Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Mithak Darshan Ka Vikash

Dr. Virendra Singh · 2011/03

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मिथक दर्शन का विकास डॉ.वीरेन्द्र सिंह स्मृति प्रकाशन १२४,शहराराबाग, इलाहाबाद-

लेखक
मूल्य सजिल्द पचीस रुपये
अजिल्द पद्रह रुपये
सस्करण प्रथम,
१६८४ ई.
प्रकाशन
स्मृति प्रकाशन
१२४, शहारा वाग
इलाहाबाद-२११००३
मुद्रव
स्टार प्रिटस
२८७, दरियाबाट
इलाहाबाद-३
(MITHAK DARSHAN KA VIKAS )

समर्पण
पिता तुल्य
जगदीश मामा
जिनके स्नेहिल सरक्षण में
मेने शिक्षा एव ज्ञान
अजित किया।

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प्राक्कथन डॉ. वीरेद्र सिंह को मैं मन बहुत स्नेह करता है । डा० सिंह हि दी के सुपरिचित विद्वान हैं । इनकी पई उच्च स्तरीय पुस्तकें प्रकाशित हो चुका है। विद्वानो ने उनकी प्रशसा की है। इनकी कुछ महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं-~हिदी कविता में प्रतीकवाद का विकास, प्रतीक दर्शन, विज्ञान दशन जादि । इनमे लेखक का दर्शन के प्रति आग्रह यह सक्त करता है कि इह तत्व मथन म विशेष रुचि है । इसके लिए तत्व मथन करते हुए गहरी से गहरी पैठ करनी पडती है, यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है । मैं इनसे अवस्था में तो बडा हूँ किन्तु अपने यहा जैसा माना जाता है विज्ञान वृद्ध को विशेष जादर प्रदान किया जाता है । मत मैं यहा पर निसकोच कहना चाहूंगा कि जिन विषया पर डॉ. वीरेद्र सिंह ने लिखा है, उन विषयो से मेरी दृष्टि से ये वयावृद्ध हैं। इसके साथ ही मैं इनकी लगन और साहित्यिक निष्ठा को और भी अधिक महत्वपूर्ण मानता है क्योकि ये जिस समय से राजस्थान विश्व- विद्यालय मे प्रवक्ता के पद पर आरूट हुए हैं, तब से ये निरन्तर साहित्य सेवा के व्रत के व्रती रहे हैं और 'सदर्भ' जैसी सस्था को चलाने मे भी इहाने विसी भी प्रकार का शैथिल्य नहीं दिखाया। इससे ज्ञान-विज्ञान के प्रेमिया का एक अच्छा समूह इनके साथ इस साहित्य और नान-विज्ञान के क्षेत्र मे जुटे हुए है। मरी दृष्टि मे यह बहुत महत्वपूर्ण कार्य है। यहा डॉ० वीरद्र सिंह जी का प्रशस्ति लिखन नही वेठा हूँ। मुझे ता उहाने अपनी नयी कृति 'मिथक् दर्शन' पर प्राक्कथन (फारवर्ड) लिखने का आदेश दिया है । यह प्राक्कथन लिखने से पूर्व मेरे लिए यह आवश्यक हो गया है कि इनका जा वैशिष्ट्य है उसकी ओर पाठर का ध्यान आकर्षित कर सक, क्याकि यह आवषण उनके कृतित्व की नाहकता के लिए मेरी दृष्टि म प्रथम सापान है। जव इनको प्रस्तुत पुस्तव है-'मिथक दशन या विसास ऐसी मिथक र्शन विषयक पुस्तक में सबसे पहला प्रयास लेखक और विचारक का यही होगा कि वह मिथक की परिभाषा देन का प्रयता कर। यद्यपि डा० वीरेन्द्र सिंह जी यह मानते हैं कि किमी को परिभाषा देना पूरी तरह सम्भव नहीं है।

फिर भी, वस्तु पो समझाने के लिए कुछ न कुछ तो परना ही होता है, ऐसा ही प्रयत्ल इस कृति में भी दिया गया है। लेखक ने एक प्रकार से मिथर और मिथ मे कोई अन्तर नहीं किया और यह स्वाभाविक ही है कि आरम्भ में इतना ध्यान मिय पर नहीं गया जितना मिय पर । मिथ पर हमने भी जो लिखा है, उसे इस प्रसग मे यहाँ उद्धृत करना समीचीन प्रतीत होता है। 'लोक्वार्ता की पगडण्डिया' से हम यहाँ उधरण दे रहे हैं- 'रेने वालेक और आस्टिन वारेन ने' थ्योरी ऑफ लिटरेचर' मे बताया है कि 'मिथ' जो कि आधुनिर आलोचना का एक प्रिय शब्द है, अर्थ के एक महत्वपूर्ण क्षेत्र की आर समेत करता है और उसी पर छाया रहता है। अर्थ का यह महत्वपूर्ण क्षेत्र धर्म (Religion) लोक्वार्ता, नृतत्व समाज शास्त्र मनो विश्लेषण तथा ललित क्लाआ द्वारा समान रूपेण उपयोग में आता है। प्रतीकवाद को एक परिभाषा देने का प्रयास करते हुए विलियम के० विमसैट तथा क्लैण्टन बुक्स अपने ग्रथ "लिटरेरी क्रिटिसिज्म ए शार्ट हिस्ट्री' मे लिखते है- Whether a real school of symbolism ever existed, remains a problem of speculation, Each poet developed and represented a single aspect of an aesthetic dectrine that was perheps too vast for one historical group to incorporate But more than on any other article of belief, the symbolist, united with Mallarme in his statements about poetic language The theory of the suggestiveness of words comes from a belief that a primitive language, half forgotten, half living, exists in each man It is a language possessing extra ordinary affinities with music and dreams (Mallarme p 26) इसमे आये (Primitive language, half forgotten, half living) पर विशेष चर्चा करते हुए लिखते है कि मल्ला ने जब ये शब्द लिखे थे तब से अब तक आधुनिक अर्थात् हमारे समय तक (prelogical and primitive mund) या आदिम मानस म जो रुचि नृतत्व अथवा गूढ-मनोविज्ञान (depth psychology) मे सद्धित हुई है उसने ही मिथ को विशेष महत्व प्रदान कर दिया है, आज के युग मे क्याकि मिथ को ही (a primitive language, hall forgotten, half living) के रूप मे स्वीकार किया जाता है।

अरस्तू म मिय वा अर्थ है यया या पानी (A Narration, story, 1 fable) चिन्नु "मिय' यो जो मह्त्य धर्मों और भाषाआ मे मिला हुआ है उगसे इमम अर्थ-वैविध्य और महान अर्थ क्षमता की सम्भावनाये सिद्ध हाती हैं। पनत मिष पहानी ये एप म ता है, पर उमम प्रतीकात्माना भी है और उसका सम्बध एर छार पर लार मानसरे आदिम स्तर से जुड़ा हुआ है। अत मिथ या कहानी स्पय आदिम भापा एक रूप है मिम मितन ही बिम्ब प्रतीरा के रूप शब्द हैं । मिय के पिता ही पर्यायवासी बताये जाते हैं-~~डा० एल० पी० विद्यार्थी ने बताया है कि श्रीमती डी० एन० भागवत 1 जपनी पुस्तक 'नि आउट लाइन आफ इण्डियन फाक्लार' (१९५८) म पुराण कथा शन्द को अस्वीकार करखे दैवत यथा नाम स्वीकार किया है। पुराण पथा या पयाय के रूप म अपना महत्व है और इसी वा पुराख्यान भी यहा गया है। 'पुरा' शब्द की अर्थवत्ता पुरातत्व के उपसर्ग 'पुरा' से ग्रहण की जाय तो यह एक अलग ही महत्व ग्रहण कर लेगा। किन्तु हम 'मिथ और 'मिथक' के पयायवाची हिन्दी शब्द ढढने की आवश्यकता नहीं है क्यापि आज मिथ और मिथक को अपने इसी रूप म स्वीकार किया जा चुका है । यह यात डॉ. वीरेद्र सिंह जी के इस प्रय के नाम और उसमे आयी चचा से भी सिद्ध होती है। तात्पय यह है कि मिथ और मिथक के जहाँ अनक रूप हैं, उन सब पर विगद चर्चा डा० सिंह ने अपनी पुस्तक म पी है जा अत्यत अभिनदनीय मानी जा सकती है। यद्यपि मैं मिथ और मिथक को पर्यायवाची नही मानता क्यापि मिथक यदि शब्द व प्प में देखा जाय तो इसकी अलग सत्ता दिखायी पडती है और दमका सामाय अर्थ होगा मिथ से सम्बधित जथवा मिथ के तत्वा से युक्त जैसे आचाय हजारी प्रसाद द्विवेदी की 'वाण भट्ट की आत्म कथा' शीपर उपयाम म 'बाराह की मूर्ति' के आख्यान का मिथक' कहा जा सकता है। वाराह पृथ्वी के उद्धारक्ता के रूप म पुराणा नौर पुराणाख्यानो अथवा दैवत कथाना मे आया है इसीलिए यह मिथ अश हुए और उनकी अथवत्ता के एक स्वरूप का ग्रहण करते हुए मूर्ति रूप प्रतिष्ठापित होकर एक विशेप अथ सदभ म ये मिथक हो गये है। केवल मिथ नही रहे। जो भी हो, डा० सिंह की तरह मिथ और मिथक को पर्यायवाची मान भी लिया जाय तब उहान जिस रूप में इनका जपने इस ग्रथ म प्रस्तुत किया है उस रूप म चित्र मिथ और मिथक वे पारस्परिक अतर का झगडा खडा क्येि बहुत ही दार्शनिक रूप म इनके स्वरूप पर प्रकाश डाला गवा है।

यही कारण है कि जब इग ग्रथ या पहना पाटर आरम्भ मरता है तो वह मिथ और मिथव की समस्त अर्थवता के विविध रूपो के स्थल से चलकर गहरे अर्थों तक पहुँच जाता है। वास्तविक समस्या यह है कि मिथ और मिया या प्रयाग जिस रूप म आज हमारे यहा हाता है उस रूप को ही समझने के लिए इतनी विशद् पैठ की आवश्यक्ता है। क्यापि आधुनिक साहित्यकार जब मिथ और मिथर का अपनी कृतिया म प्रयाग परन हैं ता इसलिए करत हैं जो अर्थ सामा यत बिसी शब्द सगठन से नही मिन वे अथ एव मिथ और मिथक में प्रयोग से प्राप्त हो जाय । केवल वही अर्थ नही जो सामायत प्रयुक्त मिथ या मिथक से पलक्ता है वरन् वह सभी अथ भी जो कि उस झलक्ते अर्थ स्वरूप से भी ऊपर ध्वनित होता है और इसका समझने के लिए जिस दशन की आवश्यक्ता है वह डॉ० वीरेद्र सिंह जी की इस पुस्तक मे विद्यमान है । मेरा विचार है कि मैंने लाक- वाता म अर्थ तक पहुंचन के लिए जो अभिधा, लक्षणा, ध्यजना के अतिरिक्त कुछ अय शक्तिया की आवश्यकता बतायी थी और उन शक्तिया पर विस्तृत चर्चा भी की थी, उसे मिथ के सम्बध में भी स्वीकार किया जा सकता है। इसको स्पष्ट करने के लिए मे 'लोक्वार्ता की पगडण्डिया मे से कुछ अश यहाँ उद्धृत करना समीचीन समयता है- भाषा के अध्ययन की तीन प्रणालिया मानी जा सकती है यथा तुलनात्मक (Comparative) ऐतिहासिक (Histortcal) तथा विवरणात्मक ये तीनो ही प्रणालियां लोक्वार्ता के लिए अपक्षित हैं किन्तु भाषा विज्ञाा को वैखरी तक ही अपनी सीमा रखनी पडती है किन्तु लोक्वार्ता को पश्यती और ऊपर तक पहुँचना पडता है। लाक्वार्ता मानव को अभिव्यक्ति मे पद से नही पदार्थ पति पदगत अथ से भी सम्बधित है। लोववार्ता पद निर्णायन तत्व के अर्थ भाषागत अर्थ को भांति अभिधा, लक्षण व्यजा शक्ति से ही प्रकट नहीं होते अपितु इनके अर्थ के लिए इनके अतिरित गुछ अन्य शक्तियों को भी यावश्यक्ता होती है । इहे हम ये नाम दे सात है-- (१) सन्दभभिधा अथवा सस्कारार्थ । (२) सम्बोधि अथवा तुलनापूर्वक प्राप्त भेद मे अभेद सत्व विषयक बोध । (३) बाधन मात्रा सम्बोधि का प्राप्त अर्थ या महत्व को परम्परा प्राप्त अशगत अर्थ मूल स्थापित (Archetype)। (४) बोधम मात्रा बोधतनमाषा को मूल मानसगत तात्विक्ता ।

(५) अक्षराव यतास्या-बोधम मात्रा से प्राप्त अथ का सम्बध मानव मात्र वी अद्वैत स्थिति से है और उससे प्राप्त भय या सार्थक्तादायक शनि । प्रथम तीन का पश्यति और मध्यमा से सम्बध माना जा सकता है और अतिम दो का सम्बध पुरावाणी के समकक्ष तत्व से है । ऊपर के उद्धरण मे पुरावाणी का उल्लेख किया गया इसका सम्बध जितना लोक्वार्ता से है उतना ही मिथ से है क्याकि मिथ का भी सम्बध लोकवार्ता से जुड़ा हुआ है और इस सम्बध का मनोतात्विक अर्थ भुग के सामूहिक अवचेतना से भी प्राय ठीक वैठ जाता है। यह इसलिए कुछ कम आश्चय की बात नही है कि डॉ० वीरेद्र सिंह ने इस पुस्तक में इस समस्त अर्थवत्ता का प्रक्ट करने के लिए इन समस्त तत्रा को पूण प्रासगिवता के साथ-साथ चर्चा में सम्मिलित किया है। इसी को बताने के लिए उनके इस प्रथ से एक उद्धरण देना आवश्यक प्रतीत होता है। इस उद्धरण से डा. वीरद्र सिंह जी की मिथक विषयक अर्थ बाध का वह समग्र रूप हमारे सामने आ जाता है जिसका उद्घाटन उहाने इस पथ मे किया है जो उनके मनस्लाक को ‘एक सूत्रता' प्रदान करते हैं। डा. सिंह की मा यता है-दूसरे शब्दो मे मिथक चेतना में स्वप्न और यथार्थ विचार और कल्पना का वास्तविक्ता आर फैटेसी का तथा शिव और अशिव का एक ऐसा 'घोल' प्राप्त होता है जिसे कदाचित् अलग करके देखा मही जा सकता है। यही कारण है कि मिथ का अर्थ प्रत्यक्ष न होकर परोक्ष है, वह अनेक प्रकट के बिम्बो और प्रतीका से आच्छादित करता है, अत मिथ के तात्विक अर्थ को स्पप्ट करने के लिए इन रूपाकारो (पिम्बा और प्रतीको) को सही परिप्रेक्ष्य में विवेचित करना आवश्यक है। यह काय दाशनिक एव तत्ववेत्ता का है कि वह इस परोक्ष अर्थ को उद्घाटित करे, और यह परोक्ष अर्थ या व्यापक अर्थ एक समग्र एव समष्टि दृष्टि के द्वारा ही सम्भव है।' इसी उद्धरण से यह भी प्रकट होता है कि लेखक मिथ या मिथक के दर्शन को क्या आवश्यक समक्षता है। वस्तुत मिथक विषय के समस्त तत्र को स्पष्ट करने के बाद भी उसके गहराई बैठने की आवश्यक्ता प्रतीत हाती है। विना गहराई में बैठे हुए मिथक का पूण स्वरूप स्पष्ट नहीं हो सकता। यह तो यथार्थ है कि लेखक ने मिथर के समग्न स्वरूप को उनके प्रकारो का स्पष्ट करते हुए भी गहराई म पैठकर मिथक की तात्विक्ता को भी उद्- धादित किया है किन्त इसम भी कोई सदेह नदी कि मिशको भलो mms का, ( १०) समझने और समझाने के लिए डॉ० वीरेद्र सिंह जी ने श्लाघ्य प्रयत्न किया है और उसकी दाशनिक व्याख्या करने और गहरी पैठ करने में भी अपनी क्षमता को भी भली प्रकार प्रदर्शित किया है। फिर भी यह सत्य है रि इस विषय पर वे अभी और बहुत कुछ लिय सपत थ । वस्तुत यह प्रथ ता मिथर विषयक उनके दाशनिर चितन को एक भूमिका मान ही है। हाँ यह अवश्य है कि यह भूमिका मात्र भी विषय का उद्घाटन करने मे पूरी तरह समर्थ है। मैं समझता हूं कि इस पुस्तक वा अध्ययन परन और मनन करने के बाद हिदा पाटक एक कृतार्थता का अनुभव करेंगे क्यापि इमो द्वारा वे शब्द और अर्थ के भाषा वैनानिक स्तर से उठकर उस प्रभा मण्डल के पार भी झांक सकेंगे जिस प्रभा मण्डल मे बिम्ब प्रतीक आदि अर्थ उपादाना से भी ऊपर ध्वनित अर्थ के साथ मानव के लाक मानस से सयुक्त मूलस्थपिता की प्रक्रिया के माध्यम से टेबू (वर्जन) टाटम (तत्वम) की छायाआ मे से जाते हुए उस प्रकाश तक पहुँच सकेंगे जिससे मिथ का रहस्य क्सिी सीमा तक पुल सकेगा और उसको आवृत करने वाले दैवी और पाव ता के आवरण के कारण भी स्पष्ट हो सकेगा। तात्पय यह है कि इस छाटी-सी पुस्तक म गागर म सागर की तरह लेखक न वह सब भर दिया है जिससे मिथ या मिथक की अर्थवत्ता के विविध पहलू समझे जा रखते हैं और इस अर्थवत्ता के साथ जुटे हुए विविध स्तर और प्रकार तथा उनके उद्भव, विकास, प्रचार और प्रमाद आदि सभी पक्षा पर प्रकाश इसमें डाला गया है। मिथ या मिथक से सम्बधित कितने ही विवाद जब तव उठे हैं, उन सभी का विद्वान लेखा न किसी न किसी प्रकार से जोर क्सिी न किमी रूप मे समाधान प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया है । अत मेरी दृष्टि म आज की साहित्य सृष्टि में जहा तहा गुम्पित मिथका के कारण अथ ग्रहण म जो वाधाएं उत्पन हो जाती है, उन सबका रहस्य खोलने की काई न कोई कुजी इस पुस्तक मे पाठक का उपलब्ध हो सकती है । क्योकि इसम मिथक के सम्यक दर्शन को प्रस्तुत करने का सम्यक् प्रयत्न किया है इसलिए महाकाव्य काल स आज तक जो सृजन काव्य और साहित्य का पनपा है, उनम जिन चीजा से मिथक अपना रूप ग्रहण करता ह, उन सबकी भाषा विषयक्, मनोविज्ञान विषयक मनामूल मूलस्थपित (मार्कीटाइप) जैस तत्वा से मिथक् का जा महत्व मिलता है, उस पर भी कुछ न कुछ प्रकाश इसम लेखक ने डाला है । इस दृष्टि से मैं इस पुस्तक का उपयागी मानता हूँ और मैं समझता हूँ दि पाठक को भी यह उपयागी प्रतीत होगी। पुन –स्व० डा. सत्येद्र न मृत्यु के कुछ दिन पूर्व अपना यह अन्तिम आलेख इस पुस्तक के लिए लिखा था। अत इस जालख का महत्व मेरे लिए तो सदा ही रहेगा, पर हिदी जगत के लिए भी इसका महत्व होना चाहिए । -डॉ० सत्येद्र लेखकीय जब कोई भी लेयर पिसी विषय का निर्वाचा बरता है, उस समय उसके सामने दो प्रमुख तत्व होते हैं जिनके आधार पर यह किसी निर्णय तर पहुँचता है । एव तत्व जा सबसे महत्वपूर्ण है कि उस विषय पर क्तिना कुछ लिया गया है अथवा व्यवस्थित रूप से उस पर पितना चिन्तन हुआ है ? यदि इस दिशा में पम लिखा गया है या नहीं लिखा गया है, तो लेखा उस ओर अग्रसर होता है। दूसरा तत्व यह है कि उस विषय-विशेष पर लघक क्या कुछ नया जोड सकता है जो ज्ञान और चिन्तन की गतिशीलता का आगे बढा सके। दूसरे शब्दो में हमारे 'सोच' का व्यापप बना सबै - विषय के नकारात्मक और सकारात्मक दाना पक्षो तटस्थ विश्लेषण कर, हमारे चिन्तन को एक मुक्त एव तटस्थ परिप्रेक्ष्य प्रदान कर सके। उपर्युक तत्वो को ध्यान मे रखकर मैंने "मिथक-दर्शन' पर कुछ व्यवस्थित रूप से लिखने का प्रयास मात्र किता है जो निश्चित रूप से अन्तिम नहीं है। हिन्दी के सन्दर्भ में यह कहा जा सकता है कि अभी तक मिथव' पर जो कुछ भी लिखा गया, वह या तो उसके मनोवैज्ञानिव पक्ष का लवर या सामाजिक अथवा भाषिक सन्दर्भो को लेकर, लिखा गया है । जो मिथक विवेचना के एक या दो पक्षो से अधिक सम्बंधित रहा है। एक वर्ग वह है जो मिथक से साहित्यिक रूपान्तरण को वैचारिक युग बोध तथा वैचारिक सदी के प्रकाश मे विवेचित एव रेखाक्ति करता है । इस दृष्टि से डॉ० रमेश तल मघ, डॉ. शम्भुसिंह, डॉ. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय, इद्रनाथ चौधुरी, नगेद्र तथा डॉ. सत्येन्द्र आदि का नाम लिया जा सकता है जिन्होंने मिथक को एक या दो दृष्टियों से ही विवेचित क्यिा है, उसका सर्वाङ्गीण एव ऐतिहासिक सास्कृतिक विवेचन एव विश्लेषण नहीं किया है शम्भुसिंह तथा इद्रनाथ चौधुरी ने यदा- पदा आधुनिक मिथका को रचना-प्रक्रिया पर विचार अवश्य किया है, पर वह भी साकेतिक रूप मे। इस विहगम दृष्टि के प्रकाश मे मैंने यह पाया है कि मियक का एक ऐतिहासिक और सास्कृतिक विवेचन अपेक्षित है जो समग्न रूप से मिथक दर्शन के व्यापक क्षेत्र का रेखावित कर सके। यही कारण है कि मैंन मिथक विवेचन के स्थान पर मियक-दर्शन का प्रयोग किया है क्योकि 'दर्शन' शब्द के द्वारा किसी भी वस्तु का एक वैचारिक ( १ ) , गतिमील ही गमावा', TT TI TIT गगन नागिन उमर पर सागो था। मन मियर में गौ ताचि गया ही रेयोक्ति परो वा प्रयरा पिया है, इंगे ग्यापार मरत ए frग पर पियार भी ता साताजा पा गो गनिशानाप लिए एए आमश्या सत्य है। एप सेवा और पार निरा यह मा भय उसी गामा - शीलता के लिए अपरित है जो रा*य उरा आम गिरीगण एव गातरणमा ओर से जाती है, यमिह उसे पूयाग्रह म स्वीर पर। मिथप, मातृतिर प्रक्रिया का एप अमित अग है और साय ही मानव ये ऐतिहासिप विनास-प्रम का, उगरी मागिर विकारागाना को सापेक्षता म रेयारित करता है । इस दृपि स, मी आदिम या प्राची मिपापा विवचन विकास प्रम पी मापता म गगार पिया है मौर आर मियको पी रचना-प्रनिया या उसमे एा मामिा स्तर पर गाडा या प्रयास रिया है। यह सम्भावित है कि इस दुम्म्ह बार म गियर या परम्परित अर्थ यति हुआ हा क्यापि मैं यह मानता हूँ Fि किसी भी श और प्रत्यम या भय एर नहीं रहता है यह भी पान और रावदना में पिसारा से साय विपशित हाता है एप एव नयी अर्थ-छवियाँ ग्रहण पर सेता है। परन्तु इसका यह अर्थ नही यि पारम्परिक अथ पूर्णतया विलुप्त हा जाता है । पर उसका स्पा शेष रहता है जो उस शट या प्रत्यय-विशेष यो परम्परा स जार्ड भी रयता है । अत मिथक स्वम्प-विवेचन में यह तथ्य ध्यान म रखा गया है और इसी क्रम में उसके ऐतिहासिक और सास्कृतिक विकास-प्रम का प्रस्तुत किया गया है। यह विकास क्रम, एक व्यापक सन्दर्भ मे, मियय या एक शानात्मक प्रक्रिया का मग बनाता है जा मानव को 'विचारणा स भी सम्बधित है। यह वह स्थिति है जहां मिया और भाषा प्रतीका का एक सापक्ष सम्बध है । मिथकाय सजन और उससे सम्बंधित पान का स्वरूप एक एसी 'भाषा' का सजन करता है जो मिथकीय अभिप्राया और सवल्पनाओ का 'स्पार दे सके जो वस्तु और भाव-सवेदना का एकीभूत सस्कार कर सके । मैंने भाषिक रूपापारा को इसी अर्थ म ग्रहण किया है और उ ह मिथकीय सफ्ल्पनालों और अभिप्रायो का वाहक माना है निराका एक अपना एतिहासिक एव सास्कृतिक बम है। यह ता भरी बात हुई, पर क्सिी भी वृति या ग्रथ का असली मूल्याक्न पाठक एव आलाचा वग ही करता है, जो तटस्थ भाव से उसके नकारात्मक और सकारात्मक पक्षो का उद्घाटन करता है। मैं इस 'उद्घाटन' को । १३ ) आवश्यक समझता हूँ क्यानि इसके द्वारा लेखक अपने या विकसित करता है। पूज्य डॉ० सत्येद्र ने पुस्तक का प्रायस्थन लिखकर मुये इसी 'विवास' की ओर गतिशील किया है। उनके स्नेह और प्रारसाहन के लिए मैं सदा आभारी रहूंगा यह सब शायद नहीं ही होना, यदि स्मृति प्रवाशन से सचालन श्री बालकृष्ण त्रिपाठी मेरे श्रम फो साकार करने में सहायक न हाते क्यापि तापी 'दृष्टि' का ही यह परिचय है जिन्होंने पुस्तव की उपादेयता का समझ कर उसे प्रकाशित किया । अन्त मे डॉ. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय पा आभारी हूं जिन्होंने पुस्तक लेखन और प्रकाशन म मुषे पूरा सहयाग दिया और साथ ही मेरे विचारा को द्वन्द्वात्मकता पो गतिशील किया। ~वीरेन्द्र सिंह जयपुर १५ अप्रैल, १९८३

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i विपय-क्रम प्राक्पथन लेखकीय प्रथमपण्ड (परिभाषा, क्षेत्र एव स्याश्या-पद्धतियां) (१) मिपक को परिभाषा और क्षेत्र परिभाषा वे घटक तथा उनका क्षेत्र, मियर, मिथ्या और सास्कृतिक-प्ररिया संश्तिष्ट परिभाषा और उसका दोन, मिया मिथक और 'इतिवृत', मियक यी 'लाप-शक्ति', मिषन का क्षेत्र ८- (२) मिथक को विभिन्न व्याल्याएँ प्रवेश एव पृष्ठभूमि (३) मियक को रूपकात्मर प्याल्या १०-१७ मिथर और रूपव-तत्व, भारतीय एव ग्रोक परम्परा, मूय तथा चाद मिथव, भाषा और मिथक (४) मियक को मनावमानिक व्याया १८-३१ मानसिक प्रिया और मिथव वा सम्बध, 'मनस्' या विभा- जन, सामूहिक अचेतन और मिथक-सूजन, 'महामाता' का मिथक, 'आदिरूप का स्वरूप', कुछ महत्वपूर्ण आदिल्प (५) मियक को समाज एव मानवशास्त्रीय व्याख्या ३२-४४ वस्तुगत व्याख्या का मारम्भ, जडात्मवादी प्रत्रिया, यातुफ अनुष्ठान और मिथव , अनुष्ठान एव सामाजिक संगठन, टोटम वाद और मिथव, टोटम और टैबू, समाज इतिहास और मिथक, सरचनात्मक व्याख्या (६) मिथक को समन तात्विक व्याख्या-वृष्टि ४५-५३ व्याख्या-पद्धतिया का महत्व और मिथक की गतिशीलता, तात्विक-दृष्टि का अर्थ और स्वरूप, अनेक अर्थ स्तर (७) प्रवेश - . ( १६ ) द्वितीय पण्ड (मियक के घुछ महत्यपूर्ण प्रकार) ५४-६१ प्रकृति-मिया, प्रति या सदर्भ, अग्नि-मिथक, वृक्ष-मियक, ऋतु-सन्दर्भ, टोटभी मिथ (0) सृष्टि-मियर ६२-७० प्रवेश, "सम्पूणता' का रूप और प्रतीव-सृजन, 'वृत्त' या 'गालव' वी धारणा, शरीर वि यास का आदिरूप, 'महामाता' का बिम्ब और सृजन तत्व, "विलोम' का सिद्धात, 'दिक्' की कल्पना, अवतार की भावना और विकासवाद, विभूति की धारणा और भूष्टि तत्व, जलप्लावन का मियक (९) हीरो-मिथक ७६-४ पुलिगोकरण-निया और हीरा का उद्भव, अचेतन और जातिवीर, हीरा की द्विविधि पैतृक्ता, 'पवित्र गौमाय' और हीरो का जम, पिता-निम्ब और हीरो, मूर्य और हीरो-मिथ, हीरो का सास्कृतिक स्वरूप, पिता-बिम्ब का अर्थ और हीरा, 'वदी' और 'निधि' + अर्थ, स्पातरण-मिथको का रूप, 'यदी' चित्र और हीरा-मिय, 'बी', 'निधि' और 'होरो' का मापेक्ष तात्विक स्पातरण (१०) आधुनिक मिथक ८५-११६ एतिहासिक परिवतन और आधुनिक मिथक, आधुनिक-मिथक का स्वरूप, मिथकीय अर्थ व्यवस्था, इतिहास के मिथक, इतिहास-एक गत्यात्मक विचार-मिथक, आधुनिक होरा- मिथक, जनवादी संस्कृति का मिथव, 'इलोट', 'समूह और मशीन , सस्कृति का प्रजातात्रीकरण, युवक और राष्ट्र- मिथक, विवान-मिथव के दो पक्ष, विकासवादी मिद्धान्त, सृष्टि-मिथक, निव-काल की धारणा, विस्तरणशील विश्व - का मिथ (११) निष्कर्ष और सम्भावना परिशिष्ट नामानुक्रम पागनुग्रम सदभ-प्रथ ११७-११ १२० १२० १२१ १२३ मिथक की परिभाषा और क्षेत्र | १ है १ परिभाषा के घटक तथा उनका स्वरूप क्सिी भी प्रत्यय या वस्तु की परिभाषा अपन मे पूण और अतिम नही हो सकती है। भाषा की यह शक्ति भी है कि वह परिभाषाआ के द्वारा सत्य और यथार्थ का आकार देने का प्रयास करती है, तो दूसरी जार, उसको यह सीमा भी है कि वह 'उसे' अतिम एव पूर्ण रूप भी नहीं दे सकती है। किमी भी 'प्रत्यय' को पारिभाषित करने म इस प्रकार का विरोधाभास सामने आता । इस प्रकार परिभाषा के द्वारा किसी भी 'वस्तु' या प्रत्यय (शब्द) के 'मूल' स्वरुप तथा उसमें निहित जावश्यक तत्वो को ग्रहण करने का प्रयास किया जाता है । अत परिभापा एक प्रकार की सतत गत्यात्मक प्रक्रिया है और यह 'प्रप्रिया' यथार्थ का अमिर साक्षात्कार करती है । दिक्, काल, पदार्थ, पर- माणु, प्रजात र, होमो सिम्बालिक्स आदि ऐसे ही प्रत्यय है जिनकी परिभापाएं उनकी 'मूल' प्रवृति तथा अन्तनिहित तत्वा का रेखाक्ति करती हैं। इसके अतिरिक उनके बारे में यह भी कहा जा सकता है कि ये परिभाषाएँ इसलिए अतिम नहीं है कि नव-ज्ञात की मापक्षता में वे गतिशील रहती हैं और यह 'गतिशीलता ही उहे अथवत्ता प्रदाा करती है। उदाहरणस्वरूप, पदाथ के स्वरूप को लिया जा सकता है। पदाथ विश्व का आदि तत्व है, पदार्थ पर- माशुओ तथा अणुआ वा सघात ह, पदार्थ भौतिक है तथा पदाथ वह भौतिक तत्व है (नान मैटेरियल) जिसकी जोर मन, सदैव गतिशील रहता है, पर 'उम' तक पूर्ण रूप से पहुँच नही सक्ता'--आदि क्थन पदार्थ वी प्रति तथा उसकी परिभाषा (स्वरूप) के घटक हैं। इन घटका के सघात के द्वारा किसी भी प्रत्यय या 'वस्तु' के स्वरूप तथा उसकी परिभाषा का हुन्यगम क्यिा जा सकता है। ज्ञान ये नवीन विकास के साथ इन घटको वा स्वरूप बदल सकता है, उनमे परिवर्तन और सशोधन हा सकता है, उह नवारा भी जा १ फ्लिासफिकल एस्पैक्ट्स आफ माडन साइस, सं० सी० ई० एम० जाह, पृ०५७ २ | मिथक दर्शन वा विकास सक्ता है तथा नये प्राप्त निप्वर्षों के द्वारा 'नवीन' घटका का भी समाविष्ट किया जा सकता है । यह सारी प्रक्रिया एक गतिशील प्रप्रिया है जा 'सत्य' के अमिक रूप का साक्षात्कार कराती है। इस प्रकार किमी भी 'प्रत्यय' या 'वस्तु' की परिभाषा उसके स्वरूप तथा माथ ही उसके घटको पर आधारित एक गत्यात्मक प्ररिया है जो सत्य और ययाथ तर पहुँचने का एर आधार है । इमसे यह स्पष्ट हाता है वि परिभाषा और यथार्थ का एक साप सम्बध है- दोना एक दूसरे पे लिए काय वारण के समान हैं । २ मिथक, मिथ्या और सास्कृतिक प्रक्रिया मिथ वे स्वरूप तथा उसकी परिभाषा का समझन के लिए उपयुक्त प्रक्रिया को ध्यान में रखना होगा। मिय या मिथर (मिथक शब्द का सबसे पहले प्रयोग नाचाय हजारीप्रसाद द्विवेदी ने दिया था) यह शट मूलत अग्रेजी का शब्द माना जाता है, पर इससे मिलता-जुलता सस्कृत का शब्द 'मिथ्या' है जिसका मिथ स कापी ध्वनि साम्य है और अय म भी समानता है। पश्चिमी यूराप तथा अमरीका के विचारपा न मिथ को इमो अथ म लिया है और उसे यथाव या वास्तव स भिन माना है । डा० प्रमपति ने अपन एक लेख म यह मत व्यक्त किया है कि भारत में मिथक वो इसी जथ म ग्रहण किया गया है और एतिहासिकता की दृष्टि से, २धर रामायण और महाभारत म रितना वास्तव है और कितना 'मिथ' ~~ इस वात या प्रमाणित करन का प्रयत्न किया गया ह ।' सत्य ता यह है कि मिथ (पुराण) या यह अब भारतीय विचारधारा के सदभ म नितात सनी नही है । पुराण शन का अर्थ 'प्राचान' या 'आदितम' है जो सास्कृतिक प्रक्रिया म क्सिी न किसी रूप म जीवित रहत हैं-यह दूसरी बात है कि युग के अनुसार उनम 'रूपातरण एव सशाधन हा सकते हैं अथवा होते हैं। पिर, दूसरी बात यह है कि इतिहास की जवधारणा म मानव विकास के वाह्य और आतरिय पक्षा का एक द्वन्द्वात्मक स्वरूप प्राप्त हाता है, वह पेवल भौतिव' घटनाना, नामा तथा तिथिया का समूह मात्र नहीं है । इस अर्थ म मिय भी एक तरह का इतिहास है । यही कारण ह मिमिया का भारतीय चितन म इनिहास ही कहा गया है जा मानव चेतना और भौतिक जगत के सम्बध या उमय आन्तिम प म रमारिन परती है। १ मधुमती, आलाचना विशेपार, जनवरी-फरवरी १८७७, पृ० ४२-४३ मिथक को परिभाषा और क्षेत्र (३ मानव विकास को यह परम्परा रही है कि वह जैव और अजैव को एक सम्बध मे बांधती है और मिथक के प्रतीक, घटनाएं तथा नाम इस सम्बध को एक- सूबता देते हुए प्रतीत होते हैं। इतिहास को इस प्रकार विवेचित करने पर मिथक से उसरा एक गहरा एव अर्थवान् सम्बध प्राप्त हाता है । उसे 'मिथ्या' या 'आदिम' यहार इतिहास व कूडेदान म फेवा नही जा सकता है। मिथव को आदिम मानसिकता से केवल जोडवर उसके व्यापक सदभ को नजरअदाज वरना है। मिथर जैसा विवहा गया है कि गास्कृतिक प्रक्रिया का अभिन्न अग है । इसका अर्थ यह हुआ वि प्रत्यय एतिहामिर परिवतन के साथ मिथको का नया सृजन होता है अत 'आधुनिक मिथक' का अस्तित्व भी एक सत्य है जिसका विवेचन आग किया जाएगा। मिथव के उपर्युक्त स्वरूप को ध्यान म रसपर कहा जा सकता है कि मिथर का सम्बध मानव के आदिम एव प्रागतिहासिक काल से है और 4 किसी भो जातीय सम्बार मे इतन गहरे पैठ रहत है वि उह मानव अस्तित्व में नकारा नहीं जा सकता है। मातानिका, समाजशास्त्रिया (मानवशास्त्री भी) भापाशास्त्रिया तथा दाशनिको ने मिथक के इसी रूप को विभिन्न दृष्टि- काणो से निवचिन एव परिभापित करने का प्रयल क्यिा है और मिथका के स्वरूप को समझने में इन समस्त दृष्टिवाणा का अपना-अपना महत्व है जो मानसिक्ता एवं सामाजिकता के विभिन्न धरातला पर मानव-चेतना के विकास और उसकी समानता तथा असमानता की आर सकेत करते हैं । इन दृष्टिकोणा का विवचन अगले अध्याया म विस्तारपूर्वक किया जाएगा। ३ सश्लिष्ट परिभाषा और उसका स्वरूप मिथर के उपर्युक्त स्वरूप को ध्यान मे रखकर मिथक की एक सश्लिष्ट परिभाषा देने का यहां पर प्रयत्न किया जाएगा। सत्य तो यह है कि मिथक को इस तरह परिभापित करना कि वह सभी विद्वानों तथा विचारका को स्वीकार हो, जवश्य ही अपने आप म एक कठिन कार्य है और इससे भी अधिक कठिन काम है कि वह उन व्यक्तिया के लिए भी स्वीकाय हा जो इस क्षेत्र के विशपन नही है। मिथक एव अत्य त जटिल सास्कृतिक सत्य है जो मानव, प्रवृति आर विश्व के पवित्र 'इतिहास' या अनेक प्रकार से रेखाक्ति और विवेचित करता है। इस परिभाषा म उन सभी तत्वो और विवेचना या समवय प्राप्त होता है जा एक आर मिथक के घटक हैं, तो दूसरी आर मिथक क्षेत्र एव विस्तार का प्रकट करते हैं ।

| मिथक दशन का विकास ब्रिटानिका विश्वकोश मे मिथक को एक 'पवित्र' इतिहास की सना दी गयी है जो आदिकाल की एक घटना है जा अप्राकृतिक व्यक्तियों के कायरतापा के द्वारा 'यथार्थ' के अस्तित्व को रेखाक्ति करती है।' यह तत्व मिथय के एक आवश्यक पटव 'अभौतिक कार्यकलापा' से सम्बन्धित है जो आदिकालीन मिथवा म रिसी न तिमी रूप म प्राप्त हात हैं। इन शक्तिया (दिन्य) का सम्बध प्राकृतिक घटनाआ तथा व्यापारा से जोडा गया है जो इस बात का स्पष्ट परत हैं दि जादिम मिथवा ने प्रति-शत्तिया या मानवीकरण पर उह मानवीय सदभ देन या प्रयत्न दिया था। यह सम्बध भी एर प्रवार से 'पवित्र' सम्बध है जो मानवीय चेतना के आदिम विधाम स गहरा सम्बधित है । यह 'सम्पध' व्यक्ति और प्रकृति के उस 'सवाद' की ओर सवेत परता है जिसमे प्रगति के प्रति एक जिनासा की भावना है, तो मरी आर उन प्रारतिक प्ररियाना के प्रति एर' 'भय' की भावना भी रनिहित । इन दोना भावनाआ ये जतराल म एक 'पवित्र' मनावृत्ति की जतधारा बहती रहती है। यही कारण है frमामाय रूप मे, मिया या गंरचना म इन तत्वा रा यूनाधिक गमावेश प्राप्त हाता है जिगया विवचन यथास्थान मविस्तार रिया जाएगा। . ४ मियक और इतिवृत्त यह 'पविगायध' मिधर पी रांराना या एप बावश्या या और प्राची देवगणा या भावना म यर तप ग गीमा ता TITam frint ध्यमियममा 'थ्यिता पा प्रगामपन प्राप्त राना उमा पानी पिस्तार आर पटगाय व्यापाग द्वारा दगाना गा| यममा मायणगाप मिना पाया मरा और प्रशियाना मा गा पार हैं। प्रसार मिया या परिभा पा गमा भी। नाता है अपना दूगर सम्म पर भी पाना गाया Irr fr सा भरमा पनि प्रभामा मिन HTTPा T नग ।पा गग पाTETriग गाभागार IT Imriram लमपग्गिन और पिया मागास प्रार, मिपिर पा TOr मा गग-I7ग - पागा गि TET माग 'निगा उग गारवाया 1 filmगि, भाग 11,2.1134 मिथव की परिभाषा और क्षेत्र | ५ और घटना के द्वारा अधिर ग्राह्य बनाता है जिसमे जन-मानम उसे मरलता से ग्रहण कर सके। इस इतिवृत्त के द्वारा तथाकथित अलौनिय व्यक्तिया के कायर नापा से यथाथ अपने अस्तित्व को व्यक्त करता है चाहे यह अभिव्यक्ति यथार्थ का अश हा या उसका सम्पूर्ण स्प हो। मिथकीय सरचना म इन दोना तत्वा का समावेश प्राप्त हाता है और इस दृष्टि स, मिथक केवल क्था या गल्प नहीं है (जैमा दि ग्रीक विचारधारा म प्राप्त होता है) वह तो केवल उसका एक अशमान है जा 'प्रभामण्डल' की सृष्टि करता है। ग्रीक विचार- धारा म मिय को तिहास और तना स नितात विपरीत माना गया है और उस एक प्रकार से 'जो मूलत अस्तित्व म नहीं है' का पर्याय माना गया है । ग्रीक मिथवा मे देवताओं के वायक्लापा वो (जैसा कि हामर में प्राप्त हाता है) अमानवीय और दूषित ठहराया गया क्यानि वे एक दूसरे को धोखा देत हैं और अनेक प्रकार के दूपित वृत्य करते हैं।' देवताओ के इन कुकृत्या से मिथ को उसके सास्कृतिक महत्व से विलग नही किया जा सकता है। दूसरी बात यह है कि यथाथ का स्वरूप अत्यत जटिल है और मानव के रूप मे देवताओ के दोना प्रकार के कम (जच्छे और बुरे) इस तथ्य को आर भी सकेत करते हैं कि यथार्थ-जीवन मे इन दाना तत्वा का अस्तित्व एव सत्य है अथवा उनकी सापेक्ष स्थिति एक जीवन-सत्य है। मिथक मानव की आतरिक गाथा का इतिहास है, वह वेवन बाह्य प्रारूपा का रगस्थल नही है। ५ मिथ की लोच 'शक्ति' जैसा कि ऊपर मक्त किया गया है कि मिथक एक 'परिन' इतिहास है जिममे अलौमिक्ता का सस्पर्श भी प्राप्त होता है। मिथक एक प्रकार से उन घटनाआ से सम्बधित होते हैं जिनका सम्बध आदि काल से होता है । मिथ के पात्र अपन कायालापो स सृजनात्मक क्रिया का उद्घाटित करते हैं और यथाथ के पक्षा को व्यक्त करते है। इस दृष्टि से, मिथक कभी-कभी 'पवित्र' का इस जगत म जवरोहण है और वह सब है जो इस ससार को स्थापित करता है। मिथक अपराल रूप से, यह उद्घाटित क्रत हैं कि आदिम मानव और आज के मानव मे एक गहरा सम्बध है जो विकास प्रक्रिया को रेखाक्ति करत १ विदेशा के महाकाव्य (उस आफ इपिरम) अनुवादक गापीकृष्ण । इस पुस्तक म ग्रीक मिथका का जो विवेचन (महाकाव्य रूप) प्राप्त हाता है, उससे यह तथ्य प्रक्ट होता है।

६ | मिथक् दशन का विकास हैं । विकास प्रक्रिया से मिथको का यह सम्बन्ध भी स्पष्ट करता है वि मिथ का स्वरूप, विकास के समान ही गत्यात्मक है (Dynamic) है और उनम जनुकूलित (adaptuve) होन की शक्ति है। मिथ की यह अनुकूलन-शक्ति उम युग और सदभ के अनुमार रूपातरित और विवेचित करती है । इस दृष्टि से मिथक की सरचना म एक प्रकार की लोच' होती है जो उसे पान के परि- वतनशील आयाम म रूपातरित परन म समथ करती है। इसके साथ यह भी अवश्य कहा जा सकता है कि कुछ मियको मे यह 'लाच' (अनुवू नन-शक्ति) जधिक हाती है और कुछ म अपक्षाकृत कम । प्रत्येक सस्कृति म आर उसक मिथ म यह स्थिति समान रूप से प्राप्त होती है । ईसाई, हिद, मुस्लिम और चीनी आदि मिथका में यह मानात्मक अतर स्पष्ट ही देखा जा सकता है क्याकि जातीय चेतना म कुछ एस मिथक हाते है जा उसके अभिन्न जग हाते है । कवि, क्लावार और चितव इन मिथका का सदभानुसार विवेचन करते हैं और 'कुछ' मिथका का इस सीमा तक अथवत्ता प्रदान करते हैं कि उनका जाति की सास्कृतिक चेतना से एक गहरा और साथ सम्बध हो जाता है । मिथ का यह रूपातरण अधिकतर कलाकारा, साहित्यकारी और विचारमा के द्वारा ही सम्पन्न होता है क्यानि जीवित और गत्यात्मक परम्परा स उनका साक्षात्कार एक ऐसे धरातल पर होता है जहां वे मिथका को नया अर्थ प्रदान करते हैं--पूरी परम्परा का मथन कर उसे प्रास गिक्ता प्रदान करते हैं । इस दृष्टि से, प्रत्येक जाति की सास्कृतिक चेतना म मिथका का एक अपना सास्कृतिक महत्व है। इस महत्व में जहां एक और मिथ या पुरागाथा का सदभानुसार पुनर्विवेचन होता है, वही युग के बदलत सदर्भो म और ज्ञान- विनार के नए आयामा के प्रकाश म मिथका का नया सृजन भी हाता है । आधुनिक मिथका नै सृजन और विकास म इस तत्व का समावेश प्राप्त होता है जिसका विवेचन यथास्थान होगा। ६ मिथक का क्षेत्र मिथक के उपयुक्त सास्कृतिक स्वरूप और महत्व के प्रवाश म यह स्पष्ट हाता है कि मिथ एक 'सत्य-इतिहास' है क्यानि इनका सम्बध मानव और विश्व के रहस्या तथा सत्यो से हैं । सृष्टि या ब्रह्माडीय मिथ इसलिए सच हैं विप्रथम बार इन मिथका के द्वारा प्रकृति और जगत के अस्तित्व की प्रामा- णिस्ता प्राप्त हाती है और ब्रह्माड के व्यापारा के प्रति एक 'प्राग-ताविक (Pre Logic) दृष्टि का स्वरूप मुखर हाता है । आदिम जार प्राचीन मानव मिथर की परिभाषा और क्षेत्र । ७ इस प्राग-ताविक शक्ति के द्वारा मानव और विश्व के रहस्यो और तथ्या के प्रति एक ऐसी 'दृष्टि' पदान को जिसकी आधारशिला पर विचारों और पत्यया का भावी इतिहाम गतिशील हो सका। प्राग-ताकिक अवस्था म आदिम मानव न जा प्रतीका और मिथया का सृजन किया, उसके जन्तराल में तर्क का जो सप प्राप्त होता है वह अपेक्षात सवेदनात्मक और उत्तेजनात्मक अधिव है क्यानि प्राकृतिक घटनाआ और व्यापारा स उनका सीधा साक्षात्कार आश्चय, जिनामा जऔर भय की मिली-जुली सवेदनाआ ये साथ हुआ जिसका फल यह हुआ कि प्रकृति से उनका 'प्रथम सम्म प्रतिक्रियात्मक स्तर पर हुआ। मिथय सृजन म इस प्राग-ताविक शक्ति का एक महत्वपूर्ण स्थान है क्याकि इसी के द्वारा क्वन मिथ ही नहीं, पर भापा, शब्द, विचार और अवधारणाआ का बहुमुखी विकास सम्भव हा सका। उपयुक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि मिथ का एक अपना सास्कृतिक महत्व है जा मिथिक-चेतना को अनेक आयामी बनाता है। जब हम मिथक के सास्कृतिक स्वरूप पर विचार करते हैं, तब उसका महत्व एकागी न होकर अनेक आयामी हा जाता है । यही कारण है कि जहां एक ओर मिथ व्यक्ति की आवश्यक्ताआ की पूर्ति करता है, वही दूसरी ओर, वह समाज को संगठित परता है।' मिथ का यह दो पक्षीय स्वरूप किसी भी जाति की सास्कृतिक चेतना का प्रकट करता है, उसे एक बाह्य और आतरिक व्यवस्था प्रदान करता है । इस बाह्य और जातरिक व्यवस्था म उस जाति के विश्वासा और अवधारणाआ का एक ऐसा सघात रप प्राप्त होता है जिससे मानव वे अतमन को आकाक्षाआ और विश्वासा का प्रकटीकरण हाता है। दूसरे शब्दा मे, मिथिक चेतना हमारे अस्तित्व का अर्थ प्रदान करती है, हमार निया-व्यापारा का अर्थवत्ता प्रदान करती है।

२. मिथक की विभिन्न व्याख्याएँ मियक की परिभाषा और उसने स्वरूप पर विचार करन में एक बात यह स्पष्ट हाती है वि मिथक् का एक व्यापक क्षेत्र है जा सास्कृतिक प्रक्रिया का एक अभिन अग है। मिथक की व्यापकता और साथ ही, उसके महत्व के कारण जाधुनिक युग मे मिथ या पुरागाथा को विभिन्न दृष्टिवाणो से विवेचित एव व्याख्यायित करने का प्रयल किया गया है । इस विवचन और व्याख्या के द्वारा मिथर के उस रूप का स्पष्टीकरण होता है जो यथार्थ और कल्पना (प्रभा मण्डल) वो द्वद्वात्मक्ता का प्रक्ट करता है और यह सिद्ध करता है कि मिथक की सरचना मे इन दाना तत्वो का ममावेश यूनाधिक रूप में पाप्त होता है । इससे एक बात यह भी उभर कर सामने आती है कि मिथ मे सब कुछ कल्पनात्मक और वायवी नही है, पर यह भी सच है कि मिथक की अवधारणा के पीछे सत्य और यथार्थ का एक गहरा सदन प्राप्त हाता है।' "म तथ्य के जाधार पर मिथ को सास्कृतिक इतिहास का एक अभिन अग भी कह सकते है । मिथ की व्याख्याआ मे जो अनेक मान-क्षेना का सहारा लिया गया है, वह मिथ की व्यापकता और अथवत्ता को जनेक आयाम प्रदान करता है। इन विभिन व्याम्याआ म भापाविनान, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, मानव- शास्त्र, और दशन का आश्रय लिया गया है, और हरेव नान-क्षेत्र ने अपनी सीमा के मदर मिथक की सारगभित व्याख्या करने का प्रयत्न किया है। उपयुक्त नान क्षेत्रा के मिथ-अध्ययन से एक बात और भी स्पष्ट होती है कि मिथ की सास्पृतिक व्याख्या में इन सभी नान-क्षेना का एक अयोन्याश्रित सम्बध हे क्याकि एक की कमी को दूसरा पूरा भरता है और इस प्रकार, मिय की एक सास्कृतिर अर्थवत्ता प्राप्त हाती है। इस दृष्टि से, मिथ की - १ मिथक और यथार्य, डो० डी० कोसाम्बो, प्रस्तावना। इस पुस्तक म पुरातात्विक खाजा के आधार पर मिथ और इतिहास के सम्बध को एक तावित आधार लिया गया है।

मिथक यो विभिन व्याख्याएं
व्याख्याआ को निम्न प्रकारा म, अध्ययन की मुविधा की दृष्टि से, बाटा जा
सकता है
(१) रूपकात्मक व्याख्या
(२) मनावैनानिक व्यास्या
(३) समाजशास्त्रीय एव मानवशास्त्रीय व्याख्या
(४) समग्र तात्त्विक व्याख्या

३ | मिथक को रूपकात्मक व्याख्या १ मिथक और रूपप तत्व रूपयात्मप व्याल्या 17 आरम्म छठी शतानी ई० पू० स माना जा सकता है क्यापि इस गमय ये आसपास भारतीय और ग्रीय विचारा न मिथप या पुरागाया अभिप्राया यो गप्ट रन रा प्रयत्न पिया । पय पा यथ और पुरागाथा से उसरा रामघ ग दृष्टि स भी माना जा गयता है कि रूपप म 'सादृश्य' या वाधार हाता है जा निहित अर्य या स्पष्ट करता है । इग स्पर- तत्व म यथा या याश का भी स्पश रहता है ना मिथर पा भी एक अभिन्न अश है । यदि मूम दृष्टि म दया जाए ता रूपा म प्रतीप का मनिवेश रहता है क्यारि शक प्रतीया और प्रतीया ये समावेश से ही निगी मियम मी रचना होती है । पर ये प्रत्यय पात्र और वस्तु का अपना एक विशप अर्थ या सन्दभ होता है जा अपन पार्यव्यापारा से मिथव की पटनात्मक योजना परत हैं । "स दृष्टि से यह भी कहा जत्युक्ति नहीं होगा कि 'स्पक' को 'उपमा' का बौद्धिक विकास भी कहा जा सकता है।' इस बौद्धिय विकाराम एक अय तत्व का भी ममारश होता है, वह है मोना और अनुभूति का समावेश जा मियर यो सर्जनात्मा बनाते है जोर माय ही उसकी अथवत्ता पा व्यापकता प्रदान करते हैं। इस प्रतिया म 'रूपर' या बहिरग तत्व ब्रमश 'महत्- तत्वो साथ एयीभूत हान लगता है जो उसका अन्यार्थ है और इमी म मिथव की अर्थवत्ता है। पर यी [चाह तो क्या-रूप (Allegory) भी कह सक्त हैं] यह सारी सरचना जैसा वि यहा गया, 'प्रतीक्वाद पर आधारित है, और बोशा की यह मा यता वि मिथ का प्रतीक्वाद एक दापयुक्त प्रतीकवाद है, सर्वया सही नहीं है। उमकी दलील है पि मिथ के प्रतीक्वाद म रूप' (बहिरग) और 'तत्व की जममानता रहती है। परन्तु यह मत एकागी है क्यावि धरातल पर एसा लगता है, पर अयार्थ की गतिशीलता के कारण 'रूप' और 'तत्व का एकीभूत सस्वार हो जाता है और दोना पक्षा का समानातर निवाह हाता है । मिथक को व्याख्या म स्पवात्मक्ता का महत्व इसी दृष्टि स १ लैंगवेन एण्ड रियेल्टी, अरबन, पृ० ४७१ २ हिस्ट्री आफ एस्थिटिक्म, वाशा, पृ० ४४ मिथय को पारात्मक व्याख्या | ११ देखा जा सकता है। मिथ की सर्जमात्माता म 'महा-तत्व' पा, सवेदना था, और गाय ही यथाय या एक गहरा और साधर समावश रहता है। २ भारतीय और ग्रीक परम्परा घटी और सातवी शताब्दी ई०पू० ये लगभग मियय या पुरागाथा की व्याख्या या भारम्भ माना गया है क्यापि इस समय ये गभग भारत तथा ग्रीन म मिथ या रूपात्मा अर्थ घे द्वारा विवचित वन वा प्रयत्न दिया गया। भारत में सबस प्रथम यास्स (६०० ई० पू०) ने निरक्त पे जाधार पर वैदिर कथाआ आर देवी देवताआ की व्याख्या प्रस्तुत की। इस व्यारया म भाषा-विनान का भी सहारा लिया गया जिस जमा विचारच मोजमूलर (मैक्समूलर) ने भा अपनी विरेचना T आधार वाया। यास्त । वैदिय कथाआ (दवी देवताआ) का प्राकृतिक घटनाआ आर आध्यात्मिक अभिप्राया का पर स्वीकार किया। द्र, वरण, साम, पूपा, मय जादि यो प्रारतिय व्यापारी एव शक्तिया पे रूप में मानवीहत करन या जो प्रयत्न प्राप्त होता है, यह प्रवृति प्रोप, ईमाई और सभी प्राचीन मस्कृतिया म यूनाधिक रूप स द्रष्टव्य है । ग्रीय विचारसा (एपीतारमस और हीराक्लिटरा) न मियना की व्याख्या भी इसी दृष्टि से की जर उहा होमर द्वारा प्रयुक्त घटना । और देवी-दवताआ का प्राकृतिक घटनाआ और शत्तिया का प्रतीक माना और उनम 'निहित गुप्त-अर्थ' को स्पष्ट करने या प्रयत्न किया गया। थियागानस न यह स्वीपर रिया रि हामर व देवी-देवतागण या ता प्रायतिर तत्व है अथवा मानवीय मानसिर शशि के प्रतिस्प। यह व्याख्या सामाय रूप से सभी धार्मिक परम्पराआ में यूनाधिप रूप से प्राप्त हाती है। दूसरी बार, ग्रीक विचारया ने दवताआ का भौतिक जार नतिक अभिप्राया तब ही परिसीमित कर दिया, पर जागे चलकर प्रथम शतान्दी ई० से हीराग्निट्स ने मिथका की पसात्मक व्याख्या का एक लम्बा बम प्रारम्भ कर दिया जिसन पाश्चात्य मिथका को एव अथ प्रदान किया। उदाहरणस्वस्प जव मिथ यह कहता है नि जियाज न 'हीरा' को आवद्ध कर लिया, तव यह घटना बताती है कि आकाश (ईथर) वायु का समाहित किए हुए है जथवा जावाश वायु का परिसीमन है।' इस व्याख्या का सहारा प्राचीन टस्टामट की अनेक क्थाआ के विवेचन हेतु लिया गया। १ ब्रिटानिका विश्वकोश, भाग १५, पृ० ११३३ १२ | मिथक दर्णन का विधाम ३ सूर्य तथा चद्र मिया पुगगायाजा की नम रपपात्मय व्यारया न भूय या अत्यत महत्व दिया और उसके उत्य और अस्त का, भषा द्वाग उसपे आच्छादन का और समुद्र म उसा निराह्न की घटना पालकर मोर-गायाजा का एक व्यापर सूजन सभी धार्मिक परम्परामा म यूनाधिर प म प्राप्त हाता है। मूय व त्या का लेवर दन मिया का मजन जहा मूय व महत्व का प्रस्तुत करता है, वहीं वह चद्र-मिथका के सृजन का भी समक्ष रखना है। इस दृष्टि स, तीन प्रकार के मियका का सुजन प्राप्त होता है जो प्रकृति-व्यापारा और वस्तुआ का केन्द्र म रखपर चियमित हुए । य मिथर है~च द्र, सूर्य और ऋतु मम्बधी गाथाए जो प्राति रे व्यापारा से सम्बधित हैं और इनम जादिम मानव की निरीक्षण शक्ति का परिचय प्राप्त हाता है और साथ ही उनसी प्राग्तापिक शक्ति का मवेत मिलता है । इस प्रारतारिक प्रवृति म भय, आश्चर्य और जिज्ञासा की भावनाएं भी प्राप्त होती हैं। जिसने प्रनि की घटनाओ को एक दैवी रूप प्रदान किया और इस प्रकार मानवीकरण की प्रक्रिया को पटित क्यिा । नील तया माक्षमूर न सोर-मियका का विवचन दिया और भापा तथा पुगण ये सम्बद्ध पो रेखाक्ति किया । बील ने आडीपस का 'प्रकाश' का रूप भाना और उसके अधत्व को मूयास्न का प्रतीक (स्फिक्म) परन्तु आग चलकर पह भी माना गया कि मियका का आधार केवल सूर्य और चद्रमा हो नही है, पर उसका आधार पूरी प्रवृति है । बाम तथा मोक्षमूलर ने भी इस स्वीकार दिया और इस प्रकार, मिय की म्पकात्मक व्याग्या को अधिक व्यापक पनान का प्रयत्न किया। इस म्पकात्मक व्याख्या की तीसरी शताब्दी ई० पू० म एक अन्य दृष्टिकोण से विवेचित किया गया । (यूहीमरस) न अपने विचारा यो एक दाशनिक रूप म प्रस्तुर पिया और उमने यह दावा किया वि देवताओं के मूल या उद्गम को उसने जान लिया है तथा उनके रहस्य को उद्घाटित कर लिया है। उसके अनुसार ये दवना, प्राचीन मप्राट थे जिहान अपर कायक्लापो के द्वारा मिथ- सृजन को गति प्रदान की। यह एक अय तरीका था जिसन हामर के देवता को ताकि विधि' से सुरक्षित रखने का प्रयन किया और उह ऐतिहासिक तथ्य स्वीकार किया । इस प्रकार, इन देवा को सम्राट मानकर यहीरमस ने ६ १ लोक साहित्य और सस्कृति, डॉ० दिाश्वर प्रमाद, १० मिथक को म्पकात्मक व्याख्याएं । १३ मिथक-सृजन की प्रक्रिया को समझाने का प्रयल किया । मिथक एक प्रकार से इन प्राचीन राजाओ (या आदिम राजाओ) के काय व्यापारो की भ्रमात्मक स्मृति थी कल्पनात्मक रूपा तरण था यहा पर जो कल्पना मक रूपा तरण की बात कही गयी है, वह मिथिय चेतना वा एष अग अवश्य है, पर सारी मिथिक चेतना अथवा मिथक सृजन का आदिम राजाआ तक ही सीमित करना मिथव के व्यापक सास्कृतिर परिप्रक्ष्य को नजर अन्दाज कर देना है। इस रूपकात्मक व्याख्या का एन प्रभाव यह भी पड़ा कि ग्रीव देवताआ को अयथार्थ माना गया आर साथ ही उनके अस्तित्व और महत्व को अपेक्षाकृत कम किया गया । परन्तु इतिहास यह भी सिद्ध करता है कि इन सब प्रयत्ना के बावजूद ये देवता अर्थहीन नहीं हो सके अथवा जधवार म लुप्त नहीं हो सके । य देवतागण इसलिये भी विलुप्त या अथहीन नही हो सके क्याकि ये जातीय चेतना के अभिन्न प्रेरक जग के रूप मे सुरक्षित रहे। साथ ही, अपने 'लोच शक्ति' के कारण अथ के विभिन्न आयामा का, युग सदभानुसार रूपातरित करते रहे । यही कारण है कि मिरिक चेतना म ये देवतागण हीरो, अथवा महापुरुष (अवतार) विसी न रिसी रूप म जपन कार्य व्यापारा के द्वारा कथा या क्याश का सुजन करते रहे। ४ भाषा और मिथक इस रूपवात्मक व्याख्या का एक अमित अग भापिक सरचना भी है क्याकि भाषा का स्वरूप अपन मूल रूप म स्परामक और प्रतीकात्मव होता है । भापा और मिय का विरेचन इसी आधार पर विकास प्राप्त कर सका और उनीसवी शताब्दी में मोक्षमूलर तथा वीसवी शताब्दी मे वैशिरर आदि विचारको न भाषा और मिथ के जापसी सम्बध का रेखाक्ति किया। मूलत भाषा, शब्दो, प्रतीका और नामा के द्वारा मिथ का सुजन करती है। माक्षमूलर ने मिथ- सृजन का भाषा स जोडकर मिथिन चेतना का एक ऐमा परिप्रेक्ष्य प्रदान क्यिा जिसन उत्नीसवी तथा वीसवी शतादी म मिथ अध्ययन का ए7 व्यापक सत्भ दिया । मोक्षमूलर के अनुमार मिय मापा की वीमागे या विकृति का फल है । इस सन्दर्भ म एक तथ्य यह भी स्पष्ट लक्षित होता ह वि एव पदार्थ या वस्तु के अनेक नाम हो सक्ते हैं जार इसके विपरीत, वे ही 'नाम' अनक वस्तुआ १ द स्टडी आफ मिथ एण्ड टाटमिज्म, एडमाड लीच, पृ० २६ १५ मियर दर्शन का विकास पर भी घटित हा सक्त है। इस प्रक्रिया के द्वारा 'नामा यी एव भ्रमात्मर स्थिति सामो जाती है, पर यह नम उस समय समाप्त हा जाता है जब निमित नामा और एव नाम स सत्य ये स्वरूप का समझने में सहायता प्राप्त हाती है । वैदिक देवा तथा ईसाई देवा म यह प्रक्रिया दी जा सकती है । अनेक देवता का एक 'परमदेव' म ममाहार और इमरे विपरीत एव देवता का अनक दव- ताआ म विभागन प्राचीन धर्मों म प्राप्त एवं रखरवाद और बहुदयवाद या प्रतिरूप माना जा सकता है । यह सारी प्रवृति मिथिक चेतना की एक प्रक्रिया है जा भाषिक रूपया के कारण प्रकट होता है। भापा और मिथिर के तत्वा म चाहे जितना भी जतर क्या न माना जाए, पर एप वात जा दाना म समान है, वह है मानसिव सकल्पना का जारम्भिक रूप जहाँ से रूपकात्मक या शाब्दिक विचार-प्रक्रिया का सूपात हाता है । मोक्षमूनर ने तुलनात्मय म मिथ का जो अध्ययन किया है, उसो मूल म भाषा भी यही रूपरामर शक्ति है जिसन ब्याकरणात्मक निंगा के द्वारा देवा के मानवीकरण को सावार निया । मोक्षमूलर न आय-देवताओं का अध्ययन मूलत सी पद्धति के द्वारा किया और वह इस निप्पप पर पहुंचा कि आर्य देवकुल अथवा वैदिक 'दवकुल ( Pantheon) का निमाण मृय, अपा और आकाश दे चारा ओर लिया गया । यही प्रवृत्ति नीर देव-कुन के बारे में भी प्राप्त होती है जो यह तथ्य प्रकट परती है कि भाषिक सकल्पनाएं और मिथिक चेतना का एक गहरा सम्बध है-दोना एक दूसरे के पूरक है । यह तथ्य एक अय पक्षा की जोर सक्त परता है कि रूपवात्मा प्रक्रिया मिथ और भापा के बीच जोडने वाली एक बौद्धिक पडी है और इस दृष्टि स 'रूपर' (Netaphor) वा एक अपना महत्व है।। मोक्षमूलर वे इस विचार को कि मिथव 'भाषा की बीमारी है का प्रत्या- ग्यान स्वाच विद्वान एड्रयू लैंग ने किया और उसने यह मत प्रस्तुत किया कि मिथ भापित विवृति या बीमारी नहीं है, पर वह 'मानवीकरण' का फल है जो प्राकृतिक और ब्रह्माडीय तवा का मानवीय रूप है । इस वह सस्कृति को जडात्म- वादी दशा (Animistic) कहता है जिसम जड पदार्था और प्रकृति व्यापारी १ त्रिटानिका विश्वकाश, भाग १५, पृ० ११३४ २ माइथालाजी, पेयरी मेराडा, पृ० २३ मिथक को स्पनात्मक व्याख्याएं | १५ को मानवीय चेतना से युक्त दिखलाया जाता है और इस प्रकार उस पर मानवीय क्रियाओ का आरोपण किया जाता है । जडात्मवादी दशा एक प्रकार से धर्म की आरम्भिक स्थिति की ओर सवत करती है जिसम भय और आश्चर्य के मनोभावो ने प्राकृतिक व्यापारा और शक्तियो को एक 'दिव्य' और 'पवित्र' रूप मे स्पातरित किया। इस प्रकार एक पवित्रता की भावना का आरोप इस मानवीकरण प्रक्रिया में प्राप्त होता है । ई० वी० टलर तथा फ्रेगर ने भी अनेक उदाहरणा तथा आदिम जातियो की प्रथाआ के विश्लेषण के द्वारा जडात्मवादी प्रवृत्ति को बल प्रदान क्यिा है और मानवीकरण की प्रक्रिया को आदिम प्राग- ताविक शक्ति से सम्बधित किया है।' इस नवीन दृष्टिकोण ने मिथ के तुलना- स्मक अध्ययन का भी सूत्रपात किया जिसमे मोसमूलर तया ई० सिके (१६०७) के द्वारा स्थापित एक सस्थान ने इस तुलनात्मक अध्ययन को एक वैनानिक आधार प्रदान किया । इस तुलनात्मक अध्ययन म प्रत्येक शन्द एक सवाक् चित्र था और उसकी एक व्युत्परक व्याग्या ही माय थी। पहल शब्द अपने मूल या व्योत्पत्तिव अथ में प्रयुक्त हात थे जा मूलत ध्वयार्थ के द्वारा अपने अर्थ को सकेत करते थे । उदाहरण के तौर पर यह क्थन ले कि 'मूप ऊषा का प्यार करता है '--इसम आदिम मानव के द्वारा सूय के उगने का एक ध्व यात्मक साक्षात्कार था । यह शब्द का अयार्थद प्रयाग तुलनात्मक अध्ययन का आधार बना और इस प्रकार मिथव और भाषा के शब्दा का एक गहरा सम्बध प्रस्ट हुआ ।' यह तुननात्मक पद्धति अत्य त लाव प्रिय हुई, पर इसम एय कमी भी थी। समस्त मिथिव चेतना को थाडे से भापित परिवतना जार कुछ श दा के आधार पर कदाचित् व्याख्यायित करना मिथक के व्यापक सदभ का नजर- अन्दाज करना है । इस कमी का समाजशास्त्रिया और मानवशास्त्रियो ने कम किया जिन्होंने मिथक को सामाजिक सदभ प्रदान किया और सास्कृतिक प्रत्रिया म मियक के महत्व को समक्ष रखा । १ टेनर ने १८७१ मे 'प्रिमिटिव कल्चर' तथा फेजर ने 'गोल्डन वा' का प्रवाशन दिया जिसम इस प्रवृत्ति का विश्लेपण प्राप्त होता है, पर य पुस्तो नृतत्वशास्त्र से अधिक सम्बधित है। यहां पर इनवा मस्त प्रसगवश है क्यावि भापा से भी इसका गहरा सम्बध है । २ लाक साहित्य और सस्कृति, डा. दिनेश्वर प्रसाद,पृ० १३ ३ इसवा विवचा यथास्थान आगे रिया जायगा।

१४ मिथर दशन का विकास पर भी घटित हा माते है।' इस प्रप्रिया के द्वारा 'नामा यी एक भ्रमात्मक स्थिति सामो जाती है, पर यह भ्रम उस समय समाप्त हा जाता है जव विभिन नामा और एक नाम से सत्य के स्वरूप या समग म सहायता प्राप्त हाता है । वैदिक देवा तथा ईमाई देवा म यह प्रप्रिया देखी जा सकती है । अनेक देवता। का एक 'परमदेव' म समाहार और इमरे विपरीत एक देवता या अनक देव- ताआ म विभाजन प्राचीन धर्मो म प्राप्न एक्सरवाद और बहुदेववाद का प्रतिम्प माना जा सकता है । यह मारी प्रवृत्ति मिथिक चेतना की एक प्रक्रिया है जो भाषिक र पका पारण प्रकट हाती है । भाषा और मिथि के तत्वो म चाहे जितना भी जतर क्या न माना जाए, पर एक बात जो दाना में समान है, वह है मानसिक साल्पना का जारम्भिक स्प जहाँ से स्पयात्मर या शाब्दिक विचार-प्रक्रिया का सूत्रपात हाता है । मोक्षमूलर ने तुलनात्मक रूप मे मिथ का जो अध्ययन किया है, उसके मूल म भापा की यही स्पवात्मक शक्ति है जिसन व्यावरणात्मर लिंगा के द्वारा देश व मानवीकरण को मारार रिया । माक्षमूलर ने आय-दवताआ का अध्ययन मूलत इमी पद्धति के द्वारा दिया और वह इस निप्पप पर पहुंचा कि आय देवकुल अथवा वैनिक 'दवकुल (Pantheon) का निर्माण सूय, ऊपा और आवाश के चारा आर किया गया । यही प्रवृत्ति नीव देव-वुल के बारे में भी प्राप्त होती है जो यह तथ्य प्रक्ट करती है कि भापिक सकल्पनाएँ और मिथिक चेतना का एक गहरा सम्बध है-दाना एक दूसरे के पूरव है । यह तथ्य एक अन्य पक्ष की ओर सक्त करता है कि रूपकात्मा प्रक्रिया मिथ और भापा के बीच जाडन वाली एक बौद्धिक पडी है बार इस दृष्टि से 'रूप' (Metaphor) का एक अपना महत्व है।। मोक्षमूनर के इस विचार को रि मिथक' 'भापा की बीमारी है का प्रत्या- म्यान स्वाच विद्वान एड्रय् लैंग न किया और उसने यह मत प्रस्तुत क्यिा गि मिथ भापित विकृति या बीमारी नहीं है, पर वह 'मानवीकरण का पल है जो प्रारतिक और ब्रह्माडीय तत्या वा मानवीय रूप है । इस यह सस्कृति को जडात्म- चादी दशा (Animistic) कहता है जिसम जड पदार्थों और प्रति व्यापारी १ बिटानिका विश्वकाश, भाग १५, पृ० ११३४ २ माइथालॉजा, पेयरी मराडा, पृ० २३ मिथक की रूपकात्मक व्याख्याएं | १५ को मानवीय चेतना से युक्त दिखलाया जाता है और इस प्रकार उस पर मानवीय क्रियाओ का आरोपण किया जाता है । जडात्मवादी दशा एक प्रकार से धर्म की आरम्भिक स्थिति की ओर सकेत करती है जिसमे भय और आश्चय के मनोभावा ने प्राकृतिक व्यापारो और शक्तिया को एक 'दिव्य' और 'पवित्र' रूप में रूपान्तरित क्यिा । इस प्रकार एक पविनता की भावना का आरोप इस मानवीकरण प्रक्रिया में प्राप्त होता है । ई० वी० टेलर तथा फ्रेजर ने भी अनक उदाहरणो तथा आदिम जातिया की प्रथाओ के विश्लेषण के द्वारा जडात्मवादी प्रवृत्ति को बल प्रदान किया है और मानवीकरण की प्रक्रिया वो आदिम प्राग- ताविक शक्ति से सम्बन्धित स्यिा है।' इस नवीन दृष्टिकाण ने मिथ के तुलना- स्मक अध्ययन का भी सूनपात किया जिसम मोक्षमूनर तथा ई० सिके (१९०७) के द्वारा स्थापित एक संस्थान ने इस तुलनात्मक अध्ययन का एक वैज्ञानिक आधार प्रदान किया । इस तुलनात्मक अध्ययन में प्रत्येक शब्द एक सवाक् चित्र था और उसकी एक व्युत्परक व्याख्या ही माय थी। पहले शब्द अपन मूल या व्योत्पत्तिक' अर्थ म प्रयुक्त होते थे जो मूलत ध्वयार्थ के द्वारा अपने अर्थ को सकेत करते थे । उदाहरण के तार पर यह क्थन ले कि 'मूय ऊपा का प्यार करता है'---इसमे आदिम मानव के द्वारा सूय के उगने का एक ध्वयात्मक साक्षात्कार था । यह शब्द का अयार्थक प्रयोग तुलनात्मक अध्ययन का आधार बना और इस प्रकार मिथक और भाषा के शब्दा का एक गहरा सम्बध प्रकट हुआ। यह तुलनात्मक पद्धति अत्यात लोकप्रिय हुई, पर इसम एक कमी भी था। समस्त मिथिव चेतना का थाडे से भाषिक परिवतना और कुछ शदा के आधार पर कदाचित् व्याख्यायित करना मिथक के व्यापक सदभ का नजर- अन्दाज करना है । इस कमी का समाजशास्त्रियो और मानवशास्त्रिया न कम किया जिन्होंने मिथक का सामाजिक सदभ प्रदान किया और सास्कृतिक प्रक्रिया म मिथक के महत्व को समक्ष रखा। १ टेनर ने १८७१ मे 'प्रिमिटिव क्ल्बर' तथा जर न 'गाल्डन बा' का प्रकाशन किया जिसम इम प्रवृत्ति का विश्लपण प्राप्त हाता है, पर य पुस्तके तत्वशास्न से अधिक सम्बधित है। यहाँ पर इनवा समेत प्रसगवश है क्योयि भापा स भी इसवा गहरा सम्बध है। २ लोक साहित्य और संस्कृति, डॉ. दिनेश्वर प्रसाद, पृ० १३ ३ इगरा विवचन यथास्थान आगे पिया जायगा।

१६ / मिथर दर्शन का विकास अस्तित्ववादी दाशनिक वैशिरर ने मिय और भापा से सम्बध यो एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करने का प्रयत्न लिया है। शिरर के विचारा में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि उसने यह स्वीकार किया कि मिय और भापा के तत्वा (contents) म चाहे कितना ही अन्तर क्या न हो, पर एक बात जा दोना में समान है, वह है एक प्रकार की मानसिक सकल्पना जो दाना म प्रियाशील है । यह मानसिा सकल्पना एप ऐसी प्रिया है जामिय भापा के अयाय सम्बध ना रखाषित करती है और यह स्पष्ट करती है कि मिथ और भापा के बीच की बडी 'रूपर' हे क्यानि रूपर-तत्व, शब्द की एक ऐसी शक्ति या गुण है जा जपन अर्थ के द्वारा भाया और मिथ के परस्पर सम्बध का रेखावित करती है। शब्द का यह गुण एक ऐसी धराहर है जो भापा, मिथ स प्राप्त करती है और मिय की सरचना म शब्द की प्रतीति उसके मौलिक रूप में और जाधा उसके स्पान्तरित रूप में होती है । यह स्थिति यातु और टेबू (तथा टोटम) म दखी जा सकती है जहा शद का स्वरूप और उसके गुण की प्रतीति उसके मौलिक और रूपान्तरित प म प्राप्त होती है। यहाँ पर जगत के प्रति एक यातुय दृष्टि का परिचय प्राप्त होता है. क्यारि यातुक क्रिया म शबा के द्वारा प्रकृति और वस्तुआ पर अधिकार किया जाता है।' उपयुक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि मिथ और भाषा दो भिन्न प्रकार की क्रियाएँ हैं, पर उनका उद्गम एव ही प्रकार के प्रतीकात्मक और रूपकात्मर क्रियाजा स हुआ है अथवा उनमा सम्वध एक ही प्रकार की मान- सिक क्रिया स ह । इम मानसिक उद्वेला म विषय और विपयो का आपसी सम्बध प्राप्त होता है। यहा पर जाकर शिरर ने प्रतीक्वादी तक शास्त्र का आधार लसर नान- मामासा को प्रस्तुन रिया । प्रतीक्वादी तक्शास्त्र की यह मा यता है कि हमारा मानस दो प्रकार की समाना तर स्वतत्र प्रक्रियामा म कार्य करता है-एक सैद्धातिय या वनानिक (ताविक) और दूसरे मिथिक चेतना । प्रथम क्रिया का स्वरूप विश्नेपणात्मक हाता है, तो दूसरी ओर मिथिक सक्ल्पनाना का स्वरूप सश्लेषणात्मन होता है । मियिक सकल्पना म मानमिम वृत्त विस्तृत न हावर सघनता की आर अग्रसर होता है अथात् मिथक सकल्पना म 'सघनन' की प्रवृत्ति प्राप्त हाता है । दूसरी आर, ताकि सकल्पना म तथ्या का विवचन १ इस पक्ष का पूरा विवचन यथास्थान नाग दिया जाएगा।

मिथक की रूपवात्मा व्याख्याएँ। १७ और विश्लेपण प्राप्त होता है।' भाषा म चितन की ये दोना प्रक्रियाएं प्राप्त होती है । अत यह कहा जा सकता है कि अपन मूल म्प मे भापिक सकल्पना मियिक सकल्पना है। इस मिथिक सकल्पना म समस्त प्रकाश एक केन्द्रीय बिंदु मे सपनोवृत हो जाता है और यह विन्दु 'अर्थ' या प्रतिस्प हे जहाँ स मिथ का अर्थ प्रकट होता है। इस वे द्रोय 'अथ विन्दु' के बाहर जो कुछ भी रहता है, वह एक प्रकार से अदृश्य रहता है । यहाँ पर यह ध्यान रपना आवश्यक ह कि केन्द्रीय अर्थ के पिन्दु से जा बाहर वा इतिवृत्त है, वह अदृश्य रहबर भी (अथ की दृष्टि से) उसी के द्रीय निन्दु का इतिवृत्तात्मक विस्तार है जो मेरे विचार से मिथिर चेतना का एक अभिन्न अग है। वे सिरर ने इस 'अदृश्य' शब्द के द्वारा एक भ्रमात्मव स्थिति को ही जम दिया है क्यानि इसके स्थान पर यदि 'इति- वृत्त का प्रयोग किया जाता ता मिथिक चेतना के सही एव सार्थक स्वरूप का निग्दशन हो सकता था। भापा और मिय के बारे म एक अन्य महत्वपूर्ण तत्व की ओर कैसिरर न अपना मतव्य प्रक्ट लिया। उसका यह कहना है कि मिथ और भाषा में जो अवधारणाए (या सक्रपनाएँ) ममाहित रहती हैं, उह विस्तार के रूप म ग्रहण न कर 'तीव्रता' के रूप में स्वीकार करना समीचीन है। दूसरे शब्दा म इन अवधारणाआ को मात्रात्मय (विस्तार) रूप म न स्वीकार कर गुणात्मक (तीव्रता) रूप म ग्रहण करना चाहिये । यह बात सही है कि मिथिक और भाषिक अवधारणाआ का अथ वैद्रीय और गुणात्मक होता है क्यापि मिथक का एक अपना गुणात्मक और तीन अर्थ-मधनन होता है, पर जैसाकि कहा गया कि मिथिक में यह अर्थ सघनन केन्द्र मे रहता है और इस पेद्र के चारा ओर इनिवृत्त का विस्तार या इसे मात्रात्मा म्प भी कहा जा सकता है, भी रहता है जो वे द्रीय अर्थ या तीनता देता है। अत मेरे विचार से विस्तार या मात्रात्मक अग का मिथिर चेतन म एक सापक्ष महत्व है जिसे एक प्रकार से, साधन रूप मे लिया जा सकता है क्यापि इस विस्तार का लक्ष्य केद्रीय अथ का अधिक तीव्र और सघन करता है। इस तत्व के द्वारा ही मिथको का काल मी सापेक्षता म और युग के सदर्भ में जथ का रूपातरण या विवेचन प्राप्त होता है जा मिथ या 'लाच शक्ति' का परिचायक है। १ लेंगवज एण्ड मिथ, कैसिरर, पृ० २७-२८ २ माइथोलाजी, स० पियरी मराडा, पृ० २८ २ ४ | मिथक को मनोवैज्ञानिक व्याख्या १ मानसिक क्रिया और मिथक का सम्बध आधुनिक वैचारिक इतिहास मे मनोवैज्ञानिक प्रत्यया और विचारा का महत्वपूर्ण स्थान है और इसने मानवीय प्रियाआ और शक्तियो या एवं नया विवेचन प्रस्तुत किया है । मानसिक वियाआ का एक तार्किक विश्लेषण और मानव विकास से उसके सम्बध का रेखाक्ति र मनोवैज्ञानिक अध्ययन ने मानव-मन ची अतल गहराइयो का साक्षात्कार किया है । इस अध्ययन तथा खोज ने मानवीय-क्रियाओं को समयने का एक नया जायाम उद्घाटित किया और साथ ही, मानस और परिवेश के नापसी सम्बध और प्रतिनियाआ को इस प्रकार प्रस्तुत किया कि उनके द्वारा मानसिक और परा-मानसिक शक्तिया का एक 'जाश्चयजनक' और रहस्यपरक (रहस्यवाद नही) लोक का क्रमिक उद्घाटन हुआ। यह उद्घाटन मानव-मन के क्रमिक विकास में परिलक्षित होता है जिसके द्वारा जादि मानव स लेकर आज तक के मानव के विकास को समझा जा सकता है जो प्रत्यक्ष रूप से मानव के वैचारिव इतिहास को जामिक रूप से रेखाक्ति करता है। आदिम मानव (प्राचीन मालव) ने मन की इम वैचारिक शनि का प्रशन (जिसे कैसिरर तथा लीवी पहल | प्रारताविक विचारा की सज्ञा दी है) अनेक नियाना तथा सृजनाजा के द्वारा प्रस्तुत किया। मिथ, प्रतीक, यातु और धम के अनेक प्रारम्भिक विचारा की पृष्ठभूमि म मा की इसी सृजनात्मक प्रिया का परिचय प्राप्त हाता है । इस मानसिक क्रिया का महत्व इसी सृजनात्मक-शक्ति म निहित है जिसन मानव के वैचारिक-इतिहास को जनेक 'रूपा' मे विकसित किया। ये 'रूप' ही व प्रारम्भिक विचार और अवधारणाएं है जिसने अनेर पान-क्षेत्रा (जैसे धम, मिथ, गणित, इतिहास आदि) का जम दिया और साप ही मानसिक-प्रबियाना की अनेक जायामी 'गतिशीलता' को रसाक्ति क्यिा । मिथ और धर्म भी इस गतिशीलता के एक आयाम की ओर सक्त करते हैं जिसके स्वरूप और सुजन प्रक्रिया को मना- वैज्ञानिक अथवा मनोविश्लेपणवादी दृष्टि से विवेचित समझा जा सकता है। मिथिव चेतना का विवेचन और उसव विकास का एक मानमिव प्रिया के मिथक को मनोवैज्ञानिक व्याख्या | १६ रूप में देखना जिसमे वाह्य जगत के प्रति एक सवेदनात्मक 'उत्तेजना' का रूप भी प्राप्त होता है, सत्य में मानव-मन की उस 'शक्ति' की ओर सकेत करता है जिसे मैंने 'सृजनात्मक' या 'प्रास्तार्किक' शक्ति की सज्ञा दी है। २ मनस का विभाजन उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि मिथ, धर्म तथा अय मानवीय- क्रियाओ का सम्बध मानसिक-क्रिया से है जिसका मम्बध 'चेतना' से है। मनम (साइकी) के दो जग है-एक 'चेतन' और दूसरे 'अचेतन' जिसके बारे मै फ्रायड और युग ने अपने तरीके से विचार किया है । फ्रायड ने 'मनस' (व्यक्तित्व) के तत्वा का विभाजन 'ईड, इगो और सुपरइगा' म किया है जबकि युग ने मनस का विभाजन चेतन, व्यक्तिगत अचेतन और सामूहिक अचेतन के रूप में किया है । मनस का इन तीन उपभागो में विभाजन युग की विचार- धारा का एक अत्यन्त महत्वप्ण तत्व है जिसने मानसिक चिकित्सा के क्षेत्र म और मिथ-सृजन के क्षेत्र म ममान ल्प से योगदान दिया है।' व्यक्तिगत-अचेतन के बारे में यह मा यता है कि वह अचेतन की ऊपरी सतह है । सामाय रूप से यह माना जाता है कि ऐमी बहुत सी वस्तुएं होती हैं जो अचेतन में एकत्र होती जाती हैं जैसे ऐसी स्मृतिया जो विस्मृत हा गयी हैं, ऐसी प्रवृत्तिया तथा इच्छाएं जो दमित हो गई हैं तथा ऐमी वामनाएं जो समाज मे (क्सिी कारणवश) पूरी नहीं हो सकी हैं। ये सभी तत्व मिलकर जचेतन की 'जटिलताओ' का निर्माण करत है । य दमित तत्व कभी भी चेतन नही होते हैं, वरन् इनका प्रयत्न यह होता है कि वे चेतन स्तर को सदैव आदोलित परन की ओर गतिशील रहते है। बहुत सी वस्तुएँ जो अचेतन की गहराई' म आरम्भ हाती है, वे क्रमश चेतना के ऊर्ध्व स्तर की आर बढती हैं जो यह स्पष्ट करती हैं कि चेतना के नीचे न जाने कितने समय से एक निरन्तर विकास होता जा रहा है और वासनाएं तथा इच्छाएँ अचेतन म दीर्घ काल से एकत्र हाती रहती हैं और तव वही इसके बाद वे अपा 'पभाव' चेतन-स्तर पर दिखाने म समर्थ हाती हैं । इस प्रकार, अचेतन का यह ऊपरी स्तर विमी व्यक्ति के उस रूप की ओर सकेत करता है, जो वह एक (चेतन) रूप में है। दूसरे शब्दो म अचेतन की यह ऊपरी सतह' । तथ्य १ माडर्न साइयालॉजी, डेविड फाक्स, पृ० ७७ २० मिथक दर्शन का विकास किमी मानव के व्यक्तिगत गुणा से सयुक्त होती है और इसी से युग इसे 'व्यक्तिगत अचेतन' की संज्ञा देता है जो प्रत्येक व्यक्ति मे भिन्न-भिन्न होती है। ३ सामूहिक अचेतन और मिथक सृजन हम यह दर आए हैं कि मनस-शक्ति, अचेतन के द्वारा ऊर्ध्वगामी (या आराहणशील) होती है जब तक कि वह अतत चेतना में प्रविष्ट नहीं हो जाती है । जब प्रश्न यह उठता है कि ये मनस् नत्व कहाँ से जान हैं, ता यह माना जा सकता है कि वे अचेतन के क्सिी गहरे स्तर से जाते हैं। अचतन के इस गहरे स्तर को 'सामूहिक अचेतन' की सना दी गयी है। हमार जीवन म ऐसी आय घटनाएं घटित होती हैं जो मामहिक अचेतन की अभिव्यक्तियों है । यहाँ पर यह ध्यान रखना आवश्यक है कि सामूहिक अचेतन के तत्व उसी प्रकार प्रकट होत हैं जिस प्रकार अचेतन के जन्य तत्व अथात् विचार, अभिवृत्त और व्यवहार । इसके अतिरिक्त व्यक्तिगत और सामूहिक अचेतन के प्रक्टी- करण मे एक अतर भी है और वह यह कि सामूहिक चतन की अभि- व्यक्तिया अय अचेतन तत्वा के विपरीत अधिक विचित और विपम हाती है, उनकी यह विषमता इसलिए भी अधिक होती है कि उह मनम् चेतन म कही अधिक प्रतिरोध सहन करना पडता ह और इसी कारण ये तत्व स्वप्न, दिवा- स्वप्न और अनेक प्रकार की मानसिक विकृतिया और हलचलो म पान्तरित होते रहते हैं। सामहिक अचेतन का प्रकटीकरण एक प्रकार से 'जीवन से भी विस्तृत' है और स्वप्न तया फैन्टेसी, जा सम्भाव्य की अपेक्षा असम्भावित से अधिक जुडी रहती हैं, सामा यत मानव जीवन म एवं आम घटना है। दूगरी जोर ऐमे दिया-स्वप्न जो सर्वशक्तिमान (विश्व म) यी भावना से अनुपरित रहत है और जीवन तथा मृत्यु की शक्ति से अय व्यक्तिया वी सापक्षता म गतिशील रहते है-म उदाहरण नेमगिर बम, उ मा तथा विक्षिप्तता यो तशा के अधिव निकट हाउ हैं । रावण का जगन का सर्वशक्तिमान मानना, हिरण्यकश्यप या अपना इम बदर महान जिशाली मानना कि उमो आग 'परमदव' भी नतशिर है और आल्ड टेम्टार में जोसफ का यह स्वप्न जहा तर यह १ सादवानाजी आफ् अनसाशेस, युग, पृ० १५ मिथरी मनावशानिर व्याख्या | २१ पल्पना करता है कि उमी सामने, सूर्य, चद्र और नक्षत्र नमन कर रहे हैं- एसे अनव उदाहरण अचेतन की प्रिया स सम्बंधित हैं जो यथार्थ जीवन से कही अधिप विस्तृत है। 'जीवन से भी वः दन गुणा भी अपक्षा मामूहिर अचेतन को अभि- व्यक्तिया इतनी व्यापक है निवे बार-बार मानवीय इतिहास म घटित हाती रहती हैं । यह युगो ही प्रयला वा फल है पि अनव मनाचिकित्मक अपने पगमर्श वभा मे उा तय्या और रहस्या को प्राप्त कर सके जिनकी समाना तर समानता प्राचीन प्रथा और प्राचीन धार्मिक पद्धतिया म प्राप्त होती है । इन वक्षा म जनक रागिया व स्वप्न और फैन्टेसी जो जीवन स भी बडे गुणा के दस्तावेज है और जिन जीवन स इनका गहरा महत्व है-इनकी समानता ऐसे पिम्बा आर पिचारा से है जो हम मिथ और धम म भी प्राप्त होते हैं। सामूहिर अचेतन की अभिव्यक्तियां अधिकतर स्वप्न और फैन्टेन्सी मे ही होती हैं, इसका कारण यह है कि यथार्थ जीवन की चेतन-प्रक्रिया से ये तत्व बहुत वम नियत्रित होते हैं । सामूहित अचेतन के प्रकटीकरण में एक अय तत्व की आर ध्यान आपित करना आवश्यक है जिसका सम्बध मिथ और धम से माना गया ह और यह तत्व है-इन अभिव्यक्तिया की अर्थवत्ता 'व्यक्तिगत' न होकर सामाय या 'सामूहिक' महत्व को हाती है। दूसरे शब्दो में, इनका सम्बध प्रत्येर व्यक्ति म है जैसे 'माता' का अस्तित्व, जम लना, सूय या ताप और उसकी अपार शक्ति, मृत्यु आदि की घटनाएं जो अनेक विम्बा और भावो के द्वारा ससार भर म प्राप्त होती है, इसे ही युग ने सामूहिव अचेतन की अभिव्यक्तियों कहा है ।' सामूहिक अचेतन की अनेक प्रकार की अभिव्यक्तिया एसी भी हैं जो मानव-सस्कृति म इतनी महत्व की है कि उह सास्कृतिक प्रक्रिया से अलग नही किया जा सकता है। इनम से सबसे महत्वपूण नायक या 'हीरो' की भावना है जो अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए अनय वाधाना पर विजय प्राप्त करता है, सृष्टि की भावना, निरपेक्ष पाप और पुण्य की भावना, तथा सभी व्यक्तिया की 'परम माता' की भावना-ये सभी तत्व प्रतीर और मिथ के सृजन म अपना योगदान देन रह है। ये सभी भाव या विचार तर्कना-शक्ति से अधिक अनुशामित नही रहत हैं और इसी , ये स्वप्न १ माडन साइकालाजी, डेविड वाक्म, पृ० १४ २२ | मिथा दशा का विकास . में रूपान्तरित होते हैं और चेतन 'फैन्टेसी' में बाप्पीटत हो जाते हैं। यह सारी प्रत्रिया मानव मन की यह अद्भुत और आधारभूत प्ररिया है जिसने धर्म और मिथ यो जम दिया। मानव की अनेक प्रियाएं शुभम य इसी प्रतीकात्मक पातरण पर विरमित हुई हैं। सामूहिक अचेतन को मनस् वा गहरा स्तर माना गया है और युग ने इसे "विषयगत या 'यस्तुपरव' (objective) माना है। इसस उसका तात्पय यह है कि यह स्तर व्यक्ति के विषयोगत (subyectuc) जीवन पर आश्रित नही है । और माय ही, व्यनि के चेतन मन के द्वारा यह 'स्तर' नियन्त्रित नहीं रहता है-वग्न यह हमार जीवन या अपन तराव स प्रभावित करता है । ठीय उसी प्रकार जिस प्रकार शरीर में आतरिक अग (गुर्दे और जिगर) विना चेतन के निर्देश और मान ने अपना काय सम्पन्न घरते हैं। एससे यह स्पष्ट होता है रि मामूहिद अचेतन का क्रिया के फलस्वरूप जा विम्व और भाव उत्पन हाते हैं, उसके लिए हम उत्तरदायी नहीं हैं। एक जय कारण स भी हम सामूहिर अचेतन या 'वस्तुपरक' कह सक्त है कि यह प्रत्यर व्यक्ति के लिए समान है जार इस आधार पर इसकी तुलना वाह्य जगत से भी की जा सकती है जिसम हमारा जीवन प्रियाशील रहता है। इस प्रकार सामूहिक अचेतन एक मानमिक (या आत्मिक) पृष्ठभूमि अथवा वातावरण प्रस्तुत करता है जिसके अन्तर हम अपन चेतन जीवन का व्यतीत करत हैं और जा प्रत्येक व्यक्ति के लिए समान है, चाहे उन व्यक्तिया म व्यक्तिगत विभिन्नताएं क्या नहा मामूवि अचेतन और बाह्य भौतिक जगत 'सम्बध को लकर आगे भी विचार किया जा सकता है । सामूहिक अचेतन की अभिव्यक्तिया जहाँ एक आर विभिन्न व्यक्तियो के जीवन म घटित होती हैं, वहीं वे समूह के जीवन में भी प्राप्त होती हैं । इसका एक उदाहरण दा महायुद्धा के बीच हिटलर का उदय है । यह कहना वि हिटलर ने जमेन जाति पर अपन अतिवादी विचारो का आरोपित क्यिा, यह पूण सत्य नहीं है, पर यह भी सत्य है कि हिटलर न जमन जाति की आतरिक इच्छाओ और कामनाआ को एक ठोस अभियक्ति प्रदान की जो अभिव्यक्ति के लिये एक सामूहिन प म प्रयत्नशील थी। यही १ -फ्लिासफो इन ए न्यू की, सूसेन के० लेगर, पृ० ३३ मिथर या मनोवैज्ञानिक व्याख्या | २३ वाय राम न जन-वाहिनी के संगठन के द्वारा सम्पन्न किया और गांधी ने जन-मानस की इच्छामा का एक सगठिन साधार प्रदान दिया है। इससे यह स्पष्ट है कि एक ही प्रकार के अचेतन तत्व एक ही समूह या जाति के व्यक्तिया को प्रभावित कर सकी हैं। इसस यह भी सिद्ध होता है कि मनस् की उप- सरचना म व्यक्ति की सत्ता समाविष्ट रहती है जिसकी अभिव्यक्ति उसके द्वारा होती है । अत युग न सामूहिक अचेतन को पर्वत की शृहला कहा है जिसकी चोटियां व्यक्ति या चेतन मन है ।' एव विश्वजनीन सामूहिक अचेतन का भाव इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि इसके द्वाग ऐमा प्रक्रियाआ आर घटनाआ का समझा जा सकता . जिनका सम्बध एक से अधिक व्यक्तिया स होता है। मिथ और प्रतीक (धम) मा सम्बध इसा प्रक्रिया से है जो सामूहिक अचेतन और चेतन व्यक्ति के आपमी सम्बध का रेखावित करती हैं। ४ महामाता का मिथक यहाँ पर यह भी ध्यान रखना आवश्यक है जि सामूहिक अवेतन सदैव ही अचेतन रहा है और रहना चाहिये । मानवीय-विकास के दौरान जो वस्तुएं कभी सामूहिक अचेतन मे थी वे क्रमश चेतना को अग हो गयी, पर यह प्रक्रिया अत्यन्त जटिल और दीर्घकालीन है और यह सम्भव नहीं है कि सामूहिक अचेतन के तत्व कम समय म नेतना के स्तर तक आ सके, इसके लिए एक लवे समय की आवश्यकता है। यदि मूक्ष्म दृष्टि से देखा जाए तो सामूहिक अचेतन, अचेतन को वह पृष्ठभूमि है जो चतना को गहनता और शक्ति प्रदान करती है। यह गहराई और शक्ति मिथ-सृजन ती एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया ह जो काल के दीघ आयाम के अदर ही घटित होती है । उदाहरण स्वरूप 'महान माता' के मिथ (धारणा) का लिया जा सकता है । 'महान माता के भाव के चारा आर जो तत्व एकत्र हुए है, उनका सम्बध मानव अनुभव से है, विशपकर 'मानव मातृत्व' से है और दूसरी पार पृथ्वी पर आश्रित हमारे जीवन की अनर दशाएं जिसने 'पृथ्वी माता' और 'प्रवृति माता' को अभिव्यक्ति प्रदान की । मातृदेविया की कल्पना के पीछे भी इसी प्रक्रिया का स्वरूप प्राप्त होता है और धीरे-धीरे महान माता का मिथ एक पवित्र और दिय रूप में विकसित १ इस पक्ष या एक मुदर विवेचन डॉ० नगेद्र कोली के समक्था पर लिम्र गये उभी राजाबासीय याना धार होता हो। २ माडन साइकोलॉजी, १०८५ T २४ | मिथक दर्शन का विकास हुआ । धरती माता का एक अय रूप भी है जो प्रत्येक वस्तु को अपने अदर समेट लेती है जो उसके भयानक रूप को समक्ष रखती है । ऐसी भयानर देविया की कल्पना अनेक सस्कृतिया में प्राप्त होती है जैसे काली, दुगा आदि । 'माता' के इस स्प का भयानक निगलने वाला रूप भी कहा गया है जो जनेव भयावह प्रस्थापनामा की सृष्टि करता है जा माता के अदर पूर्ण रूप से आश्रित होने की भावना का व्यक्त करता है । सामूहिव अचेतन म अनेक ऐसे भावो में मध्य यह भाव भी उसी समय तक रहता है जब अय भावो से उसका सतुलन और व्यवधान रहता है, परन्तु यदि यह भाव (माता) चेतन स्तर तक एक वास्त- विक अभिवृत्ति के रूप म आ गया तो यह निश्चित है वि मानव जीवन अनेक अनैच्छिर विरूपणा तथा वितियों से ग्रस्त हो जाएगा । यथाथत ऐसी अवस्था में एक व्यक्ति कुछ ऐसी वस्तु म जपने का 'निगला' हुआ पाएगा जा माता-विव का प्रक्टीकरण हो । यह कुछ वस्तु स्वय उसकी माता हो सकती है, अथवा यह 'निगलने की प्रक्रिया पूर्ण समर्पण की अवस्था तक जा सकती है जहा व्यक्ति सारी निर्णय की शक्तिया और दशाआ को समाप्त कर लता है, जथवा वह जाज की विसगतियो (सभ्यता की) से पलायन कर एकाकी जीवन बिताने लगता है अथवा वह मानवीय माता का स्थानापन क्दाचित् 'पत्नी' में कर लेगा है और उस पर पूण तथा निरपेक्ष रूप से आश्रित हा जाता है। इस प्रकार हम देखते हैं नि सामूहिक अचेतन का प्रभाव व्यक्ति और समूह पर सकारात्मक और नकारात्मक दाना रूपा म पडता है । युग का तो यहां तक मत है कि सामूहिम अचेतन के तत्वा के प्रति जब व्यक्ति सचेत हो जाता है, तब उनसे वह जनक लाभ और शक्तियां प्राप्त करता है । यह भी सम्भव है कि जब सामूहिर अचेतन के तत्व चेतन स्तर तक गतिशील हाते हैं, तब महान कलात्मक कृतिया का, वैनानिक अनुसध का तथा अय मानवीयसजनामा का उदय हाता है । चेतन और सामूहिक अचेतन के मध्य यह गतिशील 'सवाद अनक महान सजनामा का जम देता है और यह तभी सम्भव है जय 'अह' इस स्थिति पर अधिकार कर सके, और यदि अह ऐसा नहीं कर सका, ता वह मामूहिक अचतन के तत्वा स स्वय अधिकृत हा जाएगा अथवा यह भी हो सक्ता है कि वह नष्ट हो जाए ।' 'अह' का इस प्रकार अधिकृत या नष्ट हा जाता, व्यक्तित्व को सण्डित कर देता है और वह अनेक प्रकार के मानसिक रागा का शिकार हो जाता है। १ साइकोलाजी आफ दि अनवांशस, युग, १० ४६ मिथर पी मनोवैज्ञानिय व्यान्या | २५ उपयुा विवेचन से एर गात यह सप्ट हाती है मि फ्रायड ने मिथ और प्रतीन का याम द्रित ही माना पर व्यापप स्पम और उसे इच्छाजनित विचार-परिया से जाहपर आरिम मानवता रो मम्बधित रिया। इसके विप- रीत युग न मिय और प्रतीर सा या ण्य व्यापप' आधार दिया और उसे केवल यौर-दिन 7 मानपर मनस् शक्ति के प म स्वीरार दिया। युग क लिए मिय एक मारि सुजन है जिसका महत्व विश्नेपणात्मक है। ये मिथ एव पीढी से दूसरी पीढी स यो प्राप्त हात रहते हैं और यह प्रक्रिया एक प्रकार स मानगिक सरचना के द्वारा ही घटित होती है। प्रायड ने 'लीविडा वा केवल काम भावना स सम्बधित कर, मिथ और प्रताप पो योन पेन्द्रित माना था, पर जैसा नि वहा गया नि युग न लीविडा' का जीवन ऊर्जा स सम्बधित पर मिय और प्रतीक यो व्यापर मानवाय सदभ प्रदान किया। मिथ और प्रतीव इस जीवन-ऊर्जा का जैव पार्यो म स्पान्तरित परत हैं। ५ 'आदिरूप' या 'आरिकीटाइप' का स्वरूप अचेतन से एक गहरा सम्बध 'आदिम्पा' (Archetypes) या भी है जो मिथिव नेतना ये अग भी मान जा सवत है। इन 'आदिरूपा का सम्बध मिथ से जोडा गया और इस प्रकार, मनम्-शक्ति ये एप जय महत्वपूण तत्व की जार समेत किया गया। व्यक्तिगत अचेतन उन मनप तत्वा का जपन अदर समाविष्ट क्यि रहता है जा चेतना ये द्वारा अग्राह्य और बहिष्कृत विय जान हैं। य अग्राह्य और दमित तत्व अय मनस तत्वा से सगुपित हो, शक्ति और वा रूप ग्रहण कर ला हैं और अन्तत अचेतन में 'जटिलताआ को उत्पन्न करते हैं। य जटिलताएँ एक प्रकार से 'नाभिकीय केद्र' वे चारा आर एकत्र हा जाता हैं जो जटिलतामा का एक सूत्र म बांधे रखती है और इस प्रकार इन जटिलतामा का एक ऊजा प्राप्त होती है जा व्यक्ति और समूह के मानसिक जीवन को अनेक स्पा से प्रभावित करती है। युग इही नाभिकीय वेद्रा का 'आदिम्पा' की सजा दता है जो सामूहिक अचेतन के प्रमुख मनस् तत्व हैं। ये प्रारूप या 'बानिल्प' मााच प्रवृति के मूल तत्व हैं और इनका अस्तित्व प्रत्येक व्यक्ति में प्राप्त होता है । अब प्रश्न यह उठता है कि ये 'जादिरूप' किस प्रकार अपना विस्तार करते हैं और अभिव्यक्ति का प्राप्त हात हैं ? मनम् ऊर्जा की यह एक सामा य प्रवृत्ति होती है कि उसकी अभिव्यक्ति अनेव 'स्पा' मे होती है, पर यहां पर यह ध्यान रखना भी आवश्यक है कि ये 'आदिप' नितात 'विशुद्ध' रूप में प्रकट नही ?

२६ / मिथर दर्शन या विधाम होते है । मत्य म य 'आनिम्प' अभिव्यक्ति को प्राप्त नही हात हैं, पर उनके चारा आर जा 'जटिलताएं' एपत्र हा जाती हैं, य जटिलताएं ही मनप कल्पनात्मक विम्या और प्रतीया के द्वारा अभिव्यक्त होती हैं, अथवा यह भी कहा जा सकता है कि य 'जटिलताएं मनुष्य के चेता-जीवन में व्यवधान उत्पत यरवे नाव म्पा म प्रस्ट हाती हैं। उपर्युक्त प्रप्रिया यो एक व्यक्ति कुछ इस प्रकार भी रामया सकता है। मान लीजिए कि आर लेखमा को एक थान के मूल तत्व या एक परिम के तत्व दिये जाते हैं जोर उनसे यह कहा जाता है कि इन लिये गये तत्वा पे आधार पर जपने तरीके स क्था का सृजन पर, तो हम पाएंगे कि प्रत्येक लेप की क्था और उसरे विवरणों में विभिनता होगी, पर इन सारी क्थाओ में एक ही मूल 'थीम' की समानता हागी। यही बात आदिरूपा के बारे में भी सत्य है। प्राचीन और आधुनिक धर्मों म, समस्त विश्व के मिथको आधुनिक मानव के स्वनाम और अनेक कल्पनाआ म य 'थोम' बार-बार प्रकट हात है, पर प्रत्यक बार, व्यक्ति, समय और दिक् की सापेक्षता म उनके रूप 'परिवर्तित होत रहते हैं। इसी से मियका का गतिशील पहा जा सकता है, उहे किसी भी जाति का 'जीवित स्वप्न' भी कहा जा सकता है क्यादि वे जाति के अचेतन म गहरे पैठे रहते हैं। मानव मनस के गहनतल म आदिम काल स प्राप्त अनुभवा का सघात रहता है और यही सधात उस जनुभव को एकत्र करना है जा मानव जीवन के मामा य तथा पुन पुन पटित होने वाले तत्वा की गाथा रहता है। इन आदिरूपा का एक अन्य काय भी है। ये उन मागों का प्रक्ट करत है जिनके द्वारा मनुप्य जपने बाह्य परिवेश से सम्बध स्थापित करता है जिसम वह अपनी जिगी व्यतीत करता है। उदाहरणस्वरूप मानव अपन परिवेश में नारी स साक्षात् करता है और उसस समानता और असमानता के धरातल पर अपनो सवारिता को बनाता है और इस प्रकार स्त्री स सम्बध स्थापित करने के लिए वह एक प्रकार के आतरिक झुकाव या अभिवृत्ति स प्रेरित हा उससे (नारो स) गम्बर स्थापित करता है। मानव की इस जाहिम इच्छा की पूर्ति एक 'आदिस्प करना है। ये जादिस्य एम रिम्वा और प्रतीका का जन्म दत हैं जिनको हम बाह्य समार म प्रक्षेपित करत हैं और यह तुलना करते हैं कि हम आन्तरिक विम्व के द्वारा वाह्य जगत स पिस सीमा तव सम्बधित हैं और माय ही बाह्य जगत के प्रति क्तिने माग हैं । अत यह स्पष्ट रूप से कहा जा मिथक की मनोवैज्ञानिक व्याख्या | २७ सकता है कि नादिरूप केवल मारी मनस्-शक्ति के स्रोत ही नही है, पर बाह्य जगत् के परिज्ञान एव बोध के स्रोत है जिस जगत् म हम रहते है। एक बात यहाँ पर यह ध्यान रखा आवश्यक है कि आदिम्पा का प्रक्षेपण एक एसी रिया है जो व्यक्ति निर्वाचित नहीं करता है, वह ता स्वय ही घटित हाती है । यह स्वय चालित प्रक्रिया मानव इतिहास मे आदिकाल से घटित हो रही है, अतर केवल इतना है कि जादि या प्राचीनकाल म इनका आधिक्य था और जाधुनिक काल मे अपेक्षाकृत इनको यूनता। इसका कारण युग न यह बताया कि मानव मनस् म एक परिवतन और विकास का लक्षित होना जो उसकी विश्लेषणात्मक बुद्धि का परिचायक है और यह वैज्ञानिक दृष्टि जादिम मानव मे उतनी विकसित नही थी जितनी कि वह जाज विकसित है । जादिम मानव प्राकृतिक घटनाआ को (वषा, गजन जादि) किसी देवता की क्रिया समझता था जिस हम आज वैज्ञानिक विधि से समझन का प्रयत क्रत हैं और यह 'समझ' आदिल्पा के प्रक्षेपण को रोकती है । मेरा यह विचार है कि आधुनिक मिथका का स्वरूप प्राचीन मियका से इस दृष्टि से भिन है और यहा पर आकर यह तथ्य स्वय स्पष्ट हो जाता है कि मिथर को एक अपना सार्वभौम सत्ता है चाहे उसके 'स्वरूप' और 'अथ' म कालक्रम के अनुसार भेट क्या न आ गया हो ? इसका यह अथ नही है कि नादिरूपो से मानव वा जाज साक्षात्कार नही होता है, पर सच तो यह है कि यदि उनका बाह्य जगत् म प्रक्षेपित रूप म (विम्ब व प्रताप रूप म) सामना नही होता है, तो आन्तरिक रूप म (मन म) उनका साक्षात होता है। यह आदिस्पा का आतरिक साक्षात्कार ततोगत्वा चेतना के स्तर पर अनेक आदि विम्बा, मिथको और प्रतीका के द्वारा व्यक्त होता है। यहा पर एक महत्वपूण समस्या सामने जाती है। किसी भी आनिरूप के साक्षात्कार के स्वरूप को विवेचित करन मे कठिनाई इसलिए आती है कि व्यक्ति पहले से कुछ पूर्वग्रहीत विचारा पर जाथित रहता है जो उसके लिए महत्वपूर्ण होत हैं। एक धार्मिक या रहस्यवादी व्यक्ति यह कहगा कि यह उसका 'ईश्वर' से साक्षात्कार है। एक अध्यात्मवादी यह कहेगा कि यह उसका 'आत्मा' से साक्षात्कार है तथा एक तवादी उसे एक 'गणितज्ञ-मन' के रूप म साक्षात्कार करेगा। इस प्रकार के 'अनुभव' सामा यत हमारी पहुँच के बाहर है, पर उनके लिए इन 'अनुभवा' का दूरगामी प्रभाव पड़ता है जो १ माडन साइकोलाजी, डेविड काक्स, पृ० १३६ - २८ मिया भी पा विराम इन पर जाम्या या । 'गया' पा राजगिर मानव-दनिहाग मापन गुमया राना म्यागा निगग मानव-मा 'गहग या' मा गग र गात ६ तार, आमय स पर, रागम सपरे और दृश्यमा गित गागर पार refrया जा राहै। गा मावि द्वारा हम नया मा व्यर्थ ही यह रापत है मयारिये भौतिाना र नहा मान है पर ता के द्वारा सनम 'स्यरूप' या विवचन अवश्य पिया जा सपता।। ६ कुछ महत्वपूर्ण मादिरप छाया उपयुत्त विवे एन ये प्रयाश म कुछ मह वपूर्ण 'आस्पिा' मी विवेचना आवश्यर है। सा ही एव आनिरूप है 'या' (दोहा)। यह हमारे अर एप गहरा या स्प है, एक प्रकार स पर अय 'स्व' जा हमम से प्रत्येर व अपर विद्यमान हैं जो भयर आर 'पापी व्यक्ति' या प्रतिस्प है। इस का सम्बध व्यतिगत ओतन स है। यहां पर यह ध्यान रखना आवश्यक है नि मनुष्य गरी 'शया पूर्णत पापमय ही है, पर यह पहला अधिा यायसगत हागा रि यह 'छाया' उन तत्वा स निर्मित हुई है जिरो व्यक्ति अच्छा या बुरा समझता है । म्यान म यह 'पापा' एव पाल पुष या स्त्री स्प म दियाई देती है और चित्रपट तथा दूरदशन पर एक उर मनुष्य के रस म मामने जाती जो नायर या'कीरो' के द्वारा पराजित हानी है । अत यह 'छाया' हमारे चरिण 1 एा जमिन अग है जा सदा हमार साय रहती है और मनर प्राति पाएर अनिच्छित और नाना भाग है । मेवल वे ही वस्तुएँ छाया प्रतिक्षेपित परती हैं जा तीन जायामिव हाती हैं। यहाँ पर युग का यह पयन विचार योग्य हरि यदि हमार पास य छायाएं नहीं हैं, तो हम पूर्णम्पेण 'मानवीय' नही है । जराल म, छाया का यह आनिरूप उन तत्वा स गठिन होता है जो हमार द्वारा बहिवृत हावर प्रमश दमित हो जाते हैं और इस प्रकार हावा दूषित प्रभाव हमारे जीवन पर पड़न लगता है। जत यह आवश्यक है कि हम इन 'बुर तत्वा ये प्रति पूण सचेत रहे और चेतन स्तर पर उनकीलालाधना कर सके। इस प्रकार हम जो भी युर या मूखतापूण जाचरण करते है, उनके प्रति हम स्वय उत्तरदायी और सचेत हो सके। य छायाए विभिन तत्वा स निर्मित होती हैं जा चेतन मन के द्वारा स्वीकृत नही होती हैं, जत यहा यह प्रकल्पा करना आवश्यक है कि एवं गहरा आनिस्पगत केन्द्रक मिथक वो वैज्ञानिक व्याख्या | २६ होता है जिसके चारा ओर ये छायाएं एषत्र होती हैं । इस 'वेद्रा' का 'राक्षस' पाप या बुरे का एक समष्टि रूप है जो सामाय रूप से बहुसख्यर लोगों से प्राप्त हाता है। इस संसार मे हमारा जीवन अधुरा माना जाएगा यदि हम जगत और मानव स्वभाव ये दाना क्षेत्रा म न पाप या बुर (शैतान) के अस्तित्व का स्वीकार नहीं करेंगे। सत्य म, यह शैतान जच्छे और पुण्य का अनय विराधी है, यह एक प्रकार से पाप या बुरे कर्मा या जतभत सिद्धात है--एक ऐमा पाप जा घृणा याग्य है, पर 'पापी' स्नह याग्य है। यह शैतान विसी न पिसी रूप में समस्त धर्मों और मिया म प्राप्त हाता है । मानव इतिहास में मिा विकास का दृष्टिपथ पर रखकर एक अय महत्वपूर्ण आदिस्प का विवेचन आवश्यप है जा स्त्री और पुरुष के काम- आरपण और सम्बध पर आधारित है । वुरे 'स्व' (छाया) के साथ ही प्रत्येक मनुष्य म एव स्त्री पर है और प्रत्येक स्त्री म एव पुरष पक्ष है। अनेक स्त्री पुरुप इस 'अन्य' पक्ष के प्रति नकारात्मक रहते हैं अथवा उसे स्वीकार नहीं करत हैं । सामान्य रूप से ऐमा पाया गया है नि पुरुष की कल्पना और पैटसी मे नारी का बिम्ब छाया के साथ आता है आर युग ने इस रिम्य को 'मनीमा की सज्ञा दी है ।' अनीमा का गठन पुरण के स्त्री-पथ पर नाधारित है जो पुरष के उस जनुभव म सम्बन्धित है जो वह वास्तनिक नारी के सम्बध से प्राप्त करता है । 'मीना या जादिस्प यह भी स्पष्ट करता है कि पुरुष अनाटियाल म नारी के प्रति जिनामानित मनोभावा से जापित हाता रहा है और वह अपने म कभा पूर्ण' नहीं रहा है । यह आदिरूप पुरूष का नारी के समर्ग को भार प्ररित परता है और विसगति उस समय उत्पन होती है जब मनुष्य के इस दूमरे नारी पक्ष को अस्वाभाविक रूप स दमित दिया जाता है । नारी ही वह एष और 'अय' है जो उसकी जावश्यक्ता है जिसके बगर वह अधुरा है । यह 'पक्ष' प्रत्येक चतन व्यक्ति का एक अभिन्न अग है। मनुष्य म अनीमा एक नारी व्यक्तित्व के रूप म पक्ट हाती है, परन्तु नारी म अपक्षाकृत एसे व्यक्तित्व प्रधान एक पिम्ब का अभाव रहता है । नारा के स्वप्ना और करपनाआ म पुरुष के अनेक विम्बा वा समूह प्राप्त होता है अथवा व्यक्तिवादी पुरपा के अनेक बिम्ब समक्ष जाते हैं । असल मे स्त्री और पुग्प की अभिवृत्तिया म यह विराध अचेतन स्तर पर ही प्रियाशील रहता है जार चेतन स्तर पर आकर उसका स्वरूप विपरीत हो जाता है। सामाय रूप से १ माडर्न सादवालाजी, पृ० १४४ ३० मियर दर्शन का विकास नारी अपनी इच्छा से पूण समपण एक प्रभावशाली व्यक्ति या वस्तु ये पनि वरती है जवनि पुरुष अपक्षात पाप वस्तुआ के प्रति प्रेरित होता है । य परिस्थिति अचेतन म नितात उल्टा या विपरीत हा जाती है। यही कारण रि पुग्प की अपेक्षा नारी में अधिर स्थायित्व हाता है जहा तर यौन य पाम सम्बधो का प्रश्न है । पुम्प में, जिसे 'अमीर' मी मना दी गयी है नारी म उस 'अमीनम' बना गया है। यदि मानव जीवन में इह एक स्वस्ट और प्रेरणादायर स्थान दिया जाए, ता यह निश्चित है कि नारी और पुरु- के योन सम्बना म एव सजना मर अभिवृत्ति पा स्थान हा मरता हज क्वल 'वासना' पर जाधारित नहीं होगा। इस तथ्य का टूमर शब्दाम रख जाए तो कहा जा सकता है कि पुष्प 'अमीना' को नारी पर प्रतिक्षेपित करता है जिसने द्वारा यह उसकी ओर जार्पित होता है और इस प्रकार दाना के मध्य एव मम्ब च' का मूत्रपात होता है । दूसरी बार यही प्रक्रिया स्त्री के पक्ष में भी होती है और वह अपन 'अमीन्स' को पुरुर के प्रति प्रतिक्षेपित करती है। अमीन्स मादिरूप के स भ म 'महामाता' का आदिरूप एक महत्वपूर्ण मिथक के रूप म विमसित हुआ। माता का आदिस्प व्यक्ति के जम से सम्बधित है जो माता के वास्तविक रूप को प्रकट करता है जिस पर व्यक्ति का जीवन निभर करता है । माता का एक जय रूप पृथ्वी माता का ह जिसस समस्त जीवन का उद्गम होता है। अत इस आदिरूप व दो पक्ष हैं-एक दयामय व प्रममय स्प तथा दूसरा खतरनार आर भयवर रूप । धरती का दूसरा रूप इसलिए खतरनाक आर भयकर है कि वह अपने उमर म सभी कुछ को निगल जाती है तथा अपन जदर सबका पयवसित कर लेती है । यह भी कहा जा सकता है कि धरती से जीवन प्राप्त कर हम यतत मृयु के समय उसी म विलीन हो जाते है । इस प्रकार महामाता का आविरूप मूलत प्रम के मनाभाचो स सम्बधित है। महामाता के नादि स्प सार यातुधान का आदि रूप मा सम्वधित है। यातुधान का आदि रूप पुरुप के सिद्धाता वा जो नारा व मिद्वाता के तदस्प हाते है और जिनका सम्बध महामाता के आदि रम साता है, उन्हे मातु- धान के एक सूत्र म एक्त्र करता है। यह आदि रूप सत्य म, एक प्रकार से यौनगत यातुन प्रिया से सम्बंधित है जिसके द्वारा वह अपन परिवंश या जय या सिंचन करता है और इस प्रकार एस नए जीवन वा उत्पा करता है। - मिथक को मनोवैज्ञानिक व्याख्या ३१ चीनी तथा भारतीय विचारधारा में ये दानो महान् आदि स्प 'स्वग' और 'धरती' के द्वारा प्रक्ट किए गए हैं । स्वर्ग का स्प नियात्मक है जव कि धरती का स्वरूप ग्रहणशील है । इस प्रकार यातुधान का जादि म्प अपने चारा ओर उन तत्वा को एकत्र करता है जिनका सम्बध उन विचारा से है जो सत्य स्वरूप का साक्षात्कार कराते है । उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हाता हे कि आदि स्पा का सम्वध अचेतन से होता है । अचेतन से ये आदि रूप मनस् को प्रभावित करते है और मनुष्य को विपरीत स्थितिया म महत्वपूर्ण निदश देते हैं । यदि इन आदि रूपा की शक्ति को चेतन स्तर पर क्रियाशील होने का अवसर प्राप्त नही होता है, तब इन आदि रूपा की शक्ति एक व्यक्ति को या जय व्यक्तिया का खतरे म डाल सकती है । ऐसी दशा में एक व्यक्ति आदि रूप के द्वारा अधिकृत रहता ह और यह सम्भव है कि वह या तो बहुत अधिक या कम मानवीय हा सकता है। युग का मनोविज्ञान हम यह निर्देश देता है कि अचेतन मे प्राप्त आदि रूपा के प्रति हम सचेत रहे । आदिम मानव मे उपयुक्त दोनों प्रकार ने आदि रूप स्वग और धरती, देवता और दानव के रूप में प्रतिक्षेपित हात रहे हैं । इस प्रकार, मानव ने यातु जार अनुष्ठान के द्वारा देवताआ की सृष्टि जपन लिए की और वह यह तथ्य भी भली प्रकार जानता था कि देवता आर दानव मानव मन के दो अग है जिनस वह प्रभावित रहता है। देवता और दानव के आदि रूपा का प्रतिक्षेपण सही या साथ ही नहीं, पर एक प्रकार से आव- श्यक भी था क्याकि इनके द्वारा जो घटनाएँ घटित होती थी उनका समझने के लिए एक वैचारिक माडन की आवश्यकता आदि मानव का महसूस हुई थी।

५ | मिथक को समाजशास्त्रीय एव मानवशास्त्रीय व्याख्या १ वस्तुगत व्याख्या का आरम्भ मियर पी व्यापरता बार उसकी सारतिय अथवत्ता मा खारित करने लिए जहा स्परात्मकता और मनाविश्लेषण पा जाधार लिया गया, वहीं मिथर की व्याख्या या एक अय 'स्पून' न सामाजिा और मानवशास्त्रीय (नृतत्वशास्त्रीय) आधार प्रदान किया । यति व्यापक रूप म दया जाए तो मभी व्याख्या-गतिया का लक्ष्य मिथक ये रस्य और उसके जथ वो उद्- घाटित करना है, यह दूसरी बात है कि काई पद्धति भापा को स्वीकार करती है, तो दूसरी अचेतन के द्वारा मिथ-सृजन का समझने का प्रयत्न करती है । ये पद्धतियां विपयोगत दृष्टिकोण को अधिव महत्व देती है । आधुनिक काल में सामाजिक एव मानवीय अध्ययन के फलस्वस्प प्रत्यर मानवीय क्रिया को वस्तुगत दृष्टिकोण से विवेचित परने वा प्रयत्न किया गया और मिथक का भी इस दृष्टि स समयने का प्रयास हुआ है । यह मिथव की वस्तुगत व्याख्या वा एक ऐसा आधार बना जिसन आप विचार का आकर्षित किया और साथ ही, मिथ-सृजन के एक व्यापक स्रोत की आर सवेत किया । इस पद्धति ने जादिम जातिया और जनजातिया के रीति-रिवाजा पे आधार पर मिथका का सम्बध आदिम मानसिक्ता से जोडन या प्रयत्ल किया । यही काय युग और प्रायड ने भी क्यिा, पर उसे अचेतन मन से जोड कर Tथवा मिथ का अचेतन स्तर से सम्बधित पर उस आदिम सस्तार का एक अभिन आ माना । समाजशास्त्रीय और नृतत्वशास्त्रीय पद्धति न आदिम और वीलायी प्रथाआ और विश्वासा के विश्लपण और अध्ययन के द्वारा इसी दिम मानमिक्ता यो एक वस्तुगत आधार प्रदान किया। इस पद्धति ने आदिम जन-जातिया के अध्ययन के द्वारा उनका एक तुलनात्मक रूप भी प्रस्तुत किया जिसन विभिन देशा और भूखण्डा म रहने वाली आदिम जातिया में समानता और समानता को दिखाकर मिथ-सृजन की एक मियर की समाजशास्त्रीय एवं मानवशास्त्रीय व्याख्या ! ३३ 'समान' मानसिकता को चरितार्थ रिया। यही कारण है कि नृतत्वशास्त्रीय और समाजशास्त्रीय पद्धतिया ने मिथ को एक सामाजिक अर्थवत्ता तो प्रदान की, पर उसके सम्पूर्ण 'साम्यतिर' महत्व का पदाचित् रेखावित नहीं कर सका । फिर भी, इतना अवश्य वहा जा सकता है कि इस याख्या-पद्धति ने मानव की सजन प्रिया को एक एमा आधार प्रदान किया जो बहुत कुछ वैनानिव पद्धति का भी प्रभाव माना जा सकता है। २ जडात्मवादी प्रक्रिया-- इस व्याख्या-पद्धति वे व्रमिव विकास को समझने एव हृदयगम करन के लिए यह भावश्यक है कि हम इस क्षेत्र में पुछ विचारवा के मतो का विश्लेषण करेंगिहान इस व्याख्या-पद्धति का एक वैतानिक एवं सामाजिक आधार प्रदान किया । इन विचारका म एड्रयू लग, फेजर टेलर, मेलिनो- वम्बी और लोवी स्त्रास का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है । जैसा कि पहो ही सकेन दिया जा चुरा ह कि मिथिय चेतना का सम्बध भाषा और भाषिक सरचना स है और इस सदर्भ म मेक्समूलर या (माक्षमूलर भट्ट) की यह प्रस्थापना कि मिय-सृजन एक प्रकार की भाषिक विकृति जथवा बीमारी है, इसके विराध मे स्वामी विद्वान एड्रयू लेंग ने अपना यह मत रखा गि मिथ का सम्बध सस्कृति की जडात्मवादी (Animism) दशा से है जिसमे प्राकृतिक शक्तिया और वस्तुआ का एक आश्चर्य और भय की भावना से देखा गया और पनत उन्हें मानवीकृत रूप में प्रस्तुत किया गया । यह मानवीकरण को प्रक्रिया समस्त धर्मों और मिथका म किसी न किसी रूप म प्राप्त होती है । यही कारण है कि टेलर न अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'आदिम सस्कृति (Primitive Culture) म जडात्मवाद का धम का सबसे प्राचीन और आरम्भिक रूप स्वीकार किया है। इस अवधारणा का सबसे महत्वपूर्ण अश मिथक को दृष्टि से यह ह वि मिथव या सम्बध समस्त प्राकृतिक-शक्तिया से है, वह वेवल भूय और चन्द्रमा स ही सम्पत्ति नहीं है । मियक का सम्बध एक परार स सम्पूर्ण प्रकृति स है । मानवीकरण की यह प्रक्रिया अपने आरभिक स्प म एव जय तथ्य की जार सक्त करता है कि आदिम मानव ने प्रकृति १ प्रिमिटिव कल्चर, टेलर, पृ० ७-६० ३ ३४ मिथव दर्शन या विकास और उसकी शक्तिया को जानो का जो उपरम पिया, यह मिय और प्रतीक- सजन या एक ऐसा स्रोत था जिसने मानव को प्रातापिर-शक्ति या परिचय दिया ।' देवी-देवतामा यो अवधारणा में इस तथ्य का समेत प्राप्त हाना है जो एप प्रकार से पूजा-भावना आर टोटमवाद या जम द सकी। इस प्रकार स्पष्ट हाता है वि धार्मिक भावना विकास म जडात्मवार वा यागदान ता अवश्य है, पर मम्पूण धार्मिय एव पौराणिय चेतना का वैवल उसी वा विकास मानना 'यथाथ' और सस्कृति पी गत्यात्मक्ता ये प्रति आँख मूद लेना है। मुझे कभी-कभी ऐमा लगता है कि मानवशास्त्रिया और समाजशानिया ने मस्कृति और धर्म के सीमित अथ को ही ग्रहण किया है, उसरे व्यापर अथ-सदर्भ या प्रण नहीं किया है। जनजातिया और आदिमजातिया के अध्ययन से प्राप्त निष्पों का महत्व ता अवश्य है, पर केवल उही के आधार सस्कृति की व्याख्या करना, मस्टति के व्यापर अथ का एक प्रकार से नजरअन्दाज करना है। ३ यातुक अनुष्ठान और मिथक सामाजिक एवं मानवशास्त्रीय व्याख्या के अतगत एक अय स्वूर के विचारका ो महत्वपूर्ण योगदान दिया है जिसमा सम्बध जग्रजी तत्वशास्त्रियो से जोड़ा गया है । इस स्कूल के प्रमुख व्यक्ति थे सर जेम्स जार्ज फेजर, जैन हेरीसन और गिलबर्ट मूरे । इनम से फेजर का स्थान प्रमुख है यानि उसन सर्वेक्षण के आधार पर आदिम जातिया की प्रथाना और अनुष्ठाना (रिच्यूअल) का विश्लेपण प्रस्तुत किया जिसन मिय और प्रतीव की भाज्या वा एक वैज्ञा- निक आधार प्रदान किया। इन विचारका ने अनुष्ठान और यातु (जादू) का आधार बनाकर प्राचीन पूर्वीय और सीक मिथका का विवेचित करने का प्रयल किया और वे इस निष्पप पर पहुंचे वि इन यातुन गुष्ठाना के द्वारा मानव ने प्राकृतिक शक्तियो और वस्तुआ यो अपन अधिकार म करन वा प्रयत्न क्यिा, तो दूसरी ओर इन अनुष्ठाना के द्वारा प्रारतिर घटनाओं का भी समझने का प्रयत्न किया। इस दृष्टि से यह भी माना गया मि यातु का सम्बध और उसका स्वरूप विनान के रामरक्ष है जोर इमी से, यानुक अनुष्ठाना का आभासी विज्ञान १ इस शक्ति का सस्त मनावैमानिक व्याख्या के अतर्गत किया जा चुका है। २ हिमाइड जाफ प्रिमिटिव मैन, मी यास, पृ० २१ मिथक को समाजशास्त्रीय और मानवशास्त्रीय व्याख्या | ३५ (सूडो साइस) की सजा दी गयी।' दूसरी ओर यह भी सत्य है कि यातु एक विलक्षण और अद्भुत क्रिया है, पर एक यथार्थ क्रिया है जिसका लक्ष्य और उद्देश्य वैज्ञानिक है । यातुक प्रियाएँ और अनुष्ठान अपरिवतनीय एव स्थिर नियमा से अनुशासित होती है । इसी से फेजर आदि विचारका ने यातुक-अनु- प्ठाना को प्रकृति की व्यवस्था म एक यथार्थ और स्थिर क्रिया माना है जो अपने में एक विश्वास का रूप है । इस प्रकार, यातु अतिमानवीय जगत पर निय तण करने की शक्ति है जिसका प्रयोग शुभ या अशुभ कार्यो मे लिया जाए। इस दृष्टि से, यातु एक प्रकार का तन है (भारतीय शब्दावली मे) जिसके प्रमुख तत्व हैंशब्द, शब्दोच्चारण, यातुधान और इनसे सम्बधित कर्मकाण्ड या बियाएँ । इन यातुक अनुष्ठाना और क्रियाआ के द्वारा मानव और बाह्य प्रकृति के बीच एक प्रतिक्रियात्मक सम्बध स्थापित हुआ और साथ ही प्रति की भयावह और विध्वसक शक्तिया का प्रमन्न करने के लिए अथवा उन पर अधिकार प्राप्त करो के लिए उ होन एक 'माध्यम' को खाज की और उसकी मानसिकता की दृष्टि से एमे अभिप्राया और उनसे सम्बधित क्याआ का सूजन दिया जो उनके इस काय का सम्पन करा सके या कर सके । कुछ विचारका के अनुसार जादिमानव की यह जवस्था जब उसने प्रथम मिथका का सृजन किया, तब उसने अपो आर प्रकृति के वीव सभ्यध ही स्थापित नही क्यिा, पर प्रकृति शतिया का दिव्य रूप में आवाहा क्यिा । इस दृष्टि से, मानवशास्त्रियो का यह विचार है कि निए इरथत्म मानव प्रथम ऐसा मानव था जिसन मिथ सृजन का प्रारम्भ किया और इसी के बाद मिय और धम एक सामाजिक रूपम विव- सित हुए। फेजर आदि विद्वाना न अग्नि वृक्ष और आकाश पृथ्वी से सवधित अनुष्ठाना और उत्सवा के विश्लेपण के द्वारा यह दिखाने का प्रयत्न किया है कि अनुष्ठाना, उत्सवा और यातुक रीतिया का विवेचन मिय के द्वारा ही होता है अथवा इा अनुष्ठानो और उत्सवा मे मिथ ही प्रतीकीत हाते है । इस दृष्टि से मिथ और अनुष्ठाना पा एवं गहरा और अविच्छित सम्बध है। यदि १ ए एस आन मैन, मिरर, पृ०७४ २ दि गाल्डन वा, ए स्टेडी इन मैजिर ऐण्ड रेलिजन, फेजर, पृ० ११० भाग १, पुस्तक २ दि प्रिमिटिव रोहर, सम्पादव, जॉन ग्रीनवे, पृ० ६-७ इस प्रकार के मिथवा का विवेचन 'अनुष्ठानिक और यातुप मिया' के अन्तर्गत पिया जाएगा। mm ३६ / मिथप दर्शन पा विकास व्यापर दृष्टि से पहा जाए तो समष्टि रूप से यह कहा जा सकता है कि आदिम मानव यो मानसिकता म नक्षत्र, गूय, चद्र, वृक्ष, वन, मघ, अनि, ऋतुएं तथा देवगण आदि अपनी सारी नाटकीयता ये साय अभिनय करत प्रतीत हात हैं और कभी-कभी ऐसा लगता है कि यह नाटय धमपूर्ण है, पर असल म म घ्रम पीछे आदिम मानव की प्रागतापिर जवस्था और साथ ही, उनकी आस्था और विश्वाग का प्रतिस्प मिलता है। आदिम और प्राचान मानसिकता भी यह समानता यह तथ्य भी प्रक्ट करती है रिमानसिम विवास को समान परिस्थितियां एक ही प्रकार वे या उमस मिलन-जुलत मिथवा और आप्ठाना की सृष्टि करती है जा हम आदिम समाजा म तथा भारतीय रामी, ग्रीकी, और सेमटिव जानिया म प्राप्त हाती है। इससे यह भी प्रतीत हाता है कि अनुष्ठाना, यातुप रीतिया और सस्वारान मानव की दिव्य धारणा को भी विकसित किया और कुछ विचारया वा ता यहाँ तक मत है कि दिव्य भावना का आविर्भाव अनुष्ठाना से हुआ है और ब्रह्मशास्त्र का आविर्भाव मिथमा स हुआ है ।' यदि गहराई से देखा जाय ता दिव्यता की भावना जनु- प्ठाना म भी है और ब्रह्मविज्ञान (Theology) म भी प्राप्त हाती है, अन्तर केवल इतना है कि ब्रह्म विनान एर तार्किक प्रिया है जव fr अनुष्ठान एक प्रकार से कमकाण्ड है जिसम विश्वाम का गहरा पुट हाता है। मिथ का स्थान दीना में समान रूप से प्राप्त होता है । क्योकि मिथगीय सूजन अतत ब्रह्म- विनान और अनुष्ठान में अपना योगदान देता है। ४ अनुष्ठान और सामाजिक सगठन सैद्धान्तिक रूप से अनुष्ठाना और यानुग रातिय। का उपयुक्त महत्व एक अय तथ्य की ओर भी समेत करता है जो अपन प्रतीकात्मक अर्थ के साथ सामाजिक संगठन को आर भी सक्त परता है । अनुष्ठाना और यातुर रीतियो का यह सामूहिय महत्व इस बात में समाहित हे वि आष्ठाना और उत्मवा म मानव एक प्रकार से, सामूहिक शक्ति का अनुभव करता था। यह शक्ति, एप सीमित क्षेत्र म (जहा तक जातिम मानव का सम्पध है) उस समूह म रहने वाले व्यक्त्यिा वो जहा एकमूत्र म बाधती या, वही उह यह भी अनुभव कराती थी कि उनकी वैयक्तित शक्ति सामूहिर शक्ति स कही नीचा है। यदि गहराई से १ क्स्टम एण्ड मिय, एज्यू लैंग, पृ० २२ २ पिनाराफी इन ए यूवी, मूमेन चेंगर, पृ० १३० मिथक वी समाजशास्त्रीय और मानवशास्त्रीय व्याख्या ! ३७ देखा जाए ता यह आदि प्रवृत्ति व्यक्ति की सत्ता को अतिवान्त कर एक वृहत्तर या सामूहिक सत्ता की आर गतिशीन होती है और साथ ही, व्यक्ति का 'समूह' के प्रति एक दायित्व है, इस भावना को भी ज म देती है । ५ ठोटमवाद और मिथक सामाजिक चेतना के उदय म एक् अय मानवीय प्रिया का भी महत्वपूर्ण योगदान है जिसने पशु, पक्षी और प्राकृतिक वस्तुआ ये इद-गिर्द अपनी भावना और विश्वास को वेद्रित किया आर उस वस्तु आर जीवधारी को एक 'पविनता' की भावना से जोतप्रात पर उमे एक 'टाटम' के रूप म स्वीकार किया। श्री हावल, फ्रायड, फेजर, बाउन और गाल्डनवीजम के अनुसार गात्र (Clan) का नाम, जनेव' आदिम जातियो और जनजातिया क्सिी पशु, पक्षी, वन- स्पति अथवा प्राकृतिक पदाथ से लिया गया और गात्र (समूह) के सदस्य उस पशु या वस्तु के प्रति एक विशेष प्रकार का मनोभाव रखते थे जिसम पवित्रता और श्रद्धा का भाव समाहित रहता था । इस प्रकार 'टोटम' एक प्रकार से पूजा- भावना का विकसित कर सका और साथ ही उस समूह के व्यक्तिया को एक 'सगठन' प्रदान कर सका । यही नहीं एक टाटम-समूह दूसरे टोटम-समूह (गोत्र) से विवाह भी नही करता था और इस प्रकार एक टाटम दूसरे के लिए "टे' बन गया । यह प्रवृत्ति आदिम जातिया म सामाय रूप से प्राप्त होती है और अनेक प्राचीन सस्कृतियाम (यथा चीन, भारत, मिथ, वेवीलोनिया आदि) टोटम उपासना का स्वरूप अव भी सुरक्षित प्राप्त हाता है।' उपयुक्त विवेचन की दृष्टि से यह स्पष्ट होता है कि 'टाटम' एक प्रतीक है और 'टोटमवाद' एक सस्था है । दूसरे शब्दा म कहा जा सकता है कि टोटम की मस्थागत अभियक्ति 'टोटमवाद' है। इसी के आधार पर दुर्थीम ने टोटम- वाद को धर्म का प्रारम्भिक रूप माना है । यह मत पूर्ण सत्य नही है क्योकि धम न गोत्र है और न केवल वस्तुओ का रहस्य सबध । अधिक से अधिक यह माना जा सकता है कि धार्मिक चेतना के विकास म 'टाटमवाद' केवल एक तत्व के रूप म अपना योगदान दे सका न कि उसने धम का रूप ही ले लिया । १ इस पक्ष का पूण विवेचन 'टोटमो-मिथ' अध्याय के अतर्गत आगे किया जाएगा। २ सामाजिक मानवशास्त्र की रूपरेखा, रवीद्रनाथ मुखर्जी, पृ०४१० ३८ ! मियर दर्शन या विकास 1 धर्म, टोटमवार मे यही अधिक व्यापर और सारमाही मावीय दिया है। अधिक रो अधिप हम यह यह सक्त हैं fT 'टोटमवाद' विचार-प्रत्रिया वा एक 'प्रकार' है और इम दृष्टि से वह विचार (भाव) यो एक रूपकात्मक अभिव्यक्ति प्रदान परता है।' ६ टोटम और टैबू टाटम या अध्ययन आर उसरा विश्लपण एक श्रय तथ्य प्रक्ट करता है रि टाटम या अध्ययन टेवू' वे द्वारा पूरा होता है अयवा टाटम और टैबू एक दूसरे के पूरक हैं क्यारि जक्सर यह देखा गया है कि एक समूह का टोटम दूसरे टाटम का शत्रु हाता है जैसे मूपर विडाल, नाग-सर्प, वानर-हाथी आदि जिनका समेत हम अनय प्राचीन पुराणगाथाभा (मिथ) म प्राप्त होता है। मानव- शास्त्रिया का यह मत ह कि अनर दवताओ की अवधारणाआ म, (जैस 'गणेश, विष्णु दो जीवधारिया की अतभुक्ति इस बात को सूचक है दिदा जातिया का सम्मलन सम्भय हो सका जिसन अप्रत्यक्ष रूप से सामाजिक संगठन का बल प्रदान किया। टैओ का स्वरूप एक अय सत्य की आर सकेत करता है कि टैबू की धारणा में एक प्रकार का नकारात्मर घृणा का भाव अतनिहित रहता है और यही कारण है कि टैबू म सधप और द्वन्द्व का स्वरूप प्राप्त हाता है। उनाहरणस्वरूप अरर और सीरिया म सुअर को अशुभ एव घृणा की दृष्टि से देखा जाता है, ता गान, वेल्ट और स्पेंडीनविया मे सुअर को पवित्र माना जाता है, अत सुअर यहा 'टोटम' है और अरव आदि देशो में 'टेबू है। इस प्रकार हम दखते हैं रि टैबू में एक प्रकार का बजना का भाव समाहित रहता है और अनेक दक्षिण-पूर्वी जातियो (आदिम) जक्सर यह भी देखा गया है कि जिस वस्तु का वहा पर जभाव रहता है, उस वस्तु के प्रति (न प्राप्त हान के कारण) उनमे एक प्रकार का 'टेवू उत्पन्न हो जाता है। दक्षिण-पूर्वीय जनजातियो म मछली का न प्राप्त होना उसके प्रति टैबू का जम देता है और उसके न खान की बात क्रमश एक देवू के रूप म स्थिर हा जाती है। इसस यह भी सिद्ध हाता है जि टाटमिक एव टेवू मिथका में एक स्थिरता एव जटल मनोभाव के १ दि फिलासफी इन ए न्यू की, लेंगर, पृ० १३४ २ सस्कृति और समाजशास्त्र, डॉ० रागेय राघव, पृ० १२३ ३ द माइड ऑफ प्रिमिटिव मैन, पंज बॉस, पृ० २३५ - मिथक वी समाजशास्त्रीय और मानवशास्त्रीय व्याख्या | ३६ दर्शन भी होते है । यही नहीं यदि गहराई से देखा जाए तो टैबू सस्कृति के सबसे प्राचीन अनिखित कानून है । यदि किसी भी समाज में टैबुआ की प्रवृत्ति का देखा जाय तो वे अधविश्वास से लगते हैं, ता दूसरी ओर वे क्रमश हमारे सामाजिक प्रतिमाना को निर्धारित करते है। उपयुक्त विवेचन से एक अय तथ्य यह भी प्रकट होता है कि टैबू (और टोटम) की भावना का मूलम्रात जडात्मवाद है और सास्कृतिक विकास की उच्च दशाओ में इसका रूपान्तरण निर्वैयक्तिक यातुक शक्तिया म हुआ। देवू जहा एक और सामाजिर सगठन म याग दता है, वही वह नैतिकता की भावना का उत्पन करता है । यह सच है कि इस नतिक भावना का उदय नकारात्मक है और उसका स्वरप इस प्रकार का है जो आदिम मानसिकता को स्पष्ट करता है और साथ ही, सास्कृतिक विकास प्रक्रिया म एक भावनात्मक एव वैचारिक पृष्ठभूमि प्रस्तुत करता है । इस प्रकार हम देखते है कि मिथिक्- चेतना के विकास मे अनुष्ठान, यातु, टोटम और टैबू सभी का न्यूनाधिक रूप से योगदान रहा है । इसे और व्यापक रूप में कहा जाए, तो सास्कृतिक विकाम-क्रम में इन समस्त आदिम कही जाने वाली मन स्थितियो मे हमारी आज की अनेक अवधारणाआ एव मिथका का स्रोत प्राप्त होता है। ७ समाज, इतिहास और मिथक मिथ की सामाजिक और मानवशास्त्रीय व्याम्या सौरवादियो की व्याख्या से विपरीत है जो वह मानते हैं कि प्रारतिक घटनाएँ ही मिथ-सृजन की आधारभूमि है । जैसा कि सकेत दिया गया कि समाजशास्त्रीय व्याख्या यह मानकर चलती है कि मिथका का सात प्रति नही, पर समाज है । दुर्थीम, मेलिनावस्की और लीवीस्त्रास आदि समाजशास्त्रिया न इसी मत को विसी न विसी रूप में स्वीकार किया है । इन विचारवा के लिए मिथ एक ठास महत्व- पूण सामाजिक वास्तविकता है । आदिम जातियो के रीतिरिवाजा और उनके विश्वासा के आधार पर यह कहा गया कि जितने भी मूल अभिप्राय हैं, वे सामाजिक जीवन के प्रतिक्षेपण है, उनकी अभिव्यतिया है।' प्रवृति और अतोत, इन दोनो मे आदिम मानव की अभिरुचि अपन समाज को व्यावहारिव समस्याआ द्वारा उत्पन्न एव निर्धारित हुआ करती थी। सामाजिक व्याख्याकार मिथ को केवल सामाजिक व्यवस्था का सरक्षक मानते हैं। उनम इतिहासकार १ लार माहित्य और गस्कृति, डॉ. विश्वर प्रसाद, पृ० ११-१२ ४० मिपर दर्शन का पिवारा यी दृष्टि का याजना व्यर्थ है । इमी के आधार पर लीवी स्वास या तो यहाँ तब मत है शिआदिम जातिया म इतिहास-बोध नही होता है। परन्तु, यति गहराई से देया जाए ता आदिम कही जाने वाली परम्परामा और विश्वासा म 'इतिहास या स्वर' अथवा इतिहास का आभास अवश्य प्राप्त होता है । सास्कृतिम इतिहास के प्रमिव विकास मे इस आदिम इतिहास को बैम नजर- अदाज किया जा सकता है ? मिय जब एक प्रकार से सामाजिक जीवन व प्रतिरूप हैं या प्रतीक है, ता उनका अपना एक ऐतिहासिक महत्व है । बाचिन यही कारण है कि मिथ या पुराण का भारतीय विचारधारा म 'इतिहास' की सज्ञा दी गयी है ना वाह्य या भौतिय इगिहास के अतिरिक्त मानव के आतरिक इतिहास को प्रस्तुत करते हैं । इस दृष्टि स मिथिर चेतना का सम्बध व्यापक मानवीय क्षेत्र से है जिसमे याह्य और जातरिव सत्य का समागम होता है। सामाजिय एव सास्कृतिक दृष्टि स देखा जाए ता मिथ का एक अपना ऐति- हासिर महत्व है, यह दूसरी बात है काल और विश्वास परिवतन की सापक्षता म उनमे रूपातरण हा जाए। इस दृष्टि से मैलिनावस्की का यह मत कि प्रत्येक एतिहामित्र परिवर्तन अपने मिथ की क पना करता है, वह केवल आदिम-युग से सम्बधित नही है । असल म मिथ के व्यापक स्वरूप को प्रस्तुत करता है परन्तु दूसरी आर मैलिनोवस्की का यह क्थन वि क्सिी विश्वास, रीति या अनुष्ठान चे बदल जाने पर उससे सम्बद्ध मिथ भी समाप्त हो जाता है और उसके स्थान पर नए मिथा का विकास होता है, पूर्ण रूप से सत्य नहीं है।' इसका कारण यह है कि मिय कभी समाप्त नही हात है, उनका समय और विश्वास के आधार पर रूपातरण होता है वे नए सदों को सापेक्षता में रूपातरित हात हैं । यह तो अवश्य हो सकता है कि कुछ मिथको म, अय मिथको की अपेक्षा 'लोच' शक्ति अधिक हो जिससे कि उनका रूपान्तरण (नए सदर्भो म) अनक प्रकार स हो सका हो । इसी से, यह देखा गया है कि विसी भी जाति म कुछ मिथवा की सामाजिक प्रासगिकता अपेक्षाकृत अधिक होती है जो अपन समय की समस्याआ को अधिक तक्सगत रूप से प्रस्तुत कर सकने मे समर्थ होती हैं । इडीपस, जीहोवा, सैमसन, गिल्गमिश, नचिकेता, रामकृष्ण आदि से सम्बधित मिथका का महत्व इसी दृष्टि से अधिक है । सामाजिक एवं ऐति- हासिक परिवतन की सापक्षता म इनका पुनर्विवेचन समय-समय पर होता रहा है जो उनकी 'लाच शक्ति' का ही परिचायक है । इसी से, मिथिक चेतना १ एनसाइक्लापीडिया ब्रिटानिका, पृ० ११३३ मिथ को ममाजशास्त्रीय और मानवशास्त्रीय व्याख्या | ४१ - का स्वरूप 'गत्यात्मर' है और साथ ही, सागाय भावा और विचारा का आरम्भिव प्रतीकीकरण है।' इसी के नाधार पर मिथ का सम्बध विचार- प्रत्रिया से है और यह उसका एक ऐसा पक्ष है जो मिथ को जहा एक आर सामाजिक परिप्रेक्ष्य प्रदान करता है, वही उमे मानव के मानसिक इतिहास का एक अमित अग घोपित करता है । इस दृष्टि से मैलिनोवस्की की मिथित व्याख्या सामाजिक होते हुए भी अधिक व्यापक है और माथ ही यह व्याख्या मिय की सार्वभौम सत्ता को, उसके व्यापर अथ था तथा उसके जीव त रूप को रेखाक्ति करती है । समष्टि रूप से यह कहा जा सकता है कि मैलिना- वस्वी की मिथ व्याख्या जीवित सास्कृतिक सदभ में उसका विश्लपण करती है और सास्कृतिक प्ररिया म उसके महत्व को रखावित करती है । , ८ सरचनात्मक व्याख्या मिथ की व्याख्या उस समय तक अधरी रहगी, जब तक कि एक अय महत्वपूर्ण व्याख्या का उल्लेख न किया जाए । इस व्याख्या के जमदाता क्लाद लेवी स्वास है जिसने मिथ को सरचनात्मक मानव शास्त्र के (Structural Anthropology) प्रकाश में विवेचित एव विश्लेपित किया। स्त्रास १६६५ मे एक निबध, "मिथ का गठनात्मक अध्ययन' के द्वारा 'मिथ-विज्ञान' के स्वरूप को समक्ष रखा और मिथ के अध्ययन को एन सास्कृतिक अर्थवत्ता प्रदान की। इस व्याख्या-पद्धति को विकसित करत म उसन सरचनात्मक मानवशास्त्र मनोविज्ञान, मावर्स का द्वन्द्वात्मक सिद्धात और समूचन सिद्धात (Informational Theory) का विशेष रूप से उपयोग किया, उसन ब्राजील की वारोरा मिथ और दक्षिण अमरीका की आदिम जातियों में प्रचलित नायक और अग्नि मिथको के विश्लेषण के द्वारा यह दिखाने का प्रयत्न किया है कि मिथ 'अर्थों के सम्प्रेषण पी एक व्यारया है और मानव-सस्कृति इही अथों को किसी न किसी रूप में सप्रेषित करती है। यदि गहराई से देखा जाए तो मानव सस्कृति 'अर्थों के सम्प्रेषण की एक व्यवस्था है और मिथ इन व्यवस्थाआ में से एक उपव्यवस्था है। मिथ एक प्रकार से इस अव्यवस्था म १ फिलासफी इन एम्यू की, लेगर, पृ० १६३ २ लोक साहित्य और सस्कृति, डा० दिनेश्वर प्रसाद, पृ० ३२ ३ माइथोलाजी, स० एडमण्ड लीच, पृ० २६० ४२ मियर शन TT सिाग व्यवस्था गया है| भाषा नयाँ जीवाड़ा है और नयाँ को व्यवस्था ही सस्मृति की अर्थवता है। म प्टि में, भापा और मिय (सस्थति) का एक गहरा सम्बध जिसमी बार पहन ती रात किया जा चुरा है।' लेवी स्माम 1 प्रायड, प्रेजर और वे मिरर की प्रतीपपादो व्याख्या को हा एक अय जाधार प्रदान लिया और प्रतीस्याटी विश्लपण के सशोधित रूप का ही 'सरचनामा' निपनेषण को सज्ञा प्रदान की। उसका कहना है कि समान सागृतिय पग्विण म जा मिथ और शुष्ठान प्राप्त होते हैं, वे मूलत एर समान 'सरचना' मा दर्शाते हैं। यदि ए मिथ के तव और उसके सम्बधित जनुष्ठान के तत्वा का एप ताकिर योजना का आधार प्रदान किया जाए, ता हम पाण्गे वि मिथ और उससे सम्बधित 'रीति या 'अनुष्ठान' एष हा प्रकार की 'वात या 'अर्थ' सम्प्रपिन करते हैं। मिमी भी मिथ वे अथ को प्राप्त परी के लिए सवम अच्छी पद्धति यह है कि उस मिय विशेष के उन विभिन 'स्पा को एक स्थान पर एपन पर लिया जाए, चाहे उनका स्रोत और समय मिन-भिन ही क्या न हो ? दसग उस मिथ का 'मूल तत्व प्राप्त हो जाएगा जो उनकी ताविव 'सरचना' या व्यक्त करेगा। यह 'सरचना' उन समस्त विभिन स्पा म अन्तधारा के समान प्राप्त होगी। एक ही मिथ वे विभिन पाठा तरा (रूपा) के प्रकाश म उस मिथ का सरचनात्मक 'के' प्रकट हो सकेगा जा मिथ के व्यापक 'अर्थ' का सप्रेषित करने में समर्थ होगा।' इसे ही मैंने 'मिथक की सा दी है जो किसी भी मिथ का (पुराव्यान) का मूल तत्व है-उसकी कद्रीय सरचना है । यति स्वास के उपयुक्त मत का स्वीकार दिया जाए ता यह स्पष्ट हो जाता है कि वह मिथ वा एक तार्षिक माडेल के स्प से स्वीकार कर रहा है जिमस मिथ को, उसके अनय अत- विराधा के साथ (सामाजिक योनपरक जादि) एक ताविष रूप में स्वीकार किया जा सके । मिथ का यह व्यापक परिप्रेक्ष्य उस समय अधिव जयवान हो सकेगा जब मिथ क 'ममूह या 'गुच्छ का लिया जाए । यहा पर यह ध्यान रखना आवश्यर है कि यह काय मिथ क एकात अध्ययन से नहीं हागा, पर मिथ ये समूह या 'गुच्छ के द्वारा हो सकता है । इम पद्धति में यह अवश्य हो . १ दखे-परात्मक व्याख्या, अध्याय ३ काट लेवी स्त्रास, स० ३० नल्सन, हेयस, एण्डमड लीच या लख, पृ० १० ३ दखिए, "मिय की परिभाषा और स्वरूप प्रथम अध्याय ।

मिथक की समाजशास्त्रीय और मानवशास्नीय व्याख्या | ४३ सकता है कि ये 'गुच्छ' कही पर रामानता के तत्वा का दशाये और कही पर जसमानता के तत्वो या प्रगट करे । परन्तु सामूहिक रूप से इन तत्वो को लेने पर जो अन्तविरोध की श्रेणिया हैं, उनमे अवश्य हो धूमिलता या कमिया आएंगी। लैवी स्त्राम ने अपने इस सिद्धान्त का प्रतिपादित करने के लिए अनव उदाहरण दिए हैं, उनमे से एर उदाहरण प्यूलो मिय से सम्बधित है । मिथ समूह या 'गुच्छ' एक के द्रीय समस्या को प्रस्तुत करते है जिसका सम्बध जीवन और मृत्यु से है। यह मिथ गुच्छ जीवन और मृत्यु के भेद को कम करते हैं या उनम तारतम्य का अनुमधान करते है । हम मिय मे तीन प्रकार के श्रेणीगत अतर पाते हैं-पि, आवेट और युद्ध । पृपि मानव के लिए जीवा का आधार है, पर पशुआ के लिए मृत्यु का स्प है। अत यह मध्यस्थता करती हुई 'श्रेणी' है। इसी मिथ गुच्छ या एक अय रूपान्तरण विविध श्रेणी अतर पो प्रकट करता है, वह है घास खा। वाले पशु, काला कौआ और परभक्षी प्राणी। प्रथम श्रेणी में पशु निरामिष हैं और वे जीवित रहने के लिए किसी प्राणी को नहीं मारत हैं, परन्तु द्वितीय और तृतीय श्रेणी के पशु मासाहारी हैं। काला कौआ जीवित रहने के लिए किसी जीव को मारता नही है । इन दोना वर्गों को एक साथ लेन पर और उनकी प्रतीकात्मक सयोजना को ध्यान मे रय कर लेवी स्त्रास इस निप्प पर पहुँचता है कि इन सयोजनाओं के अनुक्रम से एक तार्तिक माडल की सृष्टि होती है जो यह स्पष्ट करती है कि जीवन और मृत्यु एक सिक्के के मानदो पक्ष नहीं हैं और न जीवन का आवश्यक फल है मृत्यु । इसी प्रकार, लेवी स्त्रास न इडीपस मिथ की के द्रीय समस्या स्वरतिमूलक सृष्टि को माना है और इस प्रकार मानवता की सृष्टि 'पाप' से हुई है।' उपरिलिखित व्याख्या के प्रकाश में यह कहा जा सकता है कि मिथ के अनेक स्तर हाते है। तथ्य और मिथ का एक द्वन्द्वात्मक सम्बध होता है। इसी के साथ मिथ की सरचना के दा महत्वपूर्ण पक्ष होत हैं-एक कालबम का पक्ष जिसमे घटित घटनामा का अनुक्म हाता है और दूसरे, घटनाओ को सम्बद्धता या सयोजन । यहाँ पर ऐसा प्रतीत होता है कि लेवी स्नास मिथिक प्रतीका- स्मकता को गणितीय प्रतीकात्मकता के समान मानता है, पर यह प्रश्न फिर १ लेवी स्त्रास, स० नेल्सन हेयस, पृ० ५१ ४४/मिया दर्शन या पिराग भी या रहा पिया मिय पी सपना पूण प ग गणितीय पनि स रामशी जा सती है पारि गिय पाई यात्रिय यस्तु नहीं है जा रिमा पूर्व शिशित गणितीय प्राप्पा द्वारा गमती जागा। अधिर स अधिर इतना पहा जा गया +fr मिथ 4 विपण म यह पक्षी सिी गीमा तरकार गर हा मानी * जोर तुलनामा परा विभिन्न मिय-गुडा ये अभिप्राया का एक तर गगत प म प्रस्तुत पर गपती है। लेवी स्त्रास न आसलीवाल या पया तथा भारापीय गिना पया और रह इण्डिया (अमरीया) म उमर पातरण गी पगा पर उनम प्राप्त विभिन्न अभिप्रामा वा एष तुलनात्मक प प्रस्तुत पिया है जा मिथ-नेतना व व्यापर परिप्रेक्ष्य का प्रपट परता है। यहां पर लेवी स्याम मिथ यो एप अय सन्दभ भी देता है और वह है एवं मिथ या ए रास्कृति से दूसरे संस्कृति में प्रवेश पाना जयवा उसके कुछ तत्वा एव अभिप्राय का दूगरी मस्कृति के परियतित रूप म या उसी रूप म पान्तरित हाना । जव एस सरगृति या मिय दूसरे म प्रवेश करता है, ता वह विकृति की प्रक्रिया से गुजराा है, परन्तु उसके परिवर्तन या रूपान्तरण की एक एसी सौमा आती है मि यह पुन आशिव स्प से स्पष्ट हान लगता है। इमसे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि लवी स्त्रास का यह 'सरचनात्मक विश्लपण अनेका का प्रभावशाली और प्रेरक लगे, पर इतना निर्विवाद रूप से सत्य है यि यह पद्धति ही एकमात्र मिथ व्याख्या की सार्थव पद्धति नहीं है- एक दृष्टिवाण जावश्यक है जा मिथ का उसके सामाजिक आर सास्कृतिक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करता है ।

मिथ की समग्र तात्विक दृष्टि | ६ १ व्याख्या-पद्धतियो का महत्व और मिथक की गतिशीलता- मिय की विभिन व्याख्याओं के प्रकाश में एक बात जो स्पष्ट उभर कर सामने आती है वह यह है कि मिथ का क्षेत्र अत्यत व्यापक एव अथर्गाभत है, तभी विभिन्न ज्ञान-क्षेना के अध्येताआ न अपने अनुशासन की प्रवृति एव स्वरूप के अनुसार मिथ को समयने का प्रयत्न रिया है जिसन मिथ के अर्थ को, उसके व्यापक सदभ का तथा उसकी 'नोच शक्ति' का ही रेखाक्ति किया है। इन समस्त व्याख्याआ के जनुशीलन से मेरे समक्ष यह वान स्वय म्पप्ट होती है कि हरेक व्याख्या-पद्धति में अपने गुण एव दाप भी है और साथ ही, एक ऐसी 'दृष्टि' देन की क्षमता भी है जो मिथ का समपन का एक 'कोण' है-एक 'नजरिया' है। परन्तु इसके "Tथ यह भी सत्य है कि विश्व म काई भी वस्तु या अवधारणा अपने म पूर्ण नही है आर यही बात प्रत्येक व्याख्या-पद्धति के लिए भी सत्य है। अत मैं यह दावा नही कर सरना (जार करना भी नहीं चाहिए) हि जिम तात्विक अयवा समग 'दृष्टि' वा म प्रस्तुत करने जा रहा हूँ, वह भी सभी दृष्टिया से 'पूण' हागी, पर इतना अवश्य है कि वह 'मिथ' के अर्थ और रादभ को जनेक आयामा विस्तार दन म सक्षम होगा। इस व्याख्या-पद्धति म किमी भी प्रसार का पूर्वाग्रह नही है क्योकि अश्मर यह दया गया है कि किसा सैद्धातिर पूर्वाग्रह के कारण हम सत्य और यथार्थ का 'विकृत' कर देत हैं अथवा उसके एक पक्ष को ही उजागर कर पाते हैं । यहाँ पर मेरा यह नाशय कदापि नही है कि मैं उपयुक्त व्याख्या-पद्धतिया का नकार रहा हूँ अथवा उनके महत्व को अस्वीकार कर रहा हूँ, क्म स कम एक समग्र तात्विक दृष्टि से ऐसा सम्भव भी नही है। यदि गहराई से देखा जाए ता विश्पण और शिवचन की सार्थकता उसके सश्तेपण म है जो अतत एक तात्विा ममग्न दृष्टि का विरसित करता है। उदाहरणस्वरूप मनावैनानिक एव समाजशास्त्रीय व्याख्याला म मिय सृजन का अचेतन जौर सामाजिक सगठन स केवल जोडकर, सश्लेषण का प्रक्रिया को एक सीमित क्षेत्र म ही जाबद्ध कर दिया है और मिथ के अर्थ को एक आयामिक बना दिया है। यहाँ पर यह ध्यान रखना जावश्यर है वि मिथ के अथ-स दभ जना हा सकते है ४६ / मिथक दर्शन का विकास और तथारथित समग्र दृष्टि इन अनक अर्थ-सदों को जपने अदर समेटन म समथ है। मिथ के ये अब पथ-मन्दभ मिय को एक व्यापक सन्दभ ही नहीं दते हैं, पर मिथ की विश्वजनीनता और उसकी लोचशक्ति के परिचायक हैं । मिथ की यह गतिशीलता जा लाचशक्ति और विश्वजनीनता की परिचायक है, मिय के सास्कृतिक स्वरूप का उसक तात्विक रूप का प्रगट करती है। उसी आधार पर मिथिय चेतना का सास्कृतिक प्रक्रिया का एक अभिन अग माना जा सकता है।' मिय और सस्कृति का एक विकासात्मक समानातर सम्बध है क्यारि सास्कृतिक एव एतिहासिक विकास क्रम में मिथ का नित्य नया सूजन हाता है और पारस्परिख मियका की पुनविवेचना और पुनर्व्याख्या । सत्य म, यह नाम एक अटूट कम है जो एव द्वन्द्वात्मक स्थिति की आर सकेत करता है। मिथ ये अनेक अर्थ-सदर्भ भी इमी द्वाद्वात्मक अवस्था की ओर राक्त करते हैं और मिथ के स्वरूप को एक गतिशीलता प्रदान करते हैं। मिथ को यह द्वन्द्वात्मक स्थिति उस समय और भी स्पष्ट हो जाती है जब एक मिथ ये अनेक रूपातरण विभिन्न जातिया और सस्तृतिया म प्राप्त हान हैं और उन कुछ ममान अभिप्राया और असमान तत्वा की तुलना से उस मिथ विशेप या एर व्यापर स्वरूप ही नहीं प्राप्त होता है, पर मेरे विचार से, मिय यी द्वन्द्वात्मक गतिशीलता या सुन्दर एव सारगर्भित स्वरूप प्राप्त हाता है । मिथ यो समाज- शास्त्रीय, मनाये जानिन और भापिर व्याय्याआ न प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप मे भियगी इम गतिशीलता पा एष तात्विप गर्भ प्रदाा दिया है। राम, गृष्ण, ईशु और गाहाना प मिथर। ग यह त य प्रत्या और यमत्या रूपा म यदार माजा साता। मस पर यह ध्यान रखा आाश्यप है कि यह गतिशीलता हरप मिय म समाप में प्राप्त नहीं होती है पर उनी मिधराम प्राप्त हानी जो लि और सारा या रिमण पर राम रामर्थ है और निम 'साप मति और विपनगीनता पा अग असायत अधिप २ तात्विर दृष्टि का अर्थ मन मिप मीसि पाना T गर्माष्ट दृष्टि' जामियर १ अपन मला मन पार पाfire IT IT', ही कार प्रगंगा उगा| मिथ की समग्र तात्विक दृष्टि | ४७ अर्थ-स्तरा को प्रगट करती हैं। यदि गहराई से देखा जाए तो यह काय एक दार्शनिक या वाय है जो सत्य और यथार्थ को एक ममग्रता में देखने का प्रयत्न करता है, खण्ड या अश उसके लिए उसी सीमा तर महत्वपूर्ण है जिस सीमा तब वह समग्न तात्विक दृष्टि म सहायता प्रदान कर सने, अथवा उसका "पूरर' बनकर आये । इस दृष्टि स, जिन व्याम्याआ का मैंन भी तक विवचन दिया है, उनमे अवश्य कुछ ऐसे 'तत्व' हैं जो तात्विक व्याख्या मे सहायर होते हैं अथवा हा सक्त हैं। इस तथ्य की छानबीन के दौरान इन व्याख्या- पद्धतिया की सीमाएं तथा यूनताएं भी दृष्टिगाचर हागी। अत तात्विक व्याख्या को सही परिप्रक्ष्य देन के लिए यह मूत्यावन आवश्यक है जो मरे उपयुक्त मत और विचारणा वा कदाचित 'कुछ' सार्थकता द सके । रूपकात्मक व्याख्या वा क्षेत्र वापी व्यापप है क्यानि अन मिथका का अथ रूपकात्मक होता है, विशेपर उन मियाा का जिनम 'इतिवृत्त' या 'कथा' का अश अधिक होता है। यही कारण है रि प्राचीन मिथका म 'रूपक तत्व' की प्रधानता हाती है जो विसी 'सत्य' यो क्थात्मक परिणति होती है । यह सत्य प्राकृतिक घटनाआ का भी हो सकता है, मानसिव प्रक्रियाआ और चाह्य यथार्थ का भी हो सस्ता है । यही नहीं, यह रपकात्मक तत्व ब्रह्माण्डीय 'सत्य' का भी यथात्मा रूप में प्रस्तुत करता है जो निर जानियो सुप्टि- मिथ म देखा जा सकता है। दूसरी आर, स्पमात्मा व्याख्या की एक सीमा भी है, वह उन मिथया की (जिनम आधुनिक मिथव अधिक है) व्यान्या बरन म सक्षम नहीं है जिनम 'इतिवृत' या श बहुत कम है, और यदि, वह ह मी (जा मिय पी अवधारणा का एक नावश्यर तत्व है) ता 'फिक्शन या प्रभामण्डल के रूप म। यह 'प्रभामण्डल' इतिवृत्त का एक अत्यत केद्रीकृत स्प ह जा विमी अवधारणा या व्यक्ति के चारा ओर एकत्र होता जाता है। यदि गहराई से देखा जाए तो मिथक सृजन की यह प्रक्रिया ही है जो काल दीप आयाम म घटित होती है। ऐसे मियक अधिकतर आधुनिय मिथ है जो सकल्पनाना और अवधारणाआ के रूप हैं। इनकी व्याख्या एक तात्विक-दृप्टि की अपक्षा रखती है। स रूपसात्मक व्याख्या का एक पक्ष यह भी है कि सूय और चन्द्रमा का मिथ सूजन का केद्र माना गया जा व्यापक दृष्टि से मानव बुद्धि का ग्रहण १ सृष्टि-मिथका की व्याख्या आगे यथा स्थान दी जाएगी ।

ܕܪܟ मिथक को समय तात्विक दृष्टि | ४६ हैं क्याकि सक्ल्पनाओ और विचारो के क्रमिक विकास में मिथिक चेतना का अपना योगदान रहा है । आदिम मियका ने जहा एक ओर प्रागताविक विचारा का सूत्रपात किया, वहीं दूसरी ओर, मानव के सवेदनात्मक एव वैचारिक इतिहास का गति प्रदान की । इस मानसिक विकास की दृष्टि से मिथिक तना एक सृजन-प्रक्रिया का परिचय देती है और यदि गहराई से देखा जाए दो प्रतीक, मिय, यातु तथा धर्म के प्रमिक विकास मे मन की इसी सजन- निया का परिचय प्राप्त होता है । मिथ की मनोवैज्ञानिक व्याख्या मानसिक जगत की गहनता और विशेषकर, अचेतन का केन्द्र मानकर मिय की एक ऐसी व्याख्या प्रस्तुत करती है जो सामहि अचेतन पर विशेष बल देती है। सामूहिक अचेतन की अभिव्यक्तियो वा लेकर ग ने जिस तत्व को ओर विशेष बल दिया है, वह है उसका 'वस्तुगत' हाने क्यारि यह प्रत्येक व्यक्ति के लिए समान है और उसकी अभिव्यक्ति के लिए हम उत्तरदायी नहीं है । इस प्रकार, वह सामूहिक अचेतन को 'बाह्य जगत'मा यथार्थ से जोडना चाहता है और इस प्रकार वह मिथ को व्यक्ति और समूड (समाज) दोनो से सम्बधित करता है । यहाँ पर यह बात भी स्पष्ट होता है कि मिथ की व्यापक्ता सामूहिक अचेतन के द्वारा स्पष्ट होती है जो धरतीय विचारधारा में 'सस्कार' का प्रतिरूप ज्ञात होती है । इन आतरिव सस्कारा' का व्यक्ति और समूह (यहा तक कि सस्कृति और जाति) के जीवन में अभिन स्थान है । यही कारण है कि मिथ का एक गहरा सम्बध इन सस्कार स है जिससे व्य और समूह का चेतन जीवन प्रभावित ही नहीं होता है, पर कार से वह अनेक स्तरा पर रूपान्तरित भी होता है । इस बिन्दु पर एक बात ओ युग के माडल मे नही पाप्त होती है, वह है मन की चेतन-निया का एक औचित्यपूर्ण स्थान क्याकि मुझे एमा प्रतीत होता है कि सामूहिक अचेतन पर अत्यधिक जार देने के कारण युग चेतन-क्रिया को पृष्ठभूमि में डाल देते हैं जबकि मिथ सृजन मे चेतन-प्रक्रिया का एक महत्व- पूर्ण स्थान है क्याकि वह व्यक्ति और समूह की 'सजगता' (अवेयरनेस) की ओर सकेत करती है । फिर, दूमरी बात यह भी ध्यान देने याग्य है कि किसी भी प्रकार की 'मॉडल सरचना' मे एक परिसीमन होता है जा हर वस्तु को उस मॉडल में फिट करना चाहता है। युग की 'मॉडल, सरचना में सामूहिक अचेतन और 'आदिपा का विशेष स्थान है। योकि इन्ही प्रत्ययो के द्वारा T ५० मिषय दशन या यिवारा यह मिप पी व्याख्या प्रस्तुत परता है । इस मॉडल म 'आदिम्पा' का सम्बध 'आदिम' से जोड़ा गया है, पर सम्पूर्ण साशनिय प्ररिया या ध्यान म रसार यह पहा जा गरता है Fि आम्पिा या स्वरूप येवल 'आदिम' ही नहीं है, पर उनरा अस्तित्व आज भी है, अधिक म अधिप उनके प्रक्षेपण म जन्तर हा गया है। प्रोपण म यह अतर युग के नागार, आधुनिष वैज्ञानिक दृष्टि है जो आदिरूपा ये प्रक्षेपण रा रापणी है। यहां पर 'रोक्न' या प्रश्न नहीं है, पयापि आज भी य आदिप (जैसे छाया, अमीन्ग जाति) मिगी न किमी म्प म मानव या प्रभावित परत है, चाहे उनका स्वरण नवारात्मक' हा या सकारात्मय । इन 'आदिस्पा' या एप गहग सम्बध मिथवा से है क्योकि इनके द्वारा हम अनर मिथरा को 'समझ सक्त हैं, उनकी व्याख्या पर सक्त हैं । यहाँ पर फिर यही प्रश्न उठता है कि क्या सभी मिथका को (मुख्य रूप से मिथर, हीरा-मियर, भूप एव चन्द्र मिया तथा जाधुनिक मिथक) आदिरूपा के द्वारा विवेचित पिया जा सकता है जहाँ एक चेतन एव उपचेतन अवधारणाओ एव प्रपनाना या स्प प्राप्त होता हो? एसी दशा म मिथका की व्याख्या के लिए एक समग्न तात्विक दृष्टि की ही अपेक्षा है जो पूर्वाग्रहा से जहा तम हा सके, मुक्त हो । मिथ की वस्तुगत व्याख्या का सूत्रपात समाजशास्त्रिया और नृतत्व- शास्त्रिया ने वज्ञानिक पद्धति का सहारा लेकर आरम्भ किया जिसन सामाजिक यथार्थ के स्वरूप पर बल दिया और साथ ही, मिथ और धम का सामाजिक संगठना का एक प्रमुख आधार स्वीकार किया। इस व्याख्या-पद्धति न मिथ सजन को जादिम जनजातिया और कवीला से सम्बधित किया, और इनवा अध्ययन कुछ उसी प्रकार से किया गया जैसे जोवाप्मा, (पासिल्स) का और पुरातत्व म प्राप्त उत्खनित सामग्री का। इम पद्धति ने मिथ यो अधिकतर आदिम मानसिकता से जाडने प्रयत्न किया और उसे वहीं तक एक प्रकार से 'सीमित' पर दिया । यह सच है कि इस प्रकार के अध्ययन ने अनेक मिथवा के जादि यात और अनक समान तत्वा की आर सक्त किया जिनका जस्तित्व जाज भा वतमान है। यहाँ पर यह ध्यान रखना आवश्यक है कि मिथ का सम्बध आदिम जगत स है, पर मिय की अपनी गत्यात्मवता है, वह केवल 'आदिम ही नहीं है । अनव नवीन मिया का सृजन होता है सामाजिक एव सास्कृतिक परिवतन के परिप्रेक्ष्य म। मिथ वा सम्बध केवल प्रकृति और समाज से ही नहीं है पर उनका सम्बध 'मानव' से है--उसकी सपूण सास्कृतिक अथवत्ता स है । रास्कृति वेवल समाज एव प्रानि ही नहीं है, मिथक को समग्र तात्विक दृष्टि | ५१ वह मानव नामधारी प्राणी की आतरिक और वाह्य यात्रा है । मिथ के इस सास्कृतिक पक्ष को ध्यान में रखकर यातु और अनुष्ठाना का भी अपना एक महत्व है जहां तक मिथक वे बाह्य अभिव्यक्तिकरण का प्रश्न है । इन अनुष्ठाना, उत्सवो और पर्वो के द्वारा प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से मिथक ही प्रतीकीकृत होते हैं । इस प्रकार मिथ का कोई न कोई तात्विक अर्थ (वह सामाजिक, ब्रह्मांडीय मानसिक या जातीय आदि भी हो सकता है) ही इन अनुष्ठाना के द्वारा प्रकट होता है। यदि तात्विर दृष्टि से वहा जाए तो यातु, अनुष्ठान और यहां तक कि 'टोटम' की पृष्ठभूमि में किसी न किमी भाव या विचार- प्रक्रिया का रूप मिलता है जो सस्कृति का एक आवश्यक तत्व है । मिथकीय भावभूमि म इस तत्व का अपना योगदान रहा है और समाज एव मानव- शास्त्रीय व्याख्या ने मिथ के इस पक्ष को एक तार्किक आधार प्रदान किया है जो एक प्रकार से मिथ की तात्विक-व्याख्या का एक आधार तत्व बन सकता है । उस तात्विक दृष्टि मे लेवी स्त्रास की यह मान्यता भी स्वीकार याग्य ह कि मिथ 'अर्थों' के सप्रेपण की एक व्यवस्था है या दूसरे शब्दो मे एक ऐसी उप व्यवस्था है जिसके अर्थ के जनेर स्तर हो सकते है । 'अर्थ के इन' अनक स्तरा में केवल सामाजिक संगठन प्रदान करने वाला अर्थ ही समाहित नही है जैसा वि सामाजिक व्याख्यावर मानते हैं, पर मिथ के अनेक अर्थ स्तर भी हो सकते हैं। ३ अनेक अथ स्तर समग्र तात्विक दृष्टि एक प्रकार से जैविक दृष्टि है जा मिथ के व्यापक अर्थ-सदभ को-उसके अय-स्तरो का उद्घाटन करती है और इस प्रकार, मिथ की व्याख्या को अनेक आयामी बनाती है । भारतीय विचारधारा के परिप्रेक्ष्य में यह माना गया है कि मिथ किसी न किसी तात्विक अर्थ-सदर्भ वा बाह्य प्रकटीकरण है जिसमे इतिवृत्त या 'फिक्शन' (प्रभामण्डल) का तत्व न्यूनाधिक रूप में प्राप्त होता है । इस बिंदु पर आकर यह भी कहा जा सकता है कि एक दार्शनिक (जो समग्र दृष्टि युक्त चि तक है) का यह काय है कि वह मिथ के अर्थ- स्तरा का, उसके तात्विक सदभ का उद्घाटन कर। यहा पर एक नय तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित करना आवश्यक है कि मिथ की सायक अर्थवत्ता के लिए ज्ञान पी अन्तर-अनुशासनीय प्रणाली को स्वीकार करना भी आवश्यक है क्योकि जब अर्थ-स्तरो की बात करते हैं, तब अतर-अनुशासनीय 'एप्राच' के द्वारा ही ५२ | मिरी मा विशारा हम मिय ये तालियर सदभ यो उपाटित एय विवेचित पर सक्त हैं। यही पारण है कि एक ही मिय या पियवन अन्तर-अनुशासनीय 'संवाद' के द्वारा अनेस अर्थ रादौ गो (जैसे सामाजिक, राजोतिर, ब्रह्मांडीय, मानमिक) प्रकट परता है और गाय ही मिय पी मून्ययता पा-या उगो सौन्दर्यात्मक 'मूल्य' का एक गानात्मर पीठिमा प्रदान करता है । आदिम से सेपर आधुनिम मिथकों तर यो विकासयात्रा इग तथ्य को प्रगट करती है कि प्रागतावित सवेदन स तापिप संवेदन ता सम्बध मूत्र है जा मानय यो वैचारिस (और सवेदनात्मक) विकास यात्रा या एप दस्तावेज है । मैंने अन्तर अनुशामनीय 'संवाद' की जा यात रही है, उनम एप तत्व पी आर संक्त परना आवश्यर है वि उपयुक्त व्याख्या-पद्धतिया के अतिरिक्त मिथर । यो वैमानिक-व्यास्या भी हो सकती है जिसपी आर लोगा पा पम ही ध्यान गया है । यह सही है कि सभी मिथका या इरा 'पद्धति' ये द्वारा भी व्याख्यायित नहीं किया जा सकता है, पर अनेक मिथवा वे प्रसंगा को वैमानिय प्रस्थापनाआ ये प्राश में एक नया सन्दर्भ दिया जा सकता है जो तात्विक दृष्टि से भी मिथक को समझने में सहायता दे सरता है। मिथ के सास्कृतिक महत्व को एवं अन्य दृष्टि से विवचित किया जा सकता है । सामा यत यह धारणा बन गई है कि मिथ पिनशन है, वाल्पनिक और अवास्तविक है । मिथ का यह स्वरूप सामाय रूप से मिथ के व्यापक सर्भ और अर्थ को सीमित ही नहीं करता है, पर उसे एकागी भी बना देता है । प्राचीन और आधुनिक मिथकाने सदभ म इतना सामाय रूप से कहा जा सक्ता है कि मिथ-सृजन म कोई विचार या अवधारणा को पृष्ठभूमि रहती है जो अपने चारो ओर एक प्रकार का इतिवृत्त या प्रभामडल (फिक्शन) 'काल' के दीर्घ आयाम मे एकत्र करता है क्यापि इसके बगैर मिथव वा जस्तित्व सम्भव नहीं है । यही कारण है कि मिथ और यथाथ का एक गहरा सम्बध है, कभी मिथ यथाय हो जाता है और कभी यथाथ मिथ बन जाता है । मिय और यथार्थ का यह द्वन्द्व सास्कृतिक प्रक्रिया का एक अभिन अङ्ग है। यही कारण है किसी भी जाति के लिये मिथ एव जीवित यथाथ या जीवित स्वप्न में समान होते हैं जो उनके मनस् लोन को 'एकसूत्रता' प्रदान करत हैं । दूसरे शब्ग मे मिथिक चेतना म स्वप्न और यथार्थ का, विचार और कल्पना का, वास्तविक्ता और पैटेसी का तथा शिव और अशिव का एक ऐसा घाल प्राप्त हाता है जिस कचित् अलग करके देखा नहीं जा सकता है । यही कारण है वि मिथ का मिथक को समग्न तात्विक दृष्टि | ५३ अर्थ प्रत्यक्ष न होकर परोक्ष है वह अनेक प्रकार के विम्बा और प्रतीका से से आच्छादित रहता है, अत मिथ के तात्विक जर्थ को स्पष्ट करने के लिये इन रूपावारा बिम्बा और प्रतीका को सही परिप्रेक्ष्य में विवेचित करना आवश्यर है। यह कार्य दाशनिक एव तत्ववत्ता वा है कि वह इस परोक्ष नर्थ का उद्- घाटित करे, और यह परोक्ष अर्थ या व्यापक अर्थ एक समग्र एव समप्टि-दृष्टि के द्वारा ही सम्भव है।

खण्ड--२ ७ / मिथक के कुछ महत्वपूर्ण प्रकार प्रवेश मियर की विभिन्न व्याख्याओ से यह बात स्पष्ट होती है कि मिथक्-सजन का क्षेत्र अत्यात व्यापक है और साथ ही, मिथक के विभिन अथ सदर्भ या स्तर होते हैं । मिथ के इस व्यापक परिप्रेक्ष्य को उसी समय उचित प्रकार से हृदयगम लिया जा सकता है जब हम कुछ महत्वपूर्ण मिथ प्रकारा वा विवेचन करें क्याकि कदाचित् यह सम्भव नही हो सकेगा कि सभी प्रकार वे मिथवा का पूरा विवेचन पिया जा सरे । जन मिथ की एक समन और तात्विक दृष्टि वे लिय यह आवश्यक है कि कुछ मिथका का इस दृष्टि स लिया जाय जिनकी मानव-इतिहास म एक सार्वभौम सत्ता है और जिनका काई न कोई रूपमा रूपा- तरण विभिन सभ्यताजा और सास्वतिया में प्राप्त होता है। इससे मिथ की सार्वकालिक एव सार्वदेशिक महत्ता का अनुभव किया जा सकता है और साथ ही, मिय के सास्कृतिक महत्व को रेखाक्ति किया जा सकता है । इस अध्ययन एव विवेचन से मानव 'परिवेश' का वह रूप स्पष्ट होगा जो दृश्य और अदृश्य लोको को एक सूत्र म बांधने का प्रयत्न करता है और साथ ही, मानव के अमिक वैचारिक विकास का रखाक्ति करता है। इस दृष्टि से कुछ महत्वपूर्ण मिथक्-प्रकारो का विवेचन अपेक्षित है । ये मुख्य प्रकार हैं--- १ प्रकृति मिथक २ सृष्टि मिथक ३ नायक या हीरो मिथक ४ आधुनिक मिथक प्रकृति मिथक १ प्रकृति-सदर्भ पूर्व विवेचन से यह स्पष्ट हो चुका है कि मिथक को संरचना में प्रकृति' एव नाटकीय रूप म आती है क्योकि मानव न सबसे पहल 'प्रवृति' स प्रति- मिपय रे कुछ महत्यपूर्ण प्रकार | ५५ नियात्मय सम्वय स्थापित किया । इमी मम्बध पतम्यम्प उराने प्रारतिय यस्तुआ और पटाया में प्रति एर जिगागाजनित मनामाव या परिराय दिया । यहाँ पर यह ध्यान रया आवश्यक है कि अनगत जैव पार अजेय जगत् दाना आ जात हैं और गाय हो ये घटनाएं और प्रप्रियाएं जिह हम 'प्रारतिय पटनाएं (जैम मेघ, यर्पा, अग्नि आदि) पहन हैं, उनरा ममावेश भी 'प्राति' के अन्तगत हाता है। इस दृष्टि से प्राकृतिक वस्तुआ और पटनाआ स सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण मियर या विवचन आवश्यक है जिनया मोन 'आदिम' है फिर भी जा विकास की दृष्टि स जातीय संस्कृति की एक प्रसार स अभिन्न अंग है। २ अग्नि-मिथक मानव या अग्नि से प्रथम साधारसार एम ऐमा आमव पा जिसन सभ्यता आर संस्कृति विागम एक प्रमुख तत्व प प म अपना यागदान दिया। अग्नि एर भोतिक प्रशिया या पन है। आमि मानव उसे एप प्राकृतिक घटना वेप नही देय सरा और उगे एवं आनिभौतिय शक्ति के रूप मे, जिसम भय और जिनासा पा समन्वित मनोभाव था, स्वीकार पिया। आदिम अवस्था म भय या अय मनाविकार जो गुप्तावस्था म थे, ये प्रमश चेतना के स्तर या आरित परन लग और इस प्रकार, अनर अभिव्यक्ति-प्रचारा का जन्म हुआ । जन जर अग्नि पा यह शतिरूप उपचेतना के पाश से छूट पर चेतना के स्तर पर जाया तब उमा अग्नि तथा प्रारतिय घटनाआ के प्रति एव प्रतित्रियात्मर आरम्भिा विचार-रिया का परिचय पिया जा भावात्मक एव उतेजनात्मक अधिर थो।' इस दशा म आदिम मानव ये मस्तिष्य मे यह विश्वाम घर पर गया दि अग्नि म एक सृजनात्मक शक्ति है । फेजर ने इस विश्वाग का एव धारण यताया ह । उराये अनुसार अनय आदिम जातिया म अग्नि की उत्पत्ति के लिए 'अग्नि-ड्रिल' की प्रथा प्रचलित थी । इस अनुष्ठान ने आदिम माराव का यह विश्वाम प्रदान किया रि अग्नि की उतात्ति एक प्रकार म अग्नि-लमडिया सघपण 1 फन है और इसी विचारधारणा के फलस्वरूप उहनि यह तर उपस्थित रिया हि जिस प्रकार 'अग्नि-लकडिया के घर्पण से अग्नि जैसी शनि का जम हाता है, उसी प्रकार अग्नि की कृपा से मनुष्य १ द माइण्ट आफ दो प्रिमिटिव मैन, फैज वास, पृ० २५ ५६ | मिथय दशन या विवास संतान प्राप्त कर सकता है। अत दो अग्नि-लवाडिया को उन्होंने स्त्री और पुरप रूप मे ग्रहण किया और सवाडिया के सघपण यो यौन प्रिया का सूचक माना । हिन्दू मिथवो में इन दोनो लवाडिया का उर्वशी और पुरुरवा की सजा दी गयी । आगे चलकर अग्नि को इस सृजन-शक्ति वे अनेक उदाहरण हम धर्म और उससे सम्बधित अनुष्ठानो म मिलते हैं। अग्नि का यह मिथकीय स्प (जो अग्नि के प्रतीयत्व पर निर्भर है) उस समय और भी स्पष्ट हाता है जब अग्नि को एक दिव्य 'पति' के रूप में और उसकी पत्नी को एक मानवीय अप्सरा के रूप म देखा गया । उर्वशी और पुरुरवा म यह बम विपरीत प्राप्त है जहाँ उर्वशी एक दैवी अप्सरा है, पर रोम के आरम्भिक सम्राटगण इही अप्सराआ और 'दि य अग्नि' से उत्पन्न माने गए। अनेक अफ्रीकी, एशियाई तथा योस्पीय आदिम जातिया म जग्नि-त्योहारा के मनाने की प्रथा थी । इस अनुष्ठान को करने का एक उद्देश्य यह भी था कि दम्पति स्वस्थ सतान लाभ कर सके । इसके अतिरिक्त इन पदों के मनाने का एक जय कारण भी था, और वह यह कि इनके द्वारा उन राक्षस-राक्षसिनिया, भूतो और प्रेता को वश म किया जाता था अथवा उह नष्ट किया जाता था जो फसला और सन्ताना की उत्पत्ति म बाधाएं उपस्थित करते थे। इस विपत्ति से बचने के लिये अनेक प्राणिया को अग्नि मे बलि किया जाता था। इससे यह समझा जाता था कि जीवधारी के रूप मे उस भूतात्मा जथवा राक्षस को नष्ट किया जाता है । इस प्रकार अग्नि की विध्वसक शक्ति का रूप प्राप्त होता है । इन अग्नि-त्योहारा के द्वारा सूर्य की प्रकाश शक्ति का सृजनात्मक एव विध्वसात्मक कार्यों के लिये उद्बोधित पिया जाता था। हिन्दू धर्म म अग्नि को 'देवता' के रूप में माना गया और ऋग्वेद का आरम्भ ही अग्नि ऋचाआ से होता है जो अग्नि की सृजन-शक्ति एव पवित्र शक्ति को सक्षम रखती है । हिन्द्-विवाह म अग्नि की परिक्रमा का आशय यह है कि पति-पत्नी मे सृजन-शक्ति का विकास हा (सतानात्पत्ति) और विकारा का ह्रास हो। यदि दूसरे शब्दों में कहा जाय तो यह अग्नि का मिथुनपरक रूप है। दूसरी आर, वैदिक कर्मकाण्डो मे अग्नि म 'हवि' देने की प्रथा है, वह अग्नि और अन के परस्पर महत्व का परिचायक है । वैनानिक दृष्टि से अन की उत्पत्ति (यहाँ १ दि गोल्डेन बो, स्टडी इन मैजिक एण्ड रेलोजन, फेजर भाग १, पुस्तक २ पृ० १७० २, गोल्डेन बा, बाल्डर दि न्यूटिफुल, फ्रेजर, भाग ७, पुस्तक २, पृ० ११३

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५८ मिपा गाना विपास - विराग हुआ। इण्डिया, आरपर और मम मामि जामिया म प्राप्त हाती है। इन आदिम जालिया मामा आप्रबार पी भेंट दी जाती पी जिमम यह समझा जाता पा fr प्रापधारिया मा पर पुष मात्रि बारपाया म मा जीवन-तव भिसा) पा अनित्य ।। अशुदा मागा या ा स पुरा रामप उनपा माायीररण अपया जीवीगरण पसा आरम्भ रिया। इस प्रार पतस्पति जगत पा सायुक्त (राप्राण) गरा पीरिया और साथ ही, गों में प्रति 'परम भापा' पिशाग न मा से गाया की परिकल्पना का विरगिस frया।' यह यिग प्रमिा पग हुमा बाम ग-जैग मारमा प्रत्यर प रा अलग होती गयी, बैंग-बैग उसा अपना रूप बासना आरम्भ रिया और असत वृश दयता प प म प्रतिष्ठिा हुआ । इस प्रार, वृष प्रति एप आश्चय एय रहस्य गायना न्हान युग उगन म माननीय प्रजा-या भण रामानता पीयपना की जिगन प्रमश वृक्ष पा उर्वरता या प्रतीष पाया । इस भावना 7 आदिम मानय को यह विश्वास प्रसारिया fr स्वस्थ रातान प्राप्ति म वृक्षा पा पागदाा हाता है। इसी से आप वृक्षा और पौधा यो मिथुनपरा अर्थ प्रदान दिया गया । तुलसी या वो एर देवी पे रूप म यमित पिया गया और प्रतिवप उराया विवाह श्रीकृष्ण स होन पी पटना इस बात को आर रोपेत करती है कि वृक्ष या महत्व मोन- प्रतीर पे रूप में भी माय था। हमारे यहाँ प्रियगु, अशोर, श्रीफल तथा तुलसी आदि ऐस हो या पौधे है जिहे उर्वरता का प्रतीक माना गया । यूरोपीय मियमा म 'मैद्रा गा उर्वरता या प्रतिरूप माना गया जो स्त्रिया और पशुओ या प्रजनन शक्ति प्रदाा परता है। इस तय्य या सस्तृत साहित्य म थाप' श दाहद' है जा मूलत मिथुनपरय है। यहां तक कि अन कवि- परिपाटिया पी धारणा म यह मिथुपरव अर्थ प्राप्त होता है । यह माना जाता है वि अशाप मुदरिया ये पदापात से मुकलित हा जाता है। यह सही है कि अनेय परिपाटिया (कवि समय) बल्पित है और उनका यथाथ से सम्बध नही है, पर ववि कल्पा में वे 'मत्य' ही है । मिथा म यह फिक्शन आर यथाथका अयोय सम्बध रहता है जिसकी ओर पूर्व ही सकेत (समष्टि तात्विक दृष्टि के अतर्गन) दिया जा रा है। फिनलैण्ड, रूस और फ्रास आदि देशा म डियाना नामक एक वृक्ष देवी का सवेत प्राप्त हाता है जिसे उर्वरा शक्ति का रूप माना १ गोल्डन बा, फ्रेजर, भाग १, पृ० ४४-४५ २ हिली साहित्य का आदिकाल, डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृ० २२६ मिथक के कुछ महत्वपूर्ण प्रवार | ५८ गया और उसे अपनी इस शक्ति के लिए एष नर-साथी को आवश्यक्ता पड़ी जिसे 'गियीयस' पी सज्ञा प्रदान की गयी।' यह प्रवृत्ति अनेक जातियो म समान रूप से प्राप्त होती है जो यह तथ्य प्रपट बरती है कि मानसिक विकास की समान अवस्थाएं मिन-भिन्न जातिया म समान मिथवा का सृजन करती ५ ऋतु सन्दर्भ इसी सदभ मे ऋतुआ ये परिवर्तन के पीछ आदिम मानव का यह विश्वास था कि इनके पीछे यातुक अनुष्ठाना रा समाधान है क्याकि उनकी यह मा यता थी कि ऋतु-परिवर्तन के यातुर अनुष्ठाना का पत है । इन अनुष्ठाना के द्वारा ऋतुओ को समझा जा सकता है। यही कारण है कि आदिम जातिया मे 'ओक' वृक्ष का वर्षा और सौदामिनी स सम्वधिन किया गया और इस प्रकार ज्यूपीटर और इद्र की धारणा का स्वरूप मुपर हुगा । इसी प्रकार 'जियस' या स्थान पर्पता पर माना गया जहा वृक्ष उत्पन हात है और मघ घनीभूत होते है ।' ५ टोटमो मिथ प्रकृति का एक विशाल क्षेत्र 'टोटम मिथो' या क्षेत्र माना जा सकता है जिसम जैव जगत और पशु जगत के प्रति एक पवित्रता का मनाभाव रहता है और जिनका महत्व सामूहिक भी होता है । इस दृष्टि से 'टाटम' के कुछ महत्वपूर्ण उदाहरणा के द्वारा हम उनके मिथवीय रूप का उजागर कर सकेंगे और साथ ही, उनकै सास्कृतिक एवं सामाजिक महत्व को रेखाक्ति कर सगे। सबसे महत्वपूण गात्र (clan) टोटम हैं जो पवित्रता के साथ, समूह के व्यक्तियो को सगठित करता है । गात्र का सम्बध टोटम के अलौकिक और गृह अर्थ से होता है और साथ ही टोटम उस समूह की रक्षा करता है। इस प्रकार, समूह का एक नैतिक दायित्व हाता है 'टोटम' के प्रति । १ गोल्डन बा, भाग १, पृ० १४२ २ गोल्डन वो, भाग १, पृ० ३७३ ३ टोटम का सैद्धान्तिक विवेचन पीछे किया जा चुका है, देखें समाजशास्त्रीय एव मानवशास्त्रीय व्याख्या।

- ६० 1 मिथर दर्शन या विकास गोत्र-टाटम ये अनेच उदाहरण प्राप्त होते हैं। अनक जातियां अपने पा किमी पशु, पक्षी अथवा प्रारतिय वस्तु के नाम से पुकारती थी । अपन देश म नीम या पिप्पल (पीपल) यही जाने वाली जातिया का सम्बध नीम या पीपल पाया ही पयाय है ना मूलत एष 'गोर या नाम ही हा गया । इसी प्रयार नाग जाति पा सम्बध नाग या सर्प से है। अनेक मिथका म गरुड, वानर, नाग, हस और ऋक्ष आदि का नाम आता है (जो क्रिया-कलाप करत हुए दिखाये गये हैं) जो वास्तव मे जातियां थी जो अपने 'टोटम' के नाम से पुवारी जाती थी। इस सदर्भ म श्री आनन्द कृष्ण अय्यर का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं जिन्होने दक्षिण भारत की कुछ टोटम जातिया का अध्ययन किया है और उनके नाम का क्सिी पशु, पक्षी या वृक्ष से जोड़ा है । उदाहरण- स्वरूप आडू जाति का सम्बघ बकरी आइ) से, आने जाति को सम्बध हाथी से, अग्मू जाति का सम्बध वट वृक्ष से तया अछि जाति वा सम्बध गूलर (अधि) से स्थापित किया है। इस प्रकार अनक जातियो का (गोत्र) प्रमश विकास हुआ जो आगे चलकर अपने को 'देवता' से इतना जोड लेती हैं कि वह उस देवता को अपनी जाति का पर्याय ही बना लेती है। नाग, गरुड, मण्डूक, गिद्ध आदि इसी रूप में जाने गये । इस सर्भ मे एक महत्वपूर्ण तथ्य पुराण और इतिहास मे प्राप्त होता है कि कुछ देवताओ की धारणा मे दो टोटम जातियो का, जो एक दूसरे की टैबू थी, उनका सयोग कराया गया और उनके मध्य एक प्रकार की सद्भावना को जन्म देने का प्रयत्न किया गया । उदाहरणस्वरूप गणेश की धारणा म हाथी और मूपक का सयोग, विष्णु के साथ गरुड का समझौता, काली के साथ सिंह का सम्बध आदि प्राप्त होते हैं जो पुराण कथाआ में अपना योगदान देते हैं । सथालो मे सौ गोत्र ऐसे है जिनका नामकरण पौधा पर और कुछ का नामकरण पशुओ के नाम पर प्राप्त होता है। इसी प्रकार मुडा तथा अफीका की कुछ जनजातिया मे वहिविवाही गोत्र हैं जिनका नामकरण क्सिी फ्ल, फूल, वृक्ष या पशु के नाम पर किया . . गया है। टोटम का एक बड़ा वग उपासना और श्रद्धा के मनोभाव से प्रेरित प्राप्त होता है जा हम आज तक अनेक जातिया और सस्कृतिया मे किसी न किसी १ सस्कृति और समाजशास्त्र (भाग १) डॉ० रागेय राघव, पृ० १०४ २ गोल्डेन वो, फ्रेजर, भाग २, पृ० २४०

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द | सृष्टि मिथक १ प्रवेश मिगी भी सृष्टि-मिपा पा सम्बध उत्पत्ति से है जा मानव चेतना मो यह सोपे लिए विवश परती है frविश्य और ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति बैग हुई इस गंगार पी रचा पा गुम्बध भी यष्टि उत्पति ही यह मॉइन है जा हरप यस्तु ये उदय की प्यारया पर मरती है। दूसरे शब्दो म, यह पहा जा साता है कि मिपा या परला पा-मुष्टि मियय है निगम मनस् पी मिथकीय प्रोपण सष्टि शास्त्र या ब्रह्माहात्पत्ति के क्षेत्र म हाना है। यह एय प्रसार से अई चेतना या प्रक्षेपण है जो अनक प्रती। और बिम्बा के दारा सष्टि ये रहस्य और विनापत्ति पा समान पा ए ऐसा आदि प्रयारा पा जिमन मानवीय चेतना यो ब्रह्माण्ड की गहराइया में प्रवेश करने माग प्रशस्त पिया। २ सम्पूणता का रूप और प्रती सृजन यारम्भ या मुदर अतीत म बेवल सम्पूणता थी । इस 'सम्पूणता' का देवल प्रतीकात्मकता के रूप म हा प्रपट या विवचित विया जा सकता था। इस 'मम्पूणता का स्वम्प ही कुछ स प्रकार का था उस मिथकीय विवेचन रेद्वारा ही व्यत दिया जा सरता था। आरम्भ पा यह विवचन पो मूल रूप म 'मियीय ही था जिसवा समझन के लिए वाह्य जगत की मार जाना आवश्यक था क्यानि उस समय व्यक्ति का मनस और वाह्य जगत मूलत एव ही थे।' यह 'मनस' अपन का ससार या विश्व ही समझता था और अपन 'होन' को विश्व का 'होना' मााता था । अपने हा विम्बा और प्रताका को आवाशीय पिंडो और नक्षत्रा का रूप मानता था। यहा पर यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि सभी धर्मों म 'सृष्टि' का भारम्भ प्रकाश को सृष्टि से होता है जो 'चेतना का आगमन है और अधकार (अचेतना) पर प्रकाश या चेतना का उदय । समस्त सृष्टि-मियका का यह एक 'मूल तत्व है जिसके बगर विश्व और ब्रह्माण्ड की प्रक्रिया को १ ऐन एसे आन मैन, सिरर, पृ० २२ सृष्टि मिथक | ६३ कदाचित् समझा नहीं जा सकता है । इस 'प्रकाश' के आगमन के पूर्व भी 'कुछ' की कल्पना गयी जिसके चारो ओर प्रतीको का समूह प्राप्त होता है । इन प्रतीकों का अस्तित्व मानव चेतना से है और साथ ही 'सादृश्य' के आधार पर इनके 'अथ' को ग्रहण किया जा सकता है । ऐमा हो एक मूल सम्पूण वाचक प्रतीक है वृत्त । ३ वृत्त या गोलक की धारणा एक ऐसा मिथकीय प्रतीक है जो सृष्टि-मिथका मे अनेक रूपा और 'नामा' म प्राप्त होता है । वृत्त के ही समयक्ष अथ प्रदान करने वाले पर्याय गोलक, अण्डा और पिण्ड है । यही प्लेटो का गोला (राउड) था जो आरम्भ मे उपस्थित था । अत इस विश्व का आरम्भ एक वृत्त के रूप मे हुआ जिसका न आरम्भ है और न अत । यह अनत, अनादि और सर्वव्यापी ह जिस हिन्दू धम में ब्रह्म या शूप को सज्ञा दी गयी गोनक 'अडाशायी' भी है जिससे समस्त विश्व का उद्भव हुआ है। यह निरपेक्ष और सम्पूर्ण है जिसमे सार विलाम एव विरोधी तव समाहित है। ये विलामी तत्व जर 'सम्पूर्ण' से बहिर्गामी हाते हैं, तब ससार की रचना आरम्भ होती है । चीनी मिथका मे इस गोलक या अण्डे को 'टी इची' सज्ञा दी गयी है जिसमे काता और श्वेत, दिन और रात, आकाश और पृथ्वी तथा नर और नारी आदि का समावेश है । इस वृत्त का अस्तित्व जिसम एक्त्व और अनेकत्व की शक्तिया विद्यमान हैं, जनेक पुरागाथाा म प्राप्त होती है जैसे मिश्र, ग्रीक, भारत और न्यूजीलैंड आदि देशा मे।' यही विलोमा का सघात है जिसम नर आर नारी का एक संयुक्त आकार है जो आदि सृजन तत्व है जिस वृहद् उपनिपद मे 'पुरुष' को मज्ञा दी गयी जा आरम्भ म 'अकेला' था और उसी से पति (पुरुप) और पत्नी (नारी) का निर्माण हुआ । यदि इसे जीवनशास्त्रीय भाषा म यह तो यह वृत्त की द्विलिंगी दशा थी जा जपने म पूर्ण और जनित्य थी। अण्डकाप को धारणा भी उत्पत्तिमूनक मिथका में समान रूप से प्राप्त हाती है जो वृत्त या ही प्रतिरूप है । तिब्बत और पालीशियन मिथवा मे विश्व की उत्पत्ति 'अण्डकाप' से ही मानी गयी है । बालक के जम से इन मिथको वा सम्बध माना गया है जा पुरप और नारी के सामूहिक माच्चारण १ दि वे ऐण्ड इट्स पावर, आर्थर वैले, पृ० १४ ६४ | मिथक दर्शन का विकास से सम्बधित था । इस प्रकार ससार का इतिहास और उस जाति विशेष के के इतिहास को विश्वोत्पत्ति से जोडा गया और उसे यातुक अनुष्ठाना के द्वारा पुष्ट किया गया । इन विश्वात्पतिमूलक मिथका के यातुक प्रभाव के द्वारा (उच्चारण) रागी और उसकी अपूर्णताना की चिक्त्मिा की जाती थी। अण्डकोप के समान गर्भाशय का भी ससार की उत्पत्ति का 'उत्स' माना गया जो हम प्राचीन मियको मे किसी न किसी रूप म प्राप्त होती है । यह भी आदिगालक का रूप है जिससे समस्त सृष्टि का जन्म हुआ । यह 'गर्भाशय' एक प्रकार का 'आदिरूप' (आरिकोटाइप) है जो वृत्त या गोलक का पर्याय है । ये आदिरूप अब भी 'मनस के अग हैं और इसका प्रत्यक्षीकरण स्वप्नो मे विम्बा और प्रतीको के रूप मे हाता है । यह विम्बात्मक प्रक्टीकरण कभी सर्प के रूप मे, तो कभी समुद्र, नदी या सरोवर के रूप म प्राप्त होता है । इस प्रकार यह इन आदिरूपा या सरोवर के रूप म प्राप्त होता है । इस प्रकार इन आदिरूपा का सम्बव अचेतन से है और सास्कृतिक प्रक्रिया में इनका महत्वपूण स्थान है। गर्भाशय का सम्बध केवल स्त्री से जोडना उचित नहीं है जैसा कि फ्रायड ने इसे शुद्ध यौन प्रतीक माना है । सत्य म गभाशय एक ब्रह्माडीय बिम्ब है और स्त्री वा गर्भाशय उसका एक जगमात्र है जहां से व्यक्ति का उद्भव हुआ है । यह 'आदिरूप' वेवल एक अर्थ का वाचर नही है, पर अनेकार्थी है । यह केवल 'एक तत्व' अथवा शरीर का एक अग मात्र नहीं है, अपितु एक ब्रह्माडीय क्षेत्र है जिसम अनक तत्व छिप हुए है । अत 'महामाता' का बिम्व सासारिक 'माता का विम्ब नहीं है । यह गर्भाशय का बिम्ब दी विलोमा की समरसता है और उनकी एक्ता है । एक तत्व है विश्वमाता का और दूसरा है विश्वपिता का जो अविभाज्य और एक दूसरे के पूरक हैं । यह 'विश्व पिता- माता' एक जैविक प्रतीक है जो उत्पत्ति और विकास का एक 'पूणतत्व' है जिससे प्रत्येा वस्तु का जम होता है । यह 'पूणतत्व' विलोमो का भघात है- पर और अपर, माता और पिता, स्वर्ग और धरती, ईश्वर और ससार जिह एक दूसरे से अलग नही रिया जा सकता है । यही अनत अस्तित्व है जिससे १ प्रिटानिका विश्वकोश, बण्ड १५, ११३२-३३ २ 'आनिरूपा के स्वरूप का विवेचन 'मिथ को मनावैज्ञानिक व्याख्या के अतगत हा चुका है।

सृष्टि मिथक | ६५ प्रत्येक वस्तु का उद्भव हुआ है, वही वस्तुओ का विनाश और फिर उसका नया रूपान्तरण करता है । यह एक अनत प्रक्रिया है जो ऊर्ध्वगामी और दिव्य है । मिस्री 'एटुन' और ब्रह्म तथा प्रजापति के बिम्ब इसी दिव्यता का प्रकट करते हैं । पैरामिड पाठ कहता है-'एटुन ने अपना सिंग अपन हाथ म सुख प्राप्त करने के लिए और एक भाई और बहन का जाम दिया जिनका नाम क्रमश 'शू' और 'तल्नुत्' था। इसी प्रकार 'ब्रह्म' ने उत्पत्ति हतु जपो से 'माया' नामक सृजन शक्ति को उत्पन किया और उसकी सहायता से सृष्टि का काय सम्पन किया । इस प्रकार के उदाहरणा से यह मानना अनुचित होगा कि यह यौन प्रतीकवाद "अश्लीलता' का पर्याय है, जबकि वस्तुस्थिति यह है कि उस समय वा मानव यौन-भावना का अधिक शुद्ध और अनुशासित रूप मे स्वीकार करता था । दूसरी बात यह है यौन-प्रतीक्वाद एक सृजनात्मक तत्व का परिचायक है न कि किसी भौतिक या व्यक्ति के लिंग का । भारत और मिस्र मे इस पूण ईश्वर-विम्ब का विकास आध्यात्मिकता की आर हुआ जिसने यौन प्रतीक्वाट को एक दिव्य-सृजन-शक्ति के रूप म कल्पित रिया और समस्त सृष्टि को 'हृदय' और 'वाक" से उत्पन माना । क्रमश चेतना के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना घटित हुई जिसन मानव मन को अमृतन प्रतीक्वाद की ओर अग्रसर दिया जहां ईश्वर 'जीवन के श्वास' का रूप माना गया । इस विकास यात्रा में एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य यह प्रकट होता है कि सूजन-तत्व का प्रमिक प्रत्यक्षीकरण 'त्रिम्ब' से 'भाव' की जार हुआ क्योकि 'हृदय बिम्ब' भाव या विचार का द्यातन करता है तथा जिह्वा-विम्ब वाक् का प्रतीक है । इस बात की पुष्टि चित्रलिपि से भी होती है जहा विचार और भाव को 'हृदय' से और वार का जिह्वा से सम्बधित किया गया है। इस बिन्दु पर आकर अनय मिथको म सृष्टि की उत्पत्ति और विकास को 'ईश्वर के शब्द' से माना गया जो मूलत दिव्य और सृजन-शक्ति से परिपूर्ण था । इन 'शब्द' विज्ञान का सकेत हमे ईसाई, मिस और भारत की सृष्टिकथाआ में समान रूप से प्राप्त होता है । 'शब्द' की अभियक्ति ही ससार और विश्व की सरचना है, यह तथ्य एक प्रकार से मानव की सृजनात्मक प्रकृति का ही पर्याय है जो अपनी गहराई से सुजन तत्व को क्रियाशील करता है जार अपने १ उद्धृत-ओरिजिन एण्ड हिस्ट्री आफ का शेसनेस-से, पृ० १४ २ वही, पृ० १६ ५ ६६ / मिथक दर्शन का विकास को 'अभिव्यक्ति' प्रदान करता है । यही प्रक्रिया 'देवताओ' मे भी प्राप्त होती है । विष्णु ने वाराहावतार के रूप में समुद्र से पृथ्वी को निकाला और देवताओ ने उनके मन मे ससार की विचारणा की और इस प्रकार, सृजनात्मक शब्द के द्वारा अभिव्यक्ति प्रदान की। इसी प्रकार 'ब्रह्म' की धारणा म शब्द की सुजन शक्ति का सकेत 'शब्द-ब्रह्म' के रूप में प्राप्त होता है । यदि गहराई से देखा जाय तो 'तपस' एक प्रकार का 'आतरिक' ताप है जा सृजन-शक्ति का प्रतीक है जिससे प्रत्येक वस्तु की उत्पत्ति होती है । यही आस्तित्व है जो स्वय अपने का जम देता है और फिर सृष्टि करता है । मिस्र के धर्मग्रथा म कहा म कहा गया है कि 'मेरा नाम वही था जिसने स्वय अपन का जाम दिया । मैं सभी देवताओं में प्रथम देवता हूँ' तैत्तरीय ब्राह्मण म भी प्रजापति न पहले पृथ्वी पर अपने पैर स्थापित किए आर फिर उसन सोचा कि मैं अपना विस्तार करूं। उसने ताप उत्पन किया और इस प्रकार स्वय गभधारण क्यिा । इस प्रकार के उदाहरणा से एक बात यह स्पष्ट होती है कि सृष्टि मिथका का केवल यौन प्रतीक्वाद से नही जाडा जा सकता है क्याकि य मिथर' जिस 'निम्ब' का निमाण करते हैं व लिंग भेद से परे हैं । यही कारण है कि सृजनात्मक शब्द, श्वास मूलत सृजनात्मक आत्मभाव है जो स्वय म ही पूर्ण है जिसका अस्तित्व हम प्राय सभी मिथका म किसी न किसी रूप म प्राप्त हाता है । यह ही परम आदितत्य है जो आरम्भ म एक सृजनात्मक शक्ति के रूप म अवतरित हुआ जिसस सब कुछ उत्पन्न और गतिशील हुआ, शब्द श्वाग और प्राण सभी उमी के द्वारा क्रियाशील हुए।' ४ शरीर विन्यास का आदिरूप चेतना के विकास के साथ एप' अय यातुप' विम्ब का जाविर्भाव हुआ जो मानव शरीर से मम्बधित था और जनय गिम्बा और प्रतावा पा सम्बध शरीर 4 मिमी विशेष जग स जाहा गया। इस जातिम शरीर सरचना का प्रयाग आधुनिक मनाविना म प्राप्त हाता है जहाँ उर, वश और पाल (मस्तिप्य) या महत्व गो प्रतीगतमा गर्भ म प्राप्त हाना है। यहां पर उपर या गन्नध मूल प्रतिया स, वक्ष या गदर्भ (हत्य) संवदना के क्षेत्र स तया कपाल (मस्तिप्प) पा सम्बध आत्मा की प्रियाना स है । आज भी मनोविमान और भाषा विगा शरीर इन आरिम मूल पियाग रा प्रभावित एव अनुप्ररित हैं । इस वियाग का एर महत्वपूर्ण विभाग सृष्टि मिथक | ६७ कुडलिनी-योग मे प्राप्त होता है जहां कुडलिनी के रूप मे अर्ध्वगामी चेतना, शरीर में स्थित 'चक्रो' का भेदन कर आत्म-चेतना के 'सूय' का साक्षात्कार करती है जो एक प्रकार से अचेतन का अतिक्रमण है। मूल मानव का यह आदि शरीर विन्यास एक ऐसा आदिरूप है जिसका बिम्ब रूप यह समस्त विश्व की रचना है । यह प्रतीक समस्त मिथका मे प्राप्त होता है जहा संसार के अश और भाग का सादृश्य भारत, मेक्सिको और क्वाला आदि मिथका में देखा जा सकता है। इससे यह सिद्ध होता है कि केवल ईश्वर ही नहीं, पर समस्त सृष्टि की रचना मानव बिम्ब म हुई है। इस प्रकार शरीर वियास से विश्व और देवताआ का सम्बध और उनकी समानता इस बात की द्योतक है कि मानव विश्व के केन्द्र' में है । यहा पर यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि मानव शरीर से जो कुछ भी बाहर निकलता है (बाल, मलमूत्र आदि) वह मूलत सृजनात्मक है । यही कारण है कि बाल, मल, मूत्र शब्द, श्वास, स्वेद और वीय आदि ससार की उत्पत्ति के स्रोत है और पूण का यह एक प्रकार से 'जम' कहा जा सकता है ।' दूसरे शब्दा मे मानव बिम्ब के रूप में यह 'विराट' की कल्पना है । गीता मे थी कृष्ण का यह विराट रूप इसी तथ्य की ओर सस्त करता है । यही नही, 'अवतार' की धारणा मे भी विपरीत रूपम 'विराट' का मानवीकृत रूप में अवतरण मानव शरीर की एक यातुक एव तात्विक भूमिका को ही चरितार्थ करता है जो आदिमानव वी मिथवीय कल्पना का एक भनारजन और सारगर्भित रूप माना जा सकता है। इस प्रकार, शरीर की प्रियाएं एक 'प्रतीकवाद' का रूप ग्रहण कर लेती है जो मनस की प्रक्रिया है । इस प्रकार 'अहतर' जो वृत्त या गोलक के रूप म आरम्भ होकर क्रमश गर्भाशय की दशा को प्रकट करता है--यह सारी प्रक्रिया 'अह' का चेतना प्रसार ही कहा जा सकता है जा उपयुक्त विवेचन से स्पष्ट होता है । 'जब 'अह' भ्रूण दशा का अतिरमण कर लेता है, तब 'वह' ससार में प्रति एक नयी प्रवृत्ति का परिचय देता है । इस नये परिवतन के प्रकाश म आदि स्पा, प्रतीका मिथवा और देवताओ के स्वरूप म रूपातरण और परिवतन की दशा लक्षित होती है । इस दशा में 'अह' के लिए यह ससार दुख और सुख वा स्वरूप हो जाता है और उसी से वह अपने दुख और सुख का अनुभव करता है । यह १ दारिजिन ऐण्ड हिस्ट्री आफ का शसनेस, न्यमान, पृ० २५-२६ १८| मिता गि गरमा मानिया उमा, nिग और fram (TB) भरिमा जरिया मग प्रसार महामारी' मा अवधारणा मITTP:गापार एप निगराग और गरा पर जा प्रम नौ या मागागागा गा पा 'ry for पी'T' और मामा TIT Pा और शिलप पा र गा परम यि प्रमार जागमा गिराम रिमारिगा। मप्र है।' २. महामाता पा विम्य और मृगनतत्व इम ग भएर प्याा न याम्प याग नी' और 'पुष तप ये गि म सम्याधा है। ग गंभ म मोतिर नियम है, वह यह रिस्तो मामा म्या पलिंग म्पमाप पाहाग हा यग । 'अनीमगर मी गाजा यह प्रपट परता। मितना गा स्याल निग: पार यह म्ची पारामही मया शि, पर दूगर्ग भार माप लालिग', मा पुग्पा म प्राप्त हा'महामाता मा अवधारणा में यह तर प्राण हाता है जय 'यह अप भएर प्रशिा परती है और दूसरी बार मरामाता' इम आदि म 'उ' और गपि प्रतीपातमा भी रामावश प्राप्त माता है। 'उभरता' पी भाव पारण 'महामाना' या गम्बध 'धरती' स भा माना गया है और इग प्रसार धरती और स्त्री पयायवागीश मान गये। इम पार मातृयी या महामाता या विम्य एर सुजगारमा तत्व में रूप म अवतराि हजा और इगपाप पूरप सम्बघ पुन या पुगि प्राति से हो गया । महामाता और परम पुत्र या यह सम्बध मनर गियराम प्राप्त हाता है जहां वह पुत्र भी है और उमरा प्रेम। भी । स्त्री और पुरप का यह 'आनिरूप' इस तथ्य यो भी व्यत्त परता है कि 'माता' या अस्तित्व पिता या पुष्प से पूर्व है । इग दृष्टि से, माता सृजनात्मा शति या प्रतीक है और पुरुष उसयो संरतना जोर माना 'यारण' हे आर पुरप उमरा 'पाय' । अस्तु, 'माता' जीवन प्रदान परा वाला आदिशक्ति है, और यह पुलिंग प्रवृति से पूर्व है जो उम भी जम दती है । इसरा यह स्वप्न हाता है वि स्त्री या प्रथम अस्तित्व 'माता का है और पुरप या प्रथम अस्तिव पुत्र या प्रेमी का है। जत साइबल जा माता है वह 'एटिस' यो अधित करती है, परबियस डियाना को और १ द मारिजिन एण्ड हिस्ट्री आफ का शसनस, पृ० ४०-४१ २ इसका विवचा मिथ की मनावैनानिर व्याख्या व अतगत हो चुका है।

सृष्टि मिथक ६६ फेटान और एफोडाइट को जो 'माता' के अनादि सर्जव स्प यो प्रतिपादित करती है । यही नहीं, पूर्वीय सस्तृतिया म एटिस, एडोनिस और आसरिस के विम्ब वेवल माता से उत्पन्न नही होते है, पर वे उसके प्रेमी भी है। ये सभी पुग्प-पिम्य माता के प्रेमी हैं, उसी के द्वारा मृत्यु को प्राप्त होते हैं और फिर 'माता' से ही जम लेते है । यहा पर पुरष तत्व निष्क्रिय है और पूणरूपेण 'महामाता' पर आश्रित हैं । इस स्थिति म एक अय महत्वपूर्ण तत्व का मन प्राप्त हाता है, यह है, निग-मिथ का उर्वरक स्पजो 'महामाता' की भावना से जुड़ा हुआ है क्योकि 'महामाता' के लिए पुरुष का लिंग' एक पवित्र रूप है और इस लिंग सम्बन्ध का विकास देवी और देवताआ के प्रतीवार्थ म भी प्राप्त होता है । मातृदेवी या महामाता इस प्रेमी-पुत्र को वैवल उसके "लिंग' के लिए प्रेम करती है और इस प्रकार इसका महत्व केवल लिंग तक ही सीमित न होकर सास्कृतिक एवं ऐतिहासिक है । ये सभी युवक निष्क्रिय एव बलहीन 'अह' के स्प हैं, और इनकी नियति उनके समष्टि रूप में निहित है। अत इसका अस्तित्व व्यक्ति के रूप मे प्राप्त नही होता है । महामाता का पुत्र, प्रेमी और उवर देवताआ से सम्बध केवल उनके लिंग से है जिहे वह एक 'माध्यम' के रूप मे प्रयोग करती है। महामाता एक पवित्र कौमाय का भी स्प है जा मरियम, कुती और अनक देवदासिया की भावनाओ मे विकास प्राप्त कर सका। महामाता का यह रूप अपने म स्वतत्र और निरपेक्ष है और वह किसी भी पुरुष पर आश्रित नहीं है । इस प्रकार महामाता उर्वरा शक्ति का प्रतीक है ना अनेक मिथको मे सृजनात्मा शक्ति के रूप म विकसित हुई जो निरपेक्ष, स्वतन और सव- शक्तिमान सृजन-तत्व है। इसी के साथ एक तथ्य की आर सकेत करना आवश्यक है कि तरुण प्रेमी अपने को महामाता की सापक्षता म समर्पित कर देता है जो एक स्वाभाविक समर्पण का रूप है जो अतत मृत्यु के लिए अभिशप्त है क्यारि प्रकृति थी तरह, माता के द्वारा (धरतीमाता) उसया पुनज म होता है। इस पुनज म लिए 'वह' महामाता पर पूणरूप से आश्रित है जिमका सकेत हमे ग्रीव ट्रेजेडी मे, विशेषकर 'इडीपस' आज्यान में प्राप्त हाता है । इस स्थिति तक पुरुप तत्व १ गोल्डेन बो, फेजर, पृ० ५७० (अपरिवद्धित सस्करण, १६५२) २ बोमनस् मिस्ट्रीज, एम० हाडिङ्ग, पृ० ५० ७० मिया दर्शन या विकारा रास्वतत्र अस्तित्व प्राप्त नहीं होता है और उसमें उस 'शक्ति' या भी अभाव दृष्टिगत हाता है जा महामाता यी शक्तिया का सामना कर सके। इस संघप या रूप हम आगे प्राप्त होता है जब पुरुष तत्व एक द्वन्द का जम दता है (पर अब भी वह महामाता के अधिकार क्षेत्र म ही है) और आत्म- हत्या भी करता है जसावि हमे एटिस, वाटा आदि म प्राप्त होता है । नारसि- सस और पैनपिपरा म भी यह द्वन्द्व का रूप देखा जा सकता है जो यह स्पष्ट परता है कि 'अह' चेतना क्रमश अपन प्रति सजग हो रही है और आत्म- साक्षात्कार की दशा की ओर उमुख है । ऐसी दशा म प्रमश 'महामाता' अनेक अप्सराआ, परिया, माताओ, विमाता और प्रेमिकाला आदि म्पा म खडीकृत हो जाती है और इस प्रकार प्रमश पितृतत्व का (पुरुप तत्व) वर्चस्व प्राप्त होने लगता है जा यह भी स्पष्ट करता है वि सभ्यता का विकास मातृसत्ता से पितृसत्ता सी आर प्राप्त होता है । सृष्टि मियक इस सम्मण को अप्रत्यक्ष रूप म प्रक्ट करते हैं । इसका एक उदाहरण गिल्गैमश का मिथ है जो एक शक्ति- शाली व्यति व है और जिसे हम एक 'यथार्थ हीरो' की सज्ञा भी दे सकते हैं जो 'महामाता' से अधिक प्रियाशील और प्रभावशाली है।' अत अह चेतना और पुरपत्व के विकास के साथ महामाता का बिम्ब पृष्ठभूमि में चला जाता है और पितृसत्तात्मक युग इसे दो भागो में विभक्त कर देता है-एक 'अश चेतन मन मे शिव या पवित्र मात्रा के रूप म स्थिर हो जाता है और दूसरा, अचेतन म भयानक 'माता' के रूप मे पदावनत हो जाता है। ६ विलोम का सिद्धान्त विकास की दृष्टि से चेतना का यह विभाजन एक प्रकार से 'विलोम का सिद्धात' कहा जा सकता है जहाँ पितृ और मातृ तत्वा का एक विलग अस्तित्व विकसित होता है जो भारम्भ मे 'एक' थे। यह विलोमो का विभक्तीकरण धरती और आकाश, ऊर्य और पर, प्रकाश और अधिकार, दिन और रात तथा जड और चेतन आदि युग्मो में अनेक सृष्टि मिथको का एक ऐसा क्थ्य है जो विवास की प्रक्रिया को अपने तरीके से समयन का प्रयत्न है। नादिम मानव का यह विश्वास था कि धरती और आकाश मूलत एक दूसरे से आबद्ध और जुडे हुए हैं और किसी देवता या हीरो ने अपनी अपार शक्ति के द्वारा उहे अलग १ दिजारिजिन एण्ड हिस्ट्री आफ का शेसनेस, पृ०६३ सृष्टि मिथक | ७१ कर दिया और तब से वे एक दूसरे से अलग हैं ।' पॉलीनिशी मिथको मे (तथा अय मिथका में भी) रांगी और पापा जो जाकाश और धरती के प्रतीक है उनसे समस्त वस्तुआ, देवताओ और मानवा का उद्भव माना जाता है। इस प्रकार बार-बार हम सृष्टि के मूल प्रतीक 'प्रकाश' की ओर जात है जा मुलत चेतना का स्वरूप है और यह दशा लगभग सभी सृष्टि मिथको मे प्राप्त होती है । प्रकाश का जम जधकार के कोख से होता है जो अनादि 'गालव' का रूप है । यही स्थिति मव तर की धारणाम भी प्राप्त होती है जहा सृष्टि का आरम्भ एवं गोलाकार पिण्ड स माना गया है जिस आधुनिक विज्ञान भी स्वीकार करता है । यह चेतना स्पी प्रकाश का उदय मानव की विकास यात्रा का एक अत्यत जावश्यक तत्व है जिसके द्वारा 'वह' अपने 'जह का साक्षात्कार कर सका जिससे 'मैं में है' का वोध हुआ, यही व्यक्ति की आत्मचेतना का स्वरूप है, जिसे उपनिषद् मे 'अह ब्रह्मास्मि' की संज्ञा दी गयी । 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' इसी तथ्य को प्रकट करता है जा मानव विकास और विश्व रचना का एक 'आदि रूप' है जिसने मिथकीय कल्पना को गति प्रदान की । सृष्टि का आरम्भ 'प्रकाश' स्वर्ग और धरती के आदि स्पा के द्वारा विलामा की रचना करता है जो समस्त विलोमो का मूल तत्व है। इससे पूर्व 'प्रकाश्य-अधिकार' का राज्य था । प्रथम प्रकाश के उदय के साथ एक घटना घटित हुई जिसने 'पर' को 'अपर' से विलग किया, मानवता के 'दिन' का आरम्भ हुआ और फ्लत विश्व के सारे तत्व दृष्टिगत हान लग । वैसिरर का यह मत है कि प्रकाश और अधवार के विलाम ने मानव के आध्यात्मिक जगत को, उसकी दिव्यता को एक जाकार प्रदान किया और यह प्रक्रिया वेवल धर्म और अनुष्ठाना तक ही सीमित नहीं है, पर इसका स्वरूप हम मानव की अय प्रियाओ जैसे दशन, राजनीति, इतिहास, साहित्य आदि मे) मी प्राप्त होता है। ७ दिक् की कल्पना सृष्टि रचना के इस स्वरुप मे एक जय महत्वपूर्ण तत्व का समावेश हुआ और वह तत्व है 'दिक्' की अवधारणा का विकास । जब धरती और मेघ के -देवताआ की कल्पना की गयी जो इस विलोम के मध्य में अवतरित हुए-इसने १ गोल्डेन बो, फेजर, पृ० १४२ २ दि ओरिजिन ऐण्ड हिस्ट्री आफ का शेसनेस, पृ० १०६-१०५ ७२ | मिथव दशन पा विकास "पिपरी प पना वो एप आधार प्रदान लिया। इस दिव' मा स्वरूप पूण. म्पेण 'अमूमन' पो प्राट नहीं करता है, मयारि यहाँ पर 'वि' की धारणा एप प्रकार से यानुपरा है जो प्रमश स्वप्न प्रतीस्वाद के निक्ट है। मेरे विचार से यह मत एपागी है क्या दिय की यह तथायित आदिम भावना वह आधार भूमि है जहाँ से दिव' या अमूर्तन धारणा वा विकास सम्भव हो समा जिसने दिप' को विराटता और विस्तार या हृदयगम करने का अपने तरीके से प्रयत्न रिया। चेतना के प्रमिप विकास के साथ अमूर्तन प्रिया का भी विवाम लात हाता है। इस प्रकार सस्थतिया के वाह्य और आतरित विकास का प्रारम्भ 'प्रकाश' के आगमन पे साय होता है और पनत "दिलामा (जैसे माता-पिता, मधयार-प्रयाश, पर-अपर आनि) का अस्तित्व प्रकट होता है। टन पिलामा का विस्तार समस्त सृष्टि म व्याप्त है, यहां तक कि 'मैं और 'तुम', Tर और नारी तथा सद और असद प्रवृत्तिया म विलामा फा स्वरुप स्पष्ट प्रतीत होता है । दवासुर संग्राम, जो मियका का एक महत्व- पूर्ण पथ्य है, विलाम के इसी हद को साकार करता है । मानव के इस 'अह' का विस्तार एक प्रकार से उसके 'व्यक्तित्व' का विस्तार है जो उसे विकास के उच्च धरातल पर ले जाता है। इस बिन्दु पर उसका सापक्ष सम्बध वस्तुओ से, अय व्यक्तिया से, ससार से तथा अपने 'स्व' या ईश्वर से होता है। इस प्रकार 'वह' एक अधिक गुणात्मक उच्च 'एकता' वा अग बन जाता है और इस भावना का जम विलोमा के अस्तित्व पर याधारित हैं जो जादिमितृतत्व (माता-पिता) के विभाजन से उद्भूत हाता है जिसका मकेत पहले किया जा चुका है। आदिपैतृक्तत्व के इस विमाजन के उच्च जात्मिक जगत जोर निम्न वस्तुजगत का द्वैत प्रक्ट होता है और इस प्रक्टीकरण म क्रमश नारी तत्व को सापक्षता (माता) मे 'पुरप तत्व' अधिक प्रभावशाली एव क्रियाशील होने लगता है। 'पुरुष तत्व' को 'चेतना और नारी तत्व' का 'अचेतन' से जाडकर दोनो की प्रियाशीलता को अथवत्ता प्रदान की गई है। यही कारण है कि सृष्टि मिथको म इन दोनो 'तत्वा' को एक दूसरे का पूरक माना गया है जो जनक देवी-देवताओ के प्रतीकाथ में निहित है। द्वारा १ यह मत डै जल, न्यूमॉन आदि मनोवैज्ञानिका का है।

सृष्टि मिथक | ७३ ८ अवतार और विकासवाद सृष्टि-मिथका में प्राणी जगत के विकास को भी देखा जा सकता है क्योकि यह विकास भी चेतना और अह' का क्रमिक विकास है जिसे मिथकीय कल्पना कहकर नकारा नहीं जा सकता है। हिन्दू मिथको म इस प्राणी विकास को 'अवतार' की भावना से समया जा सकता है जिसे आधुनिक वैज्ञानिक विकास- वाद भी पिसी सीमा तक स्वीकार करता है । अवतारो की दस सख्या एक प्रकार से मानवेतर प्राणियो से मानव नामधारी प्राणी तक की विकास यात्रा का सूचक है जो हिदू मिथका की कदाचित् अपती विशिष्ट यथार्थ मूलक कल्पना है । इन अवतारा के द्वारा क्रमिक रूप से 'सगठना' की जटिलता भी लक्षित होती है क्योकि विकास-जम म जीवधारियो की सगठना (शारीरिक एव मानसिक) एक्कोपोय प्राणियो से अनेक कोप य प्राणिया तर क्रमश जटिल से जटिलतर हाता जाती है।' मत्स्य से लेकर कल्कि अवतार तक की विकास यात्रा इस तथ्य की जार समेत करती है। पहला अवतार 'मत्स्य' है जो नितात जल मे रहने वाला जीव है। इसके बाद 'धर्म' अवतार है जो अशत जल और पृथ्वी दानो पर रह सक्ने म समर्थ है जो विकास के अगले चरण की ओर सकेत है जब जीवधारी जल और धरती के दो माध्यमा म एक साथ रह सक्ने म समथ था । वैज्ञानिक शब्दावली मे इसे 'एम्फीबियन' की सना दी गयी है। वाराहावतार तक आते-आते स्तनधारी जीवा का प्रादुर्भाव होता है जा धरती और आकाश मे विचरण करने वाले प्राणी ह । चौथा अवतार नरसिंह है जो एक ओर 'नर' और दूसरी ओर सिंह' (पशु सामाय प्रवृत्ति का प्रतीक) की मिश्रित अभिव्यक्ति है। यह अवतार 'नर' में पशु प्रवृत्ति के अश की ओर सकेत करता है जो उसे मानवेतर प्राणिया से जोडता है । इस 'पशु' अश का उनयन 'वामनावतार' मे हाता है जा स्पष्ट रूप से 'होमो' (मानव विवेक) का स्वरूप है। इस पर भा रक्त-पिपासा को जो प्रवृत्ति मानव मे अव भी शेष है उसी की अभिव्यक्ति 'परशुराम' अवतार है जो मानव के आक्रमणकारी रूप का प्रतीक है। 'सातवा रामावतार' है जा परशु- राम की वृत्ति का दमन करता है और उसका उदात्तीकरण भा करता है। मानव चेतना जोर अह चेतना के ऊध्वगामी रूप का प्रतीक रामावतार है जो पुरुषोत्तम भी है। इसके बाद कृष्णावतार मे चनुमुखी व्यक्ति व का विकास होता है जिसमेबुद्धि-मनस का सन्दुर सयोग प्राप्त होता है। नवा अवतार, विकदिन मापनागर नागर हवा अवतार । १ ह्य मन डेस्टनी, लीपस्तेि इयू, पृ० ३१ ७४ | मिषय दशन पा विकास 'बुद्ध है जो तय शक्ति या प्रतीप है । इस स्थिति पर आरर मानव ये भावो वियास या संकेत प्राप्त होता है जो पल्लि 'अवतार म बुद्धिमनस' की भावी विवासरा भाव पी आर समेत परता है।' अतिम दा अवतार मानव- मन पी भावी वियाग ये सम्भावनाआ को लक्षित करता है जिसर द्वारा मानमिा विकास के अधिव' मूदम स्तरा या भावी उद्घाटन सम्भव है जिसे महर्षि जरविंद ने 'अतिमानव' को सजा दी है। ६ मिमूर्ति की धारणा और सृष्टि-प्रक्रिया सुप्टि-मिथवा म ब्रह्माण्डीय सत्य का भी दिग्दर्शन प्राप्त हाता है क्योकि इन मिथको के द्वारा विश्वजनीन 'सत्य' या सक्त प्राप्त होता है । जैसाकि हम देख आये हैं कि सष्टि के लिए सृजनशक्ति की आवश्यकता होती है जिसे गोलक, अण्डवोप, महामाता, ब्रह्म और विश्व-पैतृक तत्व के स्प में चित्रित दिया गया है जो मिथकीय क्ल्पना वो एव' सार्वभौम प्रक्रिया है । सप्टिनम मे सृजन तत्व, अवस्थिति और विलय (सहार) की तीन प्रक्रियाएं एक साथ चलती हैं और इस तथ्य का एक मिथकीय स्पाकार त्रिमूर्ति (ट्रिनिटी) की धारणा है । ब्रह्म को अवधारणा मे ये तीना तत्व समाहित हैं और दूसरी ओर इन तीना तत्वो की 'ॐ' को तीन मात्राआ अकार, उकार और मकार के द्वारा व्यजित भी किया गया है । ओकार का महत्व भाषा और वाणी की दृष्टि से महत्वपूर्ण है क्योकि वाणी या वर्णो मे अकार की निहिति है जो सृष्टि में 'अकार' की सर्वव्यापकता का रूप है। जिस प्रकार अकार समस्त वाणी म व्याप्त है, उसी प्रकार वैश्वानर (अग्नि) समस्त विश्व में व्याप्त है। अत सर्वव्यापकता की दृष्टि से अकार पौर वैश्वानर मे समानता है। इस प्रकार 'अकार विश्व में व्याप्त वह तत्व है (ब्रह्मा) जो सृजनात्मक और विकासात्मक है। इसी प्रकार 'तेजस' ओउम् की दूसरी मात्रा उकार' का पर्याय है। 'उकार' मे तेजस की समानता का कारण यह है कि दोना वा धर्म उलप है। जिस प्रकार उवार, अकार आर मकार के मध्य में स्थित है, उसी प्रकार विश्व और प्रान के मध्य म तेजस है। मध्य में होन के कारण उकार का धम सम- रसता और सन्तुलन है जिसके द्वारा सृष्टि स्थित या अस्तित्व म रहती है। यही "विष्णु का प्रतीक है। मकार और प्राशतत्व को समानता है। यह १ पुरानाज इन दि लाइट आफ माडर्न साइस, २० ए० अय्यर, पृ० २०७ २ माण्डूक्योपनिषद्, आगम प्रकरण, पृ० ६६ (उपनिषद् भाप्य खण्ड २) सृष्टि मिथक ] ७५ , समानता 'मिति' के कारण है जिसे शकराचार्य ने 'मान' का प्रतीक माना है। जिस प्रकार प्रस्थ (एक प्रकार का बाट) से अन तौला जाता है, उसी प्रकार तेजस और प्रलय (विलय) मापे जाते हैं । ओकार की समाप्ति पर अवार और उकार 'मकार' में प्रवेश करके, उससे पुन अभिव्यक्त होते हैं या निक्लने है।' यह नम चला करता है जो यह स्पष्ट करता है कि उत्पत्ति और स्थिति का पयवसान 'मकार' तत्व मे होता है और पुन मकार से ये दाना तत्व बहिर्गामी होत हैं। यह क्रम निर तर चला करता है। इन तीनों शक्तियो का मानवीकरण 'निमूर्ति' की धारणा मे प्राप्त होता है। सृष्टि-रचना के इन तीनो तत्वा को ब्रह्मा, विष्णु और महेश शिव) की समष्टिपूण और सामरस्यपूर्ण धारणा या प्रतीक के द्वारा दशाया गया है। सृष्टि रचना हेतु यह समरसता आवश्यक है । ग्रीक मिथको मे भी 'निमूर्ति' की धारणा प्राप्त होती है । ड्यूबस ने इन तीना शक्तिया (सृजन, स्थिति और प्रलय) या देवो का सम्बध क्रमश पृथ्वी, जल और अग्नि से जोडा है। इससे वह इस निष्वप पर पहुँचे हैं कि प्रकृति के तीन तत्व -पृथ्वी (ब्रह्मा और ज्यूपिटर रूप), जल (विष्णु, नेप्च्यून) और अग्नि (शिव, प्लूटो स्प) जो आदिमानव की आश्चय भावना और यातुक भावना के आधार थे, उनका एक अधिक सार्थक और 'तार्किक' रूप त्रिमूर्ति की धारणा में विकसित हुआ।२ माता के नादिरूप मे 'महामाता' और धरती माता के प्रतीकार्थ मे उत्पत्ति और सृजन की भावना निहित है और त्रिमूर्ति की धारणा मे पृथ्वी की सृजन-शक्ति का समावेश परोक्ष रूप से प्राप्त होता है । दूसरी ओर विष्णु (नेपच्यून) की भावना मे 'जल' तत्व का समाहार स्पष्ट रूप से प्राप्त नही होता है, पर शिव की भावना म 'अग्नि' का रूप उसके सहारक एव सृजनात्मक रूप में देखा जा सकता है। शिव की धारणा मे प्रलय और सूजन दोनो का समाहार है जो शिव के अय नाम 'रुद्र' और 'महादेव' के द्वारा व्यजित होते हैं। इस प्रकार शिव वह तत्व है जिसम उत्पत्ति और विलय की दोना प्रक्रियाओ का रूप प्राप्त होता है और फिर, उसी से सृष्टि का आरम्भ होता है यह क्रम निरतर चला करता है। ११ जल प्लावन का मिथक सृष्टि मिथका का विवचन उस समय तक अपूर्ण रहेगा जब तक सृष्टि के अन्त या महार के मिथका का विश्लेषण न किया जाए । जल-प्रलय का मिथक १ माण्डूक्यापनिपद, आगम प्रकरण, पृ० ६६ (उपनिषद् भाष्य खण्ड २) २ हिन्दू मैनस, वस्टम्स एण्ड सेरीमनोज, ड्यूवस, पृ० ५४७ ७१/ पिसाग सामाnnो प्रों और गिपाग frगी रिगी प्रात हाता । ममिर पर पाना frगंगार और माता गि प्राार नष्ट हुए और गायीग 'ग्राम' (या जमनास) मे बार मे दम्पति (स्त्री और पुगर) भगया मुछ माग ।। जोषित , frei पुरा सुना गाय म पाग पिा। जन-नारा भार मिया और रा गंगामा यत गभी ग म HIN Em मा प्रमोशन पर गिपर सा मामाय नहीं है गि पूर्वीय एप परियगीय काम।' मग माया मे गिरित मानवता और विश्व अन्न अप मिपा भी गगी प्रीय दुपटना, भूपम्प, भूयरा गिरा, गिा गागा राग या पैनना लाजिो रागार में नाशय पारण सगो जा। पागमस्त मिपापा यह अर्थ ही है कि संसार या यह संहार अतिम है, पर राज्य यह है | यह एप जाति या पराभय और दूगरी जाति में उन्य या हमारे रागो रया हैं। मेरे विचार से ये मिथप पेयर जाति व अभय और पिताश थी गाया ही नही पहले हैं, पर विलय की उरा प्रतिमा पा भी गामा रयत हैं शिराग नवीन प्टि या पुन आरम्भ हाता है। शिय पी अवधारणा इसी तथ्य पी बार राफेन परती है। ये मिथर एप प्रकार से प्राति-गत्य पा ही प्रकट करते हैं। जल-प्लावन द्वारा धरती या पूर्णरूप से इन जाना जथवा अगि के द्वारा इसका विनाश हाना और फिर इसके पश्चात् 'योमाय पृथ्यो या प्रपट हाना-ये सभी प्रक्रियाएं यह व्यक्त परती हैं कि अव्यवस्था से ही सृष्टि या भारम्भ होता है और यह क्रम चला परता है। ओव मिथका म जल प्लावन पा सम्बध 'परमशक्ति या पुरुष' स है जिसकी इच्छा मात्र से ससार का अत पटित होता है । यह घटना कभी-कभी उस समय भी घटित हाती है जब ससार म पाप बहुत बढ़ जाते और इह नष्ट करने के लिए 'परम पुरप प्रलप की विभीपिरा वा सहारा लेता है । जमरीका के इण्डियना म एस मिथ प्राप्त होते हैं जो यह धारणा पुष्ट करते है कि जल प्लावन के बाद पुनस प्टि होतो है और इसम वे हो नष्ट होते हैं जो पापी हात है। इसी के साथ कुछ आदिम जातिया म (अप्रीवा) यह भी विश्वास है कि ससार का अत तीन या चार वार हाता है और चौथा अत (या पांचवां भी) भविष्य मे होगा जवनि मूय का निपात होगा या वह लुप्त हो जाएगा। कैली- १ प्रिटानिरा विश्वकाप, पृ० ११३८ सृष्टि मियर | ७७ फोनिया के 'मेई मिथ मे सृष्टिकर्ता एक युग्म (स्त्री-पुरुप) का सृजन करता है और उनसे यहता है "जव यह ससार अशिवगुणों से भरपूर हो जाएगा, तब मैं इस ससार या पुन निर्माण करूगा और फिर तुम्हारा जम हागा।' इन मिथका के अध्ययन से एलेक्जेडर इस निष्कप को सामने रखत हैं कि प्रशात महासागर तट के अनेक मियका मे पृथ्वी मा पुनस् जन प्रलय या भयकर प्लावन वे वाद होता है और कुछ मिथवा मे सजन और पुनर्सजन दाना का सकेत प्राप्त होता है। 'प्रलय' की अवधारणा और उससे सम्बधित मिथको की एक सार्वभौम सत्ता पूर्वीय धर्मों में भी प्राप्त होती है जिस प्रकार पश्चिमी धर्मों और मिथको मे । वैदिक काल और ब्राह्मण ग्रथा (शतपथ) म 'प्रलय' का 'मिथ' पुनसृजन की मान्यता को बल प्रदान करता है जब शतपथ ब्राह्मण मे जल प्लावन के बाद 'मनु' और श्रद्धा (कामायनी) जो प्रलय के वाद सुरक्षित रह जाते हैं, उन्ही के द्वारा फिर से सष्टि का आरम्भ होता है। पुराणा मे जो चार युगा को कल्पना की गयी है, वह चावार रूप मे मुष्टि और प्रलय के क्रम को प्रतीकात्मक रूप म रखते है आर साथ ही, 'आरम्भ' को 'पूर्णता' का निर्देश करते हैं। यह सहार या प्रलय एक प्रकार का विलय है और एक हजार चनो के बाद 'महाप्रलय' का होना भी कल्पित किया गया है । महाभारत और पुराणो म 'प्रलय' या एक जय रूप भी प्राप्त होता है । भितिज मे अग्नि का विस्फोट होगा, सात या बारह सूर्यों का जाकाश म उदय होगा जो समुद्रा को वाप्पावृत पर दरी आर पृथ्वी को भस्म कर देग । उमरे पश्चात् चारह वर्षों तक वर्षा हागा जिससे पृथ्वी नार मानव विनष्ट हो जाएंग। तत्पश्चात् फिर से प्रत्येक वस्तु वा सृजन होगा और यह क्रम जनत काल तक चलता रदगा । भारतीय विचारधारा म युगा कल्पना के पीछ अनत सृजन की प्रक्रिया का सकेत प्राप्त हाता है जा वितय और विश स पुनस जन की एव चक्राकार प्रक्रिया है। यह एव ब्रह्माडीय प्रक्रिया है जिसे न समझन के कारण कुछ पाश्चात्य विचारका न युग कल्पना का केवल मात्र जादिम मानव का ससार के वार्षिक नवीनीकरण के जनुष्ठान स जोडा हे और साथ ही यह भी मत रखा है कि यहा मानव का जतिम लक्ष्य ब्रह्माडीय चक्र से पलायन हे । भारतीय मिथका का एक मूल तत्व है ब्रह्माड की मापेक्षता म मानव को लावेट करना , १ नार्थ अमेरिकन माइथालाजी, एच० डी० एलेक्जेण्डर, पृ० २६-२७ २ जिंटानिका विश्वकोप, पृ० ११७२ . ७८ | मिपा दर्शन का विधाम और गृष्ण या विराट रूप (विष्णु, ब्रह्मा, महादेव की भावना म भी यही तथ्य है) इसी सापेक्षता पा प्रतीकात्मक रूप म रखता है। भारतीय सृष्टि-मियका में विश्व पी अतिम समाप्ति या समावेश नहीं है, वहाँ पर सजन, विलय और प्रलय की चापार स्थिति है जो पराक्ष रूप से 'महापाल' पी एक लीला है । 'भारम्भ' भी 'पूर्णता पा मिथ हम मशापाटाभिया, मिम, ग्रीक तथा यहरियो म रिमी न पिगी म प्राप्त होता है। बेबीलानिया म अनन्त स्वर्ग की पल्पना प्राप्त होती है और जल प्लावन से सात वार मानव जाति के विनाश और पुनम जन की गाथा प्राप्त होती है । यहूदिया में भी इसी प्रकार जल प्लावन और पुनर्सजन वा मिथ प्राप्त होता है । ग्रीक मिथका मे युगो की पल्पना प्राप्त होती है और 'भारम्भ' की 'पूणता' का मिय भी प्राप्त होता है। ग्रीय मे चनाकार सिद्धात पा भी स्वरूप प्राप्त होता है जिसे सबसे पहले हिसायह ने प्रमिक पांच युगो म मानवता का अमिर विनाश प्रतिप क्यिा और हीराविलट्स ने चाकार सिद्धात को बल दिया जिसका प्रभाव 'स्टॉयक्स' पर भी पडा ।' यहां पर भारतीय या हिदू मिथका के सृष्टि सिद्धात की प्रतिध्वनि प्राप्त होती है जो यह स्पष्ट करती है कि जलप्लावन और चक्रा- कार सृजन और प्रलय का एक अनादि प्रम चलता रहता है। प्लेटो ने भी जलप्लावन के मिथ का सकेत दिया है। जूडो-इसाई मिथका म भी ससार के अन्त का मिथक प्राप्त होता है, पर उसमे उपयुक्त मिथका की सापेक्षता म एक मुख्य अतर है। ईसाई परम्परा मे यह मा यता है कि ससार का अत केवल एक बार ही होगा जिस प्रकार सृष्टि रचना एक बार ही घटित हुई है । विनाश और जल-प्लावन के बाद ब्रह्माड फिर से अस्तित्व में आएगा। पर यह ब्रह्माड वही ब्रह्माड होगा जिसे ईश्वर ने आरम्भ में जम दिया था। यह पुन निर्मित ब्रह्माड जधिक पविन और रूपातरित होगा और इसका कोई भी 'अत' नहीं होगा। यहां पर 'काल' चनाकार न होकर अनिवत्य और रेखीय है । जिस प्रकार रेखा एक सीधी गति से आगे को जाती है, उसी प्रकार 'काल' की गति भी रेखीय है, उसका प्रत्या- वर्तन नहीं होता है । ईसाइयो के लिए ब्रह्माड के अत का अर्थ है प्राइस्ट का आगमन और स्वर्ग को प्रतिष्ठा । देवदूत यह पापणा करता है कि ब्रह्माड का पुन नवीनीकरण होगा, नये स्वर्ग और धरती का निर्माण होगा, वहा काई भी दुख, दैय और घृणा का साम्राज्य नहीं होगा। इस प्रकार, ईसाई धम म ब्रह्माह का पूर्ण नवीनीकरण और स्वर्ग की प्रतिष्ठा उनके सृष्टान्त-सिद्धात के दो प्रमुख तत्व हैं। १ वही, पृ० ११० होरो-मिथक ६ १ पुलिंगोकरण-क्रिया और होरो का उद्भव सुष्टि मियका के अतगत पुरुष तत्व को ऋमिा प्रधानता और नारी तत्व की वरायना में अमिर हाम इस तथ्य की आर सकेत करता है कि चेतना मा यह प्रमिक पुलिंगीकरण 'हीरा' या नायर वी धारणा का आरम्भ बिदु है जिसने क्रमश होरो मिया का सर्वांगीण विकास किया और सास्कृतिक प्रक्रिया मे उसके महव या रेखाति विया । अह चेतना के इस पुलिंगीकरण और विमुक्तिकरण (नारी तत्व से, महामाता से) के द्वारा 'अह' ने 'हीरो' का रूप धारण किया। इस प्रकार हीरो का इतिहास, जैसा कि मिथका मे प्राप्त होता है, वह इसी 'अह' विस्तार का प्रतिरूप है जो अचेतन तथा विरोधी तत्व के विरुद्ध संघर्ष करता है और इस प्रकार सास्कृतिक एव ऐतिहारि प्रक्रिया का एक अभिन्न एव महत्वपूर्ण अंग हो जाता है । सृष्टि मिथका का प्रमुख गुण उनकी प्रमाडोय अर्थवत्ता है ता हीरा मिथ का प्रमुष गुण उनकी सासारिक अथवत्ता है जो एक प्रकार से इस विश्व के केद्र मे है । इस प्रकार 'होरा एक महत्वपूर्ण आदि प्रारूप या जारिकी टाइप है जा सारी मानवता का आन्श या प्रेरणा स्रोत रहा है और रहगा । हीरा जहा एक आर समूह-मन को प्ररित करता है, वही वह व्यक्ति-मन को भी प्रेरित एव जादालित करता २ अचेतन और जातिवीर 'हीरा' का उद्गम और विकास जातीय अचेतन का स्वरूप है । युग के अनुसार किसी व्यक्ति विशेष के चारा जार जो जातीय प्रेम भावना केद्रित हो जाती है, उसका सात जचेतन मन ही है जा एक प्रकार से 'अचेतन' के प्रति जाति का प्रेम है ।' य हीरा हमार ही अग है जो जाति को सास्कृतिक चेतना के 'हीरो' हैं । हारा का यह रूप उमका जति मानवीय शक्ति से भी सम्बन्धित है जिसका स्वध्य हम 'महामाता के अधिकार म, ड्रैगन के संघप म तथा अय वायाआ पर विजय प्राप्त करने में दिखाई देता है । यही से 'जातिवीर' १ साइवालोजी आफ द अन्या शेम, युग, पृ० १०८ ५. मिया दर्शन मा विकारा 'जातिवीर' या गिल्गमेश की भावना या मूत्रपात होता है । इम जातिवीर का आदि स्प उसके यातुम और अलौपिन रपम भी प्राप्त होता है ।' आरिम मानव ये गुहा-चित्रा म (जो भारत और यारप म प्राप्त हुए हैं) कुछ ऐसे चित्र प्राप्त हुए हैं जा रिसी पुरप द्वारा अस्त्रा से बात 'पशु चित्र' है ना भावेट की सफलता में लिए लिए गए यातु पर्म हैं और ये तयार थित जातिवीर सिंह या पभ पर विजय प्राप्त करते भी दिखाए गए हैं। जातिवीरा की यह यातुन-शक्ति 'हीरो' भावना पा एक अभिन्न अंग है। सैमसन ने इस अति- मानवीय शक्ति से शेर को पराजित किया । एन्निद और गिलगमेश भी यही यार्य परते हैं। ३ हीरो को द्विविधि पैतृकता हीरो के स्वरूप पा सम्बध दो तत्वा से है । एक उनके जम से और दूसरे, उसके द्विविधि पैतृयता से । हीरो के दो पिता या दा माता होत हैं । यह तथ्य हीरो-मिय का एक ये द्रीय तत्व है । हीरो के एक व्यक्तिगत पिता के अतिरिक्त एक 'उच्च' पिता भी होता है जिसे 'आदिरूपीय' पिता (आरिपी टाइपल) का बिम्ब कहा जाता है और यही स्थिति 'माता' के सम्बध म भी प्राप्त हाती है । हीरो का यह व्यक्तिगत एवं पराव्यक्तिगत पैतृक रूप एक प्रकार से हीरो ड्रामा का एव' अभिन्न अंग है । युग तथा अय मनोविश्लेपया न ड्रेगन सघप यो तथा भूत या राक्षस युद्ध को 'हीरो' मिथ के साथ जोड कर रडीपस प्रथि, जो पश्चिमी जगत को सदैव से जादोलित करती रही है, इस तथ्य को हीरा की मनस प्रतिया या घटना को समझने का एक जाधार बनाने का प्रयत्न किया। इस हीरो मिथ के साथ अक्सर यह भी देखा गया है कि माता या पिता मे से एव 'दिव्य व्यक्तित्व का होता है जैसे मातृदेवी या पितृदेवता। ४ पवित्र कौमार्य और हीरो का जन्म सामा यत ये माताए पविन कौमाय से युक्त थी जसा कि प्राचीन संसार मे प्राप्त होता है । यह कौमाय, महामाता की सृजनात्मक शक्ति से सम्बन्धित है । जो किमी एक नर साथी की अपेक्षा नही रखती है, पर उसी म यह नर तत्व विद्यमान रहता है । पुरप तत्व से अधिकृत हो जाने के पश्चात् भी १ हीरोइक प्योटरी, बावरा, पृ० ६२ २ प्रागैतिहामिक भारतीय चित्रक्ला, डा. जगदीश गुप्त, पृ० ४०६ ३ मिय आफ दि यर्थ आप हीरो, पृ० २५ होरो-मिथर |८१ अपने 'आदि रूप को सुरक्षित रखती है। हीरो का जन्म इसी आदि रूप नाय से सम्बंधित है जिसके स्प हैं, एक भयवर (ड्रैगन) और दूसरे शुभ कल्याणमय रूप जो इस कौमार्य आदि रूप से गहरा सम्बधित हैं । सूय ते का जम इसी शुभ महामाता के नादि रूप से सम्बधित है जो पूर्व और चम के मिथको मे समान रूप से प्राप्त होता है। मेरी, कुती और केडी- य ऐसी ही कुमारी माताएँ थी जिन्होने सूर्य हीरो अथवा दिव्य शक्ति सम्पन यको को जम दिया। इन हीरा का स्वरूप मूलत परामानवीय या अलौ- क होता था। इस प्रकार के हीरो के जाम से माता एक अतरिक उल्लास अनुभव करती थी क्याकि उसने अपने से एक दिव्य परामानवीय व्यक्ति । जम दिया है जो उसी का एक 'चमत्कार' था। यह चमत्कार एक प्रकार पूर्व सृजन है जो किसी देव या ईश्वर की अपेक्षा रखता है जा परामान- 'य शक्ति का प्रतीक है। यह 'नारी' की पराशक्ति है जो उसे 'महामाता' थवा 'पृथ्वीमाता' को संज्ञा प्रदान करती है । मिस्र म इसिस, जा पहले सिरिस का जीवन देती है और फिर वह दिव्य-देवता के द्वारा प्रजनन रती है । यह दिव्य-देवता अनेक अनुष्ठाना मे देव-सम्राट, के रूप में अव- रित होता है जिसका सम्बध अनुष्ठानो मे उपराशक्ति के रूप मे है । यह दि अवस्था मिस्र मे प्राप्त होती है 19 आगे चल कर यह देव-सम्राट ही य-देवता के रूप में अवतरित होता है। हीरो के जम से इस सूय और वता का एक अभिन्न सम्बध अग है जो आदिम मिथका म सामा य रूप से प्ति होती है । लौकिक माता और अलोक्कि देवता (प्रजनव) के ससर्ग से र्ण बुद्ध, जोराष्ट्र तथा परसियस मादि नायका का नाम 'महामाता' की सी सृजनशक्ति का रूप है। इन सत्र उदाहरणा से यह स्पष्ट हाता है कि यक के द्विविध रूप का एक अपना ऐतिहासिक महत्व है जो स्त्री के जम 'ने के अनुभव से सम्बधित है। यह स्त्री का एक आध्यामिक विम्ब है जो अपने को 'स्वग' के लिए समर्पित करता है । इसके अनेक रूप है-एक कौमार्य का रूप है जा स्वर्गीय देवता से सम्पर्क करता है, एक तरुणी का रूप है जो देवता प्रति आनन्द भावना से प्रेरित होती है और एक सोफिया का वह दुःखपूर्ण रूप है जो दिव्य पुत्र या 'लागॉस' को जम देती है। यही कारण १ मिय ऐण्ड रिच्यूअल्स इन एशेंट ईजिप्ट, ब्लैकमैन, पृ० ४१ w ८२ | मियर दर्शन या विकारा है कि हीरा या नाया या जीवन संघर्ष और दुपया हाता कृष्ण, ईशु या युद्ध हो। ५ पिता विम्ब और हीरो इस प्रकार नापर या जम 'माता' ये प्रजनन से है। पुरुप तत्व (पलिंग) पी प्रमश प्रधानता जो आगे चल पर, आथिप दृष्टि से, स्त्री-तत्व को अपेक्षा, अधिप प्रियाशील हो गया । यह पुरुष तत्व की 'मह' चेतना का विकास यहा अपनी शक्ति रा क्रमश साक्षात्कार करता है। यह पुरप रूप नहीं है, पर इसम व्यक्तिगत पिता विम्य वा हत्या सा सम यह पिता ही 'समूह' या नेता हुआ और पुत्र स उसपा संघर्ष हुआ । यहाँ पर 'पिता' और 'पुत्र' समूह गुणा पे वाचय शब्द । गत सम्वधा के श । अधिक आयु वाले व्यक्ति 'पिता' है और व्यक्ति 'पुत्र' । इनवे मध्य जा सधप प्राप्त होता है, वह आए है और अपो मूल रूप म 'आदि रूपीय' प्रकृति के हैं। ये बडे : वाले 'पिता' (वृद्ध) याय और व्यवस्था सस्थापर है जो । से 'स्वर्ग' के प्रतिष्ठाता हैं।' यह 'स्वग की स्थिति नि 'माता-पृथ्वी' के विपरीत है। स्वग और 'धरना' का यह 'युग प्रतीकात्मक है जा 'आदि रूप' प्रकृति का माना जा सकता है विकास क्रमश आध्यात्मिक तत्व का जम द सका जिसर पर देवता' की कल्पना का प्रादुर्भाव हुआ जो पुग्प-तत्व की प्रधानता को घोषित करता है । यह स्वग 'शक्ति-समूह' वाम जहा देवतागण, आत्माएँ, टोटमिर पशु और पूर्वजा (पितर) या गया जा मिथकीय कल्पना वा एक राचर तथ्य है । जाव मह जाध्यात्मिा 'स्वग स जवतरित मान गए जिह स्वर्ग-दूत अपव सज्ञा दी गयी। यह एक प्रकार वा आध्यात्मिव-जम है जि पुरुप की अह चेतना और इच्छा शक्ति से है। स्वग और पुरप एक नावारभूत राह-सम्बव जहा पेता वा मध्य स्प, चेतन शा सुजन का स्रोत है। यह एक प्रकार स उच्च एव महान पुरुप त रूप है जो दिव्य नायका और महापुम्पा वा जम दे सका । इस १ एरापोलागी, गोरडन विजर, पृ० ४०८ हीरा-मिथक ३ रोचक तथ्य यह भी है कि सामा यत सभी मानव सस्थतियां चाहे वह ईसाई, यहूदी, ग्रीक, इस्लाम या भारतीय सस्थति हो, सभी का स्वरूप मूलत पुरुप प्रधान है । इन सभी सस्कृतिया में 'नारी तत्व' अदृश्य प्रेरक तत्व है जो 'अचेतन' का स्वरूप है । इसका यह अर्थ नहीं है कि नारी तत्व के महत्व और क्षेत्र को नकारा गया है जो इस सदर्भ मे ध्वनित होता है । मेरे विचार से अनेक मनोवैज्ञानिका ने (युग तथा यूमॉन आदि) स्त्री तत्व को 'अचेतन' का रूप मान कर उसके उस प्रेरव एव आदि शक्ति के रप का ही अर्थवत्ता प्रदान की है क्योकि नारी का सृजन तत्व ही वह जारम्भिक विन्दु है जहा से नायक का, हीग का, स्वर्ग दूत का, अवतार का जम होता है जो पराक्ष रूप से सस्तृतियो के विकास का केद्र और स्रोत है। उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि नायक या हीरो का जम और विकास 'महामाता' के आदि रूप को खण्डित कर, अपनी अह चेतना और इच्छा शक्ति को विस्तार देता है । आदिम समाजो मे आखेट और युद्ध का सम्बध इसी पुरुप तत्व की क्रियाशीलता का सूचक है जो नमश 'पुरुपत्व' के अभिन अग के रूप मे माय हुआ। इस दशा मे भी पुरुष तत्व निरपेक्ष नहीं है, वह नारी-शक्ति से एक सापेक्ष स्थिति रखता है।' नेता या हीरो के रूप में ही इस पुरुष तत्व का विकास नही हुआ, पर प्रजनक, सृष्टि देवता, पितृ तथा आदर्श पुरष आदि आध्यात्मिक रूपा म हीरो का विकास सभी धर्मों और मिथका में प्राप्त होता है। नायक के ये सभी रूप (लौकिक और पारि- लौक्कि) इतिहास के उपाकाल की एक ऐसी घटना है जिसने मानव सस्कृति और सभ्यता के विकास में योगदान दिया। पितृ-देवता, जा समस्त वस्तुओ का निमाता है, वह कालातीत है जो समस्त सृष्टि के पीछे विद्यमान एक परम 'शक्ति' का रूप है । इस सुप्टिक्र्ता प्रतिमा' से राजा का ईश्वरीय रूप प्रक्षेपित होता है जिसे "ईश्वरीय राजा' की सना दी गयी है । नायक या हीरा यहाँ पर ईश्वर का पुत्र है, यदि 'वह' स्वय ईश्वर नहीं है । सास्कृतिय नायक और सृष्टिवत्ता ईश्वर वा एकीकरण इसी मानवोवरण प्रक्रिया का क्रमिक विकास है जिसन नायर के व्यापक स्वरूप का विवास क्यिा । होरो 'ईश्वर पुत्र' का प्रतिरूप माना गया जिसम 'स्वग' को समस्त शक्तिया का समाहार हुआ । इस प्रकार 'वह' अपार शक्ति और ऐश्वर्य का प्रतीक बन गया जा ड्रैगन, राक्षस, अमुर और अशुभ १ दिआरिजिन ऐण्ड हिस्ट्री आफ दि का शेसनस, पृ० १४७ ८४ | मिथर दर्शन का विकास प्रवृत्तिया का दमन करने वाले नायक के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। मिथका का यह नायर मुक्तिमत्ता, उदारव और सास्कृतिक प्रगति का एक मूलस्रोत माना गया। ईश्वर-पुन से मानव-नायक की यह यात्रा एक तथ्य की ओर सकेत परती है कि नायक का पुनज म या 'अवतार' हाता है, वह अह, चेतना का एक प्रकार से ऐसा पातरण है जा सास्कृतिक प्रक्रिया के एक अभिन 'तत्व' के रूप म प्राप्त होता है। ६ सूर्य और हीरो-मिथ यहा पर एक महत्वपूर्ण तत्व की ओर ध्यान आकर्षित करना आवश्यक है। हीरो मिथ वा यह 'आदिरप' अक्सर सूर्य मिथ का रूप है, यही नही वह चन्द्र मिय का भी रूप है । हीरा मूय है या चद्र इसका एकमात्र अर्थ यह है कि हीरो एक दिव्य एव परम स्प है । सासारिक या लौविक रूप म 'वह' व्यक्तिगत पिता का पुत्र है, पर हीरा या नायक के रूप म वह ईश्वर का पुत्र है। मिस्री और हिन्दू आदि मिथका मे हीरो मूय का रूप है और मिस्र मे उसे 'रा' (सूय) का पर्याय भी माना गया।' ७ हीरो का सास्कृतिक रूप हीरो के सम्बध म यह द्विविधि पैतृक्ता का इमैन आदि मना-विश्लेपका ने 'हीरा ये दो पिता हात है के सिद्धान्त को मनुष्य को सीमित 'समझ' के परे माना है, पर यूमान ने इस सम्बब म यह मत रखा है कि यह मानव प्रकृति का 'द्वैत' है जो जब भी किसी व्यक्ति को किसी एक का पुन मानता है, पर साथ ही, उसवी महानता के कारण उसे ईश्वर पुत्र या 'दवपुत्र' की सज्ञा देता है। हीरो का यह "विशिष्ट' गौर असाधारण' रूप मिथिर चेतना का एक ऐसा तत्व है जा क्रमश प्रतीसरात्मक रूप के जातोय मा का भी एक अभिन अग बन गया । इस प्रकार हीरो-मिथ जहा व्यक्ति के अह का विस्तार एव विकास है, वही 'वह 'समूह भोर गमप्टि की अस्मिता का एक प्रमुख तत्व है। दूसरे शब्द। म हीरो-मिथ व्यक्ति और 'समूह को भावाभाआ वो जोडने वाला एक गतिशीन स्वाप जो सास्कृतिक चेतना का एक महत्वपूर्ण तत्व है। १ मिय ऐण्ड रिव्यूअलिज्म इन एशट ईजिप्ट, पृ० ५२ २ दि आरिजिन्ग एण्ड हिस्ट्री भाफ काशरानस, पृ० १५० हीरो-मिथक ५ हीरो या नायव वे इस सास्कृतिक स्वरूप के तीन प्रमुख अग है-हीरो, ड्रैगन युद्ध और फल प्राप्ति (ट्रेजर । ड्रेगन, राक्षस या अय प्रकार की अशुभ एव व्यवधान डालने वाली शक्तिया पर विजय प्राप्त पर नायक पल की प्राप्ति करता है जा सघप प्रप्रिया वा 'अन्त' माना जा सकता है। युग ने इस ड्रेगन को पुरप और नारी तत्व से एक साथ सयुक्त माना है और इसे आदि पैतृरता (माता-पिता) से भी जोडा है जिसमें हीरा माता और पिता दोना की हत्या या अधिकार कर, उस यि का परिचय देता है जिसे इडीपस थि की सजा दी गयी है । यह माता-पिता का सिद्धान्त जिस फायड ने अत्यधिक महत्व दिया, सम्पूर्ण मानवता और इतिहास की व्याख्या नही कर सकता है, यहा तक कि यह अपवाद मूलर' सम्बध ही कहा जा सकता है, एक सामाय प्रवृत्ति नही । युग न इसे एप व्यापक सन्दर्भ दिया और ड्रैगन-सघर्ष यो अचेतन से जोडकर 'लीवीडा' के विकास और रूपान्तरण की 'गति' का अधिकृत कर, माता ड्रेगन अथवा अचेतन की शक्ति को अपने बल से पराजित किया। इस प्रकार ड्रेगन सघर्ष एक प्रकार से अचेतन से ही सधित किया गया और फलत गुफा में प्रवेश, अपर ससार में प्रवेश तथा डेंगन द्वारा निगले जाने की प्रक्रिया (जो माता म गमन ही है) इन सवका सम्बध हीरो मिथ से है । ड्रेगन द्वारा निगले जान के पर्याय रानि, अधकार, समुद्र तथा अपर ससार हैं गिह भेद कर हीरो विजयी रूप मे पुन अवतीर्ण होता है। यह प्रक्रिया मूय मिथ के समक्ष है जिसम हीरो-मिथ मूय मिथ का स्प ग्रहण कर लेता है। जिस प्रकार सूय अधकार को भेद कर विजयी रूप मे पुन उदय होता है, उसी प्रकार हीरो भी 'ड्रेगन म प्रवेश कर, उस पर विजय प्राप्त कर 'हीरो' के रूप म अवतरित होता है । अह चेतना और अचेतन का यह द्वन्द्व हीरा मिथ का स्रोत है जो नित्य और अनादि है। यही शुभ-अशुभ, देव-अमुर और सह-अराद् का चिरतन-सघप है जो बाह्य रूप भी ग्रहण करता है। यहां पर यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि ड्रेगन का संघर्ष एक प्रकार से पुरुष का नारी के प्रति एक 'भय' है जिसे वह इम द्वन्द्व वे द्वारा प्रकट करता है । यही 'माता' की शक्ति है जिसे 'हीरो' अपने अधिकार में करना चाहता है। माता, गर्भाशय, गह्वर, खाई, नरव और समुद्र-~~-ये सभी ड्रेगन या चेतन के पर्याय हैं, जिन पर हीरो (अह चेतना) विजय प्राप्त करता है। यह एक प्रकार स उच्च या ऊर्ध्व 'पुरुषत्व' का प्रतीक है जो उनके लिंगीय रूप स महान और १ माइकालाजी आफ दि जनकाशेस, युग ८६ | मियर दर्शन पा विकास - पविन है । हीरा या उच्च म्प इसी तथ्य पर आधारित है जो मियकीय वल्पना होते हुए भी नायक के सास्कृतिक महत्व पर प्रराश डालती है । पुरुषत्व को सार्थकता इन दोना स्तरा या एकीभूत गम्वार है जो हमे अनेक मिथवा म प्राप्त हाता है । 'पुरुषत्व' या यह रूप हम सैमसन, प्रोमीथियस, भीम, हनुमान, राम, वृषण, जीहोवा आदि म प्राप्त होता है । हीरो को यह विजय एक नए आध्या- त्मिक स्तर का उद्घाटित वरती है, नए प्रकार में शान और अचेतन के विकास को प्रकट करती है। ८ पिता विम्ब का अर्थ और हीरो मिथ हीरा मिथ मे जहां एक ओर 'माता' से ससर्ग और उस पर विजय (इगन रूप) प्राप्त करने का एक प्रतीकात्मक अर्थ है, वही पिता की हत्या और उस पर अधिकार करने का प्रसग भी हीरा मिथ म एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है । इडीपस ग्रयि मे पिता, माता के ससग मे सहायक सिद्ध होता है, पर फिर भी नायक या हीरो के द्वार। उसकी मृत्यु को दिखलाया गया है जा पिता के आदिरूप की गतिशीलता को व्यक्त करता है । माता के समान पिता के भी दो रूप हैं -एक सकारात्मक और दूसरा नकारात्मक-जो आज के मानव में उसी प्रकार जीवित है जिस प्रकार वे मिथको म अपनी सत्ता बनाए हुए हैं । जैसाकि सकेत किया जा चुका है कि पिता 'वृद्धा का प्रतीक है जो व्यवस्था प्रदान करता है (स्वर्ग का रूप)' और इस प्रकार, मिथका का ईश्वर यही "पिता रूप है जिसम सभी पिता विम्ब समाहित हो जाते हैं। यही पिता का अति- वैयक्तिक स्प है ये पिता ही आज के “याय और व्यवस्था ये आदिस्रोत हैं हारो इन पिता को पुरानी और जर्जरित व्यवस्था का विरोध करता है, पुराने मूल्यो को चुनौती देता है तथा नयी व्यवस्था और मूल्यो को स्थापित करता है। यह प्रम एक निरतर प्रम है जो इतिहास की गतिशील प्रक्रिया का एक अभिन्न अग है । इस विराध और सघप म व्यक्तिगत पिता रिम्ब बाधा उत्पन्न करता है, पर अतिवैयक्तिम पिता-विम्ब स्थापित व्यवस्था और मूल्य का बदलने के लिए प्रेरित करता है । हीरा इसी 'अतिपितारिम्ब' से प्रेरित हो कर्म करता है और व्यक्तिगत पिता विम्ब से उसका सधप होता है । यह सघर्ष वाइबिल में दिये गए जोहावा के उस नादेश से स्पष्ट होता है जिस वह अग्राहम का देता है, 'तुम अपने सगे सम्वधियो और जपन देश से बाहर आओ, और अपने पिता १ इस पा पा सकन पीछे के पृष्ठा में दिया जा चुका है।

her हीरो-मिथक | ८७ घर से बाहर निक्लो, मैं तुम्ह इस दृश्य जगत से परे लोक म ले जाऊंगा।' ( इसी 'परे लोक' के लक्ष्य की जोर सकेत करता है और पिता के देवो से र्प करता है । बुद्ध, राम और ईशु इसी सघप को प्रतीकात्मक रूप से व्यक्त रते है और मानव मन को आध्यात्मिक लार की आर गतिशील करते है । मिथमा म स्थिति विपरीत भी है जहा पर व्यक्तिगत पिता 'अमरान' यक का पक्षधर है और रामकथा मे दशरथ की भी यही स्थिति है, पर दय- य अवस्था म । व्यक्तिगत पिता का यह बिम्ब 'नायकवाद' वो जम देता है कि पिता की हत्या या उस पर विजय प्राप्त कर नायक या हीरो अपने झपपूण अस्तित्व की घोषणा करता है। नायक का यह वीर रूप व्यक्तिगत पिता सम्राट की प्रेरणा से नायक को मकाय राक्षसा, दैत्या, भयकर जीवधारिया तथा पिशाच पिशाचिनियो से वर्ष के लिए प्रस्तुत करता है और अपन अतिव्यक्तिगत पिता (दिव्य पिता) प्रेरणा से वह इन असद् शक्तियो पर विजय प्राप्त करता है। हीरो का यह र उस समय और जटिल तथा महत्वपूर्ण हा जाता है, जब वह दवता और 'क्तिगत पिता के विम्ब से मुक्त हो, अपने को स्वतन आधुनिक मानव क्तित्व के रूप म अवतरित करता है। इसका मुदर उदाहरण प्रोमीथियस ख्यान है जो स्वग से अग्नि को मानव जाति के लिए चुराकर लाता है। सरा उदाहरण आदम और हौवा (सर्प सहित) का है जो हीरो के रूप मे नवता को नवीन चेतना और ज्ञान देता है। इसके अतिरिक्त वहा नये पितृ पता का पुत्र भी है जो पुरानी व्यवस्था से सघप करता है । इस प्रकार भयानक महामाता के समान भयानक पिता का आदि रूप भी क सत्य है जिस पर होरा विजय प्राप्त वर या उसका उमूलन कर अपो भीष्ट को प्राप्ति करता है। यह भयकर पिता का स्प एक ऐसी शक्ति है जो ह चेतना के शुभ विकास में बाधा उपस्थित करता है। हीरो का अति या रावैयक्तिक पिता विम्ब ही उस आध्यात्मिक प्रगति, किसा नय मूल्य तथा सी नये विचार को आर, प्रेरित करता है । होरा का यह पक्ष पिता पिम्ब हो सम्बन्धित है न कि माता पिम्व से। इस प्रकार सामूहिक आध्यात्मिक तियो और सामूहिक भौतिक प्रवृत्ति मूल शक्तिया का सघप एक सत्य है जो तिा तथा माता के आदिरूपा के द्वारा प्रकट होता है और नायक या हीरा इस जेनिसिम १२१ १८ | मियय दर्शन का विकास सघर्ष के मध्य मे अपने 'अह चेतना' या शुभ विकास करता है। इस विकास वे द्वारा अह (हीरा) अपने 'व्यक्तित्व' या विकास करता है जो अय लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत होता है। 'बन्दी' और 'निधि' के अर्थ हीरो-मिथ के सन्दर्भ मे माता और पिता विम्ब से संघप और अन्त म, हीरो का गन्तव्य तक पहुंचना और तदनुसार 'वन्दी' या 'निधि' को स्वतत्र और प्राप्त करना-ये तीना प्रक्रियाएं हीरो के बहुमुखी विकास के सापाा हैं जो मिथकीय प्रकल्पना का अभिन और आवश्यक अग हैं । 'बन्दी' और निधि शब्दा का अर्थ नितात साकेतिष और व्यजनात्मक है। बटी कोई भी प्रेमिका या कुमारी हो सकती है जो क्सिी दैत्य, राक्षस या अशुभ तत्व के द्वारा बन्दी पर ली गयी है और हीरो, अपने पौरुप और वीरता से उसे मुक्त करता है । जहां तक 'निधि' का प्रश्न है, यह अनेक अर्थों का वाचक । स्वर्ण, हीरा, मोती तथा अय बहुमूल्य पदार्थ इसके अतगत आते हैं जो मूलत अमर 'मूल्यो' के प्रतीक हैं।' इसी प्रकार 'जीवन जल अमृत, अमर पौदा, दाशनिक का पापाण, रहस्यमय अंगूठिया तथा परयुक्त घडिया आदि निधि के ही प्रतीक है जो मियको, परी क्थाओं, अनुष्ठाना, धर्मो, काव्यो और रहस्यवादी साहित्य म अपने व्यजनात्मक अर्थ को सुरक्षित किये हुए है। ये सभी पदार्थ, जहां तक मिथको का सम्बध है, विषयगत या वस्तुगत अर्थ देते हैं, ता दूसरी ओर वे विषयोगत या जाध्यात्मिक अर्थ देते हैं । ये दोनो ही अर्थ महत्वपूर्ण और सार्थव हैं क्यापि उनके द्वारा मिथ के अर्थ का विस्तार होता है और साथ ही, मिथ की गतिशीलता का परिचय भी प्राप्त होता है। १० रूपान्तरण मिथका का रूप इस अतिम अवस्था मे जहा 'हीरो' मुक्तदाता के रूप मे जवतरित होता है जयवा 'बटी' को मुक्त करता है-ऐसी अवस्था में वह स्वय भी रूपातरित होता है और दूसरा को भी रूपान्तरित करता है । इहे ही रूपा तरण-मिथय। वो सज्ञा दी गयी है। इन रूपा तरण मिथका का महत्व सामाजिक एवं सास्कृतिक भी है जो मानवीय चेतना को गतिशीलता देत हैं और साथ ही, व्यक्ति और समूह के ऊध्वगामी विकास को रेखाक्ति करते हैं। १ साइकालॉजी ऐण्ड एलमी, युग, पृ० ६०-६१ होरो-मिथक | ८८ जैसाकि यहा गया है कि 'बन्दी' और 'निधि' का एक अपना साकेतिक अर्थ है जो वस्तुपरक और विषयीगत अर्थों को प्रकट करते हैं । वस्तुगत रूप म बन्दी एक वास्तविक जीवित स्त्री है जो पुरुष और स्त्री के सम्बध को रेखास्ति करती है। दूसरी ओर स्त्री का यह रूप वस्तुगत क्षेत्र का अतिक्रमण कर, परावैयक्तिर विम्ब को प्रकट करती है जो मूलत सामूहिक-मनस का रूप है जो मानवता मे अताप्त है । इस अर्थ म ब्रमश 'बन्दी' का रूपान्तरण हाता है और वह आतरिक तत्व या 'आत्मा' ये रूप सामने आती है। अनेक मिथक' इस 'आत्मा' और पुरष 'अह' के सम्बध का व्यजित करते हैं और संघर्ष के द्वारा पुरुष इस आतरिक तत्व या आत्मा को मुक्त करता है। इसका यह अर्थ हुआ कि नारी और पुरुष का सम्बध अध्यातरिय है आर साथ ही, मनस पृष्ठभूमि मे इन घटनाओ का पटित होना मिथकीय प्रतीकवाद का एक ऐसा स्रोत है जो सास्कृतिक चेतना के विविध रूपा मे व्यक्त होता है। यह परालौकिक सम्बध एक प्रकार से माध्यात्मिक प्रतीवा को भी जम देता है जो धर्म और पुराणा मे, रहस्यवादी सम्प्रदायो मे, लोकगाथाओ मे तथा सृजनात्मक अभिप्रायो के द्वारा प्राप्त होता है । ये आन्तरिव घटनाएं ही बाह्य स्प ग्रहण करती हैं जो वस्तुआ के द्वारा आवार ग्रहण करती हैं। इस प्रकार मिथिक चेतना अतर और बाह्य को एक सूत्र म बाधत है अथवा अनेक विचारका का मत है कि मिथ जो आतरिक घटनाआ को प्रकट करते है, वे ही बाह्य रूपा- कार ग्रहण करते हैं । अतर का सघप ही बाह्य संघर्ष को जम देता है । अतर और वाह्य का यह सवाद एक नित्य घटना है जो मिथकीय चरित्र की हात हुए भी यथार्थ और वास्तविकता से गहरी जुडी हुई है । मिथ का वस्तुगत और विषयीगत विवेचन मिथ के भौतिक और अतिभौतिक (या अतिवैयक्तिक) स्वरूपा को एक साथ चरितार्थ करते हैं और यही कारण है कि हीरो मिथ (या अय कोई) केवल व्यक्ति का एकातिक इतिहास नही है, पर वह समूह या जाति को अति वैयक्तिक या परावैयक्तिक सामूहिक घटना है जो अचेतन म गहरी पैठी रहती है । हीरो जब ड्रैगन या राक्षस पर विजय प्राप्त करता है, तो यह घटना अतिवैयक्तिक स्वरूप की है जो स्वय हीरो में घटित हो रही है ।' हीरो का यह रूप सारी मानवता की धरोहर है क्यामि वह जाति के चितन म, विचार मे, उसके अनुभव बध मे तथा पुन -पुन विवेचित होने मे रूपान्तरित हाती रहती है । १ हि आरिजिन्स ऐण्ड हिस्ट्री आफ का शेसनेस, यूमान, पृ० १६५ 20 मियक दशन या विकास ११ 'वन्दी' विम्ब और होरो-मिथ अनेर मियता म हीरा ने राधप का गन्तव्य 'वन्दी' या गास या दैत्य से मुक्त कराना है । यह 'दैत्य' एव आदिस्प है जिसके अनेक रूपान्तरण प्राप्त हाने हैं-यही वह ड्रगन है, यही तागिय है, यही चुडैल है ता यही व्यक्तिगत क्रूर माता व पिता के पिम्व हैं । अत म, बन्दी (जो प्रेमिका का रूप में) सदैव होरा से विवाह बधन में बंध जाती है और यह तथ्य समार भर के मियको म एक मामा य प्रवृत्ति है । प्रतीकात्मक रूप में होंगे की यह विजय, यातुन रीति से उर्वरा अनुष्ठाना मे भी प्राप्त होती है जहाँ तरण हीरा-सम्राट का मिलन पृथ्वी माता या दयी से होता है। हीरो की बनी पर यह विजय इसी यातुक उर्वरा अनुष्ठान का प्रतीयात्मव स्प है। यह तथ्य हीरो मिथ को एक सामा- जिक आर्थिव सदभ प्रदान परता है जिसे फेजर, मेलीनावस्की आदि विचारयो ने महत्व प्रदान किया है। हीरो का यह 'मुक्तिदाता' रूप पुरुष की चेतना का और उसकी शक्ति का और अधिक विस्तार है जिसका आरम्भ ड्रैगन मधप और भयानक मावा सघप से हुआ है। इस प्रकार हीरा एक गति- शील व्यक्तित्व है जो सामूहिन महत्व वा तथा परावैतिर अथवत्ता का विम्ब है। इस प्रकार स्त्री और पुरुष का यह मिलन जतरा होरा का एक पारिवारिक अर्थवत्ता देता है जो पितृ सत्ता-युग के विकास में एक प्रेरक तत्व माना जा सकता है। स्त्री के पक्ष में एक तथ्य यह भी प्रकट होता है कि महामाता का जो प्रभुत्व अभी तक था जिसके द्वारा नारी शक्ति का अनुभव होता था, वह प्रभुत्व एक प्रकार से समाप्त हो गया। 'बदी का रूप नारी व उस पक्ष की ओर मकेत करता है जहां वह मानवीय रूप में अवतरित होती है और सगिनी का रूप धारण करती है जिससे पुरप किसी भी समय प्रेम बधन म बंध सक्ता है । नारी (व दी) इस समय पुरुष के पौरुष और साहस की ओर जाकृष्ट हाती है, अब पुरुष नारी के लिए केवल लिंग धारण करने वाला प्राणी नहीं है, पर मही अर्थ म आध्यात्मिक एव शारीरिक शक्तियो से युक्त 'हीरो का स्वरूप है । बहुत से पुराणा और भियबा भ वन्ने का एक अन्य रूप भी प्राप्त होता है जो ड्रैगन सघप और राक्षस संघप म होरा को सहायता देती है और इस प्रवार एक सहयागी मित्र की तरह हीरा को शक्ति प्रदान करती है। इस सदर्भ में मीडिया, एयोन, कैकेयी, सीता और इमिस आदि के ना- जिहाने हीरा को किसी न किसी रूप के सघर्प म के इम स्प वा पुरुष अपन 'अह और 'चेतना' में औ आय .

हीरो-मियव | वेवल उसके यौन सम्बधता ही सीमित नहीं रहता है। पारी का यह रूप उसके माता म्प से भिन्न है, यहां पर उसका अपना व्यक्तित्व है, यह एक आध्यात्मिक शक्ति है जो माता ये सामूहित पक्ष से नितात अलग है। नारी का यह 'यहा' ये गमान सहायता देने वाला ग पुरुष और नारी के सम्बध यो एक नया आयाम देता है जहाँ नारी स्वतत्र रूप से अह चेतस प्राणी है और इस दृष्टि से वह हीरा या नायर ये समान एप अह से युक्त शक्ति का प्रेरणा स्रोत है । हीरो उसकी सहायता से संसार से एय जीवत सम्बध स्थापित परता है। नारी का यह रूप अनीमा तत्व या विवास यहा जा सकता है जिसकी 'छाया' पुरुप म रहती है और इस प्रकार पुग्प या हीरा 'अनीमा' निम्ब का अनेय रूपो म साक्षात्कार करता है। इस प्रकार हीरा पा 'वन्दी' यो मुक्त कराना, एप प्रकार से मनस जगत का अनुसधान है। यह जगत् अत्यत विस्तृत है जिसे काम रति का जगत वह सरते हैं (ग्रीव मिथका मे इसे उरास की संज्ञा दी गयी है) जिसमे स्त्री और पुरुष का अपना सापक्ष महत्व है, वह केवल पुरुष का अनुभव और पारी के प्रति उसके पिम्ब वा सूचक मात्र नही है २ जैमावि यूमान, युग तथा अय विचारणा का मत है। मिथक, वाव्य, नाटर और अय सृजनात्मक पलाओ में हीरा और बदी के सम्बध में रूपान्तरण के अनेक आयाम प्राप्त होते हैं, यही नहीं इतिहास और सस्कृति की अनेक महान घटनाएँ स्त्री पुरुष के इस सम्बघ की गाथा कहती हैं। 'बन्दी' को यह मुक्ति एक अय तथ्य की मार सकेत करती है कि नारी की अचेतन शक्ति जो पुरुष तत्व की विराधी एव शत्रु रही है, 'वह' पुरुष के 'मह' और व्यत्तित्व से एक मित्रता की सधि करती प्रतीत होती है । यह तथ्य एक अय तत्व की ओर सयेत करता है कि नारी और पुरुष का द्वन्द्व एक सीमा पर आवर 'समरसता' की भी सृष्टि करता है जहां 'मैं' और 'तुम' की सीमाएं विलीन हाने लगती हैं। यह पुरुप और नारी सम्बध का आध्यात्मिक पक्ष है जो धर्मों, पुराणा और काव्या म दृष्टिगत होता है । १२ बन्दी, निधि और हीरो का सापेक्ष तात्विक स्पान्तरण बन्दी का सम्बध निधि से है जिसे प्राप्त करना एक कठिन कार्य है और १ साइकालाजी आफ दि टासफेरेन्स, युग, पृ० ४८ २ दि आरिजिस ऐण्ड हिस्ट्री आफ का शेसनेस, २०४ ६२/ मिथक दर्शन का विकास यह तथ्य बदी के स्वाप या प्रकट करता है। दूसरे शन्दा म बन्दी स्वय ही निधि है अथवा यह मिमी न मिमी प से उससे सम्बंधित है । इम निधि का गुण यातुर प्रकार का है, उसे प्राप्त करने वाला व्यक्ति अपनी इच्छाओ की पूर्ति, अदृश्य होने, तत्र-मार करने, अपन स्वरूप को बदलने, दिय और काल को अतिवात करने यो शक्तियां प्राप्त कर लेता है। यह तथ्य इस बात की पार संकेत करता है कि आदिम मानव अचेतन की शनिया का अधित करने के लिए इन यातुर अनुष्ठाना का करता था, पर आगे चल कर इनका सम्बध मानद की जातरिक एव आध्यात्मिक शक्तिया से हो गया। ये मनस की सृजनात्मक शक्तियां जहां एक ओर ब्रह्माड को जानने के लिए प्रक्षेपित हुई वही वै अव मानव व्यक्तित्व के अनुभव और ज्ञान के लिए, उसकी आत्मिक शक्ति को मुखर करने के लिए प्रयुक्त होने लगी। 'वटी और निधि' की प्राप्ति से हीरो अपनी 'जात्मा' की निधि का प्राप्त करता ह जा व्यक्ति की सम्भावनाआ की ओर सकेत करता है और साथ ही 'है' और 'चाहिए' के मध्य म 'सेतु' का काम करता है। हीरा का कार्य इन सुप्त बिम्बा को जागृत करना है जो अधकार और अज्ञान से उद्धृत होती है और उनसे गुजर वर एक 'प्रकाश पुज' की सम्भावना को प्रकट करना है । हीरो, बदी और निधि-इन सबका एक तात्विक रूपातरण मिथकीय चेतना में प्राप्त होता है। सभी सस्कृतियो का लक्ष्य, इसी सुप्त जगत को रूपातरित कर एक चेतन-प्रकाश-जगत की ओर सक्त करना है। यह एक प्रकार की मानवीय सृजन-शक्ति का सूचक है जो केवल मिथको और धर्मो म ही नही, पर क्ला, साहित्य, विज्ञान, इतिहास आदि मानवीय क्रियाओ में एक आवश्यक एवं अभिन्न अग है । आत्मा की यह स्वयभू शक्ति मानव का सत्य और उसका आतरिक रहस्य है जिसके द्वारा वह 'ईश्वर का बिम्ब रूप माना गया और इस दृष्टि से, उसका अय जीव- धारियों से विशिष्ट स्थान है जा उस 'हामो मिम्बालिक्स' (विवेकशील प्रतीक निर्माता प्राणी) की सज्ञा प्रदान करता है । मानव की इस सृजनात्मक शक्ति का रूपातरण क्लागार, साहित्यकार, वैमानिक, महात्मा और विचारक में हाता है और इस दृष्टि से एप व्यापक सदर्भ म ये सभी 'हीरा कह जा सकत है। आधुनिक सदर्भ म 'हीरा' को अवधारणा का यह विकास ही कहा जा सकता है। हीरा का उपयुक्त सास्कृतिक स्वरूप एक अन्य तथ्य की आर समेत करता है कि इस सास्कृतिक रूपान्तरण की प्रतिया म वह केवल वाह्य तथा अन्तर का ही रूपान्तरण नहीं करता है, पर उसका लक्ष्य मात्म रूपान्तरण या होरो-मिथक ] ६३ साक्षात्कार है जो अधिक उच्च मानवीय मूल्य है जो केवल 'समूह' तक सीमित नहीं है, पर वह एक प्रकार से, मानव मनस का वह के द्रीभूत रूप है जो आत्म निर्माण और आत्म साक्षात्कार को गति देता है। व्यक्तित्व का यह निमाण (आत्म रूपा तरण) जनेक मिथको मे प्राप्त होता है जहा मृत्यु पर विजय प्राप्त करने की जवाट्य लालसा प्राप्त हाती है। मृत्यु एक ऐसी आदि शक्ति और प्रतीक है जा मानव व्यक्तिव और उसकी शक्तिया का हनन और विजय कर लेती है । मृत्यु के इस भय ने ससार के अनेक धर्मों और मिथको मे मृत्यु पर विजय प्राप्त करने और साथ ही, मानव को अमर तथा मृत्युजय हाने की लालसा ने अनेक प्रतीका, विम्बा और धारणाआ को जम दिया। प्राचीन मिस्र के राजा को अमरत्व का पतीक मानना, पूर्वजों की उपासना, आत्मा की अमरता और नित्यता, मृत्यु से परे 'जीवन' की कल्पना (स्वग, नरक आदि) आदि ऐसी मा यताएं हैं जो हम ससार के सभी मुख्य धर्मों में प्राप्त होती हैं । मिनी मिथका म 'ओसीरिस' का मिथर इसी प्रकार का है जा व्यक्तित्व रूपातरण को समक्ष रखता है जार साथ ही डेगन सघप के द्वारा हीरो-मिथ को एक ऐसा आयाम देता है जो ओसीरिस की प्रतिभा को जाध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक बना देता है। मिस्र का एक अय देवता ‘एडोनिस' है जो मर कर पुनर्जीवित होता है, और इस प्रकार वह सदैव जीवित रहता है। 'ओसीरिस' केवल 'उर्वरा देवता' ही नहीं है जैसा कि फेजर का मत है, पर वह निम्न उर्वरा स्तर को अतिकात करता है और अतत उच्च आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक बन जाता है । हिन्दू विचारधारा म नचिकेता, सावित्री और युधिष्ठिर का भी यही रूप है जा मृत्यु पर विजय प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं और उच्च आध्यात्मिक शक्ति का परिचय देते हैं। आमीरिस का यह रूपातरण सूय (रा) को भी अपने अदर समाहित कर रोता है और मिस्री मिथका मे सूर्य और ओसीरिस पर्यायवाची शब्द है । यही नही, 'ओसीरिस एक म्वयभू आध्यात्मिक शक्ति है जो 'जात्मा शरीर' के एवीभूत सस्कार का फल है । जामीरिस में फिर से उत्पन हाने की शक्ति है, वह एक ऐसी दिव्यात्मा है जिसन देवताला का सृजन क्यिा 13 'वह ही गया। १ पैरामिड टेक्ट्स से उद्धृत । इमी अमरता वा 'ममी' के द्वारा व्यक्त किया २ गोल्डेन बो, फेजर, पृ० २३५ ३ दि आरिजिन ऐण्ड हिस्ट्री आफ काशसनस, पृ० २३७-२३८ मिथय दर्शन पा विकास भूत, वर्तमान और भविष्य है, सभी कुछ 'उसी' से उद्भूत एव विकसित हुआ है। ओसीरिस का यह रूप एक ऐसी मिययीय धारणा है जो हमे कृष्ण के विराट रूप मे तथा ग्रहा की अवधारणा में प्राप्त होता है। यह समानता इस तथ्य की ओर संकेत करती है कि विभिन संस्कृतिया की सरचना मे यह मिथकीय बोध की समानता मानव मनस की समान सार्वभौम प्रक्रिया का सूचक है । यह प्रक्रिया रूपातरण की प्रक्रिया है जो आदिम मानसिक्ता से लेकर आधुनिव मानसिकता तर किसी न किसी रूप में प्राप्त होती है । यह रूपान्तरण मानव व्यक्तित्व और चरित्र का एक ऐसा रूपातरण है जो मानव इतिहास की एक अभिन्न घटना है।

१० | आधुनिक मिथक १ ऐतिहासिक परिवर्तन और आधुनिक मिथर पूर्व विवेचित अध्याया म प्रसगवश आधुनिक मिथया के बारे म यदा-कदा समेत किया गया है जो यह तथ्य प्रकट करता है कि मिथ एक गतिशील प्रत्रिया है जो वेवल आदिम ही नहीं है, पर सार्नवालिय है । मानसिक एवं सामाजिक विकास की दृष्टि से यह कहना भी सत्य है कि मिथक का उद्गम एव विकास आदिम मानसिक्ता से सम्बधित हाते हुए भी वही तक सीमित नहीं है, उसका स्वरूप और विकास एतिहासिक और सास्कृतिक प्रक्रिया में एक गतिशील स्वरूप है । मिथ सूजन के अंतराल में यह गतिशीलता प्राप्त होती है जो मानव मन के विकास के साथ अपने स्वरूप को तथा अपनी अर्थवत्ता को रेखाक्ति करती है। यह गतिशीलता एक ऐतिहासिक गतिशीलता है जिस पर विचार करना आवश्यक है । प्रत्येक ऐतिहासिक परिवतन अपने मिथक या 'पुरागाथा' की कल्पना करता है । आदिम मिथको म भी इसी ऐतिहासिक परिवतन का स्वरूप लक्षित होता है जा प्रागताविक मानसिकता से सम्बंधित माना गया है।' इसी प्रकार, जब हम आधुनिक मिथका की बात करते है तो उसमे भी ऐतिहा- सिर परिवतन की प्रासगिक्ता स्वय स्पष्ट है। इसी सदर्भ म यह भी कहा जा सकता है कि यह परिवर्तन नए विश्वासा तथा ज्ञान के नए क्षितिजा के साथ नए मिथका का निमाण करता है और युग की मांग के अनुसार पुराने मिया का पुनर्विवचन एवं नया रूपातरण करता है । समाजशास्त्रीय विचारका म मैलीनोवस्थी का मत है कि किसी भी विश्वास, रीति या अनुष्ठान के बदल जाने पर उममे सम्बधित मिथर भी समास हा जाता है। यह मत अपने म एकागी है या अपूण है । इसका कारण यह है कि प्राचीन या पुराने मिथक, विश्वास या रीति के बदल जाने पर भी जाति के अचेतन मे ही गहरे पैठे नही रहते हैं, पर वे जाति को चेतना का भी बराबर आदालित एव प्रेरित करत १ ऐन एसे ऑन मैन, अर्नेस्ट वैसिरर, पृ० ८० २ लोक साहित्य और संस्कृति, डा. दिनेश्वर प्रसाद, पृ० ३१ ६६ / मिथक दर्शन पा विकास रहते हैं । बधिर से अधिक इतना कहा जा सकता है नि वे ही मिय संदर्भहीन या अर्थहीन हो जाते हैं जो नए सदों तथा युगीन स्पातरण से सर्वथा क्ट जाते हैं । इसे ही, दूसरे शब्दा मे 'लाच शक्ति' की सज्ञा दी जा सकता है जो मिषय की रूपातरण शक्ति या स्रोत कहा जा सकता है। हीरा मिथ, देवासुर संग्राम, ईशु, कृष्ण तथा राम आदि के मिययो मे यही 'लोच शक्ति' है जो उह अभी तक किसी न किसी रूप म जीवित किये हुए हैं । इसी परिप्रेक्ष्य म मिथक का एक अपना सास्कृतिक एव ऐतिहासिक महत्व होता है जो उसे किसी भी जाति का यहाँ तक कि मानवता का 'जीवित स्वप्न' ही बना देता है । २ आधुनिक मिथक का स्वरूप अत उपयुक्त विवेचन को ध्यान मे रपार आधुनिक मिथक के स्वरूप पर विचार करना अपश्थित है । आधुनिक मिथका का स्वरूप आदिम या प्राचीन मिथको की अपेक्षा प्रत्ययात्मक या अवधारणात्मक अधिक है। इस दृष्टि से आज के मिथकी को 'धारणाकृत मियका' की सजा दी जाती है। इतिहास, विज्ञान, दर्शन जौर कला साहित्य आदि ज्ञान क्षेत्रा के मिथक इसी कोटि म आते हैं । इसका यह तात्पर्य नहीं है कि आज के मिथका मे प्राचीन मिथका के समान सवेदनात्मक और उत्तेजनात्मक तत्त्वा का अभाव है, पर यह भी सत्य है कि इनमे अपेक्षाकृत मानात्मक अतर तो अवश्य है। इसके अतिरिक्त दूसरा तत्व 'फिक्शन' या वह चतुर्दिक 'आलोक-मडल' है जो किसी वस्तु या धारणा (व्यक्ति भी) को चारा पार से गुफ्ति या आवेष्टित कर लेता है, और क्रमश पाल के दीर्घ आयाम म उसे एक 'अर्थवत्ता' या 'दियता' प्रदान कर देता है। मिथक निर्माण की प्रतिया म यह चतुर्दिक प्रभामण्डल एक आवश्यक तत्व है जो प्राचीन मिथको के 'इतिवृत का एक अधिक बदला हुआ सूक्ष्म और व्यापक स्वरूप है। यहा पर जो दिव्यता का सवेत किया गया है, उसका अर्थ 'अलौक्कि नहीं है जो प्राचीन या आरिम मिथका का एक आवश्यक तत्व रहा है । यह रिव्यता उसके अलौक्यि अर्थ म नही, पर उसके अवधारणात्मय एव सवेदनात्मव' तत्वा के समाहार मे है । यही कारण है कि आज के मिथको मे वह इतिवृत्त या कथाश के दर्शन उस रूप म नहीं हाते हैं जिससे कि प्राचीन मिथका को पहचाना जाता था। मैं समझता हूँ कि यह मिथक का नया अर्थ रूपातरण है जा उसे एक स्थिर एव रुढ अब के जटिल वध से मुक्त भी करता है और साथ ही मिथ के व्यापर अथ-सदर्भ का रेखावित करता है। मिथर चेतना के सन्म म यह 'प्रभा मडल' एवं आधुनिक मिथक | ७ आवश्यक तत्व हैं जिसके बगैर मिथ का अस्तित्व कदाचित माना नहीं जा सकता है । इसी तव के आधार पर प्रतीर, रूपक और बिम्ब से मिथक को सत्ता एक स्वतत्र सता है, और उसका अस्तित्व सार्वकालिक और सार्वभौम है। आधुनिक मिथको के स्वरूप का हृदयगम करने के लिए उसके ज्ञानात्मक या अवधारणात्मक रूप का समझना आवश्यक है। मिथक और ज्ञान के गत्यात्मक रूप का एक सापेक्ष और गहरा सम्बध है । ज्ञान एक सतत् गत्यात्मक प्रक्रिया है जो एक ओर व्यक्तित्व को रूपातरित करती है, तो दूसरी ओर, स्वय भी रूपातरित होती है । आज के परिप्रेक्ष्य में यह बात घ्यान देने योग्य है कि आधुनिक मिथिक चेतना का इस गत्यात्मक ज्ञान से अभिन्न सम्बध है । यही कारण है कि कैसिरर ने ज्ञान मीमासा के अन्तगत वर्क के साथ-साथ मिथक और प्रतीक को आवश्यक माना है। इसी के आधार पर प्रकार की समानान्तर मानसिक प्रक्रियाओ को माना गया है पहली मिथिव चेतना और दूसरी दाशनिक चेतना ।' यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाएं तो पहली प्रक्रिया (मिथिव) सघनन और सश्लेषण की क्रिया है और दूसरी विश्लेपात्मक एव विवेचनात्मक प्रक्रिया है । असल में भाषा मे ये दोनो प्रक्रियाएं एक साथ चलती हैं। यही नही, भाषा मे और उसमे प्रयुक्त प्रतीको और मिथकों के द्वारा हम एक ऐसी भाषा का सृजन करते हैं जो ज्ञान और संवेदना के नए आयामो को समेटने में समर्थ होती है । भापा का मूल रूप 'प्रतीकात्मक' और 'मिथकीय' है । भाषा की यह मिथकीय प्रवृत्ति थादिम (प्राचीन) और आधुनिक मिथको दोना के लिए सत्य है । अतर केवल एक दृष्टि से माना जा सकता है जो उनके विभिन परिवेशो और 'प्रियो' का है । आधुनिर मियत्रा को समझने की दृष्टि ज्ञान तथा धारणा (सवेदना अधिव अपेक्षा रखती है जबकि आदिम मिषयो का समझने की 'प्टि' उत्तेजना एव प्रागताविक मनोदशाओ पर अधिक आधित रही है । इमका यह तात्पय नहीं है नि बाज के मिथका म उत्तेजना या सवेदना का सर्वथा लोप हो गया है पर इसका अर्थ केवल यह है कि उनकी निहिति में माना का अलर आ गया है। यह अन्तर युग की परिवतित 'सवेदना' और 'दृष्टि' के द्वारा ही समझा जा सकता है। विकास और सृष्टि का मिथय, १ लेंगवज एण्ड मिय, वैसिरर, पू० श ८८ | मियक दशन का विकास अतिमानव का मिथक तथा माक्मवादी 'हीरो' के मिथक आदि कुछ ऐसे मिथ बनते जा रह हैं जो ज्ञान और धारणा के नवीन विकास से सम्बंधित हैं। इन समस्त मिथवा के चारा जोर एक ऐसा चतुर्दिक 'प्रभा-मण्डल' शनै शने एकत्र हाता जा रहा है जो इह एव मिथकीय अवधारणा प्रदान करता रहा है। इस सदभ मे एप तथ्य और भी आवश्यक है जिसकी आर ध्यान जाना स्वाभाविक है। आधुनिक मिथका का एक अभिन्न तत्व मान जतिरिक्त यथाय का एक ऐसा रूपातरण है जो मिथिक चेतना का नया सन्म ही नहीं देता है पर मिथर की पारम्परिक अवधारणा को भी परिवर्तित करता है अक्मर यह मा यता स्थिर सी हो गई है कि मिथक और यथाथ में कोई सम्बध नहीं है अथवा मिथक' का मम्वध 'मिथ्या' से है,' अत यथाथ से उमका काई सरोकार नही है । समाजशास्त्रीय और मानवशास्त्रीय दृष्टि से यति कहा जाए ता मिथिक चेतना का जम ही सामाजिक वास्तविक्ता से हुआ है जा पराक्ष रूप से मिथक और यथार्थ के आपसी सम्बध का रेखाक्ति करत हैं। यहां पर यह ध्यान रखेगा आवश्यक है कि यथार्थ एव गतिशील प्रत्यय है जा ज्ञान और सवेदना के परोभ एव जपराक्ष आयामा से मम्वधित रहता है । इम दृष्टि से यथाथ केवल अपराक्ष ही नहीं है, पर वह पराक्ष एवं सापेक्ष है । मिसक यथाथ के इन दोनो पक्षा को अपने मदर समेटे रहता है। यही कारण है वि मिथ कभी यथार्थ हो जाते है और यथार्थ कभी मिथक । मिथ और यथाथ का यह अयाय सक्रमण इतना सुक्ष्म और तरल है कि उसे पूर्णरूप से पक्ड पाना एव दुर्लभ काय है । जाधुनिक मिथको की सरचना म यथाथ का यही गतिशील एव सापेम स्वरूप लक्षित होता है । इतिहास विज्ञान और दशन के मिक्व यथाथ और पान के इसी स्वरूप का उद्घाटित एव रेखाक्ति करते हैं। इस तथ्य को ध्यान म रखकर ही हम आज के मिथका का सही एव सार्थक विवेचन कर सकते हैं । यह केवल एक 'दृष्टि है, पर मैं यह दावा करता है कि यह अपने म अतिम सत्य है क्याकि कोई भी दृष्टि या विचार दृप्टेि अपने म पूर्ण नहीं हो सक्ती है, पर हा वह 'पूर्णता वी खाज में सहायक अवश्य हा सकती है। ३ मिथकीय अथ-व्यवस्था आधुनिक मिया के स्वरूप का एक अय दृष्टि से भी समझा जा सकता १ देखिए “मियर को अवधारणा' नामर प्रथम अध्याय ।

आधुनिष मिथक | 2 है। और वह दृष्टि है लेवी स्त्रास या गठनात्मक विज्ञान !' उसरे अनुसार मनुष्य का चिन्तन अपने मूल रूप मे गठनात्मक प्रक्रिया का परिचय देता है। इस प्रकार, मिथ को भाषा सस्मृति का एक अभिन अङ्ग है। प्रत्यक संस्कृति अपने स्वरूप के अनुसार मिया का सृजन करती है। यहां पर स्त्राम का यह मत वि मिय की भाषा सस्कृति के अय रूपा से अलग है पूणरूप से सत्य नहीं है । इसका प्रमुख कारण यह है कि आधुनिक मियर सस्कृति के विभिन रूपा यथा कला, विनान, दर्शन, धम और मानवशास्त्र आदि से संवाद के द्वारा मिथका का सृजन कर रह हैं । यही नहीं, विभिन्न मान क्षेत्रा के मिथर भी एक दूसरे से संवाद की दशा म है अथवा उनका विकास कभी-कभी एक दूसरे के प्रभावो से इतना प्रेरित है कि नए मिया का स्वरूप स्पष्ट होता जा रहा है। इतिहास और विकास के मिथका का स्वरूप दर्शन, विज्ञान और धम प्रत्यया पर आधारित एवं विकसित हुआ है । यह स्थिति मामा य न हाकर विशिष्ट है, और इस दृष्टि से कुछ जाधुनिक मिथका का स्वरूप एक प्रकार से विशिष्ट ही कहा जा सकता है । इस विवेचन आगे किया जाएगा। उपयुक विवेचन के प्रकाश म एक बात यह भी स्पष्ट होती है मिमियर मानव सस्कृति मै अर्य सप्रेपण को एक महत्वपूर्ण व्यवस्था है। यह मियकीय अथ- व्यवस्था मानव संस्कृति के वैचारिक एव वौद्धिक (साथ ही सवदनात्मव) पक्ष का भी रखावित करती है जिसने बगैर न मानव का और न सस्कृति वा अस्तित्व हो मा य हागा । इसमे यह भी स्पष्ट होता है नि मियर विमी भी संस्थति का ऊपरी दावा नहीं है, परन् वह उसका एक गठबधन है। मियत को यह 'आतरियता' उसे 'अयवता' भी प्रदान करती है और दूसरी बार, व्यक्ति और समाज उन मिथका की व्यवस्था ही नह परत है, पर उह विभिन्न अर्थ-सन्दर्भ प्रदान करत हैं। वियाग हो या सक्ट काल-स्कृति की इन दोना दशाआम मानव यो आशा और प्रेरणा, सघप और प्रगति उगरे मियका द्वारा ध्वनित होती है। इस प्रकारात म म मानय और मियर एर गरे या प्रभावित करते हैं और इस प्रकार, पाल वा सापातास मियारा स्पान्तरण घटित हाता है । यही मिपा का 'पाल' के साथ रूपावरण है । इस स्मातरण म पतुतिय आलोप को रश्मियो धीरे-धीरे एकत्र हाने लगता है । भार मियर यो १ गठनात्मा या सरचनात्मर व्याध्या का विवचन समाजशास्त्राप व्यापा वे अन्तगत दिया जा मुरा है। २ नाय तथा समान गन, बापूज एलन (अन्ति) भाग २, ०७४ १०० मिथक दर्शन का विकास अर्यवत्ता में विस्तार और गहराई का समावेश होने लगता है । इस सैद्धातिक विवेचन के प्रकाश म जाधुनिर मिथया वे स्वरूप और सरचना का हृदयगम विया जा सकता है और उनकी जयवत्ता का सास्कृतिक सदर्भ म रेगाक्ति दिया जा सकता है। आधुनिर मिया और प्राचीन मिथर के स्वरूप म एक मूम अतर ह जा सामूहिक अचेतन से सम्बंधित है । आज वे मिथक् जहाँ एक आर हमार जचेतन दे अग है वही दूसरी बार वे चेतना के भी अभिन्न अंग है । आज का सदर्भ नितात अचेतन प्रिया का रगस्थल नहीं है, पर इनके साथ ही साथ, वह चेतन इच्छा जोर ज्ञान (विचार) की एक मिथित अभिव्यक्ति भी है । यही कारण है कि जाधुनिक मिया मे वह फेटेसी अथवा वायवी वातावरण नहीं प्राप्त होता है जा हम आदिम मिथका म मिलता है । अधिक से अधिक इतना कहा जा सकता है कि आज के मिथवा म फैटेसी की माया अपेक्षाकृत पहले से काफी कम हा गयी है, पर इसका यह अर्थ कदापि नही है कि आज के मियका मे फैन्टे सी या फिक्शन का तत्व बिल्कुल नहीं है। क्योकि मिथक, चाहे वे किसी भी युग और काल के हा, उनके स्वरूप निमाण मे प्रभामण्डल या फिरशन का तत्व अवश्य निहित प्राप्त होगा। आधुनिक मियका के उपयुक्त स्वरूप के प्रवाश मे कुछ आधुनिक विकास- शोल अथवा विकसित मिथका को लेना आवश्यक है जो मिथक चेतना को सर्वव्यापकता और गतिशीलता को रेखाक्ति करते हैं। इस सन्म में मैं दो प्रकार के मिथका का विवेवन करूंगा-एक इतिहास मिथव और दूसरे विज्ञान मिथक । * इतिहास के मिथक जहाँ तक इतिहास के मिथका का प्रश्न है, वे यनो की प्रक्रिया म है और कुछ अपा स्वरूप का स्पष्ट भी पर चुरे है। यहा पर यह ध्यान रखना आवश्यक है कि प्रत्येक ऐतिहासिक परिवतन जपन मिथका का निमाण करता है। इस सन्दभ म प्रजातात्रिक, अधिनायकवादी और साम्यवादी विचार- दशना का एक विशेप यागदान है तो दूसरा आर वैनानिक विचारा तथा मूल्या का भा समावेश है जा जाग ये एतिहासिक युग की यल्पना को साकार परता है । आज का यह ऐतिहासिक परिवतन जहां एक जार विचारा और अवधारणाआ ये द्वन्द्व को रखावित करता है, वहीं दूसरी जार, अपन नए मिथवा वा सजन भी करता है अथवा नया मियकीय पल्पनामा कामिक आधुनिर मिथर | १०१ साकारता प्रदान परता है। यहां पर भी मिथर या शनै -शनै पाल के दीप आयाम म सृगन होता है जैसा कि हम प्राचीन एय आनिम मियवा में प्राप्त हाता है। इस ऐतिहासिक प्रक्रिया म इतिहास को अवधारणा या भी अपना एक महत्व है जो इतिहास को स्वय एवं मियकीय संस्पश प्रदान करता है । आज ये सन्दर्भ म इतिहाग की अवधारणा वेवल तथ्य एव तिथि सरलन माग नहीं है, पर अब वह एप मूल्य या अर्थवता ग्रहण करता जा रहा है। इस दृष्टि से इतिहाग पा सम्बध विचारा ये विकास एव उनके सम्बध से है। तिथि सरलन और तथ्य निर्देश का महत्व इन्ही विचारा वा रखावित करना है, अथवा दूसरे शब्दों में, यह तथ्य परक्ता वैचारिखता या उपादानमात्र है न वि लक्ष्य । लक्ष्य अथवा ध्येय है, युग विशेष के विचार-दर्शन या दर्शना का एक सापक्ष मूल्यान और उनकी गतिशीलता। इतिहास एक गत्यात्मक विचार-मिथक इस दृष्टि से, इतिहास एक गत्यात्मक विचार मिथर है क्योरि अब वह स्वय पाप या पुण्य का निर्णायर है। मध्यकालीन दैवी सत्ता का स्थानातरण अव 'इतिहास' न ले लिया है। इतिहास अव एव शक्ति या नियति या रूप लेता जा रहा है । अब हम यह कहत हैं कि 'इतिहास ही बताएगा' या 'इतिहास ही सागो है' तर म एक प्रकार के मूल्य क्थन करते हाते है अथवा इतिहास या 'मूल्यवत्ता' प्रदान करत हैं । उसे एक नियति या सत्ता के रूप में अर्थ देत हैं। यहां पर इतिहास पर ऐसी नियति या शक्ति है जो मानवनियति का भी परिचालित करती है । इतिहास के प्रति यह मनाभाव अन्य सत्य की ओर सकेत करता है कि अव इतिहास मिथव धर्मनिरपेक्ष मिथ हो गया है। सच तो यह है कि इतिहास का धर्मनिरपेक्ष बनाकर हमा सब कुछ बदन डाला।' इतिहास से जब उसकी परम्परागत पवित्र भावना को, जो धर्म की भावना का एक प्रमुख एव अभिन तत्व है, उससे पाच्युत कर दिया गया, तव इतिहास का प्रत्ययात्मक रूप ब्रमश विकसित हान लगा । इतिहास अब एक अवधार- गात्मक प्रत्रिया वा गत्यात्मक स्वरूप है, वह कोई स्थिर या जड रुप नहीं है । दूसरे शब्दो मे यह कह सकते हैं कि इतिहास अव अपने म ही तथा अपन द्वारा .. तत्व और ममाज दशन (स०) जेफ्यूज एलल का लेख, पृ०७७ १०२ मियय दशन पा विधारा प्राप्त रिपा गया 'अर्थ' है जो एक तह से इतिहास पो अर्थ प्रप्रिया' से जाहता है। मानव संस्कृति और सभ्यता इसी अर्थ प्रत्रिया या फल है जा मूलत इतिहास की गत्यात्मप प्रत्रिया अदर घटित होने वाली मानवीय शक्ति एव ऊर्जा का वैचारिप विकाग है। ५ आधुनिक हीरो-मिथक इस परिवर्तित ऐतिहासिम सदभ म हीरा या मिथ अपने नवीन रूप में विकसित होता है जिसमा सम्यक् विवेचन आवश्यर है। प्रत्येक युग की अपनी "विश्वास प्रतिभाएं होती हैं और आज युग को भी अपनी विश । विश्यास प्रतिभाएं हैं जो मानव समूह को विभिन्न स्तरो पर प्रभावित करती है । ये विश्वारा एय सम्मान की प्रतिभाएं थोक व्यक्तिया (या मूहा) या जाति की प्रेरणा स्रोत बन जाती है । इन विश्वासो प्रति आ वा स्वरूप मूलत 'धारणाहत-मिय' होता है ना किसी भी जाति के अचेतन और उप- चेतन म प्रमश अपना स्थान वनान लगती है। यह मानसिप एव सामाजिक प्रक्रिया एक दूमरे को पूरक होती है और प्रमश यर प्रक्रिया 'हीरो' या नायक को भावना का सापार करती है । वास्तव में, अधिकाश हीरो के मिथक उसी समय अपना रूप क्रमश विकसित करते हैं जिनका इतिहास अर्थयुक्त, प्रतीकात्मक और युग के व्यापक सन्दर्भो को अपने अदर समेटन म समर्थ हाता है । इस प्रकार के हीरो का एक अपना सदर्भ होता है जो इतिहास की विसी न किसी द्वन्द्वात्मक व्यवस्था को रेखाक्ति करते हैं। माक्स, गाधी और माओ (लनिन भी) का रूप कुछ इसी प्रकार का है। ये व्यक्ति अपने समय यो अर्थवत्ता प्रदान कर सके । और प्रमश 'मिथ का सृजन कर सके । ऐति- हासिक सदभ मे प्रजातन, समाजवाद, साम्यवाद और तकनीकी विकास न इन मिथका का सृजन पराक्ष रूप से किया और क्रमश उनका महत्व, मिथकीय सदभ को भी अपने चारो आर एकत्र करने लगा। इनके चारो आर जो 'प्रभामण्डल' ब्रमश एकत्र हाता जा रहा है । वह इहे एक मिथक का रूप दता जा रहा है। इस तथ्य का एक सुन्दर विश्लेषण घट्टैण्ड रसेल की पुस्तक हिस्ट्री आफ वेस्टन फिलासपो में दिया गया है जहा उहोन ईसाई धर्म ज्यूडीवाद और मार्क्सवाद के अनव तत्वो की समानता की आर समेत किय है।' जो एक प्रकार से, मिथक सृजन की प्रक्रिया को सामने रखता है, १ हिस्ट्री आफ वेस्टर्न फिलासफी, वर्टेण्ड रसेल, पृ० ३५४-३५५ आधुनिक मिथक | १०३ तो दूसरी अपर यह स्पष्ट करता है कि मिथक मृजन एक जटिल और जैविक प्रक्रिया है जो अपने चारो ओर अनेक मिथवीय तत्वो का (प्रभामण्डल या प) एकत्र करती रहती है। मार्स, गाधी और माओ जादि अब व्यक्ति मात्र नहीं रह गए हैं, पर वे "प्रतीक' बन गए हैं । व्यक्ति जब क्रमश प्रतीक बनने लगता है, तो वह मिथक पी शनै शनै सृष्टि करने लगता है। इस प्रक्रिया को समझने के लिए मैं तुलनात्मक रूप से मार्क्सवाद और ईसाई धर्म या ज्यूडी वाद के उन तत्वों की आर सोत वगा जो मिथकीय रूपान्तरण या स्पष्ट नहीं करते हैं, पर तुलनात्मक रूप से समान मिथकीय तत्वो की आर सकेत भी करते है। ईसाई धर्म मे 'ईश्वर' और मार्क्सवाद म 'इतिहास की द्वन्द्वात्मकता' का समान महत्व है । ईश्वर एव निरपेक्ष सत्ता है तो इतिहास भी एक ऐसी ही निरपेक्ष सत्ता है जिसको आर मैन आरम्भ मे ही सकेत क्यिा था । जहाँ तक पैगम्बर और मसीहा का प्रश्न है, धर्म के क्षेत्र म 'ईशु' का मसीहा रूप स्पष्ट ही है, पर मार्क्सवाद में मार्क्स ही पैगम्बर का रूप ग्रहण करता जा रहा है और लेनिन मसीहे के रूप में माना जा रहा है । 'मसीहा का अवतरण जिस प्रकार ईसाई धम में चेतना या क्रान्ति का मूचक है, उसो प्रकार साम्यवाद के लिए १६१७ को क्राति नयी चेतना या प्रतिरूप है । धर्म का पुराहित वर्ग जिस प्रकार नियामक और नियता वा रूप है, उसी प्रकार मार्क्सवाद का नियामक और नियता साम्यवादी दन है। यही नही, दोना के मिथक सतत एक 'यूटोपिया का निमाण करते हैं । जहा मा व पहुंचना चाहता है, पर शायद पहुँच नहीं सकता है। फिर भी 'वह' स्वप्न लोकती है, वही तो उसकी जिजीविषा का प्रमाण है । ईसाई धर्म म यह यूटोपिया 'वर्ग' की अवधाणा मे निहित प्राप्त होता है ता मार्क्सवाद मे साम्यवादी राष्ट्रसघ की धारणा मे । इस पूरी स्थिति वा इन प्रकार रखा जा सकता है । ईसाई धम ईश्वर द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद पैगम्बर मार्स ३ मसीहा लनिन मसीहा का अवतरण १८१७ की प्राति पुरोहित वर्ग साम्यवादी दल स्वर्ग मापसवाद २ ५ साम्यवादी राष्ट्राध १०४ / मिथर दर्शन या विकास पुछ इसी प्रकार की प्रतिया हमें बौद्धधर्म और गाधीवाद मे भी दृष्टिगत होती है । यह तुलना समानता प्रशित करने के अतिरिक्त मिथकीय सृजन- प्रतिया की समानता को भी रेखारित परतो है जो आधुनिक काल म अधिक अवधारणात्मय एव प्रत्ग्यात्मक हो गयी है। बौद्ध धर्म म दुखवाट को सत्य का स्प माना गया है जो मानव जीवन का सत्य है, तो गाधीवाद म 'राम' को सत्य का परम रूप स्वीकार किया ग ।। बौद्धमत में बुद्ध को पगम्बर का रूप माना गया तो गांधी को अवतार या पैगम्बर के रूप में स्वीकार क्यिा जाने लगा है । यदि गहराई से देखा जाए तो हिन्दूधर्म मे 'अवतार की भावना 'व्यक्ति' को मिथ का रूप प्रदान कर देती है और साथ ही उसे दिव्य का अवराहण भी स्वीकार करती है। मिथकीय प्रक्रिया से बुद्ध, महावीर, शक्राचार्य और गाधो की विश्वास प्रतिभाएं इसी रूप म विकसित हो रही है अथवा काफी सीमा तक हो चुकी हैं। जिस प्रकार बुद्ध ने अपना उत्तरा- धिकारी आनद को बनाया, उसी प्रकार गाधी ने नेहरू को अपना विश्वासी 'उत्तराधिकारी' स्वीकृत किया । बौद्ध धर्म म विहार या मठ का जो महत्व रहा है, वही महत्त्व गांधीवाद मे 'पाश्रमो का है जिसके स्वरूप मे 'मठ' की सो केन्द्रीयता और वर्जनाएं नहीं हैं। बौद्ध धर्म म मोक्ष को अन्तिम लक्ष्य के रूप म स्वीकार क्यिा या ता गाधीवाद मे 'स्वराज्य' या 'रामराज्य' को स्वीकार किया गया यही नहीं जिस प्रकार बौद्धधर्म राजनीति को सचालित करतो रही है, 'कुछ उसी प्रकार गाधीवाद भी आज की राजनीति को (नकारात्मक एव सकारात्मक रूप मे) प्रभावित किये हुए हैं। अहिंसा के तत्व दोना मे समान हैं । इस प्रकार बौद्धधर्म और गांधीवाद की मिथकीय सरचना के प्रमुख तत्व इस प्रकार हैं- बौद्ध धम गांधीवाद दुखवाद या सत्य राम या सत्य २ गाधी आनद (शिष्य) नेहरू बिहार या मठ आश्रम मोक्ष स्वराज्य या रामराज्य उपयुक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि किसी भी युग को विश्वास प्रतिमाएं क्रमश 'हीरो' के रूप में प्रतिष्ठित हो जाती हैं अथवा दूसरे शब्दो मे यह भी कहा जा सकता है कि ये हीरो विसी विचार प्रत्यय अथवा सिद्धान्त (वार) के रूप में विकसित हो जाते हैं तया अपने चारा ओर प्रमश १ ३ आधुनिक मिथक | १०५ 'प्रभामण्डल' एकत्र करने लगते हैं । हीरो की यह अवधारणा का क्रियाशील रूप हम साहित्य में भी प्राप्त होता है जहां पर व्यक्ति विशेष एक विशेष सन्दर्भ प्रभामण्डल एकत्र करता है, और रचनात्मक स्तर पर मिथक का रूप ग्रहण करता है । यही कारण है कि साहित्य के हीरा' रचनाकार की एक ऐसी मुष्टि हाते हैं जो कभी-कभी मिथक का रूप ग्रहण कर लेते हैं । यह प्रति या सामान्य नहीं है, विशिष्ट है जहाँ तक आधुनिक काल का प्रश्न है । हारी गोदान), देवदास (देवदास) आदि इसी प्रकार के 'नायक' कहे जा सकते हैं । साहित्यिक एव सामाजिक सदर्भ मे नायर का मिथकीय रूप द्वन्द्व और यातना की मिथित प्रक्रिया का फल ज्ञात होता है। ७ जनवादी सस्कृति का मिथक इतिहास की पुरागाथा या मियक का विवेचन उस समय तक अपूर्ण रहेगा जब तक कि आज वे ऐतिहासिक परिवर्तन से उद्भूत एक अय मिथक का विवेचन न किया जाये । यह मिथक है-"जनवादी सस्कृति का मियक्" । इस मिथर का विकास आज के द्वन्दात्मक युग का विचार-दर्शन भी कहा जा सकता है। इस मिथर का विकास उनीसवी शताब्दी से आरम्भ होकर बीसवी श ब्दिी तक आते-आते अपना एक निश्चित मिथकीय अर्थ ग्रहण कर चुका है । ऐतिहासिक दृष्टि से "जन" शब्द (मास) का एव अपना विचार-दर्शन है जो प्रमश समूह गुट या मांव से कही व्यापक अर्थ प्रदान करता है । उस जन- वादी सस्कृति के मिथक का विकास आधुनिक युग का एक विशेष (प्रत्यय) है जो इतिहास की नवीन स्थितिया और शक्तियो के द्वद से उत्पन एक ऐसा यथार्थ है जो मिथर के रूप मे स्वीकार किया जा रहा है। यह 'मिथ', यह भी स्पष्ट करता है कि यथार्थ की गत्यात्मक्ता कभी-कभी मिथिक चेतना की गत्यात्मकता को स्वीकार कर लेती है। यहां यथार्थ, मिथक का रूप ग्रहण करता है, क्याकि उसके चारो आर वैचारिक दद से उद्भूत एक 'प्रभामण्डल' एकत्र होता जा रहा है । इसका विवेचन यहां अपेक्षित है जो आज की मानवीय चेतना को, किसी न किसी रूप से प्रभावित एव आन्दोलित कर रहा है । जनवादी सस्कृति (माम कल्चर) का मिथक एक ऐसा गत्यात्मक "प्रत्यय" है जिसके निर्माण में जनेक राजनैतिक एव आर्थिक शक्तियो का हाथ रहा है, तो दूमरी आर वैचारिक धरातल पर अनेक विचारका दाशनिका का योगदान रहा है । यहाँ पर यह मानना कि केवल मार्क्स, लेनिन या गांधी ने ही इस मिथक् क विकास में योगदान दिया है एक भ्रामक और अधुरी अवधारणा १०६ / मिथक दर्शन का विकास होगी । सच तो यह है कि इन विचारव। के अतिरिक्त अनक भय विचारक एव चितक भी हैं जिहाँ जनवादी संस्कृति के मिथक या अर्थवत्ता प्रदान को है। यहा पर 'जन' शब्द एक विशेष अर्थ प्रदान करता है जो वैज्ञानिर विकास, उद्यागवाद, प्रजातन्त्र सर्वहारा, मध्यवग, समानता, स्वतन्त्रता और न्याय जैस 'प्रत्यया' एव विचारणाओ का एप सगुपित गत्यात्मक रूप है । इन सभी तत्वा ने यूनाधिक स्प से जनवादी संस्कृति के मिथय का एक ऐसा आवार और स्वरूप प्रदान क्यिा जो विचार और कर्म के धरातल पर मानवीय क्रियाओ को एक अथवत्ता प्रदान करता है, तो दूसरी आर मानव को सजनात्मक शक्तिया का एक नया आयाम प्रदान कर रही है । यह 'जन' शब्द केवल शब्दमात्र नही है, पर एक 'विचार' है, एक ऐसा विचार दर्शन जिसने केवल राजनीतिक और अर्थनीति को ही प्रभावित नही क्यिा है, पर साहित्य, कला, दर्शन, धम और अय मानवीय क्रियाओ का भी रचनात्मक एव वैचारिक स्तर पर प्रभावित क्यिा है। ८ इलीट, समूह और मशीन यहां पर आकर एक अन्य तत्व का विवेचन आवश्यक है। टी० एस० इलियट, लोविस आदि विचारका ने समूह (विशिष्ट) और 'इलीट' सस्कृति का बात की है जो उनके अनुसार व्यक्ति का एक ऐसा स्रोत है जहाँ से (विशिष्ट या इलीट) 'वह' प्रेरणा लेता है।' इससे यह स्पष्ट होता है कि 'इलीट' और समूह का एव सापेक्ष सम्बध है और जहां पर भी यह 'इलीट' समूह से क्ट जाता है, वहा जनवादी चेतना का एक स्वस्थ विकास सम्भव नहीं है। यहाँ पर मशीन या यत्र न भी अपना यागदान दिया। यही कारण है कि जनवादी मिथक के विकास में समूह, इलीट, व्यक्ति और वामगर (धमिर) सवा एक समष्टि योगदान है। यहां पर मशीन या यन ने भी अपना यागदान दिया। सप्रेपण माध्यमो के विकास के कारण जनवादी मिथक या विकास इसलिए सम्भव हुआ कि इन माध्यमा । “विचार-दर्शनो' को 'जन' म प्रेपित किया और इसका प्रभाव यह पडा कि जनवादी मिथक युग को आकाक्षा का रूपायित कर सका । अनेक विचारका का यह भी मत है कि मशीन के कारण संस्कृति काजमानवीयकरण हुआ आर व्यक्ति एक मशीन के पुर्जे समान हो गया। मानव का यह अवमूल्यन यात्रिरता की देन है जा जनवादी मिथर यो एक पल्चर ऐण्ड सासाइटी, विलियम्स, पृ० ३१३ १ आधुनिक मिथक | १०७ ऐसी विसगति है जिसकी आर साहित्यकार, कलाकार और दाशनिक काफी चितित हैं। परन्तु दूसरी ओर, यह एक ऐतिहासिक प्रक्रिया है जिसे नकारा भी नहीं जा सकता है । इस दृष्टि से जनवादी मिथक जहा एक ओर 'जन' की आकाक्षा का उद्घाप है, वही उसे 'व्यक्ति' की अस्मिता को भी सुरक्षित रखना है जो भविष्य ही बता सकेगा। जनवादी मिथक के विकास जहा एक ओर यात्रिनता और तकनीक ने सकारात्मक यागदान दिया, वही उसन नकारात्मक पक्ष की ओर सकेत किया। यानिक्ता और तकनीक के जत्यधिक प्रभाव स 'जनवाद' का अस्तित्व तो मुखर हुआ, पर दूसरी ओर उसने व्यक्ति के मूल्य का अपेक्षाकृत कम किया। क्ला और साहित्य, धर्म और दर्शन व्यक्ति की इस 'अस्मिता' के प्रति जागरूक है और यही कारण है कि 'आतरिकता' के बगैर जनवादी संस्कृति का मिथक एक पक्षीय होता जा रहा है । यहा पर बड रसेल का यह मत ही काफी सीमा तक सत्य प्रतीत होता है कि यत्र आर तकनीकी ने विज्ञान के 'शक्तिमूल्य को विकसित किया है जो विज्ञान का केवल एक पक्ष है । विज्ञान का एक अन्य पक्ष उसका वैचारिक या प्रममूल्य है।' इसका फल यह हुआ कि अजनबीपन और एकाकीपन जनवादी मिथक् का एक ऐसा अग हो गया जो उसके नकारात्मक पक्ष को ही उद्घाटित करता है । इससे यह स्पष्ट हाता है कि जनवादी मिथक का भावी विकास इन दोना छारा को कहा तक एकाकार एव ममवित कर सकेगा, इस पर आधारित होगा। यह मात्र भावी सम्भावना है जिसकी ओर युग-दर्शन गतिशील हो रहा है । ८ सस्कृति का प्रजात त्रीकरण इम जनवादी मियर वे विपास मे जनतात्रिक मूल्या और विचारा का एक महत्वपूर्ण स्थान है । प्रजातन और मानवतावाद के विचार दशन ने अपने सम्मिलित प्रभाव से 'सस्कृति का प्रजातत्रीकरण' (या जनत त्रीकरण डिमोरेटाइ- जेशन आफ कल्चर) करने म सहयाग दिया और इस योगदान में शिक्षा का भी जनत त्रीकरण हुआ। ट्रेड यूनियन पूंजीवाद का विराध, मर्वहारा और मध्यवर्ग का उदय तथा आर्थिक वितरण इन सभी शक्तियो न एक साथ मिलकर जनवादी मिथक का निमाण रिया । यहाँ पर इस बात पर ध्यान रखना आव- श्यक है कि जनवादी मिथा का विकास वेवल सर्वहारा वग का उदय नहीं है, १ वैज्ञानिक अन्तह प्टि, रसेल, पृ० ३२ १०८ | मियव दशन का विकास पर उपर्युक्त सभी तत्या का उसके विकास मे योगदान है। एलन स्विगवुड ने सर्व- हारा वर्ग के उदय को जनवादी मियन का केवल एक तत्व पहा है, वह पूणरुप से सत्य नही है। यदि गहराई से देखा जाय तो जनवादी मिथर का विकास पूँजीवादी व्यवस्था के विरोध तथा उसके अतविरोधा का फल है और जन- तांत्रिक मूल्या की वमिव स्थापना है । मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि सस्कृति के जनत त्रीकरण' को ऐतिहासिक नियतिवाद के द्वारा ही समझा और विश्लेपित दिया जा सकता है जिममे साहित्यिक तथा अन्य प्रकार की पुस्तक पढने एव अध्ययन करने की प्रवृत्तिया भी काफी सीमा तक शामिल हैं । इस दृष्टि से साक्षरता का एक महत्वपूर्ण स्थान माना जा सकता है क्योरि इसके वगर व्यक्ति (शिक्षित की चेतना स्वय समूह, समाज और वग से अपने सम्बध का उचित प्रकार से स्थापित नहीं कर सकेगी। यही कारण है कि बगर 'जन' के शिक्षित हुए प्रजा-तत्र सफल नही हो सकता है, केवल उसका आभास' ही होता है । यह स्थिति विश्व के अनेक देशा मे देखी जा सक्ती है । आज के सन्दभ में इस प्रकार का प्रजात त्रीकरण जहां आज की सस्कृति को एक नया रूप दे रही है, वही वह प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से मानवीय ज्ञान के क्षेत्रो को भी गतिशीलता प्रदान कर रही है। इसी के विपरीत आज के विश्व म प्रजातन की शक्तिया से एक द्वन्द्वात्मक विरोध उन शक्तिया का है जो प्रजातान्त्रिक मूल्या के विकास मे बाधा उत्पन्न कर रही है । अधिनायकवाद तथा इसी प्रकार की व्यवस्था तथा तत्र जनवादी मिथक के विकास म व्यवधान अवश्य उपस्थित कर रहे हैं, पर इस सत्य के बावजूद भी इतना अवश्य कहा जा सकता है कि ऐसे क्षेत्रा और देशा मे भी 'जनवाद' एक अत- निहित शक्ति या अतर्धारा के रूप मे प्रवाहित प्राप्त होता है । यदि ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो उनीसवी शताब्दी को 'माव' सस्कृति (समूह) ही वीसवी शताब्दी की जन या मास सस्कृति को विकसित करने में सहायक रही है । यह सक्रमण अनायास नहीं हुआ है, पर कामगार या सर्वहारा वर्ग के उदय के साथ यह सक्रमण घटित हुआ है। यह सक्रमण ही जनवादी समाज एव सस्कृति की रचना में सहायक हुआ जिमने अनेक राजनैतिक एवं सामाजिक सिद्धाता और प्रत्ययो का विकास किया। दूसरे शब्द म हम कह सक्त हैं कि श १ दि मिथ आफ दि मास कल्चर, एलन स्विंग वुड, पृ० ६६ २ नि मिथ जाफ दि मास क्ल्वर, स्विगवुड, पृ० ११८ आधुनिक मिथक | १०६ जनवादी मिथक का आधार व विकास वग सघर्प और वर्ग प्रभुत्व पर माना जा सकता है। इसी चेतना ने पजीवार के प्रभुत्व का लनमारा और उससे संघर्ष किया । इटली, फास, इग्लैण्ड और जमनी आदि देशो में इस सामूहिक विचार-दशन ने पजीवाद को चुनौती दी और यह चुनौती बीसवी शताब्दी मे अपना गतिशील रूप प्रक्ट कर सकी । यहाँ पर यह ध्यान रखना आवश्यक है कि इस चुनौती का आरम्भ उनीसवी शताब्दी मे हुआ और वीसवी शताब्दी मे जनवादी मिथव के अनेक आयाम प्रमश स्पष्ट एवं विकसित होने लगे। समाजवाद साम्यवाद, गाँधीवाद, माक्र्सवाद और मानावाद आदि ऐसे ही आयाम हैं जिहान समष्टि रूप से जनवादी मिथक के विकास में अपना योग दान दिया कभी-कभी मिथक सृजन म इतिहास की शक्तियाँ काय करती हैं जैसाकि हमे जनवादी मिथक विकास मे प्राप्त होता है। अत यहाँ पर यह कहना कि मिथक इतिहास या विनाश करता ह अथवा इतिहास को बाप्पीकृत करता है' पूर्ण रूप से सत्य नही है । मुझे कभी-कभी ऐमा लगता है कि मिथक 'इतिहास' बन जाता है जब वह 'जनमानस' मे एक 'विचार' एक 'प्ररणा' और एक 'गीत' का रूप ग्रहण कर लेता है। जनवादी मिथक एक ऐसा ही 'इतिहास-मिथक' है जो अपनी गतिशीलता के द्वारा जनमानस को आ दालित पर रहा है। रचनाकार की सृजनात्मक्ता इसी मिथक से प्रेरणा और गति ले रही है जो कला साहित्य, दशन और सामाजिक विज्ञानो म परोक्ष या अपराक्ष रूप से देखी जा सकती है। ६ युवक और राष्ट्र मिथक इस जनवादी मिथक को गतिशील बनाने वाले दो प्रमुख तत्व हैं-एक विचार-दर्शन का रूप जिसकी व्याख्या ऊपर जा चुकी है जा एक ऐतिहासिक परिवतन पी आर सकेत करता है। दूसरा तत्व है 'युवक' जिस पर सारी प्रगति और सारे विकास को, एक प्रकार से, वेदित पर दिया गया है और उसे जन आकाक्षाआ की पूर्ति का माध्यम बनाया जा रहा है। राजनेता, प्रशासन और तन की विभिन्न प्रणालिया उसे परोक्ष रूप से एक माध्यम के रूप में स्वीकार कर रही हैं। इस प्रकार हम कह सकते है कि प्रगति का एक प्रमुख आधार 'युवक' है जो अपने ही विशिष्ट इतिवृत या 'प्रभा मण्डल' का सृजन करता जा रहा है। युवक इस प्रगति का प्रेरणा स्रोत बनता जा रहा १ दि मिथ आफ दि मास वल्पर, पृ० १२० ११० मिथर दर्शन या विकास है। राष्ट्र और समाज को प्रगति और परिवतन का यह एक ऐसा माध्यम है जो विशिष्ट प्रकार का है। राष्ट्र और युवर वा एक गहरा सम्बध है । यदि व्यापक दृष्टि से देखा जाए तो 'राष्ट्र' को अवधारणा भी एक 'प्रभामण्डन' को एकत्र परती जा रही है, और 'राष्ट्र' भी एक मिथर बनता जा रहा है । राष्ट्र मिथक का उदय उस समय होता है जब हमारी दृष्टि इतिहास के प्रति पैनी हुई जब इतिहास स्वय ही एर 'अमूल्य वना, तर प्रमश राष्ट्र की धारणा म मूल्य, स्वत प्रता, स्वायत्तता और विवेक का 'दैवीकरण' हुआ जो क्ला, साहित्य और राजनीति मे अभिव्यक्त हुआ। यहाँ पर यह ध्यान देने योग्य बात है कि राजनैतिक मनोभावा न एक धार्मिर जाश की तरह राष्ट्र को एक 'शक्ति' और अस्मिता की सुरक्षा का परम प्रतीक बना दिया। इस प्रकार राष्ट्र प्रगति के मिथक के रूप में सामने आया और युवक इस प्रगति का प्रेरणा स्रोत बना। राष्ट्र युवका के लिए युवका के द्वारा बनाया हुआ एक मिथक है जिस का दायित्व युवका पर ही डाल दिया गया।' इसका फल यह हुआ कि सत्ता, विचारक और नेता आदि सब उसी पर अपना भार स्थानातरित और जारोपित कर उसे 'इतिहाम' के प्रवाह म 'झार' देते हैं । यहाँ पर युवक केवल 'छार' नहीं है, पर वह छात्र, रिसान, मजदूर और मध्यवर्ग का व्यक्ति है जो 'युवा' की शक्ति का प्रतीक है । जब इतिहास की कोई समस्या का हल दिखाई नहीं देता अथवा देखने का प्रयत्न नही किया जाता तब कोई आकर नारा दे जाता है कि 'युवाशक्ति विकास का स्रोत है' या युवक आगे बढ़ रहा है-ऐसे प्रभाववादी उत्तेजना से भरे वावया के द्वारा यह समझा जाता है कि युवक वह सब कुछ करने में सक्षम है जो हम (वडे लाग, वृद्ध) नही कर पा रहे है या करना नहीं चाहते । विडम्बना यह है कि बेचारा युवक इस 'माहौल' मे (जो मिथकीय प्रकार का है) बुरी तरह जक्ड दिया जाता है। १० विज्ञान मिथक के दो पक्ष इतिहास, जनवादी और युवक आदि के मिथका का एक ऐसा वर्ग है जिसन इतिहास की वैचारिख द्वन्द्वात्मक्ता को किसी न किसी रूप में रेखारित किया है । इन मिथको के अतिरिक्त एव और ऐसा वर्ग भी है जिसका सम्बध विज्ञान से है । इतिहास के समान विज्ञान भी एक गत्यात्मक मिथक है जिसकी गत्या- स्मक्ता के दो पक्ष हैं। विज्ञान या तकनीकी और यात्रिक पक्ष उसका एक ऐसा 'प्रभामण्डल' है जो रसेल के अनुसार विज्ञान का 'शक्ति मूल्य' है। यह १ नृतत्व और समाज दर्शन (स.) पृ० ८४ आधुनिक मिथक | १११ 'शक्ति मूल्य' विज्ञान का केवल एक पक्ष है जो उसके मिथकीय रूप को प्रकट परता है। यह शक्ति मूल्य, एव प्रकार से यातुक मनोभाव से सम्बंधित है क्योकि 'यातु' (मैजिक) प्रवृति पर अधिकार करना चाहता है और विज्ञान भी इस 'शक्ति' के द्वारा प्रवृति पर अधिकार करना चाहता है अथवा करता है। यह 'अधिकार' पी भावना केवल प्रवृति तक ही सीमित नहीं है, पर राष्ट तथा समाज पर भी इसका प्रभाव पड़ा है जो अतर्राष्ट्रीय एव राष्ट्रीय प्रति- द्वन्द्विता और सघप वा बढाने में भी सहायर हुआ है। विज्ञान की इस शक्ति को शाति तथा विकास कार्यों में भी लगाया गया है जो उसका एक सकारात्मक पक्ष है । यह एक सत्य है कि 'शक्ति' के भी दो पक्ष होते हैं-सकारात्मक एव नकारात्मक तथा इन दोना पक्षा म एक इन्द्वात्मक स्थिति के दशन होते हैं । विज्ञान का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष उसका वैचारिक या चितन पप है जो उसका 'प्रेममूल्य' है। यदि गहराई से देखा जाए तो प्रगति और विकास का मिथक (जो इतिहास की द्वन्द्वात्मक्ता को प्रकट करता है) विज्ञान के टस पक्ष पर भी आधारित है, तो दूसरी ओर शक्ति मूल्य के विकास में भी इस प्रेम या विचार मूल्य का अपना विशेष एव अभिन योगदान है। डारविन के विकास- वाद के द्वारा इतिहास की द्वन्द्वात्मकता को प्रक्ट किया गया और साथ ही, जैव और अजैव के सापेक्ष सम्बच को रेखाक्ति किया गया । हीगेल तथा माक्स ने वैचारिक द्वन्द्वात्मवता (भौतिस्वाद) का जो विचार दर्शन प्रस्तुत किया, उसका प्रेरणा पात डार्विन का विकासवाद माना जा सकता है। इतिहास की इस प्रगति चेतना का एक गहरा सम्बध विज्ञान के इस मूल्य से भी है जा हम द्वन्द्व और प्रतिद्वहिता के प्रगति मिथक की ओर समेत करता है । सत्य तो यह है कि इस प्रगति की दुहाई वामपथी भी देत हैं और दक्षिणपथी भी। ११ विकासवादी मिथक विकास के वैचारिक मिथका मे कुछ महत्वपूर्ण मिथव निर्मित हो गय हैं या निर्माण की प्रक्रिया में है । ऐसा ही विकासवादी मिथ है । जा जैविक विकास- वाद से सम्बधित है। विकास वा मियक काल की निरन्तरता और उसकी सापेक्षता के साथ घटित हाता है । विकास वाद और उसकी सापक्षता के साथ घटित होता है। विकासवाद जैरिव विकास की परम्परा का रेखास्ति करता है और साथ ही अजैविक जगत का उससे सम्बधित पर विकास के कृमिक सोपाना का स्पष्ट करता है । इन व्रमिक सोपाना (अमीया से लेकर स्तनधारी १ वैज्ञानिय तष्टि, बद रसेल, पृ० ३२ ११२ / मिषर दर्शन पा विकास जीयो सप) ये वारा यह स्पष्ट होता है कि मानव प्राणी मरचना तथा मानसिक वियास पोष्टि से समस्त प्राणिया म 'विपीत' प्राणी है । हामले ने यह मत रया है जि जैसे-जैसे प्राणी (प्राणिया) या विकारा होता है उनकी सरचना जटिस स जटिलतर हाती जाती है। अत शारीरिप एव मानसिप' सरचना की दृष्टि से मानव, विधारा मा परम मिन्दु है। इस प्रकार विशेषीकरण और वियारा या अयोय सम्बध है। इसका परा यह हुआ कि विकास परम्परा म 'मानव' पेद्र म आ गया और उसकी 'दिव्यता' या एर नया परिप्रेक्ष्य प्राप्त हुआ। इस प्रकार विकास के मिथर न मानव या स्पातरण रिया आर उसे 'ईश्वर' मा 'दिव्यता' में समरक्षा लायर यडा कर दिया। महर्षि अरविन अतिमानव (सुपरमैन) पी जो पल्पना की है, वह विवास मिथव का ही पल है। भारतीय अवतार भावना भी मानव की इस दिव्यता को रेखाक्ति वरती है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक चिन्तक ली बाम्ते ड्यू नू ने अपनी पुस्तक 'ह्यूमन डेस्टनी म 'मानव' के भावी विकास का मानसिक एव नैतिक क्षेत्रा में ही सम्भव माता है क्योकि उसका कहना है कि 'मानव प्राणी शारीरिक संरचना और प्रजनन प्रिया में सबसे जटिलतम प्राणी है, इसके आगे इन क्षेत्रो म उसका विकास अब असम्भव नहीं है, यदि उसका विकास सम्भव है, तो वह मानसिक एव नैतिय क्षेत्रा म ही हो सकता है।' ११ सृष्टि मिथक विज्ञान का दूसरा महत्वपूर्ण मिथव है सृष्टि मिथक जिसने मानवीय ज्ञान के क्षेत्र को एक व्यापक परिप्रेक्ष्य प्रदान किया है। प्राचीन मियकाम भी 'सृष्टि के बारे मे अनक प्रकार की कल्पनाए की गई हैं । जैसे वृत्त या गोलक, अधकार आदि परम तत्व तथा सम्पूर्णता जिनका विवेचन किया जा चुका है। इन सभी मियको म सृष्टि रचना के उद्गम और विकास को समझने मा प्रयत्न किया गया है जो ब्रह्माण्ड के प्रति मानव की प्रथम एव मह वपूर्ण रहस्य भावना थी जिसने ब्रह्माण्ड को विराटता को प्रागतार्किक शक्ति के द्वारा हृदयगम करने का प्रयत्न किया। आदिमानव की यह कल्पना प्रातिभ ज्ञान १ दियूनिटी ऐण्ड डाइवसिटी आफ लाइफ, जे० हक्सले, पृ० २६ २ दे० सृष्टि मिथक, अध्याय ८ ३ घूमन डेस्टनी, ली काम्टेडयू नू०, पृ० २५ ४ ह्यूमन डेस्टनी, ली कान्टेडयू न, देखें अध्याय ८ आधुनिक मिथक | ११३ (अनुभूति) पर अधिक आथित थी, पर विज्ञान न सष्टि रहस्या का उद्घाटन प्रयोग एव निरीक्षण के आधार पर किया जो तात्विक सतों को भी प्रकट करता है। प्राचीन सृष्टि मिथयो में एक प्रकार की दैवीकरण प्रक्रिया प्राप्त हातो है पर विज्ञान उस दैवीकरण प्रक्रिया के स्थान पर 'पदाथ' को सृष्टि का मूल स्रोत मानता है। यदि गहराई से देखा जाए तो वृत्त या पिण्ड की आदिम भावना आज के गोलाकार तप्त हाइड्रोजन की भावना है जिससे ग्रहो, नक्षत्रो का क्रमश निर्माण हुआ। इस दशा में प्राप्त हाइड्रोजन प्रयोगशाला की हाइडोजन से भिन है, परन्तु यह हाइड्रोजन द्रव्य दशा मे प्राप्त हातो है । यह तप्त द्रव्य हाइड्रोजन चनाकार परिक्रमा और तापमान के क्रमश कम होने से अनेक पिण्डो (ग्रहो) मे क्रमश विभक्त हो गयी। इस प्रकार सूर्य (मूल पिण्ड) और ग्रहो का (सौर मण्डल) निर्माण हुआ । यही कारण है कि सूर्य का आतरिख तापमान लगभग १५ लाय सेटीग्रेड होता है जो उसके धरातलीय तापमान की अपक्षा वही अधिक होता है ।' ग्रहा, नक्षता तथा नोहारिवाआ के सूजन में इसी पदाथ का विशेष हाथ है जिसे 'पृष्ठभूमि पदार्थ की संज्ञा दी गई है। धीरे-धीरे सूर्य की परिक्रमा गति धीमी पड़ने लगी और ग्रहा की परिक्रमा गति अधिक होने लगी। इस प्रक्रिया के फलस्वरूप ग्रह क्रमश सूय स दूर हान लग और इस प्रकार 'ब्रह्माण्ड' की विराटता का स्वरूप मुखर हुना । यह सारी घटना एक ऐसी प्राक्ल्पना है जो मिथकीय प्रकार की है और सत्य के सापेष रूप का प्रकट करती है । सौरमण्डल की यह सरचना सूय और ग्रहों के सापेथ सम्बध पर आधारित है जो परमाणु की सरचना (नाभिः सूय, एलक्ट्रान - ग्रह) के समान ह । इसे यदि तात्विक शब्दावली मे कहे, तो जो पिण्ड या माइक्रोकाज्म में है वही ब्रह्माण्ड या मैरकाज्म मे है । सृष्टि रचना का मूल 'तव' है, पृष्ठभूमि पदार्थ जो कभी भी समाप्त नही होता है। वरन् रूपातरित होकर अनेक रूपाकार ग्रहण करता है । यही रूपांतरण सृजनशीलता है। इससे यह भी प्रकट होता है कि पदार्थ नित्य है और सृष्टि का आदितत्व है। पदाथ को रूपातरण एव सश्लेषण प्रक्रियाएं गतिशील हैं । इस दृष्टि से पदार्थ भौतिक न हावर अभौतिक है जिस तर हमारा मस्तिष्क पहुंचना चाहता है, पर पूर्ण रूप से उस तक पहुँच नहीं सकता है । पदार्थ को मह म्हस्यात्माता सृष्टि उद्गम को एक ऐसी उपपत्ति है जा १ मि साइटिफिक एडवेंचर, हबर्ट डिन्जिल, पृ० १६७ २ दिनचर आप युनोवस, फेड हायल, पृ० ६५ ११४ | मिथक् दशन का विकास मिथकीय अवधारणा के समक्ष है । इस प्रकार ज्ञान किसी न किसी स्तर पर मिथकीय प्रकल्पनाओ की सृष्टि करता है । १२ दिक काल की धारणा सृष्टि मिथक का सीधा सम्बन्ध ब्रह्माण्ड से है जिसकी विराटता का सकेत विज्ञान के द्वारा भी प्राप्त होता है । ब्रह्माण्ड के स्वरूप को लेकर सबसे महत्व- पूण अवधारणा का विकास दिव और काल के सापेक्ष सम्बध को लेकर हुआ है । यूटन तया केजर ने दिक और काल को अनत तथा निरपेक्ष स्वीकार पिया था, और यह मा यता विज्ञान के क्षेत्र में एक ऐसी मायता रही जिसे सत्य का रूप ही माना गया। परतु वीसवी शताब्दी के प्रथम तथा द्वितीय चरण म आइस्टाइन ने इस धारणा को एक नया मोड दिया । यह एक ऐसी वैचारिक क्राति थी जिसो ब्रह्माण्ड के रहस्य का, उसकी विराटता को तथा उमके स्वरूप को एक नए परिप्रेक्ष्य मे रखने का प्रयत्न क्यिा । आइस्टाइन न निक् और काल को निरपेक्ष न मानकर उहे सापक्ष माना । आइस्टाइन न जपने सापक्षवादी सिद्धा त के द्वारा यह स्पष्ट क्यिा रि (गणित के द्वारा) दिक और काल एस उमूत हैं जो विश्व की सरचना का समझने में सहायता देते है । जाग चलकर नाइस्टाइन न दिक् और काल को सापेक्ष मानत हुए उहें सीमित माना तथा दूसरी ओर उह सीमित मानते हुए भी आवद्धहीन (अनवाउडेड) माना ।' यह धारणा एक तात्विक धारणा सी है जो दशन के क्षेत्र का भी प्रभावित करती है और साथ ही टिक काल के मियकीय रूप को भी व्यजित करती है। दिव और काल के आयामा म समस्त सृष्टि का विस्तार आवद्ध है। यह आयाम (डाइम श) क्या है ? दिग् एक ऐसा प्रत्यय है जिसके तीन आयाम (लम्बाई, चौडाई और ऊंचाई) है और काल का केवल एक आयाम 'लम्बाई है जो काल के रेखीय एव अप्रत्यावर्तित रूप की ओर सवेत है। यही कारण है कि काल एक गति है ना निर तर आगे बरती है । निक और काल यो स्थिति सापेध है, जत 'मि-बाल एक चतुआयामिक विस्तार ह जिसमें समस्त सृष्टि जयस्थित है । सृष्टि का सृजा और विलय इमी दिपाल के जायामा म घटित हाना है और यह प्रक्रिया नित्य है। दिव् काल की यह विराटना एप द्रष्टा की सापगता म ही अस्तित्ववान है । इसका अर्थ यह हुआ कि दिव और काल का अस्तित्व पिपयोगत है । यही नही अय प्रकार के नियम तथा घटनाएं (पाथ विभाजन से सम्बधित) मूनत आत्मपरक या विषयीगत टिफिनामका माफ पिसिन साइम-आथर इडिंगटन, पृ० ५५ १ आधुनिक मिथक | ११५ है। यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाये तो विज्ञान केवल वस्तुपरक ज्ञान नहीं है, पर वह आत्मपरक या विषयीगत ज्ञान भी है। आइस्टाइन का विचार दर्शन इस ओर इगित करता है जो मात्र भौतिक्तावादी दृष्टि का पक्षधर नहीं है। १३ विस्तरणशील विश्व का मिथक इस पृष्ठभूमि के रकाश मे एक अय महत्वपूर्ण प्रस्थापना है दिन का सदा विस्तरणशील आयाम । यह प्रिया नीहारिवाओ (गलेक्सीज) के सूजन और विलय का फन है । नीहारिका की सरचना में तारो का पुज रहता है। आकाश- गगा एक ऐसी ही नीहारिका है जो हमारे दृष्टिपथ में आ जाती है । अयथा न जाने इस प्रकार की कितनी नीहारिकाएं हमारी दृष्टि से परे हैं। नीहारिका का एक-एक तारा सूय है जिसका अपना सौरमण्डल है। इससे यह कल्पना की जा सकती है कि दिन में विराट आयाम में असख्य सौरमण्डल हैं जो बनते एव विलय (पृष्ठभूमि पदाथ म) हाते रहत है। यह प्रम निरन्तर चलता रहता है। यह कहा जा चुका है नि दिक् निर नर फैन रहा है । चक्राकार तारा पुजो का बिखरना इस बात की ओर सकेत करता है कि उनकी विस्तार की गति कितनी अधिक है । इन तारापुजो का एक अय नाम (द्वीपविश्व) भी है । इनमे से प्रत्येक द्वीपविश्व में इतना अधिक द्रव्य या पदार्थ होता है जा करोडो नक्षत्रो का सृजन करन म समय है । प्रत्येक नीहारिका की नियति इसी पदार्थ, पर जाधारित है। यहाँ पर यह सकेत करना आवश्यक है कि नीहारिकाआ की जितनी दूरी होगी, उतनी ही गति से व पीछ की ओर भागेगी। नीहारि- काआ के टस विस्तार एव सकुचन के कारण इस ब्रह्माण्ड को पनशील विश्व (आसिलेटिंग युनिवर्स) भी कहते हैं । सत्य नीहारिकाआ का यह विस्तार ही विस्तरणशील ब्रह्माण्ड का स्वरप है। विस्तरणशील ब्रह्माण्ड के चारा आर यह प्रभामण्डल उसे एक मिथक का स्वरूप प्रदान करता है । विस्तरणशील ब्रह्माण्ड का मिथक अनेक प्रश्न उप- स्थित करता है जो इस मिथक का व्यापकता प्रदान करता है। फेड हॉयल का यह कहना कि नक्षा विज्ञान न जिन रहस्यमय आश्चर्यों को उद्घाटित किया है वे हमारी सौदर्य चेतना को विस्तार देते है और यह सिद्ध करत हैं कि यह सादय क्मिी क्लात्मक सोदय से कम नहीं है। ब्रह्माण्ड का यह १ साइस ऐण्ड दि माडर्न वर्ल्ड, ए० एन० ह्वाइटहेड, पृ० १४१ २ दि लिमिटेशन्स आफ साइम, सूनीवेन, पृ० ३१ ३ दि नेचर आफ युनिवर्स, फेड हायल, पृ०६८-६६ ११६ | मिथर दर्शन का विकास विस्तारमूलय रहस्य, मानव और उसयो धरती के सापेक्ष सम्बध को रेवास्ति करता है और यह स्पष्ट करता है कि असख्य ब्रह्माण्डा की सापेक्षता में मानव और पृथ्वी एक नगण्य अशमात्र है । इस अनुपात को ध्यान म रयकर मानव वे अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। क्या मानव या अस्नित्व सक्ट में है ? क्या उमा अस्तित्व किमी सुरक्षा की मांग करता है ? ये कुछ प्रश्न उभर कर जाते हैं। यदि इन प्रशो वा उत्तर प्राप्त वरना है तो हम एक आवश्यक 'भ्रम' स गुजरना पडेगा । इम विराट विश्व म मानवीम अस्तित्व एक भ्रमात्मक धारणा है। जनर गाण्डा का सृजन और विलय इस बात की पुष्टि करता है कि हमारा ब्रह्माण्ड भी न जान पर उस विनाश प्ररिया का अंग बन जाए ? यहाँ पर हायल यह कहता है कि इस पतरे के कारण अनेर मनुष्य एसे भी हो सकत है जिह एव ऐस विश्वास को आवश्यक्ता हा जा उह सुरक्षा की भावना प्रदान कर सके । इसम पाई जाश्चय नहीं है कि ऐसे मनुष्य मुझ पर प्राधित हा जाए जिससे मैं यह यह मि यह मुरक्षा की भावना भी 'भ्रमात्मक' है । * मरी यह मायता है कि यह भमात्मव दशा भी जावश्यक है क्यामि मानव की चेतना इस अतिम प्रत्यय' की धारणा म पर इसी आवश्यर ममात्मय स्थिति का ग्रहण परती है। वास्तव में, ईश्वर, गाड, परमतत्व जैस प्रत्यय इसी आवश्यक भ्रमात्मक स्थिति के पल है । दूसरी आर, या "भ्रम हात हुए भी हमारी जास्तिकता वा विराम है जहाँ पर हम सुरक्षा की भावना प्राप्त हाती है। विस्तरणशील विश्व एक अय तत्व पी आर समेत करता है। विश्व का विस्तार दिक बाल के चतु मायामिक विस्तार मे आबद्ध है, और इसी से विश्व या ब्रह्माण्ड की 'गहनता' किसी न किसी अन्तिम इकाई या 'सत्य' की माग करती है । यह तथ्य किसी न किसी ऐसे ब्रह्माण्डीय दशक या भविता की प्राक्कल्पना मरता है जिसका शरीर सत्य विस्तरणशील है। इडिंगटन ने इसी से, एक ब्रह्माण्डीय भविता (कास्मिक बोदग) की कल्पना की है जिसका शरीर जन्तर- नीहारिवीय-~~-टिक'मे निर्मित हुआ है । यह धारणा एक प्रकार से मिथकीय धारणा के निक्ट है जा सत्य और मिथर वे अयाय सन्नमण की आर ध्यान भावपित करता है। १ नचर आफ युनिवस, फेड हायत, पृ०६८-१०० २ इसपैडिग युनिवस, इंडिगटन, पृ० १५६ निष्कर्ष और सम्भावना | ११ उपर्युक्त विवेचन के जाधार पर मिथय दशन को व्यापकता और गति- शीलता का एक ऐमा रूप प्राप्त होता है जो मिथव या केवल 'पुरातन' या 'प्राचीन' के घर से निकाल कर आधुनिक ज्ञान विज्ञान और एतिहासिक परि- वतन की प्रप्रिया से भी जोडता है । मैंने मिथक या इसी गतिशीलता का रेखा- क्ति करने का प्रयत्न किया है और मेरी यह मा यता ह (वह भी अतिम नहीं) कि मिथर की एक अपनी मार्वभौम सत्ता है जिस किसी भी जाति या देश वी सास्कृतिक प्रक्रिया से अलग नहीं दिया जा सकता है । कही न कही और क्सिी न किसी स्तर पर व्यक्ति और 'जाति' को यह एहमास हाता है कि व्यक्ति और जाति (दश) वी अस्मिता इस मिथिव चेतना से गहरी जुडी हुई है । यह कह्ना भी एक तरह से न्यायसगत हागा नि 'अस्मिता' और 'मियर' का एक ऐसा सबध है जो भापा और अर्थ का है। हम अपनी अस्मिता वो अथवा व्यापक अर्थ म 'अपन' 'हान' के अर्थ को मिथा और प्रतीक के द्वारा ही जानते और अनुभव करते हैं । यह तथ्य हीरो, सृष्टि तथा इतिहास-मिथका के विवेचा के द्वारा स्पष्ट प्रतीत होता है जहाँ 'व्यक्ति और जाति' का हाना और उसको अस्मिता का ब्रमश माक्षात्कार होना एक ऐसा 'बम' है जो सलास चलता आ रहा है और जनता रहेगा। इसी के साथ एक जय महत्वपूर्ण तत्व को आर ध्यान जाता है और वह है मिथक की एक तात्विव विवेचना । यह एक तथ्य है कि मिथ की व्याख्या यनक अर्थ-स्तरा का प्रक्ट करती है जा मिथव यो अनक आयामी बनाती है। ये अर्थ के विभिन्न स्तर मनोवज्ञानिक, सामाजिक, भाषिक और दार्शविक हो सक्न है जो अतत ऐतिहासिक परिवतन मे उद्भूत 'वैवारिकता' को रेखावित करल हैं । यहाँ यह भी ध्यान रखना आवश्यक है मि विवेचन की दृष्टि सदैव आधुनिक होता है और यही कारण है कि मिथव का विवेचन और उनके अर्थ स्तर आधुनिक ज्ञान विज्ञान से उद्भुत दृष्टि या 'एप्राच' 4 परिचायक हैं। मिथकीय व्याख्याना वे अ तगत यह 'दृष्टि काम करती है जिसे मैं। सतुलित म्प से लेने का प्रयत्न किया है । मिथ की इस समग्र या तात्विक दृष्टि म मानमिक एव बौद्धिक प्रनिया का सपना विशेष हाथ है क्योरि 'मनस् के विकास और गति से इन मिथका, प्रतीको और शब्दा का सम्बध है। यही ११८ | मिपा दगा या विकास . पारण : fT मर सारे पिम 'मास'मीप्रप्रियाला पी आर म 'आग्रह' अयश्य है, पर उग 'पूयाग्रा ने प म में म्यांमार ही पसा है। 'आग्रह' भी गत्यात्मा प्रत्ययजा विकार और पारा प्रयाश म पग्वितित व परि- यतित हा गरन हैं । मिय विरान म मैंन आग्रह' पागी प म ग्रहण दिया है जा भगे दृष्टिवियाग' पा र अग है। छग गम्ध म मैं T सय्य पी आर ध्यान आरर्पित परना चाहूंगा रि माथुनिय' मिया गा मग पिता पुछ विवाताण हा मरता है ययानि 'मिपर' शलये प्रयोग गाय जा ' माता' और 'आदिम मनाभाया जाहन या प्रयत्न किया जा', ग धारणा या में म्यीपार नहीं पर राया है। यही पारण है rि आधुनिक मियप गो गृजन प्रक्रिया या मैंन अपा तरीके म विवे वित किया है जा मिया ये व्यापर सर्भया रेगांरित परता है । इस दृष्टि से इतिहाग, जनवादी मिया और विमान ये पुछ मिथा या विवचन यह सिद्ध करता है कि मियय सृजन एक पिरन्तर प्रत्रिया है जा प्रत्येव एतिहासिय परि- वर्तन के साथ 'जम लती है । यह सही है यि आधुHिT मियर पी सजन प्ररिया वा ग्याति पिया गया है, पर ऐसे मिययावी राख्या कम ही है, इसी स विनान और इतिहाग के गिथा, जा मुझे पापी स्पष्ट लगे, उन्ही मा विवचन किया गया है। यह विसन येवल एक 'पूर्वारम्भ' है जो भावी सभाव- नाआ की आर सपेत परता है । यह विसी भी रूप में न जतिम है और न पूण । पर इतना अवश्य है नि विचारणा का यह विवेचन साचन के लिए अवश्य प्ररित करेगा, मेरा क्वल यही मन्तव्य है जहाँ तय आधुनिक मियका का प्रश्न है। इसी के साथ यह भी स्वयसिद्ध है कि मिथक एक नित्य प्रद्रिया है जो आदिकाल से लेकर आज तक घटित हो रही है । इस विकारा-म म आति या प्राचीन का अपना महत्व है क्योरि मानसिक विकारा की दृष्टि से उसे नकारा नहीं जा सकता है। मेरे विवेचन म 'आदिम' और 'आधुनिक को एवमूत्र मे अनुस्यूत करन का प्रयत्न है और इसी से, मिथक मेरे लिए न वायवी है और न अताविक, पर वह सास्कृतिक प्रक्रिया का एक ऐसा अभिन्न अग है जा मानव के मानसिक विकास क्रम को एक विशेष सदर्भ म रेखाक्ति करता है। मानव- शास्त्रिया न मिथर को आदिम माना है और उसे एक प्रकार से बवर (सैवेज) भी कहा है, उसे मैं इमलिये स्वीकार करने में असमर्थ हूँ कि कही न कही अमरिकी, फासीसी और अग्रेजी नृतत्वशास्त्रिया के मन मे यह अन्तर अवश्य कार्य निष्कप और सम्भावना | ११६ करता रहा है कि तथाकथित 'सभ्य' महे जाने वाले हम लोग उनसे अलग भी हैं और अधिक विकमित, और इस प्रकार कॉलिंगवुड ने जो वात 'जादू' या लेकर इन नृतत्वशास्थियो के बारे मे कही थी, वही बात मिथक के बारे म भी सत्य है । इसमा यह कहना है कि यह प्रवृत्ति अपने को ऊँचा तया अपने अह को किसी न किसी रूम म तुष्टि करने का अप्रत्यक्ष रूप है। जादू (यातु, अनु- प्ठान) आदिम होते हुए भी, मानव सभ्यता के अभिन्न अंग हैं जिनका अस्तित्व आज भी वतमान है । फिर दूसरी बात यह है कि जादू का हम 'आमासी' विज्ञान सूडोसाइस) भी कहा हैं जो वैज्ञानिक प्रवृत्ति का आदिरूप भी कहा जाता है। इस सारे विवेचन के प्रकाश मे मिथव को एक अपनी 'सत्ता' हे जा मानव अस्मिता से गहरी जुड़ी हुई है। इसी के साथ मिथर के बारे में यह भी पूर्वाग्रह कि मिथक शब्द का अर्थ सीमित है, वह आदिम है, कम से कम मैं मियक को एक व्यापक सदर्भ में देखता हूँ और साथ ही उनको सूजन प्रक्रिया को ज्ञान और इतिहास को सापे- क्षता में स्वीकार करता हूँ । इस अर्थ में प्रतीक और मिथक का एक गहरा सम्बध है क्योकि सामा यत मिथक का अस्तित्व इन प्रतीका (शब्दा) पर ही आश्रित रहता है । भाषा और मिथन का यह अन्योय सम्बध अनादिकाल से चला आ रहा है । भापा और प्रतीक का एक बहुत बडा क्षेत्र ऐसा है जा सकल्प- नाम और अवधारणामा का जाकार देता है, और मिथकीय सकल्पनाएँ भी भाषिक रूपाकारा के द्वारा व्यक्त होती है। यदि गहराई स देखा जाय तो मियक और भाषा का वही सम्बध है जा ज्ञान और भाषा का ह । मैं इसे व्यापर अथ मे कहूं तो मिथक सरचना भी एक ज्ञानात्मक प्रक्रिया का अग है। उसरा सम्वध भापिक रूपाकारा से इतना निकट का हा जाता ।जो मिथर और भाषा के गत्यात्मक सम्बध को हो रेखावित करता है। व्याकरणिक तत्वा के द्वारा हम मियर के अर्थ सदभ का एक सीमा तक समझ सकते हैं, पर मुझे ऐसा लगता है कि मिथक-दशन के व्यापर स्वरूप को यह पद्धति पूरी तरह से विवे- चित नहीं कर सकती है। यही कारण है कि मिथकीय विवेचन एव समय के लिए एक तात्विक दृष्टि की अपेक्षा किसी न किसी स्तर पर पडती है। इमा दृष्टि के द्वारा मियक के सास्कृतिक परिप्रेक्ष्य का हृदयगम किया जा सकता है। १ बना के सिद्धात, लिंगवुड, पृ० १७-४८ परिशिष्ट नामानुक्रम अय्यर, आन प्णा-६० अरविद-७७, ११२ आइस्टाइन-११४ इलियट, टी० एम०-१०६ इडिंगटन, आर्थर--११६ एपोकारमस-११ कॉलिंगवुड-११६ डेविड-१६, २३ केप्लर-११४ कैशिरर–१३, १६, १७, १८, ४२,७१, ६७ गोल्डन वीजर-३७ थियोगोनस-११ दुीम-३७, ३६ न्यूमॉन (एरिक)-८४, ६१ कारस, यूटन-११४ फेजर प्रेमपति-२ प्लेटो-७८ प्रायड-१६, २५, ३३, ३७, ४२, ८५ -१५, ३३, ३४, ३५, ४२, ६०, जील-१२ ब्राउन-३७ लीवी-१८ वाशा--१० माक्स-१०३, १११ मैक्ममूलर-११, १२, १३, १४, १५, ३३ मैलिनोवस्की-३३, ३६, ४०, ४१, ६०,५ बहल, --- परिशिष्ट / १२१ - मूरे, गिल्बर्ट-३३ यास्क---११ युहीमरस-१६ युग, सी० जे०-१६, २१-२५, २७, ३१, ३२, ४६,६८, ७६, ८०, ८३, ८५,६१ रसेल बर्टेण्ड-१०२, १०७, १९० लीनिस-१०६ लीवी स्टोस----३३, ३६, ४०, ४१, ४२, ४३, ५१,५७, ६६ लैग, एड्रयू-१४ लीकॉम्टे ज्य, नू-११२ सिके, ई० १५ स्विगड, एलन-~१०८ हक्सले, जूलियन-~११२ हाबेल-३७ हायल, फ्रेड-११५, ११६ हीगेल-१११ हीराक्लिटस-११ हेरीसन, जे0-~-३४ होमर-५, ११, १२ शब्दानुक्रम अतर अनुशासनोय-५२, ५३ अभौतिक तत्व (नॉन मैटेरियल)-१ अनीमा~२६, ३०,६१ अवतार-६७,७३,७४, १४, १०४ अग्रिड्रिल-५५ आदिरूप (आरकीटाइप)-२५, ३१, ४६, ६४, ६८, ७१, ७५, ७, ८१,८३,८६,७ आभासी विज्ञान (सूडो साइस)~११६ आदम हौवा (एडम ईव)-८७ इडीपस ग्रन्थि--४०, ४३, ८०,८५,८६ इलीट-१०६,१०७ ईयर--११ १२२ | मिथय दशन पा विकास ईमिस-५६ ईड, इगो, नुपर इगा १६ एफोडाइट--६६ एलिस-६८ एडोनिस-६३ एथीन-१६ ओल्ड टेस्टामेट-२१ ओसटिस, ६८, ६३ क्यारूपफ (एलीगरी)-१०,४७ कम्पनशील विश्व-१२६ कडलिनी योग-६७ गिल्गेमिस-७०,८० गोत्र- गोलक-६३, ६५, ७१,७४, ११३ छाया (शैडो)-२५ जनवादी संस्कृति-१०५, ११० जडात्मवाद (एलीमिज्म)-३३, ३४, ३६ ज्यूडीवाद--१०२, १०३ जीवाश्म-५० टोटम-१६, ३४, ३७, ३६, ५१, ५६-६१ टैबू-१६, ३७, ३६ विमूर्ति-७४, ७५, ७६ दिक्काल-१, ४६,७१,७२, ८२, ११४-११७ दिवास्वप्न-२० द्वीपविश्व-११५ नीहारिका-११३, ११५ पवित्र, कौमाय-७८ प्रभामण्डल (फिक्शन)-४, ५, ५१,६६, १८, १००, १०२, १०५ प्रागताकिक-१२, १५, १८, ३४, ४६,६५, ६७, ११२ फैन्टेसी-२०, २१, २६, १००, परिशिष्ट | १२३ ब्रह्मशास्त्र- मनस्-१६, २०, २२, २५, ११७ महामाता-२३, ३०,६४, ६५, ६५-७०, ७६, ७५, ७६, ८०, ८१, ८३, ८७, महाप्रलय--७० माइक्रोकाज्म (पिण्ड)-११३ मैक्रोकाज्म (ब्रह्माण्ड)-११३ मातृदेवियाँ-२४ यातु-१६, १८, ३१, ३४, ३६, ५१, ६६, ८०,६१, ६२, ११६ रेखीय (लीनियर) ८०, ११४ लीबिडो-२५, ८५ लोगॉस-~७८ मसूचन सिद्धात-४१ सैमेटिक-२० सापेक्षवाद-११४, ११५ होमोसिम्बालिक्स-१, ६२ सन्दर्भ ग्रन्थ १-इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका, भाग १५, स० विलियम बैटन २-एनालिसिस आफ माइड, बट्टैण्ड रसेल ३-एन ऐसे ऑन मैन, अर्नेस्ट कैसिरर ४-ए थापॉलोजी, गोल्डन वोज़र ५--ओरिजिन एण्ड हिस्ट्री आफ का शेसनेस, एरिख यूमान ६-स्टम एण्ड मिथ, एड्रयू लैंग ७-कल्चर एण्ड सोसायटी, विलियम्स ८- कला के सिद्धान्त, आर० जी० कलिंगवुड (अनूदित) ई-करेट एयापालोजी, स० विलियम एल० थामस १०-बलाद लेवी स्त्रास, स० ई० नेल्सन ह्यूस ११-गोल्डन वो, भाग १ और १२, जे० जी० फ्रेजर १२-दि प्रिमिटिव रीडर, स० जॉन ग्रीनवे १३-दि माइड आफ दि प्रिमटिव मैन, फेज बास १४-दि स्टडी आफ मिथ एण्ड टोटमिज्म, एडमेड लीच १५---दि रा ऐण्ड नि कुबड, क्लाद लेवी स्त्रास १६-दि मिथ आफ दि मॉस क्ल्वर, एलन स्विगवुड १२५ | मिथर दशन या विनाम १७-दि यूनिटी एण्ड डावस् टी आफ लाइफ, जै० हरमने १८-नि साइटिपिा एडवेंचर, हर्ट डिलि १६-दि नेचर साफ युनिवर्स, फ्रेड हॉयन २०-~-दि फ्लिाराफी माफ पिजिल साइस, आर्थर इंडिंगटन २१-- लिमिटेशन्म आफ साइस, जे० एन० सूलीवेन २२--गृतत्व और समाज दर्शन, यण्ड २, स० दयाकृष्णा, गोविन्द चद्र पाण्डेय २३-नार्य अमरीक्न माइथोलॉजी, एच० जी० एलेक्जे डर २४-पुरानाज़ इन दि लाइट आफ माडर्न साइस, के. ए. अय्यर २५-प्रागैतिहासिक भारतीय चित्रकला, जगदीश गुप्त २६-प्रिमिटिव कल्चर, टेलर २७-फ्लिासफी इन ए यू को, सूसेन के० लेगर २८-~-फिलासपिकल एसपैक्ट्स आफ माडन साइस, स० सी० ई० एम० जोड २६-भारतीय प्रतीक विद्या, जनार्दन मिश्र ३०-माडर्न साइकोलॉजी, डेविड पास ३१-माइथालॉजी, स० पेयरी मेराडा ३२-मिथव और यथार्थ डी० डी० कौसाम्बी ३३-मिथ आफ दि वय आफ होरा, बाँटा रैक ३४-मिय एण्ड रिभ्यूलिज्म इन एशेट ईजिप्ट, ब्लैकमैन ३५---मैन एण्ड हिज बक्स' जे० हसकोविट्स ३३-लार साहित्य और सस्कृति, दिनेश्वर प्रसाद ३७--लैंगवेज ऐण्ड मिथ, कैशिरर -लैंगवेज एण्ड रियाल्टी, डब्लू० एम० अरवन ३६-विदेशों के महाकाव्य (वृक आफ ईपिक्स) अनुवादक गोपीठष्ण ४०-वैज्ञानिक अतदृ प्टि, वर्देड रसेन (अनु०) ४१-~वीमेन्स मिस्ट्री, एम० हाडिंग ४२- सामाजिक मानव शास्त्र की रूपरेखा, रवीद्नाथ मुर्जी १३-सस्थति और मानव शास्त्र (भाग १) रागेय राघव ४४-साइकोलाजी आफ दि अनवा शेस, सी० जी० युग ४५-साइकोलाजो आफ दि ट्रासफेरन्स, सो० जी० युग

परिशिष्ट | १२५
४६-साइकोलाजी ऐण्ड एलकैमी, सी० जी० यग
४७- साइस ऐण्ड दि माडर्न वर्ल्ड, ए० एन० ह्वाइटहेड
४८-ह्यूमन डेस्टनी, लीकाम्टे इनू
-हिस्ट्री आफ एस्थिटिक्स, वोशों
५०-हिदी साहित्य का आदिकाल, हजारीप्रसाद द्विवेदी
५१-हिरोयिक पोयटरी, सी० एम० पावरा
५२-हिस्ट्री आफ वेस्टर्न फिलासफी, बट्रेंड रसेल
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Mithak Darshan Ka Vikash

Author
Dr. Virendra Singh
Title
Mithak Darshan Ka Vikash
File name
Mithak Darshan Ka Vikash
Text
OCR done
Citation
1965
Published
2011/03
Publisher
Smriti Prakashan Allahabad
Language
Sanskrit
Pages
146
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551573
Barcode
4990010032300.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
UdxIv7jZm9T
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