Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner

Anubhuti Ka Aalok

Sadhvi Ratantray · 2011/01

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अन्तर्जगत को गहराई तक सम्प्रेरित
करने वाला गीतों का अनूठा संग्रह
अनुमति
का
आलोक
'xxxxx
My डॉ. साध्वी रत्नत्रयी
।

पुस्तक
अनुभूति का आलोक (अध्यात्म प्रेरक गीतों का संग्रह)
रचयित्री
डॉ. 'साध्वी रत्नत्रयी'
प्रकाशक
श्री श्वे. स्था. जैन स्वाध्यायी संघ,
गुलाबपुरा (भीलवाड़ा) - 311 021
फोन : 23592
..
मुद्रक :
सूर्य ऑफसेट प्रिन्ट्स
विजयनगर फोन : 30513
मूल्य :
15 रुपये मात्र
प्रथम संस्करण :
महावीर जयन्ती पर्व सं. 2055
द्रव्य सहायक:
श्रीमान् नेमीचन्दजी सा. कोठारी
श्रीमान् अशोककुमारजी कोठारी
जालिया (द्वि.), जिला - अजमेर

.
अनुभूति का आलोक।
स्वाध्याय-शिरोमणि, आशुकवि,
मरुधर छवि, मधुरवक्ता
आचार्य प्रवर श्रद्धेय गुरुवर्य
श्री सोहनलालजी म.सा.
की सेवा में सभक्ति
समर्पण
:
Home
कृपा हुई गुरुदेव की,
हुआ सत्य का बोध ।
जिनवाणी अंतर जगी,
मन में बढ़ा प्रमोद ॥
ज्ञान और दर्शन समझ,
पाया जब चारित्र।
समभावी मन हो गया,
जीव हुए सब मित्र॥
'रत्नत्रयी' अनुभूति को
जब ली हृदय जगाय।
जो फैला आलोक है,
अर्पित चरणों मांय॥
ky डॉ. साध्वी रत्नत्रयी

अनुभूति का आलोक स्वकीय कविता भावों की उर्मियां है, अन्तर में उठने वाली जीवन की तरंग है एवं कल्पनाओं की मधुर मुस्कान है। बचपन से ही गुनगुनाने की रुचि होने के कारण संगीत के प्रति लगाव हमेशा से रहा है। संगीत की रुचि विरासत से मिली है यह बात भी अगर कहें तो अत्युक्ति नहीं होगी। जब अतीत की ओर दृष्टि जाती है तो पुरानी स्मृतियाँ आज भी तरोताजा हो उठती है। पूज्य पिताश्री की मधुर स्वरलहरी आज भी कानों में गूंजती रहती है । बचपन में रातभर की गहरी निद्रा से जागकर आँखे खुलती तो कानों में पिताश्री की सवेरे-सवेरे प्रार्थना की स्वर लहरी सुनाई पड़ती। वे अच्छे गायक एवं संगीत रचनाकार भी रहे हैं। बचपन में उनके द्वारा सुनाये हुए गीत आज भी रूचि से गाते हैं, सुनाते हैं। संयममय साध्वी जीवन में आने के पश्चात् देवगुरु एवं धर्म के स्तवनों को नियमित रुप से गाने एवं सभा के मध्य सुनाने का उत्साह बढ़ता गया। विभिन्न राग-रागनियाँ सुनकर लोक प्रचलित रागों पर स्वयं भी लिखने का प्रयास किया। परम श्रद्धेय आचार्य प्रवर गुरुदेव श्री सोहनलालजी म.सा. एवं स्व. श्रद्धेय श्री वल्लभमुनिजी म.सा. स्वयं अच्छे रचनाकार रहे हैं। आचार्य श्री तो आशुकवियों की श्रेणी में आते हैं। वैठे-बैठे ही किसी भी विषय पर रचना करते देखकर मन में बड़ा आश्चर्य होता। आपकी प्रेरणा के कारण ही प्रत्येक छोटी बड़ी सभा में धार्मिक स्तवन सुनाने का निरतंर अनुकूल अवसर प्राप्त होता रहा । गुरुदेव का विशाल रचना संसार देखकर हमारे मन में भी कुछ लिखने की I न कुछ नया .xxx.x.XX.K.XX.x.x.x.x.xx xxxuxxxxxxxxx प्रस्तुत है। umaanmaanammamtaman" अनुभूति का आलोक इच्छा बलवती होती गई। अब तक कई गीत लिखे। कितने लिखे, कितने स्मृति में रहे, कितने अपनी डायरी में सुरक्षित रह सके उनकी गिनती नहीं है। जो सुरक्षित संजोये हुए मिल गये वे ही सहृदय श्रोताओं की मांग पर पुस्तकाकार रुप में साहित्य और संगीत की महत्ता हर युग में रही है। साहित्य का विकास ही पद्य से हुआ है। काव्य को स्मरण रखना सहज होने के कारण वेद, आगम, रामायण सभी श्लोकबद्ध रहे। और विरासत में आने वाली पीढ़ी उसे गा-गाकर अगली पीढ़ी को सौंपती रही है। भर्तृहरि ने कहा है - साहित्य संगीत कला विहीनः साक्षात् पशुः पुच्छ विषाणहीन । श्रीकृष्ण ने अपना निवास भक्ति से ओतप्रोत मधुर स्वर लहरी में बताया। सूर, मीरां, तुलसी या केशव सभी ने अपने आराध्य देवों की आराधना सुमधुर गीतों से की है। संगीत की महत्ता हर युग में रही है और भविष्य में भी रहेगी। आज का युग गद्य का युग कहलाता है । पद्य का विकास तो हर युग में रहा मगर गद्य का विकास तो इसी युग की देन है। यद्यपि गद्य अपनी विविध विधाओं में रश्मियाँ बिखेर रहा है फिर भी संगीत की मधुर तान सुनकरके किसके पांव नहीं ठिठक जाते। महान् संगीतकार तानसेन को अकबर के दरबार में नवरत्नों में स्थान प्राप्त था। तानसेन ने गुरु हरिदास की कृपा से जो संगीत की शिक्षा पाई उसके प्रभाव का ही परिणाम था कि जब वे तन्मय होकर राग अलापते तो श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते । उनकी दीपक राग से दीप जल उठते, हिंडोला राग से झूले स्वयं हिलने लगते, मेघ राग से नभ में बादल छा जाते, मालकोश से पत्थर भी पिघल जाते थे। संगीत की शक्ति कठोर से कठोर हृदय को भी कोमल बनाने में सक्षम है। II युग अनुभूति का आलोक वर्तमान में आम आदमी की जिंदगी तनाव से भरी हुई है। संगीत में वह क्षमता है कि तनाव से मुक्ति प्रदान कर देता है। व्याख्यान को रोचक बनाने के लिए मधुर स्वरयुक्त यदि एक भी संगीत का गुंजन हो जाये तो वह आनंददायक बन जाता है। प्रस्तुत कृति में इस बात का विशेष ध्यान रखा है कि वर्तमान में कौनसी राग-रागनियाँ लोक प्रचलित है । चलचित्रों के भावपूर्ण सरस गीत लोगों की जुबान पर जल्दी चढ़ जाते है । बालय , युवा उन गीतों को गुनगुनाते रहते है। यह विचार करके पुराने लोक प्रसिद्ध राजस्थानी एवं हिन्दी गीतों की धुन पर ही ये गीत तैयार किये। अनेकों बार इन्हें गाया, परिमार्जित किया जब मन को पूर्ण रुप से सन्तुष्टि हो गई तब यह मधुर स्वर लहरी अंतर का आलोक बनकर सामने आई है। नवकार महिमा, जिन धर्म महत्ता, जिनवर स्तुति, गुरु आराधना के साथ-साथ विभिन्न विषयों, पर्यो, जयन्तियों के उपलक्ष में लिखे गीतों का यह संकलन तीन खण्डों में विभाजित है जिन्हें देव, गुरु एवं दिव्य साधना का नाम दिया गया है। अपने द्वारा रचित गीतों के प्रकाशन का यह प्रथम प्रयास है। इसमें जो कुछ उत्तम है वह सुधि श्रोताओं एवं पाठकों का है। यदि कुछ कमी है तो वह हमारी है। यह कमी भविष्य की कृतियों में न रहे इसका पूरा प्रयास रहेगा। परम श्रद्धेय आचार्य प्रवर गुरुदेव श्री की हम पर असीम कृपा रही है आचार्य श्री के मंगलमय आशीर्वाद का ही यह सुफल है। इस कृति को पूर्ण बनाने में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रुप से जिन्होंने भी सहयोग प्रदान किया उन्हें अंतर से साधुवाद । दशहरा पर्व, 1997 जालिया (द्वि.) डॉ. साध्वी रत्नत्रयी अनुभूति का आलोक प्रकाशकीय संगीत मानवीय भावों की रागात्मक अभिव्यक्ति है। वह इतना सहज-सरल होता है कि हर स्तर का व्यक्ति उसे अपना सकता है। बालक हो, वृद्ध हो, पंडित हो या मूर्ख, धनी हो या निर्धन, शिक्षक, शिक्षार्थी, व्यवसायी जो भी, जब भी संगीत की स्वर लहरी का पान-गान करता है तो उसकी चित्तवृत्तियां चंचलता रहित होकर उसे अन्तर्लीन बना देती है। संगीत में वह शक्ति है कि वर्तमान भौतिकवादी वातावरण से त्रस्त, उद्विग्न एवं अशान्त बने मानव-मन को समरसता में स्थापित कर देता है। इसीलिए कहा है In Sweet music is such art. Killing care and grief of heart, fall asleep or hearing die. अर्थात संसार की समस्त आधि-व्याधि से मुक्ति दिलाने वाला है संगीत। यह संगीत यदि अध्यात्म जगत से संबंध रखकर नैतिक- संस्कारों का पल्लवन एवं विकास करने वाला हो तब तो सोने में सुगंध ही समझिए। भावों का परिष्कार एवं मानव-मन का संमार्जन होते देर नहीं लगती। इससे व्यवहार में भी मधुरता घुमने लगती है। वर्तमान में, सिने-साहित्य ने जहाँ एक ओर संगीत को लोकप्रियता के उच्च-शिखर पर पहुंचाया है तो वहीं दूसरी ओर उसका आन्तरिक रस सोखकर उसे खोखला भी कर दिया है। IV

अनुभूति का आलोक
इसलिए आज के संगीतकारों ने सिने-जगत की लोकप्रिय धुनों
को अपना कर, गीतों के माध्यम से मानवीय सभ्यता एवं संस्कृति
के रक्षण व संवर्द्धन का भागीरथ प्रयास किया है, वहीं बाल एवं
युवा जगत की दृष्टि-दिशा में भी स्वस्थ परिवर्तन किया है।
श्रद्धेया महासतीजी श्री डॉ. साध्वी रत्नत्रयी ने भी भावों की
उन्मुक्त उड़ान भरकर देव-गुरु-धर्म के प्रति श्रद्धा के सुदृढ़ीकरण
का प्रयास इन गीतों के माध्यम से किया है, जिनका प्रकाशन
कर हमें अतीव हर्ष है। आपके गीतों में गेयता के साथ-साथ
संक्षिप्तता एवं लाक्षणिकता भी है इसलिए मानव मन को अपूर्व
तरीके से प्रभावित करते है।
प्रस्तुत कृति के प्रकाशन को संभव बनाया है श्रीमान्
नेमीचन्दजी सा. कोठारी एवं उनके आत्मज श्रीयुत् अशोककुमारजी
कोठारी जालिया (द्वि.) निवासी ने। आप स्वयं अच्छे विचारक एवं
धर्मनिष्ठ सुश्रावक है। श्रद्धेया महासतीजी के सं. 2054 के जालिया
वर्षावास में सेवा-भक्ति का कीर्तिमान स्थापित करते हुए इस
संकलन के प्रकाशन का भार आपने वहन किया इसके लिए हम
आपके आभारी हैं।
आपके उज्ज्वल भविष्य की मंगल-कामना
..........
गुलाबपुरा
महावीर जयन्ती
नेमीचन्द खाबिया
मंत्री
श्री श्वे.स्था.जैन स्वाध्यायी संघ,
गुलाबपुरा
सं.
2055
V

ग
XU
ज
XXXXXXXXXXXXXI
आहसा
परस्परोपग्रहो जीवानाम
XXXXXXX
धर्मप्रेमी, सुश्रावक
श्रीमान सोदानसिंहजी कोठारी
जालिया II (अजमेर)
श्रीमती भंवरीबाई
धर्मपत्नी - श्री सोदानसिंहजी कोठारी

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अनुभूति का आलोक धर्मनिष्ठ सुश्रावक श्रीमान् सोदानसिंहजी कोठारी एक परिचय -- जालिया (द्वि.) निवासी श्रीमान् सोदानसिंहजी सा. कोठारी की गणना उन विरले धर्मप्रेमी श्रावकों में की जाती है जो अपनी लक्ष्मी का सद्व्यय धार्मिक कार्यों में करके, सत्साहित्य प्रकाशन के माध्यम से बालकों, युवाओं व प्रौढ़ों में, धार्मिक-आस्थामय संस्कार सुदृढ़ करने के प्रयास में संलग्न हैं। आपका जन्म कार्तिक सुदी 1 वि.सं. 1984 को धर्मनिष्ठ सुश्रावक श्रीमान् धनराजजी कोठारी के परिवार में हुआ। आध्यात्मिक रूचि से ओतप्रोत परिवार में जन्म लेने के कारण आपको धार्मिक संस्कार जन्म से ही मिले थे। परमश्रद्धास्पद गुरुवर्य, आचार्य प्रवर श्री सोहनलालजी म.सा. का शुभाशीर्वाद एवं प्रेरणा पाकर वे संस्कार और भी विकसित हुए एवं श्री स्वाध्यायी संघ, गुलाबपुरा के आजीवन कर्मठ स्वाध्यायी सदस्य बनकर सेवाएं देना प्रारम्भ किया। पच्चीस वर्षों से भी अधिक समय से आप इस क्षेत्र में सेवारत हैं। आप कुशल गायक हैं एवं अपनी काव्यात्मक रचनाओं से पाठकों-श्रोताओं को लाभान्वित करते रहते हैं। आप प्रतिदिन चार-पाँच सामायिकें करते हैं तथा प्रति माह चार आयंबिल करने का व प्रतिदिन अचित्त जल का उपयोग करने के नियम का नियमित रुप से पालन कर रहे हैं । लगभग 30 वर्षों से चौविहार का पालन कर रहे हैं । - VI KAL अनुभूति का आलोक आपका संम्पूर्ण परिवार धर्मनिष्ट एवं परम गुरुभक्त है। ज्येष्ठ पुत्र श्री नेमीचंदजी कोठारी एवं पौत्र श्री अशोककुमारजी क्रमश : ब्यावर व दिल्ली में व्यवसायरत हैं। द्वितीय पुत्र श्री विमलकुमारजी अजमेर में बैंक - ऑफिसर के पद पर सेवाएं दे रहे हैं। श्री समुद्रसिंहजी कोठारी जालिया में ही निजी व्यवसाय में संलग्न हैं तो चतुर्थ पुत्र श्री केसरमलजी कोठारी इंजीनियर बनकर अरब राष्ट्र में कार्यरत हैं वहीं कनिष्ठ पुत्र डॉ. श्री इन्दरसिंहजी दिल्ली में चिकित्सा व्यवसाय में अपना योगदान दे रहे हैं। आपके तीन पुत्रियां श्रीमती समताबाईजी (धर्मपत्नी- श्रीमान् भँवरलालजी सा. सुराणा, अजमेर), श्रीमती कंचनबाईजी लोढ़ा (धर्मपत्नी-श्रीमान् हिम्मतमलजी लोढ़ा, केकड़ी) एवं श्रीमती शकुन्तलादेवीजी डोशी (धर्मपत्नी-श्रीमान् ज्ञानचन्दजी डोशी, ब्यावर) भी धर्मानुरागिणी महिलाएँ हैं तथा जिन शासन के प्रति समर्पित भाव से सेवारत है। अपने पुत्र श्रीमान् नेमीचन्दजी सा. कोठारी एवं पौत्र श्रीमान् अशोककुमारजी कोठारी को आपने श्रद्धेया महासतीजी के जालिया (द्वि.) के चातुर्मास की स्मृत्यर्थ प्रेरणा प्रदानकर इस प्रकाशन को संभव बनाया, इसके लिए अनेकशः हार्दिक धन्यवाद। XOXOXOXOR VII अनुभूति का आलोक ET पनाम : परिचय स्वाध्याय-शिरोमणि, आशुकवि, मरुधर छवि, मधुर वक्ता आचार्य प्रवर गुरुदेव श्री 1008 श्री सोहनलालजी म.सा. की आज्ञानुवर्तिनी डॉ. साध्वी रत्नत्रयी का संक्षिप्त परिचय डॉ. साध्वी रत्नत्रयी तीन तन, एक मन डॉ.साध्वी श्री ज्ञानलताजी म.सा. - 'प्राज्ञचन्दना' डॉ. साध्वी श्री दर्शनलताजी म.सा. - 'प्राज्ञनन्दना' डॉ.साध्वी श्री चारित्रलताजी म.सा. - 'प्राज्ञवन्दना' जन्म : यथानाम तथा गुण साध्वी रत्नत्रयी का जन्म अजमेर जिलान्तर्गत शिखराणि ग्राम में हुआ। पिताश्री दुलीचन्दजी बाफणा एवं माता श्रीमती प्रेमलताजी बाफणा के विशाल व्यक्तित्व में समाहित गुणरत्नों की छवि ने साध्वी रत्नत्रयी के जीवन को विशेष रुप से प्रभावित किया। उनसे प्राप्त संस्कारों से ही त्याग एवं वैराग्य के अंकुर प्रस्फुटित हुए। दीक्ष-17 : आत्म-कल्याण की भावना से प्रेरित एवं उत्कट वैराग्य-रस-रंजित महासतीजी डॉ. श्री ज्ञानलताजी म.सा. की दीक्षा 29 सितम्बर, 1976 को ब्यावर शहर में सम्पन्न हुई। डॉ. श्री दर्शनलताजी म.सा. ने 26 नवम्बर 1976 को तथा डॉ. श्री चारित्रलताजी म.सा. ने 9 मई 1981 को अपने जन्म स्थान शिखराणी में ही आर्हती दीक्षा स्वीकार की। ज्योतिषाचार्य, आगमज्ञाता पूज्य गुरुदेव श्री कुन्दनमलजी म.सा. आपके संयम प्रदाता गुरु रहे हैं। अद्यावधि पर्यन्त आप जिनशासन की प्रभावना VIII अनुभूति का आलोक हेतु एक जाज्वल्यमान रत्न की आभाकिरणों के सदृश समर्पण की भावना के साथ ज्ञान-प्रकाश को विकीर्ण कर रही है। धार्मिक एवं व्यावहारिक दीक्षा : धार्मिक एवं व्यावहारिक अध्ययन में आपको प्रवचन प्रभाकर स्व. श्री वल्लभमुनिजी म.सा. 'प्राज्ञकिंकर' का मार्गदर्शन एवं महत्वपूर्ण योगदान सुलभ हुआ। साधुजीवन की समस्त चेतनाएं आपके व्यक्तित्व एवं कृतित्व में साकार हो उठी है। तीनों ने ही संस्कृत साहित्य में एम.ए., जैन दर्शन में सिद्धान्त रत्नाकर एवं सिद्धान्त शास्त्री परीक्षाओं में सर्वोत्तम श्रेणी प्राप्त की है। श्रद्धेय दर्शनलताजी म.सा. ने बी.ए. की परीक्षा में राजस्थान विश्वविद्यालय से स्वर्णपदक प्राप्तकर एक कीर्तिमान स्थापित किया है। तीनों ने ही जैनागम, भारतीय दर्शन एवं हिन्दी साहित्य का गंभीर अध्ययन किया है। श्रद्धेय ज्ञानलताजी म.सा. के शोध का विषय 'महाप्राज्ञ श्री पन्नालालजी म.सा. का व्यक्तित्व एवं कृतित्व' है जो गुरु आराधना एवं ज्ञानोपलब्धि दोनों ही दृष्टियों से एक सफल प्रयास है। श्रद्धेय दर्शनलताजी म.सा. का शोधग्रंथ 'ज्ञानार्णव- एक समीक्षात्मक अध्ययन' के रुप में महत्वपूर्ण उपलब्धि है। श्रद्धेय चारित्रलताजी म.सा. के शोध का विषय 'जैन आगमों में श्रमण' रहा है। उक्त शोधग्रंथों के माध्यम से राजस्थान विश्वविद्यालय द्वारा आपको पी.एच.डी. की उपाधि से विभूषित किया गया है। आपके शोधकार्यों में मौलिकता तथा ऐतिहासिक एवं तुलनात्मक दृष्टि स्पष्ट रुप से झलकती है। साहित्य सर्जन : साहित्य सर्जन के अन्तर्गत 'बोध- IXIXXX.XXXXX.

अनुभूति का आलोक संबोध' (मुक्तक), 'महाप्राज्ञ की जीवनयात्रा' (जीवन चरित्र), 'रत्नत्रयी के गीत' (गुरुकृपा में), 'पर्वत की पगडंडी पर' (चरित काव्य), 'तीन स्रोत्र' (स्रोत्र काव्य), 'त्रिवेणी की पावन धारा' (प्रवचन संग्रह) आदि कृतियाँ महत्वपूर्ण रही है । 'अनुभूति का आलोक' (गीत-संग्रह) विज्ञ पाठकों को समर्पित है। उक्त सभी कृतियां साध्वी रत्नत्रयी के सम्मिलित प्रयास का परिणाम है। प्रवचन शैली : साध्वी रत्नत्रयी के प्रवचनों में निरन्तर प्रवाह, वाणी में मधुरता, तारतम्यता, सरसता एवं ज्ञान की पूर्णता है, जो श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देती है। गूढतत्वों का सरल शैली में विश्लेषण करने में आप सिद्धहस्त है। आपके चिन्तन में व्यावहारिकता एवं सैद्धान्तिकता का अपूर्व समन्वय है। प्रवचनों में, आप द्वारा उच्चारित गीतों की कड़ियां हृतंत्री को झंकृत कर देती है। सर्वत्र आपने चारित्र धर्म के पालन पर सर्वाधिक बल दिया है। अंतरंग : साध्वी रत्नत्रयी के विशाल व्यक्तित्व में सरलता, सहजता, उदारता तथा आत्मीयता का अपना एक विशिष्ट स्थान है। गुरुभक्ति में समर्पित जीवन, अध्ययन में निरन्तरता तथा आत्म-साधना के मार्ग में गतिशीलता आपके व्यक्तित्व के अभिन्न अंग है जो अनुकरणीय एवं वंदनीय हैं। नई पीढ़ी को दिशा बोध देने में आपश्री के प्रयत्न सदा ही प्रेरणादायी रहे हैं। महिला जागृति : आपकी सत्प्रेरणा से महिला-जागृति के अन्तर्गत राजस्थान एवं तामिलनाडु में लगभग 31 स्थानों पर जैन स्वाध्यायी महिला-मंडल संचालित किए जा रहे x .....X.XXXX. .XX.RAM.X..

अनुभूति का आलोक
जिनके माध्यम से सैंकड़ों महिलाएं ज्ञान के क्षेत्र में आगे बढ़
रही है। कई महिलाएं, आपसे प्रेरणा पाकर पर्युषण पर्व के
अवसर पर व्याख्यान देने के लिए सुदूरवर्ती क्षेत्रों तक भी जाने
लगी हैं।
विचरण क्षेत्र : राजस्थान के अजमेर, भीलवाड़ा, चित्तौड़,
नागौर, पाली, जोधपुर आदि क्षेत्रों के साथ-साथ मध्यप्रदेश भी
आपका विहार क्षेत्र रहा है। जहां-जहां भी आप पधारते है,
सर्वत्र एक अनूठी जागृति की लहर व्याप्त हो जाती है।
जप, तप, त्याग, तपस्या एवं संयम-साधना के मार्ग पर अनवरत
गतिशील साध्वी रत्नत्रयी के द्वारा जिन शासन की महती
प्रभावना हो - इसके लिए हार्दिक मंगलकामना ।
। भवरलाल श्रीश्रीमाल
XI
X.XX.X.XXXX.XXXXX.

अनुभूति का आलोक अनुक्रमणिका देव साधना 1 3 4 5 6 7 8 9 11 12 13 12. वीर 14 15 1. महामंत्र महिमा 2. नवकार जपले1 3. श्रद्धा से भज नवकार को. 4. जिनवर स्तुति . 5. तीर्थंकर चौबीसी 6. श्री पारस प्रभु .. 7. हे प्रभो पार्श्व स्वामी 8. वीर शरण में है जाना. 9. महावीर महिमा 10. महावीर प्रभु 11. प्रभु तेरी महिमा प्रभु आये 13. वीर जयन्ती 14. वन्दना है.... 15. वीतराग नमो 16. जिनवर का ध्यान 17. मन मेरे 18. प्रभु जयन्ती 19. प्रभुजी री कृपा गुरु आराधना 20. गुरु पन्ना जयन्ती 21. गुरु जयन्ती 22. प्यारे पन्ना 23. गुरु गुण गाओ 24. कीतलसर की ज्योति 25. अवसर सुहाना XII 16 17 18 19 20 21 22 .23 24 25 26 27 हमारे.. 29. xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx अनुभूति का आलोक 26. पलकां बिछावां 28 27. आचार्य श्री की महिमा ....29 28. श्री सोहन गुरु ...30 प्यारे गुरु सोहन ... 31 30. वन्दन नमन 32 31. गुरुदेवाष्टक ....33 32. गुरु गुण गान ....34 33. खुशियां अपार है 35 34. प्रिय गुरु नौका 36 35. गुरु जय कारे 37 36. जय सोहन गुरुवर ... 38 37. शत शत नमन 39 38. वन्दन करलो रे 40 39. गुरु कृपा 41 40. गुरुदेव से विनती.. 42 41. श्री वल्लभ गुरुवर 43 42. श्री वल्लभ गुरु की यादें.. 44 43. गुरुणी महिमा 45 44. कहते है गुरुवर. 46 45. आनन्द का साज है। 47 46. गुरु स्वागत ज्ञान 49 47. गुरुवर नमन 50 48. गुरुदेव के चरण में ......51 49. गुरु आशीष पायें... 52 50. भक्त मन ..... 53 51. गुरु ज्ञानामृत 54 52.. म्हारा मनड़ा. 55 हो. गुरुवर 56 54. मन मन्दिर.... 57 XxxXIIIxxx. X.x.xx 53. प्यारे AAXXXX.X अनुभूति का आलोक ....58 59 60 ...61 ...62 63 ....64 65 66 ... 67 68 66. 69 55. जीवन पहेली 56. गुरु शुभागमन 57. स्वागत गीत 58. जीवन धन्य हो जाये 59. गुरु के दर्शन 60. अनमोल रतन दिव्य भावना 61. मन दीपक जला ....... 62. प्रभु गुण गाना 63. पंछी उड़ जायेंगे..... 64. चन्दना के आँसू..... 65. उद्बोधन शिव सुख पाना है 67. जीवन जाता है 68. माया ठगनि..... 69. वीर वाणी 70. जाग जाग इंसान 71. अरे नादान 72. होली पर्व मनायें 73. ज्ञान शिविर 74. महिला जागरण 75. जीवन बीत रहा. 76. जिनवाणी पाई... 77. नश्वर तेरा चोला 78. कैसा यह संसार है 79. राजुल की भावना 80. राजुल री पुकार 81. राजुल कहे 82. धर्म सन्देश 70 ....... 71 ....... 72 73 ........ 74 75 76 77 78 79 81 ...82 83 84 85 86 XIV .

... xxxx Ixxxxxxxxxxxxxxxx अनुभूति का आलोक 83. पर्युषण पर्व सन्देश 87 84. नया वर्ष. 88 85. शुभ पर्व पर्युषण 89 86. जिनवाणी कहती 90 87. मानव भव .....91 88. संयम राही से 92 89. वीतराग बन जाऊं 93 90. मैं दीक्षा लूंगा 94 91. वीर वाणी 95 92. पर्व साधना ...96 93. नश्वर काया 97 94. आतम की मजबूरी 98 95. भक्ति गान ....99 96. नारी जागरण 100 97. संभल अब जाओ 101 98. जगो बन्धुवर 102 99. मानव भव पाया है 103 100. चन्दन बाला...... 104 101. जीवन है अनमोल 105 102. कुलक्षणी नार 106 103. क्रोध मत करज्यो रे 108 104. क्रोध बड़ी बीमारी 109 105. धनवानों से 110 106. बेटी का जन्म..... 111 107. संभल जा अब तो 112 108. मन का दीपक... 113 109. जैनी कहलाएं 114 110. अब भी संभल जा. 115 111. सुख पाओगे 116 *** XV -- देव साधना h xxxxx x अनुभूति का आलोक 1. महामंत्र महिमा (तर्ज - जहां डाल डाल पर .............) महामंत्र नवकार अनोखा, जग में मंत्र निराला। सुख-शान्ति दिलाने वाला जन्म-मरण से मुक्ति दिलाये, अद्भुत अमृत प्याला। सुख-शान्ति दिलाने वाला ॥ घाति कर्म को दूर किया है वे अरिहन्त कहाये । प्राणी मात्र को दे उद्बोधन जीवन सफल बनाये । सेठ सुदर्शन रहा सुमिरता शूली संकट टाला । सुख-शान्ति दिलाने वाला ॥ महामंत्र सिद्ध प्रभु जो कर्म मैल हर आत्म ज्योति प्रकटाए। अविचल अजर अमर अविनाशी को हम हर पल ध्याए । सोमा के गल पुष्प हार बन गया नाग वह काला । सुख-शान्ति दिलाने वाला ॥ महामंत्र पंचाचारी संघ के नायक आचार्य देव मन मोहे । अष्ट सम्पदाओं के स्वामी शशि सम संघ में सोहे। सीता ने जब जाप किया तो शीतल हो गई ज्वाला। सुख-शान्ति दिलाने वाला ॥ महामंत्र नमन हमारा उपाध्याय को होते आगम ज्ञानी। श्रद्धा युत हो पढ़े पढ़ावे होते निर्मल ध्यानी । 1 ... wwwwwwwwwwwwwwwwww ... Mausamww XXXXXXXXXXXX

tana..
अनुभूति का आलोक
सती अंजना के जीवन में खुशियां भरने वाला।
सुख-शान्ति दिलाने वाला । महामंत्र
पंच महाव्रत धारी साधक होते विषय विजेता।
सत्ताईस गुणों के धारक साधु निर्मल चेता।
'रत्नत्रयी' बनकर आराधक जपती इसकी माला।
सुख-शान्ति दिलाने वाला ॥ महामंत्र
***
):)
आहिस्त
suuuN
परस्परोपग्रही जीवानाम
2

अनुभूति का आलोक
2. नवकार जपले
(तर्ज - क्या खूब
नवकार जो जपले, वे शिव सुख पाता है,
नित ही जपो, जपते रहो, पुण्य बढ़ता है।
कर्मों का हर बन्धन टूटे, पाप घटता है॥
नवकार जो जपले
अक्षर अक्षर में जादू, है जादू ।
गर चाहो तो तुमको राज बता दूं।
परमेष्ठि मंत्र है प्यारा, है प्यारा।
देवों ने भी इसको मन से धारा।
भक्ति से जीवन में जो जाप जपता है।
कर्मों का हर
गुरुवर का यही है कहना, है कहना।
संसार आग का दरिया, बचकर रहना।
महामंत्र जपे जो जग में, हां जग में ।
सुमन खिलायेगा वह जीवन के मग में।
श्रद्धा से मुक्ति का द्वार खुलता
कर्मों का हर
महिमा को सुदर्शन जाना, हां जाना।
क्या शक्ति है दुनियां ने पहचाना ।
बन गई शूली सिंहासन, सिंहासन ।
करलो इसका ध्यान लगा पद्मासन ।
'रत्नत्रयी' भजने से भय दूर भगता है।
कर्मों का हर
है।
***
3
R.XXXXXXXX

अनुभूति का आलोक .) 3. श्रद्धा से भज नवकार को (तर्ज - साजन मेरा मानव भव यहाँ पाया है। प्रभु को तू ने क्यों भुलाया है। तज दे सभी अब विकार को। श्रद्धा से भजले नवकार को। देख किसे इतराया है। प्रभु को ॥ .. प्रभु को प्रभु को चौदह पूर्व का यह सार है। जपले उसी का बेड़ा पार है। किसका नशा तुझे छाया है। ॥ अक्षर पैंतीस पद पांच है। इसमें समाया सब सांच है। ना ध्यान हृदय में लाया है। ॥ शाम सुबह जाप करता जा । खुशियों से झोली भरता जा। जिनवर ने जग को जगाया है। 11 मंत्र परमेष्ठी बड़ा प्यारा है। जपे उसी को इसने तारा है। अवसर बड़ा ही शुभ आया है। ॥ 'रत्नत्रयी' करके वन्दना। तिर गई जगत से चन्दना । कर्मों का मैल क्यों बढ़ाया है। ॥ **. 4 प्रभु को प्रभु को प्रभु को

अनुभूति का आलोक
4. जिनवर स्तुति
(तर्ज - जय बोलो महावीर ..........)
वन्दन हो चौबीस जिनवर को।
उपकारी प्रभु तीर्थंकर को ॥
श्री आदिनाथ और अजित प्रभु।
संभव, अभिनन्दन, सुमति विभु।
श्री पद्म, सुपारस, हितकर को,
वन्दन हो चौबीस जिनवर को॥
प्रभु चन्दा, सुविधि, शीतल स्वामी।
श्रेयांस, वासु है विमल नामी।
श्री अनन्त, धर्म, शान्तिधर को,
वन्दन हो चौबीस जिनवर को॥
कुन्थु, अर, मल्ली गुण गाओ।
मुनि सुव्रत, नमि, नेमि ध्याओ।
पारस, महावीर, सुधाकर को,
वन्दन हो चौबीस जिनवर को॥
.'रत्नत्रयी' वे मार्ग दिखाते हैं।
जो नाम जपे सुख पाते हैं ।
उन ज्ञान-गुणी रत्नाकर को,
वन्दन हो चौबीस जिनवर को ॥
प्रभु अन्तर अरि निवारक हैं।
वे जन-मन के उद्धारक हैं।
अज्ञान तिमिर हर दिनकर को,
वन्दन हो चौबीस जिनवर को ।
***
5

अनुभूति का आलोक
5. तीर्थंकर चौबीसी
(तर्ज - जरा सामने तो ..........
.)
चौबीसी प्रभु की जपिये, नाम जपने से बेड़ा पार है।
हम ध्यान धरें जिनराज का, महिमा उनकी तो अपरंपार है।
ऋषभ, अजित, संभव अभिनन्दन,
सुमति, पद्म प्रभु हैं प्यारे ।
सुपारस अरु चन्द्र जिनेश्वर,
भवि जीवों को है तारे ।
श्री सुविधि, शीतल श्रेयकार है, श्रेयांस, वासु की जयकार है।
हम ध्यान धरें जिनराज का
विमल, अनंत, धर्म व शांति,
कुं थु, अर का जाप करें।
मल्ली, मुनि सुव्रत, नमि, नेमि,
नाम सभी ये ताप हरे ।
पारस प्रभु का अति उपकार है, वीर महिमा को जाने संसार है
हम ध्यान धरें जिनराज का
॥
आप तिरे जगति को तारे,
जिन वाणी बरसा करके।
आचार्य सोहन की जय-जय बोले
जग जीवन हरसा करके।
'रत्नत्रयी' के गुरु आधार हैं, जिन शासन के ये श्रृंगार है।
हम ध्यान धरें जिनराज का
॥
***
6

अनुभूति का आलोक
6. श्री पारस प्रभु
mammiaminine
।
.....
(तर्ज - हम तुम्हें चाहते ......
प्रभु पारस
के
गुण हम
गायें।
जिनवर चरणों में हम,
श्रद्धा-भक्ति के सुमन चढ़ायें ॥
वामा देवी के सुत तुम प्यारे
पावन वाराणसी,
अश्वसेन के घर तुम पधारे । प्रभु
अवधि ज्ञान से नाग बचाया।
दिव्य देखी प्रभा,
दुष्ट कमठ वहां चकराया। प्रभु ...॥
जग तज कर संयम स्वीकारा
धर्म राह दिखा,
भवियों को जगत से उबारा। प्रभु ... ||
जो चरण शरण में आया,
सुख उसको मिला,
दुःख जीवन का पल में नसाया। प्रभु ... ||
अब हम भी शरण में आए
'साध्वी रत्नत्रयी',
भेंट भावों की मन से चढ़ायें। प्रभु
.......॥
***
7

अनुभूति का आलोक 7. हे प्रभो पार्श्व स्वामी .) - (तर्ज - तुम अगर साथ हे प्रभो ! पार्श्व स्वामी दया कीजिए, हम सदा तेरा ही ध्यान. ध्याते रहे। तेरे द्वारे पै आने की चाहत लिए, हम सदा तेरा ही गान गाते रहे ॥ अश्वसेन के राज दुलारे हो तुम, देवी वामा के नयन सितारे हो तुम । रानी पद्मावती के सहारे हो तुम, डूबते के लिए तो किनारे हो तुम। मांझी हमने तुम्हें अपना माना प्रभो पार नैया हमारी लगाते रहें - हे प्रभो ....... दंभी तापस ने तुमसे कहा था प्रभो, जाओ जाओ यहां कोई काम नहीं। :: नाग-नागिन बचाये थे जलते हुए, पीछे हटने का लेते थे नाम नहीं। बाहर उनको निकाला दिया वोध भी सुनके वे फन तो अपनी हिलाते रहे - हे प्रभो हम दुनिया के पिंजरे में बंदी बने, छटपटाते हैं हर पल सताते हैं गम ॥ करते कोशिश कि मंजिल मिले आपकी, आपके बिन ये आँखें भी रहती है नम। 'साध्वी रत्नत्रयी' ने जो राहें चुनी, उसे सन्मार्ग ज्ञानी बताते रहें। हे प्रभो *** - xxxxxxx 8

अनुभूति का आलोक
8. वीर शरण
में है जाना
(तर्ज - दीदी तेरा
....
-
महिमा गाये जिनकी जमाना,
मुझे वीर शरण में है जाना।
ध्यान मैंने सीखा है लगाना,
मुझे वीर शरण में है जाना ।
चैत्र सुदी की वह तेरस सुहानी,
प्रभु
ने बदल दी आ भू की कहानी।
त्रिशला की कुक्षि ने ज्योति जो पाई,
सिद्धार्थ को दी, आ सबने बधाई।
देवों का भी स्वर्गों से आना
मुझे वीर शरण में है जाना ॥ महिमा
बचपन में तुमने जो दीपक जलाया,
यह यौवन के आते ही कर के दिखाया।
महलों के राजा ने सब कुछ है छोड़ा,
मुक्ति की राहों से अपने को जोड़ा।
अब तो अपना आतम जगाना,
मुझे वीर शरण में है जाना ॥ महिमा
चन्दना के संग चंडकोशिक को तारा,
अर्जुन से पापी का जीवन संवारा।
गौतम से ज्ञानी को देकर सहारा,
तुमने ही स्वामी बताया किनारा ।
राहें वो ही हमको बताना।
॥
9 xXxxxxxxxxxxxx.

अनुभूति का आलोक
मुझे वीर शरण में है जाना ॥ महिमा ......... ॥
ना जाने कर्मों में क्या-क्या लिखी है,
चमकीली दुनिया पै नजरें टिकी है।
आलोक गिरवी पड़ा है तमस् के,
फंसा जाल में आज मानव तो हँस के,
है 'रत्नत्रयी' मुक्ति खजाना ।
मुझे वीर शरण में है जाना ॥ महिमा
.... ||
***
• .
आज अनेक मनुष्यों को अहम् है,
अपने बड़प्पन का उन्हें बहम है।
अहं और बहस के साथ देखा हमने,
कइयों का दिल बहुत बेरहम है ॥
10

अनुभूति का आलोक 9. महावीर महिमा (तर्ज - जीता था जिसके जाना था जिसने जहाँ, जहाँ ने जिसे माना था। प्रभु वीरा ऐसे थे, जमाना नाम रटता है। महावीरा ऐसे ये, जमाना नाम रटता है। कुण्डलपुर में जन्म लिया था, त्रिशला माँ हर्षाई। हर्षित सिद्धार्थ नृपति को, दी सबने आके बधाई। जो जपता है प्रभु का नाम, उसी का पाप घटता है। महावीरा ऐसे थे, जमाना नाम रटता है ॥ भरपूर यौवन में घर बार छोड़ा, संयम डगर चले । तप कर के जिसने कर्म जलाये, मंजिल क्यों मिले। जो करता है तप साधना, जनम का बन्धन कटता है। महावीरा ऐसे थे, जमाना नाम रटता है | अर्जुन ने पाया था तेरा सहारा, पापों की कड़ी। चन्दना को तुमने दर्शन दिए थे, आई थी धड़ी। 'रत्नत्रयी' जपे नाम, अशुभ भाव सब मिटता है। महावीरा ऐसे थे जमाना नाम रटता है | पर ল टूटी पावन *** 11 AKKAKKAXXXX

xxxxxxx
-
अनुभूति का पालोक
10. महावीर प्रभु
(तर्ज - होठों से छूलो ........)
महावीर प्रभु तेरे मैं दर पर आई हूं।
शुभ भाव हृदय में भर श्रद्धा को लाई हूं।
यह जग झूठा नाता नहीं कोई अपना है,
जिन्हें अपना जान रहे वह केवल सपना है।
वह बदरी हूं प्रभुवर जो सुबह को छाई हूं.
महावीर प्रभु तेरे मैं दर पर आई हूं ॥
जीवन तो उनका है जो तुमको नित ध्याते,
तेरी महिमा के जो गीत यहाँ गाते ।
तुझे बाहर ही ढूंढ़ा पर देख ना पाई हूं.
महावीर प्रभु तेरे मैं दर पर आई हूं ॥
मोह ममता में उलझी कुछ होश नहीं पाया,
नयनों में मेरे तो बस अंधियारा छाया ।
तुम शिखर बने हो तो मैं गहरी खाई हूं,
महावीर प्रभु तेरे मैं दर पर आई हूं ॥
भक्ति रस में डूबी मन मेरा महक गया,
अंतर जो जगा मेरा जीवन ही चहक गया।
'रत्नत्रयी' गुरु ज्ञान पाकर हर्षाई हूं,
महावीर प्रभु तेरे मैं दर पर आई हूं ॥
***
XXX.XXX
12

अनुभूति का आलोक 11. प्रभु ॥ तेरी महिमा (तर्ज - तू प्यार का ......... प्रभु तेरी महिमा तो मुख से न कही जाये, मन होता है निशदिन गुण तेरे ही गायें। इस जग में जो कुछ है कर्मों की माया है, हम तपती दुपहरी में बस छांव तेरी पायें। प्रभु तेरी महिमा तो यह अश्व मेरे मन का बस दौड़ा करता है, करुणा जो तुम्हारी हो तो ठहर यहां जाये। प्रभु तेरी महिमा तो माया में उलझी है देखो तो यह काया, नजरे जो इनायत हो तो आज सँवर जाये। प्रभु तेरी महिमा तो रहती है भावनाएँ कल्याण जगत का हो, इक पल दर्शन दे दो यह जन्म सुधर जाये। प्रभु तेरी महिमा तो चन्दना को तार दिया बारी ये हमारी है, गर ध्यान करे तेरा दुःख रजनी ढल जाये। प्रभु तेरी महिमा तो 'रत्नत्रयी' भक्ति से प्रभु नाम सुमरती है, मत देर करो स्वामी कहीं सांझ न आ जाये। प्रभु तेरी महिमा तो II ॥ । ॥ *** 13

xxx xxxxxxxx
अनुभूति का आलोक
12. वीर प्रभु आये
(तर्ज - मेरे अंगने में .......)
वीर
प्रभु
आये जगाने संसार को।
तप से उतार दिया कर्मों के भार को।
चैत्र सुदी तेरस का दिन जब आया,
कुण्डलपुर मे तो हर्ष आ समाया।
धन्य किया धरा, स्वजन, परिवार को।
वीर प्रभु आये जगाने संसार को ॥
राजा सिद्धार्थ सुत त्रिशला के प्यारे,
साधक जन की अंखियों के तारे ।
विश्व भूल पाये ना प्रभु उपकार को।
वीर प्रभु आये जगाने संसार को ॥
चन्दना को तारा चण्डकोशिक उवारा,
अर्जुन से पापी ने पाया सहारा।
एवन्ता लघुमुनि भी पहुंचे भव पार को।
वीर
प्रभु आयें जगाने संसार को ॥
आचार्य सोहन का सन्देश पाया,
श्री संघ सरेरी में आनंद छाया।
'रत्नत्रयी' हरे गुरु तो मन विकार को।
वीर प्रभु आये जगाने संसार को ॥
***
XXXXXX
14

अनुभूति का आलोक
13. वीर जयन्ती
(तर्ज - जहाँ डाल डाल ............)
श्री वर्द्धमान महावीर प्रभु की गौरव गाथा गाएँ।
श्री वीर जयन्ती मनाएँ।
भू से लेकर के अम्बर तक हम जय नाद गुंजाएँ।
श्री वीर जयन्ती मनाएँ।
चैत्र सुदी तेरस दिन उत्तम कुण्डलपुर हर्षाया,
दिव्य तेज त्रिशला कुक्षी से भारत भू ने पाया।
सिद्धार्थ महल में देव देवियाँ सुरभित सुमन गिराये,
श्री वीर जयन्ती मनाएँ।
यौवन वय में त्याग महल को कष्ट अनेकों पाये,
सहे सभी उपसर्ग वीर तो तनिक नहीं घबराये।
तीर्थंकर बनकर धरती पर वीर प्रभु जी आये,
श्री वीर जयन्ती मनाएँ।
बारह वर्ष तक मौन रहे और कर्मों को ललकारा,
जीव उठाता कष्ट जगत में पापोदय का मारा।
वीर प्रभु ने शूलों पर भी निर्भय कदम बढ़ाये,
श्री वीर जयन्ती मनाएँ।
केवल ज्ञानी बनकर प्रभु ने मोक्ष मार्ग बतलाया,
सत्य, अहिंसा, दया, प्रेम का जग को पाठ पढ़ाया।
'रत्नत्रयी' भी वीर प्रभु के पथ को ही अपनाये ।
श्री वीर जयन्ती मनाएँ।
***
x.xxx.x.xxx.x.x
15

अनुभूति का आलोक'
14. वन्दना है
SSS
(तर्ज - सूरज कब दूर...........)
सेवक कब दूर चरण से, जीवन है आत्म शरण से।
कलुषों को सदा हरण से, खुशियां है मुक्ति वरण से ॥
यह वन्दन तो प्रभु को वन्दन है।
जीवन तो
बन्धन है
श्री वीर प्रभुजी प्यारे, त्रिशला नयनों के तारे ।
भव में आ पथ को भूले प्रभु आप ही हमें उबारें
तेरे पावन चरणों में हम बैठे ध्यान लगायें।
हर पल हम केवल तेरी महिमा को अब तो गायें ॥
यह वन्दन तो प्रभु को वन्दन है।
जीवन तो sss बन्धन है ॥
भव सागर में डूब रही प्रभु नैया पार लगाना।
गहरा सागर उठती लहरें आकर आप बचाना ॥
जो शरण में तेरे आये वो भवसागर तिर जाये ।
सारे बन्धन कट जाये मुक्ति को वो ही पाये. ॥
यह वन्दन तो प्रभु को वन्दन है।
जीवन तो sss
sss बन्धन है ॥
चन्दना के बाकुले खाकर बन्धन से उसे छुड़ाया।
चण्ड-कोशिक को भी तुमने जीवन का मर्म बताया ॥
अंधियारा चहुं दिश छाये प्रभु आकर आप बचाये ।
दर्शन के भाव जगाये 'रत्नत्रयी' को अपनाये ।
यह वन्दन तो प्रभु को वन्दन है।
जीवन तो sss बन्धन है ॥
***
16

अनुभूति का आलोक
15. वीतराग नमो
ध्यान
(तर्ज - हरि ॐ बोलो
वीतराग नमो, तीर्थंकर नमो प्यारे ।
जय जिनेन्द्र बोल, गुरु सोहन बोलो प्यारे ।
नौका भव सागर में डोलती हमारी।
होना है पार तो नाम जपो प्यारे ॥ वीत
श्रद्धा से अपना तू शीश तो झुकाले ।
तपा करके अपने को ताप हरो प्यारे । वीत.
सेठ सुदर्शन ने
लगाया।
हुआ शुली का सिंहासन यह ज्ञान करो प्यारे ।वीत
सती सीता ने भी ध्यान लगाया।
पतझड़ में लाओ बहार नई प्यारे ॥ वीत
सती
ने ध्यान लगाया।
जीवन में जग का उपकार करो प्यारे॥ वीत
'रत्नत्रयी' प्रभु नाम जपो हर पल ।
जप कर के जीवन उद्धार करो प्यारे॥ वीत
***
......
सुभद्रा
घड़ी सभी को समय बताती है,
छड़ी उम्र का भार उठाती है।
सीख
गुरु
की वाणी देती है सबको,
घड़ी मोक्ष को मीत बनाती है ।
17 XXXXXXXXX

अनुभूति का आलोक 16. जिनवर का ध्यान (तर्ज - बूंघट की आड़ ............) ममता के संग से जिनवर काsss ध्यान अधूरा रहता है। जब तक ना सुने गुरुवर के वचन-2 सब ज्ञान अधूरा रहता है ॥ ममता मिथ्या तिमिर को दूर हटाना है। ज्ञान दर्शन की ज्योति जलाना है। सुख दुःख पर नहीं मेरा काबू है। कुछ नहीं यह तो कर्मों का जादू है। दिल मेरा घबराने लगा, देख करके दुर्गति होsss प्रभुवर की भक्ति जगने से, ये गान अधूरा रहता है । जब तक ना मोह माया का पर्दा हटाने दे। भीतर बैठे प्रभु को जगाने दे । जाने कितने भवों की ये दूरी है। प्रभुवर से मिलना जरुरी है। मानव का जन्म मिला, भव भवो में भटकते होsss 'रत्नत्रयी' बिन मुक्ति का, संधान अधूरा रहता है। जब तक ना जब तक ना सुने गुरुवर के वचन, सब ज्ञान अधूरा रहता है |जब तक ना..... ममता के संग से जिनवर का, जिनवर का, जिनवर का, जिनवर का ॥ *** 18 अब तो

अनुभूति का आलोक
17. मन मेरे
(तर्ज - तुमसे लागी लगन .....)
महावीर कहो, प्रभु वीर कहो, मन मेरे।
मिट जायेंगे भव-भव के फेरे ।
प्रभु ध्यान धरो, गुण गान करो, मन मेरे।
कट जायेंगे संकट तेरे॥
मैंने मंजिल तुम्हीं को है माना।
नहीं मेरा है कोई ठिकाना।
अब मैं जाऊं किधर, छोड़कर तेरा दर, है अंधेरे ।
कट जायेंगे संकट तेरे ॥
मोह-ममता में ऐसे हैं डूबे ।
राग-द्वेष से अब तक न ऊबे ।
ध्यान देना प्रभो, मान लेना विभो, भक्त तेरे ।
कट जायेंगे संकट तेरे॥
शरणा तजकर के अब तो न जाना।
तेरी भक्ति में तन मन दीवाना।
बने 'रत्नत्रयी' आज मृत्युंजयी माला फेरे ।
कट जायेंगे संकट तेरे ॥
***
विकास की शान ही सरिता है, प्रकाश की शान ही सविता है।
सच पूछो तो शब्दों की नहीं, भावों की उड़ान ही कविता है |
Xxxxxxxxxxxxxxx 19

L अनुभूति का आलोक 18. प्रभु जयन्ती (तर्ज - दीदी तेरा ...... प्रभु तेरी जयन्ती मनायें, इतिहास तुम्हारा दोहरायें । बीती सदियां भुला न पायें, इतिहास तुम्हारा दोहरायें ॥ वे बोले किसी का भी दिल मत दुःखाना, मगर आज शोणित की नदियाँ बहाते। हिंसा का हर ओर है बोलबाला, दया, दान, करुणा के अक्षर मिटाते। मानवता को फिर से जगायें, इतिहास तुम्हारा दोहरायें ॥ प्रभु मूर्छा न रखो कहा था प्रभु ने, संग्रह की सीमा भी सबको बताई। परहेज पापों से जीवन में रखकर, पुण्यों की करलो तुम जग में कमाई। अनेकान्त सबको ही इतिहास तुम्हारा दोहराये॥ प्रभु सिद्धान्त सारे थे उनके निराले, पथ उनका पावन लगता है प्यारा। हिंसा का होता रुका उनसे तांडव, अहिंसा का सूरज उन्होंने उतारा। 'रत्नत्रयी' महिमा को गाए, इतिहास तुम्हारा दोहरायें । प्रभु 17 भाए, 20

अनुभूति का आलोक
19. प्रभुजी री कृपा
(तर्ज - तावड़ा मंदरो .........)
प्रभुजी म्हारी हाजरी भर लीज्यो, प्रभुजी म्हारी हाजरी भर लीज्यो।
कर जोड़ी ने एक ही विनती चरण शरण लीज्यो॥
लख चौरासी
जूण
भोग मैं मिनख जूण पाई।
शुभ कर्मा रै बल सूं स्वामी महिमा तो गाई।
जिनवाणी रा अमरत सूं म्हारौ रोम-रोम भीज्यो । कर जोड़ी.. ॥
नरक निगोद का नाम सुणत ही हिवडी तो कापै ।
कितरी बार देव सुख मिलिया मनड़ौ नी धापै ।
मानव बण मानवता पावां सद्बुद्धि दीज्यौ ॥ कर जोड़ी ......॥
अंतर सूं अरदास है म्हारी फेर जनम नी चाऊं।
रात दिवस थांका चरणां में बैठ गीत गाऊँ।
थांका ज्यूं अविचल पद पाऊं महर अठै कीज्यौ ॥ कर जोड़ी ... ||
गुरु कृपा सूं ज्ञान मिल्यो तो आई या सक्ति।
मोह माया नै त्याग आपकी करुं अठे भक्ति।
'रत्नत्रयी' भक्ति अमरत सब रात दिवस पीज्यो॥ कर जोड़ी .. ||
***
पी रहा है पाप का विष आज मानव,
चाहता अमरत्व को फिर आज मानव ।
पर छू सका बौना कभी क्या नील नभ को,
गन्दगी से जी रहा घिर आज मानव ॥
X.x.xxxx.xxxx.xxxx.xi 21

का
अनुभूति
आलोक
गुरु आराधना
Vina.
साध्वी रत्नत्रयी

अनुभूति का आलोक 20. गुरू पन्ना जयन्ती || ...... (तर्ज - यशोमती मैया से ..... तुलसा के नन्दन को वन्दन हमारा। नाम पन्ना सबको लगता है प्यारा॥ मारवाड़ कीतलसर में जन्म तुमने पाया। पिता बालूरामजी ने हर्ष तब मनाया ॥ लोग कहे शिशु यह तो सबसे ही न्यारा । नाम पन्ना सबको बचपन में ज्ञान जल से अपने को सींचा । उन्नति करनी मुझे जाना न नीचा ॥ माली घर जन्म लेकर जीवन संवारा नाम पन्ना सबको भादवा सुदी की तृतीया जन्म या पाया। गुरु मिले मोती तो मन को जगाया॥ चरणों को थाम बोले आप हो किनारा। नाम पन्ना सबको ......॥ बैशाख सुदी छठ आई अति प्यारी। आनंदपुर में हुआ उत्सव भारी ॥ दीक्षा ले अन्तर में किया उजियारा। नाम पन्ना सबको गुरुवर का नाम जब-जब जिह्वा पै आये। अन्तर्मन में उनकी छवि बन जाये ॥ 'रत्नत्रयी' गुरुवर ने सबको उबारा। नाम पन्ना सबको ...... । १ ॥ Xxxx. *** X.x.x.xxx.x.xxx.XXX 22 xxxxxxxxxx अनुभूति का आलोक ॥ 21. गुरु जयन्ती (तर्ज - नखरालो देवरियो .........) गुरुवर की जयन्ती आज सभी गुण गाओ रे। कर आतम रो उत्थान, ज्ञान प्रकटाओ रे॥ मां तुलसा रा बण्या लाडला बालचंद रा बाल। कीतलसर म्हें जनम्या वे तो प्यारा पन्नालाल । वानै पूजै सकल समाज आज हर्षाओ रे । गुरुवर की जयन्ती लघुवय मांही संयम धार्यो मोह ममता ने मारी। मोती गुरु सूं शिक्षा लेकर संत बण्या अणगारी। सुख शान्ति री जो हो बाट भावना भाओ रे। गुरुवर की जयन्ती दीन दयाला संघ हितैषी भगतां रा भगवान । प्रेरक वे स्वाध्यायी संघ रा जाणै आज जहान । वे करियो जग उपकार भूल नहीं जाओ रे । गुरुवर की जयन्ती जागै जद जद पुण्य धरा रा संत हितैषी आवै । 'रत्नत्रयी' गुण गा गुरुवर रा जीवन सफल बणावै । गुरु नाम सुधारै काज भक्ति उपजाओ रे। गुरुवर की जयन्ती .॥ ... || *** 23.

Xxxxxx Xxxxxx अनुभूति का आलोक 22. प्यारे पन्ना ) (तर्ज - तुम अगर प्यारे पन्ना गुरु दे दो दर्शन यहाँ, भक्ति भावों से तुम को बुलाते हैं हम । चाह इतनी चरण में शरण है मिले, तेरी राहों में पलकें बिछाते है हम ॥ कितने भक्तों को ज्ञान प्रकाश दिया, आज शिष्यों का मानस तिमिर तो हरो। पाप का पंक इतना जगत में भरा, थाम कर के यहां कर किनारे करो। तेरा दर छोड़कर हमको जाना नहीं, भाव मन के तो तुमको सुनाते हैं हम । चाह ... इस जगत में दुःखों का तो पार नहीं, गुरुवाणी सुनी तो खबर है पड़ी। इन कषायों से अब भी उबर ना सके, यह काया तो कीचड़ में अब भी खड़ी। हमको विश्वास हरदम तुम्हारा रहा, ज्योति अन्तर में तेरी जलाते हैं हम [चाह ........ । त्याग सबको शरण तेरी हमने तो ली, यह शरण छोड़ करके ना हम जायेंगे। 'रत्नत्रयी' तेरे गुण को गाये सदा, रत्न मुक्ति का तुमसे ही हम पायेंगे। बहुत दूर चाहे चले तुम गये, रोशनी फिर भी अन्तर में पाते हैं हम ।। *** 24 xxxx

rxxxx
xxxx
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अनुभूति का आलोक
23. गुरु गुण गाओ
(तर्ज - ले लो शान्ति
पन्ना गुरु
को नमन हजार।
महिमा उनकी अपरंपार ।
बताया इस जीवन का सार, गुरु गुण आज गाओ जी ॥
मनहर कीतलसर है ग्राम।
फैला माँ तुलसा का नाम ।
शुक्लां तीज भादवा शाम । भूल मत आप जाओ जी ॥
वंश था उनका मालाकार ।
जग में किया बड़ा उपकार ।
धर्म के बने गुरु आधार, ध्यान निश दिन ही ध्याओ जी ॥
बालूराम
तात हर्षाये।
बालक देख देख
सुख
पाये।
गुरु दर्शन को संग ले जाये। इसे गल हार बनाओ जी॥
आनंदपुर में आनंद छाया,
स्वर्णिम दीक्षा का दिन आया।
खुशियाँ घर-घर में वो लाया। संयम अब तो पाओ जी ॥
गुरुवर बने दीन उपकारी।
उनकी महिमा सबसे न्यारी।
'रत्नत्रयी' उनकी आभारी । जीवन सफल बनाओ जी ॥
***
25

xxxxxxxxxxxx xxxxxxxxxxxxx अनुभूति का आलोक 24. कीतलसर की ज्योति (तर्ज - तुम अगर साथ तुम अगर गुरु महिमा का गान करो, सारे कर्मों के बादल बिखर जायेंगे। आया अवसर सुनहरा जो ध्यान धरो, सभी संसार सागर से तिर जायेंगे। भादव महीना सुदी तीज पावन बड़ी. बालू तुलसां के घर आई अद्भुत घड़ी। नृत्य उनके तो आंगन में होने लगा, गीतों की भी वहां लग गई थी झड़ी। कीतलसर की उस ज्योति का मान करो, सभी संसार सागर से तिर जायेंगे। जब मरकत को मोती की आभा मिली, छुए पावन चरण मन की कलियां खिली। शिक्षा लेकर के दीक्षा गुरुवर ने ली. महकी आनंदपुर की गली हर गली। प्रज्ञा अपनी जगाकर जो ज्ञान करो, सभी संसार सागर से तिर जायेंगे। नाम पन्ना का जग में अमर नित रहे, चांद सूरज भी उनकी कहानी कहे। भूल पाये नहीं उनके उपकार को, जब तलक नीर गंगा में बहता रहे। 'रत्नत्रयी' तुम निज की पहचान करो, सभी संसार सागर से तिर जायेंगे || XXXXXXX *** XXX.XXXX.XXX.XXXX 26

अनुभूति का आलोक
25. अवसर सुहाना
(तर्ज - बाबुल का यह घर .........)
गुरु गुण गान करे, आया अवसर सुहाना है।
पद पंकज का ध्यान धरे, पुण्य हमको कमाना है |
भादव सुदी तृतीया को मां तुलसा हर्षाई थी।
पिता बालूराम बने, दी सबने बधाई थी।
कीतलसर की मिट्टी का हमें मान बढ़ाना है |
गुरु गुण
खिला सौभाग्य-सुमन गुरु की शरण आये,
आनंदपुर दीक्षा हुई यश बढ़ता ही जाये।
जिनवाणी अपनाले तो लगे संयम सुहाना है |
गुरु गुण
दीनों अनाथों के गुरु सहचर बने सच्चे,
सब कहते थे उनको तो प्राज्ञ गुरु हैं अच्छे ।
स्वाध्यायी बनाकर के सद्ज्ञान बताना है ।
गुरु गुण
11
॥
'रत्नत्रयी' जीवन में गुरु महिमा नित गाये,
मन तमस में हो चाहे आलोक मिल जाये।
जागरण की बेला में सोये उनको जगाना है।
गुरु गुण
***
27
X.XX.X.XXXXXXXXXXX

अनुभूति का आलोक
26. पलकां बिछावां
...
॥
(तर्ज - तेजाजी
आओ आओ पन्ना गुरु आंगणिये थे आओजी।
पलकां बिछावां थांकी राह म्हें ॥
भादव सुदी तीज नै जनम्यां मात-तात मन हरस्योजी,
कीतलसर धरती ऊपर दूधा रो मेहो बरस्योजी।
मंगल गीत गूंज्या आंगणै । आओ
बेटा बणिया बालूजी रा तुलसां गोद खिलायोजी,
पालणिये म्हें झोला दे दे थानै घणो झुलायोजी।
आया दुःखिया नैं ये तो तारणै । आओ... ॥
जिन शासन म्हें दीक्षा ले थे घर घर अलख जगायोजी,
वीर प्रभु रा सन्देशा नै घर घर थे पहुँचायोजी।
महक्यो जिन उपवन थाकै कारणै। आओ. ॥
श्रद्धालु नर नारी थांका नित उठनै गुण गावे जी,
थांको नाम लिया सूं वारों कारज सब सरजावे जी।
सगला भूलै है जीवन भार नै। आओ
युग बीतै जद पन्ना मुनि सा संत धरा पर आवेजी,
'रत्नत्रयी' का धारक बण नै जग में नाम कमावे जी।
शीष झुकावां मैं तो आप नै । आओ ...... ||
॥
***
क्रोध तो एक भयंकर जंजाल है, जिसके मारे सारा जग बेहाल है।
देख लो चाहे किसी भी क्रुद्ध को, मुँह खुला है और आंखे लाल है ॥
28 AM
XX.XXXX.X.XXXX.

xxxx
अनुभूति का आलोक
27. आचार्य श्री की महिमा
(तर्ज - हरिगीतिका छन्द)
-
(1)
आचार्य गुरुवर के गुणों का, गान करते हम सदा।
आपके उपदेश देते, शान्ति सुख अरु सम्पदा
सहस्र रश्मि सूर्य किरणें, तम हरण करती यथा ।
सदा ज्ञान-रश्मि दूर करती, विश्व की अज्ञानता ॥
(2)
आकाश में जब चन्द्र आये ताल खिलती कुमुदिनी ।
श्रद्धा हृदय में उपजती है, धर्म ध्वनि जिसने सुनी।
है धन्य अपना भाग्य जग में, गुरु मिले ज्ञानी गुणी।
हम जन्म जन्मों तक रहेंगे, आपके स्वामी ऋणी ॥
(3)
नित अप्रमादी, साधना में, पाप से अति दूर है।
बन आशु कवि अरु मधुर वक्ता, कर्म रण में शूर है।
गुरु नाम 'सोहन' दरश मोहन, ज्ञान से भरपूर है।
हां तेज तप से आपका तो,
चमकता नित
नूर
है॥
(4)
पन्ना गुरु के वंश में तुम, नित चमकते भान हो।
हो संघ के सिर ताज स्वामी, धर्म की पहचान हो।
सदा स्वस्थ दीर्घायु रहो तुम, संघ की मुस्कान हो।
'रत्नत्रयी' जिन धर्म के गुरु, महकते उद्यान हो ।
***
29

अनुभूति का आलोक ............ 28. श्री सोहन गुरु हमारे (तर्ज - जहां डाल-डाल .............) महाभाग आचार्य प्रवर हैं, सबके सबल सहारे। प्रिय सोहन गुरु हमारे॥ मन मंदिर के दिव्य देव, भक्तों के नयन सितारे। प्रिय सोहन गुरु हमारे॥ हम अज्ञानी खड़े चरण में, अवगुण चित्त ना देना। सद् शिक्षा का अमीं पिलाकर, पाप ताप हर लेना। चित चकोर चन्दा की भांति हर पल तुम्हें निहारे । प्रिय सोहन गुरु हमारे ।। सुमिरण करते नाम आपका, अद्भुत ज्योति जलती। कृपा दृष्टि आशीष वृष्टि से, जीवन बगिया खिलती। ज्ञान उर्मियाँ पाकर के हम छुए धर्म किनारे । प्रिय सोहन गुरु हमारे ॥ देवलियां की पुण्य धरा तो, सबके मन को भाई। सुवालालजी पिता आपके, माता भँवरी बाई । देव, गुरु और धर्म ध्यान से आतम सदा संवारे। प्रिय सोहन गुरु हमारे ॥ युग युग तक आलोकित करना, गुरुवर पंथ हमारा। सिर्फ आपका ही है अब तो, जग में एक सहारा। 'रत्नत्रयी' जिनवर के संग में गुरुवर नाम पुकारे । प्रिय सोहन गुरु हमारे ॥ doodmomenconocinommdounnamommamtamma *** 30 अनुभूति का आलोक' 29. प्यारे गुरु सोहन हैं, जगत, (तर्ज - जो भगवती जो मात श्री भंवरी तनय, देवलिया जिनका ग्राम है। छाजेड़ कुल अवतंस वे, आचार्य सोहन नाम है ॥ धीर गुरु गंभीर सद्गुण रतन की खान है। वात्सल्य करुणावान पर- नित संघ को अभिमान है। ज्ञान के ये कोष तो, आचार के भण्डार हैं। भूल না। पाये इनके बड़े उपकार हैं॥ ज्ञान-रश्मि हम सदा ही, आप से पाते रहें। यश कलश इन गुरुदेव का, हम नित्य छलकाते रहें । भक्ति से नित सिर झुका, हम अर्चना करते रहें। पुण्य के पथ पर चलें हम पाप से डरते रहें ॥ शिष्य पन्ना के मनोहर, दर्श ही सुखकार 'रत्नत्रयी' आधार को, वन्दन बार है॥ , K............ onc.00a0ccoomindi है। हजारों *** 31

xxxxxxx
xxxxxx
अनुभूति का आलोक
30. वन्दन नमन
(तर्ज - बहुत प्यार ...)
गुणगान करते हैं भक्ति से हम।
गुरुदेव चरणों में वन्दन नमन ।।
देवलिया में जनम था पाया।
छाजेड़ कुल ने
हर्ष मनाया।
महक उठा था, मन उपवन।
गुरुदेव चरणों में वन्दन नमन ॥
साधना के हेतु घर-द्वार छोड़ा।
माया से अपना मुखड़ा भी मोड़ा।
पावन मनोहर हो गया चमन ।
गुरुदेव चरणों में वन्दन नमन ।
प्राज्ञ गुरु को शीश नमाया।
पुष्कर को दीक्षा से पावन बनाया।
आलोकमय हुआ अंतर गगन ।
गुरुदेव चरणों में वन्दन नमन ।।
सुत सुवा भँवरी का है यह प्यारा ।
लोग कहे सोहन गुरु है हमारा।
कषायों का करते हैं देखो शमन ।
गुरुदेव चरणों में वन्दन नमन ॥
महिमा चहुँदिश गुरुवर की गाई।
आचार्य श्री की करुणा है छाई।
'रत्नत्रयी' कैसी लागी लगन ।
गुरुदेव चरणों में वन्दन नमन ॥
***
32

xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx
अनुभूति का आलोक
1. गुरु देवाष्टक
गुणमाल के मनहर मनक गुरुदेव सोहन लाल हैं।
रुपी अरुपी बोध देकर मेटते जंजाल हैं ।
देव गण पूजे चरण को धर्म के प्रतिपाल हैं।
वचन पावन है मनोहर जिन धर्म के रखवाल हैं॥
श्री संघ के सौभाग्य अरु आदर्श है संसार के।
सोहते शुभ कर्म करते जगत में उपकार के ||
हम सभी की आस्था के, आप ही आधार हैं।
नमन करते हम सभी करना तुम्हें स्वीकार है॥
लाखों भक्तों के हृदय में आपका सुनाम है।
लक्ष्य बतलाते सभी को जाना मुक्ति धाम है ॥
जीवन मिला उत्तम हमें यूं ही निकल जाये नहीं।
म.गन माया में रहें कर से फिसल जाये नहीं।
सा.धना की दिव्य आभा, शिखर हो सज्ञान के ॥
कीजिए भव पार हमको तट खड़े अज्ञान के।
जायनाद गुरुवर का सदा 'रत्नत्रयी' करती रहे ।
यह भावना हर पल कदम सद् राह में धरती रहे।
***
--
आज के भाई बहिन ब्याख्यान वाणी चाहते,
साधु साध्वी मृदु सरस आहार पानी चाहते।
रह गये आचार और विचार केवल शास्त्र में,
आज सब आडम्बरों की ही कहानी चाहते ॥
-
33

अनुभूति का आलोक 32. गुरु गुण गान (तर्ज - फूलों सा चेहरा भंवरी के नन्दन तुम्हें वन्दन ये शत बार है। आचार्य देव को, नैया के खेव को, श्रद्धा का उपहार है ॥ देवलिया पावन तीर्थ बना है, जन्मे वहां गुरु भगवान हैं। जन्म और जीवन को धन्य किया है, पाया जो अनुपम सद्ज्ञान है ।। : नश्वर धन को, स्वजन परिजन को, त्यागा था तुमने बड़ी शान से । विनती तो तुमसे यही, करना हमें पार है। आचार्य देव को नैया के खेव को श्रद्धा का उपहार है ।। आशु कवि और मरुधर छवि हो, स्वाध्याय शिरोमणि तुम हो गुरु। अनगिन गुणों को कैसे गिनाऊं, पण्डित प्रवर का ध्यान करुं॥ साध्वी 'रत्नत्रयी' यह कहती सदा ही, गाओ गुरुवर के हर पल गान को। गुरु भक्ति देती सदा मुक्ति का अधिकार है, आचार्य देव को, नैया के खेव को, श्रद्धा का उपहार है ॥ *** 34 am-

अनुभूति का आलोक
33. खुशियाँ अपार है
(तर्ज - जिया बेकरार है
खुशियाँ अपार है, चमन यह गुलजार है।
धन्य धन्य गुरुवर मेरे, महिमा का नहीं पार है।
सुवालाल
के राज दुलारे,
भंवरी बाई माता है ।
जो भी आता चरणों में,
वो ही सुख को पाता है।
साधना अपार झुकता यह संसार है।
धन्य धन्य गुरुवर मेरे महिमा का नहीं पार है॥
मंगलमूर्ति प्यारे गुरुवर,
जन उपवन के माली हैं।
धर्म ध्यान के सुमनों से,
महकी जीवन डाली है।
कण-कण में झंकार है, आनंद की बहार है।
धन्य धन्य गुरुवर मेरे महिमा का नहीं पार है |
'रत्नत्रयी' की करे साधना,
जग करता अभिनन्दन है।
पथ आलोकित करने वाले,
शत शत तुमको वन्दन है।
श्रद्धा का उपहार है, गुरुवर की जयकार है।
धन्य धन्य गुरुवर मेरे महिमा का नहीं पार है।
**
RAKARRRRR 35

xxxxx अनुभूति का आलोक कर 34. प्रिय गुरु नौका (तर्ज - रेशमी सलवार ......... गुरु सोहन गुण खान भाव से ध्यायेंगे। आतम कल्याण मोक्ष पद पायेंगे। गुरु दर्पण सम होते हैं जिसमें देखे निज चेहरा। पवित्र प्रेरणा पाकर करें दूर पाप का कोहरा। कर्म कट जायेंगे। कर ॥ जल में जो डूब रहा हो तैराक बचाये जाकर, जो हमें डूबता देखा गुरुवर ने बचाया आकर । संभल अब जायेंगे | कर ॥ गुरुवर नौका बनकर के जीवन में जब आते हैं। मंझधार जिसे भी देखे झट तट पर वे लाते हैं। डूब नहीं पायेंगे ॥ कर ॥ यह अपनी जीवन नौका पैंदे से फूट रही है। पतवार हमारी गुरुवर आगे से टूट रही है। नहीं तिर पायेंगे ॥ कर ।। गुरुवर तेरी नौका में पतवार ज्ञान दर्शन की। लहरें मन में उठती है केवल अब आत्म रमण की। दिशा हम पायेंगे ॥ कर ॥ बिन 'रत्नत्रयी' के कोई जग में न उबरने पाया, वो वक्त सदा खोता है जो माया में भरमाया! गुरु गुण गायेंगे ॥ कर ॥ . *** XXXXXXXXXXXX 36

अनुभूति का आलोक
:35.
गुरु जय
कारे
(तर्ज - नखरालो देवरियो ..........
श्री सोहन गुरुवर का अहोनिश ध्यान धरें।
आचार्य प्रवर
का सभी गुणगान
करें।
देवलिया में जन्मे गुरुवर माता भंवरीबाई।
तात आपके सुवालालजी बांटी खूब बधाई।
जन जन का अन्तर्मन दरस कर हर्ष भरे। श्री ॥
मोहनी मूरत गुरुदेव की यश जीवन में पाया।
सरल स्वभावी सेवाभावी जीवन सदा बनाया।
अब आशिष देकर आप हमारे कलुष हरें ।। श्री ।।
गांव-गांव और नगर-नगर में अमृत रस बरसाया।
धर्म का रंग धरा के ऊपर तुमने सदा लगाया।
श्रद्धा से मन धारे भवोदधि पार करे॥ श्री ॥
पन्ना गुरु के पाट विराजे नानक संघ सितारे ।
आज चहुं दिश गूंज रहे हैं गुरुवर के जयकारे।
'रत्नत्रयी' गाये गुण गान शुद्ध मन भाव भरे ॥ श्री॥
उम्र तो घट रही, विष कामनाएं बढ़ रही हैं,
धर्म पालन में पाप भावनाएं बढ़ रही हैं ।
घूमकर देख लो सर्वत्र है आयुष्मानों !
नम्रता घट रही, उद्दण्डताएं बढ़ रही हैं।
--
37

अनुभूति का आलोक
36. जय सोहन
सोहन गुरुवर
(तर्ज - ॐ जय जगदीश हरे ..........
जय सोहन गुरुवर स्वामी जय सोहन गुरुवर।
ज्ञान गुणों के सागर भरिये मम गागर ॥
महामनस्वी दिव्य तपस्वी यश के हैं धारी।
श्रद्धा से दर्शन को, आते नर नारी ॥
देवलिया में जन्म लिया मां भँवरी के जाये।
सुवालाल मुख देखे हर पल हर्षाये ॥
सुनी प्राज्ञ की वाणी जीवन को मोड़ा।
संयम धन पाने को जग-बन्धन तोड़ा ॥
तीर्थराज
पुष्कर
में संयम को धारा।
नानक वंश में फैला फिर नव उजियारा ।।
पावन पद आचार्य
गुरु
ने बिजयनगर पाया।
चार तीर्थ ने मिलकर जय स्वर गुंजाया ॥
सामायिक स्वाध्याय गुरु के हैं उत्तम नारे ।
आचार्य श्री की हम सब जय जय उच्चारे॥
सरल स्वभावी महा प्रभावी आशुकवि जाने ।
'रत्नत्रयी' दर्शन कर पुण्य यहाँ माने ॥
***
विवेकवान् युवा समय के बहाव में न बहकर
एक कीर्तिमान इतिहास बनाया करते हैं।
38
XXXX.XX.

xxxxxx अनुभूति का आलोक 37. शत शत नमन (तर्ज - बहुत प्यार .) गुरुदेव सोहन को शत शत नमन । कितना सुहाना है गुरु का चमन । गुरुदेव पन्ना की है फुलवारी। महकी है तुम से तो आज यह क्यारी। बेचैन दर्शन को रहते नयन । गुरुदेव सोहन को 1 संकट, गम अरु चिन्ता सताये! दर्शन कर मन शिव सुख पाये। तुम्हारे चरण धरें भक्ति सुमन । गुरुदेव सोहन को वीर प्रभु का पैजान लेकर! 'रत्नत्रयी' का उपदेश देकर। विषय-कषायों का करते शनन! गुरुदेव सोहन को जिनवाणी गंगा में डुबकी लगाये। कर्मों का मैल गुरु पल में छुड़ाये। 'रत्नत्रयी' को लागी भक्ति लगन । गुरुदेव सोहन को .......... || XXXX *** XXXXXxx 39 4.x.xxx.w.w..XX -- L

अनुभूति का आलोक
38. वन्दन करलो रे
(तर्ज - चिरमी रा डाला ............)
गुरु सोहन है गुणवान वन्दन करलो रे ।
है सम्यक् दर्शन खान चित में धरलो रे।
पड्या मोह रा कीच में,
थे चाहो जो सद्ज्ञान, चरण पकड़लो रे ॥
सुवालाल रा लाडला,
मां भंवरी रा है भान, शरणा गहलो रे ॥
वाणी म्हें अमृत घुल्यो,
दियो पन्ना गुरु सद्ज्ञान, भव जल तरलो रे ॥
ज्ञानी
गुरु
रे पास जा,
अब कर आतम उत्थान, दुःख
निज हरलो रे॥
आचार्य श्री री महक सूं,
सुरभित नानक उद्यान सुमन थे चुणलोरे ॥
आशुकवि मरुधर छवि,
या कहवै सकल जहान, समझे विरलो रे ॥
'रत्नत्रयी' प्यारे गुरु,
नित चमकें चन्द्र समान, दर्शन करलो रे ॥
***
X.X.X.X XX
पापी का मन सदा दहकता है, और संशयी सदा बहकता है।
कर्मठता ईमान जगाते जीवट को, प्रेम
पुष्प
ही सदा महकता है।
40

अनुभूति का आलोक +4 ॥ 39. गुरु कृपा (तर्ज - तुम अगर साथ ....) गुरुराज की हम पर कृपा जो रहे, पावन चरणों का ध्यान लगाते रहें। आप शान्ति का निर्झर बहाते रहें, हम भक्ति की गंगा नहाते रहें। तेरी उपदेश ज्योति जो जलती मिली, मैंने मन के अंधेरों को दूर किया । सच्चे आदेश निर्देश मिलते रहे, भूले भटकों को सन्मार्ग तुमने दिया। शुभ नजर यूं ही हम को जो मिलती रहे, हम कदम अपने आगे बढ़ाते रहें। गुरुराज की हम पर तेरी अमृत सी वाणी बरसती है जब, शुष्क जीवन सरस सारे बन जाते हैं। गुरु नाम की महिमा अनूठी बड़ी, सारे संकट पलों में टल ही जाते हैं। जीवन बगिया के रक्षक तुम जो बनो, हम सद्गुण के सरसिज खिलाते रहें। गुरुराज की हम पर जन्म लेकर के देवलिया आपने, वंश छाजेड़ का नाम रोशन किया। सुवालाल पिता माता भंवरी बनी। तीर्थ पुष्कर में पावन संयम लिया। 'साध्वी रत्नत्रयी' की यही कामना, हम जीवन की मंजिल को पाते रहें। गुरुराज की हम पर *** 41 । ॥ .. ॥

अनुभूति का आलोक 40. गुरुदेव से विनती ॥ (तर्ज परदेशी परदेशी .......... गुरुवर जी गुरुवर जी विनती करें। हाथ जोड़ के मान छोड़ के। गुरुवर जी मेरे प्यारे! ध्यान में लाना। सोये को जगाना कहीं भूल न जाना ॥ गुरुवर की महिमा का कोई अन्त नहीं। जग में गुरुवर जैसे देखे सन्त नहीं। नानकवंश के गुरुवर दिव्य सितारे हैं। जग हितकारी श्रद्धा केन्द्र हमारे हैं। गुरुवर जी मेरे प्यारे! सुपथ बताना। सोये को जगाना, कहीं भूल न जाना। गुरुवर जी गुरुवर जी..... देवलिया में गुरुवर जी ने जन्म लिया। मां भंवरी की कुक्षी को पा धन्य किया। सुवालालजी तात बने तो हरषाये । सुत को सोहन नाम दिया जो जग भाये। गुरुवर जी मेरे प्यारे! जीवन बनाना। सोये को जगाना, कहीं भूल न जाना। गुरुवर जी गुरुवर जी........... ॥ प्राज्ञ गुरु से सद् शिक्षा जब पाई थी। दीक्षा लेकर जीवन ज्योति जलाई थी। 'रत्नत्रयी' गुरुवर महिमा सब गाते हैं। दर्शन करके जीवन सफल बनाते हैं। गुरुवर जी मेरे प्यारे! जग है दीवाना। सोये को जगाना कहीं भूल न जाना । गुरुवर जी गुरुवर जी.. ॥ *** X.x.XXX KXXXX 42 X.x.xxxx

xxx
xxxxxxxxxxxxx
अनुभूति का आलोक
41. श्री वल्लभ गुरुवर
(तर्ज - होठों से छू लो ...........
श्री वल्लभ गुरुवर की नित यादें आती हैं।
अनुपम शिक्षा उनकी सद् राह दिखाती हैं।
यादें ही शेष रही सन्देश नहीं मिलता।
बुझ गया ज्ञान दीपक चाहे पर ना जलता।
मुक्ति पथ पाने की आवाजें भाती ।
श्री वल्लभ गुरुवर की
।
तव चरण शरण हमने वहु वर्ष विताये थे।
गुण रत्नों के सागर सबके मन भाये थे।
तेरी गौरव गाथा नित दुनियाँ गाती है ।
श्री वल्लभ गुरुवर की
11
संकेत किये बिन ही किस घर को चले गये।
मौसम वह कैसा था जिसमें हम छले गये ।
मूरत उस ज्ञानी की नयनों में छाती है
श्री वल्लभ गुरुवर की
स्वीकार करो श्रद्धा सुमनों को हे गुरुवर !
'रत्नत्रयी' गुण गाये चरणों में सिर धरकर ।
आशीष दृष्टि तेरी मन को सरसाती है।
श्री वल्लभ गुरुवर की
॥
........
REATMARATHI

अनुभूति का आलोक
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42. श्री वल्लभ गुरु की यादें
(तर्ज - तुझे भूलना
वल्लभ गुरु
की यादें हर पल हमें सताये।
सद् ज्ञान देने वाले, कैसे तुम्हें भुलायें?
वर्षों गुजर गये हैं चर्चा अभी है ताजा ।
हे ज्ञान के पुजारी देने को दर्श आजा।
नित सांझ और सवेरे, हम गीत तेरे गाएँ।
वल्लभ गुरु की यादें हर पल हमें सताये ॥
तेरे चरण में अर्पण हमने किया था जीवन ।
तेरे बिना तो सूना है संघ का ये उपवन ।
वो राह तो बतादो जिससे बहार आए,
वल्लभ गुरु की यादें हर पल हमें सताये ॥
गुरुभक्त आप जैसा हमने नहीं है देखा।
इतिहास में अमिट है आपका वो लेखा ।
सद्गुण बताये तुमने हम उनको ही बढ़ायें।
वल्लभ गुरु की यादें हर पल हमें सतायें।
लगता हमारी यादें तुमको नहीं है आती।
तुम बिन हमारे नैना नित बदरिया है छाती।
'रत्नत्रयी' हमेशा सद् ज्ञान मन जगाये।
वल्लभ गुरु की यादें हरपल हमें सताये ॥
***
44

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अनुभूति का आलोक
43. गुरुणी महिना
(तर्ज - साजन नेरा
गुरुणी की नहिना अपार है:
चरणों में वन्दना हजार है:
सरल स्वभादी की सारी है।
नानक गच्छ बलिहारी है।
भक्तों की बनी लहार है।
चरणों में वन्दन हजार है:
शुद्ध संयन का पालन करते हैं।
गुरुवर की आज्ञा तिर घरते हैं:
जिनवाणी का करती प्रचार है।
चरणों में वन्दना हजार हैं !
अनुपन कृपा कर यहां पधारे हैं।
संट में फैले उजियारे हैं
XXX
हर्षित हुए
नार हैं।
चरणों में वन्दना हजार है।
।
'दर्शन' तुन्हारे
यथा नान तथा गुनधारी हैं।
सुद्धकारी है।
निर्नल चरित्र के आधार हैं।
चरणों में वन्दन हजार है।
kkk
xxxx 45 स

Xxxxxxxxxxxxxxxxx अनुभूति का आलोक 44. कहते हैं गुरुवर (तर्ज - तू चीज बड़ी है ........ कहते हैं गुरुवर साफ साफ, कहते हैं गुरुवर साफ। मानव तन है अनमोल मोल, नहीं इसका कोई तोल तोल। जीवन में अमृत घोल घोल, तू करले प्रभु का जाप-जाप, कहते हैं गुरुवर साफ साफ ॥ बोलो बन्धु कैसी मजबूरी। जिनवर से फिर क्यों है दूरी ॥ है वक्त रेत का ढेर-ढेर, जाते ना लगती देर-देर । मन अपनी मना ले खैर-खैर, मत कर पगले तू पाप-पाप, कहते हैं गुरुवर साफ साफ ॥ गुरुवर ने जो उपदेश दिया है, क्या तुमने उसको धार लिया है? जाना है तुझको पार पार, जीवन है दिन दो चार चार । जिनवाणी ले मन धार धार। भागेंगे सब संताप ताप, कहते हैं गुरुवर साफ साफ ] 'रत्नत्रयी' ने समझ लिया है, इसीलिए तो वैराग्य लिया है। जन-धन का मत कर जोश-जोश, करले तू पगले होश होश । तू पायेगा सन्तोष तोष। धरें पांव संभलकर आप आप, कहते हैं गुरुवर साफ साफ ॥ *** 46 ज .

अनुभूति का आलोक
45. आनंद का साज है
से।
(तर्ज - फूलों सा चेहरा
चातुर्मास करने यहां, आये गुरु राज हैं,
संत सब साथ हैं, सतियाँ भी साथ हैं।
आनंद का साज है || चातुर्मास ॥
कितने बरस से आस लगी थी,
गुरुदेव आये हमारे यहाँ।
पूरे हुए हैं सपने हमारे,
आनंद मंगल ऐसा कहाँ।
भक्त जन आये, हर मन हर्षाये,
स्वागत है वन्दन करें
भाव
चारों ही तीर्थ यहां पूरण हुए काज हैं।
संत सब साथ हैं
॥
आगम की वाणी, बरसने लगी तो,
लगता है जीवन में आया सावन ।
मन की यह मैली चदरिया धुलेगी,
होगा हमारा भी मन तो पावन ।
समभाव धर के, जप तप करके,
दीपक जलायेंगे हम ज्ञान
भक्ति में शक्ति महा मन की यह आवाज है।
संत सब साथ है.
॥
आचार्य श्री का सान्निध्य पाकर,
के।
47

अनुभूति का आलोक 'रत्नत्रयी' की तो बगिया खिली। अनमोल अवसर सबको मिला है, अंतर में अब तो ज्योति जली। आत्म ज्योति जागे, पाप ताप भागे, गुरु ज्ञान प्यारा सुनो ध्यान से, गुरु पन्ना के गौरव हैं ये इन पर हमें नाज है। संत सब साथ हैं || *** T aniniaommonainamaindakiomamarand.doconocoincideodaconddonoammocommonsoonommmomonococcoonmdiom.mom.mabsoorboncommodanekinndimadrommonamoriminanimom.ar ॐ ® N 48 XX.X.A.XX

xxxxxx
xxx
xxxx
अनुभूति का आलोक
46. गुरु स्वागत गान
(तर्ज - जब प्यार किया
.)
गुरुवर का स्वागत करते हैं।
स्वागत करके श्रद्धा के हम सुमन चरण में धरते हैं
मीठी मीठी गुरु की वाणी ।
सुन उसको हर्षाये प्राणी।
गुरुवाणी का ले अवलम्बन भवसागर हम तरते हैं।
गुरुवर का स्वागत करते हैं।
भवियों को सद्भान सिखाते ।
दुःखियों के संताप मिटाते।
सद्गुरुवर की वाणी से नित ज्ञान के मोती झरते है।
गुरुवर का स्वागत करते हैं।
गुरु सेवा का लाभ उठायें।
जीवन अपना सफल बनायें।
ज्ञान की गंगा लेकर देखो गुरुवर आज विचरते हैं।
गुरुवर का स्वागत करते हैं।
"रत्नत्रयी' जहां गुरुवर जाये,
बादल कर्मों के हट जाये।
अद्भुत महिमा गुरुवर की ये त्रितापों को हरते हैं।
गुरुवर का स्वागत करते हैं।
***
49

अनुभूति का आलोक 47. गुरुवर नमन (तर्ज - बहुत प्यार करते भक्ति से करते हैं गुरु को नमन । लगाई गुरु ने ही प्रभु से लगन ॥ गुरु ज्ञान सागर कहे जग यह सारा । कोटि कोटि चरणों में वन्दन हमारा। महके हैं तुमसे ही मन के सुमन । भक्ति से ॥ ॥ पास जो भी आये दूर वो ना जाये। चरणों की धूलि को सिर पै चढाये । कर रहे त्याग तप से कर्म का शमन ॥ भक्ति से जीवन में जो भी हैं शूल को हटाओ। मुक्ति के पथ पर बढते ही जाओ ॥ हरित आज गुरुवर से जग का चमन । भक्ति से %3D चाहो अगर जो तुम चेतन जगाना। गुरुवर के चरणों में चले आप आना। 'रत्नत्रयी' के पूरे हुए हैं सपन | भक्ति से II *** 50

1R
अनुभूति का आलोक
48. गुरुदेव के चरण में
(तर्ज - वो दिल कहां से .........)
गुरुदेव के चरण में. मस्तक सता मा ।
अक्ति सुमन हजारों, रणों में जितना ॥
नेया पुरानी मेरी पतवार
को माना।
नाविक हो मेरे तुम तो मंमार से बगाली।
वह युक्ति तो बताओ जिससे किनारा गाल।
गुरुदेव के चरण में मस्त सदा र
संसार में भटकते कितना सन्मय विताया।
दीपक जला न पाये जीवन सदा जलाया।
आशीष जो मिले तो जीवन सफल बना।
गुरुदेव के चरण में मस्तक सदा मुकाऊँ ॥
दुनिया में जो भी आया जाना उसे पड़ा है।
फूटेगा एक दिन तो, तन मिट्टी का पड़ा है।
जिस पथ से आप गुजरे पद उस पे वा।
गुरुदेव के चरण में मस्तक सदा शुकाॐ।
यह दुनियां आनी जानी कब किसकीलो रवानी।
क्यों कर रहे हो तुम अब ऐसी खोंचा तानी।
मिले "रत्नत्रयी" उजाला वह दीप में जलाऊँ।
गुरुदेव के चरण में मस्तक सदा झुकाऊँ।
***

अनुभूति का आलोक 49. गुरु आशीष पायें (त तर्ज आये हो मेरी ..... . ॥ . गुरु चरण सिर झुकायें, वन्दन हजार करके। आशीष आप देना नित एतबार करके। होगी कृपा गुरुवर पायेंगे भव किनारा। मंझधार में फंसे हैं दे दो हमें संहारा। चिन्ता सभी मिटायें तट पर उतार करके। आशीष आप .. गुण एक पल को गाऊँ या जिन्दगी लगाऊँ। श्रद्धा जो मेरे मन में कैसे तुम्हें बताऊँ । कही बात सब न जाए मुख से उच्चार करके। आशीष आप अनमोल सीख देते बदले में कुछ न लेते। आशा सभी की पूरी जग में सदैव करते। भावों के पुष्प लाएं श्रद्धा को धार करके। आशीष आप 'रत्नत्रयी' के धारक चेहरे पे तेज दमके। दर्शन त्रिताप नाशक वाणी में ओज झलके। शुभ भावना बढायें तेरे दीदार करके। आशीष आप ॥ rxxx - .1 ॥ II *** 52

अनुभूति का आलोक
50. भक्त मन
.)
(तर्ज - मेरा जीवन
भक्त मन तू छोड़ सब गुरु शरण में आजा।
मैल मन का दूर कर सुख शान्ति को पा जा ॥
रास्ते सब खो गये पर होश को मत खो।
कल्पना के शिखर चढ़ बहोश तो मत हो।
मूल की हर भूल को तू दूर करता जा।
भक्त मन तू छोड़ सब गुरु शरण में आजा ॥
सिमटता ही जा रहा है हदय का संसार ।
आज जो भी दिखता वो झूठ का व्यवहार ।
खाली प्याली है तेरी अब प्यार भरता जा।
भक्त मन तू छोड़ सब गुरु शरण में आजा।
सोचने में ही कहीं ढ़ल शाम ना जाये।
धर्म बिन जीवन कभी आराम ना पाये ।
'रत्नत्रयी' की शक्ति से मन हो तरो ताजा।
भक्त मन तू छोड़ सब गुरु शरण में आजा ॥
***
हम मुसाफिर है यह संसार मुसाफिर खाना,
अहर्निश कितने रहेंगे, न कभी यह जाना ।
साथ यदि ले चलो संदर्भ पुष्प की गंगा,
तुम
तो महकोगे अखिल विश्व को भी महकाना ॥
53

अनुभूति का आलोक
51. गुरु ज्ञानामृत
(तर्ज - तावड़ा मंदरो पड़ जा
..)
गुरुवर ज्ञानसुधा दीज्यो जी, गुरुवर ज्ञानसुधा दीज्यो।
दर्शन करबा मैं तो आया चरण शरण लीज्यो ।
पुण्य
कर्म बिन
सद्गुरुवर
रो योग न मिल पावे।
यदि कदाचित मिल जावै तो समझ नहीं आवे ॥
सुन्दर, सुखद,सुयोग मिल्यो है, किरपा थे कीज्योजी।
दर्शन करबा मैं तो आया चरण शरण लीज्यो ।।
बिना गुरु रै यो जीवन तो भटक भटक जावे ।
अंधियारा म्हें आंख्यां वालो देख नहीं पावे ॥
गुरु आप म्हारै मन आंगण सूरज बण रीज्यो ।
दर्शन करबा मैं तो आया चरण शरण लीज्यो ।।
महावीर प्रभु रा गौतम जी प्यारा शिष्य बण्या।
आतम मांय उजीतो कीदौ आगम वचन सुण्या ।।
सोहन गुरुवर री मृदुवाणी सुण मनड़ो भीज्यो।
दर्शन करबा मैं तो आया चरण शरण लीज्यो॥
नश्वर दुनियां जाण संयम रै पथ पर मैं चाल्या।
तप री सीख आप जो दीनीं कर्म अठै बाल्या ॥
'रत्नत्रयी' गुरुवाणी रो रस अंतर सूं पीज्यो।
दर्शन करबा. मैं तो आया चरण शरण लीज्यो॥
***
XXXX
54 AAKAAAAX
.

अनुभूति का आलोक
52. म्हारा मनड़ा
(तर्ज -सासू लड़ मत
यूं तो गुरु भज गुरु भज म्हारा मनड़ा।
मन सूं मोह तज मोह तज म्हारा मनड़ा ॥
जिण नै कहवै म्हारो म्हारो,
वो तो होसी कदै न थारो।
खिल्यो फूल तो कुमलासी समझ बात मनड़ा।
जिण नै देख रियो यू जीतो,
अन्त समै जावेलो रीतो।
सुपना जो यूं देख रियो है धया रहसी मनड़ा।
क्रोध- मान नै यूं छोड़,
प्रभु भक्ति सूं नातो जोड़।
माया सूं मन मोड्या शिव सुख पासी मनड़ा।
श्री सोहन
गुरुवर
सीख ज्ञान री नित देवै।
"रत्नत्रयी' मुगति पथ पर चाल मनड़ा।
यूं तो गुरु भज गुरु भज म्हारा मनड़ा ॥
कहवै,
***
उपयोग हीन रत्न-जटित पात्र व्यर्थ है, तो विनय हीन स्वाध्यायी छात्र व्यर्थ है।
सच पूछो तो प्रमादी जनों के लिए
पुण्य
से मिला
हुआ
भी यह गात्र व्यर्थ है।
55

अनुभूति का आलोक 53. प्यारे गुरुवर हो हो॥ हो। हो॥ । - (तर्ज- ना कजरे की ...............) मोह ममता को · मार, छोड़ दिया संसार। करे सबका ही उद्धार, तुम तो मेरे गुरुवर हो। तुम्हीं तो प्यारे गुरुवर मन में धर्म बसा, तन में धर्म बसा जीवन में धर्म बसा, तुम तो मेरे गुरुवर तुम्हीं तो प्यारे गुरुवर थोड़े को तुमने छोड़ा तो ज्यादा तुमने पाया । घर से जो मुखड़ा मोड़ा, तो पास जगत है आया । कर दर्शन, परम पावन, मनवा उठा पुकार | मोह ममता को जीवन में क्रांति जगाकर पहना है शांति बाना। प्राज्ञ गुरु से तुमने पथ परम प्रभु का जाना। शान्त मूरत, दिव्य सूरत मन बोले बारंबार । मोह ममता को 1. शांति सुधा बरसाकर जीवन को सरस बनाया। तेरी महिमा को जग ने वाणी से हर पल गाया। महामनस्वी, हे तपस्वी नित गूंजे जय जयकार । मोह ममता आचार्य प्रवर गुरुवर ने इस जग को है तारा। "रत्नत्रयी' चरणों में वन्दन शत बार हमारा। गुरु सोहन, आप मोहन, हर लेना सभी विकार । मोह ममता को । .... *** Xxxxx.x.x. Xxx 56

xxxxxxx
अनुभूति का आलोक
54. मन मन्दिर
(तर्ज- आँखों में नींद न
.)
...
निश दिन झुकाते हैं चरणों में सिर ।
पधारो खुला है यह मन का दिर.
भक्ति के फूलों से झोली को 3.
पधारो खुला है यह मन का मंदिर।
सद्गुरु के चरण की जो गरा जानो।
जीवन यह अपना सफल हलवाला।
दले पाप संध्या सिले फिर सवेना।
मिले आत्मा को नया ही उजेरा।
मीठी मीटी जिन्दगी की तान ।
मान मेरी मान रखले तू शान ।
यह सत्यम्. शिव. सुन्दरम का निर्झर ।
निश दिन झुकाते हैं चरणों में सिर ।
अब तूफां में नैया है आप सहारे ।
है मंझधार में हम तुम हो किनारे ।
घटा वीर वाणी की वन आप छाये।
शुष्क हृदय में सरसता को लाये ।
तुम्हारी प्रतीक्षा रही हमको हरदम ।
कृपा दृष्टि हो तो भागे सभी गम ।
"रत्नत्रयी' सव चरणों में गिर ।
निशदिन झुकाते हैं चरणों में सिर ।।
57

अनुभूति का आलोक 55. जीवन पहेली ..... xxxxxx ....। (तर्ज- दिल दीवाना जीवन एक पहेली है सुलझाओ ना। कठिन समस्या का हल तुम बतलाओ ना ॥ : सूख रहा है मन का उपवन आओ ना। ज्ञान की बदरी बनकर के तुम छाओ ना ॥जीवन बतला कर सुपथ, शिष्यों का पावन करते जीवन । जीवन, जंगल ज्ञान ध्यान से बन जाता है मधुवन ॥ चन्दा बनकर महा तमस में आओ ना। कठिन समस्या का हल तुम बतलाओ ना ॥ जीवन या तो पास बुला लो हमको या तुम ही आजाओ। प्यासे नैना ताक रहे हैं आकर धैर्य बंधाओ। आतुर मन को पावन वाणी सुनाओ ना। कठिन समस्या का हल तुम बतलाओ ना ॥ जीवन...... गुरु की करुणा से बनता है जीवन सुन्दर सुखमय । गुरु का ज्ञान हृदय जो पाले बन जाता है निर्भय ॥ मंगल कर्ता दुख हरता गुण गाओ ना। कठिन समस्या का हल तुम बतलाओ ना ॥जीवन अब तक गुरु की महिमा का नहीं पार किसी ने पाया। "रत्नत्रयी' ने गुरुवाणी सुन जीवन को महकाया ॥ सत्य, अहिंसा प्रेम की फसल उगाओ ना। कठिन समस्या का हल तुम बतलाओ ना ॥जीवन xxxxxxx M x x *** XXX.X.XXX 58 XX.x.x. X.XXXXX.

अनुभूति का आलोक
......
56. गुरु शुभागमन
(तर्ज - चूड़ी मजा.
शुभ कर्म हैं हमारे गुरुदेव जो पधारे।
भक्ति व भावना से पूजे चरण तुम्हारे । शुभ ॥
कितने दिनों से हम तो राह देखते थे तेरी।
स्वाति की बूंद पाने चातक सी आश मेरी।
आचार्य देव
तुम
हो भक्तों के प्राण प्यारे । शुभ ॥
सिंचन बिना तुम्हारे सूखा है संघ उपवन ।
इक बार फिर बहादो निर्झर पवित्र पावन ।।
गुरु के शुभागमन से आए नई बहारें॥ शुभ ।।
आबाल वृद्ध कहते तुम हो हमारे भगवन ।
तेरे चरण में गुरुवर अर्पण हमारा जीवन ।
मंझधार में है नैया आकर इसे उबारें ॥ शुभ ॥
कर जोड़ कर खड़े हैं स्वागत में आज तेरे ।
विनती है, आरजू है, सारो तो काज मेरे।
जहां जहां चरण धरो उस पथ को हम निहारें॥शुभ ॥
कैसी सुनहरी घड़ियां गुरुदेव आप आये।
मन हर्ष से भरा है कैसे तुम्हें बताये।
"रत्नत्रयी' खुशी से गुरु पंथ को बुहारे ॥शुभ ॥
.....mmm
....................
***
Xxi 59

अनुभूति का आलोक 57. स्वागत गीत (तर्ज - घर से स्वागत करते हम, गुणगान करते हम, गुरुवर पधारे शहर। वर्षों से आशा थी, ज्ञान पिपासा थी आज हुई है महर॥ दर्शन गुरुवर के श्रद्धा जगाये। तत्वों की बातें सबको बताये । ना कोई शिकवा, ना ही गिला है। ज्ञान का दीपक हमको मिला है। आगम की वाणी को, सुनकर प्राणी तो जाते हैं दुनिया तिर ॥ स्वागत तीर्थों में जाकर लोग नहाते । तो तीरथ कहाते। घर बैठे आई है आज ज्ञान गंगा। वाणी को सुन सुन चंगा। मन को लुभाती है, सबको सुहाती है । सुहाना हुआ है सफर ।। स्वागत प्यारे गुरुवर को शीश नवायें। अंतर में आप सबके ज्योति जलायें। लक्ष्य है हमारा तो चरण तुम्हारे । आये हैं हम सब तो शरण तिहारे। 'रत्नत्रयी' धारेंगे जीवन संवारेंगे पायेंगे मुक्ति डगर । स्वागत *** गुरुवर हमारे हो जा तू ...... .XXX.X.XXX 60 ".

Xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx
अनुभूति का आलोक
58. जीवन धन्य हो जाये
(तर्ज - बहारों फूल बरसाओ ...........)
यह जीवन धन्य हो जाये गुरु गुण गान गाने से ।
अशुभ सव कर्म कट जाये गुरु का ज्ञान पाने से ।
महाव्रत पांच नित पाले गुरुवर दोप सब टाले ।
समिति पांच, गुप्ति तीन के वे होते रखवाले ।
तारयाणं विरुद पाये ये भवियों को तिराने से ।
यह जीवन धन्य.
दूर रहते सदा गुरुवर तो ममता और माया से।
करे उपकार ये निशदिन ही मनसा वाचा काया से
गुरु दीपक भी कहलाये मोह का तनस मिटाने से ।
यह जीवन धन्य..
जिन्हें गुरु नाम प्यारा है, उन्हें दुनिया से क्या लेना।
इस संसार सागर में हमें निज नाव है खेना।
सभी अरमान फल जाये भक्ति धारा वहाने से
यह जीवन धन्य
बहुत थोड़ा है यह जीवन इसे तू यूं ही ना खोना।
समय को व्यर्थ जो खोता उसे यूं ही पड़े रोना।
'रत्नत्रयी' लक्ष्य मिल जाये कदम आगे बढाने से।
यह जीवन धन्य
***
XXXRXXXxxx
61
AK.XXXX..KXXXXXX

अनुभूति का आलोक 59. गुरु के दर्शन (तर्ज - उड़ उड़ रे चल चल रे चल चल रे चल चल रे तू जिन अनुयायी गुरु के दर्शन करले रे। गुरु के............ - स्थानक में गुरुवर हैं आये। ज्ञानामृत का घट वे लाये। कर्म क्लेश सब हरले रे । गुरु के........... मन माया से दूर हटादे । जिससे पाई उसे लुटादे । पग शुभ मग में धरले रे । गुरु के के........ जो मुक्ति पुरी में जाना है। शिव सुख उत्तम पाना है। ज्ञान हृदय में भरले रे । गुरु के अनुपम गुरु की वाणी है। यह जीवन कल्याणी है। सुनकर आज संवर ले रे । गुरु के......... 'रत्नत्रयी' गुरु ज्ञान सिखाते। भटक गये को राह दिखाते। भव सागर तू तिरले रे । गुरु के. । Xxx 62

अनुभूति का आलोक'
60. अनमोल रतन
.)
(तर्ज - फूल तुम्हें
बात पते की तुमको कहने देखो गुरुणी आई है।
समझो अब तो मेरे भाई बातें जो बतलाई है।
बात...
-
यह जीवन अनमोल रतन है, ऐसे ही मत खो देना।
फूल तुम्हें बोने हैं जग में, शूलों को मत बो देना।
बात....
-
सुकृत करके जीवन पाया, क्या यूं ही यह बीतेगा?
अमृत घट जो पास तुम्हारे क्या यूं ही यह रीतेगा?
बात......
कर्म मैल उसका ही जलता, जो तप अग्नि तपता है।
मुक्ति पुरी में वो ही जाता, जो प्रभु नाम सुमिरता है।
बात...
'रत्नत्रयी' गफलत में सोये तो फिर तुम पछताओगे।
वक्त की चिड़िया उड़ जायेगी कर मलते रह जाओगे।
बात..........
***
लाश यदि सड़ यहां जाए तो बदबू अवश्य फैलेगी,
पात्र यदि गन्दगी लाए तो बदबू अवश्य फैलेगी।
जान भी लो हंसवत् शुभ्र दिखने वाले साधक !
शम में यदि राग समाए तो बदबू अवश्य फैलेगी ।
63

IRANA.
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--
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योक
दिव्य भावना
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शान्तानका
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अनुभूति का आलोक 61. मन दीपक जला (तर्ज ये तेरी आंखे ..... यह जीवन तुझको मिला मिला। तू मन का दीपक जला जला। मनुज का जीवन पाया है, भक्ति के पंकज खिला खिला ॥ वीर की महिमा जग छाई। धरा प्रभु पाकर हर्षाई । खुशी में झूम उठी दुनियाँ- भावना गीतों में गाई॥यह... मात त्रिशलाजी के लाला। किया त्रिभुवन में उजियाला। अनेकों पापी तारे थे तार दी थी चंदन बाला ॥ यह ... बरसती है जब जिनवाणी। प्रभु की वाणी कल्याणी सरसते हैं आगम के फूल- खुशी से झूमे भव प्राणी ॥ वीर सी समता आ जाये। वीरता रग रग में छाये। मौसम आयेगा अनुकूल - सरसता अंतर में लाये ।। ये बन्धन तो हमने डाले। खोलने है अब तो ताले कह रही 'रत्नत्रयी' बंधु ! ज्ञान गंगा में अब नहाले ॥ wuwww 64 xx xxxxxxxxxxxxxx अनुभूति का आलोक 162. प्रभु गुण गाना (तर्ज - दीदी तेरा..... जीवन पाकर आतम जगाना, सुबह शाम प्रभु के गुण गाना। आया जो भी उसको है जाना, प्रभु नाम सुमिर सुख पाना ॥ तू दुनियां में आया क्यों पाप कमाया। सदा तेरे कर्मो ने तुझको रुलाया ॥ दो चार दिन की है यह जिन्दगानी। न जाने पूरी कब हो जाए कहानी ॥ तप से काया कंचन बनाना, प्रभु नाम सुमिर सुख पाना । जीवन... नहीं साथ जाना यह झूठा खजाना। भुलाकर के चेतन क्यों जड़ का दीवाना ॥ यह कांपेगी काया बुढापा जो आया लगा लम्बा होने यह संध्या का साया। जीवन तुझको अब तो सजाना। प्रभु नाम सुमिर सुख पाना ॥जीवन.... ना मन तूने मोड़ा समय अब है थोड़ा। कब तक यूं दौड़ेगा मन का यह घोड़ा । जो आलस में सोया वही जग में रोया। जरा सोच प्राणी-क्या पाया क्या खोया ॥ चाहे 'रत्नत्रयी' समझाना प्रभु नाम सुमिर सुख पाना । जीवन.... - 65

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अनुभूति का आलोक
63. पंछी उड़जायेंगे
xx xxx
C
(तर्ज
तुम तो ठहरे....
हम तो ठहरे परदेशी साथ क्या ले जायेंगे,
एक दिन देखना सभी पंछी उड़ जायेंगे।
ओस के बिन्दु ज्यों, जीवन हमारा है,
सूरज निकलते ही हवा हो जायेंगे।
काया और माया को बादल की छाया कही,
हवा का झोंका चला, जाने कहां जायेंगे।
दौलत कमाने को पाप कितने हैं किये,
मरते दम सोच यही सारे पछतायेंगे।
जीवन संवारो सभी, वक्त अब थोड़ा है,
काल बली आने पर ठहर नहीं पायेंगे।
वीर प्रभु कहते यही अपनाओ 'रत्नत्रयी'
कलिमल हर ले जो मुक्ति पथ पायेंगे।
14
***
"
हमें भले के लिए कभी कटुता लानी होती है,
ज्वर को दूर हटाये वह कटु कुनैन भी मोती है।
इस कडुवाहट से तुम कभी नहीं घबराओ भाई,
यों खुजली को गंधक औषध ही तो धोती है ।
66

अनुभूति का आलोक
64. चन्दना के आंसू
(तर्ज - तुम तो ठहरे परदेशी .......)
x,x
चन्दना करती विनय वीर घर आयेंगे।
जनमों के बन्धन से मुक्त करायेंगे ।।
मूला का दोष नहीं फल है यह पापों का ।
कर्मों का खेल सभी दोष ना लगायेंगे।
द्वार पर आकर के, लौट गये प्रभु तुम,
मन को कैसे अब धीर हम बंधायेंगे।
दुःखों के बादल घिरे, नैनों से आसूं झरे,
क्या हम ऐसे ही निज को रुलायेंगे।
कोई मेरा अपना नहीं, बात मैं जिससे कहूं,
लौट कर आप मेरी बात सुन पायेंगे।
'रत्नत्रयी प्रभु ने, जब ये
पुकार सुनी,
देव महोत्सव करे क्यों ना हर्षायेंगे।
***
छेड़ने पर तो निश्चय ही, सांप काटता है,
और शैतानी करने पर ही बाप डांटता है
पर देखो यह कैसा आया कलियुग अपने घर में,
आज चोर ही कोतवाल को नीति वांटता है।
XX.XX.RTEREx.x
67
.XXXX.XXXXXXXXXXXX

XXXXXXXXXXXXxxxxxxx अनुभूति का आलोक 65. उद्बोधन ? (तर्ज - आए हो मेरी.. आए हो मेरी..........) आया सुनहरा अवसर यह मास चार बन के। मन धर्म में लगाना उत्तम विचार सुन के । ओ धर्म प्रेमी श्रावक ! मोह नींद को उड़ाओ- बेहोश हो न सोओ निज आत्म को जगाओ यूं ही चले न जाना धरती पे भार बनके । आया सुनहरा । जप तप करो लगन से आलस्य दूर करके। ना द्वेष हो किसी से अभिमान चूर करके , बह जाये शान्ति सरिता जीवन का सार बनके। आया सुनहरा ॥ कर्मों ने है सताया विषयों ने है दबाया। हमको न ज्ञान भाया दर्शन नहीं सुहाया, भक्ति के भाव गूंजे वीणा के तार बनके । आया सुनहरा II 'रत्नत्रयी' आराधन हर पल ही करते रहना। गर मौत पास आये, उससे नहीं है डरना, जीवन सुमन खिलाना पावन बहार बनके । आया सुनहरा ॥ *** 68 अनुभूति का आलोक 66. शिव सुख पाना है। (तर्ज - आ लौट के आज सब छोड़ के चल दे मेरे साथ, अगर शिव सुख को पाना है। तेरा होगा परम कल्याण, अगर शिव सुख को पाना है। आतम जगाले, खुद को उठाले, जीवन है अब तो थोड़ा रुकना पड़ेगा इक दिन तो तुझको, बहुत यहां पर दौड़ा। XX तू समझ ले मेरी बात, अगर शिव सुख को पाना है || सब इक दिन है मिलना, इक दिन बिछुड़ना, साथ नहीं कोई जाये, विषयों के दल दल में ऐसा फंसा कि मुक्ति को बैठा भुलाये। होने वाली है काली रात । अगर शिव सुख को पाना है।सब..... बने कहानी, तेरी सुहानी, काम तू ऐसे ही करना, 'रत्नत्रयी' दुःखियों की झोली स्नेह भाव से भरना। पतझड़ आई गिरेंगे पात, अगर शिव सुख को पाना है |सब... .... *** 69 अनुभूति का आलोक 67. जीवन जाता है। (तर्ज मैं क्या करूं राम..............) xxxxxxxxxxx अब करले धर्म कमाई , पल पल जीवन जाता है। हां हां जीवन जाता है। कौड़ी कौड़ी माया जोड़ी साथ नहीं यह जायेगी। भोर सुहानी आज मिली है कौन जाने फिर आयेगी । काया-माया में उलझाई, पल पल जीवन जाता है। हां हां ॥ मात - पिता, भाई - बन्धु ये स्वारथ के सब साथी है। स्नेह चूकने पर दीपक की जलती केवल बाती है। नहीं तूने ज्योत जलाई, पल पल जीवन जाता है। हां हां .... ॥ x ॥ मानव भव मुश्किल से मिलता गुरुदेव बतलाते हैं। मूरख नर पापों में पड़कर, जीवन सदा गंवाते हैं। गा ले प्रभु की महिमा भाई पल पल जीवन जाता है। हां हां 'रत्नत्रयी' जीवन तो बन्धु केवल रैन बसेरा है। हुआ सवेरा जाना होगा घर नहीं तेरा मेरा है। अब क्या देता नहीं दिखाई, पल पल जीवन जाता है। हां हां ॥ ** 70 XXXXXXXXX

अनुभूति का आलोक
68. माया ठगनि
(तर्ज - दिल के अरमां
माया ठगनि ठग रही संसार को।
तज रहे हम धर्म के आधार को ।।
xxxxxxxxxxxxx
आज चहुंदिश ही अंधेरा छा रहा।
नहीं आयेगा कोई यहां उद्धार को ॥
बात गुरुवर ज्ञान की बतला रहे।
हो के जाग्रत खोलो मुक्ति द्वार को ॥
निंदा चुगली में समय खोना नहीं।
काट पाया कौन जल की धार को।
xxxxxxx
भेद जड़ चेतन का अब तो जान लो।
समझ लो गुरुवाणी के तुम सार को ॥
'रत्नत्रयी' पावन परम पथ वीर का।
विश्व में फैलाओ सद्विचार को ।।
***
| हर व्यक्ति अपना रुप सराहेगा - चाहे काग हो, |
| हर व्यक्ति अपनी बात निबाहेगा - चाहे आग हो।।
| स्वार्थ को साधने वालों का यही है नारा
कि चारों ओर अपनी ढपली और अपना राग हो ।
71
XXXX.X.XXXXXXXXX

. xxx xxxx 69. वीर वाणी वे संसार सागर से तिर जायेंगे |तुना.......... ॥ अनुभूति का मालाल (तर्ज-तुम अगर पार तुम अगर वीर वाणी को धारण आये संकट सभी दूर हो जा समता साधना तेरे लोसा मोह - ममता की दो कोई कह दे तुन् ती मन में समावलि कोई अपमान या चि.... तू तो सदाह में पांच .. तुम सदगुण के सुगर :: पथ के पाषाण भी पर तुमको जाना यहां से बहुत पांव रोके तो सूरज भी दल जाता कर मलोगे यहां पर तो शिवट कारवां जो बना दो निकल जाना। तुम तो संगत को उत्तम बलात. ज्ञान से तो स्वयं पूर हो जायगो तुम. समय को प्रमाद रेंगाला, वीर ने भी तो गौतमकोवतला दिया। कल्मप में इवा वो उबरा हो, दिव्य सन्तों ने सवकोही सिखला दिया। 'रनत्रयी' जो धर्म की वोका च.. ... १ XX.XX xxxxxxxx 72 .x.x.x.x.x.x

अनुभूति का आलोक
70. जाग जाग इंसान
.)
उठा
(तर्ज - देख तेरे ..
ज्ञान ध्यान का दिव्य सन्देशा, लाये गुरु भगवान ।
अब तो जाग जाग इंसान ॥
महावीर की दिव्य वाणी का, करते नित व्याख्यान ।
अब तो जाग जाग इंसान ॥
कोठियां, खेत, खजाने, इनको तू तो अपना माने।
मोह ममता में खो दीवाने, सच के मग को ना पहचाने ॥
पड़ा नयन पर तेरे पर्दा उसे
नादान।
अब तो जाग जाग इंसान ॥
विषय नदी में अगर बहेगा, सदा सदा ही दुःखी रहेगा।
महल स्वप्न का यहां ढहेगा, जाकर के फिर किसे कहेगा ॥
नित रोग शोक से इस जीवन में आते हैं व्यवधान ।
अब तो जाग जाग इंसान ॥
भोर हुई तो शाम ढलेगी, कब तक दुनिया साथ चलेगी।
जीवन ज्योति अगर जलेगी, त्याग भावना सदा फलेगी।
शुभ कर्मों से पा लेता है मनुज नई मुस्कान ।
अब तो जाग जाग इंसान ||
'रत्नत्रयी' तन उत्तम पाया, कितना जीवन व्यर्थ गंवाया।
स्वाध्यायी भी बन ना पाया, जीवन अब तक नहीं जगाया।
तज फूलों को क्यों शूलों से सजा रहा उद्यान ।
अब तो जाग जाग इंसान ।।
***
73

अनुभूति का आलोक
71. अरे नादान
.)
(तर्ज - जब तुम् ही .......
तू करता क्यों अभिमान, अरे नादान ! यहां से जाना ।
नहीं चलेगा एक बहाना ॥
यह अहंकार दीवार बड़ी।
ना रहती आखिरकार खड़ी।
इक दिन तो इसको यूं ही बस ढह जाना।
नहीं चलेगा एक बहाना ॥ तू .
मन विषय पाप से दूर हटा ।
हर पल इनका तू बोझ घटा।
कहीं पड़े न तुझको यहां पर मित्र लजाना।
नहीं चलेगा एक बहाना ॥ तू
त्रय तापों से जो बचना है।
संसार नया ही रचना है।
पथ जिनवर का तुझको है अपनाना।
नही चलेगा एक बहाना ॥ तू
जो अहं विसर्जन करता है।
शिव
सुख से झोली भरता है।
साध्वी "रत्नत्रयी ने यह सच माना।
नहीं चलेगा एक बहाना ॥ तू
***
74

AARAK अनुभूति का आलोक 72. होली पर्व मनायें Sammoonconoconc.oooooochootapgarmnanimoongamnergiconconomcooconsmisodmoonmoncemecagonada - (तर्ज - जहां डाल डाल पर........ ..) शुभ अवसर से श्री संघ में आनंद मंगल छाये। हम होली पर्व मनायें ॥ गुरुदेव आचार्य प्रवर का दिव्य सन्देशा लाये। सब होली पर्व मनायें ॥ अब तक कितनी बार आपने होली पर्व मनाया। सच्ची होली जलती कैसे समझ न कोई पाया। जिनवाणी उरधार आज कर्मों को सभी जलायें। सब होली पर्व मनायें । माया का रंग लगा हुआ है इसको आज उतारो। मन में भक्ति भाव जगाकर प्रभु को आप पुकारो। आर्त भाव से आत्म भाव को चेतन पुनः बनायें। सब होली पर्व मनायें ॥ पर्व दिनों में खुश हो होकर तन को खूब सजाते । षट् रस भोजन नित ही कर कर तन को पुष्ट बनाते । आतम पंछी हाड मांस का तज पिंजर उड़ जाये। सब होली पर्व मनायें ॥ मौका है यह सजग बनो फिर अवसर नहीं मिलेगा। "रत्नत्रयी' के आराधन से जीवन सुमन खिलेगा। कर्मों का कर अन्त सभी अरिहन्त सिद्ध पद पायें । सब होली पर्व मनायें । *** XX.K.R.XXX.XXXX.X 75 X.X.XX । xxxxxx xxx xxxxxx अनुभूति का आलोक -- : 73. ज्ञान शिविर ॥ (तर्ज - तुम अगर तुम अगर आज सुनकर समझते रहो। हम यूं ही बात आगे बढ़ाते रहें। तुम अगर ज्ञान सरसिज खिलाते रहो। हम यूं ही पाठ हर पल पढ़ाते रहे ॥ कितने शिविर में आये हैं दौड़े चले। लेकिन चेतन जगाये वे थोड़े मिले । भीड़ हमने भी देखी उमड़ती हुई। भावना के सदा उनमें रोड़े मिले। तुम अगर आज अंतर जगाते रहो। हम यूं ही.... तुमको देखा तो हमको भी ऐसा लगा। देर से ही सही पर यह चेतन जगा । कृपा हम पे गुरुवर की ऐसी हुई। धर्म होता है जीवन का सच्चा सगा। तुम अगर ज्ञान अंकुर उगाते रहो। हम यूं ही... तीन दिन का यह शिविर जो तुमने किया। वीर वाणी का अमृत भी हर पल लिया पी के मद में कहीं चूर होना नही। त्याग तप का ही सन्देश हमने दिया। साध्वी 'रत्नत्रयी' तुम संवरते रहो। हम यूं ही. *** ।। ॥ 76 xxx 11 अनुभूति का आलोक 74. महिला जागरण .) (तर्ज - दीदी तेरा महिला शिविर सचमुच सुहाना । हमें जाग जमाने को जगाना ॥ बहिनों तुम्हें आगे है आना । कुछ कर जमाने में बताना ॥ श्री मल्ली जिनेश्वर बनी तीर्थंकर । सती चन्दना भी थी सतियों में दिनकर । रेवती, सुलसा, जयन्ती ने आकर । महिमा बढाई थी ज्ञान को पाकर । अन्तर्मन में ज्योति जलाना। कुछ कर जमाने में बताना। शिक्षा, चिकित्सा व शासन में आगे। फिर धर्म क्रिया से क्यों दूर भागे । बीती है रजनी वह उठने को जागे। रुढ़ी की चादर को मुस्काके त्यागे। लक्ष्य अपना मंजिल को पाना। कुछ कर जमाने में बताना ।। 'रत्नत्रयी' ने जो बीड़ा उठाया। आचार्य सोहन से आशीष पाया। संयम को लेकर के जीवन बनाया। जिनवाणी महिमा को जग में गुंजाया। लक्ष्य नारी जीवन उठाना। कुछ जमाने में बताना ॥ कर *** 77 XX अनुभूति का आलोक 75. जीवन बीत रहा ॥ बाबुल का यह घर ............) सुनो बन्धु मेरा कहना, नहीं जग में लुभाना है। झूठे हैं नजारे सारे, नहीं मन उलझाना है। जब पास में पैसा हो तब हर कोई अपना है। दुःख दर्द की घड़ियों में लगे सब कुछ सपना है। इस बेगानी दुनियां से नहीं दिल को लगाना है। झूठे हैं नजारे सारे नहीं मन उलझाना है । सुनो बन्धु... जब तन में शक्ति रहे, तब सब पास रहे।' सब अपना अपना कहे, पल भर ना दूर रहे। दुर्दिन के आने पर जग ढूंढता बहाना है। झूठे हैं नजारे सारे नहीं मन उलझाना है। सुनो बन्धु ........... जीवन यह बीत रहा, मानले मेरा कहा। क्या नहीं तुमने सहा भटका है यहां वहां । आया है कहां से चला अब कौन सा ठिकाना है। झूठे हैं नजारे सारे नहीं मन उलझाना है। सुनो बन्धु......... धर्म की गलियों में पांव तू धरता चल । पुण्य से जीवन घट आज तू भरता चल । 'रत्नत्रयी' दुनियां को जाग के जगाना है। झूठे है नजारे सारे नहीं मन उलझाना है। सुनो बन्धु... ॥ ॥ ॥ *** 78 अनुभूति का आलोक 76. जिनवाणी पाई (तर्ज - आधा है चन्द्रमा. ॥ कष्ट सोचो तो जिन्दगी आज भाई। कितने भव बाद फिर बारी आई। जिनवाणी पाई कभी कर्मों ने हमको दबाया। सीधा नरकों में जा पहुंचाया। कष्ट कितना वहां था उठाया। चैन तनिक कभी भी ना पाया। कभी शीत लगी, कभी प्यास जगी। भूख लगने से रोटी नहीं पाई ॥ सोचो ...... || पशु पक्षी की योनि में आये। परतंत्र होकर उठाये । बोझा ले ले हम भी चले हैं। डंडे बदले में फिर भी मिले हैं। कभी नभचर बने कभी भू पर चले । कौन देखे नैना बदरी छाई॥सोचो.. ये शुभ दिन हमारा है आया । जो मानव का जीवन पाया। देव योनि में सुख था अपारा। जिसे भोगा है बारंबारा। जीवन बीत गया सुख रीत गया। तूने महिमा प्रभु की कब गाई॥ सोचो ....... ॥ 79

अनुभूति का आलोक
मिला नर तन इसको संवार ले।
प्रभु वाणी को दिल मे उतार ले ।
गुरु चरणों का तू आधार ले ।
भव सिन्धु से खुद को उबार ले।
मनका दीपक जला, जीवन बगिया खिला
"रत्नत्रयी' के मन खुशियां छाई ॥
***
X.x.x.miamimmametimes
XX.XXX.I
श्वान जब खुश हो तो मुंह चाटने लगता है,
और जब क्रुद्ध हो तो पग काटने लगता है।
सच पूछो तो दुर्जन श्वान से भी बदतर है
पग पग पै सद्गुणों को सदा पाटने लगता है।
80

xxx xxxxxxxxxxxxxxxxxxxx अनुभूति का आलोक 77. नश्वर तेरा चोला (तर्ज - दीदी तेरा भाई तेरा जीवन अमोला। ले ले काम नश्वर तेरा चोला। जिह्वा से कब प्रभु नाम बोला। ले ले काम नश्वर तेरा चोला। तिर्यंच योनि में परतंत्र थे हम। नरकों में रहकर उठाये कई गम । कर्मों की रंगत को हमने न जानी। दुःखों का बोझा भी कर ना सके कम । बहे आंसू धीरज भी डोला । ले ले काम नश्वर तेरा चोला ॥ भाई॥ सोने के सूरज की फैली है किरणें, अरे! जागो अपनी ये आंखे तो खोलो। ज्योति से ज्योति जलेगी सदा ही अरे! अपने कालुष्य को आज धोलो। वीतरागी प्रभु ने था बोला, ले ले काम नश्वर तेरा चोला ॥ भाई॥ अरिहन्त देव हैं निर्ग्रन्थ गुरुवर धर्म अहिंसा का जीवन में धारो। "रत्नत्रयी' इस चोले को पाकर । कर्मों का सारा ही भार उतारो कब ज्ञान पाकर अन्तर टटोला। ले ले काम नश्वर तेरा चोला || भाई॥ *** 81 xxxx SER अनुभूति का आलोक 78. कैसा यह संसार है (तर्ज - जिया बेकरार.. कैसा यह संसार है, मतलब की मनुहार है। बिन मतलब के अब तो कोई करते ना उपकार है। कैसा यह संसार है.. । पुत्र पिता को प्यारा लगता खूब कमाकर लाता है। सब इच्छाएं पूरी करके खाता और खिलाता है। देखे थे जो सपने करता यदि साकार है बिन मतलब के गाय दूध देती है जब तक बोझा बैल उठाता है। मालिक खुश होकर के उसको चारा हरा चराता है। लाभ नहीं कुछ पाता है तो कहता यह बेकार है। बिन मतलब के सास बहू और पिता पुत्र, भाई से भाई कहता है। हम तो सुमन एक उपवन के प्रेम सभी में रहता है। स्वार्थ अगर ना साधे कोई बढ जाती तकरार है। बिन मतलब के ॥ देख जगत की चाल अनोखी मन होता .बेचैन है। माया में भरमाया मानव टिके स्वार्थ पर नैन है। पड़ी कर्म की मार अचानक टूट गया परिवार है। बिन मतलब के ॥ गुरु से हेत करे जो मानव कभी नहीं दुःख पाता है। प्रेम भाव की वर्षा होती हृदय सदा सरसाता है। 'रत्नत्रयी' प्रभु की भक्ति से पाये मन आधार है। बिन मतलब के ॥ ... ॥ *** 82 XXXXXXX अनुभूति का आलोक ... 79. राजुल की भावना (तर्ज - फूलों सा तोरण पर आये प्रभु करुणा के भण्डार हैं। पशुओं को खोलकर, तोरण से लौट कर बतलाया यह सार है | तोरण राजुल ने जाना कि स्वामी पधारे तो राहों में पलकें बिछाने लगी। मन को सजाकर तन को सजाया। अरमान मन में जगाने लगी। बारात आई, दुल्हन शरमाई, स्वागत को उत्सुक परिवार है। जाने की खबर मिली नैनों में अश्रुधार है॥ पशुओं ॥ कर्मों के बन्धन से सारी है उलझन, करके कुछ ऐसा मिटाऊँ इसे । शाश्वत सुखों का खजाना मिलेगा। बन्धन जो तोडूं तो पाऊं उसे । शील व्रत धारा, ममता को मारा छोड़ दिया उसने यह संसार है। भुक्ति के बन्धन खुले जाना मुक्ति द्वार है ॥ पशुओं ॥ संयम की महिमा प्रभु ने बताई, जो पानी पहले बने पाल है। तप करके तन को कंचन बनायूँ, वरना यहां तो खड़ा काल है। प्रभु नाम प्यारा क्यों इसको विसारा, भूल फिर दुबारा न स्वीकार है। जिनवर का 'रत्नत्रयी' मानेगी उपकार है॥ पशुओं ॥ *** 83 .X.XXXXXX.

अनुभूति का आलोक 80. राजुल री पुकार .) भव भव की। (तर्ज - जीजा जलेबी..... मेंहदी ज्ञान वाली हिरदा म्हें रचणी। थाके साथ रहूं सा म्हारै जचगी ॥ राजुल सूं सादी करबा ने बींद बण्या थे आया। रुप मनोहर देख्यौं थांको सगला नै थे भाया । प्रीत पौथी पुराणी थाकै साथ रहूं सा म्हारै जंचगी ॥ मेहंदी ॥ जान फौज रै भोजन खातिर पशु पक्षी मंगवाया। काना मांये पड़ी क्रन्दना नेम नैण झरआया। एक पल म्हें ही भावना बदलगी। थाकै साथ रहूं सा म्हारै अँचगी । मेंहदी। तात-मात, भाई-भावज संग राजुल मन दुःख पावै । होबा वाली कदै टलै नीं सगला ही समझावै। लौट्या वे खबर पसरगी। थाकै साथ रहूं सा म्हारै जचगी । मेंहंदी। थे छोड़ी पर म्हूं नी छोडूं प्रण म्हारौ है सांचो। मोक्ष महल म्हें कुण जावेलो कुण रहवेलो काचो। अब तो राजुल भी नेमजी बदलगी । थाकै साथ रहूं सा म्हारै अँचगी ॥ मेंहंदी ॥ राग छूट बेराग पणपग्यो अचरज देखो भारी। बात ब्याव की छोड करै सब दीक्षा की तैयारी। "साध्वी रत्नत्रयी' जौत अब जलगी । थाकै साथ रहूं सा म्हारै जचगी । मेहंदी.... ॥ पाछा *** .XXXXXxxx 84 I.XXXXXXXXX

अनुभूति का आलोक
-
81. राजुल
कहे
(तर्ज - तुम अगर
नेमि तोरण से लौटे तो राजुल कहे
अब बतादो प्रभो तुम खफा क्यों हुए?
मैं पलकों को पथ में बिछाती रही,
तुम मुझे छोड़ करके कहां चल दिये ॥
मेरे सपनों के राजा तुम्हें याद कर,
सोचा करती थी मेरी तो किस्मत बड़ी।
नित तरसते थे नयना तुम्हें देखने,
बेकरारी थी आयेगी कब वह घड़ी।
तेरे जाने की जब से खबर है सुनी,
मेरे सपनों के सारे ही महल ढहे । नेमि..
पास आकर के करते कोई बात तो,
आपकी अपनी थी मैं क्या सुनती नहीं?
मैं भारत की नारी क्षत्राणी भी थी,
पंथ पावन था बाधक तो बनती नहीं।
लुट गया कारवां ऐसा लगने लगा,
मेरे नयनों से सावन भादव बहे । नेमि....
शिवरमणी को रानी बनाने चले,
यह ना समझो मैं कमजोर काबिल नहीं।
साधना के सफर में भी मैं साथ हूँ,
अब तो दुनियां में लगता मेरा दिल नहीं।
'रत्नत्रयी' जो मुक्ति को पाना मुझे,
पांव राजुल के रह रह मचलते रहे | नेमि..
***
85

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अनुभूति का आलोक
82. धर्म
सन्देश
(तर्ज.
जय बोलो....
चौमासी का दिन आया है।
सन्देश धर्म का लाया है ।
कई जन्म भटकते बीत गये।
पुण्यवानी के घट रीत गये।
शुभ मनुज जन्म अव पाया है।
चौमासी का दिन आया है ॥
तप संयम की ज्योति चमके।
सज्ञान रश्मियां भी दमके।
सम्यग्दर्शन मन भाया है।
चौमासी का दिन आया है।
अब सेवा का संकल्प करो।
पीड़ित जीवों का दर्द हरो।
गुरुवर ने यही सिखाया है।
चौमासी का दिन आया है।
गुरुदेवों की सेवा करलो।
'रत्नत्रयी' को उर में धरलो।
प्रभु वीर ने यह फरमाया है।
चौमासी का दिन आया है ।
...................
***
86

अनुभूति का आलोक : 83. पर्युषण पर्व सन्देश (तर्ज - मेहन्दी लगा के.......... xx xx पापों से बन्धु बचना, व्यसनों से दूर रहना। सन्देश देने हमको, आया है पर्व अपना ॥ कर्मों का नाश करना, भक्ति में हमको रमना । सन्देश देने हमको, आया है पर्व अपना ।। 1. ये आठ दिन हमारे, लगते है सबको प्यारे। जो साधना करेंगे, उनको सुफल मिलेगा। मन में न वासना हो, दिल में न कामना हो। मोह तम को जो हटाएं, उनको सुफल मिलेगा। संसार झूठा सपना, प्रभुवर का नाम जपना ॥ सन्देश ........ || 2. है बूंद में भी सागर, सागर में बूंद भी है। परमात्मा है हममें, पर ज्ञात ना हमें है। इन पर्व के दिनों में, अपने को खोजना है। दुनियां को देखने से, कुछ लाभ ना हमें है ॥ दुर्गुण से डरके रहना, सद्गुण खजाना भरना ॥ सन्देश...... || 3. श्रावक व्रतों का पालन, निर्दोष ना हुआ हो। चिंतन पुराना करके, मिथ्या को दूर करना ॥ करनी है नित समाई, सच्ची है यह कमाई। समभाव में रमण कर, जिनदेव को सुमरना॥ 'रत्नत्रयी' को अपना, मुक्ति वधू को वरना ॥ सन्देश.......... *** Xxxxxxxxxxx 87

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अनुभूति का आलोक
84. नया वर्ष
(तर्ज - तुम्हीं मेरे मन्दिर ...........)
नया वर्ष आया, खुशी संग लाया।
स्वागत है स्वागत है स्वागत सवाया |नया..
॥
...॥
बहुत साल बीते क्या हमने पाया,
अनमोल जीवन को जर जर बनाया
उतर करके अन्दर देखा तो जाना।
नश्वर सुख
हित जीवन जलाया।नया.....
नये साल की सीख तुमको सुना दूं ।
आगत में करना क्या आज ही बता दूं।
पापों से बचकर पुण्य को कमालो।
वरना मिलेगा ना स्वर्गों का साया ॥ नया
...॥
नूतन गुणों से भरलो खजाना।
मुक्ति अगर जो जीवन में पाना।
ज्ञान रत्न अपनी झोली में भरलो।
गया वक्त फिर क्या लौट के आया |नया.
... 11
बात यह प्रभु ने सदा ही कही है।
मानव का चोला यूं मिलता नहीं है।
"रत्नत्रयी" की आराधना कर
गुणियों ने इसकी महिमा को गाया । नया.....
***
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अनुभूति का आलोक
85. शुभ पर्व पर्युषण
(तर्ज - दिल लूटने...
शुभ पर्व पर्युषण आया है तुम मन का दीप जलाओ रे
गुरुवर ने तुम्हें बताया है उस पथ पर पांव बढाओ रे
गुरुवर करुणा के सागर बन जीवन को सफल बनाते हैं।
शूलों में चलकर फूलों की सौरभ को नित फैलाते है।
अब त्याग तपस्या धारण कर निज आतम को चमकाओ रे।
शुभ पर्व...
॥
* सो चुके बहुत अब तो जागो यह पर्व जगाने आया है।
* आतम के ऊपर कर्मों का क्यों तुमने मैल चढाया है।
बार बार भव सागर में आ गोते तुम मत खाओ रे।
पर्व.........
शुभ पर्व
॥
बाहर बाहर घूमे अब तक अंतर में उतर नहीं पाये।
तट पर ही रहे विचरते जो मोती वे ढूंढ नहीं पाये।
'रत्नत्रयी'
सुन अब हर पल ध्यान लगाओ रे।
प्रभु वाणी
शुभ पर्व
॥
***
कई सुख पाने को जाते है भैरु भवानी के पास,
कई सुख पाने को जाते है ज्योतिर्ज्ञानी के पास
पर बगुले में पड़ा, तिनका कहीं कुछ पा सका,
सत्य, सुख अम्बार तो है धर्म के ध्यानी के पास ॥
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अनुभूति का आलोक
86. जिनवाणी कहती
O
(तर्ज - एक प्यार का ..
........
कभी याद सताती है, कभी मन बहलाती है।
जग की प्रीत तो झूठी है, पल पल में रुलाती है ।
यहां जो अपना होता, वही होता पराया है।
झूठे इन रिश्तों में क्यों मन भरमाया है !
अपनों की भी अब तो नहीं बात सुहाती है।
जग की प्रीत तो झूठी है, पल पल में रुलाती है ।
जिनवाणी नित कहती, कोई नहीं अपना है।
दिख जो भी रहे हैं वो, इस जग में सपना है।
सपने की बातें तो नहीं साथ निभाती है।
जग की प्रीत तो झूठी है, पल पल रुलाती है।
अब समझ जरा मन तू, धोखा नहीं खाना है।
नश्वर इस जीवन में तुझे नहीं ललचाना है।
जिनवाणी जगत में तो पथ सबको बताती है।
जग की प्रीत तो झूठी है पल पल में रुलाती है॥
गुरुवर ने ज्ञान दिया, उसे मन में धार चलो।
शूलों को दूर हटा, फूलों की तरह खिलो।
'रत्नत्रयी' तो निश दिन जीवन को जगाती है।
जग की प्रीत तो झूठी है पल पल में रुलाती है ।
***
90

अनुभूति का आलोक 87. मानव भव xxx कर्म का (तर्ज - क्या खूब लगती........ इस बार मानव का जो जन्म पाया है। कितने ही जन्मों से शुभ अवसर आया है। स्वर्ग निवासी देवों ने गुण गौरव गाया है। मोह नींद में अब तक सोये, हां सोये। अज्ञानी बन बोझ ढोये। क्यो नींद नही है टूटी, हाँ टूटी। आसक्ति भी तेरी है ना छूटी। जागो तो अब संभलो शुभ मौका आया है। स्वर्ग निवासी देवों ने गुण गौरव गाया है। मंजिल भी दूर है इतनी, है इतनी। बाधाएं भी पथ में है अब कितनी। ये पांव रुके ना तब तक, हां तब तक। इस जीवन में लक्ष्य मिले ना जब तक। जिनवाणी सुनकर के जीवन सरसाया है। स्वर्ग निवासी देवों ने गुण गौरव गाया है | समकित का आया सावन, हां सावन । यह जिन शासन है कितना मन भावन । सज्ञान खजाना भरना, हां भरना। बहता रहे "रत्नत्रयी' का झरना। गुरु सोहन मन मोहन सद्ज्ञान बताया है। स्वर्ग निवासी देवों ने गुण गौरव गाया है ॥ *** . Xxx 91 XXX.X.

अनुभूति का आलोक
88. संयम राही से
(तर्ज - होठों से छूलो
वैरागी बन्धु तुम जरा ध्यान लगा सुनना।
संयम पथ के राही! डग संभल-संभल भरना।
संयम को फूलों का पथ ना समझो भाई।
शूलों पर चलना है, हो समता मन माही।
कायरता तज कर के नित धीर वीर रहना।
वैरागी बन्धु तुम जरा ध्यान लगा सुनना ॥
गुरु की सशिक्षाएं जीवन धन होती है।
जो इनको मन धारे जल जाती ज्योति है।
सेवा व्रत लेकर तुम गुरु नाम अमर करना।
वैरागी बन्धु तुम जरा ध्यान लगा सुनना ॥
संयम धन को पाकर प्रमाद नहीं करना।
अंतर के कषायों को हर पल ही तुम्हें हरना।
अब सत्य अहिंसा से इस जीवन को बुनना।
वैरागी बन्धु तुम जरा ध्यान लगा सुनना।
मुक्ति है तेरी मंजिल, चलते ही तुम जाना।
उजियाला मिले जग को जलते ही तुम जाना।
'रत्नत्रयी' जीवन में जिनवर का पथ चुनना।
वैरागी बन्धु तुम जरा ध्यान लगा सुनना ॥
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92

..
अनुभूति का आलोक
..
89. वीतराग बनजाऊँ
(तर्ज - जहां डाल डाल
वीतराग जिनदेव चरण में,एक ही विनय सुनाऊँ ।
मैं वीतराग बन जाऊँ।।
कृपा दृष्टि इतनी हो मुझ पर, मैं मंजिल को पाऊँ।
मैं वीतराग बन जाऊँ॥
नरक निगोद में भटक-भटक कर कितने ही कष्ट उठाये।
कई भवों की खाकर ठोकर मानव भव में आये।
स्वर्णिम बेला हाथ में आई व्यर्थ न इसे गवांऊँ।
मैं वीतराग बन जाऊँ॥
वीतराग वाणी से मुझको अब अहसास हुआ है।
राग - द्वेष से भरा जो जीवन अंधा एक कुआ है।
ऐसी शक्ति देना जिनवर गीत तेरे ही गाऊँ।
मै वीतराग बन जाऊँ॥
स्वार्थ भाव के वश में होकर करते सब लाचारी।
व्यर्थ हुई अब तक की मेहनत जीती बाजी हारी।
'रत्नत्रयी' की यही भावना अजर अमर पद पाऊँ।
मैं वीतराग बन जाऊँ।
***
X.XXX.X.XXX.
93 Ixxxxxxxxxxxxxx

अनुभूति का आलोक
90. मैं दीक्षा लूंगा
.)
जब
(तर्ज - इन्हीं लोगों ने .....
बाबुलजी आज्ञा दिलाओ मैं दीक्षा लूंगा।
मम्मीजी
तुम
तो हर्षाओ मैं दीक्षा लूंगा ॥
मेरी ना मानो तो गुरुवर से पूछो।
उनके ही पथ पर चलूंगा, मैं दीक्षा लूंगा ॥
कभी मुझको भूख लगेगी।
निर्दोष आहार ही करुंगा, मैं दीक्षा लूंगा ॥
जब कभी मुझको यहां प्यास लगेगी।
धोवन से तृप्ति करुंगा, मैं दीक्षा लूंगा ||
जब कभी मन मेरा चंचल बनेगा ।
जिनवर का ध्यान करुंगा, मैं दीक्षा लूंगा ॥
पापाजी मन में विश्वास रखना ।
दृढ़ता से आगे बढुंगा, मैं दीक्षा लूंगा ॥
माताजी मन में धैर्य धरो तुम ।
सजग हर पल रहूंगा, मैं दीक्षा लूंगा ||
परिजन आकर मुझे आशीष दे दो ।
भव सागर पार करुंगा, मैं दीक्षा लूंगा ॥
संघ शिरोमणि गुरुवर 'श्री सोहन ।
चरणों में नित ही रहूंगा, मैं दीक्षा लूंगा ॥
"रत्नत्रयी' ने जगा दिया मुझको ।
शिव रमणी को वरुंगा, मैं दीक्षा लूंगा ॥
***
94

अनुभूति का आलोक
91. वीर वाणी
(तर्ज - दिल के अरमां..
...)
वीर वाणी को सदा सुनते
रहो।
शूल मग में जो मिले चुनते रहो।
यह मनुज भव सहज में मिलता नहीं।
तप से जीवन का वसन बुनते रहो ॥
पुण्य कर्मों में लगा अपना समय।
पाप कर्मों से सदा बचते रहो।
शुभ घड़ी है 'ज्ञान' की कर साधना।
तिमिर नित अज्ञान का हरते रहो ॥
सम्यक् 'दर्शन' मुक्ति का सोपान है।
देव गुरु को चित्त में धरते रहो।
धर्म है 'चारित्र' जग में पालना।
सत्य की महिमा सदा गुनते रहो ॥
"रत्नत्रयी' जीवन सफल करना अगर
कर्म कचरे को सदा धुनते रहो।
....I.XX
***
हे.
कठिनाईयों से डरना तो कायरता का सूचक
कठिनाइयों से लड़ना तो सायरता का सूचक है।
पल्लव की भांति छिछले देखे हैं तुच्छ व्यक्ति,
सागर सा गांभीर्य सदा महत्ता का सूचक है।
.X.X.XX
95
XxxxxxxxxX.XXX.

अनुभूति का आलोक 92. पर्व साधना कर, ............, (तर्ज-कितना सोणा तुझे ................) आया-आया ये पर्व पर्युषण, जी करे साधना करुं। पाप छोड़कर, पुण्य कर्म सुन ले भोले प्राणी। सबसे प्यारा पर्व हमारा, कहती है जिनवाणी आया-आया ये पर्व पर्युषण, जी करे साधना करुं॥ 1. महिनों से आया है, अपने आंगन में, सद्गुण पुष्प महकेंगे, जीवन उपवन में। आराधना करने में, लगता ना पैसा, दुनियां में होगा ना, कोई पर्व ऐसा। कितना पावन, कितना सुंदर, भविजन को, लगता मनहर। अब भी संभल ना पाये तो, होगी ये नादानी। सबसे प्यारा पर्व हमारा, कहती है जिनवाणी ॥ आया ये पर्व 2. तप-जप कर कर्मों के, मल को है धोना। सिद्ध प्रभु के जैसा ही, हमको है होना। जन्मों तक भटके हैं, अब ना भटकेंगे। साहस से कदम बढ़ा, अब ना अटकेंगे। आंधी हो या हो तूफान, रुक पाये ना ये अभियान । 'साध्वी रत्नत्रयी' कहे अब, सफल करो जिन्दगानी । सबसे प्यारा पर्व हमारा, कहती है जिनवाणी ॥ आया आया ये पर्व आया *** 96

अनुभूति का आलोक
93. नश्वर काया
(तर्ज - तुझे भूलना तो..
............)
माटी की तेरी काया माटी में ही मिलेगी ।
क्या सोचते हो तुम तो नहीं साथ यह चलेगी ॥
कितना सजाया इसको, बहुमूल्य भूषणों से ।
कितने हटे हो पीछे, माया प्रदूषणों से ।
चन्दन का लेप करलो अग्नि में यह जलेगी।
माटी की तेरी.....
॥
रोगों ने तन को घेरा, मुश्किल हुआ है जीना।
मृत्यु ने जिन्दगी को, आखिर में आके छीना।
देखी सुबह सुहानी वह सांझ में ढ़लेगी।
माटी की तेरी..
॥
यह तन तो है विनश्वर, सब शास्त्र बोलते हैं।
आतम का साथ तजकर, मानव क्यों डोलते हैं।
जाना पड़ेगा निश्चित घड़ियाँ नहीं टलेगी।
माटी की तेरी.
॥
जीवन मिला सुहाना, कुछ लाभ तो कमालो।
गिरते हुए मिले जो, कर थाम कर उठालो।
सद्गुण सुवास से ही 'रत्नत्रयी' फलेगी।
माटी की तेरी...
11
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अनुभूति का आलोक M 94. आतम की मजबूरी (तर्ज - सूरज कब दूर............) मुक्ति कब दूर मनुज से, कब दूर मनुज मुक्ति से। भुक्ति कब दूर मनुज से, कब दूर मनुज भुक्ति से । यह आतम की बड़ी मजबूरी है। बढ़े कर्मों से ssssss दूरी है ॥ नरक निगोद में भटक भटक कर कष्ट अनेक उठाए। पुण्य कर्म का योग मिला तो यह मानव तन पाए। गुरुवर हमको समझाये अवसर का लाभ उठायें। गुणगान प्रभु के गायें, जीवन को सफल बनायें। यह आतम की क्षण प्रमाद में मत खोओ यों गौतम से प्रभु बोले । रंगीन जहां में आकर के यह चंचल चित्त न डोले। हम आज होश में आये, निज आत्म बोध को पाये। प्रभु वीतराग मन भाये, चंचल ना चित्त बनाये। यह आतम की... मंगलमय जिन शासन की महिमा तो बड़ी निराली। सद्गुण की सौरभ फैली गुरुवर करते रखवाली। हम त्याग भाव अपनायें, ममता को दूर हटायें। तप से तन आज सजायें, कंचन अब इसे बनायें। यह आतम की... "रत्नत्रयी" मानव तन पाकर काटे कर्म के बन्धन । जीवन को महकाये घिस घिस जैसे चन्दन । अभी दूर बहुत है जाना और पथ भी है अनजाना। जीवन है सफल बनाना मन ने तो अब यह माना। यह आतम की... ॥ । ॥ *** 98 xxxxxx अनुभूति का आलोक 95. भक्ति गान ॥ (तर्ज - परदेशी परदेशी...............) करले रे करले रे भक्ति यहां प्रीत जोड़ के, मोह तोड़ के। सुन बन्धु मेरे प्यारे ! भक्ति जगाना। प्रभु गुण गाना कहीं भूल न जाना। करले रे करले भक्ति............ । मोह माया के झूले में तू झूल रहा, झूल रहा। दिव्य शक्ति की भक्ति को तू भूल रहा। तन धन यौवन नश्वर तेरी काया है, काया है। बादल छाया जैसी जग में माया है। सुन बन्धु मेरे प्यारे ! युक्ति लगाना। प्रभु गुण गाना कहीं भूल न जाना। करले रे करले भक्ति.. दीन दुःखी के प्रभुवर ही रखवाले हैं, रखवाले हैं। वे बिगड़ी को सदा बनाने वाले हैं, प्रभु चरणों का दास यहां जो होता है, कटते उसके कर्म पाप को खोता है। सुन बन्धु मेरे प्यारे । मुक्ति हो पाना । प्रभु गुण गाना कहीं भूल न जाना। करले रे करले भक्ति.... जो माया के जाल में पड़कर उलझा है, उलझा है। कर्म कटे बिन कभी नही वो सुलझा है। 'रत्नत्रयी' ने इस जीवन को जान लिया, जान लिया। वीर प्रभु का भक्ति पथ पहचान लिया । सुन बन्धु मेरे प्यारे ! शक्ति बढ़ाना। प्रभु गुण गाना कहीं भूल न जाना करले. रे करले भक्ति............ ॥ ॥ *** 99

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xxxx
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अनुभूति का आलोक
96. नारी जागरण
(तर्ज - दिल लूटने वाले..
सोने वाली प्यारी बहनों अब हम सब को उठ जाना है।
यह समय आ गया जगने का फिर आगे कदम बढ़ाना है ॥
.प्र.
अब तक भी तुमने नहीं जाना,
पुरुषों सम अपनी क्षमता को।
नर ने भी क्या समझा अब तक,
माता की पावन ममता को।
श्रद्धा करुणा और समता से नूतन इतिहास बनाना है।सोने. ॥
पावों की जूती समझ जिसे,
हर रोज दबाया जाता था।
जुल्म - सितम करके जिस पर,
नित कहर ढहाया जाता था ।
सीता, सावित्री, सत्यवती, दुर्गा बनकर दिखलाना है। सोने... ॥
"" "
जब दुखों से घबराया नर,
नारी ने धैर्य बंधाया है।
विचलित पथ से वो हुआ अगर,
नारी ने पाठ
पढाया है॥
अब "रत्नत्रयी'' राजुल बन कर के लक्ष्य हमें तो पाना है || सोने. ॥
***
100
4-

अनुभूति का आलोक
97. संभल अब जाओ
(तर्ज - ओ फिरकी वाली.
॥
ओ भाई मेरे, संभल अब जाओ, प्रभु गुण गाओ,
जीना है कितने साल जी ।
तुम भूल
गये निजहाल जी ।।
जन्म लिया था तुमने रोते, जीवन को रोते बिताया।
'ऊमर इतनी निकल गई है सोचो क्या यहां पर पाया।
कुछ
नहीं सोचा sss कहां से आये और किधर हम जाएं।
दुःख पाये, चैन नहीं आये, हुए हैं बेहाल जी ॥ तुम भूल...
आर्य क्षेत्र में मानव का जीवन, धर्म जिनेश्वर का पाया।
बन के प्रमादी सोते रहे हम, क्यों नहीं निज को जगाया।
बस खाना पीना sss लक्ष्य बनाया वह नर तो पछताया।
* जानो जानो, हमारी मानो निरर्थक धन माल जी || तुम भूल..... ||
पर घर में ही घूम रहे हो, निज घर को अब पहचानो।
लौट के फिर क्या आना तुमको, समझो समझो दीवानों।
'रत्नत्रयी' यह s s जीवन थोड़ा क्यों माया से जोड़ा।
उठो जागो, जाल सब त्यागो हो जाओगे निहाल जी ॥ तुम भूल. ॥
***
वाणी से तो सभी यहां बोला करते हैं,
और हर समय अपना मुंह खोला करते हैं।
किन्तु प्रभाव उन्हीं का सब पर पड़ता भाई!
कथनी को करनी में जो घोला करते हैं।
KAXXXKARARAM 101

xx xxxx अनुभूति का आलोक 98. जगो बन्धुवर (तर्ज - घर से निकलते ही........... ..) जगत का पसारा है, झूठा नजारा है, कहते रहे प्रभुवर। जो इसमें उलझा है, मुश्किल से सुलझा है। अब तो जगो बन्धुवर || जगत... || चौरासी लाख योनि चक्कर लगाये। नरक निगोद में भी पड़े बिल बिलाये। ना ऐसा भव है ना ही जिन्दगानी। जानले तू अपनी यह कर्म कहानी। तप आज कर ले तू, त्याग भाव भरले तू लम्बा है तेरा सफर || जगत.............. । दीनों अनाथों का बनना सहारा। सागर है गहरा दूर है किनारा। ना पाप कर, ना काली कमाई। हाथ से दिया तू ने साथ वो ही जाई। सुकृत करले तू, संसार तरले तू आये ना भव में भंवर ॥ जगत...........॥ ज्ञान की ज्योति मन में जगाले। बिरवा धर्म का अब तू उगाले। संयम पथ पर जो भी चला है। मुक्ति महल उसे आगे मिला है। "रत्नत्रयी' धन, पाते गुणी जन । बन जाये अजर अमर || जगत. .... *** .. 102j..

xxx xxx अनुभूति का आलोक 99. मानव भव पाया है (तर्ज - साजन मेरा मानव का भव तूने पाया है, कितना प्रभु का गुण गाया है। लाख चौरासी योनि पाई थी महिमा प्रभु की नहीं गाई थी। कैसा नशा तुझे छाया है। मानव का भव तूने पाया है। करुणा दया उर धार ले । थोड़ी है जिन्दगी संवार ले ॥ साथ यहां क्या तू लाया है। मानव का भव तूने पाया है। झूठे जग के रिश्ते नाते है। झूठी ही जग की सब बातें है ॥ क्या तूने मन को जगाया है। मानव का भव तूने पाया है। गुरु शरण जो भी जाते हैं। चेतन को जगा वो ही पाते हैं। ले ले गुरु की अब छाया हैं। मानव का भव तूने पाया है। थोड़ी है जिन्दगी संवार ले "रत्नत्रयी" से आतम तारले। अन्तर का दीप क्या जलाया है। मानव का भव तूने पाया है। *** RAXXXXXXxxxx 103 xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx . अनुभूति का आलोक 100. चन्दन बाला (तर्ज. जनम जनम का साथ.... जनम जनम से याद है, वो महिमा तुम्हारी। महासती चन्दन बाला लो वन्दना हमारी ॥ तात छोड़ कर जाये माता पर संकट आया । अपना जिसको जाना उससे ही धोखा खाया। धर्म शास्त्र में तुमसी है, कौन ओर सन्नारी । जनम जनम. माता की शिक्षा ने जो सद् पाठ सिखाया । दूषित मन वाला भी सद् राहों पर आया । जोड़े हाथ रथिक ने, निज भूल स्वीकारी । जनम जनम.. श्रेष्ठी बना के बेटी तुझको घर पर लाया । सेठानी मूला ने तुझ पर कहर ढहाया । माता के सम्बोधन से वाणी तूने उच्चारी । जनम जनम.. हाथ पांव को बांधा भोहरे में तुमको डाला । तीन दिनों तक तुमने खाया नहीं निवाला । श्रेष्ठी तुम्हें देखकर सोचे है बेटी दुखियारी । जनम जनम.. वीर प्रभु आये महा अभिग्रह धारे । हर्षित राजकुमारी आंखों से अश्रु डारे । लेकर के सुपात्र दान प्रभुवर ने उसको तारी। जनम जनम.. "रत्नत्रयी' देवों ने सोनैया बरसाये । संयम लेकर प्रथम साध्वी चन्दना कहलाये। धन्य धरा इस भारत की जो जनमी ऐसी नारी। जनम जनम... ** ...! 104x अनुभूति का आलोक 101. जीवन है अनमोल (तर्ज - नखरालो देवरियो...... यो जीवन हैं अनमोल, ध्यान में लाओ रे । आई घड़ी सुहानी आज, प्रभु गुण गाओ रे । देव तरसते जिसके खातिर, अति दुर्लभ यह काया। जाने कितने पुण्य किये थे, तब मानव तन पाया। करके यहां उत्तम काज, आप बतलाओ रे। आई घड़ी सुहानी आज, प्रभु गुण गाओ रे ॥ मानव भव में महावीर ने, पद निर्वाण को पाया। शुभ समता के भाव जगा, कर्मों का मैल का मैल हटाया। रखनी काया की लाज, आज जग जाओ रे । आई घड़ी सुहानी आज प्रभु गुण गाओ रे ॥ काल सौकरिक ने इस भव में, चिकने कमाये । आयुष अपना पूरा करके, चला नरक में जाये। "रत्नत्रयी" को निज पर नाज, आज उठ जाओ रे । आई घड़ी सुहानी आज, प्रभु गुण गाओ रे॥ कर्म *** XXX 105 KAAKAAKAKKAR xxxxxx xxxxx अनुभूति का आलोक 102. कुलक्षणी नार (तर्ज - जीजा जोबनियो .) .. म्हारी जिनगाणी धूल म्हें मिलादी। बी. ए. पास बीबी म्हनें परणादी ।। परण्या फेरा सासरिया म्हें मां सूं करी लड़ाई। घर वाला सूं न्यारा कीधा उल्टी चाल चलाई। बरला बरला के गली नै जगादी। बी. ए. पास बीबी म्हनै परणादी। बाल कटा नैं होठ रंगाया अंगरेजी में बोले। टी.वी. आगै बैठी रहवै भऱ्या बजारा डोले। म्हारी इज्जत म्हें धूल मिलादी। बी. ए. पास बीबी म्हनै परणादी॥ टाबरां नै नहीं संभालै रोट्या नहीं बणावें। अप टू डेट मेम बण वा तो होटल म्हें खा आवै। म्हारी घर मांये ड्यूटी लगादी। बी. ए. पास बीबी म्हनें परणादी॥ देव गुरु अर धर्म कर्म री बातां नहीं सुहावै । संत सती नै ढोंगी बतला फिल्मी गाणा गावै । म्हारी आतमा म्हें लाय लगादी। बी. ए. पास बीबी म्हनें परणादी। तन देख्यो मन देख नी पायो जिसूं है यो हाल। 106

अनुभूति का आलोक
भरी जवानी म्हारे माये चमक्या धोला बाल ।
सादी होता ही बणी सब री दादी।
बी. ए. पास बीबी म्हनैं परणादी ॥
दो घर रो उजीतो बण के नारी नै नित रहणो।
ज्ञान ध्यान रैसाथ धरम रो पहन्या रहवै गहणो।
बात मरम री अब समझादी।
बी. ए. पास बीबी म्हनैं परणादी।
पढ़बों लिखबो बुरी नहीं हैं संस्कार भी चावै ।
नार.खोडली आ जावै तो घर नै नरक बणावै।
'रत्नत्रयी' तो सांच बतादी।
बी. ए. पास बीबी जो परणादी॥
सुरभित पुष्प किसी रेग के हों, जीवन को महकाते हैं,
हो गुणज्ञ तो किसी वेश में, सब जन वहीं लुभाते है।
गंधहीन-किंशुक को भी तो बुरा नहीं कहता संसार,
पर गुणहीन पुरुष इस जग में सड़े पान कहलाते हैं।
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अनुभूति का आलोक
103. क्रोध मत करज्यो रे
(तर्ज - पनजी मूडै
क्रोध मत करज्यो रे क्रोध मत करज्यो रे।
यो जहर हलाहल दूरा रहज्यो रे ॥
धार क्रोध री महा भयंकर तलवारां सू तीखी रे।
क्रोधी नर की बात कदै ना लागै नीकी रे।
क्रोध मत करज्यो रे......
क्रोध बसै जिण ठौर उठै सुख सान्ति नहीं रह पावै रे।
कर्म चीकणा बंधे भवां तक गोता खावै रे ॥
क्रोध मत करज्यो रे......
क्रोध आग है महा भयंकर सद्गुण सारा बालै रे ।
दुर्गति में ले जावै सीधो सद्गति टालै रे
क्रोध मत करज्यो रे.
॥
छोटी छोटी बांता ऊपर करले आंख्या राती रे।
क्रोधी नर बण जावै निज भाई रो घाती रे ।।
क्रोध मत करज्यो रे...
"रत्नत्रयी' विवेक जगा नित अठै करो ये बातां रे।
सुख अर दुःख थे जो भी चाहो थांके हाथां रे॥
क्रोध मत करज्यो रे..
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अनुभूति का आलोक 104. क्रोध बड़ी बीमारी . (तर्ज - रात भर का है.... क्रोध दिल की है भारी बीमारी। इसके रोगी हैं सब संसारी ॥ क्रोध विषधर बना दिल में बैठा । इसने अनमोल जीवन को लूटा। क्रोध होता बड़ा दुःख कारी। इसके रोगी हैं सब संसारी ॥ सास बहू को तनिक कह देती। बहू घर को उठा सर पे लेती। क्रोध से कर्कशा बनती नारी। इसके रोगी हैं सब संसारी ॥ क्रोधी ज्ञान सभी बिसराये। अपने आपे नहीं रह पाये। क्रोध होता मंगलकारी। इसके रोगी हैं सब संसारी ॥ क्रोध चेहरे को लाल बनाये, क्रोध आंखों में आग जलाये । वाणी बोले अनर्गल गंवारी, इसके रोगी हैं सब संसारी । क्रोधी मर करके नरकों में जाये। क्रोधी कोई सुखी हो ना पाये। धारो "रत्नत्रयी' सुखकारी। इसके रोगी हैं सब संसारी। अ न *** 109

अनुभूति का आलोक
105. धनवानों से
.........प्र.
XX..........................................
(तर्ज. तेरी मोहब्बत......
धन की मोहब्बत ने, तुझको गुलाम कर दिया।
तूने भी पावन जीवन बस तमाम कर दिया ।
भूखा प्यासा फिरता है, देश विदेश विचरता है।
पैसा नहीं जब मिलता है, नहीं तेरा मन खिलता है।
जीना अपने आपका यूं ही हराम कर दिया ।
धन की मोहब्बत ने तुझको गुलाम कर दिया ।
धन वाला कोई आता है, मन सबका खिल जाता है।
उसको पास बिठाते हैं, उसकी महिमा गाते हैं।
मण में से कण देकर के बस नाम कर दिया ।
धन की मोहब्बत ने तुझको गुलाम कर दिया ।
धन तो आता जाता है, साथ नहीं ले जाता है।
धन वालों ध्यान धरो, थोड़ा अब तो ज्ञान करो।
यश पाओगे तुम जग में जो सत्काम कर दिया।
धन की मोहब्बत ने तुझको गुलाम कर दिया |
अनन्त सुखों को पाना हो, मुक्ति नगर जो जाना हो।
"रत्नत्रयी' को धारण कर, दुःख का आज निवारण कर ॥
भक्ति ने ही जन्म मरण का चक्का जाम कर दिया।
धन की मोहब्बत ने तुझको गुलाम कर दिया |
***
110AAR

अनुभूति का आलोक
106. बेटी
का
जन्म
(तर्ज
तुझे भूलना...
..)
बेटी ने जन्म पाया, माता रुदन मचाये ।
पापा ने जब सुना तो चेहरा उतरता जाये ॥
मां बाप सोचते है बेटी का बोझ भारी।
जन्मी है आज अब तो आफत बढ़ी हमारी ॥
अब होगा क्या हमारा चिन्ता उन्हें सताये।
बेटी ने जन्म पाया माता रुदन मचाये ॥
जन्मा था लाडला तो क्या साथ धन भी लाया।
जो जन्म लेते तुमने उत्सव बड़ा मनाया ॥
बेटी को देख करके क्यों मातम यहां मनाये।
बेटी ने जन्म पाया माता रुदन मचाये ॥
मां भी कभी थी बेटी किसी घर में जन्म पाया।
अब जन्मी घर में बेटी क्यों दिन वह भुलाया ।
नारी पे आज नारी क्यों जुल्म
को ढहाये॥
बेटी ने जन्म पाया माता रुदन मचाये ।
नारी का जन्म ना हो नर जन्म कैसे पाता।
बेटे की भांति रखलो बेटी से आप नाता ॥
'रत्नत्रयी' समझले जो भेद मन ना लाये।
बेटी ने जन्म पाया माता रुदन मचाये ॥
***
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अनुभूति का आलोक 107. संभल जा अब तो (तर्ज ये दो दीवाने..... .) श्री ज्ञानी गुरु आये, सन्देशा दिव्य लाये । संभल जा, संभल जा, संभल जा अब तो ॥ धर्म का दीप देखो गुरु ने जलाया। ज्ञान का अमृत जग को पिलाया । सब अपने कर को जोड़े, आये हैं दौड़े दौड़े। संभल जा, संभल जा,. बात गुरु की भैया ध्यान से सुनले । हंस बन के मोती ज्ञान के चुनले }} इस जीवन को जगाले, भक्ति में मन लगाले। संभल जा, संभल जा,. 11 || पर निन्दा चुगली में ध्यान ना लगाना । धर्म की बगिया को नित महकाना॥ नरकों से चाहे बचना, प्रभु का नाम जपना। संभल जा, संभल जा, ॥ वीर का पुजारी बन जप नवकार को। धर्म बनाले अब पर उपकार को ॥ 'रत्नत्रयी' गाये, प्रभु को ना भुलायें । संभल जा, संभल जा,......... ॥ *** KARAMKRI 112 r

JHA
अनुभूति का आलोक
108. मन का दीपक
(तर्ज - नील गगन में उड़ते .....
मुक्ति नगर में जाना है तो आ, आ, आ,
भक्ति रस का अमृत प्यारा गुरु कृपा से पा ।
वीर प्रभु की महिमा हर पल गा, गा, गा,
प्रेम भाव अपने अंतर में हर पल ही तू ला ।
प्यारे ज्ञानी गुरुवर देखो आज यहां है आये,
महावीर की महिमा को ये सब को आज सुनाये।
आत्म रमण में ध्यान लगाकर जीवन सफल बना,
मानव जीवन फिर ना मिलेगा संभल अभी से जा ॥ मुक्ति.
चंचल यौवन चार दिनों का बीत रही ऊमरिया,
गल जाती पानी में गिरकर जैसे मिश्री डलिया।
राग-द्वेष ईर्ष्या से अपने मन को आज हटा,
महावीर का बन के पुजारी प्रेम भाव फैला || मुक्ति
झूठी जग की मोहमाया में जीवन व्यर्थ गंवाये,
'रत्नत्रयी' जीवन थोड़ा है बार बार समझाये ।
बिना धर्म के जीवन सूना सोया इसे जगा,
अभी वक्त है मन का दीपक उठकर आज जला ॥
***
'
113 XXXXXXXXXXXX

xx अनुभूति का आलोक 109. जैनी कहलाए ॥ (तर्ज - दीदी तेरा देवर..... जीवन जीना अब भी न आए, फिर भी हम जैनी ही कहलाए। जन तो बने हो, अब जैनी बनो रे, सुनहरी घड़ियां ये जाए जीवन की। हो आचार पावन, विचार भी पावन, ये भावनाएं हो सबके ही मन की। जीवन शैली बदली न जाए, फिर भी हम... दिन भर ही खाता है पशुओं की भांति, निशा में भी खाना भूल न पाए। पेट है या कोठी, समझ में न आए, भले आदमी क्यों तू रोग बुलाए । सच्चा जैनी दिन में ही खाये, फिर भी हम. घर खाके निकले फिर होटल में खाए, मित्रों के घर जाके ना बच पाए। पंछी ना पढते ये आगम गीता, फिर भी बेचारे निशा में ना खाए भाई फिर भी तू ना शर्माये । फिर भी हम... जैनी कभी जमीकंद न खाए, रात्रि का त्याग चाहे भूखा रह जाए। मांस और मदिरा को छुए नहीं जो, होटल पे खाना जिसे नहीं भाए। 'रत्नत्रयी' गाके सुनाए। ॥ . ॥ फिर भी हम... .. ॥ *** 114 xxxx अनुभूति का आलोक 110. अब भी संभल जा (तर्ज - बाबुल का यह घर बहना...) मानव जीवन सफल बना, दिन दौड़े दौड़े जाते हैं, काल की ये चाल कैसी, हम समझ न पाते हैं। .... जिस दिन जन्मा यहां, सौ वर्ष लाया था, खाने पीने खेलने में बचपन गंवाया था। अब भी संभल जा रे, गुरुवर सुनाते हैं, काल की ये चाल कैसी हम समझ न पाते हैं........ जवानी दीवानी में , टेढा टेढ़ा चलता रहा, पिता स्वजनों को, कुछ भी न गिनता रहा। वृद्धों को देखले युवा, चले कमर झुकाते हैं, काल की ये चाल कैसी, हम समझ न पाते है। बुढापा आएगा, रोक तू ना पाएगा, सबको बुलाएगा, कोई आना नहीं चाहेगा। 'रत्नत्रयी' बीते पल, लौट नहीं आते हैं, काल की ये चाल कैसी हम समझ न पाते है। - मात ..... .... *** जिसका बैराग्य सिर्फ छल और वचन के लिये है, जिसका उपदेश, सिर्फ लोक रंजन के लिये है। वह क्या कर सकेगा? जिन शासन की प्रभावना, जिसका उद्देश्य सिर्फ मतों के भंजन मतों के भंजन के लिए है। AAAAAAAAAK 115AKI KXXXXX

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Anubhuti Ka Aalok

Author
Sadhvi Ratantray
Title
Anubhuti Ka Aalok
File name
Anubhuti Ka Aalok
Text
OCR done
Citation
1985
Published
2011/01
Publisher
Jain Swadhyayi Sang Gulabpura Bhilwara
Language
Sanskrit
Pages
142
Library
Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
548860
Barcode
4990010028947.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
UfIK9sZ3Y0c
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