Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur

Jayapayada Nimittasastra

Acharya, Purva · 2011/10

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सिंघी जैन ग्रन्थ मा ला
attituttttttttt [ ग्रन्यांक ४३]intentite
पूर्वाचार्यविरचित प्रश्नव्याकरणाख्य
-
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जयपायड निमित्तशास्त्र
(प्रथमावृत्ति-संस्कृतव्याख्योपेत मूल प्राकृत ग्रन्थ)
SRI DALCHAND JI SINGHI
LAM
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.
4. श्री दापचरज्ञा सिंघा
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SINGHI JAIN SERIES
।
Hom[NUMBER 43]
JAYAPAYADA NIMITTAŚĀSTRA
(A WORK OP The SciENCE OF PROQNOSTICS MAKING PROPHESIES
ON THE BASIS OF THE LETTERS OF SPEECH)

रचदिवासी
स्वपरित विर्य भीमद् राचन्दजी सिंघी पुय्यम्पतिनिमित
प्रविणपित एवं मसित
सिंघी जैन ग्रन्थ मा ला
[रपमिक, राति पास पानिपानिमामाने विलिस
माकप, पम पमती बारमापरि मान्न
पार पाल सोमामा पर मालीपी
मठियाय
भीमद् समनी सिंपावरपुष
स्व. दानशील-साहित्सरसिक संस्कृतिप्रिय
श्रीमद् वहादुर सिंहमी सिंघी
मपावसम्पदाणसंपरा
आचार्य जिन विजय मुनि
भपिशाता, सिपी जैन शाम शिक्षापीठ
मारी परेपर
रावसान मोरिएण्टल रिसब इन्स्टीट्यूट, बोपपुर (राजसान)
निराचमाबपीयपपरर
मारतीय दिपा मपन, पमई
Oरशमोगा मम्म
(स) मा परामर (AMAR
वापसमिप्रपा (पजाब)
संरक्षर
श्री राजेन्द्र सिंह सिंघी तथा श्री नरेन्द्र सिंह सिंघी
अधिष्ठाता, सिंघी जैन शास्त्र शिक्षा पीठ
भारतीय विपामपन, पम्यई
पापामगारेर,
बामस्मर.
बरनवाया र म

पूर्वाचार्य विरचित प्रश्नव्याकरणाख्य
जयपायड निमित्तशास्त्र
(प्रथमावृत्ति-संस्कृतव्याख्योपेत मूल प्राकृत ग्रन्थ)
जैसलमेरुदुर्गस्य -प्राचीनजनग्रन्धभाण्डागारोपलब्ध
ताडपत्रीयपुस्तकानुसार
संपादनकर्मा
आचार्य, जिन विजय मुनि
अधिष्ठाता, सिंघी जैनशास्त्र शिक्षापीठ
मॉनररी मेपर-जर्मन भोरिएण्टल सोसाईटी, जर्मनी, भाण्डारन ओरिएण्टल रिसर्च इन्स्टीब्यूट
पूना, (दक्षिण), गुगराव साहित्यसमा, महमदापाद (गुजरात), पिपरानन्द पैदिक
शोध प्रतिष्ठान, होसियारपुर (पक्षाप)
मोनरी डायरेक्टर
राजस्थान ओरिएण्टल रिसर्च इन्स्टीट्यूट, जोधपुर (राजस्थान)
निवृत्त ऑनररि डायरेक्टर-भारतीय विद्याभवन, पम्पई
प्रकाशनकर्ता
अधिष्ठाता, सिंघी जैन शास्त्र शिक्षा पीठ
भारतीय विद्या भवन, बम्बई
विक्रमाद २०१७]
प्रयमाचि-५०० प्रति
[सिस्वाद १९५८
ग्रन्थांक ४३]
सर्वाभिकार मुरक्षित
[मूल्य रू०६६०
।

SINGHI JAIN SERIES ~ . Works in the Serles already out. अपावधि मुद्रिसप्रन्पनामावलि याचारदिन परिवार पर पाएपनि मुहकार . समान लामापनि सम्प्रान्तमा एमिन पनि पूर्व पईमति सम्मसिमाम(प) २५ मेपरपिर पसंचमीमा (2) एयरपनि प्रेम २५ मामातुमय पर मिक्स विीर "मितपत मागममम.() मोरपायालादम्बामप पारपार गर्मापुरमामय एमबिएप मापसमाम (प -ऐनामावत समीमापा प्रेममापित मामा(प मिरममावा (म) पकिमल-माय. १५मणि पम्मचर. मात्र 1 (मा.) . "दोपवाति मापुजमविपर 11मिमामलाम, रिमोगमाशीवित शामिल सामोरमियर चापातको मिनियम o म माप, सविनम्मेवापारमित मारपी यमितिलार(प्रस) पवनापासपमाळा (प्रा) परिणाम(पत) पुरम्म्मुनिरनिवkt(5) मगोपापासतमा चायत परमि(4) प्रमुख पात ( नागपापित प्रारम(स्वतन्म) Shri Bahadur Singh Singhl Memoirs Dr H Böbler's Life of Hemachandracharya. Toplated from Goo by Dr Halal Patal, PhD. पारीयापरी चिौपतिमा [बीमारामार। · Lat. Baba 8. Bahadar Singhi Singhi emodial robou BHARATIYAVIDYA [Volums V]A.D.1015 s Litely Cirdo d_nimliyi_Vutupihnd Ita_Oantibahoo to Barkat Letertart. Dy D. Bhogill J Sandean, ILA, PhD (SJBUS.) 4-5 Studiea in Indim Litrey Hity Tro Votunee By Pro. P E Godo LLA (8.J & No. 8-9.) . Works in the Press, संप्रति मुध्यमाणसम्पनामावलि शिवराय toप माप .. पक्चरपत-ममम. चिरस्मात महान A- पिया माप्रपात रमलाममा पुरमिति मर्मजाम- पयुक्त मायाम-म्य परमपिताम्वरमा "मनापानोपासन वनपरोपर (प.) "मीर मा । मनट () मामी(-)

[ जयपायड निमित्तशास्त्र
सिंघी जैन ग्रन्थ माला]
1k
RHA
मकान
प्लासनामासवकायाकरक
ताशपरितमायार्थवानियतार्थ
मणोसिरसाचिरिसिरसाप्रपास्यतिाक
इयथावकामायाविर
टात सरशस्राडायपाहदसतिमिसमासस्या
सिंघाभिश्चादयतासमकारकतासभातदेय
समपियवाराणमिकासयलारायणमन्वयझेडी
"शिसिटमसमेधातासिवसायसकर्मविमला
-
सिहानामापविद्यालयामा
गायनयतकादियानकयतइत्य.
द्यपाएमयागादकियानसाधान
गादयतातिशयोतसिरसायणास्य
जियघससकनवरार
लायामामागचादीयाशिवायकि
समयसपणमित्वमातानाधुधमनववध
संग्रहातइत्यानाताबाशयकमविदारागाहासाती
बामगावच्यापनमसिहावलपवासाररूपायन
अवयसाबसवालवयनमसामणिस्ताना
7
L
जेसलमेरमें प्राप्त प्रतिके आद्य पत्र

सिपी जन प्रन्य मासा]
[अपपापरनिमितशान्त
साम्पसमा
समममम्म
तापायमम
जम्मा
ममम मम प्रतिमरितम पत्र
.

किञ्चित् प्रास्ताविक - 1 U - - प्रस्तुत जयपायड नामक निमित्त शास्त्रकी ताडपत्रपर लिखी हुई प्राचीन प्रति हमको जेसलमेरके के ज्ञान भण्डारमें प्राप्त हुई थी। इससे पूर्व, हमारे दृष्टिगोचर यह ग्रन्थ नहीं हुआ था, इसलिये हमने इसकी प्रतिलिपि करवा ली, और फिर इसका विषयावलोकन करनेसे हमें यह एक महत्त्वकी रचना ज्ञात हुई, अत: इसको इस सिंघी जन अन्य मा ला द्वारा प्रकाशित करनेका हमने संकल्प किया। जेसलमेरमें प्राप्त यह ताडपत्रीय पुस्तिका, जैसा कि इसके अन्तमें लिखा हुआ है- विक्रम संवत् १३३६ में लिखी गई थी अर्थात् आजसे कोई ६८० वर्ष पूर्वकी लिखी हुई है। इस पुस्तिकाके कुल मिलाकर २२७ ताडपत्र है । अक्षर सुवाच्य हैं, पर कहीं कहीं स्याही घिस जानेसे अक्षर अदृश्यसे हो गये हैं । लिपिकर्ता विषय और भापासे अनभिज्ञ होनेके कारण प्रतिको पाठ बहुत ही अशुद्ध और भ्रष्टखरूप- वाला लिखा गया है। अन्यको प्रेसमें छपनेके लिये देना निश्चित हुआ तब इसका कोई दूसरा प्रत्यन्तर कहीं से मिल सके तो पाठसंशोधनमें विशेष सहायक हो सके इस विचारसे, पूना, पाटण, अहमदाबाद, वडोदा आदिके प्रसिद्ध जैन भण्डारोंमें इसकी खोज की गई, पर उसमें सफलता नहीं मिली । पीछेसे भावनगरके भण्डारमें एक कागज पर लिखी प्रति प्राप्त हुई, पर, वह जेसलमेरवाली प्रतिसे मी अधिक भ्रष्ट पाठवाली निकली, अतः सशोधनमें उसका कोई खास उपयोग नहीं हुआ। तन हमने केवल उक्त भ्रष्ट पाठयाली प्रतिके उपरसे ही ययामति पाठ संशोधन आदि करके प्रस्तुत आवृत्तिको, इस खरूप में प्रकट कर देनेका प्रयत्न किया है । अन्यके अवलोकन मात्रसे ही विशेपज विद्वानको ज्ञात हो जायगा पाठसशोधन करनेमें हमको कितना श्रम उठाना पड़ा है। पुस्तिकाकी प्राय प्रत्येक पक्ति भ्रष्ट पाठवाली प्रतीत हो रही है । न मालम मूलप्रति लेखककी अज्ञानताके कारण ऐसा पाठभ्रष्ट हुआ है अथवा किसी भ्रमवश ऐसा अशुद्ध पाठ लिखा गया है। प्रन्यगत विषय बहुत ही गोपनीय माना जाता रहा है। कोई विरल ही व्यक्ति इसका अध्ययन-मनन कर सके-ऐसी रहस्यमयी भावना, इस विषयका ज्ञान प्राप्त करनेके विषयमें प्राचीन कालसे चली आ रही है, अत इसकी दुर्लभता और अप्रसिद्धि स्वाभाविक है । प्रन्थका विषय निमित्तशास्त्रान्तर्गत प्रश्नविद्या विपयक है । अत 'इस रचनाका अन्य नाम प्रश्न- व्याकरण ऐसा दिया गया है । प्रश्नचूडामणी, प्रश्नप्रकाश आदि नामके इस विषयके कई प्राचीन प्रन्योंका उल्लेख अन्यान्य ग्रन्यों में मिलते हैं । इसी आवृत्तिके अन्तमें ज्ञानदीपक नामक एक सक्षिप्त चूडामणिसार शास्त्र मी मुद्रित किया गया है जो इसी विषयकी एक सक्षिप्त रचना है। यह रचना मी हमें जेसलमेरके एक भण्डारमें फुटकल पन्नोमें मिली है। कि इसका म + सलमेर में जो पुस्तिका प्राप्त हुई उमकी पट्टिकापर 'जयपाहुड' ऐसा नाम लिखा हुआ था इसलिये हमने प्रन्यके मुद्रणमें मुख्य शिरोलेख इसी नामसे अकित कर दिया, पर पीछेसे ऊहापोह करने पर 'जयपाहुर्ड' नहीं परंतु 'जयपायर्ड' ऐसा नाम समुचित मालम दिया। अत हमने मुस्लपृष्ठ पर इसी नामका उपयोग करना उचित समझा है । मूल अन्यकी तीसरी गाया में इसी शब्दका प्रयोग किया गया है २ बसपापड-विभवम् साविक हमारे पूर्वग मीरियोंने भाव वालों और मार्यो पारने दिये कई प्रकार या पर बोच पान मात करने कि नाना प्रकार पिसन, मनन और मिरिप्पासन पिसेरामप्रसार पोशातम्प में प्रस ए उनको संक्षेपमें एक स्त्रमपमें प्रमित करो मम्म या प्रकारको सम्में मिम परते मिससे माली सपिये उसका ज्ञान प्राप्त होता है। प्रक्षा प्रब एक ऐसे बात बत पौर म्यबोध बार मात करने कराने का निप यस्यमय साल। यह UN सि मनौरी पा सो बटी तर मागत ये पसके माधारसे, मी मी प्रमादि मम वगम, पुम-माम, समत्र एवं जीवन-मरण बादि बाकि विश्पने गत मपित और पप्पर्म माम मास र सपरि प्रमाको पवा सकता है। प्राचीन नापी भिस, मोहम्प मारताप मिकी माता सह प्रारी मानी पीएम माम या ममतपमें मुम्म स्मसे १५ रनमें यमाए ऐ यो योगा ये १२६मेर- कस ग-कर्म चबम-१ बर्य र 24-7 वर्ग चरम-वर्ग प फ ब म म-पप -प एसप - इस प्रकार वाम मा ५ मंजन ।। १२ रोप१र्म जिसकी खा है। ॥ मंगोट... प. प. प. इस प्रथा सम्म सहार। इस प्रकार मर्म बर्गमा ८ बम निमय की गई। प्रत पास इन गित गाने प्रचार मेर-उपमेद मनापे गरे। ये मशर बनेकानेक गुम भोर पर पापकर ! प्रफेक बार A प्रकरके समाप और पथौर सिर र परीसरे बाहरी स्पोग मातब, पर उस संपोगो कारण और मां के प्रमाण पर और सरूप सागर बाबी समार मोर सरूपच मदत करानो की मिमिन, बानित, एप मारि सा बन गईम बम बरबस पास और हर मुम्सार । म प्रस्न ईबसे बर्मो समाप, गुण और बकर पिरान इस प्रहाय रिप गया है। एक गत माहम भौर पर दस्पमप इसमें करें सही है। प्राणाम मि इस पत्पमप विधामा सीप रिपपा सेट गुल पगाता है। इसमे ताकि प्रार्थन मारे ग भाषा इस सिपस गत चिर शाम रखते । इस Aपम मग करनेगो टेको भनेर प्रश्रम पैनाचा पार से प्रायोमाप मिमे रो।

जयपाड-किश्चित् प्रास्ताविक इस विषयके ज्ञाताओं और शास्त्रकारोंका अभिमत है कि जिन अज्ञात और गूढ तत्त्वोंका परिज्ञान, सर्वज्ञ केवलज्ञानी अपने आध्यात्मिक अन्तरज्ञान द्वारा अनुभूत कर सकता है वैसा ही परिज्ञान, इस शाखका विशिष्ट ज्ञाता, इस शास्त्र द्वारा अनुभूत कर सकता है और इस लिये इस विषयके शास्त्रको 'अर्हचूढा- मणि, 'केवली चूडामणि, कवली परिज्ञान' आदि नामोंसे मी व्यवहत किया गया है । इस विषय पर प्रकाश डालनेवाली बहुत कुछ साहित्यिक सामग्री हमारे पास सग्रहीत हो गई है, पर उसका विस्तृत रूपसे आलेखन करनेका यथेष्ट अवकाश हमें प्राप्त नहीं हो रहा है। अतः अमी तो हमने इस ग्रन्थको, इस प्रकार, केवल मूल रूपमें ही प्रकट कर देनेका यत्न किया है, जिससे इस विषयके जिज्ञासु- ओंको इस शास्त्रका कुछ आभास प्राप्त हो सके। इसकी पुनरावृत्ति, विशिष्ट रूपसे करनेका हमारा मनोरथ है, जिसके साथ इस प्रकारकी कुछ अन्य रचनाएँ भी सकलित की जायेंगी और इस विषय पर प्रकाश डालनेवाली अनेक तय्यपूर्ण वातें भी आलेखित की जायेंगी। 1 , विजयादशमी, सवत् २०१४ (२१, अक्टूबर, १९५८) भनेकान्तविहार, अहमदावाद -मुनि जिन विजय १८-१९/ जयपाया निमिवशास्त्रगत विषयानुक्रम विषय पिम्प . १ सामासिक पियाप्रकरण २२ पर्गमरिन २ संष्ट-विष्ट प्रकरण ८ २३ मार्गचित्र ५१-५२ ३ उपरापर प्रकरण ८-२२ २. पंबन पिग्राम ५१-५० . अमिवात प्रश्न २५ वर्मयोगकरण ५ बीपसमास प्रमाण १५-१८ २६ परमर्मसपोमानव मनुम्म प्रकरण २० सिंहासोफिसरप ८-१९ ० पपि प्रकरण २०-२१ २८ परि माविसस्ति ८ पप्पर प्रकरण २१-२२ ९ बीबपिन्या २९ गुपार प्रकरण २२ ३० उपरापरमियम प्रकरण १. पाहमाति २५-२५ १ सपर्म प्रनम ११ पातुपोनि १२ समे २२ पंकन कर पर १५ एम्पोनि २२ समाप्रति १. राधिषिमान प्राप २९ उपरापरसपत्रण १५ परस्पंप-सर्प प्रमाण २१-२५ ३५ पर्मावरर्सपोमोत्पादन १५ रिफ्यादि द्रम्प विष प्रसारण २१-१५ २५ सतोमर १. नरिपना २० संभ-बित प्रकरण ८१-८२ १८ पिन्वामेद प्रकरम २८ पसपीभविमाम बनम ८२-८र १९ वरिपरि संस्साप्रपाष ३९-१४ १. विपिनपत्र ८०-८५ प्रकरम १५-१६ १ पापिरस्पषिल्पक प्रम २१ मममेरिका प्रकरण १२ बामतीकास्पषिसारमा ८०-९५ प्रश्नव्याकरणाख्यं जयपाहुडनाम निमित्तशास्त्रम् । ॥ औ नमः सर्वज्ञाय ॥ । -- करकमलकलितमौक्तिकफलमिव कालत्रयस्य विज्ञानम् । यो वेत्ति लीलयव हि, तं सर्वज्ञं जिनं नमत ॥१॥ अन्यत्(ता?) प्रश्नान्यस्य जयपाहुटस्य निमित्तशाग्नस्यारम्भे अशेपदुरितप्रक्षयार्थ चाभि- प्रेतार्यप्रसिद्धयर्य मिष्टदेवतानमस्कार(र.)कर्तव्यः । तदर्धमाह - सिद्धमख्यमणिदियमकि(क)यमणवन(ज)मञ्चुयं वीरं । णमिऊण सयलतियणमत्ययचूडामणी(णिं) सिरसा ॥ १ ॥ वीर शिरसा प्रणम्येति । किंविशिष्टमन्तमुच्यते-सिद्धं । तत्र शुभाशुमफर्मविमुक्तः ॥ [५० १,पा० २] सिद्धः । नास्य रूप विद्यत इत्यरूपः । रूप मु(शु)-फपणाचात्मकम् । श्रोत्रादी- नीन्द्रियाणि पान्दाधर्थविपये न प्रवर्तत(न्ते) इत्यनीन्द्रियम्।न (मि)यत इत्यफतकः, द्रव्यरूपेण नित्यत्वात् । नावद्यमनवद्यः । अवद्य पापम् , अपापं अगी इत्यर्थः । न स्वभावात् प्रच्यवति इत्युच्य(त्यच्यु)त. 1 अशेपकर्मविदारणाद् वीरः । वीरो देवनाविशेपः । तं शिरसा प्रणम्येति सम्बन्धोऽयम् । अथवा य न(१) एव सिद्धः अत एवासावरूपी अनिन्द्रिय अकृतक अनवध ॥ अच्युतः वीरः इति वभूय(व) स एव सफल(त्रि)भुवनमस्तकचूडामणि[:] लोकामे [प० २, पा० १] निवासित्वात् । अतस्त देवताविशेष महावीराख्य सि(शि)रसा प्रणम्य प्रश्नव्याकरणं शाख व्याख्यामीति पाक्यशेपालभ्यमिति । आरादुपफारित्वात् ।। १ ।। सुयदेवयं पणमिमो, जस्स पसाएण गहियव(ध)रियस्स । सुत्तस्स अत्यपरिमियसपा(मा?)दरो तीरए काउं ॥ २॥ झुत सास्त्र(शास्त्र) मानमित्यनन्तरम् । तदेतत भुतं देवता श्रुतदेवता। तां श्रुतदेवतां प्रणता- (मा)मि । यस्याः प्रसादेन । प्रसाद इत्यनुग्रहोऽभिमुसपरितोप इत्युच्यते । गृहीतस्य (घ)तस्य च वस्य सूत्रस्यार्थः । सूत्रार्थ. प्रास्यादरः शक्यते कर्तुमिति ॥ २ ॥ मइमाह[प० २, पा० . Jप्पुप्पायं, भुवणभंतरपवंत(वत्त)वावारं । अइसयपुण्णं णाणं, पण्हं जयपायडं वोच्छं ॥ ३ ॥ मति(तिः) बुद्धि(द्वि:) प्रक्षेति पर्यायाः । वुद्धिप्रभावोत्पचिभूतमित्यर्थः। फस्तस्या बुद्ध(वे.) प्रभावः । नष्ट-मुष्टिचिन्ता-लाभालाभ-सुस-दुःख-जीवित-मरणाभिव्यसकत्वम् । किञ्च भुवनाभ्य- न्तरप्रवृत्तव्यापारम् । व्यापारस्तद्गतपदार्थोपलम्भनम् । अतिस(श)यपूर्ण ज्ञानम् । यदन्यसा(शा).

१ - . अपपाग्नाम निमिचमासम् । [ग्गा -१] मानुपमम्मं सोऽसिलपा । बतिकम)मा मिचतामात्सुपरम्पत इमतिमा। पीतामानापर्चमाननिमिचाफमेप्रकार मर-मुमिनिम्ताविसापतिस(पपूर्व प्रमाण भ[ 10 टने खमूत बगमाटम पारपामीति ॥ ३ ॥ अफ प ट त पयश पुरे, धमो लपलेध पण्हमादीए । उचरपरा य तेसिं, जाणे घग्गफ्सरसराण ॥ ३ ॥ समामे निमार्गममा )।बापी म(मा) पवर्गाममेति। पात् । तपासाये महारपर्मनात् । वाममार्गममा-बापपोतेोमबमा एपी वर्गाना पका इपि। प्रमा(मा)पामा प्रमा(स)माता पा याविनेगर्थोपसार लात् । पो भयो सरापी रन्चरत्वमपरा परपमान गपगप ॥ १ ॥ बेचियमिचे सको, [प १ . पेतुं पहस्सरे परमुहामो । से सो ठाउँ, सेसिं पढमक्सरपाहुर्वि ॥ ५ ॥ पावरमात्रान् प्रनामम् परमुप्तमु( मी मा मैमितिका सभापरिवम्मा प्रबमापार प्रति सेपममपाम् ॥ ५ ॥ समुचमसमुच, मणमिहर्य ममिहय व जाणिचा । मालिंगियामिमिय, पहाणि य लम्सए सेसि ॥ ३॥ देवा पात्यामरामा पूर्वप्रपितामा पुज्मसबुध हतिज संबोपोऽनेकमामिलामति। समापसर्ग-परपर्ग पनि समारो पो संयुका। वाभिमापो पस्पप्रमाणाधि) विपापप | नाशि-बमिभूमि-पापम्पमा । भवमिमा पमित्राचा वापरक- मेमोति ॥1॥ मोचो(ज) पठमालाव, मिची अप्पणो य परिपाई । सेसेस जीवमावीपरिचित वागरे मइम ॥७॥ प्रफाम सम्माषपातिक प्रणमाम मुक्ला प्रम(मसामचिन् प्रतिममा(नावात्मीरी (4) मुमला बम्पमात् प्रम) होला पाण-पूर्व-भीमा प्रथमवायमेन मपम बीब-मूह मात्सप्पा(मा) यापी रेपिसनाचेगी(विमानमूनोनि मिषम् ।। ७॥ पठमो य सचमसरो, कचटतपयशा प पठमभो वग्गो । विदि-महमसरसहिया, सछठ पार र पा वितीभो य ॥ रममम सती कम्यते-समय प्रबमा सापारासतमा लापरवप पर सदिगो प्रथमो वः। नारो विदीया बारा पत्रमा हराकर समेवी बिपीयो वा ॥८॥ ताओ णवमेण सम, गजरवल सा य ताइयो पम्गो। पठ-दसमसरेण सम, पसघभषहा प चउत्यो उ ॥९॥ . - .

३ T [गाया १०-१४] प्रभव्याकरणाख्यं इफारस्तृतीयः । उ(ओ)फार(रों) नवमः । 'गज उदघल स' सहिती तृतीयो वर्गः। ईकारश्चतुर्थः । ओकार(रो) दशमः । 'घ स ट ध भ व हा(ह)' समेतौ चतुर्थो धर्गः ॥९॥ अणुणासिया य [१०५, पा० १] पंच वि, पंचम-छठा सरा य बोधवा । दो चरिमसरा य तहा, पण्हक्खरमूलवत्थुस्स ॥ १० ॥ सन ण न माः' पञ्च अनुनासिकाः । 'उ' पञ्चमपष्ठौ । 'अ' द्वो चरिमस(ख)री भवतः । एते पंच वर्गाः प्रश्नाक्षरमूलवस्तुनि ॥ १० ॥ वर्गरचना समाप्ता ॥ इदानी जीव-धातु-मूलाक्षराणां विभागोपदर्शनार्थमाह - आइल्ला तिण्णि सरा, सत्तम णवमो य वारसे जीवं । पंचम-छट्ट-सरस्स[य], धाउं सेसेसु तिसि(सु) मूलं ॥ ११ ॥ आद्याः स्वराज्य 'अ आ इ । सप्तम 'ए'कारः नवम 'ओ'कारः।'अ' द्वादशमः। एते पद स्वराः जीवस्वराः विपि०५, पा० २ शेयाः । 'उ'फार[:] पचमः। ''कारः पष्टः। 'एफादशमः। प्रय एते धातुस्वराः। चतुर्य 'ई'कारः। यशम औ'कारः। 'ऐ'कारोऽष्टमः । एते प्रयोमूलखराः॥११॥ क च ट चउक्के जीयं, अट्ठम-पढमंतिमे यकारे य । तप[य?] चउके धाउं, व से य मूलं तु सेसेसु ॥ १२ ॥ 'क स ग घ च छ जन, ट ठ ड ढ' इत्येते पूर्वनिर्दिष्टा[:] प्रथमवर्गस्य । अष्टमः स(श)का- । [प०६,पा० १रः, अस्यान्तो हफारः, यकारश्च । जीवाक्षरा पते । 'तपदध, पफर में इत्येतेऽष्टौ । वकारः सकारश्चेत्येते धात्वनराः । ढवण न मा[:] तथा रकारः, लकारः, पकारश्य इत्येते मूलाक्षरा(राः) ॥ १२॥ जीवाचक्षराणामुपसंग्रहार्थं सराणां गाथामाह- जीवक्खरेकवीसा, तेरह धाउक्खरा मुणेयवा । एयारस मूलगया, पणयाला हॉति सबे वि ॥ १३ ॥ [प०६, पा० २] पूर्वनिर्दिष्टाः स्वराः पट 'अ आ इ प उ अः, क ख ग घ, च छ ज झ ट ठ ड ढ, यशहा' एते जीवाक्षराः एकविंशतिः२१ । पूर्वोक्ता धातुस्वरालयः 'उ ऊ अ' दश चान्ये 'त थ द ध प फ ब भ वसा' एते धात्वक्षरास्त्रयोदश १३ । 'ई ऐ औ, सब ण न मा, रल पा' एते मूलाक्षराः एकादश ११ । जीव-धातु-मूलसमेवाः पंचचत्वारिंस(श)दक्षराणि भवन्ति ॥ १३ ॥ [प०७,पा० १] पढमस(स्स)रसंजुत्ता, सवे लहुअक्खरा य अणभिया । इच्छंति जीवचिंता मि(मोत्तासु विवजिया जाव ॥ १४ ॥ उत्सर्गसिद्धाना जीवाद्यक्षराणामपवादः । अकारः प्रथमस्वरः येषामक्षराणामन्तर्भूतः, ते जीवाक्षराः प्रथमखरसयुक्ताः । अथवा अकारेण युक्ताः क च ट यशगज डा' पत्ये (त)ऽष्टौ लन्वक्षराः अनभिहता मात्रारहि[प०७, पा० २]ताश्च जीवचिन्तां कथयन्ति । अनुक्का अपि धातू-. । . , , . । बसपारधाम लिमिवयनम् । [माषा १५-१८] मूपिम्वाम्मा गावापा[मन्ववाचे खुप्यन्ते । पर इस पंप पावभाजन पिहया पो मात्रारदिशाम पीपमानित मपन्ति । भार एक एप मूमपणे मा। बनमियो मात्राविचिंता सीपमूपिन्यो सपपति ॥ १४॥ मचाम्स जो विभप्पो, जो वि य आलिंगिमो वि अमिपाओ । तं सर्व वष्णेहं, जहम माणुपुवीए ॥ १५ ॥ माप्रम पो पिपस इति पस्पमापोपबासागमा । सिमामेव मायमेरपये। प प4] निम्माचा पोमात्रा इति । मागिताम(मिमितापम्पमोपण पा[] पालिका । तत् पप्रपंच पयाममानुपम्मी परिणामः ॥ १५ ॥ परमो वामो य सरो, सचम णवमो य तिरियमायामो। मूळसर उह)मचा, पंचम-छट्ठा महोमचा ॥ १५ ॥ समय प्रबमा जरा गरा पूतीममरा एकारा सप्तमनाए मोचरो मघममा-को पत्लारा जारिग्मामा । मनु मूगोनो सपा सिप बस्मामा) मामा पा संबन्धि मुमिही किमपि पम्ति । नएममेऽप्यन्तरीमतिग्मापनिजाममेत पाया भवन्ति भिमापी, पेपारोऽप्रया, भौमरो पक्षमा ! [प प] पते प्रयास - मात्रा। मूसोनौ सम्मायो पमो मागसमितिमपि मुशिहीद सपम्ति । मरने मामनिवाबमे नया बरा कान्ति । पंचमान्मरा, बोकार एवो अन्य अपोमात्रौ भूएमोनो सम्बा पसामोमागसमन्धि किमपि प्रविमरदीपल) सरस(वा)। पापम्पमोमागम्मपसिना(ब)मेवारेष मरो कपषता ॥ १५॥ प्र] जीवाईसखण, णियमा दरिससि उटुमचाओ। प(वि)वरीय महोमपा, णायमा जीपाठणं ॥ १ ॥ मंमाम पियामिपामरममा जयावे पीवामएको चलानामुपगमा बीचमा समान परवन्ति। मां मूमप्यते । पस्मिनुत्प्रापिानमनवमीचमण्यमानमुपये पनि । बमोमानोलो) सत्ता मे) वो ना जीवापरमभएपरिपेने जरा भीषणा- परेमा । [...] को पोषपातरितमोम-मरा(वाम)मापाप- पारिपेाति बापापों सीमानिससाना सम्प्राविमो पीपपमिसुमते ॥१॥ मूसासरा : सो, पाठे वसति जे महोमचा । सति तिरियमचा, परपरसगमा उभयपक्स ॥ १८ ॥ माया मममममरसपा माचवे सोमाना(मा) राषम्मेवा परा सपन्ते वा साम्पसवन्ति । नियमानामि । चामता बीपकराते - मूमपबामपरिणवा पारम्पपश्चि । बागमम्म पामरा । पूर्गोजमेर । बासमरामा- परिणवावे पर जीपबारामत्तारो परेरा पीपा संवन्धि । गरमासंला पोचमेष ।।१०॥

प्रश्नज्याकरणारय
[गाया १९-२०]
सविसग्ग-बिंदुसहिया, जीवाइ णिदि[दि]संति सट्टाणं ।
अहमत्तलक्खणं पुण, सोसि सकायगुरुयाणं ॥ १९ ॥
सविसर्ग-बिन्दुसहिता[:]-विमर्गो ढाडस (शः) स्वरः, पिन्दुरेकादस:(:)।[१०१०,पा०२]
एतौ द्वौ जीवाक्षरसहितो जीवयोनि फुरतः । यदा पवावेतो स्वरी मूलाक्षरसहिती येते,
सदा मूलयोनि फुर(म)तः । धात्वभरसहितो धातुयोनि फुर(स)तः । अधोमावलक्षणमहणेन ।
पच भण्यन्ते । तद्यथा-स्वफायगुरु[:], सवर्गसंयोगः, परवर्गसयोगः, अर्धाकान्तं, यक्षरसयो.
गश्चेति । तत्र तावत् स्वकायगुरोर्लक्षणगुच्यते-- द्वौ फकारी सयुक्ती, हो गकारी, दो टकारी, एवं
सर्ववर्गेपु व्याया। स्वफायगुरयो जीवयोनी लब्धायां प्रष्टु: खकायचिन्ता फथयन्ति । धातु-
योनी ठन्धाया {१० ११,पा० १] आत्मार्थे धातुचिन्तां कथयन्ति । मूलयोनी सधायां आत्मार्थे
मूलचिन्तां कथयन्ति । स्ववर्गसयोगस्य लक्षणमुच्यते--सपारसोपरिगतः फफारः, धकार- "
सोपरिगतो गकारः, एव यगें ही हो स्ववर्गसयोगी भवतः । जीवयोनी रन्धाया प्रष्टः
स्वबन्धुचिन्ता कथयति(न्ति)। पनी धातुयोनी लच्चायो ववन्धुरने धातुचिन्ता फययन्ति ।
मूलयोनो लब्धाया सान्धुफ्ते मूलचिन्तां कथयन्ति । परवर्गसयोगम्य लक्षणमुच्यते -- गफारम्य
उपरिगतः चकार(रः), गफारम्य उपरिगतो जकारः, पफारम्योपरिगतो(तः) सकारः; इत्येव-
मादयोऽन्येऽपि परवर्गमयोगा जीवयोनी लयाया [५० ११, पा० २] प्रष्टुः पर[प]क्षचिन्ता दर्श- "
यति(न्ति)। धातुयोनो लब्धाचा परपक्षकृते धातुचिन्ता फधयन्ति । अर्द्धमान्तस्य लक्षणमुच्यते-
उपरिर्यद्वोधा(उपर्योs)क्षराणा तुल्यसरपया मो अफ्रिान्तमित्युन्यते। निदर्शन यधा- 'क्व-स्व-
प्र' इत्येवमादयः । चिन्तायां जीवयोनी लब्धे स्त्री-पुरुपचिन्ता दर्शयन्ति । [५० १२, पा० १] धातु-
योनी लव्धे स्त्रीसबन्धेन धातुद्रव्य ठभ्यत इत्यादेश्यम । मूलयोनौ लब्धे वीसवन्धेन मूलद्रव्यं
लभ्यत इत्यादेश्यम् । यक्षरसयोगस्य लक्षणमुच्यते-त्रिभित्रिभिरभरोगः सख्यभरयोगः । यथा-॥
'नि-क्रि-म्वि-स्थि-र्य-प्य(?)' एवमादयोऽन्येऽपि जीयोनी लब्धाया पृष्ठ(भष्टु.) {प• १२, पा० २]
अपत्यचिन्त्या कथयति(न्ति) । मूलयोनी लब्धाया अपत्यार्थ मूलचिन्ता फययन्ति । धातुयोनी
लब्धाया अपत्यार्थे धातुचिन्ता कथयति(न्ति) ॥ १९ ॥
अभिहयगुरुअक्खरया, रेफ यकार उ ज(ऊ?)कारसंजुत्ता ।
सचे य अहोमत्ता, णायवा अप्पहाणा य ॥ २० ॥
'रेफ व(य?)कार उफार ऊकार' पतेपा प० १३, पा० १]मन्यतमेनाधोगतेन जीवधातुमूलाक्ष-
राणा अन्यतनो(मो)ऽक्षरः सयुक्तमु(क्त उ)च्यते । तैरेवाधोगतः अभिहत उच्यते । तैरेवाधोगतैर-
प्रधानमुच्यते । जीवयोनी लब्धाया यस्य कस्यचिदक्षरस्य तले यदा रेफो दृस्य(श्य)ते, तदा प्रष्टा
यस्यार्थे पृच्छति तस्याधः फाप० १३, पा० २)ये स(शोत्रप्रहार आदेश्यः । जीवयोनौ लब्धाया यस्य
फस्यचिद् अक्षरस्य तले यदा यकारो इस्य(श्योते, तदा प्रष्टा यस्यार्थे पृच्छति तस्य स्त्रीनिमित्तं
पन्धनमादेश्यम्। जीवयोनी लब्धाया फस्यचिदक्षरस्य तले उकारो दृस्य(श्योते, तदा प्रष्टा यस्यार्थे
पृच्छति तस्य मूलमादेश्यम् । जीवयोनी लब्धाया यस्य कस्यचिद् अक्षरस्य तले ऊकारो स्य(श्य)वे
तदा प्रष्टा यस्य कृते पृच्छति तस्य [प० १४, पा० १] दीर्घकाल बन्धनमादेश्यम् । एते चार्या
यद्यपि गाथाया नोक्तास्तथाप्येते (द्र)ष्टच्याः ॥ २० ॥

अपारमाम निपिचणबम् । [पामा २१-२५] जाणे सवग्गगत्गुरु)ए, जोगी जा जस्स अप्पणातगिय । परवग्गरसरठाए, जो उगरि वस्स सा जोणी ॥ २१ ॥ पानादि वर्गापरेषाहरो गुमर पवा-स प बाम्मे पापो पचमः। 'सभाम्य पाप)पम्प | RAHI) एषयानिमिर्मूम् । परवर्गेपास मोअरो • गुरर्प पनिवaltra सा पोलिस निरसन-पप प्रापमारपो मासेम बीपभानुभूति ॥ २१॥ भाइल्य पचारि वि, जीवा पयही इपति ठाणाइ । पंचमउठा पामो, मूलपपरी य दो चरिमा ॥ २२ ॥ पापा बीपला पत्तार।। भापकाये पर्यागत पमान (दो) म गृहीता .बीगापरापासुपरगवा ARIY१५स) पीपमेन पन्धि । पार) प पीपलया पारपामा पासमरामामुपरिगवा बीचमा उति । मूगापरापासुपरिगता और मूर्य पम्ति । बीचमूम्भीरमात्वोध मागुम्वमिति बसरमपरा), परमाण, पदो से पातुमरी पालपणामयोगौ पातुमेर पतः । (प...] ' मानुतरपारया करमे पातुमेर पपरति । 'म परिमो बीपसाराम बारमेन पनि । पूर्गोसाय -पीप(क)मरामामुपरिगतो परिमसंघानुसारो पीवमेष रमयति । वामगमको मपतिमाल परावामुपरिगवोऽमुपये पातुमेव पति । मुगपरोपरिगवोऽनुपये मूरिसवति । परिमसको रिस[] पीपामरानासम्बतममामभिव(पोशोषमुपरसंपनि । पालमपयो पर्व पर्सपति । स्मरणामम्पवममामचो मालितो निसर्गः [ममेव पर्षपछि । परिमसंशय पपिपि सच ) मातीति । सामान्पपोनि(नि) समाता ॥ १५॥ सी(पिएमाघरतिमापा मोबनताप वपन्नासा- तर-मठ-जीहमला तालपा वह य उरवारमा। दंता उठा मणुणासिया प मुघला(मुरम्स) चेव ॥१५॥ मामानि पर्नाको ज्योपचो। (गम), पारा शिामूखीगा, पासम्म, मंगामा, एमा, भौमा मासिमा मूरगामेति परमावासप्रति मया ॥५॥ समिसम्गो य मारो, उकारो (ठरो) हकारो प जो हमा हस्सो। इस्सस(स्सा य मंठा, जीहामूला लग पा ५ ॥ २० ॥ समिरममा एमएम घरेदी गएको माघम्मी। सपा [१] पाए बत्तारोमेवे पम्पा । जग मेरो पालार(d) शिमूमचा ॥२४ ।। सचट्ठभा(मा)ग पढमा, वाळया वजमा य पचारि । टररपीमो प सरो, एति भलु मुरतालया ॥ २५ ॥ प्रथमममम सप्तपो पमए०, पा समपर्गम पवमो कारा, परमपमेन बना .

७ - -- . 10 . [गाथा २६-२७] प्रश्नव्याकरणाख्य स(श)कारः । 'च छ ज झ' इत्येते चत्वारस्तालव्याः। 'ट ठ ड ढ' इत्येते [प० १५,पा० १] चत्वारः, द्वितीयस्वर आकारः, पञ्च एते मूर्खतालव्याः ॥ २५ ॥ तथदध सा पु(प)ण दंता, प फ ब भ धातुस्सरा वकारोद्धा(ट्ठा)! वग्गचरिमाणुणासी, मुद्धण्णा सेसया सवे ॥ २६ ॥ 'त थ द ध सा' इत्येते पञ्च दन्त्या[:] । प फ ब भ' इत्येते चत्वार(र.), धातुखरौ च द्वौ पञ्चमपष्ठौ उ ऊ, 'व' कारश्च, सप्तैते औष्ठ्याः । वर्गचरिमग्रहणेन पञ्चमानुनासिका हुन ण न माः' गृह्यन्ते । [प० १७, पा० २]अथवा वर्गग्रहणेनानुनासिकाः, स्वराणां च मध्ये चरिमो अनुनासि[को] विन्दुः, 'अ' इत्येते च पडनुनासिकाः । शेपा:-स्वराः के ते, १ 'ईऐ औ' त्रयः । शेपास्त्र(श्चा)क्षराः 'रल पा' इत्येते त्रयः । एकत्र पड् मूर्द्धन्याः । सि(शिक्षाप्रकरणं समासम् ॥ २६ ॥ अत्रावसरप्राप्ता अक्षरलब्धिः, [तां] नामप्रकरणेऽभिधास्यति । इह ति(तु) प्राप्तिमात्र- मुच्यते । तदर्थ गाप०१८,पा० १]थामाह- ठाणं ठाणं एकेकायं तु आलिंगिधा(या)इ हायंति । उरसादी ठाणाणं, तालबे उवरिमो ठाइ ॥ २७ ॥ स्थान स्थानमेकैकमालिंगितामिधूमितदग्धास्त्यजन्ति । उरस्या निहतास्तालव्ये न] इत्येवं . क्रम अमिहत इति । अमिहतग्रहणेनालिंगिताभिधूमितदग्धा उच्यन्ते । उत्तरस्यो(उरस्यो)ऽन- मिहतो असयुक्त उरस्य एव लभते [प० १८, पा० २] अक्षरम् । उरस्य आलिंगितकण्ठस्थानं लभते । उरसोऽभिधूमितो जिह्वामूलीय लभते । उरस्यो दग्धस्तालव्यं लभते । कण्ठ्योऽनभिहतासयुक्तः कण्ठ्य एव लभते । कण्ठ्य आलिंग्य(गि)तो जिह्वामूलीयं लभते । कण्ठ्योऽभिधूमितस्तालव्यं लभते। कण्ठ्यो दग्धो मूर्खतालव्य लभते । जिह्वामूलीयोऽनभिहतासयुक्तो जिह्वामूलीयं लभते । स 0 एवालिंगितस्तालव्यं [प० १९, पा० १] लभते । स एवाभिधूमित अर्द्धतालव्यं लभते । स एवा(य?)- : दुग्धो दन्त्य लभते । तालन्यो अनभिहतासयुक्तस्तालव्य लभते । स एव दग्धो दन्त्यं लभते । तालव्यो(व्य) आलिंगितः ऊर्द्ध तालव्य लभते । स एवाभिधूमितो दन्त्य लभते । स एव दम्धो(ग्ध) उ(ओ)ष्ठ्य लभते । मूर्खतालव्योऽनभिहतासयुक्तः स्वस्थानं लभते । स एवालिंगितो पन्त्य लभते । स एवाभि[धूमि]त उ(औ)ष्ठ्य लभते । स एवा(?)दग्धो अनुनासिकं लभते । । दन्त्यो अनभिहतासयुक्त(क्तः)स्वस्थानं लभते । स एवालि[प० १९, पा० २ ]गित औष्ठ्यं लभते । स एवाभिधूमितो अनुनासिकं लभते । स एव दग्धो मूर्धन्य लभते । औष्ठ्यो अ(s)नमि हतासंयुक्तः स्वस्थान लभते । स एवालिंगितोऽनुनासिर्फ लभते । औष्ट्योऽभिधूमितो मूर्धन्य लमते । दुग्ध उरस्य लभते । अनुनासिको अनभिहतासंयुक्त स्वस्थानं लभते । आलिंगितो मूर्धन्य लभते । [१० २०, पा० १] अभिधूमित उरस्य लमते । दुग्धः कण्ठ्य लभते । मूर्धन्यो अनभिहतासयुक्तः स्वस्थान लभते । आलिंगित उरस्यं लभते । अभिधूमितः कण्ठ्य लभते । स एव दग्धो जिह्वामूलीय लभते ॥ २७ ॥ ॥ एवं स(सा)माप्ति(सि)कं शिक्षाप्रकरणं समाप्तम् ।। -- ।

८
उपपाइनाम मिमिवसायम् ।
[गारा १८-१
पठमा सइओ य सरो, सचम णवमो य सरुडा हस्सा ।
विया मंतरदीप हानि पठत्यो पनमो चेव ॥२८॥
मसरार-मर मोमर, पसाराऽमी संमर्समा नाम प्रमाण पणे पा
संरतरगान माति महा पसाये मो मान भारममा(मा) परस वा गरम करा
• मोहोमिमी पारे(पम् । मारिन हम। ममाविन प्रायोलोपिम्)।
परमविरिष्मपर्म पति को) संप्रसमामा तय गस्पे सर्व
मेव सम्पवासाश्यम् ।रिया बन्दरणीपात्यमोपते-दितीय
मामिण,
परम पाणी पिसंहा भम्रपामा प्रमामा मध्ये पारिसबाग पर्या
मास्वं मपति वा हा पम्स एमपिन् परस्मारमनो या रात मा [
...] पास
• मोझो मातीत्यापम् । मम्मति समवे। हुगादिमगम सिम्पति इन्पापम् । पार
म्मतिरिक परम्परामारि पति मा भरतीसारेगम् ॥ २८॥
सकमाउ)विभाग सेसा, सहाविदीहा य तिष्णि मि[य]मणं ।
छहटमा य पेणि विसमस्सरो पेय णाययों ॥२९॥
संपनिया समाधाम । परारा एमरोजमा बाम रम्मा
.पवे प्रपा । सेपमा निम्मुरिसानीया । ममापरानो मध्ये सह-सिंचनो पाहुन
मपति वा प्ररा पामस्ममा परिपा परमा पपस मा ११ प.पूफस पर मेरेन
पुप्पद विकासम्पम् । मामा धर्म भेगम कमाते । दुर्मगोपी पोष ममती-
बारम् । पम्पो पसरि घममग्रम पा राति वरमधर्म मरमाणम् ॥ २९॥
परमात्मवादया य पिया, पीय पठत्पा य सका बग्गा ।
सेसा क(सीकर-षियडी(ग), अर ईस्स मेवतिय ॥३०॥
सबमार-परतपरसा(मा), [तीमा] गमपसा' एवो रिप्रो ।
प्रापन घम् । शिवीप(पा)-परः चतुपा)
-पम पणे
संप्रसंशाः । पूर्वपत् पम्। पपरम[] 'मपानमा पोमपतपावर मिया
प्रम्पमुम्पते ॥२०॥. १५. )
। एष संकर विकरमकरणं समाप्तम् ।
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ममो गणमासे, सादामु य उच्चराहरो होइ।
बग्गरंग)चरा य नियमा, मच तय वग्गवाग्गुवारा चउरो ॥ १॥
चवर क्लि-बापर पणन्प्रेचर मोपोर इम्बोधन मेति । बम संपन्या
पर-परेचर पाय मोहिं बाये मारण्यावर प्राग पोस-
भवे
-1]पने पलारा व पचरा समाना मयः । तमाले(मे)
पर सहायतारा साप जपमानामेति ॥३१॥

९ ] - " 5 , . , [गाथा ३२-३६] प्रभव्याकरणाख्यं , एतदेवाह सेसा हवंति अहरा, वग्गा चत्तारि क ट प सा जाण । एककमि चउक्के, पुणो वि इणमो कमो णेओ ॥३२॥ अष्टिवर्गक्रम एव, चत्वारो वर्गा अधराः। के ते? 'कट पसा(शा)' शेपग्रहणाद् भण्यते ॥ ३२॥ गाथापश्चार्द्धस्यान्य[प० २३, पा० २ गाथया विभापा क्रियते-- एक्ककंनि(मि) चउक्के, पुणो पि(वि) इणमो कमो उ विण्णेओ । दो उत्तरा उ तेसिं, दो चिअ अहराधरा विदिए ॥ ३३ ॥ निरूपित उत्तरचतुष्क अधरचतुष्क चेति । तत्र चतुष्कद्वये भूयः] प्रधानाप्रधानदर्श- नार्थ क्रमोऽय विज्ञातव्यः । उत्तरचतुष्के द्वौ यथा-अ च वर्गों प्रागुत्पन्नत्वाद् । द्वौ च इति 10 द्वितीयचतुष्कमाह । तत्रान्यौ द्वौ वर्गों 'पश' अधराधराविति मन्तव्यौ । अथवा द्वितीयवर्गों द्वौ द्वा[व]धराविति । द्वौ अधरौ 'कट' सज्ञौ । द्वौ अधराधरौ 'पस (श)' सज्ञौ। एवं वा नेयम् ॥३३॥ अनु(मु)मेवार्थ विशेपयन्नाह - दो चेव उ [प० २४,पा० १त्तरोत्तर, तेसिं दो उत्तराधर(रा) पढमे । अधरुत्तरा य दोण्णि य दोण्णि य अहराहरा विदिए ॥ ३४ ॥ तत्र उत्तरचतुष्के पूर्वोत्पन्नत्त्वात् प्रधानत्वाच्च 'अ च' एतौ उत्तरोत्तरौ। आभ्यामनन्तरप- लि[व]त्वात् 'त य एतौ उत्तराधरौ एव प्रथमचतुष्के । द्वितीये तु 'कट' इत्येतौ अधरोत्तरौ। अधर- चतुष्कत्वादधरौ प्रागुत्पन्नत्वादुत्तरौ । द्वौ अधराधरौ । 'पस[श]' सौ अधरचतुप्फ(त्वा)दधरौ। 'कट' वर्गयोः पश्चादुत्पन्नत्वाद् अधराधराविति । एव अष्टवर्गक्रमेण वर्गोत्तरमुक्तम् ॥ ३४ ॥ पचवर्गीयेत्(ण्यमेतत् ?-)। पढम-तइया उ वग्गा, पण्हस्स य उत्तरक्खरा होति । बितिय-चउत्था अहरा, अहिरा]हर हो।प० २४, पा० २]ति अणुणासी ॥३५॥ प्रथमवर्ग[:]- क च ट त प य स (श)' इति । तृतीयो- 'गज ड द वल स' । एतौ वर्गों उत्तरोचरौ, उत्तरावित्यर्थः । द्वितीय[:]- 'स छ ठ थ फरप', चतुर्थ - 'घ झ ढ ध म वह', इत्येतो वर्गों अधरसज्ञौ । 'बण न म' इत्येपो(प) वर्ग• अधराधरसज्ञः । एवं वर्गोत्तरम् ।।३५।। 21 साम्प्रत गणनोत्तरम्, तदर्थ [गाथा]- गणणाए छा [५० २५, पा० १] इल्ला, सरुत्तरा छस्सराधरा इयरे । विसमा वि उत्तरा वंजणेसु अहरा समा भणिया ॥ ३६ ॥ गणना-अनुक्रमो भण्यते। तत्र स्वराणामाद्याः पडू उत्तराः, पूर्वोत्पन्नत्वात् । 'अ आ इ ई उ अ। पश्चादुत्पन्नत्वाद् अधरा 'ए ऐ ओ औ अअ । यद्वाऽन्यथा गणनोत्तर(र) स्वराणाम् 'अ इ उ ए ॥ ओ' द्वयोर्द्वयोः प्रागुत्पाप०५५, पा० २]नत्वादेते उत्तराः । पश्चादुत्पन्नत्वाद् 'आई ऊपे औ अ' इत्येते अधरा । यत इदमाह- "विसमा वि उत्तरा वजणेसु अहरा समा मणिया ।" 15 । । 20 नि.पा. २ . . अपरारनाम मनिपानम् । [पास ३-१] हानि गलनमेपासपोच्म् । पिरमा[:]-चम-दीप-संचम्नीया बना टिप पदमाः समा इति । सिमामाया, मममीयामपरा । ममनोतरम् ॥३१॥ हस्सा अपारसहिया, सरुचरादेसमोऽभरा इयरे । म पटतपय सा गुगओ य अकारो उचरो पनमो॥१४॥ मागोचरमेठन्-रत्या सय बमरमरवतामार घर पर पार भोपार हद रोमारिया । देगे पपी मने परो अपमाना पाण्याम, समायुचर पर डाम्पा । उमरो पपयुचर पीस इतर । पपया सबसे पापाचरो मतिया पर भरोम भार मेोवरप पुनयविद्या बाई बोला, पपपपपम्पमूतोऽयपर सपणे) साम्पा गयौ ॥ १.॥ कगपजटरतवपपयल, अट्ठममग्गस्स पनुम सहमो य । एते [य] टचरा वममु सेसा म(घरादसे ॥ १८ ॥ जगबरावरपमपम्ममा' ते बम पतीपायापासबर्गरसारमा मा) मानान् पृष्टीपास'सकारावे सो चरतेनारियायवरात। पापमपमरमपम शिपमर्पण भए मारिया ॥२८॥ उचरसरसजुचा, मग्गे लहु अस्सर(स)परादेसे । महरसरसु य महरा, हमति ये उचरा लहुया ॥१९॥ रुपोग प्रति चरमरसपुच्च पचरलया! रम्प-रएमोक [...] परे । मबम-मीप-गमतिपयरेममय सारिप-ग पसरपपपपपम सा श्येटे। बसतरोध पचरस(सारम्युच्च चरा पसारिका . (रयते । ए एस पसरवरपरपसा चपपरस'माई भोगा' इसलिन) संपुष बाय इत्यतिम(पान्ते । परमारेोचरम् ॥ ३९॥ दोमु जे पहान ८ गा, पुष्पापुप्पामा प उचरा सो। अपरा य अप्पहाणा, पशुप(पप्पुप्पाणा य बे वय nan मापरेपरेप्रमानवमा पोखराम परम पूर्वपापपवेन्यामागसतम्या। मपम पमानुसार शिवोप-पतुरंर्गमावावाशाम्पामरामेति ॥४॥ णाणानिधिरण जे [ AP1 मा, उचरपुरीर मरणो गहिया । हे वस्स उपरान उ, सेता भाहरीकया माइरा ॥१॥ बलापेरियापपराकारणेसोसिरकम (भारि रिमाममुर- एमसिसातरम गोपाग बाविसलपरम लिमिचानको प्रानि मुलाला बार भएतरपुतिमा परोपमा पम्पोन वाणा(माचारपा- पानमनिवामनुत्यो पोषरयोगमानपूर्वोचरसमात्रि का विधाप्पनिमावि ta एष पलुम्पिमसात्तरापर समासम् ।।

११
,
10
,
{गाया ४२-४५]
प्रश्नन्याकरणाख्य
'अहवा इमं अट्ठविहं उत्तराधर होइ' सूत्रवचक(न)मेतत् । अथवाऽष्टप्रकारमेतदुत्तराधरं
भवतीति वचनस्यार्थः।
अक्खरसरसंजोए, बलाबलविसेसओ अणति(हि)घाए ।
तत्तो य उत्तरोत्तर, अहराअ(5)हर अट्ठमं जाणे ॥ ४२ ॥
साम्प्रतं गाथार्थमु(र्थ उ)च्यते-स्वरोत्तर प्रथम, अक्षरोत्तर द्वितीयं, सयोगोत्तर, घलाव- 5
लोत्तरं, विभागोत्तर, अनभिप० २९, पा० १ हतोत्तर, [उत्तर,] उत्तरोत्तर चेति । एवमधरमपि
अष्टप्रकारमेव सप्रतिपक्षत्वाद् वस्तुम(नः)स्वराधर, अक्षराधर, सयोगाधर, [घलाबलाधर,
विभागाधर] अनमिहताधर, अधर, अधराधर चेति ।। ४२ ।।
हस्सस(स्स)रुत्तरं अक्खरुत्तरं उत्तराख(रक्ख)रा सवे ।
हस्सस(स्स)रसंजुत्ता, संजोएणुत्तरा लहुया ॥ ४३ ॥
अत्र खरोत्तरमुच्यते गाथाया अवयवेनाद्येन । हस्वस्वरोत्तरम् । के ह्रस्वाः स्वराः ? 'अ
इए ओ' इत्येते चत्वारः । अक्खरुत्तर उत्तरक्सरा सके । क्वे (के) च ते ? प्रथम-तृतीय-
वर्गीया गृह्यन्ते । साम्प्रतं सयोगोत्तरमुच्यते - ह्रस्वस्वरसयुक्ता ला(ल)घवो वर्णाः 'कग च जट
डस द प य ल श सा' इत्येते । यथा-प० २९,पा०२] 'क कि के को, ग गिगेगो, पचि चे चो,
ज जिजे जो' इत्यादि सयोगोत्तरम् ॥ ४३ ।।
इदानी विभागोत्तर क्रममुलच्योच्यते, संयोगस्य प्रक्रान्तत्वात् -
गरुयक्खरा य सबे, उत्तरसरसंजुआ विभाएणं ।
सो ठवइ उत्तरो खलु, होति अ से तिण्णि या(आ)देसा ॥ ४४ ॥
गुर्वा (क)क्षरा उक्का द्वितीय-चतुर्थवर्गीयाः । ते उत्तरस्वरसयुक्ताः । यथा- 'ख सि खे खो
घा घि घे पो' । इत्यादिविभागेनोत्तराः । विभागो चदन अस(श) इत्यनन्तरम् । यावता ।
हस्वस्वरसंयोगः । एतावता अंसे (शे)नोत्तरत्व भजन्तो मुख्यवधाघरा एव । तस्मात् खर
आदेशत्रयविभा[प०३०, पा० १ न भवति । लघुस्वरा, हवाः, उत्तराश्चेति । शेषा दु(दी)ोः,
गुरु(र)वः, अघराश्चेति । एव विभागोचरम् ॥ ४४ ॥
जो उत्तरेण अहरो, अभिहणंतो ठ(य) उत्तरो होइ ।
अहरेण उत्तरो वा, बलाबलं उत्तरं एयं ॥ ४५ ॥
।
15
15
य उत्तरेणाधरः अमिहतः। उत्तरस्यावलीयस्त्वात् । तद्यथा- 'ख क' । अत्र खकार: आलिं-
गितः, कसा(का)रस्यालिंगितत्वात् । एका सख्या हसति । हसी(सि)तैकसंख्या(ख्य)ग्य, खका-
र(र.) फै(क)कारो भवति । प्रतिपन्नश्चोत्तरमावं खकारो(र:,) अवलत्वात् । [त]था अधरेणामि-
छन्यमान उत्तरोत्तरो भवति । यथा-'ग घ' । अत्र घकारोऽभिधूमिक• । गकारस्य संख्या-
द्वप०३०, पा० २]यमपनयन्ति(ति) । तृ(त्रि)सख्यत्वा[] गकारस्य । हसिते च सख्याये ।
अबळत्वात् । गकारः फकारत्वमापन इति । एवमन्यत्रापि पलावलिनोत्तर परमम् ॥ ४५ ॥

1 - बयपानाम निमित्तासम् । '[पा. सामवमनमिपावोचरमुपदे- पढमस(स्सारसंजुचा, मणमिहया सेतु से अणमिहया । उत्तरमपरं वेति य, सजोएगेव दो चरिमा ॥ १५ ॥ प्रथमलरसयुमा । का प्रमम! बारावेन समरेन संपुष्मान ! प्रमण भनमिया मण्यम् । बटरवर पमपमा मेवे भरमि वात) । क्षेपवर्गास्वमिदवसम्म पनि प्रतिपक्षवामपन्वे । पवनमियोपणे रेप परिमेण पिशुना पुच्मेऽपर पर प्रति। अपरेप विसईनीमच पुजोपरा भारत प्रयतीमयः। पर पदो मेरपसोऽमम् । परा मायरोपमोला। चरमविपमेणापय [मुमा विरोचरपचिपापरावणा मोमा स्ने पापकारसम- ॥ परम्पास्मानम् ॥ ४६॥ एवं सरचराविस, पलायलं सपओ पलोएछ । चिन्तादीए भावे, जीवाइ पविाणिरिसे मइम ॥ ४० ॥ सनरोपसर (1) म सो विमेस्प पिता न मुस्लिीप-प-मोनिया विमेप मामविनापरे(ण)पामाविम्मतिमान् ॥४.॥ जीवं जाणम् दोसुतरेसु [ मा र] महरेम पोमु मण पामो)। महरुचरेस मूलं, उचरमपरे तहा पाठ ॥ १८ ॥ बीच बानी । प्रमाधप्पामापी पति ग्रामपणे बी प्रमापराची माग पनिवे बायपरापे मात, मभामा मागे पनिवे नपरे द्वितीये चोपोनकर परिवे मुम्मा गम ।[प च १] मायरामा मातो पान्यो पवे पोऽनन्तर मा(भा) माजी महमेषामना ॥१८॥ ॥ इमेष उत्तरापरं मकरणं समाप्तम् ।। T । दुषिहो भमिपाभो, सरगमो पेय अक्सरगमो य । सरगमो सिविगप्पो, मंदो मन्सो य तियो प॥१९॥ रिदियोऽमिपावा ममगतोमरगतम् । पासपो भपसरायको .नेमारा पग-पग मेरी-सम्पपठन-पारस्वाममिपावारिम्ममा । स पाणिनिता (जसो मन्चमो मानिमिति) । मा(m) पारिनिवामिभूमितपणम्या । बम- [पवममिपावमुपरिमा पस्पति ॥ १९॥ एरेको पुण दुविहो, होइ पसत्पो य भप्पसत्पो प। [म पसत्मो मैदावी, रुप मालिंगियावीमि ॥ ५ ॥ मनमो विधा- पाचो)प्रपत। बीमामा-मेल समागिता प्राचा पिप माम्मतिमा-समारिनामसामोप बाधिवा प्र- , [गाया :५१-५३ ] प्रभव्याकरणाख्यं-- १३ खो वाऽप्रशस्तों वेति । मध्यमो यः शब्दो [प० ३३, पा० १]ऽभिधूमितसंज्ञः प्रशस्तः, अनशस्तो वा। एव प्रशस्तः, अप्रशस्तो वा यः शब्दस्तीत्रः स दग्धसज्ञः । प्रशस्तो यः शब्दोऽल्पः सोऽल्प- फलं ददाति, स्थिर च करोति । प्रशस्तो यः शब्दो मध्यमः स मध्यमफलं ददाति, मध्यमं स्थैर्य करोति । प्रशस्तो यः शब्दस्तीव्रः स महत् फलं करोति, स्थैर्य च तस्याल्पकालमिति । अप्रशस्तः चः शब्दोऽल्पः सोऽल्पमान्द्यं करोति, स्थैर्य च तस्य मान्यं करोति । अप्रशस्तो यः शब्दो मध्यमः । स मध्यममान्य करोति, मध्यमं च स्थैर्य मान्द्यस्य करोति । अप्रशस्तो यः शब्दः तीवः स महामान्धं करोति, अवस्थान च ताप० ३३, पा० २]स्य मान्यस्याल्पकालमित्येतदपि शुभाशुभमल्प- मध्यम-महत्त्वेन द्रष्टिन्यम् । एवं शब्दाभिधातः ॥ ५० ॥ अक्षरामिघातार्थ:- बि-चउत्थ-पंचमाणं, वग्गाणं अक्खरा अमिहणंति। एक्कुत्तरिया य.सरा, अणभिहया सेसया वग्गा ॥५१॥ द्वितीय-चतुर्थ-पञ्चमवर्गः प्रथम-तृतीयौ वर्गावभिहन्ये ५०३४, पा० १ ते । एकान्तरिता- ख(च) स्वरा[:] के भण्यन्ते ? इत्यत्रोच्यते - यद्यप्येकान्तरिता बहवः, तथापि 'आई' कारश्च एते त्रय एकान्तरिता[:] प्रथम-तृतीयौ वर्गा[व] भिन्नन्ति । प्रथम-तृतीयवर्गा हस्खस्वराश्च चत्वार एते परस्पर नाभिनन्ति ॥ ५१ ॥ अणमिहया अनि(प्याभिहया वा, पिल्लिज्जता उ आभिघा[प० ३४, पा० २ ]तीहि । आलिंगियाभिधूमितदढ़() व लहंति ते नामं ॥ ५२ ॥ अनभिहता वर्गा उक्ता अभिहताश्च एते अनभिहता था के ते प्रश्नाक्षरा[:] १ तेषा प्रश्ना- क्षराणा स्थापिताना किमपि घातोऽस्ति नास्ति च इति चिन्त्यम् । यदा प्रभाक्षराणा परस्पराभि- घाव उच्यते तदा प्रिथमाक्षरद्वितीयाक्षरस्त्रि(स्ट)तीयामरमभिहन्ति । तृतीयाक्षर चतुर्थाक्षरं । अमिहन्ति । एवं चतुर्थाक्षर पञ्चमाक्षर, पञ्चम षष्ठः, पष्ठं सप्तमः, सप्तमो(१)ऽमिहन्यमिघाते सति । यो यस्यानन्तर स तमिति । अमिघातस्यालिङ्गिताभि[धूमि] तदग्धलक्षणमुपरिप० ३५, पा० १]ष्टाद् विस्तरेण व्याख्यास्यति । यदा प्रश्नाक्षराः सर्वे परस्परममिहताः, तदा अप्रधाना निफ(एफ)लाख(च) 15 भवन्तीति ।। ५२॥ 21 - प्राक् वावत् स्वराभिघाता उच्यन्ते- अणवि(मि)ह[य] अभिहया वा, अंतरदीहस(स्स)रेहि संजुत्ता । अभिधूम(मि)यंति लहुया, दहंति गरुया विते चेव ।। ५३ ॥ अनमिहता अमिहता वा ये प्रमाक्षराः । अथवा प्रथम-तृतीयौ वर्गावनमिहतसझी । शेपास्त्वमिहतसक्षाः । एते अन्तरदीर्घा(प)स्वरयुक्ताः। के ते अन्तरदीर्घस्वराः १ आकारः, ईकारः, ऊकारश्चेति एते प्रयः। एतैरन्तरदीर्घखरेः सयुक्ता अमिधूम्यन्ते [५० ३५, पा०२] से अग्रतो याम(न)न्तरमवस्थितैः । के ते लध्वक्षराः १ 'कागजट हतदपवय लशसा' इत्येते चतुर्दश । आकारेण ईकारेण अकारेण च सयुक्ता अप्रतो वाऽनन्तरमवस्थितैर्दान्ते गुर्वा (4) +-+ एतद्विदण्डान्तर्गत पाठो भ्रष्टप्रायो दृश्यते ।

- अपपारमाम निमिचयाचम् । मारे गुर्गीपणा! 'पफर पा इमेठे साप्त । बागरेप गिरेप मरेपर [11] संपुषा नमवो पानावरमबसिरप) परेन । गुपाया। परमपर इसेवे सप्त ॥५३॥ मालिंगियन्ति इस्सस(स्सा हु वीहस्सरा रिरहह वहति । पहस्सरा उ सके, संजुला आणुपुपीए ॥ ५ ॥ बारिम्परते सलपा से सम्मा पाए पला । ते बानि- अपवेर) ' परफरपाः परमपए मेम रितीर-मनुवर्ण- सपा सप्त । 'पापमपमनोपरा रमन्ते पार्मिी रै। पत्तारा मोमोमा । पर्व पुत्ता बानुपम्पो वासिशसम्ते, भमिम्पन्चे, पपन्५४॥ बमुमेना गान्तोष प्रतिपादनाए- अंतरवीहा ममिपूमियवि मालिंग(गि)पति इस्सा । टिविहाशे चरिमसरा, मांसाहावदीहाणुणासीया ॥ ५५ ॥ अन्तरपीकम माई पतेऽमिभूमिवस] सा जमाएर पते मालिसियार ! [ऐ मौ] खरी परिमसंत्री बाबरमा)मेयो को परका । [३] समापीपीपी बनुमासिन ममममा इमेले ॥ ५५ ।। भारावामिरा निस्पाम्पगावापामा पम्मुमते- मासिगिया प मालिंगियंति अमिपूमिया य धर्मेति । वहाका) य वहति सरा, तेसिं मुखं च परिपरमोच ॥१५॥ पारिगिसंज्ञा ते पापमो पोपतमि सग पे बालिया। रितीप- मई- बीपणा र पराममिभूमिवरणावर भाई परमिएम्पम् । प्रथम-पूतीममरा- तेऽप्पुमा । तं पापसमा मर्ममा खे प्रथम पतीवमर्गा परन्ति । पतापुत्वम् । मोदी भाप पवारोतरी संयुक्तराम 0] मबम-पतीव-पापपरा पादि। मेवाष्मपि पुनाम् । रेमो सौ सौ प्रथम-सूचीप-पत्रमार्गा पहन्ति । इनेवर म् । परमात्मा सेमुऽसर पान्ति पूर्णास पानम्वरमिति संयोगमारे सति ॥५॥ पर्व जामिषाव सानो मामिमाता- बीमो य फलम-वाइय, परम-सामा पसायदोजे यड) पठत्पं । आलिंगियंति वम्ग, पठत्म पुण पचम वर्ग ॥५०॥ [r !..] शिवायो पबमवर्ग पूती नागिपति । पा प्रथमवर्गवीवपर्यय प्रितीवर्ग- मागिपाल)का प्रबममर्गस्ताचपर्ममार्गशिरतावम्-पम-गवीचौ रोमिय - नितीबापा [ तुपा पाममाधिपति बाप्रपमा एपिम्पमानिये पापा(माला। पतीच गप्रस्मा । चर्प भाप्रता(सामा । पत्रमा सम्पमा । -भूषामाई बाn.n । - .

प्रभव्याकरणारख्य 5 10 १५ [गाथा ५८-६३] अभिधूमेइ चउत्थो, आइमबग्गे उ तिण्णि नियमेणं । पंचम-चउत्थवग्गे, दोण्णि य अभिधूमये वितिओ ॥ ५८ ॥ अभिधूमयति चतुर्थो वर्गः प्रथमवर्ग(ग) तृ(द्वितीयवर्ग त्यतीवर्ग च । द्वितीयवर्गश्चतु- र्यवर्ग पञ्चमवर्गचे (गं चे)ति ॥ ५८ ॥ आइल्ला चत्तारि वि, डझंति पंचमेण वग्गेण । पंचमओ पुण डज्मइ, पढम-तइज्जेसु दोसु पि ॥ ५९ ॥ प्रथम-द्वितीय-तृतीय]-चतुर्थवर्गा दह्यन्ते पञ्चमवर्गण अन्न्यात्मकत्वात् । पञ्चमवर्गस्तु दश्यते विनास्य(श्योते प्रथम-तृतीया (यः) पृथिव्यो(ब्यु)दकात्मकैः ॥ ५९॥ जे जे समाभिलावा, अण्णोप० ३९, पा० १ ]ण्णं ते उ णं अभिहणंवेति)ति। जह क ग च ज मादीया, दो दो लहुआ सुआ अण्णा ॥ ६ ॥ जे जे(ये थे) समानसी(शी)ला लघवश्च मात्येवे(?) लघवः अन्योन्याना(ना)भिन्नन्ति । के ते समानसी(शी)लाः, ते उच्यन्ते-'क ग घ जट ड त द प व य ल स (श) सा' इत्येते । प्रथम- वर्ग(स्तृ)तीयवर्गश्च लघुसमौ । अनयोरासनी(नौ) द्वितीय-चतुर्थवर्गी गुरुसज्ञी भवतः । पर- सराभिघातकी चेति ।। ६०॥ अभिहणमाणे दिहो(हे?), जोणीसंठाणवण्णमाईणि । अभिहणमाणस्स ऊ (१) भवे, ण जो उ अभिहण्णए तस्स ॥ ६१ ॥ अमिहन्यमाने दृष्टे । कोऽभिहण्यन्ते(न्यते) । दो(यो)पि० ३९,पा०२ इन्तीत्युक्तमपि पुनरु- च्यते-पूर्व (व)पूर्वाशरोऽप्रिमेणात्क(नारेण याहशेन यादृश इति । पूर्वोक्तं योऽभिहन्ति तस्याभियं- तु(इन्तु) योनि-स्थान-वर्णप्रमाणादीनि वक्तव्यानीति । कस्मात्कारणादित्युच्यते-येन सर्वोऽमि- हन्ति वलीयानीति (बलवान् इति?) ॥ ६१ ॥ परवग्गेण उ वग्गो, जो जेण अभिहण्णए उ तो तस्स । अभिघ(घा)यं जाणेज्जा, राजादिसंथ(घ)वणा(ण्णा)णं ॥ ६२ ॥ परवर्गण वर्गो यो येनामिहन्यत इति । परवर्गस्य इत्यक्षरस्य सना । एतत्तु प्र(घ)यक- (क)व सा(शा)त् । पराक्षरेण(1) योक्षरोऽभिहन्यन्ते (ते) तस्यामिहन्याप० ४०,पा० १]मानस्स पराजओ(यो) वक्तव्यः। अभिह (न्तु)र्जयो वक्तव्यः । एवं ब्राह्मणादिवर्णाना राजन्यस्य वा युद्ध विवादे वा जय(यः)पराजयो वाच्य इति । आलिङ्ग(शि)ते भागहानिः । अभिधूमित-अभिपाते द्वे हानिः श्यो वा । इन्धे निशे(शे)पतनक्षयो मृत्यु ।। ६२ ।। आलिंगियंमि जीवं, मूलं अभिधूमियंमि पण्हंमि । दुटुं(ड)मि भणसु धाउं, एत्तो उद्धं जहा वोच्छं ।। ६३ ॥ प्रशत्तामशस्त्राश्च ये शब्दा[] पटहकुड्यपतनादिगवाते पूर्वोका (५०४०,पा०२]आलिंगि- नाभिधूमितदग्धलक्षणाः। तत्रालिगिते शब्दे [जीव आदेश्यः । अभिघूमिते शन्दे] मूलमादे- श्यम् । दुग्धे पन्ने घासुरादेस्यः(श्य.) । तस्मात् पूर्वे() 'ययेति वक्ष्यमाणकं प्रभम् ॥६॥ 15 24

गपपाशुरनाम निमितमामम् । [गाया -१८
आरिंगिमि कलहो, मर्द अमिमियमि पम्हंमि ।
पामि भणमु मरण, एचो उई जहा योउं ॥१४॥
बभिनाजपि प्रताप्रमचमणव एपानभरस्मो पतिरपित्यारो)परिम् ॥१४॥
॥मभिपातमारण समाप्तम् ।।
H
पगाण जर पनुमा, पिरंतर वा तिहि पण्हमाइए ।
तो मुण्ण जाणेजा, []वि किंपि विचितिय तपे(त्य) ॥ १५ ॥
वर्गो परमपमा विप्रथमपामेन सरल)पो प्ररमा नाम
बगम न मममा सारा ५ वर्गमन प्रममच(प)परा । पो भयो बगा निरन्तरं मन्यो
सम्वे सना सचिम्म बाबीपात् । स विधिरि निम्ति पति । तया माकिमयम्॥
ममिहयरिंदुविसग्गे, चिंता मुट्ठी य मुनिया होइ ।
वग्गेमपालवणो, वत्प ण क मुणेयपा() ॥१५॥
बाप) प्रमाण मारामारेष मिमुनिसपमिवावा मुर(प)पम्।
वा पापापा मेरवा पापो पर्यायपि न मर्म सम्पमितः ॥ ६॥
मीसमु [17] अत्पि चिसा, आमारायमिस्सय[ति]इबिहा ।
पम्मापम्मागासा माहारा तिष्णि विमेया ॥४॥
प्रमाणप मप्पे 'मामा' पावन सरिवारमा) ले परासियामा
पहिरिपा मापारविपणा भाषेपिरणामा ।सम पापि संममा पाणिनिय
मरतीति ।भापाय पनि माविमा माडा भपर-मात्रामेन पिरिपाम्बारा-
को समापाम् । पातुस्प(भिषिको माम्पा साम्पा बागममिति-रिर भ्पामा-
मपन्ति । वरेणपरिणापमा Ham पिरम्पले मारपमा प्रसार-बापारण
(भिदिपा-पापामामो [5]
मूव मावी गेसम्पापियो। पातरोडोर
मार्ग। वा गतिम्ममो धर्मासिमले गतिमा जीपालो पुंगीपणना गनुपमरेपर्यते ।
मिनिम्मापा() भपालिका सिनिम मितिः। भबमा(गारम्पमापसबा
पाहिमामखारति पे प्रयोऽपि भमर्ण जी मूम्यामां बापा, भाषेचा पीपपातम्या
[1] ॥६॥
एव(प) एग-
जीव पाउँ मूल, पेर्य तत्प फाममो जीयो ।
नोदवीसह सौ दुमिहो, जीवापयवो य जीबो का ॥१८॥
पी), प्रयम मानुषा रिती), मुमालनीमा । प्रिमिा
- पराम्पो) बगरिति । सिरिर निर्मरति । वा गन् पबगे पापा
मोहम्ये जीणे [ीपातपति ॥ १८॥

गाथा ६९-७५] प्रभव्याकरणाख्य , जीवे दिवे जीवं, जीवावयवं च तत्थ नायबं । पुणरवि उत्तरसहिए, पण्हे जीवं हवे नियमा ॥ ६९ ॥ जीवाक्षरेप्वनमिहतेषु [५० ४३, पा०२] जीव इत्यादेश्यम् । तेष्वेवाभिहतेषु जीवावयवो वछत्र्यः । पुनरप्युत्तरखरैरमरैर्वा बहुले प्रश्ने जीवेनैव तिसस(निस्सश)यं भवितव्यम् ।। ६९ ।। अहरसहिए उ पयो(ण्हे), जीवं वावयवं नु( तु) मुणिज्जासु । जीवे लईमि पुणो, दुचय-अपदाहि(इ)पभेदा [य] ॥ ७० ॥ अधराहुतो (अधरसहिते? ) प्रश्ने जीवावयव(व) जानीहि । जीवयोनो लब्धायां द्विपद- चतुष्पदापदपादसकुला भेदा वक्ष्यमाणाश्चिन्त्याः ॥ ७० ।। लोमाणि तया रुहिरं, मेदो मंस-हि-मज्ज-सुक्काइ । जीवावयवा [य] पदे, जीवा सिद्धा असिद्धा य ॥ ७१ ॥ रोमाणि त्वम् रुधिर मास मेदोऽस्थिपि०४,पा. १]मजाशुक्राम्य(ण्य)प्टावेति जीवाव- ययाः । जीवाः सिद्धा असिद्धात्र द्विविधा भण्यन्ते ।। ७१॥ सिद्धा एगवियप्पा, [अ]सिद्ध संसारिणो चउवियप्पा । दुपया चउप्पयावि य, अपया पयसंकुला चेव ॥ ७२ ॥ वत्र सिद्धा एकमेदाः ससारविनिर्मुक्ताः। असिद्धाः ससारिणः । ते चतु [र्विकल्पा]। चतुरो मैदाना(ना)ह-देवगतिः, मनुष्यगतिः, तिर्यग्गतिः, नारकगतिश्चेति । द्विपद-चतुष्पद- यपदाः पद] सक्लाश्चेत्यमरचकमेभेधा (श्वेत्यपरचतुर्मेदाः) ॥ ७२ ॥ दुपया माणुस्स(स)देवा, पक्खी तह नारया मुणेयत्वा । मणुया हु चउवियप्पा, णायचा पण्हइत्तेहि ॥ ७३ ॥ द्विपदा मानुप(पा:) देवाः [प०४४, पा० २] पक्षिणो नारकाश्चेति वक्तव्याः । मनुजाश्चतु- ॥ मैदाः ॥ ७३ ॥ तेपामन्यगाथया चतुरो भेदान] धक्ष्यति- पढमो ह बंभणाणं, वीओ वग्गो य हवइ वेसाणं । तइओ [य] खत्तियाणं, सेसा दो हॉति सुद्दाणं ॥ ७४ ।। प्रथमो वर्ग, 'कच ट त पय सा (शा)' इति ब्राह्मणाः(ना) झेयाः(य.)। द्वितीयो वर्ग: 23 'खछठयफरपा' इति भवति वेस्या (वैश्या)नाम् । तृतीयवर्गा(र्गः) 'गज उदव लसा' अग्निया- णाम् । चतुर्थो वर्ग 'घस उघ म व हा' [प०४५, पा० १] शूद्राणाम् । 'हमण नमा' पञ्चमो वर्ग:] शं(स)करजातीनाम् ॥ ७४ ।। दुविहा एते णेया, इत्थी पुरिसा पुणो वि ते विव(तिवि)हा । बाला तरुणा थेरा, उत्तम-मझा-धमा -तिविहा ।। ७५ ।। लि. पा. ३ . बयपारनाम लिमिचायवम् । [गापा -९] पे पो बर्षिमा प्रामणारय मा तेपेष पूवर्गेपु मममो पालवीयवरिपोप पुयान या शिवीरमतुमनी पीनी । पत्रमो व नसकसका। पुलिजिपियो पा-वरण-साबिर इति। पोखिन पि प्रितिमा पाडा पाणी सपियरेति। मसा- मिति(मपि) पिरियमेषमावर सविर तिमीसम्ममन्येवानि प्रम त्रिविमान्नुपम मम्ममावमलेन सम्पानि । मिरेमेस पक्षापामापानगावया पियति ।। .५॥ वह चेप कम्मम्मा(म)मा, अकम्ममा य मंतरवी)वा । एदे कमेण सपे, सणामणिदेसियो) जाण ॥ पाकर)कर्मम्मया रेषा प्रबमपर्मासया, मन्तपीपलरेर्युपाकर्मभूमयो मयुप्पा मपन्ति । परीसराम 'माई[प पोस[स] पप भपि क्या पुनर- या। पटीपवर्गमा बन्चीलप्पा मार्मम्मयो भवन्ति देवाः । पर्मभूमिमाना बर्मभूमिशाना बोलि]लमा[गरपाति प्रमाणमिति पचम्पानि मन्वनीपार्य पदपरामरजर्व एप्रेमपाना प्रपदो नेपा(नेकपा)। चपलमनिपानि पशिान कम्पारम्पामिति ॥६॥ ॥जीवसमा[स]पकरण समासम् ॥ . पातुस्सरा सहस्सा, कगादिवम्गाणुरासिया दुपए । यीमो इसमो य सरो, चटप्पए लाइवग्गो य ॥४॥ प्रमे प्रथम पीच-पंचमममरानिय(पवि) मम गृतीय मात्रामा मेमामय परिसर पारेप पागुलरेम रोम पुल्चो(मा) वेषामेवाचवममामयो पाउमादरम- पसिन बिगारपिचा विझवा । प्रो जिीपवर्गापरणारे कितीच बाजारो सम बोमरोणचोरम्पवरेज वितीयपमरेपु पुगेपु मापा मानिन्मा पिापम्मा neun अपयाण ममय सलु, पयालयाणालाण प) पमपहा पठरो। परमपारसमा, [...] सरा य दोपहमि सामण्णा ॥८॥ पसरपाले प्रभे मिरे पेपरे पहारेप व सविसर्गन पमितिमा नौ । पी पावल्मामरमानन्दप्रसम्पलयमापम्पवयोऽभवोऽमतरमपमिते अपर मेगा । अमरातारा पौष लौमिमिमा पूोक्ताबाचेन पापमा मानियो पा इति ॥८॥ जह पठम-साय-पसम-बम्गे पहस्सराइ वीसंसि । तो दुपय-जीवचिंता, पठप्पयाण पि [विपउत्ये ॥ १॥ बार पापि परिसाल्पा पमा मितिसमपिटलोच्यवे-मबमपर्गन पापवर्गम समवर्या र सम्पपिनो बहरा मनायगात्लेन हरबो का हिराजीव -पिता मासा | पिपपपनो भाले गनुमा शेष[] ॥९॥ M - - 15 प्रश्नव्याकरणाख्य १९ [गाथा ८०-८५] भवणवइ-वाणवंतर-जोइस-वेमाणिया तहा देवा । तेसि दस अट्ट पंच य, व(वा)रस णव पंच य वियप्पा ॥ ८ ॥ दश प्रकारा भवनवासिनः, तद्यथा- असुर-नाग-विद्युत्-सुवर्णा-ऽग्नि-याव-स्तनितो-दधि- द्वीप-दिकुमाराः । अष्ट प्रकारा व्यन्तराः- किंनर-किंपुरुप-[प०४८, पा० १]महोरगा(ग)-गान्धर्व- यक्ष-राक्षस-भूत-पिशांचाः । पञ्च भेदा ज्योतिप्काः - सूर्य-चन्द्रमसो-ग्रह-नक्षत्र-प्रकीर्णतारकाञ्च ।। वैमानिका अनेकप्रकाराः- सौधर्मशान-सनत्कुमार-माहेन्द्र-ब्रह्मलोक-लान्तक-महाशुक्र-सहस्रार- आणत-प्राणत-आरण-अच्युताद्या द्वादशकल्पोपपन्नकाः । अपरे नवप्रेवेयका:-अधोमध्यमोपरि- विभागस्थाः। तथाऽनुत्तरविमानवासिनः पञ्चप्रकाराः- विजय-वैजयन्त-जयन्ता-पराजिताः सर्वार्थ- सिद्धसंज्ञाः । एते स्वभावनिर्देशतो विज्ञातव्याः॥ ८० ॥ सिद्धाण आदिवग्गो, देवाणं होति तिण्णि वग्गाओ(उ)। दो चेव मानुपा(गुसा)णं, [५० ४८, पा० २] सेसा तिरियास(ण) वग्गा हु॥८१।। लोकाने व्यवस्थिताः सिद्धा अशेपविमुक्ताश्च अकारवहुले प्रश्ने। [ क च ट वहुले प्रश्ने ? वैमानिका देवा ज्ञेया. । तप बहुले प्रश्ने मनुप्या ज्ञातव्याः । य श बहुले प्रश्ने उत्कृष्टाति(स्ति)र्य- गगयो ज्ञेयाः ॥ ८१ ॥ दुपयक्खरेसु दिढे, सबे दुपयक्खरा मणुस्साणं । जे पुण चउप्पयाणं, ते नियमा होति देवाणं ॥ ८२ ॥ द्विपदाक्षराः। के ते? प्रथम-तृतीय-पञ्चमवर्गाक्षराः । एतद्वहुले प्रश्ने मनुष्या द्रष्टव्याः । अकर्मभूमिकान्तरद्वीपकाश्च । चतुर्थ[प० ४९, पा० १ वर्ता(गी ?)याश्चातुप्पदाक्षराः, ते(तैः १) उत्तरस्वरयुक्तैर्भवनपतिव्यन्तरा ज्ञेया इति ॥ ८२ ॥ अपदाणं जो गमओ, सो चेव य होति नारयाणं पि । बहुपायाणं तइओ, सर(सा)वयवो होइ पक्खीणं ॥ ८३ ॥ अपदाक्षरा घ झ ढ पूर्वोक्ताः। द्विपद-योनौ लब्धाया धन व हा नामत्यवसोय(१)त्वाभि- न्यखको भवति । तदा पक्षमे (क्षिणो?) सत्त्वा भवन्ति ॥ ८३ ॥ मणुअक्खरेसु मणुआ, इत्थीए सेसएसु नायबा । हस्सस्स] रा य णिडा, सेसा ल(लुक्खा सरा सवे ॥ ८४ ॥ मनुष्याक्षरा. प्रागुक्ताः । विशेपोप५ि० ४९, पा० २]दर्शनार्थं पुनरुपन्यासः। प्रभे मनु- जाक्षरवहुले मनुजा ज्ञेयाः । के ते मनुजाक्षरा. । प्रथम-तृतीयवर्गप्रतिवद्धाः। द्वितीयवर्गाक्षर- बहुले प्रश्ने स्त्री ज्ञातव्या । इस्वस्वराः, के ते ? अ इ उ ए एते पञ्च (१) स्निग्धाः । एतद्बहुले प्रश्ने पुरुषा [आदेश्या. । शेपा• दीर्घा. सप्त स्वराः । एतद्वहुले प्रश्ने स्त्रिया(यो) वक्तव्या. ॥ ८४ ॥ खख्घ(ध ?) मादिणो य वग्गा, पंच य अणुणासिया भवे लुक्खा । णिद्धा कगादिवग्गा, तत्थ य कजं तु सयणगया(? यं) ॥ ८५ ॥ 21 ?

२
सरपारमाम निमिपमानम् । [पाप ८५-१.]
द्वितीय-अतुप पनाम-कामे ए पो ममासमा)। प्रथम-दवीयमविपी] ।
भिपरभरणारे प्रम समन्सबारे रखे पाव दरम्मम् ! हमाभरपाले प्रसे परस्यवसपने
मर्म प्राम्पम् ॥ ८५ ॥ योगा-
परजणकयं [ ५ प १] च कर्म, मुणेह सलुस्सएस(फ्सरेम) पि() ।
मिस्से पममासहियं, कम तह [पुचीमाक्य ॥ १॥
स्पाभरपाते मभ पर लगाने कार्यमा शिरमाप्रपा प्रमासमोगा पार्य-
पुषारापापम् ॥ ८॥
पतमक्सरेस पाला, मझेमु य जोवणमि घटुंता ।
मविगएस म पेरा, जीया पम्हेस णायदा ॥ ॥
अपनवभरपरे म पाग, पुरिमार) पी मसकर यति । एवोरवर्मघरे
पपिपुर पतापेर मी-में-ग(सपनि सपोपनाम्पास्मादागना मरमण).
पितपुरा पनि सम्मानि । रितीर तुर्पणाविर पनापेर मम्पमरपणा
पानि ।। ८०॥
सामा फहस्सामा, गोरी णीला य रचसामाचेवामा य)।
पद पच (५५ प २] पि बग्गा, क्मसो पईमि य विमचा ॥ ८८ ॥
प्रथमवर्ग:मा(क)मा ! जियो वा हप्तामा । उतीरो पर्ने । परों
वर्ग(ग) मा0। पामो रामः । पर्ष पाशाते प। अमसाज) मपिमध्मः । मन
मये पे [पना ] स भवति तामाप)निरप(1) मा ।। ८८ ॥
जारिसयाय) परपक्स, संजुचा तारसा सहि सामा ।
हीणा समाऽहिया पा, सेसा परपरसमजुत्ता Han
पारसः परपमा । पोऽसौ परममिदम्बा म] । सामिणः परम
सामा(भरपामा वर्ष मेऽमिदन] वारपा(माते देगा । दीमापा)
समा बतिब(1) पाते पसामिापिपा । पत्र दौमा मालिशिया, समा अमिमिया,
अपिल मा परसामनेन र पूर्वाभिदता मासिगिता [बमिमिद्य एपार ८९॥
॥ मनुप्पमकरण समपर्व समासम् ॥
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"
पस्सी दिहे सचमसरे प पम्गे य पठमए जसया ।
समसरे पकवग्गे, पलपा पसी(स्पी) णायया ॥१॥
समानता एपमा पप समर), बम्बामनिसासि पोरनी
भामरे() 1 मीरा। रनवर और पर्गमरमेन का
पोरेसमोररिगटो-मोरानजरमारिने पारणेमार बागा
सपिभोm॥१॥

प्रभव्याकरणान्य २१ [गाथा ९१-९५] नवमसरे वगंमि, तइऍ पक्खिणो तहा जलया । थलया वारस अट्ठम, सरे चउत्थे टवगंमि ॥ ९१ ॥ नवमस्वर उ(ओ)फारस्तृतीयवर्गचकारस्योपरिगतोऽप्रतो वाऽनन्तरमवस्थिते जलजा. पक्षिणो ज्ञेयाः । द्वादशमस्वरः अकारः सविसर्गः, अष्टमखरः कारश्चतुर्थवर्गः टकारः। टकारेण च स्थलजाः परिणो क्षेयाः पूर्वाधन्यायेनेति ॥ ९१ ॥ अणुणा[५० ५२, पा० सिएसु पंचसु, तीसु य धाउस्सरेसु णायचा । पक्खीओ कुकिआ खलु, वायसगिहा य चडया य ॥ ९२ ॥ रमणन म वहुले प्रश्ने पपामन्यतमे धातुस्परानयोऽन्यतमयुक्त जीवयोनी लन्धे पक्षिणी ग(हि)ता[:] भा(चा?)सादयश्चटका गृध्रा वायसाश्च शेयाः। धातुस्वराः के? उ ऊस इत्येते वयः।।९२॥ ॥ सप्रपञ्च पक्षिप्रकरणं समाप्तम् ।। ? स्वस्वरा- , स(सिं)गी कचाइबग्गे, गजा[इवग्गे चउप्पया ख(खु)रिणो । दुस्स[]सरा हु सबे, सिंगीखुरीण तु सामण्णा ॥ ९३ ॥ ककारस्य चकारस्योपरिमतो(गते)न चतुणां अस्वस्वराणामन्यतमेन तयोरेव कफकार-चकार- योरमतोवाऽवस्थितेन, ना [प० ५३, पा० १] नरा[:] शंगिणश्चतुष्पदा शेयाः । के ते इस्वस्वराः अ इ उ ए । अधरस्वरेण ऐकारेण औकारेण च युक्तस्य फकारस्य च व(च?)फारम्य या वयो(तो)- 11 ऽर्याक् स्थितयोः एकारीफारयो आरण्याः शूगिणो शेयाः । गकारस्य जकारस्योपरिगतो णामन्यतमेग(न) तयोरेव गकार-जकारयोरम(मोतो वाऽवस्थिते खुरिणच(श्व)तुप्पदा क्षेयाः। गकारे जकारे वा अधरस्वरसयुक्त बुरिणश्चतुष्पदा ज्ञेयाः । गाथयाऽनुक्तमप्येत[६] व्यारयातम ॥९॥ बितिउ(ओ) दसमो य सरो, खछादिवगंमि चेव दंतीओ। अणुणासिएसु पंचसु, णहिणो धातुस्सरेसुं च ॥ ९४ ॥ द्वितीय [प०५३, पा० २] आकारः, अ(ओ)कारो दशमः, सकार-ठ(छ)फारस्योपरि गतस्त- योरेव स-छयोरप्रतो वा व्यवस्थिते आकारे औकारे वा दन्तिनो ज्ञेयाः । डबण न मे सु(पु) पञ्चसु धातुस्वरयुक्तेपु वणनमा ना याऽप्रतोऽनन्तरमवस्थितेपु नसिन्नो(नो) शेयाः । धातु- खराः उभ।। ९४ ॥ घ झ ढे सु होइ दाढी, दंती तह वस(ध न) व हे सु णायचा । चउरट्ठमबारसमस(स्स)रो य दोण्हं पि सामन्ना ॥ ९५ ॥ घ झढा नामुपरिगते इ(ई)कारे [प०५४, पा० १] ण(ऐ)कारे सविसर्गे च(अ)कारे घझ ढा ना मनस्थितेपु वा ईकारादिपु दडि(ष्ट्रि)णः सूकरादयो द्रष्टव्याः । धन व हा नामुपरिगते(त)स्तैरेव समि(म)स्वरैरप्रतो वा व्यवस्थितैर्दन्तिनो द्रष्टव्याः । के त्रयः स्वराः १ ई.ऐ अः ॥ ९५ ॥ 15 +

अपारमाम निमिचयनम् । [पाप ९६-१..]
दिहे पठप्पयामि य, पम्हे जय दीसए उपरि मचा।
दो सिंगिणो ह मणिया, खरिणो मह मन्चया होति ॥ ५ ॥
गोर्षिकारा पाएपरिसपीपापमय पर पाया बगुमेऽपिडामा १ ५.]
गि सिरे परामणमिम्मको परिवारों का । पशुपायोन्यै उप पोपरयात्राम
यवे वरा गिलो पा । पमिष तुप्पामोये हम्मे पर बपोमात्रापास्न एसे
हरा धरिपो देपाः । दमिमेव पनुपरमोनी समेपारपास हरिमो याः। ममोपर-
परमोस्तुत्परोगपरिगवम साम(सीमोनिः । मलारमोरमोपरिसिवम मसिनोलो)
हेपा [ ५५.1 1मोधरेणापरेण पेनोधर्म नलिन मुरिम दाम्पत् । मरेपान
लम मलिन हुर्य मा पनि ॥५॥
॥ चतुष्पवप्रकरणे समाप्तम् ।।
सिंगिससा(मा ) किण्हावी, हचिदिन्ति)समा राइला(नापरा) मुणेयवा ।
सेसा तिणि वि वम्गा, वष्णतरियाण सप्पार्ण ॥ १७ ॥
पुगियोऽमिवायेमेगापोरा र चरन गया, जमरतीयाया।
पेषुपस्दिनोऽमिरवावेपेर निमाप्पाच वोपमरेपा पनि(मरी)-
- शिय मापस पात्से बान्तरको(मा) विपरवा सो सम्मा। मपाय
भपोएब ममेष एपिपिधे पाप पनि ९.॥
॥जीवधिम्ता समामा ।
मप सत्प भावधिता, सा दुषिहा होइ माणुपुपीए ।
पम्मापिम्मा [य] सहा, पम्माम्मा) लोह भलो च ॥४॥
पारिता पिता भपमानपूर्मा पापा [बमामा] । पाम्पा मोहम्मषा,
बपापा मममम्मतिम्पपा । ९८॥
कपणरयय तम, वर सीस भार कस लोहा
लोई अहलियम, प्प(पाषाण तह अप(प्पाहाणं प॥७॥
पात्र, रखवाय (ब), ५, 1 चा म्प, सौतर्ग, बार-बाप
- गरिमा मेई वा कममेवानि(मिमामेषम् । पर्णपणे ममे पाचर्म
समरिमेषम् । भरपरपुरे को गेम ए-मौसमणकोपानि ॥९॥
इहा य महिया सामरा प पम्मा इमे य लोहा प ।
प्पणा य पत्परा पुरवि महिमा व णो पम्मा ॥१॥

प्रभव्याकरणाख्य २३ [गाथा १०१-१०५] इष्टका स्यूरकर्परा, [मृत्तिका], स(श)राश्च धाम्याः । त्रीण्येतान्यपि । लोहामि(नि)। रत्नाति(नि) पाषाणा[:], पृथीवि(वी), मृत्तिका चाधाम्या धातवश्चत्वारः ॥ १० ॥ रयणा य इदंनीला, मरगय तह वेरुलीयजाजी(ती)या । अयकंत-सूरकंता, [प०५६, पा० २] चंदकंता य नायबा ॥ १०१ ।। इन्द्रनील-महानील-मरक्त-वैडूर्याः, अयस्कन्ताः, सूर्यकान्ताः, चन्द्रकान्ता घ(च) रन- । विशेषा ज्ञेयाः ॥ १०१ ॥ मोचिय-पवालमाई, भवंति एवं विहा [तहा] अन्ने । ते स्सा(सा)रा णिस्सार(रा), य होति पुण संखमादीया ॥ १०२ ॥ मौक्तिक-प्रवालाः। एवविधा[:] तथाऽन्ये सद्धादतियो (पि शंखादयो) विमलकाराव्य[:] ते सारा असार(ग)श्व । तत्रोत्तराक्षरयहुले प्रश्भे धातुयोनी लन्चे ससारा मुक्ता-प्रवालादयो ।। झेयाः। अघराक्षरबहुले प्रश्ने निःसारा विमल-सख(शतो-मु(शक्तिकपर्दकप्रभृतयः ॥ १०२ ।। सीय-दहाय[स]मुदा(दा),णदी तडागा [५०५७, पा० १]तहेव पम्मध(स्सव)णा। एककं तं दुविहं, थिरं चलं चेय नायचं ॥ १०३ ॥ सीतजला(? शीतहदा)नि समुद्रा नदी तटाकानि प्रश्र(ञ)वणमेकैकम् । तेषां द्विविधं- स्थिरं चल चेति । तत्र स्थिरमवहमशोश(पं) चोत्तराक्षरैः द्रष्टव्यम् । यद्वा वहति शुष्यति च तबल-1 मघराक्षरैर्द्रष्टव्यम् । नामाक्षरलावे(पे)न वस्तु-विचार-स्थानं सन्निघेसा(वेशा)दि ज्ञेयम् ॥ १०३ ॥ उण्हंगारा तह मोमुणा(मुम्मुरा) य अण्णा य एवमाईया । उक्का विज्जा(जू) अव(स)णी णिग्याउ(ओ) सूरकताउ ॥ १०४ ॥ उष्णा[दागाराश्च मुमु(k)रग्रहणेन फुफूलमुच्यते । एतौ च धाम्यधातुसझौ वाक्या- क्षतिप० ५७, पा० २]न्यौ। उल्का विद्युदशति(निः) निर्घातः सूर्यकान्त पञ्चैते अधाम्यघातु- 20 सब्ज्ञाः । वाक्याक्षरो(र)नामतो ज्ञेयाः ॥ १०४ ॥ एसा(गा?) पत्थरजी(जाई), से(सा) सवियप्पा पधाण अप्प(पोहाणा। सा परिकमि(म्मि)[य आपरा, णाअधं(ब) जं जहिं कमइ ॥ १०५ ॥ पापाणजातिसामान्यादेका पाषाणजातिः । सा द्विमेदा भवति । प्रधाना अप्रधानाश्च (च) । तत्र उत्तराक्षर(र.) परिकर्म(मि)ता पापाणअतिद्र(जाति)ष्टव्या। अप्रधानाश्च (घ) : अधराक्षरैः अपरिकर्म(मि?)तपापाणजातिद्र(द्र)प्टच्या। [५०५८, पा० १] अप्रधाना च । यथायोगंघ- स्तु(स्तू)पलंमः कार्यः स्वनामनि। परिकर्मिता टिकघटिवा। देशवश्च विज्ञातव्या अवत्याद्या भारता[:] क्षेत्राः । द्रोणमुखाः, के ? यत्रागम्य यानपानान(ण्य)वतिष्ठते(न्ते) ते देशा द्रोणमुखसझाकराः (समकाः)। खेटकाः, के ? उपप्रदेशवहुले भूभागे यो निवसते जनपदः स खेटकसनः । पृथिव्या एते भेदा भवन्ति । व्याख्यामि मृचिकाभेदमिति वक्ष्यमाणोपन्यासः ॥ १०५ ॥ - , - 1 जपपाडानाम मिचकाम्म । [मा १.६-११ हरियारमम्मपरलं, [ ५ ] मणसिस्सि)ला पारय प षोपा । तह वरचण्णपारदो वि य, महिपमेदा मुणेयवा ॥१६॥ परिचम्म माम् मन मि(निमा, पारपा पारव(परिप्रमे। पत्र वा नपारस इति दितीपाति नाम परमम् n.40 पहसरेहि पते, गायवा से जहा समुदिादिमा । अपरोचरफ(फोमण घ, सणामनिहोमतो यानि ॥ १॥ प्रभामरैरेलपपोच्य मेपा किया। पापा) एषा प्राम्मा)अपानवा चिरापर अमेहरा पालनामनिम इति ॥t..॥ मछठपका पनि बि य, विटे पाठमि होइ पम्मामो । अमरा हु एसे, सेसमपम्मम(फ्सोरा सवे ॥ १.cn खण्ठप भाजपमय मामेपामिन पाएनम पानुयोनी मम्मा चार- माम्बा) पापा । पापमपर रस्त पा एमन्ते। माता मानुप्रेमी सपा पप गयो पापेर पानुरपाम्प बारी १.८॥ परमकारवररसारसबारसमसरे य कण व कमगमप । पभामयसरेसं, पढमेऽणुणासिए य त १..॥ पासपोमलर बम, मामला सागुम्परा, बारा सरिसनमा मरणारा । पमरे म पातुपोन्मै ज्येषम् । वापरा) माम्मम्ममममोपनि गडोनियम पामेव बरेम नम्मेर सम्सयमा मापन्यमामरेप ऐभरेप पुणे भानुमोनो सामानम् ॥ १.१॥ पछ समयर लव एस य, रयप पीयस(स्सारसचमेमु प । मणुणासिए य विताए, रहे य सरे। ५९.. हवा सीस ॥११॥ पास पर पुष ममे पाष्ट्रपति पेरामेकाम्पमापरे वतीयलरेप परम- तरेण र मानुमोनो सम्पायर्या स्वयम्।[] पुरामम्पघमामरा- (ऐपारे प्रो अनुवासिक रितीपे पालोनी पाय परपरेप पुरे सा --६ पम् ॥ ११.n टठरलई कारस्मिम्मि) य, तप फर्स पुण तपदपपि) । पफरम मवमे य सरे, उत्प अणुणासिए भार । १११॥ पटरगमनामनामामराठे मा पनुपसरेप दुख पातुपोनो मापी गरज)- मारणम् । हवा मोमरमामा पानी परेप्रमे परम पार पठमावरे -[बालरेप पुसमारमा पर इसका मागाववनापर परेप्रमे वेगानेवाबमाबरेन मापतोष ममोमोज कुमावत बाम गरिस पोईवा HER .

२५ 8 M [गाथा ११२-११७] प्रश्नव्याकरणाख्यं हत(व)इ मकारे लोहं, दसमसरे अट्टमंमि वग्गंमि । एते उ धम्मभेया, अधम्मभेया इमे वोच्छा(च्छं) ॥ ११२ ॥ मकारेबहुले प्रश्ने शकारोऽष्टसा(मा)भर(रः) तद्बहुले च, औकारः दशमः स्वरः, तेन तु युक्त मकारे शकारे वा धा ................*न पवालं हेममातिण्णो('मोत्तियं)। कतमाण(सं मणिं चोकायं सीसट्टाणं चाय(च?) नीसासं(रं)॥ ११३ ॥ अधाम्यघातुयोनौ लब्धाया रजताक्षरा ये उक्तास्तेपु दृष्टेपु मौक्तिकं द्रष्टव्यम् । सुवर्णाक्षरा ये रक्तास्तेषु दृष्टि(दृष्टेपु?) स्वराश्च येऽमिहिता तेख(प्व)धाम्यधातुयोनौ लब्धायां प्रवालकं वक्तव्यम्। फसाक्षरा येऽमिहिता स्वरयुक्तो(का) आ(अ)धाम्यधातुयोनौ लब्धाया तेषु मणयो निसा(स्सा)रा वातव्याः । कायमादिका येस्व(प्व)क्षरेपु सीसकं द्रष्टव्यम् । तेष्वेव अधाभ्यातुयोनों लब्धायां 10 निःसा राम]मणयो वि[म]लकात्यो विज्ञातव्याः॥ ११३ ॥ [प०६१, पा० २] ॥ धातुप्रकृतिः समाप्ता॥ धम्ममि दिट्ठपुवे, [घडियम]घडियं च तत्थ णायचं । दुविहं च होइ तं पुण, णाणय अण्णाणयं चेव ॥ ११४ ॥ धाम्यधातौ दृष्टे तद् घटितमघटित चेति । यच्च घटिवं त[] द्विविधम् - केयूररूपक- 18 द्रमादि, यत्तक(यञ्च) [नाणकम्] । अनाणकम् - कुंडलनूपुररसनाकेयूरकटकादिकम् ॥ ११४ ॥ दिटुंमि णाणयंमि [५० ६२, पा० १] य, सम्मिस्सं होइ [तह य] उम्मिस्सं। इतरं पि होइ दुविहं, आहरणं भायणवि[य]प्पं ॥ ११५ ॥ अक्षरलच्यद्यातके (लब्ध्यंकिते?) नूपुरादौ नाणके । तद्व(ध) नाणक द्विविधम् - मिश्रममिश्र चेति । तत्र मिश्र सुवर्णरजवताविते (नैखिमिरिती)रेपा द्वयेन वा यत् क्रियते वन्मित्रम् ।। यत्सुवर्णेनैकेन रजतेन वा क्रियते नाणक तदमिश्रम् । सुवर्णा(प० ६२,पा० २]दिद्विविघं भांडक्ष- (कृ?)वमाभरण चेति ॥ ११५ ॥ आभरणंमि य दिटे, तं दुविहं देवमाणुसाभरणं । हिवमि(ट्ठिम)उवरिमकाए, एक्केकं तं पुणो दुविहं ॥ ११६ ॥ अक्ष[र]लामेनाभरण यद् दृष्ट तद् द्वि[वि]धमाभरण देवामरसीसातुपाहरणावाता (देवा- 8 भरण मानुपाभरण वा ।) तत् पुनर्द्विविधम् - एकैकम-अधाकाय(यि)कं उपरिकायिक चेति । तदुपरिष्टाद्वे(द्वि)शेपत[:] कथयिष्यामः ॥ ११६॥ पञ्चुय-पपुवयं(मपञ्चुय) वा, एकेकं तं पुणो दुहा होइ। पच्चोविए वि दिढे, मोत्तिय-माणिक-उम्मिस्सी ॥ ११७ ॥ मन्त्र मूलादर्श एका संपूर्णा पकिरक्षरशून्या स्थिता लभ्यतेऽतोऽस्या गाधायाष्टीफाया कियान् भागस्तपैवाने तनगापाया प्रथमः पादो विनष्ट. । आदर्श 'मोत्तिय ममाणिक मुम्मिस्सएण' इति यहुविकृतपाठो दृश्यते । नि. ० शा०४ 3 " . उपपानाम निमिपदासम् । [माग ११८-१९] परामरपमपामपिफमोपरि पिपिण्मुखम् । पुरानीम प्रतुसरा पुरिनिपम् । प्रत्युतमिति समिनिमोतिष परमपामरपमुच्यते । पूप्रेममौपिपपरपा प्रमे प्रागण्यापेनेव प्रस्तुभ देयम् ।। ११ ॥ उपरियाणवण(पणासहिया, उहा(दहा) मचाउ मा यधीसति । मामरणं माणिजा, उवरि श(सारीरमि देहिहिणं ॥ १८ ॥ ममापी परि रग्बमा बम्टे पामरणमपगम पर परम पर स्वामिति ॥ १८॥ महरामो महरेम, मचामो जारिसामों तारिसर्य । [१] सं(स) ठाणं [प]हमि य, पाउपिसेसेण माया ॥ ११९ ॥ परिषदरममे नापिकमामर मेषम् । पमरमाने ममे परिकाविमा- पर यम् । पदोमायापिम्म) मातापिष्मामरणम्, निर्यप्माणापिमा नियमापे (सापेक्षेपामापारिक प्रो परमोईमागे देर बापिसेरेपेशि ॥ १९॥ विष्ठे मणिमि पचोवियम्मि जीवन(जाती यी) हो[] इवर वा। जातीए माणिक, पत्पा. रजाती विनातीए ॥ १२ ॥ पर्मनिमिा पुरस्म पूर्णम्पपेनैव पेरम। सारा समुधागो सपना सार ममिप्रमु(सोसमामरन पम् । पैस निल)साप नियमाप पा प्रोपे साथः] मपुरखामामर पम् ॥ ११ ॥ तम्मिस पि य खापमलय(साय), तत्प[सप पुणो विवादविह। दुपयर) पउप्पर वा, दुपए पसी(क्सी) मणुस्सो वा ॥ १२१ ॥ परामर मिनि व्यवमता पति । पापपत्तपरपरेपो [ीया परते बचानमामरण गम् । पीवापर वावमामर गम् । स पापावरे। पमिनो मनुगाम रे पप्पाजीपापोती नवी यी हुरी पारे । पूवर मेमोन चम्पापेर ॥ ११ ॥ दिल चउप्पये गामवासिणो रण्मवाससि)मो देव । पती सिंगी प सुरी, गही य वाडी य वा होमा ।। १२२ ॥ चोपी के गुप्तराविमा-मामपामिनोनयपासिमम । पूमने एन्टी की हुई मी ही ति पनिमा । पूर्वोचवावेन सोमd.tr बनेपा १२१॥ पबोषिए पि विडे, जो गमठ(ओ) देवमाणुसामरणो। सो व प सपिसेसो, णाययो भायणेमु पि ॥ १२५ ॥ मलुमेऽप पेपरमधानो मामुपामा रा नामरणानि पानि मेरैषामने मावा परिचानि । मापसम्पनि पनि पानि परेचानि बोदम्पति ११३॥ .

[गाया १२४-१३०] ममव्याकरणान्य धाउस्सराणुणासी, छिद्दा णिढि(च्छि)। सेसया वण्णा । छिद्देसु जाण छिद्दे, णि(मि?)स्सेसु य खुम्मियं दी(द)वं ॥ १२४ ॥ धातुस्वरी द्वौ उकारो(र-3)कारी, पुषण न माः पश्चानुनासिकाः, छिद्रा[:] प्रधर्माप०६५,पा०२) वर्गः तृतीयवर्गधान्या(न्त्या') यागायेया(यरलषा?) यका(?) नि(ठिी)द्रा ये च दृष्टच्या[३] । द्वितीय-चतुर्थवर्गो निछिद्रो(दी) द्रष्टव्यो। छिद्राक्षरवाले प्रो छिद्रे (दो) धातुरादेश्यः । पना- 5 क्षरवहुले पन(नः), छिद्राछिद्रेपु मिश्रेषु दृष्टेषु स्युमितं धातु द्रव्यमादेश्यम ॥ १२४ ॥ || धातुयोनिः समाप्त:(प्ता)॥ 15 - रुखा(क्खा) ग(गुच्छा गुम्मा, लया य वल्ली य पचया चेव । तणा५० ६६, पा० १ वलय-हरित-ओसहि-जलरुह-कुहणा भवे मूले ॥१२५॥ पृक्ष-ग(गु)च्छन्लता-गुल्म-पल्मी(सी)-पर्वक-तृण-यलय-हरिती-पधि-जटरह-शाणा इति । मूलभेदा द्वादस(श) ॥ १२५ ॥ एगट्ठिय बहुबीया, रुक्खाणं चेव होति दो भेदा । सेसा वि ग(गु)च्छमादी, वण्णाण कमेण णायचा ॥ १२६ ॥ वत्रैकास्थि-बहुवीजाश्च द्विविधा वृक्षा भवन्ति । शेपा अपि [प• ६६,पा० २] ग(गु)च्छाद्या वर्णाकारप्रमाणादिभिरनुक्रमेण मातन्या[:] ॥ १२६ ॥ तय-मूल-कंद-साहा-पल्लव-फल-कुस(सु)ममेव णिज्जासो। रस-छीर-पसाहाओ, [य] मूलजाईअ(सु) भेयाई(१) ॥ १२७ ॥ स्वग्-मूल-स्कद(घ) शाखा-पल्टय-फल-शुसुम-धीज-रस-भेदाश्च मूल-जातिषु विज्ञेयाः । फो गुणमेदः १ । सुरभि[][प० ६७,पा० १] दुगंधिश्चेति । फो पा रसनेवा (भेदः ?) मधुर-लवण- फटुक-कपायादिलक्षणः ।। १२७ ॥ ग(गुच्छा वहुप्पयारा, कप्पास-करीर-पुप्फग(गु)च्छा य । गुम्मादिया य जाती-कुज्जय-कणवीर-वल्ली य ॥ १२८ ॥ ग(गु)च्छा बहुप्रकारा । फे ते ? फापा(प्पा)स-करीर-पुष्पग(गु)च्छाय(च) । के पुष्प- ग(गु)च्छा भण्यन्ते ? । ये पुष्प फेवल प्रय[प०६५, पा० २]च्छन्ति न व(च) फलं बंधन्ते। वन गुल्म(ल्मा) जाति(ती) कुन्जका कणवीर मल्लिका चेति ॥ १२८ ॥ चंपय-असोय-चूया, कुंदलयाओ व होति विविहाओ। तंवोल-लवलि-पिप्पलि-मिरिया वि य होति क(वोलीओ ॥ १२९ ॥ चपकासो(शो)कचूता लतासझकाः । फुधश्च लतासक्षः। ताबो(ताम्बू)ल-पिपलि-मरी- पाया घल्या:(क्ष्य:) ।। १२९ ॥ दूर्वा (दुवा)कसतृणवध्वपय(?)यवसालिकंगुगोधूमादीया । जलसंभवा य हरिया, गंधेणुयादि मुणेयवा ॥ १३० ॥ 10 २८ पपपानाम निमितमामम् । [ग्नग १५१-१५.] पूर्ण-स(स)-ब-पाप-प-सा(मावि-गु-गोषमापा उपसंहा। बसममा अपि तुमा एष । परिवसंशाम पिठापा सिकाए ॥ १५॥ मलया साहा पिडया, दलदलसरल्पम्मणा(मादीया । तिलमुग्गमापधणार ६५१ 11 याहय मो]सहिमो मुमेयवा ॥ ११ ॥ पाम(प)प पामा मापार कर-सरस्-पम्मपापा सिम्युगमापपवनपा मोर- बचः ॥ ११॥ पठम(मोप्पलकुमुवाई, मेसिवाल्कमेसिया य अलपमुमा । मोरनाणा)बिहा य मण्णा, सिंपा[उ गरलिपिष्ठि)पादीमा ॥१५॥ पपोसम्मसुमसेपासेमा! नमो(मान्य विपासामे अंग्गामापा पगा .संहमा॥१२॥ होहोति कुहणा अधीया, पसुभोरमा समबा य जे अण्णे। तत्प मुहणा (प) इयरे, भूमीरसकवली उ ॥ १५ ॥ भीमाः मानामा बासने पसरा सम्मे(10) एषा से मुति वास) मातरम, भपरेऽपि मराठमोपच पर(मुसि रस्मेति॥ इवण-घेणुय-येता सरकासयंगपागे हेणि)पा । [1] वारसविमास(पा य) मूला, कहिया जिणसासणमि समा ॥ १५ ॥ इवणरेपुषफेनसरीमंगास मम्सामि मचन्ते । पते पर(गीमा पनि पप्पुरोम्पोमवेनिस सपन इति पगमा मगन्ते । घरम(रसारिवानिमि) मूमनिम) कषितानि बिनसावा) ॥१४॥ मूला करा प तया, साह मापामाला प तह य पचफल । पुष्पाणि य [बीया णि य, मामिखा ज जाहं कमह ॥ १५५ ॥ म्भर-साप-पवार-पत्र-पा-पुप्प-पीमा[भ] [१] संमतीति । पपा पापरिणिति ॥ १५॥ मसाऽमस्सा य पुणो, मक्खा] तिचादिया य पंचारमा(सा) । गामारण्णा अल-पस्य पहाणा अप्पहाणा प ॥१५॥ भरा माण)महा(स्था) पिपिपाते। पत्र ममा(स्मासिसासम्ममा परसा। माया मारवाम। पुतिमा बममा सम्माम । प्रभामा [नमाया मेला १२५ ॥ पहफ्सरेहि पसे, णायवा से जहा समुविरशिठा । मपरपरकाकोमेणब, सणामणिदेसिमो आमि ॥१५मान ..] पना सपना चमणमाले प्रमे परमात्र बिपनाम) एपिमा सरपीरिपुम प्रामा पिपरपरे प्री एवं गोमबतमाय स्पर्ममा [गाया १३८-१४१] प्रभयाकरणाख्यं २९ नीरसाः हस्खाश्च भवन्ति । तैरेव प्रभाभ:] नाय[]शेया याप[] नामति(नि) दृष्ट इति [५०७०,पा. १] ॥ १३७॥ ॥ मूलभेदाः समाप्ताः॥ -- 14 । संजुत्ते फलभेदे, खाधण्णे रिक्वं(क्खरं?)मि णिप्पु(फोला भणिया । उवरिल्ले उवरिल्ला, अधरा [अ]धरेसु नायबा ॥ १३८ ॥ सयुक्ताक्षरवडुले प्रश्ने सफला वृक्षा मातव्याः । के ते सयुक्ताक्षराः ? यस्य च्छ हत्य । फरर ग्घ ज्झ हद भल्व इत्येते । [५०७०, पा० २] महससरंच ()तुर्भिरिभरे (:) सफला वृक्षाः । उपरिने उनरिसाक्षरैरुत्तराक्षरित्यर्थः । नरभराणामुपरिगत()()मादीनामुपरि- भागे फल इत्यादेश्यः(श्यम्)। अपरामरैः उत्तराक्षगणामुपरिगते दृष्टे वृक्षादि(दी)नामघोभागे फल वक्तव्यम् ।। १३८ ।। पढमे नवमे य सरे, क-चादिवग्गंमि चेव रुक्खाओ। वितिय-दसमे य सरे, लताओ ख छ ठ क्खरेसुं च ॥ १३९ ॥ ककार-चकारवहुले प्रभे [प०७१,पा० १] ककारस्य चकारस्योपरिगते अकारे (ओ?)कारे या अन्यवरस्याप्रतो वाऽनन्तरमवस्थिते वृक्षा शेयाः । स छठ घाले प्रों व छठा नामेकस्मिन् द्वितीयेन आकारेण दशमेन औकारेण वा युक्तेऽप्रतोवाऽनन्तरमयस्थितानामन्यतरस्य लता[:] प्रत्येतव्याः ॥ १३९॥ 15 + थ फरस एसुं वल्ली, तणं च धातुस्सराणुणासीया । चउरहमबारसमे, सरंमि ग(गुच्छा य ध झ ढे सुं ॥ १४ ॥ थ फर स(प?) [प०७१,पा० २] वहुले प्रो वल्ली। हल ण न मानरबहुले प्रश्तेपामेवान्यतमे धातुखरान्यतमयुक्त तेपामेवान्यतमव्या(स्या)प्रतो वाऽनन्तरमवस्थिते धातुस्वरे तृण शेयम् । धातुस्वराः उऊम । घझ ढ बहुले प्रश्ने घश ढा नामेकस्मिंश्चतुर्थ(र्थ)नाष्टमेन द्वादसे(शे)न वा स्वरेण युक्त घ झ ढा नामेकस्याप्रतो वाऽनन्तरमवस्थितेन ग(गु)च्छा ज्ञेयाः ॥ १४० ॥ गुम्मा य धभ व हे सुं, गज डे वलया हु णवम-तइएमुं। सत्तमसरे तह ओ[सहीओ]भणिया दव [ल] से सुं ॥ १४१ ॥ घस (भ) वह बहुले प्रश्रे गुल्मा भवति (न्ति)। गज ढ [प०७२,पा० १]बहुले प्रश्भे गजडा नामेकस्मिन्नवमस्वरेण ओकारेण तृतीयेन उकारेण वा युक्तेन ग ज डाना त्रयाणामेकस्यानतो वाऽनन्तरमवस्थितेन वलया झेयाः । घलयग्रहणे च ताल-खजू(जू)र-पूगफल-वृक्षादय उच्यन्ते। द व ल स बहुले प्रभे तेपामेवान्यतमेन सप्त[म] स्वरेण एकारेण युक्त एतेपामेवान्यतम्य(म)- स्याग्रदो वाऽनन्तरमवस्थितेन सप्तम स्वरेण औपधयः प्रत्येतन्याः ॥ १४१ ।। ॥ एवं मूलयोनिः समाप्ता॥ - . अपमानाम ममियमम् । [गामा १४५-१११] जीवपखरेमु मूल, जीष मूलपसरेपु(छ) मु(पाठेन । मुट्ठीए नायप, पातु [१] पाठसक्यारेसु च ॥ १२ ॥ मनपा पापा योनिमा मा(प्रभमे)बमुम्प। इसी प्रमेकमागलारपुष्पु जीपायय- पेमिर] टेषु संक्यापिका म्यम् । [ग]परा पेऽमिरवायपि सम्मारिनु सबै 'जीरो टेवा पावसरा पेप्रमियोपपपिसमा सो पात पम् ॥ १२॥ जीवत्सरेसु मूल, उचरसरसंजुएस मुठ्ठीए । अपर]सहिम] पाठ, जीव च समाववीहेसु ॥ १४ ॥ प्रसारमदिवा[]परतापा। मारपणे पवारात पर श्रीपा- भारत) पुष मुरी सूब उति । एवे लप पीवापरा परमार बुम मुमे पर मस्ति । कोमौरमे वो कोपरलय)। 'बाबा' स्मे । मान्ये एमाले । एष पीपामा समातीसरेण मी पौर्य मन्दि । समारीपर सपा ! पाइने तरण ॥ १५ ॥ .] महरस्सरसंजुषा, मूलं पाउस्त्र(पसारा उ मुठीए । उचरसरसंजुचे, पाठ पातुखा(पसारे ॥ १० ॥ मारवीमरा पसरसरयुष्य मुमै मूकश्च । अपरहण चार मेवे पलाए । बालम चरसरम सोबादि । चा पभोपचार "बालापा पागधारावरमाचा बाई बातोपा" पामन्दरा । मात्रा म परमपर॥१०॥ शानी ममसरेप प्रामिमा परे । [...] महरसस्सारसंयु(जाने, पाठ मूरपसरेस मुट्ठीए। उचरसहिए मूलं, जीर्ष सहाबवीहेमु ॥ १४ ॥ बारलगे। मागे । 'मायाले मानुष मारा माएको डम्ममरसतु पम् । महरा मरो पीतलमान रोपी को एमवे ॥१५॥ हिमि मामाभोमते, पाठं मूसपमरा उ सुमीर । सेसामुठ) सम्मनीचा), करमिन्ति) मूसरसर जीव ॥ ११ मूमनप मोमाजारिपुमा । म अयोमा समापिलपुमा मुपाय विरमा पा समग्रमा सरंगा यम रेमो मासिक पानमा एक पोस्) । सपिप्पा र पुसमेतत् । पातु.] और मन्मन्मतोऽस्मिर पे प्रभ्या विष पा इम्पाना मानापमयमा " .

[गाथा १४४-१५१] प्रमच्याफरणाल्यं भिपातमुद्धया(१) द्रव्यरूपसंज्ञाशानं शात्या शेपे प्रपंचधातु-धाम्यान्यविकल्पादिकः जीवोव(परत)- दवयवो वा द्विपदान्यवमस्य मूल वृक्षगुच्छगुल्मलतादिकं एवं सप्रपचं विमाय मुष्टी तयाऽऽ. देशः कार्य इति ॥ १४६ ॥ ॥ मुष्टिविभागप्रकरणं समाप्तम् ॥ दो दीह वट्टदीहा, वट्टो तंसो य वट्टदीहा वि । [भत्र भादर्भ तु 'पहो पीहो दि रासो य' एनहतो दितीयपदस्थो भएपाठो दृश्यते।] चतुरस्सो वि य वट्टो, ५० ७५, पा० १]होइ तह यायणादि(ता वि?)णि॥१४॥ अकार इकारश्च द्वी पृत्त(?)दीर्घा । आकारम ईकार द्वी [वृत्त दीर्घोउफारो वृत्तः । औ(१)कारस्यसः (रख्यमः) । एकारश्च ओकारश्च पुनही वृत्तदीर्घा । ऐकार औफारश्च दीर्घा । अंकार अः सविसर्गः दीर्घचतुरस्य (नौ) । मतातरेण धनुरावेवा (चतुरस्रावेय)। एतेपो मध्ये " यस बाहुल्य वेन सज्जानीयम् । पूर्वनिर्दिष्टा दीर्घा विशेय(याः) ।। १४७ ॥ दीह(हा) वट्टा तंसा, चतुरंसा आप(य?)दा य संठाणे । क-खमादिणो य वग्गा, मीसामीसेसु [५०७५, पा० २] नायबा ॥ १४८ ॥ फपटतपयशाः सप्त दीर्घा. । सछठथ फर पाः सप्त वृत्ताः । गजर दबलसा: सप्त त्यमा(ध्यमाः)। घझ ढ[ध] भ व हाः सप्त चतुरस्राः । सबण न मा: पंच दीर्धचतुरनाः ।। प्रश्नावराणा मध्ये यस्याक्षरवाहुल्यं भवति तेन तद्[व]स्तु निर्देशः(श्यम्) । वृत्तदीर्घाक्षरस्तु यदि बाहुल्येन दृश्यते तदा वृत्तदीर्घवस्तु निर्देश्यः(श्यम्) । एवमन्येऽपि मिश्रा ज्ञेयाः ॥ १४८ ॥ पढम-तइया य छिप०७६,पा० १Jहा, सीया यघणोसिणा अपि(वि) चउत्था। पंचमओ पुण वग्गो, होतिदोसु (उण्होछिद्दो?) या(य वा!) मीसो ॥१४९॥ प्रथमवर्गस्तृतीयवर्गश्च, एती द्वौ छिद्रो क-गादिको सी(पी)तौ च । द्वितीय-पतुर्थो । ख-पादिको घनी उप्णौ च । पञ्चमो धर्ग उष्णो घनछिद्रः । प्रश्ने एतेपां येन याहुल्यं तेन - निर्देश[:] कार्यः ॥ १४९ ॥ दो सेया धूमलओ, रत्तो चित्तो य किण्हवण्णो य । ये उ(ए ओ) य पुणो सेओ,दो नीला पीयला [प०७६, पा० २] चरिमा॥१५॥ अकार इकारश्च द्वौ स्वरौ श्वेतौ । आकारो धूम्रः। ईकारो लोहितः । उकारचित्रलः । उकारः कृष्णः । एकार ओकारश्च द्वी श्वेतौ । ऐकारो नीलः । औकारो(र.)पीत (नी)लः । एवं असा पीवी । प्रश्ने एतेषां मध्ये यदा(द)क्षरवाटुल्य भवति तेन वर्णनिर्देश[३] कार्यः ॥ १५० ॥ नीला तध पीयला य वण्णेण । कखमादीओ वग्गा, मीसा मीसेसु णायबा ॥ १५१ ॥ कादिवर्गः श्वेत्तः । खादिवर्गः कृष्णः । गादिवर्गो रक्तः। धादिवर्गों नीलः। म ण न माः पीतलाः । एतेपा यस्याक्षर पाहुप० ७७, पा० १]ल्यं प्रश्ने [वस्स वर्ण]निर्देशः कार्यः॥१५॥ सेदा किन्हा रत्ता, । अवपारनाम निमिचमायम् । [गाथा १५२-14] मुरमी मैदो सुरमि(मी), मदो मुगदुग्गोमिया तहा दोष्णि । मुरमी मदो मुरमी, [मदो] दुग्गभियो मुरमी ॥ १५२ ॥ अकारा पुरमिः । भामर परमिः । इकारा मुरमि। र सुरमि | हुपी। सारा पुरमिः । ऐकारोऽपमुरमिा । मोपण सरमिः । पौधारोप्रसारमिः । हुषित। [म सुरमिः] । प्रमामरामा मम्मे मुर्गपिसारवास्प मपति वा मुर्गा- ममारिक क्षेत्रम् । डुबारपे(पीप्य) मेष ॥ १५ ॥ मुरमी फगादिवग्गो, गगा(ग-जा)दिवग्गो य वह य नाययो । सेसा [प २] तिष्णि विषम्या, तुममपिजणा होति ॥१५॥ भार[गमावि मुरभी । पपत्र -पाति दुर्गमि । ममे पतेपी पासे - पू[] समारो देवा ।। १५५ ॥ एपस्मिना संचारभरिपोरया) सम्पमपम पारा हिस्साले । उपमा- रो पम्पा()ोपीरा [रोसा रोपवला पोलिसिया पोमानिपाता। महा ' भारतीय बबरण। मासमेन्या) मारमा ..] पोपच पुर्व प्रपमा विमापारिक सम्परा) सर्व मानवमि पग बामप ( पपपपरममावर्म- खोप पर्व पर पर। सिमेनपावधि। पोहोरमा, परम्मा एवम् । मगही [...] बालाचरा1] प्रोबर पुन ([11] पामा सप्रे बर्षपरमाधिपार मायमरना। समतुवित्वं ममासीमावापिदिपपात पापाल। पचास नगमि । मामा भारती परम्परामा मया माये मरण पान परेप। सिरप पापपयनो NO. दोपदोमायोपोगो परम्पको विदो माया पर पाषा, बीयब परेप मालमीचाहिए। भामना कपला पदारपणामला। पठमो णवमो य सरो, कगाविबम्गो य सीय समो [प] । कसमार लुक्साय घसास-मा), विविपदसम बारिस सरोपामा प्रथमसरा नमान(पागम मोकामाविष-रतपषशा पवार परसा पास)। सीरमवा मपम प्रायमरमा महरपभपमा रिटीकर .वापरा पिसम नोभा परमो समय पनि । पते साम) साम । पप- अमन प्रमे पार न पर्म वर्ष सीरवारिक पापम् ॥ १५॥ . . M [गाथा १५५-१६०] प्रश्नव्याकरणाल्यं तइओ [य] सत्तस(म)सरो, कमा(गा)दिवग्गो य मि(नि)द्धनिद्धाओ। लुक्खा उण्हा गरुया, खघा सरा य चउरट्ठमा दि(दो)णि ॥ १५५ ।। मृतीयः स्वर इकारः, सप्तम एकारः, ख(क)गादिवर्गी च द्वौ । एतेपां पाहुल्ये खिग्ध- द्रव्यमादेश्यम् । सघा]दिवर्गः, चतुर्धस्वर इकारः, अष्टम ऐकारः । एते रूक्षाः उष्णा [गुरुकाः।] एतदक्षरखरवाहुल्येन तद्भवति ॥ १५५ ।। धातुस्सरा य दोण्णि वि, पंचम(य?) अणुणासिया मउअ सीदा। वामिस्सा पुण सबे, मिस्सामिस्सा मुणेयवा ॥ १५६ ॥ धातुवरी 'उ', पश्चानुनासिकाः, मृदवः सी(शी)तलाच । सि[ग्ध लक्षाक्षरैः] नास्निग्धो न(ना)रुक्षो(अ) आदेश्यः । मृदु-कर्कसा(शा)क्षरेन(?) मृदु-फर्कसो(श) आदेश्यः । [५० ८०, पा० १] उष्ण-सी(शी)ताक्षरे[:] न उष्णो न सी(शी)त आदेश्यः । यथोकाक्षरपाइ- " ल्येनेतद् भवति ॥ १५६ ॥ तित्तो कडुय कसाओ, अंधो(वो) महुरो य आणुपुचीए । को(का)दीणं वग्गाणं, सरपरिमाणं(णो) मुणेयवो ॥ १५७ ॥ कादिवर्गो तिक्ता । गादिवर्गो(गः) फटुक: । खादिवर्गः कपायः । धादिरम्लः । सादि- वर्गो मधुरः। अनयोरानुपूर्व्या यथोक्तवर्गाऽक्षरयाहुल्ये स(स्वर)परिणामो(माणो) याच्यः । । एव वर्गाणां स्वराणां संस्थान च ॥ १५७ ॥ ॥ वर्ण-रस-गंध-स्पर्शप्रकरणं समाप्तम् ॥ बितिय चउत्थो य सरो, पढमो अणुणासिओ चषज(क ख ग)घाय। एते व(अ)ग्गेईए, अकगा........पुवदा तिण्णि ॥ १५८ ॥ 'च(क) ख ज(ग) घ ड(क)' इत्येपां पंचानां अन्यतमयाहुल्ये अ(आ)कारेण (ई)कारेण ॥ षा युक्त एते. ५० ८०, पा०२ पामग्रवो वाऽनन्तरमवस्थिते आकारेण (ई)कारेण वा अमेया(ग्या) दिशितद् वस्तु विज्ञेयम् । अकगाक्षरवाहुल्ये अकारेण इकारेण वा युक्ते]प्रो पूर्वस्यां विसि(शि) तद् वस्तु विज्ञेयम् १५८॥ टछ ड(च छ ज)श तइओ य सरो, वितिओ अणुणासिओ य जम्माए । अट्ठमसरो प(य) ट ठ ड ढ, हवंति गं(ण)कारो य णिरईए ॥ १५९ ॥ ट छ ड(च छ ज) झाश्चत्वारोऽक्षरा:, तृतीयस्वरः इकारः, द्वितीयानुनासिकश्च अ(ब) कारः । एतैः पूर्वोकन्यायेन याम्यायां दिशि तद् वस्तु विज्ञेयम् । अष्टमवर ऐकारः, व(ट) ठ ड ढा श्चत्वारोऽक्षराः, [५० ८१, पा० १ }णफारस्य(च) । एमिनैरु(न)त्यां दिसि(शि) द्रव्यं स्ये (मे)यं पूर्वोकन्यायेनेति ॥ १५९ ।। अधरेण सत्तमसरो, चउत्थ अणुणासिओ अपव(तथद)धा य । दसमसरो सप(मोकारो, अधरुत्तरतो फभ मा(प फवमा) य ॥ १६० ॥ 13 लि.भा. ५ wer अपपाइराम मिमियम् । [गाया 141-५] पपरमापति परमाबारे प्रो परोपामेषाम्पत्यमामवो भोकमरेप बुले एषामेवामपसमामो पामन्चरमपसिवेम सारेष पमिमा मिसिपि) प्रन सेयम् । पाप परममा प्रभे पोपामेबाबतममामयो माजातरमपलिम] बोपरेष पारम्बा(पम्) ॥ १५ ॥ पातुस्सा १ पा रा य स वहाहा), णायवा तह य उत्तरददिसाए। परिमो पषम्मेमो)य सरो, ईसाणीए सर पापरलाय ॥ ११ ॥ बामरी पेम, समराम प्रोमया, एमिा पूोषम्यान पचर रिधि इम्बनम् । परिमौ मना । मरमतर मोजारा। परपा (परम)म भयोमणा । एमिा पूरॊपम्पापेन पेशामा निति र्म गम् । पर्व मनाइशेषम् ॥ ११॥ ॥ द्विपपादेविलम्पस्प रिसिणिक पा प्रकरणं समाप्तम् ॥ " उत्तरसरेमु गामे, जाणे महरेस पाहिरमो [२] । उचरसरसंशु, गेहे महरक्सरेसुं च ॥ ११९ ॥ पराम्परेचरलपुणे पतिलपिन् परमाम मति प्रामे परिति अपम् । पो पाते। परामराम पूर्पोम एप । परसारमयुपूजपरेषु तु बस्मिपित पति -anासमिति पमम् । पोश पारस्पेन । सरकारसुचेमपरायन ty पतिस्ति पचति कमि[]ो क्षेत्र पूर्णोच्चारबागेम । चरमपम पूोया ॥ १२ ॥ उत्तरसरसनुचे, भहरे तं चेर होइ सपणपरे । परवग्गहए बग्गे, मसपणनमो हवा व ॥ ११ ॥ चरमरपुले नागपरे बानी परे दम्मम् । परपर पर्षे इम्म परमो - मातीमातरयम् । पारिगिपामिभिपपग्णवे नमोऽमिमन्ति । ते पर्गा [ प १] नमिाविका पूर्वोचवालोमो)मिति ॥ १५५॥ आणे सकारंय काम गरुए, अपाप्माणगेहमि ठषिययाठाषिय) या । परवग्गामिहरणं, सयणगगिरे होहोति त दम ॥ १६ ॥ तर जमगुरषीप दो महि । मानात मानि । सारे प्रमे लगो इम्पम् । परवशावमिम(मिरो बनो इम्मम् ॥१५ पढमे परमे [प] सरे, विठे पत्यू प होहोति पुरण । वितियसरे य कवग्गे, मग्गेईए हवा क्त्पू॥ १५५ ।। परेपरपरेर मा ममम् । पूपा() परमप्पेबकारण नगरोधरणसमक निसमा भाभिरमा पातमि पति परम्परे पूरबम् । विगतरे भामरेपर्गबरकोपरगम्मतो पासमान्तरमपनि पतिलपिन् प्रगट कमिएमा म्पान्यो पूनधिमरिमागेवप्रमम् ॥ १५५ ।।

प्रश्नव्याकरणाख्यं ३५ [गाथा १६६-१७०] तइए णवमे य सरे, तइए वग्गे हवइ जम्माए । ईकारेकारंमि य, चउत्थवग्गे य निरईए ॥ १६६ ॥ तृतीयवर्गश्चकार(र.), तस्योपरिगतेन तृतीयस्वरेण इकारेण णवमस[रेण] ओकारेण वा चकारस्य वाऽग्रतोऽनंतरमवस्थितेन द्वयोरन्यतरेण दृप्टेन यत्किंचित् पृच्छति तद्गृहस्याभ्यन्तरे दक्षिणस्या दिसि(शि) शेयम् । चतुर्थवर्गटकारस्योपरिगते[न] ईकारेण ए(ऐ)कारेण वा टकार- स्यापतो वाऽनन्तरमवस्थितेन स्वरद्वयस्याभ्यन्तरेण दृष्टेन यत्किंचित् पृच्छति तद्गृहस्याभ्यन्तरे नैरइस्या (नैर्ऋत्या) दिसि (शि)[प० ८४, पा० २] ज्ञेयम् ॥ १६६ ॥ एकार सत्तस(म)सरे, पंचमवग्गे य वारुणीए उ । छट्टे दसमसरे [वा], वायवाए उ णायचं ॥ १६७ ॥ एकादश स्वर: अ, सप्तम एकारः, ताभ्यां तकारयुक्तस्यापतो वाऽनन्तरमवस्थितेन 10 उभयतः स्थिताभ्यां वा वारुण्या द्रव्यं शेयम् । तथा पाठे वगै पकारे दशमखरेण युक्तेऽप्रतो वाऽनन्तरमवस्थिते वायव्या [प०८५, पा० १] दिशि द्रव्यं ज्ञेयम् ॥ १६७ ॥ पंचमरसे(सरे) य वग्गे, सत्तमए हवति सत्तमदिसाए । अट्ठमवग्गे छह, सरे य ईसाणिए जाण ॥ १६८ ॥ सप्तमवर्गस्या(स्य) यकारस्याधोगते उकारे यकारस्योपरिगते वाऽनन्तरमवस्थिते यत्किंचित् ।। पृच्छति तद् गृहस्याभ्यन्तरे सौम्यां (सौम्याया) दिशि द्रव्य ज्ञेयम् । अष्टमवर्गस्यि]सकारस्यायो गतो(ते) पष्ठस्वर ऊकारः(२)[प० ८५, पा० २] सकारस्यानन्तरमवस्थिते पृच्छकस्य तद्गृहाभ्यन्तरे ऐशान्यां दिसि(शि) द्रव्यं ज्ञेयम् ॥ १६८ ॥ अट्ठसरा आइल्ला, अट्ट य वग्गा य आणुपुबीए । इंदाणीण दिसाणं, कमसो वग्गेसु पविभत्ता ॥ १६९ ॥ उतार्थे (3)व गाथाऽनन्तरप्रपञ्चेन ॥ १६९ ॥ सो सट्ठाणाओ, सप(प्प)डिहता हवंति चउत्थाओ। उत्तर अह(हो) सवण्णा, हसंति पुत्वावरं वग्गं ॥ १७० ॥ प्रश्नाया पूर्थ(4)दिगृ(ग)क्षरसन्मित्रैः पश्चिमदिंगक्षरैस्तुल्यैर्द्वयोरपि दिशोन्म(म)ध्ये द्रव्य- मादेश्यम् । यदि पूर्व दिगा(ग)भाप०८६, पा० १ राणा बाहुल्य तदा पूर्वस्या(स्या) दिति(शि) । 25 पश्चिमदिगा(ग)क्षराणा बाहुल्य तदा पश्चिमादिक्समीपे द्रव्यमादेश्यम् । दक्षिणदिगा(ग)क्षरै- रुत्तरदिगा(ग)क्षरसन्मित्रैस्तुल्येय(ल्यै)योरपि दिशोरनयोम(म)ध्ये द्रव्यं शेयम् । दक्षिणदिग- झराणां बाहुल्ये दक्षिणदिक्समीपे द्रव्यमवतिष्ठति । पूर्व विगरैरामेयादिगक्षरैः सन्मित्रैम(म)ध्ये द्वयोरपि दिग्विद(दि)शोरन्तराले द्रव्य तिष्ठतीति वक्तव्यम् । पूर्व दिगक्षराणा बाहुल्ये पूर्वस्या विसि(शि) समीप० ८६, पा० २]पे द्रव्य तिष्ठतीति आदेश्यम् । आमेयाक्षरबाहुल्ये आमेयाया दिशि ॥ समीपे द्रव्यं तिष्ठतीति विज्ञेयम् । दक्षिणदिगा(ग)झरैरामेयाविगा(ग)क्षरमित्रैस्तुल्यैदेक्षिणस्या 20 अपपगुग्म विनिययनम् । (पा १.१-११ रिसि(लि) इम्पम् । बामेवा र यमे इम्पमारेरपम् । पापोरनकोतिलिपिरिप्रेग)- पपपपिप्पे पर बरा दम(मा) समापे इम्पमारेपम् । पपिपरिगधरेनेगलबारमि स्मबोधगोरमबोराणिमितिमोरपराठे इम्पमानित समाप... पम् । पोलोनिविरिपोम पमरापिषमा पम्ममिका(क) मा समीपे इमोगम् । पमिमरिगममममरमिरखपापोरबोरिनिगारिरिसोर्मन्ने पम्पम् । परा पोरगपोरिंगपिमिसोम []परामिला मम्ममिकता पममाः सीपे धर्मपम्। पमिमविपरमिमि) तुस्सेस्मारनपोनिविनिमोममे इम्पमारेश्यम् । साम्रप्परको समिरिसोपोमा Rसो विदो पारि ५ स्पिा पम्मपि सामन्या समीपे द्रम्पमापनम् । नगरपा(परम्पानिगमरमिरपोरिमितियोर्मध्ये मा. "शिवे इम्पमिमारेरयम् । परापोरमपोरिणिमितियोमो) पासपपिपा [...] मम्मपिक पातमा पमीपे मे मितीमारेरयम् । चनिगरपीसा(मावापरमिक उमेरमपरिमिनिममे इम्पमपरिवीनारेश्यम् । परा पोरणनयोतिलिपिरिमोसो)- [मरसो विरिपोपामाराविहार गई । परि उमासा) सत्र गम्भमाहेश्यम् । पूनिगमरसारण पामरमियरात्परमपोरिपिरिमोममे प्रमानिस पना- -गम् । बरा होरप्पमनिकिपिरिमोर्षमा निणे पिरिमो पायरिया सम्मानि तरा पमा निको गुर्म बसम्पम् । { . पूरिगपरेवासिनापरमिनुत्परमपणे गिरितिसोमम्मे ब्रम्पमारेबम् । पाइपरपस्पेरिसमा मारिया पम्मपि पहा पमा निको इममारेलम् । मनापा मम्मे परिनिविविवानिरिगवलासबो- An) || १..[] वितिय उत्पे पम्गे, समिम्मिातर-माहिरं मवे गई। भपरसरेपरस) य पावाहिया, अपरसस्सिारसताजावेमु च ॥ ११ ॥ प्रतीषवर्गा-रणा बाग [प] । एवरे मने परिपाम पम् । पर्पवर)-परमपरा रमेते धरनापा। सामने प्रशाम्मन्दरे इम देवमिति । पितीपबरपरणारे पण मरम्मतरे इर्म शेरम् । पर सरयुमिप्पिलपमेषाः ॥११॥ सगिहम्मि प ज द प पचार स भवे परोपस मा । विवाहोमि परोसरवीमि मोउ), उपमहो तिरियमागे वा ॥१२॥ नगरे (राब मासिक पास प्रम परोति बमसमिक। सभामरणोप्रो साता मानवमिति मा पापम् । सबोपदीयोक) - सापागामिला पिरोपमानिमिा विपमिदिरामम् । मायामापो. पसिना बापतमिविपापम् । पा(मामानिर्षिा परिषद को 10 पाम्बिा भियते । नसमेऽमोगा(मा) विमा पा प्रमाभिम परिवनमा पाप निस) परसदा १.५॥

4 [गाथा १७३-१७७] प्रभन्याफरणाल्य मूलस(स्स)रेसु उट्ठ(ड), अहो [य] धातुस्सरेय(सु) सन्चेसु । सेसेसु तिरि[य]भागे, गेहे दत्यं (घ) तुहि] परोक्खं ॥ १७३ ॥ मूलखराः 'ई ऐ औ' एतेषु दृष्टेपु प्रमे ऊर्द्धभागे द्रव्य तिष्ठतीलादेश्यम् । धाम्यधातु- स्वरी द्वीउ आभ्यां दृष्टाभ्या अधोमागे द्रव्य विष्ठतीत्यादेश्यम् । शेपेषु-'अ आ इ ए ओ' एपा पचाना अन्यवमाधिक्ये तिर्यग्भागे द्रव्यमवतिष्ठत इत्यादेश्यम् । स्वगृहे संचयं द्रव्यं नष्ट । तदेभिः स्वप०९१, पा० १]ज्ञा(शा)तव्यमिति ।। १७३ ।। जल देवय अग्गिख(घोरं, दिट्टे वत्थुमि ति[न्नि?] नि(ति)ट्ठाणं । लक्खेज जीव धाउं, मूलाण य तिनि(नि) वाणइ(ठाणा)इं ॥ १७४ ।। कपट त प य सा(शा)[नाम]न्यवमाधिके प्रक्षे जलगृहे द्रव्यमादेश्यम् । स छठय फर पाणा चतुर्थवर्गसंज्ञकाना चान्यतमाधिके प्रश्ने गोशालायां द्रव्यमिति शेयम् । गजड ॥ दयल सा नामन्यतमाधिके प्रथे देवगृहे द्रव्यमादेश्यम् । सबण न माधिके प्रभे अमिगृहे द्रव्यमवतिष्ठत इत्यादेश्यम् । मिश्रेषु यत्सयघिनोऽक्षरा यहव[:] तस्मिन् द्रव्यमिति क्षेयम् । जीवयोनी लब्धाया जीवो नष्टमि(ष्ट इ)त्यादेश्यः । मूलयोनी लच्धे मूलम् , धातुयोनी लब्धे धापि०९१, पा० २ तुद्रव्यम(न्यं नोप्टमित्यादेश्यम् । तच निस्वे(प्वे)व स्थानेविति नष्टिकाखगृह- काण्डम् ।। १७४ ।। छिद्दे तत्यंरिप(रत्यंतरिय), परवकु(त्यु)मणतरं घणे दिखे। जो च्चिय वत्यु निवेसे, गमओ सो चेव रत्थासु ॥ १७५ ॥ कनगादीना प्रयम-तृतीयवर्गीयाना छिद्रसज्ञकाना अन्यतमाक्षराधिके प्रने रध्यान्तरितं द्रव्यमादेश्यम् । ख-घादीना वर्गाक्षराणा धनसम् प० ९२, पा० १]काना अन्यतमाधिकाना प्रश्ने खगृहस्यानन्तर यत्परगृह विस्मिन् द्रव्यमित्यादेश्यम् । एवं [व]स्तुनिवेशविधिरुक्तः । पूर्वाss- मेयी दक्षिणे(णा) न()त्यपरा वायव्योत्तरेशानी चेति [दिक्] । यैरक्षरेग()हाभ्यन्तरे एतासु दिक्षु द्रव्यममिहत तैरेवाक्षरतेनेव प्रकारेण रथ्यास्वपि द्रष्टव्यम् ।। १७५ ॥ हस्सेसु समं ठाणं, सहावदीहा.५० ९२, पा० २]सु उण्णयं जाणे । पंचम छठे य सरे, दोसु वि ण्णि(णि)ण्णं मुणेयचं ॥ १७६ ॥ हस्वानां 'भइ ए ओ' एतेषामन्यतमाधिके प्रश्ने समस्थाने द्रव्य तिष्ठतीत्यादेश्यम् । स्वभाव- । दीर्घाणां [अ]ओ' एपामन्यतमाधिके प्रश्ने उन्नते भूभागे द्रव्यमवतिष्ठत इति वाच्यम् । पञ्चमस्वरउकारः],पष्ठस्वर सकारः, अनयोदृष्टयोनि(नि)नोनवभूमागे द्रव्य तिष्ठतीत्या- देश्यम् ॥ १७६ ॥ ततियस्सरो वि रत्थं, कवेथेि)ति जइ वंजा५०९३, पा० १Jणे य संजुनो। उत्तर-वंजणसहिते, वितिए उच्छ हवइ ठाणं ॥ १७७ ॥ s ३८ . बबपाण्याम निमितमामम् । [गापा १.८-१८२] पूतीममर ग स सम्पवमायोपरिगतो रप्पापो प्रम्पमापो। पितीपर भाभ, सोऽमिहतोपरामर(पपतमसमु रप्पागामेर म पनि ॥ १७ ॥ सषिसग्गेमु पठक, साणुस्सारेसु मघरलरठाणं । सोइय-लोउचरिय, पणफ्सरे देठल रस्से ॥ १७८ ॥ सविसर्ग: 'मबारा स रा म बम्पतमाभरपाबिच १५. वो हाते मे पापा पमपे इम्पमारेश्पम् । एकारपमोऽस्परा में पारपतमापरिगतो सपने पेनमे मा पराम चतुपरम पमिमनिग्मागे ट्रम्पमानित इमारेसम् । पनाममा 'पपरमा, पसरपममरामा पाम्पतमासे मनेगेलिमेर प्रम्पमासम् । [1] मेकिक बार समयरवनारिकम् । पवेष पसभरेपूचरमरगुतु मेको - परोपले प्रसमायम् । मेडोपरिप्रेशमिमाणपर्न पम्पम् ॥ १८ ॥ सबत्प [य] जीय-धातु-मूलाण उपसए सहारमो ठाणा । एसो य गामदरो, एसो विप याहिरो दगे ॥१९॥ सय जीव-पात-गो गोवस्तर मामो व जीप(प) पात) मुरति असममिबारामा प्रर्प इति । वा का मामे पप से पहिरम्यन्तरे प माम मोचा। रमपेनमा बरबानमुमते ॥ १७॥ ॥मधिको(का) समाप्तम् ॥ एवो(चो) विषिमागो, मुठिविसेसेण अफ्सएप्पची। गेहिरिसाएंगहरिपसाणं सूया,सोसि उवगयविसेसो ॥ १८ ॥ बवा पर विवानि[ १५. मागम मुशिनिपम प्राची मात्रामा पसूप मेसो- (ोरेम पगलसरमुत्सपियरसन वामप्पाइन मा मारियायो न वर्मका (Aala)मुपगवरिपमिति पसरस्सीमापोपामार्पमाता)। पता ममासपोगः ।।१८०n तह सरणिण्णमो वि[य], सो मावा य सबवाणं । दावचे जोए, सच वियप्पा [प १५८ ] इति इमे ॥ १८१॥ पारविमरपामारिसमो भाषामेन निनापीवमतिममायापति मन्यन्ते । समाना बमरप्रतिषमा 'गमागम-मुबान पीपिकमरप' स्पमरमनिमः । सभा- प्रमापा बन्मिापासे) कामे सप्त मेला भवन्तीति पस्पयापोपम्पासः॥ १८॥ तपा तत्- पठमो चितामेवो, सस्स प मेवा हवि मह इमे । गीवावीण लोणी, तिषिहो पठमोहमति मेवो ॥ १८२ ।।

[गाथा १८४-१८७] प्रश्नव्याकरणारयं ३९ तेषां सप्तानां भेदाना [प० ९६, पा० १] मध्ये प्रथमचि(श्चि)न्ठाभेदः। तस्य भेदा भव- न्यष्टौ वक्ष्यमाणाः । जीव-धातु-मूलाना योनिखिविधा या सा प्रथमचिन्ताभेदे पतति ॥१८२।। गुरु-लहुय अक्खराणं, संजोओ वितियओ हवंते(वति) भेदो । तितीओ पीडासद्धि(हि)ओ, ततो(त्तो) अभिघातिता तिन्नि ॥ १८३ ॥ गुरु-लघ्यभराणा सयोगो द्वितीयो भेटः। पीडाभेदस्तृतीयकः । क(फः) पुनरसी ? अघा- । (धो)मात्रा अप्रधाना येऽभिहता. रेफ-यकार-उकार-ऊकार-सहिताः । आलिंगितञ्चतुर्थः । अभि- धूमितः पचमः । दग्धः पष्ठो भेद [५० ९६, पा० २] इति ।। १८३ ।। एक्को पयडिविसेसो, सत्तमओ संकडाइ अट्ठमओ। एत्तो चिंताभेदा, पणयालीअक्खरुप(प्पण्णा ॥ १८४ ॥ एकः प्र[क]तिविशेषकः । कु(कः)पुनरसी ? जीवप्रकृति-धातुप्रकृति-मूलप्रकृति रूपः] " सप्तमो भेटः । सकट-विकटभेदा(दो)ऽष्टम उक्त एव । एते चिन्तामेदाः पचचत्वारिंशदभरप्रति- यद्धा इति ॥ १८४ ॥ ॥ चिन्ताभेदप्रकरणं समाप्तम् ।। [१० ९२, पा० १] . ३३४४७५ दुग दुग तिग तिग य चतू, चतुक्क पण पण छ सत्त वसु णवया । णामक्खराण य सरा, हवं(हों)ति आ(ओकारादिणं कमसो॥ १८५ ॥ ॥ म मा ६६ टक ए ऐ ओ भी संभ अकारो द्विसत्यः । आकारोऽप्य(पि) द्विसंख्य एव । [प०९५, पा० २] इकारस्तृ(स्त्रि)संख्यः। ईकारोऽपि (त्रि)- सख्या(ख्य) एव । उकारच(श्रतुः सख्या(ख्यः) । अकारश्वतुःसख्या(ख्य) एव । एकार[:] पञ्च- सख्या(ख्यः।) ऐकारोऽपि पश्चसख्या(ख्य) एव । ओकार[:] पट्सरया(ख्यः) । ओकार[:] सप्तसंख्या(स्यः) । अकारः स्वा(सा)नुस्वरोऽष्टसख्यो(ख्यः)। अकारः सविसर्गो नवसंख्या(ख्यः)। अकारादय[:] स्वरा द्वादश अक्षरयुक्ता [प०९८,पा० १] यथोक्तसल्या द्रष्टव्या इति ॥ १८५ ।। द्वितीयप्रकारः चउ ति ति चउक्क चउत्थ, चउ सत्त वयुहण(ट्टऽहणवयोवग्गं च । संखापरिमाणे तस(स्स)राणऽगाराइणं कमसो ॥ १८६ ॥ एगादीया पंच उ, कमादी(दि) अणुणासियावसाणाणं । कमसो णाम ए(प)माणं, पंचइ(चाण) वि आणुपुबीए ॥ १८७ ॥ ककार एकसख्या(ख्यः)। सकार[] द्विसख्या(ख्या)। गकारस्तृ(लि)संख्या(ख्यः)। धकारचतु(श्चतुः)सत्य[:] | डकार[] पश्वसख्य इति । एव क-गादि-कारपर्यवासानां क्रमसः (श.) [प० ९८,पा० २ ] सख्याऽभिहतेति ।। १८७ ॥ 23 , जपपारनाम लिमिचायनम् । [पमा १८८-१९५] जो देखिव कयग्गकमो, चावीणं सेसयाण सो घेव। पग्गाण होइ गमओ, जाव ण केण(णा)वि संजुचो ॥ १८ ॥ प पर संसं प्रति [र्गम भा), स एष भानो बमोमोशेगा। मरेपा- भरेग वा संपुच्छन्न भनमिवानो नेति ॥ १८८॥ जावतिया संजुचा, पचे पपेसिवि?) मेलिया संसा । आलिंगियाइ तचो, विमुरसेसा इवइ संसा ॥ १८९ ॥ तरेपायरेषा पु(य) वर या नमको पाऽ दरमपसिवेन का पूोपन] स संपुष पुष्प। स सेबोगो म सा सबसपमागिपति, ममिम (मि)चम्मममिन्मान, एपी परवीति । बार्जिगवामिभूमिवरपरमपम प्रोमा । बाणिवामिभूमिवामान्य मन्ने पो(प) निपते संमा पो सो(प)वपिता मिति (मि मेला भवति तथा देगा) कामगा मावे ॥१८॥ एक क] तिय तिय दुय दुय, पतु धतु पग एक सच पसरसाई । कमसो भक्खरमाणे, अबग्गजोए ककारस्स ॥ ११ ॥ एवं सपर्गेऽ क्षेबम् । एका [प] () मिका हिसाव गामा पाकम पचार) र सप्ताह मनानिमिा परी सनिसर्गाभरपर्यन्ताम्वरसमिरविवारी पाणी जपणो देमा संम्म कमेण पावर पण ति॥१५॥ एमेवा) [ 12 ] सेसाणं, साएदीदीगणुणासियायावसाणाणं। णामपमाण(ण) कमसो, उपरवठ्ठीपीए नायबोप) ॥ १९१॥ परमेष पाजामति पा गरम बापरिपत्रपेगेन संस्था वा पा • पापीमामपि बनुनासिकपर्यम्दानि(मा) अमममान मसा(6)। पो(गोचरागारम) सावम्ममिति पूर्वगामापामेष प्रसंगेनोपमिति ॥ १९॥ पो (जो) चेव[१ : १.१] कवरगामी, होति उ सौ व सेसवग्गाणं । णामपमाण(ण) गमओ, अपग्गमोएण निप्पमो ॥ १२ ॥ एष कपास कमो भावि स पापसिविला पारिमाची परवान पर- -प्रमागे गमवा वर्गयोगेर मापन विमारी सपायदान संपुष्मा च संसा सा मापासा प्रसंगेन पाम्पाचा ॥ १९५ntu जह उ अपग्गेम सम, कबग्गमादीण सपाचवम्गाणं । एवं चिय संजोमो, परोपप्पर सेसयाणं पि ॥ १५ ॥ र पापा बाप पर सहानगरपाता) यो संयोगोपा) मेर] रसलपा सरसताना अपनापति संयोगोोग १५॥ -- [गाथा-१९४-१९५] प्रश्नव्याकरणाख्यं फ का कि की | कु कू के कै को को। के का ददा दो दी। दं दा toon ८ ३. ध धा घि घी घु धू धेधे धो धी ख खा खि खी खु खू खे खै खो खौ ६ ग गा गि गी गु गू गे गै गो गाँ Gmay ) ه ) می ) م MP Get chr FADAV ग ग न ना नि नी नु नू ने नै नो नौ ११ १२ घ घा घि घी घु घृ घे घ घो घौ घं घ ६ ६ ६ रा हि ही हु | के है हो हो रह ६ प पा पिपी पु पे पै पो पो २ ६ फ फाफि फी फु फू फे फे फो फो ६ घ या विवीधु वू, वे वै वो यो .01.4 ८ व च। ९ १० भ म १० ११ म म ११ १२ २ भ भाभि भी भु भू मे भै भो भी ९ म मा मि मी मुमू मे मै मो मी ८ ५ ४ प चा चि ची चु चू चे चेची चौ च च १ १३३ छ छा छिछी छु छछे छछो छौ २ ६ ज जा जि जी जु सू जे जो जो ज ज ४ ४ झ झा झि झी मुझ. झो झो ६ ६ ५ न जामि भी छ नू नू से मैमोमो म जा ८.९ १० ११ १२ (१००) ट टा टिटी ह टे टै टो टी ट १ ठ ठाठिठी ठोठी ठ ९ ट डा डि डी ड इ डोडो य य १ (१००) य या यि यी यु यू ये ये यो यो १ र रारिरी रु रू, रे रे रो री ३ ल ला लि ली ले है लोलो ७ ₹ : ९ ८ १ ८ ८ वघा विधीयु वू वो यौ व व ८ . SGS NEW or arm 09516 sto aglo sgu waho DAG V Horospr dewr शशा शिशी مم ه ه م و به قو م م له مم س م ه م م शे शोशी To Tuto. 40475134ए 945444 weboo ढ दा ढिढी दुइवे ढो ढीट १० ११ ण णा णि गै जो णो ण णः ८.९ १० ११ १२ प पापि पी पु पू ३३ स सा सि सी सु सू पो ६ सैसो सो ९ स स + ह हा| हि ही हुई है त ता ति ती तु तू ते है तो ती त त थ था थि थी थु थ् थे थे यो यो .46 A थ थ ९ वत्र सयोगो(गे) आलिंगितामिधूमितदग्धसख्या कथ्यते-विशेषसख्या कथ्यते । विशेप- सख्यमानामा(सख्यानाम) प्रमाणमादेश्यम् । - पढमक्खरसंखाए, जाणसु णामक्खराण परिमाणं । आलिंगिाप० १०३, पा० १]याइ तत्तो, एक्कोत्तरिया हवइ हाणी ॥ १९४ ॥ प्रश्नाक्षराणा प्रथमाक्षरस्य या सख्या हस्सं(स)ति । अभिधूमिता द्वे, दग्धास्तिश्रा (नः) । संख्या इसति ॥ १९४ ।। सेसं उ णामसंखा, णिस्सेसमणंतरस्स संखाए । तत्तो नामपमाणं, पढमिल(लोकमेण णेयत्वं ॥ १९५ ॥ नि० ० गा.६ - ४९ अपपारन्यम मिचयम् । [गाय १९६-१९९] परमापरपोपरापर)मिपा(बा) झेपा समामाघरसमा मविभा(घ) पा पूर्षभरो(ण)मिपाणिन सम्स(ग) एसपि वा मा[:] पूर्वसानम्तरामिनावरापा (4) क्षेप[] मा नामसम्मा देया । सम्मामामाघरमा [...] प्रमाण अमेय मापममितुम् ॥ १९५॥ पनमो(मा) सइया संपत्करामो थोपं च ससमिछसि । वितियम्वउत्पा तेसि, विपत्करा ते य पहुसंसा ॥ १९५ ॥ प्रममा:-परवपयस्मा एवीमा-गमरममा पा संपतुति मेरम)- माणमसभापरिचाया प्र । अतस्तु तस्कार मगति । पाहे प्रक्षेपमायापर सम्पावा। रिसीपो बर्ग:-पाठपपरपा: । चतुर्षों वर्ग:-मममा परे पिपलपमठमा म प्रमाण मर्पः । अस्पफ्स मानिकपन्ति । सारे प्रमे मादी नामापरसभा बावम्पा ॥ ११५।। एस सरार्ण गममो, वग्गाण सचमठाठमाण च । विसमक्सरमागोमगार्ण, चरिमाण पोषिमा संसा ॥ १९ ॥ पप सरा विपिरिति पारससराः संपत्कराचे मानि(पी) पिमूर्वि हन्ति । मामध्यम । मामसेस्साबराल(मराम) सलो शन्दि। शेषतरा रिपलय मम्मम पपा । माघरसप्पा महवीं मंदि। भामेबार्य पूर्णानिधिति । एवं सपा । भावस्तु पंच पाये वर्ग पा | सामपर्णमामवर्गम व बर्मामा (मोम- अथर्मामे । दिपमाभराये परत पराः, गबामपालम)। परिया मार्गेण रमपम मा लम) परिमौरबमा बनोरमाससम्मायेगा ॥१९॥ जे जे जहा सपफ्सा, तेसि पोण्ड पि मेलिया संसा। अमिहयमुरा दुगुणा, काठण निदिदिसे ससा ॥ १९८ ॥ प्रमापो पोऽसरतम पे लपमा । औरमिषा प्रमापरम पत् मलापते । स चानमिवावा । मपरिवोऽम्पपहिवस्त म गोपासपोपोमिमितमोर्थ संसा बा(पामामनिया मापारंपरिप्रचा पापम्पमम् । पतन विश्यम् । पत बापा- म्- 'परमपसारमाए बामे नामताराप परिमाचे पाविपिना पजे एमपरिवारमा इमरे। पते-पत्र पसर्गनिहितो पो(s) विधिः । वारपारालपाण)। पसर्गापनादराव धोपोम [ १५.1 इति । मागनामिदिवस पसे पलायोगे संख्या नामाचप्पाममिरवा । परासपची बमियतो मरवरा सममिपावे अमिनोज- संस्पा(त्या) विमोप्प पा(पा) रिगुणीहम ना प्रमाने (वल्लमानो) मामनिया ॥१९॥ परपफ्साणं संसं, अमिड्यमुरं परोप्पर गुणए । मुष्णेण(ण) विहिर्ण, पाणं निहिसे संस ॥ १५९ ॥ परापा-मम्मीन-संप्पा विशावमा । लिमपरिमापमिति बापमसम्मा मांगी)- हरिते। परमपसमेगापितम्या । मनप्युमर) एप विपि । ममापी पोभरा 4 - - 1 , 15 [गौथा २००-२०२] प्रश्नव्याकरणाख्य ४३ योऽभिघातकः । तस्य यो व्यवहितोऽव्यवहितान्यः । अवव्यहितोकता(तोक्ता)भ्यामभिघातसु(शु)- द्धाभ्या परस्पर गुणिने(ते)ति सख्यारूपमिवोच्यते । परस्पर सख्या [याः?] एकपिंडमापाद्य दस- (शोभिर्गुणय(यि)त्वा प्रष्टुद्र(द्र)व्यसख्यानिर्देशः कार्यः ॥ १९९ ।। बहुसंख-अप्पसंखा, वट्ठ(ड)इ हाइति य अप्पसंखाओ। सोहे [प० १०६, पा० १] तु अप्पसंखं, दवाणं निद(दि)से संखं ॥ २००॥ । अथ द्रव्य अल्प[वह]सख्याया आनयनोप(पा)यः प्रकारान्तरेण कथ्यते-सकला प्रश्ना गृह्य । बहुसख्या द्वि-चतुर्थ-वर्गाभराः, अल्पसख्या प्रथम-तृतीयवर्गाक्षराः । तेपा विद्यमानाभि- घातशुद्ध(द्धा)नामवसि(शि)प्टसख्यापिंड स्थापयेत् । वहुसख्यानामपि विद्यमानाभिघातशुद्धाना सख्यापिंडमवस्थापयेत् । द्वयोरनयोः सख्यापिंडयोर्या यत्र सुद्ध्यति ता [प० १०६, पा० २] वत्र सोव(शोध)यित्वा या परिशिष्टा ना(ता) शून्येन विश्वा द्रव्यसख्या ज्ञेया ॥ २०० ।।. जह चेव दवसंखा, भणिया तह चेव कालपरिमाणं । एक्कमणसो करेज्जा, पुवाइतिउ(रिओ)वएसेणं ॥ २०१ ॥ यथैव द्रव्यसख्याऽभिहिता तथा तेनैव प्रकारेण तस्या द्रव्यसख्याया[:] कालपरिमाणं फुर्यात् । अनन्यमहानैमित्तिः(त्तिक)पूर्वाचार्योपदेशेनेति । तच्च कालपरिणाम(माण) कालप्रकरणे यथा वक्ष(क्ष्योतीति नोक्तमिहेति । अन्ये पठन्ति तहेव कालपरिमायण' यथा द्रव्यस्य कालपरिमाण उपचयापचयं वा प्रति । यथा पृष्टः(ः) {प० १०५, पा० १] आयु[:]प्रमाणमपि वक्तव्यम् । तदुच्यते-देवकी(दैविकी) प्रभा परिगृह्य मानसिं (नुपी) वा सैवाकाशप्रश्नोच्यते । प्रष्टुजर्ज)न्मकर्मनक्षत्रसख्यामभिघातशुद्धामेकत्र सपिंड्य विसो(विंशोत्तरन(श)तमध्यात्मो(च्छो)ध्यः । शेप मध्यः । परमायुरेकाते स्थाप्य .त[:] प्रत्येक गर्भरि()मसख्या मेलयित्वा । स च एकोनविंशत्तमो ग्राह्यः । प्रश्नाच प्रत्येक यो(या) यत्र 10 शुद्ध्यति ता विशोध्य यत्से(च्छे)प तत्पूर्वलब्धपरमायुम(म)ध्याच्छोध्यम् । प्रष्टना(टुर्ना)माक्षरों स्वकालरूपां गणयित्वा छो(शो)धयेत् । शेपः स्फुटः परमायुःपिंडक इति । [प० १०७, पा० २] गतकालपरिज्ञानार्थ उदयनक्षत्रसल्याभिघातशुद्धा सपिंड्यकत्र द्विगुण कुर्यादेकान्ते अवस्थाप्य ततः जन्मकर्मगौरी(क्षाद्यक्षरसख्यामभिघातरहिता सपिड्य(ड्या)नन्तर द्विगुणीकृत्य संख्या विशोध्य (१) भूय सकला नामाक्षरा सो(शो)धयित्वा शेपेण अतीतकाल इति । परमायुःपिंडाद्वि- शोध्य शेपमागा[प० १०८,पा० १]मिनी भवतीति । एव नैमित्तिकपूर्वाचार्योपदेशेनानत्यमाना (१ नायुष्यमान) फुर्यादिति ॥ २०१ ॥ तथा लेखाक्षरसख्यापरिज्ञानार्थम् - अक्खरमीसं दुग(गु)णं, वग्गेयवं सदा पयत्तेणं । पणपण्णभागसेसं, तमि गुणा म(अ)क्खरं जाणे ॥ २०२ ।। प्रश्नाक्षराणा या यस्य स्वरसख्याऽभिहिता ता सख्यां सकलामेकीकृता द्विगुण कृत्वा ततो। वर्गयित्वा प० १०८, पा० २] पृच्छा(प्रस्था)पयेत् । तस्य च पृ(प्रोस्थापितस्य द्वे क्रिये भवतः । तत्रैका लेखाक्षरसल्यापरिज्ञानक्रिया, द्वितीया च वर्गानयनक्रिया। तत्र तावले (ले)खाख(क्ष)रस्य सख्या- क्रिया भण्यते-वर्गेये(गयि)त्वाऽऽद्य स्थापित प्राकृतप्रतिरास्य(श्या!) पचपचास(श)ता भागमपहास ।

। । बपामुग्नाम निमियामम् । [गाया २.११.] सगल पत्पर मापयेत् । वर्णिम परइ नापिने पूर्णविरामवा)परसंस्था सोपविता पंचपंचामतमागावसि(सिराम पौन भिता पपपरसंम्मा मम्मम्ते । सो(सा)म्म परिवर्मनमनमियोप-पत्र पूर्वपनिदप प्रजमानित, वस पंचपंचामवा मागमपान बम) तत्पर मापपिलाऽपिरस नामि , मा(र्मागेडपावे पर)म्म ताकसाराविपरमपरमपक्षिर बपि फायतिरेप पः। या सर्व समाति तरा सरो सम्पते। बचपपरमापित पतसमापिक पर मपनि वत् सप्तमिरेड मानितम्मम् । नापोभा व सप्तामिति द्वारा समाति कमायतिरेप वर्गम । पप बामसम्माप्रमापेम बनानासारेपनियोत मतिमानिति ॥ २ ॥ ॥ इति सेम्बर्गरिकापिधारम(रे) संख्याममाण [प १ ९ पा] समाप्तम् ।। दिणपक्समाससंवस्स(डोरपामरा जे हवति बहुसला । सपापोर स[सा] गुणए, तस्स सनामा हवइ सखा ॥ २३ ॥ पापपप-रिपसाबमफरपा:-पक्षानगरपसा-मासाः। पापमपसंपत्सरा।रममन मार-मासा।। विनपपमाससंवत्सरापतमापरणा- पस प्रमेऽभिपा कोषिला पेतिर "मपिका संप्ता एप को पपयेत् । -दिवसमावणसर्गस्माधिसम्मम विसैरेपानभिषिक) मरतीति प्रमाणभपगरेका पर्व । एष पापा मासामगो संपत्सरापराना चाविषयसंम्मा पस्मेति ॥ २०१॥ सत्तम-गवमे प सरे, सुरविणे पठम-ततियवग्गे य । वितिमयमग्गे दसमे, सरे य पक्लो हमइ बहुली) ॥२४॥ उममलरेन पारेण नरममा बो) मरेप पपपपपामा गवरपर सानो परिगम बन पा मारिवेर छायो मपति । रितीयो पर्ग:-परमा, चे(वेन) गोवारे पापा बारेमा ॥ १ ॥ अहमसरमि संवत्स(प्ड)रा ह वगेम्गेि) य तह य चठत्पमि । परिमे पातुख(सोरेस य, मासा मणुणासिये य तहा ॥ २५ ॥ पापमपरामामम्बवमापिके मभेपामा ११ सरेप पेपारेष पुष, सा- पा(पवेगामम्पमापरे बसे मरे पत्र मानिने पति पिएपनि तत् 'संवत्सरेण प्राप्मच- पति परम्पम् । पमियी पनि । परिमाम्मा सलिमुह-विसर्गाम्मे, पर (कर्म) अनुनासिघरममन मा, मिर्मामासा) बाणा । पूर्पोचपापनदि ।। १ ।। पढमे य सत्तमसरे, पारियो होइ मुरपक्सस्स । कायस्सरेसु ससु, वितियादी मट्ठमी भाव ॥१॥ प्रपमलर मभरा। ममममर पारा । पदमाते मम पापल प्रतिपादि। पर पसे प्रभे रिसीया, पारपरे रतीया, गमरमा ची वारणारे पंचमी पपारापिके मी पप्रापि मममी [पभरापिरेमामी। पापम ॥२॥ .

. । 1 । [गाथा २०७-२१२] प्रश्नव्याकरणाख्यं ४५ तइए णवमे य सरे, पाडिवओ [प० ११२, पा० १] होइ सुक्कपक्खस्स । गायक्खरेसु सत्तसु, णवमादी पुण्णिमा जाव ॥ २०७॥ तृतीयस्वर इकारः, नवमस्वर ओकारः। एतद्बहुले शुक्लपक्षस्य प्रतिपदा भवति । गकारवहुले प्रश्ने नवमी । जकारवहुले दशमी । डकारवहुले एकादसी(शी) । दकाराधिक्ये द्वादशी । धकारा- धिके त्रयोदशी । लकाराधिके [प० ११२, पा० २] चतुर्दशी । सकारवहुले पूर्णमासी ।। २०७॥ । अट्ठम-बितिए य सरे, पाडिवओ होइ किण्हपक्खस्स । खादक्खरेसु सत्तसु, वितियादी अट्ठमी जाव ॥ २०८ ।। द्वितीयखर आकार' । अष्टमस्वर ऐकारः । एतद्वहुले प्रश्ने कृष्णपक्षस्य प्रतिपद् भवति । सकाराधिके द्वितीया। छकाराधिके तृतीया । ठकाराधिके चतुर्थी । थकाराधिके पचमी ।। फकाराधिके पष्ठी । रकाराधिके सप्तमी । पकाराधिके अष्टमी । तस्यैव कृष्णपक्षस्य ॥ २०८।। दसम-चउत्थे य सरे, निदि(दि)४ तह य कण्हपाडिवओ। घादक्खरेसु सत्तसु, णवमादी [१० ११३, पा० १] सोलसी जाव ॥ २०९ ॥ दशमस्वर औकार । चतुर्थ स्वर ईकार. । एतदधिके प्रश्ने कृष्णपक्षप्रतिपद् भवति । धकारबहुले नवमी। कारबहुले दशमी। ढकारबहुले एकादशी ।धकाराधिके द्वादशी। भकाराधिके त्रयोदशी ( वकाराधिके चतुर्दशी । हकाराधिके अमावास्या । एतास्तस्यैव कृष्णपक्षस्य ॥२०९॥ पंचमवग्गे पंचम-सरे [य] एकादसी तहा होइ । अणुणासिएसु दोसु वि, सेसा तिहिणो य चत्तारि ॥ २१०. ॥.. पंचमो द्विस्वभाव । अतः उभयपक्षस्यापि शुक्क-कृष्णाल्यस्य ग्राहको भवतीति । पचमः घर्गप्रतिबद्ध उकारस्त[प० ११३, पा० २ वहुले प्रश्ने उभयपक्षस्यापि पचमी । औकाराधिके पष्ठी। डकाराधिके सप्तमी। नकाराधिके अष्टमी । णकाराधिके नवमी । नकाराधिके दशमी।। मकारवहुले एकादशी। अकारः सानुस्वार', तदधिके प्रश्ने द्वादशी च त्रयोदशी। अकार: सविसर्गः, तहहुले प्रक्षे चतुर्दशी पचदशी चेति । एताखिवर्गा द्विस्वभावत्ता(त्वा)दभराणां पक्ष- द्वयस्य विज्ञेयाः॥ २१० ॥ वितिया अणुणासाई, एवं तिहिणो कमेण चत्तारि । दिटुंमि कण्हपक्खे, एव तिहिणो य(प)विभागो य ॥ २११- ॥ उक्तार्थ वा अतिदेशार्थकारिका । पूर्वार्द्धदृष्टे च कृष्णपक्षे शुक्लपक्षे च । एवमुक्तन्यायेन; तिथीना प्रविभागः कर्तव्यः ।। २११ ॥ सवत्स(च्छोरंमि दिट्टे, वितिए वग्गंमि [प० ११४, पा० २] जाण हेमंत(त)। तइयंमि गिम्हकालं, चडले(चउत्थए) पाउसं जाण ॥ २१२ ॥ सवत्सराक्षरे प्रश्नाक्षराणामादौ दृष्टे द्वितीयवर्गाक्षरे च तस्यानन्तर अग्रतो दृष्टे हेमतकालो। भ्रष्टव्यः । सवत्सराक्षराः- घ झ ढ ध म व हाः, द्वितीयवर्गाक्षराञ्च-ख छ ठ थ फरपाः । वस्य T

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परपारमाम लिमिषनामम् । [गामा १५-२१५
संबरसम्मरल ममापरापामारोमितम परागवारपसा नामम्ममाघरोऽन्तरमेवामयो
एप्ते पर मीका वारेश्या । वस संपत्सरापरम भारो शिवसमा परमपए
मामम्पमापरोते वा प्रावरणमे पामः ॥ २१ ॥
पचमयंमि य परिसा, पसतकाल च फ्लमकादीम् ।
मायक्सरेमु पचम, सरमो सेसेसु चरठ) पि ॥ २१५ ॥
समेष संवत्सएपरमा, ममापप्पामापस [ १५.पा ममममा नापबत-
मापये परमातरमैषामो पपवे परा पर्मानम्मे(स)। मेष संपत्सयमरण प्रमाणा-
मापस पप हमेवे पनामा म नान्तरमेवामदो सपो तरा पससमोर)
पोपः वनेष संवत्सयभरम प्रभावबएपामापन परमा(ut) इमेवेषा भनु पिर
- मयो म पम्मा पार-सापाभराम्ा परा मपपपंचो मसलन गमते
समेत गम्यम् । पापाsim)रमेवाबवमायरो एते ना सरत्यास
बारेमा। पौष-मामी हेमन्तः । फागुम्नौ पसन्वा । पैसा-रेजी मीमा । मापार-बारको
प्रास्ट्मासः । माइपर-भगो बसा। परिक-मानी परन् । पर्षकमा । गापा
भानुमेयवा पमा प्रयोग ॥ ११५ ।।
पढमरस पठमताइए, फम्गू चिचो य दो पाई।
दोस(म) य कषियमासो, मम्गसिरो दोमु परिमेम ॥ २१ ॥
प्रथमवर्गम प्रथम-ीवीब-तीये [+ HTR] -पपगुमा। प्रभारी मग
सिमि(जलपरमपरोसना पापी माघाभरानामनवमोचा पवे वा भनो मामा ।
पर मेन बार-समग सभा-समर्षिक । पस(स) मार्गशीपा ॥ १४ ॥
एमेव सेसपाण, दुषम्गाण पथ परो(त्या) य ।
मासम्सरा उपमसो, पोसावी जाव मस्सजुजोरजो) ॥ २१५ ॥
भाऐ पोगा। पर माप: । बोगमायाकामसमे।
पोपहर बा। मपरायणः । [" प.] एपम माइप। मम
मा नमध।। या पौरामिरगुबपवसा[] मिधि । हा परगौमरा पत्थर
बजाय । परमोमममममा मासामा मासामा संवत्सयारावामुमार
गवा ममयो कामपलिवामा पनि । मेवेषु वर्गापरा मासामरा मपन्धि । मोपरेका
कार्यावरगमाधापरम्प चित, समामि पम भाइपरमा। एवं मारमा all
बनेन ममामा माम-पममापमा वाषितमरण-नामावरित समय
सपा प्रतापमानापा मुसमारिन लिमिचेचवान(पवेति ॥ २१॥
काकरण समाप्तम्।
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छामयिछिमस्स छाम, पदिख जा उचरा हु अपमिहया ।
महरेस णपि माहो, ने वि[म महाहरा पटरो ॥ २१ ॥

10 - [गाथा २१७-२२१] प्रभन्याकरणाख्यं [प० ११८,पा० १] अनभिहतोत्तराभरवहुले प्रश्ने प्राला(ला)भ आदेश्यः । अधराक्षराधिके नास्ति लाभः। येऽपि चाधराधरा[:] चत्वारः स्वराः प्रागुक्का[:] तेऽप्यलाभकराः। 'आईऐ औ' एतेष्वधिकेषु लाभो नास्तीति ॥ २१६ ॥ लव्भइ लहं(हुं) सजोणुत्तरेसु[प]रजोणि उत्तरे लाभं । लब्भइ विलंबियकाले, सपरिकेकि)सं [१० ११८, पा० २] अहएसु ॥२१७॥ : उत्तरजीवाक्षरवहुले प्रश्ने अभिप्रेतमर्थ(थ) क्षिप्रं लभते स्वजना[त् ], तैरेव जीवाक्षरै- रधिकेपु प्रश्ने उत्तरधात्वक्षरमिश्रेषु उत्तरमूलाक्षरमिश्रेपु वा परश(स)काशाल्लाभो वाच्य(च्यः) । एपामेव जीवधातु-मूलाक्षरा[णा]मुत्तराणामधिकाना आलिंगिताभिधूमितानां चिरात् परिछेशेन वाऽभिप्रेतार्थमर्थ प्राप्नोति । यतः कृ(कु)तश्चिद(द)ग्धेनैवास्ति लाभ इति ॥ २१७ ॥ जह चेव य अभिघाते, तह चेव य उत्तराहरेसु पि । धातुस्सरा य चरिमा, [प० ११९, पा० १] सभावदीहा य अहरहरा ॥२१८॥ शुभाशुभ पृच्छतः अभिघातरा(ता)लिंगिताभिधूमितदग्धलक्षण उत्तराक्षरेणाधरेण आलिं- गितो(त) उत्कृष्टात् सकाशादल्पच्छेशो भवति । प्रवः उत्तराक्षरेणाधरो(रा)क्षरेणाभिधूमिते सत्यु- त्कृष्टात् सकाशान्मध्यमच्छेशो भवति । प्रष्टुः उत्तराक्षरेणाधरो(रा)मरे दग्घे सत्युत्कृष्टात् सकाशान्म- हाळेशो भवति । अधराक्षरेणोत्तराक्षरे आलिंगिते धर्मादल्पदुःखमवाप्नोति । अधराक्षरेणोत्तराझरे । अभिधूमिते धर्म(र्मात् ?)मध्यम दुःखमवा[प० ११९, पा० २]प्नोति । अधराक्षरेण उत्तराक्षरे दग्धे धर्मान्मह[]दुःखमवाप्नोति । एव शुभाशुभ पृच्छतो वाच्यम् । धातुखरौ द्वौ 'उ', चरिमौ 'अ अ.', डब ण न माः । स्वभावदीर्घात्रयः खराः 'ई ऐ औ' । इत्येतेपा मध्ये ई औ' अघराघरो(रौ) चतुर्थवर्गप्रतिवद्धत्वात् । एते दाह्या दहन्ति, न लामं कुर्वन्यधिकाः प्रश्ने । दाय(या)श्च पूर्वोक्ता एव ।। २१८ ।। अहरेसु अत्थि लाहो, जइ उत्तरवंजणेण अणुवलिओ। अहरबलाणुबलेणं, पुणो(?) भणिज्ज लाभं तु णत्थि त्ति ॥ २१९ ।। अह(ध)रेपु लाभः प्रतिवद्धः अपि वादार्थ भवत्यधरेपु लाभो याप० १२०, पा० १]त्तरे- ध्वनुवलिता भवन्ति । यदा त्वधराः अधरानुवलास्ता(स्त)दा नास्त्येव लाभ इति ।। २१९ ॥ जइ अक्खरअणभिहया, पण्हे दंसीति उत्तरा लहुआ। तो भणसु रायलाभं, अहराहरसंजुए णत्थि ॥ २२० ॥ प्रश्नाया उत्तराः लघवः जीवाक्षराः अनभिहता शुद्धा यदा वहवा, वदा क्षत्रियस्य राज्यार्थिनो राज्यलाभः। शेषवर्णाना यथास्वमर्थलाभो वाच्यः । योनिधि(वि)शेपाचाक्षराणां तथा देश्यम् । 'अधराधर' इति अधरैः अधरस्वरयुक्तैर्नास्ति लाभ इति प्रागुक्तमेवेति ॥ २२०॥ लाभमि पढमदिट्टे, [प० १२०, पा० २] तिविहं कालं तु निदिसे तस्स । अतिगतमेस्सं वट्टन्त पंचवग्गाणुमाणेणं ॥ २२१ ॥ लाभाधिकार एवायम् - लाभे प्रथम दृष्टे तृ(त्रि)विधे कालमतीतमनागत वर्तमान च। वर्गाणा परिणामेन निर्दिशेदित्येतत्सूत्रमुपरि गाथा(थ)या व्याख्यास्यति ।। २२१ ।। । - 20 25 .

अपपासनाम मिमिचत्रामम् । [गामा २२२-२२६] पठमतइया हु बग्गा, घट्टते बितईपियई)ो भईभमि । सेसा दोनि वि बग्गा, कालमि अगामियय आगमि)रसमि ॥ २२२॥ ममममर्गापन पदयपपमा माम, वतीयसक्षम मापा सा नाम, बम्बमारिकममे पर्वमानकामगरकारितीवर्गासपोपहप फरपा बायन समापि भतीवमध्यमगणा मेपवर्गमपा पापमपरा माम रममनमा चाक समाविक मविप्पताम्मपगम। पात पर्तमानामपिरे प्रभे मग मानकायोलि) भमा । बीवास पर मझे बासीग(वीवा)मा । भनिभाता- मपि प्रम माविम्पतिमा || R९३ ॥ जा अस्स पुषमणिया, जोणी तस्सस्सराइ रूपसेवा । तस्सेव पवे लाम, वा पापिय गिरिसे वेर्ण ॥ २२३ ॥ बा पम्म पीपातमूगना पोनिरा पमापिरिपारा पो (पने।) महापना यो पापीमामा भाषिन मन परा पीप जम्पर इति [.११. शमा)प्यम् । पर पप्पास बा नपरामुमानेन पूचाममैव बबम् । परे पातालपण पा पारन] वा पातुं प्राप्स(मोवीति प्रपा(पा)मा मा भूमभिका पाा मूगफ . मबापोतीति पल्मम् २२३ ।। सरा बचप इति गावापरेमार- पहासरेस पामो, जारिसओ उदिसिज जीवाई। सारिसमस म लामो, पायाति य [ 10 ] मिदिसे तेण ॥२२०n पप गाबा ॥ २२ ॥ पठमाइ पमणाणं, धीमो मग्गो हवाइ वेसाणं । तइमो य सपियाण, साणं सेसया दोणि ॥ २१५ ॥ प्रपमधषी पापमयमा भारतमाथि प्रो समयसप्रवासमोसम) भोपारिवीयर्गावण्या यापपरपाम्पसमापियो मेरमामय)मोबचम्पा । पीरवर्गामण] गमापासा बामनवमाथि प्रने भनियम(ग)मो पम्पा । मेष पोसामा पाने का मूहात गमो रकम [ 0 पल । रम पनमा [भ] मम्मवमबहुते संभागातीयाममाति। अस्प वीणा जप सम्मम् ॥ २२५॥ अयप्पोवि यणमिया, पण्णिया (ग्गियीवरगाणा सिबमासजुचा । ममियपरसंजुचा, णीया (गय) हीणाहियसमा मणिया ॥ २२० ।। अनमिया सरपणापा पापये मातिाको प्रमाविममो भगति । पर पाहतारममिमन्विारपनसम्मपरित। परमपरागसमे - - .

- 1 - [गाथा २२७-२३० प्रभव्याकरणाख्य ४९ रुपरिगतैभर्भ)यति । स्व[व]र्गसयोगः । तद्वहुले प्रश्ने लाभो भवति । ये परस्परमभिन्नंति । स चाभि[प० १२३, पा० २]घातत्रिविधः । आलिंगितादिकः पूर्वोक्तः । योऽसौ नता तमिघातेन धम्मा(र्गाः १) कदाचित्संख्यया हीना[:] कदाचिर(द)धिका[:] कदाचित्समा भवति(न्ति) । एकै- (ते ?)न अमिम(ह)न्यते(?) । हीने(?) फललाभ[:] प्रश्ने समे ईपत्फल भवति । दृष्टैरधिकैख(च) फलाभावः । एवमेति(मिः) शुद्धशेषैः शुभाशुभमध्यमादेश्यम् ।। २२६ ।। पढम-तइज्ज(जे) वग्गे, होइ [५० १२४, पा० १] सुही दुक्खिओं वी[य]-चउत्थे। पंचमए पुण वग्गे, सुह-दुक्खे(क्वं) मज्झिमं तस्स ॥ २२७ ॥ प्रथमवर्ग:-क च ट त प य शाः। तृतीयो वर्ग:-जडद घल साः। एपामक्षराणां बाहुल्ये सुखविवक्षायां प्रष्टुः] सुखलाभो भविष्यति सुखावान्ति(मि)रित्यर्थः । द्वितीयवर्ग:-खछठ थ फर याः । चतुर्थों-घ झढ म यहाः।रे(ए)तेषा अक्षराणां वाहुल्ये प्रष्ट्रादु(ष्टुरु)त्पातो [प० १२४, पा० २] ॥ ज्ञेयः । दु(उ)त्पा[ता]गमो वा भविष्यतीति । पंचमवर्गो-हमण न माः । तेषु च [सुख दुःख मध्यममयामोति । एवमसौ सुख-दुःखी (खानि ?) वा तत्राप्ये(मो)ति येव(एवं) वाच्यम् ॥२२॥ चीय-चउत्था वग्गा, दिहा इच्छंति सुबहु आउं [च] । पंचमओ पुण वग्गो, ममि(झि)मआउं सया इच्छे ॥ २२८ ॥ द्वितीयवर्ग:-स छ ठ थ फर पाः । चतुर्थः-घ अढ (प० १२५, पा० १]म व हाः। एतेपाम- । क्षराणा बाहुल्ये आयु[:] पृच्छत्तः, आयुः] प्रच्छु(भू)त वक्तव्यम् । फल लामादिकं पृच्छति(तः) अल्पं बक्तव्यम् । पचमवर्गाक्षराणा] - ढमण न मा ना बाहुल्ये मध्यमायुः पृच्छकस्य, लामप्रमे मध्यमो लामो बाच्यः ।। २२८ ।। उत्तरसरसंयु(जु)त्ता, सचे अप्पाउआ फलमुवेति । [५० १२५, पा० २] अहरस्सरसंजुत्ता, तुह (सुबहुं) इ(य)च्छंति ते आउं ।। २२९ ॥ उत्तरखराः पूर्वोत्तास्तैः सयुक्ता उत्तरामराः प्रथम-तृतीयवर्गीयाः । तद्यहुले प्रश्ने यदि लाभादिकं फल पृच्छति तेषां अभूतं फल भयति । येऽप्यायुः पृच्छति तेपामल्पमायुर्भवति(ती)- यादेश्यम् । त एवाधिका उत्तराभरा अधरखरयुक्ता आयु प्रने प्रमूतमायुः प्रयच्छति । फल- प्रश्ने फल चाल्प लाभादिकमिति ॥ २२९ ।। अहव विसण्णो आयुमि होइ सुद्धेसु काइमाईसु । सत्ताह मेसममा(वसा?)दि सरसंजुत्तेसु विवज्जासो । २३० ॥ पचवर्गन्यायेन स(सा)मान्यतः फल पृच्छक्रस्यायु[५० १२६,पा० १ चोक्तम्] । अष्ट- वर्गन्यायेन लममुत्पाद्य आयुर्विमागो नष्टविभागो नष्टजातकमिति वक्तव्यमिति । फाधादि- सप्तवर्गेपुशुद्धेपु मेपादिराशयः । सप्त कथ। प्रभाक्षरं गृह्य आद्यक्षर यक्त्वा द्वितीये 'कच ट त प य शा'चा(दि)वर्गाक्षराणा वर्गान्यतमं शुद्धमात्रारहित यद् वर्गमध्य याति दृष्टं स रासि(शि)-म रुदयादिः । तत्र च वर्गे यदि (यती)मो वर्ण[:] तति लिप्ता(कला?) शोध्या। पडस(श)को वर्णःवर्णे: पटूला। सो(शो)ध्याः।मुन्यमानस्य वर्णप्रमाणेन पदलाः शोध्याः 1 पई(प्टवी)र्गल पंचनो रेफः, स- W नि. शा० ७ पबपाग्नाम निमितमामम् । [गया ११२] [समवर्गम भरा, पपवर मामिभरिमा । पोसपा संवर सन्ति । पर्व सरगुण मापंमागेन [वि.] पयोदामा । पर्व वर्ग)मा म मनावर सत्तापते । तता सिरपपिम्सचाताप परम भरा गुपीममामामामा मनवा पपसंसानिमा गुम्म मात्र प्रतापवारिप ११४ पमिसिरपसि(क) बाप्प प्रमागतम्माजान] विशोष उपमार्ग परगर्मेप कारिगुपेस मम्मे पन्ने साप्प रूपमे पांमनो पमानाप्य परिपोरं पाणलाप, परिवरातिसम- निमिगुमे तेव भागोपरि राग पानि पनि । र्ष सगुण समाप पा] वापरागर्माम विगाति । परमरवर्गगुने पसिना । एतापनिकष माप पारगर्मगुपाशिसोप प्रमान पबम-समाम-दतीगावर -दिमावा)प वात्वागिण पम् । बिसोपा मार्ग पे नाप-तपावे पमर्गक्षेपोपपदो पा दतीबरसा(मा)मा भपकपरतपयम वर्ग भोप पाउम(पनीमा । एपमानस्मा रापधि (बि)मित्तपत । पापमय) पर्या पात्यापि १४)स पमपमान एमसिन्नि) प्रधिप्पन्चे या पार्षदेपारमोऽवसापापोषम (स्वपि मम पानो यो पा। पर्व जमातीचा पा सुटा । भागामिकामग्रिामा प एषा बति(वीवभा, • पपगुणामण, गर्मारिसो(पोप पनि । साली परमापाप(वी) सा(ज) विमापा- सा(म) पाव वापति(ती) सामिषु पामा । [१ १९८ स ह क्षेपमामेर- परिस(गाव सवयोगे (प) ममिति (1) ॥१३. ।। मामि जो वियप्पो, काले देसे य होइ सोधे । मणुणासिया म सबे, परिमा सेसा समा मणिया ॥ २१ ॥ मादुपित मोऽमिरिता स पर कामे मारापौररिकी निर्ममाति पउन । पपपपरचमानलपारि hि रेप मामठीति प्रय पायासो(पो) माम-पिपारिम्पपा मामानिमम ममो मरवाति मने चरामौकि मा पिम] भषयपरमोचयनुपहिये। [18रेष ममः | अपरामरे मापिकवि मा । बहुनासिकम्मरमसंवा मो ममा बमोनिगुस्प इति पर ॥ वामगरिकामकरण समाप्तम् ॥ . इसतहोय-परमेसु य जलं, पीय-वस्त्येसु मप्पपाणीयं । पचमए पुण वमो, णत्यि जलं व णाम ॥ २२२॥ भबमवर्ग-वीपपर्यापयति म प्रति सम्पापम् । वा माषा [] मर्गप्रति- जापामिरपेषमेति ॥ २१॥ पदम-तइएस [पर मा, पिसिए मम्मा उ सस्ससपची। पठ-पंचमए मायरिए () गत्पि सस्स (ति) जाणेजा ॥ २५ ॥ .

[गाथा २३४-२३९] प्रश्नव्याकरणाख्य प्रथम-तृतीय[प० १२९, पा० २]वर्गाक्षराधिके सस्यनिष्पत्तिः उत्कृष्टा । द्वितीयवर्गाक्ष- राधिके मध्यमा सस्यनिष्पत्तिः । चतुर्थवर्गाक्षराधिके स्तोकं निप्पद्यते । पचमवर्गाक्षराधिके स्तोक- मपि नास्ति सस्यम् ।। २३३ ॥ पढम-तइयंमि वग्गे, सइत्तणं तह य वीयए असई । चउत्थ-पंचमए वग्गंमि(ग्गे) णत्थि सइ चिय णायवा ॥ २३४ ॥ प्रथम-तृतीयवर्गाक्षराधिके प्रश्न महती सती ज्ञेया। द्वितीयवर्गाक्षराधिके प्रभे मध्यमा सती शेया । चतुर्थ-पचमवर्गाक्षराधिके प्रश्ने सतीरेव नास्तीति निष्पत्त्यभावात् ॥ २३४ ॥ ॥ वर्गस्य [प० १३०, पा० १] गंडिका समाप्ता॥ , आदा पुस्सो [य] महा, हत्थो चित्ता तहेव [साई य] । जिट्ठा [मूलो एए, इ(दु)अक्खरा अट्ठ नक्खत्ता ॥ २३५ ॥ आ-पुष्य-मघा-हस्त-चित्रा-स्वाति-ज्येष्ठा-मूला अष्टौ रे(स्य)क्षराणि नक्षत्राणि ज्ञातन्यानि ॥ अस्सिणि भरणि तह(य) कित्तिय, रोहिणि फणिदेवया विसाहा य । रेवय सवण धणिट्ठा, तिअक(क्ख)रा णव उ नक्खत्ता ॥ २३६ ॥ अश्विनी-भरणि-कृत्तिका-रोहिणी-अश्लेपा[विशाखा]-प्रवण-धरि(नि)ष्ठा-रेवत्य इति नव- नक्षत्राणि अ(व्य)मराणीति ।। २३६ ॥[प० १३०, पा०२] मिगसिर पुणव(ब)सु विन्नि, पुवासाढाणुराधजलदेवा । एए पंच वि (रि)क्खा, चउरक्खरनामया भणिया ॥ २३७ ॥ मृगसि(शि)रः पुनर्वसुः पूर्वापाढा अनुराधा शतभिषा एतानि पच नक्षत्राणि [चतुर- क्षरनामकानि भणितानी]ति ॥ २३७ ।। भृगदेवा दगदेवा, रिक्खा पंचक्खरा दुवे एते । अष्ट(ज)म-विस्सा छकं, सत्तक्खवि(रि)याहिबुद्धी(वन्धु')या ॥ २३८ ॥ पूर्वाफाल्गुनी उत्तरापाढा द्वे एते उभाव(भेs)पि पचाक्षरी(२) । अर्यमदेवता-उत्तराफाल्गुनी, विश्वदेवता-पूर्वाभाद्रपदी एतौ पडक्षरौ । अहियन्धुः उत्तराभाद्रपदा सप्ताक्षरा ॥ २३८ ।। दोक्खरमादीणं, णक्खत्तग(चा!)णं [कमेण ] ठाउं । पण्हाइमसंखाए, [५० १३१, पा० १] णक्खत्तगणं वियाणाहि ॥ २३९ ।। ट्यक्षरादीना नक्षत्राणा सरा(प्ता)भरपर्यन्ताना क्रमेण स्थापयित्वा प्रश्नाक्षराणां आद्यक्षर- सख्ययाऽमिघावशुद्धा नक्षत्रगणमध्या नक्षत्रगण जानीहि । यक्षर व्यभर चतुरक्षरं पंचाक्षर पडक्षर सप्ताक्षर चेति ॥ २३९ ॥ १०गण ठावे घेउये' इति भादर्श भ्रष्टपाट 1 , M ६२ घरपालुम्माम निमिपमामम् । [गया.-] अपरुचरकमेण, पप्छा अहवरेण सहाणं । णादणाणी) सवणाम, जाणेजा णामकरणाण ॥ २४ ॥ बगारमा चरा अपुच्छ एव । प्रमामयमामापपलियो विम) पपरमयरमा) सम्मान) मध हेरम् । प्रमापरणाग्य(मादिमिदेस मपरामरेप पास ममत्रोम्। [11] प्रमामया(पमामा पूरिन] क्रमेण पर्गमानार देपामुत्तरापरे पपप समाते । परापौरपयाण पम्प प्रतिमा अपाते। पोगोरिति । बस एप पररासिलिपि मा ।। २१० ॥ ॥ नमनगरिया समाप्ता । . - तिहि उत्तरेहि वग्ग, उचरवग्गेस (१ १२२,प 1] फठमयं लहइ । विहि अपरेहि अपर, अपरेसुम पतिजयं लहइ ॥ २११ ॥ ममापयमामाती परापोऽसरा चरा माणामिरमिरवा (माचाररिया) बसनुभ अपमिश्वास मत पापा बबा[Rato) सभात्मीय वर्ग समते । ममायरामामाती पाप्रमोऽमरा भरा मात्राररिया [v] बसेबुपा भनमिवाम पति वा देवी पत्तीपोरा [स] बामौर्य वर्ग मम ।। २०१॥ उमएसे दो दोणि मि एफे पठस्कय सहा । वामिस्सेम बि एक, परिमेसु भणतर लहड् ॥ २४२ ॥ प्रमाणपपामारी पौ चयम भवता मानाने बस अपमिरर सौ(स) जोधपति ममे मामी वर्ग [ ] मते । प्रनामप्पामापौ परा पण मागतो वसपुगै बनमियो प प्रमेप बास्मीयाम्म । परा नपरा- -(ो पतितोऽनन्वरम म) मोचरा पवित।।प(atगिवामिभूमिवषाण-मन बमि पाव सो(सो)परेशानिएर्सनम् -सभरण गभरेपारगिवी संम्बासति । विवेक- एकचरो [.पा २] ममति । पमित रगपरमावर्षयर्मार्ण ग्यते । पनपविताचम तर समवे । स एष पासप)पमरेबापतोऽसमिनामिपूपी)। ममिमिवाम पारम्म सो नियते । एक बरसला, रितीमा पारसमा । करेला मामेमागेन सार-पसायपरम्प बापवर्षमाप्नोति । स पा(ज) पानुपातितत्वात् पर्ग परामर प्रायोति । पराम[]ी पवियोऽनेवराम समोचरा पनि कपा- श्रीवामिभूमिवरपरसबमिपा गोपA]al m Rसन-पचारमो मरमरमरेप पोचरेम पम निथा संग्पा लिगम् । प्रचालिमा मासा- रम सम्पारे पति । मानपसल रारारारम्प पार्ग प्रायोति । पुनरिसी मतमोत्तनुपनिटस्वान् पर्गरचयपयानोति । एवं पकोडा चतुपैसा । बाबा पपइनमनिता पाम। .

, . [गाया २४३-२४६] प्रभज्याफरणार अन्येपामप्यक्षराणा एवमेव ऋमो नेयः । व्यामिधास्तु सयुक्ताक्षराणां चत्र पत्र पतिता आत्म- वर्ग लभते(न्ते) । तेपा संयुक्ताक्षराणा क आत्मवर्ग लभते ? किं योऽयसान् आहोश्विदु- परिह(ट: १)। [१० १३४, पा० २]उच्यते - योऽमायु(ख)पया(य)भर. । पन्ने पूर्वाक्षरी चढा द्वावु- तरौ भवतः, मात्रारहिती असयुक्ती चेति । तदा द्वितीयोऽक्षर आत्मीयं वर्ग लभते ॥ २४२ ॥ अ च त य वग्गा उत्तर-करण च हवदि [जइ ?] चर व[ग]स्स । होदि कमेण क ट प शा, चदुरा णीप(यं) च णादचं ॥ २४३ ॥ अचत या'ना चतुर्णामक्षगणां बाहुल्ये(न्य) यदा प्रने भवि(ध)त्यभिहि(ह)तानां तदा चिंताचा उत्तमकार्य पृच्छतीत्यादेश्यम् । लाभप्रश्न उत्तमो भवती पाच्यम्(१च्यः) अ(प्र?)टा । व ट प शा'ना चतुणांमक्षराप० १२५, पा. १ या प्राचुर्यं यदा प्रश्नाक्षरेपु दृश्यते अनभिहतानां वदा चिंताया नीचकार्य पृच्छतीति वचव्यम् प्रष्टा । लाभप्रश्नेऽल्पलामते भविष्यतीति ।। वचव्यम् । 'अच त या' उत्तरकरणसनकम । 'कट प शा' अघरकरणमनम् ।। २४३ ।। संजुत्तमसंजुत्तं, आलिंगियमादियं अ क च टा दी। उच्चारिजदि कमसो, अणुपुबीए करणमेदं ॥ २४४ ॥ प्रश्ने येऽनराले सयुक्ता [असयुत्ता] वा आलिंगिगा [अ] मिधूमिया नग्धा या, अ क च ट तप [च]शा येऽनराः पचचत्वारिंशत् [१०१:५, पा० २] तेपा मोचारण आनुपूर्वीति भण्यन्तेति)। 15 आनुपूर्वीक्रम उच्यते । 'अ क घटा'दीनामष्टाना वीणा कमोचारणं आनुपूर्वीक्रम उच्यते । विप- र्यासोचारण अनानुपूर्वीकरणमिति । एतावानेव, नात्र कश्चिद् विशेपः। प्रामिस्तु वर्गाणां अन्यतःका(न्यका?) रिकयोच्यते ॥ २४४ ।। [पढ]अं(म?)तिल्लचउक्के त प य श बग्गे वि पावए जेण एवं अना[णुपुवीकरण छर्ट मुणेयवं ।। २४५ ॥ प्रथमवर्गस्य 'अ कपि० १३०, पा० १]च ट त प य शास्यस्य अन्य(न्याभराश्चत्वारः 'तप यशा' एते यथा प्रामुवंति वर्गाणां तथा वर्णइ(यि)प्याम्युपरिष्टा[] । यच तद्वर्ग:(:) विलोम्येन अनानुपूर्त्या प्राप्नुवति । वर्गा:-कवर्गः चपर्ग, टवर्ग: शवर्ग मि(इ)ति । अनानु- पूर्ध्या पष्ठं करण शेयमिति । अफ च ट त प य शा इत्यत्र पूर्वा.-'तपय शा' इत्येनानुपूर्वीक्रम इत्यर्थः । एपामेय विपर्यचोशारण अन्योन्य(नानु)पूर्वी [क्रम.] । प्राप्ति(पश्चात् ? )क्रम इत्यर्थः [प० १३६, पा० २] पच करारण्य(करणानि प्र?)तीतानि । तू(त्रि)पूत्तरेषु वर्गः प्रथमकरणम् । एवं' तु(त्रि)प्वघरेपु द्वितीयम् । उभयत उत्तरी हो तृतीयम् । ध(ए)केन चतुर्थ लभ्यते चतुर्थकरणम् । व्यामिश्रेयु(यु)कैरेको वर्गः लभ्यत इति पचम करणम् । यद्वा व्यामिश्र एकेन चतुर्थमस्यावर्गवं चतुर्थोऽय भेट; । आनुपूर्वी उचारणकरणं पंचमम् । अनानुपूर्वी पष्ट करणमिति ॥ २४५ ॥ अणमिहदा संजुत्ता, पढमं पावंति अप्पणो [५० १३७, पा० १] वग्गं । आलिंगिया य तत्तो, हसंति एकेकयं ठाणं ॥ २४६ ॥ उत्तरा अनमिहता येऽनरा. प्रश्नादी अन्यतमेऽप्रतो या त एवासंयुक्ती(का) यदा दृश्यन्ते तदा ते प्रयमवर्गाः स(स्वावगं प्राप्नुवति । यदा त्वालिंगिता असयुक्ताश्च तदा एकम्यानहासेन इसे .

गयपादानाम विनियामम् । [पपा २१०-२११] (प्रस) मानुषति । निएममम्-मण समरेपाठिगिकार प्रानुष (प्रोति । परा परेशारिगिवः समरे प्रामु (मोति । पना गरो [प] पारेपामि मदा का प्रामुमोशियगर समरेमामिभूमिका रघरै पारोति । पर्व पनरोगी) भरेप मामा भानोति । एपमअप [ग] मराः संपुषण तिवारिसर मयुरेति । • रितीरगमरणेम द्वितीयोऽमर रमवे । दएर संबुच्य भागि लाम्पमसिनोलान् रे मा पूतीय खान वर्ग प्रामोसुब)ति। पांगमरोऽपि संपुणे पापो परार] पतीर वर्ग प्राप्नोति । एवं संपुअमिभूमिवामनु (म्) मा परममिति ॥ २१६॥ सहाणमुति पठा, पच्चीस एत्म होति सपोरजोगा। हस्सा य मति ममसो, घरमग्गकमेण पोषः ॥ २० ॥ लसामामुप(सुपर ति बप्पा । बा Ho(मा)परसपागेमा(नागिमिभूमिया ग्यसपोगेम प परिस(स)संयोग्य मपन्ति । अनुपरि वर्णिपिम्पति। परो मा संयुभ- गितमामिपूमिया इम चमिमा १० प्रगियाम मनि(मि)। raसिवा पेऽमरा वार्षिगवावे दिलीप खाने प्रामुमति ।ममिमिया (पीपम् एमा[] बनु ला मानुति । पर निर्मिनेन पूर्णपा(पी) बर्षितमिवोant)। पर्यवरमा- बानुसारेगामापम:-स्सा मी कमलो पानामेति परे वर्ग प्रामुमति । संयो- गल [ 8 ] मठता 'भापमो पते पालासमरसेम लय गुपये। बाराप्रमापी भम्पा मा निरपणा बर्गमेष मानातिरोपरिभाकर मनोति। परोपरगाव पापपर्ग प्रामोति । स्मपरगवा मोरा स मानोति ॥ २॥ मितिय-पठत्पो पपम उष्टो अणेमुखहदि २५ आदेसा। समवि अपरिम पठफो, सकारमावीसामु) एकेक ॥ २४८ ॥ रिप बागरा पारा पंचम [गर, पर समाप्ते पालाराला अपमाजियमामुपरि मानुनि । मागापया परचा वापरलोपरग्स मापार[1] वर्ग समते । परमोपरिगव ई परर्ग पमते , मरेम पुम पपवर्ग मते। प्रकार मरेप मुम सर्ग मानोति मग्मरिमतवाली ,पपमा मालारोपी परियसहारा पर पानि(पाम्मि) पाम) साना साना संयोगेन तमामोनिमामिम ॥ २१८ ॥ मणुपलिया लिखा पा, जुचा पुपावरेण परेका एम सराण णिवेपोसा), कमारमादी[] तपोम्णे ।। २8 ।। बारमितमा मानिसमापि(प) बिमिता सिरिया-पचरानानापडिया पर- पहिवाम I वर भरपर चरतरसपुरचनावा(पप्पापपर्गसविलेन खरेपासे पुच्चमिष र वर्गों [.. परामलापविलाहुचपमरे मवे। जयामनि मम्मे लपमेण लचर प्रायोति । चापलरमाए बापपरमिक समापपीमिनिन तरेभा पुग्नसिप अपनुपमिततारपणम मचे " , । -- प्रश्नव्याकरणाख्य [गाथा २५०-२५३] ५५ स्वराणामपि मध्ये तमेव स्वरमुत्तर(मधरं) प्राप्नोति । उत्तराभरोऽन्यवरस्वरयुक्तोघर.......... .... भिधून्यते म द्वितीयवर्ग- मवाप्नोति । निदर्शनम् - ककारोऽभिधूमितः सकारेण []वर्ग प्राप्नोति । सकारोऽभिधूमितो घकारेण उवर्ग प्राप्नोति । गकारोऽभिधूमितो प्रकारेण अवगं प्राप्नोति । फकारो दग्धः डकारेण व्वगं प्राप्नोति । एवमन्येऽयक्षा[:] पूर्वाभिहि[प० १४१, पा० २ तविस्तरक्रमेण द्रष्टव्या[:] । । ये सयुक्ताक्षरासेपामुपरि योऽक्षरः स स(स्व)वर्गाक्षरं लभते । उत्तरः उत्तराभरमघरोऽप्यपराक्षर- मवाप्नोति । एप खरनिवेशक(श:) सकारादिपु हकारान्तेवरे[पु] आलिंगिताभिधूमिवदग्धलक्षण उक्तः । इस्खा लभते । आदिचतुप्फम् -अकारप्रभृतयः । [५० १४२, पा० १]अन्त्यचतुष्कं प्राप्नो(- मुवी)ति साभ्यां (' सान्त्य) वर्ग लभन्त इति ॥२४९॥ असंवाघस्यातिदेशार्थ फारिकान्तरमाह- जह चेव सरवसेसो (विभागो ?), ककारमादीसु धं(व)जणेसु पि । एमेव वि] रई(इ)यचो, पिरंतरं जाव [3] हकारो ॥ २५० ॥ एवमेव फर्तव्यो निरतर कफारादारभ्य याचम् हफार इत्येप वर्गलभ्यर्थ स्वरविभागो विज्ञातव्यो व्यंजनेषु । अयमर्यः पूर्वगाययाऽमिहित इति नोकः ॥ २५० ॥ [५० १४२, पा० २] एवं अनानुपूर्वो(वी)प्रपचेन पष्टं प्र(१)करणम् ।। जो य सराण विभागं, देसेदि य सन्तमो य सो करणो। एमेव वंजणाणं, विभावणो अट्ठमो होति ॥ २५१ ॥ उक्तातिदेशार्थ गाधेय पठिता । पष्टमुक्तमनानुपूर्वीकरणम् । अनन्तर स्वरयोगाद्वर्ग- लब्धिरुता । असी स्वरविभागो नाम सप्तमं करणम् । सयुक्तासयुक्तविकल्पेन वर्गप्राप्तिरित्यष्टम व्यंजनविभागो नाम प्र(?)फरणम् ।। २५१ ।। दंसेति सबग्गि]क्खर-संजोगं [१० १४३, पा० १] जो य सो हवे णवमो। परवग्गक्खरसंजोयं, दंसेदि य दसमओँ करणे ॥ २५२ ॥ स्ववर्गाक्षरसयोगेन नषम करणम् । इट यथा भवति तथा पूर्वमुक्तम् । परवर्गाभर संयोगात् ] दशमं करणम् । परवर्गाक्षरसयोगोऽपि पूर्वाभिह(हि)व एव । अनयोः करणयो- येयाक्षरलाम[:] तथोपरि वर्णयिष्यामः ॥ २५२ ।। अह उत्तराणुवलिया, हस्सा उ लहंति हस्समन(न)यरं । अहरेणऽवि हम्मंता,(प० १४३, पा० २] तेसि चिय वग्गमण्णयरं ॥ २५३ ॥ अधराक्षरा उत्तराक्षरैरालिंगिता हस्खवर्ग अन्य लभन्ते । निदर्शन यथा-सकार: ककारे- णालिंगितो दग्धः कवर्ग प्राप्नोति, तस्मिंश्चोत्तराक्षरम् । एवमन्ये(न्य)वर्गेभ्योऽश्नराः प्राप्नुवन्ति । उत्तराक्षरा अघराक्षरे ण]अभिहन्यमाना लब्धवर्गेऽघराभर प्राप्नुवन्ति । यथा ककारः सकारेणा- लिंगित[:] चवर्गे अधराक्षर प्राप्नोति, अधरानुवलितत्वात् । अथवा चाम्या गायाया अन्यथा । [५० १४४, पा० १व्याख्यानम् -अधरस्वरा उत्तरेखेः स्वरेग्नुवलिता इस्खखरमेवान्यतम लभन्ते। भनाओं ३-३ पक्कयो विनष्टाक्षरा लन्यन्ते । 5 कपमा अपपादणाम निमितमामम् । [गापा १५४-१५५) अनुमरियमेव उम्पा(मोन्लम) पर इसे अपरेपलरेनामिहत्याम अपरमेव का बनुनसियममिठमठ(ब) इति ॥ २५३॥ एव अहर पर, भाइलो पपिठमो व एमंत्र । पठ तिय एवं फमसो, इस्सेस हमति आदेसा ॥ २५४ ॥ बवानुपूर्मिगम अमरतुटपमा पस्वारमापा मम्मन् । web मममा पभापम्तीनि बधिमा। । पप भमरवर्माम(1) पमिम्मे भगति । पर मे)कम् । एवापतमारिले प्रमे सम्ममाम बापा भाषा बाधा चरा सम्पपमानिक ममे हमम भारवा। एषा परमामा मम्मे बार- पाररिक माने गो पाम भोपा । पा() रपमान ममे समाप्रापिक •मने अपममम पापा ॥५४॥ जह चेम सरनिषेसो, मणिमो वह व पजणेस पि । एमेव [विरहययो, पिरंतर जाप उ इकारो ॥ २५५ ॥ भगवाऽम(सागावामा विचरेन परम्नमषि.. मागेमाभरोसादने :- चारपप पंचपपि पत्र प्रायवर बा-निन् परमगुरममि मस "पं विरणापरम्पासा-मापसे मोमोबा।। एपमेपा प्रममा वि।। पाकिमोकका। पमावा पारिटीमा पापी मोनोमा । एवीमा ।।येगा। भाषी ।। सीह दे दो पोला । सागपंचमी ।। पेपैगपो ROIFI पीबो । पुसूने मोपः। पपानिपी । प । सप्तमी । नी । [ ra) पेसो TERARgोमामी । बोसो परिमाना। परमी । परमेवा मब पंचमा भयोडामामाः । एष पदाचणेषु वितारी- ' पपरपावर पसरपमपम प्रमेनाभिएर गम] पंचमारा मनीषापामिन्प्रचारमीना)ो प्रमर पर प्रचारे पापा मामि निकालिया m4m 1] प्रभारी मोपनिम्मा(परमपोल मंमागपा एमापना गौरिसस्मिन पवित् हरसंभवा ते अगवा पभमस पसमा [atरसा परम गरिहनिम्मो जमा-कोयो, एऐबोकी भबा स्मारि । पर्ष सिरेम विपर्षका । मप(1) मायापलाममा हिमपापोमदो गमो पचा इति" या " पीतारो) गावालाविमाणे नो) | पून प्रचार AAP मिलते-वियर पाम पानि ममाची - (म)पानीलाम्पासा-मनाए मोनोगा। प्रममा जाममाचार- ASो, 11पारितीपालापता-पी बोर्वपापपारामनारयन्-सीtuntukसापा- पदे aitan पानि दी । मबापता-पोस IALSIRAIN- तार यो गीर्यपा, पयामि पीपुर मसापचार-मोको IT imes - - ५७ - - - [गाथा २५६-२५९] प्रभव्याकरणाख्य [श शा शि शी शुशुशे] एवं विरच्य(च्या)क्षरग्रहणं सिंधा(हा)वलोकित-गजविलु(लि)तकरण- द्वयन्यासेन ऊोधस्तियेदमात्राकल्पनयाऽभरत्रयस्य पूर्ववत् । एवं पंच प्रस्तारान्या(ण्या)लिख्य- (ख)नीयानि 'कस गधा' इत्यादिभिरपि वर्गरिति ।। एवं स्वरविभागो दर्शितः ।। २५५ ॥ "एमेव वजणाण, विभावणो अट्रमो फरणो" ।। [प० १४८, पा० १]म च प्रथमस्वरपंकिरहितो लिख्यते-अनापि पचवर्गीये पंचैव शेपनमः समानाक्षरग्रहण चेति "दंसेति सवग्गक्खर-सजो" । गाथा । स्ववर्गाक्षर सयोगकरणमुपरिष्टाद् ग्रन्थेनैवाभिधास्यति । लभते फकारो गुरुः । कोऽसी ? स(स्व)वर्गमित्यादिना इति । "परवग्गक्खर" इति । तत्र सयोगोऽनेकधा [प० १४८, पा० २] स्ववर्ग- संयोगः, परवर्गसयोगः, अद्धाफ्रान्तसयोगमि(गइ)ति । अत्रैव फकारो लभत इति दर्शयिष्यति । एगादीया कमसो, एकोत्तरवड्डिया मुणेयवा । अधरेसु य आदेसा, एस समत्तो सरविभागो ॥ २५६ ॥ इदानीं प्रागुपन्यस्तसप्तमस्वरविभागकरणचक्राव्यतिरिक्तविशेपाभरोपलब्ध्यर्थमाह-'एका- (गा)दीया' इति । य एते द्वादश स्वराः । एते एकादिका एकोत्तरवृद्धयाम्न(च)। स्थापना अन्न । [प० १४९, पा० १] अपरे श्वा(चा)देशाः । अक्षरलब्धिरादेशः । वर्गलब्धिर्वा । न केवलमघर- खरेपूत्तरखरेपु च । कथं ? अफार प्रश्नादी अनमिहतासयुक्त अकारवच (पश्च') नवसख्यो- (ख्या)फाफार मित्त्वा अकार अष्टापगमे फकारमेय लभते । तन्मध्ये उकारः पंचसल्यः तवर्ग ७ लमते । एव आकार(रो) द्विसख्यचकार लमते । अधसादशमं भित्ता अष्टाय(प)गमे च फकारमेव । मध्ये तु ककारी (र.) पद(छ)पवर्ग लभते । एव त्रयाणा [प० १४९, पा० २] प्रयाणां प्राप्तिद्रष्टव्या। एव स्वरविभागः । उक्तः सप्तमप्रस्तारः प्रपचेनेति ।। २५६ ॥ उत्तरसु(स)राणुवलिओ, लहइ ककारो ककारमेवन्नं । अहरभिहओ खकारं, सेसा पुचावरेणेकं ॥ २५७ ।। यदुक्तमादी व्यजनविभागाष्टमः फरणमिति । तस्मादय लघुतरः प्रयोगः । उत्तरखराः, के १ 'अ इ एउ' एपामन्यतमाना फकारो युक्तः कवर्गे उत्तराक्षर प्राप्नोति उत्तरानुवलितत्वात् । एवमन्येऽप्युत्तराक्षरा अनभिहि(ह)ता उत्तरस्वरयुक्ता उत्तराक्षर स्ववगै लभते । अधरस्वराः, के 'आ ई ऐ ओ' इत्येप० १५०, पा० १] तेपामन्यतमेन ककारो युक्तः चवर्गे अधराक्षरं प्राप्नोति । शेपाः पूर्वाक्षरेणैक लभन्ति । उत्तरानुवलितो(तः) अघरानुवलित इति पूर्वापरमुच्यते । एवम- न्येऽप्यक्षरा द्रष्टव्याः ॥२५७ ॥ ॥ व्यंजनविभागोऽष्टमः समाप्तः।। -- । धीओ पढमेण समं, गुरुओ चत्तारिमो तइजेण । सेसा सकायगरुया, वग्गे वग्गे भवे तिणि ॥ २५८ ।। द्वितीयोऽभरः प्रथमेन [प० १५०, पा० . ] युक्तो गुरुर्भवति । यथा 'क(ख) चतुर्थोऽक्षर- 2 स्तृतीयाक्षरेण युक्तो गुरुको यथा 'ग्घ' इति । शेपाः स्वकायगुरुणा(काः) 'चग्गे वग्गे हवई' तिण्णि वर्गे वर्ग त्रयस्नयो(य.) 'फग्गा' इत्येप क्रम• प्रतिवर्ग द्रष्टव्यः ।। २५८ ।। अणुणासिया य जुजइ, आदिल्लचउक्कए सवग्गस्स । सत्तट्ठमो य कमसो, सक्का(का)यगरुआ मुणेयवा ॥ २५९ ॥ - , नि० ००८ ५८ प T . . । T . प पो 1 11 - बयपाहग्माम मिचमाम् । [गाषा २१.२१] जमुनासिका रमपन मा वे युमन्ते बापमतम्लेम वर्ग (सनी) बम-11 माजमा। टपण। सम्मरम। पम्मम्मम्म | सामो अभा। मामो(मा) सकारा । सेती -सागुगर) गौ । [1 11 प पवा 'म पति ॥२५॥ पठमो तदिय घग्ग, विदिमो य घउत्पम परत्मो थ। पचमओ पुण णिया, पठत्वया पावए वम्ग ॥२९॥ [प १५११२ मममवर्ग:पटीम तीयप (गों) रितीवर्ग म .(पामोति) । द्वितीको पर्गमर्मर्ग मते । पतुपी पधर्म प्रासोधि । पंचमो वर्गमा प्रामोति । निमा कारममिमधोमतेन(वभर खामगोपा मारो राज गरेन पमरोमागित मेम(भ) सम्मा(ला) सक्लासमप] म [ १५१४१] म मपनि । गभरसामतो पानभरोसते हा सेन समरेप रिंगित सोसमामा) मक्त्वा स पापा ममरो भाति । पपरमामको पहा सारो पर दवा न मारेणामिमित इति संमे सिवा पार[मरो मपति गमाये पारेमामा निदेव परा नामिपा एम(क) संसा माता कारोबारमापते । पर मम्मे पर्गेजति पानमन्ते अमिपूजन्ते मामाभरापेमेगामितिकमेण प्रामा॥१५॥ ॥सवर्गसंपोगकरणं समाप्तम् ॥ [ १५६ प २] परवमाफ्सरगममा, फठम पार्षति अप्पणो वगं । अणुवलिता[मामिहता, लमति पुडावरेणेष ।। २११ ।। परपर्गा[गरपः प्रबम प्रानुमानापमो वर्ग समि)कि । क पप समात्म वर्गाप्राविषयपर मते। वे पारपर्ममाव्यते। सभाप' इमे- पापापा । बहुपनिवपणा पाठिगिपर्यापा । १५५ पा , पमरेण परामर मासिवे पर बारिणिवस्यात् पा संम्मा सिवानात् समय का मामोति । पवर्मप्रविमराक्ष + मते । पगार पगबामामिभूमनिवअमिम्मितवादी संप्ने हसि[][-सप(ब) परा भरमापयते । परमविपरापर प्रमोनेसम्म । परोपकारेपामवोपमितेनापते। सवि संपाता सिकार इम । मारप्रमियम नमामोमेवमापेऽपि पाठिशिवाऽमिमिवारपासवर्गप्रतिषसान मामुमति पूणिर्मापति । भारगिवामिमिता र पर्सपश्चि ॥ ११ ॥ ॥ परवर्गसंयोगकरण समासम् ॥ सीहाविलोषित(मलीइओ) पुणो, दुमादि कमसो महुवियाहादिसो । संयोजोभाषियप्पेण, पामति [य] लोयणेणं मा ॥ २२ ॥ भाप भो' बम(नई)समममिप्पा समाचार पर पती सिंहारमेनिगम्यायेम बाममो [Vा पापहरोमा मासुपरिश . .

। [गाथा २६३-२६६] प्रश्नव्याकरणाख्यं औ' इयेतेदी(तैर्दी)प्रखरैश्चतुर्भियुक्ताः ‘क च ट त प य शा' याः पंच वर्गा गजविलुलितन्यायेन आत्मनोव(ऽध)स्ताद्यः अक्षरोऽनन्तरः त प्राप्नुवन्ति । निदर्शन च -ककारो हखखरयुक्तः अकारं प्राप्नोति । चकारोऽपि ककार प्राप्नोति । एवं सर्वत्र सिंहावलोकितन्यायेन द्रष्टव्यम् । दीर्घस्वरयुक्तः फफारश्चकार प्राप्नोति । चकारो दीर्घस्वरयुक्तः टकार प्राप्नोति । टकारोऽपि [तफार प्राप्नोति ।] तकारोप्य(ऽपि)[पकार] प्रामोत्येवं पंचवर्गप्रतिवद्धाक्षरा [५० १५४, पा० २] गजविलुलिवन्यायेन । द्रष्टव्य(व्या) इति ॥ २६२ ।। पत्तो वि परं ठाणं, आइल्लं यं पुणो पलोएइ । सिंहावलोइकरणं, एयारसमं मुणेयचं ॥ २६३ ॥ प्राप्नोति(प्तोऽपि) पर स्थानं तस्मात्परस्थानात् पूर्व यस्मादालोकयति तथामिहितं सिंहाव- लोकितकरणं एकादशमं भवति । सिंहवातिकान्त पश्यतीति ।। २६३ ।। ॥ सिंहावलोकितकरणं समाप्तम् ॥ [५० १५५, पा० १] 10 , लोएइ पुवभणियं, करणो गयविलुलिओ महा भणिओ। सूरकरविपर(पवि?)ट्ठो, गउ च सरपाणियं सरए ॥ २६४ ॥ लोलयति पूर्वोक्त गजविलुलितमहाकरणोऽग्रिम अक्षर पश्यति स्व(सू)रकराहतो गज इव सरसिकाल(शरत्काल?) इव अग्रिममक्षर पश्यति । लोल्यत्यन्विपतीति वाक्यार्थः ॥ २६४ ॥ चत्तारि मूलवत्थुणि, वह(हव)ति म(ग)यविलुलियस्स करणस्स । सरवंजणेण [५० १५५, पा० २] कमसो, सवग्ग-परवग्गजोए य ॥ २६५ ॥ चत्वारि मूलवस्तूनि भवन्ति गजविलुलितस्य करण[स्य] । स्वरवस्तु, व्यखनवस्तु । व्यञ्जनान्यक्षराणि । स्ववर्गसयोगवस्तु, परवर्गसयोग[व]स्त्विति ।। २६५ ।। तत्थ सरवत्थु तिविहो, संकड-वियडा य मीसया चेव । पढमाण विवि(ति)य तहि(इ?)या, चरिमाणं आदिमा पक्खा ॥२६६॥ तत्र खरवस्तु निविधः । सकट, [प० १५६, पा० १] विकटं, सकटविकटं चेति । प्रथगाः 'कच ट त प य शास्तै (दि)तीयाना 'स छ ठ थ फरपा'णामुपरिगतेः सयोगः । 'गजड दघल सा' 'घ झ ढ ध भ व हा'नामुपरिगतेस्ख(तैश्च)सयोगः । चरिमा 'डबण न मास्तैः सर्वेपा- मेवाक्षराणा उपरिगतैः सयोगश्चेति सूत्रम् ॥ अथवाऽस्या गाथाया अन्यथा व्याख्या क(कि)यते--1 "तत्थ सरवथुप० १५६, पा० २] तिविहो" इति । सकटा• 'अइए उ अ'। विकटाः 'आई ऊः। सकट-विकटाः 'ओ ऐ औ' । पचवर्गीयो(या) वर्गा अपि । प्रथम-तृतीयौ सकटौ। द्वितीय- चतुर्थो विकटौ। पचमः सकट-विकट इति । 'पढमा विदियाण चरिमा' इत्यत्र स्वरेषु प्रथम- द्वितीयौ अआ', परिमौ 'अ अ."। एपा तुल्यता । कथ ? अकारस्य अनुस्वारः सपक्षत्वात् सकट एव भवति । अकार-विसर्जनीयौ द्वादशम. स्वपक्षः, अतो विकटोऽयम् । सपक्षता परस्पर मैत्री- भाव इति ॥ २६६॥ । । - . " , ६० सयपााग्नाम निमित्वमासम् ।। [गमा २१-10] आइडाण दोड, सवे विसरा हमति सरिपक्खा । [प १५ ] पचम-घटत्य-गवमा, होइाहोति इकारस्स सरपक्सा ॥ १० ॥ भायोलो मा बम परें मरा मति मिवालि । पंचम , का मरा, नपम बोधारा । इलेवे प्रय पारम मित्रापि ।। १५ ।। महम-पसमा दोण्णि वि, एसे ससमसरस्स सरिपक्सा। एकारस-पारसमा, छटो हर्षति उकारसरिपक्सोक्सा) ॥ १८ ॥ पएम ऐमरा समीभाइमेवे समसारस पपरम मिमि । पराम- नगम, पपपमनर] 'का' पाकर मोगरा। प्ठे बर(म) परम विनानि । ऐकारौकाराण, दुविहा {५ १५० १ २] विठ्ठी उ होइ नापना । जइ उचराणुषलिमा, लहति तो संकठा एदे ॥ २५ ॥ ऐभरम मोमरन रिपिया ससा संप्रग) विना पेवि । मनोबसुपरिवार स्पति । बारपाइने जरामत्वारा संमसमा । एवेपR]गत पर पापा पंचवर्गाश्या एका मर्मति । परेप संक्रस १५ मा यो पापा रिचमानाभिमाले पोषिते सति पोऽसर पपपनि संविपिना पम् इति संर -संज्ञा ॥१६॥ मपरवलेण य पियग, उचरमहरेण मिस्सया होति । भारुत्तरेण मिसेस, लक्सेज पलावलपिसेसं ॥ २० ॥ भाई भी नेते प्रो सिमसमा । एते मा परवपापा " 4 (1) सप्रसका मपन्धि । पतरेर मिरगुंजना भपराला विमानामिषा -सोभिवे प्रतिपोभर ममे भाकारसुता स मामिविलासरसम्ममा रितीनमर्ग प्रासोतिमा मार मामरेपारिगियो रितीपवर्ग मामोपि । (पिला फार मागरेमानतो बिदीपर्य मामोतीति।)[ १५९ मिषप्पषपभोगवानिवत्तापपरामरम्। स पर पराम ऐमामिभूमिवो पामिविसरसम्पमा पर्ग प्रामोति । पमितपपपपरिचारपपपरम् । स पर कभर सारपुशन पर।एमा प म मिनातलरमा वर्ग मम्मोति। बर्गे चयनुपनियत्वाऽचरापरमा एमिः परेपमिमिरम्मेऽपान १५५, या पूर्वांच्याम गाना 'ऐ मो मे सपा संपा-विकासमा पा पूर्णप[] पंच सरिम संमा भवन्धि । पनी संपविलोपामा बम मिपाचे सोषिते पति संकट-विर मगरेप पोमोसोम्यते व सह-रिम्समा मालिंगिणमिमिवाशिम पूर्णमिमा समेत समाविषमिति । भय बामियान्तेऽमिमम् एल्पा वेषामा . मिपासगी मा(प.) संसारिको मपति परमेयार टेरेसा प्रा. । भमा भारोत्रम् ।

n 11 [गाथा २७१-२७३ (१-८)] प्रशच्याफरणारय जो य इकारो(रे) गमओ, इ(ई)कारम्मि वि वियाण सो चेव । जो ए(य उ?)कारे गमओ, क(ऊ)कारे हवइ सो चेव ॥ २७१ ॥ इकारस्य ईकारस्य च द्वयोरस्ति प्रीतिस्तद्बहुले प्रश्ने 'प्रीति, भविष्यतीति ?' पृच्छन्तो- (तोऽसि प्रीतिरित्यादेश्यम् । ए(उ)कारस्य [ऊकारस्य च द्वयोरम्ति प्रीतिलबहुले प्रश्ने 'प्रीति- रनेन सह मे भविष्यतीति ?' चिन्ता(न्त)यतोऽतिप्रीतिरित्यादेश्यम् ॥ २७१॥ [१० १६०, पा० २] : अकारे जं वुत्तं, छठे एयारसे य बारसमे । होइ सरे तं सवं, सवत्थ बलाबलविसेसो ॥ २७२ ।। उकारस्य अकारेण अकारेण च सानुस्वारेण सविसर्गेण च सह प्रीतिः । उकाराधिके प्रो एषां स्वराणामन्यतमे दृष्टे प्रीति पृच्छतोऽस्ति प्रीतिरिति वाच्यम् । घलावलविशेपश्च द्रष्टव्यः । अनभिहतो अलियां (घलीयान्) अभिहतो दुर्वलः । प्रथमो भेदः स्वरवस्तु ॥ २७२ ॥ इदानी [प० १६१, पा० १] न्यजनविभागकरणम्यादेशं कुर्वन्नाह- जो चेव पुवमणिओ, संजोओ बंजणाण परि(य विभाओ। सो चेव इहं सबो, गयविलुलियवत्थुए बीए ॥ २७३ ।। य एवं पूर्वोक्तव्यजनानां स्वराणा च सयोगविभागस्नस्याक्षरोत्पत्ती उपरिष्टाद् वर्णयस्य- (यिष्य)ति गजविलुलितन्यायेन । एव द्वितीयो भेद (दो) व्यजनविभाग उक्तः ॥ २७३ ।। लहति ककारो गरुओ, सवग्गय(ग्गिय?) खकारसंजुओ च-चग्गं । अणुणासियसंजुत्तो, कमसो पावेइ ट-तवरगं(गे) ।। (१) लभति गकारो गरुओ, सवग्गय(ग्गिय) धकारसंजुओ प-बग्गं । अणुणासियसंजुत्तो, कमसो पावेइ य-स-वग्गं(ग्गे) ॥ (२) लल(भ)ति चकारो गरुओ, [प० १६१, पा० ० ] सवग्गयंछकारसंजुओ ट-वग्गं।, अणुणासियसंजुत्तो, कमसो पावेइ त-प-बग्गे ॥ (३) लहइ जकारो गरुओ, ज(स)वग्गयं अकारसंजुओ [य]वग्गं । अणुणासियसंजुत्तो, कमसो पावेइ स-क-बग्गे ॥ (४) लहइ टकारो गरुओ, सवग्गयं ठकारसंजुओ त-बग्गं । अणुणासियसंजुत्तो, कमसो पावेइ प-य-बग्गे ॥ लहइ डकारो गरओ, सवग्गय [५० १६२, पा० १] ढकारसंजुओ स-वग्गं । अणुणासियसंजुत्तो, कमसो पावेइ क-च-बग्गे ॥ (६) लहइ चकारो गरुओ, सवग्गयं थकारसंजुओ प-वग्गं । अणुणासियसंजुत्तो, कमसो पावेइ य-स-वग्गे ॥ (७) लहइ दकारो गरुओ, सवग्गयं धयारसंजुओ क-वग्गं । अणुणासियसंजुत्तो, कमसो पावेइ च-ट-बग्गे.॥ (८) , , 25 ६२ - - (११) उपायुरनाम निमिचकामम् । [गामा २01-(81)] लहा पफारो गरओ, सवग्गय {१ १६५ प १]फ्फारसजुओ यसमा। मगुणासियसंजुचो, कमसो पायेइ सम-बग्गे । लभा यापीकारो गरुमो, सबग्गय हामायारसजुभो सचि)-नाग । अणुणासियसजुचो, फमसा पायेइ ट-स-पग्गे ॥ लाइ प(प)कारो गरमओ, सवग्गयं रयारसजुओ स-वग्ग । मणुणासिपसजुचो, भमसो पायेइ फ-ब-वग्गे ॥ लहा रफारो गरुमओ, सपग्गय वयारसजुभो ट-बग । अणुणासियसजुयो, कमसो पायेह त-प-वग्गे ॥ रमा स(श)कारो गरमओ, सवग्गय स(पोमरसजुओ मनग्ग । अणुणासियसजुपो, कमसो पाबेहप-ट-बग्गे ॥ लहइ सफान परो गरमो, सबग्गय हकारसंजुओ तया। मणुणसिमसंजुचो, फमसो पावेड पस(य)-चम्गे ॥ पासवामपि प्रमाना लमर्गमोगरवासी मसाप पनव-सिंग पानि पंधात हत्या मरमा पनि क्स, व गग, ग प ।' म) ॥२॥बमापटान-पद, पब, नापस) TRI बमा-म, प (1) ॥३॥[२] मसामया-चप प परमाबमामा-4 प, प, म माणक मम्म पम्प) ,,||१॥ ममापा-प म), स, बसाय-एसपी - स, प, से प, 4-पपा मुनिरेपाभरपपिरिम । [गापाचतुर्दशकानुसारेण कोरकमिप स्पापितम्- क म. . 1 I प . प . . . . . । . 1 7 . प 4 । . ग . प . म ई E . . प म .

[गाया २७४-२७९]
प्रश्नन्याकरणाख्य
६३
एवं तु सभावत्या, लहंति अह अणुवलाभिघाएणं ।
दिट्ठा पुवावरओ, लहंति तो गंतरं वग्गं ॥ २७४ ॥
एवं तु स्वभारत एवं प्रसारण लन्धिरका । प्रश्नाक्षराणामधरधातु(रानु?)वलितत्वाधार
लक्षयेत् । उत्ताप० १६५, पा० १] रान(नु)वलितत्वाश्च आलिंगिताभिधूमितदग्धाच तमेवाक्षर यथोक्तं
यथा लक्षयेत् । पूर्व्या(?)क्रमेण पूर्वोक्वामिघातसु(शु)ढेन आलिंगितत्वादनन्तर घर्ग लमते । ।
अभिधूमितत्वात् द्वितीयवर्गम् , दग्धत्वात् तृतीचं वर्ग यथा प्राप्नुवति तथा पूर्वोक्तम् । स्वरवर्गा-
क्षरसयोगवस्तु तृतीयम् ॥ २७४ ॥ इदानी चतुर्यों भेदः - [५० १६४, पा० २]
परवग्गक्खरगरुया, अ(ज)त्तियमित्तेहि पण्ह आइल्ला ।
ते सच्चे पत्तेयं, पढम पावंति संठाणं ॥ २७५ ॥
प्रभाक्षराणां मध्ये यावन्मात्राः परवर्गाक्षरगुरवो दृश्यन्ते तेपामुपरि अक्षरो यः स ।
प्रत्येक प्राप्नोत्यात्मनो वर्गम् । उत्तरानुवलितत्वात् उत्तरं, अपरानुवलितत्वादघरमिति ॥ २७५ ॥
सेसा सकायगरुया, सचे नि लहंति अप्पणो वग्गं ।
सेसाण वि एस कमो, सव(व)त्थ वलावलविसेसो ॥ २७६ ॥
स्वफायगुरव (रवः) सर्वे [प० १६५, पा० १] यथा प्रामुवन्यात्मनो वर्ग तथा उत्तमेव ।
शेपाणामेप क्रमः । शेषग्रहणेनालिंगितामिधूमितदग्ध (ग्धा) भण्यन्ते । ते यथा स्व[व]गं प्राप्नु- 11
वन्ति तथा पूर्वमेचोक्तम् । सर्वत्र बलावलविशेपो द्रष्टव्यः । इत्यभिहन्ता बलीयानी(नि)ति ॥२७६||
॥ चतुर्भदं गजविलुलितं समाप्तम् ॥
,
पण्हाइमसंखाए, जाणिज्जा तंमि वग्ग एकेक ।
नामक्खरं तु लन्भइ, एवं से[स]सु त्रि कमेणं ॥ २७७ ॥
प्रश्नादिमस्याक्षरस्य वाऽनवि(भि)हतस्य या सख्या तया नामा ५० १६५, पा० २]झरसंख्न्या ,
शेया । स एवानभिहतः स्ववर्गाक्षर लभते । एवं चेऽपि तत्रावलिप्ठा अभिहतास्तेऽपि खवर्गाक्षर
लभन्त एव ।। २७७ ।।
तदा
जत्थऽगाइरित्ता, हवंति तत्थाऽट्ठयं विसोहेत्ता ।
जं तत्थ हवइ सेसं, तं मिंद्रा(?)णामक्खरवग्गे ॥ २७८ ॥
प्रभाक्षराणा निपतिताना यदा एभ्यो अक्षरेभ्योऽभि(ति)रिका [अ]क्षरा भवन्ति
तेपा या सख्या साऽऽयाझराष्टकमध्ये शोधयित्वा अष्टभिभा(भी)गमपहृत्य लब्धावसि(शि)टा :
द्वौ वर्गों लभ्येते । [५० १६६, पा० १]कवर्गादिगणनया च तो गण[यि]तव्यौ । उत्तराक्षरवहुले प्रश्ने
उत्तराक्षरो लभ्यते । अघराक्षराधिके प्रश्ने अधराक्षर इति ।। २७८ ॥
एवं तु सभावत्ये, कीरइ णामक्खराण उत्पत्ती ।
अणुवलिहा(या)भिया वि य, पुवावरवग्ग एके ॥ २७९ ॥

- बसपारनाम मिमिचमामम् । [गामा २८--10] प्रमाषयमो मम्पे पे माय भनमिता लमाषमा रमन्ते । लमारसयपीपल- पाम(नामा)परामामुत्पचिपा (प) सन् स्वयम प्रोति बाराक्षरोधी पपपपरम् । [ 1]मिरवपामेन भाििगवामिभूमिणग्या मुसम्मम् । देपमि एष पमिपावसम्या मुग्धरमेषु पस्मिन् पस्मिन् पर्गे सपा, समिर तमिर- • मनुबम्ति । पूर्वापर चारिगिवामिभूमिवरम्भम्पममेव संप्सारर्म माम || २०१५ अट्ठयवमास्स मवे, गुणयारो सेसयाण एकेक। परिहायत कमसो, [ ६ प १] परिमो एकमो सरिसो ॥२८॥ लपपाममिपामए । पगप सामिर्गुणाकारा ! बसपा(स) परिणाम । (yal पंचमिर्गमका । 'वाम' पर्मिया। -पफपमा(म) मा वाघिमिर्गपारा । 'परम्पो या गुपपरा | पसरा ए मेष गुणाकारा । प्रमापरमारस्पापिरमेश्राम मम ॥ पापरापाबा भमरो पानसरपया ९ गुण्यायमिर्मागे स्ने समपा परिमोगा। निवर्ष पपा-वाषयमापपराभरपाठिनावप्रतिवरल(म) सप्तसम्पगुमान। पमा प्रमापिरं पातमिर्गुमपेत् । प ५ मा पर ममा होसते पणे ). • सराराम भरेप प्रभाशरसमापि गुणवेत् । पपा ममापये परामा प्रतिवरेस- पा ममापरसेरापि गुपपेत् । एषमम्पेपामा ममापरामामुगुमनरेष मामला पिर पुषपिता [मागमाहरेत् । प्रसंगेनोमन - नेपासुपरि पापमा पुममापिप्पति ।। २८.॥ पण्हसाम्सोरा उ समे, भाइम-गुणकारसंगुणा काठ । घग्गएण विमाए, सेसाण(णामस्वरुप(प्पाची ॥ २८१ ।। ममायरामा लिपरिवाना वा यसपागुममरेप गुपयेत् । स-समाससम्मा सिस)मा नापी सरो) नाति वा पापपरम सी बोये) वा तम गुपच ऐन एमरेत् । सामिा मागेऽपाते सम्मासिyिn() वर्णो देशरावर्गा प्रसा- पाठचरापरकोप भरोसधिंगा।। २८१॥ { १९९. पचेर्य पचेय, एष पहलरेसु सोम । मियगुणकार) गुगिए, अपिहि(हाचे हपद वग्गो ॥ २८२ ॥ मम्पमारिसरमामुत्तनिरगुणानि (द) मामिला माभिर्वताप वम पाप पूर्व पापा । पूर्णगापापा(प) विखरामेमन न पुना निवरेणाम्मानम् ॥१८॥ चितार मुट्ठीए, णामे णमसघ मुमुस्मामिण)सेलाए । अविभाए छेचे, काले लेहक्सरे, च ॥ २८३ ॥ पिवानो मुथै मानि मम मापापमरससपा नामापरच शेगा।[1] बयामिमागे । 'बधिमागे क्षेत्र इसेतुपते-पूर्वाऽमपी पापा मैईटी पानी पापम्मा पोररी ऐमाली-साविमा ऐवम् । वपूर्वविदिषपणाम) सम्ममा पलायम् । लेखा- पराम प्रसाद पूर्वामिविय मिलेगा। ॥ २८ ॥ " .

. - [गाथा २८४-२८९] प्रश्नन्याकरणास्यं H अण्णेसु एवमाइसु, कजेसु जहटि(च्छि ?)एसु सचेसु । गुणकारं काऊणं, अट्ठा ५० १७०, पा० १ विहत्ते हवइ इच्छा ॥ २८४ ॥ अन्येष्वेवमादिपु कार्येषु यथेप्सितेपु प्रभाक्षरसख्यापिंउमाद्यक्षरवर्गाक्षरसख्यया गुणयित्वा अष्टविभक्त वर्गों लभ्यते । तमेव पूर्वोक्तमर्थ वर्णितवान् ॥ २८४ ।। ॥ गुणाकारप्रकरणं समाप्तम् ।। । . पंचण्ह वि वग्गाणं, जस्स य वग्गस्स पाहमादीए । वग्गक्खरं पईसइ, तंमि हु णामक्खरं [५० १७०, पा० २] वग्गे ॥ २८५ ॥ पंचानामपि वर्गाणा क च ट त पयशा'धानां यस्य वर्गस्य प्रश्नादो अक्षरोऽनमिहतो घश्यते तस्मिन् वर्ग एको नामाक्षरो लभ्यते ॥ २८५ ।। एवं तु सहावत्थे, बलाबल-विसेसओ जहा पुन्छ । एवं विपक्ख(क)राणं, गमओ संपक्व(क)राणं च ॥ २८६ ॥ खभावस्थाः प्रभाक्षरा अनभिहतास्तेषु घलायलविशेषेण यस्मिन् प० १७१, पा० १] वर्गे ते अक्षराः प्रतिवद्धास्तान् पर्गान् प्रति लभन्ते । विपक्स(क)राः, के ? अधराक्षराः । संपत्कराश्वो- त्तराक्षराः । उत्तरैरुत्तराभरा लभ्यन्ते । अघराक्षरैरघराक्षरा इति ॥ २८६ ।। वग्गक्खरंमि दिहे, तत्तो वग्गक्खर(रा) पवत(त्त)न्ति । पढमं तइयं छटुं, नवमं च तहक्खरं जाणे ॥ २८७ ॥ वर्गाक्षरा इति । त एव प्रश्नाक्षरा उच्यन्ते । तेभ्यः प्रभाक्षरेभ्यः वर्गाप० १७१, पा०२] क्षराणामुत्पत्तिया । ये वा प्रथम-तृतीय-पष्ठ-नवम-प्रभाक्षरा अनभिहता भवन्ति तदा ते स्ववर्गप्रतिवद्धाक्षर प्राप्नुवन्ति ॥ २८७ ।। ॥ उत्तराधरानी(णी)ति विभागप्रकरणं समाप्तम् ।। - । । णामक्खराण एसा, पयडी णामाण चेव य पहाणा । तह करणमाइयावि य, पंच य नामा भवे इत्थ ॥ २८८ ॥ नामाक्षराणामेप सभावो वर्णितप्रधानः । तथा फरणमातृकागृ(प्र)हणेन पंचचत्वारिंशदक्षरा भण्यन्ते । तेषामपि पंचभिः प्रकारैः अक्षरा लभ्यन्ते आलिंगिताभिधूमितदग्धोत्तराधरैः ॥२८॥ णवमाप० १७२, पा० १ 8मेसु एक्कक्कयं तु एकं उरेसु(रस्स ?)संठाणं । एमेव य कंठाणं, सत्तट्ठमएहि सह यो(जो)गो ॥ २८९ ॥ उरस्य(स्याः), कठ्याः, जिह्वामूलीयाः, वालव्याः, [मूर्द्धतालव्याः १], दत्याः, उ(ओ)ठयाः, अनुनासिकाः, मूर्धन्या इति नव स्थानानि वर्णानाम् । तत्र नामान्या(?)मूर्धन्याः, तेपामन्यवम आलिंगितः यदा तथा अनुनासिकानां मध्ये अक्षर लमति । अनुनासिमानामन्यतम आलिंगित - नि० .शा.

। U अपपारमाम विनियमाभम् । [ग्मवा १९.५९१] मोगा)नो मम्मेऽभई ग्मते । भोग(मामाममातम बाबिगिया [एम्लामा समेत समवे ] रम्मामामम्मतम पार्मिगिवः मूवारम्पान मप्पेऽध हमने । मूणामामा- मम्पवम बाहिंगितवामम्मामा मन र मम । रसमामातम पारि गितः मूर्धन्यानो मम्मेऽसर पमते ॥ १८९॥ पषम पठत्ययाणं, जीहाम्लेहि होइ सह जोमो । तालमाण जोगो, पनम-राइवेमु दोस पि ॥ २९ ॥ मूम्बानामम्पवम अमिभूमिता पायाना मम्मे ममते । मनुनाविनयभन्म- वम ममिमिया रम्मानो मप्पे मते । भोमानासम्बतम नमिभूमिका मूडमा मध्ये. मते । मान्यमम्पदम बमिमिवा वासम्मायो मम्मर समये। मूवामानामम्पमा नमिता शिहाम्डीवाना मपेपर मवे। बम्पा अमिभूमिकाः मयाना मम्मेऽभर मामुपम्ति । सिामूगमा [मिनिचा ममानो मोम मामुपन्धि । बामामन्यतम बमिभूमिव(तो) म्यानो मम्मेमा ममते । मलानामपदम बमिभूमित [मुनासिगाना मम्मेऽसर प्रामोति । परा परमेष बालब)परमे विममंगल भावमा मिरज नानुरूपमिति ॥ २९॥ मि-तिय उत्पेहि सम, संगोगो होइ मुरसालाणं । पचम-धउत्पएण, जोगो बग्गाम दम्तेहिं ॥ २९१ ॥ मूम्बापामम्पकमो पापो पम्सा मम्मेऽपर मामति । मुनसिबायामपसमा [ 1]एको मन्बापो मप्पेश्वर प्रामोति। बोपनामवयमो मा पासम्ममा मप्पेऽमा मोति । मामासम्मवमो मा विहानीयामा अप्पेऽमर मम। मूवममा * मासम्पवमो का पानी मम्मेऽम मवे। जम्मानसम्बतमो पपरमा समेतारे समवे । शाहीबाबामम्पवमो पा [प ! मूम्पानी सम्म म पर नामनवमो रमा भमुनासिगा मयेऽपर भमवे। परमागमम्बयो पगमा बोनापी मो. पर मते | चयापत्तपनि समाये । अपरामरमान] मरापिसि] ममंगहनो पम् । म गामानरूपम् ॥ २९॥ उहाण पुण यो(जो गो, पचम-छठेहि होइ बम्गेहि । छोण सचमेण, जोगो अणुणासियाण च ॥ २९२ ॥ जममीन परमिषम्मामा तो गाजमिति म चालिगम) Rs|| सचामेहि दोमु धि,मठणा(मुरणारण ( ११ वडेव सौ योमोलो। बगे बम्गे एम, सिण्णि हु णामसरा पढमे ॥ २५ ॥ भारिंगिवलारेगमप मते मिम्मिवत्तार वितीय पत्तावीचमपरमिति । एषा- पाम( पोप गापारी मापाता | बसो म निरप इति ॥ १९५ ।। सो(साहाविहा प एव, पपडीए पढममो हवा णाम । उचरमहरचटके, यसापलबिसेसभो पिइए ॥ २९ ॥ । . " " ७ [गाधा २९५-२९७] प्रश्नव्याकरणास्य प्रश्नाक्षराणां मध्ये येऽक्षरा अनभिहतास्ते स्वभावतः प्राप्नुवन्ति आत्मवर्गस्तै (गै तै)र्नाम- निर्देशः कार्यः । उत्तर प० १७५, पा० २]तुष्क इति 'अ च त या' निर्दिश्यन्ते । अधरचतुष्क इति 'क च ट त प य शा (क ट प शा?)ना' निर्देशः । 'अ च त या'नामन्यतमस्य 'कट प शा'नामन्यत- मोऽमतो यदा भवति तदा स्ववर्गप्रतिवद्धाक्षर प्राप्नोति । यदा 'कट पशा'नामन्यतमस्य 'अचत या'नामन्यतम(मा)क्षरोऽप्रतो भवति तदा स्ववर्गप्रतिवद्धाक्षर लभते ॥ २९४ ॥ ॥ स्ववर्गप्रकरणं समाप्तम् ॥ -- - मूलस्सरा सवग्गे, एक जुत्ता लभंति सट्ठाणोणे) । [१० १७६, पा. १] परवग्गक्खरगरुजुत्ता, वितियं च अणंतरं अहरं ॥ २९५ ॥ मूलस्वराः।। १ । के ते १ त्रयः । तैर्युक्ताः प्रश्ने 'डबण न मा' रल पाः एषामेव मध्येऽन्य- तमामरं लभते । मूलवर्गप्रतिबद्धत्वात् । पचमवर्गः स्ववर्गो मूलखराणाम्, शेपाः परवर्गाश्चत्वारः, ॥ तैर्युक्तास्त एव मूलखराः । येनाक्षरेण युक्तस्तस्याक्षरस्यानंतरो यो वर्गोऽधस्तद्वर्गप्रतिवद्धमेवाक्षरं प्राप्नुवति ॥ २९५ ॥ उत्तरे(र)वग्गे एक, बीयं पुण होइ जत्थ संजुचा । अहरंमि लभेतइयं, दुविहा दिट्ठी उ आकारे ॥२९६ ॥ [१० १७६, पा०२] दृष्टिप्रयोगसयुक्तेन असयुक्तेन च आकारेण एवमुपरिप्रयोगेष्वपि अक्षरलब्धि[:] द्विधा । भवतीति । उत्तरैर्वर्गः 'क च ट त प य शाः, ग ज ड द व ल सा' श्च । एपामन्यतमाक्षरस्योपरिगते मूलखर अनतरमघोवर्ग प्राप्नोति । उदाहरणम् - ककारस्योपरिगतो मूलखरः चवर्ग प्राप्नोति । चकारस्योपरिगतः मूलस्वरः [प० १७७, पा० १] च(ट १)वर्ग प्राप्नोति । टवर्गस्योपरिगतो मूलस्वरः तवर्ग प्राप्नोति । एवमन्येष्वपि द्रष्टव्याः । एषामेव प्रथम-तृतीय-वर्गाक्षराणां प्रश्नाया यग्रतो मूलखरोऽसयुक्तो यस्याप्रतो व्यवस्थितस्तस्यैवाक्षरस्य पूर्वस्य सबंधिवगं प्राप्नोति । एवं , द्वितीय-चतुर्थवर्गाक्षराणां अग्रतो(तः) स्थिता मूलखरा असयुक्तास्तृतीयवाप० १७७, पा० २ मतः मामुवंति । यथा खकारस्याप्रतो प्य(व्य)वस्थितो मूलखर[:] टवगं प्राप्नोति । छकारस्याप्रतो व्यवस्थितो मूलस्वर द्वितीयवर्ग प्राप्नोति । एवमन्येऽपि द्रष्टव्याः । आकाराव(रः क)कार- स्योपरिगत आकारः तस्याधोऽनतर द्वितीयवर्ग प्राप्नोति । तस्य द्वितीयस्य वर्गस्याधराक्षरमनंतर लभते । यथा ककारस्योप [प० १७८, पा० १] रिगतः अकारश्चवर्ग प्राप्नोति । चवर्गेऽप्यघराक्षरं प्राप्नोति । एवं चकारस्योपरिगतः आकार: टवगं लभते । अन्नाप्यधराक्षरम् । एवमन्यत्रापि । एवं ककारस्योपरिगतः स्थितः अकारः चकारमेव लभ्य(भ)ते । तथा अघराक्षरोपरिगत सच वा(आ?)कारोम(s)नतर द्वितीयवर्ग प्राप्नोति । तस्या(स्य) द्वितीयवर्गानतरमेवाघराक्षर [प० १७८, पा० २]प्राप्नोति । एवमनंतरोऽप्यसयुक्तः । उदाहरणं यथा-पकारस्योपरिगत आकारः ककारवर्गेऽप्यधराक्षर प्राप्नोति । एवमन्येऽपि द्रष्टव्याः॥२९६ ।। एवत्तु(न्तु) अहरवग्गे, एक वितियं तु जत्थ संजुत्ता । धातुस्सराण एवं, दुविहा दिट्ठी उ पयडीए ॥ २९७ ॥ .. - ६८ अपपादामाम मनिषकामम् । [गारा २९८-10१] दिवीप- नवगपोरमरपोर्म महरा मानुतरपुमने भयोमर्ग रितीयानंतर जिवावर मानुपम्ति । पामार मारेण परेप वा पुकाबमा सामोरमम्प्रपा) पोष पादुसरयोरपतरो पाराम जमा न बसगुण, कामे बाप मातोति। पमा समरसामो परास unt छम । शिरिया मग [प्पो ॥ २९॥ हस्सस(स्सारा य मये(सवम्गे), एकरपा तु लमति जत्य संजुषा । वितीयमग्गे सप(सबर्ग, लमति अहरेण पामिचेसि) ॥ २९८ । सरुपमरपाबापमानापमानसमाहरे [4) मा समर्ग पर प्रामुमतियार पारेपयुमोसेपसम्मेनियलपमें . मामुपम्ति । संपुच्चसमुदतस्पा माप्तिः । रिलीपर ' परमा नम्बर [MT से पnnyपमातबरसुण परापतापर्ग प्राप्नोति । पमा सार पतु मार बम्पवमेन पुश पतीपर्म मानोति । एष परपुषण्मुसाशिवत्तायुधम्म माठमन्ति ! पोर पसीपम् । एएमम्बमापि ॥ १९८॥ ॥पगनम्मरमकरण समाप्तम् ॥ जीया(हामलिमकठाइसजुओ लहड सिणि उहकारो। उचरपपिडिचटके, एक दो दोमु परिमेसु ॥ २७ ॥ 'पा प्रत्येते पत्तास्पा । प्रगमा निजाममामलाया मामला परोपम्पवर पिलरपुतमिहागीर ॥ न ममेरे प्रायोपुपपाल पति- घालाय मामिपाकमान 'भपक्षपामगोपी पठमोपण, - पणे पारयो भमपोर पहरेष पुष्तमेव बुम मते । पमा भने पुरे मोरे सति पार पम पम्पते। 'मा' भमेन पुरसम्मते । पपडी प्राम्या | मा सिमि सापती में मतीमा रिकामीवारी ९९॥ एमेव सेसयास मि, दोसासी दोसाँस) ४ जानु संयोजोजोगी) । पयरी तास्तु एसो, हाइ हसरस्स 100 महिलासो ३ ॥ एवं पारामत्तारामतप्रणपणे पम-एमपम वेषामबषयम- स्थानमन गरिब हरेण पुलो मेल jaR(मा मेरवापर यम । मरिष्यों एमा सम्परोपा भास्मानमेषमठे समात् ॥१. उचरपपडीम एनंग), लाईति जामकर संजुया ताम् । एकमेव कठा, रहाण उपरिमिमि) आप ॥ १॥ रिदिन(पग) : पोपमा परमो नमोनाला मार्ग मूरखान्यानो पापमोर धरला बामपपमेन पुस्तमेशामापाला भरएको । [111,111॥ म [गाथा ३०२-३०६] प्रभव्याकरणाख्यं ६९ अहरासु लभे एकं, एकेकं चेव जासु जं जुज्जो । अहरपयडीसु चउसु वि, दंतादी जाव सुद्धाहा (मुद्धण्णा ?)॥ ३०२ ॥ दयानामोष्टयानामनुनासिकानां मूर्द्धन्यानां मध्येऽघराक्षरो वाऽधरस्वराः 'आई ऐ औ' एपां चतुर्णामन्यतमेन युक्तोऽघराक्षरोऽधराभरमेव लभते । उत्तरोऽप्येषां दंत्यादीनां मध्ये एवेरेवाघराघरस्वरैर्यदा युक्तो(क)स्तदा अधराक्षरमेव लमन्ते(ते) ॥ ३०२ ॥ ॥ खभावप्रकृतिस्समाप्ता॥ पढमसरा आइल्ला, तिणि वि उट्ठा य हो(हों)ति पयडीओ। दोसुत्तरपयडीसुं, दोन्नि य सो अक्खरे लहइ ।। ३०३ ॥ प्राप० १८१,पा०२ मखरा आद्यालयः 'अआइ ओष्ट्याक्षरैः सार्द्धमेपां स्वराणां मध्ये अकार इकारच द्वावुत्तरी अ(आ)कारोऽधरः । ओयाक्षराणा उत्तरयोरन्यवरो यदा भवत्य- ॥ प्रतः, तदा उत्तराभर प्राप्नोति । एषां मध्ये ओट्याक्षराणामन्यतमस्याग्रतो दृष्ट आकारोऽध- रस्तेपांमध्येऽधराशरमेव प्राप्नोति ॥ ३०३ ॥ १० १८२, पा० १] अका(उत्त?)रसर(रा?)उ कंठा, दोण्णि वि चरिमा हवंति पयडीए । एवं एस विसग्गो, तिणि हु नामक्खरे लहइ ॥ ३०४ ॥ कठ्या उत्तरखराः- 'अइएओ' चत्वारः । तेषामनुस्खारेण अकारेण सविसर्गेण च सह । प्रीतिः । एवमेप (त्रि)संख्यः अकारः तृ(त्रि)नामाक्षर प्राप्मोत्येतयो(यो)परिगाथया व्याख्या- . स्यति ।। ३०४॥ L अवस(धरु ?)त्तरासु एक्केवयं तु एकं च ख(ल ?)भइ मिस्सासु । पंचम-छट्ठा [प० १८२, पा० २] तह सत्तमा य मो तइउ(१)पयडी ॥३०५॥ प्रश्ने यदा अधरवर्गों वो अघरी द्वितीयवर्गाक्षराणा यदा प्रभे 'ख छठ थ फरपाः' स्ववर्गा-* क्षराणों चातरद्वौ दृश्येते तदा तयोरन्तरोऽक्षरो लभ्यते । यथा खकारस्याग्रतः चकारोऽवस्थितः । एवमन्यत्रापि । तथा उत्तरेषु प्रथमवर्गाक्षराणां 'कच ट व पयशाना तृतीयवर्गाक्षराणां च गाज- डदव ल साना यदा प्रश्ने द्वावक्षरावनतरा वा द्वौ दृश्येते वदाऽनयोरेको लभ्यते । यथा फका- रस्याग्रयो गकारः। एवमन्यत्रापि । एव च अधरोचर लभत इति । उक्ता एव मिश्रा स्थितिः । यदा प्रश्ने एक उत्तरः आद्यः तस्यामतोऽघरोऽथवाऽधर आधः (तस्यामतोऽघरोऽयवाघर : आधः) तस्यामत उत्तरस्तदाभिघाते [५० १८३, पा० १] शुद्धे सति द्वयोरक्षरयोर्यो घलवान् [स] लभ्यते एक एव । पंचम उकारः, पष्ठ ऊकारा, सप्तम एकारः, इत्येतेपा त्रयाणा इकारेण सह प्रीतिकति(प्रकृति)रिति प्रीतिरुच्यते ॥ ३०५ ॥ कंठाअ(s)णुणासि उव्य(१ ट्ठा), तिण्णि वि तइयस्स सो लहइ (१)। दोसुत्तरि]पयडीसुं, एक अहरासु तह जाण ॥ ३०६ ॥ १ मूलादर्श द्विवारं लिखितोऽयं पाठः । २ भादर्श 'सत्तमाय मीयमा तइट' इति पाठः । 7 १ - सपपामुग्नाम निमितमामम् । [गाना २.- बभरम पपरम उधरम्प या सम्मान पामयोऽनक कारो श्यते, ना मेर पूर्णसरसामोति । बमुनासिकान्य पमममा'नो भोमानो कपडपमा (पेपरम्प) पासम्मवममोपरिणव पहारसमेपारे छमते । प्रमोचमहविच । प्राधिपो पर्यायः । 'एक पाराम जानीबि) इलेवनुपरिन] म्पास्यामति ॥२०॥ ईकान पर रस्स पठत्या, मुरहा(राणा) सेसया जहा वइए। अस्सरलमो जो उचरामु सो चेष महरासु ॥१७॥ पवारण मूर्सम्पापोस्वामिरे(र) ऐसार मते । भौचरोलमसामवोश सिवईमर भौगारमेष पामोति । रसपाना(मा) सम्पानामम्पवममोपरिमवा मरयमेवार मम्मोतिपरसपनामसमम स एवारलाप्पपरमार जा ईकारे पयरी, चटरो सा चेष होइ गयो) उकारे । अक्सरलमो जो पचमस्स सो चेव एयस्स ॥ ३.८ पाम रस पारेण सर प्रीति । प्रातिकमा समावपर्यापा। बसपामा बम्परममामयोऽवसिव परलमेर पूस पते | k[atya नाम पाय- मारम)पमापो पुचकारत्मेष म्मम पापमान मते पायेगी पदेष प्रामोति ।।३.८॥ जीहामूलियकंठा, तालवाणुणासिया य एकारे । अपवरलमो वाइए, जो नि य सो घेव इहम पि ॥ ३.९ ॥ विहाम्डीवाय ध्यानो पारमामामममासिराना बापवमाएर एमरेप पुणपति गोन चमेनायर एमए मामोदि । पटा(पानामपि लप भम्बमातरमप्रयोऽपक्षित एभरममेर पूर्णता पमते । पारेर पोऽभरममा पाऐगरेप पसी ॥ १.९॥ अपर(उर)ठोडा पता, मुरारणाणासिपाल 1.4 अट्ठमए। अपसरस्म इर्ष, त पि य महराहरे लद्दा ॥ २१॥ रमामा पानी भोपाना स्पान्ने मूर्यम्पमा बनुनासिकानो पापमापरणहर शारेन पुणेऽपय प्रमोति । रापये मप्पे पेपारेष पुपोषणपरमेव मागवि । - पो मने पे मजे(रामपमम्मामवा() लिप पेपरवमेर तरमानोति ॥ ३१ ॥ लीहामलियन्ठा, उठा अणुपामिया य ऐगरे । अस्पररमं एमो, सहा सदसरस गमणेण ॥ ३१ ॥ सिम्पूडीया 'पण्जमा भोगा. IMATA अनुनासिका समपनमा समापदाम्प पनोररिगत पेभातमेबापर ममतेसाना- -मरि पम्पापो नरमपरिसमेष पूnिt एमते । पानी परो मशागानोति। मीनरी ११॥ , , [गाथा ३१२-३१६] प्रमन्याकरणाख्यं मुद्धणुणासियकंठा, तालचा मुद्धतालदंतोट्ठा । दस[म]सरे पयडीओ,[५० १८६, पा० १]अक्खरलंभं जहम्मा(ट्ठम?)ए।।३१२।। मून्यानुनासिककंठ(व्य)तालव्य-दंतोप्टा (योट्याः) । तेपामन्यतमोऽधराक्षरस्योपरिगतः दश- मस्वरसमेवाक्षर लभते । उत्तराक्षरोपरिगतः उकारोऽघराक्षरमेव लभते । एतत्प्रतिवद्धस्वराणां 'आ ईऐ अन्यतमस्याप्रतो वंच(ऽनन्त)रमवस्थित आकार[:] पूर्वस्वर लभते । यथाष्टमा प० १८६, पा० २] ' ऐकारोऽमर लभते । एवमौकारोऽपीति ॥ ३१२ ।। मोत्तुं पंचमपयडी, एकारसमस्स सेसया अट्ट । एकेक दंतो?, मुद्धण्णे अक्खरे एक ॥ ३१३ ॥ चरस्याः कठ्याः जिहामूलीयाः तालच्या मुद्धतालच्या दंत्या औष्ट्या मूर्धन्याः । एपां अष्टानां अन्यतमोऽक्षर एकादशमः(श?)स्वरेण युक्त तमेवाक्षरं लभते । (एपामष्टानां यः ॥ [५० १८५, पा० १] एकादशस्वरेण युक्तः तमेवारं लभते ।) एपामष्टाना य एकादशखरेण युक्त स एव लभ्यत इति ॥ ३१३ ।। जो हका(का)रे म(ग)मओ, पुह()त्तो सो इहं विसग्गमि । एयस्त णविर(वरि ?)पयडी, संखा वि य तत्तिया चेव ॥ ३१४ ।। अकारः सानुस्वारः यया हर()कार प्रामुवन्ति(प्राप्नोति)। एव हकार[:] सविसर्ग-15 हकारमेव प्राप्नोति । द्वादशानां [प० १८५,पा० २] स्वराणा यन्तु (पस्तु)भावः स वर्णितः । प्रकृतिशब्दः स्वभावपर्याय इति ॥ ३१४ ॥ समाप्त ।। अणमिनगगव(हते य अ ?)यारे, अज खाट च तथा वाय(१) एकारे । अभिघाइ अट्ठमे पंचमंमि ॥ ३१५ ॥ अकारेण असा म हा तर(?)ककारस्वत्य(स्वाय)तो व्यवस्थितेन ककार एव लभ्यते । अकारे । अनमिहते व(प)कारस्याप्रतः स्थिते चकार एव लभ्यते । आकारे अनभिहतं(ते) वकारस्यामतः स्थिते टकार एव लभ्यते । अकारे अनमिहते तकारस्याप्रतः स्थिते तकार एव लभ्यते । अकारे अनमिहते यफारस्याप्रतः स्थिते [प० १८८, पा० १] यकार एव लभ्यते । एकारेण युक्त सकारो(रे) फकारो लभ्यते । एकारेण युक्त छकारे व(च)फारो लभ्यते । एकारयुक्ते ठकारे टकारो लभ्यते एकारेण युक्ते धफारे तकारो लभ्यते । एफारेण युक्त रेफे यकारो लभ्यते । अष्टमस्य ऐफारस्य । एकार स्येव सयोगफलमुक्तम् ॥ ३१५ ॥ अणमिहते आकारे, ख छ ज झ तह अभिहयंति दो चरिमा । थट त ईकारंमि, उ फर प य चउरो [अ]आरंमि ॥ ३१६ ॥ खकारस्याप्रतः स्थितेन अनभिहतेन अ(आ)कारेण सकारो लभ्यते । छकारस्यामतः स्थितेन अनमिहतेना[प० १८८, पा० २]कारेण छकारो लभ्यते । जकारः सानुस्वारः जकारमेय लभ्य(भ)ते ।। (छिकारस्यामतः स्थितेन अनभिहतेनाकारेण छकारो लभ्यते । तकार, सानुस्वारः जकारमेव । द्विलिखित पाठ एप रेनकप्रमादास् । आिदर्शेऽत्र ५-६ अक्षरपरिमिता पक्कि शून्याक्षरा वियते । - . बयपागुरनाम लिमियाजम् । [ग्मपा २१-१९] पम्प) सारा सरिसर्गो सभर परम्पते । हारपणे रमन मम | AR भरपुरारमेव प्रायोति । सरकारपुण म मरे । रेप पारेप समवे 11 १८५ प.] जह परम सत्रामाण, ताजाय नमाण सह य सहाणे । परम-वाइयागुणासिय, पाप कृमि भणमिहते ॥ ३१ ॥ पारमारतोऽनवरमपिता बममिव इसरो गमरमेरमते प्रामामठोर मरमिता पनमिहर रोपभरमेन छमते स्परलामपोजवरममिव बलमिएस इम रमरमेष म्भो । एभरमामतोऽनंवरमालिकामित मरमेष प्रासोनिगम भरस्मयोऽनतरमालितो(वा)रोण) पपरमेषम्मठे। उपरताप- - दोनपरमरसिटन मनमितभारमेर समवे । सनरमातोपावरमसिन [धन- मिहता रा सभरमसानोति । सवार पोप्रासबुक: कोमा मते । एमय मोम- रसंपुजा पोम प्रमते । उपर मोचारसंयुगेम मरे । पर बोमर पुस [ो मते । पभर मोकारसंपुजा पोल पम । बोरबोप्रा समते। कार मोगरमपुका स(सोहरम ए मोमोजा(मोमिता पारमोन -धरमपलिये पकारमेव मान्मरोग मिरो मारमावोऽस्तरमालिया सभरमे मते । परोऽनमित बगरमामा लिया हमरोणमिाहट एमालामवा सिवा र म | सारोऽनमिता साहसारमा मेर) मामतोऽतर- मनमिया अमुलारमेरमा मते । पपा पूर्णपापा मममम बारम, सामसर पारस प्रयोग चपा पूतीपस्प पारस, मममसोमरस प्रपोगो पर्मिता पमा सार गाचाम्परेप्पी ॥ ३१.॥ अमिपाइएमु उठे, हबद हमारो हु भट्ठमो णममो । 110) उपतु सइयश्शुणासा, समसरे तिष्णिक भबमा ॥ ३१॥ रोमतोऽनचरमपमिदन गोप्रमा)मितो एम प्रमोति । मभरमारतो परममिवो पमरा भतुवा मनोति । सारो पबमलरेप पुसूची sk प्रायोति । 'भवमा मप पन्तपम [] १८॥ पनम-सइयाणुणासा, पसा य योण्ड पि अंतिमसराण । माया(पानीमाइमो करणो, णामण य) इयमोहिमओ एस ॥ १९॥ प्ररमो पारा बनुन्धरेम नगरेन पुगे र ममोह। रमा सविसर्ग rat ध्म । पायो मारा मान्यता र उमटे । म पनिसमा समरमेष पवे । पप्र० सामुम्बा मा मोहिमरा परिसः समरमेर एमवे । सभा सानुबा मामोनि ॥१९॥ ॥ प्रापिंशतिकरण समान । परमोदितं माम समाप्तम् ॥ सावता विनोमा माछा [गार्थी ३२०-३२३]] प्रभव्याकरणाख्य उत्तरसरसंजुत्तो, जइ उत्तरवंजणो य दीसेज्जा । पावइ य पढमवग्गं, अहरस्सरसंजुओ तइयं ॥ ३२० ॥ उत्तराः के ? 'अ इ एउ' इत्येतेषा चतुर्णामन्यतमेन युक्त[:] प्रथम-तृतीयवर्गाक्षराणा क च ट त प य शा ना, गज ड द वल सा ना अन्य[प० १९२, पा० १]तमोऽझर आत्मीयं वर्ग लभते। यथा 'कि' क ख ग घा नां मध्येऽक्षर प्राप्नोत्युत्तरानुवलितत्वात् उत्तराक्षरम् । एवं सर्वत्र । अधर- खराः के ? 'आई ऐ औ' । एपां चतुर्णामन्यतमेन वरेण युक्तः तेपा प्रथम-मृतीयवर्गाक्षराणां अन्यतमाक्षर तृतीयं वर्ग प्रामुवन्ति(प्नोति) । यथा 'की' ट ठ ड ढा नां तृतीयवर्गाक्षराणां मध्ये उकाराक्षरं प्राप्नोति ॥ ३२० ॥ उत्तरसरसंजुत्तो, पंचमवग्गं तु पावए अहरो । अहरस्सरसंजुत्तो, सत्तमं पावए अहरो ॥ ३२१ ॥ उचरस्वराः के १ 'अ इ एउ' । एतेपा [प० १९२, पा० २]चतुर्णामन्यतमेन युक्तोऽधराणां ख छ ठ थ फर पाणा, घश ढघभ व हा ना चान्यतमाक्षरः पंचमवर्ग लभते । यथा सकारस्यो- परिगतोऽकारः पंचमवर्गाक्षर प्राप्नोति । उत्तरानुवलितत्वादुत्तरम् । एवमन्येऽपि । तथा घकारो- ऽप्युत्तरखरसयुक्त पंचमवर्गाक्षर [प० १९३, पा० १ लभते । एव सर्वेऽधरा उत्तरस्वरसयुक्ताः पंचमवर्ग प्राप्नुवन्ति । अधरस्वरा 'आई ऐ औ' एतेपा चतुर्णामन्यतमेन युक्तः द्वितीय-चतुर्थ- 15 वर्गाक्षराणामधराक्षराणामन्यतमः सप्तमवर्ग प्राप्नुवन्ति(मोति)। यथा सकारो अधरस्वरसयुक्ताः] स[प्तम]वर्ग प्राप्नोति । अधरानुवलितत्वादधरः । एवं छका प० १९३, पा० २] रोऽधरस्वरसयुक्त[:] सप्तम]वर्ग प्राप्नोति । तत्राप्यधरम् । तथाऽधरोऽप्यधरस्वरसयुक्ताः] सप्त[म]वर्ग प्राप्नोति । वत्राप्यधराक्षरम् (?) । एव फरपा इति । तथा घकारः सप्तमवर्ग प्राप्नोत्यधरानुवलितत्वाद- धराझरम् ॥ ३२१ ॥ एवं लमंति पढम(मे), वग्गे सरवंजणेहि संजुत्तो(त्ता)। उत्तर-अहराणुवला, लभंति पुवावरं वग्गं ॥ ३२२ ॥ यथा प्रथमवर्गे सु(ख)राक्षा]सयुक्ता लभंति अक्षरान् तथाभिहित पूर्वमेव । ते च खरा उत्तरानुवलितत्वादुत्तराक्षर प्राप्नुवति । [१० १९४, पा० १] अधरानुवलितत्वात् अघराक्षर प्राप्नुवंतीयेतदपि पूर्वोक्त पुनरनेन स्थिरतामापादयता वर्णितम् । पूर्व इत्युत्तराक्षर उच्यते । अपर ।। . इति चाधरो मण्यते ॥ ३२२ ।। उत्तर-अहरसरो वा, लग्गो जो जंमि वंजणे होज । उत्तर-अहराणुवला, लभंति तइ(ई)यसरं तत्तो ॥ ३२३ ॥ उत्तरखरा(र) इकारः, अधरखर ईकार[:] उत्तराक्षसरघरो(?) विलग्न उत्तराक्षरैः उत्तरो चिलमा०] तस्मात्तृतीयखर प्राप्नोति । इकार[.१] तृतीयस्वर प्राप्नोति ॥ ३२३ ॥ ॥ उत्तराधरसंपत्करणं समाप्तम् ॥ १ 'उत्सराक्षरैरुत्तरो विलन , अधराक्षरैरधरो यिलमः' इति मन्य मूलानुसारेण । नि० ० शा० १० , M अपपारम्पम निमिक्ताम् । [गापा ११४-२२५] पढमो तामो य सरो, पहाईए सम फकारेण | [प re] मइ वीसइ सो लसरमार, कयग्गए अक्सरं एवं ॥ ११ ॥ मसालयमामारी पारलापलितमामोsist मा प्रथमा जरा बोसो वा पाप कर मामोति। ततीपलरेनगुनासभर भानिमिवानामरामा कामगरम 'मवे।तरानुमिततात् चरम्। एषमम्मेप्री प्रबम-प्रतीवर्गाषण] प्रभाषयसपलिया बारे(प)मवोऽनतरमपक्षिण परेप मा पुगमा) सरपर पमन्ते ।। ५१४॥ एएहि व सहिओ, लाइ खकारो पबग्ग एरे । ताप-परिमा [१ १९५, सबग्गे, लाइ पकारो टवर्गमि ॥ ३२५ ॥ प्रममखरेम प्रकारेमामयोऽमतरमपलिन कारण मा दुखममा पारेकमम ममते । चनुपनिवस्ताएपरम्। दीपवर्गापयमा गवसाम परिमाना म्ममय मामो मम्बदमोमरोमकारेऽमतोऽनतमपमिते भरेप पुजा सीमा प्रयो। मुपनिवत्वाचरम पमएम प्रकारेऽमयोमरममि परेप पा पुरे पअपरा) गर्म- कमवर प्रामोति चयनुपहिवालानुचामेति ।[१५गापारमापि पसार मध्यरेल पम्ने(ति) रमना-पग पता एप लपैक) पभरपुको पराका प्रथम •गरेप पर पमठे । एवीपेन पाम् । समारोऽरवार विीपारामाही पण पहिवतापारमा रमापूर्णकला सादा पछानिसमा समय प्रमाण पुजाकार मवे, पुतीसुवास चना-4 पिपरीम भेषणमा परभरामी परिचमामा पर्यवे-) वर्गम गुम पालन भाषा-अनामि । बध्यायः-मामि। बताया- ए- *वर्ग-रचना । । मनापा-टिप। पापा-Trt no.1 भमाषा-निर । मापा परि। वर्गस रपमा-४रि।बमापा- पपपिप । बमापा-परमापा-भिमा-पान- पपपिपपिपरियमिप ममपीस पद। नमामा-सRस | मामा-लामाल Ram-महिला पिग। नमाषा-सससि । मामा-HिD रिपावरसम्म सचमणबमैहि सम, लला कारो पवग्ग एकेक । वाय-परिमा वि एष, सटवम्गे पवयम्गे य॥ १९॥ मनारमा सामेन एपारेन पुत्ता मवमेन गयो गरेन दुजा पा ९. मम । वा परिमो मा साम-बम-भरात पारेका परम् । परामुइति । पपा समरा सप्तमेव मानेमाहरेष पुणपरमपर चरा परिततातरम् । मा पाय सप्तमेन नबमेन पाहोन पुणे परिसर मवे त्तिनुपस्वित्वाउचामिति ॥१७॥ २ टवर्गस्य च प्रथमाः। ककार-चकार-टकारोचे (राश्चै)वम् । एते प्रभादौ उकारेण सह दृश्यमानाः [गाथा ३२५-३३०] प्रमव्याकरणाख्यं सेसाण वि एस कमो, चादीणं अट्ठमा(५० १९७, पा० १]वसाणाणं । अहरुवि(व)रि एकेकं, परिहा[य]इ वट्ट(ड)इ अहरो ॥ ३२७ ॥ प्रस्तारेणास्याओं दर्शयितव्यः । शेपाणामध्येप क्रम इति । प्रभाक्षराणामावि स्थितस्य ककारस्य चकारस्य या चकारेण वा ककारस्य युक्तस्य यथावस्थवर्गाक्षरलाभ उक्तः । चादयोऽपि इकारान्ताः सप्त सप्त प्रस्त(स्ता)रेणयुक्ता उफारयुक्ता] पूर्ववत्सवर्गादेकमक्षरं लभन्ते । उत्तराक्षरो- ऽघरखरयुक्तः परिहीयन्ते (त) [५० १९७, पा० २] अल्पसंख्यो भवतीत्यर्थः । अधराक्षरोऽधरस्वर- युक्तो व ते बहुसंख्यो भवतीत्यर्थः । एतच विस्तरेण वर्णितमिति नोक्तम् ।। ३२७ ॥ आकारीकारेहि, लभइ समेओं ककारो [य] चवग्गे । तइय-चरिमादि एवं, लभइ खकारो य-ट-तवग्गे ॥ ३२८ ॥ ककारः आकारेण युक्ता चवर्गादेकमक्षरमघरानुवलितत्वादपि० १९८, पा० १धरं प्राप्नोति ।। ककार ईकारेण युक्त[:] टवर्गे अधराक्षर अधरानुवलितत्वात् । एव तृतीयगकारः, पंचम- र(?)कारः क्रमेणाकारयुक्त चवर्गाक्षरं, ईकारेण युक्तः टवर्गाक्षर अधरं अधरानुवलितत्वात् । सकार श्राकारेण [युकः] टवर्गे अधराक्षरं प्राप्नोति । प(स)कार इ(ई)कारेण युक्त[] सवर्गादेकमक्षर [५० १९८, पा० २] लभते अधरानुषलितत्वाघरम् । एवं द्वितीयवर्गाक्षराः शेपाः सकारेण क्रमेणाकारयुक्तास्तृतीयवर्गाक्षराणि लभन्ते । इ(ई)कारयुक्ताश्चतुर्थवर्गाभर प्राप्नोति । (मुवन्ति) अधरानुवलितत्वाधरम् । अन्यगाथया अमुमेवार्थ प्रस्तार्यते -- ककार आकारयुक्त ईकारयुक्तच क्रमसः(शः) चवर्ग-टवर्गों लभते । यथा-काघ की ट । अस्याधः [प० १९९, पा० १] खकार-थकाररचना-खाट खी थ । अस्याधः-गाचगीठ । अस्याघः पकारः आ(आई?)फार- युक्तश्च । व-पवर्गों प्राप्नुवन्तः (प्राप्नोति) ॥ ३२८ ।। त-पवग्गेसु धकारो, दोसु वि एकेक्कयं लभे कमसो । सेसाण वि एस कमो, चादीणं सबवग्गाणं ॥ ३२९ ॥ घकार आकारयुक्तः तवर्गादधराक्षरमवामोति । घकार इ(ई)कारेण युक्तः पवर्गादेकमया- मोति । क)कारादयश्चतुर्थवर्गाक्ष शेषाः पद आफारेण युक्ताश्चतुर्थवर्गाक्षरं प्राप्नुवंति । ६६३)कारयुक्ताः पंचमवर्गाक्षरानधराक्षरान] लभन्ते अधरानुवलितत्वात् । यतौक्त(थोक्त)क- 1 [१० १९९, पा० २]मेण । एवं च चकारादयो हकारान्ताक्षरा आकारेण ईकारेण वा युक्ता यथा प्राप्नु- पन्वि वर्गाक्षर(रा)तयाभिहत (i) प्रस्तारोऽत्र लिख्यते - अनन्तरस्याधस्तात-पाथ पी में। एवं डाफारः चकार । ही टफारम् । स्थापनादनन्तरस्याधस्तात्-डच डी डा। एवमेतौ द्वितीय- चतुर्थमात्रौ शेपवर्गानुसार (सातोsपि वक्तव्याचा(न्यौ यावत् स्वर्ग [प० २००, पा० १त पूर्वत्या गाथया घवर्ग आ क्रान्तक्रमेणेति ॥ ३२९ ॥ क-च-टादीनां पढमा, चरिमो(मा) य समं लहसु ('हं तु) कारेण । लमइ तवग्गे एवं, साणुस्सारे य सविसग्गे ॥ ३३० ॥ ककार(?) क च ट वर्ग-त्रयस्य प्रहणम् । आदिशब्दाच्छेपवर्गाणामपि कवर्ग-चवर्ग- । 'मसावेवाः प्रस्वार्यते' अथवा 'भमुमेवार्य प्रस्वारयति' इति मध्यम् । । वदर्यगाथामाइ- 20 4 अपपारनाम निमिपमासम् । [ग्य.] NA मंच इमत पार-पषस माय मरका पर समठे ।पमा गरेप पुल परम्। रासकारम् । मामासस्पानिममेन सेपपणामपि परमा। पपयेष कमेप-समम एते उमरपुषण पर एक मवे(म्)। पपा एमर पर शुभर पर पुकार सराई [१षमा-पपुषहरा(स) । मारता-पारपुर। जस्तापात्-पापुल। इस । ततः पंचमा-शुप। पुप । पुस । बसाया था- मारा। पर्व परिसरबमास पा रमना पहारमापि कारमा यापमा परिमा यस स्मरेत गावाची पानावःतया में प्रमेवता पाम्पाते - 'व पपम(स) मिना जोन पिरमम्तिम्पायेन पावर पमर-समार-सकाएको फारसदिवान कमेमेष पम्पिासिमरनमा पारसमणका "माफ्नाम् । मपुकापुर। बसा हुमा। इसरठ।पमापा-डर। पुगठबमम । मापार-तुम । मुग। पुम् । गुम। मसापा-ई। मु। बुमार। पर्ष पवा व पप वर्गापमपणो अग्विा) परेप मामा पेपमा । पा-कारेण सा पवितम्या इति । पाम्मावमेव समवि दयों एब'मिति । 'वास्तारे य तस्तिो इसम गावापमासम्म पाम्मा पिपवे-प-पवर्ग- -पक्षणा परमार-पापा पानुम्बाप-4 एवं पूर्वमा नया स्मरदिप ममम्ते । पर बिदुनिसर्गाम्य भलि । निमोनमोहरणम् - निमुसरिया पर ममते, बाइसेपा() ()भारम्, पाप कारम् । सापमा-गा। मणापा-कार ।। बमामा-मम(न)। सानापा-पे। संभावसापा-गम मुरपी म । पा) | rat समासारगति । अपर "पुरल) परमेष । सविसपिये) पपा-काप ।। १५ ] पापा- पाजार (3) सापा- पाnel मापा- गम । मारना। मसापा-मा में मारापमा परी पानुष्यरल (स)- रिसर्गणमेव पणिाम पपा 'वयम्' इवेगामार मारा-म()। 8()। बसापा-मा। पाप its। [1]। पल)ग। मे •ाबमाप-10 मे भाग(स) पावसामाई। में पाप Ite सरिस (ों वर्ष पा-दानापस । अमापा- पा भाप । पाठ। ममापा- पाग] | सार। बमापा- मामा पापसान। नम्पापा-पाई। मापार! पानुम्पर-सिगारेती । परापमा पनात्रमेव परपOn .॥ सिरमालामाल करपा प्रत बमाभिः। -राम। सामागी मानापामा KE 4.पा. 4 14 . मा AT IITU १. HAI.. बा प्रभव्यापरणारय > उत्तरव्यञ्जनसहिता यथा-फू चूह तूपूयूशू। ऊकार अधस्तात् उत्तरव्यखनसहितो लभते [गाया ३३१-३३३] कचया(टा)दीणं पढमो, चरिमो य समं लभंतुकारेण । लमहाप० २०३, पा०२] तबग्गे एकं, सागुम्सारे य सविमग्गे ॥ ३३ ॥ 'क घटादि' इत्यनेन कपट य प य शा ना प्रथमो वर्गः । तृतीयस्वराः(वर्ग) गजट द य ल सा नां । पनगाहमण न माः । एवमेवादिमण नमर्थितं भवति । एते फ घटा व्यः उकारसहिदा यथा-फु चुटु तु पुयुशुममो(गते?)धम्नान पचमवर्गोत्तरान् लभन्ते यथा-तपय , स(श) । अफचट । तृतीया[प० २.४, पा• तु गज या क्या कारमहिना यथा-जुगु(गु जु) हुदु(य) लु मु । एतेऽपि त्य(म्य)म्मान फ्रमेण पामो परमो लभते (1) द प ल स गज उदया (हान्यः) । संत्या उकारयुक्ता यया-पुणु नुगु । ग(य)वर्ग-शवर्गयोः पत्रम• फ्रयाशन्दः, हिकाशन्दशा प्रमगले सायपि भुत्या पंचमम्म य-सवर्गप्राप्रियति । यथा- ग य य स दु । क्रय- शन्दः, हिषाप० २०४,पा० २ दश। एते सप्त । "फचटा दीण पदमो ताजो परिमो सम ॥ उफारेण लमद तपग" इत्येतद् व्यायातम ॥ ३३१ ॥ ख-छ-ठादिएहि सहिया, एते उ हवंति छट्टए बग्गे। घ-अ-ढाइएहिं सहिया, सत्तमवग्गे लभे एकं ।। ३३२ ॥ यफार उपारयुक्तः पष्टे पर्यगंऽनरगुचर प्राप्नोत्युत्तरानुयलितत्वात् । छार उकारयुक्त शयर्गे उत्तरानुयलितत्वादुत्तरम् । ठकार उकारयुक्तः अपर्गे उत्तरानुपलियत्यात् उत्तरस्परम् । ॥ एवं धफर सा(पा)[अ] पि । सकारः अनुम्बारयुक्तः पठे पर्ग उत्त प० २०५, पा० १]राक्षर लभते। स एव सविमर्गो युक्तोऽधरम् । छकार सानुस्वारः सवर्गे उत्तरमवाप्नोति । धकारः सानुस्वारः अपयर्गे उत्तर लमते । विसर्गयुक्तोऽधरम् । ण्य छकारोऽपि [म] विमर्गयुक्तो यरर्गेऽधरमिति । एवं धफरपा वक्तव्याः । एव गाथाप्रागर्दशत (१प्रागईशब्दार्यः । ) 'घन दाइएहिं सहिया' उकारविन्दुविसर्गाः । (घ)फार ओ(उ)कारयुक्तः सयर्गे उत्तर लभते । विन्दुयुक्तः सवर्ग एवोत्तर लमते,। स एव धकार. विसर्गयुक्तः तोषाधरमिति । एव अ(झ)फार उकारयुक्त सप्तमे सवर्गे उचरानुवलितत्वादुत्तरं, स य चिन्दुयुक्तः [५० २०५, पा० . ] तस्मिन्नेयोत्तर लभते । विसर्गयुक्तः अधरम् । एव ढकारोऽपि । एव च सर्वहा(?भ व हा) अपि स्वस्मात्सप्तम वर्गाभर लभन्ते ॥३३२॥ उत्तरवंजणसहि[या], सत्तमवग्गे लभंति सेससरा । अहरेहि अ संयु(जुत्ता, लभंति अहाहरे वग्गे ॥ ३३३ ॥ उत्तराः [प० २०६, पा० १] प्रथम-तृतीय-पञ्चमयर्गाक्षराः परिशिष्टेः स्वरेः 'ऊ ऐ औ' इत्येते- स्पृ(स्त्रि)भिर्युक्ताः आत्मीयादात्मीया[त् ] सप्तम ईकारयुक्तो लभ्यते । प्रभाक्षराणामादिस्थितस्य यदाऽपतः हकार इकारयुक्तो दृश्यते तदा टकार इका[प० २०६, पा० २]रयुक्तो लभ्यते । प्रभा- क्षराणामादिस्थितस्य यदाप्रतः टकार औकारयुक्तो दृश्यते तदा दकारो लभ्यते । अधरवर्गा [अ]- घराधरमक्षर लभन्ते अधरस्वरयुक्ताः । इत्येप पश्चा (ई)गाथार्थः ।। अथवाऽस्य(स्या) गाथ(या)या व्याख्या - उत्तरव्यजनशेषस्वराः 'कऐ औ' प्रयोऽप्येने क्रमसः(शः) सर्वस(१)वर्ग यथा - श अ क च ट त पा तथा उत्तरव्यञ्जना येषु वर्गेपु अघरा नालin .८ अपपायुम्नाम निसिपनामम् । [गापा ५४-१५ पवारपरापयन् । बमा परम्परामा-गूपर सम्पर्य समि। कमेपैर समयमा, एए पर्गेषु भमरावपशिवलारपरं मन्ये । बबा रम्न मममस.) सप्तमवर्गा पणा मेन पिएनुरशिवनारायणमिति । (परन्तर पारसरित पा-१ | मिस्त मसा(मा) पु बर्गेपु पाविमा भाति । पत्ताभरापरे। एमापा गभरोजी पेमपुष पचम्यापमा परमेति । वमा मौरभ परममा । पोयो पोरस)।म्बित सप्तममर्गत् पपपपडितलारपण एवं मारने ममा रोमीति। पर्ष म्भर-पेपर-भरपुमा भए मप[] सन्ते । पाप रूपू । गम्पित्यूपते पपरमपहिवतापरामेष । पापा * पवा, पापम्पूमामिम्मो पर्गेषु नभएपरिवत्तापपपपरसम्मिा मागम पषा मारपुषमा कारोभयपपि पापानिधि एवं पायपरेषन्मने । पुणे मार्च . लमह सकारो शुचो, पकारकगमि तइय-परिमेण । [त वग्गे जाइ पण्हे, समसरोहर १. इनों यादीर ॥ १० ॥ का प्रमायरामामादिमिति(व) रेप मालुहारेण पुजा गरिमा मते । ज्यसत्यमुपसियाताम्म। प्रतापपपामोशरणारिमन परामद बामपुरमोहरते परा भामरपुष्यभर एप परभरणारमियम प्रभाधर(पामा ] साराभरपुले गरे वा पर एक भिरमुख्ने उम्पते । प्रमामयनामोमरस पामग भलारपुणे ते परा प्रामरो समवे। बोमरारिमन पदावा भरभर -पुणे रातीबाग्मते। प्रनामप्पामानिसमा सरल पारामा मर पाभरपुणे परवे वा पार पाल्पान म। मनामनामनिमम बारम भाप्रपा पार परएजो वे वा तमरो परे। पौधरमामा पारो परावे परा-पापाते। बोरामवासियर परम्परा भामा बामगर भास्पा मवे ॥१४॥ वितिय पउत्पेहि समं, सरेहि सो व लमा त-स्वम्गे । सचम-गवमेहि सम, सेसेहि समं महबग्गे ॥ ५५ ॥ पूरो नमामा) गाथा मतपमाया बर्षिया । मनामनामानिन परमानना होगा पपवे। बोबारक परिमल पर एमापुम पेकार बने । बोबार ममानिसमामा पाभर चासुधा पोती मते । सारम ममानिसमा ...ममा रमय(वर) व मते परम प्रमामिलामा यमरा का समवे। करम ममारिननाममा निमा[o dwt एमवे । सारस मारिक म्पनका तर योमरम्मते । भरम मसारमता सिवन [प] पेश मवे । इगरम प्रमारिखम॥१५॥ समापदराबाद। म , प्राप्नोतीति ॥ ३३६ ॥ . . जई पुच्छइ कम(सोरं तो, करेज्ज अहाप० २१२, पा०२ रुत्वरं कमसो॥३४२॥ [गाथा ३३६-३४२] प्रश्नव्याकरणाख्यं वितिएण य संजुत्तो, चकारवग्गो लभइ [५० २१०, पा० १] तइयवग्गे । पन्यवग्गे पुण लव्भइ, चत्तारिस(म)एण संजुत्तो ॥ ३३६ ॥ चकार एकसंख्याक कः], ककारोऽप्येकसंख्य एव । ततः संयोगा[द]‘क्रान्तिकसंज्ञः। कस्मात् । तुल्यसंख्यत्वात् । यथा 'च'। स यत्रतत्रस्थः प्रश्नेष्व(ख)वर्गान् प्राप्नुतः(प्राप्नोति)। टकारः ककारयुक्तोऽर्द्धक्रान्तिकसंज्ञः यथा । स यत्रतत्रस्थः प्रश्ने पवर्ग प्राप्नोति । चतुर्वतकारेण । युक्तः [५० २१०, पा० २] फकारोऽर्द्धक्रान्तमापन्नो यथोक्तः स यत्रतत्रस्थे(स्थः) प्रश्ने तृतीयवर्ग जो अ ककारे गमओ, भणिओ सो चेव तइय-चरिमाणं । आइम-तइयामिहए, लभइ तकारो हु त-पवग्गे ॥ ३३७ ॥ यथा फकारः प्रथमस्वरेण तृतीयस्वरेण वा युक्तः सवर्गाक्षरं लभते । एवं तृतीयवर्गाक्ष- ॥ राणो गज उदय ल सा ना, परिप० २११, पा० १]माणां हमण न माना चान्यतमाक्षरप्रश्ने प्रथम- खरेण तृतीयस्वरेण वा युक्तः आत्मीयवर्गेऽक्षरमवाप्नोति उत्तरानुवलितत्त्वादुत्तरम् । खकार: प्रथमखरेण युक्तः तवर्गेऽक्षरमेकं प्राप्नोति उत्तरानुवलितत्वादुत्तरम् । स एव पकारः तृतीयस्वरेण युक्तः पवर्गेऽक्षरमेकमवामोति उत्तरानुवलितत्वाउ(दु)त्तरम् ।। ३३७ ।। लभए वीव(इ)यजुत्तो, चकारवग्गो य तइया प० २११,पा० २ जग्गं च । । चत्तारिमएण समं, लभइ यकारो पवग्गं उ ॥ ३३८ ।। चकारो द्वितीयस्वरयुक्ता टवर्ग प्राप्नोति । यफारश्चतुर्थस्वरेण य(प)वर्ग लभते ॥ ३३८॥ जह मेओ उ चवग्गे, तह य कवग्गंमि चेव णायचो । एवं चिय दा(ता)दीहिं, सरेहिं भेओ मुणेयवो ॥ ३३९ ॥ यथा चकारो द्वितीयस्वरयुक्तः तृतीयं वर्ग प्राप्नोति एव्यं(व) फफारोऽपि द्वितीयस्वरयुक्तो ॥ द्वितीयं धर्ग प्राप्नोति । तकार-चकारावप्येवमेव ।। ३३९ ॥ एमेव सेसयाणं, चादीणं अट्ठमावसाणाणं । सरवग्गाण य जोगो, अद्धकंतकमो होइ [५० २१२, पा० ११ ॥ ३४ ॥ एवं यथा प्रथमवर्गः शेषाक्षराणां शफाराष्टसप्त(टमा)ताना तृतीयवर्गाक्षराणां गज उदय छ सानां चतु:सख्यानामक्षराणा यः सयोगः सार्व(आर्द्ध)क्रान्तिकसज्ञः । वस्य सयोगस्य अधस्तात् । योऽक्षरः स तृतीयवर्ग प्राप्नोति । तुल्यसख्यस्य स्वरस्याक्षरस्य च यः सयोगः सोऽप्य क्रान्तिक संहा। एसीयवर्ग प्रामोति ॥ ३४० ॥ पण्हाइमसंखाए, सधे पण्हक्खरे गुणेऊणं । उवरिल्ले पक्खेउं, आइल्ले अट्ठहि विभाए ॥ ३४१ ।। सेसं वग्गे णामक्खरं होइ ।* , ॥ मूलादर्श अस्या ग नाश एव पूर्वार्द उपफम्यते । खण्डितप्राय इत्यामाति । - ८० अपपारनाम निमिपमम् । [पना ३१५-1] प्रमाभरमम्मे पारितराया परिमाचीवाना व संयुष्मनपा पाप- सरसंस्पा वामे हम पग ( सापयेत् । परिपालिहानो ममासपी रिपमानापरवाना मा सेप्मा सामे प्रेम्स स्पापमेव । पपपपपपपो पर मुनि-रस-मापार-मापन पम-पदाः श्रमसो(मो) गुमा] 1 प्रमापरात्री मात्रापार मतिमो गुपापण, गु • पिसा सापिट भमोऽसरसंप्यासुपरिप ११ रामर पहसापिता और प्रक्षिा- मिर्मागेऽपरदे पापाप्प ! मम्म(मे)ो। समर्गों पापिनायायामा पुनर्मागे ले सम्पानामबी पुनम्मम्मेिवे । पापापो सम्परः पास या ९१-२४५॥ एमेम सेसवग्गे, मामपसरपारयाग हमइ एक तु । जह इम्मसि तकरण, फरणेरिएम अपरापर तत्वो ॥ २३ ॥ ऐषपर्गापवर्म पर मामापरं सम्पते । प्रमाक्षरानो लपतिवामी मम्मे पूजामग्रपरम्मेपासमुत्रमार बापा ॥ १५ ॥ वर्गाक्षरसंयो.10 गोत्पावम समाप्तम् ।। । " . अत्युायासार-षिसमाविही, (गा)पयो हो सबमोमणे)। पठतु वि दिसामु एवं, यग्गे ण(गामस्तरुप्पची ॥ ३४ ॥ सवोम[] पचारमंतरेप न एमपते रपितम्। बालाररिसर्गमानेन पसरायमान सपना हवा । नतो मममसरबोमा(वनिरिसस्परसासनिकमा मुगुनगमागम- जीवितमरणापपि नामामरोत्पचिरपति मचारेण पपीत पनि सवोमदम महामा मूरामविषयापारमा(म्पापरणपत्रामपन्जि) न्यासमा [ ] Rowt) निपते । वा मूम्मतिपय मार्मम्मम्मे बना परम पूर्णता एभरायधिषवा पेपर। पपरवा पायरता भोगारात मितीपर्गे पूनियार सपना होणारपे रपिपात मा परपतु पति बरपास। पंचने पर परमप। भूयः पयपरमे पूरि नारिल-मोम-भुप-गुम्मावि-समू-सन्ता पा। सू(क)मौमापुरबारे पुनर्गम-पुप्पा-सेषण । मोमपन्दरे मषा प्याना। एला। पुल तरे वालात निघाला । पासोमम्वरे भनुपमा मेणाम्मनि । घरसनेमांतरे पापारामिमिलाम। एलमोपर पूरामा सोमयसरे पनि प्रचमिषा पूर्वमापा । पमोपरि चपमापा । पानामबारे रेषती प्रधिकी मरमी ति। गोन्परे रविश [.२७५ 1] ऐरिप्य मतिरामेति । सूर मार्ग । पखत् भगवरण पूनिगारितः ॥ मेष रूपग परापा पचप | मिपुम पोपरि गमरा । बोपरि मिथुनः। पियो पर नाम परमोपर सिरा। सरपन रभर सोपरि सम्मा(म्बा)। अपरनिसा(माओपा पा(ग)। पपमा [ .१५. भर gtink मम्मी। म [गायों ३४५-३४६] प्रश्नव्याकरणांख्य ८१ स्योपरि वृश्चिक । यरल व पंचसोऽयं कुंथशब्दो लकारोपरि धनुः । उत्तरतो मकरः। श प स ह पचमोऽयं हिंकृतः शब्दः शकारोपरि कुम्भः । क ख ग घट गकारोपरि मीनः । एवं सप्तमा- वरणम् । अष्टममिदानी-पूर्वादितः क च छ ज झन । ब ट ठ ड ढ ण । च त थ द ध न । पफ व भ म ] दयरलव । श प स ह । त क ख ग घड । च छ ज झब। एवा(वम)ष्टमम् । नवमं इदानी-पूर्वादितः च ट ठ ड ढ ण । य त थ द ध न । प फ ब भ म । श य र ल व । व श ष स । है। क क ख ग घ । पच छ ज झन । च ट ठ ड ढ ण । दशममिदानीम् - ट त थ द ध न । शप व मम । त य र ल व । क श प स ह न । प क ख ग घड । च च छप० २१६, पा० १]ज झे य। य ट ठ ड ढ ण । क त थ द्धन । एकादश(म)मिदानी- तप फ ब भ म । क य र ल व । पशपसह । घश क ख ग घर । ज च छ ज झन । न प ट ठ ड ढ ण । त थ द ध न । कृपफ व मम । द्वादश म] मिदानीम् - प य र ल व । श प स ह न । य क ख ग घ ङ । टच छ ।" जझम । श ट ठ ड ढ ण । त थ द ध न । क प फ ब भ म । प य र ल व । त्रयोदश[म]मिदानीम् - यशपस ह । ट क ख ग घड। श च छ ज झन। त ट ठ ड ढ ण । क त थ द ध न । पफ व मम । वय र ल वाय श प स हम। चतुर्दश[म]मिदानीम् - श अ, क आ, ख इ, गई, घड(उ?), बउ (?), वए, च ए(२), छ उ(ओ), ज (ओ), झ , म । क अ, ट आ, इ, द(ड) ई, ढ उ, णेज(), प ए, व ऐ, प ओ, द औ, ध, न अः। च[अ], प आ, फइ,वई, [पं० २१६, पा० २] ॥ मत, मऊ, य ए, र ऐ, व उ(ओ), ल (औ), व अ, ढ अः। दअ, [श] आ, [श] इ, सई, हउ, ख ज(ऊ), गए, क ऐ, ख उ(ओ), ग अ(ओं), घ, गः(ड) अः । पंचदशम]पूर्वादित भक च ट त प य श | ए। ऐख छ ठ थ फरष। आ। इगज ] द घ ल स । ओ। औ घश ढ घामबह-। ई। अक च ट त प य श । ए । आ ख छठ थ फरप।ऐ । गजड द व ल स । ई घ झ द ध भ व ह । औ। एवं पचदशावर्ण(रण)पर्यन्तोऽयम् ॥ ३४४ ॥ [प० २१७, पा० १] ॥ ॥ सर्वतोभद्रः समाप्तः ॥ सर्वतोभद्र इति महरि(ऋक्षराश्यक्षरविधानेन येन केनचिद् यथा दिस(श)मायातस्या- देस्यो(श्या)क्षराण(णि) च ग्राह्यानि । अन्यत्र विधान इति । मंगलार्थं च इह लिखितमिति ॥ छ। , कंठतरिओ वि उरो, उ(प?)रभारं(?) सो न गच्छए मोत्तुं । अवसेसंति(समंत?)रिओ पुण, आइल्लमणंतरं पावे ॥ ३४५ ॥ अइएउ' एते कठ्याः । एतेपामन्यतमो[प० २१७, पा० २] हकारस्ये(स्य) प्रश्नाक्षरादिस्थस्य थवाऽप्रतः तदा हकार एव लभ्यते । 'अ इ एउ' एतेपा कठ्याना अन्यतमादिस्थस्य 'आई उ ऐ औममा एतेषां अपरिशिष्टस्वराणा अन्यतमो यदाऽप्रतः स्थितमेवाद्यमन्यतरं तदा कठ्या(व्य) खरं लभते ॥ ३४५ ॥ उक्कारादिसु एवं, पढमंतरिओ ण एइ परभावं । अभिहम(म्म)तो पुरओ, आदित्त(?)मणंतरं लभइ ॥ ३४६ ॥ उकारस्य हकारस्य प्रथमस्य प्रश्नाक्षरादिस्यस्य यथाऽग्रतोऽनतर ककारः प्रथमो दृश्यते वदा हकार एव लभ्यते । हकार(रे) ककारेणालिंगिते आदिस्थो [प० २१८,पा० १] हकार एव लभ्यते । उफारस्य फल्यसयोगकरणम् ॥ ३४६ ।। नि.१० ११ . + म । मषारमाम लिमिपणम्। [ग AN-11] + तीस भायए सदा झाला ज सेस साहु तिही, यो क्सत्तकरण से ॥ लरामो जातिपीमो, याहीणा) रूपेण फण्णाहोपफ्ससस्स)। मुक पि दोहि भाग, माससनामादिरिक्सागण ॥ सरामममिनी मा राममोसपोरेपिंगमामा संग्राममायावनि पैहय एम्स(पिएमासेपारमानतिनियुपसागवानबाबत पठमो विसमो उ सरो, वितिओ य समो सरजमो सम्मो । विसमसमो य पठत्यो, सेसा एवं सरपठण ॥ ३० ॥ प्रापरामामारिनो गयो विप[म] इति इप्रसुल गारमेष ममते । प्रभावरिलो पर पारपुळे पामर एष पमते। पारो पिपम परयुपगार पर पम ॥१४ एवं समबममाण, घटल्या विसमवग्गयाणं च । गायबा वरमो, विसमा { ७९ । विसमाण सजोए ॥ २८॥ समसरे[] प्रयापरपमेष मते । निस)मलरेष पुच्छे रिपब यो। पर समायरो साता समसरे(एमा समाचपसमे समन् । विमल सिमामगर परमाचे ॥४८॥ समसमोरण समो, लमह म पिसमो प दिसमसंजोए । बग्गे दिठो एसो, मणिमो वगरसरविन १७९मामो ॥ १०९। समस्तरोगे पर सम प्रमते । पमयोगे तरबार बिमाबरो पम्पते । सम विषम पर मायोरलरषिमागे समिरिति ।। ३४९॥ ॥संकर-विकट समाप्तम् ॥ । वग्गसरा तिपु(गाणिया, सेबो पटमासरस्स वगंमि । सिमु पठम अपो अहे, तमि य णाम पसर बम्गे ॥ ३५ मप्रसगा। पर्ष वर्गाषण। मनापाको विपमानकराचा पाला मेमस प्रचि ला मनापयो कापरी रमन मम्मामा या पूरला -पत्र अधिक पसीना मां हर मामाचे पनिमेष सम्मा पिंगला परमिपाचामिर्माता मेरे पापनि जम्मा पुमा सतमिग पम्प)परमेयमापरियों सम्म ५.॥ मक्सरसरिसा जोमी, महासरिसे च जाणए रूप । एब सेण मिम, बग्गेण निरूषिो मेमो ॥ १५१ ॥ मला पापाचा पर वाया। बमबारेमा । [गामा ३५१-३५७] प्रभव्याकरणाख्यं जीव-धातु-भूटा। पूर्वोकर्जीवधातुमूलयोनिनिर्देशकार्यः(7) मात्राभिर्द्रष्टव्यम् । रूपं शुठं कृष्णं पीवं रक्तादि । लक्षणं दीर्घमल्प वृत्तं इति । जीव-धातु-मूलोत्तराधरैः पंचभिर्भेदः प्रश्नाक्षराणां निरूपयितव्यो वर्गप्रतिवन्धः ।। ३५१ ॥ [प० २२०, पा० २] पढम-तइए य चरिमा, वग्गा पासंडिया तहा भणिया । सेसा य अपासंडी, णिहिट्ठा पण्हइत्तेहिं ॥ ३५२ ॥ प्रथम-तृतीय-पंचमवर्गाणां अन्यतमबहुले प्रश्ने पाखंडिनो ज्ञेयाः। के ते ? प्रजिताः अरहन्तादयः आजीविकादयश्च । शेपाणां द्वितीय-चतुर्थ-वर्गाक्षराणा अन्यतमाधिके प्रश्ने अपा- खंडिनो झेयाः । [प० २२१, पा० १] अपापंडिन इति गृहस्था भण्यन्ते ।। ३५२ ॥ पढमो वग्गो पासंदाहिण (दाहिणपासं?) बिइ(ई)य एव चउत्थे य। रा(वा)मं तइए मज्झं, दो पासे पंचमं जाण ॥ ३५३ ॥ प्रथमवर्गाक्षरबहुले प्रश्ने तैरेव प्रथमवर्गाक्षरैरनभिहतैर्दक्षिणपार्श्वे पुरुपस्य लांछनं ज्ञेयम् । अनमिहतैः स(श)वप्रहार इति । द्वितीय-चतुर्थवर्गाक्षराणामन्यतमघहुले [प० २२१, पा० २] प्रश्ने वैरेव द्वितीय-चतुर्थवर्गाक्षरैरनभिहते वामपाधै लाछनं प्रत्येवव्यम् । अभिहतैस्तैरेव शरैः महारादिकम् ॥ ३५३ ।। , पढमसरे सिरभागं, णिडालय होइ तह कवग्गंमि । चिबुयं[च] चवग्गंमि, गिवप्पएसो टवरगंमि ॥ ३५४ ॥ प्रथमस्यरग्रहणेन अवों गृह्यते । तेन सिरो ज्ञेयः । कवर्गे निडालं । चव (प० २२२, पा० १] चिबुकं । टवर्ग प्रीवाप्रदेशा(श:) ॥ ३५४ ।। हिययं च तवगंमि, कडिय पवग्गंमि होइ नायबा । ऊरू [य] यवग्गंमि, जाणु पव(ए)सो सवगंमि ॥ ३५५ ॥ तवर्गाझरवहुले प्रश्ने हृदयं ज्ञेयम् । पवर्गयहुले प्रश्ने फटी ज्ञेया । ज(य)वर्गयहुले करू शेयौ । जाणु(न)पादौ सपर्गवडले ॥ एवं अष्टविभागागकल्पना । [प० २२२, पा० २] पंच(एव)- प्रदेसभागकल्पनार्यः(र्थमाही) ॥ ३५५ ॥ सीसो य अवग्गंमि, णिडालदेसो तहा कवग्गंमि । अच्छी य चवग्गंमि अ, णासा हु तहा टवग्गंमि ॥ ३५६ ॥ यदभिहित अवर्गयाहुले प्रश्ने शिरो ज्ञेया, तस्येदानीमवयवान् ] तैरेव वर्गाक्षरैराह- अवर्गाक्षरबहुले प्रझे मूर्खजाः प्रत्येतव्याः। [५० २२३, पा० १] कवर्गाक्षरपहले प्रश्ने ललाट नेयम् । घवर्गबाहुले प्रश्ने लोचने । स्वर्गे नासिका ॥ ३५६ ।। वक होइ तवग्गे, अहरोट्ठा तह पवग्गए मणिया । चिबुयं च [य] वग्गंमि, होइ य गीवा शवग्गंमि ॥ ३५७ ॥ वकारा(वर्गा)धिके वक्त्रम् । पवर्गाधिके ओष्ठौ । यस नियमः । हावर्गे प्रीवा इति ..... - 4

बसपाहरनाम लिमिचनामम् । [भाषा-
एसेस पराप ॥ व सेम, एतेमि भमिाएहि वम्गेहि ।
मसर्य तिलयं सस्प-क्लप प कमसो वियाणाहि ॥ ३५८ ॥
सिरमिण)प्रश्नो रे मरेका पैराग(च्या रनि(ब)मिहतो भपिक प्रमे) व
मोसो निरपरमो पम्पा । पमिस्वरुपगमपुण। पा(मामा)मिपावस(मिनिया से
परेशम्ििगतः मम पिम्पम् । अमिभूमिकामा (क) पैख सक
महारावर पोपणमा ॥ २५८॥
मणिएहि वयणदेसे, मम्गेहि य मभिहएहि जागिजा ।
मसय-तिलयाइ सप, पिण्डं गुरुपरसप्पोरसेम् ॥ ३५९ ॥
परमे पनि हानि पमिदविवानि रमिावरमरैवानि भाविक
कानि गुपपदेपेक्षेपानीति ॥ ५९॥
॥ भसविमागमकरणमंगप ॥
सचम-णवमो य रवी, चंदो वि म होइ पढम-सइएर्ण ।
मोमो बीस-बरत्ये, पंचम-छट्टो म ससिसुओं भणिमो ॥ ३ ॥
सप्तमसर पहार, पबम नमो) भणपणे सूर्पस । पाहा सम-तीय भारीयो
.शिवीर पा मापा ५ ॥ २६ ॥
एषारस सूरममओ, जीवो इसमे प महमे मुको ।
पारसमो वि य राह, एते सरसामिया ममिया ॥ ११ ॥
ना। मौ पुसः ।। [+ २४ णा। सराची सा(ला)मिल
मामला बत्रामविपरपपपपपपपोषण समन-बमा पोसावाविना बा ॥५॥
लरक्षेत्रमपनम् ॥
रवि-मोम मुफ-पु-गुरु-सणि-मांचोयो राष्ट्र मठमो एते।
मकचटतपयश बग्गाण हॉसि सेचाहिवा मियय । ३९२ ॥
परमावर्गालो : सेवापिप मा। पतिपयरपरूपी पक-
मिता(ममा)तिहासासिँगा इति ॥२१॥
पपास्सरसचमुरगांग, तिहिसहियं चमोमरचपरिसई।
मचासोहि मागसेसे, सुजा(मा)डार ५५ हा मुणेपणा ॥५॥
सर्म छरण वा (पाउरो, तिमि य पो तह प स्यमिक ।
स्रावीण एते, उमा(सा) समा तहा कमसो ॥ १५ ॥
रिपाराषपनम् ।। १५-११४॥
छाया रासी होग, पाहपसारम च होइ तीसगुणं ।
परसो वा तिणि सया, सट्टासतिदितं सा ॥१५॥

. '24 [गाया ३६६-३७३] प्रभव्याकरणाख्य तीसगुणं काऊणं, सीया(तीसा)ए हायए संया कालं । जं सेसं सा उ तिही, वोच्छं णक्खत्त-करणं से ॥ ३६६ ॥ लडाइ(ओ) जा तिहीओ, हीणा रूवेण कण्हपक्खस्स । सु(मु?)कमि(पि?) दोहिं च भवे, मासस्स नामरिक्खगणं ॥ ३६७ ॥ सर्पदा प्रश्नकालिनी छाया रास्य(श)यो द्वादश । होरेति पचदशानां सज्ञा । प्रश्नाक्षर।। [५० ११५, पा० २] [सी]मेतदेकीकृत्य तृत्सत्या(त्रिंशता) )गुणा शून्यक्षेपः ३६० वर्तमानातिथि- युक्तं च कृत्वा । शेष गतार्यम् । अनादर्घ(सी)मेतत्तिथी (थि)नक्षत्रकाढम् ।। ३६५-३६७ ॥ गंधवाह(इ) अवग्गे, दिवे विजाहरा कवग्गंमि । पमाहाहा() [च]वर्गमि, णागय(?) य(ट)वग्गमिति ॥ ३६८ ॥ [इयं गाथा अस्पष्टार्या । न चास्या व्याख्यालेशो लभ्यते । -सपादकः 1] जक्खा य [त]वग्गंमि, देवा भणिया तहा पवरगंमि । णागा य यवग्गंसि, भूया जाणे सवग्गंमि ॥ ३६९ ॥ वर्गाधिके प्रझे यक्षा। पवर्गाधिके देवा । यवर्गाधिके नागा | स(ग)वर्गाधिके भूताः ॥ ३६९ ॥ पेया य पवगंमि, जाण सकारे य तह पिसाया य । कोहंडा य हकारे, एवं जाणिज्जाप० २२६, पा० १ णुक(क)मसो ॥ ३७० ॥ , ख(प)कायधिके प्रश्ने प्रेवाः । सकाराधिके पिशाचाः । हकाराविक कुष्माडाः ॥३७० ॥ अणुणासिएसु असुरा, णायबा यं(मि दीसए जंमो । सविसग्गमि अकारे, जक्खा सुणया य संजोए ॥ ३७१ ॥ अनुनासिकवहुले असुरा । अ(म)कारः सानुस्वारः, तदधिके प्रश्ने यमो शेयः । अकारः । सविसर्गः, वदधिके प्रश्ने यक्षा क्षेयाः । सयोगाक्षराधिके प्रमे स्वा(श्वा)नरूपिणो यक्षा 10 , . झेयाः ॥ ३७१ ॥ एएहि अक्खरेहि, जाणसु अभिघाइएसु मरणं तु । जो(जा) जस्स देवया अक्ख[र]स्स तेणेव सा भणिया ॥ ३७२ ॥ यस्य यस्य देवताविशेपस्य येऽझराः पूर्वाभिहितान्तरहि (रमिह)वैस्तस्मात् तस्मात् देवता- विशेषात् सफासा(गा)न्मपि० २२६,पा० • रणमपि ज्ञेयम् ॥ ३७२ ।। पढमय-बीय(वि-तिय)चउत्थो, पंचमवग्गो य तह ध णायचो । वाइय-पित्तिय-सिभिय-सन्निवाइय अक्खरा कमसो ॥ ३७३ ।। प्रथमवर्गाधिके प्रश्ने वातिका व्याधिरादेत्या(इया)। द्वितीयवर्गे पैत्तिफा । तृतीयवर्ग श्लेष्मा । चतुर्थवर्गाक्षराधिके प्रश्ने सान्निपात. । पञ्चमवर्गाक्षराधिके प्रश्ने भयो व्याधिरादेश्यः ।। प्रष्टुरन्यस्य षा य व्याधिफत्पृच्छतीति ॥ ३७३ ।।

वपपानुरनाम मिचनम् । [माला -1] पणयालसर्य भहुचरं ष दोहावगाहिषुषापारासी । भयसाससाणं उन्ह, पोचरिया हया विट्टी(बी) || 108 पूर्णरिलस प्रारम्पेन इपमपिम्पम्प मनापरमरिता गुपयेत् ॥ ३॥ पषपसचयणम तेरसे य महादसमे य सोटसय । पचीस विपीस, आणमु गुणकार रासीमो ॥ ३॥ पूरिता प्रभा परिवा दुपात) बमालित्पति गुप सोपरि मनाई रिमोमपेन् ॥ ३.५॥ परगतिगम्सच्मा य ने होसि सोहणा कमसो । पम घूमेम) सीह साणा, सहमि पुफितिया पवे ॥un णियम(वियोमरमि जाणे, सोदणय चोदसे तु माणि)। पण्णरसगर मरिया, सोलसतके पियाणाहि ॥ एसो [सो) सखेवो, मणिमो मिणमासिमो समासेण । जाम य णि णाम, सामालामेम सम्म ॥२८॥ एर सान प्रकारेण भास्सिमम पुरान पुरिया, मेलिनासम्पा) परिसरमपानरामा(माग) बाप सामागासपनाब पम् । गुपमा बारवे पारिप्रय कम्पति । दिनमरमपरिहाना को पनामापरेप भनामगार सस मर्म मानि३५६-३.८॥ ॥ प्रसव्याकरण समासमा ॥ संगत १२५g १॥इति संपूर्णम् ।।

ज्ञानदीपकाख्यं
चूडामणिसारशास्त्रम् ।
नमिऊण जिणं सुरअणचूडामणिकिरणसोहिपयजुयलं ।
इय चूडामणिसारं कहिय मए जा(ना)णदीवक्खं ॥१॥
जिनमहंत सुरगणचूडामणिकिरणशोभितपादयुगलं नत्वा इदं चूडामणिसार ज्ञानप्रदी- ।
पाख्यं मया कथ्यत इति ॥१॥
पढम-तईय-सत्तम-रंघसरा पढम-तईयवग्गवण्णाई ।
आलिंगियाइं सुहया उत्तर-संकडअणामाई ॥ २ ॥
अ इ ए ओ एते प्रथम-तृतीय-सप्तम-नवमाश्चत्वारः, तथा क च द त प यशा गजड
दव ल सा एते प्रथम-तृतीय[वर्ग]चतुर्दशवर्णाश्च आलिंगिताः, सुभगाः, उत्तराः, सकटनामकाध ।।
भवन्तीति ॥ २॥
कुच-जुग-वसु-दिस-सरआ बीय-चउत्थाई वग्गवण्णाई।
अहिधूमिआई मज्झा ते उण अहराई वियडाइं ॥ ३ ॥
आई ऐ औ एते द्वितीय-चतुर्थाष्टम-दशमाश्चत्वारः स्वराः, तथा ख छ ठ थ फर पाः घश
उधभव हाः एते द्वितीय-चतुर्थवर्गाणा चतुर्दशवर्णाः अभिधूमिता, मध्यातथा उत्तराधरा ।।
विकटाश्च भवन्तीति ॥ ३ ॥
सर-रिउ-रुद-दिवाअर-सराई वग्गाण पंचमा वण्णा ।
दड्डाई वियड-संकड-अहराहर-असुहणामाई ॥ ४ ॥
उऊ में अः एते पंचम-पष्ठिका एकादशम-द्वादशमाश्चत्वारः स्वराः, तथा उबण नमा
इति वर्गाणा पचमा वर्णाः दुग्धाः विकटसकटा अधरा अशुभनामकाश्च भवन्ति ॥४॥
सधाण होइ सिद्धी पण्हे आलिंगिएहि सबेहिं ।
अहिधूमिएहिं मज्झा णासइ दड्डेहिं सयलेहिं ॥५॥
प्रभे आलिंगिसैः सर्वैः सर्वेपामेष सिद्धिर्भवति, [अभिधूमितैर्मध्या सिद्धिः] दग्धः सर्वैः
सिविनश्यति ॥५॥
उत्तरसरसंजुत्ता उत्तरआ उत्तरुत्तरा हुंति ।
अहरेहिं उत्तरतमा अहरा अहरेहिं णायवा ॥६॥
उत्तरसंज्ञको स्वरैः सयुक्ता उत्तरसझका एव वर्णा उत्तरतमा भवन्ति । त एव अधरा.
धरसंशकै स्वरैः सयुका उचरसझका अघरसझकाश्च भवन्तीति ॥ ६ ॥

. ८८ गमणिसारणामम् । [गणा--11] आहरसरेहिं जुचा ते पहा हुँति महरमहरतमा । कचा साईति मुहिर अपमा अपमाई कि यहुणा ॥ ॥ मपरसमस संपुच्च दरमा वर्गा पपरापरवरसंशा मति। रेल मुनिरम मन मपमापमान कार्यामि सारम्ति सिनेति ॥ ७॥ पासरेहि जुचा पातमा हुति दाया वणा । वे णासयति फज बलापल मीसयेमु सयलेस ॥८॥ परपसापाला संयुच्च माग बर्षा रग्मचममा मन्ति ते बम्पमित फस भवति ॥८॥ आलिंगिएहिं पुरिसो महिला महिमिएहि सोहि । परेहिं होइ संढो जाणिवा पाहपडिएहि ॥ ९॥ पारिगिवना ममे परिव पुरषो मरति पमिमिता मीरानपुंसमिति बानी वेति ॥९॥ जह बग्गाण य वण्णा पठम-बीय-तीय-पउत्प-पंचमया । सह विप्पाय-ययसा मुदो विय संकरा य सयलाइ ॥ १०॥ परि पापा ममममनीतीव-नवीक मनु पंचममा, पणा पिम्-एवम्ब-पिर-पार, पपिच संपरगावपा सई पर भवन्तीति ॥ १ ॥ एवेहि वणेहि कमेण पालो कुमारी सरुणो । मझिमवयो वि पपिरो जाणिजइ पाहपरिएहि ॥ ११ ॥ मा परेप ममे परिवारमेन बाग इमारचरो ममममम मम मातीति बानीदि ११॥ आसिंगिएहिं विट्ठी मम्सा अहिभूमिरहि सा होइ । छेहिं पत्पि विट्ठी मिणषयर्ण सचिर्य जाण ॥ १९ ॥ पारिमिति गमिभूमिर्मम्ममा मि, मणे मासि हिलि मियापन सममेष पाति १२॥ माटप्पसह सर्स पणे मालिंगिएहि पप्णेहिं । अहिपूमिरहिं किंधण णासह हि गो विच ॥ १५॥ भरिमपमोतफ्ते स भ मारिगिवर्षी बमिभूमिवो मिरित्तपते नापति बामो मिति ॥ १५॥ संपविकास पण्हे पणो भालिंगिमों पयासेह । महिपमिओ वि भूमे पहो उण भाषिय पूर्ण ॥ १० ॥ से मागियो । संप्रति पनि । ममिमिठोर भूगम् । पुनी- रिमभूसमिति 10 - H - . .

- [गाया १५-२२] ज्ञानदीपकाख्य ८९ तह पटम वीय तइआ वण्णा बुच्चंति तिण्णि कालाई । मा इत्य करह भंती जहसंखं सयलवग्गाणं ॥ १५ ॥ तथा समस्तवर्गाणा प्रथम-द्वितीय-तृतीयवर्णाः यथासख्यं त्रीन् कालान् त्रुवन्ति । अन्न मा भ्रांति प्रकुत्तेति ।। १५ ॥ आलिंगिएहिं मुक्कइ वाहि अहिधृमिएहिं ण हु रोई। अहवा चिरेण कटुं दड्ढो मरणं पयासेइ ॥ १६ ॥ आलिंगिताधि रोगी मुचति, अभिघूमितैर्न मुचति, अथवा चिरेण कष्टात मुंचति, दग्यश्च मरणमेव प्रकाशयति ॥ १६ ॥ विसमा दाहिणपासे वामे य वणं समा य पयडंति । वण्णा पण्हे पडिया पंचमया वेवि पासंमि ॥ १७ ॥ प्रश्ने पतिता विपमाः प्रथम-तृतीयवर्णा दक्षिणपार्श्व तथा समाः द्वि-चतुर्या वर्णाः वाम- पार्श्व पंचमका वर्णाः उत्तरपार्श्व व्रण प्रकाशयन्ति ॥ १७ ॥ अट्ठ सिरो-मणि-वयण-हियय-कडि-उरु-जाणु-चरणजुयलेहिं । पण्हविलग्गा वग्गा वणाई दरिसंति जहसंखं ॥ १८ ॥ अष्टौ वर्गाः प्रश्नविलब्धाः यथासख्य शिरोललाटवदने[पु] तथा हृदय-कटि-अरु-जानु- 11 चरण-युगलेपु त्रणा निदर्शयन्ति ।। १८ ॥ अणिलय-पित्तय-सेफय-संसग्गय-आहिघाययं रोगं । पयडंति पंचवग्गा जहसंखं पढम उद्दिट्टा ॥ १९ ॥ प्रथमोद्दिष्टाः पचवर्गाः यथासख्य अनिलजं पित्तज श्लेष्मज समर्ग अमिधात रोग . प्रकटयन्ति ॥ १९ ॥ 25 अइमंद-मझ-दारुणपीडाई दिति पण्हपडिआई। आलिंगियाहिधूमियदडा वण्णा जहासंखं ॥ २० ॥ आलिंगिताभिघूमितदग्धा वर्णाः प्रश्नपतिता ययासस्य अत्यन्तमन्दमध्यदारणा पीडां प्रकटचन्तीति ॥ २०॥ आलिंगिएहि संधी ण हु संघी विग्गहे(हो) ण अहरेहिं । अहराहरेहि कहिओ समरो सुहडाण णासयरो ॥ २१ ॥ आलिंगितैः सधिर्भवति, अवरैर्न च सधिन च विग्रहः, अघराघरैः समामः सुभटानां नाशकर इति ॥१॥ विजयं उत्तरवण्णो ण जयं ण पराजयं वि अहरेहिं । अहराहगे पयासइ पराजयं णत्थि संदेहो ॥ २२ ॥ उत्तरो वर्णो विजयं प्रकाशयति, अघरो वर्णो न जय न पराजयं, अधराधरश्च पराजय- मेवेत्यत्र नास्ति संदेहः ।। २२ ।। म मा० ११ " भूगमनिसारमासम् । [मा १५-11] जइ पढमक्सरमहर अवसाणे उच्चरक्सरं पण्हे । ता उदरो मुसलिमो विवरीमो ताण विवरीयं ॥ २३॥ बचपराधयम पा प्रबमाक्षरमपरं बरसाने पाचरमपर मला परोपी मपति ॥ २३॥ पढमसरेण य मुचा पण्हे मचाविषधिया षष्णा । मणमिहिमणाममा दे पमरति य जीवचिंताई ॥ २० ॥ प्रथमसरेप पुष बममानानिर्मिवा गम मझे मनमिहिमामन मति वे र जीवि प्रकरवन्ति ।। २४ ।। ससि-तइम-पंच-सचम-नवमसरा सबसससरसहिया । क-पटा पचमहीणा सहिया य-स-हेहिं जीवक्लो ॥ २५ ॥ मरम पती-पंच-सम-मबम्पा ला पसारमतरसरिया, या मार्ग-पवर्गमगी पंचमहीपा, बार-सकारवारसदिवा पो पमितिमाः पीवाला मन्तीति ॥१५॥ बीमो उहो सरमो सक्सिग्गो तह व-सक्सरोपेओ। तह उण पंचमहीणा त-पवम्मा पाउमामा उ ॥ २६ ॥ रितीचा पारा, पिसी, वा अपर-सापेवा तवा पुनः पवर्ग: पं+ महीन पोप्रोसपर्मा बसमामका भवन्धि ॥१५॥ ईऐ मौ सरजुचा रस-या म्ञ--न-माई षण्माइ । एमआरह मूख्यता पयासिया जिमवरिदेण ॥ २० ॥ पर्वाहमासमभरपुमा रसाए सम्म म-म-मानेकाप वर्षा मूमपरमभमान • मतीति । योमेवपुर मपनि ममममे तुममा, मूमपीरममा पारदरापाप माम तिमात्र भषों विचारणा ॥२०॥ मुट्ठीजीवफ्सरए मूलं जीवं वि मूसमक्सरए । पाउण आमिजह पाठरसरएण किं पोध ॥ २८ ॥ सो पीप बातम्पम् बीच सूमपरेरा बाई पासपोरेगेटि लिमिमापर्क- मिति॥१८॥ बहुपसमवमगवण्णा मह बहुबिर मिसम्गसंजुषा । पहुवमा जह पण्हे ता मुर्म मुद्विपिताइ ॥२७॥ मसे पार पापा मगरको भान्चाति भरमा मापिपिसम्हनुण भपति बपना मान्य एप परमो मान्दिा मुधिचिन्ता पूर्व मावि ॥ १९॥ पर 1 [गाया ३०-३६] जानदीपकाख्यं विसमसरा ऊआरो वग्गाणं पढ़म-तइयवण्णाई। दुप्पय-णराण एसा एआहाराण णहु होइ ॥ ३० ॥ विपमखराः प्रथम-तृतीय-पचम-सप्तम-नवमैकादशमाः, तथा उकारच, तथा वर्गाणां प्रथम-तृतीयवर्णाश्च एते द्विपदेपु नराणा वर्णाः, एतदाहाराणा राक्षसानां न भवन्तीति ॥ ३०॥ बीओ दसमो सरओ वग्गाणं वीयवण्णया सयला । दिसंति जइअ पण्हे ता मुणह चउप्पयं जीवं ॥ ३१ ॥ यदि प्रश्ने चतुर्याप्टद्वादशः खरो भवति, तथा वृश्चिकादीना जातिं दृष्टिं च व्याघ्रादिकं तं ववर्गवर्णों वदति, तथा वर्गाणा चतुर्थी वर्णाश्च तदा चतुष्पादा जीवा भवन्ति ।। ३१ ।। जइ वग्गाण य वण्णा पंचमया हुँति पण्हपडियाई । ता मुणह गरअवासिय भूअपिसाचाई सबाई ॥ ३२ ॥ यदि वर्गाणां पंचमा वर्णाः प्रश्ने पतन्ति भवन्ति, तदा नारकवासिनो भूतपिशाचाश्च सकलान् जानीतेति ॥ ३२॥ मत्ता त-पवग्गेहिं य-शवग्गेहिं हुंति सउणा य । सिद्धा सरेहिं भणिया देवा उण क-च-टवग्गेहिं ॥ ३३ ॥ तवर्ग-पवर्गाभ्या माः, यवर्ग-शवर्गाभ्या शकुनाः, स्वरैः सवैरेव सिद्धाः, देवाः पुनः । कवर्ग-चवर्ग-टवर्गर्भवन्तीति ॥ ३३ ॥ चवइ कवग्गो पण्हे लडो थलचारियं विहंगमयं । तं चिअ अइप्पहाणं तवग्गओ णत्थि संदेहो ॥ ३४ ॥ प्रश्नलब्धः कवर्गः स्थलचारिण विहगमं वक्ति । तमेव स्थलचारिणं विहंगमं अतिप्रधान मयूरादिकं तवर्गो वकीति सदेहो नास्ति ॥ ३४ ॥ जइ अ चवग्गो लडो तह पक्खी होइ जलयरो णूणं । तं पि टवग्गे सिर्ल्ड चवइ पवग्गो गुहसयं ॥ ३५ ॥ यदि चवर्गो लन्धः तदा जलचराः पक्षिणो भवन्ति । नून तमपि जलचर पक्षिणं श्रेष्ठं हसाविक टवर्गो वतीति । अधर्म (अन्ध?) च गुहाशयं उलुकादिकं पवर्गो वतीति ।। ३५ ।। पण्हे कवग्गवण्णा कालोरय-सिंगिणो पयासंति । राजीवसप्पजाई चवग्गवण्णा य दंतत्थं ॥ ३६ ॥ प्रभे कवर्गवर्णाः कालोरगाश्च रागिणश्च वृपभादीनि प्रकाशयन्ति । राजीवसर्पजाति शंखचूठादिकं दतात्रं च हस्तिप्रभृतिक चवर्गवर्णाः प्रकाशयन्तीति ॥ ३६॥ . 25 १० मुणह। २ म० महपमाण। ३६० पसी । ५ प्र. वपद पवग्गो समपन ।

१२ . पूगमनिसारमानम् । [पमा ३-1] गोणाससप्पजाई टपग्गवण्णा फुठं पयासति । लहुअविसाण जाई विठ्ठीणं होई तबग्गवण्णेहिं ॥ ३० ॥ गोक्सो सर्पयादि षर्मावर्णाः एट प्रासयन्ति । ममुमविपाषा अंतूमा एमिमी पारिपिम्मामाविक सबो वर्षों पाति ॥३०॥ विसम-पाहि(दि)दहि-कीरविसेसाइ किं घुष । जाकिर लरो पम्हे पवग्गमो पहचउरेण ॥ १८ ॥ परि प्राचारेण प्रमे पवर्गो निसम्परा विपमस्त्रान् गिलपस्तीम् संयन् मकर दामपतीन् हामिप्रगतिवनिमेषमा पति पत्र किमाममिति ॥ १८ ॥ ससि-अलण-याण-मुणि-गह-रद-सरा घम्गाण दु-तीयषण्णा य । पुचंति मम्मघाउ अमम चिय सेससरषण्णा ॥ १९॥ पबम-दवी-पंचम-सप्तम-नवमैचरणमाः सपा, तबा पवर्गारिसप्ततितीवपर्याय पाम्पमा बसन्तीति ॥ ३९॥ रवि-का-पक्ससरमो पंचमहीणा कयग्गवण्णा य । कमयं चवन्ति तार सचमवम्गो मुर्णिदुसरमो य ॥ १० ॥ परम्मकारसम्भवायला पंचमहीनाः पवमा परन्ति । रब न सप्तयो वर्ग वा सप्तमः प्रबमा रमेति ॥४॥ सर्वच वइमो सरओ पंचमहीणो चउत्पभो क्यो । लोहं यसमो सरमो मट्ठमवम्गो मकारो म ॥ ११ ॥ पापीपसरा पंचमहीमा पर्षों वर्गम होई ममसरा पचास्यो पा ममम परवि परमपरिणामेन पूर्वतोपर्टव इति ॥११॥ कंग तइमो वग्गो पचमहीणो फवग्गपंचममो । महम-पचमसरमो पण्हे लो पयासेइ ॥ १२ ॥ मंगरपु पंचमदानस्तुतीको वर्गा, पमा परमो पर्मम, माघमा पंचमा मारा मोसमा प्रकाशपतीवि ॥४॥ छहसरो एकतो पचमवष्णो म सईयबग्गस । जह पाविजा पम्हे ता पूर्ण सीसम मुणहे ॥ ४ ॥ परमर पम पमा स्वीपमा परमो धर्मम पनि प्रायवे वा मूग सीसई मपन्ति ।।१३॥ म-प-फ-म-मा सवण्णा पम्हे ला कुणति पित्तलय । प-त-पा व-मा इ-आरा कंस हु मत्पि संदेहो ॥२०॥ 11 M. पाचपोका [गाथा ४५-५१] ज्ञानदीपकास्यं नकार-पकार-फकार-[मकार]-भकारस्तथा ऊकारश्च एते प्रश्ने लब्धाः पिचलकं कथ- यन्ति । णकार-तकार-थकार-दकार-धकार-इकारश्च एते कास्यं कथयन्ति । तथा अत्र न सलु संदेहोऽस्तीति ॥ ४४॥ कणयक्खरं पयासइ मरगयमाणिकपहुईरयणाई। मुत्ताहीरयपहुई तारक्खरयं णे संदेहो ॥ ४५ ॥ फनकाक्षर मरकतमाणिक्यप्रभृतिरत्नानि प्रकाशयति, ताराक्षरं च मुक्ताहीरकप्रभृतिक प्रकाशयति ॥ ४५ ॥ कक्करतालयपहुदि त]वक्खरयं [च] भणइ णो चित्तं । लोहक्खरेहिं जाणह रयणाई इदनीलपहुदीणि ॥ ४६ ॥ वाम्राक्षरः तालकप्रभृति भणति नान चित्रम् , लोहाक्षरेश्च इद्रनीलप्रभृतीनि रत्नानि । जानीतेति ॥ ४६॥ 13 2" कंसक्खरं पयासइ रयणऽसेसाई काचपहुदीणि । सेसं सीसयपहुदि पित्तलसीसाइ अक्खरयं ॥ ४७ ॥ कसाक्षर काचप्रभृतीनि रत्नविशेषाणि प्रकाशयति । शेप पित्तलसीसकाद्यक्षर शीशकप्र- भृतीनि रनविशेप प्रकाशयति ॥ ४७ ।। उत्तरवण्णपहाणं पण्हे गढियं पयासए णिचं । धाउमगढिअं अहरं अक्खरयं भणइ सच्चमियं ॥ ४८ ॥ प्रश्ने उत्तरवर्णाः प्रश्नमक्षरं नित्य घटितं धातु प्रकाशयति । अधरमक्षर अघटितं धातुं भणतीति सत्यमिदम् ।। ४८ ॥ आलिंगिएहिं जाणह कंकणकेऊरपहुदि आहरणं । अहरक्खरेहिं गढिअं कच्चोलयपहुति भायणयं ॥ १९ ॥ घटिते धातोर्लच्चे सति पुनरपि प्रभे आलिंगिताक्षरैः घटितं केयूरप्रभृतिकमाभरणक भवतीति । अधरारपटित कचोलकप्रभृति भाजन भवति ॥ ४९ ॥ उत्तरवण्णपहाणं पण्हे दरिसेइ अहिणवाहरणं । अहरक्खर अपहाणं उवमुत्तं णत्थि संदेहो ॥ ५० ॥ आभरणे प्राप्ते सति पुनरन्यप्रश्ने उत्तरवर्णप्रधान प्रश्नमभिनवाभरण दर्शयति । अधरा- झरेऽप्रधान च उपाभरण दर्शयतीति नास्ति सदेहः ॥ ५० ॥ सचे उत्तरवण्णा भवंति सुरलोअलोअणाहरणं । अहरक्खराइ णूणं माणवलोयस्स जंतूणं ॥ ५१ ॥ पुनरन्यप्रश्ने सर्व एवोत्तरवर्णाः सुरलोकानामाभरण युवन्ति । अधराक्षराणि मानवलोकस्य द्विपदचतुष्पदजतूनामाभरण नुवन्ति ॥ ५१ ॥ १० °पहुदि। २३० गरिय । २० सघ घ । 21 . गमणिसारमामम् । [गामा ५१-१ दुप्पयवण्णा पण्हे दुप्पअजंतूण पवा आहरण । सो वि णर-णारयाण विहगाण विहगवणेहिं ॥ ५२ ॥ पुनरम्पपने पिरधर्मा डिपातूनामामरम हातीति । विहगपोप विपनामागरम दुपन्ति ।। ५२॥ जह य पठप्पयवण्णा पम्हे लगा हुंति पठराइ । मा करहु इत्प भती जाणिज पठप्पयाहरण ॥ १३ ॥ पुबरम्पपने परिपपरपमा प्रमे पप्पाः मधुय मति वा मा वि - प्परामरम गानीवेदि॥५५॥ विस-कुप-धेयट्टमया सरया परिसति उरमाहरण । ससि तिप-गह-सचमया मजमगे सेस मराण ॥ ५ ॥ रामम-तीय भागमा सपा मोसमरन पबन्ति | प्रथम पती-परम- सप्तमधाम मप्पोशमर रमपंचि ॥ ५ ॥ माहरणाण य यण्मा संसिठ्ठा हुति जई य त-पउरा । वा तं रयणणिषर भायणयं ताण धणेहिं ॥ ५५ ॥ पचापरमानो पो सिमा संपना समर्गप्रपुरा मनम्ति वापर अरिपाई भवति भावना समापन खनिकर भपति ॥ ५५ ।। जह पठरउचरर ता रयण मुरजाइयं मुणहु । तं भहरक्सरपर किचिमयं मीसिए मिस्सं ॥१॥ परि वा प्रधुरोचपपरसपी हनिमजाविमिमिता शामवेति ॥५६॥ उपम-मझिम-अघमा हुंति य णाणा सहा जहासस । मालिंगियाहियूमियवायफ्वेहिं पण्हेहिं ॥ ५ ॥ सपा नारिंगिवामिभूमिवरग्बो मामे प्रमे पचममम्पयाममान नापति समनि भिषामरिकाविधान भवन्तीति ॥५॥ पटर्म तरुण पण्णा तह ससि-गइसंमिओ सरो चेव । पटादुभाणमा दुश्योधण्णा दसमओ तुखो सये वेषि ॥८॥ -पतिपनो सम्मको प्रथमो पपंचवा प्रबम-बमबम पो मापी उमा- मामाची पापना सर्ग-पवर्ग-पानी शिवीपर: माता रानीवासी रोच वो सानो प्राबानो यारका इति ॥५८॥ रिठ-बाण-इसरमो पंचममण्णा तिणाइ जपति । सेसडपणा वाणा बही वग्गाण चचारि ॥ ५९ ॥ - . " - वृक्षान्, ९५ [गाथा ६०-६६] ज्ञानदीपकाख्यं षष्ठ-पंचमैकादशखरः, तथा वर्गाणां कवर्गाणां सप्तानां पंचमाश्च वर्णास्तृणानि दूर्वादीनि जल्पन्ति । शेपा द्वितीया वर्णाः चत्वारि तवर्ग-पवर्ग-यवर्ग-शवर्गाणां चतुणों वल्लीनां वूलीप्रभू- विकां जल्पन्ति ॥ ५९॥ अट्ठम-चउअं तिसरा चउत्थवण्णेण ठाइआ तिण्णि । जपंति ख-छ-ठ-फाओ जाइविसेसाइं गुम्माइं ॥ ६० ॥ कवर्गादिसप्तवर्गाणा चतुर्थवर्णेन स्थापित्ताश्चतुर्थाष्टमातिमास्त्रयः खरा: ख-छ-ठ-फा जातिविशेषान् गुल्मान् जल्पन्ति ॥ ६० ॥ ग-ज-डेहिं होति य लया सालादि सत्तमसरेहिं गहिएहिं । गहिएहिं दबलसेहिं प(ध ?)ण्णापहुदीनि जाणेह ॥ ६१ ॥ फवर्ग-चवर्ग-टवर्गाणा तृतीयवर्णेन भवन्ति तृतीय-सप्तमाभ्या स्वराभ्यां शालादिकान् ॥ तवर्ग-पवर्ग-यवर्ग-शवर्गाणा चतुणी तृतीये वर्णे गृहीते धान्यकादीन् जानीतेति ॥६१॥ जल-साहारण-जंगलदेसपभूयं चवंति भूरुहयं । आलिंगिय-अहिधूमिय-दड्डयवण्णा जहासंखं ॥ ६२ ॥ जलसाधारणं जागलदेशप्रभूत भूरुह यथा जलज कमलोत्पलादिक जागलजं करीरकर- मादिकं तानेतान् यथासख्य आलिंगिताभिधूमिता वर्णा ब्रुवन्तीति ॥ ६२ ॥ तरवो हुति असोया संणिहिया उत्तरेहि वण्णेहिं । अधरसरेहि अधमा पण्हे पडिएहिं दूरट्ठा ॥ ६३ ॥ उत्तराक्षरैरशोकाद्यास्तरवः प्रत्यासन्ना भवन्ति । अधराक्षरैरधमा वृक्षाः सर्वत्र शासोट- कादयो दूरस्था भवन्ति ॥ ६३ ॥ संजुत्त-असंजुत्ता जहाकम लद्ध[पण्हवण्णेहिं । फलियाफलिया तरुणो केवलिनाणेण भासंति ॥ ६४ ॥ संयुक्ता असयुका लब्धाः प्रश्नवर्णाः यथाक्रम फलिताफलितान् तरून् केवलिकाज्ञानेन भापन्ति इति ॥ ६४ ॥ तह दिवस-मास-पक्खय पुणो वि मासे वि तह य वच्छरए । जहसंखं लाहसुहं एसु य सयलेसु वग्गेसु ॥ ६५ ॥ एषु सर्वेपु वर्गेपु कवर्गादिसप्तस्वपि वर्गेपु एकद्वित्रिचतुःपचमके वर्णे तस्मिन्नेव दिवसे लाभसुखादिक चिन्तितं भवति । सर्वैद्धितीयवर्णैर्मासे उद्भवति, सर्वे तृतीयवर्णे पक्षे उद्भवति, सर्वे चतुर्थवर्णे पुनर्मासे एव उद्भवति, सर्वे पचमवणे सवत्सरे उद्भवति ॥ ६५॥ उत्तरवण्णपहाणो उत्तरअयणं पयासए पण्हे । अहरक्खरेसु पेण्हे दक्खिणअयणं ण संदेहो ॥ ६६ ॥ 15 25 4 १० उत्तरापर्य। २५० भमराखरपहाण । ३ प्र० दक्णियण मस्थि ।

- । गमनिसापानम् । [पामा बम चरपर्णमपानप्रमा रापप प्रकासति । परामरमपानम पिपारने प्रयापति परमाधि समेह ॥६॥ पढमस्वरेण सिसिरो मा वि सहा वीयएण पणेण । वीयस्तरेण गिम्हो चउपेण य पाउसो होइ ॥ १७ ॥ पनिसमवर्गाको प्रबमापरेप सममान सिधिय, वमा बितीपर मसंग, एवीबापरेण प्रीमा पर्यापरेष प्रारद मावि ।। 1.॥ सचमसरेहिं सरमो कहिओ अणुणासिएहि हेमतो। अभ [:1] इउ अक्सरयं पयासिय जिणवरिदेण ॥२८॥ सप्तमसरे सरत् परिवा, भनुमासिमिया र सद्यम निपान प्रभावित मिति॥१८॥ होइ घन्टेहिं चिचो वेसाहो होइ ग-अ उवष्णेहिं । जिट्टो विघ-ब-ल-सेहिं इमोघ-स-डेहिं मासाठो ॥९॥ वर्ग-पर्गपो प्रबमामराम्या को समतितार्गमावर्गाणा वीचारै माखो मति । परमपर्म बर्ग-सवर्गापा वतीमारियो मपनि । पारम्पमयमा • पवा सर्ग-पवर्ग रसना पर्वापरैयपाको भवति ॥ १९॥ णहु होइ प-म-ब-हेहि सर रिसर म्णेहिं मइयो । एक पिन्दु मिसम्गा सेसपक्ष्णेहिं आसिणमो ॥७॥ वर्ग-समर्ग-मवर्ग-प्रवर्गामी पामरैर्ममा मारणो मबति । पंच-परम्पो माया मार्ग-सबर्गाणां पंचमाघीमारपो मपति। नमुखार-विसर्गाम्बामाधिनो मनपीति ॥ .in सह त-प कत्तिकमासो कहिमो पठमेहिं पोहिं वष्णेहिं । य-शवष्णेहिं वि दोहि मियसरणामो य मासो च ॥ १ ॥ वर्ग-पवर्गपो मधमामयम्पो पम्मी पपा पुरा कार्मिको मास: मिता, परवर्गयो प्रथममम्मी सम्मो मार्गमीयो मायगो मासा पिताल ।।.॥ आ ई स्मन्छ-ठेहि सहो पफर पक्षणेहि होइ सह माहो । फागुणमासो ससि मुणिसरएहिं तह पवग्गेण ॥ ०२॥ दिवीप- बम्पो पराम्पा तथा मर्ग-पवर्गवर्गाषा शिवीवाय सह मासो मति । वर्ग-पवर्ग-सबर्ग-सबर्गमी रितीपसमा मागो मबति । प्रसव-सामनयमो पसल बमाघरेण पनमासो ममतीपि ॥१॥ वो तिमि पंच भट्ठा पच य मट्टा य सह य यो तिमि । चारिक सच छका सच का य पारिफा noun राति मिनेन्द्रकाषितं प्रमामणिसारशासं समासम् ।

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Jayapayada Nimittasastra

Author
Acharya, Purva
Title
Jayapayada Nimittasastra
File name
Jayapayada Nimittasastra
Text
OCR done
Citation
1958
Published
2011/10
Publisher
Bambai, Nirnayasagar Press
Language
Sanskrit
Pages
108
Library
Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
DLI number
314354
Barcode
99999990312477.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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