Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Supt Saroj
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47" ११२ 34सार হজ ( लेसक- सेवासदन, प्रेमपचीसी, शेखसादी, प्रेमाश्रम, समाम, प्रेमपूर्णिमा श्रादिके रचयिता "स्व० प्रेमचन्द" प्रकाशक- हिन्दी पुस्तक एजेंसी ज्ञानवापी, काशी . सोलहवीं बार] १९३८ [मूल्य 1) ।
प्रकाशक श्री वैजनाथ केडिया हिन्दी पुस्तक एजेन्सी, जानवापी-काशी। शाखाएँ- २०३ हरिसन रोड कलकत्ता गनपत रोड लाहौर दरीबाकलां दिल्ली बांकीपुर पटना मुद्रक- रामशरण सिंह यादव वणिक प्रेस, साक्षीविनायक, काशी। . , पहले संस्करणकी भूमिका उर्दू-ससारके हिन्दु-महारथियोंमे प्रेमचन्दजीका स्थान बहुत ऊँचा है। अनेक नामोंसे आपकी पुस्तके उर्दू-ससारकी शोभा बढ़ा रही हैं। उर्दू-पत्रोंने आपकी रचनाओंकी मुक्तकठसे प्रशसा हर्षकी बात है कि मातृभाषा हिन्दीने कुछ दिनोंसे आपके चित्तको आकर्पित किया है। प्रेमचन्दजीने पूजनार्थ नागरी- मन्दिरमें प्रवेश किया है और माताने हृदय लगाकर अपने इस यशशाली प्रेमपुत्रको अपनाया है । इन प्रतिभाशाली लेसक महा. नुमावने इतनी जल्दी हिन्दी ससारमें इतना नाम कर लिया है कि आश्चर्य होता है। आपकी कहानियां हिन्दी ससारमें अनूठी चीज है। हिन्दीकी पत्र पत्रिकाए आपके लेखोंके लिये लालायित रहती हैं। कुछ लोगोंका विचार है कि आपकी गल्पे साहित्यमार्तण्ड रवीन्द्र बाबूकी रचनासे टकर लेती है। ऐसे विद्वान और प्रसिद्ध लेसको विषयमें विशेष कुछ लिसना अनावश्यक और अनुचित होगा। अहरौला, आजमगढ़ पवी जून, १९१७ ई० मन्नन द्विवेदी गजपुरी -
विषय-सूची
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१
१५
३२
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रिपय
१ बडे घरकी बेटी
२ सौत
३ सजनताका दण्ड
४ पच परमेश्वर
५ नमकका दारोगा
६ उपदेश
७ परीक्षा
४३
...
१०७
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निवेदन - आज हम "सप्तसरोज" का सोलहवां सस्करण हिन्दी ससारके मम्मुख रख रहे हैं। हमें यह कहते हर्ष होता है कि हिंदी-प्रेमी पाठकोंने इसकी कहानियाँ बहुत पसन्द की। पत्र पत्रिकाओंके सम्पादफ और अन्य हिन्दीके विद्वानों ने भी इसकी बहुत सराहना की। अंगरेजी माडर्न रिव्यू' और 'लीडर' सरीखे पत्रोंने भी तारीफ करनेमें कसर नहीं की, लेकिन इस पुस्तकपर हमें सबसे "अधिक महत्वकी सम्मति-निष्पक्ष मति-श्रीमान् शरच्चन्द्र चट्टोपाध्याय महोदयसे मिली है। उस सम्मतिपर सभी हिन्दी- प्रेमियोंको गर्व होना चाहिये। हमें इस सत्यके स्वीकार करनेमें कोई आपत्ति न होनी चाहिये कि हिन्दीमें अधिकांश उपन्यास और गल्पकी पुस्तके चगभाषाकी जूठन हैं । हिन्दीके गल्प-ससारमें कोई ऐसी महत्व- शाली रचना नहीं थी, जिसे बगभापाका एक इतना महान् और प्रतिभाशाली विद्वान सराह सके । अब हम थोडेमें आपको शरत चाबूका परिचय कराकर सप्तसरोजपर उनकी सम्मतिका भावार्थ सुना देते हैं। इस समय शरत् चावू बगमापाके उपन्यास और गल्प मसारमें सर्वश्रेष्ठ गिने जाते हैं। सर जगदीशचन्द्र बोस, और सर रवीन्द्रनाथ ठाकुर सरीखे विद्वानोंने आपकी रचनायों- की असीम प्रशसा की है। अबतक वङ्गभापामें आपकी कितनी ही पुस्तकें निकली हैं और निरन्तर निकलती जा रही हैं। आपके अन्थोंके पाठकोंकी सख्या बहुत अधिक है।
- - [-] अब आपकी सम्मतिका भावार्थ सुनिये- "गल्पे सचमुच बहुत उत्तम और भावपूर्ण हैं । रवीन्द्र बाबू के साथ इनकी तुलना करना अन्याय और अनुचित साहस है, पर और कोई भी बँगला लेखक इतनी अच्छी गल्पे लिख सकता है या नहीं, इसमे सन्देह है।" एक सम्मति और उन्लेस-योग्य जान पड़ती है। अनेक पूर्वीय भाषाओंके धुरन्धर विद्वान् मि० आर० पी० ड्यूहर्ट एम० ए०, एफ० आर० जी० एस०, आई० सी० एस०, डिस्ट्रिक्ट सेशन्म जज, गोंडा लिसते हैं- "प्रेमचन्दकी कितनी ही कहानिया पढ़कर मैंने विशेष आनन्द प्राप्त किया है। अवश्य ही उनमें कहानियाँ लिसनेकी ईश्वरीय शक्ति है।" हिन्दीके विद्वानोंकी प्रशसापूर्ण सम्मतियों का उल्लेख हम । यहां इसलिये नहीं करना चाहते कि उनके तो यह घरकी चीज है, उनकी की हुई प्रशसामें दूसरोंको पक्षपातकी गन्ध आ सकती है। हमे यू० पी० की टेक्स्ट-बुक कमिटीको भी धन्यवाद देना चाहिये कि उसने इस पुस्तकको पुरस्कारके लिये नियत कर इसका गौरव बढ़ाया। आशा है कि अन्य प्रान्तकी टेक्स्ट बुक- कमिटियां तथा हिन्दी प्रेमीगण सप्तसरोजके इस सोलहवे सस्करणका यथोचित आदर कर हम कृतार्थ करेंगे। --प्रकाशक R सातत्सगोजा बड़े घरकी केटी . - बेनीमाधव सिंह गौरीपुर गांवके जमींदार और नम्बरदार थे। उनके पितामह किसी समय घड़े धन्यधान्य सम्पन ये। गांव- का पक्का तालाव और मन्दिर, जिनकी अब मरमात भी मुश्किल थी, उन्हींके कीर्तिस्तम्भ थे। कहते हैं, इस दरवाजेपर हाथी झूमता था, अब उसकी जगह एक बुढ़ी भैंस थी, जिसके शरीर पजरके सिवा और कुछ शेप न रहा था। पर दूध शायद बहुत देती थी, क्योंकि एफ-न-एक आदमी हांडी लिये उसके सिरपर सवार ही रहता था। वेनीमाधव सिंह अपनी आधीसे अधिक सम्पत्ति वकीलोंकी भेंट कर चुके थे। उनकी वर्तमान थाय वार्षिक एक हजारसे अधिक न थी। ठाकुर साहबके दो बेटे थे। पड़ेका नाग श्रीकण्ठ सिंह था। उन्होंने बहुत दिनोंतक परिश्रम और उद्योगके बाद बी० ए० की डिग्री प्राप्त की थी। अब एक दफ्तरगं नौकर थे। छोटा लडका लालयिहारीसिंह दोहरे पदनका सगीला जवान [-] अब आपकी सम्मतिका भावार्थ सुनिये- "गल्पे सचमुच बहुत उत्तम और भावपूर्ण हैं । रवीन्द्र बाबू के साथ इनकी तुलना करना अन्याय और अनुचित साहस है, पर और कोई भी बॅगला लेखक इतनी अच्छी गल्पे लिख सकता है या नहीं, इसमें सन्देह है।" एक सम्मति और उन्लेस-योग्य जान पड़ती है। अनेक पूर्वीय भापानओंके धुरन्धर विद्वान् मि० आर० पी० ड्यूहर्ट एम० ए०, एफ० आर० जी० एस०, आई० सी० एस०, डिस्ट्रिक्ट सेशन्स जज, गोंडा लिखते हैं- "प्रेमचन्दकी कितनी ही कहानियां पढकर मैंने विशेष आनन्द प्राप्त किया है। अवश्य ही उनमे कहानियाँ लिसनेकी ईश्वरीय शक्ति है।" हिन्दीके विद्वानोंकी प्रशसापूर्ण सम्मतियोंका उल्लेख हम यहा इसलिये नहीं करना चाहते कि उनके तो यह घरकी चीज है, उनकी की हुई प्रशसामे दूसरोंको पक्षपातकी गन्ध श्रा सकती है। हमे यू० पी० की टेक्स्ट-बुक कमिटीको भी धन्यवाद देना चाहिये कि उसने इस पुस्तकको पुरस्कारके लिये नियत कर इसका गौरव बढाया । आशा है कि अन्य प्रान्तकी टेक्स्ट बुक- कमिटियां तथा हिन्दीके प्रेमीगण सप्तसरोजके इस सोलहवे. सस्करणका यथोचित आदर कर हमें कृतार्थ करेग। -प्रकाशका . .
RRESTER হিজ बड़े घरकी केटी वेनीमाधव सिंह गौरीपुर गांवके जमींदार और नम्बरदार या उनके पितामह किसी समय बडे धन्यधान्य सम्पन्न थे। गांव- का पका तालाव और मन्दिर, जिनकी अब मरम्मत भी मुश्किल थी, उन्हींके कीर्तिस्तम्भ थे। कहते हैं, इस दरवाजेपर हाथी झूमता था, अब उसकी जगह एक बूढ़ी भैंस थी, जिसके शरीर में पजरके सिवा और कुछ शेष न रहा था । पर दूध शायद बहुत देती थी, क्योंकि एक-न-एक आदमी हांडी लिये उसके सिरपर सवार ही रहता था। वेनीमाधव सिंह अपनी आधीसे अधिक सम्पत्ति वकीलोंकी भेंट कर चुके थे। उनकी वर्तमान आय वार्षिक एक हजारसे अधित न थी। ठाकुर साहबके दो बेटे थे । बडेका नाम श्रीकण्ठ सिंह था। उन्होंने बहुत दिनोंतक परिश्रम और उद्योगके बाद बी० ए० की डिग्री प्राप्त की थी। अब एक दफ्तर में नौकर ये। छोटा लड़का लालबिहारी सिंह दोहरे बदनका सजीला जवान सप्तसरोज था। मुखडा भरा हुआ, चौडी छाती, भैसका दो सेर ताजा दूध वह सवेरे उठ पी जाता था। श्रीकठ सिंहकी दशा उसके बिल्कुल विपरीत थी । इन नेत्रप्रिय गुणोंको उन्होंने इन्हीं दो अक्षरोंपर न्यौछावर कर दिया था। इन दो अक्षरोंने इनके शरीरको निर्वल और चेहरेको कान्तिहीन बना दिया था। इसीसे वैद्यक ग्रन्थोंपर उनका विशेष प्रेम था। आयुर्वेदिक औषधियोंपर उनका अधिक विश्वास था। साम-सबेरे उनके कमरेसे प्राय सरलकी सुरीली कर्णमधुर ध्वनि सुनाई दिया करती थी। लाहौर और कलकत्तेके वैद्योंसे बडी लिखा-पढ़ी रहती थी। श्रीकण्ठ इस अग्रेजी डिग्रीके अधिपति होनेपर भी अंग्रेजी सामाजिक प्रथाओंके विशेप प्रेमी न थे। बल्कि वह बहुधा बढे : जोर से उनकी निन्दा और तिरस्कार किया करते थे । इसीसे गावमें उनका बड़ा सम्मान था। दशहरेके दिनोंमे वह बडे उत्साहसे, रामलीलामे सम्मिलित होते और स्वय किसी-न-किसी पात्रका पार्ट लेते । गौरीपुरमे रामलीलाके वे ही जन्मदाता थे । प्राचीन हिन्दू सभ्यताका गुणगान उनकी धार्मिकताका प्रधान अङ्ग था । सम्मि- लित कुटुम्ब-प्रथाके तो वे एकमात्र उपासक थे। आजकल स्त्रियों- की कुटुम्बमे मिल-जुलकर रहनेकी ओर जो अरुचि होती है उसे वे जाति और देशके लिये बहुत ही हानिकर समझते थे। यही कारण था कि गांवकी ललनाएँ उनकी निन्दक थीं। कोई-कोई तो उन्हें अपना शत्रु समझने में भी सङ्कोच न करतीं थीं, स्वय उनकी पत्नीको ही इस विषयमें उनसे विरोध था। वह इमलिये नहीं कि उसे अपने सास, ससुर, देवर, जेठसे घृणा थी, बल्कि उसका ।
बडे घरकी वेटी विचार था कि यदि बहुत कुछ सहन करने और तरह देनेपर भी परिवारके साथ निर्वाह न हो सके तो भाये दिनकी क्लहसे जीवनको नष्ट करने की अपेक्षा यही उत्तम है कि अपनी सिवड़ी "अलग पकायी जाय । आनन्दी एक बडे कुलकी लडकी थी। उसके बाप एक छोटी- सी रिचासतके ताल्लुकेदार थे। विशाल भवन, एक हाथी, तीन कुत्ते, वाज, बहरी, सिकरे, झाड-फानूस, आनरेरी मजिस्ट्रेटी और ऋण, जो एक प्रतिष्ठित ताल्लुकेटारके योग्य पदार्थ हैं, वह सभी यहाँ विद्यमान थे। भूपसिंह नाम था। बडे उदारचित्त, प्रतिभा- शाली पुरुप थे। पर दुर्भाग्य लडका एक भी न था। मात लड- किया हुई और दैवयोगसे सव-की सब जीवित रहीं। पहली उमग. में तो उन्होंने तीन व्याह दिल खोलकर किये, पर जो पद्रह बीम हजारका कर्ज सिरपर हो गया तो आंख खुली, हाय समेट लिया। श्रानन्दी चौथी लडकी थी। वह अपनी सब बहिनोंसे अधिक रूप. चती और गुणशीला थी। इसीसे ठाकुर भूपसिंह उसे बहुत प्यार करते थे। सुन्दर सतानको कदाचित् उसके माता-पिता भी अधिक 'चाहते हैं। ठाकुर साहव वडे धर्मसटमे थे कि हेमका विवाह कहाँ फरे । न तो यही चाहते थे कि ऋणका चोम वढे और न यही स्त्री- कार था कि उसे अपनेको भाग्यहीन समझना पडे । एक दिन श्रीकठ उनके पास किसी चन्देका रुपया मांगने आये। शायद नागरी प्रचारक चन्दा था। भूपसिंह उनके स्वभावपर रीम गये और धूमधामसे श्रीकठ सिंहका आनन्दीके साथ विवाह हो गया। प्रानन्दी अपने नये घरमं पाई तो यहांका रङ्गटन एक और
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नया व्यजन वनाने बैठी। हाडीमें देखा तो घी पावभरसे अधिक
न था। बडे घरकी बेटी, किफायत क्या जाने । उसने सवधी
आनन्दीने कहा, घी सव मांसमें पड़ गया। लाल बिहारी
जोरसे बोला, अभी परसों घी भाया है, इतनी जल्दी उठ गया ।
यानन्दीने उत्तर दिया, आज तो कुल पावभर रहा होगा।
जिस तरह सूखी लकडी जल्दीसे जल उठती है, उसी तरह
सप्तसरोज
ही देसा । जिस टीमटामको उसे बचपन में ही आदत पड़ी हुई
थी वह यहाँ नाममात्रको भी न थी। हाथी-घोडोंकी तो बात
क्या, कोई सजी हुई सुन्दर वहली तक न थी। रेशमी स्लीपर
साथ लाई थी, पर यहाँ याग कहौं। मकानमें सिडकियां तक न
थी, न जमीनपर फर्श, न दीवारपर तस्वीरे । यह एक सीधे-सादे
देहाती गृहस्थका मकान था। किन्तु आनन्दीने थोड़े ही दिनोमे
अपनेको इस नयी अवस्थाके ऐमा अनुकूल बना लिया, मानो
उसने विलासके सामान कभी देसे ही न थे।
२
एक दिन दोपहर के समय लालबिहारी सिंह दो चिडियाँ लिये
हुए आया और भावजसे कहा, जल्दीसे पका दो, मुझे भूख लगी
है। आनन्दी भोजन बनाकर इनकी राह देख रही थी। अब यह
मासमे डाल दिया । लालबिहारी साने बैठा तो दालमें घी न था,
बोला, दालमें थी क्यों नहीं छोडा?
वह सब मैने मांसमें डाल दिया।
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चुधासे बावला मनुष्य जरा जरासी वातपर तिनक जाता है ।
बड़े घरकी चेटी
लालबिहारीको भावजकी यह ढिठाई बहुत बुरी मालूम हुई।
तिनककर बोला, मैकेमें तो चाहे घी की नदी बहती है।
स्त्री गालियां सह लेती है, मार भी सह लेती है, पर मैकेकी
निन्दा उससे नहीं सही जाती। थानन्दी मुह फेरकर बोली, हाथी
मरा भीतो नी लासका,वहा इतना घो नित्य नाई कहार खा जाते हैं।
लालबिहारी जल गया,थाली उठाकर पटक दी और मोला जो
चाहता है कि जीभ पकडार सीच लूँ।
आनन्दीको भी क्रोध आया। मुह लाल हो गया, बोली, वह
होते तो आज इसका मजा चया देते।
अब 'प्रपढ, उजद्द ठाकुरसे न रहा गया। उसकी खी एक
साधारण जमीन्दारकी बेटी थी। जब जी चाहता उसपर हाथ
साफ कर लिया करता था। उसने खडा उठाकर आनन्दीकी
'ओर जोरसे फेंफी और बोला, जिसके गुमानपर भूली हुई हो,
उसे भी देखूगा और तुम्हें भी।
श्रानन्दीने हाथसे खडा रोकी, सिर बच गया। पर अगुली-
मे बडी चोट आयी । क्रोधके मारे हवासे हिलते हुए पत्तेकी भांति
कापती हुई अपने कमरेमे आकर खड़ी हो गई। स्त्रीका बल और
साहस, मान और मर्यादा पति तक है। उसे अपने पतिके ही
चल और पुरुषत्वका घमण्ड होता है। आनन्दी लोहका चूट
'पीकर रह गई।
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श्रीकण्ठ सिंह शनिवारको घर आया करते थे। वृहस्पतिको
यह घटना हुई थी। दो दिनतक आनदी कोपभवनमें रही। न
सप्तसरोज N कुत्र साया, न पिया, उनकी बाट देखती रही। अन्तमे .. को वह नियमानुकूल सध्या समय घर आये और बाहर बैठकर कुछ इधर-उधरकी बाते, कुछ देश और काल सम्बन्धी स वथा कुछ नये मुकद्दमो श्रादिकी चर्चा करने लगे। यह वार्तालाप दस बजे रात तक होता रहा। गांवके भद्र पुरुपोंको इन बातोंमें ऐसा आनन्द मिलता था कि साने-पीनेकी भी सुधि न रहती थी। श्रीकण्ठका पिंड छुडाना मुश्किल हो जाता था। यह दो-तीन घटे आनन्दीने बड़े कष्टसे काटे । किसी तरह भोजनका समय आया। पञ्चायत पठी । जब एकान्त हुआ तब लालबिहारीने कहा- भैया, आप जरा घरमें समझा दीजियेगा कि मुह सभालकर बातचीत किया करें, नहीं तो एक दिन अनर्थ हो जायगा। बेनीमाधव सिंहने बेटेकी ओरसे साक्षी दी, हां,बहू बेटियों- का यह स्वभाव अच्छा नहीं कि पुरुपोंके मुह लगे लालबिहारी-वह बडे घरकी बेटी है तो हमलोग भी कोई कुर्मी कहार नहीं है। श्रीकण्ठने चिन्तित स्वरसे पूछा, आखिर बात क्या हुई ? लालबिहारीने कहा, कुछ भी नहीं, योंही आप ही आप उलझ । पड़ी। मैकेको सामने हमलोगोंको तो कुछ समझती ही नहीं। श्रीकण्ठ सा पीकर आनन्दीके पास गये । वह भरी बैठी थी यह हजरत भी कुछ तीखे थे। आनन्दीने पूछा, चिच तो प्रसन्न है श्रीकण्ठ बोले, बहुत प्रसन्न है, पर तुमने आजकल घरमे यह क्या उपद्रव मचा रक्सा है ? आनन्दीकी तेवरियोंपर बल पड़ गये और मुझलाहटके मा , - - - ।
५...
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बड़े घरकी बेटी
चदनमें ज्वाला-सी दहक उठी। बोली, जिसने तुम्हे यह आग
लगाई है, उसे पाऊ तो मुह झुलस हूँ।
श्रीकण्ठ-इतनी गरम क्यों होती हो, बात तो क्हो ?
आनन्दी-क्या कहूँ, यह मेरेभाग्यका पर है। नहीं तो एक
गंवार लोकरा जिसको चपरासीगिरी करनेका भी ढग नहीं,
मुझे सडाक से मारकर यों न अकड़ता।
श्रीकण्ठ-सव साफ-साफ हाल कहो तो मालम हो। मुझे
तो कुछ पता नहीं।
श्रानन्दी-परसों तुम्हारे लाडले भाईने मुझसे मांस पकानेको
कहा। धी हांडीमें पावभरसे अधिक न था। वह मैंने सब मांसमें
डाल दिया। जब साने बैठा तो कहने लगा,दालमें धी क्यों नहीं है ?
बस, इसीपर मेरे मैकेको भला-बुरा कहने लगा । मुझसे न रहा
गया, कहा कि वहां इतना घी तो नाई-कहार सा जाते हैं और
किसीको लान भी नहीं पड़ता। बस, इतनीसी बातपर उस
अन्यायीने मुझपर सडाऊ फेंक मारी। यदि हाथ से न रोक
लेती तो सिर फट जाता। उसीसे पूछो कि मैंने जो कुछ कहा है
वह सच है या झूठ।
श्रीकण्ठकी पासें लाल हो गई । बोले, यहातक हो गया।
इस छोकडेका यह साहस
आनन्दी स्त्रियोंके स्वभावानुसार रोने लगी। क्योंकि आँसू
सनकी पलकॉपर रहते हैं। श्रीकण्ठ बडे धैर्यवान और शान्त
पुरुष थे। उन्हें कदाचित् ही कभी क्रोध आता था, पर स्त्रियों के
असि पुरुपोंकी क्रोधाग्नि भडकानेमें तेलका काम देते है। रातभर
करवटें बदलते रहे । उद्विग्नताके कारण पलकतक नहीं झपकी !
सप्तसरोज प्रात:काल अपने पापके पास जाकर बोले, दादा, अब इस घरम मेरा निर्वाह न होगा। इस तरहकी विद्रोहपूर्ण बातें कहनेपर श्रीकण्ठने कितनी हो बार अपने कई मित्रोंको आडे हाथों लिया था। परन्तु दुर्भाग्य आज उन्हें स्वय वही बात अपने मुहसे कहनी पडी। दूसरोंको उपदेश देना भी कितना सहज है। वेनीमाधव सिंह घबडाकर उठे और बोले, क्यों? श्रीकण्ठ-इसलिये कि मुझे भी अपनी मान-प्रतिष्ठाका फुल विचार है। आपके घरमें अब अन्याय और हठका प्रकोप हो रहा है। जिनको बडोंका आदर-सम्मान करना चाहिये वह उनके सिर चढ़ते हैं। मैं दूसरेका चाकर ठहरा, घरपर रहता नहीं, यहाँ मेरे पीछे स्त्रियों पर खडाक और जूतोंकी बौछार होती हैं। कड़ी 'बाततक चिन्ता नहीं, कोई एककी दो कह ले, यहाँतक मैं सह सकता हूँ, किन्तु यह कदापि नहीं हो सकता कि मेरे ऊपर लात, धूसे पडें और मैं दम न मारू । बेनीमाधव सिंह कुछ जवाव न दे सके। श्रीकण्ठ सदैव उनका आदर करते थे। उनके ऐसे तेवर देखकर बूढे ठाकर- अवाक रह गये। केवल इतना ही बोले, वेटा, तुम बुद्धिमान होकर ऐसी बातें करते हो? स्त्रियाँ इसी तरह घरका नाश कर देती हैं। उनको बहुत सिर चढ़ाना अच्छा नहीं। श्रीकण्ठ-इतनामैं जानता हूँ, आपके आशीर्वादसे ऐसा मूर्ख नहीं हूँ। आप स्वय जानते हैं कि मेरे ही ममझाने-बुझानेसे इसी गांवमें, कई घरसमल गये, पर जिस स्त्रीकी मान-प्रतिष्ठाका मैं - घडे घरकी बेटी ईश्वरके दर्षारमें उत्तरदाता हूँ उसके साथ ऐमा घोर अन्याय और पशुवत व्यवहार मुझे असह्य है । आप सप मानिये, मेरे लिये यही कुछ कम नहीं है कि लालविहारीको कुछ दड नहीं देता। अब वेनीमाधव सिंह भी गरमाये । ऐसी बाते और न सुन मके । बोले, लालबिहारी तुम्हारा भाई है, उससे जब कभी भूल- हो उसके कान पकडो । लेकिन- श्रीकण्ठ- लालविहारीको मैं अपना भाई नहीं समझता । चेनीमाधव सिंह-स्त्रीके पीछे ? श्रीकण्ठ-जी नहीं, उसकी करता और अविवेकके कारण । । -- सप्तसरोज प्रातःकाल अपने पापके पास जाकर बोले, दादा, अब इस घरमें मेरा निर्वाह न होगा। इस तरहकी विद्रोहपूर्ण बातें कहनेपर श्रीकण्ठने कितनी हो चार अपने कई मित्रोंको आड़े हाथों लिया था। परन्तु दुर्भाग्य वाज उन्हें स्वय वही बात अपने मुहसे कहनी पडी ! दूसरोंको उपदेश देना भी कितना सहज है। वेनीमाधव सिंह घबडाकर उठे और बोले, क्यों ? श्रीकण्ठ-इसलिये कि मुझे भी अपनी मान-प्रतिष्ठाका फुछ विचार है। आपके घरमें अब अन्याय और हठका प्रकोप हो रहा है। जिनको वडोंका आदर-सम्मान करना चाहिये वह उनके सिर चढते हैं । में दूसरेका चाकर ठहरा, परपर रहता नहीं, यहाँ मेरे पीछे स्त्रियोंपर खडाऊ और जूतोंकी बौछारें होती हैं। कडी बाततक चिन्ता नहीं, कोई एककी दो कह ले, यहांतक मैं सह सकता हूँ, किन्तु यह कदापि नहीं हो सकता कि मेरे ऊपर लात, धूसे पडे और मैं दम न मारू । वेनीमाधव सिंह कुछ जवाब न दे सके। श्रीकण्ठ सदैव उनका आदर करते थे। उनके ऐसे वेवर देखकर बूढे ठाकुर अवाक रह गये। केवल इतना ही बोले, बेटा, तुम बुद्धिमान होकर ऐसी बाते करते हो ? स्त्रियाँ इसी तरह घरका नाश कर देती हैं। उनको बहुत सिर चढ़ाना अच्छा नहीं। श्रीकण्ठ-इतना मैं जानता हूँ, आपके आशीर्वादसे ऐसा मूर्ख नहीं हूँ। आप स्वय जानते हैं कि मेरे ही समझाने-बुझानेसे इसी गांवमें, कई घर सभल गये, पर जिस स्त्रीकी मान-प्रतिष्ठाका मैं बडे घरकी बेटी ईश्वरके दरिमें उत्तरदाता हूँ उसके साथ ऐसा घोर अन्याय और पशुवत व्यवहार मुझे असा है। आप सच मानिये, मेरे लिये यही कुछ कम नहीं है कि लालबिहारीको कुछ दड नहीं देता। अब बेनीमाधव सिंह भी गरमाये। ऐसी बाते और न सुन सके। बोले, लालबिहारी•तुम्हारा भाई है, उमसे जब कभी भूल- हो उसके कान पकडो । लेकिन- श्रीएट-लालबिहारीको मैं अपना भाई नहीं समझता । बेनीमाधव सिंह-खीके पीछे ? श्रीकण्ठ-जी नहीं, उसकी क्रूरता और अविवेकके कारण । दोनों कुछ देर चुप रहे । ठाकुर साहब लडकेका क्रोध शांत करना चाहते थे, लेकिन यह नहीं स्वीकार करना चाहते थे कि लालविहारीने कोई अनुचित काम किया है । इसी बीच में गांवके और कई सज्जन हुफा चिलमके बहानेसे वहां आ बैठे। कई स्त्रियों ने जब यह सुना कि श्रीकण्ठ पत्नीके पीछे पितासे लडनेपर तैयार हैं तो उन्हें बडा हर्ष हुआ। दोनों पक्षों की मधुर वाणियां सुननेके लिये उनकी आत्माए तलमलाने लगीं। गांवमे कुछ ऐसे कुटिल मनुष्य भी थे जो इस कुलकी नीतिपूर्ण गतिपरमन ही मन जलते थे। वह कहा करते थे, श्रीरुएठ अपने यापसे दवता है इसलिये चह दब्बू है,उसने इतनी विद्या पढ़ी इसलिये वह किताबोंका कोडा है, चेनीमाधव सिंह उमकी सलाह के बिना कोई काम नहीं करते यह उनकी मर्यता है । इन महानुभावोंकी शुभ कामना भार पूरी होती दिखाई दी। कोई हुधा पीनेके बहाने और कोई लगानकी रसीद दिसाने, आ आकर बैठ गये।वेनीमाधवमिह पुराने आदमी ।
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सप्तसरोज
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जिस समय लालविहारी सिंह सिर झुकाये आनन्दीके द्वारपर
सडा था, उसी समय श्रीकंठ सिंह भी आंखें लाल किये बाहरसे
आये । भाईको खडा देखा तो घृणासे आसें फेर ली और कतरा
कर निकल गये मानो उसकी परछाहीसे भी दूर भागते हैं ।
आनन्दीने लालबिहारीकी शिकायत तो की थी लेकिन अब
सनमें पछता रही थी। वह स्वभावसे ही दयावती थी। उसे इमका
तनिक भी ध्यान न था कि वात इतनी बढ जायगी । वह मनमे
अपने पतिपर अमला रही थी कि यह इतनेमें गरम क्यों हो जाते
हैं ? उसपर यह भय भी लगा हुआ था कि कहीं मुझमे इलाहा
बाद चलनेको कहें तो कैसे क्या करूंगी। इसी वोचमें जब उसने
लालविहारीको दरवाजेपर खड़े यह कहते सुना कि अब मैं जाता
हूँ, मुझसे जो कुछ अपराध हुआ है उसे क्षमा करना, तो उसका
रहा सहा क्रोध भी पानी-पानी हो गया। वह रोने लगी। मनकी
मैल धोने के लिये नयन जलसे उपयुक्त और कोई वस्तु नहीं है।
श्रीकठको देखकर आनन्दीने कहा, लाला याहर खडे
रो रहे हैं।
श्रीकठ-तो मैं क्या करू ?
आनन्दी-भीतर घुला लो । मेरी जीममें आग लगे मैंने
कहाँसे यह गगढ़ा उठाया।
श्रीकठ-में न बुलाऊ गा!
बहुत
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आनन्दी-पछताओगे। उन्हें यहुत ग्लानि हो गई है, ऐसा
नहो फही चल दे।
बडे घरकी बेटी श्रीकण्ठ न उठे। इतने में लालबिहारीने फिर कहा, भाभी। भैयासे मेरा प्रणाम कह दो। वह मेरा मुह नहीं देखना चाहते, इसलिये मैं भी अपना मुह उन्हे. न दिसाऊ गा। लालविहारी इतना कहकर लौट पड़ा और शीव्रतासे दरवा- जेकी ओर बढा । अन्तमे आनन्दी कमरेसे निकली और उसका हाथ पकड लिया। लालबिहारीने पीछे फिर कर देखा और आँसमे आंसू भर बोला, मुझे जाने दो। आनन्दी-कहा जाते हो? लालबिहारी-जहाँ कोई मेरा मुह न देसे। श्रानन्दी-मैं न जाने दूगी। लालबिहारी-मैं तुम लोगोंके साथ रहने योग्य नहीं हूँ। भानन्दी-तुम्हे मेरी सौगन्ध,अब एक पग भी आगे न बढ़ाना । लालबिहारी -जबतक मुझे यह न मालूम हो जाय कि भैया- का मन मेरी तरफसे माफ हो गया, तबतक मैं इस घरमें कदापि न रहूँगा। आनन्दी-में ईश्वरकी साक्षी देकर कहती हूँ कि तुम्हारी ओरसे तनिक भी मैल नहीं है। अब श्रीकठका हृदय भी पिघला । उन्होंने बाहर आकर लाल- बिहारीको गले लगा लिया। दोनों भाई खून फूट फूट कर रोये । लालबिहारीने मिसकते हुए कहा, भैया । अब कभी मत कहना कि तुम्हारा मुह न देखू गा । इसके सिवा आप जो दण्ड देंगे वह मैं सहर्ष स्वीकार करूगा। श्रीकठने कांपते हुए स्वरसे कहा-लल्लू । इन बातोंको बिल- , सप्तसरोज लेती रही, परन्तु जब उसने देखा कि ये औपवियां कुछ काम नहीं करती तब वह एक महीपधिकी फिक्रम लगी जो काया-कल्पसे कग नहीं थी। उसने महीनों, परमों इसी चिन्ता-सागरमें गोते लगाते काटे । उसने दिलको बहुत समझाया, परन्तु मनमे जो घात समा गई थी वह किसी तरह न निकली 1 उसे बडा भारी प्रात्मत्याग करना पडेगा । शायद पति-प्रेमके सहश अनमोल रत्न भी उसके माथ निकल जाय, पर क्या ऐसा हो सकता है ? पन्द्रह वर्पतक लगातार जिस प्रेमके वृक्षको उसने सेवा की है क्या वह हवाका, एक झोंका भी न सह सकेगा? गोदावरीने अन्त में अपने प्रवल विचारोंके आगे सिर झुका ही दिया । अन सौतका शुभागमन करने के लिये वह तैयार हो गई थी। २ 1 पण्डित देवदत्त गोदावरीका यह प्रस्ताव सुनकर स्तम्भित हो गये । उन्होंने अनुमान किया कि या तो यह प्रेमकी परीक्षा कर रही है या मेरा मन लेना चाहती है। उन्होंने उसकी बात हसकर टाल दी । पर जब गोदावरीने गम्भीर भावसे कहा, तुम इसे हसी मत समझो मैं अपने हृदयसे कहती हूँ कि सतानका मुह देसनेके. लिये मैं सौतसे छातीपर मूंग दलवाने के लिये भी तैयार हूँ, तब तो उनका सन्देह जाता रहा । इनने ऊचे और पवित्र भावसे भरी हुई गोदावरीको उन्होंने गलेसे लिपटा लिया। वे बोले, मुझसे यह न होगा । मुझे मन्तानकी अभिलापा नहीं। गोदावरीने जोर देकर कहा, तुमको न हो, मुझे तो है। अगर सौत अपनी खातिरसे नहीं वो तुम्हें मेरी सातिरसे यह काम करना ही पड़ेगा। पण्डितजी सरल स्वभावके मनुष्य ये 1 हामी तो उन्होंने न गरी, पर बार-बार कहनेसे वे कुछ-कुत्र राजी अवश्य हो गये। उम तरफसे इसीकी देर थी। पडितजीको कुछ भी परिश्रम न करना पड़ा । गोदावरीको कार्य-कुशलताने सब काम उनके लिये मुलभ कर दिया। उसने इस कामके लिये अपने पाससे केवल रुपये ही नहीं निकाले, किन्तु अपने गहने और कपडे भी अर्पण कर दिये। लोकनिन्दाका भय इस मार्गमें सबसे बड़ा काटा था। देवदत्त मनमें विचार करने लगे कि जब मैं मोर सजाकर चलूगा तब लोग मुझे क्या कहेंगे ? मेरे दफ्तरके मित्र मेरी हमी उडायेगे और मुस्कुराते हुए कटाक्षोंसे मेरी ओर देखेंगे। उनके ये कटाक्ष छुरीसे भी ज्यादा तेज होंगे। उस समय मैं क्या करूँगा? गोदावरीने अपने गांवमें जाकर इस कार्यको आरम्भ कर दिया और इसे निर्विघ्न समाप्त भी कर डाला। नयी बहू घरमें आ गई । उस समय गोदावरी ऐसी प्रसन्न मालूम हुई मानो वह वेटेका ब्याह कर लाई हो। वह सूर्य गाती-बजाती रही । उसे क्या मालम था कि शीघ्र ही उसे इस गानेके बदले रोना पडेगा। T ३ फई मास बीत गये। गोदावरी अपनी सौतपर इस तरह शासन करती थी मानो वह उसकी सास हो, तथापि वह यह बात कभी न भूलती थी कि मैं वास्तवमे उसकी सास नहीं हूँ। उधर २ - सप्तसरोज लेती रही, परन्तु जब उसने देखा कि ये औषधिया कुछ काम नहीं करती तब वह एक महीपधिकी फिक्री लगी जो काया-कल्पसे कग नहीं थी। उसने महीनों, वरसों इसी चिन्ता-सागरमें गोते लगाते काटे । उसने दिलको बहुत समझाया, परन्तु मनमे जो बात समा गई थी वह किमी तरह न निकली। उसे बडा भारी आत्मत्याग करना पडेगा । शायद पति-प्रेमके सदृश अनमोल रत्न भी उसके साथ निकल जाय, पर क्या ऐसा हो सकता है ? पन्द्रह वर्षतक लगातार जिम प्रेमके वृक्षकी उसने सेवा की है क्या वह हवाका एक झोंका भी न सह सकेगा? गोदावरीने अन्तमें अपने प्रबल विचारों के आगे सिर झुका ही दिया । अब सौतका शुभागमन करने के लिये वह तैयार हो गई थी। २ पण्डित देवदत्त गोदावरीका यह प्रस्ताव सुनकर स्तम्भिव हो गये। उन्होंने अनुमान किया कि या तो यह प्रेमकी परीक्षा कर रही है या मेरा मन लेना चाहती है। उन्होंने उसकी बात हसकर दाल दी। पर जय गोदावरीने गम्भीर भावसे कहा, तुम इसे हसी मत समझो मैं अपने हृदयसे कहती हैं कि सतानका मुह टेसनेके लिये मैं सौतमे छातीपर मृग दलवाने के लिये भी तैयार हूँ, तय तो उनका सन्देह जाता रहा। उनने ऊचे और पवित्र भावसे भरी हुई गोदावरीको उन्होंने गलेसे लिपटा लिया। वे बोले मुगासे यह न होगा । मुझे सन्तानकी अभिलापा नहीं। गोदापरीने जोर देकर कहा, तुमको न हो, मुगे तो है । अगर - १७ सौत अपनी खातिरसे नहीं तो तुम्हे मेरी सातिरसे यह काम करना ही पड़ेगा। पण्डितजी सरल स्वभावके मनुष्य थे । हामी तो उन्होंने न भरी, पर बार-बार कहनेसे वे कुछ-कुछ राजी अवश्य हो गये। उस तरफसे इसीकी देर थी। पडितजीको कुछ भी परिश्रम न करना पड़ा। गोदावरीकी कार्य-कुशलताने सब काम उनके लिये सुलभ कर दिया। उसने इस कामके लिये अपने पाससे केवल रुपये ही नहीं निकाले, किन्तु अपने गहने और कपड़े भी अर्पण कर दिये। लोकनिन्दाका भय इस मार्गमे सबसे बडा काटा था। देवदत्त मनमें विचार करने लगे कि जब मैं मौर सजाकर चलूगा तय लोग मुझे क्या कहेंगे ? मेरे दफ्तरके मित्र मेरी हमी उडायेगे और मुस्कुराते हुए कटाक्षोंसे मेरी थोर देखेंगे। उनके ये कटाक्ष छुरीसे भी ज्यादा तेज होंगे। उस समय मैं क्या करूंगा? गोदावरीने अपने गांवमे जाकर इस कार्यको प्रारम्भ कर दिया और इसे निर्विघ्न समाप्त भी कर डाला | नयी बहू घरमें आ गई । उस समय गोदावरी ऐसी प्रसन्न मालूम हुई मानो वह बेटेका व्याह कर लाई हो । वह खूब गाती-बजाती रही। उसे क्या मालूम था कि शीघ्र ही उसे इस गानेके पदले रोना पड़ेगा। ३ फई मास बीत गये। गोदावरी अपनी सौतपर इस तरह शामन करती थी मानो वह उसकी सास हो, तथापि वह यह बात कभी न मूलती थी कि मैं वास्तवमें उसकी सास नहीं हैं। उधर २ । सप्तसरोज गोमतीको भी अपनी स्थितिका पूरा ख्याल रहता था। इसी कारण सासके शासनकी तरह कठोर न रहनेपर भी गोदावरीका शासन उसे अप्रिय प्रतीत होता था। उसे अपनी छोटी-मोटी जरूरतों के लिये भी गोदावरीसे कहते ससोच होता था। कुछ दिनों बाद गोदावरीके स्वभावमें एक विशेप परिवर्तन दिसाई देने लगा। वह पण्डितजीको घरमे आते-जाते बडी तीन दृष्टिसे देखने लगी। उसकी स्वाभाविक गम्भीरता अब मानो लोप सी हो गई, जरासी बात भी उसके पेट में नहीं पचनी । जब पडित जी दफ्तरसे आते तब गोदावरी उनके पास घण्टों बैठी गोमतीका वृत्तान्त सुनाया करती। इस वृत्तान्त-कथनमें बहुत ऐसी छोटी छोटी बाते भी होती थीं कि जब कथा समाप्त होती तव पडितजीके हृदयसे वोझसा उतर जाता। गोदावरी क्यों इतनी मृदुभाषिणा हो गई थी, इसका कारण समझना मुश्किल है। शायद अब वह गोमतीसे डरती थी। उसके सौन्दर्यसे, उसके यौवनसे, उसके लज्जायुक्त नेत्रोंसे शायद वह अपनेको पराभूत समझती । बधिको तोडकर वह पानीको धाराको मिट्टीके ढेलोंमे रोकना चाहती है एक दिन गोदावरीने गोमतीसे मीठे चावल पकानेको कहा। शायद वह रक्षाबन्धनका दिन था । गोमतीने कहा, शक्कर नहीं है । गोदावरी यह सुनते ही विस्मित हो उठी। शकर इतन जल्दी कैसे उठ गई। जिसे छाती फाडकर कमाना पडता है, उसे अखरता है, खानेवाले क्या जाने ? जब पण्डितजी दफ्तरसे आये तब यह जरा-सी बात बड़ा विस्तृत रूप धारण करके उनके कानोंमें पहुँची। थोडी देरके लिये . 1 सौत 'पडितजीके दिलमें भी यह शङ्का हुई कि गोमतीको कहीं भस्मक रोग तो नहीं हो गया। ऐसी ही घटना एक बार फिर हुई । पडितजीको रवासीरकी शिकायत थी । लालमिर्च वे विलकुल न साते थे। गोदावरी जब रसोई वनाती थी तब वह लालमिर्च रसोई-घरमे लाती ही न थी। गोमतीने एक दिन दालमें मसाले के साथ थोडी सी लाल- मिर्च भी डाल दी। पडितजीने दाल कम साई । पर गोदावरी गोमतीके पीछे पड़ गई। ऐठकर वह उससे बोली । ऐसी जीभ जल क्यों नहीं जाती 10 IN - 11 , पडितजी बडे ही सीधे आदमी थे। दफ्तर गये, साया, पड कर सो रहे । वे एक साप्ताहिक पत्र मगाते थे। उसे कभी-कभी महीनों सोलनेकी नौवत न पाती थी। जिस काममे जरा भी कष्ट या परिश्रम होता उससे वे कोसों दूर भागते थे। कभी कभी उनके दफ्तरमें थियेटरके "पास" मुफ्त मिला करते थे। पर पडितजी उनसे कभी काम नहीं लेते। और ही लोग उनसे मांग ले जाया करते । रामलीला या कोई मेला तो उन्होंने शायद नौकरी करने के बाद फिर कभी देखा ही नहीं । गोदावरी उनकी प्रकृति. का परिचय अच्छी तरह पा चुकी थी। पडितजी भी प्रत्येक विष । यमें गोदावरीके मतानुमार चलनेमें अपनी कुशल समझने थे. पर रूई-सी मुलायम वस्तु भी दयकर कठोर हो जाती है पडितजीको यह नाठों पहरकी चहचह प्रसह्य मी प्रतीत होती। कभी-कभी मन में अमलाने भी लगते । इच्छा शक्ति जो इतने
सप्तसरोज
दिनोंतक बेकार पडी रहनेसे निर्बल-सी हो गई थी, अब कुछ
सजीव-सी होने लगी थी।
पडितजी यह मानते थे कि गोदावरीने सौतको घर लानेगे
बडा भारी त्याग किया है। उसका यह त्याग अलौकिक कहा जा
सकता है , परन्तु उसके त्यागका भार जो कुछ है वह मुझपर है
गोमतीपर उसका क्या एहसान | मेरे कारण उसपर क्यों ऐसी
क्रूरता की जाती है । यहा उसे कौन-सा सुख है जिसके लिये वह
फटकारपर फटकार सहे ? पति मिला है वह बूढ़ा और सदा
रोगी,घर मिला है वह ऐसा कि अगर आज नौकरी छूट जाय तो
कल चूल्हा न जले। इस दशामें गोदावरीका यह स्नेह-रहित
वर्ताव उन्हे बहुत अनुचित मालूम होता।
गोदावरीकी दृष्टि इतनी स्थूल न थी कि उसे पण्डितजीके.
मनके भाव नजर न आवें । उनके मनमे जो विचार उत्पन्न होते -
वे सब गोदावरीको उनके मुखपर अङ्कितसे दिसाई पडते । यह
जानकारी उसके हृदयमें एक ओर गोमतीके प्रति ईकी प्रचण्ड
अग्नि दहका देती, दूसरी ओर पडित देवदत्तपर निष्ठुरता और
स्वार्थ-प्रियताका दोपारोपण कराती । फ्ल यह हुआ कि मनो-
मालिन्य दिन-दिन बढता ही गया ।
५
गोदावरीने धीरे-धीरे पडितजीसे गोमतीकी बातचीत करनी
छोड़ दी, मानो उसके निकट गोमती घरमे थी ही नहीं । न
नसके साने पीनेकी वह सुध लेती है, न कपडे लत्ते की। एक
बार फई दिनोंतफ उसे जलपानके लिये कुछ भीन मिला। पडित
-
. सौत जी तो थालसी जीव थे। वे इन सब अत्याचारोंको देसा करते, ‘पर अपने शांतिसागरमें घोर उपद्रव मच जानेके भयसे किसीसे कुछ न कहते । तथापि इम पिछले अन्यायने उनकी महती सहन- शक्तिको भी मध डाला। एक दिन उन्होंने गोदावरीसे डरते-डरते कहा, क्या भाजकल जलपानके लिये मिठाई-विठाई नहीं आती ? गोदावरीने क्रुद्ध होकर जवाब दिया, तुम लाते ही नहीं तो 'आवे कहाँ से। मेरे कोई नौकर बैठा है ? देवदत्तको गोदावरीके ये कठोर वचन तीरसे लगे। आजतक गोदावरीने उनसे ऐसी रोपपूर्ण बाते कभी न की थी। वे बोले, धीरे बोलो, मुझलानेकी तो कोई बात नहीं है। गोदावरीने से नीची करके कहा, मुझे तो जैसे आता है वैसे बोलती हूँ ! दूसरोंकी-सी मधुर बोली कहांसे लाऊ ? देवदत्तने जरा गरम होकर कहा, आजकल मुझे तुम्हारे मिजाजका कुछ रग ही नहीं मालूम होता। बात बातपर तुम उलझनी रहती हो। गोदावरीका चेहरा क्रोधाग्निसे लाल हो गया। वह बैठी थी सडी हो गयी। उसके होंठ फड़कने लगे। वह बोली, मेरी कोई बात अब तुमको क्यों अच्छी लगेगी। अब तो मैं सिरसे पैरतक दोपोंसे भरी हुई हूं। श्रन और लोग तुम्हारे मनका काम करेगे। मुझसे नहीं हो सकता। यह लो सन्दूकसी कुजीअपने रुपये पैमे सम्भाल लो, यह रोज रोजकी झमट मेरे मानकी नहीं। जवतक निभा, निभाया । अब नहीं निभ सकता। पण्डित देवदत्त मानो मूच्छित-से हो गये। जिस शाति भगरा ।
२२
.
।
।
सप्तसरोज
उन्हें भय था उसने अत्यन्त भयकर रूपा धारण करके उनके घरमें
प्रवेश किया। वह कुछ भी न बोल सके । इस समय उनके अधिक
बोलनेसे वात बढ़ जानेका भय था। वह बाहर चले आये और
सोचने लगे कि मैंने गोदावरी के साथ कौन-सा अनुचित व्यवहार
किया है। उनके ध्यानमें न आया कि गोदावरीके हाथसे निकलकर
घरका प्रबन्ध कैसे हो सकेगा। इस थोडी सी आमदनीमें वह न
जाने किस प्रकार काम चलाती थी? क्या क्या उपाय वह करती
थी? अब न जाने नारायण कैसे पार लगावेगे ? उसे मनाना
पडेगा और हो ही क्या सकता है। गोमती भला क्या कर सकती
है, सारा बोम मेरे ही सिर पड़ेगा। मानेगी तो, पर मुश्किलसे ।
परन्तु पडितजीकी ये शुभकामनाए निष्फल हुई । सन्दूक की
वह कुजी विपैली नागिन की तरह वहीं आंगनमें ज्यों-की त्यों तीन
दिनतक पढी रही, किसीको उसके निकट जानेका साहस न हुआ।
चौथे दिन पण्डितजीने मानो जानपर खेलकर उस कुञ्जीको
उठा लिया। उस समय उन्हें ऐमा मालुम हुआ मानो किसीने
उनके सिरपर पहाड उठाकर रख दिया। आलसी आदमियों को
अपने नियमित मार्गसे तिलभर भी हटना बडा कठिन मालूम
होता है।
यद्यपि पडितजी जानते थे कि मैं अपने दफ्तरके कारण इस
कार्यको सभालने में असमर्थ हू, तथापि उनसे इतनी ढिठाई न हो
सकी कि वह कुञ्जी गोमती को दें। पर यह केवल दिसावा ही भर
था। यु.जी उन्हीं के पास रहती थी, फाम मब गोमतीको करना
पडता था। इस प्रकार गृहस्थीके शासनका अन्तिम साधन भी
१ " . सप्तसरोज चाधा, कोई रुकावटन पडी। हां, अनुभव न होने के कारण पडित- जीका प्रवन्ध गोदावरीके प्रबन्ध जैसा अच्छा न था। कुछ खब ज्यादा पड जाता था। पर काम भलीभाति चला जाता था। हां. गोदावरीको गोमतीके सभी काम दोपपूर्ण दिखाई देते थे। ईपमि अग्नि है । परन्तु अग्निका गुण उसमें नहीं। वह हृदयको फैलाने के बदले और भी सकीर्ण कर देती है । अत्र घरमें कुछ हानि हो जानेसे गोदावरीको दुखके वदले आनन्द होता । वरसातके दिन थे। कई दिनतक सूर्यनारायणके दर्शन न हुए। सन्दूकमें रक्खे हुए कपडोंमें फफूदी लग गई। तेलके प्रचार विगड गये । गोदा वरीको यह सब देखकर रत्तीभर भी दुख न हुआ। हा, दो चार जली-कटी सुनानेका अवसर उसे अवश्य मिल गया। माल किन ही बनना आता है कि मालकिनका काम करना भी। पडित देवदत्तकी प्रकृतिमें भी अब नया रग नजर आने लगा। जबतक गोदावरी अपनी कार्यपरायणतासे घरका सारा बोम सभाले थी तबतक उनको कभी किसी चीजकी कमी नहीं खली। यहांतक कि शाक-भाजीके लिये भी उन्हें बाजार नहीं जाना पड़ा। पर अव गोदावरी उन्हें दिनमें कई वार बाजार दौड़ते देखती । गृहस्थीका प्रबन्ध ठीक न रहनेसे बहुधा जरूरी चीजों के लिये उन्हें बाजार ऐन वक्तपर जाना पडता । गोदावरी यह कौतुक देखती और सुना-सुनार क्हती, यही महाराज हैं कि एक तिनका उठाने के लिये भी न उठते थे। अब देखती हूँ, दिनमें दस दफे बाजारमे खड़े रहते हैं। अब मैं इन्हें कभी यह कहते नहीं सुनती कि मेरे लिसने-पढ़नेमें हर्ज होगा। 1 सात गोदावरीको इस पातका एक बार परिचर मिल चुका था कि परिउतनी बाजार हाटके काममें कुशल नहीं है। इमलिये जव उसे कपदे की जरूरत होती वर वह अपने पडोसके एक बूढे लाला साहबसे मगवाया करती थी। पण्डितजीको यह बात भूल सी गई थी कि गोदावरीको साड़ियों की भी जरूरत पड़ती है। उनके सिरमे तो जितना योम कोई हटा दे उतना ही अच्छा था। खुद वे भी वही कपडे पहनते ये जो गोदावरी मगाकर उन्हें दे देती थी। पण्डितजीको नये फैशन और नये नमूनोंसे कोई प्रयोजन न या। पर अब कपड़ों के लिये भी उन्ही को बाजार जाना पड़ता है। एक बार गोमतीके पास साडिया नथीं । पण्डितजी बाजार गये तो एक बहुत अच्छा सा जोडा उसके लिये ले आये। वजाजने मन- माने दाम लिये । उधार सौदा लानेमें पण्डितजी जरा भी आगा- पीला न करते थे। गोमतीने वह जोडा गोदावरीको दिखाया ! गोदावरीने देखा और मुह फेरकर रुखाई से बोली, भला तुमने उन्हे कपडे लाना वो सिखा दिया। मुझे तो सोलह वर्ष बीत गये, उनके हायका लाया हुआ कपडा स्वप्नमें भी पहनना नसीब नहीं हुआ। ऐसी घटनाए गोदावरीकी ईग्निको और भी प्रज्वलित कर। देती थीं। जनतक उसे यह विश्वास था कि पण्डितजी स्वभावसे ही रूसे हैं तबतक उसे सन्तोष था। परन्तु अब उनकी ये नयी नयी तरगे देखकर उसे मालूम हुआ कि जिस प्रीतिको मैं सैकडों- यत्न करके भी न पा सकी उसे इस रमणीने केवल अपने यौवन- से जीत लिया। उसे अब निश्चय हुआ कि मैं जिसे सच्चा प्रेम समझ रही थी वह वास्तवमै कपटपूर्ण था । वह निरा स्वार्थ या
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सजनताका दंड
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साधारण मनुष्यकी तरह शाहजहांपुर के डिस्ट्रिक्ट इजीनियर
सरदार शिवसिंहमें भी भलाइया और बुराइयां दोनों ही वर्तमान
थी । भलाई यह थी कि उनके यहां न्याय और दयामें कोई अन्तर
न था । बुराई यह थी कि वे सर्वथा निर्लोम और नि स्वार्थ थे।
भलाईने मातहतोंको निडर और आलसी बना दिया था, बुराई
कारण उस विभागके सभी अधिकारी उनकी जानके दुश्मन व
गये थे।
प्रात् कालका समय था । वे किसी पुलकी निगरानीके लि
तैयार सडे थे। मगर साईस अभीतक मीठी नींद ले रहा था
रातको उसे अच्छी तरह सहेज दिया गया था कि पौ फटने
पहले गाड़ी तैयार कर लेना । लेकिन सुबह भी हुई, सूर्य भगवान
दर्शन भी दिये, शीतल किरणों में गरमी भी आई, पर साईसय
नौद अभीतक नहीं टूटी।
सरदार साहब सडे-खडे थककर एक कुर्सीपर बैठ गये
साईस तो किसी तरह जागा, परन्तु अर्दलीके चपरासियोंका
पद
नहीं । जो महाशय डाक लेने गये वे एक ठाकुरद्वारमें सड़े चरण
मृतकी प्रतीक्षा कर रहे थे । जो ठेकेदारको बुलाने गये थे वे बार
रामदासी संथामे बैठे गांजेका दम लगा रहे थे।
।
सी चढे मितव्ययी थे। उनके दो भाई लामा | बधवा माता बनारसमें रहती थीं। एक विधमा अwिity लम्बित थी। इनके सिवा कई गरीव नाही ful देते थे। इन्हीं कारणोंसे वे सदा साली stu aanti 5 उनके कपड़ोंपर भी इस आर्थिक दशाके चिनिधान फेन यह सब कष्ट सहकर भी वे लोभको पद tatt हते थे और उन्हें देवता समझते थे। उनकी हानि न होती थी, लेकिन जिन लोगों न ममाEिET 1 । ননা ' धूप तेज होती जाती थी। सरदार साहब मुमताकर मान- में चले गये और अपनी पत्नीसे बोले, इतना दिन घर माया, अभीतक एक चपरासीका भी पता नहीं। इनके गारे पो गर नाकमें दम आ गया। पत्नीने दीवार की ओर देखकर दीवारसे कहा, यह-सप बन्द सिर चढानेका फल है। सरदार साहब चिढकर बोले, तो क्या करू', उन माग । २ सरदार साहब के पास मोटरकारका तो कहना ही काम फिटिन भी न थी। वे अपने इसे ही प्रमान थे, जो नौकर-चाकर अपनी भाषामे उड़नसटोला करत । Arti जोग उसे इतना आदरसूचक नाम न देकर epi kanty उचित समझते थे । इसी तरह सरदार साहब Pt Agrite देते थे। जिन लोगोंपर उनका स्नेह था थे ४.५का न ३ . 1 सप्तसरोज सम्बन्ध थे वे उनके सद्भावोंके ग्राहक न थे, क्योंकि उन्हें हानि होती थी। यहातक कि उन्हें अपनी सहधर्मिणीसे भी कभी कभी अप्रिय बातें सुननी पडती थीं। एक दिन वे दफ्तरसे आये तो उनकी पत्नीने स्नेहपूर्ण ढगते कहा,तुम्हारी यह सजनता किस कामकी, जब सारा ससार तुम को बुरा कह रहा है। सरदार साहबने दृढ़तासे जवाब दिया, ससार जो चाहे कई परमात्मा तो देखता है। रामाने यह जवाब पहले ही सोच लिया था। वह बोली, मैं तुमसे विवाद तो करती नहीं, मगर जरा अपने दिलमें विचार करके देखो कि तुम्हारी इस सच्चाईका दूसरों पर क्या असर पडत है ? तुम तो अच्छा वेतन पाते हो। तुम अगर हाथ न बढ़ाओ तो तुम्हारा निर्वाह हो सकता है। रूखी रोटियां मिल ही जायेगी। मगर ये दस-दस पांच पांच रुपयेके घपरासी, मुहरिर, दफ्तरी वेचारे कैसे गुजर करें। उनके भी घाल-बच्चे हैं। उनके भी कुटुम्म परिवार हैं। शादी-गमी, तिथि-त्यौहार यह सब उनके साई लगे हैं। भलमनसीका भेष बनाये बिना काम नहीं चलता बताओ उनका गुजर कैसे हो ? अभी रामदीन चपरासीको घर बाली आयी थी, रोते-रोते आंचल भींगता था। लड़की, हो गयी है । अब उसका ब्याह करना पड़ेगा। ब्राह्मणकी जाति हजारोंका सर्च । यताओ उसके भासू किसके सिर पड़ेगे? । ? -- -- ये सब पावें सच थीं। इससे सरदार साहबको इनकार हो सकता था। उन्होंने स्वय इस विषयमें बहुत कुछ 1 सज्जनताका दण्ड किया था। यही कारण था कि वह अपने मातहतोंके साथ वडी नरमीका व्यवहार करते थे। लेकिन सरलता और शालीनताका आत्मिक गौरव चाहे जो हो, उनका आर्थिक मोल बहुत कम है। वे पोले, तुम्हारी यातें सब यथार्य हे, किन्तु मैं विवश हूँ। अपने नियमों को कैसे तोडू ? यदि मेरा वश चले तो मैं उन लोगोंका चेतन चढ़ाहूँ। लेकिन यह नहीं हो सकता कि मैं खुद लूट मचा -और उन्हें लूटने दूं। रामाने व्यग्यपूर्ण शब्दोंमें कहा, तो यह हत्या क्रिसपर पडेगी? सरदार साहबने तीसे होकर उत्तर दिवा, यह उन लोगोंपर पडेगी जो अपनी हैसियत और आमदनीसे अधिक खर्च करना चाहते हैं । अरदली बनकर क्यों वकील के लडकेसे लड़की न्या- छनेकी ठानते हैं। दफ्तरीको यदि टहलुवेकी जरूरत हो तो यह किसी पाप-कार्यसे कम नहीं। मेरे साईसकी स्त्री अगर चाँदीकी 'सिल गलेमें डालना चाहे तो यह उसकी मूसंता है। इस झूठी बड़ाईका उत्तरदाता मैं नहीं हो सकता। ३ इन्जिनियरोंका ठेकेदारोसे कुछ वैसा ही सम्बन्ध है जैसा मधुमक्सियोंका फूलोंसे । अगर वे अपने नियत भागसे अधिक पानेकी चेष्टान करेंतो उनसे किसीको शिकायत नहीं हो सकती। यह मधु रस कमीशन कहलाता है। रिश्वत और कमीशन बडा अन्तर है। रिश्वत लोक और परलोक दोनोंका ही सर्वनाश कर देती है। उसमें भय है, चोरी है, बदमाशी है। मगर कमी. शन एक मनोहर वाटिका है, जहां न मनुष्यका डर है, न पर- - . . , सप्तसरोल मात्मा का भय, यहातक कि वहाँ यात्माकी छिपी हुई चुटकियों की भी गुजर नहीं है और कहांतक कई इसकी ओर बदनामी भाख भी नहीं उठा सकती। यह वह बलिदान है जो हत्या होते हुए भी धर्मका एक अश है। ऐसी अवस्थामे यदि सरदार शिव- सिंह अपने उज्ज्वल चरित्रको इस धव्येसे साफ रखते थे, और- उसपर अभिमान करते ये तो वे क्षमाके पात्र थे। 17 मार्चका महीना बीत रहा था। चीफ इन्जिनियर साहन जिलेमें मुआयना करने आ रहे थे। मगर अभीतक इमारतोंका काम अपूर्ण था। सडके खराब होरही थीं, ठेकेदारोंने मिट्टी और कइड भी नहीं जमा किये थे। सरदार साहब रोज ठेकेदारोंको ताकीद करते थे, मगर इसका कुछ फल न होता था। एक दिन उन्होंने सबको बुलाया। वे कहने लगे, तुम' क्या यही चाहते हो कि मैं इस जिलेसे बदनाम होकर जाऊ.. मैने तुम्हारे साथ कोई बुरा सलूक नहीं किया पाहता तो आपसे काम छीनकर खुद करा लेवा, गगर smहानि पहुँचाना उचित न समझा । उसकी मुझे याद है । खैर! ठेकेदार लोग यहांसें चले सो पारीन । गिस्टर गोपाल दास बोले, अव आटे-दालका.भाष मा हो जायगा । शहबाज खांने कहा, किसी तरह इराफा जनाजा निकले तो यहाँसे . J 4 . + सेठ चुन्नीलालने फरमाया-इन्जिनियरसे मेरी जान-पहचान मैं उनके साथ काम कर चुका हूँ। वह इन्हें खूब लथेड़ेगा। -
H
+
सज्जनताका दण्ड
इसपर बूढ़े हरिदासने उपदेश दिया, यारो, स्वार्थकी यात
और है। नहीं तो सच यह है कि यह मनुष्य नहीं देवता है।
भला और नहीं तो सालभरमें कमीशनके १० हजार तो होते
होंगे। इतने रुपयोंको ठीकरेकी तरह तुच्छ समझना क्या कोई
सहज बात है ? एक हम हैं कि कौड़ियों के पीछे ईमान बेचते
फिरते हैं। जो सज्जन पुरुप हमसे एक पाईका रवादार न हो,
सब प्रकारके कष्ट उठाकर भी जिसकी नीयत डावाडोल न हो,
उसके साथ ऐमा नीच और कुटिल बर्ताव करना पडता है। इसे
अपने अभाग्यके सिवा और क्या समझे।
शहबाज खांने फरमाया हो, इसमें तो कोई शक नहीं कि
यह शख्स नेकीका फरिश्ता है।
- सेठ धुन्नीलालने गम्भीरतासे कहा, खां साहय बात तो यही
है, जो तुम कहते हो। लेकिन ख्यिा क्या जाय? नेकनीयतीसे तो
काम नहीं चलता । यह दुनिया तो छल-कपटकी है।
. 'मिस्टर गोपालदास बी० ए० पास थे। वे गर्वके साथ बोले,
इन्हें जब इस तरह रहना था तो नौकरी करनेकी क्या जरूरत
की? यह कौन नहीं जानता कि नियतको साफ रखना अच्छी
गत है। मगर यह भी तो देखना चाहिये कि इसका दुमरोंपर
त्या असर पड़ता है। हमको तो ऐसा आदमी चाहिये जो खुद
बाय और हमें भी खिलावे ! खुद हलुवालाय, हमें रूखीरोटिया
की खिलाये । वह अगर एक रुपया कमीशन लेगा तो उमकी जगह
चिका फायदा करा देगा। इन महाशयके यहां क्या है ? इमलिये
"आप जो चाहें कहें, मेरी तो कभी इनसे निम ही नहीं सकती।
-
श्यक हो गया। सरदार माहवने आशकित हाथो पत्र-खोला। विचारधीन, स्वार्थान्ध महात्माओंके हाथों बहुत तग थे। उनका अच्छी चीज़ है, मगर ऐसी नेकी हीसे क्या जो दूसरोंकी आना गोपालदासकी हा-में-हा मिलाने लगे। निवल आत्मामोंमें निर्णय न हुआ था। आज वकील साहबका एक पत्र आया। उसने इस बातका भी निश्चय कर दिया, मगर विश्वास, आशा- और वघनके विलकुल प्रतिकूल । पहले वकील साहबने एक जिले के इञ्जिनियरके साथ किसी प्रकारका ठहराव व्यर्थ समझा। खूप मोसू बहाये। मगर जव ज्यादा पूछ-ताछ करनेपर सरदार साहयके धन-वैभवका भेद खुल गया तब दहेजका ठहराना इयको पहुत खेद और लज्जा थी कि वे इस विषयमें स्पष्ट होनेपर मजबूर किये गये। मगर वे अपने खानदानके कई बूढ़े, खुरटि- सप्तसरोज शहबाज खां बोले, हां, नेक और पाक-साफ रहना जरूर ही ले ले। बूढे हरिदासकी बातोंकी जिन लोगोंने पुष्टि की थी के, सई. सचाईका प्रकाश जुगनूकी चमक है। TI - सरदार साहबको एक पुत्री थी। उसका विवाह मेरठ के एक वरीलके नडफेसे ठहरा था। लड़का होनहार था। जाति कुश ऊधा था। सरदार साहबने कई महीनेकी दौड़-धूपमें इस विवाह को त किया था और सब बाते हो चुकी थीं, केवल दहेजका 2 ។ बड़ी सस्ती उदारता प्रकट की। इस लज्जित और घृणित व्यवहारपा, न आर- पांच हजार रुपयेमे कमपर विवाह नहीं हो सकता । वकील सा -- ३९ सज्जनताका दण्ड कोई वश न था। इन्जिनियर साहबने एक लम्बी सांस सींची। सारी आशाए मिट्टीमे मिल गयीं। क्या सोचते थे, क्या हो गया। विकल होकर कमरेमें टहलने लगे। 'उन्होंने जरा देर पीछे पत्रको उठा लिया और अन्दर चले। विचारा था कि यह पत्र रामाको सुनावे, मगर फिर ल्याल आया कि यह सहानुभूतिकी कोई आशा नहीं । क्यों अपनी निर्वलता दिखाऊ ? क्यों मूर्स बनू १ वह बिना तानोंके वात न करेगी यह सोचकर वे आंगनसे लौट गये। सरदार साहब स्वभावके बडे दयालुये और कोमल हृदय आपत्तियों में स्थिर नहीं रह सकता। वे दुख और ग्लानिसे भरे हुए सोच रहे थे कि मैंने ऐसे कौनसे धुरे कर्म किये हैं जिनका मुझे यह फल मिल रहा है। वरसोंकी दौड़ धपके बाद जो कार्य मित हुआ था वह क्षणमात्रमें नष्ट हो गया। अब वह मेरी सामर्थ्यसे बाहर है। मैं उसे नहीं सम्हान सकता। चारों ओर अन्धकार है । कही माशामा प्रकाश नहीं। कोई मेरा सहायक नहीं । उनके नेत्र सजल हो गये। सामने मेजपर ठेकेदारोंके बिल रक्से हुए थे। वे कई समाहो- से योही पडे थे। सरदार साहबने उन्हें खोलकर भी न देखा था घाज इस आत्मिक ग्लानि और नैराश्यकी अवस्थामें उन्होंने इन विलोंको सतृष्ण भांखोंसे देखा। जरासे इशारेपर ये सारी कठि- 'नाइयां दूर हो सकती है। चपरासी और कार्क केवल मेरी सम्मति के सहारे सब कुछ कर लेंगे। मुझे जबान हिलानेकी भी जरूरत 'नहीं। न मुझे लज्जित ही होना पड़ेगा। इन विचारोंका इवना । - - 1
सप्तसरोज
-
.
रामाने उन्हें बहुत उदास और मलिनमुख देखा। उसने बार-बार
कहा था कि पडे इतिनियरके सानसामाको इनाम दो, हेड तर्क
की दावत करो, मगर सरदार साहबने उसकी बात न मानी थी,
इसलिये जब उसने सुना कि उनका दरजा घटा और बदली भी
हुई तब उसने बडी निर्दयवासे अपने व्यग-वाण चलाये। मगर
इस वक्त उन्हें उदास देखकर उससे न रहा गया। बोली, क्यों
इतने उदास हो ? सरदार साहबने उत्तर दिया, क्या करू, हँसू ?
रामाने गम्भीर स्वरसे कहा, हसना ही चाहिये । रोये तो वह
जिसने कौडियोंपर अपनी आत्मा भ्रष्ट की हो-जिसने रुपयोंपर
अपना धर्म बेचा हो। यह बुराईका दण्ड नहीं है। यह भलाई
और जनताका दण्ड है। इसे सानन्द झेलना चाहिये ।
यह कहकर उसने पति की ओर देखा तो नेनों में सपा इनु-
राग भरा हुआ दिखाई दिया। सरदार साहबने भी उसकी ओर
स्नेहपूर्ण दृष्टिसे देखा । उनकी हृदयेश्वरीका मुखारविन्द सच्चे
आमोदसे विकसित था । उसे गले लगाकर वे बोले, रामा । मुझे
तुम्हारी ही सहानुभूतिकी जरूरत थी अब मैं इस दण्डको महर्प
'सहूँगा।
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1
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7
কি মুহ , - - - जुम्मन शेख और अलगू चौधरीमें गाढ़ी मित्रता थी। साझमें खेती होती थी। कुछ लेन-देनमें भी साझा था। एकको ' दूसरेपर अटल विश्वास था । जुम्मन नब हज करने गये थे तक अपना घर अलगूको सौप गये थे और अलगूजब कभी बाहर जाते, तब जुम्मनपर अपना घर छोड देते थे। उनमें न सान- पानका व्यवहार था, न धर्मका नाता, केवल विचार मिलते थे। मित्रतामा मूलमन्त्र भी यही है । इस मित्रताका जन्म उसी समय हुआ जब दोनों मित्र बालक ही ये और जुम्मनके पूज्य पिता जुमराती उन्हें शिक्षा प्रदान करते थे। अलगूने गुरुजीकी बहुत सेवा की-खूब रिकावियाँ मांजी,खून प्याले धोये। उनका हुक्का एक क्षणके लिये भी विश्राम न लेने पाता था, क्योंकि प्रत्येक चितम अलगको श्राप घण्टेतक कितावास मुक्त कर देती थी। अलगूके पिता पुराने विचारों के मनुष्य थे। शिक्षाकी अपेक्षा उन्हे गुरुकी सेवा-शुश्रूयापर अधिक विश्वास था। कहते थे कि विद्या पढ़नेसे नहीं पाती, जो कुछ होता है गुरुके आशीर्वादसे होता है। बस, गुरुजीकी कृपा दृष्टि चाहिये। अतएव यदि अलगूपर जुमराती शेखके आशीर्वाद मधवा सत्सग . - - सप्तसरोज 11 । का कुछ फल न हुआ तो वह यह मानकर' सन्तोपकर लेगा कि विद्योपार्जनमें मैंने यथाशक्ति कोई बात उठा नहीं रखी, विद्या उसके भाग्य हीमे न थी तो कैसे आती? मगर जुमराती शेख स्वय आशीर्वादके लायक न थे। उन्हें अपने सोटेपर अधिक भरोसा था और इसी सोटेके प्रतापसे आज आसपासके गावोंमें जुम्मनकी पूजा होती थी। उनके लिसे हुए रिहननामे या बैनामेपर कचहरीका मुहरि भी कलमन, उठा सकता था। हल्केका डाकिया, कांस्टेबिल और वहसीलका चपरासी-सब उनकी कृपाकी आकाक्षा करते थे। अतएव अल- गूका मान उनके धनके कारण था तो जुम्मन शेख अपनी अमोल विद्यासे ही सबके आदर-पात्र बने थे। . २ . . . r r जुम्मन शेषकी एक बूढ़ी साला ( मौमी ) थी। उनके पास कुछ थोडी-सी मिलकियत थी। परन्तु उमके निकट सम्पन्धियों में कोई न था। जुम्मनने जम्बे-चौडे वादे करके वह मिलकियत अपने नाम चदवा ली थी । जबतक दान-पत्र की रजिस्टरी न हुई 'थी तमतक माना जानका खूप आदरसत्कार किया गया, उन्हें खूप स्वादिष्ट पदार्थ खिलाये गये । इलुवे पुलावकी वर्षा सी की' गई, पर रजिस्टरीकी मुहरने इन खातिरदारियोंपर भी मानो मुहर लगा दी । जुम्मनकी पत्नी करीमन रोटियों के साथ कड़वी वाताले कुछ वेज तीये सालन भी देने लगी। जुम्मम शेख भी - निठुर हो गये। अय पारी खाला-जानको प्राय नित्य ही ऐसी बात सुननी पड़ती थी। - T . - 4 १५ । - " पच परमेश्वर बुद्धिया न जाने कबतक जियेगी। दो तीन बीघे ऊसर क्या दे दिया है मानो मोल ले लिया है। पारी दालके बिना रोटिया नहीं उतरतीं। जितना रुपया इसके पेट में झोंक चुके उतनेसे तो 'अबतक एक गांव मोल ले लेते। कुछ दिन साला-जानने सुना और सहा, पर जब न सहा गया तब जुम्मनसे शिकायत की। जुम्मनने स्थानीय कर्मचारी- गृह-स्वामिनीके प्रसन्धमें दसन देना उचित न समझा। कुछ दिन नक और योहीरो-धोकर काम चलता रहा ! अन्तमें एक दिन खानाने जुम्मनसे कहा,बेटा तुम्हारे साथ मेरा निर्गह न होगा। तुम मुझे रुपये दे दिया करो, मैं अपना अलग पका-सा लूगी । जुम्मनने धृष्टताके साथ उत्तर दिया, रुपये क्या यहां फलते है ? खानाने नम्रतासे कहा, मुझे कुछ रूसा-सूखा चाहिये भी कि - नहीं ? जुम्मनने गम्भीर स्वरसे जवाब दिया, तो कोई यह थोडे समझता है कि मौतमे लड़कर आई हो ? खाला विगड़ गई । उन्होंने पचायत करनेकी धमकी दी। जुम्मन हसे, जिस तरह कोई शिकारी हिरनको जालको वरफ जाते देखकर मन ही-मन हसता है। वे बोले, हा जरूर पचायत । करो। 'फैसला हो जाय। मुझे भी यह रात दिनकी सटपट -- L । पसन्द नहीं। . पचायतमे किसकी जीत होगी, इस विषयमें जुम्मनको कुछ भी सन्देह न था। आस-पासके गांवगे ऐसा कौन था जो उनके अनुग्रहोंका ऋणी न हो ? ऐसा कौन था जो उनको शत्रु बनानेका साहस कर सके ? किसमे इतना बल था जो उनका
सप्तसरोज
का कुछ फल न हुआ तो वह यह मानकर सन्तोपकर लेगा कि
विद्योपार्जनमे मैंने यथाशक्ति कोई बात उठा नहीं रखी, विद्या
उसके भाग्य हीमे न थी तो कैसे थाती ?
मगर जुमराती शेख स्वय आशीर्वादके लायक न थे। उन्ह
अपने सोटेपर अधिक भरोसा था और इसी सोटेके प्रतापसे
आज आसपासके गावोंमें जुम्मनकी पूजा होती थी। उनके लिये
हुए रिईननामे या चैनामेपर कचहरीका मुहरिर भी कलम न
उठा सकता था। हल्केका डाकिया, कांस्टेबिल और वहसीलका
'चपरासी-सब उनकी कृपाकी आकांक्षा करते थे। अतएव अल-,
गूका मान उनके धनके कारण था तो जुम्मन शेख अपनी अमोल
विद्यासे ही सबके आदर-पात्र बने थे।
3
२
जुम्मन शेखको एक बूढ़ी खाला (मौमी) थी। उनके पास
कुछ थोड़ी-सी मिलकियत थी । परन्तु उसके निकट सम्बन्धियों
मे कोई न था । जुम्मनने लम्बे-चौडे वादे करके वह मिलकियत
अपने नाम चढ़वा ली थी । जवता दान-पत्र की रजिस्टरी न हुई।
थी तबतक बाला जानका खून आदरसत्कार किया गया, उन्हें
खूब स्वादिष्ट पदार्थ सिलाये गये । हलुवे-पुलावकी वर्षा सी की
गई, पर रजिस्टरीकी मुहरने इन खातिरदारियोंपर भी मानो
मुहर लगा दी । जुम्मनको पत्नी करीमन रोटियोंके साथ कडवी
यावोंसे कुछ तेज तीखे सालन भी देने लगी। जुम्मम शेख भी
निठुर हो गये। अब बेचारी खाला-जानको प्राय नित्य ही ऐसी
बात सुननी पड़ती थी।
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-
-
-
पच परमेश्वर
बुढिया न जाने कबतक जियेगी। दो तीन बीघे असर क्या
दे दिया है मानो मोल ले लिया है। वधारी दालके बिना रोटिया
नहीं उतरतीं। जितना रुपया इसके पेट में झोक चुके उतनेसे तो
अवतक एक गाव मोल ले लेते।
कुछ दिन साला-जानने सुना और सहा, पर जब न सहा
गया तब जुम्मनसे शिकायत की। जुम्मनने स्थानीय कर्मचारी-
गृह स्वामिनीके प्रसन्धमें दखल देना उचित न समझा। कुछ दिन
तक और योंही रो-धोकर काम चलता रहा। अन्तमें एक दिन
खालाने जुन्मनसे कहा,बेटा ! तुम्हारे साथ मेरा निर्वाह न होगा।
तुम मुझे रुपये दे दिया करो, मैं अपना अलग पका-सा लूगी।
जुम्मनने वृष्टताके साथ उत्तर दिया, रुपये क्या यहाँ फलते
हैं ? खालाने नम्रतासे कहा, मुझे कुछ रूपा-सूखा चाहिये भी कि
नहीं ? जुम्मनने गम्भीर स्वरसे जवाब दिया, तो कोई यह थोडे
। समझता है कि भौतमे लड़कर आई हो ?
खाला विगड गई । उन्होंने पचायत करनेकी धमकी दी।
जुम्मन हसे, जिस तरह कोई शिकारी हिरनको जालकी तरफ
जाते देखकर मन-ही-मन हसता है। वे चोले, हा जरूर पचायत
करो। फैसला हो जाय। मुझे भी यह रात दिनकी सटपट
पसन्द नहीं।
- पचायतमें किसकी जीत होगी, इस विषयमें जुम्मनको कुछ
भी सन्देह न था। आस-पासके गांवगे ऐसा कौन था जो
उनके अनुग्रहोंका ऋणी न हो ? ऐसा कौन था जो उनको शत्रु
बनानेका साहस कर सके ? किसमें इतना बल था जो उनका
7
सप्तसरोज
सामना कर सके ? आसमानके फरिस्ते तो ५
ही नहीं ।
है
इसके बाद कई दिननक बूढ़ी खाला हायमे
आस-पासके गावोंमें दौडती रही। कमर मुर
थी। एक-एक पग चलना दूभर था। मगर ५.
उसका निर्णय कराना जरूरी था।
विरला ही कोई भला आदमी होना जिसके
दुसके पासून बहाये हों। किसीने तो याही .
हा करके टाल दिया। किसीने इस अन्यायपर
दी और कहा, कनमें पांव लटके हुए हैं, आज म
दिन हो, पर हवस नहीं मानती। अब तुम्हें क्या
साओ और अल्लाका नाम लो। तुम्हें खेती-पा
काम ? कुछ ऐसे सज्जन भी थे जिन्हें हास्यके
अच्छा अवसर मिला । झुकी हुई कमर, पोपला
बाल-जब इतनी सामग्रिया एकत्र हों तब हसी
ऐसे न्याय-प्रिय, दयालु, दीनवत्सल पुरुष बहुत
उस अबलाके दुखडेको गौरसे सुना हो और उस
हो । चारों ओरसे धुम-घामकर बेचारी अलगू
आई । लाठी पटक दी और दम लेकर बोली, वेटा
भरके लिये मेरी पन्चायतमें चले आना ।"
अलगू-मुझे बुलाकर क्या करोगी। कई,
आवेंगे ही।
.
-
।
पंच परमेश्वर
-
H
खाला-अपनी विपद तो सबके आगे से आई हूँ आने न
पानेका अस्तियार उनको है।
अलगू-यों आनेको मैं मा जागा, मगर पचायतगे मुंह न
खोलूगा।
खाला-मयों घेदा?
अलगू-अप इसका क्या भवान दू? अपनी खुशी 'जुम्मन
मेरे पुराने मित्र हैं। उनसे बिगाड नहीं कर सफ्ता।
साला-बेटा, क्या बिगाडके उरसे ईमानकी बात न कहोगे?
। हमारे सोये हुए धर्म-ज्ञानकी सारी सम्पत्ति लुट जाय तो
'उसे सपर नहीं होता, परन्तु ललकार सुनकर वह सचेत हो जाता
है। फिर उसे कोई जीत नहीं सकता। अलगू इस सचालका कोई
उत्तर न दे सके । पर उनके हृदयमे यह शन्द गूज रहे थे।
'क्या बिगाडके भयसे ईमानकी यात न कहोगे १३
-
सन्ध्या समय एक पेडके नीचे पचायत बैठी । शेख जुम्मनने
पहले हीसे फर्श विद्या रक्खा था। उन्होंने पान, इलायची, हुके,
तन्याकूमादिका प्रबन्ध भी किया था। हां, वे स्वय अलवत्ता
अलगू चौधरीके साथ जग दूर बैठे हुए थे। जब कोई पचायतमें
श्रा जाता था तब दबे हुए सलामसे उसका शुभागमन करते थे।
जब सूर्य अस्त हो गया और चिड़ियोंकी कलरव युक्त पचायत
पेड़ोपर बैठी तब यहां भी पचायत प्रारम्भ हुई । फर्शकी एक-एक
अंगुल जमीन भर गई, पर अधिकांश दर्शक ही थे। निमन्त्रित
महाशयोंमेंसे केवल वही लोग पधारे थे जिन्हें जुम्मनसे अपनी
-
"
दिनका रोना नहीं सहा जाता । मुझे न पेटभर रोटी,मिलती है
सकती। तुम्हारे सिवाय और किसे अपना दुख सुनाक तुम
लोग जो राह निकाल दो उसी राहपर चलू। अगर मुझमें कोई
ऐव देग्यो, मेरे मुद्दपर थप्पड़ मारो। जुम्मनमें बुराई देखो तो,
उसे समझायो। क्यो एक बेकसकी आह लेता है ? पर्णश हुक्म
सप्तसरोज
कुछ कमर निकालनी थी। एक कोनेमें आग सुलग रही थी
नाई ताबडतोड चिलम भर रहा था। यह निर्णय करना असम्भव
था कि सुलगते हुए उपलोंसे अधिक धूआं निकलता था या चिलम,
के दमोंसे । लडके इधर-उधर दौड रहे थे। कोई आपसमे गाली-
गलौज करते और कोई रोते थे। चारों तरफ कोलाहल मच रहा'
था। गांवके कुत्ते इस जमावको भोज समझकर झुण्ड-के-मुण्ड,
जमा हो गये थे।
पच लोग बैठ गये तो बूढ़ी खालाने उनसे विनती की।
"पचो | आज तीन साल हुए मैंने अपनी सारी जायदाद'
अपने भानजेके नाम लिख दी थी । इसे आप लोग जानते ही,
होंगे । जुम्मनने मुझे हीनहयात रोटी-कपडा देना कबूल
किया
था। सालभर तो मैंने इसके साथ रो-धोकर काटे, पर अब रात
और न तनका कपडा । वेस बेवा है। कचहरी-दरबार कर नहीं,
सर मायेपर चढ़ाऊगी।
रामधन मिश्र, जिनके कई असामियोंको जुम्मनने अपने
गांवमें चमा लिया था, बोले, जुम्मन मियां किसे पच बढते हो
अभीसे इसका निपटारा कर लो। फिर जो कुछे पच कहेंगे वही
मानना पड़ेगा।
.
१
।
. T . । ४९ पच परमेश्व जुम्मनको इम समय सदस्योंमे विशेषकर वही लोग दीर पडे जिनसे किसी न किसी कारण उनका वैमनस्य या। जुम्मन बोले, पन्चका हुक्म अल्लाहका हुक्म है। सालाजान जिसे चाहे यदे, मुझे कोई उम्र नहीं। खालाने चिल्लाकर कहा, अरे अल्लाह के बन्दे । पञ्चोके नाम क्यों नहीं बता देता? कुछ मुझे भी तो मालूम हो । - जुम्मनने क्रोधसे कहा, अब इस वक्त मेरा मुह न खुलवाओ। तुम्हारी बन पडी है, जिसे चाहो पञ्च वदो। । खालाजान जुम्मनके आक्षेपको समझगई। वह बोली, बेटा! खुदासे डरो। पञ्च न किसीके दोस्त होते हे न किसीके दुश्मन । कैसी बात कहते हो? और तुम्हारा किमीपर विश्वास न हो तो जाने दो, अलगू चौधरीको तो मानते हो ? लो, मै उन्हींको सर- पञ्च बदती हूँ। जुम्मन शेस आनन्दसे फूल उठे,परन्तु भानोंको छिपाकरवोले अजगू चौधरी ही सही। मेरे लिये जैसे रामधन मिश्र वैसे अलगू। ', ' अलगूइस झमेलेमें फँमना नहीं चाहते थे। वे कन्नी काटने लगे। बोले, खाला। तुम जानती हो कि मेरी जुम्मनसे गाड़ी - - -- दोस्ती है। बालाने गम्भीर स्वरने कहा, बेटा। दोस्ती के लिये कोई अपना ईमान नहीं बेचता। पचके दिलमें खुदा वमता है। पोंक मुझे जो बात निकलती है वह खुशी वरफसे निपलती है। अनगू चौधरी सरपच हुए । रामबन मिश्र और जुम्मनके दूसरे विरोधियोने दियाको मनम बहुत कोसा।
1 पूरा कानूनी यादमी था। उसने जुम्मनसे जिरह करनो आरम्भ था। रामधन मिश्र इन प्रश्नोंपर मुग्व हुए जाते थे। जुम्मन चकित सप्तसरोज अलगू चौधरी बोले, शेख जुम्मन। हम और तुम पुराने दोस्त हैं। जब काम पड़ा, तुमने हमारी मदद की है और हम भी जो कुछ बन पडा, तुम्हारी सेवा करते रहे हैं। मगर इस समय तुम और बूढी साला दोनों हमारी निगाहमें बराबर हो। तुमको पचोंसे जो कुछ अर्ज करना हो, करो। जुम्मनको पूरा विश्वास था कि अब बाजी मेरी है। अलगू यह सब दिसाचेकी बाते कर रहा है, अतएव शांत-चिच होकर, वोले, पचो । तीन साल हुए खालाजानने अपनी जायदाद मेरे नाम हिव्या कर दी थी। मैंने उन्हें हीनयात, खाना-कपडा देना : कबूल किया था। खुदा गवाह है कि आजतक मैंने सालानानको : कोई तकलीफ नहीं दी । मैं उन्हे अपनी मांके समान, समझता हूँ उनकी खिदमत करना मेग फर्ज है, मगर औरतोंमें जरा अन-पान रहती है। इसमें मेरा क्या वश है ? खालाजान मुझसे माहवार सर्च अलग मांगती हैं। जायदाद जितनी है वह पचों में छिपी नहीं है। उसमे इतना मुनाफा नहीं होता कि मैं माहवार सर्च दे सकू इसके अलावा हिब्बानामेमें माहवार खर्चका कोई जिक्र नहीं नहीं तो मैं भूलकर भी इस झमेलेमें न पड़ता। बस, मुझे यही कहना है । पाइन्द पंचोंको अख्तियार है जो फैसला चाहें करें। अलगू चौधरीको हमेशा कचहरीसे काम पडता था, की। एक-एक प्रभ जुम्मनके हृदयपर हथौडीको चोटकी तरह पद्धता । , अतएवं 1 थे कि अलगूको क्या हो गया हे ? अभी यह मेरे साथ वैठा ,
५१ ।
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पच परमेश्वर
कैसी जैसी बातें कर रहा था। इतनी ही देरमें ऐसी काया-पलट
हो गई कि मेरी जड सोदनेपर तुला हुआ है। न मालूम कवकी
कसर यह निकाल रहा है ? क्या इतने दिनोंकी दोस्ती कुछ भी
काम न आनेगी?
जुम्मन शेख इसी सङ्कल्प विकल्पमे पड़े हुए थे कि इतने में
। अलगूने फैसला सुनाया,-
जुम्मन शेस । पञ्चोंने इस मामलेपर विचार दिया। उन्हें
यह नीति मदत मालूम होता है कि खालाजानको माहवार सर्च
दिया जाय । हमारा विचार है कि खालाकी जायदादसे इतना
मुनाफा अवश्य होता है कि माहवार खर्च दिया जा सके। वस,
यही हमारा फैसला है। अगर जुम्मनको खर्च देना मजूर न हो
तो हिन्यानामा रद्द समझा जाय ।
५
यह फैसला सुनते ही जुम्मन सन्नाटेम आ गये । जो अपना
मित्र हो वह शत्रुकासा व्यवहार करे और गलेपर छरी फेरे । इसे
समयके हेर फेरके सिवाय और क्या कहे जिसपर पूरा भरोसा
या उमने समय पडनेपर धोखा दिया । ऐसे ही अवसरोपर झूठे-
सच्चे मित्रोंकी परीक्षा हो जाती है। यही कलियुगकी दोस्ती है
अगर लोग ऐसे कपटी, धोखेबाज न होते तो देशमें आपत्तियोंका
प्रकोप क्यों होता ? यह हैजा, प्लेग श्रादि व्याधियां दुष्कर्मों के
दरड हैं।
मगर रामधन मिश्र और अन्य पञ्च अलगू चौवरीकी इस
नीति परायणताको प्रशसा जी सोलकर कर रहे थे। वे कहते थे,
--
।
1
।
-
अच्छे कामोंकी सिद्धिमें बड़ी देर लगती है, पर बुरे कामोंकी',
सप्तसरोज
इमीका नाम पचायत है । दूधका दूध और पानीका पानी कर
दिया। दोस्ती दोस्तीकी जगह है, किन्तु धर्मका पालन करना ।
मुख्य है। ऐसे ही सत्यवादियोंके वल पृथ्वी ठहरी है, नहीं तो
वह कवकी रसातलको चली जाती।
इस फैसलेने अलगू और जुम्मनको दोस्तीकी जड हिला दी।
अब वे साथ साथ वाते करते नहीं दिखाई देते। इतना पुराना ।
मित्रतारूपी वृक्ष सत्यका एक हल्का झोंका भी न सह सका।
सचमुच वह वालूहीकी जमीनपर सडा था।
उनमे अव शिष्टाचारका अधिक व्यवहार होने लगा। एक
दूसरेकी आव-भगत ज्यादा करने लगे। वे मिलते-जुलते थे,
मगर उसी तरह जैसे तलवारसे ढाल मिलती है।
जुम्मनके चित्तमें मित्रकी कुटिलता आठों पहर खटका करती
थी। उसे हर घडी यह चिन्ता रहती थी कि किसी तरह बदला
लेनेका अवसर मिले ।
६
सिद्धिमें यह बात नहीं। जुम्मनको भी बदला लेनेका अवसर जल्दी
मिल गया। पिछले साल अलगू चौधरी बटेमरसे वैलों की एक
बहुत अच्छी जोड़ो मोल लाये थे। बैल पछाही जातिके सुन्दर
बडी-बढी मांगोंवाले । महीनोंतक आस पास के गांवोंके लोग उनके
दर्शन करते रहे । दैवयोगमे जुम्मनकी पचायतके एक महीने बाद
इस जोनीका एक वैत मर गया। जुम्मनने दोस्तोंसे कहा, यह
दगाबाजीको सजा है । इन्सान मन भले ही कर जाय, पर खुदा
।
।
। . पच परमेश्व नेक बद सब देखता है । अलगूको सन्देह हुआ कि जुम्मनने वै. को विप दिला दिया है। चौधराइनने भी जुम्मनपर ही इस दुध टनाका दोपारोपण किया। उसने कहा, जुम्मनने कुछ कर कर दिया है। चौधराइन और करीमनमे इस विषयपर एक दिन खू ही वाद विवाद हुआ। दोनों देवियोंने शब्द बाहुल्यकी नदी वहा दी। व्यङ्ग, वक्रोक्ति, अन्योक्ति और उपमा आदि अलङ्कारोमें चातें दुई । जुम्मनने किसी तरह शान्ति स्थापित की। उसने अपनी पत्नीको डॉट डपटकर समझा दिया। वे उसे उस रण- भूमिसे हटा भी ले गये। उधर अजगू चौधरीने समझाने बुझाने- का काम अपने तर्कपूर्ण सोटेसे लिया । अब अकेला बैल किस कामका ? उसका जोड़ा बहुत हूँढ़ा गया, पर न मिला । निदान यह सलाह ठहरी कि इसे बेच डालना चाहिये । गांवमें एक समझू साहु थे, वे इका-गाडी हाकते थे। गांवसे गुड, घी लादकर वे मण्डी ले जाते, मण्डीसे वेल, नमक भर लाते और गांवमें बेचते । इस बैलपर उनका मन लहराया। उन्होंने सोचा, यह बैल हाथ लगे तो दिन भरमै बेखटके तीन से हो । आजकल तो एक ही खेपके लाले पड़े रहते हैं । बैल देसा, गाडीमें दौडाया, बाल-भौरीकी पहचान कराई, मोल-तोलकिया और उसे लाकर द्वारपर बाध ही दिया । एक महीनेमें दाम चुकानेका चादा ठहरा। चौधरीको भी गरज थी ही, घाटे को परवाइन की। समझू साहुने नया बैल पाया तो लगे रगेदने। वे दिनमें तीन तीन, चार चार से करने लगे।न चारेकी फिलथीन पानी की। बस, खेपोंसे काम पा। मरी ले गये,वहां उच्च सूखा भूसा सामने - ५४ - सप्तसरोज डाल दिया। बेचारा जानवर अभी दम भी न लेने पाया था कि फिर जोत दिया। अलगू चौधरीके घर थे तो चैनकी वशी बजती थी। छठे छमासे कभी बहलीमे जोते जाते, तव खूब उछलते कूदते और कोसोंतक दौडते जाते थे। वहा बैलराजको रातिब, साफ पानी, दली हुई अरहरकी दाल और भूसेके साथ खली और यही नहीं,कभी-कभी घीका स्वाद भी चखनेको मिल जाता था। शाम- सवेरे एक आदमी सरहरे करता, पोंछता और सुहलाता था। कहाँ वह सुख-चैन, कहा यह आठो पहरकी खपन ! महीने भरमें ही वह पिस-सा गया । इक का जुवा देखते ही उसका लोहू सूख जाता था। एक-एक पग चलना दूभर था । हड्डियां निकल आई थीं, पर था वह पानीदार, मारकी सहन न थी। एक दिन चौथे खेपमे साहुजीने दूना बोझ लादा । दिन भरका यका जानवर, पैर न उठते थे। उसपर साहुजी कोडे फटकारने लगे। बस, फिर क्या था, चैल कलेजा तोडकर चला । वह कुछ दुर दौडा और चाहा कि जरा दम ले लू पर साहुजीको जल्द घर पहुँचनेकी फिक्र थी। अतएव उन्होंने कई कोडे बडी निर्द- यतासे फटकारे । वैलने एक बार फिर जोर लगाया। पर अबकी बार शक्तिने जवाब दिया। वह धरतीपर गिर पडा और ऐसा गिरा कि फिर न उठा । साहुजीने बहुत पीटा, टांग पकड कर सींचा, नथुनोंमें लकड़ी हँस दी | पर कहीं मृतक भी उठ सकता है ? तप साहुनीको कुछ शहा हुई । उन्होंने वैलको गौरसे देसा, सोलकर तग किया और सोचने लगे कि गाडी कैसे v . - घर पहुँचे । वे बहुत चीते-चिल्लाये, पर देहातका रास्ता - पच परमेश्व बच्चोंकी आंखों की तरह साम होते हीबन्द हो जाता है, कोई नज न आया। आसपास कोई गांव भी न था। मारे क्रोधके उन्होंन मरे हुए बैलपर और लगाये और कोसने लगे, अभागे तुम मरना ही था तो घर पहुँचकर मरता। ससुरा वीच रास्तेमें ही मर रहा । अब गाडी कौन खींचे ? इस तरह साहुजी रुब जले- भुने। कई बोरे गुड़ और कई पीपे घी उन्होंने बेचे थे, दो ढाई सौ रुपये कमरमें बंधे थे । इसके सिवाय गाडीपर कई बोरे नमक- के थे। अतएव छोड़कर जा भी न सकते थे। लाचार वेचारे गाडी पर ही लेट गये । वहीं रतजगा करनेकी ठान ली। चिलम पी, गाया, फिर हुफा पिया । इस तरह साहुजी आधी राततक नींदको बहलाते रहे, अपनी जानमे तो वे जागते ही रहे । पर पौ फटते ही जो नींद टूटी और कमरपर हाथ रक्सा तो थैली गायब घबराकर इधर-उधर देखा तो कई कनस्तर तेल भी नदारद । अफसोसमें वेचारा सिर पीटने लगा और पछाड़ खाने लगा, प्रात काल रोते-बिलसते घर पहुँचा । सहुआइनने जब यह बुरी सुनावनी सुनी तव पहले रोई, फिर अलगू चौधरीको गालियां देने लगी, निगोडेने ऐसा कुलच्छना वैल दिण कि जन्म- भरकी कमाई लुट गयी। इस घटनाको हुए कई महीने बीत गये। अलग जय अपने वैलके दाम मांगते तव साहु और सहुआइन दोनों ही गल्लाये हुए कुत्तोंकी तरह चढ पैठते और अद्ध या यकने लगते, वाह यहा तो सारे जन्मकी कमाई लुट गई, सत्यानाश हो गया, इन्हें दामोंकी पड़ी है। मुर्दा बैल दिया था, उसपर दाम मांगने पले फिर पचायत ठी। यही सन्दयाका समय था। खेतोंमें कौवे 1 आते, परन्तु डेढ सौ रुपयेसे इस तरह हाथ धो लेना आसान दल यनाने शुरू किये। इसके बाद तीसरे दिन उसी वृक्ष के नो- ५६ सप्तसरोज हैं। आखोंमे धूल झोंक दी, सत्यानाशी वैल गले बाध दिया, हमें निरा पोंगा ही समझ लिया। हम भी वनियेके बच्चे हैं, ऐसे बुडू कहीं और होंगे। पहले जाकर किसीगडहेमें मुह धो आओ तब दाम लेना, जी न मानता हो तो हमारा बैल खोल ले जाओ। महीना भरके वदले दो महीना जोत लो। रुपया क्या लोगे? चौधरीके अशुभचिन्तकों की कमी न थी। ऐसे अवसरोंपर वे भी एकत्र हो जाते और साहुजीके वरीनेकी पुष्टि करते। इस तरह फटकारे सुनकर बेचारे चौधरी अपना-सा मुंह लेर लौट न था । एक बार वे भी गरम पडे । साहुजी बिगडकर लाठी दृढने घर चले गये । अब सहुआइनजीने मैदान लिया । प्रश्नोत्तर होते-होते हाथापाईकी नौबत आ पहुँची । सहुआइनने घरमें घुस- कर किवाड़ बन्द कर लिये। शोरगुल सुनकर गांवके भलेमानुस जमा हो गये। उन्होंने दोनोंको समझाया। देकर घरसे निकाला । वे परामर्श देने लगे कि इस तरह सिर फुडौलसे काम न चलेगा। पचायत करा लो। कुछ तै हो जाय उसे स्वीकार कर लो। साहुजी राजी हो गये । अलगूने भी हामी भर ली। पचायतकी तैयारियां होने लगी। दोनों पक्षोंने अपने-अपने साहुजीको दिलासा पचायत कर रहे थे। विवाद प्रस्त विषय यह था कि मटरको L ५७ पच परमेश्व- फलियोंपर उनका सत्व है या नहीं और जनतक यह प्रश्न हल न हो जाय तबतक वे रसवालेसी पुकारपर अपनी अप्रसन्नता प्रकट करना आवश्यक समझते थे। पेडकी डालियोंपर बैठी मडली में यह प्रश्न विडा हुआ था कि मनुष्यको उन्हे बेमुरौवत कहनेका क्या अधिकार है, जब उसे स्वय अपने मित्रोंको दगा देनेमे भी सकोच नहीं होता। पचायत वैठ गई तो रामधन मिश्रने कहा, अब देरी क्यों ? पोंका चुनाव हो जाना चाहिये । बोलो चौधरी, किस किसको 'पच बदते हो? अलगूने दीनभावसे कहा, समझू साहु ही चुन लें। समयू खडे और कडककर बोले, मेरी ओरसे जुम्मन शेख । जुम्मनका नाम सुनते ही अलगू चौधरीका कलेजा धक धक करने लगा, मानो किसीने अचानक थप्पड मार दिया हो । राम- धन अलगूके मित्र थे । वे घातको ताड़ गये। पूछा, क्यों चौधरी तुम्हें कोई उन्न तो नहीं ? चौधरीने निराश होकर कहा, नहीं, मुझे क्या उन होगा? X X x अपने उत्तरदायित्त्वका ज्ञान बहुधा हमारे सकुचित व्यवहारों का सुधार होता है। जब हम राह भूलकर भटकने लगते हैं तव यही ज्ञान हमारा विश्वसनीय पथ दर्शक बन जाता है। पत्र-सम्पादक अपनी शान्ति फुटीरमे बैठा हुआ कितनी धृष्टता और स्वतन्त्रताके साथ अपनी प्रवल लेखनीसे मन्त्रि- निमसे फिर किसीको' पशुओंफ साथ मेसी निर्दयता करनेस । ५८ - अपनी जिम्मेदारीका भाव पैदा हुआ। उसने सोचा, में इस वक्त पश्चोंने दोनों पक्षोंसे सवाल-जवाब करने शुरू किये। बहुत, कि पैडके मर जानेसे समझूको हानि हुई। इसके प्रतिकूल दो सन्य मूख्य अतिरिक्त समयूको कुछ दएड भी देना चाहते थे, सप्तसरोज मण्डलपर आक्रमण करता है, परन्तु ऐसे अवसर भी आते हैं जब वह स्वय मन्त्रिमण्डलमे सम्मिलित होता है। मण्डलके भवन में पग धरते ही उसकी लेसनी कितनी मर्मज्ञ, कितनी विचारशील, कितनी न्याय-परायण हो जाती है, इसका कारण उत्तरदायित्वका ज्ञान है । नवयुवक युवावस्थामे कितना उद्दण्ड रहता है। माता-पिता उसकी ओर से कितने चिन्तित रहते हैं। वे उसे कुल-कलङ्क समझते है,परन्तु थोडे ही समयमें परिवारका बोझ सिरपर पड़ते ही वही अव्यवस्थित-चित्त उन्मत्त युवक कितना धैर्यशील, कैसा शान्त-चित्त हो जाता है यह भी उत्तर- दायित्वके ज्ञानका ही फल है । जुम्मन शेखके मन में भी सरपचका उच्चस्थान ग्रहण करते ही न्याय और धर्मके सर्वोच्च आसनपर बैठा हूँ। मेरे मुहसे इस समय जो कुछ निकलेगा वह देववाणीके सदृश है और देव- वाणीमें मेरे मनोविकारोंका कदापि समावेश न होना चाहिये। मुझे सत्यसे जौ भर टलना उचित नहीं। देरतक दोनों दल अपने-अपने पक्षका समर्थन करते रहे। इस विपयमें तो मय सहमत थे कि समस्को बैलका मूल्य देना चाहिये, परन्तु दो महाशय इस कारण रियायत करना चाहते थे * . ५९ पंच परमेश्वर साहस न हो । अन्तमे जुम्मनने फैसला सुनाया, अलगू चौधरी और समझू साहु । पचोंने तुम्हारे मुआमलेपर अच्छी तरह विचार किया। समझूको उचित है कि वैलका पूरा दाम दे । जिव वक्त उन्होंने बैल लिया, उसे कोई बीमारी न थी। अगर उसी समय दाम दे दिया जाता तो आज समझू उसे फेर लेनेका आग्रह न करते । वैलकी मृत्यु केवल इस कारण हुई कि उससे वडा कठिन परिश्रम कराया गया और उसके दाने-चारका कोई अच्छा प्रबन्ध न किया गया । रामधन मिश्र बोले, समझूने बैलको जान बूझकर मारा है । अतएव उनसे दण्ड लेना चाहिये । जुम्मन बोले, यह दूसरा सवाल है । हमको इससे कोई मत- लव नहीं। झगडू साहुने कहा, समझूके साथ कुछ रियायत होनी । चाहिये। जुम्मन बोले, यह अलगू चौधरीको इच्छापर है। वे रियायत कर तो उनकी भलमनसी है। अलगू चौधरी फूले न समाये । उठ खडे हुए और जोरसे बोले, पच परमेश्वरकी जय । चारों ओरसे प्रतिध्वनि दुई-पच परमेश्वरको जय । प्रत्येक मनुष्य जुम्मनकी नीतिको सराहता था-इसे कहते न्याय । यह मनुष्यका काम नहीं, पचमे परमेश्वर वास करते है। यह उन्हींकी महिमा है। पचके सामने खोटेशो फोन सरा कर सकता है?
सप्तसरोज
६०
थोड़ी देर बाद जुम्मन अलगूके पास आये और उनके गले
लिपटकर योले, भैया जबसे तुमने मेरी पचायत की, तबसे में
तुम्हारा प्राणघातक शत्रु बन गया था पर आज मुझे ज्ञात हुआ
कि पचके पदपर बैठकर न कोई किसीका दोस्त होता है न
दुश्मन । न्यायके सिवा उसे और कुछ नहीं सूझता । आज मुझे
विश्वास हो गया कि पचकी जबानसे खुदा बोलता है ।
अलगू रोने लगे। इम पानीसे दोनोंके दिलोंकी मैल धुल
गई। मित्रताकी मुरझाई लता फिर हरी हो गई।
नमकका दारोगा EESE 2 जर नमकका नया विभाग बना और ईश्वरदत्त वस्तु के व्यव- हार करनेका निषेध हो गया तो लोग चोरी छिपे इसका व्यापार करने लगे। अनेक प्रकारके छल प्रपचोंका सूत्रपात हुआ, कोई घुमसे काम निकालता था, कोई चालाकीसे। अधिकारियोंके पौवारह थे । पटवारीगिरीका सर्वसम्मानित पद छोड छोडकर लोग इस विभागकी वरकन्दाजी करते थे। इसके दारोगा पदो लिये तो वकीलोंका भी जी ललचता था। यह वह समय था जन अगरेजी शिक्षा और ईसाई मतको लोग एक ही वस्तु समझते थे। फारसीका प्राबल्य था । प्रेमकी कथाए और शृगाररसके काव्य पढकर फारसीदा लोग सर्वोच पदोपर नियुक्त हो जाया करते थे। मुशी वशीधर भी जुलेखकी विरह-कथा समाप्त करके मजनू और फरहाद के प्रेम-वृत्तान्तको नल और नीलकी लडाई और अमेरिका के आविष्कारसे अधिक महत्त्वकी बाते मममते हुए रोजगारकी सोजमें निकले । उनके पिता एक अनुभवी पुरुप थे । समझाने लगे, वेटा घरकी दुर्दशा देख रहे हो। ऋणके बोमसे दने हुए हैं। लड़कियां हैं, यह घास-फूमकी तरह वढती चली जाती हैं। मैं करारेपरका वृक्ष हो रहा हूँ, न मालूम कव गिर पडू । अव तुम्हीं मित्रानो ने न समाये । महाजन लोग कुछ नरम पड़े,कापार समझाऊँ। इस विषयमे विवेककी बडी आवश्यकता है। मनुष्यको उपरान्त जो उचित समझो, करो। गरजवाले आदमीके साथ कठोरता करनेमें लाभ-ही-लाभ है । लेकिन वेगरजको दांवपर पाना जरा कठिन है। इन बातोंको निगाहसे वाध लो। यह मेरी इम उपदेशके वाद पिताजीने आशीर्वाद दिया। वशीघर प्राज्ञाकारी पुत्र थे। ये बातें ध्यानसे सुनों और तव घरसे चल खडे हुए। इस विस्तृत ससारमें उनके लिये वैर्य अपना मिन, बुद्धि अपनी पथदर्शक और आत्मावलम्बन ही अपना सहायक था। लेकिन अच्छे शफुनसे चले थे, जाते-ही-जाते नमक-विभागके पारोगा-पटपर प्रतिष्ठित हो गये। वेतन अच्छा और ऊपरी प्राय फात्रा कद ठिकाना ही न था । वृद्ध मुशोजोको यह सुर-सवार सप्तसरोज घर के मालिक-मुख्तार हो । नौकरीमे ओहदेकी ओर ध्यान मत देना, यह तो पीरका मजार है। निगाह चढावे और चादरपर रखनी चाहिये । ऐसा काम ढूढना जहां कुछ ऊपरी आय हो । मासिक वेतन तो पूर्णमासीका चांद है, जो एक दिन दिखाई देता है और फिर घटते-घटते लुप्त हो जाता है। ऊपरी आय वहता हुआ स्रोत है जिससे सदैव प्यास बुझती है । वेतन मनुष्य देता है, इसीसे उसमें वृद्वि नहीं होती। ऊपरी आमदनी ईश्वर देता है, इसीसे उसमे बरकत होती है । तुम स्वय विद्वान् हो, तुम्हें क्या दसो, उसकी आवश्यकताको देखो और अवसर देखो, उसके जन्म भरकी कमाई है। की भाशालता लामा । पड़ोमियो दया शूल उठने लगी। ,
नमकका दारोगा
२
?
जाडेके दिन थे और रातका समय। नमक सिपाही,
चौकी
दार नशेमें मस्त थे। मुशी वशीधरको यहाँ आये अभी छ महीनों
से अधिक न हुए थे, लेकिन इस थोडे समयमे ही उन्होंने अपनी
कार्य-कुशलता और उत्तम आचारसे अफसरोको मोहित कर
लिया था। अफसर लोग उनपर बहुत विश्वास करने लगे । नमक
के दफ्तरसे एक मील पूर्वकी ओर जमुना बहती थी उसपर
नावोंका एक पुल बना हुआ था । दारोगाजी किवाड वन्द किये
-मीठी नींद सोते थे। अचानक आस खुली तो नदीके प्रवाहकी
जगह गाड़ियों की गड़गडाहट तथा मल्लाहोंका कोलाहल सुनायी
दिया । उठ बैठे । इतनी रात गये गाडिया क्यों नदीके पार जाती
हैं ? अवश्य कुछ न कुछ गोलमाल है। तर्कने भ्रमको पुष्ट किया।
वरदी पहनी, तमचा जेवमें रखा और वात-की बातम घोडा बढाते
हुए पुलपर आ पहुँचे । गाडियोंको एक लम्बी कतार पुलके पार
जाते देसी। डाटकर पूछा, किसकी गाडिया हैं ?
थोड़ी देरतक सन्नाटा रहा। आदमियोंमे कुछ कानाफूसी
हुई, तब आगेवालेने कहा-पण्डित अलोपीदीनकी ।
"कौन पण्डित अलोपीदीन ?"
"दाताग जके।"
मुशी वशीधर चोंके । परिडत अलोपीदीन इस इलाकेके सब
से प्रतिष्ठित जमींदार थे। लाखों रुपयका लेन देन करते थे, इधर
छोटेसे बडे कौन ऐसे थे जो उनके ऋणी न हों। व्यापार भी
बड़ा लम्बा चौडा था। पड़े चलते-पुरजे आदमी थे। अगरेज
४ कुछ जागते चले आते थे। अचानक कई गाडीवानोंने घबराये हुए श्राकर जगाया और बोले-महाराज । दारोगाने गाडियां पण्डित अलोपीदीनका लक्ष्मीजीपर अखड विश्वास था। और नीति सव तदमीके ही खिलौने हैं, इन्हे वह जैसे चाहती सप्तसरोज अफसर उनके इलाके में शिकार सेलने आते और उनके मेहमान, होते । बारहों मास सदावत चलता था। मुन्शीजीने पूछा, गाडियां कहाँ जायँगी ? उत्तर मिला, कान- पुर । लेकिन इस प्रश्नपर कि इसमें है क्या, फिर सन्नाटा छा गया । दारोगा साहयका सन्देह और भी बढा । कुछ देरतक उत्तर- की बाट देखकर वह जोरसे बोले, क्या तुम सब गूगे हो गये हो' हम पूछते है, इनमें क्या लदा है ? जन इस बार भी कोई उत्तर न मिला तो उन्होंने घोडेको एक गाडीसे मिलाकर बोरेको टटोला । भ्रम दूर हो गया। यह नमकके ढेले थे। ३ पण्डित अलोपीदीन अपने सजीले रथपर सवार, कुत्र रोक दी हैं और घाटपर खडे आपको बुलाते हैं। वह कहा करते थे कि मसारका तो पहना ही क्या, लक्ष्मीका ही राज्य है । उनका यह कहना यथार्थ ही था। न्याय सोते स्वर्गमें भी नचाती है । लेटे-ही-लेटे गर्वमे बोले, चलो हम आते हैं। यह कई कर पएिटतीने बड़ी निश्चिन्तनासे पानके बडे लगाकर खाये। फिर लिहाफ मोड़े हुए दारोगा पास आकर बोले, यापूजी आशीर्वाद । कहिये, हमसे ऐमाकौन सापराब हुआ कि गाड़ियां -
“६५
नमकका दारोगा
रोक दी गयीं। हम नामणोपर तो आपकी कृपादृष्टि रहनी
चाहिये।
वशीघर रुखाईसे बोले, सरकारी हुक्म ।
'पं० अनोपीदीनने इसकर कहा, हम सरकारी हुक्मको नहीं
जानते और न सरकारको। हमारे सरकार तो आप ही हैं।
हमारा और आपका तो घरका मामला है, हम कभी आपसे बाहर
हो सकते हैं? आपने व्यर्थका कष्ट उठाया । यह हो नहीं सकता
कि इधरसे जाय और इस घाटके देवताको भेट न चढ़ावे । मैं तो
श्रापकी सेवामें स्वय ही आ रहा था। वशीधरपर इस ऐश्वर्यकी
मोहिनी वशीका कुछ प्रभाव न पडा । ईमानदारीकी नई उमग
गी। कहकर वोले, हम उन नमकहरामोंमे नहीं हैं जो कौडियों.
पर अपना ईमान वेचते फिरते है। आप इस समय हिरासतमे
हैं। सवेरे श्रापका कायदेके अनुमार चालान होगा। बस, मुझे
अधिक बातोंकी फुर्सत नहीं है । जमादार यदलू सिंह ' तुम इन्हे
हिरासतमें ले चलो, मैं हुक्म देता हूँ।
पण्डित अलोपीदीन स्तम्भित हो गये। गाडीवानामे हलचल
मच गयी। पडितजीके जीवनमे कदाचित यह पहला ही अवसर
था कि पडितजीको ऐसी कठोर वातें सुननी पडीं। बदलू सिंह
भागे बढ़ा, किन्तु रोनके मारे यह साहस न हुआ कि उनका हाथ
पकड सके । पडितजीने धर्मको धनका ऐमा निरादर करते कभी
न देखा था। विचार किया कि यह अभी उद्दण्ड लडका है।
माया मोहके जाल में नहीं पड़ा। अल्हड़ है, निमस्ता है। बहुत
दीनभावसे बोले, बाबू साहब ऐसा न कीजिये, हम मिट जायगे।
पण्डित अलोपीदीन अपने सजीले रथपर सवार, कुछ सोते कुछ जागते चले आते थे। अचानक कई गाडीवानोंने घराये पण्डित अलोपीदीनका लक्ष्मीजीपर अखड विश्वास था। और नीति मव लक्ष्मी के ही विलौने हैं, इन्हें वह जैसे चाहती नचानी है। लेटे-ही-लेटे गर्वमे बोले, चलो हम पाते हैं। यह कह फर पण्डितजीने घड़ी निश्चिन्तनासे पानके बोडे लगाकर खाये। सप्तसरोज अफसर उनके इलाके में शिकार सेजने आते और उनके मेहमान होते । बारहों मास सदाव्रत चलता था। मुन्शीजीने पूछा, गाडिया कहाँ जायँगी ? उत्तर मिला, कान- पुर । लेकिन इस प्रश्नपर कि इसमे है क्या, फिर सन्नाटा छा गया। दारोगा साहबका सन्देह और भी बढा । कुछ देरतक उत्तर- की बाट देखकर वह जोरसे बोले, क्या तुम सब गूगे हो गये हो? हम पूछते हैं, इनमें क्या लदा है ? जब इस बार भी कोई उत्तर न मिला तो उन्होंने घोडेको एक गाडीसे मिलाकर वोरेको टटोला । भ्रम दूर हो गया। यह नमकके ढेले थे। हुए आकर जगाया और बोले-महाराज । दारोगाने गाडियाँ रोक दी हैं और घाटपर सडे आपको बुलाते हैं । वह पहा करते थे कि मसारका तो कहना ही क्या, लक्ष्मीका ही राज्य है । उनका यह कहना यथार्थ ही था। न्याय . ३ स्वर्गमें भी फिर निहाफ ओढ़े हुए दारोगा पाम पाकर बोले, बाबुजी. आशीर्वाद । कहिये, हमसे ऐमाकौन सा अपराध हुआ कि गाड़िया
दीनभावसे बोले, बाबू साइप! ऐसा न कीजिये, हम निट जायगे।
नमकका दारोन
रोक दी गयीं। हम ब्राह्मणोपर तो आपकी कृपादृष्टि रहन
चाहिये।
वशीघर रुखाईसे बोले, सरकारी हुक्म ।
५० अलोपीदीनने हसकर कहा, हम सरकारी हुक्मको नहीं
जानते और न सरकारको । हमारे सरकार तो आप ही हैं।
हमारा और आपका तो घरका मामला है, हम कभी आपसे बाहर
हो सकते हैं ? आपने व्यर्थका कष्ट उठाया । यह हो नहीं सकता
कि इधरसे जाय और इस घाटके देवताको भेट न चढावे । मैं तो
आपकी सेवामें स्वय ही आ रहा था। वशीधरपर इस ऐश्वर्यकी
मोहिनी वशीका कुछ प्रभाव न पडा । ईमानदारीकी नई उमग
थी। कडककर बोले, हम उन नमकहरामोंमें नहीं हैं जो कौडियों-
पर अपना ईमान बेचते फिरते है। आप इस समय हिरासतमे
हैं। सवेरे आपका कायदेके अनुमार चालान होगा। बस, मुझे
अधिक बातोंकी फुर्सत नही है । जमादार बदलू सिंह ' तुम इन्हें
हिरासतमें ले चलो, मैं हुक्म देता हूँ।
पण्डित अलोपीदीन स्तम्भित हो गये। गाडीवानोंमें हलचल
मच गयी। पडितजीके जीवनम कदाचित यह पहला ही अवसर
था कि पडितजीको ऐसी कठोर बातें सुननी पडी। बदलू सिंह
बढ़ा, किन्तु रोषके मारे यह साहस न हुआ कि उनन हाथ
पकड़ सके। पडितजीने धर्मको धनका ऐमा निरादर करते कभी
न देखा था। विचार किया कि यद अभी उद्दण्ड लढका है।
माया मोहके जालमें नहीं पड़ा। अल्हड़ है, मिझाता है। यहुत
श्रागे
irr
- चाहते। सम्मुख अकेला पर्वतकी भांति अटल, अविचलित खड़ा था। अलोपीदीन निराश होकर बोले, अब इससे अधिक मेरा वशीधरने अपने जमादारको ललकारा । बदलूमिह मना दारोगाजीको गालियां देता हुआ पण्डित अलोपीदीनकी' यदा। पटिवजी घबडाफर दो-तीन कदम पीछे हट गये । अत्यन्त ६६ सप्तसरोज इजत धूलमें मिल जायगी। हमारा अपमान करनेसे आपके क्या हाथ आवेगा । हम किसी तरह आपसे बाहर थोडे ही हैं ? वशीधरने कठोर स्वरमें कहा, हम ऐसी बाते नहीं सुनना अलोपीदीनने जिस सहारेको चट्टान समझ रखा था, वह पैरोंके नीचेसे खिसका हुआ मालुम हुआ । स्वाभिमान और धन- ऐश्वर्यको कडी चोट लगी। किन्तु अभीतक धनको सांख्यिक शक्तिका पूरा भरोसा था। अपने मुख्नारसे बोले, लालाजी, एक हजारका नोट बाबू साहबकी भेट करो, आप इस समय भूखे सिंह हो रहे हैं। वशीधरने गरम होकर कहा, एक हजार नहीं, एक लाख भी मुझे सच्चे मार्गसे नहीं हटा सकते धर्मकी इस बुद्धिहीन वृष्टता और देव-दुर्लभ त्यागपर धन, बहुत झुमलाया। अब दोनों शक्तियों में समाम होने लगा । धनने उछल उछलकर आक्रमण करने प्रारम्भ किये । एकसे पाच, पांच से दस, दससे पन्द्रह और पन्द्रह से बीस हजारतक नौबत पहुँची, किन्तु धर्म अलौकिक वीरताके साथ इस बहुसख्यक और . , सेनाके साहस नहीं। आगे आपको अधिकार है। 4 "तीस हजार पर?" "किसी तरह भी सम्भव नहीं ?" नमकका दारोद दीनतासे वोले, बाबू साहब, ईश्वर के लिये मुझपर दया कीजिट मैं पञ्चीस हजारपर निपटारा करनेको तैयार है। "असम्भव बात है।" , "क्या चालीस हजारपर भी नहीं ?" "चालीम हजार नहीं, चालीस लाखपर भी असम्भव है। चदलू सिंह | इस आदमीको अभी हिरासतमें ले लो। अब मैं एक शब्द भी नहीं सुनना चाहता।" धमने धनको पैरोंतले कुचल डाला। आलोपीदीनने एक हप- पृष्ट मनुष्यको हथकडिया लिये हुए अपनी तरफ आते देसा । चारों ओर निराश, कातर दृष्टि से देखने लगे। इसके बाद यका- यफ मूर्छित होकर गिर पड़े। ४ दुनिया सोती थी, पर दुनियाकी जीभ जागती थी। सपेरे ही देखिये तो वालक वृद्ध सबके मुँहते यही बात सुनाई देती थी। जिसे देखिये वही पण्डितजीके इस व्यवहारपर टीका टिप्पणी कर रहा था, निन्दाकी बौछारें हो रही थीं, मानो ससारसे अब पार- का पाप कट गया। पानीको दूधझे नामसे बेचनेवाला पाना, कल्पित रोजनामचे भरनेवाले अधिकारीवर्ग, रेलमे बिना टिस्ट सफर करनेवाले या लोग, जानी दस्तावेज बनानेवाले सेठ और माहूकार, यह सब के सब देवताओ की भाति गरी पना रहे थे। जय दूसरे दिन परिहत पलोपी तीन अभियुक्त होकर कामलों में भी नहीं की जा सकती। मुकदमा शीश ही समाप्त हो गया! कि वह कानूनके पजेमें कैसे पाये ? ऐमा मनुष्य जिसके पास क्यों कानूनके पजेमें आवे। प्रत्येक मनुष्य उनसे सहानुभूति प्रकट, वकीलों की एक सेना तैयार की गई। न्यायके मैदान में धर्म और सत्यके सिवा न कोई बल था, न स्पष्ट भाषण के अतिरिक्त कोई हा देस पड़ता था। वह न्यायमा दरवार था, परन्तु उसके फर्म न्यायका क्या मेल, जहां पक्षपात हो, वहा न्यायकी कल्पना चारियोपर पक्षपातका नशा छाया हुआ था। किन्तु पक्षपात और सप्तसरोज ६८. साथ, हाथोंमे हथकडिया, हृदय मे ग्लानि और क्षोभ भरे, लनासे गर्दन झुकाये अदालतकी तरफ चले तोसारे शहर में हलचल मच गई । मेलोंमे कदाचित् श्राखे इतनी व्यग्र न होती होंगी । भीडके मारे छत और दीवारमे कोई भेद न रहा । किन्तु अदालतमे पहुँचनेकी देर थी । पण्डित अलोपीदीन इस अगाध वनके सिंह थे। अधिकारीवर्ग उनके भक्त, अमले उनके सेवक, वकील-मुख्तार उनके आज्ञापालक और अरदली चपरासी तथा चौकीदार तो उनके विना मोलके गुलाम थे। उन्हें देखते ही लोग चारों तरफसे दौडे । सभी लोगविस्मित होरहे थे । इस लिये नहीं कि अलोपीदीनने क्यों यह कर्म किया, बल्कि इसलिये असाध्यसाधन करनेवाला वन और अनन्य वाचालता हो वह करता था । बड़ी तत्परतासे इस आक्रमणको रोकने के निमित्त धनमें युद्ध ठन गया। वशीधर चुपचाप सडे थे। उनके पास राख । गवाह थे, किन्तु लोभसे डांवाडोल । यहतिक कि मु शीजीको न्याय भी अपनी ओरसे कुछ खिंचा
डिप्टी मैजिस्ट्रेट ने अपनी तजवी में लिखा, पडित अलोपीदीनमें
विरुद्ध दिये गये प्रमाण निर्मूल और भ्रमात्मक हैं। वह एक बड़े
भारी आदमी है। यह यात कल्पनासे बाहर है कि उन्होंने थोडे
लाभके लिये ऐसा दुस्साहम किया हो । यद्यपि नमकके दारोगा
मुशो वशीधरका अधिक दोप नहीं है, लेकिन यह बडे सेदकी
बात है कि उनको उद्दण्डता और अविचारके कारण एक भले-
मानमको कष्ट झेलना पड़ा । हम प्रसन्न है कि वह अपने काममें
सजग और सचेत रहता है, किन्तु नमकके मुहकमेकी बढ़ी हुई
नमकहलातीने उसके विवेक और बुद्धिको भ्रष्ट कर दिया।
मुरु-मुककर सलाम किये। किन्तु इस समय एक-एक कटुवाक्य
चलते। आज उन्ह ससारका एक सेदजनक विचिन्न अनुभव
नमकका दारो
और
उछल पड़े। पडित अलोपी-
दोन मुस्कुराते हुए बाहर निकले । स्वजन वान्धोंने रुपयोंकी
लूट की। उदारताका सागर उमड पडा। उसकी लहरोंने अदालत
की नींवतक हिला दी। जब वशीधर बाहर निकले तो चारों ओर
से उनके ऊपर व्यग्यवाणोंकी वर्षा होने लगी। चपरासियोंने
एक-एक समेत उनकी गर्वाग्निको प्रज्वलित कर रहा था । कदा-
सफल होकर वह इस तरह अकडते हुए न
भविष्यमे उसे होशियार रहना चाहिये ।
वकीलोंने यह फैमला सुना
-
चित इस मुकदमे में
हुआ । न्याय और विद्वता, लम्बी-चौड़ी उपाधिगा, बड़ी बडी
दाढ़ियां और ढोले चोगे एक भी सारे पादरक पार नहीं हैं।
वशीधरने धनसे वैर मोहा लिगामा, उसका मूल्य चुकाना
अनिवार्य था। कठिनतासे प. समीक्षा होगा कि मुअत्तली-
पीतलसे बड़ी हुई। कई नौकर लाठियां कधीपर रसे साथ थे। ७० । बुढे पिताजीने यह समाचार सुना तो सिर पीट लिया। बोले, जो चाहता है कि तुम्हारा और अपना सिर फोड लू । बहुत देरतक क्रोध विकटरूप धारण करता । वृद्धा माताको भी दुःस-हुया। इसी प्रकार एक सप्ताह बीत गया। सन्ध्याका समय था। बुढे मुशीजी बैठे राम-नामकी माला फेर रहे थे। इसी समय उनके द्वारपर एक सजा हुआ रथ आकर रुका। हरे थोर गलावी परदे, पहिये बैलोकी जोटी, उनके गर्दनोंमें नीले धागे, सींग सप्तसरोज का परवाना आ पहुँचा। कार्यपरायणताका दण्ड मिला । वेचारे भग्न हृदय, शोक और सेदसे व्यथित घरको चले । बूढे मुशीजी तो पहले ही कुडबुडा रहे थे कि चलते चलते इस लड़केको समझाया था, लेकिन इसने एक न सुनी । वस मनमानी करता है। हम तो कलार और कसाईके तगादे सहे, बुढ़ापेमें भगत बन- कर बैठे और वहा बस वही सूखी तनख्वाह । हमने भी तो नौकरी की है और कोई ओहदेदार नहीं थे, लेकिन जो काम किया, दिल सोलकर किया और आप ईमानदार बनने चले हैं। घरमे चाहे अन्धेरा, मस्जिदमे अवश्य दीया जलायेगे । सेद ऐसी समझपर । पढ़ना लिखना सब अकारथ गया। इसके थोडे ही दिनों बाद, जब मुशी वशीधर इस दुरवस्थामें घर पहुंचे और पछत्ता पछताकर हाथ मलते रहे। क्रोधमें कुछ कठोर वाते भी कहीं और यदि वशीधर वहासे टल न जाते तो अवश्य ही यह जगन्नाथ और रामेश्वर यात्राको कामनाए मिट्टीमे मिल गई। पनीने तो कई दिनतक सीवे मु हसे वात नहीं की।
नमरुका दारोग मुन्शीजी अगुआनीको दौडे । देखा तो पण्डित अलोपीदीन हैं। मुक्कर दण्डवत की और लल्लो-चप्पोकी बाते करने लगे, हमारा भाग्य उदय हुआ, जो आपके चरण इस द्वारपर आये। आप हमारे पूज्य देवता हैं, आपको कौन-सा मुह दिखावे, मुहमें तो कालिख लगी हुई है। किन्तु क्या करें, लडका अभागा कपूत है, नहीं तो आपसे क्यों मुह छिपाना पडता ? ईश्वर निस्सन्तान चाहे रक्से, पर ऐसी सन्तान न दे । अलोपीदीनने कहा, नहीं भाई साहब ऐसा न कहिये । मुम्शीजीने चकित होकर कहा, ऐसीसन्तानको और क्या कहूँ ? अलोपीदीनने वात्सल्यपूर्ण स्वरसे कहा, कुलतिलक और पुरुषोंकी कीत्ति उज्ज्वल करनेवाले ससारमे ऐसे कितने धर्मपरा- पण मनुष्य हैं जो धर्मपर अपना सब कुछ अर्पण कर सके ? प० अलोपीदीनने वशीधरसे कहा, दारोगाजी, इसे खुशामद न समझिये, खुशामद करनेके लिये मुझे इतना कष्ट उठाने की जरूरत न थी। उस रातको आपने अपने अधिकार-बलसे मुझे अपनी हिरासतमें लिया था, किन्तु आज मैं सेच्छासे आपकी हिरासतमें आया है। मैंने हजारों रईस और अमीर देखे, हजारों उच्च पदाधिकारियोंसे काम पड़ा, किन्तु मुझे परास्त क्यिा तो आपने । मैंने मनको अपना और अपने धना गुलाम बनाकर छोड दिया । मुझे आज्ञा दीजिये कि आपसे कुछ विनय करू । वशीधरने अलोपीदीनो आते देखा तो उठकर मत्कार किया, किन्तु स्वाभिमान सहित । समझ गये कि यह महाशय मुझे लज्जित करने और लजाने छाये हैं। क्षमा प्रार्थनाकी चेष्टा वशीधर बोले, मैं किस योग्य हूँ, किन्तु जो कुछ सेवा मुझसे अपने हस्ताक्षर कर दीजिये। मैं ब्राह्मण है, जबतक यह सवाल मुशी वशीधरने उस कागजको पढ़ा तो कृतज्ञतासे माखोंमें दादका स्थायी मैनेजर नियत किया था। छ हजार वार्षिक वेतन- के अतिरिक्त रोजाना सर्च अलग, सवारीके लिये घोडे, रहनेको मुम्फरें इतनी सामथ्र्य नहीं है कि आपको इम उदारताको प्रशसा सप्तसरोज नहीं की. वरन उन्हें अपने पिताकी यह ठकुरसुहातीकी बात असहा-सी प्रतीत हुई । पर पण्डितजीकी बातें सुनी तोमनकी मैल मिट गयी । पण्डितजीकी ओर उडती हुई उष्टि से देखा। सद्भाव झलक रहा था। गर्वने अब लज्जाके सामने सिर झुका दिया। शर्माते हुए बोले, यह आपकी उदारता है जो ऐसा कहते हैं। मुझसे जो कुछ अविनय हुई है, उसे क्षमा कीजिये । मैं धर्मकी वेडीमे जकडा हुआ था। नहीं तो वैसे मैं आपका दास हूँ । जो आज्ञा होगी, वह मेरे सिर-मायेपर । अलोपीदीनने विनीत भावसे कहा, नदीके तटपर आपने मेरी प्रार्थना न स्वीकार की थी, किन्तु आज स्वीकार करनी पडेगी। हो सकती है उसमे त्रुटि न होगी। अलोपीदीनने एक स्टाम्प लगा हुआ पत्र निकाला और उसे वशीधरके सामने रखकर बोले, इस पदको स्वीकार कीजिये और पूरा न कीजियेगा, द्वारसे न हद गा । आंसू भर पाये । परिडत अलोपीदीनने उन्हें अपनी सारी जाय र-चाकर मुफ्त । कम्पित सरसे बोले, , . । घगला, नौकर- पण्डितजी कर सकूँ । किन्तु मैं ऐसे उच्चपदके योग्य नहीं हूँ।
की ही जरूरत है। । न मर्मज्ञताकी,न कार्यकुशलताकी । इन गुणोंके महत्वका परिचय नमकका दारोग अजोपीदीन हँसकर बोले, मुझे इम ममय एक अयोग्य मनुष्य- वशीधरने गभीर भावसे कहा, यों में आपका दास हूँ । आप जैसे कीर्तिवान, सजन पुरुपकी सेवा करना मेरे लिये सौभाग्यकी चात है। किन्तु मुझमे न विद्या है, न बुद्धि, न वह अनुभव जो इन त्रुटियोंकी पूति कर देता है। ऐसे महान कार्यके लिये एक बढे मर्मज्ञ अनुभवी मनुष्यकी जरूरत है। अलोपोदीनने कलमदानसे कलम निकाली और उसे वशीधर- के हाथमें देकर बोले, न मुझे विद्वताकी चाह है, न अनुभवकी, - सूर पा चुका हूँ। अव सौभाग्य और सुअवसरने मुझे वह मोती दे दिया है जिसके सामने योग्यता और विद्वताकी चमक फीकी पड जाती है। यह कलम लीजिये, अधिक सोच विचार न कीजिये, दस्तखत कर दीजिये। परमात्मासे यही मेरी प्रार्थना है कि वह आपको सदैव वही नदीके किनारेवाला, वेमुरीवत, उद्दण्ड, कठोर, परन्तु धर्मनिष्ठ दारोगा बनाये रक्से। वसोधरको आँखें डबडवा आई । हृदय के सचित पात्रमें इतना एहसान न समा सका । एक बार फिर पडितजीको ओर भक्ति और श्रद्धाफी दृष्टिसे देखा और कांपते हुए हायसे मैने नरी के गजपर हस्ताक्षर कर दिये । अलोपीदीनने प्रफुल्ल होकर उन्हें गले लगा तिया ।
मुशी वशीधरने उस कागजको पढ़ा तो कृतज्ञतासे मांखोंमें आंसू भर आये । परिवत अलोपीदीनने उन्हें अपनी सारी जाय. दादका स्थायी मैनेजर नियत किया था। छ हजार वार्पिफ वेतन- बगला, नौकर-चाकर मुफ्त । कम्पित स्वरसे बोले, पण्डितजी मुम्हप इतनो सामथ्र्य नहीं है कि आपको इम उदारताको प्रशता सप्तसरोज नही की. वरन् उन्हें अपने पिताकी यह ठकुरसुहातीकी बात असह्य-सी प्रतीत हुई । पर पण्डितजोकी बाते सुनी तो मनकी मैल मिट गयी। पण्डितजीकी ओर उडती हुई दृष्टिसे देखा। सद्भाव झलक रहा था। गर्वने अव लज्जाके सामने सिर झुका दिया। शर्माते हुए बोले, यह आपनी उदारता है जो ऐसा कहते हैं। मुझसे जो कुछ अविनय हुई है, उसे क्षमा कीजिये । मैं धर्मकी जो वेडीमें जकड़ा हुआ था। नहीं तो वैसे में आपका दास हूँ। आना होगी, वह मेरे सिर-माथेपर । अलोपीदीनने विनीत भावसे कहा, नदीके तटपर आपने मेरी प्रार्थना न स्वीकार की थी, किन्तु आज स्वीकार करनी पड़ेगी। वशीधर बोले, मैं किस योग्य हूँ, किन्तु जो कुछ सेवा मुझसे हो सकती है उसमें त्रुटि न होगी। अलोपीदीनने एक स्टाम्प लगा हुआ पत्र निकाला और उसे वशीधरके सामने रखकर बोले, इस पदको स्वीकार कीजिये और छपने हस्ताक्षर कर दीजिये। मैं ब्राह्मण हूँ, जबतक यह सवाल पूरा न कीजियेगा, द्वारसे न हटू गा । के अतिरिक्त रोजाना खर्च अलग, सवारी के लिये घोडे, रहनेको कर सकिन्तु मैं ऐमे उच्चपदके योग्य नहीं हूँ।
अलोपीदीनने प्रपन्न होकर उन्हें गले लगा लिया।
नमकका दाय
अनोपीदीन हँसकर बोले, मुझे इस समय एक अयोग्य मनुप
की ही जाबरत है।
वशीधरने गभीर भावसे कहा, यो मै गापा दास हूँ । आ
जैसे कीर्तिवान, सजन पुरुषकी सेवा करना मेरे लिये सौभाग्य
चात है। किन्तु मुझमें न विद्या है, न बुद्धि, न वह अनुभव में
इन त्रुटियोंकी पूति कर देता है। ऐसे महान कार्यके लिये एक बा
।
मर्मज्ञ अनुभवी मनुष्यकी जरूरत है।
के हाथम देकर वोले, न मुझे विद्वताकी चाह है, न अनुभवी
न मर्मज्ञताकी,न कार्यकुशलताकी । इन गुणों के महत्त्वका परिणाय
खूप पा चुका हूँ। अब सौभाग्य और सुअवसरने मुझे वह मोती
दे दिया है जिसके सामने योग्यता और विद्वताकी चमक फीती
पड़ जाती है। यह कलम लीजिये, अधिक सोच विचार
कीजिये, दस्तसत कर दीजिये। परमात्मासे यही मेरी प्रार्थना
कि वह आपको सदैव वही नदीके किनारेवाला, चेमुरोपात, १४,
वशीधरको आँखें डरडवा आई । हृदयके संकुचित पात्रा
भक्ति और श्रद्धाकी दृष्टिमे देखा और कांपते हुए झापस गोय.
पागनपर हस्ताक्षर कर दिये।
७३
अलोपीदीनने कलमदानसे कलम निकानी और उसे वशीधर.
धर्मनिष्ठ दारोगा बनाये रक्स।
कठोर,
परन्तु
FA असामीसे परिचित नये। यहातक कि कभी प्रयागके सरकारी सप्तसरोज दी। इस आत्म-विजयपर एक जातीय ड्रामा खला गया, जिसका नायक हमारे शर्माजी ही थे। समाजकी उच्च श्रेणियोंमें इस आत्म त्यागकी चर्चा हुई और शर्माजीको अच्छी-खासी ख्याति प्राप्त हो गयी। इसीसे वह कई वर्षों से जातीय सेवामें लीन रहते थे । इस सेवाका अधिक भाग समाचार पत्रोंके अवलोकनमें बीतना था, जो जातीय सेवाका ही एक विशेष अङ्ग समझा जाता। है। इसके अतिरिक्त वह पन्नोंके लिये लेख लिखते, सभाए करते और उनमें फडकते हुए व्याख्यान देते थे। शर्माजी "फ्री लाइ- बेरी" के सेक्रेटरी, "स्टुडेण्ट्स एसोसियेशन के सभापति, "सोसल सविस लीग' के सहायक मन्त्री और प्राइमरी एजूकेशन कमिटीके सस्थापक थे । कृषि-सम्बन्धी विषयों से उन्हें विशेष प्रेम था। पत्रों में जहा कहीं किसी नई खाद या किसी नवीन प्राविक कारका वर्णन देखते, तत्काल उसपर लाल पेन्सिलसे निशान कर देते और अपने लेखोंमें उसकी चर्चा करते थे। किन्तु शहरसे थोडी दूरपर उनका एक वडा प्राम होनेपर भी, वह अपने किसी . , भी सैर करने न गये थे। M
उपदेश
वे कड़वे तेलसे उसकी सेवा किया करते, पर वह नीच स्वभावके
अनुसार उन्हें काटनेसे न चूरता था। येचारेको सालके ६ महीने
पैरोंमें मरहम लगानी पडती । रहुधा नगे पाव कचहरी जाते, पर
कजूम कहलाने के भय से जूतोंको हाथमें ले जाते । जिस प्रामगे
शर्माजीकी जमीदारी थी, उसमें कुछ थोडासा हिस्सा उनका भी
था। इस नातेसे कभी-कभी उनके पास भाया करते थे। हा,
वातीलके दिनोंमें गांव चले जाते । शर्माजीको उनका पाकर
धैठना नागवार मालूम होता, विशेषकर जब वह फैशनेबुल मनु-
ज्योंकी उपस्थितिम भा जाते । मुन्शीजी भी कुछ ऐसी स्थूल दृष्टिके
पुरुप थे कि उन्हें अपना अनमिलापन रिलफुल दिखाई न देता।
असे घडी आपत्ति यह थी कि वे बरावर कुर्सीपर डट जाते।
इसोंमें कौवा । उस समय मित्रगण अगरेजीमे बातें करने
और पावूलालको जुद्रधुद्धि, झकी, बौडम, बुधू आदि
पात्र बनाते। कभी कभी उनकी हंसी उडाते थे।
इतनी सज्जनता अवश्य थी कि वे अपने विचारहीन
निरादरसे बचाते थे। यथार्थमें बाबूलालकी
"
4.
बीतता था, सप्तसरोज ७६ दी। इस आत्म-विजयपर एक जातीय ड्रामा खेला गया, जिसके नायक हमारे शर्माजी ही थे। समाजकी उच्च श्रेणियोंमें इस आत्म त्यागकी चर्चा हुई और शर्माजीको अच्छी-खासी ख्याति प्राप्त हो गयी। इसीसे वह कई वर्षों से जातीय सेवामे लीन रहते थे। इस सेवाका अधिक भाग समाचार पत्रोंके अवलोकनमें जो जातीय सेवाका ही एक विशेष अङ्ग समझा जाता है। इसके अतिरिक्त वह पत्रों के लिये लेस लिखते, सभाए करते और उनमें फडकते हुए व्याख्यान देते थे। शर्माजी "फ्री लाइ- बेरी” के सेक्रेटरी, "स्टुडेण्ट्स एसोसियेशन" के सभापति, "सोमल सविस लीग' के सहायक मन्त्री और प्राइमरी एजूकेशन कमिटीके सस्थापक थे । कृषि-सम्बन्धी विपयोंसे उन्हें विशेष प्रेम था। पत्रोंमे जहा कहीं किसी नई खाद या किसी नवीन आवि- कारका वर्णन देसते, तत्काल उसपर लाल पेन्सिलसे निशान कर देते और अपने लेखोंमें उसकी चर्चा करते थे। किन्तु शहरसे थोडी दूरपर उनका एक वडा ग्राम होनेपर भी, वह अपने किसी असामीसे परिचित न थे। यहांतक कि कभी प्रयागके सरकारी कृपिक्षेत्रकी भी सैर करने न गये थे। २ उसी मुहल्लेमें एक लाला बाबुलाल रहते थे। वह एक वकील के मुहरि थे। थोडी-सी उर्दू-हिन्दी जानते थे और उसीसे अपना काम भली-भांति चला लेते थे । सूरत शक्ल के कुछ सुन्दर न थे। उस शनापर मऊके चारसानेको लम्पी अचकन और भी शोभा देती थी। जूना भी देशी ही पहनते थे । यद्यपि कभी-कभी उपदे वे कहवे तेलसे उसकी सेवा किया करते, पर वह नीच स्वभाव अनुसार उन्हें काटनेसे न चूकता था। बेचारेको सालके ६ महीन पैरों मरहम लगानी पडती । बहुधा नगे पांव कचहरी जाते, पर फजूम कहलाने के भय से जूतोंको हाथमें ले जाते । जिस ग्राममे शर्माजीकी जमीदारी थी, उसमे कुछ थोडासा हिस्सा उनका भी था। इस नातेसे कभी-कभी उनके पास आया करते थे। हां, तातीलके दिनोंमे गांव चले जाते । शर्माजीको उनका आकर बैठना नागवार मालूम होता, विशेषकर जब वह फैशनेबुल मनु- प्पोंकी उपस्थितिम आ जाते । मुन्शीजी भी कुछ ऐसी स्थूल दृष्टिके पुरुपये कि उन्हें अपना अनमिलापन निलकुल दिखाई न देता। सबसे बड़ी आपत्ति यह थी कि वे बरावर कुर्सीपर टट जाते । मानो हसोंमे कौवा । उस समय मित्रगण अगरेजीमे बातें करने लगते और वायूलालको जुद्रधुद्धि, झकी, चौडम, बुद्धू आदि उपाधियों का पात्र बनाते। कभी कभी उनकी हंसी उडाते थे। शर्माजीमें इतनी सज्जनता अवश्य थी कि वे अपने विचारहीन मित्रको यथाशक्ति निरादरसे यचाते थे । यथार्थमे बाबूलालकी शर्माजीपर सच्ची भक्ति थी। एक तो वह बी० ए० पास थे, थे। जिसका अर्थ यह होता है कि वह सरस्वती देवीके वरपुत्र दूसरे वह देशभक्त थे। बाबूलाल जैसे विद्याविहीन मनुष्यका ऐसे रत्नको आदरणीय समझना कुछ अस्वाभाविक न था। ३ एक वार प्रयागमें प्लेगका प्रकोप हुआ। शहरके रईस लोग निकल भागे । बेचारे गरीव चूहोंकी भाति पटापट मरने लगे।
- सप्तसरोज शर्माजीने भी चलनेकी ठानी। लेकिन "सोसल सर्विस लीग" के वे मन्त्री ठहरे। ऐसे अवसरपर निकल भागनेमें बदनामीका भय था । वहाना ढूढा । “लीग में प्रायः सभी लोग कालेजमे पढ़ते थे । उन्हें बुलाकर इन शब्दों में अपना अभिप्राय प्रकट किया। मित्रवृन्द | आप अपनी जातिके दीपक हैं। आप ही इन मरणोन्मुख जातिके आशास्थल हैं। आज हमपर विपत्तिकी घटाएं छाई हुई हैं। ऐमी अवस्थामें हमारी आखें आपकी ओर न उठे तो किसकी मोर उठेगी। मित्रो, इस जीवनमें देश-सेवाके अवसर बडे सौभाग्य से मिला करते हैं। कौन जानता है कि परमात्माने तुम्हारी परीक्षाके लिये ही यह वन प्रहार किया हो । जनताको दिखा दो कि तुम वीरोंका हृदय रखते हो, जो कितने ही सकट पडनेपर भी विचलित नहीं होता। हा, दिखा दो कि वह वीर प्रमविनि पवित्र भूमि, जिसने हरिश्चन्द्र और भरतको उत्पन्न किया, आज भी शून्यगर्भा नहीं है। जिस जातिके युवकोंमे अपने पीडित भाइयों के प्रति ऐसी करुणा और यह अटल प्रेम है वह ससारमें सदैव यश-कीर्तिकी भागी रहेगी। आइये, हम कमर बांधकर कर्मक्षेत्रमें उतर पडें । इसमें सन्देह नहीं कि काम कठिन है, राह बीहड़ है, आपको अपने आमोद-प्रमोद, छापने हाफी, टेनिस, अपने मिल और.मिल्टनको छोडना पड़ेगा । तुम जरा हिचकोगे, हटोगे और मुंह फेर लोगे, परन्तु भाइयो जातीय सेवाका स्वर्गीय आनन्द सहजमें ही नहीं मिल सकता गारा पुरुषत्त्व, हमारा मनोबल, हमारा शरीर, यदि जातिके फाग न आवे तो वह व्यर्थ है । मेरी प्रवल आकांक्षा थी कि -
२
उपदेश
इस शुभ कार्यमे मैं तुम्हारा हाथ वटा सकता, पर आज ही
देहातोंमे भी बीमारी फैलनेका समाचार मिला है। अतएव में
यहाँका काम आपके सुयोग्य, सुदृढ हायोंमें सौंपकर देहातमें
जाता हूँ कि यथासाध्य देहाती भाइयोंकी मेवा करूं । मुझे
विश्वास है कि आप सहर्ष मातृभूमि के प्रति अपना कर्तव्य
पालन करेगे।
इस तरह गला छुडाकर शर्माजी सन्ध्या समय स्टेशन पहुचे।
पर मन कुछ मलिन था। अपनी इस कायरता और निर्वलवापर
मन ही मन लज्जित थे।
सयोगवश स्टेशनपर उनके एक वकील मित्र मिल गये । यह
वही वकील ये जिनके आश्रयमें वाबूलालका निर्वाह होता था।
यह भी भागे जा रहे थे। बोले, कहिये शर्माजी किधर चले ?
'क्या भाग खड़े हुए ?
शर्माजीपर पडों पानी पड़ गया, पर सँभलकर बोले,
भागू क्यों?
वकील-सारा शहर क्यों भागा जा रहा है ?
शर्माजी-मैं ऐसा कायर नहीं हूँ।
वकील-यार, क्यों वाते वनाते हो, अच्छा वामो, कहाँ
जाते हो?
शर्माजी-देहातोंमें बीमारी फैल रही है, वहाँ कुछ "रिलीफ"
मा काम करूंगा।
वकील-यह बिल्कुल झूठ है । अभी में डिस्ट्रिक्ट गवट
सके चला आता है। शहर के बाहर कही योमारी का नाम नहीं है।
. । बातोंसे सिन्न हो रहे थे। चाहते थे कि उसकी आंख बचाकर सप्तसरोज शर्माजी निरुत्तर होकर भी विवाद कर सकते थे । बोले. गजटको आप देववाणी समझते होंगे, मैं नहीं समझता। वकील--आपके कानमें तो आकाशके दूत कह गये होंगे ? साफ साफ क्यों नहीं कहते कि जानके डरसे भागा जा रहा हूँ। शर्माजी-अच्छा, मान लीजिये यही सही । तो क्या पाप कर रहा हूँ ? सबको अपनी जान प्यारी होती है। वकील-हा, अब आये राहपर । यह मरदोंकी-सी बात है। अपने जीवनकी रक्षा करना शास्त्र का पहला नियम है । लेकिन अब भूलकर भी देशभक्तिकी हींग न मारियेगा। इस कामके लिये बडी दृढ़ता और आत्मिक बलकी आवश्यकता है । स्वार्थ और देशभक्तिमें विरोधात्मक अन्तर है। देशपर मिट जानेवाले को देश- सेवकका सर्वोच्च पद प्राप्त होता है, वाचालता और कोरी कलम घिसनेसे देशसेवा नहीं होती। कम से कम मैं तो अखबार पढ़ने- को यह गौरव नहीं दे सकता । अब कभी बढ़-चढकर बातें न कीजियेगा । आप लोग अपने सिवा सारे ससारको स्वार्थान्ध समझते हैं इसीसे कहता हूँ। शर्माजीने उस उद्दण्डताका कुछ उत्तर न दिया। घृणामे मुह फेरकर गाड़ीमें बैठ गये। तीसरे ही स्टेशनपर शर्माजी उतर पडे। वकीलकी कठोर निकल जाय। पर इमने देस ही लिया और हँसकर बोला, क्या आपके ही गांवमें प्लेगका दौरा हुआ है ?
उपदेश
शर्माजीने कुछ उत्तर न दिया । बहलीपर जा बैठे। कई धेगार
हाजिर थे। उन्होंने असवाल उठाया । फागुनका महीना था।
आमोंके बौरसे महकती हुई मन्द-मन्द वायु चल रही थी। कभी-
कभी कोयनकी सुरीलीतान सुनाई दे जाती थी । खलिहानोंमे
किमान आनन्दसे उन्मत्त हो होकर फाग गा रहे थे । लेकिन
शर्माजीको अपनी फटकारपर ऐसी ग्लानिथी कि इन चित्ताकर्षक
वातुथोंका उन्हें कुछ ध्यान ही न हुआ।
थोडी देर बाद वे ग्राममें आ पहुचे । शर्माजीके स्वर्गवासी
पिता एक रसिक पुरुष थे । एक छोटा सा वाग, छोटा-सा पका
कुवा, बगला, शिवजीका मन्दिर यह सब उन्हींके कीर्ति चिह्न थे।
वह गर्मी के दिनोंमें यहीं रहा करते थे । पर शमांजोके यहाँ माने-
का यह पहला ही अवसर था। वेगारियोने चारों तरफ सफाई
कर रक्सी थी। शर्माजी बहलीसे उतरकर सीधे धगलेमें चले
गये, सैकड़ों असामी दर्शन करने आये थे, पर वह उनसे कछ
न वोले।
घडी रात जाते-जाते शर्माजीके नौकर टमटम लिये प्रा
पहुंचे। कहार, साईम और रसोइया महाराज तीनोंने असा-
मियों को इस दृष्टिसे देखा मानो वह उनके नौकर हैं । साईसो
" मोटेन्ताजे किसानसे कहा, घोउको सोल दो।
किसान चेचारा डरता डरता घोडेके निकट गग । घोड़ने
अनजान भादमीको देखते ही तेवर यदतफर कनौतियो सही
को । किसान ढरकर लौट आया। तय साईसने उसे बफेलकर
कहा, बस,-निरे पलियाके वाज ही हो । इल जोवनेसे पगा
६
-
, , सप्तसरोज अक्ल भी चली जाती है। यह लो घोडेको टहलाओ । मुंह क्या बनाते हो, कोई सिंह है कि खा जायगा? किसानने भयसे कापते हुए राम पकडी, उसका घबराया हुआ मुख देवकर हमी आती थी। पग पगपर घोडेको चौकन्नी दृष्टिसे देसता, मानों वह कोई पुलिमका सिपाही है। रसोई बनानेवाले महाराज एक चारपाईपर लेटे हुए थे। कडककर बोले, अरे नउआ कहां है । चल पानी-वानी ला, हाथ- पैर धो दे। कहारने कहा, अरे किमीके पास जरा सुरती-चूना हो तो देना । बहुत देरसे तमाखू नहीं खाई। मुख्नार (कारिन्दा) साहबने इन मेहमानोंकी दावतका प्रबध किया। साईस और कहारके लिये पूरियां बनने लगी, महाराजको सामान दिया गया। मुख्नार साहब इशारेपर दौडते ये और दीन किसानोंका तो पूछना ही क्या, वे तो बिना दामोंके गुलाम थे। सच्चे स्वतन लोग इस समय सेवकों के सेवक बने हुए थे। ५ कई दिन बीत गये । शर्माजी अपने बगलेमे बैठे हुए पत्र और पुस्तके पढा करते थे । रस्किनके कथनानुसार राजाओं और महात्माओंके सत्मङ्गका सस लूटते थे। हालैडके कृषिविवान, अमेरिकाके शिल्प-वाणिज्य और जर्मनीकी शिक्षा-प्रणाली आदि गूढ विपयोंपर विचार किया करते थे। गांवमे ऐसा कौन था जिसके साथ बैठते ? किसानोंसे बातचीत करनेको उनका जी चाहता, पर न जाने क्यों वे उजडु, अक्खड लोग उनसे दूर रहते। - - - - उपदेश शर्माजीका मस्तिष्क कृषि सम्बन्धी ज्ञानका भाण्डार था : हालैंड और डेनमार्ककी वैज्ञानिक खेती, उसकी उपजका परिमाण और वहाके को-आपरेटिव बैंक आदि गहन विषय उनकी जिह्वापर थे। पर इन गवारोंको क्या सवर ? यह सब उन्हे झुककर पालागन अवश्य करते और कतराकर निकल जाते, जैसे कोई मरकहे चैलसे बचें । यह निश्चय करना कठिन है कि शर्माजीकी उनसे चार्तालाप करने की इच्छामे क्या रहस्य था, सच्ची सहानुभूति मेवोंका अधिक सेवन करते थे। एक आदमी इस काम के लिये प्रसन्नतासे नहीं जाता। प्रतिदिन बारी-बारीमे श्रादमी भेजे जाते थे। वह इसे भी बेगार समझते थे। मुख्तार नाहयको प्राय ठोरतासे काम लेना पड़ता था । शर्माजी फिसानासी इस शिथिलताको मुटमरदीके सिवा और क्या समझते । कभी-कभी भी दौडाया जाता था। शर्माजीने अपने मुख्तारसे सख्त ताकीद कर दी थी कि किसीसे मुफ्त काम न लिया जाय, तथापि शर्मा- जीको यह देखकर आश्चर्य होता था कि कोई इन कामो के लिये सह स्वय कोषसे भरे हुए अपने शान्ति कुटीरसे निम्ल पाते और अपनो सीत्र वाक्य शकिका मार दिखाने लगते थे। शमांजी घोड़ेके लिये घास-चारे का प्रबन्ध भी कुछ कम फष्टदायक न रोज सन्ध्या समय टाट पट और रोने चिल्लानेकी मावाज न्हें सुनाई देती थी। एक कोलाहज-सा मच जाता था। पर वह चा अपनी सर्वज्ञताका प्रदर्शन | शर्माजीकी डाक शहरसे लाने और ले जाने के लिये दो आदमी प्रतिदिन भेजे जाते । वह लूईकूनेकी जल चिकित्साके भक्त थे ।
शर्माजी इस दृश्यसे बहुत प्रसन्न हुए। परन्तु इस उल्लास उन्हें अपने कई सिपाही दिखाई दिये, जो लट्ठ लिये अनाजकेडे सप्तसरोज इस सम्बन्धमे अपने मनको इस प्रकार समझा लेते थे कि घोडा भूसों नहीं मर सकता, घासका दाम दे दिया जाता है, यदि इसपर भी यह हाय हाय होती है तो हुआ करे । शर्माजीको यह कभी नहीं सूझी कि जरा चमारोंसे पूछ लें कि घासका दाम मिलता है वा नहीं। यह सब व्यवहार देस देखकर उन्हे अनु- भव होता जाता था कि देहाती बडे मुटमरद, बदमाश है, इनके विपयमें मुख्तार साहब जो कुछ कहते हैं वह यथार्थ है। पत्रों और व्याख्यानोंमे उनकी अवस्थापर व्यर्थ गुलगपाडा मचाया जाता है, यह लोग इसी बर्तावके योग्य हैं। जो इनकी दीनता और दरिद्रताका राग अलापते हैं वह सच्ची अवस्थासे परिचित नहीं हैं। एक दिन शर्माजी महात्माओंकी सङ्गतिसे उकता पर सैरको निकले । घूमते-फिरते खलिहानोंकी तरफ निकल गये। वहा आमके वृक्षोंके नीचे किसानोंकी गाढ़ी कमाईके सुनहरे ढेर लगे हुए थे। चारो ओर भूमेकी आधी-सी उड रही थी। बैल अनाजका एक गाल सा लेते थे । यह सब उन्हीकी कमाई है, उनके मुँहमें आज जाथी देना बडी कृतघ्नता है। गांवके वड़ई, धोबी और कुम्हार अपना वार्पिक कर उगाहनेके लिये जमा थे। एक ओर नट दोल बजा बजाकर अपने करतब दिसा रहा था। कवीश्वर महाराजकी अतुल काव्य शक्ति आज उमगपर थी। के पास जमा थे। पुष्प-वाटिकामें दूठ जैसा, भदा दिखाई देत चमार, । -- उपदेश थवा ललित सङ्गीतमें जैसे कोई बेसुरी तान कानों को अप्रिय ती है, उसी तरह शर्माजीको सहृदयतापूर्ण दृष्टि में ये मँडराते सिपाही दिखाई दिये। उन्होंने निकट जाकर एक सिपाहीको माया । उन्हें देखतेही मत्र के सर पाडिया सम्भालते दौडे।' शर्माजीने पूछा, तुम लोग यहा इस तरह क्यों बैठे हो ? एक सिपाहीने उत्तर दिया, मरकार, हम लोग असामियोंके पर सवार न रहे तो एक कौडी वसूल न हो। अनाज धरमें जाने की देर है, फिर तो वह सीधे बात भी न करेंगे बडे सर- श लोग हैं। हम लोग रातकी रात बैठे रहते हैं। इतनेपर भी हा प्रोग्य झपकी, ढेर गायब दुआ । शर्माजोने पूछा, तुम लोग यहां कब तक रहोगे ? एक सिपाही ने उत्तर दिया, हुजूर वनियोंको बुलाकर अपने सामने अनाज नौलाते हैं। जो कुछ मिलता है उसमेसे लगान काटकर बाकी घमामीको दे देते हैं। शर्माजी सोचने लगे, जब यह हाल है तो इन किसानोंकी भारया क्यों न खराब हो १ यह बेचारे अपने धनके मालिक नहीं है। उसे अपने पाम रसकर अच्छे अवसरपर नहीं वेच मकरो। इस agका निवारण कैसे किया जाय ? यदि मैं इस ममय इनके साथ रिमायत कर दू तो लगान कैसे वसूल होगा। दस वियरपर विचार करते हुए वह वहासे चल दिये । मिपाहियोंने साथ चलना चाहा, पर उन्होंने मना कर दिया। भीर भादसे उन्हें उलझन होतो थी। अकेले ही गांवमें घूमने मोबोटा-सा गांव वा । पर मफाईका कहीं नाम न था। -
शर्माजी हँसकर वोले,प्राणदान मांगा होता। सच बताओ,क्या
सप्तसरोज
८६
चारों ओरसे दुर्गन्ध उठ रही थी। क्सिीके दरवाजेपर गोबर
सड रहा सा, तो कहों कीचड और कूडेका ही ढेर वायुको
विषैली बना रहा था । घरोके पास ही घूरपर सादके लिये गोवर
फेका हुआ था जिससे गावमे गन्दगी फैलने के साथ-साथ खादका
सार अश धूप और हवाके साथ गायव होता था । गावके
मकान तथा रास्ते बेसिलसिले, वेढगे तथा टूटे फूटे थे। मोरियों
के गन्दे पानी निकासका कोई प्रबन्ध न होने की वजहसे दुर्ग:
न्धसे दम घुटता था। शर्माजीने नाकपर रूमाल लगा ली। सास
रोककर तेजीसे चलने लगे। बहुत जी घबराया तो दौडे और
हांफते हुए एक सघन नीमके वृक्षकी छायामे आकर खडे हो
गए। अभी अच्छी तरह सास भी न लेने पाये थे कि बाबूलाल
ने आकर पालागन किया और पूछा, क्या कोई सांड़ था?
शर्माजी सास खींचकर बोले, साडसे अधिक भयकर विपैली
हवा थी। ओह । यह लोग ऐसी गन्दगीमें फैसे रहते हैं ?
बाबूलाल-रहते क्या हैं किसी तरह जीवन के दिन पूरे
करते हैं।
शर्माजी-पर यह स्थान तो साफ है ?
बाबूलाल-जी हा, इस तरफ गावके किनारेतक साफ जगह
मिलेगी।
शर्माजी-तोवर इतना मैला क्यों है ?
याबूलाल-गुस्तासी माफ हो तो कहूँ।
-
बात है ? एक तरफ ऐसी स्वच्छता और दूसरी तरफ वह गन्दगी ।
१
उपदेश
बाबूलाल-यह मेरा हिस्सा है और वह आपका हिस्सा है
मैं अपने हिस्सेकी देख रेस स्वय करता हू पर आपका हिस्सा
नौकरोंकी कपाके अधीन है।
शर्माजी-अच्छा, यह बात है। आसिर आप क्या करते हैं ?
वाबूलाल और कुछ नहीं, केवल ताकीद करता रहता हूँ।
जहा अधिक मैलापन देखता हूँ स्वय साफ करता हूँ। मैंने सफाई
का एक इनाम नियत कर दिया है, जो प्रति मास सबसे साफ
घरके मालिकको मिलता है। आइये वैठिये ।
शर्माजीके लिये एक कुर्सी रख दी गई। वे उसपर बैठ गये
और बोले- क्या आप आजही आये हैं ?
बाबूलाल-जी हां, क्ल तातील है। आप जानते हैं कि
तातीलके दिनोंमे मैं यहीं रहता हूँ।
शर्माजी-शहर का क्या ग्ग-ढग है ?
बाबूलाल-वही हाल, पल्कि और भी सरान। 'सोमल
सर्विस लीग' वाले भी गायब हो गये। गरीबोंके घरों में मुर्दे पड़े
हुए हैं। बाजार बन्द हो गये । खानेको अनाज नहीं मिलता।
शर्माजी-मला बतानो तो ऐसी आग में यक्षा कैसे रहता ?
वस, लोगोंने मेरी ही जान सरवी समझ रखी है। जिस दिन में
यहाँ पा रहा था आपके वकील साहन मिल गये तरद गरम
हो पढे । मुझे देश भक्तिके उपदेश देने लगे। जिन्हें कभी भूलकर
भी देशका ध्यान नहीं पाता ये भी मुझे उपदेश देना मारा
कर्तव्य सममते हैं। कुछ मुझे ही देश भापका दावा है ? जिसे
देखो, वही तो देशसेवा यना फिरता है।
।
. कम-से-कम स्वार्थ सिद्ध होता। मुझे ज्ञात हो गया कि इन बातोंको सासरोज जो लोग सहस्रों रुपये अपने भोग-विलासमें फूकते हैं उनकी गणना भी जाति-सेवकोंमें है। मैं तो फिर भी कुछ-न-कुछ करता ही हूँ। मै भी मनुष्य हू, कोई देवता नहीं, धनकी अमिलापा अवश्य है । मैं जो अपना जीवन पत्रों के लिये लेख लिखनेमें काटता हूँ, देश हितकी चिन्तामें मग्न रहता है, उसके लिये मेरा इतना सम्मान बहुत समझा जाता है। जब किसी सेठजी या किसी वकील साहबके दरेदौलतपर हाजिर हो जाऊ तो वह कृपा करके मेरा कुशल-समाचार पूछ ले। उसपर भी यदि दुर्भाग्यवश किसी चन्देके सम्बन्धमें जाता हैं तो लोग मुझे यमकादुत समझते हैं । ऐसी रुखाईका व्यवहार करते हैं जिससे सारा उत्साह भग हो जाता है। यह सब आपत्तियां तो मैं झेलू, पर जब किसी सभाके सभापति चुननेका समय आता है तो कोई वकील साहव इसके पान समझे जाते हैं, जिन्हें अपने धनके सिवा उक्त पदका कोई अधिकार नहीं। तो भाई, जो गुड खाय वह कान छिदावे । देश हितैपिताका पुरस्कार यही जातीय सम्मान है, जब वहातक मेरी पहुँचही नहीं तो व्यर्थ जान क्यों द् ? यदि यह आठ वर्ष मैंने लक्ष्मीकी आराधनामें व्यतीत किये होते तो अबतक मेरी गिनती बड़े आदमियों में होती। अभी मैंने कितने परिश्रमसे देहाती बैंकोंपर लेख लिसा, महीनों उसकी तैयारीम लगे, सैकडों पत्र पत्रिकाओं के पन्ने उलटने पडे, पर किमीने उसके पढनेका कष्ट भी न उठाया । यदि इतना परिश्रम किसी और काममें किया होता तो । - कोई नहीं पूछता । सम्मान और कीर्ति यह सब धनके नौकर हैं।
९ उप बाबूलाल-आपका कहना यथार्थ ही है । पर आप में महानुभाव इन बातोंको मनमे लावेगे तो यह काम कौन करेगा शर्माजी-वही करेंगे जो 'आनरेवन' बने फिरते हैं या नगरके पिता कहलाते हैं । मैं तो अन देशाटन करूँगा, ससारक , हवा खाऊँगा। बाबूलाल-समझ गये कि यह महाशय इस समय आपेमें नहीं हैं । विपय बदलकर पूछा, यह तो बताइये, आपने देहातको कैमा पसन्द किया? आप तो पहले ही पहल यहा आये हैं। शर्माजी-चस, यही कि बैठे बैठे नी घराता है। हां, कुछ नये अनुभव अवश्य प्राप्त हुए हैं । कुछ भ्रम दूर हो गये। पहले समझता था कि किसान वडे दीन-दुःखी होते हैं । अब मालूम हुआ कि यह लोग बडे मुटमरद, अनुदार और दुष्ट हैं । सीधे चात न सुनेगे, पर कड़ाई से जो काम चाहे करा लो । यस निरे पशु हैं, और तो और, लगानके लिये भी उनके सिरपर सवार रहने की जरूरत है। टल जाओ तो कौड़ी वसूल न हो। नालिश कीजिये, बेदखली जारी कीजिये, कुर्की कराइये, यह सब आपत्तियां सहेंगे पर समयपर रुपया देना नहीं जानते । यह सब मेरे लिये नई बाते हैं। मुझे अबतक इनसे जो सहानुभूति थी वह अर नहीं है। पत्रोंमें उनकी हीनावस्थाके जो मरमिये। गाये जाते वह सर्वथा कसित हैं। क्यों, भाप का क्या विचार है? बानुलालने सोचकर जवान दिया। मुझे वो प्रयवक कोई शिकायत नहीं हुई। मेरा अनुभव यह है कि यह लोग पढ़े शोत- चान, नम्र और छतज्ञ होते हैं। परन्तु उनके ये गुण पाटी सामने मेरा मुह सोलना वृष्टता है। मैं इसका एक ही उपाय मैंने उन्हीं के लिये वैद्यक सीसा और एक छोटा मोटा औषधालय अपने साथ रमता हूँ 1 रुपया मांगते है तो रुपया, अनाज मांगते है तो अनाज देता हूँ, पर सूद नहीं लेता। इससे मुझे कोई हानि, सप्तसरोज नहीं दिखाई देते। उनसे मिलिये और उन्हे, मिलाइये तब उनके जौहर खुलते हैं। उनपर विश्वास कीजिये तब वह प्रापपर विश्वास करेगे । आप कहेगे इस विषयमे अग्रसर होना उनका काम है और आपका यह कहना उचित भी है,लेकिन शताब्दियोंसे वह इतने पीसे गये हैं इतनी ठोकरे खाई हैं कि उनमे स्वाधीन गुणोंका लोप-मा हो गया है। जमींदारको वह एक हौआ मम- झते हैं जिसका काम उन्हें निगल जाना है, वह उसका मुकाविला नहीं कर सकते, इमलिये छल और कपटसे काम लेते हैं, जो निर्वलोका एकमात्र आधार है। पर आप एक बार उनके विश्वास- पात्र बन जाइये, फिर आप कभी उनकी शिकायत न करेंगे। बाबूलाल यह बाते कर ही रहे थे कि कई चमारोने घासके बडे बडे गढे लाकर डाल दिये और चुपचाप चले गये। शर्माजी को आश्चर्य हुआ । इमी घामके लिये इनके वगलेपर रोज हाय हाय होती है और यहा किसीको खबर भी नहीं हुई। बोले, आपिर अपना विश्वास जमाने का कोई उपाय भी है ? बाबूलालने उत्तर दिया, आप स्वय बुद्धिमान हैं । श्राप हैं। उन्हें किसी कष्टमे देखकर उनकी मदद कीजिये ।' - नहीं होती, मरे रूपमें सूद अधिक मिल जाता है। गांवने दो भन्यो त्रियां और दो अनाथ लडकियां हैं, उनके निर्वाहका ९१ उपदेश कर दिया है, होता सब उन्हीं की कमाईसे है, पर नेरुनामी मेरी होती है। इतने में कई असामी आये और बोले, भैया, पोत ले लो। शर्माजीने सोचा, इसी लगानके लिये मेरे चपरासी सलिहा. नमें चारपाई डालकर सोते हैं और किसानोंको अनाजके ढेरके पास फटकने नहीं देते और वही लगान यहां इस तरह आपसे आप चला पाता है। वोले, यह सब तो तर ही हो सकता है जब जमींदार आप गावमे रहे। वाबूलालने उत्तर दिया, जी हा और क्या ? जमींदारके गांव- मे न रहनेसे इन किसानोको घडी हानि होती है। कारिन्दो और नौकरोंसे यह आशा करनी भूल है कि वह इनके साथ अच्छा वर्ताव करेंगे क्योंकि उनको तो अपना उल्लू सीधा करनेसे काम रहता है। जो किसान उनकी मुट्ठी गरम करते हैं उन्हें मालिकके सामने सीधा और जो कुछ नहीं देते उन्हें बदमाश और सरकश बतलाते हैं। किसानोंको वात-बातके लिये चूसते हैं, किसान चान बवाना चाहे तो उन्हें दे, दरवाजेपर एक खू टातक गाड़ना चाहे तो उन्हें पूजे, एक छप्पर उठानेके लिये दस रुपये जमीदार- को नजराना देतो दो रुपये मुशीजीको जलर ही देने होंगे। कारिंदे को घी दूध मुफ्त खिलावे, कहीं-कहीं तो गेहूँ चाचल तक मुफ्तमें हजम कर जाते हैं । जमींदार तो सिानोंको चूसते हैं, कारिंदे भी कम नहीं चूमते । जमींदार तीन पावके भावमें रुपयेफा सेरभर घी ले तो मुशीजीको अपने घर अपने साले बहनोइयोंके लिये अठारह छटक चाहिये। तनिक वनिक सी बातके लिये डांड़ ६ चढ़ी थाप घड़ी मनोरजनके लिये उनसे बातचीत करना सप्तसरोज ९२ और जुर्माना देते-देते किसानोंके नाकमे दम हो जाता है। आप जानते हैं इसीसे और कहीं ३०) की नौकरी छोडकर भी जमी- दारोंकी कारिन्दगिरी लोग ८), १०) में स्वीकार कर लेते हैं, क्योंकि ८), १०) का कारिन्दा सालमे ८००), १०००) ऊपरसे कमाता है । सेद तो यह है कि जमींदार लोगोंमें शिक्षाकी उन्नति- के साथ-साथ शहर में रहने की प्रथा दिनोंदिन बढती जा रही है। मालूम नहीं आगे चलकर इन बेचारोंकी क्या गति होगी ? शर्माजीको बाबूलालकी बाते विचारपूर्ण मालूम हुई । पर वह सुशिक्षित मनुष्य थे। किमी बातको चाहे वह कितनी ही यथार्थ क्यों न हो, बिना तर्कके ग्रहण नहीं कर सकते थे। चाबूलालको वह सामान्य बुद्धिका आदमी समझते आये थे। इम भावमे एकाएक परिवर्तन हो जाना असम्भव था। इतना ही नहीं इन बातोंका उल्टा प्रभाव यह हुआ कि वह वाबूलालसे चिढ गये । उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ कि बाबूलाल अपने सुप्रबन्धः के अभिमानमे मुझे तुच्छ समझता है, मुझे ज्ञान सिखानेकी चेष्टा करता है। सदैव दूसरोंको सद्ज्ञान सिखाने और सम्मान दिखाने का प्रयत्न किया हो वह बाबूलाल जैसे आदमीके सामने मुकाता अतएव जव वहांसे चले तो शर्मानीकी तर्कशक्ति वाचूलालकी बातोंको आलोचना कर रही थी। गांवमे क्योंकर रहूं ? क्या जीवनकी सारी अभिलापाओंपर पानी फेर द? गवारों के साथ बैठे बैठे गप्पे लड़ाया करू ? । , कैसे सिर ? 1 मैं
९३
उपदेश
सम्भव है, पर यह मेरे लिये असह्य है कि
वह
आठों
पहर
मेरे
सिरपर सवार रहे । मुझे तो उन्माद हो जाय। माना कि उनकी
रक्षा करना मेरा कर्तव्य है, पर यह कदापि नहीं हो सकता कि
उनके लिये मैं अपना जीवन नष्ट कर दू । बाबूलाल वन जानेकी
क्षमता मुममे नहीं है कि जिससे विचारे इस गावकी सीमासे
बाहर नहीं जा सकते । मुझे ससारमे बहुत काम करना है,
बहुत
नाम करना है। ग्राम्य जीवन मेरे लिये प्रतिकूल ही नहीं, बल्कि
प्राणघातक भी है।
यही सोचते हुए वह बगलेपर पहुचे तो क्या देखते हैं कि
कई कास्टेवल बंगलेके वरामदेमें लेटे हुए हैं। मुख्तार साहब
शर्माजीको देखते ही आगे बढकर बोले, हुजुर । बढे दारोगाजी
छोटे दारोगाजी के साथ आये हैं। मैंने उनके लिये पलग कमरेमें
ही पिछरा दिये हैं। ये लोग जब इधर आ जाते हैं तो यही
ठहरा करते हैं । देहातमे इनके योग्य स्थान और कहा हैं ? अव
मैं इनसे कैसे कहता कि कमरा खाली नहीं है। हुजूरका पलग
ऊपर बिछवा दिया है।
शर्माजी अपने अन्य देश हितचिन्तक भाइयोंकी भांति
पुलिसके घोर विरोधी थे। पुलिसवानों के अत्याचारों के कारण
उन्हे बढी घृणाकी ष्टि से देखते थे । उनका सिद्धान्त था कि यदि
पुलिसका आदमी प्याससे मर भी जाय तो उसे पानी न देना
चाहिये। अपने कारिन्देसे यह समाचार सुनते ही उनके शरीरमें
आग सी लग गयी। कारिन्देकी मोर लाल भासोंसे देखा और
लपककर कमरेकी ओर चले, कि येईमानोंका मोरिया
९४ ! । सप्तसरोज उठाके फेंक दें। वाह ! मेरा घर न हुआ कोई होटल हुआ पाकर डट गये । तेवर बदले हुए वरामदेमें जा पहुंचे कि इतनेमें छोटे दारोगा बाबू कोकिला सिंहने कमरेसे निकलकर पालागन किया और हाथ बढाकर बोले-अच्छी साइतसे चला था कि आपके दर्शन हो गये । श्राप मुझे भूल तो न गये होंगे ? यह महाशय दो साल पहले "मोसल सर्विस लीग के उत्साही सदस्य थे । इण्टरमिडियेट फेल हो जानेके बाद पुलिसमें दाखिल होगये थे। शर्माजी उन्हें देखते ही पहचान गये। क्रोध शान्त हो गया । मुस्कुरानेकी चेष्टा करके वोले, भूलना वडे आदमियोंका काम है । मैं तो आपको दूर हीसे पहचान गया था । कहिये, इमी थानमे है क्या ? कोकिला सिंह बोले, जी हा, आजकल यही हूँ। 'आइये, आपको दारोगाजीसे इन्ट्रोड्यूस (परिचित) करा दू । भीतर आराम कुरसीपर लेटे दारोगा जुल्फिकार अलीसा हुका पी रहे थे। बडे डोलडौलके मनुष्य थे। चेहरेसे रोप टप- कता था । शर्माजीको देखते ही उठकर हाथ मिलाया और बोले, जनाबसे नियाज हासिल करने का शौक मुद्दतसे था। आज खुशनसीबीसे मौका भी मिल गया। इस मुदाखिलत वेडाको मुआफ फरमाइयेगा। शर्माजीको आज मालूम हुआ कि पुलिसवालोको अशिष्ट कहना अन्याय है। हाथ मिलाकर बोले, यह आप क्या फरमाते हैं, यह तो श्रापका घर है। पर इसके साथ ही पुलिसपर आक्षेप करनेका ऐसा अच्छा अवसर हाथसे नहीं जाने देना चाहते थे । कोकिलासिंहसे बोले, .
आपने तो पिछले साल कालेज छोडा है लेकिन आपने नो
भी की तो पुलिसकी।
पडे दारोगाजी यह ललकार सुनकर सभल बैठे और वो
क्यों जनाय । क्या पुलिम ही सारे मुहकमोंसे गया-गुजरा है
ऐसा कौन सा सीगा है जहां रिश्वतका बाजार गर्म नहीं । अग
आप ऐसे एक सीगेका नाम बता दीजिये तो मैं ता उम्र आपक
गुलामी करू । मुलाजमत करके रिश्वत न लेना मुहाल है
तालीमके सीगेको बेलौस कहा जाता है मगर मुझको इमका खून
तजरवा हो चुका । अब मैं किसीके रास्तवाजीके दावेको तस्लीम
नही कर मस्ता और दूसरे सीगोंकी निस्वत तो मैं नही कह
सकता मगर पुलिसमें जो रिश्वत नहीं लेता उसे मैं
अहमक
समझता हूँ। मैंने दो एक दयानतदार सब इन्सपेक्टर देसे हैं पर
उन्हें हमेशा तबाह देसा । कभी मातूब, कभी मुअत्तल । कभी
वर्खास्त। चौकीदार और कास्टेवल वेचारे थोडी औकातके
आदमी हैं, उनका गुजारा क्योकर हो ? वही हमारे हाथ-पाव
हैं, उन्हींपर हमारी नेकनामीका दारमदार ।। जब वह खुद
भूसों मरेंगे, तन हमारी मदद क्या करेंगे ? जो लोग दाव बढ़ा-
कर लेते हैं , खुद साते हैं, दूमरोको खिलाते हैं, अफसरोंको
खुश रसते हैं, उनका शुमार कारगुजार नेकनाम आदमियोंमें
शेता है । मैंने तो यही प्रपना वसुल बना रखा है और खुदाका
शुक्र है कि अफसर और मावहत सभी खुश हैं।
शर्माजीने कहा-इसी वजह से तो मैंने ठाकुर साहबसे कहा
थिाक आप क्यों इस सीगेमे आये ?
. सप्तसरोज जुल्फिकार अलीखा गरम होकर बोले, आये तो मुहकमेपर कोई एहसान नहीं किया । किसी दूसरे सीगेमे होते तो अभीतक ठोकरें खाते होते, नहीं तो घोडेपर सवार नौशा बने धूमते हैं ।। मैं तो वात सच्ची कहता हूँ। चाहे किमीको अच्छी लगे या बुरी। इनसे पूछिये, हरामकी कमाई अकेले आजतक किसीको हजम हुई है ? यह नये लोग जो आते हैं उनकी यह आदत होती है कि जो कुछ मिले अकेले ही हजम कर ले। चुपके चुपके लेते हैं और थानेके अहलकार मुह ताक्ते रह जाते हैं । दुनियाकी निगाहमे ईमानदार बनना चाहते हैं पर खुदासे नहीं डरते । अरे, जब हम खुदा हीसे नहीं डरते तो आदमियों का क्या खौफ ? ईमानदार बनना हो दिलसे बनो। सचाईका स्वांग क्यो भरते हो? यह हज़रत छोटी-छोटी रकमोंपर गिरते हैं। मारे गरूर के. किमी आदमीसे राय तो लेते नहीं। जहा आसानीसे सौ रुपये मिल सकते हैं वहा पांच रुपयेमें बुलबुल हो जाते हैं । कहीं दूधवालेके दाम मार लिये, कहीं हजामके पैसे दवा लिये, कहीं वनियेसे निर्सके लिये भगड बैठे। यह अफसरी नहीं टुचापन है, गुनाह बेलबत, फायदा तो कुछ नहीं, बदनामी मुफ्त । मैं बडे-बडे शिकारोंपर निगाह रसता हू, यह पिदी और घटेर मातहतोंके लिये छोड देता हू । हलफसे कहता हूँ, गरज पुरी रौ है । रिश्वत देनेवालोंसे ज्यादा अहम अन्धे पादमी दुनिया न होगे । ऐसे कितने ही उल्लू आते हैं जो महज यह चाहते हैं कि मैं उसके किसी पट्टीदार या दुश्मनको दो-चार खोटी खरी सुना दू । कई ऐसे येईमान जमींदार आते हैं जो यह चाहते हैं कि , उपदेश वह असामियोंपर जुल्म करते रहे और पुलिस दखल न दे । इतने हीके लिये वह सैकडों रुपये मेरी नजर करते हैं और खुशामद घालूमें । ऐसे अक्लके दुश्मनोंपर रहम करना हिमाकत है। जिलेमें मेरे इस इलाकेको सोनेको खान कहते है। इसपर सबके दात रहते हैं। रोज एक-न-एक शिकार मिलता रहता है । प्रमींदार निरे जाहिल, लएठ, जरा-जरा सी वातपर फौजदारिया कर बैठते हैं। मैं तो खुदासे दुआ करता रहता हूँ कि यह हमेशा इसी जहालतके गढेमे पडे रहें। सुनता हूँ, कोई साहब आम- वालीमका सवाल पेश कर रहे हैं, उस भलेमानुसको न जाने यह क्या धुन है । शुक्र है कि हमारी भाली फहम सरकारने उसे ना. मजूर कर दिया। बस,इम सारे इलाक्मे एक यही आपका पट्टीदार अलबत्ता समझदार आदमी है। उसके यहां मेरी या और किसी- की दाल नहीं गलती और लुत्फ यह कि कोई उससे नाखुश नहीं। वस मीठी-मीठी बातोंसे मन भर देता है। अपने असामियों के लिये जान देनेको हाजिर और हलफसे कहता हूँ कि अगर मैं जमींदार होता तो इसी शख्सका तरीका अख्तियार करता । जमी- न्दारका फज है कि अपने असामियों को जुल्मसे पचाये । उनपर शिकारियोंका वार न होने दे। बेचारे गरीब किसानोंसे जानके तो सभी गाहक होते हैं और हलफसे कहता है, उनकी कमाई उनके काम नहीं आती। उनकी मेहनत का मजा हम लूटते हैं। यो वो जरूरतसे मजबूर होकर इन्सान क्या नहीं कर सम्वा, पर एक यह है कि इन बेचारोंकी हालत वाईरहमके शामिल है और जो सस्स नफे लिये सीना-सिपर दो सई उसके करस ७ २७ सप्तसरोज चूमने चाहिये । मगर मेरे लिये तो चद्दी आदमी सबसे अच्छा है जो शिरमें मेरी मदद करे। शर्माजीने इस वकवादको बड़े ध्यानसे सुना। वह रसिक मनुष्य थे। इसकी मामिस्तापर मुग्ध हो गये। महृदयता और कठोरताके ऐसे विचित्र मिश्रणसे उन्हें मनुष्यों के मनोभावोंका एक कौतूहल जनक परिचय प्राप्त हुआ। ऐमी वक्तृताका उत्तर देने की कोशिश करना व्यर्थ था। बोले- क्या कोई तहकीकात है या महज गश्त? दारोगाजी बोले, जी नहीं, महज गश्त । आजकल किसानोंके फमलके दिन हैं । यही जमाना हमारो फमलका भी है। शेरको भी तो मांदमें बैठे-बैठे शिकार नहीं मिलता। जगलमें घूमता है। हम भी शिकारकी तलाशमें हैं। किसीपर खुफिया फरोसीका इल- जाम लगाया, किसीको चोरीका माल खरीदनेके लिये पकडा, क्सिीको हमलहरामा झगडा उठाकर फांसा। अगर हमारे नसीवसे डाका पड गया तो हमारी पांचों अगुली घी में समझिये। डाकू तो नोच-खसोटकर भागते हैं। असली डाका हमारा पड़ता है। आस-पासके गांवों में झाडू फेर देते हैं। खुदासे शबोरोन दुआ किया करते है कि या परवरदिगार कहींसे रिजक भेज । झूठे सच्चे डाकेकी खबर आये। अगर देखा कि तकदीरपर शाकिर रहनेसे काम नहीं चलता तो तदवीरसे काम लेते हैं। जरासे इशारेकी जरूरत है, डाका पढ़ते क्या देर लगती है । आप मेरी साफगोईपर हैरान होते होंगे। अगर मैं अपने सारे हथकडे वयान करू तो आप यकीन न करेंगे और लुत्फ यह कि मेरा ।
१९ उपदे- शुमार जिलेके निहायत होशियार, कारगुजार, दयानतदार सब इन्सपेक्टरों में है। फर्जी डाके डलवाता हूँ। फर्जी मुल्जिम पक- डता हूं। मगर सजाए असली दिलवाता हूँ। शहादतें ऐसी गढाता हूँ कि कैसा ही वैरिस्टरका चचा क्यों न हो, उनमें गिरफ्तार नहीं कर सकता। इतनेमें शहरसे शर्माजीकी डाझ आ गयी । उठ सडे हुए और बोले, दारोगाजी, आपको वाते वडी मजेदार होती हैं। अब इजाजत दीजिये। डाझ आ गई है। जरा उसे देखना है। ७ चादनी रात थी। 'शर्माजी खुली छतपर लेटे हुए एक समा- चार पत्र पढ़ने में मग्न थे। अकस्मात कुछ शोर-गुल सुनकर नीचे- की तरफ झांका तो क्या देखते हैं कि गांवके चारो तरफसे फान्सटेबलोके साथ किसान चले आ रहे हैं ? बहुतसे आदमी खलिहानकी तरफसे बड़बड़ाते आते थे। बीच बीचमें सिपाहियों- की डांट-फटकार की आवाजे भी कानामे आती थीं। यह सब श्रादमी वगलेके सामने सहनमें बैठते जाते थे। कहीं-कहीं नियों का आर्तनाद भी सुनाई देता था । शर्मानी हैरान थे कि मामला क्या है। इतने में दारोगाजीकी भयकर गरज सुनाई पड़ी हम एक न मानेगे, सब लोगोंको थाने चलना होगा। फिर सन्नाटा हो गया। मालूम होता था कि आदमियों में काना फूसी हो रही है। बीच बीच मुख्तार साहय और सिपा. दियोंके हृदय विदारक शब्द आकाशी गूज उठते । फिर गेमा जान पड़ा कि किसीपर मार पड़ रही है। शर्माजीसे भय न रहा
सप्तसरोज
गया । वह सीढ़ियोंके.द्वारपर श्राये। कमरेमें झांककर देखा।
मेजपर रुपये गिने जा रहे थे । दारोगाजीने फर्माया, इतने बडे
गावमें मिर्फ यही?
मुख्तार साहबने उत्तर दिया, अभी घबराइये नहीं। अबकी
मुखियोंकी खबर ली जाय । रुपयोका ढेर लग जाता है।
यह कहकर मुख्तारने कई किसानोंको पुकारा, पर कोई न
वोला, तब दारोगाजीका गगन-भेदी नाद सुनाई दिया, यह लोग
सीधेसे न मानेगे । मुसियोंको पकड लो। हथकनिया भर दो।
एक एकको डामल भिजवाऊगा।
यह नादिरशाही हुक्म पाते ही कान्सटेबलोंका दल उन आ
दमियोंपर टूट पडा। ढोल-सी पिटने लगी। क्रन्दनम्वनिसे श्रा-
काश गूज उठा । शर्माजीका रक खौल रहा था। उन्होंने सदैव
न्याय और सत्यकी सेवा की थी। अन्याय और निर्दयताका यह
करुणात्मक अभिमान उनके लिये असह्य था।
अचानक किसीने रोकर कहा, दोहाई सरकारकी, मुख्तार
साहब हम लोगनका हक नाहक मरवाये डारत हैं।
शर्माजी क्रोधसे कांपते हुए धम-धम कोठेसे उतर पडे । यह
दृढ़ सकल्प कर लिया कि मुख्तार साहबको मारे हटरोंको गिरा
दू, पर जन-सेवामें मनोवेगोंके दघानेकी बडी प्रबल शक्ति होती
है। गस्ते हीमें सभल गये । मुख्तारको बुलाकर कहा,
मुन्शीजी,
आपने यह क्या गुलगपाड़ा मचा रखा है ?
मुख्तारने उत्तर दिया, हुजूर दारोगाजाने इन्हें एक डाकेकी
वहकीकातमें वलय किया है।
-
शर्माजी पोले, जी हां, इस तहकीकातका अर्थ में समझता हूँ | घण्टेभरसे इसका तमाशा देख रहा हूँ। तहकी हो चुकी या अभी कुछ कसर बाकी है ? मुख्तारन कहा, हुजूर, दारोगाजी जग्नें, मुझे क्या मतलन दारोगाजी बड़े चतुर पुरुप थे। मुख्तार साहबकी बातों उन्होंने समझा था कि शर्माजीका स्वभाव भी अन्य जमींदारों सदृश है। इसीलिये वह बेखटके थे, पर इस समय उन्हें अपनी भूल ज्ञात हुई। शर्माजीके तेवर देखे, नेत्रोंसे क्रोधाग्निकी ज्वाला निकल रही थी, शर्माजीकी शक्तिशालीनतासे भलीभांति परिचित थे । समीप पाकर बोले, आपके इस मुख्तारने मुझे बड़ा धोखा दिया, वरना मैं हलफसे कहता हूँ कि यहां यह आग न लगती। आप मेरे मित्र वावू कोकिला सिंहके मित्र हैं और इस नातेसे मैं आपको अपना मुरब्बी समझता हूँ, पर इस नामरदूद बद- माशने मुझे बडा चकमा दिया। मैं भी ऐसा अहमक था कि इसके चकरमे आ गया। मैं बहुत नादिम हू कि हिमाकतके बाइस जनाबको इतनी तकलीफ हुई। मैं आपसे मुआफीका सायल हूँ। मेरी एक दोस्ताना इल्तमाश यह है कि जितनी जल्दी मुमकिन हो इस शख्सको बस्तरफ कर दीजिये। यह आपकी रियासतको तबाह किये डालता है। अब मुझे भी इजाजत हो कि अपने मनहूस कदम यहाँसे ले जाऊँ। में हलफसे कहता हू कि मुझे आपको मुँह दिसाते शर्म आती है। यहाँ तो यह घटना हो रही थी, उधर याबूलाल अपने 1 सप्तसरोज १०२ चौपाल में बैठे हुए इनके सम्बन्धमे अपने कई असामियोंसे वात- चीत कर रहे थे। शिवदीनने कहा, भैया, आप जाके दारोगाजी- को काहे नाहीं समझावत हौ । राम राम । ऐमन अन्धेर । बाबूलाल-भाई, मैं दूसरेके बीचमे बोलनेवाला कौन ? शर्माजी तो वहीं है, वह आप ही बुद्धिमान हैं, जो उचित होगा करेंगे। यह आज कोई नई बात थोडे ही है। देखते तो हो कि आये दिन एक-न-एक उपद्रव मचा रहता है। मुख्तार साहबका इसमे भला होता है। शर्माजीसे में इस विषयमें इसलिये कुछ नहीं कहता कि शायद वे यह समझे कि मैं ईवश शिकायत कर रहा हूँ रामदासने कहा, शर्माजी हैं और नीचु कोठापर बेचारनपर मार परत है। देसा नाही जात है। जिनसे मुराद पाय जात हैं उनका छोडे देत हैं। मोका तो जान परत है कि ई तहकिकात सहकिकात सब रुपैयनके खातिर कीन जात है वाबूलाल-और काहेके लिये की जाती है। दारोगाजी तो ऐसे ही शिकार हुढा करते हैं लेकिन देख लेना शर्माजी अबकी मुख्तार साहबकी जरूर खबर लेगे । यह ऐसे वैसे आदमी नहीं हैं कि यह अन्धेर अपनी आखोसे देखें और मौन धारण कर लें ? हां, यह तो बताओ, अवकी कितनी ऊख बोई है ? रामदास-ऊस वोये ढेर रहे मुदा दुष्टनके मारे वचै पावै । तू मानत नहीं हो भैया पर पाखन देखी बात है कि कराह-क- कराह रस जर गवा और छटाको भर माल न परा। न जानी अस कौन मन्तर मार देत है। बाबूलाल-अच्छा, अवकी मेरे कहनेसे AM A
१०३
उपदेश
देखू ऐसा कौन वडा सिद्ध है जो कराहीका रस उडा देता है
जरूर इसमें कोई-न कोई बात है। इस गांवमें जितने कोल्हू
जमीनमें गडे पडे हैं उनसे विदित होता है कि पहले यहा ऊख
बहुत होती थी, किन्तु अब वेचारोंका मुँह भी मीठा नहीं होने
पाता।
शिवदीन-अरे भैया । हमरे होसमें ई सब कोल्हू चलत रहे
हैं। माध-पूसमे रातभर गावमे मेला लगा रहत रहा, पर जबसे
ई नासिनी विद्या फैली है तबसे कोऊका ऊसके नेरे जायेका
हियाव नाही परत है।
बाबूलाल-ईश्वर चाहेंगे तो फिर वैसी ही ऊख लगेगी।
अवकी मैं इस मन्त्रको उलट दूगा । भला यह तो बताओ अगर
ऊस लग जाय और माल पडे तो तुम्हारी पट्टीमें एक हजारका
गुड हो जायगा?
हरखूने हँसकर कहा भैया, कैसी बात कहत हो-हजार तो
पाच बीघामे मिल सक्त है । हमरे पट्टीमें २५ बीघासे कम अज
नहीं वा । कुछो न परै तौ अढाई हजार हूँ नहीं गये हैं।
बाबूलाल-तब तो आशा है कि कोई पचास रुपये वयाई में
मिल जायेंगे । यह रुपये गांवकी सफाईमें सर्च होंगे।
इतने में एक युवा मनुष्य दौड़ता हुआ आया और बोला,
भैया । यह तहकिकात देखे गइल रहीं। दरोगाजी समका
डाटत मारत रहे । देवी मुखिया बोला, मुख्तार साइय, हमका
पाहे काट डारो मुदा हम एक कौड़ी न देवै । धाना कपहरी जहाँ
कहो चलेके तैयार हुई । ई सुनके मुस्वार नाल गयेन । पार
भैया, सप्तसरोज १०२ चौपालमें बैठे हुए इन के सम्बन्धमे अपने कई असामियोंसे बात- चीत कर रहे थे । शिवदीनने कहा, आप जाके दारोगाजी- को काहे नाहीं समझावत हो। राम राम । ऐसन अन्धेर । बाबूलाल-भाई, मैं दूसरेके बीचमें बोलनेवाला कौन ? शर्माजी तो वहीं है, वह आप ही बुद्धिमान हैं, जो उचित होगा करेगे। यह आज कोई नई वात थोडे ही है। देखते तो हो कि आये दिन एक-न-एक उपद्रव मचा रहता है। मुख्तार साहबका इसमें भला होता है। शर्माजीसे मैं इस विषयमें इसलिये कुछ नहीं कहता कि शायद वे यह समझे कि मैं ईवश शिकायत कर रहा हूँ रामदासने कहा, शर्माजी हैं और नीचु कोठापर बेचारनपर मार परत है। देखा नाहीं जात है। जिनसे मुराद पाय जात हैं चनका छोडे देत हैं। मोका तो जान परत है कि ई तहकिकात सहकिकात सव रुपैयनके खातिर कीन जात है। बाबूलाल-और काहेके लिये की जाती है। दारोगाजी तो ऐसे ही शिकार हुढा करते हैं लेकिन देख लेना शर्माजी अबकी मुख्तार साहवकी जरूर खवर लेंगे। यह ऐसे वैसे आदमी नहीं है कि यह अन्धेर अपनी आसोसे देखें और मौन धारण कर लें ? हाँ, यह तो बताओ, अवकी कितनी ऊख बोई है ? रामदास-ऊख बोये ढेर रहे मुदा दुष्टनके मारे वचै पावै । तू मानत नहीं हो भैया पर अांखन देखी बात है कि कराह-क- फराह रस जर गया और छुटाको भर माल न परा। न जानी स फोन मन्तर मार देत है। बाबूलाल-अच्छा, अपकी मेरे कहनेसे यह हानि उठा लो।
पाता।
अवको मैं इस मन्त्रको उलट दूगा। भला यह तो बताओ अगर
नहीं बा । कुछो न परै तौ अढाई हजार कहूँ नहीं गये।
मिल जायेंगे। यह रुपये गांवकी सफाईमें सर्च होंगे।
इतनेमे एक युवा मनुष्य दोडता हुआ आया और घोला,
भैया। ऊह तहक्किात देसे गइल रहल। दरोगाजी सदा
डात मारत रहे। देवी मुखिया बोला, मुख्तार माइय,
कहोचलैके तैयार हुई । ईसुनके मुख्तार लाल छह गयेन।
उपदेश
देखू ऐसा कौन बडा सिद्ध है जो कराहीका रस उड़ा देता है
जरूर इसमें कोई न कोई बात है। इस गांवमें जितने कोल्हू
जमीनमें गडे पडे हैं उनसे विदित होता है कि पहले यहाँ ऊख
बहुत होती थी, किन्तु अब वेचारोंका मुँह भी मीठा नहीं होने
शिवदीन-अरे भैया हमरे होसमे ईसव कोल्हू चलत रहे
हैं। माघ-पुसमें रातभर गवमे मेला लगा रहत रहा, पर जबसे .
ई नासिनी विद्या फैली है तबसे कोऊका उसके नेरे जायेका
हियाव नाही परत है।
बाबूलाल-ईश्वर चाहेंगे तो फिर वैसी ही ऊस लगेगी।
उख लग जाय और माल पडे तो तुम्हारी पट्टीमें एक हजारका
गुड हो जायगा?
हरखूने हँसकर कहा भैया, कैसी बात कहत हो-हजार तो
पाच बीघामे मिल सक्त है । हमरे पट्टीमें २५ बीघासे कम
बाबुलाल-तब तो आशा है कि कोई
पचास रुपय ययाई
चाहे काट डारो मुदा हम एक कौड़ी न
देवे। थाना पहरी
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. २०५ उपदेश से कभी गांवकी यह दशा इस भयसे न कहता था कि शायद आप समझे कि मैं ईपके कारण ऐसा कहता हूँ । यहाँ यह कोई नयी बात नहीं है। आये दिन ऐसी ही घटनाए होती रहती हैं। और कुछ इसी गांवमे नहीं, जिस गावको देखिये, यही दशा है। इन सब आपत्तियोंका एकमात्र कारण यह है कि देहातोंमे कर्म- परायण, विद्वान और नीतिज्ञ मनुष्योंका अभाव है। शहरके सुशिक्षित जमींदार जिनसे उपकारकी बहुत कुछ आशा की जाती है, सारा काम कारिन्दोंपर छोड़ देते हैं। रहे देहातके जमींदार, सो निरक्षर भट्टाचार्य हैं। अगर कुछ थोडे-बहुत पढे भी हैं तो अच्छो सगति न मिलनेके कारण उनमें धुद्धि का विकास नहीं है। कानूनके थोडेसे दफे सुन-सुना लिये हैं, बस उसीकी रट लगाया करते हैं। मैं आपसे सत्य कहता हूँ, मुझे जरा भी सवर होती तो मैं आपको सचेत कर दिये होता। शर्माजी-खैर, यह बला तो टली, पर मैं देखता हूँ कि इस 'ढङ्गसे काम न चलेगा। अपने असामियोंको आज इस विपत्ति में देखकर मुझे बड़ा दुख हुमा । मेरा मन बार-बार मुझको इस सारी दुर्घटनाओंका उत्तरदाता ठहराता है। जिसकी कमाई गाता हूँ जिनकी बदौलत टमटमपर सवार होकर रईस मना घूमता हूँ, उनके कुछ स्वत्व भी तो मुझपर हैं। मुझे अब अपनी स्वार्धा- न्यता स्पष्ट दीस पड़ती है। मैं आप अपनी ही दृष्टिों गिर गया हूँ। मैं सारी जातिके उद्धारका बीड़ा उठाय हुए हैं, सारे भारत वपके लिये प्राण देता फिरता है, पर अपने घरको सबर दो नहीं। जिनकी रोटियो खाता हूँ उनकी तरफ हम तरह उदासान । LIF
सप्तसरोज
१०६
हू। अब इस दुरवस्थाको समूल नष्ट करना चाहता हूँ। इस
काममें मुझे आपकी सहायता और महानुभूतिकी जरूरत है।
मुझे अपना शिष्य बनाइये । मैं याचक भावसे आपके पास
आया हूँ | इस भारको सँभालने की शक्ति मुझमे नहीं। मेरी
शिक्षाने मुझे कितावोंका फिीडा बनाकर छोड़ दिया और मनके
मोदक. खाना सिसाया। मैं मनुष्य नहीं, किन्तु नियमोंका पोथा
हूं। आप मुझे मनुष्य बनाइये, मैं अब यहीं रहूँगा, पर आपको
भी यहीं रहना पड़ेगा। आपकी जो हानि होगी उसका भार
मुझपर है। मुझे सार्थक जीवनका पाठ पढ़ाइये । आपसे अच्छा
गुरु मुझे न मिलेगा। सम्भव है कि आपका अनुगामी बनकर
मैं अपना कर्तव्य पालन करने योग्य हो जाऊँ।
परीक्षा ७ जन रियासत देवगढक दीवान सरदार सुजानसिंह बूढ़े हुए वो परमात्मानी याद आयी। जाकर महाराजसे विनय की कि दीनबन्धु । दासने श्रीमान्की सेवा चालीस साल तक की, अब मेरी अवस्था भी ढल गई, राज-काज सभालनेकी शक्ति नहीं रही। कहीं भूल-चूक हो जाय तो बुढ़ापेमें दाग लगे। सारी जिन्दगीकी नेकनामी मिट्टीमें मिल जाय । राजा साहब अपने अनुभवशील, नीतिकुशल दीवानका वडा श्रादर करते थे। बहुत सममाया, लेकिन जब दीवान साहबने न माना तो हारकर उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। पर, शर्त यह लगा दी कि रियासतके लिये नया दीगन आप हीको सोजना , पडेगा। दूसरे दिन देशके प्रसिद्ध प्रसिद्ध पत्रों में यह विज्ञापन निकला कि देवगढ़के लिये एक सुयोग्य दीवानकी जरूरत है । जो सजन अपनेको इम पदके योग्य समझे वे वर्तमान दीवान सरदार सुजानसिंहकी सेवामे उपस्थित हों। यह जरूरी नहीं है कि वे प्रेजुएट हो, मगर हष्ट-पुष्ट होना आवश्यक है, मन्दामिक मरीज- -
सप्तसरोज
हू। अब इस दुरवस्थाको समूल नष्ट करना चाहता हूँ। इस
काममें मुझे आपकी सहायता और सहानुभूतिकी जरूरत है।
मुझे अपना शिष्य बनाइये । मैं याचक भावसे आपके पास
आया हूँ । इस भारको सँभालने की शक्ति मुझमें नहीं। मेरी
शिक्षाने मुझे कितावोंका कीडा बनाकर छोड़ दिया और मनके
मोदक, खाना सिखाया। मैं मनुष्य नहीं, किन्तु नियमोंका पोथा
हू। आप मुझे मनुष्य वनाइये, मैं अब यहीं रहूँगा, पर आपको
भी यहीं रहना पड़ेगा। आपकी जो हानि होगी उसका भार
मुझपर है। मुझे सार्थक जीवनका पाठ पढ़ाइये । आपसे अच्छा.
गुरु मुझे न मिलेगा। सम्भव है कि आपका अनुगामी बनकर
मैं अपना कर्तव्य पालन करने योग्य हो जाऊँ।
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রুটি ก जब रियासत देवगढके दीवान सरदार मुजानसिंह बूढे हुए तो परमात्माकी याद आयी। जाकर महाराजसे विनय की कि दीनबन्धु । दासने श्रीमानकी सेवा चालीस साल तक की, श्रव मेरी अवस्था भी ढल गई, राज-काज सभाजने की शक्ति नहीं रही। कहीं भूल-चूक हो जाय तो बुढ़ापेमें दाग लगे। सारी जिन्दगीकी नेकनामी मिट्टी में मिल जाय । राजा साहव अपने अनुभवशील, नीतिकुशल दीवानका बडा आदर करते थे। बहुत सममाया, लेकिन जन दीवान साहबने न माना तो हारकर उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। पर, शर्त यह लगा दी कि रियामतके लिये नया दीगन आप हीको सोना पडेगा। दूसरे दिन देशके प्रसिद्ध प्रमिद्ध पत्रोंमे यह विज्ञापन निकला कि देवगढ़ के लिये एक सुयोग्य दीवानकी जरूरत है । जो सान अपनेको इस पदके योग्य सममें वे वर्तमान दीवान सरदार सुजानसिंहकी सेवाम उपस्थित हों। यह जरूरी नहीं है कि मेजुएट हों, मगर हए-पुष्ट होना यावश्यक है, मन्दाग्निक मरीज-
सप्तसरोज
१०६
हू। अब इस दुरवस्थाको समूल नष्ट करना चाहता हूँ। इस
काममें मुझे आपकी सहायता और महानुभूतिकी जरूरत है।
मुझे अपना शिष्य बनाइये। मैं याचक भावसे आपके पास
आया हूँ। इस भारको सँभालने की शक्ति मुझमे नहीं। मेरी
शिक्षाने मुझे कितावोंका कीडा बनाकर छोड दिया और मनके.
मोदक. खाना सिखाया। में मनुष्य नहीं, किन्तु नियमोका पोथा
हू। आप मुझे मनुष्य बनाइये, मैं अब यहीं रहूँगा, पर आपको
भी यहीं रहना पडेगा। आपकी जो हानि होगी उसका भार
मुझपर है। मुझे सार्थक जीवनका पाठ पढ़ाइये । आपसे अच्छा
गुरु मुझे न मिलेगा। सम्भव है कि आपका अनुगामी बनकर
मैं अपना कर्तव्य पालन करने योग्य हो जाऊँ।
लगा दी कि रियासतके लिये नया दीगन आप हीको खोनना খো जन रियासत देवगढके दीवान सरदार सुजानसिंह बूढे हुए तो परमात्माकी याद आयी। जाकर महाराजसे विनय की कि दीनबन्धु दासने श्रीमान्की सेवा चालीस साल तक की, अर मेरी अवस्था भी ढल गई, राज-काज सभालने की शक्ति नहीं रही। कहीं भूल चूक हो जाय तो बुढ़ापेमें दाग लगे। सारी राजा साहब अपने अनुभवशील, नीतिकुशल दीवानका वडा आदर करते थे। बहुत सममाया, लेकिन जन दीवान साहबने न माना तो हारकर उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। पर,शते यह दूसरे दिन देशके प्रसिद्ध प्रसिद्ध पत्रों में यह विज्ञापन निकला अपनेको इम पदके योग्य सममें वे वर्चमान दीवान सुजानसिंहकी सेवामें उपस्थित हों। यह जरूरी नहीं है कि के ग्रेजुएट हों, मगर हष्ट-पुष्ट होना आवश्यक है, मन्दानिके मरीज- जिन्दगीकी नेकनामी मिट्टीमे मिल जाय । ? . पडेगा। सरदार
सप्तसरोज
हूं। अब इस दुरवस्थाको समूल नष्ट करना चाहता हूँ। इस
काममें मुझे आपकी सहायता और सहानुभूतिकी जरूरत है।
मुझे अपना शिष्य बनाइये । मैं याचक भावसे आपके पास
आया हूँ। इस भारको सँभालने की शक्ति मुझमे नहीं। मेरी
शिक्षाने मुझे किताबोंका फिीडा बनाकर छोड़ दिया और मनके
मोदक. खाना सिखाया। मैं मनुष्य नहीं, किन्तु नियमोसा पोथा
हू। आप मुझे मनुष्य बनाइये, मैं अब यहीं रहूंगा, पर आपको
भी यहीं रहना पडेगा। आपकी जो हानि होगी उसका भार
मुझपर है। मुझे सार्थक जीवनका पाठ पढ़ाइये । आपसे अच्छा
गुरु मुझे न मिलेगा। सम्भव है कि आपका अनुगामी बनकर
मैं कर्तव्य पालन करने योग्य हो जाऊँ।
अपना
?
रही। कहीं भूल चूक हो जाय तो बुढापेमें दाग लगे। सारी
राजा साहब अपने अनुभवशील, नीतिकुशल दीवानका वडा
आदर करते थे। बहुत सममाया, लेकिन जन दीवान साहबने न
लगा दी कि रियासतके लिये नया दीगन आप होको सोजना
दूसरे दिन देशके प्रसिद्ध प्रसिद्ध पत्रोंमें यह विज्ञापन निकला
परीक्षा
जन रियासत देवगढ़के दीवान सरदार सुजानसिंह बूढे हुए
तो परमात्माकी याद आयी। जाकर महाराजसे विनय की कि
दीनबन्धु ' दासने श्रीमान्की सेवा चालीस साल तक की, अब
मेरी अवस्था भी ढल गई, राज-काज सभालनेकी शक्ति नही
जिन्दगीकी नेकनामी मिट्टीमें मिल जाय ।
माना तो हारकर उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। पर, शर्त यह
कि देवगढ़ के लिये एक सुयोग्य दीवानकी जरूरत है । जो सजन
अपनेको इम पदके योग्य समझे वे वर्तमान दीवान सरदार
सुजानसिंहकी सेवामें उपस्थित हों। यह जरूरी नहीं है कि
प्रेजुएट हो, मगर हट-पुष्ट होना आवश्यक है, मन्दामिके
-
पडेगा।
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. सप्तसरोज १०८ को यहांतक कष्ट उठानेकी कोई जरूरत नहीं, एक महीने तक उम्मीदवारोंकी रहन सहन, आचार-विचारकी देस-भाल की जायगी, विद्याका कम, परन्तु कर्त्तव्यका अधिक विचार किया जायगा । जो महाशय इस परीक्षामें पूरे उतरेगेवे इस उच्च पदपर सुशोभित होंगे। २ इस विज्ञापनने सारे मुल्क में हलचल मचा दी। ऐसा ऊँचा पद और किसी प्रकारकी कैद नहीं ? केवल नसीमका खेल है। सैक्डों आदमी अपना-अपना भाग्य परखने के लिये चल खडे हुए । देवगढमें नये-नये और रग विरगके मनुष्य दिखाई देने लगे। प्रत्येक रेलगाडीसे उम्मीदवारोंका एक मेला सा उतरता । कोई पजाबसे चला आता था, कोई मद्राससे, कोई नये फैशनका प्रेमी, कोई पुरानी सादगीपर मिटा हुआ। पण्डितों और मौल- वियोंको भी अपने-अपने भाग्यकी परीक्षा करनेका अवसर मिला। वेचारे सनदके नामको रोया करते थे, यहां उसकी कोई जरूरत नहीं थी। रगीन एमामे, चोगे और नाना प्रकारके अङ्गारखे और कन्टोप देवगढमें अपनी सजधज दिसाने लगे। लेकिन सबसे विशेप सख्या प्रेजुएटोंकी थी, क्योंकि सनदकी कैद न होनेपर भी सनदसे परदा तो ढका रहता है। सरदार सुजानसिंहने इन महानुभावोंके आदर-सत्कारका बडा अच्छा प्रवन्ध कर दिया था। लोग अपने-अपने कामरोंमें बैठे हुए रोजेदार मुसल्मानों की तरह महीने के दिन गिना करते थे। हरएक मनुष्य अपने जीवनको थपनी बुद्धि के अनुसार अच्छे रूपमें
परीक्षा
दिखाने की कोशिश करता था। मिस्टर "अ" नौ बजे दिनतक
सोया करते थे, आजकल वे वगीचे में टहलते हुए अपाका दर्शन
करते थे। मि० "व" को हुफा पोनेकी लत थी, पर आजकल
बहुत राव गये किवाड़ बन्द करके अन्धेरेमे सिगार पीते थे।
मिस्टर "--"स" और "ज से उनके घरोंपर नौकरोंकी नाक
में
दम था, लेकिन ये सजन आजकल "आप और जनाब" के
वगैर नौकरोंसे बात चीत नहीं करते थे। महाशय "क" नास्तिक
थे, हक्सलेके उपासक, मगर आजकल उनकी धर्मनिष्ठा देखकर
मन्दिरके पूजारीको पदच्युत हो जाने की शहा लगी रहती थी।
मिस्टर "न" को कितावोंसे घृणा थी परन्तु आजकल वे बडे बडे
अन्य देखनेमें पढ़ने में इबे रहते थे । जिससे बात कीजिये, वह
नम्रता और सदाचारका देवता बना मालूम देता था। शर्माजी
घड़ी रातसे ही वेद मन्त्र पढ़ने लगते थे और मौलवी साहवको
वो नमाज और तलावत के सिवा और कोई काम न था। लोग
मममते थे कि एक महीनेका मझट है, किसी तरह काट लें, कहीं
कार्य सिद्ध हो गया तो कौन पूछता है।
लेकिन मनुष्योंका वह बूढ़ा जौहरी आड़में बैठा हुआ देस
रहा था कि इन वगुलोंमे हस कहां छिपा हुआ है ?
३
एक दिन नये फैशनवालोंको सुमी कि आपसमें "हाकी" का
सेल हो जाय । यह प्रस्ताव कोके मजे हुए खिलाडियोंने पेश
किया । यह भी तो आखिर एक विद्या है। इसे क्यों छिपा रखें।
सभव है, कुछ हाथोंकी सफाई ही काम कर जाय। चलिये
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