Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner

Vegyanik Paridrashti

Panday,ganga Ratan · 2010/12

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वैज्ञानिक
परिदृष्टि
भ

राजकमल प्रकाशन
पटना
दिल्ली

वर्टेड रसेल
वैज्ञानिक
परिदृष्टि

अनुवादर
श्री गगारतन पाण्डेय,
एम०११,६ल ग्लो
मूय १०००
प्ररागव
राजस्मर प्रशान प्राइवट लिमिटर
निती
मुद्रा
नवीन प्रम
मनाजी मुभाप माग दरियागज
©हिली अवार, १६
गजरमर प्रप्राइवट सिमिती
Hindi Translation of
"Sciertific Outlook
onginally published by
Georgs Allen & Unwin Lid London

प्रस्तावना यह एक सामा य वयन हो गया है कि म रोग वनानिर युग म रह रहे हैं। किनु अधिकारी सामाय उक्तिया की भांति यह क्यन भी देवल आगि स्प म ही मत्य है। इमम मन्द नहीं कि यदि म अपने पूर्वजा को दृष्टि से अपन Tमाज पर नजर टारें तो वह हम बहुत अधिक वैनानिब समाज मालूम होगा मिनु आग आन वारी पीढियो की नजर से देखने पर सम्भावना इस बात को है कि अपना ममाज हम ठीर इसका उल्टा ही दिखाई दे । मानव जीवन म विनान न अभी हाल ही म एष तात्विा म्यान ग्रहण दिया है। कला का बहुत अधिक विकाम, जसा कि हम गुफाओ के प्रासनीय चित्रा मे मालूम होना है अतिम हिम-युग म पहले ही हो चुका था। घम की प्राचीनता के सम्बध म इतन विश्वासपूवर कुछ नहीं कहा जा मरता फिर भी बहुन सम्भव है नि धम का विवाम भी करा के साथ-माथ ही हुआ हो। अनुमानत कला और घम दाना लगभग ८० हजार वर्षों स मौजूद हैं । रितु एक महत्वपूर्ण भक्ति के रूप मे विनान का प्रारम्भ गोलियो के ममय से हुआ, और मरिए विपापा अस्तित्व लगभग ३०० वष पुराना है । इस अवधि के पूवाध मे विनान वेवर कुछ विद्वान लोगा व ही अध्ययन का विषय रहा, और मामा य रोगा के विवारा अपवा उनकी आत्ता पर उमा रोई प्रभाव नहीं पडा । येवर पिटर हे मो वो दौरान ही विमान न मामा य जनता ये दनिर जीवन वा नियमन निधारण करने वार एप महन्वपूण तत्त्व का म्प धारण पिया है । इस घाटी मी अवधि म विमान न ओ महान् परिवतन विये है व प्राचीन मिन युग म अब तक होन वाल परिवतना म रही बहे और महत्त्वपूण हैं। विमारा पूर्व सम्वृति व पाच हजार वर्षों को अपना वितान के य हे गौ वष अधिर क्रानिवारी सिट हा है । यह कयना करना तोएर अपहीन वान हागो शिविमान की प्रातिरादित समाप्त हो चुकी है या उमा घरमोरप पूरा हो एमा है । गम्भावना इस बात की है कि गरिया तर विगन अधिका पिर तीन परिवतन उपन परता रहगा। यह वत्सना यो जा मरती है कि अनागत्या एक नर माम्यायम्पा पर मानव-जानि पहुँच जाएगी जा अदम्या या मा उम म्पिनि म आएगी जय मनुष्य मा गान इतना अधिर व्यापर हा जाएगा fr उमर मीमान तर पचन र गिा मनुष्य की वनपान जोबा-अवधि पयाप्त और यह न होगी और इसलिए गोध जोर आविप्नार का वाय तब तक आगे बढना असम्भव हो जाएगा जब तक मनुष्य को जीवन अवधि मे पर्याप्त वद्धि न हो, अथवा यह अवस्था उस स्थिति म आएगी जब मनुष्य जाति इम नए खिलौने से कर जाएगी वमानिक प्रगति के लिए आवश्यक श्रम और आयास से थक जाएगा और अपने पूर्वजो के श्रम से उपलब्ध हुए फलो वा उपभोग करने म ही सतोप मानने लगगी जस रोम के लोगा यो अपने पूर्वजो द्वारा निर्मित जल प्रवाहिकाआ के उपभोग म आनद मिरता था। अयवा हो सकता है कि मानव-जाति यह सिद्ध कर द कि कोई भी वज्ञानिा समाज स्थायी रहने में सक्षम हाता ही नहीं, वि मानव जीवन की निरतरता कायम रखने के लिए ववरता की स्थिति म वापस लौट जाना अनिवाय है। फिर भी इस प्रकार की कल्पनाएं बकारी के क्षणो म भले ही कुछ मनारजन पर सके पर ये इतनी धूमिल, अस्पष्ट और अनिर्दिष्ट होती हैं कि इनका कोई व्यावहाग्रि महत्त्व नहीं हो सकता। आधुनिय' यात म महत्त्वपूण बात तो यह है कि हमारे विचारा पर, हमारी आशाआ पर और हमारी आदता पर विमान का प्रभाव निरतर बढता जा रहा है और कम स एम आने वाली पई तानियो तर तो उसके बढ़ते जान की ही सम्भावना है । जगा कि नाम मे हो निम्ति है, विमान प्रथमत पान है । परम्परागत अथ म वह एक विशिष्ट कोटि वा नान है, अर्थात ऐमा पान जा अनेर विशिष्ट तथ्यों को परस्पर सम्बधित सिद्ध करने वाल सामाय नियमा की साज परता है। फिर भी धीरे पोरे विज्ञान या ज्ञानमूल्य स्वरूप अब पीछे पडता जा रहा है और प्रति पा मचालन करने वाली शक्ति के रूप म विनान आग आ रहा है। पला पी अपना विमान का सामाजिक महत्व इसीलिए अधिक है कि यह हम प्रनि या मचारन या नियमन करने की शक्ति देता है । मस्य को पोज स्प म विज्ञान कला के समकक्ष है, किन्तु उमग वरेण्य नहीं। एव तस्नीक य रूप म विपान का जो प्रायोगिक महव है यह परा को कभी नहीं प्राप्त हो सपना यपि तकनीक के रूप म विनान का भी कोई स्वत मूल्य नहीं है । एक तानी म प म विनान का एक और महत्त्व है जिसकी व्यानियां अभी तम भनीभाति स्पष्ट नहीं हो पाइ, अर्थात् विनान माव-ममाज य ाय म्यम्पायसस्थिति न केवल सम्मव बनाता है यति आवस्यव भी । आपिक मगटन पढांचा और राग्या ये पतच्या या पहा ही विना बहुत अधिर गम्भीर कप प्रभावित पर पुपा है पारियारिव जीयन पर भी उगरा गापा प्रभाव प्रारम्भ हो गया है और यह नि यहुत दूर नहीं जब निम्पिा म्प में यह पारि पारित जीवन का यहा अधिर यदर देगा। हरिए मानव जीवन पर विज्ञान प्रभाव पी विवपना पल समय हम तीन बाता की जांच-परख परनी होगी जो यूनाधिक म्प म एक-दूसरे से पृथक् हैं । पहली बात है वनानिक भान वा स्वम्प और उसकी व्याप्नि, दूसरी बात है वनानिक तकनीक से प्राप्त हान वागे बद्धमान सचालन-पाक्ति, और तोमरी थान है वनानिक तकनीक द्वारा अपपित नय प्रकार के मगठना म मामा- जिक जीवन म और परम्परागत सस्थामा एव प्रथामा म अनिवायत उत्पल होन वार परिवनन । इमम सलह नही वि विनान का पानमूलर म्वरूप गेप दोना बातों म भी अन्ननिहित है, ययाति विनान द्वारा उत्पन्न होने वाले समस्त प्रभाव परिवतन उम नान के ही परिणाम हात हैं जा विनान से प्राप्त होता है । अभी तर मनुष्य अपनी आगा को इमलिए नही सिद्ध कर पाता रहा कि उसे माधना का पान न पा । जैम-जैस यह अनान दूर होता जाता है, वैसे-वैस यह अपन भौतिक पयावरण को अपने मामाजिक परिवा दो और स्वय अपन आप- मा उन रूपा में परिवर्तित करने म अधिकाधिन सरम हाना जाता है जिहें वह सर्गोतम समझता है । जहाँ तक वह बुद्धिमानी म काम रेना है, वहां तक यह नई गति उमर रिए मगरधारी होती है, वहीं तर वह एक भूप की तरह यावरण भरता है उस हर तब यह नई गति उम लिगा पातक होती है। इसलिए बनानिय सभ्यता का यह एक मगलमया मभ्यता बनना है तो यह आप यक है कि पान को यदि व साय माय विश्व बुद्धि म भी वद्धि हा । विवर- बुद्धि स मरा तापय है जीवन र उदया की सत अवधारणा। यह एक एपी चाज है ना विनान स्वय नहीं द मरना । इमरिए विनान की प्रगति अपन आपम गुर प्रगति पोकाई गारण्टी नहीं पद्यपि एमा प्रगति के लिए आवश्यक अनक मन्बा म म ए तत्व अवय उगम पर ध होता है। भाग पृष्ठा म म विवा-बुद्धि को अपना अधिपि म विनान । हो भी करेंगे । फिर भी यह म्मरण रखना अभीष्ट हागा कि यह विवचना लागी ही होगी और य-ि मानव जीवन का एक मनुरित दृष्टिको प्राप्त करना हा सा म विचारा मनापन आय पर हगा।

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क्रम पहला भाग वज्ञानिक परिज्ञान १बज्ञानिक पद्धति के उदाहरण २ यज्ञानिक पद्धति को विशेषताएं ३ यज्ञानिक पद्धति को परिसीमाएं ४ यज्ञानिक तत्व मीमासा ५ विज्ञान और धम ५७ दूसरा भाग वज्ञानिक तकनीक ६ बजानिक तकनीरा प्रारम्म ७ निर्जीव प्रकृति पर प्रयुक्त तकनीष जीव विज्ञान में प्रयुक्त तकनीक ६ गरीर क्रिया विज्ञान की तकनीक १. मनोविज्ञान की तपनीष ११ समाजको तकनार १०७ ११४ १२० १२६ १४५ १५६ तीसरा भाग वैज्ञानिक समाज १२ कृत्रिम प से निमित समान १३ पष्टि और समर्माह १४ यज्ञानिय सरकार १५ यज्ञानिए समान में शिला १६ मानिर प्रजनन १७ विमान सौर मान-मृत्य १७८ ११. Vy

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पहला माग वैज्ञानिक परिज्ञान { पहा अध्याय वैज्ञानिक पद्धति के उदाहरण १ गलोलियो प्रेरण पला, चनानि पद्धति अधिक परिशुद्ध रूपा म मर ही जटिल मालूम हो पितु तात्विम पम वह बहुत ही मरत होती है। यह पद्धति है ऐसे तम्या का जो प्रेसर को एक विशेष प्ररार दे तथ्या वा नियमन बरनवाले सामाय निपमा योगान बग्ने मे महायता देस। प्रेषण परने दी स्थिति, और पिर एक नियम की अनुमति निधारित करन की स्थिति य दोना ही स्थिनियो अनिवार होती हैं और इनमम इयर या गोपन अनन्न म्पा म रिया जा सरता है । रितु तत्वन पहा पहर जिस व्यक्ति न यह रहा था कि "आग जगती है , वह वनानिर पद्धति का ही प्रयोग कर रहा था कम-से-कम उस स्थिति म तो निश्चय ही यदि उमन अपन-आपको कई बार आग में जरा वर अनुनय किया होगा। पर यक्ति प्रेक्षा और सामाचौररण यो दोना स्थितिया ग गुजर चुका ह। पिर भी उमर पार यह बुरा नहीं पा जिाती अपरा यनानि तरनी म हाती है, अयात एक ओर तो गावधाना व माय महत्पूण तप्पा वा माग्न और दूसरी आर वर मामा योवरण अगवा अपार गमिपमा यो उपन्य विविध माधन । व्यरित यह पहला है fr'निरापार वग्नु पृथ्वी पर गिर जाती है। यह येवर मामा पोरण पर रहा है, और उगरी, उति का गान गुगारा, सिरिया और वायुयानों द्वारा लिया जा माना है। इमर विपरीत जो व्यक्ति गिरत हुए पिण्डा गिदान गम है यह यह भी जानता है कुछ अपवार म्वाप पिड या नहीं पानिए पनि तत्वर गर' नो ययप है, पितु मी उपधि ती मरिनाईरे वा हुई है और अब मा IT उपयोग येवर युर पाडे-ग Pा द्वारा रिया जाता है जाम तमाम नाम से, जिनरे वार म व अपनी शिमगार रगा येय' वा थाना मय प म ही उनसरा उपयIn गरिमारपनिरतामा विकास निर हो जाने प्रयोगा म मात्रा मामलम परिगुरुना मा पन्ना और प्रयाना में अनुमिनि १२ वज्ञानिक परिदृष्टि । निर्धारित करने म अत्यत जटिल कौशल का प्रयोग करने का अभ्यस्त हो, तो उसे आप अपने एक छोटे से प्रयोग वा विषय बना सस्ते हैं। और यह प्रयाग निश्चित रूप से आपके लिए नानवधर होगा। यदि आप राजनीतिक दरबन्दी की राजनीति के वारे म, धमशास्त्र के बारे म, आय-कर के बारे मे, मकानो के दारो के बारे मे मजदूर-वग की स्वाग्रहिता बार म तया इमी प्रकार के अय प्रकरणो के बारे मे उसको छेडे, तो निश्चित है कि बहुत जल्दी वह उदल पडेगा और तब आप उम अपरीक्षित सम्मतिया और धारणाएं ऐसी कट्टरता के साय व्यक्त करते हुए देखेंगे जिसका लेशमात्र भी अपनी प्रयागशाला के प्रयागों से उपलब्ध सिद्ध परिणामो के सम्बध म वह कभी भी यक्त न करेगा। जमा मि इस उदाहरण से स्पष्ट होता है, वज्ञानिक अभित्ति कुछ जशो तर मनुप्य के लिए अस्वामिक होती है। हमारी अधिकाश सम्मनिया अपनी इच्छामा की पूर्तियां मात्र होती हैं प्रायडी सिद्धान्त में सपनो की भाति । हमम से सर्वाधिक तकसगत और विचारवान व्यक्ति का मस्तिष्क आवेगपूर्ण विश्वासो के तूफानी सागर जसा होता है जिस पर वैनानिक रोनि से परीक्षित कुछ थोडे- से विश्वासा को छाटी छोटी अल्पसरयक नौकाएँ सफ्टपूण स्थिति म तरती रहती है। ये सार आवेगपूण विश्वास हमारी इच्छा पर जाधारित रहते हैं । इस स्थिति को जितान्त शोचनीय भी नही कहा जा सकता, क्योंकि आखिर- कार जीवन तो जोना ही है और उन सभी विश्वासा का तसगत ढग से जाचने परखने का समय ही कहा है जिन+ अनुसार हमारे आचार यवहार का नियमन होता है ? स्वस्थ आवेगा के अभाव मे कोई जीवित रह ही नहीं सकता। इसलिए वनानिक पद्धति तो स्वभावत हमारी कुछ अधिक गम्भीर और दायित्व पूण मम्मतिया तक ही सीमित रहती है । एक चिकित्सक खुराक के सम्बध म काई राय देने से पहले इस विषय पर विज्ञान ने जो कुछ नान उपलब्ध किया है उसका पूरा पूरा विचार कर लेता है और ऐसा उसे करना ही चाहिए । लेरिन जा व्यक्ति उसकी सराह को मानकर चलता है वह उस सलाह का सत्यापन करान या उसकी जाच करन की स्थिति म नहीं होता, इसके रिए उसक पास समय ही नही, और इसलिए उसे विज्ञान पर नहीं बल्कि अपने इस विश्वास पर भरोसा करना पड़ता है कि उसका चिकित्सर वनानिक है। वितान से ससिक्न समाज ऐमा समाज होता है जिसम जाने माने विशेषज्ञ वनानिक पद्धनिया के आधार पर अपनी सम्मतियां निर्धारित करते हैं किन्तु सामाय नागरिक के लिए तो यह असम्भव ही है कि वह विपना के काय यी स्वय अनुभूति करने के लिए उह दोहराए । आधुनिक ससार म सभी प्रकार के विपया में सम्बधित सुरमित पान का बहुत बडा भडार उपलब्ध है जिसको सामाय व्यक्ति दिशा किसी सोच आधिकारिक मानार स्वीकार कर रता वनानिद पद्धति के उदाहरण है । रितु जम ही पाई प्रवर मावावे विशेषन के निणय निप्प का दृपित पर देता है, वह अविश्वसनीय हो जाता है भ' ही उमर पास वैनानिक उपारणा वा भण्गर ही हो । गर्भावस्था, प्रमव, दुग्धस्रवण के सम्दघम अभी कुछ दिन पहला डॉक्रारी राय पर परपीटन रति का पूरा-पूरा प्रभाव था। उतागण व रिए, उह इस बात पर राजी करने के लिए कि प्राव म निचतरा या प्रयोग लिया जा सकता है, जितन बधिर प्रमाण दने गे करत पडी रनन प्रमाणावी आद यवता इसम विपरीत तथ्य पर उ• राजी वरन के गिन पहनी । योडी दर के गिा माोरजन के इच्छुक पाठाा को यह सगह दी जा सकती है कि परोटि विनान के प्रम्यान विद्वाना न मस्तिप्त की नाप जोग ये आधार पर पुष्पो की अपेगा स्त्रिया को जधिर मूट सिद्ध करन के प्रयन म जिम प्रसार अपन मिदानाम उल्ट पर दिए हैं, इमा अध्ययन पिर भी वानिर पद्धति का वणन करत समय हमारा ध्यान वैनानिका की चरा पर नहीं रहना चाहिए । यनानिर सम्मति एर एमी सम्मति होती है जिग सप मानन का काई वारण होता है, जवनानिक सम्मति एव ऐनी सम्मनि होती है जिगको मा यता का कारण उसकी मम्भाव्य मत्यता 4 बजाय कुछ और ही होता है । १७ गतागम पहर दे युगा महमारा यतमान युग इमी नप्टि गेभिा और विशिष्ट है कि हमारी कुछ गम्मतियो मा मय म यनानिक मम्मतियाँ शुट तप्यार थाना को छोट दता है, क्यापि सामा यना तो यूनाधिव पम विमान वा एप तात्त्विर रक्षण ही है और (मुछ रहस्यवारिया यो छोडार) होगा म अपन दनिक जीवन में स्वत स्पष्ट तय्या का पूणत अम्वीकार पापी पति कभी भी नही आई। मानव सायरलापार प्राप प्रपर क्षेत्र म यूनानिया ने विशिष्टता प्राप्न यी पी पिन्नु यह भारचय की बात है ? उनि विमान के क्षेत्र म गभग छ भी नहीं किया। यूनानिया को एक बहुत वही बौदिर उपरीय थी ज्यामिनि, जिम योग स्ल गिमायतामा पर आधारित निगमनामर अध्यया मानते पे और जिगर गिरा प्रायोगिर गयापन या जाँच-परगी आप यस्ता उर नहा महगूम होती पो। पूनानी प्रतिमा बागमना मर होने व पजाय शिगमना मर ही अपित पो, और मागिए गन्ति मानिया का प्रिय पिय पा । या रे युगाम पूनानी गति का प्राय मग ही रिया ग्या, नरि निगमन प्रति यूनानियामी तीन अभिर मे उपप अप गात्र--विपार धमान और विधि नास्त्र में भी पारम रह और सिमित हारहे। पूनानिया १ देपिएस र सिसकी पुतन पर मोमन', पठा मरण पृष्ठ पर भागे १४ वज्ञानिय परिदृष्टि ने इस जगत को वैज्ञानिया को अपेक्षा कविया की भांति अधिक देखा मारा। मेरे विचार से इसका आगिव कारण यह था कि यूनान म सभी प्रकार का शारीरिक चाय सम्भ्रात लोगो के लिए अनुपयुक्त माना जाता था और इसलिए जिस किमी भी अध्ययन म प्रयोग करना आवश्यक हुआ, वही अध्ययन कुछ अभद्र माना गया । गायद यूनानिया के इस पूर्वाग्रह को इस तथ्य से सम्बद्ध परना कुछ अधिक कल्पनापरव मारम होगा वि नान के जिस क्षेत्र म यूनानिया ने सबसे अधिय वनानिय हान की क्षमता दिखाई वह ज्योतिष शास्त्र था, जिसका सम्बध ऐसे पिण्डा म है जा येवल दस जा सकते हैं पर जिनका स्पा नहीं किया जा सकता। जा भी हो ज्योतिप म यूनानिया ने जितनी खोज की वह निस्स देह बहुत ही प्रासनीय है। बहुत पहढे उहोन यह निश्चित कर लिया था कि पृथ्वी गोल है और उनम से कुछ रोग कापरनिक्म के इम मिद्धात को जानने थे कि सूय और तारा को प्रकट दनिक गति का कारण आराशीय पिण्डा वा परित्रमण नहीं है, बल्यि पृथ्वी का परित्रमण ही इसका कारण है। सिराफ्यूज के राजा जिरो को पत्र रिसत हुए आकमिटीज़ न लिसा या-' समास के अरिस्टाक्स ने एक पुस्तक प्रकाशित की है जिसम कुछ एसी प्राक्कल्पनाएं दी गई है जिनके आधार वाक्या से यह निष्पप निकलना है Fि यह विश्व उससे कई गुना बड़ा है जिसे आहम विश्व कहते है। उनकी प्राक्कल्पनाएं ये हैं कि तार और मूय स्थिर हैं और अविचर रहते हैं, कि पृथ्वी सूय के चारो आर एक वृत्त की परिधि बनाती हुई उसकी परित्रमा करती है और सूय उस वृत्त के पेद्र म रहता है।" इस प्रकार यूनानिया ने न केवल पृथ्वी के दनिक परिममण को ग्बोज कर ली थी, बल्कि ये मूय के पारा आर पृथ्वी की वार्षिक परित्रमा की भी खोज कर चुके थे। कापरनिक्स का इम सिद्धात की पुन • स्थापना का साहम यह जानपर ही हुआ था कि यूनानी लोग इस सिद्धान को मानते थे । पुनजागरण-काल म, जबकि कापरनिकम जीवित थे, यह माना जाता था कि प्राचीन लोग जिस किमी वात को मानते रहे हा वह मत्य हो सकती है रेविन जिम बात वो कभी प्राचीन रोगा म स विसी ने न माना हो उस बात की कोई बात नही हो सकती । मुशे सदेह है कि रिम्टाक्स का सहारा यहि मिग होता तो वापरनिास भी अपना यह मिद्धात प्रतिष्ठित वर पाने । प्राचीन गास्त्रीय अध्ययन वा पिर स प्रचग्न होने से पहले तक लोग अरिस्टारम द्वारा प्रतिष्ठिन सिद्धात को भूले हुए थ । पृथ्वी की परिधि यो नापने के पूणत माय तरीके भी यूनानिया ने सोग निवारे थे। भूगोलवेत्ता एरेटास्थनीज न पृथ्वी की परिधि २५०,००० यज्ञानिक पद्धति के उदाहरण स्टेडिया (गभग २४६६२ मीर) आंपी थी जिग सच्चाई से बहुत अधिर दूर नहीं रहा जा सरता। पूनानिमा म से गर्वाधिक वैचानिर य आरे मिनीज (२५७ २१२ ई० पूर्व) । लियोनार्दो दा विंसा का भांति आमिरीज भी अपन युद-बौर के पारण एक राजा की नजरों म चढ़ गए थ, और लियोनार्दा पी भांति उहें इस यात पी अनुमति मिल गई थी कि व मानव पान की अभिवृद्धि परें। पात पवर यह थी हि पान की उपलधि मानव जीवन से ही की जाए। फिर भी, इस क्षेत्र म उनवे पाय-वराप रियानाडों के पाय-परापा की अपना अधिक विशिष्ट कोटि येथे, क्यादि उहान रोम मी सनाया ये विपद मिरावयूद्ध नगर यी रक्षा परिए अत्यत आश्चयजना यानिय युश्तिया का आविष्यार किया था और अततोगत्वा एवं रोमन मिपारी द्वारा उनकी हया नगर का पतन होन या बाद कर ली गई थी। कहा जाता है मि यह किसी गणितीय समस्या म इतना अधिक तल्लीन थपिउ रामन सिपाहिया के आने का पता भी नहीं चला। आमिडीज़ में यात्रिय आरिप्वारा ये सम्म म परटार ने बहुत ही खेन्पूर्ण विचार व्यक्त किए हैं, उनकी राय म य आरिवार एव सम्भ्रान्त व्यक्ति के लिए उपयुक्त नही पहे जा सकत। फिर भी प्लूटाव आमिडीज को इस आधार पर क्षम्य मानत है कि वह अपन राजा को सहायता थत्यत सरट पी घडी म इन आविष्वारा द्वारा कर रहे थे। आमिडीज न गणित म अपनी बहुन बडी प्रतिभा दिया और यात्रिय आविष्वारा म असाधारण पोल प्रगित किया, जितु विनान पे क्षेत्र म उनका योगदान महत्त्वपूर्ण होते हुए भी यूनानिया पा उगी निगमनामा अभिवति यो प्रति परता है जिसके कारण प्रायोगिक पद्धति या अपनाना उनके लिए माय असम्भव ही हो गया था। स्थतिकी के क्षेत्र म नामिडीज या वाय प्रत्यात है । उग प्रग्यात हाना हा चाहिए । उमका उदगम यूविरड की ज्यामिति जरा स्वयतथ्या स हुआ है और स्वयतथ्य स्वप सिद्ध मान जाते हैं। ये प्रयोगा दाग मिस परिणाम नहीं होना 'पान पटिग याडोनीपर उनी पुस्तर परम्परा के अनुसार राम्राट हियरो ये राजमुगुट की समस्या का समाधान सोउन र परिणामस्वरण प्रस्तुत हुई थी। राजाट मन्य ध म य स देह था पि वह शुद्ध साने का बना हुआ नहीं है। जसा सभा राग जानते हैं, आमिडीज ने इस समस्या का समाधान अपन गुगरपान म पोज निपारा था। जो भी हो, आनी इरा पुम्तर म उहाने इम प्रशार ये मामरा ये राम्ब प मजा पनि सुझाई है वह पूणत माय है, और यद्यपि पुस्तर की रचना निगमनारमा पनि म अभ्युपगमा व आधार पर की गई है, फिर भी इस पारणा को स्वीकार करा ही पड़ता है हि आ मिडीउ प्रयोगों के माध्यम से वज्ञानिक परिदृष्टि की इन अभ्युपगमा को निधारित कर सके हाग । आर्कमिडीज़ की सारी रच Tओ म से शायद यही पुस्तक (आधुनिक अर्था म) वनानिक कह जाने के लिए सवाधिक उपयुक्त है। मितु आर्कमिडीज के बाद बहुत जल्दी यूनानी रोगाम जा भी वैनानिए शोध की भावनाएँ प्राकृतिक तत्त्वा के सम्बध म थी उनका हास हो गया और यद्यपि मुसलमाना द्वारा जलेक्जडिया पर अधिकार किए जाने के समय तक शुद्ध गणित का विवास होता रहा फिर भी प्राकृतिय विनान म काई प्रगति नहीं की जा सकी और जो कुछ इस क्षेत्र म सर्वोत्तम ढग से किया भी जा सका वह भुला दिया गया, जसे अरिम्टाकम का सिद्धान्त । यूनानियो की अपेक्षा अरब राग अधिक प्रयोग प्रिय थे विरोपपर रसायन शास्त्र के क्षेत्र मे । उह इस बात की आशा थी कि वे होन कोटि की घातुआ को सोने म रूपान्तरित कर देंगे पारस पत्थर खोज लेंगे और आवह्यात तैयार कर लग । अशत इस कारण भी रासायनिक मोघ का काय बडे उत्साह से किया जाता था। समूचे उधकार युग के दौरान सभ्यता की परम्परा मुख्यत अरब लोगो द्वारा कायम रखी गई और अधिसा रूप में राजरवक्न जस ईसाइयो ने मध्य युग से उपलब्ध होने वाला विनान विषयक नान उही से प्राप्त किया। किन्तु अरब लोगो में एक कमी थी जो यूनानिया की कमी से बिल्कुल उलटी थी। वे रोग सामाय सिद्धाता के बजाय असम्बद्ध तथ्या की खोज करते थे और जिन तथ्या की खोज कर रेत थे उनसे सामा य नियमा की अनुमिति कर सकने की शक्ति उनमे न थी। यूरोप म जब पहले-पहल पुनर्जागरण की लहर के मामने पुरानी पण्डिताऊ पद्धति के पर सिसक्ने लगे तब कुछ समय के लिए सभी प्रकार के सामायीकरण और सभी पटना के प्रति एक प्रकार की अरचि उत्पन हो गई। मानन में इस प्र “हरण देये जा सक्त हैं । उह कुछ अदभत तथ्य पस पर यदि वे किसी बात का खडन 1 १७ वज्ञानिद पद्धति के उदाहरण आयों (१५६८-१६८०) म हो पूराप से प्रतिष्ठित हाती है। ना नमवालीन पार (१५७१-१६००) म भी कुछ कम मास यह पद्धति शिवार ती है । पर की व्याति उन तीन नियमा दे कारण है दहान हो पहर-महा * बात बीयाज की थी कि पृथ्वी सूप रे बाग आर र वनों व घूमती है बना म नहीं। आज का गिए नोरम तय म र मी या वजन नही है कि पृथ्वी का नया एक रीर वन है किन्तु डागा प्राचीन मा यवानों ममारित ये दर शियह बल प्राय अविसनीय ही थी रिश भी भारतीय विनया बना विनी जटिट अगवा और विनो रमा पर घर मरता है। यूनानियाँ री दृष्टि म ग्रह दबा 7 और मारिए उनै अनिवायत पूर वो म ही धूमना चाहिए। बना और अधिवगे म भनी मौर्यानुभूति का वाई ठेस नहीं भाती थी किन्नु जटी, विषम करा मनमो वि पृथ्वी की कथा वानर म है. उनश रहा मरा पगा। रगरिए सौदयानुभूतिमूर पूधाम्हो स मुक्त प्रया के लिए न रिना पर बमाचारण म गहन वनित मावना को वादा थी। पर योर परिया न हो म तम्ब का प्रतिषित किया कि पृथ्वी नया अप भूय वै चारा यार चक्कर गात हैं। कॉरनिकन न तथ्य की पापा की यौ नौर, जमा कि हम देख चुन है यूनानिया न मी दन म्वीकार दिया था, जिन्तु योग इन तथ्य के प्रमादेन म ना नहीं हुए थे। वापरनिकम व पास ठा मचमुच वपन विचार की पुष्टि लिए बाई मीर तय नहीं थे। यह रहना कि कॉपरनिकम की परिकल्पना वास्वीर चरन म पर गुद्ध ना- निर प्रेरणाला और प्रयानों में ही प्रेग्नि या उमा य चाय न शायद मुर पगपात करना गगा। एया पता है कि अपनी युवायम्मा म निश्चित रूप म वह सूप गामना करना या, योर इसलिए इनन महान रवठा के उपयुक्त म्यान उम इस विद का देद्रही समय पड़ता था। नितु इस तथ्य सौ बार लिए ना गम चेवर वनानि प्रशासन और प्रेरणाएं ही प्ररित कर मी हॉगी दिग्रहा को कशा बत्त नी दोघ वन हैं। सपन पूरा प म बगनित पनि परम तथा उनमें भी अधिक गलिया म दागने को मिली है। यद्यपि ना ममय म परान कौं अपणा आज बात यघिद पान प्राप्त हो चुका है, फिर भी पदति म कार नाविर अनिवद्धि नहीं । विषिष्ट तय्या द प्रेमामय लाग परिशुद्ध परिमाण नियमा पोल्यापना लय, निरे द्वारा मावा विशिष्ट तयों कापूवरयन वियर र मरता था। इनका स्थापनासाम इनके समरीन मारा दरम्न टेगरा, मान इस बार भी दिउन निप्पप रम युग र विश्वामा एम्बनाउ बढ़त ही टेन पहुँचान वारे य। किन्तु इस वज्ञानिक परिदृष्टि आघात का एक आशिक कारण यह भी था कि आप्नत्व में श्रद्धा के कारण उम युग के विद्वान रोग अपने शोधकार्यों को पुस्तकालयो तक ही सीमित रखने म समय होत थे और उन लोगा को इस सुयाव से बहुत ही क्लेश हुआ कि जगत को ययावत जानने समझने के लिए उसरा प्रेक्षण करना भी आवश्यक हो सकता है। यह स्वीकार करना ही होगा कि गैलीलियो एक प्रकार से लावारिस जैसे ही थे। फिर भी बहुत छोटी अवस्था मे ही वह पिमा मे गणित के आचाय हो गए थे। वितु चूकि उनका वेतन केवल साढे सात शिलिंग प्रतिदिन था, इसलिए ऐसा लगता है कि वह यह नही समयत थे कि क्सिी बहुत सम्भ्रात आचरण की आशा उनसे की जा सकती थी। उहाने विश्वविद्यालय मे टोपी और गाउन पहनने की प्रथा के विरुद्ध एक पुस्तक लिखना प्रारम्भ किया। यह पुस्तक स्नातक विद्यार्थिया के बीच शायद लोकप्रिय हुइ हो, किन्तु उनके सहकर्मी आचार्यों न उसे गम्भीर आपत्ति की दृष्टि से ही देखा। ऐसी स्थितियो की सृष्टि करने में गलीलियो को आनद आता था जिनमे उनके सहकर्मी मूख मालूम हो । उदाहरण के लिए अरस्तू को भौतिकी के आधार पर वे लोग इस वात पर जोर देते थे कि दस पाण्ड वजन वाला पिण्ड एक ही ऊँचाई से धरती पर गिरने म एक पौण्ड वजन वाले पिण्ड की अपेक्षा दशमा समय हो लेगा। इसलिए वह पिसा के स्तूप पर दो पिण्ट लेकर चढे जिनम एक का वज़न दस पौण्ड और दूसरे का वजन एव पौण्ड था और जिस ममय आचाय रोग बड़े सम्भ्रान्त ढग मे अपने विद्यार्थिया की उपस्थिति मे अपने-अपन व्याख्यान-वक्षो की ओर जा रहे थे ठीक उमी समय गलीलियो ने उनका ध्यान आर्पित क्यिा और मीनार के सिरे पर से दोना पिण्ड नीचे उनके कदमो के पास गिरा दिय । दोना पिण्ड ठीक एक माय धरती पर गिरे। फिर भी आचार्यों ने यही माना कि उनकी आयो ने उह धोखा दिया होगा क्यादि यह असम्भव था कि अरस्तू की बात गलत हो। एक अय अवसर पर वह और भी अधिक दुस्साहसी वन गए । घोन के गवनर न एक निक्पण मगीन का आविष्कार दिया था और इसका उस बहुत गव था । गोलियो ने कहा कि वह मगीन और चाह जा कुछ कर मो, निश्पण नहीं कर सकेगी और उनकी बात सही मिद्ध हुई। इस घटना के वाद गवनर प्रवर अरस्तूवादी बन गया। गलोलियो की गेवप्रियता समाप्त हो गई। उसके भापणा म रोग उसकी हसी उडान की कोशिश करते जमा ग्नि मे आइमटीन के साथ भी कभी-कभी दिया गया है। तव गलीलियो ने एक दूरबीन बनाई और उस दूर बीन से आराम वृहस्पति के चांद देखने के लिए आचार्यों को आमंत्रित वज्ञानिक पद्धति के उदाहरण १६ किया। आचार्यों ने इस आधार पर यह आमरण अस्वीकार कर दिया कि अरस्तू ने कही भी इन उपनहा की चर्चा नहीं की और इसलिए जो कोई भी यह सोचता है कि उसने इन उपग्रहा को देखा है वह निश्चित रूप से भूल कर रहा है पिसा की झुनी हुई मीनार से किए गए प्रयोग द्वारा गलीलिया का पहला महत्वपूर्ण काम प्रकाराम आया। यह काय था गिरते हुए पिण्डा के नियम की स्थापना, जिसके अनुसार सभी पिण्ड निवात में एक ही रफ्तार से गिरते हैं और एक निश्चित समय के बाद उनका वग उस समय का समानुपाती हो जाता है जिसम उनके पतन की गति जारी रही, और उनके द्वारा तय की गई दूरी उस समय से वग के समानुपात मे होती है। जरस्तू ने कुछ इमसे भिन्न स्थापना की थी, किन्तु न तो अरस्तू ने और न उनके उत्तराधिकारिया न ही लगभग दो हजार वप तक यह जानने का प्रयन किया कि जो कुछ अरस्तू न कहा था वह सही था या नहीं। अव एसी सोज करने का विचार ही एक्दम नया मालूम पडता था और आप्तत्व के प्रति गोलियो की अश्रद्धा बहुत ही निदनीय और घणित समझी गई। वेशक उनके अनेक मित्र भी थे, जो ऐसे लोग थे जिहे किसी व्यक्ति मे बुद्धिमानी देखकर हप होता था। किन्तु पाण्डित्य- पूण पटा पर पायद ही ऐमा कोई व्यक्ति रहा हो, और विश्वविद्यालय की सम्मति गैलीलियो की खोजा के प्रवर विरोध म थी। जसा कि सभी को मालूम है अपने जीवन के अन्तिम काल मे गरी- रियो का सघप धार्मिक यायालय से उनकी इस मा यता के कारण हुआ कि पृथ्वी मूय वी परिक्रमा करती है । पहले भी एक छोटा मोटा सघप हा चुका था जिसम गोलियों को अधिक हानि नहा उठानी पड़ी थी, किन्तु सन १६३२ मे उहान वापरनिक्स और टोलमी की पद्धतिया के सम्बध मे एक सवादात्मक पुस्तक प्रकाशित की जिसम पोप द्वारा कही गई कुछ बातो को उहाने सिम्ली- सियम नामक पात्र में मुख से कहलान की धष्टता की। अभी तक तो पोप गलीलियो के प्रति मत्री भाव रसता था, जितु इस बात स वह अत्यत युद्ध हो गया। उस समय गीरियो पलोरेंस के डयूक के साथ मित्र रूप स रह रहे थे। धार्मिक यायालय ने उहें रोम आने का आदेश दिया जिससे उन पर मुक्दमा चाया जा सके और डयूक का धमकी दी गई कि यदि उसन गरी रिया को अपनी गरण म रखा तो उसे भी दण्ड दिया जाएगा। इस समय गलीलियो की अवस्था ७० वप की थी। वह बहुत बीमार थे और उनकी आता की रोशनी जा रही थी। उहोंने एक डॉक्टरी प्रमाण-पत्र इस आशय का भेजा कि वह यात्रा करने योग्य नहीं हैं। इस पर धार्मिक न्यायालय ने अपना एक डाक्टर यह आदेश देकर भेजा कि जसे ही गलीलियो की हालत ठीक हो, उह २० वज्ञानिक परिदृष्टि जजीरा मे बाधकर लाया जाए । यह खबर पाकर कि ऐसा आदेश जारी किया गया है, गलीलिया स्वय ही चल पडे। धमक्यिा द्वारा उह अपना अपराध स्वीकार करने के लिए विवश किया गया। धार्मिक यायालय का फमला एक मजेदार प्रलेस है स्वर्गीय विनसेजियो गलिली के पुत्र गैलीलियो, फ्लोरेंस निवासी, अवस्था ७० वप चूमि इस धमपीठ द्वारा सन १६१५ म इसलिए तुम्हारी निदा की गई थी कि अनेक रोगा द्वारा प्रचारित इस झूठे सिद्धात को तुमने सही माना कि सूय विश्व के केन्द्र में अचल है और पृथ्वी उमकी परित्रमा करती है और पृथ्वी को एक दनिक गति भी है, इसलिए भी कि तुमने इही सिद्धान्ता की गिक्षा दकर अपने कुछ शिष्य तयार किए, इसलिए भी कि इसी विषय पर तुमने जमनी के कुछ गणितनो के साथ अपना पर यवहार जारी रखा इसलिए भी कि सूय के धबो के सम्बंध में तुमने कुछ पत्र प्रकाशित किए जिनम तुमने इसी सिद्धात को एक सत्य सिद्धान्त के रूप म प्रतिष्ठित रिया इसलिए भी कि पवित्र धम-ग्रथा से बराबर उदधत की जाने वाली आपतियो का उत्तर देते हुए तुमने उन घम ग्रथा की व्याख्या अपने अर्थों के अनुसार की और धम अथा की अवमानना की और चूकि तुम्हारे द्वारा एसा किए जान पर पत्र म्प में लिखी हुई एक रचना की प्रति तुम्हारे सामने उपस्थित की गई जिसे तुमने एक ऐसे व्यक्ति को लिखा गया अपना पत्र होना स्वीकार किया जो पहले तुम्हारा शिष्य था जिसम कापरनिक्स की प्राक्कल्पना के अनुसार तुमने ऐसे अनक वक्तव्य दिए हैं जो धार्मिक पुस्तको के शुद्ध अथ और आप्तत्व के विरुद्ध हैं इमलिए (इससे उत्पन्न होने वाली और वधमान, अव्यवस्था और शतानी को जो पवित्र धार्मिक मत को हानि पहुँचा रही है रोक्ने की इच्छा से प्रेरित यह पवित्र न्यायालय) पवित्रात्मा पोप और महामहिम राड वाडिनल के इस सर्वोच्च विश्व धम न्यायालय की इच्छानुसार सूर्य की स्थिरता और पृथ्वी की गति- गीलना-सम्बधी दोना प्रस्तावनाओं की समीक्षा धार्मिक समीक्षको द्वारा निम्नरिखित रूप में की गई १ यह प्रस्तावना कि सूय इस जगत का केन्द्र है और अपने स्थान म अचल है, मूखतापूर्ण है दाशनिक दृष्टि से यूठी है और नियमत अधामिर है क्याकि यह स्पष्टत घम-ग्रया के विपरीत है । २ यह प्रस्तावना कि पृथ्वी इस जगत का केंद्र नहीं है और दिया जाए तानिर पद्धति के उदाहरण २१ न अचर है, बल्कि वह गतिशीर है और उसकी एक दनिय मनि भी है, मूखतापूर्ण है, दानिक दष्टि से यूठी है और धम शास्त्र की दष्टि से विचार करन पर इसम वमन्मे-बम निष्ठा की श्रुटि है। किन्तु चूकि उस समय तुम्हारे साथ दयापूण व्यवहार करन के विचार से फरवरी सन १६१६ के २५वें दिन आयोजिन धार्मिक महामघ मे पवित्रात्मा पोप की उपस्थिति मे यह आदेश दिया गया था कि महामहिम राट काटिनल वेलामिन तुम्हें इम उक्त मूठे सिद्धान्त यो विकुल त्याग देन का धमदिरा दें, और यदि तुम उसे न माना तो पुण्यामा पोप के धम पीठाधिकारी द्वारा तुम्ह आदेश कि तुम उक्न यूठे सिद्धात को त्याग दो, दूसरा या उसी न दो, न उमा मण्डन करो और इस वादा के न मानन पर तुम्ह वारावास का दर दिया जाए और चूकि दूसरे दिन महामहिम लाड वाडिनल बरामिन की उपस्थिति म राजमहल में उक्न आटे का काया चयन करत हुए उक्न राड काडिनर द्वारा तुम्हारी सामा य भत्सना किए जान के बाद, एक लेम्य प्रमाणक और माधिया के सामने घमपाटाघिवारा द्वारा तुम्ह आदेश दिया गया था कि तुम उक्त यूठे मिताल को त्या दा और भविष्य म किसी प्रकार भो न ता उमका मानन करो और न उसकी शिक्षा दा, न मौखिक म्प से और न लिखित म्प म, और इम याद का पाग्न वरन का वचन लिए जाने पर तुम्ह छोड लिया गया था। और, इस उद्देश्य से कि इतना पानक दुष्ट सिद्धात विल्धुर जर मूल से समाप्त कर दिया जाए और प्रत्यक्ष म्प स भी इसका प्रचार या विकाम क्यारिष स य को हानि न पहुँचान पाए पवित्र धम-सघ स एव यादेश प्रचारित किया गया जिम द्वारा वे सभी पुस्तकें अवध और निषिद्ध घोषित की गई जिनमे इम सिद्धान्त की विवचना की गई है इस सिद्धान्न को यूटा तथा पवित्र देवी धम ग्रया के नितान्त प्रतिका पापित दिया गया। और चूकि उस समय के बाद पलारम म प्रकाशित की गई एष पुस्ता गत वप निसरी है, जिसके नाम और मुखपृष्ठ म यह प्रकट हाता है रि तुम उसक लेखा हो, जिसका नाम है, 'दि डायलाग ऑफ गोरिया गलिंग, ऑन टिटू प्रिंसिपर मिस्टम्म ऑफ दि वल्ड-दि टारिमिर एण्ड कॉपरनिकन', और धूनि पवित्र घम-सघ या मालूम हुआ दि इस पुस्तक के प्रकाशन के फ्रस्वरूप पृथ्वी की गतियोलता और सूर्य की स्थिरता-मम्ब पी यूठे सिद्धान्त दिना.

२२ यज्ञानिक परिदृष्टि दिन प्रचरित होने जा रहे है, इस पुस्तक पर सावधानीपूर्वक विचार दिया गया है और उसम ऊपर पहे गए उस आदश का स्पष्ट उल्लपन दिखाई देता है जो तुम्हे दिया गया था, क्योकि इस पुस्तक म तुमने उक्त मिदात का समयन किया है जिसे पहर हो, और तुम्हारी उपस्थिति म निदनीय और स्याग्य घोषित किया जा चुका है, यद्यपि इसी पुस्तक म बनेर प्रकार से घुमा फिराकर तुमन यह विश्वास पैदा करने का प्रयान लिया है कि यह सिद्धान्त अभी अनिर्णीत है और केवल सम्भाव्य है, जवषि ऐसा रहना भी समान रूप से एक गम्भीर त्रुटि है क्यापि निस लिसी सम्मति के बारे म पहले ही और अन्तिम रुप म यह घोपित किया जा चुका है कि वह धामिर म यो के विपरीत है, यह किसी प्रकार भी सम्भाय नहीं हो सक्ती, इसलिए, हमारे आदेश से तुम्ह इस धमपीठ के सामने उपस्थित किया गया है, जा तुमने पयपूवर पूछे जान पर यह स्वीकार किया है कि उत्त पुस्तक तुम्हारे द्वारा सिवी और छापी गई है। तुमने यह भी स्वीकार किया है कि तुमन इस पुस्तक का लिखना उक्त आदश लिए जान में बाद दस या बारह वर्ष पहले प्रारम्भ किया था यह भी, कि तुमने इस पुस्तक के प्रकाशित करने का लाइसेंस मांगा और राइसेंस देने वाला का इस बात की सूचना नहीं दी कि तुम्ह वक्त सिद्धात को न मानन, उसका समथन न परने और उसकी शिक्षा न देने का आदेश दिया जा चुका है। तुमने यह भी स्वीकार किया है जि इस सिद्धात का यूठा साबित करने वाले तों के बारे म पाठक यह मोच सकता है कि उसकी शब्दावली मिदात के प्रति विश्वास उत्पन करने म अधिक प्रभाव पूर्ण सिद्ध हाने वाली है और उसका वहन उतनी आसानी से नहीं किया जा सकता। इसमें बचाय म तुमने यह कहा है कि ऐमा वरन म तुमस भू" हो गई है जो (तुम्हारे क्यानानुसार) तुम्हारा अभिप्राय नहीं था और यह भूर सवाद रूप म पुस्तक लिखने में पारण तथा अपने गूढार्थों के सम्बध में प्रत्येक व्यक्ति की स्वाभाविक असावधाना और असत्य प्रस्तावनाओ के पर मे भी पटुतापूण तथा प्रक्ट रूप में विश्वसनीय तर प्रस्तुत भरल म सामाय जनो की अपेषा अपने-आपरा अधिर बुशत सिद्ध करने के परिणामस्वरूप हो और अपने बचाव के लिए तैयारी करन का सुविधाजनर समय दिए जाने पर, नुमने लाड काडिनल वलामिन में हाप का वज्ञानिक पद्धति के उदाहरण २३ रिसा हुआ एक प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया जिसे, अपने क्यनानुमार, तुमने म्बय प्राप्त किया था ताकि तुम अपने शत्रुआ द्वारा प्रचारित उन यूठे आरोपी के विरुद्ध अपनी रक्षा कर सको जिनम यह कहा गया था कि तुमने शपयपूर्वक अपनी सम्मनिया को त्याग दिया है और तुम्हें धमपीठ द्वारा दण्ड भी दिया गया है, इम प्रमाणपत्र में यह घोपणा की गई है कि न तो तुमने अपनी सम्मतिया को शपयपूर्वक त्याग दिया है और न तुम्ह दण्ड दिया गया है, बल्कि पवित्रात्मा पोप द्वारा की गई और पवित्र धम सघ की निषेधानाआ द्वारा प्रचारित घोपणा तुम्हें मुनाई गई जिसमे यह कहा गया है कि पृथ्वी की गतिशीलता और सूर्य की स्थिरता-सम्बधी मिद्धान्त पवित्र धम ग्रयो के प्रतिकर है, और इसलिए न तो उसे स्वीकार किया जा सक्ना है और न उसका समयन किया जा सकता है इसलिए, चूकि इस प्रमाणपत्र में आदेश के दा अन्तनियमा का--अयान 'तिमा न देन योर किमी प्रकार भी का-उल्लब नहीं किया गया इमरिए तुमन यह ता पा किया कि हमे यह विश्वास करना चाहिए कि पिछले चौदह या सालह वर्षों की रम्बी अवधि में यह अतनियम तुम्ह याद नहीं रह गए और यही कारण है कि जब तुमने अपनी पुम्नक प्रकाशित करने की अनुमति मागी तब इन आदा के मम्बघ म तुम मौन ही रह, और यह भी कि यह तक तुमने अपनी भूर की माफी के लिए नहीं पा क्यिा, वल्लि इसलिए कि इस भूर का कारण झूठे आत्मगौरव की महत्त्वाकामा को माना जाए न कि किसी प्रकार की दुर्भावना को। किन्तु तुम्हारे द्वारा प्रस्तुत किए गए प्रमाणपत्र ने ही तुम्हारे अपराध को बहुत अधिक गम्भीर बना दिया है, क्योकि इसम यह घोषणा की गई है कि उक्त मम्मति पवित्र धमग्र या के प्रतिकूल है और फिर भी तुमन उस सम्मति का विवेचन करन और तक करन का दुम्माहम दिया है कि यह सम्भाव्य सम्मति है। धोखा देवर और चाराको स तुमने जो राइसॅम प्राप्त कर लिया है उमम भी तुम्हारे अपराध का हल्ला करनेवाली कोई बात नही है क्योकि अधिकारिया को तुमने उस आदेश की सूचना नहीं दी जा तुम्हारे पर लागू किया जा चुका या। किन्तु चूकि हमें ऐमा रगा कि तुमन अपने मन्तव्य के सम्बध म मम्पूण मय का उदघाटन नहीं किया इसलिए हमने यह आवश्यक समया मि तुम्हारी मरी मानि परीक्षा ली जाए और इस परीपा के दौरान (तुमन जो कुछ स्वीकार कर रिया है और जिमा २४ वज्ञानिक परिदृष्टि विवरण नुम्हार उक्त मतव्य र सदभ में तुम्हारे विरत ऊपर दिया जा चुका है उसे गितुल अलग रखने हुए) तुमने एक अच्छे क्योलिक की मांति प्रश्नो उत्तर दिए। इसलिए, तुम्हारे मामले के सभी पक्षो का दख समझार और उन पर गम्भीर विचार करके, तुम्हारी उक्त स्वीतियो और बचावा नया उन जय सभी दाता को ध्यान में रखते हुए जिन पर विचार किया जाना चाहिए, हम इम फसले पर पहुंचे हैं कि तुम्हारे विरुद्ध निम्नलिखित अन्तिम निणय घोपित किया जाए अत प्रभु इसा मसीह तथा उनकी परम पवित्र माता कुमारी मरी रे परम पवित्र नामा का स्मरण कर उन्हें साक्षी बनाते हम अपने इस अतिम निणय को घोषणा करते हैं, जिसे पवित्र घमशास्त्र के श्रद्धेय धर्माध्यक्षो तथा दोनो ही विधाना के आचार्यों तथा असमराका परिषद के साथ न्यायाधीश क रुपम बठकर हमने उन विषयो और विवादों के सम्बध में लिखित रूप म प्रस्तुत किया है जो एक और पवित्र धमपीठ के राजस्व पाया धिकारी दाना विधाना आचाय महिमामय काले सिंतीरियोवानी तथा दूसरी ओर तुम-~गैलीरियो गरि अभियुक्त और यथावत स्वीकृत अपराधी प्रतिवादो के बीच यामाग्य में विचाराम प्रस्तुत लिए गए थे हमने निणय किया है और इस निणय की घोषणा करते हैं कि तुम-~-उक्त गलोलियो... उन बाता के कारण जिनका विवरण इस प्रलराम किया गया है और जिह यथाक्त रूप म, तुमने स्वीकार किया है इस पवित्र धमपीठ की दष्टि म अपन आपको अपमिद्धात का माननवाला बना चुके हो, अर्थात तुमन इस सिक्षात पर (जो झूठा है और पविय तथा दवी पम-ग्रया में प्रतिकूल है) विश्वास किया है और इसे माना है कि मूय इम जगत का केद्र है और वह पूर्व से पश्चिम की ओर गतिशी नहीं है तथा यह कि पृथ्वी गतिशील है और इस जगत का कद्र नहीं है तुमने यह भी माना है कि कोई मम्मति पवित्र धमग्रथा के प्रतिकूल पापित दिए जाने के बाद मी मानी जा सकता है उसका समयन किया जा सरना है और उसे सम्भाव्य बताया जा सकता है, और फलन इम प्रकार के अपचारियों के विरुद्ध पवित्र धदिगो द्वारा और अय मामा य और विशिष्ट सविधानों द्वारा प्यादिष्ट और घोपित सभी प्रकार की निदा और शाग्नि का पात्र तुमन अपन आपको बना लिया है। हम चाहते हैं कि इस निदा और शास्ति से तुम्ह मुक्त वज्ञानिक पद्धति के उदाहरण २५ कर लिया जाए, बशत मि तुम गृद्ध हृदय से और कृतिम निष्ठा के साथ हमारी उपस्थिति में उपयुक्त भूला और अपसिद्धाता को तथा अय उन सभी भूला और अपसिद्धा ता को, जो कैथोरिक और पोपपरक रोम के चच के प्रतिकूल हा गपथपूक्क त्याग दो उसकी निदा करो और उससे घृणा करो-उस रूप म, जो अब तुम्ह नीचे बताया जा रहा है। लेकिन अपनी इस हानिकर और घातक भूल तथा अतिक्रमण के बावजूद तुम विल्कुल दण्डमुक्त न रह जाओ, भविष्य के लिए तुम्ह अधिक सचेत बनाया जा सके और इस प्रकार के अपचारो से दूर रहने के लिए तुम दूसरो की दष्टि म एक उदाहरण बन जाओ, इमलिए हम यह आदेश दत हैं कि तुम्हारी पुस्तक 'डायलाग्स ऑफ़ गलीरियो गरिरी' एक सावजनिक गासनादेश द्वारा निषिद्ध घोषित कर दी जाए और तुम्ह हम इस पवित्र धमपीठ के औपचारिक कारावास मे तब तक रखे जाने का जादेगा देत हैं जब तक तुम्हारा उक्त कारावास में रखा जाना हम अभीप्ट समय और हम आदेश देते है कि कल्याणकारी तपश्चया वे स्प म तुम अगले तीन वर्ष तक प्रति सप्ताह एक बार प्रायश्चित्त मूल्य सात स्तोत्रो का जाप पिया करो । ऊपर वह गए दण्ड अथवा तपश्चया को पूणत अथवा आशिक स्पम कम करने, समाप्त करने अथवा उसे और हल्ला करने का अधिकार हम अपने हाथों में सुरक्षित रखत है। इम दण्ड के फास्वरूप शपथपूवक अपसिद्धात के त्याग का जो मूत्र घोषित करने के लिए गलीलियो को विदा किया गया था, वह इस प्रकार था- महामहिम एव श्रद्धास्पद राड काडिनलो व धम भ्रष्टता के विरुद्ध विचार करन वाले विश्वव्यापी ईसाई गणतत्र के सावजनिक यायाधीगो | आपो सम्मुस व्यक्तिगत रूप स याय विचार के लिए राया गया मैं गलीलियो गरिरी, पोरेंमवामी स्वर्गीय विनसेंजियो गलिली का पुत्र, अवस्या ७० वप, आपके सामन युका हुआ, अपनी नासा के मामन पवित्र तिव्य वार्ता की पुग्नका को देख रहा हूँ जिहें अपने हाथ से छूबर में पयपूवव कहता हूँ कि मैन सवना यह विश्वाम दिया है, और भगवान की अनुकम्पा म भविष्य म भी उस प्रया नियम पर विश्वास वरंगा जो पवित्र क्यालिक और रोम के पाप का चच माय मानता है, जिनकी Pि और उपदेश देता है। किन्नु चूकि इस पवित्र धमपीठ द्वारा मुये यह धर्मादेश दिया गया है वि में उस असत्य सम्मति को दिल्लुर त्याग दू जिमम यह माना वैज्ञानिक परिदृष्टि गया है कि सूय इस जगत का केन्द्र है और अविचर है, और इस असत्य सिद्धात का रिसी प्रकार भी मानन, उसका समर्थन करने अथवा उमको शिक्षा देने मे मुये मना किया गया है और चूकि मुझे यह बताए जाने के बाद भी कि उक्त सिद्धात पवित्र धम प्रयों के प्रतिपूर है, मैंने एक पुस्तक लिखो और छापी है जिसमें मैंने इसी निषिद्ध सिद्धात का विवेचन किया है और बिना कोई समाधान प्रस्तुत किए उसके समयन म सबल तक प्रस्तुत पिए है, और इसलिए यह विषय लिया गया है कि मेरे आधी हान की गम्भीर शकाएँ हैं, अयात मैंन यह माना है और विश्वास किया है कि सूय इस जगत का रेद्र है और अविचर है तथा पृथ्वी जगत का केन्द्र नहीं है और गतिशील है, इसलिए आप महामहिम यायाधीशो के मस्तिष्क से तथा प्रयेक पैथोलिक ईसाई व मस्तिष्क स अपने विरद्ध बनी हुई इस गम्भीर मामा को दूर करन के लिए में प्रस्तुत है अत गुर हत्य और अमिम निष्टा के साथ मैं उक्त भूरा और अपमिद्धाता का तथा सामा यत एसी प्रत्यक अय भूल और पय का जो उक्त पवित्र चच के प्रतिकूल है, मैं पयपूचा त्याग करता हूँ उसी निदा करता हू और उसस घृणा करता है और शपथपूर्वक प्रतिमा परता हूं कि मैं भविष्य मे कभी भी न ता मौखिक रूप से मोर न लिखित स्प से एसी कोई बात रहूँगा या प्रतिष्ठित कहगा जिस कारण मेरे विस्त किसी प्रकार का वा उत्पन हो सके बलि यदि कभी मुझ किसी अपधर्मी का अथवा ऐसे व्यक्ति का पता चला जिसपे अप- मिक्षातवादी होन की का हुई तो मैं उसकी निला इस पवित धमपी3 के मामने अथवा जहाँ कही भी मैं हाऊगा वा क धार्मिक पायाधीश के सामन करूंगा। इमरे अतिरिक्त मैं शपथपूयर वचन देता है कि जो तपश्चधा मेरे रिए इस पवित्र धमपीठ द्वारा निर्धारित की गइ है अथवा की जाएगी उमरा पालन पूरी तरह कगा। किन्तु यदि कभी ऐसा हो कि मैं अपन उक्त वचना, अपनी शपथा और निपूण स्वीतिया का उल्लघन करे (जिससे भगवान बचाए) तो मैं अपने आप उन सभी यातनामा और दण्डा को भोगूगा जिनकी आनप्ति और घोपमा पवित्र धर्मादेगा तथा अय सामाय और विशिष्ट सविधाना द्वारा इस प्रकार के अपचारों विद्ध की गई है। अत भगवान और उनकी पवित्र दिव्य वार्ता प्रय मेरी सहायता करें जिह अपन हाया स छूबर मैं, उपरिलिखित गलगियो गरिलो, न गपथावर अपगिताताका त्याग दिया है, और पर २७ बनानिर पद्धति में उदाहरण ग्येि अनुमार अपने आपका वचनबद्ध कर लिया है, और जिम मागोम्प मे अपन ही हाया मैंने अपनी स्वीतिमूचक अपना हम्नायर इम प्रस्तुत पमिदातन्याग प्ररेस म किया है जिसे मैंने गण मम्बर पटा है। राम स्थित मिनवा के कानवेंट म २२ जून, १६३३ ई० को मैं, गली- लिया गीि, न अपने हाया पाक्त ढा मे पयपूर्वक अपमिदान का त्याग किया है।' यह भय ना है कि पथपूवक अपमिद्धाल के दम त्याग-पन को पढन दे पाद गगरिया ने धीम म्बर म 'एपर सा मूव' कहा था। यह तो दुनिया ने कहा था, गगरियान नहीं। धामिर पायालय म यह कहा गया था कि गलीलियो का दिया गया दण्ड 'दूमरा को नम प्रकार वे अपचार स दूर रहन ने लिए एक चेतावनी' होना चाहिए। कम-से-कम जहा तक इटगे का सम्बघ या इस उद्देश्य म मफरता मिली यो। गैलीरिया इटरी की अतिम महान मानान थे। उनके वार आज तक कोई भी इटीवामा इस प्रकार में अपचारा म समय नहीं हा मका । यह नहीं कहा जा माना कि गरीरिया में ममय म अब चच म वतृत वडा परिदनन हा गया है। जहाँ कही चव की मना जम आयराट और बोस्टन म वहा याज भी नए विचाग स युन मानिय निपिद्ध है। गीपिया और घामिर न्यायाग्य के बीच का यह सघप वेव स्वतत्र विचार और कट्टरपयो के बीच का अपवा विनान और घम के बीच का भयप नहीं है यह मघष निगमनात्मन और नागमनामक भावना के बीच का सघप है । जागग निगमन का भान प्राप्ति की पद्धति मानन हैं उन्हें अपन आधार पाप जपत्र-पाप किमी पवित्र प्रथम-बोलने हात हैं 1 प्ररणामूला पुस्तका स निगमन की पद्धति मय मिद्धिक रिए विधिवत्ताआ, ईसाइया, मुसलमाना और साम्यवादिया द्वारा अपनाई जाती है। चूकि जब कभी निगमन के आधार- वावया पर होगका उपन को जाता है तभी नान प्राप्ति ये एक साधन के म्प मदम पद्धति का निवाग निकर जाता है इसलिए पवित्र ग्रयो के आप्नव पर प्रश्नचिह्न लगाने वाला विन्द्ध निगमन पद्धति पर विश्वाम परन वाला का उपर पटना आवाया ही है। गगरियो ने अरस्तू और धम ग्रया में विद्ध प्रश्नचिह्न पाए और इस प्रकार मध्ययुगीन नान र पूर चे को ही नष्ट कर शिया। नरे पूजा वो इस बात का नान या नि समार की रचना कम हुई, माप्य का भाग्य क्या है, न वमीमाता के गूटतम रम्य तया पिण्डों के आचरण का १ श्री ने ज० 'बाही निखित पुस्तक 'गनीलिया, विसाप cr८ वर्ष, पृष्ठ ३१३ भारो,६०३।

२८ वजानिक परिस नियमन करने वाले गूढ सिद्धात उह मालूम 4 । सम्पूर्ण नतिक और भौति विश्व में उन लिए कुछ भी रहस्यपूण नहा था कुछ भी उनस छिपा नह था कुछ भी ऐसा नहीं था जिसकी चिरति व्यवस्थित हेत्वनुमान द्वारा न कीज सक्ती हो । इस प्रभूति की तुलना में गलीलियो के अनुयायिया के पास क्या र रह गया ?--गिरते हुए पिण्डा का सिद्धra, दोलन का सिद्धात और केपलर दीघ वृत्त । अपनी अत्यन्त थमपूरक आवि इस सम्पत्ति के इस प्रकार न होने पर यदि तत्कालीन विद्वान लोग उपल पडे हो तो इसम माश्चय हा क्या है जम उगता हुआ सूय असख्य ताराना को विलीन कर देता है, उसी प्रकार गला रिया के बाडे-से सिद्ध सत्या ने मध्ययुगीन निश्चित मता टिमटिमात हुए तार को विपीन कर दिया। सुकरात ने कहा था कि अपन समकालीन लोगा से वह सलिए अधिर बुद्धिमान पनि उर इस बात का ज्ञान था कि उह कुछ भी ज्ञान नही । य एक प्रभावपूण अतिशयोक्ति थी। गलोरियो सच्चाई क साय कह सक्त 48 उह कुछ शान प्राप्त है मितु वह यह भी जानते थे कि उनमा नान अत्यल है इसक विपरीत रस्तू के समकालीन लोगो का मान भूय था, फिर भी साचत प पि उनका नान बहुत पिश है । अभिलाषा पूति व मनागग्य के प्रति कून मान की प्राप्ति कठिनाई से होती है । यथाय नान स तनिक भी सम्पक है जान पर मनाराज्य की स्थिति वम स्वीकाय रह जाती है। तथ्य तो यह है :- पान की प्राप्ति को गलीलियो जिाना पठिन समझत थ वास्तव में वह उससे में यही अधिक कठिन है, और उनपे अधिकाश विश्वास सत्य के क्वल सनिकट है थे, किन्तु एस पान को उपल ध करने की पद्धति म जो निर्भात और साय है सामान्य भी हो गलीलियो ने पहला वडा काम उठाया था। इसीलिए गैलीलिम आधुनिक युग के जनक हैं। जिस युग म हम रह रहे हैं उसके सम्बध म हमारे पगद या नापम चाह जमी हो इस युग म आवादी की वृद्धि जनस्वास्थ्य में मुधार, रेलगाडियां माररवार रेडियो राजनीति और सावुन वे विज्ञापा-- सभी बुछ गोलियो की देन है । यदि उनकी युवावस्था म ही धार्मिक यायाल का शिका उन पर आ गया होता ता आज न ता हवाई युद्ध और विपक्षी गसे में बरदाना का और न गराबी और रागा में प्रमश मिलने वाली मुक्ति का है उपभाग हम कर पात, जो हमारे युग की विशेषताए हैं। समाजास्त्रिया वा एक वग है जा बुद्धि मरर को पामग बनान र अभ्यासी है और जो सभी प्रकार का महान घटनामा सो बडे बडे अवयत्तिक भारणो स उदभूत मानता है। मरा विश्वास है कि यह मनोरत्ति एक व्यापक विभ्रम है | मरा विश्वास है मि यदि सत्रहवा शतानी के जन समाज म स को १०० व्यक्ति समावस्या म ही मार डाल गए हान ता आधुनिक ससार का वज्ञानिक पद्धति के उदाहरण २६ अस्ति व ही न हाता । और इन १०० व्यक्तिया म से गैलीलियो प्रमुख है। २ "यूटन' मर आइजक यूटन का जम उसी वप हुआ या जिम वप (१६४२) गैलीलियो की मृत्यु हुइ थी। गोलियो की भांति हो उहाँने भी लम्बी उमर पाद थी । उनी मृत्यु सा १७२७ मे हुई थी। इन दोना व्यस्तिया के वाय-बरापा के बीच की अवधि म विनान वा स्थान मभार में बिल्कु' बदर गया था। गैलीरियो को अपने जीवन भर तत्कालीन प्रतिप्टिन विद्वाना के विरुद्ध सघप करना पड़ा था, बोर जीवन के अतिम वर्षों म उहे अभियुक्त बनन और अपन काय के निपिद्ध घोषित किए जान की वेदना मेग्नी पड़ी थी। दूसरी ओर यूटन को १३ वप वो अवस्था मे म्बिन के ट्रिनिटी पारेज का स्नातक विद्यार्थी होने के समय मे ही सावजनिक प्रासा प्राप्त हुई थी। एम० ए० की डिग्री मिरने के बाद दो वप भी नहीं वीते थे कि उनके कारिज के आचाय न उह अविश्वसनीय प्रतिभागारी व्यक्ति वताना गुरू कर दिया था । सम्पूर्ण विद्वत समाज द्वारा उनकी प्रशसा की गई सम्राटा द्वारा उनका सम्मान किया गया और विशुद्ध अग्रेजो परम्परा म उहें एक सरकारी पद देकर पुरस्कृत किया गया, पर इस पर पर व कायम न रह सके। वे इतने अधिक मह वपूण बन गए थे Fि जव जाज प्रथम गद्दी पर वठ तव महान लीनिज़ को हनोवर ही मे छोर दिया गया, क्याकि वह यूटन स रड पडे थे। आगामी पीरियो के लिए यह सौभाग्य की बात थी कि यूटन की परि- स्थितियां इतनी गान्तिपूण थी। वह एक पवडालू और अधीर व्यक्ति थे, एक ही साथ झगडार भी, और विवाद से डरन वाले भी। वह प्रचार और विनापन से घृणा करत ५ क्योकि इमम उनकी आलोचना होने के भी अवसर आत मित्रो द्वारा डराए धमवाए जाने पर ही वह अपनी रचनाएँ प्रकाशित करत थे । अपनी पुस्ता आपटिक्म' के सदभ म उहोंने रोयनिज को लिखा था- 'प्राण का अपना सिद्धान्त प्रकागित करन के कारण उत्पन विवादो से मुये इतना का हुआ कि मैंने अपनी इम मूयता के पिए अपने आपको कोसा है कि एक छाया की प्राप्ति के लिए अपनी गाति-जसे महत्वपूण वरदान को मैंने छोड दिया।" जिस प्रकार के विरोध का सामना गलीलियो को करना पड़ा था, यदि उस प्रकार के विरोध का मामना यूटन को भी करना पडता तो मम्भव है कि उहांने कभी एक पविन भी प्रागिन न की होती। वितान के इतिहास में यूटन की सफलता सर्वाधिक दानीय है। यूना निया के समय म ही समस्त विनानो म मर्वाधिक प्रगति प्राप्त और समाहत विनान रहा है ज्यातिष । वेपलर के नियम अभी तव ताजे ही थे, और उनमें से वज्ञानिक परिधि तोसरा नियम तो अभी तक सावजनिक स्वीकृति भी नहीं पा सका था। इसक अलावा जो लोग वृत्ता और दोष उत्ता अभ्यस्त थ उनराप्टिमय नियम अद्भुत और आधारहीन मालूम हाते थे । गैलीलिया का ज्वारभाटा सिद्धान्त ठीक नही पा, चन्द्रमा की गतिया ठार टीम नही समया जा सकी थी, और टो मीय पद्धति म आकाशीय पिण्डा को जो एक्ता प्राप्त थी उस नष्ट हो जाने का खेत ज्यातिपिया के लिए अनिवाय था । अपन गुरुत्वाक्पण के सिद्धान्त स यूटन ने इस सम्पूण गडवडयाले मे एक न व्यवस्था प्रतिष्ठित कर दी। न केवल ग्रही और उपग्रहा की गलिया के प्रमुख पहलुआ के कारण जान हो गए, बल्कि उम युग की सम्पूर्ण ज्ञात बारीक्यिा में भी कारण मालम हो गए कुछ समय पहले तक जा धूमकेतु राजामा को मृयु का अपशकुन माने जात थे वे भी अब गुरु स्वाक्पण के नियम के अनुसार चलने वाले सिद्ध हो गए। सभी घूमक्तुना म से हरी द्वारा वर्णित धूम+तु सवस अधिक इस नियम की यथायता मिद्ध परलेवारा सावित हुआ, और हली यूटन के सर्वोत्तम मित्र थे । यूटन की पुस्तक 'मिसिपिआ' भव्य यूनानी शनी पर लिखी गई है। गुरुत्वाकपण व नियम और तीन गति नियमो के आधार पर गुद गपिलीय निग मन द्वारा सम्पूर्ण मौर-परिवार र विश्लेषण किया गया है। यूटन की रचना दशनीय है जसी कि हमार युग की सर्वोत्तम रचनाए भा नहीं होती। आधु निर रवनामा म से उस प्रकार से अभिजातपूणना ममाप पहुँचन वाली रचना सापेक्षता सिद्धात सम्व घी रचना है किन्तु उसम भी उस प्रकार की अन्तिमता का लक्ष्य नहीं स्वीकार किया गया, क्यारि भाजपर प्रगति बहुत तज है। सेब के गिरने की कहानी सभी को मालूम है। इस प्रकार की अधिकारी कहानियो के विपरीत, निश्चित रूप से इस कहानी व झूठ होन का रिमोको मान नहीं है । जो भी हो, सन १६६५ मे ही यूटन ने सबसे पहले गुरुत्वाक्पा के सिद्धान्त पर विचार किया और उमी वप, प्लग की महामारो व वारण उहनि अपना समय देहात म मम्भवत विमो बगीचे में रिवाया। अपनी पुस्ता प्रिसिपिआ' उहाने सन १६८७ ई० तक प्रमागित नहा की। पूरे २१ वप तक वह अपने सिद्धाल पर विचार करन और फ्रमा उम पूर्ण बनाने में तीन और सतुष्ट रहे। कोई भी आधुनिक विज्ञान एका कल का माहम नहीं वरगा क्याकि २१ वष का समय वनानिव जगत का पूरी तरह बदर दने के लिए पर्याप्त है। आइन्सटीन की रचनाम भी हमला कुछ ऊबड-राबड , बुध काए जिनका समाधान नहीं हो सका और कुछ अपूण कल्पनाएं या विचार गाए रही हैं । यह बात मैं वालोचना के स्वर में नहीं कह रहा केवल अपने युग और यूटन के युग के बीच जो अन्तर है उसे स्पष्ट करने के लिए कह रहा है। अब हम पूर्णता को अपना ध्यय नही बनात, क्यादि हमारे उत्तराधिकारिया को . 1 वज्ञानिक पद्धति के उदाहरण एक पूरी सेना है जिमसे आग वढ पाना हमारे लिए काफी कठिन है और प्रति- क्षण हमारे चिह्ना को ही मिटा देने के लिए तैयार है । गलीलियो के साथ जा व्यवहार किया गया उमरे विपरीत न्यूटन को मिला सावजनिक सम्मान जो अगत गलीलियो के काय का ही परिणाम था दाना के बीच की अवधि म अय वनानिका द्वारा किया गया काप भी इसका एक कारण था, किन्तु यूटन को मिल सम्मान का कारण प्राय उसी मात्रा में राजनीति की गतिविधि भी थी। गोलियो की मृत्यु के समय जमनी में जो तीस वर्षीय युद्ध चल रहा था उमन वहा की आधी आबादी समाप्त कर दी और फिर भी प्राटेस्टटा और क्यारिका के बीच शक्ति-सतुलन मे तनिक भी परिवतन न हो सका। जिनम जरा भी सोचन विचारने की क्षमता थी, वे इस युद्ध के कारण यह सोचन रग कि धार्मिक युद्ध लडना एक भूल है। एक कयो- लिक राष्ट होते हुए भी मास न जमनी के प्राटस्टटा का समर्थन किया था, और चौपे हैनरी न यद्यपि मास का समयन पाने के लिए कयोलिक मत स्वीकार कर लिया था, फिर भी अपन इस नए मत के प्रति उसम कोई कट्टरता नहीं आई थी। इग्लड मे यूटन के जम सवन म जो गृहयुद्ध शुरु हुआ था उसने धार्मिक सन्ता का शासन स्थापित किया और इस गासन ने इन सन्ता को छोडकर शेप प्रत्यक व्यक्ति को धार्मिक अतिउत्साह का विरोधी बना दिया। द्वितीय चाल्म के देशनिकाले से वापस आन के एक वष बाद यूटन ने विश्व- विद्यालय म प्रवेश किया। द्वितीय चाल्स ने ही रायल सोसायटी की स्थापना की थी और विनान का प्रोत्माहन दा के लिए अपनी शक्ति भर सब कुछ किया था, यद्यपि इसम सदह नहीं कि अशत ऐसा करने म उसका उद्देश्य कट्टरता का प्रतिकार करना था। प्रोटेस्टटा की धार्मिक कट्टरता ने उसे देश- निकाला है रखा या और कयारिका की धार्मिक कट्टरता के कारण उसके भाई का सिंहासन छोडना पडा था। द्वितीय चाल्म एक बुद्धिमान सम्राट था। उसने सरकार का यह नियम बना गिया कि विदेशो में यात्रा पर जाने की स्थितिया से राजा को बचना चाहिए । उसर राज्यारोहण स स्वर रानी एन की मृत्यु तक का समय इग्लड के इतिहास म बौद्धिक दृष्टि से सवाधिक दीप्तिमान युग है। इस बीच देकात न मास में आधुनिक दान गास्त्र की नींव डाल दी थी, किन्तु उनका आवत सिद्धान्त यूटन के विचारा का स्वीकृति मे बाधक ही मिद्ध हुआ है । यूटन को मृत्यु के बाद हा, और अधिकागत वाल्टेयर की रचना रेट्रेस फिरासफोक्स' व परिणामस्वरूप, यूटन के विचार प्रचरित हुए । विन्तु एक बार प्रारम्भ हो जान पर उनका प्रचरन अत्यन्त प्रवल हुआ, तय्य तो यह है कि नेपोलियन व पवन तक अगरी समूची गताची के दौरान मुख्य रूप से বানি পদ্ধি मामीसी लोग ही यूटन ये बाय को आगे बढ़ाते रहे । देश भक्ति की भावना के कारण अपेज लोग तो उन क्षेत्रा मे यूटन की पदतिया से ही चिपक रह जहावे तीजि की पद्धतिया से निम्न कोटि की थीं। इसका परिणाम यह हुआ कि यूटा को मृत्यु बाद एक शतानी तप गणित म अप्रैग की प्रगति नगण्य ही रहीं। इटली को जो हानि धामिर कट्टरता के कारण हुई थी, इड म वही हानि राष्ट्रीय भावना के कारण हुई। यह कहना गरा कठिन है इन दो में से कौन अधिव घातक मिद्ध यूटन की रचना प्रिसिपिमा म यपि यूनानिमा द्वारा प्रारम्भ को गई निगमनारम पद्धति कायम रखी गई है फिर भी उसमे यूनानी रचनाओ से भिन भावना अपनाई गई है क्यादि गुरुत्वाकपण का नियम, जो उमरा एक आधारभूत सिद्धान्त है स्पन सिद्ध नहीं माना गया, बल्कि उमरी प्रतिष्ठा रेपलर वे नियमा से आगमनात्मक पक्षति द्वारा की गई है । इसलिए यह पुस्तक वैज्ञानिक पद्धति को उसके आश प म प्रस्तुत करती है। विशिष्ट तथ्या के प्रेषण के आधार पर आगमनामक पद्धति से वह एक सामा म नियम की स्थापना परती है और इस सामाप नियम से निगमनात्मक पद्धति द्वारा विशिष्ट तथ्या का अनुमान किया जाता है। आज भी यही भौतिको का आदश है और सिद्धान्तत भौतिकी ही वह विज्ञान है जिसमे अय सभी विज्ञाना का निगमन दिया जाना चाहिए । वितु जादा की सिद्धि यूटा समय जितनी कठिन मालूम होनी थी वास्तव म वह उससे भी कुछ अधिर करिन है और अपरिपाद व्यवस्थापन खतरनाक ही सिद्ध हआ है। "यूटन क गुरुवारपण सिद्धान्त का एक अदभुत इतिहास रहा है। जहां एक बार दो गतारियो से भी अधिक समय तक वह आकाशीय पिणे मी गतिया के सम्बध म ज्ञात प्राय प्रत्यक तथ्य का विश्लेषण प्रस्तुत करता रहा वहां दूसरी ओर प्राकृतिक नियमा म उसकी स्थिति बिल्कुल अलग और रहस्पपूण बनी रही। भौतिकी की नर्ट नई दहाखाओ का व्यापर विकास हुआ, ध्वनि, कप्मा प्रकार और विद्युत सम्बन्धी सिद्धान्ता की सफरतापून खोज की गई विन्तु पदाथ किसी ऐस गुण को सोजन की जा सकी जिम किसी प्रकार भी गुरस्कार पण साय सम्पत किया जा सर आदसटीन के खामा म सापषता सिदान्त द्वारा हो (१६१५ म) गुरुत्वावपण का भौतिकी वा सामाय योजना में स्थान दिया जा सका और फिर भी यह दखा गया कि प्राचीन अर्यो म उसका सम्बध भौतिरीव बजाय ज्यामिशिस अधिक है। व्यावहारिक दृष्टिकोण से आर सटीन + सिद्धात मयूटन द्वारा प्रस्तन परि- णामो के कुछ अत्यन्त मृहम साधन हा दिए गए हैं। इन सूक्ष्म मगोधनों को, जहाँ तब उसकी नाप-सोज सम्भव है अनुभव के आधार पर परखा जा चुका वज्ञानिक पद्धति के उदाहरण है किन्तु व्यावहारिक परिवतन अल्प होने पर भी वौद्धिक परिवतन वहुन अधिक हुआ है, क्यापि देश और कार मम्बधी हमारी सम्पूण धारणा म क्रान्तिकारी परिवतन वरन पड़े हैं। आइसटीन के काय ने विनान क्षेत्र म स्थायी उप- रब्धि की दुस्हता स्पष्ट कर दी है। यूटन का गुरुत्वाक्पण का नियम इतने ममय तक निर्विकल्प रूप में प्रचलित रहा और इतन प्रना, समस्या का ममाधान किया कि एसा सम्भव नहीं मालूम होता था कि उमम भी कभी सगोधन की आवश्यक्ता मालूम पडेगी। फिर भी आखिरकार ऐमा सगोधन आवश्यक सिद्ध हो गया और क्सिीको भी इस बात में सदेह नहीं है कि इस मगोधन का भी समाधन करना पडेगा। . ३ 'डायिन' वनानिक पद्धति की प्रारम्भिक सफरता ज्योतिष के क्षेत्र म हुई थी। हाल जमान म टम पद्धति की प्रसनीय सफलताएँ आणविक भौतिकी के क्षेत्र म हुई हैं। ये दोना हो ऐसे विषय हैं जिनके विश्लेषण के लिए गणित की बहुत अधिक आवश्यकता पड़ती है। गायद अन्तिम पूर्णता को स्थिति म समस्त विनान गणितीय हो जाएगा रितु तव तक ऐमे पर्याप्त व्यापर क्षेत्र हैं जिनम गणित का प्रयाग बहुत कम सम्भव है और आधुनिक विनान की कुछ सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलधियाँ इहा क्षेत्रो मे हुई हैं। डाविन के काय को हम अगणितीय विनानो का एक उदाहरण मान सकते हैं। यूटन की भाति डाविन ने भी एक युगात भर न केवल वनानिका के पनि सामाय शिक्षित जनता के बौद्धिक दृष्टिकोण पर शामन किया, और गलीलियो की भाति धम गास्त्र से उनका सपप हुआ यद्यपि उसका परिणाम उन लिए कम घातक रहा। सस्कृति के इतिहास म डादिन का महत्व बहुत अधिक है किन्तु गुद्ध वनानिक दृष्टिकोण से उनके काय का मूत्य आफ्ना कुछ कठिन है । उहाँने विकास की प्राक्कल्पना नही की जिमकी सूझ उनके वर्द एक पूर्वगामिया को हो चुकी थी। उहाने विवाम के पक्ष म तमाम प्रमाण या मागी एकत्र किए और विकाम मिद्धान्त को समयाने के लिए एक प्रक्रिया का आविप्यार किया जिसे उहाने 'प्राकृतिक चुनाव' नाम लिया। उसके द्वारा एकत्र अधिकार साय माग मा माय हैं, कितु प्राकृतिक चुनाव जीव- विनान के पण्डिता ये वीच पहरे की अपेक्षा अब क्म स्वीकाय है। उन्हान वापी रम्बी लम्बी यात्राएँ की थी, बुद्धिमानी के साथ जीजा वा देवा-परवा था और गान्निपूर्वक विचार पिया था। उनकी भांनि ग्याति- माप्त लोगा म से गायद ही कोई एस हा जिनम वौद्धिव दीप्ति उनमे कम रही हा, उनको युवावस्था म विसी ने भी उन पर विशेष ध्यान नहीं दिया ।

३४ वज्ञानिक परिदृष्टि केम्ब्रिज म उह निप्निय रह्न में और वेवर उत्तीण होकर उपाधि प्राप्त करन म ही स ताप था। उस समय विश्वविद्यालय म जीव विनान का अध्ययन करन म असमय होन क कारण उह देहात मे घूमने और गुबरले इक्टठे करन म अपना समय बिताना अच्छा लगता था। अधिकारिया की दृष्टि म यह भी वकारी का ही एक रूप था। उनकी वाम्नविक शिक्षा वीगल को यात्रा मही हुई, जबकि उह अनक क्षेत्रा की वनस्पति और जतुआ का अध्ययन करन तया समवर्गीय, किन्तु भौगोलिक दृष्टि से पथक, जातिया के वासस्थाना का प्रेक्षण करने का अवसर मिला। उनके सर्वोत्तम काय का कुछ अश परिस्थिति विनान से सम्बधित है अथात जातिया और वशो के भौगारिक वितरण से ।' उन हरण के रिए उहान यह दखा जि आल्प्स पवत की ऊंचाइया पर उपर घ वनस्पति ध्र वीय क्षेत्रा की वनस्पति से मिलती-जुलती है और इमो तथ्य से उहोने यह अनुमान लगाया कि दा के पूर्वज हिम-युग म एक ही थे । वैज्ञानिक विवरणा के अलावा डाविन का महत्व इस बात म है कि उहोने जीव विनान के पण्डिता को और उनके माध्यम से सामा य जनता को अपनी यह पूण धारणा बदलने के लिए विवश कर दिया कि जातिया अपरि वतनीय हैं, और यह विचार स्वीकार करने के लिए विवश कर दिया कि विमिन प्रकार के सभी जीव एक सामाय प्रकार के पूर्वजो से विभिन्न रूपो मे विकसित हुए हैं । आधुनिक युग के प्रयक नव विचार प्रचलित करने वाले की भाति डाविन को भी अरस्तू के आप्तत्व से सघप करना पड़ा था। यह कहना ही चाहिए कि परम्तू मानव जाति के महान् दुर्भाग्या में से एक थे । आज ग्नि तक अधिकारी विश्वविद्यालयो म तक शास्त्र के अध्यापन म तमाम अथहीन और बुद्धिहीन बातें भरी हैं जिनके लिए अरस्तू उत्तरदायी हैं । डार्विन के पूर्ववर्ती जीव विनान वत्ताआ का सिद्धात यह था कि स्वर्ग म एक आदा बिल्ली और एक वाश कुत्ता हैं तथा अय इसी प्रकार के आदश जीव हैं और धरती पर के वास्तविक बिल्ली-कुत्ते यूनाधिक रूप म इही स्वर्गीय जीवा की अपूर्ण प्रतिकृतियां हैं । प्रत्येक जीव-जाति दवी मस्तिष्क के एक भिन विचार के अनुरुप बनी है और इसलिए एक जाति से दूसरी जाति म क्सिी प्रचार भी प्रकारातरण नही हा सक्ता क्याकि प्रत्येक जाति एक भिन सप्टि क्रिया का परिणाम है । भूवनानिक साक्ष्य के कारण इस विचार को कायम रखना दिन-ब दिन अधिकाधिक कठिन होता गया क्योकि यह देखा गया कि व्यापक रूप से भिन्न वतमान जीव जातिया के पूर्वज परस्पर याज की जातिया की अपेक्षा बहुत अधिक मिलते जुलते थे, उनमे अधिक साम्य या। उदाहरण के रिए, एक समय था जब घोडे के भी परा में अंगुलियां होती थी, आदिकालीन चिडिया का १ देखिए हागविन की पुस्तक 'दि नेचर मॉप लिविंग मैटर, १६३०, पृ०१४।

बज्ञानिक पद्धति के उदाहरण सरीमृपा से पृथक कर सक्ना कठिन था, आदि आदि । यद्यपि 'प्राकृतिक चुनाव' की प्रक्रिया विशेष को अब जीव-वनानि पर्याप्त नहीं मानते, फिर भी विकास के सामाय तथ्य को शिक्षित लागो म सावजनिक रूप से स्वीकार किया जाता है। मनुष्य को छोडकर अन्य सभी जीवा के सम्बध मे विकास का सिद्धात कुछ लोगों द्वारा शायद धिना किमी सधप विप के स्वीकार कर लिया जाता, वितु जन समाज के मन म डाविनवाद इस प्राक्कल्पना के साथ एक्स्प बन गया कि मनुष्य बदरो के वशज हैं । हमारी मानव अहम्म यता के लिए यह धारणा बहुत ही कलेशकारक थी, लगभग उतनी ही कष्टदायक जितना कि कापरनिक्स या यह सिद्धात या वि पृथ्वी इस विश्व का केद्र नहीं है । जसा कि स्वाभाविक ही है, परम्परागत धम शास्त्र म हमेशा मानव-जाति की प्रशसा ही की गई है, यदि धम दशन की रचना बदरो ने अथवा गुरु ग्रह के निवासिया ने की होती तो इसमे सदेह नहीं कि उसम यह गुण न होता । किन्तु स्थिति जसी है उसमे लोगो को अपनी आत्म प्रतिष्ठा या अह भावना को रक्षा करने की सामथ्य सवदा प्राप्त रही है और वह भी इस धारणा के साथ कि ऐसा करने मे वे धम की रक्षा कर रहे हैं । और फिर हमे यह नात है कि मनुष्यो के आत्मा होती है, जबकि बदरो मे आत्मा नहीं होती। यदि मनुष्य का विकास धीरे धीरे बदरो से ही हुआ है तो उसे आत्मा की उपलघि विस अवस्था मे हुई ? वास्तव में यह समस्या अपेक्षाकृत रूप म इस समस्या से अधिक जटिल नहीं है कि भ्रूण को सि विशिष्ट अवस्था मे आत्मा की उपाधि होती है, किंतु नई कठिनाइयां हमशा पुरानो कठिनाइया की अपेक्षा अधिक जटिर मालूम होती है, थयाकि पुरानी कठिनाइया के हक लम्बे परिचय के कारण कुण्ठित हो जाते है । इस कठिनाई से बचने के लिए यदि हम यह तय कर लें कि बदरो को भी आत्मा प्राप्त है तो फिर क्दम-च कम हम यह विचार स्वीकार करना होगा कि प्रोटो जोआ को भी आत्मामा को उपलब्धि है और यदि हम प्रोटोजोआ या प्रजीवा- णुआ को आत्मा विहीन मानने हैं तो विकासवादी सिद्धात के अनुसार हम मनुष्यो को भी आत्मा विहीन मानने के लिए विवश होता पडेगा। ये सारी कठिनाइया डादिन के विरोधिया के सामने प्रत्यक्ष थी, और यह आश्चय को बात है कि डाविन का जो विरोध किया गया वह और अधिक भीपण क्या नहीं हुआ। यद्यपि डाविन के काम में अनेक स्थली पर सगोधन की आवश्यक्ता हो सकती है, फिर भी यह बाम अथानिक पदनि म जो कुछ तात्विक है उसका एक मुन्दर उनाहरण प्रस्तुत करता है अर्थात् अभिलापापूर्तिजय मनोराज्य की परी कहानियो के स्थान पर साक्ष्य पर आधारित सामाय नियमो की प्रतिष्ठा का उदाहरण 1 अपनी आशाओ की अपेक्षा साक्ष्य पर अपनी सम्मतिया का आधारित फरता मनुष्य जाति के लिए प्राय सभी क्षेत्रा म कठिन होता है। जब पडोसियो वज्ञानिक परिदृष्टि पर सरगुणा से च्युत होने का आरोप लगाया जाता है तो उस पर विश्वास पर रेन से पहले उस आरोप की सच्चाई की जाच परख कर रेना प्राय असम्भव होता है । जव युद्ध प्रारम्भ हा जाता है तब दानो पक्ष विश्वास करते हैं कि जोत निश्चित रूप से उन्ही की होगी। जब कोई व्यक्ति घुडदौड म किसी घोडे पर पमा लगाता है तो वह विश्वास करता है कि वही घोडा जीतेगा। स्वयं अपने मम्बध मे यदि कोई विचार करता है तो उम विश्वास होता है कि वह एक सज्जन व्यक्ति है जिसकी आत्मा अमर है । इनम से प्रत्यर तथा सभी प्रस्ताव नाआ के पक्ष म निष्पक्ष साक्ष्य चाहे कुछ भी न हो किन्तु हमारी इच्छाएँ उन पर विश्वास करन के लिए एक प्राय अनिवाय प्रनि पदा कर देती हैं। बना निक पद्धति हमारी इच्छा को विल्कुल अलग हटा देती है और इस प्रकार की सम्मतिया को प्रनिटित करा का प्रयत्न भरती है जिनके निर्धारण में इच्छाआ पा कोई हाथ न हो। इस सदेह नहीं दि वनानिव पद्धति म व्यावहारिस लाम हैं यदि ऐमा न होता तो इच्छाजनित मनोराज्य के विरुद्ध इस पद्धति को माग बढने में भी मफरता न मिली होती । जो जिल्दमात्र वज्ञानिक पद्धति में काम करता है, मफल और धनवान हो जाता है जबकि सामा य रूप से सच्चा किन्तु जवनानिक जिल्दसा जमफ्र और गरीब हो जाता है। मानव प्राप सम्बध में भी इस विश्वास ने वि मनुष्यो २ आत्मा होती है, माराव जाति के सुधार के लिए एक विशिष्ट तकनीर उत्पन को है किंतु एक लम्बे और पीने प्रयत्न के बाद भी इस तकनीर से अभी तक कोई गुभ परिणाम प्रत्यक्ष नहीं हुआ। टमके विपरीत मानव गरीर मानव मस्तिष्क और मानव जीवन का बनानिय अध्ययन अनतिदूर भविष्य म मानव स्वास्थ्य बुद्धि और सदगुणा के क्षेत्र में सामाय मनुष्या वा इतना अधिक सुधार करने की गति हमें दे सकता है जिसकी पहल हमने कभी स्वप्न में भी पल्पना न की होगी। आनुवशिक्ता के नियमा के सम्बध म डादिन भूल में थे और मेण्ड के वागत सिद्धात द्वारा डार्विन के नियमा का पूरा-पूरा स्पातरण हो चुव है। इसी प्रकार परिवतना और विविधताआ की उत्पत्ति र सम्बध में भी डार्वि पा कोई मिडात नहीं था और उनका विश्वास था रि य परिवतन बहुत का और अत्यधिक अमिक हुए हैं जबपि वास्तव म विशिष्ट परिस्थितिया महत इसका विल्कुल उल्टा पाया गया है। आधुनिक जीवनातिर इन विषयो । हाविन से बहुत आग जा चुके हैं, किंतु आज व जिस स्थान पर हैं उस तक वे कभी पहुँच ही न होत यदि हादिन ये वाय से मिलरी प्रेरणा और गति उह प्राप्त न हुई हाती । विकास मिक्षात के महत्व और इसकी अनिवायता मे रोगा के प्रभावित करने के लिए उन गोष-वार्यों को व्यापरता आवश्यक पी।

वनानिक पद्धति के उदाहरण ४ 'पैवलाव' किसी भी नए क्षेन म की गई विनान की प्रत्यक नइ प्रगति के विद्ध उसी प्रकार का प्रतिरोध उपन हुआ है जिमका सामना गरोलियो का करना पदा था, वितु यह प्रनिराय मा कमजोर हाता गया है। परम्परावादी हमगा यह आशा करत रहे हैं रि क्ही-न कही एक ऐसा क्षेत्र मिरगा जिमम वैनानिक पद्धति का प्रयोग करना असम्भव सिद्ध हो जाएगा। यूटन के वाद आणीय पिण्डा का क्षेत्र उहांने निरागहोकर छोड दिया । डार्विन के बाद उनम से अधि काश ने विकाम के व्यापक तथ्य को स्वीकार कर पिया, यद्यपि आज तक वे कहते जा रहे हैं कि विकास को गति का निदान विन्ही आतरिक शक्तिया द्वारा नहीं किया गया वलि उसका निदग एक नविष्यी प्रयोजन द्वारा किया गया है । हम यह कल्पना करनी पड़ेगी कि पाताकृमि जो कुछ है वह इसलिए नहीं वन गया कि मनुष्य को अन्तडिया म अय क्मिी स्सम वह जीवित रह ही नहा सकता था बल्कि इसलिए कि वह क्मिी स्वर्गीय विचारणा की प्रतिपूर्ति कर रहा है जा दवी मन-मम्निप्प का एक अग है । जसा वि वरमिंघम के दिगप ने कहा है' 'यह घणित परापजीवी उत्परिवतना के समाक 'न का परिणाम है, पया वरण के अनुपूरन का यह एक वडा सुदर उगहरण और साय ही नतिक दृष्टि स जत्य त घृणाम्पद भी । यह विवाद अभी तक पूर्णत समाप्त नहीं हुआ, यद्यपि इमम तनिक भी सदेह नहीं है कि निकट भविष्य म ही विकास के मान्न- रिक मिद्धात पूरी तरह प्रतिष्ठिन हो जाएंगे। विकामवादी सिद्धान्त का एक परिणाम यह हुआ है कि जिन गुणा का दावा हम हामासेपियम के लिए करत हैं उनका कुछ अहम जानवरो के लिए भी स्वीकार करना पड़ेगा । देवात की स्थापना थी कि जानवर केवल बुद्धिहीन यत्रवन चालित जीव हैं, जबकि मनुष्या म अपनी स्वतत्र सकल्प गक्ति हाती है। इस प्रकार के विचारा की सम्भाव्यता ममाप्त हो गई है यद्यपि 'उदगामी विकास का सिद्धान इस विचार को पुन प्रनिष्ठा करन का प्रयत्न करता है कि मनुप्य अय जीवा मे गुणात्मा प म भिन है। नित्या विनान दो प्रकार के रागा के बीच सघप का क्षत्र रहा है एक व जो सम्पूण तत्वा को वनानि पद्धनि अधीन मानते हैं और दूसरे व जा अब भी यह आगा करते हैं कि महवपूर्ण तवा म कुछ एम अवश्य हैं जिनका विश्लेषण रहस्यवादी ढग मे करना आव"यर है । क्या मानव गरीर एक मगीन मात्र है ग्मिा पूणत नियमन और नामन भौतिकी और रमायन शास्त्र के सिद्धान्ना द्वारा किया जाता है ? जहाँ तब इस गरीर-पत्र को समया जा सकता है वहा तर निश्चित रूप में वह एसा ही है किन्तु अव भा एमी प्रक्रियाएं हैं जिह पूरी तरह समया नहीं जा १ देचिर, 'नेर', २६ नवम्बर, १६३० ।

वैज्ञानिक परिदृष्टि सरना । सम्भव है इन प्रक्रियामा मे ही कोई महत्वपूर्ण सिद्धात छिपा हो । इम प्रकार जीववादक ममथक अनान के ही सगी साथी बन जात हैं। उनकी भावना कुछ एसी है कि मानव गरीर के सम्बघ म हम बहुत अधिक जानने का प्रयल न करना चाहिए कही ऐसा न हो कि अत म यह जानरर दुस हा शिम इमे पूर्णत समझ सकते हैं । प्रत्यय नया गोध नाय इस दप्टिकोण की तक सगति का और भी कम करता जा रहा है और निगूहन वृत्ति वाले लोगा के लिए उपलब्ध क्षेत्र को और भी सयुचित करता जाता है । फिर भी कुछ ऐसे लोग हैं जो मानव शरीर का पनानिका की कृपा पर छोड देने के लिए तयार हैं वगर्ते कि पात्मा को बचा सकें। हम जानते हैं कि आत्मा अपर है और उसे सत असत का मान है । सद् व्यक्ति की आत्मा का परमात्मा का भान रहता है। उसकी आत्मा उच्चतर तत्वा की ओर गतिगोल रहती है और दिय ज्योति से उसका मम्पक रहता है। ऐसी स्थिति म निश्चित रूप से आत्मा का नियमन शासन भौतिकी और रसायन शास्त्र के नियमा द्वारा, अयवा तथ्यत किसी प्रकार के भी नियमो द्वारा, ही किया जा सपता । इसीलिए बनानिक पद्धति के विरोधिया द्वारा मानव ान के अन्य विमी विभाग की अपेक्षा मनोविनान वा समयन अत्यधिक पट्टरता के साथ किया गया है। फिर भी मनाविनान भी वनानिर हाता जा रहा है अनेक लोगा न उसे वाशिक वनान म सह्योग दिया है कि तु रूमी प्रिया विमान वेत्ता पैवलराव से अधिक योग और किसी ने नहीं दिया । पंचलाव', जो अभी तक जीवित हैं सन १८४६ म पैदा हुए थे और अपने सक्रिय जीवन का अधिकार भाग उहान कुत्ता व व्यवहार की जांच-परख करने म बिताया है । दिनु मह क्यन तो बहुत अधिक शिथिल है-उनका अधिकार काय तो इस बात का प्रेक्षण करन म लगा है कि कुत्ता के मुह मे पानी कब आता है और कितना । यह बान वैतातिव' पद्धति की एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण दिपता का उदाहरण प्रस्तुत करती है जो तत्वमीमासका और घमशास्निया वी पद्धनिया व विद्ध है । विनान के क्षेत्र म काम करन वाला से तय्या की सोन म लगा रहता है जो इस दष्टि से साथ होते हैं कि उनक आधार पर सामाय नियमों की स्थापना की जा सकती है और इस प्रसार व तथ्य प्राय अपोआप मपतई मनारज नहीं हाते । विमी भी अवनानिक व्यक्ति को जब यह मालम हाता है नि रिसी प्रसिद्ध प्रयोग राम क्या किया जा रहा है, तो उसकी पहरी धारणा यही होती है कि गोव-नाय म लग हुए सभी व्यक्ति तुच्छ वाती पर अपना समय बना पर रह हैं वितु बौदिक दष्टि स नया प्रगर दन बार तथ्य प्राय मे हो हात हैं जो अपने आपम तुच्छ हान है और जिनम कुछ भी रोचव नहीं होता। यह बात परगव के विशिष्ट गोध-वाय पर विप रूप से १ २७ परवरी, १९३६ वागत हो गया।

M - दंगनिक पद्धति देउवाहर र हानी है कानों मृद गर मान वरपर। इन तथ्य का जयपन गरे पद गव न नामान्य विज्ञान्ता गेम्पापना गैडा पशुषो के अधिग' व्यवहार पर सा होत है वो वा मनुष्यों दे पवहार का भी समान नप से नियमन करते हैं। इन सोर की प्रक्रिया निर्मित है- नभी गलत हैं कि मिनी खोरे पदार्य को देवार बने वे मुह में पानी ना जाता है । पंदनाव न कुने मुह म एक नगे रत्र दी सिने यह नापा जा म कि एम पाय को देवार कुत्ते के मुहम आने वाले पानी को मात्रा स्तिनी है। उव मूह म माना होता है तब सार का प्रवाह एक प्रनिदर्ती किया होनी है अथात एमी स्थिति में लार का प्रवाह गरीर द्वारा म्वत म्फ्त क्यिामा मे म एक है। इस क्रिया पर अनुभव का कोई प्रभाव नहीं पडना । प्रतिदर्जी त्रियाएँ अनर हैं कुछ ना दन अघिर विगिप्ट या निदिष्ट होती हैं और कुछ कम । इनमें से कुछ का अध्ययन नवनात शिशुआ म किया जा सकता है किन्तु कुछ दिमाएं विकास की बाद म नान वाली स्थितियो मे ही उत्पन्न होती हैं । बच्चा छोक्ता है सम्भाई रेता है हाय-पर फगता है दूध चूसता है किसी चमकीले प्रकार का दखबर जघर अपनी आंखें फेरता है और अब अनेक प्रकार की गारीरिक क्रियाएँ उपयुक्न अवसरा पर करता है और इन सबके लिए उसे किसी प्रकार के पूर्व पान की आवश्यक्ता नही पटनी। इस प्रकार को सभी क्रियाओ का प्रनिवर्ती क्रियाएँ कहा जाता है अथवा पवलाव की नापा म इह निस्पाधिक प्रतिवतन कहा जाता है । एसी पियाओ म वे सभी क्रिया क्षेत्र आ जात हैं जिह पह' महज प्रति कहा जाता था। जटिल प्रतियां तो प्रतिवननो की एक गृहरा स निर्मित प्रतीत होती हैं, जसे चिडियो मे घोसला बनाने की प्रवृत्ति । निम्न स्तर के जीवा म अनुभव द्वारा प्रतिवतनो का सगोपन बहुत कम होता है पतगा अपन पख जल जाने के अनुभव के बाद भी आज तर लौ म कूद पड़ता है । कि तु उच्च कोटि के जीवा म अनुभव का बहुत बडा प्रभाव प्रतिवतना पर पदता है और यह बात मनुष्य पर बहुत अधिक लागू होती है । पैवराव ने कुत्ता के रार-मम्वधी प्रतिवतना पर अनुभव के प्रभाव का अध्ययन किया । इस विषय म आधारभूत नियम है सोपाधिक प्रतिवतना का नियम । जब रिसी निरपाधिव प्रतिवतन के उद्दीपर के साय अथवा उससे तुसपहले बार-बार कोई दूसरा उद्दीपव आता है, तब कुछ ममय बाद यह दूसरा उद्दीपक ही अकेला उस अनुप्रिया को उत्पन करन म समान रूप से सक्षम हो जाता है जो मूल्त निस्पाधिय प्रतियतन ये उद्दीपर द्वारा उत्पन्न हुई थी । मूलत लार का प्रवाह तभी उत्पन होता है जब मुह म भोजन सचमुच मौजूद हो बाद म देवर भोजन के देया पर और उसमी सुगध मिरने पर ही मुह म र पा हो जाती है अथवा पिसी ऐमे सात रा ४० बज्ञानिक परिदृष्टि भी मुह लार पदा हो जाती है जो नियमित रूप से साना दिए जान का सूचक बन गया हो। इमको हम मोपाधिक प्रतिवतन कहेंगे अनुक्रिया तो यही होती है जो निम्पाधिक प्रतिवतन में होनी है रितु उमका उद्दीपर बिलकुल नया होता है जो अनुभव द्वारा मूल उद्दीपक मे मम्बचित हो चुका होता है । सोपाधिक प्रतिवतन का यह नियम उस मान का आधार है जिसे पुराने मनो वनानिक विचार साहलय' कहते थे यही भापा पा, आरत का और प्राय प्रत्यक व्यवहारगत ऐसी चीज का आधार है जो अनुभव द्वारा सीवी जाता है। इम मूठभूत नियम के आधार पर पवलाव ने प्रायोगिक ढग से, तमाम तरह की जटिगताएँ निर्मित की है। उहाँने क्वर स्वादिष्ट भोजन का ही उद्दीपक रूप में प्रयाग नहीं किया बल्कि अपचिपर यम्ला का भी प्रयोग किया है ताकि स्वीकृति मूलक अनुक्रियाआ की ही माति परिहार-मूरक अनुरियाआ को भी उत्पन किया जा सके। एक प्रकार प्रयोगा द्वारा सोपाधि प्रतिवनन निर्मित पर ले। के बाद वह दूसर प्रकार में प्रयोगा द्वारा उमरा निरोध भी करा सकते हैं । यदि एक निश्चित सोन वे बाद कभी कभी मुखद परिणाम मिलें और कभी-कभी ता अतत कुत्ते का तत्रिका भग हा जाना रवाभाविक है । कुत्ता अपना मानसिक सन्तुलन खो बैठता है अथवा उसका दिमाग श्रान्त और निश्यि-सा हो जाता है और वह सचमुच एष विशिष्ट प्रकार का मानसिक रोगी हो जाता है। पंचाव उसका इलाज उस अपने बचपन की याद दिलाकर नहीं करते और न अपनी मा से अपने अपराधी भावावेग की स्वीकृति द्वारा हा उसका इलाज करत हैं कि उसे जाराम पहुचाकर और प्रोमाइ- देवर उसका इलाज करते हैं । उही एक वहानी बताई है जिसका अध्ययन मभी शिक्षा शास्त्रियो को परना चाहिए। उनके पास एक कुत्ता था जिसे भोजन देन में पहले वे हमेशा तेज रोशनी का एक वृत्त दिखाया करते थे, और बिजली का झटका दन के पहरे रोशनी का एक दोघ वत्त दिपाया करत थे। परिणामन कुत्त न पत्ता और दीघ वृत्ता का भेद स्पप्टन समय लिया, उत्ता को देखकर उसे प्रमन्नता हाती थी और दोघ वृत्ता को दपत ही वह कुछ इस के साथ उनसे दूर हटता था। पवलाव 7 फिर धीरे धीरे दौध वृत की उत्त्वे दना कम करनी शुरूपी और उसे अधिपधिप प म हत ये समान बना दिया। कापी मरमे तक ता पुता वृत्त और दोध ग्रन ये बीच स्पष्टत परता रहा- जस जसे दीपत का आवार वत्त आधार के नजीर र गया स वर अधिकाधिक सूक्ष्म विभेद करन की क्षमता भा यूना रूप म तजी वे माप दिपाई दी। रितु जब हमन एस दोष वृत्त वा गोग दिया जिसा दोना अभE बाम थे अयान दीघ वृत्त गमग वृत्त ही जना था, तर सारी स्थिति यदा गई। ए ए ढग का मधम विभेतोरण - वज्ञानिक पद्धति के उदाहरण दिखाई दिया, जो दो या तीन सप्ताह तक रहा और बाद में न केवल अपने- आप गायब हो गया बल्कि पनले के विभेदीकरणा की क्षमता भी नष्ट हो गई जिनम सूक्ष्मता की माना कम थी। जो कुत्ता पहले शातिपूर्वक अपनी बच पर खडा रहता था वही अब वरावर सघप करता था और भौंकता था। अब फिर नए सिरे स सारे विभेदीकरणो को समरना आवश्यक हो गया और मोट मोटे विभेदीकरणा को समझाने में भी पहले की अपेक्षा कही अधिक समय लगाना पड़ा। अतिम विभेदीकरण की क्षमता उत्पन करने के प्रयत्न मे फिर उसी कहानी वी पुनरावृत्ति हुइ अयान सभी प्रकार के विभेदीकरणो की क्षमता गायब हो गई और कुता फिर उसी उत्तेजित अवस्था म पहुँच गया। ' मुये आगका है कि इसी प्रकार की काय पद्धति स्कूलो म प्रचलित है और अनेक विद्यार्थिया की स्पष्ट मूग्खता का यही कारण भी है। पंवराव की राय में निद्रा भी तात्विक रूप म वही चीज है जिसे निरोधन कहते हैं तथ्यत वह विशिष्ट प्रकार का निराधन होने के बजाय एक सामाय निरोधन होता है। कुत्ता का जो अध्ययन उहोने किया है उसके आधार पर पवलाव यह म्वीकार करते हैं कि प्रवृति या स्वभाव चार प्रकार का होता है पतिक प्रकृति, विपादी प्रति सुप्रत्यागी प्रकृति और कफ प्रधान प्रति । क्फ प्रधान और सुप्रत्यागी प्रतिया को पवलाव स्वस्थ प्रकृतिया मानते हैं और विपादी तथा पित प्रधान प्रतियां उनके मतानुसार मानसिक अव्य- वस्याआ का कारण हो सकती है । अपन कुत्तो को उहाने इही चार प्रकारा में विमाननीय पाया है और उनका विश्वास है कि मनुप्या के सम्बध मे भी यही बात सत्य है। जिस अग के माध्यम से नान या अजन होता है उसे वल्कुट कहते हैं, और पयगव का खयाल है रि वह वल्कुट का ही अध्ययन कर रह हैं। वह प्रिया दिनान के अध्यता हैं मनोदनानिक नही कितु उनका विचार है कि जानवरा के सम्बध म उस प्रकार ये मनोविज्ञान की कल्पना नहीं की जा सरती, जसा मनुष्या का अध्ययन करते समय अतदशन से उपर घ होता है। ऐसा लगता है कि मनुष्या के सम्मघ मे पवराव उम हद तक आगे नहीं जाते जिम हद तक जान वी० वाटसन गए हैं। उनका कहना है, 'मनोविनान का १ दखिए इवान पेट्रोविच पैवलाव, एम० डी० की पुग्ना 'लचस भोन कशड रिफ्लक्सेज़ , पृष्ठ ३४२ । रूमी भाषा से इम पुरता का भनुवाद श्री टग्ल्यू. हासल एम. डी, बी० एमसी ने रिया पार मार्टिन तारेंस लिमिरेट, ल इन ने प्रकाशित किया है। मार भी पिए मा० पी० पैवलाद द्वारा लिखित 'एटीशट रिफ्लेश्मेश एनरवीगेशन मार दिमिनिपालॉजिकल एक्टिविटीमापदि सरेबल कारटेक्स । मी जो० वी० ऐन रेप द्वारा भनूदिन, मोमासरोह १९२७ ।

४२ वज्ञानिक परिदृष्टि सम्बध जिस हद तक मनुष्य को आत्मनिष्ठ स्थिति से है, उस ह ता उमा अस्तित्व का एर प्राकृतिक अधिकार भी है क्यामि हमारा आमनिष्ठ समार हो वह वास्तविकता है जिसका सामना हम सबसे पह' करना होता है। किन्तु मानव मनोविनान के अस्तित्व का अधिकार यापि स्वीकार किया जाता है, पिर भा कोई कारण नहीं है कि पाशन मनाविनान की आवश्यक्ता पर प्रश्न चिह्न पान लगाया जाए।'' जहाँ तर पशुआ का सम्बध है पदराव एक गुद्र व्यवहारवादी है और इसका आधार यह है कि किसी पशु म चेतना है या नही इसका नान किमी को नहीं प्राप्त हो सकता। अथवा यदि पशुशी मे चेतना है तो उसरा म्वरूप क्या हो सकता है ? मनुष्या व सम्बध म भी समातिक रूप से अतदर्शी मनोविनान की स्थिति स्वीकार करने पर भी पक्लाव जो कुछ कहते हैं उसका नाधार सोपाधिर प्रतिवतनो का उनका अध्ययन ही है और यह स्पष्ट है वि शारीरिक व्यवहार के सम्बध म वह पूणत त्रिक स्थिति स्वीकार करते हैं। इस बात को स्वीकार करना कठिन है कि त्रिका ऊतक म हान वाली भौतिक रासायनिक प्रक्रियाआ के अध्ययन से ही हमे सम्पूण तत्रिका प्रपच सम्बधी यथाय सिद्धात की उपाधि हो मस्ती है और “स प्रक्रिया की अवस्थामा से ही हम तात्रिक क्रिया-कलाप को वाह्य अभिव्यक्तिया का, उनकी श्रमिक निरतरता ना और उनके अन्तसम्बधोका विश्पण मिल सकता नाचे लिखा हुआ उद्धरण मनारजक है, केवल इमलिए नहीं कि इस सम्बध म पवलाव को मान्यता पर टमसे प्रमाण पडता है बल्कि इसलिए भी frविनान की प्रगति के आधार पर मानव जाति के सम्बधम पैवराव की मादशवादी आगाएँ भी इसस स्पष्ट होती हैं जपने काम की शुरुआत में, और उमरे बात भी र जग्म तक अपने विषय का विश्लेषण मनोवजानिक व्याख्याआ द्वारा भरने की आदत हम पर हावी रही। हर वार जब कभी वस्तुनिष्ठ शोध भाग म कोई वाधा पडी अथवा जब कभी समस्या को जटिलता के कारण वस्तुनिष्ठ अनुम धान राम देना पा तभी अपनी नई पदति दे सम्बव म स्वभावत गवाए उत्पन हुई कि वह सही है या नहीं। धीरे धीरे गोध काम की प्रगति होन र साय- साय माय गवाएं उत्पन्न होने व अवसर कम होत गए और अब मरा यह पूण और बट विश्वाम है मि इसी माग पर चलकर मानव मस्तिष मानव प्रकृति की आतरिका और उसा नियमों का पान प्राप्त कर मवगा और १ पूर्व उल्लिखित, पृ० ३२ । २ पूर्व निखित, १४ ३४६ ।

१ वज्ञानिक पद्धति के उदाहरण ४३ यही मनुष्य की सबसे बडी और जटिल समस्या है। यही एक माग है जिससे पूण, सत्य और स्थायी प्रसनता की प्राप्ति हो सकेगी। अपनी चतुर्दिक प्रकृति पर मानव मस्तिष्प निरन्तर विजय पर विजय प्राप्त करता जाए, मानव- जीवन और मानव-नायकरापा के लिए मानव मस्तिष्क न केवल पृथ्वी के धरातल को बल्कि सागरो की गहराइया मे लेकर वायुमण्डल के अन्तिम छोर और बाह्य अन्तरिक्ष तक जो कुछ भी है उस सवको अपने वशीभूत कर ले, अपनी सेवा के लिए पार ऊना का प्रवाह विश्व के एक भाग से दूसरे भाग तक संचालित करे, जपन विचारा के स्थानातरण के लिए देश गत दूरी समाप्त कर दे, किन्तु फिर भी यह सब कर सकने वाला मनुष्य ही युद्धा और ऋतिया की भयावह पक्तिया द्वारा सचारित होकर अपने लिए अपार भौतिव हानि और अवथनीय पीडाआ की मृप्टि करता है और फिर पााव स्मितिया की ओर लौट जाता है । क्वल विनान-मानव प्रकृति के सम्बध परिशुद्ध विनान-और उसके प्रति सवसमश नानिक पद्धति की सहायता से सत्यनिष्ठ उपागम ही मनुष्य को उसकी वतमान विपादभूग स्थिति से मुक्ति दे सकता है और पारस्परिक मानव सम्बयों के क्षेत्र म उसकी दतमान लज्जाजनक स्थिति को समाप्त कर सकता है। तत्वमीमासा के क्षेत्र म पवलाव न तो भौतिकवादी हैं और न मनोवादी हैं। वे उसी विचार को मानते हैं जिसे मैं भी हरतापूर्व यथाथ मानता हूँ और वह यह है कि मस्तिष्क और पदाथ के बीच भेद करना एक भूर है और दोनो को ही ययाथ वास्तविक्ता मानना अथवा किसी को भी वास्तविक्ता न मानना ममान रूप से याय सगत हो सकता है। उनका कहना है 'हम उस म्यिनि मना रहे हैं जब मस्तिष्क को, आत्मा को और पदाय को एक ही समया जाएगा, और इस दृष्टिकोण के स्वीकार कर लिए जाने पर इनके बीच वरीयता की कोई आवश्यक्ता ही न रह जाएगी।" मनुप्य रुप म पवरराव म वही सरस्ता और वही नियमितता है जो पुराने जमाने के विद्वान पुरुषों में होती थी, जम इमेनुएल काट में । उहोने एक गान्तिपूण पारिवारिक जीवन बिताया है और नियमित रूप से अपनी प्रयोगणारा म वाम करते रहे हैं । प्राति के दिना में एक बार उनका सहायक दम मिनट देर परखे आया और प्राति को ही देरी का कारण बताया। पंवलाव का उत्तर या- 'जन प्रयोग गाला म तुम्हारा काम तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है तर त्रानि से इसम क्या जन्नर पडता है? उनकी रचनामा मस की बठि- नाश्या का जिन ववल एक बार उम प्रसग म आया है जर अन की कमी ये निा म अपन जानवरा को खिलाने म उह कुछ परिनाई पनी थी। यद्यपि १ पूर्व उल्लिरिन, १८४१ । - बज्ञानिक परिदृष्टि करता, डामा काम ऐमा है निमवै मम्व व म यह कहा जा सकता है कि साम्यवादी दर के आधिकारिख तत्वमीमासा गास्त्र या उससे समथन ही मिलता है फिर भी पवाव सोवियत सरकार के सम्ब च म बहुत ही आलाचनापूर्ण विचार रपते हैं और व्यक्तिगत प से तथा सुलेआम भी उमयी सरी जालोचना करते है । इसके बावजूद मरवार न उनके साथ बहुन ही उदारतापूर्ण व्यवहार दिया है और उनकी प्रयोगशाला के लिए आवश्यक प्रत्या वस्तु उपर 4 का है। अपन सिद्धातों ये प्रस्तुतीकरण म पवगवो किमी भ य पूर्णता ना प्रयत्न नहीं किया और यह तथ्य यूटा की अथवा डार्विन को भी, अभिनि की तुलना म वनानिका पी आधुनिक अभित्ति की विशिष्टता प्रपट परता है। पंवलाव का कहना है, पिछवीस वर्षों के दौरान उपर व परिपामा को मैन वाई यास्थित अभिव्यक्ति नहीं दी। इसका कारण यह है कि यह क्षेत्र विरकुर नया है और काय निरतर प्रगति करता गया है। जब प्रतिदिन नए प्रयागा और प्रेषणा द्वारा नए तथ्या को उपधि हा रही थी तब यह क्स सम्भव था कि मैं शोध वाय रोककर क्मिी यापक अवधारणा का प्रतिपान परिणामा को व्यवस्थित स्प ता?" जाजाल विनान के क्षेत्र में प्रगति की रफ्तार इतनी अधिक है कि यूटन वे ग्रन्थ 'िि सपिआ' अथवा टावित की रचना जोरिजिन आफ स्पिशीज' जस नथ वी रचना की ही नही जा भवती । एमी पुस्तक समाप्त करने के पढे ही वह समय से पीछ पड जाएगी। यह तथ्य कई अर्थों मे खेद जना है क्याकि पुरान जमान ये महान ग या म एक विशिष्ट मोदय और विशालता होती थी जो हमारे समान का ने भगनेवाली रचनाओ म दिखाई नहीं देती, वितु पान की तीन अभिरति का यह एक अनिवाय परिणाम है, और इसलिए इस एक दानिक दृष्टि से स्वीकार करना होगा। यह तो विवादास्पद ही है कि पंवलाव की पद्धतियो का सम्पूण मानव यवहार पर लागू किया जा सकता है या नहीं, पर यह तो निश्चित है कि मानव-व्यवहार के गत वक्षन पर वे लागू होती हैं और इस क्षेत्र की व्याप्ति म एन पद्धतिया ने यह स्पष्ट कर दिया है जि मात्रामूलय शुद्धता के साथ बना निर पद्धनिया को कम प्रयाग मे राया जाना चाहिए । पैवलराव ने यथातथ्य विनान के लिए एक नया क्षेत्र पीता है और इसलिए उह हमारे युग का एक महान पुरप माना हो जाना चाहिए। जिम समस्या का सफरतापूर्वक समाधान पवागव ने प्रस्तुत रिया है यह समस्या है निम बभी तक स्वच्छाजय व्यव हार माना जाता था उम चनानिर निपम के अधीन कम लाया जाए। एष हो जाति यदा प्राणियों की अथवा दा भिन अवमरा पर एर हा प्राणी की एक पूर्व उल्लिवित, पृ०४२ । । १ वज्ञानिक पद्धति से उदाहरण ही उदीपर से उत्पन अनुनियाएँ भिन्न भिन्न हो सकती हैं। इस तथ्य से यह विचार पन हुआ शिकाई ऐमी चीर है सिरप या इच्छा कहा जाता है जो हम स्थिनिया में प्रति अस्थिर और अनियमित ढग मे पिना विसी बना- निज नियमितता का पालन करते हुए अपनी अनुक्रिया को शक्ति देती है। मापाधि प्रनिदान का अध्ययन गरचे पवगव न यह म्पष्ट कर दिया है कि जो व्यवहार किसी प्राणी की महज प्रति द्वारा निधारित नहीं है उसमें भी अपन निमम हा मान है और उसका भी उतना ही वनानिक अध्ययन विश्लेषण दिया जा सकता है जितना निम्पाधि प्रतिपनना द्वारा शासित व्यवहार का। जैसा कि प्रोफेसर हागवन ने कहा है "हमारी पीढी मे इतिहाग म पहरो वार पक्गव और उनमें अनुयायिया के वाय ने सफरतापूरक उम ममस्या का ममाधान प्रस्तुत प्रिया है जिस डा. हा अमाध्यवाद की भाषा म चतन व्यवहार वहत हैं। इन अध्ययन न ऐसे व्यवहार को उन स्थितियों में शोध का विषय बना लिया है जिनके अधीन नई प्रतिस्तन-पदनियां उत्पन्न होती हैं।" जितना ही अधिक पैवगव को दम पधि का अध्ययन किया जाता है, उनना ही अधिर मह वपूण व मिद होती जा रही है और इसी कारण पैन को हमारे युा महानतम व्यक्तिया म स्थान दिया जाना चाहिए। दति गरेन की पुस्तक, दि नेचर और निविंग मैटर', १६३०,५०२५॥

दूमरा अध्याय वैज्ञानिक पद्धति की विशेषताएँ वनानिक पद्धति का वणन अक्सर किया जा चुका है और आज उमके सम्बध में कोई बहुत नई बात कहना सम्भव नही है। फिर भी यदि हम आगे चलकर यह विचार करने में सक्षम रहना चाहत हैं कि सामाय नान प्राप्त करने को और कोई दूसरी पद्धति है या नही, तो वनानिक पद्धति का विवचन कर लेना आवश्यक है। किसी भी वनानिक नियम का निर्धारण करने मे तीन प्रमुख अवस्थाए पार करनी होती हैं पहली अवस्था है सायक तय्या का प्रेशण, दूसरी अवस्था है एक ऐसी प्राक्कल्पना स्थापित करना जो यदि वह सही हो तो, इन तथ्यो का विश्लपण प्रस्तुत कर सके तीसरी अवस्था है इस प्राक्कल्पना से ऐसे परिणामों का निगमन करना जो प्रेक्षण द्वारा जाचे परखे जा सक। यदि इन परिणामा का सत्यापन हो जाता है तो अस्थायी रूप से प्राक्कल्पना को सही मान लिया जात है, यद्यपि आगे चलकर और अधिक तथ्या की खोज के परिणामस्वरूप प्रार उमा सशाधन आवश्यक हाता है। विनान की वतमान स्थिति म कोई भी तथ्य और कोई भी प्रासल्पना एकाकी और असम्बद्ध नहीं है वैज्ञानिक नान की सामाय परिधि के भातर ही उनकी स्थिति है। किमी भी तथ्य की सायक्ता उपग्ध नान सापेश ही है। किसी भी तथ्य का विनान के क्षेत्र म साथ क्न का जय यह है वह या तो रिसी सामाय नियम की स्थापना करता है अथवा विसी सामान्य नियम का खण्डन करता है क्याकि यद्यपि वितान का प्रारम्भ विशिष्ट के प्रेषण से होता है फिर भी तत्वत विनान या सम्बध विगिप्ट से न होवर सामाय स ही है । विनान म कोई भी तथ्य एवं तय्य मात्र नहीं हाता, वकि एक उदाहरण होता है। इस दृष्टि से वनानिश क्लागार से भिन होता है, क्यापि करावार यदि कभी तथ्या या दबने की कृपा करता भी है तो सम्भा वना यही है कि वह उह उनकी सम्पूर्ण विशिष्टता म दखेगा। अपन चरम आदाम्प म दिनान कुछ ऐसे प्रस्तावा या तर वावया का मारन है जो ऊध्वाधर म म व्यवस्थित हैं निम्नतम प्रस्ताव विशिष्ट तथ्या से सम्बधित और उच्चतम विमा सामाय नियम से जो विश्व की हर चीज वा नियमन है ४७ वज्ञानिक पद्धति की विशेषताएँ करता है । इमऊ वाघर म के विभिन स्तरा म परस्पर दोहरा सम्बध है, एक कवगामी और दूसरा अधोगामी और यह सम्बघ तक मगन है। उच्च- गामी सम्बध का आधार है बागमन, और अधोगामी सम्बध का याधार है निगमन । इसका अय यह हुआ कि एक परिपूण दितान में हम नीचे लिखे ढग से आग बढना चाहिए य, व, स, द, आदि विशिष्ट तय्य हैं जो एक सम्भाव्य सामाय नियम मुझात हैं, यदि यह नियम सही हो तो य सभी तथ्य उसके उदाहरण हैं । इसी प्रकार के कुछ अय तथ्य कोई दूसरा सामा य नियम सुझाते हैं और कुछ दूसरे काद तीसरा, चौथा आदि । य सभी मामाय नियम, आग- मन पद्धति मे, एक उच्च कोटि की सामा यता का नियम स्थापित करते हैं और यदि वह सही हो ना य मामा य नियम उसके उदाहरण बन जात हैं। प्रेभित विशिष्ट तथ्या अभी तक निधारित सवाधिक सामाय नियम तक पहुँचन में इस प्रकार की अनेक अवस्थाएँ पार करती हागी। दम सामाय नियम स हम फिर तब तक निगमन पद्धति से आग वढन जात हैं जब तक उन विशिष्ट तथ्यो तक नहीं पहुँच जात जिनमे हमन निगमन प्रारम्भ किया था। पाठय-पुस्तकों में निगमन-पद्धति अपनाई जाएगी, किन्तु प्रयोगशाला म बागमनात्मा पद्धति । इस पूर्णता के कुछ ममीप पहुंचन वाला विनान अभी तक केवल भौतिकी ही है । भौतिकी पर कुछ विचार करने से हम उपर दिए गए वनानिक पद्धति के 'भावमूश्म विवरण का कुछ मून स्प दन म सहायता मिल सकती है। जैसा जि हम दख चुके हैं गर्गलिया न पृथ्वी के घरातल समीप गिरते हुए पिण्डा के नियम की साज की थी। उन्होंने यह खोज की थी कि वायु के प्रतिरोध के वावजूद गिरते हुए पिण्ड एवं ममान त्वरण स गिरत हैं और वह मबके लिए बराबर रहता है। अपेक्षाकृत प से बहुत योडे-म नय्यो के वाधार पर यह सामायीकरण निर्धारित किया गया था, अर्थात् उन गिरत हुए पिण्डा के उदाहरण के आधार पर जिनो गिरन के समय का प्रेषण गैलीपिया न किया था। किन्तु बाद म दम प्रकार व नितन भी प्रयोग किए गए उन सबम गरीरिया के इस सामा यावरण की पुष्टि हुई । गोलियो द्वारा उपर परिणाम सामा यता के काटि म म निम्नतम नियम था जो माट तथ्याम इतना अधिक नदीव था जितना का भी सामाय नियम हा सरना था। इस बीच पर न ग्रहा की गति विधि का प्रण क्यिा था और उन कसा के मम्बषम अपने तीन नियम बनाए थे । य नियम भी सामायता के काटि म म निम्नतम स्तर के थ। यूटन न वेपलर के नियमा का गगरिया द्वारा प्रतिष्ठित गिरत पिण्य के नियमा का आर ज्वार भाग व नियमा को तथा घूमरतुआ की गति विधि के मम्बच म जो कुछ नात या उस मवको एक ही नियम म सरित कर दिया, जिसका नाम है गुरु वाषण का नियम, जिसन इन मब नियमा को समाहित चज्ञानिक ४८ गुरवा कर लिया। इमसे भी अधिक इस नियम ने न केवल यह सप्ट कर दिया ये सारे पूर्वगामी नियम क्या सही थे बल्कि यह भी स्पष्ट कर लिया । वे सब क्या पूणत मही नही थे, और एक सफल सामायीकरण ये माय प्राय ऐसा ही होता है। पृथ्वी के धरातल के समीप पिण्ड पूणत एक समान त्वरण के साथ नहीं गिरते जब वे धरती के समीप पहुँचते है तो त्वरण म थानी मी वृद्धि हो जाती है । ग्रह बिल्कुल दीघ वृत्ता म परिक्रमा नहीं करते, जब कभी व रिमी दूसरे ग्रह के समीप पहुँचते हैं तब अपनी कक्षा से कुछ वाहर सिंच जात हैं । इस प्रकार यूटन का गुरुत्वाक्पण का नियम पुराने मामा योररणो का अति क्रमण कर गया किन्तु यदि इन पुराने नियमा का आधार न हाता ता गुरुत्वा क्पण नियम की स्थापना शायद ही हो पाती। दो मौ वप से अधिक सम तक ऐसा काई नया मामा योवरण नही उपर घ हो मका जो यूटन वे गुर, क्पण नियम को समाहित कर रता जैसे वेपलर के नियमो को इस नियम ने समाहित कर पिया था। और आखिरकार जब आइमटीन को एक ऐम सामा यीकरण की उपलब्धि हुई भी तो उसने गुरुत्वाक्पण के नियम को एक अत्यन्त अप्रत्याशित कोटि मे रख दिया। यह देखकर सभी को आश्चय हुआ कि क्षण का नियम वास्तव म ज्यामिति का नियम है न कि पुरान अर्थों भौतिकी का । जिम साध्य के साथ इसका सवाधिक सम्बध है वह है पेयागो. की साध्य जिगका तात्पय यह है कि क्मिी समकोण निभुज के कण पर बनने वा वग शेप दो छाटी भुजाआ पर बनने वाले वर्गों के बराबर होता है। हर स्थल विद्यार्थी इस साध्य की उपपत्ति सीप रेता है, वितु जिन लोगो ने आइमटीन को पढ रमा है केवल वही इस साय को गस्त सिद्ध करना मीस पाते हैं । यूनानिया के लिए---और एक गती पहले तक आधुनिक युग के लोगो के लिए भी ज्यामिति एक निगमनाधित अध्ययन था जसे आवारी तकशास्त्र, प्रेक्षण पर आधारित अनुभवमूलक विनान नहीं था। सन १८२६ मे रोगाचप्स्की ने इस विचार की अमत्यता सिद्ध कर दी और यह दिपा दिया कि यूक्लिडीय ज्यामिति की सत्यता केवर प्रक्षण द्वारा ही मिद्ध की जा सकती है, ता द्वारा नहीं । इम विचार न यद्यपि गुद्ध गणित की महत्वपूण नई शाखाआ को जम दिया फिर भी सन् १९१५ तक-जब आइस्टीन ने अपने मामाय सापरता सिद्धात म इमे भी शामिल कर लिया--भौतिकी म इम सिद्धात का वाई परिणाम नहीं निजग। अब तो ऐमा लगता है वि पथागोरस की साध्य बिन्युन सत्य नहीं है, और जिग गुद्ध सत्य की ओर इस साध्य म पूर्व सक्त उपल ध है उसम गुरुत्वारपण का नियम स्वय ही उपादान अथवा परिणाम प म मौजूर । है। और फिर वास्तव म वह यूटन का गुरुत्वावपण का नियम भी नहा है बल्यि एव ऐमा नियम है जिसके प्रक्षणीय परिणाम कुछ थोडे-स भिन हैं । जहाँ बज्ञानिक पद्धति की विशेषताएं ४६ आइमटीन का मतभेद यूटन से स्पष्टत दिखाई देता है, वहां यूटन के विरुद्ध आइमटीन ही का मत सही पाया गया है । आइन्सटीन का गुरुत्वाक्पण नियम यूटन के नियम की अपेक्षा अधिर सामा य है क्याकि वह न केवल पदाथ पर लगू होता है बल्कि प्रकास पर और ऊजा के प्रयक प्रकार पर भी लागू होता है। आद सटीन के सामा य गुरुत्वाक्पण सिद्धात की उपधि के लिए प्रारम्भिक पूर्वपीठिया के रूप में न केवर यूटन का सिद्धान्त आवश्यक था वन्धि विद्युन चुम्बकत्व का सिद्धात, स्पक्टम विनान, प्रकाश के दवाव का प्रेषण तथा मूत्रम ज्योतिपीय प्रेक्षण की भी जावश्यकता थी, जा वडी-वडी दूरवीना और फोटो ग्राफी की तकनीक की सफलता के कारण उपर ध हो सके है। इन प्रारम्भिक तैयारिया के विना आइन्सटीन का सिद्धात न तो खोजा ही जा मक्ता था और न उसकी सत्यता मिद्ध व प्रति को जा सकती थी। मितु जब इस सिद्धान्त को गणितीय प म प्रस्तुत किया जाता है तब हम गुरुत्वाक्पण के सामायीकृत नियम मे प्रारम्भ करते हैं और तकना के अत म उन सत्यापनीप परिणामा तर पहुँचत हैं जिनक आधार पर आगमनात्मक पद्धति से इस नियम की स्थापना की गई थी। निगमनात्मक पद्धनि म गोध की कठिनाइयां दृष्टि से ओयल हो जाती हैं और जिस आगमन के परिणामस्वरूप महत्वपूर्ण आधार-वाक्य निर्धारित किए गए उसके लिए आवश्यक व्यापक प्रारम्भिक नान का अनुमान कर सकना भी कठिन हा जाता है। क्वाटम सिद्धान्त के सम्बध भी इसी प्रकार की घटना इसी तजी से घटित हुई है तो सचमुच आश्चयजनक है। सन १९०० म पहरे पहर इस बात की खाज हुई वि कुछ ऐसे तथ्य हैं जिनक आधार पर किसी ऐसे मिद्धान्त की स्थापना आवश्यक है। और अब इस विषय का विवेचन एक नितान्त भावमूम म्प म इस प्रभार किया जा सकता है जिसमे पाठक को गायद ही कभी इसका ध्यान भी आए कि इस विश्व की सत्ता भी है। भौतिकी के सम्पूण इतिहाम मे गलीलियो के ज़माने स रेकर आज तक, सायर तथ्य का महत्व बहुत ही स्पष्ट रहा है। किसी मिद्धात के विकास की विसी एक अवम्या म जा तथ्य मायब होत हैं, विकास की दूसरी अवस्था म सायक तथ्या स व बिल्कुल भिन्न होते हैं। जब गलीलिया गिरते हुए पिण्टा के नियम की स्थापना कर रह थे उस समय यह तथ्य अधिक महत्वपूर्ण था कि निवात म एव पब और नी का एक पिण्ड दोना समान तती से गिरेंगे, बनिम्बत इस तथ्य के कि हवा म पर अधिक धीमी गति स गिरता है, क्यावि गिरते हुए पिण्य को समझन की दिशा म पा कदम इस बात का अनुभव परना है कि जहाँ तब बदल पृथ्वी व आपण का सम्बध है, सभी गिरत हुए पिपरा का त्वरण समान होता है। वायु प्रतिरोध से उत्पन परिणाम का पृथ्वी वारपण से मिन एव अतिरिक्त तथ्य समझना होगा। तात्विर वात । वज्ञानिक परिदृष्टि तो यह है कि हमेशा ऐसे तथ्यो की खोज करनी चाहिए जो किमी एक असम्बद्ध एकाकी नियम का निदान करत हा, अथवा फेवल ऐसे नियमा से सम्बद्ध विसी नियम का निदशन करते हा जिनके प्रभाव भरी भाति मालूम हो । यही कारण है कि वनानिक खोज म प्रयोग इतनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है । प्रयोग म परिस्थिनिया का कृत्रिम रूप से सरल बना दिया जाता है ताकि किसी एक नियम का एकाकी-असम्बद्ध रूप में प्रेक्षण मम्भव हो सके । अधिकाश टोस स्थिनियो म वस्तुन जो कुछ होता है उसकी व्याख्या के लिए तमाम प्राकृतिक नियमा की आवश्यकता पड़ती है, किन्तु उन नियमा को प्रमश एक एक रखे खोजने के लिए प्राय ऐसी परिस्थितिया की खोज करना जरूरी होता है जिनम केवल एक ही नियम साधत और प्रासगिक हो। और फिर सर्वाधिक शिक्षा प्रद तत्व का प्रेक्षण बहुत कठिन हो सकता है। उदाहरण के लिए जरा सोचिए मि ऐक्स किरणा और रेडियो-सप्रियता की खोज से पदाथ सम्बधी हमारा पान कितना बढ़ गया है फिर भी यदि अत्यत विस्तृत प्रायोगिक तकनीक न उपर ध होती ता य दोनो ही हमारे लिए अज्ञात ही रह जाते । रेडियो सनियता की खोज तो फोटोग्राफी विज्ञान को पूर्ण बनाने की प्रक्रिया मे हुई एक घटना का परिणाम है । वररेल के पास फोटो को कुछ अत्यत सूक्ष्म ग्राही प्लेटें थी जिनका वह उपयोग करना चाहता था किन्तु चूकि मौसम खराब था इसलिए उसने इन प्लेटा को एक जवेरी जलमारी में रख दिया, जिसमे सयोगवश कुछ यूरेनियम भी रखा हुआ था । जब प्लेटें बाहर सिफारी गई तो देखा गया कि पूण नधकार होन पर भी प्लेटो म पूरनियम का फोटो आ गया था। इस सयोग के कारण हो इस बात की खोज हो सकी कि यूरेनियम रेडियो ऐक्टिव है। सयोगवश ना गया यह फोटोग्राफ सायक तथ्य का एक दूसरा उदाहरण है। भौतिकी के क्षेत्र से बाहर, निगमा का उपयोग बहुत कम होता है और इसके विपरीत प्रेक्षण का, नौर प्रक्षण पर प्रत्यक्षत आधारित नियमो का प्रयोग बहुत अधिक होता है। अपनी विषय वस्तु पी मरलता के कारण अय क्सिी विज्ञान की रपक्षा भौतिकी एक उच्च स्तर पर पहुंच चुकी है। इस बात म तो जहाँ तक मैं समगता हूँ, वाई सदेह नही दिया जा सकता कि सभी विनाना का जादरा एक ही है किंतु इस बात म तो सदेह किया जा सकता है कि मानव क्षमता कभी भी गरीर पिया विनान को उदाहरण के लिए उतना पूर्ण निगमनात्मा गारत्र बना सकेगी जितना पूण सद्धान्तिक भौतिकी आदि हैं । गुद्ध भोतिका म भी परिवरन की कठिनाइयां बहुत जल्दी प साथ यसाध्य हो जाती हैं। यूटनीय गुरुवारपण मिद्धात म यह परिसन असम्भव था गितान पिण्ड अपने पारम्परिक आरपण ये अधीन बसे गतिशीर होग, इसका अपवाद वर वही स्थिति थी जब उनम से एक पि शेप दो की अपक्षा बहुत अधिर वडा वज्ञानिक पद्धति को विशेषताएं हा । माइ स्टीन का सिद्धान्त यूटन के सिद्धान को बपेशा बहुत अधिक जटिल है, और उमम भी सैद्धातिक परिशुद्धता के साथ यह परिकल्न असम्भव है कि वैवर दो पित्र भी अपने पारस्परिक आपण के अधीन किस प्रकार गतिशील हागे, यद्यपि व्यावहारिक प्रयोजना के लिए काफी अच्छा परिवलन सम्भव है। भौनिको के लिए यह सौभाग्य की बात है कि औसत निकालने को पद्धतिया उपल ध हैं जिनके द्वारा बडे-बडे पिण्डा के व्यवहार का परिवरन गुद्ध सत्य से काफी निकट माना ना किया जा सकता है, यद्यपि पूणत परिशुद्ध मिद्धान मानवीय शक्तिया से नितात परे है। यद्यपि यह एक विरोधाभास मालूम हो सकता है, फिर भी सम्पूर्ण यथाथ वितान सनिबटन के विचार से अभिभूत है। जब कभी कोई व्यक्ति आपमे यह कहा है कि किसी भी वस्तु या तथ्य के सम्बध मे वह ययाय सत्य जानना है, तो यापका यह अनुमान कर लेना बिल्कुल निगपद होगा कि वह एक अययायवादी मनुष्य है । विनान में सावधानीपूवा दिए गए प्रत्यक परिमापन मे सम्भाव्य भूल की स्थिति सवदा स्वीकार की जाती है। यह 'सम्भाव्य भूर' एवं तकनीकी शन्द है जिसका अपना एक गुद्ध स्पष्ट अथ होता है। इसका अय है भूल की वह मात्रा जिसका वास्तविक भूल से अधिर होना उनना ही सम्भव है, जितना सम्भव उससे कम होना है। जिन विषयो म कुछ विशिष्ट स्प से परिशुद्ध नान उपरब्ध है उनकी एक यह विशेषता है कि उनके सम्बध मे प्रयेक प्रेक्षणकर्ता यह स्वीकार कर लेता है कि सम्भव है वह गलती पर रहा हो, और यह भी जानता है कि लगभग क्तिनी गल्तो वह कर रहा होगा। जिन मामरो मे मत्य का निधारण सम्भव नहीं १ज भी सावधानीपूर्वक परिमापन सम्भव है, वहाँ विज्ञान के क्षेत्र में काम करने वाले लोगों को सनई अभिवृत्ति का नमूना नीचे लिये उद्धरण मे मिल जाता इजो 'नेचर' (७ परवरी १९३)सनिया गया है वरुण का घूणन काल~म अवनि में किए गए दो माविर विश्वसनीय निधारण है-प्रोमर लावेल और स्लाम्पराग सन १९१ में दिया गया निधारण और श्री एल. केम्पवेल द्वारा सन १९१७ म यिा गया निधारण । इनमें में पत्ता निवारण सेक्रमी थी और दूसरा निसरण प्रमाशीय विभिनता द्वारा उपलम्ब हुआ था। परिणाम पागरिक दृष्टि से समरूप दी थे, प्रमश दस घण्टे पचाम मिनर और दम घरे उन म मिना । विश्राम भार अधिक खोज करने में लियर भी पाणी माश सममो गा थी, क्योंकि रपेक्ट्रमी पद्धति मे निरि सम्भाय भूल मत्रह मिनट की शी पार भय शिमिन बसेदारा प्राणीय विभि नना की पुष्टि नहीं हो सकी थी। पिरो हो माता दरियह मूल प्रम्य यो श्रवन के कारण हुई हो। दिसम्बर महीने दे (Pab Ast Soc Pac) पत्र में मानी मूर और मंजिल कारा पिए गर एक नए स्पेक्ट्रमो निधारण या विवरण दिया गया है। रहोंने लावेन भार नपरपरकी मरा रिस उनकारि परिक्षेपण का प्रयोग पिया, इस लावावरणवा विधुचद् वृत्त मण्डल कइक मषित समीप है। इन लोगोंदारामापा गया माध्य दस घण्टे पचास वज्ञानिक परिदृष्टि थी वोर का सिक्षात प्रगति के माग में एक आवश्यक पडाव था, फिर भी वस्तुत अब उसे त्यागा जा चुका है। सच्चाई तो यह है कि पर्याप्त भावसूक्ष्म प्राक्षल्पनाएँ निधारित पर सपना मनुष्य के रिए सम्भव नही है वल्पना हमेशा तक के क्षेत्र में दस देती है और उसी के कारण लोग ऐमो घटनामा के मानस चित्र खीच रेते हैं जिह देखा जा सपना तत्वत असम्भव है। उदाहरण के लिए, अणु-सम्बधी श्री बोर के सिद्धात म एक अत्यत भावसम घटक था जिसका सत्य होना बहुत सम्भव था कि तु यह भावसूक्ष्म तत्व ऐसे कल्पना मूलक विवरणा म गुथा हुआ था जिसका कोई आगमनामक औचित्य या आधार नहीं था। हम उसी विश्व के मानस चित्र बना सकते हैं जिसे हम देखते हैं, किन्तु भौतिकी का विश्व ए भावसूक्ष्म विश्व है जा देखा नही जा सकता। इसी कारण रिसो ऐसी प्राक्कल्पना को भी निश्चित रुप से सरय नहीं माना जा सकता जिसम सम्पूण भान प्रासगिक तथ्यो का सूक्ष्मन परिशुद्ध विश्लेपण उपरब्ध हो, क्यानि प्रेक्षणीय नत्वा के सम्व व मे उस प्राक्कल्पना से निर्धारित किए जानेवाले frगमना के लिए तक्मगत टग से उगना कोई अत्यन्त भावसूक्ष्म पहल हो सम्भवत आवश्य होता है । सम्पूण वनानिय नियमा का आधार आगमन होता है, जिस पर यदि ताविक ढग से विचार किया जाए तो वह एक सदेहारपद और किसी भी निश्चय वे निर्धारण म उत्तम पद्धति सिद्ध होती है। मोटे तौर से आगमनात्मक तर कुछ इस प्रकार का होता है यदि काई प्राक्कल्पना सत्य है तो अमुक-अमुक प्रकार के तथ्य प्रेक्षणीय हागे अब चूकि वे तथ्य प्रेक्षणीय पाए गए हैं, इसलिए प्रायल्पना सम्भवत सत्य है । इस प्रकार के तक म परिस्थितिया + आसार भिन भिन पोटि म प्रामाण्यता सम्भव होगी। यदि यह सिद्ध किया जा सके कि प्रेभित मथ्या के साथ अय किमी प्रकार की प्राक्कल्पना की सगति नहीं बैठनी तो हम एक निश्चय पर पहुँच सकते है किन्तु एमा शायद कभी सम्भव नहीं है । सामा य प स सम्पुण सम्भाव्य प्रापाल्पनाओ को सोच रने का कोई तरीका नहीं है, अथवा यदि एसा तरीका है भी तो एक स अधिक प्राक्कल्पनाएँ लिए गए तथ्या के साथ संगत पाई जाएंगी। एसी सूरत म वनानिव सत्रम मरल प्रायल्पा को एक व्यावहारिक प्राक्कल्पना के प म स्वीकार कर रता है, अधिक जटिल प्रापरल्पनामा की ओर वह तभी मुडता है जब गए तथ्यो द्वारा यह मिद हो जाता है कि सबसे मरल प्राववल्पना अपयाप्त है। अगर आपने दिना यूंछ वाली दिव भी न देयी हो तो इस तथ्य का विवरण देने वाली सबसे सरल भावाल्पना यह होगी 'सभी रिल्ल्यिा में पूछ हाती है।' रितु जिम दिन पहले पह आप दिना पछ दारी मिली देम लेंगे उस दिन जाप अधिक जटिल प्राकान्पना स्वीकार करने के Pिा मजबूर हो जाएगे। जो व्यक्ति ।

५५ । वजानिक पद्धति की विशेषताएँ यह तक करता है कि चूमि जितनी भी विल्लिया उसने देखी हैं उन सबके पूछे है इसलिए सभी विल्लिया के पूछे होती हैं. वह व्यक्ति उम पद्धति का प्रयोग करता है जिसे सरल गणना द्वारा आगमन' कहा जाता है। तक की यह पद्धति बहुत ही खतरनाक है। अपने अच्छे स्पो मे आगमन इस तथ्य पर आधारित है कि हमारी प्राक्कल्पना ऐसे परिणामो को प्रतिष्ठित करती है जो सत्य सिद्ध होते हैं, किन्तु जो, यदि उनका प्रेक्षण न किया गया हो तो, बहुत ही असम्भाव्य मालूम होंगे। यदि आपकी भेंट किसी ऐसे आदमी से हो जिसके पास पासा की एक ऐसी जोडी हो जिमम हमेशा बारह पडते हो तो सम्भव है इसका कारण उस व्यक्ति का भाग्यशाली हाना हो, किन्तु एक दूसरी प्राक्कल्पना भी है जो प्रेक्षित तथ्या को इतना आश्चयजनक नही रहने देती। इसलिए अच्छा यही होगा कि आप इस दूसरी प्राक्कल्पना को अपनाएं। उत्तम कोटि के सभी आगमनो म प्राक्कल्पना द्वारा जिन तथ्या का कारण प्रस्तुत किया जाता है वे पूर्वत असम्भाव्य होते हैं और तथ्य जितने ही अधिक सम्भा य होंगे, उनका कारण प्रस्तुत करने वाली प्राक्कल्पना उतनी ही अधिक सम्भाव्य हो जाएगी। जसा हम पहले कह चुके हैं, परिमापन का यही लाभ है। यदि क्मिी आकार वाली चीज़ का आकार ठीक वैसा ही पाया जाता है जैसा आपकी प्राक्कल्पना म उसे स्थापित किया गया है, तो आप महसूस करेंगे कि आपकी प्राक्कल्पना मे कुछ-न-कुछ सत्य अवश्य है। मामा य बुद्धि से तो यह बात बिल्कुल स्पष्ट है, कितु तर के क्षेत्र में इसम कुछ कठिनाइयां पैदा हो जाती हैं। किन्तु इस वात पर अगले अध्याय से पहले हम अभी विचार नहीं करेंगे। वैनानिक पद्धति की एक विशिष्टता भी शेप है जिससे सम्बध मे कुछ चचा अवश्य करनी चाहिए। यह विशेषता है विश्पण की। सामा यत वना. निका द्वारा यह कल्पना कर ली जाती है, कम-से-कम एक कामचलाऊ प्राक्कल्पना ये स्प म, दि वस्तुत घटित होने वाली कोई भी यथाय घटना कई एक कारणा का परिणाम होती है जिनमे से प्रत्यक कारण यदि अलग अलग होता तो घटित घटना से कुछ भिन ही परिणाम निकलते। वह यह भी मान लेते हैं कि पृथक- पृथक कारणा के परिणामो प्रभावा को जान रेने पर ही सम्यक् परिणाम का परिक्लन किया जा सकता है। इसके सरलतम उदाहरण यात्रिको मे पाए जाने हैं। चद्रमा पर पृथ्वी और मूय दोना के ही आरपण का प्रभाव पड़ता है। यदि केवल पृथ्वी का ही आक्षण सक्रिय होता तो चद्रमा को क्या कुछ और हो होती,और यदि वेवर सूप का ही आक्पण काम करता तो उसकी कक्षा कुछ दूसरी ही होती विन्तु चन्द्रमा की वास्तविर कभा का परिक्रन तभी मम्भव हो पाता है जब हम पृथ्वी और सूय दोनो के लाक्पणा द्वारा उत्पन्न प्रभावा को जान लेते हैं जब हम यह मालूम हो जाता है कि पिण्ड निवान मे क्मे गिरते हैं, और वज्ञानिक परिदृष्टि जब वायु के प्रतिरोध का नियम भी हम मालूम हो जाता है नब हम यह परि- कलन कर सकते है कि हवा म पिण्ड क्से गिरेंगे। यह सिद्धान्त विज्ञान की निया विधि के लिए कुछ अशा म अनिवाय है कि फुटकर नमित्तिक नियमा को इस प्रकार जलग अलग किया जा सकता है और फिर उहे एक म सयुक्त किया जा सकता है क्यानि हर बात का एक साथ विचार कर मक्ना अथवा फुटकर नमित्तिक नियमा वा निर्धारण कर सकना, तब तक असम्भव है जब तक उह एक एक करके पृथक न क्यिा जा सके । फिर भी यह तो क्ह्ना ही पड़ेगा कि यह पूवानुमान कर लेने का कोई कारण नही है कि दो कारणो के पृथक पृथक सक्रिय हाने से उत्पन परिणामा प्रभावा के जाधार पर उस परिणाम प्रभाव का परिक्लन किया जा सकेगा जा उनके एक साथ सक्रिय होने पर उत्पन हाग और आधुनिकतम भौतिकी म यह सिद्ध हो गया है कि इस सिद्धान्त में उतनी सत्यता नहीं है जितनी पहले मानी जाती थी।' उपयुक्त परिस्थितिया के लिए यह एक व्यावहारिक और निक्ट सत्य सिद्धा त अवश्य है कि तु इसे इम विश्व का सामा य गुणधम नहीं माना जा सकता । इसम सदेह नही कि जहा कही यह सिद्धात सफल हो जाता है वहा विज्ञान का काय बहुत कठिन हो जाता है किन्तु अभी जहा तक दृष्टि जाती है, इसम सत्य की इतनी पयाप्त माना अवश्य पाई जाती है कि एक प्राक्कल्पना के रूप म इसका प्रयोग किया जा सक । जत्य धिक उच्च स्तर के और सूक्ष्म परिक्लना म बशक इसका उपयाग नहीं किया जा सकता। १ ाहरण के लिए देसिए, दिरैक की पुस्तक, 'दि प्रिंसिपुरम मॉप कन्टम मेक्सि', पृष्ठ १३०।

तोमरा अध्याय वैज्ञानिक पद्धति की परिसीमाएं जा पुछ भी भान हम प्राप्त है वह या तो विगिप्ट तथ्या कालान है अथवा वनानिर मान है। एक अप म निरास बोर भूगो विवरण पिनान के क्षेत्र मे बाहर हैं पन का माग्य यह है कि रिनान म उनको पूर्व कल्पना करती गर्द और उही वे आधार पर विनान का टाचा बहा दिया गया है। एक पार पत्र म जिम प्रकार की सूचना मानी जाती हैं जैसे नाम जम तिथि, पिनामह की बाबा का ग आदि दे सब ठोस तथ्य है सीजर और नपारियन का विगत अम्निव धरती और सूप तथा यय आकाशीय पिण्टा का वतमान यतित्व भी इभी प्रकार के ठाम तय्य माने जा मरन हैं। मतलब यह है कि हमम मे अधि काग साग रह ज्या-वा-या स्वीकार कर रेन हैं किन्तु शुद्ध अर्थों में इन ममी नय्या म एस अनुमान निहित हैं जामय हो भी सकता है और नही भी । इतिहास परन वाला कोई विद्यारी यति नपोपियन अस्तित्व पर विश्वास करने में यार कर दे तो गायद उम मजा दी जाएगी और एक पनुमयप्रामाण्यवादी एयरी तथ्य टम वाल का पयाप्त प्रमाण हो जाएगा कि नेपापियन जैसा काई यापी वास्तव म पारितु यदि विद्यार्थी इस प्रकार के प्रामाण्य का मानन वाला न हो, तो वह यी मागा नियनि उमरे अध्यापक के पाम नपारियन ये अम्तिन मािम करन वा काइ उपयुक्त कारण होता तो वह कारण स्पष्ट कर दिया गया हाता । मरा विश्वास है कि इतिहास र वन वम एम यध्यापर हांगे जो यह सिद्ध करन व रिए कोई अच्छा प्रभावपूष तक र म पि नेपो- रियन वास्तव में एक पौराणिक कल्पना मात्र नहीं था। मरा यह तान्यय नहीं है कि एमे तक है ही नहीं, में पद यह स्पष्ट कर रहा हूँ बिधिका रामाको एगे तौका पान ही नग है । स्पष्ट है कि यदि अपन दनुभव स बाहर की किसी बात पर आप विश्वास करन जा रहे है, ता उम पर विश्वास बरन के frr काई नयाई पाल हाना चाहिए। प्राय यह कारण केव' आप्तव हाना { जब कम्निन म पर पहप्रयागाएं स्थापित बग्न का प्रस्ताव दिया गया तब गिलत टाइटर न यह आपनि उठाद योनि विद्यापिया द्वारा प्रयोग की प्रक्रियाएं दमा अनावश्या है क्याकि प्रयामा मनिग्न वाल परिणामा को अध्यापम द्वारा ही प्रमाणित रिया जा सकता है जिनम म प्राय सभी उच्चतम वज्ञानिक परिदृष्टि चरित वाले व्यक्ति है और अधिकारी इग्लड के चच के पादरी है। टाइटर के विचार स आन अधिकारिया द्वारा प्रस्तुत तक ही पयाप्त होना चाहिए, किन्तु हम सभी जानत हैं कि क्तिने अधिक अवसरा पर आप्न अधिकारी गल्न सिद्ध हो चुके हैं । यह सही है कि हमम से अधिक लामा को अपने अधिकाश नान के लिए अनिवायत आज अधिकारिया पर ही निभर रहना पड़ता है। हान अंतरीप के अस्तित्व का आप्तत्व न प्रमाण पर ही हम स्वीकार कर देते हैं और स्पप्टत यह असम्भव है कि हमम से प्रत्यक व्यक्ति भूगोर के तथ्या का सत्या- पन कर सके, किन्तु यह आवश्या और महत्वपूर्ण है कि सत्यापन के अवसर और उसकी सुविधा होनी चाहिए और यह भी स्वीकार किया जाना चाहिए कि कभी- कभी सत्यापन आवश्यक होता है । हम इतिहास को मार रौटें-जैस जसे জীব। युगा की ओर बढ़ते हैं वैसे वसे सदेह की मात्रा बढतो जाती है। क्या पथागोरस नाम का व्यक्ति सचमुच था? शायद रहा होगा । क्या रोमोलम था ? शायद नहीं । बया रमस था? निश्चय ही नहीं। जितु नपोलियन के अस्तित्व और रोमोलम ये अस्तित्व के प्रमाणा के बीच वेवर मात्रा का ही अतर है। युद्ध अर्थों म न तो नेपोलियन के अस्तित्व को और न रोमोलम के अस्तित्व को एक अनिवाय तथ्य के रूप म स्वीकार किया जा सकता है क्यानि दो म स कोइ भी हमारे प्रत्यक्ष अनुभव म नही जाता। क्या सूय का अस्तित्व है ? अधिकारी लोग कहगे कि सूय तो हमारे प्रत्यक्ष अनुभव में आता है यद्यपि नपोलियन उस अथ में मारे प्रत्यन अनुभव म नहीं आता किन्तु ऐसा मोचन म वे भूल ही करते हैं। सूय की दूरी हमसे दिशा मूल्य दूरौं है और नपोलियन की दूरी काल-मूल्य दूरी है । नपोपियन की भांति ही सूय का नान भी हमे उसके प्रभावा द्वारा ही होता है । रोग कहते हैं कि वे मूय को देखते हैं मितु इसका अय क्वल यही है कि हमारे और सूय के बीच म जो नौ करोड तीस लाख मील की दूरी है उस पार करके कोई चीज हमारे पास तक आती है और हमारे दृष्टिपटर पर, हमारी हर तत्रिका पर और हमारे मस्तिष्क पर एक प्रभाव पारती है। यह प्रभाव जो हमारे ऊपर उम स्थान पर पड़ता है जहाँ वही हम होत है निश्चित म्प से उस मूय साय एकरूप नही माना जा सकता जो ज्योतिपिया की भाषा म मय है । सच तो यह है कि यही प्रभाव मय उपायो द्वारा भी उत्पन किया जा माला है। मिद्धातन पिघरी हुई धातु का अलता हुआ गोला उपर आकाश म एक ऐसी यिनि म टवाया जा सकता है जो विसा प्रेक्षक का ठीर सूय जसा मालूम हो । प्रथा पर पडन वाला यह प्रभाव मय द्वारा उत्पन होन वारे प्रभाव स अभेदनाप-निता त एक्रुप-बनाया जा सकता है । इसलिए सूप भी, हम जो धज्ञानिक पद्धति की परिसीमाएं ५६ कुछ देखते है उसके आधार पर निकाला हुआ एक अनुमान ही है और वस्तुत ज्याति का वह पिण्ट नहीं है जिसका हम तुरत आभास होता है । यह तथ्य विनान की प्रगति का ही सूचक है कि स्वीकृत जाधारभूत तथ्य रुप मे पाई जाने वाली बाता की सरया कम होती जा रही है और अधि काधिक वातें अनुमान पर आधारित सिद्ध हो रही है। बेशक अनुमान जान धूधकर नहीं किए गए हां जो लोग दाशनिक सयवाद म दीक्षित हो चुके है उनको वात दूसरी है । फिर भी ऐसा नही समयना चाहिए कि अनायास किए गए अनुमान का मा य होना आवश्यक ही है। शीशे के सामने आन पर बच्चे साचत हैं कि गीगे दूसरी ओर कोई दूसरा वच्चा है, और यद्यपि उनका यह निष्कप तारिक प्रक्रिया द्वारा नही निर्धारित होता, फिर भी निप्प गलत तो होता ही है। हमारे तमाम अनायास उपर ध अनुमान वस्तुत गंगवावस्था मे अजित किए गए सोपाधिक प्रतिवतन ही होत हैं और ताचि टग से परखे जान पर उनकी ययाथता अयन्न सदेहास्पद सिद्ध होती है। अपनी ही आवश्यक्ताओ से विवा होकर भौतिकी का इन निराधार पूर्वाग्रहा मे से कुछ पर विचार करना पडा है । एक सीधा साठा आदमी तो यह साचता है कि पदाथ ठोस होता है लेकिन भौतिकी का विद्वान तो यही सोचता है कि पदाथ तो गूय या जवस्तुता म तरगित एक प्रायिकता-तरग है। सक्षेप म वह तो किसी स्थानगत पदाथ की परिभापा यह की जा सकती है-उस स्थान पर कोई भूत दिखाई पटने को सम्भावना है । पर इस समय मैं इन तत्वमीमासीय विवचनो से अभी नही उर- झना चाहता, इस समय हमारा सम्बध वज्ञानिक पद्धति के लक्षणा से है जिनके कारण इन विवेचना को आवश्यक्ता पदा हुई। पिछले कुछ वर्षों में बनानिक पद्धति की परिमोमाएं जितना अधिक स्पष्ट हुई है उतना पहले कभी नहीं हुई थी । भौतिकी के क्षेत्र म य परिसीमाएं सबसे अधिक स्पष्ट हुई हैं और भौतिकी सभी विज्ञाना से अधिक प्रगतिशील है अय विनाना पर ता अभी तक इन परि- सीमाआ का कोई भी प्रभाव नहीं पड़ा है। फिर भी, चूकि प्रत्येक विनान का सद्धान्तिक लक्ष्य भौतिकी म लीन हो जाना ही है इसलिए भौतिकी के क्षेत्र में जा गाएँ और जो कठिनाइयां स्पष्ट हो चुकी हैं उनको यति सामा य रूप से सम्पूण विनान पर हम लागू करें तो गायद गलत नहीं होगा। वनानिक पद्धति की परिसीमाआ वो तीन वर्गो म सकलित क्यिा जा सकता है-(१) आगमन का मा यता-सम्बधी साय (२) अनुभूत के आधार पर अननुभूत व सम्बघ म अनुमिनि व निधारण म कठिनाई और (३) यह तथ्य कि अननुभूत र सम्बध म अनुमिति की सम्भाव्यता स्वीकार पर अनुमान अत्यत भावमूम होगा और इसलिए उसस उतनी जानकारी नहीं प्राप्त हो मक्ती जितनी सामाय भाषा का प्रयोग करने पर उसम प्राप्त होती ता भी एसा ६० वजानिय परिदृष्टि जान पडती है। (१) आगमन- अन्तिम रूप में सभी आगमगात्मक तक निम्नलिखिन सूत्र म समाहित हो जाते हैं- 'यदि यह सत्य है, तो वह सत्य है अब चूकि वह सत्य है इसलिए यह भी सत्य है।" इसम सदेह नहीं वि यह तर सदोष है । मान रीजिए मैं यह कहता हूँ, "अगर रोटी एक पत्थर है और पथर पोपक हात है तो यह रोटी मेरा पोषण करेगी, चूमि यह राटी मरा पोषण करती ही है, इसलिए यह एक पत्थर है और पत्थर पोपर होते है ।' यदि मैं ऐसा तब पेश कीं तो निश्चय ही मुझे मूख समझा जाना चाहिए फिर भी जिन तयों पर सम्पूण वनानिक नियम आधारित हैं उनसे इस तब म कोई मौलिक भेद होगा। विमान वे क्षेत्र मे हम हमशा यह तक करते हैं कि चूचि प्रेभिन नय्य कुछ निश्चित नियमा के अनुवर्ती हैं इसलिए उमी क्षेत्र के अ य तथ्य भी उन्ही नियमो के अनुवर्ती हांगे । वाद में हम इसको परस या इसका सत्यापन एक सौमित या व्यापक क्षेत्र मे कर सकते हैं, रेकिन इसका व्यावहारिक महत्व तो हमेगा उही क्षेत्रो के सम्बध म रहता है जिसकी जांच-परस न की जा सकी हो । उदाहरण के लिए हमन स्थतिकी के नियमा वा सत्यापन असख्य मामला म कर लिया है और अब उन नियमा का प्रयोग हम एक पुल बनाने म करत है लेकिन पुल के सम्बन्ध म इन नियमा का सत्यापन तव तक नही हो पाता जर तव पुर बनकर सड़ा नहीं हो जाता। इन नियमो का महत्व ना इस बात म है कि पुल के बन पर बडे हाने में पहले ही इस बात की भविष्यराणी वरन की गति हम इन नियमो से मिलती है कि पुर टिकाऊ होगा । यह समा साना तो आसान है कि हम ऐसा क्यो सावते है कि पुल टिकाऊ होगा, यह तो पदावर सोपापिर प्रतिवतना का एक उदाहरण मात्र है जिनके कारण हम उन सयोजना की आगा करत हैं जिाको अनुभूति पहले हम प्राय हा चुकी होती है। वितु यदि आपका रेल पर कोई पुर पार करना पडे तो येवल यह जानकर आपका बाई सात्वना न मिलेगी कि इजीनियर की नजरा म वह पुर क्या एक अच्छा पुल है । मह व पूर्ण बात तो यह है नि पुल सचमुच अच्छा हाना चाहिए, और इसरे रिए यह जरूरी है शि प्रति तय्या में उपग्ध स्थनिकी के नियमा के आधार पर अप्रैक्षित तय्या के मम्बध म उही नियमा का आगमन माय हो । यह दुर्भाग्य की बात है कि अभी नर पिसी न भी इस प्रार की अनु मिनि को टीम मान देने का कोई प्रामाणिव कारण नही प्रस्तुत किया। रगभग २०० वप पहले हा म न आगमन ये सम्बघ मै रा दह व्यक्त किए थे। उन्होने तो अधिकार अय वाला पर भी मदह व्यक्त किए थे। उस समय दानित लोग उनमे सुब्ध हुए थे और उनसी बाता का सन्न परन के लिए तभी ईजाद की थी जो अपनी निनाल अस्पष्टता के कारण ही होगा की तर म .

वनानिक पद्धति को परिसीमाएं सही बन गए थे। सच तो यह है कि काफी लम्ब बरसे तर दागनिका ने अपने तर्कों का अस्सप्ट बनाए रखने म पूरी मावधानी बरती, क्यादि अयया हर व्यक्ति यह समझ जाता कि ह्य म क तौ का जवाब दने म व लाग यसफल रहे हैं । इस प्रकार की तत्वमीमासा गढ रैना एक आसान बात है जिसके परिणाम- स्वस्प यागमन को माय सिद्ध किया जा सक, और अनक रोगा न एसा किया भी है विन्तु उस तत्वमीमासा के मनोरजक होने के अलावा एसा का कारण इन लोगान नही प्रस्तुत किया कि उनकी तत्वमीमामा पर विश्वाम क्या किया जाए । उदाहरण के रिए बगसां की तवमीमासा निम्मन्ह मनोरजक है । इस ससार को तीर विभेला से मुक्त एकता के रूप म देखन की क्षमता रम तत्व- मीमामा से हम प्राप्न हाती है उसके अनुसार यह समार कुछ अस्पप्ट म्प में आन ददायी भी मालूम होता है किंतु नान की साज म अपनाई जाने वाली तकनीक म दम गामिर नही किया जा सकता। आगमन पर विश्वास करने के लिए माय आधार हा सक्त हैं, योर तय्यत हमम से प्रयक का विवाहावर उस पर विश्वास करना ही पड़ता है, किन्तु यह वात स्वीकार करनी ही पडेगी कि सिद्धान्तन आगमन तगास्त्र की एक एसी ममस्या है जिसका समाधान नहीं हो सका। फिर भी, चूति यह सन्ह व्यावहारिक दृष्टि स हमारे प्राय सम्पूण पान का प्रभावित करता है इसलिए हम इसका नतर-अन्दाज़ कर सकन हैं और व्यावहारिक दष्टि मे यह मान सक्न है कि यागमनात्मा प्रक्रिया उप- युक्त सावधानी और बचावा व साय स्वीकार की जा सकती है। (२) अननुभून के सम्ब प म अनुमिनियां-~~जसा कि हम ऊपर दम्ब चुके हैं, नभ्यत अनुभूत बातें उनकी अपेक्षा बहुत कम हैं जिनके अनुभूत होन की कल्पना रोग स्वभावत करत हैं। उदाहरण के रिए, आप कर सकते हैं कि याप अपन मित्र श्री जोन्म को सहर पर अवेरे टहने हुए देख रहे हैं किन्तु एसा बहना उस मीमा मै बटन आगे बढ़ जाना है जिस मीमा तक वस्तुन इस सम्वय म कुछ कहन का बापको अधिकार है । आपको तो एक स्थिर पृष्ठभूमि में चलनी पिरती रगीन पवा की मापन गषा मात्र दिखाई देनी है। ये पद पव- राव मोपाधिक प्रतिवतन द्वारा आपके मस्तिष म 'जान्स' गर की याद रिय दते हैं और इसीलिए आप क्त हैं कि आप जाम को देख रहे हैं कितु दूमर लोग अपनी-अपनी विक्यिा मे दवन पर सानियमा के कारण विमिन वाणा म कुछ और ही देखेंगे इरिए यदि य मभी लग जाम को ही देख रह हैं नो जोस भी उतने ही मिन भिन प्रकार व हागे जिवन दान हैं, और यदि वाम्नविन जान्म वेवल एक ही है तो वह किसी की भी दृष्टि म नहीं आ रहा । यरि एक क्षण के लिए हम भौतिकी द्वारा दिए जान वारे विवरण को सत्य मान लें तो जिम आप 'जान्म को देयता वहते हैं उसकी व्यास्या कुछ निम्नलिपिन प्रज्ञानिक परिदृष्टि शब्दावली में की जाएगी प्रकार के छोटे छोटे पंक्ट, जिहें 'प्रवाए क्वाटम' कहा जाता है, सूरज से निचल्ते हैं और इनम में कुछ उस क्षेत्र म पहुँचत हैं जहा एक विशिष्ट प्रकार के अणु हैं जिनसे जोस के चेहरे का, उसक हाया बोर कपडो का निर्माण हुआ है। इन अणुआ का जपने-आप कोई अस्तित्व नहा है, यह तो सम्भा य घटनाओ के सारसग्रह की अप्रत्यक्ष अभिव्यक्ति मात्र हैं । जोन्म के अणुआ के पास पहुँचने पर कुछ प्रकावाटमा को आतरित व्यवस्था बदल जाती है---उसम उलट फेर हो जाता है । इसीलिए जोस धूप स युलसता है और विटामिन डी० का निर्माण होता है। कुछ दूसरे प्रकाश क्वाटम परावर्तित होते हैं और इनम से कुछ हमारी आखा मे प्रवेश करत है जहा पहुंचकर व गलाका और पाकु मे एक जटिल गडबडी पैदा करते हैं। इस गडबडी के परिणामस्वरूप हक तरिका मे एक धारा प्रवाहित होती है। मस्तिष्क म इस धारा के पहुंचने पर वह घटना घटित होती है जिस आप जोस को देखना' कहते हैं। इस विवरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि 'जोस को देखने की क्रिया के साथ जास का सम्बप बहुत ही दूर का मम्बध है-आम्मिक और अप्रत्यक्ष सम्बध है। और इस सारी प्रक्रिया मे जोस फिर भी रहस्य स आवन बना रहता है । हो सकता है वह अपने भोजन के बारे म सोच रहा हो, या अपनी उस निवेगित पूजी के बारे म मोच रहा हो जो वर्वाद हो गई अथवा अपने खोए हुए छाते के बारे में सोच रहा हो। ये विचार ही तो जोस है, किन्तु आप जो कुछ देखत हैं वह ये विचार तो नहीं हैं। यह कहना कि आप जोस को देख रहे हैं इस कथन की अपेक्षा अधिक सही नहीं होगा कि पनि पुरावाडो को चारदीवारी से उछलकर कोई गेंट सिर मे लगने पर आप कह-दीवार मरे सर से टकरा गई। दोनो बातें सचमुच एक-दूसरे के बिल्कुल अनुरूप हैं । इसलिए वास्तव में हम कभी भी उस चीज़ को नहीं दसते जिसक सम्बन्ध में हम सोचते हैं कि हम उसे देख रहे हैं। तो फिर जिस बारे म हम यह सोचते हैं कि हम उसे देख रहे हैं, यद्यपि वास्तव में हम उसे देख नहीं पात, उसके अस्तित्व को मारने का क्या कोई कारण है ? विनान को हमेगा इस बात का गव रहा है कि वह आनुभविक है और केवल उसी बात पर विश्वारा करता है जिसका सत्यापन किया जा सकता है ! अब स्थिति यह है कि जिन घटनामा वो आप 'जोस को देखना' कहत हैं उनका सत्यापन स्वयं अपने भीतर तो कर सकते हैं किन्तु स्वय जोस वा मत्यापन आप नहीं कर सकन । आप उन स्वरा को सुन सकते हैं जिहें आप जोन्स द्वारा कही गई बातें कहते हैं उस स्पा का अनुभव कर सकते है जिस आप अपने साप जोन्स का टकराना कहते हैं। यदि पिछले कुछ दिनो से जोन्स ने स्नान न पिया हो तो आपको प्राण-मवेदन पी अनुभूति हो सकती है जिसका उद्गम आप जोस को मानत हैं। यदि यह तर्फ वज्ञानिक पद्धति को परिसीमाएँ थापका जंचा हो तो आप उसके माथ इस ढग से बात कर सकते है जैसे कि यह कहीं दूर टेलीफोन से आप साथ बात कर रहा हो और कह सकते हैं, "कहो भाई, तुम्ही हो न?" और उत्तर म आपको यह सुनना पड़ सकता है, "हा चेवकूफ, क्या तू मुझे देर भी नहीं सक्ना" किन्तु यदि आप इन तर्को को जोस के वहा मौजूद होन का प्रमाण मान ल तो फिर आप तक के वास्तविक उद्देश्य को समझे ही नहीं। तथ्य यह है कि जास तो एक सुविधाजनक प्राक कल्पना है जिसके द्वारा आप अपने कुछ सवेदना को सबपित कर सक्ने हैं किन्तु उनको एकर सालित रखने वाली चीज उनका प्राक्कल्पित सामाय उदगम नही है वरिक कुछ अनुभपताए और आकस्मिक सादृश्य हैं जो उनम परस्पर पाए जाते हैं। उनो सामा य उद्गम के काल्पनिक होने पर भी ये अनुरुपताएँ और सादश्य कायम रहत हैं। जब सिनेमा में आप किसी व्यक्ति को परदे पर दखते हैं, तब आप जानते हैं कि स्टेज से बाहर होने पर उस व्यक्ति का वहाँ अस्तित्व नहीं है, यद्यपि आप मान लेते हैं कि मूल्त एक व्यक्ति था जिसका अस्तिव बराबर विद्यमान था। किन्तु आप ऐसी कल्पना करते क्यो हैं ? जोस उस आदमी की तरह क्यो नहीं हो मक्ता जिसे आप सिनमा मे देखते हैं । यदि आप जोस से ऐसी बात रहे तो वह आपमे नाराज हो सकता है, लेकिन इस रात को गलत सिद्ध करने के लिए उसके पास कोई ताक्त नहीं है, क्योकि जिस समय आपका उसकी अनुभूति नहीं हो रही उस समय यह जो कुछ कर रहा है उसकी अनुभूति वह आपका नहीं दे सकता। क्या इस बात को सिद्ध वरने का कोई उपाय है कि जिन घटनाओ की अनुभूति म्वय आपको होती है उनके अलावा और घटनाए भी होती हैं । यह प्रश्न कुछ भावात्मक अभिरुचि वाला प्रश्न है, किन्तु आधुनिक युग का सैद्धान्तिम आधुनिक भौनिक विज्ञानी इमे कोई महत्व नही देगा । वह तो कहेगा, ' मेरे सूनो का उद्देश्य मेरे सवेदना को परम्पर सम्बधित करने वाले नमित्तिक नियम उप- सध करना है। इन नमित्तिय नियमो की अभिव्यक्ति में मैं प्रावल्पित सत्तामा का उपयोग कर सकता हूँ, किन्तु यह प्रश्न कि ये सत्ता प्राथाल्पित से कुछ अधिक भी हैं या नहीं, व्यय हो है, क्याकि यह सम्भाव्य सत्यापन के क्षेत्र से बाहर है ।" जरा वाचने पर, वह अप भौतिक दिनानियों के अस्तित्व को स्वीकार कर सकता है क्योकि वह उनके द्वारा उपलब्ध परिणामा का प्रयोग करता चाहता है और भौतिक विज्ञानिया या अस्तित्व स्वीकार करन पर नम्रता दे साय अन्य विनानो के विद्यापियो का अस्तित्व भी उससे स्वीकार कराया जा साता है। वस्तुत सादृश्य के आधार पर वह यह सिद्ध करने के लिए एक तक बना सकता है कि जिस प्रकार उसका शरीर उसके विचाग से सम्बोधन है, उसी प्रकार उसके पारीर से मिरने जुरते मर शरीर भी सम्भवत विचारो वज्ञानिक परिदृष्टि । से सम्बन्धित हैं। प्रश्न किया जा सकता है कि इस तक में कितना बल है, किन्तु यदि इसे स्वीकार कर लिया जाए तो भी इमसे यह निजप तो नहीं निकाला जा सकता कि मूय और तारा का अस्तित्व है अथवा किसी भी निर्जीव पदाथ का अस्तित्व है। वस्तुत हम बकले यो मा यता को स्वीकार करने की स्थिति में पहुंच जाते हैं जिसके अनुसार केवल विचारो का ही अस्तित्व है । बकले ने इस विश्व की और शरीरो के स्थायित्व की रक्षा उनको ईश्वर के विचार मानकर की थी, कितु यह तो केवर अभिलापा की पूर्ति थी, तक्सगत विचारणा नहीं । फिर भी चूकि धकले एक पादरी भी थे और आयरलण्डवामी भी, इसलिए हम उनकी मा यता पर कठोर आपान नहीं करना चाहिए । तथ्य तो यह है कि विज्ञान का प्रारम्भ मतायन की भाषा म अत्यधिक 'प्राणि श्रद्धा से हुआ था जो वास्तव म सोपाधिक प्रतिवतन के मिद्धात के अनुसार विचार- प्रमुख है । इसी विश्वास ने भौतिक विनानिया का पदाथ जगत मे विश्वास करने को क्षमता दी। बाद म धीरे धीरे वे इसके प्रति विश्वासघाती हो गए, जसे राजा महाराजा के इतिहास का अध्ययन करके लोग गणतनवादी बन गए। हमारे युग र भौतिक विनानी अव पदाथ पर विश्वास नहीं करते । फिर भी यदि एक व्यापर और विविधतापूण बाह्य ससार उपल ध हा तो अपने-आपम भौतिक विनानियो का यह अविश्वास कोई अधिक हानि करने वाला नहीं है कि तु दुर्भाग्य स भौतिक विज्ञानियो ने अपार्थिव बाह्य समार मे विश्वास करने का कोई कारण भी हम नहीं बताया। समस्या वास्तव म तत्वत भौतिक विनानी की समरया नहीं है बल्कि तकशास्त्री की समस्या है। सार रूप म यह एक सरर सी समस्या है अथान क्या कभी भी परिस्थितियां एसी होती हैं जो म कुछ नात घटना के आधार पर यह अनुमान करने की क्षमता दे सकें कि कोई अय घटना पटित हुई है, घटित हो रही है अयवा घटित होगी? अथवा यदि हम निश्चयपूवर इस प्रकार का कोई अनुमान नहीं कर सक्त तो क्या पर्याप्त सम्भाव्यता के साथ एसा अनु- मान किया जा सकता है या क्म-मे-बम ५० प्रतिशत स कुछ अधिक सम्भाव्यता के साथ ऐसा अनुमान किया जा सकता है ? यदि इस प्रश्न का उत्तर अस्ति वाची हो तो जिन घटनाओ के घटित होने का अनुभव हमन स्वय नहीं किया उनके घटित हाने पर विश्वास करना याय सगत हागा और वास्तव में हम सभी ऐसा विश्वास करत हो हैं । किन्तु यदि उत्तर नकारात्मक हो तो फिर हमारा यह विश्वास कभी याय सगत नही हो सकता। तपशास्त्रियो ने इस प्रश्न या उसने इस सरल रुपम विवेचन शायद ही कभी दिया हो, और मुल इस प्रश्न का कोई स्पष्ट उत्तर पात नही है। जब तब इस प्रन का योई उत्तर नही उप- स्प होता तब तक तो यह प्रश्न बना ही रहगा और बाह्य विश्व म हमारा वज्ञानिक पद्धति की परिसीमाएं विश्सास एक प्राणि श्रद्धा मात्र बना रहेगा। (३) भौतिकी को भाव-सूक्ष्मता-हम यह मान भी लें कि सूय, तारे और यह सामा य भौतिक विश्व हमारी कल्पना की सृष्टि अथवा हमारे समी- करणो के सुविधाजनक गुणाक नहीं हैं, फिर भी उनके बारे म जो कुछ भी कहा जा सकता है वह असामा य रूप से भाव-मूत्रम ही है और भौतिक विनानियो द्वारा उमे समझाने के प्रयत्न म प्रयुक्न भाषा से वे जितना भाव सूक्ष्म मालूम हात है उससे कहीं अधिक भाव सूक्ष्म हैं । जिस दा और काल की विवेचना भौतिक विनानी करते हैं वह हमार अनुभव का देश-काल नहीं है । सौर परिवार के चार्टी म जा चियात्मक दीघ वत्त दिए रहते हैं, ग्रहो की कमाओ का उनसे कोई साम्य नहीं मिलता-केवल कुछ अत्यत अमूत गुणा के साम्य को छोड- कर। हमारे अनुभव म सानिध्य का जो सम्बध घटित होता है उसे भौतिक ससार के पिण्डा भी लागू करना मम्भव है किन्तु हमारे अनुभव म जो अय सम्बघ आते हैं उनका अस्तित्व भौतिक ससार मे अभी तक नहीं नात हो सका। अधिक-से-अधिक जो कुछ जाना जा सकता है और वह भी अयन्त आशावादी दृष्टिकोण से- वह यही है कि भौतिक ससार म कुछ ऐसे सम्बध हैं जिनमे कुछ ऐसे अमूत तक्सगत लषण पाए जाते हैं जो हमारे अपने नात सम्ब घो के भी गुण हैं। ये समान लक्षण वही हैं जिनकी अभिव्यक्ति गणितीय माध्यम से की जा सकती है, ये लक्षण ऐसे नहीं हैं जो इन सम्ब घा को अय सम्बधा से कल्पनामूलक विभेदो के आधार पर पृथक करते हा। उदाहरण के लिए इसी बात को लीजिए कि एक ग्रामोफोन के रेकाड और उस रेकाड स बजने वारे सगीत के बीच कौनसे सामा य गुण हैं। दोना म बुछ सरचनात्मक गुणो का साम्य है जिह भाव-मूक्ष्म गन्दावली मे व्यक्त किया जा सकता है, वितु दोना के बीच एस गुणो का साम्य नहीं है जो हमारी इन्द्रियो के लिए प्रत्यक्ष हा । वपन सरचनात्मक साम्य गुण के कारण दानो एक दूसरे का कारण बन सकते हैं । इसी प्रकार हमार सवेद्य समार यी सरचना का महभागी भौतिक ससार, सरचना के अरावा अय क्सिी वात म साम्य न रखते हुए भी, हमारे सवद्य समार का कारण बन सकता है। इमरिए भौतिक समार के सम्बध म हम अधिक से अधिक ऐस ही गुणा का जान सक्त हैं जा प्रामोफोन के रसाड और उसम वजन वाले सगीत के बीच सामा य हैं एमे गुणो का नहीं जान सक्त जा उह एक दूसरे स पृथक करत हा । भौतिकी वास्तव म जिस बात की स्थापना करती है उसके व्यक्त करने के लिए सामा य मापा नितान्त अनुपयुक्त है क्याकि दनित जीवन के पद पयाप्त रूप म माव-मूक्ष्म नहीं होते। भौतिक विनानी जितनी मूश्म अभिव्यक्ति चाहता है, वेवर गणित और गणितीय तर गास्त्र की भाषा द्वारा ही वह सम्भव है । जस ही अपने प्रतीका को वह शन्दा म अभिव्यक्त वज्ञानिक परिदृष्टि करता है वैस हौ अनिवायत वह कुछ-न-कुछ अत्यधिक भूत या ठोस बात कह जाता है, और उसके पाठको पर एक एसी कल्पना सम्भव और भाव-ग्राह्य वात का प्रमान प्रभाष पडता है जो उस बात की उपेक्षा कही अधिक आन ददायक और दैनदिन होती है जिस व्यक्त करने का यह प्रयल करता है। अनेक लोगो को भाव मूक्ष्मता मे तीन घृणा है। इसका कारण, मरे विचार स, मुग्यत इसकी बौद्धिक कठिनाई है, कितु चूनि व लोग इस कारण को प्रक्ट नहीं करना चाहते, इसलिए अनक प्रकार के अय कारण गढ़ रते हैं जो काफी प्रतिष्ठापूण मालूम हाते हैं। उनका कहना है कि सम्पूण वास्तविकता भूत होती है और भावसूमता की आर बढन म हम उमे छोड दते हैं जो तारिवर होता है । वे कहते हैं कि सभी प्रसार की अमूतता मिथ्याकरण है और जसे ही आप किसी वास्तविक्ता का कोई पहलू छोडत हैं वैसे ही क्वल गेप पहलुआ के आधार पर तक करने के कारण तर्कामास के दोपी हो जाते हैं । इस प्रकार का तक करा वाले लोग वास्तव म उन विषयो से सम्बन्धित हैं जिनका दिनान से कोई सम्बप नहीं है। उदाहरण के लिए सोदय-बोध की दृष्टि से अमूर्तीकरण पूणत भ्रामक हो सकता है । ग्रामाफोन का रेकाड सौदय बोध की दृष्टि से गूय हाता है, जवरि उससे निकलने वाला सगीत अत्यन्त सुन्दर हो सकता है, मृष्टि का इतिहास महाकाव्य के रूप म प्रस्तुत करने वाले कवि की कल्पना-दृष्टि म भौतिकी द्वारा उपल ध अमूत ज्ञाा सन्तोषपद नही हो सकता। भगवान ने जब अपनी मृष्टि पर दृष्टि डाली तव उह जो कुछ दिखाई दिया, और अच्छा दिमाई दिया, कवि उसो को जानना चाहता है, उसे उन सूत्रो से स तोप नहीं मिल सक्ता निराम भगवान की सृष्टि के विभिन्न भागो के पारस्परिक सम्बधा के भाव मूगम तर सगत गुण घम बनाए गए हा। पितु वैनानिक विचार इसम भिन्न होता है । तत्वन वनानिक विचार शवामूलक विचार होता है-ऐमा विचार जिसका प्रयोजन, चेतन या अचतन रूप में उस विचार के स्वामी को गति देना होना है। गक्ति एर नमित्तिक सबल्पना है, और किसी भी पदाथ पर शक्ति प्राप्त करन के लिए केवर उन नैमित्तिक नियमा यो समझना जरूरी होता है जिनके वावर्ती वह पदाय हो। यह तत्वत एक अमूत विषय है और अप्रासगिक विवरणा को हम अपने दृष्टि पय से जितना ही अलग हटा सकेंगे उतना ही अधिक शक्तिवान हमारे विचार होत जाएंगे। आर्थिक क्षेत्र म भी यही चात प्रगित की जा सस्ती है। एक विमान अपने सेत हर योने को भली भांति जानता है गहूँ व सम्बघ म एक टोम जानकारा रखता है और परत बहुत कम पैसा पैदा कर पाता है, उसके गहूँ वो दूर बाजार म र जाने वाली रेल्व पम्पनी गेहूं के मम्ब ध म कुछ अधिक भावसूम ढग म सोचती है और अधिर पसा पदा करती है, श्रेष्ठि-च वर या स्टार-एक्सचेंज म यज्ञानिक पद्धति को परिसीमाएं ६७ जोड़-तोड करने वाले सट्टेबाज को गेहूँ के सम्बध म उसका गुद्ध यमूत पहा, ही मालम रहता है कि उसका भाव गिर या घर माता है और वह गेहूँ की ठोम वास्तविकता से उतनी ही दूर होता है जितनी दूर भौतिक विज्ञानी, पर आर्थिक क्षेत्र में अय सभी सम्बति लोगा की अपेसा वह सबसे अधिर पैमा बनाता है और मवसे अधिक शक्निवान होता है । यही बान विज्ञान पर भी लागू होती है, यद्यपि वनानिक जिस शक्ति को खाज करता है वह उम शक्ति की अपक्षा वही अधिक दूरस्य और अवयक्तिक हाती है जिसमें रिए स्टोक्सचेंज म जोड-तोड की जाती है। माधुनिक भौतिकी को आत्यतिक अम्तता उमे दुरद बना देती है किंतु जो लोग उसे समझ साने हैं उन्हें इस समार सम्यक स्वरूप का, उसवी सरचना और उसके यात्रिक विमाम या भाव बोध उपर ध कराती है, जो सम्मवत किसी अय यम यमूत उपकरण स उपट पन हा सरना। अमृत विचारणा का प्रयोग करने की शक्ति ही बुद्धि का नत्व है, और अभूत विचारणामा म होने वाली प्रत्येवद्धि मे विज्ञान को बौद्धिक विजया की प्रतिष्ठा बढ़ती जाती है।

चौथा यध्याय वैज्ञानिक तत्वमीमांसा यह एक अदभुत बात है कि जब सडक पर चलने वाला सामाय व्यक्ति विनान पर पूणत विश्वास करने लगा है तव प्रयोगशाला काम करने वाला व्यक्ति अपना विश्वास सोने लगा है। जब मैं युवक था उन दिना अधिकाश भौतिक विनानियों को इस बात में रच मात्र भी सदेह ही था कि भौतिकी वे नियम हमे पिण्डा की गतिशीलता के बारे म ययाय ज्ञान देते हैं और भौतिक ससार वास्तव म उसी प्रकार की सत्ताओ से बना है जो भौतिक विनानी के समी करणा में मिलत है। यह सही है कि दाकि लोग इस विचार के सम्बध मे अपने सदेह बकल के समय से ही व्यक्त करते चले आए हैं किन्तु चकि उनकी मालोचना कभी भी विनान की व्यापक प्रक्रिया पद्धति के किसी एक तथ्य विशेप से सम्बद्ध नहीं हो पाई इसलिए वनानिक लोग उसकी अवहेलना कर सक्ते थे और वास्तव में उहोने यही क्रिया भी। आजक्ल तो स्थिति बिल्कुल भिन हो गइ है भौतिक विज्ञान के दशन के सम्बध म प्रान्तिकारी विचार स्वय भौतिय विनानियों द्वारा प्रस्तुत किए गए है और ये विचार सावधानी- पूर्वक किए गए प्रयोगा के परिणाम हैं । भौतिकी का नया दशन अभी बहुत विनम्र और तुतलाता टुआ सा है जबकि प्राचीन दशन शास्त्र बहुत ही गर्वीला और अधिनायकी वत्ति वाला था। मैं समझता हूँ कि भौतिक नियमा म विश्वाम तिरोहित हो जाने के कारण जो रिक्तता आ गई है उस प्रत्येक व्यक्ति द्वारा अपनी सामथ्य अनुमार भरा जाना स्वाभाविक ही है और यह भी स्वाभाविक ही है कि इसके लिए वह उस निराधार विश्वास के अवशेषो का प्रयोग करे जिसके विकास के लिए पहले कोई जवसर ही नहीं था। पुनर्जागरण काल म जब क्यालिक विश्वास का सबलता क्षीण हो गई तब उसका स्थान ज्योतिष और प्रेतविद्या ने ग्रहण करने की कोशिश की और इसी प्रकार हम यह आगा वरनी ही चाहिए कि वनानिक विश्वास क्षीण होने पर वनानिक युग के पूर्ववर्ती अपविश्वासा या फिर स प्रचलन होगा। जव तब हम काफी बारीकी से इसको जाँच परस नही करते मि बना निव का वास्तविर तात्पय क्या है तब तक ऐसा लगता है कि वह पान का एक अधिकाधिक प्रभायपूण भण्डार हमारे सामने प्रस्तुन कर रहा है । यह बात । वज्ञानिक तत्वमीमासा विशेष रूप से ज्योतिप पर लागू होती है। सभी लोग जानते हैं आकाशगगा हमारे पडोसी सभी तारा से मिलकर बनी है। प्रकाश प्रति सैकण्ड १,८६,००० मौर की रफ्तार से चरता है, एक वष म इस रफ्तार से वह जितनी दूरी तय करता है उसे एक प्रकाश-वप कहा जाता है, सबसे अधिक नजदीक तारे की दूरी लगभग चार प्रकाश वप है आगगगा मे स्थित सबसे अधिक दूर तारे की दूरी लगभग दो सौ वीम हजार प्रकाश वप है। दूरबीना से तारो के रग भग दो सौ परिवार देखे जाने हैं जिनम से प्रत्येक आवागगगा के समान है और उनम से कुछ दस कराड प्रमाश वर्षों से भी अधिक दूर हैं। इस प्रकार इस विश्व का आकार वटुन व्यापक है किन्तु उसे असीम नहीं माना जाता। एमी कल्पना की जाती है कि यदि याप एक सीधी रेखा म आगे दन्ते चले जाएँ ता अन्तत आप अपन प्रस्थान रिदु पर वापस लौट आएंगे, जैस पथ्यो का चक्कर लगान वाला जहाज़ वापस लौट आता है। फिर भी यह सोवन का कुछ कारण है कि यह विश्व निरतर बघमान है जसे भाजुन का उदुला अदर हवा भरी जान पर पंरता जाता है । एक प्रतिप्टिा ज्योतिपी, आयर हास का कहना है कि किमी समय प्राचीन कार म, जिमकी दूरी हममे जनन नहीं है दम विश्व की रिज्या एक अरन वीस करोड प्रसार वप थी किनु विश्व की विज्या प्रति एक अरव चालीस करोड वर्षो म दूनी हो जाती है पयात अनक धातुआ की आयु स भी कम समय में सूय की आयु के मगोलीय अनुमाना की तो कोई बात ही नहीं है ( नेचर', ७ फरवरा १६३१) । यह बात बात भावपूण मालूम हाती है--विन्तु वजानिक लोग म्दय इस बात को किसी प्रकार भी स्वीकार नहीं करते-कि जिन घडा-बडी सम्याआ का विवचन व करते है उनम का वस्तुनिष्ठ यथाथता भी है । मर बहन का यह तात्पय नही है कि व लोग जिन नियमा को स्थापना कर रह है उह असत्य मानन हैं मरा मनलव तो यह है कि इन नियमो की एक एमा व्याख्या भा सम्भव है जिसरे द्वारा गोलीय अन्तरिय ६ इस भवन का मान गौण सकल्पनाजा म परिणत किया जा सकता है जा ऐम परिकग्ना म उप योगी हागी जिनर द्वारा हम एक ययाय घटना को ट्रमरी के माय सम्बघित परत हैं। कभी-कभी एमा भी प्रतीत हो सकता है कि ज्यातिपी लोग माना उन्हा घटनाआ को वास्तविक रूप में अपने अध्ययन का विपय समयत हैं जा ज्योतिपिया के प्रेषण वा विषय हाती हैं । जो पाठक यह जानना चाह हा नि वनानिक विश्वास क्या और कम क्षीण होता जा रहा है, उनके रिए एटिंग्टन निपड दिनचर ऑफ दि पिजिवर वल्ड नीष भापो को परन से बकर दूसरा काई उपाय नहीं है । इन भापणा म उस मालूम हो कि भौतिकी तीन विभागा म विभाजित है।

वज्ञानिक परिदृष्टि पहले विभाग म चिरमम्मत भौतिकी के सभी नियम गामिल हैं, जैसे ज्जा और सवेग का सरक्षण नया गुरुत्वाक्पण का नियम । प्राप्सर डिग्टन के अनुसार ये सभी शियम सार म्प म परिमापन की परम्पराआ के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं, यह ठीर है कि इनमें जिन नियमा की अभिव्यक्ति की गई है व माव- भौम हैं रेफिन उसी प्रकार सावभौम तो यह नियम भी है वि एक गज मे तीन फीट होते हैं, और यह नियम भी एगिटन के अनुमार प्रकृति को गतिविधि का वैमा ही अभिसूचक है। भौतिकी पा झरा विभाग बडे-बडे समुच्चया और सयाग-सम्बधी नियमा से सम्बा घत है। इस विभाग म यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया जाता है कि अमुक-अमुर घटना असम्भव है, बल्लि कर यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया जाता है कि वह अत्यधिन अप्रायिक है । भौतिको का तीसरा विभाग, जो सवाघिर जाधुनिक है, क्वाटम सिद्धान्त है और यही विभाग मवमे अधिक परेशानी पदा करन वाला है क्याकि यह ऐसा सिद्ध करता हुना प्रतीत होता है कि कारणता के जिस नियम म अभी तक विनान वस्तुत विश्वास करता आया है उस व्यक्तिगत इरेक्टाना क काय-करापा पर नही रागू किया जा सकता। इन तीना ही विपया के सम्बधम में श्रमा कुछ गद पहूंगा। चिरसम्मन भौनिकी म ही प्रारम्भ करें। जसा मभी लोग जानते हैं “यूटन के गुरुवारपण व नियम यो आइमटीन द्वारा कुछ सगाधित किया गया और प्रयोगा द्वारा इस मनोधन को पुष्टि भी हो गई। किन्तु यदि एडि- ग्टन वा प्पिोण मही है तो इम प्रयोगिर पुष्टि म यह सायरता नहीं है जो स्वभावत लोग उसम देखन हैं। पथ्वी द्वारा सूय की परिक्रमा के सम्बध म गुरुत्वाक्पण का नियम तीन सम्भव मत प्रतिष्ठित करता है, एण्टिन इन तीना पर विचार करके एक चौया दृष्टिकोण इस आशय का प्रस्तुत करत हैं कि पथ्वी जमे चाहती है बम परिप्रमा करता है। इसका अर्थ यह हुआ कि पृथ्वी की गति विधि के मम्ब ध म गुरु वाक्पण का नियम हम कनई कुछ भी नहीं बताता । एडिग्टन इस बात को स्वीकार करते हैं कि इस दप्टिकोण में विरोधाभाम है किन्तु वह वत हैं "इम विरोधाभाम की कुजी यह है कि भौतिय जगत के पठायों के आचरण के सम्बघ म हम जो भी विदरण प्रस्तुत करते हैं उसम हम स्वय हमारी मडिया और हमारी अभिरुचि का आकर्षित करने वाली चीजें जितना अधिक प्रभाव डारती हैं उसका भान भी हम नहीं होता । और इममि हमारी रूनिया ने च मे स दसन पर वाद पाय एक जत्यत विशिष्ट और उल्लेखनीय टग से आचरण परना हुना प्रतात हा मरता है, किन्तु क्मिा मरे प्रकार की भगिया व चरम स देगने पर उमर व्यवहार म एमी काइ वात नारिवादद बज्ञानिक तत्वमीमासा ७१ सरती जो विशिष्ट और विचारणीय हो।" मुमे यह वात रवीकार कर ही रेनी चाहिए कि यह दृष्टिकोण मुये बहुत ही दुन्ह प्रतीत होता है । एटिंग्टन के प्रति सम्मान के कारण मैं यह नहीं कह सकता कि यह विचार असत्य है किन्तु उनके तक म विभिन्न वातें एसी हे जिनका अनुगमन भरन म, जिनको समनने में, मुरो कठिनाइ प्रतीत होती है। निम्स देह अमूत सिद्धात से हम जिन व्यावहारिक परिणामा का निगमन करते है व मब औपचारिक भौतिकी में क्षेत्र से बाहर हैं, जसे उदाहरण के लिए, यह निप्प कि सूय का प्रकाश हम कुछ विशिष्ट समया म दिखाई देगा और कुछ अय समया म नहीं दिखाई दगा । फिर भी मैं यह आशका प्रक्ट करने के लिए विवाहूँ कि एडिग्रन व हाया म पहुँचकर औपचारिक भौतिकी जरूरत से कुछ बहुत अधिर औपचारित हो गई है और एडिग्टन द्वारा की गई व्यान्या में उस जितना महत्व दिया गया है उसम कुछ अधिक मह व दना भी असम्भव न होगा। वात जैसी भी हा, हमार युग का यह एक महत्वपूण रक्षण है कि बनानिक सिद्धात के एक अग्रणी व्याख्याता न इतना विनम्र अभिमत प्रस्तुत किया है। अब मैं भौतिकी के साख्यिकीय अाका रेता है जिसका सम्बध बड़े- बडे समुच्चया के अ ययन से है। बडे-बडे समुच्चय प्राय ठीक उसी प्रकार का व्यवहार करत हैं जिसकी कल्पना क्वाटम सिद्धात के आविष्कार मे पहले की गइ थी, और इसलिए डाके मम्द प मे पुरानी भौतिकी बहुत कुछ ठीक ही है। फिर भी एक मर्वाधिक मह वपूण नियम है जो केवल साख्यिकीय ही है यह नियम है ऊष्मागनि विनान का टूमरा नियम । माटे तोर से इस नियम को इन गदा म व्यक्त किया जा सकता है कि यह ममार निरन्तर अधिकाधिक अव्यव- म्थित हाना जा रहा है। एडिग्टन इसका उदाहरण ताश के पता से देत हैं तारा बनाने वाले हैं यहां स पत्ते अपन प्रम म टीक-ठीक रखे हुए भली भांति ध्यवस्थित रूप में बाहर आत हैं जब आप पत्ता का वाटत हैं तब उनकी व्यवस्था नष्ट हो जाती है, और यह असम्भाव्यता की पराकाष्ठा वाली बात है कि ताण के य पत्त फिर कभी स्वत पूण म्प से अपनी पूर्व-व्यवस्थित स्थिति में आ सरें। अतीत और भविष्य के बीच का अतर कुछ इसी प्रकार का यन्तर है। सदान्तिक भौतिकी के गेप भाग म हम ऐसी प्रक्रिया का अध्ययन करत हैं जो प्रतिवर्ती होती हैं, अयात इम भाग म भौतिकी के नियम यह मिद करत हैं कि किमी पाय का विमो समय की अपनी 'अ' अवस्था स विसी दमर समय 'य' अवस्या में गुजरना सम्भव है और यही नियमों के अनुसार दमका प्रतिवर्ती सत्रमण भी उतना ही सम्भव । पितु जहाँ जप्मागति विज्ञान का दूसरा नियम ना जाता है यहां यह बात नहीं लागू होता । प्राफेसर एगिटन दम नियम का ७२ । वंज्ञानिक परिदृष्टि निरूपण इस प्रकार करते हैं-"जन कभी कोई ऐसी घटना घटित होती है जिसे मिटाया नहीं जा सकता, तब उसमा कारण किसी ऐसे अनियमित तत्व की उपस्थिति में खोजा जा सकता है जो ताश के पत्ता को बाटने की क्रिया से मिलता जुलता है।' भौतिकी के अधिकाश नियमो से भिन स्प मे यह नियम केवल सम्भाव्यताआ से ही सम्बधित है। हम इस पहले वारे उदाहरण का हा लें निस्मदेह यह सम्भव है कि यदि आप ताग के पत्तो को काफी लम्बे अरसे तक बाटते रह तो सयोगवश पत्ते अपनी पूर्व व्यवस्था में जा भी सकते हैं । वात बहुत अनहोनी मी है कि तु करोडों अणुआ के सयागवा यवस्थित प्रम म आ जाने की उपेक्षा ता यह बहुत कम अनहोनी है। प्रोफेमर एडिग्टन निम्नलिखित उदाहरण देते हैं ~मान लीजिए एक बडे वतन का वीच में कोई विभाजक लगा कर दो बरावर भागा मे नगंट दिया गया, और कल्पना कीजिए कि एक भाग मे हवा है जबकि दूसरा भाग निवान है, फिर विभाजा मे एक द्वार साल दिया जाता है और समूचे वतन मे हवा वराबर फल जाती है। हो सकता है भविष्य म कभी सयोगवश वायु के अणु अपनी अनियमित गतिविधि म फिर विभाजित हिस्से म उसी रप म एकत्र हो जाएं जिस स्प मे विभाजन से पहले थे। यह सम्भव नहीं है वेवर असम्भाव्य है कि यह जत्यधिक असम्भाव्य है।' यदि मैं अपनी जगुलिया को अनियमित रूप से याही बेकार अपने टाइपराइटर की कुजिया पर घूमने दू तो मेरी इस प्रिया में हो सकता है, कोई मायर वाक्य टाइप हो जाय। बदरा की एव फौज यदि टाइपराइटरो पर अंगुरिया चलाती रहे तो हो सकता है कि ब्रिटिंग म्यूजियम मे सी सारी पुस्तकें टाइप कर डाले। उनके द्वारा ऐसा किए जाने की सायोगिक सम्भावना अणुओ के अपनी पूर्वावस्था मे बतन के आधे हिस्स मे वापस आने की सम्भावना से निश्चित स्प अधिक है।" इसी प्रकार के अनेक उदाहरण दिए जा सक्त हैं, जमे गिलास के साफ, पानी म अगर आप म्याही की एक बूद टाल दें तो धीरे धीर वह पूरे पानी म फैल जाएगी। हो साता है वि सयोगवश वाद में वह स्याही फिर एव चूद रूप म एकत्र हो जाए रेरिन अगर ऐमा हा जाता है तो हम उसे निश्चय ही एक अदभुत जनगेनी घटना मानेंगे। जब एक गम पिण्ड और एक टपा पिण्ड एक-दूसरे के गम्पक म रग दिए जात हैं तो गम पिण्ड ठण्डा पडने रगता है और ठण्डा पिण्ड तब तर गम होता जाता है जय तर दाना पिण्य का तापमान एर नही हो जाता और सभी ग इस बात का जानते हैं पितु यह भी देवर सम्भाव्यता का एक नियम है। यह भी हो सकता है कि पानी मे भरा जो बतन भाग पर रमा हा उगा पासी सौग्ने बजाय जम जाए इममा भी मौनिसरी ये विसी भी नियम द्वारा अराम्भव गिद नहीं दिया गया, उप्मागति विशान मे बैज्ञानिक तत्वमीमासा ७३ वे दूसर नियम द्वारा इसे भी देवल अत्यधिक असम्भाव्य मिद्ध किया गया है । सामाय स्प से इस नियम मे यह कहा गया है कि यह विश्व लोक्-तत्र की ओर प्रवृत्तिगील है जोर जर लोक्त त्र की स्थिति उपर ध हो जाएगी तब यह विश्व और कुछ अधिक उपर ध करने में अक्षम हो जाएगा। ऐमा रगता है कि इस ससार की रचना रिती अनन्त अतीत मे नहीं की गई थी और उस समय यह आज की अपेक्षा कही अधिक असमानताआ से भरा हुआ था, किन्तु सृष्टि के क्षण से यह निरतर अवननिगल रहा है और यदि फिर से इसका विलय नहीं हो जाता तो अतत व्यावहारिक दृष्टि से इसकी गति अवरद्ध हो जाएगी। प्रोफ्सर एडिग्टन को, किसी कारणवश इस जगत के विलय की बात परद नहीं आती, वे इम विचार को पस द करते है कि सृष्टि का यह नाटक केवल एक बार खेला जाना है। इस तथ्य के वावजूद कि त मे इस नाटक की परिणति खेद और जवसादपूण युगा म होनी है और सारा दशक समाज इस अवधि म श्रम चिरनिद्रा में लीन हो जाएगा, एडिटन को यही विचार अधिक पसन है। क्वाटम सिद्धात, जिसरा सम्य व एक्ल परमाणुआ और इलेक्ट्रोना स है, अभी तर तीव्र विकास की स्थिति म है और अपन अतिम स्वरूप से शायद अभी बहुत दूर है। हीजेनवग, जाडिंगर तथा अय रोगा के हाथो मे यह सिद्धान्त जितना विक्षोभकारी और कातिकारी वन गया है उतना आपक्षिक्ता का सिद्धात कभी भी नहीं रहा । प्रोफेसर एडिग्टन ने हाल ही म हुए इसके विनाम की व्याख्या एसे ढग से की है जो अगणितन पाठव के लिए भी इतनी सुवोध है जितना सुबोध हाना मैंने सम्भव नही समया था। यूटन के समय से जिन पूर्वाग्रहा द्वारा भौतिसरी का नियमन किया गया उनके लिए यह याग्या अयत विक्षोभकारी है। इस दृष्टि से मम सवाधिन कष्टकारी बात यह है वि जमा नि उपर कहा जा चुरा है कारणता की सावभौमता पर इमने प्रश्न- चिह लगा दिया है इस ममय स्वीन अभिमत यह है कि शायद परमाणुआ म स्वतत्र राब र गति की कुछ मात्रा विद्यमान है, जिगर परिणामस्वस्प मिद्धात ये क्षत्र में भी उनका नाचरण पूणत नियमावीन नहीं है। और फिर जिन कुछ बाता को कम-मे-यम मिद्धात स्प म मन निश्चित मान पिया था अब वे कतई निश्चित नहीं रह गइ । एक मिद्धात है जिस अनिधायता या गिद्धात का जाना है। इस मिटान्न की म्यापना है 'मिमी कण यो कि ममप या तो स्थिति की उपर्गध रह सकती है या फिर वग की, प्रिन्तु गुस र्यो म दोना की उपधिप माथ नहीं हो पाती।" इमया अय यह हुआ पि यनि जाप यह जानत हैं हिनाप कहां हैं तो आप यह नहीं बता रामते मिआप कितना तजी से गतिगार हैं और यदि आप या जानत है मितिमी ७४ वज्ञानिक परिदृष्टि तेजी से आप गतिगील हैं तो फिर आप यह नहीं बता सकते कि आप कहा है। यह स्थापना परम्परागत भौतिकी की जड वा ही वाट दती है, जिसम स्थिति जोर वेग दोना हो आधारभूत स्वीकृत थे। कोई इलेक्ट्रॉन तभी दियाई देता है जर उममे प्रमाण का उत्सजन होता है, और प्रकाश का उत्सजन उमम तभी होता है जब वह एक स्थान से दूसरे स्थान को उत्प्लवित होता है अथात यह देखने के लिए कि वह किस स्थान पर है, उसे किसी दूसरे स्थान पर भेजना अनिवाय है । कुछ लोगो ने इसका अर्थ यह निकाला है कि भौतिक नियतत्ववाद को इस स्थापना ने समाप्त कर दिया है और एडिग्टन ने अपने अतिम अध्याया मे इसका उपयोग स्वत व सकल्प गक्ति की पुन प्रतिष्ठा मे किया है। अपनी रचना के पूर्वगामी पृष्ठा में उहान जिस वज्ञातिक अनान का निरूपण किया है उसके आधार पर प्रोफेसर एडिंग्टन ने आशावादी और सुराद निष्कप निकाले हैं । उनरा यह आशावाद इम पुरा प्रतिष्ठिन सिद्धान पर आधारित है कि जिस बात का असत्य नहा सिद्ध क्यिा जा सकता उम माय माना जा सकता है। इस सिद्धात की अमत्यता सटटेबाजा के समृद्धि सयोगा मे सिद्ध हा जाती है । यदि हम इम मिद्धान्त को त्याग दें तो फिर यह समय पाना कठिन हो जाता है कि आधुनिक भौतिको प्रसन रहने के लिए हम और कौन सा आधार देती है। भौतिकी को स्थापना है कि यह विश्व हासशीर है और यदि एटिंग्टन का विचार ठीक है तो भौनिकी इसके अलावा वस्तुत हमे कुछ नहीं बताती, क्याकि शेप जो कुछ है वे तो स्वीकृत तथ्य के सामाय नियम हैं। जसा कि सर आथर ने स्वय कहा है, विकास के बावजूर--जो विश्व के एक छोटे-स वो में अधिकाधिक व्यवस्था प्रचलित कर रहा है--सम्यक रूप से व्यवस्था का व्यापक ह्रास हो रहा है और अन्तत विकास से उत्पन्न व्यवस्था को यह बिल्कुल समाप्त कर देगा । उनका बना है कि अत म यह सारा विश्न पूण जव्यवस्था की स्थिति में पहुंच जाएगा और वही इसका अत होगा। उस स्थिति में इस विश्व में एक समान द्रव्यमान रह जाएगा जिसका तापमान एक ममान होगा । उसके बाद प्रमश इस विश्व का उत्फुल्लन होगा और कुछ नहीं । यह बात सचमुच सर बाथर को प्रसन प्रथति की ही प्रतिष्ठा बताती है कि इस दृष्टिकोण म भी अह आगावारिता का आधार मिल सका है । अयत्रियानादी अयदा राजनीतिक दृष्टिकोण से भौतिकी मे सिद्धान्त या सवाधिक महत्व गायद इस बात म है कि यदि यह व्यापर म्प मे प्रचलित हो जाता है तो पिनास पर गंगा व उस विश्वास को जप्ट कर देगा जो जाधु- मिस युग का समाप रचनात्मा पप रहा है और शुभ तथा अशुभ सभी प्रार वे परिवतन का स्रान रहा है । जटारहवी नौर ८ नीगवी तालीम पूरन वज्ञानिक तत्वमीमासा सिद्धात पर आधारित प्राकृतिक नियम का दान प्रचरित रहा । नियम की जव धारणा म नियता की सत्ता निहित मानी जाती थी, यद्यपि जैसे जैसे समय वीतता गया वस वम इम अनुमति पर कम जोर दिया जाने लगा फिर भी विश्व व्यवस्थित और प्रायनीय बना रहा । प्रकृति के नियमा वा नान प्राप्त परके हम प्रकृति का सचारन करन की भी आशा कर मान थे और इस प्रकार विनान शक्ति का स्रोत बन गया। अधिकारी ऊजस्वित व्यावहारिक रोगो का आज भा यही दृष्टिकोण है, किन्तु वैनानिका म स कुछ रोग अब इस दष्टिकोण को नहीं स्वीकार करते। उाके अनुसार इस विश्व के बारे में पहले जो धारणा थी उसकी अपया यह विश्व कही अधिक घोर अव्यवस्थित और यदृच्छामूलक है। और अठारही तया उनीसवी दातानी मे हमारे पूर्वज इसके सम्बघ म जितना जानत य उसकी अपना ये वनानिक याज बहुत कम जानते हैं । एडिग्टन जिस प्रकार के वज्ञानिक सायवाद के निरूपर हैं शायद अन्तत वह बनानिक युग का ध्वम कर देगा, जम पुनर्जागरण-काल के धम-दान-सम्बधी सशयवाद न धीर धीरे धमगन के युग को समाप्त कर दिया। मेरा खयाल है कि बिनान का ध्वम होने के बाद भी मगीने शेप रहगी, जसे धम दान का ध्वस होने के बाद भी घमाध्यश या पादरी लोग गेष रह गए हैं किन्तु उनमे प्रति आदर और आता को भावना नहीं रह जाएगी, जमे घमाध्यमा के प्रति नहीं रह गई। ऐसी परिस्थितिया में विरान तत्वमीमामा को क्या दे सक्ता है ? पानाइंडीज के जमाने से लेकर आज तक विद्वान दानिक रोग यह विश्वास परत रह हैं कि ससार एक है। इस विचार को पारिया और पत्रकारो ने इन दानिका स ग्रहण किया और इमको स्वीकृति ही प्रता की मौटी मानी गई। मेरे बौदिर विश्वामा म म सर्वाधिक आधारभूत विश्वाम यह है कि यह मा यता थोयी अयहीन है । मरे विचार स यह विश्व विशवल है इमम को एक्ता नहीं है काई निरतरता नहीं है, काइ सम्बद्धता और व्यवस्था अथवा ऐसा अप कोई गुण नहीं है जिसे अध्यापिकाएं वत पमद करती हैं । सच तो यह है कि पूर्वाग्रह और आदत को छोडकर और शायद बुद्ध भी एसा नही है जो इस दष्टिकोण के पक्ष म प्रस्तुत किया जा मरे कि ससार नाम की कोई चीज है भी । भौतिक विनानिया ने हाल ही म एमी सम्मतियां प्रस्तुन को हैं, जिनके आधार पर उह उपर कही गई वानों का स्वीकार करना चाहिए रेक्नि तगाम्प जिन नियों की एनम य ग नन पीति हुए हैं कि इनम से बहुसम्या रागा न ताशास्त्र का छाकर धम शास्त्र का पल्ल पक्ड लिया है। प्रतिन्नि वोई-नयाई नया भौतिर विशानी एक नई पायो इस तथ्य का अपन आपस और दूसरा रा छिपाने के रिए प्राशित परता है कि एक वनानिक की हैसियत से प्रतिष्ठा परता वज्ञानिक परिदृष्टि ? उसन इस ससार को अवास्तविकता और तकहीनता के सहइ म ढकेल रिया है । एक उदाहरण लें सूय के बारे म हम अपनी क्या धारणा बनाएँ ? पुराने जमाने म वह स्वग का एक गरिमामय प्रकाश पिण्ड था सुनहले वाला वाला देवता था, जोरेथ्रस्ट के अनुयाइया और अज़टेक तथा इका लागा के लिए एक पूजनीय सत्ता था । ऐसा सोचने का कुछ कारण है कि जोरशुस्ट मिटाना से ही केपटर को सूय-वन्द्रीय ब्रह्माण्डो पत्ति सिद्धान्त को प्रेरणा मिली। किन्तु अब सूय सम्भाव्यता-तरगा के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। यदि आप यह पूछे कि वह क्या है जो सम्भाय है, अथवा ये तरग किस सागर को जाती है, तो भौतिक विज्ञानी उत्तर देता है--"इसकी चर्चा बहुत हो चुकी, ऊब गया हूँ, आइए जव विपय वदल द!" रक्नि अगर फिर भी आप उस पर जार डालें तो वह कहेगा कि तरगें उसके सूनो म हैं और उसके सूत्र उसके सिर म हैं, लेकिन इसका जथ आप यह न रगा वठ वितरगें उसके सिर म है। गम्भीरतापूर्वक सोच ता बहुत से लोग यह मानते हैं कि वाह्य संसार में जो कुछ भी व्यवस्था हम प्रतीत होती है वह व्यवस्था के प्रति हमारी तोर अभिलाषा के ही कारण है वे यह भी मानते हैं कि प्रकृति के नियम जैसी कोई चीज़ है या नहीं यह भा बहुत स देहास्पद है। इस युग वा यह एक अदभत लक्षण है कि धार्मिक मतवादी लोग भी इस दृष्टिकोण का स्वागत करते हैं। अठारहवी तालीम ये लोग नियम का गासन पसट करत ये क्योकि उनका विचार था कि नियमा म नियता भी निहित है कि तु जाजकल के धार्मिक मतवादियो का विचार कुछ एमा रगता है कि एक देवना द्वारा रचा गया यह ससार अयुक्तिसगत ही हाना चाहिए प्रयपत इस मत या आधार यह है कि वे लाग स्वय भगवान की प्रतिमूर्ति 4 प म बनाए गए हैं ।' धम और विज्ञान के इस मर मियप का स्वागत प्रोफेसर और पादरी दोना ही कर रहे हैं और इसका आधार वस्तुन यद्यपि जवचतनावरथा म हो एक विकुर दूसरे ही प्रकार का है जिसे नाचे लिखे व्यावहारिक ह्त्वनुमान म व्यक्त किया जा सकता है दिनान धमागो के भरासे पर निभर है और धर्मातामा को वो विवाद से खतरा है इसलिए विनान को भी वोब्गेविक्वाद स खतरा है रैपिन धम का भी वा विश्वाट से सतरा है, य. आधुनिक दृष्टिकोण भौतिक विनानियों के बीच भी मर्वमा य नहीं है । उतारप निए गनोलियो के काय की चचा करते हुए मिलिग्न करने हे- इसके माध्यम से मनु य जाति को प ऐमेश्वर या शाहुआ जो अस्थिर पुलि और मनी नहीं है कि प्राचीन काल के मभी विना थे, बल्कि जो नियमानुकूल और नियम क माध्यम में काम करता है।' (माइस एण्ड रिलिान, १६२६, पृष्ठ ३६) पिर भी परिमाश माधुनिक भौतिक विजनी मस्थिर बुद्धि बार सना वो ही अधिक पस करते है।

वैज्ञानिश तत्वमीमासा इनलिए घम बार दिनान एक-दूसरे के मित्र हैं। वन इसका निपप यह निन ना है कि यदि दिनान ग अध्ययन गम्भीरता के साथ किया जाए तो उसन ईश्वर व अन्निव की पुष्टिो।। फिर भी इतनी ता-मात काई वात पवित्र-मन प्रोवरों का पतना में प्रवा नहा कर पाती। विचित्र दात यह है कि जिन समय भौतिकी-जा आधारभूत विन्न है-~प्रासादिक तर ने सम्मा सरचना की अवना रखें और उसे अपदन्य कर हमार सामने यूटन द्वारा प्रतिष्ठित व्यवस्था और धनता के स्थान पर स्वास्नबिर और हवाई कल्पना का स्वप्ना प्रस्तुत कर रही है उनी समय प्रामाणिक स्निान अयागी और मानव-जीवन के पिए वहुमूल्य परिणाम प्रस्तुत करन में पहले से अधिक सुमन सिद्ध हा रहा है। इस स्थिति म एक विराघामाम है जिमका बौद्धिक समाधान गायद दा' म प्राप्त हो मा अथवा सम्भव है इसका काई ममाधान हो ही नहीं । तथ्य यह है कि दिनान दो विभिन्न भूमिकाएँ या करता है--एक और तो तस्वमीमामा के रूप म और दूसरी आर. एक गिमित सामाय बुद्धि के रूप म। तत्त्वमीमाना वे रुप म तो अपनी समलनासा द्वारा ही विनान की प्रतिष्ठा कम हुई है। गगिनीय तकनी मान इवनी शक्तिवान हा गई है कि अयन बनियमित समार के लिए भी वह कोई- न-बाद न निकाल सकती है। प्लेटा और सर बन्न जीन्न का विचार है कि चति ज्यामिति म जान पर लागू होती है इरिए ईश्वर ने इस बात को एक ज्यामितीय राच जनुकूट ही बनाया हा मिन्नु ग िनीच रास्त्री सह करना है जिदर बनर पदायों ५ मरे मसार का दिना दिनी ज्यामिति- दिर के कोर का सहारा लिए न बना सका होगा। तथ्य ता यह है कि भौतिक समार पर ज्यामिति की प्रायागिकता अब दस जगत के सम्बघ म कोइ तय्य नहीं रह गई देवर ज्यामिनिविद् के कोर की प्रासा मात्र रह गई है। भामितिविद् बता एक चौर चाहता है और दह है बहुलता जबघिमात्री जा एकमात्र चीन चाहता है वह है एक्ता । एकता चाह जितनी जरूपप्ट हा पौर चाद जितनी सूम हो पर बाधुनिा दिनान को तत्त्वमीभाना के रूप में दबन पर एकता रा बाइ प्रमा। उसम नहीं मिला। नितु साधारण वुद्धि के स्प म माधुनिर विनान मफल और दिनी है वन्नुत पहल की चपणा वही अधिर सर और पितया है। इस स्पिति का ए यह तरी है दिवन के मचायनस सम्बधित तरमानातीय विवासा और व्यावहारिक दिवामा के बीच एक स्पष्ट विभेद कर पिया जाए। दावमामाना र क्षेत्रमता मेरा मन निलुर सरल और मणिप्त है। मैं तो समयता हूँ कि यह वाह ज त एर माया है पिन्तु यदि इसका यिति है भी ना यह जगत अनियमित प स घटित होने वाली छोटी- घज्ञानिक परिदृष्टि छोटो घटनाओ का बना हुआ है । व्यवस्था, एक्ता और निरतरता तो मनुष्य ने आविष्कार हैं, ठीक वैसे ही जसे सूची पन और विश्वकोष मनुष्य में आविप्यार है। कि तु मानव आविष्कार, कुछ निश्चित सोमाओ के भीतर, मानव संसार में प्रचलित और प्रभावी बनाए जा सकते हैं, और अपने दनिक जीवन के संचालन मे हम नितान्त अव्यवस्थापूण अंधेरी रात के अंधेरे को भुला सकते है जो शायद चारा ओर से हमे घेरे हुए हैं और इससे हम लाभ ही होगा। जिन तत्वमीमासीय चरम सदेहा की विवचना हम भरते आ रहे हैं उनका कुछ भी प्रभाव विनान के व्यावहारिक उपयोगी पर नहीं पडता । मेण्डेल का कोई अनुयायी यदि इस प्रकार का गेहूँ विकसित करता है जो उन बीमारियों से मुक्त हो जो पुराने प्रकार के गहूँ वो नष्ट कर देती हैं, यदि कोई शरीर प्रिया विज्ञानी विटामिना के सम्बध में कोई नई खोज करता है यदि कोई गमाय निक कृत्रिम नाइटो के उत्पादन के सम्बध में कोई सोज करता है तो इन सभी लोगो कार्यों की महत्ता और उपयोगिता मा इस प्रश्न से बिल्कुल स्वतन्त्र अस्तित्व है वि एक परमाणु मे सौर परिवार का एवं लघु रूप होता है अथवा सम्भाव्यता की एक तरण होती है अथवा पूर्णांका का एक अनन्त आयत होता है। जब में मानव जीवन के संचालन के सम्बध म वज्ञानिक पद्धति के महत्व की चचा करता हूँ ता उस समय मैं वज्ञानिक पद्धति . सासारिक स्पा की बात करता हूँ। इसका अय यह नहीं है कि तत्वमीमासा के रूप में मैं विनान का महत्व होन करता हूँ बल्कि मेरे विचार से तत्वमीमासा के रूप मे विनान का महत्व एक दूसरे ही क्षेत्र का विषय है। उसकी स्थिति धम, क्रा और प्रेम के साथ है, परमानपूण जीवन दष्टि की खोज में उसका सम्बन्ध है प्रोमथ्यूज पे उस भावो माद से, जो महानतम व्यक्तिया का देवत्व की मिद्धि के लिए प्रेरित करता है। शायर मानव जीवन का चरम भूय मदव इस भावो माल में ही है । किन्तु यह मूल्य महत्व धामिर है राजनीतिक नहीं, नतिक भी नहीं है। विज्ञान के महत्व का यह धमवत पहलू ही सायवाद को चोटों का शिकार हो रहा है । अभी कुछ ही समय पहल तर धनानिय लोग अपने-आपको एक अभिजात पथ धर्माध्यम से मानते थे। उनका यह एप मा मय के अयपण या पथ, यह सत्य नही जिसे धामिर मत मतान्तर सत्य समझते हैं अर्थात पट्टर धमापा का युद्ध-गा, बरि यह सय सिमी वह सोज कर रह प, एर दृश्य जो धूमिल-सी झांकी देवर पिर ओपर हो जाता, एक अप्रत्यागिन सूय जो मात्मा में अवस्थित स्पुरिग से एकाकार हो जाता। विनान की अव धारणा इसी प म की गई थी और यही कारण है कि वनानिक लोग अभाव, वैज्ञानिक तत्वमीमासा ७९ आपदाएं और पत्रणाएं सहने के लिए तथा प्रतिष्ठिन मतवादा के शत्रु माने जाकर निदित, उपेक्षित और अभिशापित होन के लिए सहप तयार रहते थे। अब यह सब कुछ एक बीती कहानी बनता जा रहा है आधुनिक वनानिक जानता है कि उसका सम्मान दिया जाता है, और मन ही मन अनुभव करता है कि वह सम्मान किए जाने योग्य नहीं है । प्रतिष्ठित व्यवस्था के प्रति उसका दष्टिकोण क्षमा याचनापूर्ण होता है। जैसे दह कहता है-"मेरे पूर्वगामिया ने आपके सम्बध म कुछ क्टो बातें कही हागी, क्योंकि वे लोग कुछ दपपूण थे, और यह समझत थे कि उहें कुछ नान प्राप्त है। में अधिक नम्र हूँ और मैं यह नही बहता कि मुझे ऐसा कोई भी नान प्राप्त नहीं है जो आपके मतो का खण्डन कर सके।" इसके बदरे में प्रतिष्ठिा व्यवस्था वैमानिका को उपाधिया से विभूपित करती है, उन पर सम्पत्ति निछावर करती है और इस प्रकार पुरस्कृत वनानिक उस अयाय और निगृहन-वृत्ति के अधिकाधिक कट्टर समथर बन जाते हैं जिस पर हमारी सामाजिक व्यवस्था आधारित है। मनोविनान जैसे नए विनाना म अभी यह बात नही आई उनम अभी प्राचीन उत्साह कायम है और उसी प्रकार उपेक्षाएँ और यत्रणाएँ भी जारी हैं। उदाहरण के लिए, ब्रिटेन की पुलिस न होमर लेन को, जो एक मनीषी और सन्त थे, अवाछनीय विदेगी' घोषित करने ब्रिटेन से निकाल दिया। किन्तु इन नए विनानो को सायवाद की मृयु गीतर श्वासा का स्पा भी अभी नहीं मिला जिसने भौतिकी और ज्योनिषा जीवन समाप्त कर दिया है। यह सारी परेशानी एक बौद्धिक परेशानी है। सच तो यह है कि इसका समाधान, यदि कोई समाधान हो, तक-शास्त्र म खोजना होगा। जहाँ तर मरा सम्बध है, मेरे पास इस समस्या का कोई समाधान नही है। हमारे इस युग में प्राचीन आगों के स्थान पर अधिकाधिक मात्रा में शक्ति को प्रतिष्ठा की जा रही है, और अय क्षेत्रा को भाति विनान के क्षेत्र म भी यही हो रहा है। जहां एक मोर गक्ति की योज के रूप म दिनान अधिकाधिक सफल और विजयी हाना जा है, वहाँ दुमरी और सत्य की खोज के रूप में विनान उस समयवाद का शिकार बनता जा रहा है जो वनानिक रोगों के पौल से ही उत्पन्न हुआ है। कोई भी इन्सार नहीं कर सकता कि यह रिति दुर्भाग्यपूर्ण है किन्तु मैं यह नही स्वीकार कर सकता कि सशयवाद व न पर अपविश्वाम की स्वीकृति, जिसका ममयन हमारे अनव अग्रणी वैनन्य कर रहे हैं स्थिति म कोई मुघार रा सवेगी । सायवाद दुसदायी गरबा निष्पा भी हा सरता है किन्तु वम मे-बम इतना तो है किनमें मनदी है और वह सत्य की खोज का परिणाम है । सम्भवत यह या पनि है किन्तु एक मूढतर युग वे परित्यक्त विश्वासा को फिर म मापना न तो इस स्थिति में सही अयों में कोई बचाव नहीं हो सकता।

पाचवां अध्याय विज्ञान और धर्म हाल के ज़माने मे अधिवास प्रग्यात भौनिक विनानिया ने और अनेक प्रसिद्ध जीव विनानियो ने ऐसे वक्तव्य दिए हैं जिनम कहा गया है कि विनान के क्षेत्र में हुई हार की प्रगतिया से पुराने भौतिकवाद वा खण्डन हो गया है और ये प्रगतियाँ धम द्वारा पापित सत्या को फिर से प्रतिष्ठित करती प्रतीत होती है । वनापिका ने ये वक्तन्य निरपवाद स्प म बहुत-बुछ प्रायागिक और अनिश्चित ही रहे हैं किन्तु धमशास्त्रिया न उह धर दबोचा है और उनमा विस्तार किया है पथकारा न अपनी ओर स घमास्त्रिया द्वारा लिए गए उन विवरणों को प्रचारित किया है जो जवित चमत्कारप्ण थ। और इसके परिणामस्वरूप सामा य जनता पर कुछ एमा प्रभाव पडा वि भौतिकी वस्तुत मृपि की उत्पत्ति सम्बपी सम्पूण धार्मिक स्थापनाआ का ममथन करती है । मैं स्वय तो एमा नहीं समराना नि आधुनिक विनान से वही निप्यप नियाग जा सकता है जिसका सामाय जनता मान बठी है । पला वात तो यह है कि वनानिका ने इतना कुछ नहा पहा जितना समाना जाता है कि उहाने कहा है और दूसरी बात यह रि परम्परागत धार्मिक विश्वासा के ममथन म उहाँने जो कुछ भा रहा है वह कवर भद्र नागरिका की हैसियन स सत्गुण और सम्पत्ति की रक्षा स प्रेरित होकर यहा गया है सनफ्ता- पूवव विचार पर एक वनानिय की हैसियत से उहान ३ बात नहीं कही। युद्ध न और स्म की प्राति न सभी भी लागा का रूटिवादी बना दिया है और आचाय लोग प्राय भीर प्रवृत्ति के होते है । विन्नु य वात बुछ विपया तर का हैं। लाइए हम उन वाता की परीक्षा करें जिह विन मचमुच प्रतिष्ठित करता है। (१) स्वतत्र सकल्प-धमास्त्र जा अपने परम्परागन रप म मनुप्या म स्वतत्र सफ्ल्प गस्ति की स्थिति स्वीकार करता है जभी हार हा तक निश्व मे प्रारतिक नियम र प्रति अपना प्रेम प्रस्ट वर रहा था। कभी-कभी दवी चमत्वारा म विश्वाम हा इस प्रेम म पुछ बाधा हारता था। अठारहवी नारी में यूटन प्रभाव गे धमात्र और प्राकृतिक नियम या मम्मध बहुत घनिष्ठ हो गया । यह माना गया कि ईश्वर ने गजात को रचा एक योजना के अनु सार की है, और प्राकृतिय नियम इस याना ये मून स्प हैं । १६वी गाता 1 विनान और घम ता बम गाम्न काफी कठार वौद्धिव और सुनिश्चित बना रहा । लेकिन पिछले सौ वर्षों में नास्तिावादी तक की चोरी का प्रतिकार करने के रिए जमने अधि- काधिक स्प म भावना का महारा रेना अपना लक्ष्य बना पिया है। वौद्धिक दष्टि म कुछ शिथिल भनोटगाना की स्थिति वारे रागा पर अपना प्रभाव डारने का प्रयन उमन किया है, और प्रत्यक्ष म्पप्ट और मटोक होने के बजाय वह भारी भरकम आवरण वन गया है। आज हमारे जमान म केव" भूलराधार- वादिया ने और कुछ थाटे-स जधिर विद्वान कपारिक घमगाम्बिया ने पुरानी समाहत बौद्धिक परम्परा को कायम रखा है । घम का ममथन करने वाले शेप मभी लाग तक का धार कुण्ठिन करन म लग है। 4 मस्तिप्प के वनाय हृदय को प्रभापित करने की कोशिश करते हैं उनकी स्थापना यह है कि निस निष्कप का हमार तक ने मत्य सिद्ध क्यिा हो उमरी बमयता मारी भावनाआ द्वारा मिद्ध की जा सकती है । जमा वि राड टनिसन ने सुदर ढग से कहा है और एक क्रुद्ध मानव की भाति तनकर हृदय बोला "मैंने अनुभव किया है।' हमारे युग म हृदय परमाणुश्रा के बारे में "वमन-नत्र व वार मे समुद्री अर्चिन के विकास के बारे म तथा अय एसे विपया के भी सम्बघ म भावनाएं रखता है जिनके बारे म, यदि विनान न होता तो वह उनामीन ही बना रहना। हाल के जमाने म धार्मिक ममयको की पद्धति म एव मर्वाधिक महत्व पूण विकाम यह हुआ है कि परमाणुआ के याचरण के सम्बध म हमारे अनान के आधार पर मनुष्य की स्वतन माल्प शक्ति का पुनरुद्धार करने की गेगिरा की जा रही है । जा पिण्ट इतन बड़े हैं कि उह देखा जा सके उनकी गतिविधि का नियमन करन वाले यात्रियों के पुरान नियम आज भी एम पिण्डा के मम्ब व म पयाप्न माना म सत्र ही हैं वितु एकर परमाणुआ के मम्ब ध म वे लागू नहीं हो। एक्ल दक्दाना तथा प्राटाना के सम्बध म तो और भी कम रान हाने हैं। अभी तत्र निश्चयपूपर यह नहीं जाना जा सरामि एक परमाणुआ के आचरण के मभा पना का नियमन वग्न वाले कोद नियम है अथवा यह नि एमे परमाणुजा वा आचरण बाणिक रुप म अनियमित है । एमा सम्भव समया गता है कि बडे-वढे पिपल दे आवरण का नियमन करने वाले नियम क्वल मान्यिकीय हो मक्ते है जा बहुमस्या नियमित गतिविधिया का मोमन परिणाम प्रस्तुत करत हा। कुछ ता माव्यिवाय नियम हैं ही जस ऊमागनि- दिनान का दूसरा नियम, सम्भव है ति और भी हा, परमाणु म विविध सम्भव स्थितियां होती हैं तो निरन्तर एक-दूमर म दिल्य नहीं होती रहता बल्मि उनी योच म घाट डोट सुनिश्चित अन्तरार रह्न हैं। परमाणु एव यिनि से दूमरा यिनि म उदान कर सकता है। परमाणु द्वारा मानव उदजन विविध वज्ञानिक परिष्ट प्रकार के हो सकते है। अभी नर ऐम कोई नियम नात रही है जिना आधार पर निणय किया जा सके कि किसी निश्चित अवमर पर परमाणु विम प्रकार का उदरजन करेगा और इसीलिए यह कहा जाता है कि इस सम्बध म पर माणु नियमो का वावर्ती नहीं है बल्पि मादृश्यमूक मापा म, वह 'स्वतन सरल्प' वाला है। अपनी पुस्तक नेचर आफ दि फिजिक् बन्ड' में इस सम्मा वना को लेकर एडिग्टन न बहुत उछल-कूद की है (पृष्ठ ३११ और आगे) ! स्पष्ट है कि उनके विचार से मनुष्य का मन यह निर्धारित कर मक्ता है कि मस्तिष्क के परमाणु विमी निर्दिष्ट क्षण पर कौन मा सम्भव सक्रमण करें, और इस प्रकार बदूष का घोडा दवाने की भाति, अपन सरल के अनुमार बडे बडे परिणाम प्रस्तुत कर सकता है । उनके विचार से सक्ल्प स्वत कारणजय नहीं होता । यदि उनका विचार ठीक है तो काफी बडे-बड द्रव्यमाना में सम्बध में भो भौतिक जगत की गतिविधि भौतिक नियमा द्वारा पूणत पूर्व निर्धारित नहीं होती, बल्कि मनुष्या के कारण मुक्त सक्ल्पा द्वारा उसे बदला भी जा सकता है। इस स्थिति की जांच परस करने से पहले मैं अनिर्धारिता का सिद्धान्त कही जानेवाली स्थापना के सम्बध म कुछ कहना चाहता हूँ। इस सिद्धान्त को हिज़िनबग ने सन् १९२७ म पहले महल भौतिकी के क्षेत्र में प्रस्तुत किया था, और पादरा लोगों ने इस अपना लिया है---मेरे विचार से मुख्यत इसके नाम के कारण और एसा समझकर कि गणितीय नियमा की दासता से यह सिद्धान्त उह मुक्ति दिला सरेगा । मुझे तो यह बात कुछ माश्चयजनक मालूम होती है कि डिग्टन अपन इस सिद्धात का उपयाग इस प्रकार किया जाना वदरित कर सकते हैं (देखिए ऊपर उदघृत पुस्तक पृष्ठ ३०६)। अनिर्धारिता का सिद्धान्त यह स्थापित करता है कि किसी भण की स्थिति और उसके सवेग दोना का परिशुद्ध निर्धारण कर मक्ना सम्भव है। पत्यक निर्धारण म कुछ न कुछ श्रुटि हागी और दोनों त्रुटियो का परिणाम सवदा एक समान होगा। इसका अर्थ यह है कि जितना परिशुद्ध निर्धारण एष का हम परला चाहा और करेंगे उतना ही कम परिशुद्ध निधारण दूसरे का हो मरेगा । बार इम निधारण म होन वाली श्रुटि बहुत ही अल्प है। मैं फिर कहता हूँ कि मुझे इस बात पर आश्चय है कि एडि ग्टन न इस मिदान्त वी दुदाई म्वतत्र सकल्प की समस्या ये सम्बध म दी, क्मादि रस सिक्षा त से एसा कुछ भी नही स्थापित होता जिसस यह सिद्ध हो प्रिनि की गतिविधि निर्धारित नहीं है। इस सिद्धान्न से केवल यह स्पष्ट होता है कि दिशा वार-सम्बधी हमारे पुरान पत्र और उपकरण आधुनिक भोगिरी को आवश्यक्ता रिए अपयाप्त हैं और यह बात अम पारणा में मा ज्ञात हो चुकी है। दिशा और बार की खोज यूनानिया ने की थी, और इस साजन वनमान गतागीता अपना उद्देश्य बखूबी पूरा किया। आइसटोन ने ३ विज्ञान और घम इनके स्थान पर कुछ दुनस्तो धारणा स्थापित की जिसे उहाने 'दिक्-काल नाम दिया और दो एक दशमो तक इसने भी वसूवी काम दिया, विन्तु आधु निक क्याटम यात्रिकी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कुछ अधिक आधारभूत सशोधन और पुनर्स्थापना आवश्यक है । अनिधारिता का सिद्धात तो इस जाव- श्यक्ता का एक उदाहरण मात्र है, प्रकृति की गतिविधि को निर्धारित करन म प्राकृतिक नियमो की असफलता का उदाहरण इसे नहीं माना जा सकता। जैसा कि श्री जे० ई० टनर ने सकेत क्यिा है (नेचर २७ दिसम्बर १६३०)-"अनिर्धारिता के सिद्धात का जो प्रयोग किया गया है उसका कारण बहुत-कुछ 'निर्धारित' शब्द की अस्पष्टता है।" एक अथ मे कोई परिमाण तब निर्धारित होता है जब उसकी नाप-नौर हो जाती है दूसरे अब म कोई घटना तव निर्धारित होती है जब उसका कारण घटित होता है । अनिर्धारिता के सिद्धान्त वा सम्बध नाप-तौल स है वारणता से नहीं। क्सिी कण के वेग और उसकी स्थिति को इस सिद्धान्त द्वारा इस अय में अनिधारित घोपित किया गया है कि उनकी परिशुद्ध नाप-तौल नही की जा सकती। यह एक भौतिक तथ्य है जिसका इस तथ्य से कारणात्मक सम्बध है विनाप-तौर एक भौतिक प्रक्रिया है जिसका भौतिम प्रभाव उस पर पड़ता है जिसकी नाप-तौल की जाती है। अनिधारिता के सिद्धात के सम्बध मे एसी कोई बात नही है जिससे यह सिद्ध हो कि कोई भी भौतिक घटना कारण मुक्त होती है। जसा कि श्री टनर ने कहा है-~-"इस प्रकार का प्रत्यक तक कि-चूकि किसी भी परिवतन का निधारण' इम अथ म नही किया जा सकता कि वह निश्चित' किया जा चुका है इसलिए वह एक नितान्त भिन अय में, अर्थात 'कारणजय' होने के अय में, भी अनिधारित है-एक एसा तक है जो अनेवाथ दोप से भरा हुआ है।" अब हम परमाणु और उमके कल्पित स्वतन सक्ल्प को ओर फिर लौटें । ध्यान देना चाहिए कि अभी तक यह नहीं नात हो सका कि परमाणु का आचरण अस्थिर आचरण है । यह कहना गरत है कि परमाणु ने आचरण का अस्थिर होना निश्चित रूप से नात हो चुका है और यह कहना भी गल्न है नि परमाणु के आचरण का अस्थिर न होना नान हा चुका है। अभी हाल हा म विज्ञान का इस बात का पता चरा है कि परमाणु भौतिकी के पुराने नियमा वा वावर्ती नहीं है और इसी आधार पर कुछ भौतिक विनानी बिना सोचे-समये इस निष्क्प पर पहुंच गए हैं कि परमाणु किमी प्रकार १ भी नियमा का वशवी नहीं है। मस्तिष्क पर मन के प्रमाव दे मम्ब ध म एडिग्टन ने जो तक प्रस्तुत किया है उसमे इसी विषय पर दवात के तप की वरवस याद ही आती है। देवात गतित ऊजा के सरक्षण की वात जानने थे, जितु सग के सरमण को बात यह नहीं जानत थे ।

८४ वजानिए परिदृष्टि इमलिए उहान यह सोचा कि मन पाशव भावनाओं की गति को दिशा को तो बदर सकता है, यद्यपि उमके परिमाण को नहीं बदल सकना । उनक सिद्धान के प्रवागन थोट ही ममय बाद जब सवग के सरक्षण सम्बधी खोज हुद तव देकात के मत का छाड दना पड़ा। इसी प्रकार एडिंग्टन का विचार भी प्रायो- गिक भौतिक विनानिया की कृपा पर आश्रित है जो किसी भी क्षण उन नियमा की खोज कर सक्त हैं तो एकर परमाणुआ ये आचरण का नियमन करत हो। एक एस अनान के आधार पर, जो क्षण-म्यायी हो सकता है एक घमास्त्रीय महा तयार करना बहुत ही नासमझी की बात है। और इसर प्रभाव भी-- जहाँ तक इसका काई प्रभाव हो सकता है-अनिवायत बुर है क्याकि रोगा का इनस यह आगा हान लगती है कि अब नई साजें नहीं की जाएगी। इसर अलावा स्वतत्र सकल्प पर विश्वास करत के विरुद्ध एक गुद्ध अनुभववादी आपत्ति भी है। जहा कही भी पशुआ अयवा मनुप्या के आच रण का सावधानीपूवर धनानिर प्रेषण किया जा सका है वही यह देखा गया है कि इस क्षेत्र म भी वैनानिक नियम उसी प्रकार साज जा सक्त हैं जमे अय क्षेत्रा म । इसका एक उदाहरण पंवराव के प्रयाग हैं। यह सही है कि मनुप्य व काय-बापा र सम्मघ म पूर्णन कोई प्रागुक्ति या मविष्यवाणी नहा की जा मक्ती किन्तु इस असमयता का कारण सम्बधित क्रिया विधि की जटिरता स मी भाति स्पष्ट हो जाता है और इमये रिए पूण नियमहीनता की प्रासल्पना करना क्सिा प म भी आवायर नहीं है। जहा कहा मी इम प्रारकल्पना की सावधानीपूर्वक परीक्षा की जा सकती है वहा यह गरत मिद्ध होती है। जो लोग भौतिर जगत म अनियमितता या अस्थिर बुद्धि की अभिरापा करत हैं व यह अनुभव नहीं कर सक कि इसका अथ क्या होगा। प्रति पी गतिविधि र मम्ब ध म ममी अनुमान कारणामा हैं और पनि प्राति कारणामा नियमा व यावर्ती नहा है तो य सभी अनुमान गात सिद्ध हाग, उस स्थिति म अपन व्यक्तिगत अनुभव स बाहर हम विमा भी चीज का मान नहीं प्राप्त कर सबग दम्तुत गुद्ध गर्यो म म वेवर वतमान क्षण का अपना अनुभव मात्र हो गगता है क्यानि हमारी मम्पूण स्मृति कारणात्मक नियमा पर निभर वरती है। यदि हम दूमर गंगा र अस्तित्व का अनुमान नर्ग कर मक्त अयवा स्वय अपन जतीन को भी आमिति यति असम्भव है, तो वरया अथवा घमास्त्रिया वी अभिपित रिमी भी अय चौज का अनुमान ता और भी नहीं किया जा मरना । कारणता का गिद्धाल सय भी हो सकता है और यमस्य भी रितु निग व्यक्ति का उमकी अमायना का प्रायर पना म प्रमन्नना की अनुभूति होती वह अपन मिलान व निहित यों का ममसन म असफर है। जिन पारणामा नियमा को वह अपन लिए मुविधाजनक पाता है उनका ता चिना रिसी प्रकार विज्ञान और धम की चू चपड विए प्राय स्वीकार कर रेता है, जसे, उदाहरण के लिए, यह नियम वि उमका भोजन उसकी पुष्टि करेगा और उसका व उसके चैनो का तब तक भुगतान वरता रहगा जब तक उसके खाते में पैसे रहगे, जितु जो नियम धमके लिए असुविधाजनक होते हैं उहे वह अस्वीकार कर देता है । पितु यह प्रक्रिया कुछ इतनी अधिक सरल है कि इस पर हमी आती है। वस्तुत ऐसी कल्पना करने का कोई भी उपयुक्त कारण नहीं है कि परमाणुआ का आचरण नियमाधीन नहीं है। एकर पग्माणओ के आचरण पर अभी हाल ही में प्रायोगिक पद्धतिया द्वारा कुछ प्रकाश डाला जा सका है, और यति अभी तक उनके आचरण की पूरी पूरी खोत नहीं की जा सकी तो इसमे कोई नाश्चय की बात नहीं है। यह सिद्ध कर सकता तो तास्विर और मद्धा- तिक दृष्टि मे असम्भव है कि कोई भी तत्व प्राच नियमा का शव नहीं है। केवर इतना ही निश्चित रूप में कहा जा सकता है कि यदि कोई नियम हैं ता अभी तक उनसरी खाज नही की जा सकी। हम चाह तो यह कह सकते हैं कि जो लोग परमाणु-मम्ब धी खोज करते रहे है व इतने प्रवीण और कुशल हैं कि यदि कोई नियम हात तो उहाने अवश्य उनकी खोज कर ली होनी । वितु मैं ऐसा नहा मानता कि इस विश्व सम्बम बोई सिद्धान्त निर्धारित करन के लिए यह एक पयाप्त ठोस आधार है । (२) ईश्वर गणितज्ञ के रूप मे~~सर आथर एडिग्टन धम का निग मन इस तथ्य स करते हैं कि परमाणु गणितीय नियमा का पारन नहीं बरते। इस विपरीत सर जेम्स जी स धम वा निगमन इस तथ्य से करते हैं कि परमाणु गणितीय नियमो का पालन करते हैं और धमनास्त्रियों ने इन दोना ही तों को समान उमाह क माय स्वीकार कर लिया है। स्पष्टत उनकी धारणा यह है रि सगति की आवश्यकता केवल गुप तर म होती है और गम्भीर पार्मिक भावनाओ क क्षेत्र म सपति का कोई हम्नक्षेप न होना चाहिए। एगिटन । तर यो परप-परीक्षा हमन परमाणुओ वे उदाजा की प्रक्रिया ये आधार पर की है। याइए, जब जोस के ताकी परीक्षा तारो के दोतल होने की पद्धति के आधार पर करें। जीम की धारणा का ईश्वर बहुत ही निरापद और गुद्ध आत्मा है । जीन्स का कहना है कि वह न तो जीवविनानी है और न इजीनियर बलि वह एक शुद्ध गणितन है ('दि मिस्टीरियम यूनीवस , पृष्ठ १३४) । मैं स्वीकार करता हूं कि इस प्रारका ईश्चर मुये उम ईश्वर की अपेशा अधिर पराद है जिसकी अवधारणा बहुन बडे व्यापारी के समान की इ है, किन्तु इगमा कारण निम्स देह यही है कि मुझे क्म को अपना तिन अधिक पगाद है । इमम पर यह सुपाव भी मिला है कि धम-रगान पर मासपगीय स्थिति के प्रभाव की विवदा करते हुए एक प्रय लिया जा सरता है । जिस वज्ञानिक परिदृष्टि व्यक्ति की मासपशियां दृढ और तनी हुई होती है वह मशील ईश्वर पर विश्वास करता है, और जिस व्यक्ति की मासपगियो ढीली और शिथिल होती हैं वह विचारपरक और चिन्तनगील ईश्वर पर विश्वास धरता है। सर जेम्स जीन्स को अपने ईश्वरपरक त पर निम्म देह पूरा विश्वाम है, शायद इसी- लिए वे विकासवादिया ये तोका अधिक आदर पी दष्टि से नही देखते । रहस्यमय विश्व के सम्बघ म लिखी गई उनकी पुस्तक का प्रारम्भ मूय की जीवनी से होता है, शायद यह भी कहा जा सकता है कि वह सूम की समाधि के लिए लिखा गया सस्मरणात्मक लख है । ऐमा लगता है कि लगभग एक लास तारा म से केवल एक ही तारे के ग्रह होते हैं किन्तु लगभग दो सौ करोड वप पहल सूर्य का मिलन, सयोग और सौभाग्यवा, एक दूसरे तार स हुआ और उसी से यह वतमान ग्रहीय सतति की उत्पत्ति हुई। जिन तारा के अपने ग्रह नहीं है उनमे जीवन की उत्पत्ति नही हो मक्ती जिसका तात्पय यह हुआ विश्व में जीवन एक बहुत ही दुलभ तत्व है। सर जेम्स जोस बहत हैं "यह बात अविश्वसनीय प्रतीत होती है कि इस विश्व की सरचना मुम्पत हमारे जैसे जीवन की उत्पति के लिए की गई हो। अगर ऐसा होता तो प्रयुक्त यत्रा- वलि की विशालता तथा उत्पादन के परिमाण में वीच कुछ अधिक अच्छे अनु. पात की आग निश्चित म्प में की जा मस्ती थी।" और विश्व के इस दुलभ कान में भी जीवन को सम्भावना अत्यधिक अण और अत्यधिक गीत मौसमा के बीच में अन्तराल म ही है। हमारी जाति का यह दुर्भाग्य है कि उसे सम्भ- वत शीन के कारण मर जाना पडेगा, जबकि इस विश्व का अधिकारी पदाथ भाग इतना ऊप्ण बना रहेगा कि उस पर जीवन मा जस्तित्व सम्भव न होगा।' जो दानशास्त्री इस प्रकार तक करते हैं कि जसे इस सृष्टि का प्रयोजन हो मानव जीवन हा उनकी ज्योतिप भी उतनी ही दोषपूण मालूम होती है जितना दोपपूण उनके द्वारा पिया गया स्वयं अपना और अपने सजातीय जीवो का मूल्यावन है । आधुनिक भौतिकी द्रव्य, विकिरण मापेक्षिक्ता और ईघर पर लिख गए जीम व प्रसनीय अध्यायाग सक्षिप्त रूप प्रस्तुत करने का प्रयत्न मैं नहीं करूंगा वे पहले से ही यहासम्भव संक्षिप्त हैं और उनका सारा देने में रोगर ये प्रति याय न हो सकेगा। फिर भी पाठर को जिनामा जगाने के लिए में प्रोपेगर जान्स देशों को उधत परगा सभेष में आपमिक्ता र सिद्धात द्वारा जिस नए विश्व कागन हम हुआ है उसको अभिव्यक्ति सरल और परिचित रागवीम इस प्रकार की जा राती है कि वह गानुन वा एव बुल्गुण जसा है जिसमा परी घाातर अरा- मान और नालीदार है । हमारा विश्व साया में युज्बुले का भीनरी हिमा नहीं है बरि उमा परी धरानर है और हम यह बात हमला या सनी चाहिए - विज्ञान और घम कि जहा साबुन के बुलबुरे की देवर दो विमाएं हैं वहा हमारे विश्व-बुदबुद में चार विमाएं हैं--तीन विभाएं दिशा की और एक विमा कार की । और जिम द्रव्य से यह बुदबुद बनाया गया है वह-सावुन की फिल्म-गूय आकाश है जिसकी झाई गूय काल पर की गई है।" पुस्तक के अन्तिम अध्याय मे यह तर्क पेश किया गया है कि इस सावा के बुरे को एक गणितीय देवता ने गणितीम गुण घों मे अपनी अभिरुचि क कारण उडाया है। धमगास्त्रिया को पुस्तक में इस मास बहुत प्रसनता हुई है। धमनास्त्री रोग छाटे माट दाप-दान के लिए भी बहुत कृतन हान रग है, और व इस बात की अधिक चिन्ता नहीं करते कि दिनानी रोग किस प्रकार का ईश्वर उन्हें मौंप रहे हैं, बातें जि ईश्वर नाम का कुछ न कुछ उहें उपल ध हो रहे । मर जेम्म जी म पावर, फोटो के श्वर को भाति, ऐसा है कि उसे गणित के प्रश्न हल करन का उमाद-मा है किन्तु गुद्ध गणितन होन के नाते उसे इस बात की क्तई परवाह नहीं है कि प्रश्नों का सम्बध विम बात से है। अपने तक का भूमिका म दुरूह और आधुनिक भौतिकी की माफी चचा करणे मगहर रम्मा ने गम्भीर विद्वत्ता का एक ऐसा वातावरण बना दिया है जो अयथा उम पुस्तक मन उपल ध होना। मार रूप में लेखक का तब इस प्रकार है-चूरि दो सेर और दा सब मिलकर चार सेव होत है इसलिए यह निष्कप निकला कि सप्टा को इस बात का निश्चित नान या पिदा और दो मिरकर चार होत हैं। यह आपत्ति उठाई ना सकती है रि, चूति एक पुरुष और एक स्त्री मिलकर कभी कभी तीन भी हो जान हैं इसलिए मप्टा प्रश्न ह करन म उतना दन नहा या जितना दश होन की आप उससे की जा सकती है । अव बुछ गम्भीरता से माथ बात करें सर जेम्स जीन्स म्पप्टत पारी बकले के सिद्धान्त को अपनाते हैं जिसके अनुसार केवर विचारों का ही अस्तित्व है और बाह्य जगत म ना स्थायिवत्ता हम हिवाई दती है उसका कारण यह तथ्य है कि ईश्वर कापी रम्ब समय तक चीजा के बार म साचता रहता है। उदाहरण के रिए भौतिकी पार्यों का अस्तित्व उम ममय समाप्त नहीं हो जाता जब नाई उह दम नहा रहा होता, पारि ईश्वरता बरावरहर ममय उनकी बार देखना रहता है अथवा इमरिए कि य पाय ईश्वर के मन म हर समय विचार रूप म रहन हैं । उनका कहना है वि यह विश्व गुद्ध विचार रेम्प में ही सर्वोत्तम गैति म चित्रित किया जा सकता है, यपि फिर भी यह चित्र बहुत ही अपूण और अपयाप्त होगा, इस विचार का हम क्मिी मय व्यापर गर के अभाव म, एर गणितीय विचारव का विचार यह मान हैं।' कुछ और आग चरवर हम बताया गया है कि ईश्वर के विचारा का नियमन परन वा नियम वही हैं जो हमार जागरण वार व प्रपच का नियमन गरल हैं वितु म्पष्टत हमार सपना बज्ञानिक परिदृष्टि का नियमन उनके द्वारा नहीं होता। इमम स देह नहीं कि यह तक उस औपचारिक परिशुद्धता के साथ नहीं प्रस्तुत किया गया जिसको मांग सर जेम्स एक ऐसे विषय म अवश्य ही करते जिसक साथ उनने मनोभावो का कोई सम्बध न होता । विवरणा की सारी बात हम छोड भी दें, फिर भी सर जम्स ने यहा एक मलभूत तर्वाभास की गन्ती की है, उहाने शुद्ध गणित और व्यावहारिक गणित के क्षेत्रो म गडबडी की है । शुद्ध गणित कभी भी प्रेक्षण पर आधारित नहीं रहता उसका सम्बध प्रतीको से है, और यह सिद्ध करने स है कि प्रतीका विमिन सक्रना का अथ एक ही होता है । अपने इस प्रनीरात्मक स्वरुप के कारण ही शुद्ध गणित का अध्ययन प्रयोगा की सहायता लिए बिना ही किया जा सकता है। इसके विपरीत भौतिकी चाह जितना अधिक गणितीय हो जाए, वह वरावर प्रेषण और प्रयोग पर आधारित रहती है अर्थात नतिम रूप म नानेद्रिया द्वारा प्रत्यक्ष किए जाने वाले नान पर आधारित रहती है। गणितज्ञ तो सभी प्रकार की गणित प्रस्तुत करता है, किन्तु उस द्वारा प्रस्तुत गणित म स भौतिक विनी के लिए कुछ ही उपयोगी होती है। और गणित वा प्रयोग करते हुए भौतिक विनानी गिन चीजा की स्थापना करता है में उनस बिल्कुल भिन्न होती हैं जिनकी स्थापना गुद्ध गणितन करता है। भौतिक विनानी तो यह कहना है कि जिन गणितीय प्रनीका का वह उपयाग कर रहा है उनका उपयोग शान्द्रिय सस्वारा की व्याख्या म उनके अनुवधा में और उनकी प्रागुक्ति म किया जा सकता है। उसका काय चाह जितना अमृत या भावमूम हा उसा सम्बर अनुभव से कभी नहीं रटता। यह देखा गया है रि गणितीय मूत्रा द्वारा बुछ ऐस नियमा वी अभिव्यक्ति की जा सकती है जो हमारे प्रश्य जगत का नियमन करत हैं। जोस का तर यह है कि इस जगत की सृष्टि एक गणितन द्वारा हा नियमा का प्रयतन देखा और उसरा आन द रन क लिए की गई होगा । मुझे इस बात मे सटेन नहीं है कि यदि इस तक को औपचारिक रपस प्रश्नुत रन का प्रयत्न जीस ने लिया होता नो उह स्पष्ट हो गया हाता कि इसम कितना तमारा है । हम इग सर्वाभास वादों यह बिगुल मम्भाय माम होता है कि कोई भी जगत क्या न हा, एव पुर गणितन उस सामाय नियमो की व्यानिय भीतर ला साता है । और यनि ऐसा है ता राधुनिक भौनिको का यह गणितीय स्वरुप दिन सम्बध म पात होने वाग बोई तथ्य नहीं है कि भौतिक विनानी व योर को ही प्राप्ति है। दूगरी बात यह है कि वर यति उतना ही परिशुद्ध गुट मणिता होगा जितना उस समय सर जम्स उमे मानत है, ता वह अपन पिचारा या इतना घोर बाह्य अस्तित्व दन की छा न करता । ज्यामितीय माइर बनान और या रेयाए उत्तारल कीरयाता स्वती रडा विज्ञान और धम की अवस्था के अनुकूल होती है और वोद भी आचाय उमे एक निम्न स्तरीय काय मानगा। फिर भी सर जेम्स जीस अपन प्रप्टा को इमी इच्छा का पान वनात है । वे हम समझान हैं कि यह ससार विचारा से निर्मित है एमा रगता है कि इन विचारा की तीन श्रेणिया हैं—ईश्वर के विचार, जागृत अवस्था मनुष्या के विचार और सुप्तावस्या मे मनुष्या के विचार, जव वे वुरे-बुरे सपने देखते हैं । यह बान कुछ स्पष्ट रूप से ममझ म नहीं आती कि विश्व की पूर्णता मे अन्तिम दो प्रकार के विचार क्या योग देते हैं, क्याकि यह तो साफ है कि श्वर के विचार सर्वोत्तम विचार हैं और यह वात भी समझ मे नही आती कि इतना वचारिक गडबडघोटाला पता करने से राम क्या हुआ? किसी समय एक अत्यन्न विद्वान और परम्परानिष्ठ धमशास्त्री से मेरा परिचय हुआ था, जिसन मुझे बताया था कि अपने रस्त्र अध्ययन के परिणामस्वम्प उसे और हर बात तो समझ में आ गद है, वेवर यही वान समन म नहीं आइ कि इश्वर न इम जगन की मृष्टि क्या की। मर जेम्स जीस का ध्यान में इस पही की ओर भावर्पित करता है और मुझे आशा है कि शाघ्र ही इसका विवेचन करके वह धम गाम्बिया को कुछ और सन्तोष-सात्वना देंगे। (३) ईश्वर स्रष्टा के रूप मे-वतमान समय म जा अत्यन्त गम्भीर कठिनाइयां विनान के सामने हैं उनम से एक कठिनाई तो इस तथ्य मे उत्पन्न हुइ है कि हमारा यह विश्व धीर धार क्षीण और समाप्त होता प्रतीत होता है। उदाहरण के लिए जगत म रदिया एक्टिव तत्व हैं। य तत्व निरन्तर अल्प मकर तत्वा म विघटित होते जा रह हैं और ऐमी कोई प्रक्रिया मालूम नहीं है जिसके द्वारा फिर से उनका सगठन किया जा सके। फिर भी विश्व के क्षीण और समाप्त हाते जान का यह मवाधिक महत्त्वपूर्ण और कठिन पक्ष नहीं है । यद्यपि हम एमा काद प्राकृतिक प्रक्रिया नहा मालूम है जिमके द्वारा सरस्तर तत्वा से मार तवों का निमाण हाता हो फिर भी हम एसी प्रक्रियाओं की कल्पना कर सक्न हैं और सम्भव है कि कहीं-न-कही पर एसी प्रक्रियाएँ मक्रिय भी हा । वितु जब हम मागतिविनान के टूमरे नियम को रेत हैं तब हमार सामने एक और अधिक आधारभूत पठिनाई पैदा होती है। कप्मागतिविनान का दूसरा नियम, मोट 11 म, यह कहता है कि जिन चीज़ा को या ही छोड पिया जाता है व धोरे पोरे अव्यवस्थित होने लगती हैं और फिर दावारा अपन आप गुद्ध व्यवस्थित रूप म नहीं आ पाना । एमा रगता है कि किमी ममय यह विश्व विदुर व्यवस्थित गुद्ध प म या, हर चीज़ अपन उपयुक्त स्यान म थी, योर तब से कर आज तक वह वरावर अधिकाधिक अव्यवम्पिन होता गया है और मब ऐमी स्थिति मा गई है दि जब ६० वज्ञानिक परिदृष्टि 1 तक उसका आमूल सशोधन न किया जाए तब तक उसे उस पुरातन व्यवस्थित स्थिति में नहीं लाया जा सकता । ऊष्मागतिविनान वे दूमरे नियम के मूल रूप म जिसकी स्थापना की गई थी वह तो इममे बहुत कम मामाय बात थी। वह तो यह बात थी कि जव समीपस्थ दो पिण्डा म मिन तापमान होगा तो जिसका ताप मान अधिक है वह ठप होता जाएगा और जा टण्डा है वह तब तक गरम होता जाएगा जब तक दोना पिण्टा का तापमान बरावर नही हो जाता । इम रूप में तो यह नियम एक ऐसे तथ्य का प्रतिपादन करता है जिसस सभी रोग परिचित है अगर आप एक राल जलती हुई शलाका बाहर खड़ी कर दें तो वह ठण्डी होती जाएगी और उसके चारा ओर की हवा गरम हाती जाएगी। वितु शीघ्र ही यह दवा गया कि इस नियम का एक बहुत अधिक सामान्य अथ भी है। अत्यन्त गरम पिण्डा के कण अत्यन्त तीव्र गति म रहन है जबकि शीतर पिण्डो के कणा की गति अधिक धीमी होती है। अन्नत जब तेजी से गतिशील अनेक कण और धीमी गति स चरने वाले कुछ अय कण एक ही क्षेत्र म आ जाते है तय तीव्र गति वाले कण धीमी गति वारे कणा से टकराते हैं और अत म दोना की गति का वेग औसत और समान हो जाता है । मभी प्रकार की ऊजा पर इसी प्रकार का सत्य रागू होता है। जब भी किसी एक क्षेत्र म ऊजा की मात्रा बहुन अधिक होती है और समीप के दूसरे क्षेत्र में ऊर्जा की मात्रा बहुत कम होती है तब एक क्षत्र से ऊजा तब तब दूसरे क्षेत्र की ओर गरिगोर रहती है जब तक दोना क्षेत्रा म समानता नहा स्थापित हो जाती। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को लोकतत्र उमुग्व प्रवत्ति कहा जा सकता है। यह एक अप्रत्यावर्ती प्रक्रिया है। स्पष्ट प्रतीत होता है कि अतीत काल म आग की अपेक्षा कजा बहुत अधिर असमान रूप म वितरित रही है। इस तथ्य को देखते हुए कि अर भौतिक विश्व को परिमित माना जाता है और कुछ निश्चित- यद्यपि अनात-सख्या के इक्दाना और प्रोटाना स निर्मित माना जाता है, कुछ स्थानो म अय स्थाना के विपरीत ऊजा वे सम्भव सचय या एकत्रीकरण की एक सद्धान्तिा सीमा ता है हो। जगत के पिछर इतिहाम का जब हम मागत हैं तो कुछ निश्चित अवधि र दार (जो चार हजार और चार वर्षों से तो अधिक हो है) जगा को एर एमी स्थिति म पहुँच जात है जिसके पहल, यनि ऊप्मागतिविज्ञान का दूसरा नियम उस समय भी मा य था नो, माय किमी दूमरी स्थिति की सम्भावना नहा हा सरती। जगन की यह प्रारम्मि यिनि वही हागी जिसम ऊना का वितरण उतना अममान रहा होगा नितना अपमान होना मम्मव है, जसा नि एगिटन कव है . १ देखिर पिनी पुसा र विकिल बर' १६२८ . मीर भागे।

दिनान मोर घम "एक अपरिमिनु अतीम बनीन न उत्पन्न कठिनाई तो भयावह है। यह तो एक जरल्पनीय अवधारणा है कि हम एक अनन्न काल की रचना-साधना दे उत्तगधिकारी हैं, और यह भी कुछ कम अकल्पनीय अवधारणा नही है कि कभी का एना क्षमनी या ग्मिने पहले कोइ क्षण नहीं रहा। कार के प्रारम्न की यह पहली हम और भी अधिक परेशान करती यदि हमार और अमीम अतीत के बीच जाने वाली एक और कठिनाई ने हमे थमिभून न कर लिया होता। जगत के ह्रासमान होने और क्षीण होते जाने के तय्य का अन्ययन हम करते आ रहे हैं, यदि हमारे विचार इस सम्बघ म ठीक हैं ताकार प्रारम्भ से लेकर आज तक की अवधि के बीच मे कही-न-कही इस विश्व म नए सिर में चावी भरे जाने की कल्पना हमे करनी ही पडेगी। अतीत की आर दरावर वढने जाने पर मे एक एमा जगत मिलता है जिसम अधिकाधिक मात्रा म सगटन और व्यवस्था विद्यमान यो। यदि वीच ही में हम रोरने वाली काई वाधा न पडे तो हम एक ऐसे क्षण पर पहुंच जाएंगे जब इम जगत की ऊजा पूणत सगठित और व्यवस्थित थी और उसमे एक भी अनियमित तव नहा था। प्राकृतिक नियम की वतमान व्यवस्था के अधीन इससे भी आग अतीन की खोज सम्भव है । मेरे विचार से 'पूणत सगठित और व्यवस्थित पद एसा नही है जो सोपाधिक हो और समाधान मांगता हो । जिस व्यवस्था और सगठन से हमारा सम्बध है उसकी परिशुद्ध परिभाषा सम्भव है और एक एमा सीमा है जहा पहुंचने पर यह सगठन पूर्ण हो जाता है। उच्च और उच्चतर सगठन की कोई अनत शृखला नहीं है, और मेरे विचार से अन्तिम सीमा भी ऐसी नहीं है कि उस तक अधिकाधिप' मद गति से पहुंचा जा सके । पूण व्यवस्था अपूर्ण व्यवस्था की अपेक्षा क्षय से अधिक निरापद नहा होती। इसम कोई सदेह नहीं है कि पिछली तीन चौथाई पाताली के दौरान भौतिरी पी स्थापनामा में एक ऐमी तिथि की अभिधारणा है जिग दिन इग विश्व की मताएँ या तो उच्चतम ध्यवस्थित स्थिति में उत्पापी गइ या पिर पूर्व स्थित सत्तामा म उच्चतम व्यवस्था स्थापित पी गई, जिसे राय गेयर आज तर य सत्ताएं क्षीण करती आ रही हैं। और फिर, यह व्यवस्था गिरिभा म्प से गयोगमय नहीं है, बल्यि इमवा उल्टा है। यह व्यवस्था भारम्मिमा से घटिन हाने या चाज़ नहीं है। पापी रामय तक इशा उपयोगण अत्या आत्रामा भौतिवार विरुद्ध गर तय क प म दिया गया है । इस तथ्य ये पगारिय प्रमाण म दारा उप दिया गया है कि गप्टा ने रिगी-ग रिगी गाय गा गृष्टि म नभप दिया था, और यह गमप आज म ाा मा पर मही धज्ञानिक परिदृष्टि । इस बात का समयन नही कर रहा कि इसके आधार पर जल्दबाजी म कोई निक्प निकाले जाएं ! विज्ञानिया जोर धमशास्त्रिया दोना को ही इस अति सरल घमशास्त्रीय मिद्धात को, जो (उपयुक्त छदम वश म) आजक्ल ऊप्मा गतिविनान को प्रत्येक पाठय पुस्ता में पाया जाता है, कुछ कच्चा और शुद्ध ही मानना चाहिए कि कराडा वप पहरे ईश्वर ने इस भौतिक विश्व की चाबी भर दी थी और तब से इसे सयोग के सहारे छोड दिया है। इस सिद्धान्त का ऊप्मागनिविज्ञान को कामचलाऊ प्राक्कल्पना मानना चाहिए, उसके विश्वास की घोषणा नहीं। यह उन निष्कर्षो म स है जिनसे वच निकरने का कोई तक सगत उपाय हम नही दिखाई देता कमी इसम केवल यही है कि यह अविश्वम नीय है । एक विनानी के रूप में मैं इस बात पर पतई विश्वास नहीं करता पि जगत की यह वतमान व्यवस्था अचानक एकाएक शुरू हो गई अवनानिक रूप से मैं दैवी प्रकृति की निहित अनिरन्तरता का स्वीकार करने के लिए भी उसी प्रकार तैयार नही हूँ। किन्तु इस गतिरोध को समाप्त करन के सम्बध म भी मैं कोई सुयाव नही दे मक्ता ।' यह स्पष्ट है कि इस वक्तव्य म एडिग्टन ने यह अनुमिति नही प्रस्तुत की कि सप्टा ने मृष्टि रचना का कोई निश्चित काय क्यिा । एसा न करने का एकमात्र कारण यही है कि एडिंग्टन को यह विचार पसद नहीं है । जिस निष्कप को व अस्वीकार करते हैं उसको स्थापित करने वाला वनानिक तक उस तक की अपक्षा यही अधिक सबल है जा स्वतत्र सकल्प के समयन में प्रस्तुत किया जाता है क्यादि वह अनान पर आधारित है जबकि जिस तक पर हम इम समय विचार कर रहे हैं वह नान पर आधारित है । इमस यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि विनानवता लोग अपन विन से जो घमशास्त्रीय निप्वप निकालत हैं वे फेवर' उह आनद लेने वाल होते हैं और एम नही होत जिनसे हम पर जाना उनकी परम्परा निष्ठा के लिए कठिन हो, यद्यपि तक उन्हें एसा ही करत के लिए नादेश देना है । मेरे विचार से हम स्वीकार कर लेना चाहिए कि इस दृष्टिकोण के ममयन म बहुत-कुछ वहा जा सकता है कि किसी अनति जसी मित अतीत कार म इम विश्व का प्रारम्भ हुआ था, विनानी रोग जो दूसरे धम शास्त्रीय निजप स्वीकार करने के लिए हाल ही म हमार ऊपर दवाव डालने लगे हैं उनके पक्ष म इतना अधिक कुछ नहा कहा पा सरता। इम तक म एमी कोई निश्चपा मकना नहीं है जिसका निटान दिया जा सके। ऊप्मा गतिविनान का दुगरा नियम हर समय और हर स्यान म स य नहा भी मिद्ध हो साता, अथवा हमारा यह सोचना भी गात हो रामता है कि यह विव स्थानिक दृष्टि स सीमित है, किन्तु इस प्रकार के तर जसे होत हैं उगर अनु सार यह तक भी अच्छा है, और मेरे विचार से हम स्थायी रूप स इस विज्ञान और घम ६३ प्राक्कल्पना का स्वीकार कर लेना चाहिए दि रिमी निश्चित-यद्यपि अनात- ममय म इम विश्व का प्रारम्भ हुआ था। तो क्या इसम हम यह अनुमान करें कि इम जगत की रचना विमी सप्टा द्वारा की गई थी ? यति माय वनानिक अनुमिति के मामा य नियमा का स्वीकार करना है तो निश्चय ही म इम अनुमिति को स्वीकार नहीं कर मकन । ऐमा का कारण नहीं है जिम आधार पर यह कहा जाए कि इस विश्व का प्रारम्भ स्वत स्फून नहीं है केवर यह कुछ अदमन-मा लगता है कि यह विश्व म्वत स्फूत हो किन्तु प्रकृति का ऐमा कोई नियम नहीं है कि जा वातें हम अदभुत मालूम हा व कभी घटिन न हो । एक सप्टा या बना की अनुमिति करन का अय है एव कारण की अनुमिति करना, और बिनान मे कारणात्मा अनुमितियां वही स्वीकाय हैं जहां व प्रेषित कारणात्मक नियमा म उदभून हा । अनम्नित्य मे मृप्टि एक एमी घटना है जिसका प्रेषण नहीं किया गया। इसरिए दम जगत की मृप्टि एव सप्टा द्वारा की गई। मानन का कोद एमा कारण नहीं है जो इस कल्पना के पक्ष म रम जा मान वार कारण म अघिय सबर हो कि यह मृष्टि स्वत म्फून है । दोना ही उन कारणात्मक नियमा का ममान रूप से ग्वण्टन करत हैं जिनका हम प्रेपण वर सक्त हैं। जहा तव में समय सकता हूँ इस प्राकल्पना म भी कोई विशेष मावना नहीं मिलनी कि इम जगत की रचना एक मष्टा द्वारा की गई थी। एमा चाह हुआ हो और चाह न हुआ हा, जगत जो है है। यति काई व्यक्नि रद्दी गरात्र की एक बोतर आपर हाथा वचन की कागि वर ता केवल इतना बता दने स आप उम राव को अधिक पमद नहीं वरन रगगे कि वह अगूर के रग स न बनाई जारर एक प्रयोगगा। म बनाई गई गराव है। इसी प्रकार मुये इस कल्पना म काई सात्वना मिग्ती नहा रियाई देती कि अयल अप्रीनिकर विश्व विसी निश्चित प्रयाजन स बनाया गया था। कुछ रोग-जिनम एडिग्टन गामिर नहा है--इम विचार से मनोप ग्रहण करत है कि यदि ईश्वर ने इम जगत का बनाया है ता इसरे पूगन क्षीण हो जाने पर वह फिर दोबारा इमरी चाबी भर माना है । जहाँ तर मरा सम्बध है मेरी समा म नहा माता कि कोई अप्रौनिकर प्रक्रिया क्वर इस विचार से कम पम अप्रीतिकर हो पाती है कि वह अनन्न वार ता दाहराई जाती रहेगी। पिर भी सम सह नहीं कि मरे एमा मोचने का कारण मरे अन्र धामिक भावना की कमी है। इम विपप वा गुद बौदिन तक सार प म इस प्रकार रखा जा माता है सप्टा भौतिरी व नियमा का अनुगमन करने वाग है, या नहा यह भौतिरी व नियमो का पालन करन वाग नहीं है तो भौतिक प्रपच से ? यदि ।

वज्ञानिक परिदृष्टि उसको अनुमिति भी नहीं की जा सकती, क्याकि वाई भी भौतिक कारणात्मक नियम उसको स्थापना नहीं कर सकता, और यदि वह भौतिको र नियमा को स्वीकार करने वाला है तो हमे उप्मागतिविनान का दूसरा frयम उस पर लागू करना होगा और यह कल्पना करनी होगी वि क्सिी सुदर अतीत म उसकी भी रचना करनी पड़ी होगी। किन्तु ऐमी स्थिति म तो ईश्वर के अस्तित्व प्रयोजन की ही समाप्ति हो जाएगी। यह सचमुच एक अदभुत बात है वि केवल भौतिक विनानी ही नही, धमशास्त्री भी, जाधुनिक भौतिकी के तरों में कुछ नई बात उपलब्ध करते हुए प्रतीत हार है। शायद भौतिक विनानिया से घमशास्त्र का इतिहास जानने की लाशा बहुत कम की जा सकती है, किन्तु धमशास्त्रिया को तो इस बात का वोध होना ही चाहिए कि हम आधुनिक तर्को 4 प्रतिस्प इसके पहले भी मौजूद रहे हैं। जैसा कि हम देख चुके हैं, स्वतत्र सकल्प और मस्तिष्क सम्बधी एडिग्टन का तक बहुत कुछ देवात ये तक में समानार चलता है। जी सका तक तो प्लटो और बकरे के तमेवा मिश्र रूप है और भौनिकी म इसके लिए वसा ही कोई आधिकारिक प्रमाण नहीं है जसे इन दोनो नाशनिका के जमाने में नहीं था। पाटन इम तक को अत्यधिक स्पष्ट रूप म प्रस्तुत किया है कि इस जगत रा प्रारम्भ काल दृष्टि स निश्चय ही कभी-न-कभी हुआ होगा वितु काट ही उसी प्रवर प म इस तक को भी पश करते हैं कि काल दृष्टि से इस जगत का प्रारम्भ हुआ ही नहीं। हमारा युग तो नई सोजो और नए अवेषणा की बहुरता के कारण अहम्मय हो गया है किन्तु दान के क्षेत्र में अतीत युगो की अपेगा वह अपने आपको जितना अधिक प्रगतिशीर मानता है, वास्तव म उससे बहुत कम प्रगति कर पाया है। आजवर पुराने जमाने के भौतिकवाद के सम्बप में, और आधुनिक भौतिक विनानिया द्वारा उसके खण्डन म हम बहुत कुछ मुनते हैं । तथ्य तो यह है कि भौतिकी की तकनीक म एक परिवतन आ गया है। पुरान जमान म, दानिक लोग चाहे कुछ भी कहे, तकनीकी दृष्टि से भौतिकी इम मा यता वा कर चल्ती थो वि पदाथ ठोम लघु पिण्डा से बना हुआ है। लेकिन अब वह एमा नहीं करती। विन्त डेमोकाइटस के युग के बाद शायद किसी भी दानिक ने भी ठोस लघु पिण्डा पर विश्वास नहीं किया। वा और ह्य म न तो निश्चय ही नहीं दिया और न तीवनिज पाट और होगर ने मैव तो स्वयं एन भौतिक विनानी होते हुए, एक बित्तुल भिन्न सिद्धात की प्रतिष्ठा पर गए, और प्रपन विनानी जिस दानशास्त्र या तनिक भी सम्भव उपरथा, यह स्वीकार करने के लिए तैयार पा नि ठाम रघुपिण्ड एव तकनीकी युक्ति ने अरावा और कुछ नहीं थे। उग अय म तो भौतिकवाद मर चुरा है मितु एव दूमर और अधिर महत्त्वपूर्ण अय म वह पहा या अपना अधिन जीवन्त है। महत्वपूण विज्ञान और धम प्रश्न यह नहीं है कि पदाथ ठोस रघु पिण्डो का बना है, अथवा अय किसी चीज का, महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि प्रकृति की गतिविधि भौतिकी के नियमा द्वारा निर्धारित नियमित है या नहीं। जीव विज्ञान, शरीर त्रिया विनान और मनोविनान में हुई प्राति से अब पहले की अपेक्षा यह अधिक सम्भाव्य हो गया है वि सम्पूर्ण प्राकृतिक प्रपच का सचालन और नियमन भौनिकी के नियमों द्वारा हाना हो, और यही वात वास्तव में महत्वपूर्ण है। किन्तु इस बात को मिद्ध करने के लिए म उन रागो के कुछ कथना पर विचार करना होगा जो जावन के विनानो का विवेचन अध्ययन करते हैं। (४) विकासवादी घमशास्त्र-जब विकासवाद एक नया-नया सिद्धान्त था तब उसे धम का विरोधी माना जाता था और आज भी शुद्ध परम्परावादी उसे ऐसा ही मानते हैं । बिनु कुछ ऐसे समयका का एक सम्प्रदाय पदा हो गया है जो विवासवाद म धीरे धीरे युगा से प्रकट होती हुई एक दैवी योजना का प्रमाण देखना है । कुछ लोग इस योजना को स्थिति सप्टा के मन में मानते हैं और कुछ लोग इस योजना को जीवित अगिया के दुर्योध प्रयत्ला में निहित मानते हैं । पहले दृष्टिकोण के अनुसार हम रोग ईश्वर के प्रयोजनों की पूर्ति दरते हैं दूसरे दृष्टिकोण के अनुसार हम अपने ही प्रयोजनो की पूर्ति करते हैं, यद्यपि ये प्रयोजन, जैसा हम उन्हें जानते हैं उसकी अपेक्षा अधिक अच्छे हैं । अन्य अधिकार विवादग्रस्त प्रश्ना की तरह विकास की प्रयोजनशीलता का प्रश्न भी विवरणा के जजाल म उर गया है। काफी समय पहले जब हक्सले और “ल डस्टन ने 'नाइटीय सेंचुरी' के पृष्टो मे ईमाई धम के सत्य के सम्बध में विवाद चलाया था, तब यह महान प्रश्न इस ममस्या से उलझ गया था कि गडारिन गूकर किसी यहूदी का था या यहूदियो से भिन्न भय किसी का, क्यादि यदि वह विसी यहूनी का न होकर और रिसी का था तो उसकी हत्या मरना व्यक्तिगत सम्पनि में दखल देना या जो अनुचित था, विन्तु पर यहूदी का होने पर उसकी हत्या म ऐमो कोई आपत्ति न थी। इसी प्रकार विकास का प्रपोजन भी कुछ इस प्रकार का समस्याआ से उरझ जाता है जसे एमोपिय को आदतें, उन्ट दिए जाने पर समुनी अचिन का व्यवहार और ऐक्सौरोटल नाम सरोमृप की जलीय अपवा स्थलीय आते। वितु इस प्रकार के प्रश्न चूनि यहुन गम्भीर हैं इसलिए हम उह विशेषनाम लिए छोड़ सकते हैं। भौतिको से जीव विहान तर सत्रमण करते हुए इस बात का भान होता है वि स एव ब्रह्माण्डीय विषय से रिसी सकोण क्षेत्रीय विषय की जोर बड रहे हैं। भौतिकी और ज्योनिप र अध्ययन में हम व्यापक विश्व का अध्ययन परते हैं, ववर विश्व के उम काने का नहीं जिमम हम रह रहे हैं और न उसके उन पहलुना का जिनके उदाहरण हम स्वय हैं। ब्रह्माण्डीय -- । वज्ञानिक परिदृष्टि दृष्टिकोण से जीवन एक बहुत ही महत्वहीन तत्व है बहुत थोडे-से तारो के अपने ग्रह हैं और बहुत थोडे ग्रहो म जीवन की स्थिति सम्भव है। धरती पर भी धरातल के समीपस्थ द्रव्य के बहुत अल्प अनुपात म जीवन पाया जाता है । अपने अस्तित्व के अधिकाश अतीत काल में पृथ्वी इतनी अधिक गरम थी कि उस पर जीवन सम्भव ही न था अपने भावी अस्तित्व के अधिकार कार म वह इतनी ठडी रहेगी कि जीवन सम्भव न होगा। यह बात क्सिी प्रकार भी सम्भव नहा कही जा सकती कि इस समय धरती को छोडवर विश्व मे और कही जीवन का अस्तिव नहीं है कि तु यदि एक बहुत उदार अनुमान लगाकर हम यह भी मान रे कि अतरिक्ष में करीब एक लाख अय ग्रह एसे बिसरे है जिन पर जीवन का अस्तित्व है, तो भी यह स्वीकार करना ही पडेगा कि सम्पूण मृष्टि के प्रयोजन के रूप मे सजीव पदाय की सत्ता अत्यन्त प्रभावहीन प्रतीत हाती है । कुछ बूढे राग ऐसे हैं जिहे ऐसी रसहीन रूपी कहानिया सुनाने का शौक है जिनमे सतत 'कोई बात' प्रतिपादित की जाती है, अब किसी ऐसी कहानी की कल्पना कीजिए जो उन सव कहानिया से लम्बी हो जो आपने अब तक सुनी हैं किन्तु उमम प्रतिपादित की गई 'वात' सबसे छोटी हो, तो आपको जीव विज्ञा- निया के अनुसार कल्पित यष्टा के काय-कलाप की वापी सही तस्वीर का जदाजा लग जाएगा। और फिर प्रतिपादित की गई वात' मालूम होने पर इस योग्य नही लगती कि उसके लिए इतनी लम्बी प्रस्तावना बांधी जाए। मैं यह स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ कि लोमडी की पूछ मे भी कोई-न-कोइ गुण होता है, सारिका के गीत म अथवा आल्प्स पवतीय भेड के सीगो म भी काई गुण होता है। किन्तु विकासवादी धमशास्त्री गव के साथ जिन चीज़ा की ओर समेत करता है व ये चीजें नहीं हैं वह तो मनुष्य की आत्मा की ओर सात करता है। दुभाग्य की बात यह है कि ऐसा कोई निष्पक्ष पच नहीं है जो मनुष्य जाति के गुणो के बारे म फ्मला दे सके जहा तक मेरा सम्बध है मैं जब मनुष्य जाति द्वारा निर्मित विपली गमा को जीवाणु-युद्ध मम्बधी उनकी योजा को मनुष्य जाति के ओछेपन को, उमको निदयता और अत्याचारा यो वर विचार करता है तब इस गृष्टि के सर्वोत्तम रत्न व प म मैं उसे आभाहीन पाता हूँ। लेकिन इस बात को जान द । विकास की प्रक्रिया में क्या कोई ऐगी भा चीज़ है जो एष प्रयोजन की प्रावल्पना की अपेता रपती हो-प्रयाजन चाहे सहजात हा अथवा अनुभवा तीत? यह एक बडा ही महत्त्वपूण और निर्णायर प्रश्न है। जो स्वय जीव- विशानी नहीं है उसके लिए इस प्रश्न पर बिना हिचक कुछ वह सकना बहुत कठिन है। फिर भी प्रपोजन के समथन म जो तब मैंन देसे हैं उनम मैं कतई प्रभावित नहीं हुआ। 1 , विज्ञान और धम जोवा और पौधा का व्यवहार बुट मिगर कुछ ऐसा है जिसस कुछ निश्चित परिणाम निकरते हैं और प्रमण करने वाला जीव विनानी उन परि- गामा की व्याख्या उस व्यवहार के प्रयोजन के रुप में करता है । मन्में कम पौधा के मम्ब ध म तो सामान्यत जीव विज्ञानी यह स्वीकार करन के लिए तयार हैं कि इन जैव-सघटना को इस प्रयाजन की चेतन अवधारणा नहीं होती चिन्नु यदि वे इस उद्देश्य को खष्टा का उद्दश्य सिद्ध करना चाहत हैं तब तो यह स्वीकृति उनके लिए और भी अच्छी है। विन्नु फिर भी मैं यह नहीं ममन पाता कि यदि सप्टा ने वस्तुत उस सवत्री प्रायोजना बनाई है जो कुछ जैव जगत म घटिन होता है, ता इतन बुद्धिमान सप्टा को उन प्रयोजनो की क्या आवश्यकता है जो हम उमने मत्ये मढ़ रहे हैं और फिर वनानि वोच की प्राति से ऐमा काई प्रमाण नही मिना दि जीवित पदाथ का नियमन भौतिकी और रमायन शास्त्र के नियमा के अलावा और विमी चीज स क्यिा जाता हो । उदाहरण के लिए पाचन की प्रक्रिया का हो रीजिए। अनेर जीवा में इसका सावधानीपूर्वक अध्ययन किया गया है, विशेषपर मुर्गी ये बच्चा म नवज्ञान चूजा म एक प्रतिवान होता है जिस पावादाला बातार बाली हर चीज़ पर वे चाच चलात हैं। कुछ अनुभव वे वार इनका यह निरपाधि प्रति- वतन, पवलाव द्वारा अधीन पद्धति के अनुसार सोपाधिक प्रनिवतन मे बदर जाता है । टे बच्चाम भी यही बान देखी जा सकती है वे न केवल अपनी माता के स्तना को चूसन हैं बल्कि हर उम चीज का चूमने हैं जिसे चूमा जा मरना है , वे धा, हाथा यादि से भी भोजन पाने की वाशिकरल हैं। महीना के अनुभव के बार ही वे अपन प्रयना को स्तना त हो मोमित रखना मोष पान हैं। यह चूसन की आदत शिगुआ मे पहरे एक निस्पापित प्रतिवतन हो होती है, उम किसी प्रकार भी समझा-या प्रयत्न नहीं कहा जा सरता। इसवी सपना माता की चतुराई पर निभर करती है। बवाना और निगरना भी पह' निरुपाधिक प्रतिवान ही होते हैं यद्यपि अनुभव द्वारा वे सापाधिष बन जात हैं । पाचन की विभिन स्थिनिया म भाजन जिन रामायनिक प्रत्रियाआ स गुजरता है उनका मूम अध्ययन किया गया है और उनम मे विसी ये रिए भी मिमी विनिष्ट तावित मिदान की आवश्यकता नहीं प्रतीन हुई । एक मरा उगहरण में जनन प्रक्रिया का, जो सम्पूण प्राणिजगत म मदव्यापर न होत हुए भी उसको सवायर मनोरजर विशिष्टनाआ म म है। इम प्रतिया म अब ऐमा कुछ भी नहीं रह गया ग सही बयों म रहस्यात्मक कहा जा सके। मेरा यह मताद नहीं है कि इस प्रक्रिया का पूणत भगभांति ममया जा चुका है मेरा मतलब यह है कि यानिक निधान्ता ने इम इतना अधिर स्पष्ट कर दिया है कि उपयुक्त समय मिलने पर इसकी पूर्ण व्याया यज्ञानिक परिदृष्टि दृष्टिकोण से जीवन एक बहुत ही महत्त्वहीन तत्व है बहुत थोडेन्मे तारा के अपने ग्रह हैं और बहुत थारे ग्रहा म जीवन की स्थिति मम्भव है। धरती पर भी धरातल के समीपस्थ द्रव्य के बहुत अल्प अनुपात म जीवन पाया जाता है । अपन अस्तित्व के अधिकाश अतीत काल म पृथ्वी इतनी अधिक गरम थी रि उस पर जीवन सम्भव ही न था, अपने भावी अस्तिव के अधिकार काल म वह इतनी ठडी रहगी कि जीवन सम्भव न होगा । यह बात क्मिी प्रभार भी सम्भव नहीं कही जा सकती कि इस समय धरती को छोडवर विश्व म और पहा जीवन का अस्तिव नही है कि यदि एक बहुत उदार अनुमान लगाकर हम यह भी मारें कि अतरिक्ष म करीव एक लाख अय ग्रह पसे विखरे हैं जिन पर जीवन का अस्तित्व है, तो भी यह स्वीकार करना ही पड़ेगा वि सम्पूण मृष्टि के प्रयोजन के स्प म सजीव पदाय को सत्ता अत्यात प्रभावहीन प्रतीत होती है । कुछ बूढे लाग एसे हैं जिह एमी रसहीन रूखी कहानियों सुनान वा शोर है जिनम अतत 'कोई बात' प्रतिपादित की जाती है, अव क्सिी एसी कहानी की व पना कीजिए जो उन सब बहानिया से रम्बी हो जो आपने अब तक सुनी हैं किन्तु उसमे प्रतिपारित की गई 'चात सबसे छोटी हो, तो आपको जीव विना- निया के अनुसार परिपत सप्टा के काय-बलाप की पापी सही तस्वीर का अदाजा लग जाएगा। और फिर, प्रतिपादित की गई वात' मालूम होने पर इस योग्य नही रगती दि उसके लिए इतनी गम्बी प्रस्तावना बांधी जाए। मैं यह स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ कि रामडो की पूछ म भी कोई-न-वाई गुण होता है, सारिखा गीत म अथवा आल्प्स पवनीय भेड के सीगाम भी कोई गुण होता है । किन्तु विकासवादी घमशास्त्री गव के साथ जिन चीज़ा की ओर सवेत करता है वे य चीजें नहा है वह तो मनुष्य की आत्मा की आर समेत करता है । दुर्भाग्य की बात यह है कि सा पोई निष्पक्ष पच नहीं है जो मनुष्य जाति के गुणा के बारे म पसरा दे सके जहां तक मरा सम्बध है, मैं जव मनुष्य जाति द्वारा निर्मित विपैरी गैमा को जीवाणु-युद्ध सम्बयो उनकी मोजा का मनुष्य जाति में आछपन को, उसकी निदयता और अत्याचारो को वर विचार करता है तब इस गृष्टि के सर्वोत्तम रत्न म प म मैं उस आभाहीन पाता हूँ। रेविन इस बात को जाने दें। विरास की प्रक्रिया में क्या पोई एसी भा चीज है जो एक प्रयोन की प्राक पना की अपेता रखती हो-प्रयोजन चाह महगात हा अयवा अनुभवा तीत' यह एष बडा ही महत्त्वपूण और निर्णायक प्रश्न है। जो रवय जीव- विमानो नहीं है उसरे लिए इस प्रश्न पर पिना हिचव कुछ कह गाना बहा पटिर है। फिर भी प्रयोजन के ममथन म जो तब मैंने देखे हैं उस में यतई प्रभावित नहीं हुआ।

विज्ञान और घम जीवो और पौधा का व्यवहार कुल मिलाकर कुछ ऐसा है जिसमे कुछ निश्चित परिणाम निकलते हैं और प्रेक्षण करने वाला जीव विनानी उन परि- णामो की व्यारया उस व्यवहार के प्रयोजन के रूप में करता है । कम-स कम पौधो के सम्बन्ध में तो सामा यत जीव विनानी यह स्वीकार करन के लिए तयार हैं कि इन जव-संघटनो को इस प्रयोजन की चेतन अवधारणा नही होती, किन्तु यदि वे इस उद्देश्य को सप्टा का उद्देश्य सिद्ध करना चाहते हैं तब तो यह रवीकृति उनके रिए और भी अच्छी है। किन्तु फिर भी मैं यह नहा समझ पाता कि यदि सप्टा ने वस्तुत उस सवको प्रायोजना बनाई है जो कुछ जंव- जगत म घटित होता है तो इतन बुद्धिमान स्रष्टा को उन प्रयोजनो की क्या आवश्यकता है जो हम उसके मत्ये मढ रहे हैं ? और फिर वनानिक बोध की प्रगति से ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता कि जीवित पदाय का नियमन भौतिकी और रसायन शास्त्र के नियमा के अलावा और किसी चीज़ से किया जाता हा। उदाहरण के लिए, पाचन की प्रक्रिया को ही लीजिए। अनेक जीवो में इसका सावधानीपूर्वक अध्ययन किया गया है, विशेषकर मुर्गी के बच्चा म, नवजात पूजा म एक प्रतिवतन होता है जिसके कारण खाद्यान्ना के आकार वाली हर चीज़ पर वे चाच चलाते हैं। कुछ अनुभव के बाद इनका यह निरुपाधिक प्रति- वतन, पवराव द्वारा अधीत पद्धति के अनुसार सोपाधिक प्रतिवतन मे बदल जाता है । छोटे बच्चा में भी यही यात देखी जा सकती है वे न केवल अपनी माता स्तना को चूसत है बल्कि हर उस चीज़ को चूसते हैं जिसे चूसा जा सकता है , धो, हायो आदि से भी भोजन पाने की कोशिश करते हैं। महाना के अनुभव के बाद ही वे अपने प्रपत्नो को स्तना तक ही सामित रखना सीख पाते हैं। यह चूसने की आदत शिशुआ म पहले एक निरपाधिक प्रनिवतुन ही हाती है उस किसी प्रकार भी समझा झायू प्रयत्न नहीं कहा जा मुक्ता। इसकी सफरता माता की चतुराई पर निभर करती है। चबाना और नि लन भी पहले निस्पापित प्रतिवतन ही होते हैं यद्यपि अनुभव द्वारा दन पत्र बन जाते हैं । पाचन की विभिन स्थिनिया म भाजन जिन गमावनिक से गुजरता है उनका मूग्म अध्ययन किया गया है और न भी किसी विशिष्ट तात्विक सिद्धान का यावा खानों एक दूमरा उदाहरण जनन प्रकिागगन सवव्यापर न होत हुए भी उमी मवाशि- इस प्रतिया म अब ऐमा दुष्ट मा नहाय-* वहा जा सके। मेरा यह मददी- समाना जा चुका है, मरा ? भन्ने ना अधिर स्पष्ट पर यिा* -- .

वज्ञानिक परिदृष्टि प्रस्तुत करना सम्भव हो गया है । बीस वप से कुछ अधिक हुए, जब जैक्स लोएव ने शुक्राणु के बिना भी डिम्ब म गर्भाधान कराने का तरीका खोज निकाला था। अपने प्रयोगा तया अयशोधको ये प्रयोगों से उपलघ परिणामो को उहाने एक वाक्य मे सूत्र स्पअभिव्यक्ति दा है 'जत हम यह कह सकते है कि कुछ विशिष्ट भौतिक रासायनिक अधिकरणा द्वारा शुक्राणु के विकासमूलक प्रभाव की पूर्ण अनुवृति सम्पन हो चुकी है।" फिर आनुवशिकता के प्रश्न को लीजिए, जो प्रजनन वे प्रश्न के साथ घनिष्ठ रूप से सम्बधित है। इस विषय के सम्बध म वनानिर मान की वतमान स्थिति का चित्रण प्रोफेसर हॉवेन ने अपनी पुस्तक 'नि नेवर आफ लिविंग मैटर' म बडो क्षमता के साथ किया है विशेपवर पंतवता के सम्बध म परमाण्विक प्टिकोण का विवचन बरन वाले अध्याय म। इस अध्याय म पाठर मेण्डरीय सिद्धान, गुणमूत्रा, उत्परिवर्ती गुणसूत्रो जादि के सम्बंध में वह सब पान प्राप्त कर सकता है जो एक सामाय पाठन को मालूम हाना चाहिए । इन विपया पर जितना नान आज हमे प्राप्त है उसे देखते हुए मरी समय म नही आता वि आज कसे कोई व्यक्ति यह दावा कर मक्ता है कि आनुवशिरता के सिद्धात में कोई एमी भी चीज है जिसके कारण हम किसी रहस्य के सामने अपनी पराजय स्वीकार करना आवश्यक हो। भ्रूण दिनान की प्रायोगिक अवस्था तो अभी प्रारम्भ नहीं हुई है फिर भी उसने महत्त्वपूर्ण परिणाम उपर प किए हैं उसने मिद्ध कर दिया है कि जीव सम्बधी जो अभिधारणा अभी तक जीव विज्ञान पर हावी थी वह उतनी नहीं है जितनी समती जाती थी। विसी मैराम डर टेडपोल की आंख विसी दूसर के सिर पर लगा देना प्रायोगिक भ्रूण विनान के लिए जब एव मामूली बात हो गई है। पांच परा वाले और दो सिरा वाले जन स्थलचरा का अब प्रयोगशाला म उत्पादन किया जाता है। मितु पाटर कह सकता है कि यह सब तो क्वल शरीर से सम्बन्धित है मन के सम्बध में हम क्या कह सकते हैं ? यह प्रश्न इतना आसान नहीं है। इसका विवेचन हम पगुआ से प्रारम्भ करें हम कह सक्त हैं पि पशुओं की मानसिम प्रक्रियाएँ विल्कुल प्राकाल्पित हैं और पशुओ के सम्बध म वजानिक विवेचन उनके व्यवहार और उनको शारीरिक प्रवियानो तर ही सीमित रमना होगा, पाकि वचल रही का प्रेशण किया जा सकता है । मरा यह मतलब नही है कि पशुओ म मन की स्थिति का ही हम अस्वीकार पर दें मरा तात्पय देव इतना ही है कि जहाँ तप हमार वनानिक होने का समय है. हम पशुआ म । देसिए, मिनिस्टिक वासेपान मोर सा', १९१२, पृष्ठ ११॥ २ देखिए, दागन की पूर्व उल्लिपित पुस्तक, पृष्ठ ११ ।

विज्ञान और घम 88 मन की स्थिति के पक्ष या विपथ म कुछ भी नही कहना चाहिए । तथ्य तो यह है कि जहा तक उनके शारीरिक व्यवहार का सम्बध है वह कारणात्मक दृष्टि स स्वत पूण मालूम होता है, अथात उस व्यवहार की व्याख्या के लिए कही भी क्सिी अप्रेक्षणीय सत्ता को बीच मे लाने की आवश्यक्ता नही पडती जिसे हम मन कह सकें। पशुओ के व्यवहार को व्याख्या करने के लिए पहले जिन मामले में मानसिक कारणता अनिवाय समझी जाती थी उन सभी मामले की सनोप जनक व्याख्या करने मे सोपाधिक प्रतिवतन का मिद्धात सफल पाया गया है । किसी वाह्य अभिकरण अर्थात मन के प्रभाव को स्वीकार किए बिना ही मनुष्या के शारीरिक व्यवहार की व्याया करन म भी हम समथ हैं । विन्तु मनुष्या सम्बध म इस क्थन की यथाथता पर अधिक सदेह किया जा सकता है कुछ तो इस कारण कि मनुप्या का व्यवहार अधिक जटिर होता है, और कुछ इस कारण कि अन्तदान के आधार पर हम यह जानते हैं, अयवा एसा सोचते हैं कि जानते हैं कि हमारे मन है । इसमे कोई संदेह नहीं कि अपने सम्बध म हमे कुछ ऐमा ज्ञान अवश्य है जिसे सामा यत हम यह कहकर प्रकट करते हैं कि हमार मन है रितु जैसा अक्सर होता है, कुछ जानत हुए भी यह कहना बहुत कठिन है कि हम क्या जानते हैं। विशेप रूप से यह सिद्ध करना कटिन है कि हमारे गारीरिक व्यवहार के कारण शुद्ध शारीरिक या भौतिक कारण नही हैं। अन्नदान से एसा प्रतीत होता है जसे मानो कोई एसी चीज़ है जिसे सकल्प कहते हैं और जो उन कार्यों, गतिविधिया का कारण है जिहें हम स्वैच्छिक कहते हैं । फिर भी यह बिल्कुल सम्भव है कि इस प्रकार की गतिविधियो के शारीरिक वारणा को एक सम्पूण शृखला हो और मक्ल्प (वह चाहे जो कुछ हो) इस कारण शृखला का सहवर्ती मात्र हो। अथवा, गायद यह भी हो सकता है कि जिरें हम अपन विचार कह्न हैं व उन भावयिया के अवयव हा जिह भौतिकी ने द्रव्य-मम्बधी पुरानी अवधारणा के स्थान पर प्रतिष्ठित क्यिा है, क्याकि पुरान अर्थों म स्वीकृत द्रय अब भौतिकी की विषयवस्तु नहीं रह गया । मन और द्रव्य का देव अब एक पुरानी कल्पना हा चुकी है द्रव्य बहुत-कुछ मन जैसा हो चुका है और मन बहुत-चुछ द्रव्य जैसा हो चुका है, जो विनान की प्रारम्भिक अवस्था म सम्भव नही प्रतीत होता था। अब ता यह क्ल्पना करनी पहनी है कि वास्तव म जिस चीज़ का अस्तित्व है वह पुराने ज़मान के भौतिक वाद के बिग्यिड गेंटा और पुराने मनोविनान म स्वीकृन यात्मा के बीच को कोई चीज़ है। फिर भा इस सम्बध म एक महत्त्वपूण विभेट करना ही है। एक ओर ता यह प्रश्न है कि यह ससार क्सि प्रसर को वस्तु से बना हुआ है और दूमरी ओर उसके कारणामक काल का प्रश्न है। अपन उन्भव-कार स ही विनान एवं वज्ञानिक परिदृष्टि शक्ति मूक विचारणा रहा है (पद्यपि प्रारम्भ मे उसका स्वरूप अन यत ऐसा नही रहा) अर्थात् वह उस शक्ति को समयने में प्रयत्नशील रहा है जो हमारी प्रेक्ष्य प्रक्रिया या कारण है न कि उन प्रक्रियाओ के अशी अवयवों का दिलेपण करने म । ऐमा लगता है कि भौतिकी को अत्यत भावगूक्ष्म योजना इम जगत का कारणात्मक ककाल प्रस्तुत करती है और इस जगत का पदाथ रुप समद्ध करने वाले रगो, उसकी विविधता और व्यक्तित्वो को बिल्कुल छोड देती है। भौतिकी द्वारा प्रस्तुत किए गए कारणात्मक कार को मानव शरीर के व्यवहार का नियमन करने वाले कारणात्मक नियमा के निधारण म सिद्धातन पयाप्त मानने का अर्थ यह नही है कि हम इस कोरी भावसूभ्भता को भानव मन को मानवस्तुआ के सम्बध मे अथवा जिसे हम द्रव्य मानते हैं उसके वास्तविक संघटन के सम्बप मे, कुछ भी बताने में सक्षम मानते हैं। पुराने जमाने के भौतिकवाद के विलियड गेंत इतने अधिक मूत और सवेद्य थे कि उह आधुनिक भौतिकी म स्वीकृत नही किया जा सकता था किंतु यही बात हमारे विचारो के सम्बध में भी सत्य है। जगत की इन कारणात्मद प्रत्रिया वा अवेपण करते समय वास्तविक जगत की यह मूत विविधता बहुत कुछ अप्रासगिन प्रतात होती है। एक उदाहरण ले लीवर सम्ब धी. सिद्धात बहुत हा मरर और आसानी से समझा जा सकन वाला है। यह आलमत्र, बल और प्रतिरोध की आपेक्षिक स्थितिया पर ही निभर करता है । हो सकता है कि प्रयुक्त रोवर एक प्रतिभाशाली चित्रकार द्वारा बनाय गए अनुपम चित्रा से आहत हो भले ही ये चित्र लोवर के यात्रिय गुण धर्मों की दृष्टि की अपेक्षा भावात्मा दष्टि में बहत अधिक महत्त्वपूण हा फिर भी इन गुण रमों पर उनका विमी प्रसार भी कोई प्रभाव नहीं पडना और सीवर द्वारा दिए जाने वाले पाय के विवरण म दह बिल्कुल छोडा जा सकता है । यही बात इस जगत पर भी लागू होती है। जैमा हम निवाई देता है उस प म यह जगत अपरिमित विविधताओ स समृद्ध है उसका कुछ ना सुदर है, कुछ ना कुम्प है, कुछ आ हम मला प्रतीत होता है और कुछ अप बुरा। गितु वस्तुआ के गुदारणाम गुण धौ गे इन चीजा का कोई सम्बध नहीं है, और विनान का सम्बध इही गुण धर्मों से है । मैं यह नहीं कह रहा कि यदि इन गुण धर्मों का पूरागरा पान हम हो जाए तो हम इस जगत का भी पूण पान प्राप्त हो जाएगा क्योंकि जगत् मून विविधना भी नान वा उतना ही उपयुक्त और माय विषय है । मरे वन का तात्पय यह है कि जिान एक ऐसा नान है जो हम धारणात्म बोध दता है और सम्भवत इस प्रकार का पान जय पिण्डा के सम्बन्ध में भी, उन भोनिय और रासायनिक गुण धर्मा के अलावा अय किसी बात का विचार न परने पर ही पूर्णत प्राप्त किया जा सकता है। बस, ऐसा पहले म हम उसरा पर जा रहे - विज्ञान भौर पम १०१ हैं जो आज निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है, कितु आधुनिक समय म शरीर- क्रिया विनान, जीव रमायन, भ्रूण विज्ञान और सवेन की याविकता आदि के सम्बध मे जितनी माज की जा चुका है, उसमे हमारे इस निष्कप की सत्यना अनिवायत सिद्ध होती है। एक धार्मिक भावना वाले जीव विनानी के दृष्टिकोण का एक सर्वोत्तम प्रतिपान्न रायड मागन की पुस्तक 'इमर्जेंट एवोल्यूशन' (१९२३) और 'लाइफ माइड एण्ड स्पिरिट' (१९२६) म देखा जा सकता है । सायद मागन का विश्वास है कि विकास प्रम म एक दवी प्रयाजन निहित है, विशेषकर जिसे वह उदगामी विकास' करत हैं उमम । यदि मैं टीक-ठीक समझ सका हूँ तो उदगामी विकास की परिभाषा कुछ इस प्रकार की है कभी-कभी ऐसा होता है कि एक विगिप्ट उपयुक्त प्रकार से व्यवस्थित विय गए पदार्थों का सकरन एक एम नवान गुण घम को धररता है जो एक्ल रूप म उन पदार्यों को उपलर नहीं हाता और, जहाँ तक हम ममझ सकते हैं, उन पदार्थों के पृथक्-पृयक गुण- धर्मों से तया जिस प्रकार व व्यवस्थित किये गए हैं उसस भी जिसका निगमन नहीं किया जा सकता । मागन का विचार है कि यजव जगत में भी इसी प्रकार के उदाहरण हैं। यदि मैं रायड मागन को ठीक-ठीक समझ सका हूँ तो परमाण, अणु और क्रिस्टर-सभी म एम गुण घम हैं जि है वह इन घटका के गुण धर्मों स निगम्य नही मानत । उच्चकोटि की जव सघटनामा के बारे म भी यह यात रागू होती है, और सबसे अधिर उन उच्च कोटि के जीवा पर जिह मन कही जाने वाली चीज ही उपर ध है । मागन का करना है कि हमारे मन, बेशक, भौतिक संघटना से सम्र्वा घत हैं, रितु उस सघटना के गुण धर्मों से, जिमे पूय म परमाणुआ की एक व्यवस्या माना जा सकता है, हमार मन का निगमन नहीं दिया जा सस्ता । उनका कहना है-"उदगामी विकास आदि में अन्त तक उमकी अभिव्यक्ति है जिम में दवी प्रयोजन कहता हूँ।' वह फिर कहत हैं- 'हमम स कुछ लोग, और मैं तो निश्चित रूप स, सक्रियता को उम धारणा को म्वीकार कर सतुष्ट हा जान है जो इस दवी प्रयोजन का बा और अग मानती है।' पिन फिर भी पाप दवी प्रयोजन की अभिव्यक्ति म सहायक नहा है (पप्ठ २८८)। यदि इस दृष्टिकोण में समयन म कुछ तर भी प्रस्तुत किय गए हात तो इममा विवचन परना यासान होता, किन्तु जहाँ तक मैं प्राफेसर रायड मागन की पुस्तक को समय सका है, २ एसा मानते हैं कि यह सिद्धान्त स्वय ही अपना स्वीकृति का तक है और देवर अकरमदी को प्रभावित करने के लिए १ उदारप के लिए देखिए, 'दि रेसिस मोफ मे मेरान', लबाझोपन १६८ १०२ वजानिए परिदृष्टि उसे सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है। मैं इस नान या दावा तो नही वर सक्ता पि प्राफेसर पड़ मागन की गय गलत है। मैं तो इसके विरोध म पेवल इतना जानता हूँ कि एसी एक अनत गक्ति-सम्पन सत्ता हो सकती है जिसे यह पसद हो कि छोटे छोटे बच्चे तत्रिवाशोय या मैनिनजाइटिस की चीमागे से मर और युडढे राग कमर स य घटनाएं आए दिन होता रहती हैं। और विकास के परिणामस्वरुप होती रहती हैं। इसलिए यदि विकास में कोई दवी योजना निहित है तो य घटनाएं भी निश्चित रूप से सुनियोजित होगी। मुझे ऐमा भी बताया गया है कि ये सभी यातनाएँ पाप से शुद्धि के लिए मनुष्य का भुगतनी पडती हैं, किन्तु यह सोचना मेर लिए जरा मुश्विर पड रहा है कि चार या पांच वप का बच्चा अयाय और अपराध व इतने गहरे गत म गिरा हुआ हो सकता है कि वह उस दण्ड का पात्र बन जाए जो तमाम वन्चा का भुगतना पड़ता है जिह हमारे ये आशावादी धार्मिक सत किसी भी दिन बच्चा के अरपताल में जाकर भोगते हुए देख सकते हैं, बातें कि यह दय देवना उह पसद हो। और फिर मुझे यह भी बताया गया है कि हो सकता है इन बच्चो ने कोई बहुत गहरा पाप स्वय न क्यिा हो, फिर भी अपने माता पिता की दुष्टता के कारण हो उह य यातनाएं भोगनी पडती हैं । मैं देवर इतना ही कह सकता हूँ रि यदि यही याय को दवा भावना है तो वह मरी भावना से मिन है, और मैं अपनी याय भावना को इस याप भावना से श्रेष्ठलर मानना हूँ। जिस जगत में हम रह रहे हैं वह यदि मचमुच किमा एक निश्चित योजना के अनुसार निर्मित हुआ है तो फिर इस योजना के निमाना की तुलना में जीरो को हम एक सात मानना पड़ेगा। लेकिन सौभाग्य की बात है कि दवी प्रयोजन का कोई प्रमाण है ही नही, कम से कम इस तथ्य से कि देवी प्रयोजन म विश्वास करने वाला द्वारा एसा कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं दिया गया यही निष्कम निवालजा सरना है। इसलिए उस अवा करीव निधासा का अभिवति को अपनाने से हम वध जात हैं जो अन्यथा प्रत्ये बौरव और मानवीय गुण-सम्पन व्यक्ति को ऐसे सवाक्तिमान अत्याचारी विरुद्ध अपनानी पडती। इम अध्याय में हमने धम के परम प्रस्तुत किये गए प्रसिद्ध विनानियो थे विभिातों की समीक्षा की है। हमन दसा वि एडिग्टन और जीसन दूसरे का गण्डन करा है और दानो मिल्वर जीव वैज्ञानिक धमनास्त्रिया का खण्डन परत हैं जितु य सभा इस बात म एकमत हैं कि धामि तरिना सौरता के सम्मुख विको पराजय म्वीवार पर हर जाना चाहिए। इस अभिननि यो य रोग और दशा प्रामा, पट्टर ताशुद्धिवाद की अपेमा अधिर आशावादी मानत हैं। वितु वस्तुत वा विल्दुल इमयी उटी है-यह अभि ति निर साह और विमा या परिणाम है। जमाना था जब धम विज्ञान और घम पर लोग तहदिल से और पूरे जोश-वरो के साथ विश्वास करते थे, जब लोग धार्मिक युद्धो मे भाग लेते थे और अपने विश्वासा की कट्टरता और गहनता के कारण एक दूसरे को जिंदा जला देते थे । धार्मिक युद्धो के वाद धीरे धीरे धम शास्त्र का यह आत्यतिक प्रभाव कम हो गया। उसके स्थान पर अभी तक अगर कोई चीज़ प्रतिष्ठित हो सकी है तो वह विनान ही है । अब हम विज्ञान के नाम पर उद्योगा म काति लाते हैं, पारिवारिक नतिकता की अवहलना करते हैं काली जातिया के लोगा को गुलाम बनाते हैं और विषैली गैसो स एक दूसरे को बडी कुशलता के साथ ध्वस करते हैं । विनान के ये जो प्रयोग उपयोग किए जा रहे है उनको कुछ विनानी लोग कतई पसद नही करते । भय और खेद के साथ व नान के गाघ के पथ से ही दूर भागने लगते हैं और पूवकालीन अध निश्वासा में गरण खोजते हैं । जसा कि प्रोफेसर हागवेन कहते हैं- 'विनान के क्षेत्र मे आजकल प्रचलित जो क्षमा याचना की प्रवृत्ति दिखाई देती है वह नई अभिधारणाजो के प्रयोग का तक्सगत परिणाम नही है। जिन परम्परागत विश्वासो के विरुद्ध विज्ञान विसी समय खुलकर सघप कर रहा था उही को पुन प्रतिष्ठित करने की आगा पर यह अभिवृत्ति आधारित है और यह आशा वनानिक खोजा का उपोत्पाद नहीं है। इसकी ज. युग की सामाजिक मन स्थिति मे है । यूरोप के राष्ट्रो ने पूरे पाच वप तक अपने पारस्परिक सम्बन्धो म तक्बुद्धि का प्रयोग करना बद रखा । बौद्धिक तटस्थता को निष्ठाहीनता माना गया । परम्परागत विश्वासा की आलोचना करना देशद्रोह समझा गया । दाशनिका और विनानियो ने कठोर यूथ निर्देश के सामने सिर झुका दिया । परम्परागत विश्वासो के साथ समयौता कर लेना अच्छी नागरिक्ता का सर्वोत्तम गुण यन गया। आधुनिक दानशास्त्र को आज भी उस बौद्धिक निरुत्साह के गत से बाहर निकलने का माग सोजना है जो विश्व युद्ध की विरा सत है।" पीछे की ओर लौट जाने से हमे अपनी कठिनाइया से मुक्ति नही मिलेगी। विनान से जा नई शक्ति हम मिली है उसका सही दिशाओ मे सचालन बाल कल्पनाआ ये आलस्यपूण पुनरावतन द्वारा सम्भव न होगा और भूलाधारा पे सम्बध म ही दानिक सापवाद हमारे पापकलापा की दुनिया म वनानिय तकनीक की प्रगति को रोकने मे समय न होगा। मनुष्य जाति को एव ऐरो दि वास को आवश्यकता है जो सवल, समय और सत्य हो, न कि योद और उत्साहहीन । विनान तत्वत पान की व्यवस्थित गाज व अरावा और कुछ नहीं है और पान अपने तात्विर स्पम मगरमय हो है-कुछ बुर राग उसरा चाहे १ देखिए बागदेन की पूर्व उल्लिखित पुस्ता, पृ० २८ ।

ববি বহিঃzি जितना दुरुपयोग करें। कान पर ही विश्वास सा वैठना मनुष्य की सर्वोत्तम क्षमता पर विश्वास खो देना होगा, और इसलिए म निस्सकोच इस बात को दोहराता हूँ कि एक कम विरसित युग के बचकाना सन्तोषा की बाज करने बाले भीर लोगा अपेक्षा दढ ताधुद्धिवादी का विश्वास अधिक अच्छा है उसका आशावाद अधिर पौरुपमय और दृढ है।

दूसरा माग वैज्ञानिक तकनीक

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छठा अध्याय वैज्ञानिक तकनीक का प्रारम्भ परम्परागत कलाना और दस्तकारिया नया वैनानिक तकनीक के बीच कोई स्पष्ट विभाजक रेखा नही खीची जा सकती। वनानिक तकनीक का तात्विक लक्षण है प्राकृतिक शक्तिया का ऐमा उपयोग जो नितात अप्रशिक्षित व्यक्ति के लिए स्पष्ट न हो। कुछ इच्छाओ की पूर्व कल्पना कर ली गई है-तोगा को आवश्यक्ता होती है भोजन की, सतान की, कपडो की, मकान की, मनोरजन की और या की । अप्रशिक्षित व्यक्ति इन चीजों को अत्यन्त आशिक रूप में ही उपल ध कर सकता है वनानिक ढग से साधन-सम्पन व्यक्ति इनको कही अधिक मात्रा म उपर थ कर सकता है। उदाहरण के लिए, सम्राट साइरस और एक आधुनिक अमरीकी करोडपति की तुलना करें। सम्राट साइरस आधुनिक पूजीपति की अपेक्षा शायद दो बाता मे श्रेष्ठ थे—उनके कपडे अधिक रोबीले थे, और उनकी पनिया की सख्या अधिक थी। पर साथ ही यह भी सम्भव है कि उनकी पत्निया के क्पडे इतने रोबीले नहीं थे जितने रोबीले आज के पूजीपति की पत्नी के कपडे हैं। आधुनिक पूजीपति की श्रेष्ठता का ही यह एक लक्षण है कि उसे अपने बरप्पन के प्रचार के लिए चमकीले आभरण नहा पह्नने पडते, उमकी ख्याति की चिता समाचारपत्रो को ही रहती है। मैं समयता हूँ कि मम्राट साइरस को उनके जीवन-काल म जानने वाले लोगो की संख्या शायद उस जन-समूह का शताश भी नहीं थी जो आज होलीवुड की पिसी अभिनेत्री- अभिनेता को जानते हैं। या को यह सवधित सम्भावना वनानिक तकनीक की देन है । यह विल्कुल स्पष्ट है कि मानवीय कामना के जिन अय विपया की चर्चा अभी ऊपर की गई है उन विपयो वा उपभोग एक निश्चित सन्तोप के माय कर सक्ने वाले रागा की सख्या आधुनिक तकनीक के कारण बहुत काफी बढ़ गई है । आज कार रखने वाले लोगो को सस्या डेढ सौ वप पहले पर्याप्त भोजन भी न पाने वाले लोगो की संख्या से कही अधिक है। सफाई और स्वास्थ्य- विनान की सहायता से वनानिर राय ने अपने यहां से प्लेग, टाइफम, बुग्वार तथा अप तमाम ऐसी बीमारिया का समाप्त कर दिया है जा पूर्व के देशों मे आज भी फ्री हुई हैं और पहले पश्चिमी यूरोप जिनम पीडित था। यदि व्यव- हार के आधार पर ही निणय दिया जाए तो सम्पूण मानव-जाति को-अथवा यज्ञानिक परिदृष्टि चम-स कम उसके अधिक ऊजस्वित अशा कीमवाधिक प्रवल इच्छा एक इच्छा अभी हाल ही तक अपनी सख्या में वृद्धि करने को रहा है। इस सम्बन्ध म विज्ञान असाधारण रूप में सफर सिद्ध हुआ है। यूरोपीय लागा की सन् १७०० की जनसरया की तुना आज को उनकी वाज सन्या से करें। सन १७०० म इग्रड का जनसस्या लगभग पचास राप थो, और अव लगभग चार कराड है । अन्य यूरोपीय देशो की जासच्या भी, मास का छोडकर सम्भ वत इसी अनुपात में बढ़ गई है। युरोपीय वगानुनम म उत्पन लोगा की जन सख्या आज लगभग ७२ करोड पचास राख है। इस वीर जय जातिया की जनसरया में बहुत कम वृद्धि हुई है । यह सही है कि इस सम्बध म सारे संसार म एक परिवतन आ रहा है। सवाधिक नानिक जातिया म अब जनसम्या की अधिक वृद्धि नहीं होती, और वस्तुन जनसख्या की तज अभिद्धि अब उही देना तक सीमित है जिनम सरकार तो वनानिक है किन्तु जन-समूह अवनानिक है। किन्तु यह स्थिति कुछ अत्यत हाल ही पे पारणो से पा हुई है जिन पर हम इम समय विचार नही करेंगे। वनानिक तकनीक का प्राचीनतम प्रारम्भ प्रागतिहामिक-चाल म हुआ था उदाहरण के लिए अग्नि का उपयाग पत्र-कसे प्रारम्भ हुआ कुछ नहा यद्यपि प्रारम्भिक युगो म जिस सावधानी के साथ पवित्र अग्नि की रक्षा राम तथा जय आदिकालीन सभ्य समाजाम की जाती थी, उसम यह पता चरता है कि अग्नि की उपधि उस समय बितनी कठिन थी। कृषि का प्रारम्भ भी प्रागनिहासिक है यद्यपि ऐतिहासिक कार के प्रारम्भ से बहुत अधिक पहले वृपि का प्रारम्भ गायद नही हुआ था। जानवरो का पालतू बनाना मुस्थत प्रागति हामि है किन्तु पूणत नहीं। कुछ आधिकारिक रेवा वे यनुसार पश्चिमी एगिया म घाडा का प्रयोग मुमरियन रागा वे समय प्रारम्भ हुआ, और जिन लागा न घोडों का उपयोग क्यिा उह युद्ध म उन सरोगा पर विजय मिली जो गधो का प्रयास करते थे। उम जलवायु वाले देशो मे लेखन-वला का प्रारम्भ वस्तुत इतिहास के प्रारम्भ के साथ ही हुआ है क्यापि मिय और यवीरगन म प्रारम्भिा अभिरेरा कम ऊण धरती वाल दगा की अपेणा बहुत अधिक समय ता सुरक्षित रह सकते हैं। वज्ञानिक तवनीव की प्रगनि म दूसरा महत्वता काम या धातु-बाय का जो एतिहासिक युग ये अदर ही हुआ है। वाइदिर म परिया के निर्माण के लिए गेह व प्रयाग का जो निषध किया गया है उसका कारण निश्चित स्पस यही है शिरोह का आविष्कार उस समय हार हो में हुआ था। प्रारम्भिा पार मगर नेपारियन ६ पनन तर सइया या निमा मुम्पत सामरिख कारणाम हो होता पाय-यह मामा यावा मम्बद्ध बनाए रखन के लिए गाय मत्यादरपर घी इस उद्देश्य म मका या मद्दव मालूम, वंज्ञानिक तरनीक का प्रारम्भ पढे-पहल पारस के लोगो के समय वढा और रोम के सम्राटा के समय सडको का पूरा-पूरा विकास हुआ । मध्यकालीन युगा म बारूद का और नाविक दिक- मूचा यत्र का प्रयोग प्रारम्भ हुआ, और मध्य युग के अन्त म मुद्रण-क्रा का आविष्कार हुआ। आधुनिक जीवन की व्यापक तकनीक से जो अभ्यस्त है उसके लिए यह सब कुछ बहुत महत्त्वपूर्ण नही प्रतीत होगा वितु आदिम मानव और बौद्धिक तथा कलात्मक सभ्यता के उच्चतम स्तर के बीच का अतर वस्तुत इन्ही सब बातो ने स्पष्ट किया । आज अपने इस युग म हम मगीनी सामाज्य के विरुद्ध विरोध प्राट करने तथा एक सरलतर जीवन को ओर वापस लौट जान की मुसर काम नाए यक्त करने के अभ्यस्त हो गए हैं। पर यह सब कोई नई बात नहीं है। कनफ्यूरियस के पूर्वगामी राओ-जे, जो छठी शताब्दी ई० पूर्व में जीवित थे (यदि सचमुच वह कभी थे भी), आधुनिक यात्रिक अवेपणा द्वारा प्राचीन सौदय के विनाग के सम्बध मे उतने ही अधिक मुखर थे जितने मुखर रस्किन रह हैं । सडका पुग और नावो को देखकर उनका मन भय और आतक से शुध हो जाता था क्योकि य सभी चीजें अप्राकृतिक थी। सगीत के विरोध मे उनका स्वर वसा ही था जसा आज के अनासक्त शिष्ट विद्वान लोगो का सिनेमा वे विरुद्ध रहता है । आधुनिक जीवन की त्वरा उह चिन्तनशील दृष्टिकोण के रिए घातक प्रतीत होती है। जब उनसे अधिक बर्दाश्त नहीं हो सका तब वे चीन छोडवर चले गए और पश्चिम के वबर लोगा के बीच जाकर गायव हो गए । उनका विश्वास था कि मनुष्य को प्रकृति के अनुकूर रहना चाहिए। यह ऐमा दृष्टिकोण है जो युगा से वरावर बार-बार जोर मार रहा है, यद्यपि हमेशा उसकी व्यारया कुछ भिन रूप में की गई है। प्रकृति की ओर वापस रोटन की धारणा पर रूमो को भी विश्वास या, रितु रूसो सहका, पुग और नावा के विरुद्ध कोई आपत्ति नहीं उठाते थे । उह तो न्यायालया, समृद्ध लोगा के कृत्रिम विलासा आदि पर माघ आता था। जिस प्रकार का व्यक्ति स्सो को प्रकृति या निर्गोप गुद्ध शिशु मालूम होता था वसा व्यक्ति लाओ-रजे की दृष्टि म अतीत वे निर्मेप मानव से अविश्वसनीय रूप म भिन प्रतीत होता। लामा-रजे को घोडा को पालतू बनाने और कुम्भकार तथा बढई की कलामा के विरुद्ध भी आपत्ति थी, सविन स्मो को तो बटई का काम ईमानदारी में की जान वाली मेलन का सारतत्व ही प्रतीत होता । व्यवहारत प्रवृति की ओर वापस लौटने' वा अय है उन स्थितिया की ओर लौट जाना जा सम्बधित पर की युवावस्या म उपप थी । यति प्रति की ओर वापस लौटन को वान वो पूरी गम्भीरता से अपनाया जाए तो उसका परिणाम सम्य दशा के लगभग १० प्रतिशत रोगा मा भूग मे तडप-नडपकर मर जाना होगा। इसम सटेर नहा कि आज जिस - वज्ञानिक परिदृष्टि स्थिति म उद्योगवाद है, उस स्थिति म उसने अनेक गम्भीर पठिनाइया उत्सन की हैं, किन्तु उन पठिनाइया का हर प्रकृति की आर वापस लौटने से नहीं प्राप्त हो सकता, जसे राओ जे में समय की चीन की मठिनाइयो का हर अयवा रूसो के समय के पास की कठिनाइयो का हर प्रकृति की ओर वापस लौटने से नहीं प्राप्त हो सकता था। १७वी और १८वीं शतादिया म ज्ञान के एम विनान की प्रगति बनी तेजी र माय हुई, पितु उत्पारन यी तकनोव पर उसका प्रभार १८ गतादी मम जन तक नही पडा। प्राचीन मिस्त्र में प्रति वाय पद्धनिया म सन् १७५० तर जो परिवतन हुए, वे उन परिवतना से कम है जो सन १७५० रा रेवर rr तय हुए है । कुछ याधारभून प्रगतियां बहुत धीरे धीर सम्पन हुई- मापा अगि, रूपन-क्ला, वृषि, जावरा का पालतू बनाना धातु-बाय, वारद मुणका, एक बहुत बड़े माम्राज्य की पिसी एम वेस शासन करने की कला नादि यद्यपि इस अतिम का वो आज की-मी पूर्णता तार और वाप्प इजिन के आविष्कार स पहले कभी नहीं प्राप्त हो सकी। य सभी प्रतियां बहुन धोर धीर सम्पन हुइ और इमरिए परम्परागत जीवन पद्धति म इनवा मल मन में काई अधिक हिनाई नही पदी और रोगामो कभी इस बात का बोध नहा हुभा दि उन दनिर जीवन की आदता म कोई शति हो गई है। जिन बाता के सम्म म काई वयस्क कुछ कहना चाहता था उन सबके माथ वह अपन बचपन मे ही परिचित हो जाता था और उगवे पहले उसने पिता और पितामह भा उन सबमे परिचित रहते थ। इसम सादह नहा कि इस स्थिति ५ कुछ शुभ प्रभाव भी पटत ये जो आधुनिक काल को तीव्र तकनीसरी प्रगान के सारण गेष्ट हो चुके हैं । यदि अपन समकालीन जीवन का वणन उन र म पर सक्त थे जो दोषारोन प्रयाग वे वारण अय-समृद्र तथा अतीत युगाव प्रतिष्ठित भावा द्वारा रंगीन बन चुवे होन 4। भाजार तो अवि यो दो ही विकल्प उपरध है ~या तो वह सामयिक जीवन की अवहलना कर अथवा फिर अपना वधिनाला म ऐस गदा को भरे जो रूक्ष और पठार हैं । कविता म एर पर बिना तो मम्भव है, वितु लोपोन पर कविता म बात करना कठिन है, यविता म लोनियामा हवामा का ध्वनि सुनन रहना सम्भव है, रितु रडिया का मुनना नहीं एप तज घोडे पर हवा का तरद गवारी करना तो सम्भव है रोक्न पिसी मोटरगाडी पर हवा म तेत्र चरना गम्भव नहीं। यदि वामना कर सकता है पसा यो ताकि उहकर अपनी प्रेपसी 4 पास जा गर, लितु एसा पना तब मूरतण मारम हाता है जब उम यर याद आ है fr वह एर हवाई जहाज का उपयाग इस पर सरना है। इमार मौन्य बाप पर विमान या प्रमान गम्पक पसे शेजना वज्ञानिक तकनीक का प्रारम्भ ही पटा है । मेरे विचार से इसका कारण विज्ञान का कोई तात्विक गुण नहीं है बलि तेजी के साथ परिवर्तित हान वाला पर्यावरण है जिसमे आज का मनुष्य जो रहा है । किन्तु अय श्रर्यों म विनान के प्रभाव क्हा अधिक गुम ही हुए हैं । यह एक आश्चय की बात है कि वनानिर नान के चरम तत्वमीमामीय मूल्य महव के सम्बघ म व्यक्त किए जान वाले सदहा का कोई भी प्रभाव उत्पादन की तकनीक-मम्बधी विनान की उपयोगिता पर विल्कुल नहीं पड़ता। वैनानिक पद्धति का बडा धनिष्ठ सम्बध मामाजिक सदगुण को निष्पक्षता स है। अपनी पुस्तक 'जजमट एण्ड रीनिंग इन दि चाइल्ड' म पायगेट न यह स्थापना की है नि तकना गस्ति सामाजिक भावना का फ है। उनका कहना है कि प्रत्यक वालक सवानिमत्ता व सपना के साथ जीवन प्रारम्भ करता है, जिसक अनुमार सभी तथ्य बच्चे की इच्छाओ के अनुरूप प्रतीत होते हैं। धीरे धीरे दूमरा के साय सम्पर होन पर उम बरबस यह अनुभूति हाती है कि दूसरा को इच्छाएँ उसकी अपनी इच्टाजा के विपरीत हो सकती हैं, और उसकी अपनी इच्छाएँ अनिदायत मत्य निर्धारण करने वाली नहीं होती। पापगट के अनुसार, तकना गक्ति का विकान एव एम सामाजिक सत्य की उपलधि कराने वाली पद्धति के रूप म होता है जिस पर सभी लोग महमत हो सकें। मरे विचार से यह गत बहुत-कुछ माय है और वनानिक पद्धति के एक बहुत बडे गुण पर जार देती है, वह गुण यह है कि वनानिक पद्धति उन विवाला को बचान का प्रयत्न करती है जो भ्यक्तिगत भावनाआ का मय को कमौटी मान रेने पर उत्पन होत हैं और जिनका कोई समाधान नहीं मिलता। वनानिक पद्धति के एक दूसरे पहल पर पायगट न ध्यान नहीं दिया, अयात इम पहर पर कि वना- निक पद्धनि पर्यावरण पर कुछ अधिकार गक्ति दे दनी है और पयावरण के अनुकर अपन-आपको बनाने की भी गति दे दती है । उगहरण लिए, मौसम का पूर्वानुमान कर सक्ने का क्षमता प्राप्त होना रामदायक हो सकता है, और यदि कोई व्यक्ति ऐसा पृवानुमान टोर टोक कर सकता है तो भले ही उनके बय सभा सायो गरती पर हा उस तो इसका लाम फिर भी होता ही है यद्यपि सय की एक नितान गुर सामाजिक परिभाषा के अनुसार हम उमी को गरत मानना पडगा । पयावरण पर अधिकार नक्ति प्राप्त करन को इम व्यावहारिक परीमा म अथवा पयावरण अनुदूर अपने आपको बना मकन को व्यावहारिक परीक्षा मजा मफरना मिली है, उमी ने विमान को इतना मान और गौरव दिया है । चीन के मम्रारा न बार-बार जेम्वाट पादरिया को मनान का दम महर इसीरिए नहीं उठाया कि ग्रहा। को तिपि वतान म जेस्वोट रोग मही सारित हात हे जति चीनी ज्यालिपी गरत साविन हात रह । मम्पूण आधुनिर जीवन विज्ञान वो इसी व्यावहारिक सफलता पर निमर है कम-से कम जहाँ तक वैज्ञानिक परिदृष्टि निर्जीव जगत का सम्बध है। अभी तक मनुष्य पर प्रत्यम प्रयोग करने के क्षेत्र मे विनान को कम सफलता मिली है, और इसीलिए जहां तक मनुष्य का सम्बन है आज भी परम्परागत विश्वासा द्वारा विज्ञान का विरोध दिया जाता है, किंतु इसमे कोई स दह नही किया जा सकता कि यदि हमारी यह सभ्यता कायम रहती है और आग बढती है तो मनुष्य पर भी बहुत जल्दी वैनानिक दृष्टिकोण से विचार किया जाने लगगा । शिक्षा पर और फौजदारी कानून पर इसका बहुत रडा प्रभाव पड़ेगा, नापद पारिवारिक जीवन पर भी प्रभाव पड़े। विन्तु ये बातें तो भविष्य के गम में हैं। बनानिक तकनीक की तात्विक नवीनता इस बात में है कि उसम प्रा- तिक दाक्तियो का उपयोग ऐस तरोको से किया जाता है जो अप्रतिभित दाक के लिए स्पष्ट नहीं होते बल्कि जिह अध्यवमायपूण शोघ द्वारा खाजा गया है। वाष्प का उपयोग, जो आधुनिक तकनार के प्रारम्भिक पदमो मे में है, मीमा रेखा पर माना जा सकता है क्योंकि कोई भी व्यक्ति केतली म उबरते हुए पानी को भाप की शनि देख सकता है, जैसा कि जेम्स बाट ने परम्परागत स्वीकृत कथन के अनुसार, सा था। विजली का प्रयो। इसम कहीं अधिक निश्चित रूप में वैज्ञानिक है। पुराने तरीके की पनचक्की म जर गावित का प्रयोग एक प्राक-वैज्ञानिक बाा है क्याकि उसकी सारी यात्रिर पिया विधि अप्र शिशित दार के लिए भी मिपुर स्पष्ट है किन्तु टर्वाइना द्वारा पल शक्ति रा आधुनिक प्रयोग वानिक है क्यादि इसस उत्पन प्रक्रिया उम व्यक्ति के गि नितात पाश्चयजनक है जिसे वनानिक भान न प्राप्त हो। स्पष्ट है कि पर म्परागत तकनीय और वज्ञानिय तपनीय बीच कोई स्पष्ट विभाजक रेखा नहीं है, और कोई भी यह नहीं कह सकता कि वहाँ पर एक की ममाप्ति और दूसरे का प्रारम्भ होता है। आमि युग र रिसान मानव शरीरावा उपयोग सात के लिए करत थे, और पल्पना करते थे दि इसरा आ चयजना पल्याण कारी प्रभाव होता है। निश्चित रूप से यह स्थिति प्रा वानिए युग की थी उसपे वाद प्राकृतिक खारा का जो प्रयाग प्रारम्भ हुमा और जो आज हमारे समय ना परता आ रहा है, उसका नियमन यदि सावधानीपूवर कारनिर रसायन शास्त्र अध्ययन द्वारा किया जाए तो वह वनानिय है किन्तु यति परम्परा के अशुमार ही वह चालू रहता अवनानिर है। कृषिम नाइट्रेटा का प्रयोग निश्चित म्प से बनानिष है पानि इसम उन रामापनिय प्रश्यिामाया उपयोग किया जाता है जिसकी उपधि पुगर रसायनास्त्रिया द्वारा दीप वारोन शोध के बाद हुई है। वैनानिय तपनीर की सवाधिर तावा विशिष्टता यह है कि उमरा उद्भव प्रयाग से हुआ है, परम्परा में नहीं। लधिया रोगा के लिए मन की - वज्ञानिक तकनीक का प्रारम्भ प्रायागिक वृत्ति उपल प कर पाना कुछ कठिन हाता है, सच तो यह है कि एक पीढी का विनान आने वाली दूसरी पीढी के रिए परम्परा बन जाता है और फिर भी अभी एमे व्यापर क्षेत्र पडे हैं, विशेषकर घम का क्षेत्र जिनम प्रायोगिक भावना की पैठ अभी तक हो ही नहीं सकी। फिर भी पूर्वकालान युगा के विरोध म याधुनिक युग की विशिष्टता यह प्रायोगिक भावना ही है और इसी भावना व कारण पिठल १५० वर्षों म अपन पयावरण पर मनुष्य की अधिकार-शक्ति पिछली सभ्यता की अपेथा अतुलनीय मात्रा म अधिक हो गई है।

मातवां अध्याय निर्जीव प्रकृति पर प्रयुक्त तकनीक अभी तक प्रायोगिक विनान की महानतम मफलताएँ भोनिया जोर रसायनशास्त्र क क्षेत्र म हुई हैं । लाग जव वनानिक तकनीक की बात माचत हैं तव मुख्यत देमगीना की बात मोचत हैं। यह सम्भव प्रतीत हाता है कि निकट भविष्य म हो जीव विना और गरोर क्रिया विनान के क्षेत्र म भी इसी प्रकार की सफलताएं विनान को प्राप्त होंगी और लोगा के मन मस्तिष्क का परिवर्तित करन की चमी ही शक्ति अन्तत दिनान को प्राप्त हा जाएगी जसो आज अपन निर्जीव पयावरण को परिवर्तित कर सक्न की प्राप्त है। फिर भी प्रस्तुत अध्याय म मैं विनान के जीव विनान सम्बधी प्रयोगा का विवेचन नहीं करेगा, बल्कि मनी नरी के क्षेत्र म विनान के प्रयोगा का विवचा करेगा जो कुछ घिर परिचित और घिसा पिटा विषय है। सवीण अर्यो म अधिकारी मशीनों में ऐमी कोई बात नहीं होती जिस दिनान कहा जा सर । प्रारम्भ म मगीन निर्जीव पाय द्वारा कुछ एसी नियमित गतिविधियां सम्पारित करान का साधन मात्र थी जिहें पहले मनुष्य अपन गरीर और विगेपर अपनी अगुलियो द्वारा सम्मानित करत थे। यह बात बताई जुनाद के क्षेत्र म दिप प स स्पष्ट है। र के आविष्कार म अथवा भाप के जहाजा की प्रारम्भिक अवस्था में कोई बहुत अधिक विनान निहित नहीं था। इन पत्रा म रोग जिन गस्तिया का प्रयोग कर रह ये व उन तरीका म बहुत गूढ स्पस गुप्त या अनात नही थी जा उनके लिए आश्चयजन न होन चाहिए थ यद्यपि लागा को उनमे पाश्चय हुआ। रविन विजरी की वात टमसे भिन है। एक व्यावहारिक विजरी मिस्त्री का एक नए दग का सामाय बुद्धि विकमिन परली होती है जो बिजरी का नान न रखन वार व्यक्ति को कतः प्राप्त नहीं होती। यह नए ढग का सामाय बुद्धि पूरी तरह म उम ज्ञान म निमित हाती है जिम विमान द्वारा खोजा गया है। जिस व्यक्ति ने अपना जीवन माघ-माद ग्रामीण वातावरण म तिाया हा वह यह तो जानता है शिकाई पागर मांड वया कर मरता है चिन्तु वह चाह जितना पुराना और चतुर बन जाए निर भी उम इस वान का नान नहीं हा सरता दिविजसरी की धारा क्या कर सकती है। औद्योगिर तानी । अनेर प्रयोजना म स एवं प्रपोजन मा यह रहा है 1 निर्जीव प्रकृति पर प्रयुक्त तकनीक ११५ दिमानवीय शक्ति के स्थान पर काय सम्पादन के लिए अय प्रकार की शक्ति का प्रयोग किया जाए । जानवर तो अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पूरी तरह अपनी पारीरिक शक्ति पर ही निभर करते हैं और यह कल्पना करनी पड़ती है कि आदिम मानव को भी इसी प्रकार निभा रहना पडा होगा। धीरे- धीरे जमे जसे मनुष्य को अधिक नान प्राप्त होता गया, चसे वसे अधिकाधिक मात्रा म वह इस प्रकार शक्ति स्रोतों को अपने वश में करता गया जिनके पयोग से उसरा परीरिक श्रम कम होता गया। क्मिी अनात अतीत कार मे क्सिी प्रतिभाशाली व्यक्ति ने पहिए का आविष्कार रिया और किसी दूमर प्रतिभाशा ने वल और घोड़े को इस प्रकार पारतू बना लिया कि उनसे इन पहिलो वा चलाने का काम लिया जा मा बगौर घोडो को पालतू बनाने वा काम बिजली को काम करने की अपेक्षा नहीं अधिक मुश्किल रहा होगा, किन्तु यह कठिनाई धीरज की थी, बुद्धिमानी की नहीं । 'अरेवियन नाइटस' भी पहानिया म मान वाले (जिनका तरह विजली भी उस व्यक्ति की मूक सेविका है जिसे उसका स्त्र ठीक-ठोक मारम हा) सूर्य को साग र सकना ही कठिन है, रेप सब तो आमान है। वर और घोडे ६ सम्बध म यह समय सक्ने के लिए किसी बड़े कोठी यावश्यकता नहीं थी कि दल और भोडे अपने शारी रिक बल से डा कार्या को अधिक प्रभावपूण ढग मे पर सस्त हैं कि मनुष्य अपने गारीरिक बल के सहारे कर रहा था वितु अपने मारिका की इच्छा के अनुसार काम करने के लिए बैल और घाडे को तैयार करने में बहुत काफी समय लगा होगा । कुछ ऐसे लोग भी है जो यह मानते हैं कि बला और पीडा को पात इसलिए बनाया गया जिनको पूजा की जानी यो उनकर व्यावहारिक उपयोग तो बाद म प्रारम्भ हुआ जब पुजारिया ने उन्हे पूरी तरह पारतू बना लिया था। यह सिद्धात मूग्न मम्भा प है क्यामि प्राय सभी महान प्रगतियो गा प्रारम्भ निरपेक्ष प्रयोजना से ही हुमा है । यतानिर खाजें उनकी उपयोगिता को ध्यान म रखार नहीं की गई वल्लि गाय काय येवर शोध के उद्देश्य से ही किये गए हैं और ज्ञान मी निरपे कामना और प्रीति से रहित कोई भी मानव जानि हमारी वनमान वनानिक तकनीक को कभी भी सपा पर सकी होनी । उहाण के लिए, विद्युत चुम्बकीय तरमा के निदान को हो , निम पर तार का तार आधारित है । सम्बधित वैनानिक नान का प्रारम्भ पराई गहुआ था जिहाने पहल महर प्रायोगिर ढग स वैधत घटना के समय मध्य वर्ती माध्यम सम्बध को सोज की थी। फराह पाई गणिता नहीं थे किन्नु उनके द्वारा उपग्ध परिणामावो गणिनीय परिया वयमकमर ने, मिहोने शुद्ध महातिक तरीका में इस बात को गोज की थी जि प्राग विद्युत चुम्बकीय तरगा रा निर्मित होता है । इस दिशा में दूसरा कदम उठाया हज न, जिहोंने धज्ञानिक परिदृष्टि - पहले पहल कृत्रिम ढग मे विद्युत् चुम्बकीय तरगो का निर्माण क्यिा। अब केवल इतना शेष रह गया था कि एक ऐसे उपकरण या उपकरणा की खोज की जाए जिनके द्वारा इन तरगों का उत्पादन व्यावसायिव दष्टि से राभप्रद रूप में दिया जा सके। जैसा सभी लोग जानते हैं यह क्दम मारकोनी ने उठाया था। जहा तक मालूम किया जा सकता है फराडे मक्सवेल, और हट ज ने एक क्षण के लिए भी अपनी खोजा के व्यावहारिक प्रयोग की सम्भावना पर विचार न किया था। सच तो यह है कि जब तक ये अनुमधान रगभग पूरे नहीं हो गए तब तक इसकी कल्पना करना भी असम्भव ही था कि इनका उपयोग किन किन रूपो में क्यिा जा सकेगा। जिन मामलो म आदि से अन्न तक व्यावहारिक प्रयोजन ही रहा है उनम भी प्राय एक मसले के समाधान से क्सिी ऐमो दूसरी समस्या का समा धान उपलब्ध हुआ है जिमसे उसका कोई प्रया सम्बप नहीं था। उदाहरण के लिए उडडयन की समस्या को लें। हर युग मे उडन को लालसा ने मनुष्य को क्ल्पना का आकर्षित किया है। लियोनार्डो दा विसी ने चित्रकला के बजाय इस उड़ने की कल्पना पर ही अपना अधिकार समय लगाया था। किंतु हमारे इस युग तक लोगा की भान्त धारणा यह बनी रही कि उह क्सिी एसे यत्र का आविष्कार करना पडेगा जो चिडियो के पदो के समान हो। पेट्रोल से चलने वाले इजिन की सोज और मोटरकारा के लिए उसका विकसित रूप तैयार हो जाने के बाद ही उडने की समस्या का हल निकल सका। पेट्रोल मे चलने वा इजिन की प्रारम्भिक अवस्थाआ म रिमी के भी दिमाग में यह बात नही आई कि इस इजिन का उपयोग उडने लिए भी किया जा मकगा। आधुनिा तकनीक की सवाचित कठिन ममस्यामा म से एक समस्या है बच्चे माल को। उद्योगा म निर पर अधिकाधिर वधमान मात्रा म उन पदार्यों का उपयोग किया जा रहा है जिनका मचय भूपनानिक साल म घरती के नीचे और भू पपटी म होता रहा है । इमा एक मवमे अधिन प्रया उदाहरण है तल । ससार म तर की मात्रा मोमिति ही है और ते का सच निरतर और तेजी के साय वदता जा रहा है। ससार के तेल के साधनों के वस्तुन समाप्त हो जाने म सम्भवत बहुत अधिर ममय नही लगगा हो तेल वे मायनो पर अघि पार पाने के लिए होने वाले युद्ध यदि इतने विसारी हा कि हमारी मम्यता का स्तर उस सीमा तर गिर जाए जहा तेल में उपयोग की आवश्यक्ता ही न रह जाए, तो यात दूसरी है । मैं समयता हूँ कि हम लोग यह कल्पना कर सकते हैं कि यदि हमारा सन्यता प्रत्य वा शिकार न बन गद तो जस-जैरो कम होत हाते ते बहुन अधिन पर्चीला होता जाएगा वमे-वस तेस्र स्थान पर किमी अन्य चीज को सोज पर रो जाएगा किन्तु जैसा इस उहाण से स्पष्ट होता है, निर्जीव प्रकृति पर प्रयुक्त तकनीक यौद्योगिक तकनीक कभी भी गतिहीन और परम्परामूलब नहीं हो सकती, जैसा विप्राचीन काल म खेती की तकनीक हो गई थी। जिस असाधारण तेजी के साथ हम अपनी इस पार्थिव पूजी को खत्म करते जा रहे हैं उसके कारण नई-नई प्रक्रियाआ का याविष्कार करन और शक्ति के नए स्रोता को खोजन की यावश्यक्ता निरन्तर बनी रहगी । वा शक्ति के कुछ ऐस स्रोत भी हैं जा वस्तुत अनन्त हैं विशेषकर हवा और पानी किन्तु इनम से दूसरे का यदि पूरा-पूरा उपयाग कर दिया जाए तब भी घरती की आवश्यक्ताा के लिए वह बहुत अपयाप्त होगा । ह्वा की अनियमितता के कारण उसका उपयोग करन के लिए बडे व्यापक सचायना की जावश्यक्ता पडेगी जो हवा के निकल जाने की आकाओ स आज तक बन सक्न वाले मचायका की अपेक्षा कही अधिक मुक्त हों। प्राचीन सररतर युग म प्राकृतिक उत्पादना पर जो निमरता हम विरासत वे प म मिली है वह रसायन तुरस्त्र को प्रगति के साथ-साथ कम होती जाएगी। इस बात की सम्भावना है कि निकट भविष्य में ही रखड के पडा मे निकलन वाली पड का स्थान कृत्रिम रबड रे रेगी, जसे प्राकृतिक रेशम का स्थान कृत्रिम रेशम ने ले लिया है । कृत्रिम रबडी तो पहले मही बनाई जा सकती है, यद्यपि अभी तक कृत्रिम रबडी का निमाण एक व्यावसायिक पचा नहीं वन सका। किंतु समाचारपत्रा की वृद्धि के कारण ससार के जगलों का जो खात्मा बिल्कुर निश्चिन और नजदीक दिखाई दना है उसके कारण कागज बनाने के रिए एकडी की रुगदी के स्थान पर अय परायों का उपयोग करना बहुत जल्दी आवश्यर हा जाएगा, हां, यदि वैतार के तार स समाचार मुनन की आदत इतनी पड जाए कि लोग दनिक समाचारा के लिए अखबारा का परना ही बद वर दें तो दात दूसरी है। भविष्य की वैज्ञानिक मम्भावना म स एक है वृत्रिम उपापा द्वारा जलवायु का नियंत्रण, और इसका वहन वहा मह व हो सकता है। कुट एम रोग हैं जिनरा कहना है कि यदि कनाडा के पूर्वी तट पर क्मिी उपयुक्त स्थान पर रगभग बीस मील रम्बा एक तरणरोध निमित किया जाए, तो वह दक्षिण-पूर्वी कनाडा जौर यू इग्रंड की जलवायु को एक्दम वदर देगा, क्याति जो उपडी धारा यमी इन तट पर वहनी है वह इछ तग्गरोध ६ कारण मार- तल कोचरी जाएगी और कार धरातर दक्षिण में गरम पानी से भर जाने के रिए जारी हो जाएगा। मैं इस विचार की मरयना का साथी नहीं बन मरता, फिर भी यह उन सम्भावनामा वा एक उगहरण अवश्य है जो भविष्य में ययाय सिद्ध हो सकती हैं। एक दूमरा उहण रे-तीस डिग्री और चालीम डिग्री जमाव बीच की अधिकारी धरती मा मूसनी या रही है और बनेर क्षेत्रा - वज्ञानिक परिहा ११८ मे इस समय इम भूभाग मे जितनी जनसख्या निर्वाह कर पाती है वह दो हजार वप पहले की इन क्षेत्रा की जनमस्या से बहुत कम है। दक्षिणी कैलीफोनिया म सिंचाई के वारण रेगिस्तान भी ससार का एक अधिकतम उपजाऊ क्षेत्र बन गया है। अभी तक सहारा अयवा गोबी के रेगिस्ताना को मिचाई का कोई साधन नात नहीं हो सका, रितु अतत इन क्षेत्रो का भी उपजाऊ बनाने की समस्या शायद वैमानिक साधना द्वारा हल करना असम्भव नही रहेगा। आधुनिक तकनीक ने मनुष्य को एक ऐसी शक्ति की भावना दे दी है जो उसको सम्पूण मनोति को तेजी के साथ बदलती जा रही है। अभी कुछ ही समय पहले तक भौतिक पर्यावरण को जसे तैसे स्वीकार करना ही पड़ता था और उसका अधिक से अधिक उपयोग करना पड़ता था। अगर व इतनी कम हुई कि जीवन-यापन के लिए पयाप्त न हो ससे तो विकल्प यही रह जाता था कि या तो किसी दूसरी जगह च जाएं या मौत को गले लगा लें। जो रोग युद्धो मे बलवान होते थे वे पहला रास्ता अस्तिपार करते थे और जो कमजोर होने थे व दूसरा रास्ता अपनाते थे। आधुनिक मनुष्य के लिए उसका भौतिक पर्यावरण एक कच्चा माल मात्र है जो उसे काफी तोड मोड करने का अवसर देता है । यह वात सही हो सकती है कि ईश्वर ने इम जगत बनाया है, लेकिन यह तथ्य इस बात का पर्याप्त वारण नहीं है कि हम नए सिरे से इसका निर्माण न करें। क्सिी बौद्धिक तक की अपेक्षा यही अभिवत्ति परम्परागत धम के लिए विरोधी सिद्ध हो रही है । परम्परागत घम म ईश्वर पर निभर रहने की भावना निहित थी। यह भावना यद्यपि नाम + रिए अब भी स्वीकार की जाती है लेकिन अब आधुनिर वनानिक औद्योगिको की पल्पना पर इम भावना का उतना प्रभाव और अधिकार नहीं रह गया जितना आदिम क्मिान अथवा मछुए की कल्पना पर था, जिसके लिए अपाल अयवा आँधी मौत भी ला सकते थे। आधुनिक मनोवृत्ति वाले व्यक्ति के लिए कोई भी यस्तु स्वत अपने रूप मे रोचा नहीं है, वह रोचक है वेवल इस दृष्टि से पि उसे किम नए रूप मढार जा सकता है । इस प्टिकाण मे वस्तुआ ने आन्तरिक गुण अब उनकी महत्व पूण विपताएं या लदाण नही हैं, बल्कि उनके उपयोग मात्र ही उनकी विशेषताएं हैं । प्रत्यक वस्तु पर एक औजार है । और यदि आप पूछे कि मि बात का औजार है, तो उत्तर यह होगा कि वह औजार है अय औजारो निर्माण परने के एि जो अपने से भी अधिक क्ति मम्पन्न औजार बना Tकाम देंगे, और यह प्रम अनत रूपमा चरता रहगा । मनोवमानित पदा (ली मे इमरा अय यह हुआ कि गति को वामना न अय उन सभी भावगों को अग हटा दिया है जिनसे मनुष्य का जीवन पूग बनता है। प्रम परता मुग्म और सौदय आधुनिक उद्योगपति सएि पुराने जमाने के राजामा की निर्जीव प्रकृति पर प्रयुक्त तकनीक अपना बहुत कम महत्व रखत हैं। विशिष्ट वनानिक उद्यागपति के सबने प्रवल भावावेग हैं हर फेर करना गोपण करना तथा उपयोग करना । औसत व्यक्ति इस सकोण केद्रीकरण का सहभागी नहीं हो सकता, लेकिन इसी वजह से वह शक्ति के नाता पर अधिकार भी नहीं प्राप्त कर पाना और ससार का व्यावहारिक गासन यानिकता के कट्टर अनुयायिया के हाथ म छोड बठना है। याधुनिक युग म मसार म परिवतन राने की जो शक्ति बडे-बडे व्यापारिक नताआ के हाथ म है, वह पिछरे जमाने मे व्यक्तियों के हाथ में आने वाली ऐसी गक्ति की तुलना में बहुत अधिक है। नीरा अथवा चगत या की मानि दूसरा के सिर कटा दन की नाजादी उह भले ही न प्राप्त हो पिनु आज के उद्योग- पनि यह फैसला कर सकत है कि कौन भूषा मरेगा और कौन धनवान बना व नगिया की गति बदल सकते हैं, मरकारा के पतन का यादे दे सकते हैं। समूचा इतिहास इसका प्रमाण है कि अत्यधिक शक्ति उमत्त कर देन वाली हाती है । मोमाग्य की बात है कि शक्ति के आधुनिक नियन्ताा को अभी इस वात का पूरा-पूरा पता नहीं है कि यदि व चाह ता क्या-नया भर सक्त हैं किन्तु जिम दिन उहें इसका नान प्राप्त हो जाएगा उस दिन मानव-अत्याचारा का एक नया युग प्रारम्भ हो जान की पूरी यागका है ।

आठवां अध्याय जीव-विज्ञान मे प्रयुक्त तकनीक मानव-जाति ने अपनी विभिन प्रकार की इच्छाआ को पूरा करने के लिए बनानिक तकनीक का प्रयोग किया है। प्रारम्भ मे इस तकनीक का प्रयोग मुग्य रूप से कपडो के उत्पादन और वस्तुआ तथा मनुष्यो के यातायात के लिए किया गया था। तार द्वारा सवादो को तेजी के माथ प्रेपित करने और आधुनिक समाचारपत्रा का प्रकाशन तथा शासन के केद्रीकरण वो सम्भव बनाने म वनानिक तकनीक ने बहुत महत्त्वपूर्ण काय पिया है। प्रथम वोटि की वैज्ञानिक बुद्धि का बहुत बाफी अश सामाय कोटि के मनोरजन का अभिवृद्धि करने म बहुत अधिक प्रभावी सिद्ध हुआ है। मानवीय आवश्यक्ताओ में सवाधिक जआधारभूत आवश्यकता है भोजन, और इस पर प्रारम्भ में औद्योगिक क्रान्ति का कोई अधिक प्रभाव नहीं पडा रेला द्वारा जब पहले पहल अमरीका के 'मिडिल स्ट' भाग से सम्पर बढा, तभी साधान के सम्बयम बनानिर तकनीक द्वारा पहला महान परिवतन उपस्थित हुआ। तब से लेकर आज तक चनाडा जजेंटाइना और भारत यूरोपीय देश के लिए पाधा नो ये महत्त्वपूण स्रोत बन गए हैं। रेला और भाप ये जहाजो द्वारा अन्न को इधर-उधर ने जाने की जो सुविधा हो गई है उसने मध्ययुगीन स्थिति वाले तमाम दशा पर छाए रहन वाले असार + आतक को दूर कर दिया है। यह आतर अभी कुछ हो समय पहले तक रूम और चीन दोना का पीडित किय हुए था। फिर भी, महत्त्वपूण होते हुए भी, यह परिवतन सेती म विनान के प्रयोग के कारण नहीं उत्पन हुआ । हाल वे कुछ वर्षों म जीव विनान का महत्व पाद्या ना को जापति के सम्बध म बढना गया है । अगास्त्री रोग यही पढाया करते थे कि आधुनिष तकनीक पर निर्मित पदार्थों को ही सस्ता पर सकती है और खाद्याना वा मूल्य आवादी बढन के साथ-साथ बराबर बढना जाएगा। अभी कुछ समय पह' तर यह सम्भव नहीं मालूम होना था कि विज्ञान प्रयाग से पात्राला के उत्पादन म भी उसी प्रकार प्राति राई जा सकती है जमे निर्मित पदार्थों ये उत्पादन मे राई गई है। लेकिन आजपर तो यह बात असम्भाव्यता से बहन दूर शिपाई देती है। गेती रे राम्य प म ऐसा कोई बहुचित और पातिमागे अवैषण नहा 1 जीव विज्ञान में प्रयुक्त तकनीक १२१ हुआ जो भाप के प्रयोग के समान महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुना हो, लेकिन शोध की विभिन दिशाओ मे बिय गए कार्यों से कुछ ऐसे परिणामा की उपधि हुई है जो, कुल मिलाकर काफी महत्वपूण सिद्ध हो सक्न हैं । उदाहरण के लिए, खेता मे नाइट्रोजन व प्रश्न को ही लें। सभी लोग जानत हैं कि सभी जीवित पिण्डा म, चाह पौधे हो या जीवधारी नाइटोनन का एक निश्चित प्रतिशत रहता है । जानवरो को नाइट्रोजन की प्राप्ति पौधो अथवा अय जानवरा को खाने स प्राप्त होती है। पर पौधा को नाइटोजन पहा से मिलती है ? कापी रम्ब अरसे तर यह प्रश्न एक पहली बना रहा यह कल्पना कर लेना स्वाभाविक प्रतीत होता था कि पौधो कोवा से नाइटोजन मिलती है (विशेष रूप स हवा म मौजूद रहनवारी अमानिया की अल्प मानाओ मे), लेकिन प्रयोगो से यह सिद्ध हुआ कि बात ऐसी नहीं है । एक बार यह निप्प उपरब्ध हो जान पर यह गोघ वरना बाकी रह गया कि पौधा को धरती मे नाइट्रोजन क्स प्राप्त होती है । इस समस्या का अध्ययन दो व्यक्तिया ने किया, सावस और गिरावट न । हापेण्टन के नजीक रोथमस्टड म इन लोगा ने लगभग ६० वप तक अनेक प्रयोग किए। ये लोग इस निप्प पर पहुँचे कि अधिकाश पौधा म नाइट्रोजन वे योगिनीकरण की भक्ति नहीं होती। सन १८८६ म हेलरीगर और विल्माय वा यह मालूम हुआ कि क्लोवर नामक तिन पनिया घास तथा अन्य फरीदार पौधे नाइट्रोजन के योगिकीकरण म एक विशेप योग दते हैं । इसका कारण उनकी जडा मा यकाआ का हाना है अथवा यह यह कि स्वय यिवाना के कारण नहा, यल्कि इन ग्रथिकाआ म रह्नेवाले एक विशिष्ट जाति के जीवाणुआ व कारण ये पौवे नाइट्राजन का यौगिकीकरण कर पात हैं । यदि जीवाणु न हात ता व पोध नाइटोजन के यौगिकीकरण म अय पौवा की अपक्षा तिमी स्पम भी भिन न होन, इसलिए तात्विक अभि- करण तो ये जीवाणु ही हैं। सामा य रूप स यह कहा जा सकता है कि जहा तक अभी मालूम हो सका है यवर जीवाणुआ मे ही यह शक्ति है कि उनम से कुछ तो अमानिया को नाटा म बर देन हैं और दूसरे वायुमण्डलीय नाइनातन का उपयोग करत । जमानिया नाइटोगन और हाइजन म बननी है जबमि नाइट्रेटा म नाइट्रोजन और जामीजन हाता है। धरती म पाए जानेवार कुछ विशिष्ट जीवाणुस में नमानिया वो हाडानन म मुक्त करने और उस स्थान पर आमोजन की पूर्ति करने की गति होती है। इस प्रकार य जीवाणु जिा नाइट्रेटा या उत्पादन करत हैं व सामा र पोषा का पापण करन म समय होती हैं । कुछ तो इस प्रकार निर्जीव जगत स नाइट्रोजन का प्रवा जीवन पर म होता है और कुछ उन जीवाणुआ द्वारा जो वायुमररीय नाइट्रोजन का १२२ यज्ञानिक परिदृष्टि उपयाग करते हैं। जव तव चिली के नाइट्रेटो का उपयोग प्रारम्भ नहीं हुआ था तब तक जीवन को सहारा देनवाल नाइट्रेटा को उपलब्धि का यही एकमात्र उपाय था। खाद के रूप म जिन नाइट्टा का उपयाग दिया जाता था उन सबका उदगम जय था। चिली म तथा अ यत्र पाए जानमाल नाइट्रेट एक सीमित परिमाण म ही हैं। और यदि अकेर उही सहार मेनी को निभर रहना हाता तो उनव समाप्त हो जान से गोत्र ही पती को एक मुमीरत का सामना करना पड जाता । रेक्नि आजका वा म उपर ध नाइदाजन रा नाइट्टटा का उत्पादन कृत्रिम रूप म किया जाना है, और यह स्रोत सभी व्यावहारिक प्रयो- जनों के लिए कभी न समाप्त होनेवाररा है । इस प्रकार उत्पन दिए जानवाले नाइट्रेट का परिमाण अप मभी याना म उपर हानेवाले नाइटेट की अपना वही अधिक है । नाइट्रेट उदरको द्वारा पाद्या ना का उ गदन किसी भी क्षेत्र में बहुत अधिक बढ़ाया जा सकता है। यह हिसाव लगाया गया है जिअमानिया वे मल्फेट अयवा सोरा के नाइट के रूप म एक टन नाइट्रोजन इतना मन उन्पन कर सकमा जा ३४ आदमिया रिए एम वप के लिए पर्याप्त होगा। इम परिकरन के परिणामस्वरूप एमागता है कि नाइदाजन उवरपाव उत्पादन म पच किए गए तीन पौण्ड ससार अन भण्डार म उतना अन बता देंगे जिनना नई धरती म खेनी र करन के लिए पच पिय गए २५ पौना से बढ़ सकता है। निवप यह निकरा कि वनमान समय म सामायन नाइट्रा- जन उवरका वा उत्पादन संसार में रखाद्या ना की आपूर्ति के विचार म नई जमीन पर सिंचाई अपवा रेगे की मदः स मती गुरु करन की अपेक्षा अधिक सामजनर है । पनी म विज्ञान के प्रयाग का यह उगहरण वाफी विकर और ध्यान देने योग्य है, क्याकि इसम वावनिक और अरावनिक रसायन र साय- साथ पौधो और जानवरा व सम्पूर्ण जीवन चत्र वा सावधानीपूर्वक अध्ययन करना जररी है। पौषा का नाश करन वाल जीवा और रोगा के नियंत्रण मम्बयम बनानिक शोध ना एक बड़ा ही मनोरजक क्षेत्र अब खुल गया है। अधिकारी ना जीव या ता कीडे हा है या फ्गम, और इन दाना ही के समय म हार ये वर्षा म अपन यहमून्य नान प्राप्त किया जा चुका है। मामा य जनता इम प्रसारपान का महत्त्व बहुत कम ममा पाती है सरकार भी यदि एम मान मा गष्ट्रीयता के साथ मम्बद्ध नहीं दिया जा सकता ता, उमकी प्रामा नहा . चिर टी. भर पाम की पुस्ता, मगरिय म मा लाIT पृ. २६३। - दर वरपर, ३ .

जीव विज्ञान में प्रयुक्त तकनीक बरती। यह मच है कि कुछ विगिप्ट म्प मे महत्त्वपूर्ण गाथा का प्रभाव जनता के दिमाग पर पड़ा है। मच्छरा का अण्डे देना मुश्किल कर दन मे मलेरिया और पीनज्वर का जा नियत्रण किया जा सका उसम उन अनक क्षेत्रा को अब स्वताग तानिया के लिए जावास-याग्य बनाया जा सका है, जो पहत बडे ही घातक क्षेत्र ५ । यह नियत्रण पनामा नहर के निर्माण के लिए ता विरोप रप म आव- "या था। गिल्टी वारे प्लेग का चहा प पिम्सुआ मे जा सम्बध है और टादफ़्म युवार का जो मम्बघ जुआ मे है वह भी अब गिनित गंगा को माम हो चुका है। किन्तु इस प्रकार व छुटपुट उदाहरणा का छोन्दर विशेषना और कुछ मरकारी अधिकारिया व अलावा गायद ही कुछ लागा को इस बात का अनुभव हा वि गोध वा एक एमा व्यापक क्षेत्र प्रस्तुत है जो या तो अनेक दृष्टिया म महत्वपूर्ण है, किन्तु समार के साद्यान्ना की यापूर्ति के सम्बध म जिमका विशेष म्प म महत्त्व है । जहाँ तक पौधा तथा नाकग्न वाल वीडा का सम्बध है, इस क्षेत्र म जा कुछ किया जा चुका है और जो कुछ करना गप है, उसका कुछ नान 'नचर पत्रिरा १० जनवरी मन १६३१ व यक म प्रकाशित एटामगॅलरोजी एपनि बिटिय एम्पायर गीपक लेख का परन स प्राप्त हो सकता है । इस लेख मे तीमरी इसीरियल एटामॉलोजिक वाफ्रेंस (कीट विनान-सम्मेलन) और इम्पीरियर इस्टीटयूट आप एटामॉजी (कीट विनान सस्थान) के कार्यों का विवरण दिया गया है। मैं कह नहीं सकता कि मर पाठमा म स रितन लागा का इन सस्याआ वे अस्तित्व का भी नान है, फिर भी एसा लगता है कि औसत रूप म ससार व कृषि-उत्पादन का दम निगत प्रतिवप पीडा द्वारा नष्ट पर । जमा कि ऊपर बनाए गए लप म कहा गया है-'एमा अनुमान है कि भारतीय साम्रा य म सन १९२१ म फ्मर तया जगरी नाग कीटाणुया म कारण हान वारी हानि का योग १३ करोड ६० राख पौण्ड था, और वोडा स पटा हाने वाली बीमारिया के कारण मरने वाल लोगा को सख्या मारह लाख प्रनिवप बताई गई थी। नाडा म सेता और फगवाले बगीचा की फसल को वीडा द्वारा पहुंचने वाली हानि प्रतिवप रगभग ३ करोड पौण्ड है। दक्षिणी अफ्रीका म मवई की डर म छैट करने वार एव नागर वीडे व कारण ववल एप वप म होने वाली हानि गभग २० लाय पचास हजार पौण्ड है।' भेती का नाग करन वाल वोडों का नियत्रण करने के दो तरीर है भौतिक रामायनिक तरोक और जीव-वनानिक तरीक । पहले प्रकार के तरीक प्राय धूमन के तरीक होते हैं। दूसरे प्रकार के तरीक, जो वज्ञानिक दृष्टि स अघिय मनोरजक है ऐम परजीविया की माज पर निभर है जो सनी वा नाण बरन वार वीडा का शिकार करत हैं। यह नरोरा इस क्षन पर आधारित है.-- दिया जाना धज्ञानिक परिदृष्टि * वडे पिस्तुओ की पीठ पर छोट पिस्सू होते है जो उह वाटत है, छोट पिम्मुआ की पीठ पर उनसे भी छोटे पिस्तू होल हैं और यह क्रम जनत रूप म चलता रहता है।" सामा य रूप से जिन क्षणों में खेती का नाश करन वार दशज कोड होत हैं, वहा एस परजीवी भी हात हैं जो इन कीड़ो की सस्या सीमित करते रहत हैं, किंतु जब सयोगवश कोई नाशक कीडा किसी नए देश म पहुँच जाता है तब उसका नाम करन वाला परजीवी अक्सर पीछे ही छूट जाता है और इसका परिणाम यह होता है कि ऐस नाशक कीडे द्वारा किया जान बाग विनास अपेक्षाकृत रूप म उसके मूल क्षत्र म हाने वाल विनाय की अपेक्षा रही अधिक और व्यापक होता है । इमम स देह नहीं है कि यातायात म होने वाले आधुनिक मुधारा स अनिष्टकर कीड़ों का इधर उधर फरना भी बढ गया है जोर इसलिए इन कीडा व नियत्रण की समस्या और भी आवश्यक और महत्त्वपूर्ण हो गई है। नए क्षमा म नाशक कीडा वे परत को समस्या न होने पर भी उपयोगा परजीवियो का कृत्रिम ढग स बनावा दवर इनकी रोक्थाम की दिशा म बहुत कुछ सम्पन किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, हम एक एस नाक कीडे को लें जिसके खतरे का पता हर ऐम व्यक्ति को है जिसने भी तीन बडे बडे पात्रा म टमाटरा का उगाया है। मेरा तात्पय है पादप-गही की सफेद मक्सी स । श्री ई. आर. स्पैयर ने २७ दिसम्बर सन् १९३० + अब म 'नेचर नामा पत्रिका म इस नाशव कीडे + जीव वनानिक नियत्रण का विवरण लिया है । सन् १९२६ म हरफोडशायर के ए सदी नामक स्थान पर इस सफल मक्खी के नाम परजीवी कोड की सोग की गई जिसे 'एनकारिया पारमोमा बहत हैं। तत्र से बडी सावधानी के साथ इसकी नस्ल चाट नामर प्रायोगिक पदम बराचर वगई जा रही है और वहाँ स जस्रतम द लोग इह प्राप्त कर सकते हैं। ममूर्च डिशायर मशीने की छाजन ये नीच की जाने वाली सती का क्षेत्रफल गभग उतना ही है जितना शप समूच ब्रिटन म को जाने वारी इस प्रकार की खेती का क्षेत्रफल है और यहाँ चाट स जाने वाले परजाविया की सय्या इतनी पर्याप्त रही है कि सफ मक्सिया की ताला अब छ वप पही को सम्या का एक अल्प अग मात्र रह गई है। मार्थिव कीट विज्ञान पप वडा ही महत्वपूर्ण विषय है जियम मयुक्त राय अमगेगा ब्रिटिश साम्राय की अपशा बहुत अधिक आग बड़ा हुआ है यद्यपि दम निसान का सम्भाव्य उपयोगिता अग्रजी साम्राज्य म बम-ग-बम उतना ही अधिा है जितनी अमरीका म । निकट भविष्य म ही टिडिया और निगलता को बीमारी पना बरन वाली मस्पिया का उल्न बान की समस्या का समाधान सम्भवत वनानिर साधना रा पर नही रह जाएगा। .

बज्ञानिक परिदृष्टि - प्रतिप्ति हो चुकी थी, इसलिए अब जो कुछ किया जा रहा था उसके लिए सम्माननीय पुरातनता का उदाहरण मौजूद था। बौद्ध धम के विरुद्ध शितो धम जापान में ही उदभून धम है, रेग्नि चीन और कोरिया से आये हुए इस विदेशी धम के सामने युगा तक वह पृष्ठभूमि म हो पड़ा रहा था। बडी बुद्धिमानी है माय सुधारको न यह निणय किया कि ईसाई सनिक तकनीर को जापान में राग करत समय वे उस धम-दशन को भी साथ-साथ नहा लागू करेंगे जो इस सैनिक तकनीक के साथ अब तक सम्बधित रहा था बल्कि उसके स्थान पर अपना राष्ट्रवादी धमदशन अपनाएंगे। जिस रूप म जय राय द्वारा शितो धम की शिक्षा जापान मानी जाती है उस रूप म वह राष्ट्रीयना का एक प्रबल अस्म बन गया है उसके देवता सव जापानी हैं, उसबा ब्रह्माण्डोत्पति का सिद्धान्त यह सिसाता है कि अय देशा की अपना जापान को सृष्टि पहले भी गई थी। मिकाडो सूय देवता के वशज हैं और इसलिए अप रा यो मात्र पार्थिव शासका की अपेक्षा श्रेष्ठतर हैं। जिस रूप म आज शिलो धम सिखाया जाता है उस रूप म वह जापान के अपने देशज विश्वासा मे इतना अधिक भिन्न है कि सक्षम विद्यार्थिया ने उसे एक नया ही धम कहा है। प्रगनिमील तकनीक के साथ पुराणपथी धमान इस कुशल समवय के परिणामस्वरूप जापानी लोग न क्वल पश्चिम से आए सकट को दूर भगाने म ही सफल हुए हैं बलि ससार की महानतम गावितया में अपना स्थान बना रेने म और समुद्री गलिया में तीसरा स्थान प्राप्त करने म भो सफल हुए हैं। राजनीतिक जावयक्ताआ के अनुसार विज्ञान का उपयोग करन म जापान न अमामान्य चतुराई और विवेकशीलता रियाई है । एक बौद्धिक गति के रूप मे विनान सशयवादी और घोडा-वहा सामाजिक सगी का विध्वमक भी है, दूसरी ओर एक तकनीकी शक्ति के रूप म उसके गुण ठोर इम उटे हैं। दिनान के कारण होने वाले तकनीकी विकासा ने सगठना के आगार में चोर उनकी मघनता मे वति ही की है और विशेष रूप से सरवारा की शक्ति पा बहुत अधिक बढ़ा दिया है । इसलिए विनान के प्रति मनीषण रुप अख्तियार परत ये लिए सरवारा के पास थापो मच्छे वारण हैं बातें कि उस गतरना और विध्वमवारी विचार और वनाओं म अरग रपा जा सर । राप जापान में तो एक प्रकार के अधविश्वामा पमद भरता है और पश्चिमी देशा में दूसर प्रबार ये अघविश्वामा पा समयन करता है किन्तु जापान में तथा पश्चिम में सभी बतानिक-युछ अपवादा की छाइपर-सरवारा मिलाता या उपचाप स्वीकार कर स्ने २ एि तयार रह है क्यापि उनम से अधिति अपन-आफ्ना २ रेसर प्रोसर व पेपरलेन की पुस्ता, निशान ए न्यू रिलिजन', रेशनलिएम एमोसिएशन द्वारा प्रकाशित ।

कृत्रिम रूप से निर्मित समाज नागरिक पहले मानते है और सत्य के अपक और पुजारी बाद म । जापानी नीति की असाधारण सफलता के बावजूद कुछ ऐमे अनभिप्रेत प्रमाव भी उत्पन्न हुए हैं जो समय आन पर गम्भीर कठिनाइया उपन कर सकते हैं । रोगा की आदता म और उनके मोच विचारकर बने हुए विचारा म होने वाले आकस्मिक परिवतन न एक अधीरता और अगाति की भावना पैदा कर दी है, कम से कम शहरी आवादो म । राष्टीय सक्ट के अवसर पर यह स्थिति हिम्टीरिया की प्रवत्ति पंदा कर सकती है तोकियो म आए भूचार के बाद कोरिया वासिया का जो हत्याकाण्ड हुआ उसम वस्तुत यही प्रवत्ति दिवाई दी थी । इमम भी गम्भीर बात तो यह है कि जापान जिस स्थिति में है उसमे उद्योगवाट और हथियारा की वद्धि आवश्यक है। हथियारा के निमाण म होन वाले खच के कारण जापान के मजदूर गरीब हैं, फ्रत उनमे विद्रोहात्मक मनो वति अपनान की प्रवृत्ति बढ रहा है, और जिन परिस्थिनिया में बह काम करना पता है व परिस्थिनिया उस पनिष्ठ पारिवारिक मगठन का बनाए रपने म कटिनाइया पदा कर रही हैं जिम पर जापान का समाज निर्मिन हुआ है। अगर जापान को किसी असपर युद्ध में उलझना पड जाए तो य परिस्थितिया स्मी शाति जसी काई शान्ति उत्पन कर सकती हैं। इसलिए यह सम्मव है कि जापान की वतमान सामाजिक सरचना समय आने पर अस्थिर हो जाए लेक्नि मह भी सम्भव है कि जिस कोर स पिछरे ७० दपों के दौरान जापान का सफलतापूर्वक आगे बढ़ना सम्भव हुआ है, उमी कौशर स, चिना पिसी हिंसा मर' उरट पर वे जापानी रोग वदरती हुई परिस्थितियों के अनुसार धीरे धीरे अपने को दार। एक बात काफी हद तक निश्चित मालूम होती है, और वह यह है कि जापान की सामाजिक सरचना को व्यापक रूप में साधित करना पडेगा यह सगोधन चाहे धीर धौर हो और चाहे विमी गान्ति द्वारा हो। इसरिए मह वपूण होते हुए भी जापान का उदाहरण समाज के वनानिक निमाण का सवागपूण उगहरण नहा है। ऐमा क्ढे म मेरा तात्पय यह नहीं है कि जब यह समाज बना था तभी इसका निमाण और अच्छी तरह पिया जा सकता था मरा तात्पय बदर इतना ही है कि यह समाज भविष्य के लिए एक सवागपूण बारा नहीं है। मम म सोवियत सरकार द्वारा बनानिक निमाण वा जा प्रयास पिया जा रहा है वह जापान म सन १८६७ म जो सुधार दिए गए उनका अपना पहा अधित महत्त्वाकामापूण है इसका उद्देश्य सामाजिर सस्थाआएव प्रयाग्राम बहुन अधिक परिवतन करना है और यह प्रयास एक ऐसे समाज की सष्टि करने वा है जो जापान म दिए गए प्रयास को अपना मारे अतीत अनुभव और नान से बहुत अधिर भिन्न है । निर्माण का मह प्रयोग अभी चल ही रहा है, और वज्ञानिय परिदृष्टि मोट अविवेकी उतावला व्यक्ति हो यह भविष्यवाणी करने का साहम करेगानि यह प्रयाग सफर होगा या असफल । सोवियत रूम के मिश्रा तथा शत्रुआ दोनों की ही अभिवति इस प्रयोग के प्रति अत्यधिक अवनानिक रही है। जहा तक मरा सम्बध है मैं सोनियत प्रणाली के गुण लोपा की विवेचना करने के लिए उतावण नही हूँ, मैं तो बवल इस प्रयोग के उन तत्वा की ओर सक्त करना चाहता हू जो सोच ममयकर बनाई गई योजना के तत्त्व हैं और जो इस योजना को एर वैनानिक समाज चे सर्वाधिद सर्वांगपूण उदाहरण का रूप दते हैं। पहली बात तो यह है कि उत्पादन और वितरण के सभी उपालाना को राजकीय नियत्रण में ले लिया गया है, दूसरी बात यह है कि सम्पूण राष्ट्र की शिक्षा इस ढग से सचालिन की जा रही है कि वह सरकारी प्रयोग का ममथन करने वाले काय बलापा को बढावा द तीसरी बात यह है कि रूस की सीमा के भीतर जो विभिन्न परम्परागत धार्मिक विश्वास अभी तक मौजद थे राज्य उनके स्थान पर अपन धम को प्रतिष्ठित करने का यथाशक्ति प्रयत्न कर रहा है चौथी बात यह है कि साहित्य और सम्पूर्ण समाचारपत्रो पर सरकार का नियंत्रण है और सम्पूर्ण माहित्य और ममाचारपत्र ऐस हैं जो राज्य के रचनात्मक उद्देश्यो की सिद्धि म सहायक हो सकते हैं पांचवी बात यह है कि पारिवारिक निष्ठा जिस हद तक राज्य के प्रति व्यक्ति की निष्ठा से होड रती है उस हद तक धीरे धीरे परिवार की निष्ठा को क्षीण किया जा रहा है छठी बात यह है कि पचवर्षीय योजना में समूचे राष्ट्र की सम्पूण रचनात्मक शक्ति का उपयोग एक निश्चित आर्थिक सतुलन और उत्पादन कोरल की सिद्धि के लिए दिया जा रहा है और आग की जाती है कि इस प्रकार हर व्यक्ति के लिए पर्याप्त मात्रा म भौतिक सुग मुविधा को उपलब्धि हो मवेगी । ससार में प्रत्येक अय समान म वे द्रीय निर्देशन सोवियत सवार द्वारा प्रयोग म गए जाने वारे के टीय निगान की अपेमा यहुन कम है। यह सही है कि युद्ध के दौरान पापी हा तर राष्ट्रा की पत्तियां वेदमचालित हो गई थी लेकिन हर व्यक्ति जानता था कि यह एक अन्यायो स्थिति थी और इस ममय भी अन्य राष्ट्रा का केन्द्रीय संगठन अपन सर्वाधिक एप में भी उतना रावयापी नही पा जिनना स म है ! जमा कि नाम से ही स्पष्ट है पचवर्षीय पाजना अस्यापी योजना मानी गई है और एक एमे मुसीबत के समय की योजना मानी गई है जो महायुद्ध की स्थिति सनि भिन्न नहीं है लेकिन था तो यह की जानी चाहिए कि यदि यह योजना सफर होती है तो इगद बाद अय पाजनाए इसका स्थान गो क्यापि एक बहुत बड़े राष्ट्र के पाय-बापाका त्रीय सगठन सचारन उमा नियन्नाआय रिए इतना आवषय होता है कि उमे आसानी से छाडा नहीं जा सकता। रूप का यह प्रयाग चाह सफर हो चाहे असफल, यह निश्चित है रि कृत्रिम रूप से निर्मित समाज परि यह अमार भी हुआ तो भी इसके बाद टूमरे प्रयोग किए जाएंगे जिनम इस प्रयाग का मवाधिक मनोरजन और महत्वपूर्ण रमण विद्यमान होगा, और वह रमण है एक मपूण राष्ट्र के वाय-क्राफा का एकामा निर्देशन । पही के जमान में यह वान जसम्भव थी क्याकि यह पण प्रचार की तकनीक पर आधारित है अयात मावजनिर गिभा, ममाचारपत्र, मिनमा और वनार के तार पर आधारित है। रेग ने योर तार की मुविधा न राय को पहले ही काफी मजबूत बना पिया या, क्यादि इनके द्वारा सेना का इक्टठा किया जाना और ममाचाग का सचार नजारे माय कर सकना सम्भव हो गया था। प्रचार की आधुनिक पद्धनिया के साय माय युद्ध के आधुनिक तरीका ने भी राज्य को असन्तुष तत्वा के विरुद्ध मजबूत बना दिया है, जब तक विद्रोहिया को वैमानिका और रसायन स्त्रिया का ममयन न प्राप्त हो जाए तब तक वायुपाना और विपरा गमा कै कारण विद्रोह करना कठिन हो गया है। कोई भी समयदार सरसार इन दो वर्गों का पप ग्रहण करणी और उनकी निप्टा प्राप्त करने ग प्रयत्न करगी जमा वि स वे उदाहरण ने स्पष्ट कर दिया है. अब चतुर और उद्यमी रोगाव लिए यह सम्भव हो गया है कि यदि एक बार सरकारी शामन पर उनके अधिकारमा जाए तो फिर द गति यपन हायम बनाए रख सकन हैं भले ही गुरु म उहें जनता के बहुमत का विराध भी पेलना पडे । इसलिए अब हम इस वान की अधिकाधिक मम्भावना स्वीकार करनी चाहिए कि सर कारा का गासनयत्र अन्यतत्रा हाय म जाएगा। ये बल्पनत्र जम के वापार पर न बनकर विचार के आधार पर बनेंगे। जिन दा माफी ममय म भजात काय पनि चरी या रही है उन्हाम इन अल्पत या वा माग्नाग्य प्रजासत्रीय पोर पोउ छिपा रह सस्ता है जमा कि रोम म आगस्टम के समय हुना था, किन्तु अय म्याना पर अल्पतर का तुग गामन होगा। यदि नए प्रकार र ममात्रा को रचना म वनानिव प्रयाग किए जाने हैं ता वैचारिक अपनत्र का समन अनिवाप है । यह हा माना है विभिन्न अल्पता बीच मपप हा रकिन यह भी आग की जा माती है कि अनन कोई एक अन्पत र सम्पूण ममार पर आधिपर प्राप्त कर लगा और एक विश्वव्यापा सग दन रानिमाण करेगा जा उसी प्रकार व्यापक और परिपूरा हागा जमा आज म्म म है। इस प्रकार की स्थिति र अमन कुछ गुण भी होंगे और कुछ दोष भी भरिन न गुण- गेम मी अधिक महत्वपूर्ण तथ्य ता यह है कि वानिक तकनीक सभरपूर प्रमादिन कोई भी ममाज मिस बम विमी भी स्थिति म गायट जीवित न र सरगा । दनानिक तकनीक सगटन को अपना करती है, और यह तकनीक हितना ही अधिक निदोष और परिपूण हाता जाती मन afrrier-.

बज्ञानिक परिदृष्टि सगठनो को मार भी करती है। युद्ध की बात तो जलग है वनमान आर्थिक दवाव ने ही इस बात को स्पप्ट कर दिया है कि न केवल विमा एक दासी समद्धि के लिए बल्कि सभी देगा की समद्धि के लिए उधार और साव तथा यरिंग का एक राष्ट्रीय संगठन आवश्यर है । आधुनिक पद्धतियो की दक्षता के कारण औद्योगिक उत्पादन का अतर्राष्टीय सगठन जावश्यक हाता जा रहा है । समार की कुल लावश्यक्ताला सही अधिक चाजा कोजापूर्ति अनेक दिगाआम आधु निक औद्योगिक सपत्र जामानी से कर मस्त है । लेकिन इसका परिणाम हुआ है वस्तुत गरीबी, जबपि होना चाहिए था समृद्धि । इसका कारण है प्रतियोगिता । यटि प्रनियोगितान तो थम को अत्यधिक बढी हुई उपाटन ममता रोगो को अपने विधाम और आवयक पदार्थों के बीच उचित समयौता या अनुपात निर्धा गित बरने का अवसर दे सरती है। व स्वय ही इस बात का रिणय कर सकते हैं लिये छ घण्टे प्रतिदिन काम करवे धनवान बनेंगे या चार घण्टे प्रतिदिन वाम करेंगे और सामाय सुख सुविधा का उपभाग करेंग । आर्थिक प्रतियोगिता स होने वाली बर्बादी को रापन मे और युद्ध के खतरा का उ भूलन करने म एक विश्वव्यापी सगठन से होने वाले लाभ इतने अधिक है कि धज्ञानिक तकनीक से सम्पर समाजो के जोरित रहने की एक अनिवायत ही यह बनती जा रहा है किसा सगठन स्थापित किया जाए । इम तक के विराध म जा भी तक प्रस्तुत विएना सकते हैं उनकी तुरना मे यह मवातिगायी है, और यह प्रश्न तो इसके सामने प्राय महत्त्वहीन हो हा जाता है कि एक सठिन विश्वराज्य म आज की अपना जीवन अधिर मतोपजनक होगा या कम। इसका कारण यह है कि जब तक मनुष्य जाति वज्ञानिक तकनीक का त्याग नही कर देनी तब तब एक सगटिन विश्वराज्य की दिशा म हो वह विकास पर मरती है और दनानिय तानी का त्याग कर ऐमे जल प्रलय के परिणामस्वरूप ही हो सकता है जो मानव सभ्यता में सम्पूण स्तर को ही नीच गिरा ६ । एक साटित विश्वराय म होन वाले लाम बहुत अधिक और स्पष्ट हैं । पहा लाभ तो यह है कि युद्ध के विरुद्ध मानव जानि सुरक्षित हो जाएगी और शस्त्रास्त्रा की होड म जो पार श्रम और सम्पत्ति लगाई जाती है वह गव बच जागी ।पना को ना मानी है कि केवल एक युद्ध करन वाली सेना होगी जो अत्यन्त दा होगी और मुख्य रूप से पापाना का और युद्ध की रासाय निज पद्धनिया का उपयोग गरेगी जिगका प्रनिरोध परना स्पष्टत असम्भव होगा । इसलिए उनका प्रनिराध विया भी नगे जाएगा।' हो सकता है कि समय समय पर राजमहा ३ भीतर होने वाली पानिमयेद्रीय सरकारमालनी १ देवि भी डेरिक रवीको रचना, दि प्रारम Trf-वीप सेंच्युरी ५ नमानेशाम रिनशनशिप्म, सन् १९३० ।

तिम रूप से निर्मित समाज रहे, लेकिन इसस सरकार का तात्त्विक सगठन नही बदलेगा, केवर कठपुतली की तरह काम करने वाले नामधारी अधिकारी बदलेगे । के द्रीय सरकार राष्ट्रीयता ने प्रचार पर निस्म देह रोक लगा देगी। इस राष्ट्रीयता द्वारा ही आजकल अराजक्ता कायम है। इसके स्थान पर केन्द्रीय सरकार विश्वराज्य के प्रति निष्ठा का प्रचार करेगी। निष्कप यह निकलता है कि इस प्रकार का मगठन यदि एक पीढी तक कायम रह सका तो फिर वह स्थायी हो जाएगा। जार्थिक दष्टि मे तो इसम अपार राभ होगा-प्रतियोगितामूलक उत्पादन से होने वाली ववादी समाप्त हो जाएगी रोजगार के सम्बन्ध में किसी को किसी प्रकार का अनिश्चय नहीं रहगा गरीवी नही होगी, भले दिन अचानक ही बुरे दिनो में नहीं बदल जाएग, काम करन के लिए तत्पर प्रत्येक व्यक्ति को सुस सुविधापूर्वक रखा जाएगा और वाम से जी चुराने वाले हर व्यक्ति को जेल मे वद कर दिया जाएगा । जब कभी क्मिी परिस्थितिवश उम काय की आवश्यक्ता नहीं रह जाएगी जिसे कोई व्यक्ति उस समय तक करता रहा होगा, तब उसे कोई दूसरा नया काम सिखलाया जाएगा और इस प्रशिक्षण की अवधि मे उसके भरण पापण का उपयुक्त प्रबघ किया जाएगा। जनसख्या का नियत्रण करने के लिए आर्थिक प्रेरणाओ का प्रयोग क्यिा जाएगा। जनसख्या सम्भवत स्थिर ही रखा जाएगी । जो कुछ भी मानव जीवन म दुखदायी है प्राय वह सभी समाप्त कर दिया जाएगा और मृयु भी बुलापे से पहले शायद ही कभी आएगी। इस नए स्वग म लोग सुखी होग या नही यह मैं नही कह सकता। सम्भवत जीव रसायन ही हम किसी व्यक्ति को सुखी बनाने का माग दिखा सकेगा वशर्ते कि जावन की आवश्यक वस्तुएं उसे उपल ध हो जो रोग विनोद- हीनता से उता जाएंगे उनके लिए गायद कुछ खतरनाक खेले की यवस्था की जाएगी क्यापि अयथा एस लोग उक्तार अराजक्तावादी बन जाएँग गायद राजनीतिक क्षेत्र से निष्कासित निदयना खला मे स्थान पाएगी गायर फुटवाल वे स्थान पर कौतुन युद्ध जाराम लरे जाएगे जिनमें पराजय का दण्ड मृत्यु होगा । हा सकता है कि जब तक गंगा को अपनी मृत्यु को पोज करत रहने की अनुमति दी जाएगी तब तक एक मामूली-से कारण पर भी मौत को गले लगान मरोगा को आपत्ति नहीं होगी। लखा दाको व सामने आसमान से कूद पडना सायर एक गौरवपूण मृत्यु को परम्परा समयी जाएगो, भले ही इसका उद्देश्य मौज मनाने वाले झुण्ड व मनोविनोद व अगदा और कुछ भी न हो। हो सकता है कि इसी प्रकार माराव-म्वभाव की अराातावादी और ह्मिन शक्तिया वे रिए एक मुरशा वा व पी चवस्था की गाए अयवा फिर यह भी हो सकता है कि विवरण शिक्षा और उपयुक्त भोजन द्वारा मनुप्पा के अनिर्यात भावावेगा या उपचार कर दिया जाए और घरता पर सम्पूर्ण जीवन वसा हो वैज्ञानिक परिदृष्टि १६८ शातिपूर्ण हो जाए जैसा शातिपूण रविवार का स्कूल होता है। निश्चय ही एक विश्वव्यापी भाषा भी होगी जा या तो एस्पेरेटो होगी या चीनिया और यूरोपवासिया द्वारा प्रयोग म लाई जाने वाली जग्रेजी। पुरान जमाने का अधिकाश साहित्य इस भापा म अनूदित नहीं किया जाएगा, क्यारि उसका दृष्टिकोण और भावनापरक उसकी पप्ठभूमि अयवस्थाकार समझा जाएगी। इतिहास के गम्भीर विद्यार्थियो को 'हैमलेट' और 'ओयेरो' जैसी रच नाओ का अध्ययन करने के लिए सरकार से अनुनापत्र प्राप्त हो सकेगा किंतु सामाय जनता को उनका अध्ययन इस आधार पर निपित कर दिया जाएगा कि उनम व्यक्तिगत हत्या को गौरवपूण चित्रित किया गया है समुद्री डाकुओ अथवा रेड इण्डियन लोगा के सम्बघ में लिपी गई पुस्तकें पढने की आना रडका को नहीं दी जाएगी, प्रेम-सम्बधी विषया को इस आधार पर प्रोत्साहन नही दिया जाएगा कि प्रेम अराजक्तावादी होन के कारण यदि दुष्टतापूण नही तो मूसतापूण अवश्य है । सदगुणी लोगो के लिए यह मारी स्थिति जीवन को बहुत ही मानन्ददायक बना देगी। विज्ञान हमारी शक्ति में वद्धि करता है, उस शक्ति से हम भला भी पर सकते हैं और बुरा भी इसलिए विनान हमारे विध्वमात्मक भावावगा का नियत्रित करने की आवश्यक्ता मे भी वदि करता है। इसलिए यह जरूरी है कि यदि इस वज्ञानिक जगत को आगे कायम रखना है तो लोग पहले की अपेक्षा अधिक शात चित बनें । अब रोबीर अपराधी को आदा नहीं माना जाना चाहिए और विनयशीलता की पहल की अपेभा अधिव प्रासावी जानी चाहिए। इस सारी प्रक्रिया म लाभ भी होंगे और हानि भी होगी और इन दोना के बीच कोई सन्तुलन स्थापित करना मानव शक्ति से परे है।

तेरहवा अध्याय व्यष्टि और समष्टि १६वा गातारी अपने राजनीतिक विचारा और अपने आर्थिक व्यवहारा के बीच एक विचित्र विभाजन से पीडिन थी। राजनीति के क्षेत्र म तो वह लॉक और म्मो व उतारवादी विचारा को कायरूप मे ला रही थी जा छोट-छोट कृपा- भूस्वामिया के समाज के लिए उपयुक्त थे । १८वी शताब्दी के मूर मत्र थे स्वा. धीनता और समानता' कितु उसी समय यह ती उन तस्नीका का आविष्कार भी कर रही थी जो अब बीसवी तानी को स्वाधीनता का विनाग करने और समानता के स्थान पर विभिन प्रकार के नय अल्पता की स्थापना के लिए विवा कर रही हैं । उतारवादी विचारा का प्रचल्न कई प्रकार से दुर्भाग्य पूर्ण सिद्ध हुआ है क्याकि दूरदर्शी लोगा को उद्योगवाद द्वारा प्रस्तुत की गई ममस्यामा पर निपक्ष ढग से विचार करन म रो दिया है । यह ठीक है कि समाजवाद और साम्यवाट तत्त्वत औद्योगिर सम्प्रदाय ही हैं किन्तु इनका दृष्टि- कोण वग-सघप स इतना अधिक अभिभूत है कि राजनीतिक विजय प्राप्त करन के माधना के अलावा जय किमी बात पर विचार करने का इनके पास कोई अवसर भी नहीं है । जाधुनिक मसार म परम्परागत ननिकता कोई सहायता नही कर पाती। थाज एक समृद्धिशाली व्यक्ति अपने क्मिी वाय द्वारा रावा व्यक्तिया को मोहताज बना माना है और कठोरतम क्योरिक धमाध्या भी उम वाय का पाप नहीं कह समेगा मद्यपि वामना-सम्बधी मामूगे-मी ननिक च्युति के लिए वह पाप विनिमुक्ति की मांग करगा निमम अधिक से अधिर एम घण्ट का समय जिमवा उपयाग गच्छे ढग से किया जा सकता था नष्ट पिया गया होगा। अपन पडोसी के प्रति पतव्य व मम्ब य म भी एक नय सिद्धान थी आव यकता है। इस विषय पर ना कवर परम्परागत धामिक उपदा ही पयाप्न पप प्रगान म असफल नहीं होत, वलि रवी गातारी व उतारवादक उपटानी अगफर हा जात हैं। उगहरण व रिए स्वाधीनता व मम्यध म पिपी गई मिर जम राव की पुस्तक का हो । मिर की स्थापना है कि गप को व्यक्ति के उन काय कलाराम हस्तगा परन या अधिकार है ग्नि गम्भीर परिणाम दूसरा को भी प्रभादित परत हो रविन व्यक्ति के जिन काप या प्रभाव बताता ही गोमित रते ही उन वाय-परापा म राय या १७० वजानिक परिदृष्टि हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए और व्यक्ति को पूरी आजादी देनी चाहिए। लेकिन आधुनिक ससार मे इस प्रकार का सिद्धान्त व्यक्तिगत स्वाधीनता लिए कोई अवकाश ही नहीं छोडता । जसे जसे समान अधिकाधिक स्प में एक आगिक सरचना बनता जाता है वस से व्यक्तिया के पारस्परिक प्रभाव अधिराधिर बहुसख्यक और महत्वपूर्ण हाते जात हैं परिणामत ऐसी कोई बात गेप रह हो नहा जाती जिससे सम्बधम स्वाधीनता गम्ब पी मिर का सिद्धान लागू किया जा सके । उनाहरण के लिए, भापण बाय और समाचारपत्रा की स्वाधीनता का ही ल । यह स्पष्ट हो चुवा है जो समाज इन स्वाधीननामा में उपभोग की पूरी आनी दता है वह इसी कारण उन विविध सफलता से धचिन रह जाता है जिनकी उपलब्धि इन स्वाधीनताजा का निषेध करने बारे ममाज लिए सम्भव होती है। यह तथ्य युद्ध काल म हर व्यक्ति को सप्टत समझ में आ जाता है, क्योकि युद्ध कार म राष्ट्रीय उद्देश्य बिल पर और सरल हाता है और उसमे निहित वारणता भी प्रत्या हाती है। अभी ता तो किसी भी राष्ट्र ने शान्ति पार म उम प्रकार का काट राष्ट्रीय उद्देश्य मामन रागने की प्रया नहीं अपनाई, देव अपन सविधान और भौगोलिक क्षेत्र की सुरक्षा का उद्देश्य ही वरावर सामन रमा है। सोवियत रूस की मानि जिम निमी भी सरकार मामन पाति-धारमा उतना ही उलट और सुनिप्टि उद्देश्य हागा जितना अय राष्ट्रा के सामने युद्ध-बार म रहता है जो भाषण को म्याधीनता और समाचारपत्रा को स्वाधीनता में उतनी ही वाट-छाँट गाति- बारम भी करनी पड़ेगी जितनी काट छांट अप गप्ट पुडगार में परते हैं । पिछा बीस वो दौरान व्यक्तिगत स्वाधीनता म जो पमी आती सी है वह प्रक्रिया गाय आग भी जारी रहगी क्यारि इमे जारी वन ये दो कारण मौजूर हैं। पहा कारण नो यह है रि आधुनिए नानीर समाज को अधिकाधिक जन सपटा का रूप देती जा रही है और दूसरा कारण यह है रि आधुनिर समाजलाम्म होगा को कारणामा नियमा का अधिकाधिर वोध क्राता जा रल है जिनके अनुमार Or पक्ति में गाय दूभर व्यक्ति के लिए उपयागी या हानिकारण हाल है। यदि भविष्य के वनानि ममाज म व्यक्तिगत स्वाधीनता के रिमी मा विनिष्ट प्रकार को उचित और पायसगत सिद्ध करना है ना इसी आधार पर उम मिद्ध रिया जागा उस प्रकार की स्वाधीनता गो ममाज ने गिा मगगारी है किन्तु पिIT मामा म इस आधार पर उगरा औचित्य सिदारिया जा मरामि सम्पत मायाँ वा प्रभाव कामे जगवा और मिमी पर नहीं पड़ा। आएछ परम्परागत ग मिदाता उजा साज मिमी मार भी रामपा बाल योग्य नहीं प्रतीत हात। मेरे दिमाग म आन वाय व्यष्टि और समष्टि १७१ पर उगहा है पूरी निवेश का। आजकर तो कुर व्यापक सीनाजा के भीतर जिस व्यक्ति के पास भी पमा हो वह स्वच्छानुसार जना चा. वहा सा मरना है । पर धनीति पे चढन दुर जमान में दम म्वाधीनता का ममथन इस याचार पर किया जाना था कि जिम विमी भी व्यापार या कारोबार म सबसे अधिर राम हा वही हमा सामाजिक दृष्टि में सवाधिर उपयागी है। मानकर गाय ही म रोग हा जा म प्रशारक सिद्धान्त को मानने का माहम करें। फिर भी यह पुरानी म्वतत्रता बभी तक वायम है। यह स्पष्ट है कि एक वना निरममा म पजी का निमा वहीं किया जाएगा जहां उनकी सामानित स्प योगिता मवन अधिक हो न कि वहा जहा अधिक्नम राम कमाया जा मरे । कमाया जाने वाग मुनाफा तो प्राय पिन्बुर बारम्मिक परिस्थितिया पर निभर करता है। उदाहरण के लिए ग्रों और वमा व वीच की प्रतियोगिता को एँ। रला का अपन माग करिए ग्वच करना पडना है जबधि बसा को ऐसा बच नहीं करना पडता । इमरिए हो सपना है कि पजी लगान वारे वेरिए रेसामनायब न हों और दमें रामायन हा मपि सम्पूण समाज की दृष्टि म वात विल्कुल ठीय उल्टी हो या न हो । अथवा दूमरा उहाण -जिन लोगा न मिन्ना जर के समीप उम ममय जायात परीदने की जबरमती दिखाई यो जब उन जेर काटेंट गरी म नहीं परिवर्तित पिया गया था, उनरे द्वारा माय गए मुनाफे पर ही विचार करें। जिस बचें थे कारण इन लरोगा को मुनाफ ए व पच मानजनिक पन स पूर दिय गए थे और न गंगा न ता मुनाफे कमाए उना सम्ब य म इस बात का या प्रमाण नहीं मिटता मि इन लोगान अपना पमा रिपी एम काम म गाया था जो किया प्रकार भी जनता के लिए रामदायक हो । य और अधिक महत्त्वपूण हरण -दिनापन पर पच की जानकारी असार पन राशि पर ही विचार करें। सम्भवत -म धान का दावा नहीं दिया जा मरना कि "न विनापना म समाज का कोई गम दाना है, शायद अपन यून मात्रा महाना भी हा । इपिए हर पूजीरति को अपनी रक्म का अपनी इच्छानुसार निया करने की बाजानी दन वा मिदान का मामाजिक दृष्टि में मभयन नहीं दिया गमबना। मवान व मसले काही उगारण। इड में व्यक्तिवारी विचार- पारा कारण अधिकारी परिवार अपना निज का छाटा-या मान रमना दिम मरान व निम्न में रहने की अपया अधिव पमन परल हैं। इसका परिणाम यह टया है frमोग दूर तर न नगरों ये स्प में पगमा है का विरोर यानिवारण हैं और त्रियों नया बराशि हिाने वाली हानि पचा है। हर गहिजो अपन क्रुद्ध पति वेरिए तमाम पग्यिम बराग भोग्न नथार वर पानी। 7 उब रहार ग घर और - १७२ पज्ञानिक परिदृष्टि हैं अथवा जव च इतने छोटे होते हैं कि म्यूल नही जा मरते, तब छोट छोटे नग म्याना म घुसे रहते है जहां वे अपने माता पिता के लिए परेशानी पता करन वाले सिद्ध होते है या उनके माता पिता उनके लिए कप्टकारक सिद्ध हात है। एर अधिक समसदार समाज मे हर परिवार एवं बहुत बडी इमारत के एप हिस्ग म रहेगा, इस इमारत रे बीच म सहन होगा, अलग-जग साना नहीं पागा बल्पि सम्मिलित सामाजिक भाजा होगा। बच्चे जस हो मा का दूध पीना छोड देंगे उसमा मारे दिन का समय वडे-बडे सुल कमरा म बौलगा जहाँ उनकी देखभार ऐमी महिलाएं करगी जिई बच्चा को मुगी रमन का प्रशिक्षण प्राप्त होगा जिनका स्वभाव और पान इस वाय व लिए उपयुक्त होगा। जो गहिणियां आजक अपना मारा दिन व्यथ वे वामा म वयाद करती हैं उह घर मे बाहर अपनी राजी समान की आजादी मिल जाएगी। इस प्रकार की व्यवस्था से मातामा श, और उनसे भी ज्यादा बच्चा को, जतुर लभ हागा । राचेल मामिग्न नसरो स्यूर म यह देखा गया है कि लगभग ६० प्रतिशत बच्चा के गावित होने के समय उह मूगा रोग था, और स्पूर म एग् वप का समय बीनत बीतत रगभग सभी बच्चा इस रोग मे मुक्न हो गए। सामाप घग में प्रकाश गुद्ध वायु और अच्छ भाजन की वह यवस्था नहा की जा गवनी जा नसरी स्वगम की जाती है लकिन अगर तमाम बच्चा 4 f सामूहित म्प से इन सब चाजा की व्यवस्था करनी हो तो यदे रास्त हा स पी जा मरती है। कोई अपन बच्चा या बहुत अधिक प्यार करता है और उह अपन से अग नही हान देश चाहना, इस तर के आधार पर अपन बच्चा को दुण्टिन और विराग स्प म विससित परन की बाजादी देन की मांग एक एमो मांग है गिरा सावजनिक हित की दष्टि स निश्चित रूप से स्वीकार नही किया जा माना। पिर याम न पो ही 7 याम वे अपार और उसके सम्पादन की पति-दोनाका हो । वतमान समय म ता नौजवान लोग गु हो अपना व्यव साय या अपनी रति चुन रते हैं प्राय वेव' इगौगि वि चयन य समय उह उम उत्ति या व्यवमाय में पुछ अच्छा भविष्य रिपाई देता है। एप दूरी और पूरी-पूरी जावारी रपने वाला व्यक्ति यह समझ सकता है जिसम्बधित यत्ति या यवार पुछ ही वर्षा या कम लगनायर रह जाएगा। एग मामरा मनोरयार यदि बुध ग्रापजनिर पथ निगान मिर पर तार, अत्यात उपयोगा होगा । TATT नानीया पदनिया का गमार, यह पभी भी साय जनिर हिरा की यान ही सिख हो पाती लिपिमी अति प्राचीन अथवा अय पिर गर्वी तारा उस समय भी पायम रहन लिया जाए जय उस मही अधिर पम गोंगे तानी मारम हा पुगी हो । आधुनिा गमय म ता, पूंजीयाली अवस्था थी औषियहीन और ताहीन पद्धति कारण मजदूर या व्यष्टि और समष्टि १७३ व्यक्तिगत स्वाय अधिकाम्प मे ममान के स्वाय के विपरीत पड़ता है क्याति कम सींग पदतिया व अपनाए जान मे मजदूर को अपनी गेजी से हो हाय घाग पड सकता है। इस मदका काररा यह है कि पूजीवादी सिद्धान एवं एसे समाज में भी सभी कायम है जो इतना अधिा जैव मघटन वाम्प प्राप्त कर चुका है कि अब म इन मिद्धाना का कोई म्यान नहीं देना चाहिए। बिल म्पप्ट वान है कि एक सुव्यवस्थित समाज म काफी सस्था म व्यक्तिया द्वारा दशताहीन तकनीका पा पायम रखकर मुनाफा कमाना अनम्भव हो जाना चाहिए । यह भी बिल्ट स्पष्ट है कि मवाधिन कुगल तकनीक का प्रयाग चाल किया जाना चाहिए और उनके चार हान व कारण किमी भी मजदूर का किसी प्रकार की हानि ना हाने दनी चाहिए। अब मैं एक एसे विषय का रेता हूँ जिमका सम्बध व्यक्तिया से और अधिक घनिष्ट रूप से है । मरा तान्पय मानिस में यात्मविस्तार से है । अभी तक तो यह समया जाता रहा है कि निपिद्ध सम्बघ काटिया में पर काई भी स्त्री और पुरुष परम्पर शादी करन वे अधिकारी है, और गारी कर रन के बाद उहें इस बात का भो, यदि क्तव्य नहा ता, अधिकार अवश्य है कि प्रकृति उन्हें जितने दच्चे र सरे उनुने दच पंता करें। यह एक ऐसा अधिकार है जिसे भविष्य का वनानिक समाज गाय- बर्दाश्त नहीं कर सकेगा। पिसी भी विशिष्ट औद्योगिक और वृषि-सम्बधी तकनीक से नम्पन राज्य में जन- मन्या को एक निश्चिन अधिकतम सय्या हाती है जो उमा भौतिक कल्याण को मुरत रगती है जनसम्या वे बढ जान अथवा वम हा जगन पर वह भौतिक' ममृद्धि सम्नव नहीं होती। नय दशा का छाडकर मामा यत जनसम्या इस अधिक्तम मघनना म अधिक हो रही है यद्यपि मास पिछले एक दाना म इमका अपवार रहा है। ग्नि परिवारा म जायद की पघि उत्तराधिकार म हान वाली हा नवा डोहार, जनमय की अधिकता के कारण छोटे परि- धार के माम्या का लगभग उतनी भी कठिनाइया परनी पत्नी हैं चिनी रिनी बरे परिवार व माम्या कोइमलिए जाना जनमम्या में वृद्धि वान हैं वे न पवर अपन बच्चों का हानि पटवाते हैं बन्लि ममूर्य समाज का नुकसान वरन हैं । इसलिए यह कल्पना की जा सकती है रि जम ही धार्मिक पूदारह वापर न रह जागे कम ही यावयता परन पर समाज का अधिक मतान उत्पन वरन म रोवेगा । यहा प्रश्न पुछ और अधिक सतरनार रूप में निभिन्न राष्ट्रा और विभिन्न जानिया व बीच भी पदा होगा। कोई राष्ट्र पसा ममयेगा कि अपन विराधी राष्ट्र को अपना देशम जमन्दर कम हान वे पारण उमकी मनिन घेता ममाप्त हो रही है तो वह एमी म्पिति म अपन यहाँ अमर बनान के लिए गायो उत्साहित करगा, जसा कि पिया भी ग घुमा वज्ञानिक परिहरि है, किन्तु जब यह कदम भी कारगर न सिद्ध होगा, जसा कि सम्भवन निश्चित है, तर विरोधी राष्ट्र म जम दर को सीमित करने की माग की जाएगी । यति सभी एक अन्तर्राष्ट्रीय सरकार स्थापित हो पाती है ता वह एसे मामला पर विचार करेगी, और, जैसे आजवर सयुक्त राज्य अमरीका म आन वाले राप्तीय प्रवासियो के रिए कोटा निश्चित है सो उसी प्रकार इस दुनिया में आने के लिए राष्ट्रीय प्रवासिया के काटे भविष्य म निश्चित किए जाएगे। निधारित संख्या से अधिक पदा होने वाले बच्चा का सम्भवत शिशु हया का शिकार बनाया जाएगा। यह प्रया आधुनिक प्रथा से कम निदयतापूण हागी, आज तो लोगों को युद्ध मे अथवा भूख से तडपाकर मारने की प्रथा चाल है। फिर भी मैं भविष्य के सम्बन्ध में केवल एक प्राक्कल्पना कर रहा हूँ उसका समयन नहा पर रहा। जनसरया के परिमाण की भाति ही उस गुण की मात्रा पर भी सार्वजनिक नियमन नियंत्रण होना सम्भव है। अमरीका के कुछ रा मा म तो जो लोग मानसिक विकृति वारे होत है उनका अनुवरीकरण जायज है और इगलण्ड में भी व्यावहारिक राजनीति के क्षेत्र मे ऐसा ही प्रस्ताव उपस्थित है । यह तो महज पहला कदम है। नाशा की जा सकती है कि नस जसे समय योतेगा वसे वस अधिकाधिक प्रतिगत जनता का मातृत्व और पितृत्व की दृष्टि से मानसिक विकृति वाला माना जाएगा । जो कुछ भी हो यह ता स्पष्ट हो है कि जो माता पिता यह जानने हुए भी fT भावी बच्चे के मानमिक दृष्टि से विकारग्रस्त होने की पूरी पूरी सम्भावना है वच्चा उत्पन करत हैं व उस बच्चे और समान के प्रति अयाय करते है। इसलिए उनको ऐसा करन स रोक्न के विरुद्ध स्वतत्रता का कोई भी ऐसा सिद्धात नहीं है सिरा समयन किया जा सके। स्वाधीनता में कांट छोट करन का सुझाव दत समय होगा तारित पृथप प्रश्ना पर विचार करना आवश्या होता है । पहा प्रश्न ता यह है fr एसी काट छाँट यदि बुद्धिमानीपूवक की जाए तो, क्या सावजनिव हित म हागी? और दूसरा प्रश्न यह है कि यदि एसी पाट छोट बुट जान और विपयस्त बुद्धि के साथ की जाएगा नो भी क्या उसस मावजनिर राम हागा सिद्धात को दष्टि स य दोना मन एर दूसर स बिपुर पृथर हैं, किन्तु मरवारा की दृष्टि से तो दूसरे प्रश्न वा कोई अस्तित्व ही नहीं है, क्यानि हर सरसार को पूरा दिवाम रहता है कि वह अनान और बुद्धि विषय से विरतुल मुक्त है। पन्त जहाँ तक परम्परागत पूर्वग्रह उम पर राज नहा लान, वहाँ तर प्रत्यक सरखार लोगारी स्वाधीनता म जितना हम्त प उचित और विवर पूष है उपस भी अधि हस्तभप करन वा समयन परेगी। इमलिए जर यभी यष्टि और समष्टि १७५ हम यह विचार करें कि संद्धाति दृष्टि से स्वाधीनता मे पौतस हस्तक्षेप सचित और न्यायसगत है, जसा कि इस अध्याय मे हम कर रहे है, तब यह निरप निकालने म हम कुछ सकोच बरना चाहिए कि ऐसे हस्तक्षेपो वा व्यावहारिक क्षेत्र मे भी समयन क्यिा जाना चाहिए। फिर भी मैं समझता हूँ कि स्वाधीनता मे जिस प्रकार के हस्तक्षेपा का कोई सद्धातिर औचित्य है समय बीतने पर उन सभी हस्तक्षेषा का व्यावहारिक रूप में अपनाया जाना सम्भव है । सका कारण यह है कि वैनानिक तकनीक प्रमश सरकारों का इतना सबल बनाती जा रही है कि बाहरी लोगो की राय पर विचार करना सरकारें जरूरी नही समयती। इसका परिणाम यह होगा कि जहा कहाँ सर- वारा का व्यक्तिगत स्वाधीना म हस्तक्षेप करने का काई उपयुक्त कारण निसाई देगा वही व ऐसा हस्तथप करने म समय होगी और इस प्रकार का हस्तक्षप इसीलिए, जितना होना चाहिए उससे कहीं अधिक होगा। बजानिक तकनीक, इसी कारण एक एमी सरकारी निरकुता लगने वाली है जो समय बौनन पर घातक सिद्ध हो सकती है। म्वाधीनता की भानि हो, ममानता का मेर' भी वैनानिक तकनीक के साथ मिरना कठिन है, क्योकि वनानि तपनी म दिपना और अधिकारिया का काफी वडा समुदाय आवश्यक होता है जो बटे-बडे मगठना का निमंत्रण अधिप्ररण और सचारन करता है । राजनीति के क्षेत्र म रोकतान्त्रिक स्वरूप भले ही पायम रखा जा सके, लेकिन उस स्वरुप म उतनी अधिक वास्तविकता नही हागो जितना भूस्वामिव बाल छोटे छोट पिसाना के ममाज म होती है। अधिकारी अनिवायत वितणारी होत हैं। और जहा अनेक महत्त्वपूर्ण प्रश्न 'नातानीको हो कि मामाय व्यक्ति उह समय सबने की आाही न कर सरे वहाँ विशेषना को अनिवायत काफी नियंत्रण प्राप्त हो जाता है। उदाहरण के लिए मुद्रा और साप के मन का ही रें। यह सच है कि सन १८६६ म विलियम जेनिंग्स बयान ने मुद्रा का चुनाव का एक प्रश्न बना लिया था रविन उन पाम वोट दन वारे रोग वही थे जो उर हर सूरत में वोट दत चुनाव का विषय उहोन चाह जो प्रस्तुन दिया हाना। अनेक मम्मानित विपना के अनुमार आधुनिक ममय म मुग और माप व प्रान की गरत ढग स ह निध जाने के कारण अतुलनीय कठिनाया और मुमीबतें पदा की जा रही हैं रेक्नि मतदाताओ के सामने इस प्रश्न को रिमी भावावगपूर्ण और यवनानिक पये अलावा अय विमा रूप म प्रस्तुत पर मकना समम्भव है वेवर एक हा तरीरे से चुछ किया जा सकता है और वह तरीरा है-जो अधिकारी बडे-बने पेद्रीय वामा नियत्रण परत हैं उह राखी करना । जव तर पराग ईमानदारी वे साय और परमरा व जनुमार काम करते हैं तब नर समाज उनमा नियत्रण वज्ञाशिक परिदृष्टि नही कर सकता, क्योंकि यदि वे गलती भी करते हैं तो बहुत कम लोग उस गलती को जान पाएंग। कुछ कम महत्वपूण एक दूसरा उदाहरण लें-जिस किसी भी यक्तिरेलो पर सामान के यातायात सचालन अमरीको तरीकों के साथ ब्रिटेन के तरीको की तुलना भी की है वह जानता है कि अमरीकी तरी जयत श्रेष्ठ हैं। वहीं व्यक्तिगत दूर नहीं हैं और रेल की दरें एक मानक आकार की हैं जिनम चालीम टन माल जा सकता है। इगलंपड म तो हर चीज अस्त व्यस्त और अयायत है और व्यक्तिगत दुवो के उपयाग से बहुत अधिक वरवादी होती है। यदि यह व्यवस्था सुधागे जा सके तो भाडा कम किया जा सकता है और उपभोक्तावा राम हो सकता है, लेकिन यह कोद ऐसा मामला नही जिसका स्वर चुनाव लडे जा सकें माकि इसम रपटत न तो रेल कम्पनिया को लाभ होगा और न रेल बमचारिया को। मदि कभी बुछ और अधिr एवरूप व्यवस्था लागू की जाएगी तो वह सरकारी अधिकारिया द्वारा रागू की जाएगी, न कि लोक्त त्रीय माग रे फलस्वरूप । समाजवाद अथवा साम्यवाद के अधीन भी वैज्ञानिक समाज उतना ही अल्पतात्रिय होगा जितना पूजीवाद व अधीन, क्योकि जहाँ वही तोवतात्रिक पद्धतियां मौजूद हैं वहा भी सामाय मतदाता को न तो आवयक नान को ही उपाध कराई जा सकती है और न उसे निर्णायक मोड़ पर मौजूद रहने म हा समथ बनाया जा सकता है । जो लोग आधुनिक समाज को जरिल यात्रियता को समयते हैं और जिनम उपक्रम और निणय पग्ने की आरत है, वही 7m अनिवायत काफी हर तब घटनायो की गतिविधि का नियत्रण परेंग । माय किसी प्रकार ने राज्य की अपेक्षा यह बात एक समाजवादी राय बारे में शायद और भी अधिक राग होती है, क्याकि एक समाजवादी राय म आर्थिव और राजनीतिक पाक्ति एक ही प्रकार वे लगा वे हाथो म येद्रित हो जाती है, और जिस राज्य में व्यक्तिगत उद्योग रहता है उसकी अपक्षा समाजवादी राज्य म राष्ट्र के आथिर जीवन का राष्ट्रीय स्तर पर सगठन सचालन अधिन पूर्ण होता है। इस अलावा प्रचार और विनापन ये साधना पर अप किसी राज्य की अपेक्षा एवं समाजवादी राय वा निमरण और भी अधिक व्यापर हो सकता है जिसके परिणामस्वरुप राज्य के हापा मग वान को और भी अधिक शक्ति होगी कि जो कुछ वह लागा को बताना चा* वही व जान, और जा कुछ राज्य उर न बताना चाहे उसे व न जााँ । इसरि मुग तो कुछ एसा लगता है कि स्वाधीरता की भांति हा स्वतन्त्रता भी १९वी मनाली में एर सपन स अधिर और कुछ नहीं है । भावी जगत म एक नासा वग होगा, जो मम्भवत आनुपतिक नहीं होगा वन्धि क्योरिव चच गाममा से अधिक मिरता जुरना होगा ) और जसजसे इमाम वग पा अधिकाधिन मान और विश्वारा प्राप्त स्पष्टि और समष्टि हाता जाएगा, वसे वैमे वह व्यक्ति के जीवन में अधिकाधिक हस्तक्षेप करेगा, और इस हस्तक्षेप को लगा द्वारा वदति रान की अधिकाधिक तबनी सोमना जाएगा । यह आशा की जा मस्ती है कि टन शासका के उद्देश्य सुदर हांगे और उनका आचरण सम्माननीय होगा यह भी आशा की जा सकती है दिय रोग बहुविन और उद्यमी हांगे, किन मेरे विचार से यह माशा नहीं की जा सकती दिवा अपनी शक्ति का प्रयोग करन से केवल इस आधार पर विरत हांगे कि व्यक्तिगत उपक्रम एक अच्छी चीज है अथवा इम आधार एक बरतत्र अपन दामादे सच्चे हिता का विचार सम्भवत नहा कर सकता, यानि जिन रोगो म इस प्रकार के आत्मनियंत्रण की क्षमता होगी में दाति और अधिकारपूण पदा तक पहुंच नहीं पाएंगे। ऐसे पद तो, वशानुगत होने की स्थिति को छोडकर, केवल उही लोगा का प्राप्त हो सकते हैं जा कजरवी हात हैं और जिनकी बुद्धि सदेहा से मुक्त होती है। इस प्रकार का नामक वग कमे संसार की सृष्टि करेगा। अगर अध्याय में मैं इसी प्रश्न के उतर का कुछ अप्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा। पर कि चौदहवां अध्याय वैज्ञानिक सरकार जब में वनानिक सरखार की बात करता हूँ तब शायद मुझे यह स्पष्ट कर दना चाहिए कि 'वज्ञानिव सरकार' से मेरा तात्पय क्या है । मरा मताव पवर ऐसी सरकार में नहीं है जिसम सभी लोग वनानिक' हा । नेपोलियन यी मरवार मे बहुत-से वैज्ञानिक रोग थे जिनम लाप्लेस भी शामिल थे, लेकिन राप्लेस इतन अक्षम और अयोग्य सावित हुए कि थोडे ही समय म उहें निकाल देना पडा । मरी समझ म, जब तक लागेम मेपोलियन की सरकार में थे तब तक उसे एक वैनिक सरकार मानना, और उनके निकर जाने के बाद उसे अपना निक सरकार मानना ठीक न होगा । मरे विचार से वनानिक सरकार की परि भापा इस प्रकार की जा सकती है कि जिस माना म कोई सरकार वाडित परि णाम उत्पन कर सकती है उसी मात्रा में वह कम या अधिक वनानिर है। जिनने ही अधिक परिणामो की कामना और उपलधि काई सरवार र सक्ती है उतनी ही अधिक वानिक वह है। उदाहरण के लिए अमरीका का मविधान बनाने वाले व्यक्तिगत सम्पत्ति की सुरक्षा की व्यवस्था करने में तो वनानिक थे, किन्तु राष्ट्रपति के प्रत्यक्ष निर्वाचा की अवस्था राम वरन का उनका प्रयत्न अवनानिक था। जिन सरवारा ने महायुद्ध छेडा था व अवमानिक थी, क्यारि उस युद्ध के दौरान उन सभी का पतन हो गया। फिर भी इसका एक अपवाद या सबिया जो पूणत वनानित था, पारि युद्ध का परिणाम ठोर वही हुआ जिमकी कामना सेराजेवा हत्याकाण्डा के समय सविया की शासनास्ट सरकार ने - की थी। भान की वृद्धि के कारण आजवल पहले की अपक्षा सरपारा के गि अत्यधिक वाछिन परिणाम उपर व कर सकना सम्भव हो गया है। जो परि णाम आज अराम्भव समझे जाते हैं उह उपर घ वरना शायद गीत ही गम्भव हो जाएगा । उदाहरण के लिए, गरीबो का पूण विना इस समय तकनीकी रष्टि से सम्भव है इसा मतलब यह है कि उत्पादन व पात तरोगा वा यदि युद्धि मानीपूना उपयोग किया जाए तो उनसे इतनी वस्तुए उत्पन्न सेना समनी हैं जो समूचे भूमण्टर को जनसम्या को मामा सुख-सुविधापूर रसोय रिए पर्याप्त हैं। लेकिन तरनाकी दृष्टि में यद्यपि यह सम्भव है, फिर भी वज्ञानिय सरकार १७६ मनोवैनानिक दष्टि से अभी यह सम्मव नही है । अतराष्ट्रीय विरोध बग विराध और व्यक्तिगत उद्योगो की अराजक्तामूल्य व्यवस्था इसम वाधाएं डालती हैं और इन वाघाआ का दूर करना इतना आसान काम नहीं है। रोगा का कम करना एक एमा उद्देश्य है जिसकी पूर्ति के माग म पश्चिमी देशो म कम बाधाए आती हैं और इसीलिए वहा इसकी पूर्ति का काम अधिक सफरनापूवर क्यिा जा सका है । लेकिन समूचे एगिया म इम उद्दश्य के सामने भी वडी-वडी बाधाएँ आती है । क्षाण मस्तिष्क वाले रोगा के अनुवरीकरण को छोडकर, मृजनन वितान तो नभी तक व्यावहारिक राजनीति का विषय ही नहीं बन सका लेकिन अगल पचास वर्षों के भीतर ऐसा हो सकता है । जमा कि हम पहले दम चुके हैं, भ्रूण पर सोधे कारवाई किए जान के तरीका द्वारा जब भ्रूण दिनान और अधिक विवामित हो जाएगा, तव मृजनन वितान पृष्ठभूमि म जा सकता है । य सारी बातें ऐसा है जो स्पप्टत साध्य होत ही ऊजस्वी और व्याव हारिक आदावादिया को बहुत प्रभावित करेंगी। अधिकाग आदरावादी दो प्रकारा के मिश्रण होते हैं जिह हम क्मश स्वप्नदर्गी और जोड-नोड करने वार कह सकते हैं । शुद्ध स्वप्नी तो पागल होता है और शुद्ध जोड-तोड करने वाला एसा व्यक्ति हाता है जो क्वल अपनी व्यक्तिगत शक्ति की चिन्ता करता है कि तु आदरावादी इन दोनो अतिवादी छोरा के बीच की स्थिति म रहता है । उमम कभी कभी स्वप्नदर्शी प्रबल हो उठता है जौर कभी-कभी जाड ता करने वारा । विलियम मारिस नो 'यूज माम नो व्हयर के मपन देसन म आनद मिलता था लेकिन तब तक कोई सन्लोप नहीं मिला जब तक वह अपन विचारो को वास्तविकता का जामा नही पहना सरे । दोना ही प्रकार के बादा यानी जिस जगत मे व हाते हैं उमस भिन उगत की कामना करते हैं किन्तु जोड तोड करने वाला इतना ससक्त हाता है कि वह अपने वाछित जगत की मृप्टि कर लता है जबकि स्वप्नदगी हैरान होकर कल्पनारोक दी गरण लेता है । वनानिक समाज की मृष्टि करने वाला वह बागवादी हागा जो गाड-तोड करने वाला भी होगा । हमारे जमान म एमे लोगा के आदा उदाहरण हैं लनिन । युद्ध व्यक्तिगत महत्त्वाकाथा बारे पनि स जोड-नोड करन वाला आगवानी इस दष्टि मे भिन होता है नि वह न कवर कुछ चीजें सुर अपन लिए चाहता है बल्यि एक विशप प्रकार के समाज की भी कामना करता है। साम्बर यो स्ट्रपड वाद यापरण्ड का राड स्पटीनट बन जान स या रॉड ये बात बदरवरी या आदिप बनन म बाद मन्तार न मिरता । उमवे मुग व लिए यह अत्यन्त सावन्या या वि दापड एक दिप प्रकार का देश यने पद यही नहीं कि वह स्वप दल म प्रमुख बन जाए। यह मवैयक्तिक वामना हो एव आदावाला का दूसरे रोगास मिन बनाती है । इस प्रकार व १८० धनानिक परिदृष्टि गोगा के लिए शन्ति के बाद से इस म जितना अवसर उपलब्ध हुआ है उतना अय किसी देश मे विमी भी समय नहीं हुना, और जितना ही अधिरचनानिक तकनीक पूर्णता प्राप्त करती जाएगी उतना ही अधिक अवसर एसे गा पा हर कही प्राप्त होगा। इसलिए मुझे पूरी आशा है कि अगले दो मो वर्षों म इस मसार को नया रूप देने में इस प्रकार के लोगो को एक प्रमुख भूमिका मा करनी होगी। आधुनिक युग मे वनानिका में से जिह व्यावहारिक आदावादी वहा जा सकता है शासन की समस्या के सम्बंध में उनका दष्टिकोण 'नेचर' (६ सितम्बर, १६३०) म प्रकाशित एक अपरेख में स्पष्ट रुप मे व्यक्त किया गया है। नीच उसके कुछ उद्धरण दिये जा रहे हैं दिलान की प्रगति के लिए स्थापित निटि एसोसियान पार दि एडवाममेट आफ साइम न सन १८३१ म (जब उसकी स्थापना हुई थी) अभी तक जो परिवतन देखे हैं उनम स एव है विनान और उद्योग के बीच के अन्तर का धीरे धीरे गायब हो जाना । जसा कि राड मेल्ट न हाल ही में अपने एव' भाषण में कहा है, शुद्ध विनान और प्रायोगिक विमान के बीच विभेद करने का प्रयान अब अयहीन हो गया है। विनान और उद्योग के बीच कोई स्पष्ट विभा- जन सम्भव नही है । सवाधिक चितनमूलय गोधकार्यों के परिणामों से प्राय महत्त्वपूर्ण व्यावहारिक परिणापा को उपलब्धि हाती है। अब विटा को इम्पोरियल कमिकल इस्टी, लिमिटड, जैसी प्रगतिशील पमें उम पद्धति का अनुगमन करती हैं जो जमनी में बहुत पहले से प्रचलित रही है और जिसम विश्वविद्यालया म होने वाले वनानिक शोध काय के साथ घनिष्ठ सम्बध स्थापित लिया जाता है । फिर भी, यदि यह बात सही है कि पिछले २५ वो म विनान ने उद्योग के क्षेत्र म नतृत्व का दायित्व तजी के साथ स्वीकार कर पिया है, तो अब उनम और भी व्यापक दायित्व स्वीकार करने की माग की जा रही है। आधुनिक सम्पता की परिस्थितियो म मामा य समाज की मानि उपयोगा का भी प्रायोगिक विज्ञान पर ही अपनी निरतर प्रगति और समद्धि के लिए निभर रहना पड़ता है । आधुनिर वनानिक अवपणा और उनवे प्रयोगा में प्रभाव से नवन उद्योगा के क्षेत्र म बनिय अनेक दिलाया मे भी समाज मारापूण आधार तेजी के साथ सानिक होताजा रहा है और राष्ट्रीय प्रशासन के मामने जो भी समस्याएं आती है-पाहे वे यायपारिका म सम्बधित हा और चाहे वाय पारिया स-गवम एम तत्व निहित रहत है जिनर मुग्लाने व लिए बनानिर भाग की आव"पाता होती है । हाल के कुछ वर्षों म अनराष्ट्रीय सवाद-सर और परिवहन मे तनी वजानिक सरकार के साथ जो तमाम तरह की प्रगति हुई है उमन द्योग के सम्पूर्ण दष्टिकाण और मगठन को पाश्चयजनक रूप में अन्तर्राष्टीय बना दिया है । साथ ही इन्ही गनिया न गत नौनिया के कारण उत्पन्न होन वाले दुष्परिणामों की व्यापकता भी बढा दी है। हाल म दिए गए इतिहास-सम्बधी शायकाय स यह सिद्ध हा गया है मि दक्षिण अफ्रीका की यूनियन के सामन आज जो कटिन जातीय ममस्याएँ उपस्थिन हैं तीन पीडी पहर गजनीतिक पूबा हा वे धारणनिधारित की गर गलत नीतियाक परिणाम हैं । आधुनिक ससार म पूर्वग्रह के कारण नया निप्पथ और वनानि जाच को अपना करने के काण की जान दारी गर- तिया स उत्पन खतरे मयत गम्भीर हात हैं। जिम युग में प्रशासन और विकाम का प्राय सम्पूण ममम्याला मनानिक तत्व निहित रहन हैं “म युग में प्रामनिक नियम से लोग के हापा म सोपन का सारा मन्य जात नहीं उठा साता जिद दिनान का पयाप्त पान स्वन प्राप्त न हो । माधुनिक परिस्थितिया म, इमोरिए, पान की सामा रसा विस्तृत करन বী সুধা নষ্ট ঔ ধ্বণিী আশা অশানিৰ শ ম নাম কাল বাস ম की जाती है। अब उह इस बात म सलाप नहीं मिलना चाहिा कि अपन सवपणों के परिणाम हमरा के हाथों में मौंप दें और उनका उपचाग मनमान ढग से अनिति पम करने द वनानियाप कार्यों सानियां उपर प हुई है उन नियन्त्रण का दामि च भी बनानिकरावा म्वीकार करना हो चाहिए। শনাথ শান সী লাহিনী সদস্য শানিৰ ৰা মামলা দ बिना वस्तुन असम्भव है। गरत र क सामने जो व्यावहारिक समस्याए उपस्थित हैं उनम में सर्वाचित पठिन एर समस्या है विनान और राजनीति बीच पान बार पति के चोच, अथवा अधिर मटी TEAR पर तो वैवानिर कायस्ता और समाज के जीरन के नियात्रा तया प्रशासन वीच ठार-टीर मम्बया की स्थापना की ममम्या ।विरिण एमासिएशन सम्या म समान यह आशा करन का अधिकारी है कि वे लोग एमी ममम्या पर कुछ विचार करें और उन पारा पेमबघ म मागान करें जिनम विगन अपन उपयुक्त नव का पद प्राप्त यह एक महत्त्वपूर्ण बात है वि जहाँ राष्ट्रीय मामा म नानिर वाय- बना अपमान समबममय मिद हुए हैं वर्ग इसरे विपरीत बनर्राष्ट्रीय क्षेत्र में पुर में समय में विसपनों का परामा ममिनिया न विपापिनी शक्ति मे नितान्न पय हात हुए भी वारयना और मा प्रभाव हाग है। राष्ट्रमय (ोग आप नाम) द्वारा माहित विपन समितिया का इस बात बाप है तिमीगोrimafr वज्ञानिद परिदृष्टि दिवाग्मिान मे और अस्तव्यस्त हान से बचा लिया गया तथा इतिहास म हुए सबसे बड प्रवजन व परिणामस्वरूप जो उगमा १५ लाख व्यक्ति शरणार्थी वन गए ये उनकी बारी की समस्या हल पी जा सकी। फिर भी इन समितिया या चाय पेवल परामश देना था। इन उदाहरणा से पयाप्त रूप मे यह तथ्य मिद्ध हा जाना है कि, यदि जावश्यक प्रेरणा मि और उत्साह हा ता वैनानिय विपिन एमी स्थितिया में भी अपना सफर प्रभाव डाल सकते हैं जव सामाय प्रशासनिर प्रयन असपर हो चुपे हा और जब राजममना द्वारा विमी समस्या को वस्तुल असाध्य मानकर टार लिया गया हो जमा कि आस्ट्रिया के मम्ब प म दिया गया था। सचाई ता यह है दिनमान २ भी और उद्योग के क्षेत्र म मी वैजा- निन वायनामा का एक विशिष्ट अधिकारपूप पद प्राप्त है, और प्रसनता की वान है कि इस तथ्य यो अव वनानिक कायक्ता स्वय भी स्वीकार करत हैं। इस प्रकार गत वप केमिकर मोमाइटी के मामन (लीडस म) अपना अध्यक्षीय भापण नेते हुए प्राफेमर जोमलिन थाप न यह सवेत किया था कि अब वह जमाना नजदीर गा गया है जिसम मटित उद्यागा द्वारा अनुमोति नोनिया को छोडकर अप मामला म सरवारा दे यदल्न रहन वात यनुमान महत्वपूर्ण नोनियो का निधारण नहा पर मग और विमान तथा उद्योगा के घनिष्टतर संगठन का समयन परत हुए उन्हान एमे सगरन स प्राप्त होन वारी गजनीनिर किन पर जार लिया था। विरिण एमामिएगान मामन जो नियम (दि स्त्रीनिर आप साऊथ एक काम गन पायर-गागवारा स माग्य की रक्षा) है उमस म दादा और भी प्रमाण मिलना है कि दनानिय वायना सामानिक आर नौद्यागिर सुरक्षा मामला म नेतृत्व या नायित्व स्वीकार कर रह है। ब्रिटिश एमोमिएन को बठक वैनानिष वापरताना को अपने साथ पाय चगन म चाह जो प्ररणा अथवा प्रामाहन दें, यह एमामिएन मानवना पी और अधिक उपयुक्त मवा कर सकन के लिए इससे अगदूसरा इरास्ता नहीं अपना मक्ता निवनानि चायनाआ या समाज तया उद्या ये सन म व्यापर नव व उन दायिया या स्थावार बरन व रिए प्रेग्नि कर और उनमा आदान परे जिन दायित्वों को स्वीकार करना बानिका प्रयनारे शारण हो अनिवाय हो गया है। पर जा घुछ लिखा गया है उसम यह स्पष्ट हो जाता ह मिनिा ग समान प्रति अपन उन दापिदा कममधम मजग हात जा रहा उनक पान शारण उन पर आ पड हैं और पहा की अपार मावननिर शार्मों निर्देशन म अधिर भागना अपना पम्प ममपन ग हैं। जा व्यक्ति वानिय दृष्टि म मटिन ममार मान पना है और वज्ञानिक सरकार - अपने सपना को व्यवहार के क्षेत्र में उतारना चाहता है उसके सामने अनव बठिनाश्या उपस्थित मिलनी हैं। एक विरोध तो जटता और पुराने अभ्यास द्वारा प्रस्तुत होता है। लोग जिस प्रकार का व्यवहार हमेशा से करने जाए हैं वैसा ही व्यवहार करते रहना चाहते हैं हमेशा से जस रहते आए है बस हा रना चाहते हैं । फिर निहित स्वार्थों द्वारा विरोध किया जाता है। सामन्ती जमाने मे जो आथिक पद्धति घरी आ रही है वह कुछ ऐसे लोगों को सुविधाएँ देनी है जिहोंने अपने आपको उन सुविधामा दे उपयुवा बनाने के लिए कुछ भी नहीं दिया हाता, और यही लो मौलिक परिवतन के माग मे काफी बड़ा बडी बाधाएं उत्पन करन म ममय होते हैं यानि वै धनी और शक्ति सम्पन होने हैं। इन शक्तिया के साथ साथ कुछ आदावाद भी परिवतना का विरोध करता है। ईसाई नौनिशास्त्र कुन आधारभूत मामलो म बनानिक नीनिगरात्र के विरुद्ध है पर वैज्ञानिक नीतिशास्त्र धीरे धीरे बढता जा रहा है। ईमाइ घम म पक्तिगत आमा के महत्त्व पर जोर दिया गया है, और बहुमर के किसी गूढ फ्ल्याण लिए किसी एक निर्दोष व्यक्ति का निदान करन को अनुगास्ति देने लिए तैयार नहीं है। सक्षेप मे ईसाई धम अराजनीतिक है और यह स्वाभाविक भी है क्योकि इसका विरास एस लोगो के बीच हुआ या जो राजनीतिक गति से तय थे। वनानिय तक नौर सम्बन्ध में जा नया नीतिशास्त्र धीरे धीरे विससित हो रहा है उसम “यक्ति को अपेक्षा ममार पर अधिर हप्टि वैद्रित रहेगी। अपराध और दण्ट सम्बन्धी अधविश्वास के लिए उसी काई म्यान न होगा, बलि सा नीति पास्त्र सावजनिर बल्याण के उद्देश्य से व्यक्तियो को कष्ट पहुँचान लिए प्रस्तुत होगा और इसपे रिए ऐस कारणा को गढन गे भी चिता नहीं भरेगा जिनका उद्दय यह मिद्ध भग्ना हा दिने व्यक्ति कष्ट पान के पात्र । इस अथ म यह नीतिशास्त्र निदयो होगा और परम्परागत विचारा के अनुसार अननिर होगा २ पिन मण समाज को एर सम्यक रुप में देषन समापन र अभ्यास से यह परिवनानम्वभावत सिद्ध होगा। समाज को व्यसिया का मारन या समुदाय नही माना जाएगा। उाहरण लिए मानव शरीरको हम एक सम्पर पम दमन ममयते है और यदि शरीर के किसी अगदोबाटना करी होता है तो 37 अग को पटा पुष्ट गिद्ध परना हम जारी नहीं समझत । सम्पूर्ण शरीर के बयाण काहीहम मर प म पर्याप्न तर मान रन हैं। इसी प्रकार जोति सम्पूण ममाज को गम्यत पम दारता-समयता है वह समाज के विमो भी मरस्प को गिना डाव्यतिपात या वर अधिष विचार पिए, सम्पूण ममाज याग विशि पर दरयुद्ध मना रावण यही नीति व्यवहार मराई गई है क्यारि युद्ध एर सामूहिक्ष उद्योग बैज्ञानिक परिदृष्टि होता है। सावजनिक हित के लिए ही सिपाहियो को मौत के मुह म योंक दिया जाता है, यद्यपि यह बात कोई नही कहता कि वे सिपाही इम योग्य हैं कि उहे मार डाला जाए। लेकिन युद्ध के अलावा अन्य सामाजिक प्रयोजना को अभी तक लोगो ने उतना महत्व नहीं दिया है और इसलिए उस प्रकार के बलिदान दन मे भी हिचरते रहे हैं जो उह न्याय-सगत नहीं प्रतीत हुए । मैं समझता हूँ कि भविष्य के वनानिक आदशवादियो के लिए इस सोच विचार स मुक्ति पाना सम्भव होगा, न केवल युद्ध के समय बलि शाति काल म भी। जिस विगध मा उह मामना करना पडेगा उसे परास्त करने के लिए उन मोगा को अपना एक पंचारिक अल्पत सगठित कर देना होगा जसा कि स्म म कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा सगटित किया गया है। लेकिन पाठक पूछेगा कि यह मब होगा कसे ? क्या यह केवर अपनी इच्छा-पूर्ति की कामना से प्रेरित हवाई कल्पना नहीं है, जा व्यावहारिक राज नीति मे नितात परे है ? में ऐसा नहीं मोचता । पहली यात ता यह है कि जो भविष्य मुझे दिखाई दे रहा है वह स्वय मेरी इच्छा के भी आशिक स्प म ही अनुकूल है । मुये तो भव्य व्यक्तियो को देखकर अधिक प्रसनता होती है, शक्तिशाली सगठनों को देखकर मुये उतनी प्रमाता नहीं होती, और मुझे भय है कि अतीत की अपेक्षा भविष्य म भव्य व्यक्तियों में पिए बहुत बम स्थान रह जाएगा। इस तिात व्यक्तिगत राय को छोड, जिस प्रकार की बनानिव सरकार को मैं पल्पना कर रहा हूँ ऐसी सरकार ससार यो जिन तरीका से उपरब्ध हा सक्ती है उनकी कल्पना वरना फ्यादा आसान है। यह तो स्पष्ट ही है कि अगले महायुद्ध में यूरोप ध्वस्त हो जाएगा । सम्भवत यूरोप मी जनसख्या आधी रह जाएगी और यह आधी जनसण्या भी अराजक्तापूर्ण निराशा की स्थिति म होगी। ऐसी परिस्थितियो म समार को धनिक्त त्र की मुटठी में गुरक्षित पर स्ना अमरीका का काम होगा। इस प्रप्रिया का एक तात्विा यदम होगा समूचे यूरोप पर पयाप्त नियत्रण पर लेगा। पिछले वर्षों म जमनी म 'डाज आयोजना और यग आयोजना' जिम उग्र रूप में लागू की गइ थी, उमस भी अधिक उग्र रूप में समूचे यूरोप पर लागू की जाएगी यूरोप वामिया ग काम रेन के लिए और माधुनिकतम तकनीक और सगटा लागू परने के लिए वनानिक विपला यो रसा जाएगा। पहले जहाँ हरन रहा होगा उस स्थान पर अमरीकी नौसनिक बजा करेंगे और सेंट पारिजापर वे राण्डहर पर गगनचुम्बी इमारतें बनेंगी। इस प्रकार एक एसी विश्व मर र पी स्थापना होगी जिसम बडे-बडे धनिक्तवारिया को शनि प्राप्त होगी, तु ये लोग अधिक रूप में यह शक्ति विभिन्न प्रभार में विशेषता या गौंप देंगे । यह पल्पना की जा सकती है मिय घनिवनवानी नरम पान वैज्ञानिक सरकार १८५ - - पर पार धोर आरसा हो जाएग। अपनी गतिमा का जपने से कम वैभवशाली विसपनो द्वारा हथिया लिया जाना इर वदारत हागा और धीरे धीरे यही विशन ससार के वास्तविक नाम बन जाएंगे। मैं कल्पना कर सकता हूँ कि ये लोग अपना एक धनिष्ठ कार्पोरेशन बना लेंगे जिमका निपण नियमन तद त सम्मति के नाधार पर होगा जब तक उनकी सरकार को चुनौती देन वाले मौजूद रहेग, लेकिन बाद म गासका का चुनाव परीक्षामा और बुद्धि तथा साल्पाक्ति की परख के आधार पर दिया जाएगा। विगएलो के जिस समाज की मैं वल्पना कर रहा हूँ उसम कुछ थोडे. से विकृत बुद्धि और अराजक्तादी मनकी लोगो को छोडकर विनान के परम प्रसिद्ध सभी प्रमुख रोग शामिल हाग। इस ममाज के पास सम्पूण अद्यतन हथियार होग और देव इसी समाज को युद्ध-चो के मभी नय रहस्य बान हाग। इसलिए पुद्ध हागे ही नहीं क्याकि अवनानिन लागा द्वारा किया जाने वारा प्रतिरोध स्पष्टत निश्चित रूप में असफल होगा। विपना का यह समाज पिया और प्रचार का नियंत्रण परगा। यह समाज विश्व-सरकार के प्रति निष्ठा की fPा देगा और राष्ट्रीयता को भयर गप्दाह बना देगा । सरकार एवं अल्पता की होगी इसलिए वह अधिक जनममाज में अधीनता की भावना भर दगी और उपक्रम तथा आदेश निर्देश दने वा अम्माम कवर अपने सत्स्या तर सीमित रखेगी। सम्भव है कि अपनी शक्ति को छिपाए रखने के नए-नए तरीके यह सरकार ईजाद कर ले और रोतर पाको यथा वत बने रहने दे तथा धनिकता को इस बपना वा आनट रन दवि क तत्र वे स्वरुपो वा नियत्रा बडी चतुराई साथ वही कर रहा है। फिर भी धीर पोरे जस जम धनिस्तत्र सदस्य आलमी रहन के कारण मूग हात जाएंगे वह वैध उनी सम्पत्ति भी उनर हाथ से निकलनी जाएगी। यह सम्पनि अधिकाधिक मागा म सावजनिक सम्पत्ति होती जाएगी और सत्रा नियम विपनाका सरकार करेगी। इस प्रकार वाहा स्वरूप चाहे जो भी रह सम्पूण वास्तविरति उनमा हायाम वेदित हो जाएगी जो वनानिव जाड-नाडी पग जानत हाम्। चार यह सारीको भारी बहानी एर कोरी वन्पना पा ही चित्र है और भविष्य मजा बुध भी होने वाला है यह शायद एमा होगा जिसकी पूर्व पल्पना नहीं की जा माती। हा माना है कि वानिर सम्पता तत्पन अग्धामी सिद्ध हो । अनर एम कारण है जिनम यह दृष्टिबाय अमम्भाव्य नही प्रतीत हाता । इनम सर्वाधिक स्पष्ट कारण तो युद्ध हो है। कुछ ऐमा हुआ रि युद्ध वीरगम ए नवानतम आवितारा ने आश्मा कोक्ति को मुरमा का पित की अपभा बत अधिर बगरमा है और रानी दो सम्भावना नही १९६ वजानिक परिदृष्टि दिखाई देती पि प्रतिरक्षामूलप कलाएं अगर महायुद्ध स पहले अपनी पूब स्थिति पो प्राप्त कर सकें। ऐस रोग भा है जो क्रत हैं कि अगर महायुद्ध म किमी वो भी तटम्य नहीं रहने दिया जाएगा। य-ि ऐमी बात है ताम सभ्यता के जीवित रहन का येवर यही आगा बच रहनी है वि धोइ एम राष्ट युद्ध-क्षेत्र से ना वापी दूर होगा और इतना सबर भी होगा कि वह इस युद्ध की विभा- पिरा से अपनी सामाजिक सरचना ध्वस्त हान से बचा ल। यह स्थिति प्राप्त करने का सबसे अच्छा अवसर अमरीया को प्राप्त है कुछ सम्भावना चोन की भी है मयादि उसकी जावादी बहुत अधिक है और राजाता को वश्न क्ल की क्षमता भी उसम बहुत है । अगले युद्ध म यूरोप का जा विष- टन प्राय निश्चित है यदि ये दोना राष्ट्र भी उस विश्व यापी विघटन के forकार हो जाते हैं तो वतमान स्तर पर सभ्यता का पिर पहुँचते पहुँचते कितनी ही शनाया लग सकती हैं । यहि अमरीका ज्यों का या बच निकलता है तो भी यह आवश्यक होगा कि एक विश्व सरकार का सगटन तुरत प्रारम्भ किया जाए, क्यानि यह बात नहीं की जा सकती कि यह सभ्यता इसके बाद एक नौर विश्वयुद्ध को चोट वान रखे बच सकगी। एमी परिस्थितिमा म सभ्यता में पथ म सबस अधिक महत्वपूण शक्ति होगी अमरीकी पूजीपतिया को मह इच्छा कि पुरानी दुनिया के वन देगो म सुरक्षापूर अपनी पंजो रगा सके। यदि उ: केवल अपन महाद्वीप म ही अपनी पूजो लगान से सतोप हो गया तो भविष्य निश्चय ही अधवारपूर्ण होगा। एक घज्ञानिक सभ्यता स्थायित्व पर माह करन का मरा पारण म दर की गिरावट में उत्पन होता है। सर्वाधिर वनानिक राष्ट्र सर्वाधिक बुद्धिमान वग समाप्त होते जा रह हैं, और पश्चिमी राष्ट्रो म सम्यक् रूप में अपनी जनसम्पा बनाए रखन के अलावा और अधिर कुछ नहीं लिया जा रहा । पदि गाई कातिवारी पदम नहीं उठाए जात तो इस भूमर पर नाग जातिया की जनसख्या तीन ही कम होन लगगी । पामीमी लागा को पहरे हो से अमौकी सनिका का सहारा रेना पड़ रहा है और यतिनाग बागानी कम हो जाती है तो मोटा वाम अन्य जानिया को सौपन की प्रति यानी जाएगी अततो. ग वा इमरे परिणामस्वरूप विद्रोह हाग और यूराप की हारत हायिती की गो हो जाएगी। एमी परिस्थितिमा म हमारी वनानिय सभ्यता को जारी रखन रा पाम चीन और जापान के जिम्म आएगा, नि निा अनुपान म धीन और जापान इम वैज्ञानिक सभ्यता का प्राप्त करत जाग उमा अनुपात म उनी जाम-दर भी कम होता आएगी। इसलिए एष वानिक सभ्यता या स्थायी होना न तर अमभव ही है जर ना मनाना पनि का बाम पुत्रिम तरोग नहीं १ दपिए में रपट को पुनर, देशमा वार', न् १९३० ।

वज्ञानिक सरकार १८७ अपनाए जात । एम नरीवा के अपमान म यहुन रडी बाधाएं हैं ये बाधाएँ आथिक भी हैं और भावनात्मय भी । यति बनानिक सभ्यता को ध्वस्त हाने म वरना है ता इस माम मे उस युद्ध के मामले में भी उम और भी अधिक पतानिक होना पड़गा। यह पूर्वकल्पना कर सपना असम्भव ही है कि हमारी यह बताना मन्यता पर्याप्त तेजी के साथ और अधिक वानिक हो सकेगी या नहीं। हम यह देख चुके हैं कि वैनानिर सभ्यता के स्थायी होन के लिए विश्वग्यापी सगठन की आवश्यकता है। शासन के क्षेत्र म एस सगठन को सम्मा वना पर हा विचार कर चुये हैं। अब हम आर्थिक क्षेत्र म इस सम्भावना पर विचार करेंग। अभी तो जहा तक सम्भव है उत्पादन का सगटन राष्ट्रीय आधार पर ही दिया जाता है और इसके लिए प्रतिवधा का सहारा रिपा जाता है प्रया राष्ट्र जिन वस्तुआ वा उपभाग वरना है उनका उत्पादन भी ययासम्भर अधिकाधिक मात्रा म अपने राष्ट्र में ही करन वा प्रयत्न करता है। मह प्रवत्ति बरती जा रही है और ब्रिटन भी अपाहत रूप में आर्थिव अगावी गति को स्वीकार परके अपनी उस नीति को छोरता हुआ দীর हो रहा है, तिमय अनुमार मुक्त यापार द्वारा वह अपन निर्यात को अधिकाधिक चाने का प्रयत्न करता रहा है । ब, यह वान बिल्यु स्पष्ट है कि एक गद्ध आथिर दष्टिकोण से तो अतराष्ट्रीय नाधार न बजाय राष्ट्रीय आधार पर उपान का सगठन करन म वकार यरवानी होती है। यदि समूच ससार म प्रयाग मानवाती मोटर- भारा बा उत्पादन किमी एक स्थान पर-मान गजिए डायट में~~-किया जाए तो उसम बदल वचन होगा। इसका मतलब यह है कि ऐसी स्थिति म आज की अपना का भी कुछ निश्चिन विशिष्ट गुणो म मुक्त कार रम मानवीय धम सब करके बनाई जा सकगा। वजानिक ग स सगटित ससार म अधिकार औद्यागिर रत्पादन इसा प्रकार स्थानिर बना लिए जाएग । पिन और सुइया बनान के लिए या एवं स्थान होगा, बवियां और चाकू बनान के लिए कोई दूसरा स्थान हागा हवाई जहाज बनाने के लिए कोई तीसरा स्थान होगा और मेती औजार बनानगरिए कोई चौथा स्थान होगा, आदि। जिम विव सरकार की विचारणा हम कर रह है वह यविभो स्थापित होती है तो उस प्रायमिर बताया म म एक रम्य होगा उत्सादन वा अन्तर्राष्ट्रीय संगठन । आज की भांति उत्पादन म्यक्तिगत उद्योगपतिया ६ हाय म नहीं छोहा जागा, अलि पूरी तरह सरकारी मादा के अनुसार उत्पारन की व्यवरमा की जाएगी। यूर पाता जमी पुल चीजोक वार म तो आज भी यही स्थिति है, पावि युट ६ मम्दप म दाता महत्त्वपूर्ण माती जाती है जितु अधिकार माम! म १८८ वैज्ञानिक परिदृष्टि उत्पादन व्यक्तिगत उत्पादवा की अस्त व्यस्त और व्यवस्थित प्रेरणाओ पर छोड दिया गया है, जो कुछ चीजो को तो बहुत अधिक महत्त्व दते हैं और कुछ चीजा को बहुत कम जिसका परिणाम यह होता है कि प्रयोग में न जान वाली समद्धि के बावजूद गरीबी मौजूद है । आज ससार म जो औद्योगिक सया अनेक क्षेत्रा में मौजूद हैं व समार की आवश्यक्ताआ स रही अधिक है । किसी एक ही वस्तु के उत्पादन म प्रतियोगिता को समाप्त कर और उत्पादन का बेन्द्रित पर यह सारी बरबादी बचाई जा सकती है। कच्चे माल का नियत्रण एक ऐसा मसला है जिसको किसी भी बनाना समाज मे एक वेद्रीय अधिकारी के अधीन रखा जाएगा। आजकल ता महत्व पूण कच्चे माला वा नियत्रण सनिा शक्ति द्वारा दिया जाता है। अगर किसी क्मशोर राष्ट्र में तेल उपल ध होता है नो बहुत जल्ली एसा राष्ट्र किसा बलवान राष्ट्र के अधिराजत्व में आ जाता है ट्रासवाल को अपनी स्वाधीनता इसलिए खोनी पड़ी कि उसम सोने की खान थी। कच्चे माल पर उन लोगो का कतई अधिकार नहीं होना चाहिए जिहाने विजय अथवा कूटनीति के द्वारा उन क्षेत्रा पर अधिकार र पिया हो जिन क्षमा म कच्चा मार उपल ध होता हा, वर्ष माल तो एक विश्व-अधिकारी के अधीन होने चाहिए जो उनका नियमित वित रण उन लोगा म परे जिहे सम्पत माल के उपयोग पर सवाधिय कोगल प्राप्त हो। इसव अरावा, हमारी वतमान आर्थिक व्यवस्था हर व्यक्ति में कच्चे माला की घरवाली कराती है क्यारि इस मामल म दूरदगिता वरतन वा योई प्रेरक हेतु है ही नहीं। एक वनानिा ससार म हर महत्त्वपूण कच्च माल की आपूर्ति का सावधानापू आवरन दिया जाएगा, और जस ही निसी मार घे समाप्त होन का समय नजदीक आएगा वसे हो उसके बदर म काम आन वारा किसी दूसरी चीज के लिए वज्ञानिक अनुमधान प्रारम्भ कर दिया जाएगा। सम्भव है भविष्य में सती मा उनना महत्त्व न रह जाए जितना आज और है पिछल जमाने में रहा है। इसके वारणा को पचा हम विमी पिहर अध्याय म पर चुके हैं। न मचल कृत्रिम राम ही भविष्य म हम उपराध होगा बल्पि वृत्रिम ऊन, वृषिम वाप्ठ और वृत्रिम रबड भी उपग्ध होगी। समय आ सकता है जब वृत्रिम माजन भी मिन गारपिन इस बीच सेती व तराव, और जो लोग खेती करते हैं उनकी मनोति-दाना ही अपिताधिन औद्यागिन हा जाएग! अमरासी निगाना जोर बनाडा के सिमाना म पहा ही ग यह जौद्योगिक मनोति मौजूद है उनी मनोवृत्ति एव गात रिगान को मनात्ति नहीं है। वैर माना या अधिरापिर उपयाग दिया जाएगा। वर-यडे गही बाज़ारा र पराम म धरती को कृत्रिम रूपम उप्म बनान की पढ़निया का प्रयोग पर सघन सेना द्वारा प्रतिवप कई पगर पंदा पो जाएंगी। समूचे वज्ञानिय सरकार प्रामीण क्षेत्र म यत्र तत्र यन्बट बिजलीपर होगे जो आवादिया केद्र पर्नेग। पुरान जमान म जा सेतिहर मनोति चली जा रही है उसका पाई मागेप न रहगा, क्यानि वेवल धरता बलि जलवायु भी मनुष्य रे नियत्रा म हागो। कल्पना की जा सकती है कि हर स्त्री पुरुष को काम रन रिए विवाहाना पगा, और जब कभी क्मिी पुगन व्यापार की आवश्यकता न रह जाएगी तब सम्बोधन कामगर को काई नया व्यापार मिवाया जाएगा। सरन अधिक भान पर काय, निस्मदेह वही हागा निमम इस समूचा पानिवत्ता पर सवापिर नियंत्रण प्राप्त होगा। सम्भवत सर्वाधिक गतिपूर्ण पद या यनम व्यक्तिमा का रिए पाएंगे जिनका चयन उनकी बुद्धिमत्ता को परीमामा व आधार पर किया जाएगा। निम्नाटि समप्न काय के लिए जहा वही मम्मव हागा, नानी लोगा का लगाया जाएगा। मैं समझता है यह कल्पना भी की जा मरनी है शिका काय अधिक वाखनीय हाग न पिए अधिर उच्च वलन दिया जाएगा साकि उन मम्पादन के लिए अधिक पौरन अपरित हागा । वह समाज एमा नहीं होगा निमम समानता होती है यद्यपि इस शान म मुये मदेह है कि विभिन जाजिया के बीच की असमानतामा को छाडकर-अपात् स्वताग और वार रागा के राव की असमानताना अलावा अन काई अममाननाएं पता भी होगी। हर व्यक्ति का जीवन मुविधापूण हागा और को সি সখি নি বা পা গং সৰিছিল ৷ ৰ যাণ বিদ্যুৎ শীরন না। उपभोग का मग । माज की भाति अच्छे और बुर दिना दौर नही बाग पानि पुर गिना दौर हमारा मराारतामूरद आपिक स्वस्था में हो परिणाम हैं । कोइ भा भूसा नहीं मरता मोर काई गे उन माबिर चिनार का शिकार नहीं होगा जा याज पनी और निधन दोना भी एक समान वचन बनी हैं। दूसरा यार मबसे अधित व्तन पानवार विपनाको घार स्य समाप लिा जाम म बाई साग्मण राम नगेरह लाएगा। जब म सम्यता का प्रारम्भ हुआ तव म राजन जय किसी भी वस्तु की अपना रोए अपनी मुरभा भी खाज और बिना घिर असा पूवर परत रह है। एन ममार म घर सुरभा हैं पर ध होगा, रविन दिवामपूर मैं नही वह मन म शुरमा र गि उहनि जो मूग चाया हा असर ननुरुप ये दर मय- স্বল মা মম না।

पद्रहमा अध्याय वैज्ञानिक समाज मे शिक्षा शि के दो उद्देश्य होते हैं-~-एक और तोमिनिक निमाण विकास करती है, और दूसरी ओर वह नागरिक को प्रशिक्षित करती है। एथेंसरासिया ने नि के पहले उद्दश्य पर अपना ध्यान केन्द्रित किया था, स्पाटागालो ने झरे उद्देश्य पर । माटा वाले विजयी हुए थे लेकिन दुनिया एयमवासिया कोही याद रखा। मरे विचार से एक वैनानिक समाज मे शिक्षा की सर्वोत्तम अवधारणा उस शिया के अनुरूप की जा सकती है जो मुझट लोगा से उपल ध हुई। जो उडरे सामाय मासारिक व्यक्ति बननेवाले होते थे उह जसुइट रोग एक प्रकार की Pिा देते थे, और जो के सोसाइटी या जीसम' (पार्मिक पथ) के सरस्य होनेवाले होते थे उह दूमर प्रसार की शिक्षा दते थे। इसी प्रकार वनानिन नामक भा सामाय स्त्री पुस्पा को एक प्रमार की गिरा देन की ध्यस्मा करेंगे, और ना लोग वनानिर शक्ति के न्तिा यननेवाल होग उह दुमर प्रकार की शिक्षा देंगे। सामाय स्त्री पुरुषा से यह उपेक्षा की जाएगी कि वे विनीत हा उद्यमी हा, समय परायण हा विचारहीन हो और स तुष्ट रहने वाले हा । इन सभी गुणा म ग सतुष्ट रहनेवाला गुण सम्भवन सरस अधिक महत्वपूर्ण माना जाएगा। यह T उत्पान परले के लिए मनोविश्लपण व्यवहारवाट और जीव रमायन ये क्षेत्र में दिए गए सभी बाधा का उपयोग किया जाएगा। बचपन में ही बच्चो को निभा इस ढग म व्यवस्पिन वा जाएगी जिमस भावयियाक उत्पन्न होने को रम-रो-बम सम्भावना हो। उगभग सभी यच्च प्रात, रवस्य और मुखी रड या लऽपिया हाग ! उनपा भाजन उनके माता पिता को र आदि पर निमर नही रहेगा कि मर्वोत्तम पौवरमायनशाम्पी सा निधारित मणे वगा भाजन उह दिया जाएगा। अपना काफी समय वध गरी हवा म पिता और पुस्तव जान लिया निता आवश्य होगा उगम अधिर उ नही कराया जाएगा। प्रार निर्मित स्वभाव में अधीनता की भावना पवायर परानेका अपमर द्वारा प्रयुत तरीका मे अथवा वारपरा पर प्रयाग गराए जाा बारे कुछ नरम तरीपारा उत्पनकी जाएगी। यचपन महो सभी बच्च वज्ञानिक समाज में गिना १६१ महागी बनन की क्रा सोनी, जर्यान जो कुछ हर व्यक्ति द्वारा दिया जा रहा है ठीक वही करने को करा मीगे । इन बच्चों में सरम की भावना को दवाया जाएगा, और बिना दट लिए ही अवना की भावना वनानिक ढग के प्रशिक्षण मे दूर कर दी जाएगी। उनकी मनूची गिता अधिकार रूप म शारीरिक होगी, और स्कूर की अवधि समाप्न हान पर उहको रोजगार निखाया जाएगा। विम रोजगार म किम बच्चे को लगाया जाए इसका पमूला करने के लिए विपन लोग वन्वा की अभिवृनि परखेंगे। औपचारिक पाठ जिनन भी उस स्थिति में प रहेंग, मिनमा अयवा रटिया के द्वारा पाय जाएंगे, ताकि एक ही PिAT समूचे देश म चरनेवाली मभी क्पा म वही पाठ एक साय पढा सके । इन पाटा का पान का काम निम्मदह, अत्यन्त कौलपूण काय माना जाएगा जो पामर वग के सदस्या के रिए ही आरक्षित रहगा। बाजार में कला के अध्यापन के स्थान पर स्थानाय दृष्टि से केवल एक महिला की आवश्यकता हामी जानाति और व्यवस्था कायम रखने क लिए होगी। यद्यपि आर वा यही का जाती है कि वच्चा का व्यवहार इतना अच्छा होगा कि इस सम्माय मदिन की सदामा की गाय ही कभी आवश्यकता पड़े। दूसरी ओर जिन बच्चा को गासवग का सदस्य बनना होगा, उन्हें विकुल भिन्न प्रकार की गिता दी जाएगी। एमी गिता के लिए कुछ बच्चे ताजम स पहले हो चुन लिय जागे कुछ का चुनाव जम से लकर तीन वप के मनर किया जाएगा, और कुरका तीन वप स छ वप की अवस्या के बीच म । उनी वौद्धिक गति आर मकल्प शक्ति का साथ-साथ विमित करने के लिए सर्वोतम नात विनान का प्रयोग किया जाएगा। अतत सर्वोनस सम्भव क्षमना उत्पन वन के उद्देश्य से मृजनन- दिन का भ्रूण के रामायनिक और तापीय उपचार वा तथा प्रारम्भिक वर्षों मैं उपयुक्त भोजन का प्रयोग किया जाएगा । बन्चा जर में बात करना प्रारम्भ कर सकेगा तभी में उसरे मन मस्तिष्क म बनानिक दष्टि उत्पन्न किया गएगा और प्रारम्भिक वर्षों म जब दवा पर प्राय आपानी में प्रभाव डाला जा माना है सावधानीपूर्वक द नानहीन और अवनानिक ला के मम्मक मान से बचाया जाएगा, गगव मकरबोमवप वोअवस्था तर वच्चे व दिमाग म वनानि नान भरा जाएगा और हर स्थिति म बारह वप से लेकर राव को विनान की उन गावाजा का विपाध्ययन कराया जाएगा जिनम उसकी अभि- वति सवाधित रमती हो। और साय-हो-माय उम शारोग्दि दग्ना के सवा भी मिखाए जाएंगे वफ पर नी लुटान र लिए उमे प्रो माहित किया जाएगा कभी कभी चौबीस घन्टा तर निराहार रहत, गम पिनाम मीरा की दौड र पान, शारीरित मार्मिक कार्यों में हिम्मत रिवाने, और जब भी शारीरिक कष्ट वज्ञानिक परिदृष्टि हो तब उसकी शिकायत करने के लिए उसे उत्साहित किया जाएगा। बारह वप से लेकर उसे अपने से चुछ छोट बच्चा ना मगठन करना सिखाया जाएगा, और यदि एसे बच्चा की टोलियां उसका अनुगमन न कर सकी तो उसकी वही निग और आलोचना की जाएगी। उसने सामन निरतर अपने जीवन का एक अत्यत उन्य लक्ष्य प्रस्तुत किया जाएगा और उसके आदेशो के प्रति निष्ठा इतनी स्वपसिद्ध होगी कि उसके दिमाग में अपने आदेश के सम्बध म सदेह करने की बात कभी उत्पन ही न होगी। इस प्रकार प्रत्यक युवक को तिहरा प्रशिक्षण दिया जाएगा-बुद्धिमानी का प्रशिक्षण, आत्म निर्देशन का प्रशिक्षण, और दूसरा के निर्देशन नियत्रण का प्रशिक्षण । हातीना म स विसीम भी यदि वह असफल हो जाएगा तो उसे सामा य मजदूरा को श्रणिया में गिरा देने का भयकर दण्ड दिया जाएगा और अपन गेप सम्पूण जीवन भर उसे एसे स्त्री- पुरुषा के साथ रहने का दण्ड मिलेगा जो शिक्षा म, और सम्भवत समझदारी म भी, उसस बहुन निम्नवोटि के हाग । इम द का भय हो एसे सभी बच्चा म उद्यमी और अध्यवसायी बनने की प्ररणा पदा करने के लिए काफी होगा और शासक वग के दशायद अत्यल्पसस्यक बच्चा पर यह प्रभाव कारगर न हो पाएगा। विश्व राज्य प्रति और स्वय अपने वगप्रति निष्टा के मामले को छोडवर मय सभी मामला म शासक वग के सदस्या को माहसी और उपमम सम्पन बाने के लिए उत्साहित किया जाएगा। वनानिव तकनीन में सुधार वरना और शारीरिव यम वरन वार मजदूरा को निरन्तर नये मनारजना में मतुष्ट रखना उनका फ्तव्य माना जाएगा। चंदिरही लेगा पर सारी प्रगति निभर होगी, इसलिए न तो उह अनावश्यक प म अधीन भावना वार होना चाहिए और न उनका इतना नियत्रण होना चाहिए कि वे नये विचार प्रस्तुन करने म अममय हो जाएं। अपने अध्यापर ये साय व्यक्तिगत सम्पर स्थापित मरन और उमर साय विवाद परन व रिए भी उन्हें प्रोमाहित किया जाएगा जबकि जिनके भाग्य के लिए शारीरिक श्रम कान वाल मजदूर बनना निर्धारित पर लिया जाएगा उह एमा पाई अवमर नहीं मिरगा । अपने आपको सही गिर फरला उनका क्तव्य होगा, और य िव एगा नहीं पर पाने तो विनम्रतापूर्वक अपनी भूल स्वीकार कर लेना भी उनका पज होगा । फिर भी शामर मग में बच्चा ये रिए भी बौद्धिर स्वाधीनता की पुछ मीमाएं निर्धारित होगी । रिनान य मून्य महत्त्व के मम्ब प म सपना गारीरिक जरा और विसपना ये यो म जनराम्या विभाजन मम्बघ म गदह बरन या प्रा उटान भी अनुमति उहाही दी जाया। उन लगायो इस विचार में माय मा यहाने को भी अनुमति नहीं दी जाएगी कि शायद परिता ना मीना समान वज्ञानिक समाज में शिक्षा मूल्यवान है, अयवा प्रेम उतनी ही अन्टी चीज़ है जितनी अच्छी चीज़ वनानिक गाध है। अगर किमी साहमी के मन-मस्तिष म इस प्रकार के विचार उत्पन्न हो ही गए तो उसे एर भयात्रान्त कष्टपूण गान्ति मे चुपचाप सुन लिया जाएगा और इस बात का बहाना किया जाएगा कि एमे विचारा को मुना ही नहीं गया। जितना जन्ग गामक्वग के बच्चे टम तय्य को ममयन योग्य हो जाएंगे उतनी ही जदी उनके मन मस्तिष्क म मावजनिर क्तय की एक गम्भीर भावना भर दी जाएगी। उह यह शिक्षा दी जाएगी कि मानव-जाति का व अपने ऊपर निभर मममें और यह कि उहें उदारतापूर्वक सेवा करनी है विशेषकर उन वम भाग्यगारी वर्गों को जा उन नीच हैं। लेकिन इससे यह अथ न लाया जाए कि य रोग मिथ्याभिमानी होंगे। मिथ्याभिमान से य बटन दूर होंगे। जिम बात पर व लोग अपने हृदय म विश्वाम भी करत हांग, उमे यदि स्पष्ट Tाम काई व्यक्त कर देगा तो कुछ अवमाननापूण हमी + साय वे उम बात का टार देंगे। उनका व्यवहार मर और मुखद होगा और उनकी परिहाम- वत्ति भी मी चूक्न वाटी न हागो। गासवग के मवाधिक बुद्धिमान यच्चा की गिमा का अन्तिम दौर होगा गोघ-सम्बधी प्रशिक्षण । साधकाय अत्यधिक सगठिन होगा और युवका को अपना विशिष्ट गोधकाय चुनन की अनुमति नहा दी जाएगी। वे उन्हें ऐस हो विपया म गोषकाय परन का निर्देश रिया जाएगा जिन विषया महान अपनी कुछ विशिष्ट क्षमता दिवाई होगी। कुछ थो--- रोगा को छोकर वनानिक नन वा बटन वडा बागेप सभी लोगो से छिपाकर गुप्त रखा जाएगा । पुरोहित वग व शोधकता के लिए कुछ रहस्य आरचित रहेंगे। य गावक्ता वढी मावधानी के साय अपनी बौद्धिक प्रतिमा और निष्ठा के गुणो के आधार पर चुने जाएंगे। मेरे विचार म यह था की जा सकती है कि गोष- काय आधारभून हान व बनाय तकनीकी अधिर होंगे। गाघ मम्बधी विमा भी विभाग अध्यार बुजुग लाग हांगे यऔर उहै इस विचार सही सन्तोष मिरगा कि उन विषय आधारभूत तत्त्व भर्गमाति नान हैं । यनि मूलाधारा मम्बध म मरवारी दृष्टिकोका गलत मादित करन वारे नाधवाय नौ जवाना द्वारा विय जाएँग ता दन पर आरोही व्यक्त किया जाएगा, और यदि उनावरपन के माय एम गायकाय वो प्रवागित कर पिया जाएगा तो उसका परिणाम गोधरना को पन्च्युनि ही होगा । जिन युववा का कोद आधारभून नई यात मूपैगी व अपन आचार्यों को उन नए विचाग के प्रति सहानुभूतिपूण दष्टि- का अपनान के लिए प्रेरित करन का सतातापूग प्रयत्न करेंगे, किन्तु यदि उनक य प्रयन अमर हा गए ता अपन नए विचारा को व तव तक छिपाए रहेंग जब न द स्वय अधिकारपूर्ण पा पर नहीं पहूँच जात, और ऐमा समय बान १६४ यज्ञानिक परिदृष्टि तक सम्भवत वे अपने नए विचारा को भूल भी गए होंगे। तकनीकी गोधाय के लिए संगठन और अधिकार का वातावरण बहुत ही उपयुक्त और मुविधा जनक होगा, कि तु जसे शोधकाय, उदाहरण के लिए वतमान शती में भौतिकी में क्षेत्र में देखे गए हैं इस प्रकार विध्वस नवशाया के प्रति वातावरण विरोधपूण ही रहेगा । निस्सदेह एक मरवारी नत्त्वमीमासा भी होगी जिस बौद्धिक दृष्टि से तो महत्वहीन माना जाएगा, रितु राजनीतिक दृष्टि से जिसे माय माना जाएगा। अततोगत्वा गानिक प्रगति की रफ्तार धीमी होती जाएगी और अधिकार क प्रति सम्मान की भावना शोधाय पो ममाप्त कर देगी। जहा तक शारीरिक श्रम करने वाले मजदूरा का सवार है उह गम्भीर विचार करने से निस्साहित किया जाएगा जहाँ तक सम्भव होगा उनरे रिए मुख-मुविधा का प्रबंध किया जाएगा और उनके काम के घण्टे आज की अपेक्षा बहुत कम होंगे उनके सामने निरीहता का अथवा उन बच्चा दुर्भाग्य का कोई भय नहीं रहेगा । जसे ही काम के घण्टे समाप्त हागे, इस प्रकार का मनो रजन प्रस्तुत कर दिया जाएगा जिमसे भरपूर हंसी और आनद प्राप्त हो और मतोष ये कोई विचार उत्पन ही न होने पाएं जो अयथा उनकी मुग-गुविधा को नगण्य ना सकत है। जब कभी एमे अवसर उतान हागे जिनम सामाजिर - निधारण परन को मामा य जवस्या पार कर चुकने वाल मिमी युवर या युवती म इतनी अधिर धामता दिखाई देगी जो गासका को बौद्धिक समता के समान हो तर एप पटिन स्थिति उत्पन्न होगी जिग सम्बध म गम्भीरतापूवर विचार करना आवस्या हो जाएगा। रिन्तु ऐसे अवसर बहुन क्म आएंगे। यदि ऐमा युवक अपन पहल वे सगी-साथिया को छोडकर पूरे दिल म पासवा के माय अपन आपको मिल देने के लिए तत्पर हो तो उपयुक्त परीक्षाएं लेन के वार उसे सामाजिक पता नति दी जा सकेगो रितु यदि अपन पहरे पे सगी-साथिया ये माथ वह कार्द मेजनव एकता की भावना प्रगित परला है तो मजबूरन सागर। को यह निणय परना पडेगा जि उसी अनुगामनहीन बुद्धिमानी वा विद्राह यो भावना का प्रचार करन का अवसर मिल्न से पहले ही उग पाता र म भेज देने व अरावा और काइ चारा नहीं है। सारा के लिए यह एप गाण यतथ्य होगा रविन मैं समाता हूँ कि इस तव्य को पूरा करन से व हिवरेंगे नर। गामायन पर्याप्त मात्रा म उत्तम धरान बच्चा को गर्भाधान के समय से ही गामागम शामिर पर रिया जाएगा। जम के बजाय मैंन गभाधान प समय की पर्चा दरिएकी है कि जम बजाय इसा समय में दोना पर्यो 4 साप किया जाने वाला व्यवहार भिन होगा। रितु फिर भी परि तीन वा की अवम्पा सर पहुँचन पहुँचत यह पयाप्त प म स्पष्ट हो जाता है शि बच्चा वज्ञानिक समाज में शिक्षा १९५ वाछिन स्तर तक ही पहुंचता तो उसे उसी स्थिति में नीचे के वग मे कर दिया जाएगा। इम वात को मान लेता हूँ कि उस समय तक तीन वप के बच्चे की समझदारी को पयाप्त रूप में सही सही आफ्ना सम्भव हो जाएगा। जिन मामलो में कोई सदह होगा उनकी परख छ वष की अवस्था तक सावधानी पूवर की जाएगी और कल्पना की जा सकती है कि इस अवस्था तक सरकार द्वारा कोई निणय किया जाना सम्भव होगा । मितु ऐसे मामले बहुत कम हागे, और छ वष की अवम्या तर जिनके सम्म पनिणय न किया जा सके, ऐसे माम तो और भी कम हामे। इसके विपरीन मजदूरो के बच्चो को तीन वप और छ वप के बीच की अवस्था में किसी भी समय उच्चवग मे लिया जा सकेगा, किन्तु इसके बाद बहुत कम मामलो मे एसा सम्भव होगा । फिर भी मेरे विचार में यह माना जा सकता है कि शासक्वग के वशानुगत बन जाने की बड़ी प्रबल प्रवत्ति होगी, और कुछ पोढियो के बाद एक वग के बच्चा को दूसरे वग म स्वीकार करने की प्रथा बहुत ही सीमित हो जाएगी। यदि सतति के सुधार म भ्रूण वनानिक पद्धतियो का प्रयोग केवल शासकवग मे ही किया गया और अय वर्गों में उनका प्रयाग न दिया गया तो यह वात विशेष रूप स रागू होगी। इस प्रकार दोना वर्गों के बीच नसगिर समझदारी और बुद्धिमानी-सम्बधी जन्तर की साई बरावर अधिकाधिक चौडी होती जाएगी। लेकिन इसके परि- णामस्वरूप हीन बुद्धि वाले वग का विनाश नहीं होगा, क्योकि शासक लोग अरोचक शारीरिक श्रम करना, अथवा मजदूर की व्यवस्था करने म अपनी उदारता और सावजनिक भावना को व्यक्त करने के लिए मिरने वारे अवसर से वंचित होना, पसद नही करेंगे।

मोलहवां अध्याय वैज्ञानिक प्रजनन सामाजिक संगठन पर एक बार मजबूत अधिकार हो जाने पर इसकी सम्भावना बहुत कम है कि विनान मानव जीवन के उन जीव विनान-सम्बन्धी पहा आ तव ही सीमित रह जाए जिनके सम्बध म अभी तक मागदान का वाम धम और प्रेरणा के मत्थे छोड दिया गया था। मेरे विचार से हम लोग यह कल्पना पर सस्त हैं कि आबादी की मात्रा और उसके गुण दोना का ही मतानापूवक निय मन राज्य द्वारा किया जाएगा, लेकिन बच्चा की उत्पत्ति के मामले को छोकर यौन सम्भोग को तब तक एक व्यक्तिगत मामला माना जाएगा जब ता उमरे कारण पाप मे कोई वाधा या हस्तछेप न पडे । जहाँ ना आगाटी की सख्या का सवाल है राज्य के सत्यादि यथासम्भव सावधानीपूर्वक यह निधारित करने का प्रयत्न करेंगे कि किमी भी क्षण समार को जनसाया उस निचित सस्या से कम है या ज्यादा जिसम प्रयेक व्यक्ति या सर्वाधिक भौतिय गुरा मुविधा दी जा सकती है। तकनी मे जो भी भावी परिवतन सोचे समझे जा मावते हागे उसा भी पूरा पूरा विचार य लोग करेंगे। इसम सदेह नहीं कि गामा य नियम तो जासस्या को स्थिर रसना ही होगा भिन्तु यति किमी महत्त्व पूश नारिवार द्वारा जीवन से रावश्यक वस्तुआ का उत्पादन बहुन अधिर सम्ता हा जाए, जस वृत्रिम भोजन का उत्पादन तो कुछ समय के लिए जन सध्या की वृद्धि की बात सोची जा मरेगी। फिर भी मैं ता यही वपना यरूगा हि सामाय स्थिनिया में विश्व सरवार जनसम्या को स्थिर रतन पाहा आदेश देगी। यदि हमारी यह पल्पना ठीर है कि वनानिर समाज म वि जान वार सायों के अनुसार विभिन्न गामाजिर स्तर हामे ना हम यह भी कल्पना पर मरत हैं कि ऐम समाज म उन व्यक्तिया का भी उपयोग होगा जा सर्वोच्च स्लर की बुद्धि स सम्पन न हांगे । मम्भव है rि कुछ प्रकार का थम मुन्या से नीमोगा द्वारा पिया जाए और शारीशियम करन वारे मजदूरा को मामायत मस्तिष्प के विकास की ाि न दार भयपूर गारोति श्रम परा को ाि दी जाए । इसा विपरीत गागा और विरामीको मुग्यम्पस योनिय पाक्लिया और चरित-बर विवाग को गिमा दी जाएगी। या यह मान वज्ञानिक प्रजनन रें कि दोना प्रकार का ही पोषण शिक्षण वैनानिक ग से सम्पन होगा तो इन दोना प्रकार के वर्गों के बीच अधिकाधिक भेद वरता जाएगा, जिसने फर स्वरूप दोना वग अन्नत विल्लु भिन्न प्रकार की जानिया बन जाएंगी। आजकर तो एक शुद्ध वनानिक अय म वैनानिक प्रजान ना दुनिवार विराध घम और भावना दोनाक्षेत्रा से किया जाएगा।वनानिर दग से प्रजनन लिए यह आवश्यक होगा वि पुरुषों के जत्यल्प प्रतिशत का उपयाग किया जाए जमा कि पालतू जानवरा के मम्ब ध म किया जाता है। यह बात समझ म आ सकती है कि धम और दिनान ऐमो व्यवस्था पर हमेशा एक अटल निषेध का प्रयोग करन में सफर हागे । मैं चाहता हूँ कि मैं भी ऐसा ही मान सकता। रक्नि मरा विश्वास है कि मनुष्य की भावना असाधारण म्प से रचीली होता है, और जिस व्यक्तिवादी धम के हम लोग अभ्यस्त हो गए हैं वह सम्भवत अधिकाधिक रुप मे राप्ट के प्रति निष्ठा के धम द्वारा पदच्युत हाता जाएगा । रूस के साम्यवादिया के बीच पहो ही एमा हो चुका है । जो कुछ भी हो, वैनाशिक समाज द्वारा यह जो मांग की जाएगी वह स्वाभाविक भावावेगा पर उतना कठिन नियमन नही सिद्ध होगी जितना कि थोरि पादरिया के वाच अविवाहित रह्न को माग सिद्ध हुई है । जिस पिसी भी क्षेत्र मे कुछ एमो मरत्वपूर्ण उपलब्धियाँ सम्भव होती हैं जिनसे मनुष्य के नतिर आदशवाद का तुष्टि मिल्नी है वही शक्ति का प्रेम सहज अनुराग वे जीवन को आत्मसात कर लेन म समय होता है विशेषकर यदि गुद्ध शारीरिक यौन भावावेगा की तुष्टि का माग उपध हो । यदि रूम का प्रयोग सफल सिद्ध हो गया रूम म जिस परम्परागत धम को प्राप्तिकारी ढग से अपटम्य कर दिया गया है उमी परम्परा गत एम वो हर कही अपदस्य किया जाएगा । जो कुछ भी हो, इस परम्परागत घम व प्टिकोण का नारमल उद्योगवाद और वनानिक तकनीर के दृष्टिकोण के माम मिग माना बहुत कठिन है । परम्परागत धम तो प्राकृतिक शक्तिया के सम्मु मनुप्य की असमथता की भावना पर आधारित था, इसके विपरीत वनानिक तपनीय मनुष्य की बुद्धि मामने प्राकृतिक शक्तिया की असमयता की भावना उत्पन करती है । इस शक्ति भावना के साथ माथ कोमल सुखानु भूनि व मम्बध म कुछ मिताचार की सगति बिल्कुल स्वाभाविक है। जो लाग भावी यात्रिय समाज की सष्टि कर रहे हैं उनम इस प्रकार का मिताचार पहरे ही दया जा सकता है । अमरीका में इस मिताचार न प्राटस्टेण्ट दयामा का रूप प्रा दिया है और स्म म माम्यवाद के प्रति भक्ति और निष्ठा का रूप अपनाया है। इमगिए मैं तामोचता है कि प्रजनन के मम्द धमे विनान द्वारा परम्परापन भावनाम जो पग्वितन दिए जा सका हैं उनकी कोई सीमा निधारित करना कठिन वंजानिक परिदृष्टि है। यदि मविप्य मजादादी की सध्या और उनकी गायना-दानाकाहोमाय- साय गम्भीरतापूर्वर दिदार किया गया ना हम यह बागा कर मक्त हैं रिहा पीली मगभग पन्बीन प्रतिशत स्त्रिया या और लTET पाच प्रतिशत पुरुषा को मापीरी के माता पिता बनन करिए चुना जाएगा गेप ममाज या जनुवरी करण कर लिया जाएगा निमम ना यौन मुम भाग म तो किमी प्रकार का हलपन होगा बल्कि दन मुन्न भो वा वेवर मामाधि महत्व स हीन कर दिया जाएगा। जिन स्त्रियों या प्रजनन व लिप चुना जाए नम म पर व आठ या नौ वच्च ही दिन उन स्त्रिया में अपने बच्चा वा कुछ उपयुक्त अवधि ना दूध पिगने दे अगवा और कोई काम नहीं लिया जाएगा । बनुवर्ग कृत अन्य पुस्पा के माय उनके मम्द पा म को रा नहीं लगाई जाएगी और न अनुवरीत पुरुया और स्त्रिया र पारम्पवि सम्बधों म ही कारगर एगाद जाएगी किन मन्नान बरन का काम राष्ट्र नियमन का विपर ममया जाएगा और मुम्वचित व्यक्सिया पो म्वचा पर नहीं जाग जाएगा। शायद यह भी माना जाए हि कृत्रिम गमावान अधिक निश्चित और कम नमुदिाजनक है क्योंकि इस बार वार बच्चे र पिता और माता का पारस्परिक मम्मत हान गे आवश्यकता न रह गएगी। मन्दानापनि प्रयाजन मे मुस्न यौन-नम्भाग माय व्यक्तिगत प्रम का भावनाएं रि नी सम्बधिन रह सकेंगी रिन गर्भाधान का ए बिनु मिनट म दा जाण उस एक गल्य चिकित्मा या बारगन जैमा ममा जाएगाना परिणाम हागा कि प्रावि ढग म गमापान वरना ना महिगमा के अनुसयुक्त माना जाएगा। जिन गुणा व आधार पर माता पिता या चपन frया जाएगवण हान वार वच्च ९ मामाविर पद अनुसार भिन्न भिन्न कोटि व होगनक-वग ब दिए माता पिता म अधिक बुद्धि मना उपभित होगी पूण म्वास्थ्य ना अनिवार होगा ही। नव तर नाधान मी बघि को प्रातिर यवधि ना चपन दिया जाएगा तर ता माता का चयन भीम आधार पर किया जाए। शिव मुविधापूर प्रमव वरन में मगम हा और परिए सना वनिप्र काअधिामकोण हाना उपयुमन माना जाता। फिर भी यह मम्नव है जिसमे ममय वो Tमाधान वो अधिकम होती जाएगी और भ्रम विराम व सनारी अप रिमीनमात्रि में बात। इस प्रकार बच्चा को दूध पिगन म मी मातामा वा पुमत मिट रागी पौर मानव बल वापिस न IITIग्नि दच्चा पानामावा वा माय बनना हा उनादय रग मानाया मगायत मारी गाणी मानायी गपन गृजनन-मम्बा गुण व आप पर किया जाए और मुग हो जिनकी आमा पार पाती है। कारी मार वज्ञानिक प्रजनन गमाधान के प्रारम्भिक महीन आजार को अपना अधिन बोपिर हा माते हैं क्यारि भ्रूण वा अनर प्रकार म वानिक उपचार किया जाएगा, जिसका उद्देश्य न केवर चमकी अपनी विशेषताओं के लिए लाभदायर प्रभाव उत्पन्न करना होगा बलि उमकी मम्भव सन्नति की विशिष्टनाया पर भी कल्याणकारी प्रमाव डालना होगा। बार अपने बच्चा के माय पिताश्रा का काई मम्ब घ नहीं होगा। मामा यत पाच माताया को वच्च देन के लिए एक ही पिता होगा, और यह भी बिल्लुर मम्भव है कि उमन अपने वच्चा की माताआ का कभी देखा भी न होगा। इस प्रकार पितत्व की भावना का बिल्कुल रोप हा जाएगा। गायद ममय आन पर यही वात माताओं के सम्बध म भी होगी, यद्यपि हा सकता है कि उसकी मात्रा कुछ पम हो । यदि ममय से पहले ही बच्चे का जम सम्भव हा मका और बच्चे को जन्म के समय ही माता से अग कर दिया गया, तो मातत्व को भावना विकसित हान के लिए मा बहुत कम अवमर रह जाएगा। मजदूरों के बीच म गायट इतनी व्यापक सनकता नहा वरती जाएगी, कोनि केवल शारीरिक दगाली मन्नान पैदा करना बुद्धिमान मनान पंना करने की अपक्षा अधिक आमान है और यह बसम्भव नहीं है कि इस वग की औरता का पुरान प्राकृतिक ढग मे अपन बच्चा का पालन पापण करने दिया जाए । मजदूरा म राज्य के प्रति उन अघनिष्ठा की आवश्यकता नहीं होगी जो पासवग के लिए आवश्यक समयी जाएगी, और इसलिए मजदूरा मे व्यक्ति- गत अनुगगा का हाना सरकार के लिए उननी यापत्ति की बात न होगी। यह कल्पना तो करनी ही पटेगी जिनामा म किमी प्रकार के भो व्यक्तिगत मना भावा का हाना सरकार द्वारा मदद की दृष्टि से देखा जाएगा। किमी भी पुरुष और स्त्री वीच पनि परम्पर अत्यधिक प्रेम मा निष्ठा की भावना शिवाई -गो ता उरें उसी प्रकार हेय दृष्टि स देखा जाएगा जम आजवर ननिस्वारिया द्वारा इन स्त्री पुष्पा के मम्बधा को देखा जाना है जा परस्पर विवाहित न हा। नि म दच्चों की देखरेख करन वारी शिगार या में वत्तिा धायें रखा करेंगी और नसरी स्कूगम वतिक अध्यापक रहा करेंगे किन मरि उनको निमो वच्च विशप स घोई विशप अनुराग हो गया तो वे कतव्य च्युत ममये जाएंगे। जो वच्च श्मिी भी वयस्व दिशप के प्रति काई विशए अनुराग गिवाएंगे उन्हें उम वयम्य व्यक्ति से अलग कर दिया जाएगा। म प्रसार र विचार पहरे म ही काफी फर हुए है उगहरण व रिए डॉ. जॉन वी. या सन द्वारा रिमा पर लिखी गई पुम्नव म एम विचार मिरेंगे।' १ विरजन वीरपटसन की पुसा मानातिन देयर में इन एड २०० वज्ञानिक परिदृष्टि वनानिव जाड तोड मिलाने वार लोगा की प्रवत्ति यवितात अनुरागा को अवाछनीय और दुर्भाग्यपूण मान लती है । प्रायड के अनुयायिया ने यह सिद्ध क्या है कि एसे अनुराग भाव ग्रन्थिया के स्रोत होत हैं । प्रासका का अनुभव है कि ऐसे अनुराग गष्ट्र और क्तव्य के प्रति पूण निष्ठा के माग म बाधक धनते हैं । धमपीठ (चच) ने कुछ प्रकार के प्रेमा की अनुशास्ति दी है तो कुछ दूसरे प्रकार के प्रेमा की निदा की है किन आधुनिर तपस्वी इन सबमे अधिा पूणतावादी है और सभी प्रकार के प्रेमी को एक समान वेवर मुखता और समय की वरवादी मानता है। ऐसे ससार में लोगावे मानसिक गटन के सम्बध म क्या आ7 की जानी चाहिए ? मेरे विचार से शारीरिक यम करने वाले तो काफी सुखी हो सक्त हैं । कल्पना की जा सकती है कि शासन लोग शारीरिक श्रम करने वार मजदूरा को मूष और छिछरी प्रवत्ति पे बनान म सफल होंगे, काम बहुत पठिन नहा होगा और मामूली विम्म के अन त मनोरजन हागे । अनुवरीचरण हो जान के कारण प्रेम सम्बन्धी मामगे के परिणाम तव तर अमुविधाजनक नही होगे जब तर सम्बधित स्त्री और पुरुष दोना ही वा अनुवरीकरण न किया गया हो। इस प्रकार शारीरिक श्रम करने वाला के रिए मामूली विम्म वे मुखा और सुविधापूण जीवन की व्यवस्था की जाएगी और इसर साथ-गाय निश्चित रूप समासका ये प्रति बचपन में ही अविश्वासपूर्ण श्रद्धा की भावना उनके मन म भर दी जाएगी और वयस्को के मन में यह भावना प्रचार द्वारा कायम रपी जाएगी। दासका का मनोविनान पुछ अधिक कठिन मामरा होगा। उनस आया यो जाएगी कि वे वैमानिक राज्य में आग प्रति अध्यवगाय और परिश्रम पूर्ण निष्ठा प्रदशित करें और इस आग के लिए पत्नी और बच्चा के प्रेम जैसी कोमल भावनाआ का रिदान करें। ममियों के बीच, चाहे च मर्मागी हा या भिनरिंगा, मत्री की भावना बहुत प्रवर होगी, और ऐम अवसर कम नहीं हागे जर वह सामाजिक नीतिशास्त्रिया द्वारा निर्धारित सीमाआया अतिक्रमण पर जाएगी। ऐग मामयम अधिकारी माया मित्रा को अलग कर देंगे, वगर्ने बि एसा करने से किसी महत्वपूण नायकाय अथवा प्रागनिय याय म बाधा न पडती हो। जब कभी ऐसे सावजनिर कारणाम पिता को अलग न लिया जा सपेगा तब उनी भस्मना की जाएगी। सरपारी मासापोना द्वारा गैसर परन वाले लोग उनकी बातचीतों को मुनेंगे और यहि पभी भी उनको बातचीत भावनात्मर पाई गई तो उनो विरुद्ध अनुशासन की कारवाई की जाएगी सभी गम्भीर भावनाएं निप्पल हो जाएंगी, पवर विपान और रायरे पनि भक्ति यो भावना इसका एकमात्र अपवार होगी।

वजानिक प्रजनन वगर नाम लिए भी अवकावे ममय अपने मनोरजन उपलब्ध हागे। कग अयवा माहिया विकाम ऐम मसार में क्मि प्रकार हो सकेगा, यह मैं नहीं ममय पाता, यह भी नहीं ममयना कि जिन भावावेगों और मनामावा म ग और माहिय की उत्पत्ति होती है और जिनको य प्रभावित वरत है उनका अनुमान ऐमी सरकार कर मकेगी, लकिन गासवग के युदका में अत्यधिक पुटकार बनन की प्रति का प्रोमाहन दिया जाएगा और मतरताक खरा म माग रना ऐमी मानसिक और बौद्धिक आदना के प्रशिक्षण के लिए बहुन उपयागी माना जाएगा जिनके द्वारा गारीरिक श्रम करन वाला पर अधि- कार कायम रखा जा सके । अनुवरीत रागा के बीच पारस्परिक प्रेम पर न ताकानून द्वाग कार प्रतिबध स्गापा आएगा और न जनमत द्वारा रेक्नि एमा प्रेम आरस्मिक और अन्यायो हागा जिसमें न तो कोई गहरी भावनाएं हागी और न गम्भीर प्रेम होगा। जिन रागों का उब असह्य हा रही होगी उहें एवरस्ट की चोटी पर चरन अथवा दक्षिणी ध्रुव पर उडान भरन के लिए प्रेरित रिया जाएगा, रेकिन इस प्रकार विषपणा की यावश्यक्ता का मानसिक अयवा शारीरिक अम्वास्थ्य का रक्षण माना जाएगा। एम ममार म मुष भले ही हा, पर मानद नहीं होगा। परिणामस्वरूप एक यस प्रकार की मानव जाति विकसित होगी जिसमें दढ यतिया के सामाय रमण ग्विाई देंगे। य लोग कठार होंगे, कभी न सुक्न वारे होंगे, अपने बागों में उनकी प्रवत्ति नित्यना की ओर होगी और वे रोग एमा सोचन म तत्पर हिगे कि सावजनिक कल्याण के रिए यातना देना आवश्यक है। मैं ता एमा नहीं समझता कि पाप के दपर-स्वरूप दत्त अपिन यातना दी जाएगी, वर्योति अवना और राय के प्रयाजनों को पूरा करन मे असफलता के अलावा और बाई पाप स्वीकार नहीं किया जाएगा। न्याय सम्भावना इस बात की है दि यह पतिवाद जिन परपीडनमून मनावगा का जम दगा उनको अभिव्यक्ति वनानि प्रयोगा में हागी । मजन रोगा या शल्य चिलिमका द्वारा तथा जीद रामायनित योर प्रायोगिक मनाविनानिमा द्वारा व्यक्तिया का अत्यधिक यातना दिए जान पा समयन नान की प्रगति के आधार पर दिया जाएगा। जस-जम ममय बीतेगा, एक निर्धारित यातना को ही उचित टहराने वारी मान को अनि- रिक्त मात्रा धोरे घोरे कम हाती जाएगी और एम गोया के प्रति आपषित हाले वार नामों को मध्या वरती जाएगी जिनमे निदय प्रयोग करना आवश्यक है। लिम प्रसार ऐक लगों द्वारा दी जान वारी सूय की उपासना के लिए प्रति दप हमारा मनुष्यों को यातनापूण मृत्यु आवश्यक होती थी, उसी प्रकार इस नय वज्ञानिक पम द्वारा भी पवित्र बलिंगाना की मांग की जाएगी। धीरे धीरे यह ममार अधिक अपारपूण और अघिष भयावना होता जाएगा, मानव- यज्ञानिए परिदृष्टि २०२ यत्तिया अत्भुत विषयप पहन ता अंधर कोना म छिप रहा और फिर धारे धार उच्चपदम्य लोगा को भी अभिभूत कर देंगे। रामर आनन्द प्रति जं नतिन ममना व्यापर होगी वह परपीडनमूल्य मुमा पर नहीं रागू होग क्यानि एमे मुख प्रचस्ति यतिवाद अनुरूर हागे, जसे धार्मिक यायालय दागदी गई यातनाए थी। अन्ततोगत्वा इस प्रकार की पवम्या या ता भीप रक्त पात म नष्ट भ्रष्ट हो जाएगी, अथवा आनद का नई सान म ही इस परिणति हागी। इन अमगर गूचर अशुभ भावी कल्पनाआ के अधवार मना की हिरण शिपाई दनी है जा अधवार को कुछ हल्ला वर दती है रविन र आगा की इस विरण की स्वीकृति म हमने ए। मूख आगावाट को स्वोरार पर लिया है। शायद इजेवाना औषधिया और रसायना द्वारा लोगा यो वर सत्र बुध सहने क लिए तयार कर लिया जाएगा जो कुछ जनता के वनानिक नामर ग उमा रिए कल्याणकारी निधारित करेंगे। हो सकता है मदहोगी क एम नए तरी निकाल जाए जिनमे ना उतरन क बाट सरदद न हो और नगे के एम नए तरीरा का आविष्कार किया जाए जो इतने स्वादिष्ट हा नि उहा को प्राप्त करन र गिए लोग अपने होावी घडियो को यातना म वितान के लिए तयार हा । जिस ससार का शासन प्रेम रहिल नान और प हान गावित द्वारा पिया जाएगा यह सब उसी की सम्भावनाए हैं। शक्ति म मदामन व्यक्ति विवरहीन हो जाता है और जब तर एसा व्यक्ति ससार का नामन करता है तव तर यह ससार सौदय और आनद स पूय रहगा।

मनवा अध्याय विज्ञान और मान-मूल्य नम खण्ट व अन्ययन म निम वनानिक ममाज वा चिना किया गया है उमे काई बिल्डर गम्भीर भविष्यवाणी नहा ममय रेना चाहिए । यह तो उम विश्व का चित्रित करन का एक प्रयन भर है जिसकी स्थापना तभी हो सकती है जब वनानिक तकनीक का अवाघ गामन हा। पाठकों न देखा होगा कि इसन वायनीय ममये जान वारे व माय प्राय अविच्छिन प म एमे था भी मिरे हुए हैं जो विषपण उत्पन्न वग्न वारे हैं। इसका कारण यह है कि हमन एक एम समान की कलना की है निमका विकाम मानव-स्वभाव के कुछ विशिष्ट पादाना के अनुरूप दिया गया है और नर उपनाना को दिन्कुर गहा कर दिया गया है । उपादाना के प म तो ८ अन्ट हैं रविन यनि रहें एकमात्र प्रेरक शक्ति केम्प म स्वीकार किया जाए ता व पाना मिद्ध हा मक्त हैं। वनानिक रचना वा मनावग तभी प्रामनीय हाता है जब वह मानव-जावन वा मूवान बनान वारे अप प्रमुख मनावगा वा बुटित नहा कर देता दिनु जब गेष मभी मनावगा वीसभिव्यक्ति का रारन की आगदी ममिर जाना है नव वह एक नित्य अयाचारी काम्प गया करता है। पर विचार न इस बात का भय सचमुच मौजूद * त्रि यह समार वही इस प्रकार व निग्कुल अत्या चार का शिकार न हा जाए और यगे कारण है कि वनानिक नाइनार द्वारा शिवार प म निम ममार की रचना की ला मानी है उसके ना का चिक्ति वग्न म मैंन वाद हिचर नरी को। पुछ गतानिया के अपन इतिहान म विनान का एक एमा यान्तरिक विकाम हुना है जा अभी पूरा हुआ नहा प्रतीत हाना । इस शिकाम का मप म चिन्तन मे नाइ-नाड की ओर वरना कहा जा मक्ता है। नान के जिम प्रेम की रेन स्वय दिनान है, वह मय ही दो प्रकार व मनायगा का परिणाम । विनी पाय रे मम्ब प म हम पान को पोज इरिए भी पर मस्त हैं कि उस पाय म हम प्रेम है जयवा महिए कि हम उम पाय पर अधिकार-शक्ति प्राप्त करना चाग्र हैं। पहा प्रकार का मनावग हम म पान वो बार रे जाता है जा चिन्तन मूर, और दूसरे प्रकार का मनोरंग हम व्यावहारिक पन की आर 7 जाता है । विनान विकास मनक्ति वा मनावग अधिराधिन में २०४ वजानिए परिष्ट प्रेम ये मनोवग पर हावी होता गया है । दापित का मनौवग उद्यागवाट म और शामरीय तकनीय म प्राट हुआ है। इसवी अभिव्यक्ति अयक्रियावा और यात्रियतावाट के नाम में विम्यात दानिव मिद्धानाम भी हुई है। माट तौर में इन दोना ही दाना सिद्धान्ता की मा यता यह है निश्मिी भी पनाय के सम्म प म हमारे विश्वास जहाँ तर उम पाय रे गम्बध म एम जोड-तार करने म हम ममय बनाते हैं जिनम हमारा लाभ हो, उसी हा तर 4 मही हैं। इस हम स य का गामकोय दृष्टिकोण कह सकत हैं । इस प्रकार क स य की उपध विनान द्वारा हम बटन पापी हो चुकी है सच तो यह है मि इम निगम विज्ञान की सम्भव उपधियो या कोई मत ही नहीं रिपाई दना । जा यति अपन पयावरण को परिवर्तित करना चाहता हा उम वितान जर भुन दिन सम्पन्न साधन उपल ध कराता है, और यदि नान का अथ वह क्ति हो जिसस चाछिन परिवतन उत्पन किए जा सरें तो विनान हम अपरिमित नान देता है। चिन्तु नान की कामना का एक दूमरा रुप भा होता है जो चितुर भिन मनाभावा स सम्बधिन है। रहस्यवादी लोग प्रेमो और कवि भी सत्या न्वैपी होते हैं, गायद बहुत अधिक सफल अवेप व नहीं होत रविन पिर भी इसी कारण वे हमारे रिए कम सम्मान के पात्र नहीं हो जात । प्रम के हर स्वरुप म हम प्रिय नै सम्बध म नान प्राप्त करना चाहते हैं कि प्राप्त करने के उद्दश्य से नहीं बल्कि चितन का आनद प्राप्त करन के !ि इश्वर के पान म ही हमारे अन त जीवन की स्थिति है लेकिन इसलिए नहा कि ईश्वर का नान हम ईश्वर पर गक्ति भी प्रदान करता है। जहा कहा भी क्सिा पदाथ म हम हर्पोमाद अथवा नात्यतिर जानद प्राप्त होता है हम उस पदाथ र सम्बध मे नान प्राप्त करना चाहत है । यह नान जोड-तोड २ रूप म नहीं होता जिसके द्वारा उस पदाय को किसी और रूपम भी उदर दिया जाता है बल्कि एक आन द दान रूप में हम उस जानना चाहते है क्यामि यह नान अपने आपमें और स्वत अपने लिए प्रेमी पर आन' को वर्षा करता है । वामजनित प्रेम म भी अय प्रकार के प्रेमो की भांति इस प्रकार के भान का मनाभाव विद्यमान रहता है हां यदि काम जनित प्रेम गुद्ध गारीरिक और व्यावहारिक मात्र हो तो बात दूसरा । इम मनोभाव को ऐसे हर प्रेम की क्सौटी म्वीकार किया जा सकता है जो मूल्यवान हो। जिस किसी भी प्रम में कुछ मूल्य और महता होती है, उसमें उस तान का मनोभाव भी होता है जिसके आधार पर रहस्यवादी मिलन की उत्पत्ति होती है। वितान का प्रारम्भ उन लागा द्वारा हुआ जिह इस जगत से प्रेम था। उहान ताग के, सागर के, हवाआ और पवता के सौदय का अनुभव किया । इनको व प्यार करते थे और इसीरिए उन विचार इन पर केद्रित रहते थ । - विज्ञान और मान मूल्य २०५ और द लाग वेवर वाह्य चिन्तन द्वारा इहैं जितना समय पात थे, उससे अधिक और धनिष्ठ रूप मइह समयना चाहत थे । हिरेक्टिम ने कहा था, "यह ससार एक अनन्त जीवन्त अग्नि है, जिसके स्फुलिंग जलत और बुझत रहत हैं।" वना- निक नान का प्राथमिक मनावग और प्रेरणा हिरक्टिस तया अय यूनानी दानिकर से ही प्राप्त हुई थी। य लोग ससार 'अदभुत सौदय की अनुभूति रक्न म सचरित उमाद की भाति करत थ। य लोग अति मानवीय भावावग- पूण बुद्धि वाल व्यक्ति थे और उनके वौद्धिक भावावेग की गह्नता म ही आधुनिक जगत का यह मारा गतिमूरक आनाल्न उपन हुआ है। रेक्नि धीर धीर, जस जस वितान का विकास हुआ है वैम-वस विनान का जन्म दन वार प्रेम व भावावग को अधिकाधिक प म कुण्ठित कर दिया गया है और दमा विपरीत शक्ति भावावा का जो पर' वदर एक अनुगामी मात्र या प्रमा उसकी अप्रत्याशित सफरता के कारण अधिकार पर प्राप्त हो गया है। प्रकृति व प्रमो का ता वचित और अवरुद्ध कर दिया गया है और प्रकृति पर ययाचार करने वाले का पुरस्कार मिला है। जम जस भौतिकी का विकास हुआ है वम- वस मा म उस नान स उमन वचित कर लिया है जिसके वार म हम यह साचत थे कि मोनिव जगत को आन्तरिक प्रकृति के सम्बध म हम यह नान प्राप्त है । रग और ध्वनि प्रकार और छाया म्वम्स और गठन यव उस बाह्य प्रति के ग नही रह गए जिम आयानियावामी अपनी भक्ति का अपनी श्रद्धा का पात्र अपनी प्रेयसी मानत थ । अब ये सारी चा प्रयमी प्रकृति म छिन गई हैं और प्रेमी वा प्राप्त हो गई हैं प्रयसा ता भर मेव' हिटयों का एक एडखडाना, निर्जीव और भयानर वाचा मार रह गई है जागायद केवर एक भ्रम--एक माया मात्र है । अपन मूत्रा द्वारा अनावन दम स्म रेगिस्तान में दश्य स भयभीत और भक्ति वचार भौतिक विज्ञानी भगवान से प्रायना करते हैं शिवह उन्हें सान्वना द रक्नि अपनी इस मृष्टि के इस भयावनपन का भागी ता ईश्वर को भी हाना ही पडेगा और अपनी चीख-पुकार का जो उत्तर भौतिक पितानिया का मुनाई दता है वह केवर नरे हृदय की भयभीत धडकन मात्र है। प्रकृति के प्रेमी व प म असफर हावर मनुष्य प्रनि पर सत्याचार करो वारा गासर बनता जा रहा है । व्यावारिक व्यक्ति ता रहता है. यदि में इम बाह्य जगत को अपनी इच्छानुमार बावरण वरन करिए विवा कर सकता हूँ ता फिर इससी परवाह ही क्या है कि इम जगत शैको मता है या यह नवर भ्रम है? म प्रकार विनान न अधिराधिर म्प म प्रममूलक पान स्थान पर गतिमूलक नान का प्रतिप्टिन दिया है और जम-जम मह परिवतन मधिकाधिक पूण हाता आता है वम वन विज्ञान अधिकाधिक परपीडन रत हाना जाता है । भविष्य र जिम वनानिर समाज को कल्पना हम बस आ रह हैं वह २०६ पशानिय परिदृष्टि मिा गमाज होगा जिसमे शक्ति के मोभाय ने प्रेम व मनोभाव को पूरी तरह परारित पर दिया होगा और जिम प्रसार यो निदपताआ पा प्रदान ऐग समाज म frए जाने का रातरा है उनका मनोवैमानिक उदगम यही है । जिस दिनान पा प्रारम्भ सय वी पोज प म हुआ था अब उसकी मगति सत्यता पेसाय नही बट रही ययारि पूण गत्यना अधिकाधिर हम पूर्ण मानिए मायया पा ओर प्रेरित करती है । जब विमान पर व्यावहारिक हदि पगाय चिनारक दृष्टि में रिया जाता है तब हम दरते हैं पि हम जिग वान पर भी विश्वास परत है उस पार पाव श्रद्धा होती है और विगान मे तो हम पेय अविश्वासा की ही उपलब्धि होती है। किन्तु दूगरी ओर जब हम अपने आपको और अपने पर्यावरण को रूपान्तरित परत वारी तानोर य प म विज्ञान पर विनार करते हैं तब हम यह देखते हैं कि विज्ञान हम एवं एसा शक्ति दहा है ओ तत्वमीमासीय मा यता मे बिल्युत मुक्त होती है। किन्तु इम नविन का प्रयाग हम तभी कर सकते हैं जब वास्तविकता में स्वस्प प सम्ब ध म अपने-आपरा तत्वमीमामीय प्रन पूछना बंद कर दें लेकिन फिर भी यही प्रश्न तो समार के प्रति एवं प्रमी को अभिव्यक्ति के प्रमाण हैं। इसलिए तकनीक गिल्पियारे स्पम इस जगन पर हम उमी मात्रा में विजय प्राप्त पर रावन है जिम मात्रा म जगत व प्रति अपने प्रेम का स्याग वर सक्त है। वितु आत्मा का यह विभाजन मनुष्य म जो कुछ मर्वोत्तम है उसकf घातक होगा। तत्त्वमामामा के प म विनान की असफलता की अनुभूति हो जान पर एक तकनीक के रूप म विज्ञान द्वारा दी जान वाली शक्ति कुछ ऐरो रूप में ही प्राप्त की जा सकती है जो गतान की उपामना मे मिलना जुलता है अथात प्रेम का त्याा परख ही यह शक्ति प्राप्त की जा मकती है। यही वह आधारभूत कारण है जो एक बनानिव समाज की सम्भावनाआ को जारावा को दष्टि से दमने के लिए विवा करता है। अपने शुद्ध प में वज्ञानिक समाज का चित्रित करन का ही हम प्रयत्न करत आ रहे हैं और एमे समाज की सगति केवल यतिया ये त्याग वा छोडवर सत्य प्रेम, व, स्वत स्पुरिन हप तथा ऐमे विसी भी आदा के साथ रही वठती जिगवी कामना आज तक मनुष्य करता आया है। इन मक्टा कासोन ज्ञान नहीं है। नान तो शुभ होता है और अनान ही शुभ होता है। जगत का प्रमो इस सिद्धान के किसी भी अपवाद का स्वीकार नहा करता और न गक्ति ही अपने आपम और अपने रिए सक्ट का घोत है। यतरनार तो देवर शक्ति के लिए नविन का प्रयोग विया जाना है सच्च कल्याण के लिए प्रयोग म गई जाने वाली शक्ति पतरनाक नहीं होती। आधुनिक जगत् वे नेता शक्ति म मदा मत्त हैं ! बवर विज्ञान और मान मूल्य २०७ यहा विचार कि वे ऐसा कुछ करन म समय हैं जिस पहले कभी किसी ने मम्भव भी नहीं माना था, वसा कुछ कर गुजरने के लिए उनकी दष्टि म पयाप्त कारण बन जाता है। गति जीवन का कोई सभ्य नहीं है, वह तो अय सभ्या की सिद्धि का साधन मात्र है और जब तर लोगा को यह ध्यान नहीं रहता कि गिन लया की पूर्ति शक्ति द्वारा की जानी चाहिए तव तक विनान गुम जोवन को वह सेवा नहीं कर सकगा जो उस द्वारा सम्भव है। लेकिन तब पाठक पूछेगा कि जीवन के सश्य क्या है ? मेरे विचार स किसी भी व्यक्ति को यह अधिकार नहीं है कि इस मामले में किसी दूसर व्यक्ति के लिए को विधान बनाए। प्रयक व्यक्ति के लिए उमर जीवन के लक्ष्य वही पदाथ हैं जिनकी में उबट कामना हो और जिनकी उपलब्धि उस गाति दे सके। अथवा यदि ऐसा समया जाए कि मयु से पहल शान्ति को वापना करना बहुत अधिक की कामना करना है तो हमे यह महा चाहिए कि जीवन में सपा द्वारा व्यक्ति कोप मेयवा आनद अथवा आ यतिक उम की उपर हानी चाहिए। जो व्यक्ति दिन की कामना वेदर शक्ति के लिए ही करता है उसकी पतन इच्छामा म कुन-कुछ कारिमा रहती है। जब गावित मिलती है तब वह और बधिक क्ति की कामना करता है और गे कुछ उसे मिल चवा होता है उसस उसे तुष्टि नहीं होती। प्रेमी कवि और रहस्यवादा का जितना अधिक सनाप प्राप्त होता है उसको अनुभूनि शक्ति के अवेपी को कभी भी नहीं हो सस्ती, क्यादि प्रेमी कवि और रहस्यवान तो अपन प्रम पार की उपधि सही गान्ति और सतोष पा जान है लेकिन शक्ति प अवपी को तो निरन्तर पिसी नई जोड-तोर म व्यस्त रह्ना होता है अयथा उसके जीवन मे एच मूनपन की भावना उस अभिभून परत लगती है। इसलिए मर विचार से एक प्रेमी का (यहा मैं इस ग का अधिक्तम व्यापक अब म प्रयाग कर रहा हूँ) प्राप्त हान वाले सताप एव जत्याचारी गामक को प्राप्त होने वाल सतापा स बहा अधिक होते हैं, और जीवन केल्या म उह उच्चतर स्थान प्राप्त होना चाहिए। जर मौत आएगी तब मैं यह नहीं महमूम करूंगा कि मैंन जीवन व्यथ म बिताया। मैंन मध्या समय इस धरती को रार ग म रंग जाने दवा है प्रात बार चम पते हुए आम पिदुआ को दया है और तुपाराच्छान्ति मूग व प्रकाश म पानी हुई हिमति देती हैं, मूसे वाद मरमते हुए मह को साधी उमाम मैंन अनु भव की है, और कानवाल व तट पर चटटानों स टबरात हुए तूपानी मत IIT का घोप मुना है। दिनान इन तथा एम अप आनना को उपाधि उन समाम गंगा का भी करा सकता है जो अमया पर न प्राप्त कर सरत यदि एगा किया जाए तो विधान भी शक्ति का उपराग बुदिमनापूर्ण महा जाएगा। frतु व विमान जीवन से उन क्षणा को भी छान लेता है जिना कारण जीवन पज्ञानिक परिटि पा महत्त्व है तय यह हमारी प्रामा पा पात्र नहा रहेगा, चाहे जितनी चतुराई वे माय और चाह जितन मारी भरकम माजा मामान के साथ वह हम निराला वे पप पर आग बढ़ाना चले । जहाँ ता विनान का स्वस्प ज्ञान की खोज है वहाँ तक तो ठीक है, पर उमम भिन मान-भून्या या क्षेत्र विपान को सीमामा स थाहर है । क्ति पी साज ये रूप म विभान को मान मून्या व क्षेत्र म हस्तक्षेप नहीं करने देना पाहिए और यानिष तनी द्वारा यदि मानव जीवन का समृद्ध बनाना है तो जिन रया को पूनि इम तकनीक द्वारा की जानी चाहिए उनसे अधिक महत्व स्वय तकनीक को कभी न दिया जाना चाहिए। किसी भी युग में विशिष्ट स्वरूप को निर्धारित करने वाले 73 श्री सख्या योडी ही होती है। बालम्बरा लूथर और परम पाल्स सोरहवा शतानी पर हावी थे, गरीलियो और देशात ने सत्रहवी तात्रीका निर्देशन दिया था। जा युग अभी अभी समाप्त हुआ है उसके महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं एडिसन, रार पर, शान और सनयातसेन । सनयातसन को छोडकर ये सभी लोग सस्कृति- होन थे, अतीत म पणा परनवार ५ आत्मविश्वामी और निदयी थे। उनके विचारो और उनकी भावनामा म परम्परागत विवक को कोई स्थान ही नहीं था उहें तो देवर यात्रियता और संगठन में ही अभिकचि थी। यदि भिन प्रकार की शिक्षा मिली होती तो य सभी लोग भिन्न प्रकार के व्यक्ति हो सक्त थे। एडिसन ने युवावस्था म इतिहास, वाय्य और कला का पान प्राप्त विया होता राक्पेलर को यह सिखाया जा सकता था कि एशस और सस उसके पूर्वगामी हो चुर हैं रनिन के विद्यार्थी जीवन म उसके भाई को जा पामी दी गई उसके परिणामस्वरूप उसके मन म जो घणा बस गई थी उस स्थान पर उसे इस्लाम के उदय वा और प्यूरिटन सम्प्रदाय के दयालता से पनिक तत्र की ओर विकसित होना इतिहास पाया जा सकता था। इस प्रकार की शिक्षा से इन महापुरुषा की आत्मा मे साप कुछ वियोम पदा किये जा सकते थे। और यदि थोडा-मा भा समय इनकी यात्मामा म उत्पन हो गया होता तो उनकी उपलपि को मात्रा दायद कुछ कम हो गई होनी, वितु उसका मूल्म बहुत अधिक बढ गया हाता। हमारे ससार को मस्कृति और मोदय की एक विरासत मिली है लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि हर पीढी म हम इस विरासत का उस पोही ये ऐसे लोगा को सौंपत गए हैं जो कम सक्रिय बोर महत्त्वपूर्ण रहे हैं। ससार का भासन ऐसे लोगो के हाय में जान दिया गया है जिहे अतात का कोई ज्ञान नहीं है जिनक हृदय म जो कुछ भी परम्परागत है उसके प्रति कोई कोमल भावना नहीं है और जिहें इतनी भी समझ नहीं है कि वे किस निधि का नष्ट किए डाठ रहे हैं । यसको से मेरा अय वेवर उन रोगा से नहीं है जो मत्री पदी विज्ञान और मान मूल्य २०६ पर यासीन हैं बल्कि मेरा मनरव न रोगा से है जिनके हाप में वास्तविक शक्ति है । स्थिति का एसो बनाए रखन का काई भी तात्त्विक कारण नहीं है। इस स्थिति को राक्ना एक गणित समस्या है और वाई बहन कठिन समस्या नहीं है । अतीत काल म प्राय लोगा की दिक दष्टि मीण होती थी रेविन हमारे युग के प्रमुख लो। म काल दृष्टि को सकोणता है । अतीत के प्रति उना हृदय म एक ऐभी घृणा है जो नितान्त अनुपयुक्त है, और वतमान के प्रति एक ऐसा सम्मान है जिसका पात्र यह युग और भी कम है । प्राचीन काल के नीति भूत्र आज बहुत पुरान समये जात हैं रक्नि फिर भी नये नीति-मूत्रा की आवश्यकता भी महसूस की जाती है। ऐसे नीति-मूराम में सबसे पहा स्थान दूगा इस भूत्र को- बहुत अधिक हानि करा बजाय योहा-मा कल्याण कर देता अच्छा है। द्रम मूत्र का कुछ अयपरता दन के लिए निश्चय ही यह आवश्यक होगा कि कल्याण की भावना भी कुछ स्पष्ट कर दी जाए। उदाहरण के लिए याधुनिक उमान मे शायद ही कुछ एने लेग हो जिन्हें पह वित्रास बरन के लिए प्ररित किया जा सब कि तज सबस्न में स्वत को उत्तमना नही निहित है। नरक स स्वग तक चढ जाना अच्छा है भो ही गति बहुत धीमी हो और प्रक्रिया आयासपूर्ण हो, स्वग स नरक में गिर जाना बुरा है भले ही इस पतन की गति मिल्टन पे गंतान को गति-सी वर हो । और यह बात भी नही कही जा मक्ती नि भौतिक पदार्थों के उत्पादन म हावे वाली वदि मात्र अपने-यापम कोद बहुत महत्त्वपूर्ण बात है । अत्यधिक दीनता की रोकथाम महत्त्वपूर्ण है, किन्तु जिनके पास पहल ही बहुत अधिक सम्पन्नता है उनकी ममृद्धि का वढाना यम का व्यय बरबाद करना है । अपराधा की राक- पाम जररी हा मकती है रविन केवल इसलिए नए-नए अपराधा का आविमार करना प्रासनीय नहीं है कि पुरिम को उनी राक्चाम म अपने करतब दिखान का अवसर मिन । विनान न मनुष्य को जो नइ गस्तिया दी हैं उनका निरापर प्रयोग क्वल उही रोगा द्वारा किया जा मरता है जा, चाह इतिहास के अध्ययन द्वारा अयवा अपनी जीवनानुभूति स मानव भावनामा के प्रति कुछ मम्मार और उन भावावेगा प्रति कुछ कामर अनुभूति उपल ध र मरे हा जा मनुष्य व दैनिक जीवन का कुछ रग म्प दत है। मेरा तात्पय यह नहीं है कि यानिक तकनीर समय मिलन पर एक ऐम वृत्रिम जगत् को मृष्टि नहीं कर सरगी जा उम जगत् में सभी प्रकार वरप्य हागा जिसम अभी तर लग रहते आए हैं लकिन मैं यह बात जरर कहता हूँ कि यनि एमा दिया जाना है ता इस प्रायोगिक प में ही रिया जाना चाहिए और इम अनुभूति - माय दिया जाना चादिए रि शासन का प्रयाजन वर नामका वा मुम पहुँचाना नहीं है बल्कि मिनाकरिश भी जाना जाने पाग्य बनाना है । वमानिक तकनीक की देवर क्ति सम्पन्न लोगा बज्ञानिक परिदृष्टि पा सतिपूण परने मा हो पाम नही वरन देना चाहिए और यह अनुभूति रोगा से भनिए दृष्टियोग पाएर तात्विर मावन जानी चाहिए जिपर साल्प ही शुभ जीवन पा निर्माण नही पर सरता । यति तपा ममात्र दाना ही है जीवन में ना और अनुभूति समान स्पस तात्विर अग है। ज्ञान यति पापा और गुम हुआ तो यह अतीत युगो और दूरस्य स्थानों की अनुभूति अपन माय राता है । यह भान होता है कि पति तो सवस्तिमान है और न सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है और ऐमा भान मो दष्टि भी देता है जो मान मूल्या को उन जोगा की अपेभा अधिव राष्ट रुप म देश सरनी है मिह दूरगान असम्भव होना है ।शा से भी अधित महत्वपूर्ण है मनाभावा का जीवन । हप और स्नेह राही जगत एक मूल्य हीन जगत् है । वनानिक जोड-नोड परन वाल को मपात याद ग्मनी चाहिए और यदि वह इह याद रखता है ता उसरी जाड तोड पूर्णन लाभदायक हो सरती है । आवश्यकता केवल यह है कि लाग नई शान्ति से इतना अधिक मदो मत न हो जाएं कि उन सत्या को भी भर जाएँ जिनस प्रत्पर पूरगामी पोडो भगभांति परिचित यो। सम्पूण विवेक नया नहीं है, और न सम्पूर्ण मूखसा पुरानी ही है । अभी तर तो प्रति मी अधीनता ने मनुष्य को अनुगासिा रखा था। इस अधीनता से अपने आपरो मुल कसे आज मनु प्य कुछ उन दोपा का प्रद गित कर रहा है जो मालिक बन जाने वाले गुलाम में दस जाते हैं। एक नय नतिक दृष्टिरोण की आवश्यकता है जिम में प्रकृति की स्निया की अधीनता के स्थान पर मनुष्य मे जा कुछ सर्वोत्तम है उसके मम्मान गरी प्रतिष्ठा की जाए। जहाँ इस सम्मान का अभाव है वही वैज्ञानिर तफ्नो सारनाक है। जब तक यह सम्मान विद्यमान है तब तक विनान मनुष्य को प्रकृति यो दासता म मुक्त परने मेराद अब उसे स्वयं अपन भीतर की दास भावना के वचन स मुक्त कराने की ओर प्रगति कर सकता है । सतरे तो हैं, लेकिन वे अनिवाय नहीं है और भविष्य के प्रति जाशा कम-म-बम उतनी ही तक सगन है जितना तक्सगत भय है।

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Vegyanik Paridrashti

Author
Panday,ganga Ratan
Title
Vegyanik Paridrashti
File name
Vegyanik Paridrashti
Text
OCR done
Citation
1967
Published
2010/12
Publisher
Delhi,rajkamal Prakashan
Language
Sanskrit
Pages
177
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
Science
DLI number
515068
Barcode
4990010022724.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
UcwOE4ziTau
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