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Om Brihat Sarvanukramnika Of The Atharva Veda
Front matter
ओ३म्
दयानन्द महाविद्यालय संस्कृत-ग्रन्थमाला।
अनेक विद्वानों की सहायता से
भगवद्दत्त
मंस्कृताध्यापक वा अध्यक्ष अनुसन्धान विभाग
दयानन्द महाविद्यालय, लाहौर द्वाग
सम्पादित ।
ग्रन्थाङ्क ६ ।
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श्रीमद्दयानन्द महाविद्यालय संस्कृतग्रन्थमाला सं०६
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ओ३म्
अथर्ववेदीया बृहत्सर्वानुक्रमणिका।
No.
भूमिका तथा सूचियों सहित ।
सम्पादक
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पण्डित रामगोपाल शास्त्री
अनुसन्धान कर्ता दयानन्द महाविद्यालय,
तथा अध्यापक श्री दयानन्द ब्राह्म
महाविद्यालय, लाहौर।
Meanide0000000000000000001
आर्य सम्वत् १९६०८५३०२३ ।
विक्रम सं०१९७६
सन् १९२२ ई०।
दयानन्दाब्द ३६ ।
प्रथम संस्करण ५०० प्रति मूल्य रुर
DEPRESSIPRITHVIRVICTORIAS
लालजीदास के प्रबन्ध से हिन्दी प्रैस हौस्पिटल रोड, लाहौर में छपी
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PRINTFD) 18 LALNI DASS
MANAGER HINDI PRESS, HOSPITAL ROAD, LAHORE.
AND PUBLISHED BY
THE RESEARCH DEPARTMENT, D. A. V. COLLEGE, LAHORE.
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* ओ३म् * भूमिका। 'ज्ञान के विना मनुष्य पशु के समान है' यह लोकोक्ति सर्वत्र प्रसिद्ध है। वह ज्ञान मनुष्य के अन्दर दो प्रकार का है, एक स्वा- भाविक और दूसरा नैमित्तिक । स्वाभाविक ज्ञान गत अनेक विध जन्मों के संस्कारों का फल है, जो कि अव्यक्तरूप में सदा मनुष्य के अन्दर बना रहता है। उस प्राकृतिक ज्ञान का विकाश निमित्त से होता है। किसी निमित्त से होने वाले ज्ञान का नाम नैमित्तक ज्ञान है। सर्गारम्भ में अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न हुए मनुष्यों में यद्यपि गत जन्मों के उच्चतम संस्कार थे, तो भी बाह्य निमित्त के विना तथा भाषा के विना उनका प्रादुर्भाव होना असम्भव था। अतः आवश्यक था कि जिस जगत्स्रष्टा ब्रह्म ने संसार में मनुष्यादि प्राणियों के जीवनाधार के लिये अनेक पदार्थ रचे हैं, जिसने अपनी पूर्ण शक्ति से इस सृष्टि को पूर्ण बनाया है, वह मनुष्यों को अपने भाव प्रकट करने के लिये, कर्तव्याकर्तव्य का परिचय कराने के लिये, सांसारिक पदार्थों से उपयोग लेने के लिये मनुष्यों को भाषा और ज्ञान देता है। जो शान उस ज्ञान स्वरूप प्रभु ने श्रादिम आत्माओं में प्रकट किया उसी ज्ञान का नाम वेद है, यह वेद भक्त श्रार्यों का निश्चित तथा दृढ़ सिद्धान्त है । यह विचार आर्यों का निर्मूल नहीं, प्रत्युत इसके आधार के लिये ऋग्वेद की श्रुति विद्यमान है “यशेन वाचः पदवीयमायन् तामन्वविन्दन ऋषिषु प्रविष्टाम्" ऋ० १० । ७१ । ३ यज्ञ ( ईश्वर ) से (धीर लोगों ने ) बाणी का मार्ग प्राप्त किया, उस ( वाक् ) को उन्होंने पाया जो कि ऋषियों में प्रविष्ट हुई २ थी। ऋग्वेद का यह सारा , - [ २ ] का साग ही सूक्त प्रारम्भिक ज्ञानोत्पत्ति के सम्बन्ध में है, विशेष पालोचक इस सूक्त को वहां देखें ॥ वह शान जो कि अपौरुषेय माना जाता है, लोक में वेद के नाम से प्रसिद्ध हुआ यह विश्वास भारत में ब्रह्मा से लेकर दया- नन्द पर्यन्त ऋषियों का है । संस्कृत के आर्प साहित्य में वेद से लेकर सूत्र ग्रंथ, रामायण तथा महाभारतादि किसी ग्रंथ को भी उठाकर देखें तो उसमें इसी पूर्वोक्त मत का समर्थन किया हुआ है। यह वेद भार्या साहित्य में श्रुति, निगम, श्रागम, त्रयी, छन्दः, स्वाध्याय, मन्त्र, वाक्, विद्या, संहिता आदि नामों से प्रसिद्ध है। वास्तव में वेद एक ही है तो भी विशेष नियम से यह चार भागों में विभक्त किया गया है, जो कि ऋक्, यजुः, साम तथा अथर्व के नाम से प्रसिद्ध हैं । ये चारों वेद पुरा काल से ही प्राय्यों के श्रद्धा भाजन हैं। इसके चार विभागों का वर्णन स्वयमेव भगवती श्रुति में ही आता है ‘चत्वारि शृङ्गा त्रयोऽस्य पादाः' ऋ०४।५८३ 'चत्वारे शृङ्गेति वेदा वा एते उक्ताः' निरुक्त परिशिष्ट ११७ ऋग्वेद के इस मंत्र में चत्वारि पद से चार वेद अभिप्रेत है । यास्क ने भी यही स्वीकार किया है। वेद चार होने पर भी इसका नाम त्रयी क्यों पड़ा इसका विवेचन हम आगे जाकर करेंगे । उन्हीं वेदों की आगे जाकर प्रवचन भेद से अनेक विध शाखायें बनी ( श्राख्या प्रवचनात् जै० सू० )। ऋग्वेद की २१ यजुर्वेद की १०१ सामवेद की १००० और अथर्ववेद की शाखायें बनीं, देखो० महाभाष्य पस्पशान्हिक,शौनकोक्न चरणव्यूह परिशिष्ट सूत्र, विष्णु, स्कन्द, भागवत, मार्कण्डेय, देवी भागवत श्रादि पुराण, तथा मुक्तिकोपनिषद् इनमें भी शाखायों का वर्णन किया गया है और इन सब में स्वल्प भेद भी है। मुख्य प्रमाण महाभाध्य का ही इस समय सर्व विद्वन्मएडली को स्वीकृत है । इसी प्रकार भिन्न २ शाखाओं के भिन्न २ ब्राह्मण तथा सूत्रादि निम्मित हुए, . , . [ ३ ] जिस से आर्ष वाङ्मय इतना बढ़ा कि स्यात् ही किसी जाति का साहित्य इतना बढ़ा हो । इसी प्रकार पुस्तकों परपुस्तकों के वनने से सैंकड़ों ग्रंथ आर्य जाति के वने; परन्तु काल चक्र से सैंकड़ों ग्रंथ लुप्त भी होगये, कुछ अवशिष्ट रहे जो कि भिन्न २ शाखीय ब्राह्मणों ने स्मरण कर रखे थे, वा अपने २ घरों में अत्यन्त सुरक्षित रख्खे थे, परञ्च यह अवशिष्ट साहित्य समुद्र में विन्दु के बराबर बचा है। यही एक मात्र कारण है, कि वेद के अनेक मंत्रों का रहस्य खुलता नहीं; क्योंकि वे ऋपि जिन्हें इसका साक्षात् वा परम्परा सम्वन्ध से यथार्थ ज्ञान था उन्होंने विशेष २ रहस्यों को स्व २ शाखा तथा कल्प, गाथा, नाराशंसी, इतिहास, पुराण, स्मृति, उपनिषद् तथा सूत्रादि ग्रंथों में खोला था, और ठीक २ अर्थ लिखे थे, अव उनके प्रभाव से कई २ स्थल वेद में ऐसे आते हैं जो कि अव समझने कठिन हैं । जो कुछ थोड़ा बहुत अभी तक जैसा कैसा समझ भी प्राता है, वह भी उपलब्धशाखा, ब्राह्मण तथा अङ्गादि ग्रन्थों की सहायता से । यदि ये ग्रंथ भी न होते तो समग्र प्रयास करने पर भी हम वेद के विषय में कुछ न समझ पाते । ज्यो २ भारत का प्राचीन साहित्य उपलब्ध होगा, त्यों २ वेदादि ग्रंथों के भाव को हम अधिक समझेगे यह हमारा दृढ़ विश्वास है ॥ यह 'बृहत्सर्वानुक्रमणी' नामक ग्रंथ भी वैदिक साहित्य का एक छिपा हुआ जिसके मिलने से वेद के बहुत से स्थल अधिक स्पष्ट हुए हैं। हमारी इच्छा है, कि पाठकों को इस नवीन ग्रंथ के विषय में पूर्ण परिचय दिया जावे कि (१) यह ग्रंथ क्या है ? (२) इसका किस वेद से सम्बन्ध है ? (३) और इसकाक्या लाभ है ? जिस से कि इस ग्रंथ सम्बन्धी समग्र कौतूहल समाप्त हो॥ इस ग्रंथ का सम्बन्ध तोअथर्ववेद से है। प्रथम तोवेद विषय में ही संसार में बहुत मत भेद हैं अतः आवश्यक है, कि इस के लिये वेद तथा विशेष रूप से अथर्ववेद के कालीद का मोती था, [ ४ ] निर्णय प्रथम हो जाना चाहिये । तदनु अथर्व सम्बन्धी समग्र साहित्य का कुछ न कुछ परिचय पाठकों को हम करायेंगे ॥ हैं। वेद तथा इसका काल। जब से युरोपियन जातियों का भारत से सम्बन्ध हुश्रा तब से संस्कृत साहित्य में दिन प्रतिदिन युरोपस्थ विद्वानों की रुचि इस ओर बढ़ती गयी है। पढ़ते २ वे लोग भारतीय साहित्य की पराकाष्ठा वेद तक पहुंचे और वेद को पढ़ते ही उन्होंने अपनी रीति के अनुकूल इसका भी तिथि आदि निर्णय का परिशीलन प्रारम्भ किया। यद्यपि इस साहित्य का विशेषाध्ययन १६५१ ई० में श्राब्रह्मम रोगन (Abraham Rogen) से प्रारम्भ होता है, जिसने कि पहल भर्तृहरि शतक का अनुवाद प्रकाशित किया था। इसके अनन्तर १७७५ ई० में फ्रांसीसी विद्वान् Anquetil Dic Perron ने उप- निषदों का अनुवाद लेटिन Latin में किया था, परन्तु वेद विषय में उसने भी कुछ न लिखा । सब से प्रथम वेद पर लिखने वाला H. T. Colebrook 1765–1857 में हुश्रा, जिसने कुछ वेद पर लिखा, परञ्च वेद निर्माण की तिथि का निर्णयादि वह भी न कर सका । १८३८ ई० में F. Rosen ने ऋग्वेद की पुस्तक प्रकाशित की और Rudolf Roth राथ ने १८४६ ई० में वेद के इतिहास और साहित्य पर पुस्तक लिखकर अपने विचार वेद विषय पर प्रकट किये, ऐसे ही Wilson ने भी विचार प्रकट किये, परंच वेदकाल पर निश्चित मत उन्होंने कोई भी प्रकट न किया। अंत में १८५६ ई० में प्राचीन संस्कृत का इतिहास नामक ग्रंथ लिखकर पं० मैक्समुल्लर ने जो परिष्कृत विचार तत्कालीन विद्वानों के सामने रख्खे वही सिद्धान्त उनकी दृष्टि में सर्व मान्य तथा श्रद्धास्पद हुश्रा । मैक्त- मुल्लर ने बड़ी उदारता से वेद की तिथि १२०० ई० पू० रख्खी और - [ ५ ] शेष साहित्य को इसके अकालीन रख्खा । यद्यपि इसके पीछे जैकोबी तथा तिलक ने ज्योतिष के आधार से वेद का समय चार और पांच सहस्र ई०पू०से भी ऊपर कासिद्ध किया, परं तो भी अाज तक जैसा तिथि का सिक्का साम्प्रतिक लोगों में मैक्समुल्लर का माना जाता है अन्य किसी का नहीं। हमने मैकसमुल्लर के इतिहास में उसके वेद काल निर्णय पर सव विचार पढ़े हैं, परन्तु हमे उसका कोई भी हेतु ऐसा नहीं मिला जो उसने किसी दृढ़ आधार पर लिखा हो, प्रत्युत सब कुछ अनुमान और कल्पनासे उस ने लिखा है। अलग्जेण्डर का काल निर्णय करके फिर तत्कालीन साहित्य से दो २ सौ वर्षों का अन्तर डालकर वह छन्द काल तक १३०० ई० पू० तक पहुंचा है। आज हम कुछ नवीन विचारों से मै० १० मु० के विचारों की परीक्षा करेंगे- प्रथम तो जो दो २ सौ वर्ष का अन्तर उसने स्वीकार किया है, वह नितरां हास्यजनक और अग्राह्य है अतः यह कल्पना ठीक नहीं । वास्तव में तो वेदकाल निर्णय एक साहस मात्र ही हैं, तो भी हम भिन्नदेशीय दो एक प्रमाणों से सिद्ध करेंगे कि, जय ब्राह्मणकाल ही मैक्समुल्लर के वेदकाल से ऊपर चला जाता है, तो वेदकाल की क्या कथा । प्रथम हम पाठकों के अभिमुख मिनी. धर्म के प्राचीन विचार उपस्थित करते हैं, जो कि ब्राह्मण कालीन हैं जिससे ब्राह्मण काल की अत्यन्त प्राचीनता सिद्ध होती है ।। हम एक बात अत्यन्त आश्चर्य की देखते हैं, वह यह कि जिस प्रकार सृष्टि उत्पत्ति का क्रम शत पथ ब्राह्मण में आता है ठीक वैसे ही अक्षरक्षः वर्णन सृष्टि उत्पत्ति का Egypt मिस्रीधर्म की प्राचीन पुस्तकों में मिलता है इस तुलना को हम संक्षिप्त रूप से पाठकों को दृष्टि गोचर कराते हैं- १-एक समय था जव when neither heaven किन अाकाश था और न (1) There was a time nor earth existed, and when nothing had being ही पृथिवी । तब अथाह except the boundless उत्पत्ति जनक घनान्धकार primeral water, which was, however, shrouded! से आच्छादित जल के with thick darkness, विना और कुछ भी विद्य- Page 22 मान् न था॥ [ ६ ] (2) At length the spirit of the primeval water felt the desire for creative activity. Page 23/ १-अन्ततः जलों की स्पि २-श्रापो ह वा इदमग्रे द्रवीभूत आप ही (सृष्टि) उत्पादक शक्ति ने सलिलमेवास । ता अका- के पूर्वथे उन्हों ने इच्छा की उत्पत्ति की इच्छा की ॥ यन्त कथं नु प्रजायेमहीति कि हम किस प्रकार उत्पन्न ता अश्राम्यस्तास्तपोऽतप्य- हो उन्हों ने श्रम किया न्त। शतपथ ब्रा० ११ । १। और तप तपा॥ See Books on Egypt and chaldaea by E, Walles Budge 1998.
froin which sprang the sun (3) The next act of उत्पत्ति की दूसरी अवस्था तासु तपस्तप्यमानासु उन जलों के (तप) तपने creation was the forma- अम्मों का अर्थात् एक अंडे हिरण्यमाण्ड सम्वभूव | पर एक चमकीला अण्डा tion of a gorm, or egg, का वनना था जिस से 'रा' जातोह तर्हि संवत्सरं पास उत्पन्न हुआ वह एक Ra.. जो कि सूर्य का देवता है तदिदं हिरण्यमाण्डं यावत् संवत्सर पर्यन्त उस जल whose shining form was उत्पन्न हुआ, जिस की संवत्सरस्य वेला पर्चालवत्। पर तैरता रहा । इसके embodied the rulmighty' चमकीली प्राकृति में सर्व ततः संवत्सर पुरुषः सम- अनन्तर संवत्सर के पीछे Pover of the livine| दिव्य शक्ति वा वल छिपा भवत् । स प्रजापतिः । अण्डे से पुरुष उत्पन्न हुआ spirit. Page 23 था। श० प्रा० १।६।४।१॥ वह प्रजापति था॥ God within [ ७ ] RDSure- पाठकों के अभिमुख हम ने दोनों प्राचीन पुस्तकों के विचार रख दिये हैं । वालिस वज का कथन है कि मिनी धर्म के ये विचार Pre-historic age के है, तथापि वह इस उत्पत्ति वर्ग के लिये उनकी प्राची. नता का प्रमाण उद्धृत करता है, कि यह लेख सेटी Seti की समाधि की भित्तियों पर खुदा हुआ था जिस का सन् १३७० ई० पू० दिया है (देखो Books on Egypt P 18) इन दोनों लेखों में एक विशेषता है । जिस प्रकार उत्पत्ति क्रम शतपथ ब्राह्यण में हैं, ठीक उसी क्रम से उत्पत्ति का वर्णन मिस्री धर्म में भाया है । मिस्त्री धम्मे में लिखा है, कि प्रारम्भ में जल ही था जो कि अन्धकार से ढका हुआथा ब्राह्मण ग्रन्थ में भी यही आता है re ] मिनी धर्म में जलों ने एक चमकीला अण्डा बनाया और उस से सूर्य का देवता उत्पन्न हुआ माना है । शतपथ ब्राह्मण में भी यही आता है कि जलों ने चमकीला अण्डा उत्पन्न किया और उस अण्डे से प्रजापति उत्पन्न हुआ।आप पढ़ कर आश्चर्य इस बात का करेंगे कि ब्राह्मण ग्रन्थों में अण्डे से प्रजापति की उत्पत्ति मानी है । प्रजापति को ब्राह्मण ग्रन्थों में बहुधा सूर्य ही कहा है। 'प्रजापति वैसविता' ताण्ड्य ब्रा०१६॥॥१७, तैत्तिरीय ब्रा०२६।४।१, गोपथ ब्रा० पू० ५। २२ इत्यादि स्थलों में प्रजापति को सूर्य कहा है। उधर Ra को सूर्य का देवता माना है, और इधर प्रजापति को सूर्य माना है। एक बात और अचम्भे में डालती है, वह यह कि जहां मिस्त्री धर्म में रा Ra कहा है उसे वहां Ka (क) भी कहा "That wich sent by thy Ka " P.8। यह पाठ उस समय के धर्म पुस्तक का है, जब कि Unas ३३०० ई० में राज्य करता था। इस स्थल में रा को 'क' माना गया है। ब्राह्मण ग्रंथों में भी प्रजापति का दूसरा नाम 'क' आता है । प्रजापति- बैंकः तै० ब्रा०२।३८, ६ । २, कषीतकि ५।४।, २४ ॥ ४, ५, ७,६॥ इन तुलनात्मक नामों को तथा एक ही प्रकार वाले दोनों विचारों को पढ़कर कौन नहीं मानेगा कि यह दोनों विचार लगभग सम- काल के ही हैं। इस बात को हम निश्चितरूप से सिद्ध कर सकते है कि यह विचार शतपथब्राह्मण श्रादियों में वेद से गये हैं। ऋग्वेद १० । १२६ सूत्र में भी यही लिखा है कि श्रारम्भ में और कुछ नहीं था केवल अन्धकार था वा सलिल आप ही था। इसी विचाराधार से ब्राह्मणों में अधिक विस्तार किया गया है। वालिस बज तो मिस्री धर्म की पुस्तक पृ० २ पर यही लिखते हैं कि ये विचार मिस्रोयों ने कहीं बाहर से नहीं लिये, प्रत्युत ये उनके अपने आविष्कार हैं। मि० बज से हम इस बात में सहमत नहीं, क्योंकि दोनों ग्रंथों को तुल्नात्मक दृष्टि से पढ़ने में पता लगता है, कि [] दोनों विचार अत्यन्त मिलते हैं अतः एक दूसर के सम्बन्ध से यह विचार आये सिद्ध हैं। कुछ भी हो यदि दोनों विचारों को समकालीन माना जावे तो भी शतपथ ब्राह्मण का काल न्यून से न्यून १३७० ई० पू० तक पहुंच जाता है । मिस्त्री धर्म का एक ही विचार नहीं, अन्य अनेक भाव भी वेद प्रभाव से प्रभावित दिखाई देते है। मिस्री धर्म में लिखा है कि आकाश उस (प्रभु) के सिर पर आश्रित है और पृथिवी पाद पर' ( देखो पृ०२२) यही विचार आपको अथर्ववेद १०।७। ३२ में मिलेगा। 'यस्य भूमिः प्रमा', 'देिवं यश्चक्रे मूर्धानम्' । इस प्रकार के अनेक विचारों से विदित होता है, कि अथर्ववेद का उस ओर प्रचार अधिक था। फारस, मिन, मध्य एशिया. तथा बाबल श्रादि प्राचीन देशों में अन्य वेदों की अपेक्षा अथर्व का प्रभाव अधिक था । पारसीयों की धर्म पुस्तक ज़न्द सौ में से अस्सी प्रतिशतक वेद प्रभाव से प्रभावित है। मि० हॉग ने तो अथर्व मंत्र का एक टुकड़ा 'शंनो देवी' ज़न्द में पाया जाता है ऐसा स्वीकार किया है । वायु तथा भविष्य पुराणाधार से Wilson ने सिद्ध किया है, कि पारस देश में अथर्ववेद का प्रभाव अधिक था। पूर्वोक्त मिस्त्री धर्म सम्मिलान से हम ने सिद्ध किया है, कि मैक्समुल्लर का वेदकाल निश्चय नितरां निर्मूल और निराधार है॥ . एक अन्य अत्यन्त प्राचीन कथा समग्र संसार के धार्मिक लाहित्य में पाती है। वह है मनु तथा मत्स्य (मछली) की कथा । यह कथा वेद के विना अन्य सव धम्मों के प्राचीन साहित्य में मिलती है और इधर भारत में इसका वर्णन शतपथ ब्राह्मण में पाया जाता है। इससे भी स्पष्ट है, कि शतपथ ब्राह्मण इस धार्मिक कथा के सम तथा उत्तर काल का है। परंच वेद इस कथा के प्रचार के पूर्वकाल का है । पाटकों के निश्चयार्थ हम इस कथा को नं [१०] समग्र प्राप्त प्राचीन धम्मों में जिस २ रूप में यह आई है वैसे ही संक्षेप से उपस्थित करते हैं फिर अंत में आप स्वयं निर्णय कर लेंगे कि वेद कितना प्राचीन है। ज़न्द अवस्थ में यह कथा इस प्रकार से आई देवताओं ने एक सभा की, जिस में अहुरमज़दा कहा कि हिम के पिघले हुए जल से एक भारी प्रलय होगी, जिसके पीछे एक भयंकर शीत ऋतु होगी अहुरमज़दा ने यीमा को चतुष्कोण युक्त दुर्ग बनाने का आदेश दिया और साथ ही उस दुर्ग में मनुष्य के जन्तुओं तथा वनस्पति श्रादि रखने की भी अनुमति दी। Therefore make thee varu, long as a siding-ground on every side of the square, and tither bring the seeds of sheep and oxen, of men, of dogs, of birds and of red blazing of ires. और प्रत्येक प्रकार (Avesta Vendidad Fargar II, 25 बाईबल की कथा । 'ईश्वर ने नूह को कहा कि तू एक नौका बना (क्योंकि बड़ी भारी प्रलय श्राने वाली है ) । जिस में तू अपने परिवार के साथ अन्य पशु पक्षि आदि प्राणीयों का एक २ युगल (अर्थात् पुमान, स्त्री) नौका में रख । अन्त में वह नाव प्रलय में अराराट पर्वत पर पहुंची। तौरेत पर्व ६॥ युनान धर्म की कथा । ईश्वर बृद्ध डयूकेलियन (Deucalion) और उस की स्त्री पाइराह (Pyrrha) कोएक नाव बनाने को कहा, जब नौक बनाकर और भोजन सामग्री लेकर वे नौका में बैठे तो ज्यूस (Zeus) ने 1 ११ ] ज्यूस ने सव स्रोत (चश्मे) खोल दिये, जिन से सर्वत्र भूमि पर जल ही जल हो गया और वह नौका पर्नासस (Parnasus) पर्वत पर जाकर ठहरी । ( देखो Myths of Babylonia and Assyria by D. P. Mackenzi पृ० १६५ । मिस्त्री धर्म कथा । When Ra the Sun-God, grer old as earthly king, men began to mutter words against him. He called the gods to-gather and said: "I will not slay them (his subjects) until I have heard what yea say concerning them.” Nu his father, who was the God of Primeval waters, advised the wholesale destruction of mankind. (Mackenzi book पृ० १६७). जब रा, सूर्य देवता पृथिवी का अधिपति बन वृद्ध हुआ तो मनुष्य उसके विरुद्ध कहने लगे। उसने देवों को इकट्ठा किया और कहा कि मैं तब तक उन्हें नहीं मारूंगा, जब तक मैं सुन लूं कि तुमने उनके सम्बन्ध में कुछ न कहा । नू , उसका पिता जो कि प्रारम्भिक जला का देवता था, उसने सब पुरुषों के नाश की सम्मति दी। आईरश कथा । आईरशों ( Irish ) में कथा है, कि जव जलसावन हुश्रा तो सीज़र Cessair को जो कि Noah नूह की पौत्री थी उसे उस नौका में कमरा नहीं दिया गया श्रादि २ ( देखो Makenzi पृ० १६६)॥
[ १२ ] बैबिलोनिया की कथा । "Therefore Fa mnade known the purpose of the devine rulers in hut of reeds, saying o hut of recds, hear; o wall, understand......0 man of shurippak, son Umbara Turu, tear down thy house and build a ship; leave all thow dost posses and save thy life, und preserve in the ship the living seed of every kind. Mackensi P. 19. Ea ( ईया) ने दिव्य शासक शक्तियों के भाव को बत की बनी झोपड़ियों में प्रकट किया-श्रो बेत की झोपड़ियों!, सुनो आह भित्तियो ! जानो । श्रो उम्बतुरु के मनुष्य अपने घर को तोड़ दे और एक नौका बना । सब कुछ छोड़कर अपनी जीवनी बचा। प्रतिप्राणी के (युगल) को नौका में रख । Mackenzi पृ० १६१ ॥ पुत्र शुरिपक के शतपथ ब्राह्मण की कथा। - प्रातः स्नान करते हुए मनु के हाथ में मछली आगई, उस ने कहा तू मेरी रक्षा कर मै तेरी रक्षा करूंगी,मनु ने कहा तू मेरी रक्षा किस प्रकार करेगी, मत्स्य बोला कि इसी वर्ष एक जल- प्रलय होने वाली है, उसमें तू नौका को बनाकर मेरे पास श्राना, मैं तेरी रक्षा करूंगी। यह सुन मनु ने उसको एक कुम्भ में डाल दिया, वह और बढ़ी, उसे फिर एक गढ़े में रख्खा, वह और बढ़ी, अन्त में उसे समुद्र में फेंका, वह बड़ा मत्स्य हो गया। सावनकाल में मनु ने नौका की रस्सी उस मत्स्यशृंगों में बांधी और वह भष उसे उत्तर गिरि की ओर लगयो और उसने मनु से कहा कि अब [१३] वृक्ष के साथ नौका बांधदो (देखो शतपथ ब्राह्मण कां०१ अध्या०८ व्रा०१)॥ ऊपर प्रति धर्म की कथा संक्षेप से देदी है। यह कथा कितनी पुरानी है, यह निश्चय करना अत्यन्त कठिन है, तो भी इन्साई- क्लोपीडिया श्राफ रीलिजियन एण्ड एथिक्स के डिल्यूज पद (Encyclopaedia of religion and Ethic—the word Deluge.) मैं वैवेलोनिया की जो यह कथा दी है उसका आधार वहां ऐसे माना है- The belief that, through the date of the inscription upon the akkedian tablets is probably about 660 B.C., it is a copy of a poem dating from at least 2,000 B.C. इन्साइक्लोपिडिया में यह सिद्ध किया है, कि यह लेख एकोडियन शिला लेख लगभग ६०० ई० पूर्व का है और यह ६०० ई० पू० का लेख दो सहन ईसवी पूर्व से नकल किया गया है । सब लेखों में आदेश है, कि नौका को बनायो. और उस नौका को पर्वत पर बांधने का वर्णन भी आता है। पारसीयों के ग्रंथ में नौका निर्माण के स्थान पर एक (वारा) किला बनाने का वर्णन है । कुछ भी हो तुलना फिर भी बहुत है। Egyptian (मिश्री) कथा में जल लावन के साथ Nu नू का सम्बन्ध है. Irish आईरश कथा में Cessair: सीज़र को Noah नूह की पौत्री लिखकर जल प्लावन का वर्णन किया है, वाईबल में ईश्वर का आदेश ही हज़रत नूह Noh को है, और शतपथ ब्राह्मण में जलप्लावन का सम्वन्ध “मनुः" से है । इसमें एक विशेष विचार- णीय पद है, जो कि सब में मिलता है वह नूह है। हमारी सम्मति .
[ १४ ] में तो नू, नूह आदि ये सब शतपथ ब्राह्मण के मनुः के समान हैं, मनुः का यदि आदि मकार उड़ादें तो शेष विसर्गान्त नुः Null ऐसा ही बोला जाता है, जो कि नू है, इस आधार से यह कथा दो सहस्र ईसवी पूर्व की तो सिद्ध होती है और अभी यह पता नहीं कि इस से पूर्व यह कथा कब प्रचलित हुई । यह तो हमें अब अवश्य स्वीकार करना पड़ेगा, कि यह कथा ब्राह्मण काल में प्रचलित थी । यदि पूर्वपक्षी के विचार से वेद को एक भारत का प्राचीन इतिहास ग्रंथ मान लिया जावे,तोश्रावश्यक था कि वेद भी दो सहस्र ई०पू० की कथा को अपने अन्दर देता,पर श्राश्चर्य तो यह है, कि इस कथा का गन्ध भी वेद में नहीं, अतः पूर्वपक्षी के विचार से यह तो सिद्ध हो ही जाता है कि वेद दो सहस्र वर्ष पूर्व का ग्रंथ है। मैकडौनल को इस कथा से बहुत दूर की सूझी है, उसने भी यही समझ कर कि यदि इतनी प्रसिद्ध ऐतिहासिक कथा वेद में न निकली तो हमारी कल्पना कि वेद १२०० ई० पू० के हैं सिद्ध न होगी । इसी बात को ध्यान में रखकर महाशय मैकडोनल ने एक नवीन चाल चलायी है, उसने अथर्ववेद के एक मंत्र से इस मनु की नौका का मूल निकालने का यत्न किया है--- That the story of the flood was known as carly is the tune of Atharva veda is implied in it passage of that Samhita (19, 39,8). The myth of the deluge ocures in the Avesta also, and may be Indo-Europeon. It is generally regarded as borrowed from a semitic source, but this seeins to be an unnecessary hypothesis. (Vedic mythology of macodonell.) P. 139). मैकडौनल ने अपने इस लेख में इस कथा का मूल अथर्व- . [१५ ] १६ | ३६ । ८ मंत्र से निकाला है। हम पाठकों के अभिमुख उस मंत्र को रखते हैं और यह भी बताते हैं, कि मैकडनौल ने किस चतुराई से यहां काम लिया है-"यत्र नावप्रभ्रंशनं यत्र हिमवतः शिरः। तत्रामृतस्य चक्षणं ततः कुष्ठो अजायत । १६ । ३६ 15 अथर्व के इस मंत्र में मैकडौनल ने 'यत्र, नाव, प्रभ्रंशनम्' पद भिन्न २ कर यह अर्थ निकाला है, कि जहां नाव काप्रभ्रंशन अर्थात् टूटना हुअा था । और जहां 'हिमवतः शिरः, हिमालय का सिर है। इस मंत्र में हिमालय से 'नाव प्रनशनम्' पद को साथ पड़ा देख उसने अपनी अर्थ सिद्धि की है, परंच हमें मैकडौनल की इस खचातानी से बहुत क्लेश हुआ है यदि उसका अर्थ निकलतातो हमें भी उस अर्थ करने में कोई आपत्ति नहीं थी, परन्तु शोक तो यह है, कि अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिये उसने उन तमाम पारम्पगित क्रम को कुचल कर काम लिया है। यहां पर 'यत्र नाव प्रभ्रशंनम्' पद पाठ तथा स्वर चिन्हों के अध्ययन से तो भिन्न २पाठसिद्ध है। 'यत्र न अव प्रभंशनम्' यहां न अव्यय पद को मैकडानल ने प्रभ्रं. शन के अव उपसर्ग से मिलाकर 'नाव' पद बनाया है, वास्तव यहां 'न, अव' दो पद हैं- यदि न, अव दो पद माने जावे तो नाव प्रभ्रशंन का कोई मूल ही नहीं दिखाई देता । इस मंत्र का अर्थ में जहां नाश नहीं, जहां हिमवान् का सिर है, वहां अमृत का दर्शन है, और वहां से कुष्ठ ( कुष्ठ ) औषध उत्पन्न होती है। अथर्व के इस मंत्र में कुष्ठ औषध की उत्पत्ति के स्थान का वर्णन है। वहां यह चिन्ह बताये हैं, जहां कुष्ठ उत्पन्न होती हैं वहां 'श्रव- प्रभ्रंशन नाश किसी प्रकार का नहीं। अर्थ तो यह था परन्तु मैक- डानल साहिव ने यह अर्थ कर दिया कि जहां पर नाव टूटी थी। शोक है कि प्राचीन पद पाठ और स्वर नियम को तोड़ कर केवल अपने निराधार मत की पुष्टि के लिये ऐसी २ झूठी तथा निर्मूल में हम यह म , . कल्पनाओं का करना । यदि वह यह कहे, कि प्राचीन पद पाठ और स्वर नियम अशुद्ध हो सकते हैं, तो इसके उत्तर कह देना चाहते है, कि समग्र अथर्व वेद में अन्यत्र बहुत स्थलों की उत्पत्ति का वर्णन आया है। सब जगह हमारे ही भाव हैं नौका के टूटने का संकेत कहीं नहीं। इस मंत्र में आप देखेंगे ऊपर लिखा है कि जहां नाश नहीं, उत्तर पद में लिखा है जहां अमृत का दर्शन होता है। ये दोनों वाक्य भी एक भाव के पोषक । अतः मैकडानल की कल्पना अशुद्ध है। दूसरी बात हमें यह नहीं समझ में आती कि यदि नौका का टूटना भी माने तो इस मनु मत्स्य कथा से क्या सम्बन्ध होगा, क्योंकि समग्र सांसारिक प्रलय कथानों में किश्ती के निर्माण का वर्णन तो आता है, परन्तु प्रभ्रशंन का वर्णन कहीं नहीं आता और न ही नौका टूटने से कुछ तात्पर्य है, अतः इन न. अव, दो भिन्न पदों को मिलाकर 'नाव' पद बना नौका अर्थवेद मंत्र के प्रकरण, पद पाठ, स्वर नियम और बुद्धि के विरुद्ध है; अतः मैकडानल की कल्पना मान- नीय नहीं। इस दीर्घ लेख से हम इस निर्णय पर पहुंचे हैं कि यह इतनी जगत् प्रसिद्ध कथा ब्राह्मण काल अथवा इससे पूर्व काल में तो प्रसिद्ध थी परंच वेद के काल में इस कथा को कोई नहीं जानता था। अतः ऐतिहासिक विचार से भी वेद आज से ४००० वर्ष पूर्व ही ठहरता है, अतः मैक्समुल्लर तथा मैकडानल आदि लेखको का वेद काल परिमाण नितरां अशुद्ध भ्रम मूलक और निर्मूल है। तिलक ने अपने 'Arctic home in the Vedas' नामक ग्रंथ में 'मृगा' orion नामक नक्षत्राधार से वेदकाल ४००० ई०पू० से ६०००ई०पू० तक पहुंचाया है। "ऐसे ही जैकोबी भी चार सहस्र वर्ष ही वेदकाल का निर्णय करता है । मरहट्टा ब्राह्मण दीक्षित शतपथ ब्राह्मण २।१।२।३ में "एता ह वै कृत्याःप्राच्य दिशो न च्यवन्ते सर्वाणि ह वा अन्यानि नक्षत्राणि प्राच्यै दिशश्च्यवन्ते"।
[ १७ ] इस श्राधार से २५०० ई० पू० ब्राह्मण काल निश्चित कर वेदको इस से बहुत ही ऊपर लेगया है। ऐसे ही पं० केतकरने माना है। at ytaThe Vedic Fathers of Geology Å qerit ने अपने मतानुकूल भूगर्भ विद्या के प्रमाण देकर वेद को अनेक सहन वर्ष ईसा से पूर्व सिद्ध किया है । The age of Shankar में मद्रासी नारायण शास्त्री, महाभारत काल को कई सहस्र ई० पू० वर्ष सिद्ध करता है। सव काल निर्णायक कल्पना से काम लेते हैं। निश्चित रूप से कोई नहीं कह सका। हमारी सम्मति में तो यही श्राता है, कि जब से मनुष्य चले आरहे हैं तब से ही शान उनके साथ प्रारहा है और यही एक शान है जो पुराकाल से आज तक चला आता है। ऐसा भारत के समग्र प्राचीन ऋषियों कामत अथववेद। पूर्व हमने इस बात को विशद कर दिया है कि वेद निर्माण काल का निर्णय करना केवल साहस मात्र ही है । इसमे यद्यपि भारतीय तथा भिन्न देशीय सामयिक विद्वानों ने बहुत छानवीन की है, परं तो भी वे वास्तविक रहस्य से वञ्चित ही रहे हैं। इस बृहत्सर्वानुक्रमणी ग्रंथ का अथर्ववेद से ही सम्बन्ध है, अतः हम अन्य संहिताओं को छोड़ इस समय इसी पर ही विशेषा- लोचना करेंगे। बहुत से लेखकों का यह मत है कि 'अथर्ववेद' वेद नहीं। वह ऋग्वेदादि वेदों की अपेक्षा बहुत अवर काल का है । वैदिक काल में 'अथर्व' का ज्ञान किसी को भी न था। अपन इस पक्ष की पुष्टि के लिये वे ये प्रमाण देते हैं कि ग्रंथों में जहां वेदों का नाम आता है, वहां ऋग्, यजुः, साम आता है अथर्व का नहीं। जैसे (१) तस्मद्यज्ञात्सर्वहुतऋचः साम नि जशिरे छन्दांसि जमिरे तस्मद्यजुस्तस्मादजायत । यजुः ३१ । ७। (२) यमृषयस्त्रै- [ १८ ] विदा विदुः । ऋचः सामानि, यजूंषि ।तै० ब्रा० १।२।२६ । 'अने. अंग्वेदः वायोर्यजुर्वेदः सूर्यात् सामवेदः । शतपथ ब्रा०।'अग्ने चो वायोर्यजूंषि सामान्यादित्यात्' छान्दोग्य ब्राह्मण ६।१७। अग्निवायु- रविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातनं । दुदोह यज्ञ सिदद्यर्थमृग्यजुः साम लक्षणम् । मनुः १।२३। इसी प्रकार शतपथादि ब्रा ण ग्रंथों में अनेक बार 'त्रयी' पद श्राता है, जिससे ऋग् यजुः साम का ही ग्रहण होता है अथर्व का नहीं । पूर्वपक्षी का यह श्राधार सन्मूल नहीं, क्योंकि शास्त्रों में त्रयीपद के प्राजाने से वहां तीन संहिता 'ऋग्यजुः साम से तात्पर्य नहीं, प्रत्युत वहां तो वेद मंत्रों की त्रिविध रचना से तात्पर्य है । ऋग्यजुःसामाथर्व संहिताओं में जितने भी मंत्र हैं उनकी रचना तीन प्रकार से हुई २ है १ । ऋचः, २ यजूंषि, ३ सामानि' । जो मंत्र पद्यात्मक हैं वेश्चः कहलाते हैं, जो गद्यात्मक हैं वे यजुः और जो गानात्मक हैं वे सामानि । भगवान जैमिनि ने पूर्व मीमांसा में भी यही लिखा है 'तेषामृग्यत्रार्थवशेन पादव्यवस्था ॥३॥ गीतिषु सामाख्या । ३६। शेषे यजुः शब्दः । ३७ । मी. द. अ.२ । पा. १ । मीमांसा के इन सूत्रों से स्पष्ट है कि जहां भी वेद में त्रयी पद आता उससे तीन संहिता नहीं समझनी चाहिये,प्रत्युत चार संहितान्तर्गत जो मंत्र हैं उनकी त्रिविध रचना विशेष को जानना चाहिये । इसी मीमांसा लक्षण आधारसे यास्क ने शतपथ ब्राह्मण के १४ । ।।४।२६ वाक्य को भी 'ऋक्' लिखा है क्योंकि वह भी पद्यात्मक है। तदेतदृक्श्लोकाभ्यामुक्तम्' निरु. ३।४। अतः सर्वत्र त्रयी पद से वेद मात्र का ग्रहण है। षड्गुरु- शिष्य, सायणाचार्य, तथा दयानन्द को भी यही पक्ष अभिप्रेत है। अन्त में यह त्रयी पद वेद विद्या के अपर पर्यायों में भी प्रयुक्त हुआ है, जैसे त्रयी वै विद्या। ऋचो यजूंषि सामानि'श.ना.शास१ यदि त्रयी से अभी भी पूर्वपक्षी यही माने कि नहीं त्रयी पद वेदों के लिये उस समय प्रयुक्त किया गया था जब कि अथर्ववेद नहीं [१६ ] बना था तो इस के उत्तर में हम पू. प. को इतना बताना चाहते है, कि स्वयं अथर्ववेद में ही अनेक स्थलों में ऋक्० यजुः साम का वर्णन आता है, जैसे “यत्र ऋषयः प्रथमजा ऋचः साम यजुर्मही । एकर्षि यस्मिन्नर्पिताः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः । अथ-१०। ७ । १४॥ विद्याश्च वा अविद्याश्च यच्चान्यदुपदेश्यम्। शरीरं ब्रह्म प्राविशदृचः सामाथो यजुः। अथ० १॥१०।२३।क्या इस से यह सिद्ध हो सकता है कि ये मंत्र तव बने जब कि अथर्ववेद नहीं वना था। अतः पूर्वपक्षी का यह पक्ष कि त्रयी अथर्व निर्माण काल के पूर्व वेद का नाम था ठीक नहीं। अथर्व संहिता का वर्णन प्रायः सर्वत्र प्राचीन साहित्य में उपलब्ध होता है । ऋग्वेद में चत्वारि शृङ्गा' ४।५८ । ३ पद से हम पूर्व सूचित कर चुके हैं कि चार सींग से चार वेदों का ही संकेत है। निरुक्त परि १।७ में भी यहां वेद ही माने हैं। यहां चार शृङ्गों से चार वेदों का ग्रहण नहीं करना चाहिये इसके लिये पूर्व पक्षी के पास क्या प्रमाण है ? ऋग्वेद १०।७११११ में 'ऋचां त्वा पोषमास्ते पुपुष्वान् गायत्रं त्वो गायति शक्करीषु । ब्रह्मा त्वो वदति जातविद्यां यज्ञस्य मात्रां वि मिमीत उ त्वः' इस मंत्र में ऋत्विजो के कम्मों का विनियोग बताया है। होता,उद्गाता, ब्रह्मा तथा अध्वर्यु के कम्मों का इसमें वर्णन है। होता का ऋक् से उदाता का साम से, ब्रह्मा का अथर्व से और अध्वर्यु का यजुर्वेद से सम्बन्ध है इस मंत्र का विशेष वर्णन निरुक्त रा में है। ब्रह्मा सर्व- विद्यः सर्व वेदितुमर्हति । सर्वविद्य होने से अथर्वाङ्गिरसी श्रुतियों का जानना उसके लिये अत्यन्त आवश्यक है । अथर्ववेद जाने विना वह ब्रह्मा नहीं हो सकता । पूर्वोक्त मंत्र में कथित चार ऋत्विजों में कौन किस २ वेद का पण्डित होइसे गोपथ ब्राह्मण ने ब्रह्मा 1 २० ] बहुत ही स्पष्ट किया है। 'ऋग्विदमेव होतारं वृणीष्व यजुर्विद- मध्वर्युम्, सामविदमुद्रातारम्, अथर्वाङ्गिरोविदं ब्रह्माणं तथा हास्य यज्ञः चतुष्पात् प्रतितिष्ठति । गो. ना. पू०२ । २४। इसमें स्पष्ट कर दिया है कि ब्रह्मा अथर्ववेद वित् ही है। संस्कृत साहित्य में को चतुर्मुख भी कहते हैं । ब्रह्मा के इस विशेषण का यही अर्थ है, कि 'चत्वारो वेदा मुख यस्य सोऽयं चतुर्मुखो ब्रह्मा' अर्थात् चार वेद हैं मुख में जिसके वह चतुर्मुख ब्रह्मा होता है । ऋग्वेद के इन दो मंत्रों से सिद्ध है, कि ऋग्वेद में भी चतुर्थ वेद की सत्ता को स्वीकार किया गया है । यजुर्वेद में 'तस्माद्यशात्' वाले पूर्वोक्त मंत्र में छन्दांसि पद से वेद का ग्रहण है । वेद से ऋक, यजुः, साम तो स्वयं गिने ही हैं अतः चतुर्थ केवल छन्दांसि से अव- शिष्ट अनुक्त वेद का ग्रहण करना चाहिये । 'छन्दांसि' से गायत्री आदि छन्दों का ग्रहण नहीं, क्योंकि इस मंत्र में इन छन्दों का प्रकरण तो कहीं है भी नहीं । दूसरा यदि इन छन्दों से तात्पर्य होता तो वह 'ऋचः' पद के कहने मात्र से ही गृहीत था, क्योंकि छन्दो बद्ध पद्यमयी रचना को तो ऋक् कहते हैं । जव ऋक् मात्र कहने से ही छन्दांसि पद का भाव आजाता है तो फिर निरर्थक 'छन्दांसि' पद ग्रहण क्यों किया । अतः छन्दांसि से चतुर्थ अनुक्त अथर्ववेद के मंत्रों का ग्रहण है। 'छन्द' पद से वेद मंत्रों का ग्रहण होता है इसके लिये ये प्रमाण साक्षी हैं-छन्दाभिर्यज्ञैः सुकृतां कृतेन । अथ ६ । १२४ । १ । देवा वै मृत्योर्वभ्यत स्त्रयीं विद्यांप्रावि- शस्ते छन्दोभिरच्छादयन्, यदेभिरच्छादयस्तच्छन्दसां छन्दस्त्वम् । छान्दोग्योपनि०१।४।२ छन्दोभ्यः समाहृत्य निरु० १।१ । पा- णिनि स्थान २ पर अष्टाध्यायी में वेद के लिये बहुलं छन्दसि प्रयुक्त करते हैं। छन्दांसि यस्य पर्णानि । गीता १०१ इन समग्र प्रमाणों से 'छन्दांसि' पद से मंत्रार्थ होना सिद्ध है । जब ऋक्, यजुः, साम के साथ यह छन्दांसि पद आवे तो वहां उस अनुक्त अथर्व [ २ ] वेद के मंत्र समूह से तात्पर्य होता है। अतः तस्मद्यज्ञात् मैं छन्दांसि पद से अथर्ववेद को जानना चाहिये । इस ऋचा में छन्दांसि से अथर्व का ग्रहण करना स्पष्ट है-'ऋचः सामानि छन्दांसि पुराणं यजुषा सह । उच्छिष्टाजज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिवि- श्रितः। अथ ११-६-२४ बृहदारण्यक उपनिषद् में भी यही बात स्पष्ट की है-यदिदं किञ्चोंयजू षि सामानि छन्दा सि।१।२।। इन प्रमाणों से छन्दांसि से चतुर्थ अथर्वाङ्गिरसी श्रुति का ग्रहण स्पष्ट है। अथर्ववेद का वर्णन अन्य संहिता तथा ब्राह्मण ग्रन्थों में। . 'ऋग्भ्यः स्वाहा, यजुर्व्यः स्वाहा, सामभ्यः स्वाहांगिरोभ्यः स्वाहा वेदेभ्यः स्वाहा' तैत्तिरीय संहिता ७।५।११।२। इसमें अगिरो- भ्यः' से अथर्व का ग्रहण है । मेद आहुतयो ह वा एता देवाज्ञाम् यदथर्वाङ्गिरसः स य एवं विद्वानथर्वाङ्गिरसोऽहरहःस्वाध्यायमधी- ते मेद आहुतिभिरेव तद्देवाँस्तर्पयति शतपथ ११।५।६।७। 'युवानः शोभना उपसमेता भवन्ति तानुपदिशत्यथर्वाणोवेदः ॥७॥ युवतयः शोभना उपसमेता भवन्ति ता उपदिशत्यङ्गिरसोवेदः' शतपथ ब्रा० १३।४।३। भेषजं वा प्राथर्वणानि । पंचविंश ब्रा. १६ । १० । २ । स यथार्दैनाग्नेरभ्याहितस्य पृथग्धूमावि. निश्चरन्त्येवं वाऽअरेऽस्य महतोभूतस्य निश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरसः' श. ब्रा. १४ । ४।४।१० ऋचो यजूंषि सामान्यथर्वागिरसः। तैत्तिरीय ब्रा० ३ । १२ । ८ । २ ऋचः यजूंषि सामान्यथवांगिरसः तैति० आर० ११ । ६, १० श्रतारथा- " , [ २२ ] ङ्गिरसीः कुर्यादित्याविवारयन् । वाक्शस्त्रं वै ब्राह्मणस्य तेन हन्या- दरीन्द्विजः । मनु०११ । ३३ ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः। मुण्ड० उप. १ । १ । ५ 'अथर्वाङ्गिरसः पुच्छं प्रतिष्ठा' तैत्ति० उप० २।३। १ 'अथर्वाङ्गिरस एव मधुकृतः' 'एते अथाङ्गिएतदिति- हासपुराणमभ्यतपन्' छान्दो० ३।४।१, २ 'अथर्वाङ्गिरस इति- हासः पुराणम्' बृह. उ०२।४।१० इन ऊपर के ऋग्वेद से लेकर उपनिषद् पर्यन्त प्रमाणों में सिद्ध है कि अथर्ववेद भी उसी प्रकार प्राचीन है जैसी अन्य तीन संहितायें। ऐसे ही इस वेद का वर्णन शांखायन श्रौत मूत्र १६।२।२ आश्वलायन औ० सू० १०।७।१ आश्व. गृह्य. सू. ३।३।१-३ । शांखा गृ. सू.१।१६।३, हिरगय केशी गृ. मू. २।३।६, २। १८ । ३, २०।। पारस्कर गृ. सू० २।१०। ७, २ । १० । २१ में भी आता है। इसी प्रकार रामायण, महाभारत तथा अन्य अनेक प्रामाणिक आर्ष साहित्य में इस वेद का वर्णन आता है। अतः इस वेद को अर्वाक् कालीन कहना और यह कहना कि इसका संग्रथन ब्राह्मण काल में था पूर्व नहीं केवल अपनी शास्त्रानभिज्ञता ही प्रकट करना है और कुछ नहीं । इन पूर्वोक्त प्रमाणों से साफ़ है, कि जैसे ऋगादि तीन वेदों का निर्देश हम प्राचीन वैदिक साहित्य में पाते हैं वैसे ही इस अथर्ववेद का भी वर्णन स्पष्ट हमें मिलता है अतः सिद्ध है कि यह वेद भी उतना ही प्राचीन है जितने कि अन्य वेद । चार विभाग का कारण वेदों का चार विभाग होने का कारण यही है कि एक २ वेद में एक २ विषय को मुख्य रूप से प्रतिपादन किया है। यह हम पूर्व ही लिख चुके हैं कि वास्तव में वेद एक ही है, परंच वह एक ही विषय भेद से चारों में विभक्त किया गया है। शान, कर्म, उपासना, विज्ञान ये चार विषय मुख्य हैं, सो इनका अधिकांश रूप से ऋग्यजुःसामाथर्ववेदों में वर्णन किया गया है।
[ २३ ] अथर्ववेद के नाम-अन्य वेदों की तरह इस वेद के भी अनेक नाम आते हैं-प्रथागिरस-अथ १०।७।२० अथर्ववेद गो. वा. १ । २६ भृग्वंगिरस । गो. ना. १ ॥ १।३ अङ्गिरोवेद श. प. १३२४३८ ब्रह्म वेद । अथ १५।६।८ गो. ना. १।२।१६ क्षत्र वेद श. प. १४।८।१४ । २ भेषजा। अथ १०८।१४ यातु'श.प.११। ५। २।२० । इस प्रकार के नामों से यह वेद प्रसिद्ध है भिन्न २ स्थलों में भिन्न २ उद्देश को लक्ष्य में रखकर इसे भिन्न २ नाम दिये गये है । इन पूर्वोक्त सब नामों में अथर्वाङ्गिरस और ब्रह्मवेद प्राचीनतम नाम हैं अन्य सव पीछे के हैं । अथर्वाङ्गिरस नाम पर बहुत विवाद है कईयों का कथन है कि अथर्वा और अंगिरा दोनों ऋषियों ने मिलकर इस वेद का संग्रथन किया था इससे इसका यह नाम पड़ा । दूसरा पक्ष है कि 'अथर्वाङ्गेनमेतास्वेवाप्स्वन्विच्छ' गो. ना. १।४। इसके अनन्तर नीचे इसे इन्ही जलों में ढूंढ' भृगु ने जलों में उसे देखा तो वह अथर्वा होगया आदि २ इस से इसका नाम अथर्ववेद है। तीसरा पक्ष है कि अथर्वा तथा अंगिरा से उत्पन्न हुए २० ऋषियों के मंत्रों का नाम अथवांगिरोवेद है। चौथा पक्ष है कि अथर्ववेद में अनेक मंत्र द्रष्टा ऋषियों में सबसे अधिक सूक्तों का द्रष्टा अथर्वा है इससे इसका नाम अथर्ववेद, उससे न्यून सूत्रों का द्रष्टा अंगिरा है इससे इसे अंगिरो वेद कहते हैं । दोनों ऋषियों के नाम से यह अथर्वागिरो वेद है; उससे न्यून सूक्तों के द्रष्टा ब्रह्मा ऋषि हैं जिस से इस वेद को ब्रह्मवेद कहत हैं। पांचवां पक्ष है कि थर्व हिसार्थक धातु के होने से न थर्वा अथर्वा अर्थात् जिसमें हिंसा नहीं इससे इसे अथर्वा कहते हैं । छटा पक्ष है कि 'थर्वतिश्चरति का' 'चर संशये' । अर्थात् तीनों वेदों में जो क्लिष्ट भाग श्राने से संशय उत्पन्न होता है उसके निवारण से इसे अथर्ववेद कहते हैं।
. [ २४ ] अथर्वपाठ निर्णय-अथर्ववेद के पाठ में जितनी गड़बड़ी है उतनी अन्य किसी वेद में भी नहीं। अन्य वेद तो यज्ञादियों में कहींविशेष स्थानों में उपयोग में लाये जाते थे, अतः उनके पाठा- दियों में इतनी गड़बड़ी नहीं हुई जितनी इस में है। राथह्विटने ने जो प्रथम अथर्ववेद १८५६ में Leipzig में छपवाया था उस में और पाण्डुरंग द्वारा सम्पादित सायण भाष्य संहिता अथर्व मंत्रों में कई स्थलों पर बहुत पाठभेद है । साधारण पाठ भेदों को छोड़ इस बात पर वहुत मत भेद है कि यह कितने कागडों का वेद है। एक पक्ष है कि इसके १० दश काण्ड हैं, शेष पिछले दश प्रक्षित हैं। दूसरा पक्ष है कि इसके अठारह काण्ड है क्योंकि अठारह काण्ड तक ही प्रपाठक क्रम है और कौशिक सूत्र में भी १८ कांड तक ही मन्त्रोद्धरण श्राता है । तृतीय पक्ष है कि इसके कागड १६ है क्योंकि अनुक्रमणी में १६ काण्ड तक ऋषि आदि देवता छन्द हैं और वीसवां काण्ड केवल ऋग्वेद का ही है अतएव श्राश्व- लायनानुक्रमणी से छन्द आदि दिये हैं और साथ ही निरुक्त में १६ काण्ड के मंत्र तक प्रमाण आते हैं। पाणिनि ने भी फल्गुनी और प्रोष्ठपदा नामक नक्षत्रों का वर्णन १।२।६० में किया है, ये दोनों नक्षत्र अर्व १६ । ७।३, ५ के भिन्न अन्य किसी वेद में आते ही नहीं; अतः १६ काण्ड तक अथर्वसंहिता ही प्रामाणिक है । चतुर्थ- पक्ष है कि सम्प्रति २० काण्डात्मक संहिता मिलती है और यही पूर्वकाल से चली आती है। गोपथ ब्राह्मण का कथन है कि ब्रह्माने २० अथर्ववेदी ऋषियों को उत्पन्न किया जिस से इस वद के बीस काण्ड बन इस लिये यह बीस काण्ड का ही ग्रन्थ है । इस प्रकार के अनेक मत इस संहिता प्रमाण में हैं। पहला पक्ष तो केवल बालकपने का है। अन्य तीन विचारणीय अवश्य हैं । तृतीय पक्ष बहुत प्रमाण और युक्ति से सिद्ध है । परं तो भी पूर्ण ग्रन्थ प्रमाण निर्णय हम तभी कर सकेंगे जब हमारे [ २५ ] पास बहुत सी सामग्री अथर्व के सम्बन्ध को मिल जावेगी तो। अतः प्रार्य लोगों को यत्न करना चाहिये कि अन्य सब कामों से पूर्व इस में अपना समय लगावें, यही वात श्रार्य धर्म की मूल अथर्ववेद का साहित्य । cho " " २ तौदाः ३ मौदाः " यह पूर्व लिख दिया है, कि इस वेद की नौ शाखा है । अव हम क्रमशः उन सव का उल्लेख करते हैं*- १ पैप्पलाः देखो सा. भू. २५ पृ. तथा अथर्वपरिशिष्ट सं०८ सं०२३।३ सं०२।४।१० ४ शौनकीयाः। कौशिक ८५।५ ५ जाजलाः अ. परि. सं०२३।२ ६ जलदाः अ. परि. सं० २१४ ७ ब्रह्मवदाः ८ देवदर्शाः। कौशिक ८५। ७ ६ चारण वैद्याः। केशव-कौशि. सू. ६ । ७ * शाखाओं का विशेष वर्णन जानने के लिये निम्नलिखित ग्रन्थों को अवश्य देखना चाहियेः- १ कौशिक मूत्र, गोपथ ब्राह्मण तथा वैतान सूत्र में बहुत स्थलों पर अथर्ववेदीय शाखाकारों के नाम आते हैं । (२) पाणिनि मुनिकृत अष्टाध्यायी तथा गणपाठ में अनेक नाम मिलते हैं। ३ शौनकोक्न चरणव्यूह परिशिष्ट सूत्र। (४) अथर्ववेदीय परिशिष्टान्त- र्गत ४६वां परिशिष्ट 'चरण ब्यूह' । ५ महामाण्य । ६ विष्णु पुराण ३, ४ । (७) वायु पुराण । (८' अग्नि पुराण अ.२७० । ६ मार्कण्डेय पुराण अ० ४२, २०-२२ । १० कूर्म पुराण । ११ स्कन्द पुराण । १२ भागवत पुराण । १३ देवी पुराण । १४ सूत संहिता । १५ कुमा- [ २६ ] रिल भट्ट कृत तन्त्र वार्तिक । रामकृष्ण कृत संस्कार गणपति । १६ महाभारत शान्ति पर्व । १७ सायणाथर्ववेद भाष्यभूमिका पृ. २५ । २८ मुक्तिकोपनिषद् । १६ भट्ट यज्ञेश्वर शर्मा कृत आर्य विद्या- सुधाकर । २० राधाकान्तदेव कृत शब्दकल्प द्रुम । Indische studien i. 152, 206; iii. 277-278; XIII.31-435 भाग में Weber वेवर के लेखों को। मैक्स मुल्लर कृत Ancient Sanskrit literature का इतिहास पृ० ३७१ । राजेन्द्रलाल मित्र की गोपथ ब्राह्मण पर भूमिका पृ० ६। राँथ का लेख Der Atharva- Vedair Kashmir P. 2.17-9. | स्वामी दयानन्द कृत 'सत्यार्थ प्रकाश पृ०७० तथा ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका पृ०२६९| Bloomfield की कौशिक सूत्र पर भूमिका पृ० XXXI. Dr. Richard Sinnon कृत Vedischen schulen की समग्र भूमिका तथा उसी में देव नागर अक्षरों में रामकृष्ण की पुस्तक । ब्लूमफील्ड कृत 'The Atharvaveda पृ० ११ । स्वामी हरप्रसाद कृत वेद सर्वस्व । सामाश्रमी सत्यव्रत कृत यी परिचय । बालकृष्ण कृत ईश्वरयि ज्ञान वेद ।
शाखा नामभेद के लिये देखो निम्नलिखित कोष्ठ [ २७ ] चरणव्यूह सायण गोपथ ब्रा. चरणव्यूह महीधर रामकृष्ण चरण व्यूह वयर १. पैप्पलाः पैप्पलादाः पिप्पलाः पिप्पलाः २. दान्ताः तौदाः दाताः शौनकाः ३. प्रदान्ताः मौदाः प्रदापला दामोदाः ४.स्ताता: शौनकी नैताः स्ताः तोताः तात्तायनाः ५. सौत्नाः जाजला: ब्रह्म दापलाः औताः औन्ताः जायालाः ६. ब्रह्म दाबलाः जलदाः जावालाः ब्रह्मदायश. ब्रह्म पलाशः ७. शौनकी ब्रह्मवदाः सौनकी " कुनखी ८. देवदर्शी देवदर्शाः देवदर्शी वेदार्शी ६. चरणविद्याः चारण वैद्याः * जहां पर (.,) चिन्ह दिया है वहां सब प्रथम पंक्ति में आये हुओं की तरह जानना । विशेष नाम Dr. Richiard कृत Vedischen Sedulen से लेकर दिये हैं।
, [ २८ ] कई २ इस वेद की १५ शाखा भी लिखते हैं। इन उपर्युक्त शाखाओं में इस समय केवल दो शाखायें मिलती हैं। शौनकीय तथा पैप्पलाद । प्रथम शाखा सायण भाष्य सहित नथा मूल सर्वत्र उपलब्ध है। दूसरी ब्लूमफील्ड तथा गार्वे ने बाल्टीमोर में सन्० १६०१ में लिथ्थो कराके छापी थी। वह शारदा अक्षर में प्रकाशित हुई २ मिलती है । शेष ७ लुप्त हैं, पार्यों को इनके खोजने में यत्न करना चाहिये जिस से कि वे भी शीघ्र जगत में भाजावें । अथर्व के सम्बन्ध में पांच ( अन्य ) वेद भी लिखे हैं । सर्पवेद, पिशाचवेद, असुरवेद, इतिहास वेद, पुराणवेद । ब्राह्मण-इस वेद का एक ही ब्राह्मण गोपथ नाम से प्रसिद्ध है, जो राजेन्द्रलाल मित्र तथा D. Ghastra द्वारा सम्पादित मिलता है। सूत्र-कौशिक, (यह ब्लूम फील्ड सम्पादित मिलता है ) वैतान सूत्र ( यह गार्वे Garbe सम्पादित मिलता )। नक्षत्र कल्प, श्राङ्किरस कल्प, शान्ति कल्प (अभिचार कल्प, कल्प ) यह ग्रंथ अभी तक नहीं मिला । नक्षत्र कल्पजोप्रथम परि- शिष्ट है वह मिलता है। इन पांचों कल्पों में क्या २ विषय है, यह सायण ने निज भूमिका में दिया है। पांच अथर्ववेद के लक्षण ग्रंथ हैं १ चतुरध्यायी, २ प्रातिशाख्यम्' ३ पञ्चपटलिका, ४ दन्त्योष्ठ विधिः, ५ बृहत्सर्वानुक्रमणिका । १ प्रथम लक्षण ग्रन्थ लेखरूप में लाहौर के दयानन्द कालेज के लालचन्द्र स्मारक पुस्तकालय में पड़ा है । २ दूसरा लक्षण ग्रंथ पं. विश्वबन्धु जी शास्त्री एम. ए. ने सम्पादित कर दिया है छप रहा है।३ तृतीय लक्षण ग्रंथ प.भगवद्दत्त जीने दयानन विधान [ २६ ] कालेज रिसर्च विभाग से १९२० सन् में प्रकाशित किया था । ४ चतुर्थ लक्षण ग्रंथ भी इसी रिसर्च विभाग से मैंने १६२१ सन् में प्रकाशित किया थी।५ पञ्चम लक्षण ग्रंथ यह आप कीभेंट किया जारहा है, जिस की यह भूमिका लिखी गयी है। परिशिष्ट-अथर्ववेदीय ७२ परिशिष्ट ग्रंथ हैं, जो Bolling और Negelein ने मिल कर Leipzig में १६०६ में प्रकाशित किये थे। ये उन्होंने रोमन लिपि में छपवाये हैं उनके नाम ये हैं- अथर्व-परिशिष्ट नामानि । १. नक्षत्र कल्पः । २. राष्ट्र संवर्गः। ३. राज प्रथमाभिपेकः । ४. पुरोहित कर्माणि । ५. पुष्याभिषेकः। ६. पिष्ट राज्या कल्पः। ७. आरात्रिकम् । ८. घृतावेक्षणम् । ६. तिल धेनुविधिः। १०. भूमि- दानम् । ११. तुला पुरुषाविधिः । १२. श्रादित्य मण्डकः । १३. हिरण्यगर्भ विधिः। १४. हस्ति रथदान विधिः। १५. अश्व रथ- दानावधिः। १६. गो सहस्त्रविधिः। १७. राजकर्म सांवत्सरीयम्। १८. वृषोत्सर्गः। १६. (क) इन्द्र महोत्सवः । १६. (ख) ब्रह्मयागः । २०. स्कन्दयागः अथवा धूर्त कल्पः । २१. सम्भार लक्षणम् । २२. अराण लक्षणम् । २३. यज्ञपाल लक्षणम् । २४. वेदि लक्षणम् । २५. कुण्ड लक्षणम् । २६. समी लक्षणम् । २७. सव लक्षणम् । २८. हस्त लक्षणम् २६. ज्वाला लक्षणम् ३०.(क) लघु लक्ष होमः। ३०.(ख)वृहलक्ष होमः । ३१.कोटि होमः । ३२.गण माला । ३३.वृत कम्बलम् । ३४. अनुलोम कल्पः । ३५. आसुरी कल्पः । ३६. उच्छुष्म कल्पः । ३७. समुञ्चय प्रायश्चित्तानि । ३८. ब्रह्म कूर्चविधिः। ३६. तदागद्विधिः । ४०. पाशुपतव्रतम् । ४१. संध्योपासना विधिः । ४२. स्नानविधिः । ४३. तर्पणविधिः । ४४. श्राद्धविधिः । ४५. अग्निहोत्र होम विधिः। ४६. उत्तम पटलम् । ४७. वर्ण पटलम् । ४८. कौत्सव्यनिरुक्त निघण्टुः । ४६. चरण व्यूहः । ५०. चन्द्र प्राति- [ ३० ] । - पदिकम् । ५१. ग्रह युद्धम् । ५२. ग्रह संग्रहः । ५३. राहु चारः। ५४. केतु चारः । ५५. ऋतु केतु लक्षणम् । ५६. कर्म विभागः । ५७. मण्डलानि।५८.(क)दिग्दाह लक्षणम् । ५८.(ख) उल्का लक्षणम्। ५६. विद्युल्लक्षणम् । ६०. निर्घाट लक्षणम् । ६१. परिवेप लक्षणम् ६२. भूमि कम्प लक्षणम् । ६३. नक्षत्रग्रहोत्पात लक्षणम् । ६४. उत्पात लक्षणम् । ६५. सद्यो वृष्टि लक्षणम् । ६६. गो शान्तिः । ६७. अद्भुत शान्तिः । ६८. स्वप्नाध्यायः । ६६. अथर्व हृदयम् । ७०. [क] भार्गवीयाणि । ७०. [ख] गार्याणि । ७०. [गबार्हस्पत्यानि ७१. प्रौशनसाद्भुतानि । ७२. महागुतानि । उपनिषद्-प्रसिद्ध उपनिषदों में अथर्ववेदीय पांच ये हैं . प्रश्न, २ मुण्डक, ३ माण्डूाय, ४ श्वेताश्वतर, ५ और कैवल्य शेष अथर्ववेदीय उपनिपदों के नाम ये हैं- गर्भ । ब्रह्म । क्षुरिका । शूलिका । श्रारुणेय । प्राणाग्निहोत्र । वैतथ्य अलात शान्तिः। नील रुद्र । नाद विन्दुः । ब्रह्म विन्दु । अमृत विन्दु । ध्यान । तेजो विन्दु । योग शिक्षा । योग तत्त्व । संन्यास । कराठ श्रुति । श्रात्म । महा । कठवल्ली । नारायण । बृह- नारयण । महा नारायण । सर्व । हंस । परम हंस । कालाग्नि रुद्र । राम तापनी । जाबाल । आश्रम । पिण्ड । शिरम् । शिक्षा । नृसिंह- तापनी । गरुड़। ये जितनी उपनिषदे ऊपर दी गयी हैं सब माननीय तो नहीं; परञ्च तो भी पाठकों के ज्ञानवृध्यर्थ आवश्यक जान उन के नाम हमने दिये हैं। समग्र १०८ उपनिषदा का गुटका बंबई में प्रकाशित मिलता है उसमें ये सव प्रायः मिलती हैं। शिक्षा-अथर्ववेद की शिक्षा माण्डूकी शिक्षा बहुत प्रसिद्ध है। यह यत्र तत्र अनेक प्रेसों में छपी मिलती हैं परञ्च जो दयानन्द कालिज रिसर्च विभाग में पं. भगवद्दत्त सम्पादन की है, वह बहुत सुन्दर शुद्ध और पठनीय है। नं , स्मृति--(पैठीनसी) पैठीनसी प्राचार्य के नाम से अथर्व- वेदीयों का एक धर्मशास्त्र प्रसिद्ध है। एक मत है कि उसका एक धर्मशास्त्र गद्यपद्यात्मक है, दूसरा मत है कि वह सूत्रों में है। पैंठीनसी अनेक हुए हैं । अर्व परिशिष्ट में एक पैठीनसी को मौसली पुत्र कहा गया है । (देखो The atharva reda P. 18.) लेख सामग्री। मैंने ग्रंथ सम्पादन में जिन हस्त लिखित पुस्तकों की तथा हिटने के भाष्य में पाये हुए दो श्रादर्शों की सहायता ली है । वे कहां से मिले किस प्रकार के हैं, और किस श्रायु के हैं, इसका वर्णन क्रमशः किया जाता है:- (१) क. जिस श्रादर्श पुस्तक का हमने (क) नाम दिया है, वह हमें भण्डारकर इन्स्टीट्यूट ( Bhandarkar Institute ) पूना से मिला है । 'उसकी लम्बाई १३ अङ्गुल और चौड़ाई ६ अं० है। पत्र संख्या ८७ है' प्रति पत्र में प्रायः दश पंक्तिये हैं और प्रति पंक्ति में प्रायः २५ अक्षर हैं । यह पुस्तक देवनागरी अक्षरों में है । देशी पत्र पर लिखी हुई है अक्षर स्पष्ट और पठनीय हैं। कहीं २ लेख इतना मिलाकर लिखा है कि पढ़ा नहीं जाता। पत्रों के दोनों ओर पार्श्व में दो २ काली रेखायें हैं और बीच में लाल रेखा दी हुई है । यह ग्रन्थ पूर्ण नहीं, इसकी समाप्ति दशम पटल के २१वे खण्ड के मध्य में हो जाती है। अन्तिम पृष्ट जो इस पुस्तक के साथ लगा दिया है, वह सर्वथा अप्राकरणिक और अशुद्ध है । इस पुस्तक का वर्णन दक्षिण कालेज पूना के हस्त लेख संग्रह में है, वहां इस [ ३२ ] है - की संख्या- है ( इसके लिये देखो Government १८८१-८६ collections Manuscripts Dacian College Porn 1916 पृ० २८६) इसका अन्तिम भाग नहीं है, अतः इस हस्तलेख के संवत् श्रादि का कुछ पता नहीं लग सका। (२) 'ख' नाम का जो द्वितीय हस्तलेख है इसकी संख्या बंबई हस्तलेख संग्रह पुस्तक पृ० २८६ में है। यह भी हमें १८८४-८६ भगडारकर इन्स्टीट्यट से ही मिला है। यह हस्तलेख १४ अं० लम्बा और ७ अं० चौड़ा है । इस की पत्र संख्या ३३ है । प्रति पत्र पर प्रायः ८ पंक्तिये और प्रति पंक्ति में प्रायः ३८ अक्षर हैं इसके अक्षर देवनागरी और कागज़ देशी हैं । अक्षर अत्यन्त सुन्दर स्पष्ट और काली स्याही से लिखे हैं । पढ़ने में कोई कठिनता नहीं होती। यह हस्तलेख भी अपूर्ण है । इस लेख की समाप्ति चतुर्थ पटल के अन्त तक है । संवत् इसका भी बताना कठिन है, क्योंकि इसमें चतुर्थ पटलान्त पर संवत् श्रादि कुछ नहीं है। (३) तृतीय 'ग' नाम का हस्तलेख, पूना हस्तलेख पुस्तक संग्रह के पृ०२८७ पर वर्णित है। वहां इसकी संख्या १८७०-७१ इसका आकार १५ अं० लम्बा और ७ अं० चौड़ा है। इसकी पत्र संख्या ४+२=५० है । इसके प्रति पृष्ठ पर ८ पंक्तिये और प्रति पंक्ति में प्रायः २५ अक्षर हैं । यह लेख देशी कागज़ पर है। इसके अक्षर स्पष्ट और पठनीय हैं। कहीं २ पाठ भ्रष्ट है । यह लेख भी अपूर्ण है । इस लेख की समाप्ति पंचम पटल में हो जाती है। पटल समाप्ति के श्रागे केवल “ऊं अथेयं प्राग्रापरमे" पाठ है। उसके आगे दो पत्र और पाये हैं, परन्तु वे इस पटल के नहीं .
। [ ३३ ] एकादशम पटलारम्भ के हैं जिस पटल में संहिता के २०वे काण्ड का वर्णन है। प्रतीत होता है कि अन्य पत्र इस लेख के गुम हो चुके हैं । दकन कालेज पूना के हस्तलेख वर्णन में इस लेख की आयु संवत् १६४७ लिखी है। परन्तु पता नहीं कि उन्होंने इस प्रायु की कल्पना किस आधार से की है। ग्रंथ में तो कहीं संवत् का वर्णन नहीं। इस हस्तलेख के प्रारम्भ के टाइटल पेज पर ऊपर अंग्रेज़ी में (Deccan College 1873) लिखा हुआ है और नाचे 'अथर्ववेद बृहत्सर्वानुक्रमणि प्रारम्भः । द० दुर्लभ जगदीशनि पोथि छ । शुभमस्तु । छ कल्याणमस्तु । पाठ लिखा हुआ है। (४) चतुर्थ 'गु० नामक हस्तलेख को हमने गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय ( हरिद्वार ) से प्राप्त किया था। इस लेख की पत्र संख्या १३४ है । प्राकार १५ अं० लम्बा और अं० चौड़ा है। प्रति पत्र पर प्रायः ह पंक्तियें हैं। इस समग्र ग्रंथ के दो भाग हो सकते हैं, एक पूर्व भाग और दूसरा उत्तर भाग । प्रथम भाग पंचम पटल समाप्ति तक ६६ पत्रों का है। यह भाग देशी कागज़ पर लिखा हुआ है। यहां पंचम पटलान्त में यह पाठ है। 'इति श्री ब्रह्मवेदोक्लमंत्राणां बृहत्सर्वानुक्रमणिकायां पंचमः पटलः समाप्तः। रामजी सखितं रावल व वलसुत जेशंकर ॥ भाई शंकर जी सं० १८२७ आश्विन सुदी' । लेख का उत्तर भाग ३८ पत्रों का है। यह किसी प्राचीन लेख की नकल ( प्रातलिपि) प्रतीत होती है । इसके लिये जो कागज़ लगाया गया है वह फुल्सकेप कागज़ है । इस कागज़ को दूहरा करके पुस्तकाकार बनाकर लिखा गया है । इस लेख के अक्षर पठनीय और स्पष्ट हैं । इस लेख को मैंने कालिज के गत गरमीयों के दीघावकाश में गुरुकुल में जाकर अपने लेख से मिलाया था। इस समय यह हस्तलेख गुरुकुल के पुस्तकालय में है।
। [ ३४ ] (५) पञ्चम घ० नाम का हस्तलेख भी हमने भगडारकर इन्स्टीट्यूट से लिया है । लेख संग्रह पुस्तक के पृ० २८७ पर इस का वर्णन है। वहां इसका नंवर ३६१ '१८७०-७१ है। इसके ४८ पत्र है । प्रतिपृष्ठ पर प्रायः ७ पंक्तिये और प्रति पंक्ति पर प्रायः ३२ वा ३३ अक्षर हैं । इस लेख का कागज़ देशी, अक्षर अत्यन्त सुन्दर लेख बहुत शुद्ध लिखा हुआ है । यह हस्तलेख भी अपूर्ण है। इस का प्रारम्भ पष्ठ पटल से है और समाप्ति दशम पटल में होती है। - और स्पष्ट हैं । यह इसके अन्त में इस प्रकार का पाठ है- - "इति श्री ब्रह्मवेदोक्लमंत्राणां बृहत्सर्वानुक्रमणिकायां दशमं पटलसम्पूर्णमिति ॥ स्वस्ति ॥ करकृतमपराधं तन्तुमर्हति संतः ॥ संवत् १७६७ वर्षे वैशाप वदि १ रवि दिने वायिडा झातीय जग- जीवनेन लषीतमिदं इदं पुस्तक लेखः पाठकयो चीरं जियात् ॥ ॥शुभमस्तु॥ यावल्लवणसमुद्रो यावन्नक्षत्रमंडितोमेरुः यावत् चंद्रादीत्यौ तावत् इदं पुस्तकं जयतुः । भन्मपृष्टिकटीग्रीवा बद्धमुष्टीरधोमुखं । कष्टेनलेक्षितं शास्त्रं यत्नेन परिपालयेत् । यादृशं पुस्तकं दृष्ट्वा तादृशं लखितं मया। यदिशुद्धमशुद्धं वामम दोषोन दीयते ॥ कल्याणमस्तु॥ छ।ब. ब"। (६) छटा हस्तलेख हमारा 'ङ' है। यह १४ अं० लम्बा और ७ अं० चौड़ा है । यह भी हमें भण्डारकर इन्स्टीट्यूट से मिला है। इसका वर्णन हस्तलेख संग्रह के पृ० २८४ पर है। वहां इसकी संख्या. ३८६ तथा है। इसकी पत्र संख्या ६७ १८६१-६५ है। प्रति पृष्ट पर १० पंक्तिये और प्रति पंक्ति पर ३६ अक्षर . [ ३५ ] हैं। इसका पत्र देशी है, लेख सुन्दर और कहीं २ अस्पष्ट है। इसमें प्रायः व्यः को व्यौ और भः को भौ लिखा हुआ है। यह ग्रन्थ संपूर्ण है । इसके एकादशम पटलान्त में इस प्रकार का लेख है- "इति ब्रह्मवेदोक्लमंत्राणां वृहत्सर्वानुक्रमाणिकायां एकादशमः पटलः समाप्तः । विंशतितमंकाण्ड समाप्तम् २२५ । छ ॥ संवत् १८१६ वर्षे मार्गशीर्ष शुदि ६ मंदवासरेण लिषितं सुषेश्वरेण" । । शुभं भवतु॥ (७) समम हस्तलेख हमारा 'च' है। यह हस्तलेख भी हमें भगडारकर इन्स्टीट्यट से मिला है । इसका वर्णन हस्तलेख संग्रह के पृ० २६० पर है। वहां इसकी संख्या ३१४- है। इसका १८८०-८१ श्राकार यह है १३ अं० लम्बा ५ अं० चौहा। इसके पत्र १३ हैं, प्रति पृष्ट पर प्रायः पक्किये हैं। प्रति पंक्ति में २५ के लगभग अक्षर हैं । इसका कागज़ देशी है । अक्षर पढ़े जाते हैं । यह ग्रन्थ अपूर्ण है, इस में केवल एक प्रथम पटल ही है। (८) अष्टम लेख हमारा 'बी' है। यह नकल ( प्रतिलिपि) हमें बीकानेर से मिली है। इसके पृष्ठ ५१ हैं प्रति पृष्ठ में प्रायः १२ पंक्किये हैं। प्राते पंक्ति में ३८ अतर है। यह प्रतिलिपि जो इस समय लालचन्द स्मारक पुस्तकालय द. ऐं. वै. कालेज लाहौर में है, अत्यन्त अशुद्ध है। इसका कागज़ अंग्रेज़ी है। यद्यपि अक्षर शुद्ध लिखे हुए हैं, तथापि लेखक का इतना भ्रम है, कि प्रायः लेख पढ़ा नहीं जाता। इसके अन्त में संवत् श्रादि कुछ नहीं है। (६) नवम ग्रंथाधार हमारा ह्वि. है। इससे तात्पर्य विटने का है । अपने अथर्ववेद के अंग्रेज़ी अथर्वानुवाद में विटनेने प्रारंभ में सर्वानुक्रमणी के आधार से ऋषि, देवता और छन्द दिये हैं।
[ ३६ ] ह्विटने ने लंडन और बर्लिन के दो हस्तलेखों के आधार से ही काम लिया है । ह्रिने ऊपर तो लेख लंडन संस्करणाधार से दिया है, नीचे टिप्पणी में उसने बर्लिन संस्करण का पाठ दिया है। इस पुस्तक सम्पादन में हम ने इन ६ ग्रंथों का आश्रय लिया है, जिनका इतिवृत्त संक्षेप से देदिया है । अब एक बात अन्य अावश्यकीय है, कि इन मूल लेखों में भी हमें परस्पर दो प्रकार की शाखायें प्रतीत होती हैं । बीकानेर का 'वी.' लेख अन्य क. ग्व. ग. ङ. गु. ह्वि० से बहुत स्थलों में भिन्न है। कहीं २ बी. और कु श्रापम में मिल जाते हैं, परं मुख्यरूप से बी स्वतन्त्र ही रहता है। (१) एक भेद तो यह मुख्य है कि प्रतिखण्डान्त में प्रायः 'बी.' इति लिखता और शेष क. ख. ग. ऊ. गु. कुछ नहींलिखते । जैसे उदाहरणार्थ देखो-३।५, ४ । ३, ४।४, ४ । ५, श्रादि २ अनेक स्थलों के नीचे टिप्पणी। (२) अन्य भेद ये हैं- कां. सू. मं. क.ख.ग.ऊ.* ४।१०।६ बी १. हिरण्यानाम् २. अन्वीक्षण ३. त्रैष्टुभे ४. प्रथमस्याद्या परा अग्निहिरिण्यानाम् अन्वीचक्षण त्रिष्टुभम् प्रथमस्या परा ५।२।२ ५।३।१ ५. मुमुक्तमस्मान् ६. जुहाति ५।६।८ मुमुक्तम् ५।२४ । १(नोट) जुहा *गु.पुस्तक को मैंने केवल गुरुकुल में ही मिलाकर वापिस देदिया था, अतः उसके पाठ सब स्थलों में नहीं दिये, परन्तु इतना निश्चय कर लिया है कि यह भी क. ख. ग. ङ. वत् ही है।
[ ३७ ] तक्षक दैवतम् ७. चन्द्रम् चन्द्रमसम् ८. त्रिपदार्षी ५।२७।३ द्विपदार्ची ६. मंत्रोक्लान् देवान् मंत्रोक्त देवान् १०. त्वष्टा में दैव्यं वचः त्वष्टा मे दैव्यम् ११. तक्षक देवम् ६।१२।१ १२. मनसे चेतसे ६।४१।१ मनसे चेतसे धिये १३. जायाभि वृध्यै ६।७।१ जायाभिवृध्यौ १४. द्वितीया ६।६७।१ तृतीया १५. पिप्पलीक्षिप्तम् ६।१०६ । पिप्पली १६. देवत्यम् ७।६७/१ दैवतम् १७. श्यामश्च ८।१।। श्यामश्च त्वा १८. जीवलां नघारिपाम् ८।२।६ जीवलां नघा य इन्द्र इव देवेषु य इन्द्र इव गर्भा भुरिगजगती ११।१।२७ गर्भा जगती ये ऊपर्युक्त निदर्शन है जिससे सिद्ध होता है कि बी.आदर्श- लेख का अन्य क. ख. ग. ङ. श्रादर्शलेखों से भेद है । कई स्थलों पर हम ङ और वी लेखों को भी मिला हुश्रा देखते हैं। ङ. वी. अन्य अनुष्टुप त्रिपदा आर्ची पञ्चम पाठ नहीं ब्रह्मौदनीकम् ७।२। अनुष्टुभः त्रिपदे आर्ची पञ्चम पाठ है ब्रह्मौदनिकम् गर्भा चतुष्पात् ११।१।१ गर्भापरा चतुष्पात् ११।५।१२ देखो पृ० ७२ चतुर्थ टिप्पणी।
हि० ब० [ ३८ ] इस प्रकार के स्थलों से सिद्ध है कि कहीं २ बी. कु का भी पाठ मिलता है। Whitney (ह्वि०) ने अपने English अथर्वानुवाद में प्रति- सूक्तारम्भ में जो ऋषि, देवता, छन्द दिये हैं वे वृहत्सर्वानुक्रमणि- का के दो हस्तलेखों के आधार से दिये हैं। एक London (लंडन) तथा दुसरे Berlin ( बर्लिन ) के आधार से। उसके पास जो दो श्रादर्श लेख थे वे भी एक प्रकार के प्रतीत नहीं होते क्योंकि उनमें भी परस्पर भेद है। पृ० ३५ टिप्पणी ह्रि० हि० लं० पृ० आतिमय॑म् प्रातिमय॑म् नहीं अष्टर्चम् तृचम् १६५ द्वयचम् प्रायः हि० का लंडन पाठ क्रम हमारे 'ङ' से बहुत मिलता । परन्तु बहुत स्थलों पर सब श्रादर्श लेख आपस में मिलते हैं, कहीं किसी का किसी से भेद और मेल भी हो जाता है। तो भी हम इस निर्णय पर अवश्य पहुंचते हैं कि 'बी' इन सबसे विलक्षण है। बी. कुछ २ ङ. से मिलता है यदि वी. को एक शाखा और शेष क. ख. ग. घ. ऊ. गु. को भिन्न द्वितीय शाखा मान ले तो कोई बहुत आपत्ति नहीं बैठती। ग्रंथ काल--इस ग्रंथ के निर्माण काल का निर्णय करना अत्यन्त कठिन है। इस में पञ्चपटलिका के उद्धरण, निरुक्त, अक्सर्वानुक्रमणी तथा वृहदेवता के थोड़े बहुत भेद से वाक्य भी भाते भी हैं (देखो) पृ० १ की टिप्पणी । पिङ्गल छन्दः शास्त्र के तुलनात्मक वाक्यों को इति कहकर लिखा हैं। इसके लिये देखो पृ०४ की टिप्पणी। अथर्ववेदीय पञ्चपटलिका का एक उद्धरण पृ० १६२ [ ३६ ] पर उद्धृत किया गया है । इन प्रमाणों से तो सर्वथा सिद्ध है, कि यह ग्रंथ इन ग्रन्थों से उत्तर काल का है । अथर्ववेदीय परिशिष्टों में चरणव्यूह नामक ४६वां परिशिष्ट है। उसमें यह वाक्य मिलता है "लक्षण ग्रन्था भवन्ति । चतुरध्यायी, प्रातिशाख्यम् , पञ्चपटालिका, दन्त्योष्ठविधिः, बृहत्सर्वानुक्रमणी चेति।" इस ग्रन्थ प्रमाण से तो यह सिद्ध है ही कि यह ग्रन्थ परिशिष्ट ग्रन्थों से पूर्व कालीन है। इसके निर्माण की तिथि का ठीक निर्णय बताना अभी हमारे लिये बहुत कठिन है। आशा है अन्य अथर्ववेदीय सामग्री के मिलने पर इस ग्रन्थ के काल निर्णय का हम वास्तविक रूप निर्णय कर सकेंगे। कुछ भी सही तो भी यह तो ग्रन्थ की शैली से प्रतीत हो रहा है कि ग्रन्थ पर्याप्त पुराना है। इस प्रन्थ में एकादश पटल हैं और प्रति पटल में बहुत से स्थानों पर १, २, ३ श्रादि कुछ पंक्तियों के अनन्तर अंक दिये हुए हैं, जिसे हमने 'खण्ड' की संज्ञा दी है। पटलों में खण्ड संख्या इस प्रकार से है- से पटल खराड २५ २..... ३....... समप्र ४.... २५ पटल ... --२२३ ७. ६...... ...... २३ २०...... .... .. २२३ [ ४० ] वे काण्ड एक भिन्न यह पटल क्रम वृ. सा. लेखक ने अपना स्वतन्त्र ही रक्खा हुआ है । यह पटल क्रम काण्डादियों के आधार से नहीं रक्खा, क्योंकि एक पटल में एक से अधिक कागड भी प्राजाने हैं। बृहत्सर्वानुक्रमणी के अध्ययन स तो यही पता लगता है कि लेखक ने दश पटलान्त १६ काण्ड युक्त अनुक्रमणी को स्वयं लिखा है और अवशिष्ट २० को एकादश पटल बनाकर देदिया है। इस काराड की आश्वलायनानुक्रमणी जो कि ऋग्वेदीय प्राचीनानुक्रमणी थी वहां से लेकर यहां उसका पाठ समग्र उद्धृत कर दिया है। इस वात के लिये पुस्तक में ही दो प्रमाण मिलते हैं। एक तो दशम पटलान्त में जिसमें १६वां काण्ड समाप्त होता है, वहां अन्त में इस प्रकार का पाट दिया है "भृग्वं- गिरा वह्मेति भृग्वंगिरा ब्रह्मेति" यहां पर दो बार पाठ देने में लेखक अपनी ग्रंथ समाप्ति की सूचना देता है। यह समाप्ति की एक प्राचीन गति है । दूसरा एकादश पटलारम्भ में स्पष्ट रूप से लिख दिया है, कि बीसवे काण्ड के ऋपि देवता छन्द खिल मंत्रों को छोड़कर आश्वलायन के अनुसार दिये जायेंगे। “ॐ अथावणे विंशतितम- काण्डस्य सूक्तसंख्या सम्प्रदायादृषिदेवतछन्दांस्याश्वलायनानु- क्रमानुसारणानुक्रमिष्यामः खिलान् वर्जयित्वा" । इन दोनों प्रमाणों से नितरां सिद्ध है, कि दशम पटल पर्यन्त ग्रन्थ तो बृहत्सर्वानु- क्रमणी लेखक का अपना है, और एकादशम पटल का समग्र पाठ उसने भिन्न द्वितीयानुक्रमणी से उद्धृत करके रख दिया है। ग्रन्थ कर्ता। इस ग्रन्थ के लेखक का वर्णन समग्र पुस्तक में कहीं नहीं, श्रतः इसके कर्ता का लिखना कठिन है। हां सम्भव है अन्य किसी अथर्ववेदीय साहित्य में अनुक्रमणीकार का पता मिल [ २ ] जावे; परंच वह निर्णय तो अन्य पुस्तकों के मिलने पर ही हो सकेगा। अभी तक तो हम कर्ता के नाम सम्बन्ध में कुछ भी नहीं कह सकते। है इस ग्रंथ का सम्बन्ध । । इस सर्वानुक्रमणी का सम्बन्ध शौनकीय शाखा की अथर्व- संहिता से है, अन्य किसी से नहीं । जो भी प्रतीकादि दी हुई है वे सब इस प्रकाशित शाखा शौनकीय से ही मिलती हैं; अतः इस का इस शाखा से सम्बन्ध स्पष्ट इस पुस्तक में जो काण्ड, मूक्त तथा मंत्रादियों के अंक दिये है वे हमने स्वयं दिये हैं। मंत्रों की प्रतीकोद्धरण में हमने संधिछेद करके इति को भिन्न किया है और मंत्र को भिन्न लिख दिया है। श्रादर्शलेखों में मंत्रों के अनन्तर प्रायः बहुत स्थलों में इति है। जहां २ इति है वहां २ मन्त्र में विसर्ग' का लोप किया हुआ है संधिये भी की हुई हैं, परञ्च हमने स्वयं मन्त्रों को विस- गान्त लिखकर इति पद को भिन्न किया हुआ है। यह केवल पाठकों के सुभीते के लिये किया गया है । काण्ड, सूक्त तथा मंत्रों की प्रतीकों के जो पते हमने दिये हैं, वे वैदिक यन्त्रालय अजमेर में छपी अथर्वसंहिता के जानना । इस ग्रन्थ सम्पादन में सब से अधिक सहायता मुझे उन छ अादर्श पुस्तकों में मिली है. जो मुझे भण्डारकर इन्स्टीट्यूट पूना से श्री श्रीपाद कृष्ण बलवैलकर एम० ए० पी० पच० डी०जी की कृपा से मिली हैं, एतदर्थ में उनका हार्दिक धन्यवाद करताहूं क्योंकि यदि ये मूल लेख मुझे न मिलते तो मेग कार्य अपूर्ण होता। अतः इसकी पूर्णता में मैं महाशय बलवैलकर जी का बहुत ही कृतज्ञ हूं।
[ ४२ ]
गु० नामक आदर्श लेख मुझे गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्या-
लय से पं० इन्द्र जी वेदालंकार की कृपा से प्राप्त हुआ था,अतः वे
भी मेरे धन्यवाद के पात्र हैं। पं० भगवद्दत्त जी ने मुझे इस ग्रन्थ
सम्पादनार्थ प्रेरणा की थी मैं उनका भी अनुगृहीत हूं।
मुझे पूर्ण आशा है, कि यह ग्रन्थ अथर्ववेदाध्यायर्याओं को
अत्यन्त लाभकर होगा। यदि कोई वेदभक्त इस ग्रन्थ से लाभ
उठाकर उस वास्तविक तत्त्वज्ञान को प्राप्त करेगा, तो मैं
अपने परिश्रम को सफल सममूंगा।
रामगोपाल ।
वैदिकाश्रम,
लाहौर।
ज्येष्ठ, एकादशी, वदि, १६७६ विक्रम ।
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शुद्धाशुद्धपत्रम्। भूमिका पृष्ठ । पंक्तिः तुलनात्मक वेद महीधर २४।२२ २६।३ १७.। १३ २६।६ ३३।२ ३४।२ ४०।६ ६४।५ ७८।५ ७६।६ मिली अक्षीभ्याम् आदित्यम् भृगुराज्यम् मृगारः अहमिति एकादशर्चम् इति तिस्रः विराट मारीचिः अनुवाको पूर्वोपरिष्टाद् बृहत्यनुष्टुवुष्णिक जागतानुष्टुब्गर्भा बभ्रोरध्वयों द्वेषः यद्यज्जाया दिवमु इत्युपरिष्टाद् विज्ञानाय मंत्रोत पंचदश गोतमः तुल्नात्मक वद महधिर थी मिला अनीभ्या अादित्याम भृगगज्यम् भृगारः अहमिति সন্ধাহান हातान्त्र विराटु मरीचिः अनुवको पूर्वोपरिष्टद बृहत्यतुष्टुवष्णिक जागताटुनुष्वगी । वभ्ररध्वयों द्वेत् यद्याजाया दिव- इत्युपरिष्टाद् बिज्ञानाय मत्रोत पचदश गोतम १११ । १६ । १२२।८ १२५ । १५. १५६।६ १६०।११ १६७।५ १७३।४ १७४।४ अथर्ववेदीया बृहत्सर्वानुक्रमणिका लस
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ओ३म् अथ बृहत्सर्वानुक्रमणिका। [ॐ ब्रह्मवेदं नमस्कृत्य दुर्गा विघ्नेश्वरं गुरुम् । नृसिंहदक्षिणामूर्तिमथर्वाणमभेदतः ॥ आविष्कुर्वे ब्रह्मवेदं मन्त्रानुक्रमणीं यथा । ऋषिदेवतछन्दोभियुक्तां पाठफलाप्तये ॥*] ॐ अथाथर्वण गणमन्त्राणामृषिदेवतछन्दांसि । 'यत्काम ऋषिमंत्रद्रष्टा वा+भवति यस्यां देवतायामार्थपत्य- मिच्छता स्तुतिःप्रयुज्यते सा देवता तस्य मन्त्रस्य भवति। छन्दोऽक्षरसंख्यावाच्छेदकमुच्यते।तावत्तत्रछन्दोऽनुक्रमणं, * वी. में श्री गणेशायनमः के आगे "अथर्वणनमः" है औरों में नहीं। ख.में इस स्थान पर "श्रो नमोअथर्ववेदाय है। ङ. में इस जगह पर "नमो ब्रह्मवेदाय” है। क, में "नमो ब्रह्मवेदाय, ब्रह्मवेदे भृगुरं- गिरोक्नंबृहत्सर्वानुक्रमाणका लिख्यते।श्रीगोपालरामचन्द्राभ्यांनमः। + बी. मंत्रदृष्ट्वा. क. ख. ग. घ. उ. च.मंत्रदृष्टा वा । तुलना करो निरुक्त ७।१ । यत्कामऋषिर्यस्यां देवतायामार्थपत्यमिच्छन् स्तुतिं प्रयुने तर्देवतः स मंत्रो भवति"। तथा तुलना करो कात्या- यन ऋक्सर्वानुक्रमणी। ३।२। तथा देखो बृहद्देवता 'अर्थ मिच्छ- न्नृषिर्देवं यं यमाहायमस्त्विति प्राधान्येन स्तुवन्भक्तधामन्त्रस्तद्देव एव सः।१।६॥
॥
॥ पटल १ खण्ड २ ॥ [ २ ]
गाय युष्णिगनुष्टुब्बृहतीपक्तिस्त्रिष्टुब्जगत्यतिजगतीशक्कयति-
शक्कयष्ट्यत्यष्टिधृत्यतिधृतिकृतिप्रकृत्याकृतिविकृतिसंकृत्यभिकृत्यु-
स्कृत्येकविंशति छन्दांसीति । यत्र सर्वाणि छन्दांसीति वक्ष्याम-
स्तत्र गायत्र्यादि जगत्यंत सप्तछन्दांसि प्रकृतानि विजानीयात् ।
शंतातीयगणस्य-शंतातिश्चन्द्रमाः सर्वाणिछन्दांसि । भैषज्यगण-
स्याथर्वा भैषज्यायुरतिजगत्यतिशक्कयौं सर्वाणिछन्दांसि च । रुद्र-
गणरौद्रगणयोरथर्वा रुद्रोऽतिशक्करीविराट्शकर्यष्टयः सर्वाणि
छन्दांसि च । अथ दश गणाः। शान्तिगणस्य ब्रह्मा सोमोष्टिः
संकृतिः सर्वाणिछन्दांसि च । कृत्याप्रतिहरणगणस्य शुक्रः कृत्या-
दूषणोऽतिजगतीशक्कयौं सर्वाणिछन्दांसि ॥१॥
चातनगणस्य चातनऋषिरनिर्देवता सर्वाणिछन्दांसि ।
मातृनामागणस्य मातृनामा ऋषिमातृनामा देवता, त्रिष्टुब्बृहत्य-
नुष्टुब्जगत्युष्णिकशक्करी छन्दांसि । बास्तोष्पतिगणस्य ब्रह्मा
ऋषिवास्तोष्पतिर्देवता शक्कर्यतिशक्कयाँ सर्वाणि छन्दांसि च ।
पाप्महागणस्य ब्रह्माऋषिः पाप्महादेवता गाय युष्णिगनुष्टुप्पं-
तिर्जगती छन्दांसि । तक्मनाशनगणस्य भृग्वंगिराऋषिर्यक्षमना-
शनोदेवता शर्यष्टयत्यष्टिधृतयः सर्वाणि छन्दांसि च । दुःस्वाम-
नाशनगणस्य यमऋषिदुःखमनाशनोदेवता सर्वाणि छन्दांसि ।
आयुष्यगणस्य ब्रह्माऋषिरायुदेवतातिजगतीशवयष्टयत्यष्टि धृत्य-
तिधृति प्रकृतयश्चगाय यादि सप्तछन्दांसि । वर्चस्यगणस्याथर्वा-
ऋषिङ्घहस्पतिर्देवता सर्वाणिछन्दांसि ॥२॥
[ ३ ] ॥प०१ खं०४॥ अथ सप्तगणानां स्वस्त्ययनाभयापराजितशर्मवर्मादेव- पुरीयचित्रागणपानीवतानामथवाऋषिश्चन्द्रमादेवता, शक्वर्यति- शक्वौं सर्वाणिछन्दांसि च । आदित्यगणस्यब्रह्माऋषिरादित्यो देवतातिजगतीशक्वर्यष्टयतिछन्दांस्यायुष्यगणवत् । पांचपत्या- गणस्याथर्वाऋषिराग्निर्वायुःसूर्यश्चन्द्रापोदेवता, गाय युष्णिगनु- ष्टुब्बृहतीपंक्तयश्च्छन्दांसि । सलिलगणस्यब्रह्माऋषिरादित्यो देव- तातिजगतीशक्वर्यष्टयत्यष्टिधृत्यतिधृतिकृतिप्रकृतयश्चगायत्र्यादि सप्तछन्दांसि । विश्वकर्मागणस्याथर्वा ऋषिर्वाचस्पतिर्देवतानुष्टु- बुष्णिग्यहतीपंक्तयश्च्छन्दांसि । अर्थमुत्थापनगणस्याथर्वाऋषि- रग्निर्देवतानुष्टुत्रिष्टुवुष्णिग्जगतीपंक्तिहत्यति छन्दांसि । राज्या- भिषेकगणस्य ब्रह्माऋषिमृत्युदेवताथदागिरा, आपश्चंद्रमाउष्णि- ग्जगतीपंक्तिस्त्रिष्टुबनुष्टुब्बृहत्यश्च्छन्दांसि । अहोलिंग गवस्या- थर्वाऋषिरिन्द्रानी चन्द्रवरूणविश्वेदवा देवताः सर्वाणि छन्दांसि ॥३॥ अथ सूक्तमंत्राणां ऋषिदेवतछन्दांसि । कां० १ । सू० १ तत्र प्रथमं १ 'ये त्रिषप्ता' इति त्रीणि सूक्का- न्यानुष्टुभान्येवाथर्वाऽपश्यत्पूर्व वाचस्पत्यं, द्वितीयं चान्द्रमसं पार्जन्यं, तृतीयं पर्जन्यमित्रादिबहुदेवत्यं । पूर्वेण चतुर्ऋचेन वाचस्पतिमेवास्तोत्* वाचाभिवृद्धय, द्वितीयेन चतुर्ऋचनामृतमयं पर्जन्यं स्वदेवं चन्द्रमसं च । तृतीयेन नवर्चेन मंत्रोक्तान्सर्वान्देवा- निति । ४'उपहूतो' वाचस्पतिरिति चतुष्पदा विराडुरोबृहती । * ख. वाचाविवृद्धयै।
Pr- --- ...- ॥प०१ खं०५॥ [ ४ ] १।२।३'वृक्षयदिति' त्रिपदाविराएनामगायत्री । १।३ । १ विनाशरस्येति' तृतीयस्य नवर्चस्याद्याः पथ्या- पंक्तयः । *'तत्रैकोनानिवृवयनाविराडेकाधिकाभुरिक् द्वयधिका स्वराडिति । संदिग्धे देवतादित' इति सर्वत्र परिभाष्यते । पराश्व- तस्रः +प्रथमः प्रतीकत्वेनानुष्टुभइत्येवं सर्वत्र वक्ष्यमाणेपु मंत्रेषु प्रथम प्रतीकिंका प्रकृतिरिति ॥४॥ १४-१'अम्बयोयन्तीति' त्रीणि सूक्तान्यपोनप्त्रीयाणि गायत्राणि सोमाद्वैवतानि सिन्धुद्वीपोऽपश्यदंत्यमथर्वा, कृतिः स्वस्थानत्वेनेतैः सूक्तैरप एवास्तौत् । ४'तत्राप्स्वन्तरिति' पुरस्ताद- बृहती॥ १।६।४'शं न आप' इति पथ्यापंक्तिः॥ * तु० क० पिङ्गलछन्दः सूत्रम् अध्या० ३। ऊनाधिकनैकेन निवृद्भुरिजौ।५६ । द्वाभ्यां विराड्स्वराजौ।६०। आदितः संदिग्धे। ६१ । १ देवतादितश्च ॥ ६२॥ + गु०प्रातीकल्पेन । x ग०च० प्रतीका। : इस १।४। सूक्त के १-३ मंत्रों का ऋ० वे० में ११।२३।१६-१६ में मेधातिथिः काण्व ऋषि है। अथर्व १।५।'सूक्त तथा १।६। के २, ३ मंत्र ऋ० वे० १०।६। सूक्त में आये हैं वहां इन मंत्रों का द्रष्टा विशिरास्त्वाष्ट्रः वा सिन्धुद्वीप वाआम्बरीष ऋषि हैं।
[ ५ ] ॥ प० १ खं०७॥ ११७।१ । 'स्तुवानम् १८१'इदंहविरिति चैतत्सूक्तद्वयमानुष्टुभं चातनोऽपश्यत् । प्रथमेन सप्तर्चेन स्तुबानं यातुधानमग्निमाह्वयत्ततोग्निः सर्वाभि ऋग्भिरस्तोत् । 'इदंहविरिति' द्वाभ्यामृग्भ्यां बृहस्पतमिनीपोमो चाप्रार्थयत् । पराभ्यामग्निं ७ । ५ ‘पश्यामत' इति त्रिष्टुप् । ७।३ 'अयेदमन्न' इत्यग्निमिन्द्रप्रार्थना च । ८।४। 'यत्रपामग्न' इति बार्हतग त्रिष्टुविति ॥ ५॥ १ । । । १'अस्मिन् वस्वितिसूक्तं' त्रिष्टुभं विस्वादि- नाना मंत्रोक्त देवत्यमथर्वापश्यत्तत्र प्रथमा द्वितीये बहुदेवत्ये। परे द्वे आग्नेय्यातत आभिमन्त्रोक्तान्देवानग्निपुरोगमान्सर्वा- नप्रार्थयश्चतसृभिर्वस्वादिसर्वमिष्टं च ।। १।१०।१ततोअयंदेवानामिति' सूक्मासुरं वारुणं त्रष्टुभं । पूर्वयासुरमस्तोत्पराभिवरुणमानुष्टुभावत्ये द्वे । ३ यदुवंक्थेति ककुम्मती ॥ १। ११ ॥१वषट् ते पूषन्निति सूक्तं पौष्णं पडच पक्तिमनेन मंत्रोक्तानर्यमादि देवानारीसुखप्रसवायाभिष्ट्येष्टश्च सर्वाभिर- प्रार्थयत् । २'चतस्रो दिव' इत्यनुष्टुप्परा चतुष्पदोष्णिगर्भा ककुम्मत्यनुष्टुप् । ४'नैव मांस इति तिस्रः पथ्यापंक्तय इत्यनयोः प्रागुक्तर्षिरिति ॥ ६॥ १।१२ ॥ १जरायुज इति सूक्तं यक्ष्मनाशन देवताकं जागतं भृग्वंगिरा । द्वितीयान्त्यनुष्टुप् ॥
॥५० १ खं०६॥ [ ६ ] १ । १३११'नमस्ते अस्तु ॥ १ । १४ । १'भगमस्या' इति सूक्ते वैद्युते द्वे आनुष्टुभे । प्रथमं वैद्यतं परं वारुणं वोत याम्यं वा । प्रथमेन विद्युतमस्तोत्, द्वितीयेन तदर्थ यममिति । १३ । १'भगमस्या' इति ककुम्मती । १३ । ३ प्रवतो नपादिति' चतुष्पाद्विराड्जगती । १३ । ४'यां त्वा देवा इति त्रिष्टुप्पराबृहतीगर्भा पंक्तिः । १४ । ३ ऐषा ते कुलपा इति चातुष्पाद्विराड् ॥ १ । १५॥ १ 'सं सं स्रवन्त्विति' सूक्तमानुष्टुभंसैंधव- मथर्वापश्यत्ततोऽनेन मंत्रोक्तान्देवानप्रार्थयदाद्या, द्वितीया भुरिक पथ्यापंक्तिरिति ॥ ७॥ १। १६ ॥ १ 'येऽमावास्यामिति' सूक्तमग्नीन्द्रं वारुणं दध- त्यमानुष्टुभं चातनोऽद्राक्षीदनेन मंत्रोक्तान्देवान् सीसमभिष्ट्रया- प्रार्थयत् । '४यदि नोगामिति' ककुम्मती शेषं प्राकृतम् ॥ १।१७॥१अमूर्या' इति सूक्तं योषिदेवत्यमानुष्टुभं । ब्रह्मा लोहितवाससो मंत्रोक्तदेवता अस्तीत् । श्राद्या भुरिक् । ४'परि वः सिकतावतीति' त्रिपदार्षीगायत्री। १।१८ ॥ १निलदम्यमिति' सूक्तं वैनायकमानुष्टुभं द्रविणोदाः। प्रथमोपरिष्टाद्विराड्बृहती। २ निररणिमिति' निज- गती । ३'यत्त आत्मनीति' विराडास्तारपंक्तिस्त्रैष्टुभमिति ॥८॥ १। १६ । १मानो विदनिति सूक्तमैश्वर्यमानुष्टुभं । ब्रह्मा [ ७ ] ॥प०१ खं०६॥ प्रथमन्द्री, द्वितीया मानुष्येष्ठवीदवीस्तृतीयारौद्रीया । 'यद्देवत्या तया तामेवास्तौदिति' वैश्वदेवत्या । २'विष्वञ्चो अस्मछरव' इति पुरस्ताबृहती । ३'यो नः स्व' इति पथ्यापंक्तिः ॥ १॥ २०॥+१'अदारसृदिति' सूक्तं सौम्यमानुष्टुभमथर्वा, प्रथमात्रिष्टुप् सौम्या। द्वितीया मारुतः। तृतीया मंत्रावारुणी । परा वारुणी । परैन्द्री ।। १४।२१ ॥ १'स्वस्तिदा विशामिति' सूक्तमैन्द्रमानुष् भमने नेन्द्रप्रार्थनां प्रागुक्तर्षिरकरोत् ।। १।२२।१'अनुसूर्यमिति सूक्तं सौर्यमुत मंत्रोक्तं । हरिमा- देवत्यमानुष्टुभं । ब्रह्मा ततोऽनेन सूर्य, हरिमाणं, हृद्रोगं चास्तौद नाशयम् ॥ १ । २३ ॥१'नक्तं जातेति' सूक्तं वानस्पत्यमानुष्टुभमथर्वा श्वेतलक्ष्मविनाशनायानेनासिनीमोषधिमस्तौदिति ॥६॥ ." * सब मूल पुस्तकों में इस पाठ पढ़ने में शंका वनो रही है मूल अ. वेद १ । १६ । २ में "दैवीमनुष्वेषवः" पाठ है । हमने जो शुद्ध पाठ [ङ] मूल पुस्तकाधार से जाना है, वह दिया है। +इस १॥२०॥ सूक्त का चतुर्थ मंत्र ऋण्वे०१०।१५२।१ में आता है,वहां इसका ऋाषे शासोभारद्वाज,देवता इन्द्र और छन्द निचूदनुष्टुप् है। ४१।२१ । इस सूक्त के चारों मंत्र ऋ० वे१० । १५२ सूक्त में आते हैं । स्वस्तिदा मंत्र का ऋ० वे० में थोड़ासा भेद है । ऋ० वे०॥ में इस सूक्त का द्रष्टा शासो भारद्वाजः ऋषि है। ।२२ ॥ ४ मंत्र का ऋ० १॥५०॥ १२ में बहुत थोड़े भेद से श्राता है, वहां इस का ऋषि प्रस्कण्वः कारवः है।
॥प० १ खं० ११॥ [ ८ ] १। २४ ॥ १सुपर्णो जात' इति सूक्तमासुरी वनस्पतिदेव- त्यमानुष्टुभं । ब्रह्मासुरीमनेनास्तौदिति । २'आसुरी चक्र' इति निवृत्पथ्यापंक्तिः॥ १।२५ ॥१यदग्निरिति सूक्तं यक्ष्मनाशनाग्निदैवतं त्रैष्टुभं भृग्वंगिरामंत्रोक्तदेवानस्तोत् । द्वितीया तृतीये विरागर्ने । ४'नमः शीतायेति' पुरोऽनुष्टुबिति ॥ १।२६।१'आरे साविति' सूक्तमिन्द्रादि बहुदेवत्यं गायत्रं। ब्रह्मा मंत्रोक्तान्देवानभिष्ट्रयाप्रार्थयत् । २ 'सखासाविति' त्रिपदा साम्नीत्रिष्टुप् । ४ सुषूदतेति' पादनिचूदुभे एकावसाने ॥ १ । २७ ॥ १अमूः पार' इति सूक्तं चान्द्रमसमुतेन्द्राणी दैवतमानुष्टुभं । स्वस्त्ययनकामोऽर्थवा। प्रथमा पथ्यापंक्तिः॥ १२८॥ १'उपप्रागाद्देव इति सूक्तमाग्नेयमानुष्टुभं । चातनः सा द्ययाग्निमस्तोत् । *सार्धाभ्यांपरामृग्भ्यां यातुधानश्चेिति । '३याशशापेति' विराट्पथ्याबृहती । '४पुत्रमत्त्विति' पथ्या- पंक्तिरिति ॥१०॥ १।२६ ॥१+'अभीवर्तेनेत्य'भीवर्तमाण सूक्तं पडचं ब्राह्मण- स्पत्यमानुष्टुभं । वसिष्ठोऽनेन सूक्तेनेमं मणिं सपनक्षयणाय, चन्द्रमसो ब्राह्मणस्पत्यमभिष्ट्रयाप्रार्थयत् ।। * यह पाठ किसी भी हस्तलेख में भली प्रकार से नहीं पढ़ा जाता तथापि ह० ले० के आधार से ही उपर्युक्त पाठ की कल्पना की गई है। + इस सूक्त के आदि के तीन मंत्र अत्यन्त थोड़े भेद से १० १०।१७४ में आते हैं वहां ऋषि अभीवतःऔर देवताराज्ञः स्तुतिःहै ।
[६] ॥प० १ खं० १२ ।। १।३०।१ 'विश्वदेवाः' इति सूक्तं वैश्वदेवं वैष्टुभमायुष्कामो- ऽथर्वा सर्वान् वस्वादिदेवान् सर्वाभिऋग्भिरस्तोत् । ३'ये देवाः, इति शाक्वरगर्भाविराड्जगती ॥ १।३१ । १'पाशानामाशापालेभ्यः' इति सूक्तमाशापा- लीय, वास्तोष्पत्यमानुष्टुभं । ब्रह्मानेनाशापालान्वास्तोष्पतीन् सूक्तेनास्तोत् ३'अनामस्त्वा' इति विरात्रिष्टुप् । ४ स्वस्तिमात्रे' इति परानुष्टुत्रिष्टुबिति ॥११॥ १।३२ । १'इदंजनासः' इति ब्रह्मसूक्तं द्यावापृथिवीयमानु- प्टुभमनेन तदेवास्तौदिति । +सर्वत्रानुक्लार्षसूक्तषु प्रागुक्तर्षि- रिति विजानीयादनुक्त xक्रियष्वपश्यात्तन इति च सर्वत्र परि- भाष्यते । या: यद्देवत्या तया तामेवास्तौदिति पारिभाषिकं सूक्त- मिति च । सर्वत्रावगच्छेदिति शास्त्रप्रकृतिराग्रंथ परिसमाप्तेः। २'अन्तरिक्ष श्रासाम्' इति ककुम्मतीति ।। १। ३३ । १'हिरण्य वर्णाः' इति सूक्तं चान्द्रमसमाप्यमुत त्रैष्टुभं । शंतातिः सर्वेण सूक्तेन सर्वकारणं आप एवेति विज्ञाय ता .X.अस्तादिति ॥ * ख. ग. ऊ.च. लोये ॥ + अनुक्त ऋषि ॥ ४ ख. क्रियेप्वपश्यत्तत, च. क्रियेष्वपस्थतन ॥ बी.या यदृचावत्या ॥ .1.वी. सर्वत्र नहीं॥ .x. समग्र. ह. लेखों में विज्ञातास्तोत्' पाठ है परन्तु हमारी सम्मति में यह पाठ अशुद्ध लिखे हुए हैं, शुद्ध करके व्याकरण के नियम से पाठ हमने मूल में दिया है ।
॥प०१खं०१२॥ [ १० ] १ । ३४ । १‘इयं वीरुत् ।' इति *मधुकमणिसूक्तं पञ्चर्च वानस्पत्यमानुष्टुभमथर्वा मधुवनस्पतिमस्तोत् ।। १॥३५॥ १'यदाबध्नन्' इति हैरण्यमैन्द्राममुत वैश्वदेवं जागतं ततोऽनेन सूक्तेन हिरण्यमेवास्तोत् । यच्छतानीकाय राज्ञे दक्षर्षेः पुत्रा अवघ्नस्तंत्र आत्मनि बनाम्यायुष्कामः।४+'विश्वेदेवाः' इति '४समानां मासाम्' इत्यनुष्टुब्गर्भा चतुष्पदात्रिष्टुप् 'तत्ते Xबध्ना- म्यायुषे १वर्चसेबलाय'इति शाक्करस्तथा ३: 'अस्मिन्तदक्षमाणः' इति ॥ १२ ॥ * बी. क. ग. गु. मदुघ, ख. ङ. च. मधुघ. हमने दोनों ही पाठ नहीं दिये, कौशि. १ । ३४ में इसी सूक्त पर सूत्र लिखते हुए 'मधुक मणिमौक्षऽपनीय इयं वीरूत्' पाठ में मधुकमणि' आया है, यही ठीक जान मूल में दिया है । + यह प्रतीक इस सूक्त में किसी मंत्रारम्भ की नहीं, हां चतुर्थ मंत्र उत्तरार्ध में यह पद पाया है। * यह प्रतीक भी प्रथम मंत्र के उत्तरार्ध के प्रारम्भ की है। यह भी प्रतीक नहीं, परन्तु तृतीय मंत्र के उत्तरार्ध में यह पाठ पाया है। मूल में इस सूक्त में 'समानामासामिति इस प्रतीक केविना अन्य सब प्रतीक प्रारम्भ की नहीं है, यह भी बात यहां चिन्तनीय ही है।
[ ११ ] ॥ प०१ खं०१४॥ *अथ द्वितीयं काण्डम्। २।१ । १'वेनस्तत्' इति प्रभृतिराकाण्डपरिसमाप्तः पूर्व- काण्डस्य चतुर्ऋचप्रकृतिरित्येवमुत्तरोत्तरकाण्डेषु षष्ठं यावदेकका तावत्सूक्तेष्वृगिति विजानीयात्। १'वेनस्तत्' इति त्रैष्टुभं ब्रह्मात्म- दैवतं वेनोऽपश्यत् । ततोऽनेन सूक्तेन तदेवास्तौदिति । ३ स नः पिता' इति जगती ॥ २। २ । १'दिव्यो गन्धर्वः' इति त्रैष्टुभं। मातृनामा गन्धर्वा- प्सरो देवत्वं मातृनामानेन सूक्तेन मंत्रोक्तान् गन्धर्वाप्सरसो देवता अस्तीत्। ४ अप्रिये दिद्युत्' इति त्रिपाद्विराण्नाम गायत्री १'दिव्यो गन्धर्वः' इति विराड्जगती' ५ 'याः क्लन्दाः' इति भुरि- गनुष्टुबिति ॥ १३॥ २।३।१ 'प्रदोयत् इति भैषज्यायुधन्वंतरि दैवतं षडर्चमानु- ष्टुभमंगिरा अपश्यदनेन मंत्रोक्तान् देवानस्तोत् । ६'शं नो भव- न्तु' इति त्रिपात्स्वराडुपरिष्टान्महाबृहतीति ॥ २।४। १'दीर्घायुत्वाय' इति चान्द्रमसमुतजंगिडदेवताक- मानुष्टुभं षडर्चमथर्वानेन सूक्तेन जंगिडमणिमस्तौदिति। प्रथमा विरादप्रस्तारपंक्तिरिति ॥ * यह पाठ हमारा ह॥ + थोड़े भेद से यह मंत्र ऋ० वे० १० १८२॥ ३ में आया है वहां ऋषि विश्वकर्मा भौचनः है।
। ॥१०१ ख०१५॥ [ १२ ] २।५।१*'इन्द्र जुषस्व' इति सप्तर्च त्रैष्टुभमेन्द्रं भृगुरथर्वाण इन्द्रमनेन सूक्तेनाह्वयदाद्यया पराभिश्च सर्वाभिस्तमस्तौदिति +य उपरिष्टाबृहत्यौ तत्र प्रथमा निचूदुत्तरा विराडिति। ३'इन्द्र- स्तुराषाद'इति विराटपथ्याबृहती।४'आ त्वा विशन्तु सुतासः'इति जगती पुरोविराडिति ॥ १४ ॥ २। ६ । १ समास्त्वाने इत्याग्नेयं त्रैष्टुभंसम्पत्कामः शौन- कोऽनेन सूक्तेनाग्निमस्तौदिति । ४'क्षत्रेणाग्ने स्वेन इति चतुष्पदा- पीपंक्तिः परा, विराट्प्रस्तारपंक्तिरिति । २ । ७ । १'अघ द्विष्टा' इति भैषज्यायुर्वनस्पतिदेवत्यमा- नुष्टुभमथर्वा प्रथममनेन सूक्तेन दूर्वामस्तौदिति । प्रथमा भुरिक्। ४'परि मां परि में इति विराडुपरिष्टाबृहती ।। २।८।१'उदगातां ॥ २।६।१'दशवृक्ष' इति च द्वे इमे सूक्ते वानस्पत्ये यक्ष्म- नाशन दैवते चानुष्टुभे भृग्वंगिरा आभ्यां मंत्रोक्तदेवते अस्तीत् । २। ८ । ३'बभोरर्जुन काण्डस्य' इति पथ्यापंक्तिः, परा विराट् , परा निवृत्पथ्यापंक्तिः । १'दशवृक्ष मुञ्च' इति विराटनस्तारपंक्ति- रिति ॥ १५ ॥ * इस २।५। सूक्त के ५-७ मंत्र ऋ० वे०१।३२।१–३ में आते हैं वहां इनका ऋषि हिरण्यस्तूप श्रागिरस है ॥ + ठीक पाठ पढ़ा नहीं जाता क. गु. में 'त्यं त्ये' पाठ है ॥
[ १३ ] । प० १ खं० १७॥ २।१०।१ क्षेत्रियात् त्वा' इति सूक्तं प्रागुक्तर्षिगणं निऋति द्यावापृथिव्यादिनाना देवत्यमष्टचं । प्रथमा त्रिष्टुप् तया निऋ- तिमस्तौद्ब्रह्मणा सह सर्वाभिद्यावापृथिवी । द्वितीययाग्निमद्भिः सह पूर्वपादेनोत्तरेण सहौषधीभिः सोमं । तृतीयया पूर्वपादेन वात- मुत्तरेण चतस्रो दिशः। पराभिर्वातपत्नीः,सूर्ययक्ष्म, निति प्रभृती निचेति । २'शं ते अग्निः' इति सप्तपादष्टिः । ३ शं ते वातः', ४'इमा या देवीः', ५ तासु त्वा','सूर्यमृतं', 'अहा अरातिम्' इति, प्रत्यूचं सप्तपादो धृतयः।६'अमुक्था यक्ष्मात्' इति सप्तपादत्यष्टिः। *८'एवाहं त्वाम्' इति द्वावौष्णिहौ पादाविति ॥ १६॥ २ । ११ । १ दृष्या दूषिरसि इति कृत्यापरिहरण सूक्तं कृत्यादूषण देवत्यं । शुक्रोऽनेन स्राक्त्यमणिमेव सर्वरूपमित्य- स्तोत् । प्रथमा चतुष्पदा विराड् गायत्री । २'सत्योऽसि इति चतस्रत्रिपदाः परोष्णिहः । ४ 'सूरिसि' इति पिपीलिकमध्या निवृदिति ॥ १७॥ २।१२। १+'द्यावापृथिवी उरू' इति सूक्तमष्टर्च नाना देवत्यं । त्रैष्टुभं भरद्वाजःप्रथमया द्यावापृथिवी अन्तरिक्षमुरूगाय- * गु. में यहां यह प्राधेक पाठ है जो कि अन्यों में २।१२। के प्रारम्भ में है । 'स द्यावा पृथिवी उरुतिस्तत्कमष्टर्च नाना देवत्यं त्रैष्टुभं भरद्वाजः प्रथमया सर्पदित्यष्टिः ॥ + इस सूक्त का छटा मंत्र थोड़े से भेद से ऋ० वे० ६५।२ में है।
॥ पटल १ खण्ड २० ॥ [ १४ ] मस्तोत् । द्वितीयया देवान्, परयेन्द्र, परयादित्यवस्वगिरः पितृन् सौम्यान्, परया ब्रह्मविराट्तपोऽन्यो मरुतः,परया यमसदनात्, परया ब्रह्मा,परयाग्निमिति । तत्र २'इदं देवाः' इति जगती।७ सप्त प्राणान्' इति द्वे अनुष्टुभौ । शेषः प्रतीक इति ॥ १८ ॥ २ । १३ । १ आयुर्दा' इति बहुदेवत्यमुताग्नेयं । त्रैष्टुभम- थर्वाद्ययाग्निमस्तोत् । पराभ्यांबृहस्पति *चन्द्रमसे वासः प्रार्थयत् । पराभ्यामायुर्विश्वान्देवान् । ४ एह्यश्मानम्' इत्यनुष्टुप् । ५ 'यस्य ते वासः' इति विराड्जगती॥ २ । १४ । १ निस्सालाम्' इति षडचमानुष्टुभं । शालाग्नि- देवत्यमुत मंत्रोक्तदेवताकं चातनः सर्वाभिऋभिमन्त्रोक्तान् देवान् अग्निभूतपतीन्द्रानस्तोत् । 'निर्वः' इति भुरिन् । ४'भूतपतिः- इत्युपरिष्टाद्विराड्बृहतीति ॥ १६ ।। २।१५। १'यथायो':॥ २। १६ । १'प्राणापानौ'। २।१७१ प्रोजोसि इति त्रीणि प्राणापानायुर्देवत्यानि नाना- छन्दांसि । ब्रह्मा प्रथमं पडर्च त्रिपाद्गायत्रं तेन प्राणमप्रार्थयत् । परे द्वे एकावसाने । तत्र द्वितीयं सप्त तस्याद्याः षडेकपदा आसुरी त्रिष्टुभोऽन्त्यासुर्युष्णिक् प्रथक् प्रथमेन प्रत्यूचं मंत्रोक्ता- न्देवान् स्वायुरेवाप्रार्थयत् । परेणौजः प्रभृतीनि प्राणायुश्च । * बी. चन्द्रसो. क. चन्द्रमासा॥
[ १५ ] ॥प० १ खं० २१॥ १६।१'प्राणापानौ' इत्येकपदासुरी त्रिष्टुण्* द्वितीयकपदासुयुष्णिक् । पराचैकपदासुरी त्रिष्टुप् । ४'अग्ने वैश्वानर' इति [वै] द्विपदे आसुरी गायन्यावाद्याद्य +ऋतुवर्णः पराद्या वसुवर्ण इति ॥ २ । १८ । 'भ्रातृव्यक्षयणम्' इत्याग्नयं द्वैपदं साम्नाबार्हतं चातनः सपत्नक्षयकामाऽनेन सूक्तेन सपत्नक्षयणीः समिध आधा- याग्निं प्रार्थनीयमप्रार्थयञ्चेति ॥ २० ॥ २ । १६ । १'अग्नेयत्' इति पंचसूक्तानि त्रिपागायत्राणि । प्रतिसूक्तं पंच पंचचीन्यकावसानानि Xपांचपत्यान्यथर्वा । प्रथममा- ग्नेयं, द्वितीयंवायव्यं, तृतीयंसौर्य च, तुरीयंचान्द्र, पञ्चममाप्यमिति । प्रथमेनाग्निमस्तात् द्वितीयेन वायु,तृतीयेनसूर्य,चतुर्थेन चान्द्रमसं, पश्चमेनापइति । तत्राद्यानां चतुर्णामाद्याश्चतस्रो निवृद्विषमा गाय- योऽन्त्या भुरिग्विषमा । पञ्चमस्याद्याश्चतस्रः समविषमा अंत्या स्वराविषमा । सर्वा एव संगताः पंच विंशतिस्त्रिपाद इति ।। २।२४ । १'शेरभक' अष्टर्चमायुष्यं पक्तिं । ब्रह्मा सर्वाभिः प्रत्यूचं मंत्रोक्नदेवतामृम्भिरस्तौदिति । प्रथमे द्वे पुरउष्णिहे, परे द्वे पुरो देवत्ये पाक्ने, सर्वा एताश्चतस्रो वैराजः । पराः पञ्चपदाः क्र. * मूल ग्रंथ 'भः॥ : मूल ग्रंथों में (द्वे) नहीं वंधनी में स्वयं दिया है। +.यह पाठ ठीक नहीं पड़ा जाता ऋ, और में संशय था हमने ऋ.पाठ दिया है ॥ x हि० कौशिक सूत्र ४७।८ के आधार से 'पंचापत्यान' पाठ मानता है।
॥प० सं० २३॥ [ १६ ] पथ्यापंक्तयोञाद्य भुरिजावुत्तरे निचूदाविति । ५'जूर्णि चतुष्पदा बृहत्यः प्रथमा वर्ज तिस्रो भुरिज इति ॥ २१ ॥ २ । २५ । १'शं नः' इति वानस्पत्यमानुष्टुभं, चातनोऽनेन पृश्निपर्णीमोषधीमस्तोत् । ४'गिरिमेना' इति भुरिक ॥ २ । २६ । १ एह यन्तु' इति पशव्यं त्रैष्टुभं सवितानेन पशू- नभ्यस्तोदिति । ३'सं सं स्रवन्तु' इति उपरिष्टाद्विराबृहती। ४'सं सिञ्चामि' इति द्वे अनुष्टुभौ । पूवा तत्र भुरिक् ॥ २ । २७ । १'नेच्छत्रुः' इति सप्तर्च वानस्पत्यमानुष्टुभं कपिञ्जलः ॥ प्रथमयारिनिरोजस्त्वमप्रार्थयन्मंत्रोक्तमौषधि, परा- भिश्चतसृभिवौषधिमस्तोत् । परया रौद्र्या रुद्रं, परयैन्द्रमिति ॥ २। २८ । १'तुभ्यमेव' इति त्रैष्टुभं । जरिमायुर्दैवतं । शंभू प्रथमया जरिमाणमभिष्ट्याप्रार्थयदायुश्च । द्वितीयया मित्रावरुणौ, परया पुनर्जरिमाणं । पराभिर्यावापृथिव्यादिदेवानायुश्च । प्रथमा जगत्यंत्याभुरिगिति ॥२२॥ २ । २६ । १ पार्थिवस्य' इति सप्तर्च त्रैष्टुभं बहुदेवत्यमथर्वा - प्रथमा वैश्वदेवी, तया देवानायुष्यमात्मने प्रार्थयद्वितीयायाः प्रथ. मेनायुर्जातवेदसं, परेण पादेन प्रजा त्वष्टारं, तृतीयेन सवितारं धनं शतायुश्च, परयेन्द्रं सौप्रजास्त्वादि, पराभ्यां द्यावापृथिव्यौ विश्वान्देवान् मरुतश्चापश्च, परयाश्विनौ, परयेन्द्रमस्तौदिति च शिष्यते । प्रथमानुष्टुप् । ४ इन्द्रेण दत्तः' इति पराबृहतीनिचुत्प्रस्ता। पंक्तिः॥
[ १७ ] ॥प० १ ख०२५ ॥ २ । ३० । १ यथेदम्' इति प्रजापतिराश्विनमानुष्टुभं कामिनी मनोऽभिमुखीकरणकामः प्रथमया भृतृणं दृष्टान्तेन मनो- मंथनमादध्यात् । परयाश्विनी, पराभिस्तदर्थमोपधिमस्तौदंत्यया दम्पती परस्परंमनोग्रहणमाकुरुताम् ।। २।३१ । १ इन्द्रस्य या' इति महीदेवत्यमुत चान्द्रमसमानु- प्टुभं काण्वः । प्रथमया महीमस्तुवत्, पराभिः सर्वाभिश्च कृमि- जम्भनमादध्यादिति । २ दृष्टमदृष्टम्' इत्युपरिष्टाद्विराबृहती । परापी त्रिष्टुप् । ४ अन्वान्त्यम्' इति प्रागुता बृहती । ५ ये क्रिमयः' इति प्रागुक्ता त्रिष्टुप् । २। ३२ । १'उद्यन्नादित्यः' इत्यादित्यदेवत्यं पड़चमानुष्टु- भमनेनोक्तऋषिरुक्तक्रियामकरोदिति । प्रथमा त्रिपाद्भुरिग्गा- यत्री । ६ प्र ते शृणामि शृंगे' इति चतुष्पानिचूदुष्णिगिति ॥२४॥ २। ३३ । १ अक्षीभ्या ते' इति यक्ष्मविवहणं सप्तर्च चान्द्रमसमायुष्यमानुष्टुभं । ब्रह्मानेन सर्वेण सूक्तेन सर्वांगतो यच्मनिर्गमनमादध्यात् । ५'उरूभ्यां ते' इत्युपरिष्टाद्विराड्बृहती। ३'हृदयात्' इति ककुम्मती । ४'प्रान्त्रेभ्यः' इति चतुष्पाद्भुरिगु- ष्णिक् । ६'अस्थिभ्यः' इत्युष्णिग्गर्भा निचूदनुष्टुप् । ७'अगे अङ्गे' इति पथ्यापंक्तिः॥ * इस ॥३३ सूक्त के १,२,४,५,७ मंत्र ऋ०वे०१०११६३ सूक्त में आते हैं। १, २, ५ मंत्र तो वैसे के वैसे ही है; अन्य ४, ७ मंत्र कुछ भेद से आये हैं। वहां इन मंत्रों का ऋषि विवृहा काश्यपः' है। . - ॥प०१ खं० २५॥ [ १८ ] २ । ३४ । १'य ईशे' इति पाशुपत्यं पशुभागकरणं त्रैष्टुभ- मथर्वा । प्रथमया पशुपतिमभिष्ट्रय परापश्वाप्रार्थयदंततो द्वितीयया देवान्, परयाग्निं विश्वकर्माणं, परया वायु प्रजापति- मंत्यया यज्ञियं पशुमाशिपा प्राणुदत् ।। २। ३५ । १ ये भक्षयन्तः' इति वैश्वकर्माणं त्रैष्टुभमंगिरा सर्वेणानेन सूक्तेन तं विश्वकर्माणमेवास्तोत् । प्रथमा बृहतीगर्भा । ४'घोरा ऋषयः', ५ 'यज्ञस्य चक्षुः, इति भुरिजौ ॥ २ । ३६ । १‘ा नो अग्ने' इत्यष्टर्चमग्नीषोमीयं त्रैष्टुभं पति- वेदनः प्रथमयाग्निमस्तोत् , द्वितीयया सोमादीन् देवान्, परयानी पोमो, परया विन्द्रं, परया सूर्य, परया धनपति, परया हिरण्या- दिभग चांत्ययौषधिमप्रार्थयदिति । प्रथमा भुरिक् । २ सोमजुष्टं ५ भगस्य नावम्' इति तिस्रोऽनुष्टुभोऽन्त्या निवृत्पुरउष्णिागति।।२५ +इति ब्रह्मवेदोक्तमंत्राणां बृहत्सर्वानुक्रमणिकायां प्रथमः पटलः समाप्तः॥ * यह पाठ सब मूल लेखों में पढ़ना कठिन है। घ.ऊ. में “परा- यश्च" पढ़ा जाता है। अन्यों में जो पाठ ऊपर दिया है वैसा ही पढ़ा जाता है। + गु. इत्यथर्ववेदे अनुक्रमणिकायां प्रथमः पटलः समाप्तः सम्वत् १६२२ ना कार्तिक वाद १३॥ ङ. इति ब्रह्मवेदोक्त अनुक्रमणी- कायां प्रथमः पटलः॥
[ १६ ] ॥ प०२ खं०१॥ *अथ तृतीयं काण्डम् । ३। १ । १'अग्निर्नः' इति द्वे सेनामोहने बहुदेवत्ये त्रैष्टुभेऽ- थर्वात्र +षडचं प्रकृतिरन्याविकृतिरिति विजानीयात् । प्रथमया- ग्निमस्तोत् । द्वितीयया Xमरुतः, पराभिरिन्द्रं, परस्य प्रथमाभ्या- मग्निं,पराभ्यामिन्द्रं, परया यां, परया मरुत इति पूर्वस्य तृतीयान्त्ये॥ ३।२।२'अयमग्निरम्मुहत्' इति तिस्रोऽनुष्टुभः । ३।११५ 'इन्द्रमेनाम्' इति विराटपुरउष्णिक । ३। १ । २ यूयमुना' इति विरागभी भुरिक् ॥ ३ । ३ । १'अचिक्रदत्' इति नाना देवत्यमुताग्नेयं त्रैष्टुमनेन मंत्रोक्लान्देवानस्तात् । ३'अद्भयस्त्वा राजा' इति चतुष्पदा मुरिक्पंक्तिः। ६'ह्वयन्तु' इति द्वे प्रानुष्टुभे । ३।४ । १'अात्वा गन्', ५। १‘ायमागन्' इति द्वे सूक्ते, आद्यं सप्तकं द्वितीयमष्टकं । पूर्वमेन्द्रमुत्तरं सौम्यं । पूर्वेणेन्द्रमुत्तरेण पर्णमणिमुक्तर्षिरस्तोदिति । ४ । ४'अश्विना त्वा', ४ । ५ 'आ प्र द्रव' इति ? भुरिजौ ।४।१'आत्वा गन्' इति जगती ॥ ३। ५। २ मयि क्षत्रम् इति द्वे, । ५'श्रा मारुक्षत्' इति तिस्रोऽनुष्टुभः । १'आयमगन्' इति पुरोऽनुष्टुत्रिष्टुप् । ८ 'पर्णोसि' इति विराडुरोबृहतीति ॥१॥ * यह लेख हमारा है। + मू० ले० षडर्च। x मूल लेखों में विसर्ग नहीं। ।
। प० २ खं०३॥ [ २० ] ३।६।१'पुमान् पुंसः परिजातः' इत्यष्टर्च वानस्पत्याश्व- स्थदेवत्यमानुष्टुभं जगदीजं पुरुषोऽनेने मूक्तेनारिक्षयायाम मंत्रोक्त देवमश्वत्थमेवास्तौदिति ॥ ३ । ७। १ हरिणस्य' इति सप्तर्च यक्ष्मनाशनदैवतमुत बहुदेवत्यमानुष्टुभं, भृग्वंगिरा आद्याभिस्तिसृभिहरिणमस्तोत् । परया तारके, परयापः, पराभ्यां यच्मनाशनं । ६'यदासुतेः' इति भुरिक् ॥ ३ । ८ । १'आयातु मित्रः' इति मंत्रमुत वैश्वदेवं त्रैष्टुभमथवा चतसृभिर्मित्रादीन् विश्वान्देवानस्तोत् । पराभ्यां सामनस्यमिति । २'धाता रातिः', ६'अहं गृभ्णामि' इति जगत्यो । ५ संवो मनां सि' इत्यनुष्टुप् । ४'इहेदसाथे' इति विराबृहतीगाचतुष्पादिति ॥२ ३१६ । १ 'कर्शफस्य' इति द्यावापृथिवीयमुत वैश्वदेवमानु- ष्टुभं वामदेवः । ४'येनाश्रवस्यवः' इति चतुष्पान्निबृहती। अंत्या भुरिक् ॥ ३ । १० । *१'प्रथमा ह' इति त्रयोदशर्चमाप्टक्यमानुष्टुभ- मथवा सर्वाभिरेकामेवाष्टकामस्तोत् । ४ इयमेव सा या' इति तिस्रः, १२ एकाष्टका' इति त्रिष्टुभः । ७'ा मा पुष्टे च' इति त्र्यवसाना षट्पदा विराड्गर्भाति जगती ॥ *३।१०।१ मंत्र का उत्तरार्ध ऋ० वे०४।५७१७ में देखो।
[ २१ ] । प० २ खं०५॥ ३। ११ । *१'मुञ्चामित्वा' इन्यष्टचमन्द्राग्नायुष्यं त्रष्टुर्भ ब्रह्मा यक्ष्मनाशनदेवत्यमुत भृग्वंगिराश्चोभी मंत्रोक्तदेवाननेना- स्तुतामिति । ४'शतं जीव',८'अभिन्या इति जगत्यो । पूर्वा शक्क- रीगी, परा त्र्यवसाना पट्पदाबृहतीगर्भा । ५ प्रविशत' इति द्वे आनुष्टुभौ । ७'जराये त्वा इति उष्णिग्बृहतीगर्भापथ्यापंक्तिरिति॥३ ३ । १२ । १ इहैव ध्रुवाम्' इति नवर्च शालामूक्तं वास्तोप्पति- शालादैवतं त्रैष्टुभं ब्रह्मा सर्वेणानेन शालामस्तोत् । ३'धरूण्य- सि शाले' इति बृहती । ६ऋतेन' इति शक्करीगर्भाजगती । ७'एमाम्’ आयनुष्टुप् । द्वितीया विराइजगती । ८ पूर्ण नारि' इति भुरिक् । ह'इमा आपः इत्यनुष्टुप् ॥ ३।१३। १'यददः इति सप्तर्च वारुणमुत मिन्धुदैवत- मानुष्टुभं भृगुस्ता अनेनास्तोदिति । प्रथमा निवृत् । ५'पापा भद्रा' इति विराड्जगती । परा निचूदनुष्टुबिति ॥४॥ ३।१४ । १'सं वः' इति नाना देवत्यमुत गोष्टदेवताकमा- नुष्टुभं ब्रह्मा मंत्रोक्तान्देवानस्तोत् । अंत्यापत्रिष्टुप् । *३।११ । सूक्त के प्रारम्भ के २ मंत्र अक्षरशः और ३, थोड़े भेद से ऋ० वे०१०।१६१ ॥ १-४ में मिलते हैं। वहां इन का ऋषि यक्ष्मनाशनः प्राजापत्यः है । ३ । ११ के यही प्रारम्भ के ४ मत्रं अक्षरशः इसी अथर्ववेद के २०।१६।६-६ में भी मिलते हैं, वहां भी इनका ऋषि ब्रह्मा ही है।
। पटल २ खण्ड ६॥ [ २२ ] ३ । १५ । १ इन्द्रमहम्' इत्यष्टचं त्रैष्टुभं वैश्वदेवमुतैन्द्राग्नं पण्यकामोऽथवा प्रथमया प्रागिन्द्रमस्तोत्परयापथः, *परयाग्निं, +परया प्रपणमग्निविक्रयं च, परया देवानग्निं च धनं प्रार्थयन् , उत्तरया देवानिन्द्र प्रजापति सवितारं सोमाग्निं धनरुचिं चेति, ८ परया विश्वानरं जातवेदसमिति । प्रथमा भुरिक । ४'इमा- मग्ने' इति त्र्यवसाना बृहतीगर्भा षट्पदाविराडत्यष्टिः । ५'येन धनेन' इति प्रथमा विराड्जगती । ७ उप त्वा नमसा' इत्यनुष्टुप्x ८ विश्वाहा ते' इति निदिति ॥ ५॥ ३ । १६ । १: प्रातरग्निम्' इति प्रातःसूक्तं बार्हस्पत्यमुत बहुदेवत्यं त्रैष्टुभमथर्वा । प्रथमा बहुदेवत्याषी जगती तयानीन्द्रा- दीन्मंत्रोक्तान् देवानाह्वयत् । २ प्रातर्जितम्' इति पंचभगदेवत्या- स्तत्र, ४ उतेदानीम्' इति भुरिपक्तिरेताभिरथर्वा भगमेवास्तोत् । तथांत्ययोषोदेवत्ययोषसश्च ॥ *३।१५। ३ ऋ० वे० ३।१८।३ में है, वहां इसका ऋपि 'कतो वैश्वामित्रः, है॥ + ३।१५। ४ का पूर्वार्ध वहुत थोड़े भेद से ऋ० वे०१॥३१॥१६ मह॥ x मूल लेखों में 'ष्टुभ' है। ३ । १६ । सूक्त ऋ० वे०७।४१ में यह सूक्त अत्यन्त स्वल्प भेद से आया है। सप्तम मंत्र वहां विना किसी परिवर्तन से है। ऋ० वे० में इस सूक्त का ऋषि वसिष्ठ' है और प्रथममंत्र का छन्द निजगती है।
[ २३ ] ॥ पटल २ खण्ड ७॥ ३।१७। *१ सीरायुञ्जन्ति' इति नवचं सीतादेवत्यमानुष्टुभं विश्वामित्रः, सर्वाभिः सीतामेवास्तात् । प्रथमागायत्री । २ युन- क्त मीरा', ५ शुनं सुफालाः', घृतेन सीता' इति त्रिष्टुभः । ३ लागलंपवीरवत् इति पथ्यापंक्तिः। ७ शुनासीर ह'इति विराट- पुरउष्णिक् । ८ सीतेवन्दामहे' इति निदिति ॥ ६ ॥ ३ । १८ । +१ इमां खनामि' इति वानस्पत्यमानुष्टुभम- थानेन सूक्तेन सपत्नी Xपराणुदत् । बाणपणीमौषधिमस्तोत् । ४ उत्तराहम्' इत्यनुप्वगर्भाचतुष्पादृष्णिक । ६ अभितेऽधाम् इत्युः ष्णिग्गर्भापथ्यापंक्तिः॥ ३ । १६ । १ संशितं मे' इत्यष्टचं वैश्वदेवमुत चान्द्रमसमुत न्द्रमानुष्टुभं वसिष्ठोऽनेन मंत्रोक्तान्देवानभिष्ट्रयामित्रान् पराणुद- * इस ३०१७ सूक्त का १ मंत्र ऋ० १०१०१।४। में है। द्वितीय मंत्र ऋ० १० । १०१ । ३ में है, देवता विश्वेदेवाः वा ऋत्विज है। दोनों का ऋषि वहां बुधः सौम्यः है । चतुर्थ मंत्र थोड़े भेद से ऋ० ४।५७७ में और वहां ऋषि वामदेव है। और इसका उत्तरार्ध अथर्व ३।१०।१ में भी पाया है। । पंचम मंत्र कुछ भेद से ऋ० ४।५७८ में आया है। षष्ठ मंत्र विना भेद से ४।५७१४ में मिलता है, ऋषि वामदेव है । सप्तम कुछ भेद से ऋ० ४ । ५७ । ५ में है और अष्टम कुछ भेद से ऋ०४ । ५७ । ६ में है। + यह सूक्त बहुत स्वल्प भेद से ऋ० वे० १० ११४५ में प्राता है उस में इस सूक्त का ऋषि 'इन्द्राणी' है। x सब मूल लेखों में पाठ "णुदत्यै" है ॥
॥ प० २ ख०८॥ [ २४ ] दिति । प्रथमा पथ्याबृहती । ३ नीचैः पद्यन्ताम् इति भुरिग्बृहती। *७ प्रेता जयता' इति विराडास्तारपंक्तिः । +५ एषामहम्' इति त्रिष्टुप् । ६ उद्धपन्ताम्' इति व्यवसाना त्रिष्टुप्ककुम्मतीगर्भा पट- पदातिजगती।x='अवसृष्टा परापत्' इति पथ्यापंक्तिरिति ॥७॥ ३ । २० ।- १ अयंतयोनिः' इति दशर्चमाग्नेयमुत मंत्रोक्त देवत्यमानुष्टभं प्रागुक्तर्षिः प्रथमाभ्यां द्वाभ्यां पञ्चम्याचाग्नि- मभिष्ट्रय राय चाप्रार्थयत् । सप्तभिरितरान् भगादीन्देवानिति । तत्र ६इन्द्रवायू' पथ्यापंक्तिः। ८ वाजस्य नु' इति विराड्जगती ॥ ३ । २१ । १ ये अग्नयः' इति दशर्चमाग्नेयं त्रैष्टुभमन्त्या- स्तिस्रो बहुदेवत्याः सप्तभिः प्रथमाभिरग्निमस्तोत्परााभिस्तिसृभि- मन्त्रोक्तान्देवानिति । प्रथमा पुरोऽनुष्टप् । ५ यं त्वा होतारम्' इति जगती । ७ दिवं पृथिवीम्' इति विराड्गर्भा । 1. ६उक्षान्नाय' * थोड़े भेद से यह मंत्र ऋ० १० । १०३ । १३ में है, वहां ऋपि अप्रतिरथ ऐन्द्रः है। + Whitney ने अपने भाष्य में पञ्चम मंत्र का छन्द नहीं दिया ॥ ४ थोड़े भेद से यह मंत्र ऋ०६।७५। १६ में श्राता है वहां ऋपि 'पायुर्भारद्वाज' है॥ : इस ३२० सूक्त का १ मंत्र थोड़े भेद से ऋ०२६।१० में है इसका ऋषि विश्वामित्र है। शेष २–७ मंत्र ऋ० १० । १४१ में थोड़े भेद से आते हैं । सप्तम मंत्र में भेद विलकुल नहीं। इनका ऋषि 'अग्निस्तापसः है॥ •• यह मंत्र ऋ०८।४३ । ११ में कुछ भेद से आया है ॥
[ २५ ] ।। प० २ खं०१०॥ इत्युपरिष्टाद्विराबृहती । 'हिरण्यपाणिं, २'यः सोमे' इति, ३'य इन्द्रेण' इति भुरिजः । शान्तो अग्निः' इति द्वे अनुष्टुभौ । पूर्वानिवृदिति ॥ ८॥ ३। २२ । १ हस्तिवर्चसम्' इति बार्हस्पत्यमुतवैश्वदेवमानु- प्दुभं बर्चस्यं सर्वान्देवान् वर्बोप्रार्थयदिति प्रागुक्तर्षिः । प्रथमाविरात्रिष्टुम् । ३'येन हस्ती' इति पंचपदापरानुष्टुप्- विराडति जगती । ४'यत्त वर्चः' इति त्र्यवसाना षटपदाजगती ॥ ३ । २३ । १ येन बेहद् इति चान्द्रमसमुतयोनिदेवत्यमानु- ष्टुभं ब्रह्मानेन पुत्रमप्रार्थयद्योनिमभिष्ट्रय प्रजाया इति । ५ कृणोमि ते प्राजापत्यम्' इत्युपरिष्टाद्भुरिग्बृहती । ६ यासां द्यौः' इति स्कन्धोग्रीवीबृहती ।। ३।२४ । १ पयस्वतीः' इति सप्तर्च वानस्पत्यमानुष्टुभं भृगुरुतप्राजापत्यं मंत्रोक्ता अस्तौदेवता इति । २'वेदाहम्' इति निनृत्पथ्यापंक्तिः॥ ३ । २५ । १'उत्तदस्त्वा' इति मैत्रावरुणमानुष्टुभं कामेषु- देवताकं च ततोऽनेन मंत्रोक्तान्देवानस्तोत्, जायाकामश्वस्ववशा- यतामिति ॥६॥ ३ । २६ । १'ये स्यां स्थ प्राच्याम्' इति द्वे रौद्रे, पूर्व त्रैष्टुभ- मुत्तरमाष्टिकमथर्वा प्रत्यृचमग्न्यादि बहुदेवत्ये च । पूर्वया प्राची- स्थान् सानीन्हेतिनानोदेवानस्तौदिति । द्वितीयया दक्षिणस्थान् सकामानाविष्यवनानो देवान्, परया प्रतीचीस्थान् वैराजनानो ।। प० २ ख०११॥ [ २६ ] व्युक्तान्देवान्,परयोदीचीस्थान सवातान् प्रविध्यन्तनाम्नो देवान,परया ध्रुवस्थान निलिम्पनाम्नोदेवान् सोपधिकान्, परयोर्ध्वस्थान् अव- स्वन्त नाम्नोदेवान् बृहस्पतियुक्तान्, सर्वा ऋचः पूर्वस्य प्रत्येक पंचपदा विपरीतपाद *लक्ष्मा भवन्ति । पूर्वात्रिष्टुप् । तृतीया- चतुर्थीभुरिजी । द्वितीया पञ्चम्यांत्या जगत्यौ । द्वितीयस्य पूर्वया प्राचींदिशमाग्निमसितामादित्यामस्तोत्, द्वितीयया दक्षिणमिन्द्रं तिरश्चिराजिंपितृस्तृतीयया प्रतीची वरुणं पृदाकुमन्नं, परयोदी- चीं सोमं स्वजमशनिं, परया ध्रवां विष्णु कल्मापग्रीवं वीरुधः, परयोर्ध्व बृहस्पतिश्चित्रं वर्पमिति ॥१०॥ अस्यापि पद प्रत्येकं पञ्चपदा अष्टयस्तत्र द्वितीययात्यष्टिः । पञ्चमीभुरिगेकै ककुम्मतीगर्भा द्वे इति ।। ३।२८। १ एकैकयैपाइति यामिन्यमानुष्टुभं ब्रह्मानेन यामिनी- मस्तोत् , पशु पोपणायेति । प्रथमातिशक्करीगर्भा चतुष्पदाति जगती । ४'इह पुष्टिः' इति यवमध्या विराड्ककुप् । ५'यत्रा सुहार्दः' इति त्रिष्टुप् । ६ 'यत्रा सुहार्दाम्' इति विराग प्रस्तार- पंक्तिः ॥ ३ । २६ । १'यद्राजानः' इत्यष्टर्च शितिपादमावदेवत्य- मानुष्टुभमुद्दालकोऽनेन पडर्चेन शितिपादमविमस्तोत् । सप्तमी कामदेवत्या तयाकामं । 'परा भौमा तया भूमिमिति । प्रथमा- तृतीय पंथ्यापंक्ती । ७'क इदम्' इति व्यवसाना षट्पादुपरिष्टादै- * ऊ यक्ष्मा ॥
[ २७ ] ।। प०२ खं० १२॥ वीबृहती ककुम्मतीगर्भाचिराइजगती । 'भूमिष्ट्वा' इत्युपरि- टाबृहतीति ॥११॥ ३ । ३० । १ सहृदयम्' इति सप्तर्च चान्द्रमसं सांमनस्य- मानुष्टुभमथर्वानेन दम्पत्योः समीकरणाय सांमनस्यमविद्वेषम- स्तौदिति । ५'ज्यायस्वन्तः' इति विराड्जगती । ६'समानी प्रपा'इति प्रस्तारपंक्तिः । ७ सधीचीनान्वः' इति त्रिष्टुप् ॥ । ३१ । १'वि देवाः' इत्येकादशर्च पाप्महादेवत्यमानुष्टुभं ब्रह्मानेन मूक्तेन मंत्रोक्तान्देवान् *पाप्मन्न मन्नास्तोत् । ४'वी मे' इति मुरिक् । +५'त्वष्टा दुहित्रे' इति विरादप्रस्तारपंक्तिरिति ॥ १२ ॥ *उपाप्मघन्या। + कुछ भेद से यह मंत्र ऋ० १०।१७।१ में आता है। वहां ऋषि देवश्रवायामायन है॥
॥ पटल २ खण्ड १३ ॥ [ २८ ] *अथ चतुर्थ काण्डम्। ४।१। १'ब्रह्म जज्ञानम्” इति काण्डं सप्तर्च सूक्तं प्रकृतिरन्या- विकृतिरित्यवगच्छेत् । १'ब्रह्म जज्ञानम्' इति वेनो बार्हस्पत्यमुता- दित्यदैवतम् ॥ ४ । २ +१य आत्मदा' इत्यष्टर्चमात्मदैवतमुभे त्रैष्टुभे भवतस्तां तां देवतां द्वाभ्यामस्तोत् । ४ । १ । २'इयं पि.या', ४ । १ । ५‘स बुध्न्यात्' इति । ६'आपो अग्रे' इति पुरोऽनुष्टुप् । 'आपो वत्सम्' इत्युपरिष्टाज्ज्योतिरिति ॥ ४।३। १'उदितः' इति रौद्रमुतव्याघदेवत्यमानुष्टुभम- थानेन मंत्रोक्तं व्याघ्रमस्तोत् । प्रथमा पथ्यापंक्तिः। ३'अक्ष्यौ च ते' इति गायत्री । ७ यत्संयमः' इति ककुम्मतीग परिष्टाद- बृहती॥ ४।४।१ यां त्वा' इत्यष्टचं वानस्पत्यमानुष्टुभमनेन मंत्रोक्तां उच्छुष्मौषधिं खात्वास्तौदिति च । ४'उच्छुष्मौषधीनाम्' इति पुरउष्णिक् । ६'अद्याग्ने' इति बहुदेवत्ये इमे द्वे भुरिजौ पुरोष्णिक् ॥ * यह लेख हमारा है। + थोड़े भेद से यह सूक्त मंत्र (5) के विना ऋ० १० । १२१ । में आया है, वहां ऋषि हिरण्यगर्भः प्राजापत्यः' है और देवता [ २६ ] ॥प० २ खं०१५॥ ४। ५ । *१ सहस्र शृङ्गः' इति ब्रह्मा स्वापनं वार्षभमा- नुष्टुभं । २'न भूमिम्' इति भुरिक । ७'स्वप्न स्वमा' इति पुरस्ता- ज्ज्योतिस्त्रिष्टुाबाते ॥१३॥ ४।६। १'ब्राह्मणो जज्ञ' इति द्वे सूक्ते पूर्वमष्टर्च गरुत्मान् तक्षकदेवत्यमुत्तरं वानस्पत्यमानुष्टुभे द्वाभ्यां मंत्रोक्तदेवता अस्तीत् ॥ ४ । ७ । १'वि ते मदम्' इति स्वराट् ॥ ४। ८ । १ भूतो भूतेषु' इति राज्याभिषेक्यं चान्द्रमसमा- प्यमानुष्टुभमथर्वागिरा मंत्रोक्ता देवता अनेनास्तीत् । आद्या भुरित्रिष्टुप्। ३'आतिष्ठन्तम्' इति त्रिष्टुप् । ७'एना व्याघ्रम्' इत्याद्या, ५ या आपः' इति विराट्प्रस्तारपंक्तिरिति ॥ ४ । । । १+ एहि जीवम्' इति दशर्च भृगुवकाकुदांजन दैवतमानुष्टुभमनेन सूक्तेन तदेवांजनं बहुधास्तोत् । २ परिपाणम्' इति ककुम्मती, परापथ्यापंक्तिरिति ॥ १४ ॥ ४। १० । १ वाताजातः' इति शंखमणिसूक्तं तदैवतमानुष्टु- * इस ४।५ सूक्त के १,३,५,६ मंत्र ऋ०७ १५५॥ में कम से ७, ८, ६, ५ में थोड़े भेद से आये हैं, वहां ऋपि वसिष्ठ और देवता + इस सूक्त के सप्तम मंत्र का उत्तरार्ध स्वल्प भेद से ऋ० १० । १७ । में श्राता है।
।। पं० २ ख० १६॥ [ ३० ] भमथवाभिः कृशनमस्तोत् । *६ हिरण्यानाम्' इति पंथ्यापंक्तिः । ७'देवानामस्थि' इति पञ्चपदा परानुष्टुपशक्करीति ॥ ४ । ११ । १'अनड्वान्दाधार' इति द्वादशर्च भृग्वंगिरा आनुहं त्रैष्टुभं तां देवतामिन्द्ररुपणवास्तादिति । प्रथमाचतुर्थी जगत्यौ । द्वितीयाभुरिक् । ७ इन्द्रो रूपेण' इति त्र्यवसानाषट्पदा- नुष्टुग परिष्टा +जागतानिनृच्छक्करी । ='मध्यम तदनुहहः' इति पंचानुष्टुभ इति ॥ १५ ॥ ४।१२।१'रोहिण्यसि' इति वानस्पत्यमानुष्टुभमृभुमन्त्रो- क्वां देवतामस्तौदिति । प्रथमात्रिपदागायत्री। ६'स उत्तिष्ठ' इति त्रिपदा यवमध्या भुरिग्गायत्री । ७ यदि कर्त्तम् इति बृहतीति ॥ ४। १३ । ४१'उत देवा' इति चान्द्रमसमुत वैश्वदेवमानु- प्टुभं शतातिरनेन मंत्रोक्तान् विश्वान् देवानस्तौदिति ॥ * वी. के विना क.ख.ग.ङ. में हिरण्यानाम् के स्थान में 'अग्नि- हिरिण्यानाम्' पाठ आया है वी. में पाठ मूल वेदवत् है। किसी भी मूलवेद में 'हिरण्याना के पूर्व 'अग्निः' पद नहीं है, यदि 'अग्नि' पद पूर्व लगावे तो पथ्यापंक्तिः छन्द नहीं वनता अब क्या कभी मूल संहिता में यह पद पूर्व था अथवा कुछ और वात थी इसका निर्णय करना अत्यन्त कठिन है॥ + ङ. जागती॥ x यह सूक्न छटे मंत्र के विना ऋ० १० । १३७ में आता है। वहीं इस के ऋषि एक २ऋचा वाले सात हैं। 'सप्त ऋषय एका छटा मंत्र १०। ६० । १२ में है ऋषि बन्ध्वादयो गौपायनः, देवता हस्तः॥
[ ३१ ] ॥ पटल २ खण्ड १८ ॥ ४ । १४ । १'अजाहि' इति नवचं भृगराज्यमानयं त्रैष्टुभम् तावानेनास्तोत् । २'क्रमध्वमग्निना' ४' स्वर्यन्तः' इत्यनुष्टुभी । ३'पृष्ठात् पृथिव्याः इति प्रस्तारपंक्तिः । ७ पञ्चौदनं । शृत- मजम्' इति जगन्यो । ८ 'प्रतीच्यां दिशि' इति पञ्चपदाति शक्करीति ॥१६॥ ४।१५। १ समुत्पतन्तु' इति पोडशचमथर्वा मरुत्पर्जन्य- देवत्यं त्रैष्टुभं प्रथमया प्रथमं सर्वा दिशोऽस्तोत् । पराभ्यां वीरुधश्च, परया मारुतपर्जन्यान्, परया मरुतः, परया प्रजापतिस्तनयिन्नु- नासहाह्वयत् । परया वरुणं तिसृभिस्ततामण्डूकान् पितॄश्च परया वातमप्रार्थयत् । प्राय द्वे. ५'उदीरयत' इति विराङ्जगत्यौ। १०'अपामग्निः' इति भुरिक् । ४ गणास्त्वा' इति विराट् रास्ता- बृहती । ७'सं वो ऽवन्तु' इति, *१३ संवत्सरं शशयाना' इति द्वे अनुष्टुभौ । ६'आपो विद्युत्' इति पथ्यापंक्तिः । १२'अपो निपिश्चन्' इति पंचपदानुष्टुब्गर्भा भुरिक् । १५ खण्वखा इखै- मखा' इति शंकुमत्यनुष्टुबिति ॥ १७ ॥ ४ । १६ । १'बृहन्नेषाम्' इति सन्यानृतोऽन्वी+क्षणसूक्तं नवचं ब्रह्मा वारुणं त्रैष्टुभमाद्यश्चतसृभिर्दिव्यसा देवविज्ञानमकरोत् परया वरुणेरणं, पराभ्यां वरुणप्रार्थनं,ततोद्वाभ्यां वरुणोक्तिरिति । * यह ४ । १५।१३ मंत्र ऋ०७।१०३।१ में आया है। वहां इसका ऋापे वासष्ठ और देवता मण्डूक है ॥ + क. ख. ग. ङ. वीचक्षण ॥
॥ प० २ खं०१६॥ [ ३२ ] ४।। १६ । प्रथमानुष्टुप् । 'यः समाभ्यः इति त्रिपान्महा- बृहती। ह'तेस्त्वा' इति विराएनाम त्रिपाद्गायत्री। ५'सर्व तद्राजा' इति भुरिक, 'शुतेन पार्शः' इति जगतीति ।। ४ । १७ । १'ईशानां त्वा इति चतुविंशच त्रयं सूक्तानां शुक्रो- ऽपामार्ग वनस्पतिदेवत्यमानुष्टुभं सर्वाभिरपामार्गवीरुधमस्तोत् । ततः कृत्यामशमत् । १८ । ६ यश्चकार न शशाक' इति बृहती- गर्भा । १६ । २'ब्राह्मणन पर्युक्तासि' इति पथ्यापंक्तिरिति ॥१८॥ ४ । २० । १'श्रा पश्यति' इति नवचं मातृनामा ऋषिमात् नामार्दवतमानुष्टुभमनेनौषधिमेवास्तोत् । प्रथमा स्वराट् । अंत्या भुरिक इति ॥ ४ । २१ ।*१'आ गावः' इति ब्रह्मगव्यं त्रैष्टुभमनेन गावो- ऽस्तौदिति । २'इन्द्रो यज्वने' इति तिस्रो जगत्य इति ।। ४ । २२ । १ इममिन्द्रवर्धय' इति वसिष्ठ ऐन्द्रं त्रैष्टुभम+ थर्वा क्षत्रियाय राज्ञे चन्द्रमसे प्रथमाभिः पञ्चभिः निरमित्रीकरणं मुख्येनेन्द्रमप्रार्थयत् । ग्रामगवाश्चादि सर्व राज्योपकरणं च ततः पराभ्यामन्त्याभ्यामिन्द्रो xरूपेण स्वयमेव क्षत्रियराजानं चन्द्रमसमाशिषा प्राणुददिति ।। १६ ॥ * यह ४।२१ सूक्त ऋ० ६२८१-७1 में है वहां ऋषि भरद्वाज बार्हस्पत्य है॥ + हि० त्रैष्टुभं सोऽथर्वा ॥ ४ द्वि० इन्द्र रूपेण ॥ :बि० क्षत्रियं॥
[ ३३ ] ॥ प० २ खं० २० ॥
४ । २३ । १‘अग्नेमन्वे' इति सप्त मृगारसंज्ञकानि मूक्तानि
भृगारो नाना देवत्यानि त्रैष्टुभानि । ततः १'अग्नमन्वे' इत्यनेन
प्रथमं प्रचेतसमग्निमस्तात् ॥
४ । २४ । १‘इन्द्रस्यमन्महे' इति इन्द्रं ॥
४ । २५ । १ वायोः सवितुः' इति वायुसवितारौ ।।
४ । २६ । १'मन्वे वां द्यावापृथिवी' इति द्यावापृथिव्या ।।
४ । २७ । १'मरुतां मन्वे' इति मरुतो देवान् ।
४ । २८ । १'भवाशर्वी मन्वे वाम्' इति भवशावुतरौद्र-
मथवा ॥
४ । २६ । १'मन्वे वां मित्रावरुणो' इति मित्रावरुणा-
तन्मिपतः परानृषीनिन्युत द्रुह्वणस्तत्र २३ । ३ यामन्यामन्' इति
पुरस्ताज्ज्योतिष्मती । २३ । ४ सुजातं जातवेदसम्' इत्यनुष्टुप् ।
६ येन देवाः' इति प्रस्तारपंक्तिरिति । २४ । १ इन्द्रस्य मन्महे'
इति शाक्वरीगापुरःशकरी । २५। ३तव व्रते' इत्यतिशक्करी ।
२६ । १ मन्वे वां द्यावापृथिवी' इति परोऽष्टिरित्युभेजगत्यौ ।
२५ । ७ उप श्रेष्ठा नः' इति पथ्याबृहती । २८ । १'भवाशा
मन्वे वाम्' इति यतिजागतगीभुरिन् । २६ । ७'यन्मदम् इति
शाक्करगर्भातिमध्येज्योतिः । २६ । ७'ययोः रथः' इति शाक्वरी-
गर्भाजगतीति । सर्वेषां श्रृंगाणां सर्वासंगत्येवमेकोनपंचाशत्
परानुष्टुभ इति ॥२०॥
॥ प० २ खं० २१॥ [ ३४ ]
४ । ३० । *१'अहं रुद्रेभिः' इत्यष्टचमथर्वा वाग्देवत्यं
त्रैष्टुभं स्वयमेवाहमितिवाचंसर्वरूप सर्वात्मिकासर्वदेवमयीमि-
त्यस्तोत् । ६'अहं सोमम्' इति जगती ।।
४ । ३१ । ११त्वया मन्यो' । ४। ३२ । १'यस्ते मन्यो'
इति द्वे ब्रह्मा स्कन्दोमन्युर्दैवते त्रैष्टुभे आभ्यांसेनान्योजयेन्मन्युः
सूक्तमस्तूयत् । ३१ । २'अग्निरिव मन्यो' । ३१ । ४‘एको बहनाम्'
इति भुरिजौ ३१ । ५ विजेष कृत्' इति तिस्रः॥
४ । ३२।१यस्ते मन्यो' इति जगती॥
४ । ३३ । १‘अप नः शोशुचत्' इति ब्रह्मा पाप्मत्यमाग्ने-
यमष्टर्च गायत्रम् ॥
४।३४ । १'ब्रह्मास्य' इत्यष्टर्चमथा । ब्रह्मास्यौदनं त्रैष्टुभं
४'विष्टारिणम्' इत्युत्तमाभुरिक् । ५ 'एष यज्ञानाम्' इति, व्यवसाना
सप्तपाद कृतिः । ६ घृतहदा' इति पञ्चपदातिशक्करी । पराभुरिक्-
शक्करी । ८ इममोदनम्' इति जगती ॥
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यह सूक्त ऋ० १० । १२५ में है । वहां ऋषि वागाम्भृणी
और देवता भी वागाम्भृणी है ॥
यह सूक्त ऋ० १० १८४ में है। वहां ऋषि मन्युस्तापसः है॥
+ यह सूक्त ऋ० १० । ८३ में है इस का भी ऋषि ३१ सूत्र
वाला है।
यह सूक्त ऋ० १ । ६७ में है। ऋषि कुत्स आडिरस है ॥
[ ३५ ] ॥५०२ खं० २३॥ ४ । ३५। १ 'यमोदनम् इति प्रजापतिरा तिमायं त्रैष्टुभं । ३'यो दाधार' इति भुरिक जगतीति ।। ४ । ३६ । १'तान्त्सत्याजाः' इति चातनः सत्योजसमा- नेयमानुष्टुभं । ह'ये मा क्रोधयन्ति' इति भुरिगिति ॥ २१ ॥ ४ । ३७ । १ त्वया पूर्वम् इति द्वादशचं बादरायणिरज,- ग्यप्सरोदेवत्यमानुष्टुभम् । प्रथमाभ्यां द्वाभ्यामोषधिमस्तोत् । पराभिस्तिसृभिरमग्मः, परयौषधि, पराभिःपइभिगन्धर्वाप्सरी पधिरिति । ३'नदी यन्तु' इति व्यवमाना पदपदात्रिष्टुप् । ५ यत्र वः प्रेखा' इति प्रस्तारपंक्तिः । ७'श्रा नृत्यतः' इति परोष्णिक । ११ श्ववैक' इति षट्पदाजगती, परया निवृदिति ॥ ४।३८। १'उद्भिन्दतीम्' इति द्वि देवत्यमानुष्टुभम् । सोऽक्ष- विदेवनायाद्याभिश्चतसृभिरप्मरामाह्वयत् । पराभिस्तिसृभिर्वाजिनी- वंतमृषभमस्तोत् । ३'यायैः परि' इति षट्पदा व्यवसाना जगती । तथा ५ सूर्यस्य रश्मीन्” इति भुरिगत्यष्टिः । ६ अन्तरिक्षण' इति पूर्वात्रिष्टुबुत्तरा-यवसाना पश्चपदानुष्टुब्गी पुरउपरिष्टाज्यो- तिष्मती जगतीति ॥२२॥ ४ । ३६ । १पृथिव्यामग्नये' इति दशमंगिराः सान्नत्यं नानादेवत्यं । पक्तिं तथान्त्ये द्वे आग्नेयो त्रैष्टुभो । तत्र प्रथमाभ्यां * ह्वि० श्रातिमर्त्यम् E. । ह्रि श्रातिमय॑म् Br. ॥ द्वि० सात्योजसम् ॥
परा. ॥ ०५२ खं० २३॥ [ ३६ ] द्वाभ्यां पृथिव्यग्नी स्तुत्वाप्रार्थयत् । पराभ्यां वाय्वन्तरिक्ष, भ्यां दिवादित्यौ, पराभ्यां दिकचन्द्रमसस्ततः, पराभ्यां ब्रह्मा जातवेदसमग्निं प्रार्थ्यायजदिति । १'पृथिव्याम्'. ३'अन्तरिक्ष, ५'दिवि', ७ दिक्षु' इति त्रिपादा महाबृहत्यः। २ पृथिवी', ४ अन्त- रिक्ष', ६ द्यौः, --दिशः एताश्चतस्रः संस्तारपंक्तयः ।। ४। ४० । १ ये पुरस्तात्' इति कृत्याप्रतिहरणश्मष्टर्च शुक्रो बहुदेवत्यं त्रैष्टुभम् । प्रथमया प्राच्यमग्निमस्तात्. द्वितीयया दक्षिणस्यां यम, तृतीयया प्रतीच्यां वरुणं, परयोत्तरतः सोमं, परयाधस्ताद्भुमि, परयान्तरिक्षे वायु, परयोपरिष्टात्सूर्य, ततो दिगन्तर्देशेभ्यः सर्वत्र ब्रह्मेति ब्राह्मणं सर्वत्र । जातवेद आभिमु- ख्येनास्तोत् । २'ये दक्षिणतः । ८ ये दिशामन्तर्देशेभ्यः' इति जगत्यौ । द्वितीयया पुरोति शक्करी पादयुगिति ॥ २३ ॥ इति ब्रह्म वेदोक्त मंत्राणां बृहत्सर्वानुक्रमणिकायां द्वितीयः पटलः समाप्तः॥ * ति० के Br. लेख में अष्टर्च हैं दूसरे E. में नहीं ॥
[ ३७ ] ॥प०३ खं०१॥ +अथ पञ्चमं काण्डम् । ॐ अथैवं वक्ष्यमाणमंत्रेषु मूतप्रकृति सार्पिछन्दोदेवतेष्व- वगच्छेत् सर्वत्रेति ॥ ५।१।१'ऋधङ् मन्त्रः॥ ५।२।१'तदिदास' इति द्वे वारुणे त्रैष्टुभे ।। ५।३ । १'ममाग्ने वचः' इत्याग्नेयं, पूर्वे नवके, परमेका- दशकं त्रैष्टुभं । बृहदिवोऽथा प्रथमस्या परावृहती त्रिष्टुवंत्या व्यवसाना षट्पदात्यष्टिः । १० ये नासपत्नाः' इति विराड्जगती । ५। १ । ७'उतामृतासुः' इति विराट् । ५।२। 'एवा महान्', ५ । ३ । २'अग्ने मन्युम्' इति मुरिजौ पूर्वापराति जागतौ । उरु + यह लेख हमारा है। * ङ. सा ऋषि॥ 1 ५। १ सूक्त का छटा मंत्र ऋ० १०१५। ६ में आया है। वहां इसका ऋषि 'त्रित' और देवता.अग्निः है ॥ ५।२ यह समग्र सूक्त अत्यन्त स्वल्प भेद से ऋ० १०।१२० में पाया है वहां भी इसका ऋषि 'बृहादेव पाथर्वणः' है ॥ $ ५। ३ सूक्त के ७, ११ मंत्रों के विना यह सूक्त ऋ०१०११२८ में स्वल्प भेद से आया है वहां इसका ऋषि विहव्य' और 'विश्वे देवाः' देवता है॥ || क. ख. ग. ऊ. त्रिष्टुभं ॥ बी. 'प्रथमस्याद्या परा'।
॥प०३ खं० २॥ [ ३८ ] व्यचा नः पूर्वसूक्तद्वयेन वरुणमस्तौत् । ५ । ३ । १'ममाग्ने वर्चः इति द्वाभ्यामृग्भ्यां विहव्योऽग्निं, पराभ्यां देवान्, परया द्रविणो- दादि प्रार्थनं, परा वैश्वदेवी, परा सोमी, तत्परा रोद्री, परे वैश्व- देव्यो, परमैन्द्रीति च ॥१॥ ५। ४ । १'यो गिरिषु' दशकं भृग्वंगिरा यक्ष्मनाशन कुष्ठ- देवत्यमानुष्टुभं सर्वाभिः कुष्ठतक्मनाशनं वास्तान ६'इमं मे कुष्ट' इति गायत्री । ५'हिरण्ययाः पन्थानः' इति भुरिक । १०'शीपा- मयम्' इत्युष्णिग्गर्भानिवृत् ।। ५। ५ । *१'रात्री माता' इति लाक्षिकमानुष्टुभं नवकं ।। ५।६। १'ब्रह्म जज्ञान' सोमारुद्रीयं चतुर्दशकं त्रैष्टुभमे- तदादीनि समिद्धो अंत्यातः प्राचीनान्यथवा पूर्वेण लाक्षामस्तो- दिति । उत्तरस्याद्यया ब्रह्मादित्यं, द्वितीययाकाणि, पराभ्यां रुद्रगणान् । ५ न्वे इतेन' इति तिसृभिः सोमारुद्रौ। ८ मुमुक्तम्' मूल लेखों में लामिक पाठ है ॥ ।५।६ सूक्त का १ मंत्र अथर्व ४।१।१ में पहले भी आया है। वहां इस का ऋषि 'वेन' और 'बृहस्पति' और 'श्रादित्य' है। मंत्र २ अथर्व ४।७।७ में है। वहां ऋषि 'गरुत्मान्' और देवता तक्षक है । मंत्र ३ स्वल्प भेद से ऋ०६।७३।७ में है वहां ऋषि 'पवित्र' है। मंत्र ४ ऋ० । । ११० । १ में अल्पभेद से आया है । ऋषि 'व्यरुणत्रसदस्यू' है ॥ * बी. मुमुक्तमस्मानिति ॥
[ ३६ ] ॥पटल ३ खण्ड ४ ॥ ५।६इत्येकावसानाच्य॑नुष्टुद्विपदा। तयोरेव प्रार्थनं, परया हेति पराभिश्चतसृभिः सर्वात्मकं रुद्रमिति । २'तत्र अनाप्ताय' इत्यनु- ष्टुप् । ३'सहस्रधार एवं' इति द्वे जगत्यौ । तत्र ४ पयूँ षु' इत्यनु- प्टुबुष्णिकत्रिष्टुब्गर्भापंचपदा । ५ न्वतेन' इति तिस्रविपदाविरा एनामगायत्र्यः । १० यो ऽस्मान्' इति प्रस्तारपक्तिः । ११ इन्द्र- स्य गृहः' इति चतस्रः पंक्तयोऽत्र, तुरीया स्वराडिति ॥२॥ ५। ७ । १'श्रा नो भर' इति दशकं बहुदेवत्यमानुष्टुभमा- द्यास्तिस्रोऽरातीयाः, परे सारस्वत्यो, पराः सर्वाः पुनररातीयाः। यदेवत्येति पारिभापिकं स्मरणमिति । सरस्वत्या मधुवाचोऽ- प्रार्थयदिन्द्राग्निभ्यां वसूनि चेति । प्रथमाविराड्गर्भा प्रस्तार- पंक्तिः । ४ सरस्वतीमनुमतिम्' इति पथ्याबृहती । ६ मा बनिम्' इति प्रस्तारपंक्तिः ॥ ५। ८ । १'वै कङ्कतेन' इति नवकमानुष्टुभं नानादेवत्यं प्रथमं द्वे आग्नेय्यौ, परा वैश्वदेवी, परावाशिषा एन्द्रयो भवंति। २'इन्द्रायाहि' इति व्यवसाना षट्पदा जगती । ३'यदा'. ४'अति धावत' इति भुरिक् पथ्यापंक्ती । ६ यदिप्रेयुः' इत्या- स्तारपंक्तिः । ७ यानसौ' इति द्वथष्णिग्गर्भापथ्यापतिः । ६'अत्रैनान्' इति व्यवसानाषट्पदाद्वथष्णिग्गर्भा जगतीति ।।३॥ ५। । । १ दिवे स्वाहा' ॥ * लि० गु० 'प्रस्तारपंक्तिः' छन्दावधि से वी. ऊ. क. आदि का प्रास्तारपक्तिः पाठ ठीक है।
।। पटल ३ खण्ड ५ ॥ [ ४० ] ५। १० । १ अश्मवर्म मा' इति चोभ वास्तोष्पत्ये अटक ब्रह्मा श्राद्यस्यस्वाहा दैवीबृहती, द्वितीया देवीत्रिष्टुर, तृतीया- दैवीजगतीत्येवं परा जगती, परा बृहती, परात्रिष्टुर , ७ सूर्यो में इति विराष्णिग्बृहतीगी पञ्चपदाजगती । पग पुरस्कृतित्रि- ष्टुब्बृहतीगर्भाचतुष्पदेति जगतीति व्यवसाना च । द्वितीयम्या- या पड्यवमध्यात्रिपदा गाय यः । परायवमध्याककुप, ८ बृहता मन' इति पुरोधृतियनुष्वगर्भा पराष्टिस् यवसानाचतुष्पदोऽति जगती ॥ ५ । ११ । १ कथं महे' इत्येकादशच त्रैष्टुभमथवीनन प्रश्नोत्तरमुखेनमंत्रोक्तदेवतामस्तोत् । प्रथमा भुरिक । ३ सत्यमहम्' इति पंक्तिः । ६.एकं रजसः' इति पञ्चपदातिशक्करी । ११ देवो देवाय' इति :यवसानाषट्पदात्यष्टिः ॥ ५। १२ । ११ समिद्धो अद्य' इत्येकादशचं त्रैष्टुभं जातवे- दसमंगिरा अनेनाग्निमस्तोत् । ३:श्रा जुह्वानः' इति पंक्तिरिति ॥४ ५। १३ । १ ददिः इत्येकादशच जागतं तक्षकदेवत्यं गरुन्मानेन विषमेवास्तादिति । २ यत्ते अपादकम्'इत्यास्तारपंक्तिः । ६असितस्य' इति पथ्यापंक्तिः । ४.चक्षुषा ते चक्षुः', ७ा- लिगी च' द्वे अनुष्टुभौ । 'कर्णाश्वावित्' इति भुरिक् । ५ कैरात' इति त्रिष्टुप् । १० तावुवम्' इति द्वे निवृद्गायत्र्यौ । * वी. एकादशकं ॥ ५। १२ सूक्त ऋ० १० । ११० में आता है, ऋषि जमदग्ना- रामो वा' और देवता 'प्राप्रियः' है ॥ .
[ ४१ ] ॥ प०३ खं०६॥ ५ । १४ । १ सुपर्णस्त्वा' इति त्रयोदशकं वानस्पत्यं कृत्या- प्रतिहरणमानुष्टुभं शुक्रो द्वाभ्यामोषधिमस्तीत् । पराभिः कृत्या- दूषणमिति ३'रिश्यस्येव', ५'कृत्याः संतु कृत्याकृते', १२इष्वा ऋजीयः' भुरिजः । ८ अग्ने पृतनापाद् इति त्रिपदा विराद । १३.अग्नेरिवैतु' इति स्वराद् । १० पुत्र इव पितरम्' निबृहती। ११ उदेणीव' इति साम्नां त्रिपात्रिष्टुअविति ॥ ५ ॥ ५ । १५ । १ एका च मे' इत्येकादशकं विश्वामित्रो वान- स्पत्यमानुष्टुभमनेन मधुलामोषधिमस्तौदिति । ४ चतस्रश्च में इति पुरस्ताबृहती ५ पञ्च', ७ सप्त' ८ अष्ट', 'नव च मे' इति भुरिज इति ॥ ५। १६ । १'यद्येकवृषः' इत्येकावसानकादशचमेकवृष- देवत्यद्वैपदमनेन प्रागुक्तर्षिरेकवृषमस्तोत् । २ यदि द्वि' ३ त्रि' ६ षट' ता आसुर्यनुष्टुभः । १ यद्येक'. ४'चतुः'.५ 'पंच'.७ सप्त', ८ अष्ट'ह'नव' १० दश' एताः सानामुष्णिहः। ११ यद्येकादशः' इत्यासुरीगायत्रीति ॥ ५ । १७ । १ तेवदन्' इत्यष्टादशकं मयोभूब्रह्मजायादेव- त्यमानुष्टुभमनेन सूक्तेन सोमेन बृहस्पतिजायापहरणमकारि तदाख्यामिषतामंत्रोक्तां देवानां ब्रह्मजायामस्तादिति । पूर्वाः पत्रिष्टुभः॥ * बी, के विना अन्य किसी में इति नहीं प्रायः बहुत बार ही उनमें खण्डान्त में इति नहीं होती। .
॥ प० ३ खं०७॥ [ ४२ ]
५ । १८ । १ नैतांते', ।१६।१'अतिमात्रम्' इति द्वे पञ्च-
दशके, ब्रह्मगवीदेवत्ये आनुष्टुभे । आभ्यां ब्रह्मगवीब्राह्मणं
चास्तोत् । ब्रह्मगवीब्रह्मज्यमानंदयन् । ४ निर्वै क्षत्रम्' इति द्वे
='जिह्वा ज्या' इति द्वे १३ देवपीयुः' इति त्रिष्टुभः पूर्वाभुरिक् ।
५ । १६ । २'ये बृहत्सामानम्' इति विराटपुरस्ताबृहती।
७'अष्टापदी चतुरक्षी' इत्युपरिष्टाबृहतीति ॥ ६ ॥
५ । २० । १ उच्चैषः ॥
५। २१ । १ वि हृदयम्' इति द्वे द्वादशके ब्रह्मा, वान-
स्पत्यदुन्दुभिदेवत्ये । पूर्वत्रैष्टुभमुत्तरमानुष्टुभं । द्वाभ्यां सपत्न
सेनापराजयायदेवसेनाविजयाय च दुन्दुभिमस्तादिति । परा-
भिस्तिसृभिरादित्यादीन् देवानप्रार्थयन् । पूर्वस्य पूर्वा जगती ।।
५। २१ । १'विहृदयं ४ यथामृगाः' इति द्वे पथ्यापंक्ती ।
६'यथा श्येनात्' इति जगती । ११ यूयमुग्राः' इति बृहतीगर्भा-
त्रिष्टुप् । १२ एता देव सेनाः' इति त्रिपदा यवमध्या गायत्रीति ॥
५ । २२ । १'अग्निस्तक्मानम्' इति चतुर्दशकं भृग्वंगिरा-
स्तक्मनाशनदेवत्यमानुष्टुभं तक्मापबाधयोऽनेन देवानप्रार्थयत्
तक्मनाशनमस्तौदिति च । प्रथमे द्वे त्रिष्टुभौ, पूर्वाभुरिक ।
५'अोको अस्य' इति विराटपथ्याबृहती
५ । २३ । १'श्रोते मे' इति त्रयोदशकमैन्द्रमानुष्टुभं
काण्वोऽनेन क्रिमिजम्भनाय देवानप्रार्थयत् । १३:सर्वेषां च
क्रिमीणाम्' इति विराडिति ॥ ७ ॥
[ ४३ ] ।। प०३ ख०६॥ ५ । २४ । १'सविता प्रसवानाम् इति सप्तदशकमा ब्रह्मकर्मात्मदेवत्यामिति । सविता शाक्करं प्रथमया स्वात्माविनाय कमणि प्रा.जुहोति. द्वितीययाग्नि, तृतीययाद्यावापृथिव्या, चतुर्थ्यां वरुणं, पंचम्या मित्रावरुणो, पिट्या मरुतः सप्तम्या सोमं, अष्टम्या वायु, नवम्या सूर्य, दशम्यानन्द्रमसम- कादश्येन्द्रं. द्वादश्या मरुतांपितरं. त्रयोदश्या मृत्युं. परया यमं. परया पितॄन् पिरया ततानवरानंत्यवयः । १० ततस्ततामहाः' इति सर्वा चतुष्पदातिशक्कर्यः । ११ इन्द्रोदिवः' इति शक्वरी । १५'पितरः परे' इति तिस्रस्त्रिपादस्तत्र पूर्वे द्वे भुरिग्जगत्यावंत्या विराटशक्करी ॥८॥ ५ । २५ । ॥१‘पर्वतादिवः' इति त्रयोदशकं योनिगर्भदेव- त्यमानुष्टुभं ब्रह्मानेन गर्भार्थं देवानप्रार्थयत् । तां गर्भ 'चास्ता- दननसक्नेन अंत्याविराट पुरस्ताबृहतीति ।। * वी. प्रार्थया जुहाति. क. ख. ग. ङ प्रार्थया जुहा । मूलपाठ मेरा है क्योंकि आदर्श पाठों से कुछ अर्थ नहीं निकलता ॥ । यह पाठ मैने किया है सब मूल ग्रन्थों में षष्ठी पाठ है जिस से अर्थ कुछ नहीं निकलता ॥ बी. चन्द्रम् ॥ क. बी. 'परान्' अधिक है। ५ । २५ ऋ० १०।१८४। में है वहां ऋषि त्वष्टा गर्भकर्ता 'विष्णुर्वाप्राजापत्यः है'। बी. 'वास्तोत्॥
॥१०३ख०६॥ [ ४४ ] ५ । २६ । १ यजूंषि यज्ञे' ॥ ५। २७ । १'ऊर्ध्वा अस्य' इति द्वे द्वादशके । पूर्ववास्तो- प्पत्यमुतमंत्रोक्तबहुदेवत्यमुत्तरमाग्नेयमाभ्यां मंत्रोकदेवानभिष्ट्र- यायजत् । ५ । २६ । १'यक्षियज्ञे'. ५'छन्दांसि यज्ञे' इति द्विपदा वायुष्णिहौ । २'युनक्तु देवः'. ४'प्रेषा यज्ञे', ६ एयमगन' इति तिस्रः. १० सोमो युनस्तु इाते द्वे द्विपादा प्राजापन्या बृहत्यः। ३'इन्द्र उक्था मदान्' इति त्रिपदा विराड्गायत्री । ६ 'भगो युन- क्तु' इति त्रिपात्पिपीलिकमध्यापुरउष्णिगित्येता एकावसानाः। १२'अश्विना ब्रह्मणा' इति परातिशक्करीचतुष्पाजगतीति ॥ ५। २७ । १ऊर्ध्वा अस्य' इति बृहतीगर्भा त्रिष्टुप् । २'देवो देवेषु' इति द्विपदा साम्नांभुरिगनुष्टुप् । ३ मध्वायज्ञम्' इति 'द्विपदा बृहतीति । ४'अच्छायमेति शवसा' इति द्विपात्सानी भुरिग्बृहतीति । ५'अग्निः सुचः' इति द्विपदासाम्नीत्रिष्टुप् । ६'तरीमन्द्रासु' इति द्विपाद्विराण्नामगायत्री । ७'द्वारो देवीः' इति द्विपात्साम्नीबृहतीमा एकावसानाः । ८'उरुव्यचसा' इति * ख. इति त्रिपापिपीलिका द्वे पाठ अधिक है। ऊ. इाते त्रि द्वे पाठ है॥ । सब मूल पुस्तकों में पाठ मदानीति है मूल पाठ मैने दिया है क्योंकि वेद में यह हलन्त है ॥ * बी. त्रिपदा(बृहती॥
[ ४५ ] ॥प०३खं० १०॥ संस्तारपक्तिः ह'देवा होतारः' इति षट्पदानुष्टुवगर्भापराति- जगती । १० 'तन्नस्तुरीपम्' इति तिस्रः पुरउष्णिहः॥६॥ ५ । २८ । १ 'नव प्राणान्' इति चतुर्दशर्चमथर्वा तृवृदेवत्यं त्रैष्टुभमनेनाग्न्यादीन्मंत्रोक्तान्देवान्संग्रार्थ्य तृवृतमस्तौदिति । ६ त्रेधा जातम्' इति पञ्चपदातिशक्करी हिरण्यस्तुतिः परा च । ७'न्यायुष', 'दिवम्वा पातु' इति द्वे, १२'श्रा त्वा चूततु' इति ककुम्मत्यनुष्टुभः । १३ ऋतुभिष्ट्वा पुरउष्णिक् ॥ ५ । २६ । १ पुरस्तायुक्तः' इति पञ्चदश चं त्रैष्टुभं जात- वेदसमुतमंत्रोक्तदेवताकं चातनः सर्वाभिमंत्रोक्तान् देवानस्तोत् । ३ यथा सो अस्य' इति त्रिपदाविरारनामगायत्री । ५'यदस्य हृतम्' इति पुरोऽतिजगती विराड्जगती । १२ समाहर' इति चतस्रोऽनुष्टुभः, प्रथमा भुरिक् । १४ एतास्ते' इति चतुष्पदा- पराबृहती ककुम्मतीति ॥ ५। ३० । १'आवतस्त' इति सप्तदशचमुन्मोचन आयुष्य- कामोऽनुष्टुभमनेनमंत्रोक्नान् देवान् प्राणावनायायुश्चास्तीत् । प्रथमा पथ्यापंक्तिः । ६'अङ्ग भेदः' इति भुरिक् । १२'नमोय- माय' इति चतुष्पदाविराड्जगती । १४'प्राणनाग्ने' इति विराट- प्रस्तारपंक्तिः । १७ अयं लोकः' इति त्र्यवसानाषट्पदा जगतीति ॥ ५। ३१ । १'यां ते' इति द्वादशर्च शुक्रः कृत्यादृषणदेव-
|| ०५३ खं०१०॥ [ ४६ ]
त्यमानुष्टुभमनेनकृत्याप्रशमनायकृत्यामस्तादिति । ११ यश्चकार'
इति बृहतीगर्भानुष्टुप् । १२ कृत्याकृतम्' इति पथ्याबृहतीति ॥१०
"इति ब्रह्मवेदोक्त मंत्राणां बृहत्सर्वानुक्रमणिकायां तृतीयः
पटलः समाप्तः॥
गु. लिषितं रावल बबलसुत जशकर रावल शंकरीया लिषितं
सम्वत् १६८२ ना. मा. शख ॥
[ ४७ ] ॥ प०४ ख०२॥ *अथ षष्ठं काण्डम्। ॐ अथातस्तृचसूक्तकांडमंत्रर्षिछन्दोदेवता व्याख्यास्यामः। तत्र तृचप्रकृतिरितराविकृतिरिति । ६। १ । १'दोषो गाय ॥ ६ । २ । १'इन्द्राय सोमम्' इति द्वे उष्णिहो । पूर्व सावि- त्रमुत्तरंवानस्पत्यं सौम्यम् । तृचोऽथर्वापश्यत् । ततो मंत्रोक्त- देिवानस्तौदिति । पूर्वस्याद्या त्रिपदा पिपीलिकमध्या साम्नी- जगती, तथा परे द्वे पिपीलिकमध्ये पुरउष्णिहो । द्वितीयस्य तिस्रः परोष्णिह इति ॥ १॥ ६ । ३ । १ पातं न इन्द्रापूषणा' । ६ । ४ । १'त्वष्टा मे देव्यम्' इति द्वे नानादेवते पूर्व जाग- तम् । तत्र प्रथमा पथ्याबृहती, परस्यचाद्या पथ्याबृहती, द्वि- तीया संस्तारपंक्तिः, तृतीया त्रिपदाविराड्गायत्री, द्वाभ्यामाभ्यां स्वस्त्ययनकामोऽथर्वा मंत्रोक्तदेवानात्मगोपनायाभिष्ट्रयाप्रार्थय- दिष्टमिति॥ यह लेख हमारा है॥ बी. मंत्रोक्लान् ॥ बी. देव्यं वचः॥ ६.वी. प्रात्म नहीं॥
॥प०४ खं०३॥ [ ४८ ] ६ । ५ । १ 'उदेनमुत्तरं नय॥ ६। ६ । १'योऽस्मान्' इति द्वे आनुष्टुभे पूर्वमन्द्राप्रमुत्तर ब्राह्मणस्पत्यं सौम्यं प्रागुनर्षिः । पूर्वस्य प्रथमयाग्निमस्तोत् , द्वितीययेन्द्र, परयाग्निं, परस्याद्यया ब्रह्मणस्पति, पराभ्यां सोम- मिन्द्रमिति भुरिगिति ॥२॥ ६ । ७ । १'येन सोम' इति सौम्यं गायत्रम् । तृतीया वैश्वदेवी, प्रथमा निचूत, या यद्देवत्या तया तामेवास्तौदित्युक्तर्षिः ॥ ८ । १'यथा वृक्षं लिबुजा' ॥ ६ । । । १ वाञ्छ में' इति द्वे कामात्मदैवते । पूर्वस्यतिस्रः पथ्यापंक्तयः, उत्तरमानुष्टुभंजमदाग्निरपश्यत् । ततो द्वाभ्या- माभ्यां कामात्मचेतसा मंत्रोक्त देिवतामप्रार्थयत् ॥ । १० । १'पृथिव्यै श्रोत्राय' इति द्विपदं नानादेवत्यं । प्रथमाग्नेयी, द्वितीया वायव्या, तृतीया सौर्याद्या साम्नांत्रिष्टुप् । द्वितीया प्राजापत्या बृहती, परासाम्नीबृहतीदं सूक्तं सर्वकर्मसु शंतातिः संप्रोक्षणाद्यर्थमपश्य दिति ॥ ३ ॥ क. ख. ग. गु. ऊ. इति नहीं। । क. ख. ग. ङ देवतानाम् ॥ * बी. द्विपदां॥ 3. सान्नां॥ || बी. साना ॥ कि. ख. ग. ऊहीत नहीं॥
[ ४६ ] ।। प०४ खं०५॥ ६ । ११ । १'शमीमश्वत्थः' इति रेतोदेवत्यमुतमंत्रोक्त- देवत्यमानुष्टुभं प्रजापतिरपश्यत्ततस्तान्देवानस्तोत् ।। ६ । १२ । १ 'परि धामिव' इति तक्षक देवतमानुष्टुभं गरुत्मान् ॥ ६ । १३ । १'नमो देववधेभ्यः' इति माय॑मानुष्टुभं स्व- स्त्ययनकामोऽथवा ॥ ६। १४ । १ अस्थि संसम्' इति बलासदेवत्यमानुष्टुभं बभ्रपिङ्गलः ॥ ६। १५ । १'उत्तमो असि' इति वानस्पत्यमानुष्टुभ- मुद्दालकः । ६ । १६ । १'आवयो' इति मंत्रोक्तदेवत्यमुतचान्द्रमस- मानुष्टुभं शौनकः चतुर्ऋचमपश्यत् । प्रथमा निवृत्रिपदा गा- यत्री । ३ तौविलिक' इति बृहतीगर्भाककुम्मत्यनुष्टुप् । ४'अल- साला' इति त्रिपदा प्रतिष्ठानेन हिन देिवमस्तोत् ॥ ४ ॥ ६ । १७ । १ यथेयम्' इति चतुर्ऋचमानुष्टुभं गर्भहण देवत्यमथर्वापश्यत्ततो गर्भहणाय मंत्रोक्तदेवतामनेनास्तोत् । ६ । १८ । १ ईर्ष्यायाः' इति सूक्तमीाविनाशनदेवत्य मानुष्टुभम् ॥ बी. देवम् ॥ वी. देवं नहीं॥ क. ख. ग. ऊ इति नहीं॥. * ॥ ०५४ खं०६॥ [ ५० ] ६ । १६ । १'पुनन्तु मा' इति नानादेवत्यं गायत्रमुतचान्द्र- मसं शंतातिराद्यानुष्टुप् ॥ ६ । २० । १'अग्नेरिवास्य' इति यक्ष्मनाशनदैवतं भृग्वं- गिराः । प्रथमातिजगती *द्वितीया ककुम्मती प्रस्तारपंक्तिः, तृतीया सतःपक्तिरित्यनेन मंत्रोक्तान् सर्वान् देवानस्तौ दिति॥५ ६। २१ । १'इमा याः' इति चान्द्रमसमानुष्टुभम् ॥ । २२ । १ 'कृष्णं नियानम्' इति आदित्यरश्मिदेवन्य- मुत मारुतंत्रष्टुभं शतातिरिति द्वे सूक्ने अपश्यत्तत आभ्यां मंत्रोक्तदेवानस्तोत् । २ पयस्वतीः कृणुथा' इति चतुष्पदा भुरि- ग्जगती॥ ६ । २३ । १ सस्रुषीः' । ६ । २४ । १'हिमवतः प्रस्रवन्ति' इति द्वे अब्देवत्ये आ- नुष्टुभे । आभ्यामप एवास्तोत् ॥ ६ । २३ । २'श्रोता आपः' इति त्रिपदा गायत्री। ३ देव- स्य सवितुः' इति परोष्णिागिति ॥ ६॥ ख. ङ. द्वितीयया ॥ क. ख. ग. ऊ इति नहीं। ६।२२ । १ ऋ० १ । १६४ । ४७ में है. ऋषि दीर्घतमा ॥ बी. इति नहीं॥ || क. ख. ग. ऊ इति नहीं॥
[ ५१ ] ।।५०४ खं० ७॥ ६ । २५ । १ पञ्च च याः' इति मंत्रोक्तमन्याविनाशन- देवत्यमानुष्टुभं शुनःशेपः ॥ ६ । २६ । १ 'अव मा पाप्मन्' इति पाप्मादेवताकमानें- ष्टुभं, ब्रह्मानेन पाप्मानमस्तोत् ।। ६ । २७ । *१'देवाः कपोतः ॥ ६ । २८ । १ि'ऋचा कपोतम् ॥ ६ । २६ । १ 'अमून हेतिः' इति त्रीणि सूक्तानि याम्यानि उत नैर्ऋतनि । प्रथमं जागतं, परं त्रैष्टुभं तृतीयं बार्हतं भृगुर- पश्यत् । तत ऐतैः कपोतोलूकजन्यारिष्टक्षयकामो यमं निर्ऋति च मंत्रोक्तान् देवानस्तोत् ॥ ६ । २७ । २'शिवः कपोतः' इति त्रिष्टुप् ।। ६ । २८ । २ परीमेऽग्निम्' इत्यनुष्टुप् ।३'यः प्रथमः'इति जगती ॥ ६ । २६ । ३'अवैर हत्याय' इति व्यवसाना सप्तपदा वि- राडष्टिः । २'अमून् हेतिः' इति द्वे विराण्नाम गाय यौ इति ॥७॥ ६।२७ सूक्त ऋ० १० । १६५ । में है. ऋषि कपोतो नैऋतः है॥ १६२८ । १ ऋ० १० । १६५ । ५ में कुछ भेद से है ॥ ६ । २६ । १ का २, ३ पद ऋ०१०। १६५ । ४ में हैं। $ Whitney (हिटने ) ने अपने अनुवाद में तृतीय मंत्र का बृहती छन्द दिया ही नहीं।
॥प०४ खं०६॥ [ ५२ ] ६ । ३० । १ देवा इमम्' इति शाम्यंजागतम् ॥ ६। ३१ । *१'अायं गौः' इति गव्यंगायत्रमुपरिबभ्रवो द्वे अद्राक्षीत् ।। ६ । ३० । २'यस्ते मदोवकेशः' इति त्रिष्टुप् । ३'बृहत्प- लाशे' इति चतुष्पाच्छंकुमत्यनुष्टुप् ॥ ६ । ३२ । १'अन्तर्दावे ॥ ६। ३३ । १'यस्येदमारजो युजः ॥ ६ । ३४ । १ प्राग्नये' इति पञ्चर्चम् ।। ६। ३५ । १ वैश्वानरो न ऊतये' इति चत्वारिसूतानि । प्रथमं त्रैष्टुभमुत्तराणि गायत्राणि, त्रीण्यनीन्द्रविश्वानरदेवतानि। प्रथमस्य द्वे तृतीयं च चातनस्तृतीयमथा, द्वितीयं जाटिका- यनस्तुरीयं कौशिकः । ६ । ३२ | २'रुद्रो वो ग्रीवा अशरत्' प्रस्तारपंक्तिः । ६।३३ । २'नाधृष आदधृषते' इत्यनुष्टुप् ॥८॥ ६ । ३६ । १'ऋतावानं' । ६ । ३७ । १ उप प्रागात्' इति द्वे, प्रथममाग्नेयंगायत्रं, परं चान्द्रमसमानुभं, स्वस्त्ययनकामोऽथर्वापश्यदिति ।। ६। ३१ । १ ऋ० १० । १८६ । में ये मंत्र बहुत स्वल्प भेद से आते हैं, वहांऋषि सार्पराज्ञी और देवता'सार्पराज्ञी सूर्यो वा' है 10. जादिकायनः, बी. जोतिकायनः ॥ :
[ ५३ ] ॥ प०४ ख० १०॥ ६ । ३८ । १ सिंहे व्याघ्र ॥ ६ । ३६ । १'यशो हविः' इति द्वे । प्रथमं चतुर्ऋचं त्रैष्टुभं । १'यशो हविः' इति जगती परा त्रिष्टुवंत्यानुष्टुबिम बृहस्पति- देवत्ये वर्चस्कामः प्रागुक्तर्षिरपश्यत् । उत पूर्व त्विषिदेवत्यं ततो- मंत्रोक्तान्देवानाभ्यामस्तोत् ।। ६ । ४० । १'अभयं द्यावापृथिवी', २ अस्मै ग्रामाय' इति जगत्यौ, मंत्रोक्लदेवत्येऽभयकामः । ३'अनमित्रं नो अधरात्' इत्येन्द्रीमानुष्टुभं स्वस्त्ययनकामः ॥ ६ । ४१ । १‘मनसे चेतसे धिये' इति बहुदैवतं चान्द्रम- समानुष्टुभं ब्रह्मा । आद्या भुरिक् । ३'मा नो हासिषुः' इति त्रिष्टुबिति ॥६॥ ६ । ४२ । १'अव ज्यामिव' इतिमत्रोक्तमन्युदेवत्यमानु- ष्टुभं भृग्वंगिरा । आधे द्वे भुरिजाः ॥ ६ । ४३ । १'अयं दर्भः' इति मंत्रोक्त मन्युशमनदेवता- कमानुष्टुभं, परस्परं चित्तैकीकरणकाम इमे द्वे सूक्ते अपश्यद्वा- भ्यांमंत्रोक्ते अस्तीत् ॥ * बी. धिय नहीं॥ * इति के आगे गु. में द्वे पाठ अधिक है। Whitney ने ४२ सूक्त ( ) बंधन में चित्तको करणः पाठ दिया है वह मूल श्रादर्श पुस्तका में नहीं ॥ मूल लेख में भुरिक है॥ में || प०४ ख०११॥ [ ५४ ] ६।४४।१ अस्थाद् द्यौः' इति विश्वामित्रो मंत्रोक्तदेवत्यमुत वानस्पत्यमानुष्टुभं । ३'रुद्रस्यमूलम्' इति त्रिपदा महाबृहती ॥ ६ । ४५ । *१ 'परोपेहि' दुःस्वमनाशनदेवत्यमिगिरः प्रचेता यमश्चाद्या पथ्यापंक्तिः । २'अवशसा' इति भुरित्रिष्टुप् । ३'यदिन्द्र' इत्यनुष्टुप् ॥ ६ । ४६ । १'यो न जीवः' इति तथर्षि पूर्वोक्तदेवत्यमुत स्वाममाभ्यां मंत्रोकदेवानस्तौदिति ॥ १० ॥ ६ । ४७ । १'यो न जीवः' इति विष्टारपंक्तिः । २ विद्म ते' इति व्यवसाना शक्करीगर्भापंचपदा जगती । ६ । ४६ । ३३ 'यथा कलाम्' इत्यनुष्टुप् ॥ ६ । ४७ । १'अग्निः प्रातः सवने' इति प्रथम श्रवसे आगेयं त्रैष्टुभं । द्वितीया वैश्वदेवी । तृतीया सौधन्वना । प्रथमया प्रथम मवनेऽग्निमस्तोत् । द्वितीययामाध्यन्दिने विश्वान्देवाँस्तृतीयया सौधन्वानिति ॥ ६४५२, ३ मंत्र कुछ पाठ भेद से ऋ० १० । १६४ । ३,४। में आते हैं। बी. पांगिरसः॥ क. ख. ग. ङ इति नहीं । ६६।४६ । ३ ऋ० ८।४७।१७ में कुछ भेद से आता है वहां ऋषि प्रचेता है।
[ ५५ ] ॥प०४ खं०१२॥ ६। ४८ । १ श्येनोसि' इति मंत्रोक्तर्पिदेवत्यमौष्णिहमिति तिस्रः सप्तर्षयोऽनेन स्तूयते ॥ ६। ४६ । १ नहि ते अग्ने' इत्याग्नेयं गार्य आद्यानुष्टुप् । २ मेष इव' इति द्वे जगत्यौ । परा विराट् तत्रेति ॥ ११ ॥ । ५० । १'हतं तर्दम्' इत्यथर्वाश्विनमभयकामः प्रथमा विराड्जगती ! २'तर्दहे', ३'तदापते' इति द्वे पथ्या पंक्ती ।। ६ । ५१ । १ वायोः पूतः' इति शंतातिराप्यं त्रैष्टुभमाद्या गायत्री । *३'यत्किञ्च' इति वारुणी जगती, तया वरुणस्तुतिः॥ ६ । ५२ । ११'उत सूर्यः' इति भागलिमंत्रोक्तबहुदेवत्य- मानुष्टुभम् ॥ ६ । ५३ । १ योश्च मे' इति नानादेवतं श्रेष्टुभं बृहच्छुकः । प्रथमाजगतीत्यनेन मंत्रोक्तान्देवानभिष्ट्रयाप्रार्थयदिति ॥ ६ । ५४ । १'इदं तद्' इति ब्रह्माग्नीषोमीयमानुष्टुभं ॥ ६ । ५५ । १'ये पन्थानः' इति वैश्वदेवीजगती । २'ग्रीष्मो हेमन्तः' इति द्वे रौद्रयो । पूर्वा त्रिष्टुप् । ३'इदावत्सराय इति जगतीत्यनेन मंत्रोक्नदेवतास्तुतिरिति ॥ १२ ॥ क. ख. ग. ङ. पंक्तिः॥ ६। ५१ । ३ कुछ भेद से ऋ० ७।८६ । ५ में आता है ऋषि वहां वासष्ठ है॥ +६।५२।१ ऋ० १ । १६१ । ८, ६ में बहुत भेद से आता है। ६। ५२ । २ भेद से ऋ० १ । १६१ । ४ में है ॥ क. ख. ग. ङ. इति नहीं॥
।प०४ खं० १४॥ [ ५६ ] ६। ५६ । *१ मा नः' इति विश्वदेवीत्युष्णिग्गर्भापथ्या- पंक्तिः । २ नमोऽस्त्वसिताय' इति द्वे रौद्रयौ, पूर्वा त्रिष्टुप् । ३'सं ते हन्मि' इति निवृत् ॥ ६। ५७ । १'इदमिद् वा' इति द्वे रौद्रयो । ३'शं च नः' इति शंतातिः । पूर्वे द्वे अनुष्टुभो तृतीयापथ्याबृहती ।। ६ । ५८ । १'यशसं मेन्द्रः' इत्यथर्वा यशस्कामो बार्हस्पत्य- मुतमंत्रोक्तदेवत्यमाद्याजगती । २'यथेन्द्रः' इति प्रस्तारपंक्तिः । ३ यशा इन्द्रः' इत्यनुष्टुप् ॥ ६। ५६ । १ अनुडुद्भ्यस्त्वम्' इति रौद्रमुत मंत्रोक्त देवत्यमानुष्टुभं ॥ ६ । ६० । १'अयमायात्यर्यमा' इत्यार्यमणमानुष्टुभम् ।। । ६१ । १ मह्यमापः' इति रौद्रं त्रैष्टुभम् । २ अहं वि- वेच इति द्वे भुरिजौ ॥ ६ । ६२ । १'वैश्वानरो रश्मिभिः' इति रौद्रमुत मंत्रोक्त- देवत्यत्रैष्टुम मिति ॥ १३ ॥ ६ । ६३ । ३१ यत्ते देवी' इति चतुर्ऋचं द्रुह्वणो नैऋतं क. ग. में प्रतीक 'मा नो देवाः' है ॥ + Whitney में इस सूक्त 'शंतातिः' ऋषि लिखा है ॥ क. ख. ग. ऊ. इति नहीं। १६ । ६३ । ४ ऋ० १० । १६१ ।१ में आता है, ऋषि संवतनः है और देवता 'अग्निः' है॥ । - ।। प०४ ख०१४ ॥ मयं जागतं तिसृभिराद्याभिरायुव!वलकामा निऋतियमामृत्यु- मस्तोत् । “अंत्याग्नेय्यनुष्टुर, तयाग्निं वमून्यप्रार्थयदिति । पूर्वातिजगतीगर्भा ॥ ६ । ६४ । १ मं जानीध्वम्' इत्यथवा सांमनस्यं वैश्वदेव- मानुष्टुभम् ॥ ६। ६५ । १'अव मन्युः', ६ । ६६ । १ निहस्तः', ६ । ६७ । १ 'परि वन्मानि' इति त्रीणि चान्द्रमममुतन्द्राणि । पूर्वमुत पाराशयमानुष्टुभानि । पूर्वस्याद्या पथ्यापंक्तिः ॥ । ६६ । १'निहम्तः शत्रः' इति त्रिष्टुप् ॥ ६ । ६८ । १'आयमगन्' इति मंत्रोक्तदेवत्यमाद्या पुरो- विराडति-शाक्करगर्भा चतुष्पदा जगती । द्वितीयानुष्टुप् । ३ येना- वपत्' इत्यतिजगतीगर्भात्रिष्टुम् ।। ६ । ६६ । १ गिरावरगरोटेषु' इति बार्हस्पत्यमुताश्विन- मानुष्टुभं वर्चस्कामो यशस्कामश्च ॥ ६ । ७० । १ यथा मांसम् इति काङ्कायनः आध्न्यं जागतम् ।। ६ । ७१ । १ यदन्नममि' इति ब्रह्माग्नेयं जागतमन्त्या वैश्वदेवी त्रिष्टुप् ॥ गु. में अंत्या, नहीं॥ + Whitney ने इस ६४ सूक्त के २ मंत्र का छन्द 'त्रिष्टुम' दिया है। +W. विराडति शक्करीगर्भा॥
॥१०४ खं०१६॥ [ ५८ ] ६ । ७२ । १'यथासितः' इत्यथर्वागिरा शेपोऽर्कदेवत्यमा- नुष्टुभमाद्या जगत्यंत्या भुरिक्वेति ॥ १४ ॥ ६ । ७३ । १ एह यातु' ॥ ६ । ७४ । १'सं वः पृच्यन्ताम्' इति द्वे सांमनस्ये, मंत्रोक्त नानादेवत्ये च । पूर्व त्रैष्टुभमुत्तरमानुष्टुभमथर्वाद्यस्याद्या तृतीये भुरिजौ । परस्यांत्यात्रिष्टुप् , त्रिनामदेवत्या तया त्रिनामानं सांमनस्यमप्रार्थयत् ॥ ६. । ७५ । १ निरमुं नुदः' इति मंत्रोक्नदेवत्यमैन्द्रमानुष्टुभं सपत्नक्षयकामः कबंधः । ३ एतु तिस्रः' इति षट्पदाजगती । ६ । ७६ । १'य एनम्' इति सांतपताग्नेयमानुष्टुभं, चतु- चं *३'योस्य' इति ककुम्मती ॥ ६ । ७७ । १ि'अस्थाद् द्यौः' इति जातवेदसमानुष्टुभम् ॥ ६ । ७८ । १ तेन भूतेन' इति द्वे चान्द्रमस्यौ तृतीया त्वा- ष्ट्रीति तिस्रोऽनुष्टुभोऽथर्वा प्रथमाभ्यांजायानिवृध्ये 'चन्द्रमस्तोत्, रयिं च दंपत्योरप्रार्थयदंत्यया त्वष्टारं दीर्घायूंषि चेति ॥१५॥ ६ । ७६ । १ अयं नः' इति संस्फानदेवत्यं गायत्रमत्या त्रिपदाप्राजापत्यागायत्री। * बी. 'वा' अधिक है। १६ । ७७।२ ऋ० १०। १६ । ५ में भेद से आता है ऋषि मथितो यामायनो भृगुर्वा वारुणिश्च्यवनो वा भार्गवः ॥ + क. ख. ग. ऊ 'वृध्यौ ॥
[ ५६ ] ॥ १०४ खं० १७ ॥ ६ । ८०।१'अन्तरिक्षण पतति' इति चान्द्रमसमानुष्टुभम् ।। प्रथमा भुरिक् । ३'अप्सु ते' इति प्रस्तारपंक्तिः ॥ ६ । ८१ । १'यन्तासि' इति मंत्रोक्त देवत्यमुतादित्यमा- नुष्टुभम् ॥ ६ । ८२ । १'आगच्छत' इत्येन्द्रमानुष्टुभं जायाकामो भगः।। ६ । ८३ । १'अपचितः प्रपतत' इति चतुर्ऋचमानुष्टुभं मंत्रोक्तदेवत्यम् । ४'वीहि म्वाम्' इत्येकावसाना द्विपदा निन्दा- य॑नुष्टुप् ॥ ६ । ८४ । *१'यस्यास्ते' इति चतुॠचं नतमाद्या भुरिग्जगती । २ भूते हविष्मती' इति त्रिपदापीबहती । ३ एवो प्वस्मन्' इति द्वे जगत्यो । तत्र द्वितीया भुरित्रिष्टुबिति ॥१६॥ ६। ८५ । १ वरणो वारयाता' इति वानस्पत्यमानुष्टुभः मथवा यक्ष्मनाशन कामः ॥ ६ । ८६ । १'वृषेन्द्रस्य' इति चकवृषदेवत्यमानुष्टुभ ॥ वृषकामः ॥ ६।८४।४ अथर्व ६। ६३ । ३ में पूर्व भी आया है, वहां इसका ऋषि 'द्रुह्वण' है ॥ क. ख. ग. 'इति' नहीं॥ ख. ङ 'नाशन इति कामः' । क. में ऐसा पाठलिखकर इति पर हड़ताल फेरी हुई है।
॥५०४ खं० १८॥ [ ६० ] ६ । ८७ । *१'श्रा त्वाहापम् ॥ ६ । ८८ । १ 'ध्रुवा द्यौः' इति धौव्ये आनुष्टुभे ३'ध्रुवो- च्युतः' इति त्रिष्टुप् ॥ ६ । ८६ । १ 'इदं यत् प्रेण्यः' इति मंत्रोक्तदैवतं रौद्रम् । दे आनुष्टुभे मन्युविनाशनम् ।। ६ । ६० । १'यां ते रुद्र' इति रौद्रं द्वे आनुष्टुभे । ३ नम- स्ते' इत्याषी भुरिगुष्णिक ॥ ६ । ६१ । १'इमं यवम्' इति मंत्रोक्कयक्ष्मनाशनदेवत्यमा- नुष्टुभं भृग्वंगिरा अंत्यया अप अस्तौदिति ।। १७ ॥ ६ । ६२ । १'वातरंहा भव' इति वाजिनं त्रैष्टभमाद्या जगती । अथर्वानेनेन्द्राय वाजिनमस्तोत् ॥ ६ । ६३ । १ यमो मृत्युः' इति रौद्रमन्त्या बहुदेवत्या त्रैष्टुभं शतातिबहून्विश्वान्देवान् मंत्रोक्तान् । ६ । ६४ । १'सं वो मनांसि' सारस्वत्यमानुष्टुभमथा- गिरा अंत्या विराड्जगती॥ ६। ८७ ऋ०१०। १७३ । १-३ में है । ।६।८८ । १,२। ऋ० १०। १७३ । ३, ४। में हैं । ऋषि इस सूक्त का ध्रुव है ॥ ६।१२।३०१०। ५६ । २ में स्वल्पभेद से आया वहां ऋषि 'बृहदुक्थ वामदेव्यः' है॥
[ ६१ ] ॥ प०४ खं०१६॥ ६ । ६५ । *१'अश्वत्थो देवसदनः' इाते वानस्पत्यमानु- ष्टुभम् मंत्रोक्तदेवत्यं भृग्वंगिरा ॥ ६। ६६ । ११'या ओषधयः' इति च वानस्पत्यमानुष्टुभ- मंत्या सौम्या त्रिपदाद्विराएनाम गायत्रीति ॥ १८ ॥ ६ । ६७ । १'अभिभूयज्ञः' ॥ ६ । ६८ । १'इन्द्रो जयाति ॥ ६ । ६६ । १'अभित्वेन्द्र' इति त्रीणि । पूर्व मैत्रावरुणं, परे द्वे ऐन्द्र, पूर्वे द्वे त्रैष्टुभे, तृतीयानुष्टुभमथर्वा ।। ६।६७। १'अभिभूर्यज्ञः' इति प्रथमांन्याभ्यां देवानस्तोत् । तृतीयया मित्रावरुणो, पराभ्यां सूक्ताभ्यामिन्द्रम् । २ 'स्वधास्तु इति जगती । ३ इमं वीरम्' इति भुरिक् ६ । १८ । २'त्वमिन्द्र' इति बृहतीगर्भास्तारपंक्तिः ॥ ६ । ६४।३'परिदध्म' इति भुरिग्बृहती सौम्या सावित्री च ॥ ६। १०० । १'देवा अदुः' इति गरुत्मान् वानस्पत्यमानु- * ६ । ६५ । १. २। पूर्व अथर्व ५। ४।३, ४ में अचुके हैं । १६। ६६ । १, २ ऋ० १० । १७। १५, १६ स्वल्पमेद से हैं, ऋषि भिषगाथर्वणः है॥ * क. ख. ग. ङ में इति नहीं॥ बी. द्वितीया ॥
॥०५४ खं० २१॥ [ ६२ ] प्टुभमनेन विषोपशांतये मंत्रोक्तां देवतामासुरीदुहितरमस्ती- दिति ॥ १६ ॥ ६। १०१ । *१'या पायस्व' इति ब्राह्मणस्पत्यमानुष्टुभ- मथागिराः शेपः प्रथनकामः ॥ ६ । १०२। १'यथायं वाहः' इत्याश्विनमानुष्टुभं जमदग्नि- रभिसंमनस्कामः॥ . ६। १०३ । १ संदानं वः ॥ ६ । १०४ । १'आदानेन' इति द्वै बहुदेवत्ये, उतन्द्राग्ने, आनुष्टुभे सूक्रक्रमादुच्छोचनप्रशोचनावपश्यताम् ।। ६ । १०५ । १'यथा मनः' इति कासादेवत्यमानुष्टुभम् ।। ६ । १०६।१'आयने ते' इति दूर्वाशाला देवत्यमानुष्टुभमु- न्मोचनप्रमोचनाविति ॥ २० ॥ ६।१०७ । १'विश्वजिचायमाणायै' इति चतुऋचं विश्व- जिदेवत्यमानुष्टुभं, शंतातिरनेन मंत्रोक्तां देवतामस्तोत् ।। ६ । १०८ । १'त्वं नो मेधे' इति पश्चर्च मेधादेवत्यमानु- ष्टुभं शौनकोऽनेन मेधामस्तोत् । ४'यामृषयः' इत्याग्नेयी । २ मेधामहम्' इत्युरोबृहती । ३'यां मेधाम्' इति पथ्याबृहती ॥ ६ । १०१ । ३ केलिये देखो पूर्व अथर्व ४।४।७॥ प्रशोचनाविति ॥
[ ६३ ] ॥प०४ खं०२१॥ ६ । १०६ । *१'पिप्पली' इति मंत्रोक्तपिप्पलीदेवत्यमुत- भैषज्यायुरानुष्टुभमथर्वा पिप्पलीमस्तौदिति ।। ६ । ११० । १'प्रलो हिं' इत्याग्नेयं त्रैष्टुभं । प्रथमा पक्ति- रनेनाग्निमस्तौदिति ॥ ६ । १११ । १ इमं मे अग्ने' इत्याग्नेयमानुष्टुभं, चतुर्ऋचं प्रथमा परानुष्ठए 'त्रिष्टुप ॥ ६ । ११२ । १'मा ज्येष्ठम् ॥ ६ । ११३ । १'त्रिते देवाः' इति द्वे त्रैष्टुभे । प्रथममाग्नेय- मुत्तरं पौनम् । ३'द्वादशधा' इति पंक्तिः ।। ६ । ११४ । १'यद्देवा देवहेडनम् ।। ६ । ११५ । १ यद् विद्वांसः' इति द्वे त्रैष्टुभे वैश्वदेवे आनुष्टुभे. ब्रह्माभ्यां मंत्रोक्तान्विश्वान्देवान् । ६ । ११६ । १'यद् यामम्' इति वैवस्वद्देवत्यं जागतं, जाटिकायनो, द्वितीया त्रिष्टुप् ॥ ६ । ११७ । १'अपमित्यमप्रतीत्तम्' इति त्रीण्यानेयानि त्रैष्टुभानि । चानृणकामः कौशिक एभिर्वैश्वानरम् ॥ * बी. पिप्पली क्षिप्तामेति ॥ १ ख. बी. में त्रिष्टुप् नहीं है ॥
॥प०४ ख०२१॥ [ ६४ ] ६ । १२० । १'यदन्तरिक्षम्' इति द्वे मंत्रोक्तदेवत्ये । प्रथमस्याद्या जगती । २ भूमिर्माता' इति पंक्तिः । ३'यत्रा सुहार्दः' इति तिस्रस्त्रिष्टुभः ॥ * बृहत्सर्वानुक्रमणी में १२० और १२१ सूक्त को एक ही मूक्त माना है। 'यत्रा सुहार्दः इातातस्रस्त्रिष्टुभः' पाठ सिद्धकर रहा है, कि १२० सूक्त का अन्तिम मंत्र तथा १२१ सूक्त के आदि के दोनों मंत्र त्रिष्टुप छन्द वाले हैं। सारी पुस्तक में यही शैली है, कि छन्द अपने ही सूक्त के मंत्रों का छन्द इकट्ठा देता है। यहां पर १२१, सूक्र के आदि दो मंत्रों का छन्द देना, यह स्पष्ट कर रहा है कि उसके मन में दोनों सूक एक ही है। Whitney ने अपने English अनुवाद में १२२ सूक के ऊपर ऐसे दिया है : "(कौशिक चतुर्जवं ) मंत्रोक्त देवन्यं । १, २ शवेष्टुभ, ३, ४, - - अनुष्टुभ।" । इसमें विटने ने छन्दों के विना जो कुछ लिखा है, वह उस को अपनी कल्पना है.। सर्वानुक्रमणो में इस विषय में कुछ नहीं लिखा। पता नहीं हिटने ने इस प्रकार की कल्पना को भी बृ. स. अनुक्रमणी के सिर पर क्यों मढ़ा है ॥ हमारी सम्माते में ये दोनों सूक्र भिन्न २ है । पञ्चपटालिका पृ०७ पर भी इस १२१ सूक्र को चार ऋवा वाले सूक्तों में गिना है और भिन्न माना है। इस छटे काण्ड में जितने भी सूक्त आते हैं, उन में अधिक तीन ऋचा वाले हैं, और थोड़े से चार और पांच ऋचा वाले हैं। इस समय कांड में पांच से अधिक ऋचा वाला कोई भी सूक्त नहीं। इस से यादे १२० और १२१ सूक्कों को इकट्ठा मान लिया जावे तो दोनों सूको की ऋक् संख्या ७ हो जाती है, जो कि इस काण्डक्रम के विरुद्ध है, अतः सर्वानुक्रमणी का यह क्रम चिन्त- नीय है। । .
[ ६५ ] ॥प०४ खं० २३॥ ६ ! १२१ । ३'उदगाताम्' इति द्वे आनुष्टभाचिति ॥२१॥ ६। १२२ । १ एतं भागम् ॥ ६ । १२३ । १ एतं सधस्थाः' इति द्वे पञ्चचें त्रैष्टुभे, पूर्व वैश्वकमाणं, परं वैश्वदेवं भृगुमन्त्रोक्तान्देवानस्तौदिति ॥ ६ । १२२ । ४ यज्ञं यन्तं'. ५ शुद्धाः पूता' इति जगन्यो । ६ । १२३ । ३'देवाः पितरः' इति द्विपात्साम्न्यनुष्टुप् । ४'म पचामि इत्येकावसाना द्विपात्प्राजापत्या भुरिगनुष्टुप् ॥ ६ । १२४ । १'दिवा नु माम्' इति त्रैष्टुभं मंत्रोकदेवत्यमुत दिव्याप्यनित्यपस्तरणकामोऽथर्वा ।। ६। १२५ । १'वनस्पते वीवङ्गः' इति त्रैष्टुभं वानस्पत्यम्। २ दिवस्पृथिव्याः' इति जगती ।। ६ । १२६ । १ उप श्वासय' इति वानस्पत्यं दुन्दुभिदेवत्यं- भुरिक त्रैष्ठभमाभ्यां युद्धापकरणानि । “३'प्रामम्' इति ॥२२॥ ६ । १२७ । १'विद्रधस्य इति भृग्वंगिरा चास्तोत् । वान- स्पत्यमुत यक्ष्मनाशनदेवत्यमानुष्टुभम् । ३ यो अङ्गयः' इति व्यव- साना षट्पदाजगती॥ ६ । १२८ । १'शक धृमम्' इति चतुऋचमंगिरा सौम्यं, शकधूमदेवत्यमानुष्टुभमनेन नक्षत्रराजानं चन्द्रमसमस्तादिति ।। किसी हस्तलेख में इस मंत्र का छन्द नहीं है, परन्तु जो हिटने ने इस मंत्र का छन्द पुरोबृहती विराग त्रिष्टुप् लिखा है पता नहीं उसका आधार क्या है?
॥ प०४ ० २४ ।। [ ६६ ] ६ । १२६ । १'भगेन मा' इति भगदेवत्यमानुष्टुभमथर्वा- नेन भगमस्तोत् ।। ६ । १३० । १ रथाजताम्' इति चतुर्ऋचम् ।। ६ । १३१ । १ नि शीर्षतः' इति प्रागुक्तम् ।। ६ । १३२ । १ यं देवाः' इति पंचर्चमिमानिस्मरदेवता- कानि त्रीण्यानुष्टुभानि । १३० । १ स्थजिताम्' इति विगपुर- स्तादबृहती । १३२ । १ यं देवाः' इति त्रिपादनुष्टुप् । ३ यमि- न्द्राणी' इति भुरिक । २ यं विश्वेदेवाः', ४ यमिन्द्राग्नी', ५ यं मित्रावरुणो' इति तिस्र एता “बृहत्य इति ।। २३ ॥ ६ । १३३ । १“य इमाम्' इति पञ्चचमगस्त्यो मेखला- देवताकं त्रिपादः । पूर्वे द्वे विराजौ, महामनेन मेखलामभिष्ट्रय तां ब्रह्मचारिणमंत्याभ्यां बध्वा चाप्रार्थयत् । २'आहुतासि', ५'यां त्वा' इत्यनुष्टुभौ । ३'मृत्योरहम्' इति त्रैष्टुभम् । १ ‘य इमाम्' इति भुरिक् । ४ श्रद्धाया दुहिता' इति जगती ॥ ६। १३४ । १'अयं वज्रः' इति द्वे त्रैष्टुभे मंत्रोक्तवत्र देवत्ये आनुष्टुभे शुक्रोऽन्त्या भुरिक् त्रिपदा गायत्री । प्रथमा परानुष्टुत्रिष्टुप् । अनेन मंत्रोक्नमभिमन्त्र्याभिष्ट्रय तदप्रैषीत् ।। ङ. और विटने में यहां महाबृहती छन्द इन तीनों का लिखा है।
[ ६७ ] ॥ ५०४ ख० २५ ॥ । १३५ । १ यदश्नामि' इति “मंत्ररिति ॥ २४ ॥ ६ । १३६ । १ देवी देव्याम्' इति त्रीण्यानुष्टुभानि बान- स्पत्यानि । तृतीयं पंचर्चमथवा पूर्वे द्वे केशवर्धनकामो बीतहव्य तृतीयं क्लीवकर्तुकाम इति । तन एभिनितनिमोपधिमम्तादिति । २'दंह प्रत्नन्' इत्येकावसाना द्विपात्माम्नी बृहती ॥ ६ । १३८ । ३'क्लीच क्लीवम् इति पथ्यापंक्तिः ।। ६ । १३६ । १'न्यस्तिका रुरोहिथ' इति द्वे आनुष्टुभे । पूर्व पञ्चचं वानस्पत्यं, द्वितीयं ब्राह्मणम्पत्यमुत मंत्रोक्त दंतदेव- त्यम् । १ न्यस्तिका' इति व्यवसाना षट्पदा विराइजगती । ६ । १४० । १'यो व्याघी' इत्युरोबृहती २'ब्रीहिमत्तम्' इत्युपरिष्टाज्यातिष्मती त्रिष्टुप् । ३ उपहूतौ सयुजी' इत्यास्तार- पंक्तिः ॥ ६ । १४१ । १'वायुरेनाः' इति द्वे आनुष्टुभे पूर्वमाश्चिन- मुत्तरं वायव्यं विश्वामित्र इति ॥ २५ ॥ * इतिब्रह्म वेदोक्त मंत्राणां बृहत्सर्वानुक्रमणिकायां चतुर्थः पटलः समाप्तः॥ * बी. में यहां से पाठ छूटा हुआ है। ह्वि० मंत्रोक्त विराज देवत्यं प्रानुष्टुभम् ॥ गु. में यह पाठ अधिक है "रा. राखेश्वर सुत रा. यवल सु.जेशंकर तथा शंकरीया लखित श्रीराजासत्य छ जी स्वत् १८२७ आश्वन वदी शुक्रवार श्री राम"॥
। प० ५ खं०१॥ [ ६८ ] *अथ सप्तमं काण्डम् । 'अर्थकर्चसूक्तकाण्डमन्त्राणामृषिदेवतछन्दांसि वक्ष्यामः । ७ । १ । १ धीती वाये' इति द्वयमेतत्प्रभृतीनि त्रैष्टुभा- न्यष्टमूक्तानि । पूर्वाणि त्रीण्यात्मदेवत्यानि चतुर्थ वायव्यं, 'पञ्चमं पश्चर्चमात्मदेवताकं, षष्ठं द्वयचं तथा परं त्रीणीमा- ८ ...... यह लख हमारा है॥ | गु. में "श्री राम जीओ' अधिक है । ङ. 'ॐ' अधिक है। ऊ. बी. में “पञ्चम" पाठ नहीं। बृ. सर्वानुक्रमणिका का यहां इस छटे सूक्त की ऋक् संख्या में पञ्चपटालिका से भेद है। पटलिका ने “अदितिौः. प्रपतेत इति चतुर्ऋचानि" पाठ देकर इस ७।६ सूत को चार ऋचा वाला माना है (देखो पञ्चपटलिका पं० भगवद्दत्त द्वारा सम्पादित पृ०८) परन्तु यहां इसे द्वयच मानकर, 'तथा परं' पाठ देकर 'सुत्रामा' और वाजस्य नु मंत्रों को इकट्ठा करके भिन्न यच सप्तम सूक्त स्वीकार किया है । पं. शंकर पाण्डुरंग ने इस पर सायण भाष्य में अपनी भूमिका के पृ० १७ पर पटलिका के पाठ को न स्वीकार करके अनुक्रमणिका की ऋक्संख्या के क्रम से ६, ७ भिन्न दो सूक्त ही बनाये हैं । बर्लिन तथा अजमेर में छपी हुई मूल संहिताओं में सूक्क क्रम पटलिका के ही अनुकूल लिखा है । ७।५।१ ऋ० १ । १६४ । ५० में है, वहां ऋषे दीर्घतमा और देवता साध्या है, फिर ऋ० १०। ६० । १६ में भी यह आया है, वहां ऋषि नारायण और देवता पुरुष है ॥
[ ६६ ] ॥ प०५ खं०२॥ न्यदितिदेवत्यानि । ब्रह्मवर्चस्कामोऽथवामंत्रोक्नान्देवानस्तादिति । ७ । १६ । २ महीमूषु' इति भुरिक । ७ । १ । २ स वेद पुत्रः', ७ । ६ । ३ 'सुत्रामाणं', ७ । ६ । ४ वाजस्य नु' ७७।१'दितेः पुत्राणाम्' इति जगत्यस्तत्र पूर्वास्तिस्रोविराजोऽन्त्यापींति । ७ । ५। ३'यदेवाः' इति पंक्तिः । ७ । ५ । ४ यत्पुरुषेण' इत्यनुष्टुप् ॥ ७ । ८ । १ भद्रादधि' इति द्वे त्रैष्टुभे, पूर्व बार्हस्पत्यं, 'द्वितीयं चतुर्ऋचं पोस्नमुपरिवभ्रवा मंत्रोक्त देवो । ७ । । । ३ 'पूषन् तब' इति त्रिपदार्षीगायत्री । ७ । । ४'परि पूपा' इत्यनुष्टुबिति- ॥१॥ ७ । १० । १'यस्ते स्तनः' इति द्वे त्रैष्टुमे सारस्वते ॥ * अथर्व० ७।६।१ मंत्र ऋ० १।८६ । १० मे पाया है, वहां इसका ऋषि गोतमो राहगण पुत्र लिखा है । ७।६।३ ऋ० १०। ६३ । १० में है, वहां ऋषि गयःलाता है । हम ने सूक्त क्रम प्रकाशित साहेता के अनुसार दिया है । f७।६।१,२ ऋ० १० । १७ । ६, ५ में हैं। वहां इनका ऋषि "देवश्रवा यामायन" है, देवता पूषा है। ७ । । । ३, ४ ऋ० ६। ५४ । ६, १० में हैं, वहां ऋषि भारद्वाजो वार्हस्पत्यः है ॥ क. ग. ऊ. हाते नहीं। ७।१०।१ ऋ० १ । १६४ । ४६ में है, ऋषि दीर्घतमा है।
। प० ५ खं०२॥ [ ७० ] ७ । १२ । १'मभा च मा' इति चतुर्ऋचं सभ्यमानुष्टुभं शौनकः । पूर्वाभ्यां सरस्वती तृतीयस्य पूर्वा "द्विदेवत्या उत- पित्र्या भुरित्रिष्टुप् । द्वितीयाभ्यां तृतीयेन्द्री, चतुर्थ्यामंत्रोक्त- देवत्यया तया तामप्रार्थयत् ॥ ७ । १३ । १ 'यथा सूर्य्यः' इति द्वयचमानुष्टुभं, सौम्य- मथर्वा द्विषोव!हतुकामस्तत एनमप्रार्थयत् ॥ ७।१४।११'अभि त्यं देवम्' इति चतुऋचं सावित्रमानुष्टुभम् ।। ७ । १५ । १'तां सवितः' इति द्वे सावित्रे त्रैष्टुभे, भृगु- मंत्रोक्तदेवताः । ७ । १४ । ३'सावीहि देव' इति त्रिष्टुप् । ७ । १४ । ४ दमूना देवः' इति जगती ।। ७ । १७ । १ धाता दधातु' इति चतुर्ऋचमानुष्टुभं, सावित्रमुत बहुदेवत्यम् । पूर्वा त्रिपदार्षीगायत्री । ३ धाता विश्वा' इति द्वे त्रिष्टुभाविति ॥२॥ यह पाठ, द्वि० के अनुसार दिया है हमारे मूल पाठों में देवत्योोत्यत्र्या है। 1 अथर्व० ७।१४ । १, २ सामवेद आर्चिक १, प्रपा० ५, अर्ध २, दशति ३, मं० ८ में है (देखो बैनफी Benfy द्वारा सम्पादितसाम- वेद पृ० ४८ तथा ४६। * यहां ७१४॥ ३, ४ मन्त्रों को ७ । १५ । सूक में भूल से गिना हुआ है । सव प्रकाशेत संहितात्रों में इन्हें १४वे सूक्त में ही लिखा है। हमारी सम्मति में ये १४वे सूक्त में चाहिये थे। क. ग. ङ इाते नहीं।
[ ७१ ] ।। प० ५ खं० ३॥ ७ । १८ । १'प्र नभम्ब' इति द्वयचं पाजन्यमुत पार्थिव- मथर्वा । पूर्वी चतुष्पादभुरिगुष्णिगुत्तरा त्रिष्टुप् ॥ ७ । १६ । १ प्रजापतिजनयति' इति मंत्रोक्नदेवत्यं जागतं ब्रह्मा । ७ । २० । १'अन्वद्य नः' इति पट्टचमानुष्टुभमानुमतीय- मनेनानुमतीमिति । ३'अनु मन्यताम्' इति त्रिष्टुप् । ४ यत् ते नाम' इति भुरिक । ५ 'एमं यजम्' इति द्वे जगत्यौ, तत्र द्वितीया- तिशाकरगभी ॥ ७ । २१ । १ ममेत' इति मंत्रोकात्मदेवत्यं, परा शक्करी- विरागी जगती च ॥ ७ । २२ । १'अयं सहस्रम्' इति द्वयचं लिङ्गोकदेवत्यम् । पूर्वा द्विपदकावसाना विरागायत्री । २'ब्रनः ममीचीः' इति त्रिपादनुष्टुप् ॥ ७ । २३ । १'दोष्वप्न्यम्' इति मंत्रोक्त दुःम्वमनाशनदेव- त्यमानुष्टुभं यमः ॥ ७ । २४ । १'यन्नः' इति सावित्रं त्रैष्टुभं ब्रह्मा । ७ । २५ । १'ययोरोजसा' इति द्वन्यर्चम् ।। ७ । २६ । १ विष्णोर्नु कम्' इत्यष्टमेधतिथिरुमे त्रैष्टुभे वैष्णव्येति । सवरेतर्विष्णुमभ्यस्तोत् ।। * बी. ब्रह्मत्मा ॥ + ७२७ । १ ०१ । १५४११ में है, वहांऋषिदीर्घतमा' है।
1! प.५ ग्वं० ३॥ [ ७२ ] ७।२६ : २ नद्विप्गुः इति त्रिपदा विगइगायत्री ! ३ यम्योम इति व्यवमाना पदपदा विगदशवर्ग ! -४'इदं विष्णुः इति चनमा गायत्र्यः । ='दिवाविष्ण' इति त्रिष्णु- विति ॥ ३॥ + . . क. ग. गु. में १२१२ के प्रथम दो पद ऋ ०५४ में मिलते हैं और अन्तिम पद तथा इससे पूर्व का भी पद ऋ० १०॥१८०१२ में प्रांत हूँ। s१२६ । ३ के प्रथम दो पद ऋ० १।२५४।२के अन्तिम दो पदों में भी आते हैं। 5।२६।४- ऋ०१।२२।। १-२० में आते हैं वहां इनका ऋषि मेधातिथि कागव' है। के स्थान पर 'पंच' पाट है, यह अशुद्ध है. क्योंकि भाग जाकर अंन्या कहकर जो पांचवी ऋचा है उन भिन्न लिखा है अतः ङ. वी. का पाठ ठीक है और दिवाविष्ण, मंत्र के स्थान पर अंन्या त्रिष्टुए लिखा है । ङ. में बहुत ही आश्चर्ययुक्त पाट दिया है। वहां"चनम्री गायत्र्या दिवो विष्णगिति पंच गायत्र्या अंतित्रिष्टुप" लिखा है । यह पाठ बहुत भ्रम युक्त है। हमार्ग मम्मति में यहां बी. का पाठ बहुत शुद्ध है । वही हमने मूल में दिया है। क. ग. और गु. के भिन्न है और बी. का भिन्न । ङ. का पाठ दोनों प्रकार के पाटों के मेल से लिखा गया है, क्योंकि इसमें क. ग. गु. और वी.इन चारों ही आदर्श पुस्तकों का पाठ दिया है । प्रतीत होता है कि यह आदर्शपुस्तक क. ग. गु. और वी. के पीछे लिखा गया है । साथ ही इस से यह भी सिद्ध होता है, कि क. ग. गु. एक शाखा के पुस्तक हैं और वी. दूसरी शाखा का॥ क. ग. ऊ. इति नहीं। पाठ [ ७३ ] ॥५० ५० ५॥ ७ । २७ । १ 'इडेवाम्मान इति मंत्रांकडादेवन्यं त्रैप्टुभम् ।। ७ । २८ । १ 'वेदः म्बम्तिः इति वेदवताकं त्रैष्टुभम् ।। ७ । २६ । १'अग्ना विप्र' इति दृयचं मंत्रोक्तदैवतं त्रैष्टुभम् ॥ ७ । ३० । १'म्बानं म इति द्यावापृथिवा यमुन प्रतिपादो- नंदवनाकं बाहन भृग्वंगिग ॥ ७ । ३१ । १ 'इन्द्रोनिभिः' इन्यन्द्रं भुरित्रिष्टुप् ॥ ७ । ३२ । '१'उप प्रियम्' इत्यायुष्यमानुष्टुभं ब्रह्मा ॥ ७ । ३३ । १ मं मा सिञ्चन्तु इति मंत्रोक्तदेवन्यं पथ्या- पंक्तिरित्यनया महादीन देवान प्रजादीनप्रार्थयन् ।। ७ । ३४ । १'अग्ने जातान् इति तु अथवा जानवदमे । द्वितीयं तृचं पूर्व जागतं, परमानुष्टुभम् । ७ । ३५ । ३ परं योनः' इति त्रिष्टुभावाभ्यां जातवेदम- मिनि ॥४॥ ७।३६। १ अन्यौ नौ इति मंत्रोक्तोऽतिदेवन्यमानुष्टुभम् ।। ७ । ३७ । १ अभि त्वा' इति लिङ्गोक्नदेवत्यमानुष्टुभम् ।। * वी. प्रती॥ १७३२ १ के आदि के तीन पद ऋ० ६ । ६७ । २६ में श्राते हैं।
॥ प० ५ खं० ५ ॥ [ ७४ ] ७ । ३८ । १ 'इदं खनामि' इति पञ्चर्चवानस्पत्यमानुष्टुभ- मनेनासुरीमोषधिमिति । ३ प्रतीची मोमम्' इति चतुष्पादुष्णिक् ।। ७ । ३६ । *१'दिव्यं सुपर्णम्' इति मंत्रोक्तदेवत्यं त्रैष्टुभं प्रस्कएवः ॥ ७ । ४० । १ 'यस्य व्रतम्' इति द्वयचं सारस्वतं त्रैष्टुभं प्रथमा भुरिक् ॥ ७ । ४१ । १'अति धन्वानि इति द्वयचं श्येनदैवतम् । पूर्वा जगती । परा त्रिष्टुप् ॥ ७ । ४२ । ११'मोमारुद्रा वि वृहतम्' इति द्वयचंमंत्रोक्तदेव- त्यं त्रैष्टुभम् ॥ ७ । ४३ । १“शिवास्ते' इति वाग्देवन्यं त्रिष्टुप् ॥ ७ । ४४ । १ उभा जिग्युथुः' इति मंत्रोक्तदेवत्यं भुरिक्- त्रिष्टुप् ॥ ७ । ४५ । १ जनाद्विश्वजनीनात्' इति भैषज्यमानुष्टुभम् । एतैः सप्तभिः सूक्तमंत्रोक्ताः स्वाः स्वा देवता इति ॥ ५ ॥ ३१ ऋ० ११ १६४ । ५२ में हैं वहां ऋपि दीर्घतमा है। ७।४२। १, २ ऋ०६।७४ । २, ३ में हैं, ऋषि भरद्वाज बार्हस्पत्य है॥ ७। ४४ । १ ऋ० ६ । ६६ । ८ में है वहां ऋषि "भारद्वाज बार्हस्पत्य" है॥ पंचपटालेका पृ० ७ में ७ । ४५ सूक को द्वयच माना है, परन्तु अनुक्रमाणका में यह एक ही है ॥ * , ++ ट [ ७५ ] । प० ५ खं०६॥ ७ । ४५ । २'अग्नेरिवास्य' इति मंत्रोक्तदेवत्यमापन- यनमानुष्टुभम् ॥ ७ । ४६ । *१'सिनीवालि पृथुष्टुके' इति तृचमथर्वा मंत्रो- क्तदेवत्यमानुष्टुभम् । ३'या विश्पनी' इति त्रिष्टुप् ॥ ७। ४७ । १'कुहूं देवीम् इति द्वयचं मंत्रोक्तदेवत्य- माद्या जगती परा त्रिष्टुप् ॥ ७ । ४८ । '१'राकामहम्' इति द्वयमंत्रोक्तदेवत्यं जागतम् ।। ४ । ४६ । १ देवानां पत्नी' इति द्वन्यचं मंत्रोक्तदेवपत्नी देवताकं । पूर्वार्षीजगती, द्वितीया चतुष्पदा पंक्तिरेतैः सिनी- वाल्यादिदेवता इति ॥ ७ । ५० । १'यथा वृक्षम्' इति नवर्च कितववधकामों- ७४६ १, २ ऋ०२। ३२६, ७ में हैं ऋषि गृत्समद है ॥ १७।४८ । १, २ ऋ०२॥३२॥ ४, ५ में है ऋाषे गृत्समद ॥ ७। ४६ । १, २ ऋ० ५ । ४६ । ७, ८ गे है वहां ऋषि 'प्रतिक्षत्र आत्रेय है॥ समग्र मूल लेखों में यहां कितवद्वंधन लिखा है । यदि मूललेखों का पाठ स्वीकार करें तो कुछ भी अर्थ नहीं बन पड़ता। ह्रि० ने अपनी कल्पना से 'कितववाधन कामः' पाट दिया है। ब्लूमफील्ड यहां 'बंधन' डा० रिडर 'द्वन्द्वधन' पाठ स्वीकार करते हैं; परन्तु ह्रि० ने अथर्व संहिता के ७ । ५० । १ मंत्र के अन्तिम पद पर 'बध्यासम्' पद देखकर बाधन' पाठ माना है । मेरी सम्मति में यहां कितववध' पाठ ठीक है, क्योंकि समग्र मंत्रार्थ के आलोचन .
॥प० ५ खं०६॥ [ ७६ ] ऽगिरा । एन्द्रमानुष्टुभम् । *३ ईड अग्निम्', ७ गोभिष्टरेमाम्' इति द्वे त्रैष्टुभौ । १४ वयं जयेम' इति जगती । ६'उत प्रहाम्' इति भुरित्रिष्टुप् ॥ ७ । ५१ । ३१ 'बृहस्पतिनः' इति बार्हस्पत्यं ब्रेष्टुभमाभ्यां इन्द्रबृहस्पती इति ॥ ६ ॥ से यही प्रतीत होता है कि जैसे अशनि (विद्युत्) वृक्ष को (हन्ति) मारती है वैसे ही मैं अक्षदेवन क्रीड़ा अर्थात् द्यत में अपने प्रति- रोधि कितवानर्वध्यासम्' जुआरियों को पासों से 'वध्यासम् मारूं । यहां 'हनो वध लिङि' अष्टा० २।४।४२ सूत्र से हन धातु को वधादेश हुश्रा है। मेरी सम्मति में तो मूल संहिता में भी 'वध्यासं' पाठ अशुद्ध है, वहां वध्यासम्' पाठ होना चाहिये । सम्भव है अन्य किसी आदर्श मूल संहिता के मिलने से पाठ में शुद्धता मिल जावे। श्री सायणाचार्य ने भी निज भाष्य में मूल पाठ 'वध्यासम्' मानकर ही अर्थ किया है, 'बध्यासम्' मानकर नहीं । अनुक्रमणीयों के आदर्श पाठ चिन्तनीय हैं। ७ । ५० । ३ ऋ० ५। ६०।१ । में आया है, वहां अपि 'श्यावाश्व आत्रेय' है॥ १७।५० । ४ ऋ० १।१०२ । ४ में है । वहां ऋपि 'कुत्म आङ्गिरस' है। ७। ५० । ६, ७ ऋ० १० । ४२ । ६, १० में अल्पभेद से हैं वहां ऋषि 'कृष्णः' है ॥ ६७ । ५१ । १ ऋ० १० । ४२ । ११ में अल्प भेद से है ऋषि कृष्ण और देवता केवल इन्द्र है। || 'आभ्यां' पद किन दो ऋचाओं के लिये प्रयुक्त किया है यह चिन्तनीय है।
[ ७७ ] ॥प० ५ ख०७॥ ७ । ५२ । १ संज्ञानं नः' इति द्वयचमथर्वा सांमनस्यमा- श्विनम् । श्राद्या ककुम्मत्यनुष्टुप् । द्वितीया जगतीति ॥ ७ । ५३ । १'अमुत्र भूयादधि' इति सप्तर्च ब्रह्मायुष्यमुत बार्हस्पत्यमाश्विनं त्रैष्टुभम् । ३'आयुर्यत्' इति भुरिक् । ४'मेमम्' इन्युष्णिग्गाषीपंक्तिः । ५ प्रविशतम्' इति तिस्रोऽनुष्टुभाऽनेन मंत्रोक्तान्देवानायुरिति । ७ । ५४ । *? 'ऋचं माम यजामहे' इति ऋक्सामदेवत्य- मानुष्टुभम् ।। . शंकर पाण्डुरङ्ग सम्पादित सायण भाष्य के विना, अन्य सव मूल संहिता प्रकाशकों ने ७ । ५४ । सूक्त को द्वयच माना है । परञ्च अनुक्रमणी में इसे एकत्र लिखा है। प्रतीत होता है कि रा०बि० ने पंचपटालिका के आधार से ७ । ५४ को तो द्वयच माना है और आगे के सूक्त 'ये ते पन्थानोव' को एकर्च माना है । मेरी सम्मति में यहां उन्होंने पटलिका के समझने में भूल की है। पं० भगवद्दत्त जी ने भी पटलिका सम्पादन में 'ऋचं साम' मंत्र प्रतीक के आगे जो (५४) सूक्त का पता दिया है । वह भी राथादि अशुद्ध संहिताओं के आधार से ही उन्होंने दिया है । उनको भी यहां भूल उन्हीं संहिताओं के आधार से हुई है । वास्तव में ऋचं साम' का जो पता पटलिका में दिया गया है, वह प्रकाशित अथर्व- संहिताओं के ७।५४ । के २ मंत्र से जानना चाहिये था, परन्तु संहिता प्रकाशकों ने ७ । ५४ के १ मंत्र की प्रतीक जानकर 'ऋचं- साम' और 'ऋचसाम यत्' मंत्रों का ५४ सूक्त को व्यच बनाया है और 'ये ते पन्थानोव ७। ५५ । को एक भिन्न सूक्त बनाया ठीक ऐसा होना चाहिये था कि 'ऋचंसामयजामहे' मंत्र का एकर्च ahe ॥ प०५ खं०८॥ [ ७८ ] ७ । ५४ । *२'ऋचं साम यत्' इति भृगुद्वर्यचमैन्द्रमानु- ष्टुभं द्वितीया विराटपराष्णिक् ।। ७ । ५६ । १'तिरश्चि राजेः' इति सूक्तमष्टर्चमथर्वा मंत्रोक्त- वृश्चिकदेवताकमानुष्टुभं सिपादा द्वितीया वानस्पत्या । ४'अयं यो वक्रः' इति विराटुप्रस्तारपंक्ति ब्राह्मणस्पत्यमुतेद- मिति ॥ ७॥ ७ । ५७ । १'यदाशसा' इति द्वयचं वामदेवोजागतं सारस्वतम् ॥ ७ । ५८ । ||१'इन्द्रा वरुणा सुतपो' इति द्वयचं कोरुपथि- मंत्रोक्तदेवत्यं जागतम् । द्वितीयात्रिष्टुप् ॥ ७ । ५६ । १ यो नः शपात्' इति बादरायणिररिनाशन- मंत्रोक्तदेवताकमानुष्टुभम् ॥ भिन्न सूक्क बनाते और 'ऋचंसाम यदप्राक्षं' तथा 'ये ने पन्थानोव' इन दो मंत्रों का एक भिन्न द्वयच सूत बनाते अनुक्रमणी और पट- लिका से भी यही सिद्ध होता है॥ यह एकर्च है वा यच यह निर्णय हम ने टिप्पणी में कर दिया है ॥ मूल लेखों में संपादा पढ़ा जाता है ॥ + ह्वि० ने 'व्रा णस्पत्या' पाठ कल्पित किया है ॥ लेखों में 'वानस्पस्त्याय' पाठ है ये दोनों पाठ शुद्ध क्या है ठीक रूप से पढ़े नहीं जाते ॥ ||७ ५८ सूक्त ऋ०६।६८ । १०, ११ में है, वहां ऋषि 'भार- द्वाज' बार्हस्पत्य है॥ ट पृ० ७७ की + [ ७६ ] ॥ प०५ ख०६॥ ७। ६० । १'ऊज विभ्रत्' इति सप्तचं । ब्रह्मा वास्तोष्पत्य- मानुष्टुभम् । प्रथमा परानुष्टुत्रिष्टुबनेन रम्यान्गृहान्वास्तोष्प- तीनप्रार्थयत् ॥ ७ । ६१ । १ 'यदग्ने' इति द्वयचमथर्वाग्नेयमानुष्टुभम् ।। ७ । ६२ । १'अयमग्निः' इत्याग्नेयम् ।। ७ । ६३ । १'पृतनाजित म्' इति मरीचिः काश्यप उभे जगत्यो जातवेदसम् ।। ७। ६४ । १ 'इदं यत् कृष्णः' इति द्वयचं यमोमंत्रोक्त- देवत्यमुत नैऋतं । प्रथमा भुरिगनुष्टुप् । द्वितीया न्यकुमारिणी- बृहती॥ ७ । ६५ । १'प्रतीचीन फलः' इति तृचं शुक्रोऽपामार्ग वीरुध्दैवतमानुष्टुभमनेन मंत्रोक्तां देवतां दुरितापमृष्टिमप्रार्थयत् ।। ७। ६६ । १'यद्यन्तरिक्ष' इति ब्रह्मा ब्राह्मणं त्रिष्टुप् ॥ ७ । ६७ । १ 'पुनमैत्विन्द्रियम्' इत्यात्म दैवतं पुरः परो- ष्णिग्बृहतीति ।। ८॥ ७। ६८ । १ सरस्वति व्रतेषु' इति द्वयंचम् ॥ सव मूल पुस्तकों में पाठ 'रम्यां गृहान्' है 'रम्यान् गृहान्' हमने दिया है। 1वी. देवत्यम् ॥ + पंचपटालिका में इस सूक्त को तृच माना है और अगले ६६ सूक्त को एकर्च स्वीकार किया है । परञ्च अनुक्रमणी तो ६८ ॥प०५ खं०६॥ [ ८० ] ७६८"३"शिवा नः' इति सारस्वते उभे ७६६।१'शं नः' इति सुखदेवताकं शतातिः पूर्वस्य पूर्वानुष्टुप् , परात्रिष्टुप् । ६८ । २'शिवा नः' इति गायत्री। ६६ । १'शं नो वातः' इति पथ्यापंक्तिः॥ ७ । ७० । १ यत् किं चासो' इति पञ्चर्चमथर्वा मंत्रोक्त देवत्यमुत श्येनदेवताकं त्रैष्टुभम् । २'यातुधाना' इत्यतिजगती- गर्मी जगती । ३'अजिराधिराजी' इति तिस्रोऽनुष्टुभः पूर्वा पुरः- ककुम्मती ॥ ७ । ७१ । १ परि त्वाग्ने' इत्याग्नेयमानुष्टुभम् ॥ ७। ७२ । ११'उत तिष्ठत' इत्यैन्द्रं द्वयचं प्रथमानुष्टुप् , द्वितीया त्रिष्टुप् । ३ श्रान्तं मन्ये' इत्यैन्द्रत्रैष्टुभम् ।। और ६६ इन दोनों सूक्तो को द्वयच ही मानती है । शं. पा. के. सायण भाष्य के विना अन्य सब प्रकाशित संहिताओं ने ऋचाक्रम पटलिका के आधार से लिखा है। कौशिक सूत्र में तथा वैतान में भी ६८ सूक्त को दो ऋचा वाला ही माना है। प्रकाशित संहिता में यह मंत्र ७ । ६८। ३ है, अनुक्रमणी के मत में ७ । ६६ । १ का प्रथम मंत्र है॥ + पटालिका में इस ७२ सूक्त को तृच माना है, परन्तु अनु- क्रमणी इसे द्वथच स्वीकार करके 'श्रान्तं मन्ये' वाले मंत्र का भिन्न एकर्च सूक्त स्वीकार करती है। कौशिक सूत्र में इसे इति तिनः कहकर तृच माना है ॥
[ १ ] ॥प० ५ खं० १०॥ ७ । ७३ । *१'समिद्धो अग्निपणा' इत्येकादशर्च धर्म- मूक्तमाश्विनमुत प्रत्यूचं मंत्रोक्तदवतंत्रैष्टुभमनेनधर्ममिति । पूर्वा, ४ यदुनियासु', ६'उप द्रव पयमा' इति जगत्यः । २ ममिद्धो अग्निरश्विना' इति पथ्याबृहतीति ॥ ६ ॥ ७ । ७४ । १'अपचितां लोहिनीनाम्' इति चतुऋचमथा- गिरा मंत्रोकदेवत्यमुतजातवेदसमानुष्टुभम् ।। ७ । ७५। १'प्रजावतीः' इति द्वयचमुपरिबभ्रव आघ्न्यं त्रैष्टुभम् । २ पदज्ञा' इति व्यवमाना पंचपदा भुरिक्पथ्यापंक्ति- रनेनाध्न्यास्तुतिः ॥ ७ । ७६ । ॥१‘ा सुस्रसः' इति चतुर्ऋचमथवापचिद्भष- ज्यदेवत्यमानुष्टुभमाद्या विराट् । २ या ग्रैव्या' इति परोष्णिक्॥ ७। ७३ । ७, ८ ऋ० १ । २६४ । २६, २७ में स्वल्प भेद से हैं वहां ऋषि दीर्घतमा। ७३ । ६ ऋ० ५।४।५ यहां ऋषि वसुश्रुत आत्रेय है। ७३ । १० ऋ०५।२८ । ३ में है। वहां ऋषि विश्ववारा- त्रेयी' है । ७३ । ११ ऋ० १ । १६४।४० में है। वहां ऋषि दीर्घतमा है। । वी. के विना इति' अन्य मूल लेखों में नहीं ॥ ७।७।१ ऋ० ६ । २८ । ७ में स्वल्प भेद से आया है वहां ऋषि 'भरद्वाजो बार्हस्पत्यः' है ॥ क. ग. में पंचपदा नहीं। ॥ यहां यह चतुर्ऋच है । पटलिका में इसे कहीं भीचतुर्ऋचों में नहीं गिना । प्रकाशित मूल संहिताओं में यह सूक्त घट्टच है।
॥ १०५ खं० ११॥ [ ८२ ] ७ । ७६ ।*५'विद्म वै' इति द्वयचं जायान्य न्द्र देवतं त्रैष्टुभम् । पूर्वा भुरिगनुष्ठर ।। ७ । ७७ । ॥१'सांतपना इदम् इति तृचमंगिरा मंत्रोक्तमरु- देवताकम् । पूर्वा त्रिपाद्गायत्री । २ यो नः' इति त्रिष्टुप् । ३'संवत्सरीणाम्' इति जगती ।। ७ । ७८ । १'वि ते मुञ्चामि' इति द्वयचमाग्नेयमथर्वा प्रथमा परोष्णिक, परा त्रिष्टुबित्यनेनाग्निं प्रार्थयतीति' ॥ १० ॥ ७ । ७६ । १ यत् ते देवा' इति चतुर्ऋचमथर्वामावास्या देवताकं त्रैष्टुभम् । प्रथमा जगत्यनेन मंत्रोक्तां देवतामिति ॥ प्रकाशकों ने पटालेका के आधार से ही ऐसा किया प्रतीत होता है । पटालिका में षड्चों के गण में इसे नहीं गिना, क्योंकि द्वितीय पटलान्त में इसे फिर उद्धृत करना था। ७ । ७६ । ६ ऋ० ६४७६ में आया है। वहां ऋषि गर्ग है। * पटालेका में यह सूक्त भिन्न नहीं, अनुक्रमणी में यह भिन्न इयच सूक्त माना है ॥ । सा० भा० भूमिका के पृ० १८ पर शं० पा० ने यहां पाट जायन्यः । ऐन्द्र देवतम् , दिया है । * बी. देवत्यं है॥ शं० पा० भूमि० पृ० १८ में यह पाठ नहीं है । ॥ ७॥ ७७।१० ७॥५६॥ १,१० में स्वल्प भेद से पाता है। कि. ग. ङ. 'इति' नहीं।
[ ८३ ] ॥प० ५ खं०१२॥ ७ । ८० । १ पूर्णा पश्चात्' इति चतुर्ऋचं पौर्णमासम् । *३'प्रजापते न' इति प्राजापत्यं त्रैष्टुभम् । २ वृषभं वाजिनम्' इत्यनुष्टुबनेन मंत्रोक्तां देवतां चेति ॥ ७ । ८१ । १'पूर्वापरम्' इति पचसावित्रीसूर्यचान्द्रमसं बेष्टुभम् । ३ सोमस्यांशः' इत्यानुष्टुभम् । ४'दर्शोसि' इति द्वे प्रास्तारपंक्ती । द्वितीया सम्राडनेन मंत्रोक्तं चन्द्रमसं देवमभिष्ट्रया- प्रार्थयतीति ॥११॥ ७ । ८२ । १ अभ्यर्चत' इति षडचं संपन्कामः शौनक- आग्नेयं त्रैष्टुभम् । २'मय्यग्रे' इति ककुम्मतीबृहती । ३ इहैव' इति जगतीमंत्रोक्तां देवतामभ्यस्तोत् ।। ७ । ८३ । १ 'अप्सु ते राजन्' इति चतुर्ऋचं शुनः शेपो- वारुणमानुष्टुभम् । २'धाम्नो धाम्नः' इति पथ्यापंक्तिः । ३'उदु- त्तमम्' इति द्वे त्रिष्टुभौ । तत्र द्वितीया बृहतीगा । ७।८।३ ऋ० १० । १२१ । १० में आया है। ऋाये 'हिरण्यगर्भः प्राजापत्यः' है। ।७।८१ । १, २ ऋ० १०।८५। १८, १६ में आये हैं । ऋाष सूर्या मावित्री है॥ *७।२।१ ०४।५८ । १० में स्वल्प भेद से है, ऋषि वामदेव है॥ ६७।८३।३ ऋ०१।२४ । १५ में आया है । 'शुनः शेप अाजीगर्तिः कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरात ऋषिः । ७।८३।४ पूर्व अथर्व ६।१२१ । १ में भी आया है। .
॥ ५० ५ खं० १३ ॥ [ ८४ ] ७ । ८४ । *१'अनाधृष्यो जातवेदाः' इति तृचं भृगुरेन्द्र त्रैष्टुभम् । प्रथमाग्नेयी जगतीति । ७ । ८५ । १'त्यम् षु' इति ता_देवत्यं त्रैष्टुभम् ॥ ७ । ८६ । १'वातारमिन्द्रम्' इत्येन्द्रं त्रैष्टुभमुभे स्वस्त्य- यनकामोऽथर्वा ॥ ७ । ८७ । १ 'यो अग्नौ रुद्रः' इत्यथर्वा रौद्रं जागतम् ।। ७। ८८ | १'अपेहि' इति तक्षकदेवत्यं गरुत्मान् व्यव- माना बृहतीति॥ ७ । ८६ । १'अपो दिव्या' इति चतुर्ऋचमाग्नेयमानुष्टुभं सिन्धुद्वीपः । 'एधोसि' इति त्रिपानिवृत्परोष्णिक् ।। ७ । ६० । १ अपि वृश्च' इति तृचमंगिरा मंत्रोक्तदेवत्य- माद्या गायत्री । २ वयं तत्' इति विराट् पुरस्ताबृहती । ३'यथा शेपः' इति व्यवसाना षट्पदा भुरिग्जगतीति ॥ १२ ॥ ७ । ६१ । ६१'इन्द्रः सुत्रामा' इत्यथर्वा चान्द्रमसं त्रैष्टुभम् ।। * ७ । ८४ । २ ऋ० १०1१८० । ३,२ में है ऋषि 'जयः' है ॥ ।७।८६ । १ ऋ० ६।४७।११ में है गर्ग ऋषि ॥ 1७।१०।१,२। ऋ० ८।४०। ६ में आये हैं। ७।११।१ ऋ० १० । १३१ । ६ में ऋषि सुकीर्तिः काक्षीवत है॥
[ ८५ ] ॥ प० ५ खं० १३॥ ७ । ६२ । *१'स सुत्रामा' इति च प्रागुक्तर्षि छन्दोदेवत्यम् ।। ७ । ६३ । १‘इन्द्रेण मन्युना' इति भृग्वंगिरा ऐन्द्रं गायत्रम् ॥ ७ । ६४ । १'ध्रवं ध्रवेण' इत्यथर्वा सौम्यमानुष्टुभम् ॥ ७ । ६५ । १ 'उदस्यश्यावौ' इति तृचम् ॥ ७। ६६ । १ असदन् गाव' इति प्रागुक्तमुझे कपिजलः पूर्व मंत्रोक्त गृध्रदेवत्यमुत्तरं वायसमुभे आनुष्टुभे । ६५ । २'अह- मेना' इति द्वे भुरिजौ॥ ७ । ६७।६१ 'यदद्य त्वा' इति सूक्तमष्टर्चमथर्वा मंत्रोक्तेन्द्राग्नं त्रैष्टुभमनेन यज्ञ सम्पूर्णकामो यज्ञे पतिमिष्वाप्रार्थयत् । ५ यज्ञ यज्ञम्' इति त्रिपदार्षी भुरिग्गायत्री । ६'एष ते यज्ञः' इति त्रिपा- त्प्राजापत्याबृहती । ७'वषड्छतेभ्यः' इति त्रिपदा सानीभुरिग्ज- गती । ८ मनसस्पते' इत्युपरिटाबृहती ।। ७ । ६८।१*सं बर्हिः' इति । ७।१२।१ ऋ०६।४७।१३ तथा १० । १३१ । ७ में आया है ऋषि दोनों स्थलों में वत् है ॥ ७ । ६४ । १ ऋ० १० । १७३ । ६ में है ऋषि ध्रुवः है ॥ + ह्रि० ने 'प्राकृतम्' कल्पित किया है ॥ ६७।६७ । २ ऋ० ५। ४२ । ४ में अल्पभेद से आया है ऋषि अत्रि है॥
॥प० ५ खं०१४॥ [ ८६ ] ७। ६६ । १ परि स्तृणीहि' इति द्वे मंत्रोक्त देवते त्रैष्टुभे । पूर्वा विराडुत्तरा भुरिक ।। ७ । १०० । १ ‘पर्यावर्त दुष्वप्न्यात्' इति द्वे यमो दुःम्व- मनाशनदेवत्ये आनुष्टुभे ॥ ७ । १०२ । १ 'नमस्कृत्य' इति प्रजापतिमंत्रोक्तं नाना- देवत्यं विराटपुरस्ताबृहतीति ॥ १३ ॥ ७ । १०३ । १ को अस्या नः ॥ ७ । १०४ । १'कः पृश्निम' इति द्वे ब्रह्मात्मदेवते त्रैष्टुभे । ७।१०५।१ अपक्रामन्' इत्यथर्वा मंत्रोक्नदेवत्यमानुष्टुभम् ।। ७ । १०६ । १'यदस्मृति' इति मंत्रोकदेवतमुतजातवेदन परार्द्ध वारुणं बृहतीगर्भा त्रिष्टुप् ।। ७ । १०७ । १'अव दिवः' इति भृगुःमौर्यमुताब्दवन- मानुष्टुभम् ॥ ७ । १०८ । १ यो नस्तायत्' इनि द्वधचमाग्नेयं त्रैष्टुभम् । पूर्वा बृहतीगर्भेति ॥ ७ । १०६ । १'इदमुग्राय' इति सप्तर्च वादरायणिराग्यंमुत मंत्रोक्तदेवत्यमानुष्टुभं । १ इदमुग्राय' इति विराटपुरस्तादबृहती ।
[ ८७ ] ॥ प०५ ख०१५॥ २ घृतमप्मराभ्यः, ३'अप्सग्मः, ५ यो नो युवे, ६'सं वसवः' इति त्रिष्टुभः॥ ७ । ११० । १ अन्न इन्द्रः' इति तृचं भृगुरैन्द्राग्नम् । पूर्वा गायत्री । २ याभ्यामजयन्' इति त्रिष्टुप । ३'उप त्या देवः' इत्यनुष्टुप ॥ ७ । १११ । १ 'इन्द्रग्य कुक्षिरमि' इति ब्रह्मा वार्षभं परा- बृहतीत्रिष्टुप ॥ ७ । ११२। *?'शुम्भनी' इति द्वयचं मंत्रोक्नमाब्दवतम् । वरुणमानुष्टुभम् । पूर्वा भरि गिति ॥ १४ ॥ ७ । ११३ । १ तृष्टके' इति द्वयचं भार्गवः । तृष्टिका देवत्यमाद्याविराडनुष्टुप । परा शङकुमती चतुष्पदा भुरिगुष्णिक ॥ ७ । ११४ । १'आ ते ददे' इति द्वयचमनीषोमीयमानु- ष्टुभम् ॥ ७ । ११५ । १ प्रपततः' इति चतुऋचमथांगिरा सावित्रं जातवेदसमानुष्टुभमनन पापामन्यायागतां लक्ष्मी निन्दयित्वा, न्यायागतां पुण्यामभिष्ट्रय मंत्रोक्तां देवतामप्रार्थयत । २'या मा लक्ष्मीः' इति द्वे त्रैष्टुभौ ॥ ७११२२ ऋ० १० । ६७ । १६ में है ऋाप 'भिपगाथर्वणः' है। देवता श्रोषधीः स्तुति है अथर्व ६।६६ । २ में भी यह मंत्र आया है॥ क. ग. कु हात नहीं।
॥५० ५ खं०१५॥ [ ८८ ] ७ ११६ । “१'नमो रूराय' इति द्वयचं चान्द्रम सम् । आद्या परोष्णिक् । २ यो अन्येयुः' इत्येकावसाना द्विपदाय॑नुष्टुप ।। ७ । ११७ । १‘ा मन्द्रः' इत्यन्द्र, पथ्याबृहती ।। ७ । ११८ । १ मर्माणि ने' इति बहुदेवत्यमतचान्द्रममं त्रैष्टुभमिति ॥ १५ ॥ इति ब्रह्मवेदोक्त मंत्राणां बृहत्सर्वानुक्रमणिकायां पञ्चमः पटलः समाप्तः ॥ * ७ । ११६ । १ ० ३ । ४५ । १ में आया है. ऋषि विश्वामित्र है॥ 1क.ग. चान्द्रमस्यम् ॥ *७॥ ११७ । १ ऋ०६ । ७. । १८ में है, 'पायुर्भारद्वाज' हैं ।
[ 8 ] ॥ प०६ खं०१॥ *अथाष्टमं काण्डम्। ॐ नमो ब्रह्मवेदाय । ॐ अथेयं प्राग्रापरमे त्यरंकृषतनु- क्रमणेत्यनुसंधनाभिधेयेनाविष्कृताथर्वमंत्रर्पिछन्दोदैवतानुक्रान्ति- म्तां गुर्वनुज्ञातो योऽधीतेऽध्यापयति च, योऽधीतेऽध्यापयति च, म मंत्रपाठफलं मम्यगश्नुते । तेन विनियुक्ता मंत्राश्च सवीर्या भवन्ति । देहान्ते ब्रह्मलोकमनुभूय किंचित्कालं तदन्विह द्विजोत्तमकुलेऽवतीर्य परमतुलं मुखं भुङ्क्ते । यः पुनरेतां छद्मनादत्तग्राहयति वा ततः पठति पाठयति च, स गतायुरिहाप्रतिष्ठा दण्डयश्च भवति । मृतोऽन्ध नामिस्र, नीचर्गमनं यावदचरं कालमनुभूयेमं पुनर्मू- त्युलोकं प्राप्योलूकन्वमश्नुते । किंचित्कालं पुनमतोऽपि तमेव नरकमनुभूयमं पुनरिहावतीर्य द्विजकुले विद्याभ्यासवशाद्गुरुश्रुग् जन्मान्धोऽवश्यं भवतीति । निश्चितोऽभिभवेदिति यथोक्तप्रका- शम्यचोभयथा नूनमक्षय्यं मुकृतं भवेदिति ।। अथ चुद्रकाण्डार्थमूलमंत्राणामृपिदैवतछन्दांस्युच्यन्ते । ततो यावदकादश काण्डान्तमर्थमूक्तप्रकृतिस्तावद्विहाय पर्याया- विराड्वाप्रभृतीनिति तत्र ॥ यह लख हमारा है॥ | गु० श्री गणेशाय नमः । क. में यहां कुछ नहीं । ङ. 'अपरं कृपनु' ठीक पाठ पढ़ा नहीं जाता ॥ ङ कुलं'। || क. ऊ. 'तामिथं'।
॥प०६खं०२॥ [ ६० ] ८।१ । १ अन्तकाय मृत्यवे' ।। ८ । २ । १'भारभस्व' इति द्वे ब्रह्माायुष्ये त्रैष्टुभ अप- श्यदिति । सर्वत्रानुक्तेऽपि शेषोऽनुवर्तते । या यदेवन्येति चाद्य- स्याद्या पुरोबृहती त्रिष्टुप् ॥ ८ | १ । २'उदेनम्' इति द्वे, १७ उत त्वा द्यौः' इति पञ्चा नुष्टुभः । ४'उत क्रामातः पुरुष', 'श्यामश्च त्वा', १५ जीवे भ्यस्त्वा' इति द्वे प्रस्तारपक्रयः । ७'मा ते मनः' इति त्रिपाद्वि- राङ्गायत्री | ८ मा गतानाम्' इति विराट्पथ्याबृहती । १२ मा त्वा क्रव्यात्' इति व्यवसाना पञ्चपदा जगती । १३ 'बोधश्च त्वा' इति त्रिपाद्भुरिङ्महाबृहती । १० ते त्वा रक्षन्तु' इत्यका- वसाना द्विपदा साम्नी भुरिग्बृहती । इदमेकविंशकामिहाद्यमुच्यन इति ॥१॥ चा२।१'आ रभस्व' इति द्वे,७ अधिबहि' इति भुरिजः । ३'वातात्ते' इत्यास्तारपंक्तिः । ४'प्राणन त्वा' इति प्रस्तारपंक्तिः । 'जीवला नघा' इति पथ्यापंक्तिः । 'अस्म मृत्यो' इति पुरस्ताज्ज्योतिष्मती जगती । ह'देवानां हेतिः' इति पञ्चपदा- जगती । ११'कृणोमि ते' इति विष्टारपंक्तिः । १२'आग- दरातिम्' इति पुरस्ताबृहती । १४ शिवे ते स्ताम्' इति व्यव- * बी. 'त्वा' नहीं॥ बी. 'नघारिषामिति ॥
[ ६१ ] ॥ प०६ ख०३॥ साना पदपदा जगती । १५'शिवास्ते इति पथ्यापंक्तिः । १६ यद- श्नासि' इत्युपरिष्टाबृहती । २१ शतं ते' इति सतःपंक्तिः २२ शरदे त्वा', २८ अग्नेः शरीरम्' इति पुरस्ताबृहत्यौ । ५'अयं जीवतु', १० 'यत्त नियानम्', १६ 'यत्ते वासः' इति तिस्रः, २०'अन्हे च त्वा' इति. २३ मृत्युरीशे' इति तिस्रः, २७'ये मृत्यवः' इति चता अनुष्टुभस्तत्र १७ यत् चुरेण' इति त्रिपादि- दमाधं विशंसहितमष्टों परा इति ॥ २ ॥ ८।३ । १रक्षोहणम् ॥ ८ । ४ । १'इन्द्रासोमा' इति द्वे अनुवको चातनः । पूर्व पड्विंशमाग्नेयमुत्तरं पञ्चविंशकं मंत्रोक्तदेवत्यम् । जागतमा त्रैष्टुभम् ।। ८ । ३ । ७'उतारब्धान्', १४ पराद्य देवाः' इति द्वे, "१७ संवत्सरीणां पयः', २१ तदग्ने', १२'यदग्ने' इति भुरिजः । '२५'ये ते शृङ्गे' इति पञ्चपदा बृहतीगर्भाजगती । २२ परि ८।३।१ ऋ० १० । ८७ । १ में है, ऋषि पायुः है ॥ + । ४ समग्रमून ऋग्वेद ७। १०४ मूक है वहां ऋषि वसिष्ठ है ॥ क. अनुवाकों, ङ. वी. अनुवाकं, घ० अनुवाच ॥ ८ । ३ । २४ ऋ० ५। २। E में है ऋषि कुमार अत्रेया वंशो वा जार उभौ वा ॥ ८।३। १७ ऋ० १०।८७ । १७ में है, ऋपि पायु है । 11८।३ । २४ ऋ० ५।२।६ में है ऋषि कुमार श्रात्रेया वृशो वा जार उभौवा है ॥
|| प०६खं०४॥ [ २ ] त्या अग्ने' इति द्वे अनुष्टुभौ । २६'अग्नी रक्षांसि' इति गायत्री। ८।४ । 'यो मा पाकेन' इति सप्त, १६'यो माया. तुम्' इति द्वे, १६'प्र वर्तय दिवः', २२ 'उलूकयातुम्', २४ इन्द्र जहि' इति त्रिष्टुभः । २० 'एत उ त्ये', २३ मा नो रक्ष' इति भुरिजा । २५ प्रति चच्च' इत्यनुष्टुविति ॥३॥ ८।५। १'अयं प्रतिसरः' इति द्वाविंशं शुक्रः कृत्यादृपण देवत्यमुन मंत्रोक्तदेवत्यमानुष्टुभमाद्योपरिष्टादबृहती । द्वितीया त्रिपाद्विराड्गायत्री । ३ अननेन्द्रः' इति चतुप्पादभुरिग्जगती । ५ तदग्निः' इति संस्तारपंक्तिः भुरिक । ६ अन्तदधे इत्युपरिष्टा- बृहती । ७ ये साक्त्यम्' इति द्वे ककुम्मत्यौ । ह'याः कृत्याः' इति पुरस्कृतिजगती । १०'अम्म मणिम्' इति त्रिष्टुप् । ११ ‘उत्तमा असि' इति पथ्यापंक्तिः । १४ कश्यपस्त्वा' इति यवमाना पट्पदा जगती । १५'यस्त्वा कृत्याभिः' इति पुरस्तादबृहती । १६ एन्द्रानं वर्म' इति जगतीगभा त्रिष्टुप् । २० 'यामा रुक्षत्'इति विरागभी स्तारपक्तिः। २१ अम्मिन्निन्द्रः इति परा विगदत्रिष्टुप । २२ स्वस्तिदा विशाम्' इति व्यवसाना सप्तपदा विग़द्गभा भुरिक शक्करीति ॥ ४॥ ।३।२६ ऋ० ७ । १५ । १० में है, ऋषि वसिष्ट है । क. ङ. इति नहीं। * बी. प्रस्तार पतिः। विटने में भी प्रस्तार पतिःही लिखा है परन्तु टिप्पणि में बर्लिन मूल लख से उसने भी प्रास्तार पतिः पाठ उचित माना है। क. वी. में इति है रू में नहीं।
[ ६३ ] ।। १०६ खं०६॥ ८। ६ । १'यो त माता' इति पड्विंशं मातृनामा ऋषि- मातुनामादेवन्यमुत मंत्रोक्नदेवत्यमानुष्टुभम् । ब्रह्मानन गर्भरक्ष णार्थश्चास्तीत् । २'पलालानुपलालो' इति पुरस्ताबृहती । १० ये शालाः' इति व्यवसाना पट्पदाजगती । ११ ये कुकृ- न्धाः' इति द्वे, १४'ये पूर्वे', १६ पर्यस्ताक्षाः' इति पथ्यापंक्तयः। १५ येषां पश्चात्' इति त्र्यवसाना सप्तपदा शक्करी ब्राह्मणस्पत्या। १७'उद्धर्पिणम्' इति तथा जगतीति ।। ८ । ७ । १ या बभ्रवः' इत्य टाविंशकमा भैषज्यायुष्य- मुत मंत्रोक्कोपधिदेवताकमानुष्टुभम् । २'त्रायन्तामिमं' इत्युपरि- ष्टादभुरिग्बृहती । ३'आपो अग्रम्' इति पुरउष्णिक् । ४'प्रस्तु- णती' इति पंचपदा परानुष्टुबतिजगती । ५ यद् वः सहः' इति द्वे पथ्यापंक्ती द्वितीया विगइगी भुरिक । ह'अब कोल्बा' इति द्विपदार्चीभुरिगनुष्टुर। १० उन्मुञ्चन्तीः' इति पथ्यापंक्तिः। १२ 'मवुमन्मूलम्' इति पंचपदा विराडनिशकरीति ॥ ५ ॥ १४ 'वैयाघ्रो मणिः' इत्युपरिटानिन्दबृहती । २५ यावती- नामोपीनाम्' इति पथ्यापंक्तिः । २६'यावतीषुमनुष्याः' इति निवृत् । २८ उत् त्वाहापम्' इति भुरिक् ।। ८।८ । १ इन्द्रो मन्थतु' इति चतुर्विंशं भृग्वंगिरा एन्द्र- मुतवानस्पत्यं परं सेनाहननमानुष्टुभम् । २ पूतिरज्जुः' इति द्वे ** बी. इति साष्टा विंशकम् ॥ 16. इति नहीं॥
। प०६ ख० ८॥ [ ६४ ] बृहत्यौ । पूर्वोपरिष्टद् द्वितीया विराट् । ४ पुरुषानमून इति बृहती- पुरस्तात् प्रस्तारपक्तिः । ६'बृहद्धि जालम्' इत्याम्तारपंक्तिः । ७'बृहत् ते' इति विपरीतपादलच्मा चतुष्पदानि जगतीति । ८'अयं लोकः' इति तिस्र उपरिटाबृहन्यः । ११'नयतामून' इति पथ्यावृहती । परा भुरिक । १६ 'परा जिताः' इनि द्व पुरस्तादबृहत्या । पूर्वा विराइत्तरानिन्न । २१ 'म क्राशनाम इनि त्रिष्टुप् । २२ दिशश्चतस्रः' इति चतुष्पदा शक्करी । २३ मंवत्म- रो रथः' इत्युपरिष्टाबृहती । २४ इतो जयतः' इति व्यवमाना त्रिष्टुबुणिग्गर्भा परा शक्करी पञ्चपदा जगीति ॥ ६ ॥ ८। 6 । १ 'कुतस्तो' इति पडिवंशमथवा काश्यपयमत सर्वापछान्दसं त्रैष्टुभम् । २ 'यो अक्रन्दयत् इति द्वे पंकी । द्विती याम्तारपंक्तिः । ४'बृहतः परि इति द्वे अनुष्टुभी । ८ 'यां प्रच्यु- ताम्' इति, ११ इयमेव' इति जगत्या । । 'अप्राणति' इनि भुरिक । १२ छन्दः पक्षे उपसा', २२ इत्थं श्रेयः' इति जगन्या । १४'अ- नीपोमावदधुः' इति चतुष्पदातिजगती । २३'अष्टन्द्रम्य २५'को नु गौः' इति द्वे अनुष्टुभ इति ॥ ७ ॥ ८।१० । पर्याय १। ८ । १० । विराड्वा प्रभृतिर्वस्योभ्यायां तांबविशत्म- ङ. इति नहीं॥ 13. इति नहीं॥ + क. ङ. इति नहीं तथा अन्य लेखों में पाट भाविति' है॥
[ ६५ ] ॥ प०६ख०६॥ तशतं पर्यायमंत्रानथर्वाचार्योऽपश्यत् । 'तत्र "विरावा' इति पर पर्याया विराड्देवत्यास्तत्राद्यं त्रयोदशकम् । प्रथमा त्रिपदार्ची- पंक्तिः । २ सोदक्रामत्' इति षड्याजुषीजगत्यः । ३'गृहमेधी', ६ यन्त्यस्यसभाम्' इति साम्न्यनुष्टुभौ । ५'यन्त्यस्य देवाः' आयनुष्टुप् । ७ यज्ञो',१३ यन्त्यस्यामन्त्रणं', विराङ्गायत्र्यौ। ११ यन्त्यस्य समितिम्' इति साम्नीबृहतीति ॥ ८॥ ८।१० । पर्याय २। ११'सान्तरिक्षे' इति दशकमाद्या त्रिपदा ह'ओषधीरेवास्मै इति माम्न्यनुष्टुभौ । २'तां देवमनुष्याः' उष्णिग्गर्भा चतुष्पदो- परिष्टाद्विराइबृहती । ३'तामुप' इत्येकपदा याजुषीगायत्री। ४'ऊर्ज एहि', एकपदा, ७ ओषधीरेव' इति साम्नांपती । ५ तस्या इन्द्रः' विरागायत्री । ६'बृहन्चरथन्तरं च' आय॑नुष्टुप् । 'अपो वामदेव्येन' आसुरी गायत्री । १० 'अपो वामदेव्यम्' माम्नांबृहतीति ॥ ६ ॥ * शंकर पाण्डुरङ्ग ने भीसर्वानुक्रमणिका के आधार से मायण भाग्य में इस काण्ड के १५ मून बनाये हैं परन्तु औरों ने इसके सूत्र १० स्वीकार करके शेषों को पर्याय रूप से इसके अन्तर्गत ही दिया है। हमने भी पर्याय सूकान्तगत ही रक्खा है । । इस प्रकार का प्रतीकोद्धरण क्रम अथर्व में जो है वह विस्तार रूप से पंचपटलिका १।१ में देखो ॥ 'शं. पा० ने सायणभाष्य भू० पृ०१६ में पंक्तिः पाठ दिया है।
॥प०६ खं० १०॥ [ ६६ ] ८ । १० । पर्याय ३। १'सा वनस्पतीन्' इत्यष्टौ । प्रथमा चतुष्पदा विगडनुष्टुप । २'तस्माद् वनस्पतीनाम्' आर्चीत्रिष्टुप । ३'मा पितॄन' इति तिस्रः चतुष्पादः प्राजापत्याः पंक्रयः । ४'तम्मात पितृभ्यः ६ देवेभ्यः', 'मनुष्येभ्यः' इति तिम्र प्राचीवहन्यः ।। ८। १० । प०४ । १‘सासुरान्' इति द्वे पोडशके । तत्राद्या ५'मापिनन् । ५ । १'सा देवान्', ५ । १३'मा मान्' इति चतुष्पादः मानां- जगत्यः । २ तम्या विरोचनाः', ६ यमः', १० मनुः'. ५ । १० 'कुबेरः', ५ । १४ तक्षकः' इति साम्नां बृहत्यः। ५। १ नां देवाः', ३'तां द्विधा' इति साम्न्युष्णिहाँ । ४ तां मायाम्', ८ स्वधाम्'. ५ । ४'ऊजीम्'. ५। १६ तद्विपम्' इत्याच्चनुपरभः । ७'तामन्तकः' आसुरी गायत्री ।'मा मनुष्यान'. १३'मा मान- पीन्', ५ । ह'सेतरजनान' इति चतुष्पाद उष्णिहः । ११ नां पृथी' प्राजापत्यानुष्टुप । १२ ते ऋषि', १६ तद याम' ५। तं पुण्यम्' इत्याची त्रिष्टुभः । १४'तम्याः सामः .॥२'इन्द्रः इति साम्न्युष्णिहाँ । १५'तां बृहस्पतिः' ५ । ७ वमुचिः ५। ११ रजतनाभिः' इति विराइगाय यः ॥ १० ॥ इस में ४ तथा ५ पायों के उदाहरण हैं । ४. उदा. हरणों में केवल मंत्र संख्या चिन्ह ही दे दिया है। और पचम का (४) अंक देकर मंत्र संख्या दी है। 16.बी. अनुष्टुप ॥
[ ६७ ] ।। प०६ खं०११॥ ८।१०। प० ५ ॥ ५ 'सा गन्धर्वाप्सरसः' इति चतुष्पदा प्राजापत्या जगती । ६ तस्याश्चित्र रथः' मानां बृहती त्रिष्टुप् । १२'तां विरोधाम्' त्रिपदा ब्राह्मीभुरिग्गायत्री । १५ 'तांधृतराष्ट्रः' साम्न्यनुष्टुबिति । ८।१० । प०६। १ तद् यस्मा' इति चतुष्कमाद्याविराङ्गायत्री । २'न च' इति साम्नां त्रिष्टुप् । ३ यत् प्रत्याहन्ति' इति प्राजापत्या- नुष्टुप् । ४'तां विषमेव' इत्याय॒ष्णिक । इहानुक्तपादा द्विपदा इति ॥११॥ में यह पर्याय छूट गया है।
॥प०६ख०१३॥ [ ६८ ] *अथ नवमं काण्डम्। है । १ । १ दिवम्पृथिव्याः' इति चतुर्विंशर्चमथर्वा । मधु- देवत्यमाश्विनं त्रैष्टुभम् । द्वितीया त्रिष्टुवगर्भापंक्तिः । ३ पश्यन्न्य- म्याः' इति परानुष्टुप् । ६'कस्तं'. ७'स तो' इति यवमध्ये महाबृहत्यौ । पूर्वातिशाक्करगर्भोत्तगतिजागतगी । “हिरि- ऋती' इति बृहतीगर्भा संस्तारपंक्तिः । १० स्तनयित्नुस्ते' इति परोष्णिकपंक्तिः । ११'यथा सोमः प्रातः सवने' इति तिम्रः, १५'सं माग्ने' इति द्वे, १८'यगिरिपु' इति द्वे अनुष्टुभः । १४ मधु जनिषीय' इति पुर उष्णिक । १७'यथा मक्षा' इत्युप- रिष्टाद्विराड्बृहती । २० स्तनयित्नुस्ते' इति भुगिग्विष्टारपंक्तिः । २१ पृथिवी दण्डः' इत्येकावसाना द्विपदाय॑नुष्टुप् । २२ 'यो वै कशाया' इति त्रिपदा ब्राह्मी पुरउष्णिक् । २३'मधुमान् भवति' इति द्विपदार्टीपंक्तिः । २४ 'यद वधेि' इति व्यवसाना परपदा. ष्टिरिति ॥ १२ ॥ ६ । २ । १ सपत्न हनम्' इति पंचविंशकं कामदेवत्यं त्रैष्टु- भम् । ५ सा ते काम' इत्यतिजगती । ७ अध्यक्षः' इति जगती। यह लेख हमारा है। ६।१ । १५ ऋ० १ । २३ । २४ में है, ऋषि 'मेधातिथि काएवं है॥
[ ६६ ] ॥ ५०६ खं०१५॥ ‘इदमाज्यम्' इति त्रिपदार्चीपंक्तिः । ११ अवधीत् कामः' इति भुरिक् । १२ ते धराश्वः' इत्यनुष्टुप् । १३ अग्निर्यवः' इति द्विपदाय॑नुष्टुप् । १४ असर्ववीरः' इति द्वे, १७ येन देवाः इति द्वे. २१ 'यावतीदिशः' इति द्वे जगत्यः । २० यावतीद्यावापृथिवी', २३ ज्यायान्' इति भुरिजौ । १६ यत् ते काम' इति चतुष्पदा शक्करीगी परा जगतीति ॥ १३ ॥ ६ । ३। १ उपमिताम्' इति चकत्रिंशत्कं, भृग्वंगिराः शाला देवत्यमानुष्टुभम् । ६ यानि ते' इति पथ्यापंक्तिः । ७'हविर्धानम्' इति परोष्णिक् । १५'अन्तरा द्याम्' इति व्यव- माना पञ्चपदातिशक्करी । १७'तृणैरावृता' इति प्रस्तारपंक्तिः । २१ या द्विपक्षा' इत्यास्तारपंक्तिः । २५'प्राच्या दिशः' ३१ दिशोदिशः' इति त्रिपादौ प्राजापत्या बृहत्यौ । २६ दक्षि- णाया दिशः' इति सानां त्रिष्टुप् । २७ प्रतीच्याः',२८ उदीच्याः' २६ 'ध्रवायाः',३०'ऊर्ध्वायाः', प्रतिष्ठा नाम गायत्र्यस्त्रिपाद एताः सप्तकावमाना इति ॥ १४॥ ६। ४ । १'साहस्रस्त्वेषः' इति चतुर्विशकं ब्रह्माभं त्रैष्टुभम् । ८ इन्द्रस्यौजः' इति भुरिक् । ६'सोमेन पूर्णम्', १० बृहस्पतिः सविता' इति जगत्यौ । ११ 'य इन्द्र इव' इति है * हि० द्विपदा लिखा है। ।२।१२ अथर्व ३।६। ७ में श्राचुका बी. यहां कुछ पाठ छूटा हुआ है ॥ बी. इव देवेष्विति ॥
॥ प०६ खं० १६ ॥ [ १०० ] सप्त, १६'ब्राह्मणेभ्य ऋषभम्' इति द्वे, २३ 'उपहोपपर्चन' इत्य- नुष्टुभः । १८'शत याजम्' इत्युपरिष्टाबृहती । २१'अयं पिपानः' इत्याम्तारपंक्तिः । २४ एतं वो युवानम्' इति जगती ।। ६। ५ । १'आ नय' इत्यष्टास्त्रिंशदभृगुमन्त्रोक्ताजं पंचौदन- देवत्यं त्रैष्टुभम् । ३ प्रपदः' इति चतुष्पातपुरोतिशक्करी जगती। ४'अनुच्छय श्यामन', १० 'अजस्त्रिनाक' इति जगत्याविति ॥१५ ६ । ५ । १४ अमोतम्', १७ 'येनासहस्रम्', २७ या पूर्वम्' इति तिस्रोऽनुष्टुभः । ३० अात्मानं पितरम्' इति ककुम्मती । २३'नास्यास्थीनि' इति पुर उष्णिक् । १६'अजोसि' इति त्रिपा- दनुष्टुप् । १८ अजः पक्कः' इति त्रिपाद्विराड्गायत्री । २४ इद- मिदमेव इति पञ्चपदानुष्टुबुष्णिग्गर्भोपरिष्टाद्धार्हता विराडजगती। २० 'अजो वा इदमग्रे' इति तिस्रः, २६ पञ्च रुक्म' इति पञ्च- पदानुष्टुबुष्णिगर्भोपरिष्टाद्धार्हता भुरिजः|||३१ 'यो वै नदाघम्' इति सप्तपदाष्टिः । ३२ 'यो वै कुर्वन्तम्' इति चतस्रो दशपदाः प्रकृतयः । ३६'यो वा अभिभुवम्' इति दशपदाकृतिः । + ६ । ४ । २३ ०६।२८ । ८ में बहु पाठ भेद म है ॥ । ङ. इति नहीं॥ गु० के विना अन्य क. ङ. वो. लखों में चतनः ही पाठ है। गु० का पाठ शुद्ध है क्योंकि १४, १७, २७ में तीन ऋचायें हैं जिनका अनुष्टुप छन्द है चार ऋचायें नहीं ॥ बी. में विराड् पद छूटा है॥ || सब मूल लेखों में पाठ 'भारक' है ॥
[ १०१ ] ॥प०६ खं० १८॥ ३७'अजं च पचत' इति त्रिपाद्विराड्गायत्री।३८ तास्ते रक्षन्तु' इत्येकावसाना द्विपदा माम्नांत्रिष्टुबिति ॥ १६ ॥ है।६। प० १ । ६ । ६ । १ 'यो विद्यात्' इति पर पाया ब्रह्मातिथ्या उत विद्या देवत्यास्तत्र १ 'यो विद्यात्' सप्तदश पूर्वाद्या नागी- नामत्रिपाद्गायत्री । २'मामानि यस्य' त्रिपदार्षीगायत्री । ३ यद् वा अतिथिपतिः ७'यदावसथान्' सानी त्रिष्टुभौ । ४ यदभि- वदति', ह'यदुपरिशयनम्' आय॑नुष्टुभौ । ५'या एव यज्ञ', आसुरी गायत्री । ६'यत् तर्पणं' त्रिपदा साम्नां जगती । ८ यदु- पस्तृणन्ति' याजुपात्रिष्टुप् । १० यत् कशिपूपबर्हणम्' साम्नां- भुरिग्बृहती । ११ यदाञ्जनाभ्यञ्जनम्',१४ ये ब्रीहयः' इति तिस्रः साम्न्यनुष्टुभः । १२ यत् पुरा' इति विराड्गायत्री । १३ यद- शन कृतम्' साम्नीनिवृत्पक्तिः । १७ स्रुग्दर्विः' त्रिपाद्विरा - रिग्गायत्रीति ॥१७॥ है।६ । प० २ । १'यजमान ब्राह्मणं वा' इति त्रयोदश । प्रथमा विराट्पुर- म्ताबृहती । २'यदा ह भूयः', १२ प्रजापतेर्वा एष' साम्नां- * यहां पाठ में परस्पर बहुत भेद है। क. "दश सप्तोंद्या नागानामा" । ङ. में पाठ ऊपर के मूलवत् है, किन्तु नाम के पूर्व 'नागी' पद छूटा हुआ है। हमने मूल में बी. का पाठ दिया है। ङ. इति नहीं॥
।। प०६ वं० १६॥ [ १०२ ] त्रिष्टुभी । ३'उप हरति' आसुयनुष्टुप् । ४'तपामासन्नानां' माम्न्युष्णिक् । ५ सूचा हस्तेन', ११'प्राजापत्यो वा' इति माम्नां बृहत्यौ । द्वितीया भुरिक । ६ एत व प्रियाः' आयनुष्टुप । ७ स य एवम्' इति त्रिपात्म्वगडनुष्टुप । ह'मा वा एपो जग्धपाप्मा' साम्न्यनुष्टुप् । १० मवंदा वा एप' त्रिपदाचींत्रि- ष्टुप् । १३ योऽतिथीनाम्' त्रिपदा पंक्तिरिति ॥ १८ ॥ ।। ६ । प०३। १'इष्टं च वा' इति नवकं प्रथमाः पट् , हएतद वा उ म्वा- दीयः' इति त्रिपादः पिपीलिकमध्या गायव्यः । ७'एप वा अतिथिः' माम्नी बृहती । 'आशितावती' इति पिपीलिकमध्यो- ष्णिक ॥ है । ६ । प० ४ । १ स य एवम्', ६। ६ । प० ५ । १'तम्मा उषा' इति हो दशको । ६ । ४ प० । पूर्वस्याद्याश्चतस्रः १‘म य एवम्' इति शद्ध- रूपाः प्राजापत्या अनुष्टुभः । 'म य एवं विद्वानुदकम्' इति झुरिक् । २ यावदग्निष्टोमेन' इति चतस्रो यावत्सर्वरूपास्त्रिपादो- क. ऊ. में “म य एवं विद्वानिति पंचपदा विगट पुरस्ता- बृहती" पाठ है। इनका पाठ बी. से सर्वथा भिन्न है। हि० ने भी मूलवत् पाठ ऊपर देकर टिप्पणि में बर्लिनसंस्करण का पाठ है शं. पा. यावच्छन्दरूपा । क. यावच्छत्ररूपा बी. पाठ पढ़ा नहीं जाता। हमने कु. का पाठ दिया है ।
[ १०३ ] ॥ प०६ख० २०॥ गायत्र्यः । १० 'प्रजानां प्रजननाय' इति चतुष्पात्प्रस्तारपंक्तिः ॥ ६। ५ । उत्तरस्याद्या साम्न्युष्णिक । २'बृहस्पतिरुजय' इति पुर उष्णिक । ३ निधनंभृत्याः' माम्नां भुरिग्बृहती। ४'तस्मा उद्यन्', ६'अभ्रः' 8 'उपहरति इति साम्न्यनुष्टुभः । ५'मध्यदिन' त्रिपदा निद्विषमा नाम गायत्री । ७ विद्योतमानः' त्रिपदा विराड़िवषमा नाम गायत्री । 'अतिथीन प्रति' इति त्रिपाद्वि- गडनुष्टुबिति ॥ १६ ॥ है।६। प०६। १ यत् क्षत्तारम्' इति चतुर्दशकं पूर्वासुरीगायत्री । २ यत् प्रतिशृणोति' साम्न्यनुष्टुप् । ३'यत् परिवेष्टारः, ५'यद् वा अतिथिपतिः' *त्रिपदे आचीपंक्ती । ४ तेषां न' इत्येकपदा प्रा- जापत्या गायत्री । ६ यत् सभागयति' इति पडायॊ बृहत्यः । १२ स उपहूतः' एकपदासुरी जगती । १३ अामोतीमम्' याजुषी त्रिष्टुप् । १४ ज्योतिष्मतः' एकपदासुयुष्णिक् ।। ६ । ७ । १ प्रजापतिश्चकः' षड्वंशो गव्यः । श्राद्या - बृहती ।२ सोमा राजा'आर्युष्णिक।३'विद्युजिह्वा',५ श्येन कोडः' आय॑नुष्टुभौ । ४'विश्वं वायुः, १४ नदी सूत्री', १५'विश्व- ङ. बी. त्रिपदा आर्ची ॥ । अथर्व संहिता में पाठ 'प्रजापतिः' मात्र है उसके भागे 'चैकः' नहीं परन्तु समत्र मूल लेखों में प्रजापतिश्चैकः है अतः यह पाठ विचारणीय है।
॥प०६खं० २२॥ [ १०४ ] व्यचाः , १६'देवजना' इति माम्नां बृहत्यः। ६'देवानां पत्नी ८'इन्द्राणी' आसुरी गायव्यौ । ७मित्रश्च' त्रिपदा पिपीलिक- मध्यानिवृद्गायत्री । ब्रह्म च', १३ क्रोधो वृक्को' माम्नां गाय- त्राविति ॥ २० ॥ १० धाता च' इति पुर उष्णिक । ११'चेतो हृदयम्', १२'शुन्कुक्षिः'. १७रक्षांसि लोहितम्'. २५ 'एतद्वै' इति माम्न्यु- ष्णिहः । १-'अभं पीवः', २२'तृणानि प्राप्तः एकपदे आसुरी- जगत्या । १६ 'अग्निरासीनः एकपदासुरीपंक्तिः । २० इन्द्रः प्रातिष्ठन्' याजुषीजगती । २१ प्रत्यतिष्ठन्' आसुर्यनुष्टुप । २३ मित्र ईक्षमाणः' एकपदासुरी बृहती । २४ युज्यमानः' मानां भुरिग्बृहती । ३६ उप्रेनम्' माम्नीत्रिष्टुप् । इहानुनपादा द्विपदा इति ॥ २१॥ ६। ८ । १'शीषक्तिं शीर्षामायम्' इति द्वाविंशकम् । भृग्वं- गिग अनुष्टुबनेन सर्वशीर्षामयां द्यामयमुपाकरोत् । १२ उदरात् ते' इत्यनुष्टुब्गर्भा ककुम्मती चतुष्पादुष्णिक् । १५'याः पार्थे' इति विराडनुष्टुप् । २१ पादाभ्यां ते' इति विरादपथ्या बृहती। २२ स ते शीर्ष्णः' इति पथ्यापंक्तिः ॥ ६।६।१'अस्य वामस्य' इति द्वाविंशकं नामीयम् । क. ङ. इति नहीं। + वी. सर्वशीर्षमिति । किसी मूल लेख से भी अर्थ बहुत स्फुट नहीं होता मूल पाठ घ के आधार से दिया है। *६ । ६ सूक्त ऋ० १ । १६४ सूक्त में श्राता है, ऋषि दीर्घ- तमा है। 4 [१०५] ॥प०६ खं० २२॥ ब्रह्मादित्यदेवत्यं त्रैष्टुभमध्यात्मकरम् । १२ पञ्चपादं', १४ स- नेमि', १६'साकंजानां', १८ अवः परेण पितरम्' इति जगत्यः ।। ६। १० । *१ यद् गायत्रे' इत्यष्टाविंशकम् । गोविराडध्या- त्मदेवत्यं त्रैष्टुभम् । आद्या, ७'अयं स', १४ इयं वेदिः, १७ सप्लार्धगर्भा' इति द्वे जगन्यः । २१ गौरिन्मिमाय' इति पञ्चपदाति शक्करी । तथा २३'अपादेति मैत्रावरुणौ, २४'वि- राड्वाग् इति चतुष्पदा पुरस्कृति(रिगतिजगती । २'गायत्रेण- प्रति', २६'त्रयः केशिनः' इति द्वे भुरिज इति ॥ २२ ॥ इति श्री ब्रह्मवदोक्त मंत्राणां बृहत्सर्वानुक्रमणिकायां षष्ठः पटल: समाप्तः ॥ ६१०६,१६, २३ नथा २४ मंत्रों के विना शेष सब मंत्र इस सूक्क के ऋ० १ । १६४ सूत्र में मिलते हैं, ऋषि दीर्घतमा है । इसका स्वां मंत्र ऋ० १०॥ ५५ ॥ ५ में है, ऋपि बृहदुकथः वामदेव्यः है। और मंत्र २३ ऋ० १ । १५२ । ३ में है ऋषि दीर्घतमा है ॥ कि. ङ. 'मिमाय' नहीं।
॥प०७ खं० २ ॥ [ १०६ ] *अथ दशम काण्डम् । १०।१।१ॐ 'यां कल्पयन्ति' द्वात्रिंशत् प्रत्यंगिरसः । कृत्या दूषणदेवत्यमानुष्टुभमाद्या महाबृहती । २ शीर्पण्वती' इति विराण्नाम गायत्री । ह'ये त्वा' इति पथ्यापंक्तिः । १२ दे- वैनसात्' इति पंक्तिः । १३ यथा वातः' इत्युरोबृहतीति । १५'अयं पन्थाः' इति चतुष्पदा विराड्जगती । १७ 'वात इव', २० भ्वा- यसा' इति प्रस्तारपंक्तिद्वितीया विराट् । १६'पराक ते', १८ यां बर्हिपि' इति त्रिष्टुभौ । १६ 'उपाहृतम् इति चतुष्पदा जगती। २२ सोमो राजा' इत्येकावसाना, द्विपदार्युष्णिक । २३ भव शौं' इति त्रिपदा भुरिग्विषमा गायत्री । २४ यद्येयथ' इति प्रस्तारपंक्तिः । २८ एतद्धि' इति त्रिपदा गायत्री । २६'अनागो हत्या' इति मध्येज्योतिष्मती जगती । ३२ यथा सूर्य इति द्वयनु- ष्टुब्गर्भा पञ्चपदातिजगतीति ॥ १ ॥ १० । २ । १'कन पाणी' इति त्रयस्त्रिंशत् पाणीसूक्तं नारायणः । पौरुषमानुष्टुभमाद्याश्चतस्रा, ७ हन्वोर्हि' इति द्वे त्रिष्टुभः । ६'कः सप्त खानि', ११ को अस्मिन्नापः' इति जगत्यौ । २८'ऊो नु सृष्टाः' इति भुरिग्बहती । इदं ब्रह्मप्रका- शिसूक्तम् । ३१‘अष्ट चक्रा' इति द्वे साक्षात् परं ब्रह्म प्रकाशि- न्याविति॥ यह लेख हमारा है [ १०७ ] ॥ प० ७खं०४॥ १० । ३ । १'अयं मे वरणः' इति पंचविंशकमथर्वा मंत्रो- कवरणदेवत्यमुत वानस्पत्यं चान्द्रमसमानुष्टुभम् । २'प्रैणान् कृणीहि' इति द्वे, ६'स्वमं सुप्त्वा' इति भुरिक्त्रिष्टुभः । ८'य- न्मे माता' इति पथ्यापंक्तिः। ११'अयं मे वरणः', १६'तांस्त्वम्' इति भुरिजौ । १३ यथा वातो वनस्पतीन्' इति द्वे पथ्यापंकी। १४ यथा वातः' इति १७ यथा सूर्यः' इति प्रभृति, २५ यथा देवेष्वमृतम्' इति षट्पदा दश जगत्य इति ।। २ ॥ १० । ४ । १ इन्द्रस्य प्रथमः' इति षड्विंशतिः। गरुत्मान् तक्षकदैवतमानुष्टुभम् | आद्या पथ्यापंक्तिः । २'दर्भः शोचिः' इति त्रिपदा यवमध्यागायत्री । ३'अव श्वेत' इति द्वे पथ्याबृहत्यौ । - मयतम्' इत्युष्णिग्गर्भा परा त्रिष्टुम् । १२ नष्टासवः' इति भुरिग्गायत्री । १६ इन्द्रमे हिम्' इति त्रिपदा प्रतिष्ठागायत्री । २१'श्रोषधीनामहम्' इति ककुम्मती । २३ ये अग्निजा' इति त्रिष्टुम् । २६'आरे अभूत्' इति त्र्यवसाना षट्पदा बृहतीगर्भा- ककुम्मती भुरित्रिष्टुबिति ॥३॥ १० । ५।१'इन्द्रम्यौज' इति चतुर्विंशतिः सिन्धुद्वीपः । श्रादर्श पुस्तकों में पाठ 'इन्द्रे मेहीति' है परन्तु मूलसंहिता में 'मेहिम्' पाठ जान हमने स्वयं पाठ शुद्ध किया है। + अथर्व संहिता में यह सूक्त ५० मंत्रों का है। अनुक्रमणी में यहां २४ मंत्रों का भिन्न सूक्त है । शेष आवन्तर सूत्रों के मंत्रों को साथ मिलाकर ये ५० ऋचायों वाला सूक्त बनाया है। हम अनुक्रमणी के अनुकूल भिन्न २ सूत्र देंगे।
। प०७खं०४॥ [ १०८ ] आप्यमुतचान्द्रमसमानुष्टुभमाद्या पञ्च त्रिपदाः, पुरोऽभिकृतयः ककुम्मतीगर्भाः पंक्तयः । ६ विश्वानि मा' इति चतुष्पदा जगती- गर्भा जगती । ७'अग्नेर्भाग स्थ' इत्यष्टौ व्यवसानाः पंचपदा विपरीतपादलक्ष्मा बृहत्यः । ११तत्र 'मित्रावरुणयोः' १४'देव- स्य सवितुः' इति *द्व पथ्यापंक्ती । १५'यो व आपोपां भागः' इति सप्त चतुरवसाना दशपदा मंत्रोक्कदेवत्यास्त्रैष्टुवगी अति- धृतयः । तत्र १६ हिरण्यगर्भः', २० पृश्निः' इति कृती । २४'अरिपा आपः' इति त्रिपाद्विराड़गायत्री ॥ १०।६।११(२६) विष्णोः क्रमासि' इत्येकादश व्यवसानाः कौशिका विष्णुक्रमदेवत्या उत प्रतिमंत्रोक्तदेवत्याः पट्पदा यथाक्षरंशकर्यतिशक्कय्यौँ (३६) १ जितमस्माकम्' इति मावर्ती पश्चपदातिशावरातिजागतगर्भाष्टिः ।। . १० । ७ । (३७) ११ 'सूर्य्यस्यावृतम्' इति पञ्च ब्रह्मा प्रति- * 'द्वे' से १५ मंत्र ग्रहण करना ठीक नहीं क्योंकि इसका छन्द भिन्न कहा है अतः यह पद चिन्तनीय है। पंक्ती का द्विवचनरूप हमारा है । मूल में पंक्तिः पद है। । 'कृती' यह द्विवचन रूप भी हमारा है । मूल पुस्तकों में पाठ कृतिः है। १०। ५ सूक्त क्रम में यह मंत्र २६ वां है । भिन्न सूक्त क्रम में प्रथम । अथर्व संहिता में जो १० । ५. सूक्त ५० ऋचाओं का है उसके अनुक्रमाणका के अनुसार ४ सूक्न भिन्न र बने हैं। संहिता का मंत्र क्रम भी साथ हमने बंधनी में दे दिया है।
[ १०६ ] ॥प०७ खं०५॥ मंत्रोक्तदेवत्याः । प्रथमा विराट्पुरस्ताबृहती । (३८) २ दिशो ज्योतिष्मतीः' इति पुर उष्णिक् । (३६] ३ सप्त ऋपीन्', [४१] ५ 'ब्राह्मणान्' इति द्वे आपीगायत्र्यौ। [४०] ४'ब्रह्माभ्या' इति विराविषमागायत्री ॥ ४ ॥ १०। ८ । [४२] १ 'यं वयम्' इति नवचं विहव्यः प्राजाप- त्या अनुष्टुभः । [४४] ३राज्ञो वरुणस्य' इति त्रिपाद्वायत्री गर्भानुष्टुप् । [५०] 'अपामस्मै' इति त्रिष्टुप् । १० । 16 (६) १'अरातीयोः' इति पञ्चत्रिंशबृहस्पतिः। मंत्रोक्नकालमणिदेवत्यमुत वानस्पत्यमानुष्टुभम् । आद्या, ४'हिरण्य स्रक इति गायत्र्यौ । ३ यत् त्वा शिक्कः' इत्याप्या । ५'तस्मै घृतम्' इति पट्पदा जगती । ६'यमबध्नात्बृहस्पतिर्मणिम्' इति प्रथमा सप्तपदा विराटशक्करी । ७'तमिन्द्रः' इति चतस्त्र- स्त्र्यवसाना अष्टपदा अष्टयः, अन्त्या नवपदा धृतिः । ११ बृह- म्पतिर्वाताय' इति पथ्यापंक्तिः । १२'तनेमांमणिनाकृषिम्' इति पद् व्यवसानाः षट्पदाः शक्कर्यः । २०'अथर्वाणो अबध्नत' इति पथ्यापंक्तिः । २१'तं धाता' इति गायत्री । २३ अगमत् सह गाभिः' इति पञ्च पथ्यापंक्तयः । 'उत्तरं द्विषत' इति व्यवसाना पद्पदा जगती । ३१ एतमिध्म' इति पंचपदा ध्यनुष्टुबगर्भ जगतीति ॥ ५॥ यहां भी 'द्वे' पद चिन्तनीय है। प्रकाशित संहिता क्रम वन्धनी में दिया है। * क. ऊ. व्यनु पढ़ा जाता है, बी. में 'पदानु' लिखा है । ह्रि० ने भी ध्यनुवगर्भा पाठलिखा है।
|| प० ७ ख० ७॥ [ ११० ] १०.१० (७) १'कस्मिन्नङ्गे' इति चतुश्चत्वारिंशदथवा क्षुद्रो मंत्रोक्तस्कम्भोऽध्यात्मदेवत्यत्रैष्टुभम् । प्रथमा विराड्जगती । २'कस्मादङ्गाद् दीप्यते', ८ यत्परममवमम्' इति भुरिजौ । ७ यस्मिन्स्तब्ध्वा' इति परोष्णिक् । १० 'यत्र लोका' इत्युपरि- ष्टाबृहती । ११ यत्र तपः' इति द्वे, १५ यत्रामृतश्च. २०'यस्मा- दृचः' इत्युपरिष्टात्ज्योतिर्जगत्यः । १३ यस्य त्रयस्त्रिंशद् देवा अङ्गे सर्वे' इति परोष्णिक् । १४ यत्रऋषयः', १६'यस्य चतस्रः, ८'यस्य शिरः' द्वे उपरिष्टाबृहत्यः । १७ ये पुरुषे इति त्र्यव- साना षट्पदा जगती । २१ असच्छाखाम्' इति बृहतीगभा- नुष्टुप् । २२ यत्रादित्यच' इत्युपरिष्टाज्ज्योतिर्जगती । २३'यम्य प्रयस्त्रिंशद्देवा निधिम्' इत्यष्टावनुष्टुभ ति ॥ ६॥ ३१ नाम नाम्ना' इति मध्येज्योतिर्जगती । ३२ यस्य भूमिः, ३४ यस्य वातः', ३६'यः श्रमात्' इत्युपरि- शाद्विराबृहत्यः । ३३'यस्य सूर्यः' इति परा विराडनुष्टुप् । ३५ स्कम्भो दाधार' इति चतुष्पदा जगती । ३७ कथं वातः', ४०'अप तस्य' इत्यनुष्टुभो । ३८'महद्यक्षम्' इति त्रिष्टुप् । ३६ 'यस्मै हस्ताभ्याम्' इत्युपरिष्टाज्ज्योतिर्जगती । ४१ यो वेत- सम्' इत्या| त्रिपाद्गायत्री । ४२ तन्त्रमेके' इति द्वे त्रिष्टुभौ । ४'इमे मयूखाः' इत्येकावसाना पंचपदा निवृत्पदपंक्तिराज़- नुष्टुप् , द्विपदा वा पंचपदा निवृत्पदपंक्तिरिति ॥ ७ ॥ क. ऊ. इति नहीं॥ क.अ.द्वि० पर॥
[ १११ ] ॥प० ७ खं०६॥ १०।११(८)१ यो भूत' इति चतुश्चत्वारिंशत् , कुत्सो- ऽध्यात्मदेवत्यं त्रैष्टुभ। । आद्योपरिटाद्विराबृहती । २ स्कम्भे- नेमे' इति बृहतीगर्भानुष्टुप् । ५'इदं सवितः' इति भुरिगनुष्टुप् । ६'आविः सन्निहितम्' इत्यनुष्टुम् । ७'एक चक्रम्' इति पराबृहती। १० या पुरस्तात्' इत्यनुष्टुब्गी । ११ 'यदेजति' इति जगती । २ 'अनन्तं विततम्' इति पुरोबृहती त्रिष्टुवगर्भाष पंक्तिः ।१४'ऊर्ध्व भरन्तम्', १६ 'सत्येन' इति द्वे, अनुष्टुभः । १५ दृरे पूर्णेन' इति भुरिग्वृहती । २१'अपादने', २३ सनातनम्', २५ 'वालादेकम्', २६ पूर्णात्पूर्णम्' इत्यनुष्टुभः । २२ भाग्यः' इति पुर उष्णिक् । २६ इयं कल्याणि' इति द्वयुष्णिग्गर्भानुष्टुप् । २७ त्वं स्त्री' इति सुरिग्वृहती । ३० एपा सननी' इति भुरिक् । ३१ 'अविर्व नाम' इति चतस्रः, ३७'यो विद्यात् सूत्रम्' इति द्वे, ४१'उत्तरेणेव' ४३ पुण्डरीकं नवद्वारम्' इत्यनुष्टुभः । ३६ यदन्तरा द्यावापृथिवी' इति वृहतीगर्भा । *४२ निवेशनः' इति विराड्गायत्रीति ॥ ८ ॥ १०।१२(६) १ अघायताम्' इति सप्तविंशतिरथर्वामंत्रोक्त- शतौदनदेवत्यमानुष्टुभम् । अाधात्रिष्टुप् । १२'ये देवाः' इति पथ्यापंक्तिः । २५'क्रोडौ ते स्ताम्' इति द्वयष्णिग्गर्भानुष्टुप् । २६ 'उलूखले घुसले' इति पंचपदा बृहत्यनुष्टुष्णिग्गर्भा जगती। २७'अयो देवीः' इति पञ्चपदाति जागताटुनुष्यगर्भाशक्करी ।। १०। ८।४२ ऋ० १० । १३६ । ३ में अल्प भेद से आया है ऋषि विश्वावसुदेवगन्धर्व है।
॥५० ७ खं०६॥ [ ११२ ]
१०।१३(१०)१'नमस्ते जायमानाय' इति चतुस्त्रिंशत्कश्य-
पो मंत्रोक्तवशादेवत्यमानुष्टुभमाद्या ककुम्मनी । ५'शतं कंसाः'
इति पञ्चपदातिजागतानुष्टुभं स्कंधोग्रीचीबृहनी । ६ यज्ञपदी',
'अपस्त्वं', १० यदनूची' इति विराजः । २३ सर्वगर्भात्' इति
बृहती । २४ 'युधः एकः' इत्युपरिष्टाबृहती । २६ वशामेव'
इत्यास्तार पंक्तिः । २७'य एवं विद्यात्' इति शकुमती ।
२६'चतुर्धा रेतः' इति त्रिपदा विराङ्गायत्री । ३१ वशाया दुग्धं
पीत्वा' इत्युष्णिग्गर्भा । ३२ सोममना' इति विराटपथ्या
बृहती ॥६॥
[ ११३ ] ॥ प०७ खं० ११॥ (अथैकादश काण्डम् ) ११ । १ । १'अग्ने जायस्व' इति सप्तत्रिंशद्ब्रह्मौद*निकं, त्रैष्टुभमाद्यानुष्टुब्गर्भा भुरिपक्तिः । २'कृणुत धूमम्' इति बृहतीग विराट् । ३'अग्ने जनिष्ठा' इति चतुष्पदा शाक्करगर्भा- जगती । ४ समिद्धो अग्ने' इति भुरिक् । ५ त्रेधा भागः' इति बृहतीगर्भा विराट् । ६'अग्ने सहस्वान्' इत्युष्णिक । ८ इयं मही' इति विराड्गायत्री । एतौ ग्रावाणी' इति शाकरातिजागत- गर्भा जगती । १० गृहाण ग्रावाणो' विराट्पुरोऽतिजगती विराड्जगती ।११ 'इयं ते धीतिः' इति जगती । १५'ऊों भागः' इति द्वे भुरिजौ । १७ शुद्धाः पूताः' इति विराड्जगती । १८'ब्रह्मणा शुद्धाः' इत्यतिजागतगर्भा परा तिजागताविराडति- जगती । २० 'सहस्र पृष्ठः' इत्यतिजागतगर्भा पराशाकरा चतु- पदा भुरिग्जगती ॥ १० ॥ २१ उदेहि वेदिम्' इति, २४'अदितेर्हस्ताम्' इति तिस्रो, २६ 'अग्नौ तुषान्' इति विराड्जगत्योऽन्त्या भुरिक् । २७ शुद्धाः पूताः'इत्यतितजागतगर्भा जगती । ३१ बभ्रेरध्वयो' इति भुरिक । ङ. बी 'दनीकं'। + ङ. 'गर्भानुजगती'। क.गु. 'पर'। ६ वी. गर्भा भुरिग्जगती।
||प०७ खं० १२॥ [ ११४ ]] ३५'वृषभोसि'इति चतुष्पात्ककुम्मत्युष्णिक् । ३६ स मा चिनुष्व' इति पुरोविराट् व्याघ्रादिष्ववगंतव्या । ३७ येन देवाः' इति विराड्जगती ॥ ११।२।१भवाशौंमृडतम्' इत्येकत्रिंशदर्थवा मंत्रोक्तरुद्रदे- वतं त्रैष्टुभम् । या यद्देवत्येति पारिभाषिकमनुस्मयते सर्वत्र । आद्या परातिजागताविराड्जगती । २'शुने क्रोष्ट्र' इत्यनुष्टुब्- गर्भा पञ्चपदा तथा जगती । ३'क्रन्दाय ते' इति चतुष्पात्स्वरा- इष्णिक । ४ पुरस्तात् ते' इति द्वे, ७'अस्रा नील शिखण्डेन इत्यनुष्टुभः । ६'अङ्गेभ्यस्ते' इत्याांगायत्री । ८'स नो भव' इति महाबृहती। ह'चतुर्नमः' इत्यापी । १० तव चतस्रः' इति पुरः कृतित्रिपदा विराडिति ॥ ११ ॥ ११'उरुः कोशः' इति पञ्चपदा विराड्जगतीगर्भा शक्करी । १२'धनुर्बिभर्षि' इति भुरिक् । १३ यो ३ भिंयातः', १५'नमस्ते' इति द्वे अनुष्टुभः । १४ भवारुद्रौ', १७'सहस्राक्षमतिपश्यम्' इति तिस्रो विराड्गायत्र्यः । २० मानो हिंसीः' इति भुरिग्गा- यत्री । २१'मानो गोषु' इत्यनुष्टुप् । २२'यस्य तवमा' इति विषमपादलक्ष्मा त्रिपदा महाबृहती। २३ 'योऽन्तरिक्षे', २६ मा नो रुद्र' इति द्वे विराड्गायत्र्यः । ||२६ मा नो महान्तम्', ङ. 'भौ'। + ऊ. त्र्यौ। *क. ग. लक्ष्मा । ङ.बि० लदम्या। $ ङ. त्र्यौ। || ११ । २ । २६ ऋ० १२११४ । ७ में है ऋषि कुत्सांगिरस है [ ११५ ] ॥ प०७ खं० १३॥ २४ तुभ्यमारण्याः' इति जगत्यो । २५ शिशुमाराः' इति पञ्च- पदाति शक्करी । ३०'रुद्रस्यैलबकारेभ्यः' इति चतुष्पादुष्णिक् । ३१'नमस्ते घोषिणीभ्यः' इति व्यवसाना विपरीतपादलक्ष्मा पट्पादिति ॥ १२॥ ११ । ३। प०१ १'तस्यौदनस्य' इति यः पर्यायास्तत्र पूर्वमेकत्रिंशद् बार्हस्पत्यौदनदेवत्याः । १४ ऋचा कुम्भी' इत्यासुरी गायत्र्यो । २ द्यावापृथिवी श्रोत्रे' इति त्रिपदा समविवमा गायत्री । ३'चक्षुर्मुसलं', ६'कत्रफलीकरणाः', १०'प्रान्त्राणि' इत्यासुरी- पंक्तयः । ४'दितिः शूर्प', 'त्रपुभस्म साम्न्यनुष्टुभौ । ५ अश्वाः कणा', १३'ऋतं हस्तावनेजन', १५'ब्रह्मणा परिगृहीता' २५ यावद् दाता' साम्न्युष्णिहः । ७ श्याम मयः', १६'अोदनेन' इति चतस्रः प्राजापत्यानुष्टुभः । ह'खलः पात्रं', १७'ऋतवः' इति द्वे आसुर्यनुष्टुभः । ११'इयमेव पृथिवी' इति भुरिगा~- नुष्टुप् । १२ सीताः पशवः' इति याजुषीजगती। १६ 'बृहदा- यवनम्', २३ स य ओदनस्य' इत्यासुरीबृहत्यौ । २४'नाल्प' इति त्रिपदा प्राजापत्या बृहती । २६'ब्रह्मवादिनः' इत्यार्युष्णिक् । २७'त्वमोदनम्' इति साम्नीबृहती, द्वितीया भुरिक् । ३०'नव' ऊ. गु में इति के आगे द्वे पाठ अधिक है। + ह्वि० में इति के आगे जगती पाठ दिया है।
॥१०७ खं०१४॥ [ ११६ ] इति याजुपीत्रिष्टुप् । ३१ प्रोदन एवं' अल्पशः पंक्विस्त याजुषीति ॥ १३ ॥ ११।३। प० २॥ तितश्चनम्' इति द्वासप्ततिमन्त्रोक्त देवत्याः । प्रथमा सर्वांग एव । ३८ एनभन्यैः प्राणापानैः', ४१ अन्येनोरसा' इति च सान्नी त्रिष्टुमा । ३२ 'ज्येष्ठतः , 'तं वा अहं', ताभ्यामेनं ३५'मुखतस्ते', ४२'उदरदारः', एकपदा आसुरी गायव्यः । ३२ बृहस्पतिना' ४३ समुद्रेण' इति दैवीजगत्यौ । ३५ तेनैनं', ३६ तयैनं', ३७ तैरेन', ३८'प्राणापानस्त्वा', ४४'उरू ते', ४६'बहुचारी' एकपदा आसुर्यनुष्टुभः । ४६ 'एप चा अोदनः' इति साम्न्यनुष्टुप् । ३३ एनमन्याभ्यां श्रोत्राभ्याम्' इत्यादितः 1 इस द्वितीय पर्याय में प्रकाशित मूल संहिताओं की मन्त्र संख्या १८ है । इनको बृहत्के पटल ७१४ के अन्त में दण्डक' कहा गया है। इन १८ दण्डकों में ७२ अवसान हैं। पञ्चपटालिका (द्वासप्तति परः ॥ १६ ॥) तथा बृहत् दोनों इस विभाग में सह- मत हैं । शङ्करपाण्डुरङ्ग ने स्वकीय संस्करण के तृतीय भाग पृ० ३५६ के आगे इन १८ दण्डको को ७२ अवसानों में विभक्त करके छापा है। + श्रादर्श पुस्तकों में त्रिष्टुभः पाठ है। मूल पुस्तकों में 'एकपदासुरी है।
४७ सप- - [ ११७ ] ॥ प० ७ खं० १४॥ सप्तदशाय॑नुष्टुभः । ३७'ततश्चेनमन्यदन्तः' इति साम्नीपंक्तिः । ३३ बधिरो भविष्यसि', ३६ जिह्वा ते',४० विद्युत् त्वा', स्त्वा', ४८'ब्राह्मणं हनिष्यसि' इत्यासुरी जगत्यः । *३४ अन्धो भविष्यसि', ३७ दन्तास्ते', ४१'कृष्या न रात्स्यसी',४३'अप्सु- मरिष्यसि', ४५‘सामो भविष्यसि', इत्यासुरी पंक्तयः । ३४ मूर्या- चन्द्रमसाभ्याम्' इत्यासुरी त्रिष्टुप् । ३५ ब्रह्मणा मुखेन'. ४६'अ- श्विनोः पादाभ्याम्', ४८'ऋतस्य हस्ताभ्यां' इति याजुषी गायत्र्यः । ३६'अग्नेर्जिह्वया', ३७ ऋतुभिदन्तैः', ४१'दिवा पृष्ठेन' इति दैवी पंक्तयः । ३८ सप्तर्षिभिः प्राणापानैः',३६'अन्त- रिक्षण व्यचसा' इति प्राजापत्या गायभ्यः । ३६ राजयक्ष्मस्त्वा' आसुर्युष्णिक् । ४१'पृथिव्योरसा', ०७ सवितुः प्रपदाम्या' दैवी- जगत्यौ । ४२ सत्येनोदरेण', ४५ त्वष्टुरष्ठीवद्भयाम्', ४६ 'सत्ये- प्रतिष्ठाय' इति दैवीत्रिष्टुभः । ४६ अप्रतिष्ठान', एकपदा भुरिक् साम्नी बृहतीति । यदते पर्यायसूकमंत्रा जपकर्मणि प्रयुज्यंते, तदाधिकारान्तानेतान् विजानीयात् । तदा तथा छन्दस्यता अष्टादश दण्डका भवन्ति । ‘सोदक्रामत्', 'य एवं विद्वान्' इत्या- दिषु यथाक्षरं यथा तथाधिकारांतं गायत्र्यादि कृति, धृति, पथ्यापंक्तयादि छन्दः प्रयुज्यादिति ॥ १४ ॥ * मूल पुस्तकों में 'जगत्यावंधो' पाठ है। उपर्युक्त पाठ स्वयं दिया है।
॥प०७ खं०१६॥ [ ११८ ] ११ । ३ । प०३। ५० एतद्वै बध्नस्य' इति सप्तको मंत्रोक्तदेवत्यस्तत्राद्यासुर्य- नुष्टुप् । ५१'बनलोकः' इत्याय॒ष्णिक । ५२ 'एतस्माद्वा' इति त्रिपदा भुरिक्साम्नत्रिष्टुप् । ५३'तेपां प्रज्ञानाय इत्यासुरीबृहती। ५४ स य एवं विदुषः' इति द्विपदा भुरिक्साम्नीबृहती । ५५'न च प्राणम्' इति साम्न्युष्णिक् । ५६'न च सर्वज्यानिम्' इति प्राजापत्या बृहती॥ ११ । ४ । १'प्राणाय नमः' इति पड्विंशकं भार्गवो वैदर्भि- मन्त्रोक्तप्राणदेवत्यमानुष्टुभमाद्या शंकुमती । 'नमस्ते प्राण प्राणते इति पथ्यापंक्तिः । १४ अपानति' इति नित् । १५'प्राणमाहुः' इति भुरिक् । २०'अन्तर्गर्भः' इत्यनुष्टुवगर्भा- त्रिष्टुप् । २१ एकंपादम्' इति मध्येज्योतिर्जगती । २२ 'अष्टाचक्रम् इति त्रिष्टुप् २६'प्राण मा मत्' इति बृहतीगर्भेति ।। १५ ।। १। ५ । १ ब्रह्मचारीष्णन' इति षड्विंशकं ब्रह्मा मंत्रोक ब्रह्मचारी देवत्यम् त्रैष्टुभमाद्या पुरोऽति जागता विरागर्भा । २'ब्रह्मचारिणं पितरः' इति पञ्चपदा बृहतीगा विराटशक्करी परा उरोबृहती । ६'ब्रह्मचार्येति समिधा' इति शाक्करगर्भा चतु- पदा जगती । ७'ब्रह्मचारी जनयन्' इति विरागर्भा । ८'श्रा- चार्यस्तता' इति पुरोऽति जागता विराड्जगती । 'इमाभूमिम् इति बृहतीगर्भा । १०'अवांगन्यः परः' इति भुरिक । ११ अर्वा- ११।४।२२ ऋ०१०।८।७।
[ ११६ ] ॥प०७ख०१७॥ गन्य इतः' इति जगती । १२ अभिक्रन्दन्' इति शाक्करगर्भा चतुष्पाद्विराडति जगती । १३'अग्नौ सूर्ये' इति जगती। १५'अमा धृतम्' इति पुरस्ताज्ज्योतिः।१४ आचार्योमृत्युवरुणः', १६'श्रा- चार्यो ब्रह्मचारी' इति सप्तानुष्टुभः । २३ देवानामेतत्' इति पुरोबार्हतातिजागतगर्भा । २५'चक्षुः श्रोत्रम्' इत्येकावसाना[- ष्णिक । २६'तानि कल्पत्' इति मध्येज्योतिरुष्णिग्गर्भा ।। ११ । ६ । १'अग्नि ब्रमः' इति त्रयोविंशकं शंतातिश्चा- न्द्रमसमुत मंत्रोक्नदेवत्यमानुष्टुभम् । २३ यन्मातली रथक्रीतम्' इति बृहतीगर्भेति ॥ १६ ॥ ११ । ७ । १ 'उच्छिष्टे नाम रूपम्' इति सप्तविंशतिरथा मंत्रोक्लोच्छिष्टोऽध्यात्म दैवतमानुष्टुभम् । ६'एन्द्राग्नं पवमानम्' इति पुरोष्णिग्वाहत परा । २१'शर्कराः सिकताः' इति स्वराट् । २२ 'राद्धिः प्राप्तिः' इति विराट्पथ्याबृहती ॥ ११ । ८ । १ यन्मन्युः' इति चतुस्त्रिंशत्कोरुपथिरध्यात्म- मन्युर्दैवतमानुष्टुभम् । ३३ प्रथमेन प्रमारेण' इति पथ्यापंक्तिः ॥ ११ । । । १'ये बाहवः' इति षड्विंशकं कांकायनो मंत्रो- कार्बुदिदेवत्यमानुष्टुभमाद्या सप्तपदा विराटशक्करी व्यवसाना । ३ उत्तिष्ठतमारभेथाम्' इति परोष्णिक् । ४ अर्बुदिनाम' इति त्र्यवसानोठिणगबृहतीगर्भा परा त्रिष्टुप् षट्पदाति जगती । ङ. बो. में 'गर्भापरा' चतुष्यात् है । परञ्च क. घ. द्वि में परा नहीं।
॥ प०७ ख०१८॥ [ १२० ] 'अलिक्लवा जाष्कमदा', ११'बागृह्णीतं', १४ प्रतिमानाः सम्' पथ्यापंक्तयः । १५'श्वन्वतीः' इति सप्तपदा व्यवसाना शक्करी । १६'खडूरेधिचङ्कमाम्' इति व्यवसाना पञ्चपदा विराडुपरिष्टा- ज्ज्योतित्रिष्टुप् । १७ चतुर्दष्ट्रान्' इति त्रिपदा गायत्री । २२'ये च धीराः' इति त्र्यवसाना सप्तपदा शक्करी । २३ अर्बुदिश्च त्रिपन्धिः इति पथ्यापंक्तिः । २४'वनस्पतीन् वानस्पत्यान्' इति द्वे व्यव- साने सप्तपदे शक्वौं । २६ तेषां सर्वेषाम् । इति पथ्या- पंक्तिरिति ॥ १७॥ ११ । १० । १ उत्तिष्ठत स नह्यध्वमुदाराः' इति सप्तविं- शतिः भृग्वंगिरा मंत्रोक्तत्रिपन्धिदेवत्यमानुष्टुभमाद्या विराट- पथ्याबृहती । २ ईशां वो वेद राज्यम्' इति व्यवसाना पट्पदा त्रिष्टुब्गीतिजगती । ३ अयोमुखाः सूचीमुखाः' इति विराडा- स्तारपंक्तिः । ४'अन्तहि' इति विराट् । ८ अधायन्ताम्' इति विरात्रिष्टुप् । ह'यामिन्द्रेण' इति पुरोविराट पुरस्ताज्ज्योति- स्त्रिष्टुप् । १२ साल्लोकान्' इति पंचपदा पथ्यापंक्तिः। १३ बृह- स्पतिराङ्गिरसः' षट्पदा जगती । १६ वायुरमित्राणाम्' त्र्यवसाना षट्पदा ककुम्मत्यनुष्टुप् त्रिष्टुब्गर्भा शक्वरी । १७ यदि प्रेयुः' बी. 'संधावमिति' अधिक पाठ है। 1 बी. 'सर्वेषाम्' नहीं। घ. इति नहीं। बी. त्रिष्टुम् नहीं।
[ १२१ ] ॥ प० ७ खं०१८॥ पथ्यापंक्तिः । २१ मूढा अमित्राः' त्रिपदा गायत्री । २२ यश्च कवची' विराट् पुरस्ताबृहती । २५ सहस्र कुणपा' ककुप् । २६ माविधम्' *प्रस्तारपंक्तिरिति ॥ १८ ॥ इति श्री ब्रह्मवेदोक्त मंत्राणां हत्सर्वानुक्रमणिकायां सप्तमः पटलः समाप्तः सम्पूर्णता मेति । एवं षडविंशदर्थसूक्तान्यथर्ववेद मंहितायाम् ॥ बी. स्तारपक्तिः। । मूल लेखों में 'मिति' है।
॥ प०८ ख० २॥ [ १२२ ] (अथ हादशं काण्डम् ) १२ । १ । *ओं अथानुवाका उच्यते । १‘सत्यं बृहत्' इति त्रिषष्टिस्था भौमं त्रैष्टुभम् । २'असंबाधम्' इति भुरिम् । ४ 'यस्याश्चतस्रः इति तिस्रः, १० 'यामश्विनौ इति व्यवसानाः षट्- पदा जगत्यः । ७'यां रक्षन्ति' इति प्रस्तारपंक्तिः । 'यार्णवेधि' ११ गिरयस्ते' इति व्यवसाने षट्पदे विराडष्टी । हयस्यामापः' इति परानुष्टुप् । १२ यत् ते मध्यम्' इति द्वे, १५'त्वजाताः' इति शकर्यः । पूर्वे द्वे व्यवसाने, तिस्रोऽपि पञ्चपदाः । १४ यो नो द्वेत्' इति महाबृहती। १६ ता नः प्रजाः' इति साम्नी- त्रिष्टुप् । १८ महत् सधस्थम्' इति व्यवसाना षट्पदा त्रिष्टुब- नुष्टुब्गर्भातिशक्करी । १६ अग्निभूम्याम्' इति द्वे पुरोबृहत्या, द्वितीया विराडिति ॥१॥ २१'अग्निवासाः' इति साम्नीत्रिष्टुप्पागुता । १६'ता नः' इति चोभे एकावसाने । २२ भूभ्यां देवेभ्यः' इति व्यवसाना षट्पदा । २३ 'यस्ते गन्धः पृथिवि' इति पञ्चपदोभे विराडति घ० औ नहीं । गु० श्रीगणेशायनमः अधिक है। । सब मूल आदर्श पुस्तकों में पाठ 'महाबृहत्यता नः प्रजा इति है। महाबृहती 'एता नः' पाठ संहिता में कहीं नहीं 'ता नः' पाठ हम ने दिया है। क. घ. गु. 'पंचपदे उभे । ङ. वी. ठीक है जो ऊपर दिया है . [ १२३ ] ॥१०८ खं० ३॥ जगत्या । २४ यस्ते गन्धः पुष्करम्' इति पञ्चपदानुष्टुवगर्भा जगती । २५ यस्ते गन्धः पुरुषेषु' इति सप्तपदोष्णिगनुष्टुब्गा- शक्करी । २६'शिला भूमिः' इति तिस्रोऽनुष्टुभः । ३० शुद्धा न आपः' इति विराङ्गायत्री । ३२ मा नः पश्चात्' इति पुरस्ता- ज्ज्योतिः । ३३ यावत् ते', ३५ यत् ते भूमे', ३६ यस्या पूर्व भृतकृतः' इति तिस्रोऽनुष्टुभः । ३४ यच्छयानः' इति व्यवसाना षट्पदा त्रिष्टुब्बृहतीगर्भाति जगती । ३६ ग्रीष्मस्ते' इति विप रीतपादलच्मा पंक्तिः । ३७ यापसर्पम्' इति पञ्चपदा व्यवसाना शक्करी । ३८ यम्यां सदः' इति व्यवसाना षट्पदा जगती । ४१ 'यस्यां गायन्ति इति *सप्तपदा ककुम्मती शक्करी । ४२ 'यस्या- मन्नम्' इति स्वराडनुष्टुप् ॥ २ ॥ ४३ यस्याः पुरः' इति विराडास्तारपंक्तिः । ४४ निधि विभ्रती' इति द्वे, ४६ येत आरण्याः' इति जगत्यः । ४६ यस्ते मर्पः' इति षट्पदानुष्टुब्गी परा शक्करी । ४७* ये ते पन्था- नः इति षट्पदोष्णिगनुष्टुब्गर्भा पराति शक्करी । ४८ मल्वं बिभ्रती' इति पुरोऽनुष्टुम् । ५०' ये गन्धर्वाः' इत्यनुष्टुप् । ५१ या द्विपादः' इति त्र्यवसाना पट्पदानुष्टुवगर्भा ककुम्मती शक्करी । ५२'यस्यां कृष्णम्' इति पञ्चपदानुष्टुवगर्भा पराति- जगती । ५३ 'योश्च मे' इति द्वे, ५६'ये ग्रामाः', ५६'शन्तिवा', १२।१।४१ को क. ऊ. बी. में सप्तपदा श्रौ घ० ह्वि० में षट्पदा लिखा है। घ० बिभ्रनिति।
॥१०८ खं० ५ ॥ [ १२४ ] ६३ भूमे मातः' इत्यनुष्टुभः पूर्वा पुरोबाहता । ५७ 'अश्च इव इति जगती । ५८ यद् वदामि' इति पुरस्ताबृहती । ६१ 'त्व- मस्य' इति पुरोवाहता । ६२ उपस्थास्ते' इति परा विराट ॥३॥ १२ । २ । १'नडमारोह' इति पञ्चपञ्चाशत् भृगुरानेयमुत मंत्रोक्त देवत्यं त्रैष्भम् । २'अघशंस दुःशंसाभ्याम्', ५ यत स्वा क्रद्धाः' इत्यनुष्टुभौ । ३ निरितः' इत्यास्तारपंक्तिः । ६ पुन- स्त्वादित्याः' इति भुरिगामी पंक्तिः । ७ यो अग्निः क्रव्यात्' इति जगती । क्रव्यादमाग्नेप्रहिणोमि' इति भुरिक 'अग्नि- मिषितः इत्यनुष्द्गर्भा विपरीतपादलक्ष्मा पंक्तिः ॥ ४॥ १२ देवो अग्निः' इति नवानुष्टुभः । तत्र १६'अन्यभ्य- स्त्वा' इति ककुम्मती परा बृहती । १८ समिद्धा अग्न आहुत' इति निवृत् । १२१ परं मृत्यो' इति त्रयोदश मार्व्यः । ३४ अ- पावृत्य' इति, तिस्रः, ३८ मुहुर्गृध्यः' इति चतस्रोऽनुष्टुभः । ३७ अयज्ञिया हतवर्चा' इति पुरस्ताबृहती । ४० यद् रिप्रम्' . १२ । १ । ५७ का छन्द हि० ने जगती के स्थान पर 'पुगंति जागताजगती' लिखा है पर हमारे पास जितने भी श्रादर्श पुस्तक है उन सब में जगती है अतः ह्वि० का पाठ चिन्तनीय है। ।१२।२।२१, २२, २३, २४, २५, ३०, तथा ३१ मंत्र ऋग्वेद १० । १८ । १, ३, ४, ६, ५, २, तथा ७ में क्रम से मिलते हैं ऋ०० इनका ऋषि सकुसुको यामायन है। १२ । २। २६ ऋ० १० । ५३।८ में श्राता है।
[ १२५ ] ॥ प० ८ खं०६॥ इति पुरस्तात्ककुम्मत्यनुप्युम् । ४२ अग्ने अक्रव्यात्' इति त्रिप- देकावसाना भुरिगा गायत्री । ४३'इमं क्रव्यात्' इत्यनुष्टुप् । ४४'अन्तर्धिः इत्येकावसाना द्विपदा बृहती। ४५ जीवानामायुः' इति जगती । ४६'सर्वानने' इत्येकावसाना द्विपदा सानी- त्रिष्टुप् । ४७ इमभिन्द्रम्' इति पंचपदा बाहंत बैराजगी जगती । ३८'अनवाहम्' इति द्वे भुरिजी । ५० ते देवेभ्यः' इन्युपरिष्टाद्विराबृहती । ५१ ये श्रद्धा', ५४इपीकाम्' इत्य- नुष्टुभौ । ५२ ग्रेव' इति पुरस्ताद्विराहती। ५५ प्रन्यश्चमकम्' इति बृहतीगर्भति ॥ ५ ॥ १२ । ३ । १ 'पुमान् पुसः' इति पष्टियमो मंत्रोक्लस्वर्गों- दनाग्निदेवत्यं त्रैष्टुभम् । आद्या भुरिक् । १२ पितेव पुत्रान् इति जगती । १३ यद्यत् कृष्ण' इति, “अथ १७ स्वर्गलोकम्' इति स्वराडा पंक्ती । २१ पृथग्रपाणि' इति द्वे, दक्षिणां दिशम्' २४ अग्निः पचन्' इति जगत्यः । ३४ षष्ठयां शरत्सु' इति विराड्गी । ३६ 'यद्याजाया इत्यनुष्टुद्गर्भा । ४२ निधिनि- धिपा' इति द्वे भुरिजौ । ४४'आदित्येभ्यो अङ्गिरेभ्यः' इति पराबृहती । ४७ अहं पचामि' इति भुरिन् । ५५ प्राच्य त्वादिशः' इति पद् व्यवसानाः सप्तपदाः शङ्कुगत्योतिजागतशावराति- मूल पुस्तकों में पाठ इत्याथा है कुछ स्पष्ट पाठ नहीं। । सव मूल पुस्तकों में पक्तिः एकवचन का पाठ है।
॥ प०८ खं०८॥ [१२६ ] शाक्कर *धायगी अतिधृतयः । प्रथमा ५७ प्रतीच्य त्वा' ५८ उदीच्य स्वा'. ६० 'ऊवाय त्वा इति कृतिः । ५६ 'धवार्थ त्या कृतिः' इति ॥ ६ ॥ १२ । ४ । १ ददामि' इति त्रिपञ्चाशत् । कश्यपोमंत्रोक्त- वशा देवत्यमानुष्टुभम् । ७ यदस्याः कस्मै चित्' इति भुरिक । २० देवा वशामयाचन् मुखम्' इति विराट् । ३२ स्वधाकारण पितृभ्यः' इत्युष्णिग्बृडतीगर्भा । ४२ 'तां देवाः' इति बृहती- गर्मेति । एवं सर्वत्रन्यूनाधिकत्वे समृद्यं यथातथमिति चत्वारो- ऽनुवाका इति ॥ ७॥ १२ । ५ । प० १ । १'श्रमेणतपसा' इति सप्त पायाः प्रागुनर्पिब्रह्मगवी- देवतास्तत्राद्याः पप्रथमोभौ प्राजापत्यानुष्टुप् । ६ अपकामति' इति २ सत्येनावृता' इति भुरिक् साम्न्यनुष्टुप् । ३'स्वधया- परिहिता' इति चतुष्पात्स्वराडुष्णिक । ४ 'ब्रह्म पदवायम इत्या- मुर्यनुष्टुप् । ५ तामाददानस्य' इति साम्नी पंक्तिः ॥ १२ । ५ । प० २। ७'अोजश्च' इति पंचाद्य द्वे आयनुष्टुभौ । पूर्वा भुरिक् । ङ. में इस पाठ इस पाठ को चक्कु से उड़ाया हुआ है। ऊ. में उदीच्यै के आगे 'त्वा' पद नहीं। + ङ. में 'प्रागुक्तर्षिः' पाठ नहीं। क. घ. 'आद्यः'। || सव मूल लेखों में 'श्राद्या द्वे' पाठ है।
[ १२७ ] ॥प०८ खं० १०॥ १० पयश्च' इत्युष्णिक् । एताश्चतस्रः पुनः पुनः पदान्तरेण, पदाभ्यासादकपदाः । ११ तानि सर्वाणि' इत्याची नित् पंक्तिरिति ॥ ८॥ १२ । ५ । प०३। १२ सपाभीमा' इति षोडश । प्रथमा विराविषमागायत्री। १३ सर्वाण्यस्यां घोराणि' इत्यासुर्यनुष्टुप् । १४ सर्वाण्यस्यां क्रराणि', २६'अघविषा निपतन्ति' इति द्वे साम्न्युष्णिहो । १५ सा ब्रह्मज्यम्' इति गायत्री १६ मेनिः शतवधा' द्वे, १६'हे- तिः शकान्' इति द्वे प्राजापत्यानुष्टुभः । १८'वज्रो धावन्ति' इति याजुद्दी जगती । २१ मृत्युर्हि कृण्वन्ती साम्न्यनुष्टुप् । २२ सर्वज्यानि' माम्नी बृहती । २३ मेनिर्दह्यमाना' याजुषी त्रिष्टुप् । २४ मेदिरुपतिष्ठन्ति' इत्यासुरी गायत्री । २५'शरव्या ३ मुख' साम्न्यनुष्टुप् । २७ अनुगच्छन्ती प्राणान्' आयु- विसगिति ॥ ६॥ १२ । ५। प०४। २८ वैर कृत्यमाना', इत्येकादश । आद्यासुरी गायत्री । २६ देवहेतिः', ३७ अवतिरश्यमाना' आसुर्यनुष्टुभौ । ३० पा- प्माधिधीयमाना' साम्न्यनुष्टुप् । ३१ विषं प्रयस्यन्ती' याजुषी त्रिष्टुप् । ३२ अधं पच्यमाना' साम्नीगायत्री । ३३ मूलबर्हणी' मूल का पाठ क. घ. के अनुकूल दिया है । ङ. पदान्तरेण पादाभ्यासात् । बी. पादान्तरेण पादाभ्यासात् । ह्निः पादान्तरेण पदाभ्यासात्।
॥ प० ८ ९ख० ११॥ [ १२८ ] इति सानी बृहत्या । ३५ अभूतिरुपहियमाणा' भुरिक सामन्य- नुष्टुप् । ३६ शर्वः ऋद्धः' इति साम्न्युष्णिम् । ३८अशिता लोकात्' प्रतिष्ठा गायत्री ॥ १२। ५ । प० ५। ३६ 'तस्या आहननम्' इत्यष्टाद्या साम्नीपंक्तिः । ४० 'अस्व- गता' याजुष्यनुष्टुप् । ४१ अग्निः क्रव्याद्भूत्वा', ४६ य एवं विदुषः' भुरिक्सामन्यनुष्टुभौ । ४२ सर्वास्याङ्गा पर्वा' आमुरी- बृहती । ४३ बिजयस्य' साम्नी बृहती । ४४ विवाहां ज्ञातीन सर्वान्' पिपीलिकमध्यानुष्टुप् । ४५ अवास्तुमेनमस्वगम्' आर्ची- बृहतीति ॥ १० ॥ १२ । ५ । प०६॥ ४७'क्षिप्रं वे तस्य' इति पञ्चदशाधास्कन्धोग्रीवीः । ६१ त्वया प्रमूर्ण' प्राजापत्यानुष्टुप् । ४८ तस्यादहनम् श्रा- य॑नुष्टुप् । ५० क्षिप्रं वै तस्य पृच्छन्ति' साम्नी बृहती । ५४ ओ- पन्ती समोपन्ती' इति द्वे प्राजापत्योष्णिहो । ५६'श्रा दत्से जिनताम्' आसुरीगायत्री । ६० अघ्न्ये प्रशिरः' इति गायत्री। १२ । ५। प० ७॥ ६२ वृश्च प्र वृश्च' इति द्वादशकम् । आद्यास्तिस्रः, ६६ व- * सव आदर्श पुस्तकों में पाठ 'असिता' है। । सव मूल पुस्तकों में 'अनुष्टुभं पाठ 1वी. श्रार्ची। है।
[ १२६ ] ॥प०८खं० ११॥ वेण शतपर्वणि', ६८ लोमान्यस्य' इति तिस्रः प्राजापत्यानुष्टुभः' ६५ एवा त्वं दावे' गायत्री । ६७ प्र स्कन्धान्' इति प्राजापत्या गायत्री । ७१ सर्वास्याङ्गा पाणि' आसुरी पंक्तिः । ७२'अग्नि- रनं क्रव्यात्' इति प्राजापत्यात्रिष्टुप् । ७३ सूर्य एनम्' आसुर्यु- ष्णिगिति ॥ ११ ॥ doka- ॥ प०८ खं०१३॥ [ १३० ] (अथ त्रयोदशं काण्डम् ) ३ । १ । १'उदेहि वाजिन' इति काण्डं ब्रह्माध्यात्म रोहितादित्य देवत्यं त्रैष्टुभम् । ३ यूयमुग्रा' इति तिस्रः, 'यास्ते रुहः', १२ सहस्रशृङ्गः', १५'श्रा त्वा रुरोह' इति जगत्यः । "वि रोहितो भुरिक् । ३ यूयमग्रा' इति मारुती । १५'या त्या रुरोह' इत्यति जागतगर्भा परा, १७'वाचस्पतेपृथिवी' इति ककु- म्मती जगत्यौ । १३ रोहितो यज्ञस्य' इत्यति शाकरगर्भाति जगती । १४ रोहितो यज्ञम्' इति त्रिपदा पुरः पर शाक्करा विपरीतपादलक्ष्मा पंक्तिः । १८ वाचस्पत ऋतवः' इति पर शाक्कर परा परातिजागतोमे पश्चपदे ककुम्नत्यावतिजगत्यौ, पूर्वा भुरिगिति ॥ १२॥ २१ यं त्वा' इत्या| निचूद्गायत्री । २२ अनुव्रता' इति द्वे प्रकृते । २६ रोहित दिवमारुहत्' इति विराट् परोपिणक्. परा प्रकृतिः । २८ समिद्धो अग्निः' इति चतस्र आग्नेय्यस्तत्राद्या- स्तिस्रोऽनुष्टुभः । पूर्वा भुरिक् । तुरीया बहुदेवत्या पञ्चपदा ककुम्मती शावरगर्भा जगतीपरानुष्टुम् । ३५ ये देवा राष्ट्रभृतः' इत्युपरिष्टाबृहती । ३६ उत् त्वा यज्ञाः' निवृन्महावृहती । घ. परा। ङ.बि. लदम्या। घ.क.पर। मूल लेखों में 'प्रकृता' है।
[ १३१ ] । प०८ खं०१४॥ ३७ रोहिते द्यावापृथिवी' परशावरा विराडति जगती । ३६'अमुत्र सन्निह इति द्वे अनुष्टभावेकपदी विराड् जगती । ४३ आरोहन द्याम्' इति विराण्महाबृहती। ४४ वेद तत् ते इति परोष्णिक । ४५ सूर्यो द्याम्' इति षट्, ५१ यं वातः' इति पडनुष्टुभः । ५२ वेदिं भूमिम्', ५५‘स यज्ञः' इति पथ्यापंक्ती । द्वितीया ककुम्मती बृहतीगर्भा । ५७ यो मा' इति ककुम्मती । ५६'मा प्रगाम' इति द्वे गायत्र्याविति ॥ १३ ॥ १३ । २ । १“उदस्य केतवः' अनुष्टुप् । २ दिशांप्रज्ञानाम् इति द्वे, ८ सप्त सूर्यः' इति जगत्यः । १० 'उद्यन् रश्मीन् इत्या- स्तार पंक्तिः । ११ पूर्वापरम्' इति बृहतीगर्भा । १२ दिवि त्वात् इति चतस्रोऽनुष्टुभः । ३१६'उदु त्यं जातवेदसम्' इति नवायोगायत्र्यः । २५ रोहितो दिवम्' इति ककुम्मत्यास्तार पंक्तिः । ॥२६ यो विश्व चर्षणिः' इति पुरो द्वचति जागता . * १३ । १ । ४१, ऋ० १ । १६४।१७ में है ऋषि दीर्घतमा है। + १३ । १ । ५६, ६० ऋ० १० । ५७ । १, २ में है । बन्धुः, सुबन्धुः, श्रुतबन्धुः, और विप्रवन्धु गोपायन के पुत्र ऋषि है। * १३।२।११ ऋ० १० १८५ । १८ में है ऋपि सूर्या- सावित्री है। ६१३ । २।१६से २४ पर्यन्त ऋ० १॥ ५० ॥२-६ में है ऋषि प्रस्कएव काण्व है। यही मंत्र अथर्व २०१४।१३-२१ में भी हैं। || १३।२।२६ ऋ० १०।१ । ३ में भेद से है ऋपि विश्वकर्मा भौवन है।
. ॥प०८ ख० १५ ॥ [ १३२ ] भुरिग्जगती । *२७ एकपाद् द्विपद्' इति विराड़ जगती । १२६वण्महाँ असि' इति बार्हतगर्भानुष्टुम् । ३० सबसे दिवि' इति पञ्चपदोष्णिबहतीगर्भाति जगती । ३४ चित्रं देवानां केतुः इत्यापिंक्तिः ।३७ दिवस्पृष्ठे' इति पंचपदा विरागी जगती । ३३६ रोहितः कालः' इति द्वे, ४१ सर्वा दिशः' इत्यनुष्टुभः । ४३'अभ्यन्यदेति' इति जगती । ४'पृथिवी प्रः इति चतुष्पदा पुरः शाक्वरा । ४५ पर्यस्य' इत्यति जागतगर्भा, पूर्वाभुरिगुभे- जगत्याविति ॥ १४ ॥ १३ । ३। १ य इमे द्यावापृथिवी इति चतुरवसानाष्ट- पदाकृतिः । २'यस्माद् वाताः' इति तिस्रस्थ्यवसानाः पटप हाः पूर्व द्वे अष्टी तत्र पूर्वा भुरिक्, तृतीयातिशावरगर्भा धृतिः । ५'यस्मिन् विराट्' इति तिस्रश्चतुरखसानाः सप्तपदाः । पूर्व द्व the १३।२।२७ ऋ० १० । ११७ । ८ में है ऋपि भिनुः देवता-धनान्न दान प्रशंसा है। । १३ । २ । २६ ऋ० ८ । १०१ । ११ में है ऋषि जमदग्नि भार्गव है। १३।२। ३५ ऋ० १ । ११५ । १ में है ऋषि कुत्स आङ्गिरस है। १३।२। ३८ अथर्व १०।८।१८ तथा १३।३ । १४ में प्राया हुआ है। ॥ १३ । २ । ४६ ऋ०५।१ । १ में है ऋषि बुधवेष्ठिरावा- प्रेया है * + " . [ १३३ ] ॥ १०८ खं० १६॥ शाक्कराति शाक्करगर्ने प्रकृती तृतीयानुष्टुवगातिधृतिः । अहोरात्रैः' इति त्र्यवसाना पट्पदात्यष्टिः । * 'कृष्णं निया- नम्' इत्येकादश चतुरपसाना आयाश्चतस्रः, १५'अयं स देवः', १७ येनादित्यान्' इति सप्तपदा भुरिगति धृतयः । १५अयं म देवः' इति निवृत् । १७ येनादित्यान्' इति कृतिः । १३स वरुणः', १४ सहस्राा', १६'शुक्रं वहन्ति', १८ सप्त युञ्जन्ति', १६ अष्टधा युक्तः' इत्यष्टपदाः । पूर्वे द्वे विकृती परास्तिस्र श्रा- कृतयोऽन्त्या सुरिक् । २० 'सम्यञ्च तन्तुं', २२ वि य ओर्णोत्' इति त्र्यवसाने पट्पदे अत्यष्टी । २१'निम्रचः' तिस्रः, २३ त्व- मग्ने क्रतुभिः' इति तिस्रश्चतुरवसाना अष्टपदाः । २४'य आत्मदा इति सप्तपदा, प्रथमा कृतिः । २३ त्वमग्ने', २५ एकपाद् द्विपदः' इति विकृतिः । २४ य आत्मदा' इति कृतिः ॥१५॥ १३ । ४ । प० १ । १‘स एति' इति पदपाया मंत्रोक्तदेवत्यास्तत्राद्यस्त्रयोदश। प्रथमा एकादश प्राजापत्यानुष्टुभः । १२ तमिदं निगतम् इति विरागायत्री । १३ एते अस्मिन्' इत्यासुयुष्णिक् ।। १३ । ४ । प० २। १४ 'कीर्तिश्च' इत्यष्टी । पूर्वा भुरिक् साम्नी त्रिष्टुप् । १५'य एतं देवम्' आसुरीपंक्तिः । १६न द्वितीयः', १६स १३ । ३। ६ ऋ० १ । १६४ । ४७ में है ऋाष दोर्वतमा है तथा अथर्व ६।२२।१ और ।। १० । २२ में भी यह मंत्र है ।१३।३।१४ अथर्व १३ । २।३८ में आचुका । प० ८ खं० १६॥ [ १३४ ] सर्वस्म' प्राजापत्यानुष्टुभौ । १७न पञ्चमः', १८ नाष्टमः' आसुरोगायच्या ।। १३ । ४ । प० ३। १ ब्रह्म च' इति सप्त, तत्र द्वे भुरिक् प्राजापत्या त्रिष्टुप् । २३ भूतञ्च' आर्चीगायत्री । २५ स एव मृत्युः' एकपदासुरी गायत्री । *२६ स रुद्रः' इत्यापी गायत्री । २७ तस्यम द्व प्राजापत्यानुष्टुभौ ॥ १३ । ४ । प०४। २'स वा अह्नः' सप्तदश तत्र प्रथमासुरी गायत्री । ३०'स वैराव्याः' प्राजापत्यानुष्टुप् । ३१ ‘स वा अन्तरिक्षान् बिराड़- गायत्री । ३२ स वै वायोः' प्राजापत्यानुष्टुप् । ३३ स वै दिवः' इत्यासुरी गायत्री । ३४ स वै दिग्भ्यः' साम्न्युष्णिक् । ३५ स व भूमेः', ३६'अग्नेः' प्राजापत्यानुष्टुभौ । ३७'म वा अद्भ्यः', ३८ ऋग्भ्यः' साम्न्युष्णिगनुष्टुभो । ३६'म धै यज्ञात्', ४० म यज्ञस्तस्य' इत्यासुरी गायथ्यौ । ४१'स्तनयति' साम्नीबृहती। ४२ पापाय वा' प्राजापत्यानुष्टुप् । ४३ यद्वा कृणापि अापी- गायत्री । ४४ ता वास्ते' साम्न्यनुष्टुप् । ४५ उपो ते' इत्यासुरी गायत्रीति ॥ १६ ॥ * १३।४। प०३।२६ डि० ने यहां आर्ची अनुष्टुभ छन्द लिखा है जो कि किसी मूलग्रन्थ में नहीं। 1, मूल पुस्तकों में भं' पाठ है। * मूल पुस्तकों में पाठ अनुष्टुभं है।
[ १३५ ] ॥ प०८ खं० १७॥
१३ । ४ । प० ५।
४६ भूयानिन्द्रः' इति पद् प्रथमासुरीगायत्री । ४७ भूया-
नरात्याः' यवमध्या गायत्री । ४८'नमस्ते अस्तु' साम्न्युष्णिक् ।
४६'अन्नाद्यन' निवृत्साम्नीबृहती। ५०'अम्भो अमः' प्राजा-
पत्यानुष्टुप् । ५१'अम्भो अरुणम्' विराड्गायत्री ॥
१३ । ४ । प०६।
५२'उरुः पृथुः' इति पंच । आद्या, ५३'प्रथो वरः' प्राजा-
पत्यानुष्टुभौ । ५४ भवद्वसुः' इति द्विपदाी गायत्रीति ॥१७||
इति श्रीब्रह्मवेदोक्तमंत्राणां बृहत्सर्वानुक्रमणिकायां अष्टमः।
पटलः समाप्तः ॥
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मूल पुस्तकों में 'भे' है।
। मूल लेखों में 'अष्टः' है।
।। प० ह ख०१॥ [ १३६ ] ( अथ चतुर्दशं काण्डम् ) १४ । १ । *१ 'सत्येन' इति सकोनचत्वारिंशच्छतम् । द्वयानुवाकं काण्डं सावित्री सूर्यान्मदैवतमानुष्टुभम् । प्रथमाभिः पञ्चभिः सोममस्तोत्. पराभिः स्वविवाहं शत तस्या देवाँस्त्रया- विंशति । कया सोमाकौ, परया चन्द्रमसं, परा नृणां विवाहमं- त्राशिपः पराशियः । २५ परा देहि', २७'अश्लीला तनूः' इति द्वे वधूवासः संस्पशमोचन्यो । , है इस काण्ड में दो अनुवाक । प्रथमानुवाक कीऋचाय ६४ और दूसरे की ७५ हैं। दोनों अनुवाकों की ऋचा मिलाकर ही यहां मूल में ‘एकोनचत्वारिंशच्छतम्' है । १३६ ऋचाय बनती हैं। पञ्चपटालिका में भी से ही लिग्या है "श्राद्यः मार्य- श्चतुपष्ठिः पञ्च सप्ततिरुत्तरः' ( पं० प० ४ । १७ ) प्रथम सूर्य देवता वाला ६४ ऋचाओं का और दूसरा ७१ ऋचाओं वाला मुक्त है। इस पुस्तक में दोनों अनुवाकों की समग्रऋक संख्या प्रथम द दन का क्रम इसी स्थल में देखा है अन्य किसी भी काराड मपसी बात पहले नहीं लिखी गयी । १४ । १। सूक्त के वहुत १०। ८५ सूक्त में हैं ऋषि सूर्या सावित्री है। । ङ. के विना अन्य सव मूल पुस्तकों में दृचं पढ़ा जाता है। ह्वि० ने पाठ ङ. का दिया है। समग्र मूल लेखों में पाठ तस्या' है परन्तु ह्वि० ने पाट 'तम्या' लिखा है। $3. और द्वि० में पराशिपः पाठ नहीं। न मंत्र ऋ० [ १३७ ] ॥१०६ ०२॥ परा १४।१। २ । १०'ये वध्वः' इति यत्मनाशनी: दम्पत्योः परिपंथनाशनी । ११ यदश्विना' इति विराटनम्तार- पंक्तिः । ५५ बृहस्पतिः प्रथमः', २६'तृष्टमेतत् इति पुरस्ताद- बृहत्यौ । १५ यदयातम्' इत्याम्तारपंक्तिः । १६' वा मुश्चा- मि', २० भगम्न्वतः २३ पूवापरम्', २४ नवा नवः', ३१ युवं भगम्' इति तिम्रः ३७ यो अनिध्मः', ४० शं ते हिरण्यम, ४५ या अकृन्तन', ४७ म्यानंध्रुवम्' ४६ देवम्ते' इति द्वे. ५३ त्वष्टा वासः', ५६ इदं तद्रपम्' इति द्रु. २ । ४६ यावतीः कृत्याः, २ । ६१ यजामयः', २ । ७० सं त्वा नह्यामि' २ । ७४ येदं पूर्वी' इति द्वे त्रिष्टुभ इति । २३ पूर्वापरं', ३१ युवं भगम्' ४५ या अकृन्तन २ । २४ अारोह चर्म' इति द्वे, २ । ३२ देवा अग्रे २। ३४ अप्सरसः सधमादम्', २। ३६ गया वयम', २ । ३८ तां पूषम्'. ६. भगम्ततक्ष' इति परानुष्टुभः । परावित्येधिपीमहि इति व्याघ्रादिष्ववगन्तव्यः । प्रियं जीवं रुदन्ति विनयन्तीन्द्रानी द्यावापृथिवी ब्रह्मा परमा वामगनिति तु संकाशयाम्या ॥ . १४ ॥२॥ ३१ आरोह तल्पम्' । ३६'मा रोहोरुम्' इति, ३७ में पितरावृत्विये' इति जगत्यः । तात इन्द्रामी ब्रह्मा परमा ३१ आ रोहोर', ३७ स पितरौं' भुरिक त्रिष्टुभः ।१।३४ अतृ- ।। प०६ खं०३॥ [ १३८ ] क्षराः', ३४'नवं वसानः इति प्रस्ताव । ३५'नमा गन्धर्व- स्य इति पुरोबृहती त्रिष्टुर् । ४३ 'स्यानाद्यानः इति त्रिष्टुप- गर्भापंक्तिः । ४८ अपाम्मत इति मतः पंक्तिः । ५६ योभ केशिनः' इति द्वे, ६२ यत् ते प्रजायाम्' इति पथ्यापंवयः । ह'इदं सु में' इति त्र्यवसाना पट्पदा विगडत्यष्टिगिति ।। २ ।। १ । ३८ इदमहम्' इति पुरोवृहती त्रिपात्परोष्णिक । २२५२'उशतीः कन्यला इति विराटपरीष्णि । १५ प्रति तिष्ठ', ५१ ये अन्ताः' इति भुग्जिी । २० यदा गाहपन्यम' इति पुर ग्ताबृहती । ३३ उत्तिष्ठतः' इति विराडास्तारपंक्तिः । ६० अ- ङ्गादङ्गात' इति व्यवमाना षट्पदातिशक्करी । ७१ अमोहमम्मि इति बृहती । स हृदयमिन्यथवा माम्यमानुष्टुभम् । ‘मा नो अग्न' इति पतिवेदनः सौम्यं त्रैष्टुभम् । विहिव्यधिकन्द्रावृपा- कपि इन्द्राणीन्द्रस्य समृदिरेपनिमित्येप मार्य विवाह इति ॥३॥ मूल पुस्तकों में 'पंक्तिः'।
[ १३६ ] ॥ प० ख० ५॥ (अथ पञ्चदशं काण्डम् ) १५ । प०१॥ १'वात्य आसीत इति काण्डमष्टादश पर्यायाः। अध्यात्मक मंत्रोक्तदेवत्या उत वात्य देवतमाद्याऽष्टौ । तत्र पूर्वा माम्नीपंक्तिः । २'म प्रजापतिः सुवर्णम् इति द्विपदा साम्नी बृहती । ३'तदेकम' एकपदा यजुब्राह्मयनुष्टुप । ४'मावर्धत स महान्' एकपदा विगङ्गायत्री । ५'म देवानामीशाम माम्न्यनुष्टुप् । ६'स एक व्रात्यः' त्रिपदा प्राजापन्या बृहती । ७ नीलमस्य आसुरीपंक्तिः । 'नीलेनैव इति त्रिपदानुष्टुविति ॥ ४ ॥ १५ । प० २ । - १'स उदतिष्ठत्' इति द्वयनात्रिंशन् । अाद्या स दक्षिणां', १५'म प्रतीची', २१ म उदीची', ६ भृतं च' २६ श्रुतं च साम्न्यनुष्टुभः' । २'तं बृहच, १६'तं वरुप',२२ तं श्यतं' साम्नी- त्रिष्टुभः । ३'बृहते च द्विपदापीपंक्तिः । ४'बृहतश्च १८ धेरू- पस्य', २४ श्यतस्य च, द्विपदा ब्राह्मी गायव्यः । ५.श्रद्धा * ङ. त्रिपाद्। व० 'उदिति'। क. घ. 'भं'। सब मूल पुस्तकों में 'सानोत्रिष्टुर' पाठ है । बहुवचनान्त पाठ कल्पित है। || मूल पुस्तकों के गायत्री' है।
। प०६ खं०७॥ [ १४० ] पुश्चली',१३ उपाः : १६ इरा विगट । २५ विद्युत इति द्विपदाची जगती । १४ अमावास्या च साम्नीपतिः। २०'अथ ग्रा- मुरीगायत्री । २७ मातरिश्वा च पदपंक्तिः ! २८ कवित्र त्रिपदा प्राजापत्या त्रिष्टुप । १८तं यज्ञायज्ञियम् एकपदाणिक । ११ 'यज्ञायज्ञियाय च द्विपदापी भुरिक त्रिष्टुप । १२ यज्ञायनि- यम्य च आपीपगनुष्टुप् । १७ वरूपाय च द्विपदा विगडापी- पंक्तिः । २३ श्यताय च निचूदापीपंक्तिरिति ।। ५ ।। १५ । प०३। १स मंवत्मरम्' एकादश । प्रथमा पिपीलिकमध्यागायत्री । २ मोऽब्रवीत' माम्न्युष्णिक । ३ तम्मै बान्याय याजुयी जगती । ४ तस्या ग्रीष्मश्च प्राची द्विपदाप्णिक । ५'बृहच ग्थन्तरं च आर्ची बृहती । ६ ऋचः प्राञ्चः' प्रामुयनुष्टुप । ७वेद आ- म्तरणं' मानीगायत्री । ८ सामासाद' पासुरीपंक्तिः । तामा- मन्दीम्' आमुरी जगती । १० तम्य देवजनाः प्राजापत्या त्रिष्टुप् । ११ विश्वान्येवाम्य' विगगायत्रीति ॥ ६ ॥ १५ । प०४ । १'तस्मै प्राच्या दिशः इति द्वन्यनाविंशतिः प्रथमा। तम्म प्राच्याः'.१३ ध्रवायाः',१६ उध्वीयाः देवीजगत्यः । ४ दक्षि- * वी. कविना सब म 'जगत्यः' है। । ऊ जगत्या।
, [१४१ ] ॥ १०६ ०८॥ णायाः, ७ प्रतीच्याः', १० उदीच्याः' प्राजापत्या गाय व्यः । वामन्ती मामों, बार्षिकी मामा भाच्यनुष्टुभौ । ३वा- मन्तावनं, १२ शारदावन' हिपद प्राजापत्याजगत्या । ५ ग्रेष्मा मासो' प्राजापत्या पंक्तिः । ६ ग्रेष्मान' प्राचीजगती। 'वार्पिकावनम् भौमाची त्रिष्टुप् ११'शारदा मासा' साम्नी- त्रिष्टुप् । १४ हेमन्ती मासौ प्राजापत्या बृहती। १५'हमना- वनं', १८ शशिरावनम् इति द्विपदे प्राची पंक्ती । १७ शैशि- गे मामा' आयुष्णिगिति ।। ७ ।। ५ १ १५ । प० ५। १ तस्मै प्राच्या दिशा अन्तर्देशात्' इति पाडश | मंत्रोक्त रुद्र देवत्याः । 'प्रथमा त्रिपदा समविषमा गायत्री । २ भव एनम् त्रिपदा भुरिगार्ची त्रिष्टुप् । ३ नास्यपशून् द्विपदा प्राजापत्यानुष्टुप् । १६'हिनस्ति', 'व्याघ्रादिष्ववगन्तव्यः । ४ तस्मै दक्षिणायाः' त्रिपदा स्वराट् प्राजापत्या पंक्तिः । ५ शवः', ७ पशुपतिः', 'उग्रः', १३ महादेव एनम्' त्रिपदा * मूल पुस्तकों में द्विपदा' है। । मूल पुस्तकों में जगती है। *इलका छन्द नहीं दिया, केवल इतना ही कहा है कि व्यावादियों में जानना।
॥ प० ६ खं० १०॥ [ १४२ ] ब्राह्मी गायव्यः । ६'तस्मै प्रतीच्याः', 'तम्मा उदीच्या' १२'तस्मा ऊवायाः' इति त्रिपदाः ककुभः । १४'तम्मै सर्वेभ्यः' इति भुरिग्विषमा गायत्री । ११ रुद्र एनं निब्राह्मी गायत्री । १५ ईशान एनम्' विराडिति ॥ ८ ॥ १५। प०६। १ स ध्रुवाम्' इति पड्विंशतिः । आद्या, ४ स ऊनी' आसुरीपंक्तिः । ७स उत्तमां', १० स बृहती, १३ म परमां', १६ सोनादिष्टां', २४ स सर्वान् इत्यासुरीबृहत्यः । २२ स दिशः' परोष्णिक । २ तं भूमिः', १७ तमृतवः' इत्याचीपंक्ती । १६ सोनावृत्ताम्' आर्युष्णिक । ५ तमृतं च, ११ तमिति- हासः' साम्नी त्रिष्टुभी । १७ तमृतवश्च साम्नीपंक्तिः । १४ 'त- माहवनीयः', २३'विराजश्च आर्चीत्रिष्टुभी । २०तं दितिः' साम्न्यनुष्टुप् । २५ तं प्रजापतिः' आय॑नुष्टुप् । ३ भृमेश्च वै' आर्षी पंक्तिः । ६'ऋतस्य च',१२ इतिहासस्य च' निबृहत्यौ। ह'ऋचां च' प्राजापत्या त्रिष्टुप् । १५'आहवनीयस्य च', १८ ऋतूनां च विराड्जगत्यौ । २१ दितेश्च वै' आर्ची बृहती। २६'प्रजापतेश्च' विराइबृहतीति ॥ ६ ॥ १५ । प० ७॥ १‘स महिमा' इति पञ्चकः । आद्या त्रिपदा निचद्गायत्री । मूल पुस्तकों में गायत्र्यः है। । सब मुल लेखों में पाठ पञ्चका है शं. पा. न सायणाथर्व [ १४३ ] ॥ ५० हखं० ११॥ २'तं प्रजापतिः' इत्येकपदा विराबृहती । ३'एनमापः' इति विराड्डष्णिक् । ४'तं श्रद्धा च एकपदा गायत्री । ५ एनं श्रद्धा गच्छति' पंक्तिः ॥ १५ । प०८। १ सोरज्यत' ॥ १५ । प० ।। १ स विशः' इति द्वात्रिका ॥ १५ । प०८। तत्राद्यस्याद्या साम्न्युष्णिक् । २'स विशः सबन्धूननम् प्राजापत्यानुष्टुप् । ३ विशां च वै स' आर्चीपंक्तिः ॥ १५ । प०६। १ स विशः' आसुरी जगती । २'तं सभा च' आची- गायत्री । ३'सभायाश्च' आर्चीपंक्तिरिति ॥ १० ॥ १५ । प०१०। १'तद्यस्य' इति त्रयः पांया एकादशकाः । आवस्या- द्या द्विपदा साम्नी बृहती। २ श्रेयांसमेनम्' इति त्रिपदाचीपंक्तिः । ३'अतो वै ब्रह्म' प्राजापत्या द्विपदा पंक्तिः । ४ बृहस्पतिमेव' त्रिपदा वर्धमाना गायत्री । ५'अतो वै बृहस्पति' त्रिपात्सानी- भाष्य भूमिका में पञ्चकः दिया है हम ने भी उसी का अनुकरण किया है।
॥५० हखं० १३ ॥ [ १४४ ] बृहती । ६ इयं वा उ. - एनं ब्रह्म, १० एनमिन्द्रियम् इति द्विपदा आसुरीगायत्र्यः । ७ अयं वा उ', 'यः पृथिवीं सा- म्न्युः गहो।१ आदित्यं' आसुरी बृहतीति ॥ ११ ॥ १५ प०११ । 'बात्योऽतिथिः देवीपंक्तिः । २ स्वयमेनम् द्विपदा पूर्वा त्रिष्टुवति शक्करी । ३ यदनमाह व्रात्य कावान्मीः' ४'व्रात्यो- दकम्', ५'वात्य तर्पयन्तु' द्वे, 'ते वशः', १० यदनमाह व्रात्य यथा ते निकामः' इति निचूदाीबृहत्योऽन्त्या भुरिक । ७ एनं प्रिय एनं वशः' इति द्विपदे प्राजापन्याबृहन्यौ । ११ पनं निकामः' इति द्विपदाय॑नुष्टुप् ।। १५ । प० १२ १ वात्य उद्धृतेषु' त्रिपदागायत्री। २'म्वयमेनम् प्राजा. पत्या बृहती । ३ स चातिसृजेत्' इति द्वे प्राजापत्यानुष्टुभौ । द्वितीया साम्नी तथोभे भुरिजौ । ५ प्रपितृयाणम्' इति द्वं हैन पितृयाणम्' इति द्वे आसुरीगायत्र्यः । अथ य एवम् इति विराड्गायत्री । ११'नाम्याम्मिन' ७'पर्यम्याम्मिन' इति त्रिपाद प्राजापत्या त्रिष्टुभाविति ॥ १२ ॥ ५। प०१३। १'वात्य एकाम' इति चतुर्दश आद्या माम्न्युष्णिक् । मूल पुस्तकों में द्विपदा प्राजापत्या बृहती है।
[ १४५ ] ।। प० ख० १५ ॥ २'ये पृथिव्याम् ६ ये दिवि प्राजापत्यानुष्टुभो । ३'वात्या द्वितीयां' ५ तृतीयां', ७ चतुर्थी आसुरीगायत्र्यः । ४ येऽन्त- रिक्षे', ८ ये पुण्यानां साम्नी वृहत्यौ । ७ तद् यस्यैवं विद्वान्', वात्यो परिमिता' इति द्विपदे निवृद्गायत्र्यौ । १० - परिमिताः' इति द्विपदा विराड्गायत्री। ११ अथ यस्यावा. ५ प्राजापत्यापंक्तिः । १२ कर्षदेनम्' आसुरी जगती । १३ अस्यै देवताया उदकम्' सतः पंक्तिः । १४'तस्यामेव' अक्षरपंक्ति- रिति ॥ १३ ॥ १५ | प०१४ । १ स यत् प्राचीम्' इति चत्वारिविंशतिश्चैव सप्तमः । प्रथमा त्रिपदानुष्टुम् । २ मनसानादेन' प्रभृति सर्वा उत्तरा द्विपदा आसुरीगायत्र्योऽष्टौशेषाश्चतस्रः । १२'ओषधीभिः इत्याद्याः १८ वषटकारेणान्ताः' प्राजापत्यानुष्टुभो भुरिजः । ३‘स यदक्षिणां', ध्रुवां पुर उष्णिहौ । ५ प्रतीची' अनुष्टुप् । ७ उदीची' प्रस्तारपंक्तिः ११ स यत् पशून्' स्वराङ्गायत्री । १३ यत्पितॄन्' १५ यन्मनुष्यान' आर्चीपंक्ती । १६ यद् देवान' मुरिङ्नागीगायत्री । २१ यत् प्रजाः' प्राजापत्या त्रिष्टुबिति॥१४॥ १५ । प०१५ । १'तस्य व्रात्यस्य' इत्यष्टमं नवकं विद्यात् । आद्या देवी- पंक्तिः । २ सप्त प्राणाः' आसुरीबृहती । ३ योस्य प्रथमः', * सब मूल पुस्तकों में द्विपदा निवृद्गायत्री है।
॥१०६खं०१६॥ [ १४६ ] ४ द्वितीयः' ७ पञ्चमः' ८ पष्ठः प्राणः' प्राजापत्यानुष्टुभस्ति- स्रोमुरिजः । ५'योस्य तृतीयः' ६'चतुर्थः प्राणः' द्विवादी सामन्यौ बृहत्यौ । ह'योस्य सप्तमः प्राणः' विराड्गायत्री ॥ ५ । प०१६ । १'प्रथमोपानः' इति नवमस्तु सप्तकः" । आद्या ३ तृतीयो- पानः' इति साम्न्युष्णिहौ । २ द्वितीयोपानः', ४'चतुर्थोपान' ५ पञ्चमः' प्राजापत्योष्णिहः। ६षष्ठः'याजुपी त्रिष्टुप् ७ सप्तमः आसुरी गायत्री ॥ १५ ॥ १५ । प०१७ १ अस्य प्रथमो व्यानः' इति दश दशममाद्या ५'अस्य पञ्चमो व्यानः' इति प्राजापत्योष्णिहौ । २'अस्य द्वितीयः', ७'अस्य सप्तमः' इत्यासुर्यनुष्टुभौ । ३'अस्य तृतीयः' याजुपी- पंक्तिः । ४'अस्य चतुर्थः' साम्न्युष्णिक् । ६ अस्य पष्ठः' याजुषी त्रिष्टुप् । ८ समानमर्थम्' त्रिपदा प्रतिष्ठाचीपंक्तिः । ६'यदादित्यम्' । द्विपदा सान्नी त्रिष्टुप् । १० एकं तदेपाम्' साम्यनुष्टुप् ॥ १५ । प० १८। १'तस्य व्रात्यस्य' इति पञ्चको दशमात्परः । आद्या देवी- पंक्तिः । २ यदस्य दक्षिणम्' ३ योस्य दक्षिणः' इत्या बृहत्यौ। ४'अहोरात्रे नासिके' आय॑नुष्टुप् । ५'अह्वा प्रत्यङ् व्रात्यः' साम्न्युष्णिगिति ॥ १६ ॥ क. बी. सप्तकस्य।
[ १४७ ] ॥५० हख०१६॥ ( अथ षोडशं काण्डम् ) ६ । प० १॥ १ अतिसृष्टी अपाम्' इति प्राजापत्यस्य नव पर्यायास्तत्र त्रयोदशाद्यं विजानीयात् । आद्या, ३म्रोको मनोहा' द्विपदा साम्नीबृहत्यौ । २'रुजन् परि' याजुषीत्रिष्टुप् । ४ इदं तमति- सृजामि' आसुरीगायत्री । ५'तेन तम्' इति द्विपदा साम्नीपंक्तिः । ६'अपामग्रमसि' साम्न्यनुष्टुप् । ७'योप्स्वग्निः' निवृद्विराड्गा- यत्री । 'यो व आपोग्निः' साम्नीपंक्तिः । ह इन्द्रस्य वः' आ- सुरीपंक्तिः । १०'अरिया आपः' याजुपी त्रिष्टुप् । ११ प्रास्मा- देनः' साम्न्युष्णिक् । १२ शिवेन मा', १३ शिवाननीन्' आ- च्यनुष्टुभाविति ॥ १७॥ १६ । प०२॥ १ निर्दरमण्य' इति द्वौ षट्को, सप्तकः परः । पूर्वो वाग्दे वत्य उत्तरी ब्रह्मादित्यदैवत्यौ । १'निदुरमण्य' आसुर्यनुष्टुप् । २ मधुमती स्थ' आसुयुष्णिक । ३'उपहृतो मे साम्न्युष्णिक् । ४'सुश्रुतौ को त्रिपदा साम्नीबृहती । ५ ‘सुश्रुतिश्च प्राय॑नुष्टुप् । ६'ऋषीणां प्रस्तरोमि । निवृद्विराड्गायत्रीति ॥ १८ ॥ १६ । प०३। १ मूर्धाहम्' आसुरीगायत्री । २'रुजश्चमा', ३'उर्वश्च' आ- .
॥ प० ख० २०॥ [ १४८ ] य॑नुष्टुभौ । ४ विमोकश्च' प्राजापत्या त्रिष्टुम् । ५'बृहस्पतिम साम्न्युष्णिक् । ६'असंतापं में द्विपदा साम्नीत्रिष्टुप् ॥ १६ । प०४। १ नाभिरहम् , ३ मा मां प्राणः' साम्न्यनुष्टुभौ । २ स्वा. दसि' साम्न्युष्णिक । ४ सूर्यो माह्नः' त्रिपदानुष्टुप् । ५'प्राणा- पानौ मा मा' आसुरी गायत्री । ६ स्वस्त्यद्योषसः' आच्यु- ष्णिक् । ७ शक्करी स्थ' त्रिपदाविराड्गर्भानुष्टुविति ॥ १६ ॥ १६ । प० ५। १'विद्म ते' इति त्रयोदुःस्वमनाशन देवत्यास्तान् यमः । आद्यं दशकं तस्याद्यादितः आद्याः पड्विराड्गायत्र्यः । पञ्च- मीभुरिक् । षष्ठी स्वराट् । अन्तकोसि' प्राजापत्यागायत्री । १०'तं त्वा स्वप्न' द्विपदा सानीबृहती ।। .. ६। प०६। १'अजेष्माद्या' इत्येकादशोपोंदवत्याः । प्रथमाश्चत्वारः प्राजापत्यानुष्टुभः । ५ उषा देवी' सान्नीपंक्तिः । ६ उपस्पतिः। निदा|बृहती । ७ ते ३मुष्मै' द्विपदा साम्नीबृहती । ८ कुम्भी- का' आसुरी जगती । ६'जाग्रदुष्वप्न्यम्' आसुरीबृहती । १० अनागमिष्यतो वरान्' आर्युष्णिक् । ११ तदमुष्मा अग्ने' त्रिपदा यवमध्यागायत्री वाय॑नुष्टुबिति ॥ २० ॥ १६। प०६।१ ऋ०।४७ । १८ के मंत्र में आता है. ऋषित्रितश्राप्त्य है।
[ १४६ ] ॥प० ६खं० २२ ॥ १६ । प०७। १ तेनैनम्' इति द्वयधिक विहितम् । आद्यापंक्तिः । २ दे- वानामेनम् साम्न्यनुष्टुप् । ३ वैश्वानरस्यैनन्' आसुर्युष्णिक् । ४'एवानेवाव' प्राजापत्यागायत्री । योऽस्मान्द्वेष्टि तमात्मा' आर्युष्णिक् । ६निविषिन्तं दिवः', यददः, ११ यदहरहः' साम्नीबृहत्यः । ७'सुयाम' याजुषी गायत्री । ८ इदमहमामुष्या- यणे प्राजापत्या बृहती । १० यजाग्रद् यत् सुप्तः' साम्नीगायत्री। १२'तं जहि तेन' भुरिक् प्राजापत्यानुष्टुप् । १३ स मा जीवीत नम्' आसुरी त्रिष्टुबिति ॥ २१ ॥ १६ । प०८। १ जितमस्माकम्' इत्येकादश वै त्रिगुणान्यायकपदा यजु- ब्राह्मथनुष्टुप् । २'तस्मादमुं निर्भजामोमुम्' त्रिपदा निवृद्गा- यत्री । ३‘स ग्राह्याः पाशात्' प्राजापत्या गायत्री । ४ तस्येदं वर्चस्तेजः' त्रिपदा प्राजापत्या त्रिष्टुप् । ५‘स निऋत्याः' इति तिस्रः, १२ स ऋषीणाम्', २० स ऋतूनां', २२ स मासानाम् २७'स इन्द्राग्न्योः' आसुरी जगत्यः । स पराभूत्याः'१०.स बृहस्पतेः', ११स प्रजापतेः' १४ सो अङ्गिरसाम्', १६ सोऽथ- वणां', २१ सातवानां', १३ सआर्षेयाणाम् आसुरीत्रिष्टुभः । 'स देव जामीनां', १५'स आङ्गिरसानाम्', १७ साथर्वणा- * यहां द्वयधिक पय्याय ६ से जानना. पर्याय की ऋचाय ११ है और दो अधिक करने से इस ७ पर्याय की १३ ऋचार्य बनती है। - ॥ प०६ खं० २३ ॥ [ १५० ] नाम्, १८ स वनस्पतीनाम्', १६ स वानस्पत्याना', २३ सा- ऽर्धमासानाम् चत्वराः ३२ 'म मृत्योः' आसुरीपंक्तयः । २८ म मित्रावरुणयोः' द्वे आसुरीबृहत्याविति ॥ २२ ॥ १६ । प०६। १ जितमस्माकम् इति परश्चत्वारि व वचनानि । प्रथमा प्राजापत्यायनुष्टुप् , २ तदग्निः' मंत्रोक्त बहुदेवत्यमायुणिक् । ३'अगन्म द्वौ सौय्यौं.पूर्वः साम्नीपंक्तिः, उत्तरः परोष्णिगिति ।२३ इति श्री ब्रह्मवेदोक्तमंत्राणां वृहत्सर्वानुक्रमणिकायां नवमः पटलः समाप्तः ॥ ... -- * १६ । प०६।१ अथर्व १०।५। ३६ में श्राचुका है।
[१५१ ] ।। प० १० ख०१॥ (अथ सप्तदशं काण्डम् ) १७ । १। ओं १ विषासहिम्' ऋचस्त्रिंशद्ब्रह्मादित्यदेवत्या जगती । प्रथमा १ विषासहिं सहमानम्' इत्यष्टौ व्यवसानाः, आद्याश्च तस्रःऽतिजगत्यः । ६ उदिहि' इति द्वे । १६ असति सत्' इत्यष्टयः । ८ मा त्वा दभन्' ११'त्वमिन्द्रासि विश्वजित्' १६ त्वं रक्षसे' इत्यतिधृतयः । त्वं न इन्द्र महते' इति पञ्चपदा शकरी । १० त्वं न इन्द्रातिभिः' इति चतस्रः, १६'त्वं रक्षसे' १८'त्वमिन्द्रास्त्वंमहेन्द्रः' इति द्वे; २४'उदगादयमादित्यः' व्यवसाना बाद्याष्टपदा धृतिः। १२'अदब्धो दिवि' इति कृतिः। * बी 'आत नहीं। टिन को यहां पाठ में संशय था उसने 'अष्टयः' तथा 'अत्यष्टयः दोनों पाठ दिये हैं परन्तु हमारे मूल ग्रन्थों में ङ का पाट 'अत्यष्टयः' है और शेष क. घ. वी. का पाठ 'अष्टयः' है । ऊपर पाठ क. घ. वी. का दिया है। . ने अपने भाष्य में नोट दिया है कि ६-८, १०-१३. १६, १८-१६, तथा २४ हस्तलेख तथा बंबई संस्करण में तो ज्यव- सानाः है परंच वर्लिन संस्करण में चतुरवसानाः है, हमारे चारों मूल ग्रन्थों में यह व्यवसानाः है और यही ठीक है। १७ । । । २४ स्वल्प भेद से ऋ० १ । ५० । १३ में आता है । ऋषि प्रस्करावः काराव है ॥
॥ प० १० ख० १॥ [ १५२ ] १३ या त इन्द्र' प्रकृतिः । १४'त्वामिन्द्र' इति द्वे पञ्चपढ़े शक्कय्यौं । १७ पञ्चभिः पराङ् इति पञ्चपदा विराडति शक्करी। १८'त्वमिन्द्रस्त्वं महेन्द्रः' इति भुरिगष्टिः । २४ उदगाद यमा- दित्यः' इति विराडत्यष्टिः । १ विषासहि' इत्यष्टौ षट्पदाः शेषाः सप्तपदाः । २० शुक्रोसि' इति ककुप् । २१'रुचिरसि' इति चतुष्पादुपरिष्टाबृहती । २२'उद्यते' इति याजुपी, द्वे द्विपद पूर्वानुष्टुवुत्तरा निबृहती । २५ आदित्य नावम्' इति द्वे अनु- प्टुभौ । २७ प्रजापतेरावृतः', ३० अग्निा गोप्ता' इति जगत्या । २८ परिवृतो ब्रह्मणा' इति द्वे त्रिष्टुभाविति ॥१॥ मूल में आदि के श्राठ मंत्र पट्पद लिखे हैं परञ्च पाठ में आदि के पांच मंत्र तो षट्पद सिद्ध होते हैं शेष ३ सप्तपद । विटने ने तो यहां यह भी लिखा है कि मूल का पाठ इत्यष्टौ के स्थान पर इति पञ्च चाहिये था।
[ १५३ ] ॥ प०१० ख०२॥ (अथ अष्टादशं काण्डम्) १८।१। *१'ओचित् सखायम्' इति चतुरनुवाकमष्टाविंशतिसूक्तक नवचं यमदेवत्यं त्रैष्टुभं काण्डमथर्वा मंत्रोक्त बहुदेवत्यं च । हमारी क. घ. ऊ. बी. पुस्तकों में पाठ छूटा हुश्रा है जो कि 'सूक्लकम्' के आगे ह्वि० ने अपने मूल लेखाधार से निज English भाष्य में काण्डारंभ में दिया है। उसका पाठ यह है 'ओचित् सखायम्' इति चतुरनुवाकमष्टाविंशति सूक्तकं न्यशीतिद्विशतं नवत्यचम् (पढ़ो द्विशतचंम्) । हि. ने बंधनी में पाठ अपनी ओर से दिया है। 'नवत्यर्चम्' पाठ का कुछ भी पता नहीं लगता । हमारे मूल लेखों में पाठ 'नवर्चम्' है । परञ्च यह तो हम मानना पढ़ता है कि अवश्य मंत्र इस काण्ड के २८३ ही हैं न्यूनाधिक नहीं । एक तो द्वि. वाली अनुक्रमणिका का मूल लेख प्रमाण है तथा दूसरा प्रमाण पञ्चपटलिका से भी यही मिलता है। एकषष्ठिश्च षष्ठिश्च सप्ततित्यधिकात् परः। एकोननवात श्चैव यमेषु विहिता ऋचः। ७ । १७ अनु० में भी प्रत्येक अनुवाक में गणना की है, और परि- णाम पटलिकावत् है । इस से तो सिद्ध ही है, कि यहां ऋचाएं २८३ ही चाहिये और प्रकाशित अथर्व संहिताओं के भी चारों अनुवाकों की ऋचायें जोडने से परिणाम २८३ ही निकलता है। अब 'नवत्यर्चम् वा नवर्च का पता करना बहुत कठिन है। सम्भव है कि अनुक्रमणिकायों में कुछ अन्य पाठ भी. छूटा हो
।। प०१० खं० २॥
[ १५४ ]
जिस में सव अनुवाकों की ऋक् संख्या बताई हो । यदि ऐसा हो
तोकुछ पाठ हम इस प्रकार कल्पित कर सकते हैं (प्रथममनु-
वाकमेकषष्ठयर्चम् द्वितीयं पष्ठयम्, तृतीयं त्रिसप्तत्यर्चञ्चतुर्थ मे-
कोननवत्यम्' । यदि इस प्रकार कल्पना करें तो 'नवत्यर्चम्'
का कुछ अर्थ हो सकता है परन्तु, हम यहां निश्चय से कुछ नहीं
बता सकते । श्राशा है अन्य अनेक मूल ग्रंथों के मिलने स शुद्ध
पाठ का ठीक निर्णय हो सकेगा।
इस प्रथम सूक्त के ६१ मंत्रों में से केवल पांच मंत्र (१७,
२७, २८, ५७, ६१ ) हैं जो ऋग्वेद में नहीं पाते शेष ५६ मंत्र
ऋग्वेद में हैं। हम क्रमशः उन मंत्रों का ऋग्वेद में स्थान तथा ऋषि
देते हैं । ऋषि प्रत्येक मंत्र के नीचे इस लिय नहीं दिये कि जिससे
अधिक मंत्रों के ऋषि आदि बार २ न लिखने पड़े। इन मंत्रों को
ऋग्वेद से मिलावे--
मं० मं०
(२) १ से १६ पर्यन्त-ऋ० वे० १० । १० मुक्त में आते हैं ऋपि
यमी वैवस्वती है। शेष ६, तथा १३ मंत्र
सूक्त १० में नहीं वे क्रम से ऋ० ०
१।४।१६ तथा १०१०१२ में कुछ भेद
से हैं। मं०६ का १० वे में ऋपि राहगण
गोतम है और मं० १३ का यमी वैवस्वती।
(२) १८-२६ ऋ० वे० १० । ११ सूक्त में हैं ऋषि इवि-
र्धान अङ्गिरा है।
(२) २६-३६ ॥
ऋ० १०॥ १२ में हैं ऋषि सूक्त ११ का ही
है। शेष २५, २८ मंत्र अथर्ववेद ७८२२४,५
में प्राचुके हैं।
"
[ १५५ ] ॥प०१० ख०२॥ 'यमस्य मा यम्यन्' आर्षीपंक्तिः । १४'न वा उ ते' भुरिन् । ५ बतो बतासि यम' आर्षीपंक्तिः । १८ वृषा वृष्णे दुदुहे' इति तिस्रः, २१'अध त्यं द्रप्सम्' इति तिस्रो जगत्यः । ३७'सखाय' इति द्वे परोष्णिहौ । ४१ सरस्वन्ती देवयन्तः' इतितिस्रः सरस्वती देवत्याः । '४०स्तुहि श्रुतम्' इति रौद्री पूर्वसूतानि । ४४ उदारतामवर' इति तिस्रो मंत्रोक्त पितृदेवत्याः। ४६ परे- (४) ३७-३८ (५) ३६ (६) ४० (७)४१-४३ (क) ४४-४६ . है (8) ४७, (१०) ४८ (११ ४६, ५० (१२) ५१, ५२ ऋ०८।२४। १, २ में हैं ऋषि विश्वना वैयश्व है। ऋ० १०॥३श में है ऋषि कवष एलूष है। ऋ० २ । ३३ । ११ में हैं ऋषि गृत्समद है। ऋ० १० । १७ । ७-६ में हैं ऋषि देव- श्रवा यामायन है। ऋ० १० । १५ । १, ३,२ में हैं ऋषि शंखो यामायन ऋ० १०।१४ । ३ में है ऋषि यम है। ऋ०६। ४७ । १ में है ऋषि गर्ग है। ऋ० १०।१०।१,२ में हैं ऋषि यम ऋ० १० । १५॥ ४, ६ में हैं ऋषि शंखो यमायन है। ऋ० १० ११७११ऋषि देवश्रवा यामायनः। ऋ० १०।१४। ७ ऋषि यम । ऋ०१०।१४। १०।१४।६, ५,४। सामवेद १।१।२।५।२। में है। (१३) ५३ (१४) ५४ " (१६) ५८-६० (१७) ६१ । प०१० सं०३॥ [ १५६ ] यिवांसम्' इति द्वे मुरिजी । ५१ बर्हिपदः पितरः इति द्वे पित्र्ये। ५६ उशन्तस्त्वेधीमहि' इति द्वे अनुष्टुभौ । ५६ अंगिरोभियं- ज्ञियः' पुरोबृहती । ६१ इत एत उदारुहन्' इत्यनुष्टुबेकष ठे- रिति ॥ २॥ १८।२। १ यमाय सोमः' इति तिम्रोऽनुष्टुभः । ४ मनमग्ने इत्याग्नेयी । ७ सूर्य चक्षुषा', 'यास्ते शोचयः' जगत्यौ । १८।२ सूज के मंत्रों का वर्णन जो वैसे तथा स्वल्प भद से ऋग्वेद में पाते हैं। अथर्व १-३ ऋ० १०।१४।१३-२५ ऋपि 'यमः'। दमनो यामायनः |१४|१६ ४-५ " ६ " 5-८, १० ,, ।१६। ३-४ - " " " " ।१४।१०-१२ १४-१८ । १५४ | १, ४, २, ३, ५ ऋषि यमी १६ १ । २२ । १५ मेधातिथि काण्व ऋपि ३३ १०।१७।२ ऋषि देवश्रवा यामायन । ३५ पूर्वाध "।१५। १४ शंखो ৪০ লাখ , । १८ । ११ में, संकुसुको ५।१७।३ देवश्रवा ५५ ,1, ४ ।१६।७ दमना ,।१८।६ ऋषि (५०) का वी 'मैनम् ( अग्ने नहीं है)। " " " " ६० [ १५७ ] ॥ प०१० खं०५॥ ५ यदा भृतम्' इति जातवेदसी भुरिक् ।६'त्रिक द्रुकभिः पवते' अनुष्टुप् । १३ उरुणसौ' जगती । १४ सोम एकेभ्यः' इति पंचानुष्टुभः । १६ स्योनास्मै भव पृथिवि' इति त्रिपदापाँगा- यत्री । २० असंबाधे' अनुष्टुप् । २२ उत् त्वा वहन्तु' इति द्वे, २५'मा त्वा वृक्षः सं बाधिष्ट' अनुष्टुभः । २४ मा ते मनः' इति त्रिपदा समविषमार्षी गायत्रीति ॥३॥ २६ यत् ते अङ्गम्' इति भुरिक् । २६'सं विशन्तु' इति" पिव्या । ३० यां ते धेनु', ३४'ये निखाताः' आग्नेयी । ३६ शं तप' इत्यनुष्टुभः । ३७ ददाम्यस्मै' इति विराड्जगती । ३८ इमां मात्राम्' इति सप्ता(गायत्र्यः । ४० अपेमाम्', ४२ निरिमां', इति तिस्रोभुरिजः । ४५अमासि मात्राम्' ककु- म्मत्यनुष्टुप् । ४६'प्राणो अपानः', ४८ उदन्वती द्यौः' ५०'इदमिद्वा' इति तिस्रोऽनुष्टुभः । ४६ ये नः पितुः' भुरिक् । ५६ इमौ युनज्मि ते' अनुष्टुर । ५७ एतत् त्वा' भुरिक् षष्ठि- रिति ॥४॥ १८।३। १४'प्रजानत्यघ्न्ये जीवलोकम्', 'उत्तिष्ठ प्रेहि' ११ वर्च- सा मां समनक्त', २३'आ यूथेव नुमति' सतः पंक्चयः । ५'उप - * क. घ.द्वे पाठ अधिक है। इस १८ । ३ सूक्त के उन मंत्रों का वर्णन जो ऋग्वेद में वैसे वा कुछ भेद से आये हैं- .
॥ ५० १० ख० ५॥ [१५८ ] द्यामुप वेतसम्' इति त्रिपदा निवृद्गायत्री । ६यं त्वमग्ने सम- दहः' अनुष्टुप् । उभे आग्नेय्यो । १८ अञ्जते व्यञ्जते', २५'इन्द्रो मा मरुत्वान्' इति पञ्च जगत्यः । तत्रैकाधिकाभुरि- गंत्याविराट् । ३० प्राच्यां त्वा' पञ्चपदाति जगती । ३१ दक्षि- णायां त्वा विराट् शक्करी । ३२ प्रतीच्यां त्वा इति चतस्रो -- " " २१-२४, " श्रथ० २ ऋ० १०।१८।८ १० १५६ । १ ऋषि, वृहदुकथा वामदेव्यः । अथर्व १३ ऋ० १०।१६।१३ है।८।४३ ऋपि प्राकृयामाषाः। ४।२।१६-१६ माप वामदेव । ३०-४१, १०।१३।१-४ ऋपि विवस्वानादित्य है। ४२-४५ १०।१५। १२, ७, ११, ५, ८, ६, १० में हैं यापे शंखो यामापन है। ४६-५२, १०। १८ । १०-१३ ऋपि पूर्व दे दिये हैं। " ।१६।८,६ ५६ ।१७।१४ " " " " " " "।१८।७ " . " " ।१४।८ । १५ । १४ ऋषि भरद्वाज वाईस्पत्य ६० उत्तरार्ध ।१०।१६।१४ से अधिक ६५ ऋ० ।८।१ त्रिशिरास्त्वाप्ट्र ऋपि । ११२३ । ६ चेन पिः। ६७ ७ ॥ ३२ ॥ २६ वसिष्ठ वा शक्तिः।
[ १५६ ] ॥५० १० खं०७॥ १८।३। भुरिजः । ३६'धर्तासि' इत्येकावसानासुर्यनुष्टुप् । ३७ उदपूरसि' तथासुरीगायत्रीति ॥ ५॥ ३६ स्वासस्थे भवतम्' इति परात्रिष्टुप्पंक्तिः । ४४'अग्नि- पात्ताः पितरः', ४६ ये नः पितुः पितरः' इति मंत्रोक्त देवत्ये जगत्यौ । ४७'ये तातृषुः' ४६ 'उप सर्प', ५२'उत्ते स्तन्नामि' इति मुरिजः । ५० उच्चश्वस्व' इति भौमाप्रस्तारपंक्तिः । ५४'अथवा पूर्णम्' पुरोऽनुष्टुबैन्दवी । ५६ पयस्वतीरोषधयः' इत्यायॆनुष्टुप् । ५८'सं गच्छस्व' इति विराट् । ६०'शं ते नीहारः' इति व्यवसाना षट्पदाजगती । ६४'आ रोहत दिव- तमाम्' इति भुरिपथ्यापंक्तिः । ६७ इन्द्र क्रतुं न इति पथ्या- वृहती । ६८'अपूपापिहितान्', ७० 'पुनर्देहि' इत्यनुष्टुभौ । ६६ यास्ते धानाः', ७१'प्रारभस्व जातवेदः' इत्युपरिष्टाबृहत्यौ। ७२'ये ते पूर्वे' अनुष्टुम् । सप्ततिस्त्र्यधिका पर इति ॥ ६ ॥ १८।४। १ आ रोहत'*, ४'त्रयः सुपर्णा,' ७तीर्थस्तरन्ति' इति - १८ । ४ के उन मंत्रों का निर्देश जो वैसे वा स्वल्प भेद से ऋग्वेद में आये हैं- ऋषि अथर्व २८ ऋ० १०। १७ । ११ देवश्रवा यामायन । १०७।४ दिव्यो, दक्षिणा वा प्राजापत्या । ४३ अथर्व १८।३। ६६ में श्राचुका है। " ।। प०१० ख० ८॥ [ १६० ] भुरिजः । २ देवा यज्ञमृतवः', ५ जुहूर्वाधार' इति जगत्यो । ३ ऋतस्य पन्थामनु' इति पञ्चपदा भुरिगति जगती । ६'ध्रव आरोह' इति पञ्चपदा शक्करी । अङ्गिरसामयनम्' पञ्चपदाति- शक्करी । पूर्वो अग्निः' इति पञ्चपदा भुरिक्शक्करी । ११ शमग्ने' जगती । १२ शमग्नयः' महाबृहती । १३ यज्ञ इति विततः' इति व्यवसाना पंचपदाशक्करी । १४ ईजानश्चितम्' भुरिक् । १६'अपूपवान क्षीरवान्' इति नव त्रिपदो भुरिजो महाबृहत्य इति ॥ ७ ॥ २६ यास्ते धाना' इत्युपरिष्टाबृहती।३७ अक्षिति' याजुपी गायत्री । २६'शतधारं वायुम्' इति जगती । ३१ एतत् ते देवः' द्वे, अनुष्टुभौ । ३३ एतास्ते असौ धेनवः' इत्युषरिष्टाबृहती । ३६ सहस्र धारम्' इति भुरिक् । ३८ इहैवधि' इत्यनुष्टुप् । ३६ पुत्रं पौत्रम् इति पुरोविराडास्तारपंक्तिः । ४१ समिन्धते अमर्त्यम्' इति द्वे अनुष्टुभौ । ४६'श्रा प्र च्यवेथामप' इत्यनु- दुब्ग त्रिष्टुप् । ५० एयमगन्' इति ५१ इदं पितृभ्यः' इति पुरोविराट्सतः पंक्तिरिति ॥ ८॥ - " ५८ ऋ० १०1८६। १६ ६।२।६ भरद्वाज बाहस्पत्य ६० ६।६।१६ अथर्व ६१ ऋ० ११८२।२ गोतमो राहगण १।२४।१५ शुनः शेप ५। ६ । ४ वसुश्रुत श्रात्रेय १ । १०५ । १ प्राद्यस्त्रित आगिरसः कुत्सो वा । ड " " " [ १६१ ] ॥ प०१० ख० १०॥ १८।४। ५५'यथा यमाय' इति तिस्रोऽनुष्टुभः । तत्र ५६ इदं हिरण्यम्' इति ककुम्मती । ५८ वृषा मतीनां जगती । ५६ त्वेषस्ते', ६१ अक्षनमीमदन्त' इत्यनुष्टुभौ । ६० प्र वा एतीन्दुः' इति मुरिक् । ६२'श्रा यात पितरः' इति द्वे प्रास्तारपंक्ती । पूर्वा भुरे गुत्तरा स्वराट् । ६६ असौ हा इह' इति त्रिपदा स्वराङ्गायी। ६७ शुम्भन्तां लोकाः' इति द्वे एकावसाने पूर्वा द्विपदार्च- नुष्टुविति ॥६॥ ७१ अग्नये कव्यवाहनाय' इति प्रभृति ८६ यत्र पितरः' इत्यंतः* एकावसानाः । ७१ अग्नये' आसुर्यनुष्टुम् । ७२'सामाय पितृमते' इति तिस्र असुरीपंक्तयः । ७५ एतत् ते प्रततामह' आसुरीगायत्री, परासुयुष्णि इ, उत्तरा देवी जगती । ८१'नमो वः पितरः' इति पितृदेवत्यमाद्या प्राजापत्यानुष्टुप् । ८२ पितरो भामाय' साम्नीबृहती । ८३'पितरो यद् घोरम्', ८४ यच्छिवम्' साम्नीत्रिष्टुभौ । ८५ नमो वः पितरः स्वधा' आसुरीबृहती । ८६ येत्र पितरः' इति द्वे चतुष्पदे उष्णिहो । पूर्वा ककुम्मती । सब हस्त लेखों में पाठ 'इत्यात' है ऐसा पाठ कौशिक सूत्र ८२४४, ८५ । २६, ८६ । १७, तथा ८७ । ३० में पाया है, वहां पर भी इसका अर्थ कुछ पता नहीं लगता । हि० ने यहां अनुक्रमणिका का पाठ 'श्रातः' दिया है। कौ० सू० ८१ । ४४ के पाढ़ भेद में ब्लूमफील्ड में E हस्त लेख का पाठ 'इत्यत' दिया है। मेरी सम्मति में यदि यहां 'इत्यंतः' हो तो अर्थ बहुत अच्छा लग सकता है। । क. घ. चतुष्पदावृष्णिहौ।
॥ १० १० खं० १०॥ [ १६२ ] ८७ य इह शंकुमती । ८८ मा त्वाग्न इधीमहि' इति व्यवसाना पथ्यापंक्तिराग्नेयी । ८६'चन्द्रमा अप्स्वन्तः' इति चान्द्रमसीयं पंचपदा पथ्यापंक्तिः । *'एक.ननवतिश्चैव यमेषु विहिता ऋच' इति ॥१०॥ n यह प्रतीक पंचपटलिका ४॥ । १७ से उद्धृत की गई है।
[ १६३ ] ॥१० १० ख० १२।।
(अथैकोनविंशं काण्डम्)
१६।१
१'सं सं स्रवन्तु नद्यः' इति तृचं बवृचं ब्रह्मकांडं ब्रह्मा
चान्द्रमसमानुष्टुभमपश्यदायाज्ञिकम् । तस्याये द्वे पथ्याबृहत्या।
३'रूपं रूपं वयो वयः' इति पंक्तिः ।
१६ । २।
१'शं त आपः' इति पञ्चच सिन्धुद्वीप प्राप्यम् ।
१६।३।
१ दिवस्पृथिव्याः पर्यन्तरिक्षात्' इति द्वे चतुर्ऋचे अथवा-
गिरा आग्नेये त्रैष्टुभे । २ यस्ते अप्सु महिमा' इति भुरिक ।
१६।४।
१ यामाहुतिम्' इति पञ्चपदा विराडति जगती। २'आकूति
देवीम्' इति जगती मंत्रोक्नदेवत्या ।
१६ । ५।
१७'इन्द्रो राजा' इत्येकर्चमैन्द्रं त्रैष्टुभमिति ।। ११ ।।
१६ । ६।
१ सहस्र बाहुः' इति षोडशच नारायणः पुरुष देवत्या
अनुष्टुभः।
* १६ । ५। १ ऋ०७।२७।३ में है, ऋषि वसिष्ठ है।
1१६।६ यह समप्रसूक्त ही स्वल्प भेद से ऋ०१०१६ सूक्त
में पाता है ऋषि नारायण है।
॥१० १० खं० १३ ॥ [ १६४ ] १६ । ७।१चित्राणि साकम्' इति पश्च । ६।८। १ यानि नक्षत्राणि' सप्ताभे मंत्रोक्तनक्षत्रदेवत्ये गायखैष्टुभे। ७ । ४ अन्नं पूर्वा' इति भुरिक । ८/१'यानि नक्षत्राणि विराड्- जगती। १६ । । । १'शान्ता द्यौः' इति चतुर्दश । *१६ । १० । १ शं न इन्द्रानी' दश । १६ । ११ । १'शं नः सत्यस्य षट् । 1१६ । १२ । १ 'उषा अप स्वसुः' इत्येकर्च वासिष्ठं वैश्वदेवं शंतातीयं त्रैष्टुभमार्य मंत्रोक बहुदेवत्यमिति ॥ १२ ॥ १६ ।। १'शान्ता द्यौः' विराडरोबृहती । इमानि यानि पञ्च' इति पञ्चपदा पथ्यापंक्तिः 'नक्षत्रमुल्काभिहतम्' इति पंचपदा ककुम्मती । १२'ब्रह्म प्रजापतिः' इति व्यवसाना सप्त- पदाष्टिः । १४'पृथिवी शान्तिः' इति चतुष्पदा संकृतिः, शेषाः काण्ड प्रतीकत्वेनानुष्टुभः । *१६ । १०, तथा ११ ये दो सूक्त ऋ० ७।३५ में आते हैं ११वे का अन्तिम छटा मंत्र ऋ० ५। ४७।७ में है । ७।३५ का वे० में ऋषि वसिष्ठ है और ५।४७ सू० का ऋषि ऋ०० में प्रति रथ श्रात्रेय है। 1 १६ । १२ का पूर्वार्ध ऋ०१०।१७२ का चतुर्थ मंत्र है ऋषि संवतः है। और इस मंत्र का उत्तरार्ध ऋ०६।१७ । १५ का मंत्र है वहां ऋषि भरद्वाजो बार्हस्पत्य' है।
[ १६५ ] ॥१० १० खं० १४॥ १६ । *१३ । १ इन्द्रस्य बाहू' एकादशाप्रतिरथ एन्द्रयस्त्रिष्टुभः।३ सक्रन्दनेन' इति चतस्रः, ११ अस्माकमिन्द्रः' इति भुरिजः । १६ । १४। १'इदमुच्छ्रेयः' इत्येकर्चमथर्वा द्यावापृथिवीयं त्रैष्टुभमिति।।१३।। १६ । १ि५॥ १'यत इन्द्र भयामहे' इति षडचम् १६।१६। १ असपत्नं पुरस्तात्' इति तृचम् । आयस्य चतस्र एन्द्रयः, प्रथमा अन्त्ये दे द्वितीयस्य तिस्रोऽपि मंत्रोक्त बहुदेवत्याः । १६।१५। १'यत इन्द्र' इति पथ्याबृहती। २'इन्द्रं वयं', अभयं नः करत्यन्तरिक्षम्' इति चतुष्पदे जगत्यौ। ३'इन्द्रस्नातोत' * १६ । १३ सूक्त के समग्र मंत्र प्रथम के विना ऋ० १०१०३ सूक्त में श्रा जाते हैं वहां ऋषि अप्रतिरथ एन्द्र है। ।१६।१५। १,४ मंत्र क्रम से ऋ० ८।६१ । १३ तथा ६।४७।८ में है क्रम से ऋषि भर्ग प्रागाथ और गर्ग है। * क. ऊ हि (लंडन) लेखों में तृचम्' है और घ० बी०बि० ( बर्लिन ) लेखों में पाठ 'दयचम्' है। संहिता में यह सूक्तद्वयच ही है । सायण ने तिरश्चीनन्या' को भिन्न तृतीया लिखकर भाष्य किया है। हमारी सम्मति में 'तृचम्' पाठ ही बृ० सर्वा० लेखक को अभिप्रेत है क्योंकि आगे चलकर जो 'द्वितीयस्य तिस्रोऽपि' पाठ दिया है उस से तोतीन चायें ही सिद्ध होती हैं दो नहीं। घ० गु० अन्त्ये का (१०) नहीं। || बी. 'हे' पाठ अधिक है।
॥५० १० ख० १६ ।। [१६६ ] इति विरादपथ्यापंक्तिः । ४ उरूं नो लोकम', ६'अभयं मित्रात्' इति त्रिष्टुभौ । १६ । १६ । १'असपनं पुरस्तात्' इत्यनुष्टुप् । २ दिवो मादित्याः' इति व्यवसाना सप्तपदा बृहतीगर्भातिशक्करीति ॥ १४ ॥ १६ । १७॥ 'अग्निर्मा पातु', १८१ अग्नि ते वसुवन्तम्' इत्युभे दशके प्रत्यूचं मंत्रोक्न देवत्ये । पूर्व जागतमुत्तरं द्वैपदम् । ५'सूर्यो मा द्यावापृथिवीभ्याम्', ७'विश्वका १० बृहस्पतिर्मा' अतिजगत्यः। ६'आपो माइति भुरिन् । प्रजापतिर्मा अतिशकर्यः पंचपदाः । १६ । १८ । १ अग्निं ते वसुवन्तम्' साम्नीत्रिष्टुप् । २'वायुं ते' इति तिस्रः । ६अपस्त ओषधीमतीः' आय॑नुष्टुभः । ८ इन्द्रं ते' साम्नीत्रिष्टुप् । ५ सूर्य ते सम्राडाय॑नुष्टुप् । ७ विश्व काणं ते ६ प्रजापति ते', १० बृहस्पति ते' इति प्राजापत्यात्रिष्टुभ इति॥१५ १६ । १६ । १ मित्रः पृथिव्योदकामत्' इति चैकादशकं चान्द्रमसं पांव- मुत मंत्रोक्तदेवत्यम् । १ मित्रः', ३ सूर्यः', 'इन्द्रः', भुरिग- बृहत्यः । १० देवा अमृतेन' स्वराद, शेषाः सर्वा अनुष्टुब्- गर्भाः।
[ १६७ ] ॥प०१० ख० १८॥ १६ । २० १'अप न्यधुः पौरुषेयं वधम्' बहुदेवत्यं त्रैष्टुभम् । २ यानि चकार' इति जगती । ३ यत् ते तनूषु' इति पुरस्तादबृहती ४'वर्म में अनुष्टुबगर्भा । १४ । २१ । १'गायत्र्युष्णिक्' इत्येकावसाना द्विपदा साम्नीबृहती । इद- मेकर्च ब्रह्मा छान्दसं छन्दोऽनुक्रान्तिविज्ञानायापश्यदिति ॥१६॥ १६ । २२। १'आङ्गिरसानामायैः' इत्येकविंशतिस्तत्र सर्वा एकावसाना विहायान्त्याम् । अङ्गिरा मंत्रोक्तदेवत्यम् । आद्या साम्न्युष्णिक् । ३ सप्तमाष्टमाभ्याम्', १६ पृथक्सहस्राभ्याम्' प्राजापत्या गायन्यौ। ११ उपोत्तमेभ्यः', ४'नील नखेभ्यः'७'पर्यायिकेभ्यः', १७ महा गणेभ्यः' दैवी जगत्यः । ५ हरितेभ्यः', १२ उत्तमेभ्यः', १३ उत्तरेभ्यः', दैवी त्रिष्टुभः । २'षष्ठाय', ६'क्षुद्रेभ्यः', १४ ऋषिम्यः' इति तिस्रः, २२'ब्रह्मणे देवीपंक्तयः। प्रथमेभ्यः शंखेभ्यः' इति तिस्त्र आसुरीजगत्यः । १८ सर्वेभ्योऽङ्गिरोम्यो विदगणेभ्यः' आसुर्यनुष्टुप् । २१'ब्रह्मज्येष्ठा' इति चतुष्पदा त्रिष्टुविति ॥ १७ ॥ १६ । २३॥ १ आथर्वणानां चतुचभ्यः' इति त्रिंशदथर्वा मंत्रोक्त- । प०१० ख०२०॥ [ १६८ ] देवत्या उत चान्द्रमसमंत्यां वर्जयिः।ा सर्वा एकावसानाः । प्रथमासुरी गायत्री । द्वितीयादयः षड्दैवीत्रिष्टुभः । ८ एकादश- चेभ्यः', १० त्रयोदभ्यः' इति तिस्रः, १४ सप्तदशभ्यः' इति तिस्रः प्राजापत्यागायच्यः । १७ विंशतिः', १६ तृचभ्यः' २१ क्षुद्रेभ्यः' २४ सूर्याभ्यार' २५'वात्याभ्याम्' २६'ब्रह्मणे दैवी पंक्तयः । १८ महत्कए डाय'. २६'प्राजापत्याभ्या' द्वा- दशर्वेभ्यः',२८ मङ्गलिकेभ्यः' इति दैवी जगत्यः । २० एकचभ्यः' २३ रोहितेभ्यः' २७ विषासौ दैवी त्रिष्टभ इति ॥ १८ ॥ १६ । २४ । १'येन देवं सवितारम्' इत्यष्टी मंत्रोक्त बहुदेवत्या उत ब्राम णस्पत्यमानुष्टुभम् । ४'परि धत्त' इति तिसः, - हिरण्य वर्णो अजरः' इति त्रिष्टुभः । ७ योगे योगे' इति त्रिपदापीगायत्री। १६ । २५॥ १ प्रश्रान्तस्य त्वा' इत्येकर्चमानुष्टम्, वाजिदेवत्यं गोपथः ॥ १६ । २६ । १'अनेः प्रजातं परि' इति चतुश्चमाग्नेयं हैरण्यं त्रैष्टुभम- था । ३ आयुषे त्वा वर्चसे त्वा' इत्यनुष्टुप् । ४ यद् वेद राजा वरुणः' इति पथ्यापंक्तिः, अनेन हिरण्यमस्तौदिति ॥ १६ ॥ १३ । २७॥ १'गोभिष्ट्वा पातु इति पंचदशकं भृग्वंगिरास्त्रिवृदेवत्यमुत [ १६६ ] ॥ प० १० खं० २१ ।। १६ । २७ १ गोभिष्ट्वा पातु' इति पञ्चदशकं भृग्बंगिरास्तृवृद्देवत्यमुत चान्द्रमसमानुष्टुभम् । ३ तिस्रो* दिवः', 'देवानां निहितं निधिम्' इति त्रिष्टुभौ । 'ह'आपो हिरण्यं जुगपुः' जगती । १३ ये देवाः' इति तिस्र एकावसानाः । प्रथमायुष्णिद्वितीया- य॑नुष्टुप् , तृतीया साम्नीत्रिष्टुप् ॥ १६ । २८। इमं बन्नामि ते मणिम्' इति त्रीणि । पूर्व दशकमुत्तरं नवकं तृतीयं पञ्चकम् । ब्रह्मा सपत्नक्षयकामो मंत्रोक्सन्दर्भमणि- देवत्यमानुष्टुभमेतत्त्रयमिति ॥ २० ।। १६ । ३१। १'औदुम्बरेण मणिना' इति चतुर्दश पुष्टिकामोमंत्रोक्नो- दुम्बरमणिदेवत्यमानुष्टुभम् । वेधसः पुष्टय सविता ददर्श । ५'पुष्टिं पशूनाम्' १२ ग्रामणीरसि' इति त्रिष्टुभौ । ६'अहं पशूनां' विराटप्रस्तारपंक्तिः । ११'त्वं मणीनां', १३ पुष्टिरसि' इति पञ्चपदे शक्कय्यौं । १४'अयमादुम्बरः' विराडास्तारपंक्तिः। १४ । ३२॥ १'शतकाण्डो दुश्च्यवनः' इति द्वे पूर्व दशकमुत्तरं पञ्चकम् * क. घ. 'दिवः' नहीं। संहिता में यह पाठ १६ । २७ । १ का उत्तरार्ध है। यह छन्द जगती छन्द के अनुकूल नहीं अतः यह पाठ चिन्तनीय है।
।। १० १० खं० २२॥ [ १७० ] एते मंत्रोक्तदेवत्ये आनुष्टुभे, भृगुः सर्वकाम आयुषे । 'प्रियं मा दर्भ' इति पुरस्ताबृहती । ह'यो जायमानः', ३३ । २ घृता- दुल्लुप्तः' ३३ । ५'दर्भण त्वम्' इति त्रिष्टुभः । ३२। १० स- पत्नहा शतकाण्डः', ३३ । १ सहस्रार्घः शतकाण्डः' इति जगत्यौ । ३३ । ३त्वं भूमिम्' इत्यापिंक्तिः ।३३। ४ तीक्ष्णो राजा विषासहिः' आस्तारपंक्तिः ॥ २१ ।। १६ । ३४। १ जङ्गिडोसि जङ्गिडः' इति द्वे प्रथमं दशकं. द्वितीयं पञ्च- कमगिरा उभे मंत्रोक्तदेवत्ये उत वानस्पत्ये आनुष्टुभे । १४ । ३५ । ३'दुर्हार्दः सपोरम्' इति पथ्यापंक्तिः । ४'परि मा दिवः' शक्करी निवृत्रिष्टुप् ॥ १६ । ३६ । १'शतबारो अनीनशंत्' इति पडचं ब्रह्मा शतवार दैवत- मानुष्टुभम् ॥ १४ । ३७। १'इदं वर्चः' इति चतुर्ऋचमथर्वाग्नेयं त्रैष्टुभम् । २ वर्च आ धेहि' प्रास्तारपंक्तिः ३'ऊजे त्वा बजाय त्वा इति त्रिपदा महाबृहती । ४ ऋतुझाष्ट्वातवेभ्यः' पुर उष्णिगिति ॥ २२ ।। * ङ. वी. में इसका छन्द जगती दिया है। ङ. बी. पडर्चम्। * 'त्वा' नहीं।
[१७१ ] ॥प०१० ख०२४॥ १४ । ३८। १न तं यक्ष्मा' इति तृचं मंत्रोक्त गलालु देवताकमानुष्टुभम । २ विश्वस्तस्मात्' इति चतुष्पादुष्णिक । उभयोरग्रभम्' इत्येकावताना प्राजापत्यानुष्टुः ॥ १३ । २६ । १ एतु देवः' इति दश भृमंगिरा मंत्रोक्त कुष्टदेवत्यमा- नुष्टुभम् । २त्रीणि ते', ३ जीवला नाम ते' इति द्वे व्यवसाने *पश्चपदे बृहत्यौ । तृतीया षट्पदा जगती । त्रिः शाम्बुभ्यः' इति चतस्रश्चतुरवसानाः। प्रथमा सप्तपदा शक्करी। ६ अश्वत्थो देवसदनः' इति तिस्रोऽष्टयः ॥ १६ । ४०। १ यन्मे छिद्रं मनसः' इति चतुर्ऋचं ब्रह्मा बार्हस्पत्यमुत वैश्वदेवमानुष्टुभं । प्रथमानुष्टुत्रिष्टुप् । २ मा न आपः' इति पुरः ककुम्मत्युपरिष्टाबृहती । ३ मा नो भेषाम्' इति बृहती- गर्भा । ४ या नः पीपरइश्विना' इति त्रिपदापर्षी गायत्रीति ॥२३॥ १६ । ४१ । १'भद्रमिच्छन्तः' इत्येक मंत्रोक्त तपोदेवत्यं त्रैष्टुभम् ।। १६ । ४२ । १'ब्रह्मा होता' इति चतस्रो मंत्रोक्त ब्रह्मा देवत्या आद्या * गु. घ. पञ्चपदे नहीं।
॥ प० १० ख० २६ ॥ [ १७२ ] अनुष्टुर । २ब्रह्म स्रुचः' इति ककुम्मती पथ्यापंक्तिस्यवसाना। ३'अंहोमुचे प्र भरे' इति त्रिष्टुप् । ४'अहोटवं वृषभं जगती। १४ । ४३। १ यत्र ब्रह्मविदः' इत्यष्टौ बहुदेवत्यास्त्र्यवसानाः शंकुमत्यः यथ्यापंक्वय इति ॥ २४ ॥ १६ । ४४। १'आयुषोसि' दशकं मंत्रोक्ताञ्जन देवत्यमानुष्टुभं भृगुः । 'बहीदम्' इति द्वे वारुणे । प्रथमा शन्तातिमप्रार्थयदेवं ततो मंत्रोक्तांश्च देवानिति । ४'प्राण प्राणम्' इति चतुष्पदा शंकुम- त्युणित् । सिन्धोग सि, इति त्रिपदा निवृद्विपमा गायत्री। १६ । ४५ १'ऋणाहणमिव' दशतत्रयं चाञ्जनदेवत्याः पराः पञ्च मंत्रोकदेवत्याः । आये द्वे आनुष्टुभौ । ३'अपामूर्ज' इति तिस्रः त्रिष्टुभः । ६'अग्निमग्निनावतु' इति पंचैकावसाना महाबृहत्यः । तत्राद्या विराट् चतस्रो निवृत इति ॥ २५ ॥ १६ । ४६। १ प्रजापतिष्ट्वा चनात्' इति सप्तकं प्रजापतिरस्तृतमणि दैवतं त्रैष्टुभमाद्या पंचपदा ज्योतिष्मती त्रिष्टुप् । २ ऊर्ध्वस्तिष्ठतु रचन्' इति षट्पदा भुरिक्शकरी । ३'शतं च न', ७ यथा- त्वमुत्तरः' इति पंचपदा पथ्यापंक्तिः। ४ इन्द्रस्य त्वा' चतुष्पदा।
[ १७३ ] ॥१० १० ख० २६ ।। ५'अस्मित् मण' इति पञ्चपदाति जगती । ६ घृतादुल्लुप्तः' इति पञ्चपदोष्णिग्गर्भा विराड्जगती पंक्तिरिति ॥ २६ ॥ १६ । ४७॥ १'श्रा रात्रि पार्थिवम्' इति चत्वारि सूक्तानि । पूर्व नवक- मुत्तरं षर्क मध्यमं दशकमन्त्यं सप्तकमेवं द्वात्रिंशन्मत्रोक्तराति देवत्या अनुष्टुभो गोाथ ऋच आद्यस्याद्या पथ्याबृहती । न यस्याः' पंचपदा अनुष्टुब्गर्भा परातिजगती । ६रक्षा माकिनः' इति पुरस्ताबृहती । ७ माश्वानाम्' इति त्र्यवसाना षट्पदा जगती ॥२७॥ १६ । ४८॥ १'अथो यानि च' त्रिपदार्षी गायत्री । २'रात्रिमातः' त्रिपदाविराडनुष्टुप् । ३ यत् किं चेदं बृहतीगर्भा । ५ ये रात्रि- मनुतिष्ठन्ति पथ्यापंक्तिरिति ॥ १३ । १६॥ १'इषिरा योषा' इति पञ्च, ८ भद्रासि रात्रि' त्रिष्टुभः । ६'स्तोमस्य न:' आस्तारपंक्तिः ७'शम्या ह' पथ्यापंक्तिः । १०'अ पादौ न' इति व्यवसाना षट्पदा जगती भरद्वाजश्चेति॥२८ १६ । ५१। १'अयुतोहम्' इति द्वे एकावसाने ब्रह्मा । पूर्वात्मदेवत्या झे- कपदा प्रामधनुष्टुप् उत्तरा सावित्री त्रिपाद्यवमध्योष्णिक् ।।
॥प०१० ख०३१॥ [ १७४ ] ११ । ५२। १'कामस्तद्' इति पञ्चकं मंत्रोक्तकामदैवतं शुभम् । ३'दूराचकमानाय चतुष्पादुष्णिक् । ५ यत्काम कामयमान' उपरिष्टाहती ॥ १६ । ५३। १ कालो अधः' इति द्वे पूर्व दशकमुत्तरं पंचको परदश भृगुमंत्रोक्त सर्वात्मक कालदेवत्या अनुष्टभ इति ॥ २६ ।। पूर्वस्याद्याश्चतस्रनिष्टुभः । ५'कालोऽमम्' इति निचा पुरस्ताबृहती ॥ १६ । ५४ २'कालेन वातः' इति त्रिपदापर्षी गायत्री । ५'कालेयम- गिरा' इति व्यवसाना षट्पदाविराडष्टिरिति ।। १६ । ५५ १ राति रात्रिमप्रयातम्' इति षडचमाग्नेयं त्रैष्टुभम् । २ या ते वसोः इत्यास्तार पंक्तिः । ५'अपश्चा दग्धान्नस्य इति व्यवसाना पंचपदा पुरस्ताज्ज्योतिष्मतीति ॥ ३० ॥ १६ । ५६ । १ यमस्य लोकात्' इति द्वे पूर्व षकमुत्तरं पंचकमेवमे- वमेकादश यमो दौष्वप्न्यस्त्रिष्टुभः ॥ * घ. 'श्र दिवम्' इति ।
[ १७५ ] ॥प० १० ख० ३३ ।। १६ । ५७। *१ यया कला' इत्यनुष्टुप् । ३ देवानां पत्नीनाम्' इति व्यवसाना चतुपदा त्रिष्टुप् । ४'तं त्वा स्वम इति षपदोष्णि ग्वृहतीगर्भा विरार शकरी । ५'अनास्माकस्तदेव' इति व्यव- साना पंचादा पर शाकरातिजगतीति ॥ ३१ ॥ १६ । ५८॥ १ घृतस्य जूतिः' इति पट्टचं ब्रह्मा मंत्रोक्लबहुदेवत्यमुत याज्ञिकं त्रैष्टुभम् । २ उपास्मान् प्राणः' इति पुरोऽनुष्टुप् । ३'वर्चसो द्यावापृथिवी' इति चतुष्पदातिशक्करी । १५'यज्ञस्य- चतुः' इति झुरिक् । ६ ये देवानामृत्विजः' इति त्रिष्टुप् । १६ । ५६ । १'त्वमग्ने' इति तृचमाग्नेयं त्रैष्टुभम् । प्रथमा गायत्री । १६ । ६०। १ वाङ्म आसन्नसोः' इति द्वयचं मंत्रोक्त वागादिदैवतम् । आद्या पथ्यावृहती। २ ऊर्वोः' इति ककुम्मती पुर उष्णिगिति३२ १६ । ६१ । १'तनूस्तन्वा इति त्रीण्येक_नि ब्राह्मणस्पत्यानि । प्रथमा- विराट् पथ्यावहती। १६ । ५७ । १ ऋ० ८।४७१७ में है अापत्रित प्राप्त्य है। १६ । ५८ ॥ ४ ऋ० १० । १०१ । ८ में आता है ऋषि बुधः सौम्यः है। ११६ । ५६ | १ ऋ०८१११ में है ऋषि वत्सः कारवः है । तथा १६ । ५६ । २ ऋ० १०।२।४ में है ऋषि त्रित है।
॥५०१० ख०३४॥ [ १७६ ] १प्रियं मा' अनुष्टुप् । १६ । ६३। १ उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते' इति विराडुपरिष्टाबृहती। १६ । ६४। १ अग्ने समिधः' इत्याग्नेयं चतुर्ऋचमानुष्टुभम् । १६ । ६५ । 'हरिः सुपर्णः' इत्येकच जातवेदसं सौम्यं जागतम् । १६।६६। १'अयो जालाः' इत्येकचं जातवेदसं सौय्य वज्रदेवत्यमति- जागतम १६। ६७। १ पश्येम इत्यष्टौ सौ ः प्राजापत्यागायत्र्य इति ॥ ३३ ॥ १६ । ६८। १ अव्यसश्च' इत्येकर्च मंत्रोक्नकर्ममात्रदेवत्यमानुष्टुभम | . १६। ६६ । १'जीवा स्थ' इति चतस्त्र एकावसाना मंत्रोकावदेवत्याः । प्रथमासुर्यनुष्टुप् । २ उप जीवा' इति साम्न्यनुष्टुप् । ३ संजीवा' इत्यासुरी गायत्री । ४'जीवला' इति साम्न्युष्णिक् । १६ । ७०। १ इन्द्र जीव' इत्येका सौर्या त्रिपदा गायत्री ।
[ १७७ ] ॥ प०१० खं०३४॥ १६ । ७१ । 'स्तुतामया' इति व्यवसाना पश्चपदातिजगती गायत्री देवतमकम् । १६ । ७२। १'यस्मात् कोशात्' इत्येकचं परमात्मदैवतं वैष्टुभमनेन सर्वान् देवान् स्वरक्षणकामः प्रार्थयदिति भृग्वंगिरा ब्रह्मेति भृग्वं- गिरा ब्रह्मेति ॥ ३४॥ इति श्री ब्रह्मवेदोकमंत्राणां बृहत्सर्वानुक्रमणिकायां दशमः पटलः समाप्तः एकोनविंशतिकाण्डम् समाप्तम् । घ. में यह सम्पूर्ण पाठ भी है और यह पाठ श्रागे प्राधेक है- "स्वस्ति" करकृतमपराधं तंतुमर्हति संतः। संवत् १७६७ वर्षे वैशाषवदि १ रवि वायदा ज्ञातीय जग जीवनेन लषीतमिदं इदं पुस्तक लेखकः पाठकयोः चिरंजियात् ॥ शुभमस्तु-यावल्लवण समुद्रो यावन्नक्षत्र मंडितोमेरुः । यावत् चन्द्रादीत्यौ तावत् इदं पुस्तकं जयतु । भग्न पृष्टि कटीग्रीवाबद्ध मुष्टीरधोमुखं । कटेन लेक्षितं शास्त्रं यत्नेन परिपालयेत् । यादशं पुस्तकं दृष्ट्वा तादृशं लखितं मया । यदि शुद्धमशुद्ध वा मम दोषो न दीयते। कल्याणमस्तु इन श्लोकों में अशुद्ध पाठों को अशुद्ध ही दिया है।
। प०११ खं०१॥ [ १७८ ] (अथ विंशति काण्डम् ) *ओं सूक्तसंख्याऋपिदैवतछन्दांस्यनुवर्तन्ते अपरस्याः संख्याऋषिदैवत छन्दोम्योबृहती सतोवृहत्यौ । बार्हतः प्रगाथः प्रगाथोक्तौ तं ब्रयात् ॥ प.रेभाषा ॥ ॐ अथाथर्वणे विंशतितमकाण्डस्य सूक्तसंख्या सम्प्रदायादृषिदैवतछन्दांस्या- श्वलायनानुक्रमानुसारेणानुक्रमिष्यामः खिलान् वर्जयित्वा ॥ * इसके प्रारम्भ में गु. में 'श्री गणेशायनमः' अधिक है। घ. और ग. में यह पाठ अधिक है-(ॐ नमः यह ग में नहीं)। श्री ब्रह्मवेदाय नमः॥ ॐ अथेन्द्रत्वादीन्यनाय्यं तदित्यंतान् बहूनें- द्रानान् गायत्रान्याशिय शंसनमंत्रानथांगिरा अपश्यत् तत्रा- धस्य सूक्तस्य द्वितीया मारुती, पराग्नेयी, मरुतः पोत्रादिति चतस्रो मंत्रोक्नदेवत्या एकावसाना श्राद्ये द्वे विराड्गायत्र्याविंद्रो ब्रह्मा- युष्णिग्देवोद्रावणोदाः साम्नीत्रिष्टुब्यथोदप्रुतो न वयो रक्षमाण इति वार्हस्पत्यमेवं यत्र मंत्रान्तर्देवता या दृश्यते स मंत्रस्तद्देवता- को भवतीति सर्वत्र परिभाष्यते विहिसोतोरसृक्षतेति त्रयोविंशति मंत्रानन्द्रान् वृषाकपिरिदंजना उपश्रुतेत्यादि यदस्याहमित्यंता- खिलमंत्रान् सर्वानैतशो मुनिरपश्यदैतशोमुनिरपश्यदिति ।। अथर्वान्तर्गत खिल मंत्रों के छंद और ऋषि केवल घ. में ही हमें मिले हैं। ऊ और बी. में तो यह पाठ है ही नहीं और क. का हस्त लेख ही यहां तक नहीं मिलता। | इस लेख से प्रतीत होता है, कि अथर्ववेद के बीसवे काण्ड के छन्द ऋषि आदि बृहत्सर्वानुक्रमणिका लेखकों के नहीं प्रत्युत उन्हों ने इस काण्ड के ऋषि दैवत छंद श्रादि श्राश्वलाय- नानुक्रमणी के श्राधार से दिये हैं।
[ १७६ ] ॥१० ११ खं० १॥ २०।१। *१'इन्द्र त्वा' तृचं विश्वामित्र गोतम विरुपाः प्रत्यूच- मिन्द्रमरुदग्नयोऽपि गायत्रम् ।। २०।२। १ मरुतः पोत्रात्' इति चतुष्कमेकावसाना आये द्वे विराड्गाय यौ । ३'इन्द्रो ब्रह्मा' आर्युष्णिक् । ४'देवो द्रवि- णोदाः' साम्नीत्रिष्टुप् ॥ २०।३। १ अायाहि' तृचमिरिबिठिरैन्द्रं गायत्रम् ॥ २०।४। ११'आ नो याहि ॥ २०। ५। ६१ अयमु त्वा' अष्टावत्या विश्वामित्रस्य । * २०।१ । सूक्त के तीनों मंत्र ऋ० वे० में क्रमशः ३१४०। १, १।८६।१, ८।४३ । ११ में आते हैं। वहां भी ऋषि देवता, छन्द, यही हैं। । २०।३। सूक ऋ०८।१७।१-३ में है ऋषि 'इरम्बिठिः काएव' है। २०१४। सू० ऋ०८।१७। ४-६ में है। ६२०१५। सू० ऋ०८।१७। ७-१३ में है।
।। १० ११ खं० १॥ [ १८० ] प्रकाशित अथर्वसंहिताओं में यह २०१५। सूक्त सप्तर्च है और अगला २०। ६ । सू० नवर्च है, परन्तु वृ० सर्वा० में इन दोनों को अष्टर्च ही माना है। वृ० सर्वा० में २० । ६ सूत्र का श्रादि का 'इन्द्रत्वा वृषभं' २० । ५ ! का अन्तिम मंत्र स्वीकार करके छटे सूक्त को 'इन्द्र क्रतुविदं' छटे के द्वितीय मंत्र से प्रारम्भ करके उसे भी अष्टर्च सिद्ध किया है। सायण ने अपने भाष्य में पांचवें सूक्त को सप्तर्च और छटे को नवर्च लिखा है । २० । ६ मंत्र के नीचे शंकर पाण्डुरंग ने बृ० सर्वाक्रमणी के विषय में यह टिप्पणि The Sarvanıkranui begins the hymn with 'इन्द्र ऋतुविदं' instead of with 'इन्द्र त्वा वृषभं वयं', and makes and the preceding lymn consist of eight mantras each, being supported in this by P. P. J. CP. हमारी सम्मति में यहां पञ्चम सूक्ल सप्तर्च ही चाहिये अर्च नहीं, क्योंकि अथर्ववेद के बीसवे काण्ड के तीसरे, चौथे और पञ्चम सूत्रों के जो १३ मंत्र हैं वे क्रम से ही १३ मंत्र ऋ० ।१७। सूत्र में आए हैं और छटे सूक्त के ६ मंत्र ही ० ० ३।४० । सूत्र में क्रम से आते हैं। अतः वृ० सर्वा० कार का ६ सूक्त का आदि मंत्र पञ्चम सूक्त में मिलाकर श्रष्टर्च लिखना ठीक नहीं प्रतीत होता । इसी ऋ० के एक सूक्त के आधार से ही प्रतीत होता है, कि अथर्ववेद में तीन सूत्रों की कल्पना की गयी है। न जाने वृ० सर्वा० लेखक ने इन दोनों सूनों को अटर्च किस विचार और आधार से लिखा है। * २०१६। सूक्त ऋ०३।४० में है ऋषि विश्वामित्र है।
[१८१ ] प०११ख०१॥ २०।६। १ इन्द्र क्रतु विदम्' इत्यष्टस्य सूक्तस्य विश्वामित्रः ।। २० । ७॥ *१ उद् घेदभि' चतुऋचं सूक्तं सुकक्षोऽन्त्या विश्वामित्रस्य ।। २०।८। १ एवा पाहि' तृचं सूक्तं भरद्वाजः कुत्सविश्वामित्राः प्रत्यूचं त्रैष्टुभम् ॥ २० ।। १ तं वो दस्म' इति चतुर्ऋचं सूक्तं नोधा श्राद्ययोर्मेध्या- तिथिरन्त्ययोराये द्वे त्रैष्टुभौ प्रगाथ उत्तरे ।। २० । १०॥ ॥१'उदु त्ये' इति द्वयचं सूक्तं मेध्यातिथिः प्रगाथः ।। * २० । ७ सूक्त ऋ० ८। ६३ । १-३ में आते हैं ऋषि सुकक्ष है। इस सूक्त का चतुर्थ मंत्र २०। ६ । सूक्त में ही आचुका है। 1. घ० में आदि का उद्धरण केवल 'उद्घति' से ही है। ।२०।। सूक्त के तीन मंत्र०वे० में क्रमशः६।१७।३, १ । १०४।६, ३ । ३२ । १५ में आते हैं ऋषि क्रम से भरद्वाज बाई- स्पत्य, कुत्स अङ्गिरस तथा विश्वामित्र हैं। २०।। सूक्त के तीन मंत्र ऋ० वे० में कम से ८ ।। १, २ तथा ८।३।६, १० पाते हैं। ऋषि क्रम से नोधा और । घ० में 'तं वो' है दस्त नहीं दिया। घ में द्वे नहीं। ॥ २० । १०।०८।३। १५, १६ में है ऋषि मेध्यतिथि मेध्यतिथि काण्व है काएव है।
। प० ११ ख० २॥ [१८२ ] २०।११ । *१ इन्द्रः पूर्मि' एकादशच सूक्तं विश्वामित्रत्रैष्टुभम् ॥ २० । १२ । १ उदु ब्रह्माणि' इति सप्तर्च सूक्तं वसिष्ठोऽन्त्यात्रिम् ॥ २० । १३ । ११'इन्द्रश्च' इति चतुर्ऋचं सूक्तं वामदेवगोतमकुत्सविश्वा- मित्राः प्रत्यूचमिन्द्रा बृहती मरुत आग्नेय्यौ जागतमंत्या- त्रिष्टुप् ॥१॥ २०।१४। ६१ वयम् ||त्वाम्' इति चतुर्गचं सूक्तं सौभरिरैन्द्रं प्रगाथः ॥ २०।१५॥ ११'प्र मंहिष्ठाय' इति षडचं सूक्तं गोतमस्टेष्टुभम् ॥ * २० । ११ । ऋ०३ । ३४ में है ऋषि विश्वामित्र है। + २० । १२ । प्रथम १-६ मंत्र ऋ० ७ । २३ में हैं और सातवां ५। ४०१४ में है ऋपि क्रमशः वसिष्ठ और अत्रि हैं। * २० । १३ । का प्रथम मंत्र ऋ० ४।५० । १० में, दूसरा मंत्र ऋ० १।८५। ६ में, तीसरा ऋ० १ । १४ । १ में और चतुर्थ ऋ० ३।६।६ में है। ऋषि क्रम से वामदेव गोतम. कुत्स, तथा विश्वामित्र हैं। ६ २० । १४ । ऋ०८।२१ ॥ १,२,६, १० मे हैं। मूल लेखों में 'वायमुत्वा' पाठ है यह ऊपर का पाठ सहितानुकूल जान हमने है || २० । १५ । सू० ऋ०१। ५७। में आता है वहां ऋषि सव्य श्रागिरस है। ऋषि सोभरिः काण्व है। मूल लेखों में 'षड' है।
[ १८३ ] ॥१० ११ खं०३॥ २० । १६॥ *१ उद प्रतो न' इति द्वादशचं सूक्तं अयास्यो बार्हस्पत्यम् ।। २० । १७॥ १ अच्छा में' इति द्वादश सूक्तं कृष्णा जागतमन्त्ये त्रिष्टुभौ ॥२॥ २०।१८। ११ वयम् त्वा' इति षण्मेध्यातिथिप्रियमेधौ तिसूणां शिष्टा वसिष्ठो गायत्रम् !! २०।१६। १'वात्रहत्याय' इति सप्तर्च सूक्तं विश्वामित्रः॥ २० । २० । १'शुष्मिन्तमं नः' अन्त्या गृत्समदा ॥ २०।१६। ऋ० १०।६८ में है। ऋषि अयास्य है। २० । १७ । १-११ ऋ० १०। ४३ में और १२ ऋ०७।१७। १० में है ऋषि क्रम से कृष्ण और वसिष्ट है। १२०।१८।१-३ ऋ०८।२।१६-१८ में तथा ४-६ ऋ०७।३१।४-६ में है। ऋषि क्रम से मेधातिथि कारव तथा प्रियमेधाझिगरस, वासष्ठ हैं। २० । १६ । ऋ० ३।३७ । १-७ में है ऋषि विश्वामित्र है। २० । २० । १-४ ऋ०३।३७।०-११ में और ५-७ ० २०। ४१ । १०-१२ में है। ऋषि क्रम से विश्वामित्र और गृत्समद Share ॥प०११ खं०५॥ [१८४ ] २० । २१ । १'न्यू षु' एकादशं सद्यो जागतमन्त्ये त्रिष्टुभौ ॥ ३ ॥ २० । २२। १'अभि त्वा' *षट्त्रिंशदेकस्तिसृणामन्त्यानां प्रियमेधो गायत्रम् ।। २०।२३। १'आ तु नः' नवं विश्वामित्रः ।। २० । २४॥ १ उप ना, २० । २५ । १अश्वावति सप्तगोतमोऽन्त्यामष्टको जागतमन्त्या त्रिष्टुप् ॥४ २० । २६ । १'योगे योगे' इति षट् शुनःशेपस्तिसृणां शिष्टा मंधु- छन्दा गायत्रम् ।। २० । २१ । ऋ० १ । ५३ में है ऋपि सव्य श्रागिरस है। अनुक्रमणी में इस सूक्त का ऋषि नहीं दिया। २० । २२।१-३ ०८॥ ४५ ॥२२-२४ में है तथा ४-६ ०८।५८।४-६ में है ऋषि क्रम से 'त्रिशोक कारवः', और मध्य काण्व है। इस सूक की ऋचाये छ है यहां षत्रिंशद् न जाने किस विचार से लिखा है। २०। २३ । ऋ०३।४१ में है ऋषि विश्वामित्र है। २० । २४ । ऋ२३॥ ४२ में है ऋषि विश्वामित्र है। २०।२५।१-६ ऋ० १९८३ में मंत्र ऋ० १०।१०४।३ में है. ऋषि क्रम से गोतम राहगण और अष्टको वैश्वामित्र हैं। २० ॥ २६ ॥ १-३ १०१।३०। ७-८ में है और ४-६ ऋ०१।६।१-३ में ऋषि क्रमश शुनः शेप श्राजीगर्त और मधु- १ छन्दा हैं।
[१८५ ] ।। प०११ खं०६॥ २० । २७॥ १यदिन्द्र' षट् गोक्त्यश्वमूक्तिनौ ।। २० । २८ । १'व्यन्तरिक्षम्' चतुष्कमन्त्ये त्रिष्टुभी ।। २० । ३३ । १ अप्सु धृतस्य' तृचमष्टकस्रष्टुभम् ॥ ५ ॥ २० । ३४ । १'यो जातः पञ्चदश गृत्समद एन्द्रं त्रैष्टुभम् ।। २० । ३५ ॥ १'अस्मा इदु' षोडश नोधा ।। २० । ३६ । १'य एकः' एकादश भरद्वाजः ॥ २० । २७ ०८।१४॥ १-६ में है। ऋषि गोषूक्रयश्वसूक्ति- नौ कारवायनौ हैं। २० । २८ ऋ०८।१४।७-१८ में है। ऋषि पूर्ववत् । * बीच के २६-३२ सक्तों के छन्द ऋषि हस्त लेखों में नहीं हैं। २० । ३४ ऋ०२।१२ में है अपि गृत्समद है। | इस २० । ३४ सूक्त के मंत्र, साहेता में हैं और अनु. क्रमणी के ऊ. बी दोनों मूल लेखों में यहां पञ्चदश लिखा है। २० । ३५ ऋ० १॥ ६ में है। ऋषि नौधा गौतम है। २० । ३६ ऋ०६।२२ में है। ऋषि भरद्वाज बार्हस्पत्य है।
।। १० ११ खं०६॥ . [१८६ ।
२०३७।
१'यस्तिग्म शृङ्गः' एकादश वसिष्ठः ॥
२० । ३८।
१ या याहि सुपुमा' उक्तमिन्द्रं तृचं मधुच्छन्दा गायत्रम् ॥
२०३६
१'इन्द्रं वः' पञ्च, व्यन्तरिक्षं चतसृणामुक्तम् ॥
२० । ४० ।
१ इन्द्रेण' तृचं ३'आदहं मारुती ।।
२० । ४१ ।
१'इन्द्रो दधीचः' । गोतम ।।
२०।४२ ॥
१'वाचं कुरु स्तुतिः ॥
२० । ४३।
१ भिन्धि' त्रिशोक्यः ।।
२०॥ ३७ ऋ०७।१६ में । ऋषि-वालेष्ठ है।
२० । ३८ । ऋ०८।१७।१-३ और ऋ० १।७।१-३ में है
ऋषि हारेम्बिठिः काण्व ऋषि॥
२०।३६ ऋ०१।७।१०, तथा ८।१४। ७-१०॥
२० । ४०।०१।६।७, ८, ४। में है। ऋषि, मधुछन्दा है
२० । ४१ । ऋ०१।४।१३-१५ । में है । ऋषि गोतमो
राहूगण है।
२० । ४२।०८।६५। १२, ११, १० में है। ऋषि-प्राथाथः
काएव है।
२०१४३।०८।४५ । ४०-४२ में । ऋषि-त्रिशोका
काराव है।
[ १८७ ]
।।प०११ खं०६॥
२० । ४४ ।
१ सम्राजम्' इरिम्बिठिः ॥
२०। ४५ |
१ अयमु ते' शुनःशेपो देवतापरनामा ।
२०। ४६।
१ प्रणेतारम्' इरिम्बिठिः ॥
२०।४७॥
१'तमिन्द्रम' द्वाविंशतिः सुकमस्तिसृणामिन्द्रादय उक्ता
एकोनविंशतिः ॥
२० । ४८।
१ अभि त्वा' द्वाभ्यां सूक्ताभ्यां खिलौ ।।
२०॥४४।०८।१६।१-३ में है ऋपि-इरिम्विठि कारव है।
२० । ४५।०१।३०१४-६ में है अषि-शुनाशेप बाजीगतिः।
२०४६।०८।१६ । १०-१२ में है
२०। ४७।१-३ ऋ०८।६३ ७-६ में, ४-६ ऋ० १ । ७ ।
१-३ में, ७-६ ०८।१७ । १-३ मे, १०-१२ ऋ० १।६।१-३ में,
१३-२१ १०१।५० ॥ १-१ में हैं इनके ऋाष क्रमशः सुकक्ष, मधु-
च्छन्दा, इरम्विाठा, मधुछन्दा और प्रस्कएव हैं॥
*२०।१७। सूक्त २१ ऋाचाओं का है परंच अनुक्रमणी में
इसे 'द्वाविंशतिः' लिखा है सो ठीक प्रतीत नहीं होता।
२०।४।४-६ ऋ० १०॥ १८६ । में है और अथर्व । ३१
में भी हैं । अग्वेद में ऋपि सार्पराशी और देवता भी सार्पराज्ञी
और देवता भी सार्पराशी और सूर्य है "
॥ १० ११ ख०६॥
[ १८८ ]
२०। ५०।
१'कनव्यः' द्वयचं मेध्यातिथिः प्रगाथम् ।।
२०। ५१॥
१'अभि ३'प्रवः' प्रस्कण्वः प्रगाथः 'प्र सु' पुष्टिगुप्रगाथम॥
२०। ५२।
१'वयं घ त्वा' तृचं मेध्यातिथिहितम् ।।
२०। ५३
१ क ई वेद',
२०। ५४ ।
१'विश्वाः पृतनाः' रेभोऽतिजगत्युपरिष्टाहत्यौ द्वे ॥
२०। ५५ ।
१'तमिन्द्रं रेभो बृहती ॥
२० | ५६।
१'इन्द्रोमदाय' पड् गोतमस्रष्टुभम् ।।
-
२० । ५० ऋ०८।३।१३, १४ में है ऋषि मेध्यतिथि काण्व है।
२० । ५१ ऋ० ८।४६ । १, २ तथा ८ । ५० । १, २ में है।
ऋषि प्रस्कएव है।
२०१५२। ऋ०८। ३३ । १, २ में हैं। ऋषि मेघाातेधिः-
२० । ५३ । ऋ०८३३ । ७-६ में है । ऋषि मेधातिथिः-
२०। ५४ । १०८।१७।१०-१२ में है। ऋपिरेभः कश्यप है।
२० । ५५ । ऋ०८।८६ । १३. १, २ में है।
२० । ५६ । ऋ०१।१।१-३, ७-६ में है।
[ १८६ ] ॥१० ११ ख०७॥ १'सुरुप कृत्नुम् दश मधुकन्दास्तिसृणां गायत्री । ४ ४शु- ष्मिन्तमं न' इत्याद्यक्ताः । ११ क ई वेद' इत्युक्तः ॥ ६ ॥ १ श्रायन्त इव' पएमृधो द्वयोः । ३ वएमहान्' द्वयोर्भरद्वाज आद्ययारिन्द्रस्तृतीया चतुर्थ्यः सूर्यः प्रगाथः ।। २० । ५8 । १'उदु त्ये' उक्तः । *३ उदित्' द्वयचं वसिष्ठ एन्द्रं प्रगाथः ।। २० । ६० । १एवा हि' पद् तिसृणां मुतकक्षः सुकक्षो वोत्तरासां मधु- छन्दा गायत्रम् ॥ २० । ६१ । १तं ते' दश पराणां गोधूक्तयश्वसक्तिनावौप्णिहम् ।। २० । ५७/०१४-३, तथा ३१ ३७ । ८-११, तथा २॥ ४१ । १०-१२, तथा ८।३३ ७-६, १-३ में है ॥ २० । ५८ ०.८। । ३, ४ तथा १०१।११, १२ में है। २० । ५६ । ऋ०८।३।१५, १६, तथा ७।३२।१२,१३ में है। *सर्वानुक्रमणी में 'उदित्' मंत्र से नया सूक्त द्वयच माना है परन्तु संहिताओं में यह चतुर्गच है ॥ २०। ६०।०८।८१ । २८-३० नया १।८।८-१० में है ऋषि कुसीदी काण्व और मधुचन्दा है । २० । ६१ । ऋ०८।१५। ४-६, १-३ में है। ऋषि गोसूक्लय- श्वसूक्तिभौ हैं।
। प० ११ खं०७॥
[ १६० ]
२०।६२॥
१'वयम् त्वा' इत्युक्ता पएनृमेध उष्णिहं *तम्वभ्युक्का ।।
२० । ६३ ।
१ इमा नु कं भुवना' साधनो वासार्ध चतुर्था अथा-
वाज भारद्वाजो ४य एक इद्' इन्द्र नृपोर्च गोतमः । ७ य इन्द्र'
त्रिष्टुभः शिष्टा उष्णिहम् ।।
२० । ६४।
१ एन्द्र नः' पएनृमेधास्तिसृणां चतुर्थ्याद्यास्तिस्रो गोषू-
क्लयश्वमुक्तिनावष्णिहम् । ४'एदु' तृचं विश्वमना उष्णिहम् ।।
२०६५।
१ एतो नु॥
२०१६२।५-७ ०८।१८।१-३ में है और मंत्र ८-१०
०३।२५।१-३ में है और मंत्र १-४ अथर्व २० । १४ में श्रा-
चुका है । * यह पाठ पढ़ा नहीं गया ।
२०। ६३ । १-३ ऋ० १० । १५७ तथा ६। १७ । १५ में है
मंत्र ४-६ ऋ०१।२४।७-६ में और मंत्र - ऋ०८।१२।१-३
में है।
.
यहां का सारा ही पाठ अत्यन्त भ्रष्ट है। पढ़ना बहुत
कठिन है।
२०।६४।०८।१८।४-६ तथा ८।२४।१६-१८॥
२०६५।०८।२४।१६-२१ ।
[११] ॥ प०११०॥ २०। ६६॥ १'स्तुहि ॥ ७॥ २० । ७८. 14 १ ताति' हि दशाद्याः परुछेपस्तिसृणाम् । ४'यज्ञः' चत- २० । ७समद अाधेन्द्री, द्वितीया मारुती, तृतीयाग्नेयी । चतस्रः कृतयस्तिस्रोऽत्यष्टयश्चतस्रो जगत्यः ॥ २०६८। १ सुरुप कृत्नुम्' इति तिस उताः । ४'परेहि' नव मधु- छन्दा एन्द्रं गायत्रम् ॥ २०।६६। १‘स घा नः' द्वादश । 'युञ्जन्ति' तिस्रः, १२ श्रादह' इत्येका चोक्काः॥ २० । ७०। १ वीलु चित' विंशतिः आधे कै ऐन्द्रमारुत्यौ तिम्रो मारुतः शिष्टा एन्द्रमारुतः ।। २०।६६। ऋ०८।२४ । २२-२४ । २० । ६७।१ ऋ० १ । १३३ । ७ में, मंत्र २ ऋ० ११ १३६ । ८ में है, मंत्र ३ ऋ० १ । १२७ । १ में है, मंत्र ४-६ ऋ० २ । ३६ । २,४,५ में हैं, मंत्र ७ ऋ०२१३७।२ में है। २० । ६८।०१।४।४-१० तथा ११५११-२ में है। २०। ६६ । ऋ०१।५।३-१० तथा १।६।१-४। २०। ७० ऋ० १।६।५-१० तथा १ । ७ । १-१० तथा १1८।१-२॥
॥ १० ११ ख०६॥ [१६२ } पो अया- २० । ७१ । १ महां इन्द्रः' पोडशैन्द्रम् ॥ ८ ॥ २० । ७२ ॥ १'विश्वेषु' तचं परुछेप अत्यष्टम् ॥ २० । ७३। १ तुभ्येदिमा' षड्वसिष्ठस्तिसृणां । ४'यः जम्' विदो वसुक्रदैन्द्रमाद्यास्तिस्रो विराजः । ४ यदा वज्र द्वे जगत्यौ। यो वाचा' अभिसारिणी॥ गान्ट' २०७४। १'यच्चित्' अष्टा शुनःशेपः पांतम् ॥ २०।७५ । १ वि त्वा' उक्ताः । २ विदुष्टे तृचं परुछेप अत्यष्टम् ॥ २० । ७६। १'वने न' अष्टा वसुक ऐन्द्रं त्रैष्टुभम् ।। २०। ७१ । ऋ०१।८।४-२० और मंत्र ७-१६ऋ०१।। में है। २० । ७२ । ०१।१३१ । २, ३, ६ में है। २०।७३।०८।२२। ७,८तथा ८।३१।१० तथा१०। २३। ३-५ में है॥ २०। ७५।०१।१३१।३-५ २०। ७६। ऋ०१०।२६ [ १६३ ] ॥प०११ ख०६॥ २०।७७॥ १'आ सत्यः' अष्टी वामदेव ऐन्द्रं त्रैष्टुभम् ।। २० । ७८। १'तद् : ' तृचं शंयुः गायत्रम् ॥ २० । ७६ । *१ इन्द्रः तुम्' द्वथचं सौदासोरगौ प्रक्षिप्यमाणं शक्तिरत्र्यं प्रगाथमपत्रक्षोार्च उक्त दह्येत् तं पुत्रोक्तं वसिष्ठः समापयाततिशा- द्याय नवकं वसिष्ठस्यैव हतपुत्रस्यार्षमिति ताण्डकमितः प्रगाथ- मागायत्रम् ॥ २०1८०। १'इन्द्र ज्येष्ठम्' द्वयचं शंयुः । २०1८१ । १'यद् धावः' पुरुहन्मा ॥ २०५८२ ॥ १'यदिन्द्र' वसिष्ठः ॥ २८ । ८३। १'इन्द्र त्रिधातु' शंयुः ॥ २०1७७।४।१६।१-८। २०। ७८।०६।४५।२२-२४। २० । ७६ । ऋ०७॥ ३२ ॥ २६, २७ । मूल लेख का पाठ जैसा था वैसा देदिया है परंच इस से कुछ अर्थ स्पष्ट नहीं हुअा। २०1८०1०६।४६।५,६! २०1८१ ऋ०८।७०।५,६। २०।२।०७।३२।१८, १६ । २०1८३ ऋ०६।४६।६,१०॥
॥ १० ११ खं०६॥ [ १६४ ] १ इन्द्रायाहि तृचं मधुछन्दा गायत्रम् ॥ २० । ८५ । १'मा' त्वि चतुष्कमाद्ययोयचः प्रगाथाप उत्तरयोर्मध्या- तिथिः द्वौ प्रगाथौ ॥ २०।६। १'ब्रह्मणा ते' एकचं विश्वामित्रष्टुभम् ।। २०।८७॥ १'अध्वर्यवः' सप्त वसिष्ठ एन्द्रमत्यैन्द्र वार्हस्पत्या त्रैष्टुभम् ॥ २०1८८। १ यस्तस्तम्भ' पड् वामदेवो बार्हस्पत्यम् ।। २०18 १'अस्तेव' चकादश कृष्ण एन्द्रम् ॥ २०।१०। १ यो अद्रिभित्' तृचं बार्हस्पत्यं भरद्वाजौ ॥६॥ २०1४ऋ०१।३।४,६। २०1८५ ऋ०८।१।१-४। २०।। ऋ०.३।३५।४। २०1८७।०७।६८।सूक्ता २०।०४।५०।१-६। २०.६त्रा०१०॥४२॥ २01801ऋ०६।७३।
[१६५ ] ॥प०११ ख०३॥ २० ।।१। १ इमां धियम्' पंचदशायास्यो बाहस्पत्यं त्रैष्टुभमन्त्या- स्तिस्र उक्ताः ॥ ४ उद्यद् अष्टादश प्रियमेध एन्द्रम् । 'अपादिन्द्रः' अधर्चा विश्वेदेवो वरुण इत्यधर्चा वारुणी । १६'यो राजा' इत्याद्यानां पुरुहन्मन्द्र प्रगाथौ । २० 'यद् द्यावः' द्वे उक्ने । २० ॥३॥ १'उत् त्वा' अष्टौ प्रगाथः । ४ ईडयन्तीः पञ्चदेव जामय एन्द्र मातर एन्द्रं गायत्रम् ॥ २०६४। १ ा यातु' एकादश कृष्ण एन्द्रं जागतम् त्रिष्टुवादि द्वि त्रिष्टुबन्तम् ॥ २०६१।०२०६७। २०।१२।०८।६६।४-150 * २०१६१ को यहां पञ्चदश लिखा है, संहिता में इस मुक्त के १२ मंत्र हैं और २० । १२ को अनुक्रमणी में १८ मंत्रों का लिखा है परंच साहिता में वह सूक्त २१ मंत्रों का है। अनुक्रमणी लेखक ने ६२ सूक्त के श्रादि के तीन मंत्र ६१ मुक्त में मिलाये हैं।
॥ प० ११ ख० १०॥ [१६६ ] २० 18५। १'त्रिकद्रुकेषु' पद् तिसृणां गृत्समदोऽन्त्यानां तिसृणां- सुशब्दा आद्याष्टि द्वयोरतिशक्करी चतुझ्द्यायाः शक्कर्यः ।। २०।१६॥ १'तीव्रस्य' त्रयोविंशतिः दश पूरणस्रष्टुभमन्त्याः पञ्चोक्का ब्रह्मणा परणां रक्षोहा गर्भ संस्तावे प्रायश्चित्तमित आनुष्टुभम् । १७ अक्षीभ्यां ते' इति षडताः।२४ अपेहि प्रचेता दुःस्वमनी ॥१० *२० । ६५ । सूक्त संहिता में चार ऋचाओं का है सर्वानु-. क्रमणी में जो इसे 'षट्' लिख कर षडच माना है यह ठीक नहीं ॥ २०। ६६ । सूक्त यहां २३ ऋचाओं का लिखा है और मंहिता में इसकी ऋचाय २४ हैं इस सूक्त के विषय में दोनों मत है । वृहत्सर्वानुक्रमणी में इसे त्रयोविंशति २३ ऋचा वाला लिखा है और वैतान सूत्र में इसे चौबीत ऋचा वाला माना है । "तीवस्याभिवयसोऽस्य पाहीति चतुर्विशतिमावपते" वैतान सूत्र ३४ । २० (गाद्वारा सम्पादित पृ० ५०) इस प्रमाण से दोनो मत सिद्ध होते हैं। अब विचारणीय यह है कि दोनों का अाधार क्या है ? परञ्च इस पन निर्णय से पूर्व हम इस एक बात को स्फुट करना अत्यन्त आवश्यक समझते हैं, वह यह है कि इस समय प्रामाणिक अथर्वसंहिता दो ही छपी हुई मिलती हैं। एक बिटने और रॉथ की जो उन्हों ने बर्लिन (जर्मनी) १८५६ में छपवाई थी और दूसरी सायण भाष्य सहित अथर्व- संहिता जो शंकर पाण्डुरंग पण्डित ने निर्णय सागर प्रेस बंबई में वंबई गवरमैण्ट के लिये १८६५ में छपवाई थी।
[ १६७] ॥ प०११ खं०१०॥ इसके साथ सेवकलाल बंबई वाले ने भी अथर्वसंहिता को छापा था परन्तु वह सर्वथा वर्लिन वाले वेद की नकल ही थी। अजमेर वैदिक यंत्रालय में जो अथर्वसंहिता छपी है वह पाण्डुरंग के श्राधार से छापी गई है। अब एक आपत्ति नई आती है, वह यह कि बर्लिन में जो अथर्वसंहिता छपी है उस में इस २० । १६ सूक्त के मंत्र तेईस ही आते हैं। पर आश्चर्य इस बात का है कि बर्लिन संस्करण में तेईस ऋचायें जो भाती हैं उनका पाराडुरंग वाली संहिता से बहुत भेद है पहले तो दो मंत्र उस में नहीं हैं जो कि पाण्डुरंग की अथर्व संहिता में हैं। एक-'हृदयात् ते परिक्लोनो हलीदणात् पार्थ्याभ्याम् । यक्ष्मं मत्स्नाभ्यां प्लीहो स्यनस्ते वि वृहामसि । और दूसरा "अस्थिभ्यस्ते मजभ्यः। यक्ष्मं पाणिभ्यामलिभ्यो ननेभ्यो ग्वृिहामि ते" इन दो मंत्रों के अभाव से पाण्डुरंग सम्पादित संहिता की अपेक्षा इस राथ सम्पादित संहिता में बाईस मन्त्र होने चाहिये थे परश्च इस बर्लिन मस्करण में 'मेहनादनं करणा- लोमभ्यस्ते नखेभ्यः । यक्ष्मं सर्वस्मादात्मनस्तमिदं वि वृहामि ते' एक ऋचा अधिक है जो कि पाण्डुरंग वाली संहिता में नहीं । इस एक ऋचा के योजन से बर्लिन संस्करण में इस सूक्त की तेईस ऋचा होती हैं। अब इस विषय पर विचार उत्पन्न होता है कि दोनों महिनामा में जो यह गड़बड़ी श्रागयी है. इसका निर्णय क्या है ? इस बात के मानने में हमें ज़रा भी झिजक नहीं कि अभी तक जितनी भी संहितायें छपी हैं उनमें कहीं न कहीं पाठ भेद तथा अशुद्धिय अत्र- श्य रह गई हैं; परन्तु यह दोष तभी दूर हो सकेंगे जब कि कुछ अन्य हस्त लिखित संहितायें वा अथर्व वेदीय प्राचीन ग्रंथ मिलेंगे ॥प० ११ खं० ११॥ [ १६८ ] २० । ७॥ १'वयं तचं कलिरेन्द्र प्रगाथा बृहती ।। २० । ६८। १ त्वामिद्धि द्वन्यचं शयुरेन्द्र प्रगाथः । तो। इस मुक्त में दोनों प्रकार की संहिताओं में बहुत ही पाठ भेद है। इसका कारण जहां तक मुझे प्रतीत हुआ है वह यह है कि सर्वानुक्रमणी और गथ नं २० । ६६ । सूक्त की १-१६ सोलह ऋचा तो आरम्भ की ली हैं। ६ ऋवा ऋग्वेद मंडल १० सू० १६३ की ली है और एक ऋचा ऋग्वेद १० । १६४ मूक्त के प्रारम्भ की ली है। सर्वानुक्रमणी का पेसा करना ठीक भी प्रतीत होता है क्योंकि इस बीमवे काण्ड के प्रारम्भ में ही यह लिखा है, कि इस के ऋपि देवता छन्द आदि आश्वलायन के क्रम से कहे जायेंगे । आश्वलायन ऋग्वीय था अतः यहां पर अनुक्रमणी काऋग्वद के आधार पर लिखना ठीक है। राथ ने जो २० । ६६ सूक्त की २३ ऋचाय दो है, वह भी ऋग्वेद और सानुक्रमणों के आधार से ही दी है। पाराडुरंग सम्पादित संहिता में जो २४ ऋचाय दी है उसका श्राधार यह प्रतीत होता है कि १६ ऋचाय २०। ६६ सूक्त के प्रारम्भ को और सात ऋचायें 'अक्षीभ्यांत' उस अथर्व २ काराड ३३ मन को और एक 'अपहि' वाली इस प्रकार २४ चौवीस ऋचार्य वहां बनाई गई हैं। दोनों ने अपने २ श्राधार से लिखा है। परञ्च दोनों में ठीक पक्ष क्या है यह तो सर्व अथर्ववेदीय साहित्य के प्राप्त होने पर कहा जा सकेगा। २०।१७। ऋ०८।६६ । ७-६ में है। ६।४६ । १,२ में हैं। ।
[ १६ ] ॥१० ११ ख. ११॥
२० ।।
१'अभि त्वा' मध्यातिथिः प्रगाथः ॥
२० । १००।
१'अधा हि तृचं नृमेध उष्णिहम् ।
२० । १०१।
१ अग्निं दतम्' मेध्यातिथिराग्नेयं गायत्रम् ।।
२०।१०२।
१'ईलन्यो विश्वामित्रः॥
२०। १०३।
१ अग्निमीलिष्वावसे' दिति पुरुहन्मीह्वावन्यतरो वाघयो-
योर्भग आधे बृहत्यौ । तृतीया सतोवृहती ।।
२०।१०४।
१ इमा उ त्वा चतुष्कं द्वयोमध्यातिथिरैन्द्रं प्रगाथोऽन्त्ययो
नृमेधौ प्रगाथः ॥
२० । १०५॥
१'त्वमिन्द्र' पश्च नृमेधः प्रगाथावन्त्यांत ।।
२०॥६६॥ ८।३।७-८ में है।
२०।१८०1 =
11 ७–१ में है।
२०।१०। १ । १२।१-३ में है।
३।२७।१३-१५ में है।
२०।१०३।
८।७१ । १४,४६, १, २ में है।
२०।१०४। ८।३।३३, ४ तथा १०।१,२में हैं।
२०। १०५।१-३ ऋ०८।८।५-७ और ४,५
८।५६ । १, २ में हैं।
२०।१०२।"
॥५०११ ख०११॥ [ २०० । २० । १०६। १ तव त्यत्' तृचं गोषक्रयश्वमूक्तिनावौष्णिहम् ॥ २० । १०७॥ १ समस्य पञ्चदश वत्सस्तिसृणां मूर्यो देवी कुत्स एन्द्र- मन्त्या सोरी जगती । ४ तदिदास' नव, १३ चित्रं देवानां देवोक्काः ॥ २०।१०। १ त्वं न इन्द्रा' तृचं नृमेध एन्द्रमन्त्या पुरउष्णिगाद्या गायत्री द्वितीया ककुर ॥ २० । १०१ ॥ १ स्वादोरित्था' गोतम पन्द्रं ॥ २० । ११० । १ इन्द्राय सुतकक्षः सुकक्षो वा गायत्रम् ॥ २० । १११ । १ यत् सोमं पार्वत उष्णिहम् ॥ २० । १०६ । ऋ० ८।१५। ७-६ में है। २०.१०७१-३ ऋ०८।६।४-६ तथा मंत्र ५-१२ ऋ० १०॥ १२० में है मंत्र १३ अथर्व १३।२।३४ में है मंत्र १४,१५ ऋ०१।११५१, २ में है। २०। १०८ । ऋ० ८ ६६ | १०-१२ में है। २०।१०६॥ १८४।१०-१२ में है। २०।११०॥ ८।१२।१६-२१ में है। २०। ११.१ । । ८।१२।१६-१८ में है।
[ २०१ ] ॥१० ११ ख०११ ।।
१'उभयं शृणवत्'
२० । ११२ ।
१'यदद्य सुकक्षः॥
२०। ११३ ।
द्वयचं भर्ग आग्नेयं प्रगाथः॥
२०।११४।
१'अभ्रातृव्यः' सौभरीरेन्द्रं गायत्रम् ।।
२० । ११५॥
१'अहमित्' तृचं वत्सः ॥
२० । ११६
१ मा भूम' द्वयचं मेध्यातिथिरन्द्रं वाहतम् ॥
२० । ११७।
१“पिबा सोमम्' तृचं वसिष्ठो विराजः ॥
२० । ११८।
१'शग्ध्यूषु चतुष्कं *भगंत्यियोर्मेध्यातिथिः प्रगाथः ॥
२०।११।
१ अस्तावि' द्वयचमाद्याया मायुर्द्वितीयायाः श्रुष्टिस्टेष्टुभम् ।।
२० । ११२ । १०८।६३१४-६ में है।
२०।११३॥
८।६१।१, २ में है।
२०।११४। ८।२१ । १३, १४ में है।
२०।११५ ८।६।१०-१२ में है।
२०।११६॥ ८।१ । १३, १४ में है।
२० । ११७॥ ७।२२।१-३ में है।
२०।११८॥ ८।६१ ॥ ५, ६, ३, ५, ६ में है
२०।११। ८।५२ । ६ तथा १५५ । १० में है।
* पाठ पढ़ा नहीं जाता।
"
"
॥ प० ११ ख० ११ ॥ [ २०२ ]
२०। १२० ।
१ यदिन्द्र' देवातिथिः प्रगाथः ।।
२० । १२१।
१ अभि त्वा' प्रगाथः ॥
२०।१२२ ।
१रेवतीः' तृचं शुनःशेपो गायत्रम्
२०। १२३ ॥
१'तत् सूर्यस्य' द्वयचं कुत्सः सौ- त्रैष्टुभम् ॥
२० । १२४ ।
१'कया नः' *पद् वामदेव इन्द्रो गायत्रमभीष्टुपाद निवृत् ॥
२० । १२५ ।
१ अपेन्द्र' सप्त सुकीर्तिश्चतुर्थी पञ्चम्यावाश्चिन्यौ त्रैष्टुभम् । चतु-
Wनुष्टुप् ॥
२० । १२६ ।
१'वि हि' त्रयोविंशतिषाकपिरिन्दाणीन्द्रस्य समूदिरे
पकिम् ॥
२०।१२० । १०८।४।१,२ में है।
२०। १२१॥ ८।३२ । २२, २३ में है।
२०।१२२॥ १।३०।१३-१५ में है।
२०।१२३॥ १ । ११५॥ ४, ५ में है।
२०।१४। ४॥ ३१ ॥ १-३ तथा १०।१५७ और ६ ॥
१७ । १५ में है मंत्र ४-६ अथर्व०२०। ६३ में भी पाचुके
* मूल में 'कृ' पाठ अशुद्ध लिखा था । षट् पाठ हमारा है।
२०। १२५ । ऋ० १०॥ १३१ में है।
२०।१२६। १०।८६ में है।
"
[ २०३ ] ॥प० ११ ख० ११ ।। २० । १२७ । *१ इदं जनाः खिलः ॥ २०।१३७॥ .१ यद्ध प्राचीः' चतुर्दशाद्यायाः शिरिम्बिठो लक्ष्मीनाश- न्यनुष्टुप् २ कपृन्नरः' बुधो वैश्वदेव्यत्विक् स्तुतिजगती । ३'दधिका' अनुष्टुप् ४ सुतासः' तिसृणां ययातिः सोमः पव- मानोऽनुष्टुप् । ७'अब द्रप्सः पञ्चानां तिरश्ची द्यतीनाविष्या- मिवः पादो मरुतः । परैन्द्रा बार्हस्पत्या शिष्टा ऐन्यखिष्टुभः १२ तमिन्द्रः' तिस्र उक्ताः ॥ २० । १३८॥ १'महां इन्द्रः' तिस्र उक्ता महा इन्द्रं तचं वत्स ऐन्द्रं गायत्रम् ।। २० । १२७ । से १३६ सूक्त पर्यन्त कुन्ताप सूक्त हैं। इनका पदपाठ नहीं मिलता और न ही पैप्पलाद शाखा में ये आते हैं। वैतानसूत्र ६।२ में इसके विषय में लिखा है कि “इदं जना उप- श्रुतेति कुन्तापम् अर्धर्चशः । चतुर्दश पदावग्राहम्" इस कुन्ताप सूक्त का वर्णन विशेष रूप से एतरेय ब्राह्मण की पष्ठपंचिका के ३२ वे खण्ड में किया गया है । अनुक्रमणी में इने खिल जानकर इसके छन्द आदि नहीं दिये, किन्तु केवल खिल कह कर ही समाप्त कर दिया है । साहता तथा वैतान सूत्र में पाठ 'जना' है परन्तु सर्वानुक्रमणी में 'जनासः' पाठ दिया है । २०।१३७।१०१०।१५५।४ तथा १०१ । १२ में तथा४। ३३।६तथा ६।१०१।४-६ तथा८1८५१३-१७ तथा८२ यह पाठ ठीक पढ़ा नहीं गया। जो कुछ समझा है वह दे है २० । १३८ । ऋ०८।६।१-३॥ में है।
।। प०११ खं०११॥
[ २०४ ]
*
२० । १३६ ।
१'श्रा नूनम्' पञ्च शशिकर्ण आश्विनमाद्या चतुर्थी बृहत्यौ ।
द्वितीया तृतीये गायत्र्यौ । पञ्चमी ककुप् । शिष्टा अनुष्टुभः ॥
२०। १४१ ।
यातम्यामाद्या विराट् द्वितीया जगती बृहत्यौ तृतीयानुष्टुप्
२० | १४२ ।
१'अभ्युत्स्यु पडाद्याश्चतस्रोऽनुष्टुभोऽन्त्ये गायच्या ॥
२० । १४३।
१ ते वा नव पुरुमील्हाजमीह्नावाश्विनं त्रष्टुभम् । ८(क) मधु-
मतीः' वामदेवः । ८ (ख) क्षेत्रस्यपतिः', 8'पनाय्यं मेध्या-
तिथिमध्यातिथिरिति ।।१२।।
इति श्री ब्रह्मवेदोक्लमंत्राणां बृहत्सर्वानुक्रमणिकायां एका-
दशमः पटलः समाप्तः। विंशतितमं कार
समाप्तम् संवत्
१८११ वर्षे मार्गशीर्ष शुदि १६ मंदवासरेण लिषितं सुपेश्वरेण ।।
।। शुभं भवतु ॥
२०। १३६ । ऋ०८।६।१-५. में है।
* पाठ नहीं पढ़ा जाता।
२०।१४० ऋ० में।।६-१०॥
२०। १४१ । ऋ०८।३।११-१५॥
२०११४२॥ ऋ०८।६।१६-२१ ।
२०।१४३। ऋ०४।४।१-७तथा४। ५७ । ३ तथा
ऋ०८।५७।३॥
बृहत्सर्वानुक्रमणिका विशेषपदसूची। पृष्ठ । पक्तिः पृष्ठ । पंक्तिः " अञ्जनम् २६ । १३, १७२। ५, ७ अत्यैन्द्रः १६४ । ५ अक्षः ३५। ११ अक्षि ७३ १५ अत्र्यम् १९३।३ अथर्वाणः १२।१ अग्नयः २४ । ६, १०; २५।२ अग्निः २।११; ३ । ५,५। ३. ६, अथर्वाणम् १।२ १०, १३, १२ । ७; १३ । ३, ६; अदितिः ६६ । १ १४॥ ३, ६, ११: १५ । १०, १६। अध्यात्मदेवत्यम् १०५॥३, ११०॥ ६; १६ । २, ४, ५, ६,२२।२, ३, २: १११ । २,११६।११, १३० । ३ ४. ५, ६, १०, २६ । ६, ३६ । ३ अध्यात्ममन्युः। ११६ । १५ ३८ । २.४० । १४, ४२ । ३ ४३। अनड्वान् ३० । ३, ४, ६ ३.४५ । ४,४८ । ३, ४: ५४।१३ | अनुमतीम् ७२ । ६ ५७ । २,६३।४८२ ७.१२५॥ अनृणकामः ६३ । १६ ११,१७६।२ अन्तरिक्षम् ।। १३, १३ । १६; अग्निम् ३६ । ७,१८।६ २६ । १,३६६ अग्नीन्द्रम् ६।११ अन्धतामिनः २६।८ अग्नीषोमीयम् १८१८:५५॥ १३; | अन्नम् २६ । ७ ८७॥ १२ अपचिङ्गैषज्यम् ८१ ॥ ११ अग्नीषोमौ ५।४, १६ ।। अपामार्गः ३२।५ अग्ने १८१८२८।१५ अपामार्ग वोरुत् ७६ । ११ अध्य: १४।२ अपोनप्त्रीयम् ४१७ अघ्न्या१६ अप्सरः ३५। ६ अज श्रृंगी ३५। ५ अप्सरा ३५। ७, १२ [ २ ] पृष्ट । पक्तिः पृष्ठ । पंक्तिः . अभयकामः५३।७:५५५ प्रा अभिसमनस्कामः ६२। ६ आग्नेयम् ५ । १०, ८ । १२. १५ । अभिवर्तमाणः । १६ ६; १९ । ६३१ । १,२,३४।६: अमावास्या ८२।८ ३५ ४:३७ । ६:५५ । ३.५७ । अरातीयः ३६।८,६ १६६६२।५, ८, ७६।४,८० अरिएक्षयकामः ५१ । ६ ८२।६:८३।४।२,६:५६। अरिनाशनम ७८ । ११ १४, १६,६१ । १० १२४ । ४; अर्कः ५८।१ १३० । १४, १६८।१४:१७०१२३: अर्थ मूक्तम ८६ । १३ १७४। १०१७५।६ २७६।३: अर्थमुत्थापनगणः ३६ २०१।२ अर्थापनयनम ७५ । १ आग्नेयः ३६ । १४:४४॥३, १६३६६ अर्बुदिः ११६ । १७ आग्नेयानि ६३।१५ अर्यमा ५।१६ आग्नयी ४५११३:६२१६:१८२४ अवस्वन्त २६।२ आग्नयो ३५ । १८ अविनः३।१० अान्यम् ५७।१५, ८१७ अशनिः २६।८ आजम् १०० ११ अश्मानम् ४।७ श्राज्यम् ३२१ अश्वः ३२। १५. अातिथ्यम् १०१।३ अश्वत्थः २०।१,३ प्रात्मा २८।५,४३।२६८।३, अश्विनौ १०। ३,१६१६:१४३१४|४, ७१ । ६ ७६ | १४, ८६ । ८3B अटका २०।१६:४०।१ १७३।१५ अटकः १८५।३ आत्मगोपनम् ४७ । १३ असिनी ७।१२ श्रात्मदा २८ । ५ अस्तृतमाणिः १७२ । १३ श्रार्थवणगणः १।५ अस्थि ३०।२ श्रादित्यः ३।३, ६, १४॥२, १७॥ अस्थिभ्यः १७ । १७, १०, १३ । ३:२८।४, ३६।२, [ ३ ] पृष्ठ । पंक्तिः अाश्विन्यौ २०२।६ " har पृष्ठ । पंक्तिः ३८ । १२; १०५।१, १४७ । ११, | १३; ६२।५,६७। १३; ७७।१, ८१।२, २०४।१,५ आदित्यम् २६ । ६:५६ । ३ श्रादित्य गणः ३।३ अाविष्यवः २५.। १० श्रादित्य रश्मिः ५० । ७ आष्टक्यम् २० । १५ आदित्यदीन ४२ । ११ प्राष्टिकम् २५ । १६ आन्त्रेभ्यः १७ । १६ प्रासुरी ८।१, २; १४।१८; १ प्रापः३।११, १५४।८, ६ १,२,३; ६२।१,७४।२ १५ । ११, १६। १६ः २० । ६ | श्रासुरम् ५। १२, १३ २१ । १०, १२, २८१७, ८, ३१३१३, | अंहोलिंगगणः ३ । १२ ५०।१२, १३,६०।६: १७६।। प्राप्यम् १५। ६:२६।६७ ५५७; १०८।१ इडा ७३।१ प्रायास्यः१६५।१ इन्द्र: ५।६८।७१२।३१४॥ आयुः २ । १६६ १४। १५, १६ १७ १६ । १८, १६; १८ । १०; १६॥ १६ । १७:४५ । १५, ५७ । १,४,५,१३; २२।१,२, ४, २०, २५॥ १७०।१ २, २६। ६:३०।४,५; ३२०१५, श्रायुष्कामः ६। १, २०।५, ४५॥ १६; ३३।४,४८।४,५,६०१. १५, ७७।३ १७६।२; १८२।४, १८६।२; आयुष्यम् २१ । १, ७३।८ १८७।४; ११०।३, २०२१५; श्रायुष्यगणः २।१६, ३।४ २०३८ आर्यमणम् ५६ । ११ इन्द्रबृहस्पती ७६ । ५ आर्षभम् २६ । १; ८७६; ६६।१६ | इन्द्र सेना १६ । ७ प्राशापाला:६४ इन्द्रस्य २०२८ श्राशापालीयम् ।।४ आश्विनम् १७ । १; ५५।५; ५७। । इन्द्राग्नी ३ । १३, ३६ । १० इन्द्रवायू २४।८ [ ४ ] पृष्ट । पंक्तिः पृष्ट । पंक्तिः इन्द्राणी २०२।८ इर्ष्याविनाशनम् ४६ । ७ १६८।२; १९६। ७; २००।२, ७,८; २०१। ३, ५, २०३।८ पन्द्र मारुतः १६१।६, १० पन्द्राग्नम् १०।३:२१ ।१४ २८७।३; पन्द्राग्ने १२८ उच्छिष्टम् ११६ । ११ उच्छुष्मौषधिः २८ । १४ उरुभ्याम१७ । १५ उलूकः५१ । । उपा १४८।१२ पन्द्री ७ । १,६:३८ । ४; ३६ । १४, ७०।३.१६१ । ३ पन्द्रयः १६५ । ५:२०३६ ऋक १७३।५ ए पश्वर्य्यम ६।२० ऋक्साम ७७।७ ऋचः १६२।३ ऋत्किक २०३।३ ऋपमम् ३५।१२ ऋषिः । ५:१७८।१,२, ४ श्रो श्रोजः १४ १५, १६:१६।। श्री ए पकपः ४१ । १२:५६।१४ औदनिकम ११३।१ पन्द्रम् ७ । ७; २३ । १०; ३२१३ | औदुम्बरमणिः १६६ । १० ४२ । १६; ५७ । ७ ५८।८५६ ६;७३। ७, ७६।१ः ७८।१; क ८० । ११; ८४ । १, ४५। कलिः १६८।१ २, ६६३ । १६, १६३ । ६; १७ कर्म १७६।८ ६; १८२।६; १८५।४; १८६।। कपोनः ५.१ ।। ४, ५; १९२।१, ४,८; १९३।१; | कबंधः ५- 18 १६४ । ५, ७; १६७३, ५, ७, ८; | कल्माषग्रीवः २६ । ८ [५] पृष्ठ । पतिः . पृष्ठ । पंक्तिः काल: १७४।५ ख कामः २६ । १६; ६८१४, १७४१ खरवखा ३१ ।१४ कामात्मा ४८।१,६ खिलः १८७।६; २०३।१ कामिनी १७ । २ कामेषुः २५ । १५ खिलाः १७८१५ काश्यपेयम् ६४।१० ग कासा६२।१० गण:१।१ कितवबधकामः ७५ । ११ गन्धर्वः ११॥ ६, ७; ३५। ५ कुष्ठम् ३८ । ५,६; १७१।४ गन्धर्वाप्सरः ११ । ६,७ कृत्या ३२।६ गर्भः ४३ । ११, १२, १६६।४ कृत्यादृषणम् २।९; ४१ । २: गर्भहणम् ४६ । १५, १६ ४५। २०; ६२।६:१०६।२ गर्भरक्षणम् ६३।३ कृत्या परिहरणम् १३ । १० गव्यः १०३।१४ कृत्या प्रतिहरणम् २ । ६; ३६ । गव्यम् ५२ । २ ६:४१ । २ गाव:३२।११ कृत्या प्रशमनम् ४६।१ गिरिः१६।४ कृमि जम्भनम् १७ । ६ कृशनम् ३० । १. केशवर्धनकामः ६७।३ गुल्गुलुः १७१।१ क्रिमयः १७।८ गृध्रः८५। ७ क्रिमि जम्भनम् ४२ । २० गृभ्णामि २०।१० गोष्ठः २१ । १४ क्ष गौः ३२ । १५ क्षत्रम् १६ । १६ ग्रामः ३२ । १५ क्षत्रियराजा ३२।१६ घ तुद्रः ११०।१ क्षुद्रकाण्डम् ८६।१३ धर्म८१ । १,२ गुरुधुक २६ । १० पृष्ट । पंक्तिः पृष्ठ । पतिः च जामयः १६५।। चन्द्रः ३।५, १३ जायाकामः२५ । १६, ५६।५ चन्द्रमाः२। ५:३।२,२२,२०; जायापहरणम् ४१ । १७ ८।१८, १४।६:१५। १०; ३२। जायाभिवृद्धिः ५८ । १४ १४,१७,३६।२४३५ जायान्यैन्द्रः ८२।? चन्द्रमसम् ३०। ११; ८३।६; जीवम २६ । १२ १.३६। ५, १६६। १३ जंगिडः ११।१४ चातन गराः२।११ जंगिडमणिः ११ | १५ चान्द्रमसम् ३।१७।८।१०; ६) २४; ११।१४,२५।१७। ५, त १४, २३ । १०; २५।८;२७।३; २६।८, ४१ । ११: ५०।१६ तक्मनाशनम् ३८६४२।१६,१७; तक्मनाशनगरगः २०१६ ५२।१६, ५३ । ६५७। ७; ५६ । तक्मापवाधः ४२। १६ १;८४।१४,८८।१,४; १०७। तता:४३ । ७ २; १०८।१; ११६।८, १६२ । तपः १४।२२७२।१३ २७१६३।२; १६८।१:१६६।२ ताराडकम १६३५ चान्द्रमस्यौ ५८ । १३ तारके २०।६ छ नाय॑म् ८४ । ३ तिरश्चिराजी २६ । ७ जगद्रीजम् २०।२ तृवृत् ४५। ३,४; जन्मान्धः५६।११ तृष्टिका ८७।१० जारमायुः १६ । ११, १२, १३ त्वष्टा १६ । १७.५८।१४ जातवेदाः १६।१७; ३६ । ३, १०; त्वाष्ट्री ५८ । १३ ४० । १४,४५। ६५८।१२८१विषिः ५३।४ ६;८६।१०; २७ । १५; १७६। त्रिनाम ८६ त्रिवृत् १६८ । १७; १६६ । १ , ५;
द [ ७ ] पृष्ठ । पंक्तिः पृष्ट । पंक्तिः त्रिधिः १२० । १० देवसेना ४२ । १० काकुदाञ्जनम् २६ । १२ देवातिथिः २०२।१ देवी २००।२ दौष्वप्नयः १७४ । १४ दशगणा: २८ दक्षर्षिः १०।४ द्यावापृथिवी १३ । २, १५, १६। १३, १६; २०। १२; ३३१६; दण्डकाः १२७ । १६ ४३।३ दन्तः६७।८ द्यावापृथिवीयम् ।।८; ७३ । ५ दम्पती ५८ । १५ १६५। ३; दर्भमाणः १६६ । ७ द्यौः १४ । १३; १६ । ५. १०४।२४ दिक ३६ । २ द्रावणोदाः६।१८; ३८ । २ दितिः १६६ । ५ द्विषोहर्तुकामः ७०।६ दिवा ३६।२ दिव्यः ११ । ६,६ ध दिव्याप्यम् ६५ ।। धनम् १६ । १७; २२।३ दीर्घायुः ५८ । १५ धनपतिः १८।१० धनरुचिः २२।४ दुःस्वप्न नाशनम् २।१८,५४। ३, ७१। १४८६।४; १४८ । ७ धन्वन्तरिः ११।११ दुःस्वप्ननाशनगणः २०१७ धाता २०।१० दुःस्वप्ननी १६६ । ५ धौव्ये ६०।२ दुारेतापमृष्टिः ७६ । १२ न दुन्दुभिः ४२ । ६, १०; ६५ । १२ नक्षत्रम् १६४।२ दुहिता २७ ।। नक्षत्रराजा ६५। १८ दूर्वा १२ । १० नरक:५४।१० " शाला ६२ । ११ नाना ५०।१ देवपत्नी ७५८ . नावम् १८।१२ [ ८ ] पृष्ट । पंक्तिः पृष्ठ । पंक्तिः नितत्नि ६७४ पार्थिवम ७१ ।। निलिम्प २६।२ पार्जन्यम् ३ । १८, ७१ । १ निति १३ । १, २, ५१ । ६,५७१ पार्वतः २०० ।। नित्यपस्तरणकामः ६५ । । पांचपत्यगणः ३।५ नृपः १६०।३ पांचपत्यानि १५ । नैऋतः ५६ । १६:५६ । : ७६E | पिता ११ । ५ नैतानि ५१।८ पितृ १५५ ।। प पितृन् १४।१; २६।७; ३१ । ६, पञ्चदेवः १६५६ ४३।७; पतिः८५। १० पित्र्या ७०।३१५७।८ पतिवेदनः १८।८ पिप्पली ६३।१.२ परिपाणम २६ । १३ पुरुषः २०।२; १६३।१० पवमानः २०३।४ पुष्टिकामः १६६ ।। पशव:१६।६ पृदाकु २०। ७ पशुः२६ । १२ पृश्निपर्णी १६।४ पशुभागकरणम् १८।१ पञ्चभगः२२। १७ पशुपतिः१८।२ पंचौदनम् १००।४ पर्णः १६।१८ प्रजा ७३ । १० परमात्मा १७७।३ प्राजापत्यम् २५ । १३:३२ पर्जन्यः३।१८, ३१ । ६,८ प्रपणम् २२।३ पाराशर्यम् ५७।८ प्रपा २७।६ पाशुपत्यम् १८।१ प्रविध्यन्त २६।१ पाप्मा ५११४ प्राजापत्या ४८।१४ पाप्मस्यम् ३४।६ प्रारणाः १४ । १६, १६४५ । १५, पाप्महा२।१५ ११८।१४ गरणः२।१५ प्राणायानौ १४ । १४, १५, १५॥२, " [ . ] पृष्ठ । पंक्तिः पृष्ट । पंक्तिः पौर्णमासम् ८३।१ पौरुपम् १०६ । १४ पौष्णम् ५। १५ पोस्नम् ६३ । १; ६६।८ फ फालमणिः १०६ ।। ब्रह्मचारी ११८ । १५ ब्रह्मचारिणी ६६ । १२ ब्रह्मगवी ४२ । २, ३, १२६ । १० ब्रह्मगव्यम् ३२ । ११ ब्रह्म जाया ४१ । १६, ब्रह्मज्यम् ४२ । ३ ब्रह्मणस्पतिः ४८।४ ब्रह्मप्रकाशिसूक्तम् १०६ । १६, १७ ब्रह्मसूक्तम् ।। ब्रह्मणस्पत्यम् ८।१६ ब्रह्मवर्चस्कामः ६६१ ब बलासः४६ । ७ वहु८८।४ बचम् १६३।१ ब्राह्म ७६ । १३ . बलकामः ५७ ।। वाणपर्णी २३ । ७ बार्हस्पत्यम् २२ । ६; २५ । ५; २८।३; ५६ । ७,५७ । १३; ६६ । ७; ७६।४, ७७ । ४,७८ । १; १७१ । ६,१८३।१,१६५।१ वार्हस्पत्या १०३। ६; १६४।५, ब्राह्मणः २६ । ४, ३६ । १; ४२।२, ७१।१३ ब्राह्मणस्पत्यम् ८।१८,४८।३ ६२ । ३; ६७।८६३।६,१६८। ६, १७५ । १२ भ बार्हस्पत्यौदनम् ११५ । ७ बुधः २०३।३ ब्रह्म १३ । ३; १४। ३.३६।१० ब्रह्मकाण्डम् १६३।१ ब्रह्मणा १६६।४ ब्रह्मलोकः ८६ । ५ ब्रह्मकर्म ४३ । २ भगम् १८ । १९, २२ । १२, २४ाह भव शौं ३३८ भर्गः २०१।२ भूतपतिः १४ । ११ भूमिः २६ । १६; २६ । २; ३६६ भैषज्यम् ७४ । १४ गरणः :२।५ [ १० ] पृष्ट । पंक्तिः पृष्ठ । पंक्तिः भैषज्यायु २।६; ११ । ११, १२ । ६; ६३।२ भैपज्यायुष्यम् ६३।८ भौमम् १२२ १२ मारुत् ७।५; ३२।८ ५०।८ १११।१० मारुती १८६।४ मार्त्यम ४६ । ५ मात्वी १०८ । ११ मित्रम् ३।१८ मित्रावरुणो ११ । १२, ३३ । १० म ४३।४ मृगारः ३३।१,२ मगडूकः ३१ । ६ मधुः ६८।१ मधुला ४१।८ मधुकमणिः १०१ मधुवनस्पतिः १०।२ मनोमन्थनम् १७ । २ मन्युः ३४ । ६६ ५३ । १२ मन्याविनाशनम् ५१ । १ मन्युविनाशनम् ६० । ५ मन्युशमनम ५.३ । १४ मरुतः१४।२।१६।४, ५, १६; ३१६,८३३ । ६:४३। ५, ७३। १०:५२। ३,१७६ । २,२८२।४; २०३।६ मरुत्पितरः ४३।६ मही १७।५,६ मर्त्यः ५.७ । १ मातरः १६५। ७ मातनामागणः २।१२ मानुष्येष्ठवी ७।१ मृत्युः ४३।१ः५७ । १ लोकः ८६ मेखला ६६।१०, ११ मेधा ६२। १५, १६ मैत्रम् २०१८ मैत्रवरुणम् २५ । १५६१।७ मैत्रवारुणी ७।५ मंत्रद्रया १६ मंत्राशिपः १३६।५ यज्ञ:८५।१० यशसम्पूर्णकामः ८५.। १० यशियपशुः१८।४ यक्ष्मनाशनम् २।१६६ ५, २०, ८।४, १२ । १३, २० । ४, ६, २१ । २; ३८।५:५०।३;६०1८ ६५।१५.
[ ११ ] पृष्ट । पंक्तिः पृष्ट । पंक्तिः , यच्मनाशनकामः ५६ । १३ रेतः ४६।। यक्ष्मनिर्गमनम् १७ । १५ रेभः १८८ । ५, ६ यमविवहणम् १७ । १३ रोहिणि ३०।८ यमः ६।४, ३६।८,४३॥६,५१६ | रोहितः १३० । ३ यमसदनम् १४।२ रौद्रम् २८ । ६; ३३। ८, ५६ ॥ ६, यमिनी २६ । १२ १२, १४, ६०।४, १२, ८४।६; यशस्कामः५६, ६,५७ । १४ रौद्गगणः२।७ याक्षिकम् १७५। ६ रौद्री ३८ । ३,१५५ । ५ यातुधानः५।३ रौद्रीया ७११ यातुधानी ८।१३ रोद्यौ ५५ । १४, ५६ । २, ३ याम्यानि ५। ७ ल याम्यम् ६।३ लक्ष्मीः८७।१५ युद्धोपकरणानि ६५। १३ नाशनी २०३।२ योनिः २५।८, १४३।११ लाक्षा ३८।११ योषित् ६।१४ लाक्षिकम् ३८ ।। र लाङ्गलम् १३।४ रक्षोहा १६६ । ४ लोहितवासः६।१५ रायः २४। ७ ५८ । १५ व रम्यान गृहान् ७६ । २ वज्रम् ६६ । १५, १७६ । ५ 'राजा १६ । १० वनस्पतिः८।१५१२।६, ३२१५ राज्याभिषेकगणः ३ । १० वधूवासः १३६ । ७ राज्याभिषेक्यम् २६ । ८ राज्योपकरणम् ३२ । १५ वरुणः ३ । १३ ५। १३ २६। ७ रुद्रः १६ । १०, ३६ । २; ११४।४/३१ । ६; ३६।८; ३८।१४।४ रुद्रगणः २६;३८।१३ ८७६१६५।४; वरणम् १०७।२ [ १२ ] पृष्ठ । पंक्तिः पृष्ठ । पंक्तिः वरुणस्तुतिः ५५।८ १६३ । १६.१०१२;२०७।२२०४। वशा ११२।२; १२६।६ १९७०1८ वसुः ५।८.११; ६।२:१४।१ वानस्पत्यानि ६७।३ ३६।१० वानस्पत्या ७८।४ वसुक्रः१६२।८ वामीयम् १०४ । १८ वसुक्रत् १६२।४ वायसः८५। ७ वसूनि ५७ । २ वायत्या १५ । ६४८।१३; ६७ । वर्चः २५ । ५, ५७ । १ १४; ६८।३ वर्चस्कामः ५३ । ४,५७ । १४ वायुः ३।५; १५ । १०; १८।३; वर्चस्यम २५। ५ ३६।१,६;४३ । ५ वर्चस्यगणः २।१० वायुसविताग ३३ । ५ वर्षम् २६ । ६ वारुणः ५११२६।३, १२:२१ । वाक३।१६३४।१: ७४ । ११ ११; ३१ । १७३७।५;८३।१२, १४७। २०; २७५। २० वाचस्पतिः ३।८३।१६, २१ वारुणी ७।६:५५1८:१६५४ वाचस्पत्यम् ३।१७ वासिष्टम् १६४।८ वाज:२४।८ वास्तोष्पतिः२।१४, २१ । ६ वाजिनम् ६० । १०, ११ ४०।१:७६।३ वाजी १६८।१२ वास्तापतिगणः २।१३ वातः १३।६,२६ । १५:३११८ वास्तोष्पत्यम् ।। ५; ७६ । १; वातपत्नी १३ । ५ विद्या १०१।४ वानस्पत्यम् ७।११, १६ । ३,२० । विद्युत् ६ । ३; ३१ । १३ १; २३ । ६; २५ । १२; २८ । १३ ! विराट् ६५ । २ २६ । ५; ४२॥ १,७४२।८:४६ विरूपाः १७६ । १ ६; ५४ । १, ५६ । १२, ६१ ॥ १, ३, | विश्वकर्मागणः ३ । ८ १४:३५ । १२, १४, ६७।८, ७४ । विश्वकर्मा १८।३,६ , [ १३ ] पृष्ठ । पंक्तिः पृष्ठ । पंक्तिः व्युक्तः २६।१ शकधूमः ६५। १८ शतायुः १६ । १८ विश्वजित् ६२ । १३ १४, ५६।१:५७।२७, २०३।३ विश्वानरः २२।५ वैश्वदेवत्या ७।२ विश्वेदेवाः । । १, १०॥५, ५४|१३, | वैष्णव्या ७१ । १६ ६०।१३;६३।१२, १६५।४ व्यन्तरिक्षम् १८६ । ३ विषम् ४०।१६ व्याघ्रः २८ । ६; २६।१० विष्णुः २६ । ८ व्याघ्रादि ११४ । २ क्रमः १०८।१० वीरुत् १० । १; २६ ।। वीरुधः ३१ । ७ श वृश्चिकः ७८।४ वृषकामः ५६ । १४ शतवारः १७०।११ वेदः ७३ । १ वेधाः १६६ । १० शतौदनम् १११ । १६ वैद्यतम् ६।२, ३ शाला १४।६९९८ वैनायकम् ६ । १७ शालासूक्तम् २२ । ६, ७, वैराजः २५ । २१ शान्तिगणः २।८ वैवस्वत् ६३ । १३ वैश्वकर्माणम् ६५।४ शितिपादाविः २६ । १७, १८; वैश्वानरः १५ ॥२, ६३ । १६ शुनासीरः २३।४ वैश्वदेवाः । । १,१० । ३, २० । शृङ्गः १७ । १२, २६ । १; ३३।१६ ८२० । १२०, २२ । १,२३ । शेपः ५८।१:६२। ४ १०, २५।४,३०। ११:५७ । ४.शेरभकः १५। १४ ६३।११; ६५।४, १६४।८; १७॥ शंखमणिः २६ । १५ शंतातीयगणः २।५ वैश्वदेवी ३८ । ३, ३६ । १४, ४८। शंतातीयम् १६४ । श्येनः ७४ । ७, ८०।६ शाम्यम् ५२।३ -- - पृष्ठ । पक्तिः पृष्ठ । पक्निः सुफाला २३।३ श्वेतलक्ष्म ७।१२ श्रुष्टिः २०६।८ सुहार्दः २६ । १५ सूर्यः ३ । ५: ७ । १०: १५ । १० स १६।१०३६।६:४३।५:१८४ सपत्नः८।१७ ८, २०० । २ क्षयकामः१५।५:५चा सूर्यचान्द्रममम् ८३।५ मर्ययमम १३ । ५ भना ४२।। सनामाहनम १६।२ सरस्वती ७० । २:१५५ सलिलगणः ३।६ मनाहननम् ३।१६ मंधवः ६।८ सविता १६। ५.१७: २२ । ४; सामः २८:४।१८।६; २३ सारस्वतम ७४।५, ७८८८०१: ४२५।१:३६।८,४३१५:४८ सारस्वते ६६ । ११ ४:४८।६:१३६।४ः२०३।४ सारस्वत्यम् ६०।१४ सम्राट ८३।६ सारस्वत्यौ ३६ । ८, ६; सत्यौजमम ३५। ३ सावित्रम् ४७ । ५: ७०1८, १२, सप्त प्राणाः १४ । ३ १७३ । १६ सभ्यम् ७०।१ सावित्री ६१ । १३: ७१ । १६:८७ सम्पत्कामः १२।६८३८ सर्वकामः १७०।१ सांमनस्यम् २० । ६; २७ । ३,४; सप्तर्षयः ५५ । २ ५७।४५८।४.७, ७७।१ स्मरः६६।५ सिनीवाली ७५। ६ स्कम्भः ११०।२ सीता २३ । १, २, ३, ५. स्तनयित्नुः ३१ ॥८ सीरा २३।१,२ खजम् ३६१८ सीसम् ६ । १२ स्वरक्षणकामः १७७।४ सुखम् ८०।२ स्वविवाहः १३६।४ [ १५ ] पृष्ट । पंक्तिः पृष्ठ । पंक्तिः ho स्वर्गीदनः १२५ । १० सौर्यम् ७ । ६; १५ । ६; ८६/११ स्वस्त्ययनकामः ८।११, ४७ ।। १७६ । ४, ५, ७, १३, ४६ । ६; ५२ । १६, ५३ । ८: | सौर्या ४८ । १३; १७६ । १२; २०२।४ संस्फानः १८ । १६ संयमः २८।११ हरिणः २०। ४, ५ संवत्मरः ३१ । १२ हरिमा ७ । ६ सोमारूद्रीयम् ३८ । १० हस्तिवर्चसम् २५।४ मद्रौ ३८ । १३ हिनः ४६ । १४ सोमाकी १३१ । ५ हिरण्यम् १०।४; १८।११; ३०११ः सौधन्वना ५४ । १२, १४ मौरी २००।३ हिरण्यपाणिः २५ । १ सौमी ३८ । ३ हिरण्यवर्णाः । १४ सौम्यम् ७ । ४, १६ । १३, १५ । १७७०।५ हृद्रोगः ७।१० मौम्या ७।५,६१।४, १३ हतिः २५ । २०, ३६।१ सौम्यान १४ । २ हैरण्यम् १६८ । १४ सौनजाः १६ । १० इति हृदयात् १७ । १६ H बृहत्सर्वानुक्रमणिकान्तर्गतऋषिनामानि । पृष्ठ । पंक्तिः पृष्ट । पंक्तिः ११; ७५। ३, ७७ । १:७८ । ३: ७६४,८०।५८१।१०, ८२॥ अगस्त्यः६६।१० ६,८८४५, ६,१४,८५ । ४, अङ्गिरा४।१,२८1५. ३५ । ६:८;६३1८; ६४ । २० १७,४०।१४।४।३.६५।२७: 61 । १; ६८।१:१०७११:११०॥ ७६।१;८२।३८८।११:१०६। २१.६७।७:१७०।८ १०; १२२ । २; १५३।२:१६५ । अजामील्हा २०४।५. ३; १६७ । १६:१६८।१४:१७०॥ अथर्वा २।६, ७, २०७३।२,५, १३; १८/३ ८, ६, १२, १३, १७,४८५ । ६६/८;७४, १०८।१२; अथर्वाकांतः४।८ ६।२,१०।२; ११।१४,१२ । अथर्वाचार्यः ।।? १०; १४ । ६; १५।८; १६ । १५; | अथर्वाङ्गिग ३।११:२६ । १८।२; १६। ३,२०।२, ४, ८, ५८।१६०।१५:६२।४।१। १०, १६: २३ । ७, २५ । १६:५;८७ । १४, १६३ । ५; २८ । १०; ३० । १, ३१ ॥ ६, ३२ । | अप्रतिरथः १६५.12 १४, ३३।६ ३४ । ११,३८।११६ श्रयास्यः १८३।१ ४०। ६४३।१४५१२,३,४७) अश्वमूनी १८५। १; १८६ । ८; ५, १३, ४६॥ ६,५२ । ११, ५२ ।। १६०।६; २००।१ १६,५५। ५,५६।६,५८ । ५, श्राश्वलायनः १७-१४ १४, ५६ । १३, ६०।११;६१।८% ६२।४६५।१;६६।१,६७३, ६६ । १; ७० । ६, ७१ । २, ७३ || इरिम्बिठिः १७६ । ६:१८७१,३ - her पृष्ट । पंक्तिः पृष्ठ । पंक्तिः उच्छोचनः ६२ ।। उहालक: २६ । १२; ४६ । १० उन्मोचनः ६२ । १२ उपरिवभ्रवः ५२।२ ६६ । ८; गृत्समदः १८३। ७; १८५ । ४, ७; १६१ । ३,१६६।१ गोतमः १७६ । ११८२ । ३, ७: १८६।५; १८८।७:१६० । ३: १।७ २००।७ गोपथः १६८।१३:१७३।५ गोषूक्ती १८५। १; १८६ । ८:१६०। ५,२००१ ऋ ऋभुः ३०1८ क चातनः २।११।५।२६।१२; कपिञ्जलः १६ । ६८५। ६ ८।१३,१४।१०; १५। ५; १६ । कश्यपः ११२।१:१२६।४ ३; ३५ । ३,४५। ६; ५२ । ११; कबंधः ५८।६. ५८।१४६१।६ कागवः १७।६:४२ । १० ज कांकायनः ५७ । १५; ११६ । १६ / जमदग्निः ४८।१४,६२१५ कुत्सः १११ । १; १८१ । ३,१८२० | जगदीजं पुरुषः २०१२ ३; २०० । २; २०२।४ जाटिकायनः ५२ । ११,६३।१४ त त्रिशोक्यः १८६ । ७ कृपणः २८३ । २; १६४ । ७;१६५०५ द कोरुपथिः ७८।६; ११६ । १४ द्रविणोदाः ६।१८ कौशिकः ५२ । ११; ६३ । १६; द्रुह्वणः ३३ । ११,५६ । १६ १०८।१० ग नारायणः १०६ । १४; १६३।१० गरुत्मान् २६ । ४; ४० । १६,४६। नृमेधः १६० । १; १६ । २, ८, ४;६१ । १४,४।७; १०७।८ ६; २००५ गार्यः ५५ । ३,१६४। २ नोधा १८१ । ५,१८५। ५ [ १८ ] पृष्ठ । पंक्तिः पृष्ठ । पंक्तिः पुरुमल्हा २०४।। प २५। ६; २६। १२, २७।८; २८ । पतिवेदनः१८।६ २, ३, २६ । १, ३१ । १७, ३४ । परुच्छेपः १६१ । २; १६२।२ ६,१९३६।२,३८।२; ४०१२; पुरुहन्मा १६३।८; १६५ । ५; ४२।८४३ । १२, ५१ । ४, ५३। २६४।५ १०, ५५ । १३; ५७। १६६३। १२; ७१।४,१६, ७७। ३, ७६ । प्रजापतिः १७ । १; १८।३; २२॥ | १,८६।८; ८७।६; १०। २; ४;३१।८३५। १:४६।२:८६ ६३। २०६६ । १६; १०१ । ३, ५; १७२। १३ १०५।१७ १०८।१३, ११३ । १: प्रमोचनः ६२। १२ १२८ । १४; १३०।२, १४७११; प्रशोचनः ६२।। १५१ । १; १६३।१; १६७ । ५; १६६ । ७,१७०। ११, १७१। ६ प्रस्करवः ७४|४,१८८।२ प्रियमेधः १८३ । ४; १८४ । २. १४, १७३ । १५,१७५।५, २७७१५ ब्रह्मा ऋषि २।१३, १५, १६ १६५। ३ ब्रह्मास्कन्दः ३४।५ भ बभ्रपिङ्गलः ४६।८ भगः ५६।५; ६६ । १, २ यादरायणिः ३५ । ५, ७८ । ११ भरद्वाजः १३ । १६, १८१ । ३. बृहस्पतिः२।२१; ५। ४; १४ । १८५। ६, २८१ । ३,१६०।३; ६; २६॥ ३,६४१।१७:५३।३] १६४।८ बृहच्छुक्रः ५५ । ११ भागलि: ५५।६ बृहद्दिवोऽथर्वा ३७।७ भार्गवः ७।१० ब्रह्मा २।८; ३॥ ३, ६, ११, ६ । भार्गवो वैदर्भिः ११८।८ ५४, २०, ७ । १० ८।२,८, भृगुः २५ । १३, २६ । १२; ५; ११।३; १४ । २, १६, १५।३१। १,५१।८६५।४,७०८ १४, १७ । १४, २१ ।२, ७, १५, ७८।१४।१८६।१२, ८७। .
[ १६ ] पृष्ट । पंक्तिः पृष्ट । पंक्तिः ३,१००।४, १२४।४; १७०।। य २७२।५,१७४।५ भृगुराथर्वणः १२।१ यमः२।२८५४|४, ५७।। भृग्वंगिराः ५ । २१, ८ । ५, १६, ७ । १५, ७६८; ८६ । ३, १२५॥ १२ । १४, २०। ५, २१ । २,१२, १०, १४८ । ७, १५२ । २; १५३११ ३०। ३,३८।५४२। १५, ५०। १६२। ३,१७४ । १४ ४:५३ । १३; ६०। ६; ६१ । २: | ययातिः २०३।४ ६५ । १४,८५।२६३११८६६ व ७; १२० । २०; १६८। १७, १६६। १२७१।४; १७७।४ वत्सः २००।२:२०१।४२०३८ वसिष्ठः ८।१७; २३ । ११, ३२। म १३,१८२।२.१८३।५:१८६। मधुछन्दा १८६ । २; १८६ । १,६; १,१८६।५; १६२।३; १६३२३, १६१।५; १६४।१ ४, ५, १६४। ५, २०१६ मयोभूः ४१ । १६ वादरायणिः ८६ । १६ मातृनामा २ । १२; ११ ॥ ६, ७ | वामदेवः २० । १३, ७८ । ७.१.८ ३२।८; ६३।१,२ विश्वामित्रः २३ । २; ४७ । ७; मायुः २०१८ ५४ । १,६७ ११४; १७६ । १,८; मारीचिः कश्यपः ७६ । ६ १८१ । १,२,३; १८२ । १, २, मात्वी १०८।११ १८३।६; १८४।४, १६४ । ४, मार्व्यः १२४ । १२ मृगारः ३३।२ ३; १६३।१७१६४। ६, २०२।५, मेधातिथिः ७१ । १८ २०४६ मेध्यातिथि: १८१ । ५, ६; १८३। वीतव्यः ६७।३ ४, १८८।१; १६४।२; १६६१, | वृषाकपिः २०२।८ ३, ७, २०१।५, ७२०४।७ वेनः ११ । १, ३, ४,२८।३
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श
१४:०।२; ११६ । ७; १७२१६
शक्तिः १६३।३
शंभूः १६ । ११
शतानीकः १०।४
शंयुः १६३ । २, ७, १०.१६८ । २,
शशिकर्णः २०४।१
स
शिरिम्बिटः २०३।२
सविता १६।५. १६६ । १०
शुक्रः २।६; १३ । ११, ३२।४; | सवित्रीसया १३६ । २
३६ । ७४१ । २: ४५ । १०, ६६ । सिन्धुद्वीपः ४ । ८४ । १०
१६, ७६ । ११:६२।६
१०७। १६:२६३।४
शुनः शेपः ५१ ॥ २,८३।१:१८४) | सुकक्षः १८१ । २, १८७ । ४६
७; १८७।२:१६२।६:२०२।३१८६।६; २००।८:२०११
शौनकः १२ । ६:४६ । १२:६२। सुकीर्तिः २०२।६
१६. ७०।२८३।८
सुतकक्षः १८६।६; २००।-
शंतातिः २ । ६ । १५, | सौदासः १९३।३
३० । १२, ४८ । १५, ५० । २; सौर्भागः १८२।१।२१।३
५५ । ७; ५६ । ५; ६०।१३; ६२।
-
इति पदसूची समाप्ता।
वैदिक छन्दः परिचय। गायत्री उष्णिक अनुष्टुप् बृहती पंक्तिः त्रिष्टुप् जगती ३ पाद | ३ पा० ४ पा०४पा० ४ पा०५पा० ५ पा० १ आर्षी २४ ३६ ४८ २ देवी २ २ ३ ६ ३ आसुरी १४ १३ १२ 10 ४प्राजापत्या ૧૨ १६ २० २८ ३२ . याजुषी ६ १० ११ ૨૨ ६साम्नी १२ १४ १६ २० ૨૨ - ७ श्रार्ची १८ २१ ३० 32 ३६ ८ ब्राह्मी ३६ ६० (गायत्री भेद) ७ अक्षरों के तीन पाद की पादानवृत् । प्रथमपाद ६, द्वितीय तृतीय ७० का अतिपादनिवृत् ।प्र० तथा द्वि० पाद : के तु, ६ का वह नागी । प्र०६ का द्वि० तृ० के वह वाराही। प्र०६ द्वि०७ तृ०८ वह वर्धमाना। प्र०८ द्वि०७४०६वह प्रतिष्ठा ।प्र० १२ द्वि०८ वह द्विपाविराट् गायत्री। ११ अक्षरों के तीन पादों की त्रिपात् विराट् गायत्री । ( उष्णिक भेद ) दो पाद ८ के एक १२ का ऐसे २८ का उष्णिक । प्र०८ द्वि० १२ १० ८ ककुप् । प्र० १२ द्वि० त०८ का पुराणक् । प्रद्वितृ०१२ का परोष्णिक ।प्र० द्वितच०७ का भी उष्णिक होता (अनुष्टुप्भेद)८० के चार पाद ऐसे ३२ का अनुष्टुप् । कहीं एक पाद का और दो १२ के वह त्रिपात् अनुष्टुप् । (बृहती) जव एक पाद १२ का शेष तीन ८ के तब ३६ का बृहती।प्रद्वितृ० १२ च०८ वह पथ्या बृहती। प्र०८ द्वि० १२ ४० च०८ वह न्यंकुसारिणी (स्कंधोग्रीवी, उरोबृहती) है। प्र० द्वि० ४० च०१२ का वह उपरिष्टाहती।प्र०१२द्वि०४०च०८ का वह पुरस्ताद्वृहती। तीन पाद १२ १० की महाबृहती, (सतोबृहती)। (पंक्तिः भेद जब दोपाद १२के दो के वह ४० अ० की पंक्तिः । प्र० १२ द्वि०८४० १२ १०८ अ० की सतः पंक्ति ।
प्रत० ८ द्विष्च० १२ की भी सतः पंक्ति है। प्रद्वि०८ तृ०च०१२ की आस्तार पंक्तिः। प्रद्वि०१२००८ की प्रस्तार पंक्ति । प्र०पद्वितृ०१२च० की विस्तार पंक्ति।प्र०१२.द्वि० तृ०८च०१२ की संस्तारपंक्तिः। प्रद्वितच०५.अकी अक्षर पतिः।। अक्षरी के पांच पाद की पदपंक्तिः । पांच पाद - अ० की पथ्यापंक्ति। (त्रिष्टुप् तथा जगती भेद) एक पाद ११ का शेप चार ८ के वह ५ पाद की ज्योतिप्मती त्रिष्टुप । एक पाद १२ का शेप चार ८ के वह ज्योतिष्मती जगती। प्र० ११ का शेष चार के वह पुरस्ताज्ज्योतिः त्रिष्टुप् । प्र० १२ का शेष चार ८ के वह पुरस्ताज्योतिर्जगती । प्र० द्वि० ८ तृ० ११. च०६० ८ की वह मध्ये ज्योतिः त्रिष्टुप् । प्र० द्वि०८ तृ० १२ च० पं०८ की मध्येज्योतिर्जगती । प्र० द्वि० त० च० ८ पं० ११ की उपरियाज्योतिः त्रिष्टुप । प्र० द्वि० तृ० च०८ पं० १२ की उपरिटाज्ज्योतिर्जगती। जव एक पाद ५ अक्षरों का हो और शेष पाद निज नियम के हो तो छन्द शंकुमती होते हैं। जब एक पाद ६ अक्षरों का हो और शेष पाद निजनियमों के हो तो छन्द ककुम्मती होते हैं। आदि अन्त के पाद बहुत अक्षगें के हो, मध्य के थोड़े के होतो छन्द पिपीलिक मध्या होते हैं । श्रादि अन्त के पाद थाड़े अक्षरों के, मध्य के बहुत अक्षरों के हो तो यवमध्या छन्द होते हैं। अक्षर १०४ का उत्कृतिः, १०० का अभिकृतिः, १६ का संकृतिः, १२ का विकृतिः, ८८ का प्राकृतिः, ८४ का प्रकृतिः, ८० का कृतिः, ७६ का अतिधृतिः, ७२ का धृतिः, ६८ का अत्यष्टि. ६४ का अष्टिः, ६० का अतिशर्करी, ५६ काशर्करी, ५२ का अति जगती, ४८ का जगती। (१) गायत्र्यादि छन्दों का एक अक्षर न्यून हो तो वे निवृत् गायत्र्यादि छन्द जानों (जैसे २३ अक्षर की गायत्री निवृद् गायत्री और. २७ अक्षरों का उष्णिक निवृष्णिक ऐसे सब ही छन्द जानों)। (२) गायत्र्यादियों में २ अक्षर न्यून हो तो विराड् गायत्र्यादि जानों जैसे २२ अक्षरों का विराङ् गायत्री, तथा २६ अक्षरों का विराडष्णिक । (३) एक अक्षर अधिक हो तो भुरिक् गायत्र्यादि, जैसे २५ अ० का भुरिक् गायत्री २६ अक्षरों का भुरिगुप्णिक् । (४ दो अक्षर अधिक हो तो स्वराड् गायत्र्यादि जाना । जैसे २६१० का स्वराड् गायत्री और ३० अक्षरों का स्वराडष्णिक। इसी प्रकार अन्य छन्द भी जान लो॥ इति
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ओ३म् दयानन्द महाविद्यालय संस्कृत-ग्रन्थमाला*। १-अथर्ववेदीया पञ्चपटलिका. अथर्ववेद का तृतीय लक्षणग्रन्थ । १) २-ऋग्वेद पर व्याख्यान, ऋग्वद शाखा है वा नहीं, तथा ऋग्वेद किम ने बनाया ? इन प्रश्नों पर विचार। ११) ३-जैमिनीय उपनिषद्राह्मणम् । सामवेद का आरण्यक । २॥) ४-दन्त्योष्ठविधिः । अथर्ववेद का चतुर्थ लक्षण ग्रन्थ। ॥) ५-~~-अथर्ववदीया माण्डूकी शिक्षा । १) ६–अथर्ववेदीया बृहत्सर्वानुक्रमणिका । ४) यन्त्रस्थ । काठकगृह्यसूत्रम्, with extracts rom tires commentaries. Elited by Dr. W. Calam, Utrecht, Holland २. - रामायणम् ( बाल्मीकीयम्, पश्चिमोत्तरशाखीयम् ) अयोध्याकाण्डम् । सम्पादक गोस्वामी रामलभाया, एम० ए० । ३.... -वैदिक कोषः । सम्पादक श्री हंसराज पुस्तकाध्यक्ष * ॥ भेजकर स्थायी ग्राहक बने और ३/४ मूल्य पर सव ग्रन्थ प्राप्त करें। MA--
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॥प०६ खं० १०॥ [ ६६ ] ८ । १० । पर्याय ३। १'सा वनस्पतीन्' इत्यष्टौ । प्रथमा चतुष्पदा विगडनुष्टुप । २'तस्माद् वनस्पतीनाम्' आर्चीत्रिष्टुप । ३'मा पितॄन' इति तिस्रः चतुष्पादः प्राजापत्याः पंक्रयः । ४'तम्मात पितृभ्यः ६ देवेभ्यः', 'मनुष्येभ्यः' इति तिम्र प्राचीवहन्यः ।। ८। १० । प०४ । १‘सासुरान्' इति द्वे पोडशके । तत्राद्या ५'मापिनन् । ५ । १'सा देवान्', ५ । १३'मा मान्' इति चतुष्पादः मानां- जगत्यः । २ तम्या विरोचनाः', ६ यमः', १० मनुः'. ५ । १० 'कुबेरः', ५ । १४ तक्षकः' इति साम्नां बृहत्यः। ५। १ नां देवाः', ३'तां द्विधा' इति साम्न्युष्णिहाँ । ४ तां मायाम्', ८ स्वधाम्'. ५ । ४'ऊजीम्'. ५। १६ तद्विपम्' इत्याच्चनुपरभः । ७'तामन्तकः' आसुरी गायत्री ।'मा मनुष्यान'. १३'मा मान- पीन्', ५ । ह'सेतरजनान' इति चतुष्पाद उष्णिहः । ११ नां पृथी' प्राजापत्यानुष्टुप । १२ ते ऋषि', १६ तद याम' ५। तं पुण्यम्' इत्याची त्रिष्टुभः । १४'तम्याः सामः .॥२'इन्द्रः इति साम्न्युष्णिहाँ । १५'तां बृहस्पतिः' ५ । ७ वमुचिः ५। ११ रजतनाभिः' इति विराइगाय यः ॥ १० ॥ इस में ४ तथा ५ पायों के उदाहरण हैं । ४. उदा. हरणों में केवल मंत्र संख्या चिन्ह ही दे दिया है। और पचम का (५) अंक देकर मंत्र संख्या दी है। 15. बी. अनुष्टप ॥