेऽवसीदति सह प्रयोर ॥४
केवलमिदानीमशिष्यते परम विधेयम् । त्वया सह भवानी-
मदिरमुपाश्रित्याभीष्ट तपादयितुमय प्रातरादिष्टोऽस्म्यह भगवत्या
परदेयतया । यदि तथापि मे भाग्यविप्लपस्तदानों तु
त्वमेव पोरामसरे सममा वि यस्य राष्ट्रोवरणप्रवृत्तिम् ।
प्रचिनो पहरपालपाणि परिजिष्यामि परात्मनिष्ठ ॥५
नेताली- देव धमराज्यसस्थापनोदत कृपारणस्य तवास्यान एवाप
निषेद । यत
शिवराज-(निदवाम छोडकर ) सधया साधनाहिन मुझे
सामाग्य स्थापित परी पा सौभाग्य यहा ? क्योंकि मेरे सेवर वृत्ति.
(येता) प्रभाव में अच्छे पच्छे दुग चहारदीवारी न होने के बारण
पौर पत्ति (मनि ति) प्रभाव में मेरी प्रयल पानरामा ये सय
एप साथ ही भान हो रहा है।
प्रय मात्र बरणोप सप यह है कि तुम्हारे साथ में प्राण ही
प्रात मारमयानी के मरि समसार अपने प्रमोट की याचना करूं,
सानिमति गवती का पाग है। यह भी भाम्प ने
सायं घोगा रितो-
समान राष्ट्र में उतार या काय वीरानी मुम्हारे ही कपर
पो त गतिमान् भनि भागार - पोर कार से
सपागीदार विमराण । ५
मेलामो-गग्य की स्थापना काला धारण करने
पा mm IAN महा पिचर है हो। Nir कटिनाई
-

( २८ ) अन्तरानिकपः परीक्षिताः, प्राप्नुवन्ति मनुजा महत्पदम् । विघ्नविक्लवधियो मिरुत्सया, हेलयापि निपतन्त्यधीश्यतः ॥६ तद् धयमवलाय साम्राज्यसपादनाथ यद्धपरिकरो भव । तवानु- शासनपरपंव मया पतितव्यमित्याविष्टोऽस्मि भगवता सिद्धतापसेन । न चैतदत्यया भवितुमर्हति । तद् अनन्यभावः परदेवतायो, मनः समाधाय लभस्व वापितम् । किमाश्रितः कल्पतरूं कदाचिनियततेकोऽप्यनवाप्त कामः ॥७ शिवराजः-योर सम्यगनुबोषितोऽस्मि । प्रङ्गरक्षक'--(प्रविश्य) प्राज्ञापयतु देवः । शिवराज:-भवानीमन्दिरमार्गमादेश्य । अङ्गरक्षक.--इत इतो देवः। (सर्व परियामन्ति) एतन्मन्दिरद्वार सत्प्रविशतु देवः । (इति निष्कान्तः) (बाधाएं) रूपी कसौटी पर खरे उतरने के पश्चात् मनुष्य महान् पद प्राप्त करता है, विन से शीघ्र व्याकुल होनेवाला सम्राट भी सरलता से निम्न पद को प्राप्त हो जाता है । ६ इसलिए धैर्य धारण करके साम्राज्य स्थापित करने के लिए कटिबद्ध हो जायं । मुझे सिद्धतपस्वी का आदेश हुमा है कि मैं मापके मादेशानुसार कार्य करूं । यह कभी मन्यथा नहीं हो सकता । प्रत परम- शक्तिमान् मे अनन्य भाव से हृदय को केन्द्रित करके प्रभीष्ट की पूर्ति करें, बया बल्पतरु के माश्रित रहकर भी कोई असफल मनोरण रहा है । ७ शिवराज-वीर, तू ने उचित स्मरण दिलाया । कौन है यहाँ ? भङ्गरक्षक-(प्रवेशकर) प्रादेश वरें देव । शिवराज--भवानी-मन्दिर के मार्ग का निर्दश करो। मङ्गरक्षक-इधर से, इस पोर से देव (सभी घूमकर चलते हैं) यह है मन्दिर का द्वार, पलें देव । (चला जाता है)

( २६ )
शिवराजः--बार पत्र स्थित्या मां प्रतिपालय । पायदहं भगवती.
माराध्य प्रत्यावत।
नेताजी.-तथा
(इति द्वारदेशमधितिष्ठति)
शिवराज'--(भन्दिर प्रविश्य साय साष्टाङ्ग प्रणिपत्य स्तोति)
(बटराण नितासन गीयते)
तारम सब सुतमय! भवानि!!
प्रमलयम बरि गलितविमापम् ।
प्रत्तयपयोनिपिपिसुलितनायम्
पालय परममुडानि तारय० ॥१
निबुधनो
धनुने सष दास,
मियरमा हतहिम्यविलासः
पारय मम विषमारिएतारयः॥२
स्थमसि मर्मक परम शरणम् ।
क्ससि यदि हितमायोरिषम् ।
दारम विनातानि ॥ तारयः ३

पितरसि यदि नहि करणाशम् ।
परवा ममारनं पतिवेशम् ।
निश्चितमपितार्याणि । तारप० ॥४
(प्राकाने)
भा गुचः सहायसाप्याले सिद्धयः ।
शिवराजः-(पाकी) पारणागतवत्ससे स्पस्नुपहपरयया एव मे
प्रापितसिलपः । (प्रसम्य द्वारदेशमपमृत्य) वोर स्ववधीना मे सिद्धमा
इति भावरमा प्रादेशः । सम्ममाङ्गरमकरसेनाकम्य बोजापुर प्रदेशा-
माहरापेक्षित हिरण्मसंचयम् ।
नेताजी:-देव पुरोतिजीएंदेवाप्तमकोएप्रस्तरमच्छो महान्
निधिस्त्वमोत्खातभ्य इति मम पुनरान्तरः प्रत्ययः ।
शिवराजः--न मुषा भवितुमर्हति सखायं प्रतिमासः । यतः
हे शवाणि ! यदि तुम अपनी करुणा-दृष्टि मेरे ऊपर नहीं डालती
तो निश्चित है कि मैं यतिवेश मे 'म्रमण करूंगा १४
(माकाशवापी) निराश न हो, सहायकों द्वारा मभीष्ट सिम
होगा।
शिवराज-(सुनबर) हे पारसागतवत्सले । तुम्हारे अनुग्रह पर ही
मेरे कार्य की सिद्धि निर्भर है। (प्रणाम कर, द्वार पर पहुँच) वीर,
भगवती का मादेश है कि मेरे कार्य की सिद्धि तुम्हारे अधीन है । मतः
मेरे गर के साथ बीजापुर पर भाक्रमण करके अपेक्षित धन
मादि एक करो।
नेताजी-देव, सामने स्थित जीर्ण मन्दिर के कोने में खोदवाए तो
प्रस्तर से ढकी हुई विशाल धनराशि प्राप्त होगी, यह मेरा गहरा
विश्वास है।
शिवराज-तुम्हारा दष्टिकोण असत्य नहीं हो सकता । क्योकि

संयतेन्द्रियमनाः प्रसन्नधीः, प्रत्यगात्मनि च यः समाहितः ।
तस्म यस्फुरति भादिदर्शन; न तद्भवति संशयायहम् ११८
कः कोऽत्र भो।
मगरक्षका-(प्रविश्य) प्राज्ञापयतु देव ।
शिवराजः-शिल्पिमुख्यं द्रष्टुमिच्छामि ।
प्रङ्गरक्षक-तया।
(इति निष्क्रान्त)
शिवरामः-धीर मापेरानपतीन्द्रवचसा खलु प्रोत्साहितोऽस्मि ।
शिल्पिमुख्या--(प्रविश्य) विजयतां देव ।
शिवराज:- (जोणंदेवालयं निदिश्य) तत्र नित्वा पदुपलभ्येत्
तत्सरवरमिहोहर।
शिल्पिमुख्यः--तथा । (इति नित्वा भाण्डान्याहृत्य) दिष्ट्या
विगतान्येतानि द्रव्यपूर्णानि भाण्डानि निखरतभूमिविवशत् । (इति
स्थापयति)
संयतेन्द्रिय, स्थिर और प्रसन्नचित्तवाले व्यक्ति के मन में भविष्य ज्ञान
प्रतिभासित होता है, यह सन्देहास्पद नहीं हो सकता।
कौन, कोई है।
प्रङ्गरक्षक-(पहुँचकर) माज्ञा देव ।
शिवराज-प्रमुख शिल्पो को देखना पाहता हूँ।
मङ्गरक्षा-सी माज्ञा । (कहकर जाता है)
शिवराज-चीर, में वस्तुतः माथेरान के यतीन्द्र-वचनो से ही
प्रोत्साहित हुमा है।
मुत्यशिल्पी--(पहुँचकर) देव को विजय हो।
शिवराज-(जीणं देवालय की भोर सकेत कर) वहाँ खोदकर
जो कुछ भी प्रात करो तुरन्त ले पायो ।
मुख्यशिल्पी-जो माशा ! (खोदकर भाण्डों को लेकर माता है।
भाग्यवशात खोदी हुई धरती से द्रष्यों से पूर्ण ये भाण्ड प्ररस हुए हैं।
(रख देता है।

(२३) एसाजीः-प्रहो देयं सर्वपाउनुफलमिति तक पे। सानाजी:- एयमेतरामायया वयं नेताजी सहसाः प्रकीराः परोसे. ऽपि स्यामिकाय सापयेमुः। एपानी:-- (सविस्मयम्) असे किमुच्यते । नेताजी सु यवनर्स निक- निहत इति लोकप्रतिदिन तानामो:-तं त्यपगततनं मरया परायते यवनसनिकगणे प्रति- मापन्नः स प्रच्छन्नमुपेत्य माथेरानयतीन्द्रं तदपिगतास्त्रास्त्रप्रयोगकोश- सस्तदादेशानुरोधेन साम्राज्यसंस्थापनोयतं स्यामिममन्येष्टुं यतिधमना राजमाचीदुर्ग प्रतिष्ठत । मागं च सद गमवरोद्ध नियुक्तस्य योगापुरसंन्य- श्य नायकं बन्दोवृत्य यतिवसनधरो दृढायताङ्गः, प्रबलत्पाज्वलितः शकुन्तपाणिः । नियमितपयनेशमादिशुष्टः, सरमसमेत्य विदेशराजदुर्गम् ॥६ एसाजी-महो, फिरतो देव सर्वथा अनुकूल है। तानाजी- हाँ, मन्यथा कैसे नेताजी सदृश वीर स्वामी के कार्य को गुप्तरूप मे रहकर भी संपादित करते । एसाजी--(विस्मय से) अरे क्या कहते हो ? नेताजी तो यवन सनिको द्वारा मारे जा चुके, ऐसी प्रसिद्धि है। सानाजी -यवन सैनिको ने उसे मृत जानकर छोड दिया, उनके जाने के पश्चान् जब वह चतन्य हुमा तो प्रच्छन्न रूप से माथेरान-यती के पास पहुंचा, उनसे शस्त्रास्त्र विद्या मे कुशलता प्रास की और उनके आदेशानुसार साम्राज्यसंस्थापनार्थ उद्यत स्वामी को यती के वेश में ढूंढने के लिए राजमाची दुर्ग में स्थित हो गया । मार्ग में उस दुर्ग को भाकान्त करने के लिए नियुक्त बीजापुर सैनिको के सेनापति को बन्दी बनाकर- यतिवेश धारण किये हुए, पुष्ट पारीर क्रोध एवं तेज के कारण भयानक, हाथ में भाला लिए, यवनेश-सैनिक (अश्वारोही) से सेवित वह बलपूर्वक राजमाचीदुर्ग में प्रविष्ट हुमा ।

छत्रपतिसाम्राज्यम् प्रथमोऽङ्कः सुरनिम्नगावलयित नानामृग सस, सकामन्मृगयुटुंत हिमवत शृङ्गातरे शृङ्गत । सान्द यिजमाय सश्वविजितो दिव्य निजास्न दिशन् पुटमानेय पिनापारिहरपतालमांसाकिरात शिव उत्तुङ्गमिति-एप, पिनाक , पिनावाव्य धनु पाणी यम्पस पिनाकपाणि सीलयाकिरात , लीलाकिरात , मृगान् यातीति मृगयु गिय उत्तुङ्ग, उच्च, सुरनिम्नगावलयित, सुरापगापरिवृत नानामृग सहुत ज्याप्त, हिमवत हिमालस्य शृङ्गत शिखरात मयत शृङ्ग शृङ्गान्तर, दूत, मित्र, सत्वेन, बलोवण विजित प्रसारित इरमपं, मर्जुनाय, पाचपुत्राय मानद दिम्य निजास्त पाशुपतास्त्र दिशन्, उपदिशन् युष्मान् रक्षतु । पत्र शिवपदेन शिवराज शृङ्गान्तर शृङ्गत इस्यनेन नानादुर्गाश्मण, नानामगं सदुल इस्पनेन नानारिपुगरणवीर मुगयुपदेन रिपुदलान्सरण, विजपाय दिम्य निजास्त दिशन् इत्यनन मादिभ्यो, सीमाविगतपदेन प किरात सहादियानन पमटन सूयते । पिनारमागिपदेन, घोररसस्वाद्विस्वमिति । भगवान् एकर जो लोलापूर (सच्या) गिनवे धारण कर, हप म पिनाक (धनुष) लिए, पनर पशुपा से पूर्ण एव करण के पदा गगा को लपेटे हिमालय के एक से दूमर (उच्च) शिखर तक गति मे हरिणो का अनुसरा परते. पोर मनोमय से सन्तुष्ट होकर, मार्जनको विजय रे सिए पपना पापा परत्र देते हैं-पाप समी रहा करें। (साविति :)

(२)
नान्यन्ते
समधार-(नेपथ्याभिमसमयसोरम) मार्य, मतमतिपरियमेण ।
इतस्ताववागम्यताम् ।
नटो:--(प्रषिश्य) इयमहिम । प्रागापयावायपुरः ।
सूत्रधार-पद्य खलु नटपुरयास्तम्पमूलासरविरचितेनछत्रपति-
साम्राज्मारपेन नयेन नाटकेनपा परिपसभाजनीया । तत्प्रस्तपता
ताम्मल्लाररागेण स्वरतालपदा कापि रमणीया गोतिः परिपञ्चेतो.
रजनाय । सम्प्रति खलु---
तपनाशुतपनशमनोऽनिलचपलश्चञ्चसोल्लसित्तमेघ.
गर्जति वर्षति विकिरति वनचरनिकरान् प्रसादति सोकान् ॥ २
नटी-पदार्यपुत्र याज्ञापयति । (इति गायति)
(नान्दी के पश्चात)
सूत्रधार-(नेपथ्य की मोर देखकर) मायें बहुत परिश्रम न
करो। मानो, इधर मामो।
नटो-(प्रवेश कर) यह मा गयो मैं । माता दें पार्यपुत्र !
सूत्रधार-माज नटपुर निवासी मूलशकर लिखित छत्रपति-
साम्राज्य नामक नवीन नाटक द्वारा इस परिपद्' का मनोरजन होना
पाहिए। प्रतः मल्लार राग मे, स्वर मौर तालबद्ध कोई सुन्दर गीत,
सभा के मनोरजनार्थ प्रस्तुत करो। इस समय तो-
सूर्य के ताप को शान्त करनेवाले मेघ, वायु के कारण इधर-उधर
घूमते हुए चंचल विद्युल्लता से प्रकाशित होते, गर्जन के साथ
जल-वर्षा करके, वनचर-समूह को तितर-बितर और मनुष्यो को
भानन्दित करते हैं।
मटी-जोमार्यपत्र की प्राज्ञा । गाती है।
-

(मल्लाररागेरा नितालेन गीयते)
रसपति रसयति रसा विशाला ।
विवलति
छपलपयोघरमाला ॥
भवति सपदि जनतापविलयनम् ।
मृग्यति मृगपतिरुपरि निलयनम् ॥ रस० ॥१
नमयति
तरुगरामलमासार
क्षुभ्यति गजति पारावार ॥ रस। २
मन्दति मुदितो जनपदलोक ।
जलविलोकन विगलित शोक ॥ रस० ॥३
सूत्रधार--(परिषदनिमुखमवलोक्य) धायें, एप स्वामभिमन्दति
तय सङ्गीत कलाकौशलेन समाराधितो रङ्ग ।
नटी-मार्यपुत्र यत्सत्यम्
शिध्या
यदुरकर्षमवाप्नुवन्ति
प्रभाव एष गुरोरमोघ ।
(मल्लार राम में त्रितालबद्ध गीत)
बिशाल धरती जल का भूरि-भूरि भास्वादन करने लगी, चपल
मेघो का दल इधर-उधर घूम रहा है । तुरन्त लोक का ताप नष्ट हो
रहा है, सिंह पर्वत के उच्च भाग मे शरण ढूदने लगा। जल-बूदो के
भार से वृक्षो का समूह नत हो रहा मोर विशाल सागर उपनाने लगा
है । मेघदल को देखने के कारण अपने पोक को विस्मृत कर मनुष्य
मानन्दिन हो रहे हैं।
मूत्रपार-( सभा को देखकर } मा, यह सभा तुम्हारे इस
सगीताताचातुरी से मानन्दित हो तुम्ह धन्यवाद दे रही है।
नटी-मार्य पुष्ट । यह सरय है रि-
शिष्य यदि उत्कर्ष को प्राप्त होता है तो मह गुरु का ममोपप्रभार

४ जात. प्रतापोडतकोरपाणा; कृष्णोपदिष्टो हि जयो विजेता ।। ३ शत्रधार - (माफमे) प्रायें, Yए तब गीतप्रकर्षणोम्भितस्य नवजलधरस्यतामन्दगजितम् । मटो-(सस्मितम्) आर्यपुत्र, नास्त्येतन्मेषगजितम् । किन्तु सम्प्रति भूभारावताराय सपनान्वये शराशेनावतीर्णः शिवराज. । स्वातम्यभावनपा समिद्ध. पिश्रोगरोचाधिगतार्थ विद्यो, वीरानुरक्तः सवयोभिरायत। स्वराज्य संस्थापननिश्चितवतो, गर्जस्यय केसरिण. किशोरः ॥४ (इति प्रस्तावना) : कृष्ण से उपदिष्ट होकर ही अर्जुन ने ऐश्वर्य के अभिमानी कौरवो पर विजय प्राप्त की थी।। ३ सुत्रधार-(सुनवर) प्रार्य •सुनो, तुम्हारे गीतराग से पाकृष्ट हमा नव जलघर मन्द गर्जन कर रहा है। नटी-(मुसकरा कर) भार्यपुत्र, मह मेघ गर्जन नहीं है। बल्कि, परती के भार को कम करने के लिए इस सम्म सूर्यवश मे शकर के मश से युक्त शिवराज अवतीर्ण हो गए हैं। स्वातन्त्र्यभावना से समुल्लसित- पिता मौर गुरु के समीप में राजनीति का अध्ययन करने वाला, बह, जिसमे वीरो और समवयस्क मित्रो का मनुराग है, (जो वीरो सपा समवयस्क मिथो से सनाथ है) स्वराज्य स्थापना का पुढवती, कैसरी किशोर गरज रहा है । ४ (प्रस्तावना समास) । (ततः प्रविशति वयस्य सह शिवराजः) एसाजो-महो किंतु खलु प्रवलित पवनकचक- मूर्जस्वलधमनयोपहितः से भारतीया यवनेशमदिता, नष्टप्रभा मागभिधानशेषताम् ॥५ तानाजी-ययस्य स्वोदर पूरणार्थ यवनेसमपाथिता वयमेव सत्र कारणम् । मामी-मस्यान एय वायपालम्भः । यतो मिथोविद्वेषविभिता. नामस्मा ययलेशापय विना का या गतिः सभापते। सप्रति तु सरेय मुनियंत्रिता पर्ष सुरांन बार यापयाम । एसाली-उदारचरितामनपतिगणान् घटप्रयन्धेदनालय- स्ति: कि पापमाचरितम् । (मित्रो सहित शिवराज का प्रवेश) एलामी-मोह, ऐमा यो है कि- भारतीय, जो घम मोर नीति जान गे समर हो पर भुवन साम्राज्य (समस्त गसार) रे प्रवर प्रति ममस्त सगार में दारात रहे, माज कही भारतीय जन यवनों ने पीडित हो, अपने तेन कोमट पर नाममात्र यो शेष रह गए। तानाजी-अपने उदर की पूर्ति (वार्य-साधना) हेनु यदनो में आसा (पाधिा) म स्वयं इगो कारण है। मात्री-पपासा जनाना अपित नही है। क्योंनि अय पार- हारिक दिव-भावना मे हम बाग में ही पलह कोई सो पयनों की पारा में पारित गरा मागी मौन हैइस समय गो हम उन्ही के नियंत्रण में गुगाम शिरहे हैं। एमालो- प्रपनी नीति गरा उन्हीन हमारे उदारचरित सताराममोपामार गित !

बाजी-ज सन्त्यत्रकान्तेन वोपभाजो पयोश्वराःयतः परस्परोन्मूलन सप्रवृत्तान, पिहाय धर्म विषयेषु सरन् । निरयं प्रजास्वापहरान्न पालान्, निगृह्म तैनामनुष्ठितं पिम् ।। ६ एसाजी --प्ररे फिमेव भ्रान्तोऽसि । घमंच्युतानेताभिगए कि धर्मराज्यं स्थापित पवनेश्वरः । एतेषामपचारपरंरास्मरएन जायते में रोमहर्ष । समाननमिर्पण राजसभामपस्थापितस्य गात्मजस्य जाधवरावस्पासावधेन प्रज्यास्ति कोधानलोऽद्यापि सर्वन गूद प्रज्वलति । बाजी -स्वकृत प्रतापा एव फलमुपभुक्त' जाधवरावेण । यवने. स्वरस्तु तत्र निमित्तमानम् । बालो-इस सन्दर्भ में यवनशासक ही केवल दोषी नहीं हैं क्योकि- पारस्परिक द्वेष के कारण एक दूसरे का विनाश करने में रत, धर्मानुसरण का मार्ग त्याग भोग-विलास में अनुरक्त, अपने कर्तव्य से विरत, नित्य प्रजा के धन का दुरुपयोग करने वाले नरेशो का नारा करके उन्होंने अनुचित क्या किया ६ एसाजो-यह भाप केमे भ्रम मे पड़ रहे हैं ? क्या इन भवनो ने हमारे धर्मच्युत राजामो का मन्त करके धर्मराज्य स्थापित किया है। इनके अत्याचार-परम्परा के स्मरणमात्र से मुझे रोमाच हो पाता है। सम्मान देने के व्याज से सभा में उपस्थित किये गये पुत्र सहित जाधवराव के अचानक वध से प्रज्वालिन प्रधानल आज भी सर्वत्र भली-भांति जल रहा है। बाजी-अपनी कृतघ्नना काही फल जाधवराव को मिला । सवन- राज तो उसमे निमित्त मात्र रह ।

( ७) शिवराज-वयस्था , प्रल बचनप्रतियचनं । परमार्थतस्तु न केवल मेकान्तेन दोपभाजो दुयत्ता यवनेश्वरा किन्तु तस्सधारण इदानीतना राष्ट्रदह क्षत्रेश्वरा अपि । यतः दुईते नपतो तु मंत्रिसचिवास्स्यत्वा नियोग निज, स्वच्छन्द विहरन्ति कामयशया उद्धे जयन्त. प्रजा । राष्ट्रोपप्पलवाड्याऽन्यनपत्ति सद्य धयन्तै जना कालेनापचयेन कोशबलयो राष्ट्र ततो मध्यति ।। ७ . तदयस्या उद्धतु मेना परिपोडिता भुव, धनच्युतं सन्मदराज संघ साम्राज्य मस्थापनमन्तरेण, न वर्ततेऽन्याऽर्थकरी प्रतिक्रिया || अपि चाततायिभ्य स्वप्रजानिविशेष प्रजाना परिपालनमेव सर्वत्र राजा परमोधर्म । अतो धर्मराज्यसस्थापनोद्यतस्य मम- शिवराज-मित्रो, वाद विवाद समास करो। सत्य तो यह है- केवल यवन-शासक ही दोपी नहीं हैं अपितु राष्ट्रद्रोही क्षत्रियना भी उन्हीं के समानधर्मा हैं ! घोषि--राजा के दुक्त हो जाने पर मत्री, सचिव सभी अपना वर्तव्य भुला देते हैं-स्वतन्त्र हो जाते हैं और विलास- साधन में रत प्रजा को पीडित करने लगते है । प्रजा विप्लव के भय से मन्य राजा का पाश्रय लेती है और इस प्रकार धीरे-धीरे कोश, बल, राष्ट्र नष्ट हो जाता है । ७. इसलिए मित्री-इस भूमि को धर्मच्युत, उन्मद शासको के भत्याचार से मुक्त करने के लिए स्वतन्त्र साम्राज्य स्थापना के अतिरिक्त अन्य कोई श्रेयस्वर मागं नहीं है। और सर्वत्र मत्याचारियो से प्रजा का अपनी औरस सम्तान की भौति पालन और रक्षा करना राजा का परम धर्म है। प्रत स्वराज्य संस्थापना के लिए उद्यत मेरे द्वारा- पपनेहरा पा, प्रतिपद्य साहस, स ( 5 ) दुई सत्यारित राज्यभारा प्रजाहरवायंपरा. कुशीला. । क्षनेश्वरा सद्यो भविष्यति कृपाएगोचरा ॥६ याजी-कुमार, अपायसमाकुलो हि यलयता विरोधः । यतः विना विवेक যাঙ্ক किल यश्चिकीर्षति । विपद्विभिन्न जनोऽल्पसाधन, क्षघाणघे नौरिव सीदति स्वयम् ॥ १० शिवराज –वयस्प, साहसेन एम भी प्रतिष्ठिता । यत रिपुमा । धनपागतभूति-- जितेन्द्रिय साहस विक्रमोजित । दिवानिश यः सतत प्रयत्नया- स्तमेव सद्यो वएते नृपधीः ।। ११ वे समस्त राजा, (क्षत्रिय अथवा यवन) जो प्रजा का द्रोह परने वाले, दुवृत्त में रत, स्वार्थसाधन में तत्पर, मनीतिगामी हैं , शीघ्र मेरे कृपाण के ग्रास बन जायेंगे । हर बाजो-कुमार, बलवान् से विरोध लेना हानिप्रद होता है। पयोकि विवेकहीन यदि कोई साहस के सहारे शत्रु को अल्प साधनो से पराजित करना चाहता है, वह उसी प्रकार नष्ट हो जाता है जैसे महासमुद्र म उफान पाने पर नौका नष्ट हो जाती हैं । १० शिवराज-मित्र, साहस से श्री को प्रतिष्ठा है (श्री पी प्राप्ति होती है) क्योकि-राजलक्ष्मी उसी का वरण करती है जो शत्रु के अभ्युदय मै भी धैर्य और साहस नहीं छोडता, जो जितेन्द्रिय, सतत प्रयत्नशील तथा जो पल-विक्रम का स्थान है । ११.

पुराऽपि साहसेनेव स्वायत्तीकृत स्वपितृपतामहं राज्य
पाण्डुनन्दनः ।
एसानी-अपे तेजस्विना तु साधननिरपेक्षध साध्यसिद्धि । यत
स्थल्पोऽध्यग्निज्वलयति न कि कानन लसस्थ,
मतभेन्द्राग्विदलति न क लीलया सिंहाव ।
बालोज्यकों विकिरति न कि वातमारात् ऐन,
सर्वत्र वाप्रतिहतरयस्तेजसा हि प्रभाव ॥ १२
तानाजी -कुमार तेजस्विनामपि साहाय्य मन्तरेण तु सशमिय
क सिद्धि । परन्तु
यया समन्तात् सरित
प्रवाह
स्रोतासि सर्वाणि समाविशन्ति ।
तेजस्विन लोकहितकतत्पर,
स्वय वीरगणा धयन्ते ॥ १३
प्राचीन समय में भी पाण्डवो ने अपने पूर्वजो के राज्य पर साहस से
ही अधिकार किया था।
एसाजी-तेजस्थियो को तो साधन न होने पर भी कार्य-सिद्धि हो.-
जाती है । क्योकि
तेजस्वियो का प्रभाव सवय ही अप्रतिम होता है-या मरिन का
एक वए भी पर्वनस्थित जगल को भस्म नहीं कर डालना ? क्या छोटा-
सा सिंह शावक मत्त हाथों को विदीर्ण नहीं करता क्या बाल मूर्य धने
अन्धकार को क्षणमात्र म नष्ट नहीं कर डालता १२
तानाजी--कुमार, तेजस्थिया के लिए भी साहाय्य के प्रभाव में
कार्यसिद्धि सशयात्मक ही होती है। परन्तु जैसे नदी के प्रवाह म
धारी और से स्रोत प्राकर प्रदेश करते हैं उसी प्रकार लोकहित म
सत्पर तेजस्वी व्यक्ति का अनुसरण वीरगणा स्वयं किया करते हैं । १३
.

शिवराज - नास्त्यानं विसंवाद । लोकहितवपरस्य तु सन्ति निसर्गसिद्धा । सहाया तद्भवद्धि प्रफल्पितरूपाविशेषैरह साहाय्य मासाथ मनोकसा, धूप विजेध्ये यवनेशमन्मवम् । रघुवहाभ्या कपिसेनया न कि दशाननस्यापि पृता पमन्यता ।।१४ अनुचर - (प्रविश्य) विजयता कुमार । स्वर्भागनीमायुत्तस्य प्राम प्रापयन्त नेताजी मा समानाम समाधध प त निश्यापहसा तस्य भगिनी मोजापूरसंगिदः। (इति निष्कान्त) साहायमिति-बने मोर निवासः येषा सेपा बनीमा मायलेज. नाना, महत साहायमासाद्य प्राप्य, उन्मदमुन्मत्त ययनेश बीजापुरेशा म.व निश्चयेन पिजेप्ये ३ र हाम्या रामलक्ष्मणाम्पो पपिसेन या दशाननस्य रावणस्य, पिप बन्यता लिन घृता । अपितु पृतंय । यदि रामसदमणाम्या पपिरोन या दशाननो निहित सदा वयं सर्वे मिलिरया मानवसेनया एकानन बोनापुरेश भ्रम पिजेध्यामहे इति । - -in- शिवराग-हमे कोई माय नहीं है। माप लोग सहमत हैं कि भोरसिपी प्यक्ति को स्वय हो सहायक और महायता की प्राप्ति हो पाती है। मन में माप लोगो द्वारा मपित उपाय रोही- बनवागी मायनी की सहायता से निश्चित ए मे वीरापुरगरेका पर विजय रंगा, या राम-सदमरण नेगेना की सहाया से दशानन रावर कोकिरविलीन महीपर दियापा।१४ मनुपर--(पर) पमार | अप। मपनी भगिनीयोगाव से मात एमप, यापपा ममेर नेताओं को योगपुरोगनिन मार वाला मोर उनी भागीय पहरारपिा (माता)

क्षात्र
शिवराज-(सरोपम्) अरे कथमेतादृशमत्याहितं क्षरकुलप्रसू-
तरस्माभिमरणीयम् । पयस्या
प्राताना परिपालनाय
सहसा शास्त्र
न पेनोड़त,
विधारणा वतिना च वेदविदुषामाराधने न स्थितम् ।
राज्ञामुत्पथगामिना प्रमथने युद्ध न चवावृत,
जन्म धिगस्य राघवयश प्रज्वलिते भारते ॥ १५
तदध धमराज्यसथापनेन सपादनीयमस्मज्जीवितसाफल्यम् ।
एसाजी --अभिनन्द्यते कुमारभाषितम । (दूर विलोक्य) एष
दादोजी देशमुख इत एवाभिवर्तते ।
मानिामिति--येन प्राताना पीरिताना परिपालनाय रक्षणाय
शस्त्र न उद्धृत येन च वेदविदुपा वेद विदा तिना ब्रह्मचर्यादि व्रतनिष्ठाना
विप्रणामाराधने न स्थित, येन च उत्पथगामिनामुन्मागप्रवृत्ताना राज्ञा
प्रमथने विनाशे युद्ध न पादतमस्य क्षात्र जन्म रामस्य यशसा प्रज्वलिते
प्रकाशित भारते धिक् निन्द्य मेवेत्यर्थ ।
शिवरा---(रोप सहित) मोह । क्षत्रियकुलोद्भूत हम लोग इस
अपराध को कैसे क्षमा कर सकते है। मित्रो-
पराप्रमी राम थे यश से धवलित इस भरत भूमि मे जन्म सेनेवाले
उस यात्रिय का जन्म ही व्यर्थ है, वह सबंषा निन्ध है---जिसने मात्तो
मी पुकार कर सुन उसके रक्षणार्थ तुरन्त शस्त्र नहीं उठाया, जो वैदज्ञ,
अती प्राह्मणों को पाराधना मे प्रवृत्त नहीं हुमा मौर जिसने नीतिपालक
मनाचारी राजा के विनाशार्थ पद का उपश्म नहीं किया । १५
प्रत हम लोग धर्मराज्य की स्थापना कर अपने जीवन को
सफल बनायें।
एसाजो-हमे स्वीकार है छुमार | प्रापये कथन का हम अभिनन्दन
करते हैं । (दूर देखकर) दादोजी देशमुख यही पा रहे हैं ।

( १२ ) दादोजी--(प्रविश्य) प्रायनामय कुमारस्य । शिवराज--स्यागत देशप्रमुखप्रपरस्य । समन्तात् प्रवृत्त सोक- विप्लवे पुतोऽनामय क्षत्रियाणाम् । दादोजी-तम्पमेवाभिहित कुमारे । यतो सोक्सग्रहायमेव ध्रियन्ते शनिप्राय प्रापा । कुमार स्वदधीन एमासमस्य महतः कार्यस्योपक्रम । तद्भविश्याम्यहमत्र पावज्जीय तव सहाय । शिवरान -मनुगृहीतोऽह भवता सौजन्येन । पयस्या तावदस्माभिर्वीजापुरेसाहस्तगता राह्माद्रिदुर्गा कायमपि स्वायत्तोफर्तण्या । पानी-प्रचुर कोशबलाढ्योऽय वर्तते बीजापुरेश्वर । तत् शक्तित्रयोस रामेषिताना, सामापापं परिरक्षितानाम् । प्रथम ? - दादोजो--कुमार दादोजी-(प्रवेश करके) कुमार कुशल हैं न ? शिवराज-देशमुख-बुल शिरोमणि का हम स्वागत करते हैं। सर्वन जब लोकविप्लव उपस्थित हो तो क्षत्रिय पो विधाम कहाँ सत्य कह रहे हैं। क्योकि लोकमग्रहार्य ही क्षत्रियो ने प्राण धारण किया है। इस महान कार्य का उपक्रम प्रापके ही अधीन है कुमार | प्रत हम जीवन पर्यन्त पापये इस कार्य मे सहायक रहेगे। शिवराज-आपके सौजन्य के लिए हम प्राभारी हैं। मित्रो, सर्व प्रथम, बीजापुरनरेदा द्वारा हस्तगत सह्याद्रि-दुर्गों को अपने अधिकार मे धरना चाहिए। बाजी-श्रीजापुरनरेश प्रचुरको एक शक्तिशाली है । प्रत तीनो शक्तियो के उत्कर्ष से समृद्ध, साम, दाम, दण्ड, भेद चारो उपायो से

( १३ )
पाड्गुण्मयोगोमथितद्विषा कि,
विद्वषत श्रेय उपाश्रयेम् ।। १६
एसाजो-वलवताप्यभिभवायोग्झम्भते परा संघशक्ति । यत.
प्रभायमरया न हि राजपत्त या
संपादयन्तीप्सितकापं सिद्धिम् ।
रिपो कोशवलप्रमत्ते,
नयप्रयुता परसंघशक्ति ॥१७
तानाजी.-उदासचरितानामेव परिपन्थिनामभियोग उपयुक्ता
एता शायो न स्वपमानाम् । प्रपि घ
मन्त्रगुप्तिविरहागरण संघो,
मुक्तितस्तु भवत मुखभेद्यौ।
वया
प्रभाति-प्रभाव मुख्य प्रधान. यासु ता. प्रभुममोत्साहमाक्तय.
पोशदलाम्पा प्रमत्त रिपी सपा मितकार्य मिदिन सपादयनि यथा
नयेन मर्यशास्त्रविहिरीत्या प्रयुक्ता परा उत्कृष्टा चासो सपशक्तिश्च
मार्य सपादयनीत्यर्थ ।
रदिति मौर राजनीति में छह गुमो ये महारे माने शव को पराजित
परनेवारो पाक्तिशाली से पता करपे हमें क्या लाभ होगा?
एगाजी 1-सब पालियों से उत्कृष्ट सपपक्ति शक्तिशाली वो भी
पराजित होने के लिए वियना कर सकती है-पोषि, परावल से प्रमत्त
पार के लिए तीन पाक्ति । (मत्रोत्साहादि) उतनी प्रभाव नहीं है
जितनी किनीनि-विहित गठिन शक्ति।१७
तामानी रिया तो उदारवरित पत्र से तय करने के लिए
उपयुक्त है मरि पामा लिए। पौर भी-मंत्र माहिती
पहायता से बस यात्रिय, पति पाक्षिक गण को विभिन्न करना

। माययाऽधमपरप्रतिघात , श्रेयसे नयविदा नृपतीनाम् ॥ १८ तत्पञ्चमोपायमाप्रसाध्पा भविष्यनयधमारातय शिवराज-ममाप्येतदेवास्त्यभिमतम । यत परे तु तेजस्विनि पर्यवृत्ती, सामाधुपाया सफला भवन्ति । विद्यते दुर्नयशालिना गये, मायाप्रयोगादपरा प्रतिमिया ॥ १६ म प्रपिच धर्मत प्रतिविधानमारमनो, विप्लवाय धमिनायते रिपी। विएनाऽपि लिन सुरद्विष , पातिता प्रतियुग स्वमाममा । २० मन्नति-गरा क्षत्रियाणा, वणिजा, पा, सप जानपदाना तो मनस्य गुप्ते रक्षणस्य विरहात मरभेदादिस्यथं युक्तित सामापाय सुखभेद्यो भवत । प्रत मायया, छलप्रयोग अधम य पर रिपु तस्य प्रतिघात नपविदा नृपतीना श्रेयसे भवतीत्यर्थ ॥ १६ सहज है परन्तु प्रथम सत्र से मुकाबला करने के लिए नोरिश नृपति द्वारा छल, माया का सहारा लेना परम श्रेयस्कर है। १५ मत मधम शत्रु का विनाश पचमोपाय मापा मादि से ही साध्य होगा। शिवराज-मेरा भी अभिमत यही है । क्योंकि-धर्मवृत्ति वाले तेजस्वी सत्र के समक्ष ही सामदामादि उपाय सरल होते हैं मोर दुनीति- गामी पत्र पर विजय प्राप्त करने के लिए माया प्रयोग के प्रतिरिक्त भग्य उपाय नहीं है । १६ मौर भी-पापवृत्ति सत्र के विरुद्ध धर्मनीति का थ्यवहार स्वपिनाT का पारण होता है-भगवान् विष्णु ने भी बलशाली मसुरो के विना लिए अपनी माया प्रयोग हमेशा किया था । २१ ( १५ ) धन स.-सर्वथा अभिनन्यते कुमारवचनम् । शिवराज-तप भवम्मत्रिपक्षमारूढोऽहमद्य प्रतिजाने पर मान राजविलासभोवान्, मिघ्राणि दारानपि जीवित च । हरवा रिपुज्यालितहव्यवाहने, सस्थापयिष्ये मम धर्मराज्यम् ॥ २१ सर्वे-कुमार, एतद्भीष्मप्रतिशासिद्धये बद्धपरिकरानस्मान् दुर्भद्यदुर्गाक्रमणे प्रयाणे, रणागणे दुष्करसाहसे चा। प्रवेहि पावधतिन , स्वजीवितेऽस्मिनिरपेक्षता गतान् ।। २२ शिवराज--वयस्या भविष्यन्ति भवन्त एवाधिकारपदभागिनी मम धर्मराज्ये । यत राजस्तव सभी -युमार का स्पन सर्वया अभिनन्दनीय है। शिवराज-प्रत प्रापका मित्र मैं घोषणा करता हूँ कि शत्रु के द्वारा प्रज्वालित रणरूपी अग्नि यज्ञ मे मैं अपने मान, सम्मान, धन, भोग विलास, मित्रो, परनी और प्राणों तक की प्राहुति देकर अपने पर्मराज्य की स्थापना करूंगा ॥ २१ सभी-कुमार, प्रापकी इस भीष्मप्रतिज्ञा की सिद्धि हेतु हम रटिक्स होकर- धुर्भद्यदुर्गों के ऊपर मात्रमण करते समय, रसागरण में समय अथवा अन्य दुष्कर एव साहसी कार्यों मे, राजन् । अपने प्राणो तक की चिन्ता बिना कियै पाप पार्ववर्ती रहेग, ऐसा समझे ।। २२ शिवराज-मित्रो, मेरे धर्मराज्य में भार सब अधिकार पद के भागी होग । क्योकि- प्रस्थान 1

समानविद्यानयविक्रमेषु
राष्ट्रभक्तिपथिगान्वयेषु
जितेन्द्रियेष्वेव निजाधिकार;
विभज्य साम्राज्यम्पत्ति भूमिप ॥ २३
(तत प्रविशत्यपटीक्षेपेण दादाजीफोंडदेव )
शिवराज -(सप्रश्रयम्) स्वागत भगवत ।
दादानी वत्स, विरमास्मात्साहसाध्यवसायात् । एव कुलप्रमा-
गत मृत्तिपरिश्यागातु तवानपतिरवेति सर्वये।
शिवराज -भगवन् यवनेशविद्वेषप्रभयादनयंशतादपि श्रेप एवेति
में बलवान् प्रत्यय ३ मत
धर्मेति-धर्मस्य ध्यस. दिनारा तदर्थ घृत प्रत ये. तान् पम्पने
सुब्धान् मृदो नियान् क्रूरान् विस्मशालिनि मन्दान् नम्नान् प्रतिभटे
पूटप्रयोग छलप्रयोग उत्कटान् उग्रान् स्वस्मिन् विश्वस्ते अपि हिंस्रकान्
वोदतान् कुलवधूना सकपणे मपहरणो सोत्सवान् गोविप्रेषु अपचारिण.
देवद्विप इमान् यवनेश्वरान् स्याह सधये ।
विद्या, नीति, परात्रम, राष्ट्रभक्ति, प्रतिष्ठित कुल में उत्पन्न
जितेन्द्रियों में अपने अधिकार का समान विभाजन करनेवासा राजा ही
साम्राज्य सत्ता को सुदृढ़ कर सकता है । २३
शिवराज-(नम्रता से) प्रापमा स्वागत है।
दादाजी-परस, इरा दुस्साहसपूर्ण प्रतिज्ञा को छोरदो। इस प्रकार
गुलश्मागत वृत्ति के परिपाग से भाप ही भनयं की सम्भावना हो
सकती है।
शिवराज-भगवन, पातशः प्रनयों को उत्पन्न करनेवाली भी
ययनेश की यह पता हमारे लिए अयस्सर है। क्योंकि-

शिधराज -सप्रति प्रभविष्याम्यहं सनापि मम वीरनिवहान् । पथ कियरपरिमायोज्य निधि परिकल्प्यते । नेताजी -देव, पर्याप्त एवापमस्मत्प्रयोजनाय ! मसिकार -(प्रविश्य) विजयतां देव । शिवराज --प्रवधायंतामस्य कोशसचयस्य मूल्यपरिमाणम् । मणिकार -(निरीक्ष्य ) देव सूक्ष्मानेनाम दशलहिण्याऱ्या भवितुमर्हति । शिवराज –तावरपत्र भारोप्य विस्तरेण दशयास्य मूल्य परिन्देव- स्यञ्जक परिसख्यानम् । मणिकार -तथा। (इति स्पोन कुरुते) शिवराज -वीर महानेपोऽनुपह परदेवतापा । यत सप्रति खलु मम । -- । शिवराज--पर मैं सेना तैयार करने योग्य हो गया । तुम इस निधि को कितने मूल्य की अनुमान करते हो। नेताजी-देव, हमारे प्रयोजन के लिए यह पर्याप्त है। मणिकार--(पहुँचकर) विजय हो देव । शिवराज--इस धनराशि का मूल्य अनुमान करो। मणिकार-(निरीक्षण करके) भलीभांति निरीक्षण करने पर यह लगभग दस साख मूल्य का प्रतीत होता है। शिवराज-इसके मूल्य का परिमाण मुझे विस्तार से लिखित रूप में दे दो। मणिकारको माता । (कथनानुसार करता है) शिवराज-धीर, पक्तिमान का परम अनुग्रह है यह। पर्योकि इस समय मेरी- शस्त्रास्त्रसमद्धरणोत्सुका भटा, सद्य पराहत्य परमवीरान् । प्रत्युत्कट ममविदारण द्विषा प्रकाशमिष्यत्यतुल पराश्रमम् ।।१० प्रङ्गरक्षक -(प्रविश्य) एष द्विभायसमेत फिरङ्गी देव इष्टुमिच्छति । शिवराज -शीघ्रमेन प्राय । मङ्गरक्षक तया । (इति निष्क्रान्त) द्विभाष -(फिरङ्गिण निर्दिश्य) एप महाराज सुप्रभातमावेदयति । शिवराज -प्रोतोऽस्यस्य समुदाचारेण । श्रीतो मया साधं- लक्षेपापुषसचप इति तमावेदय । द्विभाष . तथा। (इति यथोक्त कुष्ते) शिवराज -अपि सुव्यवस्थितोऽय व्यवहार । द्विभाष -भय किम् । एष पुनमहाराजस्यानुग्रहमभिनय गम- मायानुमां याचते। सेना के वीर जो युद्ध करने के लिए समद मोर उत्सुक है, शस्त्रास्त्रों से सज्जित हो अपने पराक्रम को मधिक सफलता से दिखना सकेंगे और उनका शौर्ष शत्र मन्त को विदोष करेगा। मगरक्षा-(प्रवेश कर) निमापिए के साथ विदेशी, देव का दर्शन चाहता है। शिवराज-तुरन्त उपस्थित करो। मतरतर-जो भाशा । (जाता है) द्विभाषी--(विदेसी को दिखावर) यह महाराज को प्रात का नमस्कार निवेदन कर रहे है । शिवराज-- इस व्यवहार से प्रसन्न हूँ। वह दो विमने इसके शास्त्रास्त्रों को रे लास में खरीद लिया। द्विभाषी-प्रस्तु जो प्रादेश । (कहना है) सिरान-पा यह म्यवस्था मान्म है। द्विभाषी-जी हा भापके भनुपहरामामार मानते हुए पाने की प्रामा पाहते हैं।

मपिकार -(उपसृत्य) एतसविस्तर परिसस्यानम् । (इति पत्र मर्पयति) शिवराज -(पत्रमादाय वाचयित्वा) द्विभाष मागामुकमप्यायुध- सचय वयमेव ऋष्याम इति चरिएकातिमधगमय । द्विभाष -तया। (हति यथोक्त कुरुते) शिवराज-प्रये मरिएफार प्रापयेतायावेशिकमन्दिरम् । मदचना- चोच्यता समाधिकृतोऽध्यक्षो पदय वैदेशिक सपरिवारमातिथ्येन सम्माननीय इति । मणिकार ---तया (इति निष्क्रान्तास्त्रय) शिवराज --क कोष भो । मगरक्षा -(प्रविश्य) प्राज्ञापयतु देय । शिवराज :--मत्रहमामादेशय ! मणिकार-(माकर) यह सविस्तार सालिका है । (पत्र देता है) शिवराज--(पत्र लेकर और पढ़ने के बाद) द्विभाष । हिमपति वो सूचित कर दो कि हम इनमे से मोर भी शस्त्रास्त्र खरीद लेंगे। द्विभाषी-जैसा मादेश । (उससे कहता है।) शिवराज-मरिएकार, इन दोनो को प्रतिथिमवन में ले जायो। भरी भोर से मध्यक्ष को निवेदन करो कि यह विदेशी सपरिवार राज्य अतिथि के रूप मे सम्मानित किया जाय । मतिकार-सीमाशा। (तीनों पले जाते हैं) शिवराज-कौन, कोई है? पनरक्षर--(प्रवेशवर) माज्ञा देव । शिवराज--मरणाग्रह का मार्ग निर्देश करो।

(५६) मंगरक्षक :-इत इतो देवः। (सपरिकामन्ति) एतन्मंगृहद्वार प्रविशतु देवः सानुग. । (इति निस्कान्तः) (ततः प्रविशति मंगहायस्थिता मंत्रिणः) शिवराज :-(प्रविश्य) मत्रिण दिष्ट्या सपन्नोऽस्माकं मनोरयः। मंत्रिण:-(उत्याय) वर्धतां देवोऽभीष्टसम्पदा । (इति शिवराजमन सबै उपविशन्ति) शिवराज :-सचिव रवं सापदविलम्येन निर्माय नूतनं दुर्भय- प्रारारादि परिवेष्टितं राजगडदुर्गमापादयास्य राजधानीयोग्यताम् । यावत्ता स्थिता षय राजकारण पश्येम । सचिव -पदाजापति देय. । (इति निष्क्रान्त) शिवराज :- धीर स्वमपि फिरङ्गिए. कीतरायुषं संनाह्य माव- जनवाहिनी कल्याएनयार्यस्माभिनियुक्तमायाजीपोरं संप्रतिपयस्य । सद्य एवं मगरक्षक-इघर से देव, इधर से । (सभी चलते हैं) मह मंत्रणा- गृह का द्वार है, साथियों सहित प्रवेश पर देव । (चला जाता है) (उसके पश्चात् पत्रणागृह मे मत्रिगण बैठे दिखायी पड़ते है) शिवराज-(प्रवेश कर) मत्रियों भाग्य से हमारा मनोरथ पूर्ण हुमा । मंत्रिगण-(ठार) देवका मनोरम पूर्ण होता रहे। (शिवराज के यंठने के बाद सभी बैठते हैं।) शिवरान-सविध, तुम शीघ्र ही प्राधारादि से घिरे हुए दुभंग एक नमीन दुर्ग राजगर का निर्माण कर उसे राजधानी के योग्य संयार करो। हम उस दुर्ग से राजनापं देखेंगे। तभिष-सी पासा देव । (महार पला जाता है) शिवरान-चीर, तुम भी तुरन्त ही विदेशी वणिक ये तरीदे हए चम्बालों से मारतो की सेना तयार पसे, स्याण विजप के लिए प्रेषित कपात्री वीर से बापर सम्मिलित हो जानो। तुरन्त ही । ?

( ३७ सुतीपराभल्लासिपनु समूजिता, विज्ञासदरणोपरिणद्धपाश्र्वा । स्वातंत्र्यसम्भावनया समेधिता, प्रयान्तु मे वन्यपदातिसघा ॥११ नेताजी -यहव भाज्ञापयति । (इति निष्क्रान्तः) । शिवराज :--प्रमारप, स्वमि विनिहित राज्यभारोहमपि तावरसेनानायकेन सह कोकरानवार्य प्रतिष्ठे। तदवेदस्वायप्रति सर्वाणि राजकार्याणि । तानाजी :-यदाज्ञापयति देव । (प्रतिनिधाता. संघ) समाप्तोऽय निपिसमाप्तिनामा द्वितीयोऽङ्कः -- तीक्ष्ण भालौं, कृपापों, धनुषों में प्रबल, कटि प्रदेश में सूखीर (तरफम) कसे हुए, स्वातम्य भावना से भली भांति प्रोत्साहित, वन्य- जनी (वनवासियो) की हमारी पैदल सेना प्रस्थान कर रही है। ११ नेताजी -जैसी देव की प्राज्ञा । (चला जाता है) शिवराज-भत्रिन् राजकाज का भार तुम पर छोडकर में भी सेनानायक के साथ कोकण-विजय के लिए प्रस्थित हो रहा हूँ। इसलिए माज से सभी राजकार्य की व्यवस्था करो। तानाजी-जसी भाज्ञा देव । (सभी जाते हैं) लिधिप्राप्ति नामक द्वितीय अंक समाप्त

फ्रमेण,
तृतीयोऽङ्कः
(तत प्रविशति राजगडदुर्गप्रासादावस्थिती मनिद्वितीय शिवराज )
शिवराज.-मनिन् सुव्यवस्थितेऽपि राज्यतने कपमद्यापि
निति न प्रजाति मेऽतरात्मा ।
राग्निदिव रिपुगवान शतशो निहत्य
नीती वश प्रसभमेष मया प्रदेश ।
नाय तयापि परिपन्यिवधाकुलो में,
तृप्ति प्रयाति निसरा तृषित कृपाए ॥१
मंत्री-देव न सल्वल्पीयमाऽयन परितुष्पति तेजस्विन ।
उद्भाश्य शलशिखर च्छितपादपाय
तेजोनिधि किर्मा तो विरमे द्विवस्वान् ।
मप्युद्गतो गंगनमध्यपद
धाम्ना निजेन निखिल भुवन धमास्ति ॥२
तीसरा अंक
(उसके बाद मत्री के साथ राजगहदुग में शिवराज पाते हैं)
शिवराज-मत्रिन्, राज्यता भली भांति व्यवस्पिन होने पर भी
मेरा हृदय मतान्त ही पयों है ?
यद्यपि रात दिन संकडों शमों का वध करके हमने अपनी पाक्ति
स इस प्रदेश को अधिकार मे कर लिया, तथापि शत्रुमों का वध
करने के लिए उत्सुक मेरी सलबार अभी भी सतुष्ट नहीं हुई।
मंत्री-देव, तेजस्वियों को थोड़ी सफलता से सम्तोप नहीं होता-
पमा सूर्य उदय होकर पर्वत की चोटियों पर लगे (स्थित) हुए
वों के कारी माग को प्रकाशित करके ही विधाम लेता है, नहीं
बह पीरे धीरे गगन के मध्य तक पहुँचवर प्रपनी रणों में प्रकाश से
समस्त जगत को प्रकाशित पर देता है।र

संप्रति सस्वस्मदुपकमरपो बोनापुरेशो महता सैन्येन सहसार- बमानभियोधपत इस्पाशते मे हृदयम् । शिवराम-मयाऽप्येतदेव विमृश्यते । (नेपये) सालिक:--विजयतो देवः । मापदहिताको मोतिपोगप्रतिष्ठो, वितितरितुसंपः स्वाभिला यिसृष्णः । पारगमगताना दुगताना पारय-- स्तपनकुसमणे रामरोमोघवीर्यः॥३ शिवराज-(पाकण्य) ग्रहो, मयप्रयोगाषणेन मुलसाम्या भविष्यपरालय इस मारपोरसुषपकारणम् । तथापि सस्मिना बसोपए पापीय पान । पर हमारे इस प्रयास में प्रारम्भ हो जाने के कारण बीजापुर नरेश विशाल सेना-सहित हमारे ऊपर अचानक माक्रमण करेगा, ऐसी का होती है। सिवराज-मुझे भी नाका है। (नएप्प में) पंताप्तिक-विजय हो, देव । है गूम के म!ि देशहित के कायों में रस, नीति में पिरा पौर पिर प-समूह रानासे, परने सर्विस परियाग करने वाले, दीनदुतोंरे लिए तरस भूमि, तुम्हारा पानिम बन-बी से दुक तेर । शियर-(गुनार) मोह भीप्रियोग के पहारे, पर ही में गएको र प्रास होगामी, हारमोरा की पावरपा महापाप में और संगठन के लिए प्राममा पाहिए।

४०
मत्री-पूर्वमेव मयादिष्ट सेनानायक पदातिवलस महाय ।
द्वारपाल-(प्रविश्य) विजयतां देव । एष कोंकण प्रान्तात्
सप्राप्तो गोवलकरसामन्तो द्वारि तिष्ठति ।
शिवराज -प्रवेशनम् ।
द्वारपाल-तया । (इति निधान्त )
सामन्त - (प्रविश्य) विजयता महाराज । सबन विजयशालिनी
महाराजस्य प्रणयपुर सरमुपायनीमियत एष भवानी बाग ।
देवानी नवविजयध्वजो रणाने
दत्याना प्रलपदेय घूमकेतु ।
पापाना हृदयविदारणो महो
खगोऽय तव परिकल्पितो भवामा ॥४
सत्स्योत्यनमनुगहाण सय चासजनम् ।
शिवराज -(सान द स्योकरय निरोक्षय घ) भगवति परदेयते,
मंत्री-मैंने सेनापति को पैदल सेना गठन करने शमादेश
पहले ही दे दिया है।
द्वारपाल-(प्रवेश कर) विजय हो, देव । कॉकरण प्रदेश से पाये
गोवसकर सामन्त द्वार पर स्थित है।
शिवराज-हे उपस्थित करो।
द्वारपास-जसी पाशा (पला जाता है)
सामन्त-(प्रवेश कर) महाराज की जय हो। सपन विजय प्राय
भवानी नामक यह कृपाण पापको मैं सादर भेंट करता हूं-
मुख भूमि में देवों के लिए नवविश्यम्यगा की भांति सहरनेवाली,
दयों के लिए मोतु-सदा निाशारिणी मसुर हृदयों को विदीण
करनेवाली यह तसवार भवानी मे सुम्हारे लिए प्रदान की है।४
भत' इसे स्वीकार कर सेवा को अनुपहीत करें।
शिवराज-(सानद स्वीपररपोर निरीक्षण परसे) भगवति ।
-
करने वाला,

(तत प्रविशति कल्याण प्रान्ताधिपस्नुषया सहित प्रावाजी)
प्राबाजी-वधता देव कल्याण विजयेन । देवाधीना सन्ति तन्त्र
चन्दोकृतस्य तःप्रान्ताधिपस्य प्राणा ।
शिवराज – सद्यस्ते कारागृहाविमुच्य पपार्होपचारश्च सभाग्य
विसजय।
पाबाजी -यद्देव प्राज्ञापयति । अपि च महाराजायोपायनी-
कमानीतमेतदलोकसाधारण स्त्रीरत्नम् । तस्वीकृत्यानुगृह्णात्विम
वासजनम्।
शिवरान - (सरोषम् ) परे किमिद (धयाऽनायमनुष्ठितम् ।
तपन कुलभवस्य धर्मवत्त-रपिपरदाररतिविभाव्यते किम् ।
विषममुपगतोऽपि राजहस , किम पत्तिमुपायपेक्षयाचित् ॥६
-
(उसके पश्चात् क्ल्याए प्रान्त वे अधिपति अपनी पुत्रवधू सहित
प्रवेश करते है।
छावानी-कल्याए विजय से प्रापकी वृद्धि हो। प्रान्ताधिपति
जो बन्दीगृह में हैं, उनके शए मापके मधीन है।
शिवराज-तुरस्त कारागार से बाहर पर, अयोचित सम्मान के
साप छोड दो।
मायाजी-सी देव की माता । मैं महाराज को भेंट परने के
लिए एक भलीविय स्त्रीरल लाया हूँ। उसे स्वीकार कर इस दास को
भनुगृहीत करें।
शिवराज-- (कोष से) परे, यह तुमने क्या करहाला ।
पया सूपंगुल मे उत्पन्न व्यक्ति, जो सदा धर्माचरण मे प्रवृत्त रहता
है, कभी परस्त्री में प्रवृत्त होगा? क्या राजहस विषम परिस्थिति
माने पर भी यासपी यतिका प्राश्रम कभी से सस्ता है।
।

(मनिह प्रति ) साधुष्यतो सारस्येरणास्मद्धर्मराज्य पच्छिव. राजस्य तद्भरपाना च हितनिविदोषा परस्त्रिय । मनी---पपाशापयति महाराज ! ( इति पत्र निवेशयति ) माधाजी --प्रसार देय । साम्प्रत रामकुल साधारयोऽसमुपचार रतिया मयान प्रपतम् । तदनुसापनीयोऽय दासजन । शिवराज -सप चित्र मेण परितुष्टोम्हमद्य स्वां कल्याए प्राप्तापि. पापे निपुन मि । सम्पायेन प्रजा पासपैस्तथरमाक पम चक्र प्रवर्तय । मामाजी:-पपातापयति देव । (पनि प्रान्ताधिपस्नुपया सह नियात) द्वारपाल --(प्रविष्य) विजयता देष । सत्ता गापार संनिता महारामस्य विजयशोभि समाध्या बीमारेपामपहाय महाराजाथयम- विष्यति । भाषा देव प्रमाणम । (मत्रा से) ती पनि में पोपणा वगै कि हमारे धर्मराग्य में शिषगान सपा उसके रोया दूसरों की स्त्रियों को अपनी न्यारे समान सममने है। मंत्री-महाराज प्रामा। पागनीदेव, प्रगत है। मैं राममोषित गापारण पालरा को पूर्णाहो पाया। साप पारें। शिराम-दारे विनम से सन्तुष्ट होकर हम तुमको म्याए प्रामाणिमिपुराते मला हायपूर्वका बापाला पते हुए मा धरापमाना पायो पाला। (भानापिकीपर माप रिल-सिस हो. महार, मालीपनी रिमोंगे पारमाल सो गापार में कों ने गार नरेश कोरस और मालपारानिया।

" । (1 ४४ ) शिवराज :-मंजिन करमेते विश्वसनीया । । । प्रत्यायन परिजनेऽतितर विनीते, स्त्रंणे मृषोक्ति परमे विषयमसक्त । धर्मध्वजे द्विषति हीनकुलोद्भवे व, विश्वस्म नाशम पयाति पुरन्दरोऽपि ।। मन्त्री -महाराज मत्राधिकारनियोगपरोऽयं परामर्श । सैनिकाना तु मास्ति कश्चन स्वतत्रोऽधिकार । तनोचितोन प्रतिषेध । पचते परमिण इति कृत्वाऽपि न युक्त प्रतिषेध । यता विभिन्नधर्मा नपतिनिमा प्रजा, समत्वमास्थाय सदैव पालयेत्। स्वधर्म निवन्धपरस्तु हेलया, प्रजाविरोधात् प्रवलोऽपि होयते ।। शिवराज -सत्य समदृष्ट्यधीनम साघाश्यप्रतिष्ठा । (द्वारपाल प्रति ) तबुध्यता माचनारसेनापतियंपावदेतेपी नियोगाय । शिवराज-मधिन इन पर विश्वास से किया जाय ? पत्र, परिजन, ( भत्य वर्ग ) के प्रति प्रत्यन्त विनीत, स्वण, मसत्य भाषण, विषयों में भासत, पाखण्डी, रानु पौर निम्नासोद्भुत जन मैं विश्वास करने पर इन्द्र तक सर्वनाश को प्रास हो सकता है। ७ मत्री--मत्रियों के साथ बैठकर हम इस पर विचार करेंगे । सैनिकों का तो कोई स्वतत्र प्रधिकार नहीं है । सपति उनी प्रार्थना स्वीकार करनी अनुचित है । उन्हें पर भी समझकर भी प्रतिष करना ठीक मही है। क्योकि- राशा को चाहिए कि वह अपनी प्राका पालन विभिन्न धर्मों का ध्यान रखते हुए समानभाव से परे । स्थधर्म का तिरस्कार करने वाला प्रबस भी राणा प्रजा के विरोषरे वारप नष्ट हो जाता है 10 शिवराज-गरम ही है, समानभाव की ही बुद्धि से साम्राग्य की प्रतिष्ठा होती है। (द्वारपास से ) सेनापति को मेरा भादेश मुनापो कि गरी गुणानुसार मेरी सेवा में उपरिपत नरें। .

-
द्वारपाल -तया। (इति निष्कान्त )
शिवराम -मत्रिन्, नास्ति पर्याप्त पेयत पदातिवस प्रमला-
रातिनिहाय । सदस्माभि शोम सादिवसमप्यपकल्पनीयम,
मात्री -देव, नेताजीधी राधिष्ठित सादिवलमचिरेणध भविष्यति
रसायसारक्षमम । सदानमाचीतो पदासो प्रत्यागच्येत्तदाऽस्मिन्नेय
काय नियोजनीय ।
शिवराज -यंपाभिनयते तवाप्यवसाय' ।
वारपाल' -(प्रविश्य) विजया देव । एष राजमाचीत' प्रत्या-
गतो नेताजीवीरोद्वारितिष्ठति ।
शिवराज--प्रवेशापनम् ।
वारपास' तथा (इति निस्शत)
मेमानो -(प्रविश्य) विमयता देय पोवलापमान्त प्रमि-
द्वारपास--जो भागा । (पला जाता है।)
शिवराज-मत्रिन, प्रबल शत्रु के दमन के लिए पेवल पंदल सेना
पति नहीं है । इसलिए सीध हमें रपसन्य भी सठिन करना चाहिए।
स्त्री--देव, बीरवर नेताजी के नेतृत्व में शीघ्र ही सेना रणभूमि म
उतरन लिए समर्थ होगी। मतएप बसे ही वह राजमाची से वापस
हो उन्हें इसीमारे लिए नियुकर दिया पार ।
गियराम-तुम्हारे निर्णय से सर्दया सहमत है।
द्वारपास-प्रवेश पर विजय हो देव । रारमाथी से मारकर
माये नेतात्रीद्वार पर स्मिा।
शिवराज- पापो नन्हें।
गरपास-बो मामा । 'पसा जाता है)
मैतानी-(पर) देर की विश्य हो । परि म मेरे गुर

(४६ )
प्टेन गूडचरेण निशे थेऽधः प्रसारिता रज्जुमवतन्य प्राकारमधिक
ढरस्मसनिकगनिहता राजमाच्युपरोधकारिणो यवनसनिकाः ।
शिवराज:-वीर प्रशंसनीयं खलुतवैतत्साहनविक्रान्तम् । पपि
परितोष्यते ययाहीपचारेण स्वया बन्दीकृतो यवनेश त्यालः ।
नेताजी:-अप किम् । को नु खलु महाराज शासनमतिसमितुं
प्रभवति । देव ता निवद्धाः सात्यन्ये येतयुद्धगृह ता यवन सैनिकाः ।
शिवराज:--मंत्रित पादिश राजमाच्यधिकृतं तान् विसर्जयितुम् ।
मत्रोः यदाज्ञापयति देवः। (इति पो निवेशयति)
शिवराज:-वीर प्रत्यासन एवापर: सप्रामः । तत्संनाप सादि-
निवहान् ।
नेताजी:--पहेव माज्ञापयति । (इति निष्कास)
पर ने किसान के वेश में पहुंचकर रस्सी लटका दिया जिसके सहारे
हमार सैनिको ने राजमाची मै प्रवेश कर दुर्ग के प्रवरोपक सपन संनियों
को मार डाला।
शिवराम-योर तुम्हारा यह साहस पोर को प्रशंसनीय है।
क्या बीजापुर नरेश पा स्याल, जो तुम्हारा बन्यो है मबहार से
मेताजी-जी सिमे साह्य है, को महाराज के पासन
दी पक्हेसना परें। देव मन्य भी तो युटो बन्दी पवन संनिक है।
शिवराम-मविन, रावमापी ये रक्षा को उन्हें मुक्त करने या
प्रादेत करो।
मंत्री-सी देव की माशा । (पागज पर लिखता है।)
शिवराम---और दूसरा सपा भी निकट है। इसलिए य संय
पार परमो।
मेलानी-सी देव की प्राजा । (पसा पाता है)

(४७) -प्रविश्य) देवस्य स्वातंत्र्यनिष्टया रस्धन दुरात्ममा बीजापुराधाशन कारागारे निरुद्धास्तातपादाः । (इति निष्कात) शिवराज:-(सरोपम् ) भरे दुर्मदान्ध, पपि सनिष्ठया विहिता- पास्ते सपाया ईरशः परिणामः । अपया कृतोपकारेभ्य एवं दृहन्ति दुरात्मनः । बिहाय कान्ता सुतमाधुवान, मुसप्रतिष्ठामय जीवितस्पहाम् । हन्त्येकावरयाऽपि निषेवितो धमः, पर्याप्तफामः स्वयमेव सेवकम् ॥ मंत्री:-शर्वगात्मनाश एषाधम भूषायाः पारितोषिकम् । शिवरामः-मंत्रिन्, कपमपि रक्षणमा पितृवरणाः । यतः राज प्रजायाः परिसासनं यपा, भृत्यस्य भतुहित साधनम् च । कुलरिया पत्युरथानुवर्तनं, तया सुतस्यास्ति गुरोहपासनम् ॥१० -(प्रवेश कर) देव के हृदय में स्वातम्य निष्ठा हो जाने के कारण दुरारमा बीजापुर नरेश ने पापके पिताजी को कारागार में घोर दिया है । (पसा माता है) शिवराज--(ोष से) भरे पुमंदान्ध, क्या तुम सबकी निष्ठा का पही परिणाम है ? अपवा उपचार करने वाले से ही दुरामा पुरुष द्रोह करते हैं। स्नी, पुत्र, बन्धुबान्धयों, मुल-मर्यादा भौर प्राणों तक का मोह स्पाग पर सेवा करने वाले सेषक को भी (अधम व्यक्ति) अपना कार्य पूर्ण हो जाने पर मार रात है It मंगी-प्रथम म्यक्ति की सेवा पुरस्कार सरिमनात है। शिवराज-मत्रिन्, पित्तवरण की किसी भी प्रकार रहा होनी से रामा तारा प्रजा का पालन परला परम पम्य है, सेवक पतंप्य स्वामी मा हिल शापन परना, दुलीन स्त्रीमा तम्म पति की मामा मानना है तव पुत्र का कर्तव्य है गुरु (पिता) श्री सना पाहिए । पोरि- । मंगी-देव मा समामन्ति नयशास्त्रकोविदो यत् सन्धानं सत्यसन्धे मयगुणपिहित विग्रहो हीन सत्वे, पान चान्तविपन्ने गिरिपहनाते घासने दुगसंस्थे । दय यूहाप्रपये फुटिलनपरते शत्तियोगावलिप्ते, प्रत्यायन्याशु कार्यः प्रवदनरपते संधयः श्रेयसेन ॥३१ सदेतद्विपरसतरणपं दिल्लीपतिरेव समाषयणीयः । यता सदाप्रयोऽमें विबुपी कलावतो निजे परे चापि समानभावः । निरस्तपाप.स्वयमप्रमत , प्रजा प्रजा स्वाइव शास्त्यधीश ॥१२ शिवराज-ममाप्येतदेवाभिप्रेतम् । यतः मत्री -इस विपम मे नीतिगो का मत है कि स्वहित को दृष्टि से सत्य-पथगामी नीतिवान् रात्र से सन्धि, पाक्तिहीन से युद्ध-घोपणा, जिसको शक्ति प्रदर ही मन्दर क्षीण हो उस पर भाश्मण, पर्वत, जङ्गल प्रयया दुर्ग में स्थित रानु से युद्ध-विराम, पौर उस रात्र के साथ दुहरी चाल चलनी चाहिए, जो संन्य-प्यूह के कारण भय हो रहा हो एव पुटिल नौति और तीनों पक्तियों से मुक्त अभिमानी, तथा प्रजेप 'शत्रु के लिये प्रबल राजा या पाश्रय ग्रहण परना चाहिए ।।११ पर इरा विपति से मुक्ति पाने के लिए हमे दिल्ली सम्राट का पाथप सेना चाहिए । पोंशि- यह विद्वानों, कसारारोपामाप्रयदाता अपने मित्र मोर रायु दोनों के प्रति समानभाव रसने वाला, पापमं से रहित अपने पसंप में रत मार प्रजापापोरस सम्तान को भाति पासन परनेवासा २ मिरा भी यही विपार है। योfr-

(e)
दिल्लीशोपाश्रमेणव घश नेयोऽयमुद्धतः ।
धुर्दान्तस्यापमस्यास्य नास्त्यन्या दमनक्रिया ॥१३
तत्प्रयुज्यता कोऽपि कार्यक्षमो निसृष्टापों दुतोश्मदभीष्टं
संपावपितुम् ।
मंत्रो : गच्छतु रघुनाथपरत एतत्कार्य ससिद्धये ।
शिवराज :-पान एयास्य नविचक्षणल्प पण्डितवरस्य नियोगा।
का कोय भो
द्वारपास .-(प्रविश्य) पाशापयतु देवः ।
शिवराज:-पतिवरं द्रष्टुमिच्छामि ।
द्वारपास:--प्रवाशापति देव । (इति निष्फ्रान्तः)
शिवराज - यिलिरपती तावद्विजापनपत्रम् ।
मंत्री :-तया। (इति पत्र लिखति)
इस उदत पत्र को दिल्लीश्वर की सहायता से ही वश में करना
चाहिए, दुर्दान्त पार पधम के लिए अन्य कोई उपाय नहीं है I
प्रत. हमारे प्रभीष्ट वे सपादनार्य किसी दुशल दूत को नियुक्त
करो।
मत्रो-इस कार्य की सिद्धि के लिए रघुनाथपन्द्र जायें।
शिवरा-नीति निपुण पतिवर ही सके लिए उपायो!
मौन है?
गरपात -(प्रवेशर) मामा दे।
शिवराम-पशिलवर के दानोपा है।
द्वारपास-जोपामा । (पत्ता पाता है)
शिवराम-तब तक विमापनपत्र लि।
मी-(पत्र लिखता है

।
शिवराम: -(मेस्यमाविशति)
भमभारतराजकुसायोश्यार . साम्राग्मय मिशन सार्वभौम.
मोगसंशचरण रचिताञ्जलि शिवराज सप्रश्रय प्राथयते यताबभौमस्य
भूत्यषा प्रविविधुरय जनो यया नियोगेनानुप्राह्य इति । प्रपिच कृतघ्नेन
बीजापुरेशेन विनाऽपरा कारागृहे निष्टान नि मतातपादाना मुत्तिसंपा.
देनानुग्रहान्तरमभिलपरमय सावभौमत्यः । वितरतु कृपापारावारे
श्री सावभौमेऽमन्तया समृद्धिषभव विनियन्तस्याशास्ते घ इति ।
भत्री-देव लिखितं मया पपाविष्टम् ।
पण्डिसवर :-(प्रविश्य) विज्यतो देवः ।
शिवराजः-मादायतविज्ञापनपन्न प्रतिष्ठस्य तावदिल्ली नगरम् ।
वन प सार्वभौममनुकूल विधाय त्मना सपायास्मतातपावानां
विमुक्तिम् । (इति स्वनाममुद्रासि विधाय पत्रमईपति)
-
शिवराज- पत्र लिखाते है) श्रीमद्भारतराज-कुलाधीश्वर
साम्राज्य धीनिकेतन सार्वभौम मुगल-सम्राट् के चरणों में मजलिबद्ध
यह शिवराज सादर निवेदन करता है कि सार्वभौम सम्राट के यहाँ
अपनी योग्यतानुसार सेवक के रूप में प्रवेश चाहता है। और कृतघ्न
बीजापुराधीश द्वारा निरपराध कारागार में बन्द अपने तात चरण के
मुक्ति-सपादन-कार्य के लिए भी अनुग्रह की यह सार्वभौमभृत्य इच्छा
करता है । मनन्तयशवाले सार्वभौम सम्राट्, जो विश्व के नियन्ता है.
हमारे ऊपर कृपासागर के कुछ कए विखेर दें।
मंत्रो-देव, पापके मादेशानुसार मैंने लिख दिया ।
पतिपर-(प्रवेशकर) विजय हो देव ।
शिवराज-यह विज्ञापनपत्र लेकर दिल्ली नगर जायं। मौर यहाँ
सवतोमावेन अपने प्रयास से सार्वभौम सम्राट को अपने अनुकूल करके
सातचरण को
मुक्त कराने का कार्य सम्पन्न करो। (अपने नाम की
मुद्रा से मक्ति पत्र देता है)

((५१)
पण्डितवर :-(पत्रमादाय)यदेव प्राजापयति । (इति निष्पान्त)
शिवराज :-क कोऽध भोः ।
द्वारपाल :--(प्रविश्य) प्राजापरतु देवः ।
शिवराज :-प्रतिहमार्गमादेशप ।
द्वारपास:-इस इतो देवः । (उभौ परिश्मतः) एतदन्तहदार
प्रविशतु देव । (इति निष्प्रान्तः।
(सत. प्रविशति मातहास्थिता राजमाता राजो च)
शिवराज :-(भविश्य) अम्ब अभिवादये।
राजमाता-बरस घिर भीय । प्रयस्ति कश्चिविशेषः ।
दियराज :- कृतघ्नेन बीजापुरेशन यदोहताना तानपादाना
विमुपये कतंध्यतयापतितो मोगलेशसश्रय ।
राजामाता-सुतन्त्रितोऽपं मननिर्णय । भविष्यत्यनेम तया-
भीष्टसिदिः । यतः
पतिवर-(पत्र लेकर) जैसा देव मादेश करें। (चला जाता है)
शिवराज-पो! कौन है ?
द्वारपाल-(प्रवंशकर) माशा देव।
शिवराज---अन्तगह का मार्ग दिखायो।
द्वारपास-इधर, देव इधर से। (दोनो पलने का नाट्य करते है।
यह अन्तगह का द्वार है, प्रवेश करें देव । (पला जाता है)
(उसदे गाद पन्तह मे रिपत राजमाता मोर रानी का प्रवेश)
शिवराम-(प्रपेशावर) माता-अभिवादन करता हूँ।
राजमाता-चिरमीप पुत्र । रोई विशेष समाचार ?
शिपराम-पतप वीजापुरतरेपा द्वारा बन्दी किये गये तातचरण
श्री मुक्ति के लिए मुगल बाट पा सहारा में रहा है।
राजमाता-~-पह उचित निर्णय हुआ। इस प्रकार तुम्हारा
प्रभीष्ट सिट होगा। पोधि-

( ५२ ) न सयंदा विक्रमालिनोऽयलं, भवन्त्यरातोन् सहसा प्रषितुम् उजस्विनां साहसमस्ति विप्लुते, नमप्रयोऽगतिका गतिघ्र वम् ॥१४ तत्प्रेषय पण्डितवरमैनमर्थ संपादयितुम् । शिवराज :-अम्ब, तव मया प्रकल्पितम् । एवं स्वपाउनुमो- दितस्य नितरां मोदते मेऽन्तरात्मा । राजमाता-वत्स, धुतं मया परिभ्यो पत्प्राणान्तविपद मामान रक्षितुं धर्मान्तरमाधितो बजाजीबार पुनः स्वधर्म प्रवेष्टुमिच्छति । प्रास्यत्र प्रतिकूलोऽस्मद्वन्धुवर्ग । परन्तु साम्राज्य संस्थापन प्रवृत्तम त्वया कर्तध्यो धीर संग्रहः । प्रतो याविधि परिशोषितस्यास्पारमजाय स्वकन्या प्रवाप संपात्यास्य चिरसौहृदम् । शिवराज :-शिरसि प्रियते तबादेशः। विक्रमशीलता हो सदा शत्रुभी को प्राधान्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है, शक्तिशाली भनु पर विजय पाने मे जब नीति प्रयोग भी पसफल हो जाय तो साहस ही मन्तिम साधन होता है ।१४ तो पण्डितवर को यह संपादित करने के लिए भेजो। शिवराज-पम्ब, यही व्यवस्था मैंने की है। इस प्रकार तुम्हारे अनुमोदन से मेरी मन्तरात्मा बहुत प्रसन्न है। राजमाता-वत्स, सुना है कि प्राणान्तक विपत्ति से रक्षापं धर्म- परिवर्तन करने वाला बजाजीराव पुनः स्वधर्म में प्रवेश करना चाहता है । हमारे बन्धुवां इसके प्रतिकूल हैं। वितु साम्राज्य सस्थापन में प्रयत्नशील तुमको बोरो को अपने पक्ष मे लाना चाहिए, इसलिए शुद्धि-रिया के पश्चात् तुम उसके पुत्र को अपनी कन्या प्रदान करके अनिष्टता प्राप्त करो। शिवराज -पापका पादेश स्वीकार है।

राजमाता-बस युध्यस्व भूयो योमङ्गन । प्रम महेन्यरा- राधनाम सापयामि देवगृहम् । (इति निष्कान्ता) राजी-मायपुत्र, प्रद्य खस्तु । लोक प्रकाशनारातितमोऽपहारि, सतर्पण नयनमानसयोपुस्ते । एतनवोपचितयौवनराज्यलक्ष या, तेजोदयस्य युगपरसुषमा दधाति ।।१५ शिवराज - देवि त्वमेवासि मम सकतमङ्गलालामेकायनम् । यत्व प्रोत्साहनेन समराङ्गण तत्परस्य, प्रत्यागतस्य च पराक्रमणानुयोगे । उजितस्य नयमागविकल्पनश्च, श्रान्तस्य नवचसा तनुपे मुख मे ॥१६ राजी -प्रार्यपुत्र, धम एवंप सहधर्मचारिणीना क्षत्राङ्गनानाम् । निसर्यत एव राजमाता-वत्स, साफल्य मौर मंगल के पात्र बनो। प्रव पहेश्वर की पर्चना के लिए देवमन्दिर मे जा रही हूं। (चली जाती है) राजो-प्रायपुत्र, माज-पापका यह शरीर जो ससार को प्रका- शित करनेवाला, शत्रु रूपी मान्धकार को दूर करने वाला नवयोक्न तथा राज्यलक्ष्मी से युक्त यह दारीर दोनो तेजो-सूर्य और चन्द्रमा की शोभा एक साथ धारण कर रहा है ।१५ शिराज-देवि, तुम्ही हमारे समस्त मगल के लिए केन्द्र स्थान हो । क्योंकि-तुम मुझे सदा सुख प्रदान करती रहती हो-मर के लिए प्रस्थानकाल मे प्रोत्साहित करके, वापस माने पर पराक्रम सबधी विविध प्रश्न पूछार, उद्विग्न रहने पर विभिन्न नीति विषयक वार्ता द्वारा एव जब धान्त रहता हूँ तो मधुर बचन बोलकर सुख पहुंचाती हो।१६ राशी-मार्यपुत्र, सहमिणी सत्रिय ललना का घम ही यही है। स्वभावत:

तब मे हर प्रतिष्ठिस, मनाव मे स्यन्मनसंको गतम् ।
विपि प्रसाने भवति प्रसन्नी समाकुलं, पाकुलिते स्वयि प्रिय It"
शिवराज :--(स्वगतम्) ग्रहो नु खलु पायोऽस्मि । (प्रकाशम्)
सब सुपास्मन्दियोभिरामायितोऽहं पुनः पुनर्नवतामुपधारतीनभि
भविनुमत्सहे।
ही-संप्रत्यधर्मप्रापे'राजकुलेषु धर्मवलेस्तवमुखोपयमेव
विजयश्री
शिवराज :--(पातम्नोस्यनमाकये) महो जातः खलु सेनानिरी-
क्षण समय । यावरसाधयामि।
राजी-अहमपि तावच्छिवाराधनाय देवगृहमपंमि।
(पटीक्षेप:) (इति निष्कान्ती)
समाप्तोऽयराज्यमयस्मिनियामा
तृतीयोऽङ्कः
मेरा हृदय तुम्हारे सकल्प, मस्तिष्क तुम्हारे मन के साथ एकाकार
रहता है । है प्रिय, तुम्हारे प्रसन्न रहने पर प्रसन्नता तथा व्याकुल
रहने पर मुझे माकुलता होती है ।१७
शिवराज-(स्वगत) वरतुतः भाग्यशाली हूँ मैं। (प्रकट) तुम्हारे
सुधा के समान मधुर वचनों से मानन्दित मैं शमी को मात करने
की नवस्फूति प्राप्त कर उत्साहित होता हूँ।
राजी-राजकुलो के प्रायः मधमरत होते हुए धर्मवृत्ति वाले तुम्हारे
लिए विजयधी सहज प्राप्य होगी।
शिवराज-(शतघ्नी की ध्वनि सुनकर) सेना-निरीक्षण का समय
हो गया । अब मैं चलू ।
राजी-मैं भी शिवाराधन के लिए देवमन्दिर में जा रही हूँ।
(परदा गिरता है) (दोनों चले जाते हैं)
राज्पथ्यवस्थिति नामक
तृतीय अंक समान

चतुर्थोऽङ्कः (ततः प्रविशतो राजपुष्पो) प्रयम -भद्र किमेव प्रकाऽपि महोरसचे नियोगभून्य इवान परिभ्रमसि । द्वितीय -प्रये कि निमित्तोऽथ महोत्सव । प्रथम - महो कि न जानास्य पतु भवानी प्रतिष्ठामा परि. समाप्तिदिमिति । द्वितं य-भद्र राजकार्य देशातर स्थितोऽहमद्येयान सप्राप्त । प्रपप--दिष्ट तत्प्रतिष्ठामहोरसपार्थ समुपस्थितस्य श्रीराम- घासस्वामिन सानिम्न पवित्रीकृत एप प्रतापगडदुर्ग । भविताञ्च देवस्थानेन महात्मना समागम । अपि नामास्मिस्तपोनिधी भक्तिमयको चौथा थंक (दो राजपुश्यों का प्रवेश) प्रथम-गद्र, महोत्सव के प्रारम्भ हो जाने पर भी यह तुम घूम पपों रहे हो, जैसे कोई काम न हो। द्वितीय--प्रोह, यह महोत्सव कैमा ? प्रथम-प्रोह, क्या नहीं जानते कि मानी की प्रतिष्ठा का भाज समामि दिन है। रितीव-मद्र, राज्यवार्य से देशान्तर गया था, पात्र ही यही पाया। प्रयम---माग्यवशात् प्रतिष्ठा महोत्सव के निमित्त भाये हुए स्वामी रामदास के सान्निध्य से यह दुग प्रतापगड पवित्र हुमा । पाज महाराज से इनकी भेंट होगी। मेरी इच्छा है कि देव के हृदय में इनके .

भवेरस्महेवः । यतः स एवास्ति समर्थो सेवाम विनशतान्यपि विवारयितुम् । दितीय-अप्पस्ति कश्चित्प्रतिकूल प्रसङ्गायकाशी येनंव वीषि । प्रयम-प्रय किम् । कारागृहाद्विनिर्मुक्तस्य शाहजीमहाराजस्य पुनः पदाधिकार पदापात्यनन्तरं योजापुरेशस्य पुरतो देव धन्दीपतुं प्रतिम समाविष्टो पूतः शामराज । एताप्रतिज्ञा सिद्धये च जावली प्रान्ताधिपसाहाय्यमपेक्षमाण स तमेवामित्यावर्तत । अत्र च निवसता शामरामहतकेन सह्याद्रियन पर्यटसो बेवस्य पधार्थ नियुसान् मारारम- कान किरातानिहत्य रक्षितो देवस्तार स्मादुपस्थितेन नेताजीयोरेण । । दितीय-एव मियो विद्वेष कलुषितेवामरसत्रयोरेषु कुतः स्वा- संन्याधिगमो भारतीयानाम् । प्रति भक्ति भावना प्रगाढ हो । क्योंकि वही देव के सैकडो विघ्नो को दूर करने में समर्थ है। द्वितीय-क्या कोई प्रतिकूल घटना सम्भावित है जो ऐसा कहते - . प्रथम-हो । शाहजी महाराज पे कारागार से मुक्त होकर पुनः कर्नाटक के अधिकार पद पर प्रतिष्ठित होने के पश्चात् ईविश पूतं शामराज ने घीजापुराधीश के समक्ष देव को बन्दी बनाने की प्रतिज्ञा की। इस प्रतिज्ञा की सिद्धि के लिए साहाय्य की अपेक्षा रखकर उसने जावली के शासक का माधय ग्रहण किया। उसके वही निवास परते हुए शामराज द्वारा, देव के वय हेतु प्रेषित जगल में घूमते हुए उन यधिक किरातो के मचानक उपस्थित होकर नेताजी द्वारा मारे जाने पर देव की रक्षा हुई। द्वितीय- इस प्रकार हम, क्षत्रियों के परस्पर की विद्वप भावना से बलुपित हृदय भारतीयो के लिए स्वतंत्रता की प्राप्ति वहाँ ।

( ५७ )
प्रथमः-ततश्च सुखं प्रत्यागतेन देवेन संदिष्टं तस्य साधमस्या
भावलोप्रान्ताधिषस्य यद्
वित्रीय देशकुल धर्मयशो ऽभिमाने,
ग्लेच्छाधिपाय न मनागपि लगसे त्वम्।
माक्रम्य, सुग्धकगणरपि पशबद्ध,
किया श्ववृत्तिमकिनन्दति सिंहशाय ॥१
इति । परन्तु प्रत्यासन्नमरणेन तेन सपा प्रत्याक्षिप्त देवस्य
मप्रितम् । ततश्च समिद्धमन्युना देवेनासो भाकुलापसद. क्षिप्रमेष
पमालयं प्रेषित।
द्वितीय-धन्यं हि नटपाटय देवस्य । स एव बध्यो विषोल्वणः
सुष्यसर्यः ।
प्रथम -पप रोगाकान्तं मोगल साम्राज्यमपधुत्त्य दिल्ली नगर
प्रयाते तत्रुवराजे जावली प्रानाधिपवध संजात्मण बोजापुरेशन देखें
प्रयम-उसके पश्चात् सानन्द वापस मार देव धषिय भघम
जावली प्रान्ताधिप को मादेश दिया।
यवनराज के हाथों अपना अभिमान, धर्म, यश और फुल-मर्यादा
को देचार या तुम्हें तनिक भी लग्जा नहीं पाती, घधिको द्वारा
पासवट होने पर भी क्या सिंह-पावक भी कुत्ते की वृत्ति स्वीकार
करता है।
मृत्यु के निकट जानकर भी देव की मनपा को नहीं माना और
उसके पश्चात् उससे कुछ होकर देव ने उस पत्रिपद्रोही दुष्ट को तुरन्त
यमपुर को भेज दिया।
हितीय-देव की यह राजनीतिक दुशलता प्रासनीय
जी
ही यह विपता कृष्णसपं भी मारा जाना चाहिये।
प्रथम--मुगल सम्राट को शेषमस्त जानकर उसके युवराज के
दिल्ली नगर स्थित होने के बाद वापसी प्रान्त के पितारी के बंध

4
"निग्रहीतुमाजातः स्वसेनानायरः । तर्विरेण भविष्यति पुन
युद्धारम्भः ।
द्वितीय-अप्यस्ति गिदितमेतद्देवस्य ।
प्रथम:-
:-चारचक्षणो देवस्य नास्ति रिमायगोचरम् । (पुरती
"विलोपय) एप परिसमाप्य प्रतिष्ठाकाय प्रस्थितो देवो राजमन्दिरम् ।
द्वितीय-भद्रा
तावद्देशान्तरोदन्तमावेयितुम पैमि
मन्त्रिसदनम् ।
प्रयम.-प्रहमपि स्वनियोगपरिपालनाय प्राप्नोमि राजमन्दिरम् ।
(इति निष्क्रान्ती)
(पटीक्षेप')
इति विकम्भक
.
से ध वीजापुराधीश ने अपने सेनापति को देव को बन्दी बनाने का
मादेश दिया है । इससे शीघ्र ही युद्ध पारम्भ हो जायगा ।
द्वितीय- यथा यह देव को मालूम है ।
प्रथम-गुप्तचरो द्वारा समस्त सूचनाएं प्राप्त करनेवाले देव के लिये
कुछ भी प्रज्ञात नहीं है । (सामने देखकर) प्रतिष्ठा कार्य को समास
करके यह देव राजमहल को जा रहे हैं।
द्वितीय-मद्र, मैं देशान्तर के समाचार निवेदन करने के लिये मंत्री
के पास जा रहा हूं।
प्रथम-मैं भी अपना कार्यभार निर्वाहने राजमहल को पस
रहा हूँ। (चले जाते हैं)
(परदा गिरता है)
विष्कम्भक समान

(५६) -- (तत प्रविशति रामदासेन सह शिवराज) शिवराज - (सप्रश्रयम्) दिव्याध फवार्यतां गमितोऽस्मि चिर- प्रायितेन भगवाप्रमावाधिगमेन । (इति पुष्पधज कण्ठे समय पादयो पतति) श्रीरामदास -भारतकधीर उत्तिष्ठ । धर्मराज्यसस्थापना मा राशनावती एस्य तवं भवतु सवत्राप्रतिहतो विजय । शिवराज -(स्थाय) प्रतिगृहीताको । (सनिवेद) भगवद, अथ मपा यावज्जीव किमेवमेव हिसाप्रधानो धर्मो नुष्ठेप । घोरामदास-पस्थितवर्णाश्रमेऽस्मिन् भारते व दुष्कृतां हिंसन साधूनां ध परित्राणमेव क्षत्रियस्य परा धर्म । सन्मय-मार्गमयलायो- रूपमगामिनी नपाघाश्चो मूल्य प्रवतंय तव धर्म शासनम् । न चंय प्रवतमानस्य तव श्रेय प्रतिवन्ध । यत (उसके बाद रामदास के साथ शिवराज का प्रवेश) शिवराज-(विनम्रता से) चिरकाल से भगवन के दर्शन के लिए उमुक मैं भाज भाग्यवशात् कृतार्थ हुमा । (पुष्पमाल वण्ठ मे समर्पित कर पैरो पर गिरता है) 1 धोरामदास-भारत के प्रद्वितीयवीर उठो । धर्मराज्य की स्थापना हेतु पाकर के अंश-सहित प्रवतरित तुम्हारी सर्वत्र विजय हो। शिवराज--(उठकर) अनुग्रहीत हुमा । (ससेद) भगवन्, क्या जीवन पर्यन्त में इसी प्रकार हिंसात्मक कार्य करता रहूंगा। धौरामदास-वप्रिम की व्यवस्थित परम्परा वाले इस भारतवर्ष में क्षत्रियों का परम धर्म है कि दुष्टो का बध मोर साधुजनो की रक्षा करें । इमलिए नोनिमार्ग का माधय ग्रहण करके पथभ्रष्ट प्रथम राजापों का नाश करके अपना धर्मशासन स्थापित करो। इस माचरण में तुम्हें कोई धार्मिक साधा नहीं है। क्योंकि- लोकस ग्रहपरजितात्मभिः; कर्मयोगनिएतनपोत्तमः। पाप्मना प्रमयने प्रकल्पितो, धर्मतनमपि बाषते नय' ॥२ परन्तु धर्म प्रवृत्सा परिपम्यिनरत्यया, साम्य रामन् स्ययन विधेया । म पम गुप्ते हि नयप्रयोगा , कदाविदप्पपरा भवन्ति ॥३ एष धर्म नमप्रतिष्ठितेन च स्वया मानाधर्मा प्रजा समनुष पालनीया । यत घृत यथा धर्म भयेन रस्यने, भिस्तथा नंय नरेदशासनात् । धर्मान् समाचारपरानसो नृप, प्रजातिज्ञो निममेन पालयेत् । ४ एव प्रयतमानस्य सव सर्व पानुकूला भविष्यति जगनियात्री परदेवता। उत्तम राजा जो अपनी प्रजा पे कल्याणापं पत्नशील रहते हैं, जितेन्टिय और कर्मनिष्ठ है. दुष्कर्मों का विनाश करने लिए नीति का प्रयोग करते हैं, ऐसे राजा पमत को भी पात्रान्त कर गलते हैं । २ परन्तु हे राजन्, तुन्, मपने पामो पर विजय परनी चाहिए, ये पात्र जो धर्मनीति तथा माय शक्ति से युक्त हैं, क्योरि सभी धर्मगुण के सममा राजनीतिमा प्रयोग व्यपं हो जाता है । ३ इस प्रकार भमनीतिक प्रतिष्ठा द्वारा माना घमौरा मनुसरण करते हुए समान मुदि से तुम्हें प्रमापा पारन परना चाहिए । धर्म में भय से बसे प्रापरणकी रक्षा होनी है उस प्रकार वासन म मनुष्यों को भय नहीं होता, मनुष्य पम पोर पर कोडरता है पर राजासाहिए यह धर्म एव पदापारा प्यान रखते हुए, प्रया पाहिन हदय में छोपार नियमत शासन परे ।। पार पापण परने पर जमानियत्री परातिप्रापो मनुस ऐगी।

शिवराजः-भगवन् तवानुग्रहेणाय निवृत्त' में मोहावरणम् । नवीकृतश्च साम्राज्यसत्यापनोत्साहः । चौरामदासः--वरस, तव साहान्यायं प्रतिमठं मया विनोपन्ते राष्ट्रभावमाविता. शतशो युवगरणा. तदिमे क्ष्यायामयोगोपचिताङ्ग सत्वा विद्याकलादण्डनयप्रतिष्ठिताः । राष्ट्रफभत्ता उपधाविशोषिता भवन्तु ते भाविरणे सहायाः ।।५ शिवरा---ग्रहो परमार्थतो भगवतबारधे राष्ट्रोद्धरणोच मेऽहं तु निमित्तमात्रमेव 1 सायं ब्रह्मासमेषित्तमेव क्षत्रमृघ्नोति । घोरामदास --यरस, पत्र ब्रह्म व क्षत्र च समीची धरतस्तव साम्राज्यषोविलसति । प्रत ये क्षमा स्वतपसा दुरात्मना निग्रहेऽपि च सतामनुण्हे । ब्रह्मवनि प्रात्मयाजिनस्तान्सभाजय सदा स्वगुप्तये ॥६ शिवराज-भगवन्, भापके अनुग्रह से प्राज मैरा मोहान्धकार समाप्त हुपा और साम्राज्य स्थापना का उत्साह नया हो गया। थोरामदास---वत्स, तुम्हारी सहायता से लिए मैं प्रत्येक मठ मे राष्ट्रीयभावना का समावेश कर रहा हूँ। अतः ये- व्यायाम द्वारा अपने शरीर में शक्ति एकरकर, विद्या कला, दण्डनीति मादि में दक्ष हो, राष्ट्रभक्ति से युक्त, धर्म, अर्थ मै भलीभांति परीक्षित होकर, मावी समर में सहायक होंगे। ५ शिवराज-पहो, परमार्थ की भावना से वस्तुतः राष्ट्रोदार का कार्य मापने ही प्रारम्भ किया, मैं इसमे निमित्त मात्र हूँ। यह सत्य ही है कि ब्राह्मणों की शक्ति से युक्त होकर क्षत्रियों की शक्ति बढ़ती है। थोरामदास--वत्स, जहाँ ब्राह्मण भोर क्षत्रियों की बुद्धि एव शक्ति मा सहयोग होता है, वहीं साम्नास्य-लक्ष्मी विलसती है। इसलिए वही समादरणीय हैं जो क्षमाशीलता मोर सपस्या के बल दुरारमा मनुष्यों का निमह भौर सज्जनो पर अनुग्रह करते हैं तथा जो ब्रह्मतेज प्रकाश- मान्, सभी को अपनी रक्षा हेतु, अपने ही समान मानते हैं।६ .

(६२) अपि च सामाग्यसमृद्धये यया प्रयत्नेनानुरजनीया निषाद- पञ्चमाश्चत्वारो वर्ण । मत यथाऽनलोकरयवहारसिद्धये, भयेरसमर्थोऽविश्लेद्रिय पुमान् । तथा नप. पञ्चजनोपस हात, साम्राज्यसौभाग्यफलाय कल्पते ॥७ शिवराज-भगवतो महिम्ना वशीकृतोऽय जनोऽत प्रभूति शिष्य हप्क्ष्याऽनुकम्पनीय । भीरामदास:--वत्स, न केवल शिष्य इति स्वमसि मम प्रमा- स्पदम् । अपितु स्वमसि मे द्वितीय हृदयम् । स्वदधीनप्राप्ति मे साध्यसिद्धि । तामधा सतत सावधाने नोदोक्ष्यते त्वद्विजयध्वजप्रसर । सप्रत्यपि स्वां निविष्णम पधुत्यसप्राप्तोऽस्म्यहं त प्रोत्साहनार्थमेतद्- दुर्गराजम् । अप त्या स्वरमप्यभिप्रवृत्तवीक्ष्य प्रतिष्ठह धर्म प्रयनाय 'दुर्गान्तरम् । मोर तुम्हें सामाग्य को समृद्धि के लिए चारो वर्णो मोर निपादो को प्रयास करके प्रसन्न रखना चाहिए। क्योकि- जिस प्रकार विकलेन्द्रिय पुरुष व्यवहार की सफलता के लिए समार में समर्थ होता है तय नृपति पांचों यो के संग्रह द्वारा साम्राज्यशक्ति के लाम हेतु सौभाग्य की कल्पना कर सकता है ।७ शिवराज-भगवन् की महिमा में वशीभून, इस जन पर शिष्य समझकर माप कृपा करें। धीरामदाम-वरस, सुप केवल शिष्य होने के कारण मेरे प्रिय नहीं हो यहिक तुम मेरे दूसरे हृदप हो । मेरो मिति नुम्हारे ही प्रधान है। इसलिए मैं सावधानी से हपना तुम्हारे जियध्धन का प्रसार देखता रहता हूँ। इस समय भी निरामहृश्य तुम्हें प्रोत्साहित करने के लिए इस दुर्ग में उपस्थित हुपा हूँ। अब मैं तुम्हें अपने कर्म में प्रवृत्ति देवकर दूसरे दुर्ग मे घम-प्रवचन करने जा रहा हूँ।

शिवराज-भगवताऽनुपह्योऽप जनो भूयो दर्शनेन । श्रीरामदास -भारतकवीर सपादयतु तवाभीष्ट भगवतो परदेयता । (इति निष्क्रान्त) शिवराज--क कोऽत्र भो । द्वारपाल-(प्रविश्य) प्राज्ञापयतु देव । शिवराज --मन्त्र मार्गमाशय । द्वारपाल -इत तो देव । (उभौ परिकामत) एतन्मन्वहार प्रविशतु देव । (इति निष्क्रान्त)। शिवराज-(प्रविश्य) स्वागत मन्त्रिवराणाम् । मत्रिण - (उत्थाय) विजयता महाराज । (इति शिवराजमन- पविशति) द्वारपाल-(प्रविम) देव प्रष्टकाम कोऽपि यवनतापतो द्वार लिष्यति। शिवराज-भगवन्, इस जन को पुनर्दर्शन से अनुगृहीत करेंगे। श्रीरामदाल-भारत के प्रष्ट वीर भगवती तुम्हारे प्रमोष्ट को पूर्ण करें। (चले जाते हैं) शिवराज- कौन है? द्वारपाल-(प्रवेश कर) देव मादेश दें। शिवराज-मह का द्वार दिखामो। द्वारगल-इधर, से दव (दोनों चलने का नाटय करते हैं) यह है मन्त्रगृह का द्वार प्रवेश करें देव । (चला जाता है) शिवराज-(प्रवेशकर) मत्रिवर, स्वागत है। मन्त्रिी-(उठार) विजय हो महाराज । (शिवराज के बैठने के बाद बैठना है) दारपाल-(प्रवेशकर) देव, दार पर कोई यवनतपस्वी दर्शन के सिए माया है।

शिवराज:-प्रवेशयनम् ।
द्वारपाल.-तपा। (इति निष्क्रान्त.)
-(प्रविश्य) विजयतां देयः । कयमपि तं सामूषक महोत्वा
'सरयरमानपामोति बीजापुरेशतभायां प्रतिज्ञाय मार्गे च भवानीप्रतिमा
खण्डशः धरवा द्वादशसहस्रस निफदलेन सह सप्राप्तोऽत्र पापामा
-योजापुरसेनानायक । (इति निष्क्रान्तः)..
शिवराज'-(प्राकार्य सरोषम्) भरे जाल्म
प्रविदिततपनाम्ययप्रताप, किमिति वृथा यम जल्पसे मवाम्य ।
परधनपरिपुष्टमञ्जसा त्यां, महिषबलि परिकल्पये भवान्याः ।
नेताजी:- (सरोषम् ) सद्य एव मी सस्याततायिनो निग्रहार्य.
माविशतु देवः । प्रवाह
5
।
शिवराज--प्रवेश करापो।
द्वारपाल -जैसी पाशा । (चला जाता है)
-(प्रधशकर) विजय हो। बीजापुर नरेश का सेनापति उसकी
सभा मे सह्याद्रि के मूषक को पकडकर शीघ्रातिशीघ्र उसके सामने
प्रस्तुत करने की प्रतिमा कर, मार्ग मे भवानी की मूर्ति को खण्ड-खण्ड
-करके बारह सौ सैनिको का दल लेकर पहुंच चुका है ।(चला जाता है)
शिवराज-(सुनकर क्रोध में) मरे माठ ।
मदान्ध !
यह क्यों व्यथं पे बकवास करता है ? क्या तुम्हें सूर्यवंश
के प्रताप का ज्ञान नहीं है । प्रस्तु । शीघ्र ही मैं, दूसरे के पन से
परिपुष्ट तुमको महिष की भांति भवानी के लिए घलि के रूप मे अर्पण
पलंगा।
नेताजो--(ोष-सहित) देव, उस माततायी को पकड़ने के लिए
मुझे तुरन्त मादेश दें।माज ही में-

कामकोषातिरेकट्यसनविदलित बुधिनीतं मवाय,
स्वरकोपाग्निमदग्ध परिमतविभव वायुपोऽन्त गत तम् ।
हत्या नि शेषतस्ततमतिविपुल तपयित्वा कपाणम्,
जीवप्राह गृहीत्वा निगडितचरण तेन्तिकं प्रापयामि
शिवराज-(विविन्य) धौर नाप साहसप्रतिपत्तिचिता ।
तरवाधिष्ठिता.
प्रधान परिपन्थिनां परिचयं कुर्वन्त्वनल्म स्पशा,
अध्यक्षा. स्वपदातिसादिनिवहान्संनाहयन्तूयताः ।
प्रच्छन्नमिति-स्पशा. घरा परिपन्थिना, रिपूणामनरुप गाढ
परिचयं प्रच्छन्न कुर्वन्तु । अध्यक्षा: सेनाविभागाधिकृताः उद्यताः मन्तः
स्वपदातिसादिनिवहान् सन्नाहयन्तु सन्नीकुर्वन्तु । दुर्गाधिपाः निश्चला.
सन्तः दुर्गाणामयने रक्षणं भवहिता. सावधाना भवन्तु । सधः प्रताप
रोपयितु द्विषामन्तक. कालः उदित, प्रादुर्भूत ।
काम, क्रोध मादि व्यसनो से जर्जरित दुविनीत मौर मदान्ध
उसको, जो प्रापको क्रोधाग्नि से जल रहा है, जिसका वैभव मोर मायु
पमाप्त होने को है, मैं उसके समस्त सैन्य दल को भार अपनी तलवार
की प्यास बुझाकर, पन्त में जीवित ही पकड और घरो मे बेटी
महिनाकर मापके सामने उपस्थित करता हूँ ।
शिवराज--(सोचकर) वीर, ममी पाहल करने का समय नहीं
है। इसलिए तुम्हारे निरीक्षण में--
गुप्तचरों को शवों के विषय में पूर्णतः परिषय प्राप्त करने दो,
पाति, भस्वारोही पादि सेमा-विभागो के मध्यक्ष उन्हें तैयार करें,

. दुर्गाणामयने भवरवहिता दुर्गापिपा निश्चला, सद्यो रोपचित प्रतापदित कालो द्विषामन्तक. ॥१० नेताजी--पदानापति देव । ( इति निस्तान: द्वारपाल-(प्रविश्य ) देव, परातिनिसो दूतो नारि तिष्यति । शिवराज--प्रवेशयनम् । द्वारपाल'-सथा। ( इति निष्फ्रान्त ) कृष्णाजी ---( प्रविश्य ) विजयतो महाराज । शिवराज--स्थागत विश्वयंस्य । कृपयानो-मप्यतामय महारामस्म । शिवराज--मय पिम् । दुर्गा के पियारी, दुर्गा की रक्षा के लिए निश्पल सावधान रहें, पम हमें अपना पराक्रम दिखाने पा भवसर है और शत्रुप्रो के विनाश समय मा गया १० नेताजी-मो भागा । (पना नामा है) -(प्रार) देय, गधु द्वारा प्रेक्नि दून धार पर प्रतीक्षा शिवराज-मसर मे मामी। द्वारपान-गो माना। (सा जाता है) पानी-(गार) महाराज की जय हो। पिन- विसावागत है। इमामी-महारान पास तो है। fram- 1 ६७ ) कृष्णाजी देव उभपत संनिकाना विनामा परिजिहोरावर याप्रस्मसेनापतिर्य महाजन स्वकुलपरम्परागतवृत्ति स्वीकरणेन परित्यज्य भोजापुरेशस्य विरोधमङ्गोकसम्यो भयपर्म इति । शिवराज -नास्त्यामाक बोजापुरेशेन सह कोऽपि विरोध । किन्तु दु तेभ्यस्तवधिक तेभ्य प्रजाया पालनाथममायमस्मदुपत्रम । कणाजी-तन्महाराजेन स्वायत्तीक्तस्य प्रदेशत्याधिपत्ये तावद भविष्यति महाराजस्येय नियोग । तद्यया बोजापुरेगशासनमनुए य शाहमीमहाराज करनऽप्रदेश पालयलि तथंव महाराजेन सह्यप्रदेशा पालनीय । एतदर्थ च महाराजेन ययावकारस्योऽस्मसेनापति । शिवराज-रनास्मक विप्रलिपति (क कोऽत्र भो । द्वारपाल -(प्रविश्य ) प्राजापयतु देव । कप्पाजी-देव, दोनो मोर के सैनिको का विनाश रोकने के लिए हमारे सेनापति का निवेदन है कि शत्रुता को भुलाकर, परम्परा के अनुसार बीजापुर हरेशमा सेवक धर्म स्वीकार कर लें। शिवराज-योजापुर नरेश से हमारा कोई विरोध नहीं है कि तु हुत्ति वाले अधिकारियों से प्रग की रक्षा करने के लिए हम यह साहस कर रहे । कृष्णामी-पहाराज द्वारा अधिकृत प्रदेश पर महाराज का ही माधिपरय एष शासन रहेगा। जैसे बीजापुरनरेश शासन को समाप्त पर टिप्रदेश का पालन करते हैं उसी प्रकार सह्यप्रदेश का पालन भी मापको करना चाहिए । इमस लिए सुविधानुसार हमारे सेनापति से भेंट करें। शिवराग-इसमे मुझे कोई मापत्ति नहीं है । कौन है यहा। द्वारपाल 1-(प्रवेश कर) देव माशा दें।

शिवराज--पापन विप्रवर्षमावेशिकमन्दिरम् । उच्यतां च मद्
बचनात्तत्राधिकृतो यदेव द्विजोत्तमो राजोपचार सम्भावनीय इति ।
द्वारपाल तथा । ( इति दूतेन सह निष्पात )
शिवराज- मत्रिण, अनेन किमपि हृदये कृत्वाऽन्यदेव मत्रितमिति
सक्ष्यते । यत
नयप्रयुक्त मधुरै चोभि , प्रतारणार्थ
भवमुद्यसस्य ।
कालुष्यमन्त. स्थितमस्य फेवल, पनक्ति पिच्छायमुखच्छधि स्वगम् ॥११
मशी-एवमेतत् । यत
नेत्रप्रसाद स्वयमाननयुति स्वाभाविको चंप पर प्रवृत्ति ।
अल्पोपचारो गतमापविक्लव, विवृण्वतेन्तह वयस्थमाजवम् ॥१२
सत्कयमपि भातम्यमस्य मनोगतम् ।
शिवराम-इन द्विश्रेष्ठ को प्रतिषिभवन में पहुंचाया। भोर मेरे
प्राशनुसार वहा के परिधारी से कहो कि इन हिजोष्ठ का रामोचित
रोनि से सम्मान (पानिप) होना चाहिए।
बारपाल-जो पाना । (इन के साथ चला जाता है)
तिवराज-मत्रियो, यह परने हृदय में कुष मौर ही गुप्त रखपर
बुध गौर ही मोचता है। योनि-
मोतियुक्त मधुरवाणो से हम लोगों को ठगने के लिए उन इसके
मुरादी धुनी कान्ति इसके पित मन्तरण का मामा परा
मंत्री-ऐगा दी है। पोंकि
उमरी दृषि, मुगााति, वाणीपीस्वाभाविशता, नियमित व्यवहार
मौर निर्भयता, उसके हृदय में स्पिष्टिमा पा माभास पराते हैं ।१२
रिसी प्रकार हमें इसके मन की बात माननी पाहिए ।

( ६६ शिवरामपूर्व तारधवनसेनापतये विसृष्टोऽस्मद्दतस्तमावे- दयतु पद प्रमावसस्वादृतसाहस प्रभुमहतिरोधादनुतप्यमान । निरीक्ष्य नेत्रप्रतिपाति ते महो धेर्यच्युत प्रार्थयते तवाधयम् ॥१३ मनेनोरिसच्यमानः स मदान्धोऽस्मनायपासधूतो भविष्यति । मत्री-सद्य एव प्रपयामि प-सोनोगोपीमायमेतदर्थसं सिद्धये । ( इति निष्क्रान्त ) शिवराज-~-अपि तावत्प्रत्यथित विवित उपगृहणानि । (इति मन्त्रगृहाधिगत्य परिकामति । परितो विलोक्य ) महो निशेयमाकान्ततमिस्भीषणा, पापात्मना पापचिकीषिते हिता। स्वधर्मदक्षे नपतो तु जापति, स्वपति सर्वा अकुतोभयर प्रजा. ॥१४ शिवराज-सर्वप्रथम यवन सेनापति के पास अपना दूत भेजकर कहलाएँ कि प्रमादवश शिवाजी ने सह कार्य करने का साहस किया पौर अब यह महाशक्तिशाली से विरोध करने के कारण पश्चाताप कर रहा है, प्राखो को चकाचौंध करने वाले प्रापके महातेज को देखवर धैर्य खो चुका है और पापको कारण चाहता है ११३ इस प्रकार वचनो से सिंचित होर वह मदान्य हमारे नौनिपास में बंध जायगा। मत्री-शीघ्र ही पन्तोजी गोपीनाथ को इस कार्य की सिद्धि के लिए भेजें। (चला जाता है) शिवराज-मैं भी शत्रुपक्षीय दूत को छोडकर प्राता हूँ। (मत्रणा- गृह से निकलकर धूमना है ! चारो पोर देखकर) ग्रहो, भीपण अन्धकार से युक्त यह भयानक रानि पापकमियो के पापकर्म- सम्पादन हित उपयुक्त है परन्तु धर्मनिष्ठ मोर कर्तव्य-पालन में दस राजा सजग रहे तो उसकी प्रणा निर्भय होकर सोती है ।१४

( ७०
(पुरतो विलोक्य) एतदाशिकमन्दिरम् । यावत्यविशामि ।
(ततः प्रविशति सुवर्णमयावस्थितोऽरातिदूस.)
(पटीक्षेप.)
दूत :- (ससंभ्रममुस्थाय) महो महारानः। कोऽयं मध्य
साधारणोऽनुप्रहः ।
शिवराज :-(महाहं रस्तमुपायनीकृत्य) धर्म एष अभियाणा
पद विप्रोपासनम् । (इति मनातरमु पविशति)
वृत :-(उपविश्य) देव त्वादशा धर्मना एवाहन्ति लोक्त.
प्राधिकारम् ।
शिवराज :-विप्रवर्य, सर्वत्र महोषितमेय सन समप्यते ।
बृहस्पतिपुरोगमा देवा विप्रपुरोगमाघ राजन्या एक युज्यन्ते
विजयधियेति पुराणप्रसिद्धिः।
दूत :--महारान संपति तु सत्रापचारपरिपोरितामा विप्राणा
पवनेोपाययावृते नास्त्यन्यदवलम्बनम् ।
(सामने देखकर) यह अतिथिगृह है । इसमें प्रवेश करू।
(स्वर्णमय पर स्थित दूत का प्रवेश)
दूत-(पयडाया हुमा उठकर) परे महाराज । यह मनुषह यों ?
शिवराम-(पहमूल्य रल देते हुए) क्षत्रियों का धर्म ही ब्राह्मणों
की पूजा है। (दूसरे मप पर पंठते है।)
दूत-(ठार) माप जैसे धर्म हो मोर-शासन में अधिकारी है।
शिवराज-विश्वयं, ब्राह्मणों की सहायता से ही क्षत्रियों की
समृद्धि होती है। पुराण सिद्ध है कि वृहस्पति के नेतृत्व में देवता पौर
बाह्मणों के तल में रामा विजय प्राप्त करते हैं।
-महाज। इस समय सो क्षत्रियों के व्यवहार से पीडित
साह्मणोंरे लिए कामापुरतरेग के मतिरिक्त भार कोई अवलम्य नहीं है।
-

(७१) शिवराज :-तथ्यमेवाभिहित विप्रवण । मतएवं तान्नुपाप- सवानुन्मूलयितं मया शास्त्रमुद्धत्तम् । दूत :- सर्व गाभिनन्य एवं तक पर्यो व्यवसायः । परन्तु प्रथममेय बलिना यवनेशेन विग्रहमारभमारणस्य तव महती नयच्युतिः । शिवराज :-भाध्यमेतत् । तथापि न केवलं यवनसहाय एप प्रभवति प्रशासितुं निजराष्ट्रं यस्नेश्वरः । सन्ति समाप्यधिकता। स्वधर्मपरता धर्म धीरा ये पुनः समुपस्थित उपालये ममोपकरिष्यन्ती. स्पषधार्येच मयादत एव उपत्रम । दूत :--परन्तु स्वधर्मनिष्ठानामपि मत रनिष्ठापादनेन स्वपरिहार्य एवं कृतघ्नतादोपः। शिवराज :--विप्रय, कोऽयं व्यामोहो भवासानों देदधमत- स्वविदुपाम् । 'स्वधर्मेनिधनं श्रेय' इति तु साक्षाद्भगवतंव तारः शिवराज-द्विजश्रेष्ठ, सत्य ही कह रहे हैं माप । इसीलिए इन दुष्ट राजानो का समूल नाश करने के लिए मैंने शस्त्र उठाया । इत-यह भापका धर्म-व्यवसाय सर्वथा प्रशंसनीय है। परन्तु शाक्तिसम्पन्न वीजापुरनरेश से युद्ध-घोषणा कर देना यापकी राजनीतिक भूल है। शिवराज-भले ही यह सम्भव हो तथापि बीजापुरनरेगा केवल पवनों की सहायता से शासन नहीं कर सकते । उनके यहाँ धर्मवीर लोग भी है जो मावश्यक्ता पड़ने पर कठिन समय में मेरी सहायता करेंगे, इसी धारणा से मैंने यह प्रयास प्रारम्भ किया है। दूत-परन्तु अपने धर्म में निष्ठाकान रहार भी, स्वामी के प्रति निष्ठा का निर्वाह न करने पर वृतघ्नता का दोष होगा ही। शिवराज-विप्रवयं, पाप जैसे वेद और धर्म तत्व निष्णात के लिए भी भ्रम (सकट) हो रहा है। अपने धर्म में रहकर मर जाना ही प्रेयस्कर है' यह साक्षात भगवान् ने उच्चस्वर में उद्घोपित किया है।

स्वरेपोडोपितम् । यदि स्वयम निष्ठानां धर्मार्थमात्मनाशोऽपि धेपास्तदा किमान् भतुं विप्रकारः । पुरापि धर्मायं पत्रस्य निर्माणविधी सुरार्थिता, स्वयं महपिस्तनुमप्यहासीत् । शिरः कुठारेण च जामवग्यश्चिच्छेद मातुर्गणा नियुक्तः ॥१५ दूस :-देव मात्र प्रवर्तते मे प्रतिषचनम् । शिवराज:-अये द्विजोत्तम, भन्ति विप्रा भरि धर्ममूर्तयो, विरोधिनी धर्मपरस्य भूभृतः। तदा प्ररोहै: सह धर्मपादपः, समूलमुच्छेदमवाप्नुयाद्भयम् ॥१६ दूत :-(विचिन्त्य) कीदर्श साहाय्यमपेक्षते महाराजः । शिवराज : केवल तत्त्वतो ज्ञातुमिच्छामि सेनापतेश्चि- कोषितम् । यदि अपने धर्म मे निष्ठावान् रहकर धर्मार्थ प्रात्मनाश भी श्रेयस्कर है तो स्वामी के, अपमान से क्या? प्राचीनकाल मे भी धर्मार्थ- महर्षि दधीचिने देवी की याचना सुनकर बम-निर्माणार्थ अपना शरीर त्याग दिया। परशुराम ने पिता के वचन का पालन करने के लिए माता का शिर कुठार से काट डाला ।१५ दूत-देव, इसके विरुद्ध में कुछ नहीं कह सकता । शिवराज-द्विजधष्ठ, धर्ममूर्ति ब्राह्मण यदि धर्मनिष्ठ राजा के विरोधी हो जाय तो धर्मवृक्ष का उसकी चाखामो-सहित निश्चित ही समूल नाश सम्भव है ।१६ दूत-(सोचकर) कसी सहायता प्राप पाहते हैं महाराज? शिवराज सेनापति की योजना मात्र सही-सही जानना चाहता हूं।

दूत :-(स्वगतम्) कि कर्तव्यो मया रहस्यभेदाः । उतपातितथ्यो पर्मावतार। अस्तु । धर्मावतारस्यैव रक्षणेन रक्षितो भविष्यति धर्मो मान्यया । (प्रकाशम्) देव न किमप्यस्ति तवावाच्यम् । तच्छुए। कथमपि त्वां विश्वास्पात्मनः प्रतिज्ञां निर्वाहयितुमुरवण्टतेऽस्म- सेनापतिः । शिवराज :-अहो नु खलूज्जीवितोऽस्मि । द्विजोत्तम न कदापि स्मृतिपयमतीतो भविष्यति तवायमनुप्रहः । परंत्ववशिष्यते किंदिरकत- श्यान्तरम्। दूत :-निशनुमायातु धर्मषीरः । शिवराज:-विप्रवर्य, 'प्रतीव भयाकुलो शिवराजः महता संन्येन परिवृतं त्वाम पायितुं न घायोति । अतो दुर्गपरिसर प्रतिष्ठापितोपकार्याम पेत्य स्वयकाकिना स हस्तगतः कर्तव्यः । दूस- -(स्वगत) क्या रहस्यभेदन मुझे करना चाहिए। क्या धर्मावतार की हत्या होने दूं? धर्मावतार की ही रक्षा करने से धर्म की रक्षा होगी अन्यथा नहीं। (प्रकामा) देव कुछ नहीं है, जो पाप से विपाऊँ । अतः सुनिए । हमारे सेनापति क्सिी प्रकार प्रापको विश्वस्त करके अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करना चाहते है । शिवराज-द्विजश्रेष्ठ, मापका यह अनुग्रह कभी भी भूल नहीं सक्ता । परन्तु इसके प्रतिरिक्त भी कुछ करना ऐप है। दूत-निश्शक होकर कहो धर्मवीर । शिवराज--द्विजनेष्ठ, अपने सेनापति से कहो-'विशाल सेना से पिरे हुए रहने के कारण मत्यन्त भयभीत शिवराज पापके पास भाने का साहस नहीं कर सकता । मत: दुर्ग के समीप राज-शिविर में भाप मरेले उसे मिलकर हस्तगत कर लीजिए । मन्यया उसके कहीं पम्पया तस्मिन् कुत्रापि पलायिते तब प्रतिज्ञाहानिप्रसङ्गः।--इति तमनुनीय संपादयाश्योरेशान्त समागमम् । प्रत. परं पभावि सद्भवतु । दूत :--रेव अत्र विस्त्रया भव । स्वया पुनरात्म दूतमुखेनंतदेव तत्य संदेष्टापम् । शिवराण तथा दूत -सद्य एद तावत् प्रतिष्ठे देवस्याभोष्ट संपादनाय । शिवराज :-अहमपि ममाहमुपेत्य प्रतिपालयामि चरमाध्य- वसायम् । (इति निर्गत्य परिकामति) (स्वगतम्) दिष्ट्या सुसंपस एप पूर्वरङ्गः। क्षेऽपि सोरोकपणावकल्पिते, उपत्वा सुखोजानि समृद्धभूमो । समुद्गतेष्वेव नवाथुरेपु,क्षेत्री समुपश्यति वास्य संपदम् ॥१७ भाग जाने पर आपको प्रतिक्षा पूर्ण नही हो पायेगी। इस प्रकार हम दोनो का एकान्त मिलन करायें। उसके पश्चात् जो होना होगा, होगा । दूत--देव, विश्वास रखें । पाप भी ऐसी ही मुचना अपने दूत से भिजवा दें। शिवराज-~-ठीक है। पूत-देव का अभीष्ट पूर्ण करने के लिए मैं चला। शिवराज--मैं भी मरणागृह मे पहुँचकर परिणाम की प्रतीक्षा करता है। (उठकर चलता है) (स्वगत) भाग्य से पहली योजना सफल हुई। कृषक खेत को हल से भली भांति जोतने के पश्चात् पच्छे बीज बोकर, जब उसमें नव मंकुरों को उगा देखकर शस्य की मच्छी पैदावार की माता करता है ।१७

प्रमेनाक्षिप्तेऽपि भाषिविजये क्यं नियति मापिरोहति
मेन्तरात्मा । पावदन्तः पुरमुपेत्माम्धया सह संमात्रये । (पुनः परिकम्य)
अहो सा तु मामेव प्रतिपालयत्ययाप्यवतिष्ठते ।
(इति अन्त पुरें प्रविशति)
(पटीक्षेप')
(ततः प्रविशति राजमाता राजो च)
राजमाता-वत्स, मप्यनुकूलित. प्रयापदतः ।
शिवराज :-प्रय किम् परन्तु कदाचिद्द दैवतोऽन्न विपरीतमापयेत
तदानों त्वमाधिष्ठितेनोमाजीराजेन प्रवर्तनीयः स्वराज्यसंस्थापनोद्योग
इत्येषा ममा पर्थना।
राजमाता-वत्स, देवातानुग्रहशालिनस्ते नास्त्पपाय शडायसरः ।
इस सफलता से भावी विजय सम्भावित हो जाने पर मेरा हृदय
शान्ति क्यो नहीं पा रहा है । चलू मन्त पुर
माता जी से मप्रणा
करूं । (पुन घूमकर) वह तो इस समय भी मेरी प्रतीक्षा करती हुई
बैठी हैं । (प्रन्त पुर में जाते हैं)
(पट परिवर्तन)
(उसके पश्चात् राजमाता पोर राजी का प्रवेश)
राजमाता--वरस, पाशुपक्षीय दूल को अनुकूल कर लिया?
शिवराज-हो, परन्तु कदाचित् दुर्भाग्य से प्रतिकूल हो जाय ?
उस स्थिति में मेरी प्रापसे यही प्रार्थना है कि स्वराज्य सत्यापना
का जो उद्योग प्रारम्भ है वह माप चलाती रहे।
राजमाता--वत्स, देवताम्रो का तुम्हारे ऊपर मनुग्रह है, हानि
कीका का अवसर नही है। प्रतः

पवनपादिपवाति समुदत, रिपुषवं परिमय रणाहये।
विजयदुन्दुभिनिः स्यनमन्वितः, पुनरुपेत्य विनोदय मातरम् ॥
वरस, रक्षतु त्वां समन्ततः समराधिष्ठात्री परदेवता।
शिवराज :-शिरसाभिनन्द्यन्ते तवाशिपः ।
राजमाता-परास्ताः सन्तु ते विद्विषः ।
राजी-विजयघोविलसितस्य भवतु तवाचिरेण मङ्गलागमनम्।
शिवराज :-क: कौत्र भोः ।
कंचुकी--(प्रविश्य) प्राज्ञापयतु देव' ।
शिवराज :-मन्त्रहमार्गमादेशय ।
कंचुकी-इत इते । (उभौ परिकामतः)
(पटीक्षेप.)
एतन्मत्राहद्वारं प्रविशतु देव । (इति निष्कामत)
मुगलों की प्रश्वारोही, पैदल सेना-युक्त शक्ति शाली (शत्रु) दन का
रणक्षेत्र में मर्दन कर विजयदुन्दुभि के स्वर से हर्षितमन माकर माता
को मानन्दित करो।१०
वत्स, परमानाक्ति रणदेवो हर प्रकार तुम्हारी रक्षा करें।
शिवराज-तुम्हारा प्रापीप शिरमाये ।
राजमाता-तुम्हारे पात्रु परास्त हो।
राजी-विजयश्री से शोभित शीघ्र ही तुम्हारा मगलागमन हो ।
शिवराज-बान है।
कंचुको--(प्रवेशकर) प्राज्ञा दें देव ।
शिवराज-मरणागृह का मार्ग दिखामो।
कंचुको-इधर, घर से देव । (दोनो चलने का नाट्य करते हैं)
(पटपरिवर्तन)
यह पत्रणागृह का द्वार है देव चलें। (चला जाता है)

+ (७) (सत प्रविशन्ति महायस्थता मत्रिणो दूतश्च ) शिवराज :--(प्रविश्य) अप्युपस्थितोऽस्मद्दत. । मंत्री -एप देव प्रतिपालयस्तिष्ठति । शिवराज :--(दूतं प्रति) किंमध्यवसितं यवन सेनापतिना। दूत .--जातमभीष्ट देवस्य । प्रद्य प्रातरेवायमभिकायति देवस्य समगमावसरम् । शिवराज .भा सद्य एव नित्य समायेदम 'दुर्गापत्यकामामुप- कल्पितामुपकार्यामुपेत्य यथासमय त्वया दृष्टव्यः शिवराज.' इति । दूत -तथा । (इति निष्क्रान्तः) शिवराज .-सचिव व ताच्छीघ्रमुपत्यकायां हिरण्यरत्नमण्डिता- मुकार्यामुकल्पय। सचिव , तथा । (इति निष्क्रान्तः) (उसके बाद मत्री एव दूत मश्रणागृह में स्थित दिखामी पड़ते हैं) सिराज-(प्रवेशकर) क्या हमारा दूत वापस हुमा? मंत्री देव की प्रतीक्षा मे यह बैठा है। शिवराज--(दूत से) यवन सेनापति ने क्या निर्णय किया। दूत-देव की इच्छानुसार ही झुमा । प्रात:काल ही देव से मिलना चाहते हैं। शिवराज-शीघ्र ही लौटकर जामो भौर सूचित करो कि दुर्ग के समीप राज शिविर में निर्दिष्ट समय पर शिवराज से मिले । दूत--जो पाशा । (चला जाता है) विराम-सचिव, सुम पीप्न ही हुर्ग के निकट बगल में हिरण्य रलों से सज्जित शिविर निर्मित करायें। सपिव-जो माता । (पला जाता है)

शिवराज :-सेनापो स्व साबच्लोऽसङ्गपादपान्तरितवार
तिनिवहो मार्ग एव मा प्रतिपालय।
नेताजी :--तथा । (इति निभाता)
मत्री-देव सायुषवर्मघरेण त्वया द्रष्टव्य कुटिल परिपन्थी।
शिवराज :-प्रतिपयेऽहं मत्रिवचनम् ।
(इति वर्म शिरस्त्राण वृश्चिकार याप्रनलाश्च पारयति)
मंत्री-पन्न भयतु सानाजीवोरस्तव सहाय ।
तानाजी --पूर्वमेवादिष्टोम्यम्बया तयवनसमागमे तब
पायचरो भवितुम् ।
शिवराज:-जीवितसशयेऽस्मिन्टपतिकरे त्वमेवाहसि
पायस्थानम् । (अयं विलोपर)। महो मभातकरूपा हि रजनी।
यावरसाधयाम । (इति सपरिवार: सुरगमारा परित्रामति)
शिवराज--सेनापति, तुम पर्वत के पास वृक्षो को आड में अपनी
पंदल सेना के साथ मुझे रास्ते में मिलें।
नेताजी-जो प्राशा । (चला जाता है)
मगो--देव, शास्त्र सहित कवच धारण कर भाप उस बुटिल
शत्रु से मिलें।
.
--
शिवराज-मत्रिवर के बथनानुसार ही मैं करूंगा।
(कवच, शिरस्त्राण, वृश्चिकान, बघनख पारण करने हैं)
मशी-तानाजी वीर मापके सहायक रहैं ।
तानाजी-धूर्त यथन से समागम के समय मापका अंगरक्षक रहने
के लिये राजमाता ने पहले ही आदेश दिया है।
शिवराज- हाँ, इस समय जब मेरा जीवन साटमय है, केवल
तुम ही अंगरसक के रूप में साथ रहने योग्य हो । (ऊपर देखकर) मोह
रानि समाठ, प्रभात होने वाला है । हम प्रस्थान परें। (सेवकों के
साहित थोडे पर चढ़कर घूमता है)

( w )
(परितो विलोक्य) अमात्य सण मानव संप्राप्ता यय
शेलायरोहसंक्रमम् । एषोऽस्मदागमन प्रतीक्षमाणस्तिष्ठति सपरिजनो
नेताजीः । (तत प्रविशति सपरिजनो नेताजी)
नेताजी :-(दूरं विलोक्य) महो, उपस्थितो देवः ।
प्रजवतुरगकल्पितासनोऽयं, क्यवधर करवालान्तनद्धः।
अपरिपतनयनो कथा महोन ; सरमसमेत्यभितो दिया कृतान्तः॥१६
{शिवराजमुपसृत्य) विजयता देव.। अस्ति सर्व मुव्यवस्थितम् ।
शिवराज ---(परितो विलोक्य) वीर पक्ष्य,
एतद्विपढतवाल्मलतावितानमुरसङ्गवति गह्न गहनान्तरालम् ।
प्रच्छन्नस स्वमित पबनावयूतमहलोलवीचिनलयः समता वियते ॥२०
नेताजी :-देव, अनिलीयन्तेरमसनिक निवहा ।
(चारो ओर देखकर) ममात्य, क्षणभर में ही हमलोग पर्वत की
तलहटी के सकीएं भाग पर पहुंच गए । नेताजी हमारे प्रागमन को
प्रतीक्षा में साथियों के साथ बैठे हैं । (उसके बाद सैनिको-सहित नेताजी
का प्रवेश)
नेताजी-(दूर देखकर) महो, देव पा गए ।
तीनगामी तुरग पर सहार, कवच धारण किये, तलवार, भाला
लिए, लाल-साल माखों भोर महत्तज के कारण भयानय, दामों के
लिये यमराज घले मा रहे हैं ।१६
(शिवराज के पास पहुँचकर) विजय हो देव । सब कुछ मुव्यवस्थित
शिवराज-(चारो मोर देखकर) और देसो-पर्वत के पावं में
यह वृक्ष, गुल्म पोर दितान के कारण गहन वन, जिसमें सर्वत्र प्रागियो
का निवास है, वायु चलने के कारण पान्दोलन से सहरे भी उठने से
सारा धन समृद्र की समता प्रमट कर रहा है ।२०
मैतामी-देव, यही हमारे सैनिक छिपे हुए हैं।

( ० ) शिवराज - तावच्छजस्वनेनास्मसकेत गृहीत्या तमभिमु वाराति संपम् । नेताजी -यद्देय मानापयति । शिवराज वय तावत्पुरतो प्रजाम । (इति सपरिवारो निष्कात) नेताजी -पदाति सेनापते, अवगमय सैनिकान् सकेतक्रमम् । एसाजी -तथा । (इति निष्कान्त) नेताजी –गुल्माष्पक्ष, सन्जो कुर वंतासिकगणान भयारणपटह- ध्वननाय । गुल्माध्यक्ष -पदार्य प्राज्ञापयति । (इति निष्क्रान्त) एसाजी -(प्रविश्य) माय गृहीत सकेतनम सनिकगएं । नेताजी.-साधु शिषराज-तुम हमारे शृङ्गनाद (बिगुल की मावाज) का सकेत पाकर तुरन्त पात्रु सेना पर भाक्रमण करना। नेताजी-सी माशा देव । शिवराम [-हम मागे बढ़ते हैं। (सेवको सहित जाते हैं) नेताजी-नापते, संनिको को सकेत समझा दें। एसाजी-जो मादेश । (पला जाता है) मेतामी---गुल्माध्यक्ष-वंतालिको को प्रस्थान कालीन नगाडे बजाने से लिए तैयार करें। गुल्माध्यक्ष-जैसी पापको माज्ञा । (पला पाता है) एसाजी-(प्रवेश फर) मार्य, सैनिकगरण संकेत का पर्थ भली माति समझ लिए है। नेताजी-ठीक है।

गुल्माध्यक्ष :-(तालिक सह प्रविश्य) प्रार्य उपस्थिता यया-
देशमते वैतालिका ।
नेताजी -(तारस्वरेए) भवत सर्वे सावधाना ।
- (पटीक्षेप)
(शानिमाकण्यं) प्रवर्तन्तां वो रणातीधानि । शोधाभ
सरत सर्वे सेनानियहा । (इति सपरिजनो निष्कामति)
पैतालिक:-(पटहध्वनिनोद्गायन्ति । नेपाथे पावाघात नि ।
(भूपालीरागए दादरातत्सेन गोयते)
भट्टा नदता मेव-हर हर हर महादेव ॥
अक्टयत करप्रतापपरिकुलघटितोपतापहृष्टा, नदसाट्टमैयः॥
प्रबलराज्यमदविकारांटिलपरकृत्तापकारहटा,
नवता॥२
गुल्मायक्ष--(तालिकों के साप प्रवेश पर) मादेशानुसार ये
तालिक उपस्थित हैं।
नेताजी-तीन स्वर मे) सभी सावधान हो जामो।
(शङ्ग का स्वर सुनकर) नगाहे बानी । सभी सैन्य समूह तुरन्त
प्रस्थान करें।
पंतालिगण-(नगाहे को ध्वनि के साथ गते हैं । नेपथ्य मे पैरों
की ध्वनि) (भूपाली राग, दादराताल में गाया जाता है)
वीरी, सीवस्वर से बोली-हर, हर हर महादेव ।
मपने शौर्य, पराक्रम को प्रक्ट पर शत्रुस को सन्तप्त करो
उससे हपित हो, राज्यमद के दुरभिमानी, प्रबल, कुटिल दूसरो को
पष्ट देने के कारण उसके प्रकार से रष्ट होरर, पीइण वाणो मार

(२) निशिताररुपाएपातसापितरिपुकटरूपाततृष्टा, माता॥ विजयपटहाटुनिनादपाटिसपरिपन्यिमारजुष्टा नदताट्टमेव०॥ (निष्कान्ता सर्वे) समाप्तोऽय दूत भेदनामा चतुर्योऽस. कृपाण के साधान द्वारा शत्रु सेना पर पात करके सन्तुष्ट, विजय- दुन्दुभि के निनाद से पाके मद को शान्त करके, वीरो तीन स्वर मे, भट्टहास-सहित बोलो-हर, हर, हर महादेव ।। (सभी चले जाते हैं) दूतभेद नामक चौथा अक समाप्त - पञ्चमोऽङ्कः (तत प्रविशतो इधरो) प्रपम --नून यषु प्रविलितस्प यवनमातङ्गस्य वधेन समुपानित लोकोत्तर यशो देवेन । द्वितीय -मजित त्येतरपारास शयेन । प्रथम -महो कप नामंतत् । द्वितीय -पालिङ्गनामपणासो जाल्मो देव कक्षान्तरे सपोग्य मायवसिप्रहारेणाप शिरो भेत्तमुयुक्त तावदेव देवेन ध्यानमख- विपाटितमस्य बृहत्तन्दुम् । देवस्य शिरस्त्राणेन च विफलीहतरे स्य निस्त्रिशप्रहार । पत्रातरे साहाय्यामथमाकोशतस्तस्य पूवकायो विरिहानाचणविक्रम करसेन धर्मावतारेण देवेन । तदानीमेव देव पाँचवाँ अंक (उसके बाद दो गुसमरी का प्रवेश) प्रथम-निश्चित ही, शरीराभिमानी सदन सेनापति का वध कर हमारे देव को लोकोत्तर यश मिला । द्वितीय-प्राप्त तो हुमा, प्राण सराय में डालकर। प्रथम-यह किस प्रकार ? तिीय-वह पाठ, जैसे ही देव को मालिंगन के बहाने अपने कक्ष + ले जाकर तलवार से उनका शिर काटना चाहा, देव ने बघनस द्वारा उसके उदर को फाड डाला । उसको तलवार का पात देव के शिरस्त्रारा र पड़कर निष्फल हो गया। उस दोष सहायता के लिए चिल्लाते 'ए उसके घर को प्रचण्ड वित्रम वाले धर्मावतार देव ने विच्छिन्न कर + प्रतुं मुद्यतस्तरयाङ्गरक्षको यमसदन प्रेषितस्तानाजीवोरेण । ततश्च सकेतानुरोधेनाकम्प परास्त बीजापुरेशसंन्यमस्मत्सेनापतिना नेताजी धोरेए। प्रथम --उत्तमनेन खलु साम्राज्यबीज महाराजेन । द्वितीय -~-अप क्म् ि। तत प्रभृत्ति युद्धे ग्रहीतमुक्ता ययन सैनिका अपि विहाय यवनेश महाराजाश्रयमयिष्यन्ति । प्रथम -भवन्ति सर्वेऽपि न्यायप्रयत्तस्य पक्षातिन । द्वितीय -अनन्तर च विजित्य पहालाप्रभृतीन् यवनदुर्गान् जुभप्रभूतोश्च मोगलदुर्गान प्रवर्तित तन धमचक महाराजेन ! सतश्च भावियवनाक्रमणमपेक्षमाणो देवो मानादुगसरक्षणार्य मत्रियो नियुज्य स्वयं पम्हालादुगमध्यास्त । अचिरगवावरुद्धोऽय दुर्गराज दिया। उसी समय देव पर प्रहार करने के लिए उद्यत उसके नग रक्षक को तानाजी वीर ने यमलोक को भेज दिया। उसके पश्चात् पूर्व नियोजित सकेतानुसार हमारे सेनापति नेताजी वीर ने मानमण करके बीजापुर नरेश की सेना को परास्त कर दिया। प्रथम-इस प्रकार हमारे महाराज ने साम्राज्य-स्थापना का बीजारोपण पर दिया। हितोप-प्रौर पपा, उसके बाद युद्ध में बन्दी बने पवन सैनिक मुक्त होने पर यवनराज को छोधकर महाराज का माधय चाहते है । प्रथम--समी म्पायप्रिय के ही पक्षपाती होते हैं। हितीय-मोर उसरे पश्चात् पन्हाला मोर अनर मादि मुगर दुगों को जीतकर महाराज ने धर्मराज्य स्थापित कर लिया। फि यवन प्रारमण की सम्भावित मासका से, देव दुर्गों के संरक्षणार मत्री पो नियुक्त पर स्वय पन्हासा दुर्गम स्थित हैं। शीघ्र ही इस पर पचीस हजार सैनिकों को लेकर पवन सेनापति ने पाक्रमर - पविशतिसहस्रदलसमन्वितन पवन सेनापतिना। ततो महता नप- प्रयोगैरण प्रतार्य , त यवनसेनापतिमतीतायां मस्किाया मिशीय श्य निभिद्यावरोधकगणमल्पपरिजन. प्रस्थितो देयो विशालगडदुर्गम्।। प्रथम :-महं तावासुगुप्तेन घरमंना सप्रयोपेत्य बाधयामि देवं मोगलशोदन्तमातम् । द्वितीय :--महमपि प्रविश्य यवनदलमुपलभेय तसेनापते. चिकोषितुम् । (सत प्रविशति विशालगडदुर्गोपत्यकावस्थित सपरिजन शिवराज.) बाजी :-देव विष्ट्या समाप्ता वयं विशालगडदुगंपरिसरम् । पश्य विशालवप्रोग्मतगण्डभिलिई रकमो हस्तमिताग्रमार्ग.। दुर्गोत्तमोऽय परिषद्धपार्यो ; महेन्द्रमाता निमो विभाति ।।१ तत्सत्वरमेनमधिरोहतु भारतेन्द्रः । किया। उसके पश्चात् कूटनीतिक धाल से उसे ठग कर, गत रात्रि में देव ने अवरोधको के बीच से अपने थोडे से सेवको सहित विशालगड दुर्ग को प्रस्थान कर दिया। प्रथम-तो मैं गुप्तमार्ग से वहाँ पहुँचकर मुगल सम्राट के रिया बलापो से अवगत करा द्वितीय-मैं भी यवनदल मे प्रविष्ट होकर उसके सेनापति की नीति का ज्ञान प्रास करू। (उसके बाद विशालगड दुर्ग में सेवको सहित शिवराज सहे हैं) पाजी-देव, भाग्य से हम लोग विशालगड दुर्ग के पास पहुंच गए। देखें उत्तम यह विशालगड दुर्ग, अपनी विशालता, ऊँचे-ऊंचे गुम्बदी के कारण, उन्नत गण्डस्थल के सदृश, सूद की भाति प्रमाग वाला, दुरा- क्रमणीय, विस्तृत पार्बभाग से शोभित इन्द्र के गज ऐरावत की शोभा धारण कर रहा है। हे भारतेन्द्र । तुरन्त इस पर चढ़े।

7
(८६)
शिवराज :--(परितो विलोक्य) धोर
मासोन्नभो पशिद समन्तावाच्छादित fr पनमारसेन।
(विचिन्त्य संभ्रमम्)
एतद् ध्र.वं माम्मुधावतां द्विा, पादोस्त रेणुभिरंरित घूसरम् ॥२
तदप याप्राप्तकाल तस्माभिरविलम्बेनानुष्ठेयम् ।
भाजी :--देव नास्ति तयात्रौत्सुक्य कारणम् । यतः
दासस्तवावं करवातपालि, संबाधवस्मन्यकुतोमयः स्थितः ।
मल्पानुर्ग. सदसं निपातयन् ; निरोस्पति द्राक परिपन्धिसंचरम् ।।३
(दूरं दिलोरय ससंभ्रमम् ) देव, स्वरम, स्वरय । सम्प्राप्त
यवनदसम् । मधिरा च दुर्गमावेदय मां पर्याभः शतघ्नोस्वनस्लव
तत्र मुखोपस्थितिम् । यावरहमेतान व प्रतिमि ।
शिवराज-(चारो मोर देखकर) धीर,
विस्तृत माकाश चारों मोर घन मण्डल से माच्छन्न हो उठा
(घबड़ाहट से सोचकर) निश्चित ही यह मेरा पीछा करते हुए सत्रुभों
के पादापात से उठी धूल से घुसरित हो रहा है ।२
इसलिए हम लोग पास समय का लाभ शीघ्र उठाये।
बाजी-देव, उतावला होने की मावश्यकता नहीं है । क्योकि-
मापका यह दास हाथ में तलवार लेकर पल्प संख्यक सैनिकों के,
हो सहारे शश्न दल का का नाश करते हुए सोश ही उनका बढमा
रोक देगा, इस प्रकार साधायुक्त मार्ग में मेरे स्थित रहते भय कहाँ १३
दूर देखकर, भ्रम में) देव, सीमता करें, शीघ्रता करें। यवनों
का दल मा पहुँचा । दुर्ग में पहुँचकर भाप पार तोपों के स्वर से
अपनी सुस्थिति की सूचना दें। मैं तब तक इन सब को इसी स्थान
पर रोकता हूं।
।

सध।
शिवराज -वीर, स्वामशरणमेवमरसज्य क्षमत्सहे परमपि
पुरत' प्रक्रमितुम् ।
पाजी-देय नापमयसरी युक्त युक्त विचारस्य ।
स्वदन्नपानादिशिर्वायतोऽय, भरमामयेच्चेदरने
तबास्य धर्मास्यधिनिमितत्य, देहस्य मन्ये कृतकृत्यती पराम् ।।
शिवराज •-घन्योऽसि मे भृत्य कधीर । रक्षतु त्या परदेवता ।
मगरक्षक
इत तो देव । (उभौ सरवर परिकामत)
शिवराम -(स्वगतम) यत्सत्यम्
राष्ट्रकतिपणे प्रगल्म , सत्यमितरेय रणवीरें ।
उपासित सध उपति भूमिप, स्वात पदेच्या प्रपयस्य पात्रताम् ॥५
-
शिवरान-चौर, सुम्हें मसहाय, एकाकी घोड़कर एक काम भी
में पागे कैसे जा सकता हूँ।
पानी-देव, इस समय उचित-अनुमित सोचने का अवसर
मही है।
पर्म भोर मारिप से बना यह पारीर जो प्राप के भन्न एक पानादि
से पातित-पोषित हमा है, यदि पापवे जीवन में ही लिए भस्म
होचाय तो इसे प्रस्पपिर पतरस मानूगा ॥४
शिया-वारण प्ठ, तुम पर हो। परमात मुम्हारी
रक्षा करे।
पारलग-था, पर से देव । (दोनोशीघ्रमा मे चलने ।)
शिवराग-(स्वगत) वस्तुत
जिसके पास रामत, साहसी, साली, पुम्भूमि मे पराक्रमी
शेषा हो, वह नोस जीत ही गाय देवी ॥ प्रिय पात्र बन
पाता है।

( १८ )
मगरक्षक :-एतदर्गपालाधिष्ठितं विशालगडदुर्गस्म सिंहद्वारम् ।
(पटोर)
(ता. प्रविशति सिंहद्वारास्थितो दुर्गपाल.)
दुर्गपाल :-स्यागत देवस्य ।
शिवराज :-प्रथमं तावासूचयास्मनुपस्थिति पभि शतप्नी.
विस्फजितः।
दुर्गपाल :--सथा। (इति यपादिष्ट कुरुते)
शिवराम:-(वामवाहस्पन्दनं सूचयित्वा) मरे कोऽयं कृतागम ।
तृणाय मत्वा निजजीवितं कृत, प्राणान्तकप्टे मम येन रक्षणम् ।
चुकावतस्पेव गजस्य तस्य मे, भद्रे मन संशयमेय गाहते ॥६
सैनिकः (प्रविश्य) (ससंभ्रमम्) देव हतो बाजीप्रभुः ।
अगरक्षक-यह दुर्गपाल से रक्षित विशालगडदुर्ग का सिंहद्वार है।
(पट-परिवर्तन)
(उसके बाद सिंहद्वार पर स्थित दुर्गपाल का प्रवेश)
दुर्गपाल-देव का स्वागत है।
शिवराज-सबसे पहले पांच तोपो की ध्वति द्वारा मेरी उपस्थिति
की सूचना दे दी।
दुर्गपाल-जो आज्ञा ।
(मादेशानुसार करता है)
शिवराज-(बायाँ बाहु फडकने की सूचना देते हुए) परे यह
मपशकुन पयो?
भद्र, मेरा हृदय मभी भो दाका ही मे है जो धको (मंडियों) से
घिरे हाथी के समान है, और जिसने अपने जीवन को तृणवत् मानकर,
मेरे प्रारएसकट पर रक्षा में तत्पर है, रक्षित रह सकेगा।
सैनिक-(प्रवेदाकर, घबडाहट मे) देव, वाजी प्रभु मारे गये ।

. शिवराज:-(नि.श्वस्य) हा हला स्मः । (सरोषम् रे पाप शिदिहतक कोऽयमपचारः एकापिन समरवीरमिम समतापाद्य संनिकगरण: पवनु विक्रमस्ते । प्रिय भूत्यकवीर, पारमाणेन तव पालयतो निजेश,शुधं पशस्तु परितो विततं मिलोरयाम्॥ परे विस्तरेण प्रोतुमिच्छामि । सनिक:-देवरम प्रस्थानादनातरं समन्ततोऽभिपततोऽराति निध- ।हान् सास कस्वा पञ्चविशासियतनिःसुसरारम्जितगाए प्रवीरेए रक्षितो दुर्गारोहमा तवानीमसो प्राकृष्टभीषणकृपाएकरालपाणि- शिमोक्षमाङ्गरिएसम्यकमन्धकोणम् । मार्ग निरूप्य सहमा समरप्रवीर-- श्वप्रकोपहसमुण्यलितो विरजे Ite शिवराज-(निवास लेपर) हम नष्ट हो गये। (कोष से) मरे, पापी शिदी, महसंसा धध' अपने सैनिको की सहायता से एक मरेले इस रणवीर को मारकर कौन-सा पराकम किया प्रिययोरामाने मापको समपित र अपने स्वामी की रक्षा परले पासे तुम्हारा धवल या तीनों लोको मे विसर गया १७ मोह में विस्तार से जानना चाहता हूँ। समिक-देव के प्रस्थानोपरान्त पारी पोर में घेरे हुए शव दस पोसs-TE से, पीस पाया रे पारण गरीर से प्रवाहित रक्त ने उ और मे दुर्ग में प्रवेश द्वार की मामी उमी ममम यह भोपए गए तीये हए परामपाति से पात्रु-मनिरा गिरको पार, उनके पापों से माग रात पर यह ममरपार, समा प्रमाग्नि को रवाना के समान प्रतिमा (९०) शिवराज :- स्वपतम्) महो वोर एवं लोकोत्तरवित्र मेण स्वयाध रहितं धर्मराग्यम् । सैनिक -एव पराहते रिपुदले पापेन शिष्ट्रीसकेन शासप्नीगोल- कवितः स देवस्य सुखोपस्थिति सूचकरातघ्नोरधन एव सावधान! स्वामिपितापरो भूमौ निपपात । शिवराज :--(सरोपम्) माः पाप फटाभियोगनिस्त्रपक्षुद्र, भचिरेणंघ त्वामशेष दुरितक्तभागिनं करिष्यति शिवराज । सनिक ततश्च समाय संकेतित शतप्नीस्वनं-'हो सका स्वामिनियोग। भगवति देहि मे शरणम्-इति सहसोदीयं स प्राणानजहात् । शिवराज :-(नि.श्वस्म) सन कीर, विरला हि स्वादशा: स्वामिभक्ता शिवराज-(स्वय) महो, क्षात्रवीर, इस प्रकार अनुपम पराक्रम से तुमने भाज धर्मराज्य की रक्षा की। सैनिक-इस प्रकार शत्रुदल के हत होने पर पापी शिद्दी ने तोप की गोली से उन पर पात कर दिया, तम यह देव की उपस्थिमि-सूचक तोप की ध्वनि की ही मोर ध्यान लगाये स्वामी की चिन्ता मे प्याकुल भूमि पर गिर पड़े। शिवराज-(सकोध) मोह पापी, शुद्र, अपने शत्रु के साथ कूट नीति का प्रयोग (घोखा) करते लज्जा नहीं पायो तुम्हे ? शीघ्र ही शिवराज तुम्हे इस दुष्कृत्य का फलभागी बनायेगा। सनिक-उसके बाद शतघ्नी का स्वर सुनकर-'मही स्वामी के प्रति कर्तव्य पूरा हुमा । भगवती मुझे शरण दो', कहते हुए प्राणों को छोड़ दिया। शिवराज-(निःश्वास छोडकर) चष्ठ क्षत्रियवीर, तुम्हारे समान स्वामिभक्त विरले ही हैं। .

(६१)
प्रारत्यकर्मवशगा
कमशो विकासन्,
मर्यऽनुभूप नतु कालयशं प्रयान्ति ।
नून स एव निदेश नरेशभक्तो;
घन्योऽस्ति यस्य मिषन ज्वलित पशोभि प
प्रये दुर्गपास भयतु राजोपचारेण मम धोरस्पान्स्यत्रिया।
अधं वाह तस्य राजभक्तस्य सातपुत्रान् ममाङ्गरक्षकम लियुजे।
घर --(प्रविश्य) विनयता देव । सप्रति देव दुपै मस्या
परावत ससैन्य शिद्दोहतक ।
शिवराज •-भर व तावद्ययने शमपेत्यावेजस्व तस्य भाविधि-
कोषितम्।
घर -तया । (इति निष्क्रान्त)
गुढचर -(प्रविश्य) विजया देय ।
सभी मनुष्य अपने भाग्य के भतुसार प्रमशः कर्म के वशीभूत,
क्षीण होरर मुत्यु को प्रात होते हैं । सरयत वह धन्य है जिसने अपने
देश और नरेश की सेवा में जोवन उत्सर्ग कर दिया, जिसकी मृत्यु
भी यश से प्रकाशित होती है ।
दुर्गपाल, राजोपयुक्त हा से मेरे पीर की पश्येष्टि किया हो।
पान ही उस राजभक्त के सातो पुत्रो को भगरक्षक के पद पर नियुक्त
परता है।
घर-(प्रदेशकर) विजय हो देव । पेय सम्प्रति देव को दुर्गम
मानकर सेना सहित शिही पिर गया है।
विराज-म, तुम यवनराज के पास पहुंचार उनी भविष्य
कीबोरनापों पाशान प्राप्त रो।
पर-जो माला (निक्स बासस)
प्रसार--(प्रशार) देव, बिरस हो।

। (१२) शिवराज कप प्रपतसि रिस्लीशतंत्रम् । गूढचर -देव महानस्ति तत्र विपर्यासः । न्यायानुवतिनमसी स्वर निगृह्या राज्याधिरोहणमवास्तविवेक्तत्त्यः प्राशय विश्वसितिनंब निजे पर वा; सबापते प्रकृतिमात्तमहोपवण्ड. १० संप्रति तदादेशानुरोधेनोधतो दक्षिणापयाधिपश्चारणदुर्गाप- रोषास शिवराज :-पुनरपि शायता तस्प प्रवृत्तिः । गूढघर:-तथा। (इति निष्क्रान्त) शिवराज --दुर्गपाल, प्रवत्र्यतामस्मन्छासनमधिकृतेषु यदुपस्थिते प्रायसकटे जनपद विहाय तेढुंगा समाश्रयणीया महता प्रयत्नेन च ते शिवराम-दिल्लीपति का प्रशासन किस प्रकार चल रहा है। गुढघर-देव, बहुत परिवर्तन मा गया है। न्यायपथ का अनुसरण करने वाले अपने पिता को बन्दी बनाकर राज्यसिहासन पर प्रारुड हो, राजमद से विवेकहीन होकर यह अपने भौर पराये किसी भी व्यक्ति में विश्वास नहीं रखता एव अपनी उद्दण्डता के कारण प्रजा को पीडित करता रहता है ।१० इस समय उस के मादेशानुसार दक्षिण प्रदेश का अधिपति चाकण दुर्ग पर माक्रमण करने के लिए तैयार है। शिवराज-पुन उसकी प्रवृत्ति का ज्ञान करो। गूढचर-जो प्राज्ञा । (चला जाता है) शिवराज-दुर्गपाल, हमारे पासनाधिकारियो को सूचित कर दो कि वे प्राणसकट की स्पिनि होने पर जनपद को छोड दुगों मे भात्रय से लें और पूर्ण प्रयत्न के साथ उसकी रक्षा करें। और मनी को

रक्षरगोया इति । तया चाविश्यतां मंत्री सत्यया नौसाधनेन स्वापत्ती
कर्तध्यो जंजीराद्वीप इति । तथंव सेनापतिनाप्पात्रमणीया.परमिता
मोगलप्रदेशा इति। अल्पोयसापालनोपयामो वय सिंहगादुर्ग तत्तय
प्रेषणीयानि निवेदनपत्रातीति ।
दुगंपाल :--पदाज्ञापयति देवः। (ति नितान्त)
शिवराज :--मम बाराप्रसरेण परास्तमपि पुनरस्मान् परियात
यवनसैन्यम् ।
अङ्गरक्षक :--देय, सनिहितो वर्षा समय । सदुपस्थितमपि
यवनसम्म स्वयमेव परावतिथ्यते ।
शिवराज ---(परितो विसोक्य) एवमेतद् । यत एते
सुसितपपिकनेत्र पूरयिरवा रजोभि-
यसन मपहरम्तो लुण्ठकारचक्रवाताः।
जनपरपुरमाणे यंभ्रमन्तो पर्प
पियामि पनभीसा रसवाते समन्तान् ।।११
पादेश रोकिनौसेना के महार जजीरा दीप को अपने अधिकार में
परमें। उसी प्रकार मरक्षिन मुगमप्रदेशों पर सेनापति रो मात्रमा
पर देना चाहिए । पत्रसमय परपान ही हम सिंहमार्ग पो
प्ररपान पर दो, वही सारी भूचनाएँ प्रेपित परे ।
दुगंपास--सीमामा देव । (पता माता )
निराग-धीराली पोरदारा परा होने पर भी यवन सेना
इमे पुन. पट पवा सती है।
अंगर-देव, बस निरनिए उपस्पिटं सपनगेना
ग्य होगाम हो जाएगी।
-(रों और देशकर) होर रहते हो। कोरिये
पाम पोरों के मार्ग में वायु का सार (रवा) श्वेता
हरिण का दामो भाभीनमा चासो पोर र
पारापोर प्रधान कर रहा है. पीर प्रभार देर
पE गुदा के गार पाम पिक की चिों में धूम भोर रस
पोशापार

(उच्य विलोक्य) महो गगनमध्यमारक्षति भावानहपतिः।
विरसापयामः सभागृहं राजकार्याण्यवेक्षितुम् ।
(इति सपरिजनो निधान्त)
समाप्तोऽयमात्मसमर्पणनामा
पञ्चमोऽङ्कः
(ऊपर देखकर) भगवान सूर्य गगन के मध्य में पहुंच रहे हैं।
जकार्यों के निरीक्षणार्य सभा भवन में चलू।
(सेवको के साथ जाते हैं)
मारमसमर्पण मामक
पांचवां थक समाप्त

पप्ठोऽङ्कः
(तत प्रविशन्ति सिंहगडदुर्गप्रासादावस्थिता मत्रिण)
नेताजी -(सहर्षम्) अभिनन्धते प्रधान मधिपदमपिष्ट
प्रायमिष ।
मन्त्री :-वीर महानेपोऽनुशह इतकेशिनो महाराजस्य । परतु,
भोगप्रसक्ताय महत्पदाप्ति-
भोगप्रसत्तस्य महत्पवाप्तिपथारमतोपाय न मे तयेयम् ।
देवेन साक्षात् परिचारकर्मणि नियुक्त इत्येष मम प्रमोद ।।
नेताजी -पुण्यवतामेव खलु महत्सपर्यासौभाग्यम् ।
मात्री -प्रपि गृहीता परक्षिता मोगलप्रदेशा ।
छठवां अंक
(उसके पश्चात सिहगादुर्ग में स्थित मत्रियों का प्रवेश)
मेसाजी-(प्रसन्नता से) प्रधान मंत्री पद पर मासीन होने के
उपलक्ष्य मे हम पापका स्वागत करते हैं।
मत्री-वीर, यह तो भाभारी महाराज की महती पपा है।
परन्तु
उन्म पर की प्राति से जैसा सन्तोष भोग मादि में लिप्त व्यक्ति
के लिए होता है उस प्रकार का हर्ष और पारम सन्तोप मेरे लिए
नहीं है. देव की सामान सेवा करने का अवसर मिलेगा, घस यही
मुझे प्रसालता है।
मेलानी-महापुरुषों की सेवा का सौभाग्य पुण्यवानों को ही
मत्री-या परदिस्त मुगमनदेशों को अधिकार में हिमा?

नेताजी -प्रथ किम् । सतश्च सगृहोतो सक्षत्रपपरिमाणो राजा.
सोऽयं मया कोशाध्यक्षाय समापितः।
मन्त्री --दिष्ट्या प्रतिविनमेधते महाराजस्य कोशवण्डज
प्रभाव
एसाजी -तथापि नास्ति देवस्य विधामावसर । एकतस्ताता-
देशमनुरुध्य बीजापुरेशेन सदधानस्य पुनरन्यत समुपस्थिती मोगलेशन
सह विग्रह।
मन्त्री :--वोर, लोक सहाथमाविभूतानामीश्वराणा स्वभाव.
सिद्ध प्रवृत्तिप्रकर्ष । पश्य
नित्य प्रकाशयति लोकमिम विवस्वा--
नाप्पाययस्युपचित सुधया मुगाडू
सप्तग्रहास्त्वविरत परितो
जानाति नेय पिरति महतां प्रवृति ॥२
भ्रमन्ति,
नेताजी-हो। इसके अतिरिक्त लगभग तीन लास की धनराशि
कर रूप में एकत्र करके माज ही मैंने कोशाध्यक्ष को दिया है।
मन्त्री-भाग्य से महाराज का कोश मोर सैन्य बल प्रतिदिन
बढ़ रहा है।
एसानो-पिर भी देय को वियाम का अवसर नही है। एक
पोर पिता के प्रादेशानुसार बीजापुर मरेस से सपि किया है, दूसरी
मोर मुगलसम्राट से युद्ध करने की तैयारी कर रहे हैं।
मन्त्री-चौर, ससार के हितार्थ जन्म मेने वाले महापुरषों में
स्वाभाव से ही हमेशा विकासशील प्रवृत्ति होती है। देखो-
सूर्य सदा ही इस धारको प्रमाशित परता रहता है, पन्द्रमा
अमृतवर्षा घे जगत पो मुख-शान्ति पहुँचाता है, समाह मिना विश्राम
किये पारों पोर विधरते हैं, महान् पुरषों की प्रवृति ही विधाम करने
यासी मही होडी १२

(१७)
(नेपथ्ये) इत इतो देव । (माकप) महो भने योपसर्पति
राजकार्यध्याधुलो देव ।
(तत प्रविशति शिवराजः)
मन्त्रिण :--(उपाय) स्वागतं रेवस्य ।
(सर्व शिवरानमनूपविशन्ति)
शिवराज -पुनरपि प्रत्यासन्नो विग्रह ।
विरोधे विभान्ते प्रयलयवनेशश्य परितो,
नयोऽयं सप्राप्तस्तदधिकबलविंग्रहविधिः ।
पतन्त्येते मित्य विमितिमिरान्धा रिपुगया 3;
पतङ्गत्वं प्राप्ता समरसमुचिहुं तवहे ॥३
मन्नी-देव, समादतोऽस्यचिरेण मोडतेन मोगलेशेन परंपरा-
गतराग्यशासनव्यतिनम । अनेन पुनरकाण्डोपनतो भविष्यति .
मोगलसाम्राज्यविध्वस । यतः
(नेपथ्य में) इधर, इघर में देव । (सुनकर) महो, राजकार्य से
प्याकुल देव इधर (यहाँ हो) पा रहे हैं।
(शिवराज का प्रदेश)
मन्त्रिमण-(उठकर) देव का स्वागत है।
(शिवराज के पश्चात् सभी बठने हैं)
शिवराज-मन्त्रिगण, फिर युद्ध सन्निकट है।
शक्तिशाली बीजापुर नरेश और हमारा विरोध चारो ओर से
सर्वथा समाप्त हो चला, यह नया युद्ध उससे अधिक प्रबल मुगलसम्राट
से उपस्थित हो गया । ये हमारे शत्रु क्यो पतिंग के समान युद्ध स्पी
प्रज्वलिन पग्नि मे मन्धे होकर गिर रहे हैं।३
मन्त्री-देव, मुगलराज ने अभिमान म चूर होकर परम्परागत
शासन-व्यवस्था में शीघ्र ही परिवर्तन पर दिया है। इससे अचानक
मुगल साम्राज्य का नारा हो जायगा । क्योकि

(८)
सत्यो कालसन्तोऽध्यदितनयगुणा न्याममार्गप्रवृत्ता,
पारयुत्कर्ष नरेद्राः प्रकृतिहितपरा मण्डसं प्रोगयन्तः ।
मन्ये त्वेतद्विमोहाद् व्यसनपरवशा विद्विषन्तो मदान्धा;
प्रत्यासत्रावसाना प्रकृतिविधिता माशु नाश यजन्ति ॥४
शिवराज :-सत्य प्रकृति निवन्धनय राष्ट्रसमृद्धिः ।
द्वारपाल :-(प्रविश्य) विजयतां देव. । दिल्लीनगरात् समाप्ता
कोऽपि यवनतापसी द्वारि तिष्ठति ।
शिवराज :-प्रवेशयनम् ।
द्वारपाल .-सया। (इति निष्कान्तः)
यवनतापस .--(प्रविश्य) विजपता महाराजः ।
शिवराज :--प्रस्ति काचित् सविशेषा प्रवृत्तिोगलेशस्य ।
सक्तिसम्पन्न, राजनीति-कुशल, न्यायमार्ग पर चलने वाले राजा
तभी उसपं को प्राप्त होते हैं जब वे अपनी प्रजा के हित को ध्यान
पौर मण्डल को सन्तुष्ट रखते हैं। इसके प्रतिकूल वे राजा जो व्यसनो मे
पडकर मोहवश अभिमान के कारण उनसे द्रोह करते हैं, वे सदा नाश
के समीप रहते हैं। मोर प्रजा के विद्रोह से शीघ्र ही नष्ट हो
जाते हैं।४
शिवराज--यह सत्य है-राष्ट्र की समृद्धि उसकी प्रजा पर
निर्भर होती है।
द्वारपाल-(प्रवेश कर) विजय हो देव । दिल्ली नगर से कोई
यवनतपस्वी माकर द्वार पर स्थित है।
शिवराज-उस ले मानो।
द्वारपाल-जैसी माज्ञा । (निकल जाता है)
यवनतापस--(प्रवेश कर) महाराज की विजय हो।
शिवराज-मुगलसम्राट को किसी विशेष योजना का समाचार है।

( ६ )
यवनतापस :-- देव विपर्यस्त सर्व मोगलेशतन्त्रम् ।
न मन्यते मन्त्रितानि संय क्षत्र श्वराणा कुरुतेऽवधोरणाम् ।
विष्टि सामन्तगरण स्वकारण; स्वच्छन्द चारेण चरस्यधीश्वर ॥५
प्रतो राज्यसोभाकृष्टेनानेन समतात् प्रतितो रणोद्यम ।
मत्रान्तरे तस्य श्रवणपयमपगतो वीजापुर सेनापति वधोदन्तः ।
सदेशत्
धरया तव प्रसभमाक्रमण विपक्ष,
वस्तो ध्यदस्यति स भोगविलासलोल्पम् ।
माकोशति स्वजनमुद्विजते हतोजा,
आशङ्कतेऽभिपतन तब विक्लवश्च ॥६
यवनतापस--देव, मुगल सम्राट् की समहल शासन नीति मे
परिवर्तन हो गया है।
मत्रियों द्वारा किया गया निर्णय नहीं माना जाता, क्षत्रिय
राजानो का प्रपमान किया जाता है, सामन्त सरदारो से पकारण ही
विद्वप रखता है, इस प्रकार सम्राट् स्वतत्र, अपनी इच्छानुसार
माचरण करता है ।
इसलिए राज्य के लोभ से उन्होंने चारो मोर से युद्ध प्रारम्भ
किया है । इसी बीच योजापुर के सेनापति का वध समाचार उसे
सुनायी पडा । मत
मात्र पर मापके प्रबल आक्रमण का समाचार सुनकर भयभीत
हो वह भोग-विलास का लोभ घोड चुका है अपने ही पसवालों को
वह कायर होने के कारण कोसता है पौर हतबुद्धि होकर, मापक
मचानक पात्रमा के भय से कांप रहा है ।

( १०० ) प्रतस्तेनादिष्टो दक्षिणापयाधिपो यत्यया क्यमपि निगृह्मात्रा. नेतष्प स सामूपक इति । ताज्ञानुरोधेनरिमितलसमेत स पुनानगर नविष्ठायास्मदाक्रमरम्पकपपरे । सप्रति च गपरिवार स गर्नको भिषासितो महाराजस्य प्रासार एय निवसति । शिवराम -प्रन्यनो युद्ध प्रवृत्तेष्यामात्यनेन पूलन प्रषिताः स्मद्राजधानी। इदानीमय कामक देवाग्निविप्राचनमन्मपूत, पूर्व यदासीरमम राजमन्दिरम् । परएकाभिधनराजगह्वर , करीब त मे मलिनी परोति ॥३ तदद्य त प्रदशयिष्यामि मम नपपाट वम् । मात्री •--देव सम्यक प्रयुक्ता प्रयस्मिन् कोशबल समृद्ध कुण्ठी- भविष्यति सानादावत्यार उपाया। तत्पशनोपायमन्तरेण नास्ति विमापत्र प्रतिविधानम् । यत इस लिए उसन दक्षिण के राज्यपाल यो मादेश दिया है कि वह किसी प्रकार उस सह्य पर्वत के चूहे को पकडकर लाये । उसको माज्ञा के अनुसार वह अपार सेना के साथ पूना नगर में बैठकर पात्रमण करने की योजना बना रहा है। इस समय वह मापके महप में ही अपन सबको के साथ नर्तकियो की पाना का मानन्द ले रहा है। शिवराज-हमारे अ यत्र युद्ध मे व्यस्त रहन के कारण इस घूर्त ने हमारी राजधानी पर मात्रमा कर दिया । मब यह कामुक- मेरे उस राज मन्दिर को जो ब्राह्मणो द्वारा उच्चारित वेदमत्री और देवाग्नि से पवित्र था, उस प्रकार दूषित कर रहा है जैसे सिंह को माद को हविनियो के साथ हाथी मलिन करता है 1७ तो माज मैं उसको अपना नीति कौशल दिखाऊंगा। मात्री-देय, कोश मौर बल से समृद्ध शत्रु के सामने साम, दाम आदि चारो उपाय भली भांनि प्रयोग करन पर भी पर्थ हो जायेंगे। इसलिए पञ्चम उपाय के अतिरिक्त अन्य कोइ युक्ति नहीं है । क्योकि PSIBOMB LIBRAR एकान्तेनधाप्रधय बसाइयं, दु सधान धान्तिके वर्तमानमा यत्नेनन विद्विषन्त निगृह्म, स्वात्मान वे रतये नीतिदक्ष Ic प्रपि च सैनान्यधीनंव सर्या समरप्रवृत्ति । पत यानासने व्यूहविधानमाझम पराबरोध समराब तारम् । युद्धे प्रवृत्ति विरति तल पुननेता स्थीर्यानुगुण चिकीवति ।। तन्नेतृवधेन विरवो भविष्यति रगोटाम परिरक्षिताश्च भविष्य- स्युभयत सनिकाना प्राणा। शिवराज -तदा वानुयानिकच्छदमना प्रविश्य पुनानगरमासा- दयिष्ये मोगस सेनानायकम् । भीष्मद्रोरसादय पूर्व सेनान्य पाण्डुनन्दन । एलेन व हता युद्धे श्रीपतेरनुशासनात् ॥१० रक्षा करते नीति कुशल राजा को चाहिए कि वह संन्यपल से युक्त प्रति क्रमणीय, जो सन्धि के योग्य न हो, समीप उपस्थित, शन को अपनी हुए या से वश में करे । मोर भी, युद्ध की सारी क्रियाएँ सेनानायक के अधीन होती हैं। क्योंकि युद्ध के लिए प्रस्थान, व्यूहरचना प्रारमरण, शत्रु को रोकना, युद्धारम्भ, युद्ध में रत होना, अथवा उससे विमुख होना प्रादि समस्त प्रियाएँ सेना नायक अपनी सन्य पाक्ति के अनुसार निर्दिष्ट करता है ।। प्रत नेता के वध से युद्ध की क्रियाएं समाप्त हो जायेंगी और दोनों पक्षो के सैनिकों के प्राणों की भी रक्षा होगी। शिवराज-तो आज ही बरयाना (वारात) के सदस्य के रूप म छल से पूना नगर में प्रवेश कर मुगल सेनापति को आत्रात महंगा । पूर्व समय म पाण्डवो द्वारा श्री कृष्ण के निर्देश से छा द्वारा हो भीष्म, द्रोए मादि सेनापति मारे गये थे ।१०

( १०२ )
(चर प्रति) भा उच्यतो मधिनाधवन सेनानियुको महाराष्ट्रिपो
गुल्माध्यक्षो यत्ययाय विवाहमानाय संपादनोमं मोगलसेनापतेस्तु
शपिनम् । तच्छदमपपरा पयं भविष्यामतेऽनुपात्रिका इति ।
यवनतापत :-पदामापति देव । (इति निष्फ्रान्त)
शिवराज .अस्मिन् साहसोपको फेवल पञ्चविंशतिसनिकास
भेतावमारपपदातिनायको भवतां मम पाश्र्वानुवतिनो ।
उभौ-देव सज्जो स्वः।
शिवराज :--सेनापते त्वं तावत्स्नाय शतप्नोविभागम् ।
नेताजी :--पदाजापति देवः । (इति निष्क्रान्त)
मन्त्री-प्रत्रावशिष्यते देवस्य प्रत्यागमनप्रत्यूह
निवारणाय
कापि विशिष्टा प्रमुनि । तद् देवस्य परावृत्तिसमये गृहोतसरेताः
कतिपय सैनिकाः प्रज्वालयन्तु 'काननयमनि समानतपादपविटपामु
(दूत से) भद्र, मेरे कथनानुसार यवनसेना में नियुक्त मराठा
सेनापति से कहो कि प्राज ही मुगल सेनापति से विवाह पात्रा के लिए
अनुमतिपत्र प्राप्त करें। उसमें छद्मवेशधारी हम लोग बाराती रहेगे।
यवनतापस-जो देव की माला । (चला जाता है)
शिवराज--इस साहसिक कार्य में केवल पचीस सैनिको के साथ
ममात्य मोर पैदल सेना के अध्यक्ष मेरे साथ रहे।
दोनो हम लोग तैयार है देव ।
शिवराज-सेनापति, तोपखाना को तुम तैयार कर लो।
नेताजी-जो माज्ञा देव । (निकल जाता है)
मन्त्री---देव के निविधन वापस पाने के लिए कोई विशिष्ट मुक्ति
सोचनी शेष है। प्रतः देव के लौटने के समय सकेत पाकर, सैनिको मे
से कुछ 'कान' के मार्ग में वृक्ष की शाखापो के मन भाग तथा बहे.

( १०३ ) महोतशृङ्गेषु च निबद्धास्तलकपटान्। पनेन भ्रान्ता मोगलस निकास्त- बंधानुपावे । शिवराज :-अहो सुविभावितोऽय छलप्रबन्ध । एव भविष्यति सर्वेषां पुनरन सुखोपस्थितिः । तद्भवता प्रयाणाभिमुलो मे प्रियसहायौ । यावदहमम्बामामात्र य प्रस्थान प्रथमो भवेयम । समाप्तोऽयं छलप्रवन्यनामा पष्ठोऽतः बडे बैलो की सीगो पर तेल और कपडो की ज्वालाएं प्रज्वलित कर से । इससे मुगल सैनिक भ्रम मे एडकर उधर ही दोडेगे। शिवराज-महो, यह कपट-पुक्ति मच्छी सोची गयी। इस प्रकार सभी सुखपूर्वक यहां वापस आ जायेंगे। तो मेरे प्रिय सहायको प्रस्थान के लिए तैयार हो जामो। इस बीच में माता जी से मिलकर प्रस्थान- हेतु तैयार हो जाता है। दल प्रबन्ध नामक छठवां अंक समात प्रथम - सप्तमोऽदः (तत प्रविशतो मोगलसेनामुलाध्यक्षो) सेनाधिपती कोऽयमसाधारण सार्वभौमस्य पक्षपातो पेनासो स्वाम्पधिकारामपि स्वय स्वप्तन्त्र्येणोपभुक्त। द्वितीय:- -प्रये कि न जानासि प्राग्वृत्तम् । स्वामिनियोगानुरोधेनाद्यवाह गान्धारेभ्योऽत्र समाप्त । द्वितीय -तच्छण सावधान ! पूर्व दक्षिापयाधिपत्ये स्थापितस्य सार्वभौममातुलस्य प्रासाद गाढाधकारावृताया रजन्यो प्रच्छन्न प्रविश्य शिवराजेनोच्छिन्नास्तस्य भयगुतस्य कराङ्गल्यः । अनान्तरे चाकर्ण्य तदाक्रोश साहाय्यार्थमुपागतस्तदात्मज शिवराज- सातवाँ अंक (उसके पश्चात् मुगलसैना के दो सेनापति माते हैं) प्रथम-भद्र सेनापते, यह तो सम्राट का बहुत बड़ा पक्षपात है कि (प्रमुख सेनापति) स्वामी के अधिकारो का भी स्वतंत्रता पूर्वक उपयोग कर रहा है। द्वितीय-अरे ! क्या पूर्व वृत्तान्त नही जानते हो प्रथम-स्वामी के प्रादेश से गान्धार गया था पाज ही मैं यहाँ पाया हूँ। प्रथम-फिर सावधान होकर सुनो । सबसे पहले दक्षिण प्रान्त के राज्यपाल, सम्राट् के मामा के महल में राग्नि के घोर अन्धकार मे शिवाजी छिपकर घुस गये और भयभीत होरर भागते हुए इसकी अंगुलियो को उसने काट लिया। उसके बाद चिल्लाना सुनकर सहायतार्थ पाये हुए उसके पुत्र को शिवराज के प्रगरक्षक सैनिक ने 7 निष्टस्य जयसिंहमहाराजस्य । (ऊर्व विलोक्य) अहो परिणतप्रायो हि दिवस । यावत्साघयाम स्वनियोगपरिपालनाप । (इति निष्क्रान्ती) इति विजाम्भक (तत प्रविशति जयसिंहसेनानिवेशमभिप्रस्थितः सपरिजन शिवराज) जगन्नाथपन्त:-(परितो विलोक्य) देव पश्य, चका इमे तरुलतास्तवर्क. सुगुप्ता, निम्नोन्नता विकटशाहलर्शलमार्गः। प्रायासताध्यकुटिलाक्रमपाटये ना शिक्षाविशेषमसम वितरन्ति साक्षात् ॥१ , चका इति-इमे तरुभि वृक्षः च लताभि च स्तबकः च सुगुप्ता पाच्छादिता निम्ना च उन्नता च विकटा दुर्गमा च शाला बालकृणावृत च ते शैलस्य गिरे मार्गा व मायासेन प्रयत्नेन साध्य यः कुटिल प्राक्रम गमन कुटिलानामाक्रम अभियोगो वा तस्मिन् विषये न प्रस्मभ्यननुपम शिक्षा विशेष साक्षात् वितरन्ति । जयसिंह के लिए कुछ भी असाध्य नहीं है। (ऊपर देखकर) अहो, दिन अब प्राय समाप्त हो रहा है । मत अब अपने कर्तव्य पालन का प्रयाम करू। (दोनो चले जाते हैं) विम्भक समाप्त (उसके पश्चात् अपने सेवकों सहित शिवराज जयसिंह शिविर की मोर जाते दिखायी पडते हैं।) जगन्नायपत्त-(चारो मोर देखर) देव इधर देखिए, पर्वत के ये ऊंचे नीचे दुर्गम मार्ग जो वृक्षो, लतामो, कुजी पौर पासो से ढके रहते हैं प्रयत्न करने पर साध्य हो जाते हैं, इससे हमे शिक्षा प्राप्त होती है कि उपाय द्वारा दुर्गम रास्तों को लादा तथा कुटिल समो को जीता जा सकता है।" के संन्य- शिवराज :-सत्य शलोद्देशसक्रमणपाटयेऽतिवर्तन्ते मोगलसनिका- मस्मत्सनिकगणा । पेनाल्पबला अपि यय प्रयलपरिपश्यिना पुरतो धर्मराज्यसंख्यापनयशोभागिन सत्ता । जगनायपात - एवमेतत् । अपि च उच्चावचाचलभुषो गिरिगह्वरागि, नानालतातरुपराधितकाननानि उत्तगौलशिखरसुत निझराणि दुगात्मना तव परस्य च सस्थितानि ॥२ शिवराज-एतदुर्गप्रवर रेवाद्यावधि रक्षितमस्मरस्यातम्यम् । ॥ उच्चावचेति-उच्चावचा च या प्रचलस्य गिरे मुव , गिरयश्च गह्वराणि गुहारच, नानालताभि तरुवर. च अञ्चितानि ललितानि च तानि धाननानि वनानि व, उत्तुङ्गशल शिखरेभ्य मुतानि च तानि निझराणि प्रवाहारच, एतानि सर्वाणि तब दुर्गात्मना दुगरूपेण परस्य च दुगा मना मन्त रायरूपेण स्थितानि । शिवराज-सत्य है हमारे सनिक पर्वतीय मार्ग पर चलने में मुगलस निको से प्रेष्ठ हैं । यही कारण है जो हम अल्पशक्ति से भी प्रवल सम्र के सामते धर्मराज्य की स्थापना में समर्थ हो रहे है। जगन्नायपन्त--ऐसा ही है । मोर भी, पर्वत की ऊंची, नोची धरती, पर्वत की गुफाएं, नाना प्रकार की लतामों और वृक्षों से सुशोभित वन, पर्वत के उच्च शिखर से प्रवाहित होने वाले निझर, ये सभी मापके लिए मुहढ़ दुर्ग के रूप में पौर दान के लिए बाधा स्वरूप स्थित है।२ शिवराम-इन्ही श्रेष्ठ दुर्गों से माज तक हमारी स्ववत्रता की रसा होती रही । परन्तु भाग्य के परिवर्तन से हम उन्हे सो देने के लिए

(१०८)
परंतु कालमहिम्ना संप्रति ताने याहुतीकतुं यय प्रप्ता । तथाप्यनुपले
ये पुनस्त एव भविष्ययामरस्वातन्त्र्य सहाया ।
जगन्नाथपन्त -तत्र क सदेह । सर्वनय सान्तरायोऽस्ति प्रकृष्ट
फ्लाधिगम । परतु कर्तव्यनिष्ठापा प्रविच्युताना भन्ति सर्वेऽपि
परिणामसुखोदया उपक्रमा ।
शिवराज –भद्र, प्रय मिटूर पतं ते मोगल सेनानिवेशः ।
जगन्नायपन्त -देय, पश्यतेऽस्मत्तरंगमा,
सक्रम्य गुप्तान् विषमाद्रिमार्गानुत्तीयं पिस्तोरणे जलप्रयाहान् ।
प्रवातवेगेन समुत्पनन्त , प्राप्ता क्षरणेनोच्तिशैलवाम् ॥३
शिवराजः-उपागता थय तावत् पुरन्दर परिसरप्रदेशम् । (दूरं
विलोक्य सविस्मयम् प्रहो कि नामैतत् ) पश्य,
-
-
प्रस्तुत हो गये है। फिर भी भाग्य के अनुकूल होने पर पुन ये हमारे
लिए स्वतंत्रता प्राप्त करने में सहायक होगे ।
जगन्नाथपन्त-उसमे क्या सन्देह ! उत्कृष्ट लक्ष्य की पूर्ति में
सर्वत्र बाधाएं होती ही हैं । परन्तु कर्तव्यनिष्ठा से न हट्नेवाले के
लिए सभी प्रयास सुखदायक परिणाम वाले होते हैं ।
शिवराज-भद्र, प्रब मुगल सेना का शिविर कितनी दूर है ।
जगन्नायपन्त-देव, हमारे इन घोडो को देखिए,
पर्वत के विपम और गुप्त मागों को पारकर, बड़े-बड़े जलप्रवाही
(नदियो को) लोधकर, बायु की गति म उडते हुए क्षण मात्र मे,
उच्च पर्वत पर पहुँच गये ।३
शिवराज-तब हमलोग पुरन्दर के निकट प्रदेश में मा गये।
(दूर देखकर, पाश्चर्य से) महो, यह क्या है । देखो,

(१६) पाच्छाद्यवोषणरश्मि निजघनततिमिन्तिमापाददि- हममोदीदिनाद. स्तनितपटहजगमाघोपद्भिः। धारासपातमान प्रतिभटापिटपिण्याकुलोपत्यकान्त प्राकान्तो म्लस यजलघरनियहै दुर्गराजः समन्तात् ॥४ जगन्नाथपन्त - देव, अबरुद्ध इप लश्यते पुरन्ददुर्गो मोगलसैनिक । ܫܕ पाच्छाति-निजघनततिभिरुष्णारश्मि सूर्य पक्षे दुर्गपाल मुरार- वागवीरमाच्छाव घ्यातमन्धकारमापादद्धिः कुर्वद्धि स्तनितानि एवं पटहा तेम्य जाते पो स्तनितानि इव परहा तेभ्य जातः इद. हृदयस्य मर्माणि भिन्न तादी नादं गर्वमापौषद्भि पारासपात. प्रासारं पक्षे प्रसिधा रासपात भग्ना य प्रतिभटा एवं विटपिन वृक्षा सं. व्याकुल उपम उपत्यकात उपत्यकाप्रदेश यस्य स दुर्गराजः_ पुन्दरदुग म्लन्छसन्यरूपः जलपरनिवहे. पक्षे जलधरनिवहरपं. म्लेच्छमन्य समन्तान प्राधान्त ।

(११. )
शिवराज-परे किमिद पप्रयणव पवनसेनापतः। यदेकता
सधानतात्रमुपायायान्यतोऽतो विग्रहमनुजानाति ।
जगन्नापपात -देव कप नु सभाव्यत एसरमनप्रवीरस्य जयसिंहस्य।
फिरवधारित सेनापति निशस्य मोगलपदातिनायकाय स्पादेतदनार्य
वेष्टितम । पत,
राश प्रिया बहमता व्यसने सहाया,
विसम्मभूमप इमे परिपाश्र्वगाश्च ।
संतज्य शासनमपि
स्वपतेमदाया,
बुद्रा अरण्यवषद्विचरन्त्यतन्त्रा ॥५
शिवराज -(प्रश्ववेग निरुध्य) एप कोऽपि क्षत्रियसादी सवैगमित
एवाभिवर्तते ।
शिवराज--परे, यवनसेनापति की दुरगी नीति कसी? कि एक
पोर से सन्धि करने का प्रस्ताव रखता है और दूसरी भोर से वह
युद्ध के उपक्रम करता है।
जगनाथपन्त-देव, क्या यह क्षत्रियवीर जयसिंह की नीति नहीं
हो सकती । किन्तु सेनापति के निदेश के विपरित कदाचित मुगलो को
पंदलसेना के नायक ने यह मनुचित प्रयास किया हा । क्योकि,
ऐसे क्षुद्र जन, जो राजा के प्रिय होते हैं, उनके द्वारा विशेष भादर
पाते हैं, उनके व्यसनो मे सहायक रहते हैं, उनके विश्वासपात्र और
मोर साथ रहनेवाले होते हैं, अपने स्वामी के शासन की भी मवहेलना
कर, मसन्ध-सा होकर कार्य करते हैं, जैसे जमली बैल स्वच्छन्द होकर
विचरण करता है।
शिवराज-(घोडे के वेग का अनुमानकर) यह कोई क्षत्रिय
घुड़सघार तेजी से यहां पा रहा है।

(तत प्रविशति क्षत्रिपसादी)
सादी--(समभ्रमम् ) देव, महत्याहितम् । मोगलपदातिनायके
नोपजापितोऽपि स्वामिचरणयोरामन पर निष्ठा प्रकटयन् शतशो
मोगलसनिकानिहत्य वीरगति प्रपान पुरन्दरदुर्गपाल ।
शिवराज-हा कष्टम् । उपकान्तमिष लक्ष्यते दुर्दैवविचेष्टितम् ।
सादी-तस्य चालोकसाधारणविक्रमविस्मितेन मोगलमायकेन
सदानों सहसंबोदौरित-'विश्वपतिदेवतादृशान्योरभटानुत्पादयितुं
प्रभवति इति।
शिवराज -प्रहो, पराभिनन्दितविकमस्य निश्चितोऽनन्तलोकजय ।
प्रपे गच्छ स्व पुनर्श पुरन्दरदुगम् ।
सादी-पपाशापति देव । (इति निष्क्रान्त)
(उसके बाद क्षत्रिय भश्वारोही का प्रवेश)
अश्वारोही--(घबडाया हुमा) देव, पोर आपत्ति । मुगलो की
पैदलसेना के नायक से मेल करने पर भी, पुरन्दर दुग का पालक,
स्वामी के चरणो मे परमनिष्ठावान् रहकर सैकडो मुगल सैनिको का
वध करके वीरगति को प्रास हो गया।
शिवराज-दुख है । मालूम होता है दुभाग्य न कार्य प्रारम्भ
कर दिया।
माचारोही-और उसके प्रसाधारण वीरता से पाश्चर्य में पहकर
मुगलसेनापति ने उस समय अचानक कहा-ईश्वर ही ऐसे वीर पदावर
सकता है।'
शिवरार-महो, पात्र बारा जिसकी वीरता को पासा की गयी
निश्चित ही वह छमार पिजयी बना । मादा तुम पर पुरन्दर दुर्ग
जापो।
प्रशारोही-सी पाता देव । (चला जाता है)

.
शिवराज -भा, नास्त्यावकाशो विलम्यस्य । (इति सर्वे
"श्यान्नोदन्ति)
(तत प्रविधायपटीक्षेपणास्वान्द उदयसिंह)
उदर्यासह सहोदवर, तिष्ट तावन्महूतम् ।
शिषराज --(प्रश्वनिगृह) महो उदयसिंह। प्रायनामयं
महाराजस्य
उदयसिंह-प्रकिन् । प्रपि च सदिष्टमस्ति देवेन पद्मदादेवा-
नुवर्तन निष्ठापुरस्सरं यदि तपागमन स्यात्तदा सुखेनागन्तव्यम् ।
अन्य या स्थित एव विनिवर्तनीयम् इति ।
शिवराज राया मान्य एवास्माकं सपकुलनायकस्यादेश ।
तरसत्वरमपेमी महाराजस्थ शिविरम् । (सबैशवानोदयन्ति)
-
शिवराज-भद्र, अब देर करने के लिए समय नहीं है। (सभी
घोडो को हांकते है)।
(तभी अचानक परदा हटाकर घोडे पर सवार उदयसिंह का प्रवेश)
उदयसिंह- सह्यराज, क्षणभर के लिए रुकें।
शिवराज-(घोडे को मोड़कर) महो, उदयसिंह । महाराज कुशल
उदयसिंहजी हाँ । परन्तु यह निर्देश किया है कि प्राप यदि
उनकै प्रादेश का पालन करें तो प्रसन्नापूर्वक मिल सकते हैं अन्यथा
यही से लौट जायें।
शिवराज-क्षत्रियकुलनायक का मादेश हमारे लिए सर्वथा मान्य
है। इस लिए महाराज के शिविर की ओर चल । (सभी घोडी को
हाँकते हैं।)

( ११३ )
उदर्यातह -सहोघर, प्रायासन्नोऽस्मासेनानिवेश । सदश्या-
पर प्रविशाम । (इति सर्वेऽवरोहन्ति)
(पटीक्षेप.)
(ततः प्रविशत्युपकार्यावस्थित सपरिवारो जपसिंहो रघुनाथपन्तश्च)
रघुनापपन्त --(दूर मिलोषय) एप उपस्थितोऽस्मस्वामी
शिवराज । यावत्तं प्रत्युद्गन्धामि । (इत्यपसध्यं) स्वागत देवस्य ।
(इत्यभिनन्दति) प्रविशतु देव' सपरिवारो महाराजोपकार्याम् ।
(इति सपरिवार शिवराज प्रवेशयति)
जयसिंह -(अग्युस्याय) स्वागत सोश्वरस्य । (इति हस्तयो-
गृहीत्वा) मर्मवासिनमपिष्ठातुमर्हति सहा यर । (इति स्वपाय
शिवराजमवेशपति)
शिवराज --महानेपोऽनुग्रह क्षत्रकुलमण्डनस्य ।
उदयसिह-सोपवर, हमारा संन्य-शिविर निकट है । इसलिए
पोडे से उतरकर चलें। (सभी घोडे से उतरते हैं)
(परदा गिरता है)
(उसके दाद पपने सेवको मौर रघुनाथपन्त के सहित जयसिद्ध
राज-शिविर मे बैठे दिखायी पड़ते हैं)
रघुनाथपन्त-(दूर देखकर) हमारे स्वामी शिवराज यह मा रहे
है । घलकर उनका स्वागत करूं । (पहुँचकर) स्वागत है देव । (प्रणाम
परता है) सेयगो-सहित महाराज के शिविर में प्रवेश करें। (सेवकों.
सहित शिवराज दो से जाता है।)
नपातह-(ठार) यह वर का स्वागत है । (हापो से पकडकर)
माइए मेरे मर्यासन पर मंठिए सहदेवर । (शिवराज को भरने वगस
छठाता है।)
शिव-शनियत भूषण का यह महान् मनुग्रह है।

जपतिह.-प्रप्यनामय क्षत्रमवीरस्य ।
शिवराम-राजन् संघानप्रपणेऽपि मयि शत्रपरिमदान
पिरमरप पदातिनायक।
जाँसंह :-सार्वभौमस्य यहमाने नावलितोय स्यया स्वयमेवोपेत्या
सास्वपितम्यः । एष प्रवोरतरो मम पितृश्य शुमानसिंहो भविष्यति
तय सहाय. । तामाऽभूल्लंगतोयन सवानिटाला सप्रति
प्रेषयाम्यहमदरसिंह पुषिष्टम्भाय ।
शिवराज .-रागन्, रथमावस्यपरिग्रहीतोह सर्वथा प्रतिपक्षक
हितोपदेशम् ।
जयसिंह :-पूर्व ताहियोयता स्वनाममुदातिमेसरसप्रिपनम् ।
(इस्यपंपति)
शिवराज.-(पाचपति)
जसिह -क्षत्रियवीर का कुशल है न ?
शिवराज-काजन्, यह पंदल सेना का नायक क्षत्रियो के मर्दन में
विधाम क्यो नही लेता जबकि मैं शान्ति रखना चाहता हूं।
जयसिंह-सम्राट् द्वारा विशेष भार पाने के कारण यह उत्त
हो गया है तुम स्वय उसके पास जाकर शान्त करो। वीरश्रेष्ठ मेरे
पाचा ये सुभान सिंह सुम्हारे सहायक रहेगे। मतः अपने अनिष्ट की
वनिय भी दाका न करें। संप्रति उदयसिंह को पुद रोकने के लिए
भेजता हूँ
शिवराज-राजन्, तुम्हारे स्नेह से मनुग्रहीत तुम्हारी सलाह
सर्वथा मानता हूँ।
जयतिह-पहले इस सन्धि पत्र को अपने हस्ताक्षर और मुद्रा से
पूर्ण करो (देता है।)
शिवराज-(पढता है)

२
धोमभारतराजकुलायोश्वरसार्वभौममोगलेशचरणरचिताम्मलित
शिवराज
१. स्वकीयांखयोविंशति दुर्गाश्चावारिशल्लक्षाशवहाइच जनपदान्
सार्वभौमस्य स्वाधीनामापास्यति । स्पप चायशिष्टान् द्वादशदुर्गाश्च.
तुर्लक्षाशयहांश्च जनपदान् सार्वभौमशासनमनुरुध्यानुशास्ति ।
स्वकुमार च सार्वभौमसेनाया पञ्चसहरसादिनामधिकारपदे
स्थापयति ।
स्वा च सार्वभौमुभूपाया सबंदा सादरो वर्तते ।
४. स्वम च सनिहितराज्ययोश्चमीशस प्रहाधिकार सार्वभौमा-
भयोपभुनक्ति ।
(इति । स्वनाममद्रातिविधाय) उररोत्रियते मयतत्सपिपत्रम् ।
(इत्यपंथति)
३
भारतवर्ष के राजकलों के सम्राट मार्वभौम सम्राट् मुगलेश
के घरो में शिवराज परपर प्रणाम करते हए ।
१ अपने तेईस दुर्गा पौर चालीस लास के भरा पाले जनपरों
को सार्वभौम सम्राट् के अधीन करता है। मोर स्वर रोष मारह दुगों
क्षमा पार साख को सम्पत्ति याने जनपदों पर सम्राट के पोन रहकर
पासन परता है।
२. अपने शुमार को मम्राट् की सेना में पांच हगार प्राचारोहमा
परिवार पद पर नियुक्त परता है।
३. भोर स्वप सावंभीम की सेवा के लिए मा संसार है।
४ पौर स्यय सार्वभौम की माला से दो पड़ोसी राज्यों से
पहा अपिता रखता है। (हवाशरिन मोर मुसादित
र) साँप की दात स्वाररता हूँ।

( १९६ ) जयसिंह - सहीश्वर परं प्रीपयति मा तव सौजन्यातिशयेन । उदयसिह, उच्यता मदुचनात्पदातिनायको याद्धव्यवसायतस्त्वंसद्यो. विरमेति । उदयसिंह -ययाज्ञापयति देव । (इति निष्क्रान्त) प्रतिहार -(प्रविश्य) विजयना देव । एप सार्वभौमस्य देशहर कोऽपि इतो द्वारितिष्ठति । जयसिंह -प्रवेशयनम् । प्रतिहार यदाज्ञापयति देव ) (इति निष्क्रान्त ) दूत-(प्रविषय) विजयता महाराज । जयसिंह --प्रप्यनामय सावभौमस्य । दूत -प्रय किम् । प्रेषितमेतदाजशासन महावस्त्राभूपणपुर सरं सार्वभौमेण शरणमुपागते शिवराजे वितरितुम् । (इति राज- शासनादीन्यपपति) जयसिंह-सह्येश्वर, तुम्हारी सौजन्यता से हम अत्यन्त सन्तुष्ट हैं। उदयसिंह, मेरे प्रादेशानुसार पैदल सेना के नायक को युद्ध सम्बन्धी सभी कार्य बन्द करने के लिए कहो। उदयसिंह-जैसी माता देव । (चला जाता है) प्रतिहार-(प्रवेशव) विजय हो देय । सर्वभौम का सन्देशवाहक कोई दून द्वार पर उपस्थित है। जयाँसह-ले मामो उसे। प्रतिहार-जो पाना देव । (चला जाता है) दन--(प्रवेशार) विजय हो महाराज । जयसिंह-सायंभीम युशल है न ? दूत-जी हाँ । सार्वभौम ने बहुमूल्य यग्नाभूषण शरणागत शिव- राज पो देने के लिए यह राजा भेजी है। (राजाना प्रादि देता है) जयसिंह :-(सविस्मय स्वगतम्) अहो भवितव्यता । (पाच- यित्वा) सर्वेश्वर, दिव्याऽनवलोक्तिमप्यभिनन्द्यते संघिपत्र सार्व- भीमेण यहुमायसे च स्व महाहोपचारः। शिवराज :-राजनीतिदक्षे महाराजे मन्त्रिसेनापतिपदायिह सहेवोपरमेणार्थसिद्धि सार्वभौमस्य । जीमह :- कोऽत्र भो। प्रतीहार -(प्रविश्य) प्राज्ञापयतु देव । जयसिंह --पाराधयन्तु सगीतेन सहदेवर नर्तक्यो याददहमेनं समावयामि महाहोपचार। प्रतीहार --तया । (इति निष्कान:) जयसिंह -वस शिवराज उत्तिष्ठ । (इनि खादोनि परि- पापति) नतंक्य :-(प्रविश्य) विजयता महाराम । (इति संगीतमारभन्ते). जतिह--(पाश्चर्य मे पडार स्वय) अहो, भाग्य (पढयर) महश्वर, भाग्य से बिना देसे हो सार्वभौम ने सबिर शेर कर लिया और बहमूल्य उपहारो से तुमको मार दिया है। शिवराज-राजनीति मे बुराल महाराज वे मन्यो मौर मेनापति पद पर नियुक्त रहने से सार्वभौम क्रमानुमार हर कार्य में सफल होते हैं। जयसिंह--ौन, बोई है? प्रतिहार--(प्रवेशपर) मामा देव । शसिह-सह इवर, काम यो के मंगीत में मनोरंजन राय, में राजकीय उपहार प्रदान करता हूँ। प्रतिहार-ठीक है । (पला जाता है) सिह-परम, शिवराज उटो । (बच मादि पनिाता है।) मर्तरिया-(प्रवेशकर) विजय हो महाग। (मगीत प्रारम्भ करती है।

( ११८ ) (विहागरागरण तेवरातालेन गोयते) सुमनसुकुमार नयनविहार।। हृदयधार पौवनसार । प्रणयापार पारावार ॥ सुम०॥१ जलदश्यामघर सुखधाम । कुसुमललामचम्पकदाम ।।सुमार अयि भुवनेमा मानववेश रमय रमेश मा रसिकेश ।।सुम०॥३ जयसिंह :-प्रनया चम्पकमालया सुबद्धं भवतु ते हृदयं मोगल- साम्राज्येन । (इति मालामपंपति) शिवराज -राजन् भवाशभारतवीरासरः क्षण एव पन्या प्रस्माक परम शरणम् । जयसिंह --~-अल्पोयसा कालेन नून भविष्यति तव सार्वभौमसमा गमसौभाग्यम् । तत्र न क रष्यति ममात्मजो रामसिहस्तवसाहाय्यम् । तदामी तवालोकसाधारणविक्रमपरितुष्टो मागलेशो निपोजयिष्यति स्वां दक्षिणापथाधिपाये। (विहागराग तेवराताल से गाया जाता है) है, कुसुम सुकुमार, प्रांखो को सुख देने वाले हृदय के प्राधार- चौवेन के सर्वस्व, प्रेम के समुद्र ।। बादल के समान श्याम वर्ण याले, सुखधाम, चम्पक पुष्पों को यह सुन्दर माला ।२ मनुष्य रूपधारी हे भुवनेश धारण करो मार है रसिको में श्रेष्ठ रमेश (भगवन्) मुझे साप में विहार का सुख दो॥३ जयसिंह-इस पम्पकमाला की सहायता से तुम्हारा हृदय मुगल साम्राज्य से मानद्ध हो जाय । (माला पहिनाना है) शिवराज-राजन् पाप सदृश भारतवर्ष के धीरामणी द्वारा अपनाया मार्ग ही हमारे लिए कारण है। जयसिंह- कुछ ही समय में तुमको सार्वभौम के समागम का सोमाय निश्चित रूप से प्राप्त होगा। वहाँ मेरा पुत्र रामसिंह तुम्हारा सहायक होगा । सब तुम्हारे मापारण विक्रम से सन्तुष्ट मुगल सम्राट तुम्हे दक्षिण प्रदेश का राज्यपाल नियुक्त करेंगे।

( १९६ ) शिवराज ---महाराजस्य वचसि वर्तमानस्य ममोत्तरोत्तरमरकर्ष एवं। जयसिंह क्षत्रप्रदीर, स्वादशानो विक्रमशालिना साहाय्येन समीहते सार्वभौम सामाग्यप्रभावम् समेधमितुम् । शिवराज -भवादी सत्र वरं समृद्ध साम्राज्य का गणमा मम साहाय्यस्य । किंतु महाराजस्य प्रसादात सार्वभौमसपर्याप्रसङ्गोद- येनात्मानमहं कृतिनं मन्ये । जयसिंह :-(ऊध पिलोक्य) अहो, उपक्रान्तो निशोयसमय । काकोऽत्र भी। प्रतिहार -(प्रविश्य) पानापयतु देव । जयसिंह --अन्त हमार्गमादेवाय (शिवराज प्रति) एहि सद्देश्वर । प्रतिहार :-इत इतो देव । (सर्वे परिणामन्ति) शिवराज-महाराज को सलाह मे रहने पर मेरा उत्तरोत्तर प्रत्वप ही होगा। जयसिह-सधियबीर, तुम सदा परानमी की सहायता से सावं. । भौम सामाग्य का प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं। शिवराज-पाप सहन क्षत्रिय श्रेष्ठ मारा समृर साम्राम में मेरे साहाय्य की कौन गिनती है । विन्तु महाराज की कृपा से सार्वभौम की शेवा का अवसर प्राप्त करणे में स्वप को भाग्यशाली मानमा है। जयसिंह-(पा देसार) पहो, रात्रि काल व्यतीत हो रहा है। बौन है। प्रतिहार-(प्रगमर) माशा देव । जयसिंह-पानमुद का मार्ग दिखामो। (निवरात्र में) पापो पर। प्रतिहार-पर-पर से देव । (सभी धूपार पनने है)

शिशाज:-(स्वगतम्) महो कथमधापि साशमेव धर्म
मनो मोगलापोरवरे । यद
माजन्मनां जनमिमं पिताऽधमैन, साम्राज्यवंभवमदोजतमानसेन
स्वातन्यमन्यनुपरसहिष्णुनामे, संमाननं किम कृत विलोभनार्थ
प्रतिहार :-एतदन्त मार प्रविशतु देवः सोश्वरश्च । (
निष्कान्त.)
जयसिंह :-(प्रविश्य सुवर्ण मच्चावषिरुह्मा) क्षत्रवोर तब सामं
भारप्रपातपातीय सन्तुष्टोऽस्मि ।
शिवराज :--राजन्, मस्थानेऽपि शङ्काकुलं मे मनो मा मुसरय
सरकथमलोक साधारण विक्रमा साक्षाद्विजयमूर्तयो भवादशा में
सानवमीकुर्वन्ति मोगलेशानुगत्वम् ।
शिवराज-(स्वय) महो, क्या कारण है कि माज भी मेरा हुद
मुगल सम्राट् से शकित हो है । जैसे,
वह जो अधम जन्म से मेरा शत्रु है, जिसका हृदय साम्राज्य के
वैभव से उन्मत्त है मोर जो मन्य राजामो की स्वतन्त्रता सहन नहीं
फरता, उसने मेरा इस प्रकार सम्मान क्यो पिया, येवल लालप दिखाते
के लिये ।।
प्रतिहार--यह मन्ताह का सार है, देव पौर सायबर प्रदेश
कर । (चला जाता है।
जयसिंह-(प्रवेराबर, स्वर्ण मच पर बैठपर) भानियवीर तुम्हारे
इस समध्यपहार से मैं मस्यन्त सन्तुष्ट है।
शिवराम-राजन् ममारण यह पयो मेरा मन शक्ति होरर
जानना चाहता है कि प्रमितीय परामशासी, सामान विभय की मूर्ति
सदा भाप भी मुगल सम्राट की सेवा सानन्द स्वीकार पर रहे है।

माता--हो, राधियवीर, मप्रसार मंगरदनी माग से जयसिंह •~-वरस कालचक्रपरवशा हि सर्व प्रारिपन । सप्रति होनगुणानां क्षत्रापिपाना गुणोत्कर्षेणारूढप्रतापस्य मोगलान्वयस्य सपर्यामन्तरेण न विद्यतेऽन्यदालम्बनम् । तद्यावदेत न भवन्त्यतिराया अस्मद्धर्मानुष्ठानेषु तावत्समाननीयाः । तथापि साप्रतं सम्राटपद- मास्दैम मोगलेशन परपर्मविप परणोप्तमेव साम्राज्यविध्ययोजम् । महोबत यायि तस्केन निवार्यते । पूर्व सम्राउनुग्रहपरंपरावशीकृतं. रस्माभिस्तु कृतगतयाऽनुष्ठीयते भूत्यधर्म : शिवराज :-राजन्, अन्यथा खलु में प्रत्यय । यतः स्वामिनं तु निजपमंविच्युत, सेवक परिहरग्न दोषभार । मान हि परदारलोलुपं व्यावलग मुगनिधिविभीषण ॥७ जयसिंह -महो, सत्रयोर एवं पर्मतरवल्यापनेन व्यामोहयातीय जयसिंह-वत्स, सभी प्राणी कालचर के अधीन है। सप्रति गुण हीन हुए क्षत्रिय मरेगों के लिए, गुणोरखप के कारण प्रतापशाली हो गये मुगलो की सेवा के अतिरिक्त अन्य कोई सहारा नहीं है । पना जब तक कि ये हमारे धर्मानुष्ठान में हस्रक्षेप नहीं करते, समान्य हैं फिर भी मुगल सम्राट ने मन्य पयों के साथ देष करने के कारण मामाश्य के दिमाग में बीज यो दिया है। महो, माग्य यौन बदस साता है। पूर्व सपाटों के मनुषह के कारण कृतम हम अपना सेवक पर्म निभा रहे है। सिराम-राजन्, में विपरीत समझता है। क्योकि अपने धर्म पप से विपतित हुये स्वामी को यदि सेयर माग देशा है तो वह दोपभागी नहीं है । गुग्गों मे मुक्त विभीषण ने अपने बड़े भाई रोजोपरकी सोनुर पा, पाग दिया था। - । १२२ ) मे मनीषाम् । सथाप्यस्माकं तु पूर्वरुपहत एव वर्मनि मसगिक पक्ष- पासः । (अप्वं विलोक्य) महो निशीपकरपा हि रगनी। पापद्राति. इत्यानि परिसमाप शयनमारोहाय. । (इति मिस्कारतो) (पटीक्षेप.) समाप्तोऽमं मोगलेशानुसंधाननामा सप्तमोऽ: सुम मेरे हृदय को भ्रम मे डाल रहे हैं। तथापि मैं पूर्व से अपनाए हुए मार्ग में रहने काही पक्षपाती है। (ऊपर देखकर) महो, मदरात्रिमा गयी। रात्रि के कार्य एमाह करके चलो शमन करें। (दोनो चले जाते हैं) (परदा गिरता है) मोगलेशानुसधाम नामक सातवां अंक समाप्त अप्टमोऽङ्कः (सतः प्रविशति निनोपयन प्राप्तावावस्थितः रामसिहा) रामसिह :-- (स्वगतम्) प्रहो नानानयप्रयोगपटनापि शिवराजेन पितृनययशवदेनाभिनन्दित मोगलेशानुसन्धानम् । निदेशतिना धानेनाराय स्वमानमाराध्य मोगसपातिनायकं तमं समपिता पुरस्टरप्रभृतयो दुर्गप्रयरा । स्यापितदध निजपुरानो मोगरसेनायाम. पिबारपये। इत पित्रंथ दत्ताभयोऽमो मन्त्रिषिनिहितराग्यभारः सार्वभौमतमागमापंमत्र समाप्तः यसमोरमुपयेन पालं पापपति। तष निजमातुलाग्यशादाक्षिप्तहृदयो भोगसम. पूर्ववसस्मिन् सवि. दोषभावो न सस्यते । निजामपंव मोगलयुपरामदारमान प्रतिनियेत - -- आठवा अंक ( १२४ ) सभावितस्यास्य तु सामन्तसाधारणोपचारपराय सस्क्रिया केवल सधुक्षयिष्यति निर्वाणभूविण्ठ पूर्व धरानलम् । हो घिमिमामनव स्थिति लोकपालानाम् । यद पाश्वस्थानुचरोपजापमुषिता 'पाकुर्यते सुग्रतान, दुईत्तानपि चाटुवादिविनिता श्लिष्यन्ति प्रेमगाथमा । मिथ्योरसेकहता विपत्ति च हितान् सतजयरजितान, दोलाचञ्चलचित्तवृत्तय इमे स्वाराधनीया कथम् ॥१ (पुरतो विलोक्य) एष परिसमाप्य प्रसाधन विधिमुपस्थित सह्यश्वर । पाश्वस्थेति--पाश्वस्थानमनुचराणामुपजापेन तत्वृतभेदनेत्यर्थ मुपिता अपहृता इमे नराधिपा सुग्रतान् ग्यपकुर्थ ते बाटुवाद मिथ्या- स्तुतिमि विजिता वशीकृता दुर्वृत्तानधमानपि प्रणा श्लिष्यात तेषु विश्वसम्मीत्यर्थ । मिथ्या उत्सेकेन गण हुता हितान विपत्ति उजितान् बलिनश्च सतर्जपति अवगणयन्ति । दोलावत चन्चला चित्तवृत्ति पा ते इमे तु कपमाराधनीया । साधारण सामन्त के समान स्वागतोपचार होगा तो पहले की शत्रुता द्विगुणित होकर प्रकट हो जायगी । महो, राजामों के अस्थिरचित्त को धिक्कार है। पयोकि पास रहने वाले अनुचरो की भेदनीति से प्रभावित रहने से य गुणीजनो का अनादर परते, दुराचरण करनेवालो को चाटुकारिता के कारण उन मधमो से अनुराग रखते (विश्वास करते) मिष्याभिमान प्रभाव से हितपियो से द्रोह रखते पौर बलशाली की निदा परते है, ऐसे दोला के समान चल चित्तवृत्तिवालों की सेवा करना बठिन है। (सामने देसकर) मलीमति सज्जित होयर सहारवर उपस्थित है।

द्वारपास-पर, पर से देव। (सभी पूमार घलते है) ॥ १२५ ) शिवराज:- -(प्रविश्य) टिष्ट्याद्य भविष्यति घिरमाणित. सायं. भौम समयम। रामसिह .-प्रय कम्। परंत्यपरिचिताः सन्स्येत मोगलेश्वरा प्रार्य समुदाचारस्य । तन्महाराजेनोपेक्षणीयस्तेषामाचारातिकमः । शिवराज:-कुमार, सभ्यक परिचितोऽस्मि यवन समृदावारस्य। द्वारपाल '-(प्रविश्य) विजयतो कुमार । नातः खलु सार्वभौम- सभोपासनसमय। रामसिंह :-साधयामस्तावत् । भद्र मादेशय सावंभीय प्रासाद. मार्गम् । द्वारपाल -इतहतो देयो। (सबै परिकामन्ति) शिवराज .--(पुर निर्वग्य) हो, शियराज-(प्रवेशकर) भाग्यवशात् प्राज बहुत दिनो से अमीष्ट सायमीम के दर्शन होंगे। रामसिंह-निश्चित परन्तु ये मुगलचासक हमारे सामाजिक घ्यवहार से अपरिचित है। इसलिए महाराज उनके व्यवहार की- दियो पर ध्यान न दें। frयरामघुमार, में यवनो के सामाजिक माचाररीति से मसोमानि परिचित है। द्वारपास-(प्रवेगार) कुमार पी विजय हो। सार्वभौम के सभा में पारिपन होने का समय हो गया। रामर-गलिए पते । भद्र, सम्राट के महल का मार्ग विसापो। नियम-(मगर पर दृष्टि समार) पहो, सलित सहवितानमण्डिता राजमार्गः, स्फटिकविमलभास: सोपवासः समृद्धा। पवनजवनयानः संकुलेय विशाला; विविधविपरिणपण्या राजते राजधानी ॥२ रामसिंह :-महाराज कि बहुना । साक्षाद् विलासभूमिरेषा विलासिनां मोगलराज कुलेश्वराणाम् । द्वारपास:-एते सप्राप्ता वय सार्वभौमसभामण्डपारम् । तत्प्रविशतां देवो। (इति निष्क्रान्त) (पटीक्षेप.) ललितेति-ललिताः ये तरवः तेषां वितानानि येपु तः राजमार्ग: मण्डिता मलङ्कता स्फटिकस्य विमल. भास. चुतिः इव भासः मेपार ते सोधवासः सुधया निमितः मन्दिरः समृदा यवनाना जवनः वेगवद्भिः मानः घ सङ्घला विविधाः विषणयः पथ्यानि च यस्यां सा इय विशाला राजधानी राजते। सुन्दर घृक्षो के वितान से पोभित राजमार्गों से युक्त, स्फटिक की भांति श्वेत वर्ण वाले राजप्रासादो से समुद्र मुगलो के तीव्रगामी रपो विविध बाजारों एवं विक्रपथस्तुमो से परिपूर्ण यह विशाल राजधानी सोमित है।२ रामसिंह महाराज बहुत कहने से गया। विलासप्रिय मुगल- सम्राटो की साक्षात विलासभूमि है यह । द्वारपास-यह हम लोग सार्वभौर के समा मण्डप-द्वार पर पहुंच गये । भरः प्रवेश करें देय । (चला जाता है) (परदा गिरता है)

समीप तुम्हारा पहचना मायन्त उचित है, जिसम्व करने पर प्रशुभ
पीमाका है और उसके नष्ट हो आने पर सुम्हारे लिए पश्चाताप
( १२७ )
(सतः प्रविशति सभामध्यवर्ती मयूरासनस्य सार्वभौम:)
धोगिनौ-(धोरणावाद्येन गायत )
(कटरागेा झम्पातालेन गोयते)
सताकुजलीना ।
तृपाक दायाना स्वबाहूपधाना ।
स्थय वीतमाना प्रिये सावधाना ।
शुचा विह्वला ते नवीना निलोना लता॥१
पद ते लपन्ती बियोगे तपन्ती।
मस स्नापयन्ती तनु सापयन्ती ।
हजा क्षीयते कान्तहाना निसोना लता॥२
अयस्थानमन्ते प्रियाया घर ते ।
विलम्बेऽशुभतेऽनुतापो दुरन्ते ।
क्षण याचते नाथ दोना निलोना लता०॥३
(उसके बाद मयूरासन पर स्थित सभा के मध्य सार्वभौम का प्रवेश)
घोपामादक-(वीणावादन के साथ गाते हैं)
(क्रटिराग झम्पाताल मे माया जाता है)
(मह राधा को दूतो द्वारा कृष्ण के प्रति कही गयी उक्ति है।)
दूती कह रही है-हे कृष्ण । लामो के कुज मे लीन (बैठी) गुणों को
पाच्या पर अपने पाहुमो की तकिया लगाये, अपने मान का त्याग कर,
मपने प्रियतम में मन को रमाये हुए, नवानुराग मे (विरह दुख में)
ध्याकुल है ।। शुम्हारे विरह-पीतो का उच्चारण करती, वियोग में
जलती पासुमो से मुख को धोती हुई, (इस प्रकार अपने शरीर को
तीण परती) अपनी पोमा मे हीन हो रही है ।२ तुम्हारी प्रिया के
का विषय होगा । हे नाप वह तुम्हारे क्षण भर में समागम की याचना
परती है।
।

(५ १२८ ) शिवराज :-(रामसिंहेन सह प्रविश्य संगीतमाकर्य स्वातम्) महो, मद्वियोगेन दुरवस्थामनुभवति मम महाराष्ट्रभूमिरिति सूचितमनेन गेयपदेन । रामसिंह :-(शिवराजेन राह सार्य भीमभुपमृत्य) विजयतो सार्व- भौमः । एष सार्वभौमादेशानुवर्ती समुपस्थित शिवराजः । शिवराज :--(भिः प्रणम्य) अनुगहरणातु सार्वभौमः, उपहार परिग्रहेण । (इति रत्नायुपहरति) । मोगसेश:-{रामसिह प्रति) जसवन्तसिंहपाय एनमुपवेशय । रामसिंह -- यदाज्ञापति सार्वभौमः। (इति यथादिष्टं फुरते) शिवराम -(अपया) कुमार कोऽमं नसतासिंहः । रामसिह --(प्रपयाय) एप तु जोयपुराधीश' सार्वभौमस्य परमविश्वासभाजनम् । शिवराम-रामसिंह के साथ प्रवेश और सगोत मुनवर) ग्रहो, मेरे वियोग से दुरवस्था का अनुभव कर रही है मेरी महाराष्ट्रभूमि, इस गीत से मचित होता है। रामसिंह-(शिवराज के साथ सम्राट् पै पास पहुँचार) विजय हो सम्राट् । सम्राट के मादेश का पालन करनेवाला यह शिवराज उपस्थित है। शिवराज-(तीन चार मणाम पर) उपहार स्वीकार करण अनुगृहीत पर समाद । (रल मादि उपहार देता है) भोगसेत-~-(रामसिंह से) जसवन्तसिंह के पास इसे बैठायो । रामसिंह--जो माता सम्राट । (मादेशानुसार यरता है) शिवराज-(पलंग) धुमार, कौन है, यह जरायतसिंह । रामसिंह-(पनग) यह जोधपुरनरेश सम्राट के परम विश्वासी व्यक्ति है।

( १२६ ) शिवराज -(अपवायं सरोवम्) प्राः किमह मत्सरिता मोग- खेशनवमपमानार्थमन निमन्त्रित । सन्ति जोधपुरेशातिशामिनस्तु ममापरसामन्ताः परेकोऽयमपिशेषः। रामसिंह -(अपचार्य) प्रसीदतु महाराजः । मोगलेश -(अपघाय) अरे किमसी जल्पति । रामसिंह -(अपवाय) पपरिचितजनसमदं फेवलं मर्दत्यय धर्मपीडितो पनशार्दूल । मोगलेश:-तत्प्रापर्यन स्वनिवेशम् । रामसिह -तथा। (इति शिवराजेन सह सभामण्डपाहिनिगत्य परिकामति) शिवराज :-(साक्षेपम्) कुमार, निमप्रितस्यादतिममेय, सायभीमेश्वरतानुरूपा । क्षुद्रोऽथवा प्राप्य महत्पद निज निसर्ग सिद्ध में जहाति लाधवम् ॥३ शिवराज-(प्रलग ोध मे) पाह, क्या मैं दुष्टहृदय ईष्यालु मुगल सम्राट द्वारा इस अपमान के लिए निमत्रित किया गया। जोधपुरनरेश से तो मेरे अन्य सामन्त भी बड़े हैं। प्रोह, यह कैसा अपमान । रामसिंह-(अलग) महाराज शान्त हो। भोगलेश-(प्रलग) मरे, यह क्या कहता है । रामसिंह-(अलग) धाम से व्याकुल यह वनराज जनसमूह अपरिचित होने के कारण गरज रहा है । मोगलेश-तो इसे उसके शिविर में भेजो। रामसिंह-ठीक है। (शिवराज के साथ सभा मण्डप के बाहर निकालकर घूमता है।) शिवराज-(ध्यग्य से) कुमार, निमत्रित करके मुझे अपमनित करना क्या यह सम्राट के अनुरूप है ? अथवा क्षुद्र जन महान्पद प्राध करने पर भी अपनी स्वभाव सुलभ क्षुद्रता नहीं छोडते १३ 8

{ १३० )
रामसिंह -महाराज कस्यापि धूर्तस्यैद विचेष्टितमिति तकये
एते संप्राप्ता वयमस्मन्मन्दिरम् । यावत्प्रविशामः ।
(तत प्रविशन्ति मन्दिरावस्थिता शिवराज प्रतिपालयतो भूत्या.)
भत्मा'-(जायाय) स्वागत देवस्प।
शिवराज ---(रामसि हेन सह प्रविश्य) दुयनो विफलीभूतो
स्मा मनोरथ । (इति सर्व सहोपविशति)
रामसिह :-महाराज संघ एव सिद्धिपथमारोक्ष्यति तव मनोरया
शिवराज :--(सातम्) कुमार दुरयगाहो हि दुरात्मना ना
प्रधार. । बहुमानेन प्रतार्य वशीकृता ऋजुधिय क्षत्रेश्वरा भने
धूर्तेन क्षेत्रकुलविनाशायैव इति प्रतीयते । सिद्ध कायें वेतेषा साब
भौमनिष्ठानों भावि सपर्याफल शङ्कास्पदमेव ।
रामसिंह ..-महाराज मिध्ये ते पितः। प्रचिरेण प्रकार
रामसिंह- महाराज, मेरी धारणा है, यह किसी धूर्त का क
है। यह हमलोग अपने महल को पा गए। चलें प्रवेश करें।
(उसके पश्चात शिवराज की प्रतीक्षा करते सेवक मन्दिर
दिखायी पडते हैं)
सेवकगण--(उठकर) स्वागत, देव ।
शिवराज--(रामसिंह के साथ प्रवेशकर) दुर्भाग्य से हमा
मनोरथ विफल हो गया (सबके साथ बैठ जाते हैं)
शिवराज-(समाशय ) कुमार, दुष्टो की नीति को जानना ब
कठिन है । मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि, अत्यन्त प्रादर, सम्मान
सरलमन क्षत्रिय राजामो को उसने वश मे करके, उन्हें ही क्षति
के विनाश हेतु नेता बना दिया है । परन्तु मुझे सन्देह है कि कार्य
हो जाने पर भी इनकी निष्ठा इसी प्रकार सम्राट के प्रति रहेगी।
रामसिंह-महाराज, यह प्रापकी गलत धारणा है। शीघ्र

मापन्न सार्गभौम सभा जयिष्यति त्वा यथाहाँपचारविभौ । अयमहं
सार्मभोममुपेत्य पुनरपि वासमागमा श्यते । (इति निष्कान्त )
शिवराज -ग्रहो यत महत् कष्टम् । यद्
नानादिलासविभवशतामुपेता,
रागन्यमान्यव इमे विस्तारमभाव ।
स्यवत्वा निन सपदि देशकुलाभिमान,
नष्टा स्वय स्वजनमाशु यिनाशयन्ति ॥४
रघुनाथपन्त --देव यत्सत्यम्
बुच्छभोगापहृतात्ममाना, स्वधममूडा उदरभरीश्वराः।
क्य राष्ट्रसस्थापननिश्चित्तवतो, पर्माश्रितो जीवितनि स्पहो भवान् ॥५
हीरोजी - (परितोविलोक्यससभ्रमम)हा धिप । महदत्याहितम् ।
सम्राट, प्रकृति में प्राने पर पापका सम्मान यथोचित रूप से करेंगे।
मैं यह सम्राट के पास पचकर मापके ममागम का प्रसन्न करता हूँ।
(चला जाता है।
शियराज-मोह, महान बलेश वा विषय है। नि-
ऐश्वयं और भोग-विलास पी विविध सामग्रियों में वशीभून ये
क्षत्रिय वन्धु मात्मभाव को नष्ट कर, अपने देश, कुल मभिमान को
त्याग दिये हैं और इस प्रकार ये स्वयं को नष्ट करके अपन जातिवाली
को नष्ट पर रह हैं।४
रयुनायरत-देव, वस्तुन ,
कहाँ तो तुच्छ भोग-विलागों के कारण अपने सम्मान को घोडार,
स्वधर्म में विमुख उदर भरनेवाले स्वार्थी ये राजा और यही, राष्ट्र को
स्थापना के लिए दाप्रतिम, धर्मनिष्ठ, तदर्य प्रायो को नो चिना न
करनेवाले पाए, दोनों की तुलना नहीं है ।
होरोनी-(धारो मोर देखकर घबराहट से ) पिकार है। पोर
भापति।

( १३२ ) शिवराज :-(पुरतो विलोक्य) हा बन्दी ता. मो विश्वास- घातिना मोगलेशहतकेन (समन्ताद्विलोश्य) अहो समन्ततोऽवद• मस्मन्मन्दिर मोगलसैनिकः। (निश्वस्य) मूनं यवनदासस्प जयसिह स्य वचसि वर्तमानेन मया स्वयमेव निमन्धित प्राणसङ्कटम् । अस्मिन्निसगंकुटिले वितपप्रतिज्ञ, विश्वासमागमवतो नविच्युतिम । मिश्यावलेपवियशोवरमग्नहीनः, सत्वोच्छितोऽप्यरिश सहसा प्रयास रघुनाथपन्त --देव, सत्य विपलब्या ययं जयसि हेन । पद् स्वच्छन्दगामी गिरिशहरालयो, ढप्रतापरपि दुष्प्रयायः। वनेश्वरोऽनेन महाप्रलोभनंपादितो व्यापाराग्रलक्ष्यताम् ॥७ शिवराज--(सामने देखकर) हर, दुष्ट विश्वासघाती मुगल सम्राट द्वारा हम बन्दी हो गये । (चारो ओर देखपर) अहो, मुगल संनिकों द्वारा हमारस महल चारो मोर से घिर गया । (निश्वारा लेकर) यवनो के पास जयसिंह की बात मानकर मैंने स्वय यह प्राहामंकट निमत्रित किया है। स्वभावत. पुटिल, असत्यवादी इस सम्राट पर विश्वास करो मैंने बहुत बडी राजनीतिक भूल की है, महान् पराधमनील यति भी उचित मानणा से होन, मिध्यामिमान के घर में पहपर सहमा सानु के हाथो पह जाता है।६ रघुनासपातदेय, संयतः हमसोग जयसिंह द्वारा ठगे गये। क्योकि - इमने स्वरधापूर्वक विचरण परनेवाले, पर्वत की गुफापों के निवासी, महान परारमो द्वारा भी वश में न मानेपासे पाराज (सिंह शिप) को प्रसीमन देकर व्याप वाणामय बना दिया।

मोगलनायक :-(प्रविश्यापटीपेर) राजन, कुटिलरामपुरोय. सवारक्षित समागमान्तरावधि प्रसिसिद्धस्ते स्वतन्त्रसचार' सार्व- भौमेरा। शिवराम:-अनुग्रह एष सामोमस्य । तस्यैव भूगोवर्शनायं मया व्यवसीयते । मोगलनायक :---राजन् सापयामि तवानामय निवेदपि साथ- भौमाय । (इति निष्कान्त) रघुनाथपन्त :-नाहति देव इदानीमात्मानमवसादयितुम् । यतः फर्य प्रपसोऽस्मिमितान्तदुर्गसिमकाण्ड इत्येव रूपा वितकः । प्रासाच काष्ठ जलधौ विपन्नः प्रकापयेत्सतरणाय साधनम् ॥ तछोप्रमेव विन्यता कोऽपि दुर्गसतरणोपाय । शिवरात्र - सम्यगवधारित मोगलेशस्वभावेन ममा पागेवोप-- मोगलनायक--(सहसा प्रवेशपर) राजन्, कुटिल राजपुरषो से भापके रहाणार्थ, मपने समागम की अवधि तक मापका स्वैच्छापूर्वक विचरण सम्राट ने निपिद्ध कर दिया था। शिवराज-यह सम्राट का अनुग्रह है । मैं पुनः दर्शनार्थ प्रयत्न कर रहा हूँ। मोगलनायक-राजन्, मैं पापकी कुशलता का समाचार सम्राट को जाकर देता हूँ। (चला जाता है) रघुनायपन्त-देव, भव हमे अपना साहस नही छोडना चाहिए। क्योकि प्रधानर हम यह फंसे इस दुर्गति को प्राप्त हो गये सोचना ध्यर्थ है, समुद्र में हुवता हुपा व्यक्ति राष्ठ के सहारे तरने का प्रयास करता है। प्रतः तीन ही इस विपत्ति से मुनि के लिए कोई उपाय सोचिए। सिरान-मुगलसम्राट के स्वभाव से परिचित होने का ( १३४ ) कल्पित. प्रयागप्रबन्धः। तच्छणत सये सावधाना । प्रथम तावद. स्मबागमनोसयोपायनमिषेण स्कन्धेनोह्यन्ता मिष्टपदार्य परिपूर्ण बृहत्यारण्डा: प्रतिपरिचितक्षप्रफुलमन्दिरम् । समवलोकितेषु च फेचिएकरण्इषु नष्टाशङ्का भविष्यन्ति मोगसायिकृत। मननरंच निस पंकस्मिन् करण्डे सापयिष्यामि सामजस्य मम निर्गमम् । भवद्भिश्च सय नानामिनि गत्यावां प्रयागमान्तिराले प्रतिपालनोयो। एप होरोजीरारामान रोगाकान्तशिवराज रयापयन सानुचरी भ्राम- यिप्पस्वधरोधकगणमानदोषागमम् । ततस्तेनाऽपि सानु परेण सवेत. स्थानमभ्युपगन्तव्यम् । ततश्च नानाराप्रवेषधरा यय सुमो प्रारयामो. स्मरसहाप्रदेशम् । इति रघुनाथपन्त :-देव सम्यगुप स्थितोऽयं प्रयाण प्रयन्ध । तर क्षिनाग याय प्रतिष्ठतामापनमाम्यपाल । -

द्रव्यपाल -तपा । (इति निष्फ्रान्त)
रघुनायपन्त -प्रह तावत्साधयामि रामसिहन्दिरम् । (इति
निएकान्त)
मोगलनायक - (प्रविश्य) राजन् निवेक्षि सयानामय सावं-
भौमाय।
शिवराज --सप्रति तु प्रवलोवरालपोस्तिस्य नास्ति मे स्वास्थ्य.
संश । मुखप्रसुप्तस्य तु कदाचिद्भविष्यति मे येरनानिग्रह ।
मोगलनायक-युपश्याम राजघम् ।
शिवराज--प्रानिशीष मुलायनेन यदि न निरास्यते मे वेदना-
प्रश्वस्तधानामेध
पति राजयं न प्रपोजनम् ।
मोगलनायक-साधु । (इति निशन्त )
प्रध्यपाल ---(प्रविश्य) देय श्रीता एते मियानपूर्णा पविज्ञाति
दायपास-ठीक जा पामा (जाना है।
रघुनाथप त-मैं रामसिंह के महल को जाता है । (चला जाता है)
मगसनायर-(प्रबार) राजन सम्राट से मापके मुस्वास्थ्य के
विपय मनिया पर दिया।
शिवराज इस समय प्रवल उदरशूस पी पीसा से मरा ग्याप्प
होमही है। पदापित गाती नितारे बाद पीस पद पान्त होगी।
मगरामायर--नया राजवंशको बुसाऊं।
(पराग-रातमर पहरी नि म सोने के बाद भी यह मेरी
पीपमाल न होगी तभी राजवंश की मादयाना पड़ेगी।
मुगारनायक-कोर है। (घला जाता है।)
प्रापपान--(प्रयगार) स, पिटाईयों से पूर्ण ये चीम
टोरिया तरी

शिवराज --प्रपे क्रमेणास्मदनुचराधिष्ठितान् मन्द वाहयंतान !
द्रस्यपाल -तया। (इति पयोक्त कुरुते)
हारोजी-(पुरतो विलोक्य) देव, परीक्ष्य पश करण्डान् विरतो
मोगलनायक । तवनयो रण्डयोनिल नौ भवता देव कुमारश्च ।
उभौ-तथा। (इति निलीयते)
हीरोनी – (क्रमेण फर डान् वाहयित्वा पुरतो विलोक्य) दिष्ट्या
फुमारेए सह निविधन निष्क्रान्तो देव । यावदह छपवेषयरो भूत्था
शयनमारोहामि । (इति तथा कुरते)
मोगलमायक-(विश्य) अपि लक्ष्यते वेदनापकर्ष ।
अनुचर --प्रार्य इदानीमेव सुख प्रवत्ता बलवदुदरशूलपीडितस्य
देवस्य निद्रारा तानाहत्यार्यो बचन मात्रेणापि निद्राभङ्ग विधातुम् । स्यय.
मेवाहमार्याय निवेदायष्यामि सुप्तोयितस्प तस्य कुशल वृत्तान्तम् ।
शिवराज-क्रम से एक एक करके मेरे अनुचरो द्वारा इनको
निकलवानो।
द्वध्यपाल--जैसी आज्ञा । (कथनानुसार कार्य करता है)
हीरोजो-(सामने देखकर) देव, पांच टोकरियो का परीक्षण
करके मुगल अधिकारी परीक्षण बन्द कर दिये । इसलिए अब भाप
मोर कुमार इन दो टोकरियो मे छिप जाये।
दोनो-ठीक है। (छिप जाते हैं)
हीरोजी-(क्रमानुसार टोकरियां निकलवा, सामने देखकर)
भाग्य से कुमार के साथ निविघ्नरूप से देव निकल गए। मैं अब
छवश मे शयन करूं। (उस प्रकार करता है)
मगलनायक-(प्रवेशकर) क्या पीडा कम हुई ?
अनचर-पत्यधिक उदरशूल से पीडित देव को प्रभी हो निद्रा
मायी है । प्रत पाब्द मान में भी मार्य की निद्रा भग करना उचित
नही है । मैं स्थय उनकी कुशलता का समाचार उनके शयनोपरान
उठने पर आपको दूंगा।
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मोगलनायक -तथा। (इति निष्क्रान्त) होरोजी-एतावता कालेन समल्लवित स्यान्नगरसोमा-तो देवेन । तदायामपि तावरप्रतिष्ठावहे। (इतिच्छ वष परित्यज्य सानुचरों निष्क्रान्त) मोगलनायक --(प्रविश्य स्वगतम ) ग्रहो, फयमयमेकाको गाट स्वपिति । क्व गता प्रस्थानचरा । (प्रकाशम) क फोम भो । पद्धसैनिक -(प्रविश्य) प्राजापयत्वायं । मोगलनायक-परे पश्य किमेप विगत चेतन इव लक्ष्यते शयन- गत शिवराज । न च दृश्यते कोऽप्यस्यानुचर । सनिक --(शबनमुपसृत्य स्वायुरप ससश्रमम्) प्रार्य क्व शिवराज : । एतानि स्वस्थ बसनान्येव । मोगसनायक-(ससभमनसायस तारस्वैरण) हा १ता स्म । मगलनायक-ठीक है । (मला जाता है) होरोजो-इतने समय में देव नगर की सीमा पार कर चुके हागे । सो भय हमलोग भी प्रस्थान करें। (उपवेदा घोडकर सेवक- सहित जाता है।) मुगलनायक--(प्रवेशार स्थगन) महो, यह पकेले गहरी नीद म पपो सो रहा है । इससे मनुघर कहाँ गये ? (प्रपट) कौन है परत निक-(प्रवेदार) पाशा पार्य। मोगतनायक-परे, देसो शिवराम निपाण-सा शयन स्थान पर प्रोत होता है ? और उसके कोई सेयर भी नहीं दिसायी परते । सनिए-(शया स्थान तक पहुँच, वस्त्रों को हटापर, पाहाहट से) माय शिवराम महाँ है ? ये तो केवल उसरे वस्त्र है। मुगलमाएक--(पाका, पोरन्ना हा सीन स्वर में) हा मारे गये। .

( १३८ )
-
नेपथ्ये-(प्राय मा भेषो । सनिहिता' स्म उद्धृतकृपापा ।
सैनिका (प्रविश्य खड्गान्युद्यम्य) मा दशय । क्व सन्ति ते
प्राणह ।
मोगलनायक --(सरोषम्) रे जाल्मा , भवन्त एव मे भागदह ।
पवास्ति शिवराज ।
सनिका -प्रार्य, भवेदप्रकुत्रापि प्रच्छन्न । (इति समन्ताद.
विष्यन्ति)
भोगलनायर -(ससभ्रमम्) प्ररे निपुरगमवेक्षध्वम् ।
मंनिक --प्राय न लभ्यतेऽसो कितव ।
प्रयम ---प्रसोधानधातु स्वमायया तिरोहितो भवेत् ।
द्वितीय-प्ररे कदाचिहियामागणोद्गत स्यात् ।
तृतीप-मूद, भूगर्भमागण्य सभवायस्य पलापनम् ।
,
नेपम्य मे-मायं, भय न करें। हम लोग तसवार लिए तैयार है।
सनिकाए--(प्रवेशकर और तलवार नियाले हुए) पापं ।
मापके प्रापद्रोही कही है।
मगलनायक--(त्रोध में) भरे, वाचालो, माप राव ही हमारे
प्रागदाही हैं । शिवराज फहीं है ?
सनिकमण-मार्य, पहीं कही छिपे होंगे। (चारों मोर दूढ़ते हैं)
मुगसनायर-(पदडाहट में) मरे सावधानी से देखो।
सनिकगण-पाय, नही मिलता वह पूर्त ।
प्रपम-यह अपन एल द्वारा दानवस्तुपो में छिपकर गायब हा
गमाहागा।
हितीय-परे, पदापिन् वह मारामाग से पला गया।
सृतीय-मूर, उसपा माग जाना भूगर्भ मार्ग से ही सम्भव है ।

( १३६ )
मोगलनायकः-- (सरोयम्)प्ररे अनभिजाताः । नायं वितविसरः।
कुतोऽपि निगृह्मानय तु तं सार्वभौम बन्दिन ममसमक्षम् ।
(सर्वे पुनरपि मायन्ते)
पद्धनिक.--(नायकम्पहत्य) प्राय याऽप कोलाहल ।स
पूर्तः पयमपि प्रच्छन्न पलायित इति तु सिद्धम् । तदधिलादेव
सार्वभौम गृहोप्सायं कुर्म ।
मोगलनायक-तथा। (इति निष्मान्ता स.)
पटीक्षेप
समाप्तोऽयं प्रयाए प्रयाधनामा
अष्टमोऽ
भूगलनायक-(ोध से) भरे नीचो, दिनक या पवसर नहीं है।
कहीं से भी, सम्राट् में उस पन्दी को परस्पर मेरे सामने से मामो।
(सभी पुन' (दते हैं)
धर्मनिर--(नायक' के पाम पट्टचकर) प्रार्य यह कोलाहल
ज्य है । वह पूर्त रिसी भी प्रकार दिपकर भाग गया, यह गिद्ध है।
मत पीच ही राम्राट को इसकी गूगना दी जाय ।
भगमनामा-टी (सभी चले जाते है)
(परदा गिरता है)
प्रयाण प्राधमाका
पाठयां घंफ समात

नबमोऽङ्कः (तत प्रविशत्यन्तं गृहावस्यिता राजमाता) राजमाता--(स्वगतम्) श्रृत मया धारे यो यत्प्रतार्य मोगलाधि- कृताम् देशाद्देशान्तरं पर्यटन सप्राप्तो वरस करवीरक्षेनम् । तदधि- रेणान भविष्यति तस्य सुखागमनम् । प्रत माजप्तो मया प्रधानमनी सहादुगलद्धनाय । येनोपस्यिते वत्से शोध संपादितो भवेत्साम्राज्या- भिषेकमहोत्सव । काञ्चुको (प्रविश्य) एष राजकार्य घ्याफुल प्रधानमन्त्री द्वारि तिष्ठति। राजमाता-प्रवेश नम्। नवा अंक (उसके पश्चात् पन्तगृह में स्थित राजमाला का प्रवेश) राजमाता-(स्वगत) गुरचरो से सूचना मिली है कि देश-देशान्तर का भ्रमण कर, मुगल अधिकारियो को धोखा देते हुए मेरा पुत्र करवीर क्षेत्र में पहुंच गया है। इसलिए दोन ही वह सुख-पूर्वक यहाँ प्रा जायगा । पत. प्रधानमत्री को मैंने मादेश दिया है कि सह्यदुर्ग पर मधिकार पर लें। जिससे पुत्र के यहाँ मागमन पर सीन ही साम्राज्या- भिपेर महोत्सव सम्पन्न हो जाय। को-(प्रवेशकर) राज्य कार्यों से व्याकुल प्रधानमत्री द्वार पर प्रतीक्षा कर रहे हैं। राजमाता-उसे माने दो।

( १४१ ) - कञ्ज की-सथा। (इति निष्क्रान्तः) प्रधानमन्त्री-(प्रविश्य) अम्ब स्वदादेशानुरोधेन मयात्मसारकृताः पञ्चपाः सह्यदुर्गाः। राजमाता-मत्रिवयं, अभिनन्दामि तव युद्धपाटवम् । प्रपोप- साधा फायभिनका प्रतिस्प। प्रधानमन्त्री अद्यावधि तु नास्ति श्रुतिगोचरा कापि देवस्था- भिनवा प्रवृत्तिः । सप्रति समागहमपेस्य जानामि देशान्तरप्रतिपत्तिम् । (इति मिष्यान्तः) कञ्चुकी-(प्रविश्य) एतेऽप्रभवती दृष्टकामा यतया हारि तिष्ठन्ति । राजमाता-प्रवेशय तान् । कधी-तया । (इति निष्क्रान्त) फंचुषो-ठीक है। (चला जाता है) प्रधानमत्री-(प्रवेशकर) पम्ब, मापके मादेशानुसार मैंने यह मे से पाच सह्यदुगौ दो धिकार में कर लिया है। राजमाता--मविप्रेष्ठ, तुम्हारी युद्धादासता सराहनीय है । पुत्र पेरिसी नये समाचार की कोई सूचना मिली है। प्रधानमन्त्री -इस समय तक तो देव का कोई नया समाचार नहीं गुनायी पहा । सभागृह में वसार देशान्तर के समाचार मालूम परताहूँ। चला जाता है।) काकी--(प्रवेशावर) पारे दर्शन को इस्या से एप साधु धार पर प्रतीक्षा कर रहे है। राजमाता-उन्हें बुमानो। पुरो-ठीक ! (पना जाता है।)

--- पतयः-(प्रविश्य) वर्धता प्रायितफलपिगमेन राजमाता। राजमाता -(सप्रश्रयम्) प्रतिग्रहीताती। दिष्ट्याय पवित्री कृतोऽयमुद्देशो भगवता सानिध्येन । (घामाक्षि स्पन्दन सूचयित्वा स्वगतम्) अपि नाम सभेय मम पसत्य प्रकृतिम् । प्रधानपति -प्रम्ब तीर्थ पानाप्रसङ्गेनानीत मयाऽभिकार्यमेतद्- गङ्गोदकम् । राजमाता--(प्रधानति नियम सविस्मयम स्वगतम्) महो केनधिवशेन सदस्यस्य मुखच्छविममवत्सस्य मुखच्छबिना। प्रधानमति:-तगृहागतद् । (इत्युपसृत्य कलशमपति) राजमाता-महानेपोऽनुग्रह. । (इति गृहणाति) मपि ज्ञायते कापि मम वत्सस्य प्रवृत्ति। प्रधानयति-प्रम्ब नातिदूर वर्तते तवात्मजः । (इति यतिवे साधुगए-(प्रवेशकर) राजमाता अभीष्टफल की प्राप्ति से सम्पन्न हों। राजमाता-(विनम्रता पूर्वक) अनुगृहीत हूँ । भाग्य से प्राज यह क्षेत्र माप सबके पागमन से पवित्र हो गया। (बापी मांख के फडकने का अनुभव करके स्वय) क्या पुत्र के कुछ समाचार सुन सकती हूँ। मध्यसाधु-अम्ब, तीर्थ यात्रा के प्रसग मे मैं यह गगाजल अभिषेक के निमित्त ले पाया हूँ। राजमाता-(प्रधान साधु को भलीभामि देखकर, पाश्चर्यचकित हो स्वयं) अहो, इस साघु को मुखाकृति मेरे पुत्र की मुखाकृति से कुछ समानता रखती है। मएपसाधु-इसे ग्रहण कर लें। (पास पहुँचकर कलश देता है) राजमाता-महान् मनुग्रह है यह । (ग्रहण करती है) क्या पुष के विषय मे कुछ ज्ञात है। मुख्यसाधु-अम्ब, मापका पुत्र बहुत दूर नहीं है। (साधुवेश को पम्पनीय) एप सुखप्रत्यागत शिवराजोऽभिवादये। (इति पादयोः पतति)। राजमाता-(सविस्मयम ) अहो वत्स शिवराज । न खलु मया भिजातोऽसि । (सानन्याभु हस्तयोग्रहोत्वा) वत्स उतिष्ठ । विष्ट्यायो- ज्जीवितास्मि । मुत्तस्य दुष्टय वनाधिपाशयघात, प्रस्थागतस्य पुरतो मम सस्थितस्य । एतत्तवाननमुपोदनवप्रसाद मा तपंपत्यतितरा तरणेन्दुकान्तम् ।।१ वरस पूर्वमेव मयादिष्टेन मन्त्रिएा स्वायत्तीकृतारचाकरण- सह्यदुर्गाः । तद्दण्डनीतिमेव समाश्रित्य विजित्य च महाराष्ट्रप्रदेश सपादय तव साम्राज्याभिषेक मङ्गलम् । त्यागकर) सुखपूर्वक वापस पाया यह शिवराज प्रणाम करता है। (चरणो पर गिरता है।) राजमाता---(विस्मय मे पडकर) महो वत्स शिवराज । निश्चित हो मैं पहिचान न सको। (मानन्दानुमा सहिन हाथो से पकडकर) पुत्र उठो । भाग्य से पुन जीवित हुई। दुष्ट मवन सम्राट के पाशबन्धन से छूटकर वापस पाए हुए मेरे सामने खडे तुम्हारा यह मुख नव चन्द्रमा के सदृश्य नयी छवि प्राप्त कर लेने के कारण मुझे पत्यन्त प्रानन्द पहुँचा रहा है !! बरस मेरे प्रादेशानुसार पहले से ही मत्री ने चाकण प्रादि दुर्गा को अधिकार में कर लिया है। प्रतएव दण्डनीति का सहारा लेकर, महाराष्ट्र प्रदेश को जीतो मौर अपना साम्राज्याभिषेक पूर्ण करो।

( १४४ )
-
शिवराज--प्रम्ब स्वदादेशानुरोधेनाविलम्बनय निर्वतयिष्येऽभिषेक
कमङ्गलम् । प्रत पर च स्वातन येणव प्रतिष्यते मम राज्यतन्त्रम्
क कोऽत्र भो।
कञ्चुकी-(प्रविश्य) पाशापयतु देव ।
शिवराज --मन्त्रगृहमार्गमादेशय ।
कञ्चको-इत इतो देर । (उभौ परिकामत) एतामन्याहद्वार
प्रविशतु देव । (इति निष्कान्त)
(तत प्रविशन्ति मन्त्रग्रहावस्थिता मन्त्रिप)
मन्धिरा--(उत्याय) स्वागत देवस्य ।
शिवराम---भयाग्पनर हेण खलु रक्षितोऽस्मि ।
मन्त्रिण -देव, प्रध खत्वस्माक महाराष्ट्रस्य च सुप्रभातम् ।
वैतालिक'-(नेपथ्ये) विजयतो देव ।
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शिवराज--अम्ब | आपके प्रादेशानुसार शीघ्र ही अभिषेक का
कार्य पूर्ण हागा । और मेरा राज्यशासन स्वाधीन होकर चलेगा। कौन,
कोई है
कचुकी--(प्रवेशकर) प्राज्ञा देव ।
शिवराज-~-मत्रणागृह का मार्ग दिखायो।
कचुको-इधर, इधर से देव । (दोनों घूमते हैं) यह है मनणा-
कक्ष का द्वार । (चला जाता है)
(उसके बाद मशाह में स्थित मंत्रियों का प्रदेश)
मनिगर-(उठकर) स्वागत देव ।
शिवराज-भवानी के भनुग्रह से मेरी रक्षा हुई।
मभिगए-देव ! माज हमारे और महाराष्ट्र के लिए सुप्रभात का
अवसर है।
वैतालिकाए-(नेपथ्य में) विजय हो देव ।

(१४५ )
कुटिलपयन पाशानोतियोगापसृप्तो
चुमलिरिय समन्ताद्वारा प्रस्तमुक्त' ।
चिरविरहविपन्नान् रजयन् सह्यादुर्गा-
नुपचितनवतेजा राजसे राजसूर्य. २
(अष्टोत्तरशतशतानीस्वनोपत्रम)
शिवराज-मत्रिए परम प्रोगमति मां बता सह्य जनामा घ
राजनिष्ठा।
प्रतिहार-(प्रविष) विजयतां देव । कोऽपि वैदेशिको द्वारि
संप्राप्त
शिवराज --प्रवेशय नमः ।
प्रतीहार
:- तथा। (इति निष्कान्त)
पैदेशिक - (प्रविश्य) विजयतां देवः । कृतमेन मोगलदोन त्वमसि
शिवराजश्य पक्षपातीति नित्य स्वाधिकाराप्रशितो महाप्रतापो
राह के सदा चारो ओर से पधना ये नौतिपाश द्वारा सूर्य के समान
प्रस्त, होकर, अब उससे मुक्त यह राजमूर्य (राजामों में सूर्य के
समान) नवीन सेज (शौर्य से युक्त, शोभित) चिरकाल से वियुक्त
सहदुर्गों को प्रानन्दित कर रहे हैं ।२
(एक सोपाठ होपो का स्वर)
शिवराज-मनिगमा, माप लोगो पोर सह्य निवासियो की
राजनिष्ठा से मैं बहुत प्रसन्न हूँ।
प्रतीहार-(प्रवेशकर) विजय हो देव । कोई विदेशी द्वार पर
माया है।
शिवराज-उसे से मानो।
प्रतीहार-ठीक है । (चला जाता है)
यंदशिक--(प्रवेशपर) देव की विजय हो। महाप्रतापी जयसिंह
को, कम्न मुगल सम्राट नै उसके विरुद्ध यह दोषारोपण पर

प्राजन्मन. जयसिंहः । सतश्च मोगल राजधानी यिनियतोऽसौ(मनायमानो माग एय--'पासादित मया कृतघ्नसपाया मर्मविचारणं फलम । पद् परिचरन् सामनन्यभक्तिः स्वशातिजनानपि भटानन पिनासम् । सोऽय वनोपलित विबलवदेत्यप्टे: संतजनेन मम हा हृदय भिनत्ति ।।३ हा विश्वनाय देहि मे शरणम्'- इरपाकृश्य प्राणाननहाल । सदमन्ता कार्य भीमानमा तत्पदमारडो मोपल युवराजसहायो जवावरतसिंह । शिवरान--(निःश्वस्य) विश्मशालिनानपि नयमाधिच्यु- तानामपरिहार्य एवेशो दुविपाक । प्रधानमन्त्री देव ननं शोचनीयामवस्यामापादितोऽय प्रवीरो मोगलेशहतोन। तुम शिवराज के पक्षपाती हो, उसके अधिकार से च्युन कर दिया है। उसके बाद मुगलराजधानी की ओर जाते हुए खिन्न मन वह रास्ते में -कृतघ्न की सेवा करके मैंने यह मर्मभेदी फल पार किया है। प्राजन्म मैंने जिस सम्राट की एकनिष्ठ भाव से सेवा करते हुए अपने जानीय जनो, वीरो तक का नाश कर डाला। उसी, इस वृक्ष शरीर वाले की भर्त्सना से मेरा हृदय विदीर्ण होता जा रहा है ।३ हे विश्वनाथ ! मुझे शरण दें। इस प्रकार स्वय को कोसता, उसने प्राणो को त्याग दिया । उसके बाद मुगलयुवराज से सेवित जसपन्त सिंह उसका उत्तराधिकारी बनाया गया। शिवराम-(निःश्वास छोडकर) विश्मशाली पुरुषों के लिए भी नीतिमार्ग छोड देने पर इस प्रकार की विपत्तियां पाती हैं । प्रधानमत्रो--देव, निश्चित ही दुष्ट मुगलसम्राट ने उस वीर की दशा शोचनीय बना दी।

( १४७ ) शिवराज - सप्रति खलु गान्धारा नियमने व्यापतोस्ति मोगलेशः। तदस्माभिर्महाहरलोपायः समाराध्य दक्षिणापयाधिप सद्य एमात्मसात्मतम्या महाराष्ट्रभू । प्रधानमन्त्री-देवस्योपस्यिते पूर्वमेव मया स्वायत्तीकृताश्वाकरण- प्रभृतयः सयदुर्गा । अवशिष्टानां दुर्गाणा कल्याणप्रान्तस्य चाक. मणाय प्रस्थामया सेनानियहा । परतूदयभारणपालित सिंहगडदुर्ग कथमाक्रमरणीय इत्यतीमोठितोऽस्मि । शिवरा--(विचिन्त्य) न कोऽयमात्यमन्तरेखेतत् काय साधयितुं समोऽस्ति । सप्रति तु स्वारमजस्योद्वाहकमणि ध्योऽसी नाहति प्रयागानुशासनम् । (सत प्रविशत्याटीक्षेपैरए तानाजी) शिवराज-सप्रति मुगलसम्राट गान्धागे का नियमित करने में व्यस्त है । पन हमलोग बहुमूल्य रत्नादि ये उपहार द्वारा दक्षिण प्रदेश के राज्यपाल को तुरन्त अपने काम करके समस्त महाराष्ट्र को जीत लें। प्रधानमन्त्री-देव के माने से पूर्व ही मैंने चाकण प्रादि महागौं को अधिकार म कर लिया है । शेष दुर्गों में से कल्याण प्रान्त पर प्रारमण करने के लिए मैंने संन्य समूह प्रेषित कर दिया है। परन्तु उदयभाग द्वारा रक्षित सिंहगडदुर्ग कसे अधिकार में हो, यह अत्यधिक चिन्तनीय है। शिवराज--(सोचकर) मत्री के अतिरिक्त प्राय कोई भी यह कार्य सपादित करने में समर्थ नहीं है । इस समय अपने पुत्र के विवाह कार्य मे व्या होने के कारण प्रस्थान-हेतु उन्ह मारेश नहीं दिया जा सकता। (उसके पश्चात परक्षा हटाकर प्रधानर तानाजी र प्रदेश) शिवराज:-(सविस्मयम् ) ग्रहो प्रमारपः । अपि सपन्न मङ्गता कार्यम् तानाजी - देवापानुनहेपतरसुसपन्ममेव । यस स्थपमेयाम्वा निर्वाह यिष्यति विवाहोत्सयम् । तमा चादिष्टोऽहमचंच प्रतिष्ठे सिंह- गडदुर्ग विजयाय । तदम भयतु पीतौरसुक्यो देव. । शिवराज-हो घग्योऽसि मम प्रधानवीर । अध खतु तृणाम मत्वात्मज कौतुकक्रिया राष्ट्रकभवत्योहहता पुर रणे। एकान्ततो मातृनिदेशवलिना संपादित वावरणेशस्त्वया ॥४ इदानीं तु हस्तगत एव मम सिंहगडदुर्गः । यतः एको मेहशखिपुरस्य भेता, हरियया देल्पकुलस्यहना। तया त्यमेवासि ममाग्रवीर न चेतरो दुर्गपरस्य जेता ॥५ शिवराज-~~(माश्चर्य में) महो, मनियर ! क्या मगल कार्य सम्पन्न हो चुका। तानाजी-देव की कृपा से वह सुसम्पन्न ही है । क्योकि माताजी स्वय ही विवाहोत्सव-कार्य सम्हालेंगी । और उन्होंने मुझे पान ही सिंहगडदुर्ग में विजयार्थ प्रस्थान हेतु आदेश दिया है। प्रतः इस सम्बन्ध में देव निश्चिन्त हों। शिवराज---मोह, मेरे प्रधानवीर तुम धन्य हो । माज वस्तुत. पुत्र के विवाह कार्य को तुण के समान मानकर राष्ट्रभक्ति के भारण, रग मे सेनापति व स्वीकार करनेवाले, माता के निदेश का पालन करने से तुमने राम के सस को मात कर लिया।४ प्रब तो सिंहगडदुर्ग हस्तगत ही है । क्योकि जैसे एक शकर पिपुर का भेदन करनेवाले हैं, एकाको ही इन्द्र देश्यकुल का नासा करनेवाले, उसी प्रकार है प्रधानवीर ! तुम अवेले मेरे दुर्गा के विजेना हो।

तानाजो-वेव प्रभाव प्रभावेण सत्र नियोज्याना साध्य- सिद्धिः । तद् प्राक्रम्प दुर्भधमरातिसन्य, सद्यो विजेध्ये सहसायदुर्गन् । सेनाधिपत्ये हरिणा नियुक्तो, न कि कुमारो हतवान् सुरारीन् ॥६ शिवराज-तप्रतिष्ठता में पानवीरो दुर्गविजयाय । तानाजी -यदाज्ञापयति देव । (इति निस्कान्त ) द्वारपाल'-(प्रविश्य) विजयता देव. मोगलेशमुद्राङ्कितपत्रहस्तो इतो द्वारि तिष्ठति । शिवराग-प्रवैशंपनम् । द्वारपाल -तपा। (निष्क्रान्त) दूत -(प्रविश्य) विजयता महाराज । दक्षिणापथाधिपेन प्रणया- भिनन्दनपुर सर प्रोषितमेतत्सावभौमशासन पन्नम् । (इति पन्नमर्पयति) तानाजी-देव, स्वामी के ही प्रभाव से सर्वत्र सेवको को सिद्धि होती है। पर मैं दुर्जेर सेना पर आक्रमण करके शीघ्र ही श्रेष्ठ दुर्ग यो विज्य कर लूंगा । क्या इन्द्र द्वारा सेनापति के रूप में नियुक्त कुमार कार्तिकेय ने देवताओ के पापो को मार नही डाला था? वरच मारा था।६ शिवराज-मेरे प्रधानवीर ! तो दुर्ग विजय के लिए प्रस्थान करो। सानाजी-सी देव को प्राशा । (चला जाता है) द्वारपाल---(प्रवेशकर) देव की विजय हो । मुगनसम्राट का मुद्रांकित पत्र लिए हुए दूत द्वार पर प्रतीक्षा कर रहा है । शिवराज-प्रवेश करो उसे। द्वारपाल-ठीर है । (चला जाता है) दूत-(प्रवेशकर) विजय हो महाराज । दक्षिण के राज्यपाल न पमिनन्दन सहित सार्वभौम सम्राट का यह पर भेग है । (पत्र देता है।

( १५० ) शिवरा:-(प्रदाय) मम्मिन् उद्धाट्य वाचतत् । (हरपति) मन्त्री तथा। (इति धाचयति) निजराजनगरारनाऽपि साम्राज्यविद्वेपिरोपजापनापसारित. स्थापि साम्राज्यसपर्यानुरक्तस्याने साहसविक्रमशालिनो महम्मदीयधर्म- रक्षकस्य शिवराजस्य सनिपराधान् मर्पयित्वा त च राजपेदन सयोज्य तस्मै सनिहित राज्ययोश्चतुर्थाशसमहाधिकारं वितरति सावभौमः । इति । शिवराज –मन्निन्, अपूर्व. खल्बमममनुग्रह सार्वभौमस्याक्षिणा. पथाधिपस्य च । दूत स्व तावनिवेदय दक्षिणापथाधिपाय पदचिरेण प्रतापरावद्वितीयो मम वीरामज उपयति नवान्तिकामिति । दूत --या। (इति निष्कान्त ) जियराज --मन्निन्, नाय बहुमान किंतु प्रारणसशयान्ता प्रतारणा। यतः शिवराज-(लेकर) मनिन्, खोलकर इसे बाचो। (देते हैं) मत्री-मस्तु । (वाचता है) राजधानीनगर से क्सिी साम्राज्यविरोधी द्वारा बाहर निकाले हुए, साम्राज्य की सेवा में रहने की इच्छावाले, विक्रमशाली, महम्मदीम धर्म के रक्षक, शिवराज के सभी अपराधो को क्षमाकर फे, राजपद पर प्रतिष्ठित कर, पडोस के दो राज्यो का चतुर्थांश ग्रहण करने का मधिपार उसे सम्राट देते हैं। शिवराज-मत्रिन्, निश्चित ही यह दक्षिण में गज्यपाल का महान् अनुग्रह है । दूत तुम दक्षिण के राज्यपाल को सूचित करो कि शीघ्र ही प्रतापराव के साथ मेरा वीर पुन उनके पास पहुँचेगा। दूत-ठीक है। (चला जाता है) शिवराज-मनिन्, यह बहुत बड़ा सम्मान नहीं किन्तु प्राएं- सुभयात्मक एल है। ययादि प्रतापकारेषु परेषु दुमंतिस्त्वकाण्डमाविष्कुरते य प्रादरम्। संमानदानास नियम तान् पगून बघायसी नौनिक यन्निनीयति ॥७ मात्री देव इदानीमा तो ध्याप्ततेनानेन युद्धविरामायं पुरस्कृतोऽ प मामोपचार । पररसेन सप करतलोपस्पापितय माम्राज्य- सिद्धिः । यत रिसोरानुन्तराजद पुनरते स्माताम्यमेव परित प्रपीकरोति । सोऽय तयार प्रपितोऽपितार-- मया माशरदमपति प्राप्तम् ।। शिवराम -हो मम्पमाहीत स्थया सायभौमशासनातरम् । सपापि मापमयसरोऽरमामिपक्षणीय । तद्धमारिप सम एप सापनोपमम्मरभीष्टम् । पात्री-सपा भिमग्ने देवस्याप्य वमापं । सुप्टा दाग मान का प्रयानम (TETर सम्मान दिया जाना उसी प्रकार है जमेपो मार सहित पय दान से जाना मत्री 1--व, इम समय पपत्र पर में प्रत रहन समाद 14 मा नानि अपनापी है। परम प्रसार माग्न गिदि पारदायमा गयी पर द्वारा मारा रासद योगार पर मेना, भार लिए पापी पोपणा है। और भात परम का परमार प्रसार कराE - माह मराट' पातर होगा होमोपा पर भी इस पर नही रनी । पतीने मोरना पर nो-Eric trict | t ( १५२ ) शिवराजः--तत्प्रतिष्ठता कुमारेण सह प्रतापरावो दक्षिणापयाधि पराजधानीम् । तत्र च निवसताऽनेन कर्तव्य समन्ततोऽस्मच्चतुर्थ दासग्रह । प्रतापराव - यदाज्ञापयलि देवः । (इति नियकान्त ) शिवराजः-मन्छिन्, गाधारविजयान्तरमेवाभियोध्योऽस्मा धूर्ती मोगलेश्वर, ! सत् क्षिप्रमेय साहितबलरस्माभिश्चतुर्या श सग्रहमियेणाक्रम्य स्वायत्तीकर्तव्य समयो महाराष्ट्र प्रदेश । भवन्त्वयं प्रमाणाभिमुखास्त्वदधिष्ठिता में रण प्रयोरा । यावदहमपि करोप सन हार्थ प्रतिष्ठे गुर्जरप्रदेशम् । प्रत्मागतेष्वस्मासु प्रयतिष्यते साम्राज्य भिषेकमहोत्सव । तत्संभ्रिमन्तां संभारा पुरोहितपुरोगमै कर्मसचिवं. मन्त्री--प्याज्ञापयति देव । (इति निष्क्रान्ता सर्वे) समाप्तोऽय दुर्गविजयनामा नवमोऽङ्कः शिवराज-तो, कुमार के साथ प्रतापराव को दक्षिणाधिप की राजधानी के लिए भेज दो। और वहाँ रहकर यह चारो भोर से चतुर्थाश साह करें। प्रतापराव-देव की जो माज्ञा । (चला जाता है) शियराज-भत्रिन् गान्धारविजय के पश्चात् तुरन्त धूर्त मुगल- सम्राट हमे व्यस्त कर लेगा। मत, शीघही अपनी सशक्त "सेता द्वारा चतुर्थाश संग्रह करने के बहाने से भागमण कर समस्त महाराष्ट्र प्रदेश को अधिकार मे घर सेना चाहिए । ग्राज हमारे रणधीर तुम्हारे सेनापतित्व में प्रस्थित हो जायें । जब तक मैं कर संग्रह करने के लिए गुर्जर प्रदेश को प्रस्थान करता हूँ। मेरे वापस मा जाने के बाद साम्राज्याभिषेव महोत्सव सम्पन्न होगा। इसलिए पुरोहित मादि पाम वर्मचारी मावश्यक सामग्री एकत्र करते रहे। मी-जैसी देव की माशा। (सभी चले जाते हैं) दुर्ग विजय नामक नयां अफ समान

दशमोऽङ्कः
(नत प्रविशतो रामपुरपो)
प्रयम --मही बतासस्यसम्यस्य मोगलेशस्य कुटिलपारायविनि-
मन महाराजेन पुनरहि लोसायुद्ध- स्वायत्तीरता महाराष्ट्रभूः।
द्वितीय -भद्र तथापि सिंहगरदुगजयेन नासोदेवस्य परम
परितोष ।
प्रथम --अप कय यिनयेऽप्यपरितोष इत्युच्यते ,
द्वितीय-तगंजयाय प्रेषितम्प तानाजोपोरस्प प्राणान्तसकटेनो-
जितो देव ।
प्रपमा-कुतो बिजेतुरपि प्रायसायम् ।
दसवा अंक
(उसके बाद दो गजपुरुषा का प्रवेश)
प्रपन-मोह पाश्चर्य, विश्वासपात्री मुगल सम्राट के कुटिल बन्धन
से स्यय को मुक्त कर, सहज युद्ध से महाराज ने महाराष्ट्र प्रदेश पर
अधिकार कर लिया।
हितीय --मन फिर भी सिंहगर्ग । विजय से देव को पूर्ण
सन्नोपनही है।
प्रपत्र--प्ररे । विजय होने पर भी पसन्दीप, ऐसा यों कहते हो।
हितोप--उस दुर्ग की विजय के लिए प्रेदित तानामीवीर के
पाल से देष बोसोम है।
प्रपम-पिता के लिए प्रारणसर मे।

द्विनीय --भद्र, गाढान्यारवतं निशीथे गोधामवलम्य तदुर्ग- प्राकारमासाद्यं फेन मावलेवीरेरणाघ प्रसारिताभि रज्जुभिरय प्रवीरोड प्यारोयनिज सैनिकगणम् । अथ प्रवृत्ते घोरसग्रामे परस्पर नियुध्य मानावृदयभागतानाजोपीरो वीरगति समापयेताम् । प्रथम --महो स्वाययं प्राणानुसृजताऽनेन खलु कृतकृत्यता नीत क्षात्र जम्मा द्वितीय ----प्रवान्तरे च तेनैव मार्गपाप्यारढन सूर्याजीवोरेस परास्य रिपुदल स्वविजयण्यापनाय प्रज्वालितो महानल । तत्क्षण तेन समातहणापि देवेन यदा परेधुनिजबालसुहृदस्तानाजीवीरस्य प्राणप्ययोदन्त प्राय गितस्तथानामेय विषण्ण यदनेम सहसोदीरित 'हा कष्ट मेक सिंह प्रतिप न । अपरस्तु विपन्न ।' इति । प्रथम --प्रहो, अनेकयोरध्ययसाध्या हि साम्राज्यसिद्धि। द्वितीय--भद्र, रात्रि के घोर नधकार म गाध के सहारे उस दुर्ग के प्राकार पर पहुँच मावले वीर ने नीचे लटकायी रस्सी को महायता से अपने सैनिको को इस दुर्ग में चढ़ाया। घोर सग्राम में परस्पर युद्ध करते हुए उदयभाग भोर तानाजी दोनों वीर वीरगति को प्राप्त हो गए। द्वितीय-ग्रहो स्वामी के वार्यार्थ अपने प्राणो को माहुति देकर इमने अपना क्षत्रिय जन्म सफल कर दिया। प्रथम- इमी बीच उस मार्ग से ही वीर सूर्याजी ने रिपुस की परास्त पर विजय प्रतीति स्वरूप महान्स प्रश्वालित कर दिया । उसमे हपित होकर भी देव ने जब दूसरे दिन अपने घाल सुहृद् तानाजी वीर का प्राणान्त सुना तो दुसी होपर सहसा पहा-'हा षष्ट एक सिंह नन्दी मा दूसरा नष्ट । प्रथम-महो, यातुत समय वोरो घी माइति से साम्राज्यमिद्धि मिलती है।

( १५५ ) - द्वितीय ---अथ किम् । तत प्रति तु सर्वत्राप्रतिहतप्रसराऽभूहिजय- ध्वजा देवस्य । पावाजाबीरेण स्वायत्तीकृत फ्ल्याएप्रदेश । प्रधान मन्त्रिणा च माहुलीग । प्रतापरावेण च सारहेरदुग । एष समन्ततो विजयरमाञ्चितस्प दवस्य साम्राज्यमहासवमभिनन्दितु सप्रति समुपस्थितेन साम तमण्डलेन समावुलोऽय दुर्गराज परमा त्रियमा- दधाति । प्रथम-देवतानुग्रह तरेख नंब सम्भवत्येतादृश सोभाग्यम् । द्वितीय-अपि च सप्राप्ता प्रत्र साक्षाद्वेदमूर्तय वाशीनिवासिनो गागाभटप्रभृतयो विप्रवर्या देवस्य साम्राज्याभिषेक सपादयितुम । प्रथम --एव समुपाजिता महाराजेन सफलभारतव्यापिनी यश समृद्धि । द्वितीय -भद्र जात खलु भा प्रवेशसमप । यावत्तत्रोपेव । (इति परिकामत) द्वितीय-यह सत्य है । उसी समय से देव का विजयध्वज सर्वत्र फहर उठा । पाबाजी वीर ने मल्याण प्रदेश अधिकार किया। प्रधानमत्री ने माहुलो दुग । यौर प्रतापराव ने साल्लेग्दुर्ग । इस प्रकार विजय विभूपित देव ६ साम्राज्यमहोत्सव में सम्मिलित होने के लिए चारो ओर से पाए सम्नति उपस्थित सामन्तो से पूण यह दुर्गराज परम शोभा धारण कर रहा है। प्रथम-देव के अनुग्रह बिना यह सौभाग्य सम्भव नहीं। द्वितीय-यहाँ तक कि काशीनिवासा साक्षात् वेदमूनि मे गागाभट आदि श्रेष्ठ ब्राह्मण देव का साम्राज्याभिषक संपादित करन के लिए मा गए हैं। प्रथम-इस प्रकार महाराज ने सम्पूर्ण भारत में व्याप्त होनेवाला यश प्राप्त कर लिया। द्वितीय-भद्र, सभा प्रवेश का समय हो गया। वहाँ चलना चाहिए । (दोनो घूमते हैं।)

प्रथम राजमार्गा, -(परितो विलोक्य) नूनमदृष्टपूर्वामिव मुपमा मिति दुर्गराजः। ध्वजवसनपताकामण्डिता कुसुममकुलमालारजिता फुट्टिनाश्च । नवविरचितरागालेख्यचित्रास्तरारिए दपति परमशोभा धूपितान्यङ्गनानि ।।१ द्वितीय एवमेतद् । एने संप्राप्ता घयमभिषेक मण्डप परिसरम । , , मुक्ताहिरण्मयपटारचितोपकार्या वासगृहाणि विपुला गजवाजिशाला । कौशालयाश्च प्रसनाभरणान्तकोष्ठा, प्रख्यापयन्त्यनुपमामधिराजलक्ष्मीम ॥२ प्रयम-(चा मोर देखार) निश्चित ही यह दुर्गरान पहले न देखी गयी अपूर्व सुन्दरता को धारण कर रहा है । राजमार्ग सुन्दर वस्त्रों, ध्वज और पतामामी से शोमित हैं, मणिजटिन स्थान फूलो की पलिया से गूथे मालामो से सजे, नये-नये विविध विनों से चित्र-विचित्र घस्त्री से डरे हुए प्रागन जो सुगन्धिन रिये हुए हैं, अत्यन्न सुन्दरता धारण कर रहे हैं। द्वितीय--हो, ऐसा ही प्रतीत हो रहा है । हमलोग अभिपर- मण्डप के पास पहुंच गए हैं। पर देखिए- राज शिविर मोती और स्वरणं से जटिस पस्त्री द्वारा निर्मित हैं, पोडे, हाथियों लिए विशाल भवन, यहे-यदै प्रामाद, मोरगृह, वस्त्र और पन्नागार सभी महाराज पी अपार लक्ष्मी का मामारा परा रहे है।

( १५७ ) देशत । प्रयन -अप्रतिम खल्वय साम्राज्याभिषेकमहोत्सवोपक्रम । यता मुक्ताविमतोरणाङ्कितपुरोद्वाराणि सूर्यस्वन- श्चीसार करिणा मृदङ्गनिनदरातत्वते मङ्गलम् । कामोनू पुरफिद्धिगोपरिणतक रम्ययशोगीतिका गायन्ति प्रमदा महोत्सवमुदा मादानुपूर्णानना ।।३ द्वितीय -न खत्वम केवल महोत्सव किंतु महाराष्ट्रियाणा स्वातम्यसूर्योदयोऽपि (सभामण्डप प्रविश्य) भद्र पश्यप निवर्तित साम्राज्याभिषेकमङ्गलो देवो मातरमभिवादयते । चण्डांशुप्रखरातपारपरुचिदूरात्परास्तापप- यासीधस्तपनद्युति परिपतन् देशान्तर ज्योत्स्नासमसमानदानपरम पोयूपरत्नाकर, सोय चाद्रमसौं दधाति सुपमामाबादमन्स्वा प्रजा ॥४ प्रथम-वस्तुत साम्राज्याभिषक की यह तयारी अनोखी है। वयोंकि सामने के द्वार मोती और मगि यो से खचित चहाचारो द्वारा सजे है हाथिया के चीर र तुरी की ध्वनि मृदग स्वर से मगल बिखर रहा है ।प्रसन्नता के प्रासुमो से पूर्ण मुखवाली स्त्रियाँ नूपुर एव मेखला का सुन्दर स्वर विखेरती हुई यश का गान कर रही हैं ।३ द्वितीय-यह केवल महोत्सव ही नही बल्कि मराठा के स्वातश्य- सूर्य का उदय भी है। (सभा मण्डप में प्रवेश कर) भद्र, देखो यह महाराज साम्राज्याभिपक के माल काय से निवृत्त होकर माता को प्रणाम कर रहे हैं। अपन प्रचण्ड तेज की किरणा से शत्रुपों को, ताप देनेवाला पा जैसे सूर्य एक मोर स दूसरी ओर घूमकर प्रकाश बिखेरता रहता है। वही अमृत के समुद्र के सदस्य पदमा की सुन्दरता को धारण किये हुए, जैसे उसकी ज्योत्स्ना समस्त लोक को शीतलता प्रदान करती है, उसी प्रकार भपनी प्रजामो दान मान द्वारा प्रापकर रहा है।४ तत्तव यमप्यासनपरिरहं कुम । (इस निष्कान्ती) (पटीक्षेप) इति विष्कम्भक (ततः प्रविशति ययानिदिष्टः शियराज) शिवराज --प्रम्य एवं सपादितमामाज्यभिषेशमङ्गलो महिषी द्वितीय शिवराजोऽभिवादयने । (इति महिष्या सह पादयो पतति) राजमाता-(सानन्दाधु) पर चिरंव। वत्से घिरं सकल- सौभाग्यभागन भूया.। दिध्याय खतु मया प्रत्यक्षीनियने पूर्यानुभूतं स्वप्नदर्शनम् । यत सस्याप्य विक्रमजित भुषि धर्मराज्य परप त्वया कुलयमा प्रपितं प्रिलोक्याम् । यच्चापि दुर्लभमन-ततपायेग, तव प्रचारमननी पदयित मे ॥५ हम लोग अपना मासन ग्रहण करें। (दोनो निबन जाते हैं) (परदा गिरता है) विष्कम्भक समाप्त (उसके बाद पूर्व वर्णनानुसार शिवराज का प्रश) शिवराज-माते, साम्राज्याभिषेक का मगल का गपादित परक यह शिवराज, दिनीय राजी के माय प्रणाम करता है। (राजी-सहित परो पर गिरता है) राजमाता--(प्रसन्नता के मामू सहित) वस्म ! चिरजीवी बनो। वत्से ! चिसाल तक समस्त सौभाग्यो की पात्र बनी रहो । भाष्य से पान मेरे सामन पहले देखा गया पूर्व स्वप्न प्रत्या हो गया। पयोकि अपने परम से जीतकर पृथ्वी पर धर्मराज्य की स्थापना द्वारा पुत्र तुमने कुल का या त्रिलोक में प्रसिद्ध कर दिया। प्रत्यान बठिन तपश्चर्या से भी प्रास मरना जो कठिन है, वह श्रेष्ठ वीर दी माता का पद मुझे प्रदान दिया ।

उमौ-(सप्रश्रयम्) प्रतिग्रहोसा। शिवराज-प्रम्य प्रतिपद त्वदनुशासनानुतिनैव मया समासा- दितोऽयं लोकोत्तरोत्कर्ष । (इति छत्रचामरयरंत्यसेवितो रत्नसिंहासनमपसृत्य महिष्या सहारोहति) सभ्या-(उत्याय) विजयता छत्रपतिमहाराज । विजयता माम्राज्ञो। (इति सुवर्णकुसुमानि विकिरन्ति) (प्रधानाधिकारिए सामन्त प्रतिनिधयश्च मरिण मत्ता स्वर्श- पुसुमसज प्रयन्ति) (नेपये) यतालिको-विजयता महिषीद्वितीयश्नपतिमहाराज साम्राज्या- भिषेक मङ्गलेन। दोनों--(विनम्रता से) प्राीय म अनुगृहीत है। शिवराज---माते ! सदा प्रापा प्रादेशानुसार चलकर ही मैंने यह लोकोत्तर उन्नति-पद को प्राप्त किया है। (छत्र पोर चामरधारी सेपका द्वारा सेवित, रानी सहित रस्ना सिंहासन पर बैठते हैं) सभासद-(उठार) पत्रपत्ति महाराज की विजय हो। सानाजी की जय हो। (स्वर्णफूल विखरते हैं) (प्रधान अधिकारी, सामन्तो वे प्रतिनिधिगण मणि, मुक्ता, स्वर्ण मौर फूलो की मालाएं मर्पित करते हैं) (नेपथ्य मे) तालिप-साम्राज्याभिषेष मङ्गल द्वारा महारानी सहित छत्रपति महाराज को विजय हो।

(१६० )
.
द्विायरसचिवद्रमग्नतोयाभिपित्तो
विजयपदविवादिममाऽभिगोतः
घिरमणिकिरीटी रत्नसिंहासमस्या
विमुपपत्तिरिय रयं राम भारतेन्द्र ॥
(अष्टोत्तरमाताातानोस्यनोपक्रमः)
योगिनी- योगापापेन गायत.)
(मालकोवारागरण मितासेन गोयने)
पातो पचपसे महाराज।
भारत यो पुसपते,
नयसम्पामितदिगातीत,
रमापते महारा । पालो० ॥१
स्यातव्यगुपपणापता-
गुणरांवितराष्ट्रीयाण,
पांपते महाराज | पातो० ॥२
प्रमार, थेtamilan भिमंत्रित जल गेममिति,
गुदर बयानों द्वारा गाये ए विजयगोन पर-दिनार गे, गुन्दर
समितिट पारिए, साहिल पर भागीन भारतेन्द्र।
गुददा मोमिन हो रहे हो ।

पौर रागानों, मत्रियों एवं मषियों द्वारा तुम मेक्षित हो रहे हो परमे पाह (मनिषगए)रे प्रभार से जगतारिनी होगप्रति पर, तुम सामाग्य-म युक्त हो पायपि मोमिन हो रहे हो- तुम्हारे पर सामनोपरा पर से ममिति मुगुरी गामित मायापहतनिखिसभुमार- स्वमसि कृपानिधिशिवावतारः विबुधपते महाराज । कृपालो ॥३ मरिगएचतिमिरहरमिहिर- स्व विलससि महता रणवीर- विषापरे महाराम कृपालो० ॥४ निजजनपदपुरमनाभिनन्दित देवदिजवर किंनरवन्दित विश्वपते महाराज । कृपालो० ॥५ गागाभट'-विष्य वर्धते महाराजश्चिरप्रापितेन साम्राग्य- मोविलसितेन । पाहप्रतापसमुपातदिगन्तकानि सामन्तमौसिमणिरजितपायपीठ राजन्यमग्निसधिवं समुपासित साम्राग्यवंभषयुतोऽसित विभासि ॥७ पर दिया ।२ हे वियुधपसे । मामा (पूटनीति) द्वारा समस्त भूमि (प्रदेश) के भार को दूर करनेवासे हे पानिधि ! सुमशिव के मयभार हो ।३ हे मूर्य । (महातर को धारण करनेवाले सत्रियवीर) जैसे अन्धवार को सूर्य दूर कर देता है उसी प्रकार मे धीरनेवाले है रणवीर तुम सातते से विलग रहे हो । विश्वपत्रे ! अपने जनपद और पुरजनों द्वारा अभिनदिन पोर देवों, रिनरी एय श्रेष्ठ पाह्मणों द्वारा वन्दिर होकर शोभा पा रहे हो।। पागाभट- भाग्यशाल पिरप्राप्ति साम्राज्यघी-बिसार द्वारा महाराजा रहे है। प्रमों प्यूह ( १५२ ) शिवराज.-भगयन् परदेवतामसादेन भोगुधरामदासवरणानुग्रहेण घाघ मासावितं मया साम्राज्यवयंम् । तदु धिर कपायध्यामजितानि राष्ट्र सभामण्डपमन्दिराणि । साम्राज्यदेवस्य गुरोः समन्तात् प्रत्यापयत्वप्रतिम प्रभावम् ।। प्रधानमन्त्री-(प्रतिनिधिमण्डसं निर्दिश्य) एते कुस्याहीशप्रति- सामन्तप्रतिनिधयो हत्यश्वरत्नाहिरण्योपायन देवस्य साम्राज्याभिषेक- महोत्सवममिमावन्ति । शिवराज-मधिन सामन्तसाहाय्येनाय मयानुभूयत एतमङ्ग लम् । तासकृत्य तोपपंतान महाहंघलाभूपरणाविभिः । प्रधानमन्त्री तया । (इति यथाविष्टं कुरुते) शिवराज--भगवन्, परमवाक्तिमान् पोर गुरुवर्य श्री रामदास के परणो के भनुग्रह से भाज यह साम्राज्यन्वभव मुझे - -प्राप्त हुमा है। इसलिए राष्ट्र के समस्त भवनो मोर सभामण्डप को कपाय ध्वज से शोभित करके साम्राज्य देव हमारे गुरुधष्ठ के परिमित प्रभाव को धारो और चिरकाल तक फैलाया जाप प्रधानमत्री-(प्रतिनिधि मण्डल की भोर सफेत कर)कुस्वशाह मादि ये सामन्त प्रतिनिधि हाथी, घोड़े, रन मोर स्वर्ण मादि उपहारो द्वारा देव के साम्राज्याभिषेक-महोत्सव का स्वागत करते हैं । शिवराज-मत्रिन्, सामन्तो की सहायता से मान हम इस मगल अवसर का अनुभव कर रहे हैं । अतः उनके प्रतिनिधियो को बहुमूल्य वस्त्रों तथा माभूषण प्रदान कर सन्तुष्ट करें। प्रधानमत्री-ठीक है । (मादेशानुसार करता है) शिवराज -~~प्रय च समावयतु कोशाध्यक्षो लममुद्राभिराचार्य चतुधितिसहनाभूपश्च सर्वान् द्विजोत्तमान । कोषाध्यक्षः-तथा । (इति पवादिष्टं कुरुते) गागाभट:--भारतेन्द्र तब महासभायनया परितुष्टानामस्माक- मैतवेवास्ति परममाशास्यम् । यसवाय स्वातन्त्र्यभाषज्वलिताहवानो द्विपद्धविभिर्जनता प्रतपणः। निर्वाहितो मन्त्रिपुरोहितादिभि साम्राज्ययज्ञोनितरां समृश्यताम् । शिवराज:--प्रय समाजय मम साम्राज्याधिकारपदमानानष्टी प्रधानमरित्रणो महारत्नवसनाभूषणं । कोपाम्म-तमा । (इति पधारिष्ट कुस्ते) शिवराज-पौर इसके बाद होपाध्यक्ष, एक सय मुद्रामो द्वारा पाचार्य को, धोबीस हजार मुद्रामो से पुरोहित, पाच हजार मुद्रानो से प्रत्येक ऋस्विजरे, मोर बहुमूल्य वस्त्र एक प्राभूषणों से सभी अप्ठ माहापो को सम्मानित पर। कोपाम्पस-ठीक । (पादेशानुसार करता है) गागाभट-भारतेन्द्र मापके बहुमूल्य उपहारों से सन्तुष्ट हम लोगों को यह शुमकामना है कि तुम्हारा यह स्वतंत्रता की भावना मै ज्यसित और उममे पनों की पानि, प्रजाजन के सम माहाम्य, मत्री मोर पुरोहितो द्वारा मान सामाग्यरूप मश सदा, सर्व या समृद्धि को प्रान हो । মিম্বা—ময় দুদ গালাগাছিয়াংশেঃ ৭। নানা माठ प्रधानमविषों को बहुमून, वस्त्र पौर भानूपानी नाग मम्मानित करो। भोपाध्या-ठीक है । (मादेशानुसार करता है)

( १६४ )
प्रधानमन्त्री-दिव्य पानी सम्राटपदवीमपिटद महाराजमभि-
नन्द्याशास्त एप भापवर्गों यत्
प्रबलकुटिलपिद्विया विभेता प्रतिदिनमेष तर्वधता प्रभावः ।
तपनकुलमणे सपर्ययेदं भवतु सदा सफसंघ जीवित न ॥१०
शिवराज-प्रय बहुमानेन संमानयस्व मे विजययशोभागिनी
चीरामसरान् ।
हुस्वा देहं निज पे समरहतबहे प्रस्थिता, पुण्यलोका-
स्तेषां धीरोतमामा समवितपशसामन्यये ये प्रसूताः ।
मृत्युत्कर्ष प्रतापप्रमथितरितो
पुनःतिदक्षा
सर्व ते राष्ट्रभक्तान पफुलविभवमाननीया थाहम् ॥११
कोषाध्यक्ष --तथा । (इति राजशासनात्यर्पयति)
शिवराज --मन्त्रिन सभावय विदुषो विप्रर्यान् निमतपिक.
ये
प्रधानमत्री-भाग्यवशात, सम्राट् पद पर मासीन महाराज का
मभिनन्दन कर ये सेवक चाहते हैं कि
प्रबल भोर कुटिल शत्रुमों का नाश करनेवाला पापका प्रभाव दिन
प्रतिदिन बढ़ता रहे पोर सूर्यवश के मणि भापकी सेवा में हमारा
जीवन सदा सुखी घोर सफल रहे ।१०
शिवराज-विजय यशभागी श्रेष्ठ वीरो को श्रेष्ठ सम्मान
प्रदान करो।
रणभूमि मे जिन लोगो ने अपने शरीर की माहुति देकर पुण्यलोक
को पार किया उन श्रेष्ठ वीरो के फुल मे जो उत्पन्न हैं, जिन लोगो
ने अपनी बुद्धि के प्रताप से शत्रुमों का नाश किया, जो नीति निपुण
हैं वे सभी राष्ट्रभक्त राजकुल वैभव से पथायोग्य सम्मानित
किये जायें
कोषाध्यम-ठीक । (राज्यशासन समर्पित करता है।)
शिवराम-मनिन् विद्वान् श्रेष्ठ ब्राह्मणों के लिए वार्षिक वृत्ति

{ १६५ ) अतिधित एन । मा सदत्वस्मिन् मम धर्मराज्ये कोऽपि स्नातको द्विजोत्तम । यतस्तवधान एव सद्विचारधारः। मात्री-तया। (इति विप्रेन्यो राजशासनान्यर्षपति) शिवराज -सधिवा या मानापमण लोहानी संग्रहार्थमनेक- घोरयलिभिर्मया समुपाजितमेशरमराग्य तान् सर्वानपि यसनानपाना- विभि सत्य रयानुरजयत । यत्तस्तदनुरागपरशा हास्माकं साम्राज्य- संपर। सचिधा-सया । (हति निष्कान्ता) प्रतिहार--(विाय) विजपता देवः। विप्ठ्या संप्राप्ता पर धीपणा शिवराज-दोन प्रदेश्य भावन्त माानुभाषम् । प्रतिहार:--लया । (सि निधान्त) नियम पर हैं। हमारे धर्मराज्य में कोई भी विद्वान् बाह्मण दुसी ने रहे। क्योंकि उन्ही के प्रधान सद्विधा का प्रभार है। मात्री-ठीक । (बाह्मणो को राज्यांना प्रदान करता है) शिवराज-सपिषगए नि नानाधर्मावलम्बी प्रजाजनों के लिए भने वीरों मोरलि देकर मैंने यह धर्मराज्य प्राप्त किया है। उन संक्षको पान पस्त्रादि से सन्तुष्ट रखें, उन्हे प्रसन्न परे पनि उनमें अनुराग पर ही हमारे इस सामाग्य की सम्पति मापारित है। सचिवगए-ही है। (पमे जाते हैं) प्रतिहार-(धार) विषय हो देव । भाग्य से थी (गुपयंठ) मा गए है। शिवराम-उन र परमोतीप्र से मानो प्रतिहार-टीर है। (निपम माता है) (ततः प्रविशति रामदासः) शिवराज:-(सर्वेः सहोत्याप) एष श्रीचरणप्रसादसमपाजित- साम्राज्यवैभवः शिवराजोऽभिवादयते । (इति पादयोः पतति) श्रीरामदास--वत्स, उत्तिष्कमम यति सर्वपा घर्तमानस्य तव सकलमप्यभीष्ट मया तप प्रभावात्सपादितम् । प्रय कि ते भूयः उपकरवाणि। शिवराज -भगवदनुग्रहेण न मे विमपि भद्रमशिष्यते । तथापी- दमस्तु भरतवाक्यम् । यदस्मिन् मम भारतवर्ष मोदन्तो नितरा स्वकर्मनिरता पर्याप्तकामा प्रजा, एघन्ता नविक्रमापासो लोकप्रिया, पार्थिवाः । (उसके बाद रामदास प्रधेश करते हैं। शिवराज-(सबके साय उठकर) श्रीचरणों के प्रसाद से साम्राज्य वैभव को प्राप्त करनेवाला यह शिवराज प्रापको प्रणाम करता है। (पैरो पर गिरता है) धीरामवास -बरस उठो । मेरी माता का सदा पालन करनेवाले तुम्हारे सभी अभीष्टो को मैंने तप के प्रभाव से पूर्ण किया । पत्र तुम्हारे लिए और क्या कर दूं। शिवराज-भगवन् के मनुग्रह से अब मेरे लिए कुछ भी रोप नहीं है । तथापि यह भरतवावय रहे। कि मेरे इस भारतवर्ष में प्रजाजन अपने कर्म में निरत रहें, अपने मभीष्ट की पूर्ति पर सदा सुखी, प्रसन्न रहैं, लोकप्रिय राजागा अपने विक्रम मोर नोति नपुण्य से यशस्वी हो समृद्ध होते रहें । बादल समय पर जलवश कर धान्यों

( १६७ )
सस्पाना च समृद्धप जसमष सिजन्तु कातेरस
सप्ताङ्गप्रकृतिप्रकर्ष चिर राष्ट्र चिरं वर्धताम् ।।१२
(इति निष्कान्ता सर्वे)
साम्राज्याभिषेकनाम
दशमोऽङ्कः
छत्रपतिसाम्राज्म नाम नाटकम्
समालम्
.
की समृद्ध करें-इस प्रकार सातो पगो से पूर्ण प्रकृति के सुन्दर विकास
से राष्ट्र रादा बढ़ता रहे ।१२
(सभी निकल जाते हैं)
साम्राज्याभिषेक नामक
दसवां अंक समान
छत्रपति सामाण्यम् नामक यह नाटक समाप्त
ATIYA
(BONPAY-75
LIOR

Chhatrapatisamrajyam (historical Drama)

Author
Yajnik,moolshankar Maniklal
Title
Chhatrapatisamrajyam (historical Drama)
File name
Chhatrapatisamrajyam (historical Drama)
Text
OCR done
Citation
1899
Published
2012/08
Publisher
Allahabad.,devabhasha Prakashan Daraganj
Language
Sanskrit
Pages
193
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
312932
Barcode
99999990321670.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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Chhatrapatisamrajyam (historical Drama)