Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Jain Itihaas
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स्थानकवासी-
जैन इतिहास.
सके.महारी,
दी-
mदारवि. वर्म, इन्दीर.
do-Anan
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A
अन्वेषक-श्री० केसरीचन्दजी भंडारी
मृत्यु-
ता. २७-२-१९२५
ता. २७-८-१८७१
मस्तावना
पर पार्षापाल में आग पर काम और
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अन्येषक-श्री० केसरीचन्दजी भंडारी,
मृत्यु-
ता. २७-८-१८५१
ता. २७-२-१९२५
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उल्लेख अनिवार्य था । अतएव यह आवश्यक है कि पाठकगण उन बातों को उसी भाव में ग्रहण करें जिनसे प्रेरित होकर वे लिपी गई हैं इस पुस्तक में मैंने संतोषजनक प्रमाणों द्वारा यह भी सिद्ध किया है कि जैन धर्म बहुत ही प्राचीन धर्म है, और तथाकथित प्राचीनतम वैदिक धर्म से भी पुराना है। बहुतेरे सज्जन मेरे इस चौंकाने वाले कथन को घडी हिचकिचाहट के साथ स्वीकार करेंगे, क्यों कि अब तक इस संबंध में वे कुछ और ही मानते आये हैं, फिर भी अपनी इस स्थापना के समर्थन में मैंने जो प्रमाण उपस्थित किये है, वे इतने अधिक और जोरदार है कि वे अपने आप ही पाठकों को मेरे इस कथन को बुद्धि पूर्वक मान लेने के लिये वियश कर देंगे। इस पुस्तक को निष्पक्ष भाव से पढने पर यदि पाठकों के दिल से आम तौर पर जैन धर्म और विशेषकर स्थानक- वासियों के सम्बन्ध के समस्त मिथ्या विचार दूर हो सके तो मैं अपने को कृतकृत्य समझेगा । मेरे विद्वान् और माननीय मित्र श्री के.पी. बिडवई, थी. ए ने इस पुस्तक में जैमी दिलचस्पी ली है और मुझे जिम प्रकार प्रोत्साहित किया है, उसके लिए मैं उनका जितना ऋणी होऊ, उतना कम है। पुस्तक की हस्त लिपि को पढ फर उन्होंने कई उपयोगी सूचनायें दी हैं, हस्तलिपि में
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的
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"
यह
हो सकता है वैसे ही उनको साहित्य सम्पन्धी कितनी निर्मल
व उच्च रूचि थी इसका साक्षी मयं उनके द्वारा प्रकाशित
पंचभापिक " मचित्र अर्ध-मागधी कोप व "Serices of
Janism to Indin ' नामके प्रथ है।
मैं
कह चुका हू कि यह पुस्तक उनकी उपरोक्त
अग्रेजी
पुस्तक का हिन्दी अनुवाद मात्र है। संभव है कि
मुद्रणमें व भाषाशैली के अनुसार अनुवाद में कहीं दोप रह
गया हो । आशा है कि सूज्ञ पाठक इस के लिये मुझे क्षमा
प्र करेंगे च त्रुटियों की सूचनाओं भेजकर व वादग्रस्त विशयों
पर अपने सप्रमाण विचार भेजकर आभारी करेंगे जिससे
द्वितीयावृत्ति के प्रकाशन में संशोधन हो सके।
एस के. भंडारी.
मूल्य १२ आने
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।
इन वीरों ने शिकार, बलिदान अथवा अन्य किसी भी
कार्य के लिये किसी जीवधारी की जान लेने का कहा
प्रतिरोध करके विचारे गूंगे जीवनधारी पशुओं की रक्षा की
और सर्वत्र सुस-शान्ति व समृद्धी प्रस्थापित कर दी ।
आत्म-त्याग, उदारता, सत्य-प्रेम और ऐसे ही अनेक
सद्गुणों के लिए, जो कि मनुष्य को वास्तव में श्रेष्ठ बना देते
हैं, क्षत्रिय लोग अति प्राचीन काल से प्रसिद्ध चले आते हैं।
युद्ध
के सकटमय समय में भी उन्होंने सञ्चरित्रता, धीरता,
आत्म-निरोध और कर्तव्य परायणता के ऐसे
प्रमाण
दिये है
कि जिससे उनकी सतान उनके शुभ नामों का स्मरण बड़े ही
सन्मान और आदर के साथ करती है।
इन्हीं नर-रत्नों ने जिनमें असली श्रेष्टता और महानता
ठूस ठूस कर भरी थी, जैन तीर्थंकरों जैसी पवित्र आत्माओं
को जन्म दिया। तीर्थंकरों ने असख्य जीवों की जाने
बचाई और एक ऐमे महान् धर्म का प्रचार किया कि जिसका
यशोगान पेजवान जानवर भी अपनी मौन भाषा में निरतर
गाते रहते हैं।
जैन धर्म के विषय में भ्रम
जिस धर्म का प्रचार ऐसे कर्मवीर योगियों ने किया है,
जिस धर्म में परमोत्तम सिद्धान्त भरे पड़े हैं, जिस धर्म ने
,
ܝ ܗܝܝ
-
(४)
अपमान को सहा और इन विद्वानों की भूलों को सुधारने का
कमी प्रयत्न ही न किया।
लेथब्रिज, एलफिस्टन, वेबर, वार्थ आदि विद्वानों ने
जैन धर्म की उत्पत्ति बौद्ध धर्म से मानी है। इससे यही व्यक्त
होता है कि उनको जैन, हिन्दू और यौद्ध शास्त्रों का ज्ञान
बिलकुल न था। इसी प्रकार जो विद्वान् जैन धर्म को विशेष
प्राचीन हिन्दू धर्म की शाखा मानते हैं वे भी हिन्दू और जैन
शास्त्रों सम्बन्धी अपनी अज्ञानता बतलाते हैं।
इस भ्रम के कारण.
आर्य भापाओं का ज्ञान रखने वाले कुछ विद्वानों ने
जैन धर्म को बौद्ध धर्म की शाखा केवल इसलिए मान लिया
कि इन दोनों धर्मों के कुछ मिद्धान्त आपस में मिलते हैं
परन्तु अब चौद्ध शास्त्रों में ही ऐसे प्रमाण मिले हैं जिनने
इन विद्वानों के वेबुनियाद मत को असत्य सिद्ध कर दिया
है। इसी प्रकार सिद्धान्तों की एकता ही के कारण कुछ
विद्वानों ने जैन धर्म को हिन्दू धर्म की शाखा मानी है।
इन सय विद्वानों ने इस विपय में निःसदेह वडी भारी
भूल की है । उन्होंने न तो अपने भ्रमपूर्ण विचारों के समर्थन
के लिए कभी कोई सतोपजनक प्रमाण दिये और न यह
पतलाया कि हिन्दू धर्म अथवा बौद्ध धर्म से जैन धर्म की
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अपमान को सहा और इन विद्वानों की भूलों को सुधारने का
कमी प्रयत्न ही न किया।
,
लेथनिज, एलफिस्टन, वेबर, वार्थ आदि विद्वानों ने
जैन धर्म की उत्पत्ति बौद्ध धर्म से मानी है। इससे यही व्यक्त
होता है कि उनको जैन, हिन्दू और नौद्ध शाखों का ज्ञान
बिलकुल न था। इसी प्रकार जो विद्वान् जैन धर्म को विशेप
प्राचीन हिन्दू धर्म की शासा मानते हैं वे भी हिन्दू और जैन
शास्त्रों सम्बन्धी अपनी अज्ञानता बतलाते हैं।
।
इस भ्रम के कारण.
आर्य भाषाओं का ज्ञान रसने वाले कुछ विद्वानों ने
जैन धर्म को बौद्ध धर्म की शाखा केवल इसलिए मान लिया
कि इन दोनों धर्मों के कुछ सिद्धान्त आपस में मिलते हैं
परन्तु अव चौद्ध शास्त्रों में ही ऐसे प्रमाण मिले हैं जिनने
इन विद्वानों के वेबुनियाद मत को असत्य सिद्ध कर दिया
है। इसी प्रकार सिद्वान्तों की एकता ही के कारण कुछ
विद्वानों ने जैन धर्म को हिन्दू धर्म की शाखा मानी है।
इन सब विद्वानों ने इस विषय में निःसंदेह वडी भारी
भूल की है । उन्होंने न तो अपने भ्रमपूर्ण विचारों के समर्थन
के लिए कभी कोई सतोपजनक प्रमाण दिये और न यह
पतलाया कि हिन्दू धर्म अथवा बौद्ध धर्म से जैन धर्म की
।
।
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जैन धर्म की उत्पत्ति शंकराचार्य के
घाट नहीं हुई।
हम नीचे चलकर कई प्रमाण इस बात के देते हैं कि
जैन धर्म की उत्पत्ति शंकराचार्य के बाद नहीं हुई।
(१) माधव और आनन्दगिरी ने अपने शकरदिग्विजय
नामक प्रथ में और सदानद ने अपने शंकरविजयसार नामक
ग्रंथ में लिखा है कि शंकराचार्य ने कई स्थानों पर जैन
पण्डितों के माथ शास्त्रार्थ किया था।
यदि जैन धर्म की उत्पत्ति शंकराचार्य के पीछे हुई होती
तो, यह वात कदापि सभव न होती।
(२) शंकराचार्य ने स्वयं स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि
जैन धर्म बहुत प्राचीन धर्म है, क्योंकि उन्होंने वेदव्यास के
वेदान्त, सूत्रों पर जो भाष्य रचा है उसके द्वितीय अध्याय के
द्वितीय पद के ३३ से ३६ तक के सूत्र जैन धर्म के विषय
में---
इन अकाट्य प्रमाणों के रहते हुए यह नहीं कहा जा
उत्पत्ति शकराचार्य के समय में अथवा
मन
in
कार में कीसावा नहीं है
श्री की शाखा नहीं है,
'पालो में अनों का
+7 का प्रतिपादन किया, किन्तु ये चार महाबत महावीर से २५० वर्ष पूर्व पार्श्वनाथ के समय में माने जाते थे। यह भूल बडेही महत्व की है क्यों कि उससे जैनों के उत्तराध्ययन सूत्र के तेईमवें अध्याय की यह बात सत्य सिद्ध होजाती है कि तेईसवें तीर्थकर पार्श्वनाथ के अनुयायी महावीर के समय में मोजूद थे। (६) घौद्धों ने अपने सूत्रों में कई स्थानों पर जैनों को अपना प्रतिस्पर्धी माना है, किन्तु कहीं भी जैन धर्म को बौद्ध धर्म की शात्रा, अथवा नव सस्थापित धर्म नहीं लिखा। (७) मख्खलीपुत्र गोशाला महावीर का शिष्य था, परन्तु बाद में वह पासण्डी-धर्भद्राही हो गया । इमी गोशाला और उसके सिद्धान्तों का बौद्ध धर्म के सूत्रों में कई स्थानों पर उल्लेख पाया जाता है। घौद्धों ने महावीर के शिष्य सुधर्माचार्य के गोन का और महावीर के निर्वाण स्थान का भी उल्लेख किया है। प्रोफेसर जेकोबी ने जैन धर्म की प्राचीनता के जो प्रमाण दिये हैं उनमें से केवल थोडेसे प्रमाणों का ही उल्लेख अपर किया गया है। इनसे निस्सन्देह सिद्ध होजाता है कि जैन धर्म बौद्ध धर्म की शाखा नहीं है, किन्तु उससे प्राचीन है। अब हम यह दिखलायेंगे कि हिन्दुओं के शास्त्र उपरोक्त फथन फा कहा तक समर्थन करते हैं। हिन्दू शास्त्रों में जैन
-
धर्म को बौद्ध धर्म की शासा' होना कहीं नहीं पतलाया।
इन शास्त्रों में सब कहीं इन दोनों धर्मों को पृथक २ और एक
दूमरे से सर्वथा स्वतत्र बतलाया गया है। इस बात के अनेक
उदाहरण इन शाखों में से दिये जासकते हैं, परन्तु यह स्पष्ट है
कि ये उदाहरण उत्तने महत्वपूर्ण नहीं है जितने कि बौद्ध
शास्त्रों के उदाहरण, जो हम ऊपर देचुके हैं। इसलिये अब हम
हिन्दू शाखों के उदाहरणों का उल्लेख यहा नहीं करते।
यदि अन हम जैन शास्त्रों की ओर दृष्टि डालें और यह
मालूम करें कि उनमें बौद्ध धर्म की उत्पत्ति के विषय में क्या
लिसा है, तो कुछ अप्रासगिक न होगा।
चौद्ध धर्म का सस्थापक एक जैन साधु था ।
दर्शनसार में, जिसे देवनद्, आचार्य ने विक्रम संवत्
९९० ( ईसवी सन् ९३३ ) में उज्जैन ( मालवा ) में रचा
था, लिखा है कि पिहिताश्रय नामक जैन
साधु
के एक विद्वान्
शिष्य ने जिसका नाम बुद्धकीर्ति था, बौद्ध धर्म की स्थापना
की थी जिस समय बुद्धकीर्ति पलाश नगर में सरयू नदी के
किनारे पर तपस्या कर रहा था उस समय उसने एक मरी हुई
मछली को पानी पर तैरते हुए देखा । उसने अपने मन में
विचार किया कि इस मछली के साने में हिंसा नहीं लग
सकती, क्यों कि यह तो जीव रहित है। उसने वत्काल हो
(१०)
तपस्या को छोड दी और आग, अपने आप में और जैन
साधुओं में भेद करने के हेतु उसने गेरूआ-भगवे वस्त्र धारण
कर लिए और एक नये धर्म का प्रचार किया जो उसके
य' नाम पर बौद्ध धर्म कहलाया । एक जैन पावली के अनुसार
' पिहितानव, जो पार्श्वनाथ के तीर्थ का अनुयायी था, महावीर
के समय में विद्यमान था । बुद्धकिति पिहिताश्रव का शिष्य
था, इस लिए वह महावीर का समकालीन रहा होगा। इस
से यह पता लगता है कि बौद्ध धर्म का मूल सस्थापक एक
जैन माधु था । इस बात को पुष्ट करने वाले अन्य प्रमाण
नहीं मिलते, इस लिए सभव है कि कुछ विद्वान् इस
कथा की सत्यता पर सन्दह करें, परन्तु इस से हमारे ऊपर
के परिणाम को कुछ भी बाधा नहीं आती।
।
जैन धर्म हिन्दू धर्म से प्राचीन है।
कुछ विद्वानों का मन है कि जैनधर्म हिन्दूधर्म की शाखा है
और उसके आदि प्रवर्तक पार्श्वनाथ (८७७-७७७ ईमा
से पूर्व ) हैं । यह कल्पना भी वैसी ही निर्मूल है । सिध्दान्त
की समानता के कारण जिस प्रकार लैसेन, वार्थ, वेबर
इत्यादी विद्वानोंने जैन धर्म को बौद्ध धर्म की शाखा मान
लिया था उसी प्रकार भूलर और जेकोबी की भी मान्यता है
कि जैन धर्म हिन्दू धर्म की शासा है; किन्तु केवल सिद्धान्तों
.
की समानता उनके मतको सिद्ध नहीं कर सकती, क्यों कि
जैन धर्म के तत्व हिन्दू धर्म के तत्वों से कई आवश्यक पातों
में भिन्न हैं। उन्होंने भूल से जैन और हिन्दू सिद्धान्तों
को समान मान लिया है, इसलिए मालूम होता है कि उन्होंने
इन दोनों धर्मों का अध्ययन सरसरी तोर पर किया है व
उनका केवल अपरी ज्ञान प्राप्त किया है । असली बात तो
यह है कि जैन धर्म हिन्दू धर्म से भी यहुत प्राचीन है । इस
वात के हम कई प्रमाण देते हैं।
जैन धर्म का अस्तित्व रामचन्द्रजी के समय में था।
१ हिन्दु पुराणों में योगवासिष्ठ और हिन्दूओं के
बहुत
से अन्य प्रथों में जैन धर्म का उल्लेस कई स्थानों पर
पाया जाता है।
महाभारत के आदि पर्व के तृतीय अध्याय में २३
और २६ वे शोक में एक जैन मुनि का हवाला दिया है।
शान्ति पर्व । मोक्षधर्म अध्याय २३९ शोक ६ ) में जैनो के
सुप्रसिद्ध सप्तमगी नय का वर्णन है ।
रामायण में भी जैन मुनियों का उल्लेस पाया जाता है।
कहा जाता है कि महाभारत ईसा से ३००० वर्ष पहले
हुवा था और रामचन्द्रजी महाभारत से १००० वर्ष पहले
विद्यमान थे। इसलिए यह कहा जा सकता है कि जैन धर्म,
।
(१२)
यदि अधिक प्राचीन न हो तो कम से कम रामचन्द्रजी के
समय से पूर्व का अवश्य है।
जैन धर्म पाणिनी से बहुत पहले का है।
२ सुप्रसिद्ध वैयाकरण पाणिनी ने अपनी अष्टाध्यायी
में शाक्टायन का कई स्थानों पर हवाला दिया है। शाक्टायन
एक जैन वैयाकरण थे जो पाणिनी के पहले हो चुके हैं।
शाक्टायन का नाम ऋग्वेद के प्रति-शाख्यो में, यजुर्वेद मे
और यास्क के निरुक्त में आया है। कुछ विद्वानों का मत है
कि पाणिनी ईसा से ८०० वर्ष पहले विद्यमान थे और कुछ
विद्वान् , पाणिनी का समय ईसा से २००० वर्ष पहले मानते
हैं । यास्क पाणिनी से कई शताब्दि पहले विद्यमान थे ।
रामचन्द्र घोपने अपने " Peep into the Vedic Age
नामक अथ में लिखा है कि यास्क कृत निरुक्त को हम बहुत
ही प्राचीन समझते हैं। यह प्रथ वेदों को छोडकर संस्कृत के
सब से प्राचीन साहित्य से सबध रसता है।
इस बात से यही सिद्ध होता है कि जैन धर्म का
अस्तित्व यास्क के समय से भी बहुत पहले था ।
३ कई ब्राह्मणों में भी जैन धर्म का उल्लेख पाया
जाता है। उदाहरणार्थ एतरेय ब्राह्मण में लिखा है कि कुछ
यतियों को गीदडों के आगे फेक दिया गया था और इस
प्रकार उनके साथ में कुत्सित व्यवहार किया गया था।
।
(१३)
४ डॉक्टर राजेंद्रलाल मित्र ने योग सूत्रों की भूमिका
में लिखा है कि सामवेद में एक ऐसे यति का वर्णन है कि
जो वलिदान को निंध ममझता था ।
" ॐ पवित्र नामुपवि [1] प्रसामहे येपा नग्न
[नमये ] जातिपा वीरा ॥"
६ इसके सिवाय इसी वेद में जैनों के प्रथम और
बाइसवे तीर्थंकर ऋपभदेव और अरिष्टनेमि का नाम आया है।
( क ) "ॐ नमोऽर्हन्तो ऋषभो ॐ ऋषभ
पवित्रं पुरुहूतमध्वर यज्ञेषु नग्न परम माहस स्तुत
वारं शत्रुजय त पशुरिंद्रमाहुरिति स्वाहा ।।
अध्याय २५, मंत्र १९ ।
(स) ॐ रक्ष रक्ष अरिष्टनेमि स्वाहा ।
वामदेव शान्त्यर्थमुपविधीयते
सोमाक
अरिष्टनेमि स्वाहा ॥
ऋग्वेद सबसे प्राचीन वेद है । इसके अष्टक १,
अध्याय ६, वर्ग १६ में २२ वे तीर्थकर अरिष्टनेमि का नाम
आया है।
"0 स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा स्वस्तिन. पूषा विश्ववेदा
मस्तिनस्ताक्ष्यों अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु।
८ वेदव्यास के अध्याय २, पद २, सून ३३ मे ३६
में जैनों के स्याद्वाद न्याय का उहेस पाया जाता है। इसमें
"
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-
-
प्रख्यात सहभगी नय पर, जो कि जैन धर्म की विशेषता है,
आक्षेप किय । है । वे सूत्र इस प्रकार हैं:-
(३३ ) नैकस्मिन्नसंभवात्-" एक ही वस्तु में
एक ही समय परस्पर विरोध गुण होना
असम्भव है इसलिये यह सिद्धान्त नहीं माना
जा सकता
यहा पर स्यात् आस्त और
स्थात् नास्ति इत्यादि जैन सिद्धान्त के ऊपर
आक्षेप किया गया है।
(३४) एवंचमाकाढून्यम्-" और इसी
प्रकार (
के
निकलेगा कि) आत्मा (जिन शरीरों में) रहती
है ( उनके लिये ) वह उसी प्रमाण से यही
या छोटी है।
जैन सत्व
अनुसार यह सिद्धान्त
(३५)न
पयार्यादयविरोधी
विकारादिभ्यः " यदि हम यह मानलें कि
आकार वारवार बदलता रहता है, वो भी
परस्पर विरोध ( होने की कठिनाई ) दूर
नहीं हो सकती " इसलिये यह मानना होगा,
फि आत्मा में आवश्यकतानुसार फेरफार
होता रहता है।
(३६) अन्त्यावस्थिते शोभय नित्यत्वाद
विशप:--मान लिया जाय कि अतिम
आकार स्थायी होता है, ( तो भी यह मिद्धात
स्वीकृत नहीं होसफता, क्योंकि फिर उसी तर्क
के अनुसार ( आत्मा और शरीर ) दोनों को
स्थायी मानना पडेगा।
यहा पर यह याद रखना चाहिये कि उपरोक्त सूत्रों में
जैनों के याद्वाद सिद्धान्त को विकृतरूप दिया गया है।
ब्रहासूत्रों के टीकाकार शंकराचार्य इत्यादि ने उपरोक्त सिद्धान्त
की आलोचना और उपहास करने में वडा अन्याय किया है।
क्यों कि उन्होंने उम सिद्धात के आशय को तोडमोड़ कर
बदल दिया है।
हमने जो दलीलें ऊपर दी हैं उनसे यह बात स्पष्ट हो
जाती है कि यदि वैदिक काल में जैन धर्म का प्रचार न होता
तो हमको ये उसके प्रमाण न मिलते। जैनों का स्याद्वाद्
न्याय, जो एक बहुत कठिन सिद्धान्त है, वेद व्यास के समय
तक सागपूर्ण हो चुका होगा क्योंकि तभी तो वेदव्यास जैसे
उद्भट विद्वान् का ध्यान उसकी ओर आकर्षित हुपा और इस
सम्पूर्णता को प्राप्त करने में इससे पहले निःसन्देह कई
शताब्दिया लग गई होंगी।
अतएव यह निश्चित है कि स्याद्वाद न्याय, जो जैन धर्म
का एक प्रधान अग है, अपसूत्रों के समय के पहिले मौजूद
-
(१६)
था। इस बात से और उन प्रमाणों से, जो कि जैन धर्म के
विषय में वेने में मिलते हैं, यह निश्वय पूर्वक सिद्ध हो जाता
है कि वेद जो कि अति प्राचीन होने का दावा रसते हैं इन
से भी जैन धर्म बहुत पहिले ही उन्नत अवस्था में था । अतएव
इस बात की बहुत अधिक सभावना है कि वेदोंने स्वय जैन
वर्म से कुछ बातें ग्रहण की हों।
जैन धर्म संसार का सब से प्राचीन धर्म है।
जनै धर्म ससार का सब से प्राचीन धर्म है, इस यात
पर कई विद्वानों का विश्वास दिन प्रतिदिन दृढ होता जा रहा
है। काशी निवासी स्वर्गीय स्वामी राममित्र शास्त्री ने अपने
एक व्याख्यान में कहा था कि जैन धर्म उतना ही प्राचीन
है जितना कि यह संसार है । हम आगे चल कर यह दिखाते
हैं कि उक्त पडितजी के मत का समर्थन जैन और हिन्दुओं
के धर्मशास्त्रों किस प्रकार से होता है ।
भगवान ऋषभदेव मानव जाति के आदि गुरु थे।
जैन शास्त्रों के अनुसार भगवान ऋषभदेव स्वामी मानव
जाति के प्रथम जैन धर्म गुरु थे और इस बात की पुष्टि
ब्राह्मणों के कई प्रन्थों से होती है। भागवत पुराण के स्कंध
५ अध्याय ३-६ में यह लिसा है कि सृष्टि के आदि में
ब्रह्मने स्वयम्भू मनु और सत्यरूपा को उत्पन्न किया । ऋषभ
इन से पाचवीं पीढी में हुए, इन्हीं ऋषभदेव स्वामी ने जैन
धर्म का प्रचार किया। वाचस्पत्य में पभ को जिन देव
बतलाया है और शब्दार्थ चिन्तामणी में उनको आदि
जिनदव कहा है।
यदि हम इससे यह अनुमान निकालें कि प्रथम जैन
तीर्थफर और जन फे सस्थापक ऋपभदेव, जिनको भागवत
पुराण में स्वयंभू मनु से पाचवीं पीढी में यताया है, मानव
जाति के आदि गुरु थे तो हमारा विश्वास है कि इस कथन
में कुछ अत्युक्ति न होगी।
जैन धर्म अनादि है।
किन्तु इम से यह न समझना चाहिये कि जैन धर्म
का प्रचार प्रापभदेव के समय से ही हुआ है और उस से
पहिले जैन धर्म का अस्तित्व ही न था क्यों कि जैन यह
मानते हैं कि युगों का क्रम जिनको अवसर्पिणी और उत्मर्पिणी
कहते हैं, अनादि काल से चला आता है वह अनत काल तक
रहेगा और प्रत्येक युग में चोवीस तीर्थकर जन्म लेते रहते हैं
और जैन सिद्धान्तों का प्रचार करते हैं ।
अब हम को इस मान्यता पर कि वैदिक धर्म प्राचीन
भारत का सब से पहिला धर्म है विचार करना चाहिये । सर्व
साधारण को यह विश्वास है कि वैदिक धर्म सब धर्मों से
- (१८) प्राचीन है परन्तु यह उनका भ्रम है । स्वयं वेदों में ही इसका सतोपजनक प्रमाण मिलता है कि वैदिक धर्म के पहिले और उसके साथ साथ, अन्य धर्मों का भी प्रचार था। यदि ऐसा न होता तो हमको वैदिक काल में ऐसे मनुष्यों के उल्लेस न मिलते कि जिनके सिद्धान्त वैदिक धर्म से विरुद्ध थे। इसके कुछ उदाहरण नीचे दिये जाते हैं । (१) “ अग्नि षोमियं पशु हिंस्यात्" अर्थात् ऐसे पशुओं की हिंसा न करनी चाहिये जिनके देव अग्नि और सोम हैं। (२) मा हन्यादु सर्व भूतानि " अर्थात् किसी जीवधारी की जान न लेनी चाहिये। (३) ऋग्वेद के मंडल १, अष्टक २, अध्याय ५, सूक्त २३, ऋचा ८ में ऐसे मनुष्यों का वर्णन आया है कि जो सोमरस का निषेध करते थे। (४) ऋग्वेद के मडल ८, अध्याय १०, सूक्त ८९, ऋचा ३, मे भार्गव ऋपिने कहा है कि इन्द्र कोई वस्तुही नहीं है। चोथी ऋचा में इन्द्र ने अपने अस्तित्व को सिद्ध करने की चेष्टा की है और यह कहा है कि वो अपने शत्रुओं का नाश कर देता है (५) ऋग्वेद के अष्टक ३, अध्याय ३, वर्ग २१, चा १४ में ऐसे मनुष्यों का उल्लेख है जो किक्त अथवा मगध में रहते थे और यज्ञ दानादि की निन्दा करते थे वर्ग १०, -
हम अपने मत का समर्थन करने के लिये वेदों में से
और भी अनेक उदाहरण दे सकते हैं । इन सबसे क्या सिद्ध
होता है ? इमसे निर्विवाद सिद्ध होता है कि प्राचीन भारत
में, वैदिक धर्म
सबसे प्राचीन धर्म होने का दावा स्वीकार
नहीं किया जा सकता।
वेदों में से जो प्रमाण उपर दिये गये हैं वही इस घातको
सिद्ध करने के लिये पयाप्त है कि जैनधर्म अतीव प्राचीन काल
से चला आता है और जिस वैदिक धर्म को प्राचीन यवलाया
जाता है उससे भी पहिले जैन धर्म अस्तित्व रखता था।
जैन धर्म का अन्य धर्मों के साथ मुकाबला ।
यदि हम जैन धर्म के पूर्व इतिहास की तरफ देखते
हैं तो मालूम होता है कि अन्य धर्मों की वैमनस्यता के
कारण जैन धर्म को बडा साम्हना करना पडा था । कारण
जैन धर्म ही एक ऐसा धर्म था जो बडे साहस के साथ
प्रत्येक जीव की हिंसा का प्रवल निपेव करता था। शेप
सभी धर्म किसी न किसी रूप में हिंसा का विधान करते
थे। इसके अतिरिक्त जैन धर्म अहिंसा के उत्कृष्ठ और
कल्याणकारी सिद्धान्त का उद्घोप फरके ही न रहा, किन्तु
उसने इससे भी पढकर यह किया कि इस सिद्धान्त को
वडी सावधानी के साथ कार्य रूप में परिणत किया। वैदिक
धर्म ने, जो ईश्वरीय ज्ञान होने का दावा करता है,
(२०)
मूफ जीवों के साथ कहीं २ घडी निर्दयता का पर्वाव किया
है। इतनाहीं नहीं किन्तु उसने बलिदान के लिये सर्वश्रेष्ठ
जीवधारी मनुष्य की हत्या को भी विधय बतलाया है।
एक समय गौ को भी जिसे ब्राह्मण अत्यत पवित्र समझते हैं
प्राचीन ऋपि बडी निष्ठुरता के साथ बलिदान के लिये मार
डालते थे और बलिदान किये हुए मास को जिसे वे पुरोडाश
कहते थे, सा मी लेते थे। चूकि वेद ऐसी अमानुपिक
कार्रवाइयों का विधान करते थे। यही कारण है कि जैन इन
वेदों को हिंसक श्रुतियों के नामसे पुकारते थे।
हिन्दू धर्मशास्त्र, ऐसे सिद्धान्तों से भरे पडे हैं जो
अपने अनुयायियों को कल्पित देव और देवियों को प्रसन्न
करने के लिये निरपराधी जीवों का खून बहाने की आज्ञा
उन्हीं मिद्धान्तो के कारण असख्य जीवों का बलिदान
हुआ है। यदि वे जीव न मारे जाते तो वे मनुष्य के लिये कई
तरह मे उपयोगी होकर उसके सुख और समृद्धि की वृद्धि
करते। आज हम देखते हैं कि अमुक बकरी, अमुक भेड
और अमुक भैंस आनन्द पूर्वक चर रही है परन्तु दूसरे ही
दिन यह दिखाई देता है कि संसार में उनका अस्तित्व ही नहीं
है। परन्तु जैन धर्म ने इन भयकर बलिदानों का बडी जोर
के साथ निपेव किया, वेदों के कठोर रिवाजो की जड पर
.
(२१)
कुठाराघात किया, धर्म प्रचारकों की स्वार्थपरता को प्रकट
किया, यिना जाति और धर्म भेद के अपने द्वार समस्त प्राणियों
के लिये खोल दिये और सार्वभौमिक दयाभाव और भ्रातृभाव
के सिद्धान्तों को, कि जो जैन धर्म की विशेषताए हैं, दूर दूर
तक फैला दिया। साराश यह है कि जैन धर्म ने किसी भी
जीवधारी को अपनी पवित्र छत्रछाया के बाहर नहीं किया।
जैन धर्म के विषय में झूठी यात फैलाने के कार्य ।
इस प्रकार के हिन्दू धर्म पर स्मरणीय आक्रमणों के
कारण जैन धर्म ने अपने लिये अनेक शत्रु उत्पन्न कर लिये
और उसके परिणाम मे उसे बहुत कुछ क्षति उठानी पड़ी।
उन्होंने जैन धर्म की निन्दा करने का और उसके विपय
मे भयकर भ्रामक विचारों को फैलाने का कोई अवसर मात्र
हाथ से न जाने दिया। उन्होंने जैन सिद्धाती फी बडी
सींचातानी की है और उसके विषय में सब प्रकार से
विरोधीभाव पैदा करने में कोई कसर नहीं रक्सी।
दी और द्वेष के कारण कुछ लोगों ने तो यहा तक कह
डाला है कि " हस्तिना ताड्यमानोऽपि न गच्छेजेन मदिरम्'
अर्थात् मदमत्त हाथी के आक्रमण करने पर भी किसी ने अपनी
रक्षा के लिये जैन मदिर में प्रवेश न करना चाहिये ।
मस्कृत नाटकों के पढने मे मालूम होता है कि उनमें
कई स्थानों पर जैन यतियों को नीचे दर्जे के सेवको की तथा
(२२) चोरों की पात्रता दी गई है और इसी प्रकार समस्त हिन्दू साहित्य में उनको नाची श्रेणी में रखा है और घृणा की दृष्टि से देखा गया है। इन बातों से इस बात का यथेष्ट ज्ञान हो जाता है कि संस्कृत के ब्राह्मण विद्वानों ने ही जैनों के साथ, कि जिन्होंने दर्शन शास्त्र, नीति शास्त्र, न्याय शास्त्र, अध्यात्म विद्या, विश्व विवरण विद्या, गणित और फलित, ज्योतिष, व्याकरण, कोप, अलकार और अन्य भिन्न भिन्न विषयों पर बड़े घडे पाडित्य पूर्ण प्रन्थ लिखकर सस्कृत साहित्य की अभिवृद्धि की है, कैमा कुत्सित व्यवहार किया है। . महावीर के निर्वाण के पीछे कई शताब्दियों तक जम्बू स्वामी, प्रभव स्वामी, यशोभद्र, सभूतिविजय, भद्रयाहु, स्थूलिभद्र इत्यादि प्रखर प्रतिभाशाली बडे धर्मात्मा विद्वान् तात्कालीन साहित्य मंडल में बड़े आदर के माथ चमकते थे और अपने प्रतिद्वन्दियों के हृदय में विस्मय उत्पन्न करते रहे । उनके आगे राजा महाराजा सिर झुकाते थे, उनके शातिमय प्रभाव के सामने अत्याचार नष्ट हो जाता था, उनके मुस की टिव्य प्रभा में प्रतिस्पर्धियों का घमड चूर चूर हो जाता था, और उनकी उपस्थिति में कुछ ऐमा तेज था कि उसके मामने विधर्मियों का सिर नीचा हो जाता था। इन महान विद्वानों के बाद मानतुगाचार्य, हरिभद्रसूरि, शातिसूरि, हेगचन्द्राचार्य, मेरंतुगाचार्य, और बहुत से अन्य निद्वन् हुए, जिन्होंने ।
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मूर्तिपूजा का विधान करके और कल्पित धार्मिक सिद्धातों
का प्रचार करके जैन धर्म को यद्यपि एक नया और विचित्र
रूप दे दिया तथापि उन्होंने कई शताद्वियों तक अपने अगाध
पाहित्य और अविमात परिश्रम से भीर और नीच प्रतिद्वन्दियों
की ओर से आघात पहुचते हुए भी अपनी मर्यादा को
अविछिन्न रक्सा उसके लिये वे धन्यवाद के पान हैं।
हिन्दू और अन्य धर्मावलम्बी राजाओ
पर जैन धर्म का प्रभाव ।
इन महान् विद्वानों का ऐसा प्रभाव था कि जिसके
कारण कुमारपाल आदि अनेक शक्तिशाली
राजा
धर्मावलवी हो गये और उनके हृदयो में दया भाव का ऐसा
सचार हुआ कि उन्होंने जैनों के निवास स्थानों में पशुहिंसा
रोकने के लिये फरमान (आज्ञा-पत्र ) जारी कर दिये । कई
मुसलमान बादशाहों ने आज्ञा पत्रों द्वारा ममस्त भारतवर्ष में
जहा जहा जैन मतावलम्धी रहते थे वहा पजूसन (पर्यंपण पर्व)
पर पशु हिंसा न करने के लिये आज्ञा पत्र प्रक्ट कर दिये
थे । सम्राट अकरर का एक ऐसा ही फरमार उर भी
उपलब्ध है। कई देशी रियासतों में जैनो को अन भी रह
अनूठा स्वत्व प्राप्त है।
टॉड साहिब के गजस्थान काम प्रद्धि ऐतिहासिक
प्रन्थ से पता लगता है कि तत्कालीन राजपूत राणाओं और
महाराणाओ पर जैनों या इससे भी अधिक प्रभाव था ।
बहुत से (२४) बडे बडे राजपूत राजाओ ने जैन साधुओ को महत्वपूर्ण धार्मिक हक्क दिये थे। उनके उपायों के पास होकर कोई मनुष्य वध निमित्त पशु नहीं ले जा सकता था। पहुत से फरमानों में से हम यहा पर केवल एक फरमान काही उल्लेख करते हैं जिसे महाराणा श्री राजसिंहजी ने नारी किया था कि जीनयों के उपाश्रयों के पास से कोई भी नर या मादा पशु वध करने के लिये निकाला जायगा वह अमर कर दिया जायेगा-(याने उसे कोई जान से न मार सकेगा)। वर्तमान में भी कई देशी रियामतों में इस तरह के हक हफूक आज भी चालू हैं कि जिस मुहल्ले वा बाजार में जैन लोग बसते हैं उस मुहल्ले मे वध के लिये पशु नहीं ले जा सकते । अतएव साहित्य की अभिवृद्धि करके, बहुत से शक्तिशाली राजाओं को जैन धर्मावलंबी बनाकर निरपराध मुक जानवरों की रक्षा करके और देश के हरएक कोने कोने में जैन धर्म का प्रचार करके जैनों ने मानव जाति का बहुत घडा, और स्थायी कल्याण किया है। जैनो का उपहास और उनपर अत्याचार । परन्तु काल की गति बडी विचित्र है। जैन धर्म शनैः शनैः राजाओं के आश्रय से हटता गया और तर से केवल छोटे से व्यापारी वर्ग में ही रह गया । इन शताब्दियों में जनों में बहुत कम नामी विद्वान् हुए जिससे उसक प्रति- वादियो का बहुत कम साम्हना हुआ। जव जैन धर्माव-
(२५)
लबियों में इस प्रकार निर्बलता आ गई तब उसके प्रतिवादियों
की बन आई। उन्होंने जैनों के धर्म शाखों को जला दिये,
उनके पवित्र स्थानों को अपवित्र कर दिये, उनके सिद्धातों
का उपहास किया और उनको संसार की दृष्टि में गिराने
का यथाशक्ति प्रयत्न किया । यद्यपि तत्कालिन स्थिति का यह
केवल अशमान दिग्दर्शन है तथापि इसके प्रतिवादियों का
नो अत्याचार इमपर हुआ है उसका अनुमान मात्र इससे हो
सकता है।
जैन धर्म का साहित्य अनुपलब्ध है।
कहीं पचाखुचा साहित्य भी नष्ट न हो जाय, इस भय
से जैनों ने उसे तहखाने में छिपा दिया । बहुत से
बहु-
मूल्य हस्तलिखित ग्रन्थ फीटको के भक्षस्थान को प्राप्त हुए।
अब भी जो कुछ बहुमूल्य जैन साहित्य बचा है वह भी
विद्वानों को उपलब्ध नहीं है क्योंकि जैन माहित्य-भंडारों के
स्वामी दूमरों को अपने अन्य दिखाने में बड़ा पक्षपात और
विरोध करते हैं। उस पक्षपात और अत्याचार के जमाने में
ग्रन्थों को इस प्रकार छिपाकर रखना आवश्यक था परन्तु वही
पद्धति अर भी प्रचलित रसना किसी भी प्रकार जैन साहित्य
की वृद्धि को हितकर नहीं हो सकती।
पाश्चिमात्य विद्वानों को जैन धर्म के विषय
में भ्रम क्यों हुआ।
अतएव यह पाठ स्वाभाविक थी कि पुरातत्व की
खोज करते समय पूर्वीय भाषाए जानने वाले योरोपीय विद्वानों
(२६) को पहले पहल ब्राह्मणो का साहित्य हाथ लगा जो कि ठूस ढूंसकर पक्षपात और उपहास से भरा था । उन विद्वानी को जैन साहित्य उपलब्ध न होने से उनको जैन धर्म के विषय में ज्ञान प्राप्त करने के लिये ब्राह्मणों के अन्थों का आश्रय लेना पडा । हम पहले ही कह चुके हैं कि ब्राह्मणों से यह आगा नहीं की जा मरुती कि वे अपने जैन प्रतिद्वदियों के सिद्धातों की पक्षपात रहित आलोचना करें। पाश्चिमात्य विद्वानों ने ब्राह्मणों के प्रन्थों में जैन धर्म को विकृत रूप में पाया और इमालिये उनके हृदय में जैन धर्म के विषय में कुत्सित और घृणास्पद विचार पैदा हो गये। उन्होंने अशुद्ध सामग्री को लेकर तर्क करना शुरू किया और इसलिये वे सत्य को न ढूढ सके । अभीही कुछ वर्षों से चन्द विद्वानोंने जिनके नेता प्रोफेसर जेकोवी हैं हमारे कुछ ग्रन्थों की छानबीन करना शुरू की है और जैन धर्म के विषय में जो भ्रमात्मक विधान फैले हुए है वे कुछ अंश में उनके द्वारा दूर हुए है । परन्तु अभी बहुत कुछ बाकी है। जैन साहित्य का क्षेत्र बहुत विस्तृत है और उसमें काम करनेवाले बहुत थोडे है इसलिये जैन धर्म के विषय में फेली हुई गलतफहमियों को दूर करने में और उसे उसके उच्च पद पर आसीन करने में अभी अधिक समय की आवश्यकता है।
(२७)
यह पडे खेद की बात है कि युरोपियन
विद्वानों का
समागम जैनों के साथ न होने से
जैन धर्म के विषय में उनका शान अशुद्ध और पक्षपात से भरा
हुआ है। यही कारण है कि उन्होंने जैन प्रन्यों का
अनुवाद करने में उन मन्थों के असली अभिप्राय और अर्थ
को नहीं समझा और इसलिये जैन धर्म के विषय में उन्होंने
अपने अशुद्ध मत कायम कर लिये।
जैन धर्मकी प्राचीनता पर अन्तिम वक्तव्य ।
हमने पिछले पृष्ठों में जैन धर्म को अतीव प्राचीन सिद्ध
कर दिखाया है। बहुत से इस पर आश्चर्य करेंगे और हमारे
इस मत को शायद स्वीकार न करेंगे।
उनका इम
प्रकार सदेह करना स्वाभाविक ही है, क्योंकि भिन्न भिन्न
धर्मों के अनुयायियों के हृदय में जैन धर्म के विषय में बहुत
दिनों से विरोधाभाव घुसा हुआ है और हिन्दुओं एव
नुसलमानों ने जनों के मन्दिरों का विध्वस किया है और
जैनों के धार्मिक साहित्य के बहुत से भाग को जला दिया है।
यदि यह साहित्य उपलब्ध होता तो उससे इस यात का पत्यक्ष
प्रमाण देने में बडी महायता मिलती कि जैन धर्म शेष सभी
धनों से प्राचीन और उत्कृष्ठ है।
हम ऊपर कह चुके हैं कि एक समय वह था जय जैन
धर्म फो पौद्धधर्म की शाखा माना लाता था परन्तु अय यह
(२८) मिद्ध होगया है कि यह मान्यता गलत है । इमी प्रकार अब शीघ्र ही वह समय आवेगा जब इस महत्वपूर्ण समस्या पर अधिक प्रकाश पड़ेगा । उस समय बडे बडे कट्टर विद्वानों को भी यह मानना होगा कि जैन धर्म सब धमों से प्राचीन धर्म है और शेप सभी धर्म उसमे पीछे के हैं और इन धर्मों ने अपनी दार्शनिक और धार्मिक व्यवस्था के स्थिर करने में जैन धर्म से बहुत महायता ली है। इस जगह इतना स्थान नहीं है कि हम इन विषय पर अधिक विस्तार के साथ लिसें, परन्तु हमने अपने मत के समर्थन में अबतक जितने प्रमाण दिये हैं वे सक्षिप्त होने पर भी ऐसे ठोस और अकाट्य हैं कि उनसे यह निस्सन्देह मिद्ध हो जाता है कि जैन धर्म के संस्थापक न तो पार्श्वनाथ थे न महावीर, किन्तु इस धर्म के आदि प्रवर्तक ऋपभदेव थे जिनका, अस्तित्व हिन्दुओं ने सृष्टि के आरभ में स्वीकार किया है। जैनों के तीन मुख्य सम्प्रदाय । जैन धर्म की प्राचीनता सिद्ध करने में अब हम श्वेताम्बर और दिगम्मरों का वर्णन करेंगे और यह भी बतलायेगें कि ये दोनों सम्प्रदाय एक दूसरे से किस प्रकार पृथक हुए और फिर श्वेताम्बरों के मूर्ति पूजक और साधुमार्गी विभाग कैसे बने । अत में हम यह भी दिपलायेंगे कि इन तीनों सम्प्रदाय में से कौनसा सम्प्रदाय महावीर के असली उपदेशों का अनुयायी है।
जैनी के मुख्य तीन सम्प्रदाय हैं--(१) दिगम्बर ( २)
श्वेताम्बर मूर्तिपूजक (३) श्वेताम्बर साधुमार्गी या जिनको
स्थानकवामी भी कहते हैं।
,
इन तीनों सम्प्रदायों में म कौनमा सम्प्रदाय सर से
प्राचीन है और जैन धर्म के असली सिद्धान्त के अनुसार
चलता है, इसपर गत नहुन वर्षों मे वाद विवाद चला
आता है परन्तु इसका ममावान अभी तक मतोपजनक व
प्रामाणिक तोर पर न हुआ। पिछले कुछ वर्षों में कुछ
दिगम्बर और श्वेताम्मर मूर्तिपूजक भाइयों ने जैन धर्म
कुछ पुस्तक अंग्रेजी में भी लिखी हैं, परन्तु विषेश कर धार्मिक
पक्षपात के कारण ये पुस्तके तीनों उम्प्रदाय के इतिहाम पर
पर्याप्त प्रकाश नहीं डालती।
पर
प्रोफेसर हरमन जेकाने जैनो के घेताम्बर और दिगम्बर
सम्प्रदायों में विभाजित होने की समस्या को हल करने की
चेष्टा की है परन्तु वे सत्य की खोज न कर सके । इसके दो
कारण हैं । एक तो उन्होंने जैन सूत्रों के अर्थों को बिना समझे
अपने तकों पर खड़े किये व दूमरा उन्होंने मत्य ज्ञान प्राप्त
करने के लिय जैन साधुओं से स्वय पूछताछ नहीं की।
श्वतावर और दिगवर दोनों सम्प्रदायों में उनके उत्पत्ति
के विषय में परस्पर विरोधी कथाए प्रचलित हैं और प्रत्येक
(३०) संप्रदाय अपने आपको दूसरे से प्राचीन बतलाता है। परंतु यह संतोषपूर्वक सिद्ध किया जासकता है कि दिगंमरों की उत्पत्ति श्वेताबरों के पीछे हुई है और वे महावीर के निर्वाण के बहुत समय बाद असली सध से पृथक हुए हैं । परंतु ऐसा कहने के पहले यह आवश्यक है कि हम दोनों संप्रदायों के धार्मिक प्रयों पर सरसरी निगाह डालें मूर्तिपूजक श्वेवाबरों के सिद्धांत-सूत्र पैंतालिस हैं परतु साधु मार्गियों को इनमें से केवल पत्तीस सूत्र मान्य हैं । इसके विपरीत दिगम्बर भाई इन सूत्रों को नहीं मानते और यह कहते हैं कि महावीर के कहे हुए असली सूत्र नष्ट हो गये । यद्यपि श्वेताम्बर सूत्रों के नाम असली सूत्रों के नामोंसे मिलते हैं तथापि उन्हों ने अपने सूत्र पीछे में गढे हैं । अतएव दिगम्बरों ने अपने शास्त्र स्वयं ही धनाये हैं और ये शास्त्र श्वेताम्बरों के शास्त्रों से कई आवश्यक यातों में नहीं मिलते। महावीर के सच्चे अनुयायी श्वेताम्बर हैं या दिगम्बर, इस प्रश्न का उत्तर उसी समय दिया जा सकता है जब दोनों सम्प्रदायों के शास्त्रों का रचना-काल ठीक ठीक मालूम हो जाय । जिस मम्प्रदाय के पास महापार के कहे हुए असली सूत्र हैं और जो उनके अनुसार चलता है वही सम्प्रदाय जैन धर्म का सच्चा अनुयायी कहला सकता है। अतएव यह ] (३१) मालूम करना अभीष्ट और आवश्यक है कि दोनों साम्प्रदायों में से किसके पास असली और प्राचीन शास्त्र हैं प्रोफेसर हरमन जेकोबी ने जैन सूत्रों के अनुवाद की भूमिका में बड़ी योग्यता से सिद्ध कर दिया है कि श्वेताम्बरों के वर्तमान शास्त्र महावीर के कहे हुए ही हैं और परम्परा से ज्यों के त्यों चले आते हैं। उन्होंने अपने मत के समर्थन में जो मुख्य प्रमाण दिये हैं उनको हम यहा संक्षेप में देते हैं। ( १ ) " बहुतसा प्राचीन जैन माहित्य अत्र उपलब्ध हो गया है और जो लोग जैन मम्प्रदाय के प्राचीन इतिहास के लिये सामग्री इकट्ठी करना चाहते हैं उनको इम माहित्य से बहुत कुछ सहायता मिल सकती है । यह सामग्री ऐमी नहीं है कि जिसकी प्रामाणिक्ता पर हम सन्देह करें। हम जानते हैं कि जैनों के धर्म शाख प्राचीन हैं, जिम सस्कृत साहित्य को हम प्राचीन कहते हैं जैन शास्त्र निस्सदेह उससे भी प्राचीन है। उनमें पुरातत्व की सामग्री कितनी है, इस विषय में हम यह कह सकते हैं कि उनमें से बहुत से शास्त्र उत्तरी बोद्धों के मनसे प्राचीन गन्यों का मुकाबला कर सकते हैं चूंकि इन पिछले प्रन्यो से बुद्ध और बौद्ध धर्म के इतिहास की सामग्री (३२) प्राप्त करने में बड़ी सफलता हुई है, इसलिये ऐमा कोई कारण नहीं है कि हम जैन शास्त्रों को जैन इतिहास का प्रामाणिक साधन न माने।" (२) ये सब बातें सिद्ध यह करती हैं कि जैन शास्त्रों के लिपिबद्ध होने के पहिले मी जैनों का धर्म मर्यादा रहित एवं अनिश्चित नहीं था कि जिसके कारण उसमें अन्य भिन्न २ धोके कारण हेरफेर होने और बिगडनेका डर रहता, किंतु उस समय मी जैन धर्म में छोटी से छोटी बातें मी निश्चित रूप से वर्णित की गई थी। जैनों के धार्मिक सिद्धान्तों के विपय में जो कुछ सिद्ध किया गया है, उसी प्रकार उनकी ऐतिहासिक जैन श्रुतियों के विषय में भी सिद्ध किया जा सकता है। - ( ३ ) जैन श्रुतिया एक मत होकर कहती हैं कि वल्लभि की सभा में और देवद्धि के सभापतित्वमें जैन सिद्धात की व्यवस्था हुई है और कल्पसूत्र में इस घटना का समय जो सन् ४५४ ई० है दिया है । जैन अतियों से मालूम होता है कि देवर्द्धि को यह भय हुआ कि कहीं सिद्धात लुप्त न होजाय इसलिये उन्होंने उसे शास्त्रों में लिपिबद्ध करा दिया । अतएव जैनों के धार्मिक साहित्य के साथ देवर्द्धि का जो सबंध है उसके विषय में हमारा मत जन साधारण के मत से कुछ भिन्न है। यह प्राय: ठीक मालूम होता है कि " 1 (३३) देवर्द्धि ने उस समय की उपलब्ध हस्तलिखित सामग्री को सिद्धात के रूप में व्यवस्थित कर दिया और जो अन्य उस समय लिपिनद्ध न थे उनको विद्वान् धर्माचार्यों के मुख से सुन कर लिख डाला । इसलिये इस सिद्धान्त की वह आवृत्ति जिसका सम्पादन देवर्द्धि ने किया है, उन शास्त्रों का केवल सुव्यवस्थित रूप है जो उनके पहले प्रायः उसी रूप में मौजूद था। (४) " परतु एक बडी महत्वकी दलील यह है कि हमको सिद्धात म ग्रीस की ज्योतिर्विद्य की गध भी नहीं आती|xxx चुकी मीस की ज्योतिर्विद्या का पदार्पण भारतवर्ष में इस्त्री सन् की तीमरी या चौथी शताद्वि से माना जाता है इसलिये जैनों के शाख उससे भी पहिले लिपिबद्ध हुए थे " (५) " हम सिद्ध कर चुके हैं कि जैन सिद्धात के सब से प्राचीन प्रथ, ललित विस्तार की गाथाओ मे भी पुराने हैं। चूकि यह कहा जाता है कि ललित विस्तार का अनुवाद चीनी भाषा में इस्वी सन् ६५ के लगभग हुवा था इसलिये हम वर्त- मान जैन साहित्यकी उत्पत्ति ईसवीसन से भी पहलेकी मानते हैं"। (६) " यदि हमारी उपरोक्त सोज का परिणाम मानने के योग्य है, क्यों कि मुझे उसके विरुद्ध कोई दलील नहीं देख पडती-तो वर्तमान जैन साहित्य की उत्पत्ति ईसा से ३०० वर्ष से अधिक ज्यादा पहिले नहीं मानी जा सकती", (३४) (७)" हमारा वादविवाद यहीं पर समाप्त होता है । मैं आशा करताहूं कि इससे यह सिद्ध हो गया है कि जैन धर्म के विकास में किसी समस भी किसी असाधारण घटनाके कारण कोइ बडी रुकावट पैदा नहीं हुई । हम इस विकास को शुरू से अबतक क्रमशः देख सकते हैं और जैन धर्म दूसरे धर्मों से व विशेषकर बौद्ध धर्म से इतना स्वतंत्र है जितना कि कोई धर्म हो सकता है । इस विषय का विस्तार- पूर्वक विवेचन भविष्य की सोजों से हो सकेगा परतु मैं आशा करता हूं कि जैन धर्म की स्वतन्त्रता के विषय में और जैन धर्म के प्राचीन इतिहास के निर्माण के लिये जैन शास्त्रों के विश्वसनीय होने में कुछ विद्वानों को जो संदेह है स्नको मैंने दूर कर दिया है। ऊपर की दलीलों से स्पष्ट होगया होगा कि प्रोफेसर हरमन जेकोबी ने ईसा से पूर्व तीसरी सदी तक अर्थात् महावीर के दोसौ वर्ष बाद तक जैन सिद्धान्त की प्राचीनता सतोप पूर्वक क्रमानुसार दिसला दी है। अब हमको केरल दोसौ वर्ष के उस मध्यवर्ती समय को पूरा करना है जो महावीर के निर्वाण काल और प्रोफेसर जेकोबी द्वारा निश्चित जैन सिध्दान्तों के उत्पत्ती काल के बीच में पडता है। इस कार्य के लिये हमको यह जानना आवश्यक है कि इस विषय में जैन साहित्य क्या कहता है ? जैन प्रथों में
साफ लिखा है कि महावीर ने स्वय जैन धर्म का उपदेश
अपने शिष्यों को दिया और फिर इन शिष्यों ने अगो की
रचना की। ये ही अग जैन सिद्धान्त के मुख्य अश हैं।
परन्तु इस विपय में प्रोफेसर जेकोबी का मत भिन्न है।
वे कहते हैं कि जैन जिम साहित्य को पूर्व कहते हैं वह
अगों के भी पहले विद्यमान था और उसमें महावीर और
उनके धार्मिक प्रतिद्वंदियों के बीच में जो वाद विवाद हुआ
था उसका हाल लिखा था । अपने मत के समर्थन में वे कहते
हैं कि प्रत्येक पूर्व का नाम "प्रवाद" अर्थात् वादविवाद है और
इसलिये वे दार्शनिक वादविवादों से भरे हुए थे जैसा कि नन
नामों से प्रकट होता है।
इसके सिवाय घे यह भी कहते हैं कि चूकि पूर्वो में
वाद विवाद युक्त साहित्य था, इसलिये जब महावीर के
प्रतिद्वदी मर गये तब पूर्वो की उपयोगिता जाती रही और
इस तत्कालीन स्थिति के अनुकूल ईसा से ३०० वर्ष पहले
पाटलिपुत्र की सभ में एक नया सिद्धात रचा गया ।
जेकोबी साहब का उपराक्त मत विलकुल गलत है
और उनका समर्थन किसी प्रकार नहीं हो सकता। वे अपने
मत के समर्थन में जैनों की एक जन-श्रुति का हवाला देते
हैं, परन्तु अभयदेव ने समवायाग सुत्र की टीका में इस
जनश्रुति को असत्य ठहराया है और लिखा है कि महावीर ने
- जैन सिद्धातों का उपदेश गणधरों को दिया और फिर उन्होंने आचारांग आदि को लेकर द्वादश अंगोंकी रचना की। उन्होंने आगे चलकर लिखा है कि बारहवें अंग में पूर्व, सम्मिलित थे। समस्त अंगों और उनकी टीकाओं में समान रूप से यही लिखा है कि पूर्व, बारहवें अग में सम्मिलित थे और इसलिये अन्य अंगों के साथ में मौजूद थे। पूर्वो में क्या लिखा है। इसके सिवाय जेकोबी के मतानुसार सभी पूर्वो मे वाद- विवादयुक्त साहित्य न था। पूर्वो की संख्या चौदह थी। इनके नाम और इनमें लिखित विषयों का सक्षिप्त वर्णन जैन सूत्रों में दिया है और इस वर्णन से हम जान सकते हैं कि केवल कुछ पूर्वो में ही वादविवादयुक्त बातें थीं और शेष पूर्वो में केवल जैन दर्शन का वर्णन किया गया था । पूर्वोके संबंध में प्रो. जेकोषी के अनुमान का खंडन। प्रोफेसर जेकोबी का मत है कि पूर्वो का, अस्तित्व, केवल भद्रबाहु के समय तक अर्थात् महावीर के निर्वाण के लगभग दोसौ वर्ष बाद तक ही रहा और इस समय के बाद पूर्व सर्वथा विलुप्त हो गये"। यह मत स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्यों कि पूर्वो का अस्तित्व बल्लभि की सभा तक जो ४५४ ई० में हुई थी, मिलता है, जैन पट्टावली और ,
(३७)
अन्य प्राचीन अन्यों में लिया है कि वहमि की समा के
सभापति देवगिणी को, जो पट्टापली में २७.पाट परहे,
महावीर के निर्वाण के बाद लगभग एक पूर्व का ज्ञान था ।
देवर्ति के पहले जो २६ आचार्य हो गये हैं उनमें में कुछ
तो समस्त चौदह पूर्वी का ज्ञान रसते थे और कुछ को
चौदह से फम पूर्वो का शान था । इन आवायों के सिवाय
वहामि की समा फे पहले यहत से अन्य विद्वान् साधु भी
ऐमे ये जिनको पूर्वी का न्यूनाधिक ज्ञान था। देवगिणी
अन्तिम पूर्वधारी ये और फिर उनके बाद पूर्वो का शान
सर्वथा विस्मृत होगयो । अतएव मालूम होता है कि महावीर
के निर्वाण के १००० वर्ष पाद भी पूों के कुछ अश का
सान मौजूद था।
जब विश्व में ऐसे विश्वसनीय प्रमाण मौजूद हैं। तब
यह मानना न्याय संगत नहीं है कि पूर्वो का अस्तित्व, अंगों
के पहले था, वे वाद विवादपूर्ण थे, वे शने गने लप्त हो
गये और एक नया सिद्धान्त जो अभी कायम है, पाटलीपुत्र
की सभा में इंसा से तीन सौ वर्ष पहले तैयार किया गया ।
परन्तु कुछ विद्वान यह स्वीकार करने पर भी कि पूर्व
अगों में ही सम्मिलित थे, इस बात पर आपत्ति करेंगे कि
अगो की रचना महावीर के समय में हुई थी। क्यों कि
पाटलीपुत्र की सभा के पहले अगों की प्राचीनता सिद्ध करने
(३८)
के लिये कोई प्रमाण नहीं मिलते। परन्तु इस आपत्ति में
बहुत योडा सार है क्यों कि यह मानना युक्तिसगत नहीं है
कि महावीर और पाटलीपुत्र के मध्य वर्तीकाल में अर्थात् दोसी
वर्ष से भी अधिक समय तक जैनों के पास धार्मिक पथ
दिखाने वाला साहित्य ही न था ।
इसी प्रकार यह मानना भी उतना ही असंगत है कि
पाटलीपुत्र की सभा के पहले महावीर के समय में किसी
दूसरे ही सिद्धान्त का प्रचार था और फिर उपरोक्त सभा
में एक नया सिद्धान्त गढा गया । यदि उस समय पहले के
सिद्धान्त अन्य मौजूद होते तो उनका उल्लेस उस सिद्धान्त में
अवश्य पाया जाता जो पाटलीपुत्र की सभा में रचा गया
बतलाया जाता है और साथ ही साथ वे हेतु भी लिसे
जाते, जिनके कारण प्राचीन सिद्धान्त-प्रन्थों के स्थान में
नवीन ग्रन्थ रचे गय । परन्तु जैन साहित्य के समस्त संग्रह
में इन बातों का उल्लेख कहीं नहीं मिलता। इसलिये हम
प्रोफेसर जेकोबी की कल्पना को स्वीकार नहीं कर सकते
इसके साथ यह भी याद रखना चाहिये कि जैन प्रन्थों
में स्पष्ट लिसा हुआ है कि पाटलीपुत्र में जैन सिद्धान्त का
देवल सग्रह किया गया था, उनकी रचना नहीं की गई थी।
इसके सिवाय प्रोफेसर जेकोबी की दलीलें ऐसी मजबूत नहीं
हैं कि हम जैन ग्रन्थो के स्पष्ट रेखा को अस्वीकार करें।
,
८
महावीर और पाटलीपुत्र के मध्यवर्ती काल की इस
प्रकार पूर्ति करने में केवल यही नतीजा निकलता है कि हम
इस बात पर विश्वास करें कि जिन सिद्धान्त ग्रन्थों का संग्रह
पाटलीपुत्र में हुआ था वे सभा के पहले मौजूद थे और
उनकी रचना पहले पहल महावीर के गणवरों (शिष्यों) ने
की थी। सिद्धान्त-अन्यों और उनकी टीकाओं में भी यही
बात मिलती है।
सिद्धान्त-अन्यों की रचना शैली, प्रश्नों और उत्तरी
के लिखने की रीति, समस्त साहित्य का क्रम और बहुत सी
अन्य महत्वपूर्ण बातें जिनको विस्तार के मय से यहा पर
नहीं लिख सकते । उपरोक्त कथन का बहुत कुछ समर्थन
करती है।
उपरोक्त प्रमाणों के समर्थन में चौद्ध सूत्रों
के प्रमाण'-
बौद्धों के मग्धिम निकाय नामक प्रथ में महावीर के
शिष्य उपाली और गौतम बुद्ध में जो विवाद हुआ था, उसका
वर्णन है। जेकोबी ने इस वर्णन को इस प्रकार लिया है -
निगथ उपाली कहते है कि दड तीन प्रकार के होते है (१)
काया का दंड ( २) वचन का दड (३) और मनका दड ।
स्थानाग सून के नितीय उदेशक में जो जैन सिद्वान्त दिया है वह
ज्यों का त्यों यही है।
-
(३८)
के लिये कोई प्रमाण नहीं मिलते । परन्तु इस आपत्ति में
बहुत थोडा सार है क्यों कि यह मानना युक्तिसगत नहीं है
कि महावीर और पाटलीपुत्र के मध्य वर्तीकाल मे अर्थात् दोसो
वर्ष से भी अधिक समय तक जैनों के पास धार्मिक पथ
दिखाने वाला साहित्य ही न था ।
इसी प्रकार यह मानना भी उतना ही असंगत है कि
पाटलीपुत्र की सभा के पहले महावीर के समय में किसी
दूसरे ही मिद्धान्त का प्रचार था और फिर उपरोक्त सभा
में एक नया मिद्धान्त गढा गया । यदि उस समय पहले के
मिद्धान्त अन्य मौजूद होते तो उनका उल्लेस उस सिद्धान्त में
अवश्य पाया जाता जो पाटलीपुत्र की सभा में रचा गया
घतलाया जाता है और साथ ही साथ वे हेतु भी लिसे
जाते, जिनके कारण प्राचीन सिद्धान्त-ग्रन्थो के स्थान में
नवीन अन्य रचे गय । परन्तु जैन साहित्य के समस्त संग्रह
में इन बातों का उल्लेस कहीं नहीं मिलता। इसलिये हम
प्रोफेसर जेकोबी की कल्पना को स्वीकार नहीं कर सकते ।
इमके साथ यह भी याद रखना चाहिये कि जैन प्रन्थों
में स्पष्ट लिखा हुआ है कि पाटलीपुत्र में जैन सिद्धान्त का
केवल सग्रह किया गया था, उनकी रचना नहीं की गई थी।
इसके भिवाय प्रोफेसर जेकोची की दलीलें ऐमी मजबूत नहीं
हैं कि हम जैन मन्थो के स्पष्ट रेखों को अस्वीकार करें।
।
(४१)
साधु नम रहते हैं और इसी कारण हम अत्यन्त प्राचीन काल
। दिगम्बर कहलाते हैं और इसलिये हम जैन धर्म के सबमे
चीन और असली अनुयायी हैं । वे यह भी कहते है कि
करों के नियमों के विरुध्द श्वेताम्बर साधु वस्त्र पहनते हैं,
इनके धर्म शास्त्र प्रामाणिक नहीं हैं, उनकी उत्पत्ति दिगम्बरों से
हुई है, और इसलिये ये अम्विीन हैं।
दिगम्बरों के उक्त दावे झूठे हैं।
दिगम्बरों की इन उक्त दलीलों में कुछ भी सार नहीं है
पह निन्न लिखित बातों से
मालूम
होगा:-
(१) उपरोक्त पृष्टों में हमने सतोपपूर्वक सिध्द करदिया है कि
धताम्बरों के शास्त्र सबसे प्राचीन हैं। उनको महावीर के शिष्यों
ने रचा था। वे परपरा से प्राय उमी रूप में अब तक चले
आते हैं और जैन इतिहास के निर्माण के लिये उनपर सनासे
अधिक विश्वास किया जा सकता है । इन दलीलों के অাঘা
से दिगम्बरों के दाने क सम्बन्ध में अधिक विवेचन करना
आवश्यक नहीं रहता । हम अब उनके अन्य प्रतिवादों
का उत्तर देते हैं।
(B) दिगम्बरों का कथन है कि महावीर ने मुनियों
को नम रहने का उपदेश दिया और उस समय सभी मुनि
नम रहते थे। अब यह मालूम करना चाहिये फि तिथंकरों
.
(४.)
यह और अन्य जैन सिद्धान्त बौद्ध-सूत्रों में प्रायः उन्ही
शब्दों में लिखे हुए मिलते हैं। जिन शब्दों में वे वर्तमान जैन
सूत्रों में दिये हुवे हैं। ये पार पहे महत्व की है और इससे
अगों की प्राचीनता के विशय में सभी सदेह दूर हो जाते हैं।
इस एक पात से ही विपक्ष में जितनी दलीलें उठाई जाय वे सथ
रद्द हो जाती है।
उपरोक्त दलीलें इस पात को सिद्ध करने के लिये पर्याप्त
है कि देवार्द्ध के समय में श्वेताम्बरों के सिध्दान्त-प्रथ केवल
लिपियध्द थे | उस समय से पहले वे प्रायः कण्ठस्थ थे
और वे अब तक उसीरूप मे चले आते हैं, जिम रूप में गणधर
ने उनकी रचना की थी।
जैन सिद्धान्तो का ऐतिहासिक महत्व ।
अतएव इतिहास के महत्वपूर्ण प्रश्नों को हल करने में
हम इस प्राचीन साहित्य से निर्भय होकर सहायता ले सकते
हैं । इसी बात के आधार पर हम यह सिध्द कर सकेगे कि
दिगम्बर अर्वाचीन हैं और वे महावीर के कई सदियों बाद
अपनी सम्प्रदाय से जुदा हुवे हैं ।
अपनीपाचीनताके विषय में दिगम्बरों का दावा।
दिगम्बर यह कहते हैं कि सब तर्थिकर नग्न रहते थे,
महावीर ने साधुओं को नम रहने का उपदेश दिया था और हमारे
+
(४१)
साधु नग्न रहते हैं और इसी कारण हम अत्यन्त प्राचीन काल
से दिगम्पर फहलाते हैं और इसलिये हम जैन धर्म के सबसे
प्राचीन और असली अनुयायी हैं। वे यह भी कहते हैं कि
तीर्थंकरों के नियमों के विरुध्द श्वेताम्बर साधु वस्त्र पहनते हैं,
उनके धर्म शास्त्र प्रामाणिक नहीं हैं, उनकी उत्पत्ति दिगम्परो मे
हुई है, और इसलिये ये अर्वाचीन हैं।
दिगम्बरों के उक्त दावे झूठे हैं।
दिगम्बरों की इन उक्त दलीलों में कुछ भी सार नहीं है
यह निन्न लिखित यातों से मालूम होगा:--
(१) उपरोक्त पृष्टों में हमने सतोपपूर्वक सिध्द करदिया है कि
श्वेताम्बरों के शास्त्र सबसे प्राचीन हैं । उनको महावीर के शिष्यों
ने रचा था। वे परपरा से प्राय उसी रूप में अब तक चले
आते हैं और जैन इतिहास के निर्माण के लिये उनपर मर मे
अधिक विश्वास किया जा सकता है । इन दलीलों के आधार
से दिगम्बरो के दाने क सम्बन्ध में अधिक विवेचन करना
आवश्यक नहीं रहता । हम अब उनके अन्य प्रतिवादों
का उत्तर देते हैं।
(२) दिगम्बरों का फथन है कि महावीर ने मुनियो
को नम रहने का उपदेश दिया और उस समय सभी मुनि
नग्न रहते थे। अब यह मालूम करना चाहिये कि तिथंकरों
-
।
यह और अन्य जैन सिद्धान्त बौद्ध-सूत्रों में प्रायः उन्ही शब्दों में लिखे हुए मिलते हैं। जिन शब्दों में वे वर्तमान जैन सूत्रों में दिये हुवे हैं । ये वात बहे महत्व की है और इससे अगों की प्राचीनता के विशय में सभी सदेह दूर हो जाते हैं इस एक बात से ही विपक्ष में जितनी दलीलें उठाई जाय वे सब रद्द हो जाती है। उपरोक्त दलीलें इस यात को सिद्ध करने के लिये पर्याप्त है कि देवर्द्धि के म्मय में श्वेताम्बरों के सिध्दान्त-अथ केवल लिपिबध्द हुए थे । उस समय से पहले वे प्रायः कण्ठस्थ थे और वे अब तक उसीरूप में चले आते हैं, जिस रूप में गणधर ने उनकी रचना की थी। जैन सिद्धान्तो का ऐतिहासिक महत्व । अतएव इतिहास के महत्वपूर्ण प्रश्नों को हल करने में हम इस प्राचीन साहित्य से निर्भय होकर सहायता ले सकते हैं । इसी बात के आधार पर हम यह सिध्द कर सकेंगे कि दिगम्बर अर्वाचीन हैं और ये महावीर के कई सदियों याद अपनी सम्प्रदाय से जुदा हुवे है। अपनी प्राचीनता के विषय में दिगम्बरों का दावा। दिगम्बर यह कहते हैं कि सब तथंकर नग्न रहते थे, महावीर ने साधुओं फो नम रहने का उपदेश दिया था और हमारे
(४३)
हैं। उदाहरणार्थ बुद्धघोपने धम्मपदम् पर जो दीका लिखी है
उसमें कुछ भिक्कुओं के विपय में लिखा है कि वे अचेलकों
को निग्गयों में अच्छा समझते थे, क्यों कि अचेलक सर्वथा
नम्न रहते थे और निग्गंथ किसी न किसी प्रकार का वस्त्र
लज्जा के लिये धारण करते थे । यह कल्पना मिाकु की
गलत थी। यौद्ध, मक्खलि गोशाला के अनुयायियों को अचेलक
कहते थे।"
।
यह स्पष्ट है
अतएव यौद्ध सूत्रों में निग्गथ अर्थात् जैन साधुओं के
इस हवाले से मालूम होता है कि महावीर के समकालीन बुद्ध
देव के समय में जैन साधु वस्त्र धारण करते थे । यदि महा-
वीर और अन्य तीर्थकरोंने वन धारण करने का सर्वथा
निषेध किया होता तो साधुओं के लिये शात्रों के आदेश के
प्रतिकूल आचरण करना सभव न होता । इस से
कि महावीर के समय में दिंगबरों के कथनानुसार सभी
जैन साधु नम नहीं रहते थे। अतएव वे नमता के आधार
पर महावीर के असली अनुयायी होने का दावा नहीं
कर सकते ।
(४) हमारे पास एक ऐसी ही अकाट्य दलील और है जिससे
मालूम होता है कि जैन सूत्रों में सर्वथा नमता की अनुमा
नहीं है। इस को सिद्ध करने के लिये हम उत्तराध्ययन सूत्र
फे २३ - अध्याय में से एक ऐसे अश फा उल्लेस फरते है
(४२) ने सभी मुनियों को नाम रहने का उपदेश दिया था या नहीं। धर्म शास्त्रों से यह स्पष्ट रीति से मालूम होनायगा कि महावीर ने यह उपदेश कदापि नहीं दिया कि सभी साधु नग्न रहैं। जैन शास्त्रों में लिखा है कि यदि कोई साधु नाम रहना चाहे तो रह सकता है । जब वह आत्म-ज्ञान की सीढ़ियों पर ऊंचा चढ़ जाय तप वह अपनी इच्छानुसार वस्त्रों को त्याग कर नम रह सकता है। परन्तु वक्ष धारण करने से आत्मा की उन्नति में किसी तरह की बाधा न आनेसे नमता को अनिवार्य नहीं रक्खा गया किन्तु मुख्य मुख्य प्रसंगों में ही उसका विधान किया गया। जैसे ही उस समय की परिवर्तित स्थिति के अनुसार महावीर के निर्माण के कुछ समय बाद ही यह प्रथा बंद कर दी गई । अतएव साधु अपनी इच्छानुसार नग्न रह सकते थे। नमता अनिवार्य नहीं थी। इसलिये यह सिद्ध होता है कि शारों में अनिवार्य नम रहने का उपदेश नहीं है। यौद्ध सूत्रों में इस यातके प्रमाण मिलते कि जैन साधु वस्त्र धारण करते थे । (३) बौद्ध सूत्रों से यह मालूम होता है कि जैन साधु पल धारण करते थे। हरमन जैकोबी ने जैन सूत्रों की भूमिका में लिखा है कि" बौद्ध अचेलकों और निगयों में भेद मानते
"
(४५)
२९, ३०, और ३१ नम्बर के पद्य अधिक महत्व के हैं
और उनसे उस प्रश्न पर जो हमने उठाया है बहुत प्रकाश
पड़ता है । इन पद्यों की व्याख्या, टीका में बहुत स्पष्ट दी हुई
है और इसलिए मैं नीचे उनका सक्षिप्त अनुवाद देता हूं।
केसी गौतम से पूडते हैं कि " चौवीस तीर्थकर
वर्धमान ने साधुओं को परिमित संख्या में सफेद और साधारण
वसी को धारण करने की आज्ञा दी है, परन्तु तेईसवें
तीर्थकर पार्श्वने वस्त्र धारण करने की आज्ञा देने में रग रूप
अथवा सख्या की कोई मर्यादा नहीं रखी है।
हे गौतम जब कि दोनोंने एक से उद्देशों को सामने
रस कर नियम बनाये हैं तो फिर इस मतभेद का क्या
कारण ? हे गौतम । क्या आपको वन सवधी इस दोहरे
नियम के कारण कुछ सदेह नहीं होता?
गौतम उत्तर देते हैं कि हे केसी। तीर्थंकरों ने अपने
फेवल-ज्ञान द्वारा इस बातका निर्णय करके साधुओं की
तियों के अनुसार ( धार्मिक जीवन के लिये ) साधनी
और बाह्य चिन्हों की आज्ञा दी है। एक तरफ तो उन्हों ने
ऐसे याह्य चिन्ह बतलाये हैं जो सरल स्वभाव व तेज विचार
चाले साधुओं के लिए उपयुक्त हैं और दूमरी तरफ उन्होंने
न्न साधुओं के लिए वाह्य चिन्ह बतलाये हैं जिनकी मनोवृत्ति
इसके प्रतिकूल है"।
(४४)
जो इतिहास के लिये यहे काम का है। परन्तु ऐसा करने
से पहले जैकोबी द्वारा संपादित जैन सूत्रों की भूमिका में से एक
अवतरण दिया जाता है जिससे यह मालूम हो जायगा कि
वह अध्याय विश्वसनीय है । जैकोबी ने लिखा है कि "
अम
सब लोग मानने लगे हैं कि यह प्रायः ठीक ही है कि पार्श्व
(जो जैनों के २३ वें तीर्थंकर थे और महावीर के २५० वर्ष
पहले विद्यमान थे ) ऐतिहासिक पुरुप थे । महावीर के समय
में उनकी सप्रदाय के नेता केसी नामके मुनि थे। केसी का नाम
लेन सूत्रों में कईबार ऐसी गंभीरता के साथ आया है कि
हमको उन लेखों के प्रामाणिक होने में कुछ भी मदेह नहीं
मालूम होता।
तेईसवें अध्याय का सारांश यह है:-
केसी और गौतम जो जैन धर्म के दोनों सप्रदायों के
( अर्थात् पार्श्वनाथ और महावीर के संप्रदायों के ) प्रनिनिधी
और नेता थे । अपने शिश्यों के सहित श्रावस्ती के निस्ट एक
वाटिका में एकत्रित हुए। दोनों संप्रदायों में जैन साधुओं
के महाव्रतों के विषय में और उनके वस्त्रों के रंग रूप और
सरया के विषय में कुछ मतभेद था । उन दोनों ने मिलकर
बिना वादविवाद, कियही इन मतभेदों के कारण समझकर
ऐक्यता करली।
।
-
--
-
"
२९, ३०, और ३१ नम्बर के पद्य अधिक महत्व के हैं
और उनसे उस प्रश्न पर जो हमने उठाया है बहुत प्रकाश
पडता है । इन पदों की व्याख्या, टीका में बहुत स्पष्ट दी हुई
है और इसलिए मैं नीचे उनका साक्षिप्त अनुवाद देता हूं।
केसी गौतम से पूछते हैं कि " चौवीसपे तीर्थकर
वर्धमान ने साधुओं को परिमित सख्या में सफेद और साधारण
वस्त्रों को धारण करने की आज्ञा दी है, परन्तु तेईसवें
तीर्थकर पवने वस्त्र धारण करने की आज्ञा देने में रग रूप
अथवा संख्या की कोई मर्यादा नहीं रखी है।
हे गौतम जप कि दोनोंने एक से उद्देशों को सामने
रस कर नियम बनाये हैं तो फिर इस मतभेद का क्या
कारण है ? हे गौतम | क्या आपको पत्र सवधी इस दोहरे
नियम के कारण कुछ सदेह नहीं होता ?
गौतम उत्तर देते हैं कि हे केसी। तीर्थंकरों ने अपने
फेवल-ज्ञान द्वारा इस बातका निर्णय करके साधुओं की
प्रवृत्तियों के अनुसार ( धार्मिक जीवन के लिये ) साधना
और बाध चिन्हों की आज्ञा दी है। एक तरफ तो उन्हों ने
ऐसे याह्य चिन्ह बतलाये हैं जो सरल स्वभार व तेज विचार
वाले साधुओं के लिए उपयुक्त हैं और दूमरी तरफ उन्होंने
जन साधुओं के लिए बाह्य चिन्द घतलाये हैं जिनकी मनोवृत्ति
इसके प्रतिकूल है"।
'(४६)
"महावीर के अनुयायियों का स्वभाव वक और
लापरवाही करने का था, इसलिए संभव था कि वे रंगीन
वखों का पक्ष ग्रहण करके उनकी ओर मन चलाते ।
यही कारण था कि उनको केवल श्वेत वस्त्र धारण करने की
आज्ञा का आदेश किया गया। परन्तु पार्श्वनाथ के अनुयायी
सरलता और सदाचार की तरफ झुके हुए थे, इसलिए ये
वस्त्रों को अपनी नगनत्व लज्जा ढकने का सावन मात्र समझते
थे और वनों के प्रति तनिक भी मोह अथवा पक्षपात
न रखते थे । इन्हीं पृथक् पृथक् बातों के कारण भिन्न भिन्न
प्रकार के वस्त्रों का आदेश दिया गया।
जैनधर्म के दो प्रसिद्ध आचार्य फेसी और गौतम के
उपरोक्त वार्तालाप से बिलकुल स्पष्ट हो जाता है कि महावीर
ने फेवल रगीन वखों की जिनको पाव के अनुयायी धारण
करते थे, मनाई की थी और परिवर्तित परिस्थितियों की
आवश्यकाओं के अनुसार रगीन वस्त्रों के स्थान में केवल
श्वेत वस्त्र धारण करने का आदेश किया था ।
-
इससे निकलनेवाला परिणाम ।
जव ऐसे पुष्ट प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि पार्श्व
और महावीर दोनों ने ही वस्त्र धारण करने की आज्ञा दी,
तब दिगम्बरों का यह कहना कि हम ही महावीर के मब से
प्राचीन और असली अनुयायी हैं और तीर्थंकरों ने सर्वया
(४७) नग्न रहने का ही आदेश किया था, युक्ति संगत नहीं है। इसके प्रतिकूल अनेक हेतुओं द्वारा हम इसी नतीजे पर पहुँचते हैं कि पार्श्वनाथ अथवा महावीर स्वामी के समय दिगपर सप्रदाय अस्तित्वमें न था। प्राचीनताके विषय में दिगंबरों के दावे की सत्यासत्यता । अब हमको जैन और बौद्ध सूत्रों की भी छान-चीन करनी चाहिए और यह मालूम करना चाहिए कि उनमें कोई उल्लेख ऐसा भी है जिससे दिगंबरों के प्राचीन होने के दावे का समर्थन हो सके। (१) बौद्ध सूत्रों में जैनों का उल्लेख कई स्थानों पर मिलता है, परंतु उनमें जैनों को श्रमण अथवा निग्गय कहा गया है। किसी स्थान पर भी उनको दिगषरी के नाम से नहीं पुकारा गया। (२) जैन और बौद्ध सूत्रों में ऐसे अनेक धर्मों का उल्लेख मिलता है, जिनका प्रचार महावीर और पौद्ध के समय था। उदाहरणार्थ जैनों के भगवती सूत्र में और बौद्धों के मचिम- निकाय सूत्र में गोशाला और उनके धार्मिक सिद्धान्तों का सपूर्ण विवरण मिलता है। यदि उस समय दिगयरों जैसी फोई सप्रदाय का अस्तित्व होता तो महावीर और युद्ध -- (४८) दोनों ही उसका उल्लेस करने से न चूकते, क्यों कि वे सर्वथा नग्न रहने के विषय में दिगवरों से मतभेद रखते थे। चूंकि इस प्रकार का कोई उल्लेख नहीं मिलता इसलिए यह मिद्ध होता है कि उस समय दिगंवर इस नामकी संप्रदाय का सर्वथा अभाव था। (३) दिगबर यह भी मानते हैं कि स्त्रिया मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकती। जैन और बौद्ध सूत्रों में कहीं भी इस सिद्धान्त का उल्लेख नहीं मिलता । यह मिद्धात केवल दिगंबरी को ही मान्य है और लगभग सभी धर्मों के सिद्धान्तों के प्रतिकूल है। यदि प्राचीन भारत में ऐसे सिद्वान्तो को मानने वाला कोई. धर्म होता, तो पौद्ध और जैन सूत्रों में उसका सास तौर पर उल्लेस मिलता और 'उसमें उमकी कड़ी समालोचना भी मिलती। (४) स्वय दिगवरो के शास्त्रों में अनेक पुष्ट प्रमाण मिलते है जिनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि वे और उन धार्मिक सिद्धात अर्वाचीन हैं। हम पहले ही बतला चुके हैं कि दिगबर संप्रदाय का अथवा श्वेताम्मरों के शास्त्रों से भिन्न दिगंबर शास्त्रों का उल्लेम्ब न तो जैन शास्त्रों में मिलता है और न बौद्ध शास्त्रों में। दिगंबर शास्त्रों में श्वेताम्बर और उनके सूत्रों का उल्लेस कई स्थानों पर मिलता है। कई स्थानों पर श्वेताम्बरों पर कटाक्ष किये गये हैं और यह बदलाया
(४९)
बार उल्लेख
है
।
गया है कि उनके सिद्धात दिगंधरों के सिद्धातों से भिम है।
दिगवरों के शास्त्रों में श्वेताम्बरों का की
हुआ
परंतु श्वेताम्बरों के शास्त्रों में दिगंवरों का उल्लेख एक बार
भी नहीं हुआ इस बात से सिद्ध होता है कि दिगबर तथा
उनके शास्त्र श्वेताम्बरों से पीछे के हैं।
(५) दिगवर प्रथ-कर्ताओं ने अपने प्रथों में जो रचना-
का दिये हैं उनके देखने से भी मालूम होता है कि
दिगंबरों के अंथ अर्वाचीन हैं। इससे निस्संदेह सिद्ध हो
जाता है कि दिगवरों की उप्तत्ति महावीर के पाद बहुत
पीछे हुई
(६) दिगंबर मूर्तिपूजक है, परतु महावीर ने मूर्ति पूजा
का विधान नहीं किया। इसलिए दिगंबरों को जैन धर्म का
सच्चा अनुयायी नहीं माना जा सकना । श्वेताग्नरों का वर्णन
करते समय हम मूर्ति पूना का सविस्तार विवेचन करेंगे।
अब हम जैन मूर्तियों के लेखों से यह सिद्ध करत हैं कि
दिगयर अर्वाचीन हैं।
उपलब्ध जैन मूर्तियों में से सब प्राचीन मूर्तियों केयल
१८०० वर्ष की पुरानी हैं और वे भी दिगबर संप्रदाय
से संबंध नहीं रखती यह जैनो के उवासम्गदसा नाम के
सातवें अंग पर रूहाल्फ हानले साहेब ने लिखी हुई प्रस्तावना
के निम्नलिखित अवतरण से स्पष्ट हो जाता है।
मथुरा से कुछ लेख ऐसे मिले हैं जिन में इस बार
का प्रत्यय प्रमाण मिलजाता है कि इसवी सन की पहली
सदी में श्वेतार सप्रदाय का अस्तित्व था। ये लेख जैन
तीर्थंकरों की मूर्तियों के पदों पर मिले हैं और इनमें कनिष्क
हुविक और वासुदव नामक प्रसिद्ध गजाओं का सपत् दिया
है। ये राजा सिथिया देश क थे, परन्तु भारतवर्ष पर भी
राज्य करते थे । मालूम होता है कि इनका मवत अब शक
के नाम से प्रसिद्ध है, जा ईमवी सन ७८-७९ से शुरू होता
है । इन लेखों में लिया हुआ है कि ये मूर्तिया श्वेताम्यय
संप्रदाय के अनुयायियो की भक्ति का स्मारक हैं । इन मूर्तियों
की स्थापना करने वाले दिगबर न थे किन्तु श्वेताबर थे,
इस बात का पता या लगता है कि मूर्तियों पर जो लेख है।
उनमे जैन साधुओं के कुछ गणो के नाम लिसे हैं और इन
गणों के नाम श्वेतारों के कल्प सूत्र की स्थविरावली में भी
मिलते हैं। अतएव यह सिद्ध होता है कि ये मूर्तियः
श्वेतावर सप्रदाय की हैं। इस बात का हम एक उदाहरण
देते हैं । इन मूर्तियों के लेग्यों में से एक लेस कनिष्क के राज्य
काल के नवें वर्ष का ( अर्थात् ईमवी सन् ८७-८८ का )
है । उममें लिखा है कि उस मूर्ति की स्थापना कोटिया
( अथवा कोटिक गण ) के नागनदिन नामक धर्मगुरु
उपदेश में विकटा नामक एक जैन श्राविका ने की थी । इस
गण की स्थापना स्थविरावली के
अनुसार
स्थविर सुस्थित
-
के लेस इस ने की थी जो ई. स पूर्व १५४ महावीर के ३१३ वर्प पीछे मोक्षगामी हुवे। इस प्रकार परोक्ष रूप से मथुरा बातमी साक्षी देते हैं कि इसा से पूर्व दूसरी शताब्दी के मध्य में श्वेतावर सप्रदाय का अस्तित्व था। उपरोक्त प्रमाण से यह स्पष्ट है कि मथुरा में जो जैन मूर्तिया भूगर्भ से निकाली गई हैं वे दिगवर सप्रदाय की नहीं किन्तु श्वेतापर संप्रदाय की हैं। इस बात का भी पता लग चुका है कि उन मूर्तियों को छोडकर जिनका पता पुरातत्वज्ञों ने लगाया है भारतवर्ष के जैन मदिरों की असख्य मूर्तियों में दिगपर सप्रदाय की एक मूर्ति भी नहीं है जो मथुरा में मिली हुई मूर्तियों के परावर प्राचीन हो । अतएव यह मानना गलत नहीं है कि इसवी सन् की पहली सदी में दिगयरों का अस्तित्व न था और इसलिए यह स्पष्ट है कि वे अर्वाचीन हैं। - ८ दिगंवर शाखों में महावीर के प्रसिद्ध प्रतिद्वदी भक्सली. पुत्र गोशाला का उल्लेख कहीं नहीं मिलता परन्तु जैन और बौद्ध सूत्रों में गोशाला के जीवन चरित्र और सिद्धान्तों फा संपूर्ण वृतान्त दिया है । यह बात बड़े महत्व की है और निश्चित रूप से सिद्ध कर देती है कि दिगवर तथा उनके सून अर्वाचीन है।
(५२)
इस पातकी पुष्टि करने के लिये और दलीलें देना व्यर्थ
है क्यों कि हम अपर काफी दलीलें दे चुके हैं जिनसे निपक्ष
मनुष्य यह परिणाम निकाल सकते हैं कि दिगबर और उनके
शास्त्र निस्सदेह अर्वाचीन हैं और असली तथा मूल संघ से
उनकी उत्पत्ति पीछे हुई है।
दिगंवरों की उत्पत्ति।
अन यह मालूम करना चाहिये कि दिगयर कब और
जुदा हुए । इस विषय में हमको धर्ममागर कृत प्रवचन.
परिक्षा नामक प्रथ से सहायता मिलती है। इस मय में
दिगारों की उत्पत्ति इस प्रकार दी है:-
रथवीरपुर नामक नगर में शिवभूति उर्फ सहस्रमल्ल
नामका एक मनुष्य रहता था। वह उस नगर के राजा का
खास सेवक था । एक दिन राजा की माता ने उमपर यहा
क्रोध किया इसलिये वह तुरत ही नौकरी छोडकर जैन
साधु बन गया । एक बार राजा ने उसको एक बहुमूल्य
दुशाला दिया । इस दुशाले से उसको मोह होगया ।
उसके गुरु आर्यकृष्ण उसपर बड़े कुपित हूए क्यों कि सासा-
रिक पदार्थों से मोह रखना साधुओं के धर्म के विरूद्ध है
और इमलिये उन्होंने उसे दुशाला त्याग देने की सम्मति
दी, परन्तु उसने अपने गुरु की आज्ञा का पालन न किया ।
एक दिन जय शिवभूति कहीं गया हुआ था आर्यकृष्ण ने
(५३)
उसके दुशाले को फाटकर टुकडे २ कर डाले । दुशाले को इस
प्रकार नष्ट किये जाने पर शिवभूति को यहा कोध आया और
वह तर्फ फरने लगा कि यदि वस्त्रों से मोह उत्पन्न हो जाता है
तो उनको सर्वथा ही त्याग देना उचित है। इतना कहकर
उसने नग्न रहने का व्रत धारण कर अपने गुरु को त्याग
दिया व एक नवीन धर्म का प्रचार कर उसके सिद्धान्तों
में नग्नता को प्रधानता दी। वह अपने आप को दिगबर
फहने लगा और उसी समय से दिगवर सप्रदाय का सस्थापन
होगया । उसको भगिनी उसके धर्म की अनुयायी होगई
और उससे नग्न रहने की आज्ञा मागी। शिवभूति ने उसे
ऐसा करने से रोका और यह उपदेश दिया कि स्त्रिया मोक्ष
प्राप्त नहीं कर सकती। कहा जाता है कि यह घटना ईसवी
सन् की दूमरी शताब्दी के मध्य में हुई थी। इस प्रकार दिगनरों
की उत्पत्ति की कया है। परन्तु यदि इस कथा की सच्चाई
पर मदेह भी किया जाय तो दिगंबरों के अर्वाचीन होने की
जो दलीलें ऊपर दी गई हैं उनकी सत्यता पर किसी प्रकार
का संदेह नहीं हो सकता, क्यों कि वे ऐतिहासिक प्रमाणों
पर अवलम्बित हैं।
जैनों का नाम श्वेतापर कैसे पड गया।
जब शिवभूति ने नग्न रहने का ब्रत धारण
और दिगवर सप्रदाय की स्थापना की, तब यह स्वाभाविक
,
कर लिया
,
का निर्णय करेंगे कि श्वेताम्बरों का कौनसा संप्रदाय-मूर्ति- पूजा न करने वाला या मूर्तिपूजा करने वाला-महावीर के असली उपदेशों का सच्चा अनुयायी है व मूर्तिपूजकों के इस फयन में कि मूर्ति पूजा न करने वाले (स्थानक वासी ) जैन धर्म के सच्चे अनुयायी नहीं है और इसलिए वे अर्वाचीन हैं कुछ सार है या नहीं। जैन धर्म के कुछ सिद्धांतों की निर्पक्ष और गहरी छान- धीन करने से ही यह अत्यंत महत्वपूर्ण और पेचीदी समस्या हल की जा सकती है। सबसे पहला प्रभ मूर्तिपूजा का है। श्ववाम्बर मूर्ति. पूजकों का यह कथन है कि तीर्थकरों ने मुक्ति प्राप्त करने के लिए मूर्ति पूजा का विधान किया है, परन्तु मूर्तिपूजा न फरने वाले इसका विरोध करते हैं। मूर्तिपूजा के प्रा पर कई सदियों से लगातार वाद- विवाद हुआ है और निर्पक्ष और परमेश्वर से डरने वाले मनुष्यों को यह दिसाई देया कि यह प्रभ सदा के लिए सत्तोष जनक हल हो चुका है। जैन धर्म में मूर्ति पूजा का विधान नहीं है । समस्त जैन शासों में तीर्थकरोंने मूर्तिपूजा का विधान, कहीं नहीं किया। विधान ही क्या, उन्होंने इस बात का 1
(५७)
किंचित इशारा भी नहीं किया।हम इस अपने मत का समर्थन
करने के लिए आगे चलकर कई दृष्टियों से इस प्रश्न पर
प्रकाश डालते हैं-
१ उपासकदशाग और आचाराग नामके दो जैन सूत्र इस
विपय पर बहुत्त प्रकाश डालते हैं और इस लिये इन प्रों
की छानबीन करेंगे।
उपासकदशाग में महावीर के मुख्य दस श्रावकों के
सविस्तार जीवन चरित्र दिये हैं और उसमें जैन श्रावकों के
आचार व्यवहार के नियम और व्रत ठीक उसी प्रकार समझाये
गये हैं जिस प्रकार आचाराग में जैन साधुओं के लिए नियम
और व्रत दिये हैं।
श्रावक और साधुओं को आचार के नियमों को ठीक
ठीक समझने के लिए सामकर इन्हीं दो प्रथों का आश्रय लेना
पडता है। इन दो प्रामाणिक अगों में व अन्य शास्त्रों में भी
मूर्तिपूजा का जिसे मूर्तिपूजक मुक्ति प्राप्त करने का एक मात्र
साधन बताते हैं, तनिक भी उल्लेस नहीं है। यदि महावीर
मूर्तिपूजा को जैन धर्म का आवश्यक अग समझते तो वे
साधुओं और श्रावकों के प्रतों में मूर्तिपूजा का समावेश
करने से कदापि न.
यह बात याद रखने के योग्य है और महावीर के समय
में मूर्ति-पूजा के अभाव को अकाट्य प्रमाणों से मिद्ध करती
है । यदि उस समय जैन मंदिर होते, तो महावीर उनमें ही
ठहरना अधिक अच्छा समझते । वे यक्षों के मंदिरों में
अथवा यों कहना चाहिये कि उन उपवनी में, जिनका नाम
यक्षों के नाम पर रक्सा गया था,
कभी न ठहरते ।
(८) जिस
प्रकार उपासकदशाग में महावीर ने
श्रावकों के लिये नियम बतलाये हैं उमी प्रकार उन्होंने,
आचाराङ्ग में साधुओं के वास्ते नियम दिये हैं। इस पिडले
अंथ में उन्होंने यह बतलाया है कि साधुओ अथवा साध्वियों
को कितने वन रसना चाहिये, उनकी लम्बाई चौडाई कितनी
हो, उनका रंग कैसा हो और वे किस प्रकार के हों।
उन्होंने यह भी लिखा है कि साधुओं को कितने और किम
प्रकार के पात्र रसने चाहिए। इसके सिवाय उन्होने , बडे
विस्तार के साथ चलने, बैठने, बोलने, खाने, पीने इत्यादि के
नियम दिये हैं। साधुओं को धर्म संबंधी जितने कार्य करने
चाहिये उन्मे से प्रत्येक को उन्होंने बहुत अच्छी तरह समझा
दिया है। साराश यह है कि उन्होंने इस विषय का ऐसा
विस्तार पूर्वक विवेचन किया है कि आचाराङ्ग माधुओं के
लिए एक समय-विभाजक-चक बन गया है, परन्तु उनके
नित्यप्रति के धर्म मबधी कार्यों में मूर्तियों को व मदिरों को
स्थान नहीं दिया गया ।
तीर्थकरों ने साधुओं और श्रावकों के विषय मे इतना
विस्तारपूर्वक विवेचन किया है, परन्तु उन्होंने मदिगें और
मूर्तिपूजा के विषय में कुछ नहीं कहा-यह बात ध्यान देने
योग्य है और बडे महत्त्व की है।
(९) बहुत से अन्य शाखों में भी साधुओं और
भावकों के लिए आचार सबधी नियम लिने हैं, परन्तु उनमें
मूर्तिपूजा का विधान कहीं नहीं मिलता । यदि मूर्तिपूजकों के
कथनानुसार मूर्तियों और मदिरों के बनवाने से मुक्ति
मिलती होती, तो सर्वज्ञ महावीर, सूत्रों में इस महत्वपूर्ण विपय
का समावेश विना किये कभी नहीं रहते
१
(१०) यदि तीर्थंकरों ने मूर्ति पूजा करने और मंदिर
बनवाने का विधान किया होता, तो वे यह बताना न भूलते
कि मूर्ति किम आसन में होनी चाहिए, किम पदार्थ की
बननी चाहिए, उमकी प्रतिष्ठा और पूजन के ममय किन मत्रों
का उच्चारण करना चाहिए, आभूषण किस प्रकार के होने
चाहिए, पूजन किस प्रकार होना चाहिए, उममे किम
सामग्री का प्रयोग करना चाहिए और मूर्तियों मे सपव रखने
वाले अन्य कार्य कैमे होने चाहिए।
(११) यह बात प्रसिद्व है कि महावीर,
गौतम
क ममकालीन थे और इसलिए बौद्ध सूत्र महावीर के बतलाये
(६२) जैन सिद्धान्तों मे और जैन साधुओ और श्रापकों के आचारों के हवालों से भरे पडे हैं। परन्तु बौद्ध शास्त्रों में यह कहीं नहीं लिखा कि जैनधर्म के सिद्धान्तों में मूर्ति पूजा फा भी विधान है। यदि महावीर ने मूर्ति-पूजा का उपदेश किया होता तो चौद्ध जैनों पर तीन कटाक्ष करने से और उनका उपहास करने से भी न चूकते, क्यों कि मूर्ति-पूजा का प्रचार, जो बौद्धों के केवल एक सम्प्रदाय मे अभी पाया जाता है, गौतम बुद्ध के निर्याण के बहुत समय बाद हुआ है। (१२) बौद्ध सूत्रों में उन जैन सिद्धान्तों पर जो बौद्ध सिद्धान्तों से भिन्न हैं, तीत्र कटाक्ष किया गया है और उनको गलत समझाया गया है । इसलिए यदि जैनधर्म में मूर्ति-पूजा का विधान हाता तो हम को चौद्ध सूत्रों में अवश्य ही इस सिद्धान्त की कडी समालोचना मिलती। . चूंकि यौर प्रथों में मूर्ति-पूजा पर कोई कटाक्ष अथवा नाम मात्र के लिए भी कोई हवाला नहीं मिलता, इसलिए हम केवल एक ही नतीजे पर पहुच सकते हैं और वह यह है कि महावीर के समय में जैनों में मूर्ति-पूजा न थी और महावीर ने न कभी इस विपय का उपदेश दिया । (१३) पुरातत्व की खोज करते समय भारतवर्ष के भिन्न भिन्न प्रदेशों में कई जैन मूर्तिया, भूगर्भ से निकाली गई
।
हैं, परन्तु अभीतक एक भी मूर्ति ऐसी नहीं मिली जिसके
लेख से यह सूचित होता हो कि वह महावीर अथवा उनके
पूर्ववर्ती अन्य तीर्थंकरों क समय की हो । सबसे प्राचीन
मूर्तियाँ, जो डॉक्टर
फूहरर
को मथुरा में मिली हैं फेवल १८९०
वर्ष की पुरानी हैं
(१४) मूर्तिपूजकों का मत है कि पालीताना, गिरनार
आबू, तारगा, शत्रुजय और अन्य पर्वतों पर जो मंदिर और
मूर्तिया हैं वे बहुत प्राचीन हैं और इसलिए वे कहते हैं कि
मूर्तिपूजा का प्रचार तीर्थंकरों ने किया है। परन्तु पुरातत्वज्ञों
ने इन मूर्तियों और मदिरों के समस्त लेखों की देख भाल की
है और उन्होंने यह निर्णय किया है कि ये अर्वाचीन हैं,
इनकी स्थापना महावीर के बाद कई सदियों बीत जाने पर
हुई है और ये मथुरा में मिली हुई मूर्तियों के बरोबर भी
प्राचीन नहीं है । हम ऊपर बतलाही चुके हैं कि मथुरा
की मूर्तियों भी डॉक्टर फूहरर के कथनानुसार १८००
वयं की प्राचीन हैं।
। १५) उन मूर्तियों के अतिरिक्त, जो पुरातत्वज्ञों ने
सोदकर निकाली हैं, भारतवर्ष में हजारों जैन मदिर हैं और
लाखों मूर्तियाँ हैं, परन्तु उन में एक मूर्ति भी ऐसी नहीं है
जिसके लेख और सवत यह सूचित करते हों कि वह महावीर
पार्श्वनाथ अथवा अन्य किसी पूर्ववर्ती तीर्थकर के समय की हो।
(६४) यह बात बडी विचित्र और महत्वपूर्ण है। इससे सिद्ध होता है कि मूर्तिपूजा की प्राचीनता के पक्ष में मूर्ति पूजकोंकी दलील बहुत कमजोर है । यदि मूर्तिपूजा वास्तव में इतनी प्राचीन होती जितना कि मूर्तिपूजक बतलाते हैं, तो हम को अवश्यमेव कुछ मूर्तियां भी ऐसी मिलती जिनके सवत और लेख मूर्तिपूजकों के पक्ष की पुष्टि करते । यदि हम इस प्रश्न पर दूसरी दृष्टि से विचार करें, तो मालूम होगा कि तीर्थकों के सिद्धान्त और जीवन ऐसे स्वाभाविक हैं और जैनधर्म के उपदेश ऐसे उदार है कि इस बात की तनिक भी संभवना नहीं की जा सकती कि तीर्थंकरों ने पत्थर और धातुओं की मूर्तियों को पूजने का आदेश दिया हो अथवा मूर्तिपूजा का किसी और प्रकार से उपदेश किया हो। तीर्थकरों ने मोक्ष-मार्ग बतलाते हुए श्रीमतों को तथा क्गालों को, बडों को तथा छोटों को अपने शिष्यों को तथा विद्यार्थियों को अर्थात् जातिपाति का भेदभाव छोडकर सब को यह समान उपदेश दिया है कि प्रत्येक जीव को अपने कर्मों का नाश ( निर्जरा करने ही से मुक्ति मिल सकती है और कर्मों का नाश-इन्द्रिय दमन, स्वार्थत्याग, अमित दया, आत्मनिरोध, घोर तप और अपरिग्रह के द्वारा हो सकता है । उन्होंने स्पष्ट रीति से इस सत्य का उपदेश दिया है कि मनुष्य
६५
अपने भाग्य का विधाता स्वय ही है, उसका भविष्य सर्वथा
उसी के कर्मों पर, अवलम्बित है और अनंत शान्ति तथा
सुख प्राप्त करने के लिए देवताओं अथवा देवियों का पूजन
आवश्यक नहीं है।
-
तीर्थकरों ने इन सिद्धान्तों का केवल उपदेश देकर
ही सन्तोप न किया, किन्तु उन्होंने अपना जीवन भी अपने
बदलाए हुए आदर्श के अनुसार पना लिया और वे दूसरों
को जिन श्रेष्ठ उपदेशों का अनुगामी बनाना चाहते थे उन्हीं
आदर्श उपदेशों के उदाहरण उन्होंने स्वयं अपने जीवन में
दिखाये । सभी श्रेष्ठ और दैवी गुण तीर्थकरों के जीवन में
गर्भित हैं और इन सद्गुणों की प्राप्ति को प्रत्येक जैन
धर्मानुयायी को अपना सौभाग्य समझना चादिये। इसलिये
जैनधर्म के अमली भाव समझने के लिए व आतरिक मर्म
तादाल्य होने के वास्ते यह आवश्यक है कि जैन शास्त्रों
के अर्थ इन पवित्र वीकरों के जीरनों की घटनाओं की
सहायता से लगाये जायें, और जय इस प्रकार अर्थ लगाया
जायगा तय मालूम होगा कि जैन वीरों के जीवन-चरित्र
में मूर्तिपूजा का लेश भी नहीं है।
उन्होंने मुक्ति प्राप्ति के लिए मूर्तिपूजा का कप्टरहित
मार्ग प्रहण नहीं किया। उन्होंने निर्वाण पद पाने के लिए
पाषाण की मूर्तियों के सामने घर में डाल देने वाली
बधन
पूजन विधियों का अनुसरण नहीं किया । उन्होंने कर्म के
से
छुटकारा पाने के लिए मूर्तियों की पूजा करने का
अथवा उन पर द्रव्य चढाने की कभी चष्टा वे
जानते थे कि मूर्तिपूजा करना एक प्रकार से रिशयत ( घूस)
देना है। घोर तपस्या, अपरिगृह, स्वार्थत्याग, और कष्टसाधना
के द्वाग ही उन्होंने अपने कर्मों के बंधन को तोडा और
मुल पद को प्राप्त किया, क्योंकि वे इस बात को भली
भाति जानते थे कि तीर्थकर न तो किसी दूसरे को कर्म
मुक्त कर सकते हैं और न घे प्रकृति के कार्यकारण
नामक छः नियम के विरुद्ध चल सकते हैं।
बधन से
तीर्थकर अपने विश्वव्यापी प्रेम के कारण,
अपने
अद्वितीय स्वार्थत्याग के कारण, अपनी असूट दया के कारण
व विशपतः मानव जाति पर की हुई अमूल्य सेवाओं के
कारण भावी प्रजा की ओर से अमित आदर व प्रतिष्ठा के
योग्य हैं । परन्तु इसके साथ ही साथ यह भी याद रसना
चाहिए कि उनकी सब से बडी महत्ता इस कारण है कि व
आत्मनिरोध करते थे, अत्यत दीन भाव से रहते थे और
अपन आपको बिलकुल भूल गये थे । यदि उनमें ये दैवी गुण
न होते. तो वे करोडो मनुष्यों के हृदय पर अधिकार जमाने
मे मर्वथा असमर्थ और अयोग्य होते । वे दूसरों को देते थे,
परन्तु उनसे कुछ लेने का ख्याल भी अपने जी में न लाते थे।
उन्होंने कभी अपनी प्रतिष्ठा-पूजा का ख्याल न किया, किन्तु
वे प्राणी मात्र को प्रेम करने में अपने आप को भी भूल गये
और उन्होंने अपने महत्त्वाकाक्षा रहित जीवन को, पतित
मनुष्य नाति के उद्धार में लगा दिया ।
एक ओर तो इन बातों को स्वीकार करना और उनकी
सराहना करना और दूसरी ओर यह कहना कि तीर्थंकरों ने
मूर्तियों के रूप में अपनी पूजा कराई और इसी.
पूजा
के
अनुपम सौंदर्य को मोक्ष-प्राप्ति का साधन बतलाया, उनके
असाधारण और नि:स्वार्थ जीवन और उनके उपदेश किये
हुए पवित्र और स्वार्थ रहित सिद्धान्तों को कलकित करना
है । ये दोनों बातें इतनी असगत हैं कि इसका एक दूमरे से
मेल बैठना मानन बुद्धि-सामर्थ्य के परे है।
यदि कोई अपने विचारों से पक्षपात निकाल कर, अपने
हृदय से धार्मिक ईप को दूर करके और एक मात्र सत्य की
सोज करने की इच्छा मे इन देवी आत्माओं क पवित्र
जीवन पर क्षणभर शात चित्त से विचार करे तो मूर्वि-पूजा के
विषय में उमका भ्रम अवश्य दूर हो जायगा और मत्य का
संपूर्ण प्रकाश हो उठेगा, जिसमे भ्रम में पडे हुए मूर्ति-पूजकों
का मूर्ति-पूजा मडन का दीर्घ कालिक सिद्धान्त एक क्षण भी
नहीं ठहर सकेगा।
मूर्तिपूजा के विरुद्ध जैन सूत्रों से और भी बहुत से
प्रमाण दिये जा सकते हैं, परन्तु यहा पर उनका उल्लेख
J
1
६६
पूजन विधियों का अनुसरण नहीं किया । उन्होने कर्म के
बधन
से
छुटकारा पाने के लिए मूर्तियों की पूजा करने का
अथवा उन पर द्रव्य चढाने की कभी चेष्टा न की । वे
जानते थे कि मूर्तिपूजा करना एक प्रकार से रिशरत-(घूस)
देना है। घोर तपस्या, अपरिगृह, स्वार्थत्याग, और कष्टसाधना
के द्वारा ही उन्होंने अपने कर्मों के बंधन को तोडा और
मुक्ति पद को प्राप्त किया, क्यो कि वे इस बात को भली
भाति जानते थे कि तीर्थकर न तो किसी दूमरे को कर्म
बधन मे मुक्त कर सकते हैं और न वे प्रकृति के कार्यकारण
नामक छः नियम के विरुद्ध चल सकते हैं।
तीर्थकर अपने विश्वव्यापी प्रेम के कारण, अपने
अद्वितीय स्वार्थत्याग के कारण, अपनी अखूट दया के कारण
व विशपत. मानव जाति पर की हुई अमूल्य मेवाओं के
कारण भावी प्रजा की ओर से अमित आदर व प्रतिष्ठा के
योग्य हैं । परन्तु इसके साथ ही साथ यह भी याद रसना
चाहिए कि उनकी सब से बडी महत्ता इस कारण है कि वे
आत्मनिरोध करते थे, अत्यत दीन भाव से रहते थे और
अपने आपको बिलकुल भूल गये थे । यदि उनमे थे देवी गुण
न होते. तो वे करोडा मनुष्यों के हृदय पर अधिकार जमाने
में सर्वथा असमर्थ और अयोग्य होते । वे दूसरों को देते थे,
परन्तु उनसे कुछ लेने का ख्याल भी अपने जी में न लाते थे।
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उन्होंने कभी अपनी प्रतिष्ठा-पूजा का ख्याल न किया, किन्तु
वे प्राणी मात्र को प्रेम करने में अपने आप को भी भूल गये
और उन्होंने अपने महत्त्वाकाक्षा रहित जीवन को, पतित
मनुष्य नाति के उद्धार में लगा दिया ।
एक आर तो इन बातों को स्वीकार करना और उनकी
सराहना करना और दूसरी ओर यह कहना कि तीर्थंकरों ने
मूर्तियों के रूप में अपनी पूजा कराई और इसी पूजा के
अनुपम सौंदर्य को मोक्ष-प्राप्ति का साधन बतलाया, उनके
असाधारण और नि:स्वार्थ जीवन और उनके उपदेश किये
हुए पवित्र और स्वार्थ रहित सिद्धान्तों को कलंकित करना
है । ये दोनों बातें इतनी असगत हैं कि इसका एक दूसरे से
मेल बैठना मानन बुद्धि-सामर्थ्य के परे है।
यदि कोई अपने विचारों से पक्षपात निकाल कर, अपने
हृदय से धार्मिक ईप को दूर करके और एक मात्र मत्य की
सोज करने की इच्छा से इन दैवी आत्माओं क पवित्र
जीवन पर क्षणभर शात चित्त से विचार करे तो मूर्ति-पूजा के
विपय में उमका भ्रम अवश्य दूर हो जायगा और सत्य का
सपूर्ण प्रकाश हो उठेगा, जिससे भ्रम में पडे हुए मूर्ति-पूजकों
का मूर्ति-पूजा मडन का दीर्घकालिक सिद्धान्त एफ भण भी
नहीं ठहर सकेगा।
मूर्तिपूजा के विरुद्ध जैन सूत्रों से और भी बहुत से
दिये जा सकते हैं, परन्तु यहा पर उनका उल्लेख
.
नमा
.
1
करने की आवश्यकता नहीं है, क्यों कि हम अब तक जितने
प्रमाण दे चुके हैं वे स्वयं ऐसे दृढ हैं कि निर्पक्ष मनुष्य को
इस बात में अब कुछ भी संदेह नहीं रहेगा कि जैन सूत्रों
मे मूर्तिपूजा का सर्वथा अभाव है।
महावीर के निर्वाण के सातसौ वर्ष वाद
मूर्तिपूजा का प्रचार हुआ।
अब यह प्रभ स्वाभाविक ही पैदा होता है कि यदि
मूर्तिपूजा का प्रचार महावीर में नहीं किया, तो उसका प्रचार
किस तरह हुआ और कब हुआ? परन्तु इस प्रश्न पर
विचार करने का यह स्थान नहीं है । यहा पर इतना ही कह
देना पर्याप्त है कि मूर्तियों के सबसे प्राचीन लेखों और उन
के संवतों से हम को मालूम होता है कि मूर्तिपूजा का
प्रचार आज से १८०० वर्ष पहले या यों कहिए कि महावीर
के निर्वाण के ६०० या ७०० वर्ष बाद हुआ है।
नृर्तिपूजकों को श्वेताम्बर कहना अनुपयुक्त है।
अब हम को यह देखना चाहिये कि श्वेताम्बरों का मूर्ति
पूजक मप्रदाय वस्त्रों के रंग के विषय में महावीर के
आदेशों के अनुमार चलता है या नहीं। क्यो कि इन्हीं वस्त्रों
के कारण जैन साधुओं को अन्य धर्मावलवी माधुओं से
पहिचाना जा सकता है।
( श्वेत
वत्र
करने वाला)
उत्तराध्ययन सूत्र के २३ वें अध्याय में हम देख चुके
है कि फेसी और गौतम ने पार्श्वनाथ और महावीर के शासनों
का एकीकरण किस तरह किया और पार्श्वनाथ के अनुयायियों
ने किस प्रकार रगीन वष त्याग कर महावीर के नियमों
अनुसार श्वेत वस्त्रों को धारण कर लिया।
यद्यपि मूर्तिपूजक सप्रदाय अपने आप को "श्वेताम्बर"
कहलाता है
धारण
तो भी यतियों को छोड कर इस संप्रदाय के साधु श्वेत
वक्ष धारण नहीं करते, जैसी के हम उनमे आशा कर सकते
थे। इससे यह स्पष्ट है कि इस सप्रदाय ने जैन साधुओं के
वखों के विषय में महावीर के आदेशों का सर्वथा अनुकरण
नहीं किया।
आदर्श जैन साधु के जीवन की मंक्षिप्त व्याख्या।
यह बतलाने के लिए कि महावीर के असली उपदेशों
और सिद्धान्तों से यह सप्राय किस तरह विमुप होगया
दम अब महावीर के आदेशो के अनुसार जैन साधु के जीवन
की व्याख्या करेंगे और फिर तुलना करके यह बतलायेंगे कि
मूर्ति-पूजक सप्रदाय के जैन साधु का जीवन अमली उंचे
आदर्श से किन दिन यातों में गिर गया
जैन साधु को घर घर गोचरी-भिक्षा कर अपमा
भोजन प्राप्त करना चाहिय । उमे तो स्वय भोजन
,
बनाना चाहिये और न किसी दूसरे से भोजन बना देने के
लिए कहना चाहिए । उसे गोचरी के लिए किसी का आमंत्रण
स्वीकार न करना चाहिए, किन्तु पहले से किसी प्रकार की
सूचना दिये बिना ही उसे गोचरी के लिए जाना चाहिये।
उसको न तो मवारी में बैठ कर जाना चाहिए और न स्य
किसी सवारी को चलाना चाहिये, बल्कि उसको सदा पैदल
चलना चाहिये और अपनी निगाह नीचे जमीन पर रखनी
चाहिए जिमसे कि उसके पैरों के नीचे कोई जीव जन्तु
न कुचल जाय । उनको केवल वर्षा ऋतु में एक स्थान पर
चार मास तक ठहरना चाहिये ओर शेप ऋतुओं में एक
स्थान पर एक मास से अधिक न ठहरना चाहिए। उमका
स्मय अपने हाथों से केश-लुंचन करना चाहिये
और किती
नाई से हजामत न बनवानी चाहिये । उमको जैन शास्त्रों में
कहे हुए वाईम परिपहों को शान्ति और सतोप पूर्वक सहन
करना चाहिये और अग्रड ब्रह्मचारी रहना चाहिए। उमका
अपने पाम न तो द्रव्य (रुपया-पैसा आदि) रखना चाहिये और न
ऐमी चीजें रखना चाहिये जैसे मकान, जगीन इत्यादि और उसे
अपना समस्त समय धार्मिक कार्यों में लगाना चाहिए। साराश
यह है कि उसे प्रत्येक प्रकार के परिग्रह से दूर रहना चाहिए
और शास्त्रों में कहे हुए साधुओं के पच महाव्रतों क पालन
में अपना समय लगाना चाहिए। ये जैन साधु के जीवन
की साम २ बातें हैं । अब हम इस जीवन से मूर्वि-पूजक
सप्रदाय के साधुओं के जीवन का मिलान करेंगे।
७१ मूर्तिपूजक श्वेताम्बर संप्रदाय के साधु के जीवन का मिलान। मूर्ति-पूजक श्वेताम्बर मप्रदाय के साधुओं के तीन विभाग है -१) यति, (२) श्रीपूज्यजी, और (३) सवेगी । न तो ये विभाग जैन सूनों में बतलाये गये हैं और न सवेगा और श्रीपूज्य ये शब्द जैन अथवा यौद्ध सूनों में कहीं आये हैं । अतएव इनको अर्वाचीन ही मानना होगा। वैसे ही जन्न कि इस भप्रदाय में साधुओ के तीन विभाग है तो इन तीनों विभागों के लिए आचार के भिन्न भिन्न नियमों का होना आपही से सिद्ध होता है ! मूर्ति-पूजक अपने माधुओं की मबसे अधिक प्रतिष्ठा करते हैं । इन सवेगियों के आचार की परीक्षा करने मे मालूम होगा कि महावीर के बताये हुए नियमों में ये बहुत पतित हो गये हैं। इन्होंने अपने वस्रों में बड़ा परिवर्तन कर डाला है। ये जैन धर्म के नियमों के विरुद्ध पीले वस्त्र धारण करत हैं और इसी प्रकार अन्य पदार्थों का उपयोग करते हैं। इनमे से कुछ रुपये-पैसे का लेन-देन भी करते हैं। यह बात अन्य दो विभागों के विषय में भी ठीक है। प्रतियों और श्रीपूज्यों के पास बडी बडी मिलक्यितें हैं और वे मा प्रकार के धंदे करते हैं। यह बात महावीर । स्पष्ट आदेश के सर्वथा विरुद्ध है, क्यों कि उनका यह उपदेश है कि रिसी जैन साधु
-
को तनिक भी परिग्रह रखना नहीं चाहिए। कदाचित् इन
साधुओं में कुछ ऐसे भी होंगे कि जिनके जीवन ऐसे पवित्र हो
कि वे समस्त जैनों की प्रतिष्ठा के पात्र बन सकें, परन्तु इस
बात से हमारे इस मत का तनिक भी खंडन नहीं होता कि
इन में का अधिकाश भाग उस आदर्श पर जो कि महावीरने
जैन साधुओं के जीवन के लिए निर्धारित किया था जमा
हुआ नहीं है।
स्थानकवासी जैन साधुओं के जीवन की परीक्षा ।
यदि हम स्थानकवासी अर्थात् मूर्ति-पूजा न करने वाले
सप्रदाय के साधुओं के आचार की परीक्षा करें, तो हमको
मालूम होगा कि वे न तो अपने पास द्रव्य रखते हैं,
सवारी में बैठ कर फिरते हैं, न मिलकियत रसते हैं, न
गोचरी के लिये आमत्रण स्वीकार करते हैं, न नियमों के
विरुद्ध एक ही स्थान पर पहुत दिनों तक ठहरते हैं, न
यात्राएँ करते हैं, न मूर्ति पूजा करते हैं, न रंगीन वस्त्र
धारण करते हैं और न अपना समय ससार के झझटों में
लगाते हैं। साराश यह है कि वे शाल-वर्जित सभी बातों से
अलग रहते हैं और यथाशक्ति उस आदर्श जीवन का
अनुपरण करते हैं जो महावीर ने साधुओं के लिये
पतलाया है।
पर फही हुई बातों से प्रत्येक समझदार मनुष्य को
विश्वास हो जायगा कि मूर्ति पूजक मप्रदाय के साधुओं का
।
७३
जीधन शास-विहित नियमों के अनुकूल नहीं है, अतएव ऐसे
साधुओं के धावकों से शास्त्र-विहीत नियमों के अनुसार चलन
की और भी कम आशा की ना सकती है।
जो साधु परिग्रह रयते हैं, सूत्रों के नियमों के अनुकूल
नहीं चलते और ससार के सुखो की सोज में रहते हैं, उनसे
यह आशा नहीं की जा सकती कि वे अपने अनुयायियों को
सत्य की शिक्षा दें और इसीलिए वे अपने शिष्यों के चरित्र
को उत्तमतर बनाने के अयोग्य है । वे जैन धर्म के सच्चे
सिद्धान्तो का प्रचार करने से डरते हैं, क्यों कि वे जानते है
कि उनके आचरण में और उनके उपदेशित सिद्धान्तों मे जो
यहुत वटा भेद दिखलाई देगा उसके कारण उनके प्रति उनके
अनुयायियों की श्रद्धा कम हो जायगी व सघ उनको बहिष्कृत
फर देगा । इसका फल यह हुआ कि मूर्ति पूज: सप्रदाय
के माधु और उनके प्रावक दोनों ही जैन धर्म के असली
सिद्धान्तों से परान्मुस होगये।
उपसंहार ।
ऐसी अवस्था में मूर्ति पूजक सप्रदाय न्याय पूर्वक इम
बात का दावा नहीं कर सकते कि ये महावीर के असली और
सच्चे अनुयायी है। इसलिये यही मानना होगा कि वे मूल
संघ से अलग होगये हैं और उन्होंने अपना एक पृथक
सप्रदाय बना लिया
हमने ऊपर जो तुलना की है उसमें मूर्तिपूजक संप्रदाय
के साधुओं के जीवन चरित्र में जो भिन्नताएँ प्रकट रूप में
दिखाई देती हैं उनका दिग्दर्पन मात्र है | यदि हम जैन सूत्रों
के अनुसार उनकी अच्छी तरह परिक्षा करें तो हमारे इस
मत का और भी समर्थन होगा कि वे किसी भी तरह महावीर
के अमली और सच्चे अनुयायी नहीं कहे जा सकते ।
यह सिद्ध करके फि दिगवर तथा मूर्ति पूजक श्वेताम्बर
महावीर के असली अनुयायी नहीं है, अब हम मूर्ति पूजा न
करने वाले सप्रदाय का, जो कि जन साधारण में स्थानकवासी
के नाम से प्रसिद्ध है, और महावीर का असली व सच्चा
अनुयायी है, कुछ वर्णन करेंगे । यही सप्रदाय महावीर का
असली और सचा अनुयायी है
मूर्ति पूजा के हानिकारक फल ।
इसके लिए यह आवश्यक है कि हम भूत काल पर
दृष्टिपात करें। हम पर यह सिद्ध कर आये हैं कि मूर्ति
पूजा का प्रचार महावीर के बहुत बाद हुआ है और मूर्ति पूजा
के साथ ही उससे उत्पन्न होने वाली अनेक बुराइया भी आई।
धार्मिक सिद्धान्तों पर जिन साधुओं को सदेह था उन्होंने
अपनी स्वार्थ वृत्ति को पुष्ट करने के लिए मूर्ति पूजा का
प्रचार किया। स्वार्थ-साधन लिए उनको द्रव्य की
लग
आवश्यकता हुई, परन्तु दूसरों से द्रव्य भागने का व उसे
प्रकट रूप में अपने पास रसने का जब वे साहस न कर सके
तब उन्होंने मूर्ति पूजा की नई तरकीब निकाली और अपने
अनुयायियों को मूर्तियों के पूजन और दूसरे खर्च के लिए
द्रव्य दान करने का उपदेश दिया। जैसी कि आशा की जा
सकती थी मूर्ति पूजा उनको लाभप्रद हुई और वे साधु
धीरप और चतुराई से इस सजाने का दुरूपयोग करने
गये । ज्यों ज्यों समय बीता वे इन्द्रियों के क्षणिक
सुख
में लिप्त होते गये और विषय वासनाओं के दास
। जब उनक धार्मिक भावों का लोप हो गया
तब वे दाभिक हो गये। सच्च साधुओं का मार्ग तलवार
की धारा के समान तेज-कठिन होता है किन्तु जब ये इस
मार्ग पर न चल सके, तब अपने स्वार्थ साधन के निमित्त
व अपने पतित आचरणोंके अनुकुल हो इस प्रकार शास्त्रों का
विपरीत अर्थ करने लगे । जब वे धार्मिक तत्त्वों के
असली अभिप्राय को समझने की शक्ति को सो बैठे,
तब उन्होंने लौकिक बातों को आध्यात्मिक में, नाश को
प्राप्त होने वाले पदार्थों को स्थायी में और असत्य को सत्य में
उलझा दिया।
वन गये
अहंकार के आजाने से सत्य का लोप हो गया और
जब साधु धार्मिक मिद्धान्तों को उलटी दृष्टि से देखने लगे
तब चे अर्थ का अनर्थ करके अपना मतलब गाठने लगे।
इस स्वार्थ-साधन के कारण कई बुराइया उप्तन हो गई।
इस प्रकार जब वे संसार के झगहों में बुरी तरह उलझ गये,
अपने अनुयायियों की सामाजिक और आध्यात्मिक उन्नति
करने के अयोग्य हो गये, व अपना स्वार्थ साधन करने के
लिये फल्पित सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने लगे।
मनुष्य प्राणी स्वाभाविकतया मोज शोर्क और ऐश
आराम को पसद करता है। इन्ही स्वाभाविक मानसिक
वृत्तियों का लाभ लेकर इन स्वार्थी और पतित साधुओं
ने मूर्तिपूजा की अनेक मनमानी रीतिया निर्माण की
और शास्त्रों के आदेशों की ओर से मुंह मोड लिया । उन्होंने
मुक्ति-प्राप्ति का भाव सस्ता कर दिया । इस प्रकार असली
वातों के स्थान में बनावटी बातों का प्रचार करके उन्होंने
धर्मका रूप बिलकुलही बदल दिया और उसे एक बिलकुल
नया और विचिन्न रूप दे दिया।
उपरोक्त कथन की सत्यता की जाच करने के लिये
अधिक परिश्रम करने की आवश्यकता नहीं है । श्वेताम्बर
मूर्तिपूजकों के मदिरों में जो धार्मिक क्रियाएँ प्रचलित है
जनसे हमारे कयन की सत्यता मालूम हो सकती है ।
इन निरर्थक क्रियाओंका जन शाजों में कहीं भी उल्लेस न
होने का कारण यही है कि मोक्ष प्राप्ति के लिये जिस
स्वार्थ-साग व मानसिक पवित्रता की आवश्यकता होती है
यह इससे मिल नहीं सकती।
मूर्तिपुजा की विचित्रता ।
यद्यपि मूर्तिपूजा जैनधर्म के सिद्धान्तों के विरुद्ध है तो
भी इस अशुद्ध पूजन में भी मूर्तिपूजकों की मूर्ति सम्धी
कृति बिल्कुल ही असगत है। वे तीर्थंकरों पर रागद्वेपादि
मानसिक वृत्तियों और दोपों को आरोपित करते है परंतु
तीर्थकर मसार के समस्त झझटों से परे थे। तीर्थकरों को
सर्वोच्च आदर्श मान कर उनका क्नुकरण करने की जगह वे
उनको अपने कर्मों का न्यायकर्ता समझते है । वे, त्यागी
तीर्थकर और अन्य मतावलम्बियों के देवताओं में जो कि
उनके भक्तों की पूजा व खुशामद से प्रसन्न होकर भक्तों की
भक्ती के प्रमाण से अनुग्रह करते हैं, कुछ भी भेद नही समझ
सकते।
स्वार्थवश मूर्ति
एक पुत्र प्राप्ति के लिए मूर्ति को प्रणाम करता है तो
दूसरा धन के लिए व तीसरा अपने शत्रुओं पर विजर प्राप्त
करने के लिये । इस प्रकार हर एक अपने
की पूजा करता है। हमारे देखने मे २ई बार आता है कि
कई लोग तीर्थंकरों की अपने सासारिक इच्छाओं की पूर्ति
के लिए मानताएँ करते है औ• 37के नाम पर जहा तक
उनकी इच्छा पूरी न हो जाय वहा तक किसी न किसी
७८
वस्तु को खाने का त्याग कर देते हैं। वैसे ही अपने
भले या बुरे कामों में सफलता को पाने के लिए
कई लोग मूर्तियों को छत्र, चंवर, अंगी, केशर
अथवा अन्य पदार्थ चढाने का वचन देते हैं। जो लोग
तीर्थंकरों को इस प्रकार के पदार्थ और अन्य कीमती वस्तुएँ भेंट
करने का गलत और धोका देने वाले ख्याल से पचन देते हैं
उनकी यह समझ है कि तीर्थकर, जो आकाक्षा, लोभ और
ससार की अन्य तुच्छ वातों से अलग हैं, अचल न्याय के
प्रवाह को बदल कर उनके कर्मों का ख्याल न कर उनकी
इच्छानुसार न्याय देंगे।
भ्रम में पड़े हुए इन बेचारे अनुयायियों पर बडा तरस
आता है । महावीर द्वारा उपदेशित ऊचे और श्रेष्ठ सिद्धान्तों
को वे न समझ सके और इसी कारण वे ऐसी स्वार्थ से भरी
हुई इच्छायें किया करते हैं जो कि उनको उत्तम तत्त्वों की
प्राप्ति से वचित रखती है।
हम अपर जो कुछ कह चुके हैं उसकी सत्यता में सदेह
करने की आवश्यकता नहीं है। क्या यह कोई घतला सकेगा
कि मूर्तिपूजकों में से कितने मनुष्य ऐसे हैं जो केवल
आत्मिक उन्नति करने के लिये और मुक्ति प्राप्त करने के
हेतु ही यानाएँ करते हैं, मूर्तियों के सामने धनधान्यादि
चढाते हैं और लवी चौडी पूजाएँ करते हैं ? यदि प्रत्येक
मूर्तिपूजक अथवा प्रत्येक यात्री इस प्रभ का उत्तर प्रामाणिकता
से और अपनी सदसद्विवेक बुद्धि के अनुसार थे, तो उसको
उपरोक्त कथन की सत्यता अच्छी तरह मालूम हो सकती है ।
मूर्तिपूजा के संबंध में एक बात तो बडीही विचिन है ।
यदि हम तीर्थकरों की मूर्तियों का सूक्ष्म निरीक्षण करें तो
हम को मालूम होगा कि वे मदा ध्यानावस्था में पाई जाती
हैं। इससे मालूम होता है कि उनका चित्त मिलकुल अडोल
है और उनकी दृष्टि नासिकान लगी हुई है। इसमे यह
सूचित होता है कि वे न केवल पाप और पुण्य, किन्तु यो
कहना चाहिये कि सारे समार की ओर से उदासीन है।
साराश यह है कि मूर्तियों में बाह्य व. आतरिक शान्ति
झलकती है।
1
मूर्तिपूजा, विधेय है या नहीं, इम पात को छोडकर
हम को बडे सेद के साथ कहना पडना है कि मूर्तिपूजक
पूजन के समय मूर्तियों के साथ बहा अन्याय करते हैं । वे
गहरे ध्यान में मग्न हुई हुई मूर्तियों को घटाओ की घनघनाहट
से नगाडों की वेढन धनी से मत्रों के उटपटाग उच्चारण
से जगाते हैं, सोना-चादी के आभूषणों के भार से
लादते हैं तथा मूर्तिया देख सकगी इस आशा से उनको
जबरन काचन्या स्फटिक के नेत्र लगाते हैं। इस प्रकार
।
८०
भक्त उनपर अनेक उपाधियाँ लादकर उन्हें उनके उच्च स्थान
मे नीचे गिराते है-अधःपतन करते हैं, ससारी पामर मनुष्यों
में उनकी गणना करते हैं और अपनी मनमानी कल्पना के
अनुसार उनको अपने आधीन बनाते हैं।
यद्यपि ये लोग तर्थिकरों को सिद्धगिला व्यापि मानते हैं
तो भी वे उनको एक छोटी सी मूर्ति के रूप में वन्तु रूप बना-
लेते हैं। उनको निराकार मानते हुए भी उनका पापाण
या धातु की मूर्ति में रूपान्तर कर देते हैं व उनको त्यागी
मान कर भी उन पर सम प्रकार का भोग चढाते हैं। वे
स्वीकार करते है कि तीर्थकर नग्न रहा करते थे, परतु फिर
भी वे उन्हें नाना प्रकार के वस्त्रों से लादते हैं। वे उनको
अहिंमा धर्म के सम्माननीय प्रचारक मानकर भी पुष्प
इत्यादि अनेक वस्तुएँ चढाकर असंख्य जीवों की हिंमा उनके
निमित्त करते हैं । पुनर्जन्म से मुक्त मानकर भी पापाण या चातु
के जडरूप में उनकी प्राण-प्रतिष्ठा करते हैं । तीर्थकरों को मृत्यु से
मुक्त मानकर भी
नाश होने वाले पापाण धातु आदि पदार्थ का
रूप देने हैं । इतनाही नहीं किन्तु उन्हें सर्व शक्तिमान मानकर
भी उन्हें और उनके आभूपणादि को चोरी के भय से ताले
में बद कर देते हैं । साराश यह है कि
और
मिथ्याल में फंसे हुए मूर्तिपूजकों के कृती में इसी प्रकार
के अगणित विरोध पाये जाते हैं।
।
भ्रम.
मूर्तिपूजकों के पक्ष की परीक्षा और स्वंडन ।
मूर्तिपूजकों का यह मत है कि तीर्थंकरों की पापाण की मूर्तिया
उनको तीर्थंकरों के सद्गुणों की याद दिलाती हैं और उनके
अत करणों में उन सद्गुणों का अनुकरण करने की प्रबल
इच्छा उत्पन्न करती हैं। परन्तु उनके आचार व्यवहार पर
इस बात का बहुत कम असर नजर आता है। प्रतिमाओं
के
बहुमूल्य और चमकीले आभूपण, मदिरों की चकाचौंध
कर देने वाली रोशनी, अनेक चित्ताकपक पदार्थ, मधुर और
हृदयमाही गान (जो प्रतिमाओं के सामने गाया जाता है ,
भड़कीले वस्त्र पहने हुए छोटे छोटे बालकों का सुदर नृत्य और
उनके मधुर भजन तथा उनके पैरों के घुघरुओं की सुरीली
झनकार, प्रतिमाओं के सामने जलाये हुए धूप की उन्मत्त
करने वाली सुगध, ये सब बातें भ्रमजाल में फसे हुए भक्तों
को मुक्ति प्राप्त करने के लिये न तो मोक्षमार्ग पर ले जाती है
और न उनके हृदय में जैसा कि वे समझते हैं तीर्थंकरों के
सद्गुणों के अनुकरण करने की इच्छा उत्पन्न करती है
किन्तु उनको ससार के क्षाणक सुखों की भूलभुलइयों में
फैसा देती हैं।
यदि सच पूछा जाय तो इन मूर्तियों और क्रियाकाडों
की उप्तत्ति स्वार्थवश ही हुई है और इस देश को लेकर ही
ये लोग अपने अध भक्तों के मन उस ओर झुकाते हैं। जय
।
कोई भक्त मदिर में प्रवेश करता है तो वह वहांका दृष्य
देखते ही चकित हो जाता है और रोपनी की झगमगाहट से
उसकी दृष्टि चकाचौंध हो जाती है । उस समय उसकी मनो-
वृत्तिया चक्कर में पड़ जाती हैं और उसे ऐसा मालूम होता है
कि मानो वह कोई बडा स्वम देख रहा हो। अन्य पूजा
करने वालों से प्रथम पूजा करने का अवसर पाने की धुन
व पूजन के व द्रव्यादि चढाने के आवेग रो भरे हुए भक्त की
उस समय जो दशा रहती है उस दशा में उससे यह आशा
कदापि संभव नहीं हो सकती कि वह उस समय ठहर कर
अपनी सदसद्विवेक बुद्धि मे यह सोचे कि वह जो कुछ कार्य
कर रहा है वह बुद्धिवानी का है या समझी का है। उसे
इस बात का भी ज्ञान नहीं होता कि इस प्रकार मूर्ति पूजन
से केवल उराकी वासनाओ की तृप्ति होकर वह सत्य से
वचित हो जाता है। पूज्य तीर्थकगें के उच्च सिद्धान्तों से
अनभिज्ञ होनेसे वह ऐसे आडबरों में धन का नाश करता है
और अपने जीवन के बहुमूल्य समय को अनुपयोगी पूजन
विधियों में निरर्थक सोता है। साधुओं के दवाव और डर
के कारण श्रावकों ने जरा भी चू न की और स्वार्थी साधुओं
की बताई हुई नई पूजन विधियों को शाति पूर्वक स्वीकार कर
लिया । यह शोचनीय अवस्था अब भी मौजूद है और जैनों
के मूर्तिपूजक संग्रदाय में पिछले कई सौ वर्षों से चली
आती है।
- ये निरर्थक पूजन विधियां व क्रिया-आडयर आत्म- फल्याण के साधन होना तो दूर रहा किन्तु व्यर्थ का बोझ है, क्यों कि मनुष्य निसर्ग से आत्मोन्नतिशील प्राणी है । जव पूजन विधिया बढती चली गई और उनसे अकल्याण की सम्भावना होने लगी तव स्वाभाविकसया लोगों के हृदय में आत्मा को सतोप देने के लिये किसी अच्छे साधन के खोज करने की इच्छा पैदा हुई और वे जुलमी साधुओं के शासन से छुटकारा पाने के लिए उत्कठित हो उठे। लोकाशाह द्वारा मूर्तिपूजा का निषेध । ऐसी अवस्था में परिवर्तन होना विलकुल स्वाभाविक था। नीचे लिखी हुई विचित्र घटना से अहमदापाद के लोकागाह नामके एक बड़े व्यापारी के चित्त को ऐसी ठेस लगी कि उमके जी में मूर्तिपूजा की निरर्थकता दिसाने की प्रशसनीय इच्छा उत्पन्न हो गई और वह मनुष्य जाति की रक्षा करने में तत्पर हुआ । वह घटना इस प्रकार है कि जब वह एक बार एक मदिर में गया तब वहा उसने किसी साधु को अपने प्रथ भंडार की व्यवस्था लगाते हुए और उनको जीर्ण शीर्ण अवस्था पर ऑढा सास डालते हुए देखा । साधु ने लोकाशाह से जीर्ण पोथियों की रक्षा करने में सहायता देने के लिये पूछा । लोकाशाह बहुत सुन्दर अक्षर लिसते थे और वे गडे धर्मात्मा भी ये इसलिये उन्होंने पोथियों की नकल
--
करने का भार अपने ऊपर ले लिया और तुरंत ही काम शुरू
कर दिया। जब उन्होंने यह देखा कि सूत्रों में दिये हुए
सिद्धात बडे ही उच्च श्रेणी के हैं और उनमे न तो मूर्ति पूजा
का विधान है और न जैन साधुओं को परिग्रह रसने और
लौकिक सुख भोगने का तब उन्हें बडा भारी आश्चर्य हुआ |
उन्हे मालूम हुआ कि ग्रथों में जो सिद्धान्त लिखे हैं चे उन
सिद्धान्तों से बिलकुल भिन्न थे जिनका प्रतिपादन उस समय
के
साधु
किया करते थे।
इस घटना से उनके चित्त में अचानक एक क्राति पैदा हो
गई और उनके विचार सर्वथा बदल गये । उन्होंने प्रत्येक प्रथ
की गुप्त रूप से दो नकलें उतार ली जिनमें से एक नकल तो
उन्होंने साधु को दे दी और दूसरी नकल को अपने पास रख
लिया। इसके बाद उन्होंने सूत्रों का गहरा अध्ययन किया और
महावीर के सिद्धान्तो को खूब समझा। यद्यपि उनका जन्म
और पालन पोषण मूर्ति पूजक सम्प्रदाय में हुआ था, तथापि
उन्होंने मूर्ति पूजा का तुरन्त ही त्याग दिया और जैन समाज
को जोरों के साथ यह कहा कि जो साधु मूर्ति पूजा की आज्ञा
देते हैं वे धूर्त हैं, क्यों कि सूत्रों में मूर्ति पूजा का विधान कहीं
भी नहीं है। उनमें महान् आत्मिक बल था और इसीलिये
वे अपने मन को साहस पूर्वक प्रकट करने में जरा भी न
उन्होंने उस
के साधुओं
की
घबराये ।
समय
स्वार्थता का भडाफोड कर दिया और शास्त्रों में लिखे हुए
असली जैन सिद्धान्तों का प्रचार शुरू कर दिया। शधि ही
कुछ मनुष्य उनके अनुयायी हो गये और उनकी सहायता से
उन्होंने पवित्र और असली सिद्धान्तों का प्रचार करना शुरू
कर दिया। इस प्रकार बहुत से उन्मार्गगामी मनुष्यों को
सन्मार्ग पर लगा दिया। जब स्वार्थी साधुओं को अपनी
अवस्था हावाहोल और शोचनीय हो जाने का तथा मान्यता
नष्ट हो जाने का भय तर उन्होंने लोकाशाह और उनके
अनुयायियों का छल करना शुरू कर दिया। उन्होंने लोकाशाह
पर बुराइयों की वृष्टि करना और उनके अनुयायियों के चारित्र
को कलकित करना चाहा। अनेक कठिनाइयों का सामना करते
और एक पडी भारी संख्या के विरोधी समाज का
सामना करते हुए लोकाशाह और उनके अनुयायियों ने उसी
जोर शोर के साथ अपना पविन उपदेश का काम जारी रक्सा।
स्वार्थी साधुओं की मान्यता शीघ्र ही घटने लगी और लोगों
के
झुड शीघ्र ही लोकाशाह की शरण में आने लगे।
लोकाशाह ने सम्यकज्ञान रूपी दीपक का प्रकाश किया और
यह प्रकाश भारत वर्ष के एक सिरे से दूमरे सिरे तक शीघ्र
ही फैल गया और गर्वत्र शाति का साम्राज्य छागया। सत्य के
ज्वाजल्यमान प्रकाश में असत्य और धूर्तता का लोप होने
लगा और चारसौ वर्ष के भीतर ही पाच राख भूले हुए
मनुष्य ठीक रास्ते पर भागये अर्थात् वे जैन धर्म के पवित्र
और असली विद्धान्तों के अनुयायी यन गये ।
।
स्थानकवासी नाम क्यों धारण किया गया ।
जैन धर्म के इन सच्चे अनुयायियों का उपनाम मूर्ति
पूजकों ने वैरभाव के कारण इढिया रख दिया। अपने
आपको मूर्ति पूजकों से पृथक रसने के लिये लोकाशाह के
अनुयायि, बल्कि यों कहना चाहिये कि महावीर के असली
उपदेशों के सच्चे भक्त अपने आपको स्थानकवासी कहने लगे।
द्वेष के कारण मूर्ति पूजक श्वेताम्बर, स्थानकवासियों को मूल
संघ की एक शासा बतलाते हैं और यों कहते हैं कि स्थानक
वासियों की उप्तत्ति को केवल ४०० वर्ष हुए हैं ।
लोकाशाह जैन धर्म के असली सिद्धान्तों के
प्रचारक थे।
ऊपर के पृष्ठों में यह बात अच्छी तरह सिद्ध कर दी
गई है कि स्थानकवामी सम्प्रदाय बैसा.कि मूर्ति पूजक कहते
हैं, जैन धर्म की शाम्ना नहीं है, द्रव्योपनिन करने वाले साधुओं
की स्वार्थ परता के करण ही प्राय जैन समाज भलनी दिशा
पर और कुमार्ग पर चला गया। केवल एक टैवी घटना के
कारण ही लोकाशाह को असली सूत्रों के दर्शन हुए और इस
लिए उनको सत्य का पता लग गया और वे तत्कालीन
असत्य विचारों और सिद्धान्तों का विरोध करने में समर्थ
हुए। लोकाशाह ने जैन धर्म के असली मिद्धान्तों का
प्रकाशन किया और लोगों में उनका प्रचार किया। इसका
फल यह हुआ कि लोक जैन धर्म के उन श्रेष्ठ और उदात्त
सिद्धान्तों को देखकर चकित हो गये जो कितनी ही शताब्दियों
से साधुओं की धूर्तता के कारण वे छिपे पड़े थे।
जिनके निमल हृदय में स्वार्थता का अश मात्र नहीं था
और जिसके सद्विचार, उपदेश और आचार केवल सत्य प्रेम
से ही प्रेरित थे ऐसे धर्मवीर लोकाशाह के मरल, सष्ट और
सुपर उपदेश की ओर अत्याचार स घबराये हुए और सत्य
के सहारे की खोज में लगे हुए जन समुदाय का लक्ष खिंच
गया और सत्य का प्रकाश उनके हृदय पर अंकित हो गया।
यदि सच पूछा जाय तो लोकाशाह ने न तो कोई अपने नये
सिद्धान्त स्थापित किये और न किमी दर्शन पद्धति के निर्माण
का दावा किया। उन्होंने लोगों को जैन शास्त्रों में क्या लिसा
है यह बतलाने में व उस समय के प्रचरित ऐहिक व सार्थ
से भरे हुए मितान्तों से बचने का मार्ग मिसलाने में ही
अपना समाधान मान लिया । सत्गुरु लॉकाशाद के पदलाये
हुए सरल व आत्मोन्नति, परने वाले रिखान्तों का जन
रामुलाय पर टा भारी असर हुआ। उन्होंने अपने अन्य कारण
-
में इन सिद्धान्तों के ऊपर शात होकर विचार किया और उन्हें
दृढ विश्वास हो गया कि ये सिद्धान्त सचे, पवित्र और
सर्वाङ्ग पूर्ण है और तत्कालीन नामधारी धर्मात्मा लोगों के
प्रचलित सिद्धान्त मनमाने और संकीर्ण है। इस प्रकार
विश्वास हो जाने पर परमात्मा से डरने वाले और बुद्धिमान
मनुष्यों ने तुरन्त ही असली और प्राचीन धर्म का अगीकार
कर लिया परन्तु जो लोग पक्षपाती और कट्टर थे उन्हों ने
पूजा के पासंड को और अन्य क्रियाओं को, जिनकी आज्ञा
जैन धर्म के असली प्रचारकों ने कभी न दी थी न छोड़ा।
उपरोक्त बातों के कारण स्थानकवासी संप्रदाय प्राचीन
धर्म की शाखा है यह कदापि कहा नहीं जा सकता । इमकी
जगह मूर्ति पूजक संप्रदाय पर ही मूल धर्म से पृथक हो जाने
का व महावीर के आदेशित सिद्धान्तों के विरुद्ध भिन्न
संप्रदाय उत्पन्न करने का आरोप लगाना चाहिये ।
किसी मत को किसी धर्म की शाखा उसी समय कह
मकते हैं कि जब वह मत उस धर्म के असली प्रचारकों के
सिद्धान्तों का खडन करता हो । हमने ऊपर के पृष्ठों में यह
निर्विवाद सिद्ध कर दिया है कि श्वेताम्बरों का मूर्ति पूजक
सप्रदाय ही एसा है जो सिद्धान्तों में और व्यनहार में भी
महावीर और अन्य तीकरों के सिद्धान्तो के सर्वथा विरद्ध
है । इसलिये यह कहना युक्तियुक्त है कि यह सप्रदाय प्राचीन
धर्मकी शाखा मात्र है और उसके अमली तत्वों से विमुख
हो गया है। स्थानकवासी संप्रदाय ही तीर्थरों के अमली
उपदेशों को मानता चला आ रहा है और इस लिए यह
नहीं कह सकते कि वह किसी प्रकार मी असली मूल की
शाखा है।
ऐसी अवस्था में निर्पक्ष पाठक मेरे साथ इस बात में
अवश्य ही सहमत होंगे कि जैनों में यदि कोई संप्रदाय
महावीर का असली और सच्चा अनुयायी होने का दावा
कर सकता हो तो वह केवल स्थानकवासी मंप्रदाय ही है।
स्थानकवासी जैन धर्म के असली और सच्चे अनुयायी
हैं और श्वेताम्बर मूर्ति पूजक सप्रदाय मूल सघ की शासा है
इस बात को और भी पुष्ट करने के लिये यह आवश्यक है कि
हम चन लक्षणों की जाच पडताल करें कि जिनमे हम महावीर
के सच्चे अनुयायी बन सकते हैं और फिर उन सिद्वान्तों की
कसौटी पर परीक्षा करें कि इन दोनों सम्प्रदायों में से
कौनसा सम्प्रदाय ऐसा है जो वास्तव में असली जैन धर्मा-
यलम्बी कहा जा सकता है ।
मूर्तिपूजकों और स्थानकवासियों की तुलना ।
श्वेताम्बर मूर्ति पूनक ४५ शास्त्रों को मानते हैं, परन्तु
स्थानकवासी उनमें से केवल ३२ को ही मानते हैं। उनकी
इस मान्यता के लिये उनके पास प्रवल प्रमाण भी हैं परन्तु इस विषय पर इस जगह विषयान्तर के भय से अधिक विवेचन करना आवश्यक नहीं है। श्वेताम्बर मूर्ति पूजक मूर्तिओं को पूजते हैं और कर्म के बन्धन से छुटकारा पाने के लिए यात्राएँ करते हैं, परन्तु स्थानकवासी ऐसा नहीं करते क्यों कि उनका विश्वास है कि ये यात्राएँ न केवल जैन धर्म के सिद्धान्तों के विरुद्ध हैं, किन्तु ये (यात्राएँ) अपने उद्देश को पूरा नहीं कर सकती। वे यह भी मानते हैं कि आत्म-संयम, सच्चरित्रवा और आत्म- त्याग के द्वारा ही पच्छिन उद्देश (मोक्ष-प्राप्ति) की पूर्ति हो सकती है। इसके अतिरिक्त एक बात तो यह है कि मूर्ति पूजकों के साधु तीन वर्गों में विभाजित हैं और दूसरी बात यह है कि जब वे परिग्रह में फंसे रहते हैं तो उनका आचार जैन धर्म के सिद्धान्तों के अवश्य ही विरुद्ध होता है । स्थानक-वासी साधुओं के ऐसे विभाग नहीं है और वे निरन्तर धर्म शास्त्रों के अध्ययन में लगे रहते हैं या आत्मोन्नति के लिए क्रियाएँ करते रहते हैं। इस कारण उनको न तो इस बात के लिए समय और अवसर मिलता है और न उनकी यह इच्छा ही होती है कि वे लौकिक वातों पर ध्यान दें। -
इसके विपरीत मूर्ति पूजक साधुओं में बहुत से ऐसे
हैं जो अपने पास द्रव्य रखते हैं तथा और भी ऐसी चीजें
रसते है जिनकी आज्ञा शास्त्रों में नहीं है। स्थानकवासी
साधु अपने पास केवल वही पदार्थ रखते हैं जिनकी सास
आशा जैन सिद्धान्त में दी गई है।
।
इस प्रकार दोनो संप्रदायों के साधुओं में इतनी
भिन्नताएँ हैं कि उन सबका उल्लेस करने में कई पृष्ट भर जाने
की आशंका से यहा उनका स्पष्टीकरण न करते व हमारे सूक्ष
पाठकों का अधिक समय नष्ट न करते सक्षेप में इतना ही
लिग्पना पर्याप्त होगा कि यद्यपि दोनों संप्रदाय एक ही
शास्त्री को मानते हैं व एक ही तीर्थंकरों के अनुयायी होने
का दावा रखते हैं तथापि इनके आचार विचारों में इतना
भेद नजर आता है कि यदि कोई विदेशी इन्हों का अवलोकन
करे तो उसका यही निश्चित मत होगा कि ये दोनों सप्रदाय
बिलकुल ही भिन्न भिन्न धर्म के अनुयायी हैं और इन्ही
के सिद्धान्तों में किसी प्रकार की समानता नहीं है।
मूर्ति पूजक सम्प्रदाय के साधुओं के विपरीत स्थानक.
पासी साधु आत्म सयम और आत्म त्याग के कडे नियमों
का पालन अच्छी तरह करते हैं। वे ससार से कोई ऐसा
सम्बन्ध नहीं रसते जिसके कारण वे स्वार्थी घन सकें।
उनमें कोई ऐसा दोष नहीं है जिसके कारण वे सत्य का
उपदेश न दे सकें। संसार को त्यागने में और लौकिक सुखों
को ठुकराने में उनका एक मात्र यही उद्देश है कि वे उन
उच्च सद्गुणों का पालन कर सकें कि जिनके कारण तीर्थंकरों
का नाम अमर होगया है । साराश यह है कि ये महावीर के
सच्चे भक्त होने की पात्रता रखते हैं इसलिए जैन धर्म के
पवित्र और असली सिद्धान्तो का उपदेश देने की सबसे
अधिक योग्यता इनमें ही पाई जाती है। इन सिद्धान्तों का प्रचुर
प्रचार मनुष्य जाति के व्यवहार में करने का ही इनके
जीवन का सास उद्देश होने से ये ही महावीर के सच्वे
अनुयायी कहलाने के पात्र हैं।
उन लोगों को हम महावीर के सच्चे शिष्य नहीं कह
सकते जो अपने आप को धर्मात्मा कहते हैं, केवल अपनी
ही चिन्ता में लगे रहते हैं, संसार को त्याग कर भी संमार
में फंसे रहते हैं और अपना ही मतलब गाठने में व लोगों को
धोखा देने में जरा भी नहीं डरते ।
सच्चे शिष्य बनने के लिए कौन सी पातो की
आवश्यकता है।
सच्चे शिष्य बनने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि
हम तीर्थंकरों की बाह्य उपचारों से पूजा करें जैसा कि मूर्ति
पूजक किया करते हैं। आवश्यकता केवल इस बात की है
परम + कि हम महान तीर्थंकरों के कहे हुए उत्कृष्ट आदेशों के अनुमार सदैव आचरण करें। हमको स्वार्थ की ओर ले जाने वाली इच्छाओं का व पाप की ओर झुकाने वाले विचारों का बहिष्कार कर देना चाहिये और परिग्रह को सर्वथा त्याग देना चाहिये। केवल इन्हीं बातों से हम सच्चे शिष्य- कहे जा सकते हैं । जैन धर्म की मान्यता है कि सदाचार ही धर्म है और वह प्रेम, पवित्रता, दया, आत्म त्याग इत्यादि लोकोत्तर सद्गुणों का विरोध करने वाली मानसिक और शारीरिक पातों को त्याग देने से प्राप्त होता है। जब तक मनुष्य विषय वामनाओं में फँमा रहता है और जब तक वह ससार से अपने आपको दूर नहीं रखता तब तक उसे शिश्य नहीं कह सकते । तीर्थकरों के उपदेशों का एक मात्र उद्देश यही है कि मनुष्य मद्गुण और पवित्रता ससे और मन तथा कृती से प्रेम और दया में लिप्त हो जाय जिमसे कि उसकी आत्मा ससार के बंधन से मुक्त हो सके | अपने मन में केवल यह समझ लेना कि तीर्थकर सदा दया, पवित्रता और सदाचार की मूर्ति थे किसी काम का नहीं है जब तक कि हम इन सद्गुणों का अनुकरण करने की स्वयं चेष्टा न करें। फेवल यह जान लेना कि तीर्थकर सद्गुण, दया व पवित्रता की मूर्ति थे, किसी काम का नहीं है जहा तक कि हम भी वैसे ही गुण प्राप्त करने की चेष्टा न करें। वैसाही यह जान लेना भी पयाप्त नहीं है कि तीर्थकर सपूर्ण क्षमा के सागर व संपूर्णता की मूर्ति थे, किन्तु उसके साथ यह भी आवश्यक है कि हम भी उनकी बतलाई हुई उपरोक्त बातों को अपने व्यवहार में लाने का भरसक प्रयत्न करें। साथ में यह भी आवश्यक है कि हम भी वैसे ही दयावान् और सर्वगुण सम्पन्न भनें और उन्होंने अपने जीवन में जिन देवी आदेशों का अनुकरण किया था उनको हम भी अपनावें। केवल स्थानकवासी साधु ही महावीर के सचे शिष्य हैं। इस प्रकार स्थानकवासी साधुओं का जीवन, उन मोक्ष- गामी महात्माओं के उपदेश और आदेशों का एक छोटा सा किन्तु प्रत्यक्ष जीता जागता नमूना है । स्थानकवासी साधु तीर्थंकरों के बतलाये हुए उत्कृष्ट जैन सिद्धान्तों के अनुगामी बनने की यथाशक्ति चेष्टा करते हैं और अपने आचरण को भी वैसा ही बनाते हैं। चूंकि जैन धर्म शरीर की सुन्दरता को अथवा सुख को कुछ महत्व नहीं देता लेकिन वह आत्मा को सुन्दर और उन्नत बनाना सिखलाता है, इसलिए स्थानकवावी साधु अपने शरीरकी..सुन्दरता तथा सुखकी कुछ परवाह नहीं करते, किंतु वे अपना पवित्र और निष्फलंक आचरण रखने की चेष्टा करते हैं और लौकिक पदायों और मोह से अलिप्त रहते हैं। यदि महावीर के -- उपदेश किये हुए मिद्धान्तो के अनुसार चलने में और वीर्य- कगें की पवित्रता का और सद्गुणों का अनुकरण करने में वे ऐसे आवेश में आजाय कि वे कुछ जैन सिद्धान्तो के अनुकरण करने की ६६ कर दें तो उनका 'यह दोप क्षमा करने योग्य है। परंतु सदाचार की कभी अतिशयोक्ति नहीं की जा सकती। जो लोग स्थानकवासी साधुओं को इस अतिशयोक्ति का दोषी ठहराते हैं वे एक सच्चे धर्म के उदार उद्देशों क ज्ञान से सपूर्ण वंचित हैं ऐसा समझना चाहिये । अपने चारित्र को सर्वथा निष्फलंक बनाना, अपने हृदय को बिलकुल पवित्र सबके ऊपर दया और क्षमा का भाव रसना, ये प्रत्येक बडे धर्म के आदि सिद्धान्त है। जो लोग इन आदेशों के अनुसार आवरण करते हैं उनको दोषी ठहराना तथा उनका उपहास करना न्याय के सर्वथा विरुद्ध है और जो लोग ऐमा करते हैं वे अपने इर्षायुक्त प शून्य-हृदय का परिचय देते हैं। करना, यह बड खेद की बात है कि श्वेताम्बर मूर्ति पूजक, स्थानकवामी साधुओं की पवित्रता को देखकर ईर्षा करते हैं क्यों कि स्थानकवासी साधुओं के आचार व विचार की वे घरापरी नहीं कर सकते । इन कारणों से उनमें कभी भेत्री भाव नहीं रहा है। मूर्ति पूजकों ने स्थानकवासियों से सदा वैर भाव और उनको मवाया है। उन्हों ने स्थानकवासियों । रखा को फलक लगाये हैं और उनके तरह २ के नाम रस कर चिढाया है। उन्हों ने स्थानकवासियों के विषय में मनमानी यातें कही हैं, उनके साथ बहुत कठोर व्यवहार किया है और उनको दुढिया कहकर बदनाम किया है। उन्होंने ने स्थानकवासियों को बदनाम करने में कोई कसर न की। उन्होंने ईपी और द्वेप के কাশ स्थानकवासी साधुओं का इस बात पर उपहास तक कर डाला है कि वे अहिंमा के उच्च और कल्याण कारी मिद्धान्त पर जो कि जैन धर्म का सार है, घडी सावधानी के साथ चलते हैं। अहिंसा जैन धर्म का आदि तत्व है और जैन शास्त्रों के प्रत्येक पृष्ट में उसकी झलक दिसाई देती है। अहिंसा का महान् और कल्याणकारी सिद्धान्त आर्यों के सभी धर्मों का प्रथम और मूल सिद्धान्त है। जो लोग इस सिद्धान्त पर चलते हैं उनकी हमी उडाना और उनको बदनाम करना उत्तम और उत्कृष्ट वातों की जड पर कुठाराघात करना है । श्वेताम्बर मूर्ति पूजकों ने स्थानकवासियों का केवल यही दोप नहीं बताया किन्तु अपने आपकी और जैन शास्त्रों से विरोधी सिद्धान्तों की रक्षा करने के लिये उन्होंने स्थानकामी साधुओं के पवित्र जीवन और निष्कलक चारीत्र की ऐसी बुरी व अन्याय पूर्ण आलोचना की है कि उससे फेवल स्थानक- वासियों ही के विषय में नहीं किन्तु समस्त जैन धर्म के विपय में लोगों को भयकर भ्रम हो सकता है। हम कई
फारणों से इस सम्बन्ध में विस्तार पूर्वक लिखना नहीं चाहते।
इस लिए हम पाठकों का ध्यान केवल उन पिछले पृष्ठों की
ओर आकर्पित फरते हैं जहा कि हमने स्थानकवासी और
श्वेताम्बर मूर्ति पूजकों के आचार और चारित्र की तुलना
की है। जिन पाठकों ने दोनों सम्प्रदायों के साधुओं के
दर्शन स्वय किये हों, उनके नित्यप्रति के व्यहार को ध्यान
पूर्वक देखा हो और उसकी जाँच की हो वे मेरे कथन की
सत्यता को समझ सकते हैं।
मैं समझता हूँ कि मैंने इस छोटी सी पुस्तक में उन
कठिनाइयों और सकटों का पर्याप्त वर्णन कर दिया है जिनका
सामना स्थानकवासियों को मूर्ति पूजक सम्प्रदाय की ईपी
और घृणा के कारण करना पडा है । इसके साथ ही साथ
इस सप्रदाय की उत्सत्ति कब च कैसे हुई यह भी बतला
चुका हूँ। अब मेरे सूज्ञ पाठकों के लिये चार शब्द लिख
फर इस विषय को समाप्त करता हूँ।
इस विपय का विवेचन मैंने बिना किसी प्रकार के
पक्षपात के व सब बातों का विचार करके ही किया है।
जिन प्रमाणों को मैंने सामने रक्खे हैं, सभव है कि उनमें से
थोडे वादग्रस्त भी हों, किन्तु उनमे मेरी उन दलीलों की
सत्यता में जो कि जैन, चौद्ध व हिन्दू शास्त्रों के प्रमाणों से
सिद्ध की गई है, जरा भी बाधा नहीं आ मकती। इम
विषय के सारे विवेचन में जो जो बातें प्रकाश डाल सकती
हैं उन सब बातों का व घटनाओं का मैंने पूरा. विचार किया
है और तदनतर ही मैंने अपना मत कायम किया है।
मेरी दलीलों में संभव है कि कोई ऐसी भी हो जो
कि समाधानकारक मालूम न हों किन्तु मुझे इतना वो
विश्वास है कि वे मरे सूज्ञ पाठकों को उन पर विचार करने
को तो अवश्य ही वाध्य करेंगी। यदि ये वादग्रस्त विषय हम
थोडे समय के लिये अलग भी रख दें तो भी मेरे इस मुख्य
विपय की यह सत्यता मिद्ध करने में किसी प्रकार की आपत्ति
नहीं आती कि थानकवासी हो महावीर के असली व सच्चे
अनुयायी हैं य श्वेताम्बर मूर्ति पूजक व दिगम्बर य दोनों
संप्रदाय नकली।
।
इस कारण मेरे आलोचकों से मेरा अनुग्रह है कि
वे इस पुस्तक को पक्षपात भरे-हृदय से न पढ़ें किन्तु मेरे
करने के लिये जो प्रमाण मैंने दिये हैं उनकी
छानबीन करके उन्हें न्याय की तराजू में तोलें व फिर इस
विषय में अपना मत कायम करे ।
अन्वपक.
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