Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Sarangdhara Samhita Khand-iii
Front matter
सूचीपनम् । ग • विषयाः UNERARE १२ . .. . ८ । ... ... ... पृष्टाकाः विपयाः (फफका विवरण २६ अथ पधाध्याय स्नायुकार्य तथा सन्धिलक्षण... २६ हाड़ियों घमौके कार्य आहार की गति व अवस्था ... शिराओं घ धमनियों के कार्य, उक्त आहार कीदो अवस्था ३१ पेशी, कपडराब छेदों का विवरण, २७ / रस और आम के प्रत्य ३२ अपुतादिको कसिलो आहार का सार कहकर नि. लक्षपा- २७ स्सारका कथन घृक, वृपणय लिगका लक्षण ... २८ मलका अधोगमन करना १३२ हृदय के लक्षण य देहपुष्ट्यर्थ कार्यत्व से सारभूतरस का भी ध्यापार २८ | स्थानान्तर में जाना प्राणवायुका व्यापार २८ ! रुधिर की प्रधानता आयु व मरण के लक्षण २८/ रसादि धातुओं का उत्पत्तिमम ३२ अवार्य मृत्युको कहकर रोगों का गर्भोत्पत्ति व पुन तथा कन्याफेर निवारण... ૨૮ जनने का कारण साध्यव्याधि का उपाय कर चालकों की मानाओं का माग ३३ दूसरी अवस्था में जाना २८ अञ्जनादि लगाने का समय, य. दोपोंकी विषम व समावस्था मन प विरेचनादि फर्म ३३ सृष्टिक्रम का निरूपण २९, १ वाल्यादि दश पदार्थों की हानि .परमात्मा को प्रकृति द्वारा विश्व धातप्रकृति, पित्तप्रति तथा रचना - २९ कफप्रकृति के लक्षण ३४ एकसे कार्यकी उत्पति का कम २९ वित्रिदोपज प्रकृति के लक्षण तीन प्रकार महङ्कार के कर्म २९ । निद्राविको की उत्पत्ति तथा तन्मात्राओकी उत्पत्तिव तन्माना ग्लानिय मालस्य के लक्षण पञ्चकों का विशेष ३० जमाई, छीक और डकार के पृथिव्यादि पञ्चभूतों की उत्पति लक्षण ३५ व इन्द्रियों के विषय इति पटाध्यायः॥ मूल प्रति के नाम प चौवीस तत्वों का पृथधरण, पोडशकि. अथ सप्तमाध्यायः॥ ५. कार तथा चौपीसतनराशि जीवके वन्धन, काम, क्रोध, लोभ, स्वरादि रोगांकी गणना मोह और अहकार ३१ अतीसार संग्रहणीरोग बन्धन, अवन्धन, व्याधि और प्रवाहिका य अजीर्णरोग आरोग्य के लक्षण ३१ / अलसफ च विदच्यादिरोग इति पञ्चमाध्यायः॥ यवासीर, धर्मकील पटमिरोग पाण्डुरोग, कामला, पुम्भकाम ला, हलीमकपरतपित्तरोग ... ३४ स .. . ३० ... ... .. . .. r ४० शाङ्गंधरसंहिवाया:- 10 ... ... 4 ... .. .. ७० ... विपया विपयाः पृष्टामा फास (खांसी) पक्ष्योरोग ४.धीसभांति के कफरोग ६४ शोप घसासरोग रचरोग तथा कोष्ठरोग हिचकी व जाठराग्निविधार ४१ दशमाति के दन्तरोग पसेरए - अरोचक घटिरोग: ४२ प्रकार के दन्तमूलरोग ... स्वरमेद, तृष्णा, मूछी, नम, जिहा, ताल और गले के रोग निद्रा, चन्द्रा और संन्यासरोग आटभांति मुसान्तर्गतरोग तथा मदरोग ४२ अठारह भांति के कर्णरोगः ६७ गदात्यय, दाह उन्माद व भूतो. सातभांति हेफर्णपालीरोग... ६८ न्मादरोग ४३ वर्णमूल व नासारोग सपस्मार (मिरगी) आमवात दशभांति के शिरीरोग रोग तथा लोग ५४ नयभांति के फपालरोग परिणाम शूल घ उदातरोग ४५ चौरान भांति के नेत्ररोग ...! जानाह, मत्यानाह, उरोग्रह और चौबीस घर्मरोग उदररोए ४६ नेत्रसन्धिगत बनेत्रशुरागतरोग ७१ अष्टविध शुल्म (गोला) रोग ४६ मेत्रके कालेपयूले के रोग ७१ तेरहप्रकार का मूनायात व मून- छ भांतिका फाचविन्दुरोग .. ७२ रुच्यरोग ४७ | तिमिर, लिंगनाश, दृष्टि, अभि. पथरीरोग तथा प्रमेहरोग प्यन्व, यधिमन्य, सर्वाक्षि एक प्रकारका सोमरोग रोग, पदरोग और गुनदोप मोहपिटिका, मेदोरोग व शोथ खियों के आर्तव व प्रदररोग रोग ४९ वीसभांति के योनिरोग ऋषि, भण्डवृद्धि, गण्डमाता, योनिकन्दरोग तथा गर्भकेरोग गलगण्डव अपचीरोग ५० स्तनरोग, रसीदोप, प्रसूतिरोग अर्बुद, एलीपद और विधिरोग ५१ तथा बालरोग पन्दह प्रकार के मणरोग, याग. धारहभांति के बारमा तुम प्रारोग, कोष तथा म. अनुकरोगों का सग्रह । स्थिभंगरोंग ५२ पचकों के मिथ्यादि योग से थनिग्ध, नाहीण,भगन्दर घ भावीरोग पालेदादिकों से उपयशरोग - उपजे रोग करोग तथा युघरोग शीतादिकों से उपजेरोग हद, विस्फोटक तथा मसूरिका स्यार, जंगम य धिमभेद से रोग तीनभांति का विपरोग गवप्रकार या विसरोग ५७ पिपनेर, अन्यधिपभेद, उपद्य सातपित्तय अम्लपितरोग ७९ यातरक्त व वातजरोगगमना रति सप्तमाध्यायः॥ पयारीसभातिहेपियरोग (इति प्रथगसण्ठ) L ૬૮ ... . ४८ ७४ ... . ५३ ... ... ७४ ७६ ... ७७ ... ... और आगन्तुक भद EN सूचीपत्रम् । - ... । ८० ... ८० ... ... ... 'चिपया: पृधाका विषयाः पृष्ठावाः अथ मध्यखण्डः ॥ मामनातपरदूसरासाठिपुटपाफ यवासीर पर सूरन पुटपाक .. स्यरसादि पश्चकपाय हृदयशूलपर हरिणजपुरपाक स्थरस य स्थरसकी दूसरीविधि इति प्रथमाध्यायः॥ स्थरस कीतृतीयविधि य उसमें औषध मिलाने कामान अथ द्वितीयाध्यायः॥ प्रमेहपर अमृतादिस्थरस फाथ ( काढ़ा) यमाने का । रक्तपित्तादिको पर अडूसादि विधान काथ ८१ काढ़े में पांड, मिश्री और शहद कामलापर निफलादि स्परस ८१ दालने का प्रमाण विषमज्वरपर तुलस्यादिस्वरस ८१ काढ़े में जीरादि व दूधादि रत्तातिसारपर जम्न्यादिस्वरस मिलाने का मान... सतीसार पर परादिस्यरस ... ८१ सर्वज्यरों पर गुडूच्यादि फाथ भण्डफोदा ययास पर आर्द्रक यातज्यरपर गिलोयादिकाय.. ८१ पातवरपर शालपण्योविकाथ ८६ पायर्यादिलों पर विजारे का पासज्यर पर कारमर्यादिधाथ स्वरस ८१ पित्तन्यर पर कट्फलादिकाथ पित्तशूल पर शतावरीस्वरस... ८२ पित्तज्वरपर पित्तपापरादिद्याथ गण्डमालापअपची पर गोरखा पित्तचर पर द्राक्षादिकाथ गुपडीका स्थरस ... ८२ कपल्यर पर यिजीरा पाचन.... सूपयोयदि पर मुण्डीस्थरस ८२ फफग्यर पर चिरायतादिकाप उन्माद पर ग्रामवादिस्यरस ८२ फफज्वर पर पटोलादिकाथ. उन्मादपर श्वेत फूष्माण्डस्वरस ८२ पातवरपर पित्तपापरादिपाय घायपर परियारा स्परस ८२ कफवातज्वरपरछोटीमटरटेया पुष्पाफारसपापियार काथ सर्यातीसारपर कुरैयापुटपाक ८३ यात फरवरपरममलतासादि घायल धोयन की विधि ८३ काध अरलूपुटपाक अमृताप्टक पाथ न्यग्रोधादियदाधिमादिपुटपाक ८३ सप जरोपर भटकटैयादिकाय उचाफापर पिऔरफा पुटपाक पातकफपर दशमूलफाप रक्तपित्त य फासज्यरपर मासा ससिपातस्परपर हरीतकीपाय पुटपाक ८४सक्षिपातादिकों पर भष्टादशा फास रास पर मटटैया का पुटपाक कासादिकॉपर फायफराषिताय पुराने गामातीसारपर सोडि गुइघ्यादि फान तथा पर्पटादि पुरपान ४३१११ ... ... ... ... 4.. ... ... ८८ .. ८८ ८८ ... ८२ .... .. 4. छाथ ...
शाधरसंहिताया:- . ... . . ... ... t ... - - ... विपया. पृष्टादाः विपया: पृष्ठावर सर्थशीतजरपर भटकटैयाकाथ ८९ / कफलपर परण्डमूलादिपाय विषमयर पर मोधापाध • ८९ दृश्यरोग पर दर्शमूरादिपाय नित्यभावेज्वर पर पटोलादि मुपायपर अर्जुनादि फाय... पाथ ९० अश्मरी (पथरी)ध शरादि तृतीयज्यरपर गुइच्यादिकाय . पर पलादिकाथ... चातुर्थिक-पर पर देवदाधाय ९० मूरच्छ पर गोभुरादिकाथ... स्वरातीसार परगुडूच्यादि फाथ ५९० सूत्रफचपरमिफलादिफाय ज्वरातीलार पर नागरादिकाथ ९० प्रमेह पर प्रिफलादिसाय आमशूल पर धान्यपश्चपाथ ९० प्रदरपर दागहल्दीकाथ सरक्तातीसार आमातीसार पर. क्षतयणादिपर घटादिकाथ कुरैया काय ९१ | मेदोरोग पर चिल्वादिकाय ... सयोतीसार पर फुटलाष्टक फाथ - ६५ पुनस्थिफलादिकाथ ९७ अतीसार पर नगालादि काथ ९१ | उदररोग पर चव्यादिकाय . यालको के सब अतीसारों पर पेट फूलनेपर गदापुरैनादिकाय घयफूलादि शाय ९१ पिलही परतफ्यादिकाप... संग्रहणी पर चनउर्दाकाथ. .... ,९१ | शोथपर गदापुरनादिकार्थ मासक ग्रहणीपर चतुमंद्रक अण्डवृद्धिशोथ पर त्रिफलादि काद काथ सर्वातीसारपर इन्द्रयपादिकाथ ९२ | अन्त्रवृद्धि पर रोस्तादिकाध... रुमियों पर विफलादिकाय, ९२ गण्डमाला पर कांवनारादि कामला पर विकलादि काथ ९२ शोधादिक, कास व पाण्ड पर फीलपायपर तहोड़ादिकाध' गापुरैनाकाध ९२ ) अन्तविधि पर गदापुरैनादि .. रक्तपित्त पर रूसादिधाय फाथ फासग्नर पर वासादिकाथ ९२ वरणादिगणकाथ ९८ फासवास पर शुद्रादिकाथ ९३ | भगन्दर पर शदिरादिधाथ हिचकी पर मेघसीकाथ ९३ / उपदशा ('गरमी)पर पटोलादि उपकाई पर पिल्वादिफाथ ९३ गृध्रसीरायुपर दशमूल्फाथ ९३ वातरक्तपर गुडूच्यादि काथ य चायुपर रास्नापश्चषकाय ९३ द्वितीय पढौलादि काथ चायुपर रास्नासतक हाथ ९३ वातरकर पुष्टपरलघुमंजिष्ठादि सर्यवायुपर महारास्नादि काय छाती फी पायुपर, एरण्डालक सर्यकुछवृद्धि पर गृहन्ममिछादि पातशुल पर साटिआदि हाथ शिरशूल चमेनरोगों पर पित्तशूल पर त्रिफलादि काथ ९४ : हरीतमयादिकाथ ९७ ... ... ... ... .. ... 1- काथ ... ९९ • काथ - ... ...
सूचीपनम्। P, पृष्टाका । , 4 हाथ ... ... - ... ... ... ... ... . कल्क विषयाः पृष्ठाडाः विपयाः नेत्ररोगापरवासादिय गुडूच्यादि पिचयरपर नीलकमलादिहिम १०६ १०० जीर्णांवर पर गुदाच्यादिहिम १०६ क्षतपर पिप्पल्यादिकाथव द्वितीय रत्तापित्त पर धान्यादिहिम ..." १०६ 'काय का विधान १०१ इति चतुर्थाध्यायः॥ रतातीसार परमोयादिप्रमथ्या.... १०१ अथ पञ्चमाध्यायः॥ यवागू व यूपका विधान .....: १०१ सनिपात पर सप्तमुष्टियूप १०१ कल्क का विधान. ... पानादिकल्पना . १०२ | पाण्ड पर वर्धमान पीपरि :, '१०७ ज्वर में तृषा (प्यास.) पर उशी. घावपर निम्बकल्क... १०७ रादिपाना ... १०२ | गृद्रसी पर बकायन पारया १०७ उष्णजल का विधान १०२ औपधभोगी का पथ्य... ..." क्षीरपाकविधि १०२ / अरुस्तम्भपर पिप्पल्यादिवल्क, १८ संक्षेप से अनों का विधान .... १०२ | परिणाम शूलपर विष्णुकान्ता- पिलेपी विधान १.दिफल्क पेयाविधान १०३ / पुनर्नागरादिकल्क भातका विधान ...... १०३ | सूनी बवासीर पर चिरचिरादि शुद्धमांड का विधान... १०३ ," ... ... १०८ अठगुने माइका विधान १०३ रतातीसार पर येरकल्क ...,१०९ पित्तादिको पर यवमण्ड १०३ / रक्तक्षयी पर लाहीक्षक लाजमण्ड का विधान १०३ रक्तप्रदर पर चौराईपल्क ..., १०९ इति द्वितीयाध्यायः॥ अतीसार पर अंकोलवल्क विषपर सिखसाकल्क अथ तृतीयाध्यायः॥ दीपन व पाचन हरीतकीफल्क १०९ वातपित्तज्वरपर मधूकादिफाण्ट १०४ कृमिरोग पर निशोथफ्ल्क ... .. १०९ प्यास पर माम्रादिफाण्ट १०४ ( रतातीसार पर नवजोतफल्क पित्तजप्यासपरमधूकादिफाण्ट .. १०४ इति पञ्चमाध्यायः॥ फाण्टभेदीय मन्थका विधान'... १०५ अथ पाटाध्यायः॥ १०५ उपकाई पर मसूरादि मन्थ १०५ चूर्णका विधान तृष्णापर ययमन्थ ...'.१०५ सर्वज्वर पर मामलकादिचूर्ण ११० इति तृतीयाध्यायः ज्वराटिकों पर पीपरिचूर्ण अथ चतुर्थाध्यायः॥ , प्रमेह पर त्रिफलाचूर्ण कफादि पर पञ्चकोलचूर्ण हिम व शीतका विधान १०५ / त्रिगन्ध, चातुर्जात य जीवनीय रस्तपित्त पर भाम्रादिहिम ... १०५ तृष्णादिपर मरिचादिधाथ ... १०५ / विण्यपर लवण पञ्चकचूर्ण ... ... ... . इमली का मन्थ 1 ... .." . । 4.. गण ...
८ शाईबरसंहिताया.- ... ... . ... . ... विषया पृष्ठाकाः विपयाः गुल्मादि पर सार ११३ पातपित्त कफ छर्दि पर पलादि सवावर पर सुदर्शनचूर्ण १२३ चूर्ण १२५ कासगसचर पर त्रिफलादि कुष्ठ पर पञ्चनिम्प पूर्ण चूर्ण ११४ पुष्टिपर शतावरीचूर्ण कफज्वर पर कायफलादि चूर्ण ११४ पुष्टिपर अश्वगन्धादिचूर्ण यालकोंके कासवरपर काकड़ा. धातुवृद्धि पर नयायसादि चूर्ण सिंगोमादिचूर्ण ११४ / स्तम्भनपर अकरकरभादि चूर्ण आमातीसार पर गुण्ठ्यादिचूर्ण, ११५ हिलतेहुये दांतोपर मौलसिरी भामयात पर हरीतक्यादिचूर्ण ११५ फो छालके चूर्णका मअन सर्वातीसारपर लघुगङ्गाधरपूर्ण ११५ पति पछाग्यायः॥ अतीसार पर वृद्धगाधरचूर्ण ११५ अथ सप्तमाध्यायः ।। संग्रहपी पर फपित्याप्टकचूर्ण... ११६ ग्रहणी पर दाडिमाष्टकचूर्ण ११६ घटिका, गुटिफा, घटी घ मोद- . अतीसारपर वृद्धदादिमाष्टकचूर्ण ११६ कादिको की कल्पना क्षयोपर लयगादिचूर्ण १९७१ बघासीर पर याहुशालगुड .. जातीपालादिचूर्ण ११७ फासपर मरिचादिगुदिका १२८ अरुचिपर महाखाण्डपसंशकचूर्ण -११८ यासादिकोपर गुहादिगुटिफा १२९ उदररोग पर नारायणचूर्ण ११८ प्यासपर मांधलादियटिका १२९. पेट फलने आदियोम अनुपान. ११९ | सनिपातार संजीवनी गुटिका अजीर्ण पर हनुपादिचूर्ण ११९ पौनसादिको पर प्रियुटादियरी आदि पर पञ्चसमचूर्ण १२० अर्शपर वृद्धदारमोदक १३० अफरा यादिपर पिप्पल्यादिचूर्ण १२० अर्शपर सूरनटिका यत् घोहादिकों पर लयण यथासीर पर गृहत्तरनपटिपा १३० प्रयादिचूर्ण १२० घामलादियोंपर मण्डूरपटिका १३१ शूलादिको पर तुम्यर्यादिचूर्ण... १२१ प्रमेहादिकोपर चन्द्रप्रभायटिका गुस्मादिको पर चित्रकादिचूर्ण १२१ गुल्मपर अजयायनगुटिका पनिामदियों पर परार. অৱৰিবলৈ चूर्ण १२२ यातरतादिकोपर फैशोरगुग्गुल यातादिकों पर अजमोदादिचूर्ण १२२ भगंदरादिसॉपर त्रिफलागुग्गुल शूलादिकों पर हिंन्यादिचूर्ण १२२ प्रमेहादिकोपरगोक्षुरादिगुग्गुल १३६ अरच्यादिकों पर ययानीमापदप छादिको पर त्रिफलामोदक चूर्ण १२३ गण्डमालादिको पर. कांचनार मरच्यादियॉपर तालीसादिचूर्ण १२३ गुग्गुल फासक्षयपित्तादिपरसितोपलादि गरमजल में इसका अनुपाना घूर्ण १२४ धातुपुटिपर मापादिमोदक . प्रहणी पर लवणभास्करचूर्ण. इति सामान्याय .. ... १३६, ... ... . . ..4 सूचीपत्रा विषयाः विषया: पृष्ठाका १५४ १४१' ... अथ अष्टमाध्यायः॥ अथ दशमाध्यायः मंवलेह व लेहकी कल्पना, १३८ लसाधनप्रकार हिचकी, कास व यासादिकोपर लाक्षादितल भटकटैयापलेह" क्षयादिको पर च्यवनप्राशावलेह" १३९ चातपर परियारातैले सर्पपातपर नाराणलेल रकंपित्त पर कूष्माण्डपाक पातकफजन्य विकार व.बादी मश( यवासीर) पर खण्डकपमा पर प्रसारिणील १५७ ण्डायलेह ग्रीवास्तम्मादिकोपर मापादितैल . १५७ क्षयोपर अगत्यहरीतकी १४२ यवासीर पर कुरैयायलेह शूल य पातादिको पर शतावरी तेल बकरी के दुग्धादिकों से इसका १५९ अनुपान. ववासीर पर कासीलादितैल १४३ यातरक्त पर पिण्डतैल सर्यातीसार पर कुरैयाष्टक खुजलीआदिकों पर,नदारतैर १६० प्रति अष्टमाध्यायः॥ फुष्ठादिफकों पर गरिचादितैल. अथ नवमाध्यायः॥ मणों पर त्रिफलादितैल :.. घृत व तेलाविकों का साधन ... पलितरोग पर निम्बचीजतैल पिलहीमादिफॉपर क्षीरपट्पल १४६ यालआनेपर मुलेठील संग्रहणी, मतीसार पर चालेरी इन्द्रलुप्त पर करादितैल पलिसादिरोगा परनीलिकादितैल,. १६१- धृत तीसारादिको पर मसूरघृत ... १४७ पलितादिरोगोंपर भृजराज तेल : ६३१ रक्तपित्त पर कामदेवघृत १४. मुखदन्तादिरोगों पर. इरिमेदादि थपस्मारादिको पर कल्याणघृत १४८ २६२, घातरक्तपर अमृतादिश्रुतः १४२ कर्णशूल पर हिंग्यादितल पातकुष्ठादिपर महासिकादित १४२ पधिरत्वपर दिल्यादिल कुंछ, दाह व पाजपर कासीसा. कानवहने पर खारतेल દરે दिघृत' ... १५० पानसरोग पर पाठादितैल... १६३ घावा परजात्यादित १५० नासिकारोग पर भटकटैयावैल १६३ उदररोग पर बिन्दुत ..: १५१ छींक आनेपर कुष्ठादितैल:... १६३ नेत्ररोगादिकोपर प्रिफलादिधृतः१५१ गासार्श परं गृहमादितल .. १६३ घायोपर गौर्यादित • १५२ सबकुष्ठों पर पजतलं, ४१६४. शिरोरोग पर मयूरवृत्ते....... -१५२. लोमशातनपर करवीरादितल, १६४, विध्यारोग पर फलघृत १५३ / अर्थ मासपकल्पना .... १६४ योनिदोपों पर त्रिफलादिवृतं ... , १५३/ शोधुनादिमौका भेद विषमज्वर पर पञ्चतितघृत .. १५४ राषिताहिकों पर,शीरासद . १६६ ..इति नियमाध्यायः॥ क्षयीपर पिपल्यासम ... १६१. ...
१० शाईधरसंहिताया:- ... .. ... हरतालका शोधन 4 ... २८१ .... ... . १७३ .. विपयाः पृष्ठाकाः विषयाः प्रधादा पापडपर हासच ... १६७ / मुरमा बगेरुमादिषों फाशोधन परादिकों पर फुरैयारिष्ट घमारण बिहीयादिकों में घिनदारिष्ट १६८ | मैनशिलफा शोधन य मारण प्रमादिकों पर देवदारअरिए १६८ कुष्ठादिकों पर पदिरारिष्ट १६९ पपरिया या शोधन, क्षयादिको पर पचूलारिष्ट १७० | सप धातुमों के सत निकालने उर क्षतादिकों पर द्राक्षारिए ...' १७० का विधान पपासीरमादिको पर रोहितारिए १७१ | हीराफा शोधन घ मारण क्षयी व प्रमेहादिको पर दशम् होरेकी भस्मफा दूसरा विधान , लारिष्ट पतीलरा विधान ૧૮૨ इति दशमाध्यायः॥ मान्तका शोधन व मारण ... अथ एकादशाध्यायः ।। सरहों का शोधन व मारण... शिलाजीत का शोधन २८३ स्वर्णादि धातुओं का शोधन शिलाजीत शोधने का दूसरा प्रकार ... १७३ प्रकार सोना मारने का विधान मण्डर लाने का विधान २८४ सोनेकी भस्म का हितीय विधान १७३ क्षार पनागे या विधान सोनेसी भस्मका तीसरा विधान १७४ হন হারােব | स्वर्ण भस्मफामकारान्तर १७४ चोदीकी भस्मका विधान' अथद्वादशाध्यायः॥ नपायन्त्र के बनानेकी रीति १७५ सर्वरोगहारकय पुष्किारक पारा जॉदीभस्मफा दूसरा विधान का मिनपण पीतलकी भस्मका विधान १७५, पाराके नाम य सूर्यादि भयग्रहो तावेळी भस्मका विधान फे नामसे तांयाआदि धातुओं सीसेकी भस्मका विधान १७७ सीसेंके मारनेका दूसरा विधान १७ पारा शोधने का प्रकार गंगकी भरमका प्रकार १७७ गन्धक व सिंगरफफा शोधन, २८६ लोकी भरमका प्रहार १७७ सिंगरफसे सार निकालने का लोहभरम का दूसरा प्रकार "" विधान १८६ लोहभस्म पानीसरा प्रकार ... किये पाराके मुख करने का सात उपधातुओं का शोधन १७८ विधान सोनामासीषा शोधन घ मारण १७२ मुघ घ पक्षच्छेदन का दूसरा रुपामाखीका शोधनाच मारण १७९ प्रकार, २८७ निवा फा शोधन १७९ कच्छपयन्त्र फे द्वारा गन्धफ - असकका सोधन मारण क्नेका विधान अम्रर शोधनका दूसरा विधान १८० ! पारा मारण का विधान ... ... ... ... ... ... ... - ... ... १७८ ... ... .. .. ...
सूचीपत्रम्। 1 पृष्टाका ... द २०६ ... २०७ ... ... रस २०७ ... घरस ... . विपवाः पृष्ठाकाः विपयाः पाराभस्मकरने का दूसराप्रकार १८८ समस्त उदररोगों पर महापलि. तथा तीसरा घ.चौथा प्रकार ... १८९ २०६ सर्वज्वरापहारक ज्यरांकुश रस १८९ गुल्मादिरोगोंपर विद्याधररंस.. ऐकाहिकादि ज्वरों पर ज्वरारि पक्ति (परिणाम ) शूलादिकोपर निनेगरस शीतज्वरारिरस १९० शूलादिकॉपरशुल गसकेसरीरस २२७ ज्यरनी टिका १९० । मन्दान्यादिकों पर अग्नितुण्डी अयादिरोगोंपर लोकनाथरस क्षयादिको पर भृगांक पोटलीरस १९३ अजीर्ण य हैजादिफकों पर अजीर्ण- कफक्षयादिकों पर हेमगर्भपोट: कपटक रस २०८ लीरस '१९५ कफरोग पर मन्थानुभैरयरस..... २०८ कासादिको पर हेमगरस १९६ वातविकारोंपर यातनाशनरसं २०८ अतीसारादिकों पर आनन्दभैर. सन्निपात पर फनमसुन्दररस. १९७सन्निपात पर भैरयरस २०९ सन्निपात पर लघुसूचकाभरण १९७ | संग्रही पर प्राणीकपाटरस. २१० सन्निपात पर जलचुन्दरस १९८ संग्रहणी पर धनकपाटरस सन्निपात पर पञ्चवक्त्ररस १९८ वाजीकरणपर मदनकामदेवरस ..२१२ मदारमूलकाथ १९९ / पाजीकरण पर कन्दर्पसुन्दररस २१२ सभिपात पर उन्मत्तरस १९९ क्षयादिकों पर लोहरसायन सत्रिपात पर अञ्जन इति द्वादशाध्यायः॥ शूलादिको पर नाराचरस (इति मध्यपण्डः) शूलादिकों पर इच्छाभेदीरस क्षयीपर राजमृगाकरस अथ उत्तरखण्डः॥ क्षयादिको पर स्वयमग्निरस २०० श्वासपर सूर्यावर्तरस २०१ प्रथम स्नेहपानक्रिया धातरोग पर स्वच्छन्दभैरव रस २०१ स्नेहभेद व स्नेहपानका समय... २१६ संग्रहणी पर सपोटलीरस २०२ स्नेहका सात्म्य व स्थलविशेष में अश्मरी (पथरी) पर निवि. योजना २०२ स्नेहमात्रा प्रकार कुष्ठादिकोपर महातालेश्वररस २०२ अमात्रा से स्नेह पीने में दोप २२७ । कुष्ठपर पुठाररस २०३ , दीप्ती-मध्य व अल्पागि में मात्रा । कुष्ठपर उदयादित्यरस २०३ २२७ { श्धेत कुठपर लेप का विधान २७४ स्नेह की मात्राओं का भेद २१७ कुष्ठादिकों पर सर्वेश्वररस २०४ , अल्प, मध्य च ज्येष्ठमामाओं के सुप्तिकुठपर स्वर्णक्षीरीरस २०५ गुण २ प्रमेहराग पर प्रमेहयद्धरस ... '२०५ | दोषों में वित गद्यपान ... ... २१३ ... ... २०० २०० ... ... ." -कमरस ... ... प्रमाण ... -- ... ..
१२ शाईपरसंहितायाः- - --- .. .4. २२२ ... कारण ... ... M . ... ... 44 के अंग का उपजना ... NNN ... ... विपया विपयाः पृष्ठासार थपररोगो परचो पिलाने योग्य जिनके पहले स्वेद निकालागया माणी २१८ / उनकेलियेनासादिकोकाविधान २२२ तेल पिलानेयोग्य रोगी २१८ | भगन्दरादिरोगाम पसीना नि- पसापानयोग्यवस्थिमजायोग्य' २१८ फालने की अनुशा स्नेहपान करने का समय २१८/ स्वेदके निकालने में देश घ फाल '२२२ पृतादिक फर्मधिशेषों परगास के स्वेदनिकालने पर किस मार्गसे दोपोंका दूरदोना .... २२२ स्नेहपानमै अनुपानाविधान २१९ स्थेदोके चित्तस्वस्थ करनेकायक्ष, २२२ भारा के साथ स्नेहपिलाने योग्य स्वेदके अरोग्यरोगी का निरूपण २२२ "रोगी २१६ अल्पपसीना निकालनेयोग्यमाणी स्नेहके पिना यवागू से शीघ्र २२३ स्नेहनहोनेवाले २१९ यहुवपसीना निकलने में उपद्यों धारोष्णदूध से एसी क्षण धातु २२३ का उपजना २१९ चार भॉति के स्वेदोम तापस्वेद मिथ्याहार विहारादिकों से भपक के लक्षण ... २२३ स्नेहका उपाय २१९ / ऊष्मसंज्ञक स्वदफे रक्षण २२३ स्नेहजन्म यतीर्ण का उपाय २१९ । उपनाइसंझक पसीनाके लक्षण २२४ स्नेहजन्यपित्तकोप का यत २१९ उपनाहमें महाशाल्या प्रियाग स्नेहपान के अयोग्यरोगी २२० थात्पोटलिकासितविधि २२४ स्नहपान करने में योग्य प्राणी २२० वसंशक स्वेदके लक्षण २२५ गुपदायक स्नेह के लक्षण २२० पसीना निकालनेकी अवधि' । २२५ अत्यन्त स्नेहपान के दोष २२० स्वेदनिकालने के अनन्तरउपचार २२६ रुसेको स्निग्ध घ स्निग्धको इति वितीयाध्यायः २२० अर्थ तृतीयाध्यायः॥ स्नेहादिक सेयने के गुण स्नेहसेवी को वर्जनीयपदार्थ '. २२१ चमन (दि) विरेचन (दस्त) में फालका चिंधान इति प्रथमाध्यायः॥ पमनयोग्य रोगियोका निरूपण २२६ अथ द्वितीयाध्यायः॥ चमन अयोग्यरोगी... '२२६ घमनके पूर्व उपचारोंका निरूपण २२७ रोहपानानन्तर स्वद निफालने यमनमें सहायकारी पदार्थ का विधान ... २२१ घमममेकादाकरने का प्रमाण ... "२२७ वायुझी तारतम्यता से न्यूना. यमनमेकाडापानका प्रमाण चिर स्पेदकी योजना २२१ । यमनमक्कादियाँकाप्रमाण विशेष स स्वेदविशेष पी घमनमें उसमें, मायगय कनिष्ठ योजना २२१ गांझा प्रमाण' it..द ... दखाकरना - - न ... ... ... -- ...
सूचीपत्रम् ।। , . PATH . ... ... 4 ... ... ... ... .... थाने फायदा ... ... "विषयाः पृष्ठावा विपया: पृष्ठाका यमनके विषय प्रस्थका प्रमाण २२८ मृदु व मध्यमादिकोष्ठों में मूहमा चमन में औषध विशेषांसे फफा. "ध्यादिमौषध 37"३३२ दिकों का जीतना २२८ उत्तमादि भेदोसेदस्तीफाप्रमाण २३३ चमनसे कफादिकों के निकालने विरेचन कायादि की मात्राओं की औषध का प्रमाण धमन करने में बाहिरीउपचार २२९ विरेचन कल्कादिकों का मान "२३३ भलीभांति चमनफे न होने में रेचन द्रव्योका प्रकार ভাষ २२१ अपरोपोसे रेचनकाविधान “२३३ घेहुत वमनहोनेम उपद्रय २२९ । मातुभेदसे रेचनफा प्रकार २३३ अतिधान्तमें चिकित्सा २२९ शरदूमें रेचन २३३ घमनमेशीमयोपैटनेपरचिकित्सा २२९ हेमन्त में विरेचन २३४ अतियान्तसे जीभ बाहर निकल शिशिर, घसन्त तथा प्रीष्ममें- रेवन घमनदारानेत्रों में विकार होनेका रेचनपर अभयादिक मोदक ... १२३४ उपचार २२९ अच्छेप्रकार रेचनहोनेका यत २३५ घमन करते २ ठोड़ी रहजाने पर रेचनसमयया साधनामदार २३५ उपचार २२१ रेचन देनेपर घेोके न उपजने। धान्तकलेमेहनुस्तम्भकाउपचार २३० पर उपद्रय यमनके गन्तमें रक्त गिरनेकायन २३० । उत्तम जुलावके न होनेपर उप- अतिरमनसे प्यारा बढ़ने का यत •०३० चार रसाअन धनानेफा विधान २३० अत्यन्त विरेचन में यान्तके उत्तम होमेका लक्षण २३० । अतिविरेचन में उपजे उपदयों।" धान्तके होजाने पर रोगीक्षेलिय फा यज्ञ २३० दस्त पन्दकरनेकी औषध धमनके उत्तम होनेपर संयम २३० दस्तक रोकने का उपाय इति तृतीयाध्यायः॥ उत्तम दस्त होने के लक्षण अथ चतुर्थाध्यायः॥ तुलावलेनेमें गुगोका निरूपण २३६ रेचन यातिपदार्थ धमनान्तम विरेचनका विधान ,२३० रचनमें रोगीकलिय पंथ्य .:.:२३७ रेचन (दस्त) का दूसरापकार २३१ । इति चतुधांध्यायः॥ विरेचनका सामान्यकाल २३१ विरेचनयोग्य रोगीका कथन अथ'पञ्चमाध्यायः॥ २३१ दोपनिधारणमें घिरेचमी उत्त: पलिकर्मका विधान " २३७ पता २३१ | अनुवासनवस्तिकी द्रव्यों का दस्त फरा भयोग्यरोगी १२३२ ममाण विरंचगम मृदूमध्य चरकोष्ठ २३ अनुवासनवस्तियोग्य रोगी •२३७ . ... ... पथ्य .40 २६ .. ... २३६ . । " an - .
शाईघरसहिताया.- - ... ... .. १ .. धूमपान में परिहार , ... पिण्याः पृष्टाका रिपया. पाशा आमगन में उपयोगी की प्रति २५९ प्रतिसारण का प्रकार धूममें नलीका विचार २५९० / प्रतिसारण (मंजन) के लिये धूमपान के लिये इपिंगा (नेवा) घूर्ण का विधान २६० गण्डूषादि के हीनयोगादि होने । धूनी विधान व धूनमें फल्कों की औषध २६० भलीभांति ये गण्डपके लक्षण '२६४ यान्मटोलयलादिगण २६० इति दशमाप्यायः॥ पालग्रह निवारक धूप अथ एकादशाध्यायः॥ “इति नवमाध्यायः॥ लेपका विधान दोपनाशकलेप का विधान २६४ अथ दशमाध्यायः ॥ दशाइलेप दा विधान. गण्डूग, पवल घ प्रतिसारण का घिपहाएक्लेप का दिवान. २६५ গ্রিন २६१ लेपका दूसरा विधान दोपभेदों से स्नैहिकादि गण्इपों मुखकान्तिकारयालेपका दिधान २६५ की योजना २६९ फातिकारक लेपफादूसरामदार २६५ गण्इप नथा कपल की रोनि २६१ तारुण्यपिटका ( मुहांसे ) परलेप २६५ गण्ड्रप व फपल में द्रव्यों का व्यन (झाई) रोगपर लेप १२६५ प्रमाण २६२ मुसपर की हाईपर लेप गण्डूप व कयलयोग्य अवस्था.. २६२/ तारपयपिटकादियों पर रेप अवस्था भेदसे कुले करने का भरुविका (नखी) पर रोष प्रमाण २६२ रूसी पर दूसरालेप गण्डप धारण करने में दूसरा दारुणरोग पर हेपका विधान... २६६ २६२ लेपका दूसरा प्रहार .. चादीके रोगीमें स्नैहिकगण्डप २६२ | इन्द्रलुप्त पर लेपका विधाग पिसमें शमनाक गळूप २६२ | लपफा दूसरामकार २६६ व्रणादिरोगों पर मधुगण्ट्रप २६२ केशपर्धफलेप का विधान बिपादियोंपर गण्डपका विधान २६२ / चाल जमानेका लेप २६० दांतोंके हिलने पर गण्इप .. २६२ | इन्द्रलमरोग पर लेप मुसशोरोग पर गण्डप .. १२६२ | पाल भाजाने पर दूसरा लेप. २६७ फफादिदोपारपण्डप २२. याल स्याह करने का लेप पफघरजपित्त परगण्डूप ... २६३ ] लेपका धुसरा प्रकार २६७ मुखपाय (छालोपर)गण्ड्य २६३ | सीसरा तथा चौथा मझार गण्डूप के समान प्रतिसारपाय फाटेकेशकरमेशपांचों प्रकार २६८ फयल का विधान २६३ | लोमशातन (सारगियो) पर कपल कामकार क्षेप २६६ ... प्रमाण . ... ... ... . 4.. .. ... ... २६७ . 4. . ...
सूचीपत्रम् । . - ... ... . 1 . .. ... ... ar - - Ama Am विपयाः i, पृछाङ्काः विषयाः लोमशातन का दूसरा प्रकार" २६८/ कफजन्यशोथ पर लेप : सफेद फोड़पर लेपका विधान २६९ / आगन्तुक तथा रजशोय पर लेपका दुसरा प तीसरा:मकार- २६९ लेप सेहुवांपर लेपका,विधान ... ,२६९ मणपकाने पर लेप लेपका दूसरा प्रकार २६९ मणफोरने पर लेप नेत्ररोग पर लेपका विधान, '... २६९ यणफोरने पर दूसरायसीसरा- लेपका दूसरा प्रकार... २७४ खुगली पर लेपका विधान २७० प्रणशोधन में लेपका मार .... ससीखाज पर लेप ii. २७० प्रणशोधन परोपमपर लेप लेपका दूसरा प्रकार २७० रुमिरोगनाशसस्प... रक्तपित्त पर लेप ... २७० पेटपीड़ा में नामियरलेस उदरादिरोगों परलेपका विधान २७० यातविद्रधिपरले घातविसर्परोगपर लेप .२७१ पित्तविद्रधिरर पित्तधिसर्प पर लेप ... २७१ , कफविद्रधिकरहेर कफविसपरोग पर लेप २७१ | बापन्नुवरिये. पित्तवातरक्त पर लेप २७१ | काडरर नासिकारक्तस्त्रायपर लेप २७१ मगरले बातज शिर पीड़ा पर लेप २७१ मा भारत शिरपीड़ा पर दूसरा लेप पित्तसंभव शिरोरोग पर लेप २ कफसम्बन्धी मस्तकपीढ़ापर लेप २२२ सपनेपर मस्तकपोड़ा पर दूसरालप “२२ कानि सूर्यावर्त तथा अर्थभेदवापरलेप... इस्ट (अकृति र पर कनपटी अनन्तवात तथा सर . २3 शिर रोगों पर लेप मनी) र २७ लेपका दूसरा विधान -- २ पासवर... " प्रलेप च प्रदेहक लेपाकी उंचाई रन काटेर फो प्रमाण - तिनका दूसराए २७ साधारण लेप विषयमें निषेध .. ६७३, जिव स्तनों के कटोर दरने रानिमें लेपनिषेधका कारक २३ अलग रानिमें प्रलेपादिकों को विधान -सिल्वृदि पर दूसरा रेप घ उसके योग्य रोगी योनिद्रव करने या टेप 25 मगोपचार सरकार लेपन १७३ देहलुमन्यनिवारक से। अगसम्बन्धी पातशोपनिवारक qीकरपकारक लए समस्तसमें तेललगाने का विधान 0. पिसजशोध पर लेप... ... २३३ शिरोपस्ति का विधान ... ... ... + .. ..
शाधरसंदितायाः- ... .. 1 ....२८४ ... ... .. +- .. ... ... ... | विषया. पृष्ठाड़ा घिपयाः पृछात्रा शिरोवस्ति प्रकार'... २७९ रधिर के दुट होने के लक्षण शिरोयस्ति प्रमाण तथा मानाभो धिर चढ़ने के लक्षण -फा प्रमाण २७९ क्षीणरुधिर के लक्षण... २८४ शिरोवस्ति का समय २७९ | पातपित रक्त के लक्षणा शिरोवस्तिके पीछे कर्तव्यनिया २७९ । पित्तदूपित रधिर के लक्षण शिरोवस्तिके गुण २७९ / कफपित रुधिर के लक्षण २८५ कानमें औपथ डालनेका विधान २८० द्विदोष व त्रिदोष कुपित रधिर फानमें द्रव्यभारने का प्रमाण ... २८० के लक्षण २८४ तथा मानाभों का प्रमाण २८० | अतिदुष्ट रुधिर के लक्षण २८४ फागमें रसादिक तथा तैलादिक शुद्धरतके लक्षण २८५ डालने का समय... २८० रक्तमोक्षणयोग्य रोगी २८५ फर्णव्यथा पर औषध २८० | रक्तमोक्षणका प्रकार... फर्णशूल पर मूत्रप्रयोग २८० शिराच्छेदन में अयोग्य रोगी फर्णशूल पर तीसरा प्रयोग २८० पातादिपित रुधिर निकालने फर्णशूल पर पांचयां प्रयोग २८१ का विधान २८६ पर्णशूल पर दीपिकातल २८१ | सिंगीआदि से रुधिर खींचने का फर्णशूल पर श्योनाकल २८१ प्रमाण २८६ फर्णनादपर तैल २८१ | रुधिरमोक्षणमै अयोग्यरोगी कर्णनादादिको पर धेष्ठतैल २८१ / शिरारक न देनेका यज्ञ यधिरत्यपर अपामार्गक्षारतल... २८२ रकमोक्षण का समय २८६ फर्णयणपर शम्बूकतैल २८२ थतियधिरताय में कारण २८७ कर्णनावपर औषध २८२ अत्यन्तरधिर निषलनेपर उपाय २८७ पञ्चकपायपक्षों के नाम २८२ / दग्धस्तरोगशमनोपाय २८७ फर्णनायपर औपध २८२/ दुष्टरको निकालनेपर अपशिए पानसे राद यहनेपर औषध गुण ૨૮૮ फर्णकार के दूर होनेफा तैल ... २८२ | रुधिरसेदेोत्पत्तिआदिकाप्रकार २८८ कर्णकोट, दूर होनेफा दूसरा रुधिरमोक्षण पर दोपकुपित होने यतीसरा प्रयोग ... २८८ इति एकादशाध्यायः॥ रुधिरमोक्षणपर पथ्यपिचार २८८ अच्छे प्रकाररक्तमोक्षणके लक्षण २८८ अथ दादशाध्यायः॥ रत्तमोक्षण पर निपिस पदार्थ.. रधिरमोक्षण का विधान २८३ इति द्वादशाध्यायः॥ रुधिरतावा सामान्पकाल २८३ रधिर का स्यरूप अथ त्रयोदशाध्यायः॥ २८३ रधिर में पृथिव्यादि पञ्चमत्त्वों पे गुण ८३ सेकविधान... २८९ ... ... ... ... २८६ ... ... ... ... ... ... .. + कायत ... .. ... नेत्रोपचार प्रकार ..
सूचीपंत्रम् । १९ . . ... ... ... ... ... ... ... ... + ... विपया: पृष्ठाका विषयाः पृष्टाहार स्नेहनाविभेदोंसेसेककेतीनप्रकार २८९, अम्जननामिका · पिड़िकी पर सेककी मात्राओकाप्रमाण लेप... २९३ सेक सेवन करने का समय २८९ नेत्ररोगपर तर्पण का विधान. २९४ घाताभियन्दरोगपर सेकविधान २८९ / तर्पणकी मात्राओंका प्रमाण..... 'घाताभिप्यन्द पर दूसरा प्रकार २८९ / तर्पण में कफकी अधिकताका पित्तरक्त घ अभिधात पर सेफ २९० उपाय रक्ताभिप्यन्द पर सेक २९० तर्पण में दिनों का प्रमाण नेत्रशुलपर सेक ... २९० भलीभांति तर्पण होने के लक्षण २९५ थारच्योतन का विधान २९० अत्यन्त तर्पण होने के लक्षण... लेखनादि मारच्योतन में बिन्दु हीन तर्पण के लक्षण... डालने का प्रमाण... २९० तर्पण से अतिस्निग्ध प हीन आरच्योतनमैमानाओंकाप्रमाण २९१ स्निग्ध नेत्रों का उपाय गेत्रयातामिप्यन्दपर मारच्यो. पुटपाफकी रीति का निरूपण... तन विधान २९१ / पुटपाकसम्यन्धी रस नेनों में यात घ रक्तपित्तपर आश्च्योतन २९५ धारने का विधान सोभियन्द पर माश्च्योतन... २९१ / स्नेहनादि भेदों से पुटपाकक्रिया २९६ रक्तपित्ताभिप्यन्दपर आश्च्यो. स्नेहनपुटपाक विधान २९१ रोपण नामक पुटपाक का प्रकार २९६ पिण्डी या फलिकाका प्रकार २९१ | दोपोंके संपाक होने से अम्जन नेत्राभिष्यन्द पर शिरोविरेचन २९२ घ साधारण अन्जन का सर्वाधिमन्थपर उपचार २९२ विधान अभिप्यन्दादिपर पिण्डिकाबंधन २९२ अम्जन के भेदों का निरूपन... २९७ यातयपित्ताभिष्यन्द पर कलि गुटिकादि भेदों से मम्जन के काविधान २९२ पित्ताभिप्यन्दपर द्वितीयपिण्डी २९२/ अजन में अयोग्य रोगी कफाभिप्यन्दपर पिण्डी का तीक्ष्ण अन्जन की पी का विधान २९२ प्रमाण फफपिसामिप्यन्दपर पिण्डी २९२ | अजन में रसका मनाप २९७ रक्ताभिप्पन्दपर पिण्डी २९२ विरेचन मइन में चूर्व का नेत्रशोथ व साजपर पिण्डी प्रमाण विडालनामकलेप का विधान... २९३ / पत्थर व धातु भादि सताका' सर्वाक्षिरोगों पर पिडाल (सलाई) कामना सर्वनेत्ररोगोपर दूसरा विधान २९३ / भवन रगाने का समय सर्वनेत्ररोगोपर तीसरेव चौधे चन्द्रोदयवर्ती का विधान लेपका प्रकार... २९३ गुमादिक (फूली भादि ) अर्मरोग पर रेपक्षा प्रकार पर लेसनयता ... तीन प्रकार ... ... ... ... - ... ... ...
साईधरसंदिवाया:- -- च ... ... N ३०२ .. ... पिपया पृष्ठावा. पिपया प्रधाड़ा तथा फूली आदिकों पर दूसरा नेत्र स्वच्छ होनेफेल्यि रसमिया ३०२ प्रकार ....२९९ शिरोत्पातरोग पर रसमिया ३०२ लेखनी दववर्ती २९९१ धुधिरोगपर रसविया, तन्द्रानियारक लेखनी पर्ती .. २१९/ लेखनीजन रोपिणी पुलुमिका वती २९९. रतोधीपर लेखनचूर्ण रतन्धो दूर करने की पर्ती .: २९९ / फण्डू आदिकोपर लेखनचूर्णाअन ३०२ नेत्रस्नायपर स्नेहन व ३०० सर्व नेत्ररोगों पर मृदु घूर्णाअन ३०३ रसमियाका निरूपण .:.३०० सर्वाक्षि रोगोंपर सोवीरासन ३०३ फूलो दूर करने को रसमिया ३०० सीसे की शलाका या विधान ३०३. अति निद्रा नाशक लेपनी रस . प्रत्यञ्जन करने का विधान किया ३०० सदोपनेपर निपेद . ३०४ तन्द्रानियारक रसनिया। - ३०० प्रत्यअन चूर्णका विधान ३०४ सनिपातपर लेखनरसमिया ३०० सर्पधिपनिदारद अक्षन नेत्रदाहपर रसमिया २९१ | नेत्रवाधाहार शीतल पाल का परूनी रोगपर रसक्रिया ३०४ तिमिररोग पर रोपणी रसमिया ३०१ अन्य को सन्लत्व सूचनापूर्वक असनान्त में अनुपान का विधान ३०१ निजामिमानका परिहार ३०४ प्रतापपर रोपणी रसपिया... २०१ | ग्रन्थ के पढने या फल व अ. नेत्रत्रावपर दूसरा प्रकार भ्यास करने का प्रयम । .. ... . प्रकार ... ... ... इति श्रीमत्सुलशक्तिधरविरचितशाझंघरसदितायाः • सूचीपनसमाप्तिमगादितिशिवम् ॥
पन्दम्बरी शार्ङ्गधरसंहिता॥ भाषाटीकासमेता॥ श्रियंसदद्याद्भवताम्पुरारिर्यदङ्गतेजःप्रसरेभवानी । विगजतेनिर्मलचन्द्रिकायां महौषधीवज्वलिताहिमाद्री १ श्रियमिति स कहे सो श्रीके देनगारे होहु सो पुरारि कैसे हैं जिनके तेजगता- रित अंग में भवानी विराजमान हे कैसी है भवानी मिनके निर्गत निर्मलमुस मयकी चन्द्रिकाकई चादनी मकाश करिरही है कमिव काकीनाई जैसे हिमकहे पाला अद्रिकहे पर्वत हिमाद्रि विपे महायोपधि सपिन्यादि ज्वलितबहे प्रकाशित होइ रहीहै यह अगिी अनुपम स्वरूप निराकार निरिकार जगदाधार सदाशिव परमेश्वर ने अनादिरचनादि एकवलोपकार अनेकत्व प्रकाशकरन इच्छासमय अदृश्य प्राति पुरुषसंयुक्त दृश्यमान अर्धांगीस्वरूप धारण किया है इस सरूप की महिमा वा उपमा वेदशास्त्र पुराण काव्यादि नहीं कहिसक्ते काहेसे कि एकही रूपहै इस स्वरूप की उपमा उपमाविना है रूपसंयुक्त क्येि नहीं होसक्ती है और दै उपमासे वैत भासित होता है इसलिये परमेश्वर की उपमा हिमाद्रि परमेश्वरी की उपमा महोपधि करते भये फिर हिमाद्रिगुण शीतलता भगवती के मुग्नचन्द्र की चन्द्रिका में घटितकरी और योपपिन की मज्वलिता भगवान् के तेजमें घटित करी अथवा तेज चन्द्रिका का एक ठौर होना असंगत है परन्तु इहा दोनों समान प्रकाश करते है क्योंकि भगवत्ती की शीतल चन्द्रिका करिके सदा शातिमूत्ति स- तोगुणी श्वेत कर्पूरवर्ण विश्वनाथ शोभित हैरहे हैं और श्रीभगमन के तेजशरिक प्रैलोक्यजननी श्रीपातीनी काचनवर्ण दीप्यमान छ रही है अर्थात् दोनों उपमा २ -- शायरसंहिता। [मयमखण्ड प्रसिद्धयोगामुनिभिः प्रयुक्ताश्चिकित्सकैर्ये वहुशाऽनुभू ताः। विधीयतेशाईधरेणतेपासुमंग्रहस्सज्जनरञ्जनाय २ हेत्वादिरूपाकृतिसात्म्यजातिभेदैः समीक्ष्यातुरसर्चरो गान्।चिकित्सितकर्षणबृंहणाख्यंकुवातवैद्योविधिवत्सु योगैः३ दिव्योषधीनांबहवःप्रभेदा ठन्दारकाणामिववि स्फुरन्ति । ज्ञात्वेतिसन्देहमपास्यधीरैस्सम्भावनीयाविवि धप्रभावाः ४स्वाभाविकागन्तुककायिकान्तरारोगाभवेयुः ग्र‘गी सूचित भई क्योंकि माति की उपमा के गुण पुरुष में पायेगये पुरुष की उपमा के गुण मति में पायेगये पुनरर्थः मथम कविलोग अपने इष्टदेवसे मंगला. चरण में यान्यमानहोइ ग्रंयको घटित करते है कि महादेवजीका तेज उप्ण पित्ता- धिपति पार्यतीजी की चन्द्रिका शीतल रलेप्मापिपति और प्रसारणधर्म या ज्यान भूपरण करिक चारधिपति जैसे गौरीरावर को शभापी गुणसहित सेइरहै तैसे शाधरवेत्ता बयों की सेवा में श्रीयशके देनेवाले होहिंगे कैसा है शाधिर जैसे हिमाद्रि महामओपर्धन करित ज्वलित कहे प्रकाशित होइरहाहै तैसे शामर होपधीयुक्त है ॥१॥शाईवर जू कहते हैं कि में सजन मनुष्यन के मनोरंजन के निमित सुधत चरकादि गुनि और श्रेष्ठ प्राचीन वैद्यों के निश्चित किये प्रसिद योग या शाधर में संग्रहकरि ग्रन्थित करताहूं ॥२॥ प्रथम वैद्य इन पंचमकारमें व्युत्पन्नहोय हेतु १ आदिन २ श्राकृति ३ सात्म्य ४ जातिभेद ५ तप पीड़ित रोगी की निदानपूर्वक कर्पण वृहणादि चिकित्साकर कर्पण कहे घटावना बृहणकदे य. दाना वासादि दोपन को घटावे हेत्यादिलक्षणा हेतु कहे निदान यादिकारण जिससे रोगकी उत्पत्ति है १ आदिम कहे मथम रोगी की देहट्टना अँभवाईमा- चना २ माइति रहे थेष्टा मतिनहोना वृष्णा मूर्चा सम्भ्रम दाह निद्रानाश ३ सात्म्य कहे रोगीकी अपेक्षा मिस वस्तुको मन चाहै यया गर्मीलगै पवनप्यासे में पानी या हितकारक जसे जाडालगै बस्त्र हित करै ४ जाति कहे इन्द्रियपरिज्ञान अपने घर में सायपान वा विहलता ॥३॥ जैसे गन्दारक कहे देरतन में बहुत श्रेप शुण विस्फुरित कई प्रकाशित है तैसेही दियकहे उत्तम मोपधिन में भी भासित है सो ज्ञात्वा कहे जानिक धीर वैच सन्देह छोड़िक ऐसी सम्भावना करें कि मेरे निरषय से भी अधिक गुण और प्रभाव भोपधिन में है ॥ ८॥ और स्वाभाविक अध्याय १] भापाटीकासमेता। किलकर्मदोपजाः। तच्छेदनार्थदुरितापहारिणःश्रेयोमया न्योगवरान्नियोजयेत् ५ प्रयोगानागमासिद्धान्प्रत्यक्षाद नुमानतः। सर्वलोकहितार्थायवक्ष्याम्यनतिविस्तरात् ६प्रथमपरिभाषास्यानैषज्याख्यानकन्तथा।नाडीपरीक्षा दिविधिस्ततोदीपनपाचनम् ७ततःकालादिकाख्यानमा हारादिगतिस्तथा । रोगाणांगणनाचैवपूर्वखण्डोऽयमी रितःस्वरसःक्वायफाण्टौचहिमाकल्कश्चचर्णकम् । तथै वगुटिकालेही स्नेहसन्धानमेवच ९ धातुशुद्धिरसाश्चैव खण्डोऽयंमध्यमःस्मृतः।स्नेहपानस्वेदविधिर्वमनंचविरे चनम् १० ततस्तुस्नेहवास्तिःस्यात्ततश्चापिनिरहणम् । आगन्तुक कायिक आन्तरिक इन चारों से वा तीनों दोपन से वा मारब्धकर्म से रोग होइ ताके नाश करिबे को दुरित कहे पातक प्रहार करनवारे श्रेष्ठ योग चैव कर स्नमात्रादिलक्षणा स्वाभाविक विहाराहार विषमता यथा रितुवा गतक्षुधा- राम या हीन विपरीत भोजन या निर्भोजन योही कृपा और जन्म से मरणपया अवस्थासे विपरीत कर्म होना १ आगन्तुक शनापघात पतन प्रहार विष मद सर्प पशु पीडिनादि २ कायिक व्यायाम श्रम मैथुनादि पातुन्यूनाधिकरवते दोपत्त कुषित होना ३ अन्तर मनमें खेद कोध चिन्ता शोक मूळ संन्यारा शासनिरो- धादि ४॥५॥ प्रत्यजसे औ अनुमानसे शानसे जे प्रसिद्धयोगसोलोक हितार्थ संक्षेप करि कहता हूँ॥ ६॥ या शईयर के तीन सण्ड है ताके भयगायएड में पहिले परिभाषा कई मोपधि की तोलकी फिरि भैपज्याख्यान काहा चोपधिम- परिधि फिरि नाड़ीपरीक्षा सम शकुन विचार थर दीपन याग्निचलित क- रना पाचन जो मलको भस्म करि पचावै ।। ७॥ ताके पीछे ओपरिमलण समय फिर आहार अन्तरमवेश गति कही और रोगों की संख्या कही इतनी बाते प्राम सएडमें है ॥ ८॥ (अथमध्यखण्डेऽनुक्रमणिका)न्यनका रस काय कही कादा फाण्ट कही दर पदार्थ का अग्नियोगसे फाड़ना सत्तिकी भिगोई योपवि का मातः गललेइ इसे हिम कहिये करककहे पीठी चूर्ण गोली अवलेह कही चटनी तेल ॥९॥ धातुशुद्धिरसक्रिया ये म पखण्ड में कही ( अधोसरखण्डानुमा- मणिका)ततेल पीना स्वेदविपिने कना और बोपरियों से पसीना निकालना - ४ 4 शाईधरसंहिता। [मयमस्वपट ततश्चाप्यत्तरोवस्तिस्ततोनस्यविधिर्मतः ११ धमपा नविधिश्चैव गण्डूपादिविधिस्तथा । लेपादीनांविधिः ख्यातस्तथाशोणितवितिः । नेत्रकर्मप्रकारश्चखण्डः स्यादुत्तरस्त्वयम् १२ द्रात्रिंशत्प्रमिताध्यायैर्युक्तेयंसंहिता स्मृता। पड्विंशतिरातान्यत्रश्लोकानांगणितानिच१३॥ परिभाषा॥ नमानेनं विनायुक्तिर्द्रव्याणांजायतेक्वचित् । अतःप्रयोगकार्यार्थमानमत्रोच्यतेमया १४जालान्तरगते भानौयत्सूक्ष्मंदृश्यतेरजः।तस्यात्रिंशत्तमोभागःपरिमाणुः लउच्यते १५ त्रसरेणुर्बुधैःप्रोक्तविंशतापरिमाणुभिः।वस रेगुस्तुपर्यायैर्नाम्नावंशीनिगद्यते १६ जालान्तरगतेरसूर्य कशीनिगद्यते। षडूंशीमिर्मरीचिःस्यात्ताभिःपड्भिरतु राजिका। तिगभीराजिकाभिश्चसर्षपःप्रोच्यतेवुधेः १७ यवोऽटसर्पःप्रोक्तोगुञ्जास्यात्तचतुष्टयम् । षड्भिस्तुरक्ति काभिःस्यान्मापकौहेमयान्यकौंमाश्चतुर्भिःशाणःस्या वगन कही उधार विरेचन कही दस्त ।। १०॥ स्नेहास्ति कहे गुदमार्ग से पिच- कारी देना निख्हण कहे कादा दूध की पिचकारी देना उत्तरवस्ति कहे पिचकारी का विधान अनन्तर नासविधि ॥ ११ ॥ धुवां पीने की विधि गएपषिधि जिसे पवनकला कहते हैं लेपादि की विधि अरु शोपितविनुति कही रक्त निकालना नेनांजन ये सब उत्तराखण्ड में कहे हैं ॥ १२ ॥ यह पत्तिस अध्याय में कहा इस में दो सहन सौ श्लोक हैं ॥१॥ (परिभापा) मिनतुली योपधि अयोग्य है इसलिये प्रयोग के निमित मैं मागव परिभाषाको महताहूं ॥१४॥ झरोगों के विद्रों को सूर्य की बागासे रजकणउड़ते देखपहते है उनके तीसमें भागको परिमाग कहते हैं॥१५॥ किसी २के मतसे जो बिटमें सूर्यको किरणे दिखाई पड़ती हैं उस ३० परिमारगुका एक सरेणु होता है इसीवो वंशी कहते हैं या छावंशी की एक मरीचीडःमरीपीपी एक राई तीन राई नी एक सरसौ॥ १६ ॥ १७॥ माठ सरसौंका एक यत्र चार यवकी गुंजा अर्थात् मारची छः रवीका एकमाशा सोई हेम गौ धन्य कहा है चारमाशेका एक अध्याय १] भापाटीकासमेता। दरणःसनिगद्यते १८ टङ्कःसएवकथितस्तद्वयकोलउ. च्यते।क्षुद्रःकोलवटश्चैवद्रसणस्मनिगद्यते १९ कोलह यंचकर्षःस्यात्साप्रोक्तापाणिमानिका । अक्षःपिचुःपाणित लंकिञ्चित्पाणिश्चतिन्दुकस २० विडालपदकचैवतथा षोडशिकामता । करमध्याहसपदंसुवर्णकवलग्रहः २१ उ दुम्बरश्चपर्यायैःकर्षएवनिगद्यते। स्यात्कर्षाभ्यामईपलं' शुक्तिरष्टमिक्षातथा २२ शक्तिभ्यांचपलंज्ञेयं मुष्टिराजंच तुर्थिका । प्रकुञ्चःषोडशीविल्वपलमेवात्रकीय॑ते. २३ पलाभ्यांप्रसृत्तिर्जेयाप्रसतश्चनिगयते। प्रसृतिभ्यामज लिस्यातुडवोईशरावकः २४ अष्टमानंचसंज्ञेयंकुडवा भ्यांचमानिका। शरावोष्टपलंतहज्जेयमनविचक्षणैः २५ शरावाभ्यां भवेत्प्रस्थश्चतुष्प्रस्थैस्तथाढकम् । भाजनं कांस्यपानंचचतुःषष्टिपलंचतत् २६ चतुर्भिराढोणः कलशोनल्वणोर्मणः। उन्मानश्चघटोराशिद्रोणपर्याय संज्ञितः २७ द्रोणाभ्यांशूर्पकम्भौचचतुःषष्टिशराचकः । शाण यही धरण ॥१८॥ो टङ्क कहाताहै दो रङ्गका एक कोल उसी क्षुद्र,को- लपट, दक्षण कहतेहै ।। १६ ।। दो कोल का कप होताहै उसे पाणिमानिका, अक्ष, पिचु,पाणितल,किभित्तापि,तिदुक, ॥२०॥ पिडान पदक, पोडशिका, करमय, हमपद,सुपर्ण,कवलग्रह ॥ २१॥और उदुम्पर कहते है ये सब कपके पर्याय दोकर्प को अदपलशुक्ति च अष्टमिका कहते हैं।॥ २३ ॥ दो शुक्ति को एकपल भी मुष्टि अाम्र,चतुर्थिकामच,पोडी, पिस्व कहतें ये सर पल की पर्याय कहिये ॥२३॥ और दोपलकी एक प्रमृति जानना चाहिये और प्रकृतभी कहते हे दो प्रमृतको अज- लि,कुडव थौर अर्धशराब कहतेहैं ॥ २४॥ और अष्टमान भी कहते हैं दोकुडनको मानिका उसीको जो सवैद्य हे अष्टाल कहते हैं ॥ २५॥ दो शावकी एक प्रस्थ संज्ञा है . प्रस्थ वा पाठ शराब का चौसठि पल की श्राइक संसाई इसे भाजन नौ वास्यान भी कहते हैं ॥ २६ ॥ चार ग्राहकको एक द्रोण इसके सात नाम है कलश, नत्पा, अर्मण, उन्मान, पट, राशि द्रोण ॥ २७ ॥ दो द्रोणका एक शाईनरसंहिता [मयमखएड शूर्पाभ्यांचभवेद्रोणीवाहोगोणीचसास्मृता २८ द्रोणी चतुष्टयंखारी कथितासक्ष्मबुद्धिमिः । चतुःसहस्रपलिका प्रसवत्यधिकाचसा २९ पलानां द्विसहसंचमारएकःप्रकी र्तितः । तुलापलशतंज्ञेयंसर्वत्रैवैषनिश्चयः ३० मापट ङ्काक्षविल्वानिकुडवःप्रस्थमाढकम्।राशिर्गोपीखारिकेति 'यथोत्तरचतुर्गुणाः ३१ गुजादिमानमारभ्ययावत्स्यात्कु डवस्थितिद्रवाशुष्कद्रव्याणांतावन्मानसमंमतम् ३२ प्रस्थादिमानमारभ्यद्विगुणंतद्र्वार्द्रयोः।मानंतथातुला यास्तुहिगुणनक्कचित्स्मृतम् ३३ मृदस्तुयेणुलोहादेर्भाण्ड यञ्चतुरङ्गुलम् । विस्तीर्णचतथोचंचतन्मानंकुडवंवदेत ३४यदौषधन्तुप्रथमंयस्ययोगस्यकथ्यते। तन्नाम्नैवसयो गोहिकथ्यतेऽत्रविनिश्चयः ३५॥ इति मागधपरिमाषा॥ स्थिति स्त्यवमात्रायाः कालमग्निवयोवलम् । प्रकृ तिदोपदेशोच दृष्ट्वामात्रांप्रकल्पयेत् ३६ यतोमन्दाग्न शू, कुम्भ इसे चौंसठिशरावभी कहते हैं दोशूर्पकी एकद्रोणी और पाह और गोणी भी कहते हैं ॥ २८ ॥ चारद्रोणी की एक सारी चारिसहर छानवे पलकी सारी संज्ञाहै ॥ २६ ॥ दोसहस पलको भार कहिये सौरलको तुला कहिये सब ठौर यही निश्चय जानो ॥३०॥माशे से चौगुना टक टरते चौगुना अक्ष यतते ४ दिल्य चिल्लते ४ फुटय कुडवते चौगुना प्रस्य प्रस्थते । मादक प्रादकते ४ राशि राशि ते ४ गोणी गोणीते ४ सारी एकते एक चौगुनी जानो॥१॥ गुजाते कुडवती सजलवस्तु सम लेना ॥ ३२॥ कुष्यते तुलाला सनलीनीलेना तुला ते ऊपर अोदी द्रव्य दूनीलेना ।। ३३ । चारि अंगुल चौंडावा ऊंचा समान यासन मा. रीवा लोसाहिफितीश होय उसकी कुडवसंझा जानो ॥ ३४॥ निस रोगपर जो नौपच कहगे तिस में जिस द्रन्यका प्रयग नाम प्रावै उसीको योग निश्चित फरते हैं जो रास्नादिकाय प्रथम नाम रास्नाई॥३५॥इति मागपरिभाषा।। (अथ कलिंगपरिभाषा)मात्राका कुराममाएनहीं स्थितकिया समयअग्नि श्रयस्था बल महति रोग देश देखकर वैद्य मात्राका प्रमाणकरै॥३६॥ क्योंकि ७ प्रध्याय !] पाटीकासमेता। पोह्रस्वाहीनसत्त्वानराःकलो । अतस्तुमात्रातयोग्याप्रो च्यतेसुझासम्मता ३७ यवोद्वादशभिगौरसर्षपैःप्रोच्य तेबुधैः । यवहयेनगुज्जास्यास्त्रिगुजोवल्लउच्यते३८ मा पोगुजाभिरष्टाभिःसप्तभिर्वाभवेत्त्वचित्ास्याच्चतापकः शाणःसनिष्कष्टङ्कएवच ३९ गद्यानोमाषकैःषभिःकर्पः स्यादृशमाषकः । चतुष्कर्षेःपलंप्रोक्तंदशशाणमितंबुधैः । चतुष्पलैश्चकुडचंप्रस्थाद्याःपूर्ववन्मताः ४० कालिङ्गमा गधंचेति द्विविधमानमुच्यते । कालिङ्गान्मागधंश्रेष्ठमि तिमानविदोविदुः ११ नवान्येवहियोज्यानि द्रव्याण्य खिलकर्मसु । विनाविडङ्गकृष्णाभ्यां गुडधान्याज्यमाक्षि कैः ४२ गुडूचीकुटजीवासाकूष्माण्डश्चशतावरी । अ श्वगन्धासहधरी शतपुष्पाप्रसारणी । प्रयोक्तव्यास्सदे वाद्विगुणानवकारयेत् ४३ शुष्कन्नवीनंयद्रव्यंयोज्यं सकलकर्मसु । आर्द्रञ्चद्विगुणंयुज्यादेषसर्वत्रनिश्चयः ४४ कालेऽनुक्तेप्रभातस्यादङ्गेऽनुक्तेजटामवेत् । भागेऽनु कलियुगमें मनुष्य मन्दाग्नि लघुशरीर और बलहीन होयगे इससे सहयोंका मनी कि मात्रा रोगी को यथायोग्य देनी ।। ३७ ।। बारह गौर सरसों का एक पर दो यय की एफ गुंजा तीन गुजाका एक वल्ल कहाताहै ॥ ३८ ॥ आउ मुंगा नया सात गुंजाका माशा चार माशे का शाण उसी को निष्क और टंकभी कहते हैं || l छामाशे का गद्यान दश माशे का कर्प चार कर्पका पल उसे दश शाभी कहते चारि पलका कुडर और प्रस्थादिकोंको मथम कही रीतिसे जानो ॥ ४० ॥ काल- गममाण से मागधप्रमाण सदैद्य उत्तम मानने है ।। ४१ ।। सर्वकमा में सब पर नवीन लेना पिना पीपरि,चिडंग,धनियां, घी और शहदके ॥१२॥गुर्च,कुरैया,रूमा फुम्हडा,रवेतशतापरि, असगन्ध,पात कटसरैया,कृष्णमाया, सौंफ, गंगासार- णी ये द्रव्य श्रोदी दूनी न लेना और सूमी द्रव्य सकल प्रयोगमें नदीनना और मोदी द्रव्य मसी से दनी देना यह सर्वत्र निश्चय है ।। ४।४ालिम पिपिक खान पानका काल नहीं कहा उसका प्रातःकाल जानना और निम ओपनिंग .. शाहपरसंहिता । [प्रथमएड क्लेचसाम्यस्यात्पात्रेऽतुक्केचमृन्मयम् ४५. एकमप्योप, योगे यस्मिन्यत्पुनरुच्यते। मानतोद्विगुणप्रोक्तंतद्र्व्यं तत्त्वदर्शिभिः ४६ चूर्णरनेहासवालेहाः प्रागशश्चन्द नान्विताः। कपायलेपयोःप्रागोयुज्यतेरक्तचन्दनम् ४७ गुणहीनभवेद्वादूर्भातद्रूपमौषधम् । माप्तद्वयात्तथाचूर्ण हीनवीर्यत्वमाप्नुयात् ४८ हीनत्वंगुटिकालेहोलभेतेवत्सरा त्परम् ।हीनाःस्युघृततैलाद्याश्चतुर्मासाधिकास्तथा ४९ ओषध्योलघुपाकाःस्युनिर्वीर्यावत्सरात्परम् । पुराणाःस्यु गुणैर्युक्ताबासवाधातवोरसाः ५० व्याधरयुक्तंयव्यंगु पोतमपितत्यजेत् । अनुक्तमपियुलंयद्योजयेत्तत्रतहुधः। आग्नेयाविन्ध्यशैलाद्याःसोम्योहिमगिरिम्मत ५१ अत रतदौपचानिस्युरनुरूपाणिहेतुभिः । अन्येष्वपिनरोह का नाम नहीं लिखा तहा मूल लेना जहाँ कई प्रोपधि हे ओर भागभेद नहीं है वहा समभाग लेना जहा प्रोपधि बनाने के पान की जाति नहीं लिखी तहा मा टीकाही पात्र लेना जहा प्रोपरि को गीली करना होय शौर रस दा पानी वा दूध तिरका चामल कुछ नहीं लिसा तहा जान लेना ॥ ४५ ॥ जिस मयोगमें प्रेर कार जहा एकही ओपधि को दोगर लिखें सहा वढी ओपपिके दोमाग लेना यह प्रकार तत्वदर्शी वैध कहते हैं ।। १६ ॥ और चूर्ण, तेलात हिम अर्क अपलोड आदिकन में केवल चन्दन लिया हो तहां शव लेना काहे और लेपमें लालच; न्दन लेना ।। ४७ ॥ वर्षभर भोपधिर्म गुण रहता है फिर कम होजाता दौमास वीते चूर्ण क्षीणताको मास होताहै ॥ ८ ॥ वर्षीते गोली अवलेह का गुणशीन होना है सोलह मास बीते घी, तेल गुणरहित होते हैं ।। ४६ ॥ वर्पीते लघुपाक निर्गुण होते हैं जैसे मेथी,मोदक और दारूपारस पुराने गुणदायकहोनेह ।।१०।। जो श्रोपधि रोगको अपगुणदायकहो उसे ग्रंकी लिसी भी त्यागदेइ और जो रोग, को हितकरै मो अनलिखा भी ग्रहणकरै ।।३१॥दक्षिणके विध्याचनादि पति। उष्णप्रकृति हैं उनपर उत्पन्न ओपधि भी उप्णप्रकृति होती है उत्तर के हिमाद लादि पर्वत शीतल हैं उनपरकी उत्पन्न ओपपि भी टएडी होती और वन ह अध्याय १] भाषाटीकासमेता। न्ति वनेषपवनेषुच ५२ गृह्णीयात्तानिसुमनाः शुचिः प्रा तःसुवासरे । आदित्यसम्मुखोमौनीनमस्कृत्यशिवहदि । साधारपंधराद्रव्यं गृहीयादुत्तराश्रितम् ५३ बल्मीककु रिसतानूपश्मशानोपरमार्गजाः । जन्तुवहिहिमव्याप्ता नौषध्य कार्यसाधकाः ५४ शरचखिलकार्यार्थ ग्राह्यसर समौषधम् । विरेकवमनार्थचवसन्तान्तेसमाहरेत् ५५ अ निस्थूलजटायास्तुतासांग्राह्यास्त्वचोचुधैः । गृहीयात्सू चममूलानिसकलान्यपिवुद्धिमान् ५६ न्यग्रोधादेस्त्वचो ग्राह्यासारःस्याहीजकादितः। तालीसादेशचपत्राणिफलं स्वास्त्रिफलादितः ॥ धातक्याडेश्चपुष्पाणिस्नुह्यादेःक्षी रमाहरेत्५७॥ इतिशार्ङ्गधरेपरिभापाऽध्यायःप्रथमः १ ॥ वन में जो द्रव्य होती है सो जैसा उस पृथ्वीका स्वभाव होता है वैसाही उसकी उसन द्रव्य का भी स्वभाव होताहै ॥५२॥ मनुष्य प्रात:काल पवित्रहो शुभदिन गौन होके हृदय में शियका ध्यानकरि सूर्यके सम्पुराहो ओपपिला साधारण जगहकी द्रव्य उत्तर मुसही होके लेना ॥ ५३॥ और इतनी जगहकी द्रव्य न लेना सकी बांवी कुत्सितभूमि जहां रणभयाहो रमानकी ऊसर जहां रह चूना निक- लता होइ सरमार्ग की जहां गदहे लोटते हैं और मार्गकी दलदल कृमिस्थान यी दमभूमि की पाला मारी हुई इत्यादि भूमिकी द्रव्य कार्य साधक नहीं हैं। १५४॥ सर्व कार्य अर्थ शरद् ऋतु में प्रोदी ोपधि लावै और यमन विरेचन के मय वसन्त के अन्त में मोदी वस्तुलावै ॥ ५५ ॥ और प्रतिस्थून इतके जड़की छाल सद्वैद्य लेते हैं और सब छोटे नन की जड़ ग्राह्य है ।। ५६ ॥ और घरगदादि वृतनकी छाल ग्रालहै विजयसारादि शतका हीर ली तालीमादि इतकी पाती लीजै त्रिफलादिक का फल लीन धत्रमादिकके पुप्प लीन सेंहुड़ा. दिक का दूध ली मै इस रीति से वही ग्रहण करै जहां केवल वृक्षका नाम है अङ्ग नहीं है ।। ५७॥ इति श्रीशाई परव्याख्यायांपरिभाषाऽध्यायःप्रथमः ॥ १ ॥ २ । शाईधरसंहिता । [मयमखरट भैपच्यमभ्यवहरेत्प्रभातेप्रायशोवुधः । कपायश्चवि' शेपेणतत्रभेदस्तुदर्शितः१ज्ञेयःपञ्चविधःकालोभैषज्यन हणेन्नृणाम् । किञ्चित्सूर्योदयेजात्तेतथादिवसभोजने।सा यन्तनेभोजनेचमुहुश्चापितथानिशि २ प्रायःपित्तकफोद्रे केविरेकचमनार्थयोःलेखनाथचभैषज्यंप्रभातेतत्समाच: रेत् ॥ एवंस्यात्प्रथमःकालोभैषज्यग्रहणेनृणाम् ३ भैप ज्यविगुणेपाने भोजनायेप्रशस्यते । अरुचौचित्रभोज्यै श्चमिश्ररुचिरमाहरेत् ४ समानवातेविगुणेमन्दाग्नाव ग्निदीपनम् । दद्याद्भोजनमध्येचभैषज्यंकुशलोभिषक्५ व्यानकोगेचभैषज्यं भोजनान्तेसमाहरेताहिकाक्षेपककम्पे पुपूर्वमन्तेचभोजनात्॥एवंद्वितीयःकालश्चप्रोक्तोभैपज्य कर्मणि ६ उदानेकुपितेवातेस्वरभङ्गादिकारिणि ग्रासेया सान्तरेदेवभेषज्यसान्ध्यभोजनेप्राणेप्रदुष्टेसान्ध्यस्यभु पैघलोग ओपधि सपेरे खवा और कपायादि विशेष मात काल में फांट हिम स्वरस कल आवश्यक देना और जो भोपधि देने का समय है सो आगे कहता हूँ॥१॥ प्रोषधि खानेके पांच समय हैं प्रथमकाल किश्चित् सूर्योदय, दूसरा दिनके भोजन समय में तीसरा संध्याको चौथा निशिमें भोजन के समय पांचवां रात्रि में सोने के समय ॥२॥निस मनुष्पको पित्त और कफका वेगही उसे रेचन चा वमनकही उछार वा लेखनक्रिया मात:काल करै लेखन कहे चमड़ेकी पट्टी मायर याचिकै बोपधि भरे पिन के अधिकार में वमन कफके भधिकार में रे.' चन और लेखन यह भोपार करनेका प्रथम फालयांधा ॥ ३॥ अपानवायुके विगरे में भोजन के प्रथम प्रोपधिदेय अरुचि में विचित्र भोजनके संग रुचिकारक मोपधि सघाचे ॥ ४ ॥ सदैव समानवायु और मन्दाग्नि में अग्निज्वलित कारक द्रव्य भोजन के मध्य में देय ॥५॥व्यानवायु के कोपमै भोगन के अन्त में प्रोप- घि सयाये और हिचकी थालेपक कमवायु में भोजनके श्रादि अन्त में देय यह दसरा कालई ॥ ६ ॥ स्वरभंगादि करनेवाली उदानवायु के कोप में सन्ध्या सपर ग्राम ग्राम के अन्त में मोपधि देह ॥ ७॥ माण वायु के कोप में अध्याय २] भापाटीकासमेता। तस्यान्तेचदीयते। औषधप्रायशोधीरैःकालोयरयात्तती यको ८ मुहुर्मुहुश्चटट्छर्दिहिकाश्चासगरेषुच । सान्नच भेषजंदद्यादितिकालश्चतुर्थकाः ६ ऊर्ध्वजत्रुविकारेषुले खनेवृंहणेतथा। पाचनशमनंदेयमनन्नंभेषजनिशि ॥ तिपञ्चमकालस्स्यात्प्रोक्तोभैषज्यकर्मणि १० द्रव्येरसो गुणोवीर्य विपाकःशक्तिरेवच । सम्बन्धेनक्रमादेताःप चावस्थाःप्रकीर्तिताः ११ मधुरोऽम्लःपटुश्चैव तिक्तःक टुकपायकः । इत्येतेषड्रसाख्यातानानाद्रव्यसमाश्रिताः १२ धराम्बुक्ष्मानलजलज्वलनाकाशमारुतैः । वाय्य. ग्निक्ष्मानिले तद्वयैरसभवःक्रमात् १३ गुरुस्निग्धश्च तीक्ष्णश्च रूक्षोलघुरितिक्रमात् । धराम्बुवहिपवनव्यो नांप्रायोगुणाःस्मृताः। एप्चेवान्तर्भवन्त्यन्येगुणेपुगणास उचयाः१४ वीर्यमुषणतथाशीतंप्रायशोद्रव्यसञ्चयम्। तत्सर्वमग्निषोमीयं दृश्यतेभुवनत्रये ।। अत्रैवान्तर्भविष्य सांझको भोजन के अन्त में देइ यह तृतीय काल यांचा |||| पौर वार बार प्यास छर्दि हिचकी शास में और विपपीड़ित को अन्न के संग भोपाधि देइ यह चौथा काल बांधा ॥ ६ ॥ हसली के ऊपर कर्णरोग नेत्र मुख नासिका के रोगनमें लखनके निमित्त रातको विना अन्नपाचन समय ओषपि देइ पद पश्चम काल जानना ॥१०॥ोपधि के पांच अधिकार है रस १ गुण २ वीर्य कि- पाक ४ शक्ति ५ ॥ ११ ॥ सब द्रव्यों में छ स्वादु हैं मधुर १ सट्टा २ ला तीक्ष्ण ४ कडुमा ५ कपाय ६ ॥१२॥ पृथ्वी और जलमे गार रस होता है। पृथ्वी पानसे सट्टा होता है २ जल और अग्निसे लपण होताहै भाकार और वायु से तीक्ष्ण होताहै ४ वायु और अग्नि से का होताहै ५ पृथ्वी और न- ग्नि से कसैला होताहै ६ यो दो तत्व मिलके एकरस होताहै ।। इति सोनिमा १३ ।। (अथ गुण) पृथ्वीका गुण भारी है जनका चिफ्ना अंगिका नेर बाद का रूया और आकाश का गुण हलका है ये पांचों तत्व के पांच गुण और जो गुणादि भी इनके मेल से होते है सो अनुमान से जागना ।। इनि गप ॥२॥ - १ शाई घरमंहिता ।। [प्रथमसरड न्तिवीर्याण्यन्यानियान्यपि १५ मिष्टःपटुश्चमधुरमम्ले. ऽम्लंपच्यतेरसः । कपायकटुतिक्तानां पाकःस्यात्प्राय शःकटुः १६ मधुराज्जायतेश्लेष्मापित्तमम्लाञ्चजायते। कटुकाज्जायतेवायुःकर्माण्येतानिपाकतः १७ प्रभावस्तु यथाधात्री लकुचश्चरसादिभिः। समोपिकुरुतेदोषत्रित यस्यविनाशनम् १८ क्वचित्तु केवलंद्रव्यं कर्मकुर्यात्प्रभा वतः । ज्वरहन्तिशिरोवद्यासहदेवीजटायथा १९ क्वचि द्रसोगुणोवीर्यविपाकःशक्तिरेवच। कर्मस्वस्वंप्रकुर्वन्ति द्रव्यमाश्रित्ययेस्थिताः २० चयकोपसमायस्मिन्दोपा (अथ वीर्य)सव द्रव्यका स्वभाव गर्म या ठंडा होताहे सो सूर्य या चन्द्रमा फरिक उष्ण शी नहें इन्हीं दोनों से तो म पुरादि सादु द्रव्य के अन्तर उत्तन होताहै ।। इनि वीर्य ।।१३॥(अथ विक) मीठे नुनसरे से मधुर रत होता है सट्टा विराकपर भी सट्टा रहताहै, कपाय क, विक ये तीनों विराक पर कहुये होते हैं ॥१६॥ गधुररस से कफ होताहै अम्ल से मित्त होताहे कडुरे से वायु होताहै रसोंके पाक से तीनो दोप होते हैं ।।इति विशामः ॥ १७ । (अध प्रभावगुग्ग) प्रांवरेका रस गणवीप विपाक अधिकारते ममान गुण हैं यद्यपि दल काई तो भी निदोप नाश कहीं लचस्य ऐसा पाठहै (आंयरेका गुणा दीर्घ विपाक त्रिदोपनाशाह शौर सहन का गुण ॥ वीर्य विपाक विदोपकारक है जो दोनों मिलायक देइ तो भी पारा अपने प्रभारने विदोष नाश करताहै यह रागनिषएटुका मतहै ।।१।। कोई कोई केरल द्रव के प्रभारसे रोग दूर होजाते हैं जैसे सहदे की जद मापे पर बांधने से पर छूटजाताई ॥इति प्रभाव ॥ १६॥ किमी प्रोपधि का रस किसी का गुण किसी का वीर्य किसी का विपाक फिसीकी शक्ति ये सब द्रव्य के प्रा. धीनहें यपनी अपनी प्रति के अनुसार गुण करती है गुरचका रस कडुवा नो गर्म है तो भीत नाश करता है ।। इति रस उदारण (गुण १०) मूली जदुई है तौभी कफ करती है (वार्य उ) बड़े पञ्चमून का काथ कहै तौभी चातशमन परता क्योंकि ईपण वीर्य विपकहै । तोठि तीपणहै तोभी बातशगन है क्योंकि मधुर विपाको (शक्ति उ०)जैसे सुधुतमें कहा सर को नाश करताहै ॥२०॥ चात पित्त कफ के पदानेवानी नौ कुपित करने वाली सम करनेवाली प्रस्तु का अध्याय २] भापाटीकासमेता। पांसम्भवन्तिहि । ऋतुपटकंतदाख्यातरवेराशिषुसङ्क मात् २१ग्रीष्मोमेपरपोप्रोक्तोपाटिमथुनकर्कयोः। सिंह कन्येस्मृनावर्षातुलावृश्चिकयोःशरताधनाहौचहेमन्तो वसन्तःकुम्भमीनयोः २२ ग्रीष्मेसच्चीयतेवायुःप्रावृट्का लेप्रकुप्यति । वर्षासुचीयतेपित्तंशरत्कालेप्रकुप्यति २३ हेमन्तचीयतेश्लेष्मावसन्तेचप्रकुप्यति । प्रायेणप्रशमं यातिस्वयमेवसमीरणः २४ शरत्कालेचहेमन्तेपित्तंप्रार इतौकाः । कार्तिकस्यदिनान्यष्टावष्टावाग्रहणस्यच । यमदंष्ट्रासमाख्याताअल्पाहारीसजीवति २५ चयकोप समादोपाविहाराहारसेवनैः। समानैर्यान्त्यकालेपिविपरी तैर्विपर्ययम् २६ लघुरूक्षमिताहारादतिशीताच्छ्रमात प्रमाण संक्रांति से रामपकी संक्रांति से पनी संक्रांतिताई ग्रीष्मऋतु है मिथुनते कर्कताई पारद सिंहते कन्याताई वप है तुलाते वृश्चिकनाई शरदै धनने पर ताई हेमन्त है कुम्भते मीनायत वसन्तहै यायों दो दो पालकी एक एक शुतु होतीहै |२२||ग्रीष्ट में वायु संचित कहे इकट्ठी हो माद में कोप करती है वर्ग में पिच बदके शरद् में कोप करताहै ।। २३ ।। हेमन्त कहे शिशिर में कफ इजा वसन्त में कोप करताहै और वायु इन महीनों के बीते मापसे कार पांच महीने . में समान होजाती हौ।२४॥शरद् मृतु श्री हेमन्त ऋतु में विच सम होगा और माटऋतु पाइकै कफ समवर्ती होताहै और कारगुजानकी कमी से कर्ण . कुष्ण अष्टमीताई सोलहदिन पर्यत इनदिनों की समस्या सजा उम यमदंष्ट्रा भर सूक्ष्म श्राहार करनेवाला मनुष्य सुखी रहना हो इन दिनों में रिज के कोपसे विशेष अग्नि दीसहो रुवि बहाना को भोजन विशेष करताई विशेप भोगन पनि सन्तुष्ट करदेता तिस जागेकी हुनु में कफ संचय होता है उससे अग्नि मन्द होतीहै तब अन्नके पास न होने रोग जान होते हैं और जो यमदंष्ट्रा के दिनोंमें अग्नि सन्टन के वन अनि हात रहे ॥२५॥ जे मनुष्य आहार विहार के समयमा नकारते हैं उनके दोर सम रहने और जो समय से विपरीत करते हैं उनके परे ने कोर करते समोते रहते हैं।॥ २६ ॥ और हलके, रुख, यो माया सन्या के समय गैथुन १४ शाईपरसंहिता [ मरमखएट था। प्रदोपेकामशोकाभ्यांभीचिन्तारात्रि जागरैः २७ अ भिघातादपाङ्गाहाजीर्णेन्नधातुसङ्ख्यात्। वायुःप्रकोपंया त्येभिःविपरीतैश्चशाम्यति २८, विदाहिकटु काम्लोपण भोज्यैरत्युष्णसेवनात् । मध्याहेनुत्तृपाराधाजीर्यत्यन्ने ईरात्रके। पित्तंप्रकोपयात्येभिःविपरीतैश्चशाम्यति २६ मधुरस्निग्धशीतादिभोज्यैर्दिवसनिद्रया । मन्देग्नौतुप्र भातच भुक्तमानेतथाश्रमात् । इलेपमाप्रकोपंयात्यभिः प्रत्यनीकैश्चशाम्यति ३०॥ इति श्रीदामोदरसूनुशाई धरेण विरचितायांसंहितायांसूत्रस्थाने भैपज्याख्यानकहि तीयोऽध्यायः ॥२॥ अथ नाडीपरीक्षा। करस्याङ्गुष्ठमूले या धमनीजीवसाक्षिणी। तच्चेष्टया सुखदुःखं नेयंकायस्यपण्डितैः १ नाडीवत्तमरुत्कोपे जलौकासर्पयोर्गतिम् । कुलिङ्ग काकमण्डूकगतिपित्त रयकोपतः । हसपारावतगति धत्तेश्लेष्मप्रकोपतः २ लावतित्तिरवर्तीनागमनंसन्निपाततः । कदाचिन्मन्दग अरु श क भय चिन्ता रातिके जागने से ॥२७॥ चोट से पैरने से वासी भोजन से धातुक्षय से बात कोप करता जो इनते व तो वायु समदै ॥ इति वायुः ॥२८॥ दाहवाली वस्तु का, सही, गरम, भतिगरम वस्तु सेवन दोपहरी को भय प्यास रोकना आधी रात्रि के भोजन इनसे पित्त कुपित होताहै इनसे सावधान रहै सम होता ।। इति पित्त ॥२६॥ मीठा खटमिटा दे दिनमें निद्रा भूखे रहना सबेरे साना अनश्रण इनसे कफ कुपित होता ।।इति कफ ॥ ३० ॥ इति श्रीदामोदरानु शारेणरिरचितायांसंहितायांमत्रस्यानेभैषज्याख्यानकद्वितीयोऽध्यायः २ ॥ (अब नाहीपरीक्षा) हायके अगूठे की जड़ में जो नाड़ी चलतीह मो जीर की साती वैद्य उसकी चेष्टा देखि दुःछ मुख पहिचान लेइ ॥२॥ वायुप्रधान नाड़ी जीक सर्पकी नाई चलती है पितषशान नाड़ी गौरा और मेहकी चाल चली है कफप्रधान नाड़ी हंस और कबूतर मी चाल चलती है ॥२॥ सन्निपात अध्याय ३] भापाटीसमेता। मनाकदाचिद्वेगवाहिनी ॥ द्विदोषकोपतोज्ञेया हन्तिच स्थानविच्युता ३स्थित्वास्थित्वाचलतियासास्मृताप्राण नाशिनी । अतिक्षीणाचशीताचजीवितंहन्त्यसंशयम् ४ ज्वरकोपेनधमनीसोष्णागवतीमता। कामक्रोधावेगव हाक्षीणाचिन्ताभयप्लुता ५ मन्दाग्नेःक्षीणधातोश्चनाडी मन्दतराभवेत् । असृक्पूर्णाभवेत्कोष्णागु-सामागरीय सी ६ लध्वीवहतिदीप्ताग्नेस्तथावेगवतीमता । सुखित स्यस्थिराज्ञेयातथावलवतीस्मृता ॥ चपलाक्षुधितस्य स्यात्तृप्तस्यवहतिस्थिरा ७॥ अथ दूतलक्षणम् ॥ दूताः स्वजातयोऽव्यङ्गाः पटवोनिर्मलाम्बराः । सुखिनोश्वर पारूढाः शुभ्रपुष्पफलेर्युताः ८ सुजातयस्सुचेष्टाश्चस जीवदिशिसंश्रिताः। भिषणसमयेप्राप्तारोगिणस्सुखहेत वे ९॥ इति दूतलक्षणम् ॥ वैद्याह्वानायदूतस्यगच्छतो रोगिणकृते । न शुभ सौम्यशकुनं प्रदीप्तंच सुखाव की तीतर व वटेर की चाल चलती है द्वन्दन दो दोपकी नाड़ी को धोने ही जदी चलती है और जो नाड़ी अपने स्थानको स्पागदे तो पास हरनेवाली है ॥ ३ ॥ गो नाड़ी दश पांचोर चलके बन्दहोहो चने का कारे धोरी ते श्री अनिठण्डीहो तो रोगी न जिये ॥ ४ ॥चर की नाही नाम है जन्द कहता है कामातुर और क्रोधीकी नाड़ी जल्दी चलनी है चिना भी भयही नाड़ी तारा होतीहै ॥ ५॥ मन्दाग्नि प्रो धादतीण भो नाही अतिवारी चलती रिकाविकार की कुछ गरमहो पत्थरसी भारी चलनीदै संयक्ष तहे महिपको गनि होती है॥६॥ जिसकी अग्नि दीप्तहै उसकी नाड़ी हनही जो जन्नी बनती है मा. रोग्यकी स्थिर बलवान होतीहै प्रत्येकी चान नमानेकी सिर चलनी है ॥७॥ इति नाड़ीपरीक्षा (अथ दृतलक्षणम् )च्दी झाले वा मानी जाति अंगसुद्ध श्वेताम्बरधारी चतुर सुती घोड़ेपर सवार क्षेत्र ज्ञ फनमंयुकलो मोल दूतजानिये ॥८॥ अपनी जाति होय सुन्दरहो यो वैधकी चनव सामाकी और बैठे वैद्यके पास शुभ समय जाय तो रोगी मुवी होय ।। ६ ।। टनिइनन्दन- शायरसंहिता। [मयमखएट हम् १० चिकित्सारोगिणःकर्तुगच्छतोभिपजःशुभम् । यात्रायांसौम्यशकुनप्रोक्तंदीप्तंनशोभनम् ११ नारीपुत्र वतीमाग,कुमारीदीपमालिका । ज्वलतोग्नेश्शुभारश ब्दामङ्गलंशङ्खनादिकम् १२ मृदङ्गादिध्वनिःपूर्णकल शोदधिमृत्तिका । फलंचमदिरामांसमत्स्यादिकामादि कम् १३ गजाश्वरथताम्बूलंचामरंकनकादिकम् । शुभं स्याद्गच्छतोमाग्गैवैद्यस्यलाभदायकम् १४ ॥ इति शकु नम् ॥ निजप्रकृतिवर्णाभ्यांयुक्तस्तत्वेनसंयुतः । चिकि त्स्योभिपजारोगीवैद्यभक्लोजितेन्द्रियः १५॥ इति रोगि लक्षणम् ॥ कुचैलःकर्कशस्स्तव्यःकुग्रामीस्वयमागतः॥ पञ्चवैद्यानपूज्यन्तेधन्वन्तरिसमाअपि १६ वैद्यःस्याद् गुरुसन्निधानकुशल पीयूषपाणिः 'शुचिर्दक्षःकालवयोव रणम् ॥ और दूनो वैद्यके गुलाने जाते समय राहमें शुभशकुनते गशुभ अशुभवे शुभ जानो॥१०॥जब वैय रोगीके यहां यात्राकर और उस समय याद माम्प शकुनहोय तो शुभहै गौरदीप्त शुभ नहीं है ।। ११॥जो मार्गमे पुरती स्त्री पिने तथा टीपाकी माना ग्रहण कियहुये स्न्या मिनै, मज्वनित अग्निशिग्वा शम्य मृदंगादिकी ध्वनि होती मम्मुग्प दृष्टिारे नया कुम्भ दही मिट्टी फन मदिरा मांस मछली सादिक कैनर आदि सुगन्ध पदार्थ हाथी घोड़ा रस पान चामर सुवर्णादे पदार्थ यादे जातेहुये मार्गमें मिनें तो शुभहें ॥१२॥ १४ ॥ इति शमुनविचारः॥ चिकित्मायोग्य निस रोगी की प्रकृति और वर्ण जैसे का तैसाहो और सत्वसंयुक्तहो और गेगीको वैद्यसे भक्तिहोय अर्याव वैद्यके वाक्यमें निश्चय होय और जिोन्द्रिय अर्थाइ कुपथ्यसेवी न होय इन्द्रिनके मंथममें मावधानहो ऐमा रोग चिकित्सा के योग्य है ।। १५॥ इति रोगीलक्षणम् ।। कुचैन कही जो मैले कुचने कुत्सितबख धारणकरै थोर विवादी कनही जड कुग्रामवासी होय और विना चुलाये आपही श्रावै ये पांच वैय यदि धन्वन्तरि के भी समान होय तौभी पूज्य नहीं हैं ॥ १६ ॥निस वैद्यने सद्गुरु से शाखाध्ययन कियाहोय और जिसकी प्रोपपिसे प्रापशः रोगी आरोग्य होतेहोरें अर्थात् जिसके हायको दीदुई थोपपिसमासरीसा गुणकरे ग जो पचिन व दनकही 1 अध्याय ३] १७ मापाटीकासमेता। लौषधिगदज्ञानोदीतःशास्त्रवित।धीरान्तःकरणःक्रियासु कुशलःकारुण्यपूर्णोस्टहायुक्तो भूतनियन्त्रमन्त्रचतुरोवा । उनीप्रगल्भःसुखी १७ इतिवैद्यलज्ञणम्॥स्वभेपुनग्नान्म एडांश्चरंक्तकृष्णास्वरारतान् । व्यङ्गाश्चविकृतान्कृष्णा न्सपाशान्तायुधानपि १८ वध्नतोनिघ्नतश्चापिदक्षिणांदि शमाश्रितान् । महिपोष्ट्रखरारूढास्त्रीपुंसोर्यस्तुपश्यति । सस्वस्थोलभतेव्याधि रोगीयात्येवपश्यताम् १९ अधोयो निपतत्युञ्चाज्जऽऽग्नौवाविलीयतोश्वापदैहन्यतेयोपिम स्याद्यैर्गिलितोभवेत् २० यस्यनेत्रेविलीयेतेदीपोनिर्वा पातांब्रजेत्तैलंसुरांपिवेद्वापिलोहंवालभतेत्तिलान् २१५ कालभतेऽनातिविशेत्कूपरसातलम् । सस्वस्थोलभते रोगंरोगीचात्येवपञ्चताम् २२ दुःस्वप्नानेवमादीश्वदृष्ट्वाचू यान्नकस्यचित् । स्नानकुर्य्यादुपस्येवदद्यामतिलानिच २३ पठेत्स्तोत्राणिदेवानांरात्रौदेवालयेवसेत् । कृत्वैवंत्रि प्रवीण तथा काल पराक्रम वयोनुसार रोगका यथार्थ ज्ञान करिके प्रोपधिकर पौर शाखदेता अत्यन्तधीर क्रिया में कुशल कही प्रीण और दयानु तथाधनादि वाधारहित यंत्र मंत्रमें अतिही चतुर-प्रत्यन्त प्रगल्य प्रसबचित्त धनी सम्पूर्ण सुखकरके सहित सदा मधुर संभापणफर-ऐसे चैधकी प्रोपपि सर्वदा परफर होतीहै ॥ १७॥इति वैद्यलक्षणम् ॥ रोगी स्वप्नमें नंगा शिरमुंडा रक्त रणवत्र पहिरे भयंकर अंगभग काला व फांसी और शत्रभी घरे ॥१॥बांधता मारता किसीको दक्षिण लियेजाता मारता देसे वा भैस ऊंट व गधेपर सवार नारी पुरुप कोई देरी तो प्रारोग्यके रोगहोय और रोगीहो तो मरिजाय Pel और ऊंचेसे नीचे गिरा जलमेंबूड़ा अग्निमें जलता विपत्ति में पड़ा या कुत्तेने काटाहो या मित्र बांधत्र वा मकरादि के मुसमें लालताहमा देखे ॥ २० ॥ नेत्रते अन्य भय दीसैदीपक वुझता देय तैल मुरारिये स्वप्न लोहा या तिलपात्र ॥२॥ पकामपावसाते कुगां में गिर या रसातल जाय ऐसे स्वप्नदेसनेवाला भच्छाहो वो रोगीहो रोगीहो तो मरे ॥ २२ ॥ ऐसे २ स्वप्नोंको देखिफर किसीसे न कहै शभिरसंहिता [प्रथमसगर दिनंमोदुःस्वप्नात्परिमुच्यते २४ स्वप्नेषुयःसुरान्भूपा जीवतःसुहृदोद्विजान् । गोसमिदाग्नितीर्थानिपश्यन्सुख मपाप्नुयात् २५ ताकिलुषनीराणिजित्वाशत्रुगणानपि। आरुह्यसोधगोशेलकरवाहान्सुखीभवेत् २६ शुभ्रपुष्पा णिक्षारासिमांसमत्स्यफलानिच । दृष्ट्वातुरःसुखीभूयात्स्व स्थोधनमवाप्नुयात् २७ अगम्यागमनलेपोविष्ठायारुदि तस्मृतम् । श्राममांसाशनंस्वप्नेधनारोग्याप्तयेविदुः २८ जलौकाभ्रमरीसोमक्षिकाबापियंदशेत् । रोगीसभूया दारोग्यःस्वस्थोधनमवाप्नुयात्-२९ - इति श्रीशाङ्गधर संहितायांसूत्रस्थानेर नाडीपरीक्षादिस्वप्नलक्षणदूतशकु नरोगिलक्षणवैद्यप्रशंसाख्यानं नामाध्यायोयतृतीयः३।। पचेनामवह्निकृञ्चदीपनंतद्यथामिशिः । पचत्यामनव हिंचकुर्यायत्तद्विपाचनम् । नागकेसरवद्विद्याच्चित्रोदीप सपेरे नहाके सोना तिल वयत्र दानकर ।। २३ ॥ वतीन दिन पाणी देवताओं के स्तोत्रादिकों का पाठकर और रात्रिको देवस्थानमें रहै तो दुःस्वप्न के फलसे छुट नाताई ॥२४॥(अथ सुस्वम स्वप्नमें जो देवता मौ राजा औनीपत,मिन, ग्रामण, गऊ, यज्ञ व तीर्यादि ऐसा रामदेखें तो वह मुखको माप्तहोय॥२॥और मलिन जलमें पैरत शत्रु की सेना नेते गटारी का पति वा हाथी वा घोडा इनसान पर चदा देखे तो मुमहोय ॥ २६ ॥ चतफूल, सूक्ष्म वस्त्र, मास, मछरी च फलों को रोगी स्वममें देसै तो रोगसे निर्मुक्तहोय जो आरोग्य होय दीले तो धनमाप्त होय ॥२७॥ अगम्यागमन कहे जिन खीन से गमन अयोग्य है तिनकागमन करे, मल लपेटे, रोता,मरता, कचामांत खाता देखें या बातेकर तो रोगी आरोग्य होय, और भच्चेको द्रव्य मिले ॥ २८ ॥ और जोक, भारी, सर्प, माखी इन्हें उसे देस तो रोगी भारोग्य होय और श्रारोग्य द्रव्य पावै ॥२६॥ इति दामोदरमूनुशायरविरचितसंहितायांभापाटीकापांसूत्रस्थाननादीपरीक्षा स्वाल नणदूतशकुनरोगिलतणवैयप्रशंसाख्यानमामाध्यायोऽयंतृतीयः ॥. (अप दीपनपाचन) भावको न पचवैध अग्नि ज्वलितकर उसे दीपन कहते हैं सारस । सभामसंशकोशेष सदोषत्रकोपना । 1 अध्याप] मापाटीकासमेता। नपाचनः १ नशोधयतिनदृष्टिसमान्दोषांस्तथोडतान् । शमीकरोतिविषमाञ्छमनंतद्यथामता २ कृत्वापार्कमला नायद्वित्त्वावन्धमधोनयेत् । तच्चानुलोमनंज्ञेयंयथाप्रोक्ता हरीतकी३पक्तव्यंयदपक्वैवश्लिष्टकोप्ठेमलादिकम् ।नय त्यधःस्रसनंतद्यथास्यात्कृतमालका ४ मलादिकमबई बबद्धवापिण्डितमलैः। भित्त्वाधःपातयति तदनंकटुकी बधा ५ विपक्कंयदपकंवामलादिद्रवतांनयेत रेचयत्यपि तंज्ञेयरेचनंत्रिवतायथा६अपक्वपित्तश्लेष्माणौवलादूर्व नयेत्तुयत् । वमनंतद्विविज्ञेयंमदनस्यफलंयथा ७ स्था नाहहिर्नयेदूर्ध्वमधोवामलसञ्चयम् । देहसंशोधनंतल्या देवदालीफलंयथा ८ शिलष्टानकफादिकान्दोषानुन्मूलय तियदलात् । छेदनंतद्यवक्षारोमरिचानिशिलाजतु ९ धा तून्मलान्वादेहस्यविशोप्योल्लेखयेञ्चयत् । लेखनंतद्यथा यया सौंफ और थावको पचावै अग्नि न पड़ावै उसे पाचन कहते है य नागकेसर और चीता ये दोनों दीपन व पाचन कहाने हैं ॥ १ ॥जो द्रव्य कोठे को न शुद्ध कर व मल न वायै और वदेदोष को शमन कर उसे शमन कहते हैं यया गुचि ।। २॥ और जो द्रव्य मलको पकाय भेदनकर गिरावै उसको अनुलोमन कहते हैं यथा हह ॥ ३ ॥ जो वस्तु पकनेयोग्य अनपची होय कोठे में लपटिक रहिगई हो तिसे अधोमार्ग से गिरा उसे संपन करते हैं यथा अमलतास ॥४॥जो मज वातादिक दोष से बंधा होय वा गोटे पड़गये हो उसे फोरिकै अधोमा से गिराव तिस द्रव्यको मेदन कहते हैं यथा कुटकी !! ॥ जो मल वातादि दोपसे विशेष पकगया हो या अपकहो उसे पतलाकरि बहाये उसको रेचन कहते हैं यया मिशोष ॥६॥जो द्रव्य कचा पित्त कच्चा कफमार्ग से निकाले उसे वमन कहते हैं यया मैनफल ॥७॥जो द्रव्य दुष्टमल या पित्त कफ स्वान छुडाकरऊर्च माग या प्रयोगार्ग से गिरावै उसे शरीररोधन कहते हैं ऐसी सिमोरनी कौन द्रध्यहै यया देवदाली कहे यनतोरई ॥ ८ ॥ जो हो कि भोपको रस शक्तिकरि निकार उसे छेदन कहते हैं यया यपासारादि औरसोंटि, मिर्च, पीपरिष RA शपरसंहिना। [प्रथमसपड क्षौद्रनीरमुष्णवचाचवाः १० दीपनंपाचनंयत्स्यादूपणत्वा दुसशोपकम्।माहितच्चयथाशुण्ठीजीरकंगजपिप्यली११ रोक्ष्याच्चैत्यारूपायत्वाल्लघुपाकाचयवेत् । वातस्त म्भनंतत्स्याद्यथावत्सकटुण्टको १२ रसायनश्चतज्ज्ञेयंयन राव्याधिनाशनम् । यथाऽमृतारुदन्तीचगुग्गुलश्चहरी तकी १३ यस्माद्व्यानवेत्स्त्रीहर्षोवाजीकरञ्चतत् । यथानागबलाधाःस्युजिंचकपिकच्छुजम् -१४ सयःशु क्रकरयच्चतगृह्यस्याद्यथापयः । देहस्थूलकरंयच्चयंह णतयथामिपम् । यस्माच्छुकरयद्विःस्याच्छुकलञ्चत च्यते। यथाश्वगन्धामुशलीशर्वराचशतावरी १५ दुग्धं मापाश्चमल्लातफलमज्जामलाभिच । प्रवर्तकानिकथ्य न्तेजनकानिचरेतसः १६ प्रवर्तनंस्त्रीशुक्रस्यरेचनवृहती फलम्जालीफलंस्तम्भनञ्चशोषणीचहरीतकी १७ दे इस्यसूक्ष्मच्छिद्रेषुविशेद्यत्सूक्ष्ममुच्यते। तद्यथासैन्धवंक्षी शिलाजीत इति छेदन ।। रसादि पाणु और शरीरके मल निन्, मुखा के देहको दुल कर उसे लेसन कहते हैं यथा उपपजल पच यच ॥ १० ॥ जो दीपन भोर पाचन करे और गर्मी करिव कफ धातुमल इनके रमको मुम्बा तिप्ते ग्राही फाइने हैं यथासोटि श्वेतजीरा और गनपीपरि ॥ ११ ॥जो द्रव्ध रूनहो और उपढाहो कपायहो और पाचनशक्ति तोहोरस पातहत द्रव्यको स्तंभन कहते , यथा पुरैया शौर ( स्योमाक.सोलपदी ॥१२॥द्रव्यवस्थापन को दूरकर उसे रसायन पाहते हैं यया गुर्च रुद्रयवन्ती,गुग्गुल ।॥ १३ ॥ जिसव्यस मैथुनमें विशेष सुखदो पसे घाजीकरण कहतेहें यायरियार कियाचमांगी॥१४॥ जो शोघ शुक्र कही वीर्यको यदा उसे था कहते हैं यथा दूर-और जो देहको स्थून की हट पुष्ट मोटाकर उसे वृहण कहते हैं यया प्रामिप कही मास-जोधा- नुको बहाव उसे शुक्रन कहते हैं या असगर, मुशली, शर्करा सौर शतावरि। १५॥और जो धातुकी वृद्धिकर उसे रेतजन्य कहते हैं यथाद्ध, उर्द भिलो नी मां- घरा ॥ १६ ॥ शुक्रको प्रकट करनेवाला स्त्री की धानुको रेचन करनेवाला पड़ी . । अध्याय ४] भाषाटीकासमेता। द्रीतम्वतैलंरचूद्भवम् १८ पूर्वव्याप्याखिलंकायंततःपाक उचगच्छतिाव्यवायितद्यथाभङ्गा फेनंचाहिसमुद्भवम् १९ सन्धिबन्धास्तुशिथिलान्यत्करोतिविकाशितत् । विश्ले प्यौजरचधातुभ्योयथाक्रमुककोद्रवः २० बुद्धिलुम्पन्ति यद्रव्यमदकारितदुच्यते । तमोगुणप्रधानञ्चयथाम jसुरादिकमर१व्यवायिचक्किाशिस्यात्सूक्ष्मंछेदिमदा वहम् । भाग्नेयंजीवितस्योगवाहिस्मृतंविषम् २२ नि जवीर्येणयव्यस्रोतोभ्योदोषसञ्चयम् । निरस्यतिम माथिस्यात्तद्यथामरिचंबचा २३ पैच्छिल्यागौरवाद्र्व्यं रुद्वारसवहारिसराः।धत्तेयद्गौरवंतत्स्यादभिष्यन्दियथा दधि २४ ॥ इति श्रीदामोदरसूनुशाङ्गधरविरचितसं हितायांचतुर्थोऽध्यायः ४॥ धात्वाशयान्तरस्थरतुयःलेदस्त्वधितिष्ठति । देहोपन पाविपक्वोयःसाकलेत्यभिधीयते । कलास्सप्ताशयात्सत भटकटैया का फल है थोर वीर्यस्तंभी जायफल है और वो रोकार साये ॥ १७॥ जो वस्तु रोममार्ग से शरीरये पैठे उसे सन्न करवे मग शहद, नींव और रेडीका तेल ॥१८॥ माम शरीरको सोचने व्यगायी कहते हैं यथाभांग और अफीप , देह नमाटिक धातु और शुक्रको क्षीणकरै उसेविकाशी कानुनी कार दर Rell जो वस्तु बुद्धिको संभ्रमकर मदकर और बच दोह मो तमोपली समुराई नशा ॥२॥व्यवायी, विकाशी, सूक्ष्म, देवनन्द मानमन्निादन औरस्युः कारक ये सब द्रव्य जिस प्रोपपिकासंग पार उसीश सापकरें सानिया है ॥ २२ ।। जो द्रव्य अपने पराक्रमते मंदिन दोपोंजो नितानगरमाथी कहते हैं यथा मरिच और बच ॥२३जे नाई भासे नियतागुशाग्रे रमना. हिनी सिराओंको निरोधक और शरीर से अभिप्यन्दी शहदा पया दह॥२४॥ इति श्रीशाहचरभाषाटीलपाती वनविषिश्चतुर्गेज्यातः॥१॥ जो आईपदार्थ घातु चौर आमाशयन्दर में स्थित और देवकी रुपले २२ [ शाईधरसंहिता। धातबस्सप्ततन्मलाः १ सप्तोपधातवरसप्तत्वचस्सप्तप्र कीर्तिताः। त्रयोदोपानवशस्निायूनांसन्धयरतथा । द शाऽधिकंचद्विशतमस्थ्नांपत्रिगतमतम् २ सप्तोत्तरंमर्म शतंसिरास्सप्तशतंतथा । चतुर्विशतिराख्याताधमन्योर सवाहिकाः। मांसपेश्यःसमाख्यातानृणांपञ्चशतंवुधैः३ स्त्रीणांचविंशत्यधिकाःकण्डराश्चैवषोडशानदेहेदशरन्ध्रा णिनारीदेहेत्रयोदश। एतत्समासतःप्रोक्तंविस्तरेणाधुनो च्यते ४ मांसामृग्मेदसांतिस्रोयकृत्प्लीहोश्चतुर्थिकाः । पञ्चमीचतथान्त्राणां षष्ठीचाग्निधरामता । रेतोधरास प्तमीस्यादितिसप्तकलाःस्मृताः५श्लेष्माशयः स्यादुरसि तस्मादामाशयस्त्वधः । ऊर्यमग्न्याशयोनाभेर्वामभागे व्यवस्थितः ६ तस्योपरितिलंज्ञेयं तदधःपवनाशयः । मलाशयस्त्वधस्तस्य वस्तिमूत्राशयस्त्वधः । जीवरला विषफ हो उसका कलानाम है ( अथ शारीरक) शरीरमें कला ७ स्थान ७ धातु ७ घातुमल ७॥१॥ उपधातु ७ सचा ७ दोप ३ सूक्ष्म नस १०० जोड २१० इन्ही ३०० ॥२॥ मर्मस्थान १०७ मध्यमनस ७०० शुलनाड़ी २४ पुरुष के मासप्रयि ५०० ॥ ३ ॥ खोके मासको गाट ५२० पुएनसे फैलने समिटने बाली १६ पुरुपके शरीर में छेद २० खोके १३ यह सक्षेप कहा आगे विस्तारसे कहेंगे (अप शरीर की मात कला पहिले कहते हैं) मासकोधारण फरनेवाली मासधरा पहलीकलारक्तको धारण करनेवाली रक्तथरा दूजी क्लार मेहको धारे वह मेटेोपरा तीसरी ३ कफको धारण करनेवाली चौथो यकृतीहा४ अन्न धारणेवाली पाचरी पुरीपधरा । अग्निधारिणी छठीकला पिचपरा ६ शुक्रधारणी सतई कला रेतोधरा ७ ये सातों कला है ॥ ५॥ छातीमें कफस्थान है सिससे कुछ नीचे श्रामस्थान है नाभि के ऊपर पाईयोर अग्निस्थानहै ॥६॥ तिस अग्निस्थानके ऊपर तिलहै उसे लोम कहतेह वही प्यासस्थान कहते हैं और अग्निस्थान के तरे पानाशयह उसे वायुस्थान कहते हैं उसी के नीचे वामभाग में मलस्थान है जिसे पकाराय कहते हैं और उसी पचनोशय के नीचे दक्षिणभाग
अध्याय ५०]
भापाटीकास मेता।
शयमुरोज्ञेयास्सप्ताशयास्त्वमी ७ पुरुषेभ्योधिकाश्चा.
न्येनारीणामाशयास्त्रयः । धरागर्भाशयःप्रोक्तःस्तनौस्त
न्याशयोमतौ ८ रसासृड्यांसमेदोस्थिमज्जाशुक्राणि
धातवः । जायन्तेन्योन्यतःसर्वे पाचिताःपित्ततेजसा :
जिह्वानेत्रकपोलानांजलंपित्तंचरञ्जकम् । कर्णविड्सनाद
न्तकक्षामेदादिजंमलम् १० नखानेत्रमलंबवेस्निग्धत्वंपि
टकास्तथा।जायन्तेसप्तधातूनांमलान्येतान्यनुक्रमात्११
कफपित्तमलश्चैव प्रस्वेदोनखरोमच । स्नेहाभिवग्यसो
जश्चधातूनांकमशोमलाः । रसावतंततोमांसमासान्मे
दःप्रजायते १२ मेदसोऽस्थिततोमज्जामज्जायाइशुक्र
संभवः । स्तन्यरजश्च नारीमनालेभवतिगच्छति।
शुद्धमांसभवःस्नेहो यस्सासहीत्यतिवसा १३ स्वेदोद
-
शाई धरसंहिता। [प्रथमसएट तास्तथाकेशास्तथैवौजश्च सप्तमम्।ओजःसर्वशरीरस्थ शीतं स्निग्धंस्थिरंमतम्।सोमात्मकं शरीरस्य बलपुष्टि करंमतम् । इति धातुभवा ज्ञेया एते सप्तोपधातवः १४ ज्ञेयावभासिनीपूर्वा सिध्मस्थानं च सा मता। द्विती थालोहिताज्ञेया तिलकालकजन्मभः १५ इवेताकृती यासङ्ख्याता स्थानश्चर्मदलस्यसा । तानाचतुर्थीवि ज्ञेया किलासश्वित्र भूमिका १६ पञ्चमीवेदिनीख्याता सर्चकुष्ठोद्रवाचसा। विख्यातालोहिताषष्ठी ग्रन्धिगण्डा पची स्थितिः १७ स्थूलात्वक्सप्तमीख्याता विद्रध्यादेः स्थितिश्चसा । इति सप्तत्वचः प्रोक्ताः स्थूलानीहिहि मात्रया १८ वायुः पित्तं कफो दोषा धातवश्च मलास्त था। तत्रापि पञ्चधा ख्याताः प्रत्येकं देहधारणात १६ पवनस्तेषुवलवान्विभागकरणान्मतः।रजोगुणमयः धातुकी उपधातु रन जो स्त्रीके काल पाय होती है यह कालही पाय जाती रहती है शुक्र मांसको उपधानु, वसा मेदकी उपमातु पसीना अस्थिकी उपधातु, दांत मज्जाकी उपधातु, वल पुरुषार्थ ऐतेही सातों धातुनमे सातो उपधातु होती हैं ॥१३॥ १४॥(अथससत्यक)यद्दी भवभासिनी अपरकी खाल जिप्समें सेहत्रां की जन्म भूमिहै । दूनी लोहिता तिसमें तिलकालफरोप होते है॥५॥तीजी श्वेवामै दाह होताई ३ चौथी साम्रा मिसमें किलास कुछ होताहै ४ ॥ १६ ॥ पञ्चमी दिनी . भूमि है ५ छठी लोहिता में गएडमाला श्रीष अपची ये रोगहोते हैं ६ ॥ १७॥सतई स्थना में जहरमात नासूर भगंदराटि होते हैं ये सातों मिलकै टीयर - सपान गुटाई पाती है यह चरक कहते हैं जहां मांसविशेप मोटा होता है यहां इतनी मोटी होती है ।।१॥(अध तीनों दोप) पात,पित्त,कफ ये प्रत्येक देहयारी, के मसिद्ध है सो रसादिक घातुन का पालन करते हैं इससे इनका नाममल भी है सो पांच पांच प्रकारके सुभुत में लिसेंहैं (संस्कृत) तनमस्पन्दनौदनपूरणदि चेकपरणलक्षणीवापुः ॥ १६ ॥ वायुसनस्नुन को निज निज स्थानमें पहुँचा, देतारे इस कारण वीनों दोप में घायुही मबलदै भौर रनोगुणी सूक्ष्म ठदी रूसी
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अध्याय..] भापारीकासमेता।
सूक्ष्माशीतोरुक्षोलघुश्चलः । शरीरदूषणादोषाधातो.
देहधारणात् २० वातपित्तकफाज्ञया मलिनीकरणान्म
लाः। पित्तपःकफः पङ्गुःपङ्गवोमलधातवः । वायुनाय
अनीयन्तेतत्रगच्छन्तिमेघवत् २१. मलाशयेचरन्कोछे
वहिस्थानेतथाहृदि । कण्ठेसर्वाङ्गदेशेपुवायुःपञ्चप्रकार
तः श्रपानःस्यात्समानइचप्राणोदानौतथैवच २२ व्या
नश्चेतिसमीरस्यनामान्युक्तान्यनुक्रमात् । हदिनाणोगु
देऽपानःसमानोनाभिसंस्थितः।उदानःकण्ठदेशस्थोव्यों
नस्सर्वशररीगः २३पित्तमुष्णद्रवंपीतनीलंसत्वगुणोत्तर
स् । कटुतिक्तरसंज्ञेयंविदग्धंचाम्लतांव्रजेत् । अग्न्याश्ये
भवेत्पित्तमग्निरूपंतिलोन्मितम्२४ त्वचिकान्तितरंज्ञेयं
लेपाभ्यङ्गादिपाचकम् । दृश्ययकृतियपित्तंतवसंशोणितं
नयेत्। यत्पित्तंनेत्रयुगलेरूपदर्शनकारितत् २५ यस्पित्तं
हृदयेतिष्ठन्मेधाप्रज्ञाकरञ्चतत् । पाचकंभ्राजवरज्ञ
शाईपरसंहिता [ মন कालोचकेतथा । साधकं चैवपञ्चैवपित्तनामान्यनुक्रमात् २६कफास्निग्धोगुरु श्वेतःपिच्छिलःशीतलस्तथा। तमो गुणाधिकास्वादुर्विदग्धोलवणोभवेत् २७ कफश्चामाश येमईिकण्ठेहदिचसन्धिषु । तिष्ठन्करोतिदेहेषुस्थैर्यसर्वा पाटवम् २८ छेदनःस्नेहनश्चैवरसनश्चावलम्बनः । श्लेष्मणश्चेतिनामानिकफस्योक्तान्यनुक्रमात २९ स्ना यबोवन्धनप्रोक्तादेहेमांसास्थिमेदसाम् । सन्धयश्चाङ्गस न्धानाहेहेप्रोक्ताःकफान्विताः । आधारश्च तथासारःकाये स्थानिबुधाविदुः ३० मर्माणिजीवाधाराणिप्रायेणमुनयो और धारणा चैतन्यता रखता है ताकी पांच नाम से स्थिति जानमा पाचक ! भ्राजक २ रंजक ३ पालोचक ४ साधक ५ इसमकार पिचके पांच स्थान पांच नाम क्रमसे जानना चाहिये ॥२६॥ (प्रय कफ)कफ चिकना भारी, लसलसा श्येत, एटा, तमोगुणी विशेष है और मयुर है दग्धभये नुनखरा होमाता है अन्य मताले हलका कहते हैं कि पानी पर तिरताहै सो.कारण यहहै कि स्निग्धता परिकै पानी में प्रवेश नहीं करता पास्तर गुरुही है ॥ २७ ॥ और ग्राम स्थान में गामें कएटमें हृदय में संघिन में ऐसे देहमें स्थितहो पुष्ट रखता है ॥२॥निसके नामलेदन १ स्नेहन २ रसन ३ अरलम्बन और श्लेष्मण ५ ये नाम स्थानक्रम से जानना यया आमस्थाने सदन इसमकार से ॥ २६ ॥ नौसै संधिवानी नस मास हाड़ चरतीको लपटी रहती है और देहमें अंग र पनि संघिकहें जो उसे कफसे लपटे हैं सो सपि दोपकारकी है चर और भयर चरतो डोदी कमर शारसा कराठ की है मोर अंगनी अचर कहते हैं जैसे तेल के संयोग से रथ पहियामपने औरमें पि. रते है तसे कफ संयोग हड्डी विना श्रम फिरा करती है और बुधमन कहते हैं कि अस्विन के भाषार देहदै ताते देहका सारहै ॥३॥और मर्मस्थान मुनि जीवाधार बाहते हैं सो पाचमकारकाहै मांसमर्म ११ सिरामर्म ४१ स्नायुमर्म २७ अस्थिर्म संधिम २० सन मर्म १०७ हें संधिबंधनी सिरा दोष और धातुबाहकहें सो २४ हैं जिनमें दश नाभिस्थानमें हो नीचेजाती है वात,त्र,मलाशुक्र,अन्नपान रसका नीचे पहुँचाना उनका कहे और दश अर्ध्वगतह सोशब्द रस,गन्ध,सास,जमुहाई और क्षु तपाशक्ति डकार इन तवनको अपने २ स्थान में दीपन करती हैं और चार २७ अध्याय ५ भापाटीकासमेता। जगुः। सन्धिवन्धनकारिण्योदोषधातुवहाःसिराः३१धम न्योरसवाहिन्योधमन्तिपवनंतनौ। मांसपेश्योवलायस्युर वष्टम्भायदेहिनाम् ३२प्रसारणाकुञ्चनयोरङ्गाणांकण्डरा मताः । नासानयनकर्णानांहेद्वेरन् प्रकीर्तिते ३३ मेहना पानवक्राणामेकैकंरन्ध्रमुच्यते।दशममस्तकेप्रोक्तंरन्ध्राणी तिनृणांविदुः ३४,स्त्रीणांत्रीण्यधिकानिस्युःस्तनयोर्गर्भ वर्मनः। सूक्ष्मछिद्राणिचान्यानिमतानित्यचिजन्मिनाम् ३५ तहाम फुप्फुसंप्लीहादक्षिणाङ्गेयकृन्मतम्। उदानवायो राधारःफुप्फुसंप्रोच्यतेबुधैः ३६ रक्तवाहिसिरामूलंप्लीहा ख्यातोमहर्षिभिः । यकृद्रञ्जकपित्तस्यस्थानरक्तस्यसंश्र यम् ३७ जलवाहिसिरामूलंतृष्णाच्छादनकंतिलम् । र जिनकी तिज़ गति सो अगणित शाखाहो सागमें जालेकी नाई रोम २ मति पूरित हैं उन्हीं के मुखों से स्वेद देहके याहर रोमों में होके याताहै और उसी मागहो लेपन मदनादि पदार्थ प्रवेश करते हैं ॥१॥ और रसवाहिनी धमनी को नाड़ी कहते हैं घे वायुको अपने वेगसे शरीरमें पहुँचाती है सो सिरा दोमकार की है सूक्ष्म और स्थूल तिनकी जड़ नाभिमें है वहा होके तले ऊपर दहिने बायें मागे पीछे सर्वत्र फैलती हैं ये चालिस, ४० वातवाहिनी १० पित्तवाहिनी १० कफवाहिनी १० रक्तवाहिनी १० सर ४० वातवाहिनी सिराके समीप दूसरी बात चारी १७५ नस है ऐसे दश २ चारों के पास उतनीर है इसतरह सातसै७०० हैं और देह में थैलीहै सो पलके और रोकने के लियेहै ।। ३२ ।। अंगके फैलने समेट- ने को कडराई और दो द्रि नाक में दो नेनमें दो कान में कहेहैं ॥३३॥एक पुरन एक गुदा एक लिङ्ग एक मस्तक के ऊपर ये दशनिद्रह ॥३४॥ सीके तीन छिद्र विशेपर दो पयोधरपर एक गर्भस्थान और प्रतिक्ष्म छिद्र खचा, मगणित हें । ३५ ।। हृदयके वाममागमें फुप्फुस और प्लीलाई दक्षिणभाग में यकृतकै फुकुसको ज्दानगायुके आश्रित पैद्यलोग कहते हैं ।। ३६ ॥ और रुपिरवाही सिरानोंकी जडको प्लीहा कहते और यहवको सवैध रंजक पिराका स्थान फहते और रक्तका आधारहै ।।३७॥ शोणितकी कीटसे उत्पन्न हुआ दक्षिणभाग यमन के पास तिलहै उसे लोम कहिये सोमलवाहि सिराकी जडमें रहिकेप्यामागताह और 'शाधरसंहिता । { ঘষা कौपुष्टिकरौप्रोक्तौनठरस्थस्यमेदसः ३८ वीजवाहिसिरा धारोपणौपौरुपावहो।गर्भाधानकरंलिङ्गमयनंवीर्य्यमत्र योः त्रिविधःसोपिसजातोरजस्सत्त्वतमोगुणैः। तस्मात्स स्वरजोयुक्तादिन्द्रियाणिदशाभवन्।हृदयंचेतनास्थानमो जसएचाश्रयंमतम् ३९ सिराधमन्योनाभिस्थास्सर्वाच्या प्यस्थितास्तनुम् । पुष्णन्तिचानिशवायोस्संयोगात्सर्व धातुभि ४० नाभिस्थःप्राणपवनःस्प्टष्ट्वाहत्कमलान्तरम्। कण्ठाहहिर्विनिर्याति पातुविष्णुपदामृतम् ४१ पीत्वा चाम्यरपीयूषंपुनरायातिवेगतः । प्रीणयन्देहमखिलंजी वंचजठरानलम् ४२ शरीरप्राण्योरेवंसंयोगादायुरु च्यते । कालेनतद्वियोगाञ्चपञ्चत्वकथ्यतेबुधैः ४३ न जन्तुःकश्चिदमरः प्रथिव्यांजायतेक्वचित् । अतोमृत्युर वार्य स्यात्किन्तुरोगानिवारयेत् ४४ याप्यत्वंयातिसा ध्यश्चयाप्योगच्छत्यसाध्यताम् । जीवितंहन्त्यसाध्य जठरमें जो मेद भोर रक्तदै सो टक पुष्टिकारक गोलाकार दोनों कहेहैं ॥ ३८॥ चीनवाही सिरापे श्राधार पुरुषार्थ करनेवाले पर्णहैं और गर्भ धारण करनेवाला लिङ्गवीर्य और मूत्रका मार्गदै सोलिड हृदय गलेको ग्राहक चारिकण्डराकार मरोह है और चेतनाका स्थान हृदय यलका धाश्रयहै ।हामोर नाभिमें स्थित चौबीस सिरानाम धमनी सो सय शरीर में व्याप्त होके वायुये संयोगते रसादि धातुन को संचिकै सदा शरीर को पुष्ट करती है ॥ ४० ॥ नाभिवासी प्राणवायु हृदयकमल फो सी परिकै विपदामृस पीनेसो कपउने बाहिरहो शिरपै माइक ब्रह्माण्ड से गिरताहुया प्रमुख पीके फिर उप्ती मार्गसे मायके सब शरीरको सन्तुष्टकरती हुई अग्निको पाचनशक्ति देती है।। ४१ ॥ ४२ ॥ प्रभापित शरीर और मायके सयोग रहनको बुधजन प्रायु कहते है और शरीर माण के वियोग होने को फात करते हैं ।। ४३ पृथ्वी में कोई शरीर अमर नहीं है इसी से मरने की ओषधि नहीं है रोगनिवारणीय प्रोपधि है ॥४४॥ जो मनुष्य ओपधि नहीं परते तो मुखसाध्य रोगको कष्टसाध्य करते हैं कप्टसाध्य ते असा यहोते हैं।
२६ , , 'अध्याय ५] भापटिकासमेता। स्तुनरस्याप्रतिकारिणः ४५ अतोरुग्भ्यस्तनुरतेन्नरः कर्मविपाकवित् । धर्मार्थकाममोक्षाणां शरीरसाधनंच यत् ४६ धातबस्तन्मलादोषानाशयन्त्यसमास्तनुम् । समाःसुखायविज्ञेया वलायोपचयायच ४७ ॥ इति क लादिकथनम् (अथ सृष्टिकमः ) जगद्योनेरनिच्छस्यचि दानन्दैकरूपिणः। पुंसोस्तिप्रकृतिनित्याप्रतिच्छायेवमा स्वतः४८ अचेतनापिचैतन्यंयोगेनपरमात्मनः । अक रोहिश्वमंखिलमनित्यंनाटकाकृति, ४९ प्रकृतिविश्वज ननीपूर्वबुद्धिमजीजनत् । इच्छामयींमहद्रूपामहङ्कारस्त तोभवत् ५० त्रिविधःसोपिसञ्जातोरजस्सत्त्वतमोगुणेः।त स्मात्सत्त्वरजोयुक्तादिन्द्रियाणिदशाभवन् । मनश्चजातं तान्याहुःश्रोत्रंत्वङ्नयनंतथा ५१ जिह्वाघ्राणत्वचोहस्त पादोपस्थगुदानिचीपञ्चबुद्धीन्द्रियाण्याहुःसप्रोक्तानीतरी णिच । कर्मेन्द्रियाणिपश्चैवकथ्यन्तेस्नूक्ष्मबुद्धिभिः५२तमः असाध्य होके प्राण देते हैं ।। ४५ ॥ जिससे कि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इनका सापनहेतु शरीर है इससे शुभाशुभ ज्ञाता पुरुप अवश्य शरीर की रक्षाकरे ॥ ४६ । घटे पदे रसादिक धातु वा धातुमल वा वात पित्त कफ देहके हन्ता हैं जव थे सम रहते हैं तब सुस देते हैं वक्ल और पुष्टिको करते हैं ॥४७॥ इति फलादिकथनम् ॥ (अथ सृष्टिक्रमः) जगद्योनि इच्छारहित ज्ञानधर्मका एकही 'रूपहै ऐसे विष्णुको नित्यमति सूर्यकी छायाकी नाई है ।।४८ । सो महात चेतनरहित चतन्य इन्द्रजालकी नाई परमात्मा के योगकरिकै अनित्य संसार रचती भई ।।१६ ॥ ऐसी विश्वजननी मतिने पहिले युद्धिको उत्पन्न किया सो इच्छा. मपी महबूपा कहे मूक्ष्मरूपा है उसी बुद्धिसे श्राकार होता है सो भी अंघद्वार रेजा सस्य तमोगुणों से तीन प्रकारका हुया ।। ५० ॥ इन तीनों अहहारे साहित पून अहसार से दशइन्द्रिय और मनभया सो इन्द्रिय दोपकारकी कहताहो'श्रवण त्वचा, नेत्र ॥ ११ ॥ जीम, नाक ५ वाणी, हाथ, पाय, लिंग. गुदा ५ पहिले 7 १र्वनामातंपापयास्पियवापते । अतीदानादिक्कुटपारसमसामविघषण इति ।
शाईपरसंहिता। [प्रथमलण्ड सत्त्वगुणोत्कृष्टादहकारादथाभवत्। तन्मात्रंपञ्चकंसस्यना मान्युक्तानिसरिमिः ५३ शब्दतन्मात्रकंस्पर्शतन्मात्रंरू पमात्रकम् । रसतन्मात्रकंगन्धतन्मात्रंचेतितद्विदुः५४त न्मात्रपञ्चकात्तस्मात्सञ्जातंभतपञ्चकमाव्योमानिलान लजलक्षोणीरूपंपतन्मतम् ५५ शब्दस्पर्शश्चरूपंचरस गन्धावनुक्रमात् । तन्मात्राणांविशेषारस्युःस्थूलभावमुपा गताः ५६ बुद्दीन्द्रियाणांपञ्चैवशब्दाद्याविषयामताः। क मेंन्द्रियाणांविषयाभापादानविहारतः । आनन्दोत्सर्गको चैवकथितास्तत्त्वदर्शिभिः ५७प्रधानप्रकृतिःशक्तिनित्या चाविकृतिस्तथा। एतानितस्यानामानिर्शिवमाश्रित्यया स्थिता ५८ महानहतिः पञ्चतन्मात्राणिष्टथक्टधक् । प्रकृतिविकृतिसतैतानिबुधाजगुः ५९ दशेन्द्रियाणि चित्तञ्चमहदूतानिपञ्चचा विकाराःपोडशज्ञेया:सर्वव्या प्यजगस्थिताः ६० एवंचतुर्विंशतिभिस्तत्वैः सिद्धवपु कहीहुई ज्ञान:न्द्रिय जानो पीछे कही पांच कर्मेन्द्रिपद ॥ १२ ॥ मद भार तम से उत्पष्ट रजोगुणी अहंकार भपा जिसमें पंचतन्मात्रा भई उनका नाम पण्डितजन कहते हैं ॥ ५३॥ शन्द तन्मात्रा १ स्पर्श २ रूप ३ रस ४ गन्ध ५ ये पंचतन्मात्र है । सो पांचों ज्ञानइन्द्रिन के लक्ष्य हैं लक्ष्य वह कि जिसकी मो तन्मात्रा सी का उस इन्द्रिय को ज्ञान है ॥ ५४॥ तिन तन्मात्रासे पंचभूत भये प्राकाश । वायु २' अग्नि ३ गल पृथ्वी ५॥१५॥ इनको क्रमसे जानना सौ शब्दादिक क्रमसे स्थूलभाव को मातहोके ये पांचों विशेष हैं ।। ५६ ॥ ज्ञानेन्द्रिन के शन्द्रादिक पांच विषय माने हैं सोई कर्मेन्द्रिन के वचन र गहिजेना २ चलना ३ सुखी ४ मल त्याग ५ पण्डित कहे हैं ॥५७ ॥ प्रधान १ प्रकृति र शक्ति नित्या ४ भवित ये महति के नामह इसी रीति से जानना जोकि परब्रमका याश्रपरि स्थित है ।। ५०॥ महसव अहंकार और पंचतन्माना इन सातों को पण्डितमन मतिय निवृत्ति कहते है ।। ५६ | और दशान्दिय एक चिच पंचमहाभून ये सोलह विकार जानना ये सब जग में व्याप्तहो स्थितहैं ॥६० ॥ इन चारिस तस्यनसहित देहमें
अध्यार ]
पाटीकासमेता।
हे जीवात्मानियतोनित्यंवसतिस्वान्तदूतवान् ६१
सदेहीकथ्यतेपापपुण्यदुःखसुखादिभिः । व्याप्तोबद्धश्च
मनसा कृत्रिमैःकर्मवन्धनः ६२ कामक्रोधौलोभमोहाव
हङ्कारश्चपञ्चमः । दशेन्द्रियाणिबुद्धिश्चतस्यवन्धायदे
हिमः ६३ आप्नोतिवन्धमज्ञानादात्मज्ञानाचमुच्यते । तं
खयोगकृयाधिरारोग्यंतत्सुखावहम् ६४॥ इति श्रीशा
ङ्गधरेकलादिकाख्यानेपञ्चमोऽध्यायः ५॥
पात्यामाशयमाहारः पूर्वप्राणानिलेरितः । माधुर्यफेन
भावञ्चषड्रसोपिलभेतसः :१ अथपाचकपित्तनविदग्ध
श्याम्लतांव्रजेत् । ततःसमानमरुताग्रहणीमभिधीयते २
ग्रहण्यां पच्यते कोष्ठवह्निनाजायतेकटुः । रसोभवतिस
म्पक्कादपवादामसम्भवः ३वह्नवलेनमाधुर्य स्निग्धताया
तितद्रसः। पुष्टिःपित्तधरानामसाकलापरिकीर्तिता:पक्का
माशयमध्यस्थाग्रहणीत्यभिधीयते । पुष्णातिधातूनखि
जीवात्मा सदैव स्थित रहताहै और जो ममहै सो उसका दूत है ॥६५॥ व उसीको
देही कहते हैं जो पाप, पुण्य,दुभव व सुख करिक व्याप्त सोमनके करे कमनके संग
धंधा काम,क्रोध,लोभ,मोह,अहङ्कार ५इन्द्रिय १०और बुद्धि ये सोलह देह
चन्धनके हेतु हैं । ६३ ।। जीवात्मा श्रज्ञान करिकै इनमें बारहताई और ज्ञानकरिक
चन्धन मुक्त होनाता अज्ञानते दुरसके योग, दुःखपाताई और ज्ञान करिकै मुस
पाताई ॥इति सृप्टिक्रममावशाइति श्रीशायरेकलादिकाख्यानेपञ्चमोऽध्यायः
(थधाहार ) जो कछु भोजनरिया सो प्राणायुसे प्रेरित मयम नामारायमें -
भाताई पदरस में कोई रसहो मधुर और फेनासा होनाताई।। १॥ मन्यग्रेन्यों में
लिखा है कि कफाशय मेंहो थामाशय में जा फेनभाव होजाताई इति,, मो रसभाव
हो पाचक पिच गें दग्धमय सट्टाहो नाताहै तब समानवायुका प्रेरित नहीं पड़ता
है॥२॥फिर ग्रहणीसे अग्निको पचिकै कदुवा होजाताहै जोअग्नियामागम
में अच्छी तरह पचा तो रसहुमा अरु जो अपहरहा तो आंच होगया ॥३॥वन
रस मनिके वलसे पचिकै गपुर और चिकना होनालाई सौवर पिचरत पुष्टिक्ला
१२ शायरसंदिता। [ प्रथमसपा लान्सम्यक्पकोऽमृतोपमः ५ 'मन्दवहिविदग्धश्च कटु भ्याम्लोभवेद्रसः।विषभावंबजेहापिकुर्याद्वारोगसङ्करम६ आहारस्यरसःसारःसारहीनोमलद्रवः । सिराभिस्तज्जलं नीतवस्तौमूत्रत्वमा यातातत्किटंचमलंज्ञेयंतिप्टेपक्काश येचतत् ७ वलिनितयमार्गेणयात्यपानेननोदितम् । प्रवा हिनीसर्जनीचग्राहिकेतिवलित्रयम्बरसस्तुहृदयंयातिस मानमरुतेरितः । रञ्जितःपाचितस्तत्रपित्तनायातिरक्तता म्,६ रनसर्वशरीरस्थंजीवस्याधारमुत्तमम् । स्निग्धंगुरु चलंस्वादुविदग्धंपित्तवद्भवेत् १० पाचिताःपित्ततापेनर साद्याधातवःक्रमात् ।शुक्रत्वंयान्तिमासेनतथास्त्रीणारजो भवेत् ११ कामान्मिथुनसंयोगेशुद्धशोणितशुक्रजः।गर्भः सञ्जायतेनार्याःसजातोवाल उच्यते १२आधिक्याद्रजसः फहातीहै और एकाराय श्रआमाशय के मा यमें स्थित ग्रहणी कही जातीई सो पन्दी तरह, पफारस अमृत की: गुल्य अखिल धानुनको पोपता ॥४१॥जो मन्दाग्नि फरि भएकरहा तर कहुचा खट्टा विपसमान बहुतरोग उत्पन्न करता है ।।६।।सोरस माहारका सार है जब माहार से रस भिन्नभया सोसारहीन आहार गल और जल रहगया उस जनको मनवाहिनी सिराने लेके वस्ती जो मूत्रकी थैली तिस में छोड़ा सो सूत्रहै तिसके नाम उसीकी कीटमलहो पकाशप में रहताहै ।। ७॥ सो मल अपानवायुप्रेरित भिनली में हो निकलताई पिपली कई मलमार्ग जिप्स में तीन बल शख की नाई हैं तिसके नाम मवाहिनी,सन्नी,ग्राहिका ३ ॥८॥सो रस समानवायुमेरित हृदय में गता व रंजित पित्तते पचि रक्त हो जाता है। वह रक्त उत्तम जीवापार सर्व शरीर में स्थितहै और चिकनाहै गुरुहै परहै स्वादुई व जब दग्ध होता है तब पित्तसम कटु होजाता है. ॥१०॥ पित्तकी पांचसे पचिके मासमरे में रसादिक पान क्रमते शुक्रको मामहोती है तथा स्त्रीके शरीर में उसी क्रम से रज होताई इसरीविसे एक दिनमें भोगनकारह फिर रस पचिकै पाँचदिनमें क धिर ऐसे मतिधातु पांच दिन में पचि पचिन महीनाभर में शुक्र होताहै ।।.११॥ जवखो पुरुषको कामना से संयोगदारा शुद्ध रक्त चीर्यमिश्रित होता है तब ही -
।
अध्याय ६
भापाटीकासमेता।
कन्यापुत्रःशुक्राधिकेभवेत् । नपुंसकंसमत्वेनयथेच्छापार
मेश्वरी १३ अस्थीनिमज्जाशुक्रचपितुरंशास्त्रयोमताः।
शुक्राश्रितोभवेच्छ्यावोगौरश्चरजसाश्रितः १४वालस्य
प्रथमेमासिदेयाभेषजरक्तिका । अवलेहीकृतैकैवक्षीरक्षौद्र
सिताघतैः १५ वईयेत्तावदेकैकांयावद्भवतिवत्सरः।मारे
र्टद्धिस्तदूर्वस्याद्याविषोडशवंत्सरः १६ ततःस्थिराभवे
तावद्यावहाणिसप्ततिः । ततोवालकवन्मात्राहसनीया
शनैःशनैः । मात्रेयंकल्कचूर्णानांकषायाणांचतुर्गुणा १७
अञ्जनंचतथालेपःस्नानमभ्यङ्गकर्मच । वमनप्रतिमर्श
श्चजन्मप्रभृतिशस्यते १८ कवल पञ्चमार्गदष्टमान्न
स्थकर्मच । विरेकःपोडशाहाद्विशतेश्चैवमैथुनम् १९
वाल्यंटद्धश्छविर्मेधात्वदृष्टिःशुक्रविक्रमौ । बुद्धिकमेन्द्रि
।
। ३४ शाई घरसहिता। । मधमण्ड यचैतोजीवितदशतोहसेत २० ( इति आहारपाकगर्भो त्पत्तिकुमारपोषणानि ) अल्पकेशःकृशोरूमो वाचाल चलमानसः। आकाशचारीस्वप्नेषु वातप्रकृतिकोनरः २२ अकालेपलिताप्तो धीमान्स्वेदी च रोपणः । स्वप्ने पुज्योतिपद्रिष्टापित्तप्रकृतिकोनर २२ गम्भीरबुद्धिः स्थू लाङ्गास्निग्धकेशोमहाबलः । स्वप्नेजलाशयालोकोरले मंप्रकृतिकोनरः २३ ज्ञातव्यामिश्रचिह्नश्चद्वित्रिदोषो ल्वणानरी कौमारोवनवा प्राणिनांत्रिविधवयः। क फपित्तानिलप्रार्यक्रमतःप्रकृतित्रिधा २४ (इतिहितोपदे शातू)तमःकफाभ्यांनिद्रास्यान्मू.पित्ततमोभवारिजः पित्तानिलैभ्रान्तिस्तन्द्राश्लेष्मतमोनिलैः २५ग्लानिरोज क्षयादुःखादजीर्णाचप्रमाद्भवेतायःसामथ्र्येप्यनुत्साहस्त धारणशक्ति पचासतक त्वचा साठतक दृष्टि सत्तरलों वीर्य अस्सीतक वल नये लो युदि सौतक कर्मेंद्रिय चलनशक्ति एकसौ दशतक चेत एफसोधीसतक जी- यत्व दश दशवर्ष प्रति यह क्रम जानना ॥ २० ॥ इति भाहारपाकगर्भोत्पति मारपोपणानि (घातप्रतिलक्षण) महमकेश दुर्वल रूसादरवादी मनस्थिर नहीं शाकाशचारी स्वप्न देस ये रानमहति नरके लक्षण हैं।।२।(वित्तप्रकृतिलयु. वयसमें येश पर्फे बुद्धितीव्र स्वेद बहुत निकर क्रोधी अग्नि नक्षत्रादि स्वम में देखें ये पिचमति मनुष्य के लक्षण है ॥२२॥ (फफमकृतिलक्षण)गम्भीर घुदि स्न्लशरीर चिकने केश भधिक बल जनादि समय देसे ये कफप्रकृति पुरुषके लक्षणशा(अथ यित्रिदोपप्रकृतिलक्षण)नोदो दोपके लक्षणहों तो दि- दोपजमहति जानो तीनोंके लक्षणहायतौ निदोपजमकृति जानो कौमार यौवन- वृद्ध यह तीनमकारकी अयस्थाहै-और कपविच घायुकी भाधिक्यता से प्रकृतिभी तीनमकारकी है ॥ २४ ॥ इति हितोपदेशात् ॥ तमोगुण मौर कफ मिलके मींद माती है इसे समावस्या कहते हैं पित्त में तमोगुण मिलने से अचेत होताई विसे मर्दा करते हैं रजोगुण पित्तवात मिलेसे संभ्रम होता है तमोगुण कफयात संयु क्त होनेसे तदा होती है जहावनिद्रा स्थित न होय ॥२५॥ लहानिसे दुश्पेसे ११ समसमपरस मास र ॥१॥ -- . - . अध्याय-१] भापाटीकासमेवा। दालस्यमुदीर्यते २६ चैतन्यशिथिलत्वाद्यापीत्वैकश्वास मुद्धरेत् । विदीर्णवदनःश्वासजम्मासाकथ्यतेबुधैः २७ उ दानप्राणयोरूर्वयोगान्मौलिकफस्रवात् । शब्दस्सजाय तेतेनक्षुतैतत्कथ्यतेबुधैः २८ उदानकोपादाहारस्सुस्थिर स्वाञ्चयनवेत् । पवनस्योर्ध्वगमनतमुद्रारंप्रचक्षते २९ इति प्रकृतिलक्षणानि ॥ इति श्रीशार्ङ्गधरेषष्ठोऽध्यायः६॥ रोगाणांगणनापूर्वमुनिभिर्याप्रकीर्तिता :१ सयानगो च्यतेसैवत दावहवीमताः पञ्चविंशतिरुद्दिष्टाज्वरा स्तछेदउच्यते। एथग्दोस्त्रिधाहन्दभेदेनत्रिविधःसृतः २एकश्चसन्निपातेनत दाबहवस्स्मृताः।प्रायशःसन्निपा तेनपञ्चस्युर्विषमज्वराः३सन्ततःसततश्चैव अन्येशुष्क स्तृतीयकः । चातुर्थिकश्चपञ्चैतेकीर्तिताविषमज्वराः ४ तथागन्तुज्वरोप्येक स्त्रयोदशविधोमतः । अंभिचारग्रहावे धनीर्ण से ग्लानि होताहै सामर्थ्य रखकर कृत न कर उसे मालस्य कहते हैं॥२६॥ चैतन्य स्थानकी शिथिलता से एकरघासको वंचिकै मुख फैलायक छोई उसे ज- भाईकहते है ॥ २७ ॥ उदान मोर माणवायु के ऊपर चढ़ने से शिरका कफ गिरा. साहै उसके शब्दको छींक कहते हैं ॥ २८ ॥ जर आहार अपने स्थान में गया यहां की भरीदुई उदानवायु कोपरि ऊपर निकलती है उसे डकारकहते हैं ।।२।। इति श्रीशाङ्गधरसंहितायामाहारकथननामपष्टोऽध्यायः ६ ॥ मंयम मुनियों की कहीहुई रोगों की गणना सो इस ग्रन्य में मैं कहताहूं रोगोंके बहुत भेद है ।।१।।पचीस भांति के ज्वरका भेद कहाहै वतीनमकार के भिन्न भिन्न हैं वातज्वर कफवर श्रौ दो दो दोष ते तीनिमकार के हैं वातपित्तज्वर घातकफ- ज्वर,फफपित्तज्वर ऐसे कहते हैं.॥२॥.और एक सनिपातज्वर हे तिसकेयहुतसे भेद कहै हैं बहुधा सनिपातसे पांचमकार के विषमज्वर उत्पन्न होते हैं ॥ ३ ॥ या जो ज्वर सदैव बनारहै उसे सन्तत कहते हैं ? एक वसा है दूसरा किसीवेर फिर आये उसे सतत कहते हैं २ दूसरे दिन आये उसे अन्तरिया कहते है तीजे दिनवाले को तिजरिया कहें ४ चौवे दिन यावे उसे चातुर्थिक कह ५ ये पांचंत्रि- .
शोधरसंहिता। [मंथमखण्ड शंशापैरागन्तुकस्त्रिधा५श्रमाच्छेदाक्षताहाहाच्चतुषा तजोज्वरः। कामागीतेःशुचोरोषाद्विषादीपधगन्धतः। अ भिषङ्गज्वराःपट्युरेवंज्वरविनिश्चयः ६ एथग्दो सम. स्तैश्चशोकादामाद्भयादपि। अतीसारस्सप्तधास्याग्रह पमज्वर हैं ।। ४ । एकप्रकारका प्रागन्तुकज्वरहै सो तीन कारण करके तैरह.म- फारका होताहै थभिचार कहे टोना मन्त्रादि से १ प्रहदशा से २ शाप से ३ में, तीन मकार. है ।। ५॥श्रमसे १ घोटसे २.तसे ३ व जलनेसे ४ ये,चारमकार आपातके कई कामचेष्टा में स्त्रीका प्रभाव भये अथवा चित्तासक्तं स्वीके वियोग से ? डर से, २ शोकसे ३.कोपसे विपसे अथवा विपगन्ध से प्रयलनोपंधिसे- बनसे ६ ये छःभभिपंगज्वर हैं ये सब ज्वर २४ निरचय कियेगयेहैं।।६।। अघ १३ प्रयम कहे और तेरह भागन्तुक पचीसों के लक्षणं कहताह वर के श्रानेसेदेहकाप ज्वर पानेका कोई समय बन्धन नहीं दोहा ।। मख होठ गरनीदनहिं मंतिरक्ष मुखफीका शिरहदि शूलोदरफुले मलवजम्भालीक ॥ इति पातज्वर ॥चेगदस्त झफहड्वकि कण्ठघ्राणमुखपाक । श्वेतालापी मूद कटु 'मूर्च्छीदाहमदाक ॥ त. पणा पियरो मूत्रमल नयनत्वचाई सुपीत । वचन भुलाने भ्रमसहित सो पित्तज्वर नीत ॥२॥ इति पित्तज्वर ।। शीतलता संकुचिततन भालस मध्य सताय । श्वेत मूत्रमलमीठगुरु गुरुताअरुपिजड़ाय ॥ जाडारोमांचौउयकि अतिनिद्रा तन पीर । रोध नासिका श्रवणदलमवलमूत्र गम्भीर। सूक्ष्मस्वेद लघुउष्णता अपचनासि, 'द्रप्रकासु । अरुचिनयन सितनयनरँगकज्वर कहियेतासु ॥ इति कफज्वर ।। तृष्णा मूर्दा दाहधमनींद नमस्तकपीर । रोमहर्पगरमुखसुखधुंधमरुचिउपकीर । राटि गांडि पोरकर मरत पिकचर जान ॥ इति दापितघ्यर ॥ संकुच शीतल जकड़ तन खांसी नोंद प्रधान सन्धिपीर मस्तक नकड़ प्राण द्राव अतिस्वेद । मध्यमज्वरसंतापयुतवातकफज्वरखेद ।। इति वातकफ कटुंलसेलसमुख दन्तक्षत दिकाकासरुप्यास खिनजांडाखनहीअरुचिकफपित्तज्वरबास ।। इतिकफपिचासन नासा सनदादपुनि अस्थिमायमैपीर । लारनपनल श्रवणमशब्दविलक्षणचीर' तंद्राकेटककंठगत मोहमलापकास । चासयरुचिभ्रमजम्भखरदग्धसदृशाभास॥ तनमस्तफरतउतमधिररतमुपित्तकफन प्यासप्रनिद्राहृदयमय दुष्ट स्वेद मनान ।। अति दुर्यनापातनादि घरघर कराटदि होई। उधणगात फिरकी मसित दामकले. घरजोइ । मुंगकाग पक पेटगुरु दोप यहुत दिनपकि दोपत्रदैपायकपटैलक्षणस .
७] 7 अध्याय ७ भाषाटीकासमेता पीपञ्चधामती थन्दोपैःसन्निपातातथाचानपञ्चमी प्रवाहिकाचतुर्दास्यात प्रथग्दोपैस्तथास्रतः८ अजीर्ण निनिशाक ॥ कहि असाध्य लक्षण सकल कष्टसाध्यनोगाट' पोरेलक्षण साध्य ये जो लय सरितापाट ।। इति सन्निपात ॥ सातकि दर्श द्वादश दिवस घटेनसंतत साप। सततचंदै गार नित कहत वैद्य निष्पाप । इतिसंततसततज्वर । वदैनन्येयुः पारइक टिकैघटी उचास । अंतरिया दिन धीचदै सिजरी दैतमित्रास || चातुर्थिक दिनत्र वितं कद्दत सकल रुहार । भूत मेत विपरीतजप, होमजनित थाभिचार ।। रासादि पीडाजनित कहिज्वरग्रह आवेश || वृद्ध सिद्धद्विजगुरु शपित कहाशाप ज्वर देश ६॥ अतिसारसप्तमकार । प्रतिटोप दोपविकार | पुनिशोकांवराय । ग्रहणीपचकादाय ।। मतिदोपसंतोग्राम रहिजातजोभुगरखाम ७ (अथातीसार रोग) अतीसार सातमकारकहैं चातातीसार, पित्तातीसारकफातीसार, त्रिदोषा तीसार,शोकातीसर,थामातीसार और भयातीसार लक्षण) जिसकेमल मांग वा फेनामिला पतला गिर लालरंग रूखा वा हलका होय वारवार वेग होहो भर- भराहटसे शूल से होये वातातीसारके लक्षण हैं | पीत व नीला य तात्रमल गिरे मर्दा होय गुदा में जलन और गुदा पक जाय प्यास ये पित्तातीसारके लक्षण हैं। श्वेतरंग गादा कफसहितं विसदी गंधमलठंढादेहोरोमहर्पहोय इति कफातीसार । मकर मेना तथा मांसपोवनःसा मल गिरे और वातादि दोपातीसारनके लक्षण मिलें उसे विदोपातीसार जानिये बहुत कठिनसाध्यहैं ।। इति ।।जो धन पुत्रादि वा प्रतिष्ठादि हानिके शोकसे भोजन न करे उसके शोककी उप्यता प्रोझड़ी में हो अग्निको विकल परती है उसके तेज से रधिर उफना ताम्ररंगहोय मलकेसाथ गिर वा केवल रुधिर गिर औ भामगन्ध हो वा अतिदुर्गन्ध हो उसे शोकाती सार कहते हैं सो भी अतिही कष्टसाध्य है अतिउपणचीज श्री पित्तकचीज़ साने से वा तसे गरमी होके निरे रुधिर का झादा होता है उसे रक्तातीसार कहते हैं और मूलव्याधि अर्श शोक से भी निरारक्त गिरताई इति रक्तातीसारा।और अन्न च रसके परिपाक न होने से पहोतीईसोमलके संगमनेकरंगहो गिरती औरशूल फरती है उसे प्रामातीसार कहतेहैं भपसे अतीसार होता है भयसे तीनों दोपकोप करते हैं जिस दोप के लक्षण मिलें उसी दोपका कोपजानना ।। थतीसार- लक्षण (अथ ग्रहणीरोग) पांचतरहकी ग्रहणी होती है।वातग्रहणी, पित्त- ग्रहणी, कफग्रहणी,विदोपग्रहणी,प्रामग्रणी (गृहणीलक्षण) जप अग्न्याशय 3 शांपासहिदा! थिभरसपा त्रिविधप्रोक्तंविष्टब्धंवायुनामतम् । पित्ताद्विदग्धंयिज्ञेय कफेनामंतदुच्यते ६ विपाजीर्णरसादेकंदोषैः स्पादल सस्त्रिधा। विसूचीत्रिविधाप्रोक्ता दोषैःसास्यात्ष्टथक्टथ ॥ दण्डकालसकश्चैवमेकैकंस्याद्विलम्बिका १० भ में यातादिकदीप स्थित होके कोपकरतेहैं उससे उत्तममंग्रहणीरोग होताहै प्रससे यांव गिरता है दुर्गन्धसमेत वा वायुकरिकै रुधित रखन के झाड़ा नहीं होता भी पित्त करिक तणतण भर में दिशालगती है तव कवी आर या जितनी पकै उत, नी गिरती है शक्ति घटती है पालत्य वदता है अग्नि पन्दहोती है उससे अमका पाक मरह नहीं होता और वही पाच शारको जड़ करती है यह संग्रहणी का प्रथम साद घायु के फुपितभये शूल, पेटफूलना, खांसी और श्वास होता है उसे वातसंग्रहणी कहिये-पिनके कुपिवधये खट्टीडकारमातीहै छाती कंउ जलता है रुचि न होइ उसे पित्तसंग्रहणी कहते हैं--कफ केपित भये उयासी, मुसमाग, लिपलिया, खासी, नाकरहना, भालस्य ये कफसंग्रहणी के लक्षण जानिये-- जिसमें तीनोंदोप के लक्षण होयें यह सनिपातसंग्रहणी इमामपातसेहो सो नाम संग्रहणी और संचित होके अठये चौथेटिन गिरतिसेभामातीसार कहते हैं और मया- हिका चार भाति की है सोश्रतीसारके भेद जानी यातसे पित्तसे क्फसेवरक्तसे इन चारों से होताई वायु कोप करिकै मोझड़ीमें कफसंचयकर फिर कुपथ्यके कारण पाके कफ मन में मिल पतला करि बहता उसे प्रवाहिका कहते हैं जो वायु होतो शूल हो और मलके संग फेन गिर यह यातप्रवाहिका और दाइहो पीतमल गिरे सो विचमय हिका है जो देहदै पालम्य होके कमिश्रित पांडुरंगमलगिरे उसे कमवाहिका कहते हैं जो रुविर मिल पतलामलयहरुकैनहीं उसे रक्तवाहिकाचह- तेहै।॥ अजीण के तीन भेदह किया हुआ भोजन यथ योय न पचै उसे अजीर्णक हते हैं जो वायु करके। कोष्ठबद्ध होता है तब शरीरमै शूल, घटन, पेटफ्लै. उसे विन्ध मीण कहते है जो सम्नमा मूली, दोह, देहपीर, खट्टी डकारभावै जो पायुकरके कोष्ठधे उसे पिचविदग्धाजीर्ण कहते हैं जो उबकाई, रकार, देहभारी, देइममन उसे कफ भामा नीर्ण कहते है।हायो अन्नभोजनकरि रस होताई उससे एक विपार्णि होताहै जो रस न पचै सो विष तुल्य होके मरणावस्थाके भनेक रोगको संचय करताई सो बीतमकारकाहै विसूची दण्डालस,विलंविमा लक्षण) भाड़ा परवीर मात्रै मर्चा, नाकी शुल, भ्रम, देह में शाह, अम्मा, देयुनना - अध्याय) भापाटीकासमेवा शीसिषड्विधान्याहातपित्तकफासतः ।। सन्निपाताश्च संसगीतेषांभेदोद्विधास्मृतः। संहजोत्तरजन्मभ्यांतथाशु काभेदतः ११ निधैवचर्मकीलानिवातापित्तात्कंफाद पिद्विाविंशतिप्रकारेणकृमयास्युधिोच्यते १२ वाद्यास्त थाभ्यन्तरायुस्तेषुयूकावहिश्चरो, १३ लिख्याश्चान्ये भ्यन्तरस्स्युिःकफातेह्रदयादकाः।अन्त्रादाउदरावेष्टाश्चु रंवश्चमहागुहाः १४सुगन्धादर्भकुसुमास्तथारक्ताश्चमा तरासारसालोमविध्वंसारोमहीपायुदुम्बराः:१५केशादा श्चतधैवान्येशकृज्जातामकेरुकाः।लेलिहाश्चमलूनाश्च अंशिस्येद इसे विसूचिका कहते हैं कोई हलका कहते हैं शरीर दंडाकारहो अकड़ काय प्यास डकार इसे देण्डालस कहते हैं व अधो ऊर्धयायुरुध पेटस्तम्भही फुले शलहो इसे पिलयिका च गुमशीतरस व बन्द देना कहतेहैं ।। १०॥मकई,व- थोमीर मकारकी है वातार्श,पिचार्श, कफाश, संनिपातार्श,रक्तार्श व संसारी ६ इनके दो भेद है एक शरीरसे होताद जिसे शुष्क कहते है दूसरा विपरीताहार विहार से होताहै.नो.शखाकार चक्र मलमार्ग में साढ़े पांच अंगुलेकाहै उसमें यातादिक के कोपसे मांसफा अंकर उभर आताहै (लक्षण)माथेमें शूल कटिपीडा,मन्दानि ये लक्षण याताशके, ज्वर,दाह, स्वदं, मूर्दा ये लक्षण पिचाशक है वासभेद, • हरि,माधाभारी नौ फरफूलकै पीड़ाकर बैठने में नेश ये लक्षण कफ शनी सिटी सनिपातार्शह और मति गरमी से रक्त गिरै देह पीली पनत्रीण यह रत्तारोह मलके वेगसे अकुर रक्तदेह कांटेसे गई ये संसर्गाश के लतारमैत्रीज्ञ तानि भांशिकी होती यातज,पिचन य केफन देहम बाईसरह पिदै रीन जर्मयासी जुवा चौल्हर किननी-ये केश बनेकी मलिनासे होतेई मौर मटारदे अन्तरवासीम सात मेद सो कंफंसे होती हृदयदिक भाइरसरात (चिनूना) ४ महागुइ ५ सुगन्ध ६दर्भममध्ये कफागद प्रामाण्य पुत्र होने फुपित होपो उध्यमार्ग मधोमार्ग हो निवलाई दवाई, वावरण, मोटे लम्बे तथा पानसमान लक्षण मन्दाग्नि दाकी पर नाभिलान ||१२|और छ। रक्तसे हशत है मातर १ सौरस २ मिनिस रोल दुन्दर ५ ॥१५॥ भार पेशादेये रक्त याही सिराले स्थान में होटौ (रक्षण लाल तिमदम को शायरसंहिता। [प्रयमवण्ड सौसुरादामकेरुकाः ।तधान्येकफरक्ताभ्यांसजाताःस्नायु काःस्मृताः १६व्रणस्यमयश्चान्येविषमाबाह्ययोनयः। पाण्डुरोगाश्चपञ्चस्युर्वातपित्तकफ़स्त्रिधा १७ त्रिदोषैर्म त्तिकाभिश्चतथैकाकामलास्मृता । स्यात्कुम्भकामलाचै कातथैवचहलीमकम् १८ रक्तपित्तंत्रिधाप्रोक्तमूर्ध्वगंकफ सम्भवमाअधोगमारुताज्ञेयंतहयेनद्विमार्गगम् १९का सा:पञ्चसमुद्दिष्टास्तेत्रयःस्युस्त्रिभिर्मलैः।उरतताच्चतुर्थः स्यात्क्षयादातोश्चपञ्चमः २० ० क्षयाः पञ्चैव विज्ञेयात्रि देख नहीं पर यह कष्ट उत्पन्न करतेहैं और, मकेरक लालह, मनन, सौमुरादव मरुक ये पाच मवलतर कृमि मल में होतेहैं कच्चे मलमे रहते हैं श्वेत पीत दी मोटे फभी मुससे कभी मल केसंग गिरतेहैं अग्निमन्द पीड़नादि उपद्रव होते हैं कफ और रच से उत्पन्न होते हैं उसे स्नायुक (नाहरू)कहते हैं ॥ १६, और बहुत विषम व पायोनि ये तणके कृमि (अथ पाण्ड) पाण्डुरोग पांच भातिका होताहैवातज, पिचन,कफज,निदोपज,माटी भक्षणसे ५ (लक्षण) पुस्त कातिहीन झावर कंप सूजन पैट पनावा पालस्य ये पाडुखरूहैं और कमलपाडु कुभकपाडु इलीमकपाडु इनके लक्षण)ीतचमा, हरदीसा मूजनाल मल उपण वलहीन ये कमल पाहुदेह कृष्ण वापीत कभी हरित सामर्थ्यहानि मनिमन्द सूक्ष्मज्वर नपुंसकतावासी ये कुंभ. फपाह के लक्षण हैं ऐसे ही लक्षण हलीमकपाडु ।।७॥ रक्तपित्तके तीन भेद जानो निदान उसका यहहै परिश्रम शोकमार्गगमन यमैथुन इत्यादेि प्रति करनेसे बधिर उफनाय मुख और दिशा से गिरउसे रक्तपित्त कहते हैं जर वह उफना रधिर निदान उसका यह कपकापता है तो पुससे गिरताई जो वायु कोपता ती मलमार्गसगिरता है अग्निकोपसे नाकमे गिरताई और कफवात दोनोंसे पुरस और दिशासे गिरताहै। २१कासकहे खासी पान प्रकारकीहै वातसे पित्तसे, कफसे कलेजेके विक से बचातुतीणसे पेटकोप हृदय मस्तकपीड़ासूसीधास खोखी ये यातकास हैं ॥ ज्वर मस्तकदाहायुमेरपीतकफ निकलना ये पिचकासकै लक्षण है।। सुनरी,कफसे देह जकड़ना ये कफकास के लक्षण हैं। और घातसे करेजे पाप सूखी खासीकेपीछे रक्तमाना,पमुरीपीडाये क्षवकासकेल तरह।। पापा सर्वसन्धिमाडाकारकै खासी उत्पन्न होतीहै यह धातु क्षयकालक्षणहै ॥२ M अध्याय ७]. भापारीकासमेता। भिर्दोषैस्त्रयश्चतोचतुर्थस्सन्निपातेनपञ्चमःस्यादुरःक्षता त् २१शोवाःस्युःषट्प्रकारेणस्त्रीप्रसङ्गाच्छुचोत्रणात् । अ ध्वश्रमाचव्यायामाहाईक्यादपिजायते २२ श्वासाश्च पञ्चविज्ञेयाःक्षुद्रस्स्यात्तमकस्तथा। ऊर्ध्वश्वासोमहाश्चा 'सश्छिन्नश्वासश्चपञ्चमः २३ कथिताःपञ्चहिकास्तुता सुक्षुद्रानजातथा । गम्भीरायमलाचैवमहतीपञ्चमीत थार४चत्वारोग्निविकाराःस्युर्विषमोवातसम्भवः। तीक्ष्णाः पांचमकारकी क्षयीकहते हैं वातक्षय, पिसक्षय, फफत्तय, सभियातक्षय, उरम्तय इनका चरकके मतसे निदान कहताई मुजा कोखं नलना, हाय पायें जलना, ज्वर, ध्यथा, कंठस्वर विपरीत, हाथ पाय पिराना, खांसी ये बातमक्षयके लक्षण दाह होना, चररहना, मतीसार, रक्तसहित मल गिरना यह पित्ततय के लक्षण हैं कोष्ठम पीड़ाहोइ, फफगिरे, ज्यर होइ, खांप्ती यह कफक्षयके लक्षण है ज्वर रहे। खांसीर, अन्तर्दाहहोइ यह समिपातक्षय के लक्षण हैं कएठ घरघरामा, पर होना, खांसी भाना, भग्निमन्द, दुर्गधि सहित कफकी गांठिगिर यह उतितक्षय के लक्षण है ॥२॥ शुष्करोग छन्प्रकारका मतिमैथुन से, शोचसे, ससे, प्रति चलने से, मतिपरिभम से, भति बुडापे से जब रसादिक सात धातु शरीर को मुखाती हैं ।। २२ ॥ त्रास कहे (दमा) पांच प्रकारका है तयारवास, तमक श्वास, ऊर्चश्वास, छिद्रश्वास, महाश्वास वायुकोप से ऊर्भश्वास चाती है देह . में मंद पीर ये दोश्वास साध्यलक्षण हैं कंठ घरघराना, पसुरी पीर, अतिदुःस्त्र से कफ निकले, दमाद ये तमकरवास के लक्षण हैं बहुत ऊंची श्वाससीधै उसे ऊर्चश्वास कहते हैं घरघराके जोरसे श्वासमा विषलो खांसने की शक्ति न रहे उसे महाश्यास कहते हैं हृदयमें जाड़ा, मर्ची, मलाप (प्रतियक) श्वास द- ना यह श्वास असाध्यहै ।। २३ । हिकाकडे हिचकी पांच प्रकार की है अमना, गम्भीरा, यमला, महती जो पारबार वायु मदवेग से ऊर्चगमनकर उन क्षुद्रहिका कहते हैं विशेष खाने पीनेसे अनजाहिका होती है भारी शन्दसे हिचको .श्रावे उसे गंभीरा कहते हैं रहि रहिके प्रायै उसे यमला कहते हैं देह कोपिक निर- तर हिचकी मात्रै तिसको महाहिया कहते हैं ॥२४॥ जठराग्नि के चार प्रकारके विकार है वातकोपसे हो उसे विषण कहतेई पि तसेहो उसे तीक्ष्ण कहते कफने हो उसे मन्दाग्नि कहते हैं वातपित्तसे हो उसे भस्माग्नि कहते हैं (अयलक्षप) 4.
.. .. शाईपरसंहिता। [प्रथमसत पित्तात्कफान्मन्दोभस्मकोवातपित्ततः२५पञ्चेवारोचका ज्ञेयावातपित्तकफैविधासनिपातान्मनस्तापाच्छईयास तधामताः२६निभिःपैःष्टयक्तिलःकृमिभिःसन्निपाततः। घणायाश्चतथाजीणांगर्भाधानाञ्चजायते २७ स्वरभेदाः पडेबस्युतिपित्तकफेलयः। मेदसालन्निपातेनक्षयात्पष्ठः प्रकीर्तितः २८ तृष्णाचषडिधाप्रोक्तावातापित्तात्कफाद पि।त्रिदोषैरुपसर्गणक्षयादातोश्चषष्ठिका २९-मूचि तुर्विधाज्ञेयावातपित्तकफैः पथक् । चतुर्थीसन्निपातनतथै कश्चनमःस्मृतः। निद्रातन्द्राचलन्न्यासोग्लानिश्चकैक शःस्मृतः क्षेमदास्सप्तसमाख्यातायातपित्तकफैजयः। जो अन्न की पथै कभी न पचै यह विषमाग्नि है व भोजनपर भोजनकर उसे तीक्ष्णाग्नि कहने हे व थोडा भोजन करने से भी न पचै उसे मंदाग्नि कहने है जो पारमा भोजनकरै अगमर्च और देवमें न लगै उसे भस्माग्नि कहते है ।। २५॥अरपिके पाचौदह वात, पित्तमे,कफसे.सनितमे,संतापसे ( लक्षण) दातसह, गुटफीका, हृदयपीना यह वातरोचक है मुंहकडुबा, स्वादहीन ये पित मरुपिह मुह फीका प चिटका यह कफ अरुचि है तीनों लक्षणहों तो सनिपात अरुचि है मन सतापहो तिसमें जो दोष अधिकहो वही लक्षण मानो चर्दिकर वमन सो सातमकार का है ॥२६ ॥ वा छदि कहे पार २ उपांत वातददि, पिच चर्दि, कफ,दि, सनिर्दि, कृमिर्दि व घृणाचार्ट तथा सीके गर्भधारण समय सातनी पदि होतीहै (अध लपण) हृदय मस्तक पीडा मुखरौ नाभि शूल उषाकी फेनयुक्त हसार देह पीस ये बातदि, उबकाई पीत हरित दाहयुक्त ये पिचरदि, कफ संयुक्त पशाई हो तो कफवारे जो उसकाई खट्टी नीली लाल टाहयुक्तहो तो सन्निनदि, जो निरंतर जीमिचलाय विशेष धूक तो मिहर्दि जो कुकर उचाई कुछ भिरहै तो पालोद कई अन्य ग्रंथकारका मतई कि स्त्रीकी जैनी पित्त मविहो उतनी बाहो ॥ २७ ॥ स्वरभेद छामकारका है पारस्वर रिचस्पर काफसर गते विशेष भेदसे सभिसे व धानुसयते ॥ २८ ॥ नृपा छ। प्रकारको है पातज, पिएम, फा, निकोपन घावलगे से, पानुनयसे ॥२६॥ गन्दी बार मशरको पात पिच कमळ सनिपातयूचा (तल अध्याय ७]. भापाटीकासमेता। त्रिदोषैरसृजोमद्याद्विषादपिचसप्तमः ३० सदात्ययश्च तुर्धास्थाहातापित्तात्कफादपि । त्रिदोपैरपिविशेषएकः परमदस्तथा ३१ पानाजीतथैवैकंतथैकापानविनमः। पानात्ययस्तथाचैकोदाहास्सप्तमतास्तथा ३२ रक्तपित्ता तथारक्तात्तष्णायाःपित्ततस्तथा । धातुक्षयान्मर्मघाता द्रुक्लपूर्णोदरादपि, ३३ उन्मादाःपट्समाख्यातास्सिभिर्दो पैशायश्चते । सन्निपाताद्विपाज्ञेयः पष्टोदुःखेनचेतसः ३४ भूतोन्मादाविंशतिःस्युस्तेदेवादानवादपि। गन्धर्चा किन्नराद्यक्षापितृभ्योगुरुशापतः३५ प्रेताचगुह्यकाढ क्षणं ) संज्ञा कहे चेष्टाकी बहानेगाली नो नाड़ी सो बातादिक से सचिरहों मकस्मात् तमोगुणको मातदो तमोगुण कई दुःख सुखका तिरस्कार करनेवाला फौष्ठव भूमिपर गिरादेताहे उसे मूर्दा कहते हैं और भ्रम एक प्रकारका ( तिसका लक्षण) संदेह सहित घुमेर पाना निद्रा एक प्रकारची है तन्द्रा एक प्रकारको है (लतण) कुछ जगै कुछ सो संन्यास एक प्रकार का ( लक्षण )हाय पारे चलें नहीं मृतक समान पहारहै उसे संन्यास कहतेई संन्यासरोगमें बहुत जल्दी प्रयत्न करै तो मनुष्य तुरत परजाइ इस से हाथ पाँवकी कलाई में सूचीबेद रुपिर निकाले मस्तक में फस्तदे रुधिर निकाल तोजिये ग्लानि एक प्रकारकी है (२०) मदरोग सात प्रकारका है वातमद,पित्तमद, कफमद, सन्निपात मद, रक कोपसे अधिक मय से चनेसे, विषसानेसे, कधी सुपारी खानेमे,कोदवसानेसे, धनुरासाने से जैसे गद होताहै ऐसाही वातादिल कुन्तिहो मनको रिझर करते हैं उसे मडकहते है।॥ ३० ॥ मदात्ययरोग कहते हैं अतिमद से चार विधिक रोग पानसे, पिचरो, कफसे, त्रिदोपसे एक परममद कहते हैं मनुष्यही बुदिभ्रंशहा अनेक मानि पित कर माण विकलरहै उसे मदात्यय कहते हैं ॥ ३१ ॥ पानानोरी जमक्षार एक पानविभ्रम एकमकार पानात्यप दाह सातमकारका है ॥३॥ रजन्धि, प्याससे, पित्तसे, धातुक्षयसे, मर्मसतसे, मारसानेमे,दय में रविर संदिशेनते॥३३॥ उन्मार रोग सम्मकारका है वातोन्माद, पिोन्नाट.फोन.पिसेवन से, शोफसे (लवण)चातादि टोप पिके समार्ग ठोदिमादीमा जागिर को भ्रमहर उसे उन्माद कहते है तब से रो नाच कालादोजाइ जीर्ण बन स्याग बुद्धिस्मृति मांस भोजन में चरचि ॥ २१॥ो मादरोग बीसतरह के . - ४४। - . शाईपरसंहिता। [भयममा हासिद्धाद्भूतात्पिशाचतः।जलाधिदेवतायाश्चनागाचब ह्मराक्षसाताराक्षसादपिकूष्माण्डात्कृत्यवैतालयोरपि३६ अपस्मारश्चतुर्धास्यात्समीरात्पित्ततस्तथा। श्लेप्मणोपि तृतीयःस्याचतुर्थःसन्निपाततः ३७ चत्वारश्चामवाताः स्युर्वातपित्तकफेखिधा । चतुर्थःसन्निपातेनशलान्यष्टोत्रु धाजगुः ३८ पृथग्दोपैविधाहन्दभेदेन त्रिविधान्यपि । देवसे, दानव से, गंधर्व से, किनर से, यत्तसे, पितर से, गुरुशापसे ॥ ३५ ॥मेत से, गुलक से, पद और सिद्ध शापये, भूतसे, पिशाप से, जलदेवता ये, सर्पसे, ब्रह्मराक्षस से, राक्षस से, फूष्मांध से, कर्तव्य से ( लक्षण )संतुष्ट, वित्रता, सुगंध माला धारण, संस्कृत भाषा ये देवोन्माद-मामण, गुरु, देवताकी निंदा, निर्भय ये गंधर्वोन्माद-किन्नर, गंधर्ष, भापको जाने, लाल मोरिस, मलिन, रक्त वस्खमिय, दंभ, पिक्रियारहित, मांस, तिल, गुरुपर विशेष इच्छा करै ये पित उन्माद गुरुशाप से गुरुशापोन्माद खसिद्ध गुरुवर मत प्रेत गुधक बुद्धि अनुमान से जानो उर्च पाय होय यड़बड़ाय भमंगल भाषै दुर्गधयुक्त रहै तो पिणयो- न्मादी जानो जलधि, देवता, रमशान देववत् जो मोठ भोजनमें गाइ भीमसे चाटै तो सर्पोन्माद है देव, गुरु, वेद, शास्त्र व ग्रामण को निंदै तो अक्षराक्षसो. न्माद जानो मद मांस विषयार निर्लज्जा यह रातसोन्माद है अरु अनुमान से जानना ॥ ३६॥ अपस्मार कहे (मृगी) के चार भेद है वातज, पिच कफज, भिदोपन ( लक्षण ) तनकंप, दांतकड़कड़ाना श्वासघरयराना यह वातापरमार है जो मुस्लसे फेन पीला उगले सो पिचापस्मारहै हाथ पांघ परथराना देह सफेद थोर दाहो तो कफापरमार है तीनों दोपलक्षण मिल,तो समिपातापस्मार थसाध्य जानना ।। ३७ ॥ ग्रामवात चार प्रकार का है पातज, पित्तन, फफज, निदापन यातादि दोप कोष फरके जठराग्नि को मंदकर तो भोजन अपकरदै सोमांच होनाय तिससे देहमें पीर ज्वर श्ररुचि गान प्रकरे सूत सामान्य लक्षण है जिस में देह पीड़ा विशेष हो तो यातन है दाहहो तो पितसे पित्तन कफसे भामरात है देह अकड़ जाय गुजली हो तो कफ पामवात तीनों लक्षणों तो सन्निगतामत्रात है शलके भाठ भेद हैं ॥ ३८॥ वातसे, पित्तसे, कफसे, पात पित्तसे, पित्तकासे, कफवात से,मांत्रसे, सभिपात से इसका पुण्य कारण वायु सो सूखी रूसी द्रव्य सेन कुपित होय हदय पसुरी संधिनमें पैठि शुल उपजाती .
४५
अध्याय ७]
भाषाटीकास मेता।
आमेनसप्तमंप्रोक्तं सन्निपातेनचाष्टमम् ३९ परिणामभवं
शूलमष्टधापरिकीर्तितम्।मलैःशूलसङ्ख्यास्यात्तरेवंप
रिणामजमाअन्नद्रवभवंशूलंजरपित्तभवंतथा४० एकैकङ्ग
णितंसुरुदावस्त्रियोदश। एकःक्षुन्निग्रहात्प्रोक्तस्तृष्णा
रोधाद्वितीयकः ४१ निद्राघातात्तृतीयःस्याञ्चतुर्थःश्वास
निग्रहात्।मूत्ररोधात्पञ्चमःस्यात्पष्टःक्षवथुनिग्रहात् ४२
जम्भारोधात्सप्तमःस्यादुद्गारग्रहतोष्टमः । नवमःस्थादश्रु
रोधादशमःशुक्रधारणात् ४३ मूत्ररोधान्मलस्यापिरोधा
[भयमसण्ड शापिरसंहिता! द्वातधिनिग्रहात्।उदावर्तात्रयश्चतेघोरोपद्रवकारकाः४४ पानाहोद्विविधोज्ञेयएकापकाशयोद्भवः । भामाशयोद्ध वश्पान्य प्रत्यानाहस्सकथ्यते ४५ उरोग्रहस्तथाचैको हृद्रोगाःपञ्चकीर्तिताः । वातादयसयाप्रोक्ताश्चतुर्थःस निपाततः ४६ पञ्चमः कृमिसजातस्तथाष्टावदराणिच । वातात्पित्ताकफाल्नीणित्रिदोपेभ्योजलादपि। प्लीहानता ददगुदादष्टमंपरिकीर्तितम् ४७ गुल्मास्त्वष्टोसमा निरोध से उकार विशेष मोर होना पेट फूलना १२ वायुनिरोध से नानाप्रकार के उदर रोग १३ ॥ १४ ॥ मानाह रोग दो तरह का होताहै एक जो पकाशय फा होके पेटफुलाताहै उसे भानाह कहते हैं एक भामाशय से होताहै उसे प्रत्या- नाह कहने हैं (तस्यलक्षणम् ) कटिमें पीडा, मलस्तंभ, भालस्य, पेट फूटना ये भानाइके लक्षण भामाशय में शून, मुख से रार, टकार यह मत्यानाह है ।। ४५ ॥ सरोग्रह एवमकारका है रक्त,मास, शीदा और यकन इन सबों के बढ़ने से उरोग्रह होताहै द्रोग पाचप्रकारके दे पातज, पिराज, कफज, सन्निराज, - मिन ५ हृदय, मुईसी चुभनाइएइसे बचना,कुल्हाडी से फारना, पारीसे चीरना ऐसा दर्द हो तो वातन है हदय में प्लानि, मूळ, घुश्रासी, डकार ये पित्त देह भारी, सासी, अरुचि ये कफज है जो तीनों दोपो लक्षणहों तो हदय में विशेष पीसाहो तो त्रिोपगई ।। ४६ ।। उपकाई, शूल, मुसर्गे तारा धुकयुकी ये कृमिन लक्षण, उदररोग पाठ भातिके हैं यातोदर, पित्तोदर फफोदर, ग्दिोपोदर,गलो. दप्लीहोदर तोटर पदगुदोदर (अस्पलक्षणम् ) हायपान,नाभि व कोखमैं शोथ संधिपीसा,पेटेगल,पेट गुडगुहाना ये वातोदर हैं ज्वर, मूच्ची, दाद, खुजली अवीसार, शरीर पीत था तान ये पिचोदर है शरीर ग्लानि,निद्रा, देहगुण, सासी भरुधि,रवास यह कामोदरहें विवेकशून्य दुर्बुद्धिानख, केश, मन,मल स्त्री लोभन श्यहेतु पुरुषको खिलाटेती तिससे भोप कुपित होताई मन्दी, मोह, पाहुवर्ण शरीर दुर्वल,तपातुर यह किोप है पेट चिपना, फली नर्स दखि, प्यास अधिक, देहरूश यह जलोदर है पेटमा, योख नृश, मंदचर, पेट पत्थर सदृश पादुणे ये प्लीहोदर हेपर और नाभिके मध्य में पीडा, अतिदेहाशमान परितापानीसामिला गिरै पा सार दिशानाय यह पातोदर मो मल मूसाहुमा यतिकष्टो थोडा घोडा कासकै गिर यह उदगुरोदर तक्षण है ॥ ४७ ॥ गुल्म आठ प्रकारका है चात ४७ अध्याय ७] भापाटीकासमेता। ख्यातावातपित्तकफैलयः। द्वन्द्वभेदात्त्रयःप्रोक्ताःसप्तमः सन्निपाततः४८ रक्तादष्टमकःख्यातोमूत्रघातालगोदश। वातकुण्डलिकापूर्ववाताष्ठीलाततःपरम ४६ वातबस्ति स्तृतीय स्थानानातीलश्चतुर्थकः । पञ्चमम्मत्रजठरंषष्ठो मूत्रक्षयःस्मृतः ५० मूत्रोत्सर्गःराप्तमरस्यान्मननन्थिस्त थाटमः।मूत्रशुक्रञ्चनवमंविधातोदशमःस्मृतः ५१ मू त्रासादश्चोष्णवातोवस्तिकुण्डलिकातथा । त्रयोप्येतेम वघाताःपृथग्योराःप्रकीर्तिताः ५२ मत्रकृच्छाणिचाष्टी रयुर्वातापित्तात्कफात्रिधा ५३ रानिपाताच्चतुर्थःस्यान्मू गुल्म, पिचगुल्म, कफ, रम, वातपित्तगुल्म, कफवातगुल्म, निदोपगुल्म, रक्ताल्म, मातादि कोप कार पेट में गाठि सा गुल्म याच तरहके उत्पन्न करता है दो दोनों पार्श्व में एक नाभिमें एक हदय में एक में होना भी चलकै और ठौर पीड़ा कर कभी कभी कहीं अपीडाकर मनरात तेरह मकार का होता है वातसुदलि- फा, वाताष्ठीला ॥४८१४६ ॥ पासवस्ति, मूनातीत, माजठर, मनक्षय |५० ॥ सूत्रोत्सर्ग,गन्धि, गूबशुक्र,पिज्ञात ॥ ५ ॥ मूत्रासाद, उप्पणात, वस्ति कुण्ड- लिया इस में से तीन मूत्रपात,उपणात, वरितकुगंडलिका ये माणसकट उपद्रव करतेह (लक्षणं )चिनगडोकै घोटा मूत्रसाव हो तो बातफुइलिका है अति पीड़ाहो मलमूत्र बन्द रहै सौ चाताटीला जानो पेडू, कमें अधिक पीड़ादो और मल मूत्र बन्द रहे तो पासवस्तिहै जो मूत्र का बनी रहै उतरै नहीं तो सूपरावीत है पेडू फूलै पीडाकर सूत्र न द्रवे तो मूत्रनटर है शूलदाह हो गत्र न गिरे तो मनक्षय है चिनगहो काखने से रक्तसम थोडा २.पूनद्रावहो नौ मूत्रोत्सर्ग है मूत्राशयके मुंह पर गाठिपर पीडाकर तो मूरयिह जो मूत्रत्यागके श्रादि वा अन्त सूत्र रातधोवन सागिरै तो शुक्र जानो में मलकी गंधहो तो विट्यात जानो जो दाइयुक्त गोरोचन शालना के रंग मनहोके सूसनेपर जित दोपदी रगत होजाय सौ उसी दोषको मूनसाद जानो जो मून पीलाया शुद्ध या रस पासारकटसे थोडागिरती उष्ण पात जानो जो मूत्रकी थैली के मुरसपर सूजन हो धीरे-पीता या तालसूत्र गिर ये वस्तिडलिका के लक्षण ।। ५२ ॥के भाउभे हे मतमूत्रकृत पिचर कफ ॥५॥सनिकुन्जन्य विच्छ अमरीरच येन्याक .. शाईपरसंहिता [प्रयमनपर त्रकृच्छञ्चपञ्चमम् । विकृच्छ्पष्ठमाख्यातंघातकृच्छंच सप्तमम् ५४ अष्टमंचाइमरीकच्छंचतुर्धाचाश्मरीमता। चातापित्तात्कफाच्छुकात्तथामेहाश्चविंशतिः ५५ ५ क्षुमेहस्सुरामेहः पिष्टमेहश्चसान्द्रकः ५६ शुक्रमेहोदका ख्यौचखालमेहश्चशीतकः । सिकताख्यःशनैर्महोदशैते कफसम्भवाः ५७ मजिष्ठाख्योहरिद्राख्योनीलमेहश्चर तकः । कृष्णमेहक्षारमेहःषडेतेपित्तसम्भवाः ॥ इस्तिमे होवसामेहो मजामेहोमधुप्रभः । चत्वारोवातजामेहाइ तिमहाश्चविंशतिः ५८ सोमरोगस्तथाचैकःप्रमेहपिट है (अपांलक्षणम्)पहू नाभि पीडा अधिक कांसरोदार सूत्रहो ता वातवद्ध है दाइ चिनगो लाल मूत्र द्रवे तो पित्तन्छुई पेटू भारी सूत्रस्वेद चिकना हो तो कफकुरङ्ग है तीनों के लक्षण हो तो सन्निपातकृच्छ है सो मसाध्य जानो भून धातु मिथित केशसे उत्तर तो शुकहर है जो कांसने से सूचदत्रै तो विद्कड़ है पाकी तरह अंत निश्चय हो और छरहरायके मूत्रद्राचकै पुत्रदानहोय तौ धान- हरदूई पटू या टेडीमें पीड़ा भौर शूलहो तो धरमरी कहिये ॥५४॥ अश्मरी कहे पथरी के चार दह पातारमरी, पिचारमरी, कफारमरी शुक्रारमी (अधास्याल- क्षणात पित्त कोपरि स्त्रको थली के मुँहपर रसको मुखाय पथरीसी स्थिर करते हैं वहीं पयरी है पेडू मोर हंडीको फाडने लगती है ध नहीं उतरता जर कांखने से पथरी कुछ हटती है नत्र दश बीस बंद मूत्रगिरता है तो यातपधरी है जो उपगुमलसा रा गले हाड़के कनके से या काली पथरीहो तो प्रिजाइमरी है पेडू भारी मन त्रेत ठंढा कष्टसे हो तो कफाश्मरी जानी जर धातु मूखके पयरी परती है तर पेमें पीर भंडकोश में सूजन ये शुक्रारमरी के लक्षण हैं ममेहरोग बीस प्रकारका है ॥ ५५ ॥ इनुमेह, मुरामेह, पिष्टमेह, सांद्रमेह ॥ ५६ ॥ वा शुक्रमेह, उदकमेह, लालमेह, सिकतामेह, शनिमह ये दश भेद कफसंभा है॥ ५७ ॥ मंजिष्ठामेह हरिद्रा नील रक्त कृष्ण क्षारमेह ये छापिसभा है इस्तिमेह, घसामेह, मन्नामेह, मधुमेह ये चारि वातसंभह सब मिति से बीस प्रकार के हैं (अथास्यलक्षणम्) जो मूत्रमार्ग से ऊसरससा शुक्रगिरै तौ इक्षुमेह भानी निसमें मद गैप भाव वह मुरामेह जानी पीरीसा गिरे तो पिष्टमेह जानो जो "
1.
'अध्याय ७
. भापाटीकासमेता1
कादशः। शराविकाकच्छपिका पुत्रिणीविनतालजी ५६
मसूरिकासपिकाजालिनीचविदारिका । विद्रधिश्चदशै
तास्युःपिटकामेहसम्भवाः६० मेदोदोषस्तथाचकः शो
थरोगानवस्मृताः । दोषैः एथग्द्रवैस्सर्वैरभिघाताद्विषाद
4 , शाइपरसंहिता ।।। [प्रयमखण्ड पि ६१ रहयस्सप्तगदितावातापित्ताकफेनच । रक्तन मेदसासूत्रादन्तरदिश्चसप्तमः ६२ अण्डधिस्तथा कातर्थकोगण्डमालिका । गण्डापचीतिचैकास्याद्ग्रंथ हो यरुचि अनिमन्त राति शिराय ये सफशोय हे वातपित्त लक्षण होय तो बात रिच पित्तका लक्षण हो नो पित्त कफ जो कफवातलत्रण हो तो कफवातशोथ जो निदोष लक्षण हो तो सन्निपात शोथ किसीभाति तलगे सूजनही तो अभिवात शोध जानौ विषधर जीपके दांत, डंक, पंच, पंजा, नख व दंष्ट्रा से जनदोन तो विपरोध जानी ॥६॥अंडवृद्धि पणफूलना उसे रद्धकढ़ते तिसके सात भेद है पाटन, पित्तद्ध, कफद, रक्तदृद्ध, मूत्रद्ध, प्रांतरद्ध ये सातभार : (अस्पक्षणम् ) जय वायु अंडकोश में भरिकै पीड़ा उत्तम करती और रुचाई छायलेती है तो यातद्धहै जो पके गूलरके रंग दाहयुक्त पके फोड़े की नाइ उण हो तो पित्तद्ध जानौ ठरहा भारी चिकना कटोर गुरुगलाय कुछ पीलाहो तो कफ अंडवृद्धि जानी जो कालेरंगकी फुडिया सहित पित्त लक्षण हो तो रक्तांडयुद्ध जानौ जो तालफल मे नीलगोल हों तो मेदवृन्द है और एक अन्योन अंडमुद को मांसद्ध कहते हैं उसका निदान यह है कि मूत्रवेग के रोके से दोनों योरकी गोली फूलजाती है जब मूत्र रुकजाता है। तब धीरे २ दोनो कौड़ीन में हलाइ २ पचता फिर गायुकोप से उतरिकै पीड़ा करवाई फूलताहै उसे वदि कहते हैं जो वायुक कोपसे नस अंडकोश में लटक भाती है जब वह नस फिर आयुकोप पाइकै फूलती है उसमें प्रांत उत्तर वाती है उसे अंजाद कहते हैं वह दबाने से फिर ऊपर चरिजाती है ।। ६२ ।। अंडरद्धि कहे गलांड गलेकी सन्धिन में अंडेसी गाउँ फूलक काडी होरह पीड़ से अंडराद्ध एक प्रकार के हे गंडमाना एकही प्रकारको है गले में माला की नाई : फोडे होके पफ फूटै उसे गएडम ला कही है गनगंड एक प्रकार का है जिसे घेवा कहते हैं अपनी एक प्रकारको है गण्डमाला की नाई गाउँ पकें फूटें यह एक अच्छा होने न पावै दूसरा और हो उसे अपनी कहते हैं और चरक में गले के छत्तीस तरह के रोग और को है ग्रन्धि कहे गांठिकी तरह नाभांति की होती है जिसे गोरी कहते हैं वातन्धि, पित्तप्रन्यि, रन्थि, शिर अंधि, यणथि, प्रस्थापि, मामग्रंथि मे नव प्रकार के प्रयिरोग हैं ( अधास्य लक्षणम् ) जो गांठि जना के याकार हो निलकि चिनकि उठे एने से कठोर चिराय और मरन हो सरल के पार हो रक्त पद नी पानप्रावि जानी जो यि दाह ययाय ७] भापाटीकास मेता। योनवधामताः६३ त्रिभिदोषैत्तयोरक्ताच्छिराभिर्मेदसोत्र पात्।अस्थ्नामासेननवमःपविधस्या तथार्बुदम् ६४वा तापित्तात्कफाद्रतान्मालाढपिचमेदसः । क्लीपदंचत्रि धाप्रोक्तंबातास्पित्तात्कफादपि ६५ विद्रधिपड्निधारच्या तोवातपित्तकफेस्नयःारक्तात्ततास्त्रिदोषैश्चत्रणाःपञ्चद करे फफोलेकीनाई झल्लाय और पमै नहीं कालातह है तो पित्तप्रथिगन जो गाठि उहीही कुछ पीडाकरे खुजली होय कटोर बहुत होय दिन में यहै पफे से पीरोइ तौ कफग्रयिजानी जिसमें पित्तथि के लक्षणहा रक्तवरदिशेपदीय रतनन्विजानी बूटियासीहो-तो शिराजमान्य जानी दान से इवर उपर वीर अंचीतोत्रौर मर्म स्थान में हो तो असाध्य मेटविनानौ जो हाह बदके हाडमें सटाय और गन्यि निकलायै व पत्थरसी पीडाहो तो हाडनाथजानौ सो भी प्रसाध्य है जो नाड का अच्छी हो जो मास से होती है उसे मास मयि कहते ह जो चापरि पर मासपदि कै गाठिउभरै उसे त्रणग्रन्थि कहते हैं कई मासद्ध कहते है ।। ६२॥ अर्युट रोग छम्मकारकाई याताईंद, पिचाधुंद, कफाद, मासात, मंदोद, रत्ता जो प्रथमग्रंथि के लक्षण लिसमाये हैं वैसेही हैं रक्तार्दुद और नासाउँद ये कठिन हे इन के लक्षण भिन्न २ कहताह जो मास पिंडसाहो लालरग परफ्टक अतिदु- सदेना है उसे रक्तावुद कहते हैं मास दुष्टहोके मास घीवार रादकी नाईहोचकना लाल अतिकठिनता से पकै फूट हमेशह वहाकरै नन्दी अच्छा न हो जो मर्मस्थानमें दो तौ असाव्यहै और जगह सायदै यह माताद है ।। ६४ ॥ रती पद कई फीलपात सो तीनि भातिके ई यातसे पित्तसे कफसे ( अस्य लक्षणम् । जार के जोडी सन्धिमें प्रथम छोटी गिलटी उभर के पीडा करती है फिर कुच दिना में सब जोड की नसे तनजाती हैं चलने से समझ पडताहै फिर धीरे धीरे रुधिर सहित पीडा उतरिके पैर से गाठितफफूलता है उसे फीलपार कहते हैं और हायमें तथा अंग में भी होताहै तराई की भूमि में अधिक होता है यातज में पीडा पित्तन में दाह कफलम चिकनी शोथ मद पीर ॥६५॥ विद्रधी छ.प्रकारकी है वातज, पित्तन, कमज, रतना ज्ञतज, निढोपज ये छः विद्रमा हे (प्रथास्य लक्षण ) जो लाल वा पीली व नुकीली अतिपिटका युक्त हो तो वातचिद्री हे जा दाहयुक्त लाल हो तो पितरिधी जो दीपकसी पाडुवर्ण पक काली परजाय तो रूपविधी रत चिद्रवी के पित्तमम लक्षय जो किसी भाति पाव संयी नौ सिरिती है 1 । ५२ शाघरसंहिता [प्रथमरसएट शोदिताः ६६ तेषांचतुर्दाभेदस्स्यादागन्तुबेहजस्तथा । शुद्धोदुष्टश्चविज्ञेयस्तत्सङ्ख्याकथ्यतेपृथक् । वातत्रणः पित्तजश्चकफजोरक्तजोत्रणः६७वातपित्तभवश्चान्योवा तश्लेषमभवस्तथा। तथापित्तकफाभ्यांचसन्निपातनचाष्ट मः। नवमोवातरक्तेनदशमोरक्तपित्ततः ६८ श्लेइमरत भवश्चान्योवातपित्तासृगुद्भवः । वातश्लेष्मासृगुत्पन्नःपि त्तश्लेष्मास्त्रसम्भवः । सन्निपातासृगुद्भूतइतिपञ्चदशन पा६९सयोत्रणस्त्वष्टधास्यादवक्लप्तविलम्बिनौछिन्न भिन्नप्रचलिताघृष्टविद्धनिपातिताः७० कोष्टमेदोद्विधानो क्तश्छिन्नान्त्रोनिःसृतान्त्रिकः।अस्थिभङ्गोष्टधाप्रोक्तोभग्न निस में दाह, वर, खुजली और विविध उपद्रवहीं तो त्रिदोपविधी जानौ पूण कहे पिटका फोडा सो पंद्रह प्रकारके हैं ॥६६॥ तिनमें भी चारभेद हैं प्रागंतुक, देहज, शुद्ध, दुष्ट तिसकी संरया वातज, पित्त, कफज, रक्तज ॥६७॥ वातन पिन, वातकफज, पिचकफज, सन्निपातज, वातरक्तन, रक्तपित्तन॥६॥कफ रक्तन, वातपित्तरराज, वातकफरक्तज,पित्तकफरक्तज,सन्निपातरक्तज (अधास्य लक्षणम् ) जो चोट चपेट लगने से पकै फूटै उसे आगंतुक खूण कहते हैं वाता दिकके कोपसे हो उसे देहज कहते हैं जो जीभ के रंगहो छोटा या बड़ा चिकना पीड़ान कर न प फूट न कड़ाहो यह शुद्धणहै जो दुर्गध युक्त हमेशह ऊपर कठोर भीतर पुलपुला उसे दुष्टत्रण कहते हैं ।। ६६ ॥ सोचूण कहे यागंतुकबूण सो आठ प्रकारकाई अवलम, दिलंपिन दिन्न भिन्न प्रचलित पृष्ट विद्धानिपातित (अथास्य सामान्यलक्षणम् ) नानामकारके जो अस्त्र हैं तिनकी धारसे कटे या मुद्गरादिकी चोटसे घायहो या चुटइल रक्त जमके पकै फ्टै उसे पागंतुकवूण कहते हैं ॥७०॥ कोष्टमेद कहे उदरतत लगना दो भांतिका है एक दिनांक दूसरा निम्मृतांतक पेट में छत लगने से ग्रांत कटियो वाहन निकर सो छिनांत्रक है और जो बाहर निकरि परे वा बिनाटे बाहर निकर तिसे निःसृतांत्रक कहते हैं अस्थिभंग कहे हाड़ टूटना सो पाठ भातिका है भग्नपृष्ठ, विदारित, विवर्तित चिश्लिष्ट, तिर्यक, अधोगत, अर्धगत, संघिभंग ( अथास्य लक्षणम् ) नो हाड़ से हाड़ रगड़ खाय संधि पर सूजनहो पीड़ा करे तो भग्नपृष्ठ है जो संधि अध्याय ७] भापाटीकासमेता। ५३ एष्टविदारिते । विवर्तिश्चविश्लिष्टश्चतिर्यकक्षिप्तस्त्व धोगतः।ऊर्ध्वगस्सन्धिभङ्गश्चवह्निदग्धश्चतुर्विधः७१प्लु टोतिदग्धोदुर्दग्धःसम्यग्दग्धःप्रकीर्तितः.७२ नाड्याप चसमाख्यातायातपित्तकःस्त्रिधा। त्रिदोषैरपिशल्येनत थाप्टोस्युर्भगन्दराः ७३ शतपोनरतुपवनादुष्टग्रीवश्चपि ततः। परिस्रावीकफाज्ञेयजुर्वातकफोनचः ७४ परि क्षेपीमरुत्पित्तादर्शोजःकफपित्ततः। आगन्तुजातश्चोन्मा गीशङ्खावर्तस्त्रिदोपतः७५ मेट्रेपञ्चोपदंशारस्युर्वातपित्त चर्म फटिक हाइ निकर तो विदारित है जो हाड़ पैटने में यथा स्थान न ठे ऊपर नीचे होजाय उसे विवर्तित कहते हैं जो हाई हटनेसे सन्धि दीली पै सूजन परिकै पीड़ाकर तो विस्लिट जानौ हाड सरकना कहे हाड़की और पलट जाना उसे तिर्यक् कहते हैं जो हार अपने ठौरसे नीचेको सरक जाय तो अधोगत कहि- ये जो ऊपर को सरकै तो उर्ध्वगत कहते हैं जो हाड टूट जाय उसे संधिभंग क- हते हैं ॥ ७१ । यद्विदग्ध चार प्रकार का है पुष्ट, अतिदग्ध, दुर्दग्ध, सम्पन्दप ४ ( अस्यलक्षणम् ) जो अग्नि स्पर्श से त्वचा का रंग पलट जाय उसे प्नष्ट कहते हैं जो चर्मजरिक मास, नस व हाड़ टेरिसपरे तो अतिदग्ध है जो देह जरि साल उलट जाय दाह युक्त पीडाकर तो दुर्दग्ध है जो सब देह जरि लुथाठ समान होजाइ उसे सम्यग्दग्य कहते हैं ॥७२॥ नाहीयण, पांच प्रकारका है वातनाड़ी, पित्तनाडी, कफनाड़ी, बिटोपनाड़ी, सन्निपातनाड़ी, ( अथास्य लक्षणम् ) पतसंबन्धी सूजन पफी चा कच्ची को धोने और शुद्ध न होइ वा क्षतके अंततक थाती न जाइ तो बहुत पीड़ा कर धार दिल समान चमड़ेपर दीरी और भीतर नाड़ी कहे पुंगली सा सीमा या टेवा । लंपा हो और पीर देवारहै पसे नाहीव्रए नासूर कहते हैं शल्य एक प्रकारकाई शल्य कटे शाल जो कील कांटा कांच चुभिक रदिजाय तो मांस पाटामा उसे शल्य नाहीत्रण कहते हैं ।। ७३ ।। भगंदर भाउ प्रकारका साथ ने रबरन वित्तसे उध्दव कफसे परिवावी वातकफ से मुह ।।७४ ॥ऽर- क्षेपी कफपित्त से अर्शोज धागंतु से उन्मागी विदोपमे शवमायावत्र क्षणम् ) गुढाके चारोंऔर दो अंगुलवक जो फोडा पानी के भीतर ताई छिट पर जाइ उसे भगंदर कहते हैं एक तहकन्दामा .
५४ शाईपरसंहिता । [मयमखण्ड कफेस्त्रिधासिन्निपातेनरक्ताचमेदेशकामयास्तथा ७६ च तुर्विशतिराख्यातालिङ्गार्शोग्रथितंतथा। निवृत्तमवमन्थ श्चमृदितशतपोनकः ७६ अप्ठीलिकासर्पपिकात्वक्पाक श्चावपाटिका । मांसपाकस्पर्शहानिनिरुद्धमणिरुदतः ७८ मांसावुदंपुष्करिकासम्मःपिटकालजी। रक्ताबुदेवि द्रधिश्चकुम्भिकातिलकालकः। निरुद्धःप्रकशःप्रोक्तस्तथै वपरिवर्तिका ७६ कुष्ठान्यष्टदशोक्तानि वाताकापालिकंभ वेत्।पित्तेनोदुम्बरंप्रोक्तं कफान्मण्डल चचिके८० मरुत्पि मलमाताहै भगंदर एक भातिहो अनेकभाति पकिफुष्टि के रद्दाकरताहै ॥ ७५ ॥ इन्द्रिय में पंच प्रकार का उपदेश होता है जिसे गरमी कद्दत चातसे, पिचसे, कफसे, प्रिदोपसे, रक्त से (अथास्य लक्षणम् ) डैटी में क्षवलगै या बड़ेहाथ से या रोम टूटने से व रजस्वला प्रसंगसे होता है यह निदानका मत बुद्धि से यह समझपड़ता है कि यह रोग दुष्टयोनि के संयोगसे प्रथम डंडीमें याव परिक धीरे २ सर शरीर में घार परजाते हैं ॥७६ ॥ इन्द्रियमें शूकमरोग चौमास भातिकर भी होता है यह अतिविपयाकांक्षी पुरुप स्थूलकरने को विपादि तीन औषध लगाते हैं तौ वालसमान सन्म समान सफेद किरौनासा होता है उसे शुक कहते हैं इसीके ये चौबीस भेद है लिंगार्थ ? ग्रथित २ निष्टत्त भित्रमेय मुदित ५ शतपोनक ६ ॥ ७७ ॥ अष्टोलिका ७ सर्पपिका : वपाक अब- पाटिका मासपाक ११ स्पर्शहानि २ निरुद्धमणि १३ ॥७८ ॥ मांसावंद १४ पुष्फरिका १५ संयूपिटका १६मलजी १७रक्ताबुंदर पिद्रवियर भिका २० तिलकालक २१ निरद्ध ०२ प्रकश २३ परिवर्तिक २४ ( अथास्यक्ष णम् ) ये सयरोग इन्द्रिय पर होते हैं सो जुद्ररोग गिनेजाते है और मौर नि. चानमें कहते हैं कि ये रोग इन्द्रिय के मुग्यपर होते हैं मांसदिय कुंदरकी तरह हो जाता है उत्त में फुसी होती हैं और भार भी अनेकमकारके उपद्रर संयुक्त होते है || ७६ । कुष्ठरोगमारह प्रकारका प्रथम वात जन्य कापालिक (लक्षणम् ) कृष्णरंग वा रक्तरंग माटी के खपरेकीनाई रुवा खतरा चमडा पतला हो तो का- पालिक कहते हैं दूसरा औदुम्बर गलरतुल्प दाहपीडा सुजलीयुक्तहो वह नौदुम्बर कुछ कहाताहै जो कुष्ठ सफेद चिकना चकत्तासाहो वह तीसरा कफजन्य मंडल- कुरद जो पाई में काली कालीसी पिटकाहोंके फटफटक वह खुगली करें वह चौथी अध्याय ७] भापाटीकासमेता। त्ताहक्षजिह्वश्लेष्मवाताद्विपादिकातासिधमैककुष्ठंचकि टिभंचालसंतथा ८१ कफपित्तात्पुनर्दद्रुःपामाविस्फोटकंत था।महाकुष्ठंचचर्मदलंपुण्डरीकंशतारुकम् २ त्रिदोषैः काकणंज्ञेयंतथान्यच्छित्रसंज्ञकम् ।तचवातेनपित्तेनश्ले ज्मणाचत्रिधाभवेत८३ क्षुद्ररोगाःषष्टिसंख्यास्तेष्वादोश कराव॒दम् । इन्द्रद्धापनसिकाविरतान्धालजीतथा ८४ विचर्चिका है ॥४०॥जो लालहो वीचमें काला पीडायुक्त व रीछकीसी जीभ सो वातपित्तजन्य क्षजिकुष्ट पांचवां है जो गोड़के चन्द्र में पकिकै घाव पर या हाथकी हथेली में हो वह विपादिका छठयां कुष्ठ है जो सफेद ललाई लिये हो चमड़ा पतलाहो और उसमें फ्टसा झरै वह सातवां सिध्मष्ठ है या छाती में होता है उसे सिहुवां कहते हैं कफ पित्त से उत्पन्नहै जो घार होके काला परजाय यह कफबात जन्य है पाठयां मिटिभकुष्ठ है और जो लाल लाल पिटका हो खुनगाय यह अलत्तयष्ठ नववा है ॥८॥जो श्याम चमड़ा होकै चिकना और नन्ही पिटका संयुक्तहो और खुजलाय वद दशमां दकष्ट है उसे दाद भी कहते हैं जो देह में छोटी बड़ी पिटका पकिकै पटै समाय एक अच्छी न हो और निकल बह ग्यारहवां पायाकृष्ठ है और खुजली भी कहते हैं टेंट में हो टी कहते है कफ पित्त के जोर से सब देह लाल होके छोटी डोदी पिटका सब देह फोरिक छालेकी नाई निकलें उसे विस्फोटक बारहवां कुष्ट कहते हैं उसीको शीतला भी कहते हैं जो कष्ट शरीर की त्वचा को हाथी की खाल समान करदे और पसीना , न निकर वह तेरहवां महाअष्ट है उसे चर्मकुट ओर गजचर्म भी कहते हैं जो कप लाल होकै पिराय सजुवाय के पिटकासा होजाय उसे चौदहवां कुष्ठ चर्मदल कहते हैं जो कष्ट कमलपत्र सम ऊंचा शरीरपर देख पर वह पुण्डरीक पन्द्रहवां कुट है जो कुछ छोटा फोडा होकै बहुत छेद परजायें वह शतारुक सोना कुष्ट है ।। ८२॥ जो पकिक घाव काला होजाय अतिपीड़ा कर से च पर कहते हैं यह सत्रहवां निदोपजनित असाव्य है अठारहवां रिवत्रकुटनोपन्देन पटै सो निदोष से तीनिमारका स्वित्रकुष्ठ होता है जिसके हो उसे कोड़ी पहते हैं वायु से रूता और लाल चकचासा होता है पिच मे तात्रवर्ष दाहसहित चिकना होता है कफसे सफेट चकत्ता सपन कोर होताह यह सेत मुष्ट है ।। ३ ॥ चा हुद्ररोग साठि मार के हैं सरावद १ इन्वृद्धा २ पनसिका ३ विकृता ।
शायरसंहिता। [प्रयमखएट वाराहदंष्ट्रोवल्मीकंकच्छपीतिलकालकः । गर्दभीरकस चैवयवप्रख्याविदारिका ८५ कन्दरोमसकश्चैवनौलिका जालगर्दभः । ईरिवल्लीजन्तुमणिगुदभ्रंशोग्निरोहिणी ८६ सन्निरुद्धगुदःकोठःकुनखोनुशयीतथा । पद्मिनी कण्टकाश्चिप्यमलसोमुखदृषिका ८७कक्षारपणकच्छुश्च गन्धाःपाषाणगर्दभः । राजिकाचतथाव्यङ्गश्चतुर्धापरि कीर्तितः ८८ वातात्पित्ताकफाद्रक्तादित्युक्तंव्यङ्गलक्षण म् । विस्फोटाक्षुद्ररोगेषुतेष्टधापरिकीर्तिताः ८६ पृथग्दो पैस्त्रयोहन्द्वैस्त्रिविधस्सप्तमोसृजः । अष्टमःसन्निपातेनक्षु द्रुक्षुमसूरिका ६० चतुर्दशप्रकारेणत्रिभिर्दोषैस्त्रिधाच सा। इन्द्रजात्रिविधाप्रोल्लासन्निपातेननप्तमा ६१ अष्ट मीत्वग्गताञयानवमीरत जामता । दशमीमांसजाख्या अंगालनी ५॥४॥ वाराहदष्टा ६ वल्मीक ७ कच्छपी तिलकालक गर्दभी १० रकसा ११ यत्रमख्या १२ विदारिका १३ ॥ ५ ॥ कन्दर १४ मसक १५ नीलिका ६ भालगर्दभ १७ ईरिवेली ८ जंतुमणि १६ गुदभ्रंश अग्निरोहिणी २२ ॥८६॥ सन्निरुद्धगुद २० कोट २३ कुनख २४ अनुगयी २५ पमिनीकंटक २६ चिप्य २७ बलम २८ मुखपिका २६ ॥ ८७॥ कता ३० सुपणकन्तु ३१ गंध ३२ पाषाणगर्दभ रानिका ३४ व्यंग कहे पागके चारि भेद हैं । गावातज पिचन काजरतन ३८ विस्फोटक पाठमारका है परन्तु मुद्र रेखाकी गिनती में है वातविस्फोटक, पिचविस्फोटक, कफरिसोटक, वातपित्त विस्फोटक, नफपिचविस्फोटक, वातकफविस्फोटक, रक्तविस्फोटक, सनिपान विस्फोटकमरिकारोगमी चद्रमंशा है तिस के चौदहभेद ॥ ॥ वातम त्रिका, पित्तमरिका, फममरिका,पातपिचमरिका कफपित्तममूरिका, रावक- फमसूरिका, निढोपममूरिका ॥ ३१ ॥ त्वचामरिका, मासमरिका इस से परे चार प्रतिकठिन है मेदमसरिका, मनाममूरिका, अस्थिमत्रिका, धातु ममरिका (प्रथास्य लक्षण)जो पिटका पकिके गादा या पतला पानीसी है फिरि सूग्वि के वचा कठोरहो फटिके रुधिर पहै उसे शर्कराचुद कहते हैं जो एक फुसी उठे उस - - “५७ अध्याय ७]] भापाटीकासमेता। ताचतस्रोन्याश्चदुस्तरा मेदोस्थिमज्जाशुक्रस्थाःक्षुद्ररो गाइतीरिताः ९२ विसर्परोगानवधावातपित्तकफैस्त्रिधा। के नीचे और छोटी २ यहुत फुसी हो वह इन्द्रराज जो पिटका कान के भीतरह उसे पनसिका कहते हैं जो गूलरसदृश हो घेरा अधिक वदाव दाह विशेष कर उसे विद्वत्ता कहते हैं जिस फोड़ेका मुंह न देख पर अति ऊंचा अधिक र वाधे वह अंधालनी है जो शरीर में गाठि सी कठिन उभर बूढ़े दांतके रंगपीरहो ख. जुयाय वह वराहदंप्टा है जो पिटका तुल्लासी होके बीच में साली हो किनारे मुँह करिके वहै वह वल्मीक है जो पिटका बहुत कड़ी कटोरी की पेंदी समानही उस टिकाको फछपिया कहते हैं जो देह में तिल समान हो देह से ऊंचा न हो पीड़ा न कर उसे तिलकालक कहते हैं जो वटिया सम ऊंचीहो लालरंग उसमें और पिटका निकल पीड़ा करै वह गर्दभिका है जो फूल के पके फूटै नहीं सडरी हो दह रकसाई जी यव समान हो तो यवमख्या है जो कांख या छाती या अंड. सन्धि में पताल में कोटा सी हो वह विदारिका है जो हाय पाय में कांटी लगिक उसी ठौर गाठि परिरहिजाय उसे कदर कहते हे गुग्गुरूहै जो देहमें वरद सदृश नि- कलिके रहिजाय पीड़ा न करै उसे मसक कहिये मस्साहै जो देहमें अनायास खाल काली पड़जाय उभरे नहीं और कोई विकार न कर उसे नालिका कहते हैं लह- मुनहै जो देह में सूजन होइके टेदी मैदी लम्मी सर्पाकार लिके नस नाल परि जाइ और साजहो अज्ञाय उसे जालगर्दभ कहते हैं जो वटियासी होतही अति पीड़ा उत्पन्न कर उसे वलिका कहते हैं जो देहमें देहके रंग ऊचाहो पीड़ान कर और जन्मतेहो उसे जन्नुमणि कहते है और प्राचार्य चिह कहते हैं जिसके मलत्याग स. ,मय कांच निकल श्रावै उसे गुदभ्रंश कहते है कांख कहे वगल में मास में जाला समान होके फोड़ा होताहै अन्सह होके ज्वर श्राताहै सो दश पांच दिनमें म- मुप्पको मारडालताद वह भग्निरोहिणी है जिस रोग में मलमार्ग की घाईनस रक्तको कोपकरिके मोटी परिक मलमार्गको संकीर्ण करतो मल गादा और मोरा बहुत केश में गिर यह सनिरुद्ध गुद है कफ पित्त और रक्त के कोपकारकै लाल लाल चकत्ता शरीर में पड़ते हैं बहुत सरी करते हैं तण में होइ क्षण में मिटै इसे रक्तपित्ती कहते हैं नख लगिके देहमें नकोरोजाइ उसे कुनख कहते हैं जो पाय छोटी पिटका होके पके फूटै सूजन हो सो अनुशयी है जो पीली बटियां हो खजुभाइ उसमें कांटा समान हो वह पद्मिनीकण्टकहै जो अगियायके झलका परै अथवा न तत्पकै फूटै उसके चेपलगे से उत्पन्न हो या यानादिक की प -- ८ शाघासंहिता । [प्रथमसापड त्रिधाचहन्दभेदेन सन्निपातेनसप्तमः । अष्टमोवह्निदाहेन नवमश्चाभिघातजः ९३ तथैकःश्लेष्मपित्ताभ्यामुदईःप रिकीर्तितः।वातपित्तेनचैकस्तुशीतपित्तामयःस्टतः९४ अम्लपित्तंत्रिधाप्रोक्तं वातेनश्लेष्मणातथा । वृत्तीयंश्ले लगे पकनाय उसे चिष्य कहते हैं जो पैर या हायके गावाते पानी या खराव की. पड़ या कोई विप या कोई विपमिश्रित माटी या विपपर सीट जन्दुके स्थानकी माटी या भल्लातादि रततरेकी माटी सहिके स्पर्श से सटिजाय और बहुत खजुरी कर उसे अलस कहते हैं खरवाहें और जो जठानीमें मुसपर काट काटेसे बहुत होजाते हैं जोवने से खरखराते हैं और गड़ते हैं वह मुखपिकाई लोग उसे हासा कहते हैं जो बगल में छोटी २ फुन्सिया परजाती है उसे कक्षा कहतेह जो गण्डकोशकी जड़पर छोटी २ पिटका हो वह गर्दभ है जो शरीर में राई के समान फुन्सियां परजाय उसे राजिका कहते हैं कुदैया कहते हैं वायु पित्त पितहो मुँह परजाइ.चमड़ाकालाकर थोर पतलाकर उसे व्यग कहे झाई है और माउ विस्फो. एक शीतला के भेदमें हैं सो क्षुद्ररोग की गनती में हैं और चौदह, मसूरिकाये भी शीतला के भेद है क्षुद्रगनी है ।। 8२ ॥ विसर्परोग के नवभेद हे वानपिसर्प, पिच विसर्प, कफविसर्प, वातपित्तवि०, कफवातवि०, कफपित्तवि०, सनिपातवि०, ग्निदग्धवि०,ताड़नावि० (अथास्य लक्षणम्) जिसमें वातज्वरके लक्षण कंप विषम घेगादिक दोकै सूजनहो और चमकशूल कोचनहो सो बातविसर्प है जिसमें कफज्वरके लक्षणहों और सूजन दाहयुक्त लाल रंगहो पइपित्त विसर्प है जिसमें कफवरके लक्षणों और चिकनीझेसनुमाय सो कफरिसर्प है और वंदन में जिनदोदोके लक्षण मिलैं सोई द्वन्दनविसर्प जातौ जिसमें तीनों दोपके लक्षण, हो यह सन्निपातविसर्प है जो विसर्प भागिले जलनेसे हो उसके पिचविसर्प के लक्षण होते हैं वह रविदाहविमर्प है जो घावलगे से हो वह अभिघात विसर्प है ॥१३॥ श्लेष्मायु कारकै उदर्दरोग होता है और वातपित्त करिकै शीतपित्त रोग होताहै कफवायुके कोपकरिकै शरीरमें लाल छोटे बड़े चकत्ते पड़ते हैं और बहुत सजुलातेह उसे उर्द कहते हैं जो वातपिचके कोपकरिके होतात्तीपीड़ा अधिक खान कम करता है उसे शीतपित्त कहते हैं औरचर उबकाई और दादलक्षणश्रादित गुक्तहोते हैं यह दोनों एकही भेदम ॥धाअम्लपिचरोगके तीन भेद पित्तम कफन अम्त पिन और कफवातन अम्लपित्त ये विरुद्धभोजन १५ " - अध्याय ७] भापाटीकासमेता। एमवाताभ्यांवातरक्तंतथाष्टधा ६५ वाताधिक्येनपित्ताच कफादोपत्रयेणचारक्ताधिक्येनदोषाणांद्वन्द्वेनत्रिविधःस्म तः६६अशीतिर्वातजारोगा कथ्यन्तेमुनिभाषिताः।आक्षे पकोहनुस्तम्भऊरुस्तम्भशिरोग्रहः९७वाह्यायामोन्तरा यामः पाचशूलङ्कटिग्रहः । दण्डापतानकः खल्लीजिह्वा स्तम्भस्तथादितः ९८ पक्षाघातःकोटुशीर्षामन्यास्तम्भ श्चपङ्गता कलायखञ्जतातूनीप्रतितूनीचखजेता पादहोगशीच विश्वाचीचापवाहकः । अपतानोवा यामो वातकण्ठोपतन्त्रका १०० अङ्गभेदोङ्गशोषश्च मिन्मिनत्वचगद्गदः । प्रत्यष्ठीलाऽष्ठीलिकाचवामनत्व ञ्चकुजता १ अङ्गपीडाङ्गशूलञ्च सङ्कोचस्तम्भरू क्षताः । अङ्गभङ्गोगविभ्रंशो विड्यहोवद्धविटकता २ मुकत्वमतिजृम्भास्यादत्युद्गारोन्त्रकूजनम् । वातप्रट भोजन करने से होते या वासी और जल अन्नके भोजन करनेसे पित्त कुपित- होके खट्टीडकार लाता है और बाहारका परिपाक अच्छीतरह नहीं होता उसे अम्लपित्त कहते है ।। ६५॥ौर वात पित्त पाठ प्रकारका जिस बात रक्तमें घायु विशेष है वह यातनवातरक्त है जिसमें पित्त थधिकहै वह पित्तज वातरक्त है और जिसमें कफ अधिक है वह कफन वातरक्तहै जो तीनों दोपके लक्षणों तो निदोपन वातरक्त है जिसमें रक्त अधिकहो वह राजवातरक्त है और तीनिदेव में जो दोप मिश्रितहो सो जानिये वातपिचज वातकफज कफपित्तज ये थाटम- कारको यातरक्त है ।।६६ ॥रातरोग अस्सीमकारके पिलॉग कहिगये हैं माले- पक, धनुस्तंभ, शिरोग्रह ।। ६७ ।। याद्यायाम, अन्तरायाम, पाचशूल, कटिग्रह- दडापतानक, सनी, जिल्हास्तंभ, अर्दित ॥ ६॥ पक्षाघात,क्रोप्दुशिरम,मन्या- स्तंभ, पंगुता, कलायखेजता, सूनी, मतितूनी, संजता ॥६६॥ पादर्प, गृध्रसी, विश्वाची अपवाहुक, अपतान, धरणायाम, वातकपद, अपतंत्र ।। १०० ॥ अंग- मेद, अंगशोप, मिनिमन, कृष्णवा, प्रत्यष्ठीला, थष्ठीलिका, वामनत्व,कूषड॥१॥ अगपीडा, अंगशल, सकोच, स्तमा रुक्षता, अनार, अगाविधेश, विग्रह, नद्ध- .
शाईघरसंहिता। [प्रथमला त्तिःस्फुरणं शिराणाम्पूरणन्तथा ३ कम्पःकायश्यावता च प्रलापःक्षिप्रमूत्रता। निद्रानाशः स्वेदनागो दुर्बलत्वं वलक्षयः ४ अतिप्रत्तिःशुक्रत्य कायनाशश्चरेतसः। अनवस्थितचित्तत्वं काठिन्यंविरसास्यता। कषायवक्त ताध्मानं प्रत्याध्मानंचशीतता ५ रोमहर्षश्चभीरुत्वं तोदकण्डूरसाज्ञता । शब्दाज्ञताप्रसुप्तिश्चगन्धाज्ञत्वं दशाक्षयः६॥ इति वातजरोगगणना ॥ अथ पित्तम वारोगाश्चत्वारिंशदिहोदिताः । धूमोद्गारोविदाहःस्या दुष्णाङ्गत्वमतिभ्रमम् ७ कान्तिहानिःकण्ठशोषोमुख विठकता ।। २ ॥ मूवत्वअतिर्जुमा, मत्युद्गार, अत्रकूजना यातमवृत्तिस्फुरण, शिरापूरण ॥ ३ ॥ कंप,कार्य,श्यावता,मलाप,तिमात्र,निद्रानाश,स्वेदनाश, दुर्य- लत्व,पलक्षयाशक्राभिवृत्ति शुक्रकार्य,शुक्रनाश,मनरस्थित,चिचकाटिन्य, विरसास्यता, फपायवकृत, मामान, मत्याःमान, शीतवा ॥५॥ रोमहर्प, भीर त्व, तोद,कड्, रसाइता, शब्दालता, ममुप्ति, गंधाज्ञत्व, दृशःक्षय ॥६॥(अस्य लक्षणम् ) जिस वायुमै हाथीके सवारकीनाई वारदार झूमै वह भाक्षेपकहै । जिसमें ठोदीभकहकै मुख खुलारहै वह नुस्तंभ है जिसमें क्लेकी नसें जकह के निर्यलहों चल न सके वह उरुस्ततम ३ ३ जो माथेकी शिराकहे नसें निस्तेज हो मस्तक में पीड़ार है वह शिरोग्रह है मसाध्य है ४ पीठ उभरक जो मनुष्य पन्याकार होजाय वह बाधायाम है ५ जो छाती ऊची होके धन्वाकार होजाय वह अन्तरायाम है ६ जो पसुरी में पीड़ाकर वह पारशूल है ७ जो कमर जकड़ जाय वह कटिग्रह है जो देह दंडाकार होजाय वह दंडापतानकडे ह जिस वाधु में पाव या गप घुटना नितम्म से और कमर में अधिक पीड़ाहो वह सल्ली है १० जो वायु जीभकी नस्ता न ले भोजन मुंह में कठिनता से लियाजावे वह मिहास्तभ ई ११ जो वायु साधा मुंहको फेरदे माया कम्मै जीभ से वोला न जाय हि तिरछी होजाय वह अर्दित है १२ जो आपाङ्ग निर्बल होजाय उसे पक्षरमात (अपांग) कहते हैं १३.जो गोड की दिहुनी सूजजाय स्यार वैसा महो उसे फोटुशी सियार मुंड पहते हैं १४ जिस में घीच तन नाइ मस्तकात उत्त न इलै यह मन्यास्तम्भ है १५ जो वायुफूलेकी मोटीनसोंको मानिले पाव को ६.१ अध्याय भाषार्टीकासमेता। फैलने सिमुहने नदे वह पंगु है १६ जो वायु मनुष्य के शरीर की चाल खेजरीट की नाई करदे चलने में की पांच इधर उधर पर वह कलयासंन है १७ जो वायु गुद और इन्द्रि में चिलक उत्पन्न कर वह तूनी है १६ जो गुंद लिंग में चिलंक उत्पन्न करिके सूत्र मलाशयताईनुभै सो मतितूनी है १६ जिसमें पंगुवायुके लक्षण हों पर एकैपांव लंगड़ा कर यह सजे है २० जो पैर में झुंझनी करै यह पादहर्ष है २१ जिसमें पीठ, कमर, कूजा, नूतर जांघ, पैरइन में पठने बैठने में नेशहो तो गृध्रसी है नो वायुहाथ और कानकी नसे तानके हाथ ऊपर न उठने दे यह विश्वाची है.२३ जिस में याह तनिजाद वह बाहुक है २४ जो वायु हृदय में प्रवेशंकार ज्ञानको नष्ट कर राष्टिरों के कण्ठे शब्द दिलणकरै कभी सावधान कभी अचेतर ह स्थिरचित न रह वह अंपतानकई २५ जो वायु चोट लगिक धाव और पीड़ा कर वह पूणा- याम है २६ जिसमें चलने के अम से या ऊँचे नी पर पैर या टेदापरने से वायु घुटनों में उतरिको सूजन और पीड़ा उसनकर वह पातकटक है २७ जो वायुं कर्य गतिहोकै इदय, मस्तक, कन्धा देई में पीड़ा कर और धनुप के आकार करिकै हरिको रोकै कबूतर की माई बोले मोह में पढ़ें वह अपतन्त्र है २८ जो सब शरीर में पीड़ा फरतो अंगभेदं है.२६ सशरीरकोशोपैसो अंगशाप? ३० जो मिनमिनायके बोले वह मिनिमनत्व है ३१ जिसमें कराठे से स्पष्टशब्द न कदै वह कृप्यता हरेजी नाभि के नीचे ऊंचा पत्थरसा करदे और मल मूत्र निरोध करि पेट में गॉठि गांठिसी परिक मंद २ पीड़ा करै वह अष्ठालिका है ३३ जो अष्टीलिका की नाई गांति टेदी संधी लंबीही अधिक पीड़ादे उसे प्रत्यष्ठीलिकाजानोजो पेट में गांदि गांडिसी सरिकै मंद २पीडाकर यह मष्टीलिका है ३४ जो वायु गर्भाशय में मवेशक रिगर्भ फो संकुचित करें तो वालक छोटा उत्पन्नहो पद पावन है ३५ जो वायु दुष्टदों छाती पीठको संकुचित करें वह कुब्ज है ३६ जिसमें सब अंग में पीड़ाहो वह अंग- पीड़ाई ३७ जिसमें शरीर चिपे सूजासा गरे वह अंगशूल है ३६ जो सर्वांग कों संकुचित करै वह संकोच है ३६ जो देह को तीणकर वह स्तब्ध है १० जो दो में रुपाई कर वह रूत है ४१ जिसे कभी कोई भंग शिथिलहों कभी कोई या अंगभंग है४२ जो देह को काष्ठवंत्मचेतकरै वहभंगविभ्रंश है ४३ जो मल निरोध करि भच्छी तरह न गिरनेदे विग्रह है ४४ जो पकाशयमें मलखिडे और भिन मित्र पिडिसेकर वह घद्ध विदकताई ४५ को वायु शब्द निरोधकर वह मक कहें गंग है ४६ जो अतिजभुमाई-लायै वह प्रतिसम्भहै.४७ जिसमें अधिक टकार भई वह मत्युगार है ४८ जो बापु थांतमें प्रवेशकरि बोले बा मंत्रमन । जो प्रतिहत्सर्गकर अर्यात् गुदासे अधिक निकर जद्द वात्मवृत्तिह ५० जो शरीर नहार
शाईपरसंहिता। [प्रथमखण्ड
शोपोल्पशुक्रती = तिक्तास्यताम्लवक्तत्वस्वेदलावो
पाकता । मोहरितवर्णत्वमप्तिः पीतकायता ९
रक्तस्रावोगदरणलोहगन्धास्यतातथा। दौर्गन्ध्यंपीतमूत्र
त्वमरतिःपीतचिटकता १० पीतावलोकनंपीतनेत्रता
पीतदन्तता । शीतेच्छापीतनखता तेजोद्वेषोल्पनिद्रता
११ कोपश्चगात्रसादश्चभिन्नविट्कत्वमन्धता । उष्णो
फरके वह स्फुरणहै ५१ जो जहा तहा नसाको फुला वह शिरापूरण है ५२
जो सब देह कैंपावै वह कंपवायुहै ५३ जो शरीरको दुईल करै वह कार्य है ५४
जो शरीरको कृष्णकरै बद्द श्यायतादै ५५ जिसे मानुप असंभवोले यह मलापद
५६ जो मूत्र पारवार आतुरता से हो तो तिमन है ५७ जिसमें नींद नभाचद नि-
द्रानाशह ५ जो पसीना निकर वह वेदनाश ५६ जो शरीरको दुबलाकर दए
दुर्वलत्युहै,६० जो वायु शुक्र में परेशारि फारिक उदा बद शुझातिप्रति है
६१ जो वलको घटावै वह बल तय है ६२ जो घानुको किंचिक्षीणकर वह शुमा-
कार्य है जो चिचको स्वस्थ न रक्सै वह अनरस्थिवचित्य है ६३ जपानुको
अतिक्षीण कर नौ शुक्रनाशद २४ जो देहको कदोरखरै पद काठिन्य ६५ जि-
समें नीमका स्वाद न मिलै वह विरसास्यहै ६६ जो जीम ऐंठनय वचन न कहि
सकै वह वायुकपाय वक्रता ६७ जो वायु पकाशय में जाय पेटफुलाय गुहगुहार
बद्द आमान है ६८ जो वायु भाशय में जाइ कफ से मिलि पेटफुलाय पीडाकरे
यह अत्यामान है ६६ जो शरीर को दंडारा वह शीवताहे ७० जिसमें वारवार
रोमाचद्दो वह रोमहर्षणहै ७१,जो भय उत्पत्ति चारै, वह भीरुल ७२ जो देह में
मुईसी चुभै यह बोदह ७३ जो सान उत्पन्न करै वह केंदूहै ७४ जिससे मधुरादिक
रसका साद न मिले वह रसालता है ७५ जिससे कान से सुननपरै वह शब्दा.
झता है ७६ जिसमें सवार हाथधरे समुझारै सो प्रसुति है ७७ जिसमें गन्ध
शान न हो वह गन्धाता है ७८ जिस में दृष्टि से सूझ नहीं यद दश क्षय
७६ और पिचानित चालीसरोग हैं धूपोद्गार, विदाह, उप्णाग, मविभ्रम ।।
७॥ कातिहानि, कंठशोप,युसशोप,अल्पशुक्रत्व ॥ ८॥ वित्तास्यता,अम्लवझा
स्पेदलाया घरापाककरम, हरितवर्णत्व,अप्ति,पीतकाय ॥ ६ ॥ रक्तस्राव,थंग.
दरण,लोहगंधास्य, दार्गध्य, पीतमूत्रता मरति,पीतविकता ॥१०॥ पीतांवली.
कन,पीतनेतागीतदंतता, शीतेच्दा, पीतनखता, तेजोदेपायल्पनिद्रवा ॥१॥
, २ अध्याय ७ भापाटीकासमेता। च्छासत्वमुष्णत्वंमूत्रस्यचमलस्यच : १२ तमसोदर्श नंपीतमण्डलानांचदर्शनम् । निःसरत्वञ्चपित्तस्यच त्वारिंशद्रुजेरमता १३॥ इति पित्तंजरोगगणना के फस्यविंशतिःप्रोक्ता रोगास्तन्द्रातिनिंद्रता । गौरव कोप, गात्रसाद, भिन्ननिंदकता, अंधता, उपयोच्यासत्व, उप्णयूमता, उष्णम: लता॥ १२॥ तमोदर्शन, पीतमंडलदर्शन, निम्सरत्व चालीसरोग पित्तसंभव है। १३॥ (अस्य लक्षणम्) जिसे पित्तकोपसे धुयाँसी डकारथा वह धूमोद्गारहै जो यतिदाह कर यह विदाह २ जो देह गरम रहै वह उष्णाग है जो चुदि स्थिर न रदै कभी कुछ समझे कभी कुछ न समझे वह मतिभ्रम है, ४ जो बेष्टा मलिन करै वह कान्तिहानि है ५ जो कण्ठ च मुख सुखा वह करतशोप व मुख- शोप है ६ जो शुक्रतीण करै स्वीमसंग में विना शुक्रगत शिथिल होजाय वह अल्पशुक्र है ७ जो मुख कडुवार है वह तिक्तास्त है - जो मुख खट्टारदे तो अम्न. वक है ६ जो पसीना अधिक यापै वह दस्ताव है १० जो पित्त से अंग पकाता है वह अंगपाक है ११ जो ग्लानिसे अनेकपदार्थ ग्रहणकरते झझक वह कमहे १२ जिसमें देह हरितहो वह हरितवर्णत्व है १३ देह पीली परजाय वह पीतकायता है १४ जिसे पिच के कोपसे भोजन करनेसे तृप्ति न होइ यह प्रवृत्ति है १५ जिर्स में गुखादि मार्ग से रक्त गिरै बद्द रक्तस्राव है १६ जो शरीर में त्वचा घटकनाय यह अंगदरण है १७ जो लोहा सिने सेवा लोहा सहाय कसीस बने तिन कोसी बात भावै वह लोहगंयास्प है .१जो देह में दुधि था वह दौनपी है १६ जिसमें गा पीला आवै सो नई २० जिस से सर्व पदार्य में चिंच ने चले वह परति है २१ जिसके मल पीला आवै वह पीतविदकत्व है २२ जिसमें सर पदार्थ पीले देस पड़ें वह पीतारलोक है २३ जिससे आरिख पीली पड़नायं वह पीतने।है २४ जो दांत पीले होजायें यह पीतदन्त है २५ जो ठंढी चीजपर इच्छा चले यह शीतेच्छा है २६ जो पीले नाव होजायें तो पीतनख २७ जो से. जोमय चीज देखि अच्छी न लगे यह ते मोद्वैप है २८ जो निद्रा कम भाव वह असनिद्रा है २६ जो कोष अधिकहो वह कोष है ३० जो देह पीड़ित करै वह गात्रसाद है ३१ जो मल फटकै फुटकीसा हो वह भिन्नविश्क है जो इंष्टि नाराकर वह अन्धता है १३ नो उप्यश्वास भावे सो उष्णोच्छ्वास है। ३४ जो मून मत्युषण हो वह उष्णमूल है ३५ जो मल अत्युष्ण गिर तो उगमल. . , शाईपरसंहिता। [प्रथमसरा खमाधुर्य मुखलेपःप्रसेकता १४ श्वेतावलोकनंश्वेत विट्कत्वंश्वेतमूत्रता । श्वेताङ्गवर्णताशैत्यमुष्णेच्छात्ति क्तकामिता १५मलाधिक्यञ्चशुक्रस्य वाहुल्यंबहुमूत्रता। श्रालस्यंमन्दबुद्धित्वंतृप्तिधुर्घरवाक्यता । अचैतन्यश्च गदिताविंशतिःश्लेष्मजागदाः १६॥इति कफजरोगगण ना॥ रक्तस्यचदशप्रोक्ताव्याधयस्तस्यगौरवम्। रक्तमण्ड लतारक्तनेत्रत्वरक्तमूत्रता १७ रक्तनिष्ठीवनारक्तपिट कानाञ्चदर्शनम् । औपण्यञ्चपूतिगन्धित्वं पीडापा कश्चजायते १८ चतुस्सप्ततिसयातामुखरोगास्तथो दितः। तेष्वोष्ठरोगागणिता एकादशमिताबुधैः । वात त्व है ३६ जो उमेरे में अंधेरा जानपरे वह तमादर्शन है २७ जो देह में पीलेर गैर और देख परे वह पीतमण्डल है ३८ जो देसने में पृथ्वीपर कहीं कहीं पीले पे से-देसपर यह पीतमण्डलदर्शन है ३६ जो पिन मुख से वा मलमार्ग से गिरै वह निस्सरत्व है ४० और श्रीसरोग कफसंभव है तन्द्रा, भतिनिद्रा, गौरव, मुखमाधुर्य, मुखलेप, मसेक ॥ १४ ॥ चेतावलोकन, श्वेतविकत्व, श्वेतांगव- णेता, उष्णेच्छा, तितकामिता ॥ १५॥ मलाधिक्य, शुक्रबाहुल्य, बहुमूनता, पालस्य, मंदबुधित्व, तृप्ति, पुरवाक्यता, भचैतन्य ये चीस प्रकार के कफरोग? (अस्पलक्षणम् ) जिसमें प्राखें झपीरहें निद्रा न परै वतन्द्रा है जो निद्रा विरोपहों तो अतिनिद्रा है जो शरीर भारीरहै वह गौरवई जो मुख में गुहकास्वाद बनारद वह मुखमाधुर्य जो मुखमें लसलसाहटहो तो मुखलेप जो लार गिराकर ती पसेक है जो सर्वत्र रखेत देखपरै तौ श्वेतावनोकनहै जोश्येत मलगिरती स्वतः विदकत्व है जो भून श्वेतहो तो श्वेत मत्र है जो शरीर श्वेत हो तो श्वेत मार्गवर्णत्व है,जो देहही पनीरहै तौ शैल्पताहै जो उष्णपदार्थपर इच्छारहै तो उपोच्या मो कटुपदार्थपर चिचचलै तौभालस्य ई मंदबुद्धि होजाय ती मदबुदिई समाहार से तमिहीनी होती जो बोलने में गला घराय तौ चुर्धरयाक्यद मंद चेतनाहो तो अर्थतन्पहै ।।३६॥रकविकारसे दशभांति के रोगई गौरव, रक्कमंडल, रक्तनेत्रका रक्तमता ॥ १७॥ रक्तष्ठीपन, रक्तपिटकादर्शन, उष्णत्व, पूतिगन्धित्व, पीड़ा, पाक दरारोग रकान्य हैं इनके नामही सरश लक्षण हैं ॥ १८॥ भर मुख को .
। . अध्याय ७] भापाटीकासमेता। पित्तकफेस्नेधात्रिदोपैरसृजस्तथा १६ वर्तमांसार्बुदञ्चै च खण्डौष्ठश्चगलार्वदम् । मेदोर्युदञ्चार्बुद्रञ्च रोगाए कादशोष्ठजाः २० दन्तरोगादशाख्याता दालन:कृमिद न्तकः। दन्तहर्पःकरालश्चदन्तचालश्चशर्करा २१ अ धिदन्तः श्यावदन्तो दन्तभेदःकपालिका । तथात्रयोद शमितादन्तमूलामयाःस्मृताः २२ शीतादोपकुशौहौतु दन्तचिद्रधिपुप्पुटौ । अधिमांसोविदर्भश्च महासौषिर चौहत्तर रोग है सो कहता हूं तिसमें ग्यारह गोष्ठरोग पण्डित करते हैं वात से, पित्तसे, कफसे, त्रिदोपसे, रक्तसे ॥१९॥ तवज मांसाधूद, सण्डौ, जला- धुंद, मेढोर्बुद, अर्बुद ये ग्यारह प्रोष्टरोग हैं जो श्रोष्ठ कठोर हो काला परजाइ गांठि परै पीडाकर सन फूटै फटे या साल उखड़े तो वातज है जो छोटी फु. सियां पर पीटा दाइहो पीली पैर पकजा तो पित्तज है जो थोष्ठ शेत कटुक पीडायुक्त पिटका हो ठण्डे रहें तो कफन है जो प्राट पिटका पीड़ा सहित हों कभी श्वेत कमी काला पालाहो सो त्रिदोपज है जो पोष्ठ सजूर फलके रंग हो फुन्सीयुक्त रक्त यह मास की गुत्थी निकसै प्रोष्ट में कृमि उत्पन्न हों यह (क्त न पोष्ट है जर प्रोष्ठ में शत लगे से खजुआय पकै घार पर यह क्षत है. पांस दुष्ट होके मोठ मोटाहो व मासपिंडसा हो सो मांसाहुंद है जिस में भौष्ठ फटके बहै वह सएटौष्ठ है जो मांसपिण्ड सा मोटाहो पानीसा यहै सो जला- धुंद है जो पोष्ट श्वेतर है श्वेत पानी बहै सो मेदोर्बुद है पोष्ठ में फकत गाडि परिजाय वह अर्बुद है ॥ २०॥ अथ दश दन्तरोग कहते हैं दालन, हमिदन्त, दन्तहर्ष,कराल दन्तचाल, शर्करा ॥ २१ ॥अधिदन्त, श्यावदन्त दन्तभेद और कपालिका ये दश दन्तरोग हैं (अस्य लक्षणम्) जो दन्तटीसें सोदालनहै जो दांत वृमि परनेसे काले होजाय पीड़ा करें सो कृमिदन्त है जो उल्टा पानीदांत में लगेसो दन्तहर्प है जो दात टेदे पबुरे होजाये तो कराल है जो दांत इलैं तो देतचाल है जो दांत में मैल जमके खरसराहट हो सो शर्करा है जो दन्न के तरे दूसरा दांत जमके पीड़ा करे वह अभिदन्त है पितकोप से दांत काला नीला होजाय वह श्याघदत है जो दांत इलके पीड़ा करे और हटके बाहर घटिया सी पडजाय वह दांत भेट है जो दांनसे परत उराड़ें वह कालिका है दंतमूलरोग दांतकी जड़में तेरह तरह का होता है ॥ २२ ॥ तिन तेरह के शाईपरसंहिता [ मधमखरं खमाधुर्य्य मुखलेपःप्रसेकता १४ श्वेतावलोकनंश्वेत. विट्कत्वंश्वेतमूत्रता । श्वेताङ्गवर्णताशैत्यमुष्णेच्छाति क्लकामिता १५मलाधिक्यञ्च शुक्रस्य वाहुल्यंबहुमूत्रता। आलस्यंमन्दबुद्धित्वंतृप्तिघुर्घरवाक्यता । अचैतन्यञ्च गदिताविंशतिःश्लेष्मजांगदाः १६॥इति कंफजरोगगण नारतस्यचदशप्रोक्ताव्याधयस्तस्यगौरवम्। रक्तमण्ड लतारक्तनेत्रत्वरक्तमूत्रता १७ रक्तनिष्ठीवनारक्तपिट कानाश्चदर्शनम् । औष्ण्यञ्चपतिगन्धित्वं पीडापा कईचजायते १८ चतुस्सप्ततिसख्यातामुखरोगास्तथो दितः । तेष्वोष्टरोगागणिता एकादशमितावुधैः । वात स्व है.२६ मो उमेरे में अंधेरा जानपरे वह तमादर्शन है ३७ जो देह में पीलेरा और गैर देख परे वह पीतमण्डल है जो देखने में पृथ्वीपर कहीं कहीं पीले पापे से-देखपरै-यह पीतमपटलदर्शन है.२६ जो पित्त मुस से चामलमार्ग से गिरे वह निस्सरत्य है ४० और वीसरोग कफसंभव है तन्द्रा, भतिनिद्रा, गौरव, मुस्खमाधुर्य, युखलेप, मसेक ॥ १४ ॥ श्वेताबलोकन, श्वेतविकत्व, श्वेतांगव- योता, अप्णेच्दा, तितकामिता ॥ १५॥ मलाधिक्य, शुक्रबाहुल्य, बहुसूत्रता, मालस्य, मंदबुधित्व, तमि, धुश्रवाक्यता, मचैतन्य ये वीस मकार के कफरोग है . (अस्पलक्षणम् ) जिसमें भावं झीरई निद्रा न पर बहतन्द्रा है जो निद्रा. विरोपहो सौ मतिनिद्रा है जो शरीर भारीरहै वह गौरव है जो मुख में गुड़कास्वाद नारहै वह गुखमाधुर्य जो मुखमै लसलसाहटहो तौ मुखलेप जो लार गिराकरें तो. प्रोक है जो सर्वत्र श्वेत- देसपर तो श्वेतावलोकनहै मोश्चेत मलगिरती श्वत विदकत्व है जो पूत्र श्येत हो ता-श्वेत सूत्र है जो शरीर श्वेतहो तो श्वेत मार्गवर्णव जो देह दी यनीरहै तो शैत्यता है जो उष्णपदार्थपर इच्छारहै तौ उप्पोच्छा है जो कटुपदार्थपर पिंचपलेतीमालस्य है भदबुद्धि होगाय ती मंदबुदिदै सदमाहार से तृप्तिहो नौ मुसिद जो बोलने में गला घरायती सुपरवाक्य मंद चेतनाहो ही अर्थतन्यरे ।।१६॥ रक्तविकारसे दशभांति के रोगई गौरव, रकमंडल, रक्तनेत्रता रक्तप्पता-१७॥ रक्तष्टीवन, रक्तपिट कादर्शन, उपत्र पूनिगन्धित्व, पीड़ा, पारु दशरोग रक्तजन्य हैं इनके नामही सरश लक्षण हैं।। १८॥ अव मुखके जो २५ । प - . पर अध्याय ७] भापारीकासमेता। पित्तकफैलेधात्रिदोपैरसृजस्तथा १६ आतंमांसावुदञ्चै व खण्डौष्ठश्चगलार्वदम् । मेदोर्बुदञ्चार्बुदञ्च रोगाए कादशोष्ठजाः २० दन्तरोगादशाख्याता दालन:कृमिद न्तकः दन्तहर्पःकरालश्चदन्तचालश्चशर्करा २१ अ धिदन्तः श्यावदन्तो दन्तभेदःकपालिका । तथात्रयोद शमितादन्तमूलामयाःस्मृताः २२ शीतादोपकुशौहौतु दन्तविधिपुप्पुटौ । अधिमांसोविदर्भश्च महासौपिर चौहत्तर रोग है सो कहता हूं तिसमें ग्यारह पोष्टरोग पण्डित करते हैं वात से, पित्तसे, कफसे, विदोपसे, रक्तसे ।। २६ ॥ ततज मांसार्बुद, सण्टौठ, जला- धुंद, मेदोद, अर्बुद ये ग्यारह श्रोष्टरोग हैं जो पोष्ठ कठोर हो काला परजाइ गांति परै पीडाकर सन फूटै फटै या साल उस ती पातन है जो छोटी फु. सियां पर पीढ़ा दाइको पीली परै पकनायें तो पित्तन है जो प्रोछ श्वेत कछुक पीडायुक्त पिटका दो ठपढे रहें तो कफन है जो पाउ पिटका पीडा सहित हों कभी श्वेत कमी काला पीलाहो सो निदोपज है जो श्रोध सजूर फलके रंग हो फुन्सीयुक्त रक्त यदै मांसकी गुत्थी निकसै श्रोष्ट में कृमि उत्पन्न हों यह रक्तन भोष्ठ है जन प्रोष्ठ में तत लगे से खजुत्राय पकै घार पर यह क्षत है मांस दुष्टहोके ओष्ठ मोटाहो व मांसपिठसा हो सो मांसाईद है जिस में मोष्ठ 'फटके बह वह सण्डौंठ है जो मांसपिण्ड सा मोटाहो पानीसा चहै सो जला- बुंद है जो पोष्ट श्वेतरहै श्वेत पानी व सो मेदोर्बुद है मोष्ठ में फकत गाठि परिजाय वह अर्बुद है ॥ २०॥ अथ दश दन्तरोग कहते हैं दालन, ऋमिदन्त, दन्तहर्प,कराल दन्तचाल, शर्करा ॥ २१ ॥ अघिदन्त, श्यावदन्त दन्तभेद और कपालिका ये दश दन्तरोग हैं (अस्य लक्षणम्) जो दन्तटीसैं सोदालन है जो दांत कृमि परनेसे काले होजाय पीड़ा करें सो कृमिदन्त है जो ठण्डा पानीदांत में लगे सो दन्तहर्ष है जो दात टे२ वकुरे होजायें तो कराल है जो दांत इलैं तो दतंचाल है जो दांत में मैल जमके खरखराहट हो सो शर्करा है जो दन्त के तरे दूसरा दांत जमके पीड़ा करे वह अधिदन्त है पित्तकोप से दांत काला नीला होजाय वह श्याबंदत है जो दांत इलके पीड़ा करे और हटके बाहर बटिया सी पड़गाय बह दांत भेद है जो दांतसे परत उराड़ें वह कालिका हे दंतमूलरोग दांतकी जड़में तेरह तरह का होता है ॥ २२ ॥ तिन तेरह के ६ शाईपरसंहिता [प्रथमखएड सौपिरो २३ तथैवगतयःपञ्च वातात्पित्तात्कफादपि । सशिपातागतिश्चान्यारक्तनाडीचपञ्चमी २४. तथाजि ह्वामयाःषट्स्युतिपित्तकफैत्रिधा। अलंसश्चचतुर्थःस्या दधिजितश्चपञ्चमः । षष्ठश्चैवोपजिह्वःस्यात्तथाष्टौता लुजोगदाः २५ अर्बुदन्तालंपिटकाकच्छपीतालुसंह 'तिः। गलशुण्डीतालुशोषस्तालुपाकश्यपुप्पुटः २६ गल नाम शीताद, उपकुश, दंतचिधि,पुष्पुट, अधिमांस,विदर्भ, महासौपिर सीपिर ।। २३ ॥ इसमें वातादि दोपसे दंतनाड़ीरोग पांच मकारकाई वात नाड़ी, पित्तनाड़ी, कफनाड़ी, सन्निपातनाही,रपतनाही.ये तेरह देतमूल रोग..(अथास्यलक्षणम्) जो मसूदा फटि जाय रक्तदे तो शीतादई जो मसढ़ा में दाहहोय पके दांत हने पीड़ा कमदो रक्त वहै फूल मुखमें दुर्गंध आवै वह उपकुश है जो मसूहा बाहर. पा भीतर सूनै पिराय रुधिर पीवदेइ सो दैनचिदधि है जो दो तीनदांत का.म. सूड़ा विशेष फूलै वह पुप्पुट है जो चौहडके मसूदा में पीड़ा अधिकहो वह अ.. धिमांस है जो मसूदा दान गिराने के लिये दांत रगड़ाकर चायण उत्पन्नकर या सूजन विशेप उत्वका कर दांत हिलावै वह विदर्भहै जिस मसूदा में दांत हिलें और तालू फटिंजाय और मम्दा गलिजाय वह महासौपिर है जो मसूदा पिराय के सूने लार बहावै ,चा. सौपिर है जो ममदा में फोड़ाहोके पकै पटै और पोलापर. दुर्गन्ध भावै लांची नाडीसी दायने में समुझपर वह नाही-इस नाड़ी में जिसदोपका अधिकार जानिपड़े वह वही नाड़ो. जानिये.॥ २४ ॥ अब जिंहारोग कहते हैं जीमा में छम्मकारके रोग घातजन्य, पित्तंज, कफज,अलस, अधिजिद, उपनिहं ये छग्नाम हैं (अधास्य लक्षणम्) जो जीभ फटिक मधुरादि पदरा का स्वादु परिज्ञान न होय जैसे मारवाड़देश में जिया क्ष सरसराय तो वातजह.जो जीभ लाल बापीली परजाय दाहकर कांटेयरै,सो.पित्तज है जो जीभ में कारेरकांटेसे उठे और मोटेहो और श्वेतजीभहो तौ कफज हैं जो जीभ अपनीजड़ की योरखिचिनाइ और सूजन अधिक हो और जड़यकि जाइतौथलस है जो जीभकी नाकसम सूजन नीम होइ पकि कै यहै तौ अधिनि असाध्यहै जो जीभकी नोकसी सूजन नरहो और लालहो खजुमाय उसे उपजिह जानो॥२५॥(अयोष्ट प्रकार तालरोग.) अर्बुद तान्नुपिटका, कच्चनी,तांनुसंइति, गलशुटी तान्नुशोप तानु- पाक,पुष्पुट( अस्यलक्षणम्) तालुके मध्य कमलाकुरसमान उत्तनहो और c .
-- अध्याय ७] भाषाकासमेता। रोगास्तथाख्याताअष्टादशमिताबुधैः । वातरोहिणिको पूर्वद्वितीयापित्तरोहिणी २७ कफरोहिणिकाप्रोक्तात्रिदो पैरपिरोहिणी मेदोरोहिणिकाटन्दोगलाघोगलविद्रधिः। स्वरहातुण्डिकेरीचशतघ्नीतालुकोवुदम् २८ गिलायुर्वल यश्चापि वाताद्गण्डःकफात्तथा । मेदोगण्डस्तथैवस्यादि त्यष्टदिशकण्ठजाः २९ मुखान्तःसम्भवारोगाच्यष्टौख्या तामहर्षिभिामुखपाकोभवेद्वातापित्तात्तहत्कफादपि३० रक्ताचसन्निपाताञ्चपूत्यास्योर्ध्वगुदावपि । अर्बुदंचेतिमुख जाश्चतुस्सप्ततिरामयाः३१ कर्णरोगास्समाख्याताअष्टा कार्बुदके लक्षण मिलें सो तानुभवुद जो तनिके मूझ रकविकार सम पीडादाई हो सो पिटकाहै जो कटुचा कीसी पीउ सूजयाचे पीडा थोड़ीहो सो कच्चपिका है जो तालूके वीचमें लंबी सूजनहो पीडाकरै सो तालुसंहतिहै जो तानकी जड लम्बी मोटी सूजजाय वह गलशुंडी है लो तालू फूटै फटै सो तालु शोप है जो फिजाइ सो तालुपार है जो झरवरी के समान प्रौरे परिजाइ और मेदकेगाश्रित हो सो पुप्पुटहै ॥ २६ ॥ ( अथाष्टप्रकार कण्ठरोग)वातरोहिणी पितरो- हिणी ॥ २७॥ कफरोहिणी, त्रिदोपरोहिणी, छंद, गलौघ, गलविद्रधी, स्वरदा, नुण्डिकरी, शतनी, तालुक, अर्वद ।। २८ ॥ गिलायु वलय,वातगण्ड, कफगरड और मेदोगण्ड ये अठारह प्रकारके कण्ठज रोगहैं (अथास्य लक्षणम् ) जीभ की जड़के पास चने सम छोटीहो गलेके मार्गको रोषकर इसमें त्रिदोष वा मेद जिसका विशेष लक्षण मिले वही रोहिणी जानौ पांच रोहिणी तेरह मौरहे सो बहुतभाति गलेके भीतर क्षत गाठि सूजन होकै कंठरोप परि पीडा करते नौर तीनि गण्ड ऊपर होते हैं जिसे घेघा कहते हैं सो तीनों दोष मे हो किनकी लक्षण मिले वही प्रधान जानो प्रयगौरव होने के कारण इस पनी तिला २६॥ मुसके अन्त में बाउ मकारके रोग ये सर मिलिक मुसके भीतर चोइ- पर भांतिक रोगई बातमुघाक, पिच पास करमुग्यपार, स्त्र पाक, सनिपातमुखपाक, दुर्गन्न, उर्ध्वगुद और भर्बुद ये भाउ मुख मेड । (अधात्य लक्षणम् ) मुग्मके भीतर चारों ओर फुन्सी होय हिरे उन जिस दोपके लक्षण पाये जायें वही मुखपाक जानौ गुल्में पोहा दुध आ सो दुर्गधास्यहै मुखके भीतर फोडा होके घिर जय तोमर शापरसंहिता। [भयमसरा दशमितावुधैः । वातापित्तात्कफाद्रक्तात्सन्निपाताचवि द्रधिः। शोथोर्बुदपूतिकर्णः कर्णाशःकर्णहल्लिका ३२ वा धिय॑तन्त्रिकाकण्डःशष्कुलीकृमिकर्णकः। कर्णनादःप्रती नाहइत्यष्टादशकर्णजाः ३३ कर्णपालीसमुद्भूतारोगाःस तइहोदिताः। उत्पातःपालिशोषश्वविदारीदुःखबर्द्धनः।। की गाठि उत्पन्न होके दीवाकर वह भद है ॥ ३१ ॥ या कर्णरोग मगरह मवारके हैं वातज, पित्तन, कफज, रतन, विद्रधि ॥३२॥ कर्णशेय, अर्बुद प्रति फर्ण, कर्णाश, कर्णहालकागाधिर्य, तंत्रिका,कएदू, शकुली छमिकर्णक, कर्ण. नाद, प्रतीत है ये अठारह नाम कानरोग के हैं ( अथास्य लक्षणम् ) कान में शब्द उठै पीडाहो और मल मुखिकै पानी यहै नो वातई जो लाल सूजनहोके फटै दुर्गन्ध आवै और वहै वह पित्तकर्णरोग है जो मजनहो गुजाय और मद चिकनासा वहै कममुनै पीड़ाकर सो कफन कर्णरोगहै जिसमें कुछ पित्त के लक्षण मिलें यह रक्तन कर्णरोग है जो तीनों दोपके लक्षण पाये जाय वह सभिपात कर्णरोगह कानमें घाव या विद्रधि होके वा फोडा होकै पीर पा रक्त बहै सो क. विद्रधि है जो कानमें मजनहो तो कर्णशोय है जो कानमें गिलटी सी होके पिराय तो कर्णावुद है जो दुर्गन्धित पीय यई तो पुतिकर्ण है जो चनेको बेटी सीहो खजुभाइ दाह पीढ़ाकर तो कर्णाशे है जो कान में कोई जंतु मवेशकर उसके चलने से विकल होती है स्थिर रहनेसे स्वस्थ रहती है इसे कर्णहल्लिका रहते हैं जो मुनि न परै तौ वाधिर्य है जो कानमें पीन शब्दसा भनभनाहटहो तौ तन्त्रिक जो कान खत्रुयाइ और कर्णमल सम्बनाइ सो गुत्थी है पिटकाहो वह सोश- एकुली है प्रधान्तर में कर्णताव कहते हैं जो कानमें कीला परजाइ सोमिकर्ण है जो भेरि मृदंगादि कासा शब्द परित रहै तो करीनाद है जो कर्णमल गलिकै यदै सौ प्रतिनाह है उसे भरधाशीशी भी कहते हैं॥३३॥कणेपाली रोग सातमकार का है उत्तराती, शोपाली, विदारी, दुश्वार्द्धन, परियोट, लेही, पिपली (अथास्य लक्षणम् ) फर्णरंधके ऊपर जो गर्याशार परदा है उसे पाली कहते हैं उसे भारी भाभषण पहिरने से वा खमुत्राने से वा दपनाने से कालपर पकै दाह पीड़ाकर फिर स्नकै लाल होनाइ सो उत्पातहै जो पाली मुखिकै छोटी परिजाइ तो शोपपाली है जो पाली फटिकै समाइ सो विदारी है जो कान की नस दिदजाइ का विरीत खेद हो तो चिद बदनमें सूनै जलन हा पके सो दुभारद्धन है जो गहना पहिरने उतारने से ट्रनै कालापन पके अध्याय ७] भापाटीकासेमता। परिपोटश्चलेहीचपिप्पलीचेतिसंस्मृताः ३४ कर्णमूला मयाःपञ्चवातापित्तात्कफादपि।सन्निपाताचरक्ताचतथा नासाभवागदाः ३५ अष्टादशैवसङ्ख्याता प्रतिश्याया स्तुतेष्वपिावातात्पित्तात्कफाद्रक्तात्सन्निपातेनपञ्चमः।आ पीनसःपूतिनासोनासाभ्रिंशःनवः । नासानाहःपूतिर क्तमवुदंदुष्टपीनसम् । नासाशोषोघाणपाकापुटनावश्च दीप्तकः ३६ तथादशशिरोरोगावातेनाविभेदकः। शिर सो परिपोट है जो पाली में नन्हीं २ फुसी हो खजुयाय जलन हो सो लेही है जो पाली में वेदनारहित सूजनहो स्तब्धहो सो पिप्पली है ग्रंथांतर में उन्मथ नाम है ॥ ३४ ॥ कर्णमूल पंचमकार के है वातज, पित्तन, कफन, निदोपज, रक्तन (अथास्य लक्षणम् ) कानको जड़ के नीचे सूजनको कर्णमूल कहते हैं वातसेपीड़ा पित्तसेदाह कफसे साज निदोप से तीनों लक्षण रक्तसे लालदाह संयुक्त ॥३५॥ नाकमें अठारह प्रकार के रोग हैं उनमें पांच प्रतिश्याय हैं वातप्रतिश्याय, पित्तप्रतिश्याय, कफप्रतिश्याय, रक्तप्रतिश्याय, सन्निपातपति- स्याय, पीनस, पूतिनास, नासार्श, भ्रंश व नासानाह, पूतिरक्त, अर्बुद, दुष्ट पीनस, नासाशोप, घाएपाक, पूयस्राव, दीप्तक ये अठारह प्रकार हैं (अथास्य लक्षणम् ) प्रतिश्याय कहे नाक बहना नाकबन्द होके फिर कुछ पानी वहै कण्ठ तालु अोठ सूसगाद कनपटी में पीडाहो सो पातपतिश्याय है जो काला पीला पानी यहै सो पित्तमतिश्यायहै जो कफसा श्वेतपानी बहै माथा जकदारहै सो कफ । प्रतिश्याय है जो रक्त बहै नेत्रलाल हो तो वायुपद्रवी रक्तप्रतिश्यायहै जो तीनों दोप मिल तो सन्निपातमतिश्यायहै जो नाक मुखिक चली उखड मुर्गम दुर्गधज्ञान परश्यासपूरिसी श्रावै तौ पीनस है जो नाक चा मुरासे दुर्गध श्रावै तौ पूतिनास है जो मांसकी फुटको उठायै तौ नासार्श है नाकड़ा भी कहते हैं जो प्रथम कफ सूर्यास्त से अनायास गिरे तो भ्रंशधु है जो छौंफ अधिक पौ तौ चव है जो सासाररोध हो तो नासानाह है जो अभिवात से रक्त वा पीर वहै तो पूतिरक्त है जो नाकके भीतर युटियासी परिनाय तो अर्बुद है जो पीनस से अधिक कष्ट देह तौ दुष्ट पीनस है इसे पीनस भी कहते हैं जो कष्ट करि सींचने से श्वासावे जाय तो नासायास है जो नाक फुटिक ऊपर से पीर बहै तो प्राणपाक है जो नाक से पीर का कनकी वह सो पुटलावहै जो नाक में दाहोके देह संचालन , १ ७० 4 (शाईघरसंहिता। [प्रथमसएट स्तापश्चवातेनपित्तात्पीडाहतीयका ३७ चतुर्थीकफजा पीडारक्तजासन्निपातजा। सूर्यावर्ताच्छिरःपाकास्कृमिभिः शङ्खनच ३८ तथाकपालरोगाःस्युर्नवतेषपशीर्षकम् । अलंपिकाविद्रधिश्चदारुणंपिटकाव॒दम् । इन्द्रलुप्तञ्च खालित्यंपलितंचेतितेनव ३६ तथानेत्रभवाः ख्याता तौ दीसकदै ॥ ३६॥ मायेके दश प्रकारके रोग अर्भावभेद, वातजशिरोभिताप, पित्तनशिरोभिताप ॥ ३७॥ कफजशिरोभिताप, रक्तशिरोभिताप, सनिमशिरो. भिताप, सूर्यावर्तशिरोमिताप, शिरमाक, कृमिजशिरोभिताप, शङक ये दश रोग है जो वायु निज कोप वा कफकी सहायतासे अर्द्धपस्तकमें निरोधकर व चिलक फुदारके प्रहार सम उत्पन्न होतीहो व उसी कनपटीमें कान ने ललाट में अधिक पीडा करती है व ांस भी लाल होती है सो भविभेदक है उसे आराशीशी भी कहते हैं नो रातिको व्यया बदै यह बातजशिरोभिताप है जो मस्तक श्रारासा विरै नाकसे श्वास घुग्रांसीकदै रातिको ठंडकर है सो पित्तजहै जो माथा भारी हो उँध जाय मुँहपर भरभराहट हो सो कफनहै जो पित्तलक्षणयुक्त माया अति उष्ण रहै हाय से छुआ न जाय सो रक्तनशिरोभिताप है जो तीनों दोष पाये जायें जो सनिपात शिरोभिताप है जो सूर्योदय से भौह और आरिस में पीडा बढ़ती जाय और दुपहर से दिन उतरते उतरतीजाय सो सूर्यावर्त ई जो माथे का रुधिर वा चरबी तय होजाय व चौक बहुत श्रावै पीडाकर सो शिरपाक है जो मस्तक में कृमिपर व भालासा कोंचे मायेकी मग्ना चरलेये व कनपटी में प्रति पीडा व सूजन हो तो पित्तायु रक्तकोप से शसक होताहै सो विपसदृश माया गलानिरोधकरि तीनदिन में प्राण हरलेताहै इसमें वैद्य तीन दिन बीतजाने पर चिकित्सा करते हैं।॥३॥अथ कपालरोग)नचमकारहै उपशीर्षक अरूपिका, विनी, दारुण, पिटका, अर्बुद, इन्दन्नुस, सालित्य, पलित ये नवरोग हैं (अ थास्यलक्षपम् ) वातादि दोप कोपकार कपालमें सूजन उत्पन्न कर जो दोप- धिकहो वही उपशीर्षकहै जो कृमि करिकै बहुत छिद्रहो यह सो अलंपिकाई जो मस्तक में ग्रन्थि परिकै पिराय सो विद्रधिहै जो माया रूसाहो भूसी जमैं और सन. आय सो दारुणहै इसे रूसी भी कहते हैं जो माधे में बटिया सदृश ऊंचीहोय बह पिटकाई जो पीडा संयुक्तहो व मस्तक में गांटिसी होकै पीडा करै तौ अर्बुदहै कफ रक्त कापकारे रोके छेदोंको संघिय गिराय देते हैं सोई इंद्रनुप्तहै और वह भी होना अध्याय ५] भापाटीकासमेता। श्चतुर्नवतिरामयाः । तेषुवम॑गदाःप्रोक्ताश्चतुर्विंशति सङ्ख्यकाः ४० कृच्छोन्मीलःपक्ष्मशातःकफोक्लिष्टश्च लोहितः । अरुग्निमेषःकथित्तो रक्तोदिलष्टः कुकूणकम् ४१ पक्षमाःपक्ष्मरोधश्च पित्तोलिटश्चपोथकी। शिल टवचिवहलः पक्ष्मोत्सङ्गस्तदाधुंदम् ४२ कुम्भिकासि कतावा लगणोजननामिका । कर्दमश्यावयाच विषवमातथालजी ४३ उक्लिष्टवत्र्मेतिगदाः प्रोक्ता वमसमुद्भवाः । नेत्रसन्धिसमुद्भूतानवरोगाः प्रकीर्ति ताः ४४ जलस्रावः कफलावो रक्तस्रावश्चपर्वणी । पूय सावः कृमिग्रन्थिरुपनाहस्तथालजी ४५ पूयालसइति प्रोक्ता रोगानयनसन्धिजाः । तथाशुक्लगतारोगावुधैः प्रोक्तास्त्रयोदश ४६ शिरोल्पातःशिराहर्षःशिराजालश्च शुक्तिका । शुक्लार्मचाधिमांसार्म प्रस्तार्यर्मचपिष्टकः ४७ शिराजापिटकाचैव काग्रथितकोर्जुनः । स्नाय्य र्मचाधिमांसः स्यादितिशुक्लगतागदाः। तथाकृष्णसमु द्भूताःपञ्चरोगाः प्रकीर्तिताः १८ शुद्धशुक्रशिराशुक्षत उसे बादसोरा भी कहते हैं जो माथेके वार गिरकै चिकना होजाय सो खालित्य कहे चाहे जो काल या अकालमें केश श्वेत होजाई सो पलितहै ।। ३६॥नेछ मण्डल में ६४ रोगह उनमें वर्मगद २४॥४०॥ कुच्छामील,पक्ष्मशात,कफो- किट, लोहित, अग्निमेप, रक्तोरिका, कुणक ॥४१॥ पक्ष्माशे, पक्ष्मरोग, पित्तोलिया, पोधकी, श्लिष्टरमा, बहल, पक्ष्योत्संग, अर्बुद ॥ ४२ ॥ कमिका, सिकताम,लगण,अजनुनामिका, कर्दम रयायवमा,विपरी,अनजी ॥ १३ ॥ जस्लिष्टरमा पहरोग वमसमुद्भूत नेत्रकी संधिौ रोगहैं ॥ १४ ॥ जनसाब, कफलाप, रक्तस्राय, पर्वणी, पूयसाप, कृमिपंथि, उपनाह, अलजी ॥ ४५ ॥ पूया- लस ये नयनसंधिजरोग..तथा नेत्रके सफेद भागमें तेरइरोगहैं ॥४६॥ शिरो. सात,शिराहर्प,शिराजाल,शुक्तिक,शफार्म, अधिमांसार्य, प्रस्ता,दिष्टकं ॥ ४७ ॥ शरानापिटका, कफाधितक, शन, स्नायम, अधिमांस ये शुजगतरांगहें नैनकी + ७२ शाधरसंहिता [प्रथमस पड शुक्र तथाजकः । शिरासङ्गश्चसपिप्रोक्ता कृष्णगता गदाः ४९ काचतुषड्विधज्ञयं वातात्पित्ताकफादपिास निपाताच्चरकाचपष्ठसंसर्गसम्भवम् ५० तिमिराणिपडे वस्युर्वातपित्तकफैस्त्रिधा । संसर्गेणचरक्तेन एष्ठस्यात्स निपाततः ५१ लिङ्गनाशः सप्तधास्याद्वातापित्तात्क फेनच । त्रिदोषैरुपसर्गेणरक्तात्संसर्गजस्तथा ५२ श्र प्रधादृष्टिरोगाः स्युस्तेषुपित्तविदग्धकम् । अम्लपित्तं वि दग्धश्च तथैवोष्णविदग्धकम् ५३ नकुलान्ध्यंधूसरान्ध्यं रात्र्यान्ध्यंहस्पष्टिकः । गम्भीरदृष्टिरित्येते रोगादृष्टिग ता स्मृताः ५४ चत्वारश्चाधिमन्थाःस्यर्वातपित्तकफास तः । अभिष्यन्दाश्चचत्वारो रक्तादोस्त्रिभिस्तथा ५५ सर्वाक्षिरोगाश्चाष्टौस्युस्तेषुवातविपर्ययः । अम्लशोफो न्यतोवातस्तथापाकात्ययःस्मृतः ५६ शुष्काक्षिपाकश्च तथा शोफोध्युषितएवच । हताधिमन्थइत्येतेरोगाः सर्वाक्षिसम्भवाः ५७ पुंस्त्वदोषास्तुपञ्चैव प्रोक्तास्तत्रे यक स्मृतः। आसेक्यचैवकुम्भीकस्सुगन्धिःषण्डसज्ज कः५८शुक्रदोपास्तथाष्टौस्युर्वातपित्तकफेनच।कुणपंश्ले काली जगह में रोग हैं ॥ ४५ ॥ शुद्धगुक्र, शिराशुक्र, शतशुक्र, अजक, शिरासंग ये काली पुतलीके रोगहें ॥ १९ ॥ कांच ६ तरहका है वात, पित, कफ, संसर्ग रक्त, सन्निपात ॥ ५० ॥ तिमिर छ: प्रकारकाई वात, पित्त, कफ, संसर्ग, रक्त य सन्निपात से ॥ ५१ ॥ लिंगनाश ७ प्रकारका चात,पिस कफ निदोप, उपसर्ग रखत, ससर्ग से ॥ ५२ ॥ नेत्ररोग ८ प्रकारके है उसमें पित्त- विदग्धक, अम्लपिच, विदग्ध, उपविदग्धक ॥ ५३॥ नकलांव्य, धूसराध्य, राज्यान य, इस्पष्टिक, गम्भीरदृष्टि ये दृष्टिगतरोगहे ॥ ५४ ॥ चार अधिमन्य हैं वात,पित्त,कफ, प्रसन,यमिप्यन्द ४ रक्तसे दाह से ३ ॥५५॥ सर नेनरोग है उसमें वातविपर्यय, अम्लशोफ चात, पाकात्यय।। ५६ ॥ शुष्काक्षपाक, शोफ, अम्लोपित ये अधिमन्यरोग नेन में उत्पन्नहोते हैं ।। ५७ ।। पुस्पदोष पाचही , - अध्याय,७]] भापाटीकोसमेता। प्माताभ्यां पूयाभंश्लेष्मपित्ततः '५९ क्षीणञ्चवात पित्ताभ्यां यन्थिलंश्लेमरक्ततः । मलानांसन्निपाताच्च शुक्रदोषाइतीरिताः६० अथलीरोगनामानि प्रीच्यन्तेपूर्व शास्त्रतः। अष्टावातवदोषस्स्युिर्वातपित्तकफैस्त्रिधा। पूया भंकुणपग्रन्थिक्षीणमलसमन्तथा ६१ तथाचरक्तप्रदरं चतुर्विधमुदाहृतम् । "वातपित्तकफैलेधार्चतुर्थसन्निपात, तः ६२ विशतियोनिरोगा स्युर्वातापित्तात्कफादपि। सः निपाताच्चरक्ताचलोहितक्षयतस्तथा ६३ शुष्काचवामि नीचैवषण्ढीचान्तर्मुखीतथा सूचीमुखीविप्लुताचजात धनीचपरिता ६४ उपलताप्राक्चरणामहायोनिश्चकर्णि- का। स्यानन्दाचातिचरणायोनिरोगाईतीरिताः ६५ चतु विधयोनिकन्द वातपित्तकफैस्त्रिधा । चतुर्थसन्निपातेन तथाष्टोग़र्भजागदाः ६६ उपविष्टकगर्भःस्यात्तथानागो दरःस्मृतः । मकल्लोमूढगर्भश्च विष्टम्भोमूढगर्भजः । जरायुदोषोगर्भस्य पातश्चाष्टमकःस्मृतः ६७पञ्चैवस्त है इर्यक, मासेश्य, बुम्भीक, मुंगन्धि, पण्ड ।। ५% ॥ और शुक्रटोप ८ हैं चात पित्त कफसे कुरणप श्लेम और वातसे पूयाभ, श्लेष्म और पित्तसे॥५६|| क्षीणपात पित्तसे ग्रेथिल, ग्लेष्म और रक्तसे मलों के सन्निपात से ये शुक्रदोष कहै । ६०॥ या स्त्रियों के रोग' कहते हैं - ऋतु से वात, पित्त, कर्फ से ३, मकारके पूया, कुणप, ग्रन्थि, क्षीण तथा मलसम ।। ६१ ॥ रक्तदप्रकार का है वात, पित्त, कफ से तीन प्रकार का चौथा सनिपात से ॥ ६२॥ वीस योनिरोग ई वात, पित्त, कफ, सन्निपात, लोहित नय से ।। ६३ ।। शुष्का,, वामिनी, पगढी, अंतर्मुसी, सूचीमुखी, विप्नुता, जातनी, परिप्लुता ।। ६४ ॥ उपप्लुता, माश्चरणा, महायोनि, कणिका, नन्दा और भतिचरणा ये वीस योनि। रोगहै ॥६५॥ चार मकार का योनिकन्द है वात पित्त कफ से ३ प्रकारका चौथा सनिपात से आठ रोग गम्भज हैं ॥ ६६ ॥ उपविष्टक, नागोदर मकल, महगर्भ, निष्टम्भ, मुदगर्भज, जरायुदोप, पात ये पाठहैं ।। ६७॥ अथ पाच ខុ . गाईघरसंहिता [मियमलग नरोगास्युर्वातापित्तात्कफादपि सन्निपाताक्षताच्चैव. तथास्तन्योद्भवांगदाः६८बालरोगेषुधिती स्त्रीदोषाश्च त्रयःस्मृताः। अदक्षपुरुपोत्पन्नःसपत्नीविहितस्तथा ६९ वाज्जातस्तृतीयस्तु तथायेसूतिकागदाः । ज्वरादयः श्चिकित्स्यास्तेयथादोपयथावलम् ७०. द्वाविंशतिर्वालः रोगास्तेषुक्षीरभवास्त्रयः । वातात्पित्तात्कफाच्चैवदत्तो द्भेदश्चतुर्थकः । दन्तघातोदन्तशब्दोकालदन्तोहिपतन मं७१ मुखपाकोमुखस्रावोगुदपाकोपशीर्षके । पाश्र्वारु. एस्तालुकण्ठोविच्छिन्नंपारिगर्भिकः ७२दौर्बल्यंगात्रशोः मकार स्तनरोग वातज, पिचन, कर्फज, संमिगत जा.तम जैसे ये पांच स्तन रोग :ऐसेही वातादि पांचं रोग दूध उतरने में स्तनरोग वालरोग में कोई दूध, पाली चा विना दूधवाली सीके स्तनमें यातादि दोप कोपरि मांस जो रक्त दूपित करें तो पांच प्रकार के रोग हो वे रक्तज विद्रधि के सर्व लक्षण युक्त होते हैं पतिनमें वायुके ऐसे दोप मति जानना ॥ ६ ॥ स्त्रीके दोष उत्पन्न करनेवाले तीन दोपई: अदक्षपुरुष कई स्त्रीके व्यवहारमें चतुरन होय उसके संताप फरिक जो रोग: उत्पन होय घर मुदक्ष पुरुषोत्तम कहिये जो सवति, की ईपी संताप कारण करके. रोग होप वह पत्नी विहित है जो निज़स्त्री से पुरुष प्रसन्नतासे मत न देय औरही, स्त्रीसे स्नेह रखता होय इस चिन्तासे कशहोवे शरीर जोरोग उत्पन्न होतो वह दैहिक है ॥६६॥ अथ पालांत. रोग जो बालकं होने के अन्तमें रोग उत्पनहोय यह गानांतहै उसीको प्रति भी कहते हैं इसमें ज्वादिक दोपदेखि मौररोग का मैलापल विचारिक चिकित्सा करना जिसमें देह मोड़े ज्वर, प्यास, सूजन, शूल, मतीसारंहो सो असाध्य है जो केवल खाने पीनेसे हुआहै,वह ज्वरादिक विशेष भयङ्करहै जो मकालरोग करिकै गल उत्पन्न करें और रक्त अवरोधनकरि, संपदे शल उत्पन्न करे वह बहुत दुखंदाग्रीहै बह गलनामसे मशाल है|७० प्रय वाईस प्रकारके यालरोग तिनमें तीन रोग माताके स्तनसम्बन्धी है पित्त, कफन ये घसम्बन्धी है. चार रोग दांतनके हैं.दतोद्भेददंतपाल देतशब्द, अकालदत ये ४ दंतरोग है एक पूतना ।। ७१ ॥ मुखपाक मुजनाव: गुदपाक, उपशीपक, पाश्वारुण, ताजुकपट, विच्छिमा पारिगर्भिक ।। ७२ ॥ मा.
, शायरसंहिता गमधमखरोड विशतिःस्मृताः ७३ तथावालग्रहाख्याताद्वादशैवमुनी श्वरैः। स्कन्दग्रहोविशाखःस्यात्खग्रहश्चपिटंग्रहः७४ ने गमेयग्रहस्तहच्छकुनिःशीतपूतनाामुखमण्डेितियातहत्पू पारिगर्भिकके लक्षण हैं.जो शरीर बहुत कृश होनाय सो गात्रंशाप और मुख- भाभी कहते है। इसमें उचकोई और प्रतीसार भी होता है जो बालक, प्रशानहाँके सति च दिनको विद्यौना में मत सो शय्यास्त्र हे दुःदोपस योलक को पास- की पलकपर साजहों के आखित पानी बहतारहे और वलिक.अखि नाक म: स्त सतार जारेमें मांखि नहीं सोले तो उसे कुकरणक कहते हैं जो बालक विशेपरो उसका कम वद रोवना देखिके अनुमान करिके रोग जाननी वह रोदन कर्फे कोप से चालक के शरीर में मंगासी पिड़की है शरीरके रंगम मिल रहती ह पीड़ा नहीं करती एकस एक मिल के रहती है वो अजगैली है सीधा- लक शिंपर्क होता है जवान के कम होताहै ॥ ७३ और बारह प्रकारके बाल ग्रह रोगहें स्कंदग्रह, विशाखाग्रह, खग्रह, पितृग्रह ॥ ७॥ नगमेय, शनि, शीन. पूतना, मुखमहितिका, पूतनी, अधपूतना, रेवती और शुकरेयती ये वारहे प्रकार (अस्प सामान्यलक्षणम्) स्कंददि द्वादग्रस्त बालक, अनायास चौ. कता है कि मैंटता है बोर्ड दोत चाता है 'मुख से फैन गिरता है. सोता नहीं हाय पाव सूज जाते हैं मल पतला अच्छीतरह घोलता नहीं देहमें मबलीके रक्त कोसी व प्रातीहै. ध नहीं पीता सर्व ग्रहों के सामान्य लक्षण जो बालक फुर 'कांप ऑखि देहसे पानी है.चा एकै अंग को ऊपरको देव दात चाय मुंह टेली चनी दूध न पिये कुछ रोब वह स्कन्दग्रह है जिस ग्रहमें बालकको घर और अर्वदृष्टिदो यह विशाखाग्रह है इसके विशेष लक्षण बालतेत्र में हैं जिस ग्रहम पालक बेहोश होजाय मुंहसे पनागर ज्वरादिक उपद्रयहाँ रोपे अधिक देह में रक्त. पीवकी गंध भाव उसे संग्रह कहते हैं ग्रेयांतर में स्कंन्दीपस्मार कहते हैं अग्निवी- चादि पितरों करि पीड़ित बालकको ज्वरादिक उपद्रव होते है यह पिग्रहह नेग- मेपग्रह पीड़ित बालक तिसे उबकाई, कुछ कप,कंग्मुखोपे,पी देईमें दुर्गंध,ऊ- दृष्टि,दांत चबाना वह नगर्भयहे नो पालक अंगालतहो व भयङ्कररूप लक्षण। उचकताहों देहद पक्षीकीसी गंधयाध बीस विराय उयकाई यतीसार देवी दुर्गंध. यह शीतपूतना है जिस पालक का मुख प्रतंत्रहो शरीरकी नस देखि श्रधिक: साथ में और भूत्र दुर्गन्ध भायै वह मुवहितिका है.जिस वानकको ज्वर वीरि,पियास, ऊधिरोन, निद्राहीना विहलता वह पूतना है जो बालक त्रास ३ अध्याप भापाटीकासमेता। तनाचन्धिपूतना ७५ रेवतीचैवसङ्ख्याततिथास्याच्छु करेवती । तथाचरण दास्तुवातरक्तादिकाश्चये। हिच त्वारिंशदुक्तास्तेरोगेष्वेवमुनीश्वरैः ७६.हिपंष्टिर्दोष दारस्युस्सन्निपातादिकाश्चये। तेपिरोगेपुगणिताप्टथ किमोक्तान तेक्वचित् ७७, हीनमिथ्यातियोगानां भेदैःप चदशोदिताः। पञ्चकर्मभवारोगास्तेषुरोगेपुसज्जिताः स्नेहस्वेतश्राधमोगपडूपोजनतर्पणे-। अष्टादशेत जाःपीडास्ताश्चरोगेपुलक्षिता:७९ शीतोपद्वएफास्या ज्वर पियास देदम मेदगन्यरुदन विशप दुध नहीये मन अधिकगिरे यधपूतना 'जो बालक की देहमें पिड़की घाव पावसे रुधिर वहै देहमें दुर्गध मलें पतला 'ज्वर बह रेवती है जो बालक को वर शंज मनीर्ण माथैमें पीड़ा मुपशोप सो शुप्फरेवती है ।। ७५ ॥ घातरक्त करिक पावके रोग मुप्तिपादास्तंभपाद, स्फुटन इत्यादिक पविरोग मुनिलोग बयालीस कदिगये हैं सौं ये रोग' श्लीपदादिक रोगन में प्रथम कहिगये हैं सों जानना ॥ ७६ ॥ सर्भिपातादिक दोप कारकै वांसठ ६२ प्रकार के रोग है सो वातादिक दोप में भिन्न भिन्न रोग कादिचुके है परन्तु इहैं भिन्न करि कोई नहीं कहता ऐसा समझना ॥ ७७ ॥ पंचकर्म वमन, विरेचन, निरूहणवस्ती, अनुवासनवस्ती, नस्य ये पांचौ कर्म उत्तरस- एड में कहेंगे और हीनयोग, मिथ्यायोग, प्रतियोग इन तीनोमकारके भेद है सो भी उत्तर में कहेंगे चमन कहे प्रोपधि देकै उपकावना विरेचन कहे प्रोपपिक- 'रके मल गिराना निरूहरणवस्ती भनुवासनबस्ती भोपधि की पिचकारी गुदा “मार्ग से देनी नस्य कहे नाकमें ओपपि देनेका यत्न इस भांति पांचों फर्म जा. नना हीनयोग, मिथ्यायोग, अतिपोग इन से नाना भांति के दुश्य उत्पम होते || स्नेहादि संग्रह भी उत्तर पण्ड में हैं स्नेहपान, स्पेदन धूमपान, 'गहुप, अंगन, तर्पण इन छहों में हीनयोग, मिथ्यायोग, प्रतियोग ये तीनों भेद कारिकै अठारह भेद है उससे उत्पन्न जो रोग सो उक्त रोगमें संग्रह करि माये हैं, ऐसे जानना स्नेहपान, स्त्रेद, धूमपान, गड्पता, अञ्जने यह प्रथम परिभापर में लिसंगये हैं औपधादिक करिके धातुको वृद्ध करने का प्रयोग उसे तर्पण करते है या नेत्रत्तकरने के प्रयोग उसे भी. तर्पण कहते है ।।७६ ॥ शीतादि बार उपद्रा बहुत ठंढा योग करसे मनुष्यको ठंडा उपद्रव उत्पन्न होता है बहुत उष्ण, शाईपरसंहिता। । देकश्चोष्णोपतापकः । शल्योपद्रवएकश्चक्षीरश्चैकः 'स्मृतस्तथा.: ८ स्थावरजङ्गमंचैव कृत्रिमं च त्रिधाविष म् । तेषांचं कालकूटायेर्नबंधास्थावरविषम् । जङ्गमवह धाप्रोक्तंतत्रलून भुजङ्गमाः,८१ हिचकारुपका कीटाः प्रत्येकतेचतुर्विधीः । दंष्ट्रांविपनखविपंचालटङ्गास्थिभि स्तथा ८२ मूत्रात्पुरीपाच्छुकानंदृष्टेनिश्वासतस्तथा । ला लायाःस्पर्शतस्तद्वत्तथाशङ्काविषमतम्,८३ कृत्रिमंहिचि धेप्रोक्तंगरदूषीविभेदतः।सप्तधातुविषज्ञयंतथासप्तोपधा उपद्रव उत्पन्न होताहै शल्य कहे नवा करा, कांटा, हाड़, सींग, पांडा इनके लगने से वा इनमें से कोई वस्तु पेट में जाय उससे जो रोगहोय यह शल्योपद्रव है वय जो संभलकार युनाते. परन्तु कच्चा रहिजाताई.व्ह खिलाने से जो रोग उत्पन्न हो तो विप सन्निा शस्त्र वा रस इन्होंकी तरहसे मरताहै,ऐसे चार भेद ॥०॥ (अध विपरोग)स्थावर, जंगम, वृषिमये तीनप्रकारके रिपर्दै तिसमें स्थारि विपके ना भेदई और जंगम विप यहुत मारका, तिसमें लता, सांप ॥१॥ मिच्छू, ममा, कीट इसमें वात पिच कफ सन्निपात करिकै एक एकके चारचार भेद हो जाते हैं किसी के दांत में पिपई किसीके नखमें किसी पारम किसीके सींगमें किसी क हाल में ॥२ मामे,मल में धातु में दृष्टि में श्याप्त में लारमें स्पर्शमें ऐसे भिन्न भिन्न जाति प्रति विपई मन में विपकी शनायाने से वायु कुपित हो. ज्वादि-उपद्रव शरीर में प्रकट कर सो शङ्काविप है - ३, -कृषि विपके दो भेद एक बच्छ्नागादि एकदूपी संवत संपत्ति के निमित्त शभुला करिक वा स्त्रीलोग नाना प्रकारकी चीज पसीना रज चिनाई मल प्रत्यादि अन्न के संग खिला देती है तो पांडस परादि उपद्रव होता है यामतयुक्त भयेते विरहोय: है नीबू कपुर मिश्रित भयेते विप होय यह कृत्रिम विपई और बच्छनागादि कृत्रिम 'विप एही वार,देको गीपरिमाणलेताई जिसमें कम पराक्रम है सोमाण नहीं नारा पारसक्ता परन्तु ज्यरादि उपद्रव करिक देशकाल अन्न वा दिवादि निद्रा, करिक पीड़ित करता है और सतरसादि धातुन को दूर पित करता है इसी कारण दूपित विप कहते हैं ये दो मकाउके इनिमा विप हैं चिएको भेद सुवर्णादिक.अशूद सप्तधातु की भस्म राराने से बा हरतालादि सप्तर- अध्याय,७ भापाटीकासमेता। तुजम् ८४ तथैवोपविषेभ्यश्चजातंसप्तविधविपम् । दुष्टनीरंविषचेकंतथैकंदिग्धजविषम् ८५.. कपिकच्छुभ चाकण्डूर्दुष्टनीरभवातथा तथासूरणकण्डूश्चशोथोभल्ला तजस्तथा ८६ मदश्चतुर्विधश्चान्या पगभङ्गाक्षकोद्र वैः । चतुर्विधोन्याद्रव्याणांफलत्वसूलपत्रजम् ८७ इ तिप्रसिद्धागणिता येकिलोपद्रचाभुवि असल्याश्चाप रेधातुमलजीवादिसम्भवाः-८८ ॥ इति श्रीशाङ्गधरसंहि तोयारोगगंणनायांसप्तमोऽध्यायः ॥७॥ इति शाङ्गधरस्यप्रथमखण्डरसमाप्त। धातुकी भस्म खाने से सास मदादिक अशुद्ध उपपिए खाने से विसमान पीड़ाहो- तो है उसकी विपस ज्ञाई (अथ दुष्टनीर ) जिस पानी में कीचड़-सेवाल पचा- दिक जन्तु वा मेदकक मल मूत्रसे पानी बिगड़ जाता है उसे दुष्टनीर कहते है उसके नहाने से पीने से विपसमान पीड़ित होताहै राखीदिक में विप के पानी को चदाते है उस शख के पातका घाव नहीं अच्छोहोवा और विपासहश धपद्वं होता। है सो दियविप है ।। ८१.८५॥ अय, चारिमकार, यागंतुक, उपद्रय बनकिमाच: दुष्ट पानी मग्न अङ्गके छनेसे देह खजुयाय भिलावांसे देह सुनावै. इसमकार से चारिभेद हैं और भी चोरि प्रकार है सुपारी भांग यहेड़ा की माँगी कोर्दय धान्य इन चारों के साने से चार प्रकार के मद् होते हैं इसीप्रकार-और भी, जानना 1८७ ॥ोपषि-वनस्पति फूल. डार पात मूल इनके खाने से चारमंकार के मद होते हैं इसप्रकार जो-पृथ्वी में मसिद्ध रोगोपद्व हैं, तितकी संख्या निरमयः, : करिगये है इससे वा सुवर्णादि धातु हरतालादि-उपधातु नानाप्रकारकी वनस्पति या प्रोपधि वा जीवादिक-कारिक अनेक उपद्रव उत्पन्न होते हैं सो उपद्रव मसरूप हैं. अनुमान से जानना ॥5॥इति श्रीगाई परब्याख्या निर्मितशाईपरसुधाकरः नामसप्तमोऽध्यायः ॥७॥ इति शापरस्यप्रथमखण्डस्समाप्त T 1.
श्रीगणाधिपतये नमः ॥
शार्ङ्गधरसंहिता
मध्यखण्डवार्तिकतिलकसहिता ॥
1
।
।
अथातः स्वरसः१ केल्क'२ क्वार्थश्च ३ 'हिम ४
फाण्ट ५ को । ज्ञेयाःषायाःपञ्चैते लघव स्युर्यथोत्तर
म् १आहतात्तत्क्षणोत्कृष्टाद्याक्षुण्णासमुद्भवः। वस्त्र
निष्पीडतोय स्यात्स्वरसोरसउच्यते २कुडवंचूर्णितंद्रव्य
क्षिप्तंचद्विगुणेजले । अहोरात्रास्थितंतस्माद्भवेद्वा रसउ
तमः ३ आदायशुष्कद्रव्यञ्चवरसानामसम्भवे।जलेष्ट
गुणितसाध्यंपादशेषञ्चगृह्यते ४ स्वरसस्यगुरुत्वाञ्चप
लमईप्रयोजयेत् । निश्शोषितंचाग्निसिदंपलमानरसंपि
वेत५मधुश्वेतागुंडक्षाराजीरकलवणतथा घतंतैलंचचूं
गोदीकोलमात्रातसेक्षिपेत् ६ अमृतायारसःक्षौद्रयुक्तःस
भय मध्यसएडम्मारभ्यते ॥भय काय गिसे काढा कहते हैं सो पांच मकारकार्ड
स्वरसकहे भइरस फरक र काय ३ हिम ४ फाट ५ एक से एक गुणमें न्यून
है यया स्वरस से लघु करक II उत्तम भमिसे तुरतकी उसारी मोपेपिनल
पिना फूटिक वस्त्रमें डारि निचोरि लय उस रसको स्वरस कहते हैं ॥ २॥ सोई
द्रष्य घुटव कहे सोलह तोले टिक दुगुने पानी में दिनराति भिनोइरास उसके
रसको भी स्वरस कहते हैं ॥ ३ ॥ जो द्रव्यहरी नमिलें तो सूखीद्रव्य भठगुणे पानी
में मोटे जब चौथाई रहै तब लेले॥४॥ मोदी द्रव्यका रस गरुमाहे इसकारण
कार्य में आपापल लेना भौर सूसी द्रव्य रातकी भीनीका रस हलकाहै इससे पल
भर लेना ॥ ५॥ स्वरस व मादा व यन्त्रका निकाला रस इनमें शहद, शकर, गुद,
सार, जीरा, लोन, घृत, तेल और चूर्ण ये सब भाउमाशे युक्त करना ॥ ६ ॥
1 अध्याय ?] भागारीकासमेता। चप्रमेहजित्।हरिद्राचूर्णयुक्तोवारसोधात्र्याःसमाक्षिकः७ वासंस्बिरलायोमधुनोरक्तपित्तजित् । ज्वरकासतरह कामलाश्लेष्मपित्तहा ८ त्रिफलायारतःक्षौद्रयुक्तोदा वीरसोथवा। निम्बस्यत्रागुडच्यानापीतोजयतिकामलाम ह पीतोमरिचचूर्णेनतुलसीपत्रजोरसः । द्रोणपुप्पीरसो प्येवंनिहन्तिविषमज्वरान १० जम्बाचामलकीनाञ्च पल्लवोत्थोरसोजयेत् । मध्वाज्यक्षीरसंयुक्तोरहातीसारम ल्वणम् ११ स्थूलबलिकापत्ररसःपानाव्यपोहति । सर्वातिसाराज्योनाककुटजत्वग्रसोथवा १२ आईकरव रसःक्षौद्रयुक्तोषणवातनुत् । श्वासकामारुचीहन्तिप्रति श्यायव्यपाहति १३ बीजपूररतःपानान्मधुक्षारयुतोज गुर्च का रस शहद युक्त खाने से,सेर मह.नाश होय प्रांवरे वा रस हल्दी का चूर्ण शहद मिथित करि सिलाने से भी प्रमेह नाश होता है।॥७॥ ( अध चा- सास्वरस रक्तपित्तादि पर रूसेका स्वरस शहद मिलाय के पियेसे रक्तरित नाशहोय और ज्वर, सांसी, क्षयी. कमल, कफ और पित्त इनरोगों को भी नगश ॥अथ प्रिफलादिस्वरस फलपर ) त्रिफले का रस वा बड़ी हल्दी का रस शहद व नीयका रस शहद या गुर्ष का रस शहद एल पिये तो कमल रोगको नाश करे ॥ ६॥ (अथ तुलसी आदि रन विपम जयर पर ) तुलसी का रस मरिचका चूर्ण या गूमाझा रस परिच साथ दिये तो विषमज्वर नाशहोय ॥१०॥(अथ जन्न्चादिरन रक्तातीसार पर) नागुन, श्रांक, श्रांवरा इन नीनों की पत्ती का रस शाद वृत व दूध सहित पिय तौ दिनी रक्तातीसार दरहोय ॥ ११॥ (अथ चपूरादिस्वरस अतीमार पर । वरकी छाल का रस शहदयुक्तपिलातौ सात मांतिका अत्तीसार जाय वा कुरैया का रस चाकरीलका रस शहद सङ्ग पिये तो अतीसार जाय ॥ १२ ॥ (अधाईकस्वरस अण्डकोश और श्वासपर) अदरक का रस शंन्द संग पिये तो वातावृद्धि पचे रचास, सांसी, अरुचि, नाक बहना ये सरोग मुक्त होय ॥ १३ ॥अथ बीजररस पाश्यादि शुलपर) मिनीरा नींबू का रस शहद और जवाखार सहित पिये तो पसुरी की शून हरकी रल, पेड़ शाधग्संहिता। [मध्यसपढ़ येत् । पार्श्वद्वस्तिशलानिकोष्ठवायुञ्चदारुणम् १४ शतावर्याश्चमधुना पित्तशलहरोरसः । निशाचूर्णयुतः कन्यारस प्लीहाऽपचीहरः १५ अलम्बुषायाःस्वरस पीतो द्विपलमानया। अपचीगण्डमालानां कामलायाश्चनाश नः १६ रसोमुण्ड्याःसकोष्णोवा मरिचैरवधूलितः। जये सप्तदिनाम्यासात्सूर्यावर्ताईभेदको १७ ब्राह्मीकूप्मान्ड पड्यन्थाशचिनीस्वरसःप्टथक् । मधुकुष्टयुतःपीतःसर्वो न्मादापहारकः १८ कूष्माण्डकस्यस्वरसोगुडेनसहयोजि तः। दुष्टकोद्रवसन्जातं मदपानाव्यपोहति १९ खड्डा विच्छिन्नगात्रस्यतत्कालपरितोत्रणः । गाङ्गेरुकीमूलरसे र्जायतेगतवेदनः २० पुटपाकस्यकल्कस्य स्वरसोगृह्य तेयतः । अतस्तुपुटपाकानां युक्तिरनोच्यतेमया २१ पु टपाकस्यमात्रेय लेपस्याङ्गारवर्णता । लेपञ्चयड्गुलं शूल व कोष्ठबद्ध इन सब रोगनसे निर्मुक्तहोय ॥ १४ ॥(अथ शतावरीरस पित्तशूलपर ) शतावरि रस शहद पिये तो पिचशूल हरे (अथ घीकुवार रसलीहा पर ) घीकुवाररस हल्दी चूर्ण पिये तो पित्त, अपची, पेटकी गाठि दूरहोय ॥ १५॥(अथ मुण्डीरसगण्डमाला अपचीपर ) मुंडीरस पाठ तोले पिये तो गंडमाला, अपची, कावररोग मिटे ॥ ६॥ (अथ मुंडीरस सूर्यावादि पर ) मुंडीस्वरस उपकार मरिच पूर्णयुत सात दिन पिये तो सूर्यावर्च आधाशीशी अच्छी होय ॥ १७ ॥ (अथ ब्राश्मयादिस्वरस उन्मा- दपर) ब्राह्मी, स्वेत कुम्हड़ा, कचूर व घच कौव्याला इनका सरस भिन्न भिन्न शहद मौर फूटके सङ्ग पिये तो सब उन्मादजाये ॥१८॥(श्वेतकुम्हड़ाका रस उन्माद पर ) सफेद कुम्हड़े का रस पुराने गुडसंयुत पिये तो दुष्ट कोदरका उन्माद नाराहोय ॥ १६॥ (अध परियारारस घाव पर ) शसके लगेके याव में तुरन्त परियारे का रस लगावै तौ घाव अच्छा होय ॥ २० ॥(अध पुटपाक के रसकी विधि ) पुटपाक का रस लेते हैं इससे उसका यन्न करते है ॥ २१ ॥ कोई मोदी द्रव्यहो उसे पीसिक गोली पाधै तिस पर रंड पा
अध्याय १.]
भापाटीकासमेता।
स्थूलंकुर्याहाङ्गुष्ठमात्रकम् । काश्मरीवटजम्ब्यादिपत्रै
ष्ठनमुत्तमम् । पलमात्ररसोग्राह्यःकर्षमात्रंमधुक्षिपेत् ।क
कचर्णद्रवाद्यास्तुदेयाःस्वरसवबुधैः२२ तत्कालाकृष्ट
कुटजत्वचंतण्डुलचारिणा । पिष्टांचतुष्पलमितां जम्बूप
ल्लवचेष्टिताम२३सूत्रेणबदाङ्गाधूमपिष्टेनपरिवष्टिताम्।
लिप्तांचघनपझेन गोमयैर्वन्हिनादहेत् २४ अङ्गारवर्णा
यमृदं दृष्ट्वावन्हेःसमुहरेत् । ततोरसंगृहीत्वा च शीतं
क्षौद्रयुतं पिवेत् २५ जयेत्सर्वानतीसारान्दुस्तरान्सुचि
रोत्थिान् । कण्डितंतण्डुलपलं जलेष्टगुणितेक्षिपेत् । भा
वयित्वाजलंग्राह्य देयंसर्वत्रकर्मसु २६ अरलुत्वकृतश्चै
वपुटपाकोग्निदीपनः । मधुमोचरसाभ्यांचयुक्तरसर्वाति
सारजित् २७ न्यग्रोधादेश्चकल्केनपूरयेद्गौरतित्तिरेः ।
निरन्त्रमुदरंसम्यक्पुटपाकेनतत्पचेत् । तत्कल्करस्वरसः
बरगद वा जामुनका पत्ता लपेटै फिर कपरौटी करि दो अंगुल मोटी माटी
लेसै तब अग्नि में धरै जब लालहो तब निकारिकै उसका रस निचोरि ले
उसे पुटपाकरस कहते हैं तब चार रुपया भर रस रुपयाभर शहद संयुक्त पिये
और जो करक चूर्ण पतली द्रव्य मिश्रित करनीहो तौ पुटरस को यथायोग्य देना।
२२॥ (अथ कुरैयापुटपाक सर्वात्तीसारपर) चार तोले कुरैयाकी चाल
ताजी चावल के धोवन में पीसिकै गोला बांध जामुन के पत्ते लपेटै॥२॥फिर
सूत से बोधि मोद के पाटा सौ लेपकरि पाटी लगावै तव गौरा के गोदामें कि
कै श्रृंगार होजाय तव आगिसे निकाल नियोरि उण्डाकरि शहद डारिरिस नों
बहुत दिनका कठिन अतीसार जाय २४।२५ ॥ (चावल घोक्नकी क्रिया)
चार रुपयाभर शुद्धचावल अठगुने पानी में धोवै चही धोवन सर्वत्र देव ॥२६॥
राईभरसंहिता [मध्वसण्ड क्षौद्रयुक्त.सर्वातिसारनुत् २८ पुटपानविपचेत्सुपक्कंदा डिमीफलम् । तद्रसोमधुमयुक्तःसर्वातीसारनाशनः २९ वीजपूगरजम्यूनांपल्लवानिजटाःप्रया । विपचेत्पुटपा केगचौद्रयुक्तश्चेतसः । छर्दिनिवारयेद्घोरासर्वदोप ममुद्भवाम् ३० पिष्टानांरपत्राणांपुटपाकरसोहिमः । मध्यक्तोजयेद्रतपित्तकाग्नचरचीयान् ३१ पचेत्क्षुद्रांस पञ्चङ्गापुटपापेनतद्रसः।पिप्पलींचर्णसंयुक्तःपासश्वास कफापहः३२विभीतकंफलेविञ्चिद्धृतेनाभ्यज्यलेपयेत्। गोधूमपिप्टेनानाविपत्पुटपावत् ३३ ततःपकंसमुट्ट त्यत्वचंतस्यमुखेक्षिपेत् । कासश्वासप्रतिश्यायस्वरभङ्गा जयेत्ततः३४चूकिञ्चिद्धृताभ्यहंशराव्याएरण्डजैर्दलः चेष्टितंपुटपाकेनविपचेन्मन्दवहिना३५ततउद्दृत्यतचू ग्राह्यप्रातःसितान्वितम् तेनयान्तिशर्मपीडाआमाती सारसंभवाः३६शुण्ठीकल्कविनिक्षिप्यरसेरेरण्डमूली। गोना निकाल रसनिचोरने सा रस शहद संयुक्तदेय तौ सय प्रती तारजाय ॥२८॥ पुर: चार पके अनारका पुटपाक बनाइ निसका रस शहद मिलाय देय तो सन अतीसार नारा होय ||२६(अथ विजौरा पुटपाक उचाकी पर ) दि. जौरा नीच जामुन की पाती का जड़ के पुटपार का रम शहदयुन देइ तो सर दोष की बदि जाय ॥३०॥(अथ वासापुटपाक रक्तपित्त कासज्वर पर) रूमेक पुटपाक का रस बरु शहद पिये से रक्तपित्त बास गर्दि व वरनाय । ३१ ॥ श्रथ भटकटैया का पुटपाक कासश्यास पर ) भटक टैया के पंचाग का पुटराक रस पीपरिका चूर्ण डारि कै दे तो कामरस स कफ जाप ॥ २२॥ ( अथ विभीतकपुटपाक कास श्यामपर ) बहरे परी लगाइ सान से लेप अंगार पर पुट एक करै॥३३॥ उमा दिलका नगमें राराने से काम, मास, मतिश्याय, स्वाभा ये रोग गाय ३१ (अमोहि पुराने आमातीसार पर ) संदर्गविशीत से वटी बनाय एडा में "ट मनगर में पटाका ! ३ !! म मो सोरेशासाथ मो 'अध्याय-२.] भापाटीकासमेता। विपत्पुटपाकेनतेद्रसःौद्रसंयुतः । श्रामवातसमुद्भूतां पीडाजयत्तिदुरतराम ३७सौरणकन्दमादायपुटपाकेनपा येत् । सतैललवणस्तस्यरसश्चाशीविकारनुत् ३८ श रावसम्पुटेदग्धंशृङ्गहरिणजंपिवेत् । गव्येनसर्पिषापिष्टंह च्छूलंनश्यतिध्रुवम् ३६ ॥ इति श्रीशाधरेमध्यखण्डे चिकित्सास्थाने स्वरसादिकल्पनाऽध्यायः॥१॥ पानीपंपोडशगुणक्षुण्णेद्रव्यपलेक्षिपेत् । मृत्पात्रेकाथ येद्ग्राह्यमष्टमांशावशेषितम् १ तज्जलंपाययेद्धीमान्को णमग्निसाधितम् । शृतःकाथाकषायश्चनियूहःसनि गद्यतेरआहाररसपाकेचतातेद्विपलोन्मितमाद्यो पदेशेनपिवेत्काथसुपाचितम ३ क्वाथेक्षित्सितामशेश्च तुष्टिमषोडशैावात पित्तकफातङ्केविपरीतमधुस्मृतम् जीरकंगुग्गुलुझारलवणंचशिलाजतुमाहिगुत्रिकटुकंचै वक्वाथेशाणोन्मितंक्षिपेत्. ५ वीरंघृतंगुडंतैलमूत्रंचान्य शामातीसारकी पीडा मिटे ॥ ३६ ॥ पुनः सौट चूर्ण एरंडकी जर के रस में सानि पुटपाक करि म निकारि शहद संग खाइ तो आमवात की पीडा जाय ।। ३७॥ (अथ सूरन पुराना बवामीर पर ) पुशक करि पहा माद, लोन, तेल साय साइ तौ अर्गनाश होय ॥ ३८॥ (हरिण श्रृंग पुराना हृदयशूल पर ) हरिणसींग शराब संएट में गराइ गौ के धीमें डारि पिये तो हृदय की शूल जाय ॥ ३८ ॥ इति शाईपरेशयमोऽध्यायः ॥१॥ (अबकाय) चार रूपया भर द्रव्य चौंसठ रुपया भर पानी माटीके पान में भरि मदाग्निमें मोर जा पाठ रपये मरिरहै तब उतार लेय ॥ १॥ कुछ उष्ण रहें तर पिये मायके चार नाग है शून, काथ, कपाया नियूह ॥ २ ॥ श्राहार का रस पले पर रद्ध ध के उपदेश रो दोपल काढा पिये ॥ ३ ॥ काथमें मधु मिश्री सारने काममा प्रधान हो तो मियी थोड़ी देना पित अष्टमांश क्फ पोटशांश शहद वागुरो पोइशांश वित्तगें अष्टमांश कफमें चौथा अंश देना ॥ ४॥ जीरकादि अनेक वडालने का प्रयाग जीरा, गूगल, क्षार, संधा, शिलाजीत, हींग व त्रिकटु फारे में चाम्मिा दे या बल समय देखि ॥ ५ ॥ दूध, ची, गुह, वेल, गोमूत्र, शायरसंहिता। मध्यखयर द्रवंतथा [ कल्कंचर्णादिकंक्वाथेनिक्षिपत्कर्षसम्मितमद गुडूचीधान्यकारिष्टपद्मकरक्तचन्दनम्।गुडूच्यादिगणका थासर्वज्वरहरःपरः। दीपनोदाहहल्लासतृष्णाछर्यरुचीर्ज येत् ७ गुडूचीपिप्पलीमूलं नागरैःपाचनंस्मृतम् । दद्या द्वातज्वरे पूर्णलिङ्गेसप्तमवासरे ८ शालपीवलारास्नागु डूचीशारिचातथा । प्रासांकाथंपिवेकोष्णं तीव्रवातज्व रच्छिदम् ९ काश्मरीशारिवारस्नानायमाणामृताभवः । कषायःसगुडःपीतो वातज्वरविनाशनः १० कट्फले न्द्रयचाम्वष्ठातिक्तामुस्तैःशृतंजलम् । पाचनंदशमेऽहि स्यात्तीत्रपित्तज्वरेनृणाम ११ पर्पटोवासकस्तिता किरा तोधन्वयासकःप्रियङ्गश्चकृतःकाथएपशिर्करयायुतः। पिपासादाहपित्तात्रयुक्तपित्तज्वरंजयेत् १२ द्राक्षाहरीत कीमुस्तकटुकाकृतमालकः । पर्पटश्चकृतःक्वाथएपांपित्त और शासादि लुगदी नूर्णादि ये सब दश माशे घल समय देखिकै देना ॥६॥ (गुर्चादिकादा सय ज्वरपर गुर्च, धनिया, नींबकी छाल, पद्मास, रक्त चन्दन इस गु दि फायसे सब जर नाश होय हे यह दीपनहै दाह,कृष्णा, लार, उपकाई ये योग द्र होय ।। ७ ।(गुर्गदि पाचन घातज्वरपर ) गर्थ, पी परामूल व सोंठ इनवा कादा वातवर में सतये दिन देय यह पाचन है ॥ ८॥ (वातज्वर पर ) शालपर्णी कहे यनउदी, वरिपारा, रासन, गुर्च, सरिवन इनका कादा पिये से तीन वातवर जाय ॥ ६॥ (दूसरा काढ़ा वातज्वर पर) सभारी सरिवन, रामन, आयमा, गुर्न इनका कादा गुड़ सारिकै पिये तो पाववर जाय॥ १०॥( फटफलादि पाचनपित्तज्वरपर ) कायफर इन्द्र- यव, पादा, युटकी और नागरमोथा इन पाचौंका सादा तीन पिचचरमें मनुष्यों यो दवें दिन देह ॥ १॥(पित्तपापरादि काथ पित्तवरपर ) पिन पारा, रूसा कुटकी, चिरायता, नासा, मियंगुदाना पीतसरसों सा होताहै यह काहा चीनी के संगतिये तो कृपा दाह व पिचवर ये मुक्त होय ।। १२॥ (दसरा) दास, हद, मोधा, पुटकी, अमलतास और पिचपापडा इनवा काय पिचवर नाश वर है और तृप्या, मूळ, दाह प रक्तपित्त इन शमन भोर अध्याय.२ भापाटीकासमेता। ज्वरापहः। तृएमूळदाहपित्तासक्छमनोभेदनःस्मृतः१३ वीजपूरशिवापथ्यानागरग्रन्थिकेः शतम्। समारंपाचनं श्लेष्मज्वरेद्वादशवासरे १४ भनिम्बनिम्बपिप्पल्यःशटी शुण्ठीशतावरी । गुडूचीबृहतीचेति काथोहन्यात्कफज्वर म् १५पटोलत्रिफलातिक्ताशटीवासामृताभवः।काथोमधु युतःपीतोहन्याककृतज्वरम् १६ पर्पटाब्दामृताविश्व किरातैःसाधितंजलम्।पञ्चभद्रमिदंज्ञेयं वातपित्तज्वराप हम् १७ क्षुद्राशुण्ठीगुडू चीनांकपाय:पौष्करस्यच कफ . वाताधिकेपेयोज्वरेवापित्रिदोपजोकासश्वासारुचिकरपा शिलविधायिनि १८ आरंग्वधकणामलमुस्तातिताभ याकृतः । काथःशमयतिक्षिप्रंज्वरंवातकफोद्भवम् । आम शूलप्रंशमनोभेदीदीपनपाचनः १९ अमृतारिष्टकंटुकामु स्तेन्द्रयवनागरैः । पटोलचन्दनाभ्यांचपिप्पलीचूर्णयुक् छतम् । अमृताष्टकमेतच पित्तश्लेष्मज्वरापहम् । छर्य भेदन करै।। १३ ॥ (बिजौरा पाचक कक ज्वर पर ) विजौरा की जड़, इंड़, सौंठ, पिपरामूल, जवाखार डारिकै कफ ज्वर के वारहें दिन कादा पिये तो जल्दी पाचन करै ।। १४॥ ( पुन:काथ )चिरायता नीमको झल, पीपरि, कपूर सोंठ,शनावरि गुर्च व भटकटैया यह काढ़ा कफज्वरको विनाशताहै ॥ १५ ॥ (पुनकाथ ) पटोलपत्र, त्रिफला, कुटकी, कचूर, रूसा व गुर्च इनका कादी मधुयुक्त पीने से कफजर का नाश होता है ॥ १६॥। पित्तपापरा काय यातज्वर पर ) पिपापरा, नागरमोया, गुर्च, सौंट व चिरायता इसपश्चभद्र कादे से वातपित्तचर जाता है ।। १७ ॥(छोटी भटकटैया काय कफवात ज्यर पर ) भटकटैया, सोंठ, गुर्च ,पुष्करमूल यह कोदा कर्फ बातज्वर नाश कर औरसंनिपात वर में पियें तो कांस, श्वास,अरुचि और पमुड़ी की पीड़ा हरे॥१८॥ (अमलतासादि काय चातकज्वर पर) अमलतास का गहा, पिपरामूल,मोथा,कुटकी धौर बदीहड़ इन हा कांदा घातकफवर वेगही नाश वसर प्रामशूल शमन कर और गोटा गिरोय व अग्निदीपन पांचन करें ।। १६ ।।
शाधरसंहिता मध्यसपर रोचकहल्लासहितृष्णानिवारणम् २०कण्टकारीद्वयंशु ण्ठीधान्यकंसुरदारुच। एभिःशृतंपाचनस्यात्सर्वज्वरविना शनम् २१ शालपर्णाटण्ठपणीबृहतीहयगोक्षुरैः।विल्या ग्निमन्धश्योनाककाश्मरीपाटलायुतैः २२ दशमलमिति ख्यातंकथितंतज्जलंपिवेत् । पिप्पलीचर्णसंयुक्तवातश्ले प्मज्वरापहम् २३ सन्निपातज्वरहरसूतिकादोपनाशनम् शोषशैत्यभ्रमस्वेदशासश्वास विकारनुत् । हत्कम्पग्रहए। वर्तितन्द्रामस्तकशलनुत् २४ अभयामुस्तधान्यावरत चन्दनपद्मावासकेन्द्रयवोशीरगुडूचीकृतमालकैः२५ पाठानागरतिक्ताभिःपिप्पलीचूर्णयुक्छतम् । पिवेस्त्रि दोषज्वरजित्पिपासादाहकासनत २६प्रलापश्वासतन्द्रा नंदीपनंपाचनंपरम् । विएमत्रानिलविष्टम्भवमीशोपारु चिजयेत् २७किरातकटुकीमुस्ताधान्येन्द्रयवनागरैः।दश (अथ अमृताप्टक काय ) गुचिं, नीमनी छाल कुटकी मोथा, इन्द्रयब, सोंड, पटोल और रक्तनन्दन इनका काय पीपरिका चूर्ण डारिक पीने से पित्तकफचर नाराहोय तथा उचाई, भरचि, हल्लास, दाह और रूपा इनको निधार ॥२०॥ (भटकटैयादि काथ सयज्वरन पर) दोनों भटकटैया, सोंठ, धनियों, देव. दारु यह पाचनकाय सर पर हरै ॥ २१ ॥ (दशमलकाय चातकफ पर) धनउदी बनमूंग, दोनों भटकटैया, गुरू, लकी जठ, अग्निपंथ, सोहनाचा, संभारी. पादा ॥२॥इन दों की जरका काढ़ा पीपरि के चूर्ण के संग दिये तौ पात कफचर नाशहोय ॥ २३ ॥ सनिगनयर, मूविधादोप,युस सपना, शीतन अब, भ्रम, पसीना पास, स्वास नाश करें हृदयरल, पापीड़ा, तंद्रा, मस्नकाल ये सयमुक्त शेयें ।। २ ।। (हरीनकोकायनमिपात ज्वर पर) बड़ीडर, नागरमोथा, धनियां, रक्तचन्दन पद्माय, रूसा. इन्द्रयम, सत, गुर्च, अमलतास ॥२५॥ पादे को जड़ साँठ कुटकी, पीपरिका पूर्ण समेत कादा पिये तो सनिगतवर, तृप्णा, दाडकास दरै ।। २६ ॥ भ्रम,श्यास तन्द्राद टीपन पाचन वर वायु से मन्नमूत्रागंध, वमन, कंठशोग, अरचि इन उपद्रों को नाश
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अध्याय
भापाटीकासमेत
मूलमहादारुगजपिप्पलिकायुतैः२८ कृतःकषाय पाश्र्वा
तिसन्निपातज्वरंजयेत् । कासश्वासवमीहिकातन्द्राहगृह
नाशनः २९ कटफलाम्बुदभार्गीभिर्धान्यरोहिषपंपैटः।
वचाहरीतकीशृङ्गादेवदारुमहौषधैः३० वाथ कासज्वरंह
न्तिश्वासश्लेष्मगलग्रहान्क्वाथोजीर्णज्वरहरंगुडूच्यापि
प्पलीयुतः। तथापर्पटजःक्वाथः पित्तज्वरहरः परः ३१
निदिग्धिकामृताशुण्ठीकषायंपाययेषिक् । पिप्पलीचूर्ण
संयुक्तंश्वासकासार्दितापहम्। पीनसारुचिवैस्वर्य’लाजी
ज्वरापहम् ३२ क्षुद्राधान्यकशुण्ठीभिर्गुडूचीमुस्तपद्म
कैः।रक्तचन्दनभूनिम्बपटोलपपोष्करैः३३कटुकेन्द्रयवा
रिटाभार्गीपर्पटकैःसमैः । कार्थप्रातर्निषेवेतसर्वशीतज्वर
च्छिदम३४मुस्ताक्षुद्रांमृताशुण्ठीधानीकाथःसमाक्षिकः।
पिप्पलीचूर्णसंयुक्तोविषमज्वरनाशनः३५ पटोलंत्रिफैला
कर॥२७॥(पुनरष्टांगदशमूलकाथ)चिरायता,कुटकी, नागरमोथा,धनियां,
ईन्द्रयव, सोंठ, दशमूल, देवदारु, गजपीपरि समेत फायपिये तो पसुरीपीड़ा, सनि.
तज्वर, कास, श्वास, वमन, हिचकी, तन्द्रा, हृदय रोग ये नाशझोय ॥२८॥२६॥
(कायकर कासज्वर पर)कायफर,नागरमोथा, भारंगी,धनियाँ, सस, पिच.
पापड़ा, चंच, इड, काकड़ासीगी, देवदारु, सोंठ इस कार से कासयर नाशहोय
श्वास कफ कंउरोग मिटै गुर्चका काढ़ा पीपरि युक्त पीने से जीर्णज्वर एटै पित्तपा-
पड़ेका काथ पीपरियुक्त पीने से पित्तवर जाइ ॥ ३० ॥ ३१ ॥ पुनाभटकटैया में
गिलोय, सोंठ व पीपरि डारि पिये तो श्वास, कास, अर्दितवायु, पीनस, अरुषि,
गला बैठष, शूल, जीर्णज्वर ये रोग दूरहोय ॥ ३२ ॥ (सर्व शीतज्वर पर
भटफटया कार्य ) भटकटैया, धनिया, सोंठ, गुर्च, नागरमोथा, पद्माख,
रक्तचन्दन, चिरायता, पटोल, रूसा, मोचरस, कटुकी, इन्द्रर्यव, नीच, भारंगी
और पित्तपापड़ा इनका कार्य प्रातःकाल पिये तौसम शीतज्वर नाशहोय ॥३३॥
२४॥(विषमज्वर परमोथाकाय ) नागरमोथा, भटकटैया, गुर्प, सोंठ,
प्रांवला इनका काढा शहद पीपरियुक्त पिये तो विषमचरं मुक्तहोय ॥ ३५ ॥
शायरसंहिता। [मध्यखएड निम्वद्राक्षाशम्याकवासकैः।काथःसितामधुयुतोजयेदेका हिकंज्वरम् ३६ गडूचीधान्यमुस्ताभिश्चन्दनोशीरनाग रैः कृतंकायपिवेक्षौद्रसितायुक्तंज्वरातुरः३७तृतीयज्वर 'नाशायतृष्णादाहनिवारणम् । देवदारुशिवावासाशाल पर्णीमहौषधैः ३८ धात्रीयुक्तंभृतंशीतंदद्यान्मधुसितायुत म्। चातुर्थिकञ्चरेश्वासेकासमन्दानलेतथा .३६ गुडूची धान्यकोशीरशुण्ठीवालकपर्पटैः। विल्वप्रतिविषापाठरिक्त चन्दनवत्सकैः४० किरातमुस्तेन्द्रयवैकथितशिशिरंपिये तासक्षोद्ररक्तपित्तघ्नज्वरातीसारनाशनम् ४१ नागरंकूट जोमुस्तमन्तातिविषातथा । एभिः कृतंपिवेत्वार्थज्वरा तीसारनाशनम् ४२ धान्यनागरविल्वान्दवालकैःसाधि तंजलम् । आमशलहरंग्राह्यंदीपनंपाचनंपरम् ४३ धान्य नागरज काथापाचनोदीपनस्तथा। एरण्डमूलयुक्तश्चज (नित्य आते ज्वरपर पटोलक्षाथ ) पटोल, त्रिफला,नींबकीहाल, दास, अमलतास और साइनका काय शाद व खाड़ युक्त पिये तो एकाहिकवर छुटै ॥३६॥(तृतीयक ज्वरपर गुहूच्यादिकाथ)गुर्च, धनियां,नागरमोया, रक्तचन्दन, खस और सोंठ इनका काढ़ा शकर शहद युक्त पिये तो तृतीयक ज्वर,प्यास,दाद ये उपद्रव निर्मुक्तहोय ॥ ३७॥(चातुर्थिकज्यरपर देवदारु काथ) देवदारु,नडी हड, रूसा, शालपर्णी सोंठ और भावना इनका का शब्द प मिश्री युक्त पिये तो चार्षिक अर जाय और श्वास, कास. मंदाग्नि ये सब दूरहोएँ । ३८ १३६॥ (घरातीसार पर गुहब्यादिकाय ) गुर्थ, घनिया, सस, सोंठ, मुगंधचाला, पित्तपापडा, वेल, मतीस, पादा, रस्त चन्दन, फरैया, चिरायता, मोया, इन्द्रपर यह काढ़ा ठंडाकार शहद मिश्रितकर पिये तो ज्वरातीमार व रक्तपिचका नाशहोर ॥ ४० ॥४१॥ (पुन.) सौट, सरैया, मोथा, गुर्च, अतीस इस कादेसे धरावीसार जाय ॥ ४२ ॥ ( आम. शूलपर धान्यपञ्चकफाध ) धनिया, सोंड, वेल, मोथा, नेत्रपाला इनके काय से श्रामशूलजाय व ग्राही, दीपन, पाचन है ।। १३ ॥ सहित धनियां सोंड - -
थध्याय २]
भापाटीकासमता।
येदामांनिलव्यथाम् ४४ वत्सकातिविषाविल्वमुस्तैवाल
(फमाशंतमं । अतीसारंजयेत्सामचिरजरक्तशलजित ४५॥
कुटजातिविषापाठाधातकीलोध्रमुस्तकः । ह्रीवरदाडिम
युतैःकृतःकाथःसमाक्षिका ४६ पेयामोचरसेनैवकुटजाष्ट
कसज्ञका प्रतीसाराजयेहातरक्तशालामदुस्तरान्छ
. ह्रीवेरधातकीलोध्रपाठालज्जालुवत्सक । धान्याकाति
विषामुस्तागुडूचीविल्वनागरैः ४८ कृतःकषायाशमयेद
तीसारंचिरोत्थितम् । अरोंचकामशूलास्रज्वरन्न पाचन
स्मृतः४६ धातकीविल्वलोध्राणिवालकगजपिप्पली गए
भिःकृतंशृतंशीतशिशुभ्यःचोद्रसंयुतम् । प्रदद्यादवलेहवी
सर्वातीसारशान्तये ५० शालपर्णीवलाविल्वैधान्यशुण्ठी
कृतंशृतम् । आध्मानशूलसहितांवातजांग्रहणीजगताप
गुडच्यतिविषाशुण्ठीमुस्तैःक्वाथःकृतोजयेत्।प्रामानुषतां
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शायरसंहिता ।। [मध्यखण्ड ग्रहणींग्राहीपाचनदीपनः ५२ यवधान्यपटोलानांकाथः सोदशर्करः । योज्यस्सर्वातिसारेपुषिल्वाधारिथभवस्ता था ५३ त्रिफलादेवदारुश्चमुस्तामूपककर्णिका । शिशु रेतैःकृतःक्वाथःपिप्पलीचूर्णसंयुतः । विडमचूर्णयुक्तश्च कृमिघ्नःकृमिरोगहा५४ फलत्रिकामतातितानिम्बरात वासकैः । जयेन्मधुयत क्वाथः कामलांपाण्डुतांतथा ५५ पुनर्नवाभयानिम्बदावनिक्तापटोलकैः। गुडुचीनागरयुतैः काथोगोमत्रसंयुतः।पाण्डुकासोदरश्वासशलसर्वाङ्गशो यहा५६वासाद्राक्षाभयक्वाथःपीतः सक्षौद्रशर्करः । निह न्तिरक्तपित्तातिश्वासकासान्सुदारुणान् ५७ रक्तपित्तक्षयं' कासं श्लेष्मपित्तज्वरंतथा । केवलोवासकक्वाथःपीतःक्षौद्रे णनाशयेत् ५८ वासाक्षुद्रामृताकाथःक्षौद्रेणज्वरकासहा । अहणी दर करे व ग्राहीहो' दीपन पाचन करै ॥५२॥ ( सर्वातीसार पर) इन्द्रयच, धनिया और पटोल इनका कादा साड़ शहद संग साइतो छर्दि, अती- सार गाय व मामकी गुठली चेलका काढ़ा शहद मिश्रीयुक्त पिये से सब प्रती- सार जायें ॥ ५३॥ (कृमिपर ग्निफलाकाथ ) त्रिफला, देवदारु, मोया, मुसाकरणी, सहिजनेकीदाल, पीपरि, विटंगयुक्त पियेसे कृमि और कृमिन पद्ध सब जाय ॥ ५४॥(कामलापर निकलादि काथ) त्रिफला, गुर्च, कटुकी नीप, चिरायता और रुसा इनमे कायको शहद समेत पिये तो कामला व पादु रोग नाशहोय ॥ ५५ ॥ (पांडपर गदापुरैनाफाथ, शोधादिक फासपर) गदापुरैना, हट, नींवकी छालदारुइलदी, कटुकी, पटोल, गुर्प और सोंठ इनवा कादा पिये तो पांडु, कास, उदररोग, सास,उदरशूल और सर्वाग सूजन भच्ची हो । ५६ ॥ (रक्तपित्तपर रूसाकाथ) सादासाइड इसका कादा शहद वा मिश्री युक्त पिये तो रक्तपिच पीडा दारुण कास रवास जाय ॥ ५७ ।। (पुनः) रूम का काढ़ा शहद संग पियेसे रक्तपित्त, क्षयो, कास,कफ शिरावर नाश होय ।। ५८ ॥ (कासज्वर पर वासासादा) रुता, भठक्दया और गुर्न इनका काय राहदयुक्तपीनेसे जर कास मिटै जो भटकया का वादा पीपल .. अध्याय २] भापाटीकासमेता। कासनःपिप्पलीचूर्णयुक्तःक्षद्रागृतस्तथा ५९ क्षुद्वाकुलि स्थावासाभिन गरेगाचसाधितः । काथःपौष्करचर्णाव्यः श्वासकासौनिवारयेत् ६० रेणुकापिप्पलीकाथोहिङ्गुक ल्केनसंयुतः। पानादेवहिपञ्चापि हिकान्नाशयतिक्षणात् ६बिल्वत्वचोगुडूच्यावाकाथःचौद्रेणसंयुतः। जयेत्रिदो षजांदिपर्पटःपित्तजांतथा ६२ हिगुपौष्करचर्णाढ्य दशमलशृतंजयेत् । गृहसी केवल काथशेफालीपत्रज स्तथा ६३ रास्तामृतामहादारुनागरैरैण्डजंशतम् । सप्त धातुगतेवाते सामेसर्वाङ्गगेपिवेत् ६४ रास्नागोक्षुरके रण्डदेवदारुपुनर्नवाः।गुडूच्यारग्वधौवकाथपंपांविपाच येत् ६५शुएठीचर्णेनसयुक्तपिबेज्जवाकटीग्रहोपालप्टष्ठो रुपीडायामामवातेसदुस्तरे ६६ रास्नाद्विगुणभागास्यादे कभागास्तथापरेराधन्वयासबलैरण्डदेवदारुशटीवचाः६७ चर्ण संयुक्त दे तो सांसी मिटै ॥ ५६ ॥ (कासश्वासपर क्षुद्रादिकादा) भटकटैया, कुलथी, रूसा व सोंठ इनका काय मादलका चूर्णयुक्त पिये से फास, रवास जाय ॥ ६० ॥ (हिचकीपा मेवडीफाड़ा) मेवड़ीकारीन, पीपरि, हींगभुनी युक्त पिये से पाचौ प्रकारकी हिनझी माये ॥ ६ ॥(उप- काई पर विल्वादि काढ़ा) वेलकी छालवा गुर्च का काड़ा शहदयुक्त पिये तो त्रिदोपजन्य छर्दि मिट जो पित्तापहा शादयुक्त पियसे पिच जाय ।। ६२॥ (गुसी वायुपर दशमूलकाय ) हींग, पुष्करमून का चूर्ण मयम कहे दरामून काथ में युक्तकरिपिये तो गृद्धसी वायुनाय जो मेव्हीकायमें हींग व रंडमूल चूर्णयुक्त पिये तो तुरंत गृहसीवायुमिरै ।। ६३ ।। (वायुपर रासनपं. चककादा) रासन, गुर्च, देवदारु. सौठ, रंडमन यह कादापये से मतगतुगत बात सब भगवायु दूरहो ॥ १४ ॥ (चायुपर रास्ना सप्त ) रासन, गुरु, रंड, देवदारु, गढापुरैना, गुर्च और अमलतास इनका कादा साठ वर्ण दारिक पिये से जांघ, कटि , पसुरी, पीठ, बाती और भारी प्रामात पिटे ॥६१६६ ।। (सम्पूर्ण वायुपेर महारास्नादि कादा) दो भाग रासन और सत्र एक 1 शाईपरसंहिता। [ मध्यसप वासकोनाग पथ्याचव्यामुस्तापुनर्नवा । गुडचीटबदारु इचशतपुप्पाचगोक्षुरः६८ अश्वगन्धाप्रतिविषाकृतमाल इशतावरी ।कृष्णासहचरश्चैवधान्यकंवृहतीद्वयम् ६९ए भिःकृतंपिवेत्वात्थंशुण्ठीचर्णेनसंयुतमा कृष्णाचूर्णेनवायो गराजगुग्गुलनाथवा ७० अजमोदादिनावापितैले रण्ड जेनवासीङ्गकम्पेकुजत्वेपक्षाघातेपवाहुके७५ गृहस्या माभवातेचश्लोपदेचापतान के। अण्डरौतथाध्मानेजङ्घा जानुगतेहिते७२ शुक्रामयेमेदरोगेवन्ध्यायोन्याशयेषुचा महारास्नादिराख्यातोब्रह्मणागर्भकारणम् ७३ एरण्डोवी जपूरश्चगोक्षुरोबृहतीद्वयमाप्रश्मभेदस्तथाविल्वएतन्मू लै कृतःसृतः७४एरण्डतैलहिङ्ग्वाट्यायवक्षारःससैंधवः स्तनस्कन्धकटीमेढ़हृदयोत्थव्यथांजयेत् ७५ नागरेरण्ड योःक्वाथःक्वाथइन्द्रयवस्यवाहिगुसौवर्चलोपेतोवालश लनिवारणः ७६ त्रिफलारग्वधक्काथःशर्कराक्षोद्रसंयुतः। भागमें नवासा, वरियारा. रंड, देवदार, कचूर, वच, रूसा, सोंठ, हड़चार, मोथा गदापुरैना, गुर्थ, विधारा, सौंफ, गुखुरु, असगन्ध, अतीस, अमलतास, शतावरि पीपरि, इन्द्रयप, धनिया और दोनों भटकटैया इनका कादा सॉठि चूर्ण डारि पाक वा पीपरिका चूर्ण वा योगराजगुग्गुलुसाय अजमोदादि चूर्णकसंग वा रेंडी के तेल के संग तो सर्वांग कंप, फूपड़, पक्षाघात, अपराहुक गृसी, भामवात, पीलपाव, अपतान, मन्त्रद्धि, पेट फूलना, जयापीडा, पानुरोग, पंध्याकी योनि दुष्टता यह महारास्नादि कादा ब्रह्माने कहाहै इसमें बहुत मनुष्य एक ओपधिका दना रासन लेते हैं सो अनुचित ॥६७१७३ ॥ (छाती फी वायुपर अरण्ड का सप्तक) रंड, बिजौरा की जड़, गुरमुख, दोनों भटकटैया, पापाणभेद और घेलीगिरी इन सब जड़नका कादा रेडीका तेल, हींग, पार, सैंधा युक्त दिये तो स्तनपीड़ा, कण्ठ मेदू व हरय की सर पीडामि ॥७१।७५ ॥(पाताल पर शुठीफादा ) सौंठ, रंडमूल व इन्द्रयर का काढ़ा, भुनीहींग, कालानोन मुक्त पिये से वातशूलजाय ॥ ७६ ॥(पित्तशूल पर त्रिफलाफादा) . + अध्याय २] भापाटीकासमेता। रक्तपित्तहरोदाहपित्तालनिवारणः ७७एरण्डमूलंद्विपल जलेष्टगुणितेपचेत्। तत्काथोयावशूकाठ्यपाहत्कफशू लहा ७८ दशमूलकृता हाथोयवक्षारःससैन्धवः। हृद्रोगगु ल्मशूलार्तिकासंश्वासंचनाशयेत् ७हरीतकीदुरालम्मा कृतमालकगोक्षुरैः । पाषाणभेदसहितःक्वाथोमाक्षिकसंयु ताविवन्धेमूत्रकृच्छेचसदाहेसरुजेहितः८०वीरतसर्टक्षवं दाकाशरसहचरत्रयम् । कुशद्वयनलोगुन्द्रावकपुष्पोग्नि मन्थकः८ मूर्वापाषाणभेदश्चश्योनाकोगोक्षुरस्तथा। अ पामार्गश्चकालंब्राह्मीचेतिगणोवरः८२ वीरतदिरित्यु तशर्कराइमरिकृछहा । मूत्राघातवायुरोगान्नाशयेन्निखि लानपि८३एलामधूकगोकण्टरेणुकैरएडवासकाः। कृष्णा इमभेदसहिताःक्वार्थएपांसुसाधितः। शिलाजतुयुत्तःप्रेयः शर्कराश्मरिकृच्छहा ८४ समूलगोक्षुरकाथःसितामाक्षिक त्रिफला, अमलतास इस काढ़े में शकर शहद युक्त कार पिये से रक्तपित्त दाह पित्त शूलनाय ।। ७७ ॥ (कफ शूलपर रंडमूल काढा ) रंडकी जड़ दोपल सोलह पल पानी में कादा करि जवाखार डारि पियेसे कफजन्य पापीड़ा हृदयपीडाका नाश होय ।। ७८ । (हृदयरोगपर दशमूलकाढ़ा) दशमूल का काडा जमाखार सैंधव युक्त पिये से हृद्रोग, वायुगोला, कास और शासका नाशहोय ।।७६ ॥ (मूत्रकृच्छ्रपर हरीतकी काडा ) इंड, जनासा,अमलतास, पापाणभेद और गुग्गुरू इनका काढ़ा शहदसंयुक्त पिये से मलमूत्रारोध दाहसहित सब रोग अच्छेहोप (मूत्रकृच्छपर अर्जुनकाथ) श्राकाशवचरि काशमूल तीनों फटसरैया मूल दोनों कुश, नरकटमूल, गोंदी, शिवलिंगी, अरणीकीजड़, मूर्वा, पापाणभेद वा करील, गुग्गुरू, चिचिरा, कमलपत्र यह वीरतरु श्रेष्ठ गण है इस कादाके पिथेसे शर्करा, पथरी, बाच्छ, त्रायात और सम्पूर्ण वायुरोग नाराहो- थे ८०1८३॥(अश्मरीशर्करादिपर एलाफाड़ा) इलायची,मुलहठी, गुरू, माडीबीन, रंड, रूसा, पीपरि और पापाणभेद इनका कादा शिलाजीत संयुक्त पिये से शर्करा, प्रमेह, मूनकरछ ये रोग नाश होय ॥४॥ ( सन्न . - शाई घरसंहिता। [मध्यसएट संयुतः नाशयेन्मूत्रकृच्छाणि तथाचोष्णसमीरणम् ८५ वरादाय॑न्ददारूणां क्वाथःचौद्रेणमेहहा। वत्सकस्निफला दा: मुस्तकोवीजकस्तथा ८६ फलत्रिकाव्ददार्वीणा वि शालायाःशृतंपिवेत् । निशाकल्कयुतसर्वप्रमेहविनिवर्त येत्.८७ दार्थीरसाजनमुस्तं भल्लातः श्रीफलंशषः। कैरा तवपिवेदेपा काथशतिंसमातिकम् ८८ जयेत्सशलंप्रद रं पीतश्वेतासितारुणम् । न्यग्रोधप्लक्षकोशाचवेतसौवद रीतुणिः ८९ मधुयष्टिःप्रियालुथलोध्रद्वयमुदुम्बरः। पि प्पल्यश्चमधूकरच तथापालाशपिप्पलः ९० सल्लकीर्ति न्दुकीजम्बूहयमावतरुःशिवा । कदम्बककुभौचैव भल्लात कफलानिच ९१ न्यग्रोधादिगणकाथं यथालाभंचकार येत् । अयंकायोमहामाही व्रणभग्नंचसाधयेत् । योनि फुच्छू पर गोखुरुकाड़ा) गोखरू के पंचांगका कादा, मिश्री, शहद संयुक्त पिलाने तो.सूत्रकृच्छ, उप्रणवायु अच्छीहोय।।८५ ॥ (मूत्रकृच्छपर त्रिफला फादा) त्रिफला, दारुहल्दी, नागरमोथा और देवदारु इनका कादर शहद संयुक्त पिये तो ममेह नाराहोय( पुनः)तसेही कुरैया, त्रिफला, दारुहल्दी,नागर मोथा और.फकही इनका कादा शहद सहित पिये तो प्रमेह नाशहोय ।। ८६ ॥ ममेहपर त्रिफलाफादा) त्रिफला, नागरमोथा, दारुहल्दी, इन्द्रायण को जह इनका फादा इल्दी वर्णयुक्त पिये तो सकल प्रमेह नाशदोर्षे ॥७॥ "मदरपर दालहरकत दालहदी, रसोत, नागरयोया, मिलाया, पेल- गिरी, रूसा और चिरायता इनका काढ़ा ठपढा फरि शहद संयुक्त पिये तो पीत श्वेत कृष्ण लाल सहित शूल स्त्री का प्रदररोग अच्छा होय ॥८॥(क्षतन पादि.पर वटादिकफाड़ा) घड़, पाकर. अम्बाड़,वेवस,नेर और ततस्तकी बाल,मधुमेठी, चिनी, लो, गेलरी, पीपरि, मधूक, जगन्नाथीपीपरि, पलाश, तिन्दुक, दोनों जामुन, श्राम, छोटी हड़, कदम्ब, अनतरु, मिलार्चेका फल जो द्रव्य इनमें न मिले उसे त्यागि दे यह न्यग्रोधादिगण काढ़ा बहुतग्राही है जो पाव खराब होगयाहो सो अच्छाहो योनिदोष दाह,मेद, मह, विप ये सब नाश 1 ६७ अध्याय २] भापाटीकासमेता। दोपहरोदाहमेदोमेहविपापहम् ९२ चिल्योग्निमन्श्यो नाक काश्मरीपाटलातथा। काथमेषांजयेन्मेदोदोषक्षौद्रे पसंयुतः ९३ क्षौद्रेणत्रिफलाकाथापीतोमेदोहरःस्मृतः । शीतीभूतंतथोष्णाम्बुमेदोहरक्षौद्रसंयुतः ९४ चयचित्र कविश्वानां साधितोदेवदारुणा । काथस्त्रिटचूर्णयुतो गोमूत्रेणोदराञ्जयेत् ९५ पुनर्नवामृतादारुपथ्यानागर साधितः । गोमूत्रगुग्गुलुयुतःकाथाशोथोदरापहः९६ प थ्यारोहितकवायवक्षारकणायुतम् । पिवेत्प्रातर्यकृष्ली हगुल्मोदरनिवृत्तये ९७ पुनर्नवादारुनिशानिशाशुण्ठी हरीतकी । गुडूचीचित्रकोभागीदेवदारुतःसृतः ९८ पाणिपादोदरमुरःप्राप्तशोफनिवारयेत् । फलत्रिकोनवंक्का थंगोमूत्रेणैवपाययेत् ९९ वातश्लेष्मकृतहन्तिशोषण होय वेतसको कही जगन्नाथी पीपरि कहते हैं || ६ | १२ || ( मेदरोगपर चेलकाढ़ा ) वेल. अरणी, सोहनपात, खंभारी और पादल इनका कादा शहद संग पिये तो मेददोप मिटै॥ ६ ॥ (पुनः त्रिफलादिकाय ) निफले का काढ़ा शहद संग पिये तो मेददोप जाय उष्ण जल एढाकरि शहदसंयुक्तपिये तो मेदढोष जाय ॥ ६४ ॥ (उदररोगपर चावकाढा) चाच, चीता, सोंठ और देवदारु इनका काढ़ा निशोतचूर्ण गोमूत्र के साथ पिये तो उदररोग दूर होय ॥६५( पैटफूलने पर गदापुरैनाकाढ़ा) गदापुरैना, गर्ने, देवदार और सोंठ इनुका काहा गोमूत्र गूगलयुक्त पिये से पेटकी सूजन मिटै ।। ६६ ।। (पिलही पर हरीतकीकादा) जंगीहड, अगियाखर इनका काढा जपा. सार व पीपरियुक्त प्रातःकाल पिये से प्लीहा, वायुगोला, यकृत अच्छी हो रोहित नाम करिके खर लेना ॥ १७ ॥ (शोधपर गदांपूर्णकादा) पुरैना, दारुहरदी, सौंठ, बड़ीहड, गुर्च, चीता, भारंगी, देवदारु, इनके कादा.से हाय पाचं उदर छाती मुसकी सूजन जाय || ६८॥(अंडवृद्धि सूजन पर त्रिफलाकाढ़ा) त्रिफला के काढ़ेमें गोमूत्र संयुक्त करि रिये से बात कफ जन्य १ दक्षिणभागरथानामख्यातमाससएरः॥ - गदा- ११० शाईपरसंहिता। ([मध्यखएड ठाखदिरचन्दनः।त्रिरहरुणकैरातवाकुचीकृतमालकैः१६ शाखोटकमहानिम्बकरञ्जातिविपाजलैः। इन्द्रवारुणिकान न्ताशारिवापर्पटैःसमैः१७एभिः कृतंपिवेत्वार्थकणागुग्गु लुसंयुतम्। अष्टादशेषकुठेपुवातरक्तार्दितेतथा १८ उपदं शैश्लीपदेचप्रसुप्तेपक्षघातके,। मेदोदोषनेत्ररोगेमञ्जिष्टा दिःप्रशस्यते १९पथ्याक्षधात्रीभनिम्धैर्निशानिम्बामतायु तैः। क्वाथ कृतःषडङ्गोयंसगुणःशीर्षशूलहा २० भ्रूशङ्खक र्णशूलानितथाचाईशिरोरुजम् । सूर्यावर्तशङ्खकञ्चदन्त पातचद्रुजम् ।नतान्ध्यपटलंशुक्र चक्षुःपीडांव्यपोहति २१ वासाविश्वामृतादापीरक्तचन्दनचिन्नः। भूनिम्बनि म्बकटुकापटोलत्रिफलान्बुदैः२२यवकालिङ्गकुटजैःकाथः सर्वाक्षिरोगहावैस्वयंपीनसंश्वासनाशयेदुरसःक्षतम् २३ अमृतात्रिफलाकाथः पिप्पलिचूर्णसंयुतः। सक्षौद्रःशीत अमलतास का गूदा, सहोरा, बकायन, करंज, भतीस, नेत्रवाला, इंद्रायनकी जड़, जरासा, शारिवा और पित्तपापड़ा ये सब द्रव्य समान लेके कादा करि पीपरि व गुग्गुलु मिश्रित परि पिये से प्रारदो कोद और वातरकपीडा, उप देश, फीलपाव, प्रमुख कहे शून्यवायु, पक्षाघात, मेदोदोप और नेत्ररोग इन रोगन के दूर करने को यह सृद्धिमनिष्ठादे काढ़ा हितहै ( शिरश्शूल नेत्रपर हरीतसीकादा) हड़, बहेडा, पावरा, चिरायता, हल्दी, नौकीडाल और गुर्च इन सात औपयों के पडट्स काढ़े में गुडमिश्रित करि पिये से शिररशूल, भौंह व कानकोशूल, प्राधाशीशी, सूर्यायत, शंखमूल, देतपात, दंतरोग, रतो. धी, पटल, फूली, नेत्ररोग और नेत्रपीडा ये सब दूर होय ।। १५ । २१ ॥ (नेत्ररोग पर पासादिकाढ़ा) रुसा, सौंठ,गुर्च, हल्दी, रक्तनन्दन,चीता, चिरायता, नीर, कुटकी, परंपल, निफला, मोथा, यव, इन्द्रयय और कुरैया इस काडेसे सब नेनरोग नाशहोय स्वरभनसे कपट खुल गाय पीनस रवास कलेने का घाव जातार ॥ २२ ॥ २३ ॥ (दूसरा काढ़ा पूर्व यथा ) गुर्च,निफले फा काढा, शहद पीपरि संयुक्त टएदाकरि सदैव पीने से सब नेरोग विनाश pra अध्याय २] भापाटीकासमेता। लोनित्यंसर्वनेत्रव्यथाजयेत् २४ अश्वत्थोदुम्बरप्लक्षवट वेतसशृतम् २५ व्रणःशोथोपदंशानांनाशनःक्षालना स्मृतम्।प्रमथ्याप्रोच्यतेद्रव्यक्षुण्णात्कल्कीकृताच्छ्तात्। तोयेष्टगुपितेतस्याःपानमाहुःपलद्वयम् २६ मुस्तकेन्द्रय चैःसिद्धा प्रमथ्यादिपलोन्मिता । सुशीतामधुसंयुक्तारक्ता तीसारनाशिनी २७ साध्यंचतुप्पलद्रव्यं चतुष्पष्टिपले म्वुनितित्वार्थनाईशिष्टेनयवाणूंसाधयेद्बुधः २८आया सातकजम्बूत्वकषायेविपचेद्बुधः । यवागूशालिभियुक्तां तांभुक्त्वाग्रहणींजयेत् २९ कल्कद्रव्यंपलंशुण्ठीपिप्पली चाडकार्षिकी।वारिप्रस्थेनविपचेत्सद्रव्योयषउच्यते ३० कुलित्ययवकोलैश्चमुद्द्लकशुष्ककैः।शुण्ठीधान्यकयुक्त श्चयूषःश्लेष्मानिलापहः३१सप्तमुष्टिक्इत्येपसन्निपात होयें ॥ २४ ॥ क्षतपर पिप्पल्यादिकादा ) पीपरि, गूलर, पकरिया, बड़ श्रोर वेतस इनकी छालका कादाकरि घाव घोवै तौ उपदंशकहे गर्मी और घाव सूजन ये सर अच्छे होयें ॥ २५ ॥ ( काढ़े की दूसरी विधि ) सोपधी पीसके गोली चना अठगुणा पानी में डारि कादा करै जव चौथाई पानी रहै तब उतारिले उसे ममथ्या कहते हैं इसके पानकी माना दोपल है ॥ २६ ॥ (रक्तातीसार पर मोयादि प्रमथ्या) नागरमोथा और इंद्रयवकी प्रमथ्या दोपल दाकरि शहद मिश्रीयुक्त पिये से रक्तातीसार नाशहोय ॥२७॥ (यवा गविधान ) पोडश तोले द्रय में उसका सोलहंगणा पानी २५६ तोले भरदेय प्राधा जरिजाय तब द्रव्य छानिक फैकदेइ जो पानी रहजाय उसे यत्र गू कहते हैं व श्राम, अंबाडा यौर जामुन इन तीनों पक्षों की चारपल छाल को कूटकर चौंसठगुने पानी में डाल के औटावे जर पाया पानी रहजाये तब उतारके इस जलको छानले उसमें चारपल चावल डाल प्रौटाके उतारे इसे आम्रादि यवागू कहते हैं इसको साकर संग्रहणीको नीतताहै ॥२८२६॥ यूपविधान ) सोटका कल्क औषध एकपल तिस में पीपरि पाना मागे स्यभर पानी में पचाइ तिसमें अन्न खून गलाइके देइ उसे यूप कारागा ( सन्निपात पर सप्तमुष्टियूप ) कुलथी, यव, वेर, मूग, मरीको पदी जो MARALIA Vih शाईपरसंदिता । [म यसएड ज्वरञ्जयेताओमवातहरःकण्ठहत्ताणां विशोधनः३क्ष ग्णद्रव्यंपलसांध्यंचतुप्पष्टिपलेजले अशिष्टंचतदेयं पानेभक्तादिसंविधौ३३ उशीरपर्पटोदीच्यमुरतनागरचंद नोजलंशतहिर्मदेयंपिपासाज्वरनाशनम्३४अष्टमेनांश शेषणचतुर्थेनाईकेनवा अथवाकवनेनैवसिद्धमुष्णोदकंव देत् ३५ श्लेष्मामेवातमेदो वस्तिशोधनदीपनम्। कासे श्वासज्वरहन्तिपीतमुष्णोदकंनिशि ३६ क्षीरमष्टगुणंद्र व्यात्वीरानीरंचतुर्गुणमाक्षीरावशेर्पतत्पीतं शूलमामोड वंजयेत् ३७अथान्नप्रक्रियाचैव प्रोच्यतेनातिविस्तरात् । यवागःषड्गुणाजलेसिद्धास्यात्कृसराधना ३८ तण्डुलैर्मुस माषैश्चतिलैर्वासाधिताहिता । यवागू;हिणीवल्यातर्प पत्ताके पास होती है ये सब सूची द्रव्य 'इन सरका यूप सौंठ, धनियायुक्त प्यारे तो कफवात नाशहोय इस सप्तमुष्टिक यूप से सनिपात चर लाय प्रामात जाय कएउ हय र मुस शुद्धरहै ॥ २१॥ ३० ॥ (पानादि कल्पना) फुटी द्रव्य पलभर ले चोसठि पल पानी में औटे जय श्राधा रहिजाय उस पानी को भक्त कहते हैं इसे भोजन समय थोडा घोड़ा करिदेना चाहिये ॥ ३३॥ (प्वर पापर उशीरादिपान ) खस, पित्तपापडा, सुगन्धपाता, नागर मोधा, सौंठ गौर रक्तचन्दन इन्हें पकाय पानी टएडा करतेय तौ पियास व ज्वर नाराहोय ॥ ३४ ॥ (उष्णोदक ) त्रिक पाठा नाश व था अंश अर्द्ध शेप अथवा अतितापरे उसे उष्णोदक कहो हैं “ अथ सुश्रुतोक्करलोक सायद तपादहीनवातन्नमर्दहीनतु पित्तगिन् । यफ्नपादशेपचपानीयंदीप नस्मृतम् । शारदचापादनं पादहीन गुहेमनम् । शिशिरेचरमन्तेचीपादार शेपिाए ॥ विपरीतभृत दृष्ट्वा दापिफमार्मिकस्मृतमिति ॥६॥ फफ, आमवात, मेदा, वस्तिशोधन, दीपन रियास, बात, पर ये रोग रातितो. पणोक पीने से जाते है ॥ ६ ॥ (क्षीरपाकपिधि ) द्रश्यका घाटगुणा दूध दूधका धागुणा पानी एकरकर बाटै जर पानी जरजाय तर दूध पिये तो चारशूल दूर होय ॥ ३७॥ (घनप्रकार ) मन संक्षेप से अनविपि कहते हैं अन्न यवागू रो छ गुना जल देके पार से सरा और उना कहते है ।। ३ । चावल, मंग, 3 अध्याय २] मापाटीकासेगता। पीवातनाशिनी ३९ विलेपीवघनासिक्यासिदानीरेचतु गुणाहणीतर्पणीहयामधुरापित्तनाशिनी ४० द्रवाधिका स्वल्पसिस्थाचतुर्दशगुणेजलेोसिझोपयावर्धयायूपःकि चिद्घनारमृतः।पेयालघुतराज्ञेयाग्राहिणीधातुपुष्टिदा। यूपोवलकर करख्योलघुपाकःकफापहः।जलेचतुर्दशगुणे तण्डुलानांचतुष्पलम्४१ विपचेत्साश्येन्मण्डंसभक्तोमधु ओलघुः। नीरेचतुर्दशगुणेशिहोमण्डस्त्वसिदथकः ४२ शु ण्ठीसैन्धवसंयुक्तःपाचनोदीपनारमृतः४३धान्यत्रिक्टुसि धूत्थनुद्तण्डुलयोजितःसृष्टश्चडिङ्गुतैलाभ्यांसमण्डो प्रगुणस्मृतः।दीपनःप्राणदोवस्तिशोधनोरक्तवर्द्धनः ४४ ज्वरजित्सर्वदोपनोमण्डोप्टगुणउच्यते।सुकण्डितैरतथाट टैर्चाट्यमण्डोयवैभवेत् ४५ कफपित्तहरः कण्ठ्योरक्तपित्त याप और तिल इनकी यवागू करें यह ग्रहणीको बल देनी है तृतिको करतीहुई चातको नाशती है ॥ ३६ ॥ (विलेपीप्रकार ) अनमें चौगुना जलदे पकाने सो विज्ञपी है सो धातुओं को पो हप्तकरै मन प्रसन्न करे मिय व मधुर होकर पिरानाशक है।॥ ४० ॥ ( अथ पेया) अन्नको चौदह गुने पानी में सिद्धार पतला माठा न हो जो पियागाय उसे पेया रहते हैं उससे एकही गाडेको यूप कहते हैं यह ऐया अतीव हलकी होकर मलादिकों को स्तम्भन करती व धातु पुष्ट करती है और गूप हलका है ग्रहणी को शुद्धकरताहै धातुपुष्ट करै क्ल करै कण्ठ शुद्ध करै लजपाक दै कफहारक है ( भातविधि ) चामलसे चो- दहगुणा पानी लेके जुराये उसका मांड निचौर सो मीठाई हलकाहै उसे भक्त- मरड कहते ह (शुद्धमण्ड ) उसी मांडमें सोट र सँघर डारिक पिये तो दीपन पाचन रै।। ४५१ ४३.11 (अष्टगुण मएंट) धनियां, त्रिका, संघर, मंग चावल, हींग रेलकी भनी पययुत मांडका अष्टगुणा मांड टीपन भागटाताहै चस्तिशोधन रक्तपर्जन अरघ्न सरदोपहरण? ॥ ४४ ॥ ( यवमण्ड पित्तादि पर यूटि भूनिकै नुस्ख सो पायमण्डदै कफ पित्त हर कंटे शुद्धकर रक्तर "पित्तहरै।। ४५ ॥ (लाजमंड) धानका लाबा सुटी ट्रय वा भने धानों वना को लाजमंडह यह कफपित्तहारी च बाही होकर तृपा जर को शाईघरसंहिता [ मध्यखएट प्रसादनः। लाजैर्वातण्डुलै रै जमण्डः प्रकीर्तितःाइले प्मपित्तहरोग्राहीपिपासाज्यरजिन्सतः १४६ इति श्री शार्ङ्गधरेमध्यखण्डेकाथकल्पनाद्वितीयोऽध्यायः ॥२॥ क्षुण्णेद्रव्यपलेसम्यग्जलमुष्णविनिक्षिपेत् । मृत्पात्रे कुडवोन्मानंततस्तुनावयेत्पटात् १ तरयचूर्णद्रवःफाण्ट स्तन्मानद्विपलोन्मितम् । सितामधुगुडादीस्तुक्काथवत्तत्र निक्षिपेत् २ मधूकपुष्पंमधुकंचन्दनंसपरूपकम् । मृणालं कमलंलोभ्रंखम्भारीनागकेशरम् ३ त्रिफलांशारिवांद्राक्षां लाजांकोणेजलक्षिपेत्ासितामधुयुतेपेयःफाण्टोवासोहि मोथवा ४ वातपित्तज्वरंदाहंतृष्णामूरितिभ्रमान । रक्तपित्तंमदंहन्यान्नात्र कार्याविचारणा ५ आघजम्बूकि सलयैर्वटशङ्गप्ररोहकैः। उशीरेणकृतःफाण्ट सक्षौद्रोज्वर नाशनः६पिपासाचतीसारानमूर्छाजयतिदुर्जयाम्। म विनाशताहै ।। १४६ ॥ इति श्रीशाररमुधाकरेमध्यखण्डेद्वितीयोऽध्यायः ॥२॥ फाट करक वा कुटीद्रव्य पलभर एक कुइव पानी माटीके पानमें अच्छीभांति तप्तकरि उतारिले उस कुटीई द्रव्यको अपणोदक में दारिदकदे जर ठंडाहो तब छानिलय इसे फाट कहते हैं पाठ रपये भर फांटकी मात्रा मिश्री शहद पुराना गुड़ मिसभाति कादे में डारना कहाहै उसी भाति फांट में पड़ता है ।।१।२॥ (पित्तज्वर पै मधूकफांट) महाके फूल, मूलही, लालचंदन फालसा, कमल, लोप, संभारी, नागकेशर, त्रिफला, सरिवन, दारम और लापा के तप्तबार में डारि मिश्री शहद संयुक्त पिलाव इस पाट वा हिमसे वात, पित्त, ज्वर, दाह, प्यास, भूी, मतिभ्रम, रक्तपित्त और मृद ये सर दूरहोय इस में कुछ विचार नहीं करना चाहिये ।। ३१५॥ (पियासपर आम्रादि फांट) माम व जामुन की कॉपल बड़की कली भीतरी पचे और जटा खस इनका फांट करि पिये से ज्वर, प्यासा छदि, मतीसार और मूर्छा ये सब दूरहोये ।। ६॥(पित्तवृष्णापर मधूकफांट ) महाके फूल, खंभारी, चन्दन, खस, धनियां, नेत्रपाला वा दाख इनका फाट शवारयुक्त पिये तो प्या, पिच, दाह, 1 शाईघरसंहिता। [ मध्यस्खएर धुयष्टीचकाकोदुम्बरपल्लवैः । नीलोत्पलहिमस्तेषांतृष्णा छर्दिनिवारणः ३ नीलोत्पलंबलाद्राक्षामधूकंमधुकंतथा। उशीरंपद्मकं चैवकाश्मरीचपरूपकम् ४ एतच्छीतकषाय इचवातपित्तज्वरंजयेत् । सप्रलापभ्रमच्छर्दिमोहतृष्णानि वारणः५अमृतायोहिमायोजीर्णज्वरहरस्स्मृतः । वासा याश्चहिमःकासरक्तपित्तज्वराञ्जयेत् ६ प्रातःसशकरः पे योहिमोधान्याकसम्भवः। अन्तहिंतथातृष्णांजयेत्रोतो विशोधनः७ धान्याकधात्रिवासानांद्राक्षापर्पटयोहिमः। रक्तपित्तज्वरंदातृष्णाशोपचनाशयेत् ॥ इति श्रीशा ईधरेमध्यखण्डेहिमक्ल्पनाचतुर्थोऽध्यायः ॥४॥ द्रव्यमाद्रशिलापिष्टंशुष्कंवासजलंभवेत् । प्रक्षेपाएव क्ल्कास्तेतन्मानंकर्पसम्मितम् १ कल्केमधुघतंतैलंदेयहि गुंणसात्रया। सितागुडौसमौदद्यावादेयाश्चतुर्गणः २ हिम ) मरिन, मुलहठी, फटगलरकी कॉपल नील कमल के हिमसे वृष्णा व चर्दि का नाशहोय ॥ ३ ॥ (पित्तज्वर पर नील कमलादि हिम) नील कमल, परियारा , दास, महुआ, मुलहठी, नेनवाला, पद्माख, सभारी और फा ल्सा इनका शीतकपाय वातपित्तार, मनाप, भ्रम, यदि, मोह और तृष्णा को करता है ।। ४ । ५ ॥ (जीर्णज्वर पर गुडूच्यादि रिम) गुर्थ के हिमरे जीर्णज्वर जाताहै पासा कहे रुसा हिमसे कास और रक्तपित्तज्वर जापाई ॥६॥धनियाका हिम शकर डारि माताकालापियेसे अन्तर्दाह, तृष्णा, और सारोपये तव रोग नाशहोते हैं ॥७॥ (रक्तपित्तपर) धनिया,मावरा,रूसा, दास और पिपरापड़ा इनका हिम रमन पित्तज्वर, दाह, रूपा और कंतशोपको विताराताहै ।। ८ 11 इति श्रीशाधरेम-घसरडेहिमकल्पनाचनुर्योऽध्यायः॥४॥ (अथ फल्कविधि :) गीली औपयो शिलाप पारीक चटनी के स. पान पीसे यदि सूसीहोय तो उत्तम जलडालके पीसे तिसे करत और मतेप कहते है इसकी मात्रा दशमाशे कही है ॥ ॥ कल्क में मधु, घृत, तेलमात्रा से दना देना मिश्री गुड़ समान मात्रा अति थोदी पतली चौगुनी देना .
१०७ अध्याय ५] मापाटीकरसमेता। त्रिसद्ध्यांपञ्चर-ध्यावासप्तरङ्यार्थवाकणाः । पिवेत्पि ट्वादशदिनंतास्तथैवापकर्पयेत् ३ एवंविंशदिनैः सिद्धपि प्पलीवईमानकम् । अनेनपाण्डुवातासकासश्वासारुचि ज्वराः उदराशःक्षयश्लेष्मवातानश्यन्त्युरोग्रहाः ४ लेपा निम्बदलै कल्कोत्रणशोधनरोपणमक्षणाच्चर्दिकुष्टानि पित्तश्लेष्मकृमीजयेत् ५ महानिम्बजटाकल्कोगंध्रसीना शनःस्मृनाशुद्धकल्कोरतोनस्यतिलतैलेनमिश्रितःवात रोगाञ्जयेत्तीनाविषमज्वरनाशन:पक्क सन्दरसोनस्य गुटिकानिस्तुपीकृताः। पाटयित्वाचतन्मध्यं दुरीकुत्ति दगुरम् तदुग्गन्धनाशायरात्रौतकेविनिक्षिपेत् । अपनी यचतन्मध्याच्छिलायांपेषयेत्ततः तन्मध्ये पञ्चमांशेनचूं मेषांविनिक्षिपेत् ८ सौवर्चलंयवानीचभर्जितहिशुसैन्धव १ चाहिये ॥ २ ॥ (पांडुपर बर्द्धमान पीपरि ) पीपरि तीन व पांच व सात वदायै और मैं पीपरि से प्रारम्भकर तै प्रतिदिन बदायै दशदिन ताई फिर उतनी मतिदिन घटावै चीसदिन स्थम दिनकी मात्रा पूरी कर यो चई- मानपीपरि सिद्ध करनेसे पांडुरोग, वातरक्त. कास श्वास, अरुचि,ज्वर,उदरवि. 'कार, क्षयी, कफ, वात, छाती जकड़ना ये सब दूरहों और जो पानी व द्ध संग पिया चाहै तो तीन दिनतक दो व तीन तोले दूधले फिर कल्क से चौ- गुनाले ॥३॥४॥ (घावपर निम्बकल्क ) नींदपत्र की लुगदी चार शाईपरसंहिता। मध्यवरः पहः । नवनीततिलै कल्कोजेतारलार्शसांस्मृतः २५ नै वनीतसितानागकेसरैश्चापितद्विधः । पीतोमसरयूषेण कल्कशुण्ठीशलाटुजः।जयेत्सङ्ग्रहणींतहत्तकेणवृहतीम वः २६ इति श्रीशार्ङ्गधरेमध्यखण्डपञ्चमोऽध्यायः॥५॥ अत्यन्तशुष्कंयद्रव्यसुपिष्टवस्त्रगालित्तम् । तत्स्याबू परजाक्षोदस्तन्मात्राकर्षसम्मिता १ चर्णेगडस्लमोदेयः शर्कराद्विगुणाभवेताचर्णेषभर्जितंहिड्गुदेयनोत्छेदकृद्ध तु२ लिहचूर्णद्रचे सर्वश्रुताद्यैर्द्विगुणोन्मितः। पिवेचतुर्गुणे रेवंचूर्णमालोडितंद्रवै. ३ चूर्णावलेहगुटिकाकल्कानाम नुपानकम् । वातपित्तकफातंकेत्रियेकपलमाहरेत् ४ यथातैलंजलंप्राप्यक्षणेनैवप्रसर्पति । अनुपानवलादनेत थासर्पतिभेषजम् ५ द्रवेणयावतासम्यक्चर्णसर्वप्लुतं भवेत् । भावनाया:प्रमाणन्तुचर्णेप्रोक्तंभिपग्वरः ६ आ मलंचित्रकःपथ्यापिप्पलीसैन्धवस्तथा। चूर्णितोयंगणोज्ञे पीनेसे ग्रहणी नाशहोय भटकटैया के फलमा कल्क महाके साय पीनेसे संग्रहण रोगको जीतताहै ।। २५/२६ ॥ इति श्रीशाईघरसुधाकरेपश्चमोऽध्यायः ॥५॥ (अध चूर्ण विधि ) तीर सूतीद्रव्य टिक कपड़े में छनिले उसे चूर्ण रम और नोद कहते हैं इसके साने की माना कर्षभर कही है ॥ १ ॥ चूर्ण में गुह समान लेना साड़ भूनी हींग भनी हुई देना ॥ २ ॥धृत शहद श्रादि तथा ववस्त दूनी दे चाट और पीनेकी द्रव्य चूर्ण के साथ चौगुनी देना ॥३॥ चूर्ण, अवलेह, गुटिका और परक इनका अनुपान घात में वीन पल पित्त में दो पल कफर्भ एक पल दे ॥४॥ अनुपान देने का कारण यहहै कि जसे तेल पानी में डाले से फैल जाताई सेही अनुपान के बल से प्रापध मवेश करती है॥५॥ श्रीपध में किसीको पुट देनाहो तो तिने में पूर्ण पुटकी मुफिकहो विनना देना मारना देनाहो तो चूर्णस्थान में भावभाारा में देख लेना ॥ ६॥ (सर्वज्वरपर आमलकादि चूर्ण) श्रावरा, पीता, हड़, पीपरि, संघर पाचोंका चूर्ण सर्वनर नाशकर बरेचरोचक,कफहा होकर दीपन पाचनहै ।।
अध्याय, भापाटीकासमेता। यः, सर्वज्वरविनाशनः ७ भेदीरुचिकरःश्लेष्मजेतादीप नपाचनः।मधुनापिप्पलीचूर्णलिहेकासज्वरापहम् ८ हि काश्वासहरकण्ठ्यशोहनंबालकोचितम् । एकाहरीतकी योज्याहौतुयोज्यौविभीतको ९ चत्वार्यामलकान्येवत्रिफ लैपाप्रकीर्तिता । त्रिफलामेहशोथनीनाशचेद्विपमज्वरा त् १०दीपनीश्लेष्मपित्तघ्नीकुष्ठहन्त्रीरसायनी।सर्पिमधु भ्यांसंयुक्तासैवनेत्रामयाञ्जयेत् ११ पिप्पलीमरिचंशुण्ठी त्रिभिस्त्र्यूषणमुच्यते। दीपनंश्लेष्मदोषघ्नंकुष्ठपीनसना शनम् १२ जयेदरोचकंसाममेहगुल्मगलामयान्। पिप्प लीचविकांविश्वापिप्पलीमूलचित्रकैः १३ पञ्चकोलमि तिख्यातंरुच्यपाचनदीपनम् । आनाहलीहगुल्मघ्नंशल श्लेष्मोदरापहम् १४. त्रिगन्धमेलात्वपत्रैश्चातुर्जातंस केसरम् । त्रिगन्धंसचतुर्जातंरूक्षोष्णंलघुपित्तकृत् १५ व (ज्वरपर पीपरिचूर्ण) पीपरि, शहद युका चाटै तो ज्वर, कास, हिचकी, श्वास, करटरुज, पिलही ये सकल रोग नाश होय तथा चालकों के लिये यो. ग्यई (प्रमेहपै त्रिफलाचूर्ण) हड़ एकभाग यहड़ा दो भाग भांवरा चारभाग इसमकार त्रिफला है सो त्रिफला प्रमेह शोध और विपमज्वर को नाशकरती है और दीपन कफ पित्त नाशन व कुपहरण होकर रसायन है ,वही त्रिफला शहद व वृतयुक्त खाने से नेत्ररोग दूरकरै है ॥७१-११-१॥ पीपरि, मरिच और सौंद इसे ज्यूपण और त्रिकुटा कहते हैं यह दीपन होकर फफ कुष्ठाव पीनस को नाशकरताई तथा श्रांव, अरुचि, मेह, गुल्म कण्ठरोग ये सब दूरहोय (कफादिपर पञ्चकोलचूर्ण ) पीपरि, चाव, सोंड, पीपरापून और चीता इसे पञ्चकोल कहते हैं यह रोचन, पाचन और दीपन होकर पानाह, पिलही, गुल्म, शल, कफ, उदररोग इनसबों को नाशताहै ॥ (निगन्ध चूर्ण) इला- यची, दालचीनी और तन ये त्रिगन्ध ( चातुर्जात)-इलायची, दालचीनी, और केसर ये, चातुर्जात है ये दोनों रूसे हैं उष्ण है .कुछ पित्तकारक है कांविरुचि का तीक्षण और विप व कफको नाशते हैं । (जीवनीयगण) पत्रज H ११३ शाईपरसंहिता । मध्यखण्डं एयरुचिकरतीक्ष्णंविषश्लेष्मामयाजयेत् । काकोलीक्षी रंकाकोलीजीवकर्पभकौतथा १६ मेदाचान्यामहामेदाजी चन्तीमधुकन्तथा । मुद्गपर्णीमाप्रपर्णीजीवनीयोगणस्त्व यम् १७जीवनीयोगणःस्वादुर्गर्भसन्धानकगुरुः । स्तन्यक इंहणोष्यःस्निग्धश्शीतस्तपापहः । रक्तपित्तक्षयंशोषं ज्वरदाहानिलाञ्जयेत् १८ रेमदेवेचकाकोल्यौजीवकर्षभ कौतथा। ऋदिउद्दीचनैःसधैरष्टवर्गउदाहृतः। अष्टवर्गो बुधैःप्रोक्लोजीवनीयसमोगुणेः १९ सिन्धुसौवर्चलंचववि डसामुद्रिकेंगडमाएकद्वित्रिचतुष्पचलवणानिकमाहिदुः २० तेषुमुख्यसैन्धवस्यादनुक्ततत्प्रयोजयेत् । सैन्धवाचं रोमकान्तज्ञेयंलवंणपञ्चकम् २१मधुरसृष्टविणमूत्रंस्निग्धं सूक्ष्मवलापहम् । वीर्योषणांदीपनंतीक्ष्णंकफपित्तविवई नम् २२ स्वर्जिकायावशूकश्चक्षारयुग्ममुदाहृतम् । ज्ञे काकोली, क्षीरकाकोली, जीवक, अपभक, मेदा, महामेटा, जीवन्ती " पिया लताकी धीनीकी बीमीनीसो तरकारी होतीहै" मुलहठी, मूंगफली और उर्दफली इनकी जीवनीयगण संज्ञाहै सो स्वादिष्ट, गर्भस्थितिकारक, भारी, दुग्धवादिनी, धातुपोषक, धातुशोधक, स्निग्ध व टण्दी होकर तृष्णा, रक्तपित्त, क्षयी, शोप, वर, दाह और वायुको हरताहै ॥१२१८ ॥ मेदा. दोनों काफोली, जीवक, अपभक. ऋद्धि और वृद्धि यह भष्टवर्ग है परन्तु पाठमें कोई मिलती है भष्टवर्ग को वैद्यलोग जीवनीयगणके तुल्य कहते हैं ॥ १९ ॥ (विपमूत्र पर लवण पंचफचूर्ण) सेंधा, सौचर, बिनोन, खारी और सांभर इन पांचों में पहिला एक लवण, पहिले य दूसरे को दिलवणः पहिले, दूसरे च तीसरेको निलवण, पदिले, दूसरे, तीसरे व चौथ को चतुर्लवण और पहिले, दूसरे, तीसरे, चौधे पांचवे को पंसलवण कहते हैं ॥ २० ॥ इनमें सेंधा मुख्य है जहां नाम न लिसें तहां सेंधा लेना सैंधे से सांभरि तर्फ पांच लोन जानो ॥ २१ ॥ पाक मधुर मल मूत्र पकार्यकै गिराता है चिकना मवेश करता चलइरता धातु को गरम करताउँमा दीपन घ तीक्ष्णहो कफ व पिचको बढ़ाता है ।। २२॥( गुल्मा. ८ अध्याय ६] भाषादीकासमेत। यौवह्निसमौक्षा स्वर्जिकायावशूरजौ २३क्षासश्चान्ग्रेडि. गुल्माझेब्रहणीरुक्छिदामराः । पाचना कृमिपुरत्वघ्नाः शर्कराइमरिनाशनाः २४ त्रिफलारजनीयुग्मंकण्टकारीयु, गेशटी । त्रिकटुग्रन्थिकमूगडूचीधन्वयासकाः २५क टुकापर्पटोसुस्तंत्रायमाणाचबालक । निम्बःपुष्करमूलंच मधुयष्टीचवत्मकम् २६ यवानीन्द्रयवोभार्गीशिग्रुबीजंमु राष्ट्रजा । वचात्वक्पाकोशीरंचन्द्रनातिविषाबलाः २७ शालपर्णीपष्टपर्णीविडङ्गतंगरंतथा । नित्रकोदेवकाष्ठा, चव्यंपत्रपटोलजम २८ जीवकर्षभको चैवलवङ्गवंशलो चनम् । पुण्डरीकंचकाकोलीपत्रजजातिपत्रकम् २९ ता लीसपत्रंचतथासमभागानिचूर्पयेत् । सर्वचूर्णस्यसाची शंकैरातंप्रक्षिपेत्सुधाः३० एतत्सुदर्शनंनामचूर्णदोषत्रया पहम् । ज्वरांश्चनिखिलान्हत्यान्नात्र कार्याविचारणा ३१ दिपर खार ) सज्जीखार और जवाखार ये दो खारा कहे हैं सो दोनों अग्नि समान देदीप्यमान हे ।। २३ । और तार सहिननक्षार गदापूर्णतार भी- गुल्म, अर्श, ग्रहली इन रोगों को नाश करता है तथा पाचन कृमिनाशक पुं- स्त्यहन्ताहो शर्करा व पथरी को हरता है ।। २४ा ( सर्यवरपर सुदर्शन चूर्ण) त्रिफला, दोनों हल्दी, दोनों भटकटैया, पर, निजुटा, पीपरामरा सूची, गुर्च, धमासा ॥ २५ ॥ कदुकी, पिरापापदा, नागरमोथा यमागणार घाला, नीरको छाल, पुष्करमूल, मुलहठी, कुरैया ॥ २६ ॥ अजवाइन) इन्द्र यत्र, भारंगी, सहिजन के क्रिया, भुनी फटकरी, वच, तज, पाख, सस श्या चन्दन, अतीस, बरियारा ॥२७ ॥ बनर्दी, वनमंग, पायनिहंग, तगर, चीता, देवदारु, चाव, पटोल ॥२८॥ "जीवकऋषभक इन दोनों के प्रभारमें विदारी कन्द लेना" लॉग, वंशलोचन कमलपत्र, कामोजी के अभाव में गलही लेना दुइ में दूना तेजपात, जादित्री ॥ २६ ॥ तातीसपत्र ये सब समानने चादरे सब पूर्णका आधा चिरायता डार ॥ ३० ॥ यह दर्शन गर्ग मिटोपनाशकहो निधय सर्वज्वर को हरता है इसमें विचार नहीं करना चाहिये ॥ ३ ॥ १५ शाईपरसंहिता। { সব एथग्द्वन्द्वागन्तुजांश्चधातुस्थान्विषमज्वरान् । मन्त्रिपा तोद्भवांश्चापिमानसानपिनाशयेत् ३२ शीतज्वरका हिकादीन्मोहतन्द्रांभ्रमंतषाम् । श्वासंकासंचपाण्डुत्वंह द्रोगहन्तिकामलाम् ३३ त्रिकप्टष्ठकटीजानुपाचशूलनि चारणम् । शीताम्बुनापिवेद्धीमान्सर्वज्वरनिवृत्तये ३४ सुर दर्शनंयथाचक्रंदानवानांविनाशनम् । तद्वज्ज्वराणांसर्वे पामेतचूर्णनिवारणम् ३५ कासश्वासज्वरहरात्रिफला पिप्पलीयुता। चूर्णितामधुनालीढाभेदिनीचाग्निवोधिनी ३६कट्फलंमुस्तकतिक्ताशुण्ठीशृङ्गीचपौष्करमाचर्णमेपां चमधुनोशृङ्गवेररसेनच३७लिहेज्ज्वरहरंकण्ठ्यंकासश्वा सारुचीर्जयेत् । वातशूलंतथाछर्दिक्षयंचैवव्यपोहति ३८ शङ्गीप्रतिविषाकृष्णाचूर्णितामधुनालिहेत् । शिगोःका. सज्वरच्छर्दिशान्त्यैवाकेवलाविषाम् ३९ शुण्ठीप्रतिविषा य एकाहिक,द्वन्द्वन सनिपातन और मानस ऐसे सर ज्वरों को बिनाश्ता है ।।३।। शीतज्वर, अडी, अंतरिया, तृतीयक, यातुधिक, मोह, तंद्रा, भ्रम, तृपा, श्वास, कास, पादु और हृदयरोग को हरै ॥ ३३ ॥ रीड़, पीठ, करिहाउँ, माध, पपुरी इन अंगों की पीड़ा नाश होइ जो शीत जल के संग पिये नौ सर्वधर हरै।। ३।। जैसे मुदर्शनचक्र सब दानवों को नाशताहै वैसेही मुदर्शन चूर्ण सब ज्वरों को नाश करता है ।। ३५ ॥ (त्रिफलादि चूर्ण कास यास ज्वर पर) त्रिफला पीपरिपूर्ण शहद संग चाट तो कास, श्वास, ज्वर हरै तया भेदी हो अग्निको प्रवल करताहै।। ३६ ॥ (कफज्वरपर कायफलादिचूर्ण) काय. फ्ल, नागरमोथा, फुटकी, सोंठ, काकडासिंगी और पुप्फरमूल इन द्रव्यन का पूर्ण शहद अदरख रससंग चादे तो ज्वरहरै फंशुद्ध होय कास, ग्यास, भाचे, चातशूल, धर्दि और नयी ये सब जाय ॥ ३७ । ३८॥(पालककी सांसी ज्वरपर काकडासिंगी आदि पूर्ण) काकड़ासिंगी, श्रीस और पीपरि का पूर्ण मधुयुक्त चटावै ती बालककी सासी, ज्वर, छर्दि ये दूरहोयें वैसेही धेचज भतीस से भी उक्तरोग जाय ॥२६॥(आमातीसार पर शुंग्यादि.
अध्याय ६] भापाटीकासमेवा। हिगुमुस्ताकुर्टजचित्रकैः ।चूर्णमुष्णाम्बुनापीतवाताती सारनाशनम् ४० हरीतकीप्रतिविपासिन्धुसौवर्चलंवचा। हिगुचेतिकृतंचूर्णपिवेदुप्णेनवारिणा ४१ आमातीसार शमनग्राहिचाग्निप्रबोधनम्।मुस्तमिन्द्रयविल्वंलोधेमो चरसंतथा ४२ धातकींचर्णयेत्तकगुंडाभ्यांपाययेत्सुधीः। सर्वातीसारशमनंनिरुणद्धिप्रवाहिकाम् ४३ लघुगङ्गाधर नामचूर्णसङ्ग्राहकंपरम्। मुस्तारलूकशुण्ठीभिर्धातकीलो ध्रवालकैटविल्वमोचरसाभ्यांचपाठेन्द्रयववत्सक आ स्रवीजप्रतिविपालंज्जालुरितिचूर्णितम् ४५ चौद्रतण्डुल पानीयपीतैर्यातिप्रवाहिका । सर्वातीसारग्रहणीप्रशर्मया तिवेगतारगङ्गाधरनामसरिद्वेगविवन्धकम् ४६तकेण 'यापिवेन्नित्यंचूर्णमरिचसम्भवम् । चित्रसौवर्चलोपेतंग्रह रणीतस्यनश्यति।उदरप्लीहमन्दाग्निगुल्मार्शोनाशनम्भवे चूर्ण) सौंठ, अतीस, हींग,नागरमोथा, कुरैया और चीता इनका चूर्ण उष्णपानी के साथ पियेसे पात्र व अतीसार दूरहोये ॥ ४० ॥ (आमवात पर हरीत- क्यादि चूर्ण) बड़ी हड, अतीस, सेंधालोन, कालालोन, बच और भुनी हींग इनका चूर्ण उष्णोदक सौ पिये तो ग्रामवातावीसार जाय तथा नाही हो अप्निको जगाता है ( सर्यातीसार पर लघुगंगाधर चूर्ण) नागरमोथा, इन्द्ररर, . - Hom ११६ शाधरसंहिता! [मध्यसएट ४७अष्टौभागाःकपित्थस्यपड्भागाशर्करामता । दाडि मंतिन्तिडीकंच श्रीफलंधातकीतथा ४८ अजमोदाचपिप्प ल्याप्रत्येस्युस्त्रिभागिकाः मरिपंजीरधान्यग्रन्थिकंवों लकत्तया९ सौवर्चलेपनानीचातुर्जातसचित्रकमाना गरंचैकभागास्य प्रत्येकंसूक्ष्मंचूर्णितम् ५० कामित्याष्टक सशंस्याच्चमितद्गलामयात्।अतीसारक्षयंगुल्मंग्रहणीं पव्यपोहति ५१ दाडिमाद्विपलाग्राह्याखण्डाचाप्टपलानि चात्रिगन्धस्यपलंचैकंत्रिकटुस्यापलत्रयम्५२एतदेकी कृतसवैचूर्णस्यादाडिमाटकमारुचिद्दीपनंकण्ठ्यंग्राहिका मज्वरापदम् ५३दाडिमस्वपलान्यष्टीशर्करायाःपलाष्टकं पिप्पलीपिप्पलीमलंगवानीमरिचंतथा५४धान्यकंजीरक शुण्ठीप्रत्येकंपलसमितम्।कर्षमात्रातुगातीरीत्वपत्रैला चकेसरम५५ प्रत्येकंकोलमात्राःस्यरतचूर्णदाडिमाष्टकं अतीसारक्षयंगल्मंग्रहणींचगलग्रहम् । मन्दाग्निपीनम अर्थ घे सब अच्छेहोर्थे । ४७ ।। संग्रहणी पर पित्यष्टक चूर्ण) पाठ भाग पधा कैया छरभाग खाट, अनार, अमली, बेलगिरी, फूल, अजमोद और पीपरि ये सब तीन सोन भाग मरिच, जरा, धनिया, पीपरामूल, सुगन्माला, श्रमपाइन, तन, मन इलायची, नागकेसर, चीता और सौट थे सर एक एक भाग इन ससो महीन चूर्ण बरै यह कपिलमाष्टक नाम पूर्ण गले के रोग, प्रतीसार क्षयी, गुन्म, ग्रहगी इन सबों को अच्छा करता । ४॥ ('प्रहणीपर दाडिमाष्टक । अनारदाना भाउ परामर, शाररीसभर तन, पत्रमा इन यची तीनों मिला के चार भर विटा यारह भा इन्हें एककरि पूर्ण 'करे यह दाहिमाष्टक नाम चूर्ण रोचक, दीपन व ग्राहीहोकर बैठ शुद्ध करताहुआ वासपासी नारताहै ।। ५२/५३ ॥ (अतीसार पर वृद्ध दाडिमाष्टक) मनगटासा पाठल, पीपरि पोपरान्त, अनलाइन, मिर्च धनियां श्वेत जीरा, से ये राय पल पामा शलोपा दशमाशे तन, मर्मज, गला, नागकेसर ये पाच पाचमारा यह दूसरा दागिर क्षयी, अनीगार, मुरम, ग्रहणी, गलप्रहा अध्याय ६॥ भपाटीकासमेता। ११७ कासंचूर्णमेतद्धपोहति ५६ लवङ्गंशुद्धकर्परमेलीत्वना गंकेसरम जातीफलमुशीरंचनागरंकृष्णजीरकम् ५७क पागुरुरतुगाक्षीरीमांसीनीलोत्पलंकणाचन्दनंतगरंबालं कोलतिचूर्णयेत्५८ समभागानिसर्वाणिसर्वाचिसि ताभवेत-लवेवमिदंचूर्णराजावह्निदीपनम् । ५९ रो चरंतप्रध्यंत्रिदोषघ्नंवलप्नदस् । हृद्रोगकण्ठरोगंचका संहिकोंचपीनसम् ६० यक्ष्मातमकंश्वासमतीसारमुरा क्षतम्। प्रमेहारुचिगुल्मोदीन्ग्रहणीमापिनाशयेत् ६१ जा तीफलं लव लोपत्रेस्त्वङ्नागकेसरैः । कर्परेचन्दनतिले स्त्वपक्षीरीलगरामलैः६२ तालीसपिप्पलीपथ्याचित्रक स्थूलजीरकःशुठीविडङ्गमरिचान्समभागाविचूर्णयेत्। ६३यावन्त्येतानिसर्वाणिकुर्यानाचतावतीम्। सर्वचूर्णस मादेयाशर्कराचाभिषग्वरैः ६४ कर्षमानंतथाखादेन्मधुना सावितंसुधीः । अस्यप्रभावाद्हणीकासश्वासारुचिक्षयाः। वातश्लेष्मप्रतिश्यायाःप्रशर्मयान्तिवेगतः६५ मरिचना मंदाग्नि, पानस मार 'कास इन रोगों को नाश करै॥५४१५६ ।। (क्षयी पर लवंगादि चूर्ण) लवंग, शुद्ध कपूर, इलायची दालचीनी. नागकेसर जायफल, खस सौ कृष्णजीरा, कृष्णप्रगर,बंशलोचन जटामासी,नीलकमल पीपरि,चन्दन तगर, सुगंधवाला पार कंकोल इनका चूर्ण कार चूर्णकी औधी मिश्री मिलावै यह लवंगादिचूर्णराज, दीपन, रोचक, प्रतिकारक होकर धातु पुष्ट करें त्रिदोपहर पलमद कंद हृदयरोग,कास, हिचकी, पीनप्तक्षयी,तमक, स्वास अतीसार,उर क्षवाममेह, अरुचि, गुल्म और ग्रहणी इन सर्वोको दूरकरै।। ५७ १६१॥ जाती- फलादि चूर्ण) जायफल, लोग, इलायची, तो पत्रंज, नागकेसर, कपूर चंदन, तिल वंशलोचन, तगर, यारा तालीसपत्र पीपरि, इंद, पीती, काला जीरा, सोह, मायक्लिंग और मरिच इन सबके समान भाग लेना तिसफा चूर्ण करि पूर्ण के रायरं साड़ दे कर्ष भर शहद मिलायकै साय' इसके प्रभाव से ग्रहणी, कास, स्वास चि, क्षयी वात कफ और नॉक टपकना ये रोग वेगही "
शाईघरमाहता
मयंसगड
गपुष्पाणितालीसंलवणानिच'। प्रत्येकमेकभागास्युःपि
प्पलीमूलचित्रः ६६, त्वकणातिन्तिडीकंचजीरकंचहि
भागिकाः धान्याम्लवेतसौविश्वंभद्रेलावदराणिच ६७
अजमोदीजलधरःप्रत्येकंस्युस्लिभागिकाः । सषिधचतु
थोशंदाडिमस्यफलंभवेत् ६-द्रव्येभ्योनिविलेभ्यश्चसि
तादेयार्द्धमात्रयामिहाखाण्डवसञ्ज्ञस्याचूर्णमेतत्सुरोचन
म् ६९ अग्निदीप्तिकरहाकासातीसारनाशनमाहद्रोग
ठजठरमुखरोगप्रणाशनम्७० विसूचिकांताध्मानमर्शी
गुल्मकृमीनपि । छर्दिपञ्चविधांश्वासंचूर्णमेतद्व्यपोहति
७१ चित्रकत्रिफलाव्योपंजीरकंहवुषावचायवानीपिप्प
लीमलंशतपुष्पाजगन्धिका ७२ अजमोदाशटीधान्यंवि
डॉस्थूलजीरकम् । हेमाहापौष्करमूलक्षारोलवणपञ्च
कम् ७३ कुष्ठं चेतिसमांशानिविशालास्याहिभागिका ।
तृधिभागाविज्ञेयादन्त्याभागत्रयंभवेत् ७४-पतुर्भागा
शातलास्यात्सर्वाण्येकत्रचूर्णवेत् । पाचनंस्नेहनाद्यैश्च
दूरहोयें ।। ६२ ॥६५॥ (अरुचि पर महाखांडवपूर्ण) मरिच, नागकेसर,
तालीसपुत्र, पांचौ लोन ये सब समान भाग लेना पीपरामूल चित्रक,तज,पीपरि,
अमलीकीडाल और जीरा ये सब दो २ भाग लेना धनियां, अम्लवेवस,सोंठ
बड़ी इलायची, बेर, मनमोद और मोथा से बीन तीन भाग सब द्रब्यकी चौथाई
अनार सबकी आधी-मिश्रीदे यह महाखांव सड़क पूर्ण रोचक दीपन हो हृदय
को बलदायकई तपा अतीसार हृदयरोग, केउ जलना,मुसरोग, हैजा,पेट फूलना
यवासीर, गुल्म, ऋमिरोग पंचविधा और श्वास इन्हाको नाशकरै ।। ६६ ॥
७॥ (उदररोगपर नारायण वर्ण) चीता, त्रिफला, सोंठ, पीपरि,
गरिच, जीरा हाम्चेर वच, अजवाइन, पीपरामून, सौंफ, अजमोद, कचूर, धनि-
गा, पापड़िग, कालोनीरी, चोक, पुष्करमूल, दोनोलार, पाँचौलोन और फूट
सब समान ले इन्द्रायणकीजड़ दो भाग, निशोध तीन भाग, जमालगोटा तीन
भाग पीतपुष्पी, सेहुण्डमूल चारि भाग इन सपोंको एकत्रकरि चूर्णकर कठिन
ये
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अध्याय ६
भापाटीकासमेता।
स्निग्धकोष्टस्यरोगिणः ७६ दद्याचूर्णविरकायेसर्वरोगप्र
णाशनम् हृद्रोगेपाण्डुरोगेचकासेश्वासे भगन्दरेदमन्दे
नौ बज्वरेकुष्ठेग्रहण्यांचंगलग्रहे। दद्याद्युक्तानुपानेनतथा
ध्मानेसुरादिभिः ७७ गुल्मेवदरेनीरेणविड्भेदेदधिमस्तु
ना उष्णाम्बुभिरजीर्णेच रक्षाम्लैंःपरिकर्तिपु७८ उष्ट्रीदु
धेनोदरेपुतथातऋणवागवामाप्रसन्नयावांतरोगेदाडिमै
रर्शसांतथा ७९ द्विविधेचविषेदद्याघृतेनविषनाशनम् ।
चूर्णनारायणनामदुष्टरोगगणापहम् हवुपात्रिफलाचे
वत्रायमाणोचपिप्पली । हेमक्षीरस्तरच्चैव शातलाक
टुकावचा १ नीलनीसैन्धवंकृष्णालवणंचेतिचर्णयेत् ।
उष्णोदकेनमत्रेणदाडिमास्त्रिफलारसैः २ तथामांसर
सेनापियथायोग्यपिवेनरः । अजीर्णेलीहगुल्मेषशोफी
शेधिपमाग्निषु ८३ हलीमकामलापाण्डुकुछाध धमानो
दरेष्वपि । शुण्ठीहरीतकीकृष्णासौवलंतथाः ।
- ६ ।। शाईपरसंहिता । ममसर कम् । शुण्ठीहरीतकीचेतिक्रमंड्याविचूर्णयेत् । वडवा नलनामैतच्चस्यादग्निदीपनम् १ अजमोदाविडङ्गा निसेन्धर्वदेवदारुव । चित्रकपिप्पलीमूलेशनपुष्पा,पि प्पली २ मरिचंचेतिकर्षांशप्रत्येककारयेद्बुधः । कर्पा स्तुपश्यपथ्यायादास्यु:खदारुकात् ३ नागराञ्चदशैव 'स्युःसर्वाण्येकंत्रचूर्गायेत् । पिवेत्कोष्णजलेनैवचूर्णचगुड सम्मितम् भक्षयेदथवासम्यकपरश्वयथुनाशनम्।आ मवातरुजहन्ति सन्धिपीडांचगंध्रसीम् ५ कटिरष्ठगदा स्नाञ्चजवयोश्चरुजंजयेत् । तूणींप्रतूणींविश्वाचीक फवातामयाजयेत्६ हिगुपाठाभयाधान्यदाडिमंचित्रका शटी। अजमोदात्रिकटुकहवुषाचाम्लवेतसम् ७ अजग इन्धातिन्तिडीकंजीरकपौष्करंवचाराचव्यक्षारंवयंपचलंव णानिविचूर्णयेत् ६. प्राग्भोजनस्यमध्येवाचूर्णमेतत्प्रयो थनिटीप्त व संचिको उपजाताहुआ कफ-को नाशताहै ॥१००॥ (मन्दाग्नि पर घडवानलचूर्ण) संघा पीपरामूल, पीपरि. चाब, चीना, मोट भौरवडी हड़ क्रमसे बढ़ाय पूर्ण कर जैसे सेंघा १ माशा तो पीपरामल २ मारा पीपरि ३ माशाभर लेना यह बड़वानल नाम अग्नि को जगाताहै ॥१॥ (वातादि पर अजमोदादिचूर्ण) अजमोद, वायविडंग, सैंधव, देवदाय, चीता, पीपरामल, सौंफ, पीपरि ॥ २ ॥ और मिर्च ये द्रव्य कर्प कर्ष भर हद पांच कर्प विधारा दराकर्ष ।। ३ ।। साठ दशकप इन सोको चूर्ण कर गुहमिश्रित करिअपणोदक से पिये ॥ १ ॥ अच्छीतरह खाप तो सूजन द्रहोय और सामवात,गाडि पीड़ा, मृध्रसी वायु ॥ ५ ॥ कटिपीडा, पीठ, गुदा, जायपीन, तूनीवायु, मतूनी व यु, विश्वाची, कफरोग और वायुके रोग ये सब नाशहोय ॥ ६ ॥ (शूलादिपर हिंग्यादिचूर्ण · भुनी हींग, पाड़ा, बड़ी, इड, धनियाँ, अनारदाना, चीता, फापूर, अजमोद. त्रिफुटा, हाऊवेर सम्लचेतस ॥ ७ ॥ वनतुलसी, इमली की दाल, जीरा, पुष्करणल, वच, चाय, 'दोनोंचार और पांचोलोन इन सबोंको चर्यकरै ।।1८!! भोजनादिक के प्रथम मधवा पुराने मयफे संग या गरम - अभ्याय १] भाषादीकासमेता! १२३. जयेत् । पिवेहाजीर्णमद्येनतक्रेणोष्णोदकेनवा : गुल्मे वातकफोद्भुतेविड्यहेऽष्ठीलिकासुच। हस्तिपार्श्वशूलेषु शलेचगुदयोनिजे १.० मत्रकृच्छेतथानाहेपाण्डुरोगेऽरुची तथा- हिकायांयकृतिश्लीहिश्वासेकासेगलग्रहे. १.१ ग्रह पयर्चाविकारेषुचर्णमेतत्प्रशस्यते । भावितमातुलुङ्गस्यव हुशास्वरसेनवा । कुर्याच्चंगुटिका पथ्यावातश्लेष्मामया पहाः, १२ यवानीदाडिमंशुण्ठी तिन्तिडीकाम्लवेतसौं । बंदराम्लंचकुर्वीतचतुःशाणमितानिच “१३ साईदिशा णमरिच पिप्पली दशशाणिका । त्वक्सौवर्चलधान्याक जीरकंद्विहिशाणिकम् १४ चतुःषष्टिमितैःशाणैःशर्करा मंत्रयोजयेत् । चर्णितसर्वमेकत्रयवानीखाण्डवाभिधम् । १६ नाशयेत्पाण्डुरोगंचहृद्रोगंग्रहणीज्वरम् । छर्दिशोषा- तिसारांश्चप्लीहानाहविवन्धता । अरुचिंशूलमन्दाग्नीचा #जिलागलामयान १६ तालीसमरिचंशुण्ठीपिप्पलीवं शलोचना। एकद्वित्रिचतुष्पञ्चकर्षे गान्प्रकल्पयेत् १७ जल के साथ खाय ।। ६ ।। वात कफ का गुल्म, कोष्टबन्ध, अष्ठीलिका, हृदय, पडू,पसुरी,गुदा और योनिके सब शल ॥ १० ॥ सूत्रकृच्छ, पेट फूलना, पाण्ड, अरुचि, हिचकी, यावं, प्लीहा, रवास, कास, गलरोग ॥ ११॥ महणी और अर्श इनपर यह. चूर्ण है. बिजौरा के रस में सात भावना दे गोली बांध ले. इस से मात कफ रोग नाशहोय ॥ १२ ॥ (अरुचिपर पानीखांडव घूर्ण) अजवाइन, अनारदाना, सोह, इमली की दाल, अम्लकेतस और झरबेर ये सब चार चार शाण, ॥ १३ ॥: मरिच ढाई शाण, पीपरि दशंशा- प, तेज, कालीनोन, पनियां, जीरा ये दो दो शाण ॥१४॥ शर्करा चासनि शाण "शाण चारिमाशे का होताहै" इन सबों का पूर्ण कर इसे संवानी- सांडव कहते हैं. ॥ १५ ॥ यह पांडु, हृद्रोग, ग्रहणी, छर्दि, शोप, अतीसार, प्लीहा, पेट फूलना, कोष्ठबद्ध, अरुचि, शूल, मन्दाग्नि, अंश, जीमरोग और गलारोग इन सबोंको विनाशर्त है ।। १६(अरुचिपर तालीसादिचूर्ण) १२६ वापरसंहिता मव्यसएट 'हभस्महरीतक्यौचनमर्दकचित्रको । भल्लातकविडङ्गानि- शर्करामलकानिशा ३४ पिप्पलीमरिचंशुण्ठीवाकुचीकृत मालकः । गोक्षुरश्चपलोन्मानमेकैकंकारयेद्बुधः-३५सर्व मेकीकृतंचूर्णभङ्गराजेनभावयेत्।अष्टभागावशिष्टेनखदि रासनवारिणा ३६ मावयित्वाचसंशुष्कंकर्षमात्रंततःपिये त् । खदिरासनतोयेनसर्पिघापयसाथवा ३७ मासेनसर्वकु छोनिविनिहन्तिरसायनम् पञ्चनिम्वमिदंचूर्णसर्वरोगप्त पाशनम् ३८ शतावरीगोक्षुरफबीजंचकपिकच्छुजम् । गाङ्गेरुकीचातिबलाचीजमिक्षुरकोद्भवम् ३९ चर्णितंसर्वः मेकंत्रगोदुग्धेनपिवेनिशि । नतृप्तियातिनारीभिर्नरश्चूर्ण प्रभावत्तः ४० अश्वगन्धादशपलातन्मात्रोम्बदारुकः। चूर्णीकृत्योभयं विद्वान् घृतभाण्डनिधापयेत् ४१ ककंप यसापीत्वानारीभिर्नेवतप्यति- अगत्वाप्रमाभूयोवली पलितवर्जितः ४२ चित्रकत्रिफलामुस्ताविडमंत्र्यूषणा निच। समभागानिकार्याणिनवभागाहतायसः४३एतदे कीकृतंचमधुसर्युितलिहेत् । गोमूत्रमधवातक्रमनुपा नंप्रशस्यते ४४ पाण्डुरोगंजयत्युग्रंहद्रोगंचभगन्दरम् । नित्र पूर्ण करते हैं जोकि सत्र रोगों को नाश करता है ।।३३ } ३. (शसा- परिचूर्ण पुष्टिपर) शतापरि, गुरू, क्यवारके बीज, गुलसपरी परियारा, तालमखाना ॥ २६ ॥ इनका पूर्ण गोदुग्ध में पिये इस के प्रभाव से स्त्री से तृप्त न होय और जो स्त्रीप्रसंग न करे तो चली होय चार रखेत न होय ॥ ४॥ (पुष्टि पर अश्वगंधादि चूर्ण) नागोरी भसगंध, चालीस गोले. भर, रिधारा चालीसभर इन दोनों को महीन चूर्ण कर मृतके भाजनमें धरै ॥११॥ दशमारोध में पिये तो स्त्रीसे हप्तान होय (पातुतिपर नवायसादि चूर्ण) चीता,निफला,नागरमोया, पायविड़ग और त्रिकुटा ये सब समान नप अंश पोलाद म ॥ १२॥ ४ ॥ इनका पूर्ण शहद भौर घृतके संगचाटै या गोमन व मदा . 14 . मध्याय ६] भोपाटीकासमेता। शोथकुष्ठोदराशीमिमन्दाग्निमरुचिकृमीन ४५ अंकार करभःशुण्ठीककोलंकुङ्कुमंकणा । जातीफलं लवङ्गंचचन्द नंचेतिकार्षिकान् ४६ चूर्णानीमांस्ततःकुर्यादहिफेनंपलो मितम् । सर्वमेकीकृतंचूर्णसक्ष्मंतस्त्रगालितम् ४७ सि तासर्वसमादेयामापैकंमधुनालिहेतु । शुक्रस्तम्भकाचर्ण 'पुंसामानन्दकारकम् ।नारीणां प्रीति जन सेवेतनिशिकामु का ४८त्रकुलत्वग्भवंचूर्णघर्पयेइन्तपंक्तिषु । वजादपिढी भूतादन्तारस्युश्चपला ध्रुवम् ४९इति श्रीशार्ङ्गधरेमध्य खण्डेचूर्णकल्पनापप्ठोऽध्यायः॥ ६गो ! वटिकाश्चाथकथ्यन्तेतन्नामगटिकावटी। मोदकोवटि कापिण्डीगुण्डीवर्तिस्तथोच्यते १ लेहवसाध्यतेवह्नौगुडो चाशर्करायथा । गुग्गुलुंवाक्षिपेत्तत्रचूर्णतन्निम्मितावटी२. कुर्य्यावह्निसिद्धेनवचिद्गुग्गुलुनावटी। द्रव्येणमधुना चापिगुटिकांकारयेत्सुधीः ३. सिताचतुपादेयावटीषु द्विगुणोगुडः।। - चूर्णान्चूर्णसमःकार्योगुग्गुलुंमधुतत्सम के साथ ।। ४४॥ तो पादु,हद्रोग, भगंदर म्जन, कोद,उदररोग अर्श मन्दाग्नि, अरुचि और पृमि नाशहाय ।। ४५ (स्तंभन पर अकरकरादि चूर्ण - करकरहा, सौंठ, कोल, कैंसर पीपरि. जायफल, लौंग और चतचन्दन इन्हें कर्पकर्प भरले ॥ ४६ ॥ चूर्ण करि पलभर अफीमदे पीसि कपड़छानले ॥४७॥ और सब के समान सांड देय-माशाभर शहदमें चाटै यह चूर्ण वीर्यस्तंभन फरस्त्री पुरुषों को मुख देता है इसलिये कामी पुरुष इसे रातिको सेवन करै ॥४॥ (मंजन) मौलसिरीकी छालके चूर्ण को दांतों में घिसाकर तो हिलते हुये भी दांत “चन समान होजाते हैं। ४६ ॥इति श्रीश रसुधाकरेचूर्णकल्पना पष्ठोऽध्यायः६॥ ( अथ वटी कल्पना) बर्टिका गुटिका वटी मोदक पिंडी गुण्डी और वत्ति ये गोली के नाम हैं ।।१॥गुड़ और खाड देखागि में पकावै जैसे अवलेह तरगु- ग्गुलु व चूर्ण उसी पाक में डारि गोली यापैतार । विना आनि के योगगुग्गुनु से भी गोली पैंधती है और गीली वस्तु तथा शहद से भी पती है ॥२॥ मिश्री , -- - . ममतार शायरसंहिता ५.४ द्रवचद्विगुणंदेयंमोदकेपुंभिषग्वरैः । कर्पप्रमाणत मानवलंदृष्ट्वाप्रयुज्यताम्।५ इन्द्रवारुणिकामुस्ताशुण्ठीद न्तीहरीतकी तरच्छटीविडङ्गानिगोक्षुरश्चिकस्तथा६ तेजोलाचहिकर्षाणिपथग्द्रव्याणिकारयेत्।शरणस्थपला न्यष्टोद्धदारुचतुष्पलम्,७ चतुष्पलरयाद्भल्लातःकाथये सर्वमेकतः जलद्रोणेचतुर्थाशंग्रहीयाकाथमुत्तमम् । कायद्रध्यात्विगुणितंगुडंक्षिप्त्यापुनःपचेत्। सम्यक्पक्व ज्वज्ञात्वावैचूर्णमेतत्प्रदापयेत्.९ चित्रकत्रिवृतादन्तीते जोहापलिकाःएथक् । एथनिपलिकाभागाव्योपैलाम रिचत्वचम्, निक्षिपेन्मधुगीतेचतस्मिन्प्रस्थप्रमाण कम्। एवंसिद्धोभवेच्छीमान् बाहुँशालगुडाभिधः११ जये दीसिसर्वाणिगुल्मवातोदरंतथा । आमवातंप्रतिश्याय' ग्रहणीक्षयपीनसान् । हलीमकंपांडुरोगंप्रमेहंच विनाश 'येत् १२ मरिचकर्षमात्रस्यापिप्पलीकर्षसम्मिता. अई चौगुनी गुई दूना पूर्ण लिखे ममार्णदेना गुगुनु शहद घरावर देना ॥ ४ादा वस्तु दुनीं देना सबैद्य यही रीति करें,कर्षभर गोली खाने का प्रमाण है व देह पल दोष देखि सिलाधै ॥ ॥ (इन्दारकी गुटिका अर्शपर ) इन्द्रायण रकी जड़, नागरमोथा, सौंठ, जमालगोटा के जड़की छाल, हडा निशोथ, कचूर चार्यावहंगगुरूम चौता ॥ ६॥ और यच ये सर दो दो की जमीन्द्र पाठ पल, विधारा चारपल-10 मिलानां चारपल द्रोण भर, पानी में, औरै, जब . चौथाईरहेता उत्तारलेय 1) 5॥ छान के उसका तिगुना गुडदे पाककर व प- • कनितार उटै तर यहपूर्णढाले ॥ ६॥ चीता, निशोथ, जमालगोदाकी जड़ और विचाये पल पल भर त्रिकुटा,इलायची, परिच और नज तीन तीनपल इनकोपीस छानकै मस्यभर शहद में पूर्वोक्त यह सूर्णयुक्त बँधने मुवाफिकहो मिलावै तय बाहु- •शाल गुड़ सिद्धहोता है॥१०॥ ११॥ यह सब अर्श,गुरम, वातोदर, आमवाता नाकटपकना सग्रहणी, यो,पीनस इलोमा,पाहु भार प्रमेह इन सबोंको जीतता हैं ॥१२॥.(फासपर मरिचादि गुटिका) मरिच, पीपरि कर्पकर्ष भर ।
१३६. अध्याय ५.] भापाटीकासमेता। कोयवक्षार :कर्षयुग्मंचदाडिमम् १३ एतच्चूर्णीकृतंयु ज्यादृष्टकर्षगुडेनहिाशाणप्रमाणांबटिकांकृत्वावक्तेविधा रयेत्। अस्याःप्रभावात्सर्वेपिकासायान्त्येवसंक्षयम १४गु डशुण्ठीशिवामुस्तैरियेद्गुटिकांमुखें। श्वासकासेपुसवे पुकेवलंबाचिभीतकम् ५ मामलकमलकुठलाजाश्चचट रोहकम्। एतच्चर्णस्यमधुना गुटिकांधारयेन्मुखे। तृष्णां वृद्धांहरत्येषामुखशोपंचदारुणम् अशा विडङ्गनागरंक पणापथ्यासलविभीतको बचागुडूचीमल्लातसविषंचा त्रयोजयेत् १७ एतानिसमभागानिगोमूत्रेणैवषयेत्। गुखाभागुटिकाका; दद्यादाकजैरसैः १८ एकामजीर्ण गुल्मेपुढेविसळ्यांप्रदापयेत् । तिस्रस्तुसर्पदष्टेतु चत्तत्र स्सन्निपातके। वटीसञ्जीवनीनाम्ना संजीव्यतिमानवम् १९ व्योपालवेतसंचव्यं तालीसंचित्रकंतथा :। जीरक तिन्तिडीकंचप्रत्येकंकर्षभागितम् २० त्रिसुगन्धंत्रिशाणं. जवाखार ५ माशे, अनारदाना दो कः ।। १३ ।। गुड़ पाठकप में चारि चारि माशे की गोली बांधे सो मुख में धरे राब इस के प्रभावसे सब खांसी जायें ॥१४॥ (श्वासपर गुड़ादि गुटिका) गुड़, सोंठ, इड़ नागरमोधा इन की गोली जितने गुड़ से बँधे गाशे भरकी मुहमें रासै वो सब खास कास हरे वैसे केवल व हेरा रखने से ॥ १५ ॥ (प्यासपर आंबरादिवटी)यांवला, कमल,कूट, लाजा, चटज़य इन्दै पीसि शइद में गोली बांधि मुखमै राय तो महाल्पा च मुस सूचना दूरदो ॥ १६ ॥ (सक्षिपातपर संजीवनीगुटिका ) यायविडंग, सोंठ, पीपरि हड़, भांबरा, बहेरा बच, गुर्च, मिलावां शुद्धकियामा पच्छताग ।। .१७॥ इन सचों को समान ले गोमूत्र में सरल कर धुपची समान गोली बांधे व मदरसके रसमें खिलाये ॥ १८ ॥ अजीर्ण में गोली एक विचिका ( इजा.) में दो सांप के डसेको तीत सनिपात में चारइसका संजीवनी वटी नाम है मनुष्य को जिज्ञाती है.॥ १९ ॥ (पीनसादि पर त्रिकदादिपदी ) त्रिकुटा, अम्ल- शारिरसंहिता। मध्यवरार रयांदगुडःस्याकर्षविंशतिः । व्योपादिगुटिकासामपी नसश्वासकासजित् । रुचिस्वरकराख्याताप्रतिश्यायप्र पाशिनी२१ आमेपुसगुडांशुण्ठीमजीणेगुडपिप्पलीम।। कृच्छेजीरगुडेदद्यादर्शस्सु सगुडाभयाम २२ वृद्धदारुक भल्लोतंशुण्ठीचूर्णेनयोजितः । मोदकासगुडोहन्यात्प विधार्श:कृतारुजम् २३शुष्कशरणचूर्णस्यभागान्द्वात्रिं शेदाहरेत्। भागान्पोडशचित्रस्यशुण्ठ्यामागचतुष्टयम् २४ छौभागौमरिचस्यापिसर्वमेकत्रचूर्णयेत् । गुडेनपि ण्डिकांकुयौदर्शसांनाशिनींपराम् २५ शूरणोटेवदारुश्च भागैःपोडशभिःएथकामुसलीचित्रकोज्ञेयावष्टभागमिती एथक् २६ शिवाविभीतकोधात्रीविडङ्गनागरंकणा । भ ल्लात-पिप्पलीमूलं तालीसंचष्टथक्टथक् २७ चतुर्भाग, प्रमाणानित्वगेलामरिचंतथा । विभागमात्राणिटथकस स्त्वेिकत्रचूर्णयेत् २८ द्विगुणेनगुडेनाथवटिकांकारये . चेतस, चाय,तालीसदल, चीता, जीरा मोर इमली की छाल ये साककर्षभर ।। २०॥मौर तज,पत्रज व इलायची चारि चारि माशे गुड वीस कर्ष यह व्योपादिनाम गुटिका पीनस, रवास व कासको नाशकरै रुचिकर कंठस्वर शुद्धकर व नाकका टपकना यंद करती है ॥ २१॥ मापदोपमें गुढ़ सौंठकी गोली देना, अजीर्ण में गुड़ पीपरि, कृच्छ में गुड् जीरा, बवासीर में गुड़ हड़की गोली देना ॥ २२ ॥ ( अर्शपर पृद्धदारमोदक) विधारा, भिलावा और सोंठ पीसि गुड़में गोली बांधिदेइनो छहा मासिक धर्शदकर ॥२३॥(अर्थपर पुरनवटिका) भूखे सरनका चूर्ण बत्तीसभाग, चीता सोलहभाग, सॉट चारभाग ॥ २४ ॥ 'मरिच दोभाग सय पूर्णकरि गुड़में गोली पापिसिलाचे तो सब अर्श नाशहोय।। २५॥ ( पुनः मुरन निधारा सोलह सोलह भाग लेय मुसली माठभागभीर पीता भी पाठभाग लेप ॥२६॥ त्रिफला, विंडग, सौंठ,पीपरि, भिलारा,पिपरा- मल गौर ताजीम भिम भिन्नाचार चार भाग, तनाइलायची व मरिच दो२ अध्याय ७] भापाटीकासमेवा। वुधः । प्रवलाग्निचकुरुतेतथाशीनाशनापरा २९ ग्रह णीवातकफजांश्वासंकासंक्षयामयम् । प्लीहानश्लीपदंशो थंप्रमेहंचभगन्दरम् । निहन्तिपलितंवण्यातथामेध्या रसायनी ३० त्रिफलाञ्यूषणंचव्यंपिप्पलीमूलचित्रक म् । दारुमाक्षिकधातुश्चदा:मुस्तविडङ्गका ३१ प्र त्येकंकर्षमात्राणिसबैद्विगुणितंतथा । मण्डूरंचूर्णयेच्छुई गोमूत्रेष्टगुणेक्षिपेत् ३२ पवाचवटकात्कृत्वादद्यात कानुपानतः । कामलापाण्डुमेहाशःशोथकुष्ठकफामयान्। ऊरुस्तम्भमजीर्णचप्लीहाननाशयेदपि ३३ चन्द्रप्रभाव चामुस्तंभनिम्बामरदारुच। हरिद्रातिविषादावीपिप्पली मूलचित्रकान् ३४ धान्यकत्रिफलाचव्यविडङ्गंगजपिप्प ली। व्योपमाक्षिकधातुश्चहीक्षारोलवणत्रयम् ३५ ए तानिशाणमात्राणिप्रत्येककारयेद्बुधः । तृवृद्दन्तीपत्र कंचत्वगेलावंशरोचना ३६ प्रत्येककर्षमात्राणिकुर्यादेता भाग इनसों का पूर्णकरि ।। २८॥ दूने गुटमै गोलीबाधि खिलाने तो अग्निमाल होय शौरअर्श जाय ॥२६॥ तथा पातकफजन्य ग्रहणी, ग्यास,कासक्षयी,प्लीहा, फीलपार, शोध, मोह, भगंदर, चार श्चेत होना ये सबमि घानुदि मालकरें यह रसायनीहै ।। ३०॥ (कामलादि पर मंडरपटक ) त्रिफला, रिकुटा, चाव, पिपरामूल, चीता, देवदार, सोनामासीन्दी, नागरमोघा, विडंग ॥ ३१ ॥ येकर्ष कर्प भर मंडूर शोधकै सबसे दूनाले फिर अगुने गोमूत्र में ।। ३२ ॥ पाप गोलीवा- घि मटेके साय खाय तो कामला, पांड, ममेह, अर्स, शोथ, पु, कफरोग, गठिया, अजीर्ण भौर प्लीहा इनको नाराकरे ॥१३॥ कपूर, वच, नागरमोथा, चिरायता, देवदारु, हल्दी, मतीस, दारुहल्दी, पिपलामूल, चीता ।। ३४ || पनियां, त्रिफला, नाय, वायविडंग, गजपीपरि, त्रिकुटा, सोनामाखी की भन्म, सजीसार, जवाखार तीनोलोन संघा, काला, पांगा ॥३५॥ ये सपदव्य चारचार माशे निशोष, जमाल- गोटा,पत्रगतमइलायची और बरालोचन ॥३६॥उनको कर्ष कमर अद्धिमान् A - ६२ शायरसहिता मध्यसपई निबुद्धिमान । हिकहितलोहस्यचतुष्कासिताभवेत् ३७ शिलाजत्वष्टकपास्युरष्टोकश्चिगुग्गुलोः । एमिरेकत्र संक्षएणैःकर्तव्यागुटिकाशुभा ३८ चन्द्रप्रभेतिविख्याता सर्वरोगप्रणाशिनी । प्रमेहान्विशतिकृच्छम्मूत्राघातते थाइमरीम ३९ विचन्धानाहशूलानिमहनप्रन्थिमर्युदन। थएडदिकटीशलंश्वासकासविचिका ४० अन्त्री दितथापाण्डुकामलाचहलीमकम् । कुष्ठान्यशीसिकण्डूंच लोहोदरंभगन्दरमपदन्तरोगनेत्ररोगस्त्रीणामात्तवजारु: जम् । पुसाशकंगतानोगान्मन्दाग्निमरुचितथा ४२चा तिपित्तकैफेहन्याल्योरप्यारसायनी । चन्द्रप्रभायाः कर्षस्तुचतुःशाणोविधीयते ४३ यवानीजीरकंधान्यमरि चिगिरिकर्णिकी। अजमोदोपकुञ्चीचचतुःशाणाः प्रथक पृथक् हिंगुषट्शाणिककार्यचारौलवणपञ्चकम् । 'उच्चाष्टमितैःशाणैःप्रत्येकल्पेयेत्सुधीः४५ देन्तीशटीपी करंचविडङ्गदाडिमंशिवा । चित्रोलवेतसःशुण्ठीशाणैः लेच लोभस्म दो कप इन सबको चूर्णकरि मिश्री चरिकप ॥३७॥शुद्धशिला- नीत पाठकप गगले पाक ये सब एकत्रकारि कूटिक गुटिका भुदर बना ॥२८ यह चंदूमामा गर्तिका. म.वगैग नाशको नया प्रोगबन मापात पर विया, पैटफूलना, शूल ट्रिप फूलना, गोय, अर्युद, अदि कटिशूल, वास, फसिष्ठभेद ।।४ाधि,पाडु,पामेला इलामक संवफुट सर्शि, खजुरी, प्लीहा उदररोग,भगद ४ दिन्तरोंग, नेत्ररोग,सी का नुरोग, पुरुषको धी- "तुरोग मन्दाग्नि,यरचि ॥४२॥ वात पित्त कफ सब नाशकर यलकर धारदा । यह रसायन है दशमोशेचा सोलहमाश वो दोपवल विवारिक साय ना.४३॥ (गुस्नर अजवायनाटिका) गायन, जीरा, यनियों, मिर्च, वि- फ्रांता, जमोद, मनरेला भिनभिन्न चारशणि जौहान छह शीण दूनों . चारांची लोन और निशोथ ये पाउ माशांण जमालगोटा, कर . PAN . अध्याय ७] भापाटीकासमेता। पोडशंभिःप्टर्थवीजपूरसेनैव गुटिकांकारयेवुधी घृतेनपयसामथैरम्लैरुष्णोदकेनवा ४७.पिवेकाङ्कायन प्रोक्लांगुटिकांगुल्मनाशिनीम् । मद्येनवातकेगुल्मेगोक्षी रेणचपैत्तिके ४८ मूत्रेणकफगुल्मंचदशमूलैत्रिदोषजम्। 'उष्ट्रीदुग्धेननारीणरिक्तगुल्मविनाशयेत् ४६ हृद्रोगंग्रह गीशूलंकृमीनशीसिनाशयेत् । नागरपिप्पलीचव्यंपिप्प लीमलचित्रको भिष्टहिङ्ग्वजमोदाचसर्पपाजीरकडयम् ५. रेणुकेन्द्ररावापाठाविडङ्गगजपिप्पली। कटुकातिवि पाभार्गीवचामूतिभागतः ५१ प्रत्येकंशाणिकानिस्यु 'व्याणीमानिविंशतिः । द्रव्येभ्यस्सकलेभ्यश्चत्रिफला हिगुणाभवेत् । एभिश्चूर्णीकृतैः सर्वैः समोदेयश्चगुग्गु लः १२ वङ्गरोप्यंचनागंचलोहसारंतथाम्रकम् । मण्डूर रससिन्दूरप्रत्येकंपलसम्मितम५३गुडपाकसमंकृत्वाचे देद्यायथोचितम् । एकपिण्डंततःकृत्वाधारयेघृतभाज .. पुफरमूल, वायविडंग, अनारदाना, बड़ीहड, चीता, अम्लवेतस और सोंठ इन सर्वोको सोलह शाणले चूर्ण करै ।। ४६ ॥ फिर विजौराफे रसमें घटी गांधै घृतं द्ध मद्य नीपूरस और उष्णोदक ॥४७॥ इनके संग काकापनकी कहीहुई गोली वैद्य सिला यह गोली गुल्मको व चातगुल्मको नाशकर तथा मध पित्तगुल्मको गोदुग्ध के संग॥४॥कफ गुल्मको गोमूत्र संगत्रिदोषज गुल्मको दशमूलके झाथसाथ स्त्री के रक्तगुल्मको उष्ट्रीदुग्ध संगदेय तो ॥ ४६॥होग,ग्रहणी, शूल, कृमिरोग और 'यवासीरों को नाशक (वातादिरोगपर योगराजगुग्गुलु) सोंड, पीपरि, चाप, पिपलामूल, चीता, भुनीहींग, अजमोद, सरसों, दोनों जीरे ॥ ५० ॥ मेव- डीपीज, इंद्रपया पाना, पायपिडंग, गंमपीपरि, कुटकी, प्रतीस, भारंगी, वच,मूर्वी और गसुरूं ॥५१॥ ये सव शारशारणभर सका दूना रिफ्लेका चूर्ण सत्र चूर्ण के समान शुद्ध गाल ॥ २२ ॥ वंग, रूपरस, नागेश्वर, लोहा, अभ्रक, में- दूर और रससिद इनको पल पल भैरटे॥५३॥ गुडपाक करि रस और सप र साईबरसंहिता । " [मध्यखग्रहः मजीर्णच व्यवाय श्रममातपम् । मद्यरोपंत्यजेत्सम्यग्गु. णार्थीपुरसेवकः ७३: त्रिपलंत्रिफलाचूर्णकृष्णाचूर्णपलो न्मितम् गुग्गुलुःपञ्चपलिकः क्षोदयेत्सर्वमेकंतः ७४ ततस्तुवटिकांकृत्वा प्रयुज्यावल्यपेक्षया। भगन्दरंगुल्म शोधावीसिं च विनाशयेत् ७५ अष्टाविंशतिसङ्ख्या निपलान्यानीयगोक्षुरात् । विपचेषड्गुणेनारे वायोग्रा ह्योऽईशेषतः ७६- ततःपुनःपत्तंत्रपुर, सप्तपर्लक्षि त्। गुंडपाकसमाकारं ज्ञात्वातत्राविनिक्षिपेत् ७७ त्रिक टुत्रिफला मुस्तं चूर्णितंपलसप्तकम् । ततःपिएंडीकृतस्या स्यगुटिकामुपयोजयेत् . .७८ हत्यात्प्रमेहंकृच्छंचपद रंमूत्रघातकम् । वातासंवातरोगांश्च शुक्रदोषंतथाइम रीम् त्रिफलानिपलाझार्याभल्लातानांचतुष्पलम् । वा कुचीपञ्चपलिकाविडङ्गानांचतुष्पलम ८० हतलोहंतृट चैवगुग्गुलुश्चशिलाजतु । एकैकंपलमानस्यात्पलाई । -- . कायसंग गुल्म कर ॥७२॥व सदिरादिकाय संग प्रण चकुष्ठ दकरय सट्टी, तीक्ष्ण, मैथुन, श्रम, घाम, मद्य और क्रोध इनसोको त्यागकर जो गुरण चाहै तो संयम से रहै ।।।७३ ।। भगंदर पर त्रिफलागुग्गुलु )निफलानुर्ण तीन पला पिप्पली पलभर और शुद्धग्गुल पांचपल इनको प्रीसिक एकत्रकरि ॥७॥ गोली घधिरोगीकी अग्नि विचारिकै देय तो भगंदर, गुल्म, शोथ और हो मर्श दरंदोय॥७॥(अमेह गोधुरादिगुग्गुर)गोरुभहाईसपल हा गुणे पानी में कांदाकरि नई शेपले॥७६मिरि सातपल गगुलदे पकाये जा गुड़ पाकसाइों विजो द्रव्यं कहताह सोपीस डार १७७. चिकुटा, त्रिफला और नागरमोथा ये 'सातों पलपलभरमिलायपिडीकरि गोलीबांध तो॥७८ मोहमूत्रकृच्छ मदरस प्रायात, बतिरक्त वातरोग शुक्रदोष और प्रयरी ये सपनाहोय ॥ १६॥ (कृष्ठ पर विफलोमोदक मिफला तीनपल, भिलायांचार, कुची पांच, विदंग '. चार गीलाइभमा निशोथ, गुगुल भौर शिलाजीत इनस्यों को एक एकपल, 'अध्याय ७॥ भापाटीकासमेता। पौष्करमवेत् ८३:चित्रकस्यपलाईस्यानिशाणमरिचंभ वेत् । नागरपिप्पलीमुस्तात्वगेलापत्रकुंकुमम् ८२ शा णोन्मितस्यादेकैकंचूर्णयेत्सर्वमेकतः। ततस्तत्प्रक्षिपेच्चू र्णम्पक्कखण्डेचतत्समें ८३: मोदकान्पलिकानकृत्वाप्रयु जीतयथोचितान् । हन्यु सर्वाणिकुष्ठानित्रिदोषनभवा मयान ८४. भगन्दरप्लीहंगुल्मजिह्रोतालुगलामयान्। 'शिरोक्षिभूगतानोगानन्यान्टष्ठगतानपि ८५ प्राग्भोज नस्यदेयंस्यदिध कोयस्थितेंगदें। भेषभुक्तमध्येचरोगे जठरसंस्थिते। भोजनस्योपरिग्राह्यमूर्ध्वजबुगदेषुच८६ काञ्चनारत्वंचोगाद्यपलोनांदशकबुधः । त्रिफलापटप 'लाग्राह्यांत्रिकंटुःस्योत्पलत्रयम् ८७' पलेकंवरुणकुर्या देलात्वपत्र तथा । एकैकं कर्षमात्रस्यात्सर्वाण्यकत्र चर्णयेत् ८८.यावच्चर्णमिदंसर्वतावन्मात्रस्तुगुग्गुलुः । सङ्घध्यसर्वमेकत्रपिण्डकृत्वाचंधारयेत् ८६ गुटिकाशा णमात्रणप्राताह्यायथोचिताः। गण्डमालोजयत्युग्राम पुष्करमूल अर्द्धक्ल ।। ८१ ।। चीता अर्द्धपल, मिर्च दो शाण, सोठि, वोपरि मोथा, तज, इलायची, पत्रम, केशर ॥२॥ इनसचों को शाण शाण भर ले चूर्ण करि सवचूर्ण समान सांडले पाकारि चूर्ण दारि गोली बनावै ।।८३|पलपन मित मोदकयनाय रोग वलदेसि रोगीको सिलावै तो सबष्ट नाशदोय व-निदोप जन्य रोग ॥ ८४ ॥ मन्दर, प्लीहा, गुल्म, जिदा, तालुरोग, ग्रीस, शिर, नेक भौह और पीठ इन समोके रोग नाशहाय-11८५ | शरीरके नीचे के रोगनमें भोजनादि भोपधि देना पदाग्निमनित में भोजन के मध्यदेय शिरबन्धी रोगन में भो- जनांत समय देना ॥८६॥ (गंडमालापर करनार गुग्गुल) कचनारला- ल दाल त्रिफला छापलविटा तीनरल ||८७॥ वरुण एकपल, इलायची रान, पनज, कर्प नरपर इनसों को एकत्रकरि पूर्णकरें ।। ८॥ सर्व चूर्ण के स. मान गुग्गुणपति पण मिलाय पिंड वनावे ॥८६॥ चारिमाशको गोली बनाये " " - .
- शविरसंहिताः। ...मध्यखण्ड पचीमवुदानिचे। ग्रन्धीनत्रणांश्चगुल्मांश्चकुष्ठांनिचंभ गन्दरम् ९० प्रदेयश्चानुमानार्थक्वाथोमुण्डितिकाभव क्वाथःखदिरसारस्यपथ्याक्कोथोदकोष्णकम् १ निस्तुष मापचूर्णस्यात्तथागोधमसम्भवम् । निस्तुषयवचूर्णचशा लितण्डुलतथा ६.२ सूक्ष्मंचपिप्पलीचर्णपलकान्युपक ल्पयेत् । एतदेकीकृतसवैभर्जयेद्गोधतेनच ९३ अईमात्रे सर्वेभ्यस्ततःखएडसमंक्षिपेत् । जलंचहिगुणंदत्त्वापाचं येत्तंशनैःशनैः ६४, ततःपक्समुत्यमोदकंचपलोन्मित म् । कुर्यात्सायंचतंभुक्त्वापिवेक्षिीरंचतुर्गुणम् ६५ वर्जनी योविशेषेणक्षाराम्लौहौरसावपि । कृत्वैवरमयेन्नारीवह्वीन क्षीयतेनरः ९६ इति श्रीशार्ङ्गधरेमध्यखण्डेवटककल्पना सप्तमोऽध्यायः:७॥ काथादीनांपुनःपाकादुःघनत्वंसारसक्रियाः। सोवलेह श्चलेहःस्यात्तन्मानास्यात्पलोन्मिता १.सितांचतुर्गुणा रोगपल व ओपधिपल देसि रोगीको मातस्तमय देय तो गंडगोला अपची श्रृंद, ग्रेधि, घाव, कुछ, भगंदर ये नाशहोयें ।। १०॥ (अस्पानुपानं ) गुण्डीका काय वा खैरसारका कार्य वा हड़का फाय उष्णोदक में देय (धातु मुष्टिपरमापादि मोदक) यांप कहे उरददालि घोय नूर्णकरिलेय गहचूर्ण, यकी गूदीकाचूर्ण साठी चाउरको घूर्ण ॥ ९२।। और पीपरि पूर्ण इनसो को पलपल भरले सब चूर्णी का प्राधा गोघृत दे भूनें ।। ६३ ।।नों के समान खांड ले तव सबका दूना पलडारि मन्द मन्द प्रांचदे घोटे ॥६४ | जब सिद्धहोजाय संब पलपलभरके लड्डू बांधि सांझको खाय उस पर चारिपल दूधपिये। फिर चार और खटाई दो रस न खाय स्त्री प्रसंग करे तो वीर्य न द्रवे देह पुटर १६ ॥ इति श्रीशा घरमुधाकरेसप्तमोऽध्यायः ॥७॥ (अथावलेह कल्पना) द्रव्यको कापसहेश प्रौटाचे फिर विशेष यांच देय जब गाड़ाहोप तय अगले कई लेइभी कहते हैं, माता चारिमुद्रा भर ॥१॥पूर्ण से 27 , ई अध्याय T भाषाटीकीसमेत कार्याचाचद्विगुणोगुडः । द्रवंचतुर्गुणंदद्यादितिसर्वत्र निश्चयः: २ सुपंक्वेततुमत्त्वस्योदवलेहोप्सुमज्जति । ख रत्वंपीडितेमुद्रांगन्धवर्णरसोद्भवम् ३७दुग्धमिक्षुरसंयूषं। पञ्चमूलकपायजमा वासाकीर्थयथायोग्यमनुपानंप्रश स्यते कटकारी तुलांनीरंद्रोणपरत्वाकपायकम् । पाद शेपंगृहीत्वाचतस्मिंश्चूर्णानिदपियेत् ५ पृथपलानि तानि गुडूचीचव्यचित्रकाः ३ मुस्ताकर्कटशृङ्गोचत्र्यूषणं धन्वयासका ६ भागीरास्नाशटीचैवशर्करापलविंशतिः। प्रत्येकंचपलान्यष्टौप्रदद्याद्धृततैलयोःपक्त्वालेहत्व मानीयशीतेमधुपलाष्टकम् । चतुष्पलंगाक्षी पिप्प लीनांचतुष्पलम् - क्षिप्त्वानिदध्यात्तुहढेमन्मयेभाजनेशु भोलेहोयंहन्तिहिकार्तिश्वासकासानशेषतः ९ पाटलार णिकाश्मयबिल्वारलुकेगोक्षुराःपिाण्यॊवृहत्यौपिप्पल्यः शृङ्गीद्राक्षामृताभयाः १० बलाभूम्यामलीवासा ऋद्धि मिश्री चौगुनीदेना गुह दूना द्रव्यादि चौगुने यह सर्वत्र रीति ॥ २ ॥जब श्रांचदेने पर तारधे या पानी में पाककी बूंद न चूड़ें न घुलै तब सिद्ध जाने और मंगुरी के दवान स गछद तब मुगंध रसादि डार ॥ ३ और दूध से ऊखले उत्पचि रस्तु पस पंचमूल कायसे रूसा काथसे इन अनोपानसे देना अथवा और जो रोगोचित अनोपरानो सो देना ॥४॥(हिचकी और फास श्वासपर भटकटैया- पलेह) भटकटैया चारिसैरले द्रोणभर नेल में श्रौटै जब चौथाईरह तप उसमें चूर्ण डा।शा गुर्च,चामचीता,नागरमोथा,काकड़ोसिंगी,विकटा,जवासा ॥६॥भारंगी रास्ना और कचूर ये सब पलपल भरले चूर्णकार शकर धीलपल घृत पाठपल रोल पापल || ७| ये सब कादे में प्रोटे भवलेह सिद्धो डाकारि भाउपल शहद, शलोचन चारिफ्ल, पिपली चूर्ण चारिपल मिलाय ॥८॥ उत्य पामें रासै इस बबनेह से हिचकी, श्वास, ३ कास, को अशेषतासे नाशकर ॥ ९॥(क्ष- पादि पर च्यवन प्राशावलेह ) सिरस, अग्निमय,समारी, पाटलोलायो १४२. शाघरसंहिता .मयखएडा प्योहणोविलकृन्मतः २८युक्त्यांकूष्माण्डखएडउपशूर विपचेत्सुधीः। अर्शसांमूढवातानमिन्दाग्नीनांचयुज्यते २९ हरीतकीशतंभद्रयेबानीमाढकंतधाः। पलानिदशमः टस्यविंशतिश्चनियोजयेत् ३० चित्रका पिप्पलीमूलमा पामार्गशिटीतथाः। कपिकच्छशंखपुष्पीभाचिगजपि प्पली ३१ बलापुष्करमूलंचपृथग्द्विपलमानयाा पर त्पञ्चाढकेनीरेयवैःस्विन्नैःशृतंनयेत् ३२ तच्चाभयाशतंदे द्यावाथेनास्मिन्विचक्षणः। सर्पिस्तैलाष्टपल कक्षिपेद्गुः डतुलांतथा३३पक्वालेहत्वमानीतेसिद्धशीतेपृथक्पृथक्- क्षौद्रश्चपिप्पलीचूर्णदंद्यात्कुडवमानया ३४हरीतकीद्वयं खादेत्तेनलेहेत्तनित्यशः । क्षयंकासंज्वरश्चासंहिकांशीरुः चिपीनसान ३५ यहीनाशयेदेपवलीपलितनाशनः ।। बलवर्णकरःपुंसामवलेहोरसायन विहितोगस्त्यमुनिः नासर्वरोगप्रणाशनः ३६ कुटजत्वक्तुलांद्रोणेजलस्यति कूष्माएंट भयलेह चाल एद्धको देना हाती पुष्टकर जीर्य बहावे व यलको करे ।। २८॥ (अर्शपर खंड कूष्माण्डावलेह) जैसे कुम्हड़ा की विधिहै सोई गरन' की भी पेग पार जमीकन्दकी छोटी कचे करिदोनों को एकंत्र करि उसी रीतिसे. अलेह घनाय सिलावै तो अशी मुदवात और मन्दाग्नि ये सब अच्छेहो रहा (क्षयों पर अगल्य हरीतकी) बीहड़े सौ, अश्यायन एकादक, दशमूलं.. वीसपल ॥३०॥ चीता,पीपराभूल,चिदिरा कचूर चाँच कौडाला, भारंगी गज़- पीपरि॥३॥ परियारा और पुष्करमूल सब पा पांच पाठक जल में पंचाम' गलाय उतारि छानलेय ॥३॥ तिसाँझौ.हड़, तेलावी, बाट पलं, गुडतुलाभरे देकर॥३३ ।। पकाचे ठदाकरिशहद व मीपरिक्षा चूर्ण ये सेव एकएक कुंडस्टार" ३१॥ इस अवलेह के संग दो हड़ नित्यखाये तो क्षयी का रोग,कास,ज्वर रवास हिचकी, अर्श, अरुचि वीनस।। ३५ | और नग्गी ये रोग नांशहोथे बलवन्त हो येतवालकृष्णही रूपवान्हो पुरुषको यह भवलेहरसायनहै यह अगस्त्य मुनिकी काही हरीतकी सब रोगोंको नाश करती है ।। ३६ ॥ (अधाशपर कुरैया अवलेही .
1 अध्याय ] भापाटीकासमेता। पंचेत्सुधीः । कार्यपादशेपंचगृहीयाहस्त्रगालितम् ३७ त्रिंशत्पलंगुडस्यात्रदत्वाचविपचेत्पुनः । सान्द्रत्वमाग तदृष्ट्वचिकनीमानिदापयेत् ३८ रसजिनमोचरसंत्रि- कटत्रिफलांतथा।लज्जालुञ्चित्रकंपाठांबिल्वमिन्द्रयवंव चाम् ३९ भल्लातकंप्रतिविपाविडङ्गानि बालकम् । प्र त्येकंपलसंगानंघृतस्यकुडवतथा ४ सिद्धशीतेततोद द्यन्मिधुनःकुडतथा । जयेदेषोवलेहरतुसण्यशासि वेगतः ४१ दुर्नामप्रभावानोगानतीसारमरोचकम् । ग्रह रणीपाण्डुरोगंचरक्तपित्तंचकामलामाअम्लपित्तंतथाशोथं कासंचैवप्रवाहिकाम् ४२ अनुपानेप्रयोक्तव्यमाजंतकंप यौदधि । घृतंजलंबाजीर्णेचपथ्यभोजीभवेन्नरः ४३ कुट जत्यक्तुलामाद्रद्रोणनीरेविपाचयेत् । पादशेषशृतंनीत्वा चूर्णान्येतानिदापयेत् ४४ लज्जालुर्धातकीविल्वंपाठामो चरसस्तथा।मुस्तंप्रतिविषाचैवप्रत्येकंस्यात्पलंपलम्४५ ततस्तुविषचेदग्नौयावहाप्रिलेपनम् । जलेनच्छागदु कुरैयाकी बाल तुलाभर एकद्रोण पानी पचाने पर चौपाई शेपर तय हतारि वनर्स द्वानलय।। ३५ फिर तसिपल गुड़ का गादाभये यह चूर्ण डारि ।। २६॥ रसोत, मोचरस, भिकुटा, त्रिफला लगाल, चीता, पादा, देल, रन्द्रमर लच-13- मिलादा, अतीस, बिग, और सुगन्धवाला ये पलपल भर धी कुदरभर ।। १० ।-उंडापरे कुडवभर राहद-दे यह अयलेह सशिल वेगही दूर- करता ॥४॥दुर्गमरोग, मतीसार, सरचि, ग्रहणी, पाहु, रक्त विच, कामला, अम्नपिन, शोय, सांगी और मपाहिगा ये सब दूरहोय ॥ ४२ ॥ (तस्पानु- पानम् ) छगरी का दूध ना मढ़ा दही घी उसीका या पानी भोजन के पाचन समय मोपपिसाय॥४॥(सर्वातीसारपरकरैयाट) गीतीएकनुलाया को माल द्रोण भर पानी में पका जप-चापाई शेष रहै नव यह चूर्ण डार ।।४।। लजाल, धान, देना, मोचरस, नागरमोथा और भनीस ये एलपल भर ८ -- शाघरसंहिता ६.मन्यखराड प्योहणोवलकृन्मतः २८ युक्त्यांकूष्माण्डखएडजचशरः विपचेत्सुधीः । अर्शसांमूढवातानांमन्दाग्नीनांचयुज्यते. २९हरीतकीशतभद्रयवानीमाढकंतथा । पलातिदशमू लस्यविंशतिश्चनियोजयेत् ३० चित्रकापिप्पलीमूलमा पामार्गःशटीतथाः। कपिकच्छाशंखपुष्पीभाङ्गचिगजपि. प्पली ३३ वलापुष्करमूलंचपृथरिद्वपलमात्रया'। पचे त्पञ्चाढकेनीरेयवैःस्विनैशृतनयेतं. ३२.तच्चामथाशतंद धारकार्थनास्मिन्विचक्षणः सपिस्तैलाष्ट्रपलकक्षिपेद्गु डतुलांतथा३३पक्त्वालेहत्वंमानीतेसिद्धशीतेपृथक्पृथक् : क्षौद्रश्चपिप्पलीचूर्णदद्यात्कुडवमानया३४हरीतकीद्वर्य खादेतेनलेहेननित्यशः। क्षयंकासंज्वरश्वासंहिकांशीरुः चिपीनसान ३५ ग्रहणींनीशयेदेषवलीपलितनाशनः । वलवर्णकर पुंसामवलेहोरसायनः । विहितोगस्त्यमुनिः नासर्वरोगप्रणाशनः ३६. कुटजत्वक्तुलांद्रोणेजलस्यवि. कूष्माण्ड अवलेह बाल को देना छाती पुष्टकरै वीर्य बहावे व श्लको करे ।। २८॥ (अर्श पर खंड कूष्माण्डावलेह) जैसे कुम्हड़ा की विधिह सोई गरन की भी है पेंग थार जमीकन्दकीलोटी कचे करिदोनों को एकत्र करि उसीरीबिसे अपलेह यनाय सिलाय तो अर्श, दवात और मन्दाग्नि ये सब अच्छेहोय ॥२६॥ (क्षपीपर अगस्त्य हरीतकी) बड़ीहई सौ, अमवायन एकाइका दशमूलं' धीसपल ॥३॥ चीता,पीपरामूल,विपिरा,कचेर,केचांचाकौडाला, भारती, गम- पीपरि ॥३॥ परियारा और पुष्करमूल सब है पल पांच पाठक जलमें प्रचार गलाय उतारि जानलेप ॥३२तिसमें सौ हड़, तेलायी, पाठ पलं गहालाभरः देकर ॥३३ ॥ पकाचे छंदांकरि शहद वमीपरित चूर्ण ये सब एकएक फुड़वहार ।। ३४। इस अवलेह के संग दो हड़ नित्यसाचे तोकपी का रोग,फास चर रवास हिचकी, मर्श, अरुचि पीनस ॥ ३५ ॥ और ग्रहणी ये रोग नाराहोयें चलंयन्त हो स्थेतमालकृष्णहारूपवान्हो पुरुपको यह भवलेहरसायनहै यह अगस्त्यमुनिकी कहीं हरीतकी सब रोगीको नाश करती है ।। ३६ ॥ (अधाशपर कुरैया अवलेह) 7
अध्याय'] भाषाटीकासपेता।
पंचेसुधीः । कपायंपादशेपंचगृह्णीयाद्वलगालित १७
त्रिंशत्पलंगडस्यात्रदत्वाचविपचे पुनः । सान्द्रत्यमाग
तदृष्ट्वाचर्णानीमानिदापयेत् ३८. रसजिनमोचरसंत्रि.
कटत्रिफलांतथा । लज्जालुञ्चित्रकंपाठांबिल्वमिन्द्रयवंद
चाम् ३९ भल्लातकप्रतिविपांविडङ्गानिच्वालकम् ।प्र
त्येकॅपलसमानंघृतस्यकुंडवंतथा ४० सिद्धशीतेततोद
द्यान्मधुनःकुडतथा । जयेदेषोयलेहस्तुसण्यशोसि
वेगतः ४१ दुर्नामप्रभावानोगानतीसारमरोचकम् । ग्रह
णीपाण्डुरोगंचरक्तपित्तंचकामलामाअम्लपित्तंतथाशोथ
कासंचैवप्रवाहिकाम् ४२ अनुपानेप्रयोक्तव्यमानंतप
यौदधि । घतंजलंबांजीर्णेचपथ्यभोजीभवेन्नरः ४३ कुट
जत्यक्तुलामानोपनीरेविपाचयेत् । पादपंतनीत्वा
चूर्णान्येतानिदापयेत् ४४ लज्जालुर्घातकीविल्वपाठामो
चरसस्तथा।मुस्तंप्रनिविषाचवप्रत्यकस्यात्पलंपलन्४५
ततस्तुविपचेदग्नीयावहार्वीप्रलेपनम् । जलेनच्छागढ
क . शाधरसंहिता [[-मसालगड ग्धेनपीतोमण्डेनवाजयेत् -४६-घोरान्सर्वामतीसारानना नावर्णान्सवेदनान् । असृग्दरंसमस्तंचसर्वाशीसिप्रवाहि काम् ४७ ॥ इति श्रीशार्ङ्गधरेमध्यखण्डेऽवलेहकल्पना टमोऽध्यायः॥८॥ कल्काच्चतुर्गुणीकृत्यघृतंवातैलमेवच । चतुर्गुणेद्रवे साध्यंतस्यमात्रापलोमिता निक्षिप्यवाथयेत्तोर्यकाथ्य द्रव्याचतुर्गणम् । पादशिष्टंगृहीत्वाचर नेहस्तेनैवसाध येत् २ चतुर्गुणंम्सदुद्रव्येकाठिन्येष्टगुणंजलम् । अत्यन्त कठिनद्रव्येनारंपोडशिकंमतम् । तथा च मध्यमेद्रव्ये दद्यादष्टगुणंपयः । कर्षादितःपलंयावद्दद्यात्योर्डशिकंज लं ४ ततस्तुकुडवंयावत्तोयंचाप्टगुणं भवेत् । प्रस्थादि तःक्षिपेन्नीरेखारीयावच्चतुर्गुणम् अम्बुकाथरसैर्यत्रष्टथ क्नेहस्यसोधनम् । कल्कस्यांशतंत्रदद्याच्चतुर्थपष्ठम ले।॥ ४५ ॥ फिर उसीयादे को पीटे जालंग परवी में लिपटने लगे तनसिद्ध जानी सोकरी पय ना पानी घामाटके संगपिये।ाती सर्व मतीसारका घोर बेदना निटत्तहो व सवभाति रक्ताह, सर्वाश और प्रवाहिकाको दूरकरताहै ४७॥ इति श्रीशाचरमधाकरेणविरचिवलेहवालानाष्टमोऽध्याय (अथ घृत नेल 'साधना ) कलौं चौगुना घृत'चा तेल और काधादि द्रव्यभी चौगुनी देना तिसकीमारा एकपलभरहसि व्यका फायदेगहों तो चौगुने जल में प्रोटे जपचौयाईरहै तरउतारिवानिले उसमें घी सेल सिंदकर ।। २॥ कोमलद्रव्य में चतुर्गुणा जल कठोर में पारगुणा और अत्यन्त कठोर में सोलहगुणा जल दे॥ ३ ॥ मध्यमें अटगुणा अलटेवे ( पुनर्विधि) पयाभर से चाररुपया भरताई में सोलगुणापानीदे कायकरे पलसे कुदपाई मागुनी मस्य से सारीपर्यंत चौगुनादे ॥४ाशी और जो ये चल कल्क पानी पी तेल में सिद्धार तो चतुर्थांश कल्पदे सेरभर तेल पारसेर पल्क और जो क्रक पादेके संगधी तेल पका तो घृत तेलका पठाश कर देना तीनराव में पारपाच और जय करक-रस के संग घी वा तेल में पफा वो तेलका पाष्टमांश कल्ब देना । - अध्याय, 1 भाषाटीकासमेता। टममा ६ दुग्धेदनिरसेतके कल्केदेयोप्टमांशंकः । क ल्कस्यमम्यकपाकार्थतोयमत्रचतुर्गुणम् ७ द्रव्याणियत्र स्नेहेषुपञ्चादीनिभवन्तिहि । तत्रस्नेहसमान्याहुर्यथा पूर्वचतुर्गुणम् ८ द्रव्येणकेवलेनैवस्नेहपाकोभवेद्यादि । तत्राम्बुपिष्टः कल्कः स्याज्जलंचात्रचतुर्गुणम् ९ काथेन केवलेनैवपाकोयत्रेरितःक्वचित् । काथ्यद्रव्यस्यकल्कोपि तत्रस्तेहेप्रयुज्यते १० कल्कहीनस्तुयः स्नेहःससाध्या के चलेंद्रवे ,पुष्पकल्कस्तुयत्स्नेहस्तत्रतोयंचतुर्गुणम् । स्ने हात्स्नेहाष्टमांशश्चपुष्पकल्कःप्रयुज्यते ११ वर्तिवत्स्ने हकल्कःस्योद्यदाङ्गुल्याविमर्दितः। शब्दहीनोऽग्निनिः क्षिप्तःस्नेहसिद्धोमवेत्तदा १२ यदाफेनोद्गमस्तैलेफेनशा न्तिश्चसर्पिषिन्धेिवरसोत्पत्तिःस्नेहसिन्धिस्तथाभवेत् १३ स्नेहपाकस्त्रियांप्रोक्तोम्मदुर्मध्याखरस्तथा।ईषत्सरस सैर में आधार वृत तेलका प्रमाण यही है ॥ ६ ॥ दूध, दही, रंस और महा इनमें अष्टमांश कल देय और कल्क भलीभांति पकाने के कारण चौगुना जल देना चाहिये ॥ ७॥और नहां फैल्क घी तेन काय पाय पांचों होय तहां स्ने हादिक समान देना पानी चौगुना देइ ॥८॥ जब एकही द्रव्य घृत व तेल में पकानी होय तो जल में दूध पीसि गला वा कर करि चौगुने पानी में पचा ।। ॥ जो केवल काहे में कहाहो तहा उसी काधकी द्रव्यका कल्ककरि मृत चा तेलयुक्त वह काहा और चौगुना पानीदे पकाना ॥ १० ॥ जहां कल्क रहित है तो केवल द्रववस्तु में दूध पानी देके पकालेना जब फूलके करक में स्नेह सिद्ध कहेगे तव चौगुना पानी देंगे जब स्नेह से स्नेह सिद्ध करेंगे। तब स्नेहका अष्ट, मांश दूसरा स्नेहले पुष्प कल्कयुक्त पकालेना ॥१॥ जब वह स्नेह पाया अं- गुरीमें लेके मल से गोलो बनजाय उसे आगपर डार और जलसे शब्द चिर्चिरा- ईट न करे तप सिद्धभया जानो ॥ १२ ॥ तेल फेनउठने से सिद्धनानिये घृत फेन शांतिसे सिद्ध जानिये जय गंध आये और निर्मल होजाय भौरसे उत्पत्तिकर तब धृत वा तेल सिद्धभया जानिये ।। १३ ।। स्नेहपाक तान मकारकाई-दु मध्य और ।
। शाईभरसंहिता। अध्यस्खयर कल्कस्तुस्नेहपाकोमृदुभवेत् १४ मध्यपीकञ्चसिदिश्च कल्केनीरसकोमले । ईपत्कठिनकल्कश्चस्नेहपाकोभवे त्खरः १५ तदुर्घदग्धपाक,रयादाकृन्निष्प्रयोजनम्। आमपाकैश्चनिवोचह्निमान्यकरोगरु.१६नस्यार्थस्या न्मृदुपाकोमध्यमःसर्वकर्ममु । अभ्यङ्गार्थखर प्रोक्लोयु ज्यादेवयथोचितम् १७धूततेलगुडादीइनसाधयन्नकना परे। प्रकुर्वन्त्यु पिताहोतेविशेषाद्गुणसञ्चयम् १८पिप्प लीपिप्पलीमूलंचल्यचित्रफनागरे ।ससैन्धवैश्चपलिऽ तपस्थविपाचयेत् ९क्षीरंचतुर्गुणंदत्त्वातत्सिन्दप्लीहनाश नमाविषमज्वरमन्दाग्निहररुचिकरं परम् २० पिप्पलीपि प्पलीमूलंचित्रकोहरितपिप्पली।श्चदंष्ट्रानागरधान्यपाठा बिल्वंयवानिकी २१. द्रव्यश्चलिफरेतैश्चतु पष्टिपल, घृतम् । घृताच्चतुर्गणंदेयंचाहेरीरसंसंबुधः तथा तुर्गुणंदत्वादधिसपिर्चिपाचयेत् । शनैःशपिक्तव्यंचा ड्रेरीघृतमुत्तमम् २३ तघृतंकफवातघ्नंग पयोधिकार "पर जो कल्क मोमवत् रहे तो मृदु जानिये ॥ १॥जो बल्क निरसहो कुछ को मल रहै , मध्य जानिये जो फरक निरस और कठोर होजाय तो सरा जानिय ॥ १५,जो इस प्रमाण से अधिक सो रेतो मानो स्नेह विगह गया अकार्य गया। जो बचा रहे ता से बनकरने से मन्दाग्निकरे और भारीहो ।) १६||नास लेने को नरम हित मध्यम सर्व कार्यसापक है सर मदनकी है जहा जैसा चाहै रहा तैसा' पनावै ॥ १७ ॥ घृत, तेल और गुड एकदिन न सा दिनावरदे बरे तो अधिक गुणकरे || || (पिलहीपर धीर पट्पल) पीपरि,पीरामूल,चार चीता, मोटि और मेंघों गे सरपल पलमाल प्रस्थभरती में पचा हा दुध चौगुना जन मिदहो नौ यह जी प्लीहाको नाश करताआरिपमयर समाग्निको दूसर रपिकोकर (सग्रहणी अतीसारपर चारीत ॥२०॥पीपरि, पीपरामूला पीना, जपीगरे, गुचुरू सहि, धनिया, पादा रेल और अमायन ॥ २१ ॥ये पलप नभर औरची चासठिपलबोटी नुनियाका रम२५६ पलदरगामी ५६ भध्याय } मापाटीकासमता नुत् । इन्त्यानाहंगुदभ्रंशेमूत्रकृच्छेप्रवाहिकाम् २४.ममू राणांपलशतनीरद्रोणेविपाचयेत् । पादशेषेशतंनीत्वा दत्वाविल्वंपलाष्टकम् २५ घृतपस्थंपचेत्तेनसर्वातीसार नाशनम् । ग्रहणींभिन्नविटकोचनाशयेच पंवाहिकाम् २६ अश्वगन्धापलशंतंतदईगोक्षुरंमतम् । शतावरीविदारी चशालिपीवलोमती २७ अश्वत्थस्यचराङ्गानिपद्मबी जंपुनर्नवा । कारभाश्चफलं चैवमापवीतथैवच .२८ पृथग्दशपलान्भागाश्चतुद्रोणेम्भसःपंचेत् । द्रोणेशेषेरसे तस्मिन्पचेचैववताढकम् २९ मृबीकापेमकंकुष्ठंपिप्पली रक्तचन्दनम् । पत्रकनागपुष्पंचआत्मगुप्ताफलंतथा ३० नीलोत्पुलंसारिवहेजीवनीयगणस्तथा। पृथक्कर्षसमामा गाःशर्करायापलंद्वयम् ३१ रसस्यपौएड्वेक्षणामाढकै समाहरेत् । रक्तपित्तक्षतंक्षीणंकामलांवातशोणितम् ३२ पले दही दे मंद मंद आंच से पचाये इसको नाम चेगिरी वृत है ॥ २३ ॥ इस 'से वात, कफ, ग्रहणी, अर्श दूरहो पेट फूलना, कांचनिस्सरण, मूत्रकृच्छ और प्रवाहिका ये सबै नाशहोय ॥ २४॥ (अतीसारपरमसूरत ) सौपल.ममु. शको द्रोणभर जलमें कार्यकरै चौधाई रहै तब उस कादे में आटपल येलकी नीदे ॥ २६ ॥ और स्वभर घृतदे पंचायै उससे सब प्रसार ग्रहणी और विधा मल गिरना तथा प्रभाहिका ये सब दूरहो ॥ २६ ॥ (रक्तपित्तपर कामदेव वृत असगंध सोपल गवुरू पचासयस शतावरि पिलाईकंद बनरर्दी परियारो सुधा २७ ॥ पीपरका टिंगुसा, रक्तकमलगट्टा, गदापुरना, भारी पुण,कोले उ ।। २ ॥ ये दशदश पल चार द्रोण पानी में पचाय गोश शेप रहै तब आकर्भर थी देकर पंचावै ॥ २६ ॥ फिर दास, पास, पोरर, रत चन्दन, पत्रन, नागरेशर, किवांचके पीजकी माँगी । नीलकमल का फूल, पिनी कमलगट्टा, सरिखन, पिठवन, जीवनीयगणं पुत्रोक्त जो न मिले तो 'केरल परियारा देना ये सब द्रव्य कर्ष कर भरले शङ्कर दो पल युक्त करना ।। ३१ भादकमर पौडझका रस सव इकहा उसमें पचा नई पीशेपर करा १४८. शाईपरसंहिता मध्यखण्ड हलीमकंपाण्डुरोगवर्णभेदस्वरक्षयम् । मूत्रकृच्छमुरोदाई पार्श्वशुलंचनाशयेत्॥३३ एतत्सर्पिःप्रयोक्तव्यंवदन्तःपुरे चारिणाम् । स्त्रीणांचैवाप्रजातानांदुर्बलानांचदेहिनाम् ३४ श्रेष्ठंधलकरवण्यापुष्टिरसायनम् । ओजस्तेजस्क रहद्यमायुष्यप्राणवर्द्धनम् ३५ संवईयत्तिशकस्यपुरुष दुर्वलेन्द्रियम् । सर्वरोगविनिर्मुक्तोपयस्सिलोयथाद्रुमः। कामदेवइतिख्यातसर्पिरुक्तमहागुणम ३६ त्रिफलाटेनि शेक्षान्तीसारि वेद्वेप्रियङ्गुका।शालिपर्णीपृष्ठपर्णीदेवदा व्येलबालुकम३७ नतविशालादुन्तीचदाडिमनागकेशरै मानीलोत्पलैलामजिष्ठाविडॉ पद्मकुष्ठंकम३८जातीपु पंचन्दनंचतालीसंवृहत्तीतथा। एतैःकर्षसमे कल्कै लं दत्त्वाचतुर्गुणम् ३९-घृतप्रस्थंपचेद्दीमानपस्मारज्वरेक्ष ये। उन्मादिवातरक्तेचकासेमन्दानलेतथा ४० प्रतिश्या तव छानिले. रक्तपित्त, सततीण, कमले, वातरक्त ॥ ३२ ॥ हलीमका पांडुहरै वर्णभेद, स्वरक्षय, पूत्रकृच्छ, उरदाह थौर पसुरी पीडाको दूरकरे...३३ ॥ यह घृत बहु रमणीयको देय बांझ पुत्रवती हो दुर्बलको दे तो मोटादो ॥३४॥ अष्टद चल करताहै शरीरकी रंगत श्यच्छीहो हृदयको मिय च पुष्टता करताहुया रसायन होकर बल, नेन, श्रायु और मारणोंको बढ़ाताहै, ॥ ३५॥ वीर्य पदरता है दुर्वलेन्द्रिय पुरुषकी बलीहो सब रोगनाशही जैसे सींचने से टन तरुण हो जाता सेही मनुष्का शरीर होलाहै यह फायदेच फुल बड़ा गुरुदायी कहाताई ॥३६॥ फयाण वृत अपस्मारपर ) त्रिफला, दोनों हल्दीधारेणुका, सरिचन, पिठवन, मकरा, वनउदी, वनमंग, देवदारु, एलवाल न मिले तो सुगन्धवाला देय ॥ ३७॥ तगर, इन्द्रारुण, जमालगोटे का बीज, अनार, नागकेशर, नीलक- मल,इलायची, मंजीत,पिडंग पास, फूट ॥३८॥ मालतीपुष्प, श्वेतचन्दन, तालीसपत्र और रद्ध भटकटैया ये सब कप भर पानी में पीसि कल्क, हरि चौ- शुना-पानी दे ॥ ३६॥ उस पानी में प्रस्यभर और वह कल्क देक पकाय वैधदेचे इस घी से मिरंगी, ज्वर क्षयी, चित्तभ्रम, वातरक्त, कास, मन्दाग्नि ।।४।।
१४६ अध्याय ] भापाटीकासमेत येकटीशूलेतृतीयकचतुर्थ के सूत्रकृच्छचिसर्पचकरडूपा ण्ड्डामयेतथा. ४१ 'विषद्वप्रमेहेषु सर्वशवप्रयुज्यते । ध्यानांपुत्रदंभूतयक्षरक्षोहरेस्मृतम् ॥४२. अमृताकाथ कल्काभ्यांसक्षाविपचेघृतम् । वातरक्तंजयत्याशकुष्ठं जयति दुस्तरम् ४३, सप्तच्छदैःप्रतिविषाशझ्याक कटु रोहिणी । पाठामुस्तंमुशीरंच, त्रिफलांपर्पटस्तथा ४४ पटोलनिम्बमञ्जिष्ठाःपिप्पलीपद्मकंशटी। चन्दनंधन्वयी सश्चविशालाद्वेनिशेतथा:४५.गुडूचीसारिवढेचर्चावा साशतावरीत्रायतीन्द्रयवायष्टीभूनिम्बाश्चाक्षभागिकाः ४६ घृतंचतुर्गुणंद्याघृतादामलकीरसः। द्विगुणंसर्पि पश्चात्र जलमष्टगुणंभवेत् ४७ तस्मिाईपाययेत्सर्पितिर क्तेषुसर्वसु। कुष्ठानिरक्तपित्तंचरक्ताशीसिचपाण्डुताम् ४८ हद्रोगगुल्मची सर्पप्रदरानगण्डमालिकाम् क्षुद्ररोगंज्वरं चैवमहातिक्तमिदंजयेत् ४६ कासीसंदेनिशेमुस्तहरितालं नाकटपकना, कटिगीड़ा सिंजारी, चातुर्षिक मूत्रकृच्छ, वितपिका. खजुली पाण्डु ॥४१॥ दोनों विपमें प्रमेह में और रोग सर अच्छेहों, याझ पुत्र नने और भूत व राक्षसों की वाधा ये सर दूरहोये इसका नाम कल्याणघृतहे ।। ४२।। ( वातरक्तपर अनादिवृत सुवधा कल्क गुर्चको कार्य दूध 'साय वृत पचाव इससे वातरक्त और कोद दूरहोताहै ॥ ४३ ॥(लातकुष्ठादिपर'महा तिक्तादि घृत , छितौनी, अमलतास, अतीस, 'कटुवी पादा, नागरमोथा, खस, त्रिफला, पित्तपापड़ा ।। ४४ ॥ पटोल, नीमा मिनीठ, पिपरी, पास, क. घर, चन्दन, जवासा, इन्दारुन, दोनों हल्दी !! ४५.३॥ गुर्च सरित्रन पिठवन, मुर्रा, रूसा, शतावरि, गायमा प्रद्धि है इन्द्रधव, मुलेठी और चिगयता ये सब कप कर्प भरले ।। ४६ ।। घी चौगुनादेव घीका दुनो विरकर रसदेकर अठगुणा जलदे ।। ४७, यह सिद्ध भी संपवातरक्तक विकारों में व अठारहो दुष्टों में प रक्तपित्त में व रकाश पदुमैं देवा ॥ और द्रोग, गुल्म, विसर्प भदर, गण्डमाला, क्षुद्ररोग और ज्वरको दुरिकर रसका महातिक्त नामहे पहिले कहे रोग :10 शाधरसंहिता - [ मध्यखएर मनःशिलाम् । कम्पिल्लकंगन्धकंचविडगंगुग्गुलुंतथा ५० सिक्थकमरिचंशुण्ठीतुत्थकंगोरसर्पपमारसाञ्जनंचसिन्दू रंश्रीवासंरक्तचन्दनम् ५१ इरिमेदनिम्बपत्रकरजंसारिवा वंचाम् ।मञ्जिष्ठांमधुकमांसींशिरीषलोध्राद्मकम् ५२ हरी तकी पुन्नागंचूर्णयेत्कार्षिकानुष्टथक् । ततस्तचूर्णमालो ड्यत्रिंशत्पल मितेघृते ५३ स्थापयेत्ताम्रपात्रेचघर्मसप्त दिनानिवै। अस्याभ्यङ्गेनकुष्ठानिद्रपामाविचर्चिकाः५४ शूकदोषाविसपश्चिविस्फोटावातरक्तजाः । शिरःस्फोटो पदंशाश्चनाडीदुष्टवणानिच ५५ शोथोभगन्दरश्चैवलू ताःशाम्यन्तिदेहिनामाशोधनरोपणचैवंसुवर्णकरणंघृतं म् ५६ जातीनिम्बपटोलेंचद्वेनिशेकटुरोहिणी मंजिष्ठाम धुकंसिक्थंकरजोशीरसारिवाः ५७.तुत्थंचविपंचेत्सम्यक कल्कैरेभिर्घतंयुधः । अस्यले पात्प्ररोहन्तिसत्तमनाडीव्रणों अपि। मर्माश्रिता दिनश्चगम्भीरासरुजोत्रणाः ५८ चित्रकःशङ्खिनीपथ्याकम्पिल्लस्तृटतायुगम्। ददारुश्च सर अच्छे होय ॥ ४६॥(कुष्ठ, दाह, खाजपर कसीसादि घृत) कसीस दोनों हल्दी, नागरमोधा, हरताल, मैनशिल, कवीला, गन्धक, विडंग, गुग्गुलु ५० ॥ मोम. मिर्च साठि,त्तियापीत सरसो,रसौत. सिन्दूर, रातालाल चन्दन ।। ५१ ॥ सैर, नीलकापना, करंज, सरियन वच, मंजीठ, महुआटाल, जटामासी, सिरस, लोध, पद्मास ।। ५२ ॥ हड़, गदापुरैना इन सबका एक एक कर्मचूर्णकर तिसे तीसपल वृत में सानि ॥५३॥ ताम्रपात्रमें भरि सातदिन घाममें घरै इस घी के लगाने से पुष्ठ दाद मंज,विचर्चिका ॥ ५४॥शूकदोप, विसर्प,चतिरक्तननित शीतला,मस्तकाव,गी,नासूर ।।७५ ॥शोध,भगन्दर लूतार मकड़ी)ये दरहों घाव अतिशुद्धहो पुरा घाव चिह्न न रहे।। ५६ ॥ (घावपर जातीवृत ) चमे- ली,नीर,परयलतीनों पची, दोनों हल्दी, कटुकी,मनीठ मुलेग मोम,करंज, खस, सरिवन ।। ५७ ॥ और तूतिया इन सघको समान भागले लुगदी करि घृत पकाचे इस घीके लगाने से पाव,नासूर मर्मस्थानका दुश्वदायी मम्भीर घाव और पीड़ा -- पायाय:६] भांपार्टीकासमेता। शम्याकोदन्तीचत्रिफलातथा ५९ कोशातकीदेवदालीनी लनीगिरिकर्णिका । शातलापिप्पलीमूलंविडॉकटुकीत था. ६व हेमक्षीरीचविपचेत्कल्कैरेभि पिचन्मितः तंत्र स्थस्नुपीक्षीरंषट्पलेतुपलईये६ अक्षीरस्यमतिमास्त सिंहगुल्मकुष्ठनुत । हन्तिशुलमुदावर्तशोत्थाधमानेभग न्दरम् ६२ शमयत्युदराण्यष्टौनिपीतंबिन्दुसरेययागो दुग्धेनोष्टदुग्धनकौलत्थेनशतेनवा ६३ उष्णोदकेनवापी त्याविन्दुवेगविरिच्यते । एतबिन्दुघतनामनाभिलेपादिरे चयेत् ६४ त्रिफलायारसप्रस्थंप्रस्थवासारसोद्भवम्।। भृङ्गराजरसप्रस्थंप्रस्थमाजपयस्तथा ६५ दत्त्वातंत्रघृतं प्रस्थंकल्क कर्षमितैः पृथक् त्रिफलापिप्पलीद्राक्षाच न्दनंसैन्धवंवला ६६ काकोलीक्षीरकाकोलीमेंदामरिचना गरमी शर्करापुण्डरीकञ्चकमलेचपुनर्नवा६ निशायुग्म मधुकंसधेरेभिर्विपाचयेत् । नितान्ध्यनकुलन्निध्यंचकण्डू ये सब दूरहों ।। ५ (उदररोगपर बिन्दु धृत) चीते की छाल शंखाईली, हड़,कवीला, दोनों निशोथ, विधारा, अमलतास का गूदा जमालगोटा त्रिफला ।। ५६ कवीतोरई, देववाली कहे (चंदाल ) नील की पत्ती, कोयल से हुड़की टीमी, पीपरामूल, विडंग, कटुकी ॥६०॥ और चूक ये सब कप कपभरले कल्क करि भस्थभर भीमें पचाय छः पल से हुड़का दूधडारै ।। ६१ ॥ और दो पलं मदारका दूधडार वह सिद्ध श्री देवे तो गुल्म, कुप्ठ अच्छाहो शूल उदावते,शाय, पेटफूलना,भगंदर ॥ ६२॥ और बाटो उदररोग ये दूर हो पाठवंद पानी से वा धसे वा ऊटके दूधेस फुलथी झायस ॥६॥ गरम पानी से जो धूद पियसे दस्तही यह चिन्दन नामिम लेप करने से दस्तआते हैं।६४(नेत्र रोगपत्रिफला वृत) त्रिफले का रस एकमस्थ, रूसेका एक प्रस्थ, मैंगरेका एक प्रस्थ, बकरीका द, एकमस्य ॥६५॥ एक प्रस्य ही कर्ष कप और द्रव्य त्रिफला, दीपरि, दास. चन्दन, संघव, रियारा ॥६६॥ दोनों का कोनी विना असगन्ध, मदा, विना मुलेठी, मिर्च, सॉटि, सांड़, श्वेतकाला, रक्तकमल, गदापुरना ।। ६७ । दोनों । साधरसंहिता [मध्यखण्ड पिल्लं तथैवंचे ६८ नेत्रनायंचपटलंतिमिरंचाजकंजयेत् । अन्येपिप्रशमंयान्तिनेत्ररोगा सुदारुणाः । फलंघृतमेत छिपानेनस्यादिसत्रितम् ६६ हरिनेस्थिरामूर्वीमारिवा चंदनद्वयम्।मधेपर्णीचमधुकंपद्मकेसरपद्मकम् ७० उत्प लोशीरभद्रोमितिफलापञ्चवल्कलैः । कल्कै कर्पमितैरते घृतप्रस्थंविपाचयेत्,७१ विसर्पलताविस्फोटबणकुष्ठवि पापहम् । गौर्यादिकमितिख्या सर्वत्रणहरंस्मृतम् ७२ चलामधुरास्ताभिर्दशमूलफलनिकैः । पृथग्हिहिपलेरे भिद्रोपनीरेणपाचोत्७३मयूरपक्षपित्तान्त्रयकृत्पादास्य वर्जितम् । पादशेषगृतंनीत्याक्षीरंदत्त्वाचतत्तमम् ७२ घु तंप्रस्थंपचेत्सम्यग्जीवनीयैः पिचून्मितः । तत्सिदंशिर सःपीडामन्यांपृष्ठंग्रहंतथा७५अर्दितंकर्णनासानिजिह्वा ग़लरुजोजयेत् । पानेनस्येतथाभ्यड्नेकर्णपूरेषुयुज्यते। हे मन्तकालेशिशिरे वसन्तेषुचशस्यंते ७६ त्रिफलामधुकं हल्ली और मुलेठी इनमा कल्ककरि घी में पकाये तो नत्तान्ध्य, नठुलान्ध्य,यान, पिल्लरोग|| ५६ । नेसाय, पटल, तिमिर और नीलयिन्दु ये सर अच्छेहोय इस निफ्लादिमृतको साय वा नास लेकर यथोचित बनोपन कगा। (घापपर गौर्यादि घृत), दोनों हल्दी शालिपणी, मुरा सरिएन चन्दन, दोनों गुलेटी कमल केसर, कमल!1०11 नीलकमल लस, मेदा विना गुलेटी निता, भान, वटपीपर, पाकर और इलर इनकी छाल सब कर्प कर्पले करका रिमस्थभर धी में पचाये ॥७१ ॥यह गौर्यादि घृत विसर्पिका, अगिमासन. शीतला व, कुप्ठ और विष इन सयोंको अच्छेकरे ॥७२॥(शिरोरोगपर मयूरवृत परियारा, मुनीरामन दशमूल और निफ्लाये दो दो पल देद्रोणभर जलमें पकाय॥३॥ मपुरमास विना श्रात प्रोझरी पिचा पाय पानीमें गला चौथ्याई रहै उतारि ले यह यूपतिानाहो शिवना धटे ॥७४॥ मस्थभर धीमें फर्प वर्षभर जीवनीयगण और बादास पचाने शिररोग,मन्याव्यथा, पृष्ठयह ॥७॥ लकवा, कर्ण, नाक, नेत्र, जीभ, गला सके रोगनाश साय संच मलै कानमें डार हेमन्त शिशिर वसन्त अध्याय भाषाटीकासमेता। टमम् ६.दुग्धेदधिरसेतो कल्केदेयोष्टमांशकः । क ल्कस्यसम्यक्पाकार्थतोयमत्रचतुर्गुणम् ७ द्रव्याणियन्त्र स्नेहेषुपंञ्चादीनिभवन्तिहि । तत्रस्नेहसमान्याहुर्यथा पूर्वचतुर्गुणम् = द्रव्येणकेवलेनैवस्नेहपाकोभवेद्यदि । तत्राम्बुपिष्टः कल्कः स्याज्जलंचात्रचतुर्गुणम् ९ काथेन केवलेनैवपांकोयत्रेरितःक्वचित् । क्वाथ्यद्रव्यस्यकल्कोपि तन्त्रस्नेहेप्रयुज्यते .१.९ कल्कहीनस्तुयः स्नेहःससाध्य के वलेंद्रवे पुष्पकल्कस्तुयत्स्नेहस्तत्रतोयंचतुर्गुणम् । स्ने होत्स्नेहाष्टमांशश्चंपुष्पकल्कःप्रयुज्यते ११ वर्तिवस्ने हकल्कःस्याद्यदीगुल्याविमंदितः। शब्दहीनोऽग्निनिः क्षित स्नेहसिदोभवेत्तदी, १२ यदाफेनोद्गमस्तैलेफेनशा न्तिश्चसर्पिपिगिन्धवर्णरसोत्पत्तिःस्नेहसिदिस्तथाभवेत्, १३ स्नेहपाकनिधाप्रोक्लोम्दुमध्यःखरस्तथा।ईपत्सरस सेर में प्राधपाय घृत तेलका प्रमाण यही है ॥ ६ ॥ दूध, दही, रस और यही इनमें अष्टमांश कल्क देय और कुल्क भलीभांति पकाने के कारण चौगुना जल देना चाहिये ॥ ७ ॥ और जहां कल्क घी तेन काथ पाथ पाचों होय तहाँ स्ने. हादिक समान देना पानी चौगुना देह ॥८॥जय एकही द्रव्य वृत व तेलमें पकानी होय नौ जल में द्रव्प पीसि गला या कलाकारे चौगुने पानी में पचाच ।। ६ ॥ जो केश कारे में कहाहो तहा उसी हाथकी द्रव्यका कल्करि घृत वा तेलयुक्त वह काड़ा और चौगुना पानीदे पकाना १२० ॥ जहा कल्क रहित हैं तो केवल द्रवस्तु में दूध पानी देके पकालेना जा फलके कल्क में स्नेह सिद्ध, केंगे नव चौगुना पानी देंगे जा स्नेह से स्नेह सिद्ध होता स्नेहका यष्ट- माश दूसरा स्नेहले पुष्प कल्कयुक्त पकालेना ॥ ११ ॥ जर वह स्नेह पाक- गुरीमें लेके मलसे गोली बन जाय उसे यागार डार और जलसे शब्द चिर्चिरा- हर न करे नय सिद्धमया जानो ॥ १२ ॥ तेन पेनउठने से सिदजानिये वृत फेन शांतिसे सिद्ध जानिये जब गंध पावै और निर्मल होजाय औरसे उत्सत्तिकर तब घृत वा तेल सिद्धभया जानिये ॥ १३ ॥ स्नेहपाक तान मकारकाहे-मृदु मध्य और, m .
।
शाधरसंहिता।
मध्यसयह
हलीमेकपाण्डुरोगवर्णभेदस्वरक्षयम् । मूत्रकृच्छेमुरोदाहं
पाचशूलंचनाशयेत् ३३ एतत्सर्पिःप्रयोक्तव्यवह्वन्तःपुर
चारिणाम् । स्त्रीणांचैवाप्रजातानांदुर्बलानांचदेहिनाम्
३४ श्रेष्टंपलकरवायेहापुष्टिरसायनम् । ओजस्तेजस्के
रहृद्यमायुष्यप्राणवर्दनम् ३५ संवईयतिशुक्रस्यपुरुष
'दुर्वलेन्द्रियम् । सर्वरोगविनिर्मुक्तोपयस्सिलोयथाद्रुमः ।
कामदेवइतिख्यानैसर्पिसक्तमहागुणम् ३६ त्रिफलाटेनि
शेकौन्तीसारिवेटेप्रियङ्गुका शालिपीपृष्ठपर्णीदेवदा
व्येलवालुकम ३७ नतविशालादन्तीचदाडिमनागकेशर
मानीलोत्पलैलामग्जिष्ठाविडङ्गं पद्मकुष्ठकम३८जातीपु
पंचन्दनंचतालीसंवृहतीतथा। एतैःकर्षसमे कल्कैर्जलं
दत्त्वाचतुर्गुणम् ३९ घृतप्रस्थपचेहीमानपस्मारेज्वरेक्ष
ये। उन्मादिवातरक्तेचकासमन्दानलेतथा ४० प्रतिश्या
तब छानिले रक्तापेच, तक्षीण, कमल, वातरक्त ॥ ३२ ॥ हलीमक, पांदुहेरे
वर्णभेद, स्वरक्षय, सूत्रकरछ, उरदाह और पसुरी पीडाको दुकरे ॥ ३२ ॥ यह
घृत वहु रमणीयको देय वाझ पुत्रवती हो दुलको दे तो मोटाहो ॥ ४ ॥
श्रेष्ठई वल करताई शरीरकी रंगत अच्छीहो हृदयको प्रिय व पुष्टता करताहुआ
रसायन होकर पल, तेज, वायु और माणोंको बढ़ाताई ॥३५॥ वीर्य बढ़ाता है
दुर्बलेन्द्रिय पुरुपकी पलीही सव रोगनाशहों जैसे सींचने से वृक्ष तरुण होजाता
तैसेही मनुष्यका शरीर होताहै यह कामदेव बृत धड़ा गुणदायी कहाताहै ॥३६॥
(कल्याण मृत अपस्मारपर ) त्रिफला, दोनों हल्दी, रेणका सरिवन,
पिठधन, मकरा, वनउदी, चनमूग, देवदारु, एलबालू न मिले तो मुगन्धवाला
देय ॥३७॥ तगर, इन्द्रारण, जमालगोटे का बीज, अनार, नागकेशर, नीलक-
मनाइलायची,मनीठ विडंग, पयास, फूट ॥ ३ ॥ मालतीपुष्प, श्वेतचन्दन,
तालीसपत्र और वृद्ध भटकटैया ये सब कर्प भर पानी में पोसि कल्क करि चौ-
गुना पानी दे ॥ ३६॥ उस पानी में मस्थभर थोर वह पल्क देकै पकाय चैघदेने
इस घी से मिरगी, ज्वर, पी, विषम, पातरक्त, कास, मन्दाग्नि ॥४॥
१४६ . अध्याय 3 भीपाटीकासमेता। येकटीशूलेतृतीयकचतुर्थके । सूत्रकृच्छेविसर्पचकराडूपा ण्ड्वामयेतथा ४१ विषहयेप्रमेहेषु सर्वथैवप्रयुज्यते । व न्ध्यानापुत्रदंभूतयक्षरक्षोहरंस्मृतम् ४२ अमृतावार्थ कल्काभ्यांसक्षारंविरचेद्धृतम् । वातरक्तंजयत्यांशकुष्ठं जयति दुस्तरम् ४३ सप्तच्छदःप्रतिविषांशम्या कट रोहिणी । पाठामुस्तमुशीरंच त्रिफलापर्पटस्तथा ४४ पटोलनिम्बमजिष्ठाःपिप्पलीपद्मकशटी। चन्दनंधन्वया सश्चविशालाहेनिशेतथा ४५ गुडूचीसारिवद्वेचमूर्वावा साशतावरीत्रायन्तीन्द्रयवायष्टी निम्बाश्चाक्षभागिकाः ४६ घृतंचतुर्गुणंदद्याद्धृतादामलकीरसः । द्विगुणमपि पश्चानं जलमष्टगणंभवेत् ४७ तसिंद्धपाययेत्सर्पिनतिर तेषुसर्वसु। कुष्ठानिरक्तपित्तंचरक्ताशीसिचपाण्डुताम् ४८ हृद्रोगगुल्मवीसर्पप्रदरान्गण्डमालिकाम् !क्षुद्ररोगज्वर चैवमहातिक्तमिदंजयेत् ४६ कासींसंटेनिशेमुरतंहरिताले नाफटपकना, कटिपीड़ा तिजारी, चातुषिक 'मूत्रईन्छु, विपिको 'साली पाण्डु ॥४१॥ दोनों विपर्ने प्रमेह में और रोग सब अच्छेहों, बाझ पुत्र जनै और भूत र राक्षसों की वाधा ये सब दूरहोये इसका नाम कल्याणघृतह ॥ १२ ॥ ( चातररापर'अमृतादिवृत गर्च करक गुर्ची'काध दूधके साथ घृत पचापै इससे वातरक्त मौर को दूरहोताहै ।। ४(धातकुष्ठादिपर महा तिकादि घृत छितौनी, अमलतासे, अत्तीम, कटुकी पोदो, नागरमोथा, सस, त्रिफला, पित्तपापडा ॥ ४४ ॥ पटोल, नीम, मजीट, पिपरी, पनारसे, क- चूर, चन्दन, जवासा, इन्दारुन, दोनों हल्दी ॥ ४२ ॥ गुर्च, सरियन पिठवन, मुर्रा, रूसा, शतापरि, नापमाण परिद है इन्द्रयेब, मुलेठी और वियता ये सेव कर्प कप भरले ॥ ४६॥ घी चौगुनादे उघीकी दूना प्रावरेका रसदेकर अगरणा जलदे ॥ ४७ ॥ यह सिद्ध घी सर्व चातरक्तके विकारों में च अगरहों 'कुछौ में च रक्तपित्त में च रक्तााण्ड में दे ॥ ४६॥ और हृद्रोग, गुल्म, विसर्प मदर, गण्डमालो, क्षुद्ररोग और ज्वरको दुरिकर रसका महातिक्त नामई पहिले कहे रोग , मध्यसएर A शाधरसंहिता मनःशिलाम्। कम्पिल्लकंगन्धकंचविडङ्गगुग्गुलुंतथा ५० सिक्थकमरिचंशुण्ठीतुत्थकंगौरसर्पपमारसाञ्जनंचसिन्दू रंश्रीवासंरक्तचन्दनम् ५१:इरिमेदनिम्वपत्रंकरशंसारिवा वचाम्।मञ्जिष्ठांमधुकमांसींशिरीपंलोध्रामकम् ५.२ हरी तकीप्रपुन्नागंचर्णयेत्कार्पिकानप्रथ। ततस्तञ्चूर्णमालो ड्यत्रिंशत्पल मितेघृते ५३ स्थापयेत्तानपात्रेचघर्मेसप्त दिनानिवैः अस्याभ्यङ्गेनकुष्ठानिदद्पामाधिचर्चिकाः५४ शूकदोषाविसपश्चिविस्फोटावातरक्तजाः । शिरःस्फोटो पदंशाश्चनाडीदुष्टत्रणानिच ५५ शोथोभगन्दरश्चैवलू ताःशाम्यन्तिदेहिनाम् । शोधनरोपर्णचैवसुवर्णकरणंघृत म. ५६ जातीनिम्बपटोलंचद्वेनिशेकटुरोहिणी मञ्जिप्ठाम धुकंसिक्थंकरजोशीरसारिवाः ५७ तुत्थंचविपचेत्सम्यक कलकैरेभिर्धतंबुधः। अस्यले पात्प्ररोहन्तिसूक्ष्मनाडीव्रणा अपि । मर्माश्रिता दिनश्चगम्भीरासरुजावणाः ५८ चित्रकःशसिनीपथ्याकम्पिल्लस्टतायुगम्। रददारुश्च सब अच्छे होय ॥ ४ ॥-कुष्ठ, दाह, खाजपर कसीसादि वृत्त ) कसीस दोनों हल्दी, नागरमोथा, हरताला मैनशिल, कयीला, गन्धक, विडंग, गुग्गुर्नु । ५० ॥ गोम, मिर्च,साठि जूतिया,पीत सरसौं,रसौत; सिन्दूर, राल, लाल चन्दन ।। ५१ ॥खैर, नींवकापता, करंज, सरियन, वच, मंजीर, महमादल, जटामांसी, सिरस, लोध, पद्माख ॥५२॥ हड़, गदापुरैना इन सबका एक एक कप चूर्णकरे तिसे नीसपल नये सानि ॥ ५३॥ ताम्रपात्र में भरि सातदिन यांगमें धरै इस घी फे लगाने से सष्ठ दादालाज,विचर्चिका ।। ५८!! शुकदोप, विसई वातरक्त मनित शीतला,मस्तकलावंगी नासूर ।।७५ ॥ शोथ भगन्दर लूता (मकड़ी ये दूरहों घाव अतिशुद्धहो पुरा पाव चिह्न न रहै ।। ५६ ॥ (घायपर जातीवृत) चमे- ली,नीच परवल, तीनो पत्ती, दोनो हल्दी, कदुकी,मंगीठ मुलेठी मोम,करंग, सस, सरिवन ।। ५७॥ और जूतिया इन सबको समान भागले लुगदी करि-धनमें पकावै इस पीके लगाने से घाव नासूर, पर्मस्थान का दुःखदायी गम्भीर घाव और पीड़ा n थन्याय है भोपाटीकासमेता! शम्याकोदन्तीचत्रिफलातथा ५९ कोशातकीदेवदालीनी लनीगिरिकर्णिका । शातलापिप्पलीमूलंविडॉकटुकीत था ६० हेमक्षीरीचविपचेत्कल्कैरेभिः पिचन्मितैःघितप्र स्थरनुपीक्षीरंपट्पलेतुपलद्वये ६१ अर्ब क्षीरस्यमतिमांस्त सिद्गुल्मकुष्ठनुत् । हन्तिशलमुदावर्तशोत्थाध्मानमग न्दरम ६२ शमयत्युदराण्यष्टौनिपीतंचिन्दुसख्यया।गो दुग्धेनोष्टदुग्धनकौलत्थेनशतेनवा ६३ उष्णोदकेनवापी वाविन्दुवेगैर्विरिच्यते । एतबिन्दुघृतनामनाभिलेपाद्विरे चयेत् ६४ त्रिफलायारसप्ररथंप्रस्थवासारसोद्भवम् । भृगराजरसप्रस्थंप्रस्थमाजपर्यस्तथा ६५ दत्त्वातंत्रतं प्रस्थंकल्कैःकर्षमिते पृथक् । त्रिफलापिप्पलीद्राक्षाच न्दनसैन्धवनला ६६ काकोलीक्षीरकाकोलीमेदामरिचना गरम्। शर्करापुण्डरीकञ्चकमलंचपुनर्नवा६७निशायुग्मं चमधुकंसरेभिर्विपाचयेत् । नक्तान्ध्यनकुलान्ध्यंचकण्डू ये सब दूरहोय ॥ १८ ॥(दररोगपर बिन्दु तृत) चीते की छाल,शखाली, इडलीला, दोना निशेध, विधारा श्रमलतासका गूदा जमालगोटा त्रिफला ।। ५६ ।। कटुवीतोरई देवदाली दहे ( बदाल ) नीलकी पत्ती, कोपल सेंहुडकी छीमी, पीरामूल, विग, मटकी ।।६०॥ और था ये सर कर्प कर्षभरले पल्क परि प्रस्थभर भी पचाने छ• पल सेंहुडा धडारे ।। ६९ ॥ और दो पल मारा धारै बद सिद्ध त्री देवे तो गुल्म, कुष्ठ अच्दाहो मूल उदावत,शीय, पेटफूलना,भगंदर ।। ६२ ॥ श्रार या उदररोग ये दूरही आदरंद पानी से द्धसे चा ऊंटके दधसे कुलथी हापसे १६३॥ गरम पानी मे जो ईद पियसे दस्तहों यह पिन्दगृत नाभिमें लेप करने से दस्नातई ६॥ ( नेत्र रोगपर त्रिफला पृत) निपले का रस एकमत्स्य, रसेका एक मस्थ मॅगरेका एक मस्य, नवरीचा दध एव प्रस्य ॥६५॥ एक प्रस्य जीव वर्ष और द्रव्य त्रिफला, पीपरि दास चन्दन, संव, परियारा ॥६६॥ टोनों राकानी, पिना असगन्ध, गदा, विना मुलेठी, मिर्च, सोडि, साड, श्वेतकाला, रक्तकमल, गढापुरंना ॥ १७॥ दोनों १५२ गाधरसंहिता । [ मध्यखण्ड पिल्लंतथैवच ६८ नेत्रनावंचपटलंतिमिरंचाजकंजयेत् । अन्येपिप्रशमयान्तिनेत्ररोगा सुदारुणाः। फलंघृतमेत दिपानेनस्यादिमुचितम् ६९ देहरिनेस्थिरामूर्वामारिवा चंदनहयम्। मधुपर्णी पमधुकंपद्मकेसस्पद्मकम् ७० उत्प लोशीरमेदोभित्रिफलापञ्चवल्कलैः । क्ल्कोकर्पमितेरे ते घृतपस्यविपाचयत् ७१ चिप्सर्पलूताविस्फोटन्त्रणकुष्ठवि पापहम् । गोर्यादिकमितिख्या सर्वत्रणहरंस्मृतम् ७२ बलामधुकरास्नाभिर्दशमूलफलत्रिकैः । पृथग्हिद्विपलेरे भिद्रोणनीरेणपाचयेत७३मयूरपक्षपित्तान्त्रयकृत्पादास्य वर्जितम् । पादशेषशृतंनीत्वाक्षीरंदत्त्वाचतत्समम् ७४ तंप्रस्थंपचेत्सम्यग्जीवनीय पिचन्मितः । तत्सिद्धंशिर सःपीडांमन्यांपृष्ठग्रहंतथा७५अर्दितंकर्णनासाक्षिजिह्वा गलरुजोजयेत् । पानेनस्येत्तथाभ्यड़ेकर्णपूरेषयुज्यते । हे मन्तकालेशिशिरे वसन्तेषुचशस्यते ७६ त्रिफलामधुकं हल्दी और मुलेठी इनका कन्ककरि घी में पकाये तो नकाध्य, नालाय, पान, पिल्लरोग ।। ५८॥नेलार, पटन, तिमिर और नीलरिन्दु ये सब अच्छेहोयें इस त्रिफलादिघृतको खाय वा नास लेकर यथोचित अनोपान कंग॥६६॥ (घावपर गोर्यादि घृत) दोनों हल्दी, शोलिपर्णी, मुरा सरिबन चन्दन, दोनों मुलेटी, कमल केसर, कमल।।७०॥ नीलकमल,उस, मेदा विना मुलेठी त्रिफला, पान, वट,पीपर, पाकर और गूलर इनकी छाल सब कर्प कर्पले कल्ककरिमस्थभर घी में पचावै ॥ ७१ ॥ यह गौर्यादि घृत विसर्पिका, अगिमासन, शीतला राव, कुष्ठ और विप इन सबको अच्छेकरै।।७२।(शिरोरोगपर मयूरत )परियारा, मुलेठी,रासन, शमूल और निफलाये दो दो पल दे द्रोणभर जलमें पकाना॥ मरमास विना प्रात पोहरी पित्ता पाय पानीमें गला चौथ्याई रहै उसारि ले यह एप जितनाहो तितना दृधदे itsel मस्यभर धीमें कर्ष कर्षभर जीवनीयगण और कांदा राय पचावै शिररोग,मन्याव्यथा, पृष्टग्रह ॥७॥ लंका, कर्ण, नाक, नेत्र, जीभ,गला सबके रोगनाशै साथ भू मन कानमें डार हेमन्त शिशिर वसन्त .
अध्याय: भापाटीकासमेता। कुष्टहेनिशेकटुरोहिणी विङ्गपिप्पलीमुस्ताविशालाकट, फलंबचा ७७ उमेदेवेचकाकोल्यौसारिप्रियङ्गुका शो तपुष्पाहि रास्ता चन्दनरक्त चन्दनम् ७८ जातीपुष्पंतु माक्षीरीकमलेशर्करातथा अजमोदाचदन्तीचकलकैरेते, श्चकार्षिकैः जीवहत्सकवर्णायाधतंप्रस्थंचगोःक्षिपेत्। चतुर्गुणेन पयसापचेदारण्यगोमयः ८० सुतिथीपुण्यनक्ष वेसद्भाण्डेतावजेतथा। ततःपिवेच्छुभदिनेनारीवापुरुषोः थवा ८१ एतत्सर्पिनरःपीत्वास्त्रीषुनित्यंचायते। पुत्रानु संजनयेद्धीमानूबन्ध्यापिलभतेसुतम् ६२. अनायुपवाज नयेद्या वसूतापुनःस्थिता । पुत्रमाप्नोतिसानारीवुद्धिमन्तं शतायुषम् ३. एतत्फलघृतंनामभारद्वाज़ेनभाषितम् । अनुक्तलक्ष्मणामूलंक्षिपन्त्यचिकित्सका ४ त्रिफलांडे, सह परेगुडूचीसपुनर्नवाम् । शुकनासाहरिद्रेवेरास्नामेदा शतावरीम् ८५ कैल्कीकृत्यघृतप्रस्थंपचेक्षीरेचतुर्गुणे । में सेवन करना अच्छा कहाहै -11७६॥(पंध्याको फलघृत ) त्रिफला, मुलेग; फूटादोनों हल्दी, कुटकी; विहंग,पीपरि, नागरमोथा, इंदारुण, कायफर!! ७७॥ मेदा-महामेदा, बिना मुलेठी, दोनों काकोली, विना असगंध, सरिवन, पिटयन सकरा सौंफ,हींगाराप्तन दोनाचन्दन ।। ७८ ॥ चमेलीपुष्प, वंशलोचन, कमल, शकार,अजमोद और जमालेगोटा ये कप कप भरले करककरि।। ७६॥ एकरंगकर गाय और बदराहो तिसका भी घी भस्थभर देकर चौगुना द्धदे विनुवों कपडामें मन्दमन्द आँचदेकर पचावे का सुन्दर तिथि, पुष्य नक्षत्र में मट्टी वा ताँबेके. पात्रमें शुभदिन पिये स्त्री वा पुरुष ८१ पुरुष जो पिये सो उपमनुल्य कामी रहे, कैसामी असमर्थ हो परन्तु पुरुषत्वको उत्पन्न करे और वांझिनके पुत्रहोय ॥२२॥ ज्यहि-स्त्रीके पुत्र मरजातादो उसके घृतसेवनसे पुत्रहोकर सोधपनियन २॥ यह फलघृत भारद्वाज भापितहै विनाकहे वैध इस घृत के संग लक्ष्मणा बूटी की जड़ देते हैं ।1८४॥ (योनिद्रोप पर त्रिफलादि मृत) त्रिफला, दोनों कट- सरैया,च, गदापुरैना, तिरस दोनों हल्दी, रासन मैदा और शतावरि ।। ८५॥ .
से शाधरसंहिता [मध्यखएड तत्तिईपाययेनारीयोनिरोगनिपीडिताम् ६६ पीडिताच लिंगायचनिःसृतापिटताचया। पित्तयोनिश्चविभ्रान्ता पंण्ढयोनिश्चयास्मृता ८७ प्रपद्यन्तेहितास्थानं गर्भगृह न्तिचालकत । एतत्फलघतनामयोनिदोपहरंस्मृतम् पनिम्बामृताव्याघ्रीपटोलानांतेनेच कल्केनपकसर्पि स्तुनिहेन्याविषमज्वरान्। पाण्डकष्टविसर्पचकमीनशॉसि नौशयेत् ८९॥ इति श्रीशाङ्गधरेमध्यखण्डेघृतकल्पना ध्यायोनवमः।। १ लाक्षाढकवाययित्वाजलेश्चचतुराढकैः । चतुर्थांश भृतंनीत्वातलं स्थमितंक्षिपेत् १ मस्त्वाढकंचगोदधनः संधैतैलेविनिक्षिपेत् । शतपुष्पामश्वगन्धाहरिद्रांदेवदा रुच २ कटुंकारेणकापूर्वीकुष्ठंचमधुष्टिकाम् । चन्दनं मुस्तफरास्नाप्टथकंपप्रमाणतः ३ चूर्णयेत्तत्रनिक्षिप्य इनका कार्य प्रस्यभर घृत व चारिमस्थ दूध में पकाचे जब पी सिद्धटो तव स्त्री पिय तो सब :योनिदोप दरहो .८६ ॥ पीड़ित, चलित निम्मृत, विकृत, पि. नयोनि, विभ्रांत, पण्डयोनि ।। ६७ ॥ ये, सब योनिरोग मिटे और गोटेक यह फलघृत नाम घृत योनिदोष पर रहताभच्छा कहा है | ॥ (पिपमज्वर. पर पंचसियत) रूसा, नीर, गुर्च, भटकटयां और पटोल ( परवर ) इन्हीं के.फादा.आरकल्क में दो पकाय खाय तो विषमज्वर जाय पादु कुप्ठ विसर्प छमि और भी ये भी दूरहोय ॥ ::. . • इति श्रीशाधरसुधाकरेनयमोऽध्यायः ॥1॥ ६१ अधवृततैलसाधनमकार ॥ (लाक्षादितले) लाही एक पाठक "मोहक हीन सेर कर रुपये भर होता है" चारि मांढक पानी में काला परि चाध्याई रहे उतारि ले मस्यभर तेलदेर मेस्थ ६४ रुपया भर कहाता {"tifदीकाजल के मादकभरदे सौंफ,असगंध,हल्दी, देवदारु ॥२॥ इंटकी, मेयडीयोन, मुरांपर्ट, मुलेठी, चन्दन, नागरमोथा, रासन ये कप भरलें ॥३॥ पूर्ण करि तेलमें मध्यम आंचसे सिद्धफर इस तेल के लगाने से. 11 १५५ अध्याय ११] भापाटीकासमना। साधयेन्मृदुवह्निना, अस्याभ्यगात्प्रशाम्यन्तिसपिवित मज्वराः ४ कासश्वासप्रतिश्यायनिकटष्ठग्रहस्तथा। वा तपित्तमपस्मारमुन्मादयक्षराक्षसान ५. कण्डूंशूलंचदौर्म न्ध्यंगात्राणांस्फुटनेजयेत् । पुष्टग भवेदस्यागार्भिण्यभ्यं ङ्गतोमुशम ६,अश्वगन्धावलाविल्चंपाटलावृहतीहयम् । श्वदंष्ट्रातिबलेनिम्बश्योनाकंचपुनर्नवाम् ७ प्रसारणीस ग्निमन्थंकुर्याद्दशपलंपथक् । चतुद्रोणेजलेपत्वापादशे पंतनयेत् ८ तलाढकरसंयोज्यशतावर्यारसाढकम्। क्षि पेत्तत्रचगोक्षीरंतैलात्तस्माच्चतुर्गणम् ९ शनैर्चिपाचोदे भिःकल्कैपिलिकै पृथकू । कुप्रैलाचन्दनंबालामांसीशैले यसैन्धवैः१०अश्वगन्धावलासस्ना शतपुष्पेन्द्रदारुभि पाँचतुष्टयेनैवतगरेणैवसाधयेत्-१३ तत्तलनावनेभ्यते पानेवस्तौचयोजयेत् । पक्षाघातहनुस्तम्भमन्यारतम्भंग लग्रहम् १२ कुजत्ववधिरत्वंचगतिभड्कटिग्रहम् । गा विषमज्वर शमनहोताहै ॥ ४॥ कास, शाम, नाकबहना, विककडे रीडपीडा. पीजकड़ना, बातपित्तज मिरगी, यक्षव राक्षसी उन्माद ॥ ५ ॥ खाज, पेटपीर, दुर्गध और देहफूटन ये मिटें व गर्भिणी मलै तो गर्भपुष्टि होय ॥ ६॥ (नायुपर नारायण तेल ) असगन्ध,परियारा,येत,प्रादा, मटकटैया, दोनों गुरसुरु, कडे, नींव, सोहनपती, गदापुरना ॥ ७॥ गंधमतारिणी गौर भरणी ये दश दश पन्त सब द्रव्यले चारद्रोण पानी में पकावै जर एक द्रोण शेपर है," द्रोण एकसेर पक घटाक का होता तर एक ग्राहक तेलमें शतापरि का रस एक मादक देय जो गीली होप तो रस निचोरिक देय सूखीहो तो काहाकारकै देय तेलका चौगुना दूध गजका दे ॥ ६ ॥ तिसमें कल्क डारि धीरे धीरे, पचा फटारला. यची, चंदन, सुगन्धवाला, जटामासी, हरीला, संघालरेन ॥ १० ॥ असगंध, परियारा, रासन, सौंफ, देवदार, शालपरी पृष्ठपाणी, अनुवटी, पनमूंग चौरस गर ये सब दो २ पललेकर करकारे गौर सेल में सामिलेय ॥ ११ ॥ उस तेल का नासदेप और शरीर पै,मले पिचकारी प्राति कर्ममें देर पकाचात, टोदी A १९५८ शाईधरसंहिता! मध्यतर येद्दीमान्पदिशेपरसनयेत् ३० तैलप्रस्थेततःसीकाथा नेतान्विनिक्षिपेत् । कल्कैरेभिश्चविपचेदमृताकुष्ठनागरैः ३१ रास्नापुनर्नवैरण्डैःपिप्पल्याशतपुष्पया।बलाप्रसारि णीभ्यांचमांस्याकटुकयातथा ३२ एयगईपलैरेभिस्साध येन्दुवह्निना.. हन्यातैलमिदंशीघ्रग्रीवास्तम्भापवाहु को ३३ अर्धाङ्गशोषमाक्षेपमरुस्तम्भापतानको । शाखा कम्पंशिरःकम्पविश्वाचीमदितंतथा माषादिकमिदंतैलं सर्ववातविकारनुत् ३४ शतावरीवलायुग्मंपण्यौगन्धर्व हस्तकः । अश्वगन्धाश्चदंष्ट्राचविल्वःकासःकरण्टकः३५ एषांसाईपलान्भागान्कल्कयेचविपाचयेत् । चतुर्गुणेन नीरेणपादशेषशृतंनयेत् ३६ विपाच्यप्रस्थतैलेनक्षीरप स्थंविनिक्षिपेत् । शतावरीरसप्रस्थंजलप्रस्थंचयोजयेत् ३७ शतावरीदेवदारुमालीतगरचन्दनम् । शतपुप्पाव लाकुष्ठमेलाशैलेयेमुत्पलम् ३ऋद्धिर्मेदाचमधुकंका कोलीजीवकस्तथा । एपाकर्षसमैःकलकैस्तैलंगोमयव उतारि ले ॥ २६ ॥ मस्य भर छाग मांसाचौसठपल शलमें पचाय उतारि मानि ले ॥ ३० ॥ तर मस्य भर रोलमें सब फाप और मास यूप देकर पचाय और यह कल्क भी पचाव गुर्च, कूट, साचि ॥३१॥ रासन गदापूर्ण, रंड, पीपरि सोफा परियारा, गन्धप्रसारिणी, जटामासी और कटुकी ॥ ३२ ॥ये सब भाषा भाषा पल धीमी भाचदे उस तेलम पकावै इस तेलसे ग्रीवा जकहना,बाहुल्यया ॥३॥ अर्धीग मखना भानेपा जरुस्तम्भ प्रपतानका सागकंप और शिरसम्म यो रोग इस मापादिवेल से होये सब वातविकार न रहै।। ३४ ॥ (शतापरि तेल) शतायरि दोनों परियारा,दोनॉपणी रंड असगंध,गमरूपेल,फास नौर कुरैया। ३५॥ सपद डेद पल करककरि चौगुने जलमें पचाय जा चौध्याई शेपरहै तब उतारिले ॥३६॥ पिरि मस्यभर तेल मस्थभर धर्म पचा एक प्रस्थभरि शतावरिरम प्रस्थभर पानी में पचाव ।। ३७॥ फिरि शाापरि, देवदार, जटामासी, नगर, चन्दना सौफपियारा केट,इलायची,इरीला कमल! ३८ ॥ऋद्धि सिदि अध्याय १] भापार्टीकासमेता। हिना ३९ पचेत्तेनैवतैलेननरःस्त्रीपुरयायते । नारीच लभतेपुत्रंयोनिशूलंचनश्यति ४० अङ्गशालशिरःशूलं कामलांपाण्डुतांतथा। गवसीप्लीहशोपश्चिमेहान्दण्डाप , तानकम् ४१ सदाहंवातरक्तंचवातपित्तमदार्दितम्। प्रस्त ग्दरतथाधमा रक्तपित्तनियच्छति ४२ शतावरीतेलमि दकृषणात्रेयेनभाषितम् (ॐनारायणायस्वाहा उत्तराभि मुखोभूत्वाखनेखदिरशगुना । ॐसर्वव्याधिनाशनीये स्वाहा इत्युत्पाटनमन्त्रः ॐकुमारजीवनीयेस्वाहा इतिपा चकमन्त्रः)४३ काशीशंलाङ्गलीकुष्ठंशुण्ठीकृष्णाचसैन्ध वम्। मनःशिळाश्चमारश्चविडङ्गचित्रकोपः ४४ दन्ती कोशातकीवीहेमालाहरितालकः। कल्कैःकर्पमितैस्तैलं ततःप्रस्थंविपाचयेत् ४५ स्नुह्यर्कपयसादद्यास्ट्रथन्डिप लसम्मितम्। चतुर्गुणगवांमूत्रंदत्वासम्यक्प्रसाधयेत्४६ कथितखरनादेनतैलमविनाशनम् । क्षारवत्पातयत्ये विनायराही फंद, मेदा, बिना मुरेठी दुधार कही है इससे दूनी लेना काकोलीपिनी असगंध और जीयक विना साराहीकंद ये सव कपभरले कल्ककरि गोइठा की श्रांच में पचावे ।।३६ इसे मायमें लगानेसे पुरुष स्त्रियांम पभ नुल्य होकर रमता है व स्त्री पुत्रमनती है व योनिविकार नाशहोताहै ।। ४० ॥और अगशूल शिरःशूल, कमल पाण्डु, गृसी, प्लीह, शोप प्रमेह, दण्डापतानक वायु॥४१॥ दाहसहित पातरक्त, पातपित्त, मदपाडित, रुधिर आध्मान रक्त पित्त ये सब दूरहोयें ।। ४२ ।। यह शतापरि तेल कृष्णायने कहा "मयम मन्त्र निमंत्रण, दूसरा उत्पाटन, तीसरा पाचक मंत्र ये तीनों मंत्र मूलसे जानना चाहिये । . ४३ ॥ ( अर्शपर पासीस तेल ) कसीस, कलिहारी,कट, सोठि, पीपरि, संघर, मैनाशिल कनेर, वायविडंग, चीता, अडूसा ॥४४ ॥ जमालगोटा,बनतोरई पीग चक और ह- : रताल ये सरक कर्प भरले करकफरि प्रस्थ भर तेलमें पकाय ॥४५॥ दोपल । सोडुड़ दूध, दोपल मदारध व तेल का चौगुना गोत्र देकर भली भाति पका- ॥४६॥ यह खरनाद आचार्य ने कहा है इसके लगाने से वासीर का मस्सा शाधरसंहिता। [मयर तदस्यिभ्यङ्गतोभृशम् ४७ वलीनदूषयंत्येतत्वारकर्म करंस्मृतम् ४८मजिठासारिवास यष्टीसिक्थैःपलोन्मि तै। पिण्डाल्यसाधयेत्तैलमभ्यगाद्वातरक्तनुत् ४९ अर्क पत्ररसेपहरिद्राकल्कसंयुतम् । साधयेत्सार्षपंतैलंपा 'मांकच्छूविचचिनुत् ५० मरिचंहरितालंचत्तवृतरक्तच न्दनम् । मुस्तामनःशिलामांसीडेनिशेदेवदारुच ५१ वि शालाकरवीरचकुंटमर्कपयस्तथा । तथैवगोमयरसंकुर्या कर्पमितपृथक् ५२ विपंचाईपलंदेयंप्रस्थंचकटुतैलक म् । गोमूत्रद्विगुणंदद्याज्जलञ्चद्विगुणम्भवेत् ५३"मरि चाख्यमिदंतैलंसिद्धकुष्ठवणापहम् ।जयेञ्चित्राणिसर्वाणि पुण्डरीकैविचर्चिकामापामांसिध्मंनिर कसौदर्दूकच्छूविना शयेत् ५४ त्रिफलारिष्टभनिम्बद्वनिशेरक्तचन्दनम् । ए तैःसिन्द्रमनुष्याणांतैलमभ्यजनेहितम् ५५भावयेनिम्ब वीजानिङ्गराजरसेनहि । तथासनस्यतोयेनतत्तैलंदन्ति गिरपड़ता है और क्षारकर्म सा कष्ट नहीं होता है "तारकर्म सपिये करते हैं, तो मलमार्ग के चक्र में जोखिम जाती है इसमें नहीं पाती ।। ४७११८॥(चातरक्त पर पिंडतेल) मजीठ, सरितन, रान, मुलेठी और पोम ये पलपल भरले तेन में पचाये इस विंडोलके लगाने से वातरक्त होताहै ॥ १६ ॥ (कपर मदार तेल ) प्रौपाके पुत्रका रस इल्लीका पर सरसों के तेनमें पकाने तो खनुरी, दाद, विची दूरणे ॥ ५० ॥ (कुष्ठपर मरिच तेल) काली हरताल निशोथ, रक्तचन्दन, मोथा, मैनशिल, जटामासी, दोनों हल्दी, देवदारु ॥ ११॥ हैदरन, कनेर, कूटमदारका द्ध और गोवरका रस कप की भरले ॥५२॥ आपापल मिहिमा मस्यभर करुमा तल दूना गोमूत्र व जन दना दे ।। ५३ ।। इस मरिचादि तेलसे फुटक पार अच्छे हो श्वेत रक्त व कालेदाग मिट पसरा, सें हुमा, पटोलादाद मौर #महादाद ये सब दूर हो ॥ ४ ॥ ( वातपर त्रिफलातेल)पिफना,नाव,धिगयता, दोनों हल्दी और रक्तचन्दन इसका पना तेल लगाने से मनुष्योंको बहुत गुण देता है । ५५11 (पलितपर निघतेल) भाध्याय १.] भापाटीकासमेता। १६१ तस्यतः। अकालपलितंसद्यःपुंसांदुग्धानभोजिनाम्५६ यष्टीमधुकक्षीराभ्यांनवधात्रीफले शतम् । तैलंनस्येकृतं कुर्यात्कशाश्मभूणिसर्वश. ५७ करजचित्रकीजातीकरवी रश्चपाचितम् । तेलमेभिर्द्धतंहन्याभ्यङ्गादिन्द्रलुप्तकम् ५८ नीलिकाकेतकीकन्दमङ्गराजःकुरंटकः। तथार्जुनस्य पुष्पाणिवीजकःसुमनोपिच ५९ कृष्णास्तिलाश्चतगरं समूलंकमलंतथा । अयोरजःप्रियङ्गश्चदाडिमत्वग्गुडू चिका ६० त्रिफलापद्मपङ्कश्चकल्कैरेतैःटथक्टथक् । कर्षमात्रंपचेत्तैलं त्रिफलाकाथसंयुतम् ६१-मृङ्गराजर सेनैव सिन्दकेशस्थिरीकृतम् । अकालपलितहन्तिदा रुणंचोपजिलकम् ६२ भृङ्गराजरसेनैव लोहकिफल त्रिकम् । सारिवाञ्चपचेत्कल्कैरतैलंदारुणनाशनम् । अकालपलितंकण्डूमिन्द्रलुप्तञ्चनाशयेत् ६३ इरिमेदत्व चंक्षुण्णां पचेत्पलशतोन्मिताम् । जलद्रोणेततःकाट नीमबीजकी मांगी भेगम रस में भावना देकर मासन रसमें दे उसका तेल नि फारि नास ले तो अकाल के एके बाल कालेहो दूध भात पय दे ।। ५६ ॥ (पुनस्तलम् ) मुलेठी कचे श्रायरेका क्ल्ब, चौगुना तेल दे पकाने फिर चौगुना पानीदे पकाये केरल तेलाई तप उतारिले इसके नाससे केश सप्रन होवे ।। ५७ ।। (इंद्रलसपर करजतेल ) कंजा, चीता, चमेली व कनेर में तेलपकाय लगावतो यादखोरा दूरहोय ॥५८॥ पलितपर नीलकादितेल) नौल. केतकीमत, अंगरा, कटसरैया, अर्जुन फूलनकाहार, चमेली ॥ ५६ ॥ काले तिलंगर कमलका सर्वांगालोहचून,मालकंगनी, अनारकी आल, गुर्च ।। ६० ॥ त्रिफला और कमलकी जड़की माटी कर्प कपभर सब द्रव्यले उसमें तेल पचा त्रिफले का काधसमेत॥६१ ।। भागरकारस भी टार सिद्धवरि तेल लगाय,बाल स्थित होय असालपलित अच्छाहो दारुण उपजिदक शिररोग ये सब अच्छेहों ।। ६२ ।। ( पलितपर मृगराजनेरा) भगरे के रसमें लोह जून बाकीद त्रिफलासारिक उनके कल्कमें तेलपचा वारूग्णनाशहो अकानप- .
शाई घरसंहिता। मध्यसरह हीयात्पादशेपितम् ६४ तैलस्याढिकदत्त्वा किल्कैः कर्पमितैःपचेत् । इरिमेदलवङ्गाभ्यां गैरिकागुरुपद्मकैः ६५ मञ्जिष्टालोध्रमधुकै क्षान्यग्रोधमस्तकः । त्वग्जा तीफलकपूरकंसोलखदिरैस्तथा ६६ पतङ्गचातकीपुष्प सूक्ष्मैलानागकेशरैः । कट्फलेनचसंसिदतैलमुखरुजंज येत् ६७प्रदुटनामचलितशोगदन्तच शोपिरम् । शीतो दंदन्तहर्षवविद्रधिकृमिदन्तकम् । दन्तस्फुटनदोर्ग न्ध्येजिहांलाल्योष्ठजारुजम् ६८ हिगुतुम्बुरुशुण्ठीभिः कटुतैलविपाचयेत्। तस्यपूरणमात्रेणकर्णशूलंप्रणश्यति ६९ वालविलगानिगोमवेपिष्ट्वातैलेविपाचवेत् । साजक्षीरं सनीरचनाधिर्यहन्तिपुरणात्७० बालमलकरांठीनांक्षारः क्षारयुगंतथा। लवणानिवपञ्चैवहिंगुशिमहौषधम्७१ देवदारुवचाकुठंशतपुष्पारसाऑनम्। ग्रन्थिकभद्रेमुस्तंचं लिन, साज व इन्द्रलुत मिटे ॥६॥ (मुखदारोगपर इरिमेदादितलं र दाल एक्सौ अस्सीपल'फूट कर द्रोणभर जल में पचार्य जब चापाई शेष रह तप उतारिले ॥६॥आभादक लदे सैर लौंग,गेलं,अगर पहात ॥६५॥ मनीठ,लोग मुलेठी,लाहो, पटकी जड़, मोथा,तंन जायफले. कपूर ककोल, सदि. रसार॥६६॥पतंगधरपुर, इलायची और नागरीर ये सैर कर्ष कै भरतो इस में तेल पचाय लगा तो मुखरोग दूर होय ॥ १७ ॥ मांस वाना, दात हलना, दांत घटना मुंप कार्न कतिकार दोन बाहे ना, दाँटि किटाना मुप निनाम इंतकामे, दंतफ्टना, दुध,जीमरोग,तानुरोग और गोठरोग ये सव मिट||६॥(कर्णशूलपर हिंगुनेलोमाग,धनियां और सौंठ इन नको फाखेल में पचाव इस कानमें डालनेसे पीड़ा दूर होय ।। ६६ ।। (यधिरत्वपर पेल का तेल ) छोटे वेन गोपून में कलक कर तेल पकरी का दूध पानी सहित पकाय कान पं दालने के बापतको र करना है ।।७० ॥ (कर्ण बहने पर पार तल लीसा , सजनी नवागार, पांचों लोन, ग,सदिनना, सों ॥ ७॥दार, प, एंग, मोंगा, गौत, पीपराज और नागरमोथा ..
-- अध्याये..] भापारीकास मेटा कल्क कीमतैःथक-७२: तैलपस्थंचविपचेकदलीवी जपूरयोः साभ्यांमधुसूक्तेनंचातुर्गुपयमितेनच:७३:पूय नावकर्णनादेशलेबधिरती कृमीन् । अन्यांश्चकर्णजानो गान्मुखरोगांशनाशयेत् जम्भीराणांफलरसंप्रस्थक कुडवोन्मितम् । मातितकेंद्रातव्यपलेकांपिप्पलीस्ता ७५ एतदेकीकृतसमभाण्डेचनिधापयेत् । बचाम्भोम धुसंयुक्तंशृङ्गवेरगुंडोन्धित धान्यराशौत्रिरात्रस्थमधुसू तसुदाहृतम् पर्श पाठादेचतिशमूर्वापिप्पलीजातिल वैः । दन्त्याचतैलंसंसिद्धनस्यस्यान्टुष्टपीनले ७७या ब्रीदन्तीवाशित्रुतुलीलीयोवसैन्धवैः। कल्कैश्चपादित तैलंपूतिनासांगदापहम् ७८ कुष्ठंबिल्बकणाशुण्ठीद्राक्षांक ल्ककपायवता साधिततैलमाज्यवानस्यात्क्षवथुनाशनम् ७९ ग्रहधूमकणादिलक्षारनतालसैन्धवासिशिखरिवी - ये कप-कर्षभरिले कस्क करि ॥ ७२ ॥ ममभर तेल में थे लेका रस पिगीत रस सहित पकाये बोगुना मधुसक्त दे. १५-७३ ॥ वो पीपं कानसे गिरना रोड - होना, पीड़ा, यदिरापन कानकोड़ी और कानके सय रोग-शोर मुखरोग दूरहो ।। ७४ ॥जीरा नींबू का रस;मस्थभर मुडभर शहद पीपरि पलभर ॥ ४॥ सन' इकट्ठे करि माटी के पात्र में यचा. काढ़ा अदरका सा शहद और गुद ये भी मिश्रित करि पूर्वोक्त पात्रका गृहमंदि-अनाज में गाउदै ! तोह मुरर मादे तीन दिन . । धान्य, समाधी ताहिक. मधुमुक्त चतुध वैध महाधी ।। तीसरे दिन का तो म- घुमूक्त है ।।: ७६पानस-पर-पादितला माता, दोनों हल्दी की, : पीपरि) चमेलीपत्रा और जमालगोटा इनके तेल से दुष्ट पीनस मया होय।।७।। (नाकरोगपर भटकटैयातल:) मटकटैया, जमालगोटा, यत्र सहिंगन, । सुलसी, सौंठ, मिरच, पीपरि-बार संघव इनके तेल से नाक से पीय गिरना और :: नाकरोग दूरहोय॥ निशापर कूदतेल ,टा लापीरि लोड और दाखइनको काला और कल्कारितेच या धीमें पचाय नासालेय दो जी- 7 करोग दूरहोय:।। ५8-11(नासा पर यह गादिनेल) गमक रगाह * H - १ शाईपरसंहिता मयखण्ड जैश्चतैलनासार्शसाहितम्वनीक्षाररविक्षीरंद्रबंधत्तूर चित्रकम् । महिपीविड्भवंद्रावसाशंतिलतैलकम् ८१ पचैतैलावशेषतगोमत्रेथ चतुर्गुणे । तैलावशेपंपकत्वाचत तेलंप्रस्थमात्रकम् २ गन्धकाग्निशिलातालंविडङ्गाति विषाविषम्। तिक्तकोशातकीकुष्ठंवचामांसींकटुत्रंयम् ८३ पीतदारुचयष्टयात सर्जिकाक्षारजोरकम् । देवदारुचक पशिंचूर्णतैलेविमिश्रयेत्। वत्रतैलमिदंख्यातमभ्यङ्गात्स कुष्टनुत् ८४. करवीरशिफांदन्तीतटरकोशातकीफल म् । रम्भाक्षारोदकेतैलंप्रशस्तलोमशांतनम् .. ८५ द्र वेषुचिरकालस्थंद्रव्यंयत्सन्धितंभवेत् । प्रासंवारिष्टभे दैस्तुप्रोच्यतेभेषजोचितम ८६ यदपक्वौषधाम्बुभ्यासि ईमद्यसआसवः । अरिष्टःक्वार्थसिद्धास्यात्तयोर्मातंपलो न्मितम् ८७ अनुक्तमानारिष्टेषुद्रवद्रोणेतुलांगुडम् । चौद्रं का करहुँया,पीपरि, देवदार, जवाखार, करज सैंघर्व और चिंबडाबीन इनका तेल नाकरोग हरनेमें हितहैं ।वासिय कोद पर ) छमियां सेंहुड़े का दुध मदार द्ध धतूरे और चीतकारस भैस के गोवरका रस तिल तेल में'।।१||ये सब पचाय, तेल रहे तव चौगुना गोमन दे फिर पचार चल रहे तपस्यभर तेलम।।२॥ गन्धक, भिलावा चीता,मैनशिल, हरताला विडंग, दोनों प्रतीस, कडुनीतोरई, कट, वन, जटामांसी, त्रिकुट ॥८॥दारहल्दी, मुलेंगी सज्जी, नीरा और देवदारु ये सब कपकप भर पीत नेल सिद्धकर इस बातेलकै लगाने से संकुपनाराहो ॥ ४ ॥ (फनेरका तेल रोमशांतन पर कनरपल जमालगोटा निरोध, कहुची • तोरई, फेला,तार और केले के पानी में तेल सिद्धकरि लगाये तो बॉल गिरिपरें। ५॥ (अधासव कल्पना) उदकोदि द्रव वस्तुमै औषध देक पान में भरि मुँहदि मासभरि रखने से औपच उंचम होतीहै उसे भासव या भविष्ट कहते हैं. आसव अरिष्टमें दो भेदह ॥८६॥ उदकादि पदार्थ, जो औषध पूर्वोक्त रीतिसे सिद्धकर उसे पासव कहिये जो कोई द्रव्यके कार्य में उसी नीतिसे. सिन्दकर उसे 'भरि कहिये इसके सानेकी मात्रा चार रुपये भरहै ॥७॥ जहां अरिएमें द्रव्य अध्याय १० भापारीकासमेता। क्षिपेंद्गुडादईप्रक्षेपदशमांशकम् ८८ ज्ञेयःशीतरसाशी धुरपंक्कमधुग्वैः । सिद्धःपक्वरसःशीधुः सम्पक्कैर्मधुरद्रवैः १९परिपक्वान्नसन्धानसमुत्पन्नांसुरांजगुः । सुरामण्डःप्रस इन्नास्यात्ततःकादम्बरीधना तदधोजगलोज्ञेयोमेदको जगलाघनः पुकंसोहतसार स्यात्सुराबीजंचकिपरकम यत्तालखर्ज़ररसैःसन्धितासाहिवारुणीकन्दमूलफला दीनिसस्नेहलवणानिच९२ यत्रद्रवेमिष्यन्तेतत्सूक्तमभि "धीयते । विनष्टमम्लतायातमावामधुरद्वैः९३ विनष्टः सन्धितोयस्तुतचुकमभिधीयते । गुडाम्बुनासतैलेनकन्द शाकफलैस्तथा ९४ सन्धितंचारलतायात गुडसक्तंप्रचक्ष तेः । एवमेवेक्षुसूतस्यान्महीकासम्भवतथा ६५ तुषा "म्बुसन्धितंज्ञेयमामर्विदलितैर्यवेः ।, यवैस्तुनिस्तुःपक्कः की तौल न होय वो जलादि पदार्थ द्रोणभरदे गुड़ तुलाभर शहद अद्धतुला और । द्रष्पका चूर्ण-गुंडका दशारदे अनिष्टकरे ।। ( शीघु मधभेद कहते हैं) जो कच्चे ऊख रसादिमधुर पदार्थ में सिद्धकर उसे शीतरसोशीधु कहिये जो पक्रा- यकैरसमें शिद्धकर-उसे पारसशीधु कहिये 11८६ || सुरांमसमादि भेदकरिअग्नि ल यात्रसे उतारे जसे सुरा कहिये सुराके फेनको प्रपन्ना कहिये फेनरहिताजो नीचे रई उसे कादंबरी व घनमी करिये 11॥सुराके नीचेर है उसे जगल कहिये प्रगल के घनें भागको मेदक काहिये मेदक पकानेसे जो सार निकरै.उसे मुरावीन. 'और किराब कहते हैं॥९॥ तोह या खबरका रस अग्निपत्र योगकरि घा कसा लेप सिद्धारै सो वारुणी है कन्दमूल, फल, घृत;तैलादि स्नेह, लवणः । आये सबद्रायदार्थ में अग्निव यत्र योयसे मथनकर उसे मुक्त कहिये ।। ; जो पितष्टकडे वनितरस लोके खमीर सो खोर उठी मय वा तुरंत मधुरद्रव में द्रव्य चूर्णकरि अधितकरी मासभरकी नसे. शुक्रकाहियेचा गुड़ पानी नेल कंदमूल फल:ili || इन्हें पूर्वोक्त रीतिसे संधितकरं मासभरमें सिद्ध कर उसे गुहसूक्त कहिये इसी प्रकार कखरेसका और.दाखका मुक्त होता ।।९६० यवरानी पुक्त एकदिन संतिकर उसे तुपांच कहिये और ययगरी पानीमेरिझाय एकदिन संधि- शायरसंहिता। [मपखण्ड म्भसःपंक्त्वा काथेद्रोणावोषिते । धातक्याविंशतिपलं गुडस्यचतुलांक्षिपेत् १३ मासमानस्थितोभाण्डेकुटेजा रिष्टसंज्ञकः । ज्वराप्रशमयेत्सर्वान्कुर्यात्तीक्ष्णंधनञ्जयम् १४ विडझंग्रन्थिकस्निाकुटजत्वक्फलानिच । पाठेला वालकंधात्रीभागान्पञ्चपलान्टथक् १५ अष्टद्रोणेम्भसः पक्त्वाकुर्याद्रोणावशेषितम् । पूतेशीतेक्षिपेत्तत्रौद्रंप लशतत्रयम् ।१६. धातकीविंशतिपलौत्रिजातंहिपलंत था। प्रियशकाञ्चनाराणांसलोध्राणापलंपलम् १७व्योष स्यचपलान्यष्टोचूर्णीकृत्यप्रदापयेत् । घृतभाण्डेविनिःक्षि प्यमासमेकंनिधापयेत् १८ ततःपिवेद्यथाईचजयेद्विद्रधि मूछितम् । ऊरुस्तम्भाश्मरीमेहान्प्रत्यष्ठीलाभगन्दरान्।। गण्डमालाहनुस्तम्भविडङ्गारिष्टसंज्ञितः १९ तुलाईदेव दासःस्वाहासाचपलविंशति.।मस्जिष्ठेन्द्रयवादन्तीतगर रजनीद्वयम् २० रास्नाकृमिघ्नम्मुस्तचशिरीषखदिरार्जु १ h 8 दशदा पल ॥ १२ ॥ चारिद्रोणं पानी में पचाय जब द्रोण भरि शेपरहे तच र.. तारि ले बीसपल धवफूल च तुलाभर गुहारि ॥१३॥ माटी के पात्र में मास भर राव यह कुटजारिष्ट सब ज्वरों को द्रिकरि अग्निको सीक्षण करताहै ॥२४॥ (विद्रधीपर विडंगारिष्ट ) विडग, पिपरामूल, रासन, फुरैयालाल एक एक पल पादा, एलागलछडामावरा ये पाच पाच पल ॥ २५ ॥ पाठद्रोरण जल में प्रौटाय द्रोण भगदी उतारिलें दंढाभये तानसे पल शहद ॥ १६ ॥ दीपपल घनफूल, तम पनन,इलायची दोपल गोंदी कचनार लोध पल पल भर ॥१७॥ निकुटा भादपल पूर्ण करिके डार घृत भानन में एक मास भर राखे ॥ १० ॥ नसा मम्मिाल देखे तसा पिलाचे पौ विद्रधी दरदो जयस्तंभ,पथरी, प्रमेह,मत्य- घडीला, भगर,गडमाला और हनुस्तभये रोग इस विडंगारियमे अच्छे होने हैं। १६ ॥ (प्रमेह पर देवदार अरिष्ट )मर्दनुला देवदार, रूता वीसपल, मैं मीर, इन्द्रपर्व, जमालगोटा, तगर, दोनों हल्दी1॥ २०॥ रासन, विडंग, नागर 1 .. अध्याय १०] भपाटीकासयेता। नौभागान्तशपलान्दद्याद्यवान्यावत्सकस्यावरचन्दन स्यगुडूच्याश्चरोहिण्याचित्रकस्यचे । भागौनष्टपलाने तानष्टद्रोणेम्भसःपचेत् २२ द्रोणशेपेकषायेचशीतीभूतेप्र दापयेत् । धातक्याःषोडशपलं माक्षिकस्यतुलात्रयम् २३ व्योषस्यद्विपलंदद्यास्त्रिजातस्यचतुष्पलम्। चतुष्प लंप्रियङ्गुश्चद्विपलंनागकेशरम्२४ सर्वाण्येतात्तिसञ्च पर्यघृतभाण्डेनिधापयेत् । मासादूपिवेदेनंप्रमेहंन्तिटु जयम् २५ वातरोगान्ग्रहायशीमूत्रकृच्छाणिनाशयेत् । देवदा दिकोरिटदद्रुकुष्ठनिवारणः २६ खदिरस्युतला ईन्त देवदारुचत्तत्समम् । चाकुचीद्वादशपलादावस्या स्पलविंशतिः २७ त्रिफलाविंशतिपलान्यष्टद्रोणेम्भसःप चेत् । कपायेद्रोणशेषेचपतेशीतेविनिक्षिपेत् २८ तुला द्वयंमाक्षिकस्यतुलेकाशर्करामता,। धातक्याविंशतिपलं कङ्कोलंनागकेशरम २९ जातीफललवङ्गैलात्वपत्राणि पृथक्टथक् । पलोन्मितानिकृष्णायादद्यात्पलचतुष्टय म् ३० धृतभाण्डेचिनिक्षिप्यमासायपिचेन्नरः । महा मोवा, सिरस, खैर और अर्जुन ये दश दश पल तथा अजवायन, उरैया ॥२१॥ चंदन, गुर्च, कटुकी, चीता पाठ पाठ पल पानी पाठ द्रोण में पचा ॥२२॥ जा द्रोण भर शेप रहे तो ये प्रौपचहारे पापुष्प सोलहपल तीननुला शहद ॥ २३ ॥ निमुटा दोपल, तन, पत्रग इलायची ४ पल, प्रियंगु,४ पल और नागके। शर दोपल ॥ २४ ॥ इनसतका चूर्ण पीके वर्तनमें मामभर राखे फिर पिये तो दुर्जय ममेहको हरताहै।२शातया यातरोग, प्रहणी, पर्श व मूत्रको नाशै इस देवटार अरिष्मे दाद व फुट मच्छा होता ॥ २६ ॥ (अष्टपरखदिरारिष्ट) और मनुला देवदार अर्द्धतुला, यमुची १२ पल,हल्दी २० पल ॥ २७ ॥ त्रिफना २० पल इनको प्रारद्रोण जनमें पचा द्रोशभर रहै वण्डासरि नौपाडार ।। २८ ॥शहद २ नुला सांड़र तुला, परफूल पल बोल नागकेशर ॥ Rell जायफनालॉगरलापची, राज और पान ये सर पतरमापारि ४ पल १३०॥ २२ - १७२ शाघरसंहिता ।। [ मध्यसएर ऋदिद्धिक ४६ कुर्यात्प्टथग्विपलिकान्पचेदगुणेज ले।चतुर्थाशंशृतंनीत्वामुन्नाण्डेसंनिधापयेत्५० चतुःषष्टि पलांद्राक्षांपचेन्नीरेचतुर्गुणे। त्रिपादशेषशीतंचपूर्वकाथेश तंक्षिपेत् , ५१ द्वात्रिंशत्पलिकक्षौद्रंदद्याद्गुडंचतुःशत्तम् । त्रिंशत्पलानिधतिक्याःककोलंजलचन्दनम् ५२ जातीफ लंलवङ्गंचत्वगेलापत्रकेशरम । पिप्पलीचेतिसञ्चयॆमा गौडपलिकैपथक् ५३. शाणमात्रांचकस्तूरीसर्वमेकत्रनि क्षिपेत् । भूमौनिस्त्रातयेदाण्डेततोजातरसंपिवेत् ५४ कत कस्यफलंक्षिप्वारसंनिर्मलतांनयेत्।। ग्रहणीमरुचिंशलं श्वासकासंभगन्दरम् ५५ वातव्यांधिंछयछदिपाण्डुरोगं चकामलाम् । कुष्ठान्यीसिमेहांश्चमन्दाग्निमुंदराणिच ५६ शर्करामश्मरीमूत्रकृच्छ्रन्धातुक्षयंजयेत् । कृशानांयु टिजननोवन्ध्यानांपुत्रदःपरः । अरिष्टोदशनलाख्यस्त जःशुक्रबलप्रदः ॥१५७॥इतिश्रीशार्ङ्गधरसुधाकरेसन्धा- नकल्पनायांदशमोऽध्यायः ॥ १०॥ ऋद्धि द्धि ॥ ४६॥ ये सब दोर पल सय मोपधियों का मंठगुना गलौटावै जा चौथ्याई शेप रहिनाय तर उतारि माटी के पात्र घरै ।। ५० ॥ दास साठ पल चौगुना जलटे प्रोटे चौथ्याई जरै. तीन चरगर है तर टंदाकरि पहिले काय साय मिलाचे ॥५१॥शहंद पल ३२ गुड़ पल ४०० धवपुष्प पल ३० शीतलचीनी, सस वा चंदन ॥५२ ।। जायफल लोग तज, इलायची, पनज, फेशर और पीपरि "इन सबों का पूर्ण दो दो पल ॥५३॥ कस्तूरी चारिमाशे सब इकटेकरि उसी में डारि घरती सोदि गाहे उसमें का रस पिये ॥ ५४ ॥ निर्मली रगडके डाले तो रस निर्मल शेनाय इसके पान करने से ग्रहणी, अरुचि, शल, स्वासकास, भगं- 1टर ॥ ५५ ॥ वातव्याधि,सपी ददि, पांडु, कामला, कुष्ट अर्श, प्रमेह, मंदाग्नि, उदररोग ॥ २६॥मिताममेह,पथरी, मूत्र कुच्छ और धातु तय ये रोग जार्थे दुरेल मोटाहोप पाकिनि पुषजने यह दशमूलारिष्ट तेज धानु घोरपन को देताद ॥१५७॥ इति श्रीधरसुधावरेदशमोऽध्यायः॥
१७३ अध्याय ११] भाषाटीकासमेता। स्वर्णतारताबमारनागवङ्गौचतीचर्णकम् । धातवः स विज्ञेयारततस्ताञ्छोधयेद्बुधः १ स्वर्णतारारताम्राणां पत्राएयग्नोप्रतापयेत्।निषिञ्चेत्तप्ततप्तानितैलेत–चका जिके २ गोमूत्रेचकुलत्थानांकपायेचंत्रिधात्रिधार एवंस्व र्णादिलोहानांविशुदिःसम्प्रजायते ३ नागवङ्गीप्रतप्तौवा गलितौतानिपेचयेत्।त्रिधात्रिधाविशुन्दिःस्याद्रविदुग्धेन चत्रिधा ४ स्वर्णस्यहिगुणसूतमम्लेनसहमर्दयेत् । तदोल केसमगन्धनिदध्यादधरोत्तरम् ५ गोलकंचततोरुध्याच्छ रावदृढसम्पुढे । त्रिंशहनोपलैर्दद्यात्पुटान्येवंचतुर्दश६ निरुत्थंजायतेभस्मगंन्धोदेयःपुनःपुनः काञ्चनेगलितेना गंषोडशांशेननिक्षिपेत् ७. वर्णयित्वातथाम्लेनघृष्ट्वाक त्वाचगोलकम् । गोलकेनसमंगन्धंदयाचैवधिरोत्तरम शरावसम्पुटेधृत्वापुटेत्रिंशद्वनोपलैः। एवंसप्तपुरैहमनिलं त्थंभस्मजायते ९काञ्चनाररसैघृष्ट्वासमसूतकगन्धयोः। (स्वर्णादिधातुशोधन ) सोना, चांदी, तामा, पीतर, सोसा, रांगा और लोहा इन सातों धातुओं के शोचने की रीति कहते हैं।॥ १॥ सोना, चादी, पीतर और ताबा इनके सुस्म पर रना आणि लाल तपाय तेल मढे कानी में बुझाय ।। २॥ गोमूत्र में कुलयी काय में इन सबमें तीन तीनदार बुझाये इसीमाति स्व. णादि धातु शुद्ध होता ॥ ३॥ सीसा रागा ये गलाकर पूर्वोक्त पदायाम तीनपार युझा फिर तीनर चार मदारदुग्नमें वुझा ॥ ४॥ (सोना मारनेकी विधि) शुद्धसोना तिसका दूना शुद्ध पारा मींके रस में चोटि गोलीकरि गोली समान गं. "धक पीसि वरे ऊपरघरे ।। ५ । मट्टी के दो सरपाले एकनीचे में गोलाघरि दूसरा पढिके उसपर कसौटीकार पिनुयाकंडा की प्राचदेय इसे शरासंपुट करते है इसी प्रकार आगिते निकार संपुटकरि चौदहवार पाच ॥६॥ यो पतियाचदै गंकनेसे स्वर्णभम्म निर्मल होती है (पुनर्विधि सौनेकी) १६ मारो सोना गलाय माशाभरि सोसाडारि उतारि डारि ॥ ७॥ चर्णकर नींबू के रस में गोलापार नीचे अपर पकारि ॥ ८ गोलेके समान शरावसंपुरकरि ३० गो- है 'शायरसंहिता। [मव्यखस कज्जलीहेमपत्राणिलेपयेत्सममात्रया १ काञ्चनारत्व चःकल्कमूपायुग्मंप्रकल्पयेत्।धृत्वातत्सम्पुटेगोलंमृन्मूषा सम्पुटेचतत् ११निधायसन्धिरोपंच कृत्वासंशोप्यकोकि लैः। चह्रिखरतरंकुर्यादेवंदत्वापुटत्रयम् १२ निरुत्थजा यतेभस्मसर्वकार्येषुयोजयेत् । काञ्चनारप्रकारेणलांगली हन्तिकाञ्चनम् १३ज्वालामुखीतथाहत्यात्तथाहन्तिमनः शिला। शिलासिन्दूरयोश्चूर्णसंमयोरकदुग्धकः १४सप्तै वभावनादद्याच्छोषयेच्चपुनःपुनः । ततस्तुगलितेहेन्नि कल्कोयंदीयतेसमः १५ पुनर्धमेदतितरां यथाकल्कोवि लीयते । एवंवारत्रयंदद्यातल्कोहेममृतिर्भवेत् १६ पारावतमलैलिम्पेदथवाकुक्कुटोद्भवैः । हेमपत्रासितेजांच प्रदद्यादधरोत्तरम्१७गन्धचर्णसमंकृत्वा शरावयुगसम्पु । प्रदद्यात्कुकुंटपुटं पञ्चभिर्गोमयोपलैः १८ एवंनवपु इटाकी आचदे तत्र सोना निरुत्य भस्म होजाताहै ।। ९ ॥ (तीसरा ) कचनारके रस में पारा, गंधक समान मिलाय खरलकरै ना कजलीहो तर सोने के पनार लगावै ॥ १०॥ फिर कचनार की छाल पीसिके उस गोलेपर बहुतसी लपेटै फिर दोपरिया मिट्टीकी बना एकमें धरि दूसरी ऊपर दकिं ॥१॥कसिकै छ- परोटी करि मुसाय यड़ी आचदे इसीतरह प्रथम कही रीतिसे तीन माचरे ।। २ ।। जर मिलाने से न जिये तो उत्तमहै भस्म जैसे कचनार विशान रो मरता है तैसेही करिया रीति से भी मरता है।, १३॥ ऐसे ज्वालामुखी कहे अरणी से भी भस्म होती है तैसे मैनशिन से मैनशिल सेंदुर सम ले मदारदूध में घोटि ॥१४॥ सात चार चोटियोटि सप्लाय सुखाय ले तर दशमाशे सोना गलाइ चरक साने लगता -दामाशे यह मैनशिल सिंदूरका सिद्धचूर्ण सोनेगें छोड़॥ १५॥ बुकनी देके तीन भाचट्टे जातक वह बुनी न जरिजाय तपतक पाचदे इसीमाति युकनी देदे तीन प्राचदेव तो सोनाभस्म होय ॥१६॥ पाच कलर की वा कपुटकी थीद दोनों सोने के पत्रकरि उपर नीचे ल॥ १७ ॥ उसी के समान गन्धकचूर्ण भी दोनों गेमपैरितिपासताम् ॥
अ याय ११] भापाटीकासमेता। टंदद्यादशमंचमहापुटम् । त्रिंशद्वनोफ्लैरेवं जायतेहेम भस्मतास् १९ मार्गकतालकमर्थ याममम्लेनकेनचित् । तेनमागत्रयंतारपत्राणिपरिलेपयेत् २० धृत्वामूपापटे रुध्या पुटेत्रिंशद्वनोपलैः । समुद्धृत्यपुनस्तालं दत्त्वाच ध्यापुटै पचेत् । एवंचतुर्दशपुटेस्तारंभस्मप्रजायते २१ स्नुहीतीरेणसम्पिष्टंमाक्षिकतेनलेपयेत् । तालकस्यप्रका रेण तारपत्राणिबुद्धिमान् । पुटेचतुर्दशपुटैस्तारंभस्मत जायते २२ अर्कतीरेणसम्पिष्टोगन्धकरतेनलेपयेत् ।समे नारस्यपत्राणि शुद्धान्यम्लद्वैर्महः,२३ ततोमूपापुटेधू त्वापुटेद्गजपुटेनतुं । एवंपुटद्वयेनेवभस्मारंभवतिध्रुवम् २४ आरवकांस्यमप्येवंभस्मताम्यन्तुनिश्चितम् । अर्कजीर चंदाजस्यात्तीरनिर्गएिडकातथा । ताघरीतिध्वनिवधेस शाइधरसंहिता । [ मध्यखण्ड मंगन्धकयोगतः २५ सूचमाणिताबपत्राणि कृत्यामंशोध येवुधः । वासरत्रयमम्लेनततःखल्वैविनिक्षिपेत् २६ पादाशंसूतकंदत्त्वा याममम्लेनमर्दयेत् । ततउद्धृत्यप त्राणि लेपयेद्विगुणेनच २७ गन्धकेनाम्लघप्टेन तस्य कुर्याद्रगोलकम् । तंतःपिष्टवाचमीनाक्षी चाङ्गेरीचपुनर्नवा २८ तत्कल्केनबहिर्गौलं लेपोयड्गुलोन्मितम् । त्वातदोलकंभाण्डे शरायेणचरोधयेत् २९ वालुकाभिः प्र पूर्याय विभूतिलवणाम्युभिः। दत्त्वाभाण्डेमुखेमुद्रांततश्चु ल्ल्यांविपाचयेत् ३० कमरयाग्निनासम्यग्यावद्याम चतुष्टयम् । स्याङ्गशीतलमुद्धृत्यमर्दयेत्सूरणद्रवः ३१ दिनैकंगोलकं कुर्यादईगन्धेन लेपयेत् । सघृतेनततो भूषापुटेगजपुटेपचेत् । ३२ स्वाङ्गशीतसमुद्धृत्य मृतं ताघशुभंभवेत् । वान्तिभ्रान्तिलमरेकं न करोतिकदाच पय व मिडी-रस में गक पीसि तावे वा कासेवा पीतरपन पर लगाय पूर्वोक्त रीतिसे 'कै तौ तीनोंमरे ॥ २५ ॥ (तान्नभस्म) इमली पनकी मुटाई समपत्र करि ताम्रपच पर सटाईका पानीदे-तीन दोलायत्रकी आचदेकर सरलकरी२६॥ ताये की चौधाई पारादे पदरभर नींबू में घो फिर तारेकी दूनी गधक नींबू के रसमें घोट पत्र पननेप गोला चारि मकोय पाश्रमलोनिया वागदापुरैना ।। - ७/२८॥ इनकी पीठी दो अंगुल मोटी गोनापर लपेट एक वासेनमें घरि मुगदिदे ॥२६॥ तर एक बड़े यासनकी पेंदीमें छेदकरि उसपर अनाधरि थोड़ा बालू भरे तिसपर लोनवा पानी दिटक पहिला वासनधरै फिर पालभरि लोका पानीटे दवाईदे निममें यह बासन तुपजाइ-तब बड़े यासन का मुहमंदि कपरौटी करि चूल्हेपै पार लकड़ी की श्रानदेय ॥ ३०॥ मद आचदे फिॉरे क्रममे तेज करता चार पहर रमाचदे ठंडायरि मरनके रसमें ॥ ३१ ॥ एकदिन उसी तायका प्राधा गधक प्राधा पीले सरलकरि उसे तावेपर लेपकरिम्सायंत्र धरि फिर गनपुट प्राचदे।।३।। जब पसी में स्वाभाविक शीत होजाय तय निकारिले तो उवाकी संभ्रम चित्त १मानाशे ( मपला)चाय पुननदा को कहते हैं और रिसा मत चुकी पाती है। ww -- अध्याय ११] भापाटीकासमेता। नः३३ ताम्वूलीरसंसम्पिष्टं शिलालेपात्युनः पुनानाहा त्रिशद्धिः पुटै गा निरुत्थोयोतिभस्मताम् ३४ प्रश्न स्थचिञ्चात्वचूर्ण चतुर्थाशननिक्षिपेत् । मृत्पात्रेद्राषिते नागेलोहदव्यांप्रचालयेत् ३५ यामकेन भवेन्द्रमतत्तुल्या चिमनःशिलाम्। काञ्जिनियंपिष्ट्वापचेदृढपुटेनच,३६ 'स्वाङ्गशीतंपुनःपिष्वाशिलयाकालिकेनच पुनःपटेच्छरा चाभ्यासेवं पष्टिपुटैर्मतिः ३७. म्हपात्रेद्रावितवले चि उचाश्वत्थत्वचारजना क्षिप्त्वावचत शमयोदयाप्त चलियेत् ३८ ततोद्वियाममानेणवङ्गंभस्मप्रजायते। 'थभस्मसमंतालं क्षिप्वामेनविमर्दयेत् ३९ ततोगजपु टेपक्त्वा रसेनपुनरम्लयेत् । तालेनदेशमांशेन याममेक ततःपुटेत् ४ एवंदशपुटे पक्कोचङ्गस्तुधियतेध्रुवम्श दलोहमवंचूर्ण पातालगरुडीरसै। मर्दयित्वापुटेहोद विकलाई मौरदस्त आना हो तब जानिय तादा शुद्ध तीता भस्म) पानके रस में मैनशिलको पीसि सीसे के पार लगा कति कर शांचढे सेहो पत्तिस आंचदे ॥३४॥(पुनवियौनशरिबानान का चूः चौथाई सी सादे माटी के वासन धीरे नारे कारबाही तर ही दोनों छाल का चूर्ण डॉरि हारि लोहको कलम नदार ऐसे पहर भर बाँचदेय तव सीसेकी भस्म के यावर मैनारेन काजी मोटि मुखाय गजपुट आंधदेय ॥ ३६॥ द्वामये तिर मनरेन कवित गजपुटदेय ऐसे साठि यांचदेय तर सीसामर को साडि रहे तो जीतता है॥३७॥ बैंगभस्म रांगा मार्टी के बासेन में लगा चौपाई पगिरिजलीही हालको चूर्ण देकर लोहे की कग्बी से घोट || दोपहर मोटे वो रांगा भस्महोय रांगा की भस्म के तुल्य हत्तान शारि निम्बू के रस में घोटें || 81 गमटकी पांचदे फिर निकारनामा रस और देशारा हरतानदे पहरभर घोहै। ४. फिर उसे फंकदे इसँभौतिशेधांचदेना चंग वैयार होप शुद्धनोहाति- सका पातालमूली और पातालपती विना दरवटा झेरसमें पोटै धांध 4 ।
, 1.२७८ शाईपरसंहिता ।। [मबलरह द्यादेपटत्रयम्,४१ पुटयकुमश्चकुठारच्छिन्नकार सैः। पुरषकततोगद्यादेवंतीक्ष्णामतिर्भवेत् ४२ क्षिपेढी 'दशमांशेनदरशंतीणेलोहतः । मईयेत्कन्यकाद्रावैर्याम युग्मं ततः पुटेत् । एवंमप्तपुटैर्मृत्यु लोहचामवाप्नुयात् ४३.रसैःकुठारच्छिन्नायाः पातालगरुडीरसैः स्तन्येन चार्गदुग्धेनतीक्ष्णस्यैवंमृतिभवेत् ४४ सूतकाद्धिगुणंगन्धं दत्वाकुर्याञ्चकन्जलीम द्वयोःसम लोहचूर्ण मईयेत्कन्य काद्रवपयामयुग्मंततापिण्डं: कृत्वाताम्रस्यपात्रके। घ मेधृत्तोरुवूकस्य पत्रैराच्छादलेद्बुधः ४-यामानोष्म ताभयौहान्यराशोन्यसेत्तता दत्त्वोपरिशराकचत्रिदिना समुहरेत् ४७पिष्टीचग्नालयेहस्त्रादेवंबारितरंभवेत् । -एवंसर्वाणिलोहातिस्वर्णादीन्यपिमारोत्-शिलीगन्धा दुरघोक्तास्वर्णाद्यास्सप्तधावतः । नियन्तेहादशपुटैः सत्यंगुरुवचोयथा ४९ माक्षितुत्यकाभ्रौचनीलाजन 2.ऐसे तीनि आच दे ॥४२॥ फिर घीकुवार के रस में घोटे तीन पाचदे दिर पुरैया साल के कार्य में प्रोटि सम्मायनोतो लोह भस्म होता ॥४॥ (पुनः) जितना लोहाहो तिसका चारहवा अंश सिंगरफरे घीकुवारके रस में दोपहर बोट पाच दे तो लोह भस्म होता है ॥ १३ ॥ (एना) कुरैया रस वा छरइटा रस में जाती के दूध में पा मदार रस में सिंगरफ युक्त किसी में प्रोटि सात पीच ये तो लोह भस्म होता है ॥४४॥ (पुन:)पारे की दूनी गन्धक मिनाय काली परि कजली के समान लोह पूर्ण ले चीकुचारके, रसमें दोनों मोटे ॥ ४५ ॥ दोपहर घाटि पिण्टी धनाय तारे के पत्र में घरि रंडपात से दंकि चारि घरी धूप में रासि पतोमा उतारि फेंकिदेय दूसरे पात्रमें दाकि अनाज की राशि में तीनदिन गादि निकार लेय ॥ १७ ॥ सब पीसिके कपड़े में बानि पानी पर डारे से लोह तिरंगा ऐसेही स्वर्णादि सब धातु मारिये ॥ ४॥ (सीस- रीयिघि ) शित;ब गन्धक मदार के दूध में सरल कारये इसी प्रकार सात पातु में चाहे जिस पातु को पारद-भाग-इससे पातु भस्म हो जाती है यह रोति नि- " . . । A 1
अध्याय ११]
भापाटीकासमेता।
शिलालकाः । रसकश्चैवविज्ञेयरितेसप्तोपंधातवः ।।
माक्षिकस्यत्रयोंभांगाभागकंसैन्धवस्यच । मातुलुङ्गद्ग
थिजम्बीरोत्यद्रवै.पचेत् ५१ चालयेल्लोहपात्रेणयावत्पा
बंसुलोहितम् । भवेत्ततस्तुसंशुद्धस्वर्णमाक्षिकमृच्छति
५२ (अन्यञ्च) कुलस्थस्यकषायेणघृष्ट्वातैलेनेवापुटेतात
केपवाजमूत्रेपधियतेस्वर्णमाक्षिकम् ५३ कोटीमेपट
गयुत्थै!जम्बीरजैरसैः । भावयेदातपेतीब्रेविमलाशुची
तिध्रुवम्५४विष्ठयामईयेत्तुत्थंमार्जारककपोतयोगदीशं
टङ्कणदत्त्वापपेटदुपुटेततः पुटंदनःपुटंलौद्रेदेयतुत्थ
विशुद्धये ५५ कृष्णाभ्रकन्धमेहड़ौततः क्षीविनिक्षिपे
त् । भिन्नपत्रंतुतत्कृत्वातन्दुलीयाम्लयो वैः ५६ भावयेद्
टयामन्तदेवशुध्यतिचाभ्रकम् । वाधान्ययुतावस्नेमई
येत्काजिरसह ५७, कृत्वाधान्यानतत्तुशोपयित्वाथम
१८० शाई घरसंहिता । [ मध्यता र्दयेत् । अर्कक्षीदिनमर्यचक्राकारन्तुकारयेत् ५८ वेष्टय दपत्रैश्चसम्यग्गजपुटेपचेत् । पुनर्मXपुनःपाच्यसत वारंप्रयत्नतः,५९ ततोवटजटाक्वाथैस्तद्वय पटत्रयम् । घियतेनानसन्देहःसर्वरोगेषुयोजयेत् ६० राधान्यानं कंमुस्तंशुण्ठीषड्भागयोजितमामर्दयेकांजिकैनैवंदिनधि त्रकजैरसैः ६१ ततोगजपुटदद्यात्तस्मादुधृत्यमर्दयत्। त्रिफलावारिणातहत्पुटेदेवपुटैस्त्रिभिः ६२ चलागोमूत्रम शलीतुलसीशूरणद्रवैः । मर्दितंपुटितवहौत्रिनिवलंत्र जेन्मृतिम् ६३ धान्याभंकस्यभागैकंहौभागौटकणस्यच पिष्ट्वातंदर्धमूपायां रुडातीवाग्निनापचेत् । स्वभावशी तलंचूर्णसर्वरोगेपुयोजयेत् ६४ानीलाञ्जनंचूर्णयित्वाज म्बीरद्रवभावितम् । दिनेकमात्तपेशुद्धभवेत्कार्येषुयोजयेत् ६५एवंगैरिककाशीशंटङ्कणानिवराटिका। तुचरीशंखकंकु पशुद्धिमायातिनिश्चितम्६६पचेत्त्र्यहमजामन्त्रैर्दोलीयं यासनमें धरि जव थिराय कांजी हाय अभ्रक मुग्याय मदार धमें दिनभर टाय टिकियाको || ५८ ॥ मदार पामें लपेट गगगुट आंच ऐसेही मदार धर्मे घोटि पोटि सात पुटदेय ।। ५६ ॥ (फिर ) परगदजटो कायम घोटि घोटि सीन पुटदेय इसार निःसंदेह अभ्रक मरेगा सपकर्म योग्य होयगा ॥६॥(दूसरीविधि) शुद्ध अभ्रक ले उठा छठामेश मोधा व सोठ दे कांजीमें दिनभर सरलकरि फिर चीता के रस में ॥ ६१ ॥ तरंगनपट सांचदे फिर निकार नीनयार त्रिफला रस, में घोटि घोटि गनपुर बांच देय ॥६२ ॥ फिर परियारा, गोमूत्र, एश्ली, कृष्णगुलसी और सरन मायोटि घोटि तीनगर गजपुट आंच देय तो अभक मरै ।। ५३ ॥ एक भाग शुद्ध अभ्रक दो भाग मुहागा देकर अंधापक यगमें रूपे गगपुटकी जांच में एक इसकी दी महति है सर रोगों में देना । योग्यहै ॥ - ४ ॥(सुरमा शोधन प मारण ) मुरमा गुमिरि जम्बीरी नींग- यात मुमबासी यह पादि में भरको जो भोपा शायनीहो उसकी पाली र सरकार देव समाति सारिने को दानायका , + --
अध्याय ११.]
भाषाटोकासमेता।
मनाशिंलाम् ।भावयेत्सप्तधापितरजायाःशुद्धिमृच्छति
६७(अन्यञ्च) अगस्तिपत्रतोयेतर्भावयेत्सप्तवारकम् ।
शृङ्गवेररलैर्वापिविदधातिमनःशिलामाईतालकंकणशा
कृत्वातंचूर्णकाजिकेक्षिपेत्।दोलांयन्त्रेणयामैकंततःकूष्मा
ण्डजैव ६९ तिलतैलेपचेद्यामं यामश्चेत्रिफलाजलै ।
एवंयन्त्रेचतुर्यामंपाच्यशुद्ध्यतितालका ७० नरमूत्रेतु
गोमूत्रे संप्ताहिरसकंपचेत् । दोलायन्त्रेणशुदस्यात्तताका
येपुयोजयेत्७१ लाक्षामीनपयश्छागंटङ्कर्णमृगशृङ्गकम।
पिण्यासर्पपाशिनर्गुजोर्णागुडसैन्धवम् ७२ यवास्तिता
घृतक्षौद्रयथाला विचूर्णयेत् । एभिर्थिमिश्रिता सर्वेधात
वोगाढवंहिना । मूषाध्माताः
:प्रजायन्ते
यः ७३ कुलित्थकोद्रवक्वाथै लायन्त्रेविपाचयेत् । ध्या
मुक्तमत्त्वनिसंश
शाघिरनहितो. मध्यक्षपद घोकन्दगतंवत: निदिनशुद्धिमृच्छति ७४ तप्तंततन्तुत हवखरमूनेनिपेंचयेत्॥ पुनस्ताप्यपुनःसेंच्यमेवंकुस्त्रि सप्तधा ७५ मत्कुणैस्तालकपिष्ट्वा यावद्भवतिगोलकीमतः तद्गोलेनिहितवचं ततोलंचाधिकंधमेत् ७६ सेचयेदव मूत्रेणं तगोलंचक्षिपेत्पुनः । रुद्वात्मातपुनःसेच्यमेवंकु यात्रिसप्तधाः। एवंधियतेववंचूर्णसर्वत्रयोजयेत् ७७ हिसैन्धवसंयुक्तेनायकौलत्यजेक्षिपेत् । तप्तंतप्तंपुनर्व भयाच्चर्णत्रिसप्तधा ७८ मण्डूकंकांस्यजेपात्रेनिगृह्यस्था पयेत्सुधीः। सभीतोमूत्रयेंत्तत्र तन्मूत्रेवस्त्रमावपेत् । तप्त न्तप्तश्चंबहुधावस्यैवम्मृतिर्मवेत् ५९ वैकान्तवनवच्छो ध्य नीलबालोहिततथाः। यसूत्रेतुतत्सेच्या तततप्तंहि सप्तधा ८ ततश्चमेषदुग्धेन पञ्चाङ्केगोलकंक्षिपेत् । पुर टेन्मूपापुटेरुद्धा कुर्यादेवंचसप्तः सप्तधा. वैवान्तंभस्मता. टैयाको जड़की नगदीम होगरवं कपड़ेबांधि तीनदिन सिद्ध कर तब हीरा शुद्धहो फिर आगि तपाय खर(ग) के नौ २१ यार बुझाये ॥७॥ मत्कुण कहें खटकिरना और हरताल पीसिं गोलाकार उसमें हीराधार तात्र निर्देकर भूपा- पत्रमें राति भायी के ६॥(फिर) असमत्रम २१ चार बुझाग हरताल., गोलाद परि कै 'इकीस्वार अश्चात्र में सुझाप क' से ही भस्म होताई। इसका चूर्ण संचैत्र साध्य है।। ७७ ॥ पनविधिः) मध्यसोत नदी कायमें हारि उसमें ईरा तपाई तपाई २१ घार बुझाय तो हीराम || ७६(t. तीयविधि) मेदक कांस के पात्र में पदें उसे डरावै जब भय से मूते उस मूर्त में हीरा तपाय तपाय बहुत युझाव तो खिलकै पूर्ण हो मरिजाय ॥५६॥ वैशात शोध- नमारण') चक्रांत कये हीरको कहते है कालाही या लाल सो हीरकी नाई शोधे लाल करिकरि १४ वार झाप ॥२०॥ मेदासिगों के पंचांग के गोले में धरि भूपाय :संपुट करि र्फकदे इसी तरह सातबार काय चक्रा- ने एमय शिकार होने से वैताने हीराको वैक्रांस कहा AL 14
अध्याय...]
भापाटीकासमेता।
यतिवजस्थानेमियोजयेतास्वेदयेहोलिकायन्यन्त्याः
स्वरसेन च । मणिमुक्ताप्रबालानां याम कंशोधनभवेत्
दर कुमातिन्दुलीयेन स्तन्येनचनिषेचयेत् । प्रत्येकस
सवेलञ्चतप्ततप्तानिकृत्स्नशः मौक्तिकानिप्रवालानि
तधारत्नात्यशेषता। क्षणाद्विविधानि नियन्तेनात्रसं
शबाट उकमाक्षिकवन्मुक्ताप्रवालानिनमारयेत् ।
विवेत्सर्वरतानि शोधयेन्मारयेत्तथामाशिलाजतुसमी
जीया ग्रीष्मतप्तशिलान्युतम्। गोदुग्धैत्रि कलाकाङ्ग
राजश्चमोत् । प्रातपेदिनमेकन्तु तच्छपकंशुद्धता
ब्रजेत् ८६ मुख्याशिलाजतुशिला सूक्ष्मखएडप्रकल्पित
म्। निक्षिप्यात्युषण पानीययामैकंस्थापयेत्सुधी।७.मे
दैयित्वाततीनीर, गृहणीयाहस्त्रग़ालितमा स्थापयित्वा
चमृत्पात्रं धारयेदातपेयुधः -८८ उपरिस्थंघन्यत्स्या
त्तत्क्षिपदन्यपात्रके । धारयेदातपेतस्मादपरिस्थंघनंन.
येत् ८६ एवंपुनःपुनीत्या हिमासाभ्यांशिलाजतु। भू
त भस्महाय सोहोरेकी औरदेय ॥ ( मरनशोधन व मारणं सोनी
वा माणिक वा मंगा भरणी रसदे दोलामंत्र में एकाहर सिद्धकर की परीक
८२॥ चीकुवार चौराई वा स्त्रीका दूध इन तीनोंम सातसार प्राधिकादिवार
तपाय बुझाई मंगा मुक्तादि ये सब क्षणभरमें वर्ण एलेट जाने इसमें ..
शयनहीं। मुंगा, मोती, सोनीपाखी को रीति से भी मरता है और तर रहे
पहोरेकी नाई शोधैव मारे।ौर शिलाजीत शोधन गोवती मा
पर्वतसे या शिलानीतःलाय गायका दूध या त्रिफला काय वा भगरेके समान
भरायोटिं दिनभर घाममॆधरे सरपजाय ती शुधिजायदा(दुसरीरीतिपदी
शिलाजीतनी शिलाले छोटे छोटे टूककर प्रति उपजल में भर }es
उसे पानी में पीस फिर छान लेलेप फिर मांटीके मासनमें करियसब !
जब मलाई पर उसे कांचि और पात्र में रस फिर और नख तयार !
देफिर मलाई लेले पहिली 'मलाई में रखता जाय इसीभनिदो मास
+
.
१८४
शाई धरसंहिता
[मध्यलण्ड
यात्कार्यक्षमवहाँ क्षिप्त्यालिङ्गोपभवेत् ९० निधूमंच
ततःशुई सर्वकर्ममुयोजयेत् । अधःस्थितंचतछेपंत ।
स्मितीरं विनिःक्षिपेत् । विमर्चधारयेदर्मेपर्ववचेवतन्न
येत् ९१ अक्षाबारेमेस्किटं लोहजतगाजलैः सिंच
येत्तप्ततप्तंच सप्तवारंपुनःपुनः ६२ चूर्णयित्वाततःक्वाथै
हिंगणेत्रिफलाभः । आलोड्यभर्जयेहहौ मण्डूरंजाय
तेवरम् ९३ क्षारक्षस्यकाष्ठानिशुष्कान्यग्नौपदीयते ।
नीत्वातदस्ममृत्पात्रेक्षिप्त्वानीरेचतुर्गणे, १४-विमर्यधा
रयेद्रात्री-प्रातद्वाजलेनयेत् । तन्नीरकाथोहझी याव
त्सर्वंत्रिशुष्यति ९५ ततःपात्रात्समल्लिख्य क्षारोग्राह्यः
सितप्रभः । चूर्णाभःप्रतिसार्यःस्यात्पेयःस्यात्वाथवस्थि
तः । इतिक्षारयंधीमान् युक्तकार्येपुयोजयेत् ६६॥
इति श्रीशार्ङ्गधरेएकादशोऽध्यायः ॥ ११॥ :
'तर शिनाजीत कार्यकारी होताहै और प्रागिमें रखने से लिंगाकार होजाता है ।।
१०॥निमभये जानिये कि शिलाजीत ब्रन्द्रा यनगया पहिली मलाई इसमकार
घनी फिर पहिली मलाई के तरे और जो बहुधारका निकलेपानी उसके तर थि.
राइरहे इन दोनों को गरमपानी देदे पीसि फिर दोमासताई दुना पानी डारि शुद्ध
कर ।। ( अथ महरविधि ) कीटी, लोहेवा मैल हेराकी लकडी के
कोयलामें लालक र गोमूत्र में सात बार घुझार ६ || तय कीटका वर्णकार दूने
त्रिफला कायमें मिजाय पात्रमें धरि यांच में त्रिफला हाय जरायकै उतारिले तय
पहर अच्छा होताई ।। ६३ ।। ( अथ, क्षारविधि) क्षारतकी लकड़ी को
रास्वकारि चौगुने पानी में घोलि ॥ १४ ॥ रातभर राखि ममात थिराना पानी ले
•ागिपर पढ़ाय गानी जरा जर पानी जरिजाय ॥१५॥ तम उतारिले सीको
तार कहते सफेद होजाता है और सर पानी न जर ती माय समरहता है ये दो
मफार सार पैचम्न प्रोपों में देते हैं "कुरैया, पलाश, यकायन, बेटेडा, अमल-
तास, मदारे, अमली, सेहुँड, चिरचिरा, पादा, केला, जमालगोटा सहिमन धार
मरी" इत्यादि सारखच कराने है ॥६॥इति धीशाधोएकादशोऽध्यायः॥१४॥
१ अध्याय ?"] भापार्शकासमेता। १ पारदःसर्वरोगाणांजेतापुष्टिकरःस्मृतः । सुदिनेसा धनंकुर्यात्संसिन्हिं देहलोहयोः १ रसेन्द्रः पारदःसूतोहर जःसूतकोरसः । बुधैस्तस्येतिनामानिज्ञेयानिरसकर्न सु २ तावतारारनागाश्चेहमवङ्गोचतीक्ष्णकम् । कांस्य कंटत्तलोहंच धातवोनवसंस्थिताः । सूर्यादीनांग्रहाणां तेकथितानामभिःक्रमात् ३ राजीरसोनमूपायांरसंक्षिप्त्या विवन्धयेत् । बहोणदोलिकायन्वेस्वेदयेकान्जिस्य हम् । दिनैमईयेत्सूतकुमारीसम्भवेवैः ४ तथाचित्र कजैःकार्मर्दयदेकवासरम् । काकमाचीरसस्तादिनने कञ्चमर्दयेत् ५ त्रिफलायारतथाकारसोमःप्रयत्नतः। ततस्तेभ्यःपृथकुर्यात्सूतंप्रक्षाल्यकाजिकैः ६ ततःक्षि प्यारसंखल्चरसादईचसैन्धवम् । मईयेन्निम्बुकरसैर्दिन मेकमनातुरम् ७ ततोराजीरसोनश्चशुष्यश्चनवसाद पाराको सर्वरोग जीतनेवाला पुष्टिकारक कहते हैं शुभ दिन शुद्ध करना भारम्भ कर थच्या सिद्धही नो जरा च्यापि दूरकर लोहादि धातु पारे में मता कर उत्तम होय शरीर पुष्टि करती है प्रमाण ।। उपरसरामन मयपति- मिः। अधर्ममनतारैव तैलेनाप्यधमाधमम् ॥ १॥ (पारानान } मंद्र पारा, स्त, हरज, मृतक और रस ये छः नाम पंडित रसरिया में सम्मान ।। वाया, रूपा, पीतल और सीसा, सोना, रांगा, पोलाद, कांता मोर लोहा पेनर धातु सूर्यादि नवग्रहके क्रमसेही नाम समझनेइ ॥३॥(रसशोधन राईलामुन की लुगदीका मूसायंत्र करि पाराभरि मुखमंदिगारे वसमें बावि दोलायंत्रकांनी के संग तीनदिन आँचदे शुद्धकर फिर एक दिन विकार के सम बोटेि ॥५॥ एकदिन चीताकाथमें एकदिन मकोयरसमें ॥ ५॥ एकदिन त्रिफलाके ममें और पारा निशारे घोष लेय ॥६॥पारा एस्मागरामाग'टेनभर नरम स्पयोटि मा राईलहसुन अच्छा नौसादर ये सापारके समान पारिक मंग १ र इनसौमौन चिनेकी भारी । सूर्यन मोलेर नि अन्तिम ६ १०६ शाधरसंहिता। [मध्यसपर रः। एतैरससमैस्तद्वत्सूतोमर्यस्तुषाम्बुना ८ ततःशंशो प्यचक्रामकृत्वालिप्त्वाचहिणुना । हिस्थालीसम्पुटेकृत्वा पूरयेल्लवणेनच ९ अथस्थालींततोमुद्रांदद्यादृढतरा म्बुधः । विशोप्याग्निविधायाधोनिषिञ्चेदम्बुचोपरि १० ततस्तुकुर्यात्तीवाग्नि तदधःप्रहरत्रयम् । एवंनिपातये दूर्ध्वरसोदोषविवर्जितः । अथाईपिठरीमध्येलग्नोग्राह्यो रसोत्तमः ११ लोहपात्रेविनिःक्षिप्यघृतमग्नौप्रतापयेत् । तप्तेघृतेतत्समानांक्षिपेद्गन्धकजंरजः १२ विद्रुतंगन्धकंज्ञा स्वादग्धमध्येविनिःक्षिपेत् । एवंगन्धकशुद्धिःस्यात्सर्वका र्येषुयोजयेत् १३ मेषीक्षीरेणदरदमम्लवर्गेश्चभावितम्। सप्तवारप्रयत्नेनशुद्धिमायातिनिश्चितम् १४ निम्बूरसैनि म्बपत्ररसैायाममात्रकम्। पिष्टवादरदमूर्वचपातयेत्सूत युक्तिवत्।ततःशुदंरसंतस्मान्नीत्वाकार्येषुयोजयेत् १५का लकूटंवत्सनागःशृङ्गकश्चप्रदीपनः । हालाहलोब्रह्मपुत्रो नुपाम्बुमें सब मिलाय मदनकर ॥ ८॥ जव सूरवकै गादाहो तब टिकरी बना हींग लेपरि फिर एक हांड़ी नॉनभरि तिसके बीच में पूर्वोक्त टिकिया धरि तिसपर द. जीहाड़ी के मुहरगरेहों जिसमें संघिन रहै तब कपड़ीटी करि भाचदेय ऊपर भीजी: फयरीराखे उसे सींचतार नीचे तीनपहर तक पाच सेजराखे जब ठंढीहो तब उ- परवाली हाहाल जो दोपोगा रस लपटरा बडायके सर काम युक्तकर ११॥(गंधकशोधन) लोहेकी कडाही में घी प्रतितप्तकरै घीके ममान गंधक जण दोरे जब गले तप चौगुने दूध गरमही नाइकै बुझाये तो गधक शुद्धहोकर सर्व कार्यों में योग्य होताहै ॥ १२॥१३॥(सिंगरफशोधन) सिंगरफको भेड़ के द्य और नींबू के रस में घोटि मुखावै इसे भावना कहिये ऐसे सात भावना देने से सिंगरफ निश्चय शुद्ध होता है ॥ १४॥(सिंगरफसे खार निकालने की विधि)नावरस वा नीवपत्र रसमें पइरभर सिंगरफ घोटि फिर डमरूयंत्रकारि - तारिलेय "डमरूयंत्रयों कहते हैं जैसे प्रथम पारा उड़ाया उड़ाय लेने से भी पारा गुदहोकर सर्व कार्यकारक होजाताई ॥१५॥ (अप पारेका मुख करनाकडे १७ - अध्याय १२] भापाटीकासमेता। हारिद्रःसङ्घकस्तथा । सौराष्ट्रिकइतितोलाविषभेदाओं मीनव १६ अर्कसेहण्डधत्तुरालाङ्गलीकरवीरका गुञ्जाहि फेनमित्येताः सप्तोपचिपजातयः १७ एतैत्रिमर्दितःसत श्चिन्नपक्षः प्रजायते । मुखंचजायतेतस्पधातूचनसते परन् १८ अथवाकटुकक्षारोराजीलवणपाद । सो नोनवसारश्चशिग्रुश्चैकत्रचूर्णितः। 'समां पारदादेते जम्भीरेणरसेनवा ॥ निम्बूतोयैःकाञ्जिकै मोष्णखल्वेधि मर्दयेत् १९ अहोरात्रत्रयेणस्याद्रसेधातुचरंमुखम् । अथ चाबिन्दुलीकिट्टरसोमस्त्रिवासरम् । लवणाम्लर्मुखंत स्यजायतेधातुघस्मरम २० अथकच्छपयन्त्रेणगन्धजार शमुच्यते । मत्कुण्डेनिक्षिप्लीरतन्मध्येचशरार्यक्रम २१ महत्कुण्डपिधानाभमध्येमस्खलयायुतमा लिप्त्याचमेखली मध्येचूर्णतत्ररसंक्षिपेत् २२ रसस्योपरिगन्धंस्परजोदया शुधाकर करनाभी कहते हैं । कीलकट, बच्छनाग, सिंगिया, भोपन हालाहल, ब्रह्मपुत्र,हरदिया, सहकार सौराष्ट्र ये नाविप भी मदार राईको धतूरा,फलिहारी,कनर नालापी, नीम ये सात उपविभई ११, १६ ॥ १७ ॥ सप विधर्म मर्दन करने से पारा पक्षीन होजाता समस्त धातुनों के भरण करने को सपर्य होता ।। १८|| {भय दूसरा प्रकार) त्रिकुटा दोनों सार भोर राई । और पांचोलोन, लहसुन, नौसादार और सहननकी हालये सब समभागलेची ।। रै तब पारे के समानने काशिरस या नींबूरस का कांजीमें गमकरि सरलकर।। १६ तीन दिनरात हर पारा सब धातुओं को साप और तोल न पद पार के मुरा होता है और घाटा वा वीरबहटी में तीनदिन घोरै फिर पांचालोन और H मौके रसमें घोटे दर पारेका मुवी और पादु भक्षणकरे ॥ २० ॥ (फो. यंत्रकरि गंगा की विधि) एक माटी कामदाले तिसमें चार मंगुल पानी भरि एक मानकी गति इस सदनकी केतरे पानी एक संगुल ॥ २१ ॥ तिस ।, में पारा और गारसमभाग शरिइस्स्सरसाइनको दकि नूनो दोग्नीसामी या तप नि:संविनिसक डपरमाती लगाइपदको निसकंदन की पानी शापिरसंहिता। । [मध्यखएड समांशकम् । ततोपरिशरावंचभस्ममुद्रांप्रदापयेत् २३ ततोपरिपुटंदत्त्वाचतुर्भिर्गोमयोपलेः । एवंपुनःपुनर्गन्धप गुणंजारयेहधः । गन्धेजीणेभवेत्सतरतीक्ष्णाग्निःसर्व कर्ममु२४धूमसारंरसंतोरीगन्धकंनवसादरम्यामकमर्द येदम्लैर्भागंकृत्वासमांशकम् २५ काचकुप्यांविनिक्षिप्य तांचमहसमुद्रया।विलिप्यपरितोवक्तंमुद्रांदत्त्वाचशोषये त् २६ अधःसच्छिद्रपिठरीमध्येकूपींनिवेशयेत् । पिठरी वालुकापूरै त्वाचाकुपिकागलम् २७ निवेश्यचुल्ल्यां तदधःकुर्यादशिनःशनैः। तस्मादप्यधिकंकिञ्चित्पावकं ज्वालयेत्नमात् २८. एवंद्वादशभिर्यामर्षियतेसूतकोत्त मः । स्फोटयेत्स्नाङ्गशीततमूर्ध्वगंगन्धकंत्यजेत् । अध स्थंघियतेसूर्तमर्वकार्येपुयोजयेत् २६ ,अपामार्गस्थवी जानांसूपायुग्मंप्रकल्पयेत् । तत्सम्पुटेन्यसेत्सूतमलयदु ग्धमिश्रितम् ३० द्रोणपुष्पीप्रसूनानिविडङ्गगिरिमेदक म् । एतच्चूर्णमधोवंचदत्त्वामुद्रांप्रकल्पयेत्.३१-तंगोलं न गिरे सर ऊपर से चार विनुमा कडाकी यांचदेवे इसीप्रकार छनार पारा गंधक समानदे चार फटाकी पाच देदकर फूंक तो पारा तीक्ष्णाग्निकारी होकर सर्व कार्य योग्य होता॥२-२२॥ अथ पारदभस्मविधि)घुभावासार (करायां) पारा, फटकरी, गंधक और नौसादर इन सब द्रव्योंको समभागले पहरभर नीके रसमें घोटि फिर पातशी शीशी में भरि का डौटीवरि धूपमें सुरवा तव एक नांदले चीच पेंदीमें बेदकर उस छिद्रार अभ्रकरि उसार शीशी स्थितकरि ऊपर चालू भरि चूलमें घरि सरे मागिरि पटवारह पहले अतिमद पाचकरि फिर क्रम कम पांच नीतकर तो पारान उडै सिद्ध होजाय जब सिराय तर शाशी निकारि फोर उममें गरक ऊपर गाने में पारातले पदी होयगा उस गंधक को फेंक पारा समेटिले यह पास सर्वकार्य यो य होमाताहै ॥ २६॥२६ ॥ (पुनः ) चिरचिरा चोज पीसि दोषा बनाय पारा कवरपे धमें शेटि ॥ ३० ॥ पाय मोइसचूर्ण को बीचमें पारावर मूगायनडिग,गैरका नकार दूसरा मूसावरि कपड़ोटी, भापाटीकासमेता। अध्याय १२] सन्धयेत्सम्यमन्मूषासम्पुटेत्सुधीः । मुद्रांदत्त्वाशोषयि त्वाततोगजपुटेपचेत् । एवमेकपुटेनैवजायतेभस्मसूतकम् ३२ काकोदुम्बरिकादुग्धैरसेकिश्चिद्विमर्दयेत्। तदुग्ध टहिङ्गोश्चमूपायुग्मंप्रकल्पयेत् ३३ धृत्वातत्सम्पुटेसूर्त तत्रमुद्रांप्रदापयेत् । धृत्वातगोलकंप्राज्ञोमन्मूषासम्पुटेधि के ३४ पचेन्दुपुटेनैवसूतकोयातिभस्मताम् । नागवल्ली रसैघृष्टःकर्कोटीकन्दर्भितः । मन्मूपासम्पुटेपक्कःसूतोया त्येवभस्मताम् ३५ खण्डितंमृगश्रृङ्गचज्वालामुख्यारसैः समम् । रुवामाण्डेपचेचुल्ल्यांयामयुग्मंततोनयेत्३६ एशिंत्रिकटुंदद्यानिष्कमानंतुभक्षयेतानागवल्लीरसैलाई वातपित्तज्वरापहम३७अयंज्वरांकुशोनाम्नारसं सर्वज्वरा पहः।पारदंरमकतालंतुत्थंटकणगन्धके।सर्वमेतत्समशुद्धं कारवेल्लरसैदिनम् ३८ मईयेल्लेपयेत्तेनतासपात्रोदरंभिष काअगुल्यईप्रमाणेनततोरुद्धाचतन्मुखम्३९ विपचेही - करि माटोलेगकै मुसाचे एक गजपुट यांचदे ऐसे पारा एकही सांच में मस्म होजाताई ॥ ३१॥ ३२ ॥ (पुनः) कटगूलरके धर्म पारायोटि फिर उमीदमें हाँग पीसि मुसारनाइ पारा धरि कपड़ोटी करि मांटीके मुसा में घर पुनः कपडोटी करि ।। ३३ । ३४ ॥ वीस गोइटाकी प्रांदे पारा भस्म होताहै ( पुनः ) पान के रसम पारा घोटि वांझपखसा की जड कोनके मर सीमें मंदेि कपड़ोटी पारै माटी लेए मुसाय थोडी पांचमें फूके से पारा भस्म होता है ।। ३५ ॥ (अथ ज्वरांकुश ) हरिण के सींग वर्गकरि बराबर जैतका रसले मारी पासनमें धरि मुंह शंदि दोपहरकी आंच देशा उतारिले ॥ १६॥फिरमायां अंश त्रिकुटादे पीमे चाररची नरांजर पान के रसमें खिलाये तो पात,पित्त.जर नाशकरै।। ३७॥ यह अरांकुर नामरम तय वरको हरताहै (ज्वरारिरस) पारा, सपरिया हरताना रतिया, सुहाना और गंधकये समानशोवि कोलेके रस में एक दिन कार्मिक तात्या भागाअंगुलमोटालोसिपात्रमुख मंदि।
शापरसंहिता। मन्यखएड लुकायन्त्रेछिप्त्वाधान्यानितन्मुखायदास्फुटन्तिधान्यानि तदासिद्धविनिर्दिशेत् ४० ततोनयेत्स्वागशीतावपात्रो दराद्भिपकारसंज्वरारिनामानं विचूर्ण्यमरिचैःसमम्४१मा पैकपर्णखण्डेनभक्षयेन्नाशयेज्ज्वरान् । त्रिदिनैर्विषमंतीव्र मेकद्वित्रिचतुर्थकम् ४२ तालकंतुत्थकंताघरसंगन्धमन शिशलाम् । कर्षकर्पप्रयोक्तव्यमर्दयेत्रिफलाम्बुभिः ४३ गोलंन्यसेत्सम्पुटकेपुटंदद्यात्प्रयत्नतः । ततोनीत्वार्कदुग्धे नववीदुग्धेनसप्तधा४४क्वाथेनदन्त्याःश्यामायाभावयेत्स प्तधापुनः मापमारसंदेयंपञ्चाशन्मरिचैर्युतम् ४५गुडं गद्यानकंचैवतुलसीदलयुग्मकम् । भक्षयेनिदिनभक्तया शीताग्र्दुिर्लभपरम् ४६ पथ्यदुग्धौदनदेयंविषमंशीतपू र्वकम् । दाहपूर्वहरत्याशु तृतीयकचतुर्थको ४७ व्याहि कंसनतंचैववैवयंचनियच्छति । भागैक स्याद्रसाच्छुद्धा देलायाःपिप्पलीशिवा ४८ अकारकरभोगन्धःकटुतैलेन कपड़ोर्ट करि घालकायंत्र में धरि यंत्रमुख खुलाराखि माचदेय जब उस पाल म धानहारे से खीलहोजाय तब जानिये कि रस सिद्ध होगपा ॥ ४० ॥ जय सभावसे दाहो तर उसे पात्रसे छुड़ायले उस जराकुशके समान मरिच मिलाय पीसलेय एफमारा पान के टुकड़े धरि सिलावैज्वरको नाशकर नीनदिन सानेसे अति कठिनश्वर, अन्तरिया, तिजारी और चातुर्थिकये सब दूरहोय।। ४१६४२ ॥ { शीतज्वारि रस । हरताल, तूलिया और तावा भस्म, शोधा पारा, गन्धक शुद्ध और मैन शलये सय कर्ष कर्पभर लेकर निफलाके रसमें घोटै ॥४३॥ गोला याधि कपढ़ीटी माटी लेस सूप फूफिमदार और मेहुँकेद्धौ सातभावनादे॥४४॥ फिर जमालगोटा की महके कामें फिर निशोथ के कदे में पात भावनादे तब एक माशेरस पचास मरिच ॥४॥छ माशे गुह दो नुलसीदल भक्तिपूर्वक वीन दिन खाय शीशारिरस इसका नाम है बहुत दुर्लभ है ॥४६॥पय द्धभातदेय जड़ी साह, पर, तिगरी, चातुर्थिक ॥ ४७ । अन्तरिया, नित्यज्वर और ज्वर ननिरिकार सब नाग हो। ( अथ वरमी गुटिका ) शुद्ध पारा एकभाग अध्याय १२.]. भापाटीकासमेता :- शोधितः । फलानिचेद्रवारुण्याश्चतुर्भागमिताह्यमी ४६ एकत्रमर्दयचूर्णमिन्द्रवारुणिकारसे । माषोन्मितांवटींकृ वादद्यात्सर्वज्वरेभिषक् । छिन्नारसानुपानेनज्वरघ्नीगुटि कामता ५० शुद्धोबुभुक्षितःसूतोभागद्वयमितोभवेता तथा गन्धस्यभागोहीकुर्यात्कज्जलिकान्तयोः५१ सताचतुर्गुणे प्वेवपारदेषुविनिक्षिपेत् । भागकंटङ्कणदत्त्वागोक्षीरेणवि मर्दयेत् ५२ तथाशङ्खस्यखण्डानांभागानष्टौप्रकल्पयेता क्षिपेत्सर्वंपुटस्यान्तश्चूलिप्तशरावयोः ५३ गतेहस्ती मितेधुत्वापाच्यंगजपुटेनच स्वाङ्गशीतंसमुद्धृत्यपिष्वात सर्वमेकतः५४पड्गुञ्जासम्मितंचूर्णमेकोनत्रिंशदूषणैः । घृतेनवातजेदद्यान्नवनीतेनपैत्तिक ५५ क्षौद्रेणकफजे दद्यादतीसारेक्षयेतथा । अरुचौग्रहणीरोगेकार्येमन्दान लेतथा ५६ कासश्वामेषुगुल्मेषुलोकनाथरसोहितः । त. स्योपरिघृतान्नंचभुजीतकवलत्रयम् । भवेक्षणकमुत्तानः शयीतानुपधानके ५७ अनम्लमन्नंसघृतभुञ्जीतमधुरंद + एलुवा, पीपरि, इड़नंगी ॥४८॥ अकरकरहा, का तेलका शोधागन्ध और इन्दूरत ये चार चार भाग ॥४६॥ इन्दूरनरस में घोटि मापमोत्र गोली बांधि त रुणवर में गुर्च रस में वैध ज्वर नी गुटिकाको खिलाये 400 (लोकनाथ रस) पारा युभुक्षित और धातुभक्षकः दोभागःदोनोको खरलकरि जरी पासे चौगुनी कौड़ीकी भस्म पारे समान मुहागा गायके धमें घोरै ।। ५१५२॥ पारेसे अंठगुणी शङकी भस्म शुद्ध पर पीसि दो सरवों के भीतर लेस।। ३ दोनोंको सम्पुटकरि वख लपेटि माटी लगाय गंजपुट फुकदे जब ठगदादो तवे खु. रचके निकारै खरल कर ५४॥ फिर बरती यह रस मिरच सर खरल करिवातरो. गमें धीमें दे. पित्त मंस्खन साथ दे ॥५५ । कफरोगमें शहंदमें दे प्रतीसार बर्दि; अरुचि, ग्रहणी, दुर्बलता, मन्दाग्नि ॥५६॥ कास, स्वास और गुल्म(गोला)इन रोगों में राहदयुक्त दें इस लोकगाय पर प्रथम तीन कौर घी भात खायतिर क्षण शाधरसंहिता [ मध्यस्वण्ट धि। प्रायेणजाइलमांसं प्रदेयंघृतपाचितम् ५८ सदुग्ध भक्तंदद्याञ्चजातेग्नौसान्ध्यभोजनासघृतान्मुद्वटकाव्य अनेप्येवचारयेत् ५६ तिलामलककल्कैनस्नापयेत्मर्पिपा थवा । अभ्यञ्जयेत्सर्पिपाचस्नानंकोष्णोदकेनच ६० क चित्तैलंनग्रहीयानबिल्वंकारवेल्लकम् । वार्ताकंफरीचि उचात्यजेव्यायाममैथुने ६१ मधंसन्धानकहिङ्गशुण्ठी मापन्मिसूरिकान् । कूष्माण्डराजिकांकोलकाजिकचैव वर्जयेत् ६२ त्यजेदयुक्तांनिद्रांचकांस्यपानेचभोचनम् । ककारादियुतसत्यजेच्छाकफलादिकम्६३ग्राह्योयंलो कनाथस्तुशुभेनक्षत्रवासरें। पूर्णातियोसितेपक्षेजातेचन्द्र वलेतथा६४पूजयित्वालोकनार्थकुमारीभोजयेत्ततः।दानं दद्याद्विघटिकामध्येग्राह्योरसोत्तमः ६५ रसात्सजाय तेतापस्तदाशर्करयायुतम्।सत्त्वंगुडच्याग्रहीयाद्वंशलोच नयायुतम्६६ खरंदाडिमंद्राक्षामिक्षुखण्डानिचारयेत्। भर बिना तकिये पिछौने साटपर उताना से वे फिर चाहै जैसे शयनारै ।।५७॥ खटाई छोड़ मधुर दही अच्छे मृतके सग भन्नसाय और अवश्य जगली मृगादिपशु भक्ष्य मास धीमें अच्छीतरह अजिखाय ॥५॥और सन्याके समय पका अी वशेष दूधभात भोजन करै और मेंगके मोदक अधिक घृत, पने भोग्न सगलाय ॥ ५६ तिला भारा पति उस्टन लगाय का घी मर्दन करि न्हाय उपदक से कमर ताई न्हाय ।। ६॥ तेल न छुवै वेल, करेला, भाटा, मदरी, अमली, श्रम और स्त्रीभोगको त्यागे ॥६॥ मत्र, अचार, हींगा सोंड, उर्द, मसूर, पेटा, राई, और कानीको तनै ॥३२॥ मोसमें न सोवै कासेमें न खाय ककारादि ग्राम के फल और सागोंको तनै ॥६३ ॥ यह लोकनायरस शुभनयन, पार, पूर्णाति- थि, शुकपक्ष, चल मान् चन्द्रमादेखि ॥ ६४ ॥ लोकनाथ रसको पूजि कुवारी जि. वाय दाादेय दियटिका साधि भतण श्रारम्भकर ॥६५॥ इसके खाने पर तप आती है तब मिश्री,गुर्घकासतौरवंशलोचन इन सबको मिलायकर देने॥६६॥ सजूर, अनार, दाल व उपकी गडेरी टे तो रसताप दाहो धनियाकी छाल दरि १६३ । अध्याय १२] भापाटीपारा मेना। अरुंचौनिस्तुपंधान्यं नष्टसशर्करम् ६७ दद्यात्तथान रेधान्यगुडूचीकाथमाहरेत् । उशीरचाराकाथं दद्यात्सम धुशर्करमरक्तपित्तेकफेश्वासेकासेचरवरसंक्षयो अनि मृष्टंजयाचर्णमधुनानिशिदीयते ६९-निद्रानाशेतिसारेच ग्रहण्यांपावकक्षये सौवर्चलाभयोकृष्णाचर्णसुष्पाजलेः पिवेत्७ शाजीणेताकृष्णधामधुयुत्त्यावरेहिताही मोद रेवातरक्तेत्रोंघेवगंदारे ७० नासिकाश्रतिरक्तेचरलंदा डिमपुष्पजम्। दूर्गायाः स्वरसंनस्येप्रदयाच्छर्करान्वितम् ७२ कॉलमज्जाकणांवर्हिपक्षभस्मसशर्करम्। मधुनालेह येच्छर्दिहिकाकोपप्रशान्तये ७३. विधिरेपप्रयोज्यस्तराव स्मिन्पोटलीरसे। मृगाङ्कमगर्ने चमौक्तिकाख्येपरेपचार त्येवलोकनाथोक्लोरसःसर्वजोजयेत् ७४ भर्जवचनपत्रा णिहेम्नःसक्ष्माणिकारयेत्। तुल्यांनितानिसूतेनखल्वेक्षि प्त्वाविमर्दयेत्७५ काञ्चनाररसेनैवचालामुख्यारोनया। करि घीमें भंगिक चूर्ण करि मिश्री मिलाय शिलाच ॥ ६७॥ उसी तापों भगियां गुर्चना कादादे, यस बसेका कादादे, म व मिश्रीको चिन्तायदे । १८ ॥ पिच, कफ, सास, कास और सरभंग ये सब अच्छे होय मांग भनि चूर्ग:रि लोकनायसंयुक्त रातको खिला।। ६६ ।। तथा नींदनाश, अलीसार, संगोलीय गन्दाग्निम-सोचर हड़ यापी रिसाथ रसदेकर गरमपानी पिलावे ॥ ७० ॥ तो गें व भाजीग को रिवरैः पीपरि शहदयुक्त साय तो पिनी, वातरक्क 'ददि अर्श को दूरिकरें।७?1 (नासा कारण) अनारस में दे लोकनाथरसयुक्त नासदे ॥ ७० ॥ वेरमिंगी, परि, मोरपरकी भस्म, मियी, श- इंदयुक्त साय तो छर्दि व हिचकी को रिकारे ।। ७३ ।। ये जो भान भी के अनोपान लोकनाथमें कहे सो पोटली के रममें भी सब उसी रीति देनाचादिय जैसे गृगांक, देगगर्भ, मौधिकारय यौर पंचरक्षादि पोटलिकारस इनसमा म नर- बनायोक्तरीति सदशाकर वो सम्पूर्णरोग में छहाँ ।। ७ ।। (मृगीकपोलोरें सक्षयादि पर ) सोनेका यंत्र समानानोप सोने के समं पारा मिला रान . । शाईपरसंहिता! { [ मध्यसपर लाङ्गल्यावारसैस्तावद्यावद्भवतिपिष्टिंका, ७६ ततोहेम्न श्चतुर्थाशंटकणंतत्रनिःक्षिपेत् पिष्टमौक्तिकाचर्णचहेमें द्विगुणमाहरेत् ७७ तेपुससमंगन्धंक्षिप्त्वाचैकत्रमर्दये त्। तेषांकृत्वाततोगोलंवासोभिःपरिवेष्टयेत् ७८ पश्चा न्मदावेष्टवित्वाशोपनित्याचधारयेत्।शरावसम्पुटस्यान्ते तत्रमुद्रांप्रदापयेत् ७९ लवणापरितंभाण्डेस्थापयेत्तंचस म्पुटे। मुद्रांदत्वाशोषयित्वाबहुभिगोमयैःपुटेत ८० ततः शीतेसमाहृत्यगन्धसूतसमंक्षिपेत् । घृष्ट्वाचपूर्ववत्खल्वेपु टेद्गजपुटेनाच. ८१ स्वागशीतंततोनीत्यागुञ्जायुग्मंप्रयो जयेत् । अष्टभिर्मरिचैर्युक्त कृष्णात्रयमथापिवा .८२ वि लोक्यद्रेयादोपादितेकैवरसरक्षिका । सर्पिषामधुनावापि देयादोषाधपेक्षया ८३.लोंकनाथसमंपथ्यंकुत्स्विस्थम नाःशुचिः । श्लेष्मीणग्रहणींकासंश्वासंक्षयमरोचकम् । मृगाकोयंरसोहन्यात्कृर्शत्वंवलहानिताम् ८४ सूतात्याद करें ॥ ७५ || कचनार का रस या अरणीरम चा करिवारम में घोट जस्तक गोला धजाय ।। ७६ ।। सोने का चौथ्याई मुद्दामादे और सोने का दूना मोती का चूनादे ॥ ७७ ।। इनसके समान मंधकदे सब स्वरलहरि गोलाबांधि पर क. पड़ा लपेटे | फिर मारी से लेस मुताप शरावसंपुट करि (हालोन पूरित पात्रमें संपुटधरै उसका मुंहमुखाय गजपुट में पकड़े ॥८॥दहाभयेपर नि- कारिकै सोने के समान पारा और सोने समान गंधकको युक्तफार पूर्ववत् रस में स्परलसरि फिर उसीक्रिया से गजपुट में फेंक 1१॥जर टंढाहो तर निकासि दो गुंजा रस माठ मिरच या तीन पीपरि के संगटे ॥८॥थार दोपको विचार के भापर रचीभर घाट या याद रामझके देइ यो अथवा शहद के साथ टोप पि. चारिक देनाचाहिये ।। ८३ ॥ पथ्य लोकनायसदृश इसमें भी देना योग्य है चित्त एवानकारि तिपवित्र होकर सारे सौ ग्लेप्मा, ग्रहगी, कास, श्वास आयी और अरुधि इन रोगों को यह गृगांवग्स दूर करता, बलहीनको चलवान् करताहुना, . अध्याय-१२] भापार्टीकासमेता। प्रमाणेनेहेमपिष्टिप्रकल्पयेत् । तयोःस्थाद्विगुणोंगन्धोम देयेकाञ्चनारिणा ८५ कृत्वागोलंक्षिपेन्मूषासम्पुटेमुद्रये ततः। पचेधरयन्त्रेणवासरत्रितयंबुधः ६ तंतःउद्धृत्य तत्सर्वं दद्याद्गन्धंचतत्समम्। मर्दयेदाकरसैश्चित्रकस्य रसेनवा ८७ . स्थूलपीतवराटांश्च पूरयेत्तेनयत्नतः । एतस्मादौषधाकुर्यादंष्टमांशेनटङ्कणम् ८८ टकणाई विषदत्त्वापिष्वासहुण्डग्धः । मुद्रयेत्तेनकल्केनवराटा नांमुखानिय ८९ माण्डेचूर्णप्रलिप्याथ धृत्वांमुद्रांप्रदाप येत् । गतेहस्तोनिमतेधृत्वांपुटेद्गजपुटेतचे ९० स्वा गशीतरसंनीत्वांप्रदयाल्लोकनाथवंत मा पथ्यंमगाव देयंत्रिदिनलवणंत्यजेत १ यदाच्छर्दिर्भवेत्तस्यदद्या च्छिन्नारसंतदान मधुयुक्तंतदाश्लेष्मकोपेदयाहार्द्रक म् ९२ विरेकमर्जिताभङ्गादेयादघिसंयुती। जयेत्कासं क्षयश्चासंग्रहणीमरुचिन्तथा ९३ अग्निचकुरुतेदीप्तं दुर्वलको मोटा करताहै ।।८४॥(कफक्षग्रीपर हेमपोटलीरस )पारा, पारेकी चौथ्याई सोनाले सरंलकर नई पीठी होजाय तब दोनोंसे दूनी गंधक कचनारके रसमें घोदि गोलाकरे ॥ ८५ ॥ सो मुपायंत्र में भरि संपुटकरि यसलपेट माटी लगाय सुरसाय भूधरयंत्रमें फंदे भूवरयंत्र एकदाप गहिरा, लंया घ चौड़ा सोदि । तिसमें छोटागदा खोदि सौपधरख माटीसे दापि तिसपर विनुवांकडा करसी करि बड़े गम भरि तीनदिन यांचदे ।। ६ ॥ जय स्वभावचे शीतलहो संघ निकारि समान गंगफले अद्रक वा चीते के रसमें घोटि ।। ८७॥ बड़ी पीली कौड़ी में भार औपका अष्टमांश सुहागा॥८८ || मुहागे का श्राधा सिंगिया दोनों सहुड़ के दक्षमें मीसि कौड़ी का मुख बदकार ।। ८६ | फिर माटीपात्रमें नालेसि कौड़ी में भरि दूसरे दिवस पंदकरि मुद्रितकरि गजपुटसे प्रांचदे ।। ६० ॥ दागये नि- कारि लोकनायकी रीति से खिलौवे य मृगांकी रीति से पथ्यदे तीनटिन लोन वनितरह।। ९१ ।। जो छर्दि होय ती मुर्चका रस दा कार्य मधुयुक्तटे कफाल में गुड़ श्रद्वारस युक्तदे ।। १२॥ अतीसारमें भूनीभांग व हौंग दोनोंके संगदे तथा १६६ मध्यराट क्रवातंनियच्छनि हेमगर्भ:परोज्ञेयोरंसपोटलिकाभि घाटरसस्यभागनिवारस्तावन्तःकनकस्थच तयों श्चपिष्टिकांकृत्यांगन्धोद्वादशभागिका ९५ कुर्यात्कज लिकांतेषांमुक्ताभागाश्चपोडशः । चतुर्विंशवशङ्खस्य भागेकंटकणस्यच ६६ एकत्रमदयेत्सर्वैपक्कनिम्बुकंजैर से कृत्वातेषांततोगोलंमूपासम्पुटकेन्यसेत् ६७ मुद्रांद' स्वाततोहस्तंमानेगर्तेचगोमयः । पुटेद्गजपुटेनैवस्वाङ्ग शीतंसमुद्धरेत्९८-पिष्ट्वगिजाचतुर्मानंदयाद्गव्याज्यसंयु तमाएकोनत्रिंशदुन्मानमरिचैः सहदीयते९९रोजतेमन्म पात्रेकाचजेवापिलेहयेत्। लोकनाथसमपथ्यंकुत्प्रिय तमानसा कासेश्वासेक्षयेवातेकफेहणिकागदे। अ तीसारेप्रयोक्तव्यापोटलीहेमगंभिका शुदसतोचिगन्ध प्रत्येकंशाणसस्मितमधूतवीजत्रिशाणस्यात्सर्वेभ्योति गुणाभवेतार हेमाभंकारयेदेपांचूर्णसूक्ष्मप्रयत्नता देयं - V कास तयीबारा, ग्रहणीय अरुचि इनमें भी दही व भगके साँधदे ।। ६३ । अग्निदीपन व कफयातनाशन होकर यह रेपोटजीरस श्रेष्ठ कहालाई । (पुनमगर्भरत कास परा) पारा चारभाग व सोना चारंभाग इन दोनों की पानकारिद्वादशभाग गधदः॥ १५॥ यतोनीको पागलीकरि सोलहभाग मोती चौबीस भाग राज:य एकभांग: सुहागा ॥६६॥ ये संग एकत्र करि पो नीयूके र भोटि गोलावापि पापुट में धरि मुद्रा साधि ।। ६७॥ सुखाय साधभर ममिको सोदि उस में धराय हावभर डा भराय किदे जय शीतला हो जाये तब निकारि पाचारिरची, रस मितीस गोवृतमें पीसिदेचे ॥३॥ चांदी या मादी या कांचक पात्रम धरि खिलाये और लोकनाथ रस सम प्रथ्य पताकातो. यह गलतमी, बान कमाणो ये प्रतीसारवाले पो. देय यह हेमगर्भ पोटली, इन सब रोगनको हरती है.॥१॥ पारा गंयपि शोषे चारि चारि गारी जनरामीन बारहमारी सयका दूना ॥२॥ चोक चोक विना यूट सघ युक्त -- .. ध्यध्याय २३] भागाटीकासमेता। जम्बीरमज्जाभिश्चागुञ्जायोन्मितम् जगईकस्वर सैर्वाप्रिज्वरहन्तित्रिदोषजम् । एकाहिकंद्व्याहिकवीतती संवाचतुर्थकम् विषमञ्चचरहत्याहिख्यातोयंवरा श४ दरवसना पमरिचंटङ्कणंकणाम् । चूर्णयेत्सम भागेनरसोह्यानन्दभैरवः ५ गुजैकंवाहिगुचंबा लंज्ञा वाप्रयोजयेत् मधुनालेयेच्चापिकुटजस्यफलल्यचम्। चूर्णितंकर्षमात्रन्तुत्रिदोपोत्थातिसारजित् ६ दध्यन्नंदा प्रयत्पध्वंगव्याज्यंतमेववापिपासायोजलंशीतंचिज 'याच हितानिशिः विषपलमितसूतः शाणिकाचर्णये वयमातच्चूर्णसम्पुटेधृत्वाकाचंलिप्तशरावयोमुद्रा दत्वाचसंशोध्यततरचुल्ल्यांनिवेशयेत् । वहिंशनैः शनैः कुर्यात्प्रहरद्वयसङ्गेयया ततउत्पाव्यतन्मुद्रामपरि स्थशरावकात् । संलग्नोयोभवेदमःसंग्रहणीयाच्छनैःश नैः। ॥ वायुस्प यथानस्यात्ततः कूप्यांनिवेशयेत् । करि सूक्ष्म चूर्णकरि दो गुना रस जमीरी के ॥३॥ वा अदरकरस में दे विदोप जनित ज्वर नाशकर नित्य अानेवाला, अत्तरिया, तिजरिया, चातयश व विरम- ज्वर को यह वरावश निश्चय कर नाश करता ॥ ४॥ (आनन्दभैरवरस अतीसारंपा) शद्ध सिंगर, सिंगिया, मिरच, मुद्दामा ६ पीपर ये सरस मानले महीन पुणेकरिये यह आनंदभैरवरत ॥ १॥ रोगीका बलदेखि एक गुना बा.दो गुना इद्रयव व कुरयाहोल हुन दोनों को रामारों, पीसि रसयुक्त श: इंदम मिलाय चटाव तो त्रिदोपजन्य, अंतीसार दरहोय ॥ ६॥ राजका दही या धृत वा मठा पथ्य भातसाथ खाय टढा पानी मिलावे घोर भांग अन्दीताह घोष पनायु रातको पिलाचे ॥ ७ ॥ (मनिपातमा लपविकाभरण) सिंगिया । पल पारा ४ माशे दोनो खरल कर दो पई कान के नुस्करी हुई रिक मुद्राकरि सायरल्हेपर, पहाय संदमंद हो पहरको आंचदेय ।। ॥ दोनों चुदीकरि ऊपर के सरया में लंगा घुमा होले से बोलले ॥१०॥ '. जिस पात्र में पवन न जासी उरा. शीशी में घर मनीषने शौती करिलेइ "भू.
२१८ .4 . शाधरसंहिताः। [ मध्यखदड यावत्सूचीमुखेलग्नकूप्यानितिभेषजम् तावन्मा. त्रोरसदियोमूर्चिछतेसान्निमातिति । क्षुरेणप्रच्छितेमूर्धिनत तोगुल्याचधर्षयेत् रक्तभेषजसम्पर्कान्मूच्छितोपिहि जीवति । तथैवसर्पदष्टस्तुमंतावस्थोपिजीवति । यदाता पोभवेत्तस्यमधुरतत्रदीयते १३. सूतभस्मसमंगन्धंगन्धा त्पादंमनःशिला माक्षिकपिप्पलीव्योपंप्रत्येकशिलया ससम् १४:चर्णयेद्भावयेत्पित्तैमत्स्यमायूरसम्भवैः । सेप्त धाभाव्यसंशुषकदेयंगुञ्जायोन्मितम् १५ तालपीरसै श्चानुपञ्चकोलतोपिला जलवुन्दोरसोतामसन्निपातं नियच्छति: 'जलयोगश्चकर्तव्यस्तेनवार्यभवेद्रस: १६ शुद्धसूतंविर्षगन्धंमरिचंटङ्कणकणामर्दयेदर्तजैवैर्दिन मेकंचशोषयेत् १७पञ्चवक्तोरसोनामद्विगुञ्जःसन्निपातहा। चीमुख एक नई समले कहे उसकामुर्ख -मुई समान हो उसे सूचीमुख कहते हैं । उससे जितना निकसे 1११,तितना सन्निहितका शिर.मुड़ाय पलने देय जो रक्त निकले उसी घावपर उस रसको अगुरी से मलैः॥ १२॥ जो रुधिर व रस, में मिल जाय तो मच्छित "जागै सैसेही सांपका काटा जागे फिर इसे इस उपचार से तयाये तब उस रोगी को मधुर अर्थात् डेरी, अनार, लुहारा बदाखादि को खिलानर सन्निपात पर जलवुन्दरस) पारांभ. स्म समान गन्धककी चौथ्याई मैनशिल, सोनामासी, पीपरि, सॉटि, मिच 'सत्र मैनशन समान ले || १४ा सरेलकरि मझरी के पित्त सात भावनादे सही मयूरपित्ते में सात भावनादे सुखाय दो गुजा खवावः ॥ १५ ॥ श्वेत मुसती के रसमें और पचकोल, सौटि, मिर्च, पीपरि, चाव व चीता इनके काई में दे यो जलयुन्दरस सन्निपातको दूर करता है जल ठण्टा पिय व उगढ़े जल से हाथ मुँह धोये च जल का स्पर्श राखे तो ओपय चल पाती सनिपातं को दूर करती ॥ १६॥ (सन्निपात पर पंचयरस)| शुद्धपारा, सिंगियां, गन्धक, मिरच, मुहागा पीपारवधतूराके रस में एक दिन मर्दनकर घाममें मुखावै ॥१७॥ जयबहारगोतामेतिपान्तरम् ॥
अध्याय १२] मापाटीकासमेता।
अर्कमूलरूपायन्तुसव्यूपमनुपाययेत् । युक्तंद्रध्योदनं
पंध्यंजलयोगंचकारयेत् । रसेनानेनशाम्यन्तिसक्षोंद्रेणक
फोद्भवाः,१६ मध्वाकरसंचानुपिबेदैग्निविटदये ॥यथे
घृतमांसाशीशक्तोमवत्तिपावकः २०रसंगन्धौसमानांशं
धत्तरफलजैरसैः । मईयेदिनमेकन्तुतत्तुल्यंत्रिकटुक्षिपेत् ।
उन्मत्ताख्योरसोनाम्ना नस्येस्यात्सन्निपातजित् २१,नि
स्वग्जेपालबीजंचदशनिष्कविचूर्णयेत् । मरिचम्पिप्प
लींसूतंप्रतिनिष्कविमिश्रयेत् २२ भाव्योजम्बीरजैवैः
सप्ताहंसम्प्रयत्नतः । रसोयमञ्जनेदत्त सन्निपातविनाशये
तू २३. सूतंटङ्कणकंतुल्यंमरिचंसूततुल्यकम् । गन्धकर्पि
प्पलीशुण्ठीहौहौभागोविचर्णयेत् २४सर्वतुल्यंक्षिपदन्ती
बीजंनिस्तुषितंभिषक् । गुज करेचनंसिद्ध नाराचोयंमहा
रसः ।, आध्मानंमलविष्टंभमुदावर्तचनाशयेत् २५
पह पंचपक रस दो गंजा सनियत में दे तो सन्निपात दूर होगाय ॥ (म:
दारमूल काय) सोठि, मिरच व पीपरि के सद्गदै 'यो मनोन है
* ॥ पथ्य दही भातदे और जलयोग कहे जल में बैठि श्रीवापर सई
देय तौ कफजनित उपद्रव मच्छे हो ॥ १६ ॥ अद्रक शहद सपनो मनि
दीपन कर और यथायोग्य त, मास साइतो अग्नि बन 101(स.
निपात पर उन्मत्तरस) पारा, गन्धक सम माग्देवान रससे खरत
करि तिसके समान निकुटा दे पीसि इस उन्मत्तरमा नामटेने से सनसन
दूरहोता है ।। २१॥ (मन्निपात पर अक्षम ) जमानगोटा दीनि पित्ता
दूरकरि चालिस माशे चूर्ण कर 'पिरंच, पोपरि व साठे चार बार माग ते॥
२२ ॥ जंभीरीरस में सात दिन घोटियञ्जना ता समिफन द्रहोप }[२!!
(शूल पर नाराचरस) पारा, सुरगा समभाग परि समान निन्दा गन्धर,
पीपरि व सोटि दो २ भागले सरले करें ॥ २४ ॥ सब के समान पुन जान-
गोटा दे एकप्रकार सरलकर मुंजायर टेने से रेचन होप यह नगर नाम
या पान, मलविष्टम्भ व उदार्च ये सब रोग नाश करलाई ॥२१॥
शाई धरसंहिता [ मरचण्ड दरदेंटङ्कपशुण्ठी पिप्पलीचैककार्पिका हेमालापलमा त्रास्यादन्तीबीजंचतत्समम् २६.विचार्यकत्रसर्वाणिंगो दुग्वेनैवसाधयेत्।त्रिगुजरेचनंदद्यादिष्टम्भाध्मानरोगिए २७ सूतभस्मत्रिभागंस्थानागैकहेमभस्मकम् । मृतता सत्यभागेकंशिलागन्धकतालकम् -२६ प्रतिभागद्वयंशु छमेकीकृत्यविचूर्णयेत् । वराटान्पूरयेत्तेनक्षागीधीरेणटङ्क शम्।पिष्ट्वातनमुखरुद्वाम्मुन्नाण्डेसन्निरोधयेत्९शुष्कंग जपुटेपंक्तवाचर्णयेत्स्वागशीतलमा रसोराजमृगातोय तुर्गजःक्षयापहः । दशपिप्पलिकाक्षाद्रेरेकोनत्रिंशदूप णैः३०शुदंसूतंद्विधागन्धं कुर्यात्खल्देनकजलीम् ।त्तियोः समंतीक्षणेचर्णमईये कन्याद्रः ३१ दिसामान्तकृतंगो लंताचपात्रेनिधापयेत्।आच्छाद्यैरण्डपत्रैणयांमार्दैत्युपणं ताभवेत् ३२ धान्यराशौन्योत्पश्चादहोरात्रात्समुंदरेत्। .. (शूलपर इच्छा मेदीरस) शुद्धशिंगरफ, मुहागा, साठि य पीपरि कर्प-कर्प भर,चोक पलभर जमालगोटा -पलभर ॥२६॥ सर सरलकरि गोद में लीन मुंना रेचनार्थ देय इस इच्छाभेटी रससे विष्टय र मा मान इहो ।। २७ ॥ (क्षपीपर राजमृगांकरस) पाराभम्म तीन भाग, सोनाभस्म एक भाग तासभस्म एक भाग, मैनशिल, शुद्धगन्धका हरताल ।। २८॥ दो २ भाग सर घोटि कौडी में भरि पारी के दूध में सुहागापोसि पौडीका, सुप मदि माटी पामें धरिसम्पुटकारे॥२६॥मुन्याय गजपुट में पदेय जव सिराय तर सरल करे इस राजमृगांक.रस को चारगुजा देय वा क्षयी क्षपडोप मनोमाने दश पीपरि राहद या उन्नीस मिरच शहद सङ्गदेय ॥ ३॥ (चार्ट पर स्ययनन्निरस) शुद्ध पारसे दी शुद्धगंधक सालकरि कजलीकरि दोनों के समान पोलादकी भस्मले रारको चीकुवार के रस में ॥ ३१ ॥ दो पहरभर रोटि रामन में रख रंडासे डापि था पहरमर दूध घरे उपणहोय ॥३२॥ तत्र नाजकी राशि में एक दिनरात हारि १ मतापायनिपात राम् । com M अध्याय १२] भापाटीकासमेता। 2624 संपीच्यंगालोबस्नेततोवारितरंभवेत् :३३ त्रिकटुत्रिफले लाभिर्जातीफललवङ्गकैः । नवभागोन्सितरेतैःसमःपूर्वर सोमवेत ३४ सञ्चूर्ण्यलोडयेलोद्रेभव्यनिष्कद्वयद्वयम् । अर्यमग्निरसोनाम्नक्षियकासनिकृन्तनः ३५, सता|ग न्धकोमोयामैककन्यकारसैः । योस्तुल्यताम्रपत्रं पूर्वक लेनलेपयत् ३६ दिनैकंस्थालिकायन्त्रपकमावायचूर्ण तु सूर्यावर्तोरसोधेपहिगुजःश्वासजिद्भवेत् ३७शुद्धसू तंमृतलोहंताप्यंगन्धकतालकम्। पथ्याग्निमन्थनिर्गण्डी त्र्यूषणंटकणंविषम्३८तुल्यांशंमईयेत्खल्वेदिननिर्गुण्डि काद्रवैः।मुण्डीद्रवैर्दिनैकन्तुद्विगुज्जवटकीकृतम ३९ भक्ष येहातरोगा”नाम्नास्वच्छन्दभैग्वः। रास्नामृतादेवदारु शुण्ठीवातारिजशतमासगुग्गुलुंपिवत्कोणमनुपानंसुखा वहम् ४० दग्धान्कपर्दिकान्पिष्ट्वायूपणंटङ्कणविषम्'! के निकारि लेय फिर सरलकार बसमें छानिले तत्र जलेपर डार तो तिरेगी। ३३॥ निकुटा त्रिफला इलायची जायफल लोग ये सब नवभाग इन सब समान स्वयमग्निरस ले ॥ ३४॥ ये सब खरलकरिशहन में दो निष्क साय यह भग्नि रस यी व कास को नाश करता है ॥ ३५॥ (श्वासपर सूर्योदतरस) पारा की आधी गन्धक पहरमर धीमुवार के रसमें योटि दोनों के समतावापान ले तिसपर लेपकर यह कजरी ।। ३६॥,एक दिन थालीयंत्र में पकाय ऐचले था- लिकापन्न माटीकी हांडी में लोनभरि तिसपै तापेका पनपरि मुंहदि कपडोटी करि फूंक देय यह सूर्यावर्तरस पीसि दो रोना सबसौ नौ यास नाशकर ॥२७॥ .(स्वच्छन्दभैरवरस) शुद्धपारा,मरालोहा, सोनामासी, गंधक,दरताल, इड, अरणी,मेवड़ी, निकुटा, भुनामुहागा, सिमिया, भेवड़ीरस ॥ ३८॥ त्रिकुटा भना ,मुगा, सिंगिया व मेवड़ी रसमें सब मिलाय समान सरल करि फिर एक दिन गोरखमुंडीके रसमें सरल करि दो गुजाके समान गोलीकरै ॥३६॥ यह स्वच्छन्द भैरवरस वातरोगी को खिलाय तथा रासन, गुर्च, देवदारु, सौंट व रण्डकी जड़ इनका कादाकरि गगनयुक्त गरम उमके.सर पिलावै यह अनुपान सुमदायी * शायरसंहिता । [ मध्यस्खयह गन्धकंशुद्धसूतञ्चतुल्यंजम्बीर वैः. ४.5 मईयेद्भक्षये न्मापंमरिचाज्यलिहेदनु । निहन्तिग्रहणीरोगंपथ्यंतकोंद 'नंहितम् ४२ मृतताम्रमजाक्षी पाच्यंतुल्यैर्गतद्रवैः। त त्ताघशुद्धसूतञ्चगन्धकंचसमसमम् ४३ निर्गुण्डीस्वर सेर्मदिनंतगोलकंत्रजेत्यामेकंत्रालुकायन्त्रेपाच्ययोज्यं द्विगुज्जका ४४ वीजपूरकमूलञ्चसजलंचानुपाययेत् । रसस्त्रिविक्रमोनाम्नामासकेनाइमरीप्रणुत् ४५ तालंता प्यंशिलांमतंशुद्धसैन्धवकणाम् । समाशंवर्णयेत्खल्वे सूताद्विगुणगन्धकम् ४६ गन्धतुल्यंमृतताघजम्बीरे दिनपञ्चकम् । मधषभिःपुटैःपाच्यभूधरेसम्पुटेपचेत् । :पुटेपुटेदवैसर्वमेतत्तुषट्पलम् ४७ द्विपलमारितंतायें लोहभस्मचतुष्पलम् । जम्वीराम्लेनतत्सर्वदिनमधपुटे लघु ४८ त्रिंशदंशविपंचास्यक्षिप्त्वासर्वविचूर्णयेत् । म है॥४०॥(हंसपोटली ग्रहणीपर)भुनी कौडी पीसि सोंठ, मिर्च, पीपरि मुहागा, सिंगिया, गन्धक और शुद्धपारा इन सब द्रव्यों को समानले भारी के रसमें ॥४१॥ सरलकरि माशा एकभर मरिच व पीकेसाथ साय तब ग्रहणी नाराहोय माठा भात पथ्य देय ॥ १२ ॥(त्रिविमामरस अश्मरीपर) मरा नांचा, बकरी दूध समानले किसी पात्र में परि यांचदे द्धतरै उतारिले तर सांवे के समान शुद्धपारा, गन्धक ।। ४३ ।। मेवड़ीके रसमें एक दिन याटि गोलीकरि ससायन्त्र में भरि पालुकापन्त्र में बांचढे तर दोगुना खिलाये ॥१४॥ विजौरा की गड़के रसमें या कादमें यह रसदेय इस रसका निविक्रम नामहे माशेभर सेवन रै तो पधरीको दूर करता है ॥ ४५ ॥ (कुष्टपर महातालेश्वर रस) दर- साल, सोनामासी, मैनशिल, पारा, सैंघच व सुहागा ये सब समान खरल करि पारे से दूनी गन्धकदे ॥ ४६॥ गन्धककै तुल्प मरा तांभीरी के रसमें पांच दिन योटि शराबसम्पुट में धारे कपड़ीटी फरि भूधरयन्त्र में फूंकदे ऐसे छापार फंकदे फिर निकारि पिनास में पांच दिन योटे पूर्ववत् प्रांचदै तब छापल रसले । ४७॥ मरा नापा दोपल व लोह मरा चारपल ये दोनों जंभीरी रसमें एक दिन । ग * १ अध्याय १२] भापाटीकासमेता। हिषाज्येनसम्मिश्रनिष्काईभक्षयेत्सदा ४९ मध्वाज्या कुचीचूर्णकर्षमानंलिहेदन । सर्वकुष्टनिहन्त्याशुमहाता लेश्चरौरसः ५० सूतभस्मसमोगन्धो मृतायस्तामगुग्गु लू।त्रिफलाचमहानिम्बाचित्रकश्चगिलाजतु ५१ इत्ये तच्चर्णितंकुर्यात्प्रत्येकंशाणषोडश। चतुष्पष्टिकरजस्य वीजचर्णप्रकल्पयेत्९२ चतुष्पष्टिमृतंचा_मध्वाज्याभ्यां विलोडयेत् । स्निग्धभाण्डेघतंखादेद् द्विनिष्कसर्वकुष्ठन त्। सःकुष्टकुठारोयं गलत्कुष्ठनिवारणः ५३ शुदसूत द्विधागन्धमर्यकन्याद्रवर्दिनम् । तद्गोलांपिठरीमध्येताम्य पात्रेणरोधयेत्ालतकाद्विगुणेनैवशुदेनाधोमुखेनच५४पा खेंभस्मनिधायाथपात्रोधगोमयंजलम् । किञ्चित्किञ्चि प्रदातव्यंचुल्ल्यांयामद्वयंपचेत्।चण्डाग्निनातदुद्धृत्य स्वागशीतंसमुहरेत् ५५ काष्टादुम्बरिकावह्नित्रिफलारा घोटि दश गोइटा में आचढे ॥४८॥ इस भस्मका तीसमा अंश सिंगियादे सरल कर तर देशमाश भसके घी नित्य साय ॥ ४ ॥ इसके पीछे बकुचीका चूर्ण दश माशे शहट युक्तकीके साय खाय तो सब कुष्ट नाशदोयें इसका नाम महातालेशर है।॥५०॥ कुछकुवार) ग म गा मालोहा, तान्न गुग्गुल, त्रिफला, कायन, चीता और शुद्धशिलाचीत ॥ ५१ ॥ ये द्रव्य सोलहाण शंसाठ शाण करंज बीका नूर्ण ।। ||अभ्रक भस्म ६५ शाण सत्र इकट्ठी परि शहट और घी मिलाय समान घृत भाड भरि धरि इसे ऑठमाशे सिला तो सब कुष्ट दरकर यह मुटकुठार रस गलित कोद भी नाश करता है ।। ५३ ॥ (उदयादित्यरस ) शुद्ध पारा य दूनी गन्धक एक दिन घीकुवार के रस में गर्दन करि गोली यानि माटीके पात्रों धरि पारेसे निगुणा तावेकी गहरी कटोरी पनाय उस माटीपान के भीतर गोलेपर ढापि किसी वस्तु से नि संधिशरि वेद करि ।। ३४ || पागें और ढको के रासभरि चूल्हे पर घरि दोपहर पाचटेय और उस तायके ढकनेपर पानी में गोपर घोलि थोड़ा थोडा छोडता जाय अन्न में तीन आचदेय देहा भय उतारि ॥ ५५ ॥ मगलर, चीता, तिफला श्रम २०४ शायरसंहिता -मध्यसएट जचकम् । विडङ्गंवाकचीवी काथयेत्तेनभावयेत् ५६ दिनैकमुदयादित्योरसोदेयोद्विगुञ्जकः । विचर्चिकोंदट्ठ कुष्ठं श्वेततुष्टञ्चनाशयेत् ५७ अनुपानं प्रकुतियाकु चीफलचूर्णकम. खादिरस्यकपायेणसमेनपरिपाचितम् '२८ त्रिशावागवां तीरैःकाथै त्रिफलोद्भवैः । त्रिदिना न्तेभवेत्स्फोटांसप्ताहाहाकिलासके ५९ नीलगुजांचका सीसंधत्तुरहंसपादिकम् । सूर्यभक्तांचचाङ्गेरापिष्ट्वातुल्या निलेपयेत् ६० स्फोटस्थानप्रशान्त्यर्थसप्तरानंपुनःपुनः। श्वेतकुष्टनिहन्यांशसाध्यासाध्यंनसंशयः६१ अपरंश्वित्र लेपोपिकथ्यतेऽत्रभिषग्वःगनाफलाग्निचर्णचलेपित श्वेतकुष्ठनुत् । शिलापांमार्गमस्मानिलिप्तस्वित्रंविनाश येत्६२ शुहमूतंचतुर्गन्धंपलंयामंविचर्णयेत् । मृतताया भ्रलोहानांदरदंचपलपलम् ६३ सुवर्णरजतंचैवप्रत्येकंद - लतासपत्र, विडंग व बकुची चीज इनका फायरि रसकी भावनादे ।। ५६ ।। एक दिन घोटि यह उदयादित्य रस दो गुना खिलाने से विचर्षिका, दाट व स्वेतकुष्ठ अच्छा होगाय 1. ५७ ॥, अनुगान सदिरसार काय चा गऊका ध पा प्रिफने के कामे तीन शाण वकुची सूर्ग दो गुंजा रसयुक्त साय सौ तीन दिनके मन्नम स्फोट कुष्ठ दूरहो सात दिनके अन्त में सफ़ेट कुष्ट दूरहो ॥ ५०) ५६॥(शिवनपर लेप) नीलपत्र, गुना, कसीस, घना, इंपपत्र, सूर्यमुसी मार बोटी लुनियां ये सब सम भाग लेप करने से ॥ ६ ॥ जहां फूटाहो तहां तौ, सात दिन में मलित कुष्ठ अच्छा होय और रोतमुष्ट साध्य वा असाध्य दर होय ॥ ६ ॥इसीर श्रेष्ठ वैद्य और लेग कहते हैं ।ची र चीताको जल में पीसि लगाने से श्वेत रहोय मैनशिन चिरचिरा रास पीसि पानी के साथ नेपकरें तो येताष्ठ दरहोय १६६२ ।। ( फुटपर, सर्वेश्वर रस) शुद्ध पारा एकपल, गन्धक चारपल प्रकपहर सरल कर गरातारा, अभ्रक, लोह, गर ये शुद्ध सर एक एक पल ॥ ३॥ मरासोना व चांदी एकपल मारो
अध्याय २२.] भापाटीकासमेता।
शनिष्ककम्।माकंटतववञ्चतालंशुद्धपलयम् ६१
जम्बीरोन्मत्तवासाभिःस्नुह्यविषमुष्टिभिः। मर्पयारिज,
वैःप्रत्येकेनदिनंदिनम् ६५ एवंसप्तदिनमचैतदोलंबस्त्र
वेष्टितमावालुकायन्त्रगस्वेयंत्रिदिनलघुबहिना ६६ आ
दायचर्णयेच्छ्लक्ष्णंपलैकंयोजयेद्विषम् । द्विपलंपिप्पली.
चूर्णमिश्रसर्वेश्वरोरसः६७द्विगुजोलियतनाने सुप्तिम
डलकुष्ठजित् ।वाकुचीदेवकाष्ठंचकर्षमानंसुचर्णयेन् । लि
हेदेरण्डतैलाक्तमनुपानंसुखावर ६८ हेमाह्वांपञ्चालि
कांक्षिप्त्यातक्रघटेपचेत् तक्रेजीर्णसमुद्धत्यपुनःक्षीरेघटे
पचेताचीरेजीणेसमुद्धृत्यक्षालयित्वाविशोषयेत् ६९ त
चूर्णपञ्चपलिकमरिचानांपलद्वयम् ।पलेकमच्छितंसृतमे
कीकृत्वानुभक्षयेत्।निकैकंसुतकुठातःस्वर्णक्षीरीरसोह्य
यम् ७० भस्मसूतेमृतंज्ञान्तमुन्डमरमशिलाजतु शुद्धता
riशिलाव्योपंत्रिफलंोलनीजकम,७१ अपित्यरजनी
.. गाईघरसंहिता । [मध्यखण्ड चूर्णभङ्गराजेनभावयेत् । विशद्वारंधिशोप्याथमधुयुक्तंलि- हेत्सदा ७२ निष्कमात्रहरेन्मेहान्महबदरसोमहान् । में हानिम्बस्यबीजानि पिष्वाषट्सम्मितानिच ७३ पलंत ण्डुलतोयेनघृतनिष्कद्वयनच । एकीकृत्यपिवेच्चानुहन्तिमे हचिरन्तनम् ७४.चतुःसूतस्यगन्धोप्टोरजनीत्रिफलाशि वा । प्रत्येकचद्विभागस्यास्त्रिनेपालचित्रकम् ७५ प्रत्येकंचत्रिभागस्याव्यपंदन्तींचजीरकम् । प्रत्येकमष्ट भागस्यादेकीकृत्यविचूर्णयेत ७६ जयन्तीस्नुक्पयोमृङ्गव हिवातारितैलके: । प्रत्येकनकमानीव्यंसप्तवारंटथक्ट थक् ७७ महावहिरप्सोनामनिकमप्याजलैःपिवेत् । वि रेचनभवेत्तेनतकभहंससेन्धत्रम्७८दिनान्तेदापयेत्पथ्यं वर्जयेच्छीतलंजलम् । सर्वोदरहरःप्रोक्तोमूढवातहरःपरः ७६ गन्धकतालकत्तामृतताचमनःशिला ।शुदसतंच तुल्यांशंमईयेगातयेदिनम् । पिप्पल्यास्तुकपायेणवजी निकला, झरबेरीकी नदी ||७|| कथा और हरदी इन सबका चूर्ण भैगरेके रसमें घोर्ट जर सूगजाय तर शहद मिलाय चाटै।। ७० ॥ ४ माशे नित्यखाय तो मोह नाशहोय इस रस को मेहरद्ध नाम कहते हैं यवायन के विया छ पीसि लेय ।। ७३ ॥ पारि पैसाभर चारलको धोवन पाठमाशे थी सर मिलायक पिय तो बहुत दिनी प्रमेह दूर होताहै ॥७४ ( जलोदर पर वहिरस) पारा पल चार, गन्धक पल साठ, हल्दी, निफला व इड ये सर दो २ पल, नि- शोय, पाल.और पीता ॥ ७५ ॥ ये सर तीन २ पल, त्रिकुटा, जमालगोटे की जड़ और इत जीरा पाठ २ पल सर मिलाय सरला ॥७६॥ भरगी पारस साइम मैंगरास चीतारम पाकादा रेडीका तेल इनमें कमसे सातसात भारादे ॥ ७॥ यह महापहिरस चार मारी मुहमें धरि गरमपानी से उतारि जाय तर गल निरसन्याको रेचन के पीछे पथ्य महा भात संघालोन देकर गरम जल पिय सब पेटके रोग दूरहोय व दवात दरहो ।। 5-1७६ ॥ (शुनपर विशाधररस) शुद्ध गन्धक, हरनाल, सोनामाखी, मराताया, ।
-अध्याय १२] भापाकासमेता। क्षीरणभावयेत् ८-निष्काईभक्षयेत्क्षौद्रेर्गुल्मप्लीहादिकं जयेत् । रसोविद्याधरोनामगोमूत्रंचपिवेदन ८१ टङ्कणं हारिणशृङ्गरवर्णशुल्बमृतरसम् । दिनैकमाकद्रावैर्मचरु द्वापुटेपचेत् ८२ त्रिनेत्राख्योरसःशोर्यमापंमध्वाज्यकैलि हैत । सैन्धवंजारकहिमध्धाज्याभ्यालिहेदनु । पक्तिशालं हरत्याशुमासमात्रंनसंशयः ८३ शुद्धंसूतद्विधागन्धंयामै कंमईयेदृढम् । इयोस्तुल्यंशुद्धतासम्पुटेतंनिरोधयेत् ८४ अवधिोलवणंदत्त्वामुनाण्डेधारयेषिक् । ततोगज पुटेपक्रवारवाशीतंसमुदरेत् ८५ सम्पुटंचर्णयेत्सूक्ष्म पर्णखण्डेद्विगुञ्जकम् । भक्षयेत्सर्वशलाताहिशुण्ठीसनी रकम ६वचामरिचजंचूर्णकर्षमुष्णजलैःपिवेत्।असाध्य नाशयेच्छूलरसोयंगजकेशरी ८७ शुद्धसतंविषंगन्धमज मोदांफलत्रयम्। सर्जक्षारंयवक्षारंवहिसैन्धवजीरको ८८ मैनशिल और पारा सरसमानले सरलकरि फिर पीपरि काथमें दिनभर सरल फर एक दिन सेंड्रड दूध में खरल करै ।। ७० ॥दो मारो शहद सग चाटे तो । गुल्म व प्लीहा दूरहोय यह विद्याधर रस खाय ऊपर से गोमूत्र पिये ॥१॥ (निनेत्ररस पक्तिशूलपर ) सुहागा, हरिणभंग, सोना, तांगा यौर पारामरा एक दिन अदरक के रस में घोटि गजपुट में फूंकदे ।। ८२ ॥ यह त्रिनेत्ररस माशा भर वृत शहद में चाट तिसपर संधव, जीरा, हींग, घृत और शहद चाटै यो मास भर चाटनेसे पमुरी की समस्त पीडा दूरहोय ११८३॥ (अलपर गजकेशरी रस ) शुद्धपारा व दूना शुद्ध गन्धक दोनों बलपूर्वक घोटि तिस के समान शुद्ध ताचेके कुटके करि कमली में मिलाय सम्पुटकरै ।। ८॥ फिर माटी के पात्रमें नोन बीचमें सम्पुटगाडि गजपुट प्राचदे उपहाभये निकाले ॥८॥ तव खरल करि पोपान में दो गुभारस खवा तौ पेट का शूल मिटै और उसीपर भुनीहींग, सौंठ, जीरा ॥८६॥वच और मरिचइनका चूर्ण उप्णोदक साय पिये तो असाध्य गल भी नाश होजाय यह गजकेशरी रस कहाता है।॥ ७॥ (, मन्दाग्नि पिर अग्नितुपडीरस) शुद्ध पारा, विष) गन्धक श्रजमोद त्रिफला, सनी शाईपरसंहिता [मध्यसगड सौवर्चलंबिङ्गानिसामुदत्र्यूषणसमम् । विपमुष्टिंसर्च तुल्यंजम्बीराम्लेनमर्दयेत्। मरिचामांवटींखादेवह्निमान्य प्रशान्तये८९शुद्धसतंविपंगन्धंसमंसविचूर्णयेत्। मरि सर्वतुल्यांशंकण्टकार्याःफलद्रवेः । मर्दयेनाचयेत्स वमेकविंशतिवारकम् ९० वटींगुञ्जात्रयंखादेत्सर्वाजीर्णन शान्तये।अजीर्णकण्टकश्चायरसोहन्तिविसूचिकाम् ९१ "मृतंसृतंतताचंहिपुष्करमलकम् ।सैन्धवंगन्धकतालंक टुकीचूर्णयेत्ममम् ९२ पुनर्नवादेवदालीनिर्गुण्डीतन्दुली यकैःतिक्तकोशातकीद्रावर्दिनैकंमईयेदृढम् ६३माषमा लिहेत्तौरभमन्थानभैरवम्। कफरोगप्रशान्त्यर्थछिन्ना वार्थपिवेदन सूतहाटकवजाणिताम्रलोहंचमाक्षिकम्। तालं नीलाञ्जनंतुस्थमहिफेनसमांशकमह५पञ्चानालवणा नांचभागमेकंविमर्दयेत् । वजीक्षारैर्दिने कंतुरुवातंभूधरे जवाग्वार, चीता, सेंधव, जीरा ॥८॥ कालानोन विडापागालोन और मिटा ये सब समान भागले और सबके समान कुचलाले जमीरीके रसमें घोटि मरिच सम गोली वापि साय इस अग्नितुगीरससे मन्दानि दूर होजाती है ॥८६॥ ( विसूचिका ( हैजा) पर अजीर्णकटकरस ) पारा, सिंगिया और गन्धक ये तीनों शुद्ध सरसम भागले सरल कर सबके सपान मरिचदे भटक- टैया फलके रस में मिजोय इकोसवार घोटि ॥१०॥ तीनरत्ती भर पटी बनाय कर सावे तो इस माणकएकवटी के खाने से सब अजीर्ण शान्त होये और विचिका को इनै ।। ६१ ॥ ( अथ मन्धानभैरव) मृतक पारा व तांग, हींग, पुष्करमूल, सैंधव, शुद्ध गन्धका हरताल और कट की ये सब सम भाग खरल परि ॥ १२॥ गदापुरैना, चंदाल, मेघड़ी, चौराई और कदुचीतोरई इन सरके रसमें एक एक दिन बलपूर्वक क्रमसे घोटि ॥ १३ ॥ माशभर शहद युक्त नित्य साय यह मंयानभैरवरस कहाता है इसपर कफरोगनाशार्थ गुर्च का काय पिये ॥२४(अप वातनाशकरस शुद्धपारा,शुद्धसोना, शुद्धहीरा, शु. दलोहा शुद्धमोनामारली, शुद्धररनाल, शुद्धमुग्मा, शुद्ध भूतिया और अफीम ये - 7 २०३ । अध्याय १२] भाषाटीकासमेता। पचेत् ६६ मापैकमाईकद्रावलेहयेहातनाशनम् । पिप्प लीमूलकासकृष्णमनुपाययेत् । सर्वान्वातविकारांस्तु निहन्त्याक्षेपकादिकान् ६७ कनकस्याप्टभागाःस्यु सूतो द्वादशभिर्मतः । गन्धोपिडादशप्रोक्तस्तापंशाणहयोन्मि तम् ९८ अभ्रकस्यचतुःशाणमाक्षिकस्यद्विशाणिकम् । वगोहिशाणःसौवीरंत्रिशाणलोहमष्टकम् ९९ विपंत्रिगा णिकंचैवलाइलीपलसम्मिता। मईयेदिनमेकञ्चरसैरम्ल फलोद्भः २०० दद्यान्मृद्पुटंवहौततश्चूर्णतुकारयेत्।। मापमानोरसोदेयः सन्निपातसुदारुणे १, आईकस्वरसे नैवरसोनस्यरसेनवा। किलासंसर्वकुष्ठानिविसर्पचभगन्द रम् । ज्वरंगरमजीर्णचहरेद्रोगहरोरसः २,रसोगन्धस्त्रि त्रिकोकुर्यात्कज्जलिकांद्वयोः । ताराभ्रतापवङ्गाहि साराश्चैकैककार्पिकाः ३ शिग्रुज्वालामुखीशुएठीबिल्वेभ्य समानभाग ॥ ६५ ॥ एक भागमें पांचोलोन ये सब द्रव्यले एकदिन सहुँइके दूध में सरलकर संपुट में राखि भूपरयंत्र पचावै ॥ ६६ ॥ माशेभर रस प्रदरकके रसमें मिश्रितगरि साये तो सर वायु नाश हो अथवा पिपरामल फाप में पीपरि मिलायके देय तो सन्न दात विकार थालेषकादि पिलाय जायें ॥३७॥(सन्निपात पर कनकसुन्दर रस) पाठभाग सोनाभस्म, वारहभाग पाराभस्म, शुद्धग- न्धक चारहभाग, दोशाण ताम्रभस्म । अभ्रकमस्म र शाण, सोनामासी भस्म २ बन २ सुरमाभस्म ३ लहाभस्म ८ ॥ ६ ॥ विष ३ पल, परियारी पलभर ये द्रव्य और रस एक दिन जम्बीरी नींव में खरलकर ॥ २० ॥ संपुटकरि थोडी पाचटे कि फिर खरलकर माशामर खिलायती अत्यन्त बदा हुया सन्निपात दूरहोय ॥ ॥ अदरक वा लहसुन के रस में खिलाय तो कि लास, सर्वकुछ, विसर्प, भगंदर,ज्वर, रिपरिकार और अजीर्ण इन रोगों को यह कनकमुन्दर रस हरताहै ।। २॥ (सन्निपात पर भैरयरस ) पारा ३-कर्पय गन्धक ३ कप इनदोनोंको घोटि कजलीकरि तागा, चांदी,पीतर पंग और पोलाद ये पाचौंभस्म कर्यभर ॥३॥ सहिजन ज्वालामुखी व सॉटि का सादा वेलके फत " [मध्यसएट । शाभरसंहिता। स्तन्दुलीयकात् । प्रत्येकंस्वरसैःकुर्याद्यामेकैविमर्दये त् ४ कृत्वांगोलंटतंबरौलवणैःपूरितन्यसेत् । काचभाण्डे ततःस्थाल्यांकाचकूपी निवेशयेत् । वालुकाभिःप्रपूर्थि वह्निर्यामद्वयं भवेत् ५ ततउद्धृत्यतंगोलंचूर्णयित्वाविमि श्रेयेत् । प्रवालचूर्णकर्षण शाणमात्राविपेणचा 'कृष्णस पिस्यगरलैर्दिवसभावयेत्तथा ६ तगरंमुशलीमासीहेमाहा वितसःकणा । नीलिनीपत्रकलाचित्रकश्चकुंटेरकाश तपुष्पादेवेदालीधेत्तूरागस्त्यमुण्डिकाः । मधकजातिमद नारसैरेषांविमर्दयेत्। प्रत्येकमेकींचततःसंशोप्यधारये ८वीजपूरार्द्रकद्रावमरिचैःषोडशोन्मितःोरसोहिगुजाप्र मित सन्निपातेषुदीयते।प्रसिद्धोयरसोनाम्नासन्निपातस्ये भैरवः ९ तारमौक्तिकहेमानिसारश्चैकैकभागिकाः। द्विभा गोगन्धकांसूतस्त्रिभागोमईयेदिमान् कपित्थस्वरसैर्गा ढंमृगशृङ्गेततःक्षिपेत् । पुटेन्मध्यपुटेनैवसमुहृत्यचमईये को रस चौराईरस इन रसमै पहरपहरभर योटि ॥ ४॥ गोलाबांधि कपड़ोटोकरि दो काँचके प्याले एकम लोनभरि गोला परि दसरा लोन पूरित प्याला ढांकि "फपडोटीकरि तयं माठी पात्र फे'बालुकायंत्रमें घरि दोपहरकी पदेय | ५ | ठंडा 'भये निकारि सरलकरि फिरि मंगा नण कपभर, विष शाणभर च काले सांपका जहरयुक्त एक दिन खरलकर फिर फांचकी शीशी में भरि पानुकायंत्रमें दोपहरकी यांचदेठंढाये निकारि चूर्णकरें।६॥ तगर, मुली, जटामांसी, चोक,जगंवाथी पीपरि, नीलकीपाती,इलायची, चीता, कटसरया ।। ७॥ सौंफ, धनतोरई, धतूरी, भेगस्त्य, मुदी, महुभा, चमेली और मैनफैल इनसवका रस का काढ़ा करि क्रम • से एकएकपार चोटि मुखाय राखे ॥ ॥ जंभीररस वा अदरकरसं १६ मरिचों से दोगुमा प्रमाण रसके साथ सर्मिपात में देय यह प्रसिद्ध समिपातभैरवनाम रस कहाताई ॥६॥ अय ग्रहणीकपाटेरस) चांदी, मोती, सोना और 'लोहा इनकी भस्म एक एक भाग, शुद्धगंधर्क दो भाग चार शुद्ध पारा तीन भाग ये "सर सरनकरि ॥२०॥ फिर फैयेकै रसमें सरलकरि हरिणकै सीगमभरि कपड़ाटी r अध्याय १२] भापाटीकासमेता। ११वलारसैःसप्तवेलमपामार्गरसैस्त्रिधालो,प्रतिविषा मुस्तंधातकीन्द्रयवा स्मृताः।प्रत्येकै स्वरसैनित्यंभावना स्यात्विात्रिधा १२ माषमात्रोरसोदेयोमधुनामरिचैस्त था। हन्यात्सर्वानतीसारान्यहणींसर्वजामपि । कपाटोग्रह पीरोगेरसोयवहिदीपनः १३ मृतसूताम्रकेगन्धंयवक्षारं सटङ्कणम् । अग्निमन्थंवचांकुर्यात्सततुल्यानिमान्सुधीः १४ ततोजयन्तीजम्बीरमद्रावैविमईयेत्।त्रिवासरंततो गोलंकृत्वासंशोघ्यधारयेत् । लोहपात्रेशरावञ्चदत्त्वोपरि, विमुद्रयेत् १५ अधोवहिंशनैः कुर्याधामाईततंउद्धरेत् । रसतुल्यांप्रतिविषादद्यान्मोचरसंतथा.। कपित्थविजया, द्रावर्भावयेत्सप्तधाभिषक् १६ धातकीन्द्रयवामुस्तलोध बिल्वंगुडचिका । एतद्रसैर्भावयित्वावेलेकैकंचशोषयेत् १७ रसंबवकपाटारख्यंशाणकंमधुनालिहेत् । वहिंशुण्ठी विडंचिल्वंलवणचूर्णयेत्समम् । पिबेदुष्णाम्बुनाचानुसर्व करि तीस गोयटा की श्राचदे ठंढाभये निकारि निकारि सरलकरि ।। ११ । परि- पारारस में सातवार सरलकरि फिर तीनवार चिरचिरारसमै खुरलकरिफिर लोप, अतीस, मोया, धवपुप्प, इन्द्रयव और गुर्च इनके रसमें तीन तीनपारायसे सरल करि ॥ १२॥ माशभर रस शहद मरिच मिलाय चाटै तो सब प्रतीसारच नाणी को रिकरै यह ग्रहणीकपाट अग्निको दीपन करताहै ॥ १३ ॥ वन कपाटरस अहणीपर) पाराभस्म, अभ्रकभस्म, शुद्धगन्धक, जवाधार, सुहागा, भरणी धीज और बालपच ये सब समानभागले ॥ १४ ॥ यह रस जैति,जंभीरी व भंगरा इनके रस में तीन तीन दिन घोटि गोलाकरि मुसाय लोहेकी कदैया में धरि माटी पानसे यंदकरि ।। १५ ॥ मंद मंद चार बड़ी यांचदे उतारिलेय तब उस रस के समान अतीस व मोचरस डालि कथा व भार्ग के रस में वैध सातसात बायोटे।। १६॥ फिर धवयुप्प, इन्द्रयव, मोया लोप वेल और गुर्च इनके रस में एकएक बार घोट सुसायले ।। १७ ।। यह वाकपाटरस शाणभर शहद के संगरखाय ऊपर से चीता,सोडि,पागानोनवेल और सैंधव इन सबका समभाग पूर्णपरि उष्णनलके 11 - सर शायरसंहिता मध्यखएड जांग्रहणीजयेत् १८ तारंवचंसुवर्णचतामसूतंचगन्धक म् । लोहंक्रमविरहांनिकुंर्यादेतानिमात्रया १९ विमर्थ कन्यकाद्राचन्यसेत्काचमयघटे । विमुच्यपिठरीमध्येधार येसैन्धवैर्भते । पिठरीमुद्रयेत्सम्यक्ततश्चुल्ल्यांनिवेशये त् २० वहिशनैः शनेः कुर्यादिनैकततउद्धरेत्। स्वाङ्गशी तंचसंचूर्ण्यभावयेदर्कदुग्धः २२ अश्वगन्धाचकाको लीवानरीमुशलीखुरी । त्रित्रिवेलंरसैरासांशतावश्चिमा वयेत्। पद्मकन्दकसेरूणारसैकासस्यभावयेत२२कस्तूरी व्योपकर्पूरककोलैलालवङ्गकम् । पर्वचूर्णार्दष्टमांशमेतञ्च #विमिश्रयेत् २३ सर्वैःसमशिर्करांचदत्त्वाशीणोन्मिती भजेत् । गोदुग्धद्विपलेनैवमधुराहारसेवक | तरुणीरम येंबही शुकहानिर्नजोयते २४. सूतोवनमणिर्मुक्ताता रेहेमसिताभ्रकम् । रसैःकर्पमितानेतान्मर्दयदिरिमेदजें: २५ प्रवालचर्णगन्धश्चद्विहिकर्षविमिश्रयेत् । ततोश्वंग पाय साय तो सब ग्रहणी दूरिहोय ॥ १८ ॥ (मन कामदेवरस.) चांदी हीरा,सोना और नांवा इन चारों की भस्म तथा पारा, गंधक बलोहा ये तीनों शुद्ध इन सावीको ब्रमसे बदती भोगले ॥ १६ ॥ पीकवारके रस में योटि शीशी में परि कपड़ोटीकरि माटीपान में नीचे ऊपर नौनधरि पीचमें शीशोधारे संपुटवारि चल्हें पर धरिं ॥ २०॥दिनभर मंद मंद भांच यारि फिर निकारि मदारकेद्धमें सरलकामा २१ । मसंगंध काकोली विना भी असगंध, किमाच, मुशली, तालमखाना और शतापरि इनके रसमें तीन तीन भावना दे फिर कमलकी जड़ कसेरू व कांस इनकी तीन तीन भावनादेय ॥२२॥ कस्तुरी, निफुटा,कपूर, शीतलचीनी, इलायची थोर लवंग पीसि पूर्वच जो भावनादिसे सिद्धकिये का भष्टमांश कस्तूर्यादिचूर्णयुक्त करि ।। २३ ।। सबके समान शक्कर मिलाये शाणभरि साप भाउ पैसाभरि पिये पथ्य मधुर करे इसके गानेसे बहुत नियों से गमेनका परन्तु धातु न एटै ॥२४॥ (अ कंदर्पसुन्दररम)शुद्धपारा, हीरा, मोती चांदी, सोना व कृष्णानक ये पांच भग सयंकर को भरले सरकाथमें एकदिन घोटै।। २।। मूगेका चूर्ण ।
मध्याय १२१ २१३ .. भापाटीयासमेता। न्धास्वरसैविमर्चमृगशृङ्गके। क्षिप्त्वामदुपुटेपकत्वाभावये द्धातकीरसैः २६ काकोलीमधुकमांसीवलात्रयविशेगुद मद्राचापिप्पलिवन्दाकंवरीपर्णीचतुष्टयम् २७ परूषक कसेरुश्चमधुकंवानरी तथा । भावयित्वारसैरासांशोषयि त्वाविचूर्णयेत् २८ एलॉत्वपत्रकमांसीलवङ्गागुरुकेशर म् । मुस्तम्टगमदःकृष्णाजलंचन्द्रश्चमिश्रयेत् २९ एत वणैशाणमितैरसकन्दर्पसुन्दरम् । खादेच्छापमितरात्री सिताधात्रीविदारिका ३० एतासांकर्षचणेनसर्पिःकर्षण संयुतम् । तस्यानुदिपलक्षीरंपिवेत्सुस्थितमानसः । रम णीरमयेहीनिकापिनंगच्छति ३१ शुद्धरसेन्द्रभागे फद्विभागंशुद्धगन्धकम् । क्षिपेत्कज्जलिकांकुर्यात्तत्रती क्षणभवरजः । तिप्त्याकन्जलिकातुल्यंप्रहरीकविमर्दयेत् ३२ तंत्रकन्याद्रधर्मेनिदिनंपरिमर्दयेत्। ततःसञ्जायते तस्यसोप्णोधूमोद्गमोमहान् ३३ अथतत्पिण्डितंकृत्वाता व शुद्धगधक दोदो कर्प मिलाय असगंध के रस में एकदिन युटाय मृगसांग में भर कपडोटी करि थोड़ी पाचम परि फुकदे फिर धवफूलके रस वा फायर्मे भावनादे।। २६ ॥ फिर काकोलीविना श्रासन,मुलेठी,जटामासी,बरियारा, गुलशकरी कई मसीड,हिंगरट,मुनपानीपरका वादा, कटपरैया, घनमूग, मुद्गपी, मापपर्णी ।। २७ ॥ फालसा,कसेरू, मामा और किमाचीज इनसबा के रस में एक एक मार- नादे मुसाय सरलकरि धरिरासै ॥२८॥ इलायची,खज,पप्रज, न्टामांसी, लौंग, अमर केशर,मोथा,कस्तूरी,पीपरि,मुगन्धवाला और कपूर इनका पूर्णकरि ॥२०॥ शाणभरले और शणभर पूोक्त पन्दर्पसुन्दररस और सांड,भौचरा व विदारी- कंद ॥ ३० ॥ दन सपको मिलाय कर्षभर धी रातिको साय विपक्षीपुरुष पिय सो पुरुष बहुत स्त्रीसंग भोगकरैती वाहानि नहीं होताई ॥३१॥(क्षयीपर लोररसायन ) शुद्ध गरा एकभाग व शुद्धगंधक एक भाग इन दोनों को घोष्टि फजली करि तीन भाग शुद्ध पोलाटवा चूर्ण कजली संग पहरभर चोटि ॥ ३२॥ फिर पीपारके रसमें दिन ममेंडि घोट तबधाम भौरघोटनेकी गरमीले बहुत २२४' शाई धरसंहिता सपात्रेनिघायचं । मध्येधान्यकुशलस्यत्रिदिनंधारयेहु- धः, ३४ उद्धृत्यतस्मात्खल्वेतुक्षिप्त्वीघनिधायच। रसैः कुठारच्छिन्नायास्त्रिवेलंपरिभावयेत् ३५संशोण्यधर्मकाथै. श्वभावयेत्रिकटोस्त्रिधारावासामृताचित्रकाणारसैर्भाव्यक मात्रिधाः३६ लोहपात्रेततःक्षिप्त्वाभावयेत्रिफलाजले।। निर्गुण्डीदाडिमत्वग्भिर्विसंकुरण्टकैः ३७ पलाशकद लीद्रावैजिकस्यतेन चानीलिकालम्बुपाद्रावैर्वव्लफ लिकारसैः३भावयेत्नित्रिवेलेंच ततोनागवलारसेशं तावरीगोक्षुरकैः पातालगरुडीरसे। नित्रिवेलंयथालाभ भावयेदेमिरोषधैः३९तताप्रातर्लिहेदाज्यमधुभ्यांकोलंमा त्रकम् । पलमात्रंबलीका पिवेदस्यानुपानकम ४० मास त्रयाच्छीलितंस्याहलीपलितनाशनम् । मन्दाग्निश्वास कासाचपाण्डुत्ताकफमारुतौ ४१ पिप्पलीमधुसंयुक्तहत्या देतनसंशयः । वातालम्मूत्रकृच्छंचग्रहणींचोदरंतथा ४२ धुमा उठेगा ॥ ३३.|| जब कड़ाही गोला पांधि संडपत्र लपेट ताये के पात्र में रख मुख भूदि.याममें तीन दिन गाहरक्खै ॥ ३४ ॥ फिर निकारि वैद्य याममें घरि स- बुनाके रस में तीन भावनादे ॥ २५ ॥ जब मुखिजाय सब सोडि, मिर्च व पीपरि तीनोंके तीनकाय करि तीन भावना दे फिर रूसा, गुर्च न चीता इन्हें एक एक के रसों तीन तीन भावनादे॥३६॥ जलसे निकारि लोहपात्र में परि त्रिफलामें घोति मेवड़ी,अनारका दिलका, भसीड़, भंगरा, कसरैया॥३७॥ पलाश, केलारक्षरस न विजयसार के रसका साथ, नीलमुण्डीरस, चवरकी छाल ॥ ८॥ ये सव.इन के रस वा कायम तीन तीन भावनादे फिर वरियारा, शतावरि, गुग्गुरु व घरट इनके रस में तीन तीन भावना देना जो मिले ॥.३६ ॥ प्रभात समय पाठमाशे रस मृत शहद में खिलावै: तिसपर परियाराफाथ पलभर पिये. यह अनुपान है ॥ ४० ॥ तीन महीना सेवन कर श्वेत पार न होय और त्वचाकी झुरीपड़ना दूरहोय मन्दाग्नि, वात, खांसी, पादुकफ और वायुविकार इनके अर्थ ॥ ४ ॥ पीपरि, शहदयुक्त साय तो वातरस्त, मूत्रकृच्छा ग्रहणी, जलोदरं ।। १२ ।।
२१५ अध्याय १२] मापाटीकासमेता। अण्डवृद्धिजयेदेतच्छिन्नासत्त्वमधुप्लुतम् । वलवर्णकरंट प्यमायुष्यपरमस्मृतम्४३कूष्माण्डंतिलतैलंचमापानरा जिकांतथा।मद्यमम्लरसंचैवत्यजेल्लोहस्यसेवकः २४४॥ इति श्रीशार्ङ्गधरेमध्यखण्डेरसशोधनमारणं द्वादशोऽध्यायः १२॥ इति शाईधरस्यद्वितीयखण्डस्समाप्तः ॥ तथा अंडरदिन रहै गुर्चका सत और संदर्दयुक्त देवे तो वल सुन्दरता व श्रायुको चाता है॥४३॥ श्वेत फुम्हडा, तिल-तैल, उडद, राई, मध और खटाई इन पदार्थों को लोह सानेवाला त्याग दे ।। २४४ ॥ इति श्रीशाईपरेमध्यसरडेभापाटीकायाद्वादशोऽध्यायः॥ १२ ॥ इति भीगाईवास्यवार्तिकभापासमेतोद्वितीयखएडस्समाप्तिमगादितिशिचम् ।। ग .
श्रीगणेशाय नमः॥ शार्ङ्गधरसंहिता भोपाटीकासमेता (तृतीयखण्डः) प्रथमाध्यायः॥ स्नेहश्चतुर्विधः प्रोक्तोघततैलंबसातथा । मजाचत त्पिवेन्मर्त्यः किञ्चिदम्युदितरवौ १ स्थावरोजङ्गमश्चैव द्वियोनिः स्नेहउच्यते। तिलतैलंस्थावरपुजङ्गमेघतंवर म्।हाभ्यांत्रिभिश्चतुर्भिस्तैर्यमकस्विटतोमहान २ पिबे त्यहंचतुरहंपञ्चाहपडतथा।सप्तरात्रात्परस्नेहःसात्मी भवतिसेवितः ३ दोपकालाग्निवयसांबलंष्ट्वाप्रयोजये त्। हीनांचमध्यमांज्येष्ठांमात्रांस्नेहस्यबुद्धिमान् ? अमा (अधोत्तरखण्ड प्रारभ्यते)मयमस्नेहपानक्रिया-स्नेह चारिमांतिका कहिये धृत १ तेल २ वसा कहे "मांसमें मिली.ची" ३ हाड़के भीतरकी मन्ना ये चारों स्नेह वैद्य सूर्योदय होते मनुष्य को पिलावै ॥ १॥ वे स्नेह दोपकारफे हैं स्यावर और जंगम स्थावरकहिये अचर)जहां उपनै वहीं स्थिररहै ऐसे स्नेह भनेक प्रकार के हैं उनमें से तिलका तेल श्रेष्ठहै जंगमकहे(चर)जो श्वासासहित तिनसे उत्पति घृतादि अनेकनमें घृत श्रेष्ठहै (अथ स्नेहभेद)घी,तेल वैद्य तिसे यम कह धी तेल वसा मिला तो प्रिटनकहें घी,तेल,वसा, मज्जासंयुक्तहो तो महान् कहते हैं ॥२॥ (अथ स्नेहपानझम)वृत रोगीको तीनदिन पिलाचे तेल चारदिन सा पांच दिन मग्ना छहदिन घृतादि स्नेह सात दिनसे अधिक से अधिक पान करने से- पाहार होजाता है भौषध सदृश गुण नहीं करता हैं ।। २।(अपस्नेहमात्रा भकार) वातादि दोप, ऋतुकाल, जठराग्नि, अपस्था और निर्बल, सवल व .
भापाटीदासमेता।
प्रयाय १]
वयातथाकालेमिथ्याहारविहारतः स्नेिहःकरोतिशोफाशैं
तन्द्रनिद्रांघिसंज्ञिताम् ५ अकालेचातिमात्रंवाभसात्म्य
यच्चभोजनम् । विषमाशनयगुक्तंमिथ्याहारः सकथ्यते ६
त्यादीप्ताग्नयेमात्रास्नेहस्यपलसम्मिता । मध्यमार्यस्त्रि,
कपास्याज्जधन्याचद्विकर्षिका ७ अथवास्नेहमानाः स्यु
स्तिस्त्रोन्याः सर्वसम्मताः । अहोरात्रेणमहतीजीयंत्यहि
तुमध्यगा ८ जीर्यत्यल्पादिनाचसाविजेयासुखावहा।
अल्पास्याद्दीपनीलप्यारवल्पदोषेचपजिता९मध्यमास्ने.
हनीज्ञयावृहणीभ्रमहारिणी। ज्येष्ठीकठविषोन्मादग्रहाप.
रमारनाशिनी १ केवलेपैत्तिकसर्पिवातिकेलवणान्वित,
२१८ शाईधरसंहिता। [उत्तरसण्ड म् । पेयवहुकफेवाधिव्योपक्षारसमन्वितम् ११ रूक्षक्ष तविपातीनावातपित्तयिकारिणाम् । हीनमेधास्मृतीनांच संपिपानप्रशस्यते १२ कृमिकोष्ठानिलाविष्ठाः प्रधक फमेदसः । पिवेयुस्तैलगात्म्यायेतैलंदीप्तांग्नयस्तुये १३ व्यायामकर्शिताः शुष्करतोरक्तमहारुजः । महाग्नमारु तप्राणावसायोग्यानराः स्मृताः १४ क्रूराशयाःछेशसहा वातार्तादीप्तवह्नयः। मज्जानंचपिवेयुस्तेसर्पियंसर्वतो हितम् १५ शीतकालेदिवास्नेहमणकालेपिवेनिशि । वातपित्ताधिकेरात्रौवातश्लेष्माधिकेदिवा १६ नस्याभ्य जनगण्डूषमूर्द्धकर्णाक्षितपणे । तैलंघतंवायुञ्जीतटष्ट्वादो पबलाबलम् १७ घृतेकोष्णंजलंपे/तैलेयूषः प्रशस्यते । घृत, कफरोपमें सोट, मिर्च, पीपरि च जवाखार पीसि घृतमें युक्तकरि ज्यावै ।। ११।। (अपर रोगोंपरपूत ) कसाई, उरम्लत, विपात वात पित्त दोप,दीन- युद्धि और मुधि भूलना इनमें अवश्य पृत पिलाना श्रेष्ठ कहाई ॥१२॥ (तेल योग्य रोगी ) कृमिविकार, यायुरादि, शरीर कफ और,मेदवृदि इनमें तेल पिता जो सेल उसे स्वाभाविक अहित न हो तो अग्नि दीप्त करेंगा ।। ३ ।। (वसापान योग्य) जो मनुष्य दंड कसरत व मुश्तीमावि तथा परिश्रम फरि दुर्बल और पीड़ितहो धातुतीय शुष्करत शरीरपीड़ा भस्मक आसेपकाटि वापु पश्लिष्ट इनमें यसा पिलाना योग्य है ॥४॥(अस्थि मजा योग्य) दुष्ट पोको लेशिन को मायुपीड़ित को प्रवलाग्नि को मम्मा पिलाना योग्य है तथा यी, सर्व शरीर फो, हितदायक है ॥५॥(अध स्नेहपान समय ) शीत कालमें दिनको पिलाच उप्णकाल में रात को पात पिच पिकवाले को रातको पान हफ अधिकचालेको दिनमें पिलावै ॥१६॥(घृतादिक कर्म विशेपपर नामके कारण) मर्दन को कुल्लीको मस्तक में दावने का कान आखिमें डालने लग्नाधारमा माससातस्थिसारपोरिनि मारराव तापि ॥ माजीकामज्जयास पतिस्पिकाशादेसि ।। ५ शाम, अग्नि, पप ये मत्र इनके पाप, यात् और नोडा तया हस, उस थोर पप्पस य न काट नहात है 1 +- अध्याय ?] - I १० भापारीकोसमेता। वसामज्ज्ञोःपिवेन्मण्डमनुपानसुखावहम् १८ स्नेहद्विषः शिशून्रन्दान्सुकुमारान्कृशानपि। तृष्णातुरानुषणकाले सहभक्तनपाययेत् । १९ सर्पिष्मतीबहुतिलायवागः स्व ल्पतण्डुला । सुखोष्णासेव्यमानातु सद्यः स्नेहस्यकारि णी २० शर्कराचर्णसम्भृष्टदोहनस्थेघृततुगाम् । दुरध्वा चोरपिवेदुषणसद्यःस्नेहनमुच्यते २१ मिथ्याहाराहिहारा हायस्यस्नेहोनजीर्यति । विष्टभ्यवापिजीर्येतवारिणोष्ण नवामयेत् २२ स्नेहस्याजीर्णशङ्कायोपिवेदुष्णोदकंनरः। तेनोंद्वारोमवेच्छुद्दोंभक्तप्रतिरुचिस्तथा २३ स्नेहेनपैत्ति कस्याग्निर्यदातीक्षणतरीकृतःमतदास्योदीरयेत्तृष्णांवि षमातस्यपाययेत् । शीतंजलेवामयचपिपासातेनशाम्य को घृत वा तेल वातादि दोप सबल निर्बल विचारि यं युक्तकरे ॥ १७॥ (अथ स्नेहपानापान) घृत उग्णोदकके संगपिये तेल यूपसंयुक्त चरबी होड़ मज्जा मांड युक्त पियें तो सुखदहोयं यूप मांई विधि मध्यखण्ड में देखिकरना। १६ ॥ स्नेइद्वेषी कहे जिसे लेह न भाव विसे अन्न के रोग देना और बालक, 'चूदा, मुफुमार, दुर्वल य दणायुक्त ऐसे मनुष्यको भास के साथ गरमी में देना। १९॥र स्नेह यचा ) तिल मलेप्रकारे टि थोड़ाचावलको चहरी टारि थोड़ादान और जल देकर पतला पकायलें तब गुनगुना खाय तो तुरन्त धानु को उत्पन्न करताही शरीर को चिकना करती हा २० ॥ (अथ धी- रोष्णे दुग्धविधिः ) दोनों के भीतर मिश्री पीसि वृत मिलाय लिसकर तिस में दुग्ध दुहार्य तुरन्त गर्म गर्म दिये 'तो तुरन्त सातु उत्पन्न हो जाये ।। २१ ॥ स्नेह पिये पर परिश्रम करने वा कफहत पदार्थ खानेसे स्नेह न पाहो या मलारोधं किया हो तो उप्य'मलसें चमन पराबै तो अाका दोष मिटमा हैं ॥२२॥ जो स्नेह अनौण की शंका हो तो ताल यदि जब शुद्धडकार मारे व अन्नपर इच्छाकर तब जाने कि अंजीर्ण शान्त भयो । २३शार स्नेह जन्य पित्तकोप यन), वित्तमतिबाले को स्नेहमान से गरमी होती है प्यास विशेप'लंगती है उसे टएडागल पिला व्मने कराय तो न्यास की उपमा (गरमी) રરર शाघिरसंहिता उत्तरखएड. यामभारांश्चसेवेतीमयमुक्तये ५ः येषांनस्यविधातव्यव स्तिश्चापिहिदेहिनामाशोधनीयोश्चयकेचित्पूर्वस्वेद्या श्चतेमताः६पश्चात्स्येंद्यागते शल्येमूढगर्भगदेतथा । स्वे द्यापूर्वत्रयःप्लीहभगन्दर्यसितिथा ७ अश्मर्याश्चातुरों जन्तुःशमयेच्छस्त्रकर्मणा। सर्वान्स्वेदान्निवातेचजीणीहारे चकारयेत् ८ स्वेदादातुस्थितांदोपाः स्नेहछिन्नस्यदेहि नः। द्रंवत्वंप्राप्यकोष्टान्तर्गतावान्तिविरेकताम्९ स्वियं मानशरीरस्यहृदयंशीतले स्टशेत् । स्नेहाभ्यक्तशरीरस्य शीतराच्छाद्यचक्षुपी १० अजीर्णीदुर्बलोमेहीपतक्षीणः पिंपासितः । अतीसारीरक्तपित्तीपाण्डुरोगीतथोदरी ११ फराय बोझ उठवाय ऐसी युक्तियों से कफ मेइयुक्त वायुरोग दूर होता है ॥ ५ ॥ थौर नासयोग्य चस्तियोग्य रेचनयोग्यको प्रथम स्वेदं निकलाय. उमाय करें ।। शी: निस वीके पेटके भीतर गर्भका शालहो या मुदगर्भहो इन दोका गर्भ जब बाहर होनाय तब स्वेदकर जिस मनुष्यकी प्लीह.मगंदर अर्श ॥ ७॥ और श्रश्मरी इन चारों रोगानों को प्रथम स्वेदन करि शख्ने उपाय करना उचित है स्पेदकर्म करने फा समय स्थान आहारपंचने के अनन्तर जिप्स स्थान में परनका मयेश न होस सहां बैठायके स्वेदककरै ।। "स्वेद किये पुरुपको चंड़े पात्र में तेलभरि ठाने तो वातादिक दोष और रसादि सप्तधातु के विकार मलको पतला करिके उसके साय निकलनाते है यह अन्य ग्रंथका मतई और शाघर, मत (राय से स्वेदी मनुष्य के पसीना निकलतेही रसादि सप्तधातु स्थित यातादि विकार मलको प सलाकार निलभाते हैं ।।( स्वेदीकै चित्तः स्वस्थकरनेका यन) "निसका स्वेदकरि पसीना निकालनेसे पल पतलाहो चित्त सावधान हो तो थाती : पर पंदन लगाने से सावधानहोगा जिसका शरीर नेल में मिजोया गया है और अल पतला गिरलाई उसकी यांसापर कदली गा फेवड़ाके गल में वस्त्र भिगोय, ..परने से चित्त स्वस्याहोंगा ॥२०॥ स्वेद योग्य श्रीणी दुबल. मगेस उम् चनपीड़ित प्यासानुर प्रतीसारंयुक्त रक्तपिच रोगी पांडशरीरी उदररोगी ॥११॥ मानिकी पर मालमे के प्रयोगमो नमक Pा विकारी लगाने के क्रमको पस्ति कहते हैं। :- .
२२३ अध्याय २] भापाटीकासमंता। मदातॊगर्भिणीचेवनहिस्वेद्याविजानता। एतानपिमृदुस्थे दैःस्वेदसाध्यानुपाचरेत् १२ मृदुरवेदप्रयुञ्जीततथाहन्मु कष्टिपु । अतिस्वेदात्सन्धिपीडादाहनष्पाकमोनमः १३ पित्तासुक्पिटकाकोपस्तत्रशीतैरुपाचरेत् । तेषता पाभिधःस्वेदोवालुकावस्त्रपाणिभिः १४ कपालकन्दुका गारेर्यथायोग्यंत्रयुज्यते । ऊष्मस्वेदःप्रयोक्तव्योलोहपि ण्डेष्टिकादिभिः १५ प्रतप्तैरम्लसिक्तेश्चकायेवस्वावष्टि ते । अथवातविनाशाहद्रव्यक्काथरसादिभिः १६ उणे घंटपरयित्वापाछिद्रं विधायन । विमृद्यास्यंत्रिखण्टांच धातुजांकाष्ठवंशजाम् १७ पलास्याङ्गोपच्छान्नाडीय उज्याद्विहस्तिकामासुखोपविष्टस्वभ्यतंगुरुप्रावरणात म१८हस्तिशुण्डिकयानाड्यास्धेदयेद्वातरोगिणमापुरुषा मदाती गर्भिणी ऐसे रोगी को स्वेदन न करें जो अाश्य यरनाहो तो मूक्ष्म पैदले ॥ १२॥ ( अल्पस्वेदनदिधि ) हृदय अंडरद्धि नपरोग इनरोगों में थोड़ा स्वेदले प्रतिवेदोपद्रव सपिपीडा, दाइ, तपणा, 'लानि, भ्रम ।। १३ ॥ रक पित्तसे फुसी इनके शमन करने के लिये शीतोपचारकरै शान्तिदोष (अथ. सापस्वेद ) ताप, वाल, कपड़ा ॥ १४}} हाथ कपडे की गंद बनायक और अंगार ये छ भॉतिके तापस्वेद कहे जैसा जहा योग्यहो साकरे ( अथा. मयिधिः) पत्यरादि नारि सेंकने को जमकरे लोहेका गोला वाईट वा . पत्थर तपाय ॥ १५ ॥ उसपर सट्टा पदार्थ थोड़ा छिडक मुखोष्ण ये लेके कंवल उदाय स्वेदनकर दूसरा वातहारी कहे दशमूलादि काय वा रस ॥ १६ ॥ उमाकरि बड़े में भरि मुख मंदि यगल छेटि पातु की या बांस की टो, हाथ लम्बी नल बना गोपूंछ की मूरति तिसके सरद तीनकर एक छ। अंगुल पाकीके दो समान पाती गोरसे उस छः अंगुलके टुकड़े का मोटा, मुस यदे के छेद में प्रवेशकर उस में मध्यसएड ऊंचा करिनार ।। १७११८॥ फिर तीसरामण्ड सोपालगाय मनशुण्डि सा करि तीनों सन्धि मंदि तब रोगी को प्री व तालगाय व लेप करि कम्पल उदाग सब ओर से ढक निसिन्धि शाईघरसंहिता। उत्तरखण्ड याममात्रीवाभूमिमुत्कीर्यखादिरैः : १९ का?र्दधातथाभ्यु यसीरधान्याम्लवारिभिः।वातघ्नपत्रराच्छायशयानंस्वे दोन्नरम्..२०' एवंमाषादिभिःस्विन्नैःशयानःस्वेदमाचरें वा अथोपनाहस्वेदंचकुर्याहातहरौषधीः २१ प्रदिह्यदेहं बातार्तवीरमांसरसान्वितैः अम्लपिष्टैःसलवणैःसुखोप्णैः स्नेहसंयुतैः२२ततोग्राम्यानूपमांसैर्जीवनीयगणेनंच । द विसौवीरकनारंपरितादिनीतथा २३ कुलित्थमापगोधू मैरतसीतिलसर्षपैः । शतपुष्पादेवदारुशेफालीस्थूलजी रकैः २४ एरण्डमूलबीजैश्चरास्नामूलकशिग्रुभिः। मिशि' कृष्णाकुठेरैश्चलवणैरम्लसंयुतैः २५ प्रसारण्यश्वगन्धा करि म उस गजशुण्डि रा मुस कम्पलके भीतर सोलि स्पेदनकर तो पसीना निकस (तृतीय),रोगा के शरीर से बीताभर अधिक लम्बा चौदा गदाखो.. दि द्वादशागुल गहिग सरकी लकड़ी भरि ॥ २६॥ कि सारझारि गढ़े में दूध व कांजी चा मट्ठा हिड़क वायुहारी रण्डपत्र विधाय रोगी को मुलाय' भारी धन- उड़ावै तौ पसीना निकलै ॥ २०॥ (चौथा) पूर्वप्रकार गदा । तपाय उर्द साटि पानीले धिड़क रण्ड बड़पातादिसे शग्यारंचि पूर्ववत् स्वेदनकर । २१॥ (अथ अन्यान्तरे) यातहारी द्रव्य घड़े में धरि जलभरि मुंह पन्दकारि चारपड़ी याच दे उतारिलेय रोगीको उप्णतेल मल सरहरीखायपर मुलाय कपड़ा उदाया नीचे पड़ाधार नितम्ब की भोर घटमुखोर वाफदे पसीना पादिपॉछि ले इस-उए संज्ञा सदसे रसादिक सातौ धातु के वातादिके टोप पसीने साय सब निकल जाते हैं ॥ २२ ॥ (अधोपनाहमिया) दशमूलादि वाततारी दव्यों का चूर्णकर उसमें ध र हरिणादिकों का मांस मिलाय कुछ गर्म कर पायुपीड़ित जो अंगहो उसमें गादा लेपकर पख मोदाय पसीना निकाले इस निया को उपनाह कहते हैं (अधोपनाह महाशाल्वण किया अर्थात् पोर्टलिकासितविधि ) प्रापीमांस, जलचरमांस जीवनीयगण प्य, गो. दधि, सज्जी, जयासार, सारालोन, वीरतादि गण वा गुखुरुपून ॥ २३ ॥, कुलथी, पडद, गेह, अलसी, तिल, सरसों, सौंफ, देवदारु, निरगुण्डी, मग-- रैला ॥ २४ ॥ रेंडी, रासन, मन,सदिगना, सोवाचीज, पीपरि, नाजपोई पांचो . . -- २२५ अध्याय २] भापाटीकासमेता। भ्यांवलाभिर्दुशमूलकैः ।गुडूचीवानरीबीजैर्यथालाभंसमा हतैः२६स्विन्नैश्चवस्त्रसम्बद्वैःसदासंस्वेदयेन्नरमामहाशा ल्वणसंज्ञोयंयोगः सर्वानिलातिहत् २७ द्रवस्वेदस्तुवात घ्नद्रव्यक्वाथेनपूरिते । कटाहेकोष्ठकेवापिसूपविष्टोवगाहये त् २८ सौवणेराजतेवापितायआयसदारुजे । कोष्ठक तत्रकुर्वीतोच्छायेषट्त्रिंशद्गुलम् २९ आयामेनतदेव स्याञ्चतुष्टङ्कमृणितथा । नामे षडगुलंयावन्मग्नःक्वाथस्य धारया ३० कोष्ठकेस्कन्धयोःसिक्तस्तिष्ठेस्निग्धतनुर्नरः। एवंतैलेनदुग्धेनसर्पिषास्वेदयेन्नरम् । एकान्तरेयन्तरेवा स्नेहोयुक्तोवगाहने ३१ शरीरेबलमाधत्तेयुक्तस्नेहोवगाह ने।शिरामुखेरोमकूपैर्धमनीभिश्चतर्पयेत् ३२ जलसिक्त स्यवर्धन्तेगथामूलेकुरास्तरोः। तथाधातुर्विदिस्तुस्नेह सिक्तस्यजायते ३३ नातःपरतरःकश्चिदुपायोवातनाश लोन ॥ २५ ॥ अनार, कटनरैया, असगन्ध, परियारा, दशमूल. मुई और किमाचविया इनमें जितने मिलें ॥२६।। उन्हें जल में पीसि तपाय पोरनी गौरे सकै ठण्ढी परे गरम तपेपर तपाय तपाय सेंके इस शालण-मयोग से सच पीड़ा दूर होती हे ॥ २७ ।। (अथ द्रवस्वेदविधि ) दाइलादे पान द्रव्यों का हाथ बनाय रोगी कदाउ या चौकोन कोदर ॥ २८ ॥ सोने, चांदी, तांवा, लोहा वा काठ छत्तीस अंगुल ऊंचा बनाय वैठाप ।।२९॥ वद्द कानाने रोगी के उपर पतली धार से नाचे नाभिके छः अंगुल ऊंचे बावै कक हाय को इटावै इसीप्रकार एक वा दो दिन टार टार करें इसी भांति तेल, दूध, हत और द्रास्वेदन भी करै फिर पपन को वचावै ऐसे दो तीनदिन वृक्ष का तेल लगाय करै सव नसें और रोमों का मुस खुलि जाता है जो पदन प्रवेश बन्ने पावे तो उनके मुख से स्नेहादि पदार्थ प्रवेश के वायु को निशान शरीर को तृप्त और बलवान करते हैं ।। ३०1१1१२॥ दृष्टान्त जैसे जहमें जल सींचने से वृक्ष बड़कर पुष्टहोजाता है तैसेई द्रवनंजक सेट ने मनुष्य का रोग नाशहोता व उमर बढ़ती है तैसेही रसादि महराचा वाटोप बढ़ने से New २२६ माघरसंहिता। [ उत्तरसण्ड नःशीतशलाद्युपरमेस्तम्भगौरववियहादीप्तेग्नौमार्दवेजा तेस्वेदनोद्विरतिर्मता ३४ सम्यस्विन्नं विमृदितस्नान, प्रणाम्बुभिश्शनैः। भोजयेचानभिष्यन्दिव्यायामंचनंकार येत् ३५ इति श्रीशाईघरेस्वेदविधिद्धितीयोऽध्यायः २॥ शरत्कालेबसन्तेचप्राउट्कालेचदेहिनाम् । चमनंरेच नंचैवकारयेत्कुशलोभिषक् १ क्लवन्तंकफव्याप्तहल्लासा तिनिपीडितम् । तथावमनसात्म्यवधीरचित्तंचवामयेत् २' विषदोपेस्तन्यरोगेमन्देग्नोश्लीपर्बुदे । हृद्रोगकुष्ठ वीसपमेहाजीर्णभ्रमेपुचे ३ विदारिकापचीकासश्वासपी नसवृद्धिषु । अपस्मारेज्वरोन्मादेतथारतातिसारके ४ नासाताल्चोष्ठपाकेषुकर्णस्रावेद्विजितके । गलशुण्ड्याम तीसारेपित्तश्लेप्मगदतथा ५ मेदोगदेरुचौचैववमनंका रयेन्निषक् । नवामनीयस्तिमिरीनगुल्मीनोदरीकृशः ।ना पेट वा मलमाग में भरभराहटहो तो तेलस्वेदकरै ।। ३३ । इमसेपरे वातनाशक और यन्न नहीं जवाई स्पेदकर कि वायुशूल देह जकड़ना भारीपन दूरदीय न- ग्निदीस देह कोमल हलकी हो तब न करै ॥ ३४ ॥ स्वेटकरे पर तेल लगाय मुखोष्ण जलसे न्हाय कफफारी भोजन करै ।। ३५ ।। इति श्रीशाईपरेडचरमरटेदिनीयोऽध्यायः॥२॥ शरद्, वसन्त और गारदकाल के आदि चनुरष वमन (छर्दि ) व विरे- चन (दस्त) को करारै क्योंकि अश्विनीकुमार संहितादि सर ग्रन्धकार ऐसेही कदवे पाये है इसमें मनुष्य की प्रवृत्ति शुद्ध रहती है ॥ २ ॥ (चमन योग्य) जिसे यमन करने की सामर्थ्यहो कफ व्याहो एससे लार यत्ती हो जिसे यमन हिराहो धीरचिचहो उसे चमन करावै ॥२॥ विपरोग, स्तन्यरोग, मंदाग्नि, फील- पाव,यर्बुद रोग कुष्ठ विसर्प, प्रमेह, अजीर्ण, भ्रम विदारी, माची, कास, श्वास, पीनस, पराइद्धि, अपस्मार, घर, उन्माद, रक्तातीसार |॥ ४ ॥ नासा, मोठ, नापाका, कर्णसाव,द्विनिक, गलगाडभितीसार, पिरा,रलेम ॥५॥ मेद- शीरमगि इन रोगों वैध वमन रा ( चमन अयोग्य ) तिमिरी, गुल्मरोगी, .
अध्याय ३] भापाटीकासमेता।
२२७
तिरदोगर्भिणीचनस्थूलोनक्षतातुरः ६ मदातौबालको
रूक्षाक्षुधितश्चनिरहितः । उदावरक्तीचदुश्छर्दिः
केवलानिली ७ पाण्डुरोगीकृमिव्यातः पठनात्स्वरघात
कः । एतेप्यजीव्यथितावास्यायेविषपीडिताः ८ कफ
व्याप्ताश्चतेवाम्यामधुक्काथरयपानतः । सुकुमारंकृशंवा
लंदभीनवासयेत् ९ पीत्वायचागमाकण्ठंक्षीरतकद
धीनिच । असात्म्यैःश्लेष्मलै ज्यैषानुत्छिश्यदेहिनः
१० स्निग्धस्विन्नायवमनंदत्तंसम्यक्प्रवर्तते । चमनेषु
चसर्वेषुसैन्धबंमधुनाहितम् ११ वीभत्सवमनंदेयविपरी
तंविरेचनम् । काथ्यद्रव्यस्यकुडवं श्रपयित्वाजलाढके
१२ अभागावशिष्टंचवमनेष्वेवचारयेत् । काथपाने
नवप्रस्था ज्येष्टामात्राप्रकीर्तिता १३ मध्यमाषणिम
उदररोगी, कृश (दुर्पल.), अतिबूदा, गर्भिणी, मोटा, घावसे व्याकुल ॥ ६ ॥
मदपीडित, बालक, रूपादेही, भूखा, निरुण वस्ति श्या, उदारी, अर्ध्वरक्ती,
धर्टिरोगी, केवल पातातीं ॥७॥ पाहुरोगी, कमी और दापय श्रमसे स्वर-
भी ऐसे रोगियों को वमन करा और प्रगीर्णयुक्त र विपीडित ॥८॥
तथा कफव्याप्त इन मनुष्यों को मुलेगी व मामाकी छालका हाथ पिलाय वमन
कराव और सुकमार, दुाला, पालम, बूढ़ा और भयभीत इनको कभी वमन न
करा ॥ ६॥ (वमन के पूर्व उपनार ) मिले यमन करानाहो उसे पहिले
पेटमर यवाग, दूध, मट्टा, दही, मनभावन पदार्थ और कफकारी पदार्य इनके साने
से दोप पर उभरयाते है ।। १० । तर मनको औषा देय तौ वगन अगले
प्रकार होता है और स्नेह पानकियको अच्छेप्रकार होता रमन योग्य पदार्थ सर
चमन प्रयोग में धन का सहद युक्त और हितकारक होती है ।। १५.॥ जो
तूतिया गा तांपा घृत युक्त देते हैं वह बीभत्स यमनहै जिसे वीभत्स वमन दिये
पर रेवनदेना हो तो धृत न सानेदेय वमन यौषध यदि हायका प्रमाण कायकी
द्रव्य कुइय भार दूटिकै ग्राहकार जलमें औदाय ॥ १२॥ माया स्तनाय नप
उतारिलेय फिर चमन करनेवाले मनुष्य को पिलाये (चमन लाथ पारने
का प्रमाण ) वमन प्रियाका काय नामस्थ पिलावै सो व्योमाताई ॥१॥
शायरसंहिता 1 [उत्तरखरह ताप्रोक्तात्रिप्रस्थाचकनीयसी । कल्कचूर्णावलेहानांत्रि पलंश्रेष्ठमात्रया १४ मध्यमांद्विपाविद्यात्कनिष्ठांपलस म्मितामावमनेचापिवेगास्स्युरष्टौपित्तान्तमुत्तमाः१५पड् वेगामध्यमावेगाश्चत्वाररत्वचरामताः । वमनेचविरकेच तथाशोणितमोक्षणे १६ साईनयंदशपलंप्रस्थमाहर्मनी षिणः। कफंकटुकतीक्ष्णोष्णैःपित्तस्वादुहिमैर्जयेत्।सस्वा दुलवणाम्लोपोस्संसृष्टंवायुनाकफम्१७ कृष्णाराठफलैः सिन्धुकफेकोप्याजलैःपिवेत्। पटोलवासानिम्बैश्चपित्तेशी तजलंपिवेत् १८ सश्लेष्मवातपीडायांसक्षीरंमदनंपिवे त्। अजीर्णेकोष्णपानीयंसिन्धुपीत्वावमेत्सुधीः १६ वर्म . दम्भस्य पिलावे सो मध्यममात्रा है तीन मस्य पिलावै सोछोटी माना वमन कार्य में क्ल्कादिक औपत्र का प्रमाण वमन में कल्क चूर्ण अवलेह तीन तीन पल देना सो रडी मात्राहै ॥ १४॥ दो दो पलकी मध्यममाना है एक एक पलली लयुमाता जानना चमन कार्य उत्तम, मध्यम व कनिष्ठ तीन भांतिका होताई (वेगका प्रमाण) जिस मनुष्य को वमन की औपय व्य उसके सात बारताई सव टोप गिर पाठवींचार पित्तगिर तो उत्तम वेगहै ॥ १५ ॥ पांचवार में, सब दोपगिरि छठीवार वित्त गिर वह मध्यमवेगहे तीनपार में सब दोपगिरि चौथी बार पित्त गिरे यह कनिष्ठ वेगहै वमनादिक में मस्थममाण वमन और रेचन तथा सिरारक्त- मोवण अर्थात् फस्तुलेने में ।।.१६ ।। प्रस्थ मादेनेरह पलाकर चालला दोपविशेष में यमनोपचार द्रव्य कदु तीक्ष्ण उस पदार्थ से यमनकराने से कफाती का कफ नाश होताहै मधुर व शीतल पदार्थकरि यमनकराने से पित्त नारा होता मधुर चार खाई उप्ण पदार्थ से कफयुक्त वात नाश होता सोंठ, मिर्च व पीपरि ये तीक्ष्ण सुनका अनारादि मधुर हैं ।।१७।। (कफमें वमनविधि) कफप्रकृति को पीपरि, मैनफल व सैंधव चूर्ण करि उपगल में पिलाने से पारवार कफ गिरेगा पिचमति को पसरनीमात्र पूर्ण करि ठरहे पानी में मिलाने से चार वार पिच गिरेगा ॥१८॥ और कफ, वातपीड़ित को मैनफल' में पिलाने से कफ चात दूर होता और सपा उपजल में पिलाने से अजीर्ण मिटना है ।।१६।।
अध्याय ३] भापाटीकासमेता। नपायित्वाचजानुमात्रासनेस्थितम्। कण्ठमेरण्डनालेन स्टशन्तंचामयेद्धिपक २० ललाटवमतःपुंसःपार्वेद्वौचन योधयेत् । प्रसेकोहग्रहःकोटाकण्डदुश्चर्दिताद्भवेत् २१ अतिधान्तेभवेत्तृष्णाहिकोद्वारौविसंज्ञता। जिह्वानिःसर्प णंचाक्ष्णोप्रतिहतुसंहतिः २२ रक्तच्छर्दिष्ठीवनंचक ण्ठेपीडाचजायते।वमनस्यातियोगेतुमदुकुर्याद्विरेचनम्। वदनान्तःप्रविष्टायांजिह्वायांकवलग्रहः २३ स्निग्धाम्ल लवणैर्हद्यैर्घतक्षीररसैहितः । फलान्यम्लानिखादेयुस्त स्यचान्येअंतोनराः २४ निःसृतांतुतिलद्राक्षाकल्कलि प्त्वाप्रवेशयेत् । व्यारत्तेचिणघृताभ्यक्तेपीडयेच्चशनैःश नैः २५ हनुमोक्षस्मृतःस्वेदोनस्यंचश्लेष्मवातहत् । वमन करने की रीति वमन श्रोपध पीके दोनों घुटने तोरिक बैठे 'पौर ,रंड पन की डण्डी शुद्धकरि गरे में प्रोश करें तो वमन होगा और चमन करनेवाले का मस्तक और दोनों पोरकी पसुरी सहराताजाय इसी रीतिसे वैद्यलोग वमन कराते हैं ॥ २०॥ (चमन कोपलक्षण ) जो वमन अच्छी तरह न होय तो रोगी के मुख से लार है हृदय में पीड़ारहै वोठे में खुजली ये उपद्रव होते हैं ।। २१॥ (अति वमन उपद्रव ) तृप्या अधिक, हिचकी, डकार, अज्ञानता, जीभ निगलना, नेर चलता, संभ्रमचित्त, ठोड़ी जकड़ना ॥ २२॥ मुस से रुधिर गिरना, वारसर थूकना और कण्डपीड़ा ये अतिश्मन के लक्षण है ।। (अतिवान्त चिकित्सा) जो यमन अधिकही तो उसे मृदुरेचनकर ॥२३॥ (वमन में जिला ऐंठनेपर चिकित्सा) अति उचाई,अति भीम ऐंठजातीहै उसे जो पदार्थ अच्छा लगताहो चिकना वा सहा वा सलोना सो धीयुक्त को रखवाय उसके मुसमें रसदेना वा द्ध, दही व घृत इनमें से कोई में सानि मुसमें राख और उसके सम्मुख अन्य मनुप्प को सट्टे फलादि सिला तो उसे देसने से चामनी की जीममें पानी ट्टै तौ जीम कोमल होजाती है और प्रकृति स्वस्य होती है ॥ २४ ॥ (अतिधान्त से जीभ बाहर निकल आये उसका यन) जो जाते उपकात जीम निफल श्राय तो दिल व वासपीसि जीभपर लेकर पैशयडेय और जो थावे चंचल भई तो आंसार पी लगायधीरे धीरे - शाईवर संहिता । -- [उचरखएड रक्तपित्तविधानेनरलच्छर्दिमुपाचरेत् २६ धात्रीरसाजनो शीरलाजाचन्दनवारिभिः।मन्थंकृत्वापाययेच्चसघृतक्षौद्र शर्करम् । शाम्यन्त्यनेनकृष्णाचा:पीडार्दिसमुद्भवाः २७हत्कण्ठशिरसांशुदिदीप्ताग्निचैवलाघवम् । कफपित्त विनाशश्चसम्यग्वान्तस्यचेष्टितम् २८ ततोपराह्नदीप्ता ग्निमुद्गपष्टिकशालिभिः । हृद्यैश्चजाङ्गलरसै कृत्वायूपंच भोजयेत्२९तन्द्रानिद्रास्यदौर्गन्ध्यंकण्डूञ्चग्रहणीविषम्। सुवान्तस्यनपीडायैभवन्त्येतेकदाचन ३० अजीर्णशीत पानीयव्यायाममैथुनंतथा । स्नेहाभ्याप्रकोपंचदिनैकंव जयेत्सुधीः३१॥ इति श्रीशार्द्धधरेतृतीयोऽध्यायः॥३॥ स्निग्धस्विन्नास्यवान्तस्यदद्यात्सम्बग्विरेचनम् । श्री सहराय देय।।३॥(पमन में रनुस्तम्म उपचार ) जो वमन के अन्त में ठोड़ी जकड़ जाय तो सेंकने व कफवातहारी द्रव्यों के सूमो से सुजलाती है (वमन के अन्तमें रकगिरने का यन) जो चमाात में रविर पानेलगे तो म यसएडमें कहा रक्तपिचोपचार करै ॥२६॥(अति यमन से प्यास पढ़ने का पन ) जो कृपणा व आपले वा रस, रसौत,ससपानी खील व लालचन्दन ये पाचौ पल भर चारपल पानीमें मथिके घी, शहद संयुक्त मिश्री डालिक पिला तो शाति होय ( रसांजन को रसोत मनाने की विधि) दारुहन्दीका काय दरि तिसके समान करी का दूध मिलाय मौटि गादा परि सुगाय ले उसे रसागन कहते हैं ।। २७॥ (यमन (त्तमरोने का लक्षण) जो वमन अच्छा हो तो हदय कएट व मस्तक के यपादिका दोप न र अग्नि दीपोभंग हलका हो कफपित्तजनित विकार नाश होय ॥ २८ ॥ (वमनपर पथ्य) मंग या साटी के चारतका यूपदेना चा हिरन या मास अभावै ससी मासका यूप दे 110६ }| सम्यश् यमन भरे तंद्रा,निद्रा, मुसमें दुर्गध, साज संग्र- हणी व विपदीप ये रोग नहीं रहते 7 होते है ।।..(यमन पर सयम) भारी व गरिष्ठ पदार्थ,नदा जल, परिश्रत, मैथुन, तेलमर्दन व मोघ जिसटिन वमन कर तो इनसे बचारहै ॥३१॥ इति शीशाई घरेउत्तरलरदेतीयोऽध्याय ॥३॥ (पमनान्तमें विरेचन) मयम मनुप्य स्नेद पानादिक कर्मकरि स्नेह कर्म कर " अध्याय ४] भाषाटीकासमेता। वान्तरयत्वधःसस्तोग्रहणीछादयेत्कफः १ मन्दाग्निगौर चंकु-ज्जनयेहाप्रवाहिकाम् । अथवापाचनरामवलासं चविपाचयेत् २ स्निग्धस्यस्नेहनैःकार्यस्वेदै.स्विनस्यरे चनम् । शरहतौवसन्तेचदेहशुद्धौविरेचयेत्। अन्यदात्य यिकेकालेशोधनंशीलयेवुधः३पित्तेविरेचनंदद्यादामो जूतेगदेतथा।शरीरजानांदोपाणांक्रमेणपरमौषधमावस्ति विरकोचमनंतधातैलघृतमधु ४ दोपाःकदाचित्कुप्यन्ति जितालङ्घनपाचनैः। यतुसंशोधनैःशुद्धानतेषांपुनरुद्रयः ५ बालन्दावतिस्निग्धःक्षतक्षीणोभयान्वितः । श्रान्त रतपातःस्थूलश्चगर्भिणीचनवज्वरी ६ नवप्रसूतानारी फिर वमन करै तय रेचनकर सो रेचन उत्तम प्रकार है और प्रथम कर्महीन रेचन करे,कफ नीचेजाय ग्रहणी कहे पित्तरा अग्निधरा बाइलेताहै ॥ १॥ इसकारण से अग्निमंद, देहभारी, देह जकडना, प्रवाहिका कहे दारण प्रतीसार ये रोग उत्पन्न होते है जो कर्महीन रेचन शीघ्रदियाचादै तौ नीचे गिरनेवाला कफ और आव तिसे सूने रंडकीजड़ आदि सेवन कराय पचाय रेचनकर और भेड, चरक, मुथुत व वाग्भट इनका मत यहहै कि प्रथम उमन कराय छ दिन वित्ताय दीन दिन स्नेहपान कराय पिर तीन स्वेद साधित तीन वाद सोरहे दिनमें लडमन दे रेचनकरा ॥२॥ (रेचनका दूसरा प्रकार ) जो घृत धरि मिर मनुष्य वा मट्टीके गोला व ईट करि स्वेदित मनुष्य तिसे रेचन र कन्नता सार, कातिक, चैत घ वैशारसमें रेचन कर्म किये देह शुद्ध शेतातील वैद्य रोगीका रोग विचार तिनके निवारणार्थ मनुचकाली हिरेन । ३॥ विशेष रेचन योग्य पित्त विकार, आमवायु, उदररोग,सामान, वायुकोल- पद्ध इनरोगों को निशेप शुदवारि फराय परमौपय उपमे जानना बनियम, रेचनकर्म, यमनकर्म, तेल, घृत, शहद यथारोग यतारै ॥४॥ (दोप नि- वारण में उत्कर्ष रेचन) वातादि दोप लग्न पाचनपरेरनने है परन्तु थोडे कुपथ किये ते उभर आते हैं और जो रेपनकरि वातादि दोनों से शुद्ध फिये शरीर वेग नहीं उभरते ॥ ५ ॥ (रेचन के अपोर) वाचक, वृद्ध, प्रतिस्नेह पानपर उर जत, क्षीणमाप्य, भययुक्त, अपित, पित, स्थून शरीर, साधरसंहिता! [उत्तरखण्ड चमन्दाग्निश्चमदात्ययी। शाल्यादितश्चरूक्षश्चनविरे च्याविजानता ७ जीर्णज्वरीगरव्याप्तोचातरक्तीभगन्द री । अर्शःपाण्डूदरोग्रन्थीहद्रोगारुचिपीडिताः - योनि रोगःप्रमेहातगुल्मप्नीहव्रणार्दिताः। विद्रधिच्छर्दिविस्फो टविसूचीकृष्ठसंयुता ९ कर्णनासाशिरोवक्तगदमेढ़ामया न्विताः । प्लीहशोफाक्षिरोगार्ताःकृमिक्षारानिलार्दिताः। शलिनोमत्रघाता विरेकानिरामताः१०वहुपित्तोमदुः प्रोक्तोबहुश्लेष्माचमध्यमः। बहुवातःक्रूरकोष्ठोदुर्विरेच्यः सकथ्यते ११ मृद्वीमात्रामृदौकोष्ठेमध्यकोष्ठेचमध्यमा । रेतीक्ष्णामताद्रव्यैर्मृदुमध्यमतीक्ष्णकैः १२ मृदुर्द्राक्षाप यश्चञ्चुतैलैरपिविरिच्यते।मध्यमस्त्रितातिताराज चिरिच्यते।कूरःस्नुक्पयसाहेमक्षीरीदन्तीफलादिभिः १३ गर्भिणी, नमज्वरी ॥ ६ ॥ तुरन्त पुनजनिता सी, मन्दाग्नि, अतिमदपीडित, शल्यवेथित, क्षतयुक्त और रूस कहे निस्तेज मनुष्य इनको रेचन नहीं देना। ७॥ (रेचनयोग्य ) जोर्णधरी, विपपीड़ित, वातरक्त व भगंदर रोगी, भ. शेरोगी, पादुरोगी, उदरोगी, ग्रन्थिरोगी, हृदयरोगी, थरुचिसे पीड़ित ॥८॥ योनिरोग, ममेह, गुल्म, प्लीहा, मणी, विपि, छर्दि, विस्फोटक, विसूची, अप्ठ॥ कानरोग, नाकरोग, मस्तकरोग, मुखरोग, गुदारोग, गरमी, यह, सूजन, नेत्ररोग, ऋमिरोग, सौम्लादि रोग मूल और मूत्राघात इन रोगन करि पीड़ित मनुष्य को रेचन देव ।। १०॥ (रेचन तीन प्रकार ) कोमल मध्यम व कराल कोप्ठवेधक जिस मनुष्य की कोमल प्रकृति हो उसका कोठा मृदुई जिसकी केरल मातिहै, उसका कोठा मध्यम है जिसकी केवल वाव मति हो उसका कटोर कोठा है सो कड़े कोठेवाला रेचन विपम में दुःवपाताई उसे रेचन करने से मलदाय शीघ्र नहीं होताहै ॥५॥ कोमल कोठा समुझि मृदुरेचन करा मध्यम कोडावाले को मध्यम मात्र विरेचन करा मृदु मध्यमादिककोप्टी को मृदु मध्यमादि भोपधदे कोमलकोप्ठी को दास, दूध व रंडी का तेलयुक्त करि रेचन दे मध्यमझोठी को निशोथ, कुटकी व अमलतास इनका रेचन दे कर- कोष्ठी को सेंडुड़ का दूध वा जमालगोटा इनका रेचन दे ।। १२ । १३ ॥
अध्याय ४] भागाटीकासमेता। मात्रोत्तमाविरेकस्यत्रिंशद्वेगैःकफान्तिका । गैर्विशति भिर्मध्या हीनोक्कादशवेगिका १४ विफलश्रेष्ठमाख्या ते मध्यमंचपलंभवेत् । पलाईचकषायाणां कनीयस्तु विरेचनम् १५ कल्कमोदकचर्णानां कर्षमध्वाज्यलेह तः । कर्षद्वयंपलंचापि वयोरोगाद्यपेक्षया १६ पित्तो त्तरेत्रिचूर्ण द्राक्षाकाथादिभिःपिवेत् । त्रिफलाहाथगो मूत्रैःपिवेढ्योषकफार्हितः १७ त्रिटत्सैन्धवशुण्ठीनां चूर्ण मम्लैःपिवेन्नरः । वातादितोविरेकायजाङ्गलानारसेनवा १८ एरण्डतैलंत्रिफलाकाथेनद्विगुणेनवा । युक्तम्पीत्वा पयोभिर्वा नचिरेणविरिच्यते १९ बिस्ताकोटजंबीजं पि प्पलीविश्वभेजम् । मृहीकायारसमौ वर्षाकालेवि रेचनम् २० विद्दुरालभामुस्ताशर्करादिव्यचन्दनम्। tor उत्तम, मध्यम और वानिष्ट रेचन प्रमाण मल गिरते गिरते अन्त में कफ गिरे ऐसे तीस वेग मा सो उत्तम मात्रा है वेगकहे दस्त जिसमें वीस वेग तक अन्तमें कफ गिरे वह मध्यम है जिसमें दश वेग तक कफ गिरे वह हीनरेचन गानाहै ॥ १४ ॥ (रेचन काथादि प्रमाण) रेचन में काहानी माना दो पल उत्तम एक म यम आपापल कनिष्टमाया है ।। १५ ॥ (रेचन करता दिक प्रमाण ) कल्क मोदक चूर्ण तीनों का कर्ष कर्म प्रमाणहै और शं घृतयुक्त रेचन देय वा रोगीका रोग, अवस्था व बलको देखिदो कप से पनमा तक यथोचित मात्रा देना ॥१६॥ (रेचन द्रव्यप्रकार ) पिच निगेन पूर्ण दास फार्मे गुलकन्दं गुलाब फूल वही सौफके कार में देय कफ दोन सौंठ, मिर्च पापरि चूर्ण व त्रिफला कायमें पिया दोष दूर ोड १७ ॥ वातकोप में निशोथ, सौंट, सैंधव पूर्ण, नीरस वा का जंगोत्रक मांसका उपयुक्त दे तो रेचन अच्छा हो वायुकोष शाहो ॥१॥(अपर औपध रेचनपर ) रेंडी तेल से दूना विफनाक्षाय प्यान का टूनाथ उल • प्या झाडा जल्दहो ॥ २६ ॥ (रेचन मातु भेदसे) निगेय, व्यावी- परि, सौद च दाखके साथ शहद गरि यो प्यावे (गद् ने) शाधरसंहिता। [उचरखएर द्राक्षाम्बुनासयष्ट्याआँशीतलंघनात्यये २१, त्रिशताचि अकंपाठाह्यजाजीसरलावचा । हेमक्षीरीचहेमन्तेचूर्णम पणाम्बुनापिवेत् २२ पिप्पलीनागरंसिन्धुंश्यामाचनिटता सह। लिहेत्झौद्रेणशिशिरेवसन्तेचविरेचनम् । त्रिहताश रातुल्याग्रीष्मकालेविरेचनम् २३ अभयामरिचशएठी विडङ्गामलकानिच । पिप्पलीपिप्पलीमूलत्वपत्रमुस्त भेवच २४ एतानिसमभागानिदन्तीचत्रिगुणाभवेत् । बिदष्टगणाज्ञेयाषड्गुणाचात्रशर्करा २५ मधुनामोद कंकृत्वाकर्षमात्रामाणतः । एकैकंभक्षयेत्प्रातःशीतवानु पिवेजलम् २६ तावहिरिच्यत्तेजन्तुर्यावदुष्णनसेव्यते । पानाहारविहारेषुभवेनियन्त्रणंसदा २७ विषमज्वरम न्दाग्निपाण्डुकासभगन्दरान् । दुर्नामकुष्ठगुल्मार्मोगल गण्डभ्रमोदरान २८ विदाहप्लीहमेहांश्चयक्षमाणनयना मयान् । वातरोगंतथाधमानं मूत्रकृच्छाणिचाश्मरीम् २६ और निशोथ, जवासा, मोया, मुगन्धराला, मिश्री श्वेतचन्दन, मुलेठी, दाख कायमै प्याथै तौ रेचनहो ॥ २१॥ (हेमन्तमें) निशोय, चीता, पादा, जीरा, देवदारु, चूक इनका चूर्ण उष्णजल के साथ पिय सौ रेचनहो ॥ २२ ॥ (शि- शिर व चसन्त में ) पीपरि, सोंठ, संघव, विधारा, निशोध इनका चूर्ण शहद यका चाटै तो रेचनहो ग्रोप्म में निशोध का पूर्ण शकर समभाग युक्रकरि फाकै सौ रेचनहो ।। २३ ॥ (रेचन पर अभयादिक मोदक ) इड, मिर्च, सोंठ, विड़ा, श्रापला, पापरि, पीपरामल, तज, परज व मोधा ।। २४ ॥ ये सव समान भागले जमालगोटा की जह त्रिगुण निशोध अठगुणा शकर गुणी ॥ २५ ॥ शहद में मल कप कर्प भरकी गोली पाधि मभात एकवाय शीतलजन पियै ।। २६ ॥ जावेग मल को रोंकाचाहै तर तत्ताजनपियै और खान पान विहार यन से परहेज रससे ॥२७॥ तो घिपमन्यर मंदाग्नि, पाण्ड, फास, भगन्दर, दुर्नाम, पुष्ठ, गुल्म, अर्श, गलगण्ड, भ्रम, उदररोग ॥ २८ ॥दाह, प्लीह,ममेह, यक्ष्मा, अध्याय ४] भोपाटी कास मेता। अभयामोदका तेरसायनवराःस्मृताः । एष्ठपाश्वोरुज घनकट्यूदररुजजयेत् । सततंशीलनादेषांपलितानिन णाशयेत ३० पीत्वाविरचनंशीतजलैःसंसिच्यचक्षुषी । सुगन्धिकिञ्चिदाघ्रायताम्बूलंशीलयेन्नरः३१निर्यातस्थो नवेगांश्चधारयेनस्वपेत्तथा । शीताम्बुनस्टशेत्कापिको णनीरपिवेन्मुहुः ३२ बलादोषधपित्तानिवांयुन्तेियथा नजेत् । रेकात्तथामलंपित्तंभेषजंकफोब्रजेत् ३३ दुर्वि रक्तस्यनाभेस्तुस्तब्धत्वकुक्षिशूलता । पुरीपवातसङ्गश्च कण्डमण्डलगोरवम् । विदाहोरुचिराध्मानंभ्रमश्छर्दि इचजायते३श्तपुनःपाचनैःस्नेहःपक्त्वासंस्नेह्यरेचयेत्। तेनास्योपद्रवायान्तिदीप्ताग्नेलघुताभवेत् ३५ विरेक नेत्ररोगा वातरोग, पेटफूलना, मूत्रकृच्छ, पयरी ॥ २६...पीठ, सुरी, बाती; जांध, कटि और पेट इनके रोग दहों इस अभयामोदक सेवन से तुरतही वात पकना मिटै यह रसायनश्रेष्ठहै ॥ ३० ॥ (रेचनअच्छेप्रकार होनेका यन) रचनापथ पीक दे जले से आंखें व मुख पोछ व सुगन्धादि फूल सूप पानखा: या करै इस योग के करने से चित्त स्वस्थ रहता है व अच्छी तरह वेग माते।। ३१॥(रेचन समय साधना) पवन व मलमूत्र को न रोक न पोटै टंडा जलन छुवै ज्योज्यों बेग होय त्यात्यों वारवार तत्तापानी पिये इससे खलकर गल गिरंगा ।। ३२॥ सम्यक् रेचन में जैसे सम्यक् वमन में कफ और खाई औः पथ से पित्त, वायु व सवदोप मुख से गिरते है तसेही ये सब मलमार्ग से गिरते है ॥३३॥(रेचन देने पर वेगान होय तिसके उपद्रव ) जिस मनुष्य यो रेचन देने से वेग अच्छी तरह न ाथै उसकी नाभिक नीचे कड़ापन और कोप में शूल मल में वायु मिलजाय खजुली मण्डल, देह जकड़ना, दाह, अ. रुचि, पेटफूलना, भ्रम व छर्दि ये उपद्रच उत्पन्न होते हैं ॥ १४ ॥ (अशुद्ध रेचनयने) गिसे रेचन अच्छी तरह न हुआ उसे रातका आरग्वधादि पा; चन दे फिर स्नेहविधि से घृत पिलोष कोठा चिकना करि रेचन देने से शुद्ध. रेचन होगा सब उपद्रव शान्त होंगे और जठराग्नि दीयहो , देइ इलकी हाजनी २३६ शाईघरसंहिता [उत्तरवाट स्थातियोगेनमूर्छाभ्रंशोगुदस्यचाशूलंकफातियोगःस्या न्मांसधावनसन्निभम् । मेदोनिभञ्जलाभासं रक्तवापिधि रिच्यते ३६ तस्यशीताम्बुभिःसिक्तंशरीरंतन्दुलाम्बु भिः । मधुमित्रैस्तथाशीतैःकारयेद्वमनंमृदु ३७ सहकार त्वचः कल्कोदध्नासौवीरकेणवा । पिष्टोनाभिप्रलेपेनह न्त्यतीसारमुल्वणम्३८अजाक्षीरंपिवेद्वापिकिरहारिणं तथा । शालिभिःषष्टिकैःस्वल्पमसूरैर्वापिभोजयेत् ३९ शीतैःसंग्राहिथिव्यैः कुर्यात्संग्रहणंभिषक् । लाघवेमनस स्तुष्ट्यामनुलोमेगतेनिले ४० सुविरिक्तनरंज्ञात्वापाचनं पाययेनिशि। इन्द्रियाणांवलंबुद्धःप्रसादोवह्निदीपनम् । धातुस्थैर्यवयस्थैर्यभवेद्रेचनसेवनात्,४१ प्रवातसेवा शीताम्बुस्नेहाभ्यगमजीर्णताम् ।व्यायाममैथुनवापिनसे वेतविरोचितः ४२ शालिषष्टिकमुद्गायैर्यवाणूभोजयेत्कृता है ॥ ३५ ॥ (अतिविरेक में उपद्रय) मा, कांच निकरना, पेट में शूल, कफ अधिक गिरना, मांस फे धोवन सदृश गिरना, चरवी सी वा पानी व रुधिर गिरै ।। ३६ ॥ (प्रतिविरेकोपद्रव यत) ठगदे जल से शरीर पाछे व गुलाब कॅवडा हिरके व पत्र से पोछ। या चावलका धोवन शहदयुक्त पीवै शौर शर्ट औपध दे मृदुधमन कराये इससे उपशमन होता है ।। ३७॥ श्राम कीवाल गोदधि व सौवीर इन्हें पीसि कल्ककरि नाभिपर लगा तो वेग धन्दहो अथवा सौवीर में ग्राम की चाल पीसि नाभि पर लगा सौवीर की क्रिया मध्यखण्ड में कही है" ॥ ३ ॥ (झाडा पन्द करने को)चकरी का दूध, शकनीचि- डिया का मांस यूप, भात या मसूरी सत साठीचावलका भात साय 1.३६ || और अनार व ठंडे पदार्थका सेवन करे वेग यन्दहोय ( स्वल्पविरेकमें ल. क्षण) शरीर हलका मसन्नचित्त स्वस्थ गमन वायु ॥४०॥ ऐसे लक्षण देखि रातिको पाचन देना वा पाचनार्थ रंड पूल, सौंठ, धनियंका काथ दे" रेचन सेवने से इन्द्रियां चलवान हो बुद्धि प्रानर अग्नि दीसहरे धातुपुष्टो व अवस्था यदकर स्थिर होनी है ॥४॥(रेचन पर बर्जित) यार, उएदा जल । V - अध्याय ५] भापाटीकासमेता। म्,। जाङ्गलैर्विकिराणांवारसैःशाल्योदनंहितम् ॥४३॥ इति शार्ङ्गधरेउत्तरखएडेरेचनाऽध्यायश्चतुर्थः ॥ ४॥ वस्तिद्धिधानुवासाख्योनिरूहश्चततःपरम् । वस्ति भिर्दीयतेयस्मात्तस्माद्वस्तिरितिस्मृतः १ यःस्नेहैर्दीयते सस्यादनुवासननामकः। कषायक्षीरतैलोनिरूहःसनि गद्यते-२ तंत्रानुवासनाख्योदिवस्तियःसोत्रकथ्यते। पू मेवततोवस्तिनिरूहाख्योभविष्यति ३ निरूहादुत्तरंचै ववस्तिःस्यादुत्तराभिधः । अनुवासनभेदैश्चमात्रावस्ति रुदीरितः ४ पलद्वयंतस्यमात्रातस्मादपिवाभवेत् । अनुवांसस्तुरूक्षःस्यात्तीक्ष्णाग्नि केवलानिली ५ नानुवा स्यस्तुकुष्ठीस्यान्महीस्थूलस्तथोदरी। अस्थाप्यानानुवा स्याः स्युरजीर्णोन्मादतड्युताः। शोकमू रुचिभयश्या तेलस्पर्श, अजीर्ण, श्रम व मैथुन इनसे वचारहे ॥ ४२ ॥ (रेचनपर पथ्य) चावल, मूंग की यवागू वा हरिणादि मांसका यूप वा लवा घटेर तीतर मांसका यूप भात में दे॥४३॥ इति श्रीशाईग्रमुधाकर उनरखपढे चतुर्थोऽध्यायः ।। ४ ।। : (अथ यस्तिकर्म ) गुदाके भीतर अण्डकोशकी पड़ताई द्रव्यभरि पिच- कारी देनेको वस्ति कहते हैं सो दो मकारकी है अनुवासन १ निरूहण २ जिस में पी लादि चिकनी चस्तु भरि दीने उसे अनुवासनवस्ति कहते हैं और कादा, द व तेल मिश्रित पिचकारी भरि पीड़ितकरै वह निरुणास्ति कहाती है॥१२॥ सो प्रथम अनुवासन वस्ति है पीछे निरूपण है इसी से निरू- इण को उत्तरवस्ति भी कहते हैं ।। ३ | ४ ।। ( अनुवासन की द्रव्यका प्रमाण) स्नेहादि दो पल व एक पल का प्रमाण जानना ऐसे पिचकारी के भेद है ( अनुवासन योग्य ) रूतमकृती वा स्नेहपानराहेत को वा अग्नि दीप्त करनेको केवल वातरोगी को ये अवश्य अनुवासन योग्य है ॥५॥(अयानुवा- सन अयोग्य निरूहण योग्य ) कुष्ठी, प्रमेही, मोटा शरीर और उदर रोगी ये अनुवासन योग्य नहीं है और अजीर्ण, उन्मादी, पी, शोक, मूळ- F शाधरसंहिता उत्तरखण्ड सकोसक्षयोतुराः६ने–कार्यसुवर्णादिधातुभिर्टक्षवेणुभिः नलैर्दिन्तैर्विषाणामणिभिर्वा विधीयते ७ एकवर्षानुष यावन्मानंपडेगुलमें । ततोद्वादशकयावन्मानस्वाद प्टसम्मितम् । ततःपरंद्वादशभिरङ्गुलैर्नेत्रदीर्घता मुद्ग च्छिद्रकलायाम छिद्रकोलास्थिसन्निभम् । यथासंख्यभ चेन्नेत्रश्लक्ष्णंगोपुच्छसन्निभम् ९ आतुराङ्गुष्ठमानेनमू लेस्थूलंविधीयते । कनिष्ठिकापरीणाहमचगुटिकामुख म१०तन्मूलेकर्णिकेद्वेचकार्येभागाचतुर्थकात् । योजयेत्त अवस्तिचवन्धव्यविधानतः ११ मृगाजशूकरगवांमोहि षस्यापिवाभवेत् ।। मूत्रकोशस्यवस्तिस्तुतदलाभेनचर्म जः। कपायरक्तःसुमृदुस्तीक्ष्णः स्निग्धोदृढोहितः १२ अरुचि, भय, बास, कास व जय इनसे पीडित को निरूहण वस्ति अयोग्य है ।। ६॥ परन्तु अनुवासन योग्य है वस्ति कहे ( पिचारी निर्माण विधि) नेत्रा पिचकारी की नल जो गुदामें प्रवेशी जाय सो मुवर्णादि धातुकी, घांस, नरफुल, गजदन्त व मृगसींग की हो और उसका अग्रभाग पन्ना व विल्लौरका धनाचे ॥१७॥ नली योग्य अवस्था जो वर्ष एक से छः वर्षताई वालक के वस्ति की नली छाअंगुल बनावै और छ व से बारह वर्पताई की पाठभेगुलकी पना और वारह वर्ष से ऊपरवाले की नली बारह भंगुलकी बनाये ॥ (मली छिद्रप्रमाण और निर्माणविधि। अंगुलकी नलीका घरा करनेवाला मुस भूग समान को नीचेका छोटी अंगुली समान और आठ अंगुलकी मटरसा दूसरी पध्य भंगुलीता चारह भंगुलबाली का झरबेरी के घर सेंमान दूसरी थंगुली समानरासै नली यात चिक्नी र गोपुच्छ सदश एफओर पतली दूसरी और मोटी मोटी भोरके चौथ्याई भाग में दो छल्ले जहाँ विसमें येली हरि- णादि के मूतने की चदाइ पूर्वोक्त दल्लीका मय थैली समेत बहुत पुष्ट कम जिसमें थैली भोपयन और राहसे निकले तर पिचकारी टीका जानो ॥१०॥ १॥ येली निर्मित जानो हरिण, बाग, वराह, बैल व मैसा इनके मनकी धली उस नली में लगावे जो ये न मिले तो इनके चमडे पो बमलपत्र सम काटि अध्याय भापाटीकासमेता। व्रणवस्तेस्तुनेत्रस्याच्छक्षणमष्टाङ्गुलोन्मितम्।मुद्गच्छि द्रगध्रपक्षनलिकापरिणाहिचः १३ शरीरोपचयंवर्णवल मारोग्यमायुषः । कुरुतेपरिन्दिचवरितःसम्यगुपासि तः १४ दिवसान्तवसन्तेचस्नेहवस्तिःप्रदीयते । ग्रीष्म वर्षाशरत्कालेरात्रौस्यादनुवासनम् १५. नचातिस्निग्ध मशनभोजयित्वानुवासयेत् । ममच्छीचजनयेद्विधारने हाप्रयोजितः ७६ रूभुक्तवतोत्यन्तंबलंवर्णचहीयते।यु क्तस्नेहमतोजन्तुंभोजयित्वानुवासयेत् । हीनमानावुभौ वस्तीनातिकार्यकरौस्मृतौ १७ अतिमात्रौतथानाहलमा तीसारकारको । उत्तमस्यपलेः षड्भिर्मध्यमस्यपलेखि भिः १८, पलाधनहीनस्ययुक्तामात्रानुवासने । शता लासैन्धवाभ्यांचदेयस्नेहेचाचूर्णकम् १६-तन्मात्रोत्तमम दोनों ओर छीलि साफ करि थैली समान बनाय नलीपर चढ़ाये ।। १२ । (व्रणादि पिचकारीका प्रणाम ) घाव फोड़ा नासूरादि की पिचकारी पाठ अंगुल लम्बी, मग पैठने मुखाफिक छेद रहै गृध्र के पक्षसदृश गोटी प्रतिनिकनी पतली छोटी नामर अग्णयोग है ॥ १३॥ (वस्तिगुण ) वस्ति अच्छेप्रकार हो तो शरीर पुष्ट नौ काति, बल, पारोग्य व श्रायुधद्धि करै ॥ १४ ॥, (वस्ति सेवनकाल ) बसन्तऋतुमें सन्ध्यासमय स्नेहयस्ति कहे अनुवस्ति करना ग्रीष्य वर्षा श्रद में रात को करना १,१५ ॥ रोगी को उष्ण चिकना भोजन रात को खिलाय अनुवासन करने से मद या मूळ उत्पन्न होती हैं और वे भोजन से पता व कांति की हानि होय ये दोनों तरह वस्तिकर्म करे ये रोग होते हैं ॥ १६॥१७॥ (वस्तिकर्म में न्यूनाधिकमानादोप.) अनुवासन वा निरूह में हीन.मात्रा देने से रोग नहीं जाता यति मात्रा देने से पानाह, ग्लानि च अती- सार ये उपगते हैं वस्तिकी उत्तम मात्रा छः पलकी यली को अनुवासन देना मध्यम पलको तीनपलकी॥१८॥पलहीन को हीन मात्रा डेदपल देना स्नेह में और द्रव्य मात्रा शतायरि संघव का चूर्ण छ: माशे मी उत्तम माना: की मध्यप दोमाशे की कनिष्ठ जानना ( विरेचन पर, वस्तिमकार) चारि.माशे ५ .. २४ शगाधरसंहिता उत्तरवण्ड ध्यान्ताः पट्चतुईयमापकैः । विरेचनात्सप्तरागतेजात बलायच २० भक्तान्नायानुवास्यायवस्तिर्देयोनुवासनः । अथानुवास्यस्वभक्तमुष्णाम्बुस्वेदितंशनैः २१ भोजी त्वायथाशास्त्रकृतंचमणततः । उत्सृष्टांनिलचिण्मत्रयों जयेत्स्नेहवस्तिनी २२ सुप्तस्यवामपाश्र्वेनवामजङ्घानं सारिणः । कुञ्चितापरजङ्घस्यनेत्रंस्निग्धगुदेन्यसेत् २३ बद्धावस्तिमुखंसूत्रैर्वामहस्तेनधारयेत् । पीडयक्षिणेनैव मध्यवेगेनंधीरधीः २४ जृम्भाकासायादींश्चस्तिकालें नकारयेत् । त्रिंशन्मात्रामितःकालःप्रोक्तोरस्तेस्तुपीड ने २५ ततःप्राणिहितःस्नेहउत्तानोवाक्छभिवेत् । जा नुमण्डलमावेष्टचकुर्याच्छोठिकयायुत्तम् २६ एकीमात्रा भवेदेपासर्वत्रैषविनिश्चयः । प्रसारितःसर्वगात्रैर्यथांची चप्रसर्पति २७ ताडयेत्तलयोरेनंत्रीन्वारांश्चशनैःशनैः । चन किये को सात दिन विताय वल पाने पर ॥ १६॥ २० ॥ भोजन करायं अनुवासन पस्तिकरना (पिचकारी पीड़ित प्रकार.) अनुवासन कर्म के मयम तेल लगाय गरम पानी से नधाय ॥ २१ ॥ ययालिखित भोजन कराय मुद्ध टहलाय पवन, मल व सत्र की शङ्का मिटीय ।। २२ । चाई करवंट पौहाय दहिना गोड़ सिकोड़ वायां वगारि पलमार्ग में घी लगावै ॥२॥ तब पिचकारी थैली में गंगा लिहित, स्नेह पाना भरि चैार चमित करमुख स्व से सरि यो कर धारि धीरे धीरे मलमार्ग में दो अंगुल प्रवेश ॥ २१॥ तव दहिने हाय से द्रव्यभरी थैली मन्द मन्द पीड़ित करें जिसमें भीतर पिचकारी देते है उस समय उसांसी छौंक खांसी न आये (रोगीको वस्तिमंदसमय पिचकारी देतीसं मात्रा साई रोक इतनी बेरम स्नेहादिक अन्दर प्रवेश होजायगा फिर सौ मात्रा तक सीधा मुलायै (मायाममाण),जय मण्डल को कटि से पुटनी पर्यन्त प्रतिसके चारों शोर गुटकी बजाना हाथ घूममाये ॥ २५॥ २६ ॥ तो एकमात्राहोप यह संच ग्रन्थन में निश्चय है (चस्तिके पीछे कृत्य) पस्ति पीडित करि रोगों के पार शय व शरीर फैलाय लम्बा करदे इससे सातो धातु अपने अपने स्थानमें पोल ar
अ याय, भापामासमेता।
फिजश्चतताश्रोणी शब्यांपैचोक्षिपेततः २८ जाते
विधानेतुततः कुर्यान्निद्रायशामुखम् । सानिलामुखरीप
श्चस्नेहा प्रत्येतियरयतु । उपद्रविनाशीनं ससम्यग
नुवासिता जीणीतमयसीय हे। रनेहेप्रत्यागतेप
ना लहानभोजयत् कामदीतामिस्तुनरोपदि.३४ अनु
चासितायदेवस्वाद द्वितीयेहिखोदकम् । धान्यगुल्ठी
कंपायोचारनेहव्यापत्तिनाशनम् सामनेनविधिनापड्डा
सप्तचोटोनवाविवा। विधेयानस्तापरलेषामन्ते निल
मार दत्तस्तुप्रथमोसितस्नेहथेस्तिपक्षणति
म्यग्दत्तोद्वितीयस्तेमईस्थमनिलंजयेत् । ३ चलचि
जनयेत्वृती वस्तुप्रयोजित चयनोदतीने देता
रमामृती इ2 पठोमांसहमतिसतमोमेदाच भट
माशाई भरसंहिता -उत्तरखया मानवमश्चापिमजानचयथाक्रमम३८ एवंशंकगतान्दो पॉन्द्विगुण साधुसाधयेत्। अष्टादशाष्टोदशकात्वरत्तीनां योनिषेवते ३६सकुब्जरवलोप्याजयेत्तुल्योमरप्रभारू सायबवातायस्नेहवस्तिदिनदिने दद्याद्वैद्यस्तथान्ये पामन्यांवाधामपाहरेता स्नेहोल्पमात्रोंक्षाणांदीर्घकाल मनात्यय:३८ तथानिस्हःस्निधानामल्पमात्र प्रशस्य तोअथवीयस्यतत्कालस्नेहोनितिकेवल:३९ तस्यान्यो न्यतरोदेयोनहिस्निग्धस्यतिष्ठति अशुद्धस्यमलोमिश्रः स्नेहोनैतियदापुनः ४० तथाशथिल्यमाध्मानशूलंश्वास श्चजायते। पक्वाशयगुरुत्वंचतन्त्रर्दद्यान्निरूहणंम् ४१ ती क्ष्णंतीणोपधैर्युलाफलंवर्तिर्हितायच । यथानुलोमनवी युर्मलं स्नेहश्चजायते ४२ तथाविरेचनंदद्यात्तीर्णनस्यंत्र होत॥५॥ इस कार से नवं द्विगुनी अठारह वेग देने से शुक्रवातको दोप नाश होजाता है ॥ ३६॥ और जिसे पचीस वेगहों तिसे हाथी-घोडे सदर बलो थोर देवतासमान कालिदो अन्पमत में जो सन्न जातकरि अधिक पादित हो उसे अनुवासने वस्ति नवं जय प्रयोजन जाने तब तब देय।।,३७ ।। और चिकने या मोटे मनुषको जप जब पचित मान तयं तव निरूणवस्ति देय ती रोग, नाश होता है, से मनुष्य को स्नेहवस्ति हलकी हलकी नित्य मौत देय। और जो रोग पिरकाल. का होप मा निरूपण पस्ति हलकी हलकी नित्यमति देग (स्नेह शीघ्र निकलने पर जब स्नेहादि शीघ्र निकलारत निराहावास्ति' करे. इसी रीतिसे जितने वेग देयं संपके भतम वरण देता जाय (लेखाव न होनेपर उपद्रय) जो विरेचन वमनकरिशुद्ध किया वस्तिकर्य किया तिसमें स्नेहादिक फरमेसे ये उपद्रव होते हैं। पार्टः ॥ शिथिल गात्र, पेटरलना, गेल श्वास, प्रोझरी कठोर इन उपद्रवके दूरकरने को तीक्ष्ण "निलंग देना ।। ४ । वीक्ष्ण यापंध येक फलवती निमम वायु मधोमासी 'हुई मल युक्त स्नेहको गिरा दिल तोरण रेचन तारण नास देने से शमन होते 111४२॥ जो स्नेहयस्ति करने से कोई उपद्रवन होय भार स्नेहादि भीतर से २४४ शाईनरसंहिता चरवा मानिकृतानिमुनिपुङ्या निरूहरवापरंतामनोक्तमास्था पतंबुधैः स्वस्थानस्थापनादोपधांततारयापनमतमति रूहस्यप्रमाणंतुप्रस्थंपादोत्तरंमतम् मध्यमंत्रस्यमुद्दिष्टं हीनंचकुवालय,३ अतिस्तिन्धोलिटदोनोक्षतोरस्कः $शस्तथा।प्राध्नानादिहिका कासंस्वासपीडितः गुदशोफातिलारा”वितूचीकुष्ठरोबुताागर्भिणीमधु सेहीचनास्थाप्यश्चजलोदरी वातव्यावादावर्तगाता सृग्विषमज्वरे। सू तृष्णगोदराताहमूत्रकृच्छारमरीपाच ६.दृदोसृगदरमन्दाग्निप्रमेहेपनिम्हणागशिलेस्लपि सहयोगेयोजयेहिधिवढेधः उत्सृष्टानिलनिमस्तित्र स्विनमभोजितन-साध्वालेटहमध्ये चयशास्रोग्यनिरूहये के भनेक भेद है जहा सा देना चाहिये तटी, मुनीरहनेतमाही नाम राई यथा संशनवरित दोपस्तिय टोपशमनयस्ति चुह नाम मकार जानना ॥ १ ॥ निरुदावा दूसरा नाम प्रास्यानिवि कहते हैं इस कारण से कि जहन्न हुये पापसंयुक्त रसादिक धातु सस्ने स्थान में माप्त हैं उनके वातादिक, दोप-या रोगों को दूरकार द धातुओं को स्थित करती है (निहष्ट में काय, प्रमाण निरद सनामस्थती उचममाना है मस्यभएको मध्यम तीन कुदा की पानिष्टयाना कहाती ।। ३.(निरूइमें अयोग्य प्रतिस्निगा फोटेवाला) जगन दोषपानी, उर शती, दृशी, आध्मानी ददिरोगीदिली, अशी मासाती, शौर ग्यासी ऐगे मनुष्य || गुदा निगट पीडित, शोधी, प्रतीसारी, शीत. सूत्र, मुदी, गर्भिगी, मधुप्रमे और जलोदरी इन रोगियों को निरूदग्ण देना. योग्य नहीं ॥ ५ ॥ निरूह यस्ति योग्य ) पात रात, वावरक्त, विपः मञ्चर मूछा, तप्पा, उदर, माना, मारु पयरी ॥ ६ ॥ पुराना मनमान मन्दाग्नि, प्रमेट गाल, बिमति और हदयरोग इन रोगों से मुक्त हो नि देना योग्य हैं। 9.10 निरयस्तियियान ) जिरे निल्द देनी निस मक सूत्रको शंका निवारण करण्य प्रश्न बनेगी शजा गिटीय कोटा राजसरि . देश में वैननगाय तनल से भद्र, पोटना भोड़ा सहि हो पर प्रथम से सोगन एगि मिस नसा दगदेष-तिरी तेसो भोपनियता भरि पोंक अन्याय भोपाटीकासमेता। त्टास्नेहवस्तिविधानेनबूधाकुचिमणामन जातेन्नि रचततीभवेदुत्कटकासतः शतिष्ठेमहरीमानंतुनिरू होगमतेच्छयो। अनायातमहत्तत्तनिरूहंशोधनहरेत् । निरूहरवमतिमाशामा लसन्धवयस्यकमेणगच्छ तिविमितकमवायवनालायचोपजायतसुनिरहतमा दिशत् यस्यस्यांद्वस्तिरमाल्पवेगोहीनीलामिलों भूत्रातिनाज्यारुचिमान्दुनिव्हतमादिशेत १ विविक्त तामनस्तुष्टि स्निग्धत टिस्निग्धताच्याभिनिग्रहा आस्थापन निस्नेहब स्त्योरसम्यग्दातेतुनक्षणम् १३ अनेनविधिनायुज्यानि रहबस्तिदान वित्त द्वितीचाहतीयवाचतुर्थचायथोचित 'म सस्नेहएकावनेपितेहीपयसासह पावकलता :ककोणास्त्रयोमती पित्तश्लेपमानिलाविष्टक्षी यघरसैमातानिरहंयोजयित्वाचततस्तदनवासयेत् १६ HAN अंनुवासन बरिसावधानते 'निरुदण्यक्ति का फिर आप गरेर निकलने के कारण मुहले करें दोबड़ी कधी ये बने में पापा गिरीती अन्दाजी न गिरे तो शोधन कई रेनन । यीन शिव जत्रासार, गोपून, खट्टे की रसव सपा मिनार फिर विटारी देनेल दिली यही निर हलक्षण) निरही होतो असे रंजीच, कच :... बांधु. गिरे और शरीर हलका होनाय तो नि भनी जान । अगुहयस्तिलक्षणे ) जिसके पति से विदोजन्य विकार बार मल.. नहीं निकलगये उसके मूत्रमार्ग में पाहाशाजना भार मचि होय ॥२॥ (निखस्नेहस्तिलक्षण हलको मन प्रसन्न द चिकना रोगनाश ये नयी वास्त के लक्षण : निकम माननेशन वेध या निल्यास्त कर नहीं तो बाल विन्द होता है। निहस्तिदानयमाणः): निरईयमित एक घान्दो का शान यात्रा पार हा दौरा चारोग में स्नेहयुको निरन्ह एकवार दिल में दो बार काम में कारवा. रुवादिगुवाइ गुमोणकार तीनंबर देशविदोपकाप देवं माससंयुक्त २१६ - t शाईघरसंहिता! उत्तरखण्ड सुकुमारस्यहस्यवालस्यचमृदुर्हितः । वस्तिस्तीक्ष्णः प्रयुक्तस्तुतेषांहन्यादलायुपीः १७ दद्यादुल्लेशनपूर्वमध्य दोपहरंततः।पश्चोत्संशमनीयंचर्दद्यादस्तिविचक्षणः एरण्डबीजमधुकंपिप्पलीसन्धर्ववचा।वषाफल कल्कश्च वस्तिरुत्लेशन स्मृतः १९ शताहामधुकविल्वकोटजफ़ल मेवचासकाञ्जिकासगोमूत्रोवस्तिर्दोषहरःस्मृतः२५ शोध नंद्रव्यनिष्क्वार्थस्तकल्क स्नेहसैन्धवैः युक्त्याखजेनस थितावस्तयःशोधनास्मृताः२१ प्रियङ्गुमधुकोमुस्तात, थैवचरसाजनम् । सक्षीर शंस्थतेवस्तिर्दोषाणांशमनेस्म तः२२त्रिफलाकाथगोमूत्रौद्रक्षारसमायताः ऊषकादि प्रतीवापैर्वस्तयोलेखनास्मृताः२३बृंहणद्रव्यनिष्कार्थः । क्रमसे घारगार देना तिस पीछे भेटपस्ति देना ॥ १६ ॥ मुमार पा हद्र या पालक को हलकी निरुहना सरुमारादिको - तीक्ष्णवस्ति से पल और, • मायु घटती है ईड या भावनादि कर्नु फली व यवादि स्नई ये हा भादि मध्यान्त अनसे देना प्रथम दोप उभारना म य से दोप नाशनं च अन्त में-दोष क्षीण करि शमन कारक देना ॥२७॥ १८॥ (दीप उभारन हृदय-) रेडी पीन, महुआयान, पीपरि, सैंया धच और हाऊऔर इनकी पिचकारी में दोप, उभरता है ।। १६ ।। (दोपनाशकद्रव्य)-शतावरि, मुलेटी, येल और इन्द्र- यव, इनको काजी में पीसे गोमन युक्त पिचकारी रोगहारक देना ॥20॥ (दोपशमन, औषध ) निशेष भादिक शोधनद्रव्यका कार्यकारि तेल ~ि सेंधा डारि मयिकै दोष शोधन लिमित इसीका अथरा और व्यको कल्क भी मयिक पिचकारी,देना ॥ २४॥-मकरामूल, मदुनावाला, नागरमोथा भार रसांत ये सब समभागधर्म पीसि टोपशमनार्थ देना ॥२२॥ (देखनयन्ति) निफनादायमें गोमत्र, गद व जवासार ये द्रव्य समान भागले ऊपशादिगग्गा ध्य मिश्रितकरि लेसनपसिन देना लेसन कहे "जो मंद दूपित तिन रोगिनको । दाबसाकर ॥२॥ वृहपावस्ति) मुशली, गुरगुरू प केराचीन इत्यादि । श्ण द्रव्य है सो धातुको बहाती है उनको फायरि महमा की छाल दास र १ महोरागादियों का मोय करना पति " + . " अध्याय भापाटीकासमेत २४७. कल्कैमधुरऊर्चुतः सपिनासरसोपेतावस्तयोटहणाम तार४ चदयरावतीशेलुशाल्मलीधन्वनागराक्षी 'रसिदोद्रियुक्तानाम्नानिच्छिलसंज्ञिता-पाजोरी गरुधियुक्तादेयाविचक्षणी मात्रापिच्छिलवस्तीनांपले दशभिर्मता २६ दत्त्वादौसैन्धवस्याक्षमधुनाप्रति द्वयम् विनिर्मथ्यततोदयात्स्नेहस्यप्रसूतित्रयम्,२७ एकीभूतेततास्तेहेकरकस्यप्रसृतिक्षिपेत् । सम्मच्छितें कंपयितुचतुष्प्रसूतिसम्मित्त रक्षित्वाधिमध्यदया निरूहकुशलोभिपक तिचतुष्पलशीदद्यात्स्नेह स्वैपट्पलम् :२९ पित्तेचतुष्पलक्षौद्रस्नेहस्यचपलत्रः यम् । कफेषट्पलिकक्षौद्रस्नेहस्यैवचतुष्पलम ३७ एर एडक्वायतुल्यांशमधुतैलंपलाष्टकम् । शतपुष्पापलाईन सैन्धवानसंयुतम् ३७ मधुतैलंकसंज्ञोयंवस्तिदेवीक्लिो अनारादि मधुर भय का करक और घृत तथा मांसरसा में सब पूत काय में. 'दालि घात बदाने को पिचकारी देय-॥ २६॥ (पिच्छिल वस्ति की लाल इलायची, लसोड़की छाला सेमरजवासा व सौंद ये सब समान भाग ले दूध में पीसिशहद २५ सांगा मेहाय हरिण इनका रुधिर मिश्रितहरि चतुर वैद्य दोष पिपलाने के लिभे पिडिलवस्ति को देते हैं इस की मात्रा की प्रमाण घारसपल ई (निरूहणवस्ति-प्रमाणविधि अक्षय ऊर्प की एकहीं "संज्ञाहै सेंधव कपभर शहद चारपल मर्दन करि छापलापी, दे ॥ २६ ॥२७॥ एकपको इस में दोपल पूर्वोक्त कन्क द्रव्य मिलाय माश्याः पूर्वोक्त शल्कदोपका कायहे (काकरि लीजिये ॥ ३॥ उपलबमाण कुराल वैदइफद्दी कार मयि निरूपवस्ति देय निलदेवस्ति की साधारण विधि नानो (विशेष विधान ने बातम४ पल मधु-पल स्नेह इकडा करि पिचकारी देना ॥२६॥ पित्त में प्रल मधु.३.पल स्नेहा इन्दगरि पिचकारी देय कफ में छहपल मधु'४ पल स्नेह एकत्रकारिदेनी (मधुतलवस्ति) रण्डमूनकायल शहद तेल प्रांठ माउ पल बड़ी सौक ये सावर माया मायापल ये सब एकारि क ०१८ शाईपरसंहिता [ उचलण्ड डितः। मेदोगुल्ममिप्लीहमलोदावर्तनाननः बिल वर्णकरउंचवटप्योहणदीपनः, क्षोद्राज्यनीरतलानांश, सृतिःप्तमृतिर्भवेत् ३३ बुपासैन्धवाक्षांशोनास्तिस्याही पन पर गएरण्डमलमिकाथोमधुतैलंससैन्धवम् ३ एप युक्तरसोवस्तिः रावचापिप्पलीफल पञ्चमूलस्यनिष्को थस्तैलंसागधिकामधु ३६ ससैन्धवःसरधन सिवस्ति रितिस्टतः । स्नानमुद्रणोदकै कुर्यादिवास्वप्नमजीर्ण ताम् । वर्जयेदपरंसवमाचरेत्स्नेहस्तिवत् २६ ॥ इति. श्रीशाधरेउत्तरखण्डेनिटहणविधिःपष्ठोऽध्यायः ६ ', अतःपरंप्रवक्ष्वामितस्तिमुत्तरसंज्ञितम्ाद्वादशामुलक नेत्रंमध्ये चकृतकर्णिकम् १,मालतीपुप्पचन्तामछिद्रसर्प पनिर्गमम् । पञ्चविंशतिवर्षाणांमधोमानाहिकार्पिको र तंदूर्ध्वपलमानंत्रस्नेहरयोलाविचक्षणः, अथास्थापन क्षणभर मयि ॥ ३१ ॥ यह मधुतेल वस्ति है इसे देने में मदरोग, गुल्म, मि, प्नीह, मन वादावन पे रोग नारी होते ही साल कौति, ची,इच्छा, मातु दि भाग्न दीदीय (दीपयसिस) शदाबी व सल ये दो पल शा हाऊनेर य रोवर करकी मदमसीसि समिनाय विचारादि से शनिस होय (युक्तरसस्ति इमलकाय शहद तेलम || विच, पीपरि, मैनफन, चारों समभाम पूर्णकार मिला पिचकारी देय यह युक्तरसस्तिालय रोगी पर दीजानी रसिधनि पंचमूल कोथ ) तेल और ममासजेती 'काय पीपरि संधर्व मिलाय देय यह सिदस्ति सब रोगनार ते ई (परिम में तेब्य निपेय पदार्थ ) चस्तिसेवक उपणना से नहाइ दिन में नमरे अजीणी न होप और स्नेहवाल के समान संर माचरण मा ५१६॥ र ति नीशा गधाकोउतरेंग्वर पोऽधायःran" H (अधीरवतिबिधान उत्तर यस्ति को "मनमार्ग में पिचकारी देने की विधिपतिसय माण वाहगुज्ञ लगी तिसके मध्य में पापुरी 11. मेली के पुष्प राशि व चमेली पुप्पकी ही समान मोटी रहै। मानाममाण) मनुष्य के २५ घपता स्नेहगात्रा दो चर्पची देय ॥ २॥ पचीसके उपर पलगर २४० N अध्याय ७] मापाटीकासमेता। शुदस्यतृप्तस्यस्नानभोजनैः ३ स्थितस्यजानुमात्रेचपी ठेत्विष्टशलाकया। स्निग्धयामेढमार्गेचततोनेत्रंनियोज येत् ४ शनैश्श घृताभ्यक्तंमेद्रमध्येङ्गुलानिपटं । ततोच पीडयेइस्तिंशनैर्ऋचनिहरेत् ५ ततःप्रत्यागतेस्नेहेस्ने हवस्तिकमोहितः । स्त्रीणांकनिष्ठिकास्थूलनेत्रंकुर्याद्दशा गलम् ६ मुद्गप्रवेशयोज्यंचयोन्यंतश्चतुरङ्गुलम् । व्या लमूत्रमार्गेचसूक्ष्मनेत्रंनियोजयेत्७मूत्रकृच्छविकारेपुबा ‘लानांत्येकमालम् । शनैर्निष्कम्पमाधेयंसूक्ष्मनेत्रविचक्ष णैः ८ योनिमार्गेषुनारीणांस्नेहमात्राहिपालिकी । मूत्र मार्गेपलोन्मीनाबालानांचद्विकार्षिकी ऐ"उत्तानायस्त्रिय दद्यादूर्वजान्वैविचक्षणः । अप्रत्यागच्छतिभिपग्वरता देना (अवास्थापनयस्तिविधि ) स्थापन कहे उत्तर सेवक को शुद्ध स्नान भोमन करायं ॥ ३॥ घुटने टेकार्य वैठावै वा घुटनेको टेकि सहारहे तब इष्ट श- लाका चांदीका दो अंगुन्न भुट्परयुरा भंगुजसीधा सरसोनिक रिजाने माफिक छेद होता है उस में धी चा तेल लगाय मूत्रमार्ग में ॥ ४॥ धीरे धीरे घर तथा पाउभंगुल प्रवेशकरे यत्नपूर्वक जिसमें पीड़ा न कर पा सूत्र थैलीतक पहुँच पर- सट बजे तो जानो इसके पथरी ॥५॥इमी शलाका से चन्दयमभी सुननाता है शलाकारिद्र से यदिजाता है और जो रिचारी देनी हो तो शनाकाकी पेंदी पर वैली चदाग औषधभरि पूर्ववद पीडिनकर इस से मूत्रकृच्छादि दूरहोते है यह उत्तरपस्ति क्रम है ॥ ६॥ (स्त्रीकेउत्तरवस्तिविधान) स्त्री की योनि में दो छिद्र होते हैं एक मूत्रमार्ग दूसरा गर्भमार्ग योनि यही है उसकी शलाका छगु- निवा की गुटाई दशागुल की पंग निकरने पाक्षिक छेट रासि चारि अंगुल योनि में प्रवेश पिचकारी दे और मूत्रमार्ग में सूक्ष्म शलाका दो अंगुल मोश ॥७॥ चालक के अंगुल एक शलाका प्ररी चतुर वैध अनिमहीन बालक के रसायन से देय पिचकारी पीड़ने में हाथ न पै ॥८॥(स्त्रियों की पस्ति की माग प्रमाण योनिमांगे ) पिचकारी देने की मात्रा दो पत्त औपर लेना मूत्रमार्ग की मात्रा एकपत है वाल वस्तिकी दो कहि ॥ ॥ निपुगवैध स्त्रीको उताना ३२ शापरसंहिता 1 [उचरसएट चित्तरसंज्ञिते ३० भूयोवस्तिनिदध्याञ्चसंयुक्तैः शोधनैर्गु हैं । फलवर्तिनिदध्याद्वायोनिमार्गेदृढं भिषक् ११ सूत्रे विनिर्मितांस्निग्धांशोधनद्रव्यसंयुताम् । दयमानेतथा विस्तौदाहस्तिविचक्षणः १२ क्षीररक्षकपायेणपयसा गीतलेनच । चस्तिःशुक्ररजःपुंसां स्त्रीणामार्तवजारुजः १३ हन्यादुत्तरवस्तिस्तुनोचितोमेहिनांकचित् । सम्य ग्दत्तस्यलिङ्गानिव्यापदाक्रमएवच १४ वस्तेरुत्तरसंज्ञ स्यशमनस्नेहवस्तिना । घृताभ्यक्तेगुदेक्षेप्याश्लक्ष्णेस्वा गुष्ठसन्निभा । मलप्रवर्तिनीवर्तिःफलबर्तिश्चसास्मृता १५ ॥ इति श्रीदामोदरसूनुनाशार्ङ्गधरेणविरचितायांसं हितायांचिकित्सास्थाने उत्तरखण्डेउत्तरवस्तिविधानन्नाम सप्तमोऽध्यायः॥७॥ नस्यतत्कथ्यतेधीरैर्नासाग्राह्ययोषधम् । नावनंन पीटाय पिचकारी पीडितकर फिर उकुविठाब दिया आ स्नेह गिरावे ।। १०॥ (शोधनद्रव्य मूत्रकृच्छादि में शोधनद्रव्य) रेंडी तेलादि द्रव्यभरि विकारी देय भयया फलपति रंडवीजादि सूत या वस्त्रकी कटीवती बनायरंड लादि में तप्तरि भिजाय उसपर रेंडी पीसि नुपरि योनि में रास ॥१२॥ जो वस्ति किये नाभितरे वास्तस्थान अयिक उष्णहोय तो बड़ व गुलर वीछाल के झाथ की पिचकारी देना व दे दूध की इन से वस्ति रद्ध होती है और शुभमंथी पीडा र धोके यातवसम्बन्धी रोगपीडा दरहोय ॥ १४॥ ममेहीको उत्तरवस्ति कभी अयुक्तनहों (उचरयस्तिलक्षण ) उत्तरवस्ति में स्नेहवस्ति हुई तरशुक्र सम्बन्धी प्रमेहादिक पीड़ा दूर होती है उससे ये लक्षण हैं ॥ १४॥(मलमार्ग फलकस्तिविधान ) मलमार्ग में घीलगाय मल गिराने के कारण रेचन द्रव्य रंडवीजादे कड़ी वत्तीपर लेपि गुदा में धरै इसे पलवति कहते हैं ॥ १५॥ इति श्रीशा घरमुधाकरेउत्तरखण्डेसममोऽध्याय ॥७॥ अथ नरपकर्म ) नाक की राह प्रोपर देनेको नारा कहते हैं इसके दो नाम . ( -- . अध्याय 1 भापाटीकासमेता। स्यकर्मेति तस्यनामवयंमंतम् १.नस्यभेदोद्विधाप्रोक्तो रेचनस्नेहनतथा । रेचकर्षणंप्रोत्तस्नेहतंबृंहणमतम् र कफपित्तानिलध्वंसे पूर्वमध्यापराह्नके । दिनस्यग्रह्यते नस्यं रात्रावप्युत्कटेगदे ३ नस्यत्यजेगोजनोन्ते दुर्दिने चापतर्पणे । तथानवप्रतिश्यायोगर्भिणीगरदूषित अंजीर्णीदत्तवस्तिश्चपीतस्नेहोदकासवः । कुश्शोकी भिभूतश्च तृपारवालको ५ वेगावरोधीस्नातश्च स्नातुकामश्चवर्जयेत् ६ अष्टवर्षस्यबालस्य नस्यकर्म समाचरेत् । अशीतिवदूधर्वचनावननैवदीयते ७ अथ वारेचननस्यं ग्राह्य तैलैःसुतीक्ष्णकैः। तीक्ष्णभेषजसिद्धे स्नेिहै क्वाथैरसैस्तथा ८ नासिकारन्ध्रयोरष्टौ षट्चत्वा . नाचन एक नस्य-दो ॥ १ ॥ नस्य रीति दो विधिकी है. एक रेचन दूसरीस्ने- इन और रेचनको कर्पण भी कहिये सो वातादि लेखनको कर्पण करनेवाली है और स्नेहन नस्य धातुको वृद्ध करती है इससे बृहण कहिये ॥ २॥ नस्य- कर्म समय ) कफपितको पात नस्यदेना पिनषितको मध्याह में देना वायु पितको संध्या के भीतरदेना और जो अतिपीडितहो तो रात्रिकोदेना ।।३।। (अश्र नस्यनिषेधः ) नस्यकर्म ऐसे को वनितहै भोमन करके पर तुरतही न दे दुर्दिन कहे गांधी वा पवन अति चलै या मेघाच्छादितहो और लंघनी को- पीनसके प्रारम्भ में गर्भिणीको विपदूपित को ॥ ४ ॥ अजीर्णपर यस्तिकृतको स्नेहपातको पानी वा मधीको तर्पणमतको क्रोधशोकाती मृद्ध और बालसाको.. ५॥ मलमूत्र वायु अवरोधीको तुरत स्नान कियेपर स्नानाकांक्षीको ऐसे मनुष्यर, को और इन कर्मन कियेपर नस्यकर्म न करें।॥ ६ ॥ (नत्यकर्मणि योग्या- योग्य) आठवर्ष के उपरान्त अस्सीवर्षपर्यंत नासकर्म करनी ॥७॥ (रेचन नासविधि ) रेचनकारक द्रव्यको नास देनाचाहै तो सराई चा-सरसों का तेल. तीक्ष्ण है ,निसकी नासदेना वा तीक्ष्ण द्रव्य में सिद्ध किया तेल वा तीक्ष्णद्रव्य ; का काय वा तीक्ष्णद्रव्यका स्वरसने तेल मृत सिद्धकरि नासदेना ॥६॥रे- घने नस्पप्रमाणम् ) रेचनसम्मुन्धी सोपधकी गाउद दोनों नथुनों में नाम:
२१२ शाईपरसंहिता [उत्तरसएट रश्चबिन्दवः। प्रत्येकरेचनेयोज्यमुखमध्यान्त्यमात्रया : नस्यकर्मणिदातव्यंशाणैकंतीक्ष्णमौपधम् । हिास्यायव मात्रन्तु मापैकसैन्धवंमतम् १० क्षीरंचैवाष्टशाणंस्या पानीयंत्रिकार्पिकम् । कार्पिकंमधुरंद्रव्यं नस्यकर्मणि योजयेत् ११ अवपीडःप्रधमनंद्वौभेदावपरौस्मृतौ । शि रोविरेचनस्थानेतीतदेयौयथायथम् १२ कल्कीकृतादौ षधाद्यः पीडितोनिस्सृतोरसः । सोवपीड समुद्दिष्टस्ती क्षणद्रव्यसमुद्भवः १३ षडङ्गलाद्विवक्ताया नाडीचर्णततो भमेत् । तीक्ष्णंकोलमितंवक्तं यातैःप्रधमनंहितम् १४ ऊर्ध्वजत्रुगतेरोगे कफजेस्वरसंक्षये। अरोचकेत्रतिश्या ये शिरःशूलेचपीतसे १५ शोफापस्मारकुठेषु नस्यवैरे चनंहितम् । भीरुस्त्रीकृशवालानांनस्यस्नेहेनदीयते १६ गलरोगेसन्निपाते निद्रायांविषमञ्चरे । मनोविकारेकृमि पुयुज्यतेचावपीडनम् १७ अत्यन्तोत्कटदोषेषुविसंज्ञेषुच देय ती उत्तममात्रा है बदकी म यम चारिदकी कनिष्ठमाना कहाती ॥६॥ (नस्येन्द्रक्यप्रमाणम् ) नासदेनेको तेलादि सिद्धकरने में तीक्ष्ण औषध एक शाण देना हींग यवभरि संधव मापभरि ॥१०॥ दूध याठ शाण पानी तीन कर्प भमाण पीठीद्रव्य प्रमाण देना ॥१॥ (मस्तकरेचनविधि )मस्तकरेचन दो प्रकारका है एक अवपीड़न दूसरा प्रधमन ये मस्तकरेचन जानना ॥१२॥ (अयपीड़न यामधमन विधान) तीक्ष्ण द्रव्य पीसिकै स्वरसलेनेको अवपीड़न फहते हैं ॥ १३ ॥ दूसरी छः अंगुल प्रमाण नली दो मुसकी बनाई एकपर तीक्ष्ण इच्यका चूर्णधरि नाकमें प्रवेशकर दूसरे मुखमें मुंहलगाय के उसे मधमनकहते हैं तीक्ष्णद्रव्य सौडि,मिर्च व पीपरि इसे त्रिकुटा कहते हैं ॥१४॥ (रेचन वा स्नेहन नासयोग्य) ऊर्ध्वगत कहे भृकुटी, मस्तक,कपालादशमहार पर्यंत गतेरोग कफ जन्य स्वरभंगा बरोचक,नाक टपकना,मायेकी पीड़ा,पीनस,सूजन,मृगी और कुष्ठ इनमें रेचन उचित है स्त्री,दुन । पालक इन्हें स्नेह उचित नहीं है ।। १५॥१६॥ (अवीड़नयोग्य ) रोग,सभिसात, निद्रा, विषमज्वर व मनोविकार इनमें । अध्याय-] मापाटीकासमेता। दीयते । चूर्णप्रधम धीरस्तद्वितीक्षणतरंयतः १८.न स्यस्याद्गुडशुण्ठीभ्यांपिपल्यासैन्धवेनच । जलपिष्टे नतेनाक्षिकर्णनासाशिरोगदाः १९ हनुमन्यागलोद्भूतान श्यन्तिभुजरष्ठजाः ।मधूकसारकृष्णाभ्यांवचामरिचसैन्ध वैः २० नस्यकोष्णजलेपिष्टदद्यात्संज्ञाप्रबोधने । अप स्मारेतथोन्मादेसन्निपातेऽपतन्त्रके२१सैन्धवंश्वेतमरिचं सर्षपाकुष्टमेवची वस्तमूत्रेणपिष्टानिनस्यतन्द्रानिवारण म् २२ रोहीतमत्स्यपित्तेनभावितसैन्धवंवचा । मरिचंपि प्पलीशुण्ठीककोलंलशुनपुरम्। कट्फलंचेतित-चूर्णदेयंत्र धमनंबुधैः २३ अथ बृहणनस्यस्यकल्पनाकथ्यतेऽधुना। मर्शश्च प्रतिमर्शश्चहौभेदोस्नेहनेमतौ २४ ,मर्शस्यतर्प पीमात्रामुख्यशाणैःस्मृताप्टभिः । मध्यमाचचतुःशाणे अवपीड़न नासयोग्यहै ॥१७॥ (मधमन योग्य ) मूी, अपस्मार घ सन्या- सादि अचेतन रोग अत्यन्त तीक्ष्ण चूर्णादि करि नासदेना ॥१८॥(अथ रेचन संजकनस्य ) गुड सोठि मोटिस व अद्रकरस गुड्योति नासदे पीपरि व संशा प्रोटिक दे तिससे नेत्र, कान, नाक,माथा॥१६॥ ठोड़ी, कंधागल, हाय व पांय की पीड़ा अच्छी होय (पुन प्रकार ) महुचे की छालका गाभा, पीपरि, बच, मिरच व सेंधानमक ॥२०॥ इन्हें पीसि तप्त जलसे नासदेय तो मृगी, उन्माद सनिपात व अपतन्त्र ये सब रोग मिटें शरीर हलका हो बुद्धि सावधानहो तो जान- ना॥२१॥ (पुनस्तृतीय प्रकार ) सैंधव,श्वेत मिरच सरसों व फूट ये सब छाग सूत्रमें पीसि नास देने से तन्द्रा नेत्रालस्य दूरहोइ ॥२२॥ अथ मधमननस्य) सैधव, पच, मिरच, पीपरि, साठि, कंकोल, लहसुन, गुग्गुल व कायफर इनका चूर्ण रोहू मबली के पित्तायें पुटदेइ एकनली के मुद्दीधरि दूसरा मुस नाक में म. वेशि औषध की ओर से फूकदेय तो तंद्रादि अचेतनरोग नाशहोयें इस चूर्ण का मधमन नाम है ॥ २३ ॥ (अथ वृंहणनस्यविधान ) बृहएकहे धानुको पृष्ट करै य यदा इस बृंहणनास की मात्रा-हणता के दो भेद है एकमर्श दूसरा म. तिमरी ये दोनों बृदण है ॥ २४ ॥ इनके योग्य, मर्श में तर्पणी नस्यकी मात्रा *n । शाईधरसंहिता। [उचरखएड नशाम्यन्तिरोगाश्चैवोर्ध्वजत्रजाः ४१ वलीपलितनाश इचवलमिन्द्रियजभवेत् । विभीतनिम्बर्कभारीशिवाशेलु श्चकामिनी ४२ एकैकतैलनस्येनपलितनश्यतिध्रुवम् । अथनस्यविधिवक्ष्येनस्यग्रहणहेतवे । देशेवातरजोयुक्ते कृतदन्तनिघर्पणम् ४३ विशुद्धंधूमपानेन स्विन्नंभालंगलं तथा उत्तानशायिनंकिञ्चितालम्वशिरसनरम् ४४ श्रा स्तीर्णहस्तपादेंचवस्त्राच्छादितलोचनम् । समुन्नमितना साग्रंवैद्योनस्येनयोजयेत् ४५ कोषणमच्छिन्नधारंचहेमं तारादिशक्तिभिः । शुक्त्यावापत्रशुक्त्यावाप्रोतैर्वानस्य माचरेत् । नस्यबासिच्यमानेषशिरोनैवप्रकम्पयेत् ४६ नकुप्येन्नप्रभाषेतनोछिन्येन्नहसेत्तथा । एतर्हिविहितस्ने होनैवान्तः सम्प्रपद्यते ४७ ततःकासप्रतिश्यायशिरोति गदसम्भवः । शृङ्गाटकमभिप्लाव्यस्थापयेन्नगिलेद्वम् ४६ पञ्चमप्तदशैक्स्यात्रानस्यस्यधारणे । उपविश्याथ निष्ठीवेन्नासावक्तगतद्रवम् ४६ वामदक्षिणपाश्र्वाभ्यांनि नास) बहेडा नीर, संभारी, हड, लसोड़ा र कारतुण्डी ॥४१॥४२॥ इनके वीजनका रेल भिन भिन चाहि नास देय ती चाल कारे होय (नस्यविधि) पचन व धूरि वर्मित स्थानमें मनुष्य दातूनकरि ॥ ४३ ।। हुकापी गला मस्तक शुद्ध करि राममें बताना पोहे पीछे शिर झुकाय नाक अंसी रहै ॥ ४६॥ हाव पार फैलाय काड़े स पाखेंढकि नाफा अग्नभाग नाय वैद्य नहीं धीरेसे एक एकयोर नस्य देय ॥ ४५ (नस्य देने का पान सोने,स्पे, ताये या सीसे का होय वा सीपीपन द्रोण वा कण्डेकी पोट नीसे नामदेय नासलेनेवाला मायाँ न पाने ॥ ४६॥क्रोध न कर बोले नहीं मासी, मच्छड़व सकारादि काटने न पायें हसे नहीं ऐसे समरिना नस्यद्रव्य मरा नहीं होनी ॥४ा बासीधानाती है तो खराकहो मस्तक में भासिन में कंठ पीड़ा उत्पन्न कतीहै ।। ४८ । ( नस्य साधारणप्रकार.) नास देनेसे भृगाटक में औपय मोशनार्थ पाच वा सात या दशमात्रा ताई नास गरणकरे जब मुंहमें उतर माने तर परेपरे ।। ६ || दहिने - A २५७ अध्याय ] भापारीकासमेता। ष्टीवेत्सम्मुखेनहि । नस्येनीतैमनस्तापं रजामोधचसन्त्य जेत् ५० शयीतनिद्रात्यक्त्वाचउत्तानोवाकरनिरः । तथावरेचनस्यान्तेधूमोवाकवलोहितः ५१ नस्येत्रीण्युप दिष्टानि लक्षणानिसमासतः । शुद्धहीनातियोगानिवि शेषाच्छास्त्रचिन्तकः ५२ लापर्वमनसःशुद्धि स्रोतसा व्याधिसंक्षयः । चित्तेन्द्रियप्रसादश्चशिरसःशुद्धिलक्षण म्५३ कण्डपदेहाँगुरुतास्रोतसांकफसंखवा मनिहीन विशुद्धेतुलक्षणेपरिकीर्तितम् ५४ मस्तलुङ्गागमोबात वृद्धिरिन्द्रियविभ्रमः । शून्यताशिरसश्चापिमूनिगाढेवि रेचयेत् .५५ हीनातिशुद्धेशिरसिकफवातावमाचरेत् । स म्यग्विशुद्देशिरसिसपिनस्येनिषेचयेत् ५६ कफप्रसका शिरसोगुरुतेन्द्रियविभ्रमः। लक्षणंतदातस्निग्धंरूक्षतत्र प्रदापयेत् ५७ भोजयेचानभिष्यन्दिनस्याचारिकमादि पायें थकदे सम्मुख के धूकने से औपर गिरजाती है शृगाटक उसे कहते है जो नाक के दोनों छेद मोहतक पहुँच दो गलेको चलेगये हैं ॥ ५० ॥ एक दहिनी एकबाई भृकुटी के नीचेही कपाल को चलेगये हैं (नस्प वाजत ) नास लेकर संताप न करे धलि को वैठना व निद्रा सीमामा ताई इनसे वचे उताना परारह धुर्वा न पीचे भूक न लीले ।। ५१ ॥ (नस्यशुर आदिभेद) नास पिप तीन लक्षण शास्त्रज्ञ कहतेशुद्ध, हीन व अतियोग सो में संक्षेप से कहताई ॥५२॥ उत्तम शुद्धयोग भये से देह हलकी, मनशुद्ध, मुक्त, नाकरन शुद्ध शिर रोगरहित चित्त इंद्रिय मसन्न ये शुद्धयोग के लक्षण ।। ५३ ॥ (ही. नयोग) लघुयोग भये देह खुजली, गुरुस्व, मुरस व नाकसे कफ गिरे ये हीनयोग के लक्षण है ।। ५४ ।। ( अतिपोग लक्षण ) मस्तक की सजा नाकसे गिरे वायु सृद्धि इंद्रिय संभ्रम व माया खाली ॥५५॥ (हीनवृद्धयोगयन) कफवायुहारक द्रव्यकी भलीभांति नास दे फिर घी की नासदेय ॥ ५६ ॥ (अतिस्निग्ध लक्षण ) जो नस्पकर्म से लियता अधिक हो वो कफ अधिक गिरै माया भारी इंद्रिय भ्रप ऐसे मनुष्य को रुत नामदेना ।। ५७ ॥ (नाममें 1 शाधरसंहिता । [उत्तरखण्ड शेत् । वानरेचननस्यनिरूहमनुवासनम् । एतानिपंञ्च कोणिकथितानिमुनीश्वरैः ५८ ॥ इति श्रीशार्ङ्गधरेउत्तरखण्डेनस्यविधिरष्टमोऽध्यायः॥८॥ धूमस्तुषड्विधःप्रोक्तःशमनोटहणस्तथा । रेचनःका सहाचैववामनोवधूपनः १ अमनस्यतुपर्यायौमध्यः प्रायोगिकस्तथा । वहणस्यापिपर्यायोस्नेहनोमृदुंरेवचर रेचनस्यापिपर्यायोशोधनस्तीक्ष्णएवच । अधमार्दाश्च खल्वेतेश्रान्तोभीरुचदुःखितः३ दत्तवस्तिििरक्तश्चरा चौजागरितस्तथा। पिपासितश्चदाहार्तस्तालुशोपीतथो दरी ४ शिरोभितापीसिमिरीचर्याध्मानप्रपीडितः । चतो रस्काप्रमेहात.पाण्डुरोगीचगर्भिणी ५ रूक्षःक्षीणोभ्यवह तवीरक्षौद्रघृतासवः । भुक्तानदधिमत्स्यश्चवालोद्धःकृ शस्तथा ,६, अकालेचातिपीतश्चधूमःकुर्यादुपद्रवान् । पग ) अभिप्यधनकहे "दद्धयादि भतग" त्यागै मुष्टु पूर्वोक्त भाँचार कर (परफर्म सरया) चमन, विरेक, नस्य, निरुवस्ति और अनुवासनवस्ति ये पंचकर्म मुनीश्वरों ने बहे हैं ॥ ५ ॥ इति श्रीशाघरमुपाकरेउत्तरखण्डे अष्टमोऽध्यायः ।।।। (अब धूमपानविधानम् ) धूमपान छः मकारक हैं शमन, बृंहण, विरे- चन, कासहा वामन और ब्रणधूपन ये छः मकार जानना || १।। (शमनादि धूमोंके पर्याय )शमन धूमपान की पर्याय संज्ञा मध्य और मायोगिक बंदण पर्याय स्नेद और मृदु ।। २ ।। रेचन पर्याय शोधन और तीक्ष्ण धूम में अयोग्य थदित भयभीत दुःख पीड़ित ॥ ३ ॥ धूमसेवन अयोग्य प्राणी पस्तिक्रिया दस्त आते को रातिजाग को प्यासको दाहसे मीडित को तानु उदर सूखनगालेको । ४॥ शिररोगी को तिमिररोगी को उचाकी रोगीको घामानरोगी को पेट फूलने को उक्षतीको प्रमेही पाडुरोगीको गर्भिणी को ॥ ५ ॥ स्तयो क्षीणको द्ध, शहना त स्वरस, मद्य, दही या मछली इनके भोजन दिये यो वालक दृद्ध दुर्वल इनसोधुमपान योग्य नहीं ॥६॥ सौर श्रममय धूमपान करने से उपद्रा उत्पन्न .
२५ २ अध्याय ] भापाटीकासमेता। तष्टसर्पितःपानंनावनाञ्जनतर्पणम् ७ सपिरिक्षुरसंद्रा क्षापयोवाशर्कराम्बुवा । मधुराम्लौरसोवापिशमनायादा पयेत् -'धूमञ्चद्वादशाहोद्गृह्यतेऽगीतिकान्नरः। का सश्वासप्रतिश्यायान्मन्याहनुशिरोरुजः ९ वातश्ले विकारांश्च हन्याहूमःसुयोजितः । धूमोपयोगात्पुरुपः प्रसन्नेन्द्रियवामनाः १० दृढकेशद्विजश्मश्रुसुगन्यवाद नोभरेत धूमनाडीभवेत्तत्रत्रिखण्डाचत्रिपत्रिका ११ कानि ठिकापरीणाहाराजमाषागमान्तरा । धमनाडीमवेदीर्घा शमनेरोगिणोशलैः १२ चत्वारिंशन्मितैरतद्वद्वात्रिंश निर्मदौस्मृता। तीक्ष्णेचतुर्विशतिभिःकासनेपोडशोन्मि तैः १३ देशाङ्गुलैमिनीयेतथास्याबणनाडिकाकला यमण्डलंस्थूलाकुलित्थागमरन्धिको १४ अथेषिकांप्रलि इतर (अकाले धूमपानादि कृत उपद्रव की चिकित्सा) धूमपानमे भये उपद्रव में घी पिलावै नास देय अंजन वरै अर्थात् शरीर वृति करने की दाखका रूप दे ॥ ७ ॥ घृत, अन्वरस, दास, दूध, मिनी व शपर गेति खिलावै वा इनका रस शहद युक्त पिलाय और मधुर वस्तु वा समिठा पदार्थ देतो धमउपद्रव शातहो ॥ ॥ (धूमपानावस्था समय ) धूमसेग पारद वर्ष से अस्मी वर्ष पर्यन्त के मनुष्य को करायै जो धूमपान अच्छा बन तो श्वास, कास, नाक पहना, गले व माथे की पीडा ॥ रात मफजन्य विकार सर दर ही (धूमपानविषे उपयोगी की प्रकृति ) श्रन्छ। धूमपान भये पशु- रादि इन्द्रिय र अन्तःकरण तया वाणी ये प्रसन्न होती है ॥ १० ॥ और केश, दन्त च छोड़ी दो घूमनाडी तीन सएड तीन पर्व की ॥ ११ ॥ निया सी मोटी मटरसाछेदही दीर्षहो ॥ १२ ॥ शमाधान की नली१० ल लम्बी ले मृदुसंज्ञककी ३२ अंगुल लम्बी तीक्ष्णसंबकी २४ अंगुन लम्बी कासन की, १६ अगुल लम्बी ॥ १३॥ वामनीसंज्ञक की १० अंगुल लमी और रण कहे पाप में-धूनी देने की १० अंगुन की लम्बी परन्तु की मली पूर्वोक्ति नलियों से महीन हो और छेद कुलथी मोश रुग्ने स्वाभिम रहे .. . २६० शाईपग्संहिता " [उचरतएर म्पेञ्चसुलक्षणांद्वादशाङ्गुलम् । धमद्रव्यस्यकल्केनलेप श्याष्टाङ्गुलःस्मृतः १५ कल्कंकर्षमितंलिप्त्वाचायाशुष्क नकारयेत्। ईषिकामपनीयाथस्नेहाक्तांवर्तिमादरात् १६ अङ्गारैर्दीपितांकृत्वाधृत्वानेत्रस्यरन्धके । वदनेनपिवेदमं चदनेनैवसन्त्यजेत् १७ नासिकाभ्यांततःपीत्वामुखेनैवव मेत्सुधीः। सरावसम्पटेक्षिप्त्वाकल्कमङ्गारदीपितम् १८छि नेत्रविवेश्याथवर्णतेनैवधूपयेत् , । एलादिकल्कंशमने स्निग्धंसर्जरसंमृदौ, १६, रेचनेतीक्ष्णकल्कंचकासघ्नेक्षु दिकोषणमावामनेस्नायुचर्मायंदयाडूमस्यपानकमर व्रणेनिम्बवचायंचधूपनसंप्रशस्यते। अन्येपिधमगेहेषुक तव्यारोगशान्तये २१ मयूरपिच्छंनिम्बस्यपत्राणिरहती फलम् । मरिचहिङ्गमांसीचवीजंकाससम्भवम् २२ तो व्रण धूमिल होगा ॥ १४ ॥ (धूमपानस्पैकविधानम् ) दादश अंगुल की सींक दिलके समेत घूमद्रव्य कल्क चदाय छांह में मुरमाय सींक निकारि बकला शल्क लिप्त रहिनाय ॥ १५ ॥ १६ ॥ उसके छेदमें घूमवोरी महीन बत्ती मवेश जलाय देय दूसरा छोर मुँह में ले धुका संचे और मुंहसे धुवा छोडे ।। १७ ॥ और युद्धिमान् नाकसे पी मुंह से छोडे (घूनी विधान ) दो सकोरे एक संपट कर ऊपर छेदरहै उस छेद से संपुट में अग्नि धरि कल्क सुलगा तय दुमुही नलीले एक संपुटके छिद्र में दूसरे मुँइसेत्रणपर धुवाँ देय (कल्कधूम द्रव्याणि) शमन धूमपान में एलादि गणका कल्क देय मृदु में घृतादि स्नेह राल मिलाय परककरि देय ।।१८। तीक्ष्णमें सरसौं च मधु प्रादिकोंको फल्य करि देय बात में मरिच भटकटैयादि कल्यकरि देय यमन हेतु चर्मादिका भुगदेना ॥ ५० ॥ मरण में नीर वचादि कल्कररिदेय ( वाग्भटोरी एला- दिगण ) उभय इलायची, शिलारस, सूद, कसेरू मूल, मकरा, जटामांसी, सस, रोहिपण या अगिया सर, कपूर, पचरी, विरमानी, अजवायन, तज, तमालपन, उर, मोया, चमेली, पेसर, सीपी, वानप, टेक्दारू, अगर केसर निमाचमूल, गूगल, रान, पर, चरापुर ये एलादिगण है ।। २ ।। me -- अध्याय १०:] भोपाटीकासमेता। २६ छागरोमाहिनिर्मोकंविष्ठाडालकीतथा । गजदन्तश्चत चूर्णकिश्चिद्धृतविमिश्रितम् २३ गेहेषुधपनंदत्तंसर्वोन्या लग्रहज्जियेत् । पिशाचानाक्षसाजिवासर्वज्वरहरंभवे त्. २४. परिहारस्तुधमेषुकायोरचननस्यवत् । नेत्राणि धातुजान्याहुनलवंशादिजान्यपि २५ ॥ इति श्रीशा धरेउत्तरखएडेधूमपान विधिर्नचमोऽध्यायः ॥९॥ चतुर्विधःस्यादण्डषःस्नैहिकःशमनस्तथा।शोधनोरोप णश्चैवकवलश्चापितद्विधः १ स्निग्धोष्णैःस्नैहिकोबातें स्वादुशीतैःप्रसादनः । पित्तेकट्वाललवणैरूतैःसंशोधनः कफे-२ कषायतिक्तमधरैःकदुष्णोरोपणेत्रणे । चतुःप्रकी रोगण्डूषःकवलश्चापिकीर्तितः ३ असञ्चारीमुखेपूर्णेगण्डू पाकवलश्चरतिबद्रव्येणगण्डूष कल्कनकवल स्मृतः ४ (घोलग्रह निवारण धूप) मोरस, निम्रपत्र, भटकटैया, मरिच, हींग जटामांसी, विनयर ।। २२ । केचुरी, पिलारपीट और हाथी दांत इन ग्यारहो के चूर्ण में धृत मिलाय ॥ २३ ॥ घर धूपित करने से संप वालग्रहं पिशाच व राक्षसों के उपद्रव और इन सम्बन्धी सर्व घर नाशहोय ॥ २४ ॥ (धूम पान में परिहार ) रेचन नस्य सरश करना धुमा पानेकी नली धातुमय वायांसकी में पिये ॥ २५ ॥ इति श्रीशाईवरेउत्तरखण्डेनवमोऽध्यायः ॥९॥ ('गंध केवल य प्रतिसारणकी विधि ) गडूप ४ प्रकार के हैं स्नेहिक शमन, शोधन व रोपण योही ४ प्रकार के कंवल भी हैं ।। १ ॥ (स्नैदिक गं. डूय भेद ) चिकना उष्ण पदार्थ स्नैहिकहै वायु प्रयलता में दोनै ठंढा पदार्थ शमने में पित्त बिकार में कड़वा सट्टा नणं शोधन में कफ विकार में ॥२॥ कपाय करें मधुर वप्तकरि रोपण में देना प्रणादि में ऐसेही काल में जानना ।। ३ ॥ (गंडूप कवलरीति ) जो गीला कादादि मुँइमें भर सूर्य गुलगुलाबै १ दवपायों से कुछ करने पर iii मुसमेघा चराने का प्रकार ।।
२६२ शाईपरसंहिता। [उचरखण्ड दद्याद्वेषचूर्णचगण्डूषेकोलमात्रकम् । कर्षप्रमाणःक ल्कश्चदीयतेकवलोवुधः ५ धार्यन्तेपञ्चमाहर्पाद्गण्डूपकव लादयः। गण्डूपात्सुस्थित-कुर्यात्स्विन्नमालगलादिका मनुष्यस्त्रीरलथापञ्चसप्तवादोषनाशनात् । कफपूर्णास्य तायावच्छेदोदोषस्यवाभवेत् ७ नेत्रघ्राणस्रतिवित्ताचद्ग ण्डूषधारणम् । तिलकल्कोदकंक्षीरस्नेहोवालहिकहितः तिलानीलोत्पलंसर्पिःशर्कराक्षीरमेवच । सक्षौद्रोहनुव क्तस्थोगण्डूषोदाहनाशनः९ वैशद्यजनयत्यास्येसन्दधा तिमुखवणान् । दाहतृष्णाप्रशमनमधुगण्डपधारणम्१० विषक्षारोग्निदग्धेचसर्पिर्धार्यपयोथवातैिलसैन्धवगण्डषो दन्तचालेप्रशस्यते ११ शोषंमुखस्यवरस्यंगण्डूष काजि कोजयेत् सिन्धुनिस्टुराजीभिराकेणकफेहितः१२त्रिफ उसे गड्प करें जो कल्ककरि मुहमें धरि फेराकर सो करल है।॥ ४॥(उभयों- व्यप्रमाणम् ) गड्प के फायमें द्रव्य प्रमाण फोल कवल में कर्ष वर्ष देना ॥ ५॥(गंडूप व कवलयोग्य अवस्था) पाचवर्ष के ऊपर सावधान-करि रोगनिवारणार्थ कपाल, गला व मुरा कुछ सेक तीन वा पाच वा सात दोपनाशक गड्प ( फुल्ले) करै (पुनप्रमाण ) जा मुसमें कफ भरया वा तीनों दोप शान्तितक॥ ६१७॥वा नेन नाफसे जल टपकनेतक गंडूपकरै यातरोग स्नेह गइप तिलरल्क पानी ध वा तिलादि स्निप ये देना ॥८॥(पित्ते शमन- गंडूपम् ) तिल, नीलकमल, घृत, साड, दूध व शहद युक्त कुल्ले, करने से पिच जदाह ठोदी और मुससे द्रहोय ।। ६॥ (व्रणादि पर गंडूप)शहद के फुल्ले करनेते मुस निर्मल, गुममें घाव,दाह व प्यास ये उपद्रव दूरहो मुख शुद्धहो॥१०॥ (पिपादिपर गंदूप) मृत वा घ्य के कुल्ले करने से सिप विकार चने से फटा अग्निसे जरामुरा अच्छाहो दात हलनेपर तिल तैल सैघा युक्त कुल्ले करने से दात हलना दूर होताहै ॥ ११ ॥ (मुखशोपेपर ) मुस सूखना व फीका रहना कानी कुल्लेसे शाति होय ( फदोषपर ) अदरस के ग्समें संघन, त्रिकुटा व राई पीसि मिलाय कुल्ले करने से कफ टोप मिटनाता है ।। १२ ॥
घध्याय १० ] भाषाटीपासमेता। लामधुगण्डपःकफासृक्पित्तनाशनादागुिडूचीत्रिफला द्राक्षाजात्यश्चपल्लवाः १३ यवासश्चेतितत्काथषष्ठांशः क्षौद्रसंयुतः। शीतोमुखेतोहन्यान्मुखपाकंत्रिदोषजित् १४यस्यौषधस्यगण्डूपस्तस्यैवप्रतिसारणम् । कवलश्चा पितस्यैवदेयोऽत्रकुशलैनरैः । केसरंमातुलुङ्गस्यसैन्धय व्योषसंयुतम् १५ हन्यात्कवलतोजाड्यमरुचिकफवात जाम्।कल्कोवलेहश्चूर्णचत्रिविधंप्रतिसारणम्१६आनु ल्यग्रहीतंचयथास्वमुखरोगिणाम् । कुष्टंदा:समझाच पाठातिकाचपीतिका १७ तेजनीमुस्तलोधंचचूर्णस्यात् प्रतिसारणम् । रक्तस्रतिदन्तपीडांशोथंदाहंचनाशयेत् १८ हीनयोगात्कफोरलेशोरसाज्ञानारुचीतथा। प्रतियो गान्मुखेपाकःशोपस्तृष्णाछमोभवेत् १९ व्याधेरवचय (कफ रक्तपित्तपर) विफला चूर्ण शहद में डारि कुल्ला करनेसे कफ, रक्त पिच दोप मुखमें न रहै ( मुखरोगपर ) दारुहल्दी, गुर्च, त्रिफला, दास, चमेली ।। १३॥ और जवासा ये समान भागलेकायकरि छठवा भाग शहददे दे कुल्ले करनेसे निदोप मुखपाक मिटताहै ॥ १४ ॥ गंडूप करनेवाली द्रव्य प्रति- सारण (मंजन) और कवल भी कुराली जनों को जानना चाहिये ( कवल विधान) केसर, विजौरा गूदी, सैंधा निमुटा ॥ १५ ॥ इन सबका कौर बनाय गुग्व में दिलों में तो गुस की कठोरता और कफ व वात की अरुचि दूर हो । प्रतिसारण प्रकार ) प्रतिसारण में तीन प्रकार औपध देनेकेहैं कलक, अक्लेइ चूर्ण ॥ १६॥ जैसा मुख में दोप देसै तैसी आँपर अंगुली के अग्न भाग से मुखके भीतर मलै ( प्रतिसारण चूर्ण) फूट, दारुहल्दी, धरपुष्प, पाहा, कुटकी हल्दी ।। १७ ।। तेजवल, नागरमोथा व लोध इनका चूर्ण जीभ और दारा की जड़ में वा सार मल गिरा इस मतिसारण से दातपीडा, रक्त' गिरना, मसूदा सूजन और दाह ये रोग द्रहोयें ॥ १८ ॥ ( गण्डूपादि हीन वृद्धभये से उपद्रव के लक्षण, हीन भपे कफ अधिक, साद अज्ञानता होती है अन्न सेवरुचि, प्रतियोग से मुख पकना, पिड़िकी होना, मुखशोप, १ शापरसंहिता। । [चरसए स्तुष्टिवंशयवक्तलाघवम् । इन्द्रियाणांप्रसादश्चगण्डूपैः शुद्धिलक्षणम् २०॥ इति श्रीशाईधरेउत्तरखएडेगण्ड्षा दिविधिर्दशमोऽध्यायः ॥ १०॥ : आलेपकस्यनामानिलिप्तोलेपश्चलेपनम् । दोपघ्नो विषहावामुखलेपस्त्रिधामतः १ निप्रमाणश्चतुर्भाग लिभागाीगुलोन्नतः। श्राोव्याधिहरःसस्याच्छुष्को दूषयतिच्छविम् २ पुनर्नवांदारुशुण्ठीसिद्धार्थशियमेव च। पिष्टांचैवारनालेनप्रलेपःसर्वशोथहा ३ विभीतफल मज्जाक्तलेपोदाहार्तिनाशनः । शिरीपंमधुयष्टींचतगरेर क्तचन्दनम् ४ एलामासीनिशायुग्मंकुष्ठंबालकमेवच ।इ तिसंचZलेपोयंपञ्चमांशधृतप्लुतः ५ जलेनक्रियतेसुज्ञ देशाङ्ग इतिसंज्ञितः। विसन्धिपविस्फोटाञ्चोथान्दुष्टन प्यास व ग्लानि ये उपद्रव होते हैं ॥ १६ ॥ (सम्पर गण्डप लक्षण ) मुरा व्याधिनाश, वित्त प्रसन्न, पुप निर्मल, इलंका व इन्द्रियों की समता ये लक्षण होते हैं !! २० ॥ इति श्रीशा घरेउत्तरखण्डेटशमोऽ यायः ॥ १० ॥ (अथ लेपविधानम् ) लेपके तीन नामहै, लिप्त लेप व लेपन लेपदोपन्न व विपन्न होकर वर्गामद है ॥ ॥ मुखलेप तीन प्रकारका है उसका ममाण तीन भाति है जो भगुलभर मोटा लेपहो सो दोपघ्न है, पौन अंगुल मोटा लेप च. दाचे सो विपन्न है, श्रद्धाललेप चर्य है ऐसे तीन प्रमाण हैं मोदालेप रोग- इता है सूखा कातिहर्ता है ।। २ ॥ ( दोपन लेप) गदापुरैना, देवदार, सोंठ, सफेद सरमों और सहिजने की दाल ये पाचौं समान भागले कांजी में पीसि सूजन पर लेपनकर नयाँ राजन दरहोगें ॥ ३॥ बहेडे की मांगीके लेपसे दाह व पीड़ा नाशहा ( दशांगलेप) सिरस की छाल, मुलेठी, तगर, लालच- न्दन ॥ ४॥ इलायची, जटामासी, हल्दी, दारुहल्दी, कुट और नेत्रमाला ये देशी समभाग चूर्णकरि पंचमाश मृत मिलाय 1 4 पानीमें प्रीसि लेपकरनेस विसर्प, विपदोप, विस्फोटक, सूजन व दुष्ट फोड़ा ये सब पराजयहाँ इसका दशागलेप अध्याय ११] गीपाटीकोसमेता। पाञ्जयेत् ६ अजादुग्धतिलैलेपोनवनीतेनंसंयुतः । शो थमारुष्करहन्तिलेपोवाकृष्णमृत्तिकैः ७ लादल्यतिथि घालावृजालिनीमूलबीजकः । लेपोधान्याम्बुसम्पिष्ट कीट विस्फोटनाशनः रक्तचन्दनमजिष्ठातोघंकुष्ठप्रियङ्गवः । वटाङ्कुरमिसूराश्चव्यङ्गनासुखकान्तिंदाः मातुलुङ्गज टासर्पिःशिलोगोशकृतोरसः।मुखकान्तिकरोलेपपिटिका व्यङ्गकीलजित् । १०. लोध्रधान्यवचालेपस्तारुण्यपिटि कापहः । तहगोरोचनायुक्तम्मरिचमुखलेपनात् ११ सि दार्थकवचालोध्रसैन्धवैश्चप्रलेपनम् । व्यङ्गेषुचार्जुनत्व ग्वामञ्जिष्ठावासमाक्षिका १२ लेपःसनवनीतोबाश्वेताश्व खुरजामपी। अर्कतीरहरिद्राभ्यांमईयित्वाविलेपनात् १३ नामद ॥६॥(विपालेप) चकरीके दूध तिलोको पीसि मावनगुक्त लेप कर बा काशमाटी व विलका लेपकरें तो विपसमा मूजन व भिला सूजन दूर होप।।७।। (पुनर्लेप) कलिहारी, अतीस, कध या कटुतुरई मूरी तीनों के चीन पांचों के समान कांजी में पीसिक कीददेश व विस्फोट पर लगाने से दोष मिटते है ।। ८ । (कांतिकारकलेप) रक्तचन्दन, मॅनीठ, लोध, कूट, माल- कंगनी, बटांकुर व मपूर ये सब समान भागने जल में पीसि लेपकर व्यंग (साई) रोग मिटै य कांविषदै ।। (पुनः) वीजपूर की जद मृत, मैनशिलगोवरका रस मिलाप लेपै कांति यदै मुहाँ और भाईरोग ये सब दूरहोय ॥ १० ॥( तास ण्यपिटिका (मुहांसे) पर लेप) जो तरुण मनुष्य के मुँहपर दोटी २ पिडिकी उमर यह तारुण्यपिटिकाह ( लेप ) लोध, धनियां और घर ये तीनों समभाग ले पीसि लेपकर नया गोरोचन व कालीमिर्च पानी में पीसि लगा ॥ ११ ॥ अथवा सरसौं, यच, लोध और सेंधा ये समभाग ले जल में पीसिलेये तीनमकार के लेप इनके लगाने से मुंहपर की तरुणपन की पिटिका मच्छी होयें ( व्यंग रोगपर लेप )धर्जुनटस की छाल या मजीठ वा रत थोड़के नसकी भस्म इन वानों में से कोई द्रव्य हद संयुक्त लेपको तो व्यंगरोग मिटे (मुखपर की झाईपर लेप ) महार के दूध में हली को रिस लगा ॥ १२॥१३॥ - २६६ शाईचारसंहिता । उचरखएर मुखकाण्यशमंयाति चिरकालोवंध्रुवम् । वटस्यपा ण्डुपत्राणिमालतीरक्तचन्दनम् १४ कुष्ठंकालीयकलोध्रमे मिलेपंप्रयोजयेत् । तारुण्यपिटिकाव्यगनीलिकादिवि नाशनम् १५ पुराणमथपिण्यापुरीपंकुक्कटस्यच । मूत्र पिष्टःप्रलेपोयंशीघ्रंदन्यादरुषिकाम् १६ खदिरारिष्टज म्वनांत्वरिभवा मूत्रसंयुतैः । कुटजत्वक्सैन्धवालेपोहन्या दषिकाम् १७प्रियालबीजमधुककुष्ठमाषैःससैन्धवैः।का चोदारुणकेभूमिप्रलेपोमधुसंयुतः १८ दुग्धेनखाखसं वीजप्रलेपाहारुणजयेत् ! आघवीजस्यपूर्णतुशिवाचूर्ण समंद्वयम् १६ दुग्धपिष्टःप्रलेपोयंदारुणंहन्तिदारुणम् । रसस्तितपटोलस्यपत्राणांतहिलेपनात् २० इन्द्रलुप्तंश मंयातित्रिभिरेवदिनैध्रुवम् । इन्द्रलुप्तापहोलेपोमधुनाथ हतीरसः २१ गुञ्जामूलफलवापिमल्लातकरसोपिवा । गोक्षुरस्तिलपुष्पाणितुल्येनमधुसर्पिषी २२ शिरःप्रलेप नो बहुत दिनकी भी पुखपरकी झाई निश्चय दूरहोयें (ताइण्य पिटिकापर लेप) घटके पीलेपत्ते, चमेली, रक्तचन्दन ॥१४॥ कूट,दारुहल्दी और लोप इन सोंको एक में पीसि लेपै तो तरुणनिटिका व्यंग (झाई) होय ॥ १५ ॥ (रूखी पर लेप) पुराने तिलौकी सली व फुट (मुनों) की वीट दोनों गोमूत्र में शीसि लेपफर रूपी दूहोय ॥ १६॥ (पुनःप्रकार ) खैर, नींव च जामुन इन तीनोंकी छाल गोमूत्र में पीसि लेपकरै रुवी नाशहोय ( दारुणरोग पर लेप)चिरोंजी, मुलेठी, फूट उड़द और सेंधवा ये पांचों समानभागले पीसि शवदयुक्त नेपकर दारुणरोग मिटै ॥ १७ ॥ १८ ॥(पुनर्लेप) खसखस पीस दूध लेपकर वा धामकी विपुरी छोटी ॥६॥द्ध पीसिलपे तो दारुणरोग नाराहोय (इन्द्रलप्त पर लेप) कडुवे परसनकी पत्तीका रस तीन दिनले सो वादखोरा दरहो (पुनः) मटक्टेया और शहदका लेंपकर ।। २०१२ ॥ चीनीजह पा फलफे रसका शहद के साथ लेपकर वा मिनाका रस शहद के साथ लेपकरने से वादसोरा दूर हो (केशर्डन लेप) गुखुरू व तिलपुष्प अध्याय ११] भोपाटीकासमेता। नतेनकेशसंवईनंपरम्हस्तिदन्तमपींकृत्वालागीदुग्धर साञ्जनम् २३ रोमाणितेनजायन्तेलेपात्साणितलेण्वपि। यष्टीन्दीवरमहीकातैलाध्यक्षीरलेपनैः २४ इन्द्रलुप्तःशम यातिकेशाःस्युःसघनाहढाः । चतुष्पदानांवोमनखट ङ्गास्थिभस्मभिः २५ तैलेनसहलेपोयंरोमसञ्जननःपरः। इन्द्रवारुणिकाबीजतैलेनाभ्यङ्गमाचरेत् २६ प्रत्यहंतेन कालाग्निसन्निभाःकुन्तलालम् । अयोरजोमङ्गराजस्त्रि फलाकृष्णमृत्तिका २७ स्थितमिक्षुरसेमासंलेपनात्पलि तंजयेत् धात्रीफलत्रयपथ्येहेतथैकविभीतकम्२८पञ्चा घमज्जालोहस्यककंचप्रदीयतेोपिष्ट्वालोहमयेभाण्डेस्था पयेदुषितंनिशि २६ लेपोयंहन्तिनचिरादकालपलितमह त्। त्रिफलानीलिकापत्रलोहभङ्गरजःसमम् ३० अजा मूत्रेणसम्पिष्टंलेपाकृष्णीकरंस्मृतम् ।त्रिफलालोहचूर्णच इनका समान चूर्ण करिके समान वृत में शहद में फैटि ॥ २२ ॥ लगा तो थालयाई बालजमे पर हाधीदातको जलाप रसौत और बकरी के दूध पीसिलेप करै ।। २३ ।। जहां बाल न होन्यया हथेली में तो पारजगें और अगमें पयों न जमेंगे (रसौतविधि ) निरुदण चस्तिमें कही है (इंद्रलुप्तपर लेप) यु. लेटी, कमल य दासको तिलतेल, मृत व गऊके दूझमें पीसि लेपकरै ।। २४ ।। पादखोरा दूरहोय बाल सघनहों ( पुनः) चतुप्पट जीवों की चर्म, रोम, नख, सींग और हाद इनकी भस्म ॥ २५ ॥ तिल लमें केटि लेपकर तो नष्ट पाल जाम ( केश कृष्णीकरण) इंद्रायनके बीनका रोल पाताल र निकारि सफेदवालों में लगा तो काले होजाय (पुगः) लोह, चून, भंगरा, त्रिफला, कालीमाटी ये 'समान चूर्ण करि ॥ २६ ॥ २७ ॥ उच्च रस में सानि मास भर रासि कुछ दिनोंम लेपकर नौ अकालके श्वेतगाल कालं होय (घ. तीयः) श्रांवरा तीन बहेड़ा दो ॥ २८ ॥ श्रामी बिजुली पात्र लोहचून एफ कर्ष ये सर कड़ाही में प्रतिसूक्ष्म घोटै उसी में दिन रात रहने दे॥ २६ ॥ फिर लेगकर नौ गेल केश काने हो (चतुर्थः ) निफना, चीनपर, ने. ) - . शाई धरसंहिता ।। उत्तरखण्ड दाडिमत्वग्विसतथा ३१ प्रत्येकंपञ्चपलिकंचूर्णकुर्याद्वि चक्षणः । भृङ्गराजरसस्यापिप्रस्थपटकंप्रदापयेत् ३२ मासमेकंततःकुर्य्याच्छागीदुग्धेनलेपनम् ।कूशिरसिरा जौचसंवेष्टवरण्डपत्रकैः, ३३ : स्वपेत्प्रातस्ततःकुर्यात्स्ना नंतेनप्रजायते । पलितंस्यविनाशश्चत्रिभिलेपन संशयः ३४ शङ्खचूर्णस्यभागोहीहरितालञ्चभागिकम् । मनः शिलाघाईभागास्वर्जिकाचैकभागिका ३५: लेपोयंवारि पिष्टस्तुकेशानुत्पाट्यदीयते । अनयालेपयुस्त्याचसप्तवें लंप्रयुक्तया ३६. निर्मलकेशस्थानस्यात्क्षपणस्यशिरोय था। तालंकशाणयुग्मंस्यात्षट्शाणशङ्खचूर्णकम् ३७. द्विशाणिवंपलाशस्यक्षारंदत्वाप्रमर्दयेत् । कदलीदेपडतो येनरविपत्ररसेनवा ३८ अस्यापिसप्तभिर्लेपेोमशातन चन और भगरा ये सम् भागले ॥ ३० ॥ छगरी के एनमें पीसि पकवालों पर लगाये तो काले होय (पंचमलेप) त्रिफला लोहवन, शारकी दाल और कमलका कन्द ।। ३.१ ॥ ये पांचों औषध पांच पल और: भगरेका : रस-छ प्रस्य निचोरि पूर्वोक्त द्रव्य एकत्र करि: लोहे की कड़ाही में सूक्ष्म करि घोटै ॥ ३२ ।। एक मासभरि सबै तिस.पीछे निकारि बकरी के दूध में घिज श्वेत घा. लोपर लेपकरै यौर कार से डके पत्ता बांध ।। ३३. रातिभरि बांधेरहे म.. भात स्नान करते समय पोय डा. योही तीन दिन लेप करने से सफेद बाल काले होय ॥ ३४॥ (अथ लोमंशानन प्रकार पाल गिरानेकालेपः) शंखचूर्ण दो माग, हरताल एक भाग, मैनशिन, अर्द्धभाग, सज्जी एक भाग ।। १.३५ ॥ ये.सय दवाई पानी में पीलि जहां के बाल गिराने मंतरही वहां लेप कर वावी वाजीको कपड़े, से. ढका राखे लेप के. पहिले बाल दूर करिकै तब उस -टोरमें यह लेप सातयार करै ।। ३६॥ सवाल गिरे,फिर न हो जैसे पाल: बनवाये पर यह रोमशतन, अतिउत्तम है ( पुंन हरताल दो शाण, शंख पूर्ण छ शाण ॥ १७ ॥ पोशातार दोदा-शाण केले के दण्डके पानी में का सारूपत्र के रसमें वीसि !! सानपार लेप करने से बाल गिरजायँ पाल. स अध्याय ११ भापारीकासमेवा। मुत्तमम् । सुवर्णपुष्पीकासीसं विडङ्गानिमनःशिलाः ३९ रोचनासन्धवंचवलेपनाच्छिननाशनम् । वायस्येडगजा कुष्टकृष्णाभिर्गुटिकाकृता ४०. बस्तमूत्रेणसम्पिष्ट्वाप्रले पाच्छिन्ननाशिनी । वाकुचीवेतसोलाक्षाकाकोदुम्बरिका कणा ४१ रसाजनमयश्चर्णतिलाःकृष्णास्तदेकतः। पयित्वागवांपितैःपिष्ट्वाचगुटिकाकृता ४२ अस्याःप्रले पाच्छित्राणिप्रणश्यन्त्यतिवेगतः । धात्रीसर्जरसश्चैवय वक्षारश्चर्णितः ४३सौवीरेणप्रलेपार्यप्रयोज्यःसिध्मना शने । दामूलकबीजानि तालकंसुरदारुच ४४ ताम्बूल पत्रंसर्वाणिकार्षिकाणिष्टथक्टथक् । शङ्खचूर्णशाणमात्रं सर्वाएयेकत्रचूर्णयेत् ४५ लेपोयंवारिणापिष्टःसिध्मनाश करःपरः। हरीतकीसैन्धवंचगैरिकंचरसाञ्जनम् ४६.विडा लकोजलेपिष्टःसर्वनेत्रामयापहारसाञ्जनंव्योपयुतंसम्पि गिराने को यह लेप उत्तम है (सफेद कुष्ठपर लेप ) पीली चमेली, गजपी. परि, कसीस, विडंग,,मैनशिल ॥ ३६॥ गोरोचन, सैंधव बनों समभाग गो- मूत्र में पीसि लेप कर येत पुष्ट दूरहोय (पुनः) कौवाटोदी, फूट और पीपरि ये सब समान भागने ॥४०॥ सपी (बकरे) के सूत्र में पीसि लेपकरे श्वेत कुष्ठ दूरहोप ( तीसरा ) यकुची, 'अमलरेतस, लाख, कठगुलरी, पीपरि।। ४१ ।। रसौत लोहचून, काले तिल पाठों समभाग गोपिच पीसि लेपकरै ॥ ४२ ॥ तो श्वेत कुष्ठ अतिशीघ्र दूरदोष ( सेहुआं परलेप ) नांचरा, राल व जया- खार ये तीन ॥ १३ ॥ सौवीर या कांजी में पीसि लेप करै सेहुश्रां दरहोय "सोनीर और कांजी का विधान रेचनाध्याय से जानना", पुना) दारुहली, मरी के घीज, हरताल, देवदारु ।। ४४ ॥ और पान ये सय कर्ष कपः भर शेत चूरी शाणभर सब ।। ४५ ॥ पानी में पीसि लेपकर सिम जो सेडा सो दूर होय ( नेत्रलेप ) हड़, संघन, गेरू और रसीत ये चारों समान भागले ।। ४६ ॥ पानी में पीसि पलकपर लेपकर तो सर्व नेत्ररोग दूरहोय, (पुनः). सौत,सोंठ, मिर्च और पीपार ये चारों समान भाग ले पानी में पीसि गोती , 'शाईपरसंहिता। उत्तरखण्ड लानांचमूले कुर्यात्प्रलेपनम् ६२: शिरोतिपित्तजहिन्या द्रक्तपित्तरुजत्तथा । हरेणुनतशैलेंयमुस्तैलागुरुदारु भिः ६३ मांसीरास्नोस्वकैश्चकोप्पोलेपःकफातिनुत् । शुण्ठीकुष्ठप्रपुन्नाटदेवकाःसरोहिः ६४ मूत्रपिष्टैःसुखों प्पोश्चलेपःश्लेष्मशिरोतिनुत् । सारिवाकुष्ठमधुकंवचाक प्रणोत्पलैस्तथा ६५ लेपस्सकाजिकस्नेहःसूर्यावर्ताईभेद केोवरीनीलोत्पलंदूळतिला कृष्णाःपुनर्नवा:६६शङ्ख के नन्तवातेचलेपःसर्वशिरोर्तिजित् । अथलेएविधिश्चान्यः प्रोच्यतेसुंज्ञमम्मतः६७द्वौतस्यकथितौभदौप्रलपाख्यत्र देहको। चर्मामाहिषयद्वत्प्रोन्नतंसमितिस्तयोः६-शीत स्तनुविशोषीचप्रलेपःपरिकीर्तितः आघनस्तथोष्णः - . बकी जड़, खस और नरकद की जड़ ये नवा द्रव्य समान भाग ले पानी में पोसि माधेपर लेप कियेसे 1).६२ ॥ पित्तसम्बन्धी और रक्त पित्त सम्बन्धी मस्तक पीड़ा दूरहो। कफसम्भव शिरपीड़ापर ) मेवही बीज,तगर वाल; बढ़, नागरमोथा,इलायची, भगर. देवदारु ॥ ६ ॥ जटामांसी, रासन और रण्डमेल ये दश द्रव्य पानी में पीसि गरम करि माथे पर लेपै तो कफसम्बन्धी पीड़ा दूरहो (पुनः ) सोंठ, कूट, चकौड़ी वीज. देवदारु, रोहिप विना अगिया सर ये पांचों द्रश्य समान; भागले.॥ ६४ ॥ गोमून में पीसि सुसोपण माथेपर लेपेसे कफजन्य पीडा दरहो (सूर्यावर्त आधाशीशी पर ) सरिचन, कुद, मुलेठी, वच, पीपरि और नीलकमल ॥ ६५ ॥ ये कांजी में पीसि रण्डवेलयुक्त लेप कियेसे सूर्यावर्च ( आधाशीशी) दूरहो (शंखक अनन्तवात सर्व शिरोरोग परविदारीकन्द, नीलकमल दया कारे तिल और गदापुरैना ये पांचों समान भागले पानी में पोसि ॥ ६६ ॥ लेप किये से शलक मनन्तवात च सय शिरपीड़ा मिटै पुनर्विधान ) ज्ञानी वैद्योंकी सम्मतिसे लेपका दूसरा निशान कहामाता है ।। ६७ ॥ (एक प्रलेपारुप दूसरा प्रदेहक इनकी उचाई का प्रमाण) ये दोनों लेप भैसेके गोले चमड़े की भुटाईकी तरह है तोगुणदायक है ॥ ६८. शीनवीर्य सक्ष्यमोश वाधारहित है और यनाप्रलेप , अन्याय १] भापाटीकासमेता। स्यात्प्रलेपःश्लेष्मवातहा ६९ रोमामिमुखमादेयोप्रलेपा 'ख्यप्रदेहको । वीर्यमभ्यग्विशत्याशुरोमकूपैःशिरामुखैः ७० नरानोलेपनं कुर्याच्छुप्वाणनधारयेत्।शुष्यमाणम पेक्षेतंप्रदेहंपीडनप्रति ७१ प्तमसापिहितोमारोमकूप मुखेस्थितः । विनालेपेननिर्यातिरात्रौनलेपयत्ततः ७२ रात्रावपिनलेपोदिविधिःकायोचिचक्षणः। अपाकिशोथेग म्भीरेरक्तश्लेष्मसमुवे ७३ भादोशोथहरोलेपोहितीयो रक्तसेचनः तृतीयइचोपनाहास्याच्चतुर्थःपाटनक्रमः७४ पञ्चमःशोवनोभूयात्पष्ठोरोपणइप्यते । सप्तमोवर्णकरणो नारयतेकमामता:७५वीजपूरजटामांसीदेवदारुमहौष 'धम् । रास्नाग्निमन्थोलेपोयंबातशोथविनाशनः ७६ म धुकंचन्दमूर्वानलगलंचपद्मकम् । उशीरंवालकंपा जानो अमदेहक कफ च बात को हरता है ।। ६६ ।। ये दोनों लेप रोम दूर कराय लगा रोग दूर होनेसे रोममुग गुगुल बन्छी तरह से लेप गुण मवेश करताहै ।। ७७ ॥( लेपने निपेय ) रावको लेप न वर और वारका लेप पूरी नगा क्योंकि सूखने गे रोम उचर तो देह में अधिक पीडा करें ॥ ७ ॥ (रानिलेप निषेधकारण ) राविको तम वेगसे शरीर की उन्णता उपाय रोम पुग्पपर पाय रहती है पिना लेप नियर जाती है इस कारण रात्रिको लेप न करे ।। ७२ ॥ (रामिंक लेपसी विधि ) राशिको लेप चनुर देय निबय कर जहा त्रण चिरकाल तक पपता नहीं और गम्भीर शोकहो या कफ सम्भव हो ॥ ७३ ।। (व्रणोपचार ससमकार लेपम ) प्रथम लेप मजन दूर करने को मग जाह में रधिर को यथास्थान में पिला के नानेको तासरा प्रणपर को साल को मृदु और पतली करने दो चौथा फोर के रहान को ॥ ७ ॥ पांचयां शुद्ध करनेतो जो पीर नवाजी राजार पूरने यो सातवां घाव के चर्म जो शरीर की रंगान करने को जो पीपन रहे ॥ ७॥ (अपने बालोपनियारण लेपजौरासून, मांसी, देवदार, सौंद, रासन और अरणीमूल ये सब समान भागते पानी में पीसि लेपकरे सातशोय शान्त हो ॥७६ ॥ (पिराशोध पर) पुनी, रक्तचन्दन, , नरसलको २७४ शाईपरसंहिता। [ उत्तरखण्ड पित्तशोथेप्रलेपनस् ७७ कृष्णापुराणपिण्याकंशियत्व विपकताशिवा। मूत्रपिष्टःसुखोष्णोयंप्रदेहःश्लेष्मशोथ हृत् ७८ वेनिशेचन्दनेद्वेचशिवादूर्वापुनर्नवा उशीरंपद्म फलोधगैरिकञ्चरसाजनम् ७९ आगन्तुकेरक्तजेचशोथे कुर्यात्प्रलेपनम् । शणमूलकशिगुणांफलानितिलसर्षपाः ८० सक्तवःकिण्वमतसीप्रदेहःपाचनःस्मृतः। दन्तीचित्र कमूलत्वक्स्नुह्यर्कपयसीगुडः ८१ भल्लातकश्चकाशीश सैन्धवंदारणेस्मृतः । चिरविल्वोग्निकोदन्तीचित्रकोहय मारकः ८२ कपोतकङ्कगृध्राणांमलंलेपेनदारणम् ।स्वर्जि कायावमूकाढ्याःक्षारालेपेनदारणाः ८३ हेमतीर्यास्तथा लेपोवणेपरमदारणः८४तिलसैन्धवयष्ट्याह्वनिम्बपत्रनि जडापनाक,ग्वस,नेत्रबाला और कमल ये भाठा समानभागले पानी में पीसि लेप कर तो पित्तशोय दूरहो ।। ७७॥( कफशोधपर लेप) पीपरि, पीना, सहि- जनेकी छाल, पाल पा सांद और हड़ इन पांचोंको गोमूवमें पीसि गुनगुना लेप करे यह प्रदेव संज्ञक लेपकफशोथको दूर करता है ॥७॥ (आगन्तुक और रक्तशोधपर लेप ) हल्दी, दारुहल्दी, रक्त व श्वेतचन्दन इदस्य, गदापुरैना, सस, पद्माक, लोप, गेरू और रसौंत ये सरसमभागले पानी पीसि ॥ ७९ ॥ लेप करने से आगन्तुक और रक्तशोय हो ( अणपकाने पर लेप) सनकी जह, मूली, सहिजने के बीज, तिल, सरसौं ।।८० ॥ सरा, लोहकोट, अलसी के बीज ये बाठो समानले पानी में पीसि प्रदेह संज्ञा लेपसे प्रणपकैगा (व्रण फोरनेपर लेप)जमालगोटा,चीताकी जड वा बाल-सेच मदारका दूध, गुड ॥ १॥ मिलायां, कसीस और सैंधव ये थोपध दोनों दूध पीसि माणपर लेप करनेसे फूटै { पुनः) करंजमींगी, भिलावां दन्नीकीजड़,चीताचाल कनेरफी जड़ ये पाचों पूर्णकर ।। ८२॥ या कबूतर सफेद चील वा गिदके बीटा समान मिलाय लेपकरे, फोड़ा फूटै (तीसरा लेप ) सज्जी व जवाखार इन दोनोंका ले ॥३॥ अथवा हेमनीरी (चोककी) जड़की बालका लेप करे पोडा फोड़नेमें वात भरलइ ॥८॥ (व्रणशोधन लेप ) तिला सपष, मुनेही, नोवपन, हल्दी, लारुहल्दी पौर निसोय पे सर समभागने पूर्ण २७५ अध्याय ११] भागाटीकास मेवा। शायुगैःतिघृतयुतैःपिष्टैःप्रलेपोव्रणशोधनः ८५ नि म्वपत्रघृतक्षौद्रदामधुकसंयुतः। तिलैश्चसहसंयुक्तोले पःशोधनरोपणः८६ करजारिष्टनिर्गुण्डीलेपोहन्याब' राकृमीनालशुनस्याथवालेपोहिङ्गुनिवभवोथवा८७ नि म्वपत्रंतिलादन्तीत्रिरत्सैन्धवमाक्षिकम् । दुष्टत्रणप्रशम नोलेपःशोधनरोपणः८८मदनस्यफलंतिकापिष्वाकान्जि कधारिणा । कोष्णकुर्यान्नाभिलेपंशूलशान्तिर्भवेत्ततः८९ शिग्रुशेफालिकरण्डयवगोधूममुद्रकैः । सुखोप्योबहुलोले पःप्रयोज्योवातविद्धौ९०पैत्तिकेसर्पिषालाजमधुकैःशर्क रान्वितैः।प्रलिम्पेक्षीरपिष्टैपियस्योशीरचन्दनः९१३ ष्टिकासिकतालोहकिगोशकृतासहासुखोष्णश्चप्रदेहोयं करि धीमे पि फूटे फोड़ेपर लगावै वा इनके कल्क की टिकिया बनाय धीमें छोड़ जलावै जब टिकिया जलजाय तब उतार धी राखिदाई टिकिया कि देय ये दोनों प्रकार घण शुद्धकरै ।। ८५॥ (अपशोधन व रोपणपर लेप), नीवपत्र, प्रत, शहद, दारहल्दी, मुलेठी, तिल इन सबको पीसि के लेप किये ते पण शुद्ध होके पूरआताहै ।। ८६ ॥ (कृमिनियारण लेप) करंज, नींव और बकायन इन तीनों को पीसि कृमि के स्थान में भरै तौ कृमि मरजायें चा लहसुन वा हींग पीसिभरे वा हग या नीवपत्र भर तो कृमिनाशें ।। ८७॥(वण शोधन व रोपण पर लेप) नींवपन, तिल, दन्तीको जड और सैधव ये सम ! समान पीसि शहदयुक्त लेप किये ते व्रण शुद्ध होकै पूरिया ॥ ८ ॥(पेट पीर पर नाभिलेपन) मैनफल व फुटकी इन दोनों को काजी में पीसि कुत्र गरम करि नाभिपर लेप किये से पेटशूल मिटता है ।। ८६ ।। ( पातविधि पर ) सहिजने की छालं वकायनपत्र, रंडमूल, यव, गेहूं और मंग ये सम पीसि मुखोष्ण लेप करेस वातविधि प्रहोती है।॥ १०॥ पित्तचिद्रधिपर)लाब, मुलेठी व शकरको धीम लेपकरेसे या अप्सर्गध, खस और रकचंदनकोद्धमें पीसि- लेकरे से पित्तविद्रार दूरहो।। ६४ ॥ (कफविद्गधि पर), शालू, लोह. फोट और गोबर इनचारोंको गोम्नमें पीसि लैरकर इस प्रदेव लेपरो कफविधि- २७३ शाधरसंहिता । [ उत्तरखएड मत्रैःस्याच्छेप्रमविद्रधौ ९२ रक्तचन्दनमजिष्ठानिशामधु कगैरिकांक्षीरेणविद्रमौलेपोरक्तागन्तुनिमित्तने ९३ निचु लःशिग्रुवीजानिदशमूलमथापिवा । प्रदेहोवातगण्डेषुस खोप्णःसंप्रदीयते ६ देवदारुविशालेचकफगण्डेप्रलेपये त् । सर्वपारिष्टपत्राणिग्ध्वाभल्लातसह ६५ छागमूत्रे णमपिष्टमपचीनम्प्रलेपनम् । सर्पपाञ्छिवीजानिशण बीजातसीयवान् ९६ मूलकस्यबीजानितनेणाम्लेनपे षयेत् ।गण्डमालार्बुदंगण्डलेपेनानेनशाम्यति ६७ तक्षे यित्याक्षुरेणाझंफेवलानिलपीडितम् । तत्रप्रदेहंदद्याच्चपि एंगुजाफलैः कृतम् ६८ तेनापवाहुजापीडाविश्वाचीगृद्ध सीतथा ।अन्यापिवातजापीडाप्रशमंयातिगतः.९९ध प्रेरण्डनिर्गुण्डीवभूशियसर्पः । प्रलेपश्लीपदंहन्ति दूर होजाती है ॥ १२॥ (आगतुफ विद्रधि पर तन, मनीठ, हदी, मुलेठी और गेरू ये सब समानभांगने दध में प्रीति चोट या रुधिरोपकारपर लेपकरे अच्छाहो ॥ १३॥ (दातगलगंड पर ) येत और सहिजने के वीज इनदोनों को समानभागले जलप पीसि शव गरम मटेहमशकलेप बरै तैसे ही दशएन पीसि नेवरे ।। ६४ ॥ (कफगनगंड पर ) देवदार व इंद्रायण की जड़ इन दोनों को पीति प्रदेहकलेप कफ व गडमालाको दुरदरै ( अपची पर) सरसा, नीरपत्र और मिलाया इन तीनोंको समभाग राखिकरि ॥ ५ ॥ पकरे के सूत्र में लेप करें तो अपनी हो गडमाला अर्बुद व गलगंउपर रोप) सरसौं, सहिजनके बीज, सनई के बीज, प्रलसी, यर ।। ६६ ॥ और मूली के बीज ये सर मोपच तमानभागले सटाय भये मट्टे में पीसिकै लेपार तो गंडमानामद और गलगंड ये रोग हो । (अपयोहुकपररोप) केवल पारित रोई थन अपने स्वाभाविक कर्म मपीडापरेनहाँ के राम र परि उचीको पीमि मुग्योण लेप करने से भामादक पायु विश्वाची हायकी वायु भीर गुदती यावी वायुमभर पडा होय ।। BERE I (फीलमांच पग्लेर) धरा और मैशी इा तो की, दारिना र सहिंगनेरी बाल और सरसों ये बही पनि भरे पोल पर ला रिये अन् अध्याय,११] भापाटीकासमेता। चिरोत्थमपिदारुणम्.१०० अजाजीहनुषाकुष्ठमेरण्डवद रान्वितम् । काजिकेनतुमंपिष्टंकुरण्डन्नन्प्रलेपनम् १ क रवीरस्यसलेनपरिपिष्टनवारिणा । अमाध्यापिवजत्यस्त लिङ्गोत्यारालेपनात् २ दहेतटाहेत्रिफलांसानपीमधु संयुताम् उपदशेप्रलेपोवंसयोरोपयनित्रणम् ३ रसाञ्ज नंशिरीपेणपथ्ययाचसमन्वितमासाद्रलेपनंयोज्यमुपद शगदापहम्४अग्निदग्वेनुगातीरीक्षचन्दनगैरिकाला मृतैःसपिपास्निग्धेरालेपंकारयेट्रिपक् ५ तिन्दुकीत्वका यैर्वाधृतनिःप्रलेपनात् । यवान्दग्ध्वामीकानिलेनयु तयातया.६दवारमाग्निदग्धेषप्रलेपोत्रणरोपणः पला शोदुम्बरफ स्तिलतैलसमन्वितैः ७ मधुन्दायोनिमालि म्पेद्गाढीकरणमुत्तमम् ।माकन्दफलसंयुक्तमधुकपूरलेपा नात ८ गतेपियौवनेस्त्रीणांयोनिर्मातातिजायता मरिचसे होय ॥ १०८करडे "अण्डवृषि" रोगपर ) कालानीरा, साउरेर, कुट रएडवाल और रवाल थे पांचों समानभागले पांगी में पोसि अण्डकोश पर लेप किये अच्छे होय ॥१॥(उपदंश कहे गरमीपर लेप) कनेर की बार पानी में पीसि इन्द्रियार लैंपे तो उपदंशसम्बन्धी असाध्य पीडा दन्होंय'।। २ ॥ (पुनः) बिकनो कडाही में गनाय राखफरि शहद फैदिकरि लेपकरे तो गरमी के घावशीन पर आने है। ३ ॥ ( पुनः ) रसात, सरसों हड इन तीनों को संगीनभाग ने पीसि शहद में षि उपशमन्सची राद बहते नगपर लेपयर ती उपदेश को हन्ता है ॥ ४ ॥(अग्निंदग्धपर लेप ) वंशलोचने, पाकरि रक्तचन्दन, गेरू और गुई ये पांचों पीति की मिलागलेपर लगा ॥ ५॥ अपराधी यो चोराइकाय य दिलाय लेप कर तो जन्नयी दया शांतदीय (पुनः ) यकी गरी तिन के तेल वि॥ ६॥ लगा लो वप रण पूरि प्राय ( योनि समोरोप) पलाश बार)दे फूल, नगरकन तिल के तेल में शेसि ॥ ७॥ गर्दा बिनाप निमें लेकर या संचित टोय (पुनः) मानपान र कपूर को पोजिसमें दिनांक 15 गिरी गाने रनिया (पुमा इन्द्रिय - .C : शाईपरसंहिता ।। [उत्तरखएर न्धवंकृष्णातगरंवृहतीफलम् ९ अपामार्गस्तिला कुष्टय चामापाश्चसर्षपाः। अश्वगन्धाचतचूर्णमधुनासहयोजये त् १० अस्यसन्ततलेपेनमईनाचप्रजायते । लिङ्गटदिः स्तनोत्सेधःसंहतिर्भुजकर्णयोः ११ सिताश्वगन्धासिन्धू स्थच्छागक्षीरैघृतंपचेत्।तल्लेपान्मईनाल्लिङ्गटद्धिःसजाय तेपरा१२इन्द्रवारुणिकापत्ररसैःसूतविमईयेत्ारतस्यक रवीरस्यकाप्टेनचमुहुर्मुहः१३तलिप्तलिङ्गसंयोगाद्योनिद्रा वोभिजायते। ताम्बूलपत्रचतुचर्णकुष्टशिवाभवम् १४ चारिणालेपनं कुर्याद्वोत्रदोर्गन्ध्यनाशनम् ।कुलित्यसक्तवः कुष्टमांसीचन्दनजरजः १५ सक्तवश्चतकस्यैवत्वचंचे कत्रकारयेत् । स्वेददौर्गन्ध्यनाशश्चजायतेस्यावधूलना त् १६ वचासौवर्चलंकुष्ठरजन्योमरिचानिच । एतल्लेप प्रभावेणवशीकरणमुत्तमम् १७ अभ्यङ्गःपरिषेकश्चपि कठोर करनेका लेप) मरिच, सेंपल, पीपरि, तगर,भटकटैया के फलता॥ लटनीरा के विया, काने तिल, फूट, यव, उड़द, सरसों और असगन्ध ये सब समान पीसि शहद मिश्रितकरि ॥ १०॥ नित्य इन्द्रिय पर मलाकरै तौ इन्द्रिय मोटीहोय च स्त्री के स्तनपर लगाया कर तो कठोर पड़जाय और पुरुषके भुजदपट घ कानपर मर्दन करना भलाई ॥११॥( पुनर्लेप) श्वेत फूनका असगन्ध व संधव इन दोनोंको सूक्ष्म पीसि चौगुना घृत व घृतका चौगुना भेडीका द्ध एक करि आचपर ध जलाय वा छानि इन्द्रियपर लगाये तो इन्द्रिय मोटीहोय ॥१२॥ (योनिद्रव लेप) इन्द्रायण पंत्रका रसले पारा रक्त कनेर के सोंटे चोटि चार चार रस डाले ॥१३॥जर कनरी पीठी सम होजाय तर इन्द्रिय पर लेपित्री प्रसंग कर तो स्त्री मुख पाचे पहिले वीर्यपातकरै (देहदुर्गन्धनिवारण लेप) पान,फ्ट पहड़को पानी में पीसि लेपकरे दुर्गंध दूरहोय (पुनः कुलथी भजि स्ट, जटामासी व रक्तचन्दन का दुरादा॥१४॥ व भूजे चने इन सबको पीसि कपट- छानकर धाकर तो देह दुर्गर द्रहो ॥१॥(वशीकरण लेप ) यच, का- लालोन, फट, हल्दी, दारुहल्दी और मिर्च ये सब समान भागले पानीमें पीति । अध्याय ११] भापाटीकासमेता। चुर्वस्तिरित्तिकमात् । मूतैलंचतुस्याइलबञ्चयथोत्त रम् १८त्रयोभ्यङ्गादयःपूर्वेप्रसिद्धाःसर्वतःस्मृताः। शिरो वस्तिविधिश्चात्रप्रोच्यतेसुज्ञसम्मतः१६ शिरोवस्तिश्च मणःस्याद्विमुखोद्वादशाङ्गुलः । शिरःप्रमाणस्तंबडाम स्तकेमाषपिष्टकैः २० सन्धिरोधंविधायादौ स्नेह कोणी प्रपूरयेत् । तावदार्यस्तुयावत्स्यान्नासानेत्रमुखस्नुतिः२१ वेदनोपशमोवापिमात्राणांवासहस्रकम् । विनाभोजनमे चात्रशिरोवस्तिःप्रशस्यत्ते २२ प्रयोज्यस्तुशिरोधस्तिःप चसप्ताहमेवया । विमुच्यशिरसोवस्तिग्रहीयाबसमन्त तः२३ ऊर्धकायंततःकोष्णनीरःस्नानसमाचरेत्। अनेन दुर्जयारोगावातजायान्तिसंक्षयम् २४ शिरःकम्पादय देहमें लोकवश होने के निमिच लगाये तो अच्छा है ॥ १६ ॥ २७ ॥ (मस्तक में तेल लगानेकी विधि ) अभ्यङ्ग कहे "तैलमर्दन" परिपेक कहे "तेल चुप- इना" पिच कहे "हई के पहलको तेलमें बोरि माथे में बांधे" वस्ति कहे "माथे में चौफेर चर्म वापि तेलभरै" ये नार मकार हैं सो क्रमसे उत्तरोत्तर बलवान् कहाते है॥१८ (शिरोवस्तिविधान) अभ्यङ्ग, परिपेक और पिच ये तीनों सर्वत्र मसिद्ध है और शिरोवस्तिविधि तया मात्रा यहां नहीं कही सो आगे श्लोक में कहेंगे ॥ १६ ॥ (शिरोवस्तिप्रकार ) मस्तकपर औषध धारण करने को शिरोवस्ति कहते हैं बारह अंगुल चौड़ी व हाथभर लमी शिरके समान हफाकर हरिणचर्मकी सी लेइ दोनों ओर खुली दील न हो सो माथेपर चदार भीतर से में चारों ओर पर्द के पीठेसे ॥ २० ॥ निस्संधि कर फिर नीचे चढ़े भये चमड़ेको गुलभर पीठेसे चारों ओर निस्संधि करि मुखोपण तेलभरै (शिरोवस्तिममा. ण)जतक नाक, नेत्र व मुससे जल न यह ॥ २१ ॥ अथवा मस्तकन्यया न मिटै वा इनार माना तक वस्ति स्थित रहै (मात्राप्रमाण अनुवासनवस्ति में कहिमाये है ( शिरोवस्तिकाल ) भोजनके मयम पांच व सातदिन शिरांवस्ति कर( शिरोयस्तिके पोधे किया ) मारधारण कीहुई वस्तिके चारोतरफ एकस उचारकर पटक देव ना बस्तिको उसाड़ चुके तो ॥२॥3॥ मुखोपण जल से गाया घोत्राय नहाने (शिरोपस्तिगुण) वातजन्य सिकम्पादि दुर्नर .
शोभिरसंहिता [उत्तरसएड स्तेनमर्वकाले योजयेत् । स्वदयेत्कर्ण देशंतुकिञ्चिन्नुःपा Wशायिनः २५ मूत्रैःस्नेहैरसैःकोप्णैस्ततःकर्णप्रपूरये त् । कर्णनुपूरितरक्षेच्छतपञ्चशतानिच २६ सहसंचाति मात्राणांश्रोत्र कण्ठशिरोगंदे स्वजानुनःकरोवतकुर्याच्छो टिकयायुतम् २७ एपामात्र भवदेकासर्वत्रैवेपनिश्चयः । रसाय:पूरण कर्णेभोजनात्प्राक्प्रशस्यते २८ लैलायैःपूर कर्णभास्करेस्तमुपागतः। पीतापत्रमाज्येनलिप्त्वाचे हौप्रतापयेत् २९ तलःश्रवणेक्षिप्तःकर्णशूलहरःपर। कर्णशलातुरेकोषण्वस्तसूत्रससैन्धवम् ३० निक्षिपेत्तेन शाम्यन्तिशूलपाकादिकारुजीशृङ्गबेरंचमधुकंमधुसैन्ध चामलम् ३१ तिलपरिसस्तेलंटवणनिम्बुकद्रवम् अदुष्कर्णयोर्देयमेतद्वैवेदनापहम् ३३. कपित्थमातुलु "ङ्गाम्लशृङ्गवेररसेःशुभैः । सुखोपण परकोकर्णशलो रोग दूर होते हैं इस से वैध सदा इस रोग में शिरोदास्त करावा. (कोपचार )मनुष्य को गुम्पेदारि नुन्त गोसूर व तेज व स्वरस गुगोप्य कान में पूरै ।। २६ ॥ ( कर्णमें द्रव्यधारण प्रमाण) कान कर च शिररोग के निवारगाथै सो माना व पचित्तौ हजार यात्रीत करा (मात्राप्रमाण घुटनों पर चुटकी पनावे हाथमे चौफेर सो. मोना ममाण है'( फपिचार समयः) कान में श्रीपद भाजाप्रथा सादिक पर ।। २७१२और तेल मादि संध्यासमय रे ( कर्णव्यथापर ओपध) अक्षम जो गरे पीलेपड़ जाते हैं जिन्हें सोनि उनपर घृत लगाये गये तयारी यानि में सक लेग जप गरम होयं तम निकाल ॥२६॥ कान छोड़े तो संप, फंगल दूरदाय (शुन) बाग में संघरडारि कुरतेचा ॥३०॥ करि कान में पूरे तो कान फे भीतरकी मिटिका दुर होय (हनीय ) अदरकका रस अनेी, शहद, सेंधव पांचरा 152 वितरणी "ब मैं होती है और गुरतुकीसी संप सूरति पची सभेव फली तिनमहश होती है यह तिलंपणी है" सरसों का तेजे, संहांगा में नींकरित घे तत्र पौसि शान में डाले तो कानकी पीड़ा दूरकर ।। ३२॥ -- भापाटीकासमेता। अध्याय १.] पशान्तये ३३ अर्का रानम्लपिष्टांस्तैलाक्ताल्लंघणान्वि तान् । सन्निध्यात्स्नुहीकाण्डकोरितेतच्छदारते ३४ पु टपाककमंकृत्वारसैस्तञ्चप्रपूरयेत् । सुखोप्णैरतेनशाम्य न्तिकर्णपीडाःसुदारुणाः ३५ महतःपञ्चमूलस्यकाण्डा न्यष्टाशलानितुक्षौमेणावेट्यसंसिच्यतैलेनादीपयेत्ततः ३६ यत्तैलंच्यवतेतेभ्यःसुखोणतेतपूरयेत् । ज्ञेयंतद्दीपि कातैलंसद्योगृह्णातिवेदनाम् ३७ एवंस्थाद्दीपिकातैलंकुष्ठे देवतरौतथातैलंइयोनाकमूलेननन्देन्नौपरिपाचितम्३८ हरेदाशुत्रिदोपोत्थंकर्णशूलप्रपूरणात् । फिल्मकायेनय टयाह्वाकाकोलीमाषधान्यकैः३९शूकरस्यवसांपक्त्वाकर्ष नादातिहारिणी।स्वर्जिकामूलकंशुष्कहिद्गुकृष्णासमन्धि और कैयफल का रस विगौरारस, अमलवेतके रस विना चकरस और बदरकरस ये चारों मुखोपण कान में डालने से कर्णशूल नाश होय ॥ ३३ ॥( पंचम) मदारका कोमल टिंगुप्ता नीरस में पीति तिल का तेल घ सेंधानोन मिलाव गोला बांध सेहुँडा के मोटे सएड में पोलाकरि गीलापर अच्छी भांति दानि उसीके पन लपेटि कपडोटी करि माठी चाय मधुरी यांच में पकाय पुटपाक सदृश पकजाय तर निकालि माटी कपडा उतारि कूटो रस निचोरनेय फिर पस रसको मुखोप्णकरि कान में हार तो कानकी दारुणशूल शान्तहोय ॥ ३४ ॥ ३५॥ (कर्णशूलपर दीपिकातेल) महापश्चमूल की जड़ आट अंगुन ई वा वस लपेट दीपमें पारि चिमटो से.पारि कटोरी में टपकावं बदी,गुनगुना ल कानमें टालनेसे कानकी तपका दूर होतीदै तया शहट, पञ्चमून, देल, रण्ड, टेटी,शिवनी और पाटल इनकी जड़को कहते हैं ॥ ३६ । ३७ ॥ (पुनः) टेर तेल व टेट्सूल को पानी में पीसि करक करि चौगुना निल वेलको मिलाय समान जल देय-जलजलाय तारि सहता सहवा।।माकानमें डालनेमे त्रिदोप- पन्य कर्णशल मिटै (कर्णनादपर तेल) मुलेटी, असगन्ध,पाप और धनियां इनवारोंका पाय व पल ॥ ३६॥ शूकर की चरती में पचाय पर दरी रहिनाय तव कान में टाल तो कर्णनाद को निकाल (कर्णनादपर श्रेष्टनेल) 'शाधिरसंहिता। [ उत्तरखण्ड तम् ४० शतपुप्पाचतत्तलपक्कंशुक्तंचतुर्गुणम्। प्रणादंशू लवाधिर्यसार्वकर्णस्यनाशयेत् ४१ अपामार्गक्षारजलेत रक्षारंकल्कितंक्षिपेत् । तेनपकंजयेत्तैलंबाधिर्यकर्णनादक म् ४२ शम्बूकरयतुमांसनपचेत्तैलंतुसार्पषम्।तस्यपूरण मात्रेण वर्णनाडीप्रशाम्यति४३चूर्णपञ्चकषायाणांकपि त्थरसमेवच । कर्णस्रावेप्रशंसन्तिपरणंमधुनासह ४४ ति न्दुकान्यभयालोभ्रंसमाचामलक्यपि।ज्ञेया पश्चकपाया स्तुकर्मण्यस्मिन्भिषग्वरैः४५स्वर्जिकाचूर्णसंयुक्तंवीजपूर रसंक्षिपेत्। कर्णनावरुजोदाहाःप्रणश्यन्तिनसंशयः ४६ आम्रजम्बूप्रवालानिमधुकस्यवटस्यचाएभिःसंसाधितंत लंपतिकर्णोपशान्तिकृत ४७ पूरणहरितालेनगवांमूत्रयुते सज्जी, सूनी मूली, होग, पीपरि ॥ ४० ॥ और सौंफ ये पांचों समभाग ले योगुने तिल तेल में समान मध्यखएडोक्त शुकमें पचावै जर केवल तेल रहनाय तत्र कान में नुयावे तो कर्णनादशल बधिरत्व व कान बहर इन रोगों को नशाता है ॥ ४१ ॥ (बधिरत्व पर अपामार्गक्षारतेल) लटजीरे की रास चौगुने पानी में घोलि घेगोलि रातिभर घर मात निर्मल जलले चौथ्याई रोलदे पचाप पानी जलाय कान में डाले तो यधिरत्व (पहिरापन ) मिटै गुनने लगे ॥ ४२ ॥(कर्णवण पर शंबूकतेल) घोचेका मांस चौगुने तेलमें सालकरि पचाय ले यह तेल कान में डाले तो प्रण दूरकरै ।। ४३॥(कर्णनाष पर औषध ) पश्चकपाय का चूर्ण, कैफरस और शहद मिलाय कान में डाल तो कान बना बन्द होनाय ॥ १४ ॥ (पश्चकपायवृक्ष ) तेंदू, हड़, लोध, मैंनीठ और आपला इनपाचों में से हडच आंवलाका फल पाकीकी छाललेना चाहिये इस कर्म में श्रेष्ठ वैद्योंको पश्चकपायसंझक वृक्ष जानना चाहिये ।। ४५ ॥ (पुनस्कर्णस्राय पर) सज्जीको विजौरा रसमें घोटि कान में डाले तो कान का चंदना बन्द होय ॥ ४६ ॥ (पुन: आप, जामुन, महुया व बरगद इन चारों के सेंपल सी नुगदी चौगुने तिल तेल में जराय लेन कानमें सलने से पीबहना घन्द होय ॥४७॥ (कर्णकीटपर तेल) हरिताल पीसि गोमत्र २८३ अध्याय १२] भापाटीकासमेता। नच । अथवासातैलंकर्णकीटहरंपरम् ४८ स्वरसंशिय मूलस्यसूर्यावर्त्तरसंतथा । व्यूषणंचूर्णितंचैवकपिकच्छू रसंतथा । कृत्वैकत्रक्षिपेत्कणेकर्णकीटहरम्परम् ४९ स द्योमद्योनिहन्त्याशुकर्णकोटंसुदारुणम् । सद्योहिङ्गनिह न्याशुकर्णकीटंसुदारुणम् ५० इति श्रीशाधरेउत्तर खण्डेलेपादिकर्णपूरणविधिरेकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ शोणितंत्रावयेज्जन्तोरामयंप्रसमीक्ष्यच । प्रस्थंप स्थाईकंचापिप्रस्थाईिमथापिवा १ शरत्कालेस्वभावे नकुर्याद्रक्तस्तुतिनरः। त्वग्दोषग्रन्थिशोथाद्यानस्यरक्त तेर्यतः २ मधुरंरक्कतोवर्णमशीतोष्णंतथागुरु । शोणितं स्निग्धविस्त्रस्याद्विदाहश्चास्यपित्तवत् ३ विसताद्रवता रागश्चलनंविलयस्तथा। भूम्यादिपञ्चभूतानामेतेरसगु णाःस्मृताः४रक्तेदुष्टेवेदनास्यात्पाकोदाहश्च जायते।रक चा कडुचे तेल में मिलाये तो कर्णजन्तु दूरहोय ॥४८॥ (पुनः) सहिजन मूल का रस, सूर्यमुखीका रस, सौंठ, मिर्च व पीपरिको पीसि वन क्यमाच की जड़ का रस ये सब मिलाय फॅटि कानमें छोड़े तो कर्णकीट मेरे ॥ ४९ ॥ हींग और शराय इन दोनों में से किसी वस्तुको कान में डाले तो शोधही कर्णकीट को विनाशताहै ।। १५० ।। इति श्रीशाईघरेउत्तरवण्डेएकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ (अथ रुधिरमोक्षणप्रयन ) मनुष्य के शरीर में रक्तनन्यविकार से कु- प्ठादि रोग जानि रुपिर निकल पाने का प्रमाण फहते हैं प्रस्थभर वा अर्द्धप्रस्य व चौथ्याई मस्य कई फुहर भर ॥ १॥ (रुधिरमोक्षणकाल ) देह से रुधिर निकलाने से त्वचापर के रोग, फोदा फुसी व शोधादिक रोग दूर होते हैं इस कारण शरद् काल में मनुष्य को रुधिर निकताना उचित है ॥२॥ (रुपिर गुण ) रुधिर मधुर है लाल व कुछ गरम, गरुआ, चिकना, चिसाय गन्धी, पित्त समान उणलोहू का रूप गुण है ॥ ३ ॥ और रक्त पञ्चतत्वमय है कि सायधी गंध पृथ्वीगुण, गीलापन जलगुण, उपपपरी अग्निगुण, चलना वायु- गुण,नीला होना और श्यामना लाना आकाशका गुण है ॥४॥ (रुविर दुष्ट २८४ शाईबरसंहिता। [सचरखएट मएडलताकपडूःशोथश्चपिटिकोद्गमः५ देरशाङ्गनेत्रत्वं शिराणांपूरणतथा। गात्राणांगौरवंनिद्रामदोदाहश्चजाय तेदक्षीणेऽम्लमधुराकांक्षीमूचित्वचिरूक्षताशेथिल्यं चशिराणाम्याहातादुनमार्गगामिता७अरुणंफेनिलंरक्ष' म्परुषंतनुशीघ्रगम् । अस्कन्दिसूचिनिस्तोदरक्तस्याद्वात दूषितमलपित्तेनपीतहरितंनोलंकृष्णंचवित्रम्म् । अस्क न्युष्यामक्षिकाणापिपीलीनामनिष्टकम् ९ शीतचवहुलं स्निग्धंगैरिजोदकसन्निभम् ।मांसपेशीप्रभंस्कन्दिमन्दगं कफपितम्। द्विदोषदुष्टमसृष्टंत्रिदुष्टंपतिगन्धकमास लक्षणमंयुक्त काजि काभचजायते ११ विपदुष्टंभवेच्छ्या ननासिन्मार्गगतथा।विसं फाजिकसंकाशंसर्वदुष्टकरंच होने लक्षण ) रुधिर मुष्टमये देह में पीड़ा, नण, दाइ, रक्तमण्डल, लाग, सोय व देह पासा दर्द होताहै ॥५॥(रत पड़ने का लक्षए ) मिर बदै नौ देह पनेर लाल और नस रकरित होर पूल जाती ह देह गरू रहती है नाद विशेष, मद यदा ये उपदा होते हैं ॥६॥(चाणरक्तलक्षण ) जिसके और शरीरममाण से घटनाताद उसकी रवि सट्टे व मोठेपर अधिक रहती है और मूळ,त्वचा रूयी, शिथिल शरीर और वायु ऊर्चगामी हो जाता है ऐसे लक्षण जानो ॥ ७ ॥ (यायु परिष्ठ र उपय लक्षण) वायु कुपित रधिर लाल रंग, पेनसदित हो,सप्ता, करा, हलका, शीधगामी, पतला घ दहमें सुई समा काँचता है ॥ ८ ॥ (पित्तकरि दुष्ट रुधिर लनप) पित्त कुपित र घिर-पीळा, रितनीला व काला, पके आमकी गघाला व नत्ता कर पीटी पासी न सा॥९॥ कफारिदुष्टमधिरलक्षग)कफ कुपित रककास उरखा, चिकना, गेसका रह मास व कुटकी मिश्रित व गादा कर स्थिर होता ॥ ॥(दो बा तीन दोर कृषिम रुधिर लक्षण दो दोपकारिद् पित लोहमें दो दोपक रामण पाये जाते है मिटोपप्ति में पीपकी गन्ध होती चार सय लक्षण हो पाये जाते हैं और कानी सर होता है ।। ११॥ अनिष्ट रफर मालारग रक्त उपरचद येनाकी राह प. माझी सी गलती है बागी सघन सर धातुपों को अध्याय १२] भापाटीकासमेता। हु। इन्द्रगोपप्रभंज्ञेयंप्रकृतिस्थमसंहतम् १२ शोथेदाहे ङ्गपाकेचरक्तवर्णेसृजःखतौ । वातरक्ततथाकुष्ठेसपीडेदुर्ज यनिले१३पाणिरोगेश्लीपदेचविषदुष्टेचशोणिते । ग्रन्थ्य बुंदापचीक्षुद्ररोगरक्ताधिमन्थिषु १४ विदारीस्तनरोगेषु गात्राणांसादगौरवे। रक्ताभिष्यन्दतन्द्रायांपूतिघ्राणास्य देहके १५ यकृलीहविसपुविद्रधौपिटिकोद्गमे । कर्णौष्ठ घ्राणवक्ताणांपाकेदाहेशिरोरुजि १६उपदेशेरक्तपित्तेरक्त सावःप्रशस्यते । एषुरोगेषुशृङ्गै;जलौकालावुकैरपि १७ अथवापिशिरामोतैःकुर्याद्रक्तस्रुतिनरः। नकुर्वीतशिरामो क्षंकृशस्यातिव्यवायिनः :१७ क्कोवस्यमीरोगर्भिण्या:सति । कापाण्डुरोगिणाम् । पञ्चकर्मविशुदस्यपीतस्नेहस्यचा शंसाम् १९ सर्वाङ्गशोथयुक्तानामुदरश्वासकासिनाम् । छद्यतीसारयुक्तानामतिस्विन्नतनोरपि २० ऊनषोडशव पस्यगतसप्ततिकस्यच । आघाततिरक्तस्यशिरामो बहुत दुष्ट करता है (शुद्धरक्तलक्षण) शुद्धरक्त धीरबहूटी के रंगवाला हो कर पतला होताहै स्पर्श में उष्ण व शीघ्रचारी कहाताहै ॥ १२ ॥ (रक्तमो क्षणयोग्य ) शोधमें दाहमें अंगपाक में रक्तवर्ण अंग में नाक से पहने में वातरक्त कुप्ठ, कष्टसाप पीड़ा वातसंयुका में ॥ १३ ॥ हाथरोग में पीलपाउँ- वा विपकरि गिरे रक्तमें ग्रंथि, अर्बुद, अपची, क्षुद्ररोग, रक्ताधिमन्य ॥ १४ ॥ विदारी,कुचरोग, देहजकड़ना, रक्ताभिप्यन्द, तंद्रा, दुर्गध ॥१५॥ यकृत, प्लीह, विसर्प, पिद्रधि, पिटिका, कान, ओठ, नाक व मुस पकने मेंदाइ,मायगी पीड़ा । १६ ॥ उपदंश व रक्तपित्त इनरोगों में रुधिर निकलाना उचित है (रक्तमो. क्षणप्रकार ) सिंगी, जोंक, तोयी और फम्त इन चारों से रक्त निकला। १७ ॥वा शिरामोक्षों से मनुष्य रक्तनिकला (शिराछेदन अयोग्य) दुर्बल, चिपयी ॥ १८ ॥ नपुंसक, भीत (डरपोक ), गर्भिणी, गोदवाली, पांडुरोगी, घमनाचिककृती, स्नेहादिमती. अर्शरोगी ॥ १९ ॥ सर्वोगशोषयुक्त, उदर श्वास कास, उनकी अतीसारी और प्रतिस्दी॥ २० ॥य सोलहकेभीतर an २८६ गाईपरसंहिवा।। [उत्तरखर क्षोनशस्यते २१ एषांचात्ययिकेयोगेजलौकाभिस्तुनिर्ह रेत् । तथापिविषयुक्तानांशिरामोक्षोपिशस्यते २२ गो ड्रेणजलोकाभिरलाबुभिरपित्रिधा । वातपित कफैर्दुष्टंगो णितंसावयेहुधः २३ द्विदोषाभ्यांतुसंसृष्टंत्रिदोषेरपिदूपि तम् । शोणितंत्रावयेयुक्तयाशिरामोक्ष पदेस्तथा २४ गृह्णातिशोणितंशृङ्गंदशाङ्गुलमितंवलात्।जलौकाहस्त मानचतुम्बीचद्वादशाङ्गुलम२५ पदमङ्गलमात्रेणशि रासर्वाङ्गशोधिनी। शीतनिरन्नेमूछीतितन्द्राभीतिमदश मैः २६ युतानांनस्रवेद्रक्तथाविण्मूत्रसङ्गिनाम्। अनव र्तिनिरक्तचकुष्ठचित्रकसैन्धवैः २७ मर्दयेद्रणवलंचतेन सम्यक्प्रवर्तते । तस्मान्नशीतेनात्युष्णेनस्विन्नेनातिता पिते २८ पीत्वायवागूहप्तस्यशोणितंत्रावयेवुधः । तथा सत्तर के ऊपर अवस्या (उमर) वाले को अकस्मात् नाकसे रक्तगिरे वो ऐसे मनुष्य अयोग्यके कदाचित् फोड़ा फुसी हो तो जोक लगा ऐसे रोगियोंका विषाद संयोग से रक्त प्रतिदुष्ट हो तो शिरामोक्षण करै २१॥ २२॥ (दोषा. दिकमें रक्तनिकालनेकाविधान ) वायु पित रयत सिंगीसे लेय,पित्तदूषित जोक से लेय,कफर्पित तोवीसे लेय ॥२३॥दो वा तीन दोपों से दूपित दुष्ट रुधिर शिराछेदन करि लेय ॥२४॥ (सिंगी आदिसे रुधिर खिंचने का प्रमाणसरि नित और ललात जस करार दामगुलजाईका सरत जाती है जोंक हायभरताई तांची चारह अंगुलताई ॥ २५ ॥ समशिरा अंगुलभरकी और मोटी शिरा जो सप नोंको रक्तदेय वह सर शरीरके रुधिरको शुद्ध करती है ( रुधिरमोक्षणअयोग्य) शीतकाल में उपास में तंद्रा में मदमें व परिश्चय में ॥ २६ ॥ तथा गलपूननिरोधमें ऐसे मनुष्पके शरीरसे रुधिर नहीं निकलता (शिरारक न देनेका यस) जो नस दिदकै रुधिर भनीभाति न तो कूट, चीता और सैंघर ये समान भागले पीति ॥ २७ ॥ उस बेदपर रगड़ने से अच्छे प्रकार पा देगी (रक्तमोक्षणकाल) न जाडाहो न गरमीहो न संद किये को न उणशरीरी को ॥ २८॥ जो रक्त निकाले तो मथम यवाग अध्याय १२] भापाटीकासमेता। अतिस्विन्नेसोष्णकालेतथैवातिशिराव्यधात् २९ अति प्रवर्ततेरक्तंतत्रकुर्यात्प्रतिक्रियाम् । अतिप्रवृत्तेरक्तेचलोध्र सर्जरसाञ्जनैः ३० यवगोधूमचर्णेधिवधन्वनगैरिकैः । सर्पनिर्मोकचहुँ भस्मनाक्षौमवस्त्रयोः ३१ मुखंत्रणस्यब हायशीतैश्चोपचरेद्रूणम् । विध्येदू_शिरान्तांवादहेक्षा रेणवाग्निना ३२वर्णकपायःसन्धत्तरसंस्कन्दयतेहिमम्। पूणास्यंपाचयेत्क्षारोदाहःसङ्कोचयेच्छिराम् ३३ वामाण्ड शोथेदक्षस्यकरस्याङ्गुष्टमलजाम्। दहेच्छिरांव्यत्ययेतु वामाङ्गुष्ठशिरांदहेत् ३४ शिरादाहप्रभावेणशुष्कशोथः प्रशाम्यति । विसूच्यांपाददाहेनजायतेग्नेःप्रदीपनम्३५ सञ्चन्तियतस्तेनरसश्लेप्मवहाःशिराः । यदादिर्यक प्लीहोःशिशोःसञ्जायतेसृजः ३६ तदातत्स्थानदाहेनस दे तृप्तकर लोह निकला ( अतिरुधिरस्राव ) जिसे स्वेद किये या अमासे स्थूल नस से ॥ २६ ॥ रक्तअधिक मात्रै बन्द न हो तिसके हित यन्त्र मागेवाले श्लोकमें कहतेहैं रुधिर न भनेपर ॥ जो शिरामोक्षसे रक्त न बन्दहो तो लोध, राल व रसौत इन तीनों का चूर्ण ॥ ३० ॥ वा यत्र गेहूँ का चूर्ण वा धव, जवासा और गेरू का चूर्ण या सर्पकी केंचुल वा रेशमी लचोकी भस्म इन में कोई ।। ३१ । फस्त के मुखपर बलकरि दायदे उसपर चन्दनादि शीतोपचार कर शीतल लेपकरै जो इसमें चन्द न होय तो उसके कुछ ऊपर पदिक परत देवा अग्निसम खार उसके मुँहपर लगावै या अग्निसे दागदे तो धन्द होगा। ३२ ॥ इससे क्यों बन्द हो सो कहते हैं लोधादि से घाव मुस अमलाताई शीतल लेप से रक्त भता है क्षारादि से नत पचताई जलानेसे नस का मुख सिकुड़ता है ।। ३३ ।। १ दग्धकृतरोगशांति )जिसका दहिना अण्डकोशफूल उसके बायें हाथ के अंगूठे की जड़द्रागै जो वाम अण्डकोश फूल तो दहिने हाथ के अंगूठा की मूल दागै ॥ ३४ ॥ जो यह प्रारम्भ में करें तो अवश्य अच्छा होय और जिसे शीतरस हो उसके गोड़के नलवे अत्यन्त के तौ रसवाहिनीव कफवाहिनी के मुख सिझुड़ जाते हैं व अग्निदीप्त होती है ॥ ३३६ (दुष्टरक्त शाईथरसंहिता। उपरस्सएड ङ्कुचन्त्यसृजःशिराः। रक्तेदुष्टेवशिष्टेपिव्याधि धनकुप्य ति ३७ अतःस्रावंसावशेपंरक्तेनातिकमोहितः। आन्ध्य माक्षेपकंतृष्णांतिमिरंशिरसोरुजम् ३८ पक्षाघातवा सकासौहिलांदाहंचपाण्डुताम् । कुरुतेवितरक्तमरणवा करोतिच ३६ देहस्योत्पत्तिरसृजादेहस्तेनैवधार्यते । वि नातेन जेज्जीवोरक्षेद्रक्तमतोबुधः ४० शीतोपचारैःकुपि तेस्तुतक्तस्यमारुते । कोणेनसर्पिषाशोथसर्वतःपरिषे चयेत् ४१क्षीणस्यैणशशोनम्रहरिणच्छागमांसजः। रसः समुचितःपानेक्षीरवापष्टिकाहिताः ४२ पीडाशान्तिलघु खंचव्याधेरुद्रेकसञ्जयः।मनःस्वास्थ्यंभवेञ्चिहंसम्यग्वि सावितेऽमृजि ४३ व्यायाममैथुनक्रोधशीतस्नानप्रवात अशेप म होनेपर ( दुष्ट रुचिर कादने में कुछ वाकी रहिनाय तो रोग भी कोप न करेंगा ॥ ३७॥ और अशेप होने का ज्यादा निक्लनेमें उपद्रव उत्पन्न होते हैं अन्धता, याक्षेपक वायु, तृष्णा, तिमिर, माथे में पीड़। ।। ३८ ॥ पक्षापात वायु. श्वास,कास हुचकी,जलन और पांडु ये रोग होते हैं और सब रुधिर निकल जाने पर मरनेका भी सायर्य नहीं होताह ।। ६६ ।। क्योंकि रक्तसे शरीर की उत्पत्ति है और यही देहका थाधारहै रक्त रहने से जीवत है इसीकारण थुद्धिमान् वैद्य रुधिरकी रक्षा करते हैं ।। १०॥ (रुधिरमोक्षणपर दोपकोप) रुधिर निकले पर शब पर पिचकोर दीखे सौ शेखलन्दनादि लेएक र वायुकोष दोरको चा घावपर सूजन होय पीड़ा करै तौ सुसोष्ण घी लगावै तौ रोग नाश होय । ४१ ॥ (रुधिरमोक्षणपर पथ्य ) जो रक्त निकालने परनिर्मल भयाहो तो सरगोश, भेड़, काला इरिण वा छाग इनका मांस खिलायै या गोधमें साठी के चावलको सोर करि खिलाथै वा गऊके दूधसाथ भातको खिला ये पथ्य हितकारक है ॥ ४२ ॥ ( सम्यरक्तमोक्षण लक्षण ) पीड़ाविगत, शरी इलका, रोगका नाश व प्रसन्नमन ऐसे लक्षणों तौ रक्तमोक्षण अच्छा भषा ॥ ४३॥ रक्तमोक्षणपरनिषेध) परिश्रम, मैथुन, मोध, ठंडे पानी से नहाना, बाहर जाना एकगार साना व दिन में सोना तथा जाग्वार, स्वदाई 1 अध्याय १३] भापाटीकास मेता। कात् । एकाशनंदिवानिंद्रांक्षाराम्लन्टुभोजनम् । शोक बादमजीर्णचत्यजेदावलदर्शनात् ४४ ॥ इति श्रीशाई घरेउत्तरखण्डरक्तमोक्षणविधि महादशोऽध्यायः १२॥ सेकआश्च्योतनंपिण्डीबिडालस्तर्पणंतथा। पुटपाको उजनंचैभिःकल्कनेंत्रमुपाचरेत् १ सेकस्तुसूक्ष्मधारागिः सर्वस्मिन्नयनेहितः मीलिताक्षस्यमय॑स्यप्रदेयश्चतुर मुलम् २ सचापिस्नेहनोवातरक्तपित्तेचरोपणः । लेख नश्चकफेकार्यस्तस्यमात्राऽधुनोच्यते ३ पडनावळते. स्नेहनेषुचतुर्भिश्चैबरोपणे । वाञ्छतैश्चत्रिभिःकार्यःसे कोलेखनकर्मणि। कार्यरतुदिवसेसेकोरात्रौचालयिकेगड़े ४एरण्डत्वपत्रमूलैःशृतमाजपयोहितमासुखोपणंसेचनं नेत्रेवाताभिष्यन्दनाशनम् ५ परिपेकोहितोनेत्रेपयाको प्ससैन्धवम् ।। रजनीदारुसिद्धवासैन्धवेनसमन्वितमद पादुवे पदार्थोको त्यागै शोक, पकना, अजीर्ण और जिसमें जोर पड़ता देख उस को न करें ।। ४ ।। इति श्रीशाघरसुधाकरेउत्तरखण्डेद्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ (अध नेत्रोपचारप्रकार ) नेत्ररोगपर सात मकारकी शोपय कहते हैं सेक, पाश्च्योतन, पिण्डी, पिडाल, तर्पण, पुटपाक और अञ्चन ये साल प्रकार नेत्ररोग, कहे हैं ॥ १ ॥ (सेकविधान ) दूध, घृतं व रस भादिक गंगीली प्रास दवाय चार अंगुल ऊपरसे मद्दीन धारदे औषध गिरा इसे सेफाहते ।।२।। (सेकमेद ) वातपित नेत्ररोग में स्नेहन सेक वेय, रजपित्तार रोग मेक देश, कफर्पित में लेसन सेक देय, वृितादि स्नेहन द्रव्य है, लोप, मुनेही व त्रिफलादि ये रोपण द्रव्य है इन्हें दुधमें पीमिले सोंट, मिर्च पीपरि ये लेखन द्रव्य कहाते हैं अव आगे इनकी माना कहने ।। ३ ।। स्नेहन सेककी मानक रोपण सेकी चारसै लेखनकी तीनरी मामा ताई राख मेकादिकाल मेदन) दिनमें कर व रातिको तेग रोगने कर ॥ १४ ॥ (दातामिप्यन्दरमा रण्डकी लाल, पत्र.'गल व हाय क्या करौपा इस मुन्नोपानिक ती मान अभिष्यन्द नेशयारहो (पुनः बर्ग यादव मेश्य शान्ति iry भाईधरसंहिता। [उत्तरसपट वाताभिष्यन्दशमनंहितमारुतपर्यये ।शुष्काक्षिपाकेचहि तमिदंसेचनकंतथा ७ शावरंमधुकंतुल्यं घृतभृष्टंसुचू पितम् । छागक्षीरेस्थितंसेकात्पित्तरक्ताभिघातजित् ८ त्रिफलालोध्रयष्टीभिः शर्कराभद्रमुस्तकैः । पिष्टैःशीता म्बुनासेकोरक्ताभिष्यन्दनाशनः ९ लाक्षामधुकमजिष्ठा लोधकालानुसारिया। पुण्डरीकयुतःसेकोरक्ताभिप्यन्दना शनः १०श्वेतंलोधंघतेमृष्टंचर्णितंपटविस्रुतम्।उष्णाम्बु नाविमृदितसेकाच्छलनमम्बके ११ अथाश्च्योतनकका यनिशायांनकथंचने । उन्मीलितेक्ष्णिहमध्ये बिन्दुभिर्द्ध कुलाहितम् १२ बिन्दवोष्टौलेखनेषुस्नेहनेदशबिन्दवः । रोपणेद्वादशप्रोक्तास्तेशीतेकोप्णरूपिणः १३ उष्णेचशी तरूपाःस्युःसर्वत्रैवैषनिश्चयावातेतिक्तंतथास्निग्धपित्ते फरि सेंके या हल्दी देवदारु व सैधवको डालि छगरीपयते सेंकै॥६॥तो अभिष्य- न्द, चातपर्वय य शुप्काक्षिमाक ये रोग दूरहोय ॥ ७॥ (पित्तरक्त व.अ. भिघातपर सेक) लोध य मुलेठी इन दोनोंके समानगृतमें भूजि धमें मिलाय नप्तकरि सेककर तो पिच, रक्तविकार व अभियातजनित दोष दूरहोय ॥ ॥ (रक्ताभिष्यन्दपर सेक ) त्रिफला, लोप, मुलेठी, शक्कर व नागरमोथा ये गघ समान भागले पीसि ठंडे पानी सेक किये से रक्त अभिष्पन्द दूरहोय।।६।। (रक्ताभिष्यन्दपर) लाम्य, मुलैठी. मजीद लोध, कालासारिखा मोर कमल ये सब पीसि पानीमें सेक कर नौ नेत्रनमे रक्ताभिष्यन्द दूरहो ॥ १० ॥ (नेत्र शूलपर) सफेद लोपको घृत में भूजि पूर्णकार पोटलीमें बांधि उष्णजल में घोरि घोरिखकी पलकन पर फेरै तौ नेत्रशूल हो ॥ ११ ॥ (आश्च्योतन विधान ) भारच्योतन कहे विंदु चुवायना भांखिसोलि ध काय स्वरसादि इन पदार्थ दे। अंगुलीसे घोरि भोखिमें नुवाय देय इसको "भारयातन" कहते है इसको निशासमय कभी न परै ॥ १२ ॥ (लेखनादि आइयोतन में बिंदु डालने का प्रमाण ) लेखनकर्म में पाठ हिंदु'(द) नेत्र में देय स्नेहन में दश रोपल में पारद शीतकाल में सुखोला ॥ १३ ॥ जय अध्याय १३] भापाटीकासमेता। मधुरशीतलम् १४ तिक्तोष्णरूकंचकफेमादाश्च्योतनं हितम् । आश्च्योतनानांसर्वेषांमावास्याद्वाक्छतहितम् १५निमेषोन्मेपणपुलामगुल्योइछोटिकाथवा । गुर्वक्षरो चारणवावाङ्मात्रेयस्मृताबुधैः१६विल्यादिपञ्चमूलेनबृह त्येरण्डशिग्रुभिः । काथाश्च्योतनेकोष्णोवाताभिष्यन्द नाशनः१७अन्त्रुपिष्टैनिम्बपत्रैस्त्वचलोधस्यलेपयेतान ताप्यवह्निनापिष्टवातद्रसोनेत्रपूरणात् १८ वातोत्थंरक्त पित्तोत्थमभिष्यन्दविनाशयेत् । त्रिफलाश्च्योतननेनेस वामिष्यन्दनाशनम् १९ स्त्रीस्तन्याश्च्योत नेत्ररक्तपि तानिलातिजिताक्षीरंतैलंधुतंवापिवातरक्तरुजंजयेत् । पिण्डीकवलिकाप्रोक्लावध्यतपट्टवाक नेत्राभिप्यन्द योग्यासावणेष्वपिनिबध्यते २१ अभिप्यन्देऽधिमन्येच वातादि में मारच्योतन सेन्या दग- २१२ गाईभरसंहिता । उत्तरसएट सजातेश्लेष्मसम्भवे। स्निग्धस्विन्नोत्तमाङ्गल्यशिरस्ती दणैर्विरेचयेत्, २२ अधिमन्थेषसःपुललाटेवेधयेच्छिरा म्। अगान्तमर्वथामन्थेनुमोरुपरिदाहयेत् २३ अभिष्य न्देषुसपुयनीयात्पिण्डिकांवुधः। वाताभिष्यन्दगान्त्य थैस्निग्धोपणापिण्डिकाभवेत्। एरण्डपत्रमूलत्वनिर्मिता वातनाशिनी २४ पित्ताभिष्यन्दनाशायधात्रीपिण्डीसुखा वहा ।महानिम्बफलोद्भूनापिण्डीपित्तविनाशिनी २५शि पत्रकतापिण्डीउलेमाभिष्यन्दनाशिनी । निम्बपत्रक तापिण्डीश्लेष्मपित्तहराभवेत्२६त्रिफलापिण्डिकाप्रोक्ता नाशिनीश्लेष्मपित्तयोः। पिटवाकाग्जिकतोयेनघृतभृष्टा चपिण्डिका२७ गोध्रस्यहर हरतिक्षिप्रमभिष्यन्दर्मलग्भवम् शुण्ठीनिम्दलैःपिण्डीसुम्योपणास्वल्पलैन्धवैः २८धार्या चक्षुपिसंयोगाच्छोथकण्डूव्यधापहा । 'विडालकोवहि (नेत्राभिष्यन्दपर शिरोरेचन ) जिसे कफत अभिप्यन्द व अधिमन्यहो उसके मस्तकमें तेनालगाय पसीना निकलाय नासलेय यह मस्तक शुद्ध करनको भत्ताहै ॥२०॥(सर्षाधिनन्यपरसर अधिमान्य में शिकी फस्तले अर्शमन्य में भौह दरार ता बाराम होय ॥२३॥ अभिष्पन्दादि पर) सर्वाभिप्यन्ट में वही द्रव्यमा कल्क नेत्रपर पाने वाताभिव्य दमें चिकनीय उपगद्रव्य की पिण्डी पाधै (पात व पित्ताभिध्यन्दपर) रंडके व मनाया बालको पीसि पिंडी परि नेर राने से आतामियन्द दरहोय ॥ २४ ॥ श्रावरे को पिण्डी वाधने व सामिप्यन दरहीय (पुनापिताभिप्यन्द पर) यायनके फन्न की पिटी ये तीताभिष्यन्द दूरहोर ॥ ५॥ (कफाभिष्यन्दपर / सहिजनके पत्तों की पिटी धाधेस फाभिष्यन्द दूर होप (कफपित्ताभिष्यन्दपर ) निरपन चा त्रिफनेकी विडीमा तो कपरिचामिप्पट दूरहोग ( रक्ताभिप्यन्दपर ) लोपयो कान में पाटि गृत में भूनि पितरि सारनमे ॥ २६ ॥ २७॥रकानिष्प. न्द विनाराहोय (नए पवाजपर सोड, नपत्र र थोडासा सेपर मि. लाप गनानी पिसीना॥२८॥ रमा राजनीयोमा पिडादधि- १ अध्याय १३.] भापाटीकासमेता। लेंपोनेत्रपक्षमविवर्जितः । तन्मात्रासापरिज्ञेयामुखलेप विधानवत् २९ यष्टीगरिकसिन्धूत्थदांव/तायः समांश कैः।जलपिष्टैहिलेपःसर्वनेत्रामयोपहः ३० रसाजनेन वालेपःपथ्याविश्वदलेरपि। कुमारिकाग्निपत्रैर्वादाडिमी पल्लवैरपि ३१ बचाहरिद्राविश्वैर्वातानागरंगैरिकः । दग्ध्वाग्नौसैन्धवलोधंमधूच्छिंष्टयुनेघते ३२. पिष्टमस नलेपाभ्यांसद्योनेत्ररुजापहम् । लोहस्यपात्रसंघष्टोरसो निम्बफलोद्भवः ३३ किञ्चिद्धनोबहिलेपोनत्रवाधां व्यपोहति । संचयॆमरिचंकेशराजस्वरसंमर्दनात् ३४ लेपनादर्मणांनाशंकरोत्येपश्योगराट् । स्विन्नाभित्वा विनिप्पीड्यभिन्नामञ्जननामिकाम् ३५ शिलैलानत सिन्धूत्थैः सक्षौद्रेःप्रतिमारयेत् । अथर्पणावं वच्मिनेत्र तृप्तिकरं परम् ३६ यक्षपरिशुष्पश्चनेनंकुटिलमाविल धान ) मासि मंद तले ऊपरेकी पलकवर लेपचार चरुनी परापदे इसे विदाल कोई इसकी मामा मुसलेप रागान जानी ॥ २९ ॥ ( सर्वाक्षिरोग पर पिटाल) मुलेठी, गेरू, संघ, दारुहल्ली र सारियों ये पांचों समान पानी में पासि टेपको नीमर ने जाभियन्द जायें ॥३० (पुनः) रमीत गजमें पीमि लेपकर अपना पड़, सोंठ धीनुवार पीता,मनारएन 11 ३१॥ या यच हल्दी व मोंट पा साय, गेरू ये भिन्न २ पानी में पीसि लेप कियेसे सब नेत्ररोदरहोय (पुनराधार लोषको आने मोम शीमें गरि अंगन फरि लेप भी करें तो गडी नेरोग मन्ये होप (पुनः ) नीरसको नहपात्र गरि ।। २/३३ गादामये लेप विप से नेमामात हय (अर्मरोगपर टेप) मारेक रसमें मरिचको रगरि ॥ ३४ ॥ लेकर तो सर मर्मरोग गाएरै यर रामलोग है (प्रतिसारण अंजाम नामिका पिकिसी पर ) या मोहिनी मोगर दोनी इस मिती पर पारा पोनी से दानिशार शिज. इसापनी, नगर, सर पीगि शहट गरि लगाव नहीं हो रही । (नेप्रपर त. पंग मंद सपने को बात कहते हैं ॥ १६॥ स योग्य जी नेर २६४ शायरसंहिता। [उत्तरखण्ड म् । शीर्णपक्षमशिरोल्पातकृच्छोन्मीलनसंयुतम् ३७ ति मिरार्जुनशुकायेरभिष्यन्दाधिमन्यकैः । शुक्राक्षिपाक शोथाभ्यायुक्तंबातविपर्ययैः ३८ तन्नेत्रंतपणे ज्यं नेत्रक मविशारदैः । दुर्दिनात्युष्णशीतेषु चिन्तायासभ्रमेपु . च ३९ अशान्तोपद्रवेचाक्षिणतर्पणनप्रशस्यते । वाता तपरजोहीनेदेशेवोत्तानशायिनः ४० श्राधारोमापचणे नक्किन्नेनपरिमण्डलो। समौढावसम्बाधी कर्तव्योनेत्र कोशयोः ४१ पूरयेद्धृतमण्डेन विलीनेनसुखोदकः । अथवाशतधौतेन सर्पिपाक्षीरजेनवा ४२ निमग्नान्य क्षिपक्ष्माणि यावत्स्यस्तावदेवहि । पुरयेन्मीलितेनेने त तउन्मीलयेच्छनैः ४३ धारयेद्वर्मरोगेषुवाइमात्राणांश तंबुधः। स्वच्छेकफेसन्धिरोगेमात्रापञ्चशतंहितम् ४४ शुक्लेचषट्शतंकृष्णरोगेसप्तशतमतम् । दृष्टिरोगेष्वष्ट रूले २ कटोरता व गुरुता युक्तहों झरित वरुनी शिर उत्पात, कृच्छोन्मीलन को जल्दी पलकै ल॥ ३७॥ तिमिर, अर्जुन, फुल्ली, अभिप्यन्द, अधिमन्य शुझाक्षिपाक, सूजन और वातसंबन्धी व्यया ॥ ३८ ॥ ये रोग रतियोग्य है (तर्पण यर्जित ) दुर्दिनमें अति उकाल में अतिशीतकाल में चिन्ता परि. श्रम और भ्रमों में 1 ३६॥ और यदि नेत्र उपद्रव शाल न हो तो ये तर्पण लायक नहीं कहाते हैं । तर्पणविधान ! जिस स्थान में ययारि, गामी व धरित न जाय इनके पचावको ठौर रोगी उताना पाई॥४०॥ तर उसके नेत्रों के चारों भोर मोहदी है तिसपर उदकी पीठीले मेडवाथै जमे कटोरी दिवली होती है तब पाखि मुंदवाय उसमें दिसला घी वा प्रोपों का मंड फरि वा सुखायण जल वा सौवारका घोया घृत वा दूधपा फेन या नानीत (नयन ) इनमें से कोई भरे ॥ ४॥ १२॥ कुछ घरमें धरे धीरे पलक मिलमिलाये जिसमें सूक्ष्मती शापध भीतर भी नाय ।। ४ ।। (तर्पणमात्रा) जो पलक बा पोटे के रोगों पर न हो नौ सौ चाइमा ताई औषध भी राब जो कफादिनन्य नेत्र कोई बाहिो तो पाप मात्रा पनि शापय स्थिर रहे ॥४१॥ सफेदी के अध्याय १३] मापाटीकासमेता। शतमधिमन्थेसहस्रकम् ४५ सहस्रवातरोगेषुधार्यमेवंहि तर्पणे। स्विन्नेनयवपिष्टेनस्नेहवीयरितंततः ४६ यर्थी स्वंधमपानेनकफमस्यविशोधयेत् । एकाहंचाव्यहवापि पश्चाहंचेष्यतेपरम् ४७ तर्पणेतृप्तलिङ्गानिनेत्रस्येमानि भावयेत् । सुखस्वप्नावबोधत्ववैशयंवर्णपाटवम् ४८ नि त्तियाधिशान्तिश्चक्रियालाघवमेवच । अथसाश्रुगुरु स्निग्धंने–स्यादतितर्पितम् ४९ रूक्षमस्त्राविलंरुग्णं नेत्रस्यादीनतर्पितम् । रूक्षस्निग्धोपचाराभ्यामेतयोः स्यात्मतिक्रिया ५० अतऊर्ध्वप्रवक्ष्यामिपुटपाकस्य साधनम् । हौबिल्वमात्रौमांसस्यपिण्डौस्निग्धौसुपेषि सौ ५१ द्रव्याणांबिल्चमात्रन्तुद्रवाणांकुडवोमतः । तदे कस्थसमालोड्यपत्रैःसुपरिवेष्टितम् ५२ पुटपाकेनतत्य रोग में से ताई काने डेले के रोगमें सातसै ताई रहै पुतरी रोग में आठौ साई अधिमन्य ॥ ४५ ॥ वा वात रोग में हजार मात्रा लाई श्रीपप भरे रहे (तर्पण में कफाधि के उपाय ) जो स्निग्य तर्पण से कफ उत्पन्नहो तो यष पीसि धूपपान कराय फफका शोधनकर (तर्पणमे दिनप्रमाण ) तर्पण एक दिन व तीन दिन के पांच दिन करें ।। ४६॥ ४७ ॥ (सम्यफ तर्पणलक्षप) सर्पस अच्छाहो तो मुखसे सोचे जागे नेत्र निर्मलहों और कांति वद ॥ ॥ दृष्टि शुद्धहो रोग नाश पलके हलकी ये लक्षण अच्छे तर्पण के हैं (अति. तर्पणलक्षण ) भतितर्पण से नेत्र पानी बहाँ भारी बारिप नित। १९ । (होनसर्पणलक्षण ) नेत्र तेज लाल पौड़ी युक्त र रोग पनि हो (नेत्र सूक्ष्म स्निग्ध पन) मो नेत्र चिकने हाँ दो रुन सारे हावेहों तो स्निग्ध उपायकर ॥ ५० ॥ ( पुटपार्क की रीति कहते हैं) हार- रादि मांस दोपल महीन फरि एकपल घृतादि लिपस्निाय ॥५॥ सरन मूखी भोपय द व द्रवपदार्य कुड़वभर ये सद दिलाता शनि या कार्य पप्र से बेष्टितकरि ।। ५२॥ काहोटी माटी पास ना करने का गोला र सस्प माप को मेत्र मुंदाप रूपरसे सताएको रमाका भाप घोषीप गले के हसनादीपासमा ६. शाईधरसंहिता। त्तरखण्ड क्वाटीयात्तद्रसम्बुधः। तर्पणोतविधानेनयथावंदुपचा रयेत् ५३, दृष्टिमध्येनिपेच्यःस्यान्नित्यमुत्तानशायिनः। स्नेहनोलेखनश्चैवरोपणश्चेतिमात्रिधा ५४ हितःस्नि ग्धोतिरुक्षस्यस्निग्धस्यापिहिलेखनः । दृष्टेवलार्थमित रपित्तामृग्वणवातनुत् ५५ सर्पिमौसबसामज्जामेदः स्वाहौषधै कृतः । स्नेहनःपुटपाकश्च धार्योवेवाक्छते हशो ६६ जाङ्गलानायकृन्मारौलेखनद्रव्यसंयुतैः । कृ प्णलोहरजस्तावशङ्खविद्रुमसिन्धुनः ५७ 'समुद्रफेनं कासीसस्रोतोजलधिमस्तुभिः । लेखनोवाक्छतंधार्यस्त स्यतावद्विधारणम् ५८ स्तन्यजाङ्गलमध्वाज्यतिक्तकद्र व्यपाचितः । लेखनास्त्रिगुणोधार्यः पुटपाकस्तुगेपणाः ५६ वितरेत्तर्पणोक्तांतु क्रियांव्यापत्तिदर्शने । अथसम्प निकालि रस निचोरि नेत्रपर मेसला पापि रसभर ॥ ५॥ (नेत्रपुटपाक रस धारण विधान ) पुढशक रस स्नेहन, लेग्न व रोपण भेदकार में तीन प्रकारका है रोगी को उताना मुलाय नेन खोलिकै भीतर डारै ॥ ५४॥(स्ने- हादि भेद ।। पुटपाशमिया । रूग्वे नेनार चिकना चिकनेर रूवा पुटपाक करना सबलदृष्टि पर रोपण पुटपाकायोग्यहै जो नेग्में दुष्टरोग व रक्तपित्तनम व वायु उपद्रव हो तो आनेवाले रलोक में यही द्रव्य पाग पुटपाक करौ । ५५ ॥ (स्नेहन पुटपार्फ घृतमें हरिणादि माम, वसा, मज्जा. मेदा और स्वा. द्रौपा "काकोल्यादिगणमा चूर्ण" शरार एकफरि पीसि गोलाराधि पुटपाक करि रसले नेत्रमें देय दोसै मरना तक रासै इसे पुटपाक 'याहते हैं ॥ १६ ॥ लेखन पुगक यथोचित कर मृगोंका यह मास, लोहनन, तांगा, शव, भूगा, संघर।।१७। समुद्रफेन, कसीस, सुरमा व बकरी के दहीका पानी, प्रोक्त रोति पुटपाकरस नेनमें सीमानाताई राखै यह लेसन पुटपाक कहाताहै ॥ ५० ॥ (रोपण पुटपाक ) सोका दूध, मृगमांप, मधु, घृत व कुटकी ये सब मिलाप पुटपाककार रसले माखों में देयः यह रोपण पुटपाक है तीनसै मात्रांतक रास नो पुटपाक न्यूनाधिक होय तो नेत्र भारी हैं घनिम्नेगका दोष उत्पन्न होय २९७ अध्याय १३] भापाटीकासमेता। कदोषस्य प्राप्तमजनमाचरेत् ६० हेमन्तेशिशिरेयं मध्याहजनमिप्यते । पूर्वाह्नेचापराह्णेच ग्रीष्मे शरदि चेष्यते ६१ वर्षास्वनभ्रेनात्युष्णेवसन्तेचसदाहितः । लेखनरोपणचैव तथास्यास्नेहनाजनम् ६२ लेखन क्षारतीक्ष्णाम्लरसैरजनमिप्यते । कपायतीक्ष्णरसयुक् सस्नेहरोपणंमतम६३मधुरस्नेहसम्पन्नमञ्जनंचप्रसाद नम् । गुटिकारसचूर्णानित्रिविधान्यजनानिच ६४ कुर्या च्छलाकयाङ्गुल्याहीनानिचयथोत्तरम् । श्रान्तेप्ररुदिते भीतेपीतमधेनववरे ६५ अजीणेंवेगघातेचनाजनसंप शस्यते । हरेणुमात्रांकुर्वीतवर्तिन्तीक्ष्णाजनेभिषक ६६ प्रमाणंमध्यमेध्यईद्विगुणंतुमृदौभवेत् । रसक्रियातूत्तमा तर पदे हुये सदश तर्पणक्रिया करें तो पूर्वोक्तहोय (संपक दोप अंजनः) निसको धारिखदेस भलीभाति पकचुकीहाँ तो उसके नेत्रों में अंजन लगाना फिर पंचवें दिन लगा ॥ ५६ । ६० ॥ और साधारण में हेमंत व शि शिरऋतु में मव्याह में लगाई तथा ग्रोप्म च शरद मैं पहर दिन पड़े और पहर दिनरहे लगा ॥ ६ ॥ वर्षा में परसता न हो बदरी न हो अपमा अधिक न हो तर लगावै वसन्त में सब समय अंजन लगाना हितई (अन्जन भेद ) अजन लेसन, रोपण और स्नेहन भेट से तीन प्रकारकाहै ।। ६२ ॥सो तीक्ष्य खट्टा, दो रस लेखन अमन जानना कपाय कटु स्नेहन युक्त दो रीपण जानो ॥६३ ॥ मधुर रस स्नेह युक्त मसादन स्नेह जानो (अन्जन प्रकार ) गोली मञ्जन, रस बनना चूर्ण प्रजन ॥ ६४ ॥ गोलीसे रसायन अप्ठ रसते चूर्णाजन श्रेष्ठ पे एकसे एक उचम सो सलाईव अंगुली से लगाये (अन्जन अयोग्य ) यफित, रोनेवाला भयभीत मद्यपिये नवीनचरी ॥६५॥ अजीणी चे सूत्रादिरोधी रहे अञ्जन अयोग्यई (तीक्ष्णांजन की वती) मेडीचीन सम मोटी बना ॥ ६६ ।। मध्यम में रेड वीज सम मृदु में दो चीज सप गीले अनन में माना तीन विडंगसम उत्तम दो विडंगमम मध्यमहै एक विग समान छोटी मांगद (शुष्क वैरचनांजन प्रमाण) वरेचन प्रजन - २८ शाधिरसंहिता! [ उत्तरखएटर स्यास्त्रिविडङ्गमिताहिता ६७ मध्यमाद्विविडङ्गास्याद्री नात्येकविडङ्गका । धेरेचनिकचर्णतुद्विशलाकविधीयते ६८ मृदौतुत्रिशलाकस्यांचतवःस्नैहिकेञ्जने।मुखयोःकु ण्ठिताइलक्षणाशलाकाष्टाङ्गुलोन्मिता ६९ अश्मजाधा,. तुजावास्यात्कलायपरिमण्डला । तापलोहाइमसजाता शलाकालेखनेमता ७० सुवर्णरजतोद्भूताशलाकास्नेहने मता । अङ्गुलीचमृदुत्वेनकथितारोपणेवुधैः ७१ सायं, प्रांतश्चाञ्जनस्यात्तत्सदानवकारयेत्ानातिशीतोष्णवाता भ्रवेलायांसम्प्रशस्यते७२ कृष्णभागादधःकुर्यादपाया वंदञ्जनम्। राजनाभिर्विभीतस्य मज्जापथ्यमनःशिला ७३ पिप्पलीमरिचकुष्ठंवचाचेतिसमांशकम् । छागीक्षीरे सम्पिण्यचर्तिकुर्याद्ययोन्मिताम् ७४ हरेणुमात्रांसंघष्य जलैःकुर्यादथाम्जनम्। तिमिरंमांसद्धिञ्चकाचंपटलम वुदम् ७५ रात्र्यन्धवार्षिकंपुष्पंवर्तिश्चन्द्रोदयाभवेत् । सलाई से नेत्रमें दोधार देय ॥ ६७.६८ ॥ मृदु अञ्जन का चूर्ण तीन पार फेरे मृतादि युक्त चूर्ण पारपार देय रेचन कहे जिसके लगाने से नेनन से पानी गिर (सलाका प्रमाण ) पत्थर-चा धातु की सलाई प्राद अंगुल की मृदंगाकार मुख दोनों तिल समान महीन प्रति चिकने लेखन शलाका प्रमाण लेख्न सलाई ताये का लोकी ना६९ ७० सलेन अञ्जनको सोने वा चादी की बनावै रोपण मृदुता से अंगुली बौरि नेत्रन में प्रांजै ॥ ७ ॥ (अजनसमय ) अजन सन्ध्या वा प्रभातकाल कर सहन समय न करे अनिशीत न पण कालमें न अतिवायु में न पदरी में अंजन करै ।। ७२।। और नेत्र में काले भाग के तरे,करै (चन्द्रोदयवर्ती शादी, बहेड़े की भैगशित ॥ ७३ ।। पीपरि, मिच, फूट और वच ये मागे समानभाग ले यहारी के दूध में यहुन घोटि यषभरि ॥ ७४ | मेवड़ी वीजके समान वटी बनाय पानी में रगरि नेन में माने तो तिमिर मांसद्धि, काच बिंदु, पटलरोग, बहः ॥ ७ ॥ स्तौदा वर्षभरको गौर फुल्ली ये सब बहोय ( शुमादिकपर - भांगी अध्याय १३] भापाटीकासमैता। पलाशेपुष्पस्वरसैबहुशःपरिभाविता ७६ करजबीजब तिस्तुशुक्रांदीञ्छस्त्रवल्लिखेत् । समुद्रफेनसिन्धूत्थशङ्ख शौण्ड्यण्डवल्कलैः७७शिवीजयुर्तिःशुक्रादीन्छन वल्लिखेत्। दन्तैर्दन्तवराहोष्ट्रगोहयाजखरोद्वैः ७८ श डेमुक्ताम्भोधिनयुतैःसवर्विचूर्णितः । दन्तवतिःकृता श्लक्ष्णशुक्राणांनाशिनीपरा ७९ नीलोत्पलंशिग्रुवीजना गकेसरकन्तथा । एतत्कल्क कृतावर्तिरतितन्द्राविनाश येत् ८० तिलपुष्पाण्यशीतिःस्युःषष्टिसङ्ख्याकणाभवे त्। जातीकुसुमपञ्चाशन्मरिचानिचषोडश ८१ सूक्ष्मपि ष्ट्वाम्बुनावतिःकृताकुसमिकाभिधा। तिमिरार्जुनशुक्राणां नाशिनीमांसहित ८२ एतस्याश्चाजनेनानाप्रोक्ता साईहरेणुकाारसाजनहरिद्रद्वेमालतीनिम्बपल्लवाः ८३ लेखनवर्ती ) ढाक के फूलका रस करंज की मांगी कईयार घोटि घोटि या स्वरूप वर्ता बनाय पानी में गरि नेनमें प्रागै ती फुल्ली व मासद्धि आदिको दूर करती है जैसे शस्त्र से शुद्ध होजाती है ( पुनः ) ममुद्रफेन, संघर, शाह, मुरगे के शएडे का छिलका ॥ ७६ ॥ ७० ॥ सर्दिनन के पीज ये पांचों समान भागले महीनारि जल में पीसिं गोली चाय सुखाय पानीमें घिसि अञ्जनकरती शावादि का कुछ काम नहीं रहता ( लेग्यगी दन्तवर्ती ) हाथी, घोड़ा, वराह, ऊंट, पैल, करा, सर इन सातो॥७॥ दात शंम्प, मोती व समुद्रपेन इन सरोका चूर्णकरि जलमें पीसि गोली पाधि सुसाय पानीमें विसि प्रजनकरे से फुली गिरिजाती है ॥७॥ (तन्त्रानिवारण लेवनीवर्ती) नीलकमल, सहिजनधीज और नागसर ये तीनों संग जति महीन पानीमें पीसि गोली करि सुसाय पानी पिसि पाजे ती राहा दूरहो (रोपणीकुसुमवती) तिलपुष्प प्रस्सी० पीपरि दाना साठि ६० चमेली पुप्प ५० मिर्च १६ द महीन पीसि देद मेरहीशन नुत्य यही पनाइये इमे कुमुमिका वीं रहते हैं इसको भान तो निमिर, अर्जुन, पन्नी व मासद्धि ये ना दूरहोय।।१।२|| इसके शाजोकी माटोदमेतटीशन मामी ( रतौंपीपर वर्ती) सौत .. - - है । शाईपरसंहिता [सचरखण्ड गोशद्रससंयुक्तावर्तिनतान्ध्यनाशिनी। धान्यक्षपथ्या वीजानिएकद्वित्रिगुणानिच ८४ पिण्वावर्तिजलैः कुर्या दजनंद्विहरेणकम् । नेत्रस्रावहरत्याशुवातरक्तरजन्त था ८५ तुत्थमाक्षिकसिन्धत्थसिताशङ्खमनःशिला। गै रिकोदधिफेनौचमरिचंचेतिचूर्णयेत् ८६ संयोज्यमधुना कुर्यादजनार्थरसक्रियाम् । वर्मरोगामतिमिरकाचशुक्रा पहारकम् ८७ वटक्षीरेणसंयुक्तंमुख्यःकर्पूरजरजः। क्षिप्र मज्जनत्तोहन्तिकुसुमंचद्विमासिकम् ८८चौद्राश्वलालासं घृष्टैर्मरिचैत्रमजयेत् । अतिनिद्राशमंयातितमःसूर्योद यादिव ८६ जातीपुष्पंप्रवालंचमरिचंकटुकीवचा। सैन्ध ववस्तमत्रेणापिष्टतन्द्रनिमज्जनम् ६० शिरीषधीजगोमूत्र कृष्णामरिचसैन्धवेअञ्जनस्यात्प्रबोधायसरसोनशिला हल्दी,दारुहल्ली,चमेनी पत्र और नवपन ये पांचों समान ॥ २३ ॥ गोवरकेपानी में गोली बनाय श्राजेसे रतौंधी नाराहोयें (नेत्रलाय पर स्नेहपती) पावला मिंगी १ भाग बहेडा मिंगी २ भाग हडमिगी ३ भाग ।। ४ । जल में महीन पीसि दो मेवड़ी वीजसम गोलीकरि पानी में घिसि भाजनेसे पानी वहना च बात रक्त जन्य पीडा मिजाती ॥८शा(रसफिया)तिया, सोनामाखी, संघर, मिश्री,शरस,पैनशिन,गेक,समुद्रफेन और मिरच ये नव सम भागले सूक्ष्म पीसि ।। ८६॥ शहद मिलाय गोली कधि भजन करेसे पलकोग, तिमिर, अर्भकाच- बिन्दु और फुली ये रोग दूरहोय ॥ ७ ॥ (शुक्रपर रसक्रिया) वटदुग्ध । च गुद्धकपूर बीसि अझनकरे दोमासकी फुल्ली परी दूरहो । (तन्द्रापर लेरानी रसमिया) शहद और घोड़ेकी लारसे मरिच पिसकै अञ्जन करनेसे देणे तन्द्रा दग्दो जैसे सूर्यके उदयसे अन्धकार दूर होताहै ॥६॥ (पुनरजन ) चमेनी के पुष्प भूगा, मरिच, कुटनी, चच और सैधर ये सब समान भागले लागके सूत्र में गोलीगापि तगा तो तन्द्रा निवारणहो ॥१०॥ ( सन्निपात परलेखन रसरिया)सिरसीम, पीपरि, मरिच, संघव, लहसुन, मैनशिल और वर ये सातों समानभागले गोगा में पोसि भाजै तो सनिपात शान्त .. अध्याय १३] भापारीकासमेता। वचैः ९१ दापिटोलंमधुकंसनिम्बंपनकोत्पलम् । प्रपौ ण्डरीकं चैतानिपचेत्तोयेचतुर्गुणे १२ विपाच्यपादशेषतु शृननीत्वापुनःपचेत् । शीतेतस्मिन्मधुसितांदद्यात्पादों शकानरः ९३ रसक्रियैषादाहा रक्तरोगरुजहरेत् । र साञ्जनंसर्जरसोजानीपुष्पमनःशिला ९४ समुद्रफेनोल वणंगैरिकमरिचानिच । एतत्समाशंमधुनापिष्टाप्रक्लिन्न वमनि ९५ अञ्जनछेदमण्डघ्नम्पचमाणिचप्ररोहति । गुड़ चीस्वरसःकपःक्षौद्रस्यान्माषकोन्मितम् ९६ सैन्धवौद्र तुल्यस्यात्सर्वमेकत्रमर्दयेत्।अञ्जयेन्नयनेतेनविस्तारतिमि रंजयेत्।काचंकण्डूलिङ्गनाशंशुक्रकृष्णगतान्गदान ६७ दुग्धेनकण्डूंमौद्रेणनेत्रस्रावंचसर्पिषा । पुष्पंतैलेनतिमिरं काञ्जिकेननिशान्धताम् ९८ पुनर्नवाजयेदाशुभास्करस्ति हो॥६१॥( नेत्रदाहपर रसक्रिया) दाहन्दी, पटोल, मुलेगी, नीर, पद्मास्य कमल और खेतकमल ये साता समभागले कूटके नौगुने पानी में फायरि९२॥ चौथ्याई रहै तप उतारि छानै फिर श्रौटाय गादादोग जा सिराय तत्र मधु मिश्री मिलाय अंजनकर तो नेर जलना, वहना, रक्तविकार व नेनरोग दूरहोयें (थरुनी रोगपर रसफ्रिया ) रसात, सल, चमेली फूल, मैनशिन ।। ६३।। ६१ ॥ समुद्रफेन, संधव, गेरू और मिरच ये आगे समानभागले शहददेकै अञ्जन कर तो पाकरोग व ॥ २५ ॥ चिपचिपाहट और खाज ये सब दूरहों और पलक झरना न झरे फिर जमै ( तिमिररोगपर रोपणी रमक्रिया) गुर्चका स्वरस कर्पभर मधु व संधव मारो माशे भर सव सूक्ष्म पीति अंजन कर तो पिल्लाम, तिमिर, काचविन्दु, खुजली, जिगनाश, सझेद कृष्ण डेले के सय रोग दूरहों ॥ २६ ॥ ( अंजनांते अनोपान ) जो अजन करे सानहो तो घसि लगाव तो खुजली मिटै शहद में लगा दे को जल बना रहो वृतयुक्त से दूध मुल्ली दूरहो तिल युक्त लगाये से तिमिररांग दाहो कांभी में लगाये से रतौंधी दूरहो ॥ ६७१६८ ॥ मे मूर्योदय से अंधकार द्रहो मे गदापुरना से अधि- पान सहाप से सर नेत्र रोग दूर होते है (नेवसावपर रोपणी रसमिया) *- शाहपरसंहिता [चरसएट मिरंयथावबूलदलनिष्काथोलेहीभूतस्तदञ्जनातहहने वसावजयत्येपःमधुयुक्तोनसंशयः । हिज्जलस्यफलंघृष्ट्वा पानीयेनित्यमञ्जनम् १०० चक्षुःस्रावोपशान्त्यर्थकार्य में तन्महौषधम्।कतकस्यफलंघृष्ट्वामधुनानेत्रमजयेत्पई पत्कर्पूरसहितस्मृतंनेत्रप्रसादनम्। सर्पिःक्षौद्रंचाञ्जनस्वा च्छिरौत्पातस्यशान्तये २ कृष्णसर्पवसाशङ्कः कतकाफल मजनमारसकियेयनचिरादन्यानांदर्शनप्रिया३दक्षाए त्वच्छिलाकाचैःशङ्खचन्दनगैरिके। द्रव्यैरञ्जनयोगोयं पुष्पार्मादिविलेखनः :४कणाच्छागयजन्मध्येपक्त्वातंद्रस पेपिताअचिराद्धन्तिनत्तान्ध्यंतद्वत्सौत्र्यूषणमं५ज्ञा णाईमरिचंद्वौचपिप्पल्यर्णवफेनयोः। शाणाईसैन्धवंशा पानवसौवीरकांजनात्६पिटंसुसूक्ष्मचित्रायांचुणीजनमि परपनका काय अतिगाहाभये । हर | शहद मिलाय आजै तो निश्चय नेत्र से पानी यहना दूरहो (पुनर्नेनाव पर ) निर्मली फल पानी में रगरि लगाये तो नेत्रसे पानी पहना बन्द होय ॥ १० ॥( नेत्रशुद्ध होने के अर्थ हनी रसक्रिया) निर्मली शहद में घसि किंचित् कपूर मिलाय आंने तो मे भरोग होय ॥ १॥ (शिरोत्पातपर रसक्रिया) घृतं य शहद मिलाय मंज़नकर तौ शिरोपातरोग दूर होय ॥ ॥ (धुंधपर रसक्रिया ) काले सापकी चरवी, शंत और निर्मली ये सर सरलकरिबांज तो अंधियारा दिताई देना दूरहोकर साफ दिलाई व्य ॥ ३॥ ( लेखनचूर्ण यजन) मर्गके भएटे का दिलका सफेद कांच, शाल चन्दन, गेरू व सैंधव मे चों समान प्रक्षन परिमांजने से फल्ली मांसार्मादि नाशहाँ ।। ४ ।। ( रतौंधी पर चूर्ण) छाग की फरेजीपर पीपरिधरि पकाय पीररिले उसी मांसके रस में रगरि आजै वा सोठि, मिर्च धौर परपरि को शहद में मिसि प्रागे तो रतौंधी न रहै ॥५॥ (फंहमादि पर) मरिच अर्द्धशाण, पीपरि र समुद्रफेन दोदो शारा मुरमा नब शाण ॥६॥ ये सन द्रव्य चित्रा नक्षत्र में ले महीन सुरमा पनाय नेनों में भागने से भाग्वि सजुभाना, कानपिन्द, कफजन्य पीडा व गल इनमे नेको अध्याय १] भापारीकासमेता। दंशुभमाकण्डूकाचकफातीनांमलानांचविशोधनम् ७शि लायारसकंपिष्ट्वासम्यगाप्लाव्यवारिणा। गृहीयात्तज्जलंस वत्यजेचूर्णमधोगतम् - शुष्कंचतज्जलंसपर्पटीसान्निभं भवेत्ाविचर्यभावयेत्सम्यनिलंत्रिफलारभैः ९ कर्पूर स्यरजस्तत्रदशमांशेननिक्षिपेता अजयेन्नयनेतेनसर्वदो पहरहितत् १० सर्वरोगहरंचर्णचक्षुपोःसुखकारिच । अ- ग्नितप्तंचसौवीरनिषिकचेत्रिफलारसै:११ सप्तवेलंतथा स्तन्यैः स्त्रीणांसितविर्णितम्।अजयेन्नयनेतेनप्रत्यहं चक्षुषोहितम् १२सर्वानक्षिविकारांस्तुहन्यादेतन्नसंशयः। गतदोघमपेताश्रुसंपश्येत्सम्यगाशतत् १३ त्रिफलाङ्ग शुण्ठीनारसैस्तढच्चसर्पिष।।गोमूत्रमध्वजाक्षीर सिक्तोना गःप्रतापितः १४ तच्छलाकाहरत्येवसर्वानेत्रभवान्गदा न् । गतदोषमपेताश्रुसंपश्यन्सम्यगम्भसि १५प्रक्षाल्या क्षियथादोपकार्यप्रत्यञ्जनंततः। नचानिर्गतदोषेक्षिणधा शुद्ध कर ॥ ७ ॥ ( सर्व नेत्ररोगपर मृदुचूर्णाजन ) सपरियाले अति महीन खरलकरि वासन में पानी भरि चोलि नोइले पानी निकारि पात्र में भार श्रांच में जरायकै खुरचि लेय सो सरल में डारि त्रिफलाकाधकी तीनभावना देय ॥18॥ तब उसका दशवा अंश कपूर मिलाय फिर घौट सो नेत्र में वाजे से सब रोग दूरहों ॥ २०॥ नैन सुख पावै ( सर्वाक्षिरोगपर सौवीर अंजन ) मुरमा सातयार खरल करि करि तपाय निफ्लाकाथ में बुझाय ।। २१ ॥ पैसेही सातबार स्त्री के दूध में बुझाय अतिमहीन पिसाय नेत्राजन करेसे सन नेनरोग दूरदोय यह नेत्रनको निःसंदेह हितकारकहै ॥ १२ ॥ १३ ॥ (सीसशलाका विधान ), त्रिफलाझाप, भंगरारस व सौठिकाथ इनकी पुट दिया सीसा गलाय गलाय वी, गोमूत्र, शहद, छगरीदूध सवनमें सातसात वार वुझाय ।। १४ । शलाई बनाय नेत्रमें फेरेसे सवरोग दूरहो इसलिये और अंजनादि भी इससे लगाना भला है ॥१५॥ (प्रत्यंजनविधि ) जनसीस. शलाका फेरने से दोप दरहोके नेवसे आंम् गिरते हैं जिसके पीछे शीतल बड़े २ ३०४ शाधरसंहिता। [उत्तरखण्ड वनसम्प्रयोजयेत् १६ प्रत्यञ्जनंतीक्ष्णतप्तेनेत्रेचूर्णःप्रसा दनः । शुद्धेनागेद्रुतेतुल्यंशुदसूतंविनिक्षिपेत् १७ कृष्णा अनंतयोस्तुल्यंसर्वमेकत्रचूर्णयेत्। दशमांशेनकपरंतरिंग श्चूर्णेमंदापयेत् २८ एतत्प्रत्यञ्जननेत्रगदजिन्नयनाम तम् । जयपालस्यमज्जानं भावयेन्निन्वुकद्रवैः -१६ एक विशतिबेलतत्ततोवर्तिप्रकल्पयेत् । मनुष्यलालयाघृष्ट्वात तोनेत्रेतयाञ्जयेत् २० सर्पदष्टविषंजित्वासजीवयतिमान वमाभुक्तापाणितलंघष्ट्वाचक्षुपोर्यदिदीयते।जातरोगावि नश्यन्तितिमिराणितथैवच २१ शीताम्बुपूरितमुखःप्रति वासरंयःकालत्रयेणनयनंहितयंजलेन । आसिञ्चतिध्रुवम सौनकदाचिदक्षिरोगव्यथाविधुरतांभजतेमनुष्यः२२ आ युर्वेदसमुद्रस्यगूढार्थमणिसञ्चयम् । ज्ञात्वाकैश्चिबुधै पानमें जलभारे शिरचोरि उस पानी में मौखि सोलि देस फिर नेत्रधोय मल्य- जन लगावै सो श्रागेकहेंगे ॥ १६ ॥ (सदोपनेत्रपर निषेध जिस नेत्रमें दोपकी है तो नेत्र धुपावै क्योंकि तीक्ष्णयंजन कर ना सन्ताहों तिससे मत्य- जन प्रसाधनकर सो कहते हैं ( प्रत्यक्षन पूर्ण ) शुद्ध सीसागलाय समभाग शुद्ध पारादे ।। १७ ॥ तब दो भाग युरमादे उतारिले सब खरलकरि दशची अंश कपूर दे फिर चोटे ॥ १८ । इसे मत्यजन रहते हैं इससे सम्पूर्ण नेनरोग नाश होते हैं और यह शांखिको अमृत है (सर्पविषनिवारण असन) भीतर अंपुर दूर किया जमालगोटा नीरस में इवीस पुटदे घोटि गोली पनाय मनुष्यबी लारसे घिस सर्प डसेको माखिमें भान ॥ १६॥२०॥ तो चिप शानहो मनुष्य जिप भोजन करके हाथ में घसै भार नेनों में लगाये तो क्षेत्रों के तिमिरादि रोग नाश होय ॥ २१ ॥ (शीतलजल प्रकार)जो मनुष्य नित्यप्रति सीन चेला शीतल जलं से युले शियाकर व मुप धोया कर भौर नेमों को छीटेट साचारिता पात्रमें भारे नेत्र उन्मीलन किया कर उस मनुष्य को नेचाधा कभी न होय ॥ २२ ॥ (अपग्रन्थमशंसा आयुर्वे. दामुद्र के विषय गदापल्ली मणि संचित है तिनको अरिपनीफुमार व अग्नि.
अध्याय १३] भापाटीकासमेतर। . २०५ स्तैस्तुकृताविविधसंहिताः २३ किञ्चिदर्थततोनीत्वाकृते यसंहितामया । कृपाकटाक्षविक्षेपमस्यांकुर्वन्तुसाधवः २४ विविधगंदार्तिदरिद्रनाशनंयाहरिरमणीवकरोतियो गरनैः । विलसतुशार्ङ्गधरस्यसंहितासाकविहृदयेषुसरो जनिर्मलेपु २५ अल्पायुषामल्पधियामिदानींकृतसमस्तं श्रुतिपाठशक्ति । तदत्रयुक्तम्प्रतिवीजमात्रमभ्यस्थतामा . स्महितप्रयत्नात् २६ इति त्रयोदशोऽध्यायः १३॥ इति . तृतीयःखण्डः॥ वेशादिक मुनियोंने सम्यक्प्रकार स्वसंहिता शुद्ध करि राखा ॥ २३ ॥ किश्चिम् सारांश लै शाधर ने सञ्चय करी इसे साधुजन कृषाकरि देखें ॥ २४ ॥ (ग्र. न्यपाठफलम् ) जिन वैद्य कविनके निर्मल हृदयकमल में कायादि योगरन विलास कर ते शाईपरसंहिता लक्ष्मी इव धारण कर है कैसी लक्ष्मी है कि रोग असित दरिद्रनके दरिद्रको नाश करती है ।। २५|| इस कलियुगने मनुष्यों की श्रायु और बुद्धिको अल्प करदिया इस कारण आयुर्वेद पढ़ने की शक्ति नहीं इससे मात्मरक्षणार्थ इस आयुर्वेद चीनमात्र में अभ्यास करें ।। २६ ॥ इति श्रीशाघरमुधाकरेउत्तरखण्टेजयपाल कृतेत्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ इति शाघरस्यतृतीयसएडससमाप्तः ॥ . 20244 (समाप्तोयंग्रन्थः)