Central Library, University Of Rajasthan
The Dantyosthavidih
Front matter
No text on this page.
AAAA
श्रीमदयानन्द महाविद्यालय संस्क
--长安长安安安安安安安安长长长长长长长春
ओ३म्
THE DANTYOSTHAVIDHIH
EFFEFERF
अथर्ववेदीय दन्त्योष्ठविधिः
अर्थात्
अथर्ववेद का चतुर्थ लक्षणा ग्रन्थ।
भूमिका तथा टिप्पणीयुक्त आर्यभाषानुवाद
सहित ।
सम्पादक
EF
श्री पण्डित रामगोपाल शास्त्री
अध्यापक तथा रिसर्च स्कालर दयानन्द महाविद्यालय
लाहौर।
I
Mixt
First Ellition
1000 Copies.
}
{1
No text on this page.
THE
DANTYOSTHAVIDIH
OR THE
FOURTH LAKSANA TREATISE
OF THE ATHARVA VEDA
EDITED WITH
AN INTRODUCTION, TRANSLATION AND AN INDEX
BY
PANDITA RAMAGOPALA SASTRI,
Professor and Research Scholar
D. A. T. College, Lahore.
MARCH 1921.
First Edition
1000 Copies.
}
{
Sinys.
औश्य
दयानन्द महाविद्यालय संस्कृत-ग्रन्थमाला।
अनेक विद्वानों की सहायता से
भगवत
संस्कृताध्यापक बा अध्यक्ष अनुसन्धान विभाग
दयानन्द महाविद्यालय, लाहौर द्वारा
सम्पादित ।
सुस्थाङ्क ४
श्रीमदयानन्द महाविद्यालय संस्कृतग्रन्थमाला सं०४
《长长长长长长长长长长长长长长长长长长长长长长长长长长长长长长长长长长长长长长
ओ३म्
अथर्ववेदीय
दन्त्योष्ठविधिः
अर्थात्
अथर्ववेद का चतुर्थ लक्षणा ग्रन्थ।
भूमिका तथा टिप्पणीयुक्त आर्यभाषानुवाद
सहित ।
सम्पादक
श्री पण्डित रामगोपाल शास्त्री
अध्यापक तथा रीसर्च स्कालर दयानन्द महाविद्यालय,
लाहौर।
आर्य सम्बत् १६६०८५३०२० ।
विक्रम सं० १९७७।
सन् १९२१ ई०।
दयानन्दाब्द ३८॥
प्रथम संस्करण १००० प्रति
<? 933332 23:33:27:
पं० भैरवप्रसाद के प्रबन्धसे विद्याप्रकाश प्रेस चङ्गड़महला लाहौर में छा।
Printed by Bhairo Prasada,
MANAGER, VIDYA PRAKASHA PRESS. LAHORE.
ANAJBLISHER BY
THE RESEARCH DEPARTMENT. D. A. V. COLLEGE.. LAHORE.
V
The Publications of this series can also be had of
1. MESSRS. LUZAC & Co.,
46 Great Russell Street,
London W. C.
2.. Lala Hoti -Lal Banarsi Dass, The Punjab
Sanskrit Book Depot, Said Mittha Bazar, Lahore,
3. Lala Mehar Chand , Lachman Dass, Sanskrit
Booksellers, Said Mittha Bazar, Lahore,
4. Pt. Wazir Chand, Proprietor Vedic Book Depot,
Mohan Lal Road, Lahore.
ओ३म दन्त्योष्ठविधिः। भूमिका । वेद संसार के साहित्य में सबसे प्राचीन ग्रन्थ है । वेदाध्ययन से विदित होता है, कि इस में उन २ गम्भीर तत्वों का वर्णन है जिस का निर्माण मानवी-मस्तिष्क-शक्ति से परे है। आर्य लोगों का यह दृढ़ निश्चय है, कि सारम्भ में स्वयमेव भगवान् ने इसे ऋपियों के हृदयों में प्रकट किया है। वेद शब्द ऋग् , यजुः, साम तथा अथर्व इन चार संहितामों के लिये भी प्रयुक्त हुआ है। प्राचीन पार्यों से लेकर भाज तक आर्यो ने वेद को अपना प्राण समझा है । इस की रक्षा के लिये ही ऋषियों ने सहस्रों ग्रन्थ निर्माण किये हैं । वेद के पदों की रक्षा के लिये पदपाट तथा वैदिक क्रम रक्षार्थ क्रम- पा० आदि ग्रन्थों को रचा। प्राचीन आर्यों ने तो वेदों के अक्षर तक गिन छोड़े हैं । वेद की स्वरों की रक्षा के लिये उन्हों ने भिन्न २ प्रातिशाख्यों का निर्माण किया। वेद का . उत्तरकालीन प्रायः सारा का सारा भार्ष साहित्य ही प्रत्यक्ष वा परम्परा रूप से वेद का रक्षक है। वेदोच्चारण के लिये अत्यन्त सावधान रहने का निर्देश हमें प्राचीन साहित्य में मिलता है । महागाध्य प्रथमासिक में तो स्पष्ट ही लिख दिया है कि "दुष्टः शब्दः स्वरतो वर्णतोवा मिथ्या प्रयुक्तो न तमथमाह। स वायत्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतो ऽपराधादिति ॥" अर्थात् स्वर और वर्ण से अशुद्ध प्रयुक्त किया हुआ शब्द अभीष्ट अर्थ के स्थान में विरुद्धार्थ को प्रकट करता है । इसी भाव को लक्ष्य में रख कर वेद में आये पदों के प्रत्यय वा पद की स्वरों का नियम अष्टाध्यायी तथा उनके अपने २ प्राति- शाख्यों में किया गया है। यह "दन्त्योटविधिः" नाम का छोटा सा. ग्रन्थ वेद में आये हुए केवल "बकार" पद के उच्चारण स्थिर करने के निमित्त ही लिखा गया है। पुस्तक के प्रारम्भ के द्वितीय श्लोक में रचयिता ने स्वयं ही स्वरचना का प्रयोजन बता दिया है। "बकारे संशयो नित्यमौष्ठ्यं दन्त्यमिति स्म ह" १२। अर्थात् अथर्व संहिता में आये बकार युक्त पदों में नित्य संशय ही बना रहता है, कि क्या यहां वकार ओष्ठों से उच्चा- रित किया जावे वा दान्तों से । " तस्मातद्विधि निर्णये संशयछेदनाय च ।१।३। उस वकारोच्चारण-विधि के जानने के लिये वा इस संशय का उच्छेदन करने के लिये, कि * शिक्षाओं में “मन्त्री हीनः स्वरतो......” पाठ है । 6- म ( ३ ) कहां यह वकार औष्य है और कहां दन्त्य है, इस पुस्तक का निर्माण किया गया है। " ( प्रतीत होता है, कि पुरातन काल में वर्णों के उच्चारण के सम्बन्ध में भी अनेक मत थे। स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा सम्पादित पाणिनि मुनिकृत वर्णोच्चारण शिक्षा के अध्ययन से भी यही सिद्धान्त स्थिर होता है । " कवर्ग ऋवर्णश्च जिह्वयः। सर्वमुखस्थानमवर्णमित्येके ।” कराठ्यानास्यमात्रानित्येके।" "मृटुरषा मूर्द्धन्याः। रेफोदन्तमूलीय एकेपास्।' "वकारो दन्त्यौष्ठ्यः ।" " सृकिणीस्थानमेके ।” इन ऊपर लिखे निदर्शनों से स्फुट है, कि भिन्न २ आचार्यों के मत.में वर्णों के उच्चारण स्थान भी भिन्न २ हैं। ऊपर 'एके' तथा 'इत्येके' पद इस मत के द्योतक तक हैं। दन्त्योष्ठविधि के देखने से पूर्व में भी अथर्वसंहिता में आये वकारयुक्त पदों में आये हुए 'घ' वर्ण का उसारण औष्ट्य ही जानता था, क्योंकि पाणिनीय शिक्षा में " उपूपध्मानीया औप्ठ्याः।" पवर्ग का स्थान औष्ट्य ही लिखा है । परन्तु दन्त्योष्टविधि के अध्ययन से निश्चय हुआ है कि यह "वकार" पद भी अथर्व- वेद के सर्व स्थलों में औष्ट्य ही नहीं, प्रत्युत बहुत स्थलों में यह दन्त्य भी है। कहां २ यह दन्त्य है, और कहां २ औपन्य है?
:
( ४ )
इसी का निर्णय इस ग्रन्थ में किया गया है। यद्यपि इस पुस्तक
का मुख्य उद्देश बकार पद के उच्चारण का निर्णय करना है,
तो भी कहीं २ प्रासङ्गिक "चकारोचारण का भी निर्णय कर
कर दिया गया है। एतदर्थ देखो १७ श्लोक की विस्तृत टिप्पणि ।
यद्यपि यह पुस्तक आकृति में लघु है, तो भी इस का लाभ
अत्यन्त भारी है । अनेकों पदों का उच्चारण-निर्णय इस पुस्तक
द्वारा अब होगा । मैं इस लघु-पुस्तक-सम्पादन से अपने आर
को अत्यन्त सफल समझता हूं क्योंकि इस पुस्तक-सम्पादन
द्वारा मैं कई एक ऐसे वेद के विवादास्पद पदों का निर्णय कर
सका हूं, कि जिस के लिये बहुत काल से बड़े २ स्कालर
झगड़ रहे थे। इस के लिये देखो " वैवाथ " ११११ की
टिप्पणि। "बहिष्ठः" ।। टिप्पणि । " वद्धे बद्धानि।"
२।। टिप्पणि । इन श्लोकों की विस्तृत टिप्पणियों के अध्ययन
से ही पाठक जान जायेंगे कि यह ग्रन्थ कितना लाभकारी है ।
इस ग्रन्थ का नाम दन्त्योष्ठविधि है । इस के
प्रयोजन
नाम से ही पता लग जाता है कि इस में दांत
ओष्ठों में होने वाले पदों की विधि का निर्णय है। पूर्व हमने
लिख दिया है कि इस में वकार कहां २ कैसे उच्चारित किया
जाना चाहिये, यही प्रयोजन है ।।
इमका । इस पुस्तक का प्रत्यक्ष सम्बन्ध अथर्वसंहिता से हैं,
सम्बन्ध | जिसे आज कल शौनकीय शाखा का अथर्ववेद कहा
जाता है । पैप्पलाद शाखा से इसका कोई भी सम्बन्ध . नहीं
ग्रंधनाम का
+
?
इसका
निर्माता
ग्रन्थ
के
काल
प्रतीत होता । यद्यपि इसके लिये अन्य भी बहुत से उदाहरण
दिये जा सकते हैं, तो भी “वैवाध" ११११ पद तो स्पष्ट ही
उदाहरण है । पैप्पलाद शाखा में अ० संहिता के शहार में आये
'वैबाध' पद के स्थान पर केवल "वाध" ही पद आया है। उस
में 'वै' पूर्व में नहीं। यह एक ही उदाहरण इस बात का समर्थक
है कि यह दन्त्योष्टविधि इसी अथर्वसंहिता ही की है।
। इस पुस्तक का लेखक कौन है ? इसका ज्ञान इस
अध्ययन से विल्कुल नहीं होता।
इसका ) पुस्तक का ठीक निर्माण काल वताना भी हमारे
लिये अत्यन्त कठिन है । यह बात तो सिद्ध ही है कि
अथर्ववेद के परिशिष्ट सायण के पूर्व के हैं। उन परिशिष्टों में
४६वां परिशिष्ट 'चरणव्यूह' है । उस में यह वचन है
"लक्षणग्रन्था भवन्ति । चतुरध्यायी, प्रतिशाख्यम् ,
पञ्चपटलिका,दन्त्योष्ठविधिः,वृहत्सर्वानुक्रमणीचेति" ४८
इस वचन से तो नितरां ही स्पष्ट है, कि यह पुस्तक
अथर्ववेदीय परिशिष्टान्तर्गत चरणव्यूह से पूर्व की है।
अन्य किसी भी ग्रन्थ में इसका निर्देश हमें नहीं मिला, अतः
हम इसके विषय में अन्य कुछ अधिक लिखने के असमर्थ हैं।
हस्तलिखित इस ग्रंथ के सम्पादन करने में हम ने तीन
आदर्श पुस्तकों की सहायता ली है । अ. तथा
ܟܙ
· , सामग्री :
سنت
( ६ ) व. पुस्तकों के वर्णन के लिये देखो पं० भगवद्दत्त द्वारा सम्पादित अथर्ववेदीय पञ्चपटलिका की भूमिका पृष्ट १ तथा २। (प) इस का विशेष वर्णन गर्वनमेण्ट कौलेक्शन औफ मैनुस्कृप्टस दक्कन कालेजपूना १६१६ की सूची के पृ०२६६ पर किया गया है। वहां इस का नं०. ४०५ है और चतुरध्यायिका (शौनुकीया) के अन्तर्गत इसे लिखा गया है । यह पुस्तक उस में पत्र ५७ (क) की द्वितीय पंक्ति से प्रारम्भ होता है और प०५८ (ख) की ७ वीं पंक्ति में समाप्त हो जाता है । इस पत्र की अन्तिम पंक्ति से चतुरध्यायिका अरम्भ होती है। अ, व, तथा प, इन तीन प्रकार के ही आदर्श पुरतकों के आश्रय से इस ग्रन्थ का सम्पादन किया गया है । ये तीनों ग्रन्थ भी अत्यन्त प्रमाद से लिखे गये हैं। स्थान २ पर इन में अशुद्धियें हैं। यह बात पाठक पुस्तक में टिप्पणियों के अध्ययन से जान जायेंगे । आश्चर्य तो यह है कि जो अशुद्धि एक में है वही प्रायः दूसरे दोनों में पाई जाती है। कहीं २ कुछ थोड़ा सा भेद है। आदर्श पुस्तकों से पता तो यही लगाता है कि ये तीनों ग्रन्थ किसी एक ही परिवार के लिखे गये हैं। निरर्थक विन्दु, अनुस्वार आदि स्थान २ पर दिये गगे हैं ! हम ने मूल में उन्हें नहीं दिया। मूल में बहुत स्थलों में हम ने जो पाठ शुद्ध करके दिया है, वह अथर्वसंहिता के आधार से ही दिया है । जहाँ २ पाठ शुद्ध किया गया है, वहां २ टिप्पणि में इस के हेतु आदि सब
( ७ )
इस ग्रंथ के सम्पादन में पं० भगवदत्त जी बी० ए०
रिसर्चस्कालर द० ए० वै० कालिज लाहौर ने मुझे बहुत
सहायता दी है। विशेष सहायता उन्हों ने मुझे मूल हस्तलेख
के कठिन अक्षरों के पढ़ने में दी है, अतः मैं उन का अत्यन्त
धन्यवाद करता हूँ । अन्त में मैं श्री श्रीपाद कृष्ण बलबैलकर
एम० ए० पी० एच० डीः महाशय का धन्यवाद किये बिना नहीं
रह सकता, जिन की कृपा से मुझे पूर्न के भण्डारकर इनस्टिच्यूट
से तीनों मूल हस्तलेख प्राप्त हुए । मुभी भाशा है, कि यह
ग्रन्थ अथर्ववेदाध्यायियों को अवश्य लाभकारी होगा, अतः
वेदाध्ययनइच्छुकों को इसे अवश्य पढ़ना चाहिए। यदि भविष्य
में मूल संहिता मुद्रापक, इस पुस्तक में शुद्ध किये गए पदों
को देख कर शुद्ध संहिता छापेंगे, तो मैं अपने यन को सफल
समझूगा, इति शम् ।
द० ऐ० कै कालिज
लालचन्द पुस्तकालय
लाहौर
रामगोपाल ।
फाल्गुण पूर्णिमा १६०७
No text on this page.
Writuttiritutuผนปะปน่ายเbikviนนนนนนนเkuibutilittrikit Nike
अथर्ववेदीय दन्त्योष्ठविधिः।
OmE
TUngam
No text on this page.
ओ३म् अथ दन्त्योष्ठविधिः [प्रथमोऽध्यायः।] अथवाणमृषि देवं देवहयशिरोधरम् । प्रणम्य सम्प्रवक्ष्यामि दन्त्योष्ठविधिविस्तरस् ॥१॥ दिव्य घोड़े की ग्रीवा को धारण किये हुए, (अर्थात् हय- ग्रीव) दिव्य गुणयुक्त अथर्वा ऋषि को प्रणाम करके, दन्त्योष्ठ- विधि के विस्तार को मैं कहूंगा ।।2।।* * इस श्लोक में "देवहयशिरोधरम्" जो पाठ आया है, उस से इस श्लोक की अर्वाचीनता प्रकट होती है, क्योंकि प्राचीन आर्ष ग्रन्थों में इस प्रकार के भाव-युक्त पाठ नहीं हैं, अथवा यह श्लोक प्रक्षित है। छन्दस्यध्ययने प्राप्ते विदुषामथ धीमताम् । बकारे संशयो नित्यमौष्ठ्यं दन्त्यमिति स्म ह॥२॥ इस के अनन्तर बुद्धिमान् विद्वानों के छन्द (वेद) के अध्ययन प्रारम्भ होने पर, वकार (शब्द) में नित्य संशय होता है। (वह संशय यह है, कि क्या वकार) औष्ट्य (ोष्ठों होठों) से उच्चारित किया जाता है, वा दन्त्य (दान्तों से)? ॥२॥ (१) अ, ब, प, धीयताम् । लेखकों के प्रमाद से पाठ १ ૨ दन्त्योष्ठविधिः। ३ ४ अशुद्ध लिखा गया प्रतीत होता है, क्योंकि धीयतां का तो कुछ अर्थ ही यहां नहीं बनता और "धीमतां" यहां “विदुषां" का विशेषण होने में पाठ युक्त प्रतीत होता है, अतः हमने यह पाठ स्वयं शुद्ध किया है। तस्मात्तनिधि निर्णये संशयछेदनाय च । मुक्ता दन्त्या प्रयोज्याम श्रौष्ठ्यान्वक्ष्ये क्रमाहितः।३ इस लिये इस (वकारोच्चारण ) विधि के निर्णय में, और संशय छेदन के लिये दन्त्य (वर्गों) को मुख खोल कर प्रयुक्त करे । मैं यहां क्रम से औष्ठ्य ( होठों से उच्चारित किये जाने वाले पदों को) कहूंगा ||३||* (२) अ, ब, प, “निर्णिते" । यह पाठ प्रमाद से लिखा गया प्रतीत होता है, क्योंकि ऐसा मानने से अर्थ कुछ नहीं बनता । शुद्ध पाठ हमनें “निर्णये” समझा है और वही मूल में दिया है। (३) प, "दन्त्यातू"। (४) प, प्रयोज्यास्तः । * यह श्लोक अत्यन्त अशुद्ध लिखा हुआ है। इसका उत्तरार्द्ध तो तीनों हस्तलेखों में ही पढ़ना कठिन है, अत एव अर्थ भी हमने प्राशय से ही किया है । शुद्ध अर्थ तो शुद्ध पाठ उपलब्ध होने से ही हो सकेगा। भपरं यत्र दृश्येतानिंग्ये स्पर्शनं क्वचित् । औष्ठ्यं तत्र पदे धीरो बिभीतो विभ्रतीर्यथा ॥४॥ जहां अनिग्य पद अर्थात् अवग्रह (s) न हो (प्रत्युत समस्त पद हो) उस में (यदि) वकार से परे भकार हो तो धीर पुरुप .
সমাধান্ত: { वहां (वकार ) को औष्ठ्य जाने । ( इस का उदाहरण जैसे ) "विभीतः" अथर्व २१५१ (तथा) "विनती" अथर्व ३२१४४३ ॥४॥ (५) प, शेत। अायुदाते बले बाणे बिल शब्दे तथैव च । समस्तेऽपि यत्र स्यातामन्तोदाचो विशिष्यते ॥५॥ बल ११३५॥३, बाण ६।१०।२, तथा विल १२।३।१३ शब्द आधुदाच हों तो (ये औष्ठ्य जानने चाहियें)। समस्त पद में जहाँ (आधुदाच और अन्तोदात्त हो ) वहाँ अन्तोदात की विशेषता है ॥३॥ (६) प, अन्त्योदात्तः। बलदाबलानुग्राबलधन्वा तथैव च । वलासं बाहू प्राचार्याः सर्वास्तव विभक्तियु ॥६॥ बलदा ४२१, अबलानुग्र ३१,६७, अवलधन्वा ३२१६७, और वैसे ही बलासं ५।२२।१५, बाहू . ४।२।५, प्राचार्य सब विभक्तियों में (इन्हें औष्ठ्य उच्चारित करते हैं)॥६॥ (७) अ, ब, प, " वाहूराचार्याः ”। यह पाठ भी प्रमाद से लिखा गया प्रतीत होता है, क्योंकि दीर्घ ऊकारान्त 'वाहू', के आगे विसों का होना अशुद्ध है । शुद्ध पाठ वाहू प्राचार्याः हमें प्रतीत हुआ है, जिसे हमने मूल में रख दिया है।
दन्त्योष्ठविधिः । बली बलेन बर्हिश्चाबलेन बलीयसे । अनः किल्बिषं व केतुः कुम्ब बाधिष्ट बालिति॥णा बली ३२५॥१, बलेन, बर्हिः ॥१२॥४, और अवलेन २२६३, बलीयसे ॥२॥३, ब्रनः ७२३३२,किल्बिर्ष २१६५ वाकेतुः ७१२।१, कुम्वं ६।१३८३, बाधिष्ट १८२२५ बालिति ११३॥७॥ (८)अ, ब, प, “वाकेतुः" । यह उदाहरण एक पद का वेद में नहीं है, किन्तु अथर्व ७:१२।१ के "ऋष्यो दैवः केतुः" पाठ में केतुः के पूर्व 'देवः” का अन्तिम भाग "वः" है । प्रतीत होता है, कि दन्त्योष्ठविधि- निर्माता का यह प्राशय है, कि केतुः से पूर्व वः का उच्चारण औष्ठ्य हो, दन्त्य नहीं । यद्यपि यहां पर वकार वर्ण पर संशय है वकार पर नहीं, तो भी प्रासङ्गिक वकार का भी निर्णय है । इस विधि में "नवम" अ०१ श्लो १०, “पड़वीशं' २।३ तथा "वयः" श६, २१२ पद भी ऐसे ही हैं, जिन में वकार का ही निर्णय किया गया है, वकार का नहीं । यजुर्वेदीय माण्डव्य शिक्षा में भी जहां पर औष्ठ्य पदों का संग्रह किया है, वहां वकार के प्ररकण में "ध्रुव क्षिति" "द्वयं" "वाजश्च में" "पड्वीश द्वयं” इत्यादि वकार सम्बन्धी उदाहरण भी दिये हैं। (देखो बनारस में व्रज० बी० दास कम्पनी द्वारा प्रकाशित शिक्षासंग्रह में माण्डव्य शिक्षा)। इसी प्रकार अमोघानन्दिनी शिक्षा के पृ० १ श्लो' में भी औप्ठ्य संग्रह में वकार के प्रकरण में "पड्वीशं" वकार पद का भी उदाहरण दिया है । अतः प्रतीत होता है कि यहां पर व प्रकरण में वकार भी औष्ट्य ही है।
प्रथमोऽध्यायः। , बाहुं बोधि तथा बंधुर्वहुवाधे बृहच यत् । पिबति ब्रुक्ते चैव यथार्थाः सम्प्रकीर्तिताः॥८॥ बाहुं १८/११.१, बोधि ४।३।६, (तथा) बंधुः २।१।३, बहु १।१०१३, बाधे ४॥३५१७। और बृहत् ३८१, पिवति ५५५२, और तुर्वत २०११३८१३, ये सब यथार्थ पद कहे गये हैं। (E) अ, प,"वोधु", व० "बोधी", अ. वेद में दोनों प्रकार का ही पाठ नहीं है अतः सूल में हम ने "वोधि" पाठ दिया है, जो कि वेद के ४।३२।३ मंत्र में मिलता है । प्रादर्श पुस्तकों में लेखकों की भूल प्रतीत होती है। (१०) अ, ब, प, "वतिश्चैव" । मूल में इस के स्थान पर हमने "ब्रुवते चैत्र" पाठ दिया है । इस का प्रथम कारण यह है, कि अथर्ववेद में “ब्रुवति" पद कहीं भी नहीं है, और द्वितीय हेतु यह है, कि यहां क्रिया पद के अन्त में विसौ का होना अशुद्ध है । प्रतीत होता है कि "ब्रुवतिः” पाठ "वते' के स्थान में लेखकों के प्रमाद से अशुद्ध ही लिखा गया है । बस्तवासिनो बाहकैर्वाहुवीयें तथैव च । बहवः काबवं बाहोर्बोध बढे तथैव च ॥४॥ वैसे ही वस्तवासिनः ८६१२, वाहकैः १११११११२, वाहुवीर्ये ।२१।१०, और वैसे ही वयः ११२७३, काववम् ३२३, वायोः १,६४६०, बोध २०१११७३ और बहे ॥ । ११ ૬ ૨ दन्त्योष्ठविधिः। (११) अ, ब, "वस्त बासिन" प, बस्तवासिन"। तीनों लेख पुस्तकों में पाठ विर्सग रहित है, परन्तु सँहिता में पाठ विसर्गान्त है, अतः हमनें संहिता के अनुकूल ही सूल में पाठ शुद्ध किया है । विसर्ग लेखकों के प्रमाद से छूट गये हैं । पैप्पलाद- संहिता का पाठ "वस्तवासिनः" है । (१२) अ, ब, ए, 'काव।संहिता का पाठ अनुस्वारांत है, अतः मूल में हमने पाठ काक्वं दिया है । लेखकों ने प्रमाद से अनुस्वार के स्थान पर विर्सग दे दिये हैं। पै० सं० "कावयम्" (१३) अ, ब, प, “बाहै"। संहिता में यह पद कहीं नहीं। प्रतीत होता है कि "बाह्वोः" के स्थान पर ही लेखकों के प्रमाद से 'बाद्वैः' लिखा गया है, सूल में हमने वालोः पद ही दिया है। (१४) अ, प, बहे, व, बढ़। संहिता में दोनों में से एक पाठ भी नहीं। शुद्ध क्या होना चाहिये यह हम निश्चय नहीं कर सके। अन्य हस्तलेख के मिलने से शुद्ध पाठ का निर्णय हो लक्केगा ॥ तथा बध्न्यं ताजु बहीनवमः संप्रकीर्जिताः । एते सर्वेषु शब्देषु प्रथास्पा हि मताः ||१०|| वैसे ही वन्य, वायुर्व ॥१३॥१२यह्वीः ६६६१, नवमः १३१॥५, ये (पद) सब शब्दों में प्रथम स्पर्य (अर्थात् स्पर्शों में होने वाला "व" वर्ण है प्रथम, पूर्व में जिन के) ऐले माने गये हैं ॥१०॥ १५ १७ (१३) अ, ब, "वन्य; प, वय" । संहिता में दोनों में से एक पाठ भी नहीं मिलता । वास्तविक पाठ यहां क्या होना
प्रथमेऽध्यायः
चाहिये ? यह लिखना अभी कठिन है। शुद्ध पाठ अन्य पि.सी
ह. लि. ग्रन्थ के मिलने से किया जा सकेगा।
M
(१६) यह पद भी वकारोच्चारण के उदाहरण में ही जानना
चाहिये। इस पर विशेष, १७ की टिप्पणी में देखो।
(१७) अ व, “प्रथमा स्पर्शायाः" प, स्पर्शायाल.ता ये पाठ
शुद्ध प्रतीत होते हैं. क्योंकि इस प्रकार पाठ मानने से अर्थ
कुछ
नहीं बनता। हमारी सम्मति में समस्त पद 'प्रथम स्पाः" शुद्ध है ।
शागे के ११९ श्लोक में पाठ "द्वितीय स्पर्शयों" है । यद्यपि वहां पर भी
स्पर्थः के स्थान पर स्पर्शयः पाठ अशुद्ध लिखा हुआ है, तो भी द्वितीय
के साथ यह पद समरत है । वैसे ही यदि यहां भी समस्त माने तो
अर्थ ठीक निकल पाता है। हमने जो पाठ शुद्र किया है, उस में एक
श्रापत्ति पाती है, कि चतुर्थपाद के अक्षर पाठ के स्थान पर सात
चनते हैं; जिल से छन्दो सङ्ग होता हैं। उस छन्दो भङ्ग दोष निवृत्ति
के लिये "हि" अक्षर हमने मूल में स्वयं डाला है। किसी अन्य
शुद्ध प्रादर्श पुस्तक ( mss. ) के मिलने से हम ठीक तै.र पर पता
लकेंगे, कि यहां क्या पाठ होना चाहिये, परन्तु अभी तक हमें यही
पाठ अनुकूल प्रतीत हुआ है, जो हमने फुल में दे दिया है।
૨ ૨
वैबाध देवबन्धुं च विबद्धस्तु विबन्धुषु ।
द्वितीय स्पश्यों विज्ञेयो विवबाधे तथैव च ॥११॥
वैवाध ३.६२, देववन्धु ४।११७, और विवद्धः ।२०१२,
विबंधुपु १८२२५७, (ये पद) द्वितीय स्पश्यं (अर्थात् स्पर्श .
वर्णान्तर्गत ब, वर्ण है द्वितीय जिनका जानने चाहिये । वैसे ही
विवबाधे ८६ ॥११॥
द (१८) अ, में और अ, लिखा है है , दन्त्योष्ठविधिः। " वैवाधा", घ, "देवा" । संहिता में " वैवाध " सम्बोधन पद है । प्रतीत होता है, कि ब. के अन्त अनुस्वार में विसर्ग प्रमाद से दिये गये हैं। पंचोली परिवार के जितने भी हस्तलिखित ग्रंथ हमने देखे हैं, उनमें बहुत स्थलों पर निरर्थक ही अनुस्वार दिये हुए हैं । "ब्रह्म" पद को प्रायः “ब्रह्म । अतः प, का पाठ ॥ वैवाध!" शुद्ध पदपाठ में इस पद को "वोधता" के साथ रख कर समस्त पद किया है, परन्तु यह ठीक नहीं । दन्त्योष्ठविधिः के अध्ययन से यह स्वतंत्र भिन्न पद सिद्ध है । सायणाचार्य ने भी इसे शक्षार में भिन्न सम्बोधन पद मान कर अर्थ किया है। विटने ( Whitney ) ने भी इस मंत्र की टिप्पणी में “ वैवाध", पद पर (वैवर) Weber का मत दिखाकर इसे स्वतंत्र पद माना है. समस्त नहीं । पैप्पलादसंहिता में "बाध" पद है "वैवाध" नहीं । (१६) अ"विबद्धास्तु", य०"घियधारतु",प० विवह्वीस्तु । शुद्ध पद वेद में "विबद्धः" आता है। प्रतीत होता है, कि अ. के लेखकों ने इसे बहुवचनान्त पाठ अपने प्रमाद से किया है । अन्य व, प का पाठ तो नितरां अशुद्ध है । विटनें ने श२०१२ के मन्त्रानुवाद में "विबद्धः" " के स्थान में stretchedके आगे बंधनी ( )में "विवन्ध (vi-bandh) ऐसा पाट दिया है । हिटने का यह पाठ भेद अशुद्ध है, क्यों कि किसी में भी इस का पाठ भेद नहीं मिला और साथ दन्त्योष्ठविधि ने भी निर्णय कर दिया है, कि शुद्ध पाठ क्या है । ६।११।३ में भी "विबद्धः” पद आया है "विवंध" पद तो सारे अर्थ वेद में कहीं भी नहीं, अतः हिटने का मूल में ऐसा पाठ देना निराधार है। (२०) अ० ५० "विवंधिपु",ब, "विबंधीषु" ये दोनों प्रकार के पाठ अशुद्ध है, क्यों कि इन का मूल वेद में नहीं । हमें इस के स्थान - ६ प्रथमोऽध्यायः। पर "विधुपु. १८।२।५७ पाठ उचित प्रतीत हुआ है और उसे ही हम ने मूल में देदिया है । (२१) अ० ब, प, द्वितीय स्पर्शयः । यहां पर छितीय स्पश्यः पाठ शुद्ध प्रतीत हुआ है, अतः मूल में ३।१०सी तरह इस भी शुद्ध प.रके रख दिया है। (२२) अ. "विवध", ३० "विश्वा", प० विधाधे । ५० का पाठ कुछ शुद्ध लिखा हुआ है, परन्तु वहां भी फारान्त के स्थान में ऐकारान्त पाठ अशुद्ध है। शुद्ध पाठ "विश्वाधे" ८.६६ है । म०प० का तो पाठ सर्वथा अशुद्ध है। इस श्लोक में विशेष वक्तव्य यह है, कि यहां पर प्रत्येक उदाहरण में वकार द्वितीय वर्ण स्थान में है और वफार प्रथम । इसी भाशय से इन उदाहरणों के लिये मूल में द्वितीयस्पर्शः पाठ प्राया है। वाही वाहवो बहुलं बुध्न्या बद्धकमेव च । *एते सर्वे भवन्त्योप्याये नोक्तास्ते तु दन्तजाः॥१२॥ वाही वा२७३, वाहवः ३ | १.६॥७॥ बहुलं ४।१५।६, युध्न्या १११११, और बद्धकम ६।१२११४, ये सब (पद) औष्ट्य हैं और जो (यहाँ) नहीं पड़े गये वे दन्तज अर्थात् दन्त्य हैं ।।१२।। (२:) व, प, बाह । वेद में यह पद कहीं नहीं अतः हम के स्थान पर "बाहों" पद स्वयं मूल में दिया है। (-४) अ० ० "बहुलम्" यहां पर १२वें श्लोक के प्रागे फिर म दलंक से पाठ प्रारंभ होता है, अतः प्रतीत होता है, कि यहां से दन्त्योष्ठविधि का द्वितीय अध्याय प्रारम्भ होता है यहां अध्याय का क्रम हमारा है। इति प्रथमोऽध्यायः। ने म : 7 इ.८.कुञ्ज पुस्तकों के पात्र में विसर्ग तुम मुद्ध है. अतः हमने मूल में : जर, हरण में है। इस पर इ-सा ई.वहां देखो । अ, ब, इम : " ददेशन सबसे बुकको वलिनस्तथा : ने लव र परिवेविरे ॥४॥ १४. धुरं २०१४।२, कंबूकाँ ६.१.१२.२. कुवरः ८१४१०, स्तम्बर्ज ८१.३.भोई परेको ५॥४॥ ६.८."इन्का" ३. मुका", ये दोनों पाठ अशुद्ध है. हमें "" है. दिल हमने नूरू में दिया है। '... "कुकर" पुस्तकों में विसर्ग सूटे तक में यह पाक बिल्कुल नहीं पढ़ा जाता। हम से पहपक सोन्द नगया है.परन्तु वेद में यह पाठ नहीं। इस के तार मिलना में बमोरपोकस्य" पाठ मिलता है। सारे रह यहां सादा जाये तो इन्दोभा होता है, प्रतः मारूविक पार पहालिनीय है।
द्वितीयोऽध्यायः ३ ६ ८ बहिष्ठः बुध्न्यः पड्वीशमबुंदं बधिरस्तथा। आबयोबिन्दुः संबिंब काहाबामुदुम्बलम् ॥३॥ बहिष्ठः ४॥३४॥५, बुध्न्यः १११३, पड्वीशं ८१४, अर्बुदम् ११११११५, तथा बधिरः ११।४।२, आवयो ६।१६।१, विन्दुः ॥२१, संबिंबम्, काहाबाहम् १३।११, उदुम्बलम् पा१७॥३॥ अ,ब, प, “वहिष्टे" यह पाठ भी लेखकों की भूल से भशुद्ध लिखा गया है। शुद्ध पाठ "बहिष्ठः" है जिसे हम ने मूल में देदिया है। इस पद पर भी बहुत विवाद था। शङ्कर पाण्डुरंग ने १३४.५ में प्राये हुए, इस पद को मूल तथा पद पाठ में "बहिष्ठः” ही के रूप में दिया है ।.राँथ हिटने के य. वेद में पाठ "वहिष्ठः" है, सायणाचार्य ने भी भाष्य में “वहिष्ठः" क्कारादि पद मान कर ही अर्थ किया है। विटनें ने अंग्रेजी भाप्य में इस मंत्र की टिप्पणी में ऐसा लिखा है, The mss. ( with the exception, doubtless accidental, of our P. k. all read bàhisthas at end of a, and this S. PP. retains, while our text makes the obviously called for emendation to vàh, the comm. has vàb. इस ऊपर के लेख में विटनें ने भी “वहिष्ठः” पाठ स्वीकार किया है । Vedic concordance वैदिक कनकार्डेन्स में ब्लूमफील्ड ३०६ में वकारादि पाठ ही माना है, बफारदि नहीं, परन्तु हमारी सम्मति में शंकर पाण्डुरंग का पाठ शुद्ध है, क्योंकि दन्त्योष्ठविधि में इसे धकारादि से ही लिखा गया है । अतः सारण, राँध, हिटने आदियों की कल्पना ठीक नहीं । 1. ने भी पृ० १२ दन्त्योष्ठविधिः। (४) अ, ब, प, बुधन्य । आदर्श पुस्तकों के पाठ में विसर्ग नहीं है, परन्तु यह पाठ विसर्गान्त शुद्ध है, अतः हमने सूल में विसर्गान्त पाठ दिया है। (५) "पड्वीशं” भी वकार के उदाहरण में है। इस पर हमने ११७ की. टिप्पणी में विशेष लिखा है, वहां देखो । अ, ब, "पड्वीशमबुंदं" प, “पड्वीशदर्बुदम्" । (६) अ, ब, “विन्दु" प, “विंदु"। (७) यह पद वेद में नहीं। (८) प, "काहाबीहं"। ९ ११ कन्नु पीबसि बंधुरं कंबूकाँ बलिनस्तथा : कुबेरः स्तम्बज बोपब्दैः परिवेधिरे ॥४॥ कनु ११॥३॥६, पीवसि ॥१॥४, बधुरं १०।४।२, कंबूकाँ १११११२६, तथा बलिनः १४।२।२, कुबेरः ८।१४।१०, स्तम्बर्ज ८६५, वभ्रोपब्दैः, परिबेधिरे ६।१३३॥५॥४॥ (६) अ, प, “कम्बूका", ब, कबुका। ये दोनों पाठ अशुद्ध है, वेद में पाठ "कंबूकान्" है, जिसे हमने भूल में दिया है। (१०) अ, ब, प, “कुबेर"। प्रादर्श पुस्तकों में विसर्ग टे हुए हैं। (११) अादर्श पुस्तकों में यह पाठ बिल्कुल नहीं पढ़ा जाता। हम से यह पाठ "वभ्रोपन्दैः"पढ़ा गया है,परन्तु वेद में यह पाठ नहीं। इस के साथ मिलता हुआ वेद में “वभोरपोदकस्य" पाठ मिलता है । यदि यह पाठ यहां माना जावे तो छन्दोभङ्ग होता है, अतः वास्तविक पाठ यहां चिन्तनीय है।
द्वितीयोऽध्यायः। १३ ૧ ૨ ३. असंबाधे नैर्बाध्येन बद्धे बद्धानि कूल्बजं । बतो बतासि बंधुं च बिसं क्लीवं बुजे बुजः ॥५॥ असंबाधे १८ा।२०, नैर्वाध्येन ६७५।१, बद्धे बद्धानि २३।४।४५, कूल्य १२१७/१, बतो बतासि १८।१।१५, वंधुं ५११३७, विसं २१७१६, क्लीवं ६।१३८१, बुजेबुजः॥१॥ (१२) "वद्ध बद्धानि" पदों पर बहुत विवाद था। दन्त्योष्ठविधि ने इल का पूरा निर्णय कर दिया है । यह पद अ० वेद १३।४।४५ में आये हैं । शङ्कर पाण्डुरङ्ग सम्पादित वेद से पाठ "वध्ये वद्धानि" है । शङ्कर पा० ने इस पर बहुत से पाठ भेद नीचे उद्धृत किये हैं। A. D. S "बध्ये बद्धा" R. बढे बढ़ा। Cs यध्वे बधा । E बवे चद्धा । B C P J बद्ध बद्धा । P बद्ध बद्धानि । K KV बध्वे चद्धा । DC बद्ध बद्धा Changed to वध्वे बद्धा। CP बद्ध बद्धानि Changed from बद्ध बद्धानि । R W बद्धे बद्धानि । राँथ तथा हिटनें द्वारा सम्पादित अ० संहिता में "बद्ध वद्धानि" पाठ है । १८८४ में सत्यनारायण प्रेस बंबई में सेवक- लाल ने भी राँथ वाले वेद की नकल करके पाठवही दिया है। अजमेर वैदिक यन्त्रालय वालों ने शंकर पाण्डुरंग के अशुद्ध पाठ की नकल करके पाठ अशुद्ध ही छापा है (अजमेर यंत्रालय में कार्य अत्यन्त असावधानी से होता है अतः उन के ग्रन्थों में जहां तहां अशुद्धिये भी बहुत हैं) १८०५ में Harvard oriental series में जो अथर्व संहिता का English अनुवाद विटनें ने निकाला है,उस इस पद पर उसने एक बड़ी दीर्घ टिप्पणी लिखी है :- 4 १४ दन्त्योष्ठविधिः। The translation emplies the readings "बद्वे वद्वानि" on account of the accent. which seem probably meart by the mss. which vary between वध्व-, बद्ध-बद्ध-,k reads बद्ध बद्धानि, D बढे बद्धानि SPP's authorities also exhibit very wide disagreements, which reflect a. corresponding uncertainty • of the tradition.) The word is just such a one as the mss, might be expected to boggle and blunder over, both they and we being left without help from the sense. Henry, who accepts the same emendation, understands (बद्वे) badve as Locative, which is perhaps better, and at any rate favored by the fact that the of text does not read बद्व इति. इस ऊपर के लेख से विटन ने यह सिद्ध किया है,कि वास्त- विक पाठ " बढे वद्वानि" होना चाहिये और अन्य पाठ अशुद्ध हैं। विटने की यह बात ठीक नहीं १८५६ में जो विटने में राँथ के साथ मिलकर संहिता छपवाई थी उस में तो उसने "बद्ध बद्धानि पाठ दिया है। प्रतीत होता है कुछ काल पीछे ह्विटनेने विचार बदल कर कहीं पर पाठ भेद वाला लेख लिखा था, इस बात का खण्डन Griffth ग्रिफथ ने अपने अनुवाद की टिप्पणी में कर दिया है। ऐसा लिखने पर भी १६०५ में अपने अनुवाद में विटनें ने पाठ "वद्वे वद्वानि" ही लिखा है। परन्तु यह अशुद्ध है। हमारे पक्ष को जहां अन्य कई हस्तलिखित mss. पुष्ट कर रहे हैं,वहां पर दन्त्योष्ठ- विधि ने तो सारा पक्ष ही स्फुट कर दिया है । अ० संहिता सम्पा- दकों को चाहिये कि आगे से इस पाठ को शुद्ध करके 'पद्धे बद्धानि' ही लिस् । (१३) अ, ब, कूल्यजं; प० फूलज । शुद्ध पाठ कूल्वजं ॥
१७ द्वितीयोऽध्यायः । (१४) अ, ब, युजे बुजः ; प० बुजे बुनः । अथ संहिता में न अ, ब, का पाठ है और न ही प, फा । प्रादर्श पुरतफें तीनों ही बड़े प्रमाद से लिखी हुई हैं, अतः शुद्ध पाठ कः निर्णय फरना कठिन है । मूल में हमने प० का पाठ दिया है, क्योंकि इस श्लोक में बद्ध बद्धानि, बतो वतासि, फी न्याई यह भी पद युगल ही प्रतीत होता है । संहिता में “वजः" पद ८।६।३,६,७,२४। में पाया है, जिस के साथ यह पद कुछ मिलता है, परन्तु वहां भी बजे बजः इकट्ठा पाठ नहीं, अतः पाठ की वास्तविक स्वरूप चिन्तनीय है। वधान प्राधायाश्चोत्वं कावेरकरतथा । आवेधुरैलनश्चैवावेधे वरिहकानिच ॥६॥ वधान ११४४, माबंधायाः, और उल्वं ४२८, तथा कावेरकः ८।१४।११, आवेधुः ।।६, ऐलयः ६।१६।३, आवेधे श२८११, और वलिहकान ५१२२१७ ॥६|| (१५) अ, ब, बंधनं। (१६) यह पद वेद में नहीं। यह पाठ शुद्ध नहीं पढ़ा जाता शुद्ध पद क्या है, यह चिन्तनीय है। (१७) श्र, च, श्रावधे। (१८) अ, ब, प, बल्हिकानि । वेद में यह पाठ नहीं । प्रतीत होता है, फि अादर्श पुस्तकों में पाठ अशुद्ध है । अबोधि बार्हत्सामे घोपबुद्धा तथैव च । बंधनं यत्र शेष स्यादावधे मे निदर्शनम् ॥७॥ अबोधि१३।२।४६,बाहत्सामे ॥२६॥५,घोपबुद्धा॥२०॥५, . २१ दन्त्योष्ठविधिः। वैसे ही बंधनं ६।१४।२, जहां शेष रहता है। आवधे ५।२८।११, मेरा उदाहरण है ॥७॥ (१६) अ, ब, "घोष बुद्धाः", ब, “घाघुबुद्धाः" दोनों पाठ प्रसाद से लिखे गये हैं, शुद्धं पाठ संहिता के अनुकूल हमने मूल में दे दिया है। अलाबु बजः बासं स्यादाझुदात्तो यदा भवेत् । ब्रह्म शब्दं तु सवार्थमौष्ट्यमेव विदुर्बुधाः ॥८॥ अलाबु ८१४।१४, वजः ८६॥३, बाणं १०१२।१७ यह पद समूह जव आत्रुदात्त हो तो औष्ट्य हैं । ब्रह्म १११०१४ पद तो सब अर्थों में ही बुद्धिमान शौष्ठ्य जानें। (२०) ८।१।१ में यह पद "अलावुना" के रूप में आया है और ८।१४।१४ में "अलाबुपात्रम्" के साथ आया है । हमने ८।१४।१४ के साथ आये सम्बद्ध पद में रक्खा है। (२१) अ, ब, प. "बुज" । प्रादर्श पुस्तकों में जो वकार में उकार है वह प्रमाद से लिखा हुआ है। (२२) अ, व, प. "बुधान्" । श्रादर्श पुस्तको का पाठ अशुद्ध लिखा हुआ है, शुद्ध पाठ हमने "बुधा" दिया है। छुबुकाब्द दष्कये बाले केशवाले तथैव च । अधिवाले वयः प्रोक्तं शेपेषु परिमाणतः ॥॥ छुबुकात् २।३.३३ वष्कये ६१४६, वाले, केशवाले को मूल २४ ૨૬ द्वितीयोऽध्यायः । १७ वैसे ही अधिवाले और दयः २०११.२९।१५, शेप (पदों में) परियाण से ही (ौष्ठ्य पदों का निर्णय करे) (२३) अ, ब, प, " वकयोः" । लेखकों के भ्रम से अशुद्ध लिखा गया है, शुद्ध पाठ "चकये" है जिसे हरुने मूल में रक्खा है। (२४, २५, २६) बाले, केशवाले तथा अधिवाले पद वेद. में नहीं हैं, अतः ये पद चिन्तनीय हैं। (२७) यह पद वकार के उदाहरणा का है, इस पर विशेष लेख हमने ११७ की टिप्पणी पर दिया है। (२८) अ, ब, प, “परियाणता" प्रतीत होता है आदर्श पुस्तकों में तकार के अन्त में आकार प्रमाद से लिखा गया है। २९ ३० बिभेदादिषु भेदाश्च परि पूर्व बले तथा । बंधु वा सिंधुरपर एतेषां तु बलः कचित् ॥१०॥ विभेद २१॥३, आदि के अन्य भेदों में (अर्थात् विभिदुः २०१७७६, आदि पदों में) तथा परि पूर्वक "वले" पद में "बंधु" ॥१०॥ (२६) प, विभिदादिषु । (३०) यद्यपि बले पद अ० चेद में २।२६१, और ११८।१७ में आया है, परन्तु इस के पूर्व परि उपसर्ग कहीं भी नहीं पाया; अतः यह पद भी विचारणीय है । (३१) बंधु पद ५१३१७ में आया है, परन्तु श्लोक के अर्थ से. जो सिन्धुरपर आया है, उस सिन्धु पद के साथ यह नहीं आया.. विशेष बात तो यह है, कि इस श्लोक का उत्तरार्ध का अर्थ हमें समझ नहीं आया, इसी खिये हमने इस का अर्थ नहीं किया।
दन्त्योष्ठविधिः । (३२) अ, य; प, बलः । वेद से दिसन्त पाठ नहीं, संहिता में या तो 'बलम्" १।३.१३ पाठ है या "वला ११ है । लेख का पाठ चिन्तनीय है। ३४ तुडुब्दश्चुबुकश्चैव बभूवुझ्च बस्नुपी । एते सर्वे परित्यज्य बकारोन्योन्य भत्तन ॥११॥ तुक्षुब्दः, चुबुकः और वधूवुः धारा२२ और बभूवुषी २१५।२१, इन सब को छोड़ कर कार परस्पर ॥११॥ इति रितीयोऽध्यायः। दन्योष्ठविधिःसमाप्तः ॥ (३३) अ, ब, तुचुन्दः, ५० कुछुद्धः। आदर्श पुस्तकों का लेख इतना अशुद्ध है, कि वास्तविक पद पढ्ने कठिन हैं। यह पद वेद में नहीं हैं। इस का वास्तविक निर्णय अन्य ह. लि. ग्रंथ के मिलने से होगा। (३४) चुबुका भी संहिता में नहीं । (३५) अ, प, एताः सर्वाः, व "एताः सर्व"। शुद्ध पाठ हमें एते सर्वे प्रतीत हुआ है, अतः यही पाठ मूल में दिया है। (:६) श्लोक का चतुर्थ पाद बहुत ही अस्पष्ट है, भ, ब, वकारोन्यान्य भक्षन । भक्षयेदिति, प, वकारान्चौन्य भक्षदिति ॥ इस का पाठ शुद्ध न होने से इस अर्थ नहीं कर सके, यदि कोई और हस्त लिखित ग्रंथ मिलेंगे तो शुद्ध पाठ देखकर अर्थ शुद्ध किया जावेगा। इति दन्त्याष्ठविधिभावानुवादसहितःसमाप्तः ।
दन्त्योष्ठविधि पद सूची। - . (अ) १-अबलधन्वा श६। २-अवलानुन १६ ३-अवलेन १७ ४-अबाधि राजा ५-अर्बुदम् ॥३॥ ६-अलावु शा ७-असंबाधे श५ (प्रा) ८-प्रावधे २७ -पावयो २॥३॥ १०-आवेधुः ॥६॥ ११-अ.बंधेरा। (उ). १२-उदुम्बलं ॥३॥ १.३-उल्वं शद। २०-काहावाहं ॥३॥ २.-किल्बिषम् १७ २२-क्लीबं राश २३-कुबेरः २४ २४-कुम्ब ६७ २५-कूल्बज शश (घ) २६-घोषवुद्धा २१७॥ (च) २७-चुवुकः ॥११॥ (छ) २८-छुबुका शहा (त) २६-तावुवं ११० ३०-तुछब्दः ॥११॥ . . (ऐ) . १४-ऐलवः २६ (क) १५-कब्रु २४॥ १६-कम्बलं ॥२॥ १७-कम्बूकाँ राहा १८-काववं ११९॥ १६-काबरकः राहा ३१-देवबंधुं १।११॥ (न) ३२-नवमः ॥१०॥ ३३-नैर्वाध्येन शश (प) ३४-पड्वीशं २२३ ३५-परिबेधिरे शा ३६-पिवसि श; । -- है पद सूची। ३७-पीबति ।४। ३८-प्राबंधायाः रा. (ब) ३६-चजः २८ ४० बरामहाँ असि ।। ४१-बतो बतालिश ४२-बद्धकम् ॥१२॥ ४३-बद्ध बद्धानि २५ ४४--बधान ।। .. ४५.-बधिरः ॥३॥ ४६-बधयं ११॥ ४७-बभूवुः २०११ ४८-बभूवुषी. २०११ ४६-बभ्रोपदैः ।। :-बर्जा २।। ५१-बहिः १७॥ ६३-बस्त वासिनः १९ ६४-बहवः १६ ६५-~-बहिष्ठः २३ ६६-बहु । ६७-बहुलं १.१२ ६८-बहीः ११० ६६-बढे ११६. (बा) ७-बाणा १५ ७१-चाणं.८ ७२-बाधे १८ ७३-बाधिष्ट १७ ७४-बार्हत्सामे २७ ७५-बालिति १७ ७३-चाल राह ७७-बाहवः श१२ ७८-वाहुं ११८ ७९-बाहु बीर्य १६ ८०-बाईकैः ११९ ८१-वाहो वह ८२-बाहू श६ ८३-बाहौ ११२ ५२--बयः १२। ५३-बलः २०११ ५४-बलम् ११ ५५--बदा १॥५॥ ५६-बलास ५७-घलिनः । ५८-बली १७ ५६ बलेन २' ६०-बल्बज..।। ६१- बल्हि कान् २६ ६२.--वाकये । ८४-विन्दुः २३ ८५-विभीतः १ ८६-बिभेद २०१० ८७-विभ्रती १४ - दन्त्योष्टविधिः । १०२-धंधुः १०३- बंधुर ८ १०.-नः७ १०५-बदा २२,२८ १०६-यंत ११८ ८५-विला ११५ ८९-विष्कल २२ २०-विस २५ (बी) ६-बीज २२ (४) १२-बुजे बुजः २२ ६३-धन्यः २३ ५४-बुध्न्या ११२ १) ६५-वृहत् ११८ (ल) १०६-लिमा २२ () 1 ब) १०६-वयः शर १०६-विवसः ।।११ ११. विववाधे ११ १११-विधुगु १११ ११६ वैवाध ११ ११३--मः सेतुः १७ ६-येधिः १२ (वो) १७-बोध १४-बोधि । (4) १६-बंधनं ७ १००-बंधु १० १०२-बंधुंना (श) ११४-शबले . २.५-संक्विं १२६-स्तम्बर ॥ भोम् ॥ दयानन्द महाविद्यालय संस्कृत ग्रन्यमाला । इस ग्रन्थ माला में संस्कृत के प्राचीन आर्य अलभ्य अमूल्य और अप्रकाशित ग्रन्थ छपते हैं । कई एक प्रार्थ ग्रन्थों के अनुवाद तथा धेद संरक्षक स्वतंत्र पुस्तकें भी प्रकाशित होती हैं । इस ग्रन्थ- माला से प्रार्थ साहित्य की कितनी सेवा हो रही है, यह पाठक ग्रन्थावलोकन से ही जान सकते हैं । इस ग्रन्थ माला में अधिक से अधिक पांच रूपय वर्ष के ग्रन्थ प्रकाशित होते हैं । स्थायीग्राहक बनने का शुल्क ॥) है। स्थायीग्राहकों को ग्रन्थ मूल्य पर मिलते हैं। वैदिक साहित्य प्रेमियों को इस ग्रन्थमाला का स्थायीग्राहक शीघ्र ही घन न.ना चाहिये। प्रकाशित पुस्तकें- (१) अथर्ववेदीय पंच पटलिका। (२) ऋग्वेद पर व्याख्यान । (3) जैमिनीयोपनिषद् ब्राह्मण । (४) दन्त्योष्ठ विधि। पुस्तकें जो प्रैस के लिये तय्यार हैं:- (१) वैदिक कोश (शाखा ब्राह्मणादि में किये गये वेद- पदार्थ का संग्रह। घेद में यम का स्वरूप । (३) अथर्ववेदीय माण्डूकी शिक्षा। पुस्तकें जो प्रेस के लिये तय्यार हो रही हैं। (२) अथर्ववेदीय बहुत सी पुस्तकें । () जैमिनीय ब्राह्मण। भगवद्दत्त सुप्रिंटैण्डैण्ट रिसचं विभाग दयानन्द महाविद्यालय लाद्दौर ।
No text on this page.
।। ओम् ॥ दयानन्द महाविद्यालय संस्कृत ग्रन्थमाला। इस ग्रन्थ माला में संस्कृत के प्राचीन आर्ष अलभ्य अमूल्य और अप्रकाशित ग्रन्थ छपते हैं। कई एक आर्ष ग्रन्थों के अनुवाद तथा वेद संरक्षक स्वतंत्र पुस्तकें भी प्रकाशित होती हैं । इस ग्रन्थ- माला से आर्ष साहित्य की कितनी सेवा हो रही है, यह पाठक प्रशावलाकम से ही जान सकते हैं। इस अन्थ माला में अधिक से हाधिक पांच रूपय वर्ष के ग्रन्थ प्रकाशित होते हैं । स्थायीग्राहक बनने का शुल्क १) है। स्थायीग्राहकों को ग्रन्थ मूल्य पर मिलते हैं। वैदिक साहित्य प्रेमियों को इस प्रन्यासाला का स्थायीग्राहक शीघ्र ही पान जाना चाहिये। प्रकाशित पुस्तकें:- (१) अथर्ववेदीय पंचपटलिका । (२) ऋग्वेद पर व्याख्यान । (३) जैमिनीयोपनिषद् ब्राह्मण । (४) दन्त्योष्ठविधिः। पुस्तकें जो प्रेस के लिये तय्यार (१) वैदिक लोश (शाखा ब्राह्मणादि में किये गये वेद- पदार्थ का संग्रह। (२) वैद में यम का स्वरूप । (३) अथर्ववेदीया मागकी शिक्षा । पुस्तकें जो प्रेस के लिये तय्यार हो रही हैं। (२) अथर्ववेदीय बहुत सी पुस्तकें । (२) जमिनीय ब्राह्मण । भगवद्दत्त सुप्रिंटैण्डेण्ट रिसर्च विभाग दयानन्द महाविद्यालय लाहौर ।
No text on this page.