Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Sachitra Mahabharat Bhasha Tika Ank-iv
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PADMKAJDOO9000000ction00000000000000000000000000000000000ccal So00000codeccanciesmomc00000revocore roorpuccwmocraceCEBOOPOEncope0c000000cceroocce 50owereooreerecoracokcarmccorrec00003003oal ROMANTIMORNIHIRPENDAR सम्मति भाषाटीका-सहित महाभारत मेरे अवलोकन में आया, उसकी भाषा बहुत सरल तथा मूल भारत के अर्थानुसार का गई है, यदि इसा गृङ्खला के अनुसार गेप की भाषा की गई तो अवश्य हा पाठकों के लिये विशेष लाभ होगा। यद्यपि महाभारत सस्कृत टीका सहित अन्यत्र छपा हुआ मिल मकता हे मस्कृत के विशेष पण्डितों का ही उपकार हो माता है, परन्तु इस महाभारत में मूल पाठ पधक सुन्दर छपा हे निसमे मूल का पारायण मी अनायास कर सकते हैं। ऐमा पुस्तक अवश्य ही प्रत्येक हिन्द के घर में होना चाहिये । इसमें हिन्दुधर्म का स्वरूप भले प्रकार दर्शाया गया है। परन्तु उससे RAUTAHUN ता० ८।६।३४ ६२००३ राहौ। नृसिंहदेव शास्त्री दर्शनाचार्य POORoomeyacnomooMOONROOOKIA30000anuaroor003careocx Journcooormoon 200000002onosaromcooor00000amompocomoooooomson Panooxnormmonocorrrr विषयानुक्रमणिका । वनपर्व। F-AIAAPrer -30-00-ther -00-00-0 अभ्याय पृष्ठ अध्याय पृष्ठ करना। वर्णन । विषय विषय १३. श्रीकृष्ण के वचन । १५०५-१५०७ २५. मार्कण्डेय मपि का आना और उपदेश करना। १४. संक्षेप में सौभ विमान के नाश होने का वृत्तान्त वर्णन १५४७-१५५० १५०७-१५०९ २६. बकदाल्भ्य ऋषि का समागम । १५५०-१५५३ १५ शाल्व के घेर लेने पर द्वारका पुरी की रक्षा के ढङ्ग का २७. द्रौपदी का खेद प्रकट करना । १५५३-१५५८ १५१०-१५१२ २८. बलि और प्रहाद का इतिहास । १५५८ १५६२ १६. शाल्व का द्वारका पुरी पर आक्रमण और प्रद्युम्न २९. युधिष्ठिर का क्रोध की बुराइया दिखाना१५६२ १५६९ के साथ युद्ध का होना। १५१३-१५१६ ३०.फिर द्रौपदी की उक्ति । १५६९ १५७४ १७. प्रद्युम्न का मूच्छित होना । १५१७-१५१९ ३१. युधिष्ठिर का समाधान । २५७४ १५८० १८. प्रद्युम्न और उनके माग्यी का मवाद । १५२०-२५२३ ३२. द्रौपदी का प्रत्युत्तर देना। १५८०-१५८८ १९. शाल्व का हारना । १५२४-१५२७ ३३. युधिष्ठिर से भीमसेन की बातचीत। १५८८-१५९९ २०. श्रीकृष्ण और शाल्व का सामना । १५२७-१५३२ ३४. युधिष्ठिर का उत्तर दना । १५९९ १६०३ २१. शास्त्र की माया से श्रीकृष्ण का मोहित होना । ३५. भीमसेन का प्रत्युत्तर देना । १६०३-१६०७ १५३२ १५३५ ३६. व्यास जी का आगमन । १६०७-१६१३ २२.शाब का मारा जाना। १५३६-१५४२ ३७. युधिष्ठिर का अर्जुन का विद्या देना। १६१३-१६२० २३. कुरुजालवासी प्रजा का विलाप और अर्जुन का कैरातपर्व। उन्हें आश्वास देना। १५४२-१५४४,३८. अर्जुन का हिमालय पर तप करना । १६२०-१६४२ २४. पाण्डवों का द्वैतवन में जाना । १५४४-१५४७ ३९. अर्जुन का किरानरूपी शिवम युद्ध । १६२५-१६२८ DP वनपर्व। पृष्ठ । १६५२-१६५४ विषयानुक्रमणिका । अभ्याय विषय पृष्ठ अभ्याय विषय ३९. अर्जुन का किरातरूपी शिव से युद्ध । १६२९.-१६३१ आदि देवताओं का प्रार्थना करना । १६९० १६९४ ४०. अर्जुन को पाशुपत अस्त्र प्राप्त होना । १६३४ १६३८ ५५. नल का दुम्तर दूत कार्य । १६०५-१६०७ ४१. सब लोकपालों का आना और अपने ५६. नल का देवताओं के पास जाकर अम्त्र देना। १६३८-१६४३ दमयन्ती का उत्तर मुनान! । १६०७-१७०१ इन्द्रलोकाभिगमनपर्व । ५७. नल का वग्ण, दमयन्ती का विवाह । १७०१ १७०७ ४२. अर्जुन का म्वर्ग को जाना । १६४४-१६४८ ५८, इन्द्र और कलियुग का मवाद । १७७७ १७०९ ४३. अर्जुन का मम्मान और इन्द्र के ५०. नल और पुष्कर का जुआ खेलना । १७८९-१७०१ आधे आसन पर बैठना । १६४८-१६५२ ६०. दमयन्ती का नल को छूत कीड़ा ४५. अर्जुन का अत्र विद्या तथा से रोकने की चेष्टा करना और नल गान-विद्या प्राप्त करना । शकुछ परवाह न करना। १७१२-१७१४ चित्रमेन और उर्वशी का सत्राद। १६५४ १६५६ ६१. नर पर विपत्ति पर विपति आना। ४६. अर्जुन का धैर्य और उर्वशी के वन में नल का दमयन्ती का मार्ग प्रस्ताव को अम्वीकार करना । १६५६-१६६३ पहचनमाना। १७१४ १७१८ ४७. रोमग मुनि भार इन्द्र का सवाद । १६६३ -१६६७ ६२ नल का दमयती को छोड़कर चल्दना१७१९-२७२२ ४८. अर्जुन के इम अभ्युदय का हाल ६३. दमयन्ती का विन्ग । उस निगलने मुनार धृतगष्ट्र काम्बद प्रकट करना १६६७ १६६० को अजगर का मुँह फैलाना, शिकाग ४९. मजय और धृतराष्ट्र का सवाद । १६७० १६७२ के द्वारा उसकी मृत्यु, नीयन गिहने ५०. पाण्डवों का वन में क्या भोजन था' १६७२-१६७४ पर शिकारी का भी नाम होना। १७२२-१७२७ ५१. मजय-कृन कृष्ण आदिको प्रनिना ६४. दमयन्नी को पियों के दर्शन का वर्णन । १६७४ १६७९ हाना, फिर बटोपियों से भेंट । १७२७-१७५२ नलोपाम्यानपर्व। ६५. बटोहियों के माय दमयन्नी का ५२. पृदय का आना और नगपाम्यान चेदि राज्य में जाना । १७११-१७११ का आरम्भ। ६६. नर और कोटक नाग कामवाद। ५३. दमयन्ती और हम का मवाद १६८६-१६९० नाग का उन्हें उमना और दो ५५. दन बनने के लिए नरम इन्ट कपड़े देकर धयं बंधाना। १७५१- ...-
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अध्याय १३ ] महाभारत १५०५ aninninTILumummmmmmm UNImapurumTO.Gumarmasuming अथ त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ । winimun.annananandhanairmatmiracantsimirmmandutlinindmmithaliantiil.clifilimilar Tananmitrinamannaramanam.inmnmadimanarimrosar वासुदेव उवाच --नैतत्कृच्छ्रमनुप्राप्तो भवान् स्याद्वसुधाधिप ! यद्यहं द्वारकायां स्यां राजन् ! सन्निहितः पुरा ॥ १ ॥ आगच्छेयमहं द्यूतमनाहृतोऽपि कौरवैः आम्बिकेयेन दुर्धर्ष राज्ञा दुर्योधनेन च ॥ २ ॥ वारयेयमहं द्यूतं वहून्दोपान्प्रदर्शयन् भीमद्रोणो समानाय्य कृपं वाहीकमेव च वैचित्रवीर्यं राजानमलं तेन कौरव! पुत्राणां तव राजेन्द्र!त्वन्निमित्तमिति प्रभो! ॥ १ ॥ तत्राचक्षमहं दोपान्यैर्भवान्व्यतिरोपितः वीरसेनसुतो यैस्तु राज्यात्प्रभ्रंशितः पुरा अतर्कितविनाशश्च देवनेन विशाम्पते ! सातत्यं च प्रसङ्गस्य वर्णयेयं यथातथम् स्त्रियोऽक्षा मृगया पानमेतत्कामसमुत्थितम् । दुःखं चतुष्टयं प्रोक्तं यैनरो भ्रश्यते श्रियः तत्र सर्वत्र वक्तव्यं मन्यन्ते शास्त्रकोविदाः तेरहवां अध्याय ।। १३ ॥ श्रीकृष्ण ने कहा-हे राजा युधिष्ठिर ! उस को बन्द कर देता हे महाराज! जिस दोष से राज्य समय जो मै द्वारकापुरी में होता, तो आप लोगों को से निकाले जाकर, आप यह क्लेश सह रहे हैं, जिस कभी यह क्लेश न भोगना पडता । राजा धृतराष्ट्र, दोप से वीरसेन के पुत्र नल अपना राज्य खो बैठे दुर्योधन अथवा और और कौरव मुझे उम द्यूत-सभा थे, जिम दोष से प्रत्येक मनुप्य की बुरी हालत होती में न भी बुलाते, तो मै म्वयं वहां पहुँच जाता, और है, उस दोप का उल्लेख करके यदि मैं धृतराष्ट्र आदि आपकी भगई के लिये भीम, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, के सामने वहस करता, तो कभी जुआ खेल्ने की बाहीफ और राजा धृतराष्ट्र को सभा में बुलाकर, ओर उनकी प्रवृत्ति न होती ॥१६॥ उनके आगे जुए को महा अनर्थ और अनेक दापों स्त्री, जुआ, मद्य-पान और शिकार खलना, ये की खान प्रमाणित कर, मै निम्सन्देह पामों के खेल चारी बातें काम से उत्पन्न होती है और इन चारों ही * गगवत. कृष्णस्यायमागय -इ युधिष्ठिर ! यदि त्वं तान्प्रादमामनन्यभावनाचिन्तयिष्यस्तहिं तव नवद्वारवल्या देहरूप- द्वारकायामह सन्निहितोऽभविष्य, तथाचन सम्ट न प्राप्स्यत् । यथा द्रोपदी वस्त्रापहरणकाले मा स्मृतवती, तावता च वनगाणे प्रदानेन मया मभाया मंक्यान्मांचिता । तथा त्वमप्यक्षपातनकाले मत्स्मरणेन जयं प्राप्स्यः, न च तथाऽभूदिनि । x सन्निमित्तं-धर्मराज निमित 'हे कौरव ! तव पुवाणा द्यूनेनाल' मिति तत्रसभाया माचक्षम्-आख्यास्यम् । इनि मबंध । - NEPALPL Uw.parnrTTITUDWTOASTOTommmmmuTOANWROOTuuuuNTINGamrURULE [ वनपर्व १५०६ म हा मारत Mmm.fulsiraniuminutari.cmfirmurramhanuTLAGHAGHREE . - PHEALTERTALLATIOTroyoNIPREATMELIPLOADEDomp4 विशेषतश्च वक्तव्यं द्यूते पश्यन्ति तद्विदः एकाहाद् द्रव्यनाशोऽत्र ध्रुवं व्यसनमेव च अभुक्तनाशश्चार्थानां वाक्पारुप्यं च केवलम् ॥ ९ ॥ एतच्चाऽन्यच्च कौरव्य ! प्रसङ्गि कटुकोदयम् द्यूते ब्रूयां महाबाहो ! समासाद्याऽम्बिकासुतम् ।। १० ॥ एवमुक्तो यदि मया गृह्णीयाद्वचनं मम अनामयं स्याद्धर्मश्च कुरूणां कुरुवर्धन ! न चेत्स मम राजेन्द्र ! गृह्णीयान्मधुरं वचः पथ्यं च भरतश्रेष्ठ! निगृह्णीयां वलेन तम् ॥ १२ ॥ अथैनमपनीतेन सुहृदो नाम दुहृदः सभासदोऽनुवर्तेरस्तांश्च हन्यां दुरोदरान् ॥ १३ ॥ असान्निध्यं तु कौरव्य! ममाऽऽनर्तेप्वभूत्तदा । येनेदं व्यसनं प्राप्ता भवन्तो द्यूतकारितम् सोऽह्मेत्य कुरुश्रेष्ट ! द्वारकां पाण्डुनन्दन ! अश्रोपं त्वां व्यसनिनं युयुधानाद्यथातथम् श्रुत्वेव चाऽहं राजेन्द्र ! परमोद्विग्नमानसः के कारण मे मनुष्य र६मी से प्रष्ट हो जाता है। धर्म-सञ्चय कर लेते और जो न मानते, तो मैं उसी इमी कारण शास्त्रों में इन व्यसनों को मार दु खों समय बल मे उनका निगृहीत अर्थात् गिरफ्तार कर और दीपों की वान रहा है । अधिक क्या यहूं. लेना ॥७॥१२॥ जुमारी रोग स्वयं इम काम के अनेक दोषों का इस पर यदि जुग का शौक रखने वाले यग्वान करते है। यह जुआ एमा है, कि एक ही मित्राभिमानी अनार्य लोग दुर्योधन की सहायता दिन में मय द्रव्य इम में नष्ट हो जाता है और करने का बड़ होते, तो उन्हें भी मैं उसी समय मार मनुष्य को दुःप प्राप्त होता है। इसमें मिया खोरी टालना । क्या है, मैं उम समय आनत देश यान पान गुनने और कुछ गगम नहीं है। मैं (द्वारकापु) में न था, इसी से आप निर्वासित अधिका-पुत्र राष्ट्र के पास जाकर ये मय दाप होकर, इतना सा मह रह है। हे पाण्डुनन्दन | मैं परसाहाने या बुराइयों को दशांना जीवे मंग पाहर ग अपनोटकर आया, तब सात्यकि के मुंह पहा मान ने, तो पलंगक में टनक पुत्रों का में आप लंगगों की विनित का हाल सुनकर मुझ पड़ा पम्पान होना और पारंब पे यि यहुन मा बहुआ। यह सुनन ही आप रंगों की दम्पन यो Errrrrrrrrrrrrrentiretream MIMITrerrerencetra LeL HTTAIMERIMAnanmiumnominar.shamaramataramAR. RTERTAL - । ..
AMATATUWARASHTRA NEILLINDARUIPULUMULE . अध्याय १४ ] म हा मारत १५०७ EmmramiliarinirmaampMITTITUTITNIETTENTITITITUTRITTumruirmananRITED तूर्णमभ्यागतोऽस्मि त्वां द्रष्टुकामो विशांपते ॥ १६ ॥ अहो कृच्छ्रमनुप्राप्ताः सर्वे स्म भरतर्षभ! सोऽहं त्वां व्यसने मग्नं पश्यामि सह सोदरैः ।। १७ ।। इति श्रीमन्महाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि वासुदेववाक्ये त्रयोदशोऽध्याय ॥ १३॥ यहाँ चला आया हूँ। हाय ! आप लोग कैसा कठिन को अपने भाइयों महित इस तरह दुर्दशा में देख क्लेश भोग रहे है। बड़े कष्ट की बात है, कि आप रहा है ॥१३।१७|| वनपर्व का तेरहवां अध्याय ममाप्त हुआ ॥१३॥ अथ चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥ युधिष्ठिर उवाच-असान्निध्यं कथं कृष्ण! तथाऽऽसीद् वृष्णि नन्दन! क्व चासीद्विप्रवासस्ते किंचाऽकार्पःप्रवासतः? ॥ १ ॥ श्रीकृष्ण उवाच शाल्वस्य नगरं सौभं गतोऽहं भरतर्षभ ! निहन्तुं कौरवश्रेष्ठ ! तत्र मे शृणु कारणम् महातेजा महाबाहुर्यः स राजा महायशाः दमघोपात्मजो वीरः शिशुपालो मया हतः यज्ञे ते भरतश्रेष्ठ! राजसूयेऽर्हणां प्रति स रोपवशमापन्नो नाऽमृष्यत दुरात्मवान् श्रुत्वा तं निहतं शाल्वस्तीबरोपसमन्वितः उपाऽयाद द्वारकां शृन्यामिहस्थे मयि भारत ॥ स तत्र योधितो राजन् ! कुमारैर्वृष्णिपुङ्गवैः आगतः कामगं सौभमाहत्येवं नृशंसवत् चौदहवां अध्याय ॥१४॥ श्रीकृष्ण जी की बात को सुनकर राजा युधिष्ठिर पूजा का विरोध किया था। इसी कारण वह दुरात्मा ने पूछा-हे महागज ! आप किम कारण उस समय मेरे हाथों माग गया। मौभपति शास्य ने जब शिशुपाल आनत दग मे नही थ' प्रवास में कहाँ रहकर क्या के मग्न का हाल सुना और द्वारकापुरी में मेरे उपस्थित कर रहे थे ? यह सुनकर श्रीकृष्ण जी ने कहा-मैं न रहने का सुयोग पाया, तब अपने माम नामक राजा झाल्व के मौम नामी नगर के नाश करने को नगरी रूप कामगामी विमान पर चढ़कर उमने मेरी गया था । अब उमका कारण मुनिये ॥१२॥ नगरी को घेर लिया। उस दुष्ट ने द्वारका पुर्ग पर राजा शिशुपाल ने आपके गजमूय यज्ञ में मग आक्रमण करके बहुत मे वृष्णिवश के बालकों को । AmercommunomyournDHUWARomanummm TETTUDINIJITIT TOMATIQTIGT GOGLODITED.Carca w..Guna -- BIOTATEMETALLICATITANIMATEDOTTOMATALAamroMILMS १५०८ मदा मारत | वनपर्व ImmmuTERMINom.imarimmliammarATARNIREntries पुरोद्यानानि सर्वाणि भेदयामास दुर्मतिः उक्तवांश्च महावाहो ! क्वाऽसौ वृष्णिकुलाधमः । वासुदेवः स मन्दात्मा वसुदेवसुतो गतः तस्य युद्धार्थनो दर्प युद्धे नाशयिताऽस्म्यहम् । आनाः! सत्यमाख्यात तत्र गन्तास्मि यत्रसः ॥ ९ ॥ तं हत्वा विनिवर्तिष्ये कंसकेशिनिपूदनम् अहत्वा न निवर्तिप्ये सत्येनाऽऽयुधमालभे काऽसौ काऽसाविति पुनस्तत्र तत्र प्रधावति । मया किल रणे योद्धु काङ्क्षमाणः स सौभराट् ॥ ११ ॥ अद्य तं पापकर्माणं क्षुद्रं विश्वासघातिनम् शिशुपालवधामोद्गमयिष्ये यमक्षयम् मम पापस्वभावेन भ्राता येन निपातितः शिशुपालो महीपालस्तं वधिप्ये महीतले. ॥ १३ ॥ भ्राता चालश्च राजा च न च सङ्ग्राम मूर्धनि । प्रमत्तश्च हतो वीरस्तं हनिप्ये जनार्दनम् एवमादि महाराज ! विलप्य दिवमास्थितः मार डारा । नगर मर के मद्दलों और बागों को इधर-उधर दौड़ने लगा और कहने लगा, कि अब तोड़ ताद और उजाड़कर उमन कहा- आनत- मै शिशुपाल के मारने के कारण से उम पापी, नीच देशवामियो ! वृष्णियश का करक दुरात्मा वासुदेव और विश्वासघाती कृष्ण को यमलोक में पहुंचाऊँगा कहा है। आज में उसके घमण्ड को तोड़ डालेंगा। ॥१०॥१२॥ सुम रोग सत्य-सत्य यताओ, वह कहा गया है। इसी के हाथ से मेरा भाई शिशुपाल मारा जादा यह गया है, यहीं में भी जाऊँगा ॥३॥९|| गया। आज मैं इसको मारकर पृथ्वी पर गिराऊँगा। मैं इन हथियागे को हार मांगन्ध म्याना हूँ, इसन मेरे बालक और वीर माई की ऐसी अवस्था कि टस कम और कशी क माग्ने चाले. पापी की में मारा है, कि जब वह युद्ध के लिय तैय्यार न मारे बिना नही रौटुंगा । हे धर्मराज युधिष्ठिर था। आज इम जनार्दन को बिना मारे नहीं छोड़ता पद गायक गति मे रहकर, मरमाथ युद्ध करने है। राजा युधिष्ठिर महमालय हम पकार में बहुत पीहा में "पहा है, वहा" कहना हुआ मी बातें कहता हुआ और मेरी निन्दा करता हुआ JinatantaminatandnisualmannaaTRIDIHOTRONamaramanimALIRAdinarauranam ' we'rect AttercurememurenTermainine महा मारत IMMOTPintentiaurauirrormunounuuuunymsutam - अध्याय १४] १५०९ amTTIGLTUMITIN UTTTTTTTTTTTITUTERMITTERRITATEranmumarmus कामगेन स सौभेन क्षिप्त्वा मां कुरुनन्दन! ॥ १५ ॥ तमोपमहं गत्वा यथावृत्तः स दुर्मतिः मयि कोरव्य ! दुष्टात्मा मार्तिकावतको नृपः ॥ १६ ॥ ततोऽहमपि कौरव्य ! रोपव्याकुलमानसः निश्चित्य मनसा राजन्! वधायाऽस्य मनो दधे ॥ १७ ॥ आनर्तेषु विमदं व क्षेपं चाऽऽत्मनि कौरव! । प्रवृद्धमवलेपं च तस्य दुष्कृतकर्मणः ततः सौभवधायाऽहं प्रतस्थे पृथिवीपते ! स मया सागरावर्ते दृष्ट आसीत्परीप्सता ततः प्रध्माप्य जलजं पाञ्चजन्यमहं नृप ! आहृय शाल्वं समरे युद्धाय समवस्थितः ॥ २० ॥ तन्मुहूर्तमभूयुद्धं तत्र मे दानवैः सह वशीभूताश्च मे सर्वे भूतले च निपातिताः ॥ २१ ॥ एतत्कार्य महाबाहो ! येनाऽहं नाऽगमं तदा । श्रुत्वैव हास्तिनपुरं द्युतं चाऽविनयोत्थितम् ॥ द्रुतमागतवान्युप्मान्द्रप्लुकामः सुदुःखितान् ॥ २२ ॥ इति श्रीमन्महाभारने वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि मोभवधोपाख्याने चतुर्दशोऽध्यायः ॥१४ ' सोम नाम विमान में बैठकर इच्छा के अनुमार आकाश- लिये चल पड़ा । इधर-उधर देखन-मालेने के पश्चात् मार्गी हुआ ।।१३।१५॥ दूर से वह समुद्र की लहरों पर देख पड़ा। तब मैंने जब मैं आप के यज से लौट कर द्वारका पहुंचा, पाञ्चजन्य गड्स बजाकर उस युद्ध के लिये बुलाया। तब मन मब हाल मुना । मुझे उस दुष्ट मार्तिका- तुरन्त ही शाल्व के माथी दानव सुसज्जित होकर वतक देश के गना शाल्व की बातें सुनकर बड़ा मुझ से युद्ध करने को आगे बढ़े। मैंने क्षणभर में क्रोध हुआ और मैंने उमे मारने की इच्छा उन्हें मारकर युद्ध-भूमि में गिरा दिया । हे युधिष्ठिर ! इम कारण मे की, कि उम पापी ने मेरी निन्दा की मेरे द्वारका में न होने का यह उक्त कारण था। और आनर्त देश में बहुत मनुष्य मार डाल, कि वहां से लौटते ही मैंने जुए का हाल सुना। उसको जिसके कारण में उसे बड़ा घमण्ड हो गया। यह मुनते ही महादुःखी होकर, मैं हस्तिनापुर को चला विचार कर रमको मारने की इच्छा में मैं युद्ध आया ॥१६॥२२॥ चनपर्व का चादहवां अध्याय समान हुआ ॥ १४ ॥ umdimmmmmmmmmmmslimnanistatiniumbiniiliAdimanimlammmmmmmmimmuna Mimilaritrina ETOOTILmmuLODMUMMMOUNTAILundumuMETIMNDTENTION १५१० म हा मारत ( वनपर्व ETT UTD TWITTMDFF77FOTED TUGITTITUTO TITTIOTTOTEUIT, APOTT.TTO अथ पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥ - ॥ २ ॥ ! । MUNISAXILINDAILY युधिष्ठिर उवाच-बासुदेव ! महाबाहो ! विस्तरेण महामते ! सौभस्य वधमाचक्ष्व न हि तृप्यामि कश्यतः ॥ १ ॥ वासुदेव उवाच-हतं श्रुत्वा महाबाहो ! मया श्रौतनवं नृप! । उपायाद्भरतश्रेष्ठ ! शाल्वो द्वारवती पुरीम् अरुन्धत्तां सुदुष्टात्मा सर्वतः पाण्डुनन्दन शाल्वो बेहायसं चापि तत्पुरं व्यूह्य धिष्टितः तत्रस्थोऽथ महीपालो योधयामास तां पुरीम् । अभिसारेण सर्वेण तत्र युद्धमवर्तत पुरी समन्ताद्विहिता सपताका सतोरणा सचक्रा सहुडा चैव सयन्त्रखनका तथा सोपशल्यप्रतोलीका साहाऽहालकगोपुरा सचक्रग्रहणी चैव सोल्काऽलातावपोथिका सोष्ट्रिका भरतश्रेष्ठ ! सभेरीपणवानका सतोमराङ्कुशा राजन् ! सशतप्नीकलाङ्गला ॥ ७ ॥ सभुशुण्ड्यश्मगुडका सायुधा सपरश्वधा amarnamaa mpununia.nanRainmrtainmnmannasamunMAITREATI.COM पन्द्रहवां अध्याय ।। १५ ।। श्रीकृष्ण जी की उक्त बात को सुनकर युधि- में उस ममय चारों ओर पताकाएँ लगी हुई थीं। हिर ने कहा-हे वासुदेय जी ! गोभ विमान के नाश बुर्ज और यन्त्र बने हुए थे । और उनमें मुग्ग ग्वाटने का वृत्तान्न संक्षेप में मुनकर मुझे तृप्ति नहीं हुई। और गुप्त मार्ग बनानेवाले मनुष्य प्रस्तुत ( मौजूद) हमनिए विम्नार के माथ मय वृत्तान्त सुनाइए । ध ॥१५॥ यह सुनकर श्रीकृष्ण जी ने कहा-हे युधिष्ठिर ! मो सड़कों पर लोहे के मुस्व वाली कीलें लगी हुई हाथ में शिशुपाल के मारे जाने का हाल सुनकर थी, और नगर के द्वार और अटारियां अन्न मे भरी दुष्ट शाम्ब द्वारका पुर्ग में पहुना । उम दुष्ट बुद्धि हुई थीं। मोचों पर प्राणों को उलका के समान हरने वान दानव ने विमान पर बनी हुई अपनी मौभ याल. आमेय गोले और मन्त्रयुक्त अक्तियाँ रखी नग में व्या की धापना की । सुरक्षित रूप में हुई थी। मिट्टी और नर्म के पात्र, भेरी, टोल, मृतक मी में बैठकर उगन द्वारया पर चागं और में आक.. नोमर, अंकुश, गनमी, संगर शास्त्र, भुशुष्टी, पत्थर मण दिया। बद घोर युद्ध कामगा। द्वारका पुरी के गाने, फरमा, लोहे की दाल, गन्धक आदि अशि ETTEr-517111317 MOIRImporarIMATCHECIPENaintinutern अध्याय १५ म हा मारत १५११ EinmuaHITRILTOURamniwalihim.Dmsamliatamnmunmummmmunimunivrutra - EHIMAATATULA RAUTILIATELARSHIATRIreppUTATETTIATMAITADITATAXYaatraTUNLAILAS लोहचर्मवती चाऽपि साग्निः सगुडशृङ्गिका शास्त्रदृष्टेन विधिना संयुक्ता भरतर्षभ ! रथैरनेकैर्विविधैर्गदसाम्बोद्धवादिभिः पुरुषैः कुरुशार्दूल !समर्थः प्रतिवारणे अतिख्यातकुलैर्वी रैदृष्टवीर्यैश्च संयुगे मध्यमेन च गुल्मेन राक्षभिः सा सुरक्षिता उत्क्षिप्तगुल्मैश्च तथा हयैश्च सपताकिभिः आघोषितं च नगरे न पातव्या सुरेति वै प्रमादं परिरक्षद्भिग्रसेनोद्धवादिभिः ॥ १२ ॥ प्रमत्तेष्वभिघातं हि कुर्याच्छाल्वो नराधिपः इति कृत्वाऽप्रमत्तास्ते सर्वे वृष्ण्यन्धकाः स्थिताः ॥ १३ ॥ आनःश्च तथा सर्वे नटनर्तकगायनाः वाहनिर्वासिताः क्षिप्रं रक्षद्भिर्वित्तसंचयम् ।। १४ ।। संक्रमा भेदिताः सर्वे नावश्च प्रतिपेधिताः परिखाश्चाऽपि कौरव्य! कीलैः सुनिचिता कृताः॥ १५ ।। उदपानाः कुरुश्रेष्ठ ! तथैवाऽप्यम्वरीपकाः समन्तात्क्रोशमात्रं च कारिता विपमा च भूः ॥ १६ ॥ लगानेवाली वातुएँ, गोले और गोले चलान के यन्त्र ! लोग नशे की हालत में असावधान रहेंगे, तो कहीं सब उस पुरी में विद्यमान् थे ॥६।८|| गाव जीत न जाय । सब लोग लगातार हर घड़ी गद, साम्य, उद्धव आदि शत्रुओं का विनाश सावधान रहने लगे | सब नट और नाचने-गानेवाले करने में समर्थ, प्रसिद्ध कुलों में उत्पन्न, अनेक युद्धों नगरी से निकाल दिये गये । वे अपने एकत्र किये में पराक्रम दिखाकर प्रसिद्धि को प्राप्त वीर यादव, धन रत्न आदि को लेकर चल दिये । नदियों के पुल स्थ, पताका, घोड़े और असमय सेना का साथ लिए । तोड़ दिये गये । नावों की राहें रोक दी गई। खाईयों चारों ओर से नगरी की रक्षा करने लगे । जहां की रक्षा दृढ़तापूर्वक की जाने लगी। नगरी के चाहे वहां जा सकनेवाले सौभपुर को आया हुआ बाहर गहरे गढ़े खोद दिये गये । गुप्त आग भी देखकर, उग्रमेन, उद्धव आदि वृष्णि और अन्धक , जहां-नहीं लगा दी गई । कोस भर तक अनेक कटीले वंश के बहुदर्शी वीर यादवों ने यह सोचकर नगर पेड़ सँधकर ऐसा कर दिया गया, कि कोई आंग में मदिरा पीने की मनाही कर दी, कि नगरवासी वढ़कर नगरी पर आक्रमण न कर सके ||९१६|| DIVIDUTTARTEDTUTITUTILLISmumATALABITEDIAWTUALUATTITIONAMTARTELTUDIErumenmarwa । -- -- EDUHOTOSMUMTODrumTUDISPERITAMINIMIMPLOENINovewHAIRPORY १५.२ महा मारत [ बन .....KUATESTPOTOmaritmirmananuTRELES ॥ १७॥ - 1 114.- •171.1 **... tri II IITTIMITE प्रकृत्या विपमं दुर्ग प्रकृत्या च सुरक्षितम् प्रकृत्या चाऽऽयुधोपेतं विशेषेण तदाऽनघ ! सुरक्षितं सुगुप्तं च सर्वायुधसमन्वितम् नरपुर भग्नश्रेष्ट ! यथेन्द्रभवनं तथा ॥१८॥ न घाऽमुद्रोऽभिनिर्यानि, न चाऽमुद्रः प्रवेश्यते । वृष्ण्यन्धकपुरे राजस्तदा सोभसमागमे अनुग्ध्याम सर्वासु चत्वरेषु च कौरव ! बलं बभूव गजेन्द्र ! प्रभूनगजवाजिमत् दनयंतनभनं च दत्तायुधपरिच्छदम् फूलोपधानं न नदा बलमासीन्महाभुज ! न कुप्यवतनी कधिन्न चाऽनिकान्तयेतनी नाऽनुग्रहभृतः कश्चिन्त चाऽदृष्टपगममः एवं मुधिहिना गजन् ! द्वारका भूरिदक्षिणा । आहुर्कन मुगुमा र गला गजीवलोचन ! uvadinarasimharatoantaruarantervarn.indai.randi.basa.sal.daun.5.. . १ अध्याय १६ ] म हा भारत १५१३ . &TTATRIARTITUT GUD NUUTTTTTI RITIRANI INAWURANT LANTUL अथ पोडशोऽध्यायः ।। १६ ।। - VOLUITULURLMNINO'LD'UIUDITIMITWIRTUVUWLALU वासुदेव उवाच-तां तूपयातो राजेन्द्र ! शाल्वः सौभपतिस्तदा । प्रभूतनरनागेन वलेनोपविवेश ह समे निविष्टा सा सेना प्रभूतसलिलाशये चतुरङ्गावलोपेता शाल्वराजाभिपालिता वर्जयित्वा इमशानानि देवतायतनानि च वल्मीकांश्चैत्यवृक्षांश्च तन्निविष्टमभूद्वलम् अनीकानां विभागेन पन्थानः संवृताऽभवन् प्रवणाय च नेवाऽऽसञ्च्छाल्वस्य शिविरे नृप! ॥ ४ ॥ सर्वायुधसमोपेतं सर्वशस्त्रविशारदम् रथनागाश्व *कलिलं पदातिध्वजसंकुलम् तुष्टपुष्टवलोपेतं वीरलक्षणलक्षितम् विचित्रध्वजसन्नाहं विचित्ररथकार्मुकम् संनिवेश्य च कौरव्य ! द्वारकायां नरर्पभ ! अभिसारयामास तदा वेगेन पतगेन्द्रवत् तदापतन्तं संदृश्य वलं शाल्वपतेस्तदा निर्याय योधयामासुः कुमारा वृष्णिनन्दनाः ॥ ८ ॥ सोलहवां अध्याय ॥१६॥ श्रीकृष्ण जी ने कहा-हे युधिष्ठिर! राजा शाल्व और वह सेना भी संपूर्ण आयुध, शत्र, रथ, हाथी, बड़ी भारी चतुरहिणी मेना लेकर, उक्त प्रकार मे शूरवीर, ध्वजा, कवच और धनुषों से युक्त होने रक्षा की हुई द्वारका पुरी पर चढ़ आया । और के कारण से बड़ी भयानक और सब लक्षणों से लक्षित उसकी सेना श्मशान भूमि, देयालय, वल्मीक और थी। राजा गाल्व ने ऐसे योद्धा सैनिकों को साथ लेकर, चैत्य वृक्षों को छोड़कर समान पृथ्वी पर, जहां विचित्र स्थ, हाथी, घोड़े, पैदलों के द्वारा गरुड़ के अनेक कुएं और तालार थे, टहरी । जहां पर राजा समान महावेग से द्वारकापुरी पर आक्रमण किया। माल्य का डेरा था, यहां मेना इस प्रकार से विभाग इधर वृष्णिवंग के कुमार सब सेना-सहित मौमानि पूर्वक नियत कर दी गई थी, कि वहां छिपकर पहुँनने के आने और आक्रमण करने का वृतान्त सुनकर, का कोई मार्ग नहीं रहा था ॥१४॥ बाहर निकले और उसके साथ युद्ध करने लगे। सलिलं गंवर vaveDEOHELPEPERTY TODemermETRIOTHEROETITUTErrrrrrrrrreneeri andutomamimmmmmmmRAISITIDIHIJIRamnimanmaamaimandir -- , . -- - Crn १५१४ म हा भारत [ वनपर्व SENTERTAITINounuTILamummyREALITranRRITI.marpramLODmanmnma - haratanamanarayானாராraranarathnan - असहन्तोऽभियानं तच्छाल्वराजस्य कौरव ! चारुदेष्णश्च साम्वश्च प्रद्युम्नश्च महारथः ते रथैदशिताः सर्वे विचित्राभरणध्वजाः संसक्ताः शाल्वराजस्य वहुभिर्योधपुङ्गवैः ॥ १० ॥ गृहीत्वा कार्मुकं साम्ब शाल्वस्य सचिवं रणे । योधयामास संहृष्टः क्षेमवृद्धिं चमूपतिम् तस्य वाणमयं वयं जाम्बवत्याः सुतो महत् मुमोच भरतश्रेष्ठ ! यथा वर्षं सहस्रक् ॥ १२ ॥ तद्वाणवपं तुमुलं विपेहे स चमूपतिः क्षेमवृद्धिर्महाराज ! हिमवानिव निश्चलः ॥ १३ ॥ ततः साम्बाय राजेन्द्र ! क्षेमवृद्धिरपि स्वयम् । मुमोच मायाविहितं शरजालं महत्तरम् ॥ १४ ॥ ततो मायामयं जालं माययैव विदीर्य सः साम्बः शरसहस्रेण रथमस्याऽभ्यवर्पत ततः स विद्धः साम्बेन क्षेमवृद्धिश्चमूपतिः अपायाजवनेर श्वेः साम्बवाणप्रपीडितः 1) १६ ॥ तस्मिन्विप्रद्रुते क्रूरे शाल्वस्याऽथ चमूपतौ ममिद्ध राजकुमार चारदेष्ण, साम्य और प्रद्युम्न आदि दुसह वाणों की वर्षा को सह कर साम्ब के ऊपर उममीमपनि के आममण को नहीं सह सके । मा यापूर्वक वाण यरसाने लगा। तब साम्ब ने अपने तर पर पहने, मलिये, रची पर चढ़े चे मायामय गन्त्रों के प्रभाव से सेनापति के परिश्रम गनमार ग्रुपक्ष के और और वीर पुरषों के माथ को व्यर्थ कर दिया ॥११॥१५॥ युद्ध करने ॥१०॥ इसके पश्चत गे सेनापति के रथ के ऊपर जल- जाम्बवनी के पुत्र माम्यगाय के मानी और भाग के समान लगातार वाणों की वर्षा करने लगे। मनापनि दिमे मिहार, वर्षा के ममान उस साम्य के वाणों की चोट से बहुत ही व्यथित होकर पधाण वामांग रंग मनानि वृद्धि भी दिमा- सेनापति ममाग से हट गया । क्षेमवृद्धि जप युद्ध पर मन भर होकर हिमन मा उम में भाग गया, तब वेगवान् नाम का अगर मेरे पुन .मना : - per l'19*1**77"1"'irrºs*i'i'l'ri*r*t''IT'CT'ersrendrercrrererererrureucceutical अध्याय १६ ] म हा भारत १५१५ ஒமாய்யாராமைITTIாரராாாாாாாaaரKNாாாாாாாாாாபாள ॥ १७ ॥ । - BUL'''L'UOTOLALUDILO 'LOMTULITTULLIUS'T'UTO CLI'L'I'IULU'WW'W91 वेगवान्नाम दैतेयः सुतं मेऽभ्यद्रवदली अभिपन्नस्तु राजेन्द्र ! साम्बो वृष्णिकुलोद्वहः । वेगं वेगवतो राजस्तस्थौ वीरो विधारयन् स वेगवति कोन्तेय! साम्बो वेगवतीं गदाम् चिक्षेप तरसा वीरो व्याविध्य सत्यविक्रमः तया त्वभिहतो राजन्वेगवान्यपतद भुवि वातरुग्ण इव क्षुण्णो जीर्णमृलो वनस्पतिः ॥ २० ॥ तस्मिन्विनिहते बीरे गदानुन्ने महासुरे प्रविश्य महतीं सेनां योधयामास मे सुतः ॥ २१ ॥ चारुदेणेन संसक्तो विविन्ध्यो नाम दानवः महारथः समाज्ञातो महाराज! महाधनुः ॥ २२ ॥ ततः सुतुमुलं युद्धं चारुदेष्णविविन्ध्ययोः वृत्रवासवयो राजन्यथा पूर्व तथाऽभवत् ॥ २३ ॥ अन्योन्यस्याऽभिसंक्रुद्धावन्योन्यं जनतुः शरेः । विनदन्तौ महारावान् सिंहाविव महावलो ॥ २४ ॥ रोक्मिणेयस्ततो वाणमग्न्यापमवर्चसम् अभिमन्व्य महास्त्रेण संदधे शत्रुनाशनम् स विविन्ध्याय सक्रोधः समाहृय महारथः साम्य पर आक्रमण करने को वेग से दौड़ा । साम्ब विविन्ध्य दानव जो बड़ा धनुषधारी और महारथी निर्भय-माव से, उसके उम वेग को सह कर गदा विग्यान था, नारुदेष्ण मे युद्ध करने लगा । उन हाथ में लेकर झाटे । उन्होंने वह गदा टसको दोनों का आपस में ऐमा युद्ध हुआ. जमा पहले मारी । वेगवान् अमुर साम्ब की गढा लगने से, दन्द्र और वृत्रासुर में हुआ था। दोनों वीर परम्पर एक दम अंचत होकर आंधी के उखाड़ पुगने वृक्ष कुपित होकर महावनी दी मिहों की तरह भयङ्कर की तरह पृथ्वी पर गिर पड़ा और मर गया । गल मे गरजने हुए एक दूसरे पर वाण चगने ॥१६॥२०॥ रंगे । तय रक्मिणी के पुत्र चारुदेष्ण ने आग्नि और तब मात्र उत्साह के माय वेगवान की सेना में सूर्य तुन्य भयानक वाण को मन्त्र पढ़ र, धनुप घुमकर पार मंग्राम करने रगा। हमी असमर में पर चनाया और मोध के साथ विविन्ध्य की रर. Ramruammeaninainamainani immamimara.maarnmammicraticnamata.cim.anima.x; १ ALL'OT'I'15'11''0'P****?"ISTUOTT TETT19''LCUN mrrrrrrers १५१६ म हा भारत [ वनपर्व bathDIROHTANTHIRWAITINISTOAnimamulimmummmmmmmarAmarharurane uniaTARulimmilia.GLuli.indiatiliulinalLICC चिक्षेप मे सुतो राजन् ! स गतासुरथाऽपतत् ॥ २६ ॥ विविन्ध्यं निहितं दृष्ट्वा तां च विक्षोभितां चमूम् । कामगेन स सौभेन शाल्वः पुनरुपागमत् ॥ २७॥ ततो व्याकुलितं सर्व द्वारकावासि तद्वलम् दृष्ट्वा शाल्वं महाबाहो ! सौभस्थं नृपते ! तदा ततो निर्याय कौरव्य ! अवस्थाप्य च तद्बलम् । आनर्तानां महाराज! प्रद्युम्नो वाक्यमब्रवीत् ॥ २९ ॥ सर्वे भवन्तस्तिष्टन्तु सर्वे पश्यन्तु मां युधि निवारयन्तं संग्रामे वलात्सौभं सराजकम् ॥ ३०॥ अहं सौभपतेः सेनामायसै जगैरिव धनुर्भुजविनिर्मुक्त शयाम्यद्य यादवाः ! आश्वसध्वं न भीः कार्या सौभराडद्य नश्यति । मयाऽभिपन्नो दुष्टात्मा स सौभो बिनशिप्यति ॥ ३२ ॥ एवं युवति संहृप्टे प्रद्युम्ने पाण्डुनन्दन ! धिष्टितं तद्धलं वीर! युयुधे च यथासुखम् ॥ ३३ ॥ इति श्रीम-महाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि सौभयधापाख्याने पोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ पार पर उसके ऊपर यह वाण चलाया। विविध्य में आगया हूँ। तुम लोग घबराओ नहीं ॥२७॥३०॥ भी मरवर रथ पर गिर पड़ा ॥२१॥२६॥ मै आज सप के आकार वाले, भयङ्कर याणों को राजा माल्ब उसको मरा हुआ और सेना को बाल से धनुष पर चढ़ाकर छोड़ता हूँ, और उनसे गई देयकर विमान में बटा हुआ सम्मुम्य आया। शारूप की सर मेना को नष्ट करता हूँ। तुम भय छोड़ उमा विमान में टा हुआ दंग्यकार द्वारा की कर धैर्य से दुरात्मा गाल्व आज मुझसे भिड़ कर मना व्याकुल हो गई। ममय महावीर प्रया अपने नगर के साथ नष्ट होगा। महावा मधुमके में बाहर निकल कर मय का धर्य देते हुए कहा यो कहने पर, सब मेना मार्चपदी से बड़ी कर हे भान (द्वारका) देश पासिया । देगी, म युद्ध करने लग ॥३१॥३३॥ नानिय ! माना क के लिये युद्धगमि फापर्य या गामापां अध्याग ममाना॥१६॥ anmoniumsame.aadaaTINAToilsinamroGail.COMMARA-Rainita.hale --नि ITITITI.T.ind 2.17rQl243***1*er:'*'****ErrCuaTTT TUCCI'TI'S'leri't'rt'rry''OLI LIX TAULATO'L'L'L'' .. PomrswasugUMPERIOUTBRATIOWLTIMILARLYWOHIrontense." अध्याय १७] म हा भारत १५१७ Aromanimurrammmmmuanmummmmammomammanmrammammarrironzars अथ सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ वासुदेव उवाच-एवमुक्त्वा गैक्मिणेयो यादवान्भरतर्षभ ! दंशितैर्हरिभिर्युक्तं रथमास्थाय काञ्चनम् उच्छृित्य मकरं केतुं व्यात्ताननमिवाऽन्तकम् । उत्पतद्भिरिवाऽकाशं तैर्हयैरन्वयात्परान् ॥ २ ॥ विक्षिपन्नादयंश्चापि धनुःश्रेष्ठं महाबलेः तूणखड्गधरः शूरो बद्धगोधाङ्गुलित्रवान् स विद्युच्छुरितं चापं विहरन्वे तलात्तलम् मोहयामास दैतेयान्सर्वान्सौभनिवासिनः तस्य विक्षिपतश्चापं संदधानस्य चाऽसकृत् नाऽन्तरं ददृशे कश्चिन्निघ्नतः शात्रवान् रणे मुखस्य वर्णो न विकल्पतेऽस्य चेलुश्च गात्राणि न चापि तस्य । सिंहोन्नतं चाप्यभिगर्जतोऽस्य शुश्राव लोकोऽद्भुतवीर्यमग्यम् ॥ ६ ॥ जलेचरः काञ्चनयष्टिसंस्थो व्यात्ताननः सर्वतिमिप्रमाथी वित्रासयनराजति वाहमुख्य शाल्वस्य सेनाप्रमुखे ध्वजाग्यः ततस्तूर्ण विनिप्पत्य प्रद्युम्नः शत्रुकर्षणः शाल्वमेवाऽभिदुद्राव विधित्सुः कलहं नृप! ॥ ८ ॥ मतरहवां अध्याय ॥१७॥ श्रीकृष्ण जी ने कहा-हे युधिष्ठिर ! प्रद्युम शत्रुओं पर प्रहार करने लगे, कि कोई उनके काम यादवों से यों कहकर कवच से रक्षित घोड़ों मे जुते में बाधा नहीं डाल सका । युद्ध के समय प्रबार के मुवर्ण-जटित रथ पर चढ़ कर, मुंह फैलाये हुए चेहरे का रत तनिक भी नहीं बदला । वे इतनी यमगज की तरह, बेग से शत्रु के पाम गये । उन फुती के साथ युद्ध कर रहे थे, कि उनके क्मिी के रथ पर मछली के चिन्ह वाली पनाका फहरा अन प्रत्यन का हिलना दुलना नहीं देम पड़ना था। रही थी। विविध अत्रों के जाननेवाले प्रद्युम्न ने बीच-बीच में केवल उनके मिंटनाद में यह जान बिजली प्रेम धनुष पर टोग चदार मोम नगर पर पड़ना था, कि उनके ममान वीर पुरुष पृथ्वी पर स्थित सब योद्धा दानवों को व्याकुल कर दिया ।। और कोई नहीं है। प्रद्युम्न के रथ में लगे हुए सुवर्ण- ॥१॥ मय ध्वजा के दण्ड के मिो पर रंगे-ममुद्र के प्रथम ऐमी चतुराई और मावधानी के माध जीव/ज-तुओं में श्रेष्ठ, मु. पलाय-बनावटी मन्छ । DATALITD. 170021122nipUTD101722mremTIVATIrry'COINTrrrrrra [ બનાવ १५१८ म हा मारत -HimururammmmmmmmuTumarimmisintinuomamimanmamalinmunalilhisina .. -- - - mum humatonbuIMILIALILLVI2wun अभियानं तु वीरेण प्रद्युम्नेन महारणे नाऽमर्पयत संक्रुद्धः शाल्वः कुरुकुलोद्वह ! स रोपमदमत्तो वै कामगादवरुह्य च प्रद्युम्नं योधयामास शाल्वः परपुरञ्जयः तयोः सुतुमुलं युद्धं शाल्ववृष्णिप्रवीरयोः समेता ददृशुर्लोका वलिवासवयोरिव तस्य मायामयो वीर ! रथो हेमपरिष्कृतः सपताकः सध्वजश्च सानुकर्षः सतूणवान् ॥ १२ ॥ स तं रथवरं श्रीमान्समारुह्य किल प्रभो! मुमोच वाणान्कौरव्य ! प्रद्युम्नाय महाबलः ततो वाणमयं वर्ष व्यसृजत्तरसा रणे प्रद्युम्नो भुजवेगेन शाल्वं संमोहयन्निव स तैरभिहतः सङ्ख्ये नाऽमर्पयत सौभराट् । शरान्दीप्ताग्निसंकाशान्मुमोच तनये मम तानापततो वाणोघान्संचिच्छेद महावलः ततश्चाऽन्याञ्च्छरान्दीप्तान्प्रचिक्षेप सुते मम स शाल्वयाणे राजेन्द्र ! विद्धो रुक्मिणिनन्दनः । मुमोच बाण त्वरितो मर्मभेदिनमाहवे ॥ १७॥ को देगार शारुप की सना बहुत ही टर गई । शाप मायानिर्मित मुवर्णमय रथ पर चढ़कर प्रद्युमा यह देखापर प्राओं के नाम करनेवाले प्रद्या और के ऊार देर के देर वाणों की वर्षा करने लगा। भी मार के माध युद्ध की इच्छा में शास्त्र के महाया प्रचार भी शत्रु को मारने का हद निश्चय समीर गये । शायनी मधु के पराक्रम को देश करके बंग मे याणवर्षा करते हुए शाल्व को रोकने कर यहुन क्रुद्ध हुन । पिर यह आकाश में उड़ने । अद्याप की वाणवा गे चिदकर भारत ने यांसमोम विमान में उतर व प्रपत्र में युद्ध करने भी उनपर जननी हुई आग के ममाग याण छोड़े। एगा ॥५॥१०॥ प्रा ने स्वाभारिक गाहस और परामाम के माध वमा जान पड़ा, मानी देवगन इन्द्र प्राधिन नयाणां वो फिल कर दिया । तप दुरास्मादानय गवा पनि परमारमण कर है। अब और भी प्रोधित होकर, बार-बार मन से वाण ICALCOMEONLIDARIOUTUATIMILLIATIMESTIANTARAM.NPOPUPTICAINION, । 1.MHIRITUTTARAMCHITHAIRTIMULATOPATI अध्याय १७) म हा भारत १५१९ EmmiminimummmminimuTRATIranimurmernamamRSrise गागाभागाrevIITrainitaldirien.comanimal.arunaari तस्य वर्म विभिद्याऽऽशु स बाणोमत्सुतेरितः । विव्याध हृदयं पत्री स मुमोह पपात च ॥ १८ ॥ तस्मिन्निपतिते वीरे शाल्वराजे विचेतसि संप्राद्रवन्दानवेन्द्रा दारयन्तो वसुन्धराम् हाहाकृतमभूत्सेन्यं शाल्वस्य पृथिवीपते ! नष्टसंज्ञे निपतिते तदा सौभपतौ नृपे नत उत्थाय कौरव्य ! प्रतिलभ्य च चेतनाम् । मुमोच वाणान्सहसा प्रद्युम्नाय महाबलः तैः स विद्धो महाबाहुः प्रद्युम्नः समरे स्थितः । जत्रुदेशे भृशं वीरो व्यवासीदद्रथे तदा ॥ २२ ॥ तं स विद्ध्वा महाराज!शाल्वो रुक्मिणिनन्दनम् । ननाद सिंहनादं वे नादेनाऽऽपूरयन्महीम् ॥ २३ ॥ ततो मोहं समापन्ने तनये मम भारत ! मुमोच वाणांस्त्वरितः पुनरन्यान्दुरासदान् ॥ २४॥ स तैरभिहतो वाणेवहुभिस्तेन मोहितः निश्चेष्टः कोरवश्रेष्ट ! प्रद्युम्नोऽभूद्रणाजिरे ॥ २५ ॥ इति श्रीमन्महाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि सौभवोपाख्याने सप्तदशोऽध्यायः ।। १७ ।। वरसाने लगा। शाल्व के वाणों से प्रद्युम्न के अन वह टटकर फिर प्रद्युम्न के ऊपर तीक्ष्ण वाणों की जर्जर हो गये । तब उन्होंने एक अन्तमदी वाण वर्षा करने लगा । उन वाणों के प्रहार से प्रद्युम भी शाल्व को मारा ||११|१७|| मूच्छित हो गये । यह देखकर शाल्म के आनन्द वह वाण कवच को तोडकर शाल्व के लय की सीमा न रही। उसन और भी अधिक माहित में घुम गया । इससे वह मूच्छित होकर, पृथिवी पर होकर प्रचण्ड मिहनाद किया। वह फिर प्रद्युम के ऊपर गिर पड़ा। यह देख और-और दानव गावित होकर लगातार वाण वरमाने लगा। महावीर प्राप्त हाहाकार करते हुए, पांच की धमक से पृवी पैने वाणों के जाल में छिप गये। उनके अन पई यो कम्पाते हुए, युद्धभूमि से भागने लगे। इमी जगह में घायर हो गये । वेनीघ्र ही अपेत दो अवमा में महापराक्रमी शाम को चेत हो आया । गये । ॥१८॥२५॥ वनपर्व का मनरहवां अध्याय ममाप्त हुआ ।। १७ ॥ ammmmmmonthDAsminarianusarmmroDimTICT unaani.sarma.TACTata Ti.. उसके 1 NEETINDREDITOREHINDERLDLYRITUTEDYPOEncouPORTAI Accurr, म हा भारत विन utiRamrilhindiaNATTIMirmitmmuTHSniraimurunmanndiGLIommaraitra अथ अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ - - BULLETIDAOD LOTION LOUDSPUTU0191913001 वासुदेव उवाच-शाल्यवाणार्दिते तस्मिन्प्रद्युम्ने वलिनां वरे वृष्णयो भन्नसंकल्पा विव्यथुः पृतनागताः हाहाकृतमभूत्सर्वं वृष्ण्यन्धकवलं ततः प्रद्युम्ने मोहिते राजन् ! परे च मुदिता भृशम् ॥ २ ॥ तं तथा मोहितं दृष्ट्वा सारथिर्जवनैहयैः रणादपाहरतूर्ण शिक्षितो दारुकिस्तदा नातिदूरापयाते तु रथे रथवरप्रणुत् धनुर्ग्रहीत्वा यन्तारं लब्धसंज्ञोऽब्रवीदिदम् ॥ ४ ॥ सौते! किं ते व्यवसितं कस्माद्यासि पराङ्मुखः । नेप वृष्णिप्रवीराणामाहवे धर्म उच्यते ॥ ५ ॥ कञ्चित्सौते ! न ते मोहः शाल्वं दृष्ट्वा महाहवे । विपादो वा रणं दृष्ट्वा ब्रूहि मे वं यथातथम् ॥ ६ ॥ सौतिरुवाच - जानार्दने !न मे मोहो नाऽपि मां भयमाविशत् । अतिभारं तु ते मन्ये शाल्वं केशवनन्दन ! सोपयामि शनैवीर ! बलवानेप पापकृत मोहितश्च रणे शूरो रक्ष्यः सारथिना रथी अठारहवां अध्याय ||८|| श्रीकृष्ण जी ने कहा-हे युधिष्ठिर ! शाल्व के रणभूमि को छोड़ कर तुम क्यों भागे जा रहे हो याण र गने में जब मधुन अचेत हो गये, तर वृष्णि- युद्ध से विमुग्व होकर भागना पृष्णिवंश के वीरों या कधीर यादय स्माह-हीन होकर हाहाकार का धर्म नहीं है । सत्य-सत्य कहो ! तुम क्या इस वरने मेंगे । घु-पक्ष को यहुन आनन्द हुआ। पार युद्ध में काल्प के पल विश्राम को देखकर दारता मारथी का पुन, मुमिक्षित.मया का रथी मात व्याल हो गय होश६॥ नाम दशा में दबार पयगया नहीं। यह यह मुनकर गारथी ने कहा- शयन्दन! नपर यो र मंगन वगनाथ युद्धगाम मे हर। यद आप न समझें, किम राजा शाल्पक पराक्रम र गया। यहा दात ही मार को दो पी दंगकर, टर पर भाग पाया है। उसके पाण भागारि पनुष वाण हाच मा रही की चोट में आप अंत हो गये थे, इसी पारण माया ग पागलपुर ! नुमने यह पयागा' युद्ध में विगुग हाफर चरा आया है। रथी चाहे PananaanaamaamaniaspamaamiddhananALAWOLLPundinaxantamannarra . SATTITI.TETAILEELPHALTERamtirecramLLED अध्याय १८ म हा मारत १५२१ primminirmurrrrruSUNILITarurumuTutorruarurtan UTTREng RANIMUMLMW UrEMAINTERATUTTARIUDITIHATIALAMNUALLELEMATLAarCIALLYeti आयुष्मंस्त्वं मया नित्यं रक्षितव्यस्त्वयाऽप्यहम् । रक्षितव्यो रथी नित्यमिति कृत्वाऽपयाम्यहम् ॥ ९ ॥ एकश्चाऽसि महावाहो वहवश्चापि दानवाः न समं रोक्मिणेयाऽहं रणे मत्वाऽपयामि वै ॥ १० ॥ वासुदेव वाच-एवं युवति सूते तु तदा मकरकेतुमान् उवाच सूतं कौरव्य ! निवर्तय रथं पुनः ॥ ११ ॥ प्रद्युम्न उवाच-दारुकात्मज ! मैवं त्वं पुनः कापीः कथंचन व्यपयानं रणात्सौते! जीवतो मम कर्हिचित् ॥ १२ ॥ न स वृष्णिकुले जातो यो वै त्यजति सङ्गरम् । यो वा निपतितं हन्ति तवाऽस्मीति च वादिनम् ॥ १३ ॥ तथा स्त्रियं च यो हन्ति वालं वृद्धं तथैव च विरथं विप्रकीर्णं च भग्नशस्त्रायुधं तथा त्वं च सूतकुले जातो विनीतः सूतकर्मणि धर्मज्ञश्चासि वृष्णीनामाहवेष्वपि दारुके ! स जानंश्चरितं कृत्स्नं वृष्णीनां पृतनामुखे अपयानं पुनः सौते ! मैवं काीः कथंचन अपयातं हतं पृष्ठे भ्रान्तं रणपलायितम् जितना बड़ा वीर पुरुष हो, उसके मूञ्छित हो जाने । युद्ध-भूमि से तुम्हारा भागना ठीक नहीं हुआ । जो पर उमकी रक्षा करना सारथी का कर्तव्य है । काई युद्ध छोड़ कर भाग जाता है; या शरणागन, मुझे आपकी और आपको मेरी सदा रक्षा करनी म्री, बालक, वृद्ध और जिमका रथ टूट गया हो चाहिये। इम कारण से मैं आपको रक्षायोग्य जान अथवा गम हट गया हो, उसमे युद्ध करता है, वह कर रथ को दूर रिये जाता हूँ। दूसरा कारण यह कभी वृष्णिवश में उत्पन्न नहीं है । हे दारुनन्दन ! है, कि आप अक्ले हैं और यह दानव बहुत मे हैं, तुम सूनकुल में उत्पन्न और सारथी के कार्य में इस से मैं इस युद्ध में बराग नहीं देखता हूँ । विशेषरूप से शिक्षित हो, वृष्णिवंश के युद्ध-धर्म ॥७.१०॥ को भी अच्छी तरह जानते हो। इम कारण अर वासुदेव कहने हैं-सारथी के यों कहने पर फिर कभी इस तरह युद्ध से मत भागना। में युद्ध मकरध्वज प्रद्युम्न ने उम मे कहा, कि रथ को रोटाओ मे भाग आया और शत्रुओं ने मेरी पीट पर प्रहार फिर कभी ऐसा कार्य मन करना । मेरे जीते रहते दिये यह मुनकर वीरसिंह श्रीकृष्ण के बड़े भाई WWWOODURATGARHPERATUREDDDDDDDHANTERE: aamamalnivanmommummsmammmmmunananduamasamudrammraduatraitianima. - [ वनपर्व १५२२ म हा भा र त RTOmmmmm TrmmmunnamunanammmmmmmmHISATTITrnamannamrIANE ॥ १७ ॥ .. - । HTTrainRUIDAImmorpRITD.min.hilati immunanima गदाग्रजो दुराधर्षः किं मां वक्ष्यति माधवः केशवस्याऽग्रजो वापि नीलवासा मदोत्कटः किं वक्ष्यति महावाहुबलदेवः समागतः किं वक्ष्यति शिनेनप्ता नरसिंहो महाधनुः अपयातं रणात्सूत! साम्बश्च समितिञ्जयः ॥ १९ ॥ चारुदेष्णश्च दुर्धर्षस्तथैव गदसारणी अक्रूरश्च महाबाहुः किं मां वक्ष्यति सारथे! ॥ २० ॥ शूर संभावितं शान्तं नित्यं पुरुपमानिनम् स्त्रियश्च वृष्णिवीराणां किं मां वक्ष्यन्ति संहताः ॥ २१ ॥ प्रद्युम्नोऽयमुपायाति भीतस्त्यक्त्वा महाहवम् । धिगेनमिति वक्ष्यन्ति न तु वक्ष्यन्ति साध्विति ॥ २२ ॥ धिग्वाचा परिहासोऽपि मम वा मद्विधस्य वा । मृत्युनाऽभ्यधिकः सौते!स त्वं मांव्यपयाः पुनः।। २३ ॥ भारं हि मयि संन्यस्य यातो मधुनिहा हरिः । यज्ञं भारतसिंहस्य न हि शक्योऽद्य मर्पितम् ॥ २४ ॥ कृतवर्मा मया वीरो निर्यास्यन्नेव वारितः शाल्वं निवारयिष्येऽहं तिष्ठ त्वमिति सूतज ! ॥ २५ ॥ स च संभावयन्मां वै निवृत्तो हृदिकात्मजः वरदेव, मात्यकि, माम्य, दद्धर्ष चारदेण, गद,मारण, तुम अब कभी इस तरह युद्ध-भूमि से मत भागना । महापात अमर आदि यादव मुझे क्या फंगर महात्मा मधुसूदन मुझ पर ही सर भार छोड़कर ॥११॥२०॥ भरतपशी राजा युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में गये हैं वृष्णिया व वीरों की मिया जो मुझ शान्त, इम कारण आज इस तरह मेरा युद्ध छोड़कर भागना घर बार पंरपाभिमानी मानी है- मुझे क्या किमी तरह ठीक नहीं हुआ। महावीर कृतवर्मा शान बगा। वे मर यही गी. नि भय के गारे में युद्ध पाने के रिये भा रहे थे । उन्हें मैंने यह गुट छाहर ची आये इन्हें विकार है ! पिवार ५६ करोटा दिया, कि मैं दीपाल्य को मारने देने गिधा की अन्टा न गी गनपुत्र ! जाता है। आप यहीं रहिये । वे भी बहत सम्मान के या मेरे मरोग, विकार के मा निन्दा गणने माथ मुझे भेजार रीट गये । इस तरह युद्ध मे भाग मागासी भच्या गगाते हैं। हमारय । पर उन्हीं में क्या कहूँगा ॥२१॥२६॥ RABAnaima.TECTalua.airan.amriummaa.a.TA.ar aantaramanarth...- Her: rurrrrr. PHPUmer Poarnsotreference अध्याय १८] महाभारत १५२३ DIDImmunommuTIRITUDE ATTETTERGrahanu । traliGrammanTIRTHminnn.cimmamATIIItantnananamulimmnniaminormatmanmarg HanumDimumnuaruriamlilammanasingmamalinm । तं समेत्य रणं त्यक्त्वा किं वक्ष्यामि महारथम् ॥ २६ ॥ उपयान्तं दुराधर्ष शमचक्रगदाधरम् पुरुपं पुण्डरीकाक्षं किं वक्ष्यामि महाभुजम् ॥ २७॥ सात्यकिं बलदेवं च ये चाऽन्येऽन्धकवृष्णयः । मया स्पर्धन्ति सततं किं नु वक्ष्यामि तानहम् ॥ २८ ॥ त्यक्त्वा रणमिमं सौते! पृष्टतोऽभ्याहतः शरैः । त्वयाऽपनीतो विवशो न जीवयं कथंचन ॥ २९ ॥ स निवर्त रथेनाऽऽशु पुनस्कनन्दन ! न चैतदेवं कर्तव्यमथापत्सु कथंचन ॥ ३० ॥ न जीवितमहं सौते ! वहु मन्ये कथंचन अपयातो रणागीतः पृष्टतोऽभ्याहतः शरैः ॥ ३१ ॥ कदापि सूतपुत्र! त्वं जानीपे मां भयार्दितम् । अपयातं रणं हित्वा यथा कापुरुष तथा ॥ ३२॥ न युक्तं भवता त्वक्तुं सङ्ग्रामं दारुकात्मज! । मयि युद्धाथिनि भृशं स त्वं याहि यतो रणम् ।। ३३ ।। इति श्री मन्महाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि सामवधोपाख्याने अष्टादशोऽध्यायः ॥१८॥ और जब दुद्धर्ष, शङ्ख, चक्र, और गदा को आपत्ति पड़ने पर भी ऐसा करना उचित नहीं। मैं घारण करनेवाले श्रीकृष्ण, सात्यकि,बलदेव जी और- यदि डरकर रण से भागू और गन्नु लोग मेरी पीठ पर और अन्धक और वृष्णिवंशी लोग मुझमे आ-आकर प्रहार करें तो मैं उम जीवन से अपना कुछ गौरव मिलेंगे, तब उन से मैं क्या कहूँगा ! हे सुनपुत्र : नहीं समझना । तुमने क्या कमी मुझे दरकर, कायगें मैं रण छोड़कर चला आया, इससे शत्रुओं ने मेरी की तरह युद्ध छोड़कर, मागने देखा है ! हे मूतपुत्र ! पीठ पर प्रहार किये। अब यदि तुम इस तरह युद्ध- मेरी युद्ध करने की इच्छा अत्यन्त प्रबल होने पर ममि से मुझे हटा लाओगे, तो मैं किसी तरह आना भी तुम्हारा यों युद्धभूमि छोड़कर भागना किमी जीवन न रक्तूंगा। इसी कारण कहता हूँ, शीघ्र तरह टीक नहीं हुआ। इमलिये तुम मुझे भीम युद्ध- मेरा रथ लोटा ले चलो ॥२७॥३०॥ भृमि में ले चलो ॥३१॥३३॥ वनपर्व का अटारहवां अध्याय ममाम हुआ ॥२८॥ . DanADITIandilioni HOURU maamiminalimming WITTETITELTTAUTUMITITLE CITITOTEIL. TITTITTITYTTÖ म हा भारत [यनपर्व EADIEDIETamanarauraniuminor Indinarurnimurraliatrinaccr.aruta अथ एकोनविंशोऽध्याय ॥१९॥ ॥ १ ॥ - TETTRIEm.TO.GEMEntarprimaanindmurnimaniamaramananamanmannamme वासुदेव उवाच-एवमुक्तस्तु कौन्तेय ! सूतपुत्रस्ततोऽब्रवीत् प्रद्युम्नं वलिना श्रेष्ठं मधुरं श्लक्ष्णमञ्जसा न मे भयं रौक्मिणेय ! सङ्ग्रामे यच्छतो हयान् । युद्धज्ञोऽस्मि च वृष्णीनां नाऽत्र किंचिदतोऽन्यथा।॥ २ ॥ आयुष्मन्नुपदेशस्तु सारथ्ये वर्ततां स्मृतः सर्वार्थेषु रथी रक्ष्यस्त्वं चापि भृशपीडितः वं हि शाल्वप्रयुक्तेन शरेणाऽभिहतो भृशम् कश्मलाभिहतो वीर! ततोऽहमपयातवान् स वं सात्वतमुख्याऽद्य लव्धसंज्ञो यदृच्छया । पश्य मे हयसंयाने शिक्षा केशवनन्दन ! दारुकेणाऽहमुत्पन्नो यथावच्चैव शिक्षितः वीत भीः प्रविशाम्येतांशाल्यस्य प्रथितां चमूम् ॥ ६ ॥ वासुदेव वाच. एवमुक्त्वा ततो वीर हयान्सचोद्य सङ्गरे रश्मिभिस्तु समुद्यम्य जवेनाऽभ्यपतत्तदा मण्डलानि विचित्राणि यमकानीतराणि च सव्यानि च विचित्राणि दक्षिणानि च सर्वशः ॥ ८ ॥ --ளானா....மகயை எயககையைகல கவலைககாயxL उनीमयां अध्याय ॥ १९॥ 11.1:12:12RUnrelestituterIMIMIREter, अध्याय १२ म हा भारत १५२५ பாப்பாாாாமானாரTITறாராழைகளாரராாாாா - INIONISTIALOGUIDENTIFULYMPLOWITSureau CALLSunt - प्रतोदेनाऽऽहता राजन्रश्मिभिश्च समुद्यताः उत्पतन्त इवाऽऽकाशे व्यचरंस्ते योत्तमाः ते हस्तलाघवोपेतं विज्ञाय नृप ! दारुकिम् दह्यमाना इव तदा नाऽस्पृशंश्चरणेमहीम् सोपसव्यां चमू तस्य शाल्वस्य भरतर्षभ ! चकार नाऽतियत्नेन तदभुतमिवाऽभवत् ॥ ११ ॥ अमृप्यमाणोऽपसव्यं प्रद्युम्नेन स सौभराट् यन्तारमस्य सहसा त्रिभिर्वाणः समादयत् ॥ १२ ॥ दारुकस्य सुतस्तत्र वाणवेगमचिन्तयन् भूय एव महावाहो प्रययावपसव्यतः ॥ १३ ॥ ततो वाणान्वहुविधान्पुनरेव स सोभगट् मुमोच तनये वीर ! मम रुक्मिणिनन्दने ॥ १४ ॥ तानप्राप्ताञ्छितेर्वाणश्चिच्छेद परवीरहा रोक्मिणेयः स्मितं कृत्वा दर्शयन्हस्तलाघवम् ॥ १५ ॥ छिन्नान्दृष्ट्वा तु तान्वाणान्प्रद्युम्नेन स सौभराट् । आसुरीं दारुणी मायामास्थाय व्यसृजच्छरान् ॥ १६ ॥ चलने लगे, मानो आकारा-मार्ग से होकर जा रहे हैं। घरसाने लगा । प्रद्युम्न ने भी अपने हाथों की पुती उनके पांव पृथ्वी में पड़ने हुए नहीं जान पड़ते दिखाते हुए उन वाणों को अपने पाम नक आने नहीं दिया, राम्ने में ही दण्ड-खण्ड कर टाल । इम प्रकार मे वह मारथी थोड़े ही यन से अपने वाग! को व्यर्थ होते देखकर गाय ने फिर माल्व की सेना को दाहिनी ओर करता हुआ स्थ मायावल का महाग लिया। वह अब आमुगवाण सन्मुन्य ले पहुँच! । उमको देम्बका चलाने लगा। प्रद्युम्न ने भी ब्रन अन्न चाकर राह सव का आश्चर्य मा हो गया । और राजा गाल्व में ही माल्य के मय वाणों को काट डाग और अपनी सेना का दाहिनी ओर हट जाना दबकर अपने तीक्ष्ण वाण उमके कार चलाये । ये बाग मह न सका और उमने मारथी को तीन वाण मार राह पीनेवाले थे; उन वालों ने माल्व के हाथ- कर व्यासुर कर दिया । उन वानों की नोट महकर पान, मानक और साम्थन को छद के, भी माथी उसी गति मे रथ बढ़ाना ही गया । पीकर, उमको टिन कर दिया । महायरीमान्च तय गवा गाव फिर प्रद्युम्न के उपर अमंत्र वाण जब इस तरह अचेत होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा ICTURMEDITATILGUTITUT -- ." थे।।६।१२॥ TaT. काल्व के Dammamm.roan.i OTOBPEEDEry.002133 minuTETLITERTIES १५२६ म हा भारत [ वनपर्व TODIEmirtininindmmuTUFIFTTTrmirmirirmromanimITCOICULTrian । APDEAUTORIALILLDULTURMILAIMILLY । प्रयुज्यमानमाज्ञाय दैतेयास्त्रं महावलम् ब्रह्मास्त्रेणाऽन्तरा छित्वा मुमोचाऽन्यान्पतत्रिणः ॥ १७ ॥ ते तदत्रं विधूयाऽऽशु विव्यधू रुधिराशनाः शिरस्युरसि वक्त्रे च स मुमोह पपात च ॥ १८ ॥ तस्मिन्निपतिते क्षुद्रे शाल्वे वाणप्रपीडिते रोक्मिणेयोऽपरं वाणं संदधे शत्रुनाशनम् तमर्चितं सर्वदशाहपूगैराशीविषाग्निज्वलनप्रकाशम् दृष्ट्वा शरं ज्यामभिनीयमानं बभूव हाहाकृतमन्तरिक्षम् ॥ २० ॥ ततो देवगणाः सर्वे सेन्द्राः सहधनेश्वराः नारदं प्रेषयामासुः श्वसनं च मनोजवम् तो रोक्मिणेयमागम्य वचोऽवृतां दिवौकसाम् । नेप वध्यस्त्वया वीर ! शाल्वराजः कथंचन ॥ २२ ॥ संहरस्व पुनर्वाणमवध्योऽयं त्वया रणे पतस्य च शरस्याऽजो नावध्योऽस्ति पुमान्कचित् ॥ २३ ॥ मृत्युरस्य महाबाहो ! रणे देवकीनन्दनः कृष्णः संकल्पिता धात्रा तन्न मिथ्या भवेदिति ॥ २४ ॥ तनः परमसंहृष्टः प्रद्युम्नः शरमुत्तमम् संजहार धनुः श्रेष्टात्तृणे चैव न्यवेशयत् ॥ २५ ॥ नप प्रद्युम ने और एक नागन अमोघ वाण नल पर पेमा कोई नहीं जो इस वाण के चलने पर निकाल कर धनुष पर चढ़ाया। यादव लोग जिम वच जाय; परन्तु तुम्हें किसी तरह शाल्व का वध की पूजा करने हैं उस अमोघ वाण को धनुप पर करना उचित नहीं। इसकी मृत्यु तो श्रीकृष्ण जी चामा देमकर मर ामागचारी देवना हाहा- के हाथ से ही शिवी है। विधाता के लिये को बार करने रंग ॥१॥२०॥ मर रोग अमिट मानते हैं। उमा मिथ्या होना इन्द्र श्रादि देवताओं ने एकत्र होकर नारद अनर्थ है । तुमने धनुष पर जो याण चढ़ाया है, और वायु को रविपणी पुत्र प्रहार टमेनीय उतार रो । देवताओं की आजा को रन देवताभीर का मे टमी ममय प्रम के मान पर प्रभार ने उमी समय उम याण को उतार पाम आविमा पुत्र गावी. पर तमग सम्म निय! । भर प्रयु के वाण FrrrrrrrrrrrTITINOWHENCP rrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrererCHErrorerrerrerrers sammarALIATIONamanartuntaimirriTINAATRAananmi.ramdas. - पाम भेजा अध्याय २०] महाभारत १५२७ SimiliTunnirUTUITMITTIVRUTTITUTIOUTUKUTTourism TIPTITIOnmarvaliGOLD । . तत उत्थाय राजेन्द्र ! शाल्वः परमदुर्मनाः व्यपायात्सबलस्तूर्णं प्रद्युम्नशरपीडितः ॥ २६ ॥ स द्वारका परित्यज्य क्रूरो वृष्णिभिगर्दितः सौभमास्थाय राजेन्द्र ! दिवमाचक्रमे तदा ॥ २७ ॥ इति श्रीमन्महाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि सौभवधोपाख्याने एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥ से पीड़ित शाल्व को जब होश आया तब वह को छोड़, आकाश-मार्ग से अपने नगर को चल सेना सहित सौभ-विमान पर चढ़ कर, द्वारका पुगे दिया ॥२१।२७|| वनपर्व का उन्नीसवां अध्याय समान हुआ ॥ १९ ॥ HOMEPROMLWWESOURUDDHURDERUWAONDompers. अथ विंशोऽध्यायः ॥ २०॥ वासुदेव उवाच--आनर्तनगरं मुक्तं ततोऽहमगमं तदा महाक्रतो राजसूय निवृत्ते नृपते ! तव अपश्यं द्वारकां चाऽहं महाराज ! हतस्विपम् । निःस्वाध्यायवपट्कारां निर्भूषणवरस्त्रियम् ॥ २ ॥ अनभिज्ञेयरूपाणि द्वारकोपवनानि च दृष्ट्वा शङ्कोपपन्नोऽहमपृच्छं हृदिकात्मजम् अस्वस्थनरनारीकमिंद वृष्णिकुलं भृशम् किमिदं नरशार्दूल श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः एवमुक्तः स तु मया विस्तरेणेदमत्रवीत् DDER TumuTum.TA.InvimaaTLOORIJITGTONIC.TRACamara.maa.com - वीसवां अध्याय ॥२०॥ श्रीकृष्ण जी कहते है-हे युधिष्ठिर ! इस प्रकार पड़े हैं। नगरी की ऐमी धुरी दशा देख कर, मन्दद शाय चला गया । इधर मैं जब आप का राजसूय में पड़ का, मैने कृतवर्मा से पूछा-हे नरसिंह ! यज ममाप्त होने पर, लौट कर द्वारकापुरी को गया वृणिवंश के स्त्री पुज्य मे श्री-दीन क्यों देख पड़ नर देम्वा कि नगरी की वह गोमा नहीं रही। रहे हैं ! ऐमी कौन दुर्घटना हो गई है, गीघ्र कहो। वेदपाठ और वषटकार की धनि नहीं सुन पड़ती ! टन्होंने कहा- यदुश्रेष्ठ ! दुरात्मा माल्य ने आर श्रेष्ट स्त्रियों के पहनावे और मज-धज के बिना, मुख : आक्रमण किया था, इमी मे नगर्ग की यह दगा की शोभा फीकी पड़ गई है । मनोहा याग उजड़े हो गई है। यह सुन कर राजा उग्रगेन, यमुंदय HEDPUPPETUDIEROPMEIRIDDRIBETISTEPHERDR.RRIPTI १५२८ म हा भारत (ঘনত্ব AMAnnapurnANIRUITAmpAmitrimmirmitinuman.arunanuburbalmS.ON ansmirmirmirtIONENTrue - रोध मोक्षं च शाल्वेन हार्दिक्यो राजसत्तम ! ॥ ५ ॥ ततोऽहं भरतश्रेष्ठ ! श्रुत्वा सर्वमशेषतः विनाशे शाल्वराजस्य तदैवाऽकरवं मतिम् ततोऽहं भरतश्रेष्ट ! समा श्वास्य पुरे जनम् राजानमाहुकं चैव तथैवाऽऽनकदुन्दुभिम् सर्वान्वृष्णिप्रवीरांश्च हर्पयन्नब्रुवं तदा अप्रमादः सदा कार्यों नगरे यादवर्षभाः शाल्वराजविनाशाय प्रयातं मां निवोधत नाऽहत्वा तं निवर्तिप्ये पुरी द्वारवती प्रति सशाल्वं सौभनगरं हत्वा द्रष्टाऽस्मि वः पुनः । त्रिःसामा हन्यतामेषा दुन्दुभिः शत्रुभीपणा ॥१०॥ ते मयाऽऽश्वसिता वीरा यथावद्भरतर्षभ ! सर्वे मामब्रुवन्हृष्टा प्रयाहि जहि शात्रवान् ॥ ११ ॥ तैः प्रहृष्टात्मभिर्वीरैराशीर्भिरभिनन्दित. वाचयित्वा द्विजश्रेष्टान्प्रणम्य शिरसा भवम् ॥ १२ ॥ शेव्यसुग्रीवयुक्तेन रथेनानादयन्दिशः प्रमाय शहप्रवरं पाञ्चजन्यमहं नृप! ॥ १३ ॥ प्रयातोऽस्मि नरव्याघ्र बलेन महता वृतः और मय वृष्णिवंग के दौरों तथा पुरवासियों को मुझे आगीर्वाद देते हुए कहा-तुम जाओ ' तुम्हारा আগাম मैंने कहा-हे यादवा । तुम मनोरथ तुरन्त पुरा हो । वृष्णिवंश के बड़े-बूढ़े वीर निधड़क होकर इम नगरी में रहो । मैं जाता हूँ। यादवों के आशीर्वाद को ग्रहण करके, वाग्मणों को दुष्ट माल को मार बिना कभी मैं द्वारा को न और देवादिदेव महादेव को प्रणाम करने के उपरान्त होगा। मैं शाला को और उसके सौम विमान में रथ पर सवार हुआ । उम में ध्वजा-पताकाएँ को एक दम नष्ट करक अभी आकर तुममे मिलता फहरा रही थी और शैव्य मुग्रीव आदि चार बढ़िया घोड़े । अय शत्रुओं को टरानेवाले इस युद्ध के डई जुंत हुए थे । जाते समय रथ के पहियों की पर. की बजाओ।१०॥ घराहट और पाञ्चजन्य शह का शब्द दसों दिशाओं नप मप यादवों ने धर्य धार प्रमन्नविच मे में गूंज उठा। चतुरङ्गिणी सेना मेरे साथ चली अनेक HDPREDITLEx.prammaruaamamanna PIVITRImmniroandamanianumariminatantaHRITIONIDwimmunitiaunti - LACLUDHA ।
अध्याय २०] म हा भारत १५२९ DrammiuinmmmmmmmmanmanTTORGRIUITUmarinarantrancinaraniranaaraar ॥ १४॥ । OCCOLATUT MILLILITICI VITIT ITW IIYAFTTI TUTTI Immunmarrm । HUMILITATMM 14. क्लुप्तेन चतुरङ्गेण यत्तेन जितकाशिना समतीत्य बहून्देशान्गिरीश्च बहुपादपान् सरांसि सरितश्चैव मार्तिकावतमासदम् ॥ १५ ॥ तत्राऽोपं नरव्याघ्र शाल्वं सागरमन्तिकात् । प्रयान्तं सौभमास्थाय तमहं पृष्ठतोऽन्वयाम् ॥ १६ ॥ ततः सागरमासाद्य कुक्षौ तस्य महोर्मिणः समुद्रनाभ्यां शाल्वोऽभूत्सौभमास्थाय शत्रुहन् । १७ ।। स समालोक्य दूरान्मां स्मयन्निव युधिष्ठिर आह्वयामास दुष्टात्मा युद्धायैव मुहुर्मुहुः तस्य शाईविनिर्मुक्तैर्वहुभिर्मर्मभेदिभिः पुरं नाऽऽसाद्यत शरैस्ततो मां रोप आविशत् ॥ १९ ॥ स चापि पापप्रकृतिदैतेयापसदो नृप मय्यवर्पत दुर्धर्षः शरधाराः सहस्रशः ॥ २० ॥ सैनिकान्मम सूतं च हयांश्च समवाकिरत् अचिन्तयन्तस्तु शरान्वयं युध्याम भारत ॥ २१ ॥ ततः शतसहस्राणि शराणां नतपर्वणाम् चिक्षिपुः समरे वीरा मयि शाल्वपदानुगाः ॥ २२ ॥ जनपद, वृक्षों की पंक्तियों से गोभिन पहाड़, नदी, डोरी चदाकर मर्मभेदी असंख्य वाण टस पर और सरोवर आदि को लांघकर मैं मार्तिकावत छोड़ने लगा । किन्तु मेरा एक भी वाण शाल्व के नगर में पहुँचा ॥११॥१५॥ विमान तक न पहुंचा । यह देखकर मेरे क्रोध की वहां पहुँचकर सुना कि शाल्व अपने विमान आग और भी भड़क उठी । दुष्ट दानव शाल्व भी पर चढ़कर समुद्र के निकट गया है । मैं वहां से अत्यन्त क्रोध करके मेरे ऊपर वाण चलाने लगा। समुद्रतट की ओर चला । तरङ्गमाला-गोभित मेरी सेना, सारथी, हाथी और घोड़े टमकी वाण- समुद्र के पास पहुँचकर गाल्व, अपने चाहे जहां वर्षा से व्याकुल हो गये ॥१६॥२०॥ जा सक्नेवाले विमान द्वाग, उसके भीतर जाना मैं किञ्चितमात्र मी भयभीत नहीं हुआ। मैं चाहता था कि मुझे दूर से देखकर हंसते-हंसने और भी रत्माह के साथ निडर होकर युद्ध करने वह युद्ध के लिये पारम्बार पुकारने लगा । टस लगा । तब गास्व के पीछे और वीर पुरुषगण दुरात्मा के पुकारने पर मैं शीघ्रता से धनुप पर एकत्र ही कर मेरे ऊपर अमम्य वाण चलाने लगे। DU TOTDTT TUDIITEDTTOVE PLASTICTDTTIN'DICIOTTO AnAmARuminarums - १५३० महा भारत [ वनपर्व - । Tumr.mroTMENT ORDER. RATANDATIGAnnanatarampaithin IGNITUTICONDITINE छादयामासुरसुरास्तैर्वाणैमर्मभेदिभिः ॥ २३ ॥ न हया न रथो वीर न यन्ता मम दारुकः अदृश्यन्त शरैश्छन्नास्तथाऽहं सैनिकाश्च मे ॥ २४ ॥ ततोऽहमपि कौन्तेय शराणामयुतान्वहृन् आमन्त्रितानां धनुषा दिव्यन विधिनाऽक्षिपम् ॥ २५ ॥ न तत्र विषयस्त्वासीन्मम सैन्यस्य भारत ख विपक्तं हि तत्सौभं क्रोशमात्र इवाऽभवत् ॥ २६ ॥ ततस्ते प्रेक्षकाः सर्वे रंगवाट इव स्थिताः हर्पयामासुरुच्चा सिंहनादतलस्वनैः ॥ २७॥ मत्कराग्रविनिर्मुक्ता दानवानांशरास्तथा अंगेपु रुचिरापाङ्गा विविशुः शलभा इव ॥ २८ ॥ ततो हलहलाशब्दः सौभमध्ये व्यवर्धन वध्यतां विशिस्तीक्ष्णः पततां च महार्णवे ॥ २९ ॥ निकृत्तभुजस्कन्धाः कवन्धाकृतिदर्शनाः भैरवान्नादानिपतन्ति स्म दानवाः पतितास्तेऽपि भक्ष्यन्ते समुद्राम्भोनिवासिभिः । ननो मोक्षीरकुन्देन्दुमृणालरजतप्रभम् ॥ ३१ ॥ में मात्रओं के वाण जाल में गंमा छिप गया कि मुझं आकाश में दर्शक रूप से स्थित देवगण जयध्वनि अपनी मना और मामन्न नही दंग पड़ने थे । म करक और नालिया बजाकर मुझ का उत्साहित याणजान में गिरा २५, गाई, वजा, मैं और मंग करने लगे। मो हाथ म छुट हुए. वाण येग मे मी. महिप गंय: कुछ भी नहीं देख परता मादल में पहुंचकर उनके अहो में घुसने लंग। मेर धान विधिवक मन्त्र पढ़। मनुए पाने घाणा में घायल लोग आर्तनाद करंग लगे । उस दम हजार वाण नदांग ॥२१.५॥ आनार में माम यमान प्रतिध्वनिता रटा. मामगाव मनाना मामानमण भाग पक्ष पं. गंगा के. अगद-प्रत्यक्ष पट पट कर समुद्र में मार्ग में , मी बार मिपाही और वार गिति र उन्हें उसी ममय जल पंजीयमा जाने योटा ग पामक नहीं पहुँच १३५ ।। थाइम पास मन पावजन्य भावकातिमे '********* *zq* *****************z***poftrem TTP I'l't'e't'rrrer Terrifrel'rrcrcrcrz3 RITTranamUTARIANTASTINDIAuntaliano.m.ormatrana.ma..........
अध्याय २० ] म हा भारत १५३१ MinimummiTIMIMirritiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiii17.मा.दा.वायLERY CIAED RamanandMART RIDIURVEDIMALArtmravasatramremiumreervincreensuri जलजं पाञ्चजन्यं वै प्राणनाऽहमपूरयम् तान्दृष्ट्वा पतितांस्तत्र शाल्वः सौभपतिस्ततः ॥ ३२ ॥ मायायुद्धेन महता योधयामास मां युधि ततो गदा हलाः प्रासाः शृलशक्तिपरश्वधाः ॥ ३३॥ असयः शक्तिकुलिशपाशर्मिकनपाः शगः पटिशाश्च भुशुण्ड्यश्च प्रपनन्त्यनिशं मयि तामहं माययैवाऽऽशु प्रतिगृह्य व्यनाशयम् तस्यां हतायां मायायां गिरिशृङ्गैरयोधयत् ॥ ३५॥ ततोऽभवत्तम इव प्रकाश इव चाऽभवत दुर्दिनं सुदिनं चैव शीतमुणं च भारत ! ॥ ३६ ॥ अङ्गारपांसुवर्ष च शस्त्रवर्ष च भारत ! एवं मायां प्रकुर्वाणो योधयामास मां रिपुः ॥ ३७ ॥ विज्ञाय तदहं सर्व माययैव व्यनाशयम् यथाकालं तु युद्धेन व्यधर्म सर्वतः शरः ततो व्योम महाराज! शतसूर्यमिवाऽभवत् । शतचन्द्रं च कोन्तय ! सहस्रायुततारकम् वजाया । अपने पक्ष के वीर पुरुषों को मरते देख- हुआ फिर मेरे ऊपर गम्व और अनागें की वर्ग कर भाल्ब मेरे साथ माया-युद्ध कग्न लगा। वह कग्न रगा । मैं भी मायायल का महाग लेकर रगातार मुझ पर गदा, हल, प्रास, मूल, शक्ति, इन उपद्रवों को सक्ने में प्रवृत्त हुआ । बीच-बीच परशु, नलवार वन. पाश, वाण, पट्टिश और भुशुण्टी में अवमा पाकर में वाण युद्ध भी काना जाता था। आदि अन इस बम्मान लगा । नय तो मैं भी टम उपरान्न एकाएक आयाम मण्डल में मैकड़ों माया बल का महाग लकर, उसके मायाजाल को मूर्यों का प्रकाश देख पहा । दृमर्ग और तागगण वाटंन लगा । फिर यह दृष्ट पर्वत मिनाओं के हाग मण्टिन मैकडों चन्द्रमाओं का उदय हो आया । युद्ध करने लगा। व- माया के बल में जगत को हम स या निर्णय करना कठिन हो गया कि दिन कभी घंन अधे में दालना था और कभी विकट है या गन | फिर मा अन्धग हुआ कि कौन प्रकाश में उज्जवल बना देना था। इसी तरह वर दिशा विधा है. यट भी न समझ पड़ना था। हम भी दुर्दिन और कभी मुदिन करके जाई-गर्मी. प्रकार अपने को मोह मे गिधिर दान देम्बर आधी-पानी आदि के उपद्रव को रसन्न करता मन नुप पर प्रसाद चढ़ाकर छोडा । उम अम CIRunTATTTTTTTramirrrrrrrrrrrrrrrr..reer Ticenrr, EPTrammarARITITamidadaiindianpin.hindi. I amarimm.aamail.nati...... -- ।
अध्याय २१] म हा भारत १५३३ ETIDARUIREDIT मरम्पMELL.. - ananamarnamanmammmurammarnamamammmmaromimmunmmidslimni.animalsannintmeena.cam स्थातव्यमिति तिष्ठामि शाल्ववाणप्रपीडितः । अवस्थातुं न शक्नोमि अझं मे व्यवसीदति इति तस्य निशम्याऽहं सारथेः करुणं वचः अवेक्षमाणो यन्तारमपश्यं सरपीडितम् न तस्योरसि नो मूर्ध्नि न काये न भुजद्वये । अन्तरं पाण्डवश्रेष्ट ! पश्याम्यनिचितं शरैः स तु वाणवरोत्पीडाद्विस्रवत्यसृगुल्वणम् अभिवृष्टे यथा मेघे गिरिगरिकधातुमान् अभीपुहस्तं तं दृष्ट्वा सीदन्तं सारथिं रणे अस्तंभयं महाबाहो शाल्ववाणप्रपीडितम् अथ मां पुरुपः कश्चिद्वारकानिलयोऽब्रवीत् त्वरितो रथमारोप्य सौहृदादिव भारत ! आहुकस्य वचो वीर ! तस्यैव परिचारकः विपण्णः सन्नकण्ठेन तनिन्वोध युधिष्टिर! ॥ ११ ॥ द्वारकाधिपतिर्वीर आह त्वामाहुको वचः केशवेहि विजानीव यत्त्वां पितृसखोऽब्रवीत् ॥ १२ ॥ उपायायाऽद्य शाल्वेन द्वारकां वृष्णिनन्दन विपक्ते त्वयि दुर्धर्ष ! हतः शूरसुतो वलात् ॥ १३ ॥ बहुत ही पीडित हो रहा हूँ; मेरे में अब मामर्थ्य है । यह देखकर मैंने ठम मारथी को धैय दिया । नहीं है। युद्ध-ममि को छोड़कर भागना न चाहिये, इमी अवमा में टग्रमेन का एक सेवक नीप्रता से उमी विचार मे में अब तक यहा ठहरा हुआ हूं। स्थ दौडाना हुआ मेरे पाम आया ॥१०॥ दारुक मास्थी के दीन वचनों को सुनकर मैने टमके बहुन ही मित्रता का भाव दिबाने हुए उमने वाणों मे विधे हुए. अङ्गों को देखा तो छाती, मन्ना, कहा-हे कृष्णनन्द ! तुमको राजा रमन ने बुवा शरीर और दोनों भुजाओं में कोई अङ्ग ऐमा नहीं भेजा है, तुम तो यहा युद्ध कर रहे हो, वहाद्वारका पाया जो बाणों मे बिंधा हुआ न था! और उसके में राजा गाव ने बार तुम्हारे पिता चनुदेव जी शरीर में से लोह इस प्रकार मे बदना या इमे वर्षा को मार डान है । इम में तुम यहा युद्ध करना ऋतु में गेम के पहार मे रात-राल पानी बहना छोड़ कर द्वारा की रक्षा मंगे। द्वारका की रक्ष्य rceremORT PREPORTEETIREDEEPerPErrrrrrrrrrer re: T!"l'*"TSLIUL LerL" OLDINISTILOLLONILOUTT'CIPENOVO BI OVOPUTRIEDT'UP'uf'ul'wa . 119170 १५३२ महा मारत [ वनपर्व ImasutammnumarnmammnufantarmuninmenuriammamiDmmoiraimumarar Time ततो नाऽज्ञायत तदा दिवारानं तथा दिशः ॥ ३९ ।। ततोऽहं मोहमापन्नः प्रज्ञास्त्रं समयोजयम् ततस्तदत्रं कौन्तेय ! धूतं तूलमिवाऽनिलैः ॥४०॥ तथा तदभवाद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् लव्धालोकस्तु राजेन्द्र ! पुनः शत्रुमयोधयम् ॥ ४१ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि सौभवधोपाख्याने विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥ ने प्रकट होते ही उस अन्धो को और माया को घोर संग्राम करने लगा ॥३॥४१॥ मिटा दिया। प्रकाश होने पर मैं फिर शत्रु के साथ वनपर्व का बीसवां अध्याय समाप्त हुआ ॥२०॥ ! .ananamivisimananamaramanandiniumIUTAM ISISTRILMuniraminationniumAnal maiIPIONATIODDEDITORANJANIMALLENDuraMIMPLAY अथ एकविंशोऽध्यायः ।। २१ ।। वासुदेव उवाच-एवं सः पुरुपव्याघ्रः शाल्वराजो महारिपुः युध्यमानो मया सङ्ख्ये वियदभ्यगमत्पुनः ततः शतप्नीश्च महागदाश्च दीप्तांश्च शूलान्मुसलानसींश्च चिक्षेप रोपान्मयि मन्दबुद्धिःशाल्वो महाराज! जयाभिकाङ्क्षी॥ २ ॥ तानाशुगैगपततोऽहमाशु निवार्य हन्तु खगमान्ख एव । द्विधा त्रिधा चाऽच्छिनमाशु मुक्तस्ततोऽन्तरिक्षेनिनदो बभूव ॥ ३ ॥ ततः शतसहस्रेण शराणां नतपर्वणाम् दारुकं वाजिनश्चैव रथं च समवाकिरत् ततो मामब्रवीदीर! दारुको विह्वलन्निव इकीमयां अध्याय ॥२१॥ श्रीकृष्ण कहते हैं-हे राजा युधिष्ठिर ! गजा लगा। मेरे और उसके वाण परस्पर टकराते थे उनका भास्व युछ देर तक इस तरह मुझ से घोर संग्राम | घोर शब्द आकाश-मण्डल में व्याप्त हो गया। तब करक आमाश-मार्ग में चला गया और मुझे राजा शाल्व ने सैकडो-हजारों वाण चलाकर मेरी जीनने की इच्छा से मेरे ऊपर तोप, गदा, शुल, सेना के हाथी, घोड़े और मरे रथ, सारधी आदि मुमर और तलवार आदि अनेकमार के अस्त्र-शस्त्र को ढक दिया ॥१४॥ करने सगाई में भी तीक्ष्ण वाण चलाकर अन्तरिक्ष दानव के बाणों से अत्यन्त पीड़ित होकर दारुक में ही शत्रु के प्रहारों को रोकने और सण्डित करने । ने मुझ से कहा- हे वीर ! मैं शाल्व के वाणों से ETES102THEREPTOPIPATHRIVAJIUDImmuTITIATIVITATEMuviraram. - अध्याय २१] महा भारत १५३३ BIMARIJosuTUDUTUITUTILI viruva मागण्यामधMIALMILan.. - 22152WUTY" D'UO ILLIG'LCLLLLL LLLQUJUCRUL CUTIAUTTU om.00adardastimaamanantarmusumiamommavinathuran.indayahamunanा - स्थातव्यमिति तिष्ठामि शाल्ववाणप्रपीडितः अवस्थातुं न शक्नोमि अहं मे व्यवसीदति इति तस्य निशम्याऽहं सारथेः करुणं वचः अवेक्षमाणो यन्तारमपश्यं शरपीडितम् न तस्योरसि नो मूर्ध्नि न काये न भुजद्वये अन्तरं पाण्डवश्रेष्ट ! पश्याम्यनिचितं शरैः स तु वाणवरोत्पीडाद्विस्रवत्यसृगुल्वणम् अभिवृष्टे यथा मेघे गिरिगरिकधातुमान् अभीपुहस्तं तं दृष्ट्वा सीदन्तं सारथिं रणे अस्तंभयं महावाहो शाल्ववाणप्रपीडितम् अथ मां पुरुषः कश्चिद्वारकानिलयोऽब्रवीत् त्वरितो रथमारोप्य सौहृदादिव भारत ! आहुकस्य वचो वीर ! तस्यैव परिचारकः विषण्णः सन्नकण्ठेन तनिन्बोध युधिष्टिर ! द्वारकाधिपतिर्वीर आह त्वामाहुको वचः केशवैहि विजानीव यत्त्वां पितृसखोऽब्रवीत् ॥ १२ ॥ उपायायाऽद्य शाल्वेन द्वारकां वृष्णिनन्दन विपक्ते त्वयि दुर्धर्ष ! हतः शूरसुतो बलात् ॥ १३ ॥ बहुत ही पीड़ित हो रहा हूँ; मेरे में अब सामर्थ्य है। यह देखकर मैंने उम सारथी को धैर्य दिया। नहीं है। युद्ध-मि को छोड़कर भागना न चाहिये, इमी अवमर में टग्रमेन का एक सेवक मीनता से इसी विचार से मैं अब तक यहां ठहरा हुआ हूँ | रथ दौड़ाता हुआ मेरे पाम आया ॥५॥१०॥ दारुक सारथी के दीन वचनों को सुनकर मैने टमके यहुन ही मित्रता का भाव दिखाते हुए उसने वाणों से विधे हुए अहों को देखा तो छाती, मम्नक, कहा-हे कृष्णनन्द्र ! तुमको राजा टग्रमेन ने नुलया शरीर और दोनों भुजाओं में कोई अन ऐमा नहीं भेजा है, तुम तो यहां युद्ध कर रहे हो, वहां द्वारका पाया जो बाणों मे बिंधा हुआ न था। और उसके में राजा शास्त्र ने जाकर तुम्हारे पिता यमुदेव जी शरीर में से लोह इस प्रकार से बहता था जैमे वर्षा को मार डाला है । इस मे तुम यहां युद्ध करना ऋतु में गेर के पहाड़ मे लाल-राल पानी बहना छोड़ पर द्वारका की रक्षा करो। द्वारका की रक्षा SECTOREDIRUDROETICT EPTEMErrerPTETrerrrrrrrercreract - । DU - 1917 महा भारत [ वनपर्व -- THU3237CAUTITORIAprompur TIRLIMILIA Janam WHEmaatimamimilamuTIONADArrormirraoranAnamaraamana तदलं साधु युद्धेन निवर्तस्त्र जनार्दन ! द्वारकामेव रक्षस्व कार्यमेतन्महत्तव इत्यहं तस्य वचनं श्रुत्वा परमदुर्मनाः निश्चयं नाऽधिगच्छामि कर्तव्यस्येतरस्य च सात्यकि बलदेवं च प्रद्युम्नं च महारथम् जगहें मनसा वीर तच्छ्रुत्वा महदप्रियम् अहं हि द्वारकायाश्च पितुश्च कुरुनन्दन तेपु रक्षा समाधाय प्रयातःसौभपातने बलदेवो महाबाहुः कच्चिजीवति शत्रुहा सात्यकी रोक्मिणेयश्च चारुदेष्णश्च वीर्यवान् साम्बप्रभृतयश्चैवत्यहमासं सुदुर्मना ॥ १८॥ एतेषु हि नरव्याघ जीवत्सु न कथंचन शक्यः शूरसुतो हन्तुमपि वज्रभृता स्वयम् ॥ १९ ॥ हत शूरसुतो व्यक्त व्यक्तं चैते परासवः वलदेवमुखा सर्व इति मे निश्चिता मतिः ॥ २० ॥ सोऽहं सर्वविनाशं तं चिन्तयानो मुहुर्मुहुः सुविह्वलो महाराज पुनः शाल्वमयोधयम् ॥ २१ ॥ करना भी तुम्हारा परम कार्य है। यह सुनकर मैं भी वसुदेय जी का नहीं मार सकता है । तात्पर्य विचार करने लगा कि क्या करू और क्या न करूं यह है कि वसुदेव की मृत्यु का सवाद सुनकर मुझे प.तु मेरे मन में काई यात निश्चित नहीं हुई । इस में कुछ भी सन्देह न रह गया कि घर देव आदि ॥११॥१५॥ महावीर भी अब इस लोक में नहीं है ॥१६॥२०॥ और मैने अपन मन में मात्यकि, बलदेव और मब मुहृदी के नाश का ख्यार करके शोक प्रधुम आदि महारथियों की निन्दा की, क्योंकि मैं और दुःख से अत्यन्त पीड़ित होने पर भी मै फिर उन गगों की रक्षा के यि द्वारका में छोरका, शाम से युद्ध करने का उद्योग कर रहा था, माम नगर का गिरान पाया था। फिर मैंने विनार इसी ममय मने देखा कि वसुदेव जी सौम विमान शिवदय जी, वारणा, मायरि, प्रद्युम्न के ऊपर से नीचे गिर रहे हैं । यह देखकर मैं मोह और भाव आदिवारी जीन जी यमुदेव जी क्सि के मार अचेत मा हा गया । हे महाराज ! उस नाद मार गये, क्योंकि इन रोगों के जान जा इन्द्र समय गिरते हुए मेरे पिता का स्वरूप पंसा देख Sun.NL... CALLILLET TITLU OLL OLCCLIL MILCLLLLL L'U'IL.LCLLCLLO MICVINSTRAR -- TTITTmr 1ULNEL-14 .1111UTht ULuneemummerconusJIRL . .. Muth अध्याय २१ ] मद्दा भारत १५३५ PanamamimmuTIMiromanimadammmmunmMINATIOLARGILamarinnrnamutammar - Cuma-91110932ur EmpirmsmroPrefresummer LARE ततोऽपश्यं महाराज प्रपतन्तमहं तदा सौभाच्छ्रसुतं वीर ततो मां मोह आविशत् ॥ २२ ॥ सस्य रूपं प्रपततः पितुर्मम नराधिप ! ययातेः क्षीणपुण्यस्य स्वर्गादिव महीतलम् ॥ २३ ॥ विशीर्णमलिनोप्णीपः प्रकीर्णाम्बरमूर्धजः प्रपतन्दृश्यते ह म क्षीणपुण्य इव ग्रहः ॥ २४ ॥ ततः शाएं धनुःश्रेष्ठं करात्प्रपतितं मम मोहापन्नश्च कौन्तेय रथोपस्थ उपाविशम् ॥ २५ ॥ ततो हाहाकृतं सर्व सैन्यं मे गनचेतनम् मां दृष्ट्वा रथनीडस्थं गतासुमिव भारत ! प्रसार्य वाहू पततः प्रसार्य चरणावपि रूपं पितु, विवभौ शकुनेः पततो यथा ॥ २७ ॥ तं पतन्तं महावाहो ! शूलपट्टिशपाणयः अभिनन्तो भृशं वीर ! मम चेतो ह्यकम्पयन् ॥ २८ ॥ ततो मुहूर्तात्प्रतिलभ्य संज्ञामहं तदा वीर! महाविमर्दै । न तत्र सौभं न रिपुंच शाल्वं पश्यामि वृद्धं पितरंन चापि ॥ २९ ॥ ततो ममाऽऽसीन्मनसि मायेयमिति निश्चितम् । प्रवुद्धोऽस्मि ततो भूयः शतशोऽवाकिरञ्च्छरान् ॥ ३० ॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यपर्वणि अर्जुनाभिगमनपरीण सीभवधापाख्यान एकविंशोऽध्यायः ॥ २ ॥ पड़ता था मानों राजा ययाति क्षीणपुण्य होने पर पसार हुए आकाश से गिरते और राह में दैत्यों को आकाश से गिराया गया है । पगड़ी उनकी कहीं उन्हें शूल और पटिश से मारते हुए देखकर कांपने से कदी को जाती थी और बाल विखरे हुए थे। रगा। थोड़ी देर में जब मेरा चिच ठिकाने हुआ उनको देखकर मेरे हाथ से शारंग धनुष गिर पड़ा तब मैंने वहा अपने वृद्ध पिता और शाल्व और और मैं मोह में आकर रथ की पटरी पर बैठ गया गाल्व के विमान में से किमी को न देखा । सय ॥२१॥२५॥ तो मुझको निश्चय हुआ कि यह मर माया है और मुझे इस प्रकार से बैठा हुआ देखकर मेरी यह जानकर मने अपने भैकड़ों वाण चारों और सर सेना अचेत होकर हाहाकार करने लगी। दिये। ॥२६॥३०॥ और मैं अपने पिता को दोनों हाथ और पांव SmaLeurarevenirammeMOHAMITRinpreer EEEEEEEEEEEEETruercreer Emma.manormalam.JATTrum.hriGaanemiaTTIAHIJR.Ammammar महाभारत [ वनपर्य Dn.Tic. 22" TIRTTITATI TITTA, TTTTTTTTTTTTMIMATOLOST NICHTIGT Way अथ द्वाविंशोऽध्याय ॥०॥ - TELetacuumummitraumaratsunamuTumma - । वासुदेव टवाच -ततोऽहं भरतश्रेष्ठ प्रगृह्य रुचिरं धनुः शरैरपातयं सौभाच्छिरांसि विबुधद्विपाम् शरांश्चाऽशीविपाकारानूगांस्तिग्मतेजसः प्रेषयं शाल्वराजाय शामुक्कान्सुवाससः ततो नाऽदृश्यत तदा सौभं कुरुकुलोहह ! अन्तर्हितं माययाऽभूत्ततोऽहं विस्मितोऽभवम् ॥ ३ ॥ अथ दानवसङ्घास्ते विकृताननमूर्धजाः उदक्रोशन्महाराज ! धिष्ठिते मयि भारत ! ततोऽस्त्रं शब्दसाहं वे त्वरमाणो महारणे अयोजयं तद्वधाय ततः शब्द उपारमत् हतास्ते दानवाः सर्वे यैः स शब्द उदीरितः । शरेरादित्यसङ्काशैर्ध्वलितैः शब्दसाधनैः तस्न्नुिपरते शब्दे पुनरेवाऽन्यतोऽभवत् शब्दोऽपरो महाराज! तत्राऽपि प्राहरं शरैः एवं दश दिशः सर्वास्तिर्यगूज़ च भारत ! नादयामासुरसुरास्ते चापि निहता मया ततः प्राग्ज्योनिपं गत्वा पुनरेव व्यदृश्यत वाईमवां अध्याय ॥ २२ ॥ श्रीकृष्ण जी ने कहा- हे युधिष्ठिर । इसके लिये मैंने शब्द सा अस्त्र छोड़ा, उस अस्त्र से शब्द पी में शारंग धनुष को हाथ में ले वाण मार-मार होना बन्द हो गया और सब शब्द करनेवाले दैत्य पर विमान में दैत्यों को गिगने लगा । फिर मैंने मारे गये । थोड़ी देर में फिर सब दिशाओं में शब्द पढ़े नीरण वाण नो मर्पर और नोकीले थे, गाला होने लगा, तर फिर मैंने शन्द करनेवाले को भी को वध करने के लिये मारे। परन्तु शान्य माया मे वाणों मे मार कर गिरा दिया ॥४८॥ अन्नदान हो गया और दिम्बाई नहीं दिया । यह इसके पीछे वह सीम नाम विमान प्राग्ज्योतिष दम्बार मुझको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥१२॥ नगर की ओर जाता हुआ मुझ को दीखा । उसे इनने ही में देश्यों ने आकाश में पड़े ऊँचे देखकर मेरे नेत्र मोहित मे हो गये । इतने में देत्या पर मे गन्दरिया । उम शब्द को दूर देने के ने आकाश से अकस्मात् शिलाओं की भयानक RimammauRAJammnavamimirmiuTORRENIMIRENALTHGautumaram.mammium.ar ॥ TIMER - ETERIOUPATREAUTHENTIALCHITWICECcurimurumawAILE
अध्याय २२
मे हा मारत
१५३७
Editomamroum.ORTimirmiuminummisinlaMITEDinierarcusuTINGuarananaras
-
prinirmitra.nponratrnar.m.cranameram.orarriari.bramanarai.inmantipur.cinamainaram.antm
सौभं कामगर्म वीरो मोहयन्मम चक्षुपी
ततो लोकान्तकरणो दानवो दारुणाकृतिः
शिलावर्पण महता सहसा मां समावृणोत् ॥ १० ॥
सोऽहं पर्वतवण वध्यमानः पुनः पुनः
वल्मीक इव राजेन्द्र पर्वतोपचितोऽभवम् ॥ ११ ॥
ततोऽहं पर्वतचितः सहयः सहसारथिः
अप्रख्यातिमियां राजन्सर्वतः पर्वतश्चितः ॥ १२ ॥
ततो वृष्णिप्रवीरा ये ममाऽऽसन्सैनिकास्तदा ।
ते भयार्ता दिशः सर्वे सहसा विप्रदुद्रुवुः ॥ १३ ॥
ततो हाहाकृतमभृत्सर्व किल विशांपते
द्योश्च भूमिश्च खं चैवाऽदृश्यमाने तथा मयि ॥ १४ ॥
ततो विषण्णमनसो मम राजन्सुहृजनाः
रुरुदुश्रुशुश्चैव दु ग्वशोकममन्विनाः
द्विषतां च प्रहर्षोऽभूदार्तिश्चाऽद्विपनामपि
एवं विजितवान्वीर पश्चादश्रोपमच्युत
ततोऽहमिन्द्रदायितं सर्वपापाणभेदनम्
वज़मुद्यम्य तान्सर्वान्पर्वतान्समशानयम्
॥ १७॥
ततः पर्वत भारार्ता मन्दप्राणविचेष्टिताः
इम मे वहा आनन्द हुआ। फिर मैने मय पत्थरों
घोड़े, ग्य, मारथी और मैं मय उन पत्थरों से कताईनगाले, इन्द्र के प्यार, वज्राम को छोड़ा,
ऐसे ढक गये कि किमी को न दम्बमके । यह और उसमें दानव की चलाई सय मिगओं को
दबकर वृष्णिवंशी सब सेना के वीर भयमीत चूर-चूर कर टारा ॥१२॥१७॥
होकर इधर-उधर भाग गय और मेरे अदृश्य हो
महाराज : गिलाओं के मार और प्रहार
जाने के कारण मे स्वर्ग, आकाश और पृथ्वों में से पीड़ित तथा गिधिन मेरे घोड़े मानों कांप रंद
हाहाकार मच गया। मरे माई-बन्धु-जो कि सैनिक थे; अर वे भी स्वस्थ हुए। जम मेघवाल को टा.
थ-मुझं एमी दशा में देखकर बहुत ही व्याकुल
कर सूर्य के प्रष्ट होने पर मय रोग आनन्दिन
हुए और भाग खड़े हुए । व आंग्वों में आंसू भर. होते हैं, मे ही मुझे भी शिराष्टि मे मुक्त देव
कर ऊंचे म्वा से विगप करने लगे । शत्रुपक्ष को । कर सब माई-बन्धु प्रमाला प्रक्ट करने रंग।
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वी की ॥२॥११॥
म हा भारत [ वनपर्व । 2.1.1.1.1.1.2.1.1.611.00.J.T.TTTTTTTTTTTTTT) Tintilietim..CTDTYTTISTIGTIGT AV CuminiuTILustunnmmmminimumannamorandutrimirmimranims या मम महाराजवेपमाना इवाऽभवन् ॥ १८ ॥ मेघजालमिवाऽऽकाशे विदार्याऽभ्युदितं रविम् । दृष्ट्वा मां बान्धवाः सर्वे हर्षमाहारयन्पुनः ततः पर्वतभारार्तान्मन्दप्राणविचेष्टितान् हयान्संदृश्य मां सूतः प्राह तात्कालिकं वचः ॥ २० ॥ साधु संपश्य वार्ष्णेय शाल्वं सौभपति स्थितम् । अलं कृष्णाऽवमन्यैनं साधु यत्नं समाचर || २१ ॥ मार्दवं सखितां चैव शाल्वादद्य व्यपाहर जहि शाल्वं महाबाहो मैनं जीवय केशव ॥ २२ ॥ सर्वः पराक्रमैवीर वध्यः शत्रुरमित्रहन् न शत्रुरबमन्तव्यो दुर्वलोऽपि वलीयसा ॥ २३ ॥ योऽपि स्यात्पीठगःकश्चित्किं पुनः समरे स्थितः । स त्वं पुरुषशार्दूल सर्वयत्तेरिमं प्रभो ! ॥ २१ ॥ जहि वृष्णिकुलश्रेष्ठ मा स्वां कालोऽत्यगात्पुनः । नेप मार्दवसाध्यो वै मतो नाऽपि सखा तय ॥ २५ ॥ येन त्वं योधितो बीर द्वारका चाऽवमर्दिता एवमादि तु कौन्तेय श्रुत्याऽहं सारर्थवचः पन्धर्ग की वर्षा म पारिन और निवल. घोड़ों को जीता न होई । गत्रु यदि अपने घर पर हा तो दमक दारक माग्य रम ममय के योग्य वचन भी उसके नाम का यत्र करना चाहिये; फिर जो माम कहने लगा [॥१८॥२०॥ सामन महा युद्ध का बड़ा हो उसके लिये पण महापात: दम्बिएम अभी तक कहना है । अब आप दंगन कीजिए। भीम हस गंगा जाना मान विमान पा धिन। अय दुष्ट को नष्ट करके मय की निम्ना दूर कीजिए मलता चार मित्राव पिचार होना आप ॥२१॥२॥ टमर पर पान जिए। अब उ प्राचिन ६. कृया ! आपके साथ पार युद्ध कांग. पना भारी धाम नबी 1 जिम वागार अब में पदं द्वाका की तोडफोरकर नबन का अाय नावादना धादान यायदान नाम भी हम नगद 4 PM बाना विमानात उचित काम युद्ध मन मानेगा । उस मागधी की ५ निरी उमा पान की मुना में अपने मन में बहा कि triti irrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrms *L??TIDITT.CO'LKITTULUSLONU'UTI1017*****L'OLI DULCRUIWUTLOLLIPOLYTH CLO'' --
अध्याय २२]
म हा भारत
१५३९
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तत्त्वमेतदिति ज्ञात्वा युद्धे मतिमधारयम्
वधाय शाल्वराजस्य सौभस्य च निपातने
॥ २७॥
दारुकं चाऽब्रुवं वीर मुहूर्त स्थीयतामिति
ततोऽप्रतिहतं दिव्यमभेद्यमतिवीर्यवान् ॥ २८ ॥
आग्नेयमस्त्रं दयितं सर्वसाहं महाप्रभम्
योजयंस्तत्र धनुपा दानवान्तकरं रणे ॥ २९ ॥
यक्षाणां राक्षसानां च दानवानां च संयुगे
राज्ञां च प्रतिलोमानां भस्मान्तकरणं महत् ॥ ३० ॥
क्षुरातममलं चक्रं कालान्तकयमोपमम्
अनुमन्त्र्याऽहमतुलं द्विपतां विनिवर्हणम् ॥ ३१ ॥
जहि सौभं स्ववीर्यण ये चाऽत्र रिपवो मम
इत्युक्त्वा भुजवीर्येण तस्मै प्राहिणवं रुपा ॥ ३२ ॥
रूपं सुदर्शनस्याऽऽसीदाकाशे पततस्तदा
द्वितीयस्येव सूर्यस्य युगान्ते प्रपतिप्यतः
तत्समासाद्यनगरं सौभंव्यपगतत्विपम्
मध्येनपाटयामास क्रकचोदार्विवोच्छ्रितम् ॥ ३४ ॥
द्विधाकृतं ततः सौभं सुदर्शन बलाढतम्
महेश्वरशरोवृतं पपातत्रिपुरं यथा
॥ ३५॥
यह ठीक कहता है, तब मैने राजा झाल्य क माग्ने करके धनुष पर चढाया और यह आजादा कि
और मोम नाम विमान को गिराने का विचार सौभ विमान और इसमें जो-जो मेरे
शत्रु
को मार यह कहकर अपने पराक्रम के अनुसार
इसके पीछे मैंने मारथी से कहा कि थोड़ी खींचकर क्रोधित होकर छोड दिया ॥२८॥३२॥
देर ठहर, फिर अपने प्यारे आनय अम्ब को जो उम ममय उस सुदर्शन का म्वरूप प्रेमा भयानक
दिव्य, अभेद्य, पराक्रमी, किमी गम्ब मे न टूटन- दीयता था मानों प्रन्यकाल का मूर्य है । उम
वारा, प्रभावशाली, तीक्ष्ण, निर्मल, काल और यम अब न उम मौभ विमान को बीच में में इस प्रकार
के समान, यक्ष, गक्षस, दानव और विपरीत आचार से चीर डारा जैम आग ऊँची कड़ी में चार
देखनेवाले राजाओं का नाश करनेवाला था मंत्रित डारना है । और वह पिमान फिर इस प्रकार मे
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।
हैं मय
किया ॥२६॥२७॥
१५८०
महा भारत
[वनपर्य
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॥३७॥
॥३०॥
तस्मिन्निपतिते सौभे चक्रमागात् करं मम
पुनश्चादायवेगेन शाल्वायेत्यहमब्रुवम्
ततः शाल्वं गदां गुर्वीमाविध्यन्तं महाहवे
द्विधाचकार सहसा प्रजज्बाल च तेजसा
तस्मिन् विनिहतेवीरे दानवः स्त्रस्त चेतसः
हाहाभूतादिशो जग्मुदितामम शायकैः
ततोऽहंसमवस्थाप्य रथं सौभसमीपतः
शहूं प्रमाय हर्पण सुहृदः पर्यहर्षयम्
तन्मेरुशिम्बराकारं विध्वस्ताहालगोपुरम्
दायमानमभिप्रेक्ष्य त्रियस्ताः संप्रदुद्रुवुः
एवं निहत्य समरे सौभं शाल्वं निपात्य च
आनर्तात्पुनरागम्य सुहृदां प्रीतिमावहम्
नदेनरकारणं गजन्यदहं नागसाह्वयम्
नाऽऽगम परयरिन न हि जीवेत्सुयोधनः
मय्यागनेऽथ या वीर गुतं न भविना तथा
॥ ३९ ॥
-
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PunuTITTARIEHEESHET. TRICALARIAGanarau.a.x.ma.badi.than.
॥ ४२ ॥
अध्याय २२ ] म हा भारत १५४२ SuTIOपर मा. Bhimonummuseummmmmmmmmmmumtulamineral अद्याऽहं किं करिश्यामि भिन्नसेतुरिवोदकम् ॥ १३ ॥ वैशम्पायन उवाच-एवमुक्त्वा महाबाहुः कौरवं पुरुषोत्तमः आमन्न्य प्रययौ श्रीमान्पाण्डवान्मधुसूदनः ॥ २२ ॥ अभिवाद्य महाबाहुर्धर्मराज युधिष्टिरम् राज्ञा मूर्धन्युपाघ्रातो भीमेन च महाभुजः ॥ १५ ॥ परिप्यक्तश्चाऽर्जुनेन यमाभ्यां चाऽभिवादितः । समानितश्च धोम्येन द्रौपद्या चाऽर्चितोऽश्रुभिः॥ १६ ॥ सुभद्रामभिमन्युं च रथमारोप्य काञ्चनम् आरुरोह रथं कृष्णः पाण्डवेरभिपूजितः ॥ २७॥ शेव्यसुग्रीवयुक्तेन रथेनाऽऽदित्यवर्चसा द्वारकां प्रययो कृष्णः समाश्वास्य युधिष्टिरम् ॥ १८ ॥ ततः प्रयाते दाशाहें धृष्टद्युम्नोऽपि पार्पतः द्रोपदेयानुपादाय प्रययौ स्वपुरं तदा ॥ १९॥ धृष्टकेतुः स्वसारं च समादायाऽथ चेदिराट् । जगाम पाण्डवान्दृष्ट्वा रम्यां शुक्तिमती पुगेम् ॥ ५० ॥ केकेयाश्चाऽप्यनुज्ञाताः कौन्तेयेनाऽमिोजमा । आमन्व्य पाण्डवान्सर्वान्प्रययुस्तेऽपि भारत ॥ ५१ ॥ ब्राह्मणाश्च विशश्चैव तथा विषयवासिनः पीछे श्रीकृष्ण जी पाण्डवों को पूजकर और युधिष्ठिर ने उनको प्रणाम क्यिा. द्रोपदी ने आसुओं से उन को धर्य देकर मूर्य के नेज के ममान चमकने हुए का पूजन किया और धौम्य ऋषि ने मन्मान-सदिन उस ग्थ में, जिसमें गन्य और सुग्रीव नानवाने आगीर्वाद दिया ॥४३॥४७॥ घोड़े जुने हुए थे, वेट गये । अर दृमो रथ में श्रीकृष्ण जी के चले जाने पर धृष्टया मी नुभद्रा और अभिमन्यु को मयार कगार पाण्डवों द्रौपदी के पुत्रों को रेकर पाण्डवों में विदा होकर म विदा होकर द्वारका को चल दिये । चने अपने देश का चना गया। और चंदेग देश का ममय श्री जी ने युधिष्ठिर को प्रणाम किया राजा धृरिनु अपनी बहन के साथ नया क्य और युधिष्ठिर और भीमसन ने प्यार से श्रीकृष्ण देश के रमार युधिष्ठिर को पृट मूहकर अपने-अपने जी के मम्नक को नघा अर्जुन, नकुर और मदर देश की चरे गये । बामा और पुग्वामी हो EETE TET Tere Ler: P TETREETITTEETTERTAIEEECTITri Enamumaumaailandanimatininomiatimamimitariu.tartxandrilliamarikananthal.n...
“१५४२ म हा भारत [ वनपर्व egimamrapaliimanrndatithimmummmmmmmmmmmmmmmshindiminirmalinanirmanara विसृज्यमानाः सुभृशंन त्यजन्ति स्म पाण्डवान् ।। ५२ ॥ समवायः स राजेन्द्र सुमहादभुतदर्शनः आसीन्महात्मनां रोपां काम्यके भरतर्षभ युधिष्ठिरस्तु विप्रास्ताननुमान्य महामनाः शशास पुरुषान्काले स्थान्योजयतेति वे इति श्रीमन्महाभारते आरण्यपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि सौभवधोपाख्याने द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥ पाण्डवों के साथ थे, वे बार-बार युधिष्ठिर के कहने रहने लगे। इसके पीछे समय के आने पर युधिष्ठिर पर भी उनका साथ छोड़ने को राजी नहीं हुए। ने ब्राह्मणों का सत्कार करके रथों को जोतने की सब मिलकर वहीं काम्यक वन में युधिष्ठिर के पास आज्ञा दी ॥४८॥५४॥ वनपर्व का यमयां अध्याय ममाप्त हुआ ॥२०॥ namer.misamanar.nam.raanimlssaintimammilanuTHIMmmmuntinusan TIMIGRImrancome अथ त्रयोविशोऽध्यायः ॥२३॥ वैशम्पायन उवाच-तस्मिन्दशार्हाधिपतौ प्रयाते युधिष्ठिरोभीमसेनार्जुनौ च । यमौ च कृष्णा च पुरोहितश्च रथान्महान्पिरमाश्वयुक्तान् ॥ १ ॥ आस्थाय वीराः सहिता बनाय प्रतस्थिरे भूतपतिप्रकाशाः । हिरण्यनिष्कान्वसनानि गाश्च प्रदाय शिक्षाक्षरमन्त्रविद्भयः ।। प्रेप्याःपुरो विंशतिरात्तशस्त्रा धपि शस्त्राणि शरांश्च दीप्तान्। मौर्वीश्च यन्त्राणि च सायकांश्च सर्वे समादाय जघन्यमीयुः॥ ३ ॥ ततश्च वासांसि च राजपुत्र्या धान्यश्च दास्यश्च विभूषणं च । तदिन्द्रसेनस्त्वरितः प्रगृह्य जघन्यमेवोपययौ रथेन ततः कुरुश्रेष्ठमुपेत्य पौराः प्रदक्षिणं चक्रुरदीनसत्त्वाः तेईमयां अध्याय ॥२३॥ चाम्पायन ने कहा- गना जनम जय ! यस और गाय दी 1 वीस अनुचर, अनेक प्रकार यादवश्रेष्ठ बासुदेव के नरे जाने पर युधिष्ठिर, भीम, के अम्र शस्त्रों में मगधज कर द्वारकापुरी को गये । अर्जुन, नकुल, महंदव, दीपदी और पुगहित धौम्य मुभद्रा के वर, आभूपण, पाय, दामी आदि को मा महमूल्य उत्तम पोहों में जुने ग्धों पर चढ़कर माथ लेकर रथ पर चढ़कर इन्द्रसेन द्वारका को निय समान रन की चले। जान समय उन्होंने चले ॥११॥ व वांग के माता मामणों को बहुन मा सुवर्ण, इसके पछि सय पुस्यासियों ने युधिष्ठिर के ""UnrDONTEMPOWERTISTORITERCURRBTROLOTTODLINDIANRAITHILITLCERTrtATURMUTAvaily ॥ , PraturesIRLFREPRENEUPAHALFVELERTUREROLArarate अध्याय २३] म हा भारत १५४३ amroTIDIDIODMImmm.imin.hintamina.unam.anALTOLarana - - mmmmmathalinimalishithanaGhatantra.auantrauanathamala - तं ब्राह्मणाश्चाऽभ्यवदन्प्रसन्नामुख्याश्च सर्वे कुरुजाङ्गलानाम् ॥ ५ ॥ स चाऽपि नानभ्यवदत्प्रसन्नः सहेब नैतृभिर्धर्मराजः तस्थी च तत्राऽधिपतिर्महात्मा दृष्ट्वा जनौघं कुरुजाङ्गलानाम् ॥ ६ ॥ पितेव पुत्रेषु स तेषु भावं चक्रे कुरूणामृपभो महात्मा ते चाऽपि तस्मिन्भरतप्रबह तदा वभूवुः पितरीव पुत्राः ततस्तमासाद्य महाजनौघाः कुरुप्रवीरं परिवार्य तस्थुः हा नाथ हा धर्म इति ब्रुवाणा ह्रीताश्च सर्वेऽश्रुमुखाश्च राजन् ॥ ८ ॥ वरः कुरूणामधिपः प्रजानां पितेव पुत्रानपहाय चाऽस्मान् । पौरानिमाञ्जानपदांश्च सर्वान्हित्वा प्रयातः क्व नु धर्मराजः ॥ १ ॥ धिग्धार्तराष्ट्र सुनृशंसबुद्धिं धिक्सोवलं पापमतिं च कर्णम् । अनर्थमिच्छन्ति नरेन्द्र पापा ये धर्मनित्यस्य सतस्तबैवम् ॥ १० स्वयं निवश्याऽप्रतिमं महात्मा पुरं महादेवपुरप्रकाशम् शतक्रतुप्रस्थममेयकर्मा हित्वा प्रयातः क्व नु धर्मराजः ।। ११ ।। चकार यामप्रतिमां महात्मा सभां मयो देवसभाप्रकाशाम् । नां देवगुप्तामिव देवमायां हित्वा प्रयानः क्व नु धर्मराजः ॥ १२ ॥ तान्धर्मकामार्थविदुत्तमौजा वीभत्सुम्चः सहितानुवाच पाम आकर उनकी प्रदक्षिणा की। कुरुजाहल देश हाय धर्मगज : कहते हुए मिर झुकाये आमू बहाने के बड़े-बड़े मनुष्यों ने प्रमन्नना पूर्वक युधिष्ठिर का लगे। प्रजा के लोग कहने लग-हे धर्मगज । आप यथोचित मम्मान किया । युधिष्ठिर ने भी अपने मय कुरुवगियों में श्रेष्ठ और सब के स्वामी है। भाइयों के माथ उन सबका यथोचित सम्मान किया। पुत्रतुल्य हम मय पुरवामी और दशवामियों की फिर बुरुजान में रहनेवाली प्रजा की ओर मादर छोडकर आप कहा जा रहे हैं. इन दयाहीन और दृष्टि डालकर युधिष्ठिर कुछ रुक गये । पुत्र को पापी दुर्योधन, शकुनि और कर्ण को धिगार है। देम्बका पिता के मन में जम म्नेह का मात्र उत्पन्न वही पापी हम नह आपके अनिष्ट की नेष्टा किया हो जाता है यमा ही भाव युधिष्ठिर के मन में मना करते है । हे धर्मराज युधिष्ठिर ! आपन महादेव जी को देम्बर हुआ 10 के नगा कममान इन्द्रप्रस्थ नामबाग नगर बमाया वे मय भी पिता के ममान मम्मान की दृष्टि है और उसमें मयदानव ने देताओं की मभा में युधिष्ठिर की ओर टेम्पने लगे। वे मय कुरुवार के ममान ममा बनाई है भार उनको छोरा धर्मराज के नागे और बड़े होकर हाय नाय : कहा जा रहे है | 2102TurDECEmerrrrrrrLimircrerarmsrcrrrrrrrrrrr: Nanditaantaram Indirlsammana.trilitain.cilita.antidiohindinistraam.natin......
१५४४ महाभारत [चनप Sermmireminarendrammargoniamrarunions Trendinanimar ImyDEHATI ADDITITUTERENTLITICS आदास्यते वासमिमं निरुण्य वनेषु राजा द्विषतां यशांसि ॥ १३ ॥ द्विजातिमुख्याः सहिताः पृथक्च भवद्भिरासाद्य तपस्विनश्च । प्रसाद्य धर्मार्थविदश्च वाच्या यथार्थसिद्धिः परमा भवेन्नः ॥ १४ ॥ इत्येवमुक्ते वचनेऽर्जुनेन ते ब्राह्मणाः सर्ववर्णाश्च राजन् मुदाऽभ्यनन्दनसहिताश्च चक्रुः प्रदिक्षिणं धर्मभृतां वरिष्टम् ॥ १५ ॥ आमन्व्य पार्थं च वृकोदरं च धनञ्जय याज्ञसेनी यमौ च प्रतस्थिरे राष्ट्रमपेतहर्षा युधिष्ठिरेणाऽनुमता यथास्त्रम् इति श्रीमन्महाभारते आरण्यपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि दैनवनप्रवेशे त्रयोविंशोऽध्यायः ।। २३ ।। ऐसे विलाप के वाक्य सुनकर धर्म, अर्थ और जिममें हमारा मनोरथ सिद्ध हो । यह सुनकर काम के ज्ञाता महातेजस्वी अर्जुन ने कहा-राजा उन सब ब्राह्मण और सब वर्गों के मनुप्यों ने उस युधिष्ठिर बन में बारह वर्ष व्यतीत करके लौटेंगे धर्मधारी गजा युधिष्ठिर की प्रसन्नतापूर्वक स्तुति और शत्रुओं के यश को हरने की चेष्टा करेंगे । और परिक्रमा की। और अन्य पाण्डव और द्रौपदी आप लोगों में जी जो मुग्व्य ब्राह्मण और तपम्बी से पूछ और उनसे सत्कार पा-पाकर अपने-अपने है उन मयमे हमारी प्रार्थना है कि आप लोग देशको बहुत ही खिन्न हो-होकर चले गये ॥१३।१६।। हमारी तरफ से मी प्रार्थना ईश्वर से कीजिए । वनपर्य या ईमयां अध्याय ममाप्त हुआ ।।२३।। 1 अथ चतुर्थिोऽध्यायः ॥२४॥ वाग्पायन उवाच-ततस्तेषु प्रयातेषु कौन्तेयः सत्यसनमः अभ्यभाषत धर्मात्मा भ्रातृन्सर्वान्युधिष्टिरः ॥ १ ॥ द्वादशेमाः समाऽस्माभिर्वस्तव्यं निर्जने वने समीक्षध्वं महारण्ये देशं बहुमृगहिजम् बहुपुष्पफलं रम्यं शिवं पुण्यजनावृतम् यत्रेमाः शग्दः सर्वाः सुग्ब प्रनियमेमहि चायीमयां अध्याय || सायन जी कहानगजा जनमेजय : हा। इगलिस इस महायन में ऐसा रमणीय उन पर गंगी के चले जाने पर मायनिज धर्मागा धान इंद्र निका, जहां बहुन में मृग और पक्षी पुधिष्ठित अपने म भाइयों में कहा-मात्यो ! ही, पान सफल फूल हो, पुण्यात्मा मनुष्य रहते हमा बाद वयं नक निजन वन में रहना हो और जहा रहकर दम मुग्यपूर्वक धनयामक Hani Brror MPETITITITION 10KICICTait . प יי ייי*יןינייננו अध्याय २४ ] महा भारत १५४५ - ArranAnimaltar.mishrini.nirmanimalsaninilaun m. aaushilianRTH FARMITTERamlodmATTISTITm.iniumiumunistmaliniummitramjunaravarnarara एवमुक्ते प्रत्युवाच धर्मराजं धनञ्जयः गुरुवन्मानवगुरुं मानयित्वा मनस्विनम् अर्जुन उवाच-भवानेव महर्षीणां वृद्धानां पर्युपासिता अज्ञातं मानुषे लोके भवतो नास्ति किंचन स्वया [पासिता नित्यं ब्राह्मणा भरतर्षभ द्वैपायनप्रभृतयो नारदश्च महातपाः यः सर्वलोकद्वाराणि नित्यं संचरते वशी देवलोकादब्रह्मलोकं गन्धर्वाप्सरसामपि अनुभावांश्च जानासि ब्राह्मणानां न संशयः प्रभावांश्चैव वेत्थ त्वं सर्वेपामेव पार्थिव त्वमेव राजानासि श्रेयःकारणमेव च यत्रेच्छंसि महाराज निवासं तत्र कुर्महे इदं द्वैतवनं नाम सरः पुण्यजलोचितम् वहुपुष्प'फलं रम्यं नानाद्विजनिपेवितम् ॥ १० ॥ यत्रेमा द्वादश समा विहरेमेति रोचये ។ यदि तेऽनुमतं राजन्किमन्यन्मन्यते भवान् ॥ ११ ॥ युधिष्ठिर उवाच-ममाऽप्येतन्मतं पार्थ त्वया यत्समुदाहृतम् बारह वर्ष बिता ॥१३॥ अर्थात् निग्रह और अनुग्रह गक्ति को भी जानन यह सुनकर अर्जुन ने कहा-हे धर्मराज ! है। मोक्ष और उसका साधन भी आपम छिपा हुआ आप वृद्ध महर्षियों और ब्राह्मणों की उपासना में नहीं है। आप जहां रहना चाहें वहीं हम लोग भी नित्य अपना समय व्यतीत करते है । इम मनुप्य- रहेंगे ||८|| लोक में ऐमा पदार्थ नहीं है, जिसको आप न जानने हमाग समझ में तो यह द्वेनयन का मरोवर हो। आपने व्याम आदि ब्रामण और नारद जी जल मे भरा हुआ और बड़ा रमणीक है और यहा की उपासना की है. जो जितेन्द्रिय और मब लोकों पुष्प, फल और पक्षी भी बहुत से हैं जो आपकी के मनेवाले है और देवना, गन्धर्व और अप्मगओं इच्छा हो तो बारह वर्ष यहीं व्यतीत किये जायें । के लोकों मे लेस ब्रह्मरोक तक जाने हैं ॥४|७|| यह सुनकर युधिष्ठिर ने कहा-हे अर्जुन ! मरी भी इसके मिवाय आप ब्राह्मणों के अनुमाव अर्थात इच्छा द्वनवन के रमणी मरोवर पर ही रहने की करने और न करने के योग्य काम को और प्रमार है वहीं को हम चलेंगे ॥१०॥१२॥ s't'e'"* ******?"9"}*1*?. "CT"**ILICHOLICIL" TOU'LULU'L. ''UOTULCECLUDNO 17"" In HOTrerytmentICAL MEMEMECITICICICIATICITIOTrrentir म हा भारत [चनपत्र Imm IITERTAImammarAPARAMATPITUAregresuTILuxeRUPALI -- वेदाम्पायन उवाच ततस्ते प्रययुः सर्वे पाण्डवा धर्मचारिणः ब्राह्मणेवहुभिः सार्धं पुण्यं द्वेतवनं सरः ॥ १३ ॥ ब्राह्मणाः साग्निहोत्रश्च तथैव च निरग्नयः म्वाध्यायिनो भिक्षत्रश्च तथैव वनवासिनः ॥ १४ ॥ बहवो ब्राह्मणास्तत्र परिवब्रुयुधिष्ठिरम् ततः सिद्धा महात्मानः शतशः संशितव्रताः ॥१५॥ ते यात्वा पाण्डवास्तत्र बहुभिाह्मणेः सह पुण्यं द्वैतवनं रम्यं विविशुभरतर्षभाः तमालतालाम्रमधूकनीपकदम्बसर्जार्जुनकर्णिकारैः तपात्यये पुष्पधेरैरुपेतं महावनं राष्ट्रपतिर्ददर्श ॥ १७ ॥ महाद्रुमाणां शिखरेषु तस्थुमनोरमां वाचमुदीरयन्तः मयूरदात्यूहचकोरसंघास्तस्मिन्वने वहिणकोकिलाश्च करेणुयूथैः सह यूथपानां मदोत्कटानामचलप्रमाणाम् महान्ति यूथानि महाद्विपानां तस्मिन्यने राष्ट्रपतिर्ददर्श ॥ १९ ॥ मनोरमां भोगवतीमुपेत्य पूतात्मनां चीरजटाधराणाम तस्मिन्यने धर्मभृतां निवासे ददर्श सिद्धर्पिगणाननेकान् ॥ २० ॥ ततःस यानादवरुद्ध राजा सभ्रातृकः संजनः काननं तत् । चशम्पायन ने कहा है राजा जनमेजय ! हमके वहिण और कोकिला आदि पक्षी वृक्षों की डालियों गछि धमारमा पाण्टव द्वनवन की ओर चले। उनके १९ चढ़े मधुर स्वर से बोल रहे है ॥१६॥१८॥ माथ अमिहोत्र युनः ग्वाध्याय-निरत, निरमिक, उस महायन में युधिष्ठिर ने बंड-बड़े मतवाले वनवामी और भिनु नधा और-और तपस्या से मिद्ध हाथियों को हथिनियों ममेत विचरते हुए देखा। प्रतधारी नाम भी गले ॥१३॥१५॥ पाण्टयों ने रमणीय सरस्वती नदी के किनारे पहुँच- दनवन में जाकर उन्होंने देखा, पाकात पर देवा-मिद्ध मपिगण पुण्यात्मा जटा-वलालधारी ने के कारण नाल, तमार, आम, महुआ, पदम्प, धार्मिक अपियों के आश्रमों में स्थित है । इमर्क मई, अर्जुन और कना आदि के पले हुए यशा मे पश्चात् धर्मारमा युधिष्ठिर ने रथ से उतरकर, इन्द याम यन की अपर्व गोमा दोरही है। गोर, नशेर, जमे वर्ग में प्रवेश करें, वस द्वतवन में प्रवेश manasana.om. rumantarwasna.man.animmumtasana.ANUARANTaarthanu... . rammar TouTujhyayan IILEOururamayan अध्याय २५) महा भारत १५४७ हOTamiliun मगरTuuuNTOU मन्नमाJABITAL .. .. و خانه داران را نداده و بدلیلماذا، لماذا ننا، پا، داد! لار 1 विवेश धर्मात्मवतां वरिष्ठस्त्रिविष्टपं शक इवाऽमितौजाः ॥ २१ ॥ तं सत्यसन्धं सहिताऽभिपेतुर्दिदृक्षवश्चारणसिद्धसंघाः वनोकसश्चापि नरेन्द्रसिंह मनस्विनं तं परिवार्य तस्थुः ॥ २२ ।। स तत्र सिद्धानभिवाद्य सर्वान्प्रत्यर्चितो राजबहेववच विवेश सर्वः सहितो द्विजाग्न्यैः कृताञ्जलिधर्मभृतां वरिष्टः ॥ २३ ॥ स पुण्यशीलः पितृवन्महात्मा तपस्विभिर्धर्मपरैरुपेत्य प्रत्यर्चितः पुप्पधरस्य मूले महाद्रुमस्योपविवेश राजा ॥ २४ ॥ भीमश्च कृष्णा च धनञ्जयश्च यमौ च ते चाऽनुचरा नरेन्द्रम् । विमुच्य वाहानवशाश्च सर्वे तत्रोपतस्थुर्भरतप्रवर्हाः ॥ २५ ॥ लतावतानावनतः स पाण्डवेर्महाद्रुमः पञ्चभिरेव धन्विभिः । वभौ निवासोपगतेर्महात्मभिर्महागिरिर्वारणयूथपेरिव ॥ २६ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यपर्वाण अर्जुनामिगमनपर्वणि द्वैनवनप्रवेश चतुर्विंगोऽध्यायः ॥ २४ ॥ क्यिा ॥११॥२१॥ के ममान पूजा की । इसके पीछे धर्मराज एक उनके दर्शनों की इच्छा मे चारण और सिद्ध कदम्ब के पेड़ की जड़ पर, जिसमें फल लग रहे थे, लोगों के ममूह के ममूह चले आये और वनवासियों बैट गये ॥२२॥२४॥ ने भी उनको चारों ओर मे घेर लिया । सिद्धों ने भीमसन, अर्जुन, नकुल, महदेव, द्रोपदी और राज योग्य सम्मान से उन मयका पूजन किया । मत्र माथी भी अपने-अपने स्थों में में उतर-उतर- युधिष्ठिर आदि पाण्डवों ने भी उनको प्रणाम किया। कर उनके पास जा बैठे। उनमे वह कदम्ब का फिर ब्राह्मणों-महित युधिष्ठिर ने हाथ जोड़कर वृक्ष, जिमकी डालिया झुक रही थीं, इस प्रकार महर्षियों के आश्रम में प्रवेश क्यिा । वहां धर्म- मे मुगोभिन हो गया, जमे हाधियों में बड़ा पहाड़ परायण नपम्बियों ने पुण्यगील युधिष्ठिर की पिता शोभायमान हो जाता है ॥२५॥२६॥ वनपर्व का चाबीमवां अध्याय ममान हुआ ॥2॥ Atment.LETE trAyuuuuNeupatywamrom अथ पञ्चविंशोऽध्यायः ।। || शम्पायन उवान-तत्काननं प्राप्य नरेन्द्रपुत्राः मुखोचिना वासमुपेत्य कृच्छ्रम् । विजन्हुरिन्द्रप्रतिमाः शिवेषु मरस्वतीगालबनेषु तेषु ॥ १ ॥ पन्चीमयां अध्याय ॥७॥ चाम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय पाटव कर मरम्बनी नदी के म आनन्दरूपी बाल वृक्षी उम वन में कटरूपी वनवास करने के लिये पहुंच. के यन में विहार करने रंगे । धर्मगज युधिष्ठिर hindi.ki.imitradeshalin.sitalable.hti.lhan STEEMUnrry.UPTIDESITrtsrresTREETITIrrrrrrrrrrrrrr- . १५४८ महाभारत [ वनपर्व SIMIRETRamnathurmilitantinagimamalnirnighriminantICATIRai - ....mi.imrainismirmiritualittlinimurTirsaninindiinikinnamisha.antely यतींश्च राजा स मुनींश्च सर्वांस्तस्मिन्वने मूलफलैरुदणैः । द्विजातिमुख्यानृपभः कुरूणां संतर्पयामास महानुभावः ॥ २ ॥ इप्टीश्च पित्र्याणि तथा क्रियाश्च महावने वसतां पाण्डवानाम् पुरोहितस्तत्र समृद्धतेजाश्चकार धौम्यः पितृवन्नृपाणाम् ॥ ३ ॥ अपेत्य राष्ट्राद्वसतां तु तेपामृपिः पुराणोऽतिथिराजगाम । तमाश्रमंतीवसमृद्धतेजा मार्कण्डेयः श्रीमतां पाण्डवानाम् ॥ ४ ॥ तमागतं ज्वलितहुताशनप्रभं महामनाः कुरुवृषभो युधिष्ठिरः अपूजयत्सुरऋपिमानवार्चितं महामुनि ह्यनुपमसत्त्ववीर्यवान् ॥ ५ ॥ स सर्वविद् द्रौपदी वीक्ष्य कृष्णां युधिष्टिरं भीमसेनार्जुनौ च । संस्मृत्य गम मनसा महात्मा तपस्विमध्येऽस्मयताऽमितौजाः॥६॥ तं धर्मराजो विममा इवाऽब्रवीत्मा हिया सन्ति तपस्विनोऽमी। भवानिदं किं स्मयतीव हृष्टम्तपस्विनां पश्यतां मामुदीक्ष्य ॥ ७ ॥ पार्कण्डेय याच न तात हप्यामिन च म्मयामि प्रहर्पजो मां भजतेन दर्पः । तवाऽऽपदं त्वद्य समीक्ष्य गमं सत्यव्रतं दाशरथिं स्मरामि ।। ८ ।। स चापि राजासह लक्ष्मणन बने निवास पितुरेव शासनात् । धन्वी चम्पार्थ मयेव दृष्टा गिरेः पुग ऋष्यमूकस्य सानो ॥ ९ ॥ यहा यमकर यहा के रहनेवाल. यनी, मुनि और और दबकर और मन ही मन श्रीरामचन्द्र जी का मुग्य-मुग्न्य प्राणी को सुन्दर मन मृल और जल म्मरण करके तपस्वियों की मण्डली में हँस पड़े। यह म भोजन मगन 411१२॥ देवकर धर्मराज ने उदाम होकर कहा-है महाराज ! महालजयी पुगहिन धाग्य पाण्डवों के पिता आप मुझ देग्यकर प्रसन्नता से हम पह, या दग्यकर सीमा, श्राद्ध और यत्रादि वर्ग मय का रहने छ । मय नएबी सजिन दुप ॥६७) स अवसर में एक दिन नीम और यंदा तंज में मादय मुनि ने कहा है युधिष्टिर ! प्रवासमान मयि मानदेय जी पाण्डवा के आश्रम मना हैं मुना और न अति हर्ष होने म अनिधि के रूप में आये । महामान्य युधिष्टिर में गुर बुछ वामद होना है । पान्तु तुम्हारी में अनुपम पर पिवान , पायलिन अाग के तुल्य, आपतिको दगार मुझदारथ के पुत्र गन्यमत देवता और मपिमा म जिन महर्षि माय की गमचन्द्र ही याद आ गई [[७१८॥ , प्रांग या विधि मनापाकी ३|| मा पहल समय में प्राप्यार पर्वत पर आ ॥ ममय महामा माय पण्ड्या की गायली की आप छोटे भाई २६मण मक्षित Firers. .. ... Triminatg mpur tittermirreyee Prera CITESUTULURD'W'W*LIL'S','*''C''LULLLIU'RE USUTTITULOVILINDROCOREL CELO .
अध्याय २५ । महाभारत १५४९ CER.NEXAMAmmammi maitrimminimandainsaan.anaamaanar.. MiliTO PHILIAyuto - - सहस्रनेत्रप्रतिमो महात्मा यमस्य नेता नमुचेश्च हन्ता पितुर्निदेशादनघः स्वधर्म वासं वने दाशरथिश्चकार स चापि शक्रस्य समप्रभावो महानुभावः समरेवजेयः विहाय भोगानचरद्वनेषु नशे वलस्येति चरदधर्मम् ॥ ११ ॥ नृपाश्च नाभागभगीरथादयो महीमिमां सागरान्तांविजित्य। सत्येन तेऽप्यजयंस्तात लोकान्नेशे वलस्येति चरेदधर्मम् ॥ १२ ॥ अलर्कमाहुर्नरवर्य सन्तं सत्यव्रत काशिकरूपराजम् विहाय राज्यानि वसूनि चैव नेशे वलस्येति चरेदधर्मम् ॥ १३ ॥ धात्रा विधियों विहितः पुराणेस्तं पूजयन्तो नग्वर्य सन्तः । सप्तर्पयः पार्थ दिवि प्रभान्ति नेशे वलस्यति चरेदधर्मम् ॥ १४ ॥ महावलान्पर्वतकूटमात्रान्विपाणिनः पश्य गजान्नरेन्द्र स्थितानिदेशे नरवर्य धातुर्नेशे वलस्येति चरेदधर्मम् सर्वाणि भूनानि नरेन्द्र पश्य तथा यथावद्विहितं विधात्रा । स्वयोनितः कर्म सदाऽऽचरन्ति नेशे बलस्येति चरेदधर्मम् ॥ १६ ॥ सत्येन धर्मेण यथावृत्या हिया तथा सर्वभूतान्यतीत्य । पिता की आना से वनवास करते हुए देम्वा था ॥९॥ देखो, विधाता के नियम को मानन सप्तर्षि- महमाक्ष इन्द्र उन्हीं रामचन्द्र का दूमगम्वरूप गण आकाश-मण्डल में प्रकामित हो रहे है । हे है और रामनन्द्र यमराज के नियता, नमुचि दैत्य नरेन्द्र ! क्या महायलो पर्वनाकार नागगग और के माग्नवान, निष्पाप, इन्द्र के ममान प्रभाव रखने क्या अन्य प्राणी, कोई भी आज तक विधाना के यार और युद्ध में अंजय थे। उन्होंने भी अपने पिता बहुत प्राचीन काल में स्थापित नियम का उल्लंघन की आना का पालन करना अपना धर्म समझकर नहीं करमाइमलिये मामय होने पर भी विधि- मय भागों को छोड़कर वनवाम किया था । मो कृन नियम को लांघकर अधर्म करना किमी नरह समर्थ । अधर्म करना उचित नहीं है ॥१०॥१॥ उनिन नहीं ॥१४|१५|| दम्बा. नामाग भागीरथ और कागी कम्प मंमार में देवा ने जिनने जीवधारी उत्पन्न दा के अलर्क आदि राजाओं ने ममुद्र पर्यन्न पृथ्वी क्यि हैं मय जन्म ले-लेकर अपन जन्म के अनुसार को विजय किया और मत्य मे मव लोक अपने वना कर्म करते हैं रम काम्प मे ममर्थ का धर्म ही करना में कर लिये। दम मे अधर्म करना रिमी अवस्था चाहिये। तुम्हारा मन्य और धर्म जमा नाहिय वमा में टी नहीं है ।।१।१३!! ही है और यश और नेज भी मयमे अधिक सूर्य END OPPTELS LEUILLIELIT.TOMETIMITTOTCTTTTT: CID !DO'P 1-T11384! " M'U'I'I"""CI'U'Lewen!LOLCOVOLIL'LLA!LO!'(LOPITUTIEL TITOLLI'm wwUTUnterview .......... ... ... . .T १५५० महाभारत [ वनपर्व HronmeroNTErammnmilsinTamanarsinusum Gaushastamitaulasala यशश्च तेजश्च तवाऽपि दीप्तं विभावसोर्भास्करस्येव पार्थ ॥ १७ ॥ यथाप्रतिज्ञं च महानुभाव कृच्छं बने वासमिमं निरुण्य । ततः श्रियं तेजसा तेन दीप्तामादास्यसे पार्थिव कौरवेभ्यः ॥ १८ ॥ वैशम्पायन उवाच-तमेवमुक्त्वा वचनं महर्पिस्तपस्विमध्ये सहितं सुहृद्भिः । आमन्त्र्य धौम्यं सहितांश्च पार्थास्ततः प्रतस्थे दिशमुत्तरां सः ॥ १९ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि द्वैतवनप्रवेशे पञ्चविशोऽध्यायः ॥ २५ ।। और अग्नि के समान है ॥१६॥१७॥ मार्कण्डेय जी उक्त प्रकार से कहकर और पाण्डच सो तुम इस कप्टरूपी वनवास को पूरा करके और धौम्य ऋषि से पूछकर उत्तर दिशा को चले अपने तेज से फिर कौरवों से अपनी रक्ष्मी को गये ॥१८॥१९॥ लागे। वैशम्पायन जी बोले-हे राजा जनमेजय ।। वनपर्व का पच्चीसवां अध्याय ममाप्त हुआ ॥ २५ ॥ STRITISHTRANRAIDhammediatnam.rimirmiminindmmmmmAPERITHumarein ammilanand वैशम्पायन उवाच- अथ पविशोऽध्याय ॥२६॥ च-वसत्सु वै द्वैतवने पाण्डवेषु महात्मसु अनुकीर्ण महारपयं ब्राह्मणैः समपद्यत ईर्यमाणेन सततं ब्रह्मघोपेण सर्वशः ब्रह्मलोकसमं पुण्यमासीद् द्वैतवनं सरः यजुपामृचां साम्नां च गद्यानां चैव सर्वशः आसीदुच्चार्यमाणानां निःस्वनो हृदयङ्गमः ज्याघोपचव पार्थानां ब्रह्मघोपश्च धीमताम् । संस्पृष्टं ब्रह्मणा क्षत्रं भूय एवं व्यरोचत अथाऽब्रवीद्वको दाल्भ्यो धर्मराज युधिष्ठिरम् । छब्बीसवां अध्याय ॥२६॥ बदाम्पायन जी बोले..~ राजा जनमेजय ! प्रचाएँ पढ़ते थे । शण्डवों के धनुष की टंकार और महात्मा पाण्ठयों के रहने समय उम महायन में ब्राह्मणों की वेदध्वनि सुनकर सबका चित प्रसन्न मामणों का जमघट बना रहता था । ब्राह्मणों के होता था। इस प्रकार में यह पाण्डयों का क्षत्रिय- बंदपाट वा वनि मे वह स्थान ब्रहालोक मा जान युल ग्राह्मणफुल से सुशोभित हो गया ॥३॥१॥ पड़ता था ॥१॥२॥ एक दिन सन्ध्या करने के समय में बक और प्रावण लोग मार, यजु, साग की मनोहर दालभ्य नाम परियों ने युधिष्ठिर से कहा-हे TRWYTcgterCTI'LT'CITITUROSCITISTIILTUITRUILUILTALACUCI retrevenou Want AmirmmanuarTORIVITAHARILALITaliman.aniamodian.taman अध्याय २६] मद्दा मारत EMIரைனலயமாலாராபாாாாாாாாாாாாாாாாாாாாாாா: anditatihanimunimalsinalstimamalnimilsinnihar.GDHATRAImanaanaman सन्ध्यां कौन्तेयमासीनमृपिभिः परिवारितम् ॥ ५ ॥ पश्य द्वैतवने पार्थ ब्राह्मणानां तपस्विनाम् होमवेलां कुरुश्रेष्ट संप्रज्वलितपावकाम् चरन्ति धर्म पुण्येऽस्मिंस्त्वया गुप्ता धृतवताः । भृगवोऽङ्गिरसश्चैव वासिष्टाः काश्यपः सह आगस्त्याश्च महाभागा आत्रेयाश्चोत्तमत्रताः । सर्वस्य जगतः श्रेष्टा ब्राह्मणाः संगतास्त्वया ॥ ८ ॥ इदं तु वचनं पार्थ श्रृणुष्व गढ़तो मम भ्रातृभिः सह कोन्तेय यत्त्वां वक्ष्यामि कोरव ॥ ९ ॥ ब्रह्म क्षेत्रेण संसृष्टं क्षत्रं च ब्रह्मणा सह उदीणे दहतः शत्रून्वनानीवाऽग्निमारुतो नाऽब्राह्मणस्तात चिरं बुभूपेदिच्छन्निमं लोकममुं च जेतुम् । विनीनधर्मार्थमपेतमोहं लब्ध्वा द्विजं नुदति नृपः सपत्नान् ॥ ११ ॥ चरन्नेःश्रेयसं धर्म प्रजापालनकारितम् नाऽध्यगन्छदलिलोंके तीर्थमन्यत्र वै द्विजात् ॥ १२ ॥ अन्यूनमासीदसुरस्य कामर्वरोचनेः श्रीरपि चाऽनयाऽऽसीत् । लब्ध्वा महीं ब्राह्मणसंप्रयोगात्तेप्वाचरन्दुष्टमथो व्यनश्यत् ।। १३ ।। कुन्तीनन्दन ! देखो भार्गव, आंगिरम, वशिष्ठ, गजा बामगहीन होता है उसके दोनों लोक नष्ट काश्यप, आगम्त्य और आत्रय आदि गात्रों के हो जाने है और मोह छोड़कर ब्राझग का गम्बन- श्रेष्ठ ब्राह्मण आप मे क्षित होकर अग्नि को जन्ग वाला राजा निश्चय शत्रुओं को जीनता है ।।१०।११|| कर होम आदिक कमे-कम उत्तम-उत्तम कर्म कर देखो प्रजापालन और कल्याणकर धर्म के रहे हैं। हे कौरव ! हम इम ममय आपको कुछ करनेवाल राजा बलि ने धर्य के मिरने के निय बाने सुनाना चाहते हैं; मादयों के माथ एकान मिवाय बाग के दमग टपाय नहीं पाया क्योंकि होकर मुनिए ॥2॥ बामणों में मिलाप करने के कारण में टमसी ब्रह्मकुन क्षत्रियकुल में और क्षत्रियकुल अनकुल, सन्नी अक्षय और मनोकामना पूर्ण हुई थी। और मे मिलकर बड़े प्रबल हो जाते हैं और शत्रु को हम फिर पृथ्वी पाकर जब उमने वामगों के माथ से जटा सकते हैं जमे अग्नि और वायु एक दुष्टना की, नर उमका मब धियं नष्ट हो गया दृमेर की महायता में वन को जग देन हैं । जो ॥१२॥१३॥ *t'l'l'"l'"EUR!"&"L"'LIOLCECLOTSITULUIDE POWIN'T JOUSTUVERFOLCLM. - - .. 225PTETurmBORDELETATE.Tercromamarrrrr..
[ बनपर्व म हा भारत १५५२ BILamahurmulimmmmiumpin.hindimeGENCTEmatalaahataindin "EADImmIYOTISTRIBUTIPPEN: नाऽब्राह्मणं भूमिरियं सभूतिर्वर्ण द्वितीयं भजते चिराय । समुद्रनेमिनमते तु तस्मै यं ब्राह्मणः शास्ति नयर्विनीतम् ।। १४ ॥ कुञ्जरस्येव संग्रामे परिगृह्यांऽकुशग्रहम् ब्राह्मणैर्विप्रहीणस्य क्षत्रस्य क्षीयते बलम् ॥ १५ ॥ ब्राह्मण्यनुपमा दृष्टिः क्षात्रमप्रतिमं वलम् । तौ यदा चरतः साधं तदा लोकः प्रसीदति ॥ १६ ॥ यथा हि सुमहानग्निः कक्षं दहति सानिलः । तथा दहति राजन्यो ब्राह्मणेन समं रिपुम् ॥ १७ ।। ब्राह्मणेष्वेव मेधावी बुद्धिपर्येषणं चरेत् अलव्धस्य च लाभाय लब्धस्य परिवृद्धये ॥ १८ ॥ अलब्धलाभाय च लब्धवृद्धये यथार्हतीर्थप्रतिपादनाय । यशस्विनं वेदविदं विपश्चितं बहुश्रुतं ब्राह्मणमेव वासय ब्राह्मणेपूत्तमा वृत्तिस्तव नित्यं युधिष्ठिर तेन ते सर्वलोकेषु दीप्यते प्रथितं यशः ॥ २० ॥ बैंशम्पायन उवाच-ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे वकंदाल्भ्यमपूजयन् यह पृथ्वी जिमकी खाई समुद्र है, ब्राह्मणहीन मेधावी चतुर पुरुष सदा अप्राप्त वस्तु को पाने राजा को कभी नहीं चाहती है और जिस राजा को और प्राप्त वस्तु को बढाने के विचार से ब्राह्मणों के ब्राह्मण शिक्षा करता है उसस सदैव झुकी हुई रहती उपदेश ग्रहण करते है । इसलिये हे महाराज ! आप भी अप्राप्त धातु को पाने के लिये और प्राप्त वस्तु बामणहीन राजा का पल इस प्रकार से नष्ट को बढ़ाने तथा यथायोग्य दान करने के लिये हो जाता है जम संग्राम में हाथी के मयार का वल यशम्बी, वेद और वेदाग के ज्ञाता, शास्त्रज्ञानयुक्त हाथीवान के बिना खुध नहीं चलता है ॥१४॥१५॥ ब्राह्मणों की सेवा कीजिये । हे युधिष्ठिर! आप सदा धामण में अनुपममति और क्षत्रिय में प्रयल ब्राह्मणों के ऊपर हृदय से भक्ति और श्रद्धा रखते पराकम होने हैं। जब ये दोनों मिल जाते है, तब मय हैं । इसी कारण ममी लोकों में आप का निर्मल गंग पमन्न होने हैं। नाग का यल, पाकर क्षत्रिय या अपना उज्ज्वल प्रकाश फैला रहा है ॥१८॥२०॥ भत्रुओं को इस प्रकार में नाम कर दारता है जैसे वैशम्पायन ने कहा-दे गजा जनमेजय ! यायु की महायना मे अग्नि मूव हुए वन को भम्म पक और दालभ्य ऋपियों की उक्त शिक्षा को कर देना ॥१६॥१७॥ बामणों ने उनी प्रशमा की और myrna MILANOWUJUTO"""'"'UL!C17***OPET ULTIUL PUHU'r't'ITTO TO'OC15 । है ॥२४॥ LATod । मुनकर पूर Trusternmol BHABI" अध्याय २७ म हा भारत १५५३ moma.TOMATOnomcwm.marwuTOnlimmamurg APALPATILETALLICELATIYALALI mamimildilaithilitaminianimiliatinishinmaldilat nainalistinurnmunitlilitics युधिष्ठिरे स्तूयमाने भूयः सुमनसोऽभवन् ॥ २१ ॥ द्वैपायनो नारदश्च जामदग्न्यः पृथुश्रवाः इन्द्रद्युम्नो भालुकिश्च कृतचेताः सहस्रपात् ॥ २२ ॥ कर्णश्रवाश्च मुञश्च लवणाश्वश्च काश्यपः हारीतः स्थूलकर्णश्च अग्निवेश्योऽथ शौनकः ॥ २३ ॥ कृतवाक्च सुवाक्चैव वृहदश्वो विभावसुः । ऊर्ध्वरेता वृपामित्रः सुहोत्रो होत्रवाहनः ॥ २४ ॥ एते चाऽन्ये च बहवो ब्राह्मणाः संशितव्रताः । अजातशत्रुमानचुः पुरन्दरमिवर्पयः ॥ २५ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि द्वैतवनप्रवेशे पविगोऽध्यायः ।। २६ ।। व्यास, नारद, परशुगम, पृथुश्रवा, इन्द्रद्युम्न, भालकि, वृपामिन, महोत्र, और होत्रवाहन, आदि ऋषि और कृतचेता, सहस्रपाद, कर्णश्रवा, मुन्न, लवणाश्व, ब्राह्मणों ने प्रसन्नमन होकर युधिष्ठिर की इस प्रकार काश्यप, हारीत, स्थूलकर्ण, अग्निवेश्य, शौनक, म पूजा की, मानों ऋपि लोग इन्द्र की पूजा करते कृतवाक्, मुवाक, बृहदश्व, विभावसु, ऊर्ध्वरेता, हैं ॥२१॥२५॥ वनपर्व का छामवां अध्याय ममाप्त हुआ १२६॥ . अथ मतविंशोऽध्याय. 11 वंशम्पायन उवाच-ततो वनगताः पार्थाः सायाह्ने सह कृष्णया । उपविष्टाः कथाश्चर्युःखशोकपरायणाः प्रिया च दर्शनीया व पण्डिता च पतित्रता अथ कृष्णा धर्मराजमिदं वचनमब्रवीत द्रौपावाच-न नूनं तस्य पापस्य दुःखमस्मासु किंचन विद्यते धार्तराष्ट्रस्य नृशंसस्य दुरात्मनः मत्ताईसवां अध्याय ||७|| वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय! इम युधिष्ठिर से कहने लगी कि महाराज ! उस पारी, पछि पाण्डवों ने द्रौपदी सहित दुःम्ब और गोक में दयाहान, दुगत्मा और दुर्मनि दुर्योधन को आपकी मग्न होने के कारण से मायंकाल के समय अनेक ओर का किंचिन्मात्र मी दुःख नहीं है, क्योंकि उस कथाएं कही। पीछे वह पतिव्रता और दर्शनीय द्रौपदी दुष्ट को. आपकी मृगचर्म ओढ़कर वन को जाने me.TerRENDINEERONMDCCCOMPITrerarcmarrrrruerCTEDTIES mammHOURLIVEmairvemnuaweignomy - m.
म हा भा र त [ वनपर्व Emiuminimunammingilishiiiiii.mamtarihistaminatantandnihirawinanih. Amritaiaamasthi.mulilanditinnitialinstitisanilindsaultusELRHITaram यस्त्वां राजन् ! मया सार्धमजिनः प्रतिवासितम् । वनं प्रस्थाप्य दुष्टात्मा नाऽन्वतप्यत दुर्मतिः ॥ ४ ॥ आयसं हृदयं नूनं तस्य दुष्कृतकर्मणः यस्त्वां धर्मपरं श्रेष्ठं रूक्षाण्यश्रावयत्तदा सुखोचितमदुःखाई दुरात्मा ससुहृद्गणः ईदृशं दुःखमानीय मोदते पापपूरुषः चतुर्णामेव पापानामस्रं न पतितं तदा त्वयि भारत ! निशान्ते बनायाऽजिनवाससि ॥ ७ ॥ दुर्योधनस्य कर्णस्य शकुनेश्च दुरात्मनः दुर्घातुस्तस्य चोग्रस्य राजन् ! दुःशासनस्य च ॥ ८ ॥ इतरेषां तु सर्वेषां कुरूणां कुरुसत्तम ! दुःखेनाऽभिपरीतानां नेत्रेभ्यः प्रापतज्जलम् ॥ ९ ॥ इदं च शयनं दृष्ट्वा यच्चाऽऽसीत्ते पुरातनम् । शोचामि त्वां महाराज!दुःखानहँ सुखोचितम् ॥ १० ॥ दान्तं यच्च सभामध्ये आसनं रत्नभूषितम् दृष्ट्वा कुशवृसी चेमा शोको मां रुन्धयत्ययम् ॥ ११ ॥ यदपश्यं सभायां त्वां राजभिः परिवारितम् तच्च राजन्नपश्यन्त्याः का शान्तिहृदयस्य मे ॥ १२ ॥ हुए देखकर दुख नहीं हुआ। उस पापी का हृदय । दु ख के योग्य नहीं हैं, किन्तु सर्वथा सुख भोगने भी गहे का है, क्योंकि उसने आप ऐसे धर्मात्मा ही के योग्य है । मै आपके पहले और अब के शयन को रखी बातें सुनाई और न देने के योग्य दुख को देखकर अत्यन्त दु ग्वी होती हैं ।७।१०॥ देकर भी अपने मित्रों के साथ आनन्द करता कहा तो वह रलजटित हाथीदात का आसन, । ॥१॥६॥ कहा यह कुश का विछौना, कहा वह सभा जिसमें मैंने देखा कि हम सर के बनवाम को चलने राजा लोग आपका घरे बैठ रहते थे, कहा यह पर सब कौरयों की आखसि आसू गिरते थे, परन्तु अगर, मरा मेरे मन का दु ख क्योंका शान्त हो। इन चारों पापी अर्थात् दुर्योधन, वर्ण, शकुनि और यह वही आपका सूर्य जैमा चमकीला शरीर है, जिम दु सामन, सर की आखें एसानी भी नहीं। आप पर चन्दन लगा हुआ और सुन्दर रेशमी वस्त्र पड़ा KODI) FORUUTTA SITTU V77T **PETEROTTI TUTTHY ******* TTCHCRUNKTUUD''CU LIL'La + STORRECReuperHETRurreyyraiyyyutRIWwwzearera अध्याय २७ ] महा भारत mannmom.mamisamaram Tamarine nahatisticlinhrmilamdisinthinbimlinin.hinbihbilinditaimmammimmatunniliancianRLD या त्वाऽहं चन्दनाऽऽदिग्धमपश्यं सूर्यवर्वसम् । सा त्वां पङ्कमलादिग्धं दृष्ट्वा मुह्यामि भारन ! ॥ १३ ॥ या त्वाऽहं कौशिकवस्त्रैः शुभैराच्छादितं पुरा । दृष्टवत्यस्मि गजेन्द्र!मा त्वां पश्यामि चीरिणम् ॥ ११ ॥ यच्च तद्रुक्मपात्रीभिाह्मणेभ्यः सहस्रशः ह्रियते ते गृहादन्नं संस्कृतं साकामिकम् यतीनामगृहाणां ते तथैव गृहमेधिनाम् दीयते भोजनं राजन्नतीव गुणवत्प्रभो ! सत्कृतानि सहस्राणि मर्वकामः पुग गृहे सर्वकामः सुविहिर्यदपूजयथा द्विजान् ॥ १७॥ नच गजन्नपझ्यन्त्याः का शान्तिहृदयस्य मे । यत्त भ्रातृन्महाराज ! युवानो मृष्टकुण्डलाः अभोजयन्त मिष्टान्नः सूदाः परमसंस्कृतेः सर्वांस्तानद्य पश्यामि वने वन्येन जीविनः अदुःखान्मिनुष्येन्द्र ! नोपयाम्यति मे मनः ॥ १९ ॥ भीमसेनमिमं चाऽपि दुःग्वितं बनवासिनम् ध्यायतः किं न मन्युस्ते प्राप्त काले विवर्धन ॥ २० ॥ भीमसेनं हि कर्माणि स्त्रयं कुर्वाणमच्युतम् हुआ रहता था। अब उसी गरीर पर आप मम्म रही हैं। इमर मिवाय में आपक टन मब माटयों रगाये हुए, चीर धारण किये हुए हैं। यह देखकर को जिनको कुण्टलमार्ग अबान जवान ग्मोडा अच्छ- मेरे मन में मोह होना चग आता है ॥११॥१४॥ अच्छे पदार्थ बना-बनार भोजन कगने थे, उनको देखिए, आपके घर में नाना प्रकार के बनाये वन के मूल आदि पदार्थ मा-बार जीता हुए भाग माने के बर्तनों में ब्राझग, मन्यामी, गृहम्धी हुया देखनी हूँ ॥११॥ जार ब्रह्मचारियों को बंटते थे और बर्तन भी ग्न वे रम दुबके योग्य नहीं है में इन देव- जड़े हुप महलों यतमान थे और नाझनों की भी देवकर पर: टु बी हो रही है । टन भीममन को मर मनोकामना पूरी की जानी थी। अब म टनमें अपने हाथ में मन काम करने और सुन्दर पत्रों में एक बात को भी न टेमकर परम दुबी हो के बने मृगचर्म आदन हुए देखकर आलो आय amammmmmulinchinhatihinduisitinclininhithinnGudhianachinthintindiation SELEHELP4DESTATETAMINETIDTTTTTTTTTTT, १५५४ म हा भा र त [ वनपर्व imirmirana.sindhusailungharulsi AnimalmaalhalkGambhihonlinmalia NAAKUMARTOONAMEETORRETITTILPAPreeMPETITICLEELPLIVE Com यस्त्वां राजन् !मया सार्धमजिनैः प्रतिवासितम् । वनं प्रस्थाप्य दुष्टात्मा नाऽन्वतप्यत दुर्मतिः आयसं हृदयं नृनं तस्य दुष्कृतकर्मणः यस्त्वां धर्मपरं श्रेष्ठं रूक्षाण्यश्रावयत्तदा सुखोचितमदुःखाह दुरात्मा ससुहृद्गणः ईदृशं दुःखमानीय मोदते पापपूरुपः चतुर्णामेव पापानामस्त्रं न पतितं तदा त्वयि भारत ! निष्क्रान्ते बनायाऽजिनवाससि ॥ ७ ॥ दुर्योधनस्य कर्णस्य शकुनेश्च दुरात्मनः दुर्धातुस्तस्य चोग्रस्य राजन् ! दुःशासनस्य च ।। ८ ।। इतरेषां तु सर्वेषां कुरूणां कुरुसत्तम ! दुःखेनाऽभिपरीतानां नेत्रेभ्यः प्रापतज्जलम् ।। ९ ।। इदं च शयनं दृष्ट्वा यच्चाऽऽसीने पुरातनम् । शोचामि त्वां महाराज! दुःवानह सुखोचितम् ॥ १० ॥ दान्तं यच्च सभामध्ये आसनं रत्नभूपितम् दृष्ट्वा कुशवृसी चेमां शोको मां रुन्धयत्ययम् ।। ११ ।। यदपश्यं सभायां त्वां राजभिः परिचारितम् तच्च राजन्नपश्यन्त्याः का शान्तिर्हृदयस्य मे ॥ १२ ॥ । EnGunmainamumanimuanmeramirmaltaurumiumrLimiluDImuTLSubministonsummaNarera हुए देखकर दुख नहीं हुआ। उस पापी का हृदय दुःख के योग्य नहीं हैं, किन्तु सर्वथा सुख भोगने भी लोहे का है, क्योंकि उसने आप ऐसे धर्मात्मा ही के योग्य है। मैं आपके पहले और अब म गयन को सम्बी बातें सुनाई और न देने के योग्य दुम्ब को देखकर अत्यन्त दुम्बी होती हैं ॥७।१०॥ देकर भी अपन मित्र वगों के साथ आनन्द करता कहां तो वह स्वजटित हाथीदात का आसन, सा ॥१६॥ कहा यह कुश का विछौना, कहा वह मभा जिसमें भने दम्बा कि हम सब के वनवास को चलने राजा लोग आपका घरे बेटे रहते थे, कहां यह परमपारयों की आंखास आसू गिरते थे, परन्तु जंगल, मला मेरे मन का दुख क्योंकर शान्त होवे । इन चारों पासी अर्थात् दुर्योधन, कर्ण, शकुनि और यह वही आपका सूर्य जैसा चमकीला शरीर है, जिस दु.वामन, सब की आम्दं पसीनी मी नहीं। आप पर चन्दन लगा हुआ और सुन्दर रेशमी बन पड़ा WITMENTENIUITAROLYALACHEEMPERA अध्याय २७ । म हा भारत १५५५ NOUTimirmirs H । Loremmnulu'oni''LL .. I" DunohmmmmmunmunrCODIDWAPUTRUITRIOTICLEAWILTRA irmiritidinlimilianslatithili सा त्वां पङ्कमलादिग्धं दृष्ट्वा मुह्यामि भारत ! ॥ १३ ॥ या त्वाऽहं कौशिकवस्त्रैः शुभैराच्छादितं पुरा । दृष्टवत्यस्मि राजेन्द्र! मा त्वां पश्यामि चीरिणम् ॥ ११ ॥ यञ्च तद्रुक्मपात्रीभिाह्मणेभ्यः सहस्रशः हियते ते गृहादन्नं संस्कृतं सार्वकामिकम् ॥ १५ ॥ यतीनामगृहाणां ते तथैव गृहमेधिनाम् दीयते भोजनं राजन्नतीव गुणवत्प्रभो ! सत्कृतानि सहस्राणि सर्वकामैः पुरा गृहे सर्वकामैः सुविहितैयदपूजयथा द्विजान् नच राजन्नपश्यन्त्याः का शान्तिर्हृदयस्य मे । यत्ते भ्रातृन्महाराज ! युवानो मृष्टकुण्डलाः अभोजयन्त मिष्टान्नैः सूदाः परमसंस्कृतैः सर्वास्तानद्य पश्यामि वने वन्येन जीविनः अदुःखान्मिनुप्येन्द्र ! नोपशाम्यति मे मनः ॥ १९ ॥ भीमसेनमिमं चाऽपि दुःखितं वनवासिनम् ध्यायतः किं न मन्युस्ते प्राप्ते काले विवर्धते ॥ २० ॥ भीमसेनं हि कर्माणि स्वयं कुर्वाणमच्युतम् हुआ रहता था। अब उमी गरीर पर आप भम्म रही है। इसके मियाय मै आपके इन सब भाइयों लगाये हुए, चीर धारण किये हुए हैं। यह देखकर को जिनको कुण्डलधारी जवान जवान रमोइए अच्छ- मेरे मन में मोह होता चला आता है ॥११॥१४॥ अच्छे पदार्थ बना-बनाकर मोजन कगत थे, उनको देखिए, आपके घर में नाना प्रकार के बनाये वन के फल मूल आदि पदार्थ म्वा-खाकर जीना हुए भाग मोने के बर्तनों से ब्राह्मण, सन्यामी, गृहम्धी हुआ देम्वती हूँ ॥१५/१०॥ और ब्रह्मचारियों को घटते थे और वर्तन भी रन ये इम दुम्ब के योग्य नहीं है में इनको देख- जड़े हुए. सहस्रों वर्तमान थे और ब्राह्मणों की भी देखकर परम दुःखी हो रही हैं। इन भीमसन को मत्र मनोकामना पूरी की जाती थी। अब में उनमें अपने हाथ से सब काम करते और सुन्दर बन्त्री मे एक बात को भी न देवकर परम दुःखी हो के बदले मृगचर्म आदने हुए देखकर आपको क्रोध । CHOTUMBLO9DILYMETROOTTOTTYTyre immyu महाभारत [ वनपर्व wrimaanmanNIINARMinnavinatantansiranumaunaTRETAIMA RATH ETRACTERTIERRYINGuarrannamurarium - FDowwwmmmUTODAYImmammiummamam summiuminstaurmus सुखार्ह दुःखितं दृष्ट्वा कस्मान्मन्युर्न वर्धते सत्कृतं विविधैर्यानैर्वस्त्रैरुच्चावचैस्तथा तं ते वनगतं दृष्ट्वा कस्मान्मन्युर्न वर्धते ॥ २२ ॥ अयं कुरून्रणे सर्वान्हन्तुमुत्सहते प्रभुः त्वत्प्रतिज्ञा प्रतीक्षस्तु सहतेऽयं वृकोदरः योऽर्जुनेनाऽर्जुनस्तुल्यो द्विवाहुवहुवाहुना शरावमर्दे शीघत्वाकालान्तकयमोपमः ॥ २४ ॥ यस्य शस्त्रप्रतापेन प्रणताः सर्वपार्थिवाः यज्ञे तब महाराज ! ब्राह्मणानुफ्तस्थिर ॥ २५ ॥ तमिमं पुरुषव्याघ्र पूजितं देवदानवैः ध्यायन्तमर्जुनं दृष्ट्वा कस्माद्राजन्न कुप्यसि ॥ २६ ॥ दृष्ट्वा वनगतं पार्थमदुःखाहँ सुखोचितम् । न च ते वर्धते मन्युस्तेन मुह्यामि भारत ! ॥ २७ ॥ यो देवांश्च मनुष्यांश्च सपश्चैिकरथोऽजयत् नं ते वनगतं दृष्ट्वा कस्मान्मन्युन वर्धते ॥ २८ ॥ यो यानैरभुताकारर्हयैर्नागेश्च संवृतः प्रसह्य वित्तान्यादत्त पार्थिवेभ्यः परन्तपः क्यों नहीं आता है। भीमसन सुख के योग्य हैं। ग्रामणों के ममीप स्थित हुए थे। सो इन पुरुषोत्तम आज यद्यपि दुग्नी और बनवामी हैं परन्तु केवल, अर्जुन को, जिनकी पूजा देवता और दानव भी आपकी प्रतिमा केही बन्धन में बंध होने के कारण करते हैं, हम अवस्था में देखकर आप कौरयों पर चुप है, नहीं तो इनका उन्माह सब कोम्यों को शोध क्यों नहीं करते है। मैं तो मुख के योग्य माग्न का और इनके मियाय ये अर्जुन भी यद्यपि और दुग्य के अयोग्य अर्जुन को वनवास करते ही भुजा सम्मन हैं पातु मध्यायाहु के समान और आपको बाध न करते हुए दम्ब देखकर परम पगवामी ? ॥२०१२१॥ दुबी हानी है ॥२५॥२७॥ और जाप्रयाण छान और लगाने का अभ्याम jजम अले. अर्जुन ने सप देखना और गनुप्यों सबनेकपा में यमन र वारदममान है। को युद्ध में पराजय किया, जिसने राजाओं से युद्ध हरदार प्रताप सर सजग आपक. वर-करके धारिया और जो पारसी धाण एक आप। और पाप. य. में आकर ही वेग में मार मयना दम अर्जुन को कायागी Htternshot 11151220-stramyakMTRATHere . । - अध्याय २७) महाभारत १५५७ HTTIANாரளாாரசாரராரராாாாாாாாாா Pirindikinila intendraGhalifilam.netitish shininitianitidineninstantinuinalintirintindian क्षिपत्येकेन वेगेन पञ्च वाणशतानि यः तं ते वनगतं दृष्ट्वा कस्मान्मन्युर्न वर्धते ॥ ३० ॥ श्याम बृहन्तं तरुणं चर्मिणामुत्तमं रणे नकुलं ते वने दृष्ट्वा कस्मान्मन्युन वर्धते ॥ ३१ ॥ दर्शनीयं च शूरं च माद्रीपुत्रं युधिष्टिर ! सहदेवं बने दृष्ट्वा कस्मारक्षमसि पार्थिव ! ॥ ३२ ॥ नकुलं सहदेवं च दृष्ट्वा ते दुःखितावुभौ अदुःखा) मनुष्येन्द्र ! कस्मान्मन्युन वर्धते ॥ ३३ ॥ द्रुपदस्य कुले जातां स्नुपां पाण्डोर्महात्मनः । धृष्टद्युम्नस्य भगिनीं वीरपत्नीमनुव्रताम् मां वै वनगतां दृष्ट्वा कस्मारक्षमसि पार्थिव ! ॥ ३४ ।। नूनं च तव वै नाऽस्ति मन्युर्भरतसत्तम ! यत्ते भ्रातृ॑श्च मां चैत्र दृष्ट्वा न व्यथते मनः ॥ ३५ ॥ ननिर्मन्युः क्षत्रियोऽस्ति लोके निर्वचनं स्मृतम् । तदद्य स्वयि पश्यामि क्षत्रिये विपरीतवत् ॥ ३६ ॥ यो न दर्शयते तेजः क्षत्रियः काल आगते सर्वभूतानि तं पार्थ ! सदा परिभवन्त्युत तत्वया न क्षमा कार्या शत्रून्प्रति कथंचन तेजसेव हि ते शक्या निहन्तुं नाऽत्र संशयः ॥ ३८ ॥ देखकर आपके क्रोध किम कारण से नहीं आता धारण कर रहे हैं, आपको क्रोध लेशमात्र भी नहीं है। देम्बिाए, यह ढाल और तर पार सम्बनेवाला है, क्योंकि मुझको और अपने माइयों को दुखी नकुल और यह दर्शनीय सहदेव दोनों दुम्व के देखकर मी आपके मन को पीड़ा नहीं होती है अयोग्य वनवास कर रहे हैं, इन्हें भी देखकर आप को क्रोध क्यों नहीं आना ॥२८॥३२॥ ममार में हम बात को बिना तना फिर इनके मिवाय आप मुझ द्रुपद की पुत्री मय कोई कहता है कि क्षत्रिय विना क्रोध के नहीं पाण्डवों की वधू और धृष्टद्युम्न की बहन को भी होता है. परन्तु आपको मैं क्षत्रिय होने पर विमर्गत बन में दुम्वी देख रहे है, परन्तु भार क्षमा रूप ही देखनी है । जो क्षत्रिय समय पर अपना परक्रम aummimanawikGSniliamanandnaas arrialiancinalisa chaudhariniticalhuthananatantramuta.ante ॥३३॥३६॥ CRIMOTIVATCHEMICLE COOPeterrTTreraprem अध्याय २७ ] महा भारत Thimirmirmunrur பாராராகாரரானாராராடினாராம் - intm.inhiridismisriti amsirliaminatihindiimilsinilininatilinhintinuinashtamithanaina क्षिपत्येकेन वेगेन पञ्च वाणशतानि यः तं ते बनगतं दृष्ट्वा कस्मान्मन्युन वर्धते ॥३०॥ श्यामं वृहन्तं तरुणं चर्मिणामुत्तमं रणे नकुलं ते वने दृष्ट्वा कस्मान्मन्युन वर्धते दर्शनीयं च शूरं च माद्रीपुत्रं युधिष्ठिर ! सहदेवं वने दृष्ट्वा कस्मारक्षमसि पार्थिव ! ।। ३२ ॥ नकुलं सहदेवं च दृष्ट्वा ते दुःखितावुभौ अदुःखा) मनुष्येन्द्र ! कस्मान्मन्युन वर्धते ॥ ३३ ।। द्रुपदस्य कुले जातां स्नुपां पाण्डोमहात्मनः धृष्टद्युम्नस्य भगिनी वीरपत्नीमनुव्रताम् मां वै धनगतां दृष्ट्वा कस्मारक्षमसि पार्थिव ! ॥ ३४ ॥ नूनं च तव वै नाऽस्ति मन्युर्भरतसत्तम ! यत्ते भ्रातृ॑श्च मां चैव दृष्ट्वा न व्यथते मनः ॥ ३५ ॥ ननिर्मन्युः क्षत्रियोऽस्ति लोके निर्वचनं स्मृतम् । तदद्य त्वयि पश्यामि क्षत्रिये विपरीतवत् ॥ ३६ ॥ यो न दर्शयते तेजः क्षत्रियः काल आगते सर्वभूतानि तं पार्थ ! सदा परिभवन्त्युत ॥ ३७॥ तत्त्वया न क्षमा कार्या शत्रून्प्रति कथंचन तेजसव हि ते शक्या निहन्तुं नाऽत्र संशयः ॥ ३८ ॥ देखकर आपको क्रोध किस कारण से नहीं आता धारण कर रहे हैं, आपको मोघ लेगमात्र भी नहीं है। देम्बिए, यह ढाल और तलवार रखनेवाला है, क्योंकि मुझको और अपने भाइयों को दुःखी नकुल और यह दर्शनीय सहदेव दोनों दुःख के देखकर भी आपके मन को पीड़ा नहीं होती है अयोग्य वनवास कर रहे हैं, इन्हें भी देखकर आप ॥३३॥३६॥ को शोध क्यों नहीं आता ! ॥२८॥३२॥ मंमार में इस बात को बिना नना के फिर उनके मिवाय आप मुझ द्रुपद की पुत्री मय कोई कहता है कि क्षत्रिय बिना क्रोध के नहीं पाण्डवों की वधू और धृष्टद्युम्न की बहन को मी होता है, परन्तु आपको मैं क्षत्रिय होने पर विगत वन में दु.वी देख रहे है, परन्तु आर क्षमा रूप ही देखती है। जो क्षत्रिय ममय पर अपना परकम Dummmun.ammhguardarnaraular AidianRISTIATun Glaunalishaltanaharunaantaraatain - - - . GuruarMURLOTrrorarelvrCTRONuruCCOINTSCrcurcum.
म हा भारत बनप Fairwinitilamrutinianmumdan.mmmmotamarpan.samstimuanarmumaitime तथैव यः क्षमाकाले क्षत्रियो नोपशाम्यति अप्रियः सर्वभूतानां सोऽमुत्रेह च नश्यति इति श्रीमन्महाभारत आरण्यकपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि द्रौपदीपरितापवाक्ये सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥ नहीं दिखलाता है, वह संसार में आदर नहीं पाता । भी करना उचित है, उस समय पर जो क्षमा नहीं आरको शत्रु पर क्षमा करना किसी अवस्था में करता है लोग उमको नहीं चाहते हैं और उसका उचित नहीं है, किन्तु शत्रुओं को क्रोध करके मारना परलोक भी नाश हो जाता है॥३७॥३९॥ ही चाहिये । हा क्षत्रिय को क्षमा के समय पर क्षमा वनपर्व का सत्ताईसवां अध्याय समाम हुआ ॥ २५ ॥ QuaMITTENTIVESTIVAT MATALLISTICLESHLERALLVADITIATIDATESTLINEDARPITTERTAINMore अथ अष्टाविंशोऽध्याय ॥२८॥ द्रौपद्युवाच अनाऽप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् प्रहादस्य च संवादं चलेवरोचनस्य च असुरेन्द्रं महाप्राज्ञं धर्माणामागतागमम् वलिः पप्रच्छ दैत्येन्द्रं प्रह्लादं पितरं पितुः ॥ २ ॥ बलिरुवाच-क्षमा स्विच्छ्रेयसी तात ! उताहो तेज इत्युत एतन्मे संशयं तात यथावद् ब्रूहि पृच्छते श्रेयो यदत्र धर्मज्ञ ! भूहि मे तदसंशयम् करिष्यामि हि तत्सर्वं यथावदनुशासनम ॥ ४ ॥ तस्मै प्रोवाच तत्सर्वमेवं पृष्टः पितामहः सर्वनिश्चयवित्प्राज्ञः संशयं परिपृच्छते महाद उवाच-न श्रेयः सततं तेजो न नित्यं श्रेयसी क्षमा अट्ठाईसवां अध्याय ॥२८॥ द्रोपदी ने कहा-हे महाराज ! उन विषय में कल्याण करनेवाला है। आप कृपा करके ठीक- एक पुराना इतिदास भी है, जिसमें विरोचन के पुत्र ठीक वर्णन करके मेरे सशय को दूर कीजिए । हे पनि और प्रहाद का संबाद है । उस माचीन इति- धर्मज! इस विषय में जो उचित हो सो आप निश्चित हाम को में रहती हैं, सुनिष । एक समय मजा का सहिए । में आपकी शिक्षा के अनुसार ही पनिने अपने दादा महाद में जी दत्यों का इन्द्र, सब कार्य करूंगा ॥१॥४॥ पानी और धमों काहय जाननवाला था, पूछा यह सुनकर प्रहाद कहने लंग पुत्र ! यह ६ मान ! शमा और क्रोध इन दोनों में से कौनमा निश्चय समझा कि सदा कोष दिखाना या सदा HaryanvURUMUVIADEEPLEARNERALINATIVATuyYPERCENTALENTED BILAranarurrrrammarunmanemuniliwanaloriumussunuwaunuwazzarsmarbadimanitari.ai.a.anna अध्याय २८ महा मारत Immorm.mmmmmmmmmmmmmmmmmu anAmruarantras matalashmmisiaTiminatani.tammnimithamandimmauu.mamalnews इति तात ! विजानीहि द्वयमेतदसंशयम् यो नित्यं क्षमते तात ! वहृन्दोपान्स विन्दति । भृत्याः परिभवन्त्येनमुदासीनास्तथाऽरयः ॥ ७ ॥ सर्वभूतानि चाऽप्यस्य न नमन्ते कदाचन तस्मान्नित्यं क्षमा तात! पण्डितेरपि वर्जिता ॥ ८ ॥ अवज्ञाय हि ते भृत्या भजन्ते बहुदोपताम् । आदातुं चाऽस्य वित्तानि प्रार्थयन्तेऽल्पचेतसः ॥ ९ ॥ यानं वस्त्राण्यलंकाराञ्च्छयनान्यासनानि च भोजनान्यथ पानानि सर्वोपकरणानि च ॥ १० ॥ आददीरन्नधिकृता यथाकाममचेतसः प्रदिष्टानि च देयानि न दद्युभर्तृशासनात ॥ ११ ॥ न चनं भर्तृपूजाभिः पूजयन्ति कथंचन अवज्ञानं हि लोकेऽस्मिन्मरणादपि गर्हितम् ॥ १२ ॥ क्षमिणं तादृशं तात ! युवन्ति कटुकान्यपि । प्रेप्याः पुत्राश्च भृत्याश्च नथोदासीनवृत्तयः ॥ १३ ।। अथाऽस्य दागनिच्छन्ति परिभूय क्षमावतः दाराश्चाऽस्य प्रवर्तन्त यथाकाममतसः ॥ १४ ॥ समा काना दोनों ही बने अच्छी नहीं । पण्डित ' उच्च के अनुसार जो चाहें सो ले रते हैं और स्वामी लोग सदा क्षमा रहना अच्छा इम कारण मे नहीं की आना पाने पर भी देने के योग्य वस्तु को किमी कहते है कि क्षमा से बहुत मे दोष उत्पन्न हो जाने को नहीं देते हैं । इमरिये हे बलि ! यह अवज्ञा है। क्षमावन् मे शत्रु नहीं डरते, और अनुचर रोग इम ममार में मरण मे भी अधिक निन्दिन गिनी भी उसका आदर नहीं करते ॥५॥ जाती हे ||१.१२॥ और उसकी माना को न मानका उमके धन इसके मिवाय दाम पुत्र, नौकर और उदासीन को लेना विचारते है और यह इन्टा करने है कि मनुष्य क्षमागन मनुध्य मे क्टुप वचन भी कर दमकी मवान, वस्त्र, अनहार, शयन, आमन, अन्न न है और उमा निम्म्कार करके टमी स्त्रियों पान और मय पदार्थों को ही ले ले। अधिक जाने की भी इन्टा करने है, और उमा त्रिया कहा तक कहं, समानान् मनुष्य के अन आदि भी अपनी इच्छा के अनुसार बांध कानी है। पदाथों की रक्षा के निये नियुक्त मनुष्य अपनी जब शियों को अपनी प्रसन्नतापूर्वक काम करने में Pundarriandini Ghintamalininatantarainalishaitaditidnia । tch Trcour1ccorepreneurchurmuTuruCorrrrrrrrrrrr.
[ वनपर्व म हा भारत १५६० ImmuTun.TEAMImo RTIMILSImmunm.in.animiAMODrintinumunanamme marria.TA.mam.chaininainamummittients. तथा च नित्यमुदिता यदि नाऽल्पमपीश्वरात् । दण्डमर्हन्ति दुष्यन्ति दुष्टाश्चाऽप्यपकुर्वते एते चाऽन्ये च बहवो नित्यं दोपाः क्षमावताम् । अथ वैरोचने ! दोपानिमान्विद्धयक्षमावताम् ॥ १६ ॥ अस्थाने यदि वा स्थाने सततं रजसा वृतः । कुद्धो दण्डान्प्रणयति विविधान्स्वेन तेजसा ॥ १७॥ मित्रैः सह विरोधं च प्राप्नुते तेजसा वृतः आप्नोति द्वेष्यतां चैव लोकात्स्वजनतस्तथा ॥ १८ ॥ सोऽवमानादर्थहानिमुपालम्भमनादरम् संतापद्वेषमोहांश्च शतश्च लभते नरः ॥ १९ ॥ क्रोधादृण्डान्मनुप्यषु विविधान्पुरुषो दहन भ्रश्यते शघिमेश्वर्यात्प्राणेभ्यः स्वजनादपि ॥ २० ॥ योऽपकर्तृश्च हर्तृश्च तेजसैवोपगच्छति तस्मादुहिजने लोकः माउमगतादिव यस्मादुद्विजने लोकः कथं नस्य भवो भवेत् । अन्तरं तम्य दृष्ट्व लोको विकुरुते ध्रुवम् ॥ २२ ॥ तस्मान्नाऽत्युत्सृजेत्तेजो न च नित्यं मृदुर्भवेत् । थोड़ा मा भी दण्ड न दिया जाय तब उन स्त्रियों ऐश्वर्य, प्राण और म्यजना से शीघ्र ही प्रष्ट हो में अनक प्रकार के दाप उत्पन्न हो जाते हैं, और जाना है ॥१६॥२०॥ फिर वे अपशर कान रगती ॥१३॥१५॥ जो मनुष्य उपकारी और अनुपकारी दोनों इनकमिवाय और भी यहुन में दोप क्षमावानों में क्रोध के गाय पर्याय रखना है, उसमे सब लोग महो जाने हैं। जो मनुष्य नागुणा दावर मांध इस प्रकार में टरत हैं जैसे घर में रहनेवाले सर्प से पाण में योग्य और अयोग्य दण्ड देना है, मनुष्य भयभीन रहने है। जिस मनुष्य उसका मित्रों मे विगंध और मुजनी म पछा जाना गग अप्रसन्न रहते हैं उमा एश्चर्य हा में मिल है। और यह अपमान कान में पानहानि, विचार, मकना है, क्योंकि वगग ३गके छिद्र को देगा अनादर, मानार, प, बीर मा, म दुखी होकर वन है। हम मनुष्य को चाहिय कि अत्यन्त म माय उपज घर मा है। प्राध के मापी अथवा अत्यन्त मीटा स्वभाव न रपमे, जय भारत में अंगा प्रसार दण्ड प्रधान मन्यमा ममय दम तय गा कोइम शेक और amimarathurammhimdimanawinAmiummmoirainRIDHRILAAImandatv.. - समय । । - अपने बाहुन 741rNTEITTER:CTURTHIArrnerrrrTHIMIRICEver अध्याय २८ ] म हा भारत १५६१ marponommun numminuurmultimantrumIRIDIrrianmanoramane .. CUUMOU TOTOO 'L'L'ULTORIOULOTTON' INTOTU 'L'O'rta काले काले तु संप्राप्ते मृदुस्तीक्ष्णोऽपि वा भवेत् ॥ २३ ॥ काले मृदुर्यो भवति काले भवति दारुणः स वै सुखमवाप्नोति लोकेऽमुष्मिन्निहैव च क्षमाकालांस्तु वक्ष्यामि शृणु मे विस्तरेण तान्। ये ते नित्यमसंत्याज्या यथा प्राहुर्मनीषिणः ॥ २५ ॥ पूर्वोपकारी यस्ते स्यादपराधे गरीयसि उपकारेण तत्तस्य क्षन्तव्यमपराधिनः ॥ २६ ॥ अबुद्धिमाश्रितानां तु क्षन्तव्यमपराधिनाम् न हि सर्वत्र पाण्डित्यं सुलभं पुरुषेण वै अथ ये बुद्धिजं कृत्वा ब्रूयुस्ते तदवुद्धिजम् पापान्स्वल्पेऽपि तान्हन्यादपराधे तथाऽनृजून् ॥ २८ ॥ सर्वस्यैकोऽपराधस्ते क्षन्तव्यः प्राणिनो भवेत् । द्वितीयेसति वध्यस्तु स्वल्पेऽप्यपकृते भवेत् ॥ २९ ॥ । अजानता भवेत्कश्चिदपराधः कृतो यदि क्षन्तव्यमेव तस्याऽऽहुः सुपरीक्ष्य परीक्षया मृदुना दारुणं हन्ति मृदुना हन्त्यदारुणम् नाऽसाध्यं मृदुना किंचित्तस्मात्तीव्रतरं मृदु ॥ ३१ ॥ परलोक में सुख उसी को मिलता है, जो समय के अपने को अज्ञानी बतावे तो ऐसे पुरुष को थोड़े से अनुसार क्रोध और क्षमा करता है । अब मै तुमसे भी अपराध पर दण्ट देवे ॥२६॥२८॥ यह बात विस्तारपूर्वक कहती है कि किस-किस हा एक अपराध तो सब जीवों का ही क्षमा समय पर मनुष्य को क्षमा करना चाहिये तुमको के योग्य है, परन्तु दूसरी ओर थोड़ा सा भी अपराध भी उसके विपरीत करना उचित नहीं है ।।२१।२५|| करना दण्ड-योग्य है । और जो कोई मनुष्य बिना जिम मनुष्य ने पहले कोई उपकार किया हो जाने कोई अपगध कर, तो उसका अपराध अच्छी और पीछे उससे अपराध बन पड़े तो उस उपकार तरह परीक्षा करने पर क्षमा करना चाहिये। क्षमागील के बदले उसके अपराध को क्षमा करे। दूसरे अज्ञा- व्यक्ति उग्र और कोमल स्वभाव के सभी का सहार नियों के किये हुए अपगध को भी क्षमा करे, परन्तु कर सकता है। ऐसी कोई बात नहीं जो क्षमा के मनुष्य अज्ञानी हर एक अवस्था में नहीं रहता इमस लिये अमाध्य हो । इस कारण क्षमा ही सब प्रकार जो मनुष्य ज्ञान की अवस्था में अपराध कर और , के उपायों से बढ़कर चल रखती है । कहने का 'URATTENTIPornemummORTANTHS TELEVISILAMTAARTIARILALASAILIYLIMILAM IMAnnar । WOULDmummmmmmmmmuslimeneureTTERLESALEMMELArcurmus १५६२ म हा मारत [ वनपर्व FornaroulimmummmmmunlimiliwoUNTAImmmmunitrinam.miturinnaro LAWARTATUALITYLIYUNDATINDMEDIAUNTRY देशकालौ तु संप्रेक्ष्य वलावलमथाऽऽत्मनः नाऽदेशकाले किंचित्स्याद्देशकालो प्रतीक्षताम् ॥ ३२ ॥ तथा लोकभयाच्चैव क्षन्तव्यमपराधिनः एत एवंविधाः कालाः क्षमायाः परिकीर्तिताः ॥ ३३ ॥ अतोऽन्यथाऽनुवर्तत्सु तेजसः काल उच्यते द्रौपधुवाच-तदहं तेजसः कालं तव मन्ये नराधिप ! ॥ ३४ ॥ धार्तराष्ट्रेपु लुब्धेषु सततं चाऽपकारिषु न हि कश्चित्क्षमाकालो विद्यतेऽद्य कुरून्प्रति ॥ ३५ ॥ तेजसश्चाऽऽगते काले तेज उत्स्रष्टुमर्हसि मृदुर्भवत्यवज्ञातस्तीक्ष्णादुद्विजते जनः काले प्राप्ते द्वयं चैतद्यो वेद स महीपतिः इति श्रीमन्महाभारनं आरण्यकपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि दैनवनप्रवेशे अष्टाविशोऽध्यायः ।। २८ ।। तात्पर्य यह है कि देश, समय और अपनी क्षमना आ गया है । यह लोभी धृतराष्ट्र के पुत्र सदा से को देखकर मसार के प्रत्येक काम में हाथ डालना आपको बुराई की चेष्टा कर रहे हैं । इस कारण चाहिय । इसके मिवाय कभी-कभी रोक-निन्दा के अब उनके प्रति क्षमा का व्यवहार करना आपको भय से भी अपराधी को क्षमा करना उचित होता उचित नहीं। जो मनुप्य कोमल म्वभाववाले होते है। पण्डितों ने क्षमा के ये सर समय बतलाय हैं। है लोग उनका अनादर करते है और जिनका म्वगाम इनके अतिरिक्त अन्य समय क्रोध प्रकट करने का तीक्ष्ण अर्थात् तेज होता है लोग उनसे डरते हैं । अवसर समझना चाहिये ।।२९॥३३॥ इस कारण समय के अनुसार कोमलता या अता । म प्रकार इतिहास ममाप्त करके द्रोपदी ने प्रकट करनी चाहिये । समयानुमार इन दोनों का सुशिशि- समाज : माना है कि जो टीक उपयोग करताई यही राजा है ॥३४॥३६॥ यापक भीमा प्रकट करने का यह ठीक समय पनपर्य या अहमियां अध्याय हुआ ॥२८॥ LOPEDIVOImpresUPCODAHALAXMADAMIRZINCineHAREum 4-0- LLPAPER PITH अंधानविनाऽन्याय: ॥५॥ युधिष्टिर पाप-क्रोधी हन्ता मनुष्याणां क्रोधो भावयिता पुनः । इनि विद्धि महाप्राज्ञ : क्रोधमूली भवाभया - ॥ १ ॥ यो हि संहरत ग्रोधं भवस्तम्य मुगांभने ! sory014171101* *1'111****************7'*'**T*CYK'utricity" अध्याय २९ ) महाभारत AmirmirmmsineTramanimal ranmun.rumIrananumaramanan . ENTITOITUMIMO TIETOTU) Tag uwieluwe LEDTU यः पुनः पुरुषः क्रोधं नित्यं न सहते शुभे! तस्याऽभावाय भवति क्रोधः परमदारुणः क्रोधमूलो विनाशो हि प्रजानामिह दृश्यते तत्कथं मादृशः क्रोधमुत्सृजेल्लोकनाशनम् क्रुद्धः पापं नरः कुर्यात्कुद्धो हन्याइगुरूनपि कुद्धः परुपया वाचा श्रेयसोऽप्यवमन्यते वाच्यावाच्ये हि कुपितो न प्रजानाति कर्हिचित् । नाऽकार्यमस्ति क्रुद्धस्य नाऽवाच्यं विद्यतें तथा ॥ ५ ॥ हिंस्यात्क्रोधादवध्यांस्तु वध्यान्संपूजयीत च आत्मानमपि च क्रुद्धः प्रेपयेद्यमसादनम् ॥ ६ ॥ एतान्दोपान्प्रपश्यद्भिर्जितः क्रोधो मनीषिभिः । इच्छद्भिः परमं श्रेय इह चाऽमुत्र चोत्तमम् ॥ ७ ॥ तं क्रोधं वर्जितं धीरैः कथमस्मद्विधश्चरेत् एतद् द्रौपदि ! संधाय न मे मन्युः प्रवर्धने ॥ ८ उन्तीमवां अध्याय ॥२९॥ द्रौपदी की उक्त बात को सुनकर युधिष्ठिर ने क्रोधी के लिये कोई बात न करने या न कहने के कहा-हे महापाजे ! मनुष्यों को मारने और वृद्धि योग्य नहीं है । वह चाहे अवध्यों को मार डाले करनेवाला क्रोध ही है और क्रोध ही ऐश्वर्य और और वध्यों को पूजे और क्रोध के कारण से अपने अनार्य दोनों की जड़ है । क्रोध रोकनेवाले मनुप्य को यमलोक में पहुचाये ॥४६॥ को ऐश्वर्य मिलता है और नित्य क्रोध करनेवाले का सा जो मनुष्य क्रोध के इन दोपों को जानंत नाग हो जाता है । इस संसार में क्रोध ही प्रजा है और अपना कल्याण चाहते हैं, वे कोध कभी नहीं का नाश करनेवाला है । इमलिये मेरे जमा मनुष्य करते । पण्डित लोग भी शोध न करने की शिक्षा ऐसे संमार के नाम करनेवाले क्रोध को क्योंकर करते है फिर मना मेरे जमा मनुष्य क्योंकर क्रोध धारण कर ॥१३॥ कर । हे द्रोपदी : म प्रोध में उक्त दोष समझना क्रोध ही के कारण से मनुष्य पाप करता है, हूँ इमी मे अपने क्रोध को नहीं बढ़ाता ||८|| पड़ों को मारने लगता है और अनुचित वातें कह जो मनुष्य कोधी पर क्रोध नहीं करना वह कर अच्छे मनुष्यों का अपमान करता है । यह नहीं अपने और दूसरों को बड़े भय से बचाना है और समझता कि यह बात कहने के योग्य है या नहीं। दोनों के दोष को दूर कर देना है। मूह और D'UNALNTirumLITOMTUITEWremmencemeteTorrenzur'ere! HTTPUROIATSLIMITEDALITALILURETRICTALS IMLE ARRUPTITUNLIMIti! - । alik GhumnTamanal १५६४ म हा भारत [ वनपर्व BIPINpinimummHE TIMarminranimuNIDMImmunistahamarinusaRang Aramirmirandumaraman mitrinaamarTESnathtvinाशामsunny आत्मानं च परांश्चैव त्रायते महतो भयात् कुध्यन्तमप्रतिकुध्यन्द्रयोरेष चिकित्सकः मूढो यदि क्लिश्यमानः कुध्यतेऽशक्तिमान्नरः । बलीयसा मनुष्याणां त्यजत्यात्मानमात्मना ॥ १० ॥ तस्याऽऽत्मानं संत्यजतोलोका नश्यन्त्यनात्मनः। तस्माद द्रोपद्यशक्तस्य मन्योर्नियमनं स्मृतम् ॥ ११ ॥- विद्वांस्तथैव यः शक्तः क्लिश्यमानो न कुप्यति । अनाशयित्वा क्लेप्टारं परलोके च नन्दति तस्माद्बलवता चैव दुर्वलेन च नित्यदा क्षन्तव्यं पुरुपेणाऽऽहुरापत्स्वपि विजानता ॥ १३ ॥ मन्योर्हि विजयं कृष्णे! प्रशंसन्तीह साधवः क्षमावतो जयो नित्यं साधोरिह सतां मतम् ॥ १४ ॥ सत्यं चाऽनृततः श्रेयो नृशंसाचाऽनृशंसता नमेवं बहुदोपं तु क्रोधं साधुविवर्जितम् मादृशः प्रसृजेत्कम्मात्सुयोधनवधादपि नेजस्वीति यमाहुर्वे पण्डिता दीर्घर्शिनः न क्रोधोऽभ्यन्तरस्तस्य भवतीति विनिश्चितम् । अमगध सा वरयानों पराध पर अपने प्राण कहते है और सत्पुरुषों की तो सदा ही यही बुद्धि गंवाने है ॥११॥ रहती है । जो साधु क्षमावान होता है उसकी जय पमा भवम्या में मरने से उसका पाप नष्ट रहती है,जम झूठ चार ने से सत्य कहना और दुख हो जाता है इममे असमर्थ को काध सकना ही दन में दया करना श्रेष्ठ गिना जाता है उसी प्रकार अच्छा कामी प्रकार से जी मनुष्य विद्वान में माधुओं ने मोध करना भी वर्जित किया कि और नमम हमान पान पर मान देनवान. जिममें सन मे दाप ॥१३॥१५॥ दरा नही दानादार मानहीं माना। है, हट! : दुर्शन यदि गार टारने के लिये उमापार में या भागात किमादा॥१२॥ भी नयार हो तो मुझे ऐसा पुरप. यानापमय और दमी पाणये यसवान और नियंत्र विप मानों द्वारा निन्दिन, माघ कोषमी अपने हदय में मानवारवाही जातिगादाना धान देशका प्राधान्नकनहीं रचिना माधु सभी बाधा बनना SITER दांना ? को पटना परिन गगनसम्पी बरन rear. PATTEE TEAMPARALLELLERHITamantrik ramdisunneDIARRIAnanAmmoniulinitiGLALTDeceTRatatunmantr ...कार...!
अध्याय २९ म हा भारत १५६५ HoroimummmmmmmmmmmunromanARTUNITAmriuTRALIATMAITATog mummittalist Asimammyamiltinumananmintifaltanamitamaraamananda यस्तु क्रोधं समुत्पन्नं प्रज्ञया प्रतिबाधते तेजस्विनं तं विद्वांसो मन्यन्ते तत्वदर्शिनः ॥ १७ ॥ कुद्धो हि कार्य सुश्रोणि ! न यथावत्प्रपश्यति । नाऽकार्य न च मर्यादां नरः कुद्धोऽनुपश्यति ॥ १८ ॥ हन्त्यवध्यानपि क्रुहो गुरून्कुद्धस्तुदत्यपि तस्मात्तेजसि कर्तव्यः क्रोधो दूरे प्रतिष्टितः दाक्ष्यं समर्पः* शौर्य च शीघ्रत्वमिति तेजसः । गुणाः क्रोधाभि भूतेन न शक्याः प्राप्तुमञ्जसा ॥ २० ॥ क्रोधं त्यक्त्वा तु पुरुषः सम्यक्तेजोऽभिपद्यते कालयुक्तं महाप्राज्ञे ! क्रुद्वैस्तेजः सुदुःसहम् ॥ २१ ॥ क्रोधस्त्वपण्डितैः शश्वत्तेज इत्यभिनिश्चितम् । रजस्तु लोकनाशाय विहितं मानुपं प्रति ॥ २२ ॥ तस्माच्छश्वत्यजेत्क्रोधं पुरुषः सम्यगाचरन् श्रेयान्स्वधर्मानपगो न क्रुद्ध इति निश्चितम् ॥ २३ ॥ यदि सर्वमवुद्धीनामतिक्रान्तमचेतसाम् अतिक्रमो मद्विधस्य कथं स्वित्स्यादनिन्दिते ॥ २४ ॥ हैं । जो विद्वान् क्रोध को प्रजा से रोक्ता है वहीं, जो मनुष्य क्रोध को छोड़ देता है वह समय विद्वान् तत्त्वदी जनों की राय में, तेजम्बी है । हे के अनुमार तेजबी हो जाता है परन्तु क्रोघी में तेज द्रौपदी ! कुपित पुरुष कार्य के ठीक ग्रूप को नहीं का होना असम्भव है । मूर्ख लोग तो निश्चय क्रोध देख पाता । वह गुरुजन को पीड़ा पहुंचाने, मर्यादा ही का तेज मानते हैं परन्तु मनुष्यलोक में यह क्रोध का उल्लङ्घन करने, अवध्य का वध आदि अनुचित केवल नाशकारक ही है। इसमे अच्छा कर्म करने कर्म करने लगता है। अतएव तेजम्बी पुरुष को वाले मनुष्य को क्रोध त्यागना ही उचित है क्योंकि क्रोध से सदा दूर रहना चाहिये । क्रोध के वश होने क्रोधी मनुष्य से तो वह मनुष्य भी अच्छा निश्चय से निपुणता, अमर्ष, शूरता, फुर्ती आदि तेज के गुण माना गया है निमने अपना धर्म छोड़ दिया हो। नहीं प्राप्त हो सकते, ये गुण नो नम्रता से ही प्राप्त ॥२१॥२३॥ होते है ॥१६॥२०॥ यदि मुझ एमा पुरुष इस प्रकार का आचरण POLTIunirwasaTufilimmintinaam hain. Fror trainitititivritiuditiliticialiChinalicianmun amritnaristianitle: • अमपानान गोग्पकारोपायचिन्तनम् । COUT'UTILTUMUTOLTECTITUDIT certStore म हा भारत चनपर्व HWriminimumulimmunlimmmmm manummaNTumiummitormulamimunmum PAHADIMARATimitrinatmiumusnuTuF -- यदि न स्युर्मानुषेषु क्षमिणः पृथिवीसमाः । न स्यात्संधिर्मनुष्याणां क्रोधमूलो हि विग्रहः ॥ २५ ॥ -- अभिपतो ह्यभिपजेदाहन्याद्गुरुणा हतः एवं विनाशो भूतानामधर्मः प्रथितो भवेत् आक्रुष्टः पुरुषः सर्व प्रत्याक्रोशेदनन्तरम् प्रतिहन्याद्धतश्चैव तथा हिंस्याच्च हिंसितः ॥ २७ ॥ हन्युर्हि पितरः पुत्रान्पुत्राश्चापि तथा पितृन् । हन्युश्च पतयो भार्याः पतीन्भार्यास्तथैव च ॥ २८ ॥ एवं संकुपिते लोके जन्म कृष्णे! न विद्यते प्रजानां सन्धिमूलं हि जन्म विद्धि शुभानने! ॥ २९ ॥ ताः क्षिपेरन्प्रजाः सर्वाः क्षिप्रं द्रौपदि! तादृशे । । तस्मान्मन्युर्विनाशाय प्रजानामभवाय च यस्मात्तु लोके दृश्यन्ते क्षमिणः पृथिवीसमाः । तस्माजन्म च भूतानां भवश्च प्रतिपद्यते क्षन्तव्यं पुरुषेणेह सर्वापत्सु सुशोभने ! क्षमावतो हि भूतानां जन्म चैव प्रकीर्तितम् ॥ ३२ ॥ आक्रुष्टस्ताडितः क्रुद्धः क्षमते यो वलीयसा । को तो रंग क्या कहेंगे । यदि तक में पृथ्वी के इमरिय हे मुन्दरी ! मल का ही तुम प्रजा की ममान क्षमासान, गन हात ता मय जगह सदा उत्सत्ति का कारण जानी। ह द्रोपदी ' मनुष्य यदि समर की आग जरना रहती, काई भी मोध छोड़. हरमेल का पसन्द न करते तो परम्पर मोधक कर मेट करना न चाहना । यदि सभी रोग युग आवेश में आकर एक दूसरे को मार डारते । पृथ्वी पग्नेयास के बुरे का चंदावर उममे यदा रना पर पृथ्वी के समान समाशील रोग रहते हैं, इसी से पाहत ना मय जान भोपट हो जाता और मर जगह प्रजा की उत्तम और उमति हानी है ॥२८॥३१॥ अधर्म पर जाना ॥२७॥ हम कारण मुहामने 'पप्रकार की आपचियों दादी : यदि माम अन्धा र पिना में समा परना दी टीक है क्योंकि क्षमाशील व्यक्ति पुत्र का और पुत्र मावा, अमयाबी पनि का और ही मय पाणियों की सम्पति का पारण गर्दे गये हैं। पनिमामार मार कामदार मनुष्य यरवान्. प्रमाययान, विद्धन और उपग दी जाय जर मजा दो साल पद जाय। ६ वाई पायी वाण अधया हस्त आदि ETEmmmsamsurtamarathimatiniumnindisani.wmmintainental R 32yUITMEnyUREJivn.FELIHniCATIOth अध्याय २९ महा मारत १५६७ TADIminimurti गपOTIST animdianarmadaminiminihinfinitish mitanirliaminatantriminantivitamininewsli mirria PARTAITHAL Twimmuzmamrarur यश्च नित्यं जितक्रोधो विद्वानुत्तमपूरुषः ॥ ३३ ॥ प्रभाववानपि नरस्तस्य लोकाः सनातनाः क्रोधनस्त्वल्पविज्ञानः प्रेत्य चेह च नश्यति ।। ३४ ॥ अत्राऽप्युदाहरन्तीमा गाथा नित्यं क्षमावताम् । गीताः क्षमावना कृष्णे! काश्यपेन महात्मना ॥ ३५ ॥ क्षमा धर्मः क्षमा यज्ञः क्षमा वेदाः क्षमा श्रुनम् । य एतदेवं जानाति स मर्व क्षन्तुमर्हति ।। ३६ ॥ क्षमा ब्रह्म क्षमा सत्यं क्षमा भृतं च भावि च । क्षमा तपः क्षमा शोचं क्षमयेदं धृतं जगत् अतियज्ञविदां लोकान्क्षमिणः प्राप्नुवन्ति च अतिब्रह्मविदां लोकानति चापि तपस्विनाम् ॥ ३८ ॥ अन्ये वै यजुपां* लोकाः कर्मिणामपरे नथा । क्षमावतां ब्रह्मलोके लोकाः परमपूजिताः ॥ ३९ ॥ क्षमा तेजस्विनां तेजः क्षमा ब्रह्म नपस्विनाम् । क्षमा सत्यं सत्यवतां क्षमा यतः क्षमा शमः ॥ १० ॥ तां क्षमां तादृशी कृष्णे! कथमस्मद्विधस्त्यजेत् । यस्यांब्रह्म च सत्यं च यज्ञा लोकाश्च धिष्टिताः ॥ ११ ॥ में मारे और वह क्रोध को जानने के कारण से बाघ को मी नहीं मिलने और तेजम्बियों का तेज और न करे तो उसके लोक सदैव बने रहते हैं ॥३२॥३३॥ तपम्बियों का ब्रा भी क्षमा ही ज्ञानो १३७१३८॥ और जो अल विनानी और क्रोधी होता है उनक नएम्बी और वेद जाननेवालों को जो लोक दोनों लोक नष्ट हो जाते हैं । हे द्रोग्दी ! अब हम तुममे मिलने हैं, समाधान पुरुषों को रनमे मी ऊँचे लोक क्षमा के विषय में क्या जी की कही हुई गीता मिलने हैं । यजुप अर्थात बेनाग्नि माध्य कर्म कान- कहते हैं । क्षमा ही धर्म, यज्ञ, वद गावन्पी हे इसको वाले और कर्मनिष्ठ अर्थात् वापी कृष आदि बनाने- जो जानता है वह अवश्य क्षमा करता है ॥३४॥३६॥ बाल मनयों को और ही लोक मिलते हैं। पन्तु और ब्रह्म, मत्य, मन, मावी और गौच भीक्षमा क्षमावान् को वे गंक मिलने है, जो ब्रह्मक में मी ही है और क्षमा ही जगन् का आधार है । क्षमावान् परम पुनीत माने जाने है ॥३९॥४०॥ पुरुषों को वे रोक निरने हैं, जो यज्ञ के करनवालों तेजम्बियों ने, तपम्बियों का ब्रह्म और * ব্রা পুষ্টি নহৰ ৰনাৰাৰ বৰা wimmmmmamalinihanulionslitinuinnifinanatifilanmaldbatmithilantinanni.. 1023LEVEL1.TPTMCDMerrrrrrUTERTISEMECITIE:
- BIHARMERanauLDHANALITPURRENTIALITY TEERUTirty15XDEnewsmTMELALIDITIODIHITSTITUTICALLITAUDEL । १५६८ म हा भारत [ बनपूर्व FinamurmilimurmRATRAImmitmummuTISTRITRITIATIVITRI WanicRinema क्षन्तव्यमेव सततं पुरुषेण विजानता यदा हि क्षमते सर्व ब्रह्म संपद्यते तदा ॥ १२ ॥ क्षमावतामयं लोकः परश्चैव क्षमावताम् इह समानमर्हन्ति परत्र च शुभां गतिम् ॥ ४३ ॥ येषां मन्युर्मनुष्याणां क्षमयाऽभिहतः सदा तेषां परतरे लोकास्तस्मात्क्षान्तिः परा मता ॥ १४ ॥ इति गीताः काश्यपेन गाथा नित्यं क्षमावताम् । श्रुत्वा गाथाः क्षमायास्त्वंतुष्य द्रौपदि! मा क्रुधः॥ ४५ ॥ पितामहः शान्तनवः शमं संपूजयिष्यति कृष्णश्च देवकीपुत्रः शमं संपूजयिष्यति आचार्यों विदुरः क्षत्ता शममेव वदिष्यतः कृपश्च संजयश्चैव शममेव वदिष्यतः ॥४७॥ सोमदत्तो युयुत्सुश्च द्रोणपुत्रस्तथैव च पितामहश्च नो व्याप्तः शमं वदति नित्यशः पतैहि राजा नियतं चौद्यमानः शमं प्रति । राज्यं दातेति मे बुद्धिर्न चेल्लोभानशिप्यति ॥४९॥ कालोऽयं दारुणः : प्राप्तो भरतानामभूतये मत्यवादियों का सत्य क्षमा हाहै। क्षमा में ही यज लोक में जाते हैं। इसलिये क्षमा ही सबसे श्रेष्ठ और जाति प्रनिठिन है। द्रोपदी : ब्रान, यज्ञ, पुरुषार्थ है ॥१३॥४५॥ मत्य भार मय तक जिसके आधार पर स्थित हैं हे द्रौपदी ! काश्यप पापिने क्षमाशील पुरषों के लम क्षमा का मुशतमा पुरुष में छोड़ सकता मम्बन्ध में यह पवित्र गाथा रही है। तुमने क्षमा १॥४२॥१२॥ के सम्बन्ध की सब बाने सुन ली: अब को छोड़. शानी पुरुष मदा क्षमा को धारण करते है, इमी पर प्रमन्ना। भीष्म पितामह, श्रीकृष्ण जी द्रोणा- में उन्हें प्रधक मिलमा ! क्षमाशील. पुरषों को चार्य, पिदुर, कृपाचार्य, माय, सोगद, युपुत्सु, मक और पांगर दोनों में महानि प्राप्त होती दागपुत्र अवस्थामा और हमारे विनामह व्यासदेव है। इस रोग में यदुत सम्मान और परलोक में ये मरमा की यही सराहना किया करते है उशम गनि पाते। समारमे जिनका ॥४६॥१०॥ प्रारीगणपदहान हान पा पवित्र यदि पवार ARARI पुरुष राजा नाय को - - । - Pyar"crTITCHINECT - -nirnrn.ttirthrint Post PERBARDPremarrrrrrr अध्याय ३०) महाभारत Smurmusuntanur.musmraniharorarunaamnymnasammmmIIIIIIsmsung MuymAAAAYIMILAININVImminute - निश्चितं मे सदेवैतत्पुरस्तादपि भाविनि सुयोधनो नाऽहतीति क्षमामेवं न विन्दति । अर्हस्तत्राऽहमित्येवं तस्मान्मां विन्दते क्षमा ॥ ५१ ॥ एतदात्मवतां वृत्तमेप धर्मः सनातनः क्षमाचैवाऽऽनृशंस्यं च तत्कर्ताऽस्म्यहमञ्जसा ॥ ५२ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकर्मणि अर्जुनाभिगमनपर्वाण युधिष्ठिरद्रौपदीसंवादे एकोनत्रिशोऽध्याय ॥२९॥ शान्ति की राह पर चला तो वे अवश्य हम रोगों क्योंकि वह उसका पात्र ही नहीं। मैं क्षमा के योग्य को राज्य लौटा सकते हैं; नहीं तो लोभवश होने से हूँ, इसी से क्षमा ने म्वय मेरा आश्रय ग्रहण किया वे निम्सन्देह नष्ट हो जाएँगे। मुझ जान पड़ता है, है । कहने का तात्पर्य यह है कि क्षमा और दया भरतवश के नाश का समय आ गया है । हे महात्माओं का प्रधान चिह और सनातन धर्म है । सुन्दरी ! मुझे पहले से ही यह निश्चय है कि इससे मैं अवश्य ही क्षमा और दया को धारण करूँगा सुयोधन कभी क्षमा को नहीं ग्रहण का सक्ता; ॥५०॥५२॥ वनपर्य का उन्तीमवां अध्याय ममान हुआ ॥ २० ॥ on"""""""""IntermojariousammaNDIDWARRAIMURALEmasUTUS NUMAURereumar ॥ *LUWUWW'ROL "Tuludlucun O'CL'UTU WLL'US'T'larin अथ त्रिंगोऽध्याय ।। ३ ।। द्रौपद्युबाच-नमो धात्रे विधात्रे च यौ मोहं चक्रतुस्तव पितृपैतामहे वृत्त वोढव्ये तेऽन्यथा मतिः कर्मभिश्चिन्तितो लोको गत्यां गत्यां पृथग्विधः । तस्मात्कर्माणि नित्यानिलोभान्मोक्षं यियासति ॥ नेह धर्माऽऽनृशंस्याभ्यां न क्षान्त्या नाऽऽर्जवन च। पुरुषः श्रियमाप्नोति न घृणित्वेन कर्हि चित् ॥ ३ ॥ तीमयां अध्याय ।। ३ ।। अब द्रौपदी ने युधिष्ठिर से कहा-पूर्व पुरुष है। कर्म न करंक केवर दया, धर्म, क्षमा, मरलता परम्परा से चले आ रहे राज्य का पालन करने के और लंकापवाद मे डरने के द्वारा कोई समार में बारे में आपका भ्रम और मोह में डाल्नंगले धाता उन्नति नहीं कर सस्ता । आप मब तरह मुम्ब के और विधाता को प्रणाम है । कर्म के द्वारा, भिन्न- योग्य होकर भी भाइयों के साथ इम दुर्दशा को भिन्न गनियों के अनुमार, जुद-जुदे लोक मिरत पहुंचे हैं, यही इम मर क्थन का प्रमाण । इस कारण कर्म ही नित्य पदार्थ है । लोग रोग वर्षमान या बीते हुए समय में कभी धर्म के केवल रोमवश होकर मोक्ष पाने की इच्छा करते मार्ग से.पग भर भी विचलित नहीं हुए, यहा नक । आप - IRMACIDIOneructrercroreogrigLCITALOuretreenter:
[ वनपर्व १५७० म हा भारत amartDASTimdainindinpurannamratibimuluntarwanambinmunanamrdinn TODJD.77773 AN.197TO..VIIDATOTTATOTT TEMATITIITS'UTOTDTNT Finnitus BulumoureuraaNATImahitanatmalis.ins त्वां चेयसनमभ्यागादिदं भारत ! दुःसहम् । यत्वं नाऽर्हसि नाऽपीमे भ्रातरस्ते महौजसः ॥ ४ ॥ न हि तेऽध्यगमञ्जातु तदानीं नाऽद्य भारत ! । धर्मात्प्रियतरं किंचिदपि चेज्जीवितादिह धर्मार्थमेव ते राज्यं धर्मार्थं जीवितं च ते ब्राह्मणा गुरवश्चैव जानन्त्यपि च देवताः भीमसेनार्जुनौ चेमौ माद्रेयौ च मया सह त्यजेस्त्वमिति मे वुद्धिर्न तु धर्म परित्यजेः ॥ ७ ॥ राजानं धर्मगोतारं धर्मो रक्षति रक्षितः इति मे श्रुतमार्याणां स्वां तु मन्ये न रक्षति ॥ ८ ॥ अनन्या हि नरव्याघ्र ! नित्यदा धर्ममेव ते बुद्धिः सततमन्वेति च्छायेव पुरुषं निजा नाऽवमंस्था हि सदृशान्नाऽवराञ्च्छ्रयसः कुतः । अवाप्य पृथिवीं कृत्स्नां न ते शृङ्गमवर्धत ॥ १० ॥ स्वाहाकारैः स्वधाभिश्च पूजाभिरपि च द्विजान् । देवतानि पितॄश्चैव सततं पार्थ ! सेवसे ब्राह्मणाः सर्वकामस्ते सततं पार्थ ! तर्पिताः । कि ममय-समय पर अपने धर्म का प्राणों मे भी आप सारी पृथ्वी के मालिक होकर भी क्या बरा. बदकर प्यारा समझा है। दवता, ब्राह्मण और गुरुजन. परीके, क्या चंड़ और क्या छोटे, सबका सम्मान मभी जानना है कि आपका राज्य और जीवन धर्म समान रूप में करते हैं। आपने कभी अभिमान या कही निय है। आप, भीममन, अर्जुन, नयुल. अहकार का भाव प्रकट नहीं किया ॥१॥१०॥ आ। महदेव, ममी मुंश महज ही छोड़ वन हैं, आप सदा पूजा आदि के द्वारा दवता, पितर किन्तु धान्याग किमी तरह नहीं का मत । और नायगों की सेवा किया करते हैं। पहले आप मैंने गुना है कि जो गड़ा धर्म की सा करना, अनेक प्रकार की भाग की साममियों के द्वाग उमरी रक्षा धर्म भी करता है किन्तु मैं मनाई प्रामग, मंक्षामिनापी यति और गृहम्धों को सुवर्ण कि भाप नी धर्म ही मान , ५५.तु धम के भाग में पेट भर आधार देने और मैं आपकी भार नहीं करना । पुरधष्ठ : आपसी आशा के अनुसार टमी मेदा किया करती थी। वृदि साया नहमदा पाव चलती है। पाना मुनियों को आश पातुओक यो पाय ! orrenTITUnrey'rrerrrrrrrrrrrrrrrETIREETTE.CI अध्याय ३० ] म हा भारत gardiom.nrnmmmun.nrraimanimuTISTIAnantarALIRAurrount - indianAmmunitatin internamancmunomindaindinhindustantian auntiarAmAvine यतयो मोक्षिणश्चैव गृहस्थाश्चैव भारत! भुञ्जते रुक्मपात्रीभिर्यत्राऽहं परिचारिका आरण्यकेभ्यो लौहानि भोजनानि प्रयच्छसि ॥ १३ ॥ नाऽदेयं ब्राह्मणेभ्यस्ते गृहे किंचन विद्यते यदिदं वैश्वदेवं ते शान्तये क्रियते गृहे तहत्वाऽतिथिभृतेभ्यो राजच्छिष्टेन जीवसि इप्टयः पशुवन्धाश्च काम्यनैमित्तिकाश्च ये वर्तन्ते पाकयज्ञाश्च यज्ञकर्म च नित्यदा अस्मिन्नपि महारण्ये विजने दस्युसेविते ॥ १६ ॥ राष्ट्रादपेत्य वसतो धर्मस्ते नाऽवसीदति अश्वमेधो राजसूयः पुण्डरीकोऽथ गोसवः एतैरपि महायज्ञैरिष्टं ते भूरिदक्षिणेः राजन्परीनया वुद्ध्या विपमेऽश्नपगजये ॥ १८ ॥ राज्यं वसून्यायुधानि भ्रातृन्मां चामि निर्जितः । ऋजोर्मदोर्वदान्यस्य ह्रीमतः सत्यवादिनः ॥ १९ ।। कथमक्षव्यसनजा बुद्धिगपतिता तव अतीव मोहमायाति मनश्च परिभूयते निशाम्य ते दुःम्बमिदाममां चाऽऽपदमीदृशीम् । आदि देते थे। तात्पर्य यह है कि ब्राह्मणों की कोई थोड़ी भी मुम्ती नहीं है । आपने विधिपूर्वक अश्व वस्तु आप न देने योग्य नहीं समझते थे। इस समय मेध, गोमेध, गजमूय, पुण्डरीक आदि बड़ी दक्षिणा- भी आप शान्ति-लाभ तथा अतिथियों और अन्यान्य वाले यज्ञ भी किये हैं; किन्तु जुए की हार प्राणियों को सन्तुष्ट करने के लिये घर में वैश्वदेव- विपर्गत बुद्धि के या होकर आपने राज्य, धन, गन्त्र चलि देकर शिष्टाचार पारन पूर्वक समय बिना रहे आदि के साथ भाइयों को और मुझे भी हार दिया। । याग, पशुबन्धन, काम्य और नैमित्तिक कर्म, हे राजन् ! आपके मरल, कोमल, उदार, लजागील पाक-यन और यन के कमों का निर्वाह आप अच्छी और सत्यवादी होने पर भी न जाने किम कारण तरह कर रहे है। राज्य-भ्रष्ट होकर इस भयानक, जुए के न्यमन मे आपकी बुद्धि विपरीत हो गई । दम्यु-पूर्ण वन में आकर भी आपके धर्म-कमों में आपकेन्दु.म और ऐमी विपति को देखकर में Patharummmmmmmmmmmmmmcaamanantarwiunalitimilchautarai carton...... ॥ २० ॥ है PDATABATMILITATUtureyCELECTREFELEPLALITCO'createrne यनपर्व १५७२ म हा भारत mmmmm.imm.anmmmiadingmahinilafiriinfaninainmilinzaniamlinndilini Mirmir Hymntretin UTTRIPLUIDArmourna murgininetHTTARATimepirarampyrig" - Furti umarmussumadaniCTIVisinnidianRTHDArtstar sawituitmlannitures अत्राऽप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ॥ २१ ॥ ईश्वरस्य वशे लोकास्तिष्ठन्ते नाऽऽत्मनो यथा । धातैव खल्लु भूतानां सुखदुःख प्रियाप्रिये 11 २२ ॥ दधाति सर्वमीशानः पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरन् यथा दारुमयी योषा नरवीर ! समाहिता ।। २३ ॥ ईरयत्यङ्गमङ्गानि तथा गजन्निमाः प्रजाः आकाश इव भूतानि व्याप्य सर्वाणि भारत!। २४ ॥ ईश्वरो विदधातीह कल्याणं यच्च पापकम् शकुनिस्तन्तुवद्धो वा नियतोऽयमनीश्वरः ॥ २५ ॥ ईश्वरस्य वशे तिष्ठेन्नाऽन्येषां नाऽऽत्मनः प्रभुः । मणिः सूत्र इव प्रोतो नस्योत इव गोवृषः ॥ २६ । स्त्रोतसां मध्यमापन्नः कूलाद वृक्ष इव च्युतः धातुरादेशमन्वेति तन्मयो हि तदर्पणः ॥ २७॥ नाऽऽत्माधीनो मनुष्योऽयं कालं भजति कंचन । अज्ञो जन्तुरनीशोऽयमात्मनः सुखदुःखयोः ॥ २८ ॥ ईश्वरप्रेरितो गच्छेत्स्वर्ग नरकमेव च अत्यन्त व्यथित और उदास हो रही हूँ॥११॥२०॥ क्या म्वाधीन और क्या पराधीन सभी, डोरे में बँधे पुराण इतिहासों में लिखा है कि सभी रोग हुए पक्षी की तरह, ईश्वर के वश में है। कोई भी ईश्वर के अधीन है, कोई भी बाधीन नहीं है । अपने या किसी दूसरे के ऊपर प्रभुत्व नहीं कर वह ईश्वर ही सब प्राणियों के मुख दुःख और प्रिय सकता । डोरे में परोई हुई मणियों या रस्सी से अप्रिय का एकमात्र विधाता है। वह जीवों के नंथ हुए बैलों की तरह नियन्त्रित होकर यह संसार पूर्वजन्म के किये कमों के अनुसार मुख दु.म्व आदि चलता है; क्योंकि मय चराचर जगत् तन्मय और का विधान करता है । हे पुरुषश्रेष्ठ ! जैसे कटपुतली- उसी ( ईश्वर ) में अर्पित है । जैमे नदी के किनारे पारा काट की पुनरी बनाकर उसके सर आग पर का वृक्ष, जड़ टूटने पर, दम भर भी वहां नहीं प्रत्यकों की रचना करता है, मे ही विधामा ने ठहर मकता से ही मनुष्य अपने अधीन होकर भी सब प्रजा साल की है । हे भरतश्रेष्ठ : वही घड़ी भर भी नहीं टिक सक्ता । तात्पर्य यह है कि अद्वितीय ईश्वर आकाश रूप में मर प्राणियों की अज्ञानी जीव कभी अपने मुख दुःख नियत नहीं ग्यास का पाप और पुण्य का विधान करता है। पर माना, यह ईश्वर-परित होकर ही स्वर्ग में D'G'UTIL'UN'OU'U'AUCAS'U'STULUID*sile MDCLOU LOTUCun. । MEDI'LLIEL:
अध्याय ३०] म हा भारत १५७३ harrammmiAIIIIImanrammarp (TOMINATraman.amrammamtammnrass । - BimammymTMEDIOmangrammarWHAMDARIDWommumm100mARIUIL यथा वायोस्तृणाग्राणि वशं यान्ति वलीयसः ॥ २९ ॥ धातुरेव वशं यान्ति सर्वभूतानि भारत ! आर्ये कर्मणि युञ्जानः पापे वा पुनरीश्वरः ॥ ३० ॥ व्याप्य भूतानि चरते न चाऽयमिति लक्ष्यते । हेतुमात्रमिदं धातुः शरीरं क्षेत्रसंज्ञितम् येन कारयते कर्म शुभाशुभफलं विभुः पश्य मायाप्रभावोऽयमीश्वरेण यथा कृतः ॥ ३२ ॥ यो हन्ति भूतैर्भूतानि मोहयित्वाऽऽत्ममायया । अन्यथा परिदृष्टानि मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः अन्यथा परिवर्तन्ते वेगा इव नभस्वतः अन्यथैव हि मन्यन्ते पुरुषास्तानि तानि च ॥ ३४ ॥ अन्यथैव प्रभुस्तानि करोति विकरोति च यथा काठेन वा काष्ठमश्मानं चाऽश्मना पुनः ॥ ३५ ॥ अयसा चाऽप्ययश्छिन्द्यान्निर्विचेष्टमचेतनम् एवं स भगवान्देवः स्वयंभूः प्रपितामहः ॥ ३६ ॥ हिनस्ति भूतैर्भूतानि च्छन कृत्वा युधिष्ठिर ! । और नरक में जाता है। भारत ! जैसे तृण आदि वैसे ही वह उनकी दृष्टि में वायुवेग के समान बदल का ऊपरी हिस्सा प्रबल वायु के वश में होता है, जाता है । मनुष्य जिस सम्बन्ध में और तरह की वैसे यह सब जगत् ईश्वर के अधीन है। ईश्वर ही कल्पना करते है, उमे जगदीश्वर और ही रूप सब पुण्यों और पापों का प्रवर्तक होकर मय प्राणियों दे देता है। हे महारान ! जैसे काट से काठ, में व्याप्त है; पर कोई उसे देख नहीं ममता ॥२१॥३०॥ पत्थर से पत्थर और लोहे से लोहा हट और कट विधाता का क्षेत्र-मंजक शरीर इस विश्व-मान्य जाता है, वैसे ही वह विश्वपति अपनी माया के का एकमात्र कारण है । वह उसी के द्वारा जीवों प्रभाव से प्राणियों के द्वारा प्राणियों का नाम करता को शुभ और अशुभ कमों में नियुक्त करता है । है। बालक जमे विलीने लेकर उनमे खेलते हैं, देखिए, ईश्वर न कैमा अपूर्व माया का प्रभाव मिरजा चमे ही भगवान स्वयम् अपनी इच्छा के अनुसार है । वह अपनी माया में मोहित करके प्राणियों के मंयोग और वियोग क्गत हुए. प्राणियों के द्वारा द्वाग प्राणियों का नाश करता है । तत्वदर्गी मुनि- क्रीड़ा करते है । हे गजन् : विधाना प्राणियों मे पिना- गण उसे अभी और तरह का देखते हैं, और फिर मानामा सा व्यवहार नहीं करता। वह मानों औरों maramananmmmmrapinmuTHAmartariniwarananmmmmmunmummamta - - matalaune Immm... Mirror:
- QULLUTIOTTIGO UTADTUCI'Wirt19 1"'L'L'L'L'LCL)! महा मारत [ वनपर्व ran awayamvmammu.samniwimumURamarommummmmmmmATRIVILama संप्रयोज्य वियोज्याऽयं कामकारकरः प्रभुः ।। ३७ ॥ क्रीडते भगवान्भूतैर्वालः क्रीडनकैरिव न मातृपितृवद्राजन् ! धाता भूतेषु वर्तते ॥ ३८ ॥ रोपादिव प्रवृत्तोऽयं यथाऽयमितरो जनः आर्याच्छीलवतो दृष्ट्वा होमतो वृत्तिकर्शितान् ॥ ३९ ॥ अनार्यान्सुखिनश्चैव विह्वलानिव चिन्तया तवेमामापदं दृष्ट्वा समृद्धिं च सुयोधने धातारं गहर्ये पार्थ ! विपमं योऽनुपश्यति आर्यशास्त्रातिगे क्रूर लुब्धे धर्मापचायिनि ॥ ११ ॥ धार्तराष्ट्र श्रियं दत्त्वा धाता किं फलमश्नुते । कर्म चेत्कृतमन्नति कर्तारं नाऽन्यमृच्छति कर्मणा तेन पापेन लिप्यते नूनमीश्वरः अथ कर्मकृतं पापं न चेत्कारमृच्छति कारणं बलमेवेह जनाञ्च्छोचामि दुर्बलान् ॥ ४३ ॥ इति श्रीम.महाभारत आरण्यकपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि युधिष्ठिरद्रौपदीसंवादे विंशोऽध्याय, ॥ ३० ॥ की तरह मोधित होकर ही काम किया करता है। अधर्मी दुर्योधन की सम्पत्ति का अधिकारी बनाकर सचरित्र, भीलवान् , लजागील आर्यगण कितने कष्ट विधाता क्या फल पाता है। यदि कर्मकता के सिवाय में अपना जीवन बिता रहे हैं। और, उधर निपट और किमी को किये हुए कर्म का फल भोगना नीच अनार्य रोग विषय भोग में आसक्त होकर नहीं पड़ता तो सर्वनियन्ता ईश्वर को भी, पाप कर्म परम मुग में रहते हैं। पार्थ ! आपकी एमी कराने के कारण, पाप में रित होना चाहिये अथवा पिति और दुर्योधन की विशाल मम्पत्ति तथा यदि किया हुआ पाप-धर्म ईश्वर को नहीं स्पर्श कर अभ्युदय देखकर ही मैं ममान व्यवहार न करनेवाल मना तो उसका कारण बल ही है तो फिर दुल विधातार दोषों का वर्णन वाहा ॥३१॥४०॥ व्यक्ति ही मय तम्ह शोचनीय है ॥४१॥४३॥ भागानों पचा न माननेवाले, सभी बनपा सीमया अध्याय गमान दुखा ॥ ३० ॥ rerTrmirm rmer unarepreneurs attityariTRIAPOSTATOPULDyammarATTOLEMATTOOTCOICALS RATHER.COTI अथ पत्रिमोभ्याय ॥३॥ अधिष्टिर वाप-बल्गु चित्रपदं नाणं याज्ञसनि ! त्वया वचः । उन नम्नमम्माभिर्नास्तिक्यं तु प्रभापस FREE TRUITERTMDIrrrrrrrrrrrrrrrrerERTerr अध्याय ३१] म हा मारत १५७५ sanimasumorouTIME TAITRINAMAIRIRAMANIA Nammar - WiMITADIUnterestment puruwaumauvMUMunam .. नाऽहं कर्मफलान्वेषी राजपुत्रि ! चराम्युत ददामि देयमित्येव यजे यष्टव्यमित्युत अस्तु बाऽत्र फलं मा वा कर्तव्यं पुरुषेण यत् । गृहे वा वसता कृपणे! यथाशक्ति करोमि तत् ॥ ३ ॥ धर्म चरामि सुश्रोणि ! न धर्मफलकारणात् । आगमाननतिक्रम्य सतां वृत्तमवेक्ष्य च धर्म एव मनः कृपणे ! स्वभावाञ्चैव मे धृतम् । धर्मवाणिज्यको हीनो जघन्यो धर्मवादिनाम् ॥ ५ ॥ न धर्मफलमानोति यो धर्म दोग्धुमिच्छति । यश्चैनं शङ्कते कृत्वा नास्तिक्यात्पापचेतनः ॥ ६ ॥ अतिवादाद्वदाम्येप मा धर्ममभिशङ्किथाः धर्माभिशङ्की पुरुपस्तिर्यग्गनिपरायणः ॥ ७ ॥ धर्मो यस्याऽभिशक्यः स्यादार्पवा दुर्बलात्मनः। वेदाच्छुद्र इवाऽपेयात्स लोकादजरामरात वेदाध्यायी धर्मपरः कुले जातो मनस्त्रिनि इकतीसवां अध्याय ।। ३ ।। द्रौपदी की उक्त बातों को सुनकर युधिष्ठिर ने हैं। फल की इच्छा करके धर्म का आचरण करना कहा-हे द्रौपदी ! तुम्हारा यह सुनने में मनोहर धर्म वणिक् का काम है । एमे रोगों को धर्मवादी और विचित्र पटों से युक्त कथन नानिक्मत का लोग निपट निन्दित समझते हैं। जो कोई धर्म को पूरा पूरा पक्षपाती है । मैं कर्म फल पाने की इच्छा दुहने की इच्छा करता है और नानिकता के कारण मे कम नहीं करना । देना चाहिये, यह समझकर धर्म पर मन्देह करता है, वह कभी यथार्थ धर्म फल दान देता हूँ। यज्ञ करना चाहिये, यह ममझकर नहीं पा मकना । मैं वेदोक्त प्रमाण के अनुमार यन आदि करता हूँ। फल हो या न हो, घर में कहता हूँ कि धर्म पर भी अविधाम मत करना; रहकर पुरुष का जो कर्त्तव्य है वही में यथाशक्ति क्योंकि धर्म के मम्बन्ध में नहा करनेवाले मनुष्य करता रहता है । हे मुन्दर्ग में कर्म का फल धर्म पशु-पक्षी आदि योनि में जन्म देते है। जो कोई समझकर शास्त्र के बताये और माधुजन के दिसाये अधिवेक कारण धर्म पर मन्दह करता है और व्यवहार के अनुमार धर्म-कर्म करता हूँ। हे द्रोपदी! ऋपियों के वाक्यों पा अदा दिन्याना है वइ, मेरे मन का झुकाव बभाव में ही धर्ममार्ग की ओर । वेद-वहिकृत शूद की तरह, बुहारे और मरण में rammarTanmarnamalainsmilitaarmalammamataGramin GM.nralianimmhillirill PCITIATIHATTrayeruCTITICTIVITCareCICECTerrTIrrcrert.
वनपर्व १५७६ म हा भारत GrarITarururiandimraimauniliuna TamamIIIImmanmamamal FUUNDImmanduorum.mmarnamalin IRSAnimumITMENTuuta nirmanaimmumCRITI स्थविरेपु स योक्तव्यो राजभिर्धर्मचारिभिः पापीयान्स हि शूद्रेभ्यस्तस्करेभ्यो विशिप्यते । शास्त्रातिगो मन्दबुद्धिर्यो धर्ममभिशङ्कते ॥ १० ॥ प्रत्यक्षं हि त्वया दृष्ट ऋपिर्गच्छन्महातपाः । मार्कण्डेयोऽप्रमेयात्मा धर्मेण चिरजीवितः व्यासो वसिष्टो मैत्रेयो नारदो लोमश शुकः । अन्ये च ऋषयः सर्वे धर्मेणैव सुचेतसः ॥ १२ ॥ प्रत्यक्षं पश्यसि ह्येतान्दिव्ययोगसमन्वितान् । शापानुग्रहणे शक्तान्देवेभ्योऽपि गरीयसः एते हि धर्ममेवाऽऽदौ वर्णयन्ति सदाऽनघे ! । कर्तव्यममरप्रग्याः प्रत्यक्षागमबुद्धयः ॥ १४ ॥ अतो नाऽहसि कल्याणि ! धातार धर्ममेव च । राज्ञि! मृढेन मनसा क्षेप्तु शङ्कितुमेव च ॥ १५ ॥ उन्मत्तान्मन्यते चालः सर्वानागतनिश्चयान् धर्माभिशी नाऽन्यस्मात्प्रमाणमधिगच्छति । आत्मप्रमाण उन्नद्धः श्रेयसो यवमन्यक हीन रोक मे दूर कर दिया जाता है। धर्म का आच में इनका देवताओं का सा गौरव है । यह सब वेद- रण करने वाले रोग उच्च युल में वंदपाठी, वेदान के ज्ञाता मपि देवताओं में प्रसिद्ध हैं। धर्मात्मा व्यक्ति को पृद्ध और माननीय समझने हैं। इन्होंने धर्म की ही मुख्य कर्तव्य माना है । इस- जो कोई अपनी चुरी बुद्धि वश होकर शास्त्रमन नियेई कस्याणी धोम्ब में पड़कर धर्म और विधाता क विद आनग्ण धर्म में गा काना यह को युगमा दाना या उनपर अश्रद्धा प्रकट करना पद और गोर आदिम भी बदकर पारी ॥१॥१०॥ तुम्हारे योग्य काम नहीं है । पालक तत्व द्रौपटी' तुमने प्रयक्ष दम्बा है कि मामा शानियों को पागर ममझने द, धर्म में मारे में मारण्य धर्म भाव मेचिनारी हो गया है। मन्दद करने है, किन्तु अन्य किमी आगे उस मुमने यह भी दम्या ियाम, वशिष्ठ, मंत्रय, विषय प्रमाण का पता नही सन, क्योंकि मादमा अस्व और अन्याय विशुद्ध हत्य वघर जानी र ग्गिन प्रमाणपद्धनि भरोमे मपिया नेपाल प्रभाव म दिय योगवर और कर धर्म का अपमान कान है। ये इन्द्रिय- Pार नाना पावरन ही निगममार गुम्ब में माया सनवार समारक व्यवहांगी AuranaamaamreamLSDINormathahamundahaisa उत्पन्न, ..1:TIMI untuirtel.tute Horrer - - TURISTIAAINAUTANIYATRIPURAUTUnpurTTAyurumsuTEMPETITEDuramare अध्याय ३१] म हा मारत १५७७ SammmmmmmamrrOTTOMurarumassromRTISTERIOMummanmmmmumarAmarana इन्द्रियप्रीतिसंवद्धं यदिदं लोकसाक्षिकम् एतावन्मन्यते वालो मोहमन्यत्र गच्छति प्रायश्चित्तं न तस्याऽस्ति यो धर्ममभिशङ्कते ध्यायन्स कृपणः पापो न लोकान्प्रतिपद्यते ॥ १८ ॥ प्रमाणाद्धि निवृत्तो हि वेदशास्त्रार्थनिन्दकः । कामलोभातिगो मूढो नरकं प्रतिपद्यते यस्तु नित्यं कृतमतिर्धर्ममेवाऽभिपद्यते अशङ्कमानः कल्याणि! सोऽमुत्राऽऽनन्त्यमश्नुते॥ २० ॥ आप प्रमाणमुत्क्रम्य धर्म न प्रतिपालयन् सर्वशास्त्रातिगो मृढः शं न जन्मसु विन्दति ॥ २१ ॥ यस्य नाऽऽर्प प्रमाणं स्याच्छिष्टाचारश्च भाविनि!। नैव तस्य परो लोको नाऽयमस्तीति निश्चयः ॥ २२ ॥ शिष्टैराचरितं धर्म कृष्णे! मा स्माऽभिशशिन्थाः । पुराणमृपिभिः प्रोक्तं सर्वज्ञैः सर्वदर्शिभिः धर्म एव प्लवो नाऽन्यः स्वर्ग द्रौपदि ! गच्छताम् । सैव नौः सागरस्येव वणिजः पारमिच्छतः ॥ २४ ॥ ही ठीक समझते हैं और इसी कारण इन्द्रियों से मिलता है ॥११॥२०॥ परे जो विषय है उसके ज्ञान का लेश भी उनमें और जो कोई ऋषिवाक्यों का अनादर और धर्म नहीं होता । जो पापी धर्म पर सन्देह करता है, का त्याग करके शास्त्रमत का उल्लङ्घन करता है उसके पाप का कोई प्रायश्चित ही नहीं है । वह वह कई जन्मों तक अनेक प्रकार के कैश भोगता संसार में रहकर धन की चिन्ता में ही डूबा रहता रहता है । हे द्रौपदी ! जो काई ऋषियों के प्रमाण है, कभी पुण्यलोकों को प्राप्त नहीं कर सकता । या शिष्टाचार के अधीन नहीं होता उसके दोनों जो मूर्ख, प्रमाण आदि की अपेक्षा न करके, वंद- लोक बिगड़ जाते हैं। इसलिये हे सुन्दरी ! शान्त- शास्त्र की निन्दा करता है उसे काम और लोभ के शील, सर्वज्ञ, सर्वदर्गी ऋषियों के चलाये हुए मत्यधर्म यशवर्ची होकर नरक गति में जाना पड़ता है। किन्तु पर भूलकर भी अविश्वास मत करना । देखो. समुद्र हे कल्याणी ! जो कोई स्थिर और मन्दहरहित चित्त के पार जाने की इच्छा रखनेवाले व्यापारी के लिये से केवल धर्म-कर्म करता रहता है उसे इस लोक , जहान ही जमे एकमात्र उपाय है, वैसे ही म्वर्गलोक में सम्पूर्ण सुख मिलते और परलोक में ब्रह्मभाव । जाने की इच्छा रसनेवालों के लिये धर्म ही एकमात्र SATARATranspamananenmitruuniawararunmiar annel TriTERIAGEislutatinancinamaditiminatings .. SAMRATIOTIramma.com "TreTecnoCQCMCUTUSTUTAIUT IT'Corriere MPEITOTITCOITOTT".**r?
१५७८ म हा भारत वनपर्व VIRREETINATutomatomismamteamIRED - OIDALITTINDISONamastiatimminarunnilindanimilaithiti ammarmarTHAPAN अफलो यदि धर्मः स्याच्चरितो धर्मचारिभिः । अप्रतिष्ठे तमस्येतजगन्मज्जेदनिन्दिते ! ॥ २५॥ निर्वाणं नाऽधिगच्छेयु वेयुः पशुजीविकाम् । विद्यां ते नैव युज्येयुर्न चाऽथ केचिदाप्नुयुः ॥ २६ ॥ तपश्च ब्रह्मचर्यं च यज्ञः स्वाध्याय एव च दानमार्जवमेतानि यदि स्युरफलानि वै ॥ २७॥ नाऽऽचरिष्यन्परे धर्म परे परतरे च ये विप्रलम्भोऽयमत्यन्तं यदि स्युरफलाः क्रियाः ॥ २८ ॥ ऋषयश्चैव देवाश्च गन्धर्वासुरराक्षसाः ईश्वराः कस्य हेतोस्ते चरेयुर्धर्ममाहनाः फलदं विह विज्ञाय धातारं श्रेयसि ध्रुवम् धर्म ते व्यचरन्कृष्णे ! तन्द्रि शर्म सनातनम् ॥ ३० ॥ स नाऽयमफलो धर्मो नाऽधर्मोऽफलवानपि । दृश्यन्तेऽपि हि विद्यानां फलानि तपसां तथा ॥ ३१ ।। त्वमात्मनो विजानीहि जन्म कृष्णे! यथा श्रुतम्। वेत्थ चापि यथा जातो धृष्टद्युम्नः प्रतापवान् ॥ ३२ ॥ एतावदेव पर्याप्तमुपमानं शुचिस्मिते ! उपाय है । हे मुन्दरी ! धर्मात्माओं का धर्म-पालन सा विश्वास होने के कारण ही सब लोग भलाई यदि निष्फल होता तो यह विश्व एकदम अन्धकार. के लिये धर्म का आचरण करते है । तात्पर्य यह है समुद्र में ड्य जाता। कोई भी मुक्ति न पा सकता। कि धर्म ही सनातन सुम्प है ॥२१॥३०॥ सब लोग विद्या और मम्पनि से शल्य होकर पशुओं ससा में कभी धर्म निष्फल और अधर्म सफल की ना६ जीवित रहते। उमी तरह यदि २१, ब्रह्म नहीं होता । सब विज्ञ पुरुष तपस्या को भी इसी चर्य, यज, ग्वाध्याय, दान, मालना आदि धर्म-कर्म तरह मफल मानत है । हे पाचाली ! तुम अपने निष्फल होते और फलदायक कर्म मब केवर ठग और प्रतापी धृष्टद्युम्न के जन्म-वृत्तान्त को म्मरण विवाहान ना कोई भी धर्म-कर्म न करना । तो करके देखो, धर्म-धर्म के अनुष्ठान का विशेष रूप फि. मुनि, प्रापि, देव, दानव, गन्धर्व आदि महा म फल मिलता है या नहीं। तुम दोनों ही इस विषय परामा रोग किमनिय धर्म-कर्म कान काम के उत्तम दृष्टान्न हो । धीर प्रकृति के लोग धर्माचरण सहने । धर्म करने में विधाता उसका फल देता है, का थोड़ा सा फल पाकर भी सन्तुष्ट हो जातपितु EMAILETEETTITLEDITORE CHANNErtureneurrent CERTY TICARMA, MAudinmantitininetmarathimitramanianR-SAMANDIRasividiimc. - - , , अध्याय ३१ पहा भारत १५७. DIGWATIONALAIMIMITATION Annnn nanemam । Grr CITOL'UNIGI.LTURORUL" TI.LL'UTILISATIEAUTOMHUR'Ure" per l'EPIFCOULETALURI कर्मणां फलमाप्नोति धीरोऽल्पनापि तुष्यति ॥ ३३ ॥ बहुनाऽपि ह्यविद्वांसो नैव तुष्यन्त्यबुद्धयः तेषां न धर्मजं किंचित्प्रेत्य शर्माऽस्ति वा पुनः ॥ ३४ ॥ कर्मणां श्रुतपुण्यानां पापानां च फलोदयः प्रभवश्चाऽऽत्ययश्चैव देवगुह्यानि भाविनि ! एतानि वेद यः कश्चिन्मानवः शुभदर्शने ! । अपि कल्पसहत्रेण नरः श्रेयोऽधिगच्छति रक्ष्याण्येतानि देवानां गूढमाया हि देवताः कृनाशाश्च बनाशाश्च तपसा दग्धकिल्वियाः ॥ ३७॥ प्रसादैर्मानर्सयुक्ताः पश्यन्त्येतानि वै द्विजाः । न फलादर्शनाद्धर्मः शङ्कितव्यो न देवताः ॥३८॥ यष्टव्यं च प्रयत्नेन दातव्यं चाऽनसूयता कर्मणां फलमस्तीह तथेतद्धर्मशाश्वतम् ब्रह्मा प्रोवाच पुत्राणां यद्दपिर्वेद कश्यपः तस्मात्ते संशयः कृष्ण ! नीहार इव नश्यतु ॥१०॥ व्यवस्य सर्वमस्तीति नास्तिक्यं भावमुत्सृज ईश्वरं चापि भूतानां धातारं मा च वे क्षिप विद्याहीन अन्मबुद्धि के रोग बहुत मा फल पार भी कहने का प्रयोजन यह है कि फल न देख पाकर भी सन्तुष्ट नहीं होते। वे पारोक में भी धर्म के मुख का देवता और धर्म के प्रति अश्रद्धा प्रकट करना तिमी कुछ भी भोग नहीं कर मक्ते। हे भामिनी : देवना नम्ह ठीक नहीं । द्वेष और हिमाप्रवृत्ति को छोड़कर मे उपजे कमों की उत्पत्ति, नाम यन माथ यागयन का अनुष्ठान और दान करना और फरसम्भावना को अच्छी तरह नहीं जानत । चाहिये। कर्म का फल अवश्य है। यह धर्म नमाने जो कोई इन बातों का पिगेप का मे जानकर भी अपने पुत्रों में कहा है । इमे क्या कपि जानने मर्वमाधारण प्रजा को मोद में टालता है वह महय. है । इसमे हे द्रौपदी ! तुदागमगाय कुहरे की नाह कप में भी कल्याण प्राप्त नहीं कर सकता। गूद मिट जाय, धर्म फट रत्यादि सब कुछ है, पमा विनार मायावानं देवता इन मब धर्म-मों की रक्षा करने । करके नाम्निानाभाव छोड़ दी। नगर जगन के गान्त प्रकृतिका बामग, नप के प्रभाव में निप्पार प्रमुविधाता ईश्वर को युग-भगमन कह।।३१॥४०॥ और ध्यान फल-युक्त होकर, उम बान को देखना है। दमे यथार्थ का में जानने का पर गे और "*****PriceLILOLTU'VOIELCLLOY'ULD'l'Ulf LTM12'I'UCCCLCLLCLTD] - भी पाप-पुण्य । rrrrrrrrrrrveyorrrrrrrrrrTTETTIMITATEPSITTITrrrrrrrrrrrrrrr.nl [ वनपर्व १५८० म हा भारत ImmmmmsamawimanmummusmumesanimalurnmomumAJuwanmmmmmmmmmnavmstu ॥ ११ ॥ muinti..... शिक्षस्वैनं नमस्खैनं मा ते भूवुद्धिरीदृशी यस्य प्रसादात्तद्भक्तो मत्यों गच्छत्यमर्त्यताम् । उत्तमां देवतां कृष्णे ! माऽवमंस्थाः कथंचन ॥ ४२ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि युधिष्ठिरद्रौपदीयादे एकत्रिंशोऽध्यायः ॥३।। बारम्बार प्रणाम करो। तुम्हारी बुद्धि फिर कभी ऐसी होकर भी, जिसके प्रसाद से अमर हो जाते हैं उस न हो। हे द्रौपदी ! भक्त पुरुष, मरणशील मनुष्य अमर देवता का कभी अपमान मत करो॥४१॥४२॥ घनपर्व का इकतीसवां अध्याय समाप्त हुआ ।। ३१ ।। AAVAITADIURATURANTILILAImupnuummonerawuurer. अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२॥ द्रौपद्युबाच-नाऽवमन्ये न गर्दै च धर्म पार्थ ! कथंचन ईश्वरं कुत एवाऽहमवमस्ये प्रजापतिम् आर्ताऽहं प्रलपामीदमिति मां विद्धि भारत! । भूयश्च विलपिष्यामि सुमनास्त्वं निवोध मे कर्म खल्विह कर्तव्यं जानताऽमित्रकर्शन ! अकर्माणो हि जीवन्ति स्थावरा नेतरे जनाः यावद्दोस्तनपानाच्च यावच्छायोपसेवनात् जन्तवः कर्मणा वृत्तिमाप्नुवन्ति युधिष्ठिर ! जङ्गमेपु विशेषेण मनुप्या भरतर्षभ ! इच्छन्ति कर्मणा वृत्तिमवाप्तुं प्रेत्य चह च यत्तीमयां अध्याय ।। ३२।। युधिष्ठिर के उक्त उपदेश को सुनकर द्रौपदी ने हैं । पशुओं को देखिए, वे माता का दूध पीते हैं, कहा-हे महाराज ! में न तो धर्म की निन्दा या छाया में जाकर बैठते है। इस प्रकार वे भी काम तिरस्कार करती हूँ और न प्रजापति ईश्वर का अपमान करके ही अपनी आयु विताते हैं। चलने फिरनेवाले ही कर मरनी है । क्लेश और दुम्व मे बहुत जीवों में एक मनुष्य ही ऐसे हैं कि ये इस लोक विदल दोकर दी में इस तरह विलाप कर रही है। और परलोक में कर्म के द्वारा पृत्ति प्राप्त करना चाहते हे राजन् ! आप एकचित होकर मुनिए; मैं और हैं। भारत ! माणिमान अपन पूर्व जन्म के किये भी मिलाप करती है। हे शत्रुनागन ! मंमार में कर्म कमाँ से प्राप्त संस्कार के बल से कर्म करके प्रत्यक्ष करना ही ज्ञानी पुरुष का कर्तव्य है। क्योंकि स्थायर जिस सब लोग देखन , पाते हैं। क्या धाता पदार्थ ही यल निषमा रहकर अपनी आयु विनात और क्या विधाता, सभी जल में स्थित घगले की RPRETEDRDCUTEJnapUTILIRECraWHITECTREALITYALAYEDIrrrr:- HomATI OPARTOn5159rLMSAATO INRomansar - अध्याय ३२] म हा भारत Tarun TuanTIAN AIRTUETDWTHATTUNNITINDINIT, । VITUITI'am OTD (LTLULUWDD'11"COTLL'ULTWUD'IUTI'LL - उत्थानमभिजानन्ति सर्वभूतानि भारत ! प्रत्यक्षं फलमश्नन्ति कर्मणां लोकसाक्षिकम् ॥ ६ ॥ सर्वे हि स्वं समुत्थानमुपजीवन्ति जन्तवः अपि धाता विधाता च यथाऽयमुदके वकः अकर्मणां वै भूतानां वृत्तिः स्यान्न हि काचन । तदेवाऽभिप्रपद्येत न विहन्यात्कदाचन स कर्म कुरु मा ग्लासीः कर्मणा भव दंशितः । कृतं हि योऽभिजानाति सहस्त्रे सोऽस्ति नाऽस्ति च ॥ ९ ॥ तस्य चापि भवेत्कार्य विवृद्धौ रक्षणे तथा भक्ष्यमाणो ह्यनादानात्मीयत हिमवानपि उत्सीदेरन्प्रजाः सर्वा न कुर्युः कर्म चेदभुवि । तथा ह्येता न वर्धेग्न्कर्म चेदफलं भवेत अपि चाऽप्यफलं कर्म पश्यामः कुर्वतो जनान् । नाऽन्यथा ह्यपि गच्छन्ति वृत्तिं लोकाः कथंचन ॥ १२ ॥ यश्च दिष्टपरो लोके यश्चाऽपि हठवादिकः उभावपि शठावेता कर्मबुद्धिः प्रशस्यने तरह पूर्व-संकल्प के वश होकर कर्म करते हैं। भी समाप्त हो जायगा ॥१॥१०॥ इसी प्रकार अन्यान्य प्राणी भी अपने-अपने पूर्वसम्कार प्रजागण जगत् में जन्म ले-लेकर यदि कर्म न के बल से जीवन बिताते हैं । वे यदि कर्म न करते होते करत तो उन मयका नाग हो जाना । तासर्य यह तो उनकी जीविका कभी न चलनी । उम जीविका के है कि यदि कर्म निष्फल होता तो मनुष्य की श्रीवृद्धि लिये कर्म करना मयका कर्तव्य है । इमलिये आप होना बिलकुल ही असम्भव होना । जगत में ऐसे ग्लानि छोड़कर कर्म कीजिए और लगातार म अनेक लोग है जो बिलकुल अनावश्यक काम में करते रहकर कृतकार्य हूजिए। हम संमार में महलों भी लगे रहकर ममय विनाने हैं। दमका कारण यही में शायद एक मनुष्य भी कर्म के रहस्य को जानने- है कि कर्म के बिना लोगों को आयु मारू हो जाती वाला न मिरगा । सम्पत्ति की रक्षा और दम्बाम्ब है। मंमार में भाग्यशादी और चार्वाक-मन के मानने- में तथा उमे बढ़ाने में भी कर्म की आवश्यकता है। वाटे, दोनों ही गट हैं। कर्मपगया लोग ही वास्तव क्योंकि रक्षा या बढ़ाने की चेष्टा न करके केवल में प्रगसनीय है । जो कोई न नी परिश्रम करना चाटते रहने से हिमाचल के यरायर धन का देर भौर न.चष्टा करना है, केवल माग्य के भगम बेटा FonammaNATIHainamaininthiaTaitimrainshanaGalaminentatictimslim.co.in.hi । TOTrmernrTTERTCHIT HTorrectrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrr:
१५८२ म हा मा रत [ वनपर्व FamimmomorniOMTRainmTummmmmmmmmmmmmmmunisianraimaa raramainaramMRAGTAMImanoranami.arcinilamanumantmathurmunary यो हि दिष्टमुपासीनो निर्विचेष्टः सुखं शयेत् । अवसीदेत्स दुर्बुद्धिरामो घट इवोदके तथैव हठदुर्बुद्धिः : शक्तः कर्मण्यकर्मकृत् आसीत न चिरं जीवेदनाथ इव दुर्बलः अकस्मादिह यः कश्चिदर्थं प्राप्नोति पूरुपः तं हठेनेति मन्यन्ते स हि यत्नो न कस्यचित् ॥ १६ ॥ यच्चापि किंचित्पुरुषो दिष्टं नाम भजत्युत देवेन विधिना पार्थ ! तदेवमिति निश्चितम् ॥ १७ ॥ यत्स्वयं कर्मणा किंचित्फलमाप्नोति पूरुषः प्रत्यक्षमेतल्लोकेषु तत्पौरुपमिति श्रुतम् स्वभावतः प्रवृत्तो यः प्रामोत्यर्थं न कारणात् तत्स्वभावात्मकं विन्दि फलं पुरुषसत्तम ! एवं हटाच्च देवाच्च स्वभावात्कर्मणस्तथा यानि प्राप्नोति पुरुपस्तत्फलं पूर्वकर्मणाम् धाताऽपि हि स्वकर्मव तैस्तैहेतुभिरीश्वरः विदधाति विभाज्येह फलं पूर्वकृतं नृणाम् रहना है, यह बिलकुल ही बुद्धि से रहित है, पानी कहलाना है । हे पुरुषोत्तम ! इसी प्रकार हठ से, देव में पड़े हुए थे पड़े की तरह वह मकट में पड़ता म, म्यभाव में और कर्म में जो कुछ फल मिलता है। वस ही जो कोई हट-बाद में पढ़कर, कार्य करने है मो वह सब पूर्वजन्म के क्येि कम का फल है में गार्थ होकर भी, आलम्य के मारे कार्य नहीं ॥११॥२०॥ करना नो यह अनाथ दुर्वल की नाह काल के मुंह विधाता भी अपने कर्म के प्रभाव से, पूर्वोत पर जाना है। मनुष्य मंमार में अम्मात् जो कुछ अनिवनीय कारणों के द्वारा सबका अधीश्वर होकर, पा जाना र म हर माम बहने है, पयोंकि यह मनुष्यों के पूर्वहन यमों के विभाग के अनुमार फल किमी कम में प्रत नहीं है । देव या जो कुछ देता है । मनुष्य शुभ और अशुभ, जो कुछ कर्म भाग्य ममाप्त ६ । म्ययं साना दमो सय ता के द्वारा विदित पूर्वकृत वर्म दान में जो कुरा मिरना है या पारप में मान ' को पाग वा रदय माना गया है। दहधारियों कामना म प्रन हार किमी अनि । बी दह पं.पर विधाता के कामों के मापन का 4 काम 41 पान ६ पदमभावज फट । पारण म्यपद। शरीर म्ययं दिया समिधाना EROTONIA 10 TATUD TN ... EJTTJ JD.ro, fir. Flest..wan . - मातानाद विभाव - ArpretirmirrrrrrrrLUTIPTIRITTEEpmittorrPRITERTPHOITINGreer अध्याय ३२] म हा मारत LIRAMAmanTrimmiISTRUITRATIMATAMITIWAururammarmuTOITI .. PUIRITUATEIRITUTOROPAKRAPTIrelammmmmmmmmummycetrent Amerceurums यत्ययं पुरुषः किंचित्कुरुते वे शुभाशुभम् । तद्धातुविहितं विद्धि पूर्वकर्मफलोदयम् कारणं तस्य देहोऽयं धातुः कर्मणि वर्तते । स यथा प्रेरयत्येनं तथाऽयं कुरुतेऽवशः ॥ २३ ॥ तेषु तेषु हि कृत्येषु विनियोक्ता महेश्वरः सर्वभूतानि कौन्तेय ! कारयत्यवशान्यपि ॥ २१ ॥ मनसाऽर्थान्विनिश्चित्य पश्चात्प्राप्नोति कर्मणा । बुद्धिपूर्व स्वयं वीर ! पुरुषस्तत्र कारणम् ॥ २५ ॥ संख्यातुं नेव शक्यानि कर्माणि पुरुपर्पभ ! अगारनगराणां हि सिद्धिः पुरुपहेतुकी ॥ २६ ॥ तिले तलं गवि क्षीरं काटे पावकमन्ततः धिया धीरो विजानीयादुपायं चाऽस्य सिद्धये ॥ २७ ।। नतः प्रवर्तते पश्चात्कारणस्तस्य सिद्धये तां सिदिमुपजीवन्ति कर्मजामिह जन्नवः ॥ २८॥ कुशलेन कृतं कर्म कर्त्ता साधु स्वनुष्टितम् इदं त्वकुशलेनेनि विशेषादुपलभ्यते इप्टापूर्तफलं न स्यान्न शिप्यो न गुरुर्भवत पुरुपः कर्मसाध्येषु स्याञ्चदयमकारणम् ॥ ३०॥ टमे जिम काम के लिये प्रेरित करता है टमी को बात को अपनी बुद्धि में जानकर घीर रोग उक्त वह क्यिा करता है। है बुन्नीपुत्र ! मव प्राणी वस्तुओं को निकालने या तैयार करने के उपाय विवश हैं। विधाता उन मयको विशिष्ट काम-काज मोज निकालने है । पश्चात निश्चित उपाय में कार्य में नियुक्त करता है। कनों का कारण स्वरूप पुरुष करके अपने अभिप्राय को मिद्ध करने हैं । सब मन ही मन फल टीक करके माता हे और उम जीव इसी प्रकार कर्म-मिद्धि के महोर जीवित रहने फन को पाता है। कर्म असम्य हैं और अनेक है। ग्नेवाग यदि कार्यकुशल हो तो मभी काम प्रकार के हैं। बड़े-बड़े नगर और मकान जो अन्छी तरह पूरे होने हैं और उनका फल शुम तैयार होने हैं उमस का ही है। निगे में होना है । जो टममें अन्तर पड़ जाता है तो मन में तेल, गाय में और कड़ी में अमि है, भी अनर पड जाता है । जी महारा साध्य ETumhandrammlilandslimmunm.hindastisatnamahitilitil naddititahatnatnashintamanthan । NTT TrmTTT COTTONTITEC TCRITTITTESTTrrrrrroni'OLOTLAT वनपर्व १५८४ म हा भारत mumthimmmamataTamiliaominduinmSTUTUnfirmuniRImamLLE mmravatituntyranAMINADUIYALUAnytunuTIONSORINE. कर्तृत्वादेव पुरुषः कर्मसिन्दौ प्रशस्यते असिद्धौ निन्द्यते चापि कर्मनाशात्कथं विह ॥३१॥ सर्वमेव हठेनैके दैवेनैके बदन्त्युत पुंसः प्रयत्न केचित्त्रैधमेतन्निरुच्यते ॥ ३२ ॥ न चैवैतावता कार्यं मन्यन्त इति चाऽपरे अस्ति सर्वमदृश्यं तु दिष्टं चैव तथा हठः दृश्यते हि हठाञ्चव दिष्टाच्चाऽर्थस्य संततिः । किंचिदेवाद्धठात्किचिम्किचिदेव स्वभावतः ॥ ३४ ॥ पुरुपः फलमाप्नोति चतुर्थं नाऽत्र कारणम् कुशलाः प्रतिजानन्ति ये वै तत्त्वविदो जनाः ॥ ३५॥ तथैव धाता भूतानामिष्टानिष्टफलप्रदः यदि न स्यान्न भूतानां कृपणो नाम कश्चन यं यमर्थमभिप्रेप्सुः कुरुते कर्म पूरुषः तत्तत्सफलमेव स्याद्यदि न स्यात्पुरा कृतम् त्रिद्वारामर्थसिद्धिं तु नाऽनुपश्यन्ति ये नराः नर्थवाऽनर्थसिद्धिं च यथवाऽऽत्मा तथैव ते विषय में पारा व्यर्थ होता तो याग यज करने और विश्वास करना नहीं चाहते । वे कहते है कि "देव" नालाप आदि गुदवाने का कुछ भी फल न होता । या "अम्मात" आदि मय कारण पूर्व जन्म के गुरु और शिष्य भी कोई न होता ।।२११३०॥ क्यि कर्मों के प्रकारान्तर मात्र है। जो रोग धर्म का पता होने के कारण ही पुरष कार्य "अकस्मात्" और "देव" को कार्यसिद्धि का कारण सिद्ध होने का मामा और सिद्ध न होने पर निन्दा मानते है और जो तत्त्ववित जानने है कि "देव", का भागीदाता है। फिर कर्म का नाश यहा कम अम्मान" और "स्वभाव", इन तीन के सिवाय हो सकता है। एक गंगबहन कि सभी मनुष्य के फन पाने का चौथा कारण नदी है ये काम सम्मान बन जान है । वृद्ध गंग कहने । सस्व के माता हैं। क्योंकि मिाता यदि सय कि सामान मम्मन जान दें, यकी गय राणियों को पूर्वजन्म मशिन कमों अनुसार फल रवि मयोग कार्य मिद जाने और नमा तामाणियों में काई दीन न देय पढ़ता जो बाग पोगद्वारा पोका मिटाना मानने जिमय मे जो काम करना या उगमा कार्य सिद्ध 1 T गनगन में किसी दो जानामयि यदी सिद्धात टीक ६ कि पूर्वोत For TILEny Iristirrerityun Tannel onumunavailDIATRENiraunshindianatanisatirandmanduisinkedindiadriana.tu.tr । .
अध्याय ३२] महा भारत an.mm.nnn.mmonmMDirmannmandarImmumininaina Veure'l'OUITSTOVULU'LT'C227951'3't'!!*****''*' ' 'url'UWLET कर्तव्यमेव कर्मेति मनोरेप विनिश्रयः एकान्तेन ह्यनीहोऽयं पराभवति पूरुपः ॥ ३९ ॥ कुर्वतो हि भवत्येव प्रायेणेह युधिष्ठिर ! एकान्तफलसिद्धिं तु न विन्दत्यलसः क्वचित् ॥ ४० ॥ असंभवे त्वस्य हेतुः प्रायश्चित्तं तु लक्षयेत् । कृते कर्मणि राजेन्द्र ! तथाऽऽनृण्यमवाप्नुते ॥ १ ॥ अलक्ष्मीराविशत्येनं शयानमलसं नरम् निःसंशयं फलं लब्ध्वा दक्षो भूतिमुपाइनुते ॥ ४२ ॥ अनर्थाः संशयावस्थाः सिध्यन्ते मुक्तसंशयाः । धीरा नराः कर्मरता ननु निःसंशयाः क्वचित् ॥ ४३ ॥ एकान्तेन ह्यनर्थोऽयं वर्ततेऽस्मासु सांप्रतम् स तु निःसंशयं न स्यात्त्वयि कर्मण्यवस्थिते ॥ ४ ॥ अथवाऽसिद्धिरेव स्यादभिमानं तदेव ते वृकोदरस्य वीभत्सोमा॑त्रोश्च यमयोरपि ॥४५॥ अन्येषां कर्म सफलमस्माकमपि वा पुनः विप्रकर्पण बुध्येत कृतकर्मा यथा फलम् तीन कारणों पर ही काम का सिद्ध या असिद्ध होना है । प्रायश्चित के द्वारा वह वाधा का कारण हटने अवलम्बित है-सिद्धि का प्रधान कारण पूर्वसश्चित पर अवश्य इच्छित फल मिलना है । काम में लगे कर्म ही है । जिन्हें इसपर विश्वास नहीं च निम्मन्देह न रहकर, आलरय में समय व्यतीत करने से शरीर मनुष्य के आकार में जड़ पदार्थ हैं । मनु ने भी में अरक्ष्मी घुमती है। किन्तु जो मनुष्य मन रगा- म्वीकार किया है कि कर्म अवश्य क्स्ना चाहिये । कर परिश्रम के साथ कर्म करता है वह निम्सन्देह इसलिये जो मनुष्य निश्चेष्ट होकर आलम्य में समय कर्म फल प्राप्त करके ऐश्वर्यवान् होता है। सन्देह गॅवाता है उसका सब जगह पराभव होता है । ही अनिष्ट की जड़ है। अतएव सन्देह से बचकर नात्पर्य यह है कि किया हुआ काम कभी निष्फल कर्म करने से वह सिद्ध हो जाता है । किन्तु इम नहीं होता और आलम्य कम्ने से फल सिद्धि की मंसार में संशयशून्य, कर्मनिरत, धीर पुरुष यहुन सम्भावना नहीं है ॥३१॥१०॥ दुर्लभ है। हे महाराज ! हमारी जो यह विषम दुर्दशा कभी-कभी ऐमा देसा जाता है कि काम करने हम समय है वह यदि आप पाम्प का सहारा लें तो पर भी फल नहीं मिरता । इमका कारण अवश्य अवश्य दल सकती है। कार्य न जान सफल न 19'L'hit 'W''' LL'ULTIUSTED'ICITUDITCIT OUTLAW LATIT 119'*"VITITLETI ECU'to,t't'ITIN'E ULTICULIWLICCT TUL [ वनपचे १५८६ म हा भारत UDIWW7720P TINTENTIITIT.TOT IN IM DJ17 TA OR WTWD:7 An ning TITTI UT - IMTOTI HITTAT FGCUTAN VILTITATTUTTITILLO n wild UM DI : Huntamanniliunaraswinilina tandanaarate - पृथिवीं लाङ्गलेनेह भित्वा वीजं वपत्युत आस्तेऽथ कर्षकस्तूष्णीं पर्जन्यस्तत्र कारणम् ॥४७॥ वृष्टिश्चन्नाऽनुगृह्णीयादनेनास्तत्र कर्षकः यदन्यः पुरुपः कुर्यात्तत्कृतं सकलं मया ॥४८॥ तच्चेदफलमस्माकमपराधो न मे क्वचित् इति धीरोऽन्ववेक्ष्यैव नाऽऽत्मानं तत्र गर्हयेत् ॥ ४९ ॥ कुवतों नाऽर्थसिद्धि, भवतीति ह भारत! निर्वेदो नाऽत्र कर्तव्यो द्वावन्यौ ह्यत्र कारणम् ॥ ५० ॥ सिद्धिर्वाऽप्यथवाऽसिद्धिरप्रवृत्तिरतोऽन्यथा बहूनां समवाये हि भावानां कर्मसिद्धयः गुणाभावे फलं न्यूनं भवत्यफलमेव च अनारम्भे हि न फलं न गुणो दृश्यते क्वचित् ॥ ५२ ॥ देशकालावुपायांश्च मङ्गलं स्वस्तिवृद्धये युनक्ति मेधया धीरो यथाशक्ति यथावलम् ॥ ५३॥ अप्रमत्तेन नकार्यमुपदेष्टा पराक्रमः भूयिष्टं कर्मयोगेषु दृश्यमेव पराक्रमः टो, यह सोचकर जो आप, भीग, अर्जुन, नकुल वर्षा न हो तो उसमें हमारा क्या दोष' इसी तरह और सहदेय, ममी उछ भी चेष्टा न करें तो पिर बुद्धिमान् पण्डित को अपनी शक्ति भर धर्म करके हम रोगों के राज्य पान की आना निरी दुगशा पर न मिलने पर कभी अपनी निन्दा न करनी १ । आपका यह क्षमा का सिद्धान्त समुचित नहीं चाहिये । इस कारण “फर्म करने से वह सिद्ध न जरहिम सब उपायों को मार हान देखने होगा" यह मोचकर आरम्य में समय व्यतीत करना हैं नर मागही नकार्य न हो मकना मानव विमीय रियमी रचित नहीं विशता नहोना और नही। मं वर्ग में यद, सीप हो या दो म, पारप, यही दो पर सिद्धि के कारण है । सिद्ध हो अवश्य मिद्ध दाना है। विमान गंग हल नराकर या न हो, 'प्रकृति' मे रिमुम्ब होना किसी ताद पर पानी को मानने शिवाज वारर वर्षा की योग्य नहीं ॥११॥५॥ मददगा कान है। टीना वर्षा मम पाणी न होने पर कार्य का मिदि मनपा भी नाम नहीं देना। में बार भी माय नहीं बना | भाग दिये हुए मानरमी काना धाम कर चु, अय काम का प्रधान काजी गनभाना पग पर । . ६ अनुमा - - F 11-11..." It' ICULth". PHOTOHIREET अध्याय ३२] म हा भा र त SLATITUDIOmmamumrarunamamunaTarumaurusrammnamainarana Immaruaamanandhanaiantarmanchammamimiliamernamamama यत्र धीमानवेक्षेत श्रेयांसं वहुभिर्गुणैः साम्नेवाऽर्थं ततो लिप्सेत्कर्मचाऽस्मै प्रयोजयेत् ॥ ५५ ॥ व्यसनं वाऽस्य काळेत विवासं वा युधिष्टिर । अपि सिन्धोगिरे,पि किं पुनर्मर्त्यधर्मिणः ॥ ५६ ॥ उत्थानयुक्तः सततं परेपामन्तरपणे आनृण्यमाप्नोति नरः परस्याऽऽस्मन एव च ॥ ५७ ॥ न वेवाऽऽत्माऽवमन्तव्यः पुरुषेण कदाचन न ह्यात्मपरिभूतस्य भूतिर्भवति शोभना एवंसंस्थितिका सिन्द्विरियं लोकस्य भारत! । तत्र सिद्धिगतिः प्रोक्ता कालावस्थाविभागतः ॥ ५९ ॥ ब्राह्मणं मे पिता पूर्वं वासयामास पण्डितम् । सोऽपि सर्वामिमां प्राह पित्रे मे भरतर्षभ ! ॥ ६ ॥ नीतिं वृहस्पतिप्रोक्तां भ्रातृन्मेऽग्राहयत्पुरा तेषां सकाशादीपमहमेतां तदा गृहे स मां राजन्कर्मवतीमागतामाह सान्वयन् । शुश्रूपमाणामासीनां पितुरङ्के युधिष्टिर ! ॥ ६२ ॥ इति श्रीमन्महाभारत आरण्यकपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि द्रौपदीवाक्य द्वात्रिंगोऽध्यायः ॥ ३२ ॥ नहीं मिलेगा, बल्कि काम का एकदम निष्फल हो की कौन कहे, समुद्र और पर्वत को भी न छोड़ना जाना भी सम्भव है। किन्तु आरम्भ ही न करने चाहिये; उनके भी नाग का प्रयत्न करना चाहिये । जो से किमी प्रकार का फल नहीं देख पड़ता और न कोई शत्रु के दोष देखने में लगातार लगा रहता है वह शूरता आदि गुण ही प्रकट होते है | कल्याण की स्वयं और उसके मन्त्री आदि निदीप हो जाते हैं। चाह रखनेवाला प्रत्येक मनुष्य अपनी शक्ति के अनुमार बहुत ही असमर्थ है" यह सोचकर मनुष्य को बुद्धिपूर्वक देश, समय, उपाय और महल आदि का कभी अपना अपमान न करना चाहिये, क्योंकि प्रयोग करता है । इमलिये पराक्रम का सहारा लेकर अपना अपमान करनेवाला पुरुष कभी उन्नति नहीं सावधान चित्त से कर्म करना चाहिये। जो बुद्धिमान् कर सकता। हे भग्नश्रेष्ठ ! टमी प्रकार लोगों को पुरुष हैं वे बहुगुणी व्यक्ति के पास माम, दान, भेद, स्वाभाविक फल सिद्धि प्राप्त होनी है । ममयानुसार इन तीनों उपायों को जानकर कार्य-सिद्ध करने की उम फल-सिद्धि में यदि कुछ व्यनिकम दम पड़ना इच्छा करें । हे राजन् ! यदि अपारी हो तो मनुष्य है तो समका प्रधान कारण समय और अबन्या को "12'15''l'l'e'ULUMPUTOVODILD'U'L'RU IUTTO EWIDUUM VIRUMTIDULILLATO . । COOLCLYD't'Chit I'CHIMCU't'e't'IT(TLICI CMT'CISCOT'IUTTITOCIN*);
१५८८ महा भारत वनपर्व PATORomanummmmmmmmmmmmamimamamuTURINAAMunmurarurunner ही समझना चाहिये । समझना चाहिये कि या तो पिता जी को सुनाई थी और मेरे भाइयों को सिखाई समय ठीक न था या अवस्था ही उसके उपयुक्त न थी। उस समय मै पिता के ही घर थी। इस कारण थी ॥५११५९॥ मैंने भी सब उपदेश सुना था। हे महाराज ! मैं जय हे भरतश्रेष्ठ ! एक समय मेरे पिता ने एक किसी काम के लिये वहां जाती थी तब पिता की ब्राह्मण पण्डित को कुछ दिनों तक अपने घर में गाद में बैठ जाती थी। वे ब्राह्मण नीति का उपदेश टिकाया था। उन्होंने वृहम्पति की यह सब नीति किया करते थे; मैं भी सुना करती थी ॥६०।६२|| बनपर्व का बत्तीसवां अध्याय समाप्त हुआ ।। ३२॥ CALLITATuuurareauIIIITHICERTIFUNPHETAIL अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्याय ॥ ३३ ॥ वैशम्पायन उवाच याज्ञसेन्या वचः श्रुत्वा भीमसेनो ह्यमर्पणः । निःश्वसन्नुपसंगम्य क्रुद्धो राजानमब्रवीत् ॥ १ ॥ राज्यस्य पदवीं धां व्रज सत्पुरुषोचिताम् । धर्मकामार्थहीनानां किं नो वस्तुं तपोवने नैव धर्मेण तद्राज्यं नाऽऽर्जवेन न चौजसा अक्षकूटमधिष्ठाय हृतं दुर्योधनेन वे गोमायुनेव सिंहानां दुर्वलेन बलीयसाम् आमिपं विघसागेन तद्राज्यं हि नो हृतम् ॥ ४ ॥ धर्मलशप्रतिच्छन्नः प्रभवं धर्मकामयोः अर्थमुत्सृज्य किं राजन्दुःखपु परितप्यसे नैनीमया अध्याय ॥ ३३॥ वैशम्पायन ने कहा हे राजा जनमजय : भीम. हमारा राज्य दुर्योधन ने ले लिया है । हे भरतथेठ ! मन द्रोपदी के ये बचन मुनर बहुत फ्राषित आप माधारण धर्म की रक्षा के रिय क्यों 'धर्म'- होकर, रग्बी माम रे का, युधिष्ठिर मे वाले राजन् ! 'काम'नेवाले राज्य रुप महान् 'अर्थ' को छोड़ मापुरषों के योग्य धर्मसत राजपदवी को ग्रहण करमा दुम्सद क्रंश भोग रहे हैं। युधिष्ठिर! पीजिए । धर्म, अर्थ और काम मे हीन होकर हम आपक प्रमाद के कारण मनमाय राज्य जिसकी इस नवन में यया को दुरामा दुर्योधन ने धर्म इन्द्र भी नहीं ले सकना था, हमारे दबने और इस व अनुसार, या मरलना कं. गाव अधया परपर गाण्टीय धनुषधारी अर्जुन से रक्षित होने पर हर हमाग गाय नहीं रिया, टमन नो कपट का जुआ गिया गया । अमे टने के हाथ से बल का फल सर आप पर शिया है। दुर्घर गदा या गड़े मनुष्य से गाय छिन जातात काही प्रम दरदान निद माम को दी मार हान हुए आर कारण हमारा चयलिग raEAmsunyavaamTMENTINimilsinaamanianimaraEARTHRITE ErrrrrrrrrrITTrrrrrrITTPITITITIITTIMIRMIRIT १५८९ - .. E.TO TOTIUIUTIUTOWY CUKUULIOLOVALIW'W'WWUWUWW'VELUT अध्याय ३३] महा मा रत Mmm TRmmmmmmmmm.orrammmmmmmmmmmmmmmmmmary भवतोऽनवधानेन राज्यं नः पश्यतां हृतम् अहार्यमपि शक्रेण गुप्तं गाण्डीवधन्वना कुणीनामिव विल्बानि पंगूनामिव धेनवः । हृतमैश्वर्यमस्माकं जीवतां भवतः कृते ॥ ७ ॥ भवतः प्रियमित्येवं महद्वयसनमीदृशम् धर्मकामे प्रतीतस्य प्रतिपन्नाः स्म भारत ! ॥ ८ ॥ कर्पयामः स्वमित्राणि नन्दयामश्च शात्रवान् । आत्मानं भवतां शास्त्रेनियम्य भरतर्षभ ! ॥ ९ ॥ यद्वयं न तदैवतान्धार्तराष्ट्रान्निहन्महि भवतः शास्त्रमादाय तन्नस्तपति दुष्कृतम् ॥ १० ॥ अथैनामन्यवेक्षस्त्र मृगचर्यामिवाऽऽत्मनः दुर्वलाचरितां राजन्नवलस्थेनिपेविताम् ॥ ११ ॥ यां न कृष्णो न वीभत्सुर्नाऽभिमन्युर्न सृञ्जयाः । न चाऽहमभिनन्दामि न च माद्रीसुतावुभी भवान्धर्मो धर्म इति सततं व्रतकर्शितः कञ्चिद्राजन्ननिर्वेदादापन्नः क्लीवजीविकाम् ॥ १३ ॥ गया। हे निप्पाप ! आप धर्मात्मा हैं, आप का प्रिय नकुल, सहदेव और सञ्जय भी युग कहते हैं। आप करने के लिये ही हम इस प्रकार की विपत्ति में पड़ क्या सब जगह धर्म ही धर्म कहकर अपने को बनों गये हैं । हे भरतश्रेष्ठ ! हम लोग केवल आपकी से दुर्वल बनाकर, विषाद-पूर्ण हृदय से हिजड़ों की आज्ञा से ही अपने को रोककर लगातार मित्रों का तरह समय वितरिंगे ! कायर लोग ही राजलक्ष्मी मन्ताप और शत्रुओं का आनन्द बढाते हैं। आपके का उद्धार करने में असमर्थ होकर म्वार्थ के विरोधी वाक्य को मानकर उस समय हमने धृतराष्ट्र के और फल को मिटानेवाले वैराग्य का आमरा लेने पुत्रों को नहीं मारा । यह बात इम ममय म्मरण हैं । आप जानी होकर भी कार्य मिद्ध करने के आने मे हमको अत्यन्त कष्ट हो रहा है ॥१॥१०॥ लिये अपने कुल के योग्य पोरण का प्रयोग क्यों नहीं आप इम मृगचर्या अर्थात् वनवाम के दुःख करते ! आप हमारे बाहुबल को भी अच्छी तरह को भोग रहे हैं, यह वृत्ति बलवानों की नहीं है जानते है किन्तु केवल शान्ति और क्षमा के कारण किन्तु दुर्बल जीवों की है। इस वृत्ति को मैं और ही हम अनर्थ की भोर आप ध्यान नहीं देते। अर्जुन अच्छा नहीं जानते हैं और श्रीकृष्ण,अभिमन्यु, । यद्यपि हम रोग मन ही मन आपको परम पगकमी DVD "Incroarrer Del TITTTrrerLECTATI' TITTIICEITTTTITOR wincarnunarmmunmunanimianiministransmimmmcinmarathi call - १५९० म हा मा रत वनपर्व ForumenuMDEHTITUECORTALERNALITIDI EmanmadinamruariprammIMANAMITRADITED urmerminiummindimumnastawinirummimmunosorrarmanamurammar दुर्मनुष्या हि निर्वेदमफलं स्वार्थघातकम् अशक्ताः श्रियमाहर्तुमात्मनः कुर्वते प्रियम् ॥ १४ ॥ स भवान्दृष्टिमान्छक्तः पश्यन्नस्मासु पौरुषम् । आनृशंस्यपरो राजन्नाऽनर्थमवबुद्धयसे ॥ १५॥ अस्मानमी धार्तराष्ट्राः क्षममाणानलं सतः अशक्तानिव मन्यन्ते तदुखं नाऽऽहवे वधः तत्र चेाध्यमानानामजिह्ममनिवर्तिनाम् सर्वशो हि वधः श्रेयान्प्रेत्य लोकाँल्लभमहि अथवा वयमेवैतान्निहत्य भरतर्षभ ! आददीमहि गां सर्वां तथापि श्रेय एव नः ॥ १८ ॥ सर्वथा कार्यमेतन्नः स्वधर्ममनुतिष्टताम् काङ्क्षतां विपुलां कीर्ति वैरं प्रतिचिकीर्पताम् ॥ १९ ॥ आत्मार्थं युध्यमानानां विदिते कृत्यलक्षणे अन्यैरपि हृते राज्ये प्रशंसैव न गर्हणा ॥ २० ॥ कर्पणार्थो हि यो धर्मों मित्राणामात्मनस्तथा व्यसनं नाम तद्राजन्न धर्मः स कुधर्म तत् ॥ २१ ॥ जानते है किन्तु इस समय, क्षमा का सहारा लेने है। अधिक क्या कहूँ, इस ममय यदि हम कर्तव्य मे, दुर्योधन आदि धृतराष्ट्र के पुत्र आपको अत्यन्त मगझकर शत्रुओं के माथ युद्ध करके हार जाय तो अशता के मिवाय और क्या ममाने होंगे। मैं तो यह भी हमारे लिये प्रशसा की बात होगी।॥११॥२०॥ यदा रहूँगा, कि हम दुर्दशा की अपेक्षा युद्ध मूभि जिम धर्म का आचरण करने से अपने सगे, में मर जाना अन्छ। था। धर्म युद्ध में मारे जाने में भाई-बन्धु आदि मयको झट हो, उमे न्यसन कहते दृमरे जन्म में मम्पति मिलंग की सम्भावना रहता है। यमन कभी धर्म नहीं गिना जाता. यह हा है। अथवा दुर्योधन आदि | मारकर जो हम धर्म का बीज है। जम मृत व्यक्ति के पास मुख अपना माग गज्य पागा ना गमें भी यश मा और दु य नहीं गाना धम ही जो कोई लगातार दांनी आमाई! पाहा, अपने धर्म के पारन, धर्म में रहना उम धर्मगीर का धा और अपरिमित मसी पामि और यदा चुर्शन के रिय अर्थ नहीं मिलता। जो न्याना धर्म के लिये ही धर्म पुर में प्रथम हाना हाररिये मम नाम अना का आनणरमा मेनकमार केस • Pirn Fri, rite 1 orderPrastriFPIrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrICHEMurrari अध्याय ३३ । पहा मारत मpinznnuTIIIMa ranhiaTV inummisamannmnmannाण Emmusermommonsummmmmoirmonymumymeter ध्रुवम् । सर्वथा धर्मनित्यं तु पुरुपं धर्मदुर्वलम् त्यजतस्तात ! धर्मार्थो प्रेतं दुःखसुखे यथा ॥ २२ ॥ यस्य धर्मो हि धर्मार्थ क्लेशभाङ् न स पण्डितः । न स धर्मस्य वेदाऽर्थं सूर्यस्याऽन्धः प्रभामिव ॥ २३ ॥ यस्य चाऽऽत्मार्थमेवाऽर्थः सचनाऽर्थस्य कोविदः। रक्षेत भृतकोऽरण्ये यथा गास्तादृगेव सः ॥ २४ ॥ अतिवेलं हि योऽर्थार्थी नेतरावनुतिष्ठति स वध्यः सर्वभूतानां ब्रह्मदेव जुगुप्सितः ॥ २५॥ सततं यश्च कामार्थी नेतरावनुतिष्टति मित्राणि तस्य नश्यन्ति धर्मार्थाभ्यां च हीयते ॥ २६ ॥ तस्य धर्मार्थहीनस्य कामान्ते निधनं कामतो रममाणस्य मीनस्येवाऽम्भसः क्षये ॥ २७ ॥ तस्माद्धर्मार्थयोर्नित्यं न प्रमाद्यन्ति पण्डिताः । प्रकृतिः सा हि कामस्य पावकस्याऽरणिर्यथा ॥ २८ ॥ सर्वथा धर्ममृलोऽर्थो धर्मश्चार्थपरिग्रहः इतरेतरयोनीतो विन्दि मेघोदधी यथा ॥ २९ ॥ मोगने पड़ते हैं । जमे अन्धा मनुष्य मूर्य की प्रभा के समान मय के लिये मारने योग्य है । एसे ही जो को नहीं जान सकता वैसे ही वह अपण्डित व्यक्ति कोई धर्म और अर्थ की ओर से लापरवाही करके धर्म के प्रयोजन को नहीं समझ सकता। जिम मनुष्य लगातार काम के मेवन में ही ममय बिताता है उमके का द्रव्य केवल अपनी आवश्यकता की वस्तुओं में मित्र नष्ट हो जाते हैं और वह मदा धर्म और अर्थ ही चुक जाता है उसके विषय में समझना चाहिये से हीन रहता है । मे तालाब का जल सूब जाने कि वह धन कमाने के प्रयोजन को नहीं जानना । पर मछलियाँ तड़प-तड़पकर मर जाती है, वैसे ही जङ्गल में चगनेवाले मे गायों की रक्षा किया करते धर्म और अर्थ मे हीन पुरुष भी कुछ दिन तक मन- है वमे ही इस मंमार के वन में उक्त अधम जन माना काम-भोग करके अन्त में टमके अमात्र में कवल धन की रक्षा में ही लगा रहकर अपना जीवन नष्ट हो जाता है। इस कारण धन और अर्थ का गंवा देता है । जो कोई धर्म और काम को त्याग मञ्चय करने में विवेकी लोग लापरवाही नहीं करते। कर केवल तुच्छ धन के कमाने और एकत्र करने जैसे अरणि मे अमि टसन्न होती है वमे धर्म और में ही लगा रहता है वह दुगत्मा ब्रह्महत्या करनेवाले अर्थ मे काम की प्राप्ति होती है। धर्म और अर्थ, Murrammlilichunanasanilliantlinallantaliaadlalitaran aunicintinantlifinarama - । MILLIOTILATITUDICTIKATTramcitralNCLECTITrrrrrroi.
[ वनपर्व १५९२ म हा भारत IVOMITATURIAAIIM Emacrosmumtaramimalamansamanujnanimal - AMITTALIORulufilm Pranamitram ramprimamimirm TianimadinaminummifieDinnrnima द्रव्यार्थस्पर्शसंयोगे या प्रीतिरुपजायते स कामश्चित्तसंकल्पः शरीरं नाऽस्य दृश्यते ॥३०॥ अर्थार्थी पुरुपो राजन्! वृहन्तं धर्ममिच्छति । अर्थमिच्छति कामार्थी न कामादन्यमिच्छति ॥ ३१ ॥ न हि कामेन कामोऽन्यः साध्यते फलमेव तत् । उपयोगात्फलस्यैव काष्टाद्भस्मेव पण्डितः ॥ ३२ ॥ इमाञ्च्छकुनकान्राजन्हन्ति वैतसिको यथा एतद्रूपमधर्मस्य भूतेषु हि विहिंसता कामाल्लोभाच्च धर्मस्य प्रकृति यो न पश्यति । स वध्यः सर्वभूनानां प्रेत्य चेह च दुर्मतिः ॥ ३४ ॥ व्यक्तं ते विदितो राजन्नाऽर्थो द्रव्यपरिग्रहः । प्रकृति चाऽपि वेत्थाऽस्य विकृतिं चापि भूयसीम् ॥ ३५ ॥ तस्य नाशे विनाशे वा जरया मरणेन वा अनर्थ इति मन्यन्ते सोऽयमस्मासु वर्तते इन्द्रियाणां च पञ्चानां मनसो हृदयस्य च विषये वर्तमानानां या प्रीतिरुपजायते ॥ ३७॥ परम्पर एक दूमरे की जड़ है और मेघ तथा समुद्र । है। काम म्वय प्रीति उत्पन्न करनेवाला फल है । जैस की तरह दोनों परम्पर एक दूसरे को पुष्ट करते हैं। । चिड़ीमार पक्षियों के प्राण हर लेता है वैसे ही अधर्म माल चन्दन व आभूपण धन आदि के मिलने से सब प्राणियों की हिंसा करता है । जो पुरुष इस लोक जो असीम आनन्द होता है उसी का नाम काम | में धर्म से विमुख होकर काम और लेम में ही फसा है। काम या कामना केवर मन में ही उठनी है, रहता है वह दुरात्मा इस लोक और परोक में सब यानय में उसका कोई निर्दिष्ट आकार नहीं है प्राणियों द्वारा मारे जाने योग्य है । हे महाराज ! आप ॥२१॥३०॥ अच्छी तरह जानते है किमी, धन, गाय, हाथी, घोड़े धर्म से अर्थ प्राप्त होता है । अर्थ में काम की आदि मर पदार्थों से ही काम प्राप्त होता है। उन सब प्राप्ति हो मकनी है। किन्तु काम से कुछ पाने की पढायों की प्रकृति और विकृति को भी आप अच्छी आमा नहीं की जा सकती। जमे र कड़ी जलने पर तरह जानने हैं। वृद्धायम्या या मरण के द्वारा इन जोभमराजाना उसमे अन्य मम्म नहीं बन सक्नी, सय वातुओं का न देख पड़ना या विछुड़ना अनर्ध बमे काम मे अन्य नाम की प्राप्ति दोना अमम्भर कहलाता है। उसी महान् अनर्थ में इस समय हम - Minuinnar TITTII.17 Tularima TITTT - । । 1712039TFITTITITI'I rrefi'i'l'ordreriminimiteidt*t*tit pHCI'ENCIC अध्याय ३३ महा भारत १५९३ RamanumariaTTTTTTT TITTWIST.MAmirman Pilitation campairmirmanandnomindaianimmamlinnalisunarMIRITUATICAamanthalimantamanarmi maranand स काम इति मे बुद्धिः कर्मणां फलमुत्तमम् । एवमेव पृथग्दृष्ट्वा धर्माथा काममेव च ॥ ३८ ॥ न धर्मपर एव स्यान्न चाऽर्थपरमो नरः न कामपरमो वा स्यात्सर्वान्सेवेत सर्वदा ॥ ३९ ॥ धर्म पूर्वे, धनं मध्ये, जयन्ये काममाचरेत् अहन्यनुचरेदेवमेप शान्त्रकृतो विधिः कामं पूर्व धनं मध्ये जघन्ये धर्ममाचरेत् वयस्यनुचरेदेवमेप शास्त्रकृतो विधिः ॥ ४२ ॥ धर्म चाऽर्थं च कामं च यथावद्वदतां वर ! विभज्य काले कालज्ञः सर्वान्सेवेत पण्डितः ॥ १२ ॥ मोक्षो वा परमं श्रेय एप राजन् ! सुखार्थिनाम् । प्राप्तिवा वुद्धिमास्थाय सोपायां कुरुनन्दन ! ॥ १३ ॥ तद्वाऽऽशुक्रियतां राजन्प्राप्तिर्वाऽप्यधिगम्यताम् । जीवितं ह्यातुरस्येव दुःखमन्तरवर्तिनः ॥ ४४ ॥ विदितश्चैव मे धर्मः सततं चरितश्च ने जानन्तस्त्वयि शंसन्ति सुहृदः कर्मचोदनाम् ॥ ४५ ।। लोग फंसे हुए हैं। हे भरतश्रेष्ठ ! इन्द्रियाँ, मन और इमी प्रकार किगोर अवस्था में काम भोग, हृदय अपने-अपने विषय को पाकर जिम प्रीति का युवा अवम्धा के अन्त में घनोजन और अवस्था टपभोग करते हैं वही काम है। मेरी समझ में दरने पर घर्म का आचरण करना चाहिये । हे नरश्रेष्ठ! वही कर्म का उत्तम फल है। इस प्रकार धर्म, अर्थ ममय का यथोचिन विभाग करके मनुश्य जुदे जुड़े और काम, टन तीनों पर अलग-अलग दृष्टि ग्वकर ममयों में धर्म अर्थ काम, इम त्रिवर्ग का उपयोग मवका यथासमय, यथोचित रूप मे, मेवन करना करे । हे मुन्नन्दन ! जो मनुप्य महान् ऐश्वर्य मे उचित है। तीनों में म तिमी एक में ही तत्तर हो प्राप्त सुख का भोग करके, मोक्ष के उपाय कर जान जाना मूर्चना है । लगातार ममभान मे उक्त त्रिवर्ग का महाग लेकर, मुम्ब की दुन्ठा करता है उसके का मेवन करना चाहिये । मात्रकारों ने निमा है , लिये मोल ही श्रेयार है । आर मोक्ष पान का कि प्रान काल धर्मकार्य करे, दोपर को धनोपार्जन अथवा महान् पश्चर्य प्राप्त करने का विशेष कर मे की चिन्ता में रगा रहे और तीमो पदर काम-भाग यन कीजिए। जो कोई इन दोनों असम्थाओं के प्रवृत्त हो ॥३१॥20॥ चीन में पड़ा है-न मोक्ष पाने का यन करता है RSSISidainital mitawaiiantrianitlifiliuthindiantaliandihandna willistinana anita taaranaitik - CLOTrrorerearererITTTTTreeMMITTrerMarrrrrrrrTTTTTTTorrrrrr वनपर्व १५९४ म हा मारत MImawwanmmmmmmmmmmunomiasimonialhindiralILatitaniramAurance L..LLLLLLLLIA - LOUICUMTOTTATILOLIVUMUS दानं यज्ञाः सतां पूजा वेदधारणमार्जवम् । एप धर्मः परो राजन्फलवान्प्रेत्य चेह च ॥४६ ॥ एष नाऽर्थविहीनेन शक्यो राजन्निषेवितुम् अखिलाः पुरुषव्याघ्र ! गुणाः स्युर्यद्यपतिरे ॥४७॥ धर्ममूलं जगद्राजन्नाऽन्यद्धर्माद्विशिष्यते धर्मश्चाऽर्थेन महता शक्यो राजनिषेवितुम् ॥ ४८ ॥ न चाऽर्थो भैक्ष्यचर्येण नाऽपि क्लैव्येन कर्हिचित् । वेत्तुं शक्यः सदा राजन् ! केवलं धर्मवुद्धिना ॥ ४९ ॥ प्रतिपिडा हिते याचा यया सिद्धयति वै द्विजः । तेजसैवाऽर्थलिप्सायां यतस्व पुरुषर्षभ ! भैक्ष्यचर्या न विहिता न च विदशूद्रजीविका । क्षत्रियस्य विशेषेण धर्मस्तु वलमौरसम् ।। ५१ ॥ स्वधर्म प्रतिपद्यस्व जहि शत्रून्समागतान् । धार्तराष्ट्रवनं पार्थ ! मया पार्थेन नाशय उदारमेव विद्वांसो धर्म प्राहुर्मनीषिणः उदारं प्रतिपद्यस्व नाऽवरे स्थातुमर्हसि ॥ ५३ ॥ और न ऐश्वर्य प्राप्ति की चेष्टा करता है । बहुत सा धन पास होने से ही धर्म का पालन जीवन रोगी के जीवन के समान क्लेशदायक हो किया जा सकता है, किन्तु कायरपन या भिक्षावृत्ति उठना है। आप धर्म के मर्म को अच्छी तरह का सहारा लेने में किसी तरह धन का लाभ नहीं जानते हैं और लगानार धर्म का आचरण भी किया हो सकता । धर्म का आचरण करने से ही अर्थ करते हैं, यह जानकर आपके सुहृद्गग आएको कर्म की प्राप्ति होती है । मागकर धन का सग्रह करना करने के लिये उत्तेजित करते हैं। दान, यज्ञ, सजनों आपके लिय अनुचित है। भिक्षावृत्ति केवल ब्राह्मणों की पूजा, वेदपाट, हाय दी शुद्धता, यही प्रधान के लिये ही है । इस कारण आप तेज के द्वारा धर्म है । इस लोक और परलोक, दोनों लोकों में अर्थ प्राप्त करने का उद्योग कीजिए ॥४१॥५०॥ यह धर्म फलदायक है । हे पुरुषश्रेष्ठ ! और सब भिक्षाप्रति या वैश्य और शद्रों की अन्य प्रकार की गुण नदि हों, परन्तु यदि धन न हुआ तो मनुष्य जीविका क्षत्रिय के रिये नहीं यताई गई है । बल इस धर्म का पारन नहीं कर माता । धर्म ही इस । और उत्साह प्रकट करना तो क्षत्रिय का प्रधान धर्म जगत का मन है। धर्म में बदकर और कुछ नहीं है। इमरियह राजन् ! आप अपने धर्म का आश्रय mratapmuurmuintamanislmanninindisindainainalistiaadiwasitinuindnisnanandinindianandita -उसका Happy TriDrirrr11).J'I'ITTO TUTMUF********Limone Arte TerrOrji mmuniturinamurnamumment ...... PIPEDIOnetworkUDHAINRINITI' अध्याय ३३] महा मारत सwwmannamonammmmmmmmmmmmmmmmmmmmummer अनुबुध्यस्त्र राजेन्द्र ! वेत्थ धर्मान्सनातनान् । क्रूरकर्माऽभिजातोऽसि यस्मादुद्विजते जनः ॥ ५ ॥ प्रजापालनसंभूतं फलं तव न गर्हितम् एप ते विहितो राजन् ! धात्रा धर्मः सनातनः॥ ५५ ॥ तस्मादपचितः पार्थ ! लोके हास्यं गमिष्यसि । स्वधर्माद्धि मनुष्याणां चलनं न प्रशस्यते ॥ ५६ ॥ स क्षात्रं हृदयं कृत्वा त्यक्त्वेदं शिथिलं मनः । वीर्यमास्याय कोरव्य ! धुरमुट्ठह धुर्यवत् ॥ ५७ ॥ न हि केवलधर्मात्मा पृथिवीं जातु कश्चन । पार्थिवो व्यजयद्राजन्न भूतिं न पुनः श्रियम् ॥ ५८ ।। जिह्वां दत्त्वा बहूनां हि क्षुद्राणां लुब्धचेतसाम् । निकृत्या लभते राज्यमाहारमिव शल्यकः भ्रातरः पूर्वजाताश्च सुसमृद्वाश्च सर्वशः निकृत्या निर्जिता देवरसुगः पार्थिवर्षभ ! ॥६०॥ एवं बलवतः सर्वमिति बुवा महीपते ! । लेकर मेरी और अर्जुन की महायना मे भेनामहित । है । प्रजागलन में अममर्थ होने मे जन-ममाज में धृतराष्ट्र के पुत्रों का नाम कीजिए । पण्टिन लोग आपकी निन्दा होगी: क्योंकि मनुष्य अपने धर्म में प्रमुख को ही धर्म कहते हैं । इमलिय आपको प्रभुना । यदि टिग जाता है तो लोग टमकी निन्दा करने है । प्राप्त करने के लिये यन करना चाहिये । सङ्कट में इन मब बानों पर विशेष रूप में विचार करके आप पड़कर मालमी रहना किमी तरह उचित नहीं। अपने चित्त मे मुम्नी को दूर कर दीजिए । क्षत्रियों मोचकर देखिए, लोग जिम हिमा से टरते और घब के तेज को धारण करके मचे धुरन्धर की तरह पृथ्वी राने हैं, टमीहिंमा-प्रधान क्षत्रियवंश में आपका जन्म का भार ममानिय । केयर धर्म कामडारा लेकर अब हुआ है। अपने कुन के योग्य कर्म का करना ही नक कोई कमी मानान्य नहीं पा मारा। बनिये मापका मुम्य कर्तव्य है । वही आपका मनातनधर्म मे बिपी माने की वस्तु का टोम दिनाकर वन है। आपको उसी धर्म की रक्षा करनी चाहिये । में रहनेवाले मृगों को पाने और उनको मार दाने प्रजापान के द्वारा जो फल होता है उमे प्राप्त है, वैमे ही जो बुद्धिमान पुरुष हैं वे क्षुद्र विचारवाल, ग्ना आरकरिये निन्दनीय नहीं; क्योंकि वह वंहा रारची, गत्रुपक्ष के लोगों को उत्तीच आदि देकर परम्परा मे चग आ रहा क्षत्रियों का मनातन धर्म उनमें पट दाल देते हैं और महज ही उनका गल्य ComeTREPORTEDTUBTETTER:CTETTETTERTACTerritor:
वनपर्व १५९६ महा मारत NOTITIEUTETUTTITYTTU, HUTT matindinin qorist. Mita a TUTITTI HTTARTAINTERNATOncattsutrrAWINNELDHARATUTTARTICE TER । जहि शत्रून्महावाहो ! परां निकृतिमास्थितः ॥ ६१ ॥ न ह्यर्जुनसमः कश्चिद्युधि योधो धनुर्धरः भविता वा पुमान्कश्चिन्मत्समो वा गदाधरः ॥ ६२ ॥ सत्वेन कुरुते युद्धं राजन् ! सुवलवानपि । न प्रमाणेन नोत्साहात्सत्वस्थो भव पाण्डव ! ॥ ६३ ॥ सत्त्वं हि मूलमर्थस्य वितथं यदतोऽन्यथा न तु प्रसक्तं भवति वृक्षच्छायेव हैमनी । ६४ ॥ अर्थत्यागोऽपि कार्यः स्यादर्थ श्रेयांसमिच्छता । वीजीपम्येन कौन्तेय ! मा ते भूदत्र संशयः ॥६५॥ अर्थन तु समोऽनर्थो यत्र लभ्येत नोदयः न तत्र विपणः कार्यः खरकण्डयनं हि तत् ॥ ६६ ॥ एवमेव मनुष्येन्द्र ! धर्म त्यक्त्वाऽल्पकं नरः वृहन्तं धर्ममाप्नोति स वुद्ध इति निश्चितम् ॥ ६७ ॥ अमित्रं मित्रसंपन्नं मिर्मिन्दन्ति पण्डिताः । भिन्नर्मित्रैः परित्यक्तं युवानं कुरुते वशम् सत्त्वेन कुरुते युद्धं राजन् ! सुवलवानपि । ले लेते हैं । अमुरगण देवताओं के बड़े भाई और राज! आप बल प्रकट कीजिए । बल ही अर्थ की जड़ बहुत बली थे । किन्तु देवताओं ने फट टालकर कहा गया है । बल के बिना सब कुछ जाड़े की छाया के उन्हें हरा दिया ॥५११६०॥ समान निष्फल है। जैसे अधिक अन्न प्राप्त करने की हे महाबाहो ! जो बली है, उसे किसी बात की इच्छा से किमान लोग पहले थोड़ा चीज बोते है, वैसे ही कमी नहीं रहती । आप इन बातों पर विचार करके अधिक अर्थ लाभ के मतलब से अर्थ की इन्छा रखने- कौशल के साथ शत्रुओं का नाश कीजिए । वाले मनुष्य को थोड़ा सा धन व्यय करना चाहिये । निधय में कहता हूँ कि इस पृषी पर अर्जुन के किन्तु जहा पर धन व्यय करने से उतने या उतने ममान धनुर्षिया जाननवाला और मेरे ममान गदा मे अधिक धन पाने की सम्भावना नहीं है वहां युद्ध में निपुण, दूसरा पुरुष न तो है और न होगा। प्रतिमा पूर्वक धन देना ठीक नहीं; क्योंकि यह जोर परी रोग कभी अपने शत्रुपक्ष या अन्यपक्ष की विमी से सुजलाने के समान परिणाम में दुम्व जनक ही तरह पीटहलने चिसा नहीं करतये तो अपने पर होता है । दे महागज! इसी प्रकार यदि थोड़े धर्म कमहायुद्धगमि में उता पड़ने हैं। इसलिये हे महा का श्याग करने से अधिकतर धर्म का लाभ होता mummmmmmmm 12mm IpITTERTADMINTOTAL TALUTELAR TWORLums । यह DurprimarimmerrrrrromNITIRI rem अध्याय ३३ ] म हा भा र त १५९७ mommunimmmmmunniaommmmmmmmmmmmmsmameinarTITA FROAD THEATERTISMELLECTIOwner Arrai51 1550 won नोद्यमेन न होत्राभिः सर्वाः स्वीकुरुते प्रजाः सर्वथा सहनेरेव दुर्वलेबलवानपि अमित्रः शक्यते हन्तुं मधुहा भ्रमरैरिव ।। ७०।। यथा राजन्! प्रजाः सर्वाः सूर्यः पाति गभस्तिभिः। अत्ति चैव तथैव त्वं सदृशः सवितुर्भव ।। ७१॥ एतच्चाऽपि तपो राजन् ! पुराणमिति नः श्रुतम् । विधिना पालनं भूमर्यत्कृतं नः पितामहः ॥ ७२ ॥ न तथा तपसा राजल्लोकान्प्राप्नोति क्षत्रियः । यथा सृष्टेन युद्धेन विजयेनेतरेण वा ॥ ७३॥ अपेयात्किल भा सूर्यालक्ष्मीश्चन्द्रमसस्तथा । इति लोको व्यवसितो दृष्ट्वमां भवतो व्यथाम् ॥ ७ ॥ भवतश्च प्रशंसाभिर्निन्दाभिरितरस्य च कथायुक्ताः परिपदः पृथग्राजन् ! समागताः इदमभ्यधिकं राजन् ! ब्राह्मणाः कुरवश्च ते समेताः कथयन्तीह मुदिताः सत्यसन्धताम् ।। ७६ ।। यन्न मोहान्न कार्पण्यान्न लोभान्न भयादपि । हो तो वह आपके लिये अवश्य कर्तव्य है। ऐसा उतारनेवाले को काट काटकर अधमरा कर टालती कानेवाला ही सावधान समझा जाता है । चतुर लोग हैं जैसे ही बहुत से निर्बल लोग भी मिलकर भी बहुत मित्रोंवाले शत्रु को किमी न किमी तरह भेद शत्रु का नाश कर मकते हैं ॥६११७०॥ नीति का प्रयोग करके मित्रों से हीन कर देते हैं; मूर्य जमे अपनी किरणों के द्वारा पृ.वी से रस क्योंकि मित्रों और भाई-बन्धुओं के त्याग करने पर ग्वींचकर और फिर उसे वर्षाऋतु में रसाकर प्रजा शत्रु दुर्बल हो जाता है और फिर यह सहज ही को मारते और जाते हैं, वैसे ही आप भी युद्धभूमि वग में कर लिया जा सकता है । हे धर्मराज ! में शत्रुओं का नाश करके अपनी प्रजा का प्रतिपालन बलवान् पुरुष अनेक उद्यमों से या मीठे वचनों के कीजिए । हे राजन् ! मने सुना है कि विधिपूर्वक द्वारा प्रजारञ्जन करने की चेष्टा नहीं करता, वह पृथ्वी का पालन करना भी तप है, जो कि हमार अपने बाहुबल की महायता से युद्ध करके ही प्रजा पूर्वपुम्प कर गये हैं। हमको भी वही करना चाहिये । को अपने वश में कर लेता है। छोटी-छोटी मधु क्षत्रिय को युद्ध में लड़कर मरने या मारने में जो मक्षिकाएँ जैम बहुत सी एक जगह मिलकर महद रोक मिरने हैं वे तप करने से नहीं मिग्ने । आप PULO'S WELLTILCIEL" "P"***"1910"WS!!!!!!!ROL'ULTUOLICIDIOTT UIZ TITOITUMIWDITI .. ir MMTITYTTITIVITETITATORITETITIMLTorerTTITITrstrirroratris) ororer १५९८ म हा भारत ( वनपर्व IIIIIIIIIIILATOMARTHIANATAILutayaNUDEIONALC nomNTOTIN MUUTTUM DOTTOTITUTETITIMINTADTTITONTTIMTI MULTS अनृतं किंचिदुक्तं ते न कामान्नाऽर्थकारणात् ॥७७॥ यदेनः कुरुते किंचिद्राजा भूमिमवाप्नुवन् सर्व तन्नुदते पश्चाद्यज्ञैर्विपुलदक्षिणेः ॥ ७८॥ ब्राह्मणेभ्योऽददद्ग्रामान्गाश्च राजन् ! सहस्रशः । मुच्यते सर्वपापेभ्यस्तमोभ्य इव चन्द्रमाः पौरजानपदाः सर्वे प्रायशः कुरुनन्दन ! सवृद्धवालसहिताः शंसन्ति त्वां युधिष्ठिर ! ॥८०॥ श्वहतौ क्षीरमासक्तं ब्रह्म वा वृषले यथा सत्यं स्तेने वलं नायां राज्यं दुर्योधने तथा इति लोके निर्वचनं पुरश्चरति भारत ! अपि चैताः स्त्रियो वालाः स्वाध्यायमधिकुर्वते ॥ ८२ ॥ इमामवस्थां च गते सहाऽस्माभिररिन्दम ! । हन्त नष्टाः स्म सर्वे वै भवतोपद्रवे सति ॥ ८३ ॥ स भवान्रथमास्थाय सर्वोपकरणान्वितम् त्वरमाणोऽभिनिर्यातु विप्रेभ्योऽर्थविभावकः ॥ ८४ वाचयित्वा द्विजश्रेष्ठानद्यैव गजसाह्वयम् की ऐमी दशा देखकर लोगों ने निश्चय कर लिया से मिट जाता है । लोग ब्राह्मणों को बहुत से गाव है कि सूर्य मण्टल से उसका तेज और चन्द्रमण्डल और सहस्रा गायें देकर राहु-मुक्त चन्द्रमा की तरह से उमकी कामनीय कान्ति शीघ्र ही लुप्त हो जायगी। पाप से छुटकारा पा जाते है। हे कुरुकुलश्रेष्ठ! नगर हे धर्मराज ! इस समय प्राय मभी समाजों में के रहने वाले बालक-युद्ध-स्त्री आदि सब आपकी आपकी बहुत प्रशसा और धृतराष्ट्र के पुत्रों की निंदा बारम्बार बहुत प्रशसा किया करते हैं ।।७१४८०॥ मुन पड़नी है। आप मोह, कृपणता, रोम, भय, युत्ते के चमड़े में दूध, शुद्ध के मुख में वेद, काम या अर्थ के रिये कभी अमत्य नहीं योर । चोर के मुख में सत्य वचन और स्त्री जाति में बल इसी कारण सय ग्रामण और कुरुवश के रोग एकत्र होना जसा है वैमा ही दुराचारी दुर्योधन को राज्य होका केवल आपकी ऐसी मत्यपरायणता की ही प्राप्त होना है। हे भरतश्रेष्ठ | सब नगर निवासी चर्चा किया करते हैं। राज्यगम के ममय राजाओं प्रजा इसी बात का आन्दोलन कर रही है। हाय, पोजिस पाप का भागी टोना पड़ना है यह पाप आप अपनी बुद्धि के दोष से इस प्रकार हम लोगों- राज्यराम के उपरान्त यान दक्षिणावाने. यज करने सहित दारण दुर्दशा में पड़े हैं। हम सबकी यह ENTERTAIMID 2018yoIDIOPATHURApncrewanvarETumcil garmanorammadurainhintanuasthanisanapaddinkha ।
अध्याय ३४] महा मा र न TOPATIMOTAIIMarरापमा PRImuwwwmummommutionautilynewsmuvimulationwinni अन्नविद्भिः परिवृतो भ्रातृभिदधन्विभिः आशीविषसमवारमरुद्भिरिव वृत्रहा अमित्रांस्तेजसा मृन्द्रगन्नसुगनित्र वृत्रहा श्रियमादत्व कोन्तेय ! धार्तराष्ट्रान्महावल ! ॥ ८६ ॥ न हि गाण्डीवमुक्तानां शगणां गार्धवाससाम् । स्पर्शमाशीविपाभानां मर्त्यः कश्चन संसहेत् ॥८७॥ नस बीगेन मातङ्गो न च सोऽश्वोऽस्ति भारत!। यः सहेत गदावेगं मम क्रुद्धस्य संयुगे सृञ्जयः सह ककवृष्णीनां वृपभेण च कथंखियुधि कौन्तेय ! न राज्यं प्राप्नुयामहे ॥ ८९ ॥ शत्रुहस्तगतां गजन् ! कथस्विन्नाऽऽहरेर्महीम् । इह यत्नमुपाहृत्य बलेन महताऽन्वितः इति श्रीमन्महामारन आरण्यकपर्वणि अर्जुनाभिगमनपनि मीमयाचे वयन्निमोऽध्यायः ।। ३३ ।। दंदगा आपकी ही बदौलत है ! हे शत्रुओं के नाश के गान्टीव धनुष ने निकले हुए विचित्र पंववाले वानों करनेवाले ! आप नाझना मे आगीर्वाद पार को मह मके में भी कद्ध होम युद्धमूनि में जब उन्हें धन देने के लिये गीत्र ही मव युद्ध की गहा घुनाऊं तब उनके वेग गे गेरने की गति माननियों में पूर्ण ग्थ पर मबार हथिए और परम ग्वनवाग कोई वीर पुन्प, घोड़ा या हाथी अनी पगनी नहावर्ग हम माटयों के माथ ही समय नक पृथ्वी पर पैदा नहीं हुना। हे भानश्रेष्ठ यदि हन्निनगपुर को चल दीजिए । बेमे देवगन टन्ट ने मय मजय और क्या नया दृष्णिवम-वृडामनि मग्न नानक देवनाओं को माय लेक प्रचन्ड दानवों श्रीकृष्ण हमारे महाया हो और मब मानन्न रोग काहगारवा कागज्य पाया था बम ही आर भी बहुन मा मना मदिन हमारे साथ हों तो हमें विधाम मटयों के माथ दाम दुर्योधन मे गन्य छीन है कि हम गेग युद्ध करके मत्र के हाथ में अनि नीजिए। ऐसा कौन है जो युद्धमूनि में न्हावार अर्जुन राज्य का उद्धार अवश्य लेंगे || बनपर्व का तीनवां अध्याय ममान हुआ ॥३३॥ Murmilammandidalitidinadindinmalintaininthintamatidar अय चनुम्निमोऽध्याय ॥४॥ वैशम्पायन उवाच स एवमुक्तस्तु महानुभावः सत्यवतो भीमसेनेन गजा । अजातशत्रुस्तदनन्तरं वै धर्यान्वितो वाक्यमिदं बभापे युधिष्ठिर उवाच असंशयं भारत ! सत्यमेतद्यन्मांतुदन्वाश्यगन्यःक्षिणोपि hathiandianherintl... - ICTETrrrrrrrrrTTEr:ITTTTTrrrrrrrrrrrrrrr म हा मारत वनपर्व ImummammiduRIMimithanashmmenuintHOJullammamta - EHATITarzEcMAHELIWOODUCUTTERTravgVIRAPILITREE न त्वां विगहें प्रतिकूलमेव ममाऽनयान्द्वि व्यसनं व आगात् ॥ २ ॥ अहं ह्यक्षानन्वपद्यं जिहीर्पराज्यं सराष्ट्रं धृतराष्ट्रस्य पुत्रात् तन्मां शठः कितवः प्रत्यदेवीत्सुयोधनार्थं सुवलस्य पुत्रः महामायः शकुनिः पार्वतीयः सभामध्ये प्रवपन्नक्षपूगान् अमायिनं मायया प्रत्यजैपीत्ततोऽपश्यं वृजिनं भीमसेन ! अक्षांश्च दृष्ट्वा शकुनेर्यथावत्कामानुकूलानयुजो युजश्च शक्यं नियन्तुमभविष्यदात्मा मन्युस्तु हन्यात्पुरुषस्य धैर्यम् यन्तुं नाऽत्मा शक्यते पौरुषेण मानेन वीर्येण च तात नद्धः न ते वाचो भीमसेनाऽभ्यसूये मन्ये तथा तद्भवितव्यमासीत् ॥ ६ ॥ स नो राजा धृतराष्ट्रस्य पुत्रो न्यपातयद्यसने राज्यमिच्छन् दास्यं च नोऽगमयभीमसेन ! यत्राऽभवच्छरणं द्रौपदी नः खं चापि तद्वेत्थ धनञ्जयश्च पुन तायाऽऽगतांस्तां सभा नः यन्माऽब्रवीद धृतराष्ट्रस्य पुत्र एकग्लहाथ भरतानां समक्षम् चाँतीमवां अध्याय ॥ ३४ ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! भीम अनुमार ही सम और विपम पांमे पड़ रहे है तब सेन की उक्त बात को मुनकर वह सत्यवादी और उस दुरात्मा का कपट कुछ-कुछ मुझे मालूम हो गया धैर्यधारी राजा युधिष्ठिर टमी समय कहने लगे- हे था । मुझे उसी समय खल बन्द कर देना था; किन्तु भीममेन ! तुम्हारे वाक्य रूपी वाणों के न गने से में पुरुष के धैर्य को मिटानेवाले क्रोध के आ जाने से यहुत दुखी हुआ हूँ, किन्तु उसके लिय मैं तुमको में किसी तरह खेल से अपने को नहीं रोक सका। दोष नहीं दे सकना । क्योंकि मर ही विना माने. इममें सन्देह नहीं कि धर्म का लोप होने पर पारुप, विचार काम करने के दोष से तुम रांगों को यह अभिमान या चरिता, किसी से आत्मा का मंयम याटिन बनयाम का कर भागना पड़ा है। जुए में नहीं किया जा सकता । मुझे विश्वास है कि प्रेमी दुर्योधन को हराने और उमम गन्य प्राप्त करने के दुर्घटना होनी ही थी, और इसी म में तुम्हें किसी विचार महमिंग जुभावला था; किन्तु दुष्ट शयुनि ताह दीप नहीं दे सकता। दुर्योधन ने जुए में हरा इम पान को जानकर प्रनिनिधि यावर मुझम बरन पर हम रोगों को दास बना लिया था और राज्य गा। दयावानी या कपट का कुछ भी बस में की इन्छा हमें माट में टाल दिया था । उभ नीजानना; किन्तु मनि नापनों पाकिगणि माय उप मट में द्रोपदी ने ही हम रोगों की ६। ममा में समा कपट. पाम पर मुही जान पचाया। उसके बाद फिर जुभा पलने के लिये जप गिया । म अबदेशिनि की महा में मभा में गया गया, नव दुर्योधन ने सप भरना । win trimmy COMMITTAuTIVermanyatreetyummayaPATIPS Firearrrrrrrrrrrrrrrrr permirmirenni अध्याय ३४ । म हा मा र त TIOIEWwwममाIATRITIDARAT TIRUmmanartnam WALI .. VITIT LUPI'VWLLOLIVIU**IU' OLAN CLIVIU PUSTENUTKILUI वने समा द्वादश राजपुत्र ! यथाकामं विदितमजातशत्रो ! अथाऽपरं चाऽविदितं चरेथाः सर्वः सह भ्रातृभिश्छद्मगूढः त्वां चेच्छत्वा तात!तथा चरन्तमवभोत्स्यन्ते भारतानां चराश्च । अन्यांश्चरेथास्तावतोऽब्दांस्तथा त्वं निश्चित्व तत्प्रतिजानीहि पार्थ! ॥ १० ॥ चरैश्चन्नो विदितः कालमेतं युक्तो राजन्मोहयित्वा मदीयान् ब्रवीमि सत्यं कुरुसंसदीह तवैव ता भारत! पञ्च नद्यः वयं चेतद्भारत! सर्व एव त्वया जिताः कालमपास्य भोगान् । वसेम इत्याह पुरा स राजा मध्ये कुरूणां स मयोक्तस्तथेति ॥ १२ तत्र द्यूतमभवन्नो जघन्यं तस्मिञ्जिताः प्रत्रजिताश्च सर्वे इत्थं तु देशाननुसंचरामो वनानि कृच्छ्राणि च कृच्छूरूपाः ॥ १३ ॥ सुयोधनश्चाऽपि न शान्तिमिच्छन्भूयः स मन्योर्वशमन्वगच्छत् । उद्योजयामास कुरुंश्च सर्वान्ये चाऽस्य केचिद्वशमन्वगच्छन् ॥ ११ ॥ तं सन्धिमास्थाय सनां सकाशे को नाम जह्यादिह गज्यहेतोः । आर्यस्य मन्ये मरणाद्रीयो यद्धर्ममुत्क्रम्य महीं प्रशासेत् वंशियों के सामने मुझमे दा-हे युधिष्ठिर ! अबकी नहीं किया और मैंने भी यह गर्न मान री । दिर यदि तुम जुर में हारे तो तुम्हें मान भाटयों-महित हम लोगों का जुआ हुआ । उममें हारने के कारण बारह वर्ष वन में रहना पड़ेगा और फिर एक वर्ष हम ले ग वनवासी हुए। तब मे हम रोग उन्यन अज्ञातवास करना पड़ेगा। इस अज्ञानकाम में यदि हीन थेप में देश-देग और वन वन में मोर-मर हमें तुम्हाग पता लग गया तो तुम्हें फिर बारह वर्ष फिरते हैं । शान्ति की इन्छा न रखनेवाले दुर्योधन वनवाम करना पड़ेगा ॥१॥१०॥ ने क्रोधवा हमको जियो पित्ति में दान दिया किन्तु जो तुम हमार जामुमों में छिपकर और जो उम्वनी रोग उसके अनुगत हुए. टन्हें अमानवामबाग वर्ष विना मकोगे और तुम्हारा दंगगामा, दुर्गरक्षा आदि के ऊँचे पद देकर प्रमन पना हमारे जासूम न लगा मगे नो पञ्चनद का किवा । हे भीमसेन ! पदले मजनों के आगे ममा. गन्य तुम फिर पा जाओगे। मैं कुरु-ममा में यद मण्टर में हारने पर बारह वर्ष वन में रहने की प्रतिमा मच-मच कर रहा हूँ। और जो हम लेग जुए में करने पर मैं उसे तोडकर कैमे गन्य पान की चेष्टा हा जायगे तो हम भी यों ही बनवाम और अन्नान कर सकता हूं ! ऐमा कान मजन करेगा। में बाम करेंगे। हम वार मेन में हन रोगों का यही मझता हूँ कि धर्म को छोड़कर वी का गन्य मग रहा। तुमने या अर्जुन ने हमका कुछ विरोध करने की ओक्षा नर उगना ही आर्य पुरुष के ग्येि hindAamarthaihindtimsinusartalahilianililitiniumin נוחתי MOOTTTY_RATION TOTTITITIPLITT TTECCIII.FI वनपर्व म हा मारत AmmuTITImam mauriamrmanyumndaitaran Mummmmmmmoiruitmumund mainalia mannmiIITTAINMMEVIDENT सदैव चेद्वीरकर्माऽकरिष्यो यदा द्यूते परिघं पर्यमृक्षः वाहू दिधक्षन्वारितः फाल्गुनेन किं दुष्कृतं भीम! तदाऽभविष्यत् ॥ १६ ॥ प्रागेव चैवं समयक्रियायाः किं नाऽब्रवीः पौरुपमाविदानः प्राप्तं तु कालं त्वभिपद्य पश्चारिक मामिदानीमतिवेलमात्थ भूयोऽपि दुःखं मम भीमसेन ! दूये विषस्येव रसं हि पीत्वा यद्याज्ञसेनी परिक्लिश्यमानां संदृश्य तत्क्षान्तमिति स्म भीम! ॥ १८ ॥ न त्वद्य शक्यं भरतप्रवीर ! कृत्वा यदुक्तं कुरुवीरमध्ये कालं प्रतीक्षख सुखोदयस्य पक्तिं फलानामिव वीजवापः ॥ १९ ॥ यदा हि पूर्व निकृतो निकृन्तेद्वैरं सपुष्पं सफलं विदित्वा । महागुणं हरति हि पौरुपेण तदा वीरो जीवति जीवलोके ॥ २०॥ श्रियं च लोके लभते समयां मन्ये चाऽस्मै शत्रवः संनमन्ते मित्राणि चैनमचिराद्भजन्ते देवा इवेन्द्रमुपजीवन्ति चैनम् मम प्रतिज्ञा च निवोध सत्यां वृणे धर्मममृताजीविताच राज्यं च पुत्राश्च यशो धनं च सर्व न सत्यस्य कलामुपैति ॥ २२ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि युधिष्ठिरवाक्ये चतुरिंशोऽध्याय ॥३४॥ भरा है। हे भीमसेन ! तुमने जर उस चूत सभा रहे, यह बात इस समय म्मरण आने पर पिये हुए में बेरन उठाकर मेरे दोनों हाथों को जरा दना विष की तरह मेरे हृदय और सारे शरीर को पीड़ा चाहा था तब अर्जुन ने तुमको रोका था। उम ममय पहुँचा रही है । हे भरतश्रेष्ठ | तुगने कुरुक्श के तुमने अर्जुन का कहा न मानकर वीरता क्यों नहीं वीरों के बीच में जो दुर्योधन और दु शासन को प्रकट की। जो मा कर टारने तो इतना परेश मारने आदि की प्रतिज्ञा की है उसको अभी पूर्ण ग सहना पहना । जुभा गेग्ने के ममय प्रतिना करने की इच्छा क्मिी तरह ठीक नहीं । किसान पपने और हारने में पहले ही तुमने मुझमे एमे वचन रोग जैसे बीज बोकर उसके फरने के समय पयों नहीं कहे ! तुम ना अपने पारप को अन्ती की राह दम्पते हैं मे ही तुम भी अपने मुम्ब और तरह जानने थे। तुम उम समय में यचन पाते अग्युदय के समय की प्रतीक्षा करो। जिसको धोखा नो शायद यह अनर्थ न होना। इम ममय कार. दिया गया यह यदि धोखा देनेवाले को, सय गुप्य विगति को बीकार पान के पधान् गुम यों तरह पुष्ट पार, नष्ट करना ह-यदरा रेता है तो मनानम पया पर रोगा। भीमन ! हमरोग उमः पंप की यही प्रगामा होती और उसका समय सी वी दुशा दगार भी गुप जगत् में जाना माधक होनाद ॥११॥२०॥ mirmireorm...mammy.miraim tiumanSant UPITERIODaareer IAOMI PremiTTTrrrrrrrrrrrrerririTrg rrrrr Iiruvrer5*" . crrcrcii अध्याय ३४] महा भारत १६०३ TO IM TI TITATI DUITTIIN TITW wonin UTIMITATITITETTIINTEUTTWOMAT MAT वह संसार में साम्राज्यलष्टमी प्राप्त करता है। नहीं हो सकती। मै देवभाव और जीवन की अपेक्षा सब शत्रु उसे मिर झुकाते और उससे दवते हैं। जैसे भी सत्य को प्रिय समझता हूँ । राज्य, धन, पुत्र या देवगण इन्द्र की सेवा किया करते है वैसे ही मित्र- यश, कुछ भी सत्य-धर्म की एक क्ला के भी समान गण अत्यन्त अनुराग के साथ उसको मानते हैं । हे ! नहीं है ॥२१॥२२॥ वीर ! तुम निश्चय जानो कि मेरी प्रतिना कभी मिथ्या वनपर्व का चौंतीसवां अध्याय समाप्त हुआ |॥ ३४ ॥ anSHe-- mmmmmmmmmmalniminaliamilandimamlinniaDairliamilnaduiaantimidatunit matradithunitiamwaimam अथ पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५॥ भीम उवाच-सन्धि कृत्वैव कालेन ह्यन्तकेन पतत्रिणा अनन्तेनाऽप्रमेयेण स्रोतसा सर्वहारिणा प्रत्यक्षं मन्यसे कालं मर्त्यः सन्कालवन्धनः । फेनधर्मा महाराज ! फलधर्मा तथैव च निमेषादपि कौन्तेय यस्याऽऽयुरपचीयते सूच्येवाऽञ्जनचूर्णस्य किमिति प्रतिपालयेत् ॥ ३ ॥ यो नूनममितायुः स्यादथ वाऽपि प्रमाणवित् । स कालं वै प्रतीक्षेत सर्वप्रत्यक्षदर्शिवान् ॥ ४ ॥ प्रतीक्ष्यमाणः कालो नः समा राजस्त्रयोदश । आयुपोऽपचयं कृत्वा मरणायोपनेण्यति शरीरिणां हि मरणं शरीरे नित्यमाश्रितम् पैंतीमवां अध्याय ॥ ३५ ॥ भीमसेन ने कहा-हे महाराज ! फेने के समान है वैसे ही पल-पल करके जिमकी आयु क्षीण होती शीघ्र मिट जानेवाले और फल के समान गिर पड़ने- है उस मनुप्य के लिये अनन्त काल की प्रतीक्षा वाले 'काल' के अधीन मनुष्य 'काल' को प्रत्यक्ष करना कभी मम्भव नहीं। जिसका जीवन का समय जात सा समझा करते हैं। किन्तु वह अनन्त, अप्र बहुत बड़ा है, अथवा जो सब बातों को पहले से मेय और सबका अन्त करनेवाला 'काल' वाण की ही प्रत्यक्ष की तरह देखता है, या अपने जीवन काल तरह गीघ्रगामी और जल की धारा की तरह नित्य के परिमाण को जानता है वही ससय की प्रतीक्षा करे। चलायमान है । इसी कारण ऐसे काल की प्रतीक्षा । यह कौन कह सकता है कि हम रोग तेरह वर्ष की करके फल पाने की सम्भावना कहां है ? जैसे बहुत बाट जोहते-जोहते बीच में ही काल के मुँह का महीन सलाई भी कुछ न कुछ अञ्जन खर्च कर देती । कौर न बन जायेंगे? जब कि मृत्यु हर घड़ी हरएक HamromanterruptemutePAIDrurexercury लपODAIDYADROIRADUADODAREDEErruarparrorerurromurar १६०४ म हा मारत वनपर्व unnanARATimirmmupermaliniUITMISSETrandiRITUITamiltianimeluNuuntin ITRARHIT Rian.zwanatantrananimammuTIMNTANICTarunsariminame "TTA INITIONSOMerrowaunuyYOURAILWARA .. - प्रागेव मरणात्तस्माद्राज्यायैव घटामहे यो न याति प्रसंख्यानमस्पृष्टो भूमिवर्धनः अयातयित्वा वैराणि सोऽवसीदति गौरिव ॥ ७ ॥ यो न यातयते वैरमल्पसत्वोद्यमः पुमान् । अफलं जन्म तस्याऽहं मन्ये दुर्जातजायिनः ॥ ८ ॥ हैरण्यौ भवतो वाहू श्रुतिर्भवति पार्थिवी हत्वा द्विषन्तं संग्रामे भुक्ष्व वाह्वर्जितं वसु ॥ ९ ॥ हत्वा वै पुरुषो राजन् ! विकर्तारमरिन्दम अह्नाय नरकं गच्छेत्स्वर्गेणाऽस्य स संमितः ॥१०॥ अमर्पजो हि संतापः पावकाहीप्तिमत्तरः येनाऽहमतिसंतप्तो न नक्तं न दिवा शये अयं च पार्थों चीभरसुर्वरिष्टो ज्याविकर्षणे आस्ते परमसंततो नूनं सिंह इवाऽऽशये ॥ १२ । योऽयमेको न मनुते सर्वाल्लोके धनुर्भूतः । सोऽयमात्मजमृण्माणं महाहस्तीव यन्छति ॥ १३ ॥ नकुलः सहदेवश्च वृद्धा माता च वीरसू तवेव प्रियमिच्छन्त आसते जडमृकवत् ॥ १४ ॥ मनुष्य के शरीर के साथ लगी हुई है तब हमें उससे उपार्जित धर्य का भोग कीजिए । अपने को पोला पहले ही राज्य पाने की चेष्टा क्यों न करनी चाहिये। देनेवाले पुरुष को उमी ममय मारकर यदि नरक जो पुरुप भग्ना आदि गुणों से अपने को प्रमिद भोगना पड़े तो वह नरक भी वर्ग के समान है। घरे मधुओं मे बदला लेकर, श्रेष्ठ की नहीं प्राप्त ॥१॥१०॥ यम्मा यह पृथ्वी का भार पनका हर गांचनेवाले ६ भरता ! शोध की आग आग से भी पलपी नाहट पाताई घोड़े यल और उघमाग यदकर हानी है। मैं हर पड़ी सी आग में जस्ता औपुरण परियों से बदरानुकान में विमुख होता है, रहता हूँ। मेरा खाना-पीना टूट गया है। अद्वितीय र जमको मेनिन समझना । महारान! धनुर महावीर अर्जुन ममर में वीग के लिये अजेय भारी भुजाएं सुदर्श मापनि दो अधिकारिणी में दार भी दिन-रात हृदय में माता में सपन हुए, और नमी गजानकी महामयिभार गराज छी तरह, अपने माय को आप रोके दुप पद में सभी का ना पाप अपने बापर में हैं। अईले ही गय पीरों का नाम पर सायाने - HTTrreratrikrrrrroretirrrrriMEXPHrrrrrrrrnersPEECIPEECTerwents* अध्याय ३५] म हा भारत १६०५ armanmmmmmmmmm TAITAMITALITIHAiduniaTramananा Minaranamalsindianimaummitmmaavnwr madhwtandimamme सर्वे ते प्रियमिच्छन्ति वान्धवाः सह मृञ्जयः । अहमेकश्च संतप्तो माता च प्रतिविन्ध्यतः प्रियमेव तु सर्वेषां यद्ब्रवीम्युत किंचन सर्वे हि व्यसनं प्राप्ताः सर्वे युद्राभिनन्दिनः ॥ १६ ॥ नाऽतः पापीयसी काचिदापद्राजन् ! भविष्यति । यन्नो नीचरल्पवले राज्यमाच्छिद्य भुज्यते ॥ १७ ॥ शीलदोपाद् घृणाविष्ट आनृशंस्यात्परन्तप! क्लेशांस्तितिक्षसे राजन्नाऽन्यः कश्चित्प्रशंसति ॥ १८ ॥ श्रोत्रियस्येव ते राजन् ! मन्दकस्याऽविपश्चितः । अनुवाकहता बुद्धिर्नपा तत्त्वार्थदर्शिनी घृणी ब्राह्मणरूपोऽसि कथं क्षत्रेपु जायथाः अस्यां हि योनौ जायन्ते प्रायशः क्रूरबुद्धयः ।। २० ।। अश्रौपीस्त्वं राजधर्मान्यथा वै मनुरब्रवीत् । क्रूरान्निकृतिसंपन्नान्विहितानशमात्मकान् ॥ २१ ॥ धार्तराष्ट्रान्महाराज! क्षमसे किं दुरात्मनः कर्तव्ये पुरुषव्याघ्र ! किमास्से पीठसर्पवत् ॥ २२ ॥ अर्जुन लाचार होकर अत्यन्त क्लेश भोग रहे हैं। राजन् ! आप अपने स्वभाव के दोप से शत्रुओं पर नकुल, सहदेव और कुन्ती, सभी आपका प्रिय करने दया करके यह क्लेश भोग रहे हैं । आपके इम के लिये जड़ और गूगों की तरह समय व्यतीत कर काम को कोई अच्छा नहीं कहता । हे धर्मपरायण! रहे हैं। कुछ नहीं कहते । मैं और राजकुमार प्रतिविभ्य आपकी वुद्धि, अर्थज्ञान से रहित और वेदों के की माता द्रौपदी, दोनों अत्यन्त सन्ताप के साथ अक्षर-मात्र को रटनेवाले अत्यन्त निन्दित श्रोत्रिय वनवास का क्लेश सह रहे हैं। मैं जो आप से कह की तरह, केवल गुरु के उपदेश की अनुगामिनी रहा हूँ यही आपके सब म्वजनों को प्रिय हैं। हम है; यथार्थ तत्त्व को विचारपूर्वक देखने में असमर्थ सर भाई वीर और संग्राम-प्रिय हैं तो भी हम इस है। आप ब्राह्मणों की तरह दयाल हैं । क्षत्रियवंश प्रकार के कष्ट में पड़े है । हे महाराज ! हमसे कम में आप कैसे रसन्न हुए ! क्षत्रियवंग में तो प्रायः वर वाले नीच-बुद्धि पुरुष हमारे राज्य को छीनकर ' क्रूर म्पभाववाले पुरुष ही जन्म लेते हैं ॥११॥२०॥ मुम्ब से टसका उपभोग कर रहे हैं। इसमे बढ़कर हे भरतनन्दन ! आप मगरान् मनु के बहे और बुरी आपत्ति और कोई नहीं हो सकती। हे , राजधर्म को विशेष रूप से जानते है । उन्होंने कर rarimmmuniMIUMLalithalidiindinstals adulundministm. - MOTImmumoremropyrITITIrrrrrrrameterCori म हा मारत वनपर्व PimgrumwimminiumininanmiminiuminiumimilamINITIAudinasamaMMIMPianartan raamirmirawimmmmmmmIRinanormanamannE बुद्धया वीर्येण संयुक्तः श्रुतेनाऽभिजनेन च । तृणानां मुष्टिनैकेन हिमवन्तं च पर्वतम् ॥ २३ ॥ छिन्नमिच्छसि कौन्तेय ! योऽस्मान्तवर्तुमिच्छसि । अज्ञातचर्या गूढेन पृथिव्यां विश्रुतेन च ॥ २१ ॥ दिवीव पार्थ ! सूर्येण न शक्या चरितुं त्वया । बृहच्छाल इवाऽनूपे शाखापुप्पपलाशवान् ॥ २५॥ हस्ती श्वेत इवाऽज्ञातः कथं जिष्णुश्चरिष्यति । इमौ च सिंहसङ्काशौ भ्रातरौ सहितौ शिशू ॥ २६ ॥ नकुलः सहदेवश्च कथं पार्थ! चरिष्यतः पुण्यकीर्ती राजपुत्री द्रौपदी वीरसूरियम् ॥ २७॥ विश्रुता कथमज्ञाता कृष्णा पार्थ! चरिष्यति । मांचापि राजन्!जानन्ति ह्याकुमारमिःप्रजाः। २८ ।। नाऽज्ञातचर्यां पश्यामि मेरोरिव निगृहनम् । तथैव बहवोऽस्माभी राष्ट्रेभ्यो विप्रवासिताः ॥ २९ ॥ राजानो राजपुत्राश्च धृतराष्ट्रमनुव्रताः छली पुरुषों के साथ क्षमा का व्यवहार करने को छिपकर रहना सम्भव नहीं । ऐरावत के समान नहीं कहा है । फिर आप क्यों क्रूर, छली, दुरात्मा । अर्जुन का शरीर विविध शाखा-पुप्प पूर्ण शाल वृक्ष दुर्योधन आदि का नाश करने को कटिबद्ध नहीं । के समान लम्बा-चौड़ा है। वही कैसे छिपकर रह होते । हे कुन्तीपुत्र ! अजगर की तरह बिना हाथ. सकेंगे? सिंह के समान पराक्रमी नकुल और सहदेव पाच हिलाये रहना ही क्या आप कर्तव्य समझते ही से अज्ञातवास करेंगे। वीर पुत्रों की माता, हैं । आप तो बड़े बुद्धिमान और परमपराक्रमी है। ये द्रौपदी भी अपने रूप और गुणों के कारण जगत् सोचिए तो, आप इस तरह रहकर कैसे हम लोगों | भर में विख्यात है । यही कैसे अज्ञातवास में हिप- की रक्षा कर सकेंगे। मुट्टीमर घास-फूस के द्वारा ! कर रह सकेंगी मुझे भी सब प्रजा के लोग बचपन कही हिमालय पर्वत ढका जा सकता है। परन्तु से पहचानते हैं । घास फूस आदि के द्वारा जैसे देग्यता हूँ, आप यही करना चाहते हैं । आकाश- 1 कोई सुमेरु पर्वत को छिपाना चाहे पैसे मै ही किस मार्ग में सूर्य का छिया रहना जैसे असम्भव है से तरह अपने को छिपा सकूँगा। पहले हमने अनेक ही युद्धि, बल, शास्त्र भाग और पुरीनता आदि । राजाओं को राज्य से भ्रष्ट कर दिया है। ये सब इस गुणों मे प्रमिद्ध जो आप है उनका पट-वेष से समय अवश्य दुर्योधन के साथी बन गये होंगे। पहले IDROSTITvenuTomTIOTUSTRATIMIRCTRICROTOTRurammamerE TanuTIME TIT,ID'U'NU'CU'l'oi'ri'act cumpreurTTOBILUTONOTOTICE UOMI अध्याय ३६) म हा भारत १६०७ ITT TITTITATI TUTTI TOT TOIMITTUTTO TUTILITILATOA Louwtrim0rt IV LLI: 1 ON JULLILLLLLL न हि तेऽप्युपशाम्यन्ति निकृता वा निराकृताः ॥ ३० ॥ अवश्यं तैनिकर्तव्यमस्माकं तत्प्रियैषिभिः तेऽप्यस्मासु प्रयुञ्जीरन्प्रच्छन्नान्सुवहूंश्चरान् । आचक्षीरंश्च नो ज्ञात्वा ततः स्यात्सुमहद्भयम् ॥ ३१ ॥ अस्माभिरपिताः सम्यग्वने मासास्त्रयोदश परिमाणेन तान्पश्य तावतः परिवत्सरान् ॥ ३२ ॥ अस्ति मास प्रतिनिधिर्यथा प्राहुर्मनीषिणः । पूतीकानिव सोमस्य तथेदं क्रियतामिति ॥ ३३ ॥ अथवाऽनडुहे राजन् । साधवे साधुवाहिने सौहित्यदानादेतस्मादेनसः प्रतिमुच्यते ॥ ३४ ॥ तस्माच्छत्रुवधे राजन् । क्रियतां निश्चयस्त्वया । क्षत्रियस्य हि सर्वस्य नाऽन्यो धर्मोऽस्ति संयुगात् ॥ ३५ ॥ इनि श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि अर्जुनाभिगमनपाण भीमवाक्ये पश्चरिंशोऽध्याय ॥३॥ हमने उन्हें हराया था। उनके राय से उन्हें निकाल जैसे 'सोमलता' की जगह पर यज्ञ में काम दे सक्ती पार किया है, इमरिये अब वे भी न चूकेंगे। है वैसे ही एक माम एक वर्ष का प्रतिनिधि हो दुर्योधन के साथी ओर दिनपी होकर वे हमें सताने सस्ता ह । आप तेरह महीनों की तरह र्प मानकर E की चेष्टा करेंगे ॥२१॥३०॥ शत्रुओं का नाश करने के लिये तेयार हो जाइए । वे भी हमारा पता लगाने के लिये अज्ञातवास यदि आप इम प्रतिनाभन में कोई पाप समझते हों के समय बहुत मे नासूम नियत करेंगे। वे हमारा पता तो, धर्मशास्त्र के कथनानुसार, नोझ ढोनेवाले वर का लगाकर यदि हमारे शत्रुओं को सूचित कर देंगे तो पेभर मोनन दकर उसका प्रायश्चित कर डानिएगा ! अवश्य हमें पिर बारह वर्प बनवास का कष्ट उठाना इस प्रकार उस पाप मे आप छुटकारा पा सकते हैं। पड़ेगा । हे महारान ! इस समय हम वन में रहते इसलिये अब आप शत्रुओं को मारन के लिये निश्चय तेरह मास हो गये हैं। आप इनको तेरह वर्ष के समान कर लीजिए, क्योंकि युद्ध ही मत्रियों का सनानन ममझ सकन है । शास्त्रमाग का कहना है कि 'पूतिका' धर्म है ॥३१॥३५॥ वनपर्व का पतीमवा अध्याय ममाप्त हुआ ॥३॥ 1.tamTumnium TimrINTDuantumamimarimmit UTTITIFUnirl.ITI Irlalruildi अथ पदनिंगोऽध्याय ॥ चम्पायन याच भीमसेनश्चः श्रुत्वा कुन्तीपुत्रो युधिष्टिर निःश्वम्य पुस्पव्याघ्रः सप्रदध्यो परन्तप ॥ १ ॥ T" CRTIMr.rn. mium merennim remTTTTTTTTTTTTTTTTTEACrorartM १६०८ म हा भारत वनपर्व । IITTERail.ruarumilithARTINITINUTin m 110VTCWmnWTIMTIMI A1107010 NOTITUTIONIDAD TID OLLA Waarom श्रुता मे राजधर्माश्च वर्णानां च विनिश्चयाः । आयत्यां च तदात्वे च यः पश्यति स पश्यति ॥ २ ॥ धर्मस्य जान मानोऽहं गतिमन्न्यां सुदुर्विदाम् । कथं बलात्करिष्यामि मेरोरिव विमर्दनम् ॥ ३ ॥ स मुहूर्तमिव ध्यात्वा विनिश्चित्येतिकृत्यताम् । भीमसेनमिदं वाक्यमपदान्तरमब्रवीत् युधिष्ठिर उवान-एवमेतन्महाबाहो ! यथा वदसि भारत ! इदमन्यत्समाधव वाक्यं मे वाक्यकोविद ! ॥ ५ ॥ महापापानि कर्माणि यानि केवलसाहसात् । आरभ्यन्ते भीमसेन ! व्यथन्ते तानि भारत ! ॥ ६ ॥ सुमन्त्रिते सुविकान्ते सुकृते सुविचारिते । सिध्यन्त्यर्था महाबाहो ! देवं चाऽत्र प्रदक्षिणम् ॥ ७ ॥ यतु केवलचापल्याद्वलदपोत्थितः स्वयम् आरब्धव्यमिदं कार्य मन्यसे शृणु तत्र मे ॥ ८ ॥ भूरिश्रवाः शलश्चैव जलसन्धश्च वीर्यवान् । भीष्मो द्रोणश्च कर्णश्च द्रोणपुत्रश्च वीर्यवान् ॥ धार्तराष्ट्रा दुराधर्षा दुर्योधनपुरोगमाः चशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! धर्मराज | विषय में कुछ और भी कहना है । यह मेरा कथन युधिष्ठिर, भीमसम के ये वचन सुनकर, एक लम्बी एकाग्र होकर सुनो। हे वीर ! जो कम केवल साहस सांस लेकर कुछ देर तक सोचते रहे। ये सोचने रगे के भरोसे किये जाते हैं वे निम्सन्देह पापपूर्ण हैं । कि मैंने सब वर्णो के, और राजाओं के, धर्म सुने । उनके करने से पीछे अन्तःकरण को चोट लगती है। । जो कोई अच्छी तरह आगा-पीछा सोचकर वर्त- । आगे-पीछे अच्छीतरह सोचकर युक्तिपूर्वक जो काम मान पर विचार कर सकता है वही सच्चा जानकार किये जाते हैं वे ही ठीक-ठीक सिद्ध होते हैं । उन है। में धर्म के गर्म को अच्छी तरह जानकर भी कैसे कामों की सिद्धि में देय भी सहायता करता है । तुम उसके विपरीत चल सकता हूँ ! महाराज युधिष्ठिर आगे-पीछ सोचे बिना बल और घमण्ड के मारे बिल छ देर तक ध्यानमा होकर यो सोचकर और । कुल नासमझ की तरह जिस साहस के काम में लगना अपना काव्य टीक करके भीमसेन में घोले-हे 'नाइने हो, उसके विषय में जो कुछ मुझे कहना महाया! तुम्हारा यह कहना ठीक नहीं है । मुझे इम , सी सुनो । मरिश्रया, शल, जलमन्ध, भीष्म, द्रोण, purT***@bum''19'0'Wro'n'U'MITTETTUUNOITETTUATORIA WLMin muu TIETOS TRUIDORMINVIVIUMTI FTUAMISIJOUTTELEMEES - - mimammruram Inarurrinirmitinidinimirmirmantitanni litilis uninthinnali samainaminimmunnames अध्याय ३६ ] म हा मारत Twimmmmmmmmmm ImmanwroomrammarmuILITITIGELTS एव कृतास्त्राश्च सततं चाऽऽततायिनः ॥१०॥ राजानः पार्थिवाश्चैव येऽस्माभिरुपतापिताः संश्रिताः कोरवं पक्षं जातन्नेहाश्च तं प्रति ॥ ११ ॥ दुर्योधनहिते युक्ता न तथाऽस्मासु भारत ! । पूर्णकोशवलोपेताः : प्रयतिप्यन्ति सङ्गरे ॥ १२ ॥ सर्वे कोरवसन्यस्य सपुत्रामात्यसैनिकाः संविभक्ता हि मात्राभिौगैरपि च सर्वशः ॥ १३ ॥ दुर्योधनेन ते वीरा मानिताश्च विशेषतः । प्राणांस्त्यक्ष्यन्ति संग्राम इति मे निश्चिता मतिः॥ १४ ॥ समा यद्यपि भीप्मस्य वृत्तिरस्मासु तेषु च । द्रोणस्य च महाबाहो ! कृपस्य च महात्मनः ॥ १५ ॥ अवश्यं राजपिण्डस्तनिवेश्य इति मे मतिः । तस्मात्त्यक्ष्यन्ति संग्रामे प्राणानपि सुदुस्त्यजान् ॥ १६ ॥ सर्वे दिव्यास्त्रविद्वांसः सर्वे धर्मपरायणाः अजेयाश्चेति मे बुद्धिरपि देवैः सवासवेः ॥ १७॥ अमपी नित्यसंरब्धस्तत्र कर्णो महारथः पराक्रमी अश्वत्थामा और दोधन आदि दुर्द्धर्य | जैमा सम्मान करता है उसमे यह आगा नहीं की धृतराष्ट्र के पुत्र, ये सभी अत्रविद्या में बड़े निपुण | जा मनी कि वे कभी दुर्योधन के विरुद्ध कुछ हैं और मदा युद्ध के लिय कटिबद्ध रहते हैं ॥१॥१०॥ केंगे । मुझे तो निश्चय है कि आवश्यक्ता पड़ने विपकर जिन राजाओं को हंगकर हमने पर वे युद्ध में दुर्योधन के लिये अपने प्राण तक नीचा दिखाया है ये मय इस समय दुर्योधन के पक्ष दमकते हैं । यह अवश्य है कि भीष्म, टोग और में हो गये हैं। दुर्योधन ने भी उनको बहुत मा धन कृपाचार्य दोनों पक्षों (काग्वों और पाण्डवों) पर और मैन्य माम्न देकर और भी अधिक अपने यगर बह रखने है। किन्तु वे इम ममय दुर्योधन अनुकूल तथा आजाकारी बना लिया है । युद्ध में ही अन्न-यन और अनेक प्रकार के भोग पाने आम्म होने पर वे कभी हमाग सहायना नहीं हैं। इसके शिये वे उनके ऋणी है। उम ऋणको करेंगे। दुर्योधन ने तरह-तरह के वन, माभूपग, चुकाने के लिये ये अवश्य दुर्योधन की और मे, धन आदि देकर मैनिकों को मन्तुष्ट करना है। प्राणों की ममता छोड़कर, युद्ध कग व मय घर, म्वयं दुर्योधन वीर पुरुषों से ना रहकर उनका भम विद्या में निपुण और युद्धाग में अद्वितीय है। "**"'''POPUCIO'T''W''UltUVID'!',1.CONTITETT'CIVICTORIDOR D'*L! STOPOITOUTE - Mauliitl...दा. . HOTrurIIITTrrerymammmmmmmrrrrrrrrrrrrrrroram महा मारत वनपर्व mamimarathisanninmnmantrATUNLIMIRATEINiminimamsDI ॥१८॥ onarmanorammarATTRanam .. सर्वास्त्रविदनाधृष्यो ह्यभेद्यकवचावृतः अनिर्जित्य रणे सर्वानेतान्पुरुषसत्तमान् अशक्यो ह्यसहायेन हन्तुं दुर्योधनस्त्वया न निद्रामधिगच्छामि चिन्तयानो वृकोदर ! । अतिसन्धिनुाहान्सूतपुत्रस्य लाघवम् 11 २० ॥ वैशम्पायन उवाच-एतद्वचनमाज्ञाय भीमसेनोऽत्यमर्पणः बभूव विमनास्त्रस्तो न चैवोवाच किंचन ॥ २१ ॥ तयोः संवदतोरेवं तदा पाण्डवयोईयोः आजगाम महायोगी व्यासः सत्यवतीसुतः । २२ । सोऽभिगम्य यथान्यायं पाण्डवैः प्रतिपूजितः । युधिष्टिरमिदं वाक्यमुवाच वदतां वरः ॥ २३ ॥ न्याम उबान-युधिष्ठिर ! महावाहो ! वेद्मि ते हृदयस्थितम् । मनीपया ततः क्षिप्रमागतोऽस्मि नरर्पभ ! भीमाद द्रोणात्कृपाकर्णाद् द्रोणपुत्राच्च भारत!। दुर्योधनान्नृपसुतात्तथा दु शासनादपि ॥ २५ ॥ यत्ते भयममित्रन ! हृदि सपरिवर्तते अब विधा में निपुण महारथी कर्ण का गरीर सदा दोनों पाण्डव इस तरह बात चीत कर ही रहे थे कि करव से सुरक्षित रहता है । वह कपच किसी प्रकार महर्षि वेदव्यास वहा पर आ पहुँचे । पाण्डवों ने उनका में काटा नही जा सकना । युद्धभूमि में कुपित यथोचित सरकार किया। इसके उपरान्त व्यासदेव वर्ण का सामना करना कई महज काम नहीं है। जीने युधिष्ठिर से कहा हे नरश्रेष्ठ! मैं अपने तपोबल तुम महायहीन दो। फिर किस तरह इन सब स तुम्हारे हदय के भाव का जानकर शीघ्रता से महायरी वीर पुरषों को हरा सकोगे। पहले इन यहा आया है। ह महागज ! तुम्हें भीप्म, द्रोण, योग को हगये पिना किमी तर तुम दुर्योधन की पाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, दुर्योधन और दुःशासन गार नहीं मांगे। भाई भीम, दुर्घ कर्ण की युद्ध से जोमय रग रहा है उसी को दूर करने में तुम्हारे निपुणता कम्मरण कर गुम गाना पीना या मांना मा आया है। जिम उपाय से तुम्हारी नहीं आएगना ॥९॥२०॥ हा होगी यह मैं कहता हूँ। मुनकर उभी के ग्रोधी भीगमन भने पर गई युधिष्ठिर तय अनुमार कार्य करी । उम उपाय के अनुमार कार्य पवन गुनकर दाम भाव में उपर पुरा । पाने र तुम्हें पद व्यर्थ चिन्ता न करनी EmmanumammummalkinandMmmarulaiaasandhortrauasaram innamaruritannuliMAATM -- या । 12. I mwiririrrrrrrrrrsim ertrrrti" tritt : 131 artnereirWeror'crcnc1* अध्याय ३६ महा भारत FIRomamimrronmmmmmmuncuminimummmmmmmmmundarmadarare - EUISILLID ILLILULURULUVITILA LOTTOP"* "CD'lererLOTPUUTOU'L'LLPOLITTLILLY'L'LL! तत्तेऽहं नाशयिष्यामि विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ २६ ॥ तच्छ्रुत्वा धृतिमास्याय कर्मणा प्रतिपादय । प्रतिपाद्य तु राजेन्द्र ! ततः क्षिप्रं ज्वरं जहि ॥ २७ ॥ तत एकान्तमुन्नीय पाराशयों युधिष्ठिरम् अब्रवीदुपपन्नार्थमिदं वाक्यविशारदः श्रेयसस्ते परः कालः प्राप्तो भरतसत्तम ! येनाऽभिभविता शत्रूनणे पार्थो धनञ्जयः ॥ २९॥ गृहाणेमां मया प्रोक्तां सिद्धि मूर्तिमतीमिव । विद्यां प्रतिस्मृतिं नाम प्रपन्नाय ब्रवीमि ते ॥ ३० ॥ यामवाप्य महावाहुरर्जुनः साधयिष्यति अस्त्रहतोर्महेन्द्रं च रुद्रं चैवाऽभिगच्छतु वरुणं च कुवरं च धर्मराजं च पाण्डव ! । शक्तो ह्येष सुगन्द्रष्टुं तपसा विक्रमेण च ॥ ३२ ॥ ऋपिरेप महातेजा नारायणसहायवान् पुराणः शाश्वतो देवस्त्वजेयो जिष्णुरच्युतः ॥ ३३ ॥ अस्त्राणीन्द्राञ्च रुद्राञ्च लोकपालेभ्य एव च समादाय महाबाहुर्महत्कर्म करिष्यति ॥ ३ ॥ वनादस्माञ्च कौन्तेय! वनमन्यद्विचिन्त्यनाम् होगी। इसके पश्चात् त्र्यामदेव धर्मराज को बुलाकर कुबर और धर्म आदि देवताओं के भी दर्शन पावेंगे। एकान्त में ले गये। वहां पर व्यामदेव जी ने कहा-हे अर्जुन महानेजम्बी प्राचीन ऋषि है । भगवान् नारा- भरन श्रेष्ठ ! मैं तुमको प्रतिम्मृति नाम की विद्या देता यण इनके महायक है । इनको काई जीत नही हूँ, इमको तुम ग्रहण करो। हम विद्या के पा जाने । सकना । य अर्जुन इन्द्र, म्द्र, वरण आदि रोकपागे मे अर्जुन युद्ध में शत्रुओं को ले डालेंगे ॥२१॥३०॥ से अनेक प्रकार के अम पाकर बड़ा भाग काम महाबाहु अर्जुन इम विद्या के प्रभाव से अब करेंगे। हे धर्मगज युधिष्ठिर, अब तुम रहने के योग्य पाने के लिये तप करेंगे तो देवादिदेव महादेव और और एक वन निश्चित बगे, क्योंकि बहुन ममय तक देवराज इन्द्र की प्रसन्नता प्राप्त कर लेंगे । महावीर एक हीस्थान रहना अच्छा नही रगता । वेद-बदाम अर्जुन तपस्या और पराकम के प्रभाव से वरण, के ज्ञाता बहुन ग्राभग आर माय है। आरंक Samirmiunnar nanciditaliuffinilwnianGISTI.indiathlifanitarianitliftini anisatan findin bhabhidditi.rat...is: - . - मे ** 10miniere TrucTSK'llGTareerHerccrrrrrrrrrrerir.**** महा मारत [ वनपर्व NELamammawITTETIDAIasinusummununiMITAmaramareturmaniwwmarar Simranimmm.inCNTRIMemoranmainamummunimimirmananmain commumaniaaary निवासार्थाय यद्युक्तं भवेदः पृथिवीपते ! ॥ ३५॥ एकत्र चिरवासो हि न प्रीतिजननो भवेत् । तापसानां च सर्वेपां भवेदुद्वेगकारकः ॥ ३६॥ मृगाणामुपयोगश्च वीरुदोषधिसंक्षयः विभर्पि च बहून्विप्रान्वेदवेदाङ्गपारगान् ॥ ३७॥ वैशम्पायन उवाच-एवमुक्त्वा प्रपन्नाय शुचये भगवान्प्रभुः । प्रोवाच लोकतत्त्वज्ञो योगी विद्यामनुत्तमाम ॥ ३८ ॥ धर्मराजाय धीमान्स व्यासः सत्यवतीसुतः । अनुज्ञाय च कौन्तेयं तत्रैवाऽन्तरधीयत युधिष्ठिरस्तु धर्मात्मा तद्ब्रह्म मनसा यतः धारयामास मेधावी काले काले सदाऽभ्यसन् ॥ ४० ।। स व्यासवाक्यमुदितो वनाद् द्वैतवनात्ततः । ययौ सरखतीकूले काम्यकं नाम काननम् ॥४१॥ तमन्वयुमहाराज ! शिक्षाक्षरविशारदाः ब्राह्मणास्तपसा युक्ता देवेन्द्रमृपयो यथा ॥ ४२ ॥ ततः काम्यकमासाद्य पुनस्ते भरतर्षभाः न्यविशन्त महात्मानः सामात्याः सपरिच्छदाः ॥ ४३ ॥ नत्र ते न्यबसन्राजन् ! किंचित्कालं मनस्विनः । धनुर्वेदपरा बीराः शृण्वन्तो वेदमुत्तमम् ॥ १४ ॥ यदुन दिनों तक एक जगह रहने से, रोगों की प्राप्त करके समय समय पर एकाग्र मित्त से उसका भीड़ भाड़ में मान्न नपम्बियों क नप में बाधा पड़ अभ्याम करने लगे ॥३१॥४०॥ मानी। सना और औषधियों का नाश हो सकता इसके पश्चात् महर्षि की आज्ञा म्मरण करके, और गगों की मंध्या भी कम हो जाया योग- नका की छड़कर, ये मस्ती के तट पर मित ना के जाननाले भगवान् श्याम प्रमनिराम काभ्यक यन के लिये चल दिये । यद-वदाह के जानने- धर्मगजको पद व विधा देकर उनम विदाए. याले मामय गभी उनके साथ साथ गले मायक भार अन्नहाना गये । परिमां युधिष्ठिर भी पवित्र वन में पहुंचकर यहा सप पाण्टय रहने लगे। ६ मणि पीना उस गन्नमय विधाको मनिदिन बंद सुनने, शिकार बसने, और दयनानी THMAREETTEMPTrreneurNErrrrrrrrrrentGEETTETAPrayernment Wuawunlodmam.malnutlu.turERAGAurana..marati.aa.antar.com .. - .. STORITARATI.TA.Timhimam GITIOTIITD.TOURina.mm.in.mum hutindiatvammanamamaniamlinamanna अध्याय ३७] म हा भारत १६१३ PaniraniviliTITIOLumntunismnnamimaranamam Taras an aman trimary चरन्तो मृगयां नित्यं शुद्धैर्वाणै गार्थिनः । पितृदेवतविप्रेभ्यो निर्वपन्तो यथाविधि ॥ १५ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि काम्यकवनप्रवेश पत्रिंशोऽध्यायः ।। ३६ ।। तथा पितरों की विधिपूर्वक पूजा करते हुए कुछ समय तक उसी वन में रहे ॥४१॥४५॥ वनपर्व का छत्तीमयां अध्याय ममाप्त हुआ ॥ ३६ ।। विगण अथ समत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७॥ वैशम्पायन उवाच कस्यचित्त्वथ कालस्य धर्मराजो युधिष्ठिरः संस्मृत्य मुनिसंदेशमिदं वचनमब्रवीत् विविक्ते विदितप्रज्ञमर्जुनं पुरुपर्पभ ! सान्त्वपूर्वं स्मितं कृत्वा पाणिना परिसंस्पृशन् ॥ २ स मुहूर्तमिव ध्यात्वा वनवासमरिन्दमः धनञ्जयं धर्मराजो रहसीदमुवाच ह युधिष्ठिर उवाच-भीष्मे द्रोणे कृपे कर्णे द्रोणपुत्रे च भारत ! । धनुर्वेदश्चतुष्पाद एतेष्वद्य प्रतिष्टितः देवं ब्राह्मं मानुपं च सयत्नं सचिकित्सितम् । सर्वास्त्राणां प्रयोगं च तेऽभिजानन्ति कृल्नशः ॥ ५ ॥ ते सर्वे धृतराष्ट्रस्य पुत्रेण परिसान्विताः संविभक्ताश्च तुष्टाश्च गुरुवत्तेपु वर्तते 200" and "Orwimmu muMoptim'OPHILProm EPITOLIWOOL.INLOAD मंतीमवां अध्याय ॥ ३७ ।। वैशम्पायन जी ने कहा-हे राजा जनमेजय ! के चारों अद्गों को अर्थात् लेना, चढ़ाना, छोड़ना इसी तरह कुछ ममय के व्यतीत होने के पश्चात् एक और लौटाना अच्छी तरह से जानते है ॥११॥ दिन महाराज युधिष्ठिर ने वनवास के क्लेश का तनिक ब्राम, देव, और मानुष आदि सब अबों के प्रयोग विचार किया और फिर महर्षि वेदव्याम के उपदेश और शत्रुओं के चलाये इन अबों के उपमंदार में को स्मरण करके बुद्धिमान् अर्जुन को एकान्त में भी ये लोग मुशिक्षित हैं । दुर्योधन नम्रता के साथ युनाया और स्नेहपूर्वक उमकी पीठ पर हाथ फेरकर ' बहुत मा धन देकर इन मवको प्रसन्न रम्बना है और मुम्कगते हुए कहा-दे अर्जुन ! भीष्म, द्रोणाचार्य, मयका गुरु के ममान मम्मान करता है। सब योटा कृपाचार्य, कर्ण और अश्वत्थामा, ये पांचों धनुर्वेद उपसे प्रसन्न रहते हैं । द्रोण आदि आचार्य भी TUL'UTE*3*ebitele ID COLECTIILyurrereSterCICLOT १६१४] महाभारत [ वनपर्व maarpuranournamuraan Hamaruaal.comidnicational - mymarwanamanianumaunimaramanandirmwaranananamane सर्वयोधेषु चैवाऽस्य सदा प्रीतिरनुत्तमा आचार्या मानितास्तुष्टाः शान्ति व्यवहरन्त्युत ॥ ७ ॥ शक्ति न हापयिष्यन्ति ते काले प्रतिपूजिताः । अद्य चेयं मही कृत्स्ना दुर्योधनवशानुगा ॥ ८ ॥ सग्रामनगरा पार्थ! ससागरवनाकरा भवानेव प्रियोऽस्माकं त्वयि भारः समाहितः ॥ ९ ॥ अत्र कृत्यं प्रपश्यामि प्राप्तकालमरिन्दम ! कृष्णद्वैपायनात्तात ! गृहीतोपनिषन्मया तया प्रयुक्तया सम्यग्जगत्सर्व प्रकाशते तेन त्वं ब्रह्मणा तात! संयुक्तः सुसमाहितः ॥ ११ ॥ देवतानां यथाकालं प्रसादं प्रतिपालय तपसा योजयाऽऽत्मानमुपेण भरतर्षभ ! ॥ १२ ॥ धनुष्मान्कवची खड्गी मुनिः साधुव्रते स्थितः । न कस्यचिदन्मार्ग गच्छ तातोत्तरी दिशम् ॥ १३ ॥ इन्द्रे ह्याणि दिव्यानि समस्तानि धनञ्जय ! । त्राद्भीनैवलं देवस्तदा शके समर्पितम् तान्येकस्यानि सर्वाणि ततस्त्वं प्रतिपत्स्यसे । शाकमेव प्रपद्यम्ब स तेऽस्त्राणि प्रदाम्यति मामानिन और मन्तुष्ट रहकर मदा उमक दोषों एक रहस्य विद्या पतलाई है ॥५॥१०॥ को हरने की नेटा दिया करते हैं। समय के आने उम विद्या का टीक-टीक प्रयोग करने से सब पायर्यापन के द्वारा पूजिन होकर ये अश्य अपने जगत प्रमाणित हो सकता है। तुम उम विद्या को योग्य यन, और विक्रम प्राट बगी। अर्जुन : सावधानी में उसका प्रयोग करके देवताओं १० ममय गाय, नगा, यन, समुद्र मान आदिमस्ति को प्रमन को और आना मन उग्र तपस्या में या. गव या दुर्योधन या मगर गाओ। अब तुम धनुष, कवच और बङ्ग धारण घागुम प्रयन्न मिय।। तुम्हार ।। 371 रहा पाक सानुगों का मन कर मुनि के म्यरूप में वाभानियाव का निवारमी उत्तर दिशा को चर जाओ । नाग। के डर असम माय योग्य भी कई यो टीप गोरगर दवा मानयि अब इन्द्र थे। किनारामा गोर अजुनयाम जी ने दो दिय । अब गय अब एक हन्दी पास For:rrrrrrrrrrrrrat Marrrrrrrrrrrrent HAMARImaximummitranslammatuaditain.com.taas.ELax.............. 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महाभारत mmuin.DITIONaraininilammilanidinainamaintaitantriti metininenalitimammiliaNS . अध्याय ३७] १६१५ Emmmmmmm.nramin ranuTITITIOmmarMPERAILERANILtd दीक्षितोऽद्यैव गच्छ त्वं द्रष्टुं देवं पुरन्दरम् । वैशम्पायन उवाच-एवमुक्त्वा धर्मराजस्तमव्यापयत प्रभुः दीक्षितं विधिनाऽनेन धृतवाकायमानसम् अनुजज्ञे तदा वीरं भ्राता भ्रातरमग्रजः ॥ १७॥ निदेशाद्धर्मराजस्य द्रष्टुकामः पुरन्दरम् धनुर्गाण्डीवमादाय तथाऽक्षय्ये महेपुधी ॥ १८ ॥ कवची सतनुत्राणो वडगोधांगुलित्रवान् हुताग्निाह्मणान्निप्कैः स्वस्ति वाच्य महाभुजः ॥ १९ ॥ प्रातिष्ठत महावाहुः प्रगृहीतशरासनः वधाय धार्तराष्ट्राणां निःश्वस्योर्ध्वमुदीध्य च ॥ २० ॥ तं दृष्ट्वा तत्र कौन्तेयं प्रगृहीतशरासनम् अब्रुवन्त्राह्मणाः सिद्धा भूतान्यन्तर्हितानि च ॥ २१ ॥ क्षिप्रमाप्नुहि कौन्तेय ! मनसा यद्यदिच्छसि । अब्रुवन्त्राह्मणाः पार्थमिति कृत्वा जयाशियः ॥ २२ ॥ संसाधयख कौन्तेय ! ध्रुवोऽस्तु विजयस्तव । तं तथा प्रस्थितं वीरं शालस्कन्धोरूमर्जुनम् ॥ २३ ॥ मनांस्यादाय सर्वेषां कृष्णा वचनमब्रवीत् । इमसे तुम इन्द्र ही को प्रमन्न कंगे वही तुमको के मारने का विचार करके एक लम्बी सोम लेकर मय अम्ब देगा ॥११॥१५॥ आकाश की ओर देखा ॥१६॥२०॥ तुम इम विद्या की दीक्षा लेकर इन्द्र मे मिल्ने उम ममय अर्जुन की दम्बार मिद्ध, ब्राह्मण के लिये अभी चल दो। यह कहकर युधिष्ठिर ने आर गुप्त प्राणियों ने कहा-हे कुन्तीपुत्र ! यहुन अर्जुन को वह मन्त्र बना दिया। अब अर्जुन ने शीघ्र तुम्हाग मनोग्य मिद्ध होगा । तुम्हारी विजय दम प्रकार से अपने बड़े भाई मे दीक्षा पाकर उमरी निश्चित है। जाओ, अग्ने मर कार्य सिद्ध करो। मय आना के अनुमार दन्द्र के दर्शनों की दन्छा मे ब्राह्मण आगीर्वाद देते हुए कहने लगे-ई अर्जुन ! गाण्टीव धनुष, दो अक्षय तर्कम तुम निदर होकर जाओ, तुम्हें जय प्राप्त होगी। किये । इसके पश्चात् अमिहोत्र किया। फिर ब्राह्मणों अब अर्जुन को जाने के लिये नयार देयकर दयावनी को बहुत मा धन देकर म्बम्निवानन का पाठ कराया द्रोपदी करण ग्म मे मरके मन कोधिगरिन करनी अर्जुन ने मन में दुर्योधन आदि धृतराष्ट्र के पुत्रों हुई कहने रगी-दे वीर ! तुम्हार जन्म के समय - mmmmmmmmmmmmmmy TIPymouTIMAITHILIPPIMPETITIHAHITENTIANE कवच धारण MamactrrnmmmmmmmmuTorrrrrrcimmmmmm rrrrrrrrrrrr ...
म हा भा र त [ वनपर्व Main TOUmmunmunmuviurunusumifiumlunnnilhnamusuntunauli mucatimiumariAnam 17... Imasti.iranamamalita deviCRITTulsilvstiatitutivatmaithilitnslitimalTGIGEstant - कृष्णोवाच-यत्ते कुन्ती महाबाहो ! जातस्यैच्छद्धनञ्जय ! ॥ २४ ॥ तत्तेऽस्तु सर्व कौन्तेय ! यथा च स्वयमिच्छसि । माऽस्माकं क्षत्रियकुले जन्म कश्चिदवाप्नुयात् ॥ २५ ॥ ब्राह्मणेभ्यो नमो नित्यं येषां भैक्षेण जीविका इदं मे परमं दुःग्वं यः स पापः सुयोधनः ॥ २६ ।। दृष्ट्वा मां गौरिति प्राह प्रहसनराजसंसदि तस्माद् दुःखादिदं दुःखं गरीय इति मे मतिः ॥ २७ ॥ यत्तत्परिषदो मध्ये वह्वयुक्तमभाषत नूनं ते भ्रातरः सर्वे त्वत्कथाभि प्रजागरे ॥२८ ।। रंस्यन्ते वीर ! कर्माणि कथयन्तः पुनः पुनः । नैव नः पार्थ ! भोगेषु न धने नोत जीविते ।। २९ ।। तुष्टिर्बुद्धिर्भवित्री वा त्वयि दीर्घप्रवासिनि त्वयि नः पार्थ ! सर्वेषां सुखदुःखे समाहिते । ३०॥ जीवितं मरणं चैव राज्यमैश्वर्यमेव च आपृष्टोमेऽसि कोन्तेय ! स्वस्तिनाप्नुहि भारत! ।। ३१ । बलवनिर्विरुदं न कार्यमेतत्वयाऽनत्र ! कुन्ती ने जो इच्छा की थी, और तुम्हारे मन में कामी का वर्णन करके तुम्हारी चर्चा करके अपना जो अभिगपा है, मी सत्र मफल हो। मैं ईश्वर मे दिल बहलावेंगे | हे नाथ ! तुम यह निश्चय जानी प्रार्थना करनी है कि हम लोगों में मे कोई फिर कि तुम्हारे बहुत दिन के वियोग के दु ख से अत्यन्त भत्रिय-बुल में न उत्पन्न दो ॥२१॥२५॥ व्याकुल होकर हम लोग आहार, विहार और जीवन मेक्षिा में ही आनी जीविका चरने वाले, में तनिक भी सन्ताप न प्राप्त करेंगे ॥२६॥३०॥ मानों को नमस्कार करती हैं। पहले पापी दुर्योधन पयोंकि हम मय के मुम्व, दुम्व, जीवन, मरण, गजगमा में "गाय गाय" (अंने पुगों की म्बी) गम्य और ऐश्वर्य तुम्हारेही आश्चय है। मै हृदय कहकर पापा मग उपादाम किया था। टमी मे में प्रार्थना करती कि तुम्हारा मगर हो । हे नाथ! मुंग अत्यात दुम हुआ था। किन्तु म माय ग तुमन जिम कार्य के करने का निश्चय किया देमनी हा वियोग ! दुम मम भी यह वीर पुरष कही योग्य है। तुम जय-प्राप्त करने पदा पीडा मारहा?1 पार्थ ! नुम्टो माई के लिये ना जो तुम्हार मय विश दाहा। तुम्ही मर जान पत्रिका जागले समय तुम्हार में नुम्हारी मार और न्याय के शिय पाना और ....... ninterp4TAPATIENTATURATEGRITIEI "111'1V T'UTIMIT TOO LEITTU PILULTIMILOR MULBI । - अध्याय ३७ ] महा भारत पाDJanamimharmilliraiminishwahamstaniantarrarunanidina - Emonommmmm ANTICOTou warreLLERTIDuramminutmunmurenuncum प्रयाह्यविघ्नेनैवाऽऽशु विजयाय महावल! । नमोधाने विधानेच स्वस्ति गच्छ ह्यनामयम् । ३२ ॥ ह्रीः श्रीः कीर्तिद्युतिः पुष्टिरुमा लक्ष्मीः सरस्वती। इमा वै तव पान्थस्य पालयन्तु धनञ्जय ! ॥ ३३ ॥ ज्येष्टापचायी ज्येष्ठस्य भ्रातुर्वचनकारकः प्रपद्येऽहं वसून्रुद्रानादित्यान्समरुद्गणान् ।। ३४ ॥ विश्वेदेवांस्तथा साध्याञ्च्छान्त्यर्थं भरतर्षभ ! । स्वस्ति तेऽस्त्वान्तरिक्षेभ्यः पार्थिवेभ्यश्च भारत!॥ ३५॥ दिव्येभ्यश्चैव भूतेभ्यो ये चाऽन्ये परिपन्थिनः । वैशम्पायन उवाच-एवमुक्त्वाऽऽशिषः कृष्णा विरराम यशस्विनी ॥ ३६ ॥ ततः प्रदक्षिणं कृत्वा भ्रातृन्धौम्यं च पाण्डवः । प्रातिष्टत महाबाहुः प्रगृह्य रुचिरं धनुः ॥ ३७॥ तस्य मार्गादपाक्रामन्सर्वभूतानि गच्छतः युक्तस्यैन्द्रेण योगेन पराकान्तस्य शुष्मिणः ॥ ३८ ॥ सोऽगच्छत्पर्वतांस्तात ! तपोधननिवितान् । दिव्यं हेमवतं पुण्यं देवजुष्टं परन्तपः अगच्छत्पर्वतं पुण्यमेकालैव महामनाः मनोजवगतिर्भूत्वा योगयुक्तो यथाऽनिलः ॥ १० ॥ हिमवन्तमतिक्रम्य गन्धमादनमेव च विधाता को नमस्कार करती हूँ; वे तुम्हाग भरंग से तुम्हारा बचाव रहे ॥३१॥३५॥ करें । ही, श्री, कीर्ति, घुति, पुष्टि, उमा, लक्ष्मी, बाम्पायन ने कहा-ई राजा जनमेजय ! एम मरम्वती, ये सदा विदेश में तुम्हारी रक्षा करें। तुम प्रकार द्रौपदी जब आविर्वाद दे चुकी तब मुन्दर धनुष बड़े भाई की सेवा और उनकी आज्ञा का पालन हाथ में लिये हुए अर्जुन ने अपने भाइयों की और करते हो । इसी कारण मैं तुम्हारे भले की इच्छा पुगेहित धाग्य की प्रदक्षिणा की । इन्द्र योग मे युक्त से वसु, रुद्र, आदित्य, मरगण, विश्वेदेवा, सायण पराक्रमी और कान्तिशाली महापरी अर्जुन जर आदि की आराधना करूंगी। ये शान्ति देवें। दिव्य, चले तब सब प्राणी मार्ग में उनके मामने मे दटने पृथ्वी के, आकाशचारी और अन्यान्य प्रकार के विनों रगे। तपम्बियों के आश्रमों मे मुगाभिन अंनानक AmmonominanimanamamMDiamitaram.ammell.chuadain.cm ..Indial.. UTTINonymyommIIRAMATIPTITANDIDATEDTMITTITIENTITITCrearri .
१६१८ म हा भारत पिन [IIITTrairman Find AurraaammifinalTruman Amma EMAILORIORITIATICAR UJutube.BLISHELAMICCALLLLLLL अत्यकामत्स दुर्गाणि दिवारानमतन्द्रित इन्द्रकीलं समासाद्य ततोऽतिष्टद्धनञ्जयः अन्तरिक्षेऽतिशुश्राव तिष्ठति स वचस्तदा ॥ ४२ ॥ तच्छ्रुत्वा सर्वतो दृष्टिं चारयामास पाण्डवः अथाऽपश्यत्सव्यसाची वृक्षमूले तपस्विनम् ॥ ४३ ॥ ब्राह्मया श्रिया दीप्यमानं पिङ्गलं जटिलं कृशम् । सोऽब्रवीदर्जुनं तत्र स्थितं दृष्ट्वा महातपाः ॥ ४४ ॥ कस्त्वं तातेह संप्राप्तो धनुप्मान्कवची शरी । निवासितलत्राण क्षत्रधर्ममनुवतः नेह शस्त्रेण कर्तव्य शान्तानामेप आलयः । विनीतक्रोधहीणां ब्राह्मणानां तपस्विनाम् ॥४६ ॥ नेहाऽस्ति धनुषा कार्य न सग्रामोऽत्र कर्हिचित् । निक्षिपेतदनुस्तात | प्राप्तोऽसि परमां गनिम् ॥ १७ ॥ ओजसा तेजसा वीर | यथा नाऽन्यः पुमान्क्वचित् । नथा हमन्निवाऽभीक्ष्ण ब्राह्मणोऽर्जुनमब्रवीत् । न चैनं चालयामास धर्यात्सुधृतनिश्चयम् ॥ ४८ ॥ तमुवाच ततः प्रीतः स द्विज. प्रहसन्निव । पर्वनों को रापते हुए अर्जुन एक ही दिन में दिव्य उम तपम्वी न अजुन को देखकर कहा- धनुपयाण अति पवित्र और दवाओकरदन व ग्यान हिमालय और तारारक रम्बनेवाले और क्षत्रिय धर्म पर चरने पर्वत पर पहुंच गये 1251200 पारे । तुम कौन हो । क्षत्रियप से इस शान्ति मन और वायु ममान यग में सने हुए पूर्ण आश्रम में क्यों आय हो । यस सम्म और धनुर अजुन रिमान्य और गन्धमादन पर्वत का गंधार आदि का क्या प्रयानन । यहा तो गमे तपम्ची प्रामण गाना। चयर इन्द्रवीर पर्वत पर पहुच । वहा गत जिनमन हैन प्रोध ॥४१४६|| पर चने की "टांग 'गद मुन पहा । अर्जुन यहाँ युद्ध करन गार भी कोई नहीं है । इमरिये मयी कामबरदशा या दगी नंगे । दीन तुम पाप का और याणा को पर दो। तुम भाग्य पामहीय नारंग नवी मग को दम् । मी परम गति को प्राप्त हुप हो । यद्यपि उस १८ माकन नजाबी और न ही दुरगया । वह असा न य उम यांन अर्जुन में हसकर पटी पर भा। पापा भी। न र भयमेन या रस FU1AM JILHADICIndorruitmen Former.rrm - E . MILANI अध्याय ३७ ] पहा भारत १६१९ IHDAIIIranianurinuomimimnsurmamminini Immigramirmirmirew ॥ १९ ॥ EuALIDISHEDULEVwICULenouTCreatcETAILemmmmmmunmummy वरं वृणीष्व भद्रं ते शक्रोऽहमरिसूदन ! एवमुक्तः सहस्राक्षं प्रत्युवाच धनञ्जयः प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा शूरः कुरुकुलोद्वहः ॥ ५० ॥ ईप्सितो ह्येप वै कामो वरं चैनं प्रयच्छ मे । त्वत्तोऽद्य भगवन्नस्त्रं कृस्नमिच्छामि वेदितुम् ॥ ५१ ॥ प्रत्युवाच महेन्द्रस्तं प्रीतात्मा प्रहसन्निव इह प्राप्तस्य किं कार्यमस्त्रैस्तव धनञ्जय ! ।। ५२ ॥ कामान्वृणीष्व लोकांस्त्वं प्राप्तोऽसि परमां गतिम् । एवमुक्तः प्रत्युवाच सहस्त्राक्षं धनञ्जयः ॥ ५३॥ न लोभान्न पुनः कामान्न देवत्वं पुनः सुखम् न च सर्वामरैश्वर्यं कामये त्रिदशाधिप ! भ्रातृस्तान्विपिने त्यक्त्वा वैरमप्रतियात्य च । अकीर्ति सर्वलोकेपु गच्छेयं शाश्वतीः समाः ॥ ५५ ॥ एवमुक्तः प्रत्युवाच वृत्रहा पाण्डुनन्दनम् सान्त्वयं लक्ष्णया वाचा सर्वलोकनमस्कृतः ॥ ५६ ।। यदा द्रक्ष्यसि भूतेशं व्यक्षं शूलधरं शिवम् । दाताऽस्मि ते तदा तात! दिव्यान्यस्त्राणि मर्वशः॥ ५७ ॥ ब्राह्मण ने प्रसन्न होकर हंसकर कहा कि तुम्हाग आ पहुँचे हो जो कुछ तुमको भोगने की इच्छा हो कल्याण हो । हे गत्रुओं के नाम करनेवाल ! मुझसे वह हममे मांगो। यह सुनकर अर्जुन ने उत्तर दिया-- जो चाहो वह वर मांग लो मैं इन्द्र हूँ। उम समय हे देवेन्द्र ! मैं तुच्छ और अमार मुम्ब-भाग या दंबन्ध टम शूग्वीर अर्जुन ने दोनों हाथ जोड़कर नम्रतापूर्वक पाने की इच्छा में यहां नहीं आया। मैं अपने भाइयों को वन में छोड़कर शत्रुओं मे बदला चुकाने के लिये मैं यहां आपके दर्शनों के निमित ही आया था। अस्त्र-विद्या सीम्बने आया हूं। यदि हम चेष्टा को दे भगवन् ! मैं आपमे मापूर्ण अत्र-विद्या मीम्बन छोड़कर मैं और कुछ चाहूँगा नो जगत में मंगनिन्दा आया हूँ । यदि आप प्रमन्न है तो मेरी यह इच्छा हुआ करेगी ॥५१॥५५॥ पूरी कीजिए । तब इन्द्र ने प्रमन होकर हमकर यह सुनकर उम वृत्रासुर के मारनवार और पहा हे अर्जुन ! तुम जय यहां पहुंन गये तय अत्र मय रोकों के पूज्य इन्द्र ने मधुर म्बर मे कहा- लेकर क्या करोगे ! तुम तो परम गनि के न्यान पा है अजुन ! तुम जर देवादिदेव के जो सय मानियों 1013mm MIMIREOLoryprPPLErammHATTLEVIDY कहा ॥४७॥५०॥ TOTS TermmsmrTTTTTTTrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrari १६२० म हा भारत बनपर्व ....... ... .. mmuATIOnl मिना को न दाम्म मन: दर्शनात्तस्य कौन्तेय ! ससिद्धः स्वर्गमेष्यसि ॥ ५८ ।। इत्युक्त्वा फाल्गुनं शक्रो जगामाऽदर्शनं पुनः । अर्जुनोऽप्यथ तत्रैव तस्थौ योगसमन्वितः ॥ ५९ ॥ इति श्रीमन्महाभारत आरण्यकपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि इन्द्रदर्शने सप्तत्रिंशोऽध्यायः ।। ३७ ।। समाप्तं च अर्जुनाभिगमन पर्व के ईश्वर त्रिशूलधारी और तीन नेत्र रखनेवाले है, सिद्ध हो जायगा। यह कहकर इन्द्र तो वहीं अन्त- दर्शन पाओगे तब मैं उसी समय वहा आकर तुमको नि हो गये और अर्जुन उसी स्थान पर ठहर गया सब दिव्य अस्त्र दूंगा। अब उनको प्रसन्न करने का ॥५६।५९॥ यत्न करो। उनके दर्शन मिलने से ही तुम्हारा मनोरथ वनपर्व का मतीमवां अध्याय ममाप्त हुआ ॥ ३७ ।। ....-.-- MPSI PRIDAYALUTELYRITITUTILIUTRITTEMPTLwrews wwdiaWMar- ॥ 11 amarriaidieminimunlimatarnanmitramananja अध कैरात पर्व। अथ अपत्रिंशोऽध्याय ॥ ३८ ॥ जनमेजय उवाच-भगवच्छ्रोतुमिच्छामि पार्थस्याऽक्लिष्टकर्मणः । विस्तरेण कथामेतां यथाऽस्त्राण्युपलव्धवान् ॥ १ ॥ यथा च पुरुषव्याघ्रो दीर्घबाहुर्धनञ्जयः वनं प्रविष्टस्तेजस्वी निर्मनुष्यमभीतवत् किं च तेन कृतं तत्र बसता ब्रह्मवित्तम ! कथं च भगवान्स्थाणुदेवराजश्च नोपितः पतदिच्छाम्यहं श्रोतुं त्वत्प्रसादाद द्विजोत्तम!। वं हि सर्वज्ञ ! दिव्यं च मानुपं चेव येस्थ ह अत्यद्भुनतमं बटोमहर्पणमर्जुनः अपनीमा अध्याय ॥ ३८ ॥ या मरणान्न मुनकर राजा जनमेजय ने किम प्रकार में रहा और उमन यया ऐमा काम किया गाय जी से कहा- भगवन् ! महाया अजुन जिसमे उमपर सिवनी और इन्द्र प्रसन्न हुप । मिनमय रिस्य अमर किय, मो भाष गर्वन और प्रनानियों में 18आर देवताभी विनार मा परिवायद भी पदिए किया और मनुष्यों के मय नान्तों को अच्छी तरह जानने पार्शनम अजुन दम निजन यन में निर्णय होता है। में आप मुग में यह मय शान्त गुनना चाहता personer ********Trrrrrrrrrrrt'rrrr'r'*''rrrrleier prin retenci अध्याय ३८] म हा मारत AUTIwமயாTRUTாாாாாாாாாாாாாாாாாாாாா - भवेन सह संग्राम चकाराऽप्रतिमं किल पुरा प्रहरतां श्रेष्टः संग्रामेप्वपराजितः यच्छ्रुत्वा नरसिंहानां दैन्यहतिविस्मयात् ॥ ६ ॥ शुराणामपि पार्थानां हृदयानि चकम्पिरे यद्यच्च कृतवानन्यत्पार्थस्तदखिलं वद न ह्यस्य निन्दितं जिष्णोः सुसूक्ष्ममपि लक्षये । चरितं नस्य शूरस्य तन्मे सर्व प्रकीर्तय वैशम्पायन टवाच कथयिष्यामि ते तात ! कथामेतां महात्मनः दिव्यां पौरवशार्दूल महतीमदभुतोपमाम् गात्रसंस्पर्शसंबद्धां व्यम्बकेण सहाऽनघ ! पार्थस्य देवदेवेन शृणु सम्यक्समागमम् ॥ १० ॥ युधिष्टिरनियोगात्स जगामाऽमिनविक्रमः शक्रं सुरेश्वरं द्रष्टुं देवदेवं च शंकरम् ॥ ११ ॥ दिव्यं तदनुरादाय खरं च कनकत्सरुम् महावलो महावाहुरर्जुनः कार्यसिद्धये ॥ १२ ॥ दिशं घुदीची कौरव्यो हिमवच्छिखरं प्रनि । ऐन्द्रिः स्थिरमना राजन् ! सर्वलोकमहारथः ॥ १३ ॥ त्वरया परया युक्तस्तपमे धृतनिश्चयः ॥२॥४॥ वैशम्पायन जी ने कहा है-गजा जनमेजय ! जिम मैंने सुना है उम अपराजित अर्जुन मे और शिव तरह देवादिदेव महादेव मे अर्जुन की भेंट हुई और जी मे बड़ा अद्भुन, रोमहर्पण और अनूप युद्ध हुआ दोनों का घोर सग्राम हुआ, मोमब दिन्य क्या कहना था जिसको सुनकर नाश होने के भय, हर्प और हूँ मुनिए । वद पराक्रमी अर्जुन, कार्य की मिद्धि विम्मय मे पाण्डवों के हृदय भी कम्पिन हो गये थे। के लिये युधिष्ठिर की आजा मे. महादेव और दन्ट इम मिवाय और जो कुछ कर्म अर्जुन ने वहां क्येि के दर्शन करने के लिय, गाण्डीय धनुष और मुवर्ण वह मय भी कृपा करके मुझे सुनाइए । मैं जानता की मूठवागम्बटग लेकर, भिर मन होकर, अको है कि उम शुग्मीर का कोई काम माघारण और ग्रीनतापूर्वक टत्तर दिशा की ओर चल दिये । महा- ग्थी अजुन उत्तर दिगा को जा करके, काटों मे मेरे LILLOTTTT'EXPECTAN'L'UT'DISTLEDArrinerrrrr.Ini. .. Famammmmamalindiraimini Gitahai.insilliantainlammahititin tihannGi.hindi.mithlarul vranipermHINDUREDICADRRIDHIDummDU010mmarthern - -- , निष्टित नहीं है ॥८॥ -- म हा मारत ( वनपर्व Turn.11111111 DATTETTITUTimiti " 17IGUninthan ALLEDITITITIL.MARW PLAND.0L120Ceur TLINCmonun2dttinnitualu वनं कण्टकितं घोरमेक एवाऽन्त्रपद्यत नानापुष्पफलोपेतं नानापक्षिनिषेवितम् नानामृगगणाकीर्णं मिद्धचारणसेवितम् तत प्रयाते कौन्तेये वनं मानुषवर्जितम् शटानां पटहानां च शब्दः समभवहिवि ॥ १६ ॥ पुप्पवर्षं च सुमहन्निपपात महीतले . मेघजालं च विततं छादयामास सर्वतः सोऽतीत्य वनदुर्गाणि सन्निकर्षे महागिरे. । शुशुभे हिमवत्पृष्टे बसमानोऽर्जुनस्तदा तत्राऽपश्यद द्रुमान्फुल्लान्विहगैवल्गुनादितान् । नदीश्च विपुलावर्ता वैदूर्यविमलप्रभाः हंसकारण्डवोद्गीताः सारसाभिरुतास्तथा पुस्कोकिलरुताश्चैव क्रौञ्चचर्हिणनादिता मनोहरवनोपेतास्तस्मिन्ननिरथोऽर्जुन. पुण्यगीतामलजला. पश्यन्प्रीतमनाभवन् ॥ २१ ॥ रमणीये वनोद्देशे रममाणोऽर्जनस्तदा और मिविध पर पगे तथा तरह-तरह के पक्षियों से प्रकार के पक्षी वृक्षों की डारिया पर रेठे मधुर म्बर मोमिन वन को लापर, अन्त को हिमालय पर्वन ३ मे बोल रहे है । बड़ी बड़ी चक्कर ग्वाती हुई नदिया पाम पहुच गये ॥९॥१२॥ यह नहीं । उनका जर अत्यन्त पवित्र और वैइय यहा सिद्ध और चारण रोग रहने । म मणि के ममान निर्मल नदियों के तहों पर पूरे म में मनुष्य नहीं जा माना था। नप अर्जुन यहां पर वृध नगगे हैं। जिन पर हेम, कारण्य, सारस, पहुँच नमर्ग और नगाई योग। जोश, वागि, मोर आदि जर और स्थल भी शरी पदिय पगेनी वर्षा हुई और नारों आर नाए और कोर कर रहा । मायाहु अर्जुन मे सादर गह गाय । गाटीय मन मारण कानबारे उस गनादरा और भीतर पवित्र जारवा नदियों अर्जुन रम वा में दुर्गन्धानी को गएर मारय को दमदा मान प्रमय हुए ॥१२॥ की उपयश गमिम पाने । उदांग दमापगे महमा अर्जुायकर, दण्ड, मृगार आदि और नगर पाई भी की कतारे धाक दृशी श्रार गिरेग गूल पर पनि माग गर AR भय पटिन नपान एग। ३.टोन Emeannata Taman) IITTAINMEDITATION Idian ! LGainduLDKEE.muvimbatorstution - TIMILrryitrrierrrr's IPL Telumami HTh।।
अध्याय ३८]
महाभारत
१६२३
प्राकmmsमामा..nामममममममारसमस
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ARE indiahintainti mm.in.mmmmmstainamruthstaminuummitmamimanam
तपस्युग्रे वर्तमान उग्रतेजा महामनाः ॥ २२ ॥
दर्भचीरं निवस्याऽथ दण्डाजिनविभूषितः ।
शीर्णं च पतितं भृमौ पर्ण समुपयुक्तवान् ॥ २३ ॥
पूर्णे पूर्ण विगत्रे तु मासमेकं फलाशनः ।
द्विगुणेन हि कालेन द्वितीयं मासमत्ययात् ॥ २४ ॥
तृतीयमपि मासे स पक्षेणाऽऽहारमाचरत्
चतुर्थे त्वथ संप्राप्ते मासे भरतसत्तमः
वायुभक्षो महावाहुरभवत्पाण्डुनन्दनः
ऊर्बबाहुनिरालम्बः पादांगुष्टाग्रधिष्टिनः ॥ २६ ॥
सदोपस्पर्शनाचाऽस्य बभूवुरमितौजसः
विद्युदम्भोरुहनिभा जटाम्तस्य महात्मनः ॥ २७ ॥
तनो महर्पयः सर्वे जग्मुर्देवं पिनाकिनम् ।
निवेदयिषवः पार्थ तपस्युग्रे ममास्थितम् ॥ २८ ॥
नं प्रणम्य महादेवं शंसुः पार्थकर्म नत्
एप पार्थो महातेजा हिमवत्पृष्टमाम्यिनः ॥२९॥
उग्रे तपसि दुप्पारे स्थितो धृमाययन्दिशः ।
नस्य देवेश! न वयं विद्मः सर्वे चिकीर्पितम् ॥ ३० ॥
संतापयति नः
निवार्यताम् ।
पहले माम में तीन-तीन दिन के बाद, दूमरे माम थीं। मब महर्षि अर्जुन की टम प्रकार कटिन
में छ छ दिन के बाद और तीमरे माम में पन्द्रह तरम्या करने का कारण जानने के लिए पिनाक्याने
पन्द्रह दिन के बाद केवल फल खाकर ही तप
मिनी के पास गये । उनको प्रणाम करके उन्होंने
कहा-हे महागज ! टिमान्य की पृट पर अर्जुन
और चथि माम में उन्होंने केवल वायुभक्षी दिवाओं को मम्म करनेवारी उन नपम्या कर रहे
रहकर उपरको हाथ टटाय हुए बिना महारे पाव है हम नहीं जानते है कि प्रेमी नपस्या करने में
के अंगूटों के बल मे बड़े होकर नपम्या की । उनका क्या प्रयोजन है ॥२३॥
उनकी जटाएं मटा जन म्नान करने मे बिजली
टनकी तपस्या के तेज मे हम मर रोग ना
और कमन की मानिन्द चमनी हुई देव पड़नी हो गये हैं। आप यदि उनको ठप करने से हटा
" ELETE PICTOY THE TREETPATILITTLIENCE TELL ELEELER
unlimilitillstoanilivanidinsibiluridulhdsinindian.andhandhanalishasuraldhulnilon
।
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सर्वानसी साधु
किया था ॥२॥२५॥
१६२४ महा मारत वनपर्व murtiurumastatininMMITranamasannaitunfinitionalitimummnamainancimtem maramannapurn.hunxnnnnnxxindi तेषां तद्वचनं श्रुत्वा मुनीनां भावितात्मनाम् ॥ ३१ ॥ उमापतिर्भूतपतिर्वाक्यमेतदुवाच ह महोदय उवाच-न वो विवादः कर्तव्यः फाल्गुनं प्रति सर्वशः ॥ ३२ ॥ शीघ्रं गच्छत संहृष्टा यथागतमतन्द्रिताः अहमस्य विजानामि संकल्पं मनसि स्थितम् ॥ ३३ ॥ नाऽस्य वर्गस्पृहा काचिन्नश्वर्यस्य तथाऽऽयुपः । यत्तस्य काक्षितं सर्व तत्करिष्येऽहमद्य वै ॥ ३४ ॥ वैशम्पायन उवाच तच्छुत्वा शर्ववचनमृपयः सत्यवादिनः प्रहृष्टमनसो जग्मुर्यथा स्वान्पुनरालयान् ॥ ३५॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि कैरातपर्वणि मुनिशंकरसंवादे अष्टात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥ तो बहुत श्रेष्ठ होगा। यह सुनकर प्राणियों के ईश्वर । और आयु की इच्छा नहीं है । अब मैं उनके महादेव जी ने उन शुद्ध अन्त'करण मुनियों से मनोरथ को पूरा करूँगा । वैशम्पायन ने कहा-हे कहा-तुम लोग प्रसन्न होकर अब शीघ्र अपने- । महाराज ! यह सब ऋपि लोग महादेव के वचनों अपने आश्रमों को चले जाओ। अर्जुन से तुम लोग ! को सुनकर प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने आश्रमों को किसी प्रकार का भय मत करो । मै उनके मनोरथ चले आये ॥३॥३५॥ को अन्छी तरह जानता हूँ । उनको म्बर्ग, ऐश्वर्य चनपर्व का अड़तीसवां अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३८ ॥ EARTiminatimaannadinewsirmon TV.WALLY अथ एकोनत्रिंशोऽध्याय ॥ ३९॥ वैशम्पायन उयाच गतेपु तेषु सर्वेषु तपस्विषु महात्मसु पिनाकपाणिभंगवान्सर्वपापहरो हरः केरातं वेपमास्थाय काञ्चनद्रुमसंनिभम् विभ्राजमानो विपुलो गिरिर्मेसरिवाऽपरः ॥ २ ॥ उत्तालीसवां अध्याय ॥ ३९ ॥ वशम्पायन ने कहा- राजा जनमेजय ! जब पर्वत के ममान झलकती थी । उस देह को धारण यह मय महात्मा तपम्बी चले गये तर गिव जी करके शिव जी धनुष और सयों के समान वाण महाराज ने जो पर ऐश्वर्य के म्यामी और पागे के को लिय हुए अमि के तुल्य वेग से चल दिये । दूर करनेवाले है मुनहरे पक्ष के समान किंगत का और पार्वती सहित जिनके पीछे-पीछे बहुत से अनेक म्याप धारण किया। उनके शरीर की कान्नि मेरु वेषधारी पार्यद थे सहयों स्त्रियों को साथ लिये हुए. MandMurational rrrrogatoru'ret'm'CT+CHICOLTURNOUT CITY'VETITILONITOHUP
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फिरानम्पचा गिर जी का पन में बिग महिन अर्जुन की पगंग टने के निशाना ।
अध्याय ३९] म हा भारत १६२५ TamirATRAUMATORITERATIMATTATRImamiATTATUITITINimnant - Bahaduaith.DETAITanadiDain. thatantwaastamaintiomold.maduD.main. HIJD.namnaram.karma श्रीमद्धनुरुपादाय शरांश्चाशीविषोपमान् निप्पपात महावेगो दहनो देहवानिव देव्या सहोमया श्रीमान्समानवतवेपया नानावेषधेरै«ष्टैर्भूतैरनुगतस्तदा किरातवेपसंछन्नः स्त्रीभिश्चापि सहस्रशः अशोभत तदा राजन् ! स देशोऽतीव भारत!॥ ५ ॥ क्षणेन तद्वनं सर्वं निःशब्दमभवत्तदा नादः प्रस्रवणानां च पक्षिणां चाऽप्युपारमत् ॥ ६ ॥ स संनिकर्षमागम्य पार्थस्याऽक्लिष्टकर्मणः मूकं नाम दनोः पुत्रं ददर्शाऽद्भुतदर्शनम् ॥ ७ ॥ वाराह रूपमास्थाय तर्कयन्तमिवाऽर्जुनम् हन्तुं परमदुष्टात्मा तमुवाचाऽथ फाल्गुनः गाण्डीवं धनुरादाय शरांश्चाशीविपोपमान् । सज्यं धनुर्वरं कृत्वा ज्याघोपेण निनादयन् ॥ ९ ॥ यन्मां प्रार्थयसे हन्तुमनागसमिहाऽऽगतम् । तस्मात्त्वां पूर्वमेवाऽहं नेताऽद्य यमसादनम् ॥ १० ॥ दृष्ट्वा तं प्रहरिष्यन्तं फाल्गुनं दृढधन्विनम् । किरातरूपी सहसा बारयामास शंकरः ॥ ११ ॥ यस वन में आ पहुचे जिसमें अर्जुन कठिन तपम्या | अरे दुष्ट ! मैने तेरी कुछ बुराई नहीं की, तो भी कर रहे थे । शिव जी के आने से वह वन अत्यन्त तू यहां पर स्थित मुझे मार टारने की ताक में है। मुगोभित हो गया। चारों ओर मे पक्षियों की चट इसलिये मैं तुझे, अपने ऊपर आक्रमण करने के चटाहट और झरनों का अर्राटा बन्द हो गया और पहले ही, यमलोक को पहुंचाये देता हूँ ॥७॥१०॥ य, वन मुनसान सा दीखने लगा ॥१६॥ किरातमाघारी गिव जी ने अर्जुन को दैत्य के जब शिव जी अर्जुन के पास पहुंचे तब उन्होंने ' कार वाण चलाने के लिये उद्यत देशकर, उन्हें रोकने म्क नामी दैत्य को जो वाराह का म्वरूप धरकर हुप, कहा- मुनि ! दम श्याम मेघ के ममान अर्जुन को मारने आया था देखा । अर्जुन उस दैत्य प्रभावगाले यागढ़ को में पहले से ही अपना निशाना को देखकर धनुष को चढ़ाकर टंकारने लगे और मर्प बना चुका है। अनादर का माय दिलाने हुए नजुन के समान वाणों को हाथ में धारण करके कहने रग- में विगत के कहने पर ध्यान न देकर उम वागट PHATAMITICTIMITTISTITTIFICATrim MITTIrrrrrrrrr FFOTOmmuninamaidamishitavalirtinidina.tandan un.c.ultailsinaa aurali. ...httraininilaiantarlal. -- म हा भारत [वनपर्व OXIAOMICALARuthyruitmRutuMERRIOTIINDIA நeranTEILLETIUINNILETITRINITIIIIIIITTENTITYாரIIIITATIபாாயா मयैप प्रार्थितः पूर्वमिन्द्रनीलसमप्रभः अनादृत्य च तद्वाक्यं प्रजहाराऽथ फाल्गुनः ॥ १२ ॥ किरातश्च समं तस्मिन्नेकलक्ष्ये महाद्युतिः । प्रमुमोचाऽशनिप्रख्यं शरमग्निशिग्वोपमम् तौ मुक्तौ सायको ताभ्यां समं तत्र निपेततुः । मूकस्य गाने विस्तीर्णे शैलसंहनने तदा ॥ १४॥ यथाऽशनेविनिर्घोपो वज्रस्येव च पर्वते तथा तयोः सनिपातः शरयोरभवत्तदा स विद्धो बहुभिर्वाणर्दीप्तास्यैः पन्नगरिव ममार राक्षसं रूपं भूयः कृत्वा विभीपणम् ॥ १६ ॥ स ददर्श ततो जिष्णुः पुरुषं काञ्चनप्रभम् किरातवेपसंछन्नं स्त्रीसहायममित्रहा । १७॥ तमब्रवीत्प्रीतमनाः कौन्तेयः प्रहसन्निव को भवानटते शून्ये बने स्त्रीगणसंवृतः ॥ १८॥ न त्वमस्मिन्वने घोरे विभषि कनकप्रभ ! । किमर्थं च त्वया विद्धो वराहो मत्परिग्रहः ॥ १९ ॥ मयाऽभिपन्नः पूर्व हि राक्षसोऽयमिहाऽऽगतः । रूपी दैत्य पर ज्याही वाण चलाया त्योही किरातरूपी गया । मरते समय उसका वही असली राक्षस का मदादेय ने भी उस वाराह के ऊपर वज्र के समान घोर रूप हो गया ॥१४॥१६॥ आणि शिखा-युक्त एक वाण चराया॥११॥१३॥ इसके पश्चात् अर्जुन उन स्त्रियों-सहित सुवर्ण दोनों के धनुषों से छुटे हुए दोनों वाण प्रथम की सी प्रभा रखने वाले किरातरूपधारी शिव जी को योग से आकर एक साथ उस वाराह के शरीर में लगे। देखकर हंसते हुए प्रमन्नतापूर्वक बोले- हे पुरुष ! पत्थर पर बिजली गिरने से या पर्वत पर इन्द्र का तुम कौन हो जो इस निर्जन वन में स्त्रियों को साथ वन गिरने में जमा विकट शब्द होता है वैमा हो लिये हुए बेखटके फिर रहे हो । ऐसे वन में क्या शब्द टग वाराह के शरीर में वाणों के लगने से आपको भय नहीं लगता है ? मैं इस वाराह को पहले हुआ। दोनों वारों ने और भी यहुन से वाण उग्र ही अपने वाण का निशाना बना चुका था। तुमने शुर पर नगये । इस प्रकार यहन में वाणों का इसपर याण चराकर क्यों मृगया (शिकार ) के धर्म निमाना बनकर व वाराह रवी पा शिरसर गर फे विरुद्ध काम किया । अव में विना तुम्हारे प्राण vomitinmarathimarnar.mahaoLALUWEARCH ama.TARATRAINET HorrowLANDEYOTIRLUmaratEMAITHILHAPUPLEAREn अध्याय ३९] महा मारत WImmummyHITTORNuwarroraane.in GRECIROICERTAITERMITTEETATICALLOWANCIPcreasrewance कामात्परिभवाद्वापि न मे जीवन्विमोध्यसे ॥ २० ॥ न ह्येप मृगयाधर्मो यस्त्वयाऽद्य कृतो मयि । तेन त्वां नाशयिष्यामि जीवितात्पर्वताश्रयम् ॥ २१ ॥ इत्युक्तः पाण्डवेयेन किरातः प्रहसन्निव उवाच श्लक्ष्णया वाचा पाण्डवं सव्यसाचिनम् ॥ २२ ॥ न मत्कृते त्वया वीर! भीः कार्या वनमन्तिकात् । इयं भूमिः सदाऽस्माकमुचिता वसतां बने ॥ २३ ॥ त्वया तु दुष्करः कस्मादिह वासः प्ररोचितः । वयं तु बहुसत्त्वेऽस्मिन्निवसामस्तपोधन ! ॥ २२॥ भवांस्तु कृष्णवभिः सुकुमारः सुखोचितः । कथं शृन्यमिमं देशमेकाकी विचरिष्यति अर्जुन उवाच-गाण्डीवमाश्रयं कृत्वा नाराचांश्चाऽग्निसंनिभान् । निवसामि महारण्ये द्वितीय इव पावकिः ॥ २६ ॥ एप चापि मया जन्तुर्मंगरूपं समाश्रितः राक्षसो निहतो घोरो हन्तुं मामिह चाऽऽगतः ॥ २७॥ किरान ट्वाच-मयेप धन्वनिर्मुक्तस्ताडितः पूर्वमेव हि बाणेरभिहतः शेते नीतश्च यमसादनम् ॥ २८ ॥ लिये बिलकुल न छोटुंगा ॥१७॥२०॥ मैं गाण्टीव धनुष और अग्नि के तुल्य वालों के अर्जुन के ये वचन सुनकर गिनन्दधारी शिव माश्रय मे हम मदान में दमो कार्तिकेय के समान जी ने हंसकर मधुर वाणी से कहा-हे वीर ! तुमको गहना हूँ ॥२॥२०॥ मुझमे बिलकुल नहीं दरना चाहिये । इस बन के याम यद राक्षम येर वागः । कर पान करके ही मेरा रहने का म्यान है । हे नशेधन ! दम बहुन मुझे माग्ने आ रहा था। मैंने अपनी रक्षा करने जीव-जन्तुओं मे भी बन में हम लोग रहते हैं। के लिये वाम नगाकर इमनार दागा गिन- यह स्थान दम रोगों के ही रहने योग्य है । हमें मापा शिव जी ने कहा हे नाम्बी : इन गक्षम की किन्तु तुम अग्नि के मारने के लिये मन तुम मे पहले ही धनुष पर काम ममान तेजम्बी, मुम्ब के योग्य और नुकुमार होकर चढ़ाया था मेरे ही दान में यह बाराह नारा गया भी क्मि लिये इस मूनमान दुर्गन वन में अपने है। हे मदम्ने! तुम अपने बन के पमन्द में अपने विचरने और रहते हो! यह सुनकर अर्जुन ने कहा- दोष को दूसरे पर टाग्ने हो। अभी नुन अपने ELECTIOEErresmarrrrrrr.ncricrxcri aimmammifinitianitlinthalidifiliancismunitianimlima.TAMNICTIMATLiltitualidina.trial । Timlailtilin . यहां किम वान का भय है महा भारत [ पनपर्व purnimurt rurmurrrrrrrannurunlimmuamanawrmirma aunrammanurana .. .. TVINDADIMIMAtmVEADImmanmumIIMSRTCURImmmmm ममैप लक्ष्यभूतो हि मम पूर्वपरिग्रहः ममैव च प्रहारेण जीविताद्वयपरोपितः ॥ २९ ॥ दोषान्स्वान्नाऽहंसेऽन्यस्मै वक्तुं स्ववलदर्पितः । अवलिप्तोऽसि मन्दात्मन्न मे जीवन्धिमोक्ष्यसे ॥३०॥ स्थिरो भवस्व मोक्ष्यामि सायकानशनीनिव घटस्व परया शक्त्या मुश्च त्वमपि सायकान् ॥ ३१ ॥ तस्य तद्वचनं श्रुत्वा किरातस्याऽर्जुनस्तदा रोपमाहारयामास ताडयामास चेपुभिः ॥ ३२ ॥ ततो हृष्टेन मनसा प्रतिजग्राह सायकान् भूयो भूय इति प्राह मन्द ! मन्देत्युवाच ह ॥ ३३ ॥ प्रहरख शरानेतान्नाराचान्मर्मभेदिनः इत्युक्तो वाणवपं स मुमोच सहसाऽर्जुनः ॥ ३४ ॥ ततस्तौ तत्र संरब्धौ गर्जमानी मुहुर्मुहुः शरैराशीविपाकारैस्ततक्षाते परस्परम् ततोऽर्जुनः शरवर्ष किराते समवासृजत् तत्प्रसन्नेन मनसा प्रतिजग्राह शङ्करः ।। ३६ ।। मुहूर्त शरवर्ष तत्प्रतिगृह्य पिनाकधृक् पने वाणी मे यमपुरी को भेज दूंगा ॥२७॥३०॥ जी के इन वचनों से और भी कुपित होकर अर्जुन माभर जाओ। मे तुमपर वज्र मदृश वाण उनके ऊपर लगातार लाखों वाण घरसाने लगे। अब चराना है। तुम भी अपनी शक्ति वा प्रयोग करने | वे दोनों वीर मोघ के मारे बारम्बार गरजते हुए में कुछ कमी न रकमो और यथाशक्ति मुझपर अपने परम्पर एक दृमर के ऊपर ढेर के ढेर साप सदृश वाणों की चोट करो। शिव जी के एमे कटोर वचन वाण यरमाने सगे ॥३१॥३५|| मुनकर महावीर अर्जुन बहुत ही मोध में आ गये सितमपधारी शिव जी पर अर्जुन ने जितने और उसपर वाणों की वर्षा करने लगे। शिर जी वाण चराय उन्हें उन्होंने हंसते-हँसते सह लिया। ने प्रमय होकर उनके छोड़े हुए. वाणों को पकड़ दमभर तक बड़े रहकर शिव जी ने अर्जुन की वाण- निया और कहा नियुद्धि र निर्वृद्धि ! तृ और या अपने शरीर पर होने दी। उन चाणों की व भी याण चम, और भी बाण चग । तरे पाय मे उनके द्वार में वही पार नहीं लगा, वे पर्वत जिनने मर्मभदी वाण है, सर मुझ पर चरा । विष की तरह अनर खड़े रहे । अपने भयानक वाणी Emmmmmmmmmmmm namamuram.DimpRIWDammamanna TWITTE 'DD39:0DUNIONLINE FRILLErotumuTERIA अध्याय ३९] महा भारत १६२९ FunTITTITrimmunirmirmansignmrammarAmirmananmraurammam ॥ ३७॥ VALTMUTITOTT" MUUTTUITITANITTELIID 90DT LITTLDTITULVINO अक्षतेन शरीरेण तस्थौ गिरिरिवाऽचलः स दृष्ट्वा वाणवर्ष तु मोघीभूतं धनञ्जयः परमं विस्मयं चक्रे साधु साध्विति चाऽब्रवीत् ॥ ३८ ॥ अहोऽयं सुकुंमाराङ्गो हिमवच्छिखराश्रयः गाण्डीवमुक्तान्नाराचान्प्रतिगृह्णात्यविह्वलः कोऽयं देवों भवेत्साक्षाद्रुद्रो यक्षः सुरोऽसुरः । विद्यते हि गिरिश्रेष्ठे त्रिदशानां समागमः न हि मद्वाणजालानामुत्सृष्टानां सहस्रशः शक्तोऽन्यः सहितुं वेगमृते देवं पिनाकिनम् ॥ ४१ ॥ देवो वा यदि वा यक्षो रुद्रादन्यो व्यवस्थितः । अहमेनं शरैस्तीक्ष्णैर्नयामि यमसादनम् ॥ ४२ ॥ ततो हृष्टमना जिष्णुर्नाराचान्मर्मभेदिनः व्यसृजच्छतधा राजन्! मयूखानिव भास्करः ॥ १३ ॥ तान्प्रसन्नेन मनसा भगवाँल्लोकभावनः शूलपाणिः प्रत्यगृह्णाच्छिलावर्पमिवाऽचलः ॥१४॥ क्षणेन क्षीणवाणोऽथ संवृत्तः फाल्गुनस्तदा । भीश्चैनमाविशत्तीबा तं दृष्ट्वा शरसंक्षयम् ॥ ४५ ॥ की वपी को इस तरह निष्फल होते देखकर महाबाहु किरात शिव जी के सिवाय और कोई यक्ष या देवता अर्जुन को बड़ा आश्चर्य हुआ; वे शिव जी के पौरुष , है तो अभी मैं इसको तीक्ष्ण वाणी से मारकर यम- की सराहना करने लगे । अर्जुन यह विचार करने लोक में भेज देता हूँ। यह विचारकर अर्जुन लगे कि इस हिमालय पर्वत पर विचरनेवाले सुकुमार- सैकड़ों प्रकार से अनेक ममन्धानों को छेदनेवाले शरीर पुरुष ने हँसते हँसते गाण्डीव धनुष से हटे वाण मारे परन्तु उन रोकों के नाथ शिव जी महाराज हुए वाणों को सह लिया है ! यह कौन है ! कहीं ने उन सब वाणों को इस प्रकार से ग्रहण कर लिया यह शिव जी अथया यक्ष या और कोई देवता तो नहीं जैस पहाड़ पत्थरों की वर्षा को ग्रहण कर लेना है है । इस पर्वत पर देवताओं का आना-जाना तो रहता ॥४१॥४४॥ ही ॥३६॥४०॥ दमभर में अर्जुन के सब वाण समाप्त हो गये। मेरे मारे हुए सहमों वाणी को मिवाय गिव जी महाबाहु अर्जुन अपने वालों को समाप्त होने देमकर के दुमरे की सामर्थ्य सहने की नहीं है । सो जो यह मन ही मन बहुत डरे। उस समय अजुन ने अमि. 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१६३० म हा मारत बनप GlimanormanmmmIIIIMinuTITTWITalumammmmmmmmarumrammamrnamaAmmunom EHIMAnurnamummmmmunamTOTunnamore STITUTORITI TITIOTICTIRLITTum TRUITMEINDIATTIDUATERNITIODI .. चिन्तयामास जिष्णुस्तु भगवन्तं हुताशनम् । पुरस्तादक्षयौ दत्तौ तूणी येनाऽस्य खाण्डवे ॥ ४६ ॥ किं नु मोक्ष्यामि धनुपा यन्मे वाणाःक्षयं गताः । अयं च पुरुषः कोऽपि वाणान्यसति सर्वशः ॥४७॥ हत्वा चैनं धनुष्कोट्या शूलाग्रेणव कुञ्जरम् । नयामि दण्डधारस्य यमस्य सदनं प्रति ॥ ४८ ॥ प्रगृह्याऽथ धनुष्कोट्या ज्यापाशनाऽवकृण्य च । मुष्टिभिश्चाऽपि हतवान्वज्रकल्पैर्महाद्युतिः संप्रयुन्दो धनुष्कोट्या कौन्तेयः परवीरहा तदप्यस्य धनुर्दिव्यं जग्राह गिरिगोचरः ततोऽर्जुनो ग्रस्तधनुः खड्गपाणिरतिष्ठत युद्धस्याऽन्तमभीप्सन्चै वेगेनाऽभिजगाम तम् ॥ ५१ ॥ तस्य मूर्ध्नि शितं खड्गमसक्तं पर्वतेष्वपि मुमोच भुजबीर्येण विक्रम्य कुरुनन्दनः तस्य मूर्धानमासाद्य पफालाऽसिवरो हि सः । ततो वृक्षः शिलाभिश्च योधयामास फाल्गुनः ॥ ५३॥ तदा वृक्षान्महाकायः प्रत्यगृह्णादथो शिलाः । देव को याद किया उन्होंने खाण्डव वन को जलाने को खींचकर मुक्कामुक्की करने लगा। थोड़ी देर तक के समय अर्जुन को दो अक्षय तर्कस अर्थात् ऐसे तर्कस | तो अर्जुन ने अच्छा युद्ध उस खाली धनुष से भी जिन में वाण कभी न घटें दिये थे । और विचार किया उपरान्त किरातकमी शिव जी ने वह धनुप करने लगे कि मेरे सब बाण समाप्त हो गये; अब मैं । अर्जुन से छीन रिया ॥१५॥५०॥ क्या चलाऊँ । और भन्या यह मनुष्य ही कौन है । धनुप को शत्रु के हाथ में जाते देख अर्जुन ने जो मेरे बाणों को निगरता चला जाना है । जो हो, । खद्ग लिया। हाथ में खड्ग लेकर किगतरूपी शिव जी असे अंकुश के द्वारा हाथी का दमन किया जा सकता । के मस्तक पर प्रहार करने के लिये झपटे यद्यपि वह है, मे ही दम घनुप के अग्रभाग मे में अभी इसे । गहा ऐमा था कि पर्वत पर भी मारने से उसकी यमपुरी को भेजेंगा । यह विचार र अर्जुन ने एक धार नहीं जाती थी परन्तु शिव जी के मस्तक पर दाय में धनुष और दूसरे में टमकी ज्या अर्थान डोरी लगते ही यह टुकड़े-टुकड़े हो गया। खड्ग के भी पकह से और उसके चांच में विरानगीशिव जी निष्फल होने पर अर्जुन वृक्षों और गिलाओं को हाथ - TOLTCICIEL D''M'IILOLITULT CLIClutrot Cerere our CT THEI?
अध्याय ३९] म हा भारत १६३१ TIMinuTurnmommuTIMITATUTIOuAITIATIMirmudraraman ॥ ५४॥ -- - TrainiammarTimeharyanarmalwalicraniuminumaanamruiliatistifiliaminatritium mutammnatna किरातरूपी भगवांस्ततः पार्थो महावलः मुष्टिभिर्वज्रसंकाशेधूममुत्पादयन्मुखे प्रजहार दुराधर्षे किरातसमरूपिणि ततः शक्राशनिसमैर्मुष्टिभिभृशदारुणैः किरातरूपी भगवानर्दयामास पाण्डवम् ॥ ५६ ॥ ततश्चटचटाशब्दः सुघोरः समपद्यत पाण्डवस्य च मुष्टीनां किरातस्य च युद्धयतः ।। ५७ ।। सुमुहूर्तं तु तयुद्धमभवल्लोमहर्पणम् भुजप्रहारसंयुक्तं वृत्रवासवयोरिव ॥ ५८ ॥ जघानाऽथ. ततो जिप्णुः किरातमुरसा वली । पाण्डवं च विचेष्टन्तं किरातोऽप्यहनद्वली ॥ ५९ ॥ तयोर्भुजविनिप्पेपारसंघर्पणोरसोस्तथा समजायत गात्रेषु पावकोऽङ्गारधूमवान् ॥ ६०॥ तत एनं महादेवः पीड्य गात्रैः सुपीडितम् । तेजसा व्यक्रमद्रोपाच्चेतस्तस्य विमोहयन् ॥ ६१ ॥ ततोऽभिपीडितैर्गात्रैः पिण्डीकृत इवाऽऽवभौ । फाल्गुनो गात्रसंरुडो देवदेवेन भारत ! निरुवासोऽभवञ्चैव संनिरुद्धो महात्मना में ले-लेकर युद्ध करने लगे। किरातरूपी शिव जी ने ही युद्ध इस प्रकार से हुआ जमे इन्द्र और अर्जुन की चलाई हुई गिलाओं और वृक्षों को भी का हुआ था और उस युद्ध के देखने मे गेम खंड टमी तरह मह लिया। क्रोध के मारे अर्जुन के मुग्व मे हो जाने थे । इसके पीछे अर्जुन ने किगतरूपी मिय धुआं निकलने लगा तब वे आगे बढ़कर शिव जी की जी को अपनी छाती से रेला दिया और शिव जी छाती पर वन के समान घुमे लगाने लगे॥५१॥५५॥ ने भी वैसा ही किया। उन दोनों की भुजा मे भुजा देवादिदेव महादेव भी अर्जुन के वक्षःस्थल और माती मे छाती लगने और घिमने मे धुमा पर वन के ममान क्टोर घुमे लगाने लगे । फिर दिये हुए अमि प्रस्ट दो गई ॥१६॥ कुछ देर तक दोनों परम्पर वायुद्ध करने लगे। तय गिरजी ने कोधित होकर अर्जुन के मध उन दोनों के शरीरों पर, दोनों के हाथ पड़ने से ' महों को तोड़ दाना और उन्हें यल मे दवा लिया। ना पटाक गद होने लगा। दो घड़ी नक ऐमा । उसके कारण मे अर्जुन पिण्डप हो गये श्री. rirImmmcwOECENETITICLECTIOETITIrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrroni navamarawadharnamainindmstamainikRIGI.inmaniaintaanita.namalamamalam वृत्रासुर "GIRL म हा मारत [ वनपर्व । anummummORARDIALOTROLOTAMILLIALLEDIOLAIIIrenuum CTA MOTOWORMHDTMITTTTTTTTOMAMMINIETADTG MTOT.ITEMIMOLLAGHAN पपात भूम्यां निश्चेपो गतसत्व इवाऽभवत् ॥ ६३ ॥ स मुहूर्त तथा भूत्वा सचेताः पुनरुत्थितः रुधिरेणाऽऽप्लुताङ्गस्तु पाण्डवो भृशदुःखितः ॥ ६४ ॥ शरण्यं शरणं गत्वा भगवन्तं पिनाकिनम मृन्मयं स्थण्डिलं कृत्वा माल्येनाऽपूजयद्भवम् ॥ ६५॥ तच्च माल्यं तदा पार्थः किरातशिरसि स्थितम् । अपश्यत्पाण्डवश्रेष्ठो हर्पण प्रकृतिं गतः पपात पादयोस्तस्य ततः प्रीतोऽभवद्भवः उवाच चैनं वचसा मेघगम्भीरगीहरः जातविस्मयमालोक्य ततः क्षीणाङ्गसंहतिम् ॥ ६७ ।। गव उवाच-भो भो फाल्गुन ! तुष्टोऽस्मि कर्मणाऽप्रतिमेन ते। शौर्येणाऽनेन धृत्या च क्षत्रियो नाऽस्ति ते समः ॥ ६८ ॥ समं तेजश्च वीर्यं च ममाऽद्य तव चाऽनघ! । प्रीतस्तेऽहं महावाहो ! पश्य मां भरतर्षभ! ॥ ६९॥ ददामि ते विशालाक्ष! चक्षुः पूर्वऋपिर्भवान् । विजेप्यसि रणे शत्रूनपि सर्वान्दिवौकसः ॥ ७० ॥ प्रीत्या च तेऽहं दास्यामि यदस्त्रमनिवारितम् । चेटा रहित अर्थात् अचेत होकर निर्जीव के समान । वे किरात-वेपधारी महादेव के चरणों पर गिर पड़े। पृथ्वी पर गिर पड़े ॥६॥६३॥ आशुलोप (शीघ्र प्रसन्न होनेवाले) महादेव ने तप उनकी देह लोहू से लथ-पथ हो गई । दम से दुबले हो रहे अर्जुन पर प्रसन्न होकर अत्यन्त भर में मूचा दूर होने पर वे फिर उठ खड़े हुए गम्भीर म्बर से कहा- हे अर्जुन | आज मैं तरे इस और अत्यन्त दुःग्वित चित्त मे शरणागत-रक्षक अमानुप कर्म को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। तुम्हारे भगवान् महादेव की पार्थिव मूर्ति का पूजन करके । समान धैर्यवान् और शूरवीर कोई क्षत्रिय नहीं है। उसपर मारा चदाई। बाद में उन्होंने क्या देखा मेरा और तुम्हारा तेज और पराक्रम बराबर है । मै कि वही माला उम किरात के सिर पर शोभा दे रही तुमको दिव्य ज्ञान देता हूँ। तुम मेरे रूप को देखो। है। यह देखकर अर्जुन के माननेत्र सुर गये। उन्हें हे पाण्टय ! तुम पूर्वजन्म के यापि हो । यदि यह विधाम हो गया कि ये किरातम्पधागे साक्षात् देवता भी तुम्हारे शत्रु हो तो तुम उन्हें भी युद्ध महादव । उनलय में भत्तिमाय उमड़ आया में जीन सकोगे ॥६१७०॥ HTTEAMITarrorTIOTTEGPrem MITHAITHIPORTAIMERAPPEN EranurpumalarாாபாரமYANாயாயா mARAN - .
अध्याय ३९] म हा मारत தாராளானறாாாமாராபாாாளUITTEDாளனாக - EUL (LAITOITUTIILEU'IT'ULURDUONINI'U 'UTC'L******* ODUTOTT वं हि शक्तो मदीयं तदस्त्रं धारयितुं क्षणात् ॥ ७१ ॥ वैशम्पायन उवाच-ततो देव महादेवं गिरिशं शूलपाणिनम् ददर्श फाल्गुनस्तत्र सह देव्या महाद्युतिम् ॥ ७२ ।। स जानुभ्यां महीं गत्वा शिरसा प्रणिपत्य च । प्रसादयामास हरं पार्थः परपुरञ्जयः ॥७३॥ अर्जुन उवाच-कपर्दिन् ! सर्वदेवेश ! भगनेत्रनिपातन ! देवदेव ! महादेव ! नीलग्रीव ! जटाधर ! ॥ ७॥ कारणानां च परमं जाने त्वां त्र्यम्बकं विभुम् । देवानां च गति देव ! त्वत्प्रसूतमिदं जगत् ॥७५ ॥ अजेयस्त्वं त्रिभिर्लोकः सदेवासुरमानुपः शिवाय विष्णुरूपाय विष्णवे शिवरूपिणे ॥ ७६ ।। दक्षयज्ञविनाशाय हरिरुद्राय वे नमः ललाटाक्षाय शर्वाय मीढुषे शूलपाणये ॥७७॥ पिनाकगोप्ने सूर्याय मार्जालीयाय वेधसे । प्रसादये त्वां भगवन् ! सर्वभूतमहेश्वर ! ॥ ७८ ॥ गणेशं जगतः शम्भुं लोककारणकारणम् प्रधानपुरुषातीतं परं सूक्ष्मतरं हरम् ॥ ७९ ॥ मैं प्रसन्नता के कारण तुमको वह अम देना की गति हो। तुम्ही विश्व के रचनवाले हो ।।७११७५५ हूँ जिसको रोक्नेवाला कोई अत्र नहीं है । तुम्ही तीनों लोकों में क्या देवता, क्या दानव और क्या उम अम को धारण करने में ममर्थ और योग्य हो। मनुष्य, कोई तुमको जीत नहीं मना । मैं विष्णु- वैशम्पायन कहते हैं-हे राजा जनमेजय ! एमके पीछे की शिव जी श्री सिकी दिशु को प्रणाम करना शिव जी महाराज ने अर्जुन को पार्वती-सहित अग्ने है। तुम दक्ष के ही विवंम करनेवाले न्द्र म्बका के दर्शन दिये । अर्जुन ने उम न्वा को ही होरि नाचन मत्र, हे धर्षक. देखते ही दोनों घुटनों में बैठकर भिर मे शिव जी का गुलाम टेलिग मूर्य, हे म. दष्टयन की और म्नुनि करने लगे। अर्जुन ने कहा- यान मुद प्राणियों का एक मगनेन,हे की, हदयदेव, हे महादेव,हे नारकल. मैं दुर्गनग्न करियका कद हे जटाधारी, हे विभो, ६ मितीचन : नुमका टोटबाल कल्यान : मका माप मनाता है। तुमनका SameerETEETIrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrror कभी . andilvalidustannialistiauritanniliradicaNmuraniuminarinidinauntinuintainme - aanindimarnniuTIMILTANIELITTLIT.DEHAL म हा भारत [ वनपर्व armTIL MITTIT TITATOTTICEnnnnmat MTT MIT AT TUITI ETIQUETAS व्यतिक्रमं मे भगवन् ! क्षन्तुमर्हसि शंकर ! । भगवदर्शनाकाङ्क्षी प्राप्तोऽस्मीम महागिरिम् ॥ ८० ॥ दयितं तव देवेश ! तापसालयमुत्तमम् प्रसादये त्वां भगवन् ! सर्वलोकनमस्कृतम् ॥ ८१ ॥ न मे स्यादपराधोऽयं महादेवाऽतिसाहसात् । कृतो मयाऽयमज्ञानाद्विमर्दो यस्त्वया सह । शरणं प्रतिपन्नाय तत्क्षमखाऽद्य शंकर! ॥ ८२ ॥ वैशम्पायन उवाच तमुवाच महातेजाः प्रहस्य वृषभध्वजः प्रगृह्य रुचिरं बाहुं क्षान्तमित्येव फाल्गुनम् ॥ ८३ ॥ परिष्वज्य च वाहुभ्यां प्रीतात्मा भगवान्हरः । पुनः पार्थ सान्त्वपूर्वमुवाच वृषभध्वजः ॥ ८४ ॥ इति श्रीमन्महाभारने आरण्यकपर्वणि कैरातपर्वणि महादेवस्तवे एकोनचत्वारिंशोऽध्याय ॥ ३९ ॥ श्रेष्ठ, परमश्रेष्ठ और परम सूक्ष्म हो । हे देवेश ! मै | जाने तुमसे युद्ध किया है । हे शक्कर ! मैं इस समय केवल तुम्हारे ही दर्शन की इच्छा से तपस्वियों के । तुम्हारी शरण में आया हूँ; मुझे क्षमा करो। वैशम्पायन रहने के दिव्य स्थान महापर्वत पर आया हूँ।७६१८०॥ कहत हैं-हे महाराज ! शिव जी अर्जुन की उस हे त्रिभुवननाथ ! मैं हाथ जोड़कर तुमको मनाता स्तुति को सुनकर बहुत प्रसन्न हुए और हंसकर हूँ। मैने अत्यन्त साहस करके तुम्हारा बड़ा अपराध अर्जुन की बाह पड़कर कहने लगे कि मैंने तुम्हारे दिया है । हे महाराज ! आप कृपा करके मेरे उस अपराध को क्षमा किया । अब अर्जुन को गले से अपराध को क्षमा कीजिए। हे उमाकान्त ! मैंने बिना लगाकर महादेव जी फिर कहने लगे ॥८१८४|| वनपर्व या उतालीसवां अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३९ ॥ EaamwranmuADMINAMAANDonounMAATRUSTLEBOOK - - अथ चत्वारिंशोऽध्याय ॥४॥ देवदेव उवाच-नरस्त्वं पूर्वदेहे – नारायणसहायवान् वदयाँ तप्तवानुग्रं तपो वर्पायुतान्बहून् चालीमयां अध्याय ।। ४।। शिव जी ने कहा-हे अर्जुन! तुम पूर्वजन्म में पुरुषोत्तमों के तेज से यह जगत् स्थित हो रहा है । नर नाम के ऋषि थे।तुमने नारायण के साथ बहुत तुमने और श्रीकृष्ण जी ने इन्द्र के अभिषेक के समय वर्षों तक यदरिकाश्रम में तपस्या की है। तुममें और मेघके समान गरजनवारा बड़ा भारी धनुष लेकर बहुत विष्णु में परम वेज विराजमान है । और तुम दोनों से दानवों का नाश किया था। हे पुरषोत्तम ! वह SammanLAIGITRACERESTIsahar 1 HEREHTIHAmurtoLCLE MULusmitaulaMITIEML अध्याय ४०] महा मा रत oriAITIFICATIONISTIADIGITTOMITA ATIOमार । munnilianimmmmmitTimilarminuinitimilimmunominnamamalnihanmmmmnama त्वयि वा परमं तेजो विष्णौ वा पुरुषोत्तमे । युवाभ्यां पुरुपान्याभ्यां तेजसा धार्यते जगत् ॥ २ ॥ शक्राभिषेके सुमहद्धनुर्जलदनिःस्वनम् प्रगृह्य दानवाः शस्तास्त्वया कृष्णेन च प्रभो! ॥ ३ ॥ तदेतदेव गाण्डीवं तव पार्थ ! करोचितम् मायामास्थाय यद् अस्तं मया पुरुषसत्तम! ॥ ४ ॥ तूणौ चाऽप्यक्षयौ भूयस्तव पार्थ! यथोचितौ। भविष्यति शरीरं च नीरुजं कुरुनन्दन ! प्रीतिमानस्मि ते पार्थ! भवान्सत्यपराक्रमः गृहाण वरमस्मत्तः काशितं पुरुषोत्तम ! न त्वया पुरुषः कश्चित्पुमान्मत्यैपु मानद ! । दिवि वा वर्तते क्षत्रं त्वत्प्रधानमरिन्दम ! ॥ ७ ॥ अर्जुन उवाच-भगवन् !ददासि चेन्मह्यं कामप्रीत्या वृषध्वज! । कामये दिव्यमन्त्रं तद्वोरं पाशुपतं प्रभो ! यत्तु ब्रह्मशिरो नाम रौद्र भीमपराक्रमम् युगान्ते दारुणे प्राप्ते कृल्नं संहरते जगत् कर्णभीप्मकृपद्रोणेभविता तु महाहवः त्वत्प्रसादान्महादेव ! जवयं तान्यथा युधि ॥ १० ॥ दहेयं येन संग्रामे दानवान्राक्षसांस्तथा गाण्टीप नाम का धनुष ये ही था जिमको तुम्हारे हाथ अर्जुन ने कहा- हे शिव जी महागन ! जो आर मे लेकर मैंने अपनी माया म छीन लिया है । वह धनुप प्रमन्नना मे मुझको वर देना चाहते हैं नो ब्रह्मागिरा और अपने दोनों अक्षय तर्कमों को अब तुम ले रो नाम का वही भीम पराक्रम दिव्य पाशुपत नाम का तुम्हारा नगर भी रोगरहित हो जायगा ॥१॥५॥ अब दीजिए, जो प्रन्यकार में मर जगन् कानाम हे अर्जुन ! तुम्हारा पराक्रम सच्चा है, मैं तुमपर कर देना है। क्योंकि मैं आपकी कृश म युद्ध अब प्रसन्न हूँ जो कुछ तुम्हारी इच्छा हो सो कर्ण, मीन, द्रोणाचार्य और कृपाचार्य आदि मे वर मांग रो। हे शत्रुदमन ! मनुष्यरोक में तुम्हारे युद्ध में पराम्न करना चाइना हूँ ॥६॥१०॥ ममान दूमग पुरुष नहीं है । स्वर्ग में भी तुममे और मेरी यद भी इच्छा है कि टम बल के बदार कोई पुस्प नहीं देख पड़ना । यह सुनकर प्रबार मे में मंग्राम में दानव, राक्षम, मन, रिनाच, TITTTTTTTTTTTTITATIOTICETITTTTTTTTTTTTTrrrrrrecoram Muro i'l'C1' TOIVOCLO''''ITUUD'U'LLL LL"l'UomiLCULLTD'UTILURILELNIYJUUS!D'IT'UL''OUIE'''AL ॥ - - - " STTIMOOT महाभारत [ वनपर्व LumAININDMISiritLLET.MMARTranamamaramanarthridharm1 TrannTITATTOONITrmiremainyiirnitrowmaAALIMITTARATrainin orthwinawwanmmIGImathuntindianerusailuuumminimuanAmALADARLETIRITER - भूतानि च पिशाचांश्च गन्धर्वानथ पन्नगान् ॥ ११ ।। यस्मिञ्च्छूलसहस्राणि गदाश्चोग्रप्रदर्शनाः शराश्चाऽऽशीविषाकाराः संभवन्त्यनुमन्त्रिते ॥ १२ ।। युध्येयं येन भीष्मेण द्रोणेन च कृपेण च सूतपुत्रेण च रणे नित्यं कटुकभाषिणा ॥ १३ ॥ एप मे प्रथमः कामो भगवन् ! भगनेत्रहन् ! । त्वत्प्रसादाद्विनिवृत्तः समर्थः स्यामहं यथा ॥ १४ ॥ मा उवाच-ददामि तेऽस्त्रं दयितमहं पाशुपतं विभो।। समर्थों धारणे मोक्षे संहारे चाऽसि पाण्डव ! ॥१५॥ नैतद्वेद महेन्द्रोऽपि न यमो न च यक्षराट् वरुणोऽप्यथ वा वायुः कुतो वेत्स्यन्ति मानवाः ॥ १६ ॥ न वेतत्सहसा पार्थ! मोक्तव्यं पुरुपे क्वचित् । जगद्विनाशयेत्सर्वमल्पतेजसि पातितम् ॥ १७॥ अवध्यो नाम नाऽस्त्यस्य त्रैलोक्ये सचराचरे । मनसा चक्षुपा वाचा धनुषा च निपातयेत् ॥ १८ ॥ वैशम्पायन उवाच तच्छ्रुत्वा त्वरितः पार्थः शुचिर्भूत्वा समाहितः । उपसंगम्य विश्वेशमधीष्वेत्यथ सोऽब्रवीत् गन्धर्व, पन्नग आदि को भस्म कर सकूँ। मैंने सुना नहीं जानते है । परन्तु तुमको यह अस्त्र बिना है उस अम को, मन्त्र पढ़कर, धनुप पर चढ़ाने में विचारे किसी मनुष्य पर छोड़ना उचित नहीं है हजारों शूल, उम रूपधारी गदा और विपले साप क्योंकि थोड़े तेजम्दी पुरुष पर छोड़ने से यह अन्न सहा वाणों के दर के दर प्रकट होते हैं। हे भगवन् । सब जगत को भस्म कर देगा। लोक्य में ऐसा यह पहला बरदान में आप से मागकर कृतकृत्य कोई नहीं जिमे यह अब नष्ट न कर सकता हो । और समर्थ होना चाहता है। यह सुनकर महादेव गन से, मेत्र से, वाक्य मे या भनुप से, किसी तरह ने कहा-हे विभो ! मैं तुमको यही परमप्रिय पाशुपत इस अम्ब का प्रयोग क्यों न किया जाय, यह सबको नाम का अस देता है। तुम्हारे लिये उसाधारण मोक्ष नष्ट कर सकता ॥१६॥२८॥ और उपसंहार मब सहज साध्य होगा ॥११॥१५॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! अर्जुन मनुष्य की कीन पहे, इम अम्स को इन्द्र, शिव जी महाराज की उस यात को सुनकर शीम पगगन, यज्ञों का राजा कुरेर, वरण और वायु भी पवित्र और सावधान होकर शिव जी महाराज के .. -- trước 12 triệu triệt • Anure. THESIREMEHATAASANTOPENCILLION.
अध्याय ४०] म हा भारत EPIROImmimirmSITTIAuruRATHORITALIRamlमागमmuzuEANILam - HARINITMARWLAIMIUMIRTILITILALUTAwLuAMROINDUINTELLITERALLOWERMAHARIWOOT ततस्त्वध्यापयामास सरहस्यनिवर्तनम् तदस्त्रं पाण्डवश्रेष्टं मूर्तिमन्तमिवाऽन्तकम् ॥ २० ॥ उपतस्थे च तत्पार्थं यथा व्यक्षमुमापतिम् । प्रतिजग्राह तच्चाऽपि प्रीतिमानर्जुनस्तदा ॥ २१ ॥ ततश्चचाल पृथिवी सपर्वतवनद्रुमा ससागरवनोद्देशा सग्रामनगराकरा ॥ २२ ॥ शङ्खदुन्दुभिघोपाश्च भेरीणां च सहस्रशः तस्मिन्मुहूर्ते संप्राप्ते निर्घाताश्चाऽपतन्मुहुः ॥ २३ ।। अथाऽस्त्रं जाज्वलद्धोरं पाण्डवस्याऽमितौजसः । मूर्तिमद्धे स्थितं पावं ददृशुर्देवदानवाः ॥ २४ ॥ स्पृष्टस्य व्यम्बकेणाऽथ फाल्गुनस्याऽमितौजसः । यत्किंचिदशुभं देहे तत्सर्व नाशमीयिवत् ॥ २५ ॥ स्वर्ग गच्छेत्यनुज्ञातस्त्र्यम्बकेण तदाऽर्जुनः । प्रणम्य शिरसा राजन् ! प्राञ्जलिदेवमैक्षत ॥ २६ ॥ ततः प्रभुस्त्रिदिवनिवासिनां वशी महाद्युतिर्गिरिश उमापतिः शिवः । धनुर्महद्दितिजपिशाचसूदनं ददौ भवः पुरुपवराय गाण्डिवम् ॥ २७॥ ततः शुभं गिरिवरमीश्वरस्तदा सहोमया सिततटसानुकन्दरम् । विहाय ते पतगमहर्पिसवितं जगाम खं पुरुषवरस्य पश्यतः ॥ २८ ॥ इति श्रीमन्महामारत आरण्यकपर्वणि करातपर्वणि शिवप्रस्थान चत्वारिंशोऽध्यायः ॥४॥ ममीप चले गये और कहने लगे-हे विश्वनाथ ! वन, वृक्ष, ममुद्र, ग्राम और नगर कांपने लगे और कृपा करके मुझे उम अम्त्र की शिक्षा दीजिए। महनों गड्डा दन्दुभी और भेरियों के बजने का गन्द स्व महादेव जी ने उमी ममय महार-प्रतिमहार मुनाई देने लगा। बिजली कड़कने लगी। वह शिव आदि के मन्त्रों-सहित वह अम्त्र अर्जुन को दिया। जी का अब उमी ममय प्रचलिन हो गया और मय ॥१९॥२०॥ देवता और दानवों ने टम अब को अर्जुन के समीप तब वह दिव्य अब महादेव के ममान अर्जुन चिन देवा ॥२१॥२४॥ की भी सेवा में उपस्थिन हुआ। अर्जुन ने प्रसन्नता महादेव जी ने अर्जुन के गरीर पर हाथ फेरकर पूर्वक रमे स्वीकार दिया। उम ममय पृथ्वी, पर्वत, उनकी मब न्यथा दूर कर दी । इसके पश्चात् उन्होंने MITTENTIOTTTTTTTTTTTTISTINCTIENTITITION TETTEPITOrrrrrraj Filipintentinnitli Ga nahinilawati I amalinicannabfinitidinuvillamincidantirvantalifiltilalalithin thulation inthinni loint १६३८ महा भारत । वनपर्व anirmamannaulimmunmantraumarMURTImumnamaAmpramanararam अर्जुन से स्वर्ग जाने के लिये कहा । वीर अर्जुन ने गाण्डीव धनुष अर्जुन को दिया। फिर पार्वती सहित उनको प्रणाम किया । अर्जुन हाथ जोड़े हुए खड़ अर्जुन के देखते ही देखते उस रमणीक पर्वत को होकर उनकी ओर एकटक निहारने लगे । अब शिव छोड़कर जिप्तके सुन्दर वन और श्वेत कन्दराओं में जी ने दानव और पिशाच आदि को मारनेवाला बड़े-बड़े तपस्वी रहते थे म्वर्ग को चले गये ।।२५।२८॥ वनपर्व का चालीसवां अध्याय समाप्त हुआ ॥४०॥ IMIKIM -- TOTLIMITAMILUIDASTIVATIUNLODORANDIRDWwituRINIATI अथ एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४१॥ वैशम्पायन उवाच-तस्य संपश्यतस्त्वेव पिनाकी वृषभध्वजः जगामाऽदर्शनं भानुलॊकस्येवाऽस्तमीयिवान् ॥ १ ॥ ततोऽर्जुनः परं चक्रे विस्मयं परवीरहा मया साक्षान्महादेवो दृष्ट इत्येव भारत ! धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यन्मया व्यम्वको हरः । पिनाकी वरदो रूपी दृष्टः स्पृष्टश्च पाणिना कृतार्थ चाऽवगच्छामि परमात्मानमाहवे शश्च विजितान्सर्वानिवृत्तं च प्रयोजनम् इत्येवं चिन्तयानस्य पार्थस्याऽमिततेजसः ततो वैदूर्यवर्णाभो भासयन्सर्वतो दिशः यादोगणवृतः श्रीमानाजगाम जलेश्वरः नांगै दैनंदीभिश्च दैत्यैः साध्यैश्च देवतैः वरुणो यादसां भर्ता वशी तं देशमागमत् ॥ ६ ॥ इकतालीमवां अध्याय ॥४१ ।। वैशम्पायन ने कहा-दे जनमेजय ! शिव जी और हम लोगों की इच्छा पूर्ण हुई । जिस समय महाराज के इस प्रकार से अन्त न होने पर मानो अर्जुन यह विचार कर ही रहे थे उसी समय उस मूर्य अन्न हुआ है अर्जुन आधर्य करके कहने लगे स्थान पर वरुण देवता जिनकी प्रमा वैदूर्यमणि की कि अटो में कैसा भाग्यवान हूँ। मैंने माक्षात् महादेव सी थी सब दिशाओं को प्रकाशित करने हुए जल- जी के दर्शन किये। निम्मन्दह मुझपर भगवान् कर जीयों महित आन पहुंचे ॥१५॥ ने कृपावाद । मैंने उनके अरको मर्म किया और उनके माथ बड़े बड़े नाग, नद, छोटी आज मेरे मन मनोरथ मिद्ध हो गये । इतने दिनों नदिया, दैत्य, साध्य और देवना भी थे । वह धन के पर मगा कि अब गरे भत्रु युद्ध में परास्त हुए. ईश्वर घुबर देवता जिनकी प्रभा सुवर्ण के समान और mmanmmmmmmadirhamasamaulimansoom IRAL Primari - LU 1 Flynt Hair अध्याय ४१] महाभारत १६३९ . Merammandindianimlindains inflaim ilvirdinatuwamilittlintaintinranditions interstina EMAImornimuaaTRamroTAIRITUसरमा अथ जाम्बूनदवपुर्विमानेन महात्रिपा कुवेरः समनुप्राप्तो यक्षरनुगतः प्रभुः विद्योतयन्निवाऽऽकाशमद्भुनोपमदर्शनः धनानामीश्वरः श्रीमानर्जुनं द्रष्टुमागतः ॥ ८ ॥ तथा लोकान्तकृच्छ्रीमान्यमः साक्षात्प्रतापवान् । मर्त्यमृतिधरः सार्ध पितृभिर्लोकभावनेः दण्डपाणिरचिन्त्यात्मा सर्वभूतविनागकृत वैवखतो धर्मराजो विमानेनाऽवभासयन् त्रील्लोकान्गुह्यकांश्चैव गन्धर्वाश्च सपन्नगान् द्वितीय इव मार्तण्डो युगान्ते समुपस्थिते ॥ ११ ॥ ते भानुमन्ति चित्राणि शिखराणि महागिरः । समास्थायाऽर्जुनं तत्र ददृशुस्तपसान्वितम् ॥ १२ ॥ तनो मुहूर्नाद्भगवानरावतशिरोगतः आजगाम सहेन्द्राण्या शक्रः सुरगणैर्वृतः ॥ १३ ॥ पाण्डुग्णाऽऽतपत्रेण ध्रियमाणेन मूर्धनि शुशुभे तारकाराजः सितमभ्रमिवाऽऽश्रितः ॥ १४ ॥ संस्तूयमानो गन्धर्वपिभित्र नपोधनः शृङ्गं गिरेः समासाद्य तस्थौ सूर्य इवोदितः ॥ १५ ॥ अथ मेघखनो धीमान्व्याजहार शुभां गिरम् । दगन बंड अद्भुत थे यनों को मायरिये हुप विमान दन्न रंगे ॥८॥१२॥ में बैठकर आकाश को प्रकाशित करने हुए अर्जुन हमीचीच में गवन पर इन्द्रानी-महित विगन. कोदेखने आय। थोड़ी देर पीछे सूर्य के पुत्र यमराज मान इन्द्र मी वहां पहुंच गये । उनके माय मर जो रोगों के नाम करनेवाने हैं हाथ में दण्डलिये देवगन थे। इन्द्र मिर पर श्वेन छत्र शोभायमान विमान में बैठे हुम पिनर, गुह्यक, गन्धर्व और पन्नगों या । जान पड़ना था, मानों शेन मध चन्द्रमाल महिन तीनों गेकों को प्रकाशित करते हुए इस प्रकार के कार घिग हुआ है। नसोधन ऋषि और गन्यत्र मे आ पहुचे मे प्रलयकार पर सूर्य उदय होता टनकी स्तुति कर रहे थे। इस प्रकार हिमारय है। ये तीनों देवता यदा आप उम पर्वन के चित्र पर्वत पर उपस्थित होन भगवान् इन्द्र आदिल के विचित्र निम्बरों पर बड़े होकर मतपस्यायुक्त अर्जुन मनान मोभित हुए. ॥१३॥१५॥ PNPPRPymy19191990mmmmshim Impraniunymsumertainmmutterful torrccraTORITTEurrrrrrrrriuTITLEncrearra १६४० म हा मारत वनपर्व MUUTTI.FLITIGATIMIT TUTTI GT ninnum 60, mon MUT IT710pamut ॥ १६ ॥ - KADAMAILYountanAmraamzRHIVIRAHULWILMLMAMTLIDIOILLEO - यमः परमधर्मज्ञो दक्षिणां दिशमास्थितः अर्जुनाऽर्जुन ! पश्यास्माँल्लोकपालान्समागतान् । दृष्टिं ते वितरामोऽद्य भवानहति दर्शनम् ।। १७॥ पूर्वर्षिरमितात्मा स्वं नरो नाम महावलः नियोगाद् ब्रह्मणस्तात! मर्त्यतां समुपागतः ॥ १८ ॥ त्वया च वसुसंभूतो महावीर्यः पितामहः भीष्मः परमधर्मात्मा संसाध्यश्च रणेऽनघ ! ॥ १९ ॥ क्षत्रं चाऽग्निसमस्पर्श भारद्वाजेन रक्षितम् दानवाश्च महावीर्या ये मनुष्यत्वमागताः निवातकवचाचैव दानवाः कुरुनन्दन ! पितुर्ममांऽशो देवस्य सर्वलोकप्रतापिनः ॥ २१ ॥ कर्णश्च सुमहावीर्यस्त्वया बध्यो धनञ्जय ! अंशाश्च क्षितिसंप्राप्ता देवदानवरक्षसाम् ॥ २२ ॥ स्वया निपातिता युद्धे स्वकर्मफलनिर्जिताम् । गति प्राप्स्यन्ति कौन्तेय! यथास्वमरिकर्शन! ॥ २३ ॥ अक्षया तव कीर्तिश्च लोके स्थास्यति फाल्गुन!। त्वया साक्षान्महादेवस्तोपितो हि महामृधे ॥ २४ ॥ इसके पीछे यमराज जो बड़े बुद्धिमान् और और धर्मात्मा है उनको परास्त कगेगे; द्रोणाचार्य धर्मन थे और दक्षिण दिशा की ओर बड़े थे बड़ी के द्वारा रक्षित क्षत्रियों को मारोगे और नर रूपधारी गम्भीर वाणी से कहने लगे है पाण्डव ! हम मय नियात कवन आदि अन्यान्य दानवों को मारोगे । लोकपाल तुम्हें देखने को यहा आये है। तुम योग्य- हे अर्जुन ! सब लोकों को प्रकाशित करनेवाले मेरे पात्र हो, इमलिये हम आज तुमकी दिव्य ज्ञान पिता सूर्य देवता के अङ्ग से उत्पन्न महाबली कर्ण देने है । हे अर्जुन ! तुम पूर्वजन्म में नर नाम के की मृत्यु तुम्हारे ही हाथ से होगी । जो देयों राक्षसों महापगमामी और तेजनी मपि थे । इस समय और दानवों के अगों से मनुष्य योनि में प्रसन्न हुए घ्रामा जी की आजा के अनुमार तुमको मनुष्यजन्म है, वे ममाग में तुम्हारे बाणों से मरकर अपने-अपने प्रा हुआ है ॥१६॥१८॥ कमों के फल के अनुसार गति पविगे। हे अर्जुन ! निष्पाप ! तुम युद्ध में भाग पितामह, को जगत् में तुम्हारी अभय कीर्ति रहेगी। तुमने साक्षात् जो यमुना के अंदा में उत्पन्न हैं और बड़े पराक्रमी देवादिदेव महादेव जी को प्रसन्न किया है ॥११॥२४॥ TwimmamimarathimanuTRANSmuvMumINARROAmr.aamanarmaramanarraimire । Ultrix's strategin'! ''ll till I'vi's with ft trang trại* 1 अध्याय ४१] महा मा र TOTTIE பாரானாராமராயனாாாாாாாாாTALாளரான - haahanaimadiumGIRImrnt.fits iTIRTINivdimaniramimilithiaminatital लम्बी बसुमती चाऽपि कर्तव्या विष्णुना सह । गृहाणाऽस्त्रं महाबाहो ! दण्डमप्रतिवारणम् । अनेनाऽस्त्रेण सुमहत्वं हि कर्म करिष्यसि ॥ २५॥ वैशम्पायन उवाच-प्रतिजग्राह तत्पार्थो विधिवत्कुरुनन्दनः समन्त्रं सोपचारं च समोक्षविनिवर्तनम् ॥ २६ ॥ ततो जलधरल्यामो वरुणो यादसां पतिः पश्चिमां दिशमास्थाय गिरमुचाग्यन्प्रभुः ॥ २७॥ पार्थ! क्षत्रियमुख्यस्त्वं क्षत्रधर्म व्यवस्थितः । पश्य मां पृथुनाम्राक्ष ! वरुणोऽस्मि जलेश्वरः ॥ २८ ॥ मया समुद्यतान्पाशान्वारुणाननिवारितान् प्रतिगृह्णीब कौन्तेय ! सरहस्यनिवर्तनान् ॥ २९॥ एभिस्तदा मया वीर ! संग्रामे तारकामये । देतेयानां सहस्राणि संयनानि महात्मनाम् ॥ ३० ॥ तस्मादिमान्महासत्त्व ! मत्प्रसादसमुत्थितान् । गृहाण न हि ते मुव्यदन्तकोऽप्याननायिनः ॥ ३१ ॥ अनन स्वं यदाऽन्त्रण संग्रामे विचरिष्यसि । नदा निःक्षत्रिया भूमिभविष्यति न संशयः ॥ ३२ तुम विग्गुन कृष्ण की महायता में पृथ्वी महार के मन्त्रों-महिन अपना यट अनिवार्य अत्र का भार उतारोगे । हे महाबाहो! मैं तुमको अपना (पाम) देता हूँ । इमे ले लोहि बीर : मने तारका- दष्ट नाम का अन्त्र देना है। यह भी कहीं निकल सुर मंग्राम के समय हमी पाग के द्वारा हजारों नहीं जाता । तुम दम अत्र डाग चंड़ ड काम महायरी दयों को पांच रिया था । टमग्यि है कामकोगे। वगायन ने कहा-हे गजा जनमेज्य: महारगामी अर्जुन : में प्रसन्न होकर तुमको य, टमके पीछे कुरुश्रेष्ठ अर्जुन ने छोड़न और बीचने अत्र देना है। इसका निम पर प्रयोग किया जाना के मन्त्री-महिन वह यनगज का दिया हुआ दण्ट है वह, यमगज ही क्यों न हो, हममे कन नही नाम का अत्र विधिपूर्वक ले निया । इसके पीछे मरना है ॥२५॥३॥ पश्चिम दिशा की ओर मे जन्तीयों के स्वामी कम्य हम पाग को निय हुए जब तुम युद्धमनि में दवना बोले-हे अर्जुन : म उन का स्वामी का मंड़े हो जाओगे नब मार्ग पृथ्वी को भी पत्रियों में हैं। तुम मुझे देखो। मैं तुमको मंदार पति रहिन कर मांग अगम पर ना धनानि Er. rrrrr.recrTTPTErrericorrrrrrrrrrrrrrrracter HimmatrinamalininalshiniminimishalifinititionalindanraiidnnG.Gltkinanciatiiranti.cmhi.dhna.rani.tel....
१६४२ महा भारत [ वनपर्व FUNuTunuwaurumanAmimaranam TAITruramaiamrumIGA.ANIRTEL RemamanumanPTIONERIOTINEAAINMan marnamanummmnamannm वैशम्पायन उवाच ततः कैलासनिलयो धनाध्यक्षोऽभ्यभापत दत्तेष्वस्त्रेषु दिव्येषु वरुणेन यमेन च ॥ ३३ ॥ प्रीतोऽहमपि ते प्राज्ञ ! पाण्डवेय ! महावल ! । त्वया सह समागम्य अजितन तथैव च सव्यसाचिन् ! महावाहो ! पूर्वदेव! सनातन !। सहाऽस्माभिर्भवाञ्च्छ्रान्तः पुराकल्पेषु नित्यशः॥ ३५ ।। दर्शनाते विदं दिव्यं प्रदिशामि नरर्षभ ! अमनुष्यान्महाबाहो ! दुर्जयानपि जेष्यसि मत्तश्चैव भवानाशु गृहात्वस्त्रमनुत्तमम् अनेन खमनीकानि धार्तराष्ट्रस्य धक्ष्यसि तदिदं प्रतिग्रहीष्व अन्तर्धानं प्रियं मम ओजस्तेजोद्युतिकरं प्रस्खापनमरातिनुत् महात्मना शंकरण त्रिपुरं निहतं यदा तदेतदत्रं निर्मुक्तं येन दग्धा महासुराः त्वदर्थमुद्यतं चेदं मया सत्यपराक्रम ! स्वम) धारणे चाऽस्य मेरुप्रतिमगौरव ! ततोऽर्जुनो महावाहुर्विधिवत्कुरुनन्दनः कावेरमभिजग्राह दिव्यमस्त्रं महाबलः ॥४१॥ मुझेर ने अर्जुन मे कहा-है वीर पाण्टव ! कृष्ण जी के को भी जीन सकोगे जिनका जीतना दुर्लभ है । शिय दर्शन में मुझे जितनी प्रमानना होता है, उतनी ही जी ने जब त्रिपुर दैत्य को मारा था तब यही आत्र प्रमलता इस समय तुम्हें दबकर हुई है। हे महाबाहु ! छोड़ा गया था इमने बड़े-बड़े दैत्यों को गम्म कर हे पूर्वजन्म के मनानन देवता ! पूर्वकल्प में तुमने दिया । मैं तुमको योग्य जानकर यह अग्त्र देता है हमारे सायनित्य साम्यावी ॥३२॥३॥ अब में तुम्हें अपना प्रत्यापन नाम का अन्तर्दान यह सुनकर अर्जुन ने उपर देवता से वह दिव्य आप जोपर, नेज और शान्ति का बदानवारा और आप विधिपूर्वक ले लिया। इसके पास गए और शत्रुओं का मानवारा देना है। मुगदम परमजाबी दुन्दुभी की मी गार याणी में दयराज इन्द्र अर्जुन दिव्य भारोह गेमभानवे नमानुग ग पहने दो-द मुन्नी के पुत्र ! गुम पूर्वमाग के दुयोधन की नाकादाय कांग और उन सभी प्रापिही।तुमको पड़ी मिदि भास दी गई म समय anmumtammanauntinumanrarueumILABLSAGE.HERaza........ . E-MIT HTMyarmirrrrrrraPPETITIRICHERECEMLIcernotercurerITICI' अध्याय ४१] महा मारत DIRAOTOसामाभागमभागाRAAmirmir.anandnaaTICTI.mam - marMENTIAnantim.tuaamaaniinninmamimararhimilialiananaaranand ततोऽब्रवीदेवराजः पार्थमक्लिष्टकारिणम् सान्त्वयञ्च्छ्लक्ष्णया वाचा मेघदुन्दुभिनिस्वनः ॥ १२ ॥ कुन्तीमातर्महावाहो ! स्वमीशानः पुरातनः परां सिद्धिमनुप्राप्तः साक्षाद्देवगतिं गतः ॥ १३ ॥ देवकार्य तु सुमहत्वया कार्यमरिन्दम ! आरोढव्यस्त्वया स्वर्गः सजीभव महाद्युते ! ॥२२॥ रथो मातलिसंयुक्त आगन्ता त्वत्कृते महीम् । तत्र तेऽहं प्रदास्यामि दिव्यान्यस्त्राणि कोरव!॥ १५ ॥ तान्दृष्ट्वा लोकपालांस्तु समेतान्गिरिमूर्धनि जगाम विस्मयं धीमान्कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः ततोऽर्जुनो महातेजा लोकपालान्समागतान् । पूजयामास विधिवद्वाग्भिरद्भिः फलेरपि ततः प्रतिययुर्देवाः प्रतिमान्य धनञ्जयम् यथागतेन विबुधाः सर्वे काममनोजवाः ॥१८॥ ततोऽर्जुनो मुदं लेभे लब्धास्त्रः पुरुषर्पभः । कृतार्थमथ चाऽत्मानं स मेने पूर्णमानसम् ॥ १९ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि फैरातपर्वणि देवप्रन्याने एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥१५॥ ममान र रानपर्व । तुमने श्रेष्ठ दिव्य पद पाया है । हे शत्रुदमन ! तुम्हें चक्नि हो गया। उन्होंने वाणी, जन और फलों के टेवनाओं का कार्य सिद्ध करने के लिये म्वर्ग जाना द्वारा रोस्पारों को विधिपूर्वक पूजा की। इसके पीछ पड़ेगा । इमलिये तैयार हो जाओ। मानलि सारथी वे मब देवता अर्जुन का प्रतिमान करके अपनी अपनी तुम्हारे पाम रथ लावगा उम्पर चढ़कर तुम वर्ग इच्छा के अनुसार पिगनों में बंटे हुए चले गये । आना। यहां में तुम्हें मय दिव्य अन दूंगा ॥४१॥४५॥ उन अत्रों के प्राप्त हो जाने में अर्जुन बड़े प्रपत अर्जुन उन मन रोक्पागेको पर्वन पर देखर हुए । उनका मनोग्य सिद्ध हो गया ॥४॥ सनपर्व कारतालीममां अध्याय ममान आ 1101 Erm"".W*********TI******* *****************729 PPT'UrruMNULULIZIRD'U'ILITI!* Unl'W'L''U'L'LCL)!!El'l'on TITHI Firr.rr.Trrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrn.
१६४४ महा मारत { वनपर्व IMLClairinakamannarmal ..... - 'DDINACTITHILITTOrgamCTET PENDOCRAMAOISTITCOIJAY MOR THIEOINTAL अथ द्विचत्वारिंशोऽध्याय ॥ ४२ ॥ वैशम्पायन उवाच-गतेषु लोकपालेषु पार्थः शत्रुनिवर्हणः चिन्तयामास राजेन्द्र ! देवराजरथं प्रति नतश्चिन्तयमानस्य गुडाकेशस्य धीमतः रथो मातलिसंयुक्त आजगाम महाप्रभः नभो वितिमिरं कुर्वञ्जलदान्पाटयन्निव दिशः संपूरयन्नादैर्महामेघरवोपमैः असयः शक्तयो भीमा गदाश्चोग्रप्रदर्शनाः दिव्यप्रभावाः प्रासाश्च विद्युतश्च महाप्रभाः ॥ ४ ॥ तथैवाऽशनयश्चैव चक्रयुक्तास्तुलागुडाः वायुस्फोटाः सनिर्धाता महामेघस्वनास्तथा ॥ ५ ॥ तत्र नागा महाकाया ज्वलितास्याः सुदारुणाः । सिताभ्रकूटप्रतिमाः संहताश्च तथोपलाः दश वाजिसहस्राणि हरीणां वातरंहसाम् वहन्ति ये नेत्रमुपं दिव्यं मायामयं रथम् ॥ ७ ॥ तत्राऽपश्यन्महानीलं वैजयन्तं महाप्रभम् ध्वजमिन्दीवरश्यामं वंशं कनकभूषणम् ॥ ८ ॥ बयालीसवा अध्याय ।। ४२ ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे जनमेजय ! लोकपालों पत्थर और गोले चलाये जायें, वायुम्फोट अर्थात् ये के अपने-अपने स्थानों को चले जाने पर अर्जुन इन्द्र अन्त्र जिनके वेग से वायु उत्पन्न हो जावे, मेघों के के रथ के आने की बाट देखने लगे। थोड़ी देर में शब्द बड़े बड़े भयानक सर्प जिनके मुख से अमि वह प्रभाववान् अर्थात् चमकता हुआ रथ आकाश निकलती थी और बड़े बड़े दृढ़ पत्थर जिनकी शिखरे के अन्धेरे को दूर करता हुआ दिशाओं को अपने बादल के समान शेत थीं रक्खे हुए थे ॥१६॥ गत मे झन्झानाता हुआ और पादरों को फाड़ता उम रथ में दश हजार हरी जाति के वह घोड़े हुआ मानलि मारथी सहित आ पहुँचा। उस रथ में जुन रहे थे जो उस मायामय रथ को ले चलते थे । भयानक तलवार, शक्ति, गदा, माम, अम्त्र, रिजरी, और एक सुवर्ण की राटी भी उसमें जड़ रही थी पन, चायुक्तः मांटगोलके अर्थात् ये आयुध जिनमें कि जिममें महानीले कमल की सदृश श्याम रह की Mirmireonomirmwarriomuspitronm Fr broteAGraon meeromainik mmmm.imanapartismTRIKEUPATI-NIRMronmIATRNITURNATrmatmaranewsHEY MER:
अध्याय ४२] म हा मारत १६४५ RTIாமாாாாாாாாாாாாாாாபாரராாானUTாாாாாாா FOTO.IDATITITI ATOA MTOTODATTITUTO Timbulood TOTH ॥ तस्मिन्रथे स्थितं सूतं तप्तहेमविभूपिनम् । दृष्ट्वा पार्थो महावाहुर्दैवमेवाऽन्वतर्कयत् तथा तर्कयतस्तस्य फाल्गुनस्याऽथ मातलिः । सनतः प्रश्रितो भूत्वा वाक्यमर्जुनमब्रवीत् ॥ १० ॥ मातनिरुवाच-भोभोः शक्रारमज!श्रीमाञ्च्छकस्त्वां द्रष्टुमिच्छति आरोहतु भवाञ्च्छीघ्रं रथमिन्द्रस्य संमतम् ॥ ११ ॥ आह माममरश्रेष्टः पिता तव शतक्रतुः कुन्तीसुतमिह प्राप्तं पश्यन्तु त्रिदशालयाः ॥ १२ ॥ एप शक्रः परिवृतो देवपिगणेस्तथा गन्धर्वरप्सरोभिश्च त्वां दिक्षुः प्रतीक्षते अस्माल्लोकादेवलोकं पाकशासनशासनात् आरोह त्वं मया साध लब्धास्त्रः पुनरेष्यसि ॥ १४ अर्जुन उवाच-मातले ! गच्छ शीघ्र स्वमारोहस्व रथोत्तमम् । राजसूयाश्वमेधानां शतरपि सुदुर्लभम् पार्थिवः सुमहाभांगर्यचभिर्भूरिदक्षिणः देवतैर्वा समारोहुँ दानवेर्वा रथोत्तमम् नाऽतप्ततपमा शक्य एप दिव्यो महारथः द्रष्टुं वाऽप्यथवा स्प्रष्टुमारोढुं कुत एव च वैजयन्त नामवारी घजा रगी हुई थी । उम रथ में के लिये तुम अर्जुन को यदा ले आओ। मो देवेन्द्र अर्जुन साग्थी को बंटा हुआ देखकर जिसकी प्रमा आपके दर्शनों की इच्छा मे देवता, ऋषि, गन्धर्व तपाये हुए. सुवर्ण के समान थी विचारने रगा कि और जप्पराओं महित आपकी बाट देख रहे हैं। आए यह कोई दवना है। उमी समय मातलि नाम का मेरे माथ वहा चलिये और अम्त्र मीग्व कर फिर चले वह सारथी रथ मे उतरकर अर्जुन के ममीप आया आइयेगा । यह सुनकर अर्जुन ने कहा-हे सारथि ! और नग्रता के माथ कहने लगा -हे इन्द्र के पुत्र इम रथ की मबाग मैक्डों राजम्य और अश्वमेध यन अर्जुन! आपको इन्द्र देखना चाहते हैं। आप गीघ्र कानवागं को और बड़े-बड़े दानी राजा और दानवों इस रथ पर मवार इजिए ॥७॥१२॥ को भी दुर्लभ है । इम रथ को तपम्या-रहिन मनुन्य मुझमे चने ममय आपके पिना इन्द्र ने यह देख भी नहीं सकता हना और मवार होना तो दर- कहा था कि देवताओं के दिव्य स्थानों को दिम्बाने किनार है। तुम पहले रथ पर चढ़कर घोड़ों की गम 12mmmwamy TITANDARBLEVELOPMEMEDEPARATE PEOAANIMALHOTRE - . TerroreSTUDIMUtorroramminarrotramIIIIIIcert2.
मदा मारत बिनपने PHHAMAADurnmniilimmitaliramaarimurnimaliticialidultantsranamurariliputanamananduanantra .. GIMULUS ILLUULLATWLTP ALUTRULLOLOL Tartuma20774' ROL TUTTito's त्वयि प्रतिष्ठिते साधो ! रथस्थे स्थिरवाजिनि । पश्चादहमथाऽऽरोक्ष्ये सुकृती सत्पथं यथा वैशम्पायन उवाच-तस्य तद्वचनं श्रुत्वा मातलिः शक्रसारथिः । आरुरोह रथं शीघ्र हयान्येमे च रश्मिभिः ततोऽर्जुनो हृष्टमना गङ्गायामाप्लुतः शुचिः । जजाप जप्यं कोन्तेयो विधिवत्कुरुनन्दनः ॥ २० ॥ ततः पितृन्यथान्यायं तर्पयित्वा यथाविधि । मन्दरं शैलराज तमाप्रष्टुमुपचक्रमे ॥ २१ ॥ साधूनां पुण्यशीलानां मुनीनां पुण्यकर्मणाम् । वंसदा संश्रयः शैल! खर्गमार्गाभिकाक्षिणाम् ॥ २२ ॥ स्वत्प्रसादात्सदा शैल ! ब्राह्मणाः क्षत्रियाविशः । स्वर्ग प्राप्ताश्चरन्ति स्म देव सह गतव्यथाः ॥ २३ ॥ अद्रिराज! महाशैल ! मुनिसंश्रय ! तीर्थवन् ! । गच्छाम्यामन्त्रयित्वा त्वां सुखमसम्युपितस्त्वयि ॥ २४ ॥ तव सानूनि कुञ्जाश्च नद्यः प्रस्रवणानि च तीर्थानि च सुपुण्यानि मया दृष्टान्यनेकशः ॥ २५॥ फलानि च सुगन्धीनि भक्षितानि ततस्ततः । सुसुगन्धाश्च वार्योधास्त्वच्छरीरविनिःसृताः ॥ २६ ॥ पकड़ो। पुण्यात्मा पुरुष जिस प्रकार अच्छी राह पर । मुकर्मी है और स्वर्ग जाने की अभिलापा रखते हैं पैर रखते हैं उसी प्रकार मैं पीछे से रथ पर चहूँगा।। ॥१९॥२२॥ ॥१२॥१८॥ १९८यान में कहा है जनमेजय ! अर्जुन के ने म्याग्मा ही कप से शामिण, क्षत्रिय और वैश्य यो बदन पर गातलिने रथ पर चढ़कर घोड़ों की रास निर्विस देवताओं के साथ घूमते है । तुम मुनियों के धाम ली। अर्जुन पहले प्रसन्नतापूर्वक गगा में खान आश्रम और अनेक तीर्थ हो । हे पर्वतराज ! मैंने करक पवित्र हो गया। फिर जप करके उसने विधि- तुम पर रहकर बड़ा मुम्ब पाया है। अब तुमसे विदा पूर्यफ पिनरों का तर्पण किया। इसके पश्चात् पर्वतराज होकर स्वर्गलोक को जाता हूँ | मन यहां रहकर मादगनल में रहने स्मा-हे पर्वनगज : तुम उन तुम्हारी तीर्थरूपी चोरियों, पाटियां,नदियां और झरने मुनियों के रहने के आश्रम दो जो पुण्यात्मा और दांव और सुन्दर सुन्दर फल वाये और झरनी का EmiummLIGILIMELLizaaranasiaamudrumIUILDADALLummmun - HINITORIAEIrrentNLOHAHAyuret cornerummusamain .
अध्याय ४२ ] म हा भारत १६४७ mireonTURITAMISARomanimlimodanimillaurinamumIGURUNdjummxmaamiDRERAT - mananearnitinenniuminium NVITATTIImunitrinafitsamiti IALNARTE GHal अमृतास्वादनीया मे पीताः प्रस्रवणोदकाः शिशुर्यथा पितुरके सुसुखं वर्तते नग ! ॥ २७॥ तथा तवाऽङ्के ललितं शैलराज ! मया प्रभो!। अप्सरोगणसंकीर्णे ब्रह्मघोषानुनादिते ॥ २८ ॥ सुखमस्म्युपितः शैल ! तव सानुपु नित्यदा । एवमुक्त्वाऽर्जुनः शैलमामन्त्र्य परवीरहा ॥ २९॥ आरुरोह रथं दिव्यं द्योतयन्निव भास्करः स तेनाऽऽदित्यरूपेण दिव्येनाऽद्भुतकर्मणा ॥ ३० ॥ ऊर्ध्वमाचक्रमे धीमान्प्रहृष्टः कुरुनन्दनः सोऽदर्शनपथं यातो मानां धर्मचारिणाम् ॥ ३१ ॥ ददर्शाऽडुतरूपाणि विमानानि सहस्रशः न तत्र सूर्यः सोमो वा द्योतते न च पावकः ॥ ३२ ॥ स्वयैव प्रभया तत्र द्योतन्ते पुण्यलब्धया तारारूपाणि यानीह दृश्यन्ते युतिमन्ति वै ॥ ३३ ॥ दीपवद्विप्रकृष्टत्वात्तनूनि सुमहान्त्यपि तानि तत्र प्रभास्वन्ति रूपवन्ति च पाण्डवः ॥ ३४ ॥ ददर्श स्वेषुधिष्ण्येपु दीप्तिमन्ति स्वयाऽऽर्चिषा । तत्र राजर्षयः सिद्धा वीराश्च निहता युधि ॥ ३५॥ पवित्र जल पिया और जैसे बालक पिता की गोद में राह में अर्जुन ने अनेक प्रकार के अद्भुत विमान बड़े सुख से रहता है इसी प्रकार से मैने तुम्हारी गोद देवे । वे स्थान सूर्य, चन्द्रमा या अग्नि के प्रकाम में जो अप्सराओं से संकीर्ण और वेदवाणी से घोपित से प्रकाशित नहीं हैं। किन्तु वे सुकृति मनुप्य अपने हो रही है रहकर परम सुख प्राप्त किया ॥२३॥२८॥ सुकृत मिले हुए तेज से प्रकाश कर रहे है । वे ही इस प्रकार विनीत वचन कहकर, पर्वतराज से विमान इस रोक में दूर होने के कारण से दीपक विदा होकर, अर्जुन उस महारथ पर सवार हुए। के समान दिखाई देते हैं और तारागण कहलाते हैं। उनके सवार होते ही रथ का प्रकाश सूर्य की तरह अर्जुन उन सब प्रकाशमान और अपने तेज से अपने और भी चमकने लगा। अर्जुन उसी स्थ पर बैठकर अपने स्थान पर चमक्ते हुए तारागण और मैकड़ों आकाश-मार्ग में जाने लगे । देखते ही देखते वे ऋपि सिद्ध और ऐसे मनुष्यों को जिन्होंने अपने तप मनुष्यों की दृष्टि से अदृश्य हो गये ॥२९॥३१॥ से अथवा युद्ध में सन्मुख मारे जाने के कारण से diwHUPREDIREDImemurTomorrILIMMINUTENESIAN TIPSPBILUTICALCINEWS . - TOOTOOTOUTORIAnmystymaayonmurryyyyyCITCOMr.aurCH महा भारत 1717 SHOIT RITERREUmaritainmmmmmmmmmmmmarAGICKuma.marammam .4 . RUOTOJA. TRILMIOXICULTADOS Internmenunia MartoisarmanuTHATRatorimaaEARTwimamtvniPAIMOTamanna ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्पयः हृष्टाः संपूजयामासुः पार्थमक्लिष्टकारिणम् ॥ १० ॥ आशीर्वादैः स्तूयमानो दिव्यवादित्रनिःस्वनः । प्रतिपेदे महावाहुः शङ्खदुन्दुभिनादितम् नक्षत्रमार्ग विपुलं सुरवीथीति विश्नुतम् इन्द्राज्ञया ययौ पार्थः स्तूयमानः समन्ततः ॥ १२ ॥ तत्र साध्यास्तथा विश्वे मरुतोऽथाऽश्विनी तथा । आदित्या वसवो रुद्रास्तथा ब्रह्मर्पयोऽमलाः ॥ १३ ॥ राजर्षयश्च बहवो दिलीपप्रमुखा नृपाः तुम्बुरुर्नारदश्चैव गन्धर्वो च हाहाहहूः तान्सर्वान्स समागम्य विधिवत्कुरुनन्दनः ततोऽपश्यद्देवराजं शतक्रतुमरिन्दमः ततः पार्थो महावाहुरवतीर्य रथोत्तमात् ददर्श साक्षाहेवेशं पितरं पाकशासनम् पाण्डुरेणाऽऽतपत्रेण हेमदण्डेन चारुणा दिव्यगन्धाधिवासेन व्यजनेन विधूयता विश्वावसुप्रभृतिभिर्गन्धर्व स्तुतिवन्दिभिः स्तूयमानं द्विजाग्यैश्च ऋग्यजुःसामसंभवैः ॥ १८ ॥ ततोऽभिगम्य कौन्तेयः शिरसाऽभ्यगमहली । स चेनं वृत्तपीनाभ्यां वाहुभ्यां प्रत्यगृह्णत - अध्याय ४३) महा मारत १६४९ TrnimamannamrutrimminumarRIOTIROImummTTITITITIrrerator Eootto TUTTUUUTAMIDLOM 'LDILALLONTIDLWAUMULUCULDADILLU HIRUITOURDLIRITEDAININATIONAL - - तत्र सौगन्धिकानां च पुष्पाणां पुण्यगन्धिनाम् । उद्वीज्यमानो मिश्रेण वायुना पुण्यगन्धिना ॥ २ ॥ नन्दनं च वनं दिव्यमप्सरोगणसेवितम् ददर्श दिव्यकुसुमैराह्वयद्भिरिव द्रुमैः नाऽतप्ततपसा शक्यो द्रष्टुं नाऽनाहिताग्निना । स लोकः पुण्यकर्तृणां नापि युद्धे पराङ्मुग्वेः ॥ ४ ॥ नाऽयज्वभिर्नाऽवतिकैर्न वेदश्रुतिवर्जितैः नाऽनाप्लुताङ्गैस्तीर्थेषु यज्ञदानवहिष्कृतैः नाऽपि यज्ञहनैः क्षुद्रैर्द्रष्टुं शक्यः कथंचन पानगुरुतल्पैश्च मांसादेर्वा दुरात्मभिः स तदिव्यं वनं पश्यन्दिव्यगीतनिनादितम् प्रविवेश महावाहुः शक्रस्य दयितां पुरीम् ॥ ७ ॥ तत्र देवविमानानि कामगानि सहस्रशः संस्थितान्यभियातानि ददर्शाऽयुतशस्तदा संस्तूयमानो गन्धर्वैरप्सरोभिश्च पाण्डवः पुष्पगन्धवहेः पुण्येर्वायुभिश्चाऽनुवीजितः तेंतालीमवां अध्याय ॥ ४३ ।। । वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! वह यन की क्रिया को बिगाड़नेवाले दुगत्मा नीच और यज्ञ इन्द्रपुरी मिद्ध लोग और ऋषियों मे सवित और तप दान न करनेवारों को तो उस रोक का दर्शन भी सुगन्धिन पुष्प और मनोहर वृक्षों से शोभित थी । मिलना दुर्लभ है ॥१६॥ अर्जुन उसको देखता हुआ नन्दन वन के ममीप अर्जुन उस वन की गोमा देवता और अप्सराओं पहुँचा जहां शीतल मन्द मुगन्ध वायु चल रही थी के मनोहर गीतों को सुनता हुआ इन्द्र-भवन के और पेमे-ऐमे दिव्य फले फूले वृक्ष लग रहे थे मानों पाम जा पहुंचा। वहां उसने हमारों और सम्बों बोरना चाहते हैं और जहां तहां अप्मराओं के झुण्ट विमान दमे जो इन्छा के अनुसार चलनेवाले और के झुण्ड विहार कर रहे थे। वह लोक पुण्यात्माओं का पृथ्वी के चारों ओर घूमनेवाले थे। उम ममय देवना, है और उसे वे मनुष्य कभी नहीं देख सकते है जिन्होंने गन्धर्व, मिद्ध और ऋषियों ने अर्जुन की पूजा की न तपस्या की है और न अमिहोत्र क्यि है अथवा जो तब वह मुगन्धिन पुमों में महानी हुई वायु को युद्ध में विमुम हो गये हैं और मद्य पीनेवाले मांसाहारी, मूंघना हुआ गन्धर्व और अप्पराओं मे म्न्यमान हो LACED OwmIDIOTIDIOHIPROTECEPTITTTTETAPAIITTETPREDERAarti BULUCULSULTALODur । SOTRADER वनपथ १६४८ म हा मारत utamnnouTwitriralamITATIOLENTINGlimittaimunamdhiliarGirionarrial - - GurmimanuTum imuTRUITMarwanamurarimmam .. तपसा च जितं स्वर्ग संपेतुः शतसंघशः गन्धर्वाणां सहस्राणि सूर्यज्वलितेतजसाम् ॥ ३६ ॥ गुह्यकानामृपीणां च तथैवाऽप्सरसां गणान् लोकानात्मप्रभान्पश्यन्फाल्गुनो विस्मयान्वितः ॥ ३७ ॥ पप्रच्छ मातलिं प्रीत्या स चाऽप्येनमुवाच ह । एते सुकृतिनः पार्थ ! स्वेपुधिष्ण्येष्ववस्थिताः ॥ ३८ ।। यान्दृष्टवानमि विभो ! तागरूपाणि भूतले ततोऽपश्यत्स्थितं हारि शुभं वैजयिनं गजम् ॥ ३९ ॥ ऐरावतं चतुर्दन्तं कैलासमिव शृतिणम् स सिद्धमार्गमाक्रम्य कुरुपाण्डवसत्तमः ।। ४०॥ व्यरोचत यथा पूर्व मान्धाता पार्थिवोत्तमः अभिचकाम लोकान्स राज्ञां राजीवलोचनः ॥ ११ ॥ एवं स संक्रमस्तत्र स्वर्गलोके महायशाः ततो ददर्श शकस्य पुरी ताममरावतीम् ॥ ४२ ॥ इनि श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि इन्द्रलोकाभिगमनपर्वणि अर्जुनप्रस्थाने द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४॥ म्वर्ग जीत लिया था देखता हुआ और गन्धर्व, गुह्यक फल से यहा आकर, तारा-रूप धारण कर, अपने- और अप्सराओं के गणों को जिनका तेज सूर्य की अपने निर्दिष्ट स्थान पर स्थित हो अपनी ज्योति से प्रभा के सदृश था और एसे लोकों को जो स्वय जगमगा रहे है। इसके पीछे जब अर्जुन इन्द्रपुरी के प्रकाशित थे निरखता हुआ ऊपर को चला गया और द्वार पर पहुँचा तब उमने ऐगवत हाथी देखा जो आश्चर्य करने लगा ॥३२॥३७॥ कैलास पर्वत के समान ऊँचा और चार दांत रखता उम समय अर्जुन ने मातलि स सब वृत्तान्त था। इस प्रकार से अर्जुन राजा मान्धाता की तरह पूछा । मातलि ने कहा-हे अर्जुन ! तुमने पृथ्वी गजाओं के मार्ग को लांघता हुआ इन्द्रपुरी के भीतर पर मे जो तारों के झुण्ड के झुण्ड देख हैं वे ये सब गया और वहां की शोभा देखने लगा ॥३८॥४२॥ पुण्यात्मा माधु पुरुष है । वे अपन-अपने पुण्य के घनपर्व का बयालीसवां अध्याय समाप्त हुआ ॥१२॥ - hincuminamuttoTAIADLimeliunintenanimunamaAmbanaranslam alssam.naissana.sa.or.. TamanTITAL UMLLLIA । अथ विमत्यारिंशोऽध्यायः ॥४३॥ वगायन उवान स ददर्श पुरी रम्यां सिद्धचारणसेविताम् सर्वतुकुसुमेः पुण्येः पादपेरूपशोभिताम् FIRTAITRIPATIENTarrestfeeruteAIITUTOMATICTIRTEDurat अध्याय ४३ ] महा मारत १६४९ மாமாரளமாரrmuNாாாாாாாாாாாாாாாாாாரரா' । touton DTUISTITUIUTIUD UUDUMICUTULLUTO!'W'CHUD'UOMALOWWID'LouTuULUTUwcaans anditaintvalidifilvnldsaintinidi.alirtiananumanmranamamimmomandal तत्र सौगन्धिकानां च पुष्पाणां पुण्यगन्धिनाम् । उद्वीज्यमानो मिश्रेण वायुना पुण्यगन्धिना ॥ २ ॥ नन्दनं च वनं दिव्यमप्सरोगणसेवितम् ददर्श दिव्यकुसुमैराह्वयद्भिरिव द्रुमः नाऽतप्ततपसा शक्यो द्रष्टुं नाऽनाहिताग्निना । स लोकः पुण्यकर्तृणां नापि युद्धे पराङ्मुग्वेः ॥ ४ नाऽयज्वभिर्नाऽवतिकैर्न वेदश्रुतिवर्जितैः नाऽनाप्लुताङ्गैस्तीर्थेषु यज्ञदानवहिष्कृतेः नाऽपि यज्ञहनैः क्षुद्रेर्द्रष्टुं शक्यः कथंचन पानपैगुरुतल्पेश्च मांसादेर्वा दुरात्मभिः स तहिव्यं वनं पश्यन्दिव्यगीतनिनादितम् प्रविवेश महाबाहुः शक्रस्य दयितां पुरीम् ॥ ७ ॥ तत्र देवविमानानि कामगानि सहस्रशः संस्थितान्यभियातानि ददर्शाऽयुतशस्तदा संस्तूयमानो गन्धर्वरप्सरोंभिश्च पाण्डवः पुष्पगन्धवहैः पुण्येर्वायुभिश्चाऽनुवीजितः तेंतालीमवां अध्याय ॥४३ ।। वैशम्पायन ने कहाहे राजा जनमेजय : वह यज की क्रिया को बिगाड़नेवाले, दुगरमा नीच और यज इन्दपुरी सिद्ध लोग और ऋषियों मे सविन और तप दान न करनेवालों को तो उम रोक कादर्शन भी मुगन्धिन पुण और मनोहर वृक्षों से शोभित थी । मिलना दुर्लभ है ।।१६॥ अर्जुन टमको देखना हुआ नन्दन वन के ममीप अर्जुन उम वन की गोमा देखता और अप्मगओं पहुंचा जहा शीतल मन्द सुगन्ध वायु चल रही थी के मनोहर गीनों को सुनना हुआ इन्द्र-भवन के और ऐसे-ऐसे दिव्य फले फूले वृक्ष लग रहे थे मानों पाम जा पहुँचा। वहां उमने हज़ारों और नाबों चोरना चाहते है और जहां तहां अप्सराओं के झुण्ड विमान देखे जो इन्टा के अनुसार चलनेवाले श्रीर के झुण्ट विहार कर रहे थे। वह रोक पुण्यात्माओं का पृथ्वी के चारों ओर घूमने वाले थे। उस समय देवना. है और टसे वे मनुष्य कभी नहीं देख सकते हैं जिन्होंने गन्धर्व, मिद्ध और ऋषियों ने अर्जुन की पूजा की न नपम्या की है और न अमिहोत्र दिये हैं अथवा जो नर बद मुगन्धिन पुयों में महकनी ई वायु को युद्ध में विमुम्ब हो गये हैं और मद्य पीनेवाले मामाहाग, मूंघना हुआ गन्धर्व मीर अप्मगओं में म्न्यमान हो WERE WEITTTTTTTPLETEROICErrorceremorrIrrrrrrrrent - महा मारत वनपर्व TYTT LOT LUN « Dan tiri in 2014, Haur GTI in m. nt. mi ang amardsunuTuonainRiTMananandamannamrawimmADMILMnAmum ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्पयः हृष्टाः संपूजयामासुः पार्थमक्लिष्टकारिणम् ॥१०॥ आशीर्वादैः स्तूयमानो दिव्यवादित्रनि स्वनैः । प्रतिपदे महाबाहुः शङ्खदुन्दु भिनादितम् नक्षत्रमार्ग विपुलं सुरवीथीति विश्रुतम् इन्द्राज्ञया ययौ पार्थः स्तूयमानः समन्ततः ॥ १२ ॥ तत्र साध्यास्तथाविश्वे मरुतोऽथाऽश्विनौ तथा । आदित्या वसवो रुद्रास्तथा ब्रह्मर्पयोऽमलाः ॥ १३ ॥ राजर्षयश्च बहवो दिलीपप्रमुखा नृपाः तुम्बुरुर्नारदश्चैव गन्धर्वो च हाहाहूहूः तान्सर्वान्स समागम्य विधिवत्कुरुनन्दनः ततोऽपश्यदेवराज शतक्रतुमरिन्दमः ॥ १५॥ ततः पार्थो महावाहुरवीर्य रथोत्तमात् ददर्श साक्षाद्देवेशं पितरं पाकशासनम् पाण्डुरेणाऽऽतपत्रेण हेमदण्डेन चारुणा दिव्यगन्धाधिवासेन व्यजनेन विधूयता ॥ १७ ॥ विश्वावसुप्रभृतिभिर्गन्धर्व स्तुनिवन्दिभिः स्तूयमानं द्विजाग्न्यैश्च ऋग्यजुःसामसंभवैः ॥ १८ ॥ ततोऽभिगम्य कौन्तेयः शिरसाऽभ्यगमली । स चेनं वृत्तपीनाभ्यां बाहुभ्यां प्रत्यगृहत उम मुरवीथी नाम नक्षत्र मार्ग में पहुंचा जहा अनेक पिता इन्द्र को देखा । इसके पश्चात् रथ से उतरकर प्रकार के शह और दुन्दुभी बज रहे थे ॥७॥१०॥ अर्जुन ने देखा कि विश्वावमु आदि गन्धर्व और अर्जुन ने यहा पहुंचकर माव्यगण, विश्वेदेवा ऋक्-यजु -माग के जाननवारे ब्राह्मण इन्द्र के मरहण, दोनों अश्विनीकुमार, बारह मूर्य, आठौं ही चारों ओर बैठे उनकी स्तुति कर रहे हैं। उनके यमु, यादों रद्र, नापिंगण, दिरोष आदि बहुत सिर पर मुवर्ण के दण्ड से मढ़ा हुआश्चत छन लगा मेराजमापि और तुपुर, नारद, दादा, आदि हुआ है। इधर-उधर दिव्य गन्ध से मुवासित मनोहर सरों को देस मयंग यथायोग्य मिरकर अपने चयर दुराये जा रहे हैं। तब अर्जुन ने अपने पिता FREETTIAHITIEPITEurorerverrerrerrerriIMITEMPERIMATTENTINENE Eri RECEIRDITORIPTIOTTEEKESTROYERPNPROMPTLETYLEOTUnmuTIONARAKALADS - - अध्याय ४३] म हा भा र त १६५१ TாராராராராTITIரFTER ராராராராரொரானா TEILT Erlo TIVTOIDYTOWIATURI CLAROI MICACLORATIVELOU DONT 40 p***er www tytos PVLUV tre ततः शक्रासने पुण्ये देवर्षिगणसेविते शक्रः पाणो गृहीत्वैनमुपावेशयदन्तिके ॥ २० ॥ मूर्ध्नि चैनमुपाघ्राय देवेन्द्रः परवीरहा अङ्कमारोपयामास प्रश्रयावनतं तदा ॥ २१ ॥ सहस्राक्षनियोगात्स पार्थः शक्रासनं गतः अध्यकामदमेयात्मा द्वितीय इव वासवः ॥ २२॥ ततः प्रेम्णा वृत्रशत्रुरर्जुनस्य शुभं मुखम् पस्पर्श पुण्यगन्धेन करेण परिसान्वयन् ॥ २३॥ प्रमार्जमानः शनकैर्वाह चाऽस्याऽऽयतौशुभौ । ज्याशरक्षेपकठिनी स्तम्भाविव हिरण्मयौ ॥ २४ ॥ वज्रग्रहणचिह्न करेण परिसान्वयन् मुहुर्मुहुर्वज्रधरो वाहू चाऽऽस्फोटयञ्च्छनेः ॥ २५॥ स्मयन्निव गुडाकेशं प्रेक्षमाणः सहस्रहक् हर्पणोत्फुल्लनयनो न चाऽतृप्यत वृत्रहा ॥ २६ ॥ एकासनोपविष्टो तो शोभयाश्चक्रतु. सभाम् । सूर्याचन्द्रमसौ व्योम चतुर्दश्यामिवोदितो ॥ २७॥ तत्र स्म गाथा गायन्ति साम्ना परमवल्गुना गन्धर्वास्तुम्बुरुश्रेप्टाः कुशला गीतसामसु इन्द्र के पास पहुँनकर सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम झाड़ा और मन्द मन्द मुम्कगकर प्रेम मे अपने पुत्र क्यिा । देवगन इन्द्र ने भी प्रणाम करते हुए पुत्र को देख देवकर तृप्त नहीं हुआ ॥२१॥२६॥ को गोद में लेकर उमका माथा मूंघा । फिर हाथ वे दोनों पिता पुत्र एक आमन पर बैठे हुए पकड़कर उसे अपने पवित्र आमन के कोने पर रिटा ऐमे मुगोभित दीम्बते थे मानों चतुर्दगी के दिन सूर्य लिया ॥११॥२०॥ और चन्द्रमा दोनों आकाश में उदय हुए है । तुम्धुर देवराज की आना मे उनके आधे आमन पर आदि महीन-विद्या विशारद गन्धर्व मधुरम्बर मे माम चटार अर्जुन भी दूसरे इन्द्र के ममान जनने लगा। और गाथा गाने लगे। मृनाची, मेनका, रम्मा, उस ममय इन्द्र ने अर्जुन के मुम्ब पर प्यार मे हाथ पूर्ववित्ति, म्बयप्रभा, रवंशी, मिनी, दण्टाग, फेग और सोने के बम्भों के ममान उमकी दोनों बरूथिनी, गोपालरी, महजन्या, कुम्मयोनि, प्रजागग, भुजाओं को अपने बज रम्बनेगाने हाथ मे बार बार चित्रमेना, नित्ररेखा, और माझा आदि विकार नेत्री- internmwwRPOWEDDY HITED Euiriswaranathunidinnintrodil addifiliahtihinitisht indin wintinainitaintance in antulin.ra Gra NIGAGI.COM । PICTIRDIT TATALATHI) १६५२ महाभारत [यन Hurnimilanthruminimumtne.mhnidianmmmmm.tumnanciatihimantarami घृताची मेनका रम्भा पूर्वचित्तिः स्वयंप्रभा । उर्वशी मिश्रकेशी च दण्ड गौरी वरूथिनी गोपाली सहजन्या च कुम्भयोनिः प्रजागरा चित्रसेना चित्रलेखा सहा च मधुरस्वना एताश्चाऽन्याश्च ननृतस्तत्र तत्र सहस्त्रशः चित्तप्रसादने युक्ताः सिद्धानां पद्मलोचनाः महाकटितटोण्यः कम्पमानैः पयोधरैः कटाक्षहावमाधुर्यश्चेतोबुद्धिमनोहरैः ॥ ३२ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि इन्द्रलोकाभिगमनपर्वणि इन्द्रसभादर्शने त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४३।। वाली अप्सराएँ सिद्ध पुरुषों का मनोरञ्जन करती हुई स्तन,मनोहर हाव-भाव, विलास और कटाक्ष देखकर सभामण्डप में स्थान-स्थान पर मधुर स्वर से गाती सरके चित्त चञ्चल और मोहित हो गये ॥२७॥३२॥ और नाचती थीं। उनके विशाल नितम्ब, उभरे हुए वनपर्व का तालीसवां अध्याय ममाप्त हुआ ।। ४३ ।। अथ चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥ वैशम्पायन उवाच ततो देवाः सगन्धर्वाः समादायाऽय॑मुत्तमम् । शक्रस्य मतमाज्ञाय पार्थमानचुरञ्जसा पाद्यमाचमनीयं च प्रतिग्राह्य नृपात्मजम् प्रवेशयामासुरथो पुरन्दरनिवेशनम् एवं संपूजितो जिष्णुरुवास भवने पितुः उपशिक्षन्महाखाणि ससंहाराणि पाण्डवः शक्रस्य हस्ताइयितं बनमन्त्रं च दुःमहम् अशनीश्च महानादा मेघयहिणलक्षणाः वालीमयां अध्याय ॥१४॥ चाम्पायन न पदा-दराजा जनमेजय ! हमके के भीतर ले गये । विजयी अर्जुन इम पर पूमा पश्चान देवनानी और गन्धयों न इन्द्र की आजा में और मम्मान पाकर पिनाक, यहा रहने लगा। यहां अर्य देकर अर्जुन की पूजा की। पाय, आचमन उमने पाहुन में महामन्त्रों के प्रयोग और उपहार आदि के निय ज. देशा व अर्जुन की इन्द्रमवन भादिशी विधि माम्बी। इसने महेन्द्र से पस, अनि EHamirmirmannmamaAINDUIAnuumaamanamamaARTIUImmmmmHIDDO.Mandirliner Farmoni.maraMD.mm PEERUTTITUTILITICIATTERIFICEOFICINEETITIE12 अध्याय ४४] महा मारत १६५३ Primrainrain मागगगगगगनमारमा ! Animurti CI'vealita raamanna Trilini.italifilionitihaanti manana - गृहीतास्वस्तु कोन्तेयो भ्रातृन्सस्मार पाण्डवः । पुरन्दरनियोगाच्च पञ्चाब्दानवसत्सुखी नतः शक्रोऽत्रवीत्पार्थ कृतास्त्रं काल आगते । नृत्यं गीतं च कोन्तेय ! चित्रसेनादवाप्नुहि ॥ ६ ॥ वादित्रं देवविहितं नृलोके यन्न विद्यते नदर्जयस्व कौन्तेय ! श्रेयो वे ते भविष्यति सखायं प्रददो चाऽभ्य चित्रसेनं पुग्न्दरः म तेन सह संगम्य रमे पार्थी निगमय. गीतवादिननृत्यानि भूय एवाऽऽदिदेन ह तथापि नाऽलभच्छर्म तरखी नकारितम् दुःशासनवधामी शकुनेः सोवलस्य च ततस्तेनाऽतुलां प्रीतिमुपागम्य क्वचिवचित् ॥ १० ॥ गान्धर्वमतुलं नृत्यं वादित्रं चोपलब्धवान् । स शिक्षितो नृत्यगुणाननेकान्वादित्रगीतार्थगुणांश्च मर्वान् । न शर्म लेभे परवीरहन्ता भ्रातृन्स्मरन्मातरं चैव कुन्तीम् ॥ ११ ॥ डाननीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि इन्दलोसभिगमनपर्वरि अर्जुनानादिगिलागं चतुचवारिसोराय" आदि प्रधान प्रधान अम्त्र प्राप्त किये; किन्तु बीच- कितुम मढा तत्पर रहकर महीन-विद्या मीम्बोप पिरन्तु बीच में भाइयों का म्मरण हो आने से उनका चित्त वह क्मिी नम्र निश्चिन्त होकर मदीन-विद्या न मीम दुमी हो जाना था। इस प्रकार वटा अर्जुन ने पान मका; क्योंकि जुप मे होनेवाले अनर्थ की कठिन वर्ष व्यतीत क्येि ॥११॥ यन्त्रण मदा उमरे मन में बनी रहती थी। मे इन्द्र ने जय डाना कि अर्जुन मय अम्त्रविद्या शकुनि माग जायगा. मे कर्ण और दु गासन आदि माम चुके नब एक दिन उन्होंने अर्जुन से कहा- दुगन्मा हगये जायेंगे, यही निन्ना मदा उमके मन है पुर! अब तुम चित्रमेन गन्धर्व में नाचना, गाना में बनी बनी थी बीच वन में वट आनद के माथ और वर्ग के बाजे बजाना मीम्बो। रममे आगे चल. गन्य विद्या के अनुपम मुन्न का अनुमर भी काना का अवश्य तुम्हाग कुछ उपकार होगा। भर इन्द्र था। महीन विधा में मनरह विशेष जानकारीम ने चित्रमेन को चुगया और उममे अर्जुन की मित्रता क यद्यपि यह उमर मर्म को जानने माग उन कग दी। नये मित्र नित्रमेन को पार अर्जुन बड़े हो गया: नो नी मा उन्नी और युधिर आदि मुझ मे गहने रगा । इन्द्र ने अर्जुन को आजादी भाइयों को मरण करके यह किसी तरह मुनी नदी Entillavulitatununituintainstititiviniti.cohtihinichy clost in.al.com in anciential tuti tata thier their 201:179TOMEREMONT:TrimmETTET.I.VIATUTrrer-..
१६५२ महा भारत [ वनपर्व MarunMunmanimalhamamihirunangrammmmumoniuTERamanamunanam. tunninainamuram SEA.ADMATERIATEGH घृताची मेनका रम्भा पूर्वचित्तिः स्वयंप्रभा । उर्वशी मिश्रकेशी च दण्डगौरी वरूथिनी ॥ २९॥ गोपाली सहजन्या च कुम्भयोनिः प्रजागरा चित्रसेना चित्रलेखा सहा च मधुरस्वना ॥ ३० ॥ एताश्चाऽन्याश्च ननृतस्तत्र तत्र सहस्रशः चित्तप्रसादने युक्ताः सिद्धानां पद्मलोचनाः महाकटितटोण्यः कम्पमानैः पयोधरैः कटाक्षहावमाधुर्यश्चेतोवुद्धिमनोहरैः ॥ ३२ ॥ इनि श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि इन्द्रलोकाभिरामनपर्वणि इन्दमभादर्शने त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४॥ वाली अप्सराएँ सिद्ध पुरुषों का मनोरञ्जन करती हुई स्तन,मनोहर हाव-भाव, विलास और कटाक्ष देखकर समामण्डप में स्थान-स्थान पर मधुर स्वर से गाती सबके चित्त चञ्चल और मोहित हो गये ॥२७॥३२॥ और नाचती थी। उनके विशाल नितम्ब, उभरे हुए वनपर्व का ततालीसयां अध्याय ममान हुआ ।। ४३॥ अथ चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥ वैशम्पायन उवान ततो देवाः सगन्धर्वाः समादायाऽर्घ्यमुत्तमम् । शक्रस्य मतमाज्ञाय पार्थमानचुरञ्जसा पाद्यमाचमनीयं च प्रतिग्राह्य नृपात्मजम् प्रवेशयामासुरथो पुरन्दरनिवेशनम् एवं संपूजितो जिष्णुरुवास भवने पितुः उपशिक्षन्महास्त्राणि ससंहागणि पाण्डवः शकस्य हस्ताहयितं वनमन्त्रं च दुःसहम् अशनीच महानादा मेघयर्हिणलक्षणाः वालीमषा अध्याय॥४४॥ यसम्पायन ने कहा- राजा जनमेजय! हमके के भीतर ले गये । विजयी अर्जुन इम प्रकार पूजा ५धान देवनामों और गन्धर्चा न इन्द्र की मात्रा में और मम्मान पार पिना के यहां रहने ल! | ami अयं देकर अर्जुन की पूजा की। पाय, आचमन रमने बहुन में महाआयों के प्रयोग और उपहार आदिकयि प्रम देकर व अर्जुन को न्द्रमवा आदि की विधि माम्बी। उसने महेन्द्र में यम, अनि RANJLAIMONITIGanirnIIIIIIIJANUARNIRHINDIGEN.PILaharasmed.nindance ॥ २ ॥ HALDILLIODunmun -- rect-2015urce HELPIUM अध्याय ४४] म हा भारत Minimummmmmmmmmmsamanduranrammmm.iTORImamminार - mananmannerrarian. TRUEILGI.tecauti.oratTilitilwaivDinananirani.manana गृहीतास्त्रस्तु कौन्तेयो भ्रातॄन्सस्मार पाण्डवः । पुरन्दरनियोगाच्च पञ्चाव्दानवसत्सुखी ततः शक्रोऽब्रवीत्पार्थं कृतास्त्रं काल आगते । नृत्यं गतिं च कौन्तेय ! चित्रसेनादवाप्नुहि ॥ ६ ॥ वादित्रं देवविहितं नृलोके यन्न विद्यते तदर्जयस्व कौन्तेय ! श्रेयो वे ते भविष्यति ॥ ७ ॥ सखायं प्रददौ चाऽस्य चित्रसेनं पुरन्दरः स तेन सह संगम्य रेमे पार्थो निरामयः गीतवादिननृत्यानि भूय एवाऽऽदिदेश ह तथापि नाऽलभच्छर्म तरस्त्री द्यूतकारितम् दुःशासनवधामी शकुनेः सौबलस्य च ततस्तनाऽतुलां प्रीतिमुपागम्य क्वचित्कचित् ॥ १० ।। गान्धर्वमतुलं नृत्यं वादित्रं चोपलब्धवान् । स शिक्षितो नृत्यगुणाननेकान्यादित्रगीतार्थगुणांश्च सर्वान् । न शर्म लेभे परवीरहन्ता भ्रातृन्स्मरन्मातरं चैव कुन्तीम् ॥ ११ ॥ इतिश्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि इन्द्रलोकाभिगमनपर्वणि अर्जुनास्त्रादिशिक्षायां चतुश्चत्वारिंगोऽध्यास ४४ आदि प्रधान प्रधान अम्त्र प्राप्त किये; किन्तु बीच- कि तुम मदा तत्पर रहकर मद्गीत-विद्या सीखो परन्तु बीच में भाइयों का स्मरण हो आने से उनका चित्त वह किमी तरह निश्चिन्त होकर मनीत-विद्या न माग्व दुखी हो जाता था। इस प्रकार यहां अर्जुन ने पान सका; क्योंकि जुए मे होनेवाल अनर्थ की कीटन वर्ष व्यतीत किये ॥१५॥ यन्त्रणा मदा उमके मन में बनी रहती थी। कम इन्द्र ने जब जाना कि अर्जुन मब अम्त्रविद्या शकुनि माग जायगा, कैमे कर्ण और दु गामन आदि मीम्ब चुके तब एक दिन उन्होंने अर्जुन से कहा दुगरमा हराये जायेंगे, यही निन्ना मदा उसके मन ह पुत्र ! अब तुम चित्रमेन गन्धर्व से नाचना, गाना में बनी रहती थी। चीन बीन में यह आग्रह के माथ और म्वर्ग के बाज बजाना सीम्बो। इमस आगे चल गन्धर्व विद्या के अनुपम मुम्ब का अनुमर भी करता कर अवश्य तुम्हारा कुछ उपकार होगा। अब इन्द्र था। सद्गीन विद्या में दम तरह विशेष जानकारी प्राप्त मे नित्रमेन को बुलाया और उमसे अर्जुन की मित्रता करक यद्यपि यह उमर गर्म को जाननेवारा उन्नाट कग दी। नये मिन मित्रमेन को पार अर्जुन बड़े , हो गया; नो भी माना जुन्नी और युधिष्ठिर आदि मुम्म मे गहने लगा । इन्द्र ने अर्जुन को आजादी भाइयों का स्मरण करके यह किमी तरह मुनी नदी rinainamunwinninhittan.archina.com.maa.animal.aat.caci.cuut.ac ... 112031213102517101300DrumICATunera.TAJITrrrrrat OLULTETITULUNMUUTO.CD'ULLTWU'LUE ULTL'Lu'lu'CL'CEA! १६५४ महाभारत ( वनपर्य REDiarrageramanirmaanmammu-GantantanALLY हो सका ॥६॥११॥ वनपर्व का चवालीसवां अध्याय समाप्त हुआ ॥४१॥ -वाल अथ पञ्चचत्वारिंशोऽध्याय ॥ ४५ ॥ वैशम्पायन उवाच कदाचिदथ तं शकश्चित्रसेनं रहोऽब्रवीत् पार्थस्य चक्षुरुवश्यां सक्तं विज्ञाय वासवः गन्धर्वराज ! गच्छाऽद्य प्रहितोऽप्सरा वराम् । उर्वशी पुरुषव्याघ्रं सोपतिष्टतु फाल्गुनम् यथाऽर्चितो गृहीतास्त्रो विद्यया मन्नियोगतः । तथा त्वया विधातव्यः स्त्रीपु सङ्गविशारदः एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा सोऽनुज्ञां प्राप्य वासवात् । गन्धर्वगजोऽप्सरसमभ्यगादुर्वशी वराम् तां दृष्ट्वा विदितो हृष्टः स्वागतनाऽर्चितस्तया । सुखासीनः सुखासीनां स्मितपूर्व वचोऽब्रवीत् ॥ ५ ॥ विदितं तेऽस्तु सुश्रोणि! प्रहितोऽहमिहाऽऽगतः । त्रिदिवस्येकराजेन त्वत्प्रसादाभिनन्दिना यस्तु देवमनुष्येषु प्रख्यातःसहजैर्गुणे. श्रिया शीलेन रूपेण व्रतेन च दमेन च प्रख्यातो बलवीर्यण संमतः प्रतिभानवान् पंतालीमवा अध्याय ॥५॥ वापायन ने कहा है राजा जनमेजय ! जब ही होगा' कहकर उसी के पास गया । उर्वशी से इन्द्र को यह मालूम हुआ कि अर्जुन का चित्त उर्वशी मिरकर उसने युशल प्रश्न किया। उसने भी उचित पर चरायमान हुआ है, तब उन्होंने चित्रमन को पमे पूजा करके गन्धर्वराज चित्रमन को मुखपत युलाकर यहा- हे चित्रमन ! तुम मीम ही अप्नगी मिठाया। अब गन्धर्वगन ने मुम्मात हुए कहा- में बंदगी के पास जार उममे की कि वह मुन्दरी 'इन्द्र ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है। शायद यहां और और अर्जुन की हा पूर्ण को। तुमने तुम यह जाननी होगी। जिमने म्यामारिक भगक । मग आम अंजुनो'जमे मानविय में निपुश गुणों, पारायश्यता, मुशीर ना, मनानुन और दिया है मेसी कामशास्त्र में भी में निपुण इट्रियमयम द्वारा दवर्गक नया मगुप्योक में यहुन कर दी। इन्द्र। यह माना पार निगमन स! नाम पाया है, जो गाना, योरता, पराग आरक्षमा ERUNNINotinusummaNSTANTORREAKINGLEADESDAurumaoTANTam..d..rm.Rntuk - MirrrrrrrVELIMOTHERE trymurtimunETS .
अध्याय ४५] महा मारत TWEAawaranMarTOम्भmmmmmmmmmmmmm.imirmirmirmirammimmunmunam । urinanimILAaur.amanmiaramiriamoniuTIOnlinmnale वर्चस्वी तेजसा युक्तः क्षमावान्वीतमत्सरः । साङ्गोपनिपदान्वेदांश्चतुराख्यानपञ्चमान् योऽधीते गुरुशुश्रूषां मेधां चाऽष्टगुणाश्रयाम् । ब्रह्मचर्येण दाक्ष्येण प्रसवैर्वयसाऽपि च ॥ ९ ॥ एको वे रक्षिता चैव त्रिदिवं मघवानिव अकत्थनो मानयिता स्थूललक्ष्यः प्रियंवदः सुहृदश्चाऽन्नपानन विविधनाऽभिवर्षति सत्यवावपूजितो वक्ता रूपवाननहंकृतः भक्तानुकम्पी कान्तश्च प्रियश्च स्थिरसंगतः । प्रार्थनीयैर्गुणगणैर्महेन्द्रवरुणोपमः ॥ १२ ॥ विदितस्तेऽर्जुनो वीरः स स्वर्गफलमाप्नुयात् । तव शकाऽभ्यनुज्ञातः पादावद्य प्रपद्यताम् तदेवं कुरु कल्याणि ! प्रपन्नस्त्वां धनञ्जयः ॥ १३ ॥ एवमुक्त्वा स्मितं कृत्वा समानं बहु मन्य च । प्रत्युवाचोर्वशी प्रीत्या चित्रसेनमनिन्दिता ॥ १२ ॥ यस्त्वस्य कथिनः सत्यो गुणोद्देशस्त्वया मम । तं श्रुत्वाऽव्यथयं पुंसो वृणुयां किमतोऽर्जुनम् ॥ १५ ॥ के प्रभाव से जगत् में प्रसिद्ध हो रहा है, जो डाह की तरह सहज ही ममझ लेना है, ॥१॥१०॥ नहीं करता है। जिसने वेद, पेदाङ्ग, उपनिषद् आदि जो अन्न, जल, आदि देकर अपने मुहदों का सब मात्र पढ़ है, जो भक्तिपूर्वक गुमजन की सेवा पारन पोषण करता है, जो मत्यवादी, वक्ता, दृढ़ क्यिा करता है; आठ गुणों से युक्त मेधा जिमकी प्रतिज्ञागरा, सपका पूजनीय, शरणागत, आये म्वाभाविक शक्ति है, जो इन्द्र के ममान ब्रह्मचर्य, की रक्षा करनेवाग और प्रियदर्शन है, जो अपने आरम्य रहित और अभिन्नता के द्वारा मय रोगों गुणों में इन्द्र और वरुण के ममान, वा अर्जुन की रक्षा और देम गेम्व क्यिा करता है वह अर्जुन आजम्बर्ग-प्राप्ति के पल मे पश्चिन न हो, यही देवगन म्ची-प्राप्ति के फल म पश्चिन न हो, यही इन्द्र ही इन्द्र की इच्छा और आना है । है उर्वशी ! इन्द्र इच्छा है। जो तनिक भी अपने मुंट अपनी बड़ाई की मात्रा के अनुमार ही नुमको वही करना उचित करना नहीं जानता; जो सका यथायोग्य सम्मान है जिसमें अर्जुन को तुम्हारा अनमा प्राप्त हो. करना है जो मन अथों को अत्यन्न स्थूल अर्थों क्योंकि यह तुम पर अन्यन्त आमक्त है। यह सुनकर Fanninirmalinmamiminimun.imamalinmalnitianitilitar thanGhunatin.in | HEMENT . -- Timummmmmmmmm.DATELLBRIALDILIMILAUCLIPAT.ru महा मारत वन minirevamundantamnimummmuniauntumunaniminasamasurintainmantra महेन्द्रस्य नियोगेन त्वत्तः संप्रणयेन च तस्य चाऽहं गुणोघेन फाल्गुने जातमन्मथा गच्छत्वं हि यथाकाममागमिष्याम्यहं सुखम् ॥ १६ ॥ इतिश्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वाण इन्द्रलोकाभिगमनपर्वणि चित्रसेनोर्वशीसंवादे पञ्चचत्वारिंगोऽध्याय ४५ उर्वगी प्रसन्न होकर मुम्कराती हुई चित्रसेन से कहने और इन्द्र की आज्ञा से मेरा चित्त अर्जुन पर और लगी-हे चित्रसेन ! तुमने अर्जुन के जिन गुणों का भी मोहित हो गया है । तुम अब अपने स्थान को वर्णन किया है, वह संचमुच उसमें है। मैंने जब जाओ । मैं ठीक समय पर अर्जुन के पास जा पहुंचूगी से लोगों के मुँह से.अर्जुन के गुण सुने हैं तबसे मुझे ॥१११६॥ कामदेव सता रहा है। अब उसके गुण तुम्हारी नम्रता वनपर्व का पैंतालीसवां अध्याय समाप्त हुआ ॥ ४५ ॥ narianm mutilandicraniparindin.nanLATEDAIHIJinni अथ पट्चत्वारिंशोऽध्याय ॥४६॥ वैशम्पायन उवाच ततो विस्मृज्य गन्धर्व कृतकृत्यं शुचिस्मिता उर्वशी चाऽकरोत्स्नानं पार्थप्रार्थनलालसा नानालङ्करणहृद्यैर्गन्धमाल्यैश्च सुप्रभैः धनञ्जयस्य रूपेण शरैर्मन्मथचोदितैः अतिविद्धन मनसा मन्मथेन प्रदीपिता दिव्यास्तरणसंस्तीर्णे विस्तीर्णे शयनोत्तमे चित्तसङ्कल्पभावेन सुचित्ताऽनन्यमानसा मनोरथेन संप्राप्तं रमन्त्येनं हि फाल्गुनम् निर्गम्य चन्द्रोदयने विगाढे रजनीमुखे प्रस्थिता सा पृथुश्रोणी पार्थस्य भवनं प्रति छयालीमा अध्याय ।। ४६ ।। बाम्पायन ने कहा-दराजा जनमेजय : गन्धर्वराज की मोहिनी मूर्ति का मरण कर कामदेव के वाणी को विदा करने के पीछे उर्वशी ने अर्जुन में प्रीति में अन्यन्त पीदिन होने लगी। दिव्य विधीने जिस पान की इच्छा मेग्नान किया और गनमान सुन्दर पा विछ हुए टम पर पर रेटकर या अनन्य- यार और आभूषण पहनार यद शहार कानेगी। इदय में कसाना द्वारा प्रियतम की मृर्षि का ध्यान गो भलों में अगमाया मगर में मुगन्धिन करके मामांग सुम्ब मे अपना हा पूरी करने लगी। चादन भरिरमा बिहमन ही मा अर्जुन धीरे धार जय मायंकाल हो गया और चन्द्रमा उदय RustoriestandanaamanianuswinadiasmitissandarimantussLLAHarixaxxinmanmE iterar TimnrrrrrrrartyrITrTerrITICIRTerrtipur अध्याय ४६] म हा भारत १६५७ TODabarin TDTTITA muvirunanimunnintraMITrrrrain - . - marmurtamunnamnavminuumidirtmuTommaithunmun मृदुकुञ्चितदीर्पण कुसुमोत्करधारिणा केशहस्तेन ललना जगामाऽथ विराजती भ्रूक्षेपालापमाधुर्यैःकान्त्या सौम्यतयाऽपि च । शशिनं वक्त्रचन्द्रेण साऽऽह्वयन्तीव गच्छति ॥ ७ ॥ दिव्याङ्गरागौ सुमुखौ दिव्यचन्दनरूपितो गच्छन्त्या हाररुचिरौ स्तनौ तस्या ववल्गतुः ॥ ८ ॥ स्तनोद्वहनसंक्षोभान्नम्यमाना पदे पदे त्रिवलीदामचित्रेण मध्येनाऽतीव शोभिता अधोभूधरविस्तीर्ण नितम्बोन्नतपीवरम् मन्मथायतनं शुभ्रं रसनादामभूपितम् ॥ १०॥ ऋपीणामपि दिव्यानां मनोव्याघातकारणम् । सूक्ष्मवस्त्रधरं रेजे जघनं निरवद्यवत् गूढगुल्फधरौ पादौ ताम्रायततलाङ्गुली कूर्मपृष्टोन्नती चापि शोभेते किङ्किणीकिणो ॥ १२ ॥ सीधुपानेन चाऽल्पेन तुष्टयाऽथ मदनेन च विलासनैश्च विविधैः प्रेक्षणीयतराऽभवत् ॥ १३ ॥ सिद्धचारणगन्धर्वः सा प्रयाता विलासिनी हुआ तर विशाल निनम्बावाली वह अपमग परन पर उसकी कमर धी गेल-शिसा सहा ऊँचे चीड़े नितंब, से उठकर अर्जुन के भवन की ओर चली ॥१५॥ करधनी की टग्जवल रड़ियों में गोभित होने के कारण फूलों के गुच्छों मे शोभित, सुकोमल, घूघर कामदेव की क्रीडाममि से जान पड़ते थे ॥६॥२०॥ वाग उमकी अल जाने के समय उमके मुम्बमण्डल बहुत ही वार्गक रेगमी वर से ढकी हुई टमकी की शोभा को बढ़ाने रगी। कटाक्ष, मधुर भाषण सुटील मनोहर जाँघों को देखकर बड़े-बड़े ऋपियों और अमाधारण म्प और रावण्यना से टमकी अपूर्व के भी मन टिग जाने थे। उसके दोनों गुलगूद शोभा हुई। उसके मा को देखकर चन्द्रमा भी त्लुए रास राल रंगिरिया रम्बी नबी और पाय रजित साहो गया । वह अप्मा दिल्य चन्दन रंगे क्छुए की पीठ के समान ऊंचे ऊंचे थे । वह अप्मरा हुए हिल रहे हार मे गोभित म्ननों के बोझ से पग- थोड़ा मयगन किये हुए कामदेव के मद मे भरी हुई पग पर रचाती हुई जा रही थी । त्रिवरी से मोमिन होने के कारा मे दर्शन करने के योग्य हो गई और नाभि और सोने की काची (करधनी) मे पित कार का वस पनग होने के कारण मे वद मर्ग में aamannariouTorrminduinandan.d.man.adimanalitidan - - । PUTCUTTITUDICIAruarcorrectelDramITTIIITEMICorren १६५८ म हा मारत पनपर्व IITDImmunwaranimuaranamammmmmmmmmmmmmmranmomummmmIATIOImamrritammnary ॥ १४ ॥ ! - वह्वाश्चर्येऽपि वै स्वर्ग दर्शनीयतमाऽऽकृतिः सुसूक्ष्मेणोत्तरीयेण मेघवर्णेन राजता तनुरभ्रावृता व्योनि चन्द्रलेखेव गच्छती ॥१५॥ ततः प्राप्ता क्षणेनैव मनःपवनगामिनी भवनं पाण्डुपुत्रस्य फाल्गुनस्य शुचिस्मिता ॥ १६ ॥ तत्र द्वारमनुप्राप्ता द्वारस्थैश्च निवेदिता अर्जुनस्य नरश्रेष्ठ ! उर्वशी शुभलोचना ॥ १७॥ उपातिष्ठत तद्वेश्म निर्मलं सुमनोहरम् स शङ्कितमना राजन् ! प्रत्युद्गच्छत तां निशि ॥ १८ ॥ दृष्ट्वैव चोर्वशी पार्थो लज्जासंवृतलोचनः तदाऽभिवादनं कृत्वा गुरुपूजां प्रयुक्तवान् ॥ १९ ॥ अर्जुन उवाच-अभिवादये त्वां शिरसा प्रवराप्सरसां वरे! । किमाज्ञापयसे देवि प्रेष्यस्तेऽहमुपस्थितः ॥ २० ॥ फाल्गुनस्य वचः श्रुत्वा गतसंज्ञा तदोर्वशी गन्धर्ववचनं सर्व श्रावयामास तं तदा युगच-यथा मे चित्रसेनेन कथितं मनुजोत्तम ! तत्तेऽहं संप्रवक्ष्यामि यथा चाऽहमिहाऽऽगता ॥ २२ ॥ उपस्थाने महेन्द्रस्य वर्तमाने मनोरमे भी दर्शनीय रूप रसनेवाली अप्सरा आकाशमार्ग से । के समान उसका आदर सत्कार करके कहने लगा-हे शिद्ध चारण और गन्धर्वो सहित जाती हुई ऐसी ' श्रेष्ठ अप्सरा I मैं तुमको प्रणाम करता हूँ । हे देवी! दोखती थी मानों पूर्णमासी का चन्द्रमा पतले बादल । मैं तुम्हारा सेवक हूँ; आज्ञा करो, मैं अभी उसे पूर्ण से ढका हुआ है ॥११॥१५॥ करुगा ॥१६॥२०॥ इस प्रकार से यह मन ओर पवन के समान अर्जुन के एसे विकार शून्य वचन सुनकर उर्वशी चरनेवारी अप्सरा एक रक्ष में अर्जुन के भवन पर घबरा सी गई। वह गन्धर्वराज चिमन का कहा सब आ पहुची। तब शीघ्रता के साथ जाकर द्वारपालरों । वृत्तान्त विस्तार के साथ कहने लगी। अब उर्वशी ने ने उसके आने का वृतान्त अर्जुन को कह सुनाया। कहा-हे नरश्रेष्ठ ! मैं यहा चिनसेन गन्धर्ष के कहने वह मन में शकरके यद्यपि रात्रि थी तो भी उसके । से आई हूँ । उसने जो कुछ कहा है सो सब पहत्ती समीप चरा गया और रजित दो नमस्कार कर बड़े हैं, मुनिए । जब तुम इन्द्र की समा में आये थे तब BrepoxyruptiorOLED FEMINITISAIRAIYAtumtORIAmreneurmumtug- EaamarILIAREASEANIraulammmmmHORITEDimouTREAnimun Real Natumuraru TELLITER अभ्याय ४६] महा मारत १६५९ IraniarriouTIDINATEGaram TAMILNamArouTROUTI nummadurinuummineraimurmimirmirmirmaniurminalimminITim तवाऽऽगमनतो वृत्ते वर्गस्य परमोत्सवे ॥ २३॥ रुद्राणां चैव सांनिध्यमादित्यानां च सर्वशः । समागमेऽश्विनोश्चैव वसूनां च नरोत्तम ! ॥ २४ ॥ महर्षीणां च संघेषु राजर्पिप्रवरेपु च सिद्धचारणयक्षेषु महोरगगणेषु च ॥ २५॥ उपविष्टेषु सर्वेषु स्थानमानप्रभावतः ऋद्धया प्रज्वलमाने अग्निसोमार्कवर्मसु ॥ २६ ॥ वीणासु वाद्यमानासु गन्धवः : शक्रनन्दन ! दिव्ये मनोरमे गेये प्रवृत्ते पृथुलोचन ! ॥ २७॥ सर्वाप्सरःसु मुख्यासु प्रनृत्तासु कुरुद्वह ! वं किलाऽनिमिपः पार्थ मामेकां तत्र दृष्टवान् ॥ २८ ।। तत्र चाऽवभृथे तस्मिन्नुपस्थाने दिवौकसाम् । तब पित्राऽभ्यनुज्ञाता गताः स्वं स्वं गृहं सुराः ।। २९ ॥ तथैवाऽप्सरसः सर्वा विशिष्टाः स्वगृहं गताः । अपि चाऽन्याश्च शत्रुघ्न! तब पित्रा विसर्जिताः।। ३० ॥ ततः शक्रेण संदिष्टश्चित्रसेनो ममाऽन्तिकम् । प्राप्तः कमलपत्राक्ष! स च मामत्रवीदथ ॥ ३१ ॥ त्वत्कृतेऽहं सुरेशेन प्रेषितो वरवर्णिनि ! प्रियं कुरु महेन्द्रस्य मम चवाऽऽत्मनश्च ह ॥ ३२॥ तुम्हारे आने के कारण में बड़ा मनोहर रत्सव हुआ ममा में बैठे थे. और बारम्बार मरी ओर देख रहे थे था । टस टत्सव में जिममें सब स्ट, द्वादश सूर्य, ॥२१॥२८॥ आटों वमु.दोनों अश्विनीकुमार, महामपि, गजन्मपि, नाचना-गाना बन्द हो गया । तुम्हारे पिता ने मिद्ध, चारण, यक्ष और महोग्गजो मब के मन अग्नि, देवताओं, अप्पगों और अन्य मभामदों को विदा चन्द्रमा और सूर्य के ममान तेजम्बी हैं अपने-अपने करके अन्त में चित्रमेन गन्धर्ष को मेरे पान मेवा । योन्यन्यानों पर बैठे हुए थे। गन्धर्व रोग वीणा वग वे तुम्हारे पिता की आजा पाते ही मेरे पाम आर कर सुन्दर म्बर मे मधुर गीत गा रहे थे। सब मुम्च- कहने रमा-हे मुन्दरी! इन्द्र की अन्ना में मे तुम्टोर मुम्य अप्मगण नाच रही थीं। टम ममय तुम भी टम पाम आया हूँ ! तुम भी नहावर्ग पगमा अर्जुन rammmmmmmmmm.artmlarammarAmmumulamilnaduITRINAGARGUTICALLY trngrrrrrrrrrrrrrrTTTTTTTTTTTTTTTTTTTTTTTTT:
० म हा भारत [ वनपर्व WwWLANTOLM CITIT TIITTI TOISTOT TULOTT I TIIT NAT2 ar trist TOTTITAITEILU -- FLYTIDuudutut IZDILIM WINVULLILUVTLHEILULLIAL TILL शकतुल्यं रणे शूरं सदौदार्यगुणान्वितम् पार्थं प्रार्थय सुश्रोणि ! त्वमित्येवं तदाऽब्रवीत् ॥ ३३ ॥ ततोऽहं समनुज्ञाता तेन पित्रा च तेऽनघ ! तवाऽन्तिकसनुप्राप्ता शुश्रूपितुमरिन्दम ! ॥ ३४ ॥ स्वदगुणाकृष्टचित्ताऽहमनङ्गवशमागता चिराभिलपितो वीर ! ममाऽप्येप मनोरथः ॥ ३५॥ वैशम्पायन उवाच तां तथा ब्रुवती श्रुत्वा भृशं लज्जावृतोऽर्जुनः । उवाच करें हस्ताभ्यां पिधाय त्रिदशालये ॥ ३६ ॥ दुःश्रुतं मेऽस्तु सुभगे! यन्मां वदसि भाविनि!! गुरुदारैः समाना मे निश्चयेन वरानने ! यथा कुन्ती महाभागा यथेन्द्राणी शची मम । तथा त्वमपि कल्याणी नाऽत्र कार्या विचारणा ।। ३८ ॥ यचेक्षिताऽसि विस्पष्टं विशेषेण मया शुभे! । तच कारणपूर्व हि शृणु सत्यं शुचिस्मिते ! ॥ ३९ ॥ इयं पौरववंशस्य जननी मुदिनेति ह त्वामहं दृष्टवांस्तत्र विज्ञायोत्फुल्ललोचनः न मामर्हसि कल्याणि! अन्यथा ध्यातुमप्सरः!। गुरोर्गुरुतरा मे त्वं मम वं वंशवर्धिनी ॥४१॥ को पतिरूप से स्वीकार करो। तुम्हारे यह कार्य करने । उंगली टारफर कहने लगा-हे उर्वशी ! तुमने जो से इन्द्र और मैं, दोनों ही परम प्रसन्न होंगे। तुम कुछ मुझ से कहा, वह सुनना मेरे लिये सब तरह भी अर्जुन के सा से अपने को कृतकृत्य समझागी । अनुचित है । मै निश्चय तुमको अपनी गुरु की स्त्री ॥२९॥३३॥ के समान समझता है ॥३४॥३७॥ सो हे अर्जुन ! मै तुम्हारे पास इन्द्र और उक्त कुन्ती और इन्द्राणी जैसे मेरे लिये पूजनीय है गन्धर्व की आज्ञा मे तुम्हारी सेवा करने आई है। मे ही तुम भी हो । हे सामने ! मै यही सोचकर तुम्हारे गुणों ने मेरे मन को खींचकर कामामत करबार बार तुम्हारी और देख रहा था कि यही श्रेष्ठ दिया और मेरी यह इन्छा बहुन दिन पहले से भी अप्सरा हमारे पोरयरस की माता है ॥३८॥४०॥ थी। अग देवगेक में इस अप्सरा की रक्त बात तात्पर्य यह है कि मेरा कोई बुरा विचार न सुनकर रन ही रनित हुआ और अपने कानों में था। इसमे तुमको मेरी ओर से और किसी प्रकार ATIOman ODMITHAutoTOINTEREImanainamamouTLamaMIERE: Antaraman REPUBLULARLLCOLLEOPLLERecoraHNILPELLLLLL AUpamam अध्याय ४६ म हा मारत PermiraduITTOMICROIRAMAILamIITIOमराsrusmr.mमामpartm - IITUTiantraThiamiltimalitidinatomicillidisuniliutistini.hilita टर्वयुवाच अनावृताश्च सर्वाः स्म देवराजाभिनन्दन! गुरुस्थाने न मां वीर! नियोक्तुं त्वमिहाऽर्हसि ॥ १२ ॥ पूरोवंशेहि ये पुत्रा नतारो वा विहाऽऽगताः । तपसा रमयन्त्यस्मान्न च तेषां व्यतिक्रमः ॥ १३ ॥ तत्प्रसीद न मामाता विसर्जयितुमर्हसि हृच्छयेन च संतप्तां भक्तां च भज मानद ! ॥ १४ ॥ अर्जुन उवाच-श्रृणु सत्यं वरारोहे ! यत्त्वां वक्ष्याम्बनिन्दिने !। शृण्वन्तु मे दिशश्चैव विदिशश्च सदेवताः ॥ १५॥ यथा कुन्ती च माद्री च शची चेव ममाऽनघे। तथा च वंशजननी त्वं हि मेऽद्य गरीयसी ॥१६॥ गच्छ मृा प्रपन्नोऽस्मि पादी ते वरवर्णिनि ! । त्वं हि मे मातृवत्पूज्या रक्ष्योऽहं पुत्रवत्वया ॥ १७ ॥ वंशम्पायन उवाच-एवमुक्ता तु पार्थेन उर्वशी क्रोधमृच्छिता वेपन्ती भृकुटीवका शशापाऽथ धनञ्जयम् टवट्युवाच-तब पित्राऽभ्यनुज्ञातां स्वयं च गृहमागताम् यस्मान्मां नाऽभिनन्देथाः कामबाणवशंगताम् ॥ १९ ॥ तस्मात्वं नर्तनः पार्थ ! स्त्रीमध्ये मानवर्जितः । का ध्यान करना उचित नहीं है । तुम्हीं में पुरुषश यह नुनकर अर्जुन ने क्या-हे अप्सरा ! मैंन उत्पन्न हुआ है । तुम मेरी बड़ी हो। यह सुनकर जो तुममे रहा है और कहता हूँ टेमे तुम निश्चय वगी ने कहा-हे इन्द्र के पुत्र!हम अनावृत दिया मत्य जानो। मब विकारों को माझी करके कहता हैं। तुम मुझे अपनी गुरु-पत्नी मत कहो । देखो हूँकि कुन्नी, मादी और इन्द्राणी मे मेरे लिये पूज- पुरुवंग के बहुन मे पुत्र और नाती तपस्या कर काके नीय और कुल की माता है वैसे ही तुम हो । में यहां आये है चौर व सब हमारे माथ रमण करते तुम्हारे चरणों में मिर रखकर प्रगान करता हूँ। तुम हैं। टनको क्मिी प्रकार का दोष नही लगता है। जाओ तुम मेरे गिय माता की तरह पूजनीय हो और में काम मे विहल हो रही हूँ। मैं मक्त और अनुग्ल मैं तुम्हार रिये पुत्रकी तरह रमनीय हूँ॥१५॥४७॥ होकर यहा आई हूँ। मुझ पर कृपा करके तुम मुझे वंशवायन ने कहा-हे राबाउनमेजय! अर्जुन , म्बीकार को । मुने विमुख करना तुम्हें क्मिी नह के एमे वचन सुनकर टर्वी क्राधित हो गई। टमका रचित नहीं है ॥४॥ शरीरकाने लगा। मोटेदा हो गई य में आकर Enjananmadinattnisairaundicitianism.indianarmiliarwaduatiaununihalifanemiundari.ki.ten.utaa.natnana Giri - । Arr DuraEETMEROTIerarmer Orrrrrrructercrernerravars महाभारत [ वनपर्व RLDINumaniammarrammmmmmmmanmanmanmamimaandaurimahamanna ॥ ५० ॥ - animummmmuni and prillianimuainmahimammiumiLLNORTamanROINE अपुमानिति विख्यातः पण्ढवद्विचरिष्यसि एवं दत्वाऽर्जुने शापं स्फुरदोष्ठी श्वसन्त्यथ पुनः प्रत्यागता क्षिप्रमुर्वशी गृहमात्मनः ॥ ५१ ॥ ततोऽर्जुनस्त्वरमाणश्चित्रसेनमरिन्दमः संप्राप्य रजनीवृत्तं तदुर्वश्या यथा तथा निवेदयामास तदा चित्रसेनाय पाण्डवः तत्र चैवं यथावृत्तं शापं चैव पुनः पुनः अवेदयच्च शकस्य चित्रसेनोऽपि सर्वशः ॥ ५३॥ तत आनाय्य तनयं विविक्ते हरिवाहनः सान्त्वयित्वाशुभैर्वाक्यैः स्मयमानोऽभ्य भाषत ॥ ५४ ॥ सुपुत्राऽद्य पृथा तात ! त्वया पुत्रेण सत्तम! । ऋषयोऽपि हि धैर्येण जिता वै ते महाभुज ! ॥ ५५ ॥ यत्तु दत्तवती शापमुर्वशी तव मानद ! स चाऽपि तेऽर्थकृत्तात ! साधकश्च भविष्यति ॥ ५६ ॥ अज्ञातवासो वस्तव्यो भवद्भिर्भूतलेऽनघ ! वर्षे त्रयोदशे वीर! तं तत्र क्षपयिष्यसि तेन नर्तनवेपेण अपुंस्त्वेन तथैव च अर्जुन को शाप देते हुए उसने कहा-हे अर्जुन ! | गन्धर्वराज उसको साथ लेकर इन्द्र के पास गया । काम से मिहल हुई हुई मै तुम्हारे पिता की आज्ञा उनको उसने आदि से अन्त तक सब वृत्तान्त कह से तुम्हारे पास स्वयं आई, पर तुमने मुझे प्रसन्न नहीं | सुनाय! । तय इन्द्र अपने पुत्र अर्जुन को एकान्त में किया। इस कारण तुमको मान रहित होकर स्त्रियों ले जाकर कहने लगे-हे पुस ! तुमको गर्भ में धारण के बीच में नाचना पड़ेगा। तुम नपुंसक कहलाओगे। करने के कारण आज कुन्ती धन्य हुई। तुम, इसमें ॥४८॥५०॥ कोई सन्देह नहीं उनके सुयोग्य पुत्र हो ॥५१॥५५|| इस तरह अर्जुन को शाप देकर उर्वशी अपने हे पुत्र ! तुमने अपने धैर्य से ऋपियों और पर चली आई। उस समय भी उसके ओठ फरक देवताओं को भी जीत लिया और जो उर्वशी ने तुम रहे थे और यह हम्पी सांस ले रही थी। अप्सरा के को शाप दिया है उसका कुछ भी भय नहीं है। यह शाप से अर्जुन यहुत व्याकुल हुआ। अप वह चित्रसेन शाप भी आगे तुम्हारे बड़े काम आयेगा । क्योंकि के पास गया। यहां उसने उससे सर वृषान्त कहा। तुमको तेरहवें वर्ष में गुप्तवास करना है । सो जय DD'OBRECIA CRISTITION OULULELOTOT TU. T W DTTITORE.NLOD TUOTTOUS NOULD TUTULLIITTIMMUULIIN ! - currymum19DMOMeroCOLUTICLuLCLoantIArunacuTUM.Rev hanumaniaTIMITDivilimdisiriLarmalarinTHE अध्याय ४७ म हा भा र त १६६३ Traumari மாராராராராரானாராாராபாயரUaranary वर्षमेकं विहृत्येव ततः पुंस्त्वमवाप्स्यसि ॥ ५८ ॥ एवमुक्तस्तु शक्रेण फाल्गुनः परवीरहा मुदं परमिकां लेभे न च शापं व्यचिन्तयत् ॥ ५९ ॥ चित्रसेनेन सहितो गन्धर्वेण यशस्विना रेमे स स्वर्गभवने पाण्डुपुत्रो धनञ्जयः ॥ ६०॥ इदं यः शृणुयाद्वृत्तं नित्यं पाण्डुसुतस्य वै । न तस्य कामः कामेषु पापकेषु प्रवर्तते इदममरवरात्मजस्य घोरंशुचि चरितं विनिशम्य फाल्गुनस्य । व्यपगतमददम्भरागदोपास्त्रिदिवगताविरमन्ति मानवेन्द्राः ॥६२॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि इन्द्रलोकाभिगमनपर्वणि उर्वशीशापोनाम पट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥४६॥ वह समय आवे तब तुम एक वर्ष हिजड़े के स्वरूप । वैशम्पायन ने कहा-हं जनमेजय ! पाण्डव अर्जुन के में रहियो । तेरहवाँ वर्ष व्यतीत होने पर फिर तुम ज्यों । इस वृतान्त को सुननेवाले मनुष्य की इच्छा पाप- का त्यों पुरुष हो जाओगे ॥५६।५९॥ युक्त कामना मे दूर रहती है। और राजा लोग इस पिता के मुख से ऐसे वचन सुनकर अर्जुन बड़ा पवित्र इतिहास को सुनकर राग, द्वेप, मद और मेद प्रसन्न हुआ 1 शाप के कारण उसको जो चिन्ता हुई को छोड़कर म्वर्ग पाते हैं और वहा आनन्दपूर्वक थी वह सब दूर हो गई। वह निश्चिन्त होकर स्वर्ग रमण करते हैं ॥६०।६२॥ में रहकर चित्रसेन गन्धर्व के साथ रमण करता रहा। बनपर्व का झ्यालीसवां अध्याय समाप्त हुआ ॥ ४६॥ अथ सप्तवत्वारिंशोऽध्यायः ॥४७॥ वैशम्पायन उवाच कदाचिटमानस्तु महर्पिरुत लोमशः जगाम शकभवनं पुरन्दरदिदृक्षया स समेत्य नमस्कृत्य देवराज महामुनिः ददर्शाऽर्धासनगतं पाण्डवं वासवस्य हि ॥ २ ॥ संतालीसवां अध्याय ॥४॥ वैशम्पायन ने कहा- हे जनमेजय ! एक समय को इन्द्रासन पर इन्द्र की यरावर बेटा हुआ देखकर रोमश ऋपि घूमते हुए इन्द्र को देखने की इच्छा विचार करने लगे कि कुन्ती का पुत्र अर्जुन क्षत्रिय से इन्द्रपुरी में आये और इन्द्र से मिलकर इन्द्र के होर विम तरह देवताओं और ऋपियों के लिये दिये हुए आमन पर बैठ गये । उस समय वे अर्जुन मी दुर्लभ इन्द्र के आमन पर बैठ गया है। इसने । mant VTU OTVitamination almnommanmulaam Tarun Tamainanimlilianimaiclinadi.tamnastimaanbar.anuamn. mandadas- - MOODUTODCLOOmereeMMODUCTICAL CLIDINTError १६६४ महा भारत [ बनपर्व FammaruRIGrammmmiDiwnpadaTomorrupilummamaliKADITrmanen. निषसाद द्विजश्रेष्ठः पूज्यमानो महर्षिभिः तस्य दृष्ट्वाऽभवद् बुद्धिः पार्थमिन्द्रासने स्थितम्। कथं नु क्षत्रियः पार्थ ! शक्रासनमवाप्तवान् ? ॥ ४ ॥ किं त्वस्य सुकृतं कर्म के लोका वै विनिर्जिताः। स एवमनुसंप्राप्तः स्थानं देवनमस्कृतम् तस्य विज्ञाय संकल्पं शको वृत्रनिपूदनः लोमशं प्रहसन्वाक्यमिदमाह शचीपतिः ब्रह्मर्षे ! श्रूयतां यत्ते मनसैतद्विवक्षितम् नाऽयं केवलमयों वै मानुषत्वमुपागतः महर्षे मम पुत्रोऽयं कुन्त्यां जातो महाभुजः । अस्त्रतोरिह प्राप्तः कस्माञ्चित्कारणान्तरात् अहो ! नैनं भवान्वेत्ति पुराणमृषिसत्तमम् । शृणु मे वदतो ब्रह्मन् ! योऽयं यच्चाऽस्य कारणम्॥ ९ ॥ नरनारायणो यो तो पुराणावृषिसत्तमौ ताविमावनुजानीहि हुपीकेशधनायौ विख्यातो त्रिपु लोकेषु नरनारायणाषी कार्यार्थमवती तो पृथ्वी पुण्यप्रतिश्रयाम् पमा कौन सा पुण्य किया है, अथवा ऐमा कौन ऐसे प्रमापिइस पुराने ऋषि को नहीं जानते हैं! श्रेष्ठ लोक जीता है कि ऐमा देव-पूजित म्यान प्राप्त हे असन् ! जो नर और नारायण नाम से पुराने प्रापि कर लिया ! ।।१५]] विख्यात हैं उन्हीं दोनों ने पृथ्वी का भार दूर करने टस मुनि को इस प्रकार सोचते देख उनके के लिये श्रीकृष्ण और अर्जुन के नाम से अस्तार गन के भाव को जानकर इन्द्र हंसकर कहने लगे- लिया है ॥६॥१०॥ हे प्रामावि ! में आपके मन के सकल्प को जान इन दोनों नर और नारायण का रहने का स्थान गया है। तुम इम अर्जुन को केवल मनुष्य ही मत पदविधिमजदा से गंगा जी निकलती है और समझो किन्तु यह मेरा पुत्र है और पुन्नी से उत्सन जिसे देवता और महात्मा मरिनही देरा सस्ते दें। हुआई और यहां किसी कारण से अब विधा सामगे । इन दोनों तेजम्बियों ने मेरी प्रेरणा से पृथ्वी पर बिरेही आभयंका पात आप पेमे. अवतार लिया है और दोनों मिलकर पृथ्वी का मार mahArAhut.cam.hirurtamamalATALAITHILLCDSLEEmirtmeraman -- भाया THDRDOHORT19134:12NIO90194THMAANVIVAware अध्याय ४७ ] पहा मा रत १६६५ FuluilitarTIALnmzmarranorammarAmAniranamroMeaninthian 151'1"t":"120 'I'IIIIIIIIII'I'L'OLOL! I'er TOMT719er PCT'lo' T'U ALIUDMU यन्न शक्यं सुरेष्टुमृपिभिर्वा महात्मभिः तदाश्रमपदं पुण्यं बदरीनाम विश्रुतम् ॥ १२ ॥ स निवासोऽभवद्विप्र ! विष्णोर्जिष्णोस्तथैव च । यतः प्रववृते गङ्गा सिद्धचारणसविता ॥ १३ ॥ तो मन्नियोगाद ब्रह्म ! क्षितो जातो महाद्युती । भूमे रावतरणं महावीर्यों करिष्यतः उबृत्ता ह्यसुगः केचिन्निवातकवचा इति विप्रियेषु स्थिताऽस्माकं वरदानेन मोहिताः ॥ १५ ॥ तर्कयन्ते सुरान्हन्तुं वलदर्पसमन्विताः देवान्न गणयन्त्येते तथा दत्तवरा हि ते पातालवासिनो रौद्रा दनोः पुत्रा महाबलाः । सर्वदेवनिकाया हि नाऽलं योधयितुं हि तान् ॥ १७ ॥ योऽसौ भूमिगतः श्रीमान्विष्णुमधुनिपूदनः । कपिलो नाम देवोऽसौ भगवानजितो हरिः येन पूर्व महात्मानः खनमाना रसातलम् दर्शनादेव निहताः सगरस्याऽऽत्मजा विभो ! ॥ १९ ॥ तेन कार्य महत्कार्यमस्माकं द्विजसत्तम ! पार्थेन च महायुद्धे समेताभ्यां न संशयः सोऽसुरान्दर्शनादेव शक्तो हन्तुं सहानुगान् । निवातकवचान्सर्वान्नागानिव महादे ॥ २१ ॥ उतारंग। और जो नियातक्यच नाम के दैत्य पाताल. जिन्होंने पृथ्वी पर अवतार लिया है और जो कपिल रोक में रहते हैं वरदान पाने के कारण से बड़े बरी ऋषि का रूप हैं जिन्होंने राजा सगर के पुत्रों को और भयर हो रहे हैं और देवनाओं को कुछ न रमातल खोदने पर दृष्टिमात्र से ही मम्म कर दिया समझकर मारने को उद्यत रहते हैं और देवता उनमे था इन निवातकवच नाम के पक्षपानियों महित युद्ध नहीं कर मकने ॥११॥१७॥ देखकर ही भम्म कर सकते हैं परन्तु ऐसे छोटे से उनको यह अर्जुन मारकर फिर नस्लोक को काम के लिये मैं उनमे कहना योग्य नहीं समझता हूँ जायगा यद्यपि मधुदत्य को मारने वाले विष्णु भगवान् । क्योंकि जो उनको यह यात जितनाई जाये तो अपने Flusluminstituttimili wmanandinindstanditikathamadnavishalaashina.cruit 100000001020129TODOTCOITTTTTTOT.2 महाभारत वनपर्व . . - MTUPILObronadtruwduod: TA'L' DITITIPIU'UQU'UNIT CUTICULT तेजसः सुमहाराशिः प्रबुद्धः प्रदहेज्जगत् ॥ २२ ॥ अयं तेषां समस्तानां शक्तः प्रतिसमासने । तान्निहत्य रणे शूरः पुनर्यास्यति मानुपान् ॥ २३ ॥ भवानस्मन्नियोगेन यातु तावन्महीतलम् काम्यके द्रक्ष्यसे वीरं निवसन्तं युधिष्ठिरम् ॥ २४ ॥ स वाच्यो मम सन्देशाधर्मात्मा सत्यसंगरः नोत्कण्ठा फाल्गुने कार्या कृतास्त्रः शीघ्रमेष्यति ॥ २५ ॥ नाऽशुद्धबाहुवीर्येण नाऽकृतास्त्रेण वा रणे भीष्मद्रोणादयो युद्धे शक्याः प्रतिसमासितुम् ॥ २६ ॥ गृहीतास्त्रो गुडाकेशो महावाहुमहामनाः नृत्यवादित्रगीतानां दिव्यानां पारमीयिवान् ॥ २७ ॥ भवानपि विविक्तानि तीर्थानि मनुजेश्वर ! भ्रातृभिः सहितः सर्वैर्द्रष्टुमर्हत्यरिन्दम ! तीर्थावाप्लुत्य पुण्येषु विपाप्मा विगतज्वरः राज्यं भोक्ष्यसि गजेन्द्र ! सुखी विगतकल्मषः ॥ २९ ॥ भवांश्चैनं द्विजश्रेष्ठ ! पर्यटन्तं महीतलम् त्रातुमर्हति विप्राग्य ! तपोवलसमन्वितः तेज के समूह से जगत् को भस्म कर डालेंगे। इससे | द्रोणाचार्य को वश में नहीं कर सकता। सो अर्जुन यह अर्जुन ही उनको मार डालने को समर्थ है इस अब सब अस्त्र सीखकर नाचने, गाने और जाने अर्जुन और श्रीकृष्ण के मिलकर युद्ध करने से हमारा । में भी निपुण हो गया है ॥२४॥२७॥ बड़ा काम निकलेगा ॥१८॥२३॥ इससे तुम भी अपने छोटे भाइयों को साथ अब आप मेरी आज्ञा से पृथ्वी पर काम्यक बन लेकर तीर्थ यात्रा कगे । तीथों में स्नान करने से में युधिष्ठिर के पास जाइये और उसंस हमारा यह । तुम्हारे सब पाप दूर हो जायेंगे और कल्मपरूपी रोग सन्देसा कह दीजिएगा कि तुम अर्जुन की ओर से नष्ट हो जायगा। फिर तुम सुखपूर्वक राज्य करोगे। किमी पात की चिन्ता मत करो। वह अस्त्र सीखकर हे ब्रह्मण ! तपोवल के प्रभाव से आप तीर्थ यात्रा शाम ही तुम्हारे पाम आवंगा । जो मनुष्य मात्र समय सब आपतियों से उन्हें बचाते रहियेगा। मीखा हुआ और पराक्रमी नहीं है वह भीष्म और पहाड़ों पर और विषम स्थानों में भयाकर राक्षस रहस STILUULELCMCILATCOIN TITRIPTOLD'U'D WITH 17153417WM'DATATTE MULTUMUTULOPULLITTU ANTIPATMeerumIDOHDAINIMAmaronmmentaJIMRAPATRAMMपा अभ्याय ४८]] म हा भारत १६६७ Hunremium MEDImauirmania - - - VIDImanpurvanuarUDIIIAtomD.COUpens' adrumonian .:: च सदा देशेषु विपमेषु च वसन्ति राक्षसा रौद्रास्तेभ्यो रक्षां विधास्यति ॥ ३१ ॥ एवमुक्ते महेन्द्रेण वीभत्सुरपि लोमशम् उवाच प्रयतो वाक्यं रक्षेथाः पाण्डुनन्दनम् ॥ ३२ ॥ यथा गुप्तस्त्वया राजा चरेत्तीर्थानि सत्तम! । दानं दद्याद्यथा चैव तथा कुरु महामुने ! ॥ ३३ ॥ वैशम्पायन उवाच नथेति संप्रतिज्ञाय लोमशः सुमहातपाः काम्यकं वनमुद्दिश्य समुपायान्महीतलम् ॥ ३४ ॥ ददर्श तत्र कोन्तेयं धर्मराजमरिन्दमम् तापसैतृभिश्चैव सर्वतः परिवारितम् ॥ ३५ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि इन्द्रलोकाभिगमनपर्वणि लोमशगमने मनचत्वारिंशोऽध्याय ॥ ४ ॥ हैं उनमे पाण्डवों की रक्षा करना ॥२८॥३१॥ जनमेजय ! लोमश ऋषि उक्त बात को सुनकर बहुत जब इन्द्र उक्त प्रकार से कह चुका तब अर्जुन अच्छा' कहकर पृथ्वी पर आये और काम्यक वन में बोला-हे महाराज! आप युधिष्ठिर की रक्षा अवश्य पहुँचकर युधिष्ठिर के पास पहुंचे जो अपने भाइयों और कीजिएगा जिसमे वह आपमे रक्षित होकर तीर्थयात्रा तपम्वियों की मण्डली में बैठा हुआ था ॥३२॥३५॥ कर सके और दान देवे । वैशम्पायन ने कहा-हे चनपर्व का संतालीसवां अध्याय ममान हुआ ॥४७॥ अय अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ जनमेजय उवाच-अत्यद्भुतमिदं कर्म पार्थस्याऽमिततेजमः धृतराष्ट्रो महाप्राज्ञः श्रुत्वा विप्र ! किमब्रवीत् ॥ १ ॥ वैशम्पायन उवान शकलोकगतं पार्थं श्रुत्वा राजाऽम्बिकासुतः द्वैपायनादृषिश्रेष्टात्संजयं वाक्यमत्रीत् धृतराष्ट्र व्याच-श्रुतं मे सूत! कात्स्न्येन कर्म पार्थस्य धीमतः । अड़तालीमवां अध्याय ॥४८॥ इस कथा को सुनकर राजा जनमेजय ने पूछा- अम्बिका के पुत्र धृतराष्ट्र ने जब यदव्याग क मुग है महाराज ! महामान नगष्ट्र ने जब परम तेजम्बी मे अर्जुन के इन्द्रमांक जान का नाम गुना नय अर्जुन के इस अद्भुत काम का वृतान्त मुना तब उन्होंन मन्त्रय म कहा- मन्नय! मन अर्जुन के क्या कहा ! वैगम्यायन जी ने कहा- उनमेजय ! मत्र विचित्र कामों का हाल, पुना है। क्या तु EMIChintainamainalisthuranamannalitlantauran.amanantionarinaLSERVew.m, । २ II MAHAmr.u.tumentrestinuum-rrrrrrrrrrrrrrrrrrrrr .
म हा भारत [ मनपर Farmiuaniammarmanormamtalinmunmurarurammahararmirmananimalrmy CAToPREPARAMDmangRPUmmmuTHORITUDIOTECIPUR कञ्चित्तवाऽपि विदितं याथातथ्येन सारथे ! ॥ ३ ॥ प्रमत्तो ग्राम्यधर्मेषु मन्दात्मा पापनिश्चयः मम पुत्रः सुदुर्बुद्धिः पृथिवीं घातयिष्यति यस्य नित्यमृता वाचः खरेष्वपि महात्मनः त्रैलोक्यमपि तस्य स्याद्योद्धा यस्य धनञ्जयः ॥ ५ ॥ अस्यतः कर्णिनाराचांस्तीक्ष्णाग्रांश्च शिलाशितान्। कोऽर्जुनस्याऽग्रतस्तिष्ठदपि मृत्युर्जरातिगः मम पुत्रा दुरात्मानः सर्वे मृत्युवशानुगाः । येषां युदं दुराधर्षः पाण्डवैः प्रत्युपस्थितम् ॥ ७ ॥ तथैव च न पश्यामि युधि गाण्डीवधन्वनः । अनिशं चिन्तयानोऽपि य एनमुदियाद्रथी द्रोणक प्रतीयातां यदि भीष्मोऽपि वा रणे महान्स्यात्संशयोलोके तत्र पश्यामि नो जयम् ॥ ९ घृणी कर्णः प्रमादी व आचार्यः स्थविरो गुरुः । अमर्षी बलवान्पार्थः मरम्भी दृढविक्रमः ॥ १० ॥ संभवेत्तुमुलं युद्धं सर्वशोऽप्यपराजितम् भी यह सब हाल मालूम है ! मै जानता हूँ कि यह खड़ा हो गया मैं जानता हूँ कि मेरे पुत्र दुगमा मुद्र, दुष्ट, दुर्बुद्धि, और पापी मेरा पुत्र दुर्योधन और काल के वश में हैं । मैंने अभी तक ऐसे किसी केवल विषय-भोग में ही लग रहकर समय गँवा रहा वीर को नहीं देखा, जो गाण्डीव धनुष लिये खड़े है। चद्द अवश्य अब सब पृथ्वी का नाश करेगा। अर्जुन के साथ युद्ध कर सक । मुझे जान पड़ता है क्योंकि जिम महात्मा की बात स्वतत्रता में भी कभी कि कर्ण, द्रोण या भीष्म पितामह भी यदि दुर्योधन असत्य नहीं होती और जिसकी और अर्जुन सरीखा की ओर से युद्ध करेंगे तो भी युद्ध में हमारे पक्ष के योद्धा है वह तीनों लोकों को भी जीत सकता है। जीतने की सम्भावना नहीं है क्योंकि कर्ण दयाल तेल, नुकीले, की और नाराच नाम के बाणों को और प्रमादी है और द्रोणाचार्य तथा भीष्म दोनों जप अजुन छोड़ेगा तब उनको कान सहेगा ! यमराज पृद्ध है। ये अर्जुन से युद्ध नहीं कर सकते । अर्जुन पी भी यह मामय नहीं है जो अर्जुन के तीक्ष्ण झांधी, बलवान और हदपराक्रमी है ॥७॥१०॥ वाणों के सन्मुम्ब टहर सके || पाण्डवों के साथ घोर संग्राम होना सम्भय है, मो उन पाण्डवों मे अब मेरे पुत्रों का युद्ध , किन्तु उन्हें परास्त करना अत्यन्त कठिन है । क्योंकि Ermilam MINISTwitysansad MATRasinimilarmananiraunity, Jamaina Vimaww.rrrrrrrrrrrrrrrrrrr Preeroup DE अध्याय ४८]] म हा मारत ImmunomommmmmanimumUTTTTTiminimummiuTITamiliarl .. MRILMMAMT Miniuan mudalaimalitimallantonlintonianili - सर्वे शस्त्रविदः शूराः सर्वे प्राप्ता महद्यशः ॥ ११ ॥ अपि सर्वेश्वरत्वं हि ते वाञ्छन्त्यपराजिताः वधे नूनं भवेच्छान्तिरेतेषां फाल्गुनस्य वा ॥ १२ ॥ न तु हन्ताऽर्जुनस्याऽस्ति जेनावाऽस्य न विद्यते । मन्युस्तस्य कथं शाम्येन्मां चैव प्रतिसंहितः ॥ १३ ॥ त्रिदशेशसमो वीरः खाण्डवेऽग्निमतर्पयत् । जिगाय पार्थिवान्सर्वानाजसूये महाक्रतो ॥ १४ ॥ शेपं कुर्यादिरेर्वजो निपतन्मूर्ति संजय ! न तु कुर्युः शराः शेषं क्षिप्तास्तात ! किरीटिना ॥ १५ ॥ यथा हि किरणा भानोस्तपन्तीह चराचरम् तथा पार्थभुजोत्सृष्टाः रास्तप्स्यन्ति मत्सुतान् ॥ १६ ॥ अपि तद्रथघोपण भयार्ताः सव्यसाचिनः प्रतिभाति विदीर्णेव सर्वतो भारती चमू यदुद्वमन्प्रवपंश्चैव वाणान्स्थाताऽऽनतायी समरे किरीटी । सृष्टोऽन्तकः सर्वहगे विधात्रा भवेद्यथा तद्वदपारणीयः ॥ १८ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि इन्द्रलकाभिगमनपर्वणि वृतराष्ट्रविलापे अष्टमत्वारिंशोऽध्याय 111८11 मन पाण्डव शूरवीर, अब जाननेवाले और याम्बी इन्द्र के वज़ मे पर्वत शेष बच रहे परन्तु अर्जुन है। वे शत्रुओं को हराकर यश पाने की इच्छा । के वाण ऐसे हैं कि उनमे कदापि कोई नहीं बच रखते हैं। इस कारण सर पाण्डवों को, अथवा केवल ॥११.१५॥ अर्जुन को, मारे बिना किमी तरह युद्ध का भय नहीं पुत्र उमके वाणों में इस प्रकार से तापित : मिट मना । इम जगत् में ऐसा कोई नहीं देस है जैसे सूर्य की किरणों मे मब जगत् तप्त हो रहा है। पड़ता जो अर्जुन को मार सके या हरा सके । मेरे मुझे ऐमा प्रतीत होता है कि भरताभियों की मेना । प्रति अर्जुन के मन में जो क्रोध उत्पन्न हुआ है वह । अर्जुन के रथ के चलने के गन्द मे भयभीन और किमी नाह नहीं मिट सकना । देखो, अर्जुन ने । तिनर बितर हो रही है और अर्जुन तम में वाण खाण्डर वन को जराकर अमिटेव को प्रमन्न क्यिा निकाल निकार कर मृत्यु के समान रण में बड़े होर। और सब पृथ्वी के राजाओं को जीतकर राजसूय मार रहा है और उमको कोई नहीं जीत सकता। यन रचा उमा परानम इद्र के ममान है। चाहे ॥१६॥१८॥ वनपर्व का अहतारीमया अध्याय ममान हुआIn८॥ NanufIDIdaliynistration otu Giannu ini tact: । सकता है 05.13 1U1: . .nrTOm.com.nu.CUHrrrrrrrrrr. .ru" १६७० म हा मारत । वनपर्व . . . 1''LOLLUTITUTULTIT TONTOLOTT, INUED UMLUDUIE LUDITUTUVCP UDIIDI - सब्जय उवाच-यदेतत्कथितं राजस्वया दुर्योधनं प्रति सर्वमेतद्यथातत्त्वं नैतन्मिथ्या महीपते ! मन्युना हि समाविष्टाः पाण्डवास्ते महौजसः । दृष्ट्वा कृष्णां समां नीता धर्मपत्नी यशखिनीम् ॥ २ ॥ दुःशासनस्य ता वाचः श्रुत्वा ते दारुणोदयाः । कर्णस्य च महाराज! न खप्स्यन्तीति मे मतिः॥ ३ ॥ श्रुतं हि मे महाराज ! यथा पार्थेन संयुगे एकादशतनुः स्थाणुर्धनुपा परितोपितः कैरातं वेपमास्थाय योधयामास फाल्गुनम् जिज्ञासुः सर्वदेवेशः कपर्दी भगवान्स्वयम् तत्रैनं लोकपालास्ते दर्शयामासुरच्युतम् अस्त्रहेतोः पराक्रान्तं तपसा कौरवर्पभम् नैतदुत्सहते चाऽन्यो लव्धुमन्यत्र फाल्गुनात् । साक्षाद्दर्शनमेतेपामीश्वराणां नरो भुवि महेश्वरेण यो राजन् ! न जीर्णो ह्यष्टमूर्तिना । कस्तमुत्सहते वीरो युद्धे जरयितुं पुमान् आसादितमिदं घोरं तुमुलं लोमहर्पणम् द्रौपदी परिकर्पद्भिः कोपयद्भिश्च पाण्डवान् ॥ ९ ॥ रुचासवा अध्याय ॥१९॥ धृतराष्ट्र की उक्त वातों को सुनकर सजय ने है और महादेव जी ने उसे जानने के लिये किरात- कहा-हे महाराज ! आपने दुर्योधन के बारे में जो रूप धरकर उसमे युद्ध किया है ॥१।५।। कुछ कहा है सो ठीक है । इसमें तनिक भी मिथ्या और यह भी सुना है कि अर्जुन अम्म मिलने नहीं है । वे तेजस्वी पाण्टय उस धर्मपत्नी द्रौपदी को के लिये तपस्या करने को गया था वहां उसको लोक- समा में लाये जाने के कारण से क्रोध में भरे हुए हैं। पालों ने अपन दर्शन दिय । सो सिवाय अर्जुन के है और कर्ण और दुःशासन के कहे हुए दुर्वचनों से इन माक्षात् ईश्वरों का दर्शन इस संसार में दृमग महामोधित हो रहे हैं। मैंने यह मुना है कि अर्जुन, कान कर सकता है । भगवान् शकर जिस संग्राम ने धनुष मे युद्ध करके महादेव जी को प्रसन्न किया में निर्यल नहीं कर सके उसे सग्राम में हरानेवाला - - - RiotmarUIdanimuaniateliminiMICLERTALL.mitharamaditin dr.. । - । MATHunymsAgroMTCRITreeswarrazeruarruaryanawareaumarAPPEPEm अध्याय ४९] म हा भारत १६७१ ICTICTIMRITIATIOnmanाmausminiumATRamunartneraसामान । WOYUNIN, NOTLU'I'IIHOTTU!''''''P'L'OIt'step'US'TI'UIINCIU pet l'ULTICUS.'t wat hull'I***.L' Gr. यत्र प्रस्फुरमाणोप्टो भीमः प्राह वचोऽर्थवत् । दृष्ट्वा दुर्योधनेनोरू द्रौपद्या दर्शितावुभौ ऊरू भेत्स्यामि ते पाप ! गदया भीमवेगया । त्रयोदशानां वर्षाणामन्ते दुडूंनदेविनः सर्वे प्रहरतां श्रेष्टाः सर्वे चाऽमिततेजसः सर्वे सर्वास्त्रविद्वांसो देवैरपि सुदुर्जयाः ॥ १२ ॥ मन्ये मन्युसमुद्भूताः पुत्राणां तव संयुगे । अन्तं पार्थाः करिप्यन्ति भार्यामर्पसमन्विताः ॥ १३ ॥ घृनगष्ट्र उवाच- किं कृतं सूत ! कर्णेन वदता परुपं वचः पर्याप्तं वेरमेतावद्यत्कृष्णा सा सभां गता ॥ १४ ॥ अपीदानीं मम सुतास्तिष्टेरन्मन्दचेतसः येपां भ्राता गुरुज्यष्टो विनये नाऽवतिष्ठते ॥१५॥ ममापि वचनं मूत ! न शुश्रूपति मन्दभाक् । दृष्ट्वा मां चक्षुपा हीनं निर्विचेष्टमचेतसम् ये चाऽस्य सचिवा मन्दा कर्णमावलकादयः ने तस्य भूयसो दोपान्वर्धयन्ति विचेतसः ॥ १७॥ खरमुक्ता द्यपि शराः पार्थेनाऽमिततेजमा और कौन मंमार में होगा। ममा में द्रौपदी को लाकर रोग निश्चय आपके पुनों को मार डालेंगे॥१०॥१३॥ पाण्टवा का शेप बढाने मे ही यह घोर अनर्थ उपन्थिन यह सुनकर धृतराष्ट्र ने कहा-हे मूत ! केवल हो गया है । कर्ण के क्टोर वचनों से कुछ नहीं हुआ। द्रौपदी आप जानते हैं कि जिम ममय दुर्योधन ने अपनी को मब मामने मभा में बीच गने मे ही यह जांघ द्वीपदी को दिखाट थी म ममय मीममेन ने मयङ्कर शत्रुना उत्पन्न हुई है । हे मनय ! जिनका जिमके होट कोध मे फड़क रहे थे यह कहा था कि गुरु बड़ा भाई दुर्योधन म्वय विनयविहीन है वे मेरे तेरह वर्ष यनीन हो जाने पर मैं तेग दोनों जाघों मौ पुत्र अभी तक जीने-जागते हैं, यही मुझे आश्चर्य को युद्ध में गदा मे त.इंगा। हे मटागज ! मी जान पड़ना है। वह मुझे अन्या. अनानी और अनेनन पाण्डव बड़े बरयान् और श्रेष्ठ योद्धा है यहा ताकि जानक किमी तरह मेरी बात को नदी मुनना है। देवता भी युद्ध करके उन्हें नहीं हगमस्ते । अपनी कर्ण, गकुनि आदि दृष्ट मन्त्री मदा उम निर्बुद्धि के धर्मपनी के अरमान के भाग मे छोधिन होकर वे भवगुणों को और वढाने रहने है । महावीर अर्जुन Anmuantitation nidinandinisuviwdhanathain. thadinatitlabilindialont unlihistamina annintunar - 2012.Tomer DILLum"TITTETran":.
१६७२ म हा भा र त [पन ImmunommuwiTADuTumirnarmumornime arntamanirunanamurt MOTO TI TO I W10 111 IN MO Arno.0077 निर्दहेयुर्मम सुतान्कि पुनर्मन्युनेरिताः पार्थवाहुवलोत्सृष्टा महाचापविनि मृता. दिव्यास्त्रमन्त्रमुदिताः सादयेयु. सुरानपि ॥ १९ ॥ यस्य मन्त्री च गोता च सुहृञ्चैव जनार्दन हरिस्त्रैलोक्यनाथ. स किं नु तस्य न निर्जितम् ॥ २० ॥ इद हि सुमहच्चित्रमर्जुनस्येह सञ्जय । महादेवेन बाहुभ्यां यत्समेत इति श्रुति प्रत्यक्षं सर्वलोकस्य खाण्डवे यत्कृत पुरा फाल्गुनेन सहायार्थे वहेर्दामोदरेण च ॥ २२ । सर्वथा न हि मे पुत्रा सहामात्याः ससौवला । क्रुद्ध पार्थे च भीमे च वासुदेवे च सात्वते ॥ २३ ॥ इति श्रामन्महाभारत आरण्यकपर्वाण इन्द्रलोकाभिगमनपर्वणि धृतराष्टपदे एकोनपश्चाशत्तमोऽध्याय ॥४९।। सहज ही वाण चलाकर मेरे पुत्रों को यमलोक मेज ) की है कि उसने भुनाओं के बल से महादेव जी के सकता है। वही अर्जुन जब क्राधान्ध होकर युद्धभूमि साथ युद्ध किया और उनको प्रमन्न कर लिया। में खड़ा होगा और प्रबल वेग से वाण बरसावगा तब। इससे पहले अभि की महायता करने के लिये श्रीकृष्ण न जाने क्या अनथे हो जायगा, क्योंकि दिव्य मन्त्रों और अर्जुन जो कुछ कर चुके है वह किसी से छिपा से अभिमन्त्रित और अर्जुन के हाथों से बड़ वेग से | नहीं है । इसलिये हे सञ्जय । सब बातों पर विचार छूटे हुए नाराच वाण जब चलेंगे तब देवता भी उनसे करके देखने से मुझे जान पड़ता है कि भीमसेन, अर्जुन न बच सकेंगे । इसके सिवाय जिप्तका म त्री, रक्षक अथवा वासुदर कुरित होकर युद्धभूमि में उतर आगे और सुहृद तीनों रोकों का स्वामी कृष्ण जैसा हो तो मेरे पुत्र, म त्री, शकुनि आदि कोई जीत न मकेगा वह क्या नहीं जीत सकता है ॥१४॥२०॥ ॥२१॥२३॥ हे सञ्जय ! अर्जुन की यही एक बात आश्चर्य वनपर्य का उच्चासवा अध्याय समाप्त हुआ ।। ४९ ।। T. Nautatuitarini.nTimrTTITLanmTIT "NTINGTITTTTTTTTTTWDOTilTITI अथ पञ्चाशत्तमे ऽध्याय ॥ ५ ॥ जनमेजय उवाच-यदिदं शोचितं राज्ञा धृतराष्ट्रेण वै मुने । प्रमाज्य पाण्डवान्चीरान्सर्वमेतन्निरर्थकम् कथं च राजपुत्र तमुपेक्षतोऽल्पचेतसम् दुर्योधनं पाण्डुपुत्रान्कोपयान महारथान् NT Maasan .... ॥ २ ॥ 10.... anta "Rultul . 10L.COULtru" अध्याय ५० महाभारत Manism.mmmmmmmmmmmmmmmmitmananmintinuTURMelinamainan । iantaram.anirurthiananditain.midinfinitihanimurthi.nim.mtihairava किमासीत्पाण्डुपुत्राणां बने भोजनमुच्यताम् । वानेयमथवा कृष्टमेतदाख्यातु नो भवान् वैशम्पायन उवाच वानेयं च मृगांश्चैव शुद्धर्वाणैर्निपातितान् ब्राह्मणानां निवेद्याऽग्रमभुञ्जन्पुरुपर्पभाः तांस्तु शूरान्महेष्वासांस्तदा निवसतो वने अन्वयुाह्मणा राजन् ! साग्नयोऽनग्नयस्तथा ॥ ५ ॥ ब्राह्मणानां सहस्राणि स्नातकानां महात्मनाम् । दश मोक्षविदां तत्र यान्विति युधिष्ठिरः ॥ ६ ॥ रुरूकृष्णमृगांश्चैव मेध्यांश्चाऽन्यान्वनेचरान् । वाणरुन्मथ्य विविधैाह्मणेभ्यो न्यवेदयत् ॥ ७ ॥ न तत्र कश्चिदुर्वर्णो व्याधितो वाऽपि दृश्यते । कृशो वा दुर्वलो वाऽपि दीनो भीतोऽपि वा पुनः ॥ ८ ॥ पुत्रानिव प्रियान्भ्रातृज्ञातीनिव सहोदरान् । पुपोप कौरवश्रेष्ठो धर्मराजो युधिष्ठिरः पतींश्च द्रौपदी सर्वान्द्रिजातींश्च यशस्विनी मातृवद्भोजयित्वाऽग्रे शिष्टमाहारयत्तदा ॥ १० ॥ पचासवां अध्याय ।।५० ।। यह सुनकर जनमेजय कहने लगे-हे महाराज! । विशुद्ध वाण मे मारे गये मृगों के माम और फल-मूल महावीर पाण्डवों को वन में भेजकर राजा धृतराष्ट्र आदि जगली वस्तुएँ पहले अपने साथिन ब्रामणों कायों मोच करना बिलकुल निरर्थक था। जब नीच को खिलाकर फिर आप भोजन करते थे ॥१॥४|| प्रकृति दुर्योधन महारथी पाण्डवों पर अत्याचार करके उनके माथ में इसी कारण से सन्यासी और गृहम्पी टनके क्रोध की आग को भड़का रहा था तब धृतराष्ट्र ब्राह्मण रहा करते थे। महाराज युधिष्ठिर वाणों मे रुरु न क्यों नहीं उसका कुछ उपाय किया ? दुर्योधन और कृष्णमार आदि विशुद्ध वन के मृगों और अन्य को ऐसा करने मे क्यों नहींगका गया ! अब आप जन्तुओं को मारकर हजारों ब्राह्मणों, महात्मा म्नातक यह बतलाइए कि महात्मा पाण्डय वन में क्या पदार्थ और दम मोक्षतत्व के नाना ब्रामणों का पालन पोषण म्वार रहते थे, वन के फल-मूल म्याते थे अथवा करते थे । जहा युधिष्ठिर रहते थे वहां कोई विवर्ण, मनी में उरान हुआ अन्न आदि भोजन करते थे। गेगी, दुवा, दीन या डरा हुआ नहीं देय पड़ना शम्पायन ने कहा-हे महाराज ! महात्मा पाण्डव था ॥५॥८॥ Taranamanian.annatantantinia.o.mas cramm.uri.aur.aniran Garinulla.ac.aar.mart.crrn. - -- . . Planton.५017DELHISTORICC Invamerrrrrrr- , | वनपर्व १६७४ म हा मारत Eminematrikamundarmala marathimanumauni. mumbaiantaram indiminalianAILITD It itiara प्राची राजा दक्षिणां भीमसेनो यमौ प्रतीचीमथ वाऽप्युदीचीम् धनुर्धरा मांसहेतोमगाणां क्षयं चकुर्नित्यमेवोपगम्य ॥ ११ ॥ तथा तेषां वसतां काम्यके वै विहीनानामर्जुनेनोत्सुकानाम् । पञ्चैव वर्षाणि तथा व्यतीयुरधीयतां जपता जुह्वतां च ॥ १२ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि इन्द्रलोकाभिगमनपर्वणि पार्थाहारकथने पञ्चासत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥ राजा युधिष्ठिर अपने भाइयों को पुत्र के समान । दिशाओं में और नकुल और सहदेव पश्चिम और उत्तर और जातिबालों को सगे भाई के समान पालते थे। दिशा में नित्य जाकर मृग मारकर लाते थे | इस और यशस्विनी द्रौपदी अपने पतियों और ब्राह्मणों प्रकार से उन अर्जुन के बिना चारों पाण्डवों के वेद- को माता की तरह भोजन कराकर पीछे आप भोजन पाठ, जप और होम करते हुए उस काम्यक वन में करती थीं । युधिष्ठिर पूर्व दिशा में, भीमसेन दक्षिण | पांच वर्ष व्यतीत हुए ।९।१२५ बनपर्व का पचासवां अध्याय समाप्त हुआ ॥ ५० ॥ PILVADrumourtesunatandAMPUTEtrvestinCATLAPUTRADAMUnauIONALLAVIary": repuungMECLAR PRITUTwitmetvUPLamm अथ एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ।। वैशम्पायन उवाच-तेषां तच्चरितं श्रुत्वा मनुष्यातीतमद्भुतम् । चिन्ताशोकपरीतात्मा भन्युनाऽभिपरिप्लुतः ॥ १ ॥ दीर्घमुष्णं च निःश्वस्य धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः । अब्रवीत्सञ्जयं सूतमामन्य पुरुषर्षभ! न रानो न दिवा सूत ! शान्ति प्रामोमि वैक्षणम् । संचिन्त्य दुर्नयं घोरमतीतं द्यूतजं हि तत् तेपामसह्यवीर्याणां शौर्य धैर्य धृति पराम् अन्योन्यमनुरागं च भ्रातृणामतिमानुपम् देवपुत्री महाभागो देवराजसमद्युती इक्यावनवां अध्याय ।। ५१ ।। वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! रामा करता हूँ। उम सोच में मेरा चित्त एक क्षणभर भी धृतराष्ट्र पाण्डवों के अद्भुन चरित्र को सुना जिसको चैन से नहीं रहता है ॥१४॥ मनुष्य नहीं कर माना है शोक और चिन्ता मे दुःखी जिम समय दोनों भाई नकुल और सहदेव जो हुआ और मलय को बुलाकर कहने लगा-६ सन्जय ! सिंह के समान पराक्रमी, अधिनीकुमारों के समान जुए. पी अनीनि आर पाण्डवों की शुरता, धर्य और दु.सह देवपुत्र, महामाग, देवराज से तेजस्वी, दृढ़- आपम में परापर मानिक होने को में दिन-नात सोवा, आयुष, नीम वाण चलाने वाले और कोधा भीमसेन FamaATTIMITEL TRADITAMILENTERPremaramananews NayaneR अध्याय ५१] महा मारत १६७५ EmainmmmmmmaidamommmmmmmuTIdiwomaurung PuurerummerpmmunutemamvommmmmmmBINDuntunam नकुलः सहदेवश्च पाण्डवो युद्धदुर्मदौ दृढायुधो दूरपातौ युद्धे च कृतनिश्चयो शीघ्रहस्तो दृढक्रोधी नित्ययुक्तौ तरखिनो भीमार्जुनौ पुरोधाय यदा तो रणमूर्धनि स्थास्येते सिंहविक्रान्तावश्विनाविव दुःसहो ॥ ७ ॥ निःशेषमिह पश्यामि मम सैन्यस्य सञ्जय ! तो ह्यप्रतिरथी युद्धे देवपुत्रो महारथी द्रोपद्यास्तं परिक्लेशन ऑस्यते त्वमर्पिणी वृष्णयोऽथ महेष्वासाः पञ्चाला वा महौजसः ॥ ९ ॥ युधि सत्याभिसन्धेन वासुदेवेन रक्षिताः प्रवक्ष्यन्ति रणे पार्थाः पुत्राणां मम वाहिनीम् ॥ १० ॥ रामकृष्णप्रणीतानां वृष्णीनां सूतनन्दन ! न शक्यः सहितुं वेगः सर्वस्तैरपि संयुगे तेषां मध्ये महेवासो भीमो भीमपराक्रमः शेक्यया* वीरघातिन्या गदया विचरिष्यति ॥ १२ ॥ नथा गाण्डीवनिर्घोपं विस्फूर्जितमिवाऽशनेः । गदावेगं च भीमस्य नाऽलं सोढुं नराधिपाः ॥ १३ ॥ ततोऽहं सुहृदां वाचो दुर्योधनवशानुगः और अर्जुन को आगे करके युद्ध करेंगे तब मेग आकर मेरे पुत्रों की सेना और सामन्तों को मम्म मेना और मामन्तों में से कोई न बचेगा क्योंकि इन कर डॉलंग ॥५॥१०॥ दोनों देवपुत्रों के साथ युद्ध करने को उनका प्रतिस्थी दुर्योधन आदि हमारी ओर का कोई मनुष्य वोट नहीं है । द्रौपदी के अपमान मे टपना हुआ वृष्णिवगियों के वेग को नहीं म६ मकना है। संग्राम क्रोध उनके हृदय में मोरहों आने बना हुआ है; में भीमविक्रम भीममेन शूरवीरों को माग्नेवाली गदा इम कारण वे किमी तरह क्षमा नहीं करेंगे। अद्वितीय को वेग मे चगवेगे। कान राना ऐमा परी जी योद्धा वृष्णिवंग के यादव, मदानेजम्मी पाचार देश मीममेन की गदा के वेग का और अर्जुन के गाण्डीव के वीर और मत्यमन्ध वामुदव म्टापाण्टयों के सगे धनुष की घोर वनि को मह म गा ! हाय, पहले महायक हैं । मन्यि ये मव महावीर युद्धभूमि में मने दुर्योधन के कहे पर बनकर हितचिन्नों के कहने गिस्यस्पया, भूम किया पानार प्रदेश्यन नि भयादन्नारस एव पुतये चयः। Eanimandatinirmaavrriddinilin lilanation GuinutaliauntaraanGi.nautanki - - - है COMDCOMMIT.UOTECuctTerruct:nonrmm Trrrrrrrrrrrrn.
१६७४ म हा मा र त ( बन TRAITHAT MIMI 'ITIT imirmr GT/MPUThroom TWAur lund I amaT Jiwan sina प्राची राजा दक्षिणां भीमसेनो यमौ प्रतीचीमथ वाऽप्युदीचीम् धनुर्धरा मांसहेतोमगाणां क्षय चकुर्नित्यमेवोपगम्य ॥ ११ ॥ तथा तेषां वसतां काम्यके वै विहीनानाम नेनोत्सुकानाम् । पञ्चैव वर्षाणि तथा व्यतीयुरधीयतां जपतां जुह्वतां च ॥ १२ ॥ इति श्रीमन्महाभारत आरण्यक्पणि इद्रलोकाभिगमनपर्वणि पार्थाहारकथने पञ्चाशत्तमोऽध्याय ॥ ५ ॥ राना युधिष्ठिर अपने भाइयों को पुत्र के समान | दिशाओं में और नकुल और सहदेव पश्चिम और उत्तर और जातिवालों को सगे भाई के समान पालते थे। दिशा में नित्य जाकर मृग मारकर लाते थे । इस और यशम्धिनी द्रौपदी अपने पतियों और ब्राह्मणों प्रकार से उन अर्जुन के बिना चारों पाण्टयों के वेद को माता की तरह भोजन कराकर पीछे आप भोजन पाठ, जप और होम करते हुए उस काम्यक वन करती थीं। युधिष्ठिर पूर्व दिशा में, भीमसेन दक्षिण पाच वर्ष व्यतीत हुए ।।९।१२॥ वनपर्व का पचामवा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ५ ॥ में अथ एक्पञ्चाशत्तमोऽध्याय ॥ ५१ ॥ वगप्पायन उवाच तेषां तच्चरित श्रुत्वा मनुष्यातीतमद्भुतम् । चिन्ताशोकपरीतात्मा मन्युनाऽभिपरिप्लुत. ॥ १ ॥ दीर्घमुष्ण च नि श्वस्य धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुत । अनवीरसञ्जय सूतमामन्त्र्य पुरुषर्षभ । न रात्रौ न दिवा सूत शान्ति प्राप्नोमि वैक्षणम् । संचिन्त्य दुर्नय घोरमतीतं द्यूतज हि तत् तेपामसह्यवीर्याणां शौर्य धैर्य धृति पराम् अन्योन्यमनुराग च भ्रातृणामतिमानुपम् देवपुत्रो महाभागो देवराजसमगुती इक्यावनवा अध्याय ॥५१॥ सम्पाया ने कहा-हे राजा जनमजय ! गजा करता हूँ। उम सोच में मेरा चित्त एक क्षणभर भी नाराष्ट्र पाण्टयों के अदभुन चरित्र को सुना जिमको नैन में नहीं रहता है ॥१४॥ माय नहीं कर मरना भोप और चिन्ना मे दुम्बी जिम समय दोनों भाई नयुल और सददेव जो हुआ और माय को युराकर पहने रमा-हे सम्जय! मिंद के समान परामी, अश्विनीयुमागे के समान है। तुए वी अनति और पाण्डयों की शुरता, धर्य और दुसह देवपुन, महाभाग, देवराज से तेजस्वी, द आग में पाया प्रीनिक हातकों में दिा रात सोचा | आयुध, गोमवाण परोनेवाले और मोधी हैं भीमसे .naiawaormouamaruram uamasumaADAJInno Marwormaxommmsasarainrantikaamasan - ॥ - - HINDt.... ..." A . II CLINI ...
अध्याय ५१] महा मारत १६७५ TamaamannmaaranusNJanuTWARIKinnarium - GuLLUD ILU LAISTIISIVUNUR'LOPRU 110 til !!''***10'ls tinititig'rflyWURULLIVE! नकुलः सहदेवश्च पाण्डवो युद्धदुर्मदौ दृढायुधौ दूरपातो युद्धे च कृतनिश्चयो शीघहस्तो दृढक्रोधो नित्ययुक्तो तरखिनी भीमार्जुनो पुरोधाय यदा तो रणमूर्धनि स्थास्येते सिंहविक्रान्तावश्विनाविव दुःसहो ॥ ७ ॥ निःशेपमिह पश्यामि मम सैन्यस्य सञ्जय ! तो ह्यप्रतिरथी युद्धे देवपुत्रो महारों द्रोपद्यास्तं परिक्लेशं न शंस्यने त्वमर्पिणो वृष्णयोऽथ महेष्वासाः पञ्चाला वा महोजसः ॥ ९ ॥ युधि सत्याभिसन्धेन वासुदेवेन रक्षिताः प्रधश्यन्ति रणे पार्थाः पुत्राणां मम वाहिनीम् ॥ १० ॥ रामकृष्णप्रणीतानां वृष्णीनां सूतनन्दन! न शक्यः सहितुं वेगः सर्वस्तरपि संयुगे तेषां मध्ये महेष्वासो भीमो भीमपराक्रमः शेक्यया' वीरघातिन्या गदया विचरिष्यनि तथा गाण्डीवनिर्घोपं विस्फूर्जिनमिवाऽशनेः । गदावेगं च भीमस्य नाऽलं सोढुं नराधिपाः ॥ १३ ॥ ततोऽहं सुहृदां वाचो दुर्योधनवशानुगः और अर्जुन को आगे करके युद्ध करेंगे तब मेग आकर मेरे पुत्रों की मेना और सामन्तों की मम्म मेना और मामन्तों में से कोई न बनेगा क्योंकि इन कर टालंग पार॥ दोनों देवपुत्रों के माथ युद्ध करने को उनका निम्थी दुर्योधन आदि हमारी ओर का कोई मनुष्य कोई नहीं है । पटी के आमान में सपना हुआ वृष्णिकगियों के चंग को नहीं मह माना है । मंग्राम शोध उनके हृदय में मोरहों आने बना हुआ है; में भीमविक्रम मीममेन शूग्वीरों को माग्नेवारी गटा इस काम्पये किमी तरह श्मा नहीं करेंगे। अद्वितीय को वेग म नगवेगे। कान राना ऐमा वर्ग है जो बोद्धा वृष्णिवम के यादर, महानवम्मी पाचार देश भाममन की गदा के वेग को और अर्जुन के गाटीव * वीर और सत्यमन्ध वासुदेव म्दापाटयों के मचे धनुष की घोर ध्वनि की मह मरेगा ! हाय, पटने महायक हैं । मन्येि ये मय महावीर गुदममि में मने दुर्योधन के कहे पर नरसहितचिन्नों के करने *सिया, भूमि या तानपादन यः। Fatimemadurinanda Girinaththit alithanahin thununciation Maa chut it.Gl. anuhunu.nahati.hianuarulai - - - CTET19rLETTLETITU"rtner mirrrrrrrrrrrrrrrrrrn.
१६७६ म हा भारत वनपर्व TOTRaixirmiuorammamarimmalpurDAImmunnlirmanarasaan.aunarian ELUT TULOLALILULUOTTOTIES UUTUD I'v'DWUSUNT: - स्मरणीयाः स्मरिष्यामि मया या न कृताः पुरा ॥ १४ ॥ सन्जय उवाच व्यतिक्रमोऽयं सुमहांस्त्वया राजन्नुपेक्षितः । समर्थेनाऽपि यन्मोहात्पुत्रस्ते न निवारितः ॥ १५ ॥ श्रुत्वा हि निर्जितान्द्यूते पाण्डवान्मधुसूदनः । स्वरितः काम्यके पार्थान्समभावयदच्युतः ॥ १६ ॥ द्रुपदस्य तथा पुत्रा धृष्टद्युम्नपुरोगमाः विराटो धृष्टकेतुश्च केकयाश्च महारथाः ॥ १७॥ तैश्च यत्कथितं राजन् ! दृष्ट्वा पार्थान्पराजितान् । चारेण विदितं सर्वं तन्मयाऽऽवेदितं च ते समागम्य वृतस्तत्र पाण्डवैर्मधुसूदनः सारथ्ये फाल्गुनस्याऽऽजौ तथेत्याह च तान्हरिः ॥ १९ ॥ अमर्पितोहि कृष्णोऽपि दृष्ट्वा पार्थांस्तदा गतान् । कृष्णाजिनोत्तरासकानब्रवीच युधिष्ठिरम् या सा समृद्धिः पार्थानामिन्द्रप्रस्थे वभूव ह । राजसूये मया दृष्टा नृपैरन्यैः सुदुर्लभा यत्र सर्वान्महीपालाञ्च्छस्त्रतेजोभयार्दितान् सबङ्गाङ्गान्सपोण्ड्रोड्रान्सचोलद्राविडान्ध्रकान् ॥ २२ ॥ पर ध्यान नहीं दिया । अब मुझे उनकी उन्हीं बातों भी सुनाई थीं । अर्जुन ने श्रीकृष्ण जी को रणभूमि को स्मरण करके पछताना पड़ेगा। यह सुनकर में अपना सारथी बनाने के लिये कहा था श्रीकृष्ण सन्जय ने कहा-हे महाराज ! आपने यह बड़ी जी ने यह बात स्वीकार की और पाण्डवों की दशा अयोग्य पान की जो अपने पुत्र को समर्थ होने पर को देखकर क्रोधित होकर युधिष्ठिर से कहने लगे- भी मोदके कारण से निवारण नहीं किया ॥११॥१५॥ ॥१६॥२०॥ देखिए, श्रीकृष्ण जी पाण्डवों को जुए में परा जो तुम लोगों का धन आदि जो दूमेरे राजाओं जय मुगकर शीघ्र ही काम्यक वन में आये थे टन्होंने को मिलना दुर्लभ है मैने उस राजसूय यज्ञ में देग्वा पाण्डवों कोधयं दिया था और धृष्टद्युम्न, विराट, धृष्ट था जिममें तुम्हारे शम्र के प्रताप के भय से अन. तु और काय आदि राजाओं ने पाण्टयों को हारा । वार, पाण्ड, आण्ड, चोल, द्राविड, अन्धक, सागर. दुआ देखकर जी-जावान कहीधी मय दनों के द्वारा अनूप, मान्ननिवासी, सिंहल, पबी, लेक्छ, रह- मुसीमादमा गई और मैंने वह मय बनि आपको नियामी, पहब, दरद, किगत, ययन, नक, हारहण, ***********RID EDITION ****}'L'L'UVCCIPITX121LLATTEN'T'OromouTCUTTI"*PELICUIT CLYTIET ON TAAL! . - .instrummermazmarriremiummerrentract अध्याय ५१] म हा भारत १६७७ HidimmuarirAITHUInfirmimmmmmunisummmmmmmmunmunanimurmainalian । nirman Jaimermain namanimmitomaran mitaWommanmaaNEL सागरानूपकांश्चैव ये च प्रान्ताभिवासिनः सिंहलान्धर्वरान्म्लेच्छान्ये च लङ्कानिवासिनः ॥ २३ ॥ पश्चिमानि च राष्ट्राणि शतशः सागरान्तिकान् । परवान्दरदान्सर्वान्किरातान्यवनाञ्च्छकान् ॥ २४ ॥ हारहूणांश्च चीनांश्च तुपारान्सैन्धवांस्तथा जागुडान्रामठान्मुण्डान्स्त्रीराज्यमथ तङ्गणान् ॥ २५ ॥ केकयान्मालवांश्चैव तथा काश्मीरकानपि अद्राक्षमहमाहुतान्यज्ञे ते परिवेषकान् ॥ २६ ॥ सा ते समृद्धिरात्ता चपला प्रतिसारिणी आदाय जीवितं तेपामाहरिष्यामि तामहम् ॥ २७ ॥ रामेण सह कौरव्य ! भीमार्जुनयमैस्तथा अक्रूरगदसाम्बैश्च प्रद्युम्नेनाऽऽहुकेन च धृष्टद्युम्नेन वीरेण शिशुपालात्मजेन च दुर्योधनं रणे हत्वा सद्यः कर्णं च भारत ! ॥ २९ ॥ दुःशासनं सौबलेयं यश्चाऽन्यः प्रतियोत्स्यते ततस्त्वं हास्तिनपुरे भ्रातृभिः सहितो वसन् ॥ ३० ॥ धार्तराष्ट्रीं श्रियं प्राप्य प्रशाधि पृथिवीमिमाम् । अथैनमब्रवीद्राजा तस्मिन्वीरसमागमे ॥ ३१ ॥ चीन, तुषार, सन्धय, जागुड़, रामठ, मुण्ड, तद्गण, दु.शासन, शकुनि आदि लोगों को जो हमारे सामुम्ब केकेय, मालव, काश्मीर, पश्चिम की ओर के और आगे मारकर, तुम्हारी पहले की, राजर६मी फिर सागर-तट पर रहनेवाले उन देशों के राजा जहां स्त्रियों तुमको अर्पण कमगा। तुम भाइयों के साथ हस्तिना- का राज्य है और अन्य राजा लोग एकत्र हुए हुए पुर में रहकर फिर इस समुद्र पर्यन्त पृथ्वी के अद्वितीय थे मैंने देग्वे थे। जिन नीच मनुष्यों की शिक्षा मानने- राजा होकर सुन्य भागोगे ॥२८॥३०॥ वालों ने हर लिया है मै उनको मारकर उस सय यह सुनकर युधिष्ठिर ने धृष्टद्युम्न आदि के मन्मुम्ब धन को अभी जाकर हर लेता हूँ॥२१॥२७|| श्रीकृष्ण जी से कहा-हे महाराज ! तुमने जो कुछ मैं बलदेव जी, भीममेन, अर्जुन, नकुल, सहदेव, उसे मैं ठीक मानता हूं । किन्तु तुम मुझमे यह अकार, गद, साम्घ, प्रद्युम्न, आहुक, शिशुपाल का प्रतिज्ञा करो कि इन तरह वर्षों के व्यतीत हो जाने पुत्र भार धृष्टद्युम्न को साथ ले जाकर दुर्योधन, कर्ण पर तुम मेरे शत्रुओं को उनके सहायकों और व.धु- Samamimamulimmumtamanianimiliarrhannel.tni. lrintinutnalaimadrianti.. - - कहा Trammar । inutemarrrrrrryINCT CATImmumo. m... Finni [ वनपर्व RITTENDAamata imattaliaurt.niummamilbilimilsinimlindamsuinaruwmaManamanararam १६७८ म हा भारत PHATOmaand amisamavailamusalmindinstantlemannaamanatimonitisataye शृण्वत्स्वेतेषु वीरेषु धृष्टद्युम्नमुखेपु च युधिष्ठिर उवाच-प्रतिगृह्णामि ते वाचमिमां सत्यां जनार्दन ! ॥ ३२ ।। अमित्रान्मे महावाहो ! सानुवन्धान्हनिष्यसि । वर्षात्त्रयोदशादूचं सत्यं मां कुरु केशव ! ॥ ३३ ॥ प्रतिज्ञातो बने चासो राजमध्ये मया ह्ययम् तद्धर्मराजवचनं प्रतिश्रुत्य सभासदः ॥ ३४ ॥ धृष्टद्युम्नपुरोगास्ते समयामासुरञ्जसा केशवं मधुरैर्वाक्यैः कालयुक्तैरमर्पितम् पाञ्चालीं प्राहुरक्लिष्टां वासुदेवस्य शृण्वतः । दुर्योधनस्तव क्रोधादेवि ! त्यक्ष्यति जीवितम् ॥ ३६ ॥ प्रतिजानीमहे सत्यं मा शुचो वरवर्णिनि ! ये स्म तेऽक्षजितां कृष्णे दृष्ट्वा त्वां प्राहसंस्तदा । मांसानि तेषां खादन्तो हरिष्यन्ति वृकद्विजाः ॥ ३७॥ पास्यन्ति रुधिरं तेषां गृध्रा गोमायवस्तथा उत्तमाङ्गानि कर्पन्तो यैः कृष्टाऽसि सभातले ॥ ३८ ॥ तेषां द्रक्ष्यसि पाश्चालि ! गात्राणि पृथिवीतले । क्रव्यादैः कृप्यमाणानि भक्ष्यमाणानिचाऽसकृत् ॥ ३९ ॥ परिक्लिष्टाऽसि यैस्तत्र येश्राऽसि समुपेक्षिता । वान्धयों महित मारोगे; क्योंकि मैंने सभा के बीच । तुम्हें जुए में जीती गई देखकर जिन्होंने तुम्हारी में सबके मामने तेरह वर्ष वन में रहना अगीकार । हसी की थी उनके शरीर के मास को मड़िय और कर लिया है । इमलिय अवधि मे पहले उन्हें मारना अन्य पक्षी नोच-नोचकर खायेंगे और गृद्ध, गीदड़ किमी तरह उचित नहीं। धृष्टद्युम्न आदि सभा के आदि उनके कटे हुए सिरों को घसीट कर उनका पटनयालों ने यह बात स्वीकार कर ली और समय रक्त पियेंगे। हे पाञ्चाली! सभा के बीच में जिन्होंने के अनुकूल, मोटी-मोटी बात कहकर श्रीकृष्ण जी के ; तुम्हारे बाल पकड़कर तुमको खींचा है, सयो श्रोध की शात किया ॥३१॥३५|| तुम पृथ्वी में पड़े हुए देखोगी और जन्तु उनके फिर धर्मराज युधिष्ठिर ने उन्हीं के सामन द्रौपदी शरीर को नोच-नोचकर खायेगे। हे कल्याणी सभा मे पहा-दे द्रौपदी ! तुम्हारे कांध से ही दुर्योधन में जिन्होंने तुमको क्लेश पहुँचाया है और तुम्हारी माग जायगा । हमालय अब तुम शोक गन कगे। उपेक्षा की है उनके सिर काटकर हम पृथ्वी को तर AurLDLATImdumATLumulimanusunauli Malina.tu.anatanAGIRM... उन - PrecarrrrrroMHIRECORPTETTITUMCCEPTaaranMENTUnm.miranm अध्याय ५२] म हा मारत १६७९ ammnimumtammoniummamarutinainainamamimarAmaranmaramAURA - marCornemr CUeLOAamil ! - तेपामुत्कृत्तशिरसां भूमिः पास्यति शोणितम् ॥ ४० ॥ एवं बहुविधा वाचस्त ऊचुर्भरतर्षभाः सर्वे तेजस्विनः शूराः सर्वे चाऽहतलक्षणाः ॥ १ ॥ ते धर्मराजेन वृता वर्षादूचं त्रयोदशात् । पुरस्कृत्योपयास्यन्ति वासुदेवं महारथाः ॥ ४२ ॥ रामश्च कृष्णश्च धनञ्जयश्च प्रद्युम्नसाम्बौ युयुधानभीमौ । माद्रीसुतौ केकयराजपुत्राः पञ्चालपुत्राः सह मत्स्यराज्ञा ॥ ४३ ।। एतान्सर्वान्लोकवीरानजेयान्महात्मनः सानुवन्धान्ससैन्यान् । को जीवितार्थी समरेऽभ्युदीयात्क्रुद्धान्सिहान्केसरिणो यथैव ॥ ४४ ॥ धृतराष्ट्र उवाच-यन्माब्रवीद्विदुरोद्यूतकाले त्वं पाण्डवाञ्जष्यसि चेन्नरेन्द्र ! ध्रवं कुरूणामयमन्तकालो महाभयो भविता शोणितौघः ॥ ४५ ॥ मन्ये तथा तद्भवितेति सूत ! यथा क्षत्ता प्राह वचः पुरा माम् असंशयं भविता युद्धमेतद्गते काले पाण्डवानां यथोक्तम् ॥ १६ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि इन्द्रलोकाभिगमनपर्वणि धृतराष्ट्रविलापे एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।।२१।। इन्द्रलोकाभिगमनपर्व समाप्तम् ॥ कर देंगे ॥३६॥४०॥ होगा जो इन अजेय और क्रुद्ध सिंहरूपी वारों का हे महाराज ! उन शूरवीरों ने जिनमें वीरता के सामना करेगा। यह सुनकर घृतराष्ट्र ने कहा-जुआ सब चिद मौजूद थे इस प्रकार से बहुत बात होने के समय विदुर जी ने मुझसे कहा था कि जो कहीं। सो वे सब महारथी तेरह वर्ष व्यतीत होने पर तुम पाण्डवों को जीतोगे निश्चय कौरवों का बड़ा युधिष्ठिर के बुलाये हुए श्रीकृष्ण जी को आगे करके भयानक नाश होगा। हे सञ्जय ! मो अब मुझे अच्छी युद्ध के लिये आवेंगे । और उनके साथ बलदेव जी, तरह जान पड़ता है कि समय के आने पर पाण्डयों अर्जुन, प्रद्युम्न, साम्य, सात्यकि, भीममेन, नकुल, मे अवश्य युद्ध होगा और जो कुछ विदुर जी ने सहदेव, केकेय द्रुपद के पुत्र और राजा विराट भी मुझसे कहा था वह सब मत्य होगा ॥४१॥४६॥ होंगे। भला ऐमा कोनसा जीने की इच्छा रखनेवाला वनपर्व का इक्यावनवां अध्याय ममान हुआ ॥५१॥ अध नलोपारस्यानपर्व ।। अध द्विपञ्चामत्तमोऽध्यायः ॥५॥ जनमेजय उवाच-अस्त्रहेतोर्गते पार्थे शकलोकं महात्मनि युधिष्ठिरप्रभृतयः किमकुर्वत पाण्डवाः Enhindmmmm.inlairwilliancimulinrarunismsandhrammaNIMLIGuruaama.man.cam.ouaransistan ENTRI Pt. Vidyuyur.POELECTRIVERDULUArtoo"0"00:09 पनपर्व १६८० म हा भारत uroustor.orrrrh •nm.w.mulunarrrrrrmusum mr JLLLLAHATAIEtantIAL IMPAL वैशम्पायन उवाच अस्त्रहेतोगते पार्थे शकलोकं महात्मनि न्यवसन्कृष्णया साधं काम्यके भरतर्षभाः ततः कदाचिदेकान्ते विविक्त इव शाहले दुःखार्ता भरतश्रेष्ठा निषेदुः सह कृष्णया धनञ्जयं शोचमाना साश्रुकण्ठाः सुदुःखिताः । तद्वियोगार्दितान्सर्वाञ्च्छोकः समभिपुप्लुवे धनञ्जयवियोगाच्च राज्यभ्रंशाच्च दुःखिताः अथ भीमो महावाहुर्युधिष्ठिरमभापत निदेशात्ते महाराज ! गतोऽसौ भरतर्षभ अर्जुन पाण्डुपुत्राणां यस्मिन्प्राणाः प्रतिष्ठिताः ॥ ६ ॥ यस्मिन्विनष्ट १ञ्चाला. सह पुत्रैस्तथा वयम् । सात्यकिर्वासुदेवश्च विनश्येयुर्न संशयः योऽसौ गच्छति धर्मात्मा वहुन्क्लेशान्विचिन्तयन् । भवन्नियोगाद्वीभत्सुस्ततो दु खतर नु किम् ॥ ८ ॥ यस्य बाहू समाश्रित्य वयं सर्वे महात्मनः मन्यामहे जितानाजोपरान्प्राप्तां च मेदिनीम् ॥ ९ ॥ यस्य प्रभावान्न मया सभामध्ये धनुप्मत Sunaulimmaaruwarunaanandmarlifiligurimms. - CLILIANT GYTIT CUGITTWAT वावनवा अध्याय ॥५॥ इतनी कथा सुनकर राजा जनमेजय ने कहा हम पाण्डा लोग जिमक सहारे पर जीते हैं, है, महाराज ! अर्जुन के स्वर्ग में चले जाने पर युधिष्ठिर जिसके नष्ट होने पर पाञ्चाल देश के राजा और राज आदि पाण्टयों ने क्या किया। वैशम्पायन ने कहा कुमार, मात्यकि,नासुदेव और हम सब नष्ट हो जायग, हे जनमेजय । अर्जुन के म्वर्गलाक को जान पर पाण्टा जिसके बाहुबर के भरोमे हम लोग समर में शत्रुओं द्रौपदी सहित काम्यक चन में रहने लगे। एक समय को हराया हुआ और पृथ्वी को अपने हाथ में आई वे चागे माई द्रौपदी महित किमी एकात स्थान पर हुई समझते हैं, जिसके प्रभाव से मैंने उस सभा के वठकर अर्जुन के वियोग के दुग से गदग्द् होकर बीच में शकुनि और दुर्योधन आदि को मारकर और गाय के प्रष्ट हाने मे दुखी होकर महाशोच | यमरोक नहीं भेज दिया, वही अर्जुन आपकी आज्ञा करने रगे। उसी समय अर्जुन के वियोग से व्याकुल मे इन्द्ररीक को गया है। दाय, इससे और क्या महाया भीमगम ने युधिष्ठिर से कहा ॥१॥५॥ अधिर दुख होगा कि वह धर्मात्मा अर्जुन आपकी: ....must tutOULYTITHILILLA अध्याय ५२] म हा मा रत १६८१ HODAISTDibitrimonimarMATALATHITATIATImrnsrimanLISTMAmasimhamhai. Dirnimamta Naa.antimilianR..imilita.indi Dinmantities Namundrame - नीता लोकममुं सर्वे धार्तराष्ट्राः ससौवलाः ॥ १० ॥ ते वयं वाहुवलिनः क्रोधमुत्थितमात्मनः सहामहे भवन्मूलं वासुदेवेन पालिताः वयं हि सह कृष्णेन हत्वा कर्णमुखान्परान् स्ववाहुविजितां कृत्स्नां प्रशासेम वसुन्धराम् ॥ १२ ॥ भवतो द्यूतदोपेण सर्वे वयमुपप्लुताः अहीनपौरुपा वाला बलिभिवलवत्तराः क्षानं धर्म महाराज ! त्वमवेक्षितुमर्हसि न हि धर्मो महाराज ! क्षत्रियस्य वनाश्रयः ॥ १४॥ राज्यमेव परं धर्म क्षत्रियस्य विदुर्बुधाः स क्षत्रधर्मविद्राजा मा धान्नीनशः पथः प्राग्द्वादशसमा राजन् ! धार्तराष्ट्रान्निहन्महि निवर्त्य च बनात्पार्थमानाय्य च जनार्दनम् ॥ १६ ॥ व्यूढानीकान्महाराज ! जवेनैव महामते ! धार्तराष्ट्रानमुं लोकं गमयामि विशांपते ! ॥ १७॥ सर्वानहं हनिष्यामि धार्तराष्ट्रान्ससौवलान् दुर्योधनं च कर्णं च यो वाऽन्यः प्रतियोत्स्यसे ॥ १८ ॥ मे बहुत से क्लेश उठा रहा है ।।६।१०॥ करना ही क्षत्रियों का एकमात्र धर्म बतलाया है हे राजन् ! हम लोग भुजायल रखने और वासुदेव इस कारण शत्रुओं से राज्य लेकर क्षत्रिय-धर्म का जी से रक्षित होने भी पर अपने क्रोध को सह रहे हैं। पालन करना ही आपका कर्तव्य है। आप जान-बूझ- आप ही इम क्रोध की जड़ है। निस्सन्देह हम लोग कर भी धर्म के मार्ग से न हटिये ॥११४१५|| श्रीकृष्ण जी को साथ लेकर कर्ण आदि मय शत्रुओं चलिए, हम अर्जुन को लौटाकर और श्रीकृष्ण को मारकर अपनी भुजा के बल से पृथ्वी को जीतकर को कर बारह वर्ष बीतने के पहले ही दुर्योधन राज्यशामन कर सकते हैं। परन्तु क्या करें वरहीन , आदि का नाश कर डालें । मैं अग्ला ही मेना तो हम नहीं है केवल आपके जुए के दोष में हम सहित दुर्योधन आदि को, कर्ण, शकुनि और अन्य सम इव रहे हैं और दुर्योधन आदि हमारे शत्रु धन जो कोई हमारे शत्रुपक्ष की सहायता कर उमझी, पाकर बलवान् हो गये हैं। मो हे महाराज! वनवाम सबको बलपूर्वक नष्ट कर डालंगा | आप निष्कण्टक करना क्षत्रियों का धर्म नहीं है। बुद्धिमानों ने गज्य होकर फिर चाहे वन में आकर रहिए । हे महाराज! 'aid Immmmmmm DoremARCOTramam HAIR MINIT आजा - : ""COLL.12mmOTO 5000 30.11.Me PLAMM12.3MDL0mm नपर्न १६८० महाभारत . ..bhulr. Irrfaritram urr.kirannerire । I LIJI HDI 2327 ।। II aur - Lamvarunalaintainamition । LLIAL LALJIVUWAITHILD वैशम्पायन उवाच अस्त्रतोगते पार्थे शकलोकं महात्मनि न्यवसन्कृष्णया साधु काम्यके भरतर्पभा ॥ २ ॥ तत कदाचिदेकान्ते विविक्त इव शाहले दुखार्ता भरतश्रेष्ठा निषेदु सह कृष्णया धनञ्जय शोचमाना साश्रुकण्ठा सुदु खिता । तद्वियोगार्दितान्सर्वाच्छोक समभिपुप्लुवे धनन्जयवियोगाच राज्यभ्रशाञ्च दु खिता अथ भीमो महावाहुर्युधिष्ठिरमभापत निदेशात्ते महाराज । गतोऽसौ भरतर्षभ अर्जुन पाण्डुपुत्राणां यस्मिन्प्राणा प्रतिष्ठिता ॥ ६ ॥ यस्मिन्विनष्ट पञ्चाला सह पुत्रैस्तथा वयम् । सात्यकिर्वासुदेवश्च विनश्येयुर्न सशय ॥ ७ ॥ योऽसौ गच्छति धर्मात्मा बहून्क्लेशान्विचिन्तयन् । भवन्नियोगाद्वीभत्सुस्ततो दु खतर नु किम् ॥ ८ ॥ यस्य वाहू समाश्रित्य वय सर्वे महात्मन मन्यामहे जितानाजौ परान्प्राप्ता च मेदिनीम् ॥ ९ ॥ यस्य प्रभावान्न मया सभामध्ये धनुष्मत बावनवा अध्याय 1१२।। इतनी कथा सुनकर राजा जनमेजय ने कहा हम पाण्डप लाग जिमक सहार पर जीत है, हे महाराज ! अर्जुन के वर्ग में चले जाने पर युधिष्ठिर | जिसके नष्ट होने पर पाञ्चाल दश क राजा और राज आदिपाण्डवाने क्या किया। वैशम्पायन न कहा कुमार सात्यकि बासुदेव और हम सब नष्ट हा जायँग २ हे पनमेजय ! अजुन के स्वर्गराव को जाने पर पाण्डा जिसके बाहुबल के भरोमे हम लेग समर में शत्रुओं F द्रौपदी सहित काम्यक वन में रहने रगे। एक समय का हराया हुआ और पृथ्वी को अपन हाथ में आइ व चारों भाई द्रौपदी महित क्मिी एकात स्थान पर हुई समझते है, जिसके प्रभाव से मैंने उस सभा क चटका अर्जुन के वियोग के दु से चीच में शकुनि और दुर्योधन आदि को मारकर पार राज्य के प्रष्ट हाने मे दुखी टोकर महाशीच यमरोक नहीं भेज दिया, वही अजुन आपकी आना करने नगे। उमी ममय अर्जुन के वियाग म ध्यान से इदनाक को गया है । हाय इससे और क्या दायातु भाममन ने युधिष्ठिर म पहा ॥१५॥ अधिक दुख होगा कि यह धर्मात्मा अजुन आएकी न गदद् होकर rim Um....... 21 .. 110 MUJulICLUILDutu.
अध्याय ५२] म हा मा र त १६८१ HIDImulibaimirmirmirmirriTimiriIATIMITTOTTATimeTMAITamILGTIAuspinabindi .. EHIMIma.TWIGITAMARH more LUncam नीता लोकममुं सर्वे धार्तराष्ट्राः ससौवलाः ॥ १० ॥ ते वयं वाहुवलिनः क्रोधमुत्थितमात्मनः सहामहे भवन्मूलं वासुदेवेन पालिताः वयं हि सह कृष्णेन हत्वा कर्णमुखान्परान् स्वबाहुविजितां कृत्स्ना प्रशासेम वसुन्धराम् ॥ १२ ॥ भवतो द्यूतदोपेण सर्वे वयमुपप्लुताः अहीनपौरुषा वाला वलिभिवलवत्तराः ॥ १३ ॥ क्षात्रं धर्म महाराज ! त्वमवेक्षितुमर्हसि न हि धर्मों महाराज ! क्षत्रियस्य वनाश्रयः ॥ १४ ॥ राज्यमेव परं धर्म क्षत्रियस्य बिदुर्बुधाः स क्षत्रधर्मविद्वाजा मा धान्नीनगः पथः ॥ १५ ॥ प्राग्द्वादशसमा राजन् ! धार्तराष्ट्रान्निहन्महि निवर्त्य च बनात्पार्थमानाय्य च जनार्दनम् ॥ १६ ॥ व्यूढानीकान्महाराज ! जवेनैव महामते ! धार्तराष्ट्रान, लोकं गमयामि विशांपते ! ॥ १७॥ सर्वानहं हनिप्यामि धार्तराष्ट्रान्ससौवलान् दुर्योधनं च कर्णं च यो वाऽन्यः प्रतियोत्स्यसे ॥ १८ ॥ बहुत से क्लेग उठा रहा है ।।६।१०॥ करना ही क्षत्रियों का एकमात्र धर्म बतलाया हे राजन् ! हम लोग मुजावर रखने और वामदेव इम कारण शत्रुओं से राज्य लेकर क्षत्रिय-धर्म का जी से रक्षित होने भी पर अपने क्रोध को सह रहे हैं। पालन करना ही आपका कर्त्तव्य है। आप जान-यूझ- आप ही इम क्रोध की जड़ हैं। निस्मन्देह हम रोग कर भी धर्म के मार्ग से न हटिये ॥११॥१५॥ श्रीकृष्ण जी को साथ लेकर कर्ण आदि मब शत्रुओं चलिए, हम अर्जुन को लौटाकर और श्रीकृष्ण को मारकर अपनी भुजा के बल से पृथ्वी को जीतकर को नगर बारह वर्ष बीतन के पहले ही दुर्योधन राज्यभामन कर सकते है। परन्तु क्या करें बलहीन आदि का नाश कर टालें । मैं अकला हो मेना तो दम नहीं है या आपके जुए के दोष में हम सहित दुर्योधन आदि को, कर्ण, शकुनि और अन्य मय डूब रहे है और दुर्योधन आदि हमारे शत्रुधन । जो कोई हमारे शत्रुपक्ष की महायता करे उमको, पार बरयान् हो गये है। मो हे महागन! वनवाम मयको बलपूर्वक नष्ट कर डालूंगा । आप निकटक करना क्षत्रियों का धर्म नहीं है। बुद्धिमानों ने गम्य होकर फिर चाहे वन में आररहिया महाग! andidnianslatinuousandstondusthaadiwasirnbididihindituilt.aar Ghintuitariantda.netic, आजा मे 3 । • 'CD402020009001.17'0'E' १८11110112190112113 १६८२ चनपर्व म हा भारत IMIMmmmmmmmmmaduaanamadimaalAMunam TitbindinODIN NormathmanuRAINMnanlianamannanrainramin mammuanra मया प्रशमिते पश्चात्त्वमेष्यसि वनं पुनः एवं कृते न ते दोषा भविष्यन्ति विशांपते ! ॥ १९ ॥ यज्ञैश्च विविधैस्तात ! कृतं पापमरिन्दम ! अवधूय महाराज! गच्छेम स्वर्गमुत्तमम् ॥ २० ॥ एवमेतद्भवेद्राजन् ! यदि राजा न वालिशः अस्माकं दीर्घसूत्रः स्याद्भवान्धर्मपरायणः निकृत्या निकृतिप्रज्ञा हन्तव्या इति निश्चयः । न हि नैकृतिकं हत्वा निकृत्या पापमुच्यते ॥ २२ ॥ तथा भारत ! धर्मेपु धर्मज्ञैरिह दृश्यते अहोरात्र महाराज ! तुल्यं संवत्सरेण ह ॥ २३ ॥ तथैव वेदवचनं श्रूयते नित्यदा विभो! संवत्सरो महाराज! पूर्णों भवति कृच्छ्रतः ॥ २४ ॥ यदि वेदाः प्रमाणास्ते दिवसादूर्ध्वमच्युत! त्रयोदशसमाः कालो ज्ञायतां परिनिष्ठितः ।। २५ ।। कालो दुर्योधनं हन्तुं सानुबन्धमरिन्दम ! एकाग्रं पृथिवीं सर्वां पुरा राजन् ! करोति सः ॥ २६ ।। द्यूतप्रियेण राजेन्द्र ! तथा तद्भवता कृतम् प्रायेणाऽज्ञातचर्यायां वयं सर्वे निपातिताः ॥२७॥ ऐसा करने से हम कभी दोपमागी नहीं हो सकते । | से बिताने होंगे। यदि इस वेद-वाक्य को आप प्रामा- नाना प्रकार के यन करके हम इस पाप का प्रायश्चित णिक माने तो और एक दिन बीतने पर हमारे कर टालेंगे । तय हम अपश्य ही परम पवित्र स्वर्ग घनवास के तेरह वर्ष पूरे हो जायगे और बन्धु-बान्धव रोक के अधिकारी होंगे ॥१६॥२०॥ सहित दुर्योधन को मारने का समय आ जायगा आप यदि यालकों की तरह वृथा हठ न करें, ॥२१॥२५॥ धर्मपरायण न हों और प्रत्येक काम में विलम्ब न आपने जुए के व्यसन मे आकर अपना बहुत रेनो पेमा हो सकता है। छतरी को उन से मारने अनिष्ट कर दाला है । एक वर्ष छिपकर रहना और मेंहदीपनदी ।धमान लोग इमको ठीक यतनाते भी कठिन है । मुझे ऐसा कोई स्थान नहीं देख पड़ता है। दवा पमाण किसक वर्ष एक दिन रात जहा पापी दुर्योधन के जासूस हमारा पता न रगा । दम रोगों की तरह वर्ष अत्यन्न मंग म । यदि यह हम वर्ष में हमारा पता लगा लेगा Sundatinians thatantnatandaniummadam limun.inrmms inmom annd.inmuandon NDAND । चतुरूप द 12040:40mmumour motySPITU."
- - Eam meaniraama TaTo Niromanit maintain Timilim liftinidinsionnatinidise aintim LMALLE अध्याय ५२ ] महा मा र त १६८३ yomamarmrunmarruammmmmmmmmmm. nanmmmnanusum amounarianarar rran न तं देशं प्रपश्यामि यत्र सोऽस्मान्सुदुर्जनः । न विज्ञास्यति दुष्टात्मा चोरेरिति सुयोधनः ॥ २८ ॥ अधिगम्य च सर्वान्नो वनवासमिमं ततः । प्रवाजयिष्यति पुनर्निकृत्याऽधमपूरुपः ॥ २९॥ यद्यस्मानभिगच्छेत पापः स हि कथंचन अज्ञातचर्यामुत्तीर्णान्दृष्ट्वा च पुनराह्वयेत् द्यूतेन ते महाराज ! पुन तमवर्तत भवांश्च पुनराहतो द्यूते नैवाऽपनेष्यति ॥ ३१ ॥ स तथाऽक्षेषु कुशलोऽनिश्चितो गतचेतनः चरिष्यसि महाराज ! वनेषु वसतीः पुनः ॥ ३२ ॥ यद्यस्मान्सुमहाराज ! कृपणान्कर्तुमर्हसि यावज्जीवमवेक्षस्व वेदधर्माश्च कृत्स्नशः निकृत्या निकृतिप्रज्ञो हन्तव्य इति निश्चयः । अनुज्ञातस्त्वया गत्वा यावच्छक्ति सुयोधनम् ॥ ३४ ॥ यथैव कक्षमुत्सृष्टो दहेदनिलसारथिः हनिष्यामि तथा मन्दमनुजानातु मे भवान् ॥ ३५॥ वैशम्पायन उवाच एवं ब्रुवाणं भीमं तु धर्मराजो युधिष्ठिरः उवाच सान्त्वयनाजा मूर्युपाघाय पाण्डवम् ॥ ३६ ॥ असंशयं महाबाहो ! हनिप्यसि सुयोधनम् । तो फिर हमें बारह वर्ष के लिये वन को भेज देगा हम लोगों को यदि आप मुखी रखना चाहते हैं तो और जो कदाचित् हम रोग ऐसे स्थान में रहें भी मेरे बतलाये वेदविहित धर्म का पालन कीजिए। मैं जहां यह दुए हमारा पता न पा मके तो भी यह पहले ही कह चुका हूँ कि छली को तो छल से ही टरहै कि उस अनातचर्या के बीतने पर फिर वह मारना उचित है । आप मुझको भाना दीजिए में आपको जुआ खेलने को वुगवे ॥२६॥३०॥ अपनी शक्ति के अनुमार आपकी आना पाकर हम मैं कह सकता हूँ कि वुलाये जाने पर आप प्रकार से दुर्योधन को मामगा जमे वायु मे उड़ी हुई अवश्य जुआ खेलने जायेंगे और जुए में फंसकर चिनगारी तृण के ढेर को भम्म कर देती है।॥३१॥३५।। फिर बनवाम के कष्ट उठावेंगा हे धर्मराज युधिष्ठिर! ! वैशम्पायन ने कहा-हे गजा जनमेजय! भीममन - cid y0uTutor.TranRVIErrereCTRELrer arrertra.rrcc.
१६८४ म हा मारत । वनपर्व Tamanandaprimittarian ninusitihnhanaMammumusndanasranmalamaanam ॥३७॥ Gall'UDITY ROUTI UnloomM PULTI TL'! TULD "{"TUTUL वर्षात्त्रयोदशादूर्व सह गाण्डीवधन्वना यत्वमाभापसे पार्थ ! प्राप्तः काल इति प्रभो!। अनृतं नोत्सहे वक्तुं न ह्येतन्मम विद्यते ॥ ३८ ॥ अन्तरेणाऽपि कौन्तेय ! निकृति पापनिश्चयम् । हन्ता त्वमसि दुर्धर्ष ! सानुवन्धं सुयोधनम् ॥ ३९ ॥ एवं ब्रुवति भीमं तु धर्मराजे युधिष्ठिरे आजगाम महाभागो वृहदश्वो महानृषिः ॥ ४० ॥ तमभिप्रेक्ष्य धर्मात्मा संप्राप्तं धर्मचारिणम् शास्त्रवन्मधुपर्केण पूजयामास धर्मराट् ॥४१॥ आश्वस्तं चैनमासीनमुपासीनो युधिष्ठिरः अभिप्रेक्ष्य महाबाहुः कृपणं वहभापत ॥ ४२ ॥ अक्षयूते च भगवन् ! धनं राज्यं च मे हृतम् । आहूय निकृतिप्रज्ञैः कितवरक्षकोविदः ॥४३॥ अनक्षजस्य हि सतो निकृत्या पापनिश्चयै. भार्या च मे सभां नीता प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ॥ १४ ॥ के यों कहने पर धर्मराज युधिष्ठिर ने म्नेहपूर्वक उसका उनको आया हुआ देखकर युधिष्ठिर ने शास्त्र माया घा और उन्हें शान्त करते हुए कहा-हे वीर ! की विधि के अनुमार अर्ध्य, पाच, मधुपर्क आदि तरह वर्ष बीत चुकने पर तुम अर्जुन के साथ युद्ध अर्पण कर उनकी पूजा की । थकान मिट जाने पर भूमि में जार दुर्योधन को और उसके साथियों को जब वे सुख से बैठ गये तब युधिष्ठिर ने दीनता से मारना। किन्तु तम जो करते होकि समय आ गया उनमे कहा हे भगवन् ! जुए के खेल को मै बिलकुल है. मैं पापी दुर्योधन को अभी बन्धुबान्धवा महित नहीं जानता । इसी कारण उन छली, पापी, ज्वारी, नष्ट करंगा, सो में इस मिश्या वाक्य का मुनकर मनुष्यों ने काट के विचार से मुझे जुआ खेलने के ऐमा करने के लिये तुगको उत्पादित नहीं कर सकता लिये बुलाया । उस खेल में उन्होंने मेरा सय गज्य कपट का आचरण मेरे मन में स्थान नहीं पा सकता; और धन हर लिया है और प्राणों से भी अधिक प्यारी क्योंकि तुम बिना ही रपट । बर्ताव किय दुर्योधन मेग धर्मपत्नी द्रौपदी को सभा में बुलवाया । उन्होंने की बा-बान्धवा ममेन मार रोगे । वैशया में मेरे शरीर को भी जुए में जीत लिया, और हमें वा- गजा जनमेजय! मी अवमर में महर्षि मृगचर्म पहनाकर घोर यन में रहने के लिये यहां भेज पृ. वहां आ गये ॥३६॥१०॥ दिया है। उन दुरात्माओं ने ममा के बीच में जो कटोर HerCERHIEmpiniowdat rrrrmrerhumimnTYLERPOILES : , innr RIDARimactananeदर. Andr:MAILammelyMeanineneraNATurthi अध्याय ५२] म हा भारत १६८५ Emiraramounार - FRAMEmirenKETARImnternmen" CARTHRIDWUpronunrism MAHATTIKOTAARTAImamwwwIncremature पुनद्यूतन मां जित्वा वनवासं सुदारुणम् प्रावाजयन्महारण्यमजिनैः परिवारितम् ॥४५॥ अहं बने दुर्वसतीर्वसन्परमदुःखितः अक्षयूताधिकारे च गिरः शृण्वन्सुदारुणाः ॥ ४६॥ आर्तानां सुहृदां वाचो द्यूतप्रभृति शंसताम् । अहं हृदि श्रिताः स्मृत्वा सर्वरात्रीविचिन्तयन् ॥ १७॥ यस्मिथैव समस्तानां प्राणा गाण्डीवधन्वनि । विना महात्मना तेन गतसत्त्व इवाऽभवम् ॥१८॥ कदा द्रक्ष्यामि बीभत्सुं कृतास्त्रं पुनरागतम् । प्रियवादिनमक्षुद्रं दयायुक्तमतन्द्रितम् ॥ १९ ॥ अस्ति राजा मया कश्चिदल्पभाग्यतरो भुवि । भवता दृष्टपूर्वो वा श्रुनपूर्वोऽपि वा क्वचित् न मत्तो दुःखिततरः पुमानस्तीनि मे मतिः ॥ ५० ॥ वृहदश्व उवाच-यद्वीपि महाराज ! न मत्तो विद्यने क्वचित् । अल्पभाग्यतरः कथित्पुमानस्तीनि पाण्डव ! अत्र ते वर्णयिष्यामि यदि शुश्रूपसेऽनघ ! यस्त्वत्तो दुःखितनगे राजाऽऽसीत्पृथिवीपते! ॥ ५२ ॥ वचन कहे और हमारे मुहृदों ने शोकाकुल होकर और राना भी आपने देम्बा या सुना है ! मुझे जान जुआ खेलने के पहले ममझाने हुए जो वाक्य कहे पड़ना है कि मुझमे वदार अभागा और कोई नहीं थे, मोमब अमीतकम्मरण कर-करके नित्य में निना है ॥१६॥५०॥ किया करता हूँ ॥४१॥४५॥ यह मुना वृहदश्व जी ने कहा-हे युधिष्ठिर! उम अवस्था में हम अमा वनवाम का दुःम आप जो यह कह रहे है कि मेरे ममान अमागाऔर है । विशेषकर अर्जुन के न होने के कोई नहीं हुआ मो टीक नहीं है। आपमे भी बढ़कर कारण निमके आश्रय हम मय के प्राण में निवि अभागे और कष्ट उटानेवाले राजा का हार मुझे के ममान रहता हूँ । रात्रि को मुझे निद्रा नहीं आती। मालूम है । यदि आप मुनना चाहें तो सुनाऊँ। आप कृपा भाके वनलाइए कि वे नदाराकनी, प्रिय- वैशम्पायन करते हैं कि नव युधिष्टिर ने कहा-टे यादी अर्जुन अन्य विद्या मीम करके कि यहां कर महाराज कप में सुनना चाहता हूं। स्मि गना आयगे दम पृथ्वी पर मेरे ममान अभागा क्या कोर्ट की ऐमी दुर्दशा हो चुकी है ! यह मुनकम टा MammommanommewaynewyomuneHimmatmu' दूनाटो उटना ..'' in TIC:".....LTTPCreyarastrrrrrrrrrrrorm.gi १६८६ म हा भारत { पर्व linal IMANDIMITalu06115ununthitibidhunalistiauntihimnucliGalumanity mmahanmunatutendraLatadiritti antaJam SanninArinhasanmumtary INCOLalu MamTRA : । वैशम्पायन उवाच अथैनमब्रवीद्राजा ब्रवीतु भगवानिति इमामवस्थां संप्राप्तं श्रोतुमिच्छामि पार्थिवम् ॥ ५३ ॥ वृदश्व उवाच-शृणु राजन्नवहितः सह भ्रातृभिरच्युत ! यस्त्वत्तो दुःखिततरो राजाऽऽसीत्पृथिवीपते! ॥ ५४॥ निषधेषु महीपालो वीरसेन इति श्रुतः तस्य पुत्रोऽभवन्नाम्ना नलो धर्मार्थकोविदः स निकृत्या जितो राजा पुष्करेणेति नः श्रुतम् । वनवासं सुदुःखातों भार्यया न्यवसत्सह ॥ ५६ ॥ न तस्य दासा न रथो न भ्राता न च बान्धवाः । वने निवसतो राजच्छिष्यन्ते स्म कदाचन ॥ ५७॥ भवान्हि संवृतो वीरैर्भातृभिर्देवसंमितः ब्रह्मकल्पैर्द्विजाग्न्यैश्च तस्मान्नाऽर्हसि शोचितुम् ॥ ५८ ॥ युधिष्ठिर उवाच-विस्तरेणाऽहमिन्छामि नलस्य सुमहात्मनः चरितं वदतां श्रेष्ठ ! तन्ममाऽख्यातुमर्हसि इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि द्विपश्चाशत्तमोऽध्याय ॥५२।। बोले-आप भाइयों सहित मन लगाकर इस कथा को और भाइयों और ब्रह्मतुल्य ब्राह्मणों के साथ वन में मुनिए | निषद देश में बीरसन नाम का एक राजा रहते हैं, किन्तु उसके साथ दाम दासी, भाई या रहता था। उसके नल नाम का एक बड़ा पण्डित बन्धु घान्धर कोई नहीं था। इस कारण आपको और धर्मात्मा पुन था ॥५११५५|| किसी तरह शोक न करना चाहिये । यह सुनकर मुना है कि राजा नल को भी पुष्कर ने युधिष्ठिर ने कहा- हे महाराज ! मै विस्तारपूर्वक कपट में जीत लिया था। उमसी सब राज्य सम्पत्ति महात्मा नर का चरित्र सुनना चाहता हूँ, आप वर्णन सोनार पुष्कर ने नल को उमकी स्त्री सहित वन | कीजिए ॥५६॥५॥ भेज दिया था । आप तो देवनाओं के तुल्य क्षत्रिय बनपर्व का यावनवां अध्याय ममाप्त हुआ ।। ५२॥ । । RAMMINITISRO UTO . - अथ त्रिपन्नाशत्तमोऽध्याय ॥ ५३ ॥ वृदश्च टपाच--आसीद्राजा नलो नाम वीरसेनसुतो बली उपपन्नो गुणरिष्टै रूपयानवकोविदः CLICht, . ..' ... . + Cit 14r/7 '; {"ft, to first ' * अध्याय ५३] महा मा रत १६८७ TAITamIMAGE STAGaurinamuramuna.iranuVATION - Tamarinarasimmifinamammilitant Installiam aadimitatinidinainintendarmiraimstiane अतिष्ठन्मनुजेन्द्राणां मूर्ध्नि देवपतिर्यथा उपर्युपरि सर्वेपामादित्य इव नेजसा ॥ २ ॥ ब्रह्मण्यो वेदविच्छूरो निषधेषु महीपतिः अक्षप्रियः सत्यवादी महानक्षौहिणीपतिः ईप्सितो वरनारीणामुदारः संयतेन्द्रियः रक्षिता धन्विनां श्रेष्ठः साक्षादिव मनुःस्वयम् ॥ ४ ॥ तथैवाऽऽसीद्विदर्भपु भीमो भीमपराक्रमः शूरः सर्वगुणेर्युक्तः प्रजाकामः स चाऽप्रजः स प्रजार्थे परं यत्नमकरोत्सुसमाहितः तमभ्यगच्छद ब्रह्मर्पिदमनो नाम भारत ! तं स भीमः प्रजाकामस्तोपयामास धर्मवित् । महिण्या सह राजेन्द्र ! सत्कारेण सुवर्चसम् ॥ ७ ॥ तस्मे प्रसन्नो दमनः सभार्याय वरं ददौ कन्यारत्नं कुमारांश्च त्रीनुदारान्महायशाः ॥ दमयन्तीं दमं दान्तं दमनं च सुवर्चसम् उपपन्नान्गुणैः सर्वभॊमान्भीमपराक्रमान् तिरपनवां अध्याय ॥५३ ॥ वृहदश्व ने कहा-हे युधिष्ठिर ! राजा वीरसेन इमी प्रकार से विदर्भ देश में भीम नामी बड़ा का पुत्र नल बड़ा गुणवान् . रूपवान् , और घोड़ों पराक्रमी और गुणवान् एक राजा था । इस राजा की विद्या का जाननेवाग था। मय राजा लोग उसकी के कोई सन्नान न थी और वह सन्तान चाहता था। आजा में रहते थे और वह उनके ऊपर इन्द्र के समान उमने सन्तान होने के लिये बहुत से यत्न किये। शासन करता था । टस राजा का तेज मूर्य के तुल्य एक ममय उस राजा के पाम दमन नाम एक ब्रह्म- था। वह बड़ा ब्राह्मणभक्त, वेदपाठी, शूरवीर, मत्य. ऋषि आये। राजा ने अपनी रानी महिन म ब्रान- वादी, अारिणी का स्वामी, जुए में प्रीति रखने- ऋषि का बड़ा आदर सत्कार क्यिा और उनकी चारा और निषाद देन का वामी अधिपति था। श्रेष्ठ प्रमन्न क्यिा।तर उम ब्रह्ममपि ने राजा को दमयन्नी मिया उसे चाहा करती थी और यह उदारता जिते. नाम एक कन्या और दम, दान्त, और दमन नाम न्द्रियता और रक्षा करना आदि गुणों मे मम्पन्न वड़ा के तीन बड़े पराक्रमी पुत्र होने का वरदान दिया। धनुग और साक्षात् मनु जी के समान था | פטיטוצ'ניפוציפוייייששששייישיפינגוויויוינומ') 80 (!'נין וניז פ הומוג' לופינינו (: פוגו'י'י' ' ט'נייר - ॥५॥२॥ Timi JeremiuTE:mirrrrrrrrrrrrrrent म हा भारत [ वनपर्व Munda minungimarsintimathunMuniinm.hindi.mindiaTMLAGLAndrAhala । POPULHUSH NO'LUMIT TE POTITOJ TUTUP TERUITU 'L 'UITSLOVA दमयन्ती तु रूपेण तेजसा यशसा श्रिया सौभाग्येन च लोकेषु यशः प्राप सुमध्यमा ॥ १० ॥ अथ तां वयसि प्राप्ते दासीनां समलंकृतम् शतं शतं सखीनां च पर्युपासच्छचीमिव ॥ ११ ॥ तत्र स्म राजते भैमी सर्वाभरणभूपिता सखीमध्येऽनवद्याङ्गी विद्युत्सौदामनी यथा अतीव रूपसम्पन्ना श्रीरिवाऽऽयतलोचना न देवेषु न यक्षेषु तादृग्रूपवती क्वचित् ॥ १३ ॥ मानुषेष्वपि चाऽन्येषु दृष्टपूर्वाऽथवा श्रुता चित्तप्रसादनी वाला देवानामपि सुन्दरी नलश्च नरशार्दूलो लोकेष्वप्रतिमो भुवि कन्दर्प इव रूपेण मूर्तिवानभवत्स्वयम् तस्याः समीपे तु नलं प्रशशंसुः कुतूहलात् नेपधस्य समीपे तु दमयन्तीं पुनः पुनः ॥ १६ ॥ तयोरदृष्ट कामोऽभूच्छृण्वतोः सततं गुणान् । अन्योन्यं प्रति कौन्तेय! स व्यवर्धत हृच्छयः ॥ १७ ॥ अशक्नुवन्नलः कामं तदा धारयितुं हृदा यह दमयन्ती कन्या अपने स्वरूप, तेज, यश, | कहीं वैसा का नहीं देख पड़ता था। दमयन्ती को शोभा और सौभाग्य के कारण से इस लोक में विख्यात | देख लेने से मन को बड़ा आनन्द प्राप्त होता था हो गई । जब वह कन्या युवा अवस्था को प्राप्त हुई अधिक क्या कहें. देवता भी उस राजकुमारी को नर टमकी मेवा के लिये सौ दामी नियुक्त कर दी । परमसुन्दरी समझते थे। उधर मनुष्यलोक में नल के गई और उसकी सेवा इन्द्राणी के समान होने लगी। | समान कोई सुन्दर पुरुष न था। उसका रूप देखने इम प्रकार अनेक क्म माभूषण पहने, सर्वाङ्गसुन्दरी, से रोगों को अम हो जाता था कि वह शरीरधारी भीमनार की कन्या मग्रियों के साथ मेघमाला के कामदेव ही दे ॥१०।१५|| बीन में चमकनी हुई बिजली की तरह शोभित होने सभी लोग कौतूहलवश नल की प्रशंसा दमयन्ती गी। वह विगालनेत्रांबानी कन्या रश्मी के ममान के आगे और दमयन्ती की प्रशंसा नल के आगे अत्यन्त मुन्दरी धी। यया देवशक में, क्या यशा आ-आवर क्यिा करते थे । इस कारण से एक दूसरे में, पया मनुष्यों में और क्या अन्य किमी रोक में, को बिना देख उन दोनों के हरय ' MOUNDumvwaterta017ntritix.pinta WALITmitonymnomyourcentMMIYE । IATI.MA.मा.. परम्पर प्रति HI.MysureryLPAPEterettinenuTumbhuvan अध्याय ५३] महाभारत १६८९ mmanmanTimiminainmmmmmmsinaSUITrimmsniinnauruITOTrurtanarianarm ॥ १८॥ Portrainhitiminantarnadimirmanandina Himanitaramatitanatantnidinatnanatanirinames अन्तःपुरसमीपस्थे वन आस्ते रहोगतः स ददर्श ततो हंसाञ्जातरूपपरिष्कृतान् वने विचरतां तेषामेकं जग्राह पक्षिणम् ततोऽन्तरिक्षगो वाचं व्याजहार नलं तदा । हन्तव्योऽस्मि न ते राजन् ! करिष्यामि तव प्रियम्॥ २०॥ दमयन्तीसकाशे त्वां कथयिष्यामि नैपध! । यथा त्वदन्यं पुरुषं न सा मस्यति कर्हिचित् ॥ २१ ॥ एवमुक्तस्ततो हंसमुत्ससर्ज महीपतिः ते तु हंसाः समुत्पत्य विदर्भानगमंस्ततः ॥ २२ ॥ विदर्भनगरी गत्वा दमयन्त्यास्तदाऽन्तिके निपेतुस्ते गरुत्मन्तः सा ददर्श च तान्खगान् ॥ २३ ॥ सा तानद्भुतरूपान्वे दृष्ट्वा सखिगणावृता हृष्टा ग्रहीतुं खगमांस्त्वरमाणोपचक्रमे ॥ २४ ॥ अथ हंसा विसपुः सर्वतः प्रमदावने एकैकशस्तदा कन्यास्तान्हंसान्समुपाद्रवन् ॥ २५॥ यं हसं समुपाधावदन्निके उत्पन्न हो गई और उन दोनों के हृदय में सोता हुआ | तब सब हंस एक साथ आकाश-मार्ग में उड़कर काम जगकर प्रति दिन बढ़ने लगा । राजा नल उस विदर्भ देश में पहुचे । कुछ समय के पश्चात् वे सब कामदेव के वेग को धारण न कर सका और महलों हंस विदर्भ नगरी में जाकर दमयन्ती के पास पहुंचे। के समीप वन में अकेला रहने लगा । एक ममय नल ज्योंही वे उतरे त्याही दमयन्ती ने उन्हें देख लिया। कुछ हंस देखे जिनके पट्ट सुनहर्ग अपनी मग्रियों के बीच में खड़ी हुई दमयन्ती सों थे । नल ने उनमें से एक हंम को पकड़ लिया ! के अत्यन्त अद्भुत रूप को देखकर प्रसन्न हुई और उस समय वह हंस कहने लगा-हे राजन् ! आप उन्हें पकड़ने के लिये बार-बार चेष्टा करने लगी। मुझे मारिएगा नहीं, छोड़ दीजिए । मैं आपका प्रिय उसकी सखिया भी हमों को पकड़ने की इच्छा से कार्य करेंगा अर्थात दमयन्ती के पास जाकर आपकी बार-बार उनके पीछे दौड़ने लगी। वे हंम भी दरकर मुन्दरता का वर्णन करुंगा जिममे बह आपके मिवाय उन म्बियों के बीच में इधर-उधर भागने लंग।।२२।२५।। दुसरे मनुष्य को न चाहे ॥१६॥२१॥ पकड़ने के लिये उत्सुक होकर दमयन्नी जिम यह मुना र नल ने उम हंस को छोड़ दिया। , हम के पीछे दौड़ती थी वही हम मनुष्य का वाणी PawunmainangifirmwamimmilaninDITARTINisthuminimirmannddi in anituat taiminanatantants ther indian दमयन्ती तु - ने उम वन । "LLITERAPIDTHumsammertyreneuy.com १६९० म हा भारत | वनपर्व EarmuTIITamannial InmlILuirrrrrrrrrrrrnar । Lampanuman - ramanmuans TTuraute auurinamuinthunaruMANDLama HirwUNILIt... MALARI IT स मानुपी गिर कृत्वा दमयन्तीमथाऽब्रवीत् ॥ २६ ॥ दमयन्ति | नलो नाम निषधेषु महीपतिः अश्विनो सदृशो रूपे न समास्तस्य मानुपाः ॥२७॥ कन्दर्प इव रूपेण मूर्तिमानभवत्स्वयम् तस्य वै यदि भार्या त्वं भवेथा वरवणिनि ! ॥ २८ ॥ सफलं ते भवजन्म रूपं चेदं सुमध्यमे! । वयं हि देवगन्धर्वमनुष्योरगराक्षसान् दृष्टवन्तो न चाऽस्माभिदृष्टपूर्वस्तथाविध वं चापि रत्नं नारीणां नरेषु च नलो वर ॥ ३०॥ विशिष्टया विशिष्टन सग्रामो गुणवान्भवेत् । एवमुक्ता तु हसेन दमयन्ती विशांपते । अब्रवीत्तत्र त हंसं स्वमप्येव नले वद नथेत्युक्त्वाऽण्डज कन्यां विदर्भस्य विशांपते ।। पुनरागम्य निषधान्नले सर्व न्यवेदयत् ॥ ३२ ॥ इति श्रीम महाभारने आरण्यकपर्वणि नलोपारयानपर्वणि हमदमयन्तीसवादे विपञ्चाशत्तमोऽध्याय ॥५॥ में कहता था कि ह दमयन्ती । निपध देश में एक तुम भी स्त्रियों में रन हो और वह नल भी पुरुषा में नर नाम का राना है । उमका रूप अश्विनीकुमारों श्रेष्ठ है । विवाह और युद्ध दोनों बराबरवारों ही में के समान हैं । पृथ्वी पर वैसे रूप रावण्य का होना शोभा दते है । हे राजन् । यह सुनकर दमयन्ती ने असम्भव है। हे मुन्दर कमर और सु दर रङ्गवारी। कहा हे हस ! तुमने नल का वृत्तान्त जिस तरह तुम यदि उमकीत्री हो सको तो निम्म देह तुम्हारा मुझसे कहा है उसी तरह उनके पास जाकर मेरा में जम सफर और मुन्टरता सार्थक हा। हे सु दी। वृत्तान्त उनमे कहो। यह सुनकर वे सब हस बहा क्योरिदमन देवना, ग धर्व, दानव, नाग और मानवों स उड़कर राजा नल क पास आये और उससे सब में कही गमा अपूर्व कप नहीं दसा न सुना व्यगाथा कह सुनाई ॥२६॥३२॥ यापर्य या तिरपावा अध्याय ममाप्त हुआ ।। ५३ ।। - - rari R TATALIA -------- अध चतु पशाशनमोऽध्याय ।।५४ ।। यादव यान-दमयन्ती तु तच्छत्वा वचो हंसम्य भारत।। ननः प्रभृति न स्वम्धा नलं प्रति बभूव सा ॥ १ ॥ Fir"..! .rr.khub. t.dll. Attauru".... .C, UTION" अध्याय ५४] म हा भारत १६९१ IPTEROINTINUnsurrour902321mIrrrrammLLUDIOHD Featimemurrarmerammamimom मा unmannaamwomaramataon ततश्चिन्तापरा दीना विवर्णवदना कृशा बभूव दमयन्ती तु निःश्वासपरमा तदा ऊर्ध्वदृष्टिानपरा बभूवोन्मत्तदर्शना पाण्डुवर्णा क्षणेनाऽथ हृच्छयाविष्टचेतना न शय्यासनभोगेपु रतिं विन्दति कर्हिचित् । न नक्तं न दिवा शेते हाहेति रुदती पुनः तामस्वस्थां तदाकारां सख्यस्ता जनुरिङ्गितैः । ततो विदर्भपतये दमयन्त्याः सखीजनः न्यवेदयत्तामस्वस्थां दमयन्ती नरेश्वरे तच्छ्रुत्वा नृपतिभीमो दमयन्ती सखीगणात् ॥ ६ ॥ चिन्तयामास तत्कार्य सुमहत्स्वां सुतां प्रति । किमर्थ दुहिता मेऽद्य नाऽतिस्वस्थेव लभ्यते ॥ ७ ॥ स समीक्ष्य महीपालः स्वां सुतां प्राप्तयोवनाम् । अपश्यदात्मना कार्य दमयन्त्याः स्वयंवरम् ॥ ८ ॥ स संनिमन्त्रयामास महीपालान्विशांपतिः अनुभूयतामयं वीराः स्वयंवर इति प्रभो ! श्रुत्वा तु पार्थिवाः सर्वे दमयन्त्याः स्वयंवरम् । अभिजग्मुस्ततो भीमं राजानो भीमशासनात् ॥ १० ॥ चव्यनवां अध्याय ॥५४॥ वृहदश्व ने कहा-हे युधिष्ठिर! हम के मुख से राजा अकेले में हाय-हाय किया करती थी ॥१॥ नल का वृत्तान्त मुनकर दमयन्ती व्याकुल हो गई। वह दमयन्ती कीऐमी दशा और आकार देम्वकर दिन पर दिन दुचनी और मलिन होने लगी। वह उसकी मम्बियों ने टमके मन का भाव जान लिया। मदा बार-बार लम्बी माय लिया करती थी। वह कार उन्होंने उसके पिता गजा भीम पाम जाकर टमयन्ती का दृष्टि किये, ध्यान में मन मी, पागल मी देव के नल पर आयक्त होने का हाल कह सुनाया। विदर्भ पड़नी थी। क्षण-क्षण भर पर कामदेव की पीड़ा में नरेग भीम, मम्बियों के मुख मे ऐमा दमयन्नी का हाल, पीड़ित होने के कारण टमकामगर पीग पड़ने लगा। मुनकर बहुत ही चिन्तित हुए। वे विनार वग्नंगे मखाना, पीना, टटना, चटना और अच्छी मेज पर कि अस्म्मान दमे कोनमी व्यथा उत्पन्न हो गई। मोना कुछ अच्छा नहीं लगता था । यह दिन रान हमके पश्चात् दमयन्तीको जवान हुई देखकर गजा ने tisz"*1'111*11******PETTO'rtriTerrier's TIC'errrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrr*** anatimamalnalisauntinsteaminatilnapalistudrandisindhulithialidalanatil.ca.sunita................... .
वनपर्व म हा भारत amaATIINITrmanmaaimamtasvipmaduaaTInanasamunlouamtamannaor aamananRIDALIRIMADIRMIREDIRANTITIVitain.antaHIRTELGuanians हस्त्यश्वरथघोषण पूरयन्तो वसुन्धराम् विचित्रमाल्याभरणैर्वलेदृश्यैः स्वलंकृतैः तेषां भीमो महाबाहुः पार्थिवानां महात्मनाम् । यथार्हमकरोत्पूजां तेऽवसंस्तत्र पूजिताः ॥ १२ ॥ एतस्मिन्नेव काले तु सुराणामृपिसत्तमौ अटमानौ महात्मानाविन्द्रलोकमितो गती ।। १३ ॥ नारदः पर्वतश्चैत्र महाप्राज्ञी महावतो देवराजस्य भवनं विविशाते सुपूजितौ ॥ १४ ॥ तावर्चयित्वा मघवा ततः कुशलमव्ययम् पप्रच्छाऽनामयं चापि तयोः सर्वगतं विभुः ॥१५॥ नारद उवाच-आवयोः कुशलं देव ! सर्वत्रगतमीश्वर ! लोके च मघवन् ! कृरस्ने नृपाः कुशलिनो विभो! ॥ १६ ॥ वृहदश्व उवाच - नारदस्य वचः श्रुत्वा पप्रच्छ बलवृत्रहा धर्मज्ञाः पृथिवीपालास्त्यक्तजीवितयोधिनः ॥ १७ ॥ शस्त्रेण निधनं काले ये गच्छन्त्यपराङ्मुखाः । अयं लोकोऽक्षयस्तेषां यथैव मम कामधुक् ॥ १८ ॥ उसके म्ययायर की तैयारी की । महाराज भीम गे, देवऋपियों की यथोचित रूप से पूजा की और दमयन्ती के स्वयम्वर में आने के लिये, राजाआ के | कुशलप्रश्न किया। तब नारद जी ने कहा-हे इन्द्र! पाम न्यौता भेजा। तब भीम का न्यौता पाकर मर हम लोगों के लिये सब जगह कुगल है । मनुष्यलोक राजा स्वयम्वर के लिये आने लगे। उनके हाथी, घोड़े में सब राजा भी कुशलपूर्वक हैं ॥१२॥१६|| और स्थी के शब्द से और विनित्र आपण माला वृहदश्व कहते है- है-यह सुनकर वृत्रासुर के मारने. आदि पहने हुए सनिकों के कोराहल से भी गूंज वाले इन्द्र ने फिर नारद जी के वचन सुनकर कहा- टी॥५॥११॥ हे महाराज ! जो धर्मात्मा राजा लोग युद्ध में बिना महावा भीम ने उन महाप्रभावशाली नरपत्तियों । मुग्व मोड़े जीने की आशा छोड़कर संग्राम में शस्त्र का स्वागत किया। वे मर आदर पाकर यहा मुख मे से मरकर इम अक्षय और सय कामनाओं के देने. रहने रंग। दमी अवमर में नारद और पर्वत नाम वाले रोक में आय है मैं उन सबको यहां नहीं देखता दी गहामा ताबी देवयापि विनम्ने विनरने है आप यनलाइए कि वे राजा रोग कहां है ! इन्द्र देवरीक में इन्द्र भवन में पन्द्र ने उन दोनों के यों पूछने पर देवर्षि नारद ने कहा-हे देवराज ! Himmyrex-BASURITYUTOPEECHATATE -- ..rruth internet.COETCurrenteracreeramTTEEL अध्याय ५४] म हा भारत १६९३ marati.... dhirditainin. MANTRisinitatishathiniclini.cimmittainmanthamiti ILLS PAINTIAlmmamimammimINGTOnlimitrammarimminianus क्क नु तेक्षत्रियाः शूरा न हि पश्यामि तानहम् । आगच्छतो महीपालान्दयितानतिथीन्मम एवमुक्तस्तु शक्रेण नारदः प्रत्यभापत नारद उवाच-शृणु मे मघवन् ! येन न दृश्यन्ते महीक्षितः ॥ २० ॥ विदर्भराज्ञो दुहिता दमयन्तीति विश्रुता रूपेण समतिकान्ता पृथिव्यां सर्वयोपितः ॥ २१ ॥ तस्याः स्वयंवरः शक्र ! भविता न चिरादिव । तत्र गच्छन्ति राजानो राजपुत्राश्च सर्वशः ॥ २२ ॥ तां रत्नभूतां लोकस्य प्रार्थयन्तो महीक्षितः । काङ्क्षन्ति स्म विशेपेण बलवृत्रनिपूदन ! ॥ २३ ॥ पतस्मिन्कथ्यमाने तु लोकापालाश्च साग्निकाः । आजग्मुर्देवराजस्य समीपममरोत्तमाः ततस्ते शुश्रुवुः सर्वे नारदस्य वचो महत् श्रुत्वेव चाऽब्रुवन्हष्टा गच्छामो वयमप्युत ॥ २५॥ नतः सर्वे महाराज ! सगणा: सहवाहनाः । विदर्भानभिजग्मुस्ते यतः सर्वे महीक्षितः ।। २६ ॥ नलोऽपि राजा कौन्तेय! श्रुत्वा रानां समागमम् । अभ्यगच्छददीनात्मा दमयन्तीमनुनतः अथ देवाः पथि नलं ददृशुर्भूतले स्थितम् । राजा रोगों के न दग्विने का कारण यह है, में कहता लोकपाल भी यहां आ गये । वे मय नारद जी की हैं. मुनिए । विदर्भराज की कन्या दमयन्ती का और बात को मुनका प्रमन्नना मे कटन रंगकि हमरोग रावण्य में पृथ्वी भर की मय स्त्रियों में श्रेष्ठ है। भी यहां नलंगे ॥२३१२५|| उमा म्वयम्बर होनेवाला है। उमी परम मुन्दरी कन्या इसके पीछे ये मय देवता अपने-अपने वाहनों पर को प्राप्त करने के लिये सब गजा और राजपुर विदर्भ चदार टमी मार्ग मे विटभ देश को चल दिये निम दवा की गजधानी को गये है. ॥१७॥२२॥ मार्ग में और गना लोग जा रहे थे । हे युधिष्ठिर इन्द्र की और नारद जी को यह पम्पा बान. इधर निषध देश के गजानन भी, यद मुनकर कि चीन दो ही रही थी कि इतने में अदिव आदि । दमयन्नी के स्वयम्बर के लिये गजाओं का जमार Corp.com'19*ITO'sirritim'treeriui'cerererereri'pi'sirloprerrz'orreic", "": 1***'f'l":"********** ltor rolTCP'UL'UT'UL'ULUCULULUTO 'LULU'L'OLIOTILOCOS म हा भारत | वनपर्व , marinmut Marro.ThomWina nUGU MWITUTTGART AUG IIT- Irri.nainamainal CYTMinirmiTATimiamirmirmilarasame साक्षादिव स्थितं मूर्त्या मन्मथं रूपसंपदा ॥ २८ ॥ तं दृष्ट्वा लोकपालास्ते भ्राजमानं यथा रविम् । तस्थुर्विगतसंकल्पा विस्मिता रूपसंपदा ततोऽन्तरिक्षे विष्टभ्य विमानानि दिवौकसः । अब्रुवन्नैपधं राजन्नवतीर्य नभस्तलात् भो भो निषधराजेन्द्र ! नल ! सत्यवतो भवान् । अस्माकं कुरु साहाय्यं दूतो भव नरोत्तम ! ॥ ३१ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि इन्द्रनारदमवादे चतु पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५४॥ हो रहा है, दमयन्ती के साथ विवाह होने की आशा को देखकर सब देवता चकित हो गये और दमयन्ती से प्रसन्नतापूर्वक उधर को चल पड़े । देवताओं ने की प्राप्ति से निराश हो गये । अब उन्होंने अपने भावासमार्ग में जाते जाते नीचे देखा कि शरीरधारी विमानों को आकाश में खड़ा करके नल से कहा- कामदय के समान रूपवान् नल भी स्वयम्बर को जा हे राजा नल | तुम सत्यवती हो। इसलिये हे नरश्रेष्ठ ! रहे हैं । टनके अलारिक, सूर्य-सदृश शरीर के तेज तुम दूत बनकर हमारी सहायता करो ॥२६॥३१॥ वनपर्व का चव्वनवा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ५४ ।। अय पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५५ ।। वृहदश्व उगाच तेभ्य प्रतिज्ञाय नलः करिष्य इति भारत !। अर्थतान्परिपप्रच्छ कृताञ्जलिरुपस्थितः के वे भवन्तः कश्चाऽसौ यस्याऽहं दूत ईप्सित । किंच तद्वो मया कार्यं कथयध्वं यथातथम् एवमुक्त नेपधेन मघवानभ्यभापत अमगन्चे नियोधाऽम्मान्दमयन्त्यर्थमागतान् ॥ ३ ॥ अहमिन्द्रोऽयमग्निश्च यथवाऽयमपां पतिः पनपनया अध्याय॥५५॥ वृदय ने कहा- युधिष्ठिर ! राजा नर ने ने कहा-२ भद्र। हम सब देवता हैं । में तो इन्द्र न दक्षताओं मे दल मनो मी मनिला की और पाम है. अमिय यरण है और ये प्राणियों का देहान्त हाय रसायने रमा-मामय गेगीन करंवार यमराज है । हम मप देवता दगयन्ती राम मुमनाबाहन है। मापांगी मात करने की मेज पर आये हैं। 41 41 4 मुश करना होगा । या गुनकर तुम दमयन्नी के पास जाकर हो कि इन्द्र आदि Mirrerimurunm.mmmnidirtmnurse.mahrtehurmurti no ouTOPPED OUTUByn' - . . न अध्याय ५५] महा मारत १६९५ ironmtirinanimaAImminounuTITIALAIMAATISTIAmWorenatarian ontraindiadiman.anirudinantimoniumindudhirmalnutdihironlialist ammuTILATION शरीरान्तकरो नृणां यमोऽयमपि पार्थिव ! त्वं वे समागतानस्मान्दमयन्त्यै निवेदय लोकपाला महेन्द्राद्याः समायान्ति दिदृक्षवः ॥ ५ ॥ प्राप्तुमिच्छन्ति देवास्त्वां शक्रोऽग्निवरुणो यमः । तेषामन्यतमं देवं पतित्वे बरयस्व ह एवमुक्तः स शक्रेण नलः प्राञ्जलिरब्रवीत् । एकार्थं समुपेतं मां न प्रेपयितुमर्हथ ॥ ७ ॥ कथं तु ज्ञातसंकल्पः स्त्रियमुत्सहते पुमान् परार्थमीदृशं वक्तुं नरक्षमन्तु महेश्वराः देवा ऊचुः करिष्य इति संश्रुत्य पूर्वमस्मासु नैषध ! न करिष्यसि कस्मात्त्वं ब्रज नैपध मा चिरम् ॥ ९ ॥ वृदश्च उवाच-एवमुक्तः स देवेस्तनपधः पुनरब्रवीत् सुरक्षितानि वेश्मानि प्रवेष्टुं कथमुत्सहे ॥ १० ॥ प्रवेक्ष्यसीति तं शक्रः पुनरेवाऽभ्यभाषत जगाम स तथेत्युक्त्वा दमयन्त्या निवेशनम् ॥ ११ ॥ ददर्श तत्र वैदर्भी सखीगणसमावृताम् देदीप्यमानां वपुपा श्रिया च वरवर्णिनीम् ॥ १२ ॥ रोकाल तुम्हारे म्वयम्वर की सभा में जा रहे हैं। तुम पहले प्रतिज्ञा कर चुके हो कि मैं आपका कार्य इन्द्र, अमि, वरुण और यम, ये चारों देवता तुम्हें करूँगा । फिर अब करने से क्यों इन्कार करते हो। प्राप्त करना चाहते हैं । इनमें मे जिसे चाहो उमे तुम अभी हमारे कार्य मे विदर्भ देग जाओ और हमाग पति यना । इन्द्र के ये वचन सुनकर राजा नल मदेशा दमयन्ती को कह दो। वृहदश्व कहते हैं कि ने हाथ जोड़कर कहा-हे महाराज! मेरे और आपके रोक्पागें के यों कहने पर नल ने फिर कहा-'बहुन । आने का प्रयोजन एक ही है इसमे मुझे न भेजिए अच्छा' मैं जाऊंगा परन्तु मैं महल के अन्दर रिम- क्योंकि जो मनुष्य जिस स्त्री को आप वरना चाहता तरह जान पाऊँगा क्योंकि वह महल द्वारपारों मे द यह उस घी से यह क्योंकर कह सक्ना है कि अच्छी तरह मे रक्षित है। यह मुनकर इन्द्र ने कहा- तुम अमुक पुरुष को अपना पनि बना रो। इमान्ये तुम मेरे प्रभाव में महज ही वहा पहुंच सकोगे । यह : आप गंग इस बारे में मुझे क्षमा करें ॥१८॥ मुनर नल 'यहुन अच्छा' कटकर चर दिया। विदर्भ यह मुनकर देवताओं ने कहा-हे निषध-नरेग! देश में जागर यह दमयन्ती के घर में गया । वहा Funwinpintl.rimabilittindian marnatulswaminiti.alinian anaunihitionaanaaaantataat... Sinmri 30122012DOLLECTRImucyan Lucture crconceanort १६९६ म हा भारत [ वनपर IJI. 11.0. minTIMTI7171111 1117I infHRA TIL 20- MP POL IPL - I Ty. Mou. MM2MPPune moLL . अतीव सुकुमाराङ्गी तनुमध्यां सुलोचनाम् । आक्षिपन्तीमिव प्रभां शशिन वन तेजसा ॥ १३ ॥ तस्य दृष्दैव ववृधे कामस्तां चारुहासिनीम् । सत्य चिकीर्षमाणस्तु धारयामास हृच्छयम् ॥ १४ ॥ ततस्ता नैषध दृष्ट्वा सभ्रान्ता' परमाङ्गनाः आसनेभ्य समुत्पेतुस्तेजसा तस्य धर्पिता ॥ १५ ॥ प्रशशसुश्च सुप्रीता नल ता विस्मयान्विता । न चैनमभ्यभाषन्त मनोभिस्त्वभ्यपूजयन् अहो रूपमहो कान्तिरहो धैर्य महात्मन कोऽय देवोऽथवा यक्षो गन्धर्वो वा भविष्यति ॥ १७ ॥ न तास्त शक्नुवन्ति स्म व्याहर्तुमपि किचन । तेजसा धर्पितास्तस्य लज्जावत्यो वराङ्गना अथैन स्मयमान तु स्मितपूर्वाभिभाषिणी दमयन्ती नल वीरमभ्यभाषत विस्मिता कस्त्व सोनवद्याह्न । मम हृच्छयवर्धन । प्राप्तोऽस्यमरवद्वीर । ज्ञातुमिच्छामि तेऽनघ । ॥ २० ।। कथमागमनं चह कथ चाऽसि न लक्षित वद्द उस दमय ती को जा परमसुदरी, शाभायमान, छ न पूछ सका। उमके असाधारण रूप कामनाय अत्यत कामल अद्गवारी, सूक्ष्मकटि, मुदर नेत्र कात्ति और अनुपम गाम्भर्य का दखकर सभी मन रमनेवारी और अपने तेज मे च द्रमा की प्रभा का में माचन लगी । यह पुरुष कौन है । यह तो कोई F मरिन करनेवाली था सखिया क बाच में बैठी हुइ दवता यक्ष अथवा ग धर्व जान पड़ता है। तात्पर्य F देखकर उसका हृदय कामामि से राप्त हो गया पर तु यह है कि किमी क मुख म बोर तक नहीं निकला। मा अपनी प्रनिना मत्य करने की इस स समा म्रिया सक शरीर का काति दखकर रज्जा से पर न होने दिया । दमय ती का मखिया नरक सिर झुकाकर रह गई। इसके पीछे दमयती ने अचम्म मग का दबकर अपर अपन आसनों पर स २८ में आर म द म द मुसकरार उम मुमकरति हुए नहा दुई ॥१५॥ नर से पूछा-हे सु दर अङ्गबाले ! आप सत्य सत्य मन और पिम्मय हार नर पकी यहिए आप कौन है ? आपका दराकर मेरा हदय पारधार मा म प्रगमा करागी। कोई भी उसम कामरा वाणों में पिदार्ण हा गया है।ह पुण्यात्मा' mu 1 F "ICIAN 11. LtLtu. .LL.... ..
- mamirmaniamminatommiminutrimnanama अध्याय ५६] म हा भारत १६९७ Empinimummmmmmunanimonrmmanumami सुरक्षितं हि मे वेश्म राजा चैवोग्रशासनः ॥ २१ ॥ एवमुक्तस्तु वैदा नलस्तां प्रत्युवाच ह नल उवाच-नलं मां विद्धि कल्याणि! देवदूतमिहाऽऽगतम् ॥ २२ ॥ देवास्त्वां प्राप्तुमिच्छन्ति शकोऽग्निवरुणो यमः । तेषामन्यतमं देवं पति वरय शोभने ! ॥ २३॥ तेषामेव प्रभावेण प्रविष्टोऽहमलक्षितः प्रविशन्तं न मां कश्चिदपश्यन्नाऽप्यवारयत् ॥ २४ ॥ एतदर्थमहं भद्रे ! प्रेपितः सुरसत्तमः एतच्छ्त्वा शुभे ! वुद्धिं प्रकुरुप्व यथेच्छसि ॥ २५ ॥ इति श्रीमन्महाभारत आरण्यकपर्वणि नलोपास्यानपर्वणि नलस्यदेवदात्य पञ्चपञ्चाशचमोऽध्यायः ॥ ५५ ॥ इम महल के अच्छीतरह मे रक्षित होने पर भी आप यमगज, ये चारों रोक्पाल तुम्हें प्राप्त करना चाहते किम तरह यहां चले आये ? मुझे आप कोई देवता हैं । इस कारण तुम इनमें मे किमी एक को अपना जान पड़ते हैं। मैं जानना चाहती हूँ, आपके यहा पति बना रो। यह उन्हीं देवनामों का प्रभाव है आने का क्या कारण है ? नल ने कहा-हे कल्याणी! जो म विना दीने और विना गेस्टोक के यहांचा मैं निपघ देश का राजा नल हूँ। इम ममय देवताओं आया हूँ। हे भद्रे : देवनाओं का यह कार्य मिद्ध का दूत बनकर यहां आया हूँ। हे गोमने ! इन्द्र, करने के न्येि ही यहां आया हूँ। अब तुमको जमा अमि, वरुण और प्राणियों का देहान्न करनेवाले समझ पड़े, वमा क्गे ॥१६॥२५॥ वनपर्व का पचपनयां अध्याय ममाप्त हुआ ।। ५५ ।। Enindiandin.litilimminensifilalil - DIIIm अथ पदपञ्चागतमोऽध्यायः ।। ५६ ॥ बृहदश्व उवाच-सा नमस्कृत्य देवेभ्यः प्रहस्य नलमत्रवीत् प्रणयव यथाश्रहं राजन्कि करवाणि ते अहं चेव हि यञ्चाऽन्यन्ममाऽस्ति वसु किंचन । तत्सर्वं तव विश्रब्धं कुरु प्रणयमीश्वर ! ינזיניווינוניופוני • מיונזלומונוניטין ון גו מייפיירון ג'יני וי animmmmmmmmmm छपनवा अध्याय ॥५६fi वृहदश्व करने है-दे राजा युधिष्टिर नट के बनन चुकी। आर मित्र की तरह मय ग्रहण करके जो मुनका दमयन्ती ने श्रद्धा मे टन देवनाओं को प्रगान वय ममों मोकामेरा निकट प्रेम आरही किया। फिर वह हमकर कहने लगी-टे नहागन ! पर ई। नरेगा ! जब मे हम के मुख में आरक में अपने मरीर और मय धन को आरके अनिका ! वृत्तान्न मुना है तब मे आरके न्यि में अनेक प्रकार ...'reserrrrrreneToRELATErrorrectrrrrrrrr.cree वनपर्व १६९८ महा भा र त 3m.nidhiriim indiminarumauninthamshiriinidharaahirmJDIATTERIATRINidana - mer Meri TRUMNDTeam interest - । हंसानां वचनं यत्तु तन्मां दहति पार्थिव ! त्वत्कृते हि मया वीर ! राजानः संनिपातिताः ॥ ३ ॥ यदि त्वं भजमानां मां प्रत्याख्यास्यसि मानद!। विषमग्निं जलं रज्जुमास्थास्ये तब कारणात् ॥ ४ ॥ एवमुक्तस्तु वैदा नलस्तां प्रत्युवाच ह तिष्टत्सु लोकपालेषु कथं मानुपमिच्छसि येपामहं लोककृतामीश्वराणां महात्मनाम् न पादरजमा तुल्यो मनस्ते तेषु वर्तताम् ॥ ६ ॥ विप्रिय ह्याचरन्मयों देवानां मृत्युमृच्छति त्राहि मामनवद्याङ्गि ! बरयख सुरोत्तमान् विरजांसि च वासांसि दिव्याश्चित्राः स्त्रजस्तथा । भूषणानि तु मुख्यानि देवान्प्राप्य तु भुव वै ॥ ८ ॥ य इमां पृथिवीं कृत्स्नां संक्षिप्य असते पुनः । हुताशमीशं देवानां का तं न वरयेत्पतिम् यस्य दण्डभयात्सर्वे भूतग्रामाः समागताः धर्ममेवाऽनुरुध्यन्ति का तं न वरयेत्पतिम् धर्मात्मानं महात्मानं देत्यदानवमर्दनम् के कष्ट मह रही है। आपको पाने के लिये ही म्वयम्वर ! उन्हीं में से किमी एक को अपना हृदय अर्पण करो। की यादो रही है। है नरथेष्ठ! में आपका मन क्योंकि जो मनुष्य देवताओं का अप्रिय करता है टीमन अपना पनि बना चुकी है। अब यदि आप मुझ उमकी मृत्यु होती है । इससे तुम देवताओं में से शिमुम्म कर देंगे तो मैं आपके विरह मे अमि में किमी एक कोम्बीमार करके मेरी रक्षा करो। देवताओं 'नरकर, पानी में दबकर, विष बार या फांमी के माथ निर्भर बन्न दिव्य और विचित्र फूल माला गावर अपने माणदगी ॥१३॥ तथा अच्छे-अच्छ भाभूषण धारण करके आनन्द यह सुनकर नर ने कहा-हे दमयन्ती ! देवना गुममे विवाद कामा गाईने हैं। तुम सब पारों की भलापमा कौन होगा जो अपि से देवता को पर क्यों एक साधारण मनुष्य की चाह रही अपना पति न बनाना चाहे जो दम पृती के सम्पूर्ण ना दन भर भीगकरनेवाले देवनानी पदायों को भक्षण करते और जिम यमराज के गीत ममान भी दी है। हमारय तुम दण्ट के गय से मर प्राणी धर्म ही करने का - । करो ||५३८॥ ArrrrrrrrrrrrUCTIrt 'CEREM PROPERIALI Mutner महा मारत । nam.hotsituatindi Crai lihenationalitlantali.imiliatri.cl.inanimilannintentiahinians अध्याय ५६] १६९९ MOTIHARImrammarLamaramaiamamrphamimix nomina.raatmamera महेन्द्रं सर्वदेवानां का तं न वरयेत्पतिम् ॥ ११ ॥ क्रियतामविशङ्केन मनसा यदि मन्यसे वरुणं लोकपालानां सुहृद्वाक्यमिदं शृणु ॥ १२ ॥ नेपधेनेवमुक्ता सा दमयन्ती बचोऽब्रवीत् ममाप्लुताभ्यां नेत्राभ्यां शोकजेनाऽथ वारिणा ॥ १३ ॥ देवेभ्योऽहं नमस्कृत्य सर्वेभ्यः पृथिवीपते ! बृणे त्वामेव भर्तारं सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥ ११ ॥ तामुवाच ततो राजा वेपमानां कृताञ्जलिम् । दोत्सेनाऽऽगत्य कल्याणि! तथा भद्रे! विधीयताम् ॥ १५॥ कथं ह्यहं प्रनिश्रुत्य देवतानां विशेषतः परार्थे यत्नमारभ्य कथं स्वार्थमिहोत्सहे एप धर्मो यदि स्वार्थो ममापि भविता ततः एवं स्वार्थ करिष्यामि तथा भद्रे! विधीयताम् ॥ १७ ॥ ततो बाप्पाकुलां वाचं दमयन्ती शुचिम्मिता । प्रत्याहरन्ती शनर्कर्नलं राजानमत्रवीत् ॥ १८॥ उपायोऽयं मया दृष्टो निरपायो नरेश्वर! । येन दोषो न भविता तब राजन्! कथंचन ॥ १९ ॥ कनकी नाही ! और वह कौनमीत्री समा च्याणी हे मंद मैं उस माप दूनमात्र में मार में होगी जो दैत्यों को माग्नेवाले देवताओं के गजा है। मुझको वही कृत्य करना उचित है जिसमे दृन इन्द्र की भार्या न होना चाहे! हे चारुदामिनी ! मैं का धर्म बना रहे । विगपरम देवनाओं से प्रतिज्ञा तुम्हारे ही मने के लिये कहता हू, जोपमन्द हो तो करके आया हूँ इस भवन्या में पगये काम के करने जरानि वरुण कोदी अपना पनि बनारो॥१२॥ के लिये यदा आर मैं अपना वापर नल के यों कहते ही दमयन्ती शोक मे न्याकुल मरना हूँ ॥१३॥१६॥ हो गई भार नेत्रों में आंसुओं की धाग छोड़ती हुई निमम मेग यह दन-धर्म नष्ट नगा योग-मेमर देवनाओं को नमस्कार करके पर उपाय निकाल, मोना में प्रयच्यवहारमा तुम्ही को अपना पनि चाहती हूँ। तुम मेरे हम वचन गा। मृदु मा हाप्यारी माना को मल्य जानो ! यह सुनकर नर उम कानी हुई में प्रांग माया दिया - नार! और हाथ जोड़े हुए. दमयन्नी मे कहने रगा आपका निमम धनपन मंग या पाय RET IDIOT LETrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrerint * * 12THILDImmwwmummmmmmmmNED UNITED DIRohemalneums ।
१७०० । वनपर्व म हा भारत intisthaarithilianimati.nati.baitadhimirmiumsmrmuTITAlumniaudel m.mamalin nareran.citrusarmmatalRImarantina त्वं चैव हि नरश्रेष्ठ ! देवाश्चन्द्रपुरागमाः आयान्तु सहिताः सर्वे मम यत्र स्वयंवरः ॥ २० ॥ ततोऽहं लोकपालानां संनिधौ स्वां नरेश्वर !। वरयिष्ये नरव्याघ्र ! नैवं दोपो भविष्यति एवमुक्तस्तु वैदा नलो राजा विशांपते ! । आजगाम पुनस्तत्र यत्र देवाः समागताः ॥ २२॥ तमपश्यंस्तथाऽऽयान्तं लोकपाला महेश्वराः दृष्ट्वा चैनं ततोऽपृच्छन्वृत्तान्तं सर्वमेव तम् ॥ २३ ।। कच्चिद् दृष्टा त्वया राजन् ! दमयन्ती शुचिस्मिता। किमब्रवीच्च नः सर्वान्वद भूमिपते ! अनघ! ॥ २४ ॥ नल उबान-भवद्भिरहमादिष्टो दमयन्त्या निवेशनम् प्रविष्टः सुमहाकक्षं दण्डिभिः स्थविरैर्वृतम् ॥ २५ ॥ प्रविशन्तं च मां तत्र न कश्चिद् दृष्टवान्नरः ऋते तां पार्थिवसुतां भवतामेव तेजसा ॥ २६ ॥ सख्यश्चाऽस्या मया दृष्टास्ताभिश्चाऽप्युपलक्षितः विस्मिताचाऽभवन्सर्वा दृष्ट्वा मां विवुधेश्वराः ! ॥ २७ ॥ वर्यमानेषु च मया भवत्सु रुचिरानना कालिया । आप इन्द्र आदिराकरा के माथ मेरे नल ने कहा मैं आपकी आज्ञा के अनुसार दमयन्ती म्वयम्वर की मभा में आइएगा । मैं उन देवनाओं के भवन में जिमकी कक्षा अर्थात् भवन में घुसने का के. मागन ही आपके गल में जयमालय टारकर आपकी हार यड़ा भारी था और बहुत से वृद्ध द्वारपाल हाथों अपना पनि यनाउंगी। पमा दाने में आपको किसी में सही लिय हुए. पहा दे रहे थे बिना किमी माका दोष नगेगा ॥१७॥२१॥ गेवटी घुमा हुआ चरा गया । आप लोगों के तेज दराजन् ! गजा नन्दमयानी क ग यान के प्रभाव मे राजपुत्री दमयन्ती के सिवाय और किमी गुनार पार्टी के पामगर गये । शवणारी में मुझे भीतर जात नहीं देखा ॥२२॥२६॥ में आया दमार सब पृतान्न पान हुए जय में दगयन्ती के पास पहुंचा तर गैन उसकी निप: नुमने क्य! २॥ गुन्दर मुमतान गनिया दम्या । ये भी मुग्ने दम्पर बड़ा आश्चर्य दार्गदमयनाको दमाद मन हमार्ग बात कष्ट देवनानी! मैं आपका संदा माहा, गोगा। पर सुनवाजा एमयानाम पद दिया। नथ उग गुन्दरी ने पद Forum...and.lanata Timlaimernamainaliti.irani.ta.anti.com.actsLax. । - Internatimstiyantertainment अध्याय ५७] म हा मा र त १७०१ मारurmnimadimanavsarmmmmmmminainamaAIDTH ErrentreTomdehaythemusicmMIRCURevutomorren मामेव गतसंकल्पा वृणीते सा सुरोत्तमा! ॥ २८ ॥ अब्रवीच्चेव मां वाला आयान्तु सहिताः सुराः । त्वया सह नरव्याघ्र ! मम यत्र स्वयंवरः ॥ २९॥ तेषामहं संनिधो त्वां वरयिष्यामि नेपध ! एवं तब महावाहो ! दोपो न भवितेति ह ॥ ३०॥ एतावदेव विवुधा यथावृत्तमुपाहृतम् मया, शेपे प्रमाणं तु भवन्तस्त्रिदशेश्वराः ॥ ३१ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि नलोपास्यानपर्वणि नलदीत्ये पट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५६ ॥ सङ्कला के साथ मुझे ही आना पति स्वीकार करके | कोई दोष न लगेगा । सो हे स्वर्गवासी देवताओ ! कहा- है नरश्रेष्ठ ! वे देवता आपके माथ स्वयम्बर के दमयन्ती ने मुझमे जो कहा था सो सब मैने आपके समामण्डप में उपस्थित होंगे; तब मैं उनके आगे ही सामने कह दिया है । अब आप जो उचित समझें आपके गले में जयमाला डाल दूंगी। तब फिर आपको वही करें ॥२॥३१॥ वनपर्व का छपनवां अध्याय ममाप्त हुआ ॥५६॥ org अथ मप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५७ ॥ बृहदश्व उवाच-अथ काले शुभे प्राप्ते तिथौ पुण्ये क्षणे तथा । आजुहाव महीपालान्भीमो राजा स्वयंवरे तच्छ्रुत्वा पृथिवीपालाः सर्वे हृच्छयपीडिताः । त्वरिताः समुपाजग्मुदमयन्तीमभीप्सवः कनकस्तम्भरुचिरं तोरणेन विराजितम् विविशुस्ते नृपा रहू महासिंहा इवाऽचलम् ॥ ३ ॥ तत्राऽऽसनेषु विविधेप्यासीनाः पृथिवीक्षितः । सुरभिस्रग्धराः सर्वे प्रभृष्टमणिकुण्डलाः मत्तावनां अध्याय ॥ ५७ ॥ वृहदश्व ने कहा-हे राजा युधिष्ठिर ! इसके पीछे ' और दमयन्ती पर मोहित होने के कारण से मुन्दर जय म्ययम्बर के होने का नियन काल और गुममुहुर्स ' गन्धमाला और कुण्डल धारण किये हुए उम राममि आया तब राजा भीम ने मय राजाओं को स्वयम्बर में निममें मुवर्ण के बम्भे लगे हुए थे आये और युयाया। वे गंजा संग काम मे पाटिन नाना प्रकार के विचित्र आसनों पर बैठ गये || FaucrilanmarringromaraHAmaruuumaamaruninamurmultitasalalithaaraldaniml............hant । २ - 12.00000 PEOPATrurrenchul.rrairmirrrrranArI । वनपर्व १७०० म हा भारत and ahu TOmmami.nitinuii.muanianimrishmasummarathi | "LIVOLUIDDLUID.11121LULAR ILLUDE ILL.T.In ता राजसमितिं पुण्यां नागैर्भोगवतीमिव सपूर्णां पुरुषव्याघेानिरिगुहामिव देवगन्धर्वपतयो ददृशुर्विस्मयान्विताः पौरजानपदाश्चैव ये तत्राऽऽसन्समाहिता तत्र स्म पीना दृश्यन्ते वाहवः परिघोपमाः । आकारवर्णसुश्लक्ष्णा पञ्चशीर्षा इबोरगा सुफेशान्तानि चारूणि सुनासाक्षिभ्रुवाणि च । मुखानि राज्ञां शोभन्ते नक्षत्राणि यथा दिवि ॥ ८ ॥ दमयन्ती ततो रङ्ग प्रविवेश शुभानना मुष्णन्ती प्रभया राक्षां चक्षुपि च मनांसि च ॥ ९ ॥ तस्या गात्रेषु पतिता तेषां दृपिमहात्मनाम् । तत्र तत्रैन सक्ताऽभून्न चचाल च पश्यताम् ॥ १० ॥ तत संकीर्त्यमानेपु गज्ञां नामसु भारत । ददर्श भैमी पुरुपान्पश्च तुल्याकृतीनिह तान्समीक्ष्य ततः सर्वान्निशिपाकृतीस्थितान् । मंदेहादथ वैदर्भी नाऽभ्यजानान्नलं नृपम् १२ ॥ य यं हि ददृशे तेषां त तं मेने नल नृपम् पवित्र भोगवनी नगर्ग नस नागमण्टनीम परिपूर्ण दमय ती की ओर देखने लगे । दमय ती के जिस टी. पर्वन की दग(गुफा) अमे सिंदा मेमोमिन अग पर जिमकी दृष्टि पड़ी यह वहीं पर जम गई । ६ धमेही वह राजममा अमाय नस्पतियों से परि अब टागजाओं के नाम का कीर्तन होना प्रारम्भ भूगोगई। राजपुष्पा र बन्न एम पुष्ट बाहुपान हुआनिय दमय तीने दखा मभा में नल के समान मिस्वान नागार ममान ना पहने थे। न मनोहर पसले पाा पुरुष बेटे हैं ॥५॥१०॥ विका, मार, भाग्य और मारे मु दर दमयन्ती के लिये विशेष रूप से देखकर भी। भी गमाओं कचरे, पानपत्रा की नगे म अमरी नर को पहचान रंगा करिन हो नाह, मदागने या हमर पारा गुहावट गुम गया। निगी और यह दृष्टि डारनी भी यही उसे पाय, नाकानि आयएए जा गर 17 पहना था I मरदगय नी बाहुन नितिन । मानय पी आपिन माना हुई वा मानना कि इन कान तो दयना। या मगजमार साथ और 17 जा नर । दमयन वृद्ध पुरषों में TANTRASIDOT WINNR SUTRastamini Haas.33ULL र . + + है . HI11.4" . .....HTTLICILI अध्याय ५७] म हा मारत १७०३ mannmamSOLITIMIRDairan.mmATTImmmuTIOmannmarALAM ARUTIVATERImmmmmuTRADITATUITED TO NIDHIMDIVPULAT सा चिन्तयन्ती बुद्धयाऽथ तर्कयामास भाविनी ॥ १३ ॥ कथं हि देवाञ्जानीयां कथं विद्यां नलं नृपम् । एवं संचिन्तयन्ती सा वैदर्भी भृशदुःखिता ॥ १४ ॥ श्रुतानि देवलिङ्गानि तर्कयामास भारत! । देवानां यानि लिङ्गानि स्थविरेभ्यः श्रुतानि मे ॥ १५ ॥ तानीह तिष्ठतां भूमावेकस्याऽपि न लक्षये । सा विनिश्चित्य वहुधा विचार्य च पुनः पुनः ॥ १६ ॥ शरणं प्रति देवानां प्राप्तकालममन्यत वाचा च मनसा चैव नमस्कारं प्रयुज्य सा ॥ १७ ॥ देवेभ्यः प्राञ्जलिर्भूत्वा वेपमानेदमब्रवीत् हंसानां वचनं श्रुत्वा यथा मे नेपधो वृनः पतित्वे तेन सत्येन देवास्तं प्रदिशन्तु मे ॥ १८ ॥ मनसा वचसा चैव यथा नाऽभिचराम्यहम् तेन सत्येन विवुधास्तमेव प्रदिशन्तु मे यथा देवैः स मे भर्ता विहितो निपधाधिपः तेन सत्येन मे देवास्तमेव प्रदिशन्तु मे ॥ २० ॥ यथेदं व्रतमारब्धं नलस्याऽऽराधने मया तेन सत्येन मे देवास्तमव प्रदिशन्तु मे ॥ २१ ॥ स्वं चेव रूपं कुर्वन्तु लोकपाला महेश्वराः देवताओं के जो रक्षण मुने थे उनसे भी वह कुछ नहीं चाहती टमी प्रकार मे तुम मुझको राजा नल निश्चय नहीं कर सकी । अन्त को अनेक प्रकार के को बतलाओ। हे देवताओ ! मैंने यह सत्य संकल्प उपायों द्वाग कुछ भी निश्चय न कर पाने पर वह और वन राजा नल के ही पाने को क्यिा है आप देवताओं के शरणागत हुई । मन और वाणी मे रोग भी अपनी ओर से मुझे नल ही को पति दीजिए देवताओं को प्रणाम करके कापती हुई दमयन्ती ने और अपने स्वरूप को यथावत् करके ऐमा कीजिप कहा-हे देवताओ! जिम प्रकार मैंने अपने सच्चे मन जिमसे मैं टम पुप्यश्लोक राजा नर को जान म मेहंसों की बात सुनकर राजा नल को अपना पति वरा ॥११॥२०॥ है और अवनक किमी दूसरे मनुप्य को पनि करना दमयन्ती के उम रुगा विगप को सुनकर QUUM LOUILLWWLLOW'W''@'l.lalu Witty♡SLED'IVTTLTO'' 16'unity!!** - Homy ''u'auty" pour CTRCT' O'Let'IT CATu crercrorel'Il t'r'1'?'T १७०० महाभारत । वनपर्व सla alutarNIT11min1rrritribufiuni.linalne .mauahuaalananaunny । ॥ ७ ॥ ma 11 TIMIn HimumrTITHI Hula. नां राजसमिति पुण्यां नागैर्भोगवतीमिव सपूर्णा पुरुषव्याघैया धैर्गिरिगुहामिव देवगन्धर्वपतयो ददृशुविस्मयान्विताः पौरजानपदाचैव ये तत्राऽऽसन्समाहिता तत्र स्म पीना दृश्यन्ते वाहव परिघोपमाः । आकारवर्णसुश्लक्ष्णा पञ्चशीर्पा इवोरगा सुकेशान्तानि चारूणि सुनासाक्षिभ्रुवाणि च । मुखानि राज्ञां शोभन्ते नक्षत्राणि यथा दिवि ॥ ८ ॥ दमयन्ती ततो रङ्ग प्रविवेश शुभानना मुष्णन्ती प्रभया राज्ञां चक्षुपि च मनांसि च ॥ ९ ॥ तस्या गात्रेषु पतिता तेषां दृप्रिमहात्मनाम् । तत्र तत्रैव सक्ताऽभून्न चचाल च पश्यताम् ॥ १० ॥ तत संकीर्त्यमानेषु राज्ञां नामसु भारत । ददर्श भैमी पुरुषान्पश्च तुल्याकृतीनिह नान्समीक्ष्य ततः सर्वान्निशेषाकृतान्स्थितान् । मदहादथ वैदर्भी नाऽभ्यजानान्नलं नृपम् य य हि दहशे नेपां न त मेने नल नृपम् अध्याय ५७] महा मारत १७०३ GMAImornruarriorinasalunguम्पEELunarai - - Anamnnar.annualitatinensitinnitiatifiediurrint Hindi.ali.dulhaniaanifalnimlaimming सा चिन्तयन्ती बुद्धयाऽथ तर्कयामास भाविनी ॥ १३ ॥ कथं हि देवाजानीयां कथं विद्यां नलं नृपम् । एवं संचिन्तयन्ती सा वैदर्भी भृशदुः खिता ॥ ११ ॥ श्रुतानि देवलिङ्गानि तर्कयामास भारत! । देवानां यानि लिङ्गानि स्थविरेभ्यः श्रुतानि मे ॥ १५ ॥ तानीह तिष्ठतां भूमावेकस्याऽपि न लक्षये । सा विनिश्चित्य बहुधा विचार्य च पुनः पुनः ॥ १६ ॥ शरणं प्रति देवानां प्राप्तकालममन्यत वाचा च मनसा चेव नमस्कारं प्रयुज्य सा देवेभ्यः प्राञ्जलिर्भूत्वा वेपमानेदमब्रवीत् हंसानां वचनं श्रुत्वा यथा मे नेपधो वृनः पतिले तेन सत्येन देवास्तं प्रदिशन्तु मे ॥ १८ ॥ मनसा वचसा चव यथा नाऽभिचराम्यहम् तेन सत्येन विबुधास्तमेव प्रदिशन्तु मे । १९ ॥ यथा देवः स मे भर्ता विहितो निपधाधिपः तेन सत्येन मे देवास्तमेव प्रदिशन्तु मे ॥ २० ॥ यदं व्रतमारब्धं नलस्याऽऽराधने मया तेन सत्येन मे देवास्तमव प्रदिशन्तु मे ॥ २१ ॥ स्वं चत्र रूपं कुर्वन्तु लोकपाला महेश्वगः देवताओं के जो रक्षण मने थे उनमे भी वह कुछ नहीं चाहती उमी प्रकार में तुम मुझको राजा नल निधय नहीं कर सकी । अन्त को अनेक प्रकार के को बताओ । हे देवताओ ! मैंने यह सत्य मंकन उपायों द्वाग कुछ भी निश्चय न कर पाने पर वह और बन गजा नल के ही पाने को दिया है आप देवनाओं के शरणागत हुँ । मन और वाणी में रोग भी अपनी ओर से मुझे नर ही को पनि दीजिए देवनाओं को प्रणाम करके कारनी हुई दमयन्नी ने और आने म्बा को यथावन् करके ऐमा कीजिए कहा-हे देवनाओ!जिम प्रकार मैंने अपने म मन जिसम में टम पुप्योक गजानन की जान म मेहंमों की बात सुनकर गजा नल को अपना पति वरा ॥११॥२०॥ है और अबतक किमी दृमरे मनुन्य को पनि करना दमयन्नी के टम करना बिगर को सुनकर 117"titni .innitionarmireonimillastlificannicatmannmariminindmarwinsonorarinews .. - HEATURAwin rurture:ECERTIMECEBITTTreurrencrerrit म हा भा र त [ वनपर्व १७०४ MARAur UTTAmmmmmmmmmit furniamlilamhinath.airtuRTILIT rrorn. Limirza.....animaamaramatiPrituritiuthindainainam imunical यथाऽहमभिजानीयां पुण्यश्लोकं नराधिपम् ॥ २२ ॥ निशम्य दमयन्त्यास्तकरुणं प्रतिदेवितम् निश्चयं परमं तथ्यमनुरागं च नैषधे ॥ २३ ॥ मनोविशुद्धिं बुद्धिं च भक्तिं रागं च नैपधे यथोक्तं चक्रिरे देवाः सामर्थ्य लिङ्गधारणे ॥ २४ ॥ साऽपश्यद्विवुधान्सर्वानस्वेदान्स्तव्धलोचनान् । हृपितस्रग्रजोहीनान्स्थितानस्पृशतः क्षितिम् ॥ २५ ॥ छायाद्वितीयो म्लानस्रग्रजःस्वेदसमन्वितः भूमिष्टो नैपधश्चैव निमेषेण च सूचितः ॥ २६॥ सा समीक्ष्य तु तान्देवान्पुण्यश्लोकं च भारत!। नैपधं वरयामास भैमी धर्मेण पाण्डव ! ॥ २७ ॥ विलजमाना वस्त्रान्तं जग्राहाऽऽयतलोचना स्कन्धदेशेऽमृजत्तस्य स्त्रजं परमशोभनाम् ॥ २८ ।। वरयामास चनं पतित्वे वरवर्णिनी नतो हाहेति सहसा मुक्तः शब्दो नराधिपैः ॥ २९ ॥ देवेमहर्षिभिस्तत्र साधु साध्विति भारत ! विभिनेरीरितः शब्दः प्रशंसद्भिर्नलं नृपम् ॥ ३० ॥ दमयन्ती तु कोरव्य ! वीरसेनसुतो नृपः और सपने म अनुममा जोगन के मन की शुद्धता अपने शरीर की छाया रखते हैं, माला मी नेली और मनि का दार देवताओं ने आना बा , पर्माना मस्तक पर आ रहा है, जहां तहां रज पड़ी जमा पहावामा कर लिया जा हि दमयन्ती न हुई है, और श्वी पर बैठप है। ये निह देखकर वनामा प्रार्थना है। था। 21 समय दमयन्ती दमयन्ती एक क्षणमर में राजा नल को देवताओं से दम याटिममानों पुरषों में जो दवाई अदना जान गई और उगने उनको अपना पति गईगाना परपमीना नदी, आंगनब्ध मान मकम्य कारके मजा-मदिन उनका यस कह लिया मान, गुन्दर मारा पहनेए है, मगर और मारे गंर में गुन्दर गाग पाना दी। यह ५५ का नाम नही मार मा में टेप की दम्पवर आरमय आय दुगना रोग दादावार करने दीमापार प्रगान गावना महर्षि धन्यवाद देने हुए राजा an>htrinay" "tripa - - । . हा... INDRENIETRIPALI.PEntmat very - marurtamamimarDITIAnurirmananummintifilinian.animal.diliGanmanmunalist, mins अध्याय ५७] महा मारत १७०५ amiariornmoanuarunmarwrimmHTTOmmmmITIOHATruhuruaruanrizurumaunuca Crimum आश्वासयद्वरारोहां प्रहृष्टेनाऽन्तरात्मना ॥ ३१ ॥ यत्वं भजसि कल्याणि ! पुमांसं देवसंनिधौ । नस्मान्मां विद्धि भर्तारमेतत्ते वचने रतम् ॥ ३२ ॥ यावच्च मे धरिष्यन्ति प्राणा देहे शुचिस्मिते! । तावत्वयि भविष्यामि सत्यमेतद्रवीमि ते ॥ ३३ ॥ दमयन्ती तथा वाग्भिरभिनन्द्य कृताञ्जलिः । तौ परस्परतः प्रीती दृष्ट्वा त्वग्निपुरोगमान् ॥ ३४ ॥ तानेव शरणं देवाञ्जग्मतुर्मनसा तदा वृते तु नैपधे भैम्या लोकपाला महौजसः प्रहृष्टमनसः सर्वे नलायाऽप्टौ वरान्ददुः प्रत्यक्षदर्शनं यज्ञे गति चाऽनुत्तमां शुभाम् ॥ ३६ ॥ नेपधाय ददौ शकः प्रीयमाणः शचीपतिः अग्निरात्मभवं प्रादाद्यत्र वाञ्छति नैषधः ॥ ३७॥ लोकानात्मप्रभांश्चैव ददौ तस्मै हुताशनः यमस्त्वन्नरसं प्रादाद्धर्मे च परमां स्थितिम् ॥ ३८ ॥ अपां पतिरपां भावं यत्र वाञ्छति नेपधः स्रजश्चोत्तमगन्धाढ्याः सर्वे च मिथुनं ददुः ॥ ३९ ॥ नल की बारम्बार प्रशंसा करने लगे ॥२१॥३०॥ नल को आठ वरदान दिये ॥३१॥३५|| उस समय राजा नल अपने मन से प्रसन्न होकर । उन में से इन्द्र ने दो वरदान दिये एक तो यज दमयन्ती से कहने लगे-हे कल्याणी ! तुमने मुझे में देवताओं का प्रत्यक्ष दर्शन और दूमरा उत्तम और देवताओं के विगजमान रहने पर अपना पति म्वीकार शुभगति का मिलना । और अग्निदेव ने भी दो वर किया है इममे में भी सदैव तुम्हारे कहे के अनुसार दिये पहला यह कि तुम मुझे जहां पर स्मरण करोगे, चलँगा और जबतक मेरे गरीर में प्राण रहेंगे तबतक वहीं पर मैं उसी समय प्रकट होऊँग और तुम्हारी तुममे प्रीति रक्तूंगा। यह सुनकर दमयन्ती ने भी इच्छा के अनुकूल फल तुमको दूंगा । और यमराज हाथ जोड़कर मीठी माटी बातों से नल को प्रसन्न ; ने यह दो वर उमको दिये प्रथम अन्नरम अर्थात् जो किया । इसके उपगन्त नल और दमयन्ती, दोनों अन्न तुम बनाओगे वही परमम्बादिष्ट बनेगा और उन अपि आदि लोकपाल देवनाओं को प्रणाम करके द्वितीय धर्म में परमम्धिति अर्थात् तुम्हारी बुद्धि सदा उनके शरणागत हुए । उन देवताओं ने प्रसन्न होकर, , धर्म में रहेगी । और वरुण देवता ने भी दो ही वर ERU TOTINOINTIDITETOMIDTOT UIT Duducand Trad. 01..win.41.07.2017.ce' - - - 1071910CR NOIDALCHALArmourenTrurreneuretmm । वनपर्व 1......Charani anticiBIENNICITIA in HACTDTerminRTHDaman १७०६ म हा भारत FRIDALOEIm.nulivamanumanasannainamimanmamanar.nanama.mstinam BLIC वरानेवं प्रदायाऽस्य देवास्ते त्रिदिवं गताः पार्थिवाश्चाऽनुभूयाऽस्य विवाहं विस्मयान्विताः ॥ ४० ॥ दमयन्त्याश्च मुदिताः प्रतिजग्मुर्यथागतम् गतेपु पार्थिवेन्द्रपु भीमः प्रीतो महामनाः ॥ ४१ ॥ विवाहं कारयामास दमयन्त्या नलस्य च उप्य तत्र यथाकामं नैषधो द्विपदां वरः भीमेन समनुज्ञातो जगाम नगरं स्वकम् अवाप्य नारीरत्नं तु पुण्यश्लोकोऽपि पार्थिवः ॥ ४३ ॥ रेमे सह तया राजञ्च्छच्येव वलवृत्रहा अतीव मुदितो राजा भ्राजमानोंऽशुमानिव ॥ ४४ ॥ अरञ्जयत्प्रजा वीरो धर्मेण परिपालयन् ईजे चाऽप्यश्वमेधेन ययातिरिव नाहुपः ॥ ४५ ॥ अन्यैश्च बहुभिर्धीमान्क्रतुभिश्चाऽऽप्तदक्षिणैः । पुनश्च रमणीयेषु बनेपूपवनेषु च । दमयन्त्या सह नलो विजहाराऽमरोपमः जनयामास च ततो दमयन्त्यां महामनाः इन्द्रसेनं सुतं चापि इन्द्रसेनां च कन्यकाम् ॥ १७॥ एवं स यजमानश्च विहरंश्च नराधिपः ररक्ष वसुसंपूर्णा वसुधां वसुधाधिपः इति धीमन्महामाग्न आरण्यकपर्याग नलोपार यानपर्वणि दमयन्नास्वयंयरे मतपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५४॥ दिय पकना दिस्य मागदी कि जो सदा नई पनी नल के साथ दमयन्ती का विवाह कर दिया। वे हे और दमा! यह वा दिया कि गुग मुझे जहां दुरा दिनों तक वह और फिर भीम से आ युगभाग यह में मी समय पहुँचगा। इस प्रकार पाकर अपने देश को चले गये । इन्द्र जसे इन्द्राणी मक पागे शाल नस को दो-दो बादान देकर । के माय विदार मरने हुए समय बिताते हैं, बसे ही अग्न-मग रंगों की परे गये । और जानी राजा महागा नल मा उम श्री रन दमयन्ती के साथ माया में आये थे व मय प्रमसनापूर्वक दिन-राने मुम्न गागने रंगे । सूर्य के समान प्रतापी भानी-अपनी गजधानियों को परे गये ॥३६॥१०॥ गशा नल गजधर्म के अनुमार अपनी प्रजा पा पारन मरे पर आंग भीम ने विधिपूर्वक पाने गोमय समय पर बहुत सी दक्षिणा देकर ANTIGTETARIAGRADNAWATINANONONTOORRANO । 10. arthrirumentarentinuTEIRINruM अध्याय ५८] म हा मारत १७०७ imanmmmmmmmmmmmmmmmwaranmummmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmitaliATM उन्होंने अश्वमेघ और अन्य अनेक महायज्ञ किये । उत्पन्न हुई। हे राजा युधिष्ठिर ! उस नल राजा ने इस इसके पश्चात् नल ने दमयन्ती के साथ अनेक रमणीक प्रकार से विहार और अनेक प्रकार के यज्ञ किये और वन और उपवनों में विहार किया और उसके इन्द्रसेन | अपने राज्य की पृथ्वी की रक्षा की ॥४१॥४८॥ नाम का एक पुत्र और इन्द्रसेना नाम की एक कन्या वनपर्व का सत्तावनवां अध्याय समाप्त हुआ ।। ५७ ॥ ARTOMADITORIEma reaminatinromnainamusilifinandanasamiti andlilianiauruliamamuraru अथ अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५८ ।। वृहदश्व उवाच-वृते तु नैपधे भैम्या लोकपाला महौजसः । यान्तो ददृशुरायान्तं द्वापरं कलिना सह ॥ १ ॥ अथाऽब्रवीत्कलिं शक्रः संप्रेक्ष्य बलवृत्रहा द्वापरेण सहायेन कले! ब्रूहि व यास्यसि ॥ २ ॥ नतोऽब्रवीत्कलिः शक्रं दमयन्त्याः स्वयंवरम् । गत्वा हि वरयिष्ये तां मनो हि मम तां गतम् ॥ ३ ॥ तमब्रवीत्प्रहस्येन्द्रो निवृत्तः स स्वयंवरः वृतस्तया नलो राजा पतिरस्मत्समीपतः एवमुक्तस्तु शक्रेण कलिः कोपसमन्वितः देवानामन्य तान्सर्वानुवाचेदं वचस्तदा देवानां मानुपं मध्ये यत्सा पतिमविन्दत तत्र तस्या भवेन्न्याय्यं विपुलं दण्डधारणम् ॥ ६ ॥ अट्टावनवां अध्याय ॥५८।। वृहदश्व ने कहा-है राजा युधिमिर जिस समय कहा-हे कलियुग! वह स्वयम्वर तो समाप्त हो गया। इन्द्र आदि लोकपाल दमयन्ती के स्वयम्बर होने पर राजकुमारी ने हम लोगों के सामने ही नल को अपना अपने-अपने लोकों को जा रहे थे उस समय उन्होंने पति बना लिया है ॥१४॥ दूसरी ओर से करियुग और द्वापर को आते हुए यह सुनकर कलियुग को क्रोध चढ़ आया। देम्वा । उसको देख कर इन्द्र पूछने लगे-हे कलियुग ! ' उसने कहा-हे देवताओ! दमयन्ती ने जैसे देवताओं तुम अपने सारथी द्वापर को लिये हुए कहां जा रहे का अपमान करके एक साधारण मनुप्य को अपना हो ! कलियुग ने कहा-हे देवराज! मेरा मन दमयन्ती पति बनाया है वैसे ही उसे इस काम का उचित पर मोदित हो रहा है मैं उसे वरने के लिये उसके दण्ड देना चाहिये । देवताओं ने कहा-इस बारे में म्वयम्बर में जा रहा हूँ। यह सुनकर इन्द्र ने हंसकर | दमयन्ती का कुछ भी अपराध नहीं है क्योंकि हम - Umaratmarnamannaam TAUnmartAnamnarauli c9001400mmrouTYAMDATEMEDITATrurotrrrrayer | वनपर्व ....handanamain minuTPAPNA manasanga IITE mama म हा भारत MInternmmmmmmunommammmmmmmmmmmmuTHATrom amonomina.mmmmitment एवमुक्ते तु कलिना प्रत्यूचुस्ते दिवौकसः । अस्माभिः समनुज्ञाते दमयन्त्या नलो वृतः ॥ ७ ॥ का च सर्वगुणोपेतं नाऽऽश्रयेत नलं नृपम् । यो वेद धर्मानखिलान्यथावच्चरितव्रतः योऽधीते चतुरो वेदान्सर्वानाख्यानपश्चमान् । नित्यं तृप्ता गृहे यस्य देवा यज्ञेपु धर्मतः अहिंसानिरतो यश्च सत्यवादी दृढव्रतः यस्मिन्दाक्ष्यं धृत्तिानं तपः शौचं दमः शमः ॥ १० ॥ ध्रुवाणि पुरुषव्याने लोकपालसमे नृपे एवंरूपं नलं यो वै कामयेच्छपितुं कले ! ॥ ११ ॥ आत्मानं स शपेन्मूढो हन्यादात्मानमात्मना । एवंगुणं नलं यो वै कामयेच्छपितुं कले! ॥ १२ ॥ कृच्छ्रे स नरके मजेदगाधे विपुले हृदे एवमुक्त्वा कलिं देवा द्वापरं च दिवं ययुः ॥ १३ ॥ ततो गतेपु देवेषु कलि परमब्रवीत् संहर्तुं नोत्सहे कोपं नले वत्स्यामि द्वापर ! ॥ १४ ॥ भ्रंशयिष्यामि तं राज्यान्न भैम्या सह रंस्यते । त्वमप्यक्षान्समाविश्य साहाय्यं कर्तुमर्हसि पनि भीम महामारने आरण्यकपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि कलिदेवमयाद अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५८ ॥ रोगों की आशा महो उसने नल का वापिसी हैं कि जिनमें विश करने से भी बाधा नहीं लग कोनमी होगी जी नर. एम पुरुष को अपना पति मरती है ॥५॥१०॥ नयनाना नदि क्योंकि राजा नल मय गुणों से युक्तः मे धर्मात्मा राजा को जो कोई शाप देने की मी, यद६, धमों को जाननेवारा और नाग वदी इच्छा करेगा यह मूर्य अपने आपको शाप देगा और या परवान उसके घर में धर्म और यश ने अपनहायों अपनी मृत्यु करेगा। ऐसे पुरुष को भन्त र भारत में मंद ना रहने है। और यह आप भी ' ममय नरक में जाना पड़ता। यह कहकर ये देवता आगरकसम्यवादी और ममता और निशान, म्या को चले गये । टनके चले जाने पर कलियुग १,पदम अर्थात इन्द्रियों गंगा और द्वापर में कहा-हेद्वापर किमी तरह इस दारुता भनमा नआदिगु विधमान् । बाप के वेग को नहीं रोकमानाचिदि निम तार meanemurraniremiummunrirBEITHERAPrireenterta prominentures rem MINITS Termirmir owesouTELEVE - । अध्याय ५९] म हा मारत १७०९ iamrn rommmmmunarmammm.imurrammmmmmummmomsamummonuraamanamam हो, मैं नल के शरीर में प्रवेश करके उसे राज्य से | न कर सकेगा। तुम्हें पासों में प्रवेश करके इस कार्य प्रष्ट कर दूंगा और वह दमयन्ती के साथ आनन्द में मेरी सहायता करनी होगी ॥११॥१४॥ वनपर्व का अट्टावनवां अध्याय समाप्त हुआ ।। ५८ ॥ ar अथ एकोनपष्टितमोऽध्यायः ॥ ५९॥ बृहदश्व उवाच-एवं स समयं कृत्वा द्वापरेण कलिः सह आजगाम ततस्तत्र यत्र राजा स नैपधः ॥ १ ॥ स नित्यमन्तरप्रेप्सुनिषधेष्ववसच्चिरम् अथाऽस्य द्वादशे वर्षे ददर्श कलिरन्तरम् ॥ २ ॥ कृत्वा मूत्रमुपस्पृश्य सन्ध्यामन्वास्त नैषधः । अकृत्वा पादयोः शौचं तत्रैनं कलिराविशत् ॥ ३ ॥ स समाविश्य च नलं समीपं पुष्करस्य च गत्वा पुष्करमाहेदमेहि दीव्य नलेन वै अक्षयूते नलं जेता भवान्हि सहितो मया । निषधान्प्रतिपद्यस्व जित्वा राज्यं नलं नृपम् ॥ ५ ॥ एवमुक्तस्तु कलिना पुष्करो नलमभ्ययात् । कलिश्चैव वृपो भूत्वा गवां पुष्करमभ्ययात् ॥ ६ ॥ आसाद्य तु नलं वीरं पुष्करः परवीरहा दीव्यावेत्यब्रवीभ्राता वृषेणेति मुहुर्मुहुः उनसठयां अध्याय 11५९॥ वृहदश्व ने कहा-हे युधिष्ठिर ! कलियुग द्वापर पांसे खेलने के लिये [तरह-तरह के लोभ दिखाकर] से ऐसा कहकर राजा नल के यहां गया और नल उसने पुष्कर से कहा-चलो, तुम मेरे प्रभाव से नल के शरीर में प्रवेश करने का अन्तर अर्थात् मौका । को जीत लोगे; उसके सब ऐश्वर्य और राजपद को देखने लगा । जब बारह वर्ष व्यतीत हो गये तब प्राप्त करके निषद देश के निप्कण्टक राजा बन एक दिन राजा नल ने लघुशका करके आचमन तो जाओगे ||५|| कर लिया परन्तु पांव चिना धोये सन्ध्या करने को यह सुनकर पुटकर अपने भाई राजा नल के बैठ गया उस समय कलियुग ने यह अन्तर पाकर पास गया।इधर कलियुग भी पांमों का रूप रसकर राजा के शरीर में प्रवेश किया। फिर वह कलियुग पुष्कर के पाम आ गया। पुष्कर ने हाथ में पामे नल के भाई पुष्कर के पास गया। नल के साथ लेकर नल को बारम्बार खेलने के लिये कहा। नल U'UDIT: TU I croTTITUITUDTUUTUU''20:minuLIO 2014" MAITaurulimmamisammaamsil.mobaiminilivuniaimiannapuranam **2*4****, *2%"L'YITOUWENTO TrueTOPITITO'Y UTWORODILOLOTE chakumi Cara MUTLULUS ३ वनपर्व म हा भारत FaralaanimarimmmmmmmunTHSAnumbinidirtalliAFRILamuraininrniclinairy - ournamaa.ac.niuminimirmirmirelyinLIMIMIRECwaminimurti iranel न चक्षमे ततो राजा समाह्वानं महात्मनः वैदाः प्रेक्षमाणायाः पणकालममन्यत हिरण्यस्य सुवर्णस्य यानयुग्यस्य वाससाम् आविष्टः कलिना द्यूते जीयते स्म नलस्तदा ॥ ९ ॥ तमक्षमदसंमत्तं सुहृदां न तु कश्चन निवारणेऽभवच्छतो दीव्यमानमारिन्दमम् ॥ १० ॥ ततः पौरजनाः सर्वे मन्त्रिभिः सह भारत ! । राजानं द्रष्टुमागच्छन्निवारयितुमातुरम् ॥ ११ ॥ ततः सूत उपागम्य दमयन्त्यै न्यवेदयत् । एप पौरजनो देवि ! द्वारि तिष्ठति कार्यवान् ॥ १२ ॥ निवेद्यतां नैषधाय सर्वाः प्रकृतयः स्थिताः । अमृष्यमाणा व्यसनं राज्ञो धर्मार्थदर्शिनः ॥ १३ ॥ ततः सा बाप्पकलया वाचा दुःखेन कर्शिता । उवाच नैषधं भैमी शोकोपहतचेतना राजन् ! पौरजनो द्वारि त्वां दिक्षुरवस्थितः । मन्त्रिभिः सहितः सर्व राजभक्ति पुरस्कृतः । तं द्रष्टुमहसीत्येवं पुनः पुनरभायत का म्यभार सहने का न था । वह जुआ खेलने को ! लिये उनके पास आये। उनको आया हुआ देखकर प्रसन्न हो गया। अब शर्त लगाकर दोनों दमयन्ती सारथि ने दमयन्ती के पास आकर कहा-हे देवी! के मामन खेलने लगे। नल ने रनों के ढेर के ढेर, सब पुरवासी और मन्त्री लोग राजा के दर्शन की मुरर्ण, रथ आदि वाहन और अन्यान्य जो कुछ दांव इच्छा से बाहर खड़े हैं । आप एक बार महाराज में रपया था वह सब कलियुग के प्रभाव से पुष्कर को सूचना देकर कहिये कि उनके मनट को न सह जीन रिया। पास रहनेवाले मित्रों ने उसको, सकनेवाले, धर्म-अर्थ के ज्ञाता, पुरवासी और मन्त्री जुआ मरने की धुन में अनत सा देखकर, रोकने लोग उनके मिलने के लिये द्वार पर खड़े राह देख की मदुन नेष्टा की परन्तु वे लोग कुछ भी न कर रहे हैं। यह सुनकर दमयन्ती शोक से व्याकुल होकर म ॥२०॥ राजा नल के पास गई और आखों में आंसू भरकर भन्न को मय पुरवामी रोग मन्त्री को आगे पदने लगी-हे महाराज ! सब पुरवासी मन्त्रियों सहित दर. गजानन का दम घुरे व्यमन से यनाने के | आपकी प्रीति के कारण से आपके दर्शनों के लिये commmmmmm.in.imunistan Nandamamatameer Here Mirrwire 'purCELECIPEECLeavrrerrectantArardPermiraram अध्याय ६०] न हा मा रत १७११ emamnmonamammmmmmmmmmmmmmmmmmmarranormanmunADIOCam FUTTIPTITICTIONARAwamli तां तथा रुचिरापाङ्गीं विलपन्तीं तथाविधाम् । आविष्टः कलिना राजा नाऽभ्यभाषत किंचन ॥ १६ ॥ ततस्ते मन्त्रिणः सर्वे ते चैव पुरवासिनः । नाऽयमस्तीति दुःखार्ता वीडिता जग्मुरालयान् ॥ १७ ॥ तथा तदभवद् द्यूतं पुष्करस्य नलस्य च युधिष्ठिर ! बहून्मासात्पुण्यश्लोकस्त्वजीयत ॥ १८ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलद्यूत एकोनपष्टितमोऽध्यायः ॥ ५९ ।। आये हैं और द्वार पर खड़े हैं आप उनसे मिलि . आपने अपने पर नारे गये कि अन्य इस सब का दमयन्ती ने इस प्रकार से रो-रोकर कई बार कहा | नाश का समय आ गया है । हे युधिष्ठिर! इस प्रकार परन्तु कलियुग से आविष्ट चित्त होने के कारण से । से नल और पुष्कर का जुआ कई महीनों तक हुआ नल ने उसे कुछ उत्तर नहीं दिया । सब पुरवासी' और नल हारता ही चला गया ॥११॥१८॥ और मन्त्री दुःखी और लत्रित होकर यह कहते हुए वनपर्व का उनसठवां अध्याय समाप्त हुआ ।। ५९।। -cop- 101010TWI201301991UNDISODE अथ पष्टितमोऽध्यायः ॥ ६॥ वृहदश्व उवाच-दमयन्ती ततो दृष्ट्वा पुण्यश्लोकं नराधिपम् उन्मत्तवदनुन्मत्ता देवने गतचेतसम् भयशोकसमाविष्टा राजन् ! भीमसुता ततः । चिन्तयामास तत्कार्य सुमहत्पार्थिवं प्रति ॥ २ ॥ सा शङ्कमाना तत्पापं चिकीर्पन्ती च तत्प्रियम् । नलं च हृतसर्वस्वमुपलभ्येदमब्रवीत् वृहत्सेनामतियशां तां धात्री परिचारिकाम् । साठवां अध्याय ॥ ६॥ वृहदश्व ने कहा-हे युधिष्ठिर ! राजा भीम की । होनेवाले अनर्थ को बढ़ते देखकर अत्यन्त शक्ति पुत्री दमयन्ती ने जब देना कि राजा नल जुआ खरने हुई । तब गजा का हित करने के लिये वृहरमेना में मग्न और अचेत से हो रहे हैं तब वह शोक और नाम की दामी मे दमयन्नी ने कहा-देम वृहत्मेना! दुःख से व्याकुल हो टटी । मन में राजा की उस तू जैमी मीटा बोलनेवाली है वैमा ही तेग महाराज दशा पर विचार करने से उसकी आंखों के आगे पर अनुराग है । विशेषकर तू मभी कामों में नतुर अन्धेरा सा छा गया । दमयन्ती क्रमशः पामों मे है । इसलिये तू महाराज की आजा मे मन्त्रियों के HamidhianarmuladiTELearninilaun. ImmumorncouTurcierceb.rrcarrrrrrrr Errorruction [ वनपर्व Aurammadarliata.olaintinoil.cinalismilinusitishthani HUI ama १७१२ म हा भारत Emummer UnirmulmnmuTRImmanumaramananamthimalay हितां सर्वार्थकुशलामनुरक्तां सुभाषिताम् वृहत्सेने ! ब्रजाऽमात्यानानाय्य नलशासनात् । आचक्ष्व यद्धृतं दिव्यमवशिष्टं च यद्वसु ततस्ते मन्त्रिणः सर्वे विज्ञाय नलशासनम् । अपि नो भागधेयं स्यादित्युक्त्वा नलमात्रजन् ॥ ६ ॥ तास्तु सर्वाः प्रकृतयो द्वितीयं समुपस्थिताः । न्यवेदयद्भीमसुता न च तत्प्रत्यनन्दत वाक्यमप्रतिनन्दन्तं भर्तारमभिवीक्ष्य सा दमयन्ती पुनश्म वीडिता प्रविवेश ह निशम्य सततं चाऽक्षान्पुण्यश्लोकपराङ्मुखान् । नलं च हृतसर्वस्वं धात्रीं पुनरुवाच ह वृहत्सेने ! पुनर्गच्छ वार्ष्णेयं नलशासनात् सूतमानय कल्याणि ! महत्कार्यमुपस्थितम् ॥ १० ॥ वृहत्सेना तु सा श्रुत्वा दमयन्त्याः प्रभाषितम् । वाष्र्णेयमानयामास पुरुपैराप्तकारिभिः वाप्णेयं तु ततो भैमीसान्त्वयञ्च्छ्लक्ष्णयागिरा। उवाच देशकालज्ञा प्राप्तकालमनिन्दिता ॥ १२ ॥ पाम जाकर म पोर अनर्थ की मूनना कर दे और होकर फिर अपने भवन में चली गई। थोड़ी देर के टीम यहां ले आ। बता दे कि कितना धन बाद उसने सुना कि अपने विरुद्ध पांसे पड़ने से महाराज हा और दिनना नष्ट हो गया ||१५|| नल अपना सर्वम्ब हार गये हैं। तब दमयन्ती ने यह गुनकर बद दामी मन्त्रियों के पाम गई फिर वृहत्सेना को बुलाकर कहा- वृहत्सेना ! धीरे-धीर और दीमाग वृतान्न कर मुनाया । राजा की गर्वनाम हुआ जा रहा है। तू महाराज की आज्ञा से थामा गुरमत्रियों ने अपने को भाग्यवान समझा मारधि कोल आ। यह सुनकर म सेना ने और समदिन मगर गजद्वार पर आये। मेयकों के द्वारा नल की आज्ञा कहकर सारधि की कोहि आय हुए दनकर दमयन्ती ने फिर गमा युरा दिया । उमसे टा अनिन्दित और देशकार महम र पहा-६ महाग! पुरवामी अपदमरी के जाननयानी दमयन्ती ने मीठीयारी में गमय के १ पदे भर दना पुरागत्रिए पम्न अनुसार कहा- मा!ि महाराज सदा तुम्हारे नगुना यह दामपानीमजन माय "नमा प्यार करते हैं मा सुगम छिपा हुआ Prerantrwarrrrrrrrrrrrrrrena.PIPerentNErrrrrrrCEMPurrican EcmmmmmmmmmmmminisadakisatishcMERIALIDITaluanarasRILL ।
अध्याय ६०] - १७१३ महा मारत भारतPortmaramaARWwwmarwari mmrtmmartinutRMITLamimmi Tamam Rmmmmmunmun जानीपे वं यथा राजा सम्यग्वृत्तः सदा त्वयि । तस्य त्वं विषमस्थस्य साहाय्यं कर्तुमर्हसि ॥ १३ ।। यथा यथा हि नृपतिः पुष्करणव जीयते तथा तथाऽस्य वै छूते रागो भूयोऽभिवर्धते ॥ १४ ॥ तथा च पुष्करस्याऽक्षाः पतन्ति वशवर्तिनः । तथा विपर्ययश्चाऽपि नलस्याऽक्षेषु दृश्यते ॥ १५॥ सुहृत्स्वजनवाक्यानि यथावन्न शृणोति च ममापि च तथा वाक्यं नाऽभिनन्दति मोहितः ॥ १६ ॥ नूनं मन्ये न दोपोऽस्ति नैषधस्य महात्मनः । यत्तु मे वचनं राजा नाऽभिनन्दति मोहितः ॥ १७ ॥ शरणं त्वां प्रपन्नाऽस्मि सारथे ! कुरु मद्वचः । न हि मे शुध्यते भावः कदाचिद्विनशेदपि ।। १८ ॥ नलस्य दयितानश्वान्योजयित्वा मनोजवान् इदमारोप्य मिथुनं कुण्डिनं यातुमर्हसि ॥ १९ ॥ मम ज्ञातिषु निक्षिप्य दारको स्यन्दनं तथा अश्वांश्चमान्यथाकामं वस वाऽन्यत्र गच्छ वा ॥ २० ॥ दमयन्त्यास्तु तद्वाक्यं वार्णेयो नलसारथिः । न्यवेदयदशेपेण नलामात्यपु मुग्यशः ॥ २१ ॥ नहीं है। अब इम टलटे ममय में तुमको उनकी रहा है। मैं इस ममय तुम्हारी शरण में हूँ। तुम महायता करनी चाहिये । इम ममय गजा का यह मेरा कहा मानो में बहुत ही व्याकुल हो रही हूँ। हाल है कि ज्यों-ज्यों हारता जाता है त्या-त्या उमकी मालम नहीं, भाग्य में क्या होना लिखा है । इमलिये में चढ़ती जाती है । गजा के पामे संदव तुम अभी मन के वेग के ममान नलनेवाले घोड़ों को टरटे पहन और पुटकर मुंह मांगा दाँव पाना जाता जोनकर मेरे पुत्र और पुत्री को विदर्भ नगर में, छोड़ है ॥६॥१५॥ आओ। रथ और घोड़ों को वही रहने देना । तुम्हाग महाराज इस जुए में एमे मोहित हो गये हैं. जी चाहे, वहीं रहना; नहीं तो अन्यत्र चले जाना किन मेरी बात सुनते हैं न किमी दूसरे मुहद की। ॥१६॥२०॥ में जानना है कि इस समय दैव उनके प्रतिकून हो नल के मारधि वार्णय न दमयन्ती की आना FoamIIVITIETublivintilbidifiliuniasinitidinantristifindinahnisatirina adiunna imittariasataranatant । प्रीनि जु Smamimitation . Mmmmm.cD LIrctcourteururu.xyCErrrrrrrrrrrrrrrrrrn.
१७१४ म हा भारत [ वनपर्य na -- . immmmuidtamanian CENALI CINE ययौ मिथुनमारोप्य विदर्भास्तेन वाहिना ॥ २२ ॥ हयांस्तत्र विनिक्षिप्य सूतो रथवरं च तम् इन्द्रसेनां च तां कन्यामिन्द्रसेनं च वालकम् ॥ २३ ॥ आमन्त्र्य भीमं राजानमार्तः शोचन्नलं नृपम् । अटमानस्ततोऽयोध्यां जगाम नगरी तदा ॥ २४ ॥ ऋतुपर्णं स राजानमुपतस्थे सुदुःखितः भृति चोपययौ तस्य सारथ्येन महीपते ! ॥ २५ ॥ इतिश्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि मलोपाख्यानपर्वणि कुण्डिनंप्रतिकुमारकुमारीप्रस्थापने पष्टितमोऽध्यायः६० मान करके सब वृत्तान्त मन्त्रियों से कहा । मन्त्रियों ने । से आज्ञा लेकर, सारथि पैदल ही चल दिया। उसने विशेष रूप से विचार करके उसका अनुमोदन किया। | अयोध्या में पहुंचकर वहां के राजा ऋतुपर्ण के यहां राजपुत्र इन्द्रसेन और राजकुमारी इन्द्रसेना को लेकर सारथियों में नौकरी कर ली । वहां पर यह बड़े कष्ट वह सारथि विदर्भ नगर को गया। यहां घोड़े, रथ, से रहने लगा ॥२१॥२५॥ राजकुमार और राजकुमारी को रखकर, राजा भीम | वनपर्व का साठवां अध्याय समाप्त हुआ ।। ६० ॥ अथ एकपष्टितमोऽध्यायः ॥ ६१ ॥ वृहदश्व वाच-ततस्तु याते वाणेये पुण्यश्लोकस्य दीव्यतः । पुष्करण हृतं गज्यं यच्चाऽन्यद्वसु किंचन ॥ १ ॥ हतराज्यं नलं राजन् ! प्रहसन्पुष्करोऽब्रवीत् । भूयः प्रतिपाणोऽस्ति कस्तव ॥ २ ॥ शिष्टा ते दमयन्त्यका सर्वमन्यजितं मया दमयन्त्याः पणः साधु वर्ततां यदि मन्यसे ॥ ३ ॥ इकमठवां अध्याय ।। ६१ ।। पददश्च करने है-हे युधिष्ठिर! याणेय के चले दमयन्ती रानी रह गई है यदि आपको अच्छा लग जाने पर राजा नल पुष्कर मे मय राज्य और धन तो इसे भी लगाकर पक दाँव खल टालिए । पुष्कर हार गया उस समय पुस्कर हंगना हुआ कहने लगा क ऐम मर्मभेदी वचन सुनकर नल बहुत ही दुःखित अप और क्या दप लगाइएगा! जो कुछ धन सम्पत्ति हुए परन्तु उन्होंने कुछ उत्तर नहीं दिया । पुष्कर भी यह मय ना मरी हो गई। आरकेपाम अब कवाल की ओर देखने में टमका क्रोध उमड़ पड़ा। कुछ amamuanimadiranamamanupamaatmaliraha.arun....... Ans.inurmuTom द्यूतं प्रवर्तता MEETICHEELIENTIRLIENTSweTTITESereneummyanti अध्याय ६१] महा मारत १७१५ Tuo 77 TD ATD MUITOODTITUTATOTT MOTTATTOORETOT, OTTOVAT.CO - । FODrammerrereummerTRADITrumD5Y पुष्करेणैवमुक्तस्य पुण्यश्लोकस्य मन्युना व्यदीयतेव हृदयं न चैनं किंचिदब्रवीत् ततः पुष्करमालोक्य नलः परममन्युमान् उत्सृज्य सर्वगात्रेभ्यो भूपणानि महायशाः ॥ ५ ॥ एकवासा ह्यसंवीतः सुहृच्छोकविवर्धनः निश्चक्राम ततोराजा त्यक्त्वा सुविपुलां श्रियम् ॥ ६ ॥ दमयन्त्येकवस्त्राऽथ गच्छन्तं पृष्ठतोऽन्वगात् । स तया वाह्यतः सार्धं त्रिरात्रं नैषधोऽवसत् ॥ ७ ॥ पुष्करस्तु महाराज ! घोपयामास वै पुरे नले यः सम्यगातिष्ठेत्स गच्छेद्वध्यतां मम पुष्करस्य तु वाक्येन तस्य विद्वेषणेन च पौरा न तस्य सत्कारं कृतवन्तो युधिष्ठिर ! स तथा नगराभ्याशे सत्कारार्हो न सत्कृतः । त्रिरात्रमुपितो राजा जलमात्रेण वर्तयन् ॥ १० ॥ पीड्यमानः क्षुधा तत्र फलमूलानि कर्पयन् । प्रातिष्टत ततो राजा दमयन्ती तमन्वगात् क्षुधया पीड्यमानस्तु नलो बहुतिथेऽहनि । न कहकर उन्होंने अपने शरीर से सब वस्त्र और के पास जायगा या उसका आदर करेगा वह मेरे गहने उतार डाले। इस प्रकार महाराज नल सब हाथ से मारा जायगा। इस भय से यद्यपि नल सम राज्य और लक्ष्मी को छोड़कर, केवल एक वस्त्र पहने, आदर किये जाने के योग्य थे परन्तु किसी ने उनसे वहां से चल दिये ॥१६॥ बात तक नहीं की और उन्होंने तीन दिन तक केवल उनकी ऐसी दशा देखकर सब भाई-बन्धुओं जल पीकर निर्वाह किया ॥७॥१०॥ को बड़ा शोक हुआ । दुख से व्याकुल दमयन्ती | इसके पश्चात् भूख और प्याम मे अत्यन्त भी केवल एक वस्त्र पहन करके नल के पीछे पीछे ! व्याकुल होकर, कोई और उपाय ने देख, वे चली। इस प्रकार राज्य से भ्रष्ट होकर नल ने, अपनी फूल फल आदि की तालाग में निकले । पतिव्रता रानी के साथ, नगर के बाहर आकर तीन दिन और दमयन्ती भी उनके पीछे-पीछे चरी । इस तरह फल. रात्रि याम किया। उनके चले जाने पर पुष्कर ने मूल सा-सार नल ने कुछ दिन व्यतीत किये । नगर में यह प्रसिद्ध कराया कि जो कोई मनुष्य नल | एक दिन प्याम से अत्यन्त व्याकुल होकर वे एक - Pronommunmanitil.dimmm.insuraliasti.ition or mini.TOraci.hanti.kaa atant - 44242romARTITEDRUITMDHercuTITEREmxerrierceremy १७१६ म हा भारत [ वनपर्व wrammar3ummTMummaNamunaamanamamanarmanamurm.cntATHITLA, ॥ १२ ॥ aaMITTI T 11 trang 11 PhưƯli ti ti (t 149 m by M५००R Lunar URLFLature- अपश्यच्छकुनान्कांश्चिद्धिरण्यसदृशच्छदान् स चिन्तयामास तदा निषधाधिपतिर्वली अस्ति भक्ष्यो ममाऽद्याऽयं वसु चेदं भविष्यति ॥ १३ ॥ ततस्तान्परिधानेन वाससा स समावृणोत् तस्य तद्वस्त्रमादाय सर्वे जग्मुर्विहायसा ॥ १४ ॥ उत्पतन्तः खगा वाक्यमेतदाहुस्ततो नलम् । दृष्ट्वा दिग्याससं भूमौ स्थितं दीनमधोमुखम् ॥ १५ ॥ वयमक्षाः सुदुर्बुद्धे । तव वासो जिहीर्पवः आगता न हि न प्रीतिः सवाससि गते त्वयि ॥ १६ ॥ तान्समीपगतानक्षानात्मानं च विवाससम् । पुण्यश्लोकस्तदा राजन् । दमयन्तीमथाऽब्रवीत् ॥ १७ ॥ येषां प्रकोपादेश्वर्यात्प्रच्युतोऽहमनिन्दिते । प्राणयात्रां न विन्देयं दुखित. क्षुधयाऽन्वितः ॥ १८ ॥ येपां कृते न सत्कारमकुर्वन्मयि नैषधा इमे ते शकुना भूत्वा वासो भीरु | हरन्ति मे ॥ १९ ॥ वेपम्य परमं प्राप्तो दुःखितो गतचेतनः भी तेऽहं निबोधेदं वचनं हितमात्मन ॥ २० ॥ मरोवर के किनारे पहुँने । यहा उन्होंने देखा कि ! र लिया ! यह सुनकर और अपने को ना दखकर यदुन मे सुवर्ण के पहले पक्षी इधर उधर पिनर राजा नर ने दमय नी से कहा देखो प्रिये । जिनके । गम्ब मारे दाने यह विचारा किया कि कोप से मैं सम राज्य और पा हारकर भूब के मारे आज मइही की मारकर बाऊँगा । इम पिचार मे | ऐमा दुखी हैं कि केवर प्राण ही निकरने शेष रहे ही अपनी धोनी द्वार पर उन पनियों का टर हैं और जिसके कारण से पुरवासियों ने मेरा आदर दिया और वे पक्षी उम बत्र को गियर आकाश नहीं क्यिा उन्होंने अब पक्षी वनकर गरे बन्न को माग परशा हर लिया है। इस समय दारण दुर्दशा में पड़ने से ग्न पभियों न नर की नारे मुम दिये हुए मेरी बुद्धि प्रष्ट सी हो रही है-मुझे पुछ नहीं सूझता। नामदेसरा पदारे दिनल हग वे ही में मुम्हाग पनि । म तरह से तुम्हारी रक्षा करना पामा नु वर पान दमकर हमें यहा मंद । मेरा पाम कर्तव्य है । हम कारण तुम सं जो में दुभागहमी में पक्षी यनर तुम्हारा यम भी हमन वहता, सो मुनी ॥१॥२०॥ "TIMinodium CLI म A . - - - + म. PRILDIrLII121 अध्याय ६१ ] म हा मारत १७१७ - Enimrannaormurariummerumaunxantumarmum marrrriRamananamurarianam : CamsanwmoranormargRuTEUROPPLCUTTINErrora UrCE IT.Le Crewormire - एते गच्छन्ति वहवः पन्थानो दक्षिणापथम् । अवन्तीमृक्षवन्तं च समतिक्रम्य पर्वतम् ॥ २१ ॥ एप विन्ध्यो महाशलः पयोष्णी च समुद्रगा । आश्रमाश्च महर्षीणां बहुमूलफलान्विताः ॥ २२ ॥ एप पन्था विदर्भाणामसौ गच्छति कोसलान् । अतः परं च देशोऽयं दक्षिणे दक्षिणापथः ॥ २३ ॥ एतद्वाक्यं नलो राजा दमयन्तीं समाहितः । उवाचाऽसकृदातॊ हि भैमीमुद्दिश्य भारत ! ॥ २४ ॥ ततः स वाप्पकलया वाचा दुःखेन कर्शिता । उवाच दमयन्ती तं नैपधं करुणं वचः उद्वेजते मे हृदयं सीदन्त्यङ्गानि सर्वशः तव पार्थिव ! संकल्पं चिन्तयन्त्याः पुनः पुनः ॥ २६ ॥ हृतराज्यं हृतद्रव्यं विवस्त्रं क्षुच्छ्रमान्वितम् । कथमुत्सृज्य गच्छेयमहं त्वां निर्जने वने ॥ २७॥ श्रान्तस्य ते क्षुधार्तस्य चिन्तयानस्य तत्सुखम् वने घोरे महाराज ! नाशयिष्याम्यहं क्लमम् ॥ २८ ॥ न च भार्यासमं किंचिद्विद्यते भिपजां मतम् । देख, ये जो बहुत मे मार्ग दिखाई देते है ये शोक से अत्यन्त पीड़ित होकर दमयन्ती से बार-बार अवन्ति और ऋक्षवान् पहाड़ों पर से होते हुए दक्षिण यही बातें कह-कहकर सुनाने लगे । हे युधिष्ठिर ! दिशा की ओर चले गये हैं और यह जो बड़ा पहाड़ राजा नल ने जब ये उक्त बातें दमयन्ती से बार- दिखाई देता है इसका नाम विन्ध्याचल है और इसके बार कहीं तब दमयन्ती दुखी होकर दीनता मे समीप पयोष्णी नाम की नदी बहती है, जो समुद्र योग ॥२१॥२५॥ में जाकर मिल गई है। यहां पर बहुत से महामपियों हे महाराज! आकार और चेष्टा से आपके मन के आश्रम हैं जिनमें फल-फूलों की कमी नहीं है । के भाव को जानकर मेरा हृदय फटा सा जा रहा है। यहां से दो राह गये हैं। इस राह मे जाने पर विदर्भ सोचकर भी मैं इस समय कुछ कर्तव्य ठीक नहीं देश में पहुँचा जा सकता है । यह राह कौगल देश कर पाती। मेरा सारा मगर शिथिल हुआ जा रहा को गया है । इस मार्ग की दक्षिण सीमा में स्थित है। ह नाथ ! मैं आपको भूम्बा, नगा, गज्यहीन देश को दक्षिणापथ कहते हैं। राजा नल दुम्य और और थका हुआ इस निर्जन वन में छोड़ार कम winnauritiuTulamnamGLAGTE - MODartnerCHE PLUOTELECTCranelorer Crent वनपर्व १७१८ म हा भारत ANTIGAMI TT W T UT OTTITUTWU ODLIITTORAT ॥ २९ ॥ raruRITERNETmmnaru TITrnmarmuramaram mmmmmmmmmsarominecausuzuriditJILIL.L.bur ANMATI TI TI TI TITI औषधं सर्वदु खेषु सत्यमेतद् ब्रवीमि ते नर उवाच-एवमेतद्यथाऽऽत्थ त्वं दमयन्ती । सुमध्यमे । नास्ति भार्यासम मित्रं नरस्याऽऽर्तस्य भेषजम् ॥ ३० ॥ न चाऽहं त्यक्तुकामस्त्वां किमलं भीरु शङ्कसे । त्यजेयमहमात्मानं न चैव त्वामनिन्दिते ! ॥ ३१ ॥ दमयत्युवाच-यदि मां व महाराज | न विहातुमिहेच्छसि । तकिमर्थं विदर्भाणां पन्थाः समुपदिश्यते ॥ ३२ ॥ अमि चाऽह नृपते । न तु मां त्यक्तुमर्हसि । चेतसा त्वपकृप्टेन मां त्यजेथा महीपते । ॥ ३३ ॥ पन्थानं हि ममाऽभीक्षणमाख्यासि च नरोत्तम ।। अतोऽनिमित्तं शोक मे वर्धयस्यमरोपमा ॥ ३४ ॥ यदि चाऽयमभिप्रायस्तव ज्ञातीन्द्रजेदिति सहितावेव गच्छावो विदर्भान्यदि मन्यले विदर्भराजस्तत्र त्वां पूजयिष्यति मानद तेन त्वं पूजितो राजन् । सुख वत्स्यसि नो गृहे ॥ ३६ ॥ इनि प्रामन्महाभारन आरण्यापति नरापाख्यानपाण नलवनयातायाम् एकपष्टितमोऽध्याय ॥६१ ॥ घरी पाउँ । मैं आपके साथ रहकर इस महायन में नहीं कर बैठ है ता मुझे क्यों बारम्बार विदर्भ देश की आपक श्रम और मान को दूर करेंगी । यद्यों का गह दिग्वा र है ? मैं इसका कारण कुछ भी नहीं । भी यी कहा कि मप दु ग्वों में बी के ममान टीक कर मकी दमी से अत्यन्त व्याकुल हो रही है। कोई आपधि नहीं है । इसकी आप सत्य जानिए । ह महाराज | मैं आपकी शरण म हुँ । कलियुग से दमयनी ये यमन मुराका नर ने कहा- पिये। आविष्ट चित्त क कारण से आप मुझे न त्य गिए । तुम जो कहना। गो टाकदुम्बी गनुप्य की आपका निर तर राह बता मेरे शोक को पदाता आपकार मित्र मी मगाई नी । तुम जाता है । अथवा यदि आपकी यह इच्छा हो कि मैं ननी सापयों पर पदीही ॥२६॥३०॥ अपने वनानियों के पाम चली जाउँ तो हम तुम मसानु छोडो कीनरी। दानों ।। चर। यदि आप वहा नगगी विदर्भ (२.५ पया पर चार पा र ! त्याग गोग आपका यहा सम्मान करेंगे । आप घटा को ५. मारियागंगाायामुपादान आदर और गुम्प में रहा ॥३१॥३६।। नागपतिय र मुप हा निधय तपासया अध्याय ममा टुसा ।। ६१ ॥ । - - Lalu-LRIAL10Brrey 1CLIL अध्याय ६२ ] महा भारत १७१९ - - - alranamammar.aamaanar erala umuasmatamannrarmilammmmmmmunaniminamaARomanisMADIMADum TamannaamannmammimaraormIIIIIITTERemmmmmmmmmmmmunic अथ द्विप्टितमोऽध्यायः ॥१२॥ नल उवाच-यथा राज्यं तव पितुस्तथा मम न संशयः । न तु तत्र गमिष्यामि विपमस्थः कथंचन कथं समृन्तो गत्वाऽहं तव हर्षविवर्धनः परिच्युतो गमिष्यामि तब शोकविवर्धनः वृहदश्च उवाच - इति ब्रुवन्नलो राजा दमयन्ती पुनः पुनः सान्त्वयामास कल्याणीवाससोऽर्धन संवृताम् ॥ ३ ॥ तावेकवस्त्रसंवीतावटमानावितस्ततः क्षुत्पिपासापरिश्रान्तौ सभां कांचिदुपेयतुः ॥ १ ॥ तां सभामुपसंप्राप्य तदा स निपधाधिपः वैदा सहितो राजा निपसाद महीतले स वै विवस्त्रो विकटो मलिनः पांसुगुपिठतः । दमयन्त्या सह श्रान्तः सुप्वाप धरणीतले ॥ ६ ॥ दमयन्त्यपि कल्याणी निद्रयाऽपहृता ततः सहसा दुःखमासाद्य सुकुमारी तपस्विनी सुप्तायां दमयन्त्यां तु नलो राजा विशांपते ! । शोकोन्मथितचित्तात्मा न स्म शेते यथा पुरा । यासठवां अध्याय ॥३२॥ राजा नल ने कहा-हे प्रियतमे ! तुम्हारे पिता कइकर दमयन्ती के चित को मान्त किया और वे के जितना ऐश्वर्य है उतना मेरे भी था । मैं यहां बड़े दोनों ही एक वत्र आढे हुए जहा तहा भूये प्यामे ऐश्वर्य के साथ जाया करता था, जिसे देखकर तुम फिरते हुए वन के एक एकान्त स्थान में पहुंचे। भी प्रमन्न होती थी। इस ममय घोर दुर्दशा में पड़कर वहा प्रिया के माथ बैठकर [ अपनी दुर्दशा के मम्बन्ध मैं अत्यन्त दीन-हीन हो रहा हूं। अब जो मैं वहा में तरह-तरह की चिन्ताएं करते-करते ] नल रेट रहे। मलिन वेप स जाऊँगा तो तुम्हारे कोमल हृदय में दमयन्ती भी उनके पास रेट गई । वह रेटते ही भी चोट लंगगी । इमलिये हे प्रिये ! मैं इस दद्या थकान के मारे अचेत हो गई; किन्तु ऐमी दुर्दशा में किसी तरह वहा न जाऊंगा । वृदव ने कहा में पड़ने के कारण नल के हृदय में रगातार शोक हे राजा युधिष्ठिर! राजा नल ने इस प्रकार से बारम्बार की आग जर रही थी, रम कारण टनकी आखें विगत.स्टदामन यामात् । TERRIEnumergenerancesenterram.ormerreterrer recrural CU " " " non finieri .LWPD970'L'L'ONAM O'CiceITOĽCULUMTIDULU'Caumong'LOLUTIOILLOIOLACIO * १७२. म हा भारत [ वनपर्व OETITLET TOTimranTITITAmrinnamruarrary ITENT EHRITHIFTTTuuurs rernad TurmTrom lidai mmHETI ITrminal Tara TETTE.LEDITTTTE स तद्राज्यापहरण सुहृत्यागं च सर्वशः वने च तं परिध्वंसं प्रेक्ष्य चिन्तामुपेयिवान् ॥ ९ ॥ कि नु मे स्यादिदं कृत्वा किं नु मे स्यादकुर्वतः । किं नु मे मरणं श्रेयः परित्यागो जनस्य वा ॥ १० ॥ मामियं ह्यनुरक्तैवं दुःखमाप्नोति मत्कृते मद्विहीना त्वियं गच्छेत्कदाचित्स्वजनं प्रति ॥ ११ ॥ मयि निःसशयं दुःखमियं प्राप्स्यत्यनुव्रता उत्सर्गे संशय: स्यात्तु विन्देतापि सुखं क्वचित् ॥ १२ ॥ स विनिश्चित्य बहुधा विचार्य च पुनः पुनः । उत्सर्ग मन्यते श्रेयो दमयन्त्या नराधिप । ॥ १३ ॥ न चैपा तेजसा शक्या कैश्चिद्धर्पयितु पथि यशस्विनी महाभागा मद्भक्तेय पतिव्रता ॥ १४ ॥ एवं तस्य तदा वुद्धिर्दमयन्त्यां न्यवर्तत कलिना दुष्टभावेन दमयन्त्या विसर्जने सोऽवस्त्रतामात्मनश्च तस्याश्चाऽप्येकवस्त्रताम् । चिन्तयित्वाऽध्यगाद्राजा वस्त्रार्धस्याऽवकर्तनम् ॥ १६ ॥ कथ वासो विकर्तेयं न च बुध्येत मे प्रिया । तुरत पर गई । वे गज्य के चरे जाने और सुहृदों सुख मिले या न मिले। हे युधिष्ठिर ! इस प्रकार से दादर न करो और वन में वस्त्र के हर जाते घार वार विचार कर राजा नल ने यह निश्चय किया आदि देशों कोम्मरण कर करके चित्ता करने लगे। कि दमयन्ती को छोड़ देना ही अच्छा है क्योंकि अब मुझको प्या करना उचित है क्या कर क्या यह पतिवना और मेरी भत्ताद इसको मार्ग में कोई नकम् । आत्महत्या का रेने म भरा है या इम सकर भी न दे सकेगा |मा विचार कर राजा का श्रागनी को त्याग दंगा ना अच्छा ह ।।१।१०॥ सान दमय ती की आर से जाता रहा और अब उसके यद मेरी री मरी प्रानि शरण में इन। त्याग करने का उपाय मोचने लगे और अपने को दुम टाही ओ में हम छोहार चला जाऊँ नो बमदीन और दमयन्ती के पास भी एक ही वा यह अन किमी ग्यजन या चर्ग नायगी । मरे दम्पकर दमयनी के घर में से आधा वन काटगे मायने में हम अवश्य दुम होगा और जा मैं पादिनार किया ॥११॥१६॥ मेरमा क्या आश्च विही हमा और गा मानेगेकि उमर यन्त्रको कमे Com "DDLELCOME TIMLI EKD 03m CLOS. । [ transmirhriz1PlrlrmTURMERIUU. LALITIELOD अध्याय ६२] म हा मारत १७२१ Tamirmitidindianfilanm.ma.co.ins MaintainsinitiatinatandinviliaNP HorromanTHITERAImmmmmmmmmmmmmunMRImmuneranAECTITIETIES विचिन्त्यैवं नलो राजा सभां पर्यचरत्तदा । १७॥ परिधावन्नथ नल इतश्चेतश्च भारत ! आससाद सभोद्देशे विकोश खड्गमुत्तमम् ॥ १८ ॥ तेनाऽध वाससहिच्छत्वा निवस्य च परन्तपः । सुप्तामुत्सृज्य वैदर्भी प्रावगतचेतनाम् ॥ १९ ॥ ततो निवृत्तहृदयः पुनरागम्य तां सभाम् दमयन्ती तदा दृष्ट्वा रुरोद निपधाधिपः ॥ २०॥ यांन वायुर्न चाऽऽदित्यः पुरा पश्यति मे प्रियाम् । सेयमद्य सभामध्ये शेते भूमावनाथवत् ॥ २१ ॥ इयं वस्त्रावर्तेन संवीता चारुहासिनी उन्मत्तेव वरारोहा कथं वुध्वा भविष्यति कथमेका सती भैमी मया विरहिता शुभा चरिष्यति वने घोरे मृगव्यालनिपेविते ॥ २३ ॥ आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनी समरुद्गणो रक्षन्तु त्वां महाभागे ! धर्मेणाऽसि समावृता ॥ २४ ॥ एवमुक्त्वा प्रियां भार्यां रूपेणाऽप्रतिमां भुवि । कलिनाऽपहृतज्ञानो नलः प्रातिष्टदुद्यतः का कहीं वह जाग न पड़े इम विचार से नल उम की तरह पृथ्वी पर पड़ी हुई मो रही है। हाय ! जय वन में इधर-टघर धूमने लगे । थोड़ी देर में उन्होंने यह उठेगी और अपना आधा कटा हुआ वस्त्र देवगी टम वन में एक स्थान पर नगी तस्वार धरी हुई तब इमी क्या गति होगी ॥१७॥२२॥ देखी । राजा ने टम तरवार को स्टा रिया और और मेरे बिना हम घोर वन में निममें मृग उममे दमयन्ती के आधे वन को काटकर आर पटन और व्याघ्र रहते हैं कैमे विचरेगी। हे महाभागे । लिया और उसे अनन मोती हुई छोड़कर वहा में नू धर्म में निधन है बारहों मूर्य, आटों बमु. ग्यारहों चल दिय। दो-एक पग जाने पर दमयन्नी के मुम्ब. न्द्र, दोनों अश्विनीकुमार और मरहण तेग रक्षा चन्द्र को याद करके वे हि दमयन्ती के पास ट करें । राजा नल हम प्रकार मे उम मोनी हुई अपनी आये । उम समय उनकी आम्बों में आंसू बह रहे थे। परम प्याग स्त्री में कहर, करियुग में जान नष्ट वे कहने लगे कि हाय !इम मरी मी को पहल सूर्य 'किये जाने के कारण मे चल दिये। थोड़ी दूर जाकर और वायु ने भी कभी नहीं देखा था अब अनाथ फिर लौट आये और फिर चर दिये । इस प्रकार EDITIIII' PresrWRMIRPATREETITITTERPOIm - Prem +- POLICY150T.TTrrrrurCRIDWrrrrrrrrrrrrrrrrrrrr...
[ वनपर्व १७२२ म हा भारत wam Punam siummATINDIdharmmunmunitariamliamomanimaranaitrentre artunmauranteamanaLODIAnandinimmm.nn गत्वा गत्वा नलो राजा पुनरेति सभां मुहुः । आकृष्यमाणः कलिना सौहृदेनाऽवकृप्यते ॥ २६ ॥ द्विधेव हृदयं तस्य दुःखितस्याऽभवत्तदा दोलेव मुहुरायाति याति चैव सभां प्रति ॥ २७॥ अवकृष्टस्तु कलिना मोहितः प्राद्रवन्नलः सुप्तामुत्सृज्य तां भार्यां विलप्य करुणं बहु ॥ २८ ॥ नष्टात्मा कलिना स्पृष्टस्तत्तद्विगणयन्नृपः जगामैकां वने शून्ये भार्यामुत्सृज्य दुःखितः ॥ २९ ॥ इति श्रीमन्महामारते आरण्यकपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि दमयन्तीपरित्यागे द्विषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६२॥ से उनका चित्त दो प्रकार का हो गया। प्रीति तो उन्हें कलियुग का आकर्षण प्रबल हो गया और वे रोते खींचकर लौटा लाती थी और कलियुग उन्हें फिर हुए नप्टवुद्धि होकर अनेक प्रकार के विचार करते ले जाता था। वे इन दोनों की आकर्षण शक्ति से हुए उस वन में अपनी स्त्री को सोती हुई अकेली कई बार लौट आये और फिर चले गय । अन्त में छोड़कर दूर निकल गये ॥२६॥२९॥ वनपर्व वा यासठवां अध्याय समाप्त हुआ ।। ६२ ।। ouTutamOMGAGADGaalaam Jitanda.natin... - TamuTITranramma अथ त्रिपप्रितमोऽध्यायः ।। ६३ ।। ददश्व उवाच-अपक्रान्ते नले राजन् ! दमयन्ती गतलमा अयुध्यत वरारोहा संत्रस्ता विजने वने अपच्यमाना भर्तारं शोकदुःग्वसमन्विता प्राकोशदुच्चेः संत्रस्ता महाराजेति नेपधम् ॥ २ ॥ हा नाथ ! हा महाराज! हा स्वाामन् ! किंजहासि माम् । हा हताऽम्मि विनटाऽम्मि भीताऽम्मि विजने वने ॥ ३ ॥ ननु नाम महाराज ! धर्मज्ञः सत्यवागसि निग्मठमां अध्याय ।। ६३ ।। पदव पर है-१ गजा युधिष्ठिर ! जय गजा पुकार कर कहने लगी। नाथ हे महाराज ! गर परे गये नय दमयानी रम निर्जन यन में भयभीन वाह! आपने पया दोप दंग्यकर मुझ छोड़ दिया Enाग 4 श्रीर नर वहां न पाइरसर । में नी मारी गई; में विशेष रूप से नष्ट हो दुआ मय मे मिन दायर बाम गई। मैं इस भयानक यन में रीटर रही है। st stunnertimer earlierminenerut अध्याय ६३ ] महा मारत १७२३ mmaanmamimarurammmmmanmmmmmmmmmmamiminarMRImatonmaram TIMILGER । । mmmmmnainikNILUIDImasanililMATIVE FULTIMARVEDE...ilianianAL LEARNAL - कथमुक्त्वा तथा सत्यं सुप्तामुत्सृज्य कानने ॥ ४ ॥ कथमुत्सृज्य गन्ताऽसि दक्षां भार्यामनुव्रताम् । विशेषतोऽनपकृते परेणाऽपकृते सति शक्यसे ता गिरः सम्यकर्तुं मयि नरेश्वर! । यास्तेषां लोकपालानां संनिधौ कथिताः पुरा ॥ ६ ॥ नाऽकाले विहितो मृत्युर्मानां पुरुषर्षभ ! यत्र कान्ता त्वयात्सृष्टा मुहूर्तमपि जीवति ॥ ७ ॥ पर्याप्तः परिहासोऽयमेतावान्पुरुपर्पभ ! भीताऽहमतिदुर्धर्ष ! दर्शयाऽऽत्मानमीश्वर! ॥ दृश्यसे दृश्यसे राजन्नप दृष्टोऽसि नेपध ! आवार्य गुल्मैरात्मानं किं मां न प्रतिभापसे नृशंसं चत राजेन्द्र ! यन्मामेवंगतामिह विलपन्ती समागम्य नाऽऽश्वासयसि पार्थिव ! ॥ १० ॥ न शोचाम्यहमात्मानं न चाऽन्यदपि किंचन । कथं नु भविताऽस्येक इति त्वां नृप! शोचिमि ॥ ११ ॥ कथं नु राजस्तृपितः क्षुधितः श्रमकर्शितः सायाहे वृक्षमूलेषु मामपश्यन्भविष्यसि ॥ १२ ॥ हे महाराज ! आप तो बड़े सत्यवादी और धर्मात्मा अब हसी दिल्लगी को जाने दीजिए । अब दर्शन हो । मुझमे सत्य प्रतिज्ञा करके मुझे सोती हुई देकर मेरी प्राणों की रक्षा कीजिए। मैं अत्यन्त भयभीत इस निर्जन वन में छोड़कर क्यों चले गये ? आपका हो रही हूं। मै आपको देख रही हूं वहा आप छिपे अपकार शत्रु की ओर से हुआ था मैंने तो आपका हुए हैं, वहा आप खड़े हुए हैं आप अपने शरीर कोई अपकार नहीं किया । फिर मुझ अनुव्रता स्त्री को पतों से छिपाकर मुझमे क्यों नहीं बोलते है। को छोड़कर कैमे चले गये ॥१५|| बड़े दुःश्व ओर निर्दयीपन की बात है जो आप मुझे है महाराज ! पहले रोकपालों के सामने जो इस अवस्था में विलाप करती हुई देखकर मेरे पाम आपने प्रतिना की थी, इस समय वह आपका सत्य आकर मुझे धैर्य नहीं देते ? ॥६॥१०॥ व्रत कहां गया हे पुरपश्रेष्ठ ! मनुष्य के लिये अकाल हाय ! मुझे अपना और दृमग किसी बात का मृत्यु का विधान कहीं नहीं है । इमी कारण मैं सोच नहीं है केवल यह सोच है कि तुम मेरे बिना आपसे अलग होकर अब तक जी रही हूं। हे नाथ! अल कैसे रहोगे : जब दिन भर के मम्मे और ImmummranITAITrumanAmAImmuTRARIYADITIATICAvainsamacanammarmarlimmiummarwa । FDImunaram InvUTHunmuTPHARMATICURRENOLLETECaren म हा भारत | वनपर्व १७२४ ENTammuttiuTRAITHIAnaimmunmarmummammiummaramanarasimon ९wxanuratiPITHornerMITTERVATIMa mmmmmmm ... Clianam.ramanandiTIFammamtammanaimer: ततः सा तीनशोकार्ता प्रदीप्तेव च मन्युना इतश्चेतश्च रुदती पर्यधावत दुःखिता ॥ १३ ॥ मुहुरुत्पतते वाला मुहुः पतति विह्वला मुहुरालीयत भीता मुहुः क्रोशति रोदिति अतीव शोकसंतप्ता मुहुनिःश्वस्य विह्वला । उवाच भैमी निःश्वस्य रुदत्यथ पतिव्रता यस्याभिशापाद्दुःखातों दुःखं विन्दति नैपधः । तस्य भूतस्य नो दुःखाददुःखमप्यधिकं भवेत् ॥ १६ ॥ अपापचेतसं पापो य एवं कृतवान्नलम् तस्माद्दुः दुःखतरं प्राप्य जीवत्वसुखजीविकाम् ॥ १७ ॥ एवं तु विलपन्ती सा राज्ञो भार्या महात्मनः । अन्वेषमाणा भर्तारं वने श्वापदसेविते ॥ १८ ॥ उन्मत्तवद्भीमसुता विलपन्ती इतस्ततः हा हा राजनिति मुहुरितश्चेतश्च धावति तां क्रन्दमानामत्यर्थं कुररीमिव वाशनीम् करुणं वहु शोचन्तीं विलपन्ती मुहुर्मुहुः ॥ २० ॥ महसाऽभ्यागतां भैमीमभ्यासपरिवर्तिनीम् । प्याम और थक हुए किमी वृक्ष की जड़ पर मुझे और जिस पापी न निष्कपट नल को इस अवस्था बिना दम्ब पड़ रहोगे तब तुम्हारी क्या गति होगी। को पहुँनाया है वह नल से भी अधिक दुख पावे इस प्रकार से दमयन्नी वियर करके शोक से अत्यन्त और उसकी नायिका भी दु व से मिले ।इसके पछि पारित होकर या में इधर-उधर दौड़ने लगी। वह दमयन्ती फिर विलाप करती हुई उस यन में अपने मी विनर गिर परती, कभी टरकर नही पनि को इंदने लगी और हाय राजन्! हाय राजन् ! हो जाना, पानी और कमी गगाद. पुर-पुकार पर इधर-उधर दौड़ने लगी। देवयोग गन विहान नती थी। मरे पछि टम पनियता से वह गंनी, पुकारनी, विलाप करती और सोचती दमी कार और मनीमा दिया कि ईई अम्मात् एक पड़े अजगर के समीप जा निरी fatar मेरा पति का अत्यन्त दुम बटा और उम अजगर ने उसे पा लिया। दमयन्ती हादसे मार दम भी अधिक दुग न गर्म रे गहने और महादु गाने पर जी अपनी और पाकिस्तानी की जितनी निन्ना मन आने . Av. tr1719 7177 Trrrrrrrrrrrrrereserere Prem crrr'escrip'r'1.'
FamoweLuxAVATIMITATIVITAULIANCIPuraaneru PLUERIHereuwarerroren अध्याय ६३ ] महा मारत १७२५ மாமாமாராஜாராமாராராயலாளாாராைய்பாபட்டாயா जग्राहाऽजगरो ग्राहो महाकायः क्षुधान्वितः ॥ २१ ॥ सा ग्रस्यमाना ग्राहेण शोकेन च परिप्लुता । नाऽऽत्मानं शोचति तथा यथा शोचति नैषधम् ॥ २२ ॥ हा नाथ ! मामिह बने ग्रस्यमानामनाथवत् । ग्राहेणाऽनेन विजने किमर्थं नाऽनुधावसि ॥ २३ ॥ कथं भविष्यसि पुनर्मामनुस्मृत्य नेपध ! कथं भवाञ्जगामाऽद्य मामुत्सृज्य वने प्रभो ! ॥ २४ ॥ पापान्मुक्तः पुनर्लब्ध्वा वुद्धिं चेतो धनानि च । श्रान्तस्य ते क्षुधार्तस्य परिग्लानस्य नैपध! । कः श्रमं राजशार्दूल ! नाशयिष्यति तेऽनघ ! ॥ २५॥ ततः कश्चिन्मृगव्याधो विचरन्गहने बने आक्रन्दमानां संश्रुत्य जवेनाऽभिससार ह ॥ २६ ॥ नां तु दृष्ट्वा तथा ग्रस्तामुरगेणाऽऽयतेक्षणाम् । त्वरमाणो मृगव्याधः समभिकम्य वेगतः ॥ २७ ॥ मुखतः पाटयामास शस्त्रेण निशितेन च निर्विचेष्टं भुजङ्गं तं विशस्य मृगजीवनः ॥ २८॥ मोक्षयित्वा स तां व्याधःप्रक्षाल्य सलिलन ह । समाश्वास्य कृताहारामथ पप्रच्छ भारत ! ॥ २९॥ पति नल की की। वह रोकर कटने लगी-हाय नाथ! ही रही थी कि इमी अवमर में शिकार के लिये आये आप कहां गए ? यहां हम निर्जन वन में आकर हुए व्याघ ने टमके गेने का मन्द मुना । वह गन्द मुन्न अनाथ और सर्प मे ग्रमी हुई की रक्षा क्यों मुनपर दमयन्ती के पाम तुग्न्त आ गया । उसने नहीं करते हो हे महाराज ! जर तुम मन, बुद्धि देखा कि विशाल नेत्रोंवाली स्त्री को अमने के लिये और धन फिर प्राप्त करोगे तब मुझे म्मरण करके एक मयानक मप मुंह गये चा आ रहा तिच कैसे जीवोगे ? आप मुझको यन में छोड़कर चल उम शिकारी ने गीघ्र एक पैनी धार के हथियार मे दिये। मेरे बिना आपकी थकावट को, मुम्ब प्याम अजगर का मुंह फाड़ डाला। उस अजगर को मारकर और दुम्ब को कौन दूर करेगा ॥१७॥२५॥ निका ने दमयन्नी को मौत के मुंह मे बसारिया। दमयन्नी इस प्रकार विगप और मन्तार कर फिर जल मे दमयन्नी का मगर घोर उमने धर्य Pipasmom rewaret rreprererrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrr. FArrantulitimarindiatimelinlanmusivadinindimultantiatanALAnimantunaadamia in carera [ वनपर्व १७२६ म हा भारत HTraiminariLIATIOImmuviminarunniliantammtuamanGOINGuarnamaATTLITIAN FULD NAVBHALDILTOOPANIDIARLIRIDDHIANAVISHVATILL Romen . - कस्य त्वं मृगशावाक्षि! कथं चाऽभ्यागता वनम्। कथं चेदं महत्कृच्छ्रे प्राप्तवत्यसि भाविनि ! ॥ ३० ॥ दमयन्ती तथा तेन पृच्छयमाना विशांपते!। सर्वमेतद्यथावृत्तमाचचक्षेऽस्य भारत ! तामर्धवस्त्रसंवीतां पीनश्रोणिपयोधराम् सुकुमारानवद्याही पूर्णचन्द्रनिभाननाम् ॥ ३२ ॥ अरालपक्ष्मनयनां तथा मधुरभाषिणीम् लक्षयित्वा मृगव्याधः कामस्य वशमीयिवान् ॥ ३३ ॥ तामेवं श्लक्ष्णया वाचा लुब्धको मृदुपूर्वया । सान्वयामास कामार्तस्तदबुध्यत भाविनी ॥ ३४ ॥ दमयन्त्यपि तं दुष्टमुपलभ्य पतिव्रता तीनरोपसमाविष्टा प्रजज्वालेव मन्युना स तु पापमतिः क्षुद्रः प्रधर्पयितुमातुरः दुर्धर्षां तर्कयामास दीप्तामग्निशिखामिव ॥३६॥ दमयन्ती तु दु खार्ता पतिराज्यविनाकृता । अतीतवाक्पथे काले शशापैन रुपान्विता ॥ ३७॥ यद्यहं नैपधादन्यं मनसापि न चिन्तये तथाऽयं पततां क्षुद्रः परासुभृगजीवनः देते हुप. पूछा-हे मृगगावानयनी ! तुम किमकी और मधुर वाणी सुनकर कामदेव के यश हो गया। ची। यहां तुम मेरी पिसलिये आई हो ! वह अनेक प्रकार के मधुर वचनों से दमयन्ती के। की बुरी दहा तुम्हारी क्यों हुई ! ॥२६॥३०॥ शान्त करने लगा। दमयन्ती उसके भाव को तुमन्त या गुनकर दमयन्ती ने आदि में अन्त तक जान गई और पतियत धर्म से महाकाधित होकर मर पृतान्न पद मुनाया। नीर पनि व्याप आधी अमि के ममान प्रज्वलित हो गई ॥३१॥३५॥ धानी पहन रही दमयन्नी के अगतिक मौन्दर्य को उम ममय उस पापी नीच और आतुर व्याध देकर टममा गोदिन हो गया। दमयन्नी के उभरे हुए नविचारा कि इसके साथ यरजोरीकर और दमयन्ती मन च मुन्दा नितार, पूर्णचन्द्र के ममान मुम्मा नटसे बहुत प्रकार से समझाया परन्तु जब यह नहीं माल, मनादर भाटा गाभायमान नेत्र दमकर माना नव दमयन्ती ने उसे यह शाप दिया कि जो Homamer uttrarreuansretareerCERTIEREnerenameterCLearn ..
अध्याय ६४] महा मारत १७२७ DINA WITAMYLITTIIN TUTTI TUTTI TIDAKTIWITATIOTTI उक्तमात्रे तु वचने तथा स मृगजीवनः व्यसुः पपात मेदिन्यामग्निदग्ध डव द्रुमः ॥ ३९ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि अजगरप्रस्तदमयन्तीमोचने त्रिषष्टितमोऽध्यायः॥३॥ मैंने नल के सिवाय किसी अन्य पुरुष को मन से वह व्याघ इस प्रकार से प्राण रहित होकर गिर पड़ा भी स्मरण न किया हो तो यह नीच-प्रकृति व्याध जैसे अमि से जला हुआ वृक्ष पृथ्वी पर गिर पड़ता निर्जीव होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। यह शाप देते ही है ॥३६॥३९॥ वनपर्व का तिरमठवां अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३॥ r pam.in.saram.anam.ornamamumaunt crimulumirmananmanytamaramananam अथ चतुःपष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ । बृहदश्व उवाच-सा निहत्य मृगव्याधं प्रतस्थे कमलेक्षणा । वनं प्रतिभयं शून्यं झिल्लिकागणनादितम् सिंहद्वीपिरुरुव्याघमहिपर्क्षगणैर्युतम् नानापक्षिगणाकीर्णं म्लेच्छतस्करसेवितम् ॥ २ ॥ शालवेणुधवाश्वत्यतिन्दुकेंगुदकिंशुकैः अर्जुनारिष्टसंच्छन्नं स्यन्दनैश्च सशाल्मलैः जम्बाम्रलोध्रखदिरसालवेत्रसमाकुलम् पद्मकामलकप्लक्षकदम्बोदुम्बराबृतम् वदरीबिल्वसंच्छन्नं न्ययाधैश्च समाकुलम् प्रियालतालखजूरहरीतकिविभीतकैः नानाधातुशतैर्नद्धान्विविधानपि चाऽचलान् निकान्परिसंघुष्टान्दरीश्चाऽद्भुतदर्शनाः चौमठवां अध्याय ॥४॥ वृहदश्व कहते हैं-हे युधिष्ठिर ! उम व्याध को पक्षी वृक्षों की डालियों पर बेटे थे। कहीं पर म्लेच्छ मारकर वह कमलोचन दमयन्ती उम वन में अकेली जाति के डाक दल गांधे हुए रहते थे। बीच बीच धैर्य धारण कर नल को हंदती हुई विचरने लगी। में अनेक प्रकार के वृक्ष लग रहे थे। वहा पर झाल, भयानक आकार के सैकड़ों जङ्गली जीव उम वन में वेणु, धव, पीपल, तेंदू, इंगुद, किंशुक, अर्जुन. रहते थे। कहीं पर सिंह, हाथी, व्याघ, भैमे, हि भरिष्ट, म्यंदन, शाल्मली, जामुन, आम्र, लोध, वर, और अनेक प्रकार के जीप टम वन में इच्छा के सार, वेत्र, पद्मा, आवरा, सम, कदम्य, टग्या, अनुमार विचर रहे थे। वही पर अनेक प्रकार के वर, वेर, महुड़, बरगद, प्रियार, नार, महार 16! e're AnnecTCRIDIDODON'TMINUUTTI TUTILMITOLTUVU - - . mommOurmometecturecrucww.rrcrCECircuiry [ वनपर्व - Treramrnm.immitoinent init Trm amymanavin momE १७२८ म हा मारत LamamalTANTRImmummmmmmmmmmmmmmmunamarantarammamamurarummonalisa नदीः सरांसि वापीश्च विविधांश्च मृगद्विजान् । सा चहुन्भीमरूपांश्च पिशाचोरगराक्षसान् ॥ ७ ॥ पल्बलानि तडागानि गिरिकूटानि सर्वशः सरितो निझरांश्चैव ददर्शाद्भुतदर्शनान् यूथशो ददृशे चाऽत्र विदर्भाधिपनन्दिनी महिपांश्च वराहांश्च ऋक्षांश्च वनपन्नगान् ॥ ९ ॥ तेजसा यशसा लक्ष्म्या स्थित्या च परया युता । वैदर्भी विचरत्येका नलमन्वेषती तदा नाऽविभ्यत्सा नृपसुताभैमी तत्राऽथ कस्यचित् । दारुणामटवीं प्राप्य भर्तृव्यसनपीडिता विदर्भतनया राजन् ! विललाप सुदुः खिता भर्तृशोकपरीताही शिलातलमथाऽऽश्रिता ॥ १२ ॥ दमयन्त्युवाच-व्यूढोरस्क ! महावाहो ! नैषधानां जनाधिप ! । क नु राजन्! गतोऽस्यद्य विस्मृज्य विजने बने ॥ १३ ॥ अश्वमेधादिभिर्वीर ! क्रतुभिभूरिदक्षिणैः कधमिष्ट्वा नरव्याघ्र ! मयि मिथ्या प्रवर्तसे ॥ १४ ॥ यत्त्वयोक्तं नरश्रेष्ठ ! मत्समक्षं महाद्युते ! और यटेड़ा आदि अनेक प्रकार के वृक्ष चारों और जय हुँदते-द्वंदते हार गई और कहीं कुछ पता उंग । दमयन्तीने उमबन में नाना प्रकार. न लगा नव यह एक शिला पर बैठकर विलाप करने वाले अनेक पर्वत, गयानक पद नदी, मरायर, रगी। निगद देश के स्वामी ! मुझे इस बादरी, पल्पर, नाग, पहारों की चोटियां और चन में छोड़कर कहां चले गय हाय नाथ! तुमने ने दम पातु नल पा रहीं पना न गा और अश्वमेध भादि बड़ी-बड़ी दक्षिणावाले यज्ञ करके यान में स्थानों पर अंग प्रकार के पक्षी, मृग, । मेरे साथ मुटा पद से किया ! तुम तो नराधम भयान पवार पिाय, मगक्षम, मॅग, वागद, तंजानी और राजाओं में येष्ठ हो। तुमको यह बात 5 श्री मारे गुण्ड के झुण्ड मे पातु या. मरण कानी चाटिंग जो तुमने मुझमे पहले ही भने पनि वियोग में भी दुमी चीन सय धी और मां ने की थुध आपमे और मुझम कहा दुर्गम ना मागों में वर्गमा । उसो धा भी प्रापका विवाना रचित महाराज! गर नदी ॥११॥ चलस्यमन्त्री नादचारों वेद पढ़ने के तुरुप ferntrerererererer efrire crererergereerrrero)'Cr***gresie, crecierra onMASHAMAK.karismati..marimaniamarnama । निर्जन अध्याय ६४] पहा मारत १७२९ nam.mpurnmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmm.amanamanities 4-11-1 10.17.स. Anmun namammumdamitallin 'DIL स्मर्तुमर्हसि कल्याण ! वचनं पार्थिवर्षभ ! यञ्चोक्तं विहगैर्हसैः समीपे तव भूमिप! । मत्समक्षं यदुक्तं च तदवेक्षितुमर्हसि !! १६ ॥ चत्वार एकतो वेदाः साङ्गोपाङ्गाः सविस्तराः । खधीता मनुजव्याघ्र ! सत्यमेकं किलकतः ॥ १७॥ तस्मादर्हसि शत्रुघ्न ! सत्यं कर्तुं नरेश्वर ! उक्तवानसि यद्वीर ! मत्सकाशे पुरा वचः ॥ १८ ॥ हा वीर नल नामाऽहं नष्टा किल तवाऽनघ । अस्यामटव्यां घोगयां किं मां न प्रतिभाषसे ॥ १९ ॥ कर्षयत्येप मां रौद्रो व्यात्तास्यो दारुणाकृतिः । अरण्यराट् क्षुधाविष्टः किं मां न त्रातुमर्हसि ॥ २० ॥ न मे त्वदन्या काचिद्विप्रियाऽस्तीत्यव्रवीः सदा । तामृतां कुरु कल्याण पुरोक्तां भारती नृप ॥ २१ ॥ उन्मत्तां विलपन्तीं मां भार्यामिष्टां नराधिप । ईप्सितामीप्सितोऽसित्वं किंमां न प्रतिभापसे ॥ २२ ॥ कृशां दीनां विवर्णा च मलिनां वसुधाधिप । वस्त्रार्धप्रावृतामेकां विलपन्तीमनाथवत् ॥ २३ ॥ । इस कारण इस समय तुमको पहले की प्रतिज्ञा प्यारी दमयन्ती तुम्हारे विरह में पागलों की तरह मत्य करनी चाहिये । हाय प्राणनाथ ! मला तुम जगल में रोती हुई तुमको ढूंढ़ रही है । इस समय मुझसे क्यों नहीं बोलते ? मै तुम्हारे वियोग में नष्ट इस अभागिन से तुम बोलते क्यों नहीं ! हाय हुई है। देखो महाराज ! यह अत्यन्त भयानक नाथ ! में केवल आधा वर पहने अपने झुण्ड से सवाला सिंह अपने कराल मुग्व को खाले हुए मुझे बिछुड़ी हुई कुररी की तरह मलिन वेश मे जगह- ग्वाना चाहता है । तुम आकर टमको क्यों नहीं जगह तुमको खोज रही हूँ। यह जानकर भी तुम रोकने ! ॥१२॥२०॥ क्यों नहीं आकर अपने मधुर वचनों मे मुझे दिलामा तुम तो पहले कहा करते थे कि तू मुझे प्राणों देते ! हाय नाथ ! हाय दमयन्ती-वाम ! तुम्हारी मे भी बढ़कर प्यारी है फिर इस समय अपने उस पतिव्रता भार्या अकली इम निर्जन वन में रानी हुई कथन के विरुद्ध काम क्यों कर रहे हो? हाय प्राण पारम्बार तुमको पुकार रही है । तुम उत्तर देकर बलम ! तुम्ही मेरे जीवन के आधार हो। तुम्हारी क्यों नहीं अपनी दामी को मान्वना देने ? हे पुरुषcrur *,*D'U'I'MULE 1*TE THITTIC. TUTO LLUI DILUWUTATI: HINDIMULILAMuTHEWInterPATILIPermaneerirrorer.rrce:
१७३० म हा भारत [ नन५५ FDImrnimaniummmmmmmmmmmucumulatinuornerBaIEL aantri irary u. GUTOILLUDIN.LOL UW ILI U hedhi । Itna imirmiri Intelstml यूथभ्रष्टामिवैकां मां हरिणीं पृथुलोचन न मानयसि मामार्य रुदन्तीमरिकर्शन ॥ २४ ॥ महाराज महारण्ये अहमेकाकिनी सती दमयन्त्यभिभापे त्वां किं मां न प्रतिभापसे ॥ २५ ॥ कुलशीलोपसंपन्न चारुसङ्गशोभन नाऽद्य त्वां प्रतिपश्यामि गिरावस्मिन्नरोत्तम ॥ २६ ॥ वने चाऽस्मिन्महाघोरे सिंहव्याघ्रनिषेविते शयानमुपविष्टं वा स्थितं वा निषधाधिप ॥ २७॥ प्रस्थितं वा नरश्रेष्ठ मम शोकविवर्धन क नु पृच्छामि दुखार्ता त्वदर्थे शोककर्शिता ॥ २८ ॥ कञ्चिदृष्टस्त्वयाऽऽरण्ये सगत्यह नलो नृप को नु मे वाऽथ प्रष्टव्यो वनेऽस्मिन्प्रस्थित नलम् ॥ २९ ॥ अभिरूपं महात्मान परव्यूहविनाशनम् यमन्पसि राजानं नल पद्मनिभेक्षणम् ॥ ३० ॥ अयं स इति कस्याऽद्य श्रोप्यामि मधुरागिरम् । अरण्यराडयं श्रीमांश्चतुर्दष्ट्रो महाहनुः शार्दूलोऽभिमुसोऽभ्येति प्रजाम्येनमशकिता । भवान्मृगाणामधिपस्त्वमम्मिन्कानने प्रभुः ॥ ३२ ॥ ५ ! मुझ म पनि में तुम्हारा मन सुन्दर शरीर कौन मुझ तुम्हारी सूनना देकर मेरे जरते हुए नही दम परना । हाम नाथ ! हग भयास में हृदय । टण्डा करेगा। यह भयानक सिंद कराल बाप श्रीर माम मरे हुएई । इसमें तुम यहा पर मंहनाका मेरे मामन ना आ रहा है। चन, टर रहा या ग। या पमराया छोड़कर इगी में पटे। यो निश्चय कर दमयन्ती भी निभय नहीं कर पान । हाय नाय में निमम मिट पास गई ] वह उसमें पूछने लगी- मृगराज पनिगुमाउन दागबननादमा है जिनक गुम हम या में नेवार पशुमा के गना हो। में परम, भाभी का नाम विदर्भगन की पुत्री और पिश गागल न? मलम 417 पानाग नागिनी भाषा । मंग नाग दमयनी है। इस समय कहा ॥ परिक वियाग को ITER में ही rrrrrrrrar Tr, Tr . N THIP FILITL t * JI । IMELIGIOULICut अध्याय ६४] महा मारत १७३१ numoniaWwwimmmwwwmonारमाTTorraraman । विदर्भराजतनयां दमयन्तीति विद्धि माम् निपधाधिपतेर्भायर्यां नलस्याऽमित्रघातिनः ॥ ३३॥ पतिमन्वेपतीमेकां कृपणां शोककर्शिताम् आश्वासय मृगेन्द्रेह यदि दृष्टम्त्वया नलः ॥ ३४ ॥ अथवा त्वं वनपते नलं यदि न शंससि मां खादय मृगश्रेष्ठ दुःखादस्माद्विमोचय ॥ ३५ ॥ श्रुत्वाऽऽरण्ये विलपितं न मामाश्वासयत्ययम् । यामिमां स्वादुसलिलामापगां सागरंगमाम् ॥ ३६ ॥ इमं शिलोच्चयं पुण्यं शृङ्गेवहुभिरुच्छ्रुितेः विराजद्भिरिवाऽनेकनेकवर्णमनोरमः नानाधातुसमाकीर्ण विविधोपलभूपितम् अस्याऽऽरण्यस्य महनः केतुभूतमिवोत्थितम् ॥ ३८ ॥ सिंहशार्दूलमातंगवराहक्षमृगायुतम् पनविभिर्वहुविधैः समन्तादनुनादितम् किंशुकाशोकवकुलपुन्नागरुपशोभितम् कर्णिकारधवप्लक्षः सुपुष्पेरुपशोभितम् ॥ १० ॥ सारद्भिः सविहङ्गाभिः शिखरेश्च समाकुलम् । को खोज रही हूं, किन्तु उनके दर्शन नहीं कर पाती । सिम्बर है, इसमें अनेक प्रकार की धातुएं और नरह- तुमने जो मह मा नल को कहीं देखा हो नो मूचना तरह के पत्थर है। यह पर्वत वन के बीच में घजा देकर मेरे प्राण बचाओ, और, नहीं तो मुझ माकर की तरह ऊँचाई और इसमें मिटें, हाथी, रीठ, मृग, मेरे मब मन्ताप दूर कर दो। [सिंह अपनी टच्छा मुअा आदि रहते हैं । इसमें तरह-नाह के पक्षी भी के अनुसार दूसरी ओर ना गया । नत्र दमयन्नी बोलने रहने हैं; दाक, अमोक, नौनमिग, पुन्नाग, पागल मी होकर कटन नगी-हाय ! यह पार्दूल नैर, घब और प्लान के पूरे हुए पड़ है और इसपर मी मरे विनगर को सुनकर मुझे धैर्य नहीं देता है। प्रेमी नदियां बटती हैं जिनके किनागे पर पनी स्गिलें. अब में रम नदी के पाम जाकर पहं जिमका जल मग्न है नया जिनमें नहाने है ॥३१॥४०॥ म्वादिष्ट है और समुद्र मेंज का मिरती है; अयदा इम उस पर्वनामम्बोधन करके दमयन्नी ने कहा- पनगन को अपने दुःख का हाल मुनाकर नल का हे पर्वनगज : मैं तुम्हें नमस्कार करती हूँ। मैंगन पना हूं। हम पर्वत के अनेक धान ऊंने ऊंने की पुत्री राजा की पुत्रवधू और गजा ही की भाया COWTIM10.10 2.GIWAMUD.101iletebalan Databaco Wam11JM08.1.2017 - HIMIT 2100THDArcCULTIPTrrrrricurrrrr.
महा भारत [ बन५५ wimarma.TAmmmmmmmmmmmmmmmnamurranimumamarum MIvermarate EmraamanarramanaADHIWITTALIGALIGarrammauranamaman amar.. गिरिराजमिमं तावत्पृच्छामि नृपतिं प्रति ॥४१॥ भगवन्नचलश्रेष्ठ दिव्यदर्शन विश्रुत शरण्य बहुकल्याण नमस्तेऽस्तु महीधर ॥ ४२ ॥ प्रणमे त्वाऽभिगम्याऽहं राजपुत्रीं निवोधमाम् । गज्ञः स्नुषां राजभायां दमयन्तीति विश्रुताम् ॥ ४३ ॥ राजा विदर्भाधिपतिः पिता मम महारथः । भीमो नाम क्षितिपतिश्चातुर्वर्ण्यस्य रक्षिता ॥ १४ ॥ राजसूयाश्वमेधानां ऋतूनां दक्षिणावताम् आहर्ता पार्थिवश्रेष्ठः पृथुचावञ्चितेक्षणः ॥ ४५ ॥ ब्रह्मण्यः साधुवृत्तश्च सत्यवागनसूयकः शीलवान्वीर्यसंपन्नः पृथुश्रीधर्मविच्छुचिः ॥ ४६ ॥ सम्यग्गोप्ता विदर्भाणां निर्जितारिगणः प्रभुः । तस्य मां विन्द्वि तनयां भगवस्त्वामुपस्थिताम् ॥ ४७ ॥ निपधेपु महाराजः श्वशुरो मे नरोत्तमः गृहीतनामा विख्यातो बीरसेन इति स्म ह 1॥४८॥ नस्य राज्ञः सुतो वीरः श्रीमान्सत्यपराक्रमः कमप्राप्तं पितुः खं यो राज्यं समनुशास्ति ह ।। ४९ ।। नलो नामाऽरिहास्यामः पुण्यश्लोक इति श्रुतः । ब्रह्मण्यो वेदविद्वाग्मी पुण्यकृत्सोमपोऽग्निमान् ॥ ५० ॥ है। मग नाम दमयन्ती । मैं पनि में विष्टही हुई, दमर + गुणों में दोष न र गानेवारा, शास्वान् , अनार, दुभी और अपने पति को माननी हुई पराक्रमी, सीवान् धर्म पवित, शानुओं को जीतने गुहा पाम आई । म प्रणाम करके पर यान याग और प्रभु । और मेरे ससुर का नाम वीरसेन छनी । तुर देकर मेरे प्राणों की मा कीजिए। है जो निषध देश के स्वामी और नरोत्तम हैं। उनके मोनिका नाम भीमबह विदर्गदेवा मायामी, पुत्र का नाम राजा नल जो मेरे पनि है। और रा, पण वासा, गनाओं में भ्रष्ट, बीर, श्रीमान . मत्यपराक्रमी, पिना राज्य और धन या मधोमवार, ग्रामग पानवाल. का गारवाह, ब्रमण्यवादी EART 1 मम, माइपमार, मन्यवाद को जाननवान, योग में मेहे चतुर, परिवार Virtyr irriter : Aru grrestedILEE TIL HARDOINT enter EDOASAMANARinaruRATA.रा.min.aam TamnnaPaints ।
अध्याय ६४] म हा मा रत १७३३ CLANWIRTS MINTIMIDIOMMITTATTITAITIJDLITANALSATTIINTA ommmmmimmHALUTERIALOTRINALESARILYMIRECTROMITRAME - यष्टा दाता च योद्धा च सम्यक्चेव प्रशासिता । तस्यमामवलांश्रेष्टांविद्धि भार्यामिहाऽऽगताम् ।। ५१ ।। त्वतश्रियं भर्तृहीनामनाथां व्यसनान्विताम् । अन्वेपमाणां भर्तारं वं मां पर्वतसत्तम ॥ ५२ ॥ समुल्लिखद्भिरेतैर्हि त्वया शृङ्गशतैर्नृपः कञ्चिद दृष्टोऽचलश्रेष्ट बनेऽस्मिन्वा नलो नृपः ।। ५३ ।। गजेन्द्रविक्रमो धीमान्दीर्घबाहुरमर्षणः विक्रान्तः सत्त्ववान्वीरो भर्ता मम महायशाः ॥ ५४ ॥ निपधानामधिपतिः कच्चिद् दृष्टस्त्वया नलः किं मां विलपतीमेकां पर्वतश्रेष्ट विह्वलाम् ॥ ५५॥ गिरा नाऽऽश्वामयस्यद्य स्वांसुतामिव दुःखिताम्। वीर विक्रान्त धर्मज्ञ सत्यसन्ध महीपते ॥ ५६॥ यद्यस्यस्मिन्नने राजन् दर्शयाऽऽत्मानमात्मना । कदा सुस्निग्धगम्भीरां जीमूतवनसंनिभाम् श्रोग्यामि नैपधस्याऽहं वाचं ताममृतोपमाम् । वैदर्भीत्येव विस्पष्टां शुभां राज्ञो महात्मनः ॥ ५८ ॥ आम्नायसारिणीमृद्धां मम शोकविनाशिनीम् । भीतामाश्वासयत मां नृपते धर्मवत्सल इति सा तं गिरिश्रेष्टमुक्त्वा पार्थिवनन्दिनी । Guverenler YUUVITIT WIN10 WIT MILUTID'IT'ULOT L'ITALO'T LETOU'LDLO LDHU'LSID TOPU ॥ ५७॥ aa.inmutari pandhan [ वनपर्व - - IITRINTruaranararrrrrrrrrul Titutnam umamma arume १७३४ म हा भा र त TAITIWwwrarrammnamanrnmmmmarrimum amiaTamuTDamaTRawraanerum दमयन्ती ततो भूयो जगाम दिशमुत्तराम् ॥ ६० ॥ सा गत्वा त्रीनहोरात्रान् ददर्श परमाङ्गना तापसारण्यमतुलं दिव्यकाननशोभितम् वसिष्ठभृग्वत्रिसमैस्तापसैरुपशोभितम् नियतैः संयताहारैर्दमशौचसमन्वितः ॥ ६२ ॥ अब्भर्वायुभश्च पत्राहारैस्तथैव च जितेन्द्रियैर्महाभागैः स्वर्गमार्गदिदृक्षुभिः ॥ ६३ ।। वल्कलाजिनसंवीतैर्मुनिभिः संयतेन्द्रियः तापसाध्युपितं रम्यं ददर्शाऽऽश्रममण्डलम् ॥ ६४ ॥ नानामृगगणैर्जुष्टं शाखामृगगणायुतम् तापसैः समुपेतं च सा दृष्ट्वैव समाश्वतत् ॥६५॥ सुभ्रूः सुकेशी सुश्रोणी सुकुचा सुद्विजानना । वर्चखिनी सुप्रतिष्ठा स्वसितायतलोचना ॥६६॥ सा विवेशाऽऽश्रमपदं वीरसेनसुतप्रिया योपिद्रत्नं महाभागा दमयन्ती तपस्विनी माऽभिवाद्य तपोवृद्धान्विनयावनता स्थिता स्वागतं त इति प्रोक्ता तैः सस्तापसोत्तमैः ॥ ६८ ॥ तुम अदी और मेरे शोक को दूर करनेवाली हो। यन्त्र और मृगछालाधारी मुनि लोग रहते थे । दमयन्ती हे धर्मात्मा राजा नर । अब शीघ्र यहा आकर मुझ । ने वहा पहुँचकर उन तपस्वियों के रहने के आश्रम डरी हुई को धर्य दीजिये । इसक पीठे दमयन्ती देखे जो अनेक प्रकार के मृगों से युक्त और तपस्वियों रत्त प्रकार से किया करती हुई उत्तर दिशा को के समूह से सुशोभित थे उनको देखकर दमयन्ती चरी गई ॥५६॥ को धैर्य हुआ। सुन्दर भौंह, सुन्दर केश, सुन्दर इस प्रकार तीन दिन तक दिन रात चलकर, नितम्य, उभरे हुए म्तन, नद्रतुल्य मुख आदि अना युद्ध दूर जाने पर, दमय ती एक बड़े तपधियों के से शोभित और अनुपम रूप लावण्यवारी वह दमयन्ती वन में पहुँनी । उस वन में दिय कान थे और तपस्वियों के उम आश्रम में गई। वहा कुछ दिलासा वशिष्ठ, भृगु और आत्रेय आदि बड़े बढ़ पापियों पाकर दमय ती ने पापियों को प्रणाम किया। फिर मान जिनेद्रिय, निराहार रहनेवारे, दमपरायण, नम्रतापूर्व मिर गुमाकर यह एक और खड़ी हो गई। जर वायुमभी, पत्त माका निर्वाह करनेवार वल्ल. तपस्वियों ने दमयन्ती से वशल प्रश्न करके उसका gaummawaamansamanawimmanur.misian Aryanwidawwas arrrrarswatamannauta - 1-121210.kuCILITALLPAILI .UIITILI UNVE अध्याय ६४] म हा भारत மானமாாராராராராாாாாாாாாாாாாாாாாாாயாமாயாளை - manmmomammiuaarimammmsin airman mrarmoniumniumnimun' TOTRUTADI20ULAUntentrate पूजां चाऽस्या यथान्यायं कृत्वा तत्र तपोधनाः । आस्यतामित्यथोचुस्ते ब्रूहि किं करवामहे ॥ ६९ ॥ तानुवाच वरारोहा कच्चिद्भगवतामिह तपःस्वग्निपु धर्मेपु मृगपक्षिषु चाऽनघाः ॥ ७० ॥ कुशलं वो महाभागाः स्वधर्माचरणेषु च तैरुक्ता कुशलं भद्रे सर्वत्रेति यशस्विनि ॥ ७१ ॥ ब्रूहि सर्वानवद्याङ्गि का त्वं किं च चिकीर्पसि । दृष्ट्वैव ते परं रूपं द्युतिं च परमामिह ॥७२ ॥ विस्मयो नः समुत्पन्नः समाश्वसिहि मा शुचः । अस्याऽरण्यस्य देवी त्वमुताहोऽस्य महीभृतः ॥ ७३ ।। अस्याश्च नद्याः कल्याणि वद सत्यमनिन्दिते । साऽब्रवीत्तानृपीन्नाऽहमरण्यस्याऽस्य देवता ॥ ७॥ न चाऽप्यस्य गिरेविप्रा नैव नद्याश्च देवता । मानुपी मां विजानीत यूयं सर्वे तपोधनाः ॥७५ ॥ विस्तरेणाऽभिधास्यामि तन्मे शृणुत सर्वशः । विदर्भेषु महीपालो भीमो नाम महीपतिः ॥ ७६ ॥ तस्य मां तनयां सर्वे जानीत द्विजसत्तमाः । विधिपूर्वक मत्कार किया और फिर मामन देकर शो। अब रोओ मत । हे कल्याणी! क्या तुम इस बैटने के लिये कहा। उपरान्त उन तपस्थियों ने उसमे . वन या पहाड़ अथवा नदी की देवी हो। हे सुन्दरी ! कहा-कहो,हम लोग तुम्हारा क्या कार्य करें! दमयन्ती तुम अपना ठीक-ठीक परिचय देकर हमारे मन्देह ने पूछा-हे महाभाग तपम्बियो ! आप लोग मर्वथा । को दूर करो। यह सुनकर दमयन्ती ने कहा- कुगरपूर्वक हैं न ? तप, जल, अमि, धर्म, मृग और ऋपियो ! मैं पहाड़ वन और नदी की देवी नहीं हूँ पक्षी तो निर्विघ्न है न ! ॥६११७०॥ मैं मानुषी हूँ। मेरा सब वृतान्न विम्नारपूर्वक मुनिये। दमयन्नी के कुशल-प्रश्न का टीक-टीक उत्तर में गजा भीम की पुत्री है जो विदर्भदेश के स्वामी देकर ताम्बियों ने कहा-हे भद्रे! हे याम्विनी ! और पृथ्वी के पालन करनेवाले हैं। और निषध देश हे मुन्दरी ! तुम कौन हो तुम्हाग तारार्य क्या है? के गजा नल मेरे पनि हैं जो बड़े बुद्धिमान् , यगम्बी, तुम्हाग अमाधारण रूप और कामनीय कान्नि विद्वान् , मंग्राम में मना विजय प्राप्त करनेवाले, देव- देखकर हमें बड़ा आश्चर्य हुआ है । हे पुत्री ! धीरज ताओं के पूजन में तत्सर, बामणों पर अनुगग रमने- CenuMUTERECTROPERHITCHELPHATIT GULMIn Crrrrmus honan DataTIL ON - Mammalinmannel १७३६ महाभारत [1 . F । Pammaanndiraniuminumamim writin tim + MATARATEDIO TER ATTETimali - ::.....: वीरः संग्रामजिद्विद्वान्मम भर्ता विशांपतिः । देवताभ्यर्चनपरो द्विजातिजनवत्सलः ॥ ७८॥ गोप्ता निपधवंशस्य महातेजा महाबलः सत्यवान्धर्मवित्प्राज्ञः सत्यसंधोऽरिमर्दनः ॥ ७९ ॥ ब्रह्मण्यो देवतपरः श्रीमान्परपुरञ्जयः नलो नाम नृपश्रेष्ठो देवराजसमद्युतिः ॥ ८० ॥ मम भर्ता विशालाक्षः पूर्णेन्दुवदनोऽरिहा आहर्ता ऋतुमुख्यानां वेदवेदाङ्गपारगः ॥ ८१ ॥ सपत्नानां मृधे हन्ता रविसोमसमप्रभः स कैश्चिन्निकृतिप्रज्ञेरनायैरकृतात्मभिः ॥ ८२ ॥ आहृय पृथिवीपालः सत्यधर्मपरायणः देवने कुशलैर्जिौहतं राज्यं वसूनि च ॥ ८३ ॥ तस्य मामवगच्छध्वं भार्यां राजर्षभस्य वे दमयन्तीति विख्यातां भर्तुदर्शनलालसाम् ॥ ८४ ॥ सा वनानि गिरीश्चैव सरांसि सरितस्तथा पल्बलानि च सर्वाणि तथाऽरण्यानि सर्वशः ॥ ८५ ॥ अन्वेपमाणा भर्तारं नलं रणविशारदम् महात्मानं कृतास्त्रं च विचरामीह दुःखिता ॥ ८६ ॥ वाले, निपध-वंश के रक्षक, बड़े तेजस्वी, पराक्रमी, वे मेरे पति किसी छली, नीच और मलिन मन, सत्यवादी, धर्मन, बड़े ज्ञानी, सत्यप्रतिज्ञ, ब्रह्मनिष्ठ, । ज्वारी और कुटिल मनुष्य से जुए में सब राज्य और देवपरायण, धीमान् , शत्रुओं का नाश करनेवाले, धन हारकर चले गये है । मैं उनकी दमयन्ती स्त्री राजाओं में श्रेष्ठ, इन्द्र के समान तेजस्वी, विशाराक्ष, है । उनके वियोग में उनके दर्शनों की इच्छा से पूर्णचन्द्र के मगान कान्तिशाली, बड़े-बड़े यगों के दु.खी होकर पहाड़, नदी, सरोवर, यन और दूसर कानेवार, वेद और वदार के जाननेवाले, सूर्य और स्थानों में उन्हें इंदती हुई यहां आ पहुंचा हूँ कदाचित् चन्द्रमा की मी प्रमा रम्ननवाले और युद्ध में शत्रुओं । ये मेरे मामी इस तपोवन में न होवे उन्हीं के कारण शजीतनेवार ॥७११८२॥ मे में इस वन में आई हूँ जिममें शार्दूल रहा करते Ganawaamanaamananminarurniturtant.man.asaralhunnainitantanamarat - । - PierranearnternatiraminenewIMPERHITarPravran अध्याय ६४] महा मा रत १७३७ 2.7mm'UTITTITOITTAMATTOMTOTTINTO MINTTUITINTITOIGT.ar OT? Eumanuarpion 1 .. - maanmammiracuumondwiviniti.cm.mamtirthamam TRIGamananmami कञ्चिद्भगवतां रम्यं तपोवनमिदं नृपः भवेत्प्राप्तो नलो नाम निपधानां जनाधिपः ॥ ८७॥ यत्कृतेऽहमिदं ब्रह्मन्प्रपन्ना भृशदारुणम् वनं प्रतिभयं घोरं शार्दूलमृगसेवितम् 1 ८८॥ यदि कैश्चिदहोरात्रैर्न द्रक्ष्यामि नलं नृपम् आत्मानं श्रेयसा योध्ये देहस्याऽस्य विमोचनात् ॥ ८९ ।। को नु मे जीवितेनाऽर्थस्तमृते पुरुपर्पभम् । कथं भविष्याम्यद्याऽहं भर्तृशोकाभिपीडिता ॥ ९ ॥ तथा विलपतीमेकामरण्ये भीमनन्दिनीम् दमयन्तीमथोचुस्ते तापसाः सत्यदर्शिनः ॥ ९१ ॥ उदर्कस्तव कल्याणि कल्याणो भविता शुभे । वयं पश्याम तपसा क्षिप्रं द्रक्ष्यसि नैषधम् ॥ ९२ ॥ निपधानामधिपति नलं रिपुनिपातिनम् भैमि धर्मभृतां श्रेष्टं द्रक्ष्यसे विगतज्वरम् ॥ ९३ ।। विमुक्तं सर्वपापेभ्यः सर्वरत्नसमन्वितम् तदेव नगरं श्रेष्टं प्रशासतमरिन्दमम् ॥ ९४॥ द्विषतां भयकर्तारं सुहृदां शोकनाशनम् पतिं द्रक्ष्यसि कल्याणि कल्याणाभिजनं नृपम् ॥ ९५ ॥ हैं । जो कुछ दिनों में वे गजा नल मुझको नहीं। पति गना नल सब दुखों से छुटकारा पाकर, मिरेंगे तो इम गरीर को त्यागकर मैं म्वर्गवास कम्गी पहले की तरह अतुन ऐश्वर्य के अधिकारी हुए हैं। क्योंकि टनके बिना मेरा जीना व्यर्थ है । मैं किसी तरह सिंहासन पर बैठकर वे नीति के अनुमार राजधर्म उनके विशेगकी व्यथा न सह सगी ॥८३१९०॥ का पालन करेंगे । ये प्रजा के पारन, दम्युओं के तब ऋषियों ने दमयन्ती का विनाप मुनकर दमन और भाई-बन्धुओं की मुम्ब-ममृद्धि बढ़ाने का कहा-हे शुभे ! आगे तुमको कल्याण और मुम्ब यन करेंगे। इस प्रकार दमयन्ती को यों तसटी प्राप्त होगा। हम लोग ना के प्रभाव में आनी दिव्य । देकर वे ताम्दी रोग अपने अमिष्टोत्र और आश्रम दृष्टि के द्वारा देख रहे हैं कि तुम बहुत सीघ्र अपने ' आदि सहित वही अन्नान हो गये । अव दमयन्नी पनि से मिलोगी। तुम गीघ्र ही देखोगी कि तुम्हारे यह देखकर मोचने लगी कि अब यह और क्या Pratininamernam.nrnimmm र ARUDHOCCALyrontprerrurrountryTITLEnrritan TrTHIP [ वनपर्व क्कनु marrianuarnmaunrammmmmamrachamisharinmanominamaintiman CRITICIDENarrang १७३८ म हा भारत CD raumiraramamunainamrunanaraumatiniuminamuraninanancianaiariary एवमुक्त्वा नलस्येष्टां महिपी पार्थिवात्मजाम् । तापसान्तर्हिताः सर्वे साग्निहोत्राश्रमास्तथा ॥ ९६॥ स दृष्ट्वा महदाश्चयं विस्मिता ह्यभवत्तदा । दमयन्त्यनवद्याङ्गी वीरसेननृपस्नुपा ॥ ९७॥ किं नु स्वप्नो मया दृष्टः कोऽयं विधिरिहाऽभवत् । ते तापसाः सर्वे व तदाश्रममण्डलम् ॥ ९८ ॥ क्क सा पुण्यजला रम्या नदी द्विजनिषेविता । क नु ते ह नगा हृद्याः फलपुष्पोपशोभिताः ॥ ९९ ॥ ध्यात्वा चिरं भीमसुता दमयन्ती शुचिस्मिता भर्तृशोकपरा दीना विवर्णवदनाऽभवत् ॥१०॥ सा गत्वाऽथाऽपरां भूमि वाष्पसंदिग्धया गिरा । विललापाऽश्रुपूर्णाक्षी दृष्ट्वाऽशोकतरुं ततः ॥१०१॥ उपगम्य तरुश्रेष्ठमशोकं पुष्पितं वने पल्लवापीडितं हृद्यं विहंगैरनुनादितम् ॥१०२॥ अहो वताऽयमगमः श्रीमानस्मिन्वनान्तरे आपीडैर्वहुभिर्भाति श्रीमान्पर्वतराडिव ॥१०३॥ विशोकां कुरु मां क्षिप्रमशोक प्रियदर्शन । वीतशोकभयावाधं कञ्चित्वं दृष्टवान्नृपम् ॥१०४॥ अद्भुन घटना हुई ! मैंने क्या यह म्वन देखा! पहुंची। वहां उसने एक अशोक का वृक्ष देखा ! वह वट आथम कहां गया ! पवित्र जलवाली वह नदी वृक्ष फूलों से लद रहा था। उसके ताये के रङ्ग के वहां गई ये मुन्दर वृक्ष कहां गये जिनमें फल और नये पल्लय वायु से हिल रहे थे । नाना प्रकार के पक्षी फूल लगे हुए थे ! जिन महात्माओं से में अभी वात- 1 उस वृक्ष की डालियों पर बैठे हुए मधुर स्वर से बोल चीन कर रही थी ये सब कहां चले गये ! वृहदश्व कहते रहे थे । शोक से व्याकुल हुई दमयन्ती जिसकी ३-२ गजा युधिष्ठिर ! दमयन्ती कुछ देर तक तो आंखों में आसू भर रहे थे गद्गद् स्वर से विराप या मोच करती रही उपगन्न अपने पनि के गोक करती हुई उस अशोक के वृक्ष के पास पहुँची। वे में फिरदीन और विवर्ण हो गई ॥९११००॥ पहने लगी-आहा ! यह अशोक का वृक्ष अपनी वनिमय करनी दुई किमी अन्य स्थान पर टालियां फैलाकर वनही कैसी शोभा बढ़ा रहा है। **l *1397"en "D> "C19***13*W'1byrrveem. OCUPRINTOUFNcrererwehren rommastaramrecorrouTINEntire womamNationyms अध्याय ६४] पहा मारत १७३९ orruaamanurturmTGTwमप्mcruirmaamTGTIRUAROL -ImmmmuTITATITATIMIT नलं नामाऽरिदमनं दमयन्त्याः प्रियं पतिम् । निषधानामधिपतिं दृष्टवानसि मे प्रियम् ॥१०५॥ एकवनार्धसंबीतं सुकुमारतनुत्वचम् व्यसनेनाऽदितं वीरमरण्यमिदमागतम् ॥ १०६॥ यथा विशोका गच्छेयमशोक नग तत्कुरु सत्यनामा भवाऽशोक अशोकः शोकनाशनः ॥१०७॥ एवं साऽशोकवृक्षं तमार्ता वे परिगम्य ह जगाम दारुणतरं देशं भैमी वराङ्गना ॥१०८॥ सा ददर्श नगान्नैकान्नेकाश्च सरितस्तथा नेकांश्च पर्वतात्रम्यान्नकांश्च मृगपक्षिणः ॥१०९॥ कन्दरांश्च नितम्वांश्च नदीश्चाऽद्भुतदर्शनाः । ददर्श नान्भीमसुता पतिमन्वेपती तदा ॥११०॥ गत्वा प्रकृष्टमध्वानं दमयन्ती शुचिस्मिता । ददर्शाऽथ महासार्थ हस्त्यश्वरथसंकुलम् उत्तरन्तं नदी रम्यां प्रसन्नसलिलां शुभाम् । सुशीततोयां विस्तीर्णा हृदिनी वेतसैनाम् ॥ ११२ ।। प्रोद्धष्टां क्रौञ्चकुरेरैश्चक्रवाकोपकूजिताम् हमें एकाएक देखने में ऊँचे शिम्बरों से गोभित पर्दन वह इधर टधर गजानन की ताराम करती हुई को घोबा होता है । हे अयोक के वृक्ष ! तुम मुझे एक अत्यन्त मयान न्यान में आ पहुंची । वटा टमने बहुत प्यारे लग रहे हो । मैं तुम्हारे पास आई हूँ। बहुत मे वृक्ष, नद, नदी, पर्वत, मृग और पक्षी देखे तुम गीत मेरे शोक को दूर कर दो। तुमने क्या और पर्वत की कन्दराओं को देखती हुई एक ऊँची मेो पनि राजा नल को घर आने देखा है। अपने रहगे मे गोभिउ मच्छ बनवारी नदी के किनारे सुकुमार शरीर को आधी धोती मे ढक्कर इमी वन पहुँची ॥१०९०११०॥ में आये हैं। हे अशो! तुम दह यन कगे जिसमे उसके दोनों ओर वेन और माऊ के मन थे। मैं तुम्हारे पाम मे मो रहित होकर जा मई। कोच, कुम, मारम, नावाक आदि जरचा जीय गीय मेग गोक हटाकर अपने नाम की मार्थक करो। मधुर वा में गीन मा गांत पना 31. गडा भीम की कन्या, दमयन्ती पनि मोर टहार विनर थे, मठ-ग, मगर आदि व्याकुर होकर अनोक वृक्ष पाम म आगे बढ़ी। जनचा जीव भानन्द जाय। Emmmmunniuminstinimittaintmdadhimilaintan.militaliGTIALIdanant maintamanihmlamummmmmon nnel stuntain turna DOECErrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrruuttamcorrur [ वनपर्व १७४० म हा भारत DDLCLAIMinainalianarmuhun nuint arrianRALAMICHELtuarantanaries DuouTIOTITATITION .. Ramantrmanaananamrircritin pinmami iranmimiR TERREAREIR । कूर्मग्राहझपाकीणां विपुलद्वीपशोभिताम् सा दृष्दैव महासाथ नलपत्नी यशस्विनी उपसर्प वरारोहा जनमध्यं विवेश ह ॥११४॥ उन्मत्तरूपा शोकार्ता तथा वस्त्रार्धसंवृता कृशा विवर्णा मलिना पांसुध्वस्तशिरोरुहा ॥११५॥ तां दृष्ट्वा तत्र मनुजाः केचिद्भीताः प्रदुद्रुवुः । केचिच्चिन्तापरा जग्मुः केचित्तत्र विचुकुशुः ॥११६ ।। प्रहसन्ति स्म तां केचिदभ्यसूयन्ति चाऽपरे । अकुर्वत दयां केचित्पप्रच्छुश्चापि भारत ।११७॥ काऽसि कस्याऽसि कल्याणि किं वा मृगयसे बने । तां दृष्ट्वा व्यथिताः स्मेह कच्चित्वमसि मानुपी ।। ११८ । वद सत्यं वनस्याऽस्य पर्वतस्याऽथवा दिशः देवता त्वं हि कल्याणि त्वां वयं शरणं गताः ॥ ११९ ।। यक्षी वा राक्षसी वा त्वमुताहोऽसि वराङ्गना सर्वथा कुरु नः स्वस्ति रक्ष वाऽस्माननिन्दिते ॥१२०।। यथाऽयं सर्वथा सार्थः क्षमी शीघ्रमितो ब्रजेत् । उस समय उस नदी पर एक बड़ा जनसमूह अर्थात् । स किसी एक ने पूछा-हे कल्याणी ! तुम कौन हो! काफला जिसके साथ बहुत से हाथी, घोड़े और रथ किसकी स्त्री हो और इस वन में क्या हूँढ़ रही हो' थे उतर रहा था । दमयन्ती उस काफले को देखकर तुम्हारी दशा देखकर हमें बड़ा दुख हो रहा है । मीन वहां पहुंची और उन्हीं के बीच में मिल गई।। तुम अपना परिचय देकर हमारी उत्कण्ठा दूर करो। पति के शोक से बिद्दल, आधा वस्त्र पहने हुए, दुर्बल। तुम क्या मानुषी हो ! या इस वन, पहाड़ और दिशा और धूल में भरी हुई दमयन्ती को देखकर बहुत से | की अधिष्ठात्री देवी हो ! या यक्ष अथवा राक्षस की मनुष्य दर के मारे भागने लगे, कोई मिन्ता करने | कन्या हो । जो हो, हम तुम्हारे शरणागत हैं । शीघ्र लगे, कोई पुकारने लगे, कोई तरह-तरह के सन्दह अपना परिचय देकर हमारे सन्देह को दूर करो तुम हाक दमयन्नी के आर अनेक प्रकार के दोषों का ऐसा करो कि मार्ग में हमें किसी प्रकार के विन का आगाम करने लगे । कई मनुष्यों ने उसे देखकर सामना न करना पड़े ॥१११११२०॥ मामी की। उनमें कुछ श्रेष्ठ मनुष्य भी थे। यह सुनकर दमयन्ती उम काफले के स्वामी दमयन्नी के गदादम्बार उन्हें दया आई, टन और पालक, वृद्ध और जवान मनुष्यों से जो उसके ZSRIDurammarpauLOID TIMIZATITHI arvironion - NAME - 1 Cireraturernatinuour CLETEORUMPICMCapint अध्याय ६४] महा मा र त १७४१ AnorammarnamD.mmm rsummmmmmmmmmmmmmmmmunm.arunanumaramanian - n'imUMMITITUD LMOITOLAITU MUTLULTOR CU U TOM LOTTOTITITICUMLULLUVILUULOID तथा विधत्स्व कल्याणि यथाश्रेयो हि नो भवेत् ।।१२१॥ तथोक्ता तेन सार्थेन दमयन्ती नृपात्मजा प्रत्युवाच ततः साध्वी भर्तृव्यसनपीडिता ॥१२२॥ सार्थवाहं च सार्थं च जना ये चाऽत्र केचन । युवस्थविरवालाश्च सार्थस्य च पुरोगमाः ॥१२३॥ मानुषीं मां विजानीत मनुजाधिपतेः सुताम् । नृपस्नुपां राजभार्यां भर्तृदर्शनलालसाम् ॥१२४॥ विदर्भराण्मम पिता भर्ता राजा च नैपधः नलो नाम महाभागस्तं मार्गाम्यपराजितम् ॥१२५॥ यदि जानीत नृपतिं क्षिप्रं शंसत मे प्रियम् नलं पुरुषशार्दूलममित्रगणसूदनम् ॥१२६॥ तामुवाचाऽनवद्याङ्गीं सार्थस्य महतः प्रभुः सार्थवाहः शुचिर्नाम शृणु कल्याणि मद्वचः ॥१२७॥ अहं सार्थस्य नेता वै सार्थवाहः शुचिस्मिते । मनुष्यं नलनामानं न पश्यामि यशस्विनि ॥१२८॥ कुञ्जगद्वीपिमहिषशार्दूलःमृगानपि पश्याम्यस्मिन्वने कृत्स्ने ह्यमनुष्यनिषेविते ॥१२९॥ ऋते त्वां मानुषीं मर्त्य न पश्यामि महावने तथा नो यक्षराडद्य मणिभद्रः प्रसीदतु ॥१३०॥ साऽब्रवीद्वणिजः सन्सिार्थवाहं च तं ततः सन्मुख खड़े हुए थे कहने लगी-मैं राजपुत्री, राजा बतला दो । दमयन्ती के यों कहने पर शुचि नाम के की पुत्रवधू और राजा ही की भार्या हूँ और मानुषी उस काफले के स्वामी ने कहा-हे कल्याणी ! मैं हूँ। अपने पति के दर्शनों की इच्छा से यहां फिर काफले का स्वामी हूँ । नल नाम का कोई मनुप्य मुझे रही हूँ। विदर्भ देश के महाराज भीम मेरे पिता हैं कहीं नहीं दिखाई दिया। मैंने इस में अनेक और निषध देश के राजा महाराज नल मेरे स्वामी प्रकार के पक्षी देखे हैं। मैंमा, रीछ, शार्दूल, मृग, हैं। सो मैं उन्हीं अपने पति को ढूँढ रही हूँ। यदि हाथी और तरह-तरह के अनेक जीव जन्तु भी देखे तुममें से किसी एक ने उनको देखा हो तो शीघ्र ! हैं; किन्तु इस निर्जन वन में तुम्हारे मिवा और किसी amavcimiummmmmmmmuwamanainamama.mamtaiaNaIAxidadaMILamadhanGurunm. - । इस । । guina am ulurROID'UNEDITI UMUM UND PUU'ITTAIN TID ILUTULOTUOLTO १७४२ म हा मारत ( वनपर्व Panmitrarmiliaunmananemliminimummmittirmaamanarammranimtamanam क्व नु यास्यति सार्थोऽयमेतदाख्यातुमर्हसि ॥१३१॥ सार्थवाह उवाच-सार्थोऽयं चेदिराजस्य सुवाहोः सत्यदर्शिनः । क्षिप्रं जनपदं गन्ता लाभाय मनुजात्मजे ॥१३२॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि दमयन्तीसार्थवाहसंगमे चतुःपष्टितमोऽध्यायः॥६४॥ मनुप्य को नहीं देखा । यक्षों का राजा मणिभद्र हम लोग लाभ की इच्छा से चेदिदेश के राजा सुबाहु हम पर प्रसन्न हो। यह सुनकर दमयन्ती ने पूछा- के राज्य में जा रहे हैं ॥१२१२१३२॥ तुम्हारा काफला कहां को जायगा ? उन्होंने कहा- वनपर्व' का चौंसठवां अध्याय ममान हुआ ।। ६४ ॥ DUINDumraamana comamraamnmammonium अथ पञ्चपष्टितमोऽध्यायः ।। ६५ ।। बृहदश्व उवाच-सा तच्छ्रुत्वाऽनवद्यागी सार्थवाहवचस्तदा जगाम सह तेनैव सार्थेन पतिलालसा अथ काले बहुतिथे वने महति दारुणे तडागं सर्वतोभद्रं पद्मसौगन्धिकं महत् ददृशुर्वणिजो रम्यं प्रभूतयवसेन्धनम् बहुपुष्पफलोपेतं नानापक्षिनिषेवितम् निर्मलस्वादुसलिलं मनोहारि सुशीतलम् । सुपरिश्रान्तवाहास्ते निवेशाय मनो दधुः संमते सार्थवाहस्य विविशुर्वनमुत्तमम् उवास सार्थः सुमहान्बेलामासाद्य पश्चिमाम् ॥ ५ ॥ पमटयां अध्याय ॥ ६॥ वृदिध कहते है-दे युधिष्ठिर ! दमयन्ती सार्थ सपन टण्डी छाया देखकर सार्थवाहक से कहने लगे वाहक की बात सुनकर पति के देखने की इच्छा से | कि अब सायंकाल हो गया है। आप इसी स्थान बापरे के माय दोहाथो दिनों में वह काफर। पर विश्राम कीजिए । यह सुनकर सार्थयाटक ने भयानक वन में एक पा मोगन्धिक नाम के सरोवर । यही टहरने की आजा दे दी और वह काफाला वहीं के किनारे पहुँच। जिसमें कमल पल रहे थे । उस टहर गया ॥१॥ पापलेकाच्या रोग मायान पाल, पोमें धीरे-धीरे रात दो गई । चारों और अन्स रोपाम, राने पोधन, पाने की मुन्दर म्वादिष्ट छा गया। धके हुए काफले के गनुप्य तुरन्त रेटार पर, मनि की मोटे पर, और आराम करने को विराट लग लाइम नगद आधी रात के गभग MIFINImmunGULATASTICKERA.Guwarminor-INTAMMELAAADATEG. mumtarometronmIremurenTHREEnterpuruwater - L'UTITTIMANTTILLATELY TED LID OLD LANTZULIALDITORIULUI अध्याय ६५]. म हा मा रत १७४३ Emmanuaruwaommmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmanummarammar अथाऽर्धरात्रसमये निःशब्दस्तिमिते तदा सुप्ते सार्थे परिश्रान्ते हस्तियूथमुपागमत् पानीयार्थं गिरिनदी मदप्रस्रवणाविलाम् अथाऽपश्यत सार्थं तं सार्थजान्सुवहून्गजान् ॥ ७ ॥ ते तान्याम्यगजान्दृष्ट्वा सर्वे वनगजास्तदा समाद्रवन्त वेगेन जिघांसन्तो मदोत्कटाः ॥ ८ ॥ तेपामापततां वेगः करिणां दुःसहोऽभवत् । नगाग्रादिव शीर्णानां शृङ्गाणां पततां क्षितौ ॥ ९ ॥ स्पन्दतामपि नागानां मार्गा नष्टा वनोद्भवाः । मार्ग संरुध्य संसुप्तं पद्मिन्याः सार्थमुत्तमम् ॥ १० ॥ ते तं ममर्दुः सहसा चेष्टमानं महीतले हाहाकारं प्रमुञ्चन्तः सार्थिकाः शरणार्थिनः ॥ ११ ॥ वनगुल्मांश्च धावन्तो निद्रान्धा वहवोऽभवन् । केचिद्दन्तैः करैः केचित्केचित्पद्यां हता गजैः ॥ १२ ॥ निहतोष्ट्राश्ववहुलाः पदातिजनसंकुलाः भयादाधावमानाश्च परस्परहतास्तदा व्यतीत हो जाने पर वन में सब जगह सन्नाटा छा मर गये और अकस्मात् निद्रा से स्टार इधर-उघर गया। जिनके कपोलों पर मद वह रहा है उन हाथियों दौड़ने लगे। उन हाथियों ने बहुत से मनुष्यों को सूट का एक झुण्ड इमी समय पहाड़ी नदी में जल पीने । मे पकड़कर मार डाना, बहुतों को दांतों से दवा के लिये वहां पर आया । उस हाथियों के झुण्ड ने दिया और बहुनों को पाव से दावकर नष्ट किया। वहां काफले के मनुप्य और उन मनुष्यों में कई हाथी इस प्रकार से जब वे लोग मारे गये तब जो उनमें देखे । वे वन के हाथी उन ग्राम के हाथियों के बच रहे थे वे चिल्लाने पुकारते टकराते और गिरत- मारने को बड़े वेग से दौड़। उनमें लड़ने, भिड़ने, पड़ते जहां तहां भागने लगे। उनमें से बहुत से दौड़न और गिरने का ऐसा गन्द हुआ मानों पहाड़ महाविपत्ति देखकर अपनी जान बचाने के लिये वृक्षों की चोटियां पृथ्वी पर गिरती है। उनके गिरने मे पर चढ़ गये; किन्तु पदले मे अधिक टर के मारे उस वन के सब मार्ग रुक गये और उस मरोवर के कॉपते हुए वे ऊपर से गिर पड़े ॥५॥१२॥ सोते भी बन्द हो गये 1 उन हाथियों के दाड़ने मे इस प्रकार मे टस काफले के बहुन से मनुष्य, काफले के बहुत मे मनुष्य हाथियों के पांव से दवर ऊँट और घोड़े टन हाथियों ने मार डाले और पेमा Emeram.neDEEPETEmmsenrTLETTEETTETTTERPrarrernet : שמיניוימוומונופש'חמישיסטיוימזיןזיופיודיפויושזיפיסנויאויאוישימו יוון יפיפני: * ש'מיין Gil । -- [ पनपर्व InmimmunGLGITTARIRTUNDARudummaNPAATE HISHIROr piranarrant १७४४ म हा मारत EmasonrmRITITIMAmmammmmmmanmyanmummernmratarunarwarnamardananeg घोरान्नादान्विमुञ्चन्तो निपेतुर्धरणीतले वृक्षवारुह्य संरब्धाः पतिता विषमेपु च ॥ १४ ॥ एवंप्रकारैर्वहुभिर्देवेनाऽऽक्रम्य हस्तिभिः राजन्विनिहतं सर्वं समृद्धं सार्थमण्डलम् ॥ १५ ॥ आरावः सुमहांश्चाऽऽसीत्रैलोक्यभयकारकः एपोऽग्निरुत्थितः कष्टस्त्रायचं धावताऽधुना ॥ १६ ॥ रत्नराशिर्विशीर्णोऽयं गृह्णीध्वं कि प्रधावत सामान्यमेतद् द्रविणं न मिथ्या वचनं मम ॥१७ एवमेवाऽभिभाषन्तो विद्रवन्ति भयात्तदा पुनरेवाऽभिधास्यामि चिन्तयध्वं सकातराः ॥ १८॥ तस्मिस्तथावर्तमाने दारुणे जनसंक्षये दमयन्ती च बुबुधे भयसंत्रस्तमानसा अपश्यद्वैशसं तत्र सर्वलोकभयंकरम् अदृष्टपूर्व तदृष्ट्वा वाला पद्मनिभेक्षणा संसक्तवदनाश्वासा उत्तस्थौ भयविह्वला ये तु तत्र विनिर्मुक्ताः सात्केिचिदविक्षताः ॥ २१ ॥ तेऽत्रुवन्सहिताः सर्वे कस्येदं कर्मणः फलम् । नूनं न पूजितोऽस्माभिर्मणिभद्रो महायशाः ॥ २२॥ शब्द उन सत्र के चिल्लाने पुकारने का हुआ था कि इधर-उधर भागने लगे। मनुष्यों के मरने और घायल उसको सुनकर त्रिलोकी को भय उत्पन्न हो जाय । होने से जो भयानक कोलाहल मचा, उससे दमयन्ती चाग ओर सुन पड़ने लगा-हाय ! कैसी भयानक की आंख खुल गई । कमल-नयनी दमयन्ती पहले आग जल टटी है, शीघ्र आकर हमारी रक्षा करो। कभी न देखे हुए भयानक नर-नाश को देखकर बहुत हमार ये धन और स्लों के देर विखरे पड़े हैं। इन्हें ही डरी और कांपती हुई उठ बैठी ॥१३॥२०॥ आकर उटाओ । यह सब धन हमारे लेखे बहुत ही उघर जो लोग इस दारुण विनाश से किसी माधारण है। इसे ले लो। कहां भागे चले जा रहे तरह बच गये थे ये सब मिलकर परस्पर कहने लगे- दो ! इस प्रकार बद-पूर्ण वचन कहकर, आर्तनाद | इस आगति के पड़ने का क्या कारण है? कोई बोला परन हुए, काफले के मनुष्य अपनी-अपनी जाने रेफर | कि हम लोगों ने यशस्वी मणिभद्र की पूजा नहीं की, SOHDaianimuITAmarmusumurtainaliaom.aurandar aasamaaDiseamrat Hr02049BRDAryarurANTRATEPTLITEmerature Termarevaitiveurna अध्याय ६५]] म हा भारत १७४५ GW.TORIN Tarannum TTDI MulunARuminumarammarnaCrum - ETIDUNIDuramupRIRAITAPUPTITUnrelumourururururammDHANUMrmourent यथा यक्षाधिपः श्रीमान्न वै वैश्रवणः प्रभुः । न पूजा विघ्नकर्तृणामथवा प्रथमं कृता ॥ २३ ॥ शकुनानां फलं वाऽथ विपरीतमिदं ध्रुवम् ग्रहा न विपरीतास्तु किमन्यदिदमागतम् ॥ २४ ॥ अपरेत्वब्रुवन्दीना ज्ञातिद्रव्यविनाकृताः यासावद्य महासार्थे नारी ह्युन्मत्तदर्शना ॥ २५॥ प्रविष्टा विकृताकारा कृत्वा रूपममानुषम् तयेयं विहिता पूर्व माया परमदारुणा ॥ २६ ॥ राक्षसी वा ध्रुवं यक्षी पिशाची वा भयंकरी । तस्याः सर्वमिदं पापं नाऽत्र कार्या विचारणा ॥ २७ ॥ यदि पश्याम तां पापां सार्थप्नीं नैकदुःखदाम् । लोप्टभिः पांसुभिश्चैव तृणैः काष्टैश्च मुष्टिभिः ॥ २८ ॥ अवश्यमेव हन्यामः सार्थस्य किल कृत्यकाम् । दमयन्ती तु तच्छुत्वा वाक्यं तेपां सुदारुणम् ॥ २९ ॥ हीता भीता च सविना प्राद्रवद्यत्र काननम् । आशङ्कमाना तत्पापमात्मानं पर्यदेवयत् ॥ ३० ॥ अहो ममोपरि विधेः संरम्भो दारुणो महान् । दूमरे ने कहा कि हमने यक्षों के राजा कुबेर को नहीं अथवा पिशाचिनी है केवल उसी के कारण से ही मनाया था, तीसरे ने कहा कि हमने पहले सब विघ्नों यह उपाधि उठी थी। जो उसको हम लोग अब देख को दूर करनेवाले देवताओं की आराधना नहीं की; पावें तो उस नाशकर्ता को अवश्य ढेले, लकड़ी, किसी ने कहा कि चलते समय हमने जो सगुन देखे थे। मुक्कों से मार डालें क्योंकि उसी के कारण हमारा उनका यह विपरीत फल है।यात्रा के समय ग्रह और दल नष्ट हो गया है और हमारे भाई-बन्धु मारे गये नक्षत्र, सभी हमारे अनुकूल थे 1 मालूम नहीं, फिर ! हैं । उनके ऐसे दारुण वचन सुनकर दमयन्ती बहुत क्यों ऐसी घोर दुर्घटना हुई । उनमें फिर किसी ने ही डरी और लजिन हुई । यह होनेवाले अनर्थ ही जिसके सम्बन्धी मारे गये थे और धन नष्ट हो गया था से शीम भागकर वन के भीतर छिप रही कहा कि यह जो उन्मत्त स्त्री विकृताकार हमारे काफले और बारम्बार पश्चाताप करती हुई कहने लगा-हाय ! में आई है इसी ने यह माया रची है। निश्चय वह मेरे कार ईश्वर का कैसा यहा कोप है, कुछ सगा मी मानुषी नहीं है वह कोई राक्षसी या यक्षिणी में नहीं आता ॥२१॥३०॥ PLOADImanorandu. TRILOKaalaunaulomadiladi.cmaravah - ANSTERTILATrand. आशका and DrumpwoutuRTUPurcircrcretarCEELamrat Merrer' १७४६ महाभारत [ वनपर्व HAIMUCATIணராமாயகரமாaimuraவாைரராடினானாப் TA । Treantarar mmmmmmmucuurmr ma URIAnmoamilAnurammnamamuTNE नाऽनुवधाति कुशलं कस्येदं कर्मणः फलम् ॥ ३१ ॥ न स्मराम्यशुभं किंचित्कृतं कस्यचिदण्यपि ।' कर्मणा मनसा वाचा कस्येदं कर्मणः फलम् ॥ ३२ ॥ नूनं जन्मान्तरकृतं पापमापतितं महत् । अपश्चिमामिमां कष्टामापदं प्राप्तवत्यहम् भर्तृराज्यापहरणं स्वजनाञ्च पराजयः भर्ना सह वियोगश्च तनयाभ्यां च विच्युतिः ॥ ३४ ॥ नि थता वने वासो बहुव्यालनिविते अथाऽपरेयुः संप्राप्ते हतशिष्टा जनास्तदा देशात्तस्माद्विनिष्क्रम्य शोचन्ते वैशसं कृतम् भ्रातरं पितरं पुत्रं सखायं च नराधिप अशोचत्तत्र वैदर्भी किं नु मे दुष्कृतं कृतम् । योऽपि में निर्जनेऽरण्ये संप्राप्तोऽयं जनार्णवः ॥ ३७॥ स हतो हस्तियूथेन मन्दभाग्यान्ममैव तत् प्राप्तव्यं सुचिरं दुःखं नूनमद्याऽपि वै मया ॥ ३८ ॥ नाऽप्राप्तकालो म्रियते श्रुतं वृन्दानुशासनम् । या नाऽहमद्य मृदिता हस्तियूथन दुःखिता ॥ ३९ ॥ जहां जाती हूँ वहा मजल की सम्भावना नहीं | के शेष रहे हुए मनुष्य उस स्थान से निकलकर देख पड़ती । हाय ! मैंने ऐसा क्या किया है कि अपने भाई, पिता और पुत्र और मित्रों के मरने का जिसके कारण से यह दु ख प्राप्त हुआ है । मैंने सोच करने लगे। और दमयन्ती भी यह सोच करने आजतक मन, वाणी और शरीर से भी किसी का लगी कि हाय ! मुझसे क्या अपराध बन पड़ा है कि बुछ नहीं बिगाहा निश्चय इस दुख का कारण मेरे जिसके कारण से इस निर्जन वन में काफले का पूर्व जन्मों के कमों का फल है कि जिसके कारण मिलना हुआ वह भी मेरे भाग्य से हाथियों से मारा से मेरे उपर ऐसे ऐसे दु रा पढ़े पति के राज्य का गया निस्सन्दह मुझको अभी बहुत दिनों तक ऐसा जाना, मुजन से हारना, पति का वियोग होना, पुत्रों ही दुख रहेगा। मैंने जो बड़ों से मुना था कि बिना से अलग रहना, नाथ से अनाथ हो जाना और इस समय पूरा हुए कोई नहीं मरता है सो सत्य है। दुग्यदायी पन में वास करना जिसमें बड़े-बड़े सर्प देगो, मुश दुखिया को हाथियों ने भी नहीं मारा। गहने दें। इसके पीछे जब मान काल हुआ तब काफले मेरी समझ में बिना ईश्वर की इच्छा से कुछ नहीं nuTMENumsamucatunaraummmunMunabihanumharrassmanartha usly'319"TRUTCI"COND'ler ucuruicrciocraeror OTCATO CUONCUCVULTIVUT" (IT अध्याय ६५] महा मारत १७४७ MirmananTTATREGrnmmmnamaAITIGoraramamuramurarurammmunal - JIKUNDT TAIT ATTOOTHPANTITTTT POTSITMn.MNTIREME न ह्यदैवकृतं किंचिन्नराणामिह विद्यते न च मे वालभावेऽपि किंचित्पापकृतं कृतम् ॥४०॥ कर्मणा मनसा वाचा यदिदं दुःखमागतम् । मन्ये स्वयंवरकृते लोकपालाः समागताः प्रत्याख्याता मया तत्र नलस्याऽर्थाय देवताः । नूनं तेषां प्रभावेण वियोगं प्राप्तवत्यहम् ॥ ४२ ॥ एवमादीनि दुःखार्ता सा विलप्य वराङ्गन्ना प्रलापानि तदा तानि दमयन्ती पतिव्रता ॥४३॥ हतशेपैः सह तदा ब्राह्मणैर्वेदपारगैः अगच्छद्राजशार्दूल चन्द्रलेखेव शारदी ॥ ४४ ॥ गच्छन्ती साऽचिराद्वाला पुरमासादयन्महत् । सायाहे चेदिराजस्य सुवाहोः सत्यदर्शिनः ॥४५॥ अथ वस्त्रार्थसंवीता प्रविवेश पुरोत्तमम् तां विह्वलां कृशां दीनां मुक्तकेशीममार्जिताम् ॥ १६ ॥ उन्मत्तामिव गच्छन्ती ददृशुः पुरवासिनः । प्रविशन्ती तु तां दृष्ट्वा चेदिराजपुरी तदा ॥४७॥ अनुजग्मुस्तत्र वाला ग्रामिपुत्राः कुतूहलात् । सा तैः परिवृताऽगच्छत्समीपं राजवेश्मनः होता है और जो कहो कि यह मेरे पापों का फल । होकर, वहां से चल दिये । उनमें कुछ वेद-पाठी है तो मैंने कोई पाप शरीर या मन अथवा वाणी से ब्राह्मण भी थे। शोक से व्याकुल दमयन्ती क्या बाल अवस्था में भी नहीं क्यिा ॥३१॥४०॥ करती ! लाचार वह भी कुछ देर में उन ब्राह्मणों के में जानती हूँ मैंने अपने स्वयम्वर में लोकपाल पीछे पीछे जाने लगी । इस प्रकार दिन भर चलकर दवताओं को छोड़कर नल को ही वरा था। यह अन्त को सन्ध्या से पहले दमयन्ती चेदिदेश के राजा मेरा वियोग उन्हीं की कुदृष्टि से ही हुआ है। पतिव्रता मुबाहु के गज्य में पहुंची। आधा वस्त्र पहने हुए दमयन्ती इस प्रकार मन में विलाप और चिन्ता करने । दमयन्ती म्वामी के गोक से अत्यन्त अधीर होरही थी। लगी। इधर मरने से बचे हुए मुमाफिर, माई, पिता, उसके बाल खुले हुए थे, शरीर मैला था और यह पुत्र, पन्धु वान्धव आदि के नाम से अत्यन्त शोकाकुल | दुचली तथा दीन थी। पागलों की तरह सब नगर. - BaanmummunmummmmmshniciaDreaml Trium PARITRuminumm.inaniml. 11100 . Lowcu WU'thu Ungut W't'stuunerwarte1*1LOTITCremrLu'il'tr'n'13 १७४८ म हा मारत • 11५५ LilimnamaintainmmmmmmmmmmmminimunanananatimaNILIMImmendmarimmertime raniamamumannanaIATIGauriHTTORESARImE Mummary 13mICID'SUCDutRILMS तां प्रासादगताऽपश्यद्राजमाता जनताम् धात्रीमुवाच गच्छैनामानयेह ममाऽन्तिकम् ॥ ४९ ॥ जनेन क्लिश्यते वाला दुःखिता शरणार्थिनी । ताग्रूपं च पश्यामि विद्योतयति मे गृहम् उन्मत्तवेषा कल्याणी श्रीरिवाऽऽयतलोचना । सा जनं वारयित्वा तं प्रासादतलमुत्तमम् ॥ ५१ ॥ आरोग्य विस्मिता राजन् दमयन्तीमपृच्छत । एवमप्यसुखाविष्टा विभर्षि परमं वपुः ॥ ५२ ॥ भासि विद्युदिवाऽभ्रेपुशंस मे काऽसि कस्य वा। न हि ते मानुपं रूपं भूपणैरपि वर्जितम् असहाया नरेभ्यश्च नोद्विजस्यमरप्रभे तच्छ्रुत्वा वचनं भैमी वचनमब्रवीत मानुषीं मां विजानीहि भर्तारं समनुव्रताम् सैरन्ध्री जातिसंपन्नां भुजिप्यां कामवासिनीम् ॥ ५५ ॥ फलमूलाशनामेकां यत्रसायंप्रतिश्रयाम् असंख्येयगुणो भर्ता मां च नित्यमनुनतः भक्ताऽहमपि तं वीरं छायेवाऽनुगता पथि वासियों के सामने वह वस्ती के भीतर गई। कई एक | खिझा रहे हैं। [मैं उसके दुःख को देखकर दुखी बालक और स्त्रियां दमयन्ती को इस दशा में देख- हो रही हूँ।] इमलिये तू उसे यहां ले आ।स्वामिनी का, पागल सी समझकर, उसके पछि-पछि हो लिये। की आज्ञा से धाय उसी समय महल से उतरकर, भीड़ अब उन सबसे घिरी हुई दमयन्ती चलते-चलते राज को हटाकर, दमयन्ती का बुला लाई और राजमाता महल के पास पहुँची ॥४१॥४८॥ के पास पहुंची। धाय ने दगयन्ती से कहा-ऐसी उस समय वहां के राजा की माता अपने मद्दल दशा में भी तुम्हारा अरोकिक रूप-लावण्य है । है पर टहल रही थीं। उन्होंने वहां से बालों से घिरी शुभ ! तुम कौन हो ! किसलिये अत्यन्त असहाय हुई दमयन्नी को देखा। पाय को बुलाकर उन्होंने | और अनाथ की तरह अकेरी धूम रही हो ! मनुष्य पहा-देख पाय ! यह जो दीन येष से तेजस्विनी | तुम्हें यश दे रहे हैं तो भी तुम चुपचाप हो । इसका माक्षात् २६मापिणी की पागरी की तरह चरी कारण क्या है दमयन्ती ने उस धाय को यही उर जादी है उमे, पगरी ममका, भारफ यहुत ६ दिया-मैं पनियता और कुलीन स्त्री हूँ। केवल फल. GREATurmamam - - AuddasasasmolanatarumsumanAmATIONummasranAmanAmAnasundlani अध्याय ६५] म हा मारत १७४९ Harmanantonanmammonommamminiantrimmirmirmirmananागाcularunarama ॥ ५७॥ amamaram.mmmmmmmmm.in.muLUNDAamulineni aanuamnd तस्य दैवात्प्रसङ्गोऽभूदतिमात्रं सुदेवने द्यूते स निर्जितश्चैव वनमेक उपेयिवान् तसेकवसनं वीरमुन्मत्तमिव विह्वलम् ॥ ५८॥ • आश्वासयन्ती भर्तारमहमप्यगमं वनम् स कदाचिद्वने वीरः कस्मिंश्चित्कारणान्तरे ॥ ५९॥ क्षुत्परीतस्तु विमनास्तदप्येकं व्यस यत् तमेकवसना नग्नमुन्मत्तवदचेतसम् अनुव्रजन्ती बहुला न स्वपामि निशास्तदा । ततो बहुतिथे काले सुप्तामुत्सृज्य मां क्वचित् ॥ ६१ ॥ वाससोऽध परिच्छिद्य त्यक्तवान्मामनागसम् । त मार्गमाणा भर्तारं दह्यमाना दिवानिशम् ॥ ६२ ।। साऽहं कमलगर्भाभमपश्यन्ती हृदि प्रियम् । न विन्दाम्यमरप्रख्यं प्रियं प्राणेश्वरं प्रभुम् ॥ ६३ ॥ तामश्रुपरिपूर्णाक्षी विलपन्ती तथा बहु राजमाताऽब्रवीदार्ता भैमीमार्तखरां स्वयम् ॥ ६४ ॥ वसस्व मयि कल्याणि प्रीतिमें परमा त्वयि । , मृगयिष्यन्ति ते भद्रे भर्तारं पुरुपा मम मूल खाकर ही अपने जीवन का निर्वाह करती हूँ। लटकर सो जाते देख मैं भी उन्हीं के पास सो रही। और जहां सन्ध्या हो जाती है वहीं ठहर जाती हूँ। सोते ही मुझे निद्रा आ गई क्योंकि में कई रात्रि तक मेरे पति असंख्य गुणों के रखनेवाले और मुझको जागती रही थी। आंख खुलने पर मैंने उठकर देखा, चाहनेवाले हैं। मैं भी छाया की तरह सदा उनके । वे मेरी साधी धोती फाड़कर कहीं चले गये हैं। साथ रहती थी। देवइच्छा से मेरे पति ने जुआ विलाप करती हुई, अकेली देश-देश में उन्हीं को खेला था उसमें वे हारकर अकेले एक वस्त्र पहनकर मैं देखती फिर रही हूँ। किन्तु अबतक कहीं भी वन को चल दिये ! मैं भी उन्हें धर्य देती हुई उनके उनके दर्शन नहीं हुए। पतिव्रता दमयन्ती इस तरह पीछे-पीछे होली । एक दिन मुम्ब-प्याम से बहुत ही अपना वृत्तान्त वर्णन करते-करते गोक में मम होकर व्याकुल होकर ये घूम रहे थे कि उनका वह एक आँसू बहाने लगी। यह मुनकर गजमाना को बड़ा वस्त्र भीदाथ से चला गया ॥४९॥५॥ दुख हुआ। अब उन्होंने विचार करती दु.मी और तब उन्हें न, चिन्ता में इये, धीरे-धीरे वही । गद्गद वाणी से बोलती हुई दमयन्नी को धर्य देकर מושיטישזיפי! זיפזופוביש'יז'נ'צ'זינהמתמחוננו - Jamaian Tick ogramme MOTORIEOntarvamirmiretrusottamremurrcrapircrarendra [ बनपर्व - LANATATIOTALADImmumouTIRTEL DIALORADABANDED १७५० म हा भारत CIRRHITEimurariharaLITIATIanaumaraாயாTaartTTEET अपि वा खयमागच्छेत्परिधावन्नितस्ततः इहैव वसती भद्रे भर्तारमुपलप्स्यसे राजमातुर्वचः श्रुत्वा दमयन्ती वचोऽब्रवीत् । समयेनोत्सहे वस्तुं त्वयि वीरप्रजायिनि ॥ ६७॥ उच्छिष्टं नैव भुञ्जीयां न कुर्यां पादधावनम् । न चाऽहं पुरुपानन्यान्प्रभाषेयं कथंचन ॥ ६८॥ प्रार्थयेद्यदि मां कश्चिद्दण्डयस्ते स पुमान्भवेत् । वध्यश्च तेऽसकृन्मन्द इति मे व्रतमाहितम् ॥ ६९ ॥ भर्तुरन्वेषणार्थं तु पश्येयं ब्राह्मणानहम् यद्येवमिह वत्स्यामि त्वत्सकाशे न संशयः ॥ ७० ॥ अतोऽन्यथा न मे वासो वर्तते हृदये कचित् । तां प्रहप्टेन मनसा राजमातेदमब्रवीत् ॥ ७१ ॥ 'सर्वमेतत्करिण्यामि दिष्ट्या ते व्रतमीदृशम् । एवमुक्त्वा ततो भैमी राजमाता विशांपते ॥ ७२ ।। उवाचेदं दुहितरं सुनन्दां नाम भारत सैरन्ध्रीमभिजानीव सुनन्दे देवरूपिणीम् ॥ ७३ ॥ वयसा तुल्यतां प्राप्ता सखी तव भवत्वियम् । कहा-हे कल्याणी में तुमपर बहुत प्रमन्न हूँ। तुम | तो आप उसे उसी समय दण्ड दें। जो वह उसपर मेरे पाम रहे। मेरे अनुचर लोग तुम्हारे स्वामी का भी न माने तो आपको उसे माणदण्ड देना होगा। पता लगा देंगे। अथवा ग्वयं तुम्हारे म्वामी ही किसी जो लोग मेरे स्वामी का पता लगाने के लिये जायेंगे समय घूमते-फिरते घर आ नि+लें । तात्पर्य यह उनसे मै स्वयं सब वृत्तान्त पूढूगी। यदि मेरे इन नियमों कि तुम यहीं रहा । अवश्य पति से तुम्हारी भेंट का पालन यहा अच्छी तरह हो सकेगा तो मैं आपके हो जायगी। अब दमयन्ती ने राजमाता से कहा पास रहूँगी । यदि न हो सकेगा तो मैं यहां कदापि वीर पुत्र की माता आपके पास रहना मुझे स्वीकार न रह सकूँगी ॥६०७०॥ है। मैं आपके पास इस नियम से रह सकती हूं कि दमयन्ती की बात सुनकर राजमाता बहुत प्रसन्न न किमी का जूठा साऊँगी, न किसी के पैर धोऊँगीहुई। उन्होंने कहा-हे दमयन्ती ! मैं ऐसा यत्न करूँगी औरन विमापुरप से पान-चीत करेंगी। और यदि जिसमें तुम्हार इन नियमों का पालन अच्छीतरह कोई मनुष्य मेरे पानियन धर्म को दूर करना चाहे हो सके । तुम किसी प्रकार की चिन्ता न करो। AGRImamimarwariNamamaARE.HTETTINR.GLmum । HIHDPHCHOTEMPETECurreparaturenTOUmustram - AmALLADIETraipu । H अध्याय ६६] म हा भारत १७५१ PrimanwrsmurranmusummmmmmmmmmuTHILITamrammarimmurari LALTS एतया सह मोदस्व निरुद्विग्नमनाः सदा ॥ ७४ ॥ ततः परमसंहृष्टा सुनन्दा गृहमागमत् दमयन्तीमुपादाय सखीभिः परिवारिता ॥७५ ॥ सा तत्र पूज्यमाना वै दमयन्ती व्यनन्दत सर्वकामैः सुविहितैर्निरुद्वेगाऽवसत्तदा ॥ ७६॥ इतिश्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि दमयन्तीचेदिराजगृहवासे पञ्चपष्टितमोऽध्यायः॥६५॥ गजमाता ने उसी समय अपनी कन्या सुनन्दा को ! होकर दमयन्ती को अपने गृह में ले गई । पतिव्रता बुलाकर कहा-हे पुत्री ! यह असाधारण रूप लावण्य दमयन्ती वहां यथोचित आदर और सम्मान पाकर, वाली स्त्री है। विशेषकर यह तुम्हारी हमजोली की तरह-तरह की भोग की सामग्रियों का उपभोग करती है । तुम इसे अपनी सस्त्रियों में रख लो । इसके साथ हुई, रहने लगी ||७१:७६॥ बरावर क्रीड़ाकौतुक किया करो । सुनन्दा प्रसन्न वनपर्व का पैंमठवां अध्याय ममान हुआ ।। ६६॥ are अथ पट्पष्टितमोऽध्यायः॥ ६ ॥ वृहदश्व उवाच-उत्सृज्य दमयन्ती तु नलो राजा विशांपते । ददर्श दावं दह्यन्तं महान्तं गहने बने तत्र शुश्राव शब्दं वै मध्ये भूतस्य कस्यचित् । अभिधाव नलेत्युच्चैः पुण्यश्लोकेति चाऽसकृत् ॥ २ ॥ मा भैरिति नलचोक्त्वा मध्यमग्नेः प्रविश्य तम् । ददर्श नागराजानं शयानं कुण्डलीकृतम् स नागः प्राञ्जलिर्भूत्वा वेपमानो नलं तदा । उवाच मां विद्धि राजन्नागं कर्कोटकं नृप छामठवां अध्याय ॥६६॥ वृहदश्च ने कहा-हे राजा युधिष्ठिर ! इधर दमयन्ती । राजा नल दावानल के भीतर घुम गये । वहां पहुंचकर को छोड़कर राजा नल एक सदने वन के भीतर देखते क्या है कि एक सर्प कुण्टली बांधे हुए घटा घुस । आगचरकर उन्होंने देखा, वह वन दावानल. हुआ है । नल को देखकर वह मर्प नमना मे कहने मे जल रहा है। वहां उन्होंने किमी प्राणी को बारम्बार लगा-दे में नाग-वंश में टसन हूँ। मेरा ऊंचे म्बर से यह पुकारते हुए मुना कि हे राजा नल ! नाम काटक है। मैंने एक ममय असत्य बोलकर शीम दाहो, भीम दाड़ो । "टरो मत" कहते हुए नारद को धीमा दिया था। तब उन्होंने यह कहकर AmICT.MAntarnintsannathurai Nim, PORDLIRunum LARRHWIKIPIKUNDATIONATELLITADITIONAL राजन् । andslidaladodarduasanawRatndianARIcam.or.lar.ma.cut.cE १७५२ महा मारत [ वनपर्य aurn man HilariminarsimlmannmanaunurnimmunmummmmnCGTALATTERDICTirrial । Ramnmant Ram Jility umurt andu NRImunamamaniana EE मया प्रलब्धो महर्पिारदः सुमहातपाः तेन मन्युपरीतेन शप्तोऽस्मि मनुजाधिप तिष्ट त्वं स्थावर इव यावदेव नलः क्वचित् । इतो नेता हि तत्र त्वं शापान्मोक्ष्यसि मत्कृतात् ॥ ६ ॥ तस्य शापान्न शक्तोऽस्मि पदाद्विचलितुं पदम् । उपदेक्ष्यामि ते श्रेयस्त्रातुमर्हति मां भवान् ॥ ७ ॥ सखा च ते भविष्यामि मत्समो नास्ति पन्नगः । लघुश्च ते भविष्यामि शीघ्रमादाय गच्छ माम् ॥ ८ ॥ एवमुक्त्वा म नागेन्द्रो बभूवाऽड्गुष्ठमात्रकः । तं गृहीत्वा नलः प्रायाद्देशं दावविवर्जितम् ॥ ९ ॥ आकाशदेशमासाद्य विमुक्तं कृष्णवर्मना उत्स्रष्टकामं तं नाग. पुनः कर्कोटकोऽब्रवीत् ॥ १० ॥ पदानि गणयन्गच्छ स्वानि नैषध कानिचित् । तत्र तेऽहं महाबाहो श्रेयो धास्यामि यत्परम् ॥ ११ ॥ ततः संख्यातुमारब्धमदशदशमे पदे तस्य दप्टस्य तद्रूपं क्षिप्रमन्तरधीयत ॥ १२ ॥ मुझे शाप दिया था कि "आज से तुम जड़ जीवों / छोटा यि लेता हूँ। यह कहकर वह सर्प अगूंठ की तरह अचल होकर यहीं पड़े रहोगे । जब महाराज भर का और बहुत हलका हो गया और नल उसे गल घूमते फिरते यहा आवेगे और तुम्हें इस जगह उठाकर वहा ले आया जहा अमि न थी। जब नल मे घटॉवंग, तब शाप से तुम्हारा छुटकारा होगा।" ने उसे छोड़ना चाहा तब यह कहने रगा कि हे ॥१६॥ महाराज नल आप अभी मुझे न रखिए । मुझे दराजन् ! उस शाप के कारण से मैं एक पग लिये हुए, गिनते हुए, कई पग चरिए ! मै आपका भर भी नहीं चल सकता हूँ तभी से यहा पड़ा हूँ। बड़ा भारी उपकार करूगा ।।७।११।। आप कृपा करके शीघ्र मुझं यहा से हटा दीजिए। यह सुनकर राजा नल गिनते हुए कई पग दमदाराज! में आपका सम्दा होऊँगा और आपको चले । दश पग पर जन नल ने दश* कहा, तप हित की पान यताउँगा। दे राजन् ! मेरे समान नाग ने उनको डम रिया। उसके डसते ही नल का दना कोई मर्प नहीं है। मैं अभी अपने शरीर को पहला रूप एक दम बदल गया। इससे उनका बड़ा •मात मदद का अब 'बाटो मा । नाग विता Er नही काटने । हम ये गरम मुंद से 'दश' SITAmail.amaya.rada Nuskaxmalinmalisraa - - जी- - वरगराएर उनी रम पिया। Xuy wrITIFTITIT.Irrrr!'CETMECTEMET.CLP'tite CremonOrucima अध्याय ६६] महा मारत १७५३ ~~~ २ PUNIAuuNGNUMBLR स दृष्ट्वा विस्मितस्तस्थावात्मानं विकृतं नलः । स्वरूपधारिणं नागं ददर्श स महीपतिः ॥ १३ ॥ ततः कर्कोटको नागः सान्त्वयनलमत्रवीत् । मया तेऽन्तर्हितं रूपं न त्वां विद्युर्जना इति ॥ १४ ॥ यत्कृते चाऽसि निकृतो दुःखेन महता नल विषेण स मदीयेन त्वयि दुःखं निवत्स्यति ॥१५॥ विषेण संवृतेर्गात्रैर्यावत्वां न विमोक्ष्यति तावत्वयि महाराज दुःखं वै स निवत्स्यति ॥ १६ ॥ अनागा येन निकृतस्त्वमनहाँ जनाधिप क्रोधादसूययित्वा तं रक्षा मे भवतः कृता ॥ १७॥ न ते भयं नरव्याघ्र दंष्ट्रिभ्यः शत्रुतोऽपि वा। ब्रह्मविद्भयश्च भविता मत्प्रसादान्नराधिप ॥ १८ ॥ राजन्विपनिमित्ता च न ते पीडा भविष्यति । संग्रामेपु च राजेन्द्र शश्वजयमवाप्स्यसि ॥ १९ ॥ गच्छ राजन्नितः सूतो वाहुकोऽहमिति ब्रुवन् । समीपमृतुपर्णस्य स हि चवाऽक्षनैपुणः ॥ २०॥ अयोध्यां नगरी रम्यामद्य वे निषधेश्वर आश्चर्य हुआ । अब नागराज ने अपना पहला रूप आपका उपकार किया है। हे महाराज! आप निश्चय धारण करके नल को धर्य देते हुए कहा-हे महाराज ममनिए, मेरे अनुकूल होने के कारण अब आपको नल ! मैंने जो आपको डसा, उसका तात्पर्य यही है किसी का मय नहीं रहा। हिंसक जीव या शत्रु अय कि रूप बदल जाने से अब आपको कोई पहनान आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकेंगे। मेरी कृपा मे न मकेगा। विशेषकर वह पापी कलियुग जो आपके आपको किमी का गार भी न लगेगा। मेरे काटने गरीर में घुमकर आपको तरह तरह के दुःम दे रहा से और मेरे तीक्ष्ण विप से आपको तनिक भी कर द वह मेरे विष के प्रभाव से अब पीड़िन होता रदेगा।। न होगा। युद्ध में आप मदा विजयी होंगे ॥१२॥१९॥ जस्तक यह दुरात्मा आपके गरीर में रहेगा तर अब आप इमी अवस्या में अयोध्यापुगेको तक टमे मरे अत्यन्त तीक्ष्ण विप की जलन सहनी जाइए । यहां इन्वाकुवंगी महागा ऋतु राज्य परेगी। निमने आपले अंक प्रकार के का दिये करते हैं। उनके पास बार आर टन मारधि ग ₹टमे टमकी कानी का उनिन दण्ट देकर मैंने काम कीजिए आर उनें अपना या परिनय दीजिएगा -AINADALANASANAMAIN - ।
१७५४ [ वनपर म हा मारत - URLABAAPIAN स तेऽक्षहृदयं दाता राजाऽश्वहृदयेन वै ॥ २१ ॥ इक्ष्वाककुलजः श्रीमान्मित्रं चैव भविष्यति । भविष्यसि यदाऽक्षज्ञः श्रेयसा योक्ष्यसे तदा ।। २२ ।। सममेष्यसि दारैस्त्वं मा स्म शोके मनः कृथाः । राज्येन तनयाभ्यां च सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥ २३ ॥ खं रूपं च यदा द्रष्टुमिच्छेथास्त्वं नराधिप संस्मर्तव्यस्तदा तेऽहं वासश्चेदं निवासयेः अनेन वाससा छन्नः स्वरूपं प्रतिपत्स्यसे इत्युक्त्वा प्रददौ तस्मै दिव्यं वासोयुगं तदा ॥ २५॥ एवं नलं च संदिश्य वासो दत्वा च कौरव । नागराजस्ततो रास्तत्रैवान्तरधीयत इति श्रीममहाभारसे आरण्यकपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलकर्कोटकसवादे पद्पष्टितमोऽध्याय ॥ ६६ ॥ कि "मेरा नाम बाहुक है। मैं घोड़े हाकने की कला अब आपको शोक न करना चाहिये । मैं आपको में बहुत ही चतुर हूँ।" महाराज ऋतुपर्ण को पासे य दो वस्त्र देता हूँ, इन्हें ले लीजिए । जब आप खेलने की विद्या अच्छीतरह मालम है । वे अपनी अपने पहले रूप को प्राप्त करना चाहें तब मुझे स्मरण विद्या देकर आपसे घोड़े चलाने की विद्या सौखेंगे। करके इन वस्त्रों को पहन लीजिएगा। तुरन्त ही अन्त को वे आपके मित्र हो जायेंगे। पाँसे खेलने आपको अपना पहला रूप प्राप्त हो जायगा । महाराज की विद्या में निपुण होने से आपका भरा होगा। राज्य, नल को दो वस्त्र देकर कोटक नाग, उनके देखते पेश्वर्य, पुन, कन्या और मी को फिर पाकर आप ही देखते वहीं अन्तद्धान हो गया ॥२०॥२६॥ निम्मन्देह परम मुख से अपना जीवन व्यतीत करेंगे। वनपर्व का मासठया अध्याय समाप्त हुआ ॥ ६६ ।। अथ मनपष्टितमोऽध्याय ॥ ६७ ॥ पादश्च टवाच-तम्मिन्नन्तहिते नागे प्रययौ नेपधो नलः ऋतुपर्णस्य नगरं प्राविशदशमेऽहनि मड़मठया अध्याय ॥ ६७ ॥ वृहदश कहते हैं- राजा युधिष्ठिर उम नागराज और राजा ऋतुपर्ण के समीप जाकर कहने लगे-हे ६ अन्नदान हो जाने पर राजा नर अयोध्या नगरी राजेन्द्र ! मेरा नाम माहुक है । में घोड़े चराने की और पर विच और दशायें दिन का जा पहुंचे। विधा में बहुत ही निपुण हूँ। [इसके सिवाय में और ----- अध्यार ६७ महा मारत १७५५ ८८८८८ ८० स राजानमुपातिप्टद्वाहुकोऽहमिति ब्रुवन् अश्वानां वाहने युक्तः पृथिव्यां नास्ति मत्समः ॥ २ ॥ अर्थकृच्छ्रेषु चैवाऽहं प्रष्टव्यो नैपुणेषु च अन्नसंस्कारमपि च जानाम्यन्यविशेषतः यानि शिल्पानि लोकेऽस्मिन्यच्चैवाऽन्यत्सुदुष्करम्। सर्व यतिप्ये तत्कर्तुमृतुपर्ण भरस्व माम् ॥ १ ॥ मतुपर्ण उवाच-बस वाहुक भद्रं ते सर्वमेतत्करिष्यसि शीघ्रयाने सदा वुद्धिधियते मे विशेषतः स त्वमातिष्ट योगं तं येन शीघ्रा हया मम । भवेयुरश्वाध्यक्षोऽसि वेतनं ते शतं शता त्वामुपस्थास्यतश्चैव नित्यं वार्ष्णेयजीवलो एताभ्यां रंस्थसे साधं वस वै मयि बाहुक ॥ ७ ॥ वृहदचटवाच एवमुक्तो नलस्तेन न्यवसत्तत्र पूजितः ऋतुपर्णस्य नगरे सहवाष्र्णेयजीवलः स वै तत्राऽवसद्राजा वैदर्भीमनुचिन्तयन् सायं सायं सदा चेमं श्लोकमेकं जगाद ह ॥ ९ ॥ क नु सा क्षुत्पिपासार्ता श्रान्ता शेते तपस्विनी । भी कई तरह की कारीगरिया जानता हूँ।] ममय यत्न करो निसमें मेरे रथ के घाड़े शीघ्र चल सके। समय पर धन की कमी के कारण यदि कुछ गड़बड़ आन से मैंने तुमको अपने यहा की अश्वशाला का हो तो उसे दूर करने की सराह भी में दे सक्ता | अभ्यक्ष बनाया । तुम्हें वेतन के तौर पर हर महीने हूँ । तरह-तरह की रसोई बनाने में भी मैं बहुत दस हज़ार सुवर्ण की मोहरें मिला करेंगी। ये वाष्र्णेय निपुण हूँ। इमक मिवाय में और भी चहे जो कारीगरी और जीवर नाम के दो सारथी, तुम्हारे अधीन रहकर, का काम विगेप यन और परिश्रम के साथ कर मक्ता इम कार्य में तुम्हारी सहायता करेंगे । तुम इनके हु ! इमलिये हे रानन् आप मुझका नोर रन । साथ वहा सम से रहो। राजा नल अब परम आदर लनिये ॥१॥ पार तुपर्ण के राज्य में रहने लगे। वे बीच बीच यह सुनकर राना मतुपर्ण ने कहा-बाहुक ! में अपनी प्यारी दमयन्ती कोम्मरण किया करते थे। तुमने निन निन बातों का वर्णन किया, उन सबको 'नित्य सायंकार को वे यह कहकर विराप क्यिा यहारहकर तुम कर सकोगे। तुम यहा रहकर विशेष करते थे कि हाय । प्रियतमा की केसी दशा हुई। ARANBARNANNNNNN - " -- १७५६ म हा मारत । वनपर्व ८८८८ ८८सर Alan Ainas NAN MANN NN Nava स्मरन्ती तस्य मन्दस्य के वा साऽद्योपतिष्ठति ॥ १० ॥ एवं ब्रुवन्तं राजानं निशायां जीवलोऽब्रवीत् । कामेनां शोचसे नित्यं श्रोतुमिच्छामि वाहुक ॥ ११ ॥ आयुष्मन्कस्य वा नारी यामेवमनुशोचसि तमुवाच नलो राजा मन्दप्रज्ञस्य कस्यचित् ॥ १२ ॥ आसीद्वहुमता नारी तस्याऽदृढतरं वचः सवै केनचिदर्थेन तया मन्दो व्ययुज्यत ॥ १३ ॥ विप्रयुक्तः स मन्दात्मा भ्रमत्यसुखपीडितः । दह्यमानः स शोकेन दिवारात्रमतन्द्रितः ॥ १४ ॥ निशाकाले स्मरंस्तस्याः श्लोकमेकं स्म गायति । स विभ्रमन्महीं सर्वां क्वचिदासाद्य किंचन । वसत्यनहस्तदुःखं भूय एवाऽनुसंस्मरन् ॥ १५॥ सा तु तं पुरुषं नारी कृच्छेऽप्यनुगता वने । त्यक्ता तेनाऽल्पपुण्येन दुष्करं यदि जीवति ॥ १६ ॥ एका बालानभिज्ञा च मार्गाणामतथोचिता क्षुत्पिपासापरीताङ्गी दुष्करं यदि जीवति ॥ १७॥ श्वापदाचरिते नित्यं वने महति दारुणे त्यक्ता तेनाऽल्पभाग्येन मन्दप्रज्ञन मारिप ॥ १८ ॥ ओही वह गम और प्यास से व्याकुल होकर | अकेली छोड़कर अब उसके विरह में अधीर होकर निमकीचारण में ॥५॥१०॥ मारा-मारा फिरा करता है। और स्त्री-वियोग के शौक जीवर नित्य रान को नल के मुंह से विलाप में उसे दिन-रात नींद नहीं आती। रात्रि के समय ये वाक्य गुना परता था। यह एक दिन कहने | उसी को स्मरण करके यह मूढ़ विलाप किया करता समा-हे पाहुक! तुम नित्य निम बी के लिये इस है । वह अमामा पुरुष अनेक स्थानों में मरद विराप करते हो! में गुनना चाहता हूँ, यह को एक जगह किसी और काम में लग गया है और विकी नस न पहा- जीवन !एक उसी काम को करके अपनी जीविका चला रहा है। मन्दधुदि पुरी गुणवनी पी थी। यह अमागा अदा ! यह पतिपता स्त्री अत्यन्त दुर्दशा और कर पुतिm पनिमना ग्नी को गन परका भी यन में अपने पति के साथ आई थी, घूमकर अन्त N अध्याय ६८ ] म हा मारत १७५७ ८८.७KV N . इत्येवं नैपधो राजा दमयन्तीमनुस्मरन् अज्ञातवासं न्यवसद्राज्ञस्तस्य निवेशने ॥ १९ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलविलापे सप्तपष्टितमोऽध्यायः ॥ ६७॥ किन्तु वह पुरुष उसे वहीं छोड़कर चल दिया। हाय! में, पति से अलग होकर, वह स्त्री जीती है या मर न जाने उस स्त्री की अब कैसी दुर्दशा हुई होगी।] गई । इस प्रकार दमयन्ती को स्मरण करते हुए भूख और प्यास से व्याकुल होकर वह न जाने कैसे महाराज नल ऋतुपर्ण के राज्य में गुप्त रूप से रहकर कष्ट सह रही होगी, या यही कौन कह सकता है समय बिताने लगे ॥११॥१९॥ कि उस हिंसक भयानक जङ्गली जानवरों से भरे वन वनपर्व का सड़सठवां अध्याय समाप्त हुआ ॥ ६७ ॥ ore- अथ अष्टपष्टितमोऽध्यायः ॥ ६८॥ वृहदश्व उवाच-हतराज्ये नले भीमः सभार्ये प्रेष्यतां गते । द्विजान्प्रस्थापयामास नलदर्शनकाङ्क्षया सन्दिदेश च तान्भीमो वसु दत्त्वा च पुष्कलम् । मृगयध्वं नलं चैव दमयन्तीं च मे सुताम् ॥ २ ॥ अस्मिन्कर्मणि संपन्ने विज्ञाते निपधाधिपे गवां सहस्रं दास्यामि यो वस्तावानयिष्यति ॥ ३ ॥ अग्रहारांश्च दास्यामि ग्राम नगरसमितम् न चेच्छक्याविहानेतुं दमयन्ती नलोऽपि वा ॥ ४ ॥ ज्ञातमात्रेऽपि दास्यामि गवां दशशतं धनम् । इत्युक्तास्ते ययुहृष्टा ब्राह्मणाः सर्वतोदिशम् ॥ ५ ॥ पुरराष्ट्राणि चिन्वन्तो नैपधं सह भार्यया अड़सठवां अध्याय ॥६॥ बृहदश्व कहते है-हे राजा युधिष्ठिर! विदर्भदश । भी पता लगाकर लावेगा उसको मैं एक हजार.गायें के राजा भीम राजा नल के राज्यहरण और स्त्रीसहित दूगा और जो उनको यहां ले आवेगा उसको मैं बन को जाने का हाल सुनकर नल को देखने की एक नगर के बराबर बड़ा गाँव दूंगा। राजा भीम इच्छा से सब ब्राह्मणों को बुलाकर कहने लगे कि | की बातों से पूर्ण रूप से उत्साहित होकर सय ब्राह्मण आप लोग चारों ओर जाकर नल और दमयन्ती को | लोग उसी समय चारों दिशाओं को चल दिये और हूँदिए । जो कोई उन दोनों का अथवा एक का प्रदेशों में नल और दमयन्ती को ढूँढ़ने लगे परन्तु AVASAVAINAUGUANUARAN [ वनपर्य १७५८ म हा भारत ALLPAL LAL . - %3- नैव क्वाऽपि प्रपश्यन्ति नलं वा भीमपुत्रिकाम् ॥ ६ ॥ ततश्चेदिपुरी रम्यां सुदेवो नाम वै द्विजः विचिन्यानोऽथ वैदर्भीमपश्यद्राजवेश्मनि पुण्याहवाचने गज्ञः सुनन्दासहितां स्थिताम् । मन्दं प्रख्यायमानेन रूपेणाऽप्रतिमन ताम् । निवां धूमजालेन प्रभामिव विभावसोः तां समीक्ष्य विशालाक्षीमधिकं मलिनां कृशाम् । तर्कयामास भैमीति कारणरुपपादयन् सुदेव उवाच-यथेयं मे पुरा दृष्टा तथारूपेयमङ्गना कृतार्थोऽस्म्यद्य दृष्ट्वेमा लोककान्तामिव श्रियम् ॥ १० ॥ पूर्णचन्द्रनिभा श्यामां चारुवृत्तपयोधराम् कुर्वन्ती प्रभया देवी सर्वा विनिमिरा दिशः ॥ ११ ॥ चारुपद्मविशालाक्षी मन्मथस्य रतीमिव इष्टां समस्तलोकस्य पूर्णचन्द्रप्रभामिव विदर्भसरसस्तस्मादेवदोषादिवोद्धृताम् मलपङ्कानुलिप्ताङ्गी मृणालीमिव चोद्धृताम् ॥ १३ ॥ पोर्णमासीमिव निशां राहुग्रस्तनिशाकराम् किसी ने कुछ पता उन दोनों कान पाया ॥१६॥ । महाराज भीम की ही पुत्री है । उस समय सुदेव उनमें से एक मुदेव नाम का ब्राह्मण. उन दोनों | अपने मन में कहने लगा कि अहो! इम राजकुमारी को द्वंदता हुआ अन्त में चेदि देश की राजधानी को पहले अच्छी दशा में देखकर मुझे जैसी प्रसन्नता में पहुंचा । उस समय राजभवन में पुण्याहवाचन हुई थी वैसी प्रसन्नता ऐसी हीन अवस्था में देखकर हो रहा था सुदेव ब्रामण भी वहां चला गया और भी हो रही है। आज इस त्रिलोक-सुन्दरी को देख. वहां उमने मुनन्दा के साथ दमयन्ती को देखा जो कर में कृतार्थ हो गया ॥७॥१०॥ पनि-वियोग के गोक से बहुत ही मुरझाई हुई थी। । यह सुवर्ण के समान कान्तिवाली, पीन स्तनों उसके बड़े नेत्र, सूर्य की सी प्रमा, सुन्दर स्वरूप वाली, पूर्णचन्द्र के समान मुखवाली, सुडौल अ- और मलिन या में इस प्रकार से नमानी हुई देख. वारी स्त्री अपने अनुपम रूप-लावण्य की आमा में कर जमे धुएं में जलनी दुई अमिदिखाई देती है मप ओर प्रकाश फैला रही है। इसके मेत्र कमलदल उमा अनक कारणों से यह निश्चय क्यिा कि यह के समान विशाल हैं। इसे एकाएक देखने से कामदेव ANANALAN.. AMALS अध्याय ६८] महाभारत १७५९ - anteemocrocheme.necemenere BANAWWWhealso पतिशोकाकुलां दीनां शुष्कस्रोतां नदीमिव ॥ १४ ॥ विध्वस्तपर्णकमलां वित्रासितविहङ्गमाम् हस्तिहस्तपरामृष्टां व्याकुलामिव पद्मिनीम् ॥ १५ ॥ सुकुमारी सुजाताङ्गी रत्नगर्भगृहोचिताम् दह्यमानामिवाऽर्केण मृणालीमिव चोद्धृताम् ॥ १६ ॥ रूपौदार्यगुणोपेतां मण्डनार्हाममण्डिताम् चन्द्रलेखामिव नवां व्योम्नि नीलाभ्रसंवृताम् ॥ १७॥ कामभोगैः प्रियीनां हीनां वन्धुजनेन च । देहं धारयती दीनं भर्तृदर्शनकाङ्क्षया ॥ १८ ॥ भर्ता नाम परं नार्या भूषणं भूपणैर्विना एपा हि रहिता तेन शोभमाना न शोभते ॥ १९ ॥ दुष्करं कुरुतेऽत्यन्तं हीनो यदनया नलः धारयत्यात्मनो देहं न शोकेनाऽपि सीदति ॥ २० ॥ इमामसितकेशान्तां शतपत्रायतेक्षणाम् सुखााँ दुःखितां दृष्ट्वा ममाऽपि व्यथते मनः ॥ २१ ॥ कदा नु खल्लु दुःखस्य पारं यास्यति वै शुभा । की स्त्री रति का भ्रम होता है। वह रत्नजटित राज से ढकी हुई नवीन चन्द्ररेखा की तरह. अत्यन्त महल में रहने के योग्य, रूप और गुण से युक्त, मलिन और क्षीण होती जा रही है । फिर अपने पति सुकुमारी, भीम राजा की कन्या पति वियोग के शोक के मिलने की आशा से ही यह अबतक जी रही से अत्यन्त दुबली और मलिन होकर ऐसी जान पड़ती है। अहो! पति ही पतिव्रता स्त्री का एकमात्र प्रधान है, जैसे राहु के ग्राम में पड़े हुए चन्द्रमा से युक्त आमूपण है । यद्यपि इस सर्वाङ्ग सुन्दरी का सहज- पूर्णिमा की गत्रि हो; या घाम से सूखी हुई नदी हो; सौन्दर्य असीम हैं, तो भी केवल पतिरूप रत्न के या मरोवर में से हाथी ने रॉड से जिसे खींचा हो; बिना इसकी कुछ भी शोभा नहीं है । महाराज नल वह दलित, पक मलिन, अपने स्थान से भ्रष्ट, कान्ति का हृदय कैमा कठोर है जो ऐसीबी को छोड़कर शून्य कमलिनी हो। औदार्य गुणशालिनी, आभूषणों भी वे अबतक जीवित हैं ॥११॥२०॥ स रहित यह त्रिलोक-सुन्दरी अपने प्रिय पति और इम सुख भोगने के योग्य, विशाल नेत्रोंवाली भाई-बन्धुओं के माथ छूटकर, सूर्य के ताप में को ऐमे दु.ख के समुद्र में मग्न देखकर मेरा जी तपी हुई उम्बड़ी पड़ी कमलिनी की तरह, नील वादल दुखी हो रहा है । इसका दु.ख पति के मिलने ही - [ वनपर्व १७६० महाभारत N - - भर्तुः समागमात्साध्वी रोहिणी शशिनो यथा ॥ २२ ॥ अस्या नूनं पुनर्लाभान्नैपधः प्रीतिमप्यति राजा राज्यपरिभ्रष्टः पुनलब्ध्वा च मेदिनीम् ॥ २३ ॥ तुल्यशीलवयोयुक्तां तुल्याभिजनसंवृताम् नैषधोऽहति बैदर्भी तं चेयमसितक्षणा ॥ २४॥ युक्तं तस्याऽप्रमेयस्य वीर्यसत्त्ववतो मया समाश्वासयितुं भार्यां पतिदर्शनलालसाम् ॥२५॥ अहमाश्वासयाम्येनां पूर्णचन्द्रनिभाननाम् । अदृष्टपूर्वां दुःखस्य दुःखार्ता ध्यानतत्पराम् ॥ २६ ॥ बृहदश्व उवाच-एवं विमृश्य विविधैः कारणलक्षणैश्च ताम् उपागम्य ततो भैमी सुदेवो ब्राह्मणोऽब्रवीत् ॥ २७॥ अहं सुदेवो वैदर्भि भ्रातुस्ते दयितः सखा । भीमस्य वचनाद्राज्ञस्त्वामन्वेष्टुमिहाऽऽगतः ॥ २८ ॥ कुशली ते पिता राज्ञि जननी भ्रातरश्च ते । आयुष्मन्तौ कुशलिनो तत्रस्थौ दारको च तौ ॥ २९ ॥ त्वत्कृते बन्धुवर्गाश्च गतसत्त्वा इवाऽऽसते । अन्वेष्टारो ब्राह्मणाश्च भ्रमन्ति शतशो महीम् ॥ ३० ॥ दृहदश्व उवाच-अभिज्ञाय सुदेवं तं दमयन्ती युधिष्ठिर पर दूर होगा और उस समय इसका दुख ऐसे । दमयन्ती को धैर्य देना ही मेरा कर्तव्य है ॥२१॥२५॥ जाता रहेगा जैसे सेहिणी का दुख चन्द्रमा के बृहदश्व कहते हैं-हे युधिष्ठिर ! अब मन में ममागम से जाता रहता है । महाराज नल भी इसको। ऐसा निश्चय करके दमयन्ती के पास जाकर सुदेव फिर पाकर इस प्रकार में प्रसन्न होंगे और इससे | ने कहा-हे दमयन्ती ! मैं तुम्हार भाई का परम- प्रीति करेंगे जैसे गये हुए राज्य को पाकर राजा प्रमन्न मित्र सुदेव नाम ब्राह्मण हूँ । राजा भीम की आज्ञा होता है। राजा नल अपने पुर, शील, स्वभार और से यहां तुम्हें हूँढ़ने को आया हूँ। तुम्हारे पिता, माया मे दमयन्ती के योग्य है और दमयन्ती भी माता, भाई आदि सब प्रकार कुशल से हैं। तुम्हारे उनके योग्य है । अप इम ममय इम पति के दर्शन | पुत्र और कन्या दोनों भी कुशल से हैं। परन्तु तुम्हारे दी दहा रखनेवारी, दुस मे अन्यन्त पीदिन, कारण से ये सब निजीच के समान हो रहे हैं। -ee-re अध्याय ६८] म हा मारत १७६१ ... । - BANANAGAURAINBABA... पर्यपृच्छत तान्सन्क्रिमेण सुहृदः स्वकान् ॥ ३१ ॥ रुरोद च भृशं राजन्वैदर्भी शोककर्शिता दृष्ट्वा सुदेवं सहसा भ्रातुरिष्टं द्विजोत्तमम् ॥ ३२ ॥ ततो रुदन्तीं तां दृष्ट्वा सुनन्दां शोककर्शिताम् । सुदेवेन सहैकान्ते कथयन्ती च भारत ॥ ३३॥ जनिव्याः कथयामास सैरन्ध्री रुदते भृशम् । ब्राह्मणेन सहागम्य तां वेद यदि मन्यसे ॥ ३४ ॥ अथ चेदिपतेर्माता राज्ञश्चाऽन्तःपुरात्तदा जगाम यत्र सा वाला ब्राह्मणेन सहाऽभवत् ॥३५॥ ततः सुदेवमानाय्य राजमाता विशांपते पप्रच्छ भार्या कस्येयं सुता वा कस्य भाविनी ॥ ३६ ।। कथं च नष्टा ज्ञातिभ्यो भर्तुर्वा वामलोचना । त्वया च विदिता विप्र कथमेवंगता सती ॥ ३७॥ एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं त्वत्तः सर्वमशेषतः तत्त्वेन हि ममाऽऽचक्ष्व पृच्छन्त्या देवरूपिणीम् ॥ ३८ ॥ एवमुक्तस्तया राजन् सुदेवो द्विजसत्तमः सुखोपविष्ट आचष्ट दमयन्त्या यथातथम् ॥ ३९ ॥ इति श्रीम-महाभारते आरण्यकपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि दमयन्तीसुदेवसंवादे अष्टपष्टितमोऽध्यायः ॥६॥ है तुम्हारे ढूँढ़ने के लिये सैंकड़ों ब्राह्मण भेजे गये हैं ' हे माता जी ! यह सैरन्ध्री (दमयन्ती का कल्पित 2. और वे देश-देश में तुम्हें तालाश कर रहे हैं । नाम है) एक ब्राह्मण से मिलकर क्यों रो रही है। ॥२६॥३०॥ आपकी इच्छा हो तो वहां चलकर उससे इसका यह सुनकर दमयन्ती ने सुदेव को अच्छीतरह कारण पूछिए । कन्या के वनन मुनकर राजमाना देमा और पहचाना और उससे क्रमपूर्वक अपने मुहदों महल से निकलकर टसम्यान पर भाई जहां दमयन्ती का हाल पूछने लगी और उसे अपने भाई का मित्र उस ब्राह्मण के पास बेटी थी और मुदेव को युगकर जानकर और अकस्मात् देखकर वह शोक मे रोने पूछने रगी-यह बाला किमकी दी और किमी लगी। मुनन्दा उसको इस प्रकार मे रोती और एकान्त पुत्री है ! अपने पति और जातिवालों से किम कारण ब्रामण से पाल-चीन करती देसकर गोकाकुल में अलग हुई । तुमने हमे कैसे पहचाना ! में यह होकर आनी माता के पास गई और कहने लगी सब विस्तारपूर्वक मुनना चाहती है। राजमाना के NAVAILAGAIBAVANASUBASAVAR - १७६२ [ वनपर्व महा मारत ८ - Veverestmethurcene 1 वचन सुनकर और अधिक आग्रह देखकर सुदेव | वृत्तान्त विस्तारपूर्वक सुनाने लगे ॥३१॥३९।। एक आसन पर बैठ गये और दमयन्ती का सब वनपर्व का अड़सठवां अध्याय समाप्त हुआ ॥ ६८ ॥ अथ एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ६९।। सुदेव उवाच-विदर्भराजो धर्मात्मा भीमो नाम महाद्युतिः । सुतेयं तस्य कल्याणी दमयन्तीति विश्रुता ॥ १ ॥ राजा तु नैषधो नाम वीरसेनसुतो नलः भार्येयं तस्य कल्याणी पुण्यश्लोकस्य धीमतः ॥ २ ॥ स द्यूतेन जितो भ्रात्रा हतराज्यो महीपतिः । दमयन्त्या गतः सार्धं न प्राज्ञायत कस्यचित् ॥ ३ ॥ ते वयं दमयन्त्यर्थे चरामः पृथिवीमिमाम् सेयमासादिता वाला तव पुत्रनिवेशने अस्या रूपेण सदृशी मानुषी न हि विद्यते । अस्या ह्येष ध्रुवोर्मध्ये सहजः पिप्लुरुत्तमः ॥ ५ ॥ श्यामायाः पद्मसंकाशो लक्षितोऽन्तर्हितो मया । मलेन संवृतो ह्यस्याश्छन्नोऽभ्रेणेव चन्द्रमाः ॥ ६ ॥ चिह्नभूतो विभूत्यर्थमयं धात्रा विनिर्मितः उनहत्तरवां अध्याय ॥ ६९ ।। मुदेव ब्राह्मण कहने लगे हे राजमाता ! यह मनुप्यलोक में इसके समान स्वरूपवाली स्त्री कल्याणी विदर्भ देश के राजा भीम की पुत्री है । दूसरी कोई नहीं देख पड़ती। विधाता ने इसकी हमा नाम दमयन्ती है । और राजा वीरसेन के भौंहों के बीच में एक लाल रज का तिलक-चिह नल नामी यशस्वी पुत्र की भार्या है जो निपद देश | स्थापित कर दिया है। वह चिह्न इस समय मैल के अधिपनि है । वे राजा नल अपने भाई से जुए से छिप जाने के कारण मेघ में चन्द्रमा के समान में सब राज्य और धन हारकर दमयन्ती सहित बिना | छिपा हुआ है । यह कन्या अतुल ऐश्वर्य की अधि- किसी के जाने यन को चले गये थे। उनके और कारिणी होगी-इसी बात का सूचक यह चिद इसके इम दमयन्नी के देदने को हम सैकड़ों ब्राह्मण देश- माथे में है । इस समय पड़वा के चन्द्रमा की तरह देश में शिर रहे हैं। आन सामाग्य से मैने इस इस सुन्दरी का सौन्दर्य छिपा हुआ है। धोये न जाने दयनी पीआरसी कन्या के भवन में देम्वा ॥१४॥ से इसका शरीर यद्यपि बहुत मरिन हो रहा है, तो - ।
अध्याय ६९] महा मारत १७६३ Meredaton प्रतिपत्कलुपस्येन्दोर्लेखा नाऽतिविराजते ॥ ७ ॥ न चाऽस्या नश्यते रूपं वपुर्मलसमाचितम् । असंस्कृतमभिव्यक्तं भाति काश्चनसंनिभम् अनेन वपुपा वाला पिप्लुनाऽनेन सूचिता । लक्षितेयं मया देवी निभृतोऽग्निरिवोमणा ॥ ९ ॥ : तच्छुत्वा वचनं तस्य सुदेवस्य विशांपते । सुनन्दा शोधयामास पिप्लुप्रच्छादनं मलम् ॥ १० ॥ स मलेनाऽपकृष्टेन पिप्लुस्तस्या व्यरोचत । दमयन्त्या यथा व्यभ्रे नभसीव निशाकरः ॥ ११ ॥ पिप्लं दृष्ट्वा सुनन्दा च राजमाता च भारत रुदन्त्यो तां परिष्वज्य मुहूर्तमिव तस्थतुः ॥ १२॥ उत्सृज्य वाप्पं शनकै राजमातेदमब्रवीत् भगिन्या दुहिता मेऽसि पिप्लुनाऽनेन सूचिता ॥ १३ ।। अहं च तव माता च राज्ञस्तस्य महात्मनः सुते दशार्णाधिपतेः सुदाम्नश्चारुदर्शने ॥ ११ ॥ भीमस्य राज्ञः सा दत्ता बीरवाहोरहं पुनः त्वं तु जाता मया दृष्टा दशार्णेपु पितुर्यहे ॥ १५ ॥ भी मुवर्ण के ममान चमक रहा है । आँच या गर्मी । अत्यन्त दुःखित ही दमयन्ती को गले से लगा के द्वारा जैमे राम्ब से ढकी हुई अग्नि का अस्तित्व , लिया। एक मुहूर्त के पीछे राजमाना रोती-रोती जाना जाता है, वैसे ही भौहों के बीच में स्थित यह दमयन्ती से कहने लगी-हे पुत्री ! तुम्हारे मनक चिद और मलिन गरीर-कान्ति देखकर मैंने पहचान के चिह को देखकर मुझे पूर्ण विश्वास हो गया है लिया कि यही दमयन्ती है ।।५।९॥ कि तुम्ही मेरी बहन की बेटी दमयन्ती हो। हे बेटी! मुदेव की उक्त यातों को सुनकर मुनन्दा ने तुम्हारी माता और मैं दोनों ही दशार्ण देश के स्वामी उस मैल को पानी मंगवार धुलवा टाग जिममे राजा सुदामा की कन्या है । पिना ने तुम्हारी माता वह चिद ढका हुआ था और मैल के दूर होने पर का विवाह महाराज मीम के साथ कर दिया और वह इस प्रकार से प्रकाश करने लगा मानों निर्मल मेग विवाह महाराज वीरबाहु के माय कर दिया भामाश में चन्द्रमा उदय हुआ है । उस चिद को था। मैंने तु, बालकपन में अपने पार के घर में देमार अब सुनन्दा और उनकी माता, दोनों ने देखा था। हे बेटी! मेरे घर को तुम आने पिता के wasairatSWAureunion । - १७६४ महा भारत [ वनपर्व PGADAV - AIAviaNAMANANAMRUAGWANASNA यथैव ते पितुर्गेहं तथैव मम भाविनि यथैव च ममैश्वर्यं दमयन्ति तथा तव ॥ १६ ॥ तां प्रहृष्टेन मनसा दमयन्ती विशांपते प्रणम्य मातुर्भगिनीमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १७॥ अज्ञायमानाऽपि सती सुखमसम्युपिता त्वयि । सर्वकामैः सुविहिता रक्ष्यमाणा सदा त्वया सुखात्सुखतरो वासो भविष्यनि न संशयः । चिरविप्रोपितां मातामनुज्ञातुमर्हसि ॥ १९ ॥ दारको च हि मे नीतौ वसतस्त्र बालको पित्रा विहीनौ शोकाकॊ मया चैव कथं नु तौ ॥ २० ॥ यदि चापि प्रियं किंचिन्मयि कर्तुमिहेच्छसि । विदर्भान्यातुमिच्छामि शीघं मे यानमादिश वाढमित्येव तामुक्त्वा हृष्टा मातृष्वसा नृप । गुप्तां चलेन महता पुत्रस्याऽनुमते ततः ॥ २२ ॥ प्रास्थापयद्राजमाता श्रीमती नरवाहिना यानेन भरतश्रेष्ठ स्वन्नपानपरिच्छदाम् ॥ २३ ॥ ततः सा न चिरादेव विदर्भानगमत्पुनः तां तु बन्धुजनः सर्वः प्रहृष्टः समपूजयत् ॥ २४ ॥ सर्वान्कुशलिनो दृष्ट्वा बान्धवान्दारको च तो। पर के समान समझो । मेरा सब ऐश्वर्य तुम अपना दिनों से परदेश में रह रही हूँ। अब आज्ञा दीजिए, दी ममो ॥१०११६|| । मै अपन पिता के घर जाऊँ । मेरे पुत्र और पुत्री यह सुनकर दमयन्ती ने प्रसन्न होकर कहा अभी बालक हैं न जाने के बिना माता और पिता मासी! अबतक यद्यपि आप मुझे पहचान नहीं मरी के यहां केमे रहते होंगे ॥१७॥२०॥ थानी भी आपके यहां मुझे किसी बात के लिये कष्ट यदि आप गेरा प्रिय करना चाहती है तो शीघ्र नदी हआ। आपने सदा मेरी रक्षा की और देख- ! मुझे मेरे पिता के यहां भेज दीजिए । यह सुनकर राज- समरसती है। मन बह गुमगे आपके यहां रहकर माता बहुत प्रसन्न हुई और उन्होंने अपने पुत्र इतना समय व्यतीन दिया है। हे गीमा ! मैं बाहुन से अन्न यर और अन्य अनेक प्रकार की । । । आज्ञा -RIGINAL UM अध्याय ६९] म हा मा र त १७६५ SAVAN स 200CNRNALNNNNNNNAILANNAWN मातरं पितरं चोभौ सर्व चैव सखीजनम् ॥ २५॥ देवताः पूजयामास ब्राह्मणांश्च यशस्विनी परेण विधिना देवी दमयन्ती विशांपते ॥ २६ ॥ अतर्पयत्सुदेवं च गोसहस्रेण पार्थिवः प्रीतो दृष्ट्वैव तनयां ग्रामेण द्रविणेन च ॥ २७॥ सा व्युष्टा रजनीं तत्र पितुर्वेश्मनि भाविनी । विश्रान्ता मातरं राजन्निदं वचनमब्रवीत् ॥ २८॥ दमयन्त्युवाच-मां चेदिच्छसि जीवन्ती मातः सत्यं ब्रवीमि ते । नरवीरस्य चैतस्य नलस्याऽऽनयने यत ॥ २९ ॥ दमयन्त्या तथोक्ता तु सा देवी भृशदुःखिता । वाप्पेणाऽऽपिहिता राक्षी नोत्तरं किंचिदब्रवीत् ॥ ३० ॥ तदवस्थां तु तां दृष्ट्वा सर्वमन्तःपुरं तदा हाहाभूतमतीवाऽऽसीद्धृशं च प्ररुरोद ह ॥ ३१ ॥ ततो भीमं महाराजं भार्या वचनमब्रवीत् दमयन्ती तव सुना भर्तारमनुशोचति ॥ ३२ ॥ अपकृष्य च लज्जां सा स्वयमुक्तवती नृप । प्रयतन्तु तव प्रेप्याः पुण्यश्लोकस्य मार्गणे ॥ ३३ ॥ बहुत सी मामग्रियां देकर, बहुत सी सेना के साथ, गाँव दिया। रात्रि भर विश्राम कर चुकने के उपरांत दमयन्ती को पालकी में बैठाकर विदर्भ नगर को भेज दमयन्ती ने माता मे कहा-हे माता! यदि तुम मेरा दिया। वह थोड़े ही दिनों में विदर्भ देग में आ जीना चाहती हो तो राजा नल को हँदने के लिये कोई पहुँची उसके सब भाई-बन्धुओं ने प्रमन्न होकर उसका मनुष्य भेजो । कन्या के वचन सुनकर माता बहुत बड़ा आदर किया । और दमयन्ती ने भी अपने मय ही दु.म्बित हुई। कुछ उत्तर न देकर वह लगातार भाई, पुत्र, पुत्री, माता, पिता और सब सखियों को आंसू बहाने लगी ॥२७॥३०॥ कुगलपूर्वक देखकर देवता और ब्राह्मणों की पूजा उसको रोनी हुई देखकर रनिवाम की और की ॥२१॥२६॥ नियां भी रोने लगी । इसके पीछे रानी ने गजा राजा भीम ने बहुत दिनों के बाद अपनी कन्या भीम मे कहा-हे महाराज! तुम्हारी कन्या पति के को देखकर, प्रतिज्ञा के अनुमार, मुदेव ब्राह्मण को । गोक मे महान्याकुल होकर विलाप कर रही है। उसने हजार गायें, बहुत साधन और एक नगर के वगवर । लना छोड़कर मुझमे अपने मन का भाव प्रकट किया। 28VRIOUBLIADANAIRAL - ALS म हा भारत [ वनपर्व 2 - AMALAaiN तया प्रदेशितो राजा ब्राह्मणान्वशवर्तिनः प्रास्थापयदिशः सर्वा यतचं नलमार्गणे ॥ ३४ ॥ ततो विदर्भाधिपतेनियोगाद्ब्राह्मणास्तदा दमयन्तीमथो सृत्वा प्रस्थितास्ते तथाऽब्रुवन् ॥३५॥ अथ तानबवी मी सर्वराग्विदं वचः ब्रूयास्त जनसंसत्सु तत्र तत्र पुनः पुनः क्व नु त्वं कितव च्छित्वा वस्त्रार्धं प्रस्थितो मम । उत्सृज्य विपिने सुप्तामनुरक्तां प्रियां प्रिय ॥ ३७॥ सा वै यथा त्वया दृष्टा तथाऽऽस्ते स्वत्प्रतीक्षिणी । दह्यमाना भृशं बाला वस्त्रार्धनाऽभिसंवृता ॥ ३८ ॥ तस्या रुदन्त्याः सततं तेन शोकेन पार्थिव प्रसादं कुरु वै वीर प्रतिवाक्यं वदस्व च एवमन्यच्च वक्तव्यं कृपां कुर्याद्यथा मयि वायुना धूयमानो हि वनं दहति पावकः ॥ १० ॥ भर्तव्या रक्षणीया च पत्नी हि पतिना सदा । तन्नष्टमुभयं कस्माद्धर्मज्ञस्य सतस्तत्र ख्यातः प्राज्ञः कुलीनश्च सानुकोशो भवान्सदा । है । इसलिये आप अपने अनुचरों को आज्ञा दीजिए । में जाओ वहा यही कहो कि "हे छली | हे कपटी! शिवशीघ्र ही महाराज नल का पता रगाने के रिय, | अपनी पतिव्रता स्त्री को सोते समय भयानक जगल दर दर पे देशों में जाय । वृहदश्व कहते हैं-हे राजा में अकेली छोड़कर, उसका आधा यस फाड़कर, कहा युधिष्ठिर! रानी के यों कहने पर राजा ने उसी समय भाग आये हो ? यह तुम्हारी प्रतीक्षा में उसी तरह राजा नर का पता लगाने के रिय ब्राह्मणों को चारों है जिसतरह तुमने उसे देखा था। तुम्ही को अपना और भेजा। उनसे १६ दिया कि तुम रोग नर के जीवन प्राण समझनेवानी वह सुन्दरी वही आधा वस्त्र पता गाने का यम करो । राजा की आज्ञा पाकर पहने तुम्हारे विरह में रात दिन रोया करती है। दमयन्नी पास जाकर जामणों ने कहा-हे राज इसलिये तुम प्रसन्न होकर शीघ्र उसकी बातों का पुमारी हम रोग तुम्हारे पिता की आज्ञा से महात्मा उत्तर दो।" दे ब्राह्मणो ! आप रोग ये सब बात नर का पता लगाने जा रहे हैं। दमयन्ती ने कहा कहकर उनसे चित्र में मेरे उपर दया उत्पन्न करने है प्रामा ! आप गग जिम गग्य और जिम सभा की चेष्टा करना । अगि जसे वायु की सहायता से अध्याय ६९] म हा मारत १७६७ NA . - संवृत्तो निरनुक्रोशः शंके मद्भाग्यसंक्षयात् ॥ ४२ ॥ तत्कुरुष्व नरव्याघ्र दयां मयि नरर्षभ आनृशंस्यं परो धर्मस्त्वत्त एव हि मे श्रुतः ॥ ४३ ॥ एवं त्रुवाणान्यदि वः प्रतियात्कथंचन स नरः सर्वथा जेयः कश्चाऽसौ क्व नु वर्तते ॥ १४ ॥ यश्चैवं वचनं श्रुत्वा यात्प्रतिवचो नरः तदादाय वचस्तस्य ममाऽऽवेद्यं द्विजोत्तमाः ॥ १५॥ यथा च वो न जानीयाद् ब्रुवतो मम शासनात् । पुनरागमनं चैव तथा कार्यमतन्द्रितः ॥ ४६॥ यदि वाऽसौसमृद्धः स्याद्यदि वाऽप्यधनो भवेत् । यदि वाऽप्यसमर्थः स्याज्ञयमस्य चिकीर्पितम् ॥ १७ ॥ एवमुक्तास्त्वगच्छंस्ते ब्राह्मणाः सर्वतोदिशम् । नलं मृगयितुं राजस्तदा व्यसनिनं तथा ॥ १८ ॥ ते पुराणि सराष्ट्राणि ग्रामान्धोपांस्तथाऽऽश्रमान् । अन्वेपन्तो नलं राजन्नाऽधिजग्मुर्द्विजातयः ॥ ४९ ॥ बढ़कर सारे वन को भम्म कर देती है उसी प्रकार । का कारण क्या है बहुत हो चुका अब दया करो।" विरह की अमि इस अपला नारी का अन्त करना , हे ब्राह्मणो ! आप लोगों की इन बातों पर जो कोई चाहती है । ऐसा मन में विचार हे राजा नर । उस कुछ उत्तर द उमका स्त्र वृत्तान्त जानने की आप अपला के ऊपर कृपा कीजिए ॥३१॥४०॥ रोग चेष्टा करें । उममे उसी समय टमका नाम, धाम आप लोग मेरी ओर से यह भी कहिएगा कि पूर्छ । वह पुरुप अनेक प्रश्नों के उत्तर में जो कुछ "विही हुई स्त्री की सदा रक्षा और देख भाल करना कहे, मो मत्र प्रकार मुझमे कहिएगा । यह चिन्ता पति का आश्य कर्तव्य है। इसके विपरीत आचरण न कीजिएगा कि वह धन है या निधन या अमर्थ । करके क्या तुम धार्मिक का काम कर रहे हो। 'तुम किन्तु इस बात को और कोई न जान मके कि में बड़े धर्मात्मा, दय लु, अच्छे हृदयवाले, प्राज़, सुशील आप रोगों को इस काम के रिये भेज रही हूँ । इम और दुर्गन हो । फिर इस समय क्या मेरे भाग्य के प्रकार निर्विन रस मे यह काम करके आप रोग दोष से निठुर बन गये । हे नाथ ! तुमने आप ही गीघ्र लाट आवे । वे ब्रामा रोग दमयन्ती की आना क्तिनी यार कहा है कि निलुग्ता न करना ही प्रधान मे विदर्भ देश मे, चन र अनेक देशों में गिरने रंगे, धर्म है। फिर इस समय तुम्हारे एमे निदर बन जाने क्हों नद, नदी, गांव, नगर, वन और आश्रम oceneni .0.00AM १७६८ म हा भारत [ वनपर्व ABUJIT--- । DEDENE DEDERAT WORDE NERD तच्च वाक्यं तथा सर्वे तत्र तत्र विशांपते । श्रावयांचक्रिरे विप्रा दमयन्त्या यथेरितम् ॥ ५० ॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलावेपणे एकोनमातितमोऽध्यायः ।। ६९ ॥ लाँधकर दमयन्ती ने जो कुछ कहा था उसी की महाराज नल का कहीं कुछ पता न लगा ॥४१॥५०॥ घोषणा स्थान-स्थान पर करते हुए विचरने लगे । परन्तु वनपर्व का उनहत्तरवां अध्याय समाप्त हुआ ।। ६९।। अथ सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ वृहदश्व उवाच-अथ दीर्घस्य कालस्य पर्णादो नाम वै द्विजः । प्रत्येत्य नगरं भैमीमिदं वचनमब्रवीत् नैपधं मृगयाणेन दमयन्ति मया नलम् अयोध्या नगरी गत्वा भाङ्गासुरिमुपस्थितः ।। २ ॥ श्रावितश्च मया वाक्यं त्वदीयं स महाजने ऋतुपर्णो महाभागो यथोक्तं वरवर्णिनि तच्छ्रुत्वा नाऽब्रवीत्किञ्चितुपर्णो नराधिपः न च पारिपदः कश्चिद्भाष्यमाणो मयाऽसकृत् ॥ ४ ॥ अनुज्ञातं तु मां राजा विजने कश्चिदब्रवीत् ऋतुपर्णस्य पुरुषो वाहुको नाम नामतः सूतस्तस्य नरेन्द्रस्य विरूपो ह्रस्वबाहुकः शीघ्रयानेषु कुशलो मृष्टकर्ता च भोजने स विनिःश्वस्य बहुशो रुदित्वा च पुनः पुनः । मत्तरवां अध्याय ॥७॥ गृहदश्व कहते है-दे राजन् ! बहुत दिनों के ने कुछ उत्तर नहीं दिया । मैं वहां से विदा होकर पीछे एक पर्णाद नाम का ब्राह्मण लौटकर दमयन्ती जब दूसरे स्थान को जाने लगा तब एक पुरुष एकान्त के पास आया और कहने लगा-हे दमयन्ती ! मैं में मेरे पास आया | उसका नाम बाहुक था । वह राजा नल को ढूँढ़ता हुआ अयोध्या नगरी में राजा बड़ा ही कुरूप था । वह महाराज ऋतुपर्ण के यहां मातुपर्ण के यहां पहुँचा। वहां गने राजसभा में तुम्हारे सारधि का काम किया करता है । घोड़े चलाने और शिक्षा किये हुए वाक्य सुनाये परतु उनको सुनकर । रसोई बनाने में वह बड़ा ही चतुर है । श्वास लेता राजा मातुपर्ण अथवा उसके सभासदों में से किसी दुआ और आंसू बहाता हुआ वह मेरे पाम आया। - -- - 1 अध्याय ७०] महा मारत १७६९ ८८ .. - meinwrder-carriedere - कुशलं चैव मां पृष्ट्वा पश्चादिदमभापत | वेपम्यमपि संप्राप्ता गोपायन्ति कुलस्त्रियः । आत्मानमात्मना सत्यो जितः खगों न संशयः ॥ ८ ॥ रहिता भर्तृभिश्चैव न कुप्यन्ति कदाचन प्राणांश्चारित्रकवचान्धारयन्ति वरस्त्रियः विषमस्थेन मूढेन परिभ्रष्टसुखेन च यत्सा तेन परित्यक्ता तत्र न क्रोधुमर्हति ॥ १० ॥ प्राणयात्रां परिप्रेप्सोः शकुनेह॒तवाससः आधिभिर्दह्यमानस्य श्यामा न क्रोधुमर्हति ॥ ११ ॥ सत्कृताऽसत्कृता वापि पतिं दृष्ट्वा तथागतम् । भ्रष्टराज्यं श्रिया हीनं क्षुधितं व्यसनाप्लुतम् ॥ १२ ॥ तस्य तद्वचनं श्रुत्वा त्वरितोऽहमिहाऽऽगतः । श्रुत्वा प्रमाणं भवती राक्षश्चैव निवेदय ॥ १३ ॥ एतच्छ्रुत्वाऽश्रुपूर्णाक्षी पर्णादस्य विशांपते दमयन्ती रहोऽभ्येत्य मातरं प्रत्यभापत ॥ ११ ॥ अयमर्थो न सेवेद्यो भीमे मातः कदाचन त्वत्संनिधी नियोक्ष्येऽहं सुदेवं द्विजसत्तमम् ॥ १५ ॥ मुझसे कुशल प्रश्न करके उसने कहा -अच्छे कुल की पक्षियों के द्वारा वन दर जाने के कारण से बियां घोर दुर्दशा में पड़कर भी तनमन मे अपनी महाराज नल बहुत ही अधीर हो रहे थे । इस समय रक्षा करती है। इसी कारण उन्हें मरने पर अवश्य भी व दारुण मानमिक वेदना भोगते हुए बड़े कष्ट ही म्वर्गलोक मिरता है । पति के पाम रहने पर भी ' से जीवित हैं । दमयन्ती को किमी तरह भी उनपर वे प्राणपण से आत्मरक्षा करने में तनिक भी मुम्नी क्रोध न करना चाहिये । विशेषार हम ममय ये गग्य नहीं होने देती । पति पर क्रोध करके कुमार्ग में पाँव , मे प्रष्ट, रक्ष्मी मे हीन, मम और प्यास मे व्यारर गमने की प्रवृत्ति कमी उनको नहीं होती । इमनिये । होकर, किमी तरह जीवित है। ये दमयन्नी पर प्रीति यदि गजा नल ने गज्य मे प्रष्ट होकर, ऐमी दुर्दशा प्रकट करें या न करें, टनकी प्रेमी दशा दमर में पड़कर, अपनी प्यारी मी दमयन्ती को वन में दमयन्ती को टनमा न करना नादिय । अमेरी छोड़ दिया है ना मी दमयन्ती को उनपर । दमयन्ती में वाहक के मुंह मे टस टच को मुन- ? कोष या अमन्ताप प्राट न करना चाहिये ।।१॥१०॥ कर नीम यहां नग आया हूँ। अब आर जी काना NAGirirawimalamNANAM - १७७० [ वनपर्व महा मा र त - MAMANASANNUAau यथा न नृपतिर्भीमः प्रतिपद्येत मे मतम् तथा खया प्रकर्तव्यं मम चेत्प्रियमिच्छसि ॥ १६ ॥ यथा चाऽहं समानीता सुदेवेनाऽऽशु वान्धवान् । तेनैव मङ्गलेनाऽऽशु सुदेवो यातु मा चिरम् ॥ १७ ॥ समानेतुं नलं मातरयोध्या नगरीमितः विश्रान्तं तु ततः पश्चात्पर्णादं द्विजसत्तमम् ॥ १८ ॥ अर्चयामास वैदर्भी धनेनाऽतीव भाविनी । नले चेहाऽऽगते तत्र भूयो दास्यामि ते वसु ॥ १९ ॥ त्वया हि मे बहु कृतं यदन्यो न करिष्यति । यद्भाऽहं समेष्यामि शीघ्रमेव द्विजोत्तम ॥ २० ॥ स एवमुक्तोऽथाऽऽश्वास्य आशीर्वादैः समलैः । गृहानुपययो चापि कृतार्थः सुमहामनाः ॥ २१ ॥ ततः सुदेवमानाय्य दमयन्ती युधिष्ठिर अब्रवीत्संनिधौ मातुर्दुःखशोकसमन्विता ॥ २२ ॥ गत्वा सुदेव नगरीमयोध्यावासिनं नृपम् ऋतुपर्ण वचो ब्रूहि संपतन्निव कामगः ॥ २३ ॥ आस्थास्यति पुनभैमी दमयन्ती स्वयंवरम् । उचित हो सो क्रें। पर्णाद के मुख से ये बातें सुनकर | भी धन दूंगी । आपने मेरा यह उपकार किया है जो दमयन्ती का शोक उमड़ पड़ा । वह आँसू बहाती दूसर। कदापि नहीं कर सकता । अब पति से मेरी हुई अपनी माता के पास गई और एकान्त में जाकर शीघ्र भेंट हो जायगी । इसके पश्चात् वह ब्राह्मण कहने लगी-हे गाता! में मुदेव ब्राह्मण को अयोध्यापुरी | धन लेकर आशीर्वाद देता हुआ घर को चला गया गंगहाराज नल का पता लगाने के लिये शीघ्र भेजना | ॥११॥२०॥ चाहती है। वे जैसे मेग पना लगाकर मुझे आपके अव दमयन्ती ने दु.खी होकर सुदेव ब्राह्मण को पाम ले आये हैं, मे ही वे महाराज नल का भी बुराया और अपनी माता के सन्मुख उससे कहा-हे १ पता लगाकर उन यहां ले आयेंगे । पर्णाद जब विश्राम मुदेव ! शाम अयोध्यापुरी में जाकर राजा यातुपर्ण कर चुके नव दमयन्ती ने यहत सा धन और को यह सूनना दे दीजिए कि "राजा भीम की कन्या देकर उन्हें मन्तुष्ट किया और कहा-है बामणश्रेष्ठ दमयन्ती का फिर से स्वयम्बर होगा। कल स्वयम्बर सत्र नर. जर यहां आ जायेंगे तो मैं आपको और का दिन है । जगह-जगह यह सुनना फैलने से अनेक - रत्र ANNA अध्याय ७१] महा मा रत १७७१ 1Avander . , SANAITINAM तत्र गच्छन्ति राजानो राजपुत्राश्च सर्वशः ॥ २४ ॥ तथा च गणितः कालः श्वोभूते स भविष्यति । यदि संभाविनीयं ते गच्छ शीघ्रमरिन्दम ॥ २५ ॥ सूर्योदये द्वितीयं सा भर्तारं वरयिष्यति न हि सज्ञायते वीरो नलो जीवति वा न वा ॥ २६ ॥ एवं नया यथोक्तो वै गत्वा राजानमब्रवीत् । ऋतुपर्ण महाराज सुदेवो ब्राह्मणस्तदा ॥ २७॥ इति श्रीमन्महामारते आरण्यकपर्वणि नलोपास्यानपर्वणि दमयन्तीपुन.स्वयंवरक्यने मप्रतितमोऽध्यायः ।। राजपुत्र म्वयम्बर-ममा में एकत्र हो रहे हैं । कल अभी तैयार हों।" दमयन्ती ने यों कहकर अब सूर्योदय होते ही दमयन्ती दूसरे पनि का वरण करेगी। सुदेव को अयोध्या में भेज दिया । वह ब्राह्मण बड़ी टमके इस दुबारा स्वयम्वर का अभिप्राय यह है कि ' शीघ्रता के साथ जाकर महाराज ऋतुपर्ण मे मिग टमे यह नहीं मालूम पड़ता कि नल जीते हैं या नहीं। और उमने दमयन्ती के कथनानुमार सय वृत्तान्त कह जो हो, यदि आप इस म्वयम्वर में जाना चाहें तो मुनाया ॥२१॥२७|| वनपर्व का मत्तरवां अध्याय ममाप्त हुआ ॥ ७॥ अथ एस्मातिवमोऽध्यायः ॥ ७१॥ बृहदश्व टवाच-श्रुत्वा वचः सुदेवस्य ऋतुपर्णो नगधिपः सान्त्वयञ्च्लक्ष्णया वाचा बाहुकं प्रत्यभापत ॥ १ ॥ विदर्भान्यातुमिच्छामि दमयन्त्याः स्वयवंग्म् । एकाहा हयतत्वज्ञ मन्यसे यदि बाहुक एवमुक्तस्य कोन्तेय तेन राजा नलस्य ह व्यदीर्यत मनो दुःखात्प्रदध्यो च महामनाः ॥ ३ ॥ दमयन्ती बदतत्कुर्याद्रुःखेन मोहिता इरहत्तरवां अध्याय ॥ ७ ॥ वृहदश्व कहते हैं- गजा युधिष्ठिर ! गजा ही विदर्भ नगर में पहुँन जाना नाटता है । यद ऋतुपर्ण मुदेव ब्राह्मण की चान को मुनकर मधुर मुनका वाहक अर्थात् नल का मन दुम में विदर्ण वाणी के माय बाहुक में कहने लगा-हे र यतत्त्व के , हो गया । वह विचार करने लगा कि क्या दमयन्ती ज्ञाता ! मुनना है कि दमयन्नी का दुवारा स्वयम्बर मचमुच शिर अपना विवाद करना चादनी है या मुझे होगा । क टमका दिन नियत हुआ है। में आर पाने के निये यह टपाय निकाग गया हाय बड़े .... Hanuman - --- ।
[ वनपर्व १७७२ म हा भारत areAatestra अस्मदर्थे भवेद्वाऽयमुपायश्चिन्तितो महान् ॥ ४ ॥ नृशंसं वत वैदर्भी भर्तकामा तपस्विनी मया क्षुद्रेण निकृता कृपणा पापबुद्धिना स्त्रीस्वभावश्चलो लोके मम दोषश्च दारुणः स्यादेवमपि कुर्यात्सा विवासाद्गतसौहृदा मम शोकेन संविना नैराश्यात्तनुमध्यमा नैवं सा कहिचित्कुर्यात्सापत्या च विशेषतः ॥ ७ ॥ यदत्र सत्यं वाऽसत्यं गत्वा वेत्स्यामि निश्चयम् । ऋतुपर्णस्य वै काममात्मार्थं च करोम्यहम् ॥ ८ ॥ इति निश्चित्य मनसा वाहुको दीनमानसः । कृताञ्जलिरुवाचेदमृतुपर्ण जनाधिपम् प्रतिजानामि ते वाक्यं गमिष्यामि नराधिप । एकाह्रा पुरुषव्याघ्र विदर्भनगरी नृप ॥ १० ॥ ततः परीक्षामश्वानां चके राजन्स बाहुकः । अश्वशालामुपागम्य भाङ्गासुरिनृपाज्ञया स त्वर्यमाणो बहुश ऋतुपर्णन बाहुकः अश्वाञ्जिज्ञासमानो वै विचार्य च पुनः पुनः । दुम्प की बात है जो मेरे जैमे नीच, कृपण और पाप अब मुझको अपने मनोरथ को जानने के लिये इस बुद्धि गनुप्य ने उस तपस्विनी विदर्भ राजा की पुत्री का राजा ऋतुपर्ण की कामना पूरी करनी चाहिये । यह जो अबपति बरना चाहती है निरादर किया ॥१५॥ विचारकर और दुखी होकर बाहुक ने हाथ जोड़- दा, संगार में स्त्रियों का म्यभार बहुत ही चश्वर कर राजा ऋतुपर्ण से कहा-हे महाराज ! मैं आपकी होना है। मैंने उस अपरा स्त्री के साथ जैसा निकुर इच्छा के अनुसार एक ही दिन में विदर्भ देश में व्यवहार किया है उसका पाल फरक, उसके ऐसे । आपको पहुँचा दूंगा ॥६॥१०॥ विचार के रिये, में उमे दोष नहीं दे सकता। मेरे इसके पीछे बाहुक ने राजा ऋतुपर्ण की आज्ञा शिमे दमयन्नी अत्यन्न सण्टिन हो रही है। में घुहमाल (अम्तयल) में जाकर फुलि घोड़ों के PREमो वीर्य समपक पारक और एक कन्या विशेष विशेष रक्षणों अनुसार घोड़े छोटे । महाराज भी सन्न हो चुरे । जो कुछ हममें सस्य और ऋतुपर्ण को विदर्भ नगर जाने के लिये अत्यन्त प्रमग या यहाही जाने पर निधय होगा। हमार अधीर देरावर पादुक ने भीम चलनेवाले अच्छी COMPAROGAVMGAN-COMGAGAa - । 1rl.
अध्याय ७१ ] महा मारत १७७३ ८८ अध्यगच्छत्कृशानश्वान्समर्थानध्वनि क्षमान् ॥ १२ ॥ तेजोवलसमायुक्तान्कुलशीलसमन्वितान् वर्जिताल्लक्षणेहीनः पृथुप्रोथान्महाहनून् शुद्धान्दशभिरावर्तेः सिन्धुजान्वातरंहसः दृष्ट्वा तानब्रवीद्राजा किंचित्कोपसमन्वितः ॥ १४ ॥ किमिदं प्रार्थितं कर्तुं प्रलव्धव्या न ते वयम् । कथमल्पवलप्राणा वक्ष्यन्तीम हया मम् महानध्वा च तुरनगन्तव्यः कथमीदृशैः बाहुक उवाच-एको ललाटे द्वौ मूर्ध्नि द्वौ द्वौ पार्थोपपार्श्वयोः । द्वौ द्वौ वक्षसि विज्ञेयो प्रयाणे चैक एव तु एते हया गमिष्यन्ति विदर्भान्नाऽत्र संशयः । यानन्यान्मन्यसे राजन् ब्रूहि तान्योजयामि ते ॥ १७ ॥ ऋतुपर्ण उवाच-त्वमेव हयतत्त्वज्ञः कुशलो ह्यसि वाहुक यान्मन्यसे समर्थांस्त्वं क्षिप्रं तानेव योजय ॥ १८ ॥ ततः सदश्वांश्चतुरः कुलालसमन्वितान् योजयामास कुशलो जवयुक्तानथे नलः ततो युक्तं रथं राजा समारोहवरान्वितः जाति के दुबले-पतले घोड़े छांट लिये। वे घोड़े अच्छे । चारों पुट्टों पर चार, छाती में दो, पीछे एक, इस ६ वंश में उत्पन्न, सुशिक्षित, सिन्धु देश के, हीन | प्रकार दस भौरियां हैं । मुझे पूर्ण विश्वास है कि ये लक्षणों से शून्य, शीघ्रगामी, बड़े बलपान और उत्तम घोड़े निर्विघ्न रूप से एक ही दिन में आपको विदर्भ थे। उनपर दम भौरियां थी। उनकी नाक मोटी नगर में पहुँचा देंगे । अथवा जो आप इन घोड़ों थी और थूथन चौड़ा था। ऐसे घोड़ों को छांटकर | को पसन्द न करें तो जिन घोड़ों के लिये आप आजा निकालते देख ऋतुपर्ण को क्रोध आ गया। उन्होंने | दें उन्हीं को रथ में जोतने के लिये तैयार हूँ। ऋतुपर्ण कहा-हे चाहुक! तुम क्या मेरे कार्य को बिगाड़ना | ने कहा-हे वाहक ! तुम मच विद्या में नतुर हो। चाहते हो! ये दुबले और कमजोर घोड़े किस तरह तुम जिन घोड़ों को अची लक्षणोंवाला ममझो टन्दी इतनी राह एक दिन में चल सकेंगे ! ॥११॥१५॥ को स्थ में जोतो । यह सुनकर याहुक ने उन वायु साहुक ने कहा-हे महाराज ! इन घोड़ों के | के तुल्य वेग रखनेवाले चारों घोड़ों को व्य में जोना माथे पर एक भौरी, मूर्ध्नि पर दो, अगल बगल के | और ऋतुपर्ण उस रथ पर आतुरता के साथ मवार MAKnearBINAWABAIWAN PAN MALS AMAN
१७७४
म हा भारत
[ वनपर्व
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ANANDLANABANANBRUNWANUASiwww
अथ पर्यपतन्भूमौ जानुभिस्ते योत्तमाः ॥ २० ॥
ततो नरवरः श्रीमान्नलो राजा विशांपते
सान्त्वयामास तानश्वांस्तेजोवलसमन्वितान् ॥ २१ ॥
रश्मिभिश्च समुद्यम्य नलो यातुमियेप सः ।
सूतमारोप्य वार्ष्णेयं जवमास्थाय वै परम् ॥ २२ ॥
ते चोद्यमाना विधिवद्वाहुकेन हयोत्तमाः
समुत्पेतुरथाऽऽकाशं रथिनं मोहयन्निव
तथा तु दृष्ट्वा तानश्वान्वहतो वातरंहसः
अयोध्याधिपतिः श्रीमान्विस्मयं परमं ययौ ॥ २४ ॥
रथघोषं तु तं श्रुत्वा हयसंग्रहणं च तत्
वाष्र्णेयश्चिन्तयामास बाहुकस्य हयज्ञताम्
किं नु स्यान्मातलिरयं देवराजस्य सारथिः ।
तथा तल्लक्षणं वीरे वाहुके दृश्यते महत् ॥ २६ ॥
शालिहोत्रोऽथ किं नु स्याद्धयानां कुलतत्ववित् ।
मानुपं समनुप्राप्तो वपुः परमशोभनम् ॥ २७ ॥
उताऽऽहोस्विद्भवेद्राजा नलः परपुरञ्जयः
सोऽयं नृपतिरायात इत्येवं समचिन्तयत्
अथ चेह नलो विद्यां वेत्ति तामेव चाहुकः
तुल्यं हि लक्षये ज्ञानं बाहुकस्य नलस्य च ॥ २९ ॥
हो गया । उसके सवार होते ही वह घोड़े घोटुओं के राजा ऋतुपर्ण को बड़ा आश्चर्य हुआ । और
के बल गिर पड़े ॥१६॥२०॥
चार्णय सारथी उस रथ के शब्द को सुनकर विचारने
तर वादुक ने शीघ्रता से वन घोरे के पास लगा कि यह बाहुक तो बड़ा गुणवान् और हयतत्व
जार टन पुकारा और वार्ष्णेय सारथि को का ज्ञाता है। क्या यह इन्द्र का सारधि मातलि है!
हटाकर घोड़ों की बागडोर आप हाथ में ले ली और क्योंकि बाहुक में मातलि के सब श्रेष्ठ लक्षण देख
घोड़ों की बड़े वेग के माथ हाँ।। विधि के अनुसार पढ़ते हैं । अथवा यह घोड़ों की जाति को पहचानने.
हाम्न से पेमा जान पड़ता था मानों यह घोड़े याला शालिहोत्र, मनुष्य शरीर धारणकर, पृथ्वी पर
आकाश जा रहे हैं । यह देखकर अयोध्या आकर, घोड़ों की रास पकड़े रथ को हांक रहा है।
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॥ २८ ॥
अध्याय ७१] म हा मारव ८.स ८८ MNANASA PUNE अपि चेदं वयस्तुल्यं वाहुकस्य नलस्य च नाऽयं नलो महावीर्यस्तद्विद्यश्च भविष्यति ॥३०॥ प्रच्छन्ना हि महात्मानश्चरन्ति पृथिवीमिमाम् । दैवेन विधिना युक्ताः शास्त्रोक्तैश्च निरूपणैः ॥ ३१ ॥ भवेन्न मतिभेदो मे गात्रवैरूप्यतां प्रति प्रमाणात्पग्हिीनस्तु भवेदिति मतिर्मम ॥ ३२ ॥ वयाप्रमाणं तत्तुल्यं रूपेण तु विपर्ययः नलं सर्वगुणैर्युक्तं मन्ये वाहुकमन्ततः ॥ ३३ ॥ एवं विचार्य बहुशो वार्ष्णेयः पर्यचिन्तयत् । हृदयेन महाराज पुण्यश्लोकस्य सारथिः ॥ ३४ ॥ ऋतुपर्णश्च राजेन्द्रो वाहुकस्य हयज्ञताम् । चिन्तयन्मुमुदे राजा सहवार्ष्णेयसारथिः ॥ ३५ ॥ ऐकाम्यं च तथोत्साहं हयसंग्रहणं च तत् । परं यलं च संप्रेक्ष्य परां मुदमवाप ह इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि ऋतुपर्णविदर्भगमने एकसप्ततितमोऽध्यायः ॥७१॥ या यह वही महाराज नल है ! क्योंकि यह बाहुक | पड़ती है,तो भी रूप-रत आकार आदि में भन्तर है सब घोड़े चलाने में उससे किसी बात में कम नहीं है । प्रकार विचार करके देखने से मुझे बाहुक में नल के यदि यह महात्मा नल न भी हो तो उसके शिप्य या सभी गुण देख पड़ते हैं । वृहदश्व कहते हैं-हे राजा उसके सदृश और कोई महापुरुष होगा ॥२१॥३०॥ युधिष्ठिर! इस प्रकार से उस नल के सारथि वार्ष्णेय ने दैव के कोप में पड़कर या शास्त्रनिर्दिष्ट नियम बहुत सी बातें विचार कर बड़ी चिन्ता की और राजा के अनुसार सैकड़ों महात्मा और गुणी, रूप बदले | ऋतुपर्ण बाहुक के हयतत्त्व के ज्ञान को देखकर बहुत हुए, इस पृथ्वी पर विचरते हैं। तात्पर्य यह है कि प्रसन्न हुआ और उसकी एकाग्रता, उत्साह, यत्न और बाहुक के नल होने में मुझे सन्देह होता है, क्योंकि घोड़ों के पकड़ने की विधि को जानकर परम हर्षित यद्यपि वाहुक और नल की अवस्था समान देख | हुआ ॥३१॥३६॥ वनपर्व का इकहत्तरवां अध्याय ममाप्त हुआ ||७१ ।। GNASAWAL sus4 WMARWw22 १७७६ [चनपर्व म हा भारत PARN Pr PUNAVAN । Car - - Meaninxempernyan अथ द्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७२ ॥ वृहदश्व उयाच–स नदीः पर्वतांश्चैव च वनानि च सरांसि च । अचिरेणाऽतिचक्राम खेचरः खे चरन्निव तथा प्रयाते तु रथे तदा भातासुरिनृपः उत्तरीयमधोऽपश्यद्धृष्टं परपुरञ्जयः ततः स त्वरमाणस्तु पटे निपतिते तदा ग्रहीष्यामीति तं राजा नलमाह महामनाः निगृह्णीष्व महाबुद्धे हयानेतान्महाजवान् वार्ष्णेयो यावदेनं मे पटमानयतामिह नलस्तं प्रत्युवाचाऽथ दूरे भ्रष्टः वटस्तव योजनं समतिकान्तो नाऽऽहतुं शक्यते पुनः ॥ ५ ॥ एवमुक्ते नलेनाऽथ तदा भाङ्गासुरिर्नृपः आससाद वने राजन् फलवन्तं विभीतकम् ॥ ६ तं दृष्ट्वा वाहुकं राजा त्वरमाणोऽभ्यभापत ममाऽपि सूत पश्य स्वं संख्याने परमं बलम् ॥ ७ ॥ सर्वः सर्व न जानाति सर्वज्ञो नाऽस्ति कश्चन । नैकत्र परिनिष्ठाऽस्ति ज्ञानस्य पुरुपे क्वचित् ॥ ८ ॥ वृक्षेऽस्मिन्यानि पर्णानि फलान्यपि च वाहुक । यहत्तरवां अध्याय ।। ७२ ।। वृहदश्व कहते है-दे राजा युधिष्ठिर जैसे पक्षी वह वस्त्र यहा से एक योजन पर रह गया है । इस आकाश में उड़ते हैं धमे ही यादुक बड़े वेग से समय वह नहीं लाया जा सकता। इसके पीछे राह चगना हुआ अनेक नद, नदी, वन, उपवन, सरोवर में गजा ऋतुपर्ण ने एक बहेड़े के वृक्ष को देखकर और पर्वत आदि को रॉयता छोड़ता चरा जाता था। नल से कहा-हे बाहुक ! देखो, मैं गिनने में कैसा हमी बीन में राजा ऋतुपर्ण का एरीय वस्त्र रथ से फुतीला और जानकार हूँ। इस बड़े के में नीचे गिर पड़ा। उस समय ऋतुपर्ण ने नल से जितने पते और फल है, सो मैं अभी गिनकर तुम्हें कहा- पाक ! तुम तनिक गम मींचकर घोड़ों बनाये देता हूँ । देखो, सभी विषयों को सब शेग यो गक शे । मेरा यस गिर गया है । घाणेय नहीं जानते। कोई भी सर्वज्ञ नहीं है । सम्पूर्ण ज्ञान जारर टमे से आयेगा । पाहु ने कहा- महाराज ! या सब विद्याएँ एकही पुरुष में नहीं हो सकती ।।१।८॥ --- रथ वृक्ष Maru002 अध्याय ७२ ] महा मारत १७७७ torreneneteerencetreeeeeeee. पतितान्यपि यान्यत्र तत्रैकमधिकं शतम् ॥ ९ ॥ एकपत्राधिकं चाऽत्र फलमेकं च वाहुक पञ्चकोट्योऽथ पत्राणां द्वयोरपि च शाखयोः ॥ १० ॥ प्रचिनु ह्यस्य शाखे द्वेयाश्चाऽप्यन्याः प्रशाखिकाः। आभ्यां फलसहस्से द्वे पञ्चोनं शतमेव च ततो रथमवस्थाप्य राजानं बाहुकोऽब्रवीत् । परोक्षमिव मे राजन् कत्थसे शत्रुकर्शन ॥ १२ ॥ प्रत्यक्षमेतत्कर्ताऽस्मि शातयित्वा विभीतकम् । अथाऽत्र गणिते राजन् विद्यते न परोक्षता ॥१३॥ प्रत्यक्षं ते महाराज शातयिष्ये विभीतकम् अहं हि नाऽभिजानामि भवेदेवं न वेति वा ॥ १४ ॥ संख्यास्यामि फलान्यस्य पश्यतस्ते जनाधिप । मुहूर्तमपि वार्ष्णेयो रश्मीन्यच्छतु वाजिनाम् ॥ १५ ॥ तमब्रवीन्नृपः सूतं नाऽयं कालो विलम्बितुम् । वाहुकरत्वब्रवीदेनं परं यत्नं समास्थितः प्रतीक्षख मुहूर्त त्वमथवा त्वरते भवान् एप याति शिवः पन्था याहि वार्ष्णेयसारथिः ॥ १७ ॥ अनवीहतुपर्णस्तु सान्वयन्कुरुनन्दन त्वमेव यन्ता नाऽन्योऽस्ति पृथिव्यामपि बाहुक ॥ १८ ॥ इस वृक्ष के नीचे एक सौ एक पत्ते और एक । आपका सारथि वार्ष्णेय दमभर के लिये घोड़ों की सौ एक फल पड़े हुए हैं। और इसकी दोनों शाखाओं रास थाम रहे ॥२॥१५॥ में पांच कोड़ पत्ते और दो हजार पञ्चानवे फल यह मुनकर ऋतुपर्ण ने कहा-हे बाहुक ! व्यर्थ राजा ऋतुपर्ण के ये वाक्य मुनकर बाहुक ने स्थ दर करने का कुछ प्रयोजन नहीं। चलो, गीध विदर्भ को रोककर कहा-दे महाराज ! जबतक मैं स्वय देश में पहुंचना होगा। बाहुक ने कहा-दे गजन् । इस वृक्ष के पचे और फलों को न गिन तबतक । आपको यहां एक मुहूर्त भर टहरना होगा। इसके कुछ विश्वास नहीं कर सकता। मैं अभी इस वृक्ष को पते और फरों को गिन लें। यदि आप टहरना न काटकर इसके पत्तों और फलों को गिनकर देनूंगा। चाहें तो वाप्य सारथि घोड़ों की रास पकड़कर इस MANANASAIRNANTWASAURIAGWANABRARIAN SARNAL [ वनपर्व १७७८ महा भारत २४८८ ALPron त्वत्कृते यातुमिच्छामि विदर्भान्हयकोविद शरणं त्वां प्रपन्नोऽस्मि न विघ्नं कर्तुमर्हसि ॥ १९ ॥ कामं च ते करिष्यामि यन्मां वक्ष्यसि बाहुक । विदर्भान्यदि यात्वाऽद्य सूर्य दर्शयिताऽसि मे ॥ २० ॥ अथाऽत्रवीद्वाहुकस्तं संख्याय च विभीतकम् । ततो विदर्भान्यास्यामि कुरुष्वैवं वचो मम ॥ २१ ॥ अकाम इव तं राजा गणयखेत्युवाच ह एकदेशं च शाखायाः समादिष्टं मयाऽनघ ॥ २२ ॥ गणयस्वाऽश्वतत्त्वज्ञ ततस्त्वं प्रीतिमावह । सोऽवतीर्य रथातूर्णं शातयामास तं द्रुमम् ॥ २३ ॥ ततः स विस्मयाविष्टो राजानमिदमब्रवीत् । गणयित्वा यथोक्तानि तावन्त्येव फलानि तु ॥ २४ ॥ अत्यद्भुतमिदं राजन् दृष्टवानस्मि ते वलम् श्रोतुमिच्छामि तां विद्यां ययतज्ज्ञायते नृप ॥ २५ ॥ तमुवाच ततो राजा त्वरितो गमने नृप विद्यक्षहृदयशं मां संख्याने च विशारदम् ॥ २६ ॥ भले मार्ग से आपको विदर्भ देश में ले जायगा । ऋतुपर्ण को लाचार होकर बाहुक का कहना मानना गजा ने कहा-हे याहुक ! तुम्हार जैसा श्रेष्ठ सारथि | पड़ा । राजा ने बाहुक से कहा-अच्छा गिन लो । हम जगत् में दूसरा कोई नहीं है। तुमन सारथि । हे अश्वविधा के जाननेवाले बाहुक ! तुम इस शाखा बनना म्वीकार क्यिा है, इमी से आज में इस कठिन के केवल एक हिम्स के पत्तों और फलों को गिनकर काम में आगे रहा हूँ। में हम समय तुम्हारी शरण में देख रो। इतने से ही तुमको मेरी गिनती पर विश्वास । तुम्हें इस समय विन न करना चाहिये । यदि हो जायगा । पाहुक ने उसी समय रथ से उतरकर बाजही तुम मुंत्र विदर्भ देश में पहुँना दांग और वृक्ष को काट डाला। उसके पत्तों और फलों को गिन सूर्य यदा पहुंचकर निकले तो तुम जो पहोंगे वह रेन पर माहुक को बड़ा आधर्य हुआ । उसने कहा- तुम्हारी इच्छा पूरी वरंगा ॥१६॥२०॥ हे महाराज ! मैन आपकी यह अशैकिक गिनने की बाहुक ने बह-६ महाराज ! मैं हम वृक्ष के माक्ति प्रत्यक्ष देख री । आप जिस विद्या के प्रभाव पामा और पगे गिनकर विदर्भ देशको नाउँगामापत्तो और फरों की टीम-टीक संध्या इतनी जस्ती भार गरे कहने के अनुमार हरिय । अब गजा भान गये उसका हाल सुनने की गुशे पड़ी हसा अध्याय ७२] महा मारत १७७९ THE ENTEN retrvala ve hatta बाहुकस्तमुवाचाऽथ देहि विद्यामिमां मम मत्तोऽपि चाऽश्वहृदयं गृहाण पुरुषर्षभ ॥ २७॥ ऋतुपर्णस्ततो राजा बाहुकं कार्यगौरवात् हयज्ञानस्य लोभाच्च तं तथेत्यत्रवीद्वचः यथोक्तं त्वं गृहाणेदमक्षाणां हृदयं परम् निक्षेपो मेऽश्वहृदयं स्वयि तिष्टतु वाहुक ॥ २९॥ एवमुक्त्वा ददौ विद्यामृतुपर्णो नलाय वे तस्याऽक्षहदयज्ञस्य शरीरान्निःसृतः कलिः ॥ ३०॥ कर्कोटकवि तीक्ष्णं मुखात्सततमुद्रमन् कलेस्तस्य तदातस्य शापाग्निः स विनिःमृतः ॥ ३१ ॥ स तेन कर्शितो राजा दीर्घकालमनात्मवान् ततो विपविमुक्तात्मा स्वं रूपमकरोत्कलिः । तं शप्तुमैच्छत्कुपितो निपधाधिपतिनलः ॥ ३२ ॥ तमुवाच कलिर्भातो वेपमानः कृताञ्जलिः । कोपं संयच्छ नृपने कीर्ति दास्यामि ते पराम् ॥ ३३ ॥ इन्द्रसेनस्य जननी कुपिता माऽशपत्रपुरा यदा त्वया परित्यक्ता ततोऽहं भृशपीडितः ॥ ३४ ॥ है । कृपा करके बतलाइए । ऋतुपर्ण ने कहा-दे दी। टसके जानते ही नल के शरीर में से कोटक बाहुक ! मैं गणना की विद्या और पासों की विद्या के विप की अमि को टगलता हुआ कलि और उसकी बदा चतुर हूँ ॥२१॥२६॥ शापामि जिसके कारण से नल इतने दिनों से मूद बाहुक ने कहा-दे पुरपश्रेष्ठ ! आप मुझे अपनी | हो रहा था बाहर निकल आया। विप की अमि के ये दोनों विधाएँ सिखा दीजिए । इसके बदले में शान्त होने पर करि युग ने अपना म्वरूप धारण किया। आपको में अश्व-विज्ञान वतग दूंगा। राजा ऋतुपर्ण, टम म्वरूप को दमकर राजा नर ने शोषित होर यह सुनकर अपने कार्य की गौरवता और अश्वविद्या माप देना चाहा ॥२७॥३२॥ के लोभ के कारण से वोग कि "ऐसा ही होगा"। परन्तु नल शाप नहीं देने पाया था कि कति रो, तुमको में असरदय विद्या विधिपूर्वक बताता हूँ ने मय से कम्पित होकर दोनों हाथ जोड़कर न से है और अक्ष हृदय विद्या को अपने पास मेरी धरोहर नम्रता के माय कहा-दे महाराज ! पहले जब आर रक्सो। यह कहकर राजा ने नल को वह विद्या बनग अकारण दमयन्ती को अगवन में छोट आये थे NAMANAVANAGAnatkinnAmar १७८० म हा भारत [ वनपर्व VASANASANAVARANANGANWAR - - अवसं त्वयि राजेन्द्र सुदुःखमपराजित विषेण नागराजस्य दह्यमानो दिवानिशम् 11 ३५॥ शरणं त्वां प्रपन्नोऽस्मि शृणु चेदं वचो मम । ये च त्वां मनुजा लोके कीर्तयिष्यन्त्यतन्द्रिताः ॥ ३६ ॥ मत्प्रसूतं भयं तेषां न कदाचिद्भविष्यति भयातं शरणं यातं यदि मां वं न शप्स्यसे । एवमुक्तो नलो राजा न्ययच्छत्कोपमात्मनः ॥ ३७ ॥ ततो भीतः कलिः क्षिप्रं प्रविवेश विभीतकम् । कलिस्त्वन्यैस्तदाऽदृश्यः कथयन्नैपधेन वै ॥ ३८॥ ततो गतज्वरो राजा नैषधः परवीरहा संप्रणष्टे कलौ राजा संख्यायाऽस्य फलान्युत ॥ ३९ ॥ मुदा परमया युक्तस्तेजसाऽथ परेण वै रथमारुह्य तेजस्वी प्रययौ जवनैहयैः विभीतकश्चाऽप्रशस्तः संवृत्तः कलिसंश्रयात् । हयोत्तमानुत्पततो द्विजानिव पुनः पुनः नलः संनोदयामास प्रहृष्टेनाऽन्तरात्मना विर्दभाभिमुखो राजा प्रययो स महायशाः ॥ ४२ ॥ तब उन्होंने अत्यन्त दुखित होकर मुझे शाप दिया | भी डर के मारे जल्दी से उस बहेडे के वृक्ष में घुस था । तभी से में दुखित होकर कोटक नाग के विष गया । कलियुग और नल के उक्त वार्तालाप को और की यन्त्रणा सहता हुआ आपके शरीर में रहता था। किसी ने नहीं जाना । कलियुग के प्रवेश करते ही दे शत्रुनाशन ! इस समय दमयन्ती के शाप से मेरा बटे का वृक्ष छोटा हो गया। इस प्रकार कलियुग छुटकारा हुआ । अब आप पुपित होकर मुझे से छुटकारा मिलने पर राजा नल को शान्ति मिली। शाप मत दीजिए । मैं आपकी शरण में हूँ। हे अपना स्वभाविक तेज पाकर, म्वस्थ होकर, नल ने महाराज ! आप यदि मुझ भयभीत और शरणागत । वृक्ष के पतों और फलों को गिना । फिर परम प्रमन्त्र न दिखाकर भाप नहीं देंगे तो मैं आपको होकर रथ पर चढ़कर, वायु के समान वेग से नल यह वरदान दूंगा कि जगत् में जो कोई आपका नाम । विदर्भ नगर की ओर चले ॥३३॥४०॥ रेगा, टमे मुन्नमे कुछ भी हर न रह जायगा । तर तर मे बहे? का वृक्ष कलि से संसर्ग होने के राजा ने अपने मोप के वेग को रोक लिया । कलियुग कारण से अधम माना जाता है । क्रमशः नल को अध्याय ७३] महा मारत १७८१ NR नले तु समतिक्रान्ते कलिरप्यगमगृहम् ततो गतज्वरो राजा नलोऽभूत्पृथिवीपतिः । विमुक्तः कलिना राजन् रूपमात्रवियोजितः ॥४३॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि कालनिर्गमे द्विसप्ततितमोऽध्याय ॥७२॥ आंखों की ओट होते देखकर कलियुग भी उस वृक्ष वैसा ही बना रहा उसमें कुछ परिवर्तन नहीं हुआ से निकलर अपने स्थान को गया । महागज नल का ॥४१॥४३॥ कलियुग से छुटकारा तो हो गया किन्तु उनका रूप वनपर्व का वहत्तरवां अध्याय माप्त हुआ। । अथ त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७३ ।। वृहदश्व उवाच-ततो विदर्भान्सप्राप्तं सायाहे सत्यविक्रमम् । ऋतुपर्ण जना राज्ञे भीमाय प्रत्यवेदयन् स भीमवचनाद्राजा कुण्डिनं प्राविशत्पुरम् । नादयन्रथघोषेण सर्वाः स विदिशो दिशः ततस्तं रथनिर्घोपं नलाश्वास्तत्र शुश्रुवुः श्रुत्वा तु समदृष्यन्त पुरेव नलसंनिधी दमयन्ती तु शुश्राव रथघोपं नलस्य तम् यथा मेघस्य नदतो गम्भीरं जलदागमे परं विस्मयमापन्ना श्रुत्वा नादं महावनम् । नलेन संगृहीतेषु पुरेव नलवाजिपु सदृशं रथनिर्घोपं मेने भैमी तथा हयाः तिहत्तरवां अध्याय ॥ ३ ॥ बृहदश्व कहते है-हे राजा युधिष्ठिर ! महाराज आने पर जैसे उनके घोड़े सन्तुष्ट होते थे वैसे ही ऋतुपर्ण सन्ध्या के समय विदर्भ देश की राजधानी इस समय, ऋतुपर्ण के रथ का शब्द सुनकर, वे में जा पहुँचे । राजा भीम ने, उनके आने की सूचना प्रसन्नता प्रकट करने लगे । वर्षाकाल के मेघ के पाते ही, उन्हें राजमहल में ले आने के लिये जल्दी । गरजने के समान रथ के पहियों की घरघराहट सुनकर से अपने अनुचरों को भेजा । तव महाराज ऋतुपर्ण, दमयन्ती को बड़ा अचरज हुआ। वह सोचने लगी रथ के पहियों की ध्वनि से दसों दिशाओं को व्याप्त ! कि पहले महाराज नल जब रथ चलाते थे तब ऐसा करते हुए राजधानी के भीतर गये । पहले नल के ही शब्द होता था । महलों पर बैठे हुए मोर और NEAAUPHAGAVAIBABASABASAN ।
[ वनपर्व VIRemararwBANGA १७८२ म हा भारत ovatnavnene प्रासादस्थाश्च शिखिनः शालास्थाश्चैव वारणाः । हयाश्च शुश्रुतुस्तस्य स्थघोपं महीपतेः ॥ ६ ॥ तच्छुत्वा रथनिघोपं वारणाः शिखिनस्तथा । प्रणेदुरुन्मुखा राजन् मेघनाद इवोत्सुकाः ॥ ७ ॥ दमयन्त्युवाच-यथाऽसौ स्थनिर्घोपः पूरयन्निव मेदिनीम् । ममाऽऽहादयते चेतो नल एप महीपतिः अथ चन्द्राभवक्त्र तं न पश्यामि नलं यदि । असंख्येयगुणं वीरं विनंक्ष्यामि न संशयः यदि वै तस्य वीरस्य बाह्वोर्नाऽद्याऽहमन्तरम् । प्रविशामि सुखस्पर्श न भविष्याम्यसंशयम् ॥१०॥ यदि मां मेघनिर्घोषो नोपगन्छति नैपधः अद्य चामीकरप्रख्यं प्रवेक्ष्यामि हुताशनम् यदि मां सिंहविक्रान्तो मत्तवारणविक्रम. नाऽभिगच्छति राजेन्द्रो विनंक्ष्यामि न संशयः ॥ १२ ॥ न स्मराम्यनृतं किंचिन्न स्मराम्यपकारताम् । न च पर्युपितं वाक्यं स्वैरेष्वपि कदाचन प्रभुः क्षमावान्वीरश्च दाता चाऽप्यधिको नृपैः । हम्निशारा में बंधे हुए हाथी, बादल की गरज के | उन्होंने बात-चीत न की तो मै निस्सन्देह आत्महत्या समान उस रथ के शब्द को सुनकर, नाचने-बोरने कर दूंगी। यदि वे गजराज और सिंह के समान पराक्रमी और गरजन रगे। तबदमयन्ती कहने लगी कि इस नल मरे पास नहीं आये तो मैं अपने आपको अमि रथ का शब्द एयी को पूर्ण और मेरे चित्त को प्रसन्न में जला दूंगी। मैंने कभी भी अपने पति के साथ करना है इसमें महाराज नल अवश्य है। और जो असत्य नहीं बोला है न कभी उनका कुछ अपकार वे चन्द्रमा का सा मुम्ब और अमरय गुण रखनेवाले ही किया है और स्वतन्त्र रहने पर भी कभी उनके नर इस नहीं हुए तो में अवश्य अपने प्राणों को विपरीत काम नहीं किया। मेरे स्वामी बड़े क्षमाशील, होड़ देगी। नर की भुजाओं का पर्श पड़ा मुख- । उदार और दयाल हैं। उन्होंने कभी भी पराई स्त्री दापी है, जो उन मुजाओं के बार में मेरा यह शरीर की ओर दृष्टि नहीं की। अवतक में उन्हीं में मन न प्रवेश होगा तो यह मेरा शरीर न रहेगा॥१०॥ लगाये हुए उन्हीं का ध्यान कर रही है। उनके आज जो मदागज नर मुशम नहीं मिले और विरह से उत्पन्न शोक से मेरा हृदय दिन और रात ANDh2CLAGANGAPAGAPAGE 1 -- NAVVVVF.VM अध्याय ७३] म हा मारत १७८३ neecreteen रहोऽनीचानुवर्ती च क्लीववन्मम नैपधः गुणांस्तस्य स्मरन्या मे तत्पराया दिवानिशम् । हृदयं दीर्यत इदं शोकात्प्रियविनाकृतम् एवं विलपमाना सा नष्टसंजेब भारत आरुरोह महद्वेश्म पुण्यश्लोकदिदृक्षया ॥ १६ ॥ ततो मध्यमकक्षायां ददर्श रथमास्थितम् ऋतुपर्णं महीपालं सहवार्ष्णेयवाहुकम् ॥ १७ ॥ ततोऽवतीर्य वाष्र्णेयो वाहुकश्च रथोत्तमात् । हयांस्तानवमुच्याऽथ स्थापयामास वै रथम् ॥ १८ ॥ सोऽवतीर्य रथोपस्थाहतुपर्णो नराधिपः उपतस्थे महाराजं भीमं भीमपराक्रमम् तं भीमः प्रतिजग्राह पूजया परया ततः स तेन पूजितो राज्ञा ऋतुपर्णो नराधिपः ॥ २० ॥ स तत्र कुण्डिने रम्ये वसमानो महीपतिः न च किंचित्तदाऽपश्यत्प्रेक्षमाणो मुहुर्मुहुः स तु राना समागम्य विदर्भपतिना तदा अकस्मात्सहसा प्राप्तं श्रीमन्तं न स्म विन्दति । विदीर्ण हुआ जारहा है । वृहदश्व कहते हैं-हे युधिष्ठिर ! महाराज ऋतुपर्ण विचित्र आसन पर बैठकर मन अपने मन में इस तरह विलाप और सन्ताप करके ही मन स्वभ्यवर के सम्बन्ध की बातों पर विचार करने पुण्यश्लोक नल के दर्शन की इच्छा से, दमयन्ती लगे । अबतक उन्हें इस बात की खबर न थी कि बिलकुल ही अचेत की तरह महल के ऊपर जा चढ़ी। दमयन्ती ने पिता से बिना कहे, केवल माता से ही वहां से उसने देखा, वार्ष्णेय और बाहुक सारथि के | सम्मति करके, उनके पास अयोध्या को दूत भेजा साथ महागज ऋतुपर्ण बीच की कक्षा (ड्योटी) में था। इधर महाराज भीम मी अकस्मात् ऋतुपर्ण के पहुँच गये हैं। इसके पश्चात् वार्ष्णेय, और बाहुक | आने का कुछ भी तात्पर्य नहीं जानते थे । उन्होंने से उतरकर, घोड़ों को खोलकर, रथ खड़ा कर कुशल-प्रश्न पूछने के उपरान्त उनसे अपने यहां आने दिया । ऋतुपर्ण रथ से उतरकर राजा भीम के पास का कारण पूछा । राजा भीम को यह पता न था कि आये । महाराज भीम ने समुचित सत्कार के माथ उनकी कन्या के लिये ही ऋतुपर्ण आये हैं। तब उनकी अभ्यर्थना की ॥११॥२०॥ ऋतुपर्ण बड़े सोच-विचार में पड़े वे कुछ निश्चय न ALBUWANUAGANGANA -- । ने स्थ - र म हा भारत १७८४ [वनपर .८८~ ८८MR -- - किं कार्य स्वागतं तेऽस्तु राज्ञा पृष्टः स भारत ॥ २२ ॥ नाऽभिजज्ञे स नृपतिर्दुहित्रर्थे समागतम् ऋतुपर्णोऽपि गजा स धीमान्सत्यपराक्रमः ॥ २३ ॥ राजानं राजपुत्रं वा न स्म पश्यति कञ्चन नैव स्वयवरकथां न च विप्रसमागमम् ॥ २४ ॥ ततो विगणयद्वाजा मनसा कोसलाधिपः आगतोऽस्मीत्युवाचैनं भवन्तमभिवादकः ॥ २५ ॥ राजाऽपि च स्मयन्भीमो मनसा समचिन्तयन् । अधिकं योजनशतं तस्याऽगमनकारणम् ॥ २६ ॥ ग्रामान्वहूनतिक्रम्य नाऽध्यगच्छद्यथातथम् अल्पकार्यं विनिर्दिष्टं तस्याऽऽगमनकारणम् ॥ २७ ॥ पश्चादुदर्के ज्ञास्यामि कारणं यद्भविष्यति नैतदेवं स नृपतिस्तं सत्कृत्य व्यसयत् ॥ २८ ॥ विश्राम्यतामित्युवाच क्लान्तोऽसीति पुनः पुनः । स सत्कृतः प्रहृष्टात्मा प्रीतः प्रीतेन पार्थिवः ॥ २९ ॥ राजप्रेग्यैरनुगतो दिष्टं वेइम समाविशत् ऋतुपर्णे गते राजन्वार्ष्णेयसहिते नृपे ॥ ३० ॥ घाहुको रथमादाय रथशालामुपागमत् वर सके कि भीम नरेश को अब क्या उत्तर दें। चार सौ कोस से भी अधिक राह चलकर यहा इनके वे एकाएक क्या कहकर स्वयम्वर की बात का उल्लेख / आने का कारण क्या है, सो कुछ समझ में नहीं आया। करते । राजा नातुपर्ण ने देखा कि यहा न और कोई इन्होंने जो कारण बतलाया है, वह बिलकुल साधा- राजपुर आया है न वहा कुछ स्वयम्वर की चर्चा रण जान पड़ता है । खैर, बाद को अवश्य इसका ही है और न प्राण ही आये हैं। थोड़ी देर रुक गूद कारण मालूम हो जायगा ! अब राजा भीम ने पर टन्दोंने कहा- महाराज ! पहत दिनों से आपसे । ऋतुपर्ण से कहा-महाराज ! दूर से चर कर आने से भेट नहीं हुई थी, इसी से आप गिरने आया हूँ। आप यहुत थक गये होंगे, इससे विश्राम कीजिए। परनुपर्ण बनाये हुए इस कारण को मुनकर भीम | अनुचरों सहित महाराज स्तुपर्ण पतराये हुए विश्राम राश का सन्देश हुआ । उन्दाने मन में कहा कि भवन में गये। इधर बाहुर ने घोड़ों की सेवा करके - A STAN अध्याय ७४ ] महा मा र त १७८५ Paro coccaomence स मोचयित्वा तानश्वानुपचर्य च शास्त्रतः स्वयं चैतान्समाश्वास्य रथोपस्थ उपाविशत् । दमयन्यपि शोकार्ता दृष्ट्वा भाङ्गासुरिं नृपम् ॥ ३२ ॥ सूतपुत्रं च वार्ष्णेयं वाहुकं च तथाविधम् । चिन्तयामास वैदर्भी कस्यैप रथनिःस्वनः ॥ ३३ ॥ नलस्येव महानासीन्न च पश्यामि नैपधम् वाष्र्णेयेन भवेन्नूनं विद्या सैवोपशिक्षिता ॥ ३४ ॥ तेनाऽद्य रथनिर्घोपो नलस्येव महानभूत् । आहोस्विदृतुपर्णोऽपि यथा राजा नलस्तथा । यथाऽयं रथनिघोपो नैपधस्येव लक्ष्यते ॥३५॥ एवं सा तर्कयित्वा तु दमयन्ती विशांपते दूती प्रस्थापयामास नैपधान्वेषणे शुभा ॥ ३६॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि नलोपारयानपर्वणि भीमपुरीप्रवेशे त्रिसमतितमोऽध्यायः ।। ७३ ।। रथ को रथशाला में रख दिया ॥२१॥३०॥ दिला रहा है । वार्ष्णेय मी महात्मा नल के समान फिर वह उसी रथ के भीतर जा बैठा । राजा अश्वविज्ञान-विद्या को जानता है । इसी कारण उसके ऋतुपर्ण,वार्ष्णेय और कपटवेषधारी बाहुक को देखकर हाकने से इस रथ के पहियों का वैसा ही शब्द हो दमयन्ती मन में बारवार चिन्ता करने लगी कि रथ रहा है । अथवा यह बात है कि महाराज ऋतुपर्ण के आते समय उसके पहियों की घरघराहट सुनकर भी महात्मा नल के समान रथ को चला सकते हो। मैंने सोचा था कि महाराज नल ही आ रहे हैं, किन्तु बहुत देर तक तरह-तरह के विचार करके दमयन्ती वे तो नहीं देख पड़ते । उघर वह रथ का शब्द ने एक दामी को, नल का पता लगाने के लिये, लगातार कानों में गूंजर महात्मा नल की सी याद स्थशाला में भेजा ॥३१॥३६॥ वनपर्व का तिहत्तरवां अध्याय समाप्त हुआ ।। ७३ ।। अथ चतु सप्ततितमोऽध्यायः ॥७४ ।। दमयन्त्युवाच-गच्छ केशिनि जानीहि क एप रथवाहकः उपविष्टो रथोपस्थे विकृतो ह्रस्ववाहुकः चौहत्तरवा अध्याय ॥ ४ ॥ अब दमयन्ती न केशिनी नाम की दासी को छोटी बाहें रखनेवाले, विकृत गरीर, सारथि के पास ६ बुलाकर कहा-हे केशिनी ! तुम एक बार इस छोटी जाओ और उसका परिचय करो। उसे जब से देखा । GALL १७८६ म हा भारत •[ वनपर्व ८ra ८८८८८ अभ्येत्य कुशलं भद्रे मृदुपूर्व समाहिता पृच्छेथाः पुरुपं ह्येनं यथातत्त्वमनिन्दिते अत्र में महती शङ्का भवेदेष नलो नृपः यथा च मनसस्तुष्टिहृदयस्य च निवृतिः चूयाश्चैनं कथान्ते त्वं पर्णादवचनं यथा प्रतिवाक्यं च सुश्रोणि बुद्धयेथास्त्वमनिन्दिते ॥ ४ ॥ ततः समाहिता गत्वा दूती बाहुकमब्रवीत् । दमयन्त्यपि कल्याणि प्रासादस्था छुपैक्षत ॥ ५ ॥ केशिन्युवाच-स्वागतं ते मनुष्येन्द्र कुशलं ते ब्रवीम्यहम् । दमयन्त्या वचः साधु निबोध पुरुपर्पभ ॥ ६ ॥ कदा वै प्रस्थिता यूयं किमर्थमिह चाऽऽगताः । तत्त्वं ब्रूहि यथान्यायं वैदर्भी श्रोतुमिच्छति ॥ ७ ॥ बाहुक उवाच-श्रुतः स्वयंवरो राज्ञा कोसलेन महात्मना द्वितीयो दमयन्त्या वै भविताश्व इति द्विजात् ॥ ८ ॥ श्रुत्वैतत्प्रस्थितो राजा शतयोजनयायिभिः । हयैर्वातजवेमुख्यैरहमस्य च सारथिः वेशिन्युवाच-अथयोऽसौ तृतीयो वः स कुतः कस्य वा पुनः । है तभी से मेरा मन और हृदय सन्तुष्ट सा हो रहा पहुंचे है । यहा आप लोगों के आने का कारण क्या द, इससे जान पड़ता है कि यही महाराज नल हैं ! है । हमारी स्वामिनी दमयन्ती ने यह जानने के लिये तुम इस पुरप के पास जाकर बातचीत करो । उसी । मुझे यहा भेजा है वे जानना चाहती हैं । इस कारण प्रम में पर्णाद के वचन सुनाना । उसपर यह जो आप विशेष रूप से सब वृत्तान्त कहिए ॥१७॥ उचर द वह स्मरण रखना और मेरे पास आकर सब यह सुनकर बाहुक ने कहा--म राजा कोशल का पदना। दमयन्ती इस प्रकार कमिनी दामी को बाहुक सारथि हूँ । राजा कोशल ने किसी ब्रामण के मुख के पास भेजकर, राष्टित होकर, गजगहर की से सुना था कि कल के दिन दमयन्ती का दूसरा एन १९ जा चदी। दमयन्ती की आना से केशिनी म्वयम्बर होगा। यह सुनकर वह राजा नार सौ कोस पादुका के पास जाकर नम मधुर वचनों से कुशल- चलनेवाले घाटों को रथ में जुतवाकर यहा आया है प्रभरिया दमिनी ने कहा- महाराज ! आप और मैं उसके साथ आया है। यह सुनकर केशिनी शंगारिम समय अयोध्या से चार हम ममय यहां न बहाद महाराज ! आप कौन है । आप किसके । .. - अध्याय ७४] म हा मारत १७८९ त्वं च कस्य कथं चेदं त्वयि कर्म समाहितम् ॥ १० ॥ बाहुक टवाच-पुण्यश्लोकस्य वै सूतो वाष्र्णेय इति विश्रुनः । स नले विद्रुते भड़े भाङ्गासुरिमुपस्थितः अहमप्यश्चकुशलः सूतत्वे च प्रतिष्टितः ऋतुपर्णेन सारथ्ये भोजने च वृतः स्वयम् १२ ॥ केशिन्युवाच-अथ जानानि वार्णेयःक्व नु राजा नलो गतः । कथं च त्वयि वा तेन कथितं स्यात्तु बाहुक ॥ १३ ॥ बाहुक उवाच --- इहव पुत्रो निक्षिप्य नलस्य शुभकर्मणः । गतस्ततो यथाकामं नेप जानाति नेपधम् ॥ ११ ॥ न चाऽन्यः पुरुषः कश्चिन्नलं वेत्ति यशस्विनि । गूढश्चरति लोकेऽम्मिन्नष्टरूपो महीपतिः आत्मैव तु नलं वेद या चाऽस्य तदनन्तरा । नहि वै स्वानि लिंगानि नलः शंसति कहिंचित् ॥ १६ ॥ केशिन्युवाच-योऽसावयोध्यां प्रथमं गतोऽसौ ब्राह्मणस्तदा । इमानि नारीवाक्यानि कथयानः पुनः पुनः ॥ १७ ॥ क्व नु त्वं कितव च्छित्वा वनार्ध प्रस्थितो मम । उत्सृज्य विपिने सुप्तामनुरक्तां प्रियां प्रिय ॥ १८ ॥ सेक है? आपको क्सिलिये यह कार्य सौंपा गया है कि राजा नल कहां चले गये हैं ! या उसने कमी है ? यह तीमरा मनुष्य कान है और स्मिका पुत्र है, आपके आगे यह बात कही है ! बाहुक ने कहा-हे यहां मे आया है ! बाहुक ने कटा-हे शुभे ! यह । मद्रे ! वाष्र्णेय राजा नल के पुत्र और पुत्री को वहां तीमग मनुष्य गजा नल का मारधि है । दमका नाम छोड़कर चन्ग गया था वह राजा नल का हाल कुछ वार्णय है । राजा नर के मब गन्य हारकर चले जाने नहीं जानता है और न कोई और मनुष्य है जो नन पर टसने गना ऋतुपर्ण के यदा वेतन प्राप्त क्यिा : को जानना हो । नल नष्टर होकर गुप्त विचरता है अर्थात नोकरी कर ली है । मैं मी अश्व विद्या में है ॥८॥१५॥ पण्डित है। इमन्येि महाराज ने मुझे अपना मारथि उन्होंने अपने स्वाभाविक सौन्दर्य से हीन होकर बना लिया है । मैं मोजन बनाने में भी बड़ा चनुर क्या किया, यो केवल यही बना सकते हैं। और हूँ। इमी से कमी-कमी महागज का मोजन भी बनाना कोर्ट इसका हाल नहीं जानता। केशिनी ने । केशिनी ने पूछा-दे महागज ! वार्ष्णेय बानता हे महाराज! पहले आपके पास अयोन्यापुरी में एक SAG १७८८ म हा भारत [ वन पर्व evere wn८.VACY सावै यथा समादिष्टा तथाऽऽस्ते त्वत्प्रतीक्षिणी । दह्यमाना दिवा रात्री वस्त्रार्थेनाऽभिसंवृता ॥ १९ ॥ तस्या रुदन्त्याः सततं तेन दुःखेन पार्थिव । प्रसादं कुरु मे वीर प्रतिवाक्यं वदस्व च ॥ २० ॥ तस्यास्तत्प्रियमाख्यानं प्रवदस्व महामते तदेव वाक्यं वैदर्भी श्रोतुमिच्छत्यनिन्दिता ॥ २१ ॥ एतच्छ्रुत्वा प्रतिवचस्तस्य दत्तं त्वया किल । यत्पुरा तत्पुनस्वत्तो वैदर्भी श्रोतुमिच्छति ॥ २२ ॥ वृहदश्व उवाच-एवमुक्तस्य केशिन्या नलस्य कुरुनन्दन हृदयं व्यथितं चाऽऽसीदश्रुपूर्णे च लोचने ॥ २३ ॥ स निगृह्याऽऽत्मनो दुःखं दह्यमानो महीपतिः । वाप्पसंदिग्धया वाचा पुनरेवेदमब्रवीत् ॥ २४ ॥ वाहुक उवाच-वैशम्यमपि संप्राप्ता गोपायन्ति कुलस्त्रियः । आत्मानमात्मना सत्यो जितः स्वर्गों न संशयः ॥ २५॥ रहिता भर्तृभिश्चाऽपि न क्रुध्यन्ति कदाचन । प्राणांचारित्रकवचान्धारयन्ति वस्त्रियः ॥ २६॥ विषमस्थेन मूढेन परिभ्रष्टसुखेन च प्रामण ने जाकर यारम्बार, स्त्री के कई हुए, ये वाक्य । जो कुछ उपदेश के वाक्य कहे थे उन्हें हमारी राज- कई थे कि "दे पून! अपनी पतियना सी को, अपने । युमारी फिर सुना चाहती है ॥१६॥२२॥ पर अत्यन्न अनुगमननेवारी जानकर भी उसका धृहदश्व कहते है-राजा युधिष्ठिर ! केशिनी आपा धम्म पाइर, गुम क्यों निपट निदर की तरह दासी के ये वचन सुनकर नल का हृदय मानों फटगे या में गोहार भाग आये ! तुम जो कुछ लगा । ऑम्वों में आंसू भर आये । पहले दमयन्ती आशाद आये थे 3RN यह अपना पढ़े कष्ट के पूर्वोक्त बनन मुनकर याहुक ने पर्णाद ब्रामण और यम के माथ निबाहनी चरीआ रही है। वही से जो कुछ पहा था वही इस समय भी, अपने सन्ताप भाषा वम पहने, दिनगन आम्खों में आँस् भो, और दुम के वेग को रोककर, महाराज नल पहने सायनसार और मन्नार मस्ट पिया पाती है। ग-ओसियां दर्शन होती है आपसि काल के मगि नुम अमर रोका हम पान का टीकटी गनपा अपने आप अपनी रक्षा करनी और ऐसी सास।" मदागत ! भागे मी ३० मियां निश्चय स्वर्ग को भाने वश में कर लेनी है। - अध्याय ७५] म हा मारत १७८९ V ८ew N८८८८ यरसा तेन परित्यक्ता तत्र न क्रोधुमर्हति ॥ २७॥ प्राणयात्रां परिप्रेप्सोः शकुनैहृतवाससः आधिभिर्दह्यमानस्य श्यामा न कोडुमर्हति ॥ २८ ॥ सत्कृताऽसत्कृता वापि पतिं दृष्ट्वा तथाविधम् । राज्यभ्रष्टं श्रिया हीनं क्षुधितं व्यसनाप्लुतम् ॥ २९ ॥ एवं ब्रुवाणस्तद्वाक्यं नलः परमदुर्मनाः न वाष्पमशकत्सोढुं प्ररुरोद च भारत ॥३०॥ ततः सा केशिनी गत्वा दमयन्त्यै न्यवेदयत् । तत्सर्व कथितं चैव विकारं तस्य चैव तम् ॥ ३१ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलकेशिनीसंवादे चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ।।७४ ।। दैवयोग से यदि उनके पति उनको छोड़ देते हैं तो नल दमयन्ती के ऊपर स्नेह का भाव प्रकट करें या न भी वे किसी तरह उनपर क्रोध नहीं करतीं बल्कि करें, तो भी उन्हें राज्य से भ्रष्ट, श्रीहीन और विवर्ण सदाचार की रक्षा करती हुई धर्म का पालन करती देखकर दमयन्ती को किसी तरह क्रोध करना उचित हैं। इस कारण महाराज नल ने यदि वैसी वुरी दशा नहीं । वृहदश्व कहते हैं-हे महाराज ! बाहुक इस में पड़कर, भ्रष्टवुद्धि होकर, दमयन्ती को छोड़ दिया अपने दुःख के वेग को न रोक है तो भी उसके लिये दमयन्ती को उनपर क्रोध या सके और रो-रोकर आंसू बहाने लगे। यह देखकर , असन्तोप प्रकट न करना चाहिये । खान के लिये । केशिनी दमयन्ती के पास चली गई और उससे सब पक्षी पकड़ने को टन्होंने वस्त्र फेंका तो वे उसे ले वृत्तान्त कहकर बाहुक के दुखी होने और रोने का भागे इससे राजा नल अत्यन्त दुःखी थे । इसके सब हाल कह सुनाया ॥२३॥३१॥ मिवा आपदाओं ने उन्हें सता रक्खा था। महाराज वनपर्व का चौहत्तरवां अध्याय समाप्त हुआ। ७४ ॥ PURVAVA प्रकार से कह कर K- ८M- अथ पञ्चमाततितमोऽध्यायः ॥ ७५ ॥ वृहदश्व उवाच-दमयन्ती तु तच्छ्रुत्वा भृशं शोकपरायणा । शङ्कमाना नलं तं वै केशिनीमिदमब्रवीत पचहत्तरवां अध्याय ॥ ५॥ वृहदश्व कहते हैं-हे राजा युधिष्ठिर ! केगिनी । ही मन में नल के सम्बन्ध की अनेक बातों पर विचार मुख से बाहुक का सब हाल सुनकर दमयन्ती ने करके गोक से व्याकुल होने लगी। उसने केशिनी ६ अनुमान कर लिया कि वही राजा नल हैं। वह मन को सम्बोधन करके कहा-हे केशिनी ! तुम फिर १७९० महाभारत [ वनपर्व cene.venteenterneminenewerever -AVAIBAGAGAUPCi गच्छ केशिनि भूयस्त्वं परीक्षां कुरु बाहुके अनुवाणा समीपस्था चरितान्यस्य लक्षय यदा च किंचित्कुर्यात्स संलक्ष्यं तत्र भामिनि । तत्र संचेष्टमानस्य लक्षयन्ती विचेष्टितम् न चाऽस्य प्रतिवन्धन देयोऽग्निरपि केशिनि । याचते न जलं देयं सर्वथा त्वरमाणया एतत्सर्व समीक्ष्य त्वं चरितं मे निवेदय । निमितं यत्त्वया दृष्टं वाहुके दैवमानुषम् यच्चाऽन्यदपि पश्येथास्तचाऽऽख्येयं त्वया मम । दमयन्त्येवमुक्ता सा जगामाऽथ च केशिनी ॥ ६ ॥ निशम्याऽथ हयज्ञस्य लिङ्गानि पुनरागमत् । सा तत्सर्वं यथावृत्तं दमयन्त्यै न्यवेदयत् निमित्तं यत्तया दृष्टं वाहुके दैवमानुपम् केशिन्युवाच-दृढं शुच्युपचारोऽसौ न मया मानुषः क्वचित् । दृष्टपूर्वः श्रुतो वापि दमयन्ति तथाविधः हस्खमासाद्य संचारं नाऽसौ विनमते क्वचित् । तं तु दृष्ट्वा यथासङ्गमुत्सर्पति यथासुखम् संकटेऽप्यस्य सुमहान्विवरो जायतेऽधिकः बाहुक के पास जाकर उनसे कुछ न कहो, केवल कह देना । यो समझाकर दमयन्ती ने केशिनी को उनके चरित्र की जाँच करो, मन लगाकर उनके सय फिर बाहुक के पास भेजा । दमयन्ती की आज्ञा कामों और चेष्टाओं की देखभाल करो। यदि बाहुकवेशिनी बाहुक के पास गई । वहां रहकर बाहुक के आणि और जल माँगतो न देना । यदि एक घर देना सब कामों और चेष्टाओं पर रक्ष्य रखकर केशिनी भी तो बहुत देर कर देना। तुम इस तरह के वर्चाय | दमयन्ती के पास सैट गई । यहा जाकर उसने कहा- में की जान करना । तुम्हारे ऐसे व्यवहार के बाद हे राजकुमारी ! मैंने पहले कभी बाहुक ये जो कुछ कामो नुम आर मुझसे कहना ! हमके मनुष्य देखा-सुना नहीं । अग्नि और जल आदि पदार्थ भिवादनकोक्कि और अगरिक काम देखना | भी उनकी आज्ञा मानते हैं। छोटे से छोटे द्वार में उन मय पर विशेष रक्ष्य रखकर सब दाल मुझसे । घुमते समय भी वे न तो झुरते हैं और न सिकुड़ने AAVALE । ॥ - से समान अध्याय ७१] म हा मारत १७९१ ME Nonne arah TNHHAVNALARTHANDRA NAINITARIALSResNAVAGAAVM ऋतुपर्णस्य चाऽर्थाय भोजनीयमनेकशः प्रेपितं तत्र राज्ञा तु मांसं वहु च पाशवम् तस्य प्रक्षालनार्थाय कुम्भास्तत्रोपकल्पिताः ॥ ११ ॥ ते तेनाऽऽवेक्षिताः कुम्भाः पूर्णा एवाऽभवस्ततः । ततः प्रक्षालनं कृत्वा समधिश्रित्य वाहुकः ॥ १२ ॥ तृणमुष्टिं समादाय सवितुस्तं समादधत् अथ प्रज्वलितस्तत्र सहसा हव्यवाहनः ॥ १३ ॥ तदद्भुततमं दृष्ट्वा विस्मिताऽहमिहाऽऽगता अन्यञ्च तस्मिन्सुमहदाश्चर्य लक्षितं मया ॥ १४ ॥ यदग्निमपि संस्पृश्य नैवाऽसौ दह्यते शुभे । छन्देन चोदकं तरय वहत्यावर्जितं द्रुतम् अतीव चाऽन्यत्सुमहदाश्चर्यं दृष्टवत्यहम् यत्स पुष्पाण्युपादाय हस्ताभ्यां ममृदे शनैः ॥ १६ ॥ मृद्यमानानि पाणिभ्यां तेन पुष्पाणि नाऽन्यथा । भूय एव सुगन्धीनि हृपितानि भवन्ति हि । एतान्यद्भुतलिङ्गानि दृष्ट्वाऽहं द्रुतमागता ॥ १७॥ वृहदश्व उवाच-दमयन्ती तु तच्छत्वा पुण्यश्लोकस्य चेष्टितम् । अमन्यत नलं प्राप्तं कर्मचेष्टाभिसूचितम् ॥ १८ ॥ हैं-दरवाज़ा अपने आप बढ़ जाता है। महाराज भीम | अपनी आखों देख आई हूँ। और भी कई अद्भुन ने ऋतुपर्ण के लिये जो सामग्री भेजी थी उममें बहुत | बाने मैने देखी हैं । वे आग को छूकर भी नहीं जरते से पशुओं का कच्चा माम मी था ॥१॥१०॥ उनके इच्छा करते ही पानी उनके पास होकर बहता उम मांस को घोने के लिये बहुत से खाली है । मैंने यह भी देखा कि उन्होंने बहुत से फूलों घड़े स्वम्बे थे । बाहुक के देखते ही देखते वे मव को धीरे धीरे हाथों से मल डारा किन्तु वे फूल जैसे घड़े पानी से भर गये । उस पानी से सब मोजन- । के तैसे बने रहे। उन फूलों में से पहले से भी अधिक सामग्री घोकर बाहुक ने चूल्हे पर चढ़ा दी। फिर मुगन्ध निकरने लगी। इन अद्भुत बातों को देखकर मुट्ठी भर तिनके हाथ में लेकर थोड़ी देर तक सूर्यदेव / मैं बहुत ही विलित हुई हूँ। यह सब देखकर मैं की ओर देखा तो वे तिनके जल उठे । मैं यह सब आपके पास दौड़ी आई हूँ ॥११॥२७॥ --ALLA १७९२ महाभारत [ वनपर्व NR Avoriternance - COCOMOPSoon सा शङ्कमाना भर्तारं वाहुकं पुनरिहितैः केशिनीं श्लक्ष्णया वाचा रुदती पुनरब्रवीत् ॥ १९ ॥ पुनर्गच्छ प्रमत्तस्य बाहुकस्योपसंस्कृतम् महानसाच्छ्रितं मांसमानयस्वेह भाविनि ॥ २० ॥ सा गत्वा वाहुकस्याऽग्रे तन्मांसमपकृष्य च । अत्युष्णमेव स्वरिता तत्क्षणात्प्रियकारिणी ॥ २१ ॥ दमयन्त्यै ततः प्रादात्केशिनी कुरुनन्दन सोचिता नलसिद्धस्य मांसस्य बहुशः पुरा ॥ २२ ॥ प्राश्य मत्वा नलं सूतं प्राक्रोशइ भृशदुःखिता । वैक्लव्यं परमं गत्वा प्रक्षाल्य च मुखं ततः ॥ २३ ॥ मिथुनं प्रेषयामास केशिन्या सह भारत इन्द्रसेनां सह भ्रात्रा समभिज्ञाय बाहुकः अभिद्रुत्य ततो राजा परिश्वज्याऽङ्कमानयत् । बाहुकस्तु समासाद्य सुतौ सुरसुतोपमो ॥ २५॥ भृशं दुःखपरीतात्मा सुखरं प्ररुरोद ह नेपधो दर्शयित्वा तु विकारमसकृत्तदा वृहदश्व कहते हैं-हे राजा युधिष्ठिर! केशिनी चखकर, उसका स्वाद देख कर, दमयन्ती को विश्वास के मुख से बाहुक के इन विचित्र कामों की बात हो गया कि बाहुक महाराज नल ही हैं । वह बहुत मुनकर दमयन्ती ने मन ही मन उन्हीं को अपना देर तक रोती रही । फिर उसने मुँह धोया और पति समझ लिया। परन्तु बिलकुल ही सन्देह न केशिनी के साथ देवस्वरूप अपने पुत्र और पुत्री को रहने देने के लिये वह अनेक प्रकार के कौशलों से बहुत दिनों के बाद देखकर नल का हृदय स्नेहरस काम लेने लगी। रोती हुई दमयन्ती ने फिर केशिनी ' से भर गया । वे आनन्दपूर्वक केशिनी की गोद से को बुलाकर कहा-हे केशिनी ! तुम एक बार फिर दोनों बालकों को लेकर, अपनी गोद में बिठाकर बाहुक के पास जाओ और यहां से, रसोई से, बाहुक । बारम्बार उनके मुँह को निहारने लगे। इसी बीच में का पकाया हुआ मांस ले आओ ॥१८॥२०॥ व्यतीत हुआ हुआ वृत्तान्त स्मरण हो आने से वे देशिन ने टमी गमय जाकर, [पाहुक को व्याकुल हो उठे। उनका शोक उमड़ पड़ा । किसी और काम में लगा पार थोड़ा मागर्म मांस निकाल तरह आंसुओं को रोक न सकने के कारण वे ज़ोर रिया और दमयन्ती को शकर दिया। उस मांमको से रोने लगे। फिर अपने वृत्तान्त को छिपाये रखने They अध्याय ७६ ] म हा मारत १७९३ ८.८ex . - ८८४ उत्स्सृज्य सहसा पुत्रौ केशिनीमिदमत्रवीत् ॥ २६॥ इदं च सदृशं भद्रे मिथुनं मम पुत्रयोः अतोऽदृष्दैव सहसा वाष्पमुत्सृष्टवानहम् ॥ २७ ॥ बहुशः संपतन्तीं त्वां जनः शङ्केत दोपतः । वयं च देशातिथयो गच्छ भद्रे यथासुखम् ॥ २८ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि नलोपारयानपर्वणि कन्यापुत्रर्शने पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ।। ७५ ॥ के लिये उन्होंने, एकाएक बच्चों को गांद से उतार- मै इस देश में अतिथि रूप से आया हूँ। तुम यदि कर, केशिनी से कहा-हे भद्र ! अपने बालकों के बारम्बार मेरे पास आओगी तो लोग तरह तरह के समान रग-रूपवाले इन बच्चों को देखने से ही मेरे सन्देह करने लगेंगे। तुम यहां से चली जाओ। आंसू बह चले । तुम और तरह की शङ्का न करना। ॥२१॥२८॥ वनपर्व का पचहत्तरवां अध्याय समाप्त हुआ ।। ७५॥ ४४.८venCMAGAR अथ पट्सप्ततितमोऽध्यायः ।। ७६ ॥ वृहदश्व उवाच-सर्वं विकारं दृष्ट्वा तु पुण्यश्लोकस्य धीमतः आगत्य केशिनी सर्व दमयन्त्यै न्यवेदयत् ॥ १ ॥ दमयन्ती ततो भूयः प्रेषयामास केशिनीम् मातुः सकाशं दुःखार्ता नलदर्शनकाङ्क्षया ॥ २ ॥ परीक्षितो मे बहुशो वाहुको नलशङ्कया रूपे मे संशयस्त्वेकः स्वयमिच्छामि वेदितुम् ॥ ३ ॥ स वा प्रवेश्यतां माता वाऽनुज्ञातुमर्हसि विदितं वाऽथवाऽज्ञातं पितुर्मे संविधीयताम् ॥ ४ ॥ छियत्तरवा अध्याय ॥ ७६ ॥ वृहदश्व कहते हैं-हे राजा युधिष्ठिर ! वाहुक | ने अनेक युक्तियों के द्वाग परीक्षा करके जान लिया BiterRENAVABUA - । के पास गई। वहां उसने सब हाल कह सुनाया । रूप को देखकर उसे सन्देह हो रहा है। सो उस २ पति के वियोग से व्याकुल दमयन्ती नल से मिलने बारे में वह स्वय मिलकर जानना चाहती है। कुमारी के लिये आतुर हो गई । उसने उसी समय केशिनी | चाहती है कि महाराज भीम को जताकर या उन्हें , से कहा कि तुम शीघ्र जाकर मेरी माता से यह सब विना जताये ही आप या तो बाहुक को मद्दल के हाल कहो । उनसे कहना कि राजकुमारी दमयन्ती । भीतर बुरा रीजिए, या कुमारी को बाहुक के पास CLAM [ वनपर्व १७९४ म हा भारत Denn BANARAUNUSA ॥ ८ ॥ एवमुक्ता तु वैदा सा देवी भीममब्रवीत् दुहितुस्तमभिप्रायमन्वजानात्स पार्थिवः सा वै पित्राऽभ्यनुज्ञाता मात्रा च भरतर्षभ नलं प्रवेशयामास यत्र तस्याः प्रतिश्रयः तां स्म दृष्ट्वैव सहसा दमयन्ती नलो नृपः आविष्टः शोकदुःखाभ्यां बभूवाऽश्रुपरिप्लुतः ॥ ७ ॥ तं तु दृष्ट्वा तथायुक्तं दमयन्ती नलं तदा । तीनशोकसमाविष्टा बभूव वरवर्णिनी ततः कायायवसना जटिला मलपंकिनी दमयन्ती महाराज बाहुकं वाक्यमब्रवीत् ॥ ९ ॥ पूर्व दृष्टस्त्वया कश्चिद्धर्मज्ञो नाम बाहुक सुप्तामुत्सृज्य विपिने गतो यः पुरुषः स्त्रियम् ॥ १० ॥ अनागसं प्रियां भायां विजने श्रममोहिताम् । अपहाय तु को गच्छेत्पुण्यश्लोकमृते नलम् ॥ ११ ॥ किमु तस्य मया वाल्यादपराद्धं महीपतेः यो मामुत्स्मृज्य विपिने गतवान्निद्रयार्दिताम् ॥ १२ ॥ साक्षाद्देवानपाहाय वृतो यः स पुरा मया जाकर उनसे मिलने की आज्ञा दीजिए ॥१४॥ बाल रूखे और उलझे हुए थे । अपने हृदय का दुख केशिनी ने जाकर रानी से कहा ! रानी ने प्रकट करती हुई वह बाहुक से कहने लगी-हे बाहुक! जाकर महाराज भीम को सब हाल मुनाया । उन्होंने तुमने कभी ऐसा भी धर्मात्मा मनुष्य देखा है जो दमयन्ती के इराद को सुनकर पसन्द किया । माता अपनी स्त्री को वन में सोती हुई छोड़कर चरा गया की भाशा पारदमयन्ती ने अपने भवन की ड्योढ़ी हो ॥५॥१०॥ में पादुक-गामधारी नल को बुलाया । यहुत समय सिवाय गजा नल के और कौन ऐसा पुरुप के बाद अपनी पतिनता धर्मपनी को देखकर राजा होगा। जो अपनी प्यारी, निष्पाप और थकी हुई गल एक दम शोक समुद्र में हर गये । वे लगा. मी को निर्जन वन में अकेरी छोड़कर चला जाये। तार आंसू बहाने लगे। नल की ऐसी दशा देखकर तुम जानते हो कि मैने उन गजा का अपनी अज्ञानता दगयम्मी को कहा कि भा । मग्नि शरीरयारी | मे क्या अपराध किया था जो वे मुझको वन में सोती । दमयन्ती पाय वर धारण यि हुए थी, उस हुई छोडकर चले गये। पहले मैंने स्वयम्वर की सभा 1 NAGAR त AMAN AM अध्याय ७६] म हा मारत १७९५ marvwwMANAVASANASANAWAR अनुव्रतां साभिकामां पुत्रिणीं त्यक्तवान्कथम् ॥ १३ ॥ अग्नौ पाणिं गृहीत्वा तु देवानामग्रतस्तथा । भविष्यामीति सत्यं तु प्रतिश्रुत्य क्व तद्गतम् ॥ १४ ॥ दमयन्त्या ब्रुवन्त्यास्तु सर्वमेतदरिन्दम शोकजं वारि नेत्राभ्यामसुखं प्रास्त्रवद्वहु ॥ १५ ॥ अतीव कृष्णसाराभ्यां रक्तान्ताभ्यां जलं तु तत् । परिस्रवन्नलो दृष्ट्वा शोकाामिदमब्रवीत् मम राज्यं प्रनष्टं यन्नाऽहं तस्कृतवान्खयम् । कलिना तत्कृतं भीरु यच्च त्वामहमत्यजम् ॥ १७ ॥ यत्वया धर्मकृच्छ्रे तु शापेनाऽभिहतः पुरा । वनस्थया दुःखितया शोचन्त्या मां दिवानिशम् ॥ १८ ॥ स मच्छरीरे त्वच्छापाद्दह्यमानोऽवसत्कलिः । त्वच्छापदग्धः सततं सोऽग्नावग्निरिवाऽऽहितः ॥ १९ ॥ मम च व्यवसायेन तपसा चैव निर्जितः दुःखस्याऽन्तेन चाऽनेन भवितव्यं हि नौ शुभे ॥ २० ॥ विमुच्य मां गतः पापस्ततोऽहमिह चाऽऽगतः । में साक्षात् लोकपाल देवताओं को छोड़कर उन्हें हे दमयन्ती ! मै जो अपने राज्य से चला आया अपना पति बनाया। उन्होंने मुझे पतिप्राणा, अत्यन्त और तुमको विशुद्ध पतिव्रता जानकर भी छोड़ आया, अनुरागिणी और पुत्रवती देखकर भी न जाने किस उसमें मेरा किञ्चितमात्र भी अपराध नहीं है क्योंकि दोष से छोड़ दिया । विवाह के समय उन्होंने कहा | कलियुग के प्रभाव से ही यह दुर्घटना हुई है। प्रिये, था-"इन देवताओं को और अग्नि को साक्षी बनाकर मेरी अनुगामिनी होकर, मेरी दुर्दशा देख अत्यन्त कहता हूँ कि मै जन्म भर के लिये तुम्हारी आज्ञा दुखित होकर, तुमने जिसे शाप दिया था वही कलि- का अनुगामी पति होता हूँ। युग, अग्नि के भीतर अमि की तरह, तुम्हारे शाप वह सत्यवादी होना कहा गया ? इस प्रकार से अनेक और कर्कोटक नाग के विष की अग्नि से जलता हुआ चिलाप-वचनों से व्यतीत हुए-हुए वृत्तान्त का परिचय बड़े कष्ट से मेरे शरीर में रहता था। मेरे आनार- देते देते दमयन्ती के हृदय में शोक का वेग प्रबल व्यवहार और तपस्या के प्रभाव से असमर्थ होकर हो उठा। उसकी आखो से आसू बहने लगे । दमयन्ती पापरूप कलियुग अब मुझे छोड़कर चरा गया ६ को रोते देखकर महाराज नल बोले-॥११॥१६॥ जान पड़ता है, अब हमारे दुखों के अन्त का समय Revoleeveeeeeeeer .. " इस समय उनका AUGLAN १७९६ म हा भारत [ वनपर्व Navr... खदर्थं विपुलश्रोणि न हि मेऽन्यत्प्रयोजनम् ॥ २१ ॥ कथं तु नारी भर्तारमनुरक्तमनुव्रतम् उत्सृज्य वरयेदन्यं यथा त्वं भीरु कर्हिचित् ॥ २२ ॥ दूताश्चरन्ति पृथिवीं कृत्स्नां नृपतिशासनात् । भैमी किल स्म भर्तारं द्वितीयं वरयिष्यति ॥ २३ ॥ खरवृत्ता यथाकाममनुरूपमिवाऽऽत्मनः श्रुत्वैव चैवं त्वरितो भाङ्गासुरिरुपस्थितः ॥ २४ ॥ दमयन्ती तु तच्छ्रुत्वा नलस्य परिदेवितम् । प्राञ्जलिर्वेपमाना च भीता वचनमब्रवीत् दमयन्त्युवाच-न मामर्हसि कल्याण दोपेण परिशङ्कितुम् मया हि देवानुत्सृज्य वृतस्त्वं निषधाधिप ॥ २६ ॥ तवाऽभिगमनार्थ तु सर्वतो ब्राह्मणा गताः वाक्यानि मम गाथाभियमाना दिशो दश ॥ २७ ॥ ततस्त्वां ब्राह्मणो विद्वान्पर्णादो नाम पार्थिव । अभ्यगच्छत्कोसलायामृतुपर्णनिवेशने ।। २८ ।। तेन वाक्ये कृते सम्यक्प्रतिवाक्ये तथाऽऽहते। उपायोऽयं मया दृष्टो नैषधाऽऽनयने तब ॥ २९ ॥ आ गया । प्यारी ! मैं कंवल तुम्हारे ही लिय यहा । फिर हाथ जोड़कर उसने कहा-हे महाभाग ! आया हूँ ॥१७॥२१॥ आप जानते हैं कि मैंने देवताओं को छोड़कर आपको मला ऐसी कौनसी स्त्री होगी जो अपने अनुव्रत अपना पति बनाया है । इस समय मेरे ऊपर ऐसा पीति करनेवाले पति को त्यागकर दूसरा पति करना दोष लगाकर मुझपर सन्देह करना आपको उचित नादे, जैसा तुम करना चाहती हो। पृथ्वी पर चारों । नहीं है। मेरी बातों को कहते हुए जो ब्राह्मण आपका और दून यह कहते फिरते हैं कि राजा भीम की पता लगाने इधर-उधर भेजे गये थे, उनमें से पर्णाद फम्या दमयन्ती अपनी इच्छा के अनुसार अपने नाम के ब्राह्मण न राजा ऋतुपर्ण के यहां आपको सदृश दूसरे मा को फिर वोगी यही मुनकर राजा देखा। उस ब्राह्मण ने आपके आगे भी वही बातें परतुपर्ण भी यहां आये है।गल के ऐसे वचन सुन- कहीं जो मैंने उससे कह दी थीं। आपने उनका जो हर दमयन्ती बहुत ही घबराई और कांपने लगी। | कुछ उत्तर दिया वह टसने आकर मुझसे कह दिया। ॥२२॥२४॥ तब आपको यहां लाने के लिये ही मैंने यह उपाय NUAGurNAGALPNAIPANASI अध्याय ७६] म हा मारत १७९७ । Merma.cume-ANAN त्वामृते न हि लोकेऽन्य एकाला पृथिवीपते । समर्थो योजनशतं गन्तुमनराधिप ॥ ३०॥ स्पृशेयं तेन सत्येन पादावेतौ महीपते यथा नाऽसत्कृतं किंचिन्मनसाऽपि चराम्यहम् ॥ ३१ ॥ अयं चरति लोकेऽस्मिन्भूतसाक्षी सदागतिः । एप मे मुञ्चतु प्राणान्यदि पापं चराम्यहम् ॥ ३२ ॥ यथा चरति तिग्मांशुः परेण भुवनं सदा समुश्चतु मम प्राणान्यदि पापं चराम्यहम् ॥ ३३ ॥ चन्द्रमाः सर्वभूतानामन्तश्चरति साक्षिवत् स मुञ्चतु मम प्राणान्यदि पापं चराम्यहम् ॥ ३४ ॥ एते देवास्त्रयः कृत्स्नं त्रैलोक्यं धारयन्ति वै । वित्रुवन्तु यथासत्यमेतद्देवास्त्यजन्तु माम् एवमुक्तस्तथा वायुरन्तरिक्षादभापत नैषा कृतवती पापं नल सत्यं ब्रवीमि ते ॥ ३६ ॥ राजञ्च्छीलनिधिः स्फीतो दमयन्त्या सुरक्षितः । साक्षिणो रक्षिणश्चाऽस्या वयं त्रीन्परिवत्सरान् ॥ ३७॥ उपायो विहितश्चाऽयं त्वदर्थमतुलोऽनया निकाला था। क्योंकि मैं अच्छी तरह जानती थी कर दें। यदि मन वचन काया से मैंने कभी कुछ कि सिवाय आपके दूमरा मनुप्य घोड़ों के द्वारा एक बुरा आचरण किया हो तो सब लोकों के साक्षी दिन में चार सौ कोस नहीं जा सकता है ॥२५॥३०॥ चन्द्रदेव अभी मेरी जान ले लें। हे तीनों देवताओ! मैं आपके पाव छूकर सौग-ध खाती हूँ कि मैंने आप लोग यथार्थ कह दें कि मैंने अभी तक कुछ भूल कर भी किसी पाप को अपने हृदय में म्यान अधर्म तो नहीं किया ॥३१॥३५॥ नहीं दिया। हे नाथ | मैं आपके आगे सौगन्ध खाती अब वायु ने अन्तरिक्ष में स्थित होकर कहा- हूँ कि यदि मैंने कभी कोई वुरा आचरण क्यिा हो । हे नल ! मैं सत्य कहता हूँ कि दमयन्ती ने कभी तो सर प्राणियों के भले बुरे कामों के साक्षी सदागति । कुछ बुरा काम नहीं किया। दमयन्ती ने सदा अत्यन्त वायुदेव मेरे प्राणों को नष्ट कर डालें । यदि मैंने यन के साथ धर्म कर्म करके अच्छी तरह अपने किसी पाप का आचरण क्यिा हो तो सब प्राणियों ! सतीत्व की रक्षा की है। इन तीनों व्यतीत हुए हुए के साक्षी भगवान सूर्य अभी मेरे प्राणों को नष्ट वर्षों में हम देवताओं ने बराबर दमयन्ती की रक्षा - - -A १७९८ म हा भारत { वनपर्व - न ह्येकाला शतं गन्ता त्वामृतेऽन्यः पुमानिह ॥ ३८ ॥ उपपन्ना त्वया भैमी त्वं च भैम्या महीपते । नाऽत्र शङ्का त्वया कार्या संगच्छ सह भार्यया ॥ ३९ ॥ तथा ब्रुवति वायौ तु पुष्पवृष्टिः पपात ह । देवदुन्दुभयो नेदुर्वचौ च पवनः शिवः ॥ ४० ॥ तदद्भुतमयं दृष्ट्वा नलो राजाऽथ भारत दमयन्त्यां विशङ्का तामुपाकर्पदरिन्दमः ॥ ४१ ॥ ततस्तद्वस्त्रमरजः प्रावृणोद्वसुधाधिपः संस्मृत्य नागराजं तं ततो लेभे स्वकं पुः ॥ ४२ ॥ स्वरूपिणं तु भर्तारं दृष्ट्वा भीमसुता तदा प्राक्रोशदुच्चैरालिङ्गय पुण्यश्लोकमनिन्दिता ॥४३ ॥ भैमीमपि नलो राजा भ्राजमानो यथा पुरा । सखजे स्वसुतौ चाऽपि यथावत्प्रत्यनन्दत ॥४४॥ ततः स्वोरसि विन्यस्य वक्त्रं नस्य शुभानना । परीता तेन दुःखन निशश्वासाऽऽयतेक्षणा ॥ ४५ ॥ तथैव मलदिग्धाहीं परिप्वज्य शुचिस्मिताम् । और देन-माल की और इस समय आपके विश्वास नल को दमयन्ती के पतिव्रता होने में ज़रा भी के लिय माक्षी दे रहे हैं। आपको यहा तक बुलाने ] सन्देह नहीं रह गया। पहले का सा अनुराग प्रकट के लियटीदमयन्नी ने यह उपाय निकाला था; करके राजा नल ने उसी समय दमयन्ती का हाथ क्योंकि मनिश्चय था कि आरके सिवाय और पकड़ लिया। नल ने नागराज कर्कोटक के दिये कोई एक दिन में चार मो कोस रथ नहीं ले जा हुए वस्त्र पहनकर ज्याही उसे म्मरण किया क्योंही सपनाहग गमय मामान्य से आप दोनों मिल गये उनका म्प पहले का मा हो गया । नल को पहले दें। अब आप बिना किमी मन्देश के मिलकर मुम्ब | के समान रूपवान् देखकर दमयन्ती ने उनको गल भोगने हुए आप भीपन बिनाए । यायु के यो वह मे लगा लिया । गोक का वेग उमड़ आने से पहले पुग्ने परम पगेकी यी होने लगी। देवता के दु.वों को स्मरण करके बद ऊँच म्बर से रोने नगाई घजाने हो तर यायु पूरी की मुबार लगी। अपनी प्रिया और पुत्र-पुत्री को दमकर नल परमादमाद चरने ममी ॥३६॥१०॥ ने रम, छाती सरगा लिया। पतिमना दमयन्ती अम्मान कमी अद्गुन पटना दमकर महाराज प्रियना की हानी पर आना सिर माका, अपने अध्याय ७६] म हा मारत १७२९ ~e. - ANAVIVAYANANAVAoneexxx सुचिरं पुरुषव्याघ्रस्तस्थौ शोकपरिप्लुतः ततः सर्व यथावृत्तं दमयन्त्या नलस्य च भीमायाऽकथयत्प्रीत्या वैदा जननी नृप ॥४७॥ ततोऽनवीन्महाराजः कृतशौचमहं नलम् दमयन्त्या सहोपेतं कल्ये द्रष्टा सुखोपितम् ॥ १८ ॥ ततस्तौ सहितौ रात्रिं कथयन्तौ पुरातनम् वने विचरितं सर्वमूपतुर्मुदितौ नृप गृहे भीमस्य नृपतेः परस्परसुखैषिणौ वसेतां हृष्टसंकल्पो वैदर्भी च नलश्च ह ॥ ५०॥ स चतुर्थे ततो वर्षे संगम्य सह भार्यया सर्वकामैः सुसिद्धार्थो लब्धवान्परमां मुदम् ॥ ५१ ।। दमयन्त्यपि भर्तारमासाद्याऽऽप्यायिता भृशम् । अर्धसंजातशस्येव तोयं प्राप्य वसुन्धरा ॥ ५२॥ सैवं समेत्य व्यपनीय तन्द्रां शान्तज्वरा हर्षविवृद्धसत्वा । रराज भैमी समवाप्तकामा शीतांशुना रात्रिरिवोदितेन ॥ ५३॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलदमयन्तीसमागमे पट्सप्ततितमोऽध्यायः ॥१६॥ पिछले दु.खों को याद करके, वारम्बार ठण्डी सांस ! अधिक समय बीत गया । महाराज नल ने तीन वर्ष लेने लगी। विरह-वेषधारिणी, दुबली, मलिन शरीर- बड़े ही क्लेश से बिताये थे। इस समय अपनी प्यारी वाली दमयन्ती को छातीस लगाकर राजा नल खेद पत्नी को पाकर, सब दु.खों को भूलकर, वे पण करने लगे ॥४॥४६॥ प्रसन्न हुए । जल के पड़ने से जैसे खेती बढती है इधर राजकुमारी दमयन्ती की माता ने नल | वैसे ही अपने पति नल को पाकर दमयन्ती को बड़ा और दमयन्ती के सम्बन्ध की सब बातें राजा भीम आनन्द प्राप्त हुआ। बिना मेघ के पूर्ण चन्द्र की से कहीं । उन्होंने कहा-मैं कल सवेरे कन्या और / हृदय में धारण करने से रात्रि जैसी सुहावनी लगती दामाद को नाती-नातिन सहित एक आसन पर सुम्ब है वैसे ही अपने पति को पाकर, आलस्य और से बैठे देलूँगा। आज उन्हें मुखपूर्वक विश्राम करने सन्ताप से रहित होकर, दमयन्ती भी शोभायमान दो । रात्रि को राजा नल और दमयन्ती दोनों एक | हुई ॥४७॥५३॥ ही जगह सोये । बीती हुई बातें करने में ही उनका वनपर्व का ख्यित्तरवां अध्याय समाप्त हुआ ।। ७६ ॥ । ८४४०४४८... ~~ म हा भारत [ वनपर्व १४ NA - Mrvvvivorchervwne अथ सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७७ ॥ वृहदश्व उवाच-अथ तां व्युपितो रात्रि नलो राजा स्वलंकृतः । वैदा सहितः काले ददर्श वसुधाधिपम् ॥ १ ॥ ततोऽभिवादयामास प्रयतः श्वशुरं नलः ततोऽनु दमयन्ती च ववन्दे पितरं शुभा ॥ २ ॥ त भीमः प्रतिजग्राह पुत्रवत्परया मुदा यथार्ह पूजयित्वा च समाश्वासयत प्रभुः ॥ ३ ॥ नलेन सहितां तत्र दमयन्ती पतिव्रताम् तामहणां नलो राजा प्रतिगृह्य यथाविधि परिचर्या स्वकां तस्मै यथावत्प्रत्यवेदयत् ततो बभूव नगरे सुमहान्हर्पजः स्वनः जनस्य संप्रदृष्टस्य नलं दृष्ट्वा तथागतम् अशोभयच्च नगरं पताकाध्वजमालिनम् सिक्ताः सुमृष्टपुष्पाढ्या राजमार्गाः स्वलंकृताः । द्वारि द्वारि च पौराणां पुष्पभोपकल्पिताः ॥ ७ ॥ अर्चितानि च सर्वाणि देवतायतनानि च ऋतुपर्णोऽपि शुश्राव वाहुकच्छद्मिनं नलम् ॥ ८ ॥ मतहत्तरवां अध्याय ॥ ७७ ।। वृहदा कहते है-दराजा युधिष्ठिर प्रात काल चारों ओर हर्ष-सूचक कोलाहल होने लगा। हरएक होने पर नल और दमयन्ती ने स्नान किया और घर में अनेक प्रकार के हर्प सूचक उत्सव होने लगे। गुन्दर वर और भूपण पहनकर राजा भीम के पाम हरएक द्वार पर जल से भरे हुए कलम, पताका और गये। यहां जाकर नल ने गजा के चरणों में प्रणाम । वन्दमवार नोभा बढ़ाने लो। सड़कों पर मुगन्धित दिया। दमयानी ने भी पिता को प्रणाम दिया। जल का छिड़काव हो गया । फूलों की वर्षा होने पना भाग ने अपने दामाद का आदर, पुत्र की गी । नाग और ग-विली ध्वजाएँ पादराने लगी। नाम लिया और दादाम पाया। अपने घर में मार नगर की अपूर्व शामा दुई । नगर के रहनेवाले आदर साकार पार महागाननने कृशनासकट रोग नरह-तरह के पुष्योपदार से लेकर देवमन्दिरों 41 नगर निवामा यहुन दिनों के बाद में देवनानी ही पूजा करने लगे। उधर महाराज गर आप दमका यान ही गुम्वीपनगर में ! परनु वर्ग भी यह गनर अमल हुए कि बाहुए . , - अध्याय ४] पहा मारन 3.८८ । । www.narwwwmailrmineharareer दमयन्त्या समायुक्तं जहपे च नराधिरः नमानाच्य नलं गजा क्षमयानास पार्थिवत् ॥ ६॥ सत्र नं अमयामास हेतुभिवृद्धिसमितः स सत्कृतो महीपालो नेपथं निलिवानना उवाच वाक्यं तत्त्वज्ञो नैप, वदनां वरः दिष्टया समेतो दारैः स्वैर्भनित्यभिनन्दितः ॥ ११ ॥ कञ्चित्तु नाऽपराधं ते कृतवानस्मि नैपध अज्ञानवास बसतो महे वसुधाधिप ॥ १२ ॥ यदि वाऽबुद्धिपूर्वाणि यदिबुद्ध्यापि कानिचित् । मया कृतान्यकार्याणि तानि त्वं क्षन्तुमर्हसि ॥ १३ ॥ नल ट्वाच-न मेऽपराधं कृतवांस्त्वं स्वल्पमपि पार्थिव । कृतेऽपि च न मे कोपः क्षन्तव्यं हि मया तव ॥ १४ ॥ पूर्व ह्यपि सखा मेऽसि संबन्धी च जनाधिप । अत ऊर्ध्वं तु भूयस्त्वं प्रीतिमाहर्तुमर्हसि ॥ १५॥ सर्वकामैः सुविहितैः सुखमस्म्युषितस्त्वयि न तथा स्वगृहे राजन् यथा तव गृहे सदा इदं चैव हयज्ञानं त्वदीयं मयि तिष्ठति वेषधारी महाराज नल हीथे और वे अब अपनी प्रिय- । सत्य कहता हूँ. मापने कभी मेरा कुछ अपराध नहीं तमा पनी दमयन्ती के साथ हैं ॥१९॥ किया । और, यदि कभी भूल से या विना जाने कुल ऋतुपर्ण ने उसी समय महाराज नल को सम्मान | अपराध आपसे बन भी पड़ा हो तो भी उसके लिये मै के माथ बुलाया और विनयपूर्ण मधुर वचनों से कहा आप पर क्रोध नहीं कर सकता । मुझे क्षमा ही करना १ हे निषय-नरेश ! आप बहुत दिनों के बाद अपने चाहिये । आप मेरे पहले से ही मिन और सम्बन्धी प्रिय परिवार से मिले, इससे मुझे बडा सन्तोष हुआ , थे। इस कारण क्षमा-प्रार्थना की कुछ आवश्यक्ता है । अब कृपा करके आप मुझे क्षमा प्रदान कीजिए। नहीं । आपखेद न करें, प्रसन्न हों और मुझसे पहले आप जबतक मेरे यहां कपट वेप से रहे, उस बीच के समान ही प्रीति रक्खें । मै आपके यहां इतने दिनों में यदि मैंने जानकर या बिना जाने आपका कुछ तक बड़े सुख से रहा। ऐसा सुख मुझे और कहीं अपराध किया हो तो उसे क्षमा कर दीजिए । ऋतुपर्ण नहीं मिल सकता था । जो हो, आपने जो अश्वविज्ञान- ६ के ये वचन सुनकर नल ने कहा-हे महाराज ! मै | विद्या मेरे पास धरोहर के तौर पर छोड़ रक्खी है उसे .. - - १८०२ म हा मारत [ वनपर्व - PLANAT -abocon- तदुपाकर्तुमिच्छामि मन्यसे यदि पार्थिव एवमुक्त्वा ददौ विद्यामृतुपर्णाय नैपधः स च तां प्रतिजग्राह विधिदृष्टेन कर्मणा गृहीत्वा चाऽश्वहृदयं राजन् भागासुरिर्नृपः । निपधाधिपतेचापि दत्वाऽक्षहृदयं नृपः सूतमन्यमुपादाय ययौ स्वपुरमेव ह ऋतुपर्णे गते राजन्नलो राजा विशांपते नगरे कुण्डिने कालं नातिदीर्घमिवाऽवसत् ॥ २० ॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि ऋतुपर्णस्वदेशगमने सप्तसप्ततितमोऽध्याय ||७४।। क्व रीजिएगा? आप चाहें तो मैं अभी देने को | एक सारथि को लेकर, रथ पर चढ़कर, वे अपने राज्य तैयार हूँ । तर महाराज ऋतुपर्ण ने नल स अश्व को चल दिये। महाराज मतुपर्ण के चले जाने पर नल विज्ञान विद्या सीखी और उसक बदले में नल को भी थोड़े समय तक विदर्भ नगर में रहे ॥१०॥२०॥ अक्षविद्या (पास)का काशर सिखाया। फिर अन्य पनपर्य का सतहत्तरवा अध्याय समाप्त हुआ ।। ५७ ।। अथ अष्टसप्ततितमोऽध्याय ॥७८ ॥ वृहदश्च उवाच-स मासमुप्य कौन्तेय भीममामन्त्र्य नैषधः । पुगढल्पपरीवारो जगाम निषधान्प्रति रथेनेकेन शुभेण दन्तिभि परिपोडशैः पञ्चाशद्भिहयेचव पदशतैश्च पदातिभिः स कम्पयन्निव महीं त्वरमाणो महीपतिः । प्रविशाऽथ संरब्धस्तरसेव महामनाः अटदत्तग्या अध्याय ।। ७८ ।। पाश पने-६ राजा युधिष्ठिर! राजा नर मीप ही अपने राज्य में जा पहुँन । यदा उन्होंने पण महीने मनोधमुरचे घर में रहे | रि उनमे । अपने भाई पुग्दर से मेंट की और कहा- हे भाई! विदा हुए और घोरे ग मनुष्यों का साय ऐपर वे , में फिर तुमसे जुभा मेगा। अप की याहुत सा भानसी पर गिर पकमोरह भन गया है। यह देखी, पन राशि मेरे साथ ही सधी, नाम पर, और गौ पैदर टन माथ दाम मिया और जो गुछ मेरे पास है उगे, , पंचना iraniपान प्राणों से भी अधिक प्यारी दाती की भी, - ॥
अध्याय ७८] म हा भारत १८०३ ८eena.tee AGAURAVARABANAwardNALWARAVALAN VIBABASAWALAAG ततः पुष्करमासाद्य वीरसेनसुतो नलः उवाच दीव्याव पुनर्वहुवित्तं मयाऽऽर्जितम् ॥ ४ ॥ दमयन्ती च यच्चाऽन्यन्मम किंचन विद्यते । एप वै मम संन्यासस्तव राज्यं तु पुष्कर पुनः प्रवर्ततां द्यूतमिति मे निश्चिता मतिः । एकपाणेन भद्रं ते प्राणयोश्च पणावहे जित्वा परस्वमाहृत्य राज्यं वा यदि वा वसु । प्रतिपाणः प्रदातव्यः परमो धर्म उच्यते न चेद्वाञ्छसि त्वं द्यूतं युद्धद्यूतं प्रवर्तताम् । द्वैरथेनाऽस्तु वै शान्तिस्तव वा मम वा नृप ॥ ८ ॥ वेशभोज्यमिदं राज्यमर्थितव्यं यथातथा येन केनाऽप्युपायेन वृद्धानामिति शासनम् ॥ ९ ॥ द्वयोरेकतरे बुद्धिः क्रियतामद्य पुष्कर कैतवेनाऽक्षवत्यां तु युद्धे वा नाम्यतां धनुः ॥१०॥ नैषधेनैवमुक्तस्तु पुष्करः प्रहसन्निव ध्रुवमात्मजयं मत्वा प्रत्याह पृथिवीपतिम् दिष्टया त्वयाऽर्जितं वित्तं प्रतिपाणाय नैषध । दाँव में लगा देने में आगा पीछा नहीं करूँगा । हो, पुरखों का राज्य प्राप्त करना चाहिये । इसलिये आओ, अब ज्यादा देरी करने की आवश्यकता नहीं। आओ, या तो फिर जुआ खेलो, या युद्ध के लिये अभी खेल शुरू हो जाय । तुमको भी अपना राज्य | तैयार हो जाओ ॥१॥१०॥ बद देने में सङ्कोच न करना होगा। दूसरे का राज्य नल के ये वचन सुनकर पुष्कर ने सोचा कि और सारी धन सम्पत्ति तुमने जीत ली है, सो सब जय तो मेरी ही होगी। उसने हँसकर कहा-हे नल! तुमको भी बदना पड़ेगा। शास्त्रकारों ने इसे परम- आज मैं अपने सौभाग्य का वर्णन नहीं कर सकता, धर्म कहा है। यदि किसी कारण तुम जुआ न खेलना | क्योंकि बहुत सा धन लेकर तुम दाव लगाने आये चाहो तो तुमको मुझसे युद्ध करना पड़ेगा। इस युद्ध | हो । जान पड़ता है, अब दमयन्ती के बुरे दिन में और किसी की सहायता न ली जायगी । उस गये । बड़ी प्रसन्नता की बात है कि तुम अपनी ६ युद्ध में, तुम या मैं, एक को अवश्य विजय प्राप्त स्त्री सहित उपस्थित हो। मैं सर्वदा बड़ी उत्कण्ठा के होगी। प्राचीन पण्डितों का कहना है कि जिस तरह साथ तुम्हारे आने की प्रतीक्षा क्यिा करता था। जन १८०४ महा मारत [ वनपर्व NALUnsuTHANINGarlA दिष्टया च दुष्कृतं कर्म दमयन्त्याः क्षयं गतम् ॥ १२ ॥ दिष्ट्या च ध्रियसे राजन् सदारोऽद्य महाभुज । धनेनाऽनेन वै भैमी जितेन समलंकृता मामुपस्थास्यति व्यक्तं दिवि शक्रमिवाऽप्सराः । नित्यशो हि स्मरामि त्वां प्रतीक्षेऽपि च नैपध ॥ १४ ॥ देवने न मम प्रीतिर्न भवत्यसुहृद्गणैः जिस्वा स्वद्य वरारोहां दमयन्तीमनिन्दिताम् ॥ १५॥ कृतकृत्यो भविष्यामि सा हि मे नित्यशो हृदि । श्रुत्वा तु तस्य ता वाचो वह्ववद्धप्रलापिनः ॥ १६ ॥ इयेप स शिरच्छेत्तुं खट्नेन कुपितो नलः म्मयंस्तु रोपताम्राक्षस्तमुवाच नलो नृपः ॥ १७॥ पणावः किं व्याहरसे जितो न व्याहरिष्यसि । ततः प्रावर्तत द्यूतं पुष्करस्य नलस्य च ॥ १८ ॥ एकपाणन भद्रं ते नलेन स पराजितः स रनकोशनिचयः प्राणेन पणितोऽपि च जित्वा च पुष्करं राजा प्रहसन्निदमब्रवीत् मम सर्वमिदं राज्यमव्ययं हतकण्टकम् ॥ २० ॥ वेदी न खया शक्या राजापसद वीक्षितुम् । म तुम्हारी मारी धन-मापति जीन गातय अवश्य ही कहा- ओ पुका ! इस समय तूपसा क्या पक रहा दयनी वय आप मुझे मजेगी। उम निरोक- । जब जुए में हारेगा तब तेरे मुंह से पात भी मुन्दरीको में आज जुप में जानकर अपनी अभिरा। न मिलेगी। इसके पश्चात् नल और पुप्पर दोनों ग वगादिममानी की जब लेंगा न अप्सराएँ बसने लगे। नल ने एक ही दाव में पुष्कर का अंग इन्द्र की सेवा काना र वमे दी, यह मग मेवा । मम्य जीन रिया। पुष्पर ने अपने प्राण तक दांव सापुत्राम अमन पावाद की गुनकर मेंगा दिये । गस ने उम दांय को भी जीतकर नरकास प्राध गद आया। नरवार में टमी गुमरान हुए कहा-भरे राजाओं में अपम! अब म पु बाट नियार हो गये। नाममा आगामी की जा कट गई । मेरा राज्य RIP Pा निराकर उन्होंने निपट गया ॥११॥२०॥ SAGADASAIN.PIN2018 .. । : - - - अध्याय ७८ ] म हा मारत १८०५ -AVAGAL BeneKOCALrvieweeMORNIWAN तस्यास्त्वं सपरीवारो मूढ दासत्वमागतः ॥ २१ ॥ न खया तस्कृतं कर्म येनाऽहं विजितः पुरा कलिना तत्कृतं कर्म त्वं च मूढ न बुध्यसे ॥ २२ ॥ नाऽहं परकृतं दोपं त्वय्याधास्ये कथंचन यथासुखं वै जीव त्वं प्राणानवस्मृजामि ते ॥ २३ ॥ तथैव सर्वसंभारं स्वमंशं वितरामि ते तथैव च मम प्रीतिस्त्वयि वीर न संशयः ॥ २४॥ सौहार्द चापि मे त्वत्तो न कदाचित्प्रहास्यति । पुष्कर त्वं हि मे भ्राता संजीव शरदः शतम् ॥ २५॥ एवं नलः सान्त्वयित्वा भ्रातरं सत्यविक्रमः । स्त्रपुरं प्रेषयामास परिष्वज्य पुनः पुनः ॥ २६ ॥ सान्वितो नेपधेनैवं पुष्करः प्रत्युवाच तम् । पुण्यश्लोकं तदा राजन्नभिवाद्य कृताञ्जलिः ॥ २७॥ कीर्तिरस्तु तवाऽक्षय्या जीव वर्पायुतं सुखी । यो मे वितरसि प्राणानधिष्टानं च पार्थिव ॥ २८॥ स तथा सत्कृतो राज्ञा मासमुष्य तदा नृपः प्रययौ पुष्करो हृष्टः स्वपुरं स्वजनावृतः ॥ २९ ॥ अरे नराधम ! अब तो दमयन्ती की योर आँख । है वह भी तुमको देता हूँ । लेकर अपने स्थान को टठाकर देखने की भी क्षमता तुझे नहीं है । अब जा। भाई का स्नेह कभी मिट नहीं सकता।तू मेरा सपग्विार तुझको दमयन्ती का दास बनना पड़ेगा। छोटा भाई है । तुझपर मेरी प्रीति पहले की सी ही अरे मूढ़ ! तू नहीं जानता है कि केवल कलियुग रहेगी। मैं तुझे आशीर्वाद देता हूँ कि तू चिरजीवी की सहायता से ही तूने पहले मुझको हरा दिया। होकर सुखसे अपने जीवन का समय विता॥२१॥२५॥ था। दूसरे की सहायता पर भरोसा करके जीतने में राजा नल ने इस प्रकार से पुष्कर को धर्य तेरी बहादुरी क्या थी? एक के अपराध से दूमरे के देकर और बारम्बार मिलकर उसे अपने नगर को जाने ऊपर क्रोध प्रकट करना उचित नहीं। मैं चाहूँ तो की आज्ञा दी। इसके पीछ नल के धैर्य देने पर पुष्कर अभी तुझे प्राण दण्ड दे सकता हूँ; किन्तु मैं यह ने नल को प्रणाम किया और कहने लगा-हे गजन् ! कुछ नहीं करूँगा। मैं इस समय तुझे जीवन की | आपने कृपा करके मुझको धन, प्राण और आश्रय भिक्षा देता हूँ। तेरी जो सब सम्पत्ति मैंने जीत ली दिया। इस कारण मैं आपका कृतन रहूँगा। आपकी ANNABINATUAVINAYAVARAN RA १८०६ म हा भारत [ वनपर्व महत्या सेनया सार्धं विनीतः परिचारकैः भ्राजमान इवाऽऽदित्यो वपुषा पुरुपर्पभ ॥ ३० ।। प्रस्थाप्य पुष्कर राजा वित्तवन्तमनामयम् । प्रविवेश पुरं श्रीमानत्यर्थमुपशोभिताम् ॥ ३१ ॥ प्रविश्य सान्त्वयामास पौरांश्च निषधाधिपः । पौरा जानपदाश्चापि संप्रहृष्टतनूरुहाः ॥ ३२ ॥ ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे सामात्यप्रमुखा जनाः । अद्य स्म निता राजन् पुरे जनपदेऽपि च उपासितुं पुनः प्राप्ता देवा इव शतक्रतुम् ॥ ३३ ॥ इनिश्रीमन्महाभारलेआरण्यकपर्वणि नलोपारयानपर्वणिपुष्करपराभवपूर्वराज्यमत्यानयनेऽष्टमप्ततितमोऽध्यायः । यह निरम्मरणीय कीर्ति कभी नष्ट न होगी। अब बड़े म्नेह के साथ सबको धैर्य दिया । बहुत दिनों में प्रार्थना करता हूँ कि आप चिरजीवी होकर अत्यन्त के बाद अपने राजा को देखने से सबको बड़ा आनन्द काल तक अपने साम्राज्य का भोग कीजिए। इसके हुआ । मन्त्री आदि प्रधान-प्रधान पुरवासी प्रजागण उपरान्त नल से मत्कार पाकर पुष्कर एक मास तक नल के पास आकर हाथ जोड़कर नम्रता पूर्वक कहने यदा रहा उपरान्त प्रसन्नतापूर्वक अपने भाई, बन्धु, लगे-हे महाराज ! आज आपको देख कर हम बड़े मेना और सेवकों सहित सूर्य के तुल्य प्रकाश करता मुखी हुए है। देवता जैसे स्वर्ग में इन्द्र की उपासना हुआ अपने नगर को चला गया। उसके चले जाने किया करते हैं वैसे ही हम लोग भी फिर आपकी पर महाराज नल ने अपनी प्रजा को बुलाया और सेवा करने के लिये उपस्थित है ॥२६॥३३॥ वनपर्व का अटदत्तरवां अध्याय समाप्त हुआ ।। ७८ ॥ namUPLOAALAPUR CLAL - अथ उनाशीतितमोऽध्याय ॥ ७९ ॥ शृदद ?११-प्रशान्ते तु पुरे दृष्टे संप्रवृत्ते महोत्सवे महत्या सेनया राजा दमयन्तीमुपानयत् दमयन्तीमपि पिता सत्कृत्य परवीग्हा प्रस्थापयदयात्मा भीमो भीमपराक्रमः अनामीयां जयाय !॥५६॥ इस नई-६ गजा युधि!ि जयनगर दमयनी का बुरवाया। ममा भीगने उमे मस्तार in "नीरजन म महिन सिरिया और बद पुर और कन्या को रानभान नरमी मगा भजफर माप पर यह गई। आने पर राजा अध्याय ७२) म हा भारत १८०७ - SAvmenANANAGANAWASANA आगतायां तु वैदा सपुत्रायां नलो नृपः । वर्तयामास मुदितो देवराडिब नन्दने ॥ ३ ॥ तथा प्रकाशतां यातो जम्बुद्वीपे स राजसु । पुनः शशास तद्राज्यं प्रत्याहृत्य महायशाः ॥ ४ ॥ ईजे च विविधैर्यविधिवच्चाऽऽप्तदक्षिणैः तथा त्वमपि राजेन्द्र ससुहृद्वक्ष्यसेऽचिरात् ॥ ५ ॥ दुःखमेतादृशं प्राप्तो नलः परपुरञ्जयः देवनेन नरश्रेष्ठ सभार्यों भरतर्षभ एकाकिनैव सुमहन्नलेन पृथिवीपते दुःखमासादितं घोरं प्राप्तश्चाऽभ्युदयः पुनः ॥ ७ ॥ त्वं पुनर्घातृसहितः कृष्णया चैव पाण्डव रमसेऽस्मिन्महारण्ये धर्ममेवाऽनुचिन्तयन् ॥ ८ ॥ ब्राह्मणैश्च महाभागैवेदवेदाङ्गपारगैः नित्यमन्वास्यस राजंस्तत्र का परिदेवना अक्षाणां हृदये प्राप्ते ऋतुपर्णस्य संनिधौ । नलेन याचितं राज्ञा कलिना च प्रतिश्रुतम् ॥ १० ॥ नल प्रसन्नतापूर्वक इस प्रकार से रहने लगे जैसे नन्दन सोचकर देखिए कि राजा नल दैवकोप से जुए में वन में देवताओं का राजा रहता है । इसके उपरान्त हारकर राज्य से भ्रष्ट हुए, वन-वन में अपनी प्रियतमा नल के प्रताप का उदय हुआ और वे राज्य शासन पत्नी के साथ घूमकर अनेक कष्ट भोगते रहे । अन्त नीतिपूर्वक करने से इस जम्बुद्वीप में अत्यन्त सुशोभित को अपनी धर्मपनी के वियोग का विशेष कष्ट भी हो गये । उस राजा नल ने बहुत दक्षिणावाले यज्ञ उनको भोगना पड़ा। किन्तु फिर उन्होंने अपना राज्य करके अक्षय यश का सञ्चय किया। इसी प्रकार से पाया, सैंकड़ो प्रकार के धर्म-कर्म किये और वे अपना हे राजा युधिष्ठिर ! थोड़े ही दिनों में तुम भी महाराज अमर यश पृथ्वी पर छोड़ गये । तुम तो द्रौपदी और नल के समान शीघ्र ही फिर अपना राज्य, धन, भाइयों के साथ इसी वन में रहकर धर्म कर्म कर रहे ऐश्वर्य, और अन्य सब आवश्यक वस्तुएँ प्राप्त करके | हो । वेद-वेदाग के जानकर ब्राह्मण लोग सदा तुम्हारे परमसुख से जीवन व्यतीत करोगे । इस समय व्यर्थ साथ रहते हैं । तुम्हारा विलाप और सन्ताप करना चिन्ता में समय विताना किसी प्रकार उचित नहीं किसी तरह उचित नहीं । जो मनुष्य मन लगाकर है। इस जगत् में मुख या दुःख सदा बना नहीं रहता। कर्कोटक नाग, नल, दमयन्ती और राजा ऋतुपर्ण UAAAASANABAJANABAe&SASUPAM ।
१८०८ म हा मारत [ वनपर्व ७८८८८ १.८ -- MantraMMYYpernapps कर्कोटकस्य नागस्य दमयन्त्या नलस्य च ऋतुपर्णस्य राजर्षेः कीर्तनं कलिनाशनम् य इदं पठते नित्यं य इदं शृणुयान्नरः 'न तस्य विद्यते राजन् भयं वै कलिकारकम् ॥ १२ ॥ धर्मनित्यस्य युक्तस्य सदाऽऽर्जवरतस्य च दान्तस्य च वदान्यस्य कलिःपुंसः करोति किम् ॥ १३ ॥ इतिहासमिमं चाऽपि कलिनाशनमच्युत शक्यमाश्वसितुं श्रुत्वा त्वद्विधेन विशांपते ॥ १४ ॥ अस्थिरत्वं च संचिन्त्य पुरुषार्थस्य नित्यदा । तस्योदये व्यये चापि न चिन्तयितुमर्हसि श्रुत्वेतिहासं नृपते समाश्वसिहि मा शुचः व्यसने त्वं महाराज न विपीदितुमर्हसि ॥ १६ ॥ विषमावस्थिते देवे पौरुषेऽफलतां गते विषादयन्ति नाऽऽस्मानं सत्त्वोपाश्रयिणो बुधाः ॥ १७ ॥ ये चेदं कथयिष्यन्ति नलस्य चरितं महत् । श्रोप्यन्ति चाप्यभीक्ष्णं वै नाऽलक्ष्मीस्तान्भजिप्यति ॥ १८॥ अर्थास्तस्योपपत्स्यन्ते धन्यतां च गमिष्यति इतिहासमिमं श्रुत्वा पुराणं शश्वदुत्तमम् निदाम की सुनता है टसे कलियुग में किसी ! चाहिये । देव के प्रतिकूल होने और पीरप से कुछ का भय नहीं रहता ॥१॥१०॥ | न होने पर धीर पुस्प हिम्मत नहीं हारते । जो गंग मागज ! आप एमे पुरुष को यह सब एषाम मन से इस अत्यन्त पवित्र नल के चरित्र को मान्न मुनार किमी नाहहनाश न होना चाहिये। सुनते या कहते है उन्हें कभी दादि नहीं सताता । द गजन् ! पुप पी अम्धिाता को जानार भी वे निम्सन्देह धन और अतुल ऐश्वर्य पनि है । ये पुत्र, पिर विमरिय टमरे विनाम या अभ्युदय की पात्र, गाय, पोहे आदि को पावर अनन्त काल नक hिim को आगगा योग देम गुम्मी रहते हैं। उन्हें गंग गायक नहीं सताता। mar पाना पायरों का रक्षण अब आता दीजिए, मैं जाना चाहता । यदि रि गरिय अपराध ही धारण राना आगामी नाहीएक पाणीवा आचि , NAGAGAGANAGABBANSAR अध्याय ७९] महा मा र त १८०९ - - पुत्रान्पौत्रान्पशृंश्चापि लभते नृषु चाऽग्यताम् । आरोग्यप्रीतिमांश्चैव भविष्यति न संशयः ॥ २०॥ भयात्त्रस्यसि यच्च त्वमाह्वयिष्यति मां पुनः । अक्षज्ञ इति तत्तेऽहं नाशयिष्यामि पार्थिव ॥ २१ ॥ वेदाऽक्षहृदयं कृत्स्नमहं सत्यपराक्रम उपपद्यस्व कौन्तेय प्रसन्नोऽहं ब्रवीमि ते ॥ २२॥ वैशम्पायन उवाच ततो हृष्टमना राजा बृहदश्वमुवाच ह भगवन्नक्षहृदयं ज्ञातुमिच्छामि तत्वतः ॥ २३ ॥ ततोऽक्षहृदयं प्रादात्पाण्डवाय महात्मने दत्वा चाऽश्वशिरोऽगच्छदुपस्प्रष्टुं महातपाः ॥ २४॥ वृहदश्वे गते पार्थमश्रौपीत्सव्यसाचिनम् वर्तमानं तपस्युग्रे वायुभक्षं मनीषिणम् ॥ २५॥ ब्राह्मणेभ्यस्तपस्विभ्यः संपतद्भयस्ततस्ततः तीर्थशलवनेभ्यश्च समेतेभ्यो दृढव्रतः ॥ २६ ॥ इति पार्थो महावाहुर्दुरापं तप आस्थितः न तथा दृष्टपूर्वोऽन्यः कश्चिदुग्रतपा इति ॥ २७॥ यथा धनञ्जयः पार्थस्तपस्वी नियतत्रतः मुनिरेकचरः श्रीमान्धर्मो विग्रहवानिव ॥ २८ ॥ का सामना करना पड़े तो आप मुझे म्मरण कीजिएगा। वह विद्या मुझे दीजिए । वृहदश्व ने धर्मराज को मैं उसी समय आकर उसका प्रतिकार करूँगा । हे अक्षविद्या के साथ ही अश्वविद्या भी दे दी। फिर महाराज! मैं अक्षविद्या में अद्वितीय जानकारी रखता हूँ वे स्नान करने को चल दिये। महर्षि बृहदश्व के चले आप पर प्रसन्न होकर मै वह विद्या आपको देना चाहता जाने पर युधिष्ठिर ने हिमालय पर्वत पर से आये हूँ। इसलिये आप उसे ग्रहण कीजिए ॥११॥२२॥ हुए तपस्वियों के मुँह से सुना कि महावीर अर्जुन वैशम्पायन ने कहा- हे राजा जनमजय ! वृहदश्व केवल वायु भक्षण करके अत्यन्त कठोर तपस्या कर के यों कह चुकने पर अब धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा रहे हैं। उनकी तप में तत्परता देखने से जान पड़ता हे महाराज ! पूरी अक्षविद्या सीखने की मुझे बड़ी है कि साक्षात् धर्मदेव शरीर धारण किये हुए तप इच्छा है। यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो कृपा करक कर रहे हैं । अर्जुन के ऐसे कठोर तप करने का हाल AOMINASABOUT महाभारत [ वनपर्व तं श्रुत्वा पाण्डवो राजस्तप्यमानं महावने । अन्वशोचत कौन्तेयः प्रियं वै भ्रातरं जयम् ॥ २९ ॥ दह्यमानेन तु हृदा शरणार्थी महावने ब्राह्मणान्विविधज्ञानान्पर्यपृच्छद्युधिष्ठिरः ॥ ३० ॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि वृहदश्वगमने ऊनाशीतितमोऽध्यायः ॥ ७९ ॥ समाप्त च नलोपाख्यानपर्व । सुनकर धर्मराज बहुत ही दुखी हुए । यह चिन्ता | कठिन क्लेश सह रहे है । तब महाराज युधिष्ठिर बहुदर्शी प्रबल होकर उनके हृदय के टुकड़े टुकड़े करने लगी। ब्राह्मणों के शरणागत होकर उनसे अर्जुन के सम्बन्ध कि हाय । प्रियतम अर्जुन हमारे लिये कैसे-कैसे | की बातें पूछने लगे ॥२३॥३०॥ वनपर्व का उन्नासीवां अध्याय समाप्त हुआ ॥ ७९ ॥ अथ नीर्थयात्रापर्व । अथ अशीतितमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ जनमेजय उवाच-भगवन्काम्यकास्पार्थे गते मे प्रपितामहे पाण्डवाः किमकुर्वस्ते तमृते सव्यसाचिनम् ॥ १ ॥ स हि तेषां महेष्वासो गतिरासीदनीकजित् । आदित्यानां यथा विष्णुस्तथैव प्रतिभाति मे ॥ २ ॥ तेनेन्द्रसमवीर्येण सङ्ग्रामेष्वनिवर्तिना विनाभूता बने वीराः कथमासन्पितामहाः ॥ ३ ॥ वैशम्पायन उवाच-गसे तु पाण्डवे तात काम्यकात्सत्यविक्रमे । बभूवुः पाण्डवेयास्ते दुःखशोकपरायणाः आक्षिप्तसूत्रा मणयश्छिन्नपक्षा इव द्विजाः । अप्रीतमनसः सर्वे बभूवुरथ पाण्डवाः अस्प्तीवा अध्याय ॥८॥ जनमेजय ने कहा- हे महाराज ! मेरे प्रपितामह | पराक्रमी अर्जुन के विरह में किस तरह रहे, अर्जुन जय काम्यक वन से तप करने चले गये तर मुझसे कहिए। वैशम्पायन ने कहा-दे राजा जनमेजय! पाण्डयों ने रसके विरह में यया क्यिा ! विष्णु जमे | सत्यपराक्रमी अर्जुन जब काम्यक वन से चले गये आदियों में प्रधान , मे ही महाधनुदर संग्राम तर पाण्डव शोक में मा तथा अत्यन्त उदास होकर, विजयी अर्जुन पाण्टयों में प्रधान और उनके एक मात्र | टोरे से अरग मणियों या परक्टे पक्षियों की तरह, महागधांगरे प्रपितामह पाण्डव टन इन्द्र कामगार अत्यन्त दुग्नी हो गये । यह यन भी अर्जुन के विरह यह अध्याय ८०] महा भारत १८११ - 1 NAIDUNIANNUARINA वनं तु तदभूत्तेन हीनमक्लिष्टकर्मणा कुवरेण यथा हीनं वनं चैत्ररथं तथा तमृते ते नरव्याघ्राः पाण्डवा जनमेजय । मुदमप्राप्नुवन्तो वै काम्यके न्यबसंस्तदा ब्राह्मणार्थे पराक्रान्ताः शुद्धैर्णिमहारथाः निघ्नन्तो भरतश्रेष्ठ मेध्यान्वहुविधान्मृगान् ॥ ८ ॥ नित्यं हि पुरुषव्याघा वन्याहारमरिन्दमाः उपाकृत्य उपाहृत्य ब्राह्मणेभ्यो न्यवेदयन् सर्वे संन्यवसंस्तत्र सोत्कण्ठाः पुरुषर्षभाः । अहृष्टमनसः सर्वे गते राजन् धनञ्जये विशेषतस्तु पाञ्चाली स्मरन्ती मध्यमं पतिम् । उद्विग्नं पाण्डवश्रेष्ठमिदं वचनमब्रवीत् योऽर्जुनेनाऽर्जुनस्तुल्यो द्विवाहुर्बहुवाहुना तमृते पाण्डवश्रेष्ठ वनं न प्रतिभाति मे शुन्यामिव प्रपश्यामि तत्र तत्र महीमिमाम् ॥ १२ ॥ वह्वाश्चर्यमिदं चापि वनं कुसुमितद्रुमम् न तथा रमणीयं वै तमृते सव्यसाचिनम् ॥ १३ ॥ नीलाम्बुदसमप्रख्यं मत्तमातङ्गगामिनम् में कुबेरहीन चैत्ररथ वन के समान अत्यन्त शोभाहीन अर्जुन को म्मरण करके द्रौपदी अत्यन्त व्याकुल हो गया। हे राजा जनमेजय ! इस प्रकार अर्जुन रहती थी। उसने युधिष्ठिर से कहा-हे महाराज ! के विरह में अत्यन्त व्याकुल पाण्डव उसी वन में उन दो भुजापाले अर्जुन के बिना जो सहसराहु के रहकर समय व्यतीत करने लगे। वे नित्य प्रति तुल्य हैं, मुझको यह वन अच्छा नहीं लगता है। विचित्र वाणों से पवित्र मृग मारकर, उनके मास से ! मुझे यह सारी पृथ्वी शून्य सी जान पड़ती है । और और वन में उत्पन्न होनेवाली आहार की अन्यान्य यह वन भी यी पृला फग हुआ और शोभित सामग्रियों से ब्राह्मणों को तृप्त करते थे । अर्जुन है परन्तु उन अर्जुन के बिना, जिनका वर्ण नीले के वियोग से वे अत्यन्त ही व्याकुल और पीड़ित बादल के समान, चाल मताले हाथी की सी, ऑग्में हो रहे थे ॥११॥ । कमल के सदृश और धनुप का मन्द बज्र के तुल्य PECIABAILGANA . NA अध्याय ८०] म हा भारत १८११ । वनं तु तदभूत्तेन हीनमक्लिप्टकर्मणा कुवरेण यथा हीनं वनं चैत्ररथं तथा तमृते ते नरव्याघ्राः पाण्डवा जनमेजय । मुदमप्राप्नुवन्तो वै काम्यके न्यवसंस्तदा ॥ ७ ॥ ब्राह्मणार्थे पराक्रान्ताः शुद्धैर्वाणैर्महारथाः निघ्नन्तो भरतश्रेष्ठ मेध्यान्वहुविधान्मृगान् ॥ ८ ॥ नित्यं हि पुरुषव्याघा वन्याहारमरिन्दमाः उपाकृत्य उपाहृत्य ब्राह्मणेभ्यो न्यवेदयन् ॥ ९ ॥ सर्वे संन्यवसंस्तत्र सोत्कण्ठाः पुरुषर्षभाः । अहृष्टमनसः सर्वे गते राजन् धनञ्जये विशेषतस्तु पाञ्चाली स्मरन्ती मध्यमं पतिम् । उद्विग्नं पाण्डवश्रेष्ठमिदं वचनमब्रवीत् योऽर्जुनेनाऽर्जुनस्तुल्यो द्विवाहुर्वहुवाहुना तमृते पाण्डवश्रेष्ठ वनं न प्रतिभाति मे शून्यामिव प्रपश्यामि तत्र तत्र महीमिमाम् ॥ १२ ॥ बह्वाश्चर्यमिदं चापि वनं कुसुमितद्रुमम् न तथा रमणीयं वै तमृते सव्यसाचिनम् ॥ १३ ॥ नीलाम्बुदसमप्रख्यं मत्तमातङ्गगामिनम् में कुबेरहीन चैत्ररथ वन के समान अत्यन्त गोभाहीन अर्जुन को स्मरण करके द्रौपदी अत्यन्त व्याकुल हो गया। हे राजा जनमेजय ! इस प्रकार अर्जुन, रहती थी । उसने युधिष्ठिर से कहा-हे महाराज ! के विरह में अत्यन्त व्याकुल पाण्डव उसी वन में उन दो भुजायाले अर्जुन के बिना जो सहसबाहु के रहकर समय व्यतीत करने लगे। वे नित्य प्रति । तुल्य हैं, मुझको यह वन अच्छा नहीं लगता है । विचित्र वाणों से पवित्र मृग मारकर, उनके मास से । मुझे यह सारी पृथ्वी शून्य सी जान पड़ती है । और और वन में उत्पन्न होनेवाली आहार की अन्यान्य यह वन भी यद्यपि फूला फला हुआ और शोभित सामग्रियों से ब्राह्मणों को तृप्त करते थे | अर्जुन है परन्तु उन अर्जुन के बिना, जिनका वर्ण नीले के वियोग से वे अत्यन्त ही व्याकुल और पीड़ित बादल के समान, चाल मतवाले हाथी की सी, आँखें हो रहे थे ।।१११०॥ कमल के सहा और धनुष का शब्द वज्र के तुल्य AASANABANANABANABBAUNAWARGABA - NAGAVACAD १८१२ म हा मा र त [ वनपर्व ॥ १७॥ AVAILABALUMAMANANAGAR तमृते पुण्डरीकाक्षं काम्यकं नाऽतिभाति मे ॥ १४ ॥ यस्य वा धनुषो घोषः श्रूयते चाऽशनिस्वनः । न लभे शर्म वै राजन् स्मरन्ती सव्यसाचिनम् ॥ १५॥ तथा लालप्यमानां तां निशम्य परवीरहा । भीमसेनो महाराज द्रौपदीमिदमब्रवीत् भीम उवाच-मनःप्रीतिकरं भद्रे यब्रवीषि सुमध्यमे तन्मे प्रीणाति हृदयममृतप्राशनोपमम् यस्य दीर्थों समौ पीनौ भुजौ परिघसंनिभौ । मौर्वीकृतकिणौ वृत्तौ खगायुधधनुर्धरौ निष्कागदकृतापीडो पञ्चशीविवोरगौ तमृते पुरुषव्याघ्र नटसूर्यमिवाऽम्बरम् यमाश्रित्य महावाहुं पञ्चाला कुरवस्तथा सुराणामपि यत्तानां पृतनासु न बिभ्यति ॥ २०॥ यस्य पाहू समाश्रित्य वयं सर्वे महात्मनः । मन्यामहे जितानाजी परान्प्राप्तां च मेदिनीम् ॥ २१ ॥ तमृते फाल्गुनं वीरं न लभे काम्यके धृतिम् । पक्ष्यामि च दिशः सर्वास्तिमिरेणाऽवृता इव ॥ २२ ॥ tweetermerentireferenventnews. - अध्याय ८०] महा मारत १८१३ ra - VANAMANAVAGAVANUARMACIAL नकुल उवाच-यस्मिन्दिव्यानि कर्माणि कथयन्ति रणाजिरे । देवा अपि युधां श्रेष्टं तमृते का रतिर्वने ॥ २३ ॥ उदीची यो दिशंगत्वा जित्वा युधि महावलान् । गन्धर्वमुख्याञ्च्छतशो हयाँल्लभे महायुतिः ॥ २४ ॥ राज्ञे तित्तिरकल्माषाञ्च्छ्रीमतोऽनिलरंहसः प्रादाभ्रात्रे प्रियः प्रेम्णा राजसूये महाकतो ॥ २५ ॥ तमृते भीमधन्वानं भीमादवरजं वने कामये काम्यके वासं नेदानीममरोपमम् ॥ २६॥ सहदेव उवाच-यो धनानि च कन्याश्च युधि जित्वा महारथः । आजहार पुरा राक्षे राजसूये महाक्रतौ ॥ २७॥ यः समतान्मृधे जित्वा यादवानमितद्युतिः सुभद्रामाजहारैको वासुदेवस्य संमते ॥ २८ ॥ तस्य जिष्णोसी दृष्ट्वा शून्यामिव निवेशने । हृदयं मे महाराज न शाम्यति कदाचन ॥ २९ ॥ वनादस्माद्विवासं तु रोचयेऽहमरिन्दम न हि नस्तमृते वीरं रमणीयमिदं वनम् ॥ ३०॥ इति श्रीमन्महाभारत आरण्यकपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि अर्जुनानुशोचने अशीतितमोऽध्यायः ॥ ८॥ इसके पीछे नकुल ने गद्गद् स्वर से कहा सहदेव ने कहा-वे अर्जुन युद्ध में बहुत सा धन उन अर्जुन के युद्ध सम्बन्धी कामों की प्रशंसा देवता और बहुत सी कन्याएँ जीतकर राजसूय यज्ञ में लाये भी करते हैं वे योद्धाओं में सब से श्रेष्ठ हैं उन्होंने | थे और वासुदेव जी की मति से सब यादवों को उत्तर दिशा में जाकर बड़े-बड़े गन्धों को रण में अकेला युद्ध में जीतकर सुभद्रा को लाये उन अर्जुन जीता और उनसे तीतर के तुल्य चिह, रखनेवाले के आसन को खाली देखकर मेरा चित्त स्वस्थ नहीं के समान शीघ्रगामी सैक्ड़ों घोड़े लाकर रहता है और बिना उनके यह वन भी रमणीक अपने बड़े भाई को राजसूय यज्ञ में दिये, उन नहीं लगता है । इसलिये यहां से तो और हीम्यान तेजस्वी देवसदृश अर्जुन के बिना मुझे काम्यक वन पर रहना ठीक है ॥२३॥३०॥ में रहना अच्छा नहीं लगता है । इसके उपरान्त वनपर्व का अस्सीवां अध्याय समाप्त हुआ ।। ८० ॥ aai AVA और वायु GAVADAVPRA GANGA.
१८१२ म हा भारत { वनपर्व ८N ALBrdNANTARVASNow तमृते पुण्डरीकाक्षं काम्यकं नाऽतिभाति मे ॥ १४ ॥ यस्य वा धनुपो घोपः श्रूयते चाऽशनिस्वनः । न लभे शर्म वै राजन् स्मरन्ती सव्यसाचिनम् ॥ १५ ॥ तथा लालप्यमानां तां निशम्य परवीरहा भीमसेनो महाराज द्रौपदीमिदमत्रवीत् ॥ १६ ॥ भीम उवाच-मनःप्रीतिकरं भद्रे यद्ब्रवीपि सुमध्यमे तन्मे प्रीणाति हृदयममृतप्राशनोपमम् ॥ १७॥ यस्य दीर्घो समौ पीनौ भुजौ परिघसंनिभौ । मौर्वीकृतकिणौ वृत्तौ खगायुधधनुर्धरौ निष्काहन्दकृतापीडो पञ्चशीविवोरगौ तमृते पुरुषव्याघ्र नष्टसूर्यमिवाऽम्वरम् यमाश्रित्य महाबाहुं पञ्चाला कुरवस्तथा सुराणामपि यत्तानां पृतनासु न बिभ्यति ॥ २० ॥ यस्य वाहू समाश्रित्य वयं सर्वे महात्मनः । मन्यामहे जितानाजौ परान्प्राप्तां च मेदिनीम् ॥ २१ ॥ तमृते फाल्गुनं वीरं न लभे काम्यके धृतिम् । पश्यामि च दिशः सर्वास्तिमिरेणाऽऽवृता इव ॥ २२ ॥ ततोऽब्रवीत्साश्रुकण्ठो नकुलः पाण्डुनन्दनः । है रमणीक और अच्छा नहीं मालूम होता है । दिन | खग, आयुध, धनुष, विजायठ आदि से शोभित हैं, रात अर्जुन को स्मरण करके मुझे कहीं सुग्व नहीं उन पुरुषसिंह अर्जुन के वियोग में सब कुछ सूर्यहीन मिस्ता ॥११॥१६॥ आकाश के समान अन्धकारमय प्रतीत होता है पाचाल हे महागज! द्रौपदी के ये वाक्य सुनकर भीमसन | और कौरव जिनका आश्रय पाकर युद्ध में पराक्रमी ने कहा-हे द्रौपदी! मन को प्रसन्न करनेवाले तुम्हारे | दैवमेनास भी नहीं डरते और हम लोग जिनके माहु- पचन मुनकर मेरे हृदय में अमृन पान का सा आनन्द बल के सहारे युद्ध में शत्रुओं को पराम्त और पृथ्वी उमड़ रहा है । जिनकी भुजाएँ वेरन के ममान गोल को अपने हाथ में समझते है, उन महाबाहु अर्जुन के और रवी , पाँच मिस्वाले नाग के समान है, | बिना इस वन में हमें तनिक भी सुस नहीं है; सब पनुप बी टोरी के पट्टों में शामिल हैं, मोटी हैं, और 1 दिशाएँ अन्धकार से ढकी जान पड़ती है ।।१७।२२।। . 1GALALADA.७:
अध्याय ८० म हा मारत १८१३ नकुल उवाच-यस्मिन्दिव्यानि कर्माणि कथयन्ति रणाजिरे । देवा अपि युधां श्रेष्टं तमृते का रतिर्वने ॥ २३ ॥ उदीची यो दिशंगत्वा जित्वा युधि महावलान् । गन्धर्वमुख्याञ्च्छतशो हयाँल्लेभे महाद्युतिः ॥ २४ ॥ राजे तित्तिरकल्मापाञ्च्छीमतोऽनिलरंहसः प्रादाभ्रात्रे प्रियः प्रेम्णा राजसूये महाकतो ॥ २५ ॥ तमृते भीमधन्वानं भीमादवरजं बने कामये काम्यके वासं नेदानीममरोपमम् ॥ २६ ।। सहदेव उवाच-यो धनानि च कन्याश्च युधि जित्वा महारथः । आजहार पुरा राज्ञे राजसूये महाक्रतो ॥ २७॥ यः समेतान्मृधे जित्वा यादवानमितद्युतिः सुभद्रामाजहारैको वासुदेवस्य संमते ॥ २८॥ तस्य जिष्णोर्बुसीं दृष्ट्वा शून्यामिव निवेशने । हृदयं मे महाराज न शाम्यति कदाचन ॥ २९ ॥ वनादस्माद्विवासं तु रोचयेऽहमरिन्दम न हि नस्तमृते वीरं रमणीयमिदं वनम् इति श्रीमन्महाभारत आरण्यकपर्वणि तीर्थयात्रापणि अर्जुनानुशोचने अगीतितमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ इसके पीछे नकुल ने गद्गद् स्वर से कहा- | सहदव ने कहा-वे अर्जुन युद्ध में बहुत सा धन उन अर्जुन के युद्ध सम्बन्धी कामों की प्रशंसा देवता और बहुत सी कन्याएँ जीतकर राजसूय यज्ञ में लाये भी करते हैं वे योद्धाओं में सब से श्रेष्ठ हैं उन्होंने थे और बासुदेव जी की मति से सब यादवों को उत्तर दिशा में जाकर बड़े-बड़े गन्धों को रण में अकेला युद्ध में जीतकर सुभद्रा को लाये उन अर्जुन जीता और उनसे तीतर के तुल्य चिह्न, रखनेवाले | के आसन को खाली देखकर मेरा चित्त स्वस्थ नहीं के समान शीघ्रगामी सैंकड़ों घोड़े लाकर रहता है और बिना उनके यह वन भी रमणीक अपने बड़े भाई को राजसूय यज्ञ में दिये, टन नहीं लगता है। इसलिये यहां से तो और हीस्थान तेजस्वी देवसदृश अर्जुन के बिना मुझे काम्यक वन पर रहना ठीक है ॥२३॥३०॥ में रहना अच्छा नहीं लगता है । इसके उपरान्त वनपर्व का अस्सीवां अध्याय समाप्त हुआ ॥ ८ ॥ ลง और वायु NonvuANGABADBAwaaaavat [ पनपर्व Artering - - १८१४ महा मारत BALAMAMALA अथ एकाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८१ ॥ वैशम्पायन उवाच धनञ्जयोत्सुकानां तु भ्रातृणां कृष्णया सह । श्रुत्वा वाक्यानि विमना धर्मराजोऽप्यजायत ॥ १ ॥ अथाऽपश्यन्महात्मानं देवर्षि नत्र नारदम् दीप्यमानं श्रिया ब्राह्मया हुतार्चिपमिवाऽनलम् ॥ २ ॥ तमागतमभिप्रेक्ष्य भ्रातृभिः सह धर्मराट् । प्रत्युत्थाय यथान्यायं पूजां चक्रे महात्मने ॥ ३ ॥ स तैः परिवृतः श्रीमान्भ्रातृभिः कुरुसत्तमः विवभावतिदीप्तौजा देवैरिव शतक्रतुः यथा च वेदान्सावित्री याज्ञसेनी तथा पतीन् । न जही धर्मतः पार्थान्मसमर्कप्रभा यथा प्रतिगृह्य च तां पूजां नारदो भगवानृषिः आश्वासयमसुतं युक्तरूपमिवाऽनध उवाच च महात्मानं धर्मराज युधिष्ठिरम् बृहि धर्मभृतां श्रेष्ठ केनाऽर्थः किं ददानि ते ॥ अथ धर्मसुतो राजा प्रणम्य भ्रातृभिः सह । उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा नारदं देवसंमितम् इक्यामीया अध्याय ॥ ८११) वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! राजा । बैठे हुए है । और द्रौपदी ने उन अपने पतियों को गुधिष्ठिर द्रौपदी और भाइयों की बातें सुनकर अर्जुन । इस प्रकार से धर्म से त्याग नहीं किया जैसे सावित्री न होने के कारण से उदाम हुए । उसी समय वेदों को और सूर्य की प्रभा मेरु पर्वत को त्याग वहां परम तेजम्बी महात्मा और ब्रामणों की शोभा नहीं करती है । नारद जी पाण्डवों की पूजा को मअशि के महा तेज के धारण करनेवाले नारद ग्रहण करके युधिष्ठिर को धैर्य देन रंगे और बोले- जी आन पहुँने उन्हें देखकर राजा युधिष्ठिर गाइयों । हे धर्मधारियों में श्रेस युधिष्ठिर ! कहो, तुम्हारा क्या महित उठार गहे हो गये और बड़े आदर में उन्हें प्रयोजन ई और मैं तुम्हें क्या हूँ॥१७॥ घटाकर उनका विधिपूर्वक पूजन किया। उस समय यह सुनकर युधिष्ठिर ने भाइयों सहित नारद १ युधिष्ठिर अपने भाइयों के चीन में बैठे हुए एसे जी को प्रणाम किया और कहा-हे महाभाग ! आप सोमायमान दीबन मानी देयताओं मदित इन्द्र मय रोकों में पूजित है। आपके प्रसन्न ही होने RUGAJJALA MURU .-.00 अध्याय ८१] म हा भारत १८१५ .2MOMChinade त्वयि तुष्टे महाभाग सर्वलोकाभिपूजिते कृतमित्येव मन्येऽहं प्रसादात्तव सुत्रत यदि त्वहमनुग्राह्यो भ्रातृभिः सहितोऽनघ । संदेहं मे मुनिश्रेष्ट तत्वतश्छेत्तुमर्हसि ॥ १० ॥ प्रदक्षिणां यः कुरुते पृथिवीं तीर्थतत्परः किं फलं तस्य कास्न्येन तद्भवान्वक्त मर्हति ॥ ११ ॥ नारद उबान-शृणु राजन्नवहिनो यथा भीष्मेण धीमता पुलस्त्यस्य सकाशाढे सर्वमेतदुपश्रुतम् पुरा भागीरथीतीरे भीष्मो धर्मभृतां वरः पित्र्यं ब्रतं समास्थाय न्यबसन्मुनिभिः सह ॥ १३ ॥ शुभे देशे तथा राजन् पुण्ये देवर्षिसेविते गङ्गाद्वारे महाभाग देवगन्धर्वसेविते ॥ १४ ॥ स पितृस्तर्पयामास देवांश्च परमद्युतिः ऋपींच तर्पयामास विधिदृष्टन कर्मणा कस्यचित्त्वथकालस्य जपन्नेव महायशाः ददर्शाऽद्भुतसंकाशं पुलस्त्यमृषिसनमम् I! १६ ॥ स तं दृष्ट्वोग्रतपसं दीप्यमानमिव श्रिया प्रहर्पमतुलं लेभे विस्मयं परमं ययौ ॥ १७ ॥ मे मैं ममझता हूँ कि मेरे मव कार्य सिद्ध हो गये । पहले ममय में एक समय मीम जी ने पित- पन्तु जो आप मुझपर और मेरे भाइयों पर अनुग्रह सम्बन्धीव्रतधारण करके मुनि लोगों के साथ गंगातट करना चाहते हैं तो मेग यह मन्देह विधिपूर्वक दूर पर कुछ काल वाम किया था और दृरिद्वार में रहकर कीजिए । मैं आपके मुख में यह बात मम्पूर्णता के जहां देवऋपि, देवना और गन्धर्व वाम करने हैं माथ सुनना चाहता हूँ कि तीर्थयात्रा करते हुए पृथ्वी उसने अनेक वेदोक्त कमों को करके पितृ देवता और की परिक्रमा करने से क्या फल मिलता है ? यह ऋपियों को तृप्त किया था। कुछ ममय के पीछे मुनकर नारद जी ने कहा-हे महागज! पुग्म्त्य जी जप कर रहे थे कि उन्होंने वहां ने यही क्या भीष्म जी मे कही थी मैं भी उमको ऋपियों में टचन, बड़े तेजम्बी, तपम्बी और ब्रह्मरूपी तुम्हें सुनाता हूँ तुम मन लगाकर.मुनो ॥८॥१२॥ लक्ष्मी मे प्रकाशमान पुनम्त्य जी महागज को आने AIMIMisruwwwwrenesentGUARANAusive - Nar. एक दिन भीम ALL महा मारत [ वनपर्व - उपस्थितं महाभागं पूजयामास भारत भीष्मो धर्मभृतां श्रेष्ठो विधिदृष्टेन कर्मणा शिरसा चाऽय॑मादाय शुचिः प्रयतमानसः । नाम संकीर्तयामास तस्मिन्ब्रह्मर्पिसत्तमे भीष्मोऽहमस्मि भद्रं ते दासोऽस्मि तव सुत्रत । तव संदर्शनादेव मुक्तोऽहं सर्वकिल्विषैः एवमुक्त्वा महाराज भीप्मो धर्मभृतां वरः । वाग्यतः प्राञ्जलिर्भूत्वा तूष्णीमासीद्युधिष्ठिर ॥ २१ ॥ तं नियमेनाऽथ स्वाध्यायाम्नायकर्शितम् । भीष्म कुरुकुलश्रेष्ठ मुनिः प्रीतमनाऽभवत् ॥ २२ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि पार्थनारदसंवादे एकाशीतितमोऽध्यायः ।। ८१ ॥ हुए देखा । भीष्म जी उन्हें देखकर आश्चर्य करके हाथ जोड़े हुए चुपचाप उनके सन्मुख बैठ गये और बहुत प्रसन्न हुए और वदोक्त रीति से उनकी पूजा पुलस्त्य जी उस कुरुकुल में श्रेष्ठ भीम को धर्म और कर शिर से अर्घ्य देकर कहने लगे-हे महाराज! मैं नियम के साथ वेदपाठ करते हुए देखकर बड़े आपका दास भीष्म हूँ। आपका आज दर्शन पाकर प्रसन्न हुए ॥१३॥२२॥ मैं सब पापों से छूट गया । यह कहकर भीष्म जी । वनपर्व का इक्यासीवां अध्याय समाप्त हुआ ॥ ८१॥ PRAYOGeeMBANGra अय द्विशीतितमोऽध्याय ।। ८२॥ पुलत्य उवाच-अनेन तव धर्मज्ञ प्रश्रयेण दमेन च सत्येन च महाभाग तुष्टोऽस्मि तव सुव्रत ॥ १ ॥ यस्येदृशस्ते धर्मोऽयं पितृभक्त्याऽऽश्रितोऽनघ । तेन पश्यसि मां पुत्र प्रीतिश्च परमा स्वयि अमोघदर्शी भीष्माऽहं ब्रूहि किं करवाणि ते ययामीवां अध्याय ॥ ८२॥ पुरम्य ने कहा- भीम ! मैं तुम्हारे सत्य, के धर्म का अनुष्ठान कर रहे हो, इसी से मैं तुमपर दम और विनय आदि सद्गुणों को देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ और तुमको मेरे दर्शन हुए। हे निप्पाप । संतुष्ट हुआ । तुम पितृभक्ति के कारण इस प्रकार मेरा दर्शन कमी निष्फल नहीं होता है। तुम्हारा N000mAWNLANNARNAGAP अध्याय ८२] म हा मारत १८१७ veerent यद्वक्ष्यसि कुरुश्रेष्ट तस्य दाताऽस्मि तेऽनघ ॥ ३ ॥ भीष्म उवाच-पीते त्वयि महाभाग सर्वलोकाभिपूजिते कृतमेतावता मन्ये यदहं दृष्टवान्प्रभुम् यदि वहमनुग्राह्यस्तव धर्मभृतां वर संदेहं ते प्रवक्ष्यामि तन्मे त्वं वक्तुमर्हसि ॥ ५ ॥ अस्ति मे हृदये कश्चित्तीर्थेभ्यो धर्मसंशयः तमहं श्रोतुमिच्छामि तद्भवान्वक्तुमर्हति प्रदक्षिणां यः पृथिवी करोत्यमरसंनिभ किं फलं तस्य विप्रर्षे तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥ ७ ॥ पुनम्त्य उवाच-हन्त ते कथयिष्यामि यदृषीणां परायणम् तदेकाग्रमना पुत्र शृणु तीर्थेषु यत्फलम् ॥ यस्य हस्तौ च पादौ च मनश्चैव सुसंयतम् । विद्या तपश्च कीर्तिश्च स तीर्थफलमउनुते प्रतिग्रहादपावृत्तः संतुष्टो येनकेनचित् अहंकारनिवृत्तश्च स तीर्थफलमग्नुते ॥ १० ॥ अकल्कको निरारम्भो लम्बाहारो जितेंद्रियः । विमुक्तः सर्वपापेभ्यः म तीर्थफलमश्नुते मैं क्या प्रिय कहे भीम । तुम जो कहोगे मैं । पुलम्त्य ने प्रसन्न होकर कहा-हे पुत्र रही तुमको दूगः ॥१॥३॥ मपियों की परमगति म्वरूप तीर्थयात्रा का फल यह सुनकर भीष्म ने कहा हे महाराज ! आपका | करता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो। जिम पुरुष के मुझपर प्रसन्न होना और दर्शन दना ही मर कुछ हाथ पाव, मन, विद्या, तप और कीर्ति सुमयत है है। मैं अपन सब कामों को केवल आपके दर्शनों ही वहीं तीर्थयात्रा का फल पाता है। जो पुरुष दान से सिद्ध मानता हूँ। पर तु ना आपको मुझपर आर नहीं लेता और सदा स तुष्ट रहकर अहङ्कार को भी अनुग्रह करना है तो कृपा करके मुझे यह निश्चय अपने पास नहीं आने दता वही तीर्थयात्रा का फल करक मुनाइए कि पृथ्वी की परिक्रमा करन म मनुष्य पाता है। जो पुस्य दम्भ आदि से बचा रहता है, को क्या फल प्राप्त होता है। मुझे तीर्थों के विषय अधिक उद्योग नहीं करता, थोड़ा आहार करता है, में धर्म समय हो रहा है आप उसको दूर कानिए निद्रिय होकर सर पातकों स बचा रहत है, आप देवताओं के तुल्य और ब्रह्ममपि हैं ॥४७॥ श्रीधरहिन है, सत्यवादी और दृढप्रतिज्ञ होकर सत्र MAKvareABUMMecurem -- 2 1 -- ALWARAN १८१८ म हा भारत [ वनपर्व .. Ne८ AkÁtarinnatas*vavaa अक्रोधनश्च राजेन्द्र सत्यशीलो दृढव्रतः आत्मोपमश्च भूतेषु स तीर्थफलमश्नुते ऋपिभिः ऋतवः प्रोक्ता देवेष्विह यथाक्रमम् । फलं चैव यथातथ्यं प्रेत्य चेह च सर्वशः ॥ १३ ॥ न ते शक्या दरिद्रेण यज्ञाः प्राप्तुं महीपते । बहूपकरणा यज्ञा नानासंभारविस्तराः प्राप्यन्ते पार्थिवैरेतैः समृद्धर्वा नरैः क्वचित् । नाऽर्थन्यूनर्नाऽवगणैरेकात्मभिरसाधनैः यो दरिद्रैरपि विधिः शक्यः प्राप्तुं नरेश्वर तुल्यो यज्ञफलैः पुण्यैस्तं निवोध युधां वर ॥ १६ ॥ ऋषीणां परमं गुह्यमिदं भरतसत्तम तीर्थाभिगमनं पुण्यं यज्ञरपि विशिष्यते ॥ १७॥ अनुपोप्य त्रिरात्राणि तीर्थान्यनभिगम्य च अदत्त्वा काञ्चनं गाश्च दरिद्रो नाम जायते ॥ १८ ॥ अग्निष्टोमादिभिर्यज्ञैरिष्ट्वा विपुलदक्षिणैः न तत्फलमवाप्नोति तीर्थाभिगमनेन यत् नृलोके देवदेवस्य तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् । पुष्करं नाम विख्यातं महाभागः समाविशेत् ॥ २० ॥ ८entence प्राणियों से वैसा ही व्यवहार करता है जैसा कि वह है भरतश्रेष्ठ ! दरिद्र पुरुष भी जिसको करके यज्ञों अपने साथ औरों से चाहता है, यह तीर्थयात्रा का। का पवित्र फल पा सकते हैं वह ऋपियों की परमगुप्त पार पा सस्ता है ।।८।१२॥ तीर्थयात्रा यज्ञों से भी बढ़कर मानी गई है। मै तुमसे द युधिष्ठिर ! देवताओं को प्रसन्न करने के उसी तीर्थयात्रा का वर्णन करता हूँ। सुनो। तीन दिन लिय अपियों ने यज्ञों का वर्णन किया है। किन्तु उपयाम न करके, तीर्थयात्रा न करके, ब्राह्मणों को यी कलिये बहुत सी साममा भार धन की आव- । मुवर्ण और गाय आदि न देकर मनुष्य दरिद्र होता श्याना होनी है। इस कारण निराश्रय, निर्धन या है। तीर्थयात्रा करने से जो फल मिलता है यह फल असहाय दरिद्र पुरुष टनको नहीं कर पाते। हां, राजा । यही पड़ी दक्षिणायाले अमिष्टोम आदि यजों के करने शेग और धनी पुरुष ही यज्ञों को कर सकने हैं। से भी नहीं प्राप्त होना । हे कुरुश्रेष्ठ! मनुष्यलोक में - अध्याय ८२] म हा भारत १८१९ ~RAalan .. ABPMAnwarWAR दशकोटिसहस्राणि तीर्थानां वै महामते सांनिध्यं पुष्करे येषां त्रिसन्ध्यं कुरुनन्दन ॥ २१ ॥ आदित्या वसवो रुद्राः साध्याश्च समरुद्गणाः गन्धर्वाप्सरसश्चैव नित्यं संनिहता विभो ॥ २२ ॥ यत्र देवास्तपस्तप्त्वा दैत्या ब्रह्मर्पयस्तथा । दिव्ययोगा महाराज पुण्येन महताऽन्विताः ॥ २३ ॥ मनसाऽप्यभिकामस्य पुष्कराणि मनस्विनः । पूयन्ते सर्वपापानि नाकपृष्ठे च पूज्यते ॥ २४ ॥ तस्मिस्तीर्थे महाराज नित्यमेव पितामहः उवास परमप्रीतो भगवान्कमलासनः ॥ २५ ॥ पुष्करेषु महाभाग देवाः सर्पिगणाः पुरा सिद्धिं समभिसंप्राप्ताः पूण्येन महताऽन्विताः ॥ २६ ॥ तत्राऽभिषेकं यः कुर्यात्पितृदेवार्चने रतः अश्वमेधाद्दशगुणं फलं प्राहुर्मनीषिणः ॥ २७॥ अप्येक भोजयेद्विप्रं पुष्करारण्यमाश्रितः तेनाऽसौ कर्मणा भीष्म प्रेत्य चेह च मोदते ॥ २८ ॥ शाकैर्मुलैः फलैर्वापि येन वर्तयते स्वयम् । त्रिलोक प्रसिद्ध पुष्कर नाम कार्थि हे ॥१३॥२०॥ चित्त से इस तीर्थ में निवास करते है । हे महाभाग वहा दस करोड़ तीर्थ सदा निवास करते हैं। पूर्व समय में ऋपि और देवता इसी पुष्कर तीर्थ में परम चाम्हों सूर्य, आठों वसु, ग्यारहों स्द्र, साध्यगण, सिद्धि और पुण्य प्राप्त कर चुके हैं । बुद्धिमानों का मरुद्गण, अप्सग, गन्धर्व आदि वहा नित्य बने कहना है कि इस तीर्थ में स्नान करने से दस अश्वमेध रहते है । देवता, दैत्य और ब्रह्मपि उसी पुष्कर तीर्थ करने का पुण्य मिलता है । जो कोई पुष्कर तीर्थ में में तप करके दिव्य योगसिद्धि और पुण्य जाकर एक ब्राह्मण का भी भोजन करा सकता है वह हुए हैं । भाग्यशारी पुरुष को पहले उमी तीर्थ में इस लोक और परलोक में परम सुख पाता है । हे जाना चाहिये । मनम्बी व्यक्ति मन में पुष्कर तीर्थ | कौरव । वहा रहकर जो कोई साग, फल, मूल आदि को जाने की इच्छा करने से भी सब पापों से छुटकारा आप खाता है और उन्हीं से श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणों को पा जाता है। वह स्वर्गलोक में पूजित और आनदित तृप्त करता है उसे भी अश्वमेध का फल मिलता है। होता है। हे राजा युधिष्ठिर पितामह ब्रह्मा सदा प्रसन्न नाह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र, जो कोई पुष्कर तीर्थ MINNAMAVASABANNAVAMAmentBA७४ - - को प्राप्त - १८२० [ वनपर्व महाभारत eMe - Eenechananeaamerekeepenenene तद्वै दद्याद्ब्राह्मणाय श्रद्धावाननसूयकः ॥ २९ ॥ तेनैव प्राप्नुयात्प्राज्ञो हयमेधफलं नरः ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा वा राजसत्तम ।। ३० ।। नवे योनौ प्रजायन्ते सातास्तीर्थे महात्मनः । कार्तिकी तु विशेषेण योऽभिगच्छति पुष्करम् ॥ ३१ ॥ प्राप्नुयात्स नरो लोकान्ब्रह्मणः सदनेऽक्षयान् । सायंप्रातः स्मरेद्यस्तु पुष्कराणि कृताञ्जलिः ।। ३२ ॥ उपस्पृष्टं भवेत्तेन सर्वतीर्थेषु भारत जन्मप्रभृति यत्पापं स्त्रिया वा पुरुषेण वा ॥ ३३ ॥ पुष्करे स्नातमात्रस्य सर्वमव प्रणश्यति यथा सुराणां सर्वेषामादिस्तु मधुसूदनः ॥ ३४ ॥ तथैव पुष्करं राजस्तीर्थानामादिरुच्यते उष्ट्वा द्वादश वर्षाणि पुष्करे नियतः शुचिः ॥३५ ।। ऋतून्सर्वानवाप्नोति ब्रह्मलोकं स गच्छति । यस्तु वर्षशतं पूर्णमग्निहोत्रमुपासते ।। ३६ ॥ कार्तिकी वा वसेदेकां पुष्कर सममेव तत् । त्रीणि शृङ्गाणि शुभ्राणि त्रीणि प्रस्त्रवणानि च ॥ ३७ ।। पुष्कराण्यादिसिद्धानि न विद्मस्तत्र कारणम् । में स्नान करता है उस फिर जन्म-मरण का कष्ट नहीं जैसे सब देवताओं में श्रेष्ठ है वे ही पुष्कर भी सब भोगना पड़ता ॥२१॥३०॥ तीर्थों में श्रेष्ठ और सवतीर्थों का आदि है । जो कोई विशेषकर जो कोई कार्तिकी की पूर्णिमा को सदा पवित्र रहकर बारह वर्ष तक पुष्कर तीर्थ में रहता पुष्कर तीर्थ में स्नान करता है उसे अक्षय ब्रह्मक है यह ब्रह्मलोक पाता है और सब यज्ञों के फल का मिलनादादे पुरुषश्रेष्ठ ! जो कोई हाथ जोड़कर अधिकारी होता है । जो पुरुष पूरे सौ वर्ष तक अग्नि- नाम मय पुष्कर तीर्थ का ध्यान करता है उसे सब होत्र करता है और जो पुरुष कार्तिक पूर्णिमा के नायों में स्नान करने का फल मिलता है । बी हो दिन पुष्कर तीर्थ में रहता है, उन दोनों को एक या पुरुष, पुरकर सीध गं ग्नान करने से ही, जन्ममर वावर फल मिलता है । पुष्कर क्षेत्र में तीन पर्वत के पार्शमे छुटकारा पा जाता है हि भास्न ! नागयण शिम्बर, तीन झरने और तीन पुष्कर (कमल) है। WALAMUAVARAJSAMANAVASANPRANAMANNOUNew - अध्याय ८२] म हा भारत १८२१ maneemumtirvance.७८reen दुष्करं पुष्करे गन्तुं दुष्करं पुष्करे तपः दुष्करं पुष्करे दानं वस्तुं चैव सुदुष्करम् । उष्य द्वादशरात्रं तु नियतो नियताशनः ॥ ३९ ॥ प्रदक्षिणमुपावृत्य जम्बूमार्ग समाविशेत् जम्बूमार्ग समाविष्य देवर्पिपितृसेवितम् अश्वमेधमवाप्नोति सर्वकामसमन्वितः तत्रोप्य रजनीः पञ्च पूतात्मा जायते नरः ॥४१॥ न दुर्गतिमवाप्नोति सिद्धि प्राप्नोति चोत्तमाम् । जम्बूमार्गादुपावृत्य गच्छेत्तन्दुलिकाश्रमम् ॥ ४२ ॥ न दुर्गतिमवाप्नोति ब्रह्मलोकं च गच्छति आगस्त्यं सर आसाद्य पितृदेवार्चने रतः ॥४३॥ त्रिरात्रोपोपितो राजन्नग्निष्टोमफलं लभेत् शाकवृत्तिः फलैर्वापि कौमारं विन्दते परम् ॥ ४४ ॥ कण्वाश्रमं ततो गच्छेच्छ्रीजुष्टं लोकपूजितम् । धर्मारण्यं हि तत्पुण्यमाद्यं च भरतर्षभ ॥४५॥ यत्र प्रविष्टमात्रो वै सर्वपापैः प्रमुच्यते अर्चयित्वा पितृन्देवान्नियतो नियताशनः वे वहुत ही प्राचीन और सृष्टि के आदि से देख हृदय शुद्ध और आत्मा पवित्र हो जाता है। वह सब पड़ते हैं। उनकी उत्पत्ति के कारण को हम लोग | दुर्गतियों से छुटकारा पाकर परमसिद्धि पा जाता है। नहीं जानते । पुष्कर तीर्थ में जाना, वहाँ तप करना, वहां से तन्दुलिकाश्रम में जाना चाहिये । वहा जाने दान करना और रहना भी दुप्कर है। संयमपूर्वक | से सब दु ख दूर होते हैं और ब्रह्मलोक प्राप्त होता उपवास करके पुष्कर तीर्थ में बारह दिन रहना चाहिये है । हे महाराज ! जो कोई पितगें और देवताओं ॥३१॥४०॥ की सेवा करता हुआ वहां से अगस्त्य मरोवर में जाता उमकी प्रदक्षिणा करके फिर जग्बूमार्ग नाम के | है और वहां तीन दिन तक उपवास करता है उसे तीर्थ में जाना चाहिये । देवर्षियों और पितरों द्वारा अग्निष्टोम यज्ञ का फल प्राप्त होता है । वहां जो कोई सेवित जम्बूमार्ग तीर्थ में जाने से मनुष्य की सब केवल साग और फल खाकर रहता है उसे कौमार इच्छाएं पूर्ण होती हैं और उसे अश्वमेघ यज्ञ का फल पद प्राप्त होता है वहां मे लोकपूजित और रमणीय मिलता है। जो पुरुष वहां पांच दिन रहता कण्व ऋषि के आश्रम में जाना चाहिये । वह आदि NASPICALMAGMAITRINAIA - - उसका LAL NAALI १८२२ महाभारत [ वनपर्व veers ..- eHimsenseenenewer सर्वकामसमृद्धस्य यज्ञस्य फलमश्नुते प्रदक्षिणं ततः कृत्वा ययातिपतनं व्रजेत् ४७॥ हयमेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति तत्र वै । महाकालं ततो गच्छेन्नियतो नियताशनः ॥४८॥ कोटितीर्थमुपस्पृश्य हयमेधफलं लभेत् ततो गच्छेत धर्मज्ञः स्थाणोस्तीर्थमुमापतेः ॥ १९ ॥ नाम्ना भद्रवटं नाम त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । तत्राऽभिगम्य चेशानं गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ५० ॥ महादेवप्रसादाच गाणपत्यं च विन्दति समृद्धमसपत्नं च श्रिया युक्तं नरोत्तमः ॥ ५१॥ नर्मदां स समासाद्य नदी त्रैलोक्यविश्रुताम् । तर्पयित्वा पितृन्देवानग्निष्टोमफलं लभेत् ॥ ५२ ॥ दक्षिणं सिन्धुमासाद्य ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः । अग्निष्टोममवाप्नोति विमानं चाऽधिरोहति । ५३ ।। चर्मण्वती समासाद्य नियतो नियताशनः । रन्तिदेवाभ्यनुज्ञातमग्निष्टोमफलं लभेत् ॥ ५४ ।। ततो गच्छेत धर्मज्ञ हिमवत्सुतमवुदम् और पवित्र धर्म वन है। हे भरतश्रेष्ठ ! कण्व ऋषि के भद्रपट नाम के त्रिलोकप्रसिद्ध तीर्थ में जाना चाहिये आयम में पहुँचते ही सब पाप नष्ट हो जाते हैं । ॥४१॥५०॥ वहां संयम के साथ थोड़ा आहार करके पितरों और उस तीर्थ के दर्शन करने से सहल-गोदान का देवताओं की पूजा करने से सब इच्छाएँ पूरी होती फल मिलता है। शिव की कृपा से यात्री परम है, और यज्ञ करने का फल प्राप्त होता है । क्य समृद्धियुक्त गणपति के पद को पाता है। वहां से आश्रम की प्रदक्षिणा करक ययातिपतन नाम के साथ नर्मदा नदी को जाना चाहिये। त्रिलोकप्रसिद्ध नर्मदा में जाने से अश्वमेध यज्ञ के करने का फल होता है। नदी में देवताओं और पितरों का तर्पण करने से वहां से महाकाल तीर्थ में जाना चाहिये। यहां संयम ! अमिष्टोम यज्ञ का फल मिरता है। वहां से दक्षिण- २ बार थोडे आदार के साथ रहकर कोटि तीर्थ में जाना । सागर में जाकर ब्रह्मचारी और जितेन्द्रिय रहने से पाहिये । यहां स्नान करने से अश्वमेध यज्ञ का फल मनुष्य को अग्निष्टोम यज्ञ का फल मिलता है। , प्रमोना है। धर्मज पुरणको वहां से महादेव के अन्त वो यह मनुष्य विमान पर चढ़कर स्वर्ग को ULLLLPGuruPANAGE । . CPUTIL अध्याय ८२] महा मारत १८२३ ANAS veernancerner पृथिव्यां यत्र वै छिद्रं पूर्वमासीयुधिष्ठिर ॥ ५५॥ तत्राऽऽश्रमो वसिष्ठस्य त्रिषु लोकेषु विश्रुतः । तत्रोग्य रजनीमेकां गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ५६॥ पिङ्गतीर्थमुपस्पृश्य ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः कपिलानां नरश्रेष्ट शतस्य फलमश्नुते ॥ ५७॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र प्रभासं तीर्थमुत्तमम् । तत्र संनिहितो नित्यं स्वयमेव हुताशनः देवतानां मुखं वीर ज्वलनोऽनिलसारथिः । तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा शुचिः प्रयतमानसः ॥ ५९ ॥ अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलं प्राप्नोति मानवः । ततो गत्वा सरस्वत्याः सागरस्य च संगमे ॥ ६० ॥ गोसहस्रफलं तस्य स्वर्गलोकं च विन्दति । प्रभया दीप्यते नित्यमग्निवद्भरतर्षभ तीर्थ सलिलराजस्य स्नात्वा प्रयतमानसः त्रिरात्रमुपितः स्नातस्तर्पयेपितृदेवताः ॥ ६२॥ प्रभासते यथा सोमः सोऽश्वमेधं च विन्दति । वरदानं ततो गच्छत्तीर्थ भरतसत्तम ॥ ६३ ॥ जाता है । वहां से चर्मण्वती नदी में जाकर स्नान वहां मे रमणीय प्रभास तीर्थ में जाना चाहिये। वहां करना चाहिये । राजा रन्तिदेव के इस तीर्थ में नियम- देवताओं का मुख जो अग्नि है वह स्वयं उपस्थित पूर्वक टपवास करने से अग्निष्टोम यज्ञ का फल प्राप्त | है। इस तीर्थ में पवित्रतापूर्वक म्नान करने से अग्नि- होता है। वहां से चलकर हिमवान् पर्वत से निकले टोम और अतिरात्र यज्ञ का फल होता है । वहां हुए अर्बुद तीर्थ में जाना चाहिये । हे राजन् ! पहले से सरम्बती और सागर के सङ्गम में जाना चाहिये। यहां पर पृथ्वी का छिद था । अर्बुद तीर्थ के पास ॥५१॥६॥ ही त्रिलोक विख्यात वशिष्ठ ऋपि का आश्रम है । वहां जाने से मनुष्य को सहस्र गोदान का फल वहां एक रात्रि रहने से सहस गोदान का फल होता मिलता है। वहां म्नान करनेवाला मनुष्य कान्ति- है । हे नरश्रेष्ठ | फिर पिङ्ग तीर्थ में जाना चाहिये। माली होकर स्वर्गलोक को जाता है। वहां जो कोई जितेन्द्रिय और ब्रह्मचारी होकर वहां स्नान करने से । पवित्र हृदय से तीन दिन रहकर देवताओं और पितरों सौ कपिला गायें देने का फल होता है । हे राजेन्द्र! का तर्पण करता है उसे सूर्य के समान तेज और WWWornerencreenerenchen १८२४ म हा मारत [ वनपर्व - विष्णोर्दुर्वाससा यत्र वरो दत्तो युधिष्ठिर । वरदाने नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ६४ ॥ ततो द्वारवती गच्छेन्नियतो नियताशनः पिण्डारके नरः स्नात्वा लभेद्वहुसुवर्णकम् ॥ ६५ ॥ तम्मिस्तीर्थे महाभाग पद्मलक्षणलक्षिताः अद्यापि मुद्रा दृश्यन्ते तदद्भुतमरिन्दम त्रिशूलाङ्कानि पद्मानि दृश्यन्ते कुरुनन्दन । महादेवस्य सान्निध्यं तत्र वै पुरुषर्षभ सागरस्य च सिन्धोश्च संगमं प्राप्य भारत । तीर्थे सलिलराजस्य स्नात्वा प्रयतमानसः तर्पयित्वा पितृन्देवानृपींश्च भरतर्षभ प्राप्नोति वारुण लोकं दीप्यमानं स्वतेजसा ॥ ६९ ।। शंकुकर्णेश्वरं देवमर्चयित्वा युधिष्ठिर अश्वमेधाद्दशगुणं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ७० ॥ प्रदक्षिणमुपावृत्य गच्छेत भरतर्षभ तीर्थ कुरुवरश्रेष्ठ त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ ७१ ॥ दमीति नाम्ना विख्यातं सर्व पापप्रणाशनम् । चन्द्रमा के समान कान्ति प्राप्त होती है और अश्वमेध में जाकर पवित्र हृदय से सलिलराज तीर्थ में स्नान यज्ञ का फल मिरता है। हे भरतश्रेष्ठ । वहा से उस और देव, कपि, पितृगण का तर्पण करने से मनुष्य वरदान तीर्थ में जाना चाहिये जहा दुर्वासा ने विष्णु अपनी प्रभा से प्रकाशित बरुण रोक को प्राप्त होता को घर दिया था। वरदान तीर्थ में स्नान करने स है। हे युधिष्ठिर ! बुद्धिमानों का कहना है कि वहा पर महस गोदान का फर होता है । वहा मे सयम के | स्थित शड्बुकणेश्वर महादेव की पूजा करने से मनुष्य साथ उपयामपूर्वक द्वारका तीर्थ में जाना चाहिये। को दम अश्वमेध यज्ञों का फल होता है ॥६११७०॥ पिण्डारक तार्थ म म्नान करने से बहुत सुवर्ण मिनता सरिराज तीर्थ की प्रदक्षिणा करके सब पापों । महाभाग ! यह बड़े आचर्य की यातह का नए करने वाले निरोकपसिद्ध दगी नाम के तीर्थ पहा अचनक पद्म-चिद से युक्त मुदाएँ और में जाना नाहिये । वटा ब्रह्मा आदि देवता महेश्वर विशूनविद से युन पद्म दम पड़ते हैं। यहा मदा की उपामना किया करते हैं। यहा पर द (ग) मीका महादेय रहन 1 मिन्धु नद और मागर के महम ऐमा पेह है निमकी स्तुति सम देवता करते हैं। CRAYAraNameer M अध्याय ८२] म हा मारत १८२५ v८.८० - PAWANAPAAUSA तत्र ब्रह्मादयो देवा उपासन्ते महेश्वरम् तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च रुद्रं देवगणैर्वृतम् । जन्मप्रभृति यत्पापं तत्यापं तत्स्नातस्य प्रणश्यति ॥ ७३ ॥ दमी चाऽत्र नरश्रेष्ठ सर्वदेवैरभिष्टुतः तत्र स्नात्वा नव्याघ्र हयमेधमवाप्नुयात् ॥ ७४ ॥ गत्वा तत्र महाप्राज विष्णुना प्रभविष्णुना । पुरा शौचं कृतं राजन् हत्वा दैतेयदानवान् ॥ ७५ ॥ ततो गच्छेत धर्मज्ञ वसोर्धारामभित्रुताम् गमनादेव तस्यां हि हयमेधफलं लभेत् ॥ ७६ ।। स्नात्वा कुरुवरश्रेष्ठ प्रयतात्मा समाहितः तर्प्य देवान्पितॄश्चैव विष्णुलोके महीयते ॥ ७७॥ तीर्थे चाऽत्र सरः पुण्यं वसूनां भरतर्षभ । तत्र स्नात्वा च पीत्वा च वसूनां समतो भवेत् ॥ ७८ ॥ सिन्धूत्तममिति ख्यातं सर्वपापप्रणाशनम् तत्र स्नात्वा नरश्रेष्ठ लभेद्वहुसुवर्णकम् ॥ ७९ ॥ भद्रतुङ्गं समासाद्य शुचिः शीलसमन्वितः । ब्रह्मलोकमवाप्नोति गतिं च परमां व्रजेत् कुमारिकाणां शक्रस्य तीर्थं सिद्धनिषेवितम् । तत्र स्नात्वा नरः क्षिप्रं स्वर्गलोकमवाप्नुयात् ॥ ८१ ॥ पहले किसी समय दैत्यों और दानवों को मारकर पितरों का तर्पण करता है उसको विष्णुलोक मिलता भगवान् विष्णु ने इसी तीर्थ में शुद्ध होने के लिये है। इसी स्थान पर वसुओं का बड़ा पवित्र सरोवर स्नान किया था। इस स्थान में स्नान और देवगण- है उसमें म्नान करने से वसु देवता प्रसन्न होते हैं और युक्त रुद्र की पूजा करने से जन्म भर के पाप दूर । सिन्धूत्तम नाम एक बड़ा उत्तम तीर्थ भी वहीं है उसमें हो जाते हैं और अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। स्नान करने से मनुष्य को बहुत सा सुवर्ण मिलता है। इसके पीछे वसुधा तीर्थ में पहुंचे जहा जाने ही से ! इसके उपरात मनुष्य शीलता और पवित्रता से भद्रतुङ्ग 2 मनुष्य को अश्वमेध यज्ञ करने का फल मिलता है। नाम तीर्थ में जाकर स्नान कर वहा जाने से मनुष्य इस तीर्थ में जो मनुष्य जितेन्द्रिय होकर देवता और | को ब्रह्मलोक और परमगति प्राप्त होती है ।।७११८०॥ AINMAAVAMANNAIAIAANABARAMAT CALLAGAVAN । वनपर्व १८२६ महा भारत ८८ ४. behan रेणुकायाश्च तत्रैव तीर्थ सिद्धनिषेवितम् तत्र स्नात्वा भवेद्विप्रो निर्मलश्चन्द्रमा यथा ॥ ८२ ॥ अथ पश्चनदं गला नियतो नियताशनः पञ्च यज्ञानवाप्नोति क्रमशो येऽनुकीर्तिताः ॥ ८३ ॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र भीमायाः स्थानमुत्तमम् । तत्र स्नात्वा तु योन्यां वै नरो भरतसत्तम ॥८४ ॥ देव्याः पुत्रो भवेद्राजस्तप्तकुण्डलविग्रहः गवां शतसहस्रस्य फलं प्राप्नोति मानवः श्रीकुण्डं तु समासाद्य त्रिषु लोकेपु विश्रुतम् । पितामहं नमस्कृत्य गोसहस्रफलं लभेत् ॥८६॥ ततो गच्छेत धर्मज्ञ विमलं तीर्थमुत्तमम् । अद्यापि यत्र दृश्यन्ते मत्स्याः सौवर्णराजताः ॥ ८७॥ तत्र स्नात्वा नरः क्षिप्रं वासवं लोकमाप्नुयात् । सर्वपापविशुद्धात्मा गच्छेत परमां गतिम् ॥ ८८ ॥ वितस्तां च समासाद्य संतl पितृदेवताः । नरः फलमवाप्नोति वाजपेयस्य भारत काश्मीरोवेव नागस्य भवनं तक्षकस्य च और उसी के निकट इन्द्र की कुमारिकाओं का मनुप्य देवी का पुत्र होता है और उसको एक लाख तीर्थ है जहा सिद्ध रोग रहते हैं, वहा स्नान करने मे गोदान करन का फल प्राप्त होता है । यहा से श्रीकुण्ड मनुष्य कोयलोक प्राप्त होता है । फिर इस तीर्थ में जाकर स्नान करे जो तीनों लोकों में विख्यात है। के पाम है। रेणुका तीर्थ है वहा भी सिद्ध रोग रहते इस तीर्थ में ब्रह्मा जी की पूजा करने से मनुप्य हैं उस तीर्थ में जो प्राण स्नान करता है उसकी मास गोदान करने का फल मिलता है । इसके आगे कान्ति चन्द्रमा की सी हो जाती है। इसके आगे विमल नामी तीर्थ है जिसमें अबतक सुनहली और पचनद नाम तीर्थ है जो सावधान और नियत भोजन रूपहरी मछरिया दीखती है इस तीर्थ में जाकर स्नान ६ रनवार। मनुष्य उम नार्थ की यात्रा करता है उसको करने से मनुष्य को इन्द्रसरोक मिलता है और सम पाया जाने का फल प्राप्त होता है। वहा मे फिर | पापा म घरकर परमगति पाता है । वहा से वितस्ता भीमादेवी के स्थान की या करे जहा पर एक नार्थ में जाकर देव, पितृ का तर्पण करे। ऐसा करने योनि,निमम यातन से तप्तकुण्डल पाकर से मनुष्य को बाजपेय यज्ञ करने का फल मिलता है। ALANAVPROUNDAGIANE अध्याय ८२] म हा मारत १८२७ स 2.vnerwor heWANCIALI वितस्ताख्यमिति ख्यातं सर्वपापप्रमोचनम् ॥१०॥ तत्र स्नात्वा नरो नूनं वाजपेयमवाप्नुयात् सर्वपापविशुद्धात्मा गच्छेच्च परमां गतिम् ॥ ९१ ॥ ततो गच्छेत वडवां त्रिषु लोकेपु विश्रुताम् । पश्चिमायां तु सन्ध्यायामुपस्पृश्य यथाविधि ॥ ९२ ॥ चरूं सप्ताचिपे राजन् यथाशक्ति निवेदयेत् । पितृणामक्षयं दानं प्रवदन्ति मनीषिणः ऋषयः पितरो देवा गन्धर्वाप्सरसां गणाः । गुह्यकाः किंनरा यक्षाः सिद्धा विद्याधरा नराः ॥ ९४ ॥ राक्षसा दितिजा रुद्रा ब्रह्मा च मनुजाधिप नियतः परमां दीक्षामास्थायाव्दसहस्त्रिकीम् ॥ ९५ ॥ विष्णोः प्रसादनं कुर्वश्चरं च श्रपयंस्तथा सप्तभिः सप्तभिश्चैव ऋग्भिस्तुष्टाव केशवम् ॥ ९६ ॥ ददावष्टगुणश्वयं तेषां तुष्टस्तु केशवः यथाभिलपितानन्यान्कामान्दत्वा महीपते ॥ ९७॥ तत्रैवाऽन्तर्दधे देवो विद्युदभ्रेषु वै यथा नाना सप्तचरुं तेन ख्यातं लोकेपु भारत । इसके आगे काश्मीर देश में पितम्त नाम तक्षक नाग राक्षस, दैत्य, रुद्र और ब्रह्माजी ने विष्णु भगवान् को का स्थान है वहा स्नान करने से मनुष्य को बाजपेय प्रसन्न करने के लिये सहस्रवर्य की दीक्षा लेकर चरु यज्ञ करने का फल मिलता है ओर विशुद्धात्मा होकर अर्थत् हविष्य न अर्पण किया था और मवेद के उम मनुष्य को परमगति मिलती है ॥८११९१॥ मन्त्रों से सात बार स्तुति की थी विष्णुभगवान् ने प्रसन्न इसके उपरान्त मनुष्य को बड़वातीर्थ की यात्रा होकर उन सबको आटगुणा वैभव दिया था, और करनी चाहिये जो तीनों लेकों में विरय त है और जिस जिसकी जो जो मनोरान्छा थी मरको देकर वहा उसको सन्ध्या समय स्नान करके अग्नि में होम इस प्रकार से अन्तर्द्वान हो गये थे जैसे वादों में १ करना चाहिये । बुद्धिमान् लोग कहते हैं कि इस तीर्थ बिजली चमककर गुप्त हो जाती है। इमी कारण से में पितरों को दिया हुआ दान क्षय नहीं होता है । यह तीर्थ सप्तचरु नाम से विख्यात हो गया। यहा पर एक समय इस स्थान पर कपि, पितर, देवता, गन्धर्व, अग्नि में हवन करना एक रास गोदान, सौ राजमूर्य अमरा, गुह्यक, किन्नर, यक्ष, सिद्ध, विद्याधर, मनुप्य, और सहस्र अश्वमेध यन करने में भी उत्तम है । इस VAANABAUNAUNA.NNGUAWAIMeer १८२८ म हा भारत [ वनपर्व - 12PMPM गवां शतसहस्त्रेण राजसूयशतेन च अश्वमेधसहस्रेण श्रेयान्सप्ताचिपे चरुः ॥ ९९ ॥ ततो निवृत्तो राजेन्द्र रुद्रं पदमथाऽऽविशेत् । अचयित्वा महादेवमश्वमेधफलं लभेत् ॥१००॥ मणिमन्तं समासाद्य ब्रह्मचारी समाहितः एकरात्रोपितो राजन्नग्निष्टोमफलं लभेत ॥१०१॥ अथ गच्छेत राजेन्द्र देविकां लोकविश्रुताम् । प्रसूतियत्र विप्राणां श्रूयते भरतर्षभ ॥ १०२॥ त्रिशूलपाणेः स्थानं च त्रिषु लोकेषु विश्श्रुतम् । देविकायां नरः स्नात्वा समभ्यर्च्य महेश्वरम् ॥१०३।। यथाशक्ति चर्स तत्र निवेद्य भरतर्षभ सर्वकामसमृद्धस्य यज्ञस्य लभते फलम् ॥१०४॥ कामाख्यं तत्र रुद्रस्य तीर्थ देवनिपेवितम् । तत्र स्नात्वा नरः क्षिप्रं सिद्धि प्राप्नोति भारत ॥१०५॥ यजनं याजनं चैव तथैव ब्रह्मवाल्लुकम् पुष्पाम्भश्च उपस्पृश्य न शोचेन्मरणं गतः ॥१०६ ।। अर्धयोजनविस्तारा पञ्चयोजनमायता एतावती देविका तु पुण्या देवर्पिसेविता ॥१०७॥ तीर्थ के आगे रुद्रपद नामी तीर्थ है । वहा जाकर शिवजी की पूजा करने से और यथाशक्ति हधिप्यान्न शिवजी की पूजा करने से अश्वमेघ यज्ञ करने का फल निवेदन करने से मनुष्य के सय मनोरथ पूर्ण होते हैं मिलता है ॥२२॥१०॥ और वृद्धियुक्त होकर यज्ञ करने का फल पाता है । वहा मे चरकर मणिमन्तनाम तीर्थ में एक रात्रि इसी तीर्थ में कामान्य नाम शिवजी का भी तीर्थ है थाम कर ऐसा करने से अग्निष्टोम यज्ञ का फल मिलता जहा देवता रहते हैं उसमें स्नान करने से मनुष्य है । इसके आगे देवता नाम तार्य तीनों लोकों में को शीघ्र सिद्धि प्राप्त होती है । इस तीर्थ में जो विख्यान होणेमा सुना जाता है कि ब्रामण इसी स्थान यजन याजन, ब्रह्मबालक और पुष्पांम नामी तीर्थ पर टान्न हुये थे। इस तीर्थ में एक तीनों कों में हैं उनमें स्नान अवश्य करे और मरने का शौच न पाट निवजी काम्यान भी है। यहा म्नान करने और । करे। यह देविका नामी पुण्यतीर्थ आध योजन चौड़ा अध्याय ८२] म हा मारत १८२९ praameremeen AMAVALORAMANAGhe ततो गच्छेत धर्मज्ञ दीर्घसत्रं यथाक्रमम् तत्र ब्रह्मादयो देवाः सिद्धाश्च परमर्पयः ॥१०८॥ दीर्घसत्रमुपासन्ते दीक्षिता नियतव्रताः गमनादेव राजेन्द्र दीर्घसत्रमरिन्दम ॥१०९॥ राजसूयाश्वमेधाभ्यां फलं प्राप्नोति भारत ततो विनशनं गच्छेन्नियतो नियताशनः ॥११०॥ गच्छत्यन्तर्हिता यत्र मेरुपृष्ठे सरस्वती चमसेऽथ शिवोद्भेदे नागोद्भदे च दृश्यते ॥११२॥ स्नात्वा तु चमसोद्भदे अग्निष्टोमफलं लभेत् । शिवोऽदे नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ११२ ॥ नागोद्भेदे नरः स्नात्वा नागलोकमवाप्नुयात् । शशयान च राजेन्द्र तीर्थमासाद्य दुर्लभम् ॥११३।। शशरूपप्रतिच्छन्ना. पुष्करा यत्र भारत सरस्वत्यां महाराज अनुसंवत्सरं च ते ॥११४॥ दृश्यन्ते भरतश्रेष्ठ वृत्तां वै कार्तिकी सदा तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र द्योतते शशिवत्सदा ॥११५॥ गोसहस्रफलं चैत्र प्राप्नुयाद्भरतर्षभ कुमारकोटीमासाद्य नियतः कुरुनन्दन ॥११६॥ और पाच योजन रम्बा है और इसमें देवमपि रहा और नागोद्भेद नामी तीथों में आकर दीवती है। करते हैं । इस तीर्थ से चलकर दीर्घमत्र तीर्थ में इन तीर्थों में से पहले में स्नान करने से अग्निष्टोम पहुचे जहा पर ब्रह्मादिक देवता, सिद्ध आर महर्षि यन का और दूसरे में सहस्र गोदान का फल मिलता रोग दीक्षित होकर दीर्घमत्र यज्ञ करते है । वहा है और तीसरे में स्नान करने से नागलोक प्राप्त होता जाते ही मनुष्य को राजसूय और अश्वमेध यज्ञ करन है। यहा से पिर गशियान तीर्थ की यात्रा करे जहा का फल मिलता है ।।१०१।११०॥ शशिम्प से ढके हुए पुष्कर रहते हैं और हर वर्ष की वहा मे मनुप्य को विंगन तीर्थ की यात्रा करनी कात्तिकी पौर्णमासी को दीखते हैं। इस तीर्थ में स्नान चाहिए जहा पर सरम्वती नदी मेरु पर्वत की पृष्ठि पर करने से मनुप्य को सहस्र गोदान करने का पल होती हुई गुप्त वहती है। और चमसोद्भेद, शिसोद्भेद, मिलता है और उसकी कान्ति चन्द्रमा के तुल्य हो - MASAGAMAU ।
१८३० म हा भारत [ वनपर्व ... LarianmaravnNANNAN NEDERDERSDDENONTON. - तत्राऽभिपेकं कुर्वीत पितृदेवार्चने रतः गवामयुतमाप्नोति कुलं चैव समुन्द्वरेत् ॥११७॥ ततो गच्छेत धर्मज्ञ रुद्रकोटिं समाहितः पुरा यत्र महाराज मुनिकोटिः समागता ॥११८॥ हर्षेण महताविष्टा रुद्रदर्शनकाङ्क्षया अहं पूर्वमहं पूर्व द्रक्ष्यामि वृषभध्वजम् ॥११९॥ 4 एवं संस्थिता राजन्नृपयः किल भारत। ततो योगीश्वरेणाऽपि योगमास्थाय भूपते ॥१२० ।। तेषां मन्युप्रणाशार्थमृषीणां भावितात्मनाम् । सृष्टा कोटीति रुद्राणामृपीणामग्रतः स्थिता ॥१२१ ॥ मया पूर्वतरं दृष्ट इति ते मेनिरे पृथक् तेषां तुष्टो महादेवो मुनीनां भाविनात्मनाम् ॥ १२२ ॥ भक्त्या परमया राजन् वरं तेषां प्रदिष्टवान् । अद्यप्रभृति युष्माकं धर्मवृद्धिर्भविष्यति ॥१२३॥ तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र रुद्रकोट्यां नरः शुचिः । अश्वमेधमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ॥१२४॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र संगमं लोकविश्रुतम् जाती है। इसके आगे कुमारकोटि तीर्थ है देवता अन्तःकरण मुनियों के क्रोध को शान्त करने के और पितरों में प्रीति रखनेवाले मनुष्य इस तीर्थ में लिये योग से अपने एक कोटि रूप प्रकट किये और जाकर स्नान करें। ऐसा करने से मनुष्य को दश एक एक रूप से सब ऋषियों के सन्मुख जा खड़े महस गोदान करने का फल मिलता है और वह हुए । उनको देखकर सब ऋपियों ने यह जाना मनुष्य अपने कुल का उद्धार करता है । इस तीर्थ कि पहले शिव जी के मुझे ही दर्शन हुए हैं । महादेव से चलकर रुद्रकोटि नार्थ की यात्रा करे | जहाँ जी ने उनकी भक्ति देखकर उनको यह वरदान पहले ममय में शिव जी के दर्शनों की इच्छा से एक दिया कि अब से तुम सब के धर्म की वृद्धि होगी। कोटि मुनि इट्ट हुए थे और अपने अपने स्थानों इस रुद्र कोटि माग तीर्थ में स्नान करने से मनुष्य मे यह कहते हुए गले कि पहले मै ही जाकर को अश्वमेध यज्ञ करने का फल मिलता है और यह शिव जी का दर्शन गंगा ॥१११११२०॥ मनुष्य अपने कुल का उद्धार करता है। इस तीर्थ से योगीश्वर शिव जी ने उस समय उन शुद्ध फिर सरस्वती के सङ्गम तीर्थ की यात्रा करे जो तीनों अध्याय ८३ म हा मारत ८८र । सरस्वत्या महापुण्यं केशवं समुपासते ॥१२५॥ यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयश्च तपोधनाः अभिगच्छन्ति राजेन्द्र चैत्रशुक्ल चतुर्दशीम् ॥१२६॥ तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र विन्देद्वहु सुवर्णकम् । सर्वपापविशुद्धात्मा ब्रह्मलोकं च गच्छति ॥ १२७॥ ऋषीणां यत्र सत्राणि समाप्तानि नराधिप । तत्राऽवसानमासाद्य गोसहस्रफलं लभेत् ॥१२८॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि पुलस्त्यतीर्थयााया द्वयशीतितमोऽध्याय ॥ ८ ॥ रोकों में विख्यात है और वड़ा पुण्यस्थान है। इस छूटकर ब्रह्मरोक पाता है। वहीं अवसान नाम तीर्थ तीर्थ को ब्रह्मादिक देवता और बड़े बड़े तपम्वी ऋपि है जहा मपियों ने अपने यज्ञ समाप्त किये थे। उस चैत्र शुक्ला चतुर्दशी को जाया करते हैं । वहा स्नान तीर्थ की यात्रा करने से मनुप्य को सहस्र गोदान करने और केशव का आराधन करने से मनुष्य को । करने का फल मिरता है ॥१२१।१२८॥ बहुत सा सुवर्ण मिलता है । और वह सब पापों से वनपर्व का पयासीवा अध्याय समाप्त हुआ ।। ८२ ॥ । MEI- । 00- ALMoreManv । अथ निशीतितमोऽध्याय ॥ ८३ ।। पुरन्त्य उवाच-ततो गच्छेत राजेन्द्र कुरुक्षेत्रमभिष्तृतम् पापेभ्यो यत्र मुच्यन्ते दर्शनात्सर्वजन्तवः कुरुक्षेत्रं गमिष्यामि कुरुक्षेत्रे वसाम्यहम् य एवं सततं बृयात्सर्वपापै प्रमुच्यते पांसवोऽपि कुरुक्षेत्रे वायुना समुदीरिताः अपि दुप्कृतकर्माणं नयन्ति परमां गतिम् ॥ ३ ॥ तिरामीवा अध्याय ।। ८३॥ पुरम्त्य ऋषि बोले-हे भीष्म अधमान तीर्थ हो जाते है । वहा का ऐसा प्रभाव है कि जो पापी से नर कर मनुष्य का कुरक्षेत्र नाम तीर्थ की यात्रा मनुप्य पर वहा की धून भी टहर जा पड़े तो भी करना उचित है। जिसके दर्शनमानसे माणी के उस पापी को परमाति प्राप्त हो जाती है। इस मय पाप दूर हो जाते हैं। जो कोई मनुष्य यह कुरक्षेत्र के उत्तर में दृगढनी और दक्षिण में सम्पनी भी कहता है कि मैं गुरुक्षेत्र को जाऊँगा अथवा नाम नदिया बहती हैं। इनके माय में जो रहनेवाले वहा रहूँगा, तो इतना ही कहने से उसके पाप दूर मनुष्य है २ वर्ग में यमत है। मरस्वती के तट पर - Mr.
१८३२ म हा भारत । पनपन VVV१८८ twareneursaanelences ॥ दक्षिणेन सरस्वत्या दृपद्वत्युत्तरेण च ये बसन्ति कुरुक्षेत्रे ते वसन्ति त्रिविष्टपे तत्र मासं बसेद्धीरः सरस्वत्यां युधिष्ठिर यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयः सिद्धचारणाः गन्धर्वाप्सरसो यक्षाः पन्नगाश्च महीपते ब्रह्मक्षेत्रं महापुण्यमभिगच्छन्ति भारत मनसाऽप्यभिकामस्य कुरुक्षेत्रं युधिष्ठिर पापानि विप्रणश्यन्ति ब्रह्मलोकं च गच्छति ॥ ७ ॥ गत्वा हि श्रद्धया युक्तः कुरुक्षेत्रं कुरूद्वह फलं प्राप्नोति च तदा राजसूयाश्वमेधयोः ततो मचक्रकं नाम द्वारपालं महाबलम् यक्षं समभिवाद्यैव गोसहस्रफलं लभेत् ततो गच्छेत धर्मज्ञ विष्णोः स्थानमनुनमम् । सततं नाम राजेन्द्र यत्र संनिहितो हरिः तत्र स्नात्वा च नत्वा च त्रिलोकप्रभवं हरिम् । अश्वमेधमवाप्नोति विष्णुलोकं च गच्छति ॥ ११ ॥ ततःपारिप्लवं गच्छेत्तीथं त्रैलोक्यविश्रुतम् अग्निष्टोमातिरानाभ्यां फलं प्राप्नोति भारत ॥१२॥ मनुष्य को एक महीना वाम करना चाहिए। वहा पर उसको नमस्कार करने से महस गोदान का फल प्रमादिक देवता, ऋपि, सिद्ध, चारण, गन्धर्व, अप्सरा, मिलता है ॥१९॥ यक्ष और पन्नग आते हैं । वहा बसने से मनुष्य वहा से सतत नाम विष्णु भगवान् के स्थान की को प्रलोक प्राप्त होता है। जो मनुष्य कुरुक्षेत्र को यात्रा करे जहा विष्णु भगवान् रहा करते हैं । वहां की मन से भी मरण करता है उसके भी सब पाप दूर यात्रा करने और वहां स्नान करने से मनुष्य को हो जाते हैं और वह नरोक पाता है । और जो अश्वमेध यज्ञ करने का फल मिलता है और वह मनुष्य श्रद्धा मे कुरक्षेत्र में जाता है उसको राजसूय विष्णुलोक को जाता ही इस तीर्थ के पीछे पारिलवनामी चौर अधर्मध यज्ञों करन का फल मिलता है तीर्थ को जाय जो तीनों लोकों में विख्यात है। यहां है। वहीं मंकणक नाम यहा पराक्रमी द्वारपाल यक्ष है की यात्रा करने से मनुष्य को तीन रात्रि में अमिष्टोम -AVALOV.८८८८४Croche - अध्याय ८३] म हा भारत १८३३ । - CANAVer८८Rs. पृथिवीतीर्थमासाद्य गोसहस्रफलं लभेत् ततः शाकिनी गत्वा तीर्थसेवी नराधिप ॥ १३ ॥ दशाश्वमेधे स्नात्वा च तदेव फलमाप्नुयात् सर्पदेवीं समासाद्य नागानां तीर्थमुत्तमम् ॥ १४ ॥ अग्निष्टोममवाप्नोति नागलोकं च विन्दति ततो गच्छेत धर्मज्ञ द्वारपालं तरन्तुकम् तत्रोप्य रजनीमेकां गोसहस्रफलं लभेत् ततः पञ्चनदं गत्वा नियतो नियताशनः ॥ १६ ॥ कोटितीर्थमुपस्पृश्य हयमेधफलं लभेत् अश्विनोस्तीर्थमासाद्य रूपवानभिजायते ॥ १७॥ ततो गच्छेत धर्मज्ञ वाराहं तीर्थमुत्तमम् । विष्णुर्वाराहरूपेण पूर्व यत्र स्थितोऽभवत् ॥ १८ ॥ तत्र स्नात्वा नरश्रेष्ट अग्निष्टोमफलं लभेत् ततो जयन्त्यां राजेन्द्र सोमतीर्थं समाविशेत् ॥ १९ ॥ स्नात्वा फलमवाप्नोति राजसूयस्य मानवः एकहंसे नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ २० ॥ कृतशौचं समासाद्य तीर्थसेवी नराधिप यज के करने का फल मिलता है, यहां से पृथिवी ! और कोटिनी में स्नान करे | ऐमा करने से मनुष्य तीर्थ को जाने से सहस्र गोदान करने का फल मिलता को अश्वमेघ यन करने का फल मिलता है और वही है। फिर शाकिनी तीर्थ में जाकर दशाश्वमेध में म्नान अश्विनीकुमारों का तीर्थ है जिसमें म्नान करने में करने मे दश अश्वमेघ यज करने का फल मिलता है वहां मनुष्य सुन्दरम्परूपवान् हो जाना है। वहां से फिर मे फिर सर्व देवीनाम नागों के उत्तम तीर्थ की यात्रा वराह तीर्थ की यात्रा को जहां पहिले ममय में विष्णु. करे। जहां जाने से मनुष्य को अमिष्टाम यज्ञ करने ' भगवान् ने वागद का रूप धारण क्यिा था। वहां का फल मिलना है और अन्त ममय में उमको नाग म्नान करने में मनुष्य को अमिष्टोम यज करने का गेक प्राप्त होता है। इमी तीर्थ के निकट तरतुक नाम फल मिलता है। वहां मे आग जयंती नाम मोमतीर्थ द्वारपाल १ वहां जाने और एक गत्रि थमने मे मद्दम में जाय । वहां म्नान करने से मनुष्य को रानग्य गोदान करने का फल मिलताई। उम के आगे फिर यज करने का फल मिलता है और वही एकम. नियतामन होकर पचनद नाम तीर्थ की यात्रा कर नार्य भी है वहां म्नान करने में महम गादान करने १८३४ महा भारत [ वनपर्व MPSAAMANAL पुण्डरीकमवाप्नोति कृतशोचो भवेच्च सः ॥ २१ ॥ ततो मुञ्जवटं नाम स्थाणोः स्थानं महात्मनः । उपोप्य रजनीमेकां गाणपत्यमवाप्नुयात् ॥ २२ ॥ तत्रैव च महाराज यक्षिणी लोकविश्रुताम् स्नात्वाऽभिगम्य राजेन्द्र सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥ २३ ॥ कुरुक्षेत्रस्य तद् द्वारं विश्रुतं भरतर्षभ प्रदक्षिणमुपावृत्य तीर्थसवी समाहितः ॥ २४ ॥ संमितं पुष्कराणां च स्नात्वाऽर्थ्य पितृदेवताः । जामदग्न्येन रामेण कृतं तत्सुमहात्मना कृतकृत्यो भवेद्राजन्नश्वमेधं च विन्दति ततो गमहदान्गच्छेत्तीर्थसेवी समाहितः ॥ २६ ॥ तत्र रामेण राजेन्द्र तरसा दीप्ततेजसा क्षत्रमुत्साद्य वीरेण ह्रदाः पञ्च निवेशिताः ॥ २७ ॥ पूरयित्वा नरव्याघ्र रुधिरेणेति विश्रुतम् पितरस्तर्पिताः सर्वे तथैव प्रपितामहाः ततस्ते पितरः प्रीता राममूचुनराधिप पितर ऊचु -राम राम महाभाग प्रीताः स्म तव भार्गव ॥ २९ ॥ का फल मिलता है ॥१०॥२०॥ पुष्करकी तुल्य तीर्थ है । बहा म्नान करने और देवता इम तीर्थ के पीछे यात्री को कृतशीच तीर्थ में | और पितरों का तर्पण करने से मनुष्य अश्वमेध यज्ञ जाना चाहिये जहां जाने से मनुष्य का पुण्डरीक यज्ञ करने का फल पाकर कृतकृत्य हो जाता है। वहां के करने का फल मिलता है और शरीर पवित्र हो से चलकर फिर परशुराम जी के कुण्डों की यात्रा जाता है। वहा से मुजवट नाम तीर्थ में शिव जी करे ॥२१॥२६॥ कम्धान पर जाय जहा एक रात्रि बसने में मनुष्य परशुराम जी ने, जिनका तेज बड़ा दीप्त था, ना गाणपत्य पद प्राप्त होता है। वहीं यक्षणी नाम क्षत्रियों को मारकर रधिर से पांच कुण्ट भरे थे । गनी में विन्यात ती उसमें स्नान करने में और उन गुण्टों में स्नान करके पितरों का तर्पण मनुष्य की मय मनोकामना पूर्ण होती हैं । तीर्थसेवी किया था। परशुराम जी के वितृ उस तर्पण से प्रसन्न , मनुष्य यहां में प्रदक्षिणा करना हुआ पुरुक्षेत्र के होकर आकाश में प्रकट हो गये और कहने लगे- : हार पर जांच जहा पर परशुराम जी के हाये हुए हे राम! हे राम! हे मार्गय ! हम तुम्हारी पितृभकि eveneupane । - अध्याय ८३ ] महा मारत १८३५ ८८८८e P२.८० - अनया पितृभक्त्या च विक्रमेण च ते विभो । वरं वृणीष्व भद्रं ते किमिच्छसि महाद्युते एवमुक्तः स राजेन्द्र रामः प्रहरतां वरः । अब्रवीत्प्राञ्जलिर्वाक्यं पितॄन्स गगने स्थितान् ॥ ३१ ॥ भवन्तो यदि मे प्रीता यद्यनुग्राह्यता मयि पितृप्रसादमिच्छेयं तपआप्यायनं पुनः ॥ ३२ ॥ यञ्च रोपाभिभूतेन क्षत्रमुत्सादितं मया ततश्च पापान्मुच्येयं युष्माकं तेजसाऽप्यहम् ॥ ३३ ॥ ह्रदाश्च तीर्थभूता मे भवेयुर्भुवि विश्रुताः । एतच्छुत्वा शुभं वाक्यं रामस्य पितरस्तदा ॥ ३४ ॥ प्रत्यूचुः परमप्रीता रामं हर्पसमन्विताः तपस्ते वर्धतां भूयः पितृभक्त्या विशेषतः ॥ ३५॥ यच्च रोपाभिभूतेन क्षत्रमुत्सादितं त्वया ततश्च पापान्मुक्तस्त्वं पतितास्ते स्वकर्मभिः ॥३६ ॥ ह्रदाश्च तव तीर्थत्वं गमिप्यन्ति न संशयः । हृदेपु तेषु यः स्नात्वा पितृन्सतर्पयिष्यति पितरस्तस्य वे प्रीता दास्यन्ति भुवि दुर्लभम् । ईप्सितं च मनःकामं स्वर्गलोकं च शाश्वतम् ॥ ३८ ॥ एवं दत्वा वरात्राजत्रामस्य पितरस्तदा और शूरवीरता से प्रमन्न हुए अब तुम हम से वर ने प्रसन्न होकर कहा कि पितृभक्ति के कारण से तुम्हारे मागो । यह मुनकर परशुराम जी हाथ जोड़कर तप की वृद्धि होगी और तुम क्षत्रियों को नाश करने पितरों से बोले कि जो आप मेरे ऊपर प्रसन्न होकर के पाप से मुक्त होगे और ये तुम्हारे कुण्ड भी नार्थ- मुझ पर अनुग्रह किया चाहते हैं तो मैं नाहता हूँ रूसी हो जायेंगे । जो कोई मनुष्य इन युण्डों में कि आप मुझपर प्रसन्न रहें, मेरे तप की वृद्धि होय म्नान करक विधिपूर्वक पितों कातर्पण करेगा टसके और मैं क्षत्रियों के कुल को क्रोध के कारण से नाग पितृ निश्चय उसको दुर्लभ पदार्थ देकर टमकी सय करने के पाप से दूर जाऊँ और मेरे ये पानी कुण्ड मनोकामनाओं को पूरा करेंगे और टमको म्वर्गलोय तधिमा पृथ्वी पर विण्यात होवें। यह मुनकर पिनगे भी देंगे। यह वरदान देकर पितृ पशुगम जी में AIMAINARASUWAIIr १८३६ महाभारत [वनपर्व ८०८W ANATALBURGAJABAR आमन्त्र्य भार्गवं प्रीत्या तत्रैवाऽन्तर्हितास्ततः ॥ ३९ ॥ एवं रामहृदाः पुण्या भार्गवस्य महात्मनः । स्नात्वा हृदेपु रामस्य ब्रह्मचारी शुभवतः ॥ ४० ॥ राममभ्यर्च्य राजेन्द्र लभेद्वहु सुवर्णकम् वंशमूलकमासाद्य तीर्थसेवी कुरूद्वह स्ववंशमुद्धरेद्राजन्नात्वा वै वंशमूलके कायशोधनमासाद्य तीर्थं भरतसत्तम ॥ ४२ ॥ शरीरशुन्द्वि स्नातस्य तस्मिस्तीर्थे न संशयः । शुद्धदेहश्च संयाति शुभॉल्लोकाननुत्तमान् ततो गच्छेत धर्मज्ञ तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् । लोका यत्रोद्धृताः पूर्व विष्णुना प्रभविष्णुना ॥ ४४ ॥ लोकोद्धारं समासाद्य तीर्थं त्रैलोक्यपूजितम् । स्नात्वा तीर्थवरे राजन् लोकानुन्दरते स्वकान् ॥ ४५ ॥ श्रीतीर्थं च समासाद्य स्नात्वा नियतमानसः अर्चयित्वा पितृन्देवान्विन्दते श्रियमुत्तमाम् ॥ ४६॥ कपिलातीर्थमासाद्य ब्रह्मचारी समाहितः तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च पितॄन्स्वान्दैवतान्यपि ॥ ४७ ॥ पूछकर वहीं अन्तर्धान हो गय ॥२७॥३०॥ तीर्थ की यात्रा कर जो तीनों लोकों में विख्यात है सो हे राजा युधिगिर ! ये परशुराम जी क और जहा पहले सर्वव्यापी विष्णु भगवान् ने रोकी गुण्ट इस प्रकार में पवित्र और तीर्थप है। जो का उद्धार किया था उसमें स्नान करने से मनुष्य के मनुष्य नमनारी और मनी टोकर उसमें स्नान करता रोमों का उद्धार होता है। वहीं श्री तीर्थ भी हे ६ और परशुराम जी की पूजा करता है उसको बहुत जिसमें स्नान करने और देवता और पितरों को पूजने मा सुवर्ण मिरना है। वहा से मनुष्य को वशमूरक से मनुष्य को रक्ष्मी प्राप्त होती है । वहा से चल नामी साधना यात्रा करनी नाहिये। जिस में स्नान वर यात्री कपिला तीर्थ में स्नान करे और अपने परने में मनुष्य में वश का उदार होता है और पिनर और देवताओं का पूजन करे । जिसके करने रिकामाधन तीर्थ को जान । जिनमें ना करने ग महम कपिला गोदान करंग का पर मिलता है में मनुष्य का मार गुद्ध हो जाता है और इसकी वटा में फिर सूर्य तीर्थ को चला जाय जहा देवता शुभ और उसमोर गिरते हैं । वहा मे गोदा और पितरों की पूजा करने गे गनुप्य का अमिष्टोग अध्याय ८३] म हा मारत ૧૮૨૭ ८८८८८४ - awrawanatimernam कपिलानां सहस्त्रस्य फलं विन्दति मानवः सूर्यतीर्थं समासाद्य स्नात्वा नियतमानसः ॥ १८॥ अर्चयित्वा पितृन्देवानुपवासपरायणः अग्निष्टोममवाप्नोति सूर्यलोकं च गच्छति ॥ १९ ॥ गवां भवनमासाद्य तीर्थसेवी यथाक्रमम् तत्राऽभिपेकं कुर्वाणो गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ५० ॥ शसिनीतीर्थमासाद्य तीर्थसबी कुरूद्धह देव्यास्तीर्थे नरः स्नात्वा लभते रूपमुत्तमम् ततो गच्छेत राजेन्द्र द्वारपालमरन्तुकम् यच्च तीर्थ सरस्वत्यां यक्षेन्द्रस्य महात्मनः ॥ ५२ ॥ तत्र स्नात्वा नरो राजन्नग्निष्टोमफलं लभेत् ततो गच्छेत राजेन्द्र ब्रह्मावर्त नरोत्तमः ॥ ५३ ॥ ब्रह्मावर्ते नरः स्नात्वा ब्रह्मलोकमवाप्नुयात् ततो गच्छेत राजेन्द्र सुतीर्थकमनुत्तमम् ॥ ५४ ॥ तत्र संनिहिता नित्यं पितरो दैवतैः सह तत्राऽभिषेकं कुर्वीत पितृदेवार्चने रतः ॥ ५५ ॥ अश्वमेधमवाप्नोति पितृलोकं च गच्छति ततोऽम्बुमत्यां धर्मज्ञ सुतीर्थकमनुत्तमम् यज्ञ करन का फल मिलता है और अन्त में सूर्यगक है। वहा से फिर ब्रह्मावर्च को चरा जाय । जहा को जाता है। वहा से गयाभवन तीर्थ की यात्रा करे म्नान करने में ब्रह्मक प्राप्त होता है । वहा से जहा म्नान करने से सहम गोदान करने का फल फिर मानुपक नाम उत्तम तीर्थ की यात्रा को । मिलता है ४२॥५०॥ जहा देवता और पितरों का बाम रहता है । वहां उमके आगे गम्बिनी नाम देवी का तीर्थ है। देवता और पितरों की पूजा में प्रीति रखनेवाग मनुष्य जिसमें म्नान करने मे मनुष्य को टत्तम म्परूप मिलता म्नान करके अश्वमेध यन करने का फर पाना । यहा म्नान करके तरडक द्वारपाल यक्ष के नीर्थ और उमको पितृलोक का वाम मिरना है। उसके की यात्रा करे जो सम्पनी में है। उसमें स्नान करने आंग अनुमती में कामीश्वर का मुनीर्धक नाम एक से मनुष्य को अमिष्टीम यन करने का फर मिन्ता नीर्थ है टममें स्नान करने से मनुष्य मा बाधाओं CARA ASA Kavala ARASAAVAA - -- है 2.00 १८३८ महाभारत [ वनपर्व sar काशीश्वरस्य तीर्थे च स्नात्वा भरतसत्तम सर्वव्याधिविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते ॥ ५७॥ मातृतीर्थं च तत्रैव यत्र स्नातस्य भारत प्रजा विवर्धते राजन्नतन्वीं श्रियमश्नुते ततः सीतवनं गच्छन्नियतो नियताशनः तीर्थं तत्र महाराज महदन्यत्र दुर्लभम् पुनाति दर्शनादेकं स्नानादेकं नराधिप केशानभ्युक्ष्य वै तस्मिन्पूतों भवति भारत ॥ ६० ॥ तीर्थं तत्र महाराज श्वाविल्लोमापहं स्मृतम् । यत्र विप्रा नरव्याघ्र विद्वांसस्तीर्थतत्पराः प्रीतिं गच्छन्ति परमा स्नात्वा भरतसत्तम श्वाविल्लोमापनयने तीर्थे भरतसत्तम ॥ ६२ ॥ प्राणायामैनिहरन्ति स्वलोमानि द्विजोत्तमाः । पूतात्मानश्च राजेन्द्र प्रयान्ति परमां गतिम् ।। ६३ ।। दशाश्वमेधिकं चैव तस्मिंस्तीर्थे महीपते तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र गच्छेत परमां गतिम् ॥ ६४ ॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र मानुपं लोकविश्रुतम् यत्र कृष्णमृगा राजन् व्याधेन शरपीडिताः ॥६५॥ से हटकर ब्रह्मलोक को जाता है । इसी स्थान पर जहां विद्वान् ब्राह्मण लोग परम्पर प्रीतिपूर्वक रहकर मातृतीर्थ भी है जिस में स्नान करने से मनुष्य की प्राणायाम करके अपने पापों को दूर करते है और ? सन्तान की वृद्धि होती है और उसको लक्ष्मी मिलती पवित्र आत्मा होकर परमगति पाते हैं। उममें यात्री है । यहा मे फिर यात्री को सीन वन को जाना को म्नान करके दशाश्वमेधिक नाम तीर्थ में जो उचित है। जहां पेमा तीर्थ है विवमा दमर स्थान उसी स्थान पर है म्नान करना चाहिये। उसमें स्नान पर टीना दुर्लभ है । उम नाथ के दर्शन मान और करने में परमगति मिरती है। इसके पीछे गानुप- समें बाल धोने मे ही मनुष्य पवित्र हो जाना है तीर्थ में जाय जो तीनों लोकों में विख्यात है। उस ॥५१॥६॥ मावर में एक समय काले मृग बाणों से पीड़ित होकर और वहीं वाविही गाद६ नाम तार्थ भी है। गिरकर मनुष्यरूप हो गये थे । मनुष्य अपनर्य ४८eeeeeeeeartCame.
अध्याय ८३] म हा भारत १८३९ - - विगाह्य तस्मिन्सरसि मानुपत्वमुपागतः तस्मिंस्तीर्थ नरः स्नात्वा ब्रह्मचारी समाहितः ॥ ६६ ॥ सर्वपापविशुद्धात्मा स्वर्गलोके महीयते मानुपस्य तु पूर्वेण कोशमात्रे महीपते ॥ ६७॥ आपगा नाम विग्याता नदी सिद्धनिपेविता । श्यामाकं भोजने तत्र यः प्रयच्छति मानवः ॥ ६८॥ देवान्पितॄन्समुद्दिश्य तस्य धर्मफलं महत् एकस्मिन्भोजिते विप्रे कोटिर्भवति भोजिना तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च पितॄन्वे देवतानि च । उपित्वा रजनीमेकामग्निष्टोमफलं लभेत् ततो गच्छेत राजेन्द्र ब्रह्मणः स्थानमुत्तमम् । ब्रह्मोदुम्बरमित्येव प्रकाशं भुवि भारत ॥ ७९ ॥ तत्र सप्तर्पिकुण्डेषु स्नातस्य नरपुङ्गव केदारे चैव राजेन्द्र कपिलस्य महात्मनः ॥ ७२ ॥ ब्रह्माणमधिगत्वा च शुचिः प्रयतमानसः सर्वपापविशुद्वात्मा ब्रह्मलोकं प्रपद्यते ।। ७३॥ कपिप्टलम्य केदारं समासाद्य सुदुर्लभम् । अन्तर्धानमवाप्नोति तपसा दग्धकिल्विपः ॥ ७॥ मे टम तीर्थ में म्नान करके विशुद्ध आत्मा होर मिरता है 11१1०॥ वर्गक पाना है । इस नीर्थ के पूर्व दिगा में एक वहा में चरकर तमा जी के प्रयोदुम्बर नाम योग पर आपगा नाम नदीद गमिद्ध गेग रहा न्यान की यात्रा कवटा मतमपि के कुण्ट में और करते । न हा पर देना अंगपिनों के नाम पर महात्मा कपिल के केदार नाम तीर्थ में स्नान करने श्यामाक भोजन देने मे यड़ापन होना। यहा नक और पवित्रतापूर्वक मन की शुद्धता मे मा जी का कि एक व्रण को भोजन कराने में वोटि नमगों भ्यान करने में मनुष्य को प्रगक मिरना। और को भानन देने का फर होता है। समर्थन म्नान उम कपिर केदार तीर्य में नाम्या नेम मय पापों करने और देवना, विनगे की पूजा करने और यहा मे हटकर मनुष्य को अन्न यान हो जाने की मामार्य पक गति वमने में अमिष्टाम या वग्न का पर हो जाती है। वन मे सार नाम नाका जायजा anwMAMr.mvwnewww १८४० महा मारत [ वनपर्व VEGALANG - ANUANALSAX 1 ८०॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र सरकं लोकविश्रुतम् । कृष्णपक्षे चतुर्दश्यामभिगम्य वृपध्वजम् ॥ ७५ ॥ लभेत सर्वकामान्हि स्वर्गलोकं च गच्छति तिस्रः कोट्यस्तु तीर्थानां सरके कुरुनन्दन रुद्रकोव्यां तथा कूपे ह्रदेषु च महीपते इलास्पदं च तत्रैव तीर्थ भरतसत्तम ॥७७॥ तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च देवतानि पितृनथ न दुर्गतिमवाप्नोति वाजपेयं च विन्दति किंदाने च नरः स्नात्वा किंजप्ये च महीपते । अप्रमेयमवाप्नोति दानं जप्यं च भारत ॥ ७९॥ कलश्यां वार्युपस्पृश्य श्रद्दधानो जितेन्द्रियः । अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः सरकस्य तु पूर्वेण नारदस्य महात्मनः तीर्थ कुरुकुलश्रेष्ठ अम्बाजन्मेति विश्रुतम् ॥ ८१ ॥ तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा प्राणानुत्सृज्य भारत । नारदेनाऽभ्यनुनातो लोकान्प्राप्नोत्यनुत्तमान् ॥ ८२ ॥ शुक्लपक्षे दशम्यां च पुण्डरीकं समाविशत् । तत्र स्नात्वा नरो राजन् पुण्डरीकफलं लभेत् ॥ ८३ ।। नीनों लोकों में विख्यात हैं और कृष्णपक्ष की चौदश नामी तीर्थ हैं उनमें स्नान, दान और जप करना को शिव जी का पूजन करे । वहा जाने से मनुष्य अप्रमेय होता है। वहा से कलशी तीर्थ में जाकर को स्वरोक मिरता है और उसकी सब मनोकामना श्रद्धायुक्त जितेन्द्रिय होकर स्नान करे जिसके कान पूरी होती है । इस मरक तीर्थ और रुद्रकोटि, हृद से मनुष्य को अनिष्टोम यज्ञ करने का फल मिलता और प नीयों में तीन तीन कोटि तीर्थ है और है ॥७१६८०॥ बदी गायधनामी तीर्थ भी है। बदा म्नान करने और सरक तीर्थ से पूर्व दिशा में अग्याजन्म और देवना पितरों का पूजन करने से मनुष्य की नाग नारद जी का विव्यात तीर्थ है । उस तीर्थ में दुर्गति नही होती है और अमेध यज्ञ करने का म्नान करने और प्राणों को छोड़ने से नारद जी की पर निताई। इसके आगे निदान आप जप्य आना में मनुष्य को उतम रोक मिलते हैं । वहा SANAL.NAGAvi अध्याय ८३ ] महा मा रत १८४१ ४८८ । - ततस्त्रिविष्टपं गच्छेत्रिषु लोकेपु विश्रुतम् तत्र वैतरणी पुण्या नदी पापप्रणाशिनी ।। ८४ ॥ तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च शूलपाणिं वृषध्वजम् । सर्वपापविशुद्धात्मा गच्छेत परमां गतिम् ॥ ८५ ॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र फलकीवनमुत्तमम् तत्र देवाः सदा राजन् फलकीवनमाश्रिताः ॥ ८६ ॥ तपश्चरन्ति विपुलं बहुवर्पसहस्रकम् दृपद्वत्यां नरः स्नात्वा तर्पयित्वा च देवताः ॥ ८७॥ अग्निष्टोमातिरानाभ्यां फलं विन्दति भारत तीर्थे च सर्वदेवानां नात्वा भरतसत्तम गोसहस्रस्य राजेन्द्र फलं विन्दति मानवः पाणिखाते नरः स्नात्वा तर्पयित्वा च देवताः ॥ ८९ ।। अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलं विन्दति भारत राजसूयमवाप्नोति ऋपिलोकं च विन्दति ॥ ९०॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र मिश्रकं तीर्थमुत्तमम् तत्र तीर्थानि राजेन्द्र मिश्रितानि महात्मना ॥ ९१ ।। व्यासेन नृपशार्दूल द्विजार्थमिति नः श्रुतम् । से फिर पुण्डरीक तीर्थ को जाकर शुक्लपक्ष की दशमी । वहीं सब देवताओं का तीर्थ भी है उसमें म्नान करने को स्नान करे तो म्नान करनेवाले को पुण्डरीक यन्त्र से मनुप्य को सहस्र गोदान करने का फल मिलना करने का फल मिलता है। इस तीर्थ के आगे त्रिवि है। और पाणिसात नाम तीर्थ में स्नान और तर्पण १ टप नामी तीनों लोकों में विख्यात तीर्थ है । वहां करने में अग्निष्टोम, अतिरात्र और राजसूय यनों के चैतरणी नाम पुण्य नदी पापों को दूर करनेवारी है। करन का फल मिलना है और म्नान करनेवाला अन्त उममें म्नान कर शूलपाणि वृषध्वज शिव समय में ऋपिलोक पाता है ।।८१४९०॥ पूजन करने मे मनुप्य शुद्ध होकर परमगति पाना यहां से चलकर मिश्रक तीर्थ की यात्रा करे। है। यहां से आगे चलकर फलकी वन की यात्रा जहा हमने सुना है कि महात्मा व्याम जी ने सब करे । जहां देवना मदमों वर्षों मे तप कर रहे हैं। तीर्थ लाकर वामगों के लिए मिलाये है उममें स्नान वहां पद्धती में स्नान और तर्पण करने में अमिष्टोम' करने में मत्र तीयों में स्नान करने का फर मिना और अतिरात्र यनों के करने का फल मिलता है है। यहां मे चलकर व्याम जी के वन में जाय । - N८NNAGA auvavannen -- - 1 ALMAL2017 R-MALAL { वनपर्व १८४२ महाभारत १८८ । ranteenageeMeevr सर्वतीर्थेषु स स्नाति मिश्रके स्नाति यो नरः ॥ ९२ ।। ततो व्यासवनं गच्छन्नियतो नियताशनः मनोजवे नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ९३ ।। गत्वा मधुवटीं चैव देव्यास्तीर्थे नरः शुचिः । तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च पितॄन्देवांश्च पूरुषः ॥ ९४ ।। स देव्या समनुज्ञातो गोसहस्रफलं लभेत् । कौशिक्या. संगमे यस्तु दृपद्वत्याश्च भारत स्नाति वै नियताहार. सर्वपापैः प्रमुच्यते ततो व्यासस्थली नाम यत्र व्यासेन धीमता ॥ ९६ ॥ पुत्रशोकाभितप्तेन देहत्यागे कृता मतिः ततो देवैस्तु राजेन्द्र पुनरुत्थापितस्तदा अभिगत्वा स्थली तस्य गोसहस्त्रफलं लभेत् । किंदत्तं कूपमासाद्य तिलप्रस्थं प्रदाय च गच्छेत परमां सिद्धि मृणमुक्तः कुरूद्वह वेदीतीर्थे नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ९९ ॥ अहश्च सुदिनं चैव द्वे तीर्थे लोकविश्रुते तयोः स्नात्वा नरव्याघ्र सूर्यलोकमवाप्नुयात् ॥१०० ।। मृगधूमं ततो गच्छेत्रिषु लोकेपु विश्रुतम् जहां मनोजव तीर्थ में स्नान करने से सहस गोदान । न पुत्र के शोक में प्राण छोड़ने के समय में की करने का फल मिलता है । फिर वहा से मधुवटी | थी। यहा जाने से मनुष्य को सहस्र गोदान करने नाम देवी के तीर्थ की यात्रा करे। जहा स्नान करने का फल मिलता है । वहां से किंदत्तकर की यात्रा और पितृ और देवताओं को पूजने मे दवी की आजा करे । जहां एक प्रम्य तिल दान करने से मनुष्य मे मनुष्य को महस गोदान करने का फल मिल्ला । को सहस गोदान करने का फल मिलता है। इसके 1वी कौशिकी और पद्वती नदियों का संगम आगे अह और मुदिन नामी दोनों तीर्थ तीनों लोकों है। उसमें स्नान करने में मनुष्य के सब पाप निश्चय में विख्यात हैं। उनमें स्नान करने से मनुष्य को दर हो जाते हैं । यहां से फिर घ्याम धनी नाम, सूर्गलोक मिलता है ।।११।१००॥ नधि को जाय । जहाव्याम जी की रक्षा देवनाओं वहां से मृगधूम तीर्थ की यात्रा करे जो तीनों NAL.१२८eracrane. .. । - 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अध्याय ८३] म हा मारत १८४३ Anemov~NALItnaa.. GALAMNCamenovo तत्राऽभिषेकं कुर्वीत गङ्गायां नृपसत्तम ॥१०१।। अर्चयित्वा महादेवमश्वमेधफलं लभेत् देव्यास्तीर्थे नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥१०२।। ततो वामनकं गच्छेत्रिपु लोकेषु विश्रुतम् तत्र विष्णुपदे नात्वा अर्चयित्वा च वामनम् ॥१०३॥ सर्वपापविशुद्धात्मा विष्णुलोकं स गच्छति कुलंपुने नरः स्नात्वा पुनाति स्वकुलं ततः ॥ १०४॥ पवनस्य हृदे स्नात्वा मरुतां तीर्थमुत्तमम् तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र विष्णुलोके महीयते ।।१०५॥ अमराणां हृदे स्नात्वा समभ्यया॑ऽमराधिपम् । अमराणां प्रभावन स्वर्गलोके महीयते ॥१०६॥ शालिहोत्रम्य तीर्थे च शालिसूर्ये यथाविधि नावा नरवरश्रेष्ट गोसहस्रफलं लभेत् ॥१०७॥ श्रीकुझं च सरस्वत्यास्तीर्थ भरतसत्तम तत्र स्नात्वा नरश्रेष्ट अग्निष्टोमफलं लभेत् ॥१०८॥ ततो नैमिपकुजं च समासाद्य कुरूद्वह ऋपयः किल राजेन्द्र नैमिषेयास्तपस्विनः ॥१०९॥ रोकों में विम्यान है । वहारमाजी में मान करने और हनिममें म्नान करने से मनुष्य वायुगेक को जाता महादेव जी का पूजन करने मे मनुष्य को अश्वमेध यज्ञ है ॥१०१।१०५॥ करने का फल मिल्ना है। वहीं देवी के तीर्थ में भी और वही देवताओं का कुण्ड भी है टममें स्नान म्नान करे जिममें म्नान करने मे मनुष्य करने और इन्द्र का पूजन करने से मनुष्य कोम्बर्गगेक गोदान करने का फल मिरनाई। इसके पीछे वागनक मिलता है। और शानिदोत्र और मानिसूर्य में म्नान नीर्थ में जान जो तीनों गेकों में विम्यान है। वहां करने मे सहम गोदान करने का पर मिलता है। विष्णुपद में स्नान करने और वामन जी को पूजने इन नीयों के आगे मरम्पती जी में श्रीरतनामी नार्थ में मनुष्य की आत्मा शुद्ध हो जाती है और अन्न । हे विममें म्नान करने मे मनुन्य को अमिष्टीम यन ममय में विष्णुरोक पाना है। वहीं कुन्युन तीर्थ मी ' करने का फर मिनाहावदा मेशि मिपान नर्षि है जिममें स्नान करने से मनुष्य का उल पवित्र हो की यात्रा करे। पदरे उम म्यान परजी नाम्बी ऋगि जाना । उमरे आगे मनवना का पान कष्टनार्थ रहने थे वे तीर्थयात्रा करने के लिये सरक्षेत्र में चले को महम - १८४४ [ वनपर्व महा भारत AGAUR every NAAMRAUNAVANAGANA तीर्थयात्रां पुरस्कृत्य कुरुक्षेत्रं गताः पुरा ततः कुञ्जः सरस्वत्याः कृतो भरतसत्तम ॥११०॥ ऋषीणामवकाशः स्याद्यथा तुष्टिकरो महान् तस्मिन्कुले नरः स्नात्वा अग्निोमफलं लभेत् ॥१११॥ ततो गच्छेत धर्मज्ञ कन्यातीर्थमनुत्तमम् कन्यातीर्थे नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ११२ ।। ततो गच्छेत राजेन्द्र ब्रह्मणस्तीर्थमुत्तमम् तत्र वर्णावरः स्नात्वा ब्राह्मण्यं लभते नरः ॥११३॥ ब्राह्मणश्च विशुद्धात्मा गच्छेत परमां गतिम् । ततो गच्छेन्नरश्रेष्ठ सोमतीर्थमनुत्तमम् ॥११४॥ तत्र स्नात्वा नरो राजन् सोमलोकमवाप्नुयात् । सप्तसारस्वतं तीर्थं ततो गच्छेन्नराधिप यत्र मणकः सिद्धो महर्पिोकविश्रुतः पुरा मङ्कणको राजन् कुशाग्रेणेति नः श्रुतम् ॥११६ ॥ क्षतः किल करे राजस्तस्य शाकरसोऽस्त्रवत् । स वै शाकरसं दृष्ट्वा हर्षाविष्टः प्रनृत्तवान् ॥११७॥ ततस्तस्मिन्प्रनृत्ते तु स्थावरं जगमं च यत् । प्रनृत्तमुभयं वीर तेजसा तस्य मोहितम् ॥११८॥ गये थे इस कारण से ऋषियों को अवकाश मिरने मिलता है और जो ब्राह्मण उसमें स्नान करे तो उसको के प्रयोजन से यह नमिषरजरचा गया। इसमें म्नान परमगति मिलती है । उस तीर्थ से चलकर फिर चन्द्रमा करने में मनुष्य को अमिष्टोम यज्ञ करने का फल के उत्तम तीर्थ की यात्रा करे जहाम्नान करने से मनुष्य मिरता है ॥१०६।१११॥ को चन्द्ररोक मिरता है । और फिर वहा से सप्तसार- इसके पीछे यात्री को पन्या तीर्थ की यात्रा करना म्वत तीर्थ कोचरा जावे। जहा मकणक नामी महा- चिन जिममे एग और कोई तार्थ नहीं है। उस मपि जो तीनों रोकों में प्रसिद्ध है,रहते हैं। हमने सुना में ग्नान करने में मनुष्य को सहय गोदान करने का है कि पहले समय में मकणकमपि के हाथ में कुशा की रमिता है। टम आगे ब्रह्मा जी का उत्तम नोक समा गई थी उसके गन से उस महामपि नाद यहा म्नान करने में मनुष्य को ब्राह्मण्य पद के हाथ में से गाकरस टाको लगा उसको देखकर -AVALNA अध्याय ८३] महा मा रत १८४५ VA traMeanMirmireentireone .. ब्रह्मादिभिः सुरै राजन्नृपिभिश्च तपोधनैः विजप्तो वै महादेव ऋपेरर्थे नराधिप नाऽयं नृत्येद्यथा देव तथा त्वं कर्तुमर्हसि ॥११९॥ तं प्रनृत्तं समासाद्य हविष्टेन चेतसा सुराणां हितकामार्थमृर्षि देवोऽभ्यभापत ॥१२०॥ भो भो महर्षे धर्मज्ञ किमर्थं नृत्यते भवान् । हर्षस्थानं किमर्थं वा तवाऽद्य मुनिपुङ्गव ॥१२१ ॥ ऋपिरुषाच-तपस्विनो धर्मपथे स्थितस्य द्विजसत्तम किं न पश्यसि मे ब्रह्मन्कराच्छाकरसं स्त्रुतम् ॥१२२ ।। यं दृष्ट्वा संप्रनृत्तोऽहं हर्षेण महताऽन्वितः तं प्रहस्याऽब्रवीद्देव ऋषि रागेण मोहितम् ॥१२३॥ अहं तु विस्मयं विप्र न गच्छामीति पश्य माम् । एवमुक्त्वा नरश्रेष्ट महादेवेन धीमता ॥१२४॥ अंगुल्यग्रेण राजेन्द्र स्वांगुष्टस्ताडितोऽनघ ततो भस्मक्षताद्राजनिर्गतं हिमसन्निभम् ॥ १२५॥ तद् दृष्ट्वा बीडितो राजन् स मुनिः पादयोर्गतः । नाऽन्यद्देवात्परं मेने रुद्रात्परतरं महत् ॥१२६॥ सुरासुरस्य जगतो गतिस्त्वमसि शूलधृक् । वह ऋपि हर्ग के कारण से नानने लगा और उसके करने का क्या कारण है ! यह सुनकर वह ऋवि तेज से मोहित होकर सब जड़ और चैतन्य जीव भी कहने लगा कि क्या तुमको यह भाकरस नहीं नानने लगे। यह देखकर ब्रह्मादिक देवता और ऋपियों दीखता है जो मुझ तपम्बी और धर्मज ऋपि के हाथ ने यह वृत्तान्त शिवजी से कहकर विनय की, कि आप से टपका है। मैं इमी रस को देखकर, हर्पिन होकर ऐमा यत्न कीजिये जिससे इस ऋषि का नाचना बन्द नान रहा हूँ। यह सुनकर महादेव जी ने उमग हो जाय ॥११२।१२०॥ से माहित हुए ऋपि से कहा कि मुझको इममें कोई यह सुनकर महादेव जी प्रसन्न होकर उस चात आश्चर्य की नहीं दीखती है और फिर चुटकी ऋपि के पास गये और उससे कहने लगे हे धर्मन बजाई कि जिसके बजते ही उस मम्मान से हिम महर्षि ! तुम क्यों नाच रहे हो और तुम्हारे दर्प के समान रम निकरने लगा। यह देखकर मंकणक - १८४६ म हा भारत [ वनपर्व - wrtaiRNALDETENDED त्वया सर्वमिदं सृष्टं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥१२७॥ त्वमेव सर्वान् ग्रससि पुनरेव युगक्षये देवैरपि न शक्यस्त्वं परिज्ञातुं कुतो मया ॥१२८॥ त्वयि सर्वे प्रदृश्यन्ते सुरा ब्रह्मादयोऽनघ सर्वस्त्वमसि लोकानां कर्ता कारयिता च ह ॥१२९॥ त्वत्प्रसादात्सुराः सर्वे मोदन्तीहाऽकुतोभयाः । एवं स्तुत्वा महादेवमृपिर्वचनमब्रवीत् ॥१३०॥ त्वत्प्रसादान्महादेव तपो मे न क्षरेत वै ततो देवः प्रहृष्टात्मा ब्रह्मर्षिमिदमब्रवीत् ॥१३१॥ तपस्ते वर्धतां वित्र मत्प्रसादात्सहस्त्रधा आश्रमे चेह वत्स्यामि त्वया सह महामुने ॥१३२॥ सप्तसारस्वते स्नात्वा अचयिष्यन्ति ये तु माम् । न तेषां दुर्लभं किंचिदिह लोके परत्र च ॥१३३॥ सारस्वतं च ते लोकं गमिष्यन्ति न संशयः । एवमुक्त्वा महादेवस्तत्रैवाऽन्तरधीयत ॥१३४॥ ततरत्वोशनसं गच्छेत्रिषु लोकेपु विश्रुतम् यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयश्च तपोधनाः ॥१३५॥ कार्तिकेयश्च भगवास्त्रिसन्ध्यं किल भारत ऋपिरजित होकर शिव जी के चरणों पर गिर पड़े । हो ॥१२१०१३०॥ और उनको सर से रड़ा जानकर उनकी स्तुति करने हो ।तुम्ह। ३।०३पा से सब देवता आनन्दपूर्वक लगे-हे शूलधारी ! तुम इस सुर और असुररूपी जगत् रहते हैं। अब आप मुझपर भी ऐसी कृपा कीजिये की गति और सर चर और अनर जीवों के उत्पन्न जिससे मेरा तप नाश न हो। यह सुनकर शिव करनेवाले दो । महापत्य के आने पर सर विश्व जी प्रसन्न होकर बोले हे ऋपि ! मेरी कृपा से तेरा तुमही में लय हो जाता है। तुम्हारी महिमा को तप सहस गुणित होकर बढ़ेगा और तेरे साथ मैं देयता भी नहीं जानते हैं मेरी तो क्या सामथ्यं है भी हम आश्रम में वास करूँगा और इस सारस्वत ब्रह्मादिक देवता के भी तुम ही कारण है। और जगत् | में जो मनुष्य स्नान करके मेरी पूजा करेगा उसको और सपनों के करानेवारे भी तुम ही इस लोक और परलोक में कोई बातु मिलना दुर्लभ अध्याय ८३] म हा मारत १८४७ २८ - सांनिध्यमकरोन्नित्यं भार्गवप्रियकाम्यया ॥१३६॥ कपालमोचनं तीर्थं सर्वपापप्रमोचनम् तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥१३७॥ अग्नितीर्थं ततो गच्छेत्तत्र स्नात्वा नरर्षभ अग्निलोकमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ॥१३८॥ विश्वामित्रस्य तत्रैव तीर्थं भरतसत्तम तत्र स्नात्वा नरश्रेष्ठ ब्राह्मण्यमधिगच्छति ॥१३९॥ ब्रह्मयोनिं समासाद्य शुचिः प्रयतमानसः तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र ब्रह्मलोकं प्रपद्यते ॥१४॥ पुनात्यासप्तमं चैव कुलं नाऽस्त्यत्र संशयः । ततो गच्छेत राजेन्द्र तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् ॥१४१॥ पृथूदकमिति ख्यातं कार्तिकेयस्य वै नृप तत्राऽभिषेकं कुर्वीत पितृदेवार्चने रतः ॥१४२॥ अज्ञानाज्ज्ञानतो वापि स्त्रिया वा पुरुपेण वा । यत्किंचिदशुभं कर्म कृतं मानुपबुद्धिना ॥ १४३॥ तत्सर्व नश्यते तत्र स्नातमात्रस्य भारत अश्वमेधफलं चाऽस्य स्वर्गलोकं च गच्छति ॥१४४ ॥ नहीं होगा और अन्त समय में उसको सागम्वत । हे जिममें म्नान करने से मनुष्य ब्राह्मण हो जाना लोक निश्चय मिलेगा। यह कहकर महादेव जी वहीं | है ॥१३६।१४०॥ अन्तर्द्वान हो गये ॥१३१४१३५|| वहां से चलकर ब्रह्मयोनि तीर्थ की यात्रा करे इम तीर्थ से फिर शुक के तीर्थ की यात्रा करे। जिसमें स्नान करने से मनुष्य को ब्रह्मलोक मिलता , जो तीनों लोकों में विन्यात है और जहां ब्रह्मादिक | है और उसकी सात पीढ़ियां पवित्र हो जानी हैं । देवता और बड़े बड़े तपम्मी ऋषि और कार्तिकेय इम तीर्थ के आगे पृथूदक नाम कार्तिकेय जी का १ जी रहा करते हैं। वहीं कपालमोचन नाम तीर्थ भी तीर्थ है जो तीनों लोकों में विख्यात है। जो मनुष्य है। उसमें म्नान करने में मब पार दूर हो जाते | देवना और पिनरों के पूजन में भक्ति रखते हैं व है। हमके आगे अमितीर्थ है। उसमें स्नान करने टम तीर्थ में म्नान करने मे मी अथवा पुरुष कोई मे मनुष्य के कुल का उद्धार होता है और टमा भी हो सब जान अथवा अनान से किये हुए पार्टी में , अपिशेक मिलता है। वहीं विश्वामित्र का भी तीर्थ | हट जाने हैं और अश्वमेघ यज्ञ करने का फल पार - १८४८ म हा मारत [ धनपर्व - पुण्यमाहुः कुरुक्षेत्रं कुरुक्षेत्रात्सरस्वती सरस्वत्याश्च तीर्थानि तीर्थेभ्यश्च पृथूदकम् ॥१४५ ॥ उत्तमं सर्वतीर्थानां यस्त्यजेदात्मनस्तनुम् पृथूदके जप्यपरो नैव श्वो मरणं तपेत् ॥१४६॥ गीतं सनत्कुमारेण व्यासेन च महात्मना एवं सनियतं राजन्नभिगच्छेत्पृथूदकम् ॥१४७॥ पृथूदकात्तीर्थतम नाऽन्यत्तीर्थ कुरूद्वह तन्मेध्यं तत्पवित्रं च पावनं च न संशयः ॥१४८॥ तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति येऽपि पापकृतो नराः । पृथूदके नरश्रेष्ठ एवमाहुर्मनीषिणः ॥१४९॥ मधुस्रव च तत्रैव तीर्थं भरतसत्तम तत्र स्नात्वा नरो राजन् गोसहस्रफलं लभेत् ॥१५०॥ ततो गच्छेन राजेन्द्र तीर्थ मेध्यं यथाक्रमम् । सरस्वत्यारुणायाश्च संगमं लोकविश्रुतम् ॥१५१॥ त्रिरात्रोपोपितः स्नात्वा मुच्यते ब्रह्महत्यया । अग्निष्टोमातिरानाभ्यां फलं विन्दति मानवः ॥१५२ ॥ आसप्तमं कुलं चैव पुनाति भरतर्षभ अर्धकीलं च तत्रेव तीर्थ कुरुकुलोद्वह ॥१५३॥ स्वगिक पाते हैं। सब तीर्थों से बढ़कर छुरक्षेत्र पावन है और सब तार्थों स बड़ा है । ज्ञानी लोग का माहात्म्य है । उससे अधिक सरस्वती का है। कहते हैं कि इस तीर्थ में स्नान करने से पापी मनुष्य मरम्बनी से अधिक सरस्वती के तीर्थों का है और उन को भी स्वर्गलोक मिरता है ॥१४१।१५०॥ तीर्थों से भी अधिक माहात्म्य पृथूक तीर्थ का है। वहीं मधुश्रय तीर्थ भी है। उसमें स्नान करने इमसे यह तीर्थ सर्वोत्तम है। इसमें शरीर त्यागने से मनुष्य को सहस गोदान करने का फर मिलता मे जप करने वारा मनुष्य मरता नहीं है । पृथूदक है। यहा से चलकर मेध्य तीर्थ की यात्रा करे जद्दा का यह माहास्य व्याा जी और सनसुमार जी ने सरस्वती और भरणा नदियों का सजग है । इसमें वर्णन किया है। इसमें इस तीर्थ की यात्रा अवश्य स्नान करने और तीन रानि वसने से मनुष्य नाम करनी चादिये। यह नीर्थ मन्देश दिन, पवित्र और दत्यासे हट जाता है और अनियोग और अतिरात्र ।
अध्याय ८३] म हा मारत १८४९ NoteeMuncencreennetvc.cameer विप्राणामनुकम्पार्थ दर्भिणा निर्मितं पुरा व्रतोपनयनाभ्यां चाऽप्युपवासेन वाऽप्युत ॥१५४॥ क्रियामन्त्रश्च संयुक्तो ब्राह्मणः स्यान्न संशयः । क्रियामन्त्रविहीनोऽपि तत्र स्नात्वा नरर्षभ चीर्णवतो भवेद्विद्वान्दृष्टमेतत्पुरातनैः ॥१५५॥ समुद्राथापि चत्वारः समानीताश्च दर्भिणा । तेषु स्नातो नरश्रेष्ठ न दुर्गतिमवाप्नुयात् ॥१५६ ॥ फलानि गोसहस्राणां चतुर्णां विन्दते च सः । ततो गच्छेत धर्मज्ञ तीर्थं शतसहस्रकम् ॥१५७ ।। साहस्रकं च तत्रैव द्वे तीर्थे लोकविश्रुते । उभयोर्हि नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥१५८॥ दानं वाऽप्युपवासो वा सहम्रगुणितं भवेत् । ततो गच्छेत राजेन्द्र रेणुकातीर्थमुत्तमम् ॥१५९ ॥ तीर्थाभिषेकं कुर्वीत पितृदेवार्चने रतः सर्वपापविशुद्धात्मा अग्निष्टोमफलं लभेत् ॥१६॥ विमोचनमुपस्पृश्य जितमन्युर्जितेन्द्रियः प्रतिग्रहकृतैर्दोषैः सर्वैः स परिमुच्यते ॥१६१॥ ततः पञ्चवटीं गत्वा ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः । यज्ञों के करने का फल पाता है और उसकी सात है। वहीं पर सहस्रक और शत सहस्रक तीर्थ भी पीदिये भी पवित्र हो जाती है । इसी तीर्थ के निकट है। मनुष्य उनमें स्नान करने से सहस्र गोदान करने अर्घकीलक नामी तीर्थ भी है, जिसको दर्भ ऋषि का फल पाता है ॥१५१११६०॥ ने चारों समुद्र लाकर पहले समय में ब्राह्मणों पर इन तीर्थों में दान और व्रत करने का भी फल कृपा करके निर्माण किया था। इसमें स्नान करने सहस्र गुणा होता है । यहां से फिर रेणुका तीर्थ से क्रिया और मन्त्रहीन ब्राह्मण मी फिर ब्राह्मण्यता की यात्रा करे और उसमें देवता और पितरों के पूजन को पाता है । यह बात पुराने मनुष्यों ने देखी है । ' में प्रीति रखनेवाला यात्री स्नान करे ऐसा करने से है इसमें स्नान करनेवाले की दुर्गनि नहीं होती है और मनुष्य की आत्मा शुद्ध हो जाती है और अमिष्टोम मनुष्य को चार सहस्र गोदान करने का फल मिलता यज्ञ करने का फल मिलता है । फिर मनुप्य क्रोध tercapovovo Convencore - VRNI r- १८५० [ वनपर महाभारत ८८८ spennavavalavaattainenn पुण्येन महता युक्तः सतां लोके महीयते ॥१६२॥ यत्र योगेश्वरः स्थाणुः स्वयमेव वृषध्वजः तमर्चयित्वा देवेशं गमनादेव सिध्यति ॥१६३॥ तैजसं वारुणं तीर्थं दीप्यमानं स्वतेजसा यत्र ब्रह्मादिभिर्देवैर्ऋपिभिश्च तपोधनैः ॥१६४॥ सैनापत्येन देवानामभिषिक्तो गुहस्तदा तैजसस्य तु पूर्वेण कुरुतीर्थं कुरूद्वह ॥१६५॥ कुरुतीर्थे नरः स्नात्वा ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः सर्वपापविशुद्धात्मा ब्रह्मलोकं प्रपद्यते ॥१६६॥ स्वर्गद्वारं ततो गच्छेन्नियतो नियताशनः स्वर्गलोकमवाप्नोति ब्रह्मलोकं च गच्छति ॥ १६७॥ ततो गच्छेदनरकं तीर्थसेवी नराधिप तत्र स्नात्वा नरो राजन्न दुर्गतिमवाप्नुयात् ॥१६८ ॥ तत्र ब्रह्मा स्वयं नित्यं देवैः सह महीपते अन्वास्ते पुरुषव्याघ्र नारायणपुरोगमैः ॥ १६९॥ सान्निध्यं तत्र राजेन्द्र रुद्रपन्याः कुरूद्वह । अभिगम्य च तां देवी न दुर्गतिमवाप्नुयात् ॥१७०॥ तत्रैव च महाराज विश्वेश्वरमुमापतिम् करना छोड़कर इन्द्रियों को अपने वश में करके । ब्रह्मादिक देवता और तपस्वी ऋपियों ने स्यामि विमोचन तीर्थ में जाकर स्नान करे उसमें स्नान करने । कार्तिक का देवताओं की सेना के सेनापति होने का स दान रेने का दोष दूर हो जाता है । वहा से , अभिषेक किया था। उससे पूर्व की दिशा में कुरु पिर पचवटी तीर्थ को ज्ञाय और नावारी जितेन्द्रिय तीर्थ है। इन दोनों में स्नान करने से और ब्रह्मनर्य होकर रहे । ऐसा करने से मनुष्य को सत्पुरुषों के ! और इन्द्रियों को जीतकर रहने से मनुष्य सब पापों रोक में आदर सहित वाम मिरना है। इस स्थान | से छूटकर पवित्र हो जाता है और अन्त समय पर पर श्री योगेश्वर शिव जी आप रहते हैं उनका पूजन | उसको ब्रह्मरोक मिलता है । यहा से आग म्वर्गद्वार कान में मनुष्य को मिद्धि प्राप्त होती है और वहीं तीर्थ की यात्रा करे जहा स्नान करने से मनुप्प को जम नाम का देवता का भी तीर्थ है, जहा धर्म और ब्रह्मरोक मिलता है। वहा से अनरक A.......
अध्याय ८३] म हा मारत १८५१ सर - NaNAGANAGeneral अभिगम्य महादेवं मुच्यते सर्वकिल्विषैः ॥१७१॥ नारायणं चाऽभिगम्य पद्मनाभमरिन्दम राजमानो महाराज विष्णुलोकं च गच्छति ॥१७२॥ तीर्थेषु सर्वदेवानां स्नातः स पुरुषर्षभ सर्वदुःखैः परित्यक्तो द्योतते शशिवन्नरः ॥१७३॥ ततः स्वस्तिपुरं गच्छेत्तीर्थसेवी नराधिप प्रदक्षिणमुपावृत्य गोसहस्रफलं लभेत् ॥१७४॥ पावनं तीर्थमासाद्य तर्पयेपितृदेवताः अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति भारत ॥१७५॥ गङ्गाह्रदश्च तत्रैव कूपश्च भरतर्षभ तिस्रः कोट्यस्तु तीर्थानां तस्मिन्कूपे महीपते ॥१७६ ॥ तत्र स्नात्वा नरो राजन् स्वर्गलोकं प्रपद्यते । आपगानां नरः स्नात्वा अर्चयित्वा महेश्वरम् ॥१७७॥ गाणपत्यमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ततः स्थाणुवटं गच्छेत्रिपु लोकेषु विश्रुतम् ॥ १७८ ।। तत्र स्नात्वा स्थितो रात्रिं रुद्रलोकमवाप्नुयात् । बदरीपाचनं गच्छेद्वसिष्ठस्याऽऽश्रमं गतः ॥१७९॥ तीर्थ को जाय जिसमें स्नान करने से दुर्गति नहीं | दुःख दूर हो जाते हैं और उसकी चन्द्रमा की सी होती है ॥१६१।१७०॥ प्रभा हो जाती है । इस तीर्थ से तीर्थसेवी स्वस्तिपुर इस तीर्थ में ब्रह्मादिक देवता नारायण को आगे को जाय जिसकी परिक्रमा करने से सहस गोदान , करके रहते हैं। वहीं रुदपली तीर्थ भी है, जहां जाकर करने का फल मिलता है । और वहां से पावन तीर्थ रुद्रपनी का ध्यान करने से मनुष्य की दुर्गति नहीं | को चला जाय जहां देवता और पितरों को तृप्त करने होती है और यहीं विश्वेश्वर उमापति और पद्मनाभ से मनुष्य को अग्निष्टोम यज्ञ करने का फल मिलता नारायण के मी तीर्थ हैं उनमें स्नान करने और है । इस तीर्थ के निकट गङ्गाकुण्ड और गहाकूप है शिव जी और नारायण की पूजा करने से मनुष्य जहां तीन कोटि तीर्थ वास करते है। उनमें स्नान पापों से मुक्त हो जाता है और अन्त समय में उसको करने से मनुष्य को स्वर्गरोक मिलता है। इस तीर्थ है विष्णुलोक मिलता है। यहां मे फिर देवता के तीर्थ | के आगे आपगा तीर्थ है। वहां स्नान करने और महा- की यात्रा करे जहां स्नान करने से मनुष्य के सब | देव जी की पूजा करने से मनुष्य गाणपत्य पद पाता १८५२ म हा मारत [ बनपर्व N - &AMANNAAGINNI बदरीन्भक्षयेत्तत्र त्रिरात्रोपोपितो नरः सम्यग्द्वादश वर्षाणि वदरीन्भक्षयेत्तु यः ॥१८॥ त्रिरात्रोपोपितस्तेन भवेत्तुल्यो नराधिप रुद्रमार्ग समासाद्य तीर्थसेवी नराधिप ॥१८१॥ अहोरात्रोपवासेन शक्रलोके महीयते एकरात्रं समासाद्य एकरात्रोपितो नरः ॥१८२॥ नियतः सत्यवादी च ब्रह्मलोके महीयते ततो गच्छेत राजेन्द्र तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् ॥१८३॥ आदित्यस्याऽऽश्रमो यत्र तेजोराशेर्महात्मनः । तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा पूजयित्वा विभावसुम् ॥ १८४ ॥ आदित्यलोकं ब्रजति कुल चैव समुद्धरेत् । सोमतीर्थे नरः स्नात्वा तीर्थसेवी नराधिप ॥१८५॥ सोमलोकमपाप्नोति नरो नाऽस्त्यत्र संशयः ततो गच्छेत धर्मज्ञ दधीचस्य महात्मनः ॥१८६॥ तीर्थं पुण्यतमं राजन् पावनं लोकविश्रुतम् । यत्र सारस्वतो यातः सोऽगिरास्तपसो निधिः ॥१८७॥ तस्मिस्तीर्थे नरः स्नात्वा वाजिमेधफलं लभेत् । सारस्वती गतिं चैव लभते नात्र संशयः ॥१८८॥ है और अपने कुल का उद्धार करता है । वहा से पिर रात दिन उपवास करने से इन्द्ररोक मिलता है और स्थाणुवट तीर्थ की यात्रा करे ॥१७१।१८०॥ वहा से एकरात्र तीर्थ में जाकर एक रात्रि वास करे जहा स्नान करने और रात्रि में वास करने से मनुष्य ऐसा करनेवाले को ब्रह्मलोक मिरता है । यहा से फिर को रोक मिरता है। यहा से बदरीपाचन नाम सूर्याश्रम तीर्थकी यात्रा करे जो तीनों लोकों में विख्यात वशिष्ठ जी के आश्रम को जाय । वहा तीन रात्रि वास | है। यहा स्नान और सूर्य की पूजा करने से मनुष्य के कर केवर बदरी फल अर्थात् बेर खाकर रहे । उस सूर्यते।क मिलता है और उसके कुल का उद्धार हो म्थान पर तीन रात्रि पर खाने का फल और स्थानों जाता है। वहीं चन्द्रतीर्थ भी है उसमें स्नान करने पर बारह वर्ष वैरम्बाकर रहने के यगयर है। इस नार्थ से निस्सदेह उसे चन्द्ररोक मिलता है। इस तीर्थ मनरार रद मार्ग सौध को जाय । जहा एक के पीछे यात्री को दर्धाचि नामी महारमा ऋषि के तीर्थ - .. ALWARAULA अध्याय ८३] म हा भारत १८५३ ८४. Vermete८ ततः कन्याश्रमं गच्छेन्नियतो ब्रह्मचर्यवान् । त्रिरात्रोपोषितो राजन्नियतो नियताशनः ॥१८९॥ लभेत्कन्याशतं दिव्यं स्वर्गलोकं च गच्छति । ततो गच्छेत धर्मज्ञ तीर्थं संनिहतीमपि तत्र ब्रह्मादयो देवा ऋपयश्च तपोधनाः मासि मासि समायान्ति पुण्येन महताऽन्विताः॥१९१ । सनिहत्यामुपस्पृश्य राहुग्रस्ते दिवाकरे अश्वमेधशतं तेन तत्रेष्टं शाश्वतं भवेत् ॥१९२॥ पृथिव्यां यानि तीर्थानि अन्तरिक्षचराणि च नद्यो ह्रदास्तडागाश्च सर्वप्रस्रवणानि च ॥१९३॥ उदपानानि वाप्यश्च तीर्थान्यायतनानि च निःसंशयममावास्यां समेष्यन्ति नराधिप ॥१९४॥ मासि मासि नरव्याघ्र संनिहत्यां न संशयः । तीर्थ सन्निहनादेव सन्निहत्येति विश्रुता तत्र स्नात्वा च पीत्वा च स्वर्गलोके महीयते । अमावास्यां तु तत्रैव राहुग्रस्ते दिवाकरे ॥ १९६॥ यः श्राद्धं कुरुते मर्त्यस्तस्य पुण्यफलं शृणु । अश्वमेधसहस्रस्य सम्यगिष्टस्य यत्फलम् ।। १९७॥ को जाना चाहिये जो तीनों लोकों में विख्यात पुण्य वहां से फिर सन्निहती तीर्थ की यात्रा करे । वहां कारी पवित्र स्थान है और जहां बड़े तपस्वी अंगिरा ब्रह्मादिक देवता और बड़े बड़े तपस्वी ऋपि प्रत्येक ऋषि को सारस्वती गति प्राप्त हुई थी उस तीर्थ में महीने में आया करते हैं । इस तीर्थ में सूर्य ग्रहण स्नान करने से मनुष्य को सारस्वती गति और अश्वमेघ में म्नान करने से सौ अश्वमेध यज्ञ करने का फल यज्ञ करने का फल मिलता है ।।१८१।१९०॥ मिलता है और पृथ्वी पर जो जो तीर्थ, नदी, कुण्ड, उसके पीछे कन्याश्रम तीर्थ को जाय और तड़ाग, झरने, बावली और देवताओं के स्थान हैं नियतामन ब्रह्मचर्य से वहां तीन रात्रि वाम करे। वे सब प्रति मास की अमावस्या को इस सन्निहती ऐसा करने से मनुष्य को सौ दिव्य कन्या मिलती है ! तीर्थ में आया करते हैं। इसी कारण से इस तीर्थ का और अन्त समय में यह स्वर्गलोक को जाता है। नाम सन्निहती है। इस तीर्थ में स्नान करने से HABIERIALetweerentRAN १८५४ [ वनपत्र म हा भारत NC१८V. CिV. .. SVAATIA DAN । स्नात एव समाप्नोति कृत्वा श्राद्धं च मानवः । यत्किच्चिदुष्कृतं कर्म स्त्रिया वा पुरुषेण वा ॥१९८॥ स्नातमात्रस्य तत्सर्व नश्यते नात्र संशयः । पद्मवर्णेन यानेन ब्रह्मलोकं प्रपद्यते अभिवाद्य ततो यक्षं द्वारपालं मचक्रुकम् । कोटितीर्थमुपस्पृश्य लभेद्वहुसुवर्णकम् ॥ २००॥ गङ्गाह्रदश्च तत्रैव तीर्थ भरतसत्तम तत्र स्नायीत धर्मज्ञ ब्रह्मचारी समाहितः ॥२०१॥ राजसूयाश्वमेधाभ्यां फलं विन्दति मानवः पृथिव्यां नैमिषं तीर्थमन्तरिक्षे च पुष्करम् ॥२०२।। त्रयाणामपि लोकानां कुरुक्षेत्रं विशिष्यते पांसवोऽपि कुरुक्षेत्राद्वायुना समुदीरिताः ॥२०३।। अपि दुष्कृतकर्माणं नयन्ति परमां गतिम् । दक्षिणेन सरस्वत्या उत्तरेण दृपद्धतीम् 11२०४॥ ये वसन्ति कुरुक्षेने ते वसन्ति त्रिविष्टपे कुरुक्षेत्रे गमिप्यामि कुरुक्षेत्रे वसाम्यहम् ॥ २०५॥ अप्येकां वाचमुरमृज्य सर्वपापैः प्रमुच्यते । मनुष्य को म्वर्गलोक मिलता है और जो अमावस्या फल पाता है। इस पृथ्वी पर नैमिप तीर्थ, आकाश को सूर्यग्रहण में स्नान और श्राद्ध करे तो सहस में पुटकर और तीनों लोकों में कुरुक्षेत्र बड़े तीर्थ हैं। सवयन करने का पल पाता और स्त्री अथवा इनमें से फुरुक्षेत्र का ऐसा माहात्य है कि पापी पुरप कोई हो हम नीर्थ में स्नानमात्र करने से मय मनुष्य पर वहां की धूल भी हया से उड़कर जा पड़े के राय पार दर हो जाते हैं और पनवर्ण के विमानों तो उमको परमगति प्राप्त होती है। इस कुरुक्षेत्र में में पेटकर प्रकको जाते हैं ॥१११।२०१॥ पद्वती नदी के उचर और सरम्यती नदी के दक्षिण इस उपगन्न मनाक गाम यज्ञ द्वारपाल को में जो मनुष्य रहते हैं उनका रहना म्यर्ग के तुल्य है पदना ने और काटिना में स्नान करने से बहुत । और जो मनुष्य यह भी कहते हैं कि मैं कुरक्षेत्र को मा सुवर्ण मिताह इमानी रे निकट गलाण्ट । जाऊँगा अथवा परक्षेत्र में याग करूँगा यह गी सप नार्थ भी है। मनुध्य पसीध में प्रधर्य ग नान पापों से मुक्त हो जाते हैं। यह पुरुक्षेत्र प्रमा जी कान मे राप्रपा अधध के करने का की येती है और उसमें पुण्यात्मा मनुष्य और तावी । ~ अध्याय ८४] म हा भारत १८५५ २३ ८ ब्रह्मवेदी कुरुक्षेत्रं पुण्यं ब्रह्मर्पिसेवितम् ॥ २०६॥ तस्मिन्वसन्ति ये मा न ते शोच्याः कथंचन ।। २०७॥ तरन्तुकारन्तुकयोर्यदन्तरं रामहृदानां च मचक्रुकस्य च । एतत्कुरुक्षेत्रसमन्तपञ्चकं पितामहस्योत्तरवेदिरुच्यते ॥२०८॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि तीर्थयात्रापर्वाण पुलस्त्यतीर्थयात्रायां त्र्यशीतितमोऽध्याय ॥ ८३॥ ऋपि रहते हैं। और वहां के रहनेवालों का किमी, जी के कुण्ड और चंचकुक का अन्तर है उसको अवस्था में शोच करना उचित नहीं है और इस समन्त पञ्चक नाम से ब्रह्मा जी की उत्तर वेदी कहते कुरुक्षेत्र में जिस स्थान पर तरन्तु, तारन्तु परशुराम : हैं ॥२०२।२०८॥ वनपर्व का तिरामीवां अध्याय समाप्त हुआ ।। ८३ ॥ .. BRANnwBAI अथ चतुशीतितमोऽध्यायः ।। ८४ ॥ पुलम्त्य उयान-- ततो गच्छेन्महाराज धर्मतीर्थमनुत्तमम् यत्र धर्मो महाभागस्तप्तवानुत्तमं तपः तेन तीर्थं कृतं पुण्यं स्वेन नाम्ना च विश्रुतम् । तत्र स्नात्वा नरो राजन् धर्मशीलः समाहितः ॥ २ ॥ आसप्तमं कुलं चैव पुनीते नात्र संशयः ततो गच्छेत राजन्द्र ज्ञानपावनमुत्तमम् ॥ ३ ॥ अग्निष्टोममवाप्नोति मुनिलोकं च गच्छति सौगन्धिकवनं राजंस्ततो गच्छेत मानवः तत्र ब्रह्मादयो देवा ऋपयश्च तपोधनाः सिद्धचारणगन्धर्वाः किन्नराश्च महोरगाः चौरासीवां अध्याय ॥ ८४॥ पुलम्त्य जी बोले-हे राजा भीम ! उक्त तीर्थों ) टोम यज्ञ के करने का फल पाता है और अन्तकाल की यात्रा करके धर्मार्थ की यात्रा करे जहा धर्मराज | में मुनिलोक को जाता है। वहां से फिर मौगन्धिन ने बड़ी तपस्या की थी और अपने नाम से उस वन को चला जाय ॥१४॥ म्यान को पुण्यतीर्थ बनाया था। धर्मात्मा मनुष्य उस जहा ब्रह्मादिक देवता, तपम्बी, ऋषि, मिद्ध, तीर्थ में म्नान करने से निम्सन्देह अपनी सात पीढियों चारण, गन्धर्व, विन्नर और महोरंग आया करते हैं। १ को पवित्र करता है। इसके उपरान्त ज्ञानपावन नाम उस वन में जाते ही मनुष्य के सब पाप दूर हो जाने तीर्थ को जावे। वहाम्नान करनेवाला मनुष्य अग्नि- हैं। वहा मे आगे प्लक्षावा सरस्वती नाम से विम्यात NALLA म हा भारत [ वनपर्व AVAIAL SharasANATANUAGAURAVAIWWiN तद्वनं प्रविशन्नेव सर्वपापैः प्रमुच्यते ततश्चापि सरिच्छ्रेष्ठा नदीनामुत्तमा नदी ॥ ६ ॥ प्लक्षादेवी स्मृता राजन् पुण्यादेवी सरस्वती । तत्राऽभिषेकं कुर्वीत वल्मीकान्निःस्मृते जले ॥ ७ ॥ अर्चयित्वा पितृन्देवानश्वमेधफलं लभेत् ईशानाध्युपितं नाम तत्र तीर्थं सुदुर्लभम् ॥ ८ ॥ पट्सु शम्यानिपातेपु वल्मीकादिति निश्चयः । कपिलानां सहस्त्रं च वाजिमेधं च विन्दति ॥ ९ ॥ तत्र स्नाखा नरव्याघ्र दृष्टमेतत्पुरातने सुगन्धा शतकुम्भां च पञ्चयक्षां च भारत अभिगम्य नरश्रेष्ठ स्वर्गलोके महीयते त्रिशुलखातं तत्रैव तीर्थमासाद्य भारत तत्राऽभिषेकं कुर्वीत पितृदेवार्चने रतः गाणपत्यं च लभते देहं त्यक्त्वा न संशयः ॥ १२ ॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र देव्याः स्थानं सुदुर्लभम् । शाकम्भरीति विग्याता त्रिपु लोकेपु विश्रुता ॥ १३ । दिव्यं वर्पसहस्रं हि शाकेन किल सुव्रता आहारं सा कृतवती मासि मासि नराधिप ॥ १४ ॥ एक नही मत्र नदियों में उत्तम है। उममें उम स्थान उनमें स्नान करने से मनुष्य को स्वर्गलोक मिलता पर स्नान करने से जहा वल्मीक से जल निकलता है और इन्हीं तीयों के निकट त्रिशूलखात नामी तीर्थ है और देवता और पितरों का पूजन करने से अश्वमेध भी है । देवता और पितरों के पूजन में प्रीति रखने- यन करने का फल मिरता है। उसी स्थान पर ईशाना- याले मनुष्य को उसमें स्नान करने से गाणपत्य पद 'युपि नाम एक बड़ा दुर्लभ तीर्थ परमीक से कुछ मिलता है । यहा से शाकम्भरी देवी के बड़े दुर्लभ दूर पर है। यहा स्नान करने में सहस गोदान और स्थान की यात्रा करे जो तीनी रोकी में विख्यात अमेध यन करने का फल मिलता है ।।५।। है । उस सुनता देवी ने महम वर्ष तक शाक का इस मान को पुराने रोगों ने दम्या है और वहीं भहार किया था और जो तपम्बी प्रापि उसके पास गुगन्धा, गनग्मा और पयशा नाम तीर्थ भा है। उसकी भक्ति के कारण से गये थे उनको भी उस देवी MeAMVAwarene ।
अध्याय ८४] महा मारत १८५७ Varamenneorang wacanavana, ऋपयोऽभ्यागतास्तत्र देव्या भक्त्या तपोधनाः । आतिथ्यं च कृतं तेपां शाकेन किल भारत ततः शाकम्भरीत्येव नाम तस्याः प्रतिष्टितम् । शाकम्भरी समासाद्य ब्रह्मचारी समाहितः त्रिरात्रमुपितः शाकं भक्षयित्वा नरः शुचिः । शाकाहारस्य यत्किंचिद्वादशभिः कृतम् ॥१७॥ तत्फलं तस्य भवति देव्याश्छन्देन भारत ततो गच्छेत्सुवर्णाख्यं त्रियु लोकेपु विश्रुतम् ॥ १८ ॥ तत्र विष्णुः प्रसादार्थ रुद्रमाराधयत्पुरा वरांश्च सुवहुँल्लेभे दैवतेषु सुदुर्लभान् उक्तश्च त्रिपुरलेन परितुष्टेन भारत अपि च त्वं प्रियतरो लोके कृष्ण भविष्यसि ॥ २० ॥ वन्मुखं च जगत्सर्व भविष्यति न संशयः तत्राऽभिगम्य राजेन्द्र पूजयित्वा वृपध्वजम् ॥ २१ ॥ अश्वमेधमवाप्नोति गाणपत्यं च विन्दति धूमावती ततो गच्छेत्रिरात्रोपोपितो नरः ॥ २२ ॥ मनसा प्रार्थितान्कामाँल्लभते नाऽन्न संशयः देव्यास्तु दक्षिणार्धेन रथावर्तो नराधिप ॥ २३ ॥ ने शाक ही का भोजन कराया था इस कारण से उमका दुर्लभ वरदान पार्य थे। उनमें से दो यह थे कि संसार नाम शाकम्भर्ग विम्यात हुआ। जो मनुष्य उस देवी में तुमको मव प्रियतर मानेंगे और सब जगत् तुमको के स्थान पर जाकर शाक का आहार करके तीन प्रधान कर तुम्हारी पूजा करेगा। उम तीर्थ में जाकर गत्रि वाम करता है उसको देवी की कृपा मे बारह शिव जी की पूजा करने से मनुप्य को अश्वमेघ यज्ञ वर्ष तक शाक खाकर रहने का फल मिलता है । करने का फल मिलता है और वह अन्तकाल में गिव इम स्थान से नीर्थमेवी को सुवर्णास्य तीर्थ की यात्रा जी का गण वनना है। यहां से फिर घूमावती तीर्थ करनी चाहिये जो तीनों लोकों में विम्यान है और को जाय जहां तीन रात्रि रहने से मनुष्य की मब जहां विष्णु ने निव जी को प्रमन्न करने के लिये मनोकामना पूरी होती हैं। इम म्धान मे दक्षिण की तपस्या की थी और देवताओं के बीच में बहुत मे ओर रथावर्त नामी तीर्थ है ॥१०॥२३॥ WALAIMANIRWAURVASAIANDR.30 - --- LANGU १८५८ म हा मारत [ वनपर्व HarveeBaari तत्राऽरोहेत धर्मज्ञ श्रद्दधानो जितेन्द्रियः । महादेवप्रसादाद्धि गच्छेत परमां गतिम् ॥ २४ ॥ प्रदक्षिणमुपावृत्य गच्छेत भरतर्षभ धारा नाम महाप्राज्ञः सर्वपापप्रमोचनीम् ॥ २५॥ तत्र स्नात्वा नव्याघ्र न शोचति नराधिप । ततो गच्छेत धर्मज्ञ नमस्कृत्य महागिरिम् ॥ २६ ॥ स्वर्गद्वारेण यत्तुल्यं गङ्गाद्वारं न संशयः । तत्राभिषेकं कुर्वीत कोटितीर्थे समाहितः ॥ २७ ॥ पुण्डरीकमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् उप्यैकां रजनीं तत्र गोसहस्रफलं लभेत् ॥ २८ ।। सप्तगंगे त्रिगङ्गे च शक्रावर्ते च तर्पयन् । देवान्पितॄश्व विधिवत्पुण्ये लोके महीयते ॥ २९ ॥ ततः कनखले स्नात्वा त्रिरात्रोपोपितो नरः । अश्वमेधमवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति कपिलावटं ततो गच्छेत्तीर्थसेवी नराधिप उपोप्य रजनी तत्र गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ३१ ॥ नागराजस्य राजेन्द्र कपिलस्य महात्मनः उमपर श्रद्धाधर्मी और जितेन्द्रिय होकर चदन मिलता है और वहीं सप्तगला, त्रिगना और शकावर्त मे गिय जी की कृपा से मनुष्य का परमगति प्राम तीर्थ भी है। उनमें विधिपूर्वक तर्पण करने से मनुष्य होती है। यहां से फिर धारा तीर्थ की यात्रा करे जो को पुण्यरोक मिलना है । इसके आगे कनखल तीर्थ पर पार्टी को दूर करनेवानगई। उममें स्नान करने। यहा म्नान करने और तीन रात्रि रहने से मनुष्य मे को शोक नहीं होता है और यहा मे महा की अश्वमेध यज्ञ करने का फल और स्वर्गवास पनि की नमसार कर गाहार तीर्थ को जारे मिलता है ॥२४॥३०॥ मी स्वर्ग के द्वार के महारावहां म्नान करने में तीर्थमेवी यहा से कपिला बट की यात्रा करे निगन्दर मनुष्य की कोटि नीथों में स्नान करने जहा एक रात्रि चाम कामे में मनुष्य को सहम । और पुगी मा पाने का फल मिलता है और गोदान कागे का फल मिलता । इसके आगे कपिल । द्वारे तुम या स्टार दोना है । इस तीर्थ में एक नामी नागराज का उत्तम साथ द उसमें स्नान करने : विवाह गीदान को पागल म गनुष्य की गदस कपिल दान करने का फल i - - अध्याय ८४ ] म हा मारत १८५९ - तीर्थं कुरुवरश्रेष्ट सर्वलोकेषु विश्रुतम् ॥ ३२॥ तत्राऽभिषेकं कुर्वीत नागतीर्थ नराधिप कपिलानां सहस्रस्य फलं विन्दति मानवः ॥ ३३ ॥ ततो ललितकं गच्छेच्छान्तनोस्तीर्थमुत्तमम् तत्र स्नात्वा नरो राजन्न दुर्गतिमवाप्नुयात् ॥ ३४ ॥ गङ्गायमुनयोर्मध्ये स्नाति यः संगमे नरः दशाश्वमेधानाप्नोति कुलं चेव समुहरेत् ॥३५॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र सुगन्धं लोकविश्रुतम् । सर्वपापविशुद्धात्मा ब्रह्मलोके महीयते ॥ ३६॥ रुद्रावर्त ततो गच्छेत्तीर्थसेवी नराधिप तत्र स्नात्वा नरो राजन् स्वर्गलोके च गच्छति ॥ ३७ गङ्गायाश्च नरश्रेष्ठ सरस्वत्याश्च सङ्गमे स्नात्वाऽश्वमेधं प्राप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ॥ ३८ ॥ भद्रकर्णेश्वरं गत्वा देवमर्च्य यथाविधि न दुर्गतिमवाप्नोति नाकपृष्टे च पूज्यते ॥ ३९ ॥ ततः कुब्जाम्रके गच्छेत्तीर्थसेवी नराधिप । गोसहस्रमवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ॥ १० ॥ अरुन्धतीवट गच्छेत्तीर्थसेवी नराधिप मिलना है। यहां से फिर गन्तनु के रलितिक नामी । करने से मनुष्य को स्वर्गलोक मिलता है । गङ्गा तीर्थ की यात्रा करे जहां स्नान करने से मनुन्य की और सरस्वती के संगम में जो मनुष्य म्नान करता दुर्गति नहीं होती। जो मनुष्य यमुना और गङ्गाके है वह अश्वमेध यज्ञ करने के फल को पाकर स्वर्ग- मङ्गम में स्नान करना है उसको दश अश्वमेध यन लोक को जाता है और मद्र कर्णेश्वर तीर्थ में जाकर करने का फल मिलता है और उसके कुल का भी शिव जी की पूजा करने से मनुश्य की दुर्गति नहीं उद्धार होता है। इस तीर्थ में म्नान करके यात्री को होती है किन्तु स्वर्गबाम पाना है । वहां मे कुञाम्रक मुगन्ध तीर्थ को जाना चाहिये जहा जाने मे मनुष्य सब तीर्थ की यात्रा करे जहां जाने मे मनुष्य को स्वर्ग- पापों मे छूटकर ब्रद्मगेक को जाता है ॥३१॥३६॥ लोक और सहस गोदान करने का फल मिलता है वहां से रुदावन तीर्थ की यात्रा करे जहां स्नान ॥३७॥४०॥ OMNAMAMALNICATIONS - १८६० म हा भारत [ वनपर्व .. - - NMot Reioaadevi सामुद्रकमुपस्पृश्य ब्रह्मचारी समाहितः अश्वमेधमवाप्नोति त्रिरात्रोपोपितो नरः गोलहस्रफलं विद्यात्कुलं चैव समुद्धरेत् ॥ ४२ ॥ ब्रह्मावर्त ततो गच्छेब्रह्मचारी समाहितः । अश्वमेधमवाप्नोति सोमलोकं च गच्छति ॥ ४३ ॥ यमुनाप्रभवं गत्वा समुपस्पृश्य यामुनम् । अश्वमेधफलं लब्ध्वा स्वर्गलोके महीयते ॥४४॥ दीसंक्रमणं प्राप्य तीर्थ त्रैलोक्यपूजितम् । अश्वमेधमवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ॥ ४५ ॥ सिन्धोश्च प्रभवं गत्वा सिद्धगन्धर्वसेवितम् । तत्रोप्य रजनीः पञ्च विन्देद्वहु सुवर्णकम् ॥ ४६ ।। अथ वेदी समासाद्य नरः परमदुर्गमाम् । अश्वमेधमवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ॥४७॥ ऋपिकुल्यां समासाद्य वासिष्ठं चैव भारत । वासिष्टी समतिक्रम्य सर्वे वर्णा द्विजातयः ॥१८॥ ऋपिकुल्यां समासाद्य नरः स्नात्वा विकल्मपः । देवान्पितॄश्चाऽर्चयित्वा ऋपिलोकं प्रपद्यते ॥ ४९ ॥ टसके पीछे धनय से रहकर यात्री अरुन्धती. जाय जो तीनों लोकों में पूज्यनीय है। यहां स्नान वट को जाय और यहां सामुद्रक में स्नान करके तीन | करने से मनुष्य का अश्वमेध यज्ञ करने का फल गानिरहे । पमा करने में मनुष्य को अधमेध यज्ञ और स्वर्गलोक मिलता है। वहां से सिन्धुप्रसव सार्थ और महम गोदान करने का फल मिरता है और को चला जाय जहां पांच रात्रि वास करने से मनुष्य टमरल का नी उद्धार हो जाना है । इम नीर्थ को बहुत मा सुवर्ण मिलता है। इस तीर्थ से वेदी मेनका प्रधान नर्थ को जाग और ब्रह्मनय से नार्थ की यात्रा करे जिसका मार्ग कठिन है। वहां जाने i. ऐमा करने में मनुष्य को अशंगेध या करने में मनुष्य को म्यागिक और अश्वमेध यज्ञ करने का चन्दक मिलना। पर मिलता है। यहां मे फिर प्रापिपुल्या और प्राय की यात्रा का। यहां स्नान करने में वाशिष्ठ ना की जाय जहां यागिनों को लंच कर मनु अर्धगध या करने का प. और वर्ग जान में तीनों यणं के मनुष्य प्रापण हो जाता है। गरमसलाद हम पदवीमंत्राण माधका वा। नान और तर्पण करने से मनुष्य को प्रापि. दाम यमुना अध्याय ८४ ] म हा मारत ८र - । BROAGActravane.rane.ence यदि तत्र वसेन्मासं शाकाहारो नराधिप भृगुतुङ्गं समासाद्य वाजिमेधफलं लभेत् ॥ ५०॥ गत्वा वीरप्रमोक्षं च सर्वपापैः प्रमुच्यते कृत्तिकामघयोश्चैव तीर्थमासाद्य भारत ॥ ५१॥ अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलमाप्नोति मानवः तत्र सन्ध्यां समासाद्य विद्यातीर्थमनुत्तमम् ॥ ५२ ।। उपस्पृश्य च वै विधां यत्र तत्रोपपद्यते महाश्रमे वसेद्रात्रि सर्वपापप्रमोचने एककालं निराहारो लोकानावसते शुभान् पष्ठकालोपवासेन मासमुष्य महालये ॥ ५४॥ सर्वपापविशुद्धात्मा विन्देवहुसुवर्णकम् दशाऽपरान्दश पूर्वान्नरानुद्धरते कुलम् अथ वेतसिकां गत्वा पितामहनिपेविताम् अश्वमेधमवाप्नोनि गच्छेदौशनसी गतिम् अथ सुन्दरिकातीर्थं प्राप्य सिद्धनिषेवितम् । रूपस्य भागी भवति दृष्टमेतत्पुरातनैः ततो वै ब्राह्मणी गत्वा ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः । लोक मिलता है । इस तीर्थ में मनुष्य को शाक महाआश्रम में एक रात्रि वास करे जो सब पापों खाकर एक मास रहना चाहिये । वहां से भृगुतुङ्ग का दूर करनेवाला है। यहां जो कोई एक काल पर्वत पर जाने से अश्वमेघ यज्ञ करने का फल मिलता उपवास करता है उसको शुभ लोक मिलते हैं और है ॥४१॥५०॥ उसके दश अगले और दश पिछले पुरुषा तर जाते और वहां से प्रमोक्ष तीर्थ में जाकर स्नान करने | हैं । इस तीर्थ से चलकर वेतसिका तीर्थ की यात्रा से सब पाप दूर हो जाते है । जो मनुष्य इस तीर्थ | करे जहां ब्रह्मा जी रहा करते हैं वहां जाने से शुक्र में कृत्तिका और मघा नक्षत्र में म्नान करता है उसकी कीमी गति और अश्वमेध करने का फल मिलता । अमिष्टोम और अतिरात्र यज्ञों के करने का फल है । वहा से सुन्दरिका तीर्थ को जाय जहां सिद्ध 2 मिलता है और वहां से विद्या तीर्थ को जाकर जो लोग रहा करत हैं। वहां स्नान करने से मनुप्य को १ कोई सन्ध्या समय में स्नान करता है उसको जो | सुन्दर स्वरूप मिलता है इस बात को पुगने लोगों , विद्या वह चाहे सोही मिलती है। यहां से चलकर ने देखा है। इस तीर्थ से फिर ब्रह्मचारी और जिते. DERN Rretera NRA १८६२ म हा भारत [ वनपर्व ५२८ पद्मवर्णन यानेन ब्रह्मलोकं प्रपद्यते ततस्तु नैमिषं गच्छेत्पुण्यं सिद्धनिषेवितम् । तत्र नित्यं निवसति ब्रह्मा देवगणैः सह ॥ ५९ ।। नैमिषं मृगयाणस्य पापस्याऽधं प्रणश्यति । प्रविष्टमात्रस्तु नरः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ६० ॥ तत्र मासं वसेद्धीरो नैमिषे तीर्थतत्परः पृथिव्यां यानि तीर्थानि तानि तीर्थानि नैमिषे ॥ ६१ ॥ कृताभिषेकस्तत्रैव नियतो नियताशनः गवां मेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति भारत ॥ ६२ ॥ पुनात्यासप्तमं चैव कुलं भरतसत्तम यस्त्यजेन्नैमिषे प्राणानुपवासपरायणः स मोदेत्सर्वलोकेपु एवमाहुर्मनीषिणः नित्यं मेध्यं च पुण्यं च नैमिषं नृपसत्तम ॥ ६४ ॥ गडोद्भदं समासाद्य त्रिरात्रोपोपितो नरः वाजपेयमवाप्नोति ब्रह्मभूतो भवेत्सदा ॥६५॥ सरस्वती समासाद्य तर्पयेपितृदेवताः सारस्वतेपु लोकेपु मोदते नात्र संशयः न्द्रिय होकर ब्राह्मणी तीर्थ को जाय । वहा स्नान | मनुष्य सब लोकों में आनन्दपूर्वक वास करता करने से मनुष्य पद्मवर्ण विमान में बठकर ब्रह्मलोक ज्ञानी लोग इस तीर्थ को बड़ा पवित्र और पुण्यतीर्थ को जाता है। वहां से नमिष तीर्थ की यात्रा करे कहते हैं। यहां से गहोद्भव तीर्थ को जावे जहां तीन जहां गिद्ध रोग और ब्रह्मादिक देवता मदा रहा करते रात्रि वास करने मे गनुप्य ब्रह्मरूप हो जाता है और साइम नधि को ढूंदनेवाले के आधे पाप और जाने- अधमेध यज्ञ करने का फल पाता है। इसके आगे थाने के सब पाप दा हो जाते है ॥५१॥६०॥ सारम्बनी तीर्थ है उसमें स्नान और तर्पण करने से हम तीर्थ में मय पृथ्वी के तीर्थ वमने हैं। मनुष्य सारम्पती तीर्थ में जाकर आनन्दपूर्वक यास जानाधसदी यहा एक माम पामर इम तीर्थ करता है। वहां से वादा तार्थ की यात्रा करे जहां नान पाताईटम गोगध या करने का फल, ब्रह्मदर्य मे एक रात्रि वास करने से मनुष्य को स्वर्ग- मिरना और जो यात्री २ वहींची माण छूट जायें नी । लोक प्राप्त होना है और देवमत्रत करने का फल पाता. -SING है।
अध्याय ८४ ] महा भारत १८६३ Ceo - ततश्च वाहुदां गच्छेब्रह्मचारी समाहितः । तत्रोप्य रजनीमेकां स्वर्गलोके महीयते ॥६७॥ देवसत्रस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति कौरव ततः क्षीरवती गच्छेत्पुण्यां पुण्यतरैर्वृताम् ॥ ६८ ॥ पितृदेवार्चनपरो वाजपेयमवाप्नुयात् विमलाशोकमासाद्य ब्रह्मचारी समाहितः तत्रोप्य रजनीमेकां स्वर्गलोके महीयते गोप्रतारं ततो गच्छेत्सरय्वास्तीर्थमुत्तमम् ॥ ७० ॥ यत्र रामो गत. स्वर्ग समृत्यवलवाहनः देहं त्यक्त्वा महाराज तस्य तीर्थस्य तेजसा ॥७१ ॥ रामस्य च प्रसादेन व्यवसायाच्च भारत तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा गोप्रतारे नराधिप ॥७२॥ सर्वपापविशुद्धात्मा स्वर्गलोके महीयते रामतीर्थे नरः स्नात्वा गोमत्यां कुरुनन्दन ॥ ७३ ॥ अश्वमेधमवाप्नोति पुनाति च कुल नरः शतसाहस्रक तीर्थं तत्रैव भरतर्षभ ॥ ७४ ॥ तत्रोपस्पर्शनं कृत्वा नियतो नियताशन: गोसहस्रफलं पुण्यं प्राप्नोति भरतर्षभ ॥ ७५॥ पुण्यात्मा सपि रहते है । वहा जाने से देवता और | मनुष्य को रामचन्द्र जी की कृपा से म्बर्गलोक मिलता पित्रों की भक्ति करनेवाले मनुष्य को वानपेय यज्ञ है और सब पापों से छूटकर पवित्र हो जाता है । के करने का फल मिलता है। उसके आगे विमा वहा से चलकर गोमती नाम रामचन्द्र जी के तीर्थ शोक तीर्थ है जहा ब्रह्मचर्य से एक रात्रि वास करने | में स्नान करे जिसमें एक लाख तीर्थ रहते है। वहा मनुप्य को स्वर्गलोक मिलता है । वहासे गोमतार म्नान करने से मनुष्य को अश्वमेध यज्ञ और सहस नाम सरयू के उत्तम तीर्थ की यात्रा करे॥६११७०॥ | गोदान करने का फल मिलता है और उसका कुल जहा पर रामचन्द्र जी अपने भृत्य, सेना और पवित्र हो जाता है । वहा से भर्तृम्थान तीर्थ को जाय वाहनों सहित देह त्यागकर उस तीर्थ के प्रभार से जहा म्नान करने से अश्वमेध यज्ञ करने का फल म्वर्गलोक को गये थे । उम तीर्य में स्नान करने से मिलता है। वहा से कोटि तीर्थ की यात्रा करे जह। eneneraneeMPERMeenvocaenim २८ - १८६४ महा मारत [ बनपर्व CN AL APALoCADAINI ततो गच्छेत राजेन्द्र भर्तृस्थानमनुत्तमम् । अश्वमेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः कोटितीर्थे नरः स्नात्वा अर्चयित्वा गुहं नृप गोसहस्रफलं विद्यात्तेजस्वी च भवेन्नरः ॥ ७७॥ ततो वाराणसी गत्वा अर्चयित्वा वृपध्वजम् । कपिलाहदे नरः सात्वा राजसूयमवाप्नुयात् ॥ ७८ ॥ अविमुक्तं समासाद्य तीर्थसेवी कुरूद्वह दर्शनाद्देवदेवस्य मुच्यते ब्रह्महत्यया ॥ ७९ ॥ प्राणानुत्सृज्य तत्रैव मोक्षं प्राप्नोति मानवः मार्कण्डेयस्य राजेन्द्र तीर्थमासाद्य दुर्लभम् ॥ ८० ॥ गोमतीगगयोश्चैव सङ्गमे लोकविश्रुते अग्निष्टोममवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ॥ ८१ ॥ ततो गयां समासाद्य ब्रह्मचारी समाहितः । अश्वमेधमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ॥ ८२ ॥ तत्राऽक्षयवटो नाम त्रिषु लोकेषु विश्रुतः । तत्र दनं पितृभ्यस्तु भवत्यक्षयमुच्यते ॥ ८३ ॥ महानद्यामुपस्पृश्य तर्पयेत्पितृदेवताः म्नान और स्वामी कार्तिक की पूजा करने से मनुष्य और अमिष्टोम यज्ञ करने का फल पाता है॥७२८१॥ तेजम्बी हो जाता है और सहस गोदान करने का यहा से गया को चला जाय। जहा ब्रह्मचर्य पल पाता है। यहा से वाराणसी तीर्थ को जाय जहा होकर जाने से मनुष्य के कुल का उद्धार अच्छी तरह शिव जी की पूना और कपिरतुण्ड में स्नान करने हा जाता है और अश्वमेध यज्ञ करने का फल पाता मे मनुष्य को राजसूय यन्न करने फल मिलता है । यहीं अक्षयवट तीर्थ भी है जहा रोग यह कहते है। हमके पास अपिमुत तीर्य को जाय जाशिष हैं कि पिनी को जो कुछ दिया जाता है जी का दर्शन करने से मनुष्य प्रमहत्या से हट जाता कम नहीं होता है। और वहीं महानदी भी है जिसमें है और वहा प्राण छूट जाने से मनुष्य की मोक्ष स्नान और तर्पण करने से मनुष्य के कुल का उद्धार हो जाती है। इसके उपरान्त मार्कण्डेय जी के दुरंभ हो जाता है और उसको अक्षयक मिलते हैं । नाथ की यात्रा करे जहा गोमनी और गहा के संगम वहा से धर्मारण्य में ब्रह्मसर तीर्थ की यात्रा करे म रमान वरने से मनुन्य के युल का उद्धार हो जाता है जहा जाने से मनुष्य को ब्रह्मरोक मिलता है। इस ---- वह कभी - . ALLNAYA-ARAN HARAJGACIA अध्याय ८४] म हा मारत १८६५ vavernmenetarnamendmenAN अक्षयान्प्राप्नुयाल्लोकान्कुलं चैव समुद्धरेत् ॥ ८४ ॥ ततो ब्रह्मसरो गत्वा धर्मारण्योपशोभितम् ब्रह्मलोकमवाप्नोति प्रभातामेव शर्वरीम् ॥८५॥ ब्रह्मणा . तत्र सरसि यूपश्रेष्ठः समुच्छ्रितः । यूपं प्रदक्षिणीकृत्वा वाजपेयफलं लभेत् ॥ ८६ ॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र धेनुकं लोकविश्रुतम् । एकरात्रोपितो राजन् प्रयच्छेत्तिलधेनुकाम् ॥ ८७ ॥ सर्वपापविशुद्धात्मा सोमलोकं ब्रजेद् ध्रुवम् । तत्र चिहं महद्राजन्नद्यापि सुमहद्भृशम् ॥८८॥ कपिलायाः सवत्सायाश्चरन्त्याः पर्वते कृतम् । सवत्सायाः पदानि स्म दृश्यन्तेऽद्यापि भारत ॥ ८९ ॥ तेपूपस्पृश्य राजेन्द्र पदेपु नृपसत्तम यत्किचिदशुभं कर्म तत्प्रणश्यति भारत ॥ ९० ॥ ततो गृध्रवटं गच्छेत्स्थानं देवस्य धीमतः । स्नायीत भस्मना तत्र अभिगम्य वृपध्वजम् ब्राह्मणेन भवेच्चीर्णं व्रतं द्वादशवार्षिकम् इतरेपां तु वर्णानां सर्वपापं प्रणश्यति ॥ ९२ ॥ 'उद्यन्तं च ततो गच्छेत्पर्वतं गीतनादितम् । सावित्र्यास्तु पदं तत्र दृश्यते भरतर्षभ ॥ ९३ ॥ सरोवर में ब्रह्मा जी ने एक श्रेष्ठ और ऊँचा यज्ञ के चिह्न बने हुये हैं उनपर स्नान करने से मनुप्य के म्तम्भ खड़ा किया है उसकी परिक्रमा करने से मनुप्य सब किये हुये अशुभ कर्म नाश हो जाते हैं । वहा को वाजपेय यज करने का फल मिलता है । इस तीर्थ | से गृद्धवट तीर्थ को चला जाय वहा शिव जी की पूजा के पीछे धेनुक तीर्थ को जाय और वहां एक रात्रि | करने से और देह में भस्म लगाने से ब्राह्मण को बसकर तिल, धेनु का दान करे ऐसा करने से मनुष्य वारहचीर्ण व्रत करने का फल मिलता है और अन्य वर्ण निश्चय सब पापों से छूटकर पवित्र हो जाता है और | के मनुप्यों के सब पाप दूर हो जाते हैं ।।८२।२२॥ चन्द्रलोक में वास करता है। इस तीर्थ में अब भी वहां से उद्यत नाम परत की यात्रा करे जो गीतों से , पर्वत में घूमती हुई बड़ा सहित कपिला के खुरों । नादित है और जहा सावित्रि के चरणों के चिह दिखाई WAIAILAAIIMINAGPURI - म हा भारत [ वनपर्व CAM८ew - - evenveseeneveAIRUAGAL तत्र सन्ध्यामुपासीत ब्राह्मणः संशितव्रतः । तेन ह्युपास्ता भवति सन्ध्या द्वादशवार्षिकी ॥ ९ ॥ योनिद्वारं च तत्रैव विश्रुतं भरतर्षभ तत्राऽभिगम्य मुच्येत पुरुषो योनिसंकटात् ॥ ९५ ॥ कृष्णशुक्लावुभौ पक्षौ गयायां यो वसेन्नरः पुनात्यासप्तमं राजन् कुलं नाऽस्त्यत्र संशयः ॥ ९६ ॥ एप्टव्या बहवः पुत्रा योकोऽपि गयां व्रजेत् । यजेत चाऽश्वमेधेन नीलं वा वृषमुत्सृजेत् ॥ ९७ ॥ ततः फल्गुं ब्रजेद्राजस्तीर्थसवी नराधिप अश्वमेधमवाप्नोति सिद्धिं च महतीं व्रजेत् ॥९८ ।। ततो गच्छेत राजेन्द्र धर्मप्रस्थं समाहितः तत्र धर्मों महाराज नित्यमास्ते युधिष्ठिर ॥ ९९ ॥ तत्र कूपोदकं कृत्वा तेन स्नातः शुचिस्तथा । पितॄन्देवांस्तु संतर्य मुक्तपापो दिवं व्रजेत् ॥१०॥ मतदस्याऽऽश्रमस्तत्र महर्भावितात्मनः तं प्रविश्याऽऽश्रमं श्रीमच्छ्रमशोकविनाशनम् ॥१०१ ॥ गवामयनयज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः धर्म तन्नाऽभिसंस्पृश्य वाजिमधमवाप्नुयात् ॥१०२॥ देते हैं वहापर जो ब्राह्मण सन्ध्योपासन करता है उसको । फरगू तीर्थ की यात्रा करे जहा जाने से अश्वमेध बारहवर्ष सध्योपासन करने का फल मिरता है । वहीं यज करने का फल मिलता है । वहा से धर्मप्रस्थ योनिद्वार तीर्थ भी है उसमें स्नान करने से मनुष्य तीर्थ को जाय जहा धर्मगज सदा रहा करते है। वहा पिर योनि में जन्म नहीं रेता है। गया में जो मनुष्य कुएँ के जर से म्नान और तर्पण करने से मनुष्य पापों कृष्ण और शुक्र दोनों पक्षों में वास करता है उसकी जाता है और स्वर्गलोकपाता है।।२३।१००॥ सात पीदिया निम्मदेह पवित्र हो जाती है । ससार में वहीं मतन्नमापिका भी आश्रम है उसमें जाने मनुष्य बहुत से पुत्र इसी इच्छा से चाहा करते हैं । से मनुष्य को गवामय यज्ञ करने का फल मिलता दिन में से कोई ना ऐसा होगा जो गया अथवा है जो धर्मराजा पूजन करता है बद्द वाजिमेध यज्ञ पपोत्सा या अश्वमेध यज करेगा। इसके पछि यात्री / करने का पल पाता है । इसके उपरान्त मनुष्य ब्रह्मा ~ अध्याय ८४] म हा मारत १८६७ Pvre.. anNAGPURBANANAwenemovement ततो गच्छेत राजेन्द्र ब्रह्मस्थानमनुत्तमम् । तत्राऽभिगम्य राजेन्द्र ब्रह्माणं पुरुपर्पभ ॥१०३॥ राजसूयाश्वमेधाभ्यां फलं विन्दति मानवः । ततो राजगृहं गच्छेत्तीर्थसेवी नराधिप ॥१०४॥ उपस्पृश्य ततस्तत्र कक्षीवानिव मोदते । यक्षिण्या नैत्यकं तत्र प्राश्नीत पुरुषः शुचिः ॥१०५॥ यक्षिण्यास्तु प्रसादेन मुच्यते ब्रह्महत्यया मणिनागं ततो गत्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥१०६ ॥ तैर्थिकं भुञ्जते यस्तु मणिनागस्य भारत दष्टस्याऽशीविषेणापि न तस्य क्रमते विषम् ॥१०७॥ तत्रोग्य रजनीमेकां गोसहस्रफलं लभेत् । ततो गच्छेत ब्रह्मोतमस्य वनं प्रियम् ॥१०८॥ अहल्याया हदे स्नात्वा ब्रजेत परमां गतिम् । अभिगत्वाऽऽश्रमं राजन् विन्दते श्रियमात्मनः ॥१०९॥ तत्रोदपानं धर्मज्ञ त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । तत्राऽभिषेकं कृत्वा तु वाजिमेधमवाप्नुयात् ॥११० ॥ जनकस्य तु राजर्षेः कूपस्त्रिदशपूजितः तत्राभिषेक कृत्वा तु विष्णुलोकमवाप्नुयात् ॥ १११ ॥ जी के तीर्थ में जाय और ब्रह्मा जी का पूजन करे | को पीने से मनुष्य को सर्प के काटने का विष नहीं एसा करनवाले को राजसूय और अश्वमेध यज्ञों के बढ़ता है और वहा एक रात्रि रहने से सहस्र गोदान करने का फल मिलता है । वहा से राजगृह तीर्थ करने का फल मिलता है। इसके पीछ तीर्थसेवी २ को चला जाय । जहा म्नान करने से मनुष्य काक्षी गौतम ब्रह्मर्पि के वन की यात्रा करे । जहा अहल्या वान् राजा का सा सुख पाता है। वहीं एक यक्षिणी के कुण्ड में म्नान करने से परमगति और लक्ष्मी ₹ भी है उसको भोजन कराने से मनुष्य उसकी कृपा मिलती है। उसी वन में एक उपदान भी है जो तीनों ६ से ब्रह्महत्या से छूट जाता है । वहा से मणिनाग लोकों में विस्यात् है उसमें स्नान करने से मनुष्य को तीर्थ को जाय जहा जाने से सहस्र गोदान करने अश्वमेघ यज्ञ करने का फल मिलता है॥१०१।११०॥ १ का फल मिलता है । इस मणिनाग तीर्थ के जर इसके आगे राजमपि जनक का कृष है उस Pree revu..WNeha - । ८.
१८६८ महाभारत । वनपर्व DEDE NAARDE BOTEAREDERE ततो विनशनं गच्छेत्सर्वपापप्रमोचनम् वाजपेयमवाप्नोति सोमलोकं च गच्छति ॥११२॥ गण्डकी तु समासाद्य सर्वतीर्थजलोद्भवाम् । वाजपेयमवाप्नोति सूर्यलोकं च गच्छति ॥११३॥ ततो विशल्यामासाद्य नदी त्रैलोक्यविश्रुताम् । अग्निष्टोममवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ॥११४ ॥ ततोऽधिवङ्गं धर्मज्ञ समाविश्य तपोवनम् । गुह्यकेषु महाराज मोदते नात्र संशयः ॥११५॥ कम्पनां तु समासाद्य नदी सिद्धनिपेविताम् । पुण्डरीकमवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ॥११६॥ अथ माहेश्वरी धारां समासाद्य नराधिप । अश्वमेधमवाप्नोति कुल चैव समुद्धरेत् ॥११७॥ दिवौकसां पुष्करिणी समासाद्य नराधिप । न दुर्गतिमवाप्नोतिवाजिमेधं च विन्दति ॥११८॥ अथ सोमपदं गच्छेब्रह्मचारी समाहितः माहेश्वरपदे स्नात्वा वाजिमेधफलं लभेत् ॥११९ ॥ तत्र कोटी तु तीर्थानां विश्रुता भरतर्षभ । पर स्नान करने से मनुन्य विष्णुलोक को जाता है। से धिवम नाम तपावन में नाय ना जाने से मनुष्य वटा से विनशन नामी पापों के दूर करेनवाले तीर्थ । गुह्यकों में आनन्दपूर्वक वास पाता है । इसके आगे की यात्रा करे उसमें स्नान करने से | मनुष्य कम्पना नदी की यात्रा करे जहा सिद्ध लोग रहा करते यज करने का फल मिलता है और बह चन्द्ररोक को है वहा स्नान करने से मनुष्य को स्वर्गलोक मिलता जाता है । वहा से चर कर गण्डरी नदी में स्नान | है और पुण्डरीक यज्ञ करने का फल पाता है । वहा परे जो सब तीयों के जल से प्रसन्न हुई है। उसमें से माहेश्वरी धारा को जाय जिसमें स्नान करने से मनुष्य वाज रेय यज करने का पन कुल का उद्धार हाता है और मनुष्य को स्वर्गलोक पाता है और सूर्यरेक को नाता है । इसके पीछे मिरता है । इसके उपरात देवताओं की पुष्करिणी १ विशल्या नदी पर नाय जो तीनों रोरों में शियात्। में जाकर स्नान करे निसमें स्नान करने में गनुप्य की है, उसमें स्नान करने मे अमिष्टोम यज्ञ करने का दुर्गति नहीं होती हैं और वह बाजपेय यज्ञ करने पर गिरना है और म्वरोक को नाता है । वहा का कर पाता है । यहा से ब्रह्मचर्य के साथ सोमपद । को वाजपेय -- म्नान करने से AMALAMZ अध्याय ८४ ] म हा भारत १८६९ Pr SANAVAINS कूर्मरूपेण राजेन्द्र ह्यसुरेण दुरात्मना ॥१२०॥ ह्रियमाणा हृता राजन् विष्णुना प्रभविष्णुना । तत्राऽभिपेकं कुर्वीत तीर्थकोव्यां युधिष्ठिर ॥१२१ ॥ पुण्डरीकमवाप्नोति विष्णुलोकं च गच्छति । ततो गच्छेत राजेन्द्र स्थानं नारायणस्य च ॥१२२॥ सदा संनिहितो यत्र विष्णुर्वसति भारत । यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋपयथ तपोधनाः ॥१२३॥ आदित्या वसवो रुद्रा जनार्दनमुपासते शालग्राम इति ख्यातो विष्णुरद्भुतकर्मकः ॥१२४॥ अभिगम्य त्रिलोकेंशं वरदं विष्णुमव्ययम् । अश्वमेधमवाप्नोति विष्णुलोकं च गच्छति ॥१२५॥ तत्रोपदानं धर्मज्ञ सर्वपापप्रमोचनम् समुद्रास्तत्र चत्वारः कूपे संनिहिताः सदा ॥१२६॥ तत्रोपस्पृश्य राजेन्द्र न दुर्गतिमवाप्नुयात् अभिगम्य महादेवं वरदं रुद्रमव्ययम् ।।१२७॥ विराजति यथा सोमो मेधैर्मुक्तो नराधिप जातिस्मरमुपस्पृश्य शुचिः प्रयतमानसः ॥१२८॥ के तीर्थ को जाय जहां माहेश्वर पद में स्नान करने | और ग्यारहों रुद्र उनकी सेवा किया करते हैं। उस से मनुष्य को वाजपेय यज्ञ करने का फल मिलता स्थान पर विष्णुभगवान् शालिग्राम नाम से प्रसिद्ध है ॥११११११९॥ हैं। उन त्रिलोकीनाथ वरदाता और अव्यय विष्णु वहीं कोटि तीर्थ भी है जिसको एक दुरात्मा | के दर्शन करने से मनुष्य विष्णुलोक और अश्वमेध असुर कछुए के रूप से हर ले गया था और श्रीविष्णु- यज्ञ करने का फल पाता है । वहीं पर एक सब पापों भगवान् ने उस असुर को मारकर उस तीर्थ को का दूर करनेवाला कुऑ भी है जिसमें चागे समुद्र स्थापित किया था उस तीर्थ में स्नान करने से विष्णु-रहते हैं । उस कुएँ पर स्नान करने से मनुष्य की दुर्गति लोक को जाता है और पुण्डरीक यज्ञ करने का फल नहीं होती है और वहां अव्यय और वरदाता शिव पाता है । वहां से चलकर नारायण स्थल को जाये। जी का ध्यान करने से मनुष्य अन्धकार से निकलकर जहा विष्णुभगवान् आप बसते हैं और ब्रह्मादिक एमा शोभित हो जाता है जैसा बादलों के हट जाने देवता, बड़े-बड़े तपस्वी ऋषि, वारहों सूर्य, आठों वसु, सं चन्द्रमा शोभायमान् दीखता है। वहां से चलकर .. ८७२ ८८.८DAV १८७० [ वनपर्व म हा भारत ८.र. । ܫܝ MAY जातिस्मरत्वमाप्नोति स्नात्वा तत्र न संशयः माहेश्वरपुरं गत्वा अर्चयित्वा वृपध्वजम् ॥१२९॥ ईप्सिताँल्लभते कामानुपवासान्न संशयः ततस्तु वामनं गत्वा सर्वपापप्रमोचनम् ॥१३०॥ अभिगम्य हरिं देवं न दुर्गतिमवाप्नुयात् कुशिकस्याऽऽश्रमं गच्छत्सर्वपापप्रमोचनम् ।। १३१॥ कौशिकी तत्र गच्छेत महापापप्रणाशिनीम् । राजसूयस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥१३२॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र चम्पकारण्यमुत्तमम् तत्रोप्य रजनीमेकां गोसहस्रफलं लभेत् ॥१३३॥ अथ ज्येष्ठिलमासाद्य तीर्थं परमदुर्लभम् सत्रोष्य रजनीमेकां गोसहस्रफलं लभेत् ॥१३४॥ तत्र विश्वेश्वरं दृष्ट्वा देव्या सह महाद्युतिम् मित्रावरुणयोलोंकानाप्नोति पुरुषर्षभ ॥१३५॥ त्रिरात्रोपोपितस्तत्र 'अग्निष्टोमफलं लभेत् कन्यासंवेद्यमासाद्य नियतो नियताशनः ॥१३६॥ मनोः प्रजापतेर्लोकानामोति पुरुषर्षभ कन्यायां ये प्रयच्छन्ति दानमण्वपि भारत ॥१३७॥ यात्री जातिम्मर तीर्थ में जाकर स्नान करे । जिमगें । नदी है उसमें स्नान करने से मनुप्य को राजसूय मनुष्य को जानिम्मरत्व अर्थात् पूर्व | यज्ञ करने का फल मिलता है । यहां से चपकारण्य अन्म कामरण मिलना है यहां में माहेश्वापुर की यात्रा को जाय, जहां एक रात्रि वास करने से सास गोदान को जहां शिव जी की पूजा और मन करने से मनुष्य करने का फल गिरता है। और यही फल ज्येष्ठिल नाम की इच्छानुसार कामना निसंदेह पूरी होता है। हमके तीर्थ में भी एक रात्रि वास करने से मिलता है और पार, यामन नाका जाय ॥१२०११३०॥ वहा उमा महेश्वर के दर्शन करने से मनुष्य को अविनाध्यान करने में मनुष्य की दुर्गति मित्रावरुण का लक गिरता है । और जो उस स्थान नही होनी । बदाम निकाधा की यात्रा करे । पर तीन रात्रि काम करता है पद शिष्टम यश करने जामय पार्श नाश वानवागविनाम का फल पाना है। यहां से कन्या संयद तीर्थ को जान । म्नान करने से ।
अध्याय ८४] महा मारत १८७१ - - CherASA तदक्षय्यमिति प्राहुर्ऋपयः संशितव्रताः ततो निर्वीरमासाद्य त्रिपु लोकेषु विश्रुतम् ॥१३८॥ अश्वमेधमवाप्नोति विष्णुलोकं च गच्छति ये तु दानं प्रयच्छन्ति निर्वीरासंगमे नराः ॥१३९॥ ते यान्ति नरशार्दूल शकलोकमनामयम् तत्राऽऽश्रमो वसिष्ठस्य त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ॥१४०॥ तत्रांऽभिषेकं कुर्वाणो वाजपेयमवाप्नुयात् । देवकूटं समासाद्य ब्रह्मर्षिगणसेवितम् ॥१४१॥ अश्वमेधमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ततो गच्छेत राजेन्द्र कौशिकरय मुनेह्रदम् ॥१४२ ॥ यत्र सिन्दिं परां प्राप्त विश्वामित्रोऽथ कौशिकः । तत्र मासं वसेंद्रीर.. कौशिक्यां भरतर्षभ ॥१४३॥ अश्वमेधस्य यत्पुण्यं तन्मासेनाऽधिगच्छति । सर्वतीर्थवरे चैव यो . वसेत महाहदे ॥१४४॥ न दुर्गतिमवाप्नोति विद्याद्वहु. सुवर्णकम् । कुमारमभिगम्याऽथ वीराश्रमनिवासिनम् ॥१४५॥ अश्वमेधमवाप्नोति नरो नाऽस्त्यत्र संशयः । से मनुष्य मनु प्रजापति के लोक को जाता है और | करने का, फल मिलता है। वहां से ब्रह्मकूट तीर्थ की तीक्ष्ण व्रत करनेवाले ऋषि कहते है कि जो कोई उस यात्रा करे जहां ब्रह्मर्पि रहा करते हैं । वहां जाने से तीर्थ में थोड़ा सा भी दान करता है वह अक्षय वना मनुप्य के कुल का उद्धार हो जाता है और उसको रहता है। इसके पीछे निर्वीर तीर्थ की यात्रा करे जो | अश्वमेध यज्ञ करने का फल मिलता है । इसके पीछे तीनों लोकों में विख्यात् है। वहां जाने से मनुष्य को | कौशिकमुनि के कुण्ड को जाय जहां पर कुशिकवंशी विष्णुलोक और अश्वमेध यज्ञ करने का फल मिलता | विश्वामित्र ने बड़ी सिद्धी पाई थी। वहां कौशिकी पर है और जो कोई निर्वीर के संगम पर दान करता है एक महीना रहने से मनुष्य को अश्वमेध यज्ञ करने उसको इन्द्रलोक मिलता है । इस तीर्थ के आगे वशिष्ठ का फल मिलता है और उस श्रेष्ठ कुंड पर वास करने जी का आश्रम है जो तीनों लोकों में विख्यात् है। | से मनुप्य को सुवर्ण मिलता है और उसकी दुर्गति ॥१३१।१४० नहीं होती है वहां से चलकर उन कुमारों के दर्शन वहां स्नान करने से मनुष्य को वाजपेय यज्ञ करे जो वीराश्रम में रहते हैं उनके दर्शन करने से ANNav १८७२ महा भारत ( वनपर्व ४.edustanveedees अग्निधारां समासाद्य त्रिषु लोकेषु विश्रुताम् ॥१४६ ।। तत्राऽभिषेकं कुर्वाणो ह्यग्निष्टोममवाप्नुयात् । अभिगम्य महादेवं वरदं विष्णुमव्ययम् ॥१४७ ॥ पितामहसरो गत्वा शैलराजसमीपतः तत्राऽभिषेकं कुर्वाणो ह्यग्निष्टोममवाप्नुयात् ॥१४८।। पितामहस्य सरस. प्रस्तुता लोकपावनी कुमारधारा तत्रैव त्रिपु लोकेषु विश्रुता ॥१४९ ॥ यत्र स्नात्वा कृतार्थोऽस्मीत्यात्मानमवगच्छति । . पष्टकालोपवासेन मुच्यते ब्रह्महत्यया -॥१५०॥ ततो गच्छेत धर्मज्ञ तीर्थसेवनतत्पर शिखर वै महादेव्या गौर्यास्त्रैलोक्यविश्रुतम् ॥ १५१ ॥ समारुह्यं नरश्रेष्ठ स्तनकुंण्डेपु. सविशेत् स्तनकुण्डमुपस्पृश्य बाजपेयफलं लभेत् ॥१५२॥ तंत्राऽभिषेक. कुर्वाणः, पितृदेवार्चने रतः हयमेधमवाप्नोति , शकलोकं च गच्छति ताम्रारुणं, समासाद्य ब्रह्मचारी समाहितः । अश्वमेधमवाप्नोति ब्रह्मलोकं च गच्छति ॥१५४ ॥ मनुष्य को अश्वमेध यज्ञ करने का फल निस्सदेह व्रत रखने से ब्रह्महत्या से छूट जाता है ।।१४१५१५०॥ मिरता है। वहा से अग्निधारा नाम तीर्थ की यात्रा कर। तीर्थसेवी को यहा से महादवी गौरी के शिखर वहास्नान और वरदाता शिव और अविनाशी विष्णु की यात्रा करनी चाहिये जो तीनों लोकों में विख्यात् की पूजा करने से मनुष्य को अमिष्टोम यज्ञ कान | है । उस शिखर पर चढ़कर स्तनकुण्ड में स्नान करने या फल मिलता है । वहा से पर्वतराज के पास नमा से मनुष्य को वाजपेय और हयमेध यज्ञों के करने जी के सरोवर पर जाय जहा स्नान करके मनुष्य का पर मिलता है और अन्त समय में इन्द्रलोक को अमिष्टाम यज्ञ करने का पर पाता वहीं जाता है। वहा से ताम्रारुण तीर्थ पर जाने से मनुष्य प्रभा जी के सगेवर से एक धारा निदरती है जिसको को अश्वमेध यज्ञ करने का पल मिलता है और वह युगारधारा कहते हैं और जो कि रोक को पवित्र करने परोक को जाता है । और वहीं नन्दिनी तीर्थ भी वाग और नीना शेकम विन्यात् है । उसमें समान है। उसमें एक कुआँ है जिसपर देवता बने रहते करने से मनुष्य कृतार्थ हो जाना और वदो छ कार । है उस पृएँ पर जाने से मनुष्य को नरमेध यज्ञ करने . है . पर अध्याय ८४] म हा मारत १८७३ NAVAL - . । ७.८८८८८ नन्दिन्यां च समासाद्य कूपं देवनिपेवितम् । नरमेधस्य यत्पुण्यं तदाप्नोति नराधिप ॥१५५॥ कालिकासगमे स्नात्वा कौशिक्यरुणयोर्गतः । त्रिरात्रोपोपितो राजन् सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥१५६ ॥ उर्वशीतीर्थमासाद्य ततः सोमाश्रमं बुधः कुम्भकर्णाश्रमं गत्वा पूज्यते भुवि मानवः ॥१५७॥ कोकामुखमुपस्पृश्य ब्रह्मचारी यतव्रतः जातिस्मरत्वमाप्नोति दृष्टमेतत्पुरातनैः ॥१५८॥ प्राङ्नदी च समासाद्य कृतात्मा भवति द्विजः । सर्वपापविशुन्दात्मा शंक्रलोकच गच्छति... ॥१५९ ॥ ऋषभद्वीपमासाद्य मध्यकोचनिपूदनम् सरस्वत्यामुपस्पृश्यः विमानस्थो विराजते ॥१६॥ औद्दालकं महारान तीर्थ मुंनिनिवितम् तत्राऽभिपेकं कृत्वा वैः सर्वपापैः प्रमुच्यते ।.१६१॥ धर्मतीर्थ समासाद्य 'पुण्यं ब्रह्मर्पिसेवितम् ।। वाजपेयमवाप्नोति विमानस्थश्च पूज्यते ॥१६२॥ अथ चम्पां समासाद्य भागीरथ्यां कृतोदकः । दण्डार्तमभिगत्वा तु गोसहस्रफलं लभेत् ॥ १६३॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि पुलस्त्यतीर्थयात्रायां चतुरशीतितमोऽध्यायः ॥ ८४॥ का फल मिलता है। और कालिका के सङ्गम में स्नान जाता है उसको अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है और करके कौगिकी और अरुण नाम नदियों के मध्य में वह सब पापों से छूटकर इन्द्रलोक को जाता है । तीन रात्रि रहने से मनुष्य के सब पाप दूर हो जात इन तीर्थों की यात्रा करने पर जो कोई ऋपमद्वीप हैं । और जो कोई उर्वशी के तीर्थ की यात्रा करता में मेध्य, क्रौंच और निपूद नामी तीर्थों में जाकर हुआ सोमाश्रम और कुम्भकर्ण के आश्रम को जाता सरस्वती में स्नान करता है उसको चढ़ने को विमान है वह जगत् में पूजित होकर रहता है । पुराने मिलता है ॥१५१।१६०॥ लोगों ने यह भी देखा है कि कामुख नामी तीर्थ में वहीं औद्दालक तीथ भी है जहां मुनि लोग म्नान करने से मनुष्य को पूर्वजन्म का म्मरण हो रहा करते हैं उसमें स्नान करने से मनुष्य के सब जाता है । जो कोई ब्राह्मण शक्रनन्दा तीर्थ को पाप दूर हो जाते हैं। और वहीं जो धर्म नामी पुण्यमय - ८.८......
महा मारत [ यनपर्य PN-र तीर्थ जहा ब्रह्मर्षि वसते हैं उसमें स्नान करने से मनुष्य पीछे ललीतिका तीर्थ में जाकर स्नान करे जो परम- को वाजपेय यज्ञ करने का फल और चढ़ने को विमान । पुण्यद तीर्थ है वहां स्नान करने से मनुष्य राजसूय मिलता है । वहा से गङ्गाजी के चम्पा नामी तीर्थ में यज्ञ करने का फल पाता है और उसे चढ़ने के लिये म्नान करके दण्डार्थ तीर्थ की यात्रा करने से मनुष्य । विमान मिलता है ॥१६१।१६३।। को सहस्र गोदान करने का फल मिलता है । इसके वनपर्व का चौरासीवां अध्याय समाप्त हुआ।। ८४ ॥ Admite -- ॥ ३ ॥ अथ पश्चशीतितमोऽध्यायः ॥ ८५॥ पुलम्त्य उवाच-अथ सन्ध्यां समासाद्य संवेद्यं तीर्थमुत्तमम् । उपस्पृश्य नरो विद्यां लभते नात्र संशयः ॥ १ ॥ रामस्य च प्रभावेण, तीर्थं राजन कृतः पुरा । तल्लौहित्य समासाद्य विद्यार्थीहु सुवर्णकम् ॥ २ ॥ करतोयां समासाद्य त्रिरात्रोपोषितो नरः । अश्वमेधमवाप्नोति प्रजापतिकृतो विधिः गङ्गायास्तत्र राजेन्द्र सागरस्य च संगमे । अश्वमेधु दंशंगणं प्रवदन्ति मनीषिणः 'गङ्गायास्त्वपरं पारं प्राप्य यो नाति मानवः । त्रिरीत्रमुपितो राजन्, सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ५ ॥ ततो. वैतरणी गच्छेत्सर्वपापप्रमोचनीम् विरजं तीर्थमासाद्य विराजति यथा शशी ॥ ६ ॥ -पच्चासीवां अध्याय ८५।। पुलम्स्य जी बोले-हे भीष्म ! जो मनुष्य फल मिलता है। वहां से यात्री गङ्गा और सागर के माध्या समय में संवेद्य नामी तीर्थ में जाकर स्नान ! साम में जाकर स्नान करे जहां स्नान करने से मनुष्य करता है उसको निम्सन्देह विद्या प्राप्त होती है। को अश्वमेध यज्ञ करने का दश गुणा फल मिलता वहां से लौहित्य तीर्थ की यात्रा करे जिसको पहले है। और जो कोई तीर्थसेवी गला के अपरम्पार तीर्थ समय में धीरामन म्थापित किया था। उममें ग्नान में म्नान करके वहां तीन रात्रि वास करता है उमके वरने से मनुष्य को सुवर्ण मिलता है । इसके पीछ सब पाप दूर हो जाते हैं ।।१।५।। परनोया तीध में जाकर तीन रात्रि वास कर। वहा वहां से चलकर वैतरणी नदी पर जाये और शाम करने से मनुष्य को अश्वमेध यज्ञ करने का वहां विरज नाम तीर्थ में स्नान करे। ऐसा करने से अध्याय ८५] म हा मा र त १८७५ ANN . प्रतरेच्च कुलं पुण्यं सर्वपापं व्यपोहति गोसहस्रफलं लब्ध्वा पुनाति स्वकुलं नरः ॥ ७ ॥ शोणस्य ज्योतिरथ्यायाः संगमे नियतः शुचिः । तर्पयित्वा पितॄन्देवानग्निष्टोमफलं लभेत् शोणस्य नर्मदायाश्च प्रभेदे कुरुनन्दन वंशगुल्म उपस्पृश्य वाजिमेधफलं लभेत् ऋषभं तीर्थमासाद्य कोशलायां नराधिप वाजपेयमवाप्नोति त्रिरात्रोपोषितो नरः ॥ १० ॥ गोसहस्रफलं विन्द्यात्कुलं चैव समुद्धरेत् । "कोशलां तु समासाद्य कालंतीर्थमुपस्पृशेत् ॥ ११ ॥ वृप भैकादशफलं लभते नात्र संशया ....... पुष्पवत्यामुपस्पृश्य त्रिरत्रिोपोपितो नरः ॥ १२ ॥ गोसहस्रफलं लब्ध्वा पुनाति' स्वकुल पन ततो बदरिकातीर्थ स्नात्वी भरतसत्तमः ॥ १६.॥ दीर्घमायुरवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति । तथा चम्पां समासद्या भागीरंथ्यां कृतोदकः १४.॥ दण्डाख्यमभिगम्यैव गोसहस्रफलं लभेत्। मनुष्य की कान्ति चन्द्रमा की मी हो जाती है । (रात्रि वास करने से मनुष्य को वाजपेय यज्ञ करी यह तीर्थ सब पापो का दूर करनेवाला है और वहा का फल मिर्हता.है ॥६॥१०॥ जाने से मनुष्य के कुल का उद्धार हो जाता है और और उसके कुल का भी उद्धार हो जाता उसको सहस्र गोदान करने का फल मिलता है। और सहस गोदान करने का फल पाता है। उसी देश वहा से शोनि और ज्योतिर य नदियों के सगम में मे काल तीर्थ भी है उसमें स्नान करने से मनुष्य जाकर स्नान और तर्पण करे वहा ऐसा करने से को निम्सदेह ग्यारह वृषभ छोड़ने का फल मिरता मनुष्य को अमिष्टोम यज्ञ करने का फल मिरता | हे और उसके आगे पुप्पवती तीर्थ है उसमें स्नान है । और नर्मदा और शोनि नदियों के वश गुल्म और तीन रात्रि वास करने से मनुष्य का कुल पवित्र अर्थात् निकास के स्थान पर स्नान करने से मनुष्य हो जाता है और वह सहस्र गोदान करने का फल को वाजिमेध यज्ञ करने का फल मिलता है । वहा पाता है। वहा से चलकर बदरिका तीर्थ में म्नान करने से कौगरा देश के मपभ तीर्थ में स्नान और तीन से मनुष्य की आयु बड़ी हो जाती है और अन्त समय । । ।
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॥
१८७६
म हा भारत
[4.1
More
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लपेटिका ततो गच्छेत्पुण्यां पुण्योपशोभिताम् ॥ १५ ॥
वाजपेयमवाप्नोति देवैः सर्वेश्च पूज्यते
ततो महेन्द्रमासाद्य जामदग्न्यनिषेवितम् ॥ १६ ॥
• रामतीर्थे नरः स्नात्वा अश्वमेधफलं लभेत् ।
मतङ्गस्य तु केदारस्तत्रैव कुरुनन्दन
तत्र स्नात्वा कुरुश्रेष्ठ गोसहस्रफलं लभेत् । ।
श्रीपर्वतं समासाद्य नदीतीरमुपस्पृशेत्
अश्वमेधमवाप्नोति पूजयित्वा वृषध्वजम् ।
श्रीपर्वते महादेवो देव्या संह महाद्युतिः
न्यवसत्परंमप्रीतो ब्रह्मा च त्रिदशैः सह
तत्र देवहदे नात्वा शुचिः प्रयतमानसः ।
अश्वमेधवानोति पर सिद्धिं च गच्छति
ऋषभ पवतं गत्वा पाण्ड्य दैवतपूजितम् ॥ २१ ॥
वाजपेयमवाप्नोति नोकपृष्टं च मोदते
ततो नाच्छेत कावेरी वृतामसरसा गणैः
स्निात्वा नरो राजगोसंहस्रफलं लभेत
स्वर्गलो पाता है। फिर गंगा जी के चम्पा,तीर्थ में में स्नान करके शिव जी का पूजन करने से मनुष्य
म्नान करने के दण्डारुप तीर्थ में जाने से सहन गोदान का अश्वमेध यज्ञ करने का फल मिलता है । इस पर्वत
करने का फल मिलता है। यहां स लंटिको नामी पर उमा सहित महादेव जी और देवताओं सहित
पुण्यतीर्थ की यात्रा कर ! जर जाने से मनुष्य को | ब्रह्मा जी सदा रहते हैं। वहां देवकुण्ड में स्नान करने
वाजपेय यज्ञ करने का फल मिलता है और वह देवताओं से मनुष्य को अश्वमेध यज्ञ करने का फल मिलता
६. में पूज्य होता है इसके पीछ यात्री महेन्द्र पर्वन की यात्रा है और परमसिद्धि प्राप्त होती है। यहां से ऋषभ पर्वत
फरे जहा श्री परशुराम जी रहा करते हैं ॥११॥१६॥ पर जाय जो देवताओं से पूजित है । वहा जाने से
यहा राम तीर्थ में स्नान करने से गनुप्य को | मनुष्य को वाजपेय यज्ञ करने का फल और स्वर्गरोक
રાધ यज्ञ करने का फल मिलता है। यहीं केदार | मिलता है। इसके पीछे कावेरी नदी की यात्रा करे
नागी मतन्नमपि का तीर्थ भी । उममें स्नान जहा अप्सराओं के गण विचग करते हैं वहा स्नान
करने से मनुष्य को सहय गोदान करने का फल करने मे मनुष्य को सहस गोदान करने से मनुष्य को
मिलता है। यहां मे यात्री श्रीपर्वत पर शाय जहा नदी सहम गोदान करने का फल मिलता है ॥१७॥२२॥
॥ २२ ॥
अध्याय ८५] महा मा र त १८७७ ॥ २४॥. ततस्तीरे समुद्रस्य कन्यातीर्थमुपस्पृशेत् । तत्तोयं स्पृश्य राजेन्द्र सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ २३ ॥ अथ गोकर्णमासाद्य त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । समुद्रमध्ये राजेन्द्र सर्वलोकनमस्कृतम् यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयश्च तपोधनाः । भूतयक्षपिशाचाश्च किंनराः समहोरगाः ॥ २५ ॥ सिद्धचारणगन्धर्वमानुपाः पन्नगास्तथा सरितः सागराः शैला उपासन्त उमापतिम् ॥ २६ ॥ तत्रेशानं समभ्यर्च्य त्रिरात्रोपोपितो नरः अश्वमेधमवाप्नोति गाणपत्यं च विन्दति ॥ २७ ॥ उज्य द्वादशरात्रं तु पूतात्मा च भवेन्नरः । तत एव च गायत्र्याः स्थानं त्रैलोक्यपूजितम् ॥ २८ ॥ त्रिरात्रमुपितस्तत्र गोसहस्रफलं लभेत् निदर्शनं च प्रत्यक्षं ब्राह्मणानां नराधिप ॥ २९ ॥ गायत्री पठते यस्तु योनिसङ्करजस्तथा गाथा च गाथिका चापि तस्य संपद्यते नृप अब्राह्मणस्य सावित्री पठतस्तु प्रणश्यति और वहां से समुद्र के तीर पर कन्या तीर्थ में मनुप्य की आत्मा पवित्र हो जाती है । इस तीर्थ जाकर म्नान करने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता के आगे गायत्री का स्थान है जो तीनों लोकों में है । वहां से समुद्र में गोकर्ण तीर्थ को जाय जो पूजित है ॥२३॥२८॥ तीनों लोकों में विख्यात् और सब लोंका से नमस्कृत वहा तीन रात्रि वास करने मे मनुप्य को सहम है और जहां ब्रह्मादिक देवता, तपम्वी, ऋषि, मूत, गोदान करने का फल मिलता है । इस गायत्री के यक्ष, पिशाच, किन्नर, महोरंग, सिद्ध, चारण, गन्धर्व महात्म्य का प्रत्यक्ष प्रमाण ब्राह्मण है जो उसके पाठ मनुष्य, पन्नग, नदी, सागर, और पर्वत सब शिव करने के प्रभाव से कमी सामर्थ्य रखते हैं और जो जी का आराधन किया करते हैं । वहां शिव जी अब्राह्मण अथवा वर्णसंकर इसका पाठ करता है की पूजा करने और तीन गत्रि रहने से मनुष्य उमका वह पाठ करना फलीभूत नहीं होता है किन्तु अश्वमेध यज्ञ करने का फल पाता है और गिव जी ग्राम के गीत गाने के ममान होता है। इस स्थान का गण हो जाता है और दश रात्रि वास करने मे से चलकर मंवत नामी ब्रह्मर्षि की बावली को जाय WanterwasaneMAINBwmal NIMAL है १८८८ महाभारत [ 114 VAN - संवर्तस्य तु विप्रर्वापीमासाद्य दुर्लभाम् ॥ ३१ ॥ रूपस्य भागी भवति सुभगश्च प्रजायते ततो वेणां समासाद्य त्रिरात्रोपोपितो नरः मयूरहंससंयुक्तं विमानं लभते नरः ततो गोदावरी प्राप्य नित्यं सिद्धनिषेविताम् ॥ ३३ ॥ गवां मेधमवाप्नोति वासुकेर्लोकमुत्तमम् वेणायाः संगमे स्नात्वा वाजिमेधफलं लभेत् ॥ ३४ ॥ वरदासंगमे स्नात्वा गोसहस्त्रफलं लभेत् ब्रह्मस्थानं समासाद्य त्रिरात्रोपोपितो नरः ॥ ३५ ॥ गोसहस्रफलं विन्यात्स्वर्गलोकं च गच्छति कुशप्लवनमासाद्य ब्रह्मचारी समाहितः ॥ ३६ ।। त्रिरात्रमुपितः स्नात्वा अश्वमेधफलं लभेत् ततो देवदेऽरण्ये कृष्णवेणाजलोद्भवे ॥ ३७॥ जातिस्मरहदे स्नात्वा भवेज्जातिस्मरो नरः यत्र क्रतुशतैरिष्ट्वा देवराजो दिवं गतः अग्निष्टोमफलं विन्द्याद्गमनादेव भारत यहा जाने से मनुष्य म्वरूपवान् और ऐश्वर्यवान् । सहस्र गोदान करने का फल मिलता है। उसके पीछे हो जाता है। इसके आंग वेणा नामी तीर्थ है जहा कुशाप्ला तीर्थ की यात्रा करे और ब्रह्मचर्य से रहकर तीन रात्रि यास करने से मनुष्य को मोर और हंस स्नान करे और तीन गनिरहे । ऐमा करने से पक्षियों से युक्त विमान मिलता है । यहा मे फिर मनुष्य को अश्वमेध यज करने का फल मिलता है। गोदारी की यात्रा करे जहा सिद्ध लोग सदा रहा वहा स यात्री देवद नाम वन कोजाय और कृष्णा करते हैं । यदा म्नान करने में मनुष्य गोमेध यज और वेणा नदियों के जल से भरे हुए जातिम्मर नाम करने का पर और यामुकि लोक पाता है और वेणा म्नान करे ऐसा करने से मनुष्य जातिस्मर के मंगम में स्नान करने में अश्वमेध यज्ञ करने का अर्थात् पूर्वजन्म का स्मरण करनेवाला हो जाता है। पर मिलता है। यहा से जार बरदा सनम इमी स्थान पर इन्द्र सौ यज्ञ करके वर्गलोक को में स्नान कर जिम करने से महस गोदान का गया था। इमसे यहा जाने सही मनुष्य को अग्निष्टोम पर मिलता है । वहा से आग ब्रह्मस्थान है जहा यन करने का पर मिलता है। इसके उपरान्त यात्री नान गरि वाम करने से मनुष्य को अर्गलोक और सहिद तीर्थ में जाकर स्नान करे जिसके करने से - कुण्ड में अध्याय ८५] म हा मारत १८७९ २४NNN - AGRAWAL८८.. ततः सर्वहदे स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ३९ ॥ ततो वापी महापुण्यां पयोष्णी सरितां वराम् । पितृदेवार्चनरतो गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ४० ॥ दण्डकारण्यमासाद्य पुण्यं राजन्नुपस्पृशेत् गोसहस्रफलं तस्य स्नातमात्रस्य भारत शरभङ्गाश्रमं गत्वा शुकस्य च महात्मनः न दुर्गतिमवाप्नोति पुनाति च कुलं नरः ॥ ४२ ॥ ततः शूर्पारकं गच्छेज्जामदग्न्यनिषेवितम् रामतीर्थे नरः स्नात्वा विन्द्याबहु सुवर्णकम् सप्तगोदावरे स्नात्वा नियतो नियताशनः महत्पुण्यमवाप्नोति देवलोकं च गच्छति ॥४४॥ ततो देवपथं गत्वा नियतो नियताशनः देवसत्रस्य यत्पुण्यं तदेवाप्नोति मानवः ॥ ४५ ॥ तुङ्गकारण्यमासाद्य ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः वेदानध्यापयत्तत्र ऋषिः सारस्वतः पुरा ॥ ४६ ॥ तत्र वेदेषु नष्टेषु मुनेरगिरसः सुतः ऋषीणामुत्तरीयेषु सूपविष्टो यथासुखम् ॥ ४७ ॥ मनुप्य को सहस्र गादान करने का पल मिलता । है । वहा से शूर्पारक नामी तीर्थ की यात्रा करे जहा है ॥२९॥३०॥ परशुराम जी सदा रहा करते है वहा रामतीर्थ में वहा से देवता और पितरों के पूजन में प्रीति म्नान करन से मनुष्य को सुवर्ण मिलता है । उसके रखनेगले मनुष्य को श्रेष्ठ पुण्यद पयोषिणी नाम आगे सप्तगोदावरी तीर्थ है जहा म्नान करने से नदी में स्नान करना चाहिये जिसके करने से मनुष्य मनुष्य को बहुत सा पुण्य प्राप्त होता है । और उसके को सहस्र गोदान करने का फल मिलता ह और वहा आगे देवपथ तीर्थ है वहा जाने से मनुष्य को देवसत्र स दण्डकारण्य नाम तीर्थ की यात्रा करे जहा स्नान यज करने का पुण्य मिलता है । इसके उपरान्त यात्री मात्र करने से सहस्र गोदान करने का फल मिलता तुगकारण्य तीर्थ की यात्रा करे जहा पर सारम्बत हे । उसके आगे शम्भङ्गनामी महात्मा शुक्देव जी नामी मपि ने वेदों की शिक्षा की थी और जहा का तीर्थ है। उसमें स्नान करने से मनुष्य का कुल । वेदों के रोप हा जाने पर अगिरा मपि के पुत्र के पवित्र हो जाता है और उसकी दुर्गति नहीं होती | ऋषियों के उत्तरीय वस्त्र पर वठने से वे वेद सब aavNCAMPURNA - -- १८८० म हा भारत [ वनपर्व .. । Vineermanent Altra । . ओङ्कारेण यथान्यायं सम्यगुच्चारितेन ह येन यत्पूर्वमभ्यस्तं तत्सर्वं समुपस्थितम् ॥४८॥ ऋषयस्तत्र देवाश्च वरुणोऽग्निः प्रजापतिः हरिनारायणस्तत्र महादेवस्तथैव च ॥ १९ ॥ पितामहश्च भगवान्देवैः सह महाद्युतिः भृगु नियोजयामास याजनार्थे महाद्युतिम् ततः स चक्रे भगवानृपीणां विधिवत्तदा सर्वेषां पुनराधानं विधिदृप्टेन कर्मणा आज्य भागेन तत्राऽग्निं तर्पयित्वा यथाविधि । देवाः स्वभवनं याता ऋषयश्च यथाक्रमम् तदरण्यं प्रविष्टस्य तुङ्गकं राजसत्तम पापं प्रणश्यत्यखिलं स्त्रियो वा पुरुषस्य वा तत्र मास वसेद्धीरो नियतो नियताशनः ब्रह्मलोकं ब्रजेद्राजन्कुलं चैव समुन्द्वरेत् ॥ ५४ ॥ मेधाविकं समासाद्य पितृन्देवांश्च तर्पयेत् अग्निष्टोममवाप्नोति स्मृति मेधां च विन्दनि ॥ ५५ ॥ अत्र कालञ्जरं नाम पर्वतं लोकविश्रुतम् तत्र देवहदे नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ऋषियों को म्वर और प्रणय के माथ जसा जिमने जान है और जो कोई वहा ब्रह्मचर्य और जितेन्द्रिय पहले अन्याम दिया था यथावत उपस्थित हो गये। होकर एक महीने तक वास करता है उसके कुल का 1120|४८॥ उद्धार हो जाता है और वह ब्रह्मलोक को जाना है। मी म्थान पर सपि. देवना, वरुण, प्रजापति, । यहा से मेधाविक तीर्थ को जाय जहा मान और तर्पण अपिनारायण, हरि, महादेव और ब्रह्मा जान भृगु जी करने में मनुष्य का अमिष्टोम यान करने का फल छ। य कमि को पाना दीया और भृगु जी के विधि प्राप्त होता है और उसकी बुद्धि नीव और स्मृनि पक या माने पर सवापि और दवना भाग हरदो जानी ॥४॥५५॥ अपने पानी की चल गये । मो हम तुंगकारण्य में यही कातिर नाम नीनों रोक में विख्यात् प्रया बाले हामी और पुष्पा गय पाप दा हो पति है। यहा जाकर दवाण्ट में स्नान करने से - . - ।
अध्याय ८५] म हा भारत १८८१ PG सर ८. - - vasaanwwLAGANALANA paranevica-vivanavavano यो स्नातः स्नापयेत्तत्र गिरौ कालञ्जरे नृप स्वर्गलोके महीयेत नरो नास्त्यत्र संशयः ततो गिरिवर श्रेष्टे चित्रकूटे विशाम्पते मन्दाकिनी समासाद्य सर्वपापप्रणाशिनीम् तत्राऽभिषेकं कुर्वाणः पितृदेवार्चने रतः अश्वमेधमवाप्नोति गतिं च परमां व्रजेत् ततो गच्छेत् धर्मज्ञ भर्तृस्थानमनुत्तमम् यत्र नित्यं महासेनो गृहः संनिहितो नृप तत्र गत्वा तृपश्रेष्ट गमनादेव सिद्ध्यति कोटितीर्थ नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ६१ ॥ प्रदक्षिणमुपाबृत्य ज्येष्टस्थानं ब्रजेन्नरः अभिगम्य महादेवं विराजति यथा शशी ॥६२ ॥ तत्र कूपे महाराज विश्रुता भरतर्षभ समुद्रास्तत्र चत्वारो निवसन्ति युधिष्टिर तत्रोपस्पृश्य राजेन्द्र पितृदेवार्चने रतः नियतात्मा नरः पूतो गच्छेत परमां गतिम् ॥ ६४ ॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र श्रृङ्गवेरपुरं महत् मनुष्य को सहस्र गोदान करने का फल मिलता है | यात्री वहां से परिक्रमा करता हुआ ज्येष्ठ म्यान को और जो मनुष्य इम काल्जिर पर्वत पर स्नान करके । जाय जहां शिव जी की पूजा करने से मनुष्य की तपस्या करता है वह निम्सन्देह म्वर्गलोक को जाता। कांनि चन्द्रमा की सी हो जाती है ॥५६॥६२॥ है । वहा स चित्रकृट नामी उत्तम तीर्थ की यात्रा वहीं एक कुऑ भी है जिसमें चारों समुद्रों का करे और गह्ना जी में म्नान और देव पितृ तर्पण होना सुना जाना है। उसमें जो देव और पितृमक्त करे ऐसा करने से मनुष्य पामगति और अश्वमेध मनुष्य म्नान करता है वह पवित्र होकर परमगति यन करने का फल पाता है। वहा मे भरत जी के पाता है। वहा से शृङ्गवेर नामी नगर को जाय जहा उत्तम स्थान को जाय जहां म्वामी कात्तिक जी सदा पहले समय में दशरथ के पुत्र रामचन्द्र जी गना के वहां जान में मनुष्य को सिद्धि प्राम पार उतरे थे। वहां ब्रह्मचर्य से ग में म्नान करने होती है और वहीं कोटि तीर्थ भी है जिममें म्नान मे मनुष्य के सब पाप दूर हो जाते है और वह करने मे सहस गोदान करने का फल मिलता है । वाजपेय यन करने का फल पाता है। वहा से मुन्न. रहा करते NAND १८८२ { चना म हा भारत - - eNAINAINALWordNNN यत्र तीर्णो महाराज रामो दाशरथिः पुरा ॥ ६५ ॥ तस्मिंस्तीर्थे महावाहो स्नात्वा पापैः प्रमुच्यते गङ्गायां तु नरः स्नात्वा ब्रह्मचारी समाहितः ॥ ६६ ॥ विधूतपाप्मा भवति वाजपेयं च विन्दति ततो मुञ्जवटं गच्छेत्स्थानं देवस्य धीमतः ॥ ६७॥ अभिगम्य महादेवमभिवाद्य च भारत प्रदक्षिणमुपावृत्य गाणपत्यमवाप्नुयात् तस्मिंस्तीर्थे तु जाहव्यां स्नात्वा पापैः प्रमुच्यते। ततो गच्छेत राजेन्द्र प्रयागमृपिसंस्तुतम् ॥६९ ॥ यत्र ब्रह्मादयो देवा दिशश्च सदिगीश्वराः लोकपालाश्च साध्याश्च पितरो लोकसंमताः सनत्कुमारप्रमुखास्तथैव परमर्पयः अगिरः प्रमुखाश्चैव तथा ब्रह्मर्ययोऽमलाः ॥ ७१॥ तथा नागाः सुपर्णाश्च सिद्धाश्चक्रधरास्तथा सरितः सागराश्चैव गन्धर्वाप्सरसोऽपि च ॥ ७२ ॥ हरिश्च भगवानास्ते प्रजापतिपुरस्कृतः तत्र त्रीण्यग्निकुण्डानि येपा मध्येन जाह्नवी बेगेन समतिकान्ता सर्वतीर्थपुरस्कृता यट नामी नर्यि की यात्रा कर जहा शिव जी का नदी, सागर, गन्धर्व, अप्सरा और हरि रहा करत आराधन और परिक्रमा करन मे मनुप्य महादेव जी हैं । यहा तीन अमिकुण्ट हैं जिनके बीच में होकर का गण बनना है और गहा में स्नान करने में मय श्रीगङ्गा जी, जिनके आगे सब तीर्थ रहते है, वह पापों से मुक्त हो जाता है। इसके पीछे प्रयाग नर्थ वेग से बहनी है और लोकपायनी तीनों लोकों में का जाय जिमनी प्रशंमा मय ऋषि रोग करने है विन्यात् सूर्य की पुत्री यमुना का वहीं गङ्गा जी से सनम हुआ है। इस गहा और यमुना के गाय की मता में प्रमादिक देवना, कपाल, मा-य भूमि को गंगवी का जघन अर्थात नाभि के नीचे रिना, मनात मार जादि परमप्रापि, अहिरा आदि भाग बनाने और ऋषि लोग इस प्रयाग को प्रमावि, नाग, सुपर्ण, मिट, सूर्य आदि नक्रनर, जो अघन ग्थान में सप तीथों के उत्पन्न होने । । 1 .
अध्याय ८५] म हा मा र त १८८३ Va तपनस्य सुता देवी त्रिषु लोकेपु विश्रुता ॥७४॥ यमुना गङ्गया साध संगता लोकपावनी गङ्गायमुनयोर्मध्यं पृथिव्या जघनं स्मृतम् ॥७५ ॥ प्रयागं जघनस्थानमुपस्थमृषयो विदुः प्रयागं सप्रतिष्ठान कम्बलाश्वतरौ तथा ॥ ७६ ॥ तीर्थं भोगवती चैव वेदिरेषा प्रजापतेः तत्र वेदाश्च यज्ञाश्च मूर्तिमन्तो युधिष्ठिर ॥ ७७ ॥ प्रजापतिमुपासन्ते ऋपयश्च तपोधनाः यजन्ते क्रतुभिर्देवास्तथा चक्रधरा नृपाः ॥ ७८॥ ततः पुण्यतमं नाम त्रिपु लोकेषु भारत प्रयागं सर्वतीर्थेभ्यः प्रवदन्त्यधिकं विभो ॥ ७९ ॥ गमनात्तस्य तीर्थस्य नामसंकीर्तनादपि मृत्युकालभयाच्चापि नरः पापात्प्रमुच्यते तत्राऽभिषेकं यः कुर्यात्संगमे लोकविश्रुते पुण्यं स फलमाप्नोति राजसूयाश्वमेधयोः एषा यजनभूमिर्हि देवानामभिसंस्कृता तत्र दत्तं सूक्ष्ममपि महद्भवति भारत ॥ ८२ ॥ का म्यान जानते हैं और कहते है कि यह सबका । अश्वमेध यज्ञों के करने का फल मिलता है । यह प्रतिष्ठान है इसमें कंबल और अश्वतर नाग भी रहते हैं तीर्थ देवताओं की यज्ञभूमि है इससे इस तीर्थ पर और इमी में भोगवती तीर्थ भी है यह प्रयाग ब्रह्मा थोड़ा सा दिया हुआ दान भी बहुत सा फल देता जी की वेदी हैं । जब तपम्वी ऋषि और वेद यन है । जो मनुष्य के हृदय में प्रयाग में प्राण छोड़ने म्वरूप धारण क्येि हुए जहां ब्रह्मा जी की सेवा की बुद्धि उपजे तो उस बुद्धि को वेद और रोक के करते हैं और देवता और चक्रवर्ती राजा लोग यज्ञ वचनों से भी फेरना उचित नहीं है क्योंकि इस प्रयाग करते हैं । इन कारणों में यह प्रयाग तीर्थ तीनों में माठ कोटि और दश महम तीर्थ रहते हैं। चारों लोकों में सब तीयों में अधिक और पुण्यनम विद्याओं के अभ्याम और मत्य बोलने से जो पुण्य इममें जाने अथवा इसकी प्रशंसा या इसका म्मरण मिलता है वह केवल इम गङ्गा और यमुना के सगम 2 करने से मनुष्य के सब पाप दूर हो जाते है ॥७०1८०॥ में स्नान करने से मनुष्य को प्राप्त होता है और और सङ्गम में स्नान करने से राजसूय और वहां जो भोगवती नाम वासुकि का तीर्थ है उममें morernadaneesreeMASAL - AN८ म हा भारत ।बन । N UALNutar ॥ ८८ ॥ न वेदवचनात्तात न लोकवचनादपि मतिरुत्क्रमणीया ते प्रयागमरणं प्रति ॥ ८३ ॥ दश तीर्थसहस्त्राणि पष्टिः कोट्यस्तथाऽपराः येषां सांनिध्यमत्रैव कीर्तितं कुरुनन्दन ॥ ८४॥ चतुर्विद्ये च यत्पुण्यं सत्यवादिषु चैव यत् स्नाता एव तदाप्नोति गङ्गायमुनसङ्गमे तत्र भोगवती नाम वासुकेस्तीर्थमुत्तमम् तत्राऽभिषेकं यः कुर्यात्सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥ ८६ ॥ तत्र हंसप्रपतनं तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् दशाश्वमेधिकं चैव गङ्गायां कुरुनन्दन ॥ ८७ ॥ कुरुक्षेत्रसमा गङ्गा यत्र तत्राऽवगाहिता विशेपो वै कनखले प्रयागे परमं महत् यद्यकार्यशतं कृत्वा कृतं गङ्गावसंचनम् सर्व तत्तस्य गङ्गापो दहत्यग्निरिवन्धनम् सर्व कृतयुगे पुण्यं त्रेतायां पुष्करं स्मृतम् द्वापरेऽपि कुरुक्षेत्रं गढ़ा कलियुगे स्मृता ॥ ९० ॥ पुष्करे तु तपस्नप्येहानं दद्यान्महालये मलये त्वग्निमारोहेढ़ भृगुतुङ्गेवनाशनम् म्नान करने में मनप्य को अश्वमेध यन करने का है। मतयुग में सर तीयों में स्नान करने से पुण्य पाल मिलना और यही गहा जी में हम प्रतपन होता है और त्रेता में पुष्कर द्वापर में कुरुक्षेत्र और और दशाश्चमधिक नाम तीथ भी हैं जो तीनो रंगकों कलियुग में गगा जी पुण्यरूपी कही है ।। ८१३९.०।। में विग्यात् । इम गगा में किमी म्थान पर स्नान पुष्कर में तप, महालय में दान, मर याचल करन ग कुरक्षेत्र के ममान फर मिन्ना है परन्तु पर अमि तपना, भृगुता पर्वत पर रहकर अनशन बनम्बर में गिर और प्रयाग में महान फल प्राप्त ग्रत धारण करना और पुष्कर,पुरक्षेत्र, गदा और मगध होना । जो मनुष्य मी काम छोरपर गंगा में देश के नीयों में स्नान करना परम पुण्यद है। एमा म्नान पाना उमगर पार इमप्रकार म भग करने में मनुष्य की सात मान पीढ़ी अगरी और जगत जनवाद र म मम्म हो जाता निर जाती है और गङ्गा जी की स्तुति करने - अध्याय ८५] म हा मारत १८८५ । पुष्करे तु कुरुक्षेत्रे गङ्गायां मगधेषु च स्नात्वा तारयते जन्तुः सप्तसप्तावरांस्तथा ॥ ९२ ॥ पुनाति कीर्तिता पापं दृष्टा भद्रं प्रयच्छति अवगाढा च पीता च पुनात्यासप्तमं कुलम् ॥ २३ ॥ यावदस्थि मनुष्यस्य गङ्गायाः स्पृशने जलम् । तावत्स पुरुपो राजन् स्वर्गलोके महीयते यथा पुण्यानि तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च । उपास्य पुण्यं लब्ध्वा च भवत्यमरलोकभाक् ॥ ९५ ॥ न गङ्गासदृशं तीर्थं न देवः केशवात्परः ब्राह्मणेभ्यः परं नास्ति एवमाह पितामहः यत्र गङ्गा महाराज स देशस्तत्तपोवनम् सिद्धिक्षेत्रं च तज्ज्ञेयं गङ्गातीरसमाश्रितम् ।। ९७ ॥ इदं सत्यं द्विजातीनां साधूनामात्मजस्य च सुहृदां च जपेत्कणे शिष्यस्याऽनुगतस्य च इदं धन्यमिदं मध्यमिदं स्वय॑मनुत्तमम् इदं पुण्यमिदं रम्यं पावनं धर्म्यमुत्तमम् महणामिदं गुह्यं सर्वपापप्रमोचनम् अधीत्य द्विजमध्ये च निर्मलः स्वर्गमाप्नुयात् ॥१०० ॥ से पाप दूर हो जाते हैं, दर्शन करने मे कल्याण के समान तीर्थ, केशव के समान देवता और ब्रामणी होता है और म्नान पान करने में मात पाहिया में बड़ा कोई नहीं है। जिम देश में गहा है वही मनुष्य की पवित्र हो जाती हैं । और जब तक गङ्गा देश तोवन है और जो गातट की पृथ्वी है वही जी में मनुष्य के हाड रहते है नब नक यह मनुष्य सिद्धक्षेत्र भूमि है। इस सन्य क्या को वामग, माधु म्वर्गगेक में इस प्रकार में प्रतिष्ठिन रहता है जैम मुहद, पुत्र और आज्ञाकारी नियों में कान में पुण्य तीर्थ और पुण्य देवस्थानों की उपासना करने | कटना रचिन है । यह क्या धन्य, पवित्र, वर्ग- के पुण्य से मनुष्य अमरलोक पान का भागी हो जाना दाता, दत्तुम, पुण्यशी, म्य, पान, धर्मशी मर है ॥११॥५॥ पारों को दूर करनेवारी और बड़े बड़े अषियों की देना, ब्रमा जी ने आप यह कहा है कि गंगा जी . गुप्त यान है । हमको ब्रमणों के बीच में पढ़ने मे vrimarwANAMALAIMLAIAIIMIMICAL - .00 १८८६ [ नपर्व म हा भारत । eMANASAIAPatra । श्रीमत्स्वयं तथा पुण्यं सपत्नशमनं शिवम् मेधाजननमग्न्यं वै तीर्थवंशानुकीर्तनम् ॥१०१॥ अपुत्रो लभते पुत्रमधनो धनमाप्नुयात् मही विजयते राजा वैश्यो धनमवाप्नुयात् ॥१०२॥ शुद्रो यथेप्सितान्कामान्ब्राह्मणः पारगः पठन् । यश्चेदं शृणुयान्नित्यं तीर्थपुण्यं नरः शुचिः ॥१०३॥ जातीः स स्मरते वह्वी कपृष्ठे च मोदते गम्यान्यपि च तीर्थानि कीर्तितान्यगमानि च ॥१०४।। मनसा तानि गच्छेत सर्वतीर्थसमीक्षया एनानि वसुभिः साध्यैरादित्यमरुदश्विभिः ।।१०५॥ ऋषिभिर्देवकल्पैश्च स्मातानि सुकृतैपिभिः एवं त्वमपि कौरव्य विधिनाऽनेन सुव्रत ॥१०६॥ व्रज तीर्थानि नियतः पुण्यं पुण्येन वर्धयन् भावितः करणेः पूर्वमास्तिक्याच्तिदर्शनात् ॥ १०७॥ प्राप्यन्ते तानि तीर्थानि सद्भिः शास्त्रानुदर्शिभिः । नाऽवती नाऽकृतात्मा च नाऽशुचिर्न च तस्करः ॥१०८ ॥ मनुष्य निर्मर होकर म्वरोक पाता ।०६।१००॥ में जाना उचित है क्योंकि ये तार्थ केवल देव इन नीयों को कार्जन करना स्वर्गदाता, पुण्य मपिया के ही साध्य हैं जो आकाशमार्ग से जाकर कपी, शत्रुनाशक, आनन्ददाता, गेधावुद्धि का सिन्न उनम म्नान करते है। ये सब तीर्थ अष्टवमु साध्यगण बरनाग और अष्ठ है और हमको नित्य सुनने में द्वादश सूर्य, मरगण, दोनों अश्विनीकुमार आदि अपुत्र को पुत्र, निर्धन को धन, राजा की विजय, देवनाओं के तुत्य हैं और शुभ कर्म करनेवाले बन्यकी अर्धाम, गदकामिन दामना और प्रापि गंग इसमें स्नान करते हैं। तुम भी इन तीयों माधि या पार प्राप्त होना । हम नार्थ की यात्रा का और अपने पुण्य को नीर्थयात्रा के कामिर को नित्य पाठ पानवारा गंगा पानाद पुण्य में पढ़ाओ। पहर समय इन तीयों का श्री. को पूर्व मी पाहार विदिन ६ जाना भवन शुद्ध पदय इप्रिय और शाम जाननयारे 1. भाज'हमने तुममे मय नाणं, र मनुष्य मपुरा ने अस्निययना और श्रुतिमी चे भान म Bामना भार नही आगना, वर्णन किया था जो मनुष्य अपनी, अजित नि अर्थात पिन म मायनांधी म मानसिक मिनिमन बना चिनो वश नही रियाद, .. - अध्याय ८५] महा मारत १८८७ DABGOLU - स्नाति तीर्थपु कौरव्य न च वक्रमतिर्नरः त्वया तु सम्यग्वृत्तेन नित्यं धर्मार्थदर्शिना ॥१०९ ॥ पिता पितामहश्चैव सर्वे च प्रपितामहाः । पितामहपुरोगाश्च देवाः सपिंगणा नृप ॥ ११०॥ तब धर्मेण धर्मज्ञ नित्यमेवाऽभितोषिताः अवाप्स्यसि त्वं लोकान्वै वसूनां वासवोपम ॥ १११ ॥ कीर्ति च महती भीष्म प्राप्स्यसे भुवि शाश्वनीम् । नारद उवाच-एवमुक्त्वाऽभ्यनुज्ञाय पुलस्त्यो भगवानृषिः ।।११२॥ प्रीतः प्रीतेन मनसा तत्रैवाऽन्तरधीयत भीष्मश्च कुरुशार्दूल शास्त्रतत्वार्थदर्शिवान् ॥११३॥ पुलस्त्यवचनाचेव पृथिवीं परिचक्रमे एवमेपा महाभागा प्रतिष्टाने प्रतिष्टिना ॥ १११॥ तीर्थयात्रा महापुण्या सर्वपापप्रमोचनी अनेन विधिना यस्तु पृथिवीं संचरिष्यति ॥११५॥ अश्वमेधशतं सायं फलं प्रेत्य स भोक्ष्यति तनश्राऽष्टगुणं पार्थ प्राप्स्यसे धर्ममुत्तमम् ॥११६॥ भीष्मः कुरूणां प्रवगे यथापूर्वमवाप्तवान् । नेता च त्वमृपीन्यस्मात्तेन तेऽष्टगुणं फलम् ॥११७॥ अपवित्र, चौर और कुबुद्धि होना है, वह तीर्थों में हो गये और शास्त्र के तत्त्वार्थ देखनवाने भीष्म स्नान नहीं करता है। तुम तो श्रेष्ठ व्रत करनेवाले और ने पृथ्वी पर भ्रमण करके तीर्थयात्रा की। पर यह धर्मार्थदी हो ।।१० १।१०९॥ पापों के दूर करनेवानी और महापुण्य देनेवारी क्या तुमने अपने धर्म मपिता, पितामह, प्रपितामह, ममाप्त हुई। जो मनुप्य तीर्थयात्रा के लिये वी पर ब्रह्मादिक देवता और ऋषियों को तृप्न दिया है । घूमता हे टसको मो अश्वमेघ यज्ञ करने के फर मे तुमको वसुओं का लोक मिलेगा और सम्र में भाठ गुणा अधिक फल मिरना है जैमा कि पहले तुम्हारी बड़ी कीर्ति होगी। इतनी क्या मुनाकर नारद भीमजी पा चुके है। और तुम जो कापियों को साथ जी बोले कि हे राजा युधिष्टिर! पुग्म्त्य जी भीष्म से ले जाकर यह यात्रा क्गेगे तो तुमको उमका आठ गुणा १ रक्त प्रकार से कहकर प्रमन्नतापूर्वक वहीं अन्न न फल मिलेगा। इस तीर्थ यात्रा में राममों के गण गण DAANANAWALMALAYALMNMwnl - 299 -PANNAL PRASADA १८८८ म हा भारत [ बनपर्व - MAugaanemade रक्षोगणविकीर्णानि तीर्थान्येतानि भारत न गतानि मनुष्येन्द्रैस्त्वामृते कुरुनन्दन ॥११८॥ इदं देवर्षिचरितं सर्वतीर्थाभिसंवृतम् यः पठेत्कल्यमुत्थाय सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥११९॥ ऋपिमुख्याः सदा यत्र वाल्मीकिस्त्वथ कश्यपः । आत्रेयः कुण्डजठरो विश्वामित्रोऽथ गौतमः ॥१२०॥ असितो देवलश्चैव मार्कण्डेयोऽथ गालवः भरद्वाजो वसिष्ठश्च मुनिरुद्दालकस्तथा 11१२१॥ शौनकः सह पुत्रेण व्यासश्च तपतां वरः दुर्वासाश्च मुनिश्रेष्टो जाबालिश्च महातपाः ॥१२२॥ एते ऋषिवराः सर्वे त्वत्प्रतीक्षास्तपोधनाः एभिः सह महाराज तीर्थान्येतान्यनुवज ॥१२३॥ एष ते लोमशो नाम महर्षिरमितद्युतिः समेष्यति महाराज तेन सार्धमनुब्रज ॥१२४॥ मयापि सह धर्मज्ञ तीर्थान्येतान्यनुक्रमात् । प्राप्स्यसे महती कीनि यथा राजा महाभिपः ॥१२५॥ यथा ययातिधर्मात्मा यथा राजा पुरुरवाः । तथा त्वं राजशार्दूल स्वेन धर्मण शोभसे ॥१२६ ।। मिन कान है। इमस तुम मरीधे राजा के मियाय तीर्थयात्रा को और जो यह रोमा नामी बड़े दुमरे मजा नीर्थयात्रा नहीं कर म॥११०१११८॥ तजम्बी महपिं तुम्हार पाम चले आ रहे है इनको भी इम नधि पथा के दयमपि चगिन को जी माथ लेते जाओ । मेरे साथ भी तुम तीर्थयात्रा वा मान.पा. बटार पंदगा था, मय पाषा महट करना। तुगको गजा महामिप की मी कातिमिरेगी। जायगा। युधिष्टिर! तुम्हार माथ यानी, और जिस प्रकार राजा ययाति, पुरुरवा, भगीरथ, भांप्रेय. माष्टमटा, विश्वामित्र, गाना, अमिन, देवर, गगनद्र, मनु. इक्ष्वाकु, पुर और पैन्य आदि मानों गाय, महाजयति. हा inा, पृन मरिन में अपने धर्मा के कारण से विम्यान उसी याम जी, दुर्ग:मा और जापान आदि मुग मृग्य काम तुम भी मूर्यनुज्य उनस अधिष पानी पापा मगरको माधया मान श्री विजयान होगा और जो प्रामुर सल्या, अध्याय ८६] म हा मारत - MLAVNL GALAN यथा भगीरथो राजा यथा रामश्च विश्रुतः । तथा त्वं सर्वराजभ्यो भ्राजसे रश्मिवानिव ॥१२७॥ यथा मनुर्यथेक्ष्वाकुर्यथा पूरुर्महायशाः यथा वेन्यो महाराज तथा त्वमपि विश्रुतः ॥ १२८॥ यथा च वृत्रहा सर्वान्सपत्नान्निर्दहन्पुरा त्रैलोक्यं पालयामास देवराड् विगतज्वरः ॥१२९ ।। तथा शत्रुक्षयं कृत्वा वं प्रजाः पालयिष्यसि । स्वधर्मविजितामुर्वी प्राप्य राजीवलोचन ख्यातिं यास्यसि धर्मेण कार्तवीर्यार्जुनो यथा ॥१३० ।। वैशम्पायन उवाच एवमाश्वास्य राजानं नारदो भगवानृषिः । अनुज्ञाप्य महाराज तत्रैवाऽन्तरधीयत ॥१३१॥ युधिष्ठिरोऽपि धर्मात्मा तमेवाऽर्थ विचिन्तयन् । तीर्थयात्राश्रितं पुण्यमृषीणां प्रत्यवेदयत् ।।१३२॥ इतिश्रीमन्महाभारतेआरण्यकपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि पुलस्त्यतीर्थयात्रायां नारदवाक्ये पञ्चाशीतितमोऽध्यायः८५ दैत्य के मारनेवाले इन्द्र ने अपने शत्रुओं को मारकर इतनी कथा सुनाकर वैशम्पायन जी बोले-हे राजा और चिन्तारहित होकर तीनों लोकों का पालन किया जनमेजय ! नारद जी युधिष्ठिर को उक्त प्रकार से था। उसी प्रकार मे तुम भी अपने वैश्यिों को मार धैर्य देकर वहीं अन्तर्धन हो गये ओर युधिष्ठिर ने कर प्रजा का पालन करोगे और अपने धर्म से पृथ्वी उस अर्थ को विचारकर तीर्थयात्रा करने का पुण्य को जीतकर कार्तिवीर्यार्जुन के समान कीर्ति पाओगे।। ऋषियों से कह सुनाया ॥११९।१३२॥ वनपर्व का पच्चासीवां अध्याय समाप्त हुआ ।। ८५ ।। अथ पडशीतितमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ वैशम्पायन उवाच-भ्रातृणां मतमाज्ञाय नारदस्य च धीमतः पितामहसमं धौम्यं प्राह राजा युधिष्टिरः ॥ १ ॥ ज्यिासीवां अध्याय ॥८६॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! गजा तपोधन और वीर अर्जुन को अमविद्या सीखने के युधिष्ठिर अपने भाई और बुद्धिमान् नारद जी के मन लिये प्रदेश में भेजा है, यद्यपि वह अवविद्या में को विचारकर धौम्य ऋषि से कहने लगे कि मैने श्रीकृष्ण जी के समान विचक्षण है । मैं और व्यास पुरुषोत्तम, सत्यपराक्रमी, धर्यवान् , महावाहु, समर्थ, जी इन दोनों पराक्रमी और शत्रुओं के नाश करने- १८९० म हा भारत [ वनपर्व ~ - - renairerslas awantudattiin . मया स पुरुषव्याघो जिष्णुः सत्यपराक्रमः अस्त्रहेतोर्महावाहुरमितात्मा विवासितः स हि वीरोऽनुरक्तश्च समर्थश्च तपोधनः । कृती च भृशमप्यस्त्रे वासुदेव इव प्रभुः अहं घेतावुभौ ब्रह्मन्कृष्णावरिविघातिनौ अभिजानामिविक्रान्तौ तथा व्यासःप्रतापवान् ॥ ४ ॥ त्रियुगी पुण्डरीकाक्षौ वासुदेवधनञ्जयो नारदोऽपि तथा वेद योऽप्यशंसत्सदा मम तथाऽहमपि जानामि नरनारायणावृपी शक्तोऽयमित्यतो मत्वा मया स प्रेपितोऽर्जुनः ॥ ६ ॥ इंद्रादनवरः शक्र सुरसूनुः सुराधिपम् द्रष्टुमस्त्राणि चाऽऽदातुमिन्द्रादिति विवासितः ॥ ७ ॥ भीष्मद्रोणावतिरथौ कृपो द्रौणिश्च दुर्जयः । धृतराष्ट्रस्य पुत्रेण वृता युधि महारथाः सर्वे वेदविदः शूराः सर्वास्त्रविदुपस्तथा योधुकामाश्च पार्थेन सततं ये महावलाः स च दिव्यास्त्रविकर्णः सूतपुत्रो महारथः ॥ ९ ॥ योऽस्त्रवेगानिलवलः शरार्चिस्तलनिःस्वनः वारों को जानते हैं। यह दोनों अर्थात श्रीकृष्ण बहुत कठिन है और कृपाचार्य और अश्वत्थामा आदि और अर्जुन नरनारायण और तीनों युगों में अवतार बड़े-बड़े महारथी धृतराष्ट्र के पुत्रों से मिले हुए निवाल है । नारद जी भी इन दोनों को ऐसा ही और सबके मय वेदपाटी, शूरवीर और अत्रों के बनाते हैं, न्होंने यहुधा मुशमं यह सम्याद कहा जाननेवाले हैं और अर्जुन से युद्ध करने की इच्छा है और मैंने भी टप अर्जुन को इन्द्र का पुत्र और पन हैं और इनके सिवाय सून का पुत्र कर्ण भा। इन्द्र के तुल्य ममशार देवराज इन्द्र को देखने महारथी और मय दिव्य असो का जाननेवाला है। और उमंग अमविपा मापन की कामना में प्रदेश के शान चलाने का येग घायु के बैग के समान मज दिया है, याण उमके अग के सदृश हैं और माय धुणे. यात माग और द्रोणाचार्य जिनको जीतना पगान , मी यह कर्ण युग थे. अन्त में महाकाल अध्याय ८६ ] महा मारत न MANGUAGANRAL. रजोधूमोऽस्त्रसंपातो धार्तराष्ट्रानिलोद्धतः ॥ १० ॥ निसृष्ट इव कालेन युगान्ते ज्वलनो महान् मम सैन्यमयं कक्षं प्रधक्ष्यति न संशयः तं स कृष्णानिलोधूतो दिव्यास्त्रज्वलनो महान् । श्वेतवाजिवलाकाभृगाण्डीवेन्द्रायुधोल्वणः ॥ १२ ॥ संरब्धः शरधाराभिः सुदीप्तं कर्णपावकम् अर्जुनोदीरितो मेघः शमयिष्यति संयुगे ॥ १३ ॥ स साक्षादेव सर्वाणि शकात्परपुरञ्जयः दिव्यान्यस्त्राणि बीभत्सुस्ततश्च प्रतिपत्स्यते ॥ १४ ॥ अलं स तेषां सर्वेयामिति मे धीयते मतिः नास्ति त्वनिकृतार्थानां रणेऽरीणां प्रतिक्रिया ॥ १५ ॥ ते वयं पाण्डवं सर्वे गृहीतास्त्रमरिन्दमम् द्रष्टारो न हि वीभत्सुभारमुद्यम्य सीदति वयं तु तमृते वीरं वनेऽस्मिन्द्विपदां वर अवधानं न गच्छामः काम्यके सह कृष्णया ॥ १७ ॥ भवानन्यद्वनं साधु वह्वन्नं फलवच्छुचि आख्यातु रमणीयं च सेवितं पुण्यकर्मभिः ॥ १८ ॥ से छोड़ी हुई अग्नि के समान दुर्योधन रूपी वायु से । हे महाराज ! ऐसा दिन कौनसा होगा जिस दिन प्रेरित होकर मेरी सेनारूपी तृण के वन को निम्संदेह । हम उस अस्त्र सीखे हुए अर्जुन को, जो बोझ को भम्म कर डालेगा ॥६।१।। । उठाकर दुःखी नहीं होता है, देखेंगे | उसके बिना उस कर्णरूपी प्रज्वलित अग्नि को मेघरूपी अर्जुन । द्रौपदी सहित हम सबका चित्त इम वन में म्बम्ध कृष्णरूपी वायु से प्रेरित होकर वाणरूपी जलधारा | नहीं रहता है । आप और कोई ऐसा वन बताइये छोड़कर शांत करेगा और वह अर्जुनरूपी मेघ बलाका• जहां अन्न और फल बहुत मिलें और पुण्यकर्म करने- सपी श्वेत घोहे, गाण्डीवरूपी इन्द्रधनुष और अस्त्र- ; वाले मनुष्य रहते हों और स्थान भी जहां का पुण्य रूपी विजली से सुशोभित होगा। मै जानता हूँ कि ! और पवित्र हो। जिससे हम लोग वहां रहकर अर्जुन वह अर्जुन इन्द्र से सव दिव्य अस्त्र सीख आवेगा । के आने की बाट इस प्रकार से देखें जैसे मनुष्य और इन सबको जीत सकेगा परन्तु बिना अर्जुन बादलों की राह वर्षाऋतु में देखा करते हैं। अब के इन शत्रुओं को जीतने का कोई उपाय नहीं है। हमारा मन नहीं लगता NPAawrentVANAGAVAVA इस काम्यक वन है हम १८९२ म हा मारत [ वनपर्व MAN - यत्र कंचिद्वयं कालं वसन्तः सत्यविक्रमम् । प्रतीक्षामोऽर्जुनं वीरं वृष्टिकामा इवाऽम्वुदम् ॥ १९ ॥ विविधानाश्रमाकांश्चिद्विजातिभ्यःप्रतिश्रुतान्। सरांसि सरितश्चैव रमणीयांश्च पर्वतान् ॥ २० ॥ आचक्ष्व न हि मे ब्रह्मन्रोचते तमृतेऽर्जुनम् । वनेऽस्मिन्काम्यके वालोगच्छामोऽन्यां दिशंप्रति ॥ २१ ॥ इति श्रीमन्महामारते आरण्यकपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि धौम्यतीर्थयात्रायां पडशीतितमोऽध्यायः॥८६॥ लोगों की इच्छा किमी और दिशा के जाने की है। नदी और रमणीक पर्वतों का वृत्तान्त हमको सुनाइये सो आप ब्राह्मणों से सुने हुए अनेक आश्रम, सरोवर कि हम लोग उसी ओर की यात्रा करें ।।१२।२१।। वनपर्व का छियासीवां अध्याय समाप्त हुआ ।। ८६ ।। अथ सप्तशीतितमोऽध्यायः ॥ ८७ ।। वैशम्पायन उवाच-तान्सर्वानुत्सुकान्दृष्ट्वा पाण्डवान्दीनचेतसः आश्वासयंस्तथा धौम्यो बृहस्पतिसमोऽब्रवीत् ॥ १ ॥ ब्राह्मणानुमतान्पुण्यानाश्रमान्भरतर्षभ दिशस्तीर्थानि शैलांश्च शृणु मे वदतोऽनघ ॥ २ ॥ याञ्च् त्वा गदतोराजन् विशोको भवितासि ह। द्रोपद्या चानया साधं भ्रातृभिश्च नरेश्वर श्रवणाचैव तेपां त्वं पुण्यमाप्स्यसि पाण्डव गत्वा शतगुणं चैव तेभ्य एव नरोत्तम पूर्व प्राची दिशं राजनाजर्षिगणसेविताम् रम्यां ते कथयिष्यामि युधिष्टिर यथास्मृति ॥ ५ ॥ मसामीयां अध्याय ।। ८७॥ काम्पायन जी बोले- गजाजनगंजय ! धीम्य वृत्तान्त सुनो, जिसके सुनने स तुमको पुण्य होगा वि पाण्डवों को भी निए और घबराय हुए और शोक मे हट जाओगे और जो उनमें गा दार देशर पनि ममाग इस प्रकार में करने जाओगे तो माँ गुणा पुण्य पाओगे। अब पहले हो -८ युधिष्ठिर ! तुम अपने भाइयों और मैं नुमंग अपन म्मरण के अनुमार पूर्व दिशा के साथों दीदी मदिन पुगभाग, दिशाना और पना । का वृत्तान्त कहना है सदा राजपतषियों के समूह AASANNA ॥ ४ ॥ ....
अध्याय ८७ ] म हा मारत १८९३ MMMMMeaimevn ॥ BANSALI तस्यां देवर्षिजुष्टायां नेमिपं नाम भारत यत्र तीर्थानि देवानां पुण्यानि च पृथक्पृथक् ॥ ६ ॥ यत्र सा गोमती पुण्या रम्या देवर्पिसेविता । यज्ञभूमिश्च देवानां शामित्रं च विवस्वतः तस्यां गिरिवरः पुण्यो गयो राजर्पिसत्कृतः शिवं ब्रह्मसरो यत्र सेवितं त्रिदशर्षिभिः यदर्थे पुरुषव्याघ्र कीर्तयन्ति पुगतनाः एष्टव्या वहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गयां ब्रजेत् ॥ ९ ॥ यजेत वाऽश्वमेधेन नीलं वा वृपमुत्सृजेत् उत्तारयति संतत्या दशपूर्वान्दशावरान् ॥ १० ॥ महानदी च तत्रैव तथा गयशिरो नृप यत्राऽसौ कीर्यते विरक्षय्यकरणो वटः ॥ ११ ॥ यत्र दत्तं पितृभ्योऽन्नमक्षय्यं भवनि प्रभो । सा च पुण्यजला तत्र फल्गुनामा महानदी ॥ १२ ॥ बहुमूलफला चापि कौशिकी भरतर्षभ विश्वामित्रोऽध्यगाद्यत्र ब्राह्मणत्वं तपोधनः ॥ १३ ॥ गहा यत्र नदी पुण्या यस्यास्तीरे भगीरथः । के समूह रहते हैं ॥१५॥ । जो बहुत से पुत्र होंगे तो कोई तो उनमें से जाकर इस देवताओं के रहनेवाली दिशा में पहले । गया कोगा अथा अश्वमेध यज्ञ या नीरा वृषभ नैमिपतीर्थ है, उममें अलग-अलग देवताओं के अलग छोड़ेगा क्योंकि यह कर्म दश अगले और दशा पिटले अलग पुण्यतीर्थ हैं और वहीं गोमती नाम पुण्य नदी । पुरम्बाओं को तारता है ॥६॥१०॥ भी है जो बड़ी रमणीक और देवताओं में सेविन और यहीं गया शिर और फल्गु नामी महानदी | यह नैमिषतीर्थ देवताओं की यज्ञभूमि और और अक्षयकरण वट भी है। जहा पर पितरों का श्राद्ध यमराज का सा मित्र हैं। उसके आगे गय नाम पुण्यद कग्न म पितरों का दिया हुआ पदार्थ अक्षय बना पर्वत है जिसमें ब्रह्ममर नामी एक कल्याणरूषी तीर्थ रहता है। उसके आगे कौशिकी नदी है जहाविधामित्र है जहा देवता ओर ऋषि रहा करते हैं । पुगने : ऋषि ने ब्राह्मणत्व पाया था दम नदी पर मूल और फल रोगों ने इमी तीर्थ के कारण मे ग्रह कहा है कि बहुत मिलते हैं। और इसी दिशा में गङ्गा नाम पुण्य मनुप्य क बहुत से पुत्र हों तो अच्छा है क्योंकि नदी मी है जिसके तट पर भगीरथ ने बहुत मे बटे- AMALAMINAal | वनपत्र १८९४ म हा भारत atautrintatatandaard अयजत्तन बहुभिः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणेः पञ्चालेषु च कौरव्य कथयन्त्युत्पलायनम् । विश्वामित्रोऽयजद्यत्र पुत्रेण सह कौशिकः ॥ १५॥ यत्राऽनुवंशं भगवाजामदग्न्यस्तथा जगौ विश्वामित्रस्य तां दृष्ट्वा विभूतिमतिमानुपीम् ॥ १६ ॥ कान्यकुब्जेऽपिवत्सोममिन्द्रेण सह कौशिकः । ततःक्षत्रादपाक्रामबाह्मणोऽस्मीति चाऽब्रवीत् ॥ १७ ॥ पवित्रमृषिभिर्जुष्टं पुण्यं पावनमुत्तमम् गङ्गायमुनयोर्वीर संगमं लोकविश्रुतम् ॥ १८ ॥ यत्राऽयजत भूतात्मा पूर्वमेव पितामहः प्रयागमिति विख्यातं तस्माद्भरतसत्तम अगस्त्यस्य तु राजेन्द्र तत्राऽऽश्रमवरो नृप तत्तथा तापसारण्यं तापसैरुपशोभितम् ॥ २० ॥ हिरण्यविन्दुः कथितो गिरौ कालञ्जरे महान् । आगस्त्यपर्वतोरम्यः पुण्यो गिरिवरः शिवः ॥ २१ ॥ महेन्द्रो नाम कौरव्य भार्गवस्य महात्मनः अजयत्तत्र कौन्तेय पूर्वमेव पितामहः ॥ २२ ॥ यत्र भागीरथी पुण्या सरस्यासीद्युधिष्ठिर बंड़ यज्ञ किये थे। वहीं उत्पला वन तीर्थ भी है जो है जहा ऋपि लोग रहा करते हैं वहां पहले समय पांचाल देश में गिना जाता है । वहा विश्वामित्र ने । में ब्रह्मा जी ने यज्ञ किया था। उसी कारण से उस पुत्र मदित यन किया था और परशुराम जी ने उनके स्थान का नाम प्रयाग विख्यात् है । उसके आगे तपो. पश्चर्य को दबकर उनके वंश की प्रशंसा की थी। वन में अगम्त्य जी का श्रेष्ठ आश्रम है जहा तपम्बी और कान्यकुब्ज देश में विश्वामित्र ने इन्द्र के माथ लोग रहते है ॥१२॥२०॥ मोम पान किया था और क्षत्रिय धर्म को छोड़कर उसके आगे कलिञ्जर पर्वत में हिरण्य बिन्दु नामी यह कहा था कि में ब्राह्मण ह । इसके आगे गन्ना तीर्थ है और वहीं श्रेष्ठ धर्म को बढ़ानेवाला, बड़ा और यमुना नदियों का मंगम जपवित्र, पापनाशक, | रमणीक, कल्याणकारी अगम्त्य पर्वत भी है । और पायदानवाला, उत्तम, नीना रोकों में विग्यात् । उसके पीछे परशुराम जी का गेहेन्द्र पर्वत है जहां - अध्याय ८८] म हा मारत १८९५ यत्र सा ब्रह्मशालेति पुण्या ख्याता विशाम्पते । धूतपाप्मभिगकीर्णा पुण्यं तस्याश्च दर्शनम् ॥ २३ ॥ पवित्रो मङ्गलीयश्च ख्यातो लोके महात्मनः केदारथ मतङ्गस्य महानाश्रम उत्तमः ॥ २४ ॥ कुण्डोदः पर्वतो रम्यो वहुमूलफलोदकः नैपधस्तृषितो यत्र जलं शर्म च लब्धवान् ॥ २५॥ यत्र देववनं पुण्यं तापसैरुपशोभितम् वाहुदा च नदी यत्र नन्दा च गिरिमूर्धनि ॥ २६ ॥ तीर्थानि सरितः शैलाः पुण्यान्यायतनानि च । प्राच्यां दिशि महाराज कीर्तितानि मया तव ॥ २७ ॥ तिसृष्वन्यानि पुण्यानि दिक्षु तीर्थानि मे शृणु । सरितः पर्वताश्चैव पुण्यान्यायतनानि च ॥ २८ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि धौम्यतीर्थयात्रां सप्ताशीतितमोऽध्यायः ॥ ८७ ।। पहले ब्रह्मा जी ने यज्ञ किया था। हे राजा युधिष्ठिर ! । जल मिलता है । राजा नल को पिपासाकुल होने पर इसी पूर्व दिशा में मणिकर्णिका सरोवर है जिसमें इसी पर्वत पर जल मिला था। और इसी के समीप श्री गगा जी ने प्रवेश किया था। वहीं वाराणसी अर्थात् देववन भी है जहा तपस्वी लोग रहा करते है। इसी काशी है जो धर्म के बहाने में ब्रह्मलोक के समान दिशा में बाहुदा और नन्दा नाम नदिया पहाड़ के है । यहां निष्पाप मनुष्य रहते है । उसके दर्शन से ऊपर बहती हैं। हे राजा युधिष्ठिर ! मैने तुमको ये सब धर्म की वृद्धि होती है। यह स्थान संसार में मङ्गलीय पुण्यस्थान, तीर्थ, नदी और पर्वत पूर्व दिशा के और पवित्र विख्यात है। वहीं केदारनामी मतङ्गऋषि सुनाये है। अब जो-जो स्थान, तीथ, आदि शेष तीनों का बड़ा उत्तम स्थान है। उसके आगे बड़ा रमणीक ' दिशाओं में है, उनको भी सुनो ॥२१॥२८॥ कुंदोद नामी पर्वत है जिसपर सुन्दर फल-मूल और वनपर्व का सत्तासीवां अध्याय समाप्त हुआ ।। ८७ ॥ । । - अथ अष्टाशीतितमोऽध्याय ॥ ८८ । धौम्य उवाच- दक्षिणस्यां तु पुण्यानि शृणु तीर्थानि भारत विस्तरेण यथावुद्धि कीर्त्यमानानि तानि वै यस्यामाख्यायते पुण्या दिशि गोदावरी नदी। Avm [ वनपर्व म हा मारत सर - Parewatantnenetrenameries वहारामा बहुजला तापसाचरिता शिवा वेणा भीमरथी चैव नद्यौ पापभयापहे मृगद्विजसमाकीर्णे तापसालयभूषिते राजप॑स्तस्य च सरिन्नृगस्य भरतर्षभ रम्यतीर्था बहुजला पयोष्णी द्विजसेविता ॥ ४ ॥ अपि चाऽत्र महायोगी मार्कण्डेयो महायशाः । अनुवंश्यां जगौ गाथां नृगस्य धरणीपतेः ॥ ५ ॥ नृगस्य यजमानस्य प्रत्यक्षमिति नः श्रुतम् । अमाद्यदिन्द्रः सोमेन दक्षिणाभिर्द्विजातयः ॥ ६ ॥ पयोष्ण्यां यजमानस्य वाराहे तीर्थ उत्तमे । उद्धृतं भूतलस्थं वा वायुना समुदीरितम् । पयोष्णा हरते तोयं पापमामरणान्तिकम् स्वर्गादुत्तुङ्गममलं विषाणं यत्र शूलिनः स्वमात्मविहितं दृष्ट्वा मर्त्यः शिवपुरं व्रजेत् एकतः सरितः सर्वा गङ्गायाः सलिलोचयाः । पयोप्णी चैकतः पुण्या तीर्थेभ्यो हि मता मम ॥ ९ ॥ माठरस्य वनं पुण्यं बहुमूलफलं शिवम् अहामीयां अध्याय ।। ८८॥ भाग्य प्रापि बोले-हे राजा युधिष्ठिर ! अब मैं जिसमें यहुन या जल है और जिसके तट पर ब्राह्मण अपनी बुद्धि के अनुमा दक्षिण दिशा के पुण्यतीर्थों लोग रहा करने है । इसी नदी के तट पर बड़े तपस्वी का इजान्त कहता है, मुनी । इस दिशा में प्रथम और योगी माण्डेिय ऋपिने राजा नृग के वंश को तो बड़ी पल्याणरूपी गोदावरी नदी है। जो वन, प्रशंमा उमी के सम्मुग्व की धी और हमने यह भी रवा और नास्वियों म मुशामिन और अनि गभीर मुना कि इमी म्यान पर गजा नृग के यज में है और उस भाग वेगा भार भीमरी नाग नादिया इन्द्र सोम पान का मतवाला हो गया था और जिना तट पर अंक नास्वियों के आथम है। वारण रोग दक्षिणा पाकर निहाल हो गये थे। इस यदाना नदिया मृग और पक्षियों ग न्यार पर पयोणी नदी पर बागा, ताक पर और की पास भयका दर कामयागह। किस पयोणी जी की धून पकान या वायु में ऊपर पड़ने नागवि मृग नाम कानही राम मणी पाया पदा पर नदी के जल कोपीन ग गनुष्य के -- .. - अध्याय ८८ ] म हा भारत १८९७ यूपश्च भरतश्रेष्ठ वरुणस्रोतसे गिरौ ॥ १० ॥ प्रवेण्युत्तरमार्गे तु पुण्ये कण्वाश्रमे तथा तापसानामरण्यानि कीर्तितानि यथाश्रुति वेदी शूर्पारके तात जमदग्नेर्महात्मनः रम्या पापाणतीर्था च पुनश्चन्द्रा च भारत अशोकतीर्थं तत्रैव कौन्तेय बहुलाश्रमम् अगस्त्यतीर्थं पाण्डयेपु वारुणं च युधिष्ठिर ॥ १३ ॥ कुमार्यः कथिताः पुण्याः पाण्डयेष्वेव नरर्षभ । ताम्रपर्णी तु कौन्तेय कीर्तयिष्यामि तां शृणु ॥ १४ ॥ यत्र देवस्तपस्तप्तं महदिच्छद्भिराश्रमे गोकर्ण इति विख्यातस्त्रिपु लोकेषु भारत शीततोयो बहुजलः पुण्यस्तात शिवः शुभः ह्रदः परमदुष्प्रापो मानुपैरकृतात्मभिः तत्र वृक्षतृणाद्यैश्च संपन्नः फलमूलवान् आश्रमोऽगस्त्यशिष्यस्य पुण्यो देवसमो गिरिः ॥ १७ ॥ वैदूर्यपर्वतस्तत्र श्रीमान्मणिमयः शिवः अगस्त्यस्याऽऽश्रमश्चैव वहुमूलफलोदकः मरण पर्यन्त के पाए दूर हो जाने है और वहा पर के वन है । इसके आगे शूपरिक में जमदग्नि ऋणि शिव जी का ही रचा हुआ है उसको देखने से मनुप्य वहीं अशोक तीर्थ भी है जिसमें बहुत से आश्रम को शिवलोक मिलता है । हे युधिष्ठिर ! गगा आदि हैं। उसक आगे पाण्ड्य देशों में अगम्त्य और वारण नदिया एक ओर और पर्याप्णी एक ओर है । मै । नामी तीर्थ हैं और उसी देश में कुमारी तीर्थ भी पयोणी को सब तीर्थों से पुण्यद समझता हूँ । वहीं बड़ा पुण्य का देनेवाला है और वहीं ताम्रपर्णी है माठर का वन कल्याणरूप, बहुत मूल और फल रखने- । जहा मोक्ष पाने की इच्छा से देवताओं ने आश्रम वाला और धर्म का बढ़ाने वाला है और वरणभातम में तपस्या की थी। तब से वह स्थान गोकर्ण नाम १ नाम पहाड़ पर यूष अर्थात् यजम्तम्भ है ।।१।१०॥ से तीनों रोकों में विख्यात हुआ। यहा परमकल्याण वहा से जो त्रिवेणी को मार्ग गया है उसके का करनेवाला एक सरोवर भी है जिसमे बहुत शीतल उत्तर की ओर कण्व ऋपि का आश्रम और तपम्पियों जल भरा हुआ है । वह जल धर्म का बढानेवाला MYReewerUAAMANASANASeA ..
१८९८ महा मारव । वनपर्व .. - recifixatininenevance huye 1 सुरावपि वक्ष्यामि पुण्यान्यायतनानि च आश्रमान्सरितंश्चैव सरांसि च नराधिप चमसोद्भेदनं विप्रास्तत्रापि कथयन्त्युत प्रभासं चोदधौ तीर्थं त्रिदशानां युधिष्ठिर ॥ २० ॥ तत्र पिण्डारकं नाम तापसाचरितं शिवम् । उज्जयन्तश्च शिखरी क्षिप्रं सिद्धिकरो महान् ॥ २१ ॥ तत्र देवपिवीरेण नारदेनाऽनुकीर्तितः पुराणः श्रूयते श्लोकस्नं निबोध युधिष्टिर ॥ २२ ॥ पुण्ये गिरौ सुराष्ट्रेपु मृगपक्षिनिषेविते उज्जयन्ते स्म तप्ताङ्को नाकपृष्ठे महीयते ॥ २३ ॥ पुण्या द्वारवती तत्र यत्राऽसौ मधुसूदनः साक्षादेवः पुराणोऽसौ स हि धर्म. सनातनः ॥ २४ ॥ ये च वेदविदो विप्रा ये चाऽध्यात्मविदो जनाः । ते वदन्ति महात्मानं कृष्णं धर्म सनातनम् ॥ २५ ॥ पवित्राणां हि गोविन्दः पवित्रं परमुच्यते पुण्यानामपि पुण्योऽसौ मङ्गलानां च मङ्गलम् । त्रैलोक्ये पुण्डरीकाक्षो देवदेवः सनातनः ॥ २६॥ है। जिनके अन्त करण अशुद्ध है वह उमगे नही नाम देवताओं का तीर्थ है ॥१श२०॥ घुस मकते हैं । वहा एक देवताओं के तुल्य पहाड़ वहीं पिंडारक तीर्थ भी है जहा साम्बी रोग रहते भी है जिसपर वृक्ष, घाम, फल और मून बहुत है है और उज्जयन्त पर्वत जहा मिद्धी शीघ्र मिलती है। और अगम्य जी के शिष्य का आश्रम है । उसी इसके विषय में हमने एक नारद जी का कहा हुआ और बड़ा कल्याणरूपी बर्य नामी मणि रम्बनेगान पुगना श्लोक सुना है जिसका अर्थ यह है कि जो पर्वत है जहा फल-मूर और जल बहुत मिलते है रजयन्त नाम पर्वत मुराष्ट्र देशों में है, जिसपर अनेक यह पर्वत अगम्य जी का आश्रम है। इसके आगे मृग और पक्षी रहते हैं, उमपर तपम्या करने से मनुप्य मुराष्ट्र दगद उममें जो जो पुण्य और पवित्र म्यान, को परोक मिलता है। वहीं द्वारका नाम धर्म के नदी और मगेपर हैं उनका भी वृत्तान्त कहना है, यदानेवाली पुगे भी है जिसमें श्रीकृष्ण जी रहते है। ये मुवामा गगवदने है कि उपदेश में एक तो श्रीकृष्ण माक्षात् पुगने देवता हैं और उनका पूजन यामाहान नर्यि है और गमुद्रक नट पर प्रभाम करना मनातन धर्म है । जो ब्राह्मण वेदपाठी और । । ....
अध्याय ८९ ] म हा भारत १८९९ अव्ययात्मा व्ययात्मा च क्षेत्रज्ञः परमेश्वरः आस्ते हरिरचिन्त्यात्मा तत्रैव मधुसूदनः ॥ २७ ॥ इति श्रीमन्महाभारने आरण्यकपर्वणि तीर्थयागापर्वणि धौम्यतीर्थयात्रायां अष्टाशीतितमोऽध्यायः ।। ८८ ।। अध्यात्म के जाननेवाले हैं वह श्रीकृष्ण जी की पूजा मङ्गलों में मगल,मनातन,अविनाशी, परमेश्वर,अचिन्त्य करने को ही सनातन धर्म कहते है । सो हे युधिष्ठिर! आत्मा, और देवताओं के भी देवता है उसी द्वारका ये श्रीकृष्ण जो पवित्रों से पवित्र, पुण्यों के पुण्य, पुरी में रहते हैं ॥२१॥२७॥ वनपर्व का अट्टामीवां अध्याय ममाप्त हुआ !! ८८ ॥ + ॥ अथ उननवतितमोऽध्याय: ।। ८९ ॥ धौम्य उवाच-आनर्तेषु प्रतीच्यां वै कीर्तयिष्यामि ते दिशि । यानि तत्र पवित्राणि पुण्यान्यायतनानि च प्रियंग्वाम्रवणोपेता वानीरफलमालिनी प्रत्यक्त्रोता नदी पुण्या नर्मदा तत्र भारत त्रैलोक्ये यानि तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च । सरिद्वनानि शैलेन्द्रा देवाश्च स पितामहाः ॥ ३ ॥ नर्मदायां कुरुश्रेष्ट सह सिद्धर्विचारणैः स्नातुमायान्ति पुण्यौघैः सदा वारिपु भारत निकेतः श्रूयते पुण्यो तत्र विश्रवसो मुनेः जज्ञे धनपतिर्यत्र कुवेगे नरवाहनः वैदूर्यशिखरो नाम पुण्यो गिरिवरः शिवः नित्यपुष्पफलास्तत्र पादपा हरितच्छदाः नवासीयां अध्याय ॥ ८९॥ धौम्य ऋषि बोले-हे राजा युधिष्ठिर ! अब मैं नदिया, पर्वत जो तीनों लोकों में विख्यात् ब्रह्मादिक उन तीर्थों का वृत्तान्त कहता हू जो पश्चिम दिशा देवता, सिद्ध, ऋषि और चारण आदि पुण्यात्मा में अवन्ति देशों में हैं । प्रथम तो इस दिशा में नर्मदा । जीव सदा म्नान करने को आया करते है। इसी नदी है जो पश्चिम की और को बहती हुई धर्म को दिशा में विश्रवा मुनि का स्थान है, जहां कुवेर जी बढानवाली है। इसके तट पर प्रियंगु और आम्ब के उत्सन्न हुए थे और वैडूर्य शिखर नाम पर्वत परम-, वृक्षों के वन हैं। इस नदी में सब तीर्थ, पवित्र स्थान, कल्याणरूप धर्म का बढ़ानेवारा है, जिसपर वृक्ष NAIGenerBAvaDBALBABUABAkadem BANANEWANA .
म हा भारत [ वनपर्व - NANTARABYRINTENPOHARASHDAN तस्य शैलस्य शिखरे सरः पुण्यं महीपते फुल्लपमं महाराज देवगन्धर्वसेवितम् बह्वाश्चर्य महाराज दृश्यते तत्र पर्वते पुण्ये स्त्रोपमे चैव देवर्षिगणसेविते ॥ ८ ॥ हादिनी पुण्यतीर्था च राजस्तत्र वै सरित् । विश्वामित्रनदी राजन् पुण्या परपुरञ्जय यस्यास्तीरे सतां मध्ये ययातिनहुपात्मजः पपात स पुनर्लोकाँल्लेभे धर्मान्सनातनान् तत्र पुण्यो हृदः ख्यातो मैनाकश्चैव पर्वतः बहुमूलफलोपेतस्त्वसितो नाम पर्वतः ॥ ११ ॥ आश्रमः कक्षसेनस्य पुण्यस्तत्र युधिष्ठिर च्यवनस्याश्रमश्चैव विख्यातस्तत्र पाण्डव ॥ १२॥ तत्राऽल्पनेव सिध्यन्ति मानवास्तपसा विभो । जम्बूमार्गों महाराज ऋपीणां भावितात्मनाम् ॥ १३ ॥ आश्रमः शाम्यतां श्रेष्ठ मृगद्विजनिपेवितः ननः पुण्यनमा राजन् सततं तापसयुता ॥ १४ ॥ केतुमाला च मेध्या च गङ्गाद्वारं च भूमिप ग्यानं न सन्धयारण्यं पुण्यं द्विजनिषेवितम् ॥ १५ ॥ पिनामहमरः पुण्यं पुष्करं नाम नामतः १४ पहन है। इस पर्यन पाए धर्म का समरपुरगों के बीच में गिरकर फिर मनातन रोक बनानदायमगंदामाजिम मदर कमर पर रहने पाये ॥१॥१०॥ पावन और गर्व को मन। यह राएर पुण्य मरोवर भीर मनाक और अमित पन नुन्या यता न पियों नामी मन और पल मे युक्त पत भी इमी निal • मग पहा का भार अंना वा भार ग्ययन कापियों का पुग्य आधrt Suntacा गाहदि जा घोड़ी नया का मना मनुष्य मिदि ममयटी मदन विविधामिय UR जाता है, 1 महीं भमाग मागी मृग और नयन पनियों में गुन. नासम भार हाट अनावरण ।
अध्याय ९० ] महा भारत RAN८~ ~~AL वैखानसानां मिद्धानामृषीणामाश्रमः प्रियः ॥ १६ ॥ अप्यत्र संश्रयार्थाय प्रजापनिग्यो जगौ पुष्करेषु कुनश्रेष्ट गाथां सुकृतिनां वर ।। १७॥ मनसाऽप्यभिकामस्य पुष्कगणि मनम्विनः विप्रणश्यन्ति पापानि नाकपृष्टे च मोदने इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि धान्यर्थियात्रायां उननवतितमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ रम्बनेवाले ऋषियों के आश्रम हैं। और हमके आगे मिद्ध ऋषियों का आश्रम है । हे गजा युधिष्टिर' स्तुमान्य, मन्या और गङ्गाद्वार नानी बड़े पुण्यद ब्रह्मा जी ने यहा वाम करने के लिए यह कहा है नीर्थ हैं, जहां तपम्बी लोग सदा रहा करते हैं । कि जो कोई पुष्कर का म्मग्ण मन में भी करता इसके आगे मैन्धव वन है, जहां पवित्र बामण रहते हैं उमके सब पाप निश्चय दूर हो जाते है और वह हैं। इसी विद्या में पु कर नामवाला धर्म का बहानेवाला बगेक पाना है ॥१२॥१८॥ ब्रह्मा जी का एक मरावर भी है जहां वैवानम नाम के वनपर्व का नवामीवां अध्याय ममाम हुआ ।। ८९॥ - - अथ नवनितमोऽध्यायः ॥ ५॥ धौग्य उवाच-उदीच्यां राजशार्दूल दिशि पुण्यानि यानि वै तानि ने कीर्तयिष्यामि पुण्यान्यायतनानि च ॥ १ ॥ शृणुप्वावहितो भूत्वा मम मन्त्रयतः प्रभो । कथाप्रतिग्रहो वीर श्रद्धां जनयते शुभाम् ॥ २ ॥ सरस्वती महापुण्या हादिनी तीर्थमालिनी ममुद्रगा महावेगा यमुना यत्र पाण्डव यत्र पुण्यनरं तीर्थ लक्षाबतरणं शुभम् । यत्र सारस्वरिष्ट्वा गच्छन्त्यवभृथैर्द्विजाः ॥ १ ॥ पुण्यं चाऽऽन्यायते दिव्यं शिवमग्निशिगेऽनघ । नव्ववां अध्याय ॥ ९॥ धौम्य ऋषि बोले-हे राजा युधिष्ठिर ! अब मैं इम दिशा में प्रथम मरस्वती, मालिनी, हदिनी और उत्तर दिमां के तीर्थ और पुण्य स्थानों का वृत्तान्त यमुना नाम की नदियां बड़े पुण्य की देनेवाग। १ कहता है, तुम मावधानी से सुनो। क्योंकि क्या को यमुना का बड़ा वेग है, जो समुद्र में जा मिलनी है। है मन में याद रमन से अच्छी श्रद्धा उत्पन्न होती है। यहां प्लक्षा, बटरण नाम का बड़ा शुभ और पुण्यद 23-10 म हा मारत [ वनपर्व - । enon DENNANINDENNANN तस्य शैलस्य शिखरे सरः पुण्यं महीपते फुल्लपद्मं महाराज देवगन्धर्वसेवितम् वहाश्चर्य महाराज दृश्यते तत्र पर्वते पुण्ये स्वर्गोपमे चैव देवर्षिगणसेविते ॥ ८ द्वादिनी पुण्यतीर्था च राजर्षस्तत्र वै सरित् । विश्वामित्रनदी राजन् पुण्या परपुरञ्जय यस्यास्तीरे सतां मध्ये ययातिनहुपात्मजः पपात स पुनलोंकाँल्लेभे धर्मान्सनातनान् ॥ १० ॥ तत्र पुण्यो ह्रदः ख्यातो मैनाकश्चैव पर्वतः बहुमूलफलोपेतस्त्वसितो नाम पर्वतः आश्रमः कक्षसेनस्य पुण्यस्तत्र युधिष्ठिर च्यवनस्याऽऽश्रमश्चैव विख्यातस्तत्र पाण्डव तत्राऽल्पेनैव सिध्यन्ति मानवास्तपसा विभो । जम्बूमार्गो महाराज ऋषीणां भावितात्मनाम् ॥ १३ ॥ आश्रमः शाम्यतां श्रेष्ठ मृगद्विजनिषेवितः ततः पुण्यतमा राजन् सततं तापसैयुता ॥ १४ ॥ केतुमाला च मेध्या च गङ्गाद्वारं च भूमिप च्यातं च सैन्धवारण्यं पुपयं द्विजनिषेवितम् ॥ १५॥ पितामहसरः पुण्यं पुष्कर नाम नामतः मदा पूल फल रहते हैं। इस पर्वत पर पक धर्म का से सत्पुरुषों के बीच में गिरकर फिर सनातन लोक : बनानेवाला मगेयर भी जिममें मदेव कमल फूले रहते पाये थे ॥१॥१०॥ । उमपर देवता और गन्धर्य बने मंन । यद्द वहां एक पुण्य सरोवर और मैनाक और अमित पर्वत वर्ग के तुन्य । देवना और प्रापियों के नामी मूल और फल से युक्त पर्वत भी है। इसी दिशा मगह के समूह वहां बिना कान है और अनेक में कक्षमेन और च्यवन ऋषियों के पुण्य आश्रम आधी मी याने दिवाई देता है। वहीं गादिनी जहां थोड़ी नाम्या करने में भी मनुष्य को सिद्धि नाम पाम पुण्य नदी गाद,निमगोगनप्रापि विधामिन पाम हो जाती है । वहीं जम्बुमार्ग:नागी मृग और राये मीनदी नर पर गजा ययानि वर्ग पक्षियों मे युक्त आश्रम भी है जहां शुद्ध अन्तकरण - - अध्याय ९०] महा भारत १९०१ वैखानसानां सिद्धानामृषीणामाश्रमः प्रियः अप्यत्र संश्रयार्थाय प्रजापतिरथो जगौ पुष्करेषु कुरुश्रेष्ट गाथां सुकृतिनां वर मनसाऽप्यभिकामस्य पुष्कराणि मनस्विनः विप्रणश्यन्ति पापानि नाकपृष्ट च मोदते इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि धौम्यतीर्थयात्रायां ऊननवतितमोऽध्यायः ।। ८ ।। रखनेवाले ऋषियों के आश्रम हैं। और इसके आगे सिद्ध ऋपियों का आश्रम है । हे राजा युधिष्ठिर केतुमाला, मन्या और गङ्गाद्वार नामी बडे पुण्यद ब्रह्मा जी ने यहा वास करने के लिए यह कहा है तीर्थ है, जहां तपम्धी लोग सदा रहा करते हैं । कि जो कोई पुष्कर का स्मरण मन में भी करता इसके आगे सैन्धव वन है, जहां पवित्र ब्राह्मण रहते है उसके सब पाप निश्चय दूर हो जाते है और वह हैं । इसी दिशा में पु'कर नामवाला धर्म का बढानेवाला मर्गलोक पाता है ॥११॥१८॥ ब्रह्मा जी का.एक सरोवर भी है जहां वैखानम नाम के वनपर्व का नवामीवां अध्याय समाप्त हुआ ॥ ८९॥ Ea9- winnrnvrternmeABANAUGUR - अथ नवतितमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ धोग्य उवाच-उदीच्यां राजशार्दूल दिशि पुण्यानि यानि वै । तानि ते कीर्तयिष्यामि पुण्यान्यायतनानि च ॥ १ ॥ शृणुष्वावहितो भूत्वा मम मन्त्रयतः प्रभो । कथाप्रतिग्रहो वीर श्रद्धां जनयते शुभाम् ॥ २ ॥ सरस्वती महापुण्या हादिनी तीर्थमालिनी समुद्रगा महावेगा यमुना यत्र पाण्डव यत्र पुण्यतरं तीर्थं प्लक्षावतरणं शुभम् यत्र सारस्वतेरिष्टा गच्छन्त्यवभृथैर्द्विजाः पुण्यं चाऽऽव्यायते दिव्यं शिवमग्निशिगेऽनघ । नव्वेषां अध्याय ॥ ९ ॥ धौम्य ऋषि बोले-हे राजा युधिष्ठिर ! अब मै इस दिशा में प्रथम सरम्वती, शालिनी, ददिनी और उत्तर दिशा के तीर्थ और पुण्य स्थानों का वृत्तान्त यमुना नाम की नदियां बड़े पुण्य की देनेगली हैं। कहता हूँ, तुम सावधानी से सुनो। क्योंकि कथा को यमुना का बड़ा वेग है, जो समुद्र में जा मिलती है। मन में याद रखने से अच्छी श्रद्धा उत्पन्न होती है। यहां प्लक्षा, यलरण नाम का बड़ा शुभ और पुण्यद ८ १९०२ महा मा र त [ अनपर्व - .. सहदेवोऽयजयत्र शम्याक्षेपण भारत एतस्मिन्नेव चाऽर्थेऽसाविन्द्रगीता युधिष्टिर । गाथा चरति लोकेऽस्मिन्गीयमाना द्विजातिभिः ॥ ६ ॥ अग्नयः सह देवेन ये चिता यमुनामनु ते तस्य कुरुशार्दूल सहस्रशतदक्षिणाः ॥ ७ ॥ तत्रैव भरतो राजा चक्रवर्ती महायशाः विंशतिः सप्त चाऽष्टौ च हयमेधानुपाहरत् ॥ ८ ॥ कामकृयो द्विजातीनां श्रुतस्तात यथा पुरा । अत्यन्तमाश्रमः पुण्यः शरभङ्गस्य विश्रुतः सरस्वती नदी सद्भिः सततं पार्थ पूजिता । वालखिल्यैर्महाराज यत्रेप्टमृपिभिः पुरा दृपद्धती महापुण्या यत्र ख्याता युधिष्ठिर न्यग्रोधाख्यस्तु पुण्याख्यः पाञ्चाल्यो द्विपदां वरः॥ ११ ॥ दाल्भ्यघोषश्च दाल्भ्यश्च धरणीस्थो महामनाः । कौन्तेयाऽनन्तयशसः सुवृत्तस्याऽमितौजसः ॥ १२ ।। आश्रमः ख्यायते पुण्यस्त्रिषु लोकेपु विश्रुतः । एतावर्णावध? च विश्रुतौ मनुजाधिप तीर्थ है, जहां ब्राह्मण लोग यन करके और सरस्वती की थी। वहीं शरभग ऋषि का भी परमपुण्यद आश्रम में अवभृथ ग्नान करके चले जाते हैं । वहीं अग्निशिर | मुना जाता है ||१६१०॥ नाम का भी एक बड़ा दिन्य और कल्याणरूपी तीर्थ इम दिशा में जो मरम्वती नदी है वह सत्पुरुषों है, जहा सहदेव ने यन किया था कि जिसके कारण से निरन्तर पूजित रहती है और अगले समय में इस से संसार में यह इन्द्र की कही हुई बात ब्राह्मणों के नदी के तट पर वालखिल्य ऋषियों ने यज्ञ किया द्वारा फैल रही है कि यमुना के तट पर सहदेव ने था। इसी दिशा में पढ़ती नाम नदी भी बड़े पुण्य अग्नि की मेवा की थी और उसके किये हुए यजों की देनेवाली है और पांचाल देश में न्यग्रोध नामी में लाग्यों को दक्षिणा खन हुई थी । इसी दिशा में | नीर्थ और दृपद नामी मनुष्यों में श्रेष्ठ राजा है। राजा भरत ने एक मी अड़तारीम अश्वमेध यन किये | यहीं पर दालभ्य ऋपि का आश्रम तीनों लोकों में ध और यह मुनने में आया है कि हम राजा ने विन्यात् है । दालभ्य प्रापि बड़े यशस्वी और तेजस्वी अगले ममय में बामणों की मय मनोकामनाएं पूर्ण | और इसी स्थान पर ब्रह्मजाता श्वेन श्याम और .
अध्याय ९०] म हा मारत "Indirtarvrso.monalANANANAMIN - वेदनौ वेदविद्वांसौ वेदविद्याबिदावुभौ ईजाते क्रतुभिर्मुख्यैः पुण्यैर्भरतसत्तम समेत्य बहुशो देवाः सेन्द्राः सवरुणाः पुरा । विशाखयूपेऽतप्यन्त तेन पुण्यतमश्च सः ऋषिमहान्महाभागो जमदग्निर्महायशाः पलाशकेषु पुण्येषु रम्येप्वयजत प्रभुः ॥ १६ ॥ यत्र सर्वाः सरिच्छेष्टाः साक्षात्तमृपिसत्तमम् स्वं स्वं तोयमुपादाय परिवार्योपतस्थिरे अपि चाऽत्र महाराज स्वयं विश्वावसुर्जगौ इमं श्लोकं तदा वीर प्रेक्ष्य दीक्षां महात्मनः ॥ १८ ॥ यजमानस्य वै देवाञ्जमदग्नेर्महात्मनः आगम्य सरितो विप्रान्मधुना समतर्पयन् गन्धर्वयक्षरक्षोभिरप्सरोभिश्च सेवितम् किरातकिन्नरावासं शैलं शिखरिणां वरम् ॥ २० ॥ विभेद तरसा गङ्गा गङ्गाद्वारं युधिष्ठिर पुण्यं तख्यायते राजन् ब्रह्मर्षिगणसेवितम् ॥ २१ ॥ सनत्कुमारः कौरव्य पुण्यं कनखलं तथा पर्वतश्च पुरुर्नाम यत्र यातः पुरूरवाः ॥ २२ ॥ रक्त वर्ण रखनेवाले सब वेदों के पण्डित नग्नारायण ने उनको इस प्रकार मे दीक्षित देखकर आप अपने ? ने मुग्य-मुख्य यज्ञ क्यि थे। अगले समय में यहा मुख से एक श्लोक कहा था जिसका अर्थ यह है कि विशाख यूग पर देवताओं ने इन्द्र और वरुण के साथ हे देवताओ। महात्मा जमदनिजी के यज्ञ में नदियों कई प्रकार से तप किया था इससे यह स्थान बहुत ने आकर ब्राह्मणों को मधु पिलाकर तृप्त किया। इसी पुण्य का देनेवाला है ।।११।१५॥ दिशा में श्री गगा जी हिमाचल पहाड को, जिसपर यहा पर जो ढाक का वन है उसमें महाभाग गन्धर्व, यक्ष, राक्षम, अप्सरा, किरात और किन्नर जमदमि महर्षि ने यज किया था । उम यज्ञ में सब लोग रहा करते हैं, फोड़कर निकरी है। यह स्थान नदिया अपना अपना जल लेकर आई थी और जमदग्नि गङ्गाद्वार कहराता है, वहा बहुत मे मपि रोग रहते जी को घेरकर खड़ी हो गई थी। विश्वावसु ग-धर्व है और सनत्कुमार ऋषि धर्म के बहाने की इच्छा से महा मारत [ वनपर्व -- eenancerencreteected सहदेवोऽयजद्यत्र शम्याक्षेपेण भारत एतस्मिन्नेव चाऽर्थेऽसाविन्द्रगीता युधिष्टिर । गाथा चरति लोकेऽस्मिन्गीयमाना द्विजातिभिः ॥ ६ ॥ अग्नयः सह देवेन ये चिता यमुनामनु ते तस्य कुरुशार्दूल सहस्रशतदक्षिणाः तत्रैव भरतो राजा चक्रवर्ती महायशाः विंशतिः सप्त चाऽष्टौ च हयमेधानुपाहरत् ॥ ८ ॥ कामकृयो द्विजातीनां श्रुतस्तात यथा पुरा । अत्यन्तमाश्रमः पुण्यः शरभङ्गस्य विश्रुतः सरस्वती नदी सद्भिः सततं पार्थ पूजिता । वालखिल्यैर्महाराज यत्रेप्टमृपिभिः पुरा दृपद्धती महापुण्या यत्र ख्याता युधिष्ठिर न्यग्रोधाख्यस्तु पुण्याख्यः पाञ्चाल्यो द्विपदां वरः॥ ११ ॥ दाल्भ्यघोषश्च दाल्भ्यश्च धरणीस्थो महामनाः । कौन्तेयाऽनन्तयशसः सुवृत्तस्याऽमितौजसः ॥ १२ ॥ आश्रमः ख्यायते पुण्यस्त्रिपु लोकेषु विश्रुतः । एतावर्णावय! च विश्रुतौ मनुजाधिप तीर्थ है, जहा ब्राह्मण लोग यज्ञ करके और सरस्वती की थी। वहीं शरभग ऋषि का भी परमपुण्यद आश्रम में अवभृथ म्नान करके चले जाते हैं । वहीं अग्निशिर | सुना जाता है ॥१॥१०॥ , नाम का भी एक बड़ा दिव्य और कल्याणम्पी तार्थ इम दिशा में जो सरम्बा नदी है वह सत्पुरुषों है जहा सहदेव ने यज्ञ किया था कि जिसके कारण से निरन्तर पूजित रहती है और अगले समय में इस से संसार में यह इन्द्र की कही हुई बात ब्राह्मणों के नदी के तट पर बालखिल्य ऋषियों ने यज्ञ क्यिा द्वारा फैल रही है कि यमुना के तट पर सहदेव ने | था। इसी दिशा में दृपद्धती नाम नदी भी बड़े पुण्य अग्नि की मेवा की थी और उसके किये हुए यज्ञों की देनेवाली है और पाचाल देश में न्यग्रोध नामी की दक्षिणा खर्भ हुई थी। इसी दिशा में | तीर्थ और द्रुपद नामी मनुष्यों में श्रेष्ठ राजा है । राजा भरत ने एक सौ अड़तालीम अश्वमेध यज्ञ किये यहीं पर दारभ्य ऋषि का आश्रम तीन लोगों में थे और यह सुनने में आया है कि इस राजा ने विग्यात् है । दालभ्य प्रापि बड़े यशम्वी और तेजस्वी अगले ममय में ब्राह्मणों की मय मनोकामनाएं पूर्ण । थे और इसी स्थान पर ब्रह्मनाता स्वत श्याम और
अध्याय ९०]
महा मारत
१९०३
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वेदज्ञो वेदविद्वांसौ वेदविद्याविदावुभी
ईजाते क्रतुभिर्मुख्यैः पुण्यैर्भरतसत्तम ॥ १४ ॥
समेत्य बहुशो देवाः सेन्द्राः सवरुणाः पुरा ।
विशाखयूपेऽतप्यन्त तेन पुण्यतमश्च सः ॥ १५॥
ऋषिर्महान्महाभागो जमदग्निमहायशाः
पलाशकेषु पुण्येषु रम्येष्वयजत प्रभुः ॥ १६ ॥
यत्र सर्वाः सरिच्छेप्टाः साक्षात्तमृषिसत्तमम्
स्वं स्वं नोयमुपादाय परिवार्योपतस्थिरे
अपि चाऽत्र महाराज स्वयं विश्वावसुर्जगौ
इमं श्लोकं तदा वीर प्रेक्ष्य दीक्षां महात्मनः ॥ १८ ॥
यजमानस्य वै देवाञ्जमदग्नेर्महात्मनः
आगम्य सरितो विप्रान्मधुना समतर्पयन्
गन्धर्वयक्षरक्षोभिरप्सरोभिश्च सेवितम्
किरातकिन्नरावासं शैलं शिखरिणां वरम् ॥ २० ॥
विभेद तरसा गङ्गा गङ्गाद्वारं युधिष्टिर
पुण्यं तख्यायते राजन् ब्रह्मर्पिगणसेवितम् ॥ २१ ॥
सनत्कुमारः कौरव्य पुण्यं कनखलं तथा
पर्वतश्च पुरुर्नाम यत्र यातः पुरूरवाः
रक्त वर्ण रखनेवाले मब वेदों के पण्टित नग्नारायण ने उनको इस प्रकार मे दीक्षित टेग्खकर आप अपने ?
ने मुग्न्य-मुम्ब्य यन किये थे। अगले ममय में यहां मुग्व मे एक श्लोक कहा था जिसका अर्थ यह है कि
विगाख यूग पर देवताओं ने उन्द्र और वरुण के माय हे देवताओ ! महात्मा जमदग्नि जी के यज्ञ में नदियों
कई प्रकार से तप क्यिा था इमम यह म्यान बहुत ने आकर ब्राह्मणों को मधु पिलाकर तृप्त किया। इमी
पुण्य का देनेवाला है ॥११॥१५॥
दिशा में श्री गङ्गा जी हिमाचल पहाट को, जिमपर
यहां पर जो दाक का वन है उममें महाभाग गन्धर्व, यक्ष, राक्षम, अमरा, किरात और किन्नर
जमदग्नि महर्षि ने यज्ञ किया था । उम यज्ञ में सब रोग रहा करते हैं, फोड़कर निक्री हैं। यह स्थान
नदिया अपना-अपना जल लेकर आई थी और जमदग्नि गङ्गाद्वार कहलाता है, वहा बहुत मे ऋपि लोग रहने
जी को घेरकर खड़ी हो गई थी। विश्वावमु गन्धर्व है और सनत्कुमार ऋषि धर्म के बहाने की इच्छा से
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॥ २२ ॥
[ वनपर्व महा मारन ८WAL~ - ananostvaNNaana भृगुर्यत्र तपस्तेपे महर्पिगणसेविते राजन् स आश्रमः ख्यातो भृगुतुह्रो महागिरिः ॥ २३ ॥ यः स भूतं भविष्यञ्च भवच्च भरतर्षभ नारायण प्रभुर्विष्णुः शाश्वतः पुरुषोत्तमः ।। २४ ।। तस्याऽतियशसः पुण्यां विशालां वदरीमनु । आश्रमः ख्यायते पुण्यस्त्रिषु लोकेपु विश्रुतः ॥ २५ ॥ उष्णतोयवहा गङ्गा शीततोयवहा पुरा सुवर्णसिकता राजन् विशाला बदरीमनु ।। २६ ॥ ऋषयो यत्र देवाश्च महाभागा महोजसः प्राप्य नित्यं नमस्यन्ति देवं नारायणं प्रभुम् ।। २७ ।। यत्र नारायणो देवः परमात्मा सनातनः तत्र कृत्स्नं जगत्सर्व तीर्थान्यायतनानि च ॥ २८ ॥ नत्पुण्यं परमं ब्रह्म तत्तीर्थं तत्तपोवनम् तत्परं परमं देवं भूतानां परमेश्वरम् ।। २९ ।। शाश्वतं परमं चैव धातारं परमं पदम् यं विदित्वा न शोचन्ति विद्वांसः शास्त्रदृष्टयः ॥ ३० ॥ नत्र देवर्षयः सिद्धाः सर्वे चैव तपोधनाः उमा ध्यान किया करते है । यहा कनखल और महाभाग और तेजम्बी ऋषि और देवता नित्य नारायण पुरु नाम पर्वत हैं, जहा राजा पुरुस्या गया था। यह को नमस्कार करते हैं । हे युधिष्ठिर ! जहा नारायण सब धर्म के बदानवाले स्थान है ॥१६॥२२॥ है वहीं सब जगत् , सब तीर्थ और सब स्थान समझने वहीं एक बड़े पर्वत पर, जहां महाऋषि रहते हैं, चाहिये । नारायण ही पुण्य है, नारायण ही परब्रह्म भृगु जी ने तपस्या की थी। वह पवन तब से भृगुतुङ्ग है, नागयण ही तीर्थ है, नारायण ही तपोवन है, भाधम नाम में प्रसिद्ध है। उसके आगे बदरी वन यण ही पर है, नारायण ही परम देवता है, नारायण के निकट तीनों लोकों में विख्यात त्रिकाल न श्री विष्णु ही सब प्राणियों का परमेश्वर है और नारायण ही भगवान का विचार और पुण्यद आश्रम है । हे, नित्य श्रेष्ठ धाता और परम पर है। शास्त्र के जानने- गजा युधिष्ठिर ! इस बदरी वन के निकट पहले गहा वाले और विद्वान् लोग उस नारायण को ऐसा समझ. जलप और गरम और एक ओर गीतर बहता पर किमी प्रकार का गोच नहीं करते हैं ॥२३॥३०॥ धा और चार सुवर्ण मयुन थी। वहां पर पटे रहे जहां आदिदेव और महायोगी मधुसूदन जी -- . नारा- ४.८५८ ८.४४ अध्याय ९१] महा भारत १९०५ -CARRANG VSS आदिदेवो महायोगी यत्राऽऽस्ते मधुसूदनः ॥ ३१ ॥ पुण्यानामपि तत्पुण्यमत्र ते संशयोऽस्तु मा । एतानि राजन् पुण्यानि पृथिव्यां पृथिवीपते ।। ३२ ॥ कीर्तितानि नरश्रेष्ठ तीर्थान्यायतनानि च एतानि वसुभिः साध्यैरादित्यैर्मरुदश्विभिः ॥ ३३ ॥ ऋपिभिर्देवकल्पेश्च सेवितानि महात्मभिः चरन्नतानि कौन्तेय सहितो ब्राह्मणपभैः भ्रातृभिश्च महाभागैरुत्कण्ठां विहरिष्यसि ॥ ३४ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि धौम्यतीर्थयात्रायां नवतितमोऽध्यायः ॥ ९० ॥ है वहीं सब तपोधन सिद्ध और सब देवऋपि ममझन मरुद्गण, अश्विनीकुमार और देवताओं के तुल्य चाहिये । वह आदिदेव पुण्यों का भी पुण्य है। तुमको प्रभाव रखनेवाले ऋषियों से सेवित हैं। इनकी जो तुम इसमें कुछ भी मन्देह करना उचित नहीं है । हे युधि- अपने महाभाग माई और ब्राह्मणों सहित यात्रा करोगे ष्ठिर ! ये सब तीर्थ और म्थान, जो हमने वर्णन किये हैं, तो तुम्हारा सब शोक दूर हो जायगा ॥३१॥३४॥ सब धर्म के बढानेवाले और वसु, साध्य, आदित्य, CUC4Cl. caun avaravikivany - अथ एकनवतितमोऽध्यायः ॥ ९१ ।। वैशम्पायन उवाच-एवं संभाषमाणे तु धौम्ये कौरवनन्दन लोमशः स महातेजा ऋपिस्तत्राऽऽजगाम ह ॥ १ ॥ तं पाण्डवाग्रजो राजा सगणो ब्राह्मणाश्च ते । उपातिष्टन्महाभागं दिवि शक्रमिवाऽऽमराः ॥ २ ॥ समभ्यर्च्य यथान्यायं धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः पप्रच्छाऽऽगमने हेतुमटने च प्रयोजनम् स पृष्टः पाण्डुपुत्रेण प्रीयमाणो महामनाः इक्यानयां अध्याय ॥ ९१ ।। वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! जब उठ खडे हुए और आगे जाकर इस प्रकार से उनके धौम्य ऋषि उक्त क्या राजा युधिष्ठिर से कह चुके तर समीप जा खड़े हुए जैसे इन्द्र के ममीप देवता जा वहा बड़े तेजस्वी लोमश ऋषि आय । उनको आये खड़े हो । राजा युधिष्ठिर ने उस समय लोमश ऋषि हुए देखकर राजा युधिष्ठिर सब साथी ब्राह्मणों सहित की विधिपूर्वक पूजा की और उनसे वहां आने और १९०६ म हा भा र त । वनपर्व ४५८ उवाच श्लक्ष्णया वाचा हर्पयन्निव पाण्डवान् ॥ ४ ॥ संचरन्नस्मि कौन्तेय सर्वाल्लोकान्यदृच्छया गतः शकस्य भवनं तत्राऽपश्यं सुरेश्वरम् ॥ ५ ॥ तव च भ्रातरं वीरमपश्यं सव्यसाचिनम् शकस्याऽर्धासनगतं तत्र ते विस्मयो महान् आसीत्पुरुषशार्दूल दृष्ट्वा पार्थ तथागतम् आह मां तत्र देवेशो गच्छ पाण्डुसुतान्प्रति ॥ ७ ॥ सोऽहमभ्यागतः क्षिप्रं दिदृक्षुस्त्वां सहानुजम् । वचनात्पुरुहूतस्य पार्थस्य च महात्मनः आग्यास्ये ते प्रियं तात महत्पाण्डवनन्दन ऋपिभिः सहितो राजन् कृष्णया चैव तच्छृणु ॥ ९ ॥ यत्त्वयोक्तो महावाहुरस्त्रार्थं भरतर्षभ तदस्त्रमाप्त पार्थेन रुद्रादप्रतिमं विभो यत्तब्रह्मशिरो नाम तपसा रुद्रमागमत् अमृतादुत्थितं रौद्रं नल्लब्धं सव्यसाचिना नत्समन्त्रं ससंहारं सप्रायश्चित्तमङ्गलम् वजमस्त्राणि चाऽन्यानि दण्डादीनि युधिष्ठिर ॥ १२ ॥ घूमने का कारण पूछ । रोमन सपि यह सुनकर आता है । अब मै तुमसे तुम्हारे हित की बात कहता हूँ, वहुत और मधुर वाणी मे पाडवों का प्रमन्न तुम अपने भाइयों और द्रौपदी सहित सुनो ॥१॥९॥ करते हुए. कहने लगे- युधिष्ठिर दिन की इच्छा मे तुमन जो अर्जुन को अस्त्र सीखने के रिय भेजा में मर रोगों में घूमता हुआ इन्द्रगक को चला गया था मो उसको ब्रह्मगिर नामी अप्रमित अन्न जो था यहा मने इन्द्र के दर्शन किये और तुम्गरे पीर अमृत से प्रकट हुआ था और शिव जी की तपस्या : भाई अर्जुन का भी हदें के आधे आसन पर बैठा हुआ करन पर मिना था संहार, प्रायश्चित्त और माल अर्थात् , देगा। उगमों बेटे हा देवकर मुझको बड़ा आधर्य अत्र को छोड़ना, ग्वींचना,रक्षा करना और मम्म हुए और विष्मय हुआ। तब उम ममय मुझम देवेद्र ने पदार्थ का रिज्यों कात्या कर देना,गन्त और विधान मानहाकि तुम पाडवों के पास जाओ।मो में तुगको मदिस महादेव जी में प्राप्त हो गया है और यम, है और मुदिौरे छोटे भाइयों को देवी की इन्छा से | कुवर, वरण और इन्द्र में वन आदि दूसरे आत्र भी है हद और जर्जुन पहने । अनुमार वहीं में चग मिर गये है । इसके मियाय उसने विश्वावमु गंधर्म ... प्रसन्न हुए ..
अध्याय ९१] महा मा रत १९०७ - creatementeen यमात्कुवेरावरुणादिन्द्राञ्च कुरुनन्दन अस्त्राण्यधीतवान्पार्थो दिव्यान्यमितविक्रमः ॥ १३ ॥ विश्वावसोस्तु तनयाद्गीतं नृत्यं च साम च वादित्रं च यथान्यायं प्रत्यविन्दद्यथाविधि ॥ १४ ॥ एवं कृतास्त्रः कौन्तेयो गान्धर्व वेदमाप्तवान् सुखं वसति वीभत्सुरनुजस्याऽनुजस्तव यदर्थं मां सुरश्रेष्ठ इदं वचनमब्रवीत् तच ते कथयिष्यामि युधिष्ठिर निवोध मे भवान्मनुष्यलोकेऽपि गमिष्यति न संशयः ब्रूयाद्युधिष्ठिरं तत्र वचनान्मे द्विजोत्तम ॥१७॥ आगमिष्यति ते भ्राना कृतास्त्रः क्षिप्रमर्जुनः । सुरकार्य महत्कृत्वा यदशक्यं दिवौकसैः तपसाऽपि त्वमात्मानं योजय भ्रातृभिः सह । तपसो हि परं नास्ति तपसा विन्दते महत् अहं च कर्णं जानामि यथावद्भरतर्षभ सत्यसन्धं महोत्साहं महावीर्य महावलम् ॥ २० ॥ महाहवेवप्रतिमं महायुद्धविशारदम् महाधनुर्धरं वीरं महास्त्रं वरवर्णिनम् महेश्वग्सुतप्रख्यमादित्यतनयं प्रभुम् की बेटी से गाना, बजाना और नाचना भी विधिपूर्वक मीग्व चुका है । अब वह कुछ देवताओं का कार्य, सीग्व लिया है। सो वह तुम्हारा छोटा भाई अब सम्पूर्ण जो देवताओं से नहीं हो सक्ता है, करके शीघ्र तुम्हारे अस्त्र और गाधर्ष द को सीखकर इन्द्र के यहा पास आवेगा। जबतक तुम भी भाइयों सहित तपम्या सुखपूर्वक रहता ॥११॥१५॥ करो। तप में श्रेष्ठ और कोई पदार्थ नहीं है। मोक्ष भी जर मैं इन्द्रलोक से चरने लगा तब इन्द्र ने तप मे ही मिलता है। मै उस सत्यप्रतिज कर्ण को मुझसे कहा कि आप अवश्य मृत्युलोक में भी जायगे। जो पड़ा वीर, बड़ा पराक्रमी, युद्ध में अपने समान वहा जब आप जाय तब मेरी ओर से युधिष्ठिर से यह । दूमरा न रखनेवाला, युद्ध में निपुण, बड़ा धनुषधारी, कह देना कि तुम्हारा छोटा भाई अर्जुन अस्त्रविद्या । वडा अत्रवेत्ता, परमसुन्दर, सूर्य का पुत्र और महेश्वर NAGAWUBARAURahees - । N महा भारत [ वनपर्व ८८ - - . तथाऽर्जुनमतिस्कन्धं सहजोल्वणपीरुपम् न स पार्थस्य संग्रामे कलामहति पोडशीम् ॥ २२ ॥ यच्चापि ते भयं कर्णान्मनसिस्थमरिन्दम तबाऽप्यपहरिष्यामि सव्यसाचिन्युपागते ॥ २३ ॥ यच्च ते मानसं वीर तीर्थयात्रामिमां प्रति समपिर्लोमशस्ते कथयिष्यत्यसंशयम् ॥ २४ ॥ यञ्च किंचित्तपोयुक्तं फलं तीर्थेषु भारत ब्रह्मर्पिरेष ब्रूयात्ते न तच्छ्रद्धेयमन्यथा ।। २५ ।। इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशसंवादे एकनवतितमोऽध्यायः ॥ ९१ ।। के पुत्र के तुल्य है और अर्जुन को, जो ऊचे कन्धे मैं अर्जुन के तेरे पास चले आने पर दूर कर दूंगा। रखनेवाले शरीर के साथ उत्पन्न हुआ था और जिसका तबतक तुमने जो तीर्थयात्रा का मन में विचार किया पराक्रम म्पष्ट है, जानता हू । कर्ण युद्ध में अर्जुन की है वही करो । लोमश ऋषि तुमको सब तीर्थों में मोलहवीं कला को भी नहीं पहुँचता है और जो तेरे जाने का महात्म्य सुनावेंगे। उनके वचनों पर तुमको मन में कर्ण की और का खटका लग रहा है वह भी विश्वास करना चाहिये ॥१६।२५|| वनपर्व का इक्यानवेंवां अध्याय ममाप्त हुआ ॥ ९१ ॥ अथ द्विनवतितमाऽध्याय ॥ ९ ॥ गेगा टवान–धनञ्जयेन चाऽप्युक्तं यत्तच्छृणु युधिष्ठिर । युधिष्ठिरं भ्रातरं मे योजयेर्धय॑या श्रिया । त्वं हि धर्मान्परान्वेत्थ तपांसि च तपोधन श्रीमतां चापि जानासि धर्म राज्ञां सनातनम् ॥ २ ॥ स भवान्परमं वेद पावनं पुरुषं प्रति तेन संयोजयेथास्त्वं तीर्थपुण्येन पाण्डवान् ॥ ३ ॥ यानवेयां अध्याय ।। ५२ ।। लामा ऋषि पोले-ह, गजा युधिष्ठिर ! जय इन्द्र स मनुष्य पवित्र हो जाता है वह भी आपको अच्छी मुझम उग प्रकार में यह चुरा, नय अर्जुन कहने तरद्द विदित है। इसमे आप मेरे भाइयों को तीर्थरूपी २-६ महागज! आप मेरे भाई युधिष्ठिर को धर्मरूपी पुण्य मे युक्त कीजिये और ऐसा कीजिये कि जिममे गनी मे पुन कीजिय। आप गप श्रेष्ठ धर्म, तप और राजा युधिष्ठिर तीथों की यात्रा और गीभी का दान गजामा मनानन धमों को जानते हैं और जिम भर्ग करें। आपकी रक्षा में रहने में राजा युधिष्ठिर सर अध्याय ९२]] म हा भा र त १९०९ ८NP - Balneal Arananenanenunte - यथा तीर्थानि गच्छेत गाश्च दद्यात्स पार्थिवः । तथा सर्वात्मना कार्यमिति मामर्जुनोऽब्रवीत् ॥ ४ ॥ भवता चाऽनुगुप्तोऽसौ चरेत्तीर्थानि सर्वशः । रक्षोभ्यो रक्षितव्यश्च दुर्गेषु विषमेषु च दधीच इव देवेन्द्रं यथा चाऽप्यंगिरा रविम् । तथा रक्षस्व कौन्तेयात्राक्षसेभ्यो द्विजोत्तम ॥ ६ ॥ यातुधाना हि बहवो राक्षसाः पर्वतोपमाः त्वयाऽभिगुप्तं कौन्तेयं न विवर्तेयुरन्तिकम् ॥ ७ ॥ सोऽहमिन्द्रस्य वचनान्नियोगादर्जुनस्य च रक्षमाणो भयेभ्यस्त्वां चरिष्यामि त्वया सह द्विस्तीर्थानि मया पूर्व दृष्टानि कुरुनन्दन । इदं तृतीयं द्रक्ष्यामि तान्येव भवता सह इयं राजर्षिभिर्याता पुण्यकृद्भिर्युधिष्टिर मन्वादिभिर्महागज तीर्थयात्रा भयापहा ॥ १० ॥ नाऽनृजुर्नाऽकृतात्मा च नाऽविद्यो न च पापकृत् । स्नाति तीर्थेषु कौरव्य न च वक्रमतिर्नरः त्वं तु धर्ममतिर्नित्यं धर्मज्ञः सत्यसङ्गरः विमुक्तः सर्वसङ्गेभ्यो भूय एव भविष्यसि ॥ १२ ॥ तीर्थो की यात्रा कर सकेंगे और दुर्ग विषम स्थानों में । है । अब तीसरी बार तुम्हारे साथ यात्रा करूँगा। हे आप राजा की राक्षसों से रक्षा कीजियेगा ॥शमा राजा युधिष्ठिर ! ये तीर्थयात्रा सब विनों का नाश जैसे पहले समय में दर्घाचि ऋषि ने इन्द्र की आर करनेवाली है । मनु आदि सब राजऋपियों ने इसको अङ्गिग ऋषि ने सूर्य की रक्षा की थी। यातुधान किया है ।।६।१०॥ नामी बहुत से राक्षम पर्वतों के ममान है, आपकी जो मनुष्य कुटिल, अशुद्ध अंतकरण, विद्याहीन, रक्षा में रहने से वह राजा के निकट न आ सकेंगे। सो पापी और कुत्रुद्धी होता है, वह तीर्थों में म्नान नहीं हे युधिष्ठिर ! मै इन्द्र की आज्ञा और अर्जुन की प्रार्थना कर सकता है । तुम तो सदा धर्ममति.धर्मज्ञ, सत्यवादी, से तुम्हारे साथ रहकर सब विघ्नी से तुम्हारी रक्षा ! सब सङ्गों से विमुक्त और ऐश्वर्यवान् हो और राजा करुंगा। मैंने पहले दो वार सब तीर्थों की यात्रा की भगीरथ, राजा ययाति और गय आदि अगले धर्मज्ञ AMVAISPLANGA RAMANACAN १९१० महा भारत [ वनपर्व CAN LAM । ANDGAVA- यथा भगीरथो राजा राजानश्च गयादयः यथा ययातिः कौन्तेय तथा स्वमपि पाण्डव युधिष्ठिर उवाच-न हात्सप्रपश्यामि वाक्यस्याऽस्योत्तरं क्वचित् । स्मद्धि देवराजो यं को नामाऽभ्यधिकस्ततः ॥ १४ ॥ भवता संगमो यस्य भ्राता चैव धनञ्जयः वासवः स्मरते यस्य को नामाऽभ्यधिकस्ततः ॥१५॥ यच्च मां भगवानाह तीर्थानां दर्शनं प्रति । धौम्यस्य वचनादेपा बुद्धिः पूर्वं कृतव मे तद्यदा मन्यसे ब्रह्मन्गमनं तीर्थदर्शने तदेव गन्तास्मि तीर्थान्येप मे निश्चयः परः ॥ १७ ॥ वगम्पायन उवाण-गमने कृतयुन्द्विं तु पाण्डवं लोमशोऽब्रवीत् । लघुर्भव महाराज लघुः स्वैरं गमिष्यसि युधिष्ठिर उवान-भिक्षाभुजो निवर्तन्तां ब्राह्मणा यतयश्च ये । क्षुत्तृडध्वश्रमायासशीतालिमसहिष्णवः ते सर्वे विनिवर्तन्तां ये च मिष्टभुजो द्विजाः । पक्कान्नलेखपानानां मांसानां च विकल्पकाः ॥ २० ॥ गजाओं मे किमी प्रकार से कम नहीं हो। तुमको कर रपया है । सी हे महाराज ! जब आप इग्छ। नीर्थयात्रा दुग नहीं है। यह सुनकर युधिष्ठिर बोले- को तभी मैं भी तीर्थयात्रा करने के लिये आपके द गदागन ! मैं आपकी याची का उचर त्रिकी में माथ चलने को उपम्धिन है। वैशम्पायन ने कहा- नहीं देगना है। आज में बहुत ही प्रमन्न हैं । मला हे गजा जनमेजय ! लोमश ऋषि युधिष्ठिर को तीर्थ म भी और क्या अधिक होगा, जो इन्द्र मेग यात्रा करने के लिये उपस्थित देवकर कहने लगे कि IIT को और जिनका मिना आग जमे मापुरुषों तुम अपने माथ के समुदाय को थोड़ा करो। ऐसा गदीची माई जिम! अजुंग माह, जिमी पान में यात्रा इच्छा के अनुमार होगी। यह मुनः गादयन्द्र मादेवना कर, समग पदका कौन मनुष्य यधिष्ठित मय समुदाय में कहने लगे कि तुममें HER५|| में जो ग्रामण और सनी, भिमा-गोजन करनेवाल महा! ना गया इन्द्र ने मृो नाध. और गम, याम,सह नगी मायट और शीन यया भदौ म कप जीमम्मी को नही मद मरने हो और मिहास, भनय पावि भानामा परलेग शिवार पक्वाशय,पान और माम-भोजन करने की अध्याय ९३] म हा भारत । . तेऽपि सर्वे निवर्तन्तां ये च सूदानुयायिनः मया यथोचिताजीव्यैः संविभक्ताश्च वृत्तिभिः ॥ २१ ॥ ये चाऽप्यनुगताः पौरा राजभक्तिपुरः सराः । धृतराष्ट्रं महाराजमभिगच्छन्तु ते च वै ॥ २२ ॥ स दास्यति यथा कालमुचिता यस्य या भृतिः । स चेद्यथोचितां वृत्तिं न दद्यान्मनुजेश्वरः ॥ २३ ॥ अस्मत्प्रियहितार्थाय पांचाल्यो वः प्रदास्यति ॥ २४ ॥ वैशम्पायन उवाच-ततो भूयिष्ठशः पौरा गुरुभारप्रपीडिताः विप्राश्च यतयो मुख्या जग्मुर्नागपुरं प्रति ॥ २५॥ नान्सन्धिर्मराजस्य प्रेम्णा राजाऽम्बिकासुतः । प्रतिजग्राह विधिवद्धनैश्च समतर्पयत् ततः कुन्तीसुतो राजा लघुभिाह्मणैः सह लोमशेन च सुप्रीतस्त्रिरात्रं काम्यकेऽवसत् ॥ २७॥ इति श्रीमन्महाभारने आरण्यकपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां द्विनवतितमोऽध्यायः ।। ९२ ॥ रखते हों वे सब लौट जाय ॥१६॥२०॥ हे राजा जनमेजय ! यह सुनकर बहुत से पुरवासी हमारे रसोइये, जो हमारे साथ अन्नादि भोजन | बेदपाठी ब्राह्मण और यती दुःखी होकर हस्तिनापुर को करनेवाले हैं और पुरवामी, जो राजभक्ति के कारण लौटकर चले गये । राजा धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर की प्रीति से हमारे साथ हैं, वे भी लौट जाय और राजा धृतराष्ट्र के कारण से उन सबको प्रीतिपूर्वक अपने पास रख के पास चले जाय । राजा धृतराष्ट्र तुम सबको यथा लिया और सबको धन देकर तृप्त कर दिया और चित मामिक और जीविका देंगे और जो न दें तो युधिष्ठिर ने उनके चले जाने पर लोमश ऋषि और तुम सब लोग पाञ्चाल देश में राजा द्रुपद के पास थोड़े ब्राह्मणों सहित उस वन में तीन रात्रि वास चले जाना। राजा द्रुपद हमारी प्रीति के कारण से किया ॥२१॥२७॥ तुम सब को जीविका देंगे। वैशम्पायन ने कहा- वनपर्व का वानवेंवां अध्याय समाप्त हुआ ॥ ९ ॥ .. ALAN . अथ त्रिनवतितमोऽध्यायः ॥ १३ ॥ वैशम्पायन उवाच-ततः प्रयान्तं कौन्तेयं ब्राह्मणा वनवासिनः अभिगम्य तदा राजन्निदं वचनमब्रुवन् -८८८८८८०८ १९१२ म हा भारत [ वनपर्व ८८८८८८८८८८८८८८ ॥ NAARBANDED THE NEEDEHANDWR - राजस्तीर्थानि गन्तासि पुण्यानि भ्रातृभिः सह । ऋपिणा चैव सहितो लोमशेन महात्मना अस्मानपि महाराज नेतुमर्हसि पाण्डव अस्माभिहि न शक्यानि त्वहते तानि कौरव ॥ ३ श्वापदैरुपसृष्टानि दुर्गाणि विषमाणि च अगम्यानि नरैरल्पैस्तीर्थानि मनुजेश्वर भवतो भ्रातरः शूरा धनुर्धरवराः सदा भवद्भिः पालिताः शूरैगच्छामो वयमप्युत भवत्प्रसादाद्धि वयं प्राप्नुयामः सुखं फलम् । तीर्थानां पृथिवीपाल बनानां च विशांपते तव वीर्यपरित्राताः शुद्धास्तीर्थपरिप्लुताः भवेम धूतपाप्मानस्तीर्थसंदर्शनान्नृप ॥ ७ ॥ भवानपि नरेन्द्रस्य कार्तवीर्यस्य भारत अष्टकस्य च राजोमपादस्य चैव ह भरतस्य च वीरस्य सार्वभौमस्य पार्थिव ध्रुवं प्राप्स्यति दुष्प्रापाँलोकांस्तीर्थपरिप्लुतः प्रभासादीनि तीर्थानि महेन्द्रादींश्च पर्वतान् । तिगनवा अध्याय ॥ ९३ ।। वैशम्पायन जी बोले-हे राजा जनमजय! जय में श्रेष्ठ हैं। आपकी रक्षा में रहकर हम लोग भी राजा युधिष्ठिर तीर्थयात्रा करने के लिये चलन को नीर्थ कर आग और आपकी कृपा मे सुखपूर्वक तीर्थ उद्यत हुम, तब उस समय सब बनवासी बामण उनके और वनों की यात्रा का फल पावेंगे। उन तीर्थों का पास आकर कहने लगे-हे महाराज! आप नीर्थ करने दर्शन और स्नान करके शुद्ध और निष्पाप हो जायेंगे। को अपने भाई और लोमा ऋषि के साथ जाते है और आपको भी तीर्थों में स्नान करने से निश्चय वे हम लोगों को भीलन चरिय। बिना आपके हम लोग दुप्पाप्य लोक मिलेंगे जो राजा कार्तवीर्य राजऋषि अंकार टननीयों में नहीं जा सकने । क्योकि येतीर्थ अष्टक, लोमपाद और राजा भरत को मिले है ||५|| म्याग्दों में पूर्ण होकर दुर्ग और विषम है और अल्प हम लोग भी आपके साथ चलकर प्रभाव आदि पुरपयहां नहीं जा सकते हैं ||१४|| सार्थ, महेन्द्र आदि पर्वत, गदा आदि नदी और पक्ष आपय भाई यह गरीर और धनुपधारियों आदि कामतियों को देखना चाहते हैं। यदि आप ॥ HAN अध्याय ९३] म हा भारत १९१३ - AlianRIAGAINLAN- BPMAJARURBALPUR गङ्गाद्याः सरितश्चैव प्लक्षादींश्च वनस्पतीन् त्वया सह महीपाल द्रष्टुमिच्छामहे वयम् यदि ते ब्राह्मणेष्वस्ति काचित्प्रीतिर्जनाधिप ॥ ११ ॥ कुरु क्षिप्रं वचोऽस्माकं ततः श्रेयोऽभिपत्स्यते । तीर्थानि हि महावाहो तपोविघ्नकरैः सदा ॥ १२ ॥ अनुकीर्णानि रक्षोभिस्तेभ्यो नस्त्रातुमर्हसि । तीर्थान्युक्तानि धौम्येन नारदेन च धीमता ॥ १३ ॥ यान्युवाच च देवर्षिर्लोमशः सुमहातपाः विधिवत्तानि सर्वाणि पर्यटस्व नराधिप ॥ १४ ॥ धूतपाप्मा सहाऽस्माभिर्लोमशेनाऽऽभिपालितः । स राजा पूज्यमानस्तैहर्षादश्रुपरिप्लुतः भीमसेनादिभिर्वरिओतृभिः परिवारितः वाढमित्यवधीत्सवास्तानृवीन्पाण्डवर्षभः लोमशं समनुज्ञाप्य धौम्यं चैव पुरोहितम् । नतः स पाण्डवश्रेष्ठो भ्रातृभिः सहितो वशी ॥ १७ ॥ द्रोपद्या चाऽनवद्यांग्या गमनाय मनो दधे अथ व्यासो महाभागस्तथा पर्वतनारदौ ॥ १८ ॥ काम्यके पाण्डवं द्रष्टुं समाजग्मुर्मनीषिणः रोगों को ब्राह्मणों से प्रेम है तो हम लोगों के कहने जैसा कहते है वैसा हम करेंगे ॥१०॥१६॥ । मान लीजिये इसमें आपका कल्याण होगा। तीर्थों इसके पीछे युधिष्ठिर ने भाइयों सहित लोमश में बहुधा नप के विघ्न करनेवाले राक्षस विचरा करते ऋपि और धौम्य पुगेहित की पूजा की और द्रौपदी हैं आप हम लोगों की उनमे रक्षा कीजिये और जो-जो सहित तीर्थयात्रा करने का विचार किया। उसी समय तीर्थ नारद जी, धम्य ऋपि और तपम्वी देवमपि वहा पाण्डवों को देखने के लिये महाभाग व्यास जी, लोमश जी ने वर्णन किये हैं उन सब की विधिपूर्वक नारद और पर्वत ऋपि आये। युधिष्ठिर ने विधिपूर्वक यात्रा कीजिये ! उन ब्राह्मणों की उक्त बात को सुन उन तीनों की पूजा की और वे तीनों ऋषि सत्कार कर युधिष्ठिर ने आंखों में आनन्द के आशू भरकर । पाकर कहने लगे-हे युधिष्ठिर! हे नकुल ! हे सहदेव ! सब भाइयों के बीच में कहा कि बहुत अच्छा आप हे भीमसेन ! तुम चारों भाई ऋजुना को ग्रहण करो । LALPAP.
महा मारत नपरे ॥ २० ॥ Plearnesex LALIATv. तेषां युधिष्ठिरो राजा पूजां चके यथाविधि सत्कृतास्ते महाभागा युधिष्ठिरमथाऽब्रुवन् ॥ १९ ॥ ऋषय ऊचु -युधिष्ठिर यमौ भीम मनसा कुरुताऽऽर्जवम् मनसा कृतशौचा वै शुद्धास्तीर्थानि यास्यथ शरीरनियमं प्राहुाह्मणा मानुपं व्रतम् * मनोविशुद्धां बुद्धिं च देवमाहुबतं द्विजाः ॥ २१ ॥ मनो ह्यदुष्टं शौचाय पर्याप्तं वै नराधिप मैत्री बुद्धिं समास्थाय शुद्धास्तीर्थानि द्रक्ष्यथ ॥ २२ ॥ ते यूयं मानसैः शुद्धाः शरीरनियमवतैः दैवं व्रतं समास्थाय यथोक्तं फलमाप्स्यथ ॥ २३ ॥ ते तथेति प्रतिज्ञाय कृष्णया सह पाण्डवाः कृतवस्त्ययना सर्वे मुनिभिर्दिव्यमानुपेः ॥ २४॥ लोमशस्योपसंगृह्य पादौ द्वैपायनस्य च नारदस्य च राजेन्द्र देवः पर्वतस्य च ॥ २५॥ धौम्येन सहिता वीरास्तथा तैर्वनवासिभिः मार्गशीर्ष्यामतीतायां पुष्येण प्रययुस्ततः ॥ २६ ॥ कठिनानि समादाय चीराजिनजटाधराः अभेद्यैः कवचैर्युक्तास्तीर्थान्यन्वचरंस्ततः ॥ २७ ॥ इन्द्रसेनादिभिर्भूत्यै रथैः परिचतुर्दशैः भीर मन को शुद्ध करके तीर्थयात्रा करो। ब्राह्मण ॥१७॥२३॥ रोग कहते कि शरीर से नियम का साधना, मानुष यह सुनका पाण्डवों ने द्रौपदी सहित वह व्रत मा और मन को शुद्ध करना देववत कहलाते हैं स्वीकार किया और अगहन की पूनो के पीछे पुष्य परन्तु गौन यिमन का निदोप होना ही पर्याप्त नक्षत्र में मृगछाला और जटा धारण किये हुए है 1 इममे तुम मब गरीर और मन के नियमों का अभेद्य कवच अर्थात् वस्त्र पहर हुप रोमश ऋषि, माधन और प्रत करके शुद्ध ही हो। अब देवनत को! याम जी, नारद और पर्वत यापि के चरणों को भारण करके, भापम में मित्रता रखकर तीर्थ यात्रा कर मुनियों से म्यम्त्ययन कराकर उन सब वन- संगे। तुमको नथियात्रा का फन यथोक्त मिरेगा। । वामी ब्राह्मणों और धीय पुरोहित सहित नर दिये।
अध्याय ९४ ] महा भारत १९१५ AS - महानसव्यापृतैश्च तथाऽन्यैः परिचारकैः सायुधा वदनिस्त्रिंशास्तूणवन्तः समार्गणाः प्राङ्मुखाः प्रययुर्वीराः पाण्डवा जनमेजय ॥ २९ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयानायां त्रिनवतितमोऽध्याय ॥ ९३ ॥ इन्द्रसेन आदि भृत्य भी पन्द्रह रथों को लिये हुए, हथियारों और तर्कसों को बाधे हुए पूर्व दिशा को वह सेवक जो साथ जाने के योग्य थे, उनके साथ चल दिये ॥२४॥२९॥ हो रिये और वह पाण्डव अपने-अपने आयुध अर्थात् वनपर्व का तिरानवेवा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ९३ ॥ अथ चतुर्नवतितमोऽध्यायः ॥ ९४ ॥ युधिष्ठिर उवाच-न वै निर्गुणमात्मानं मन्ये देवर्षिसत्तम तथाऽस्मि दुःखसंतप्तो यथा नाऽन्यो महीपतिः ॥ १ ॥ परांश्च निर्गुणान्मन्ये न च धर्मगतानपि ते च लोमश लोकेऽस्मिन्नृध्यन्ते केन हेतुना ॥ २ ॥ नाऽत्र दुःखं त्वया राजन् कार्य पार्थ कथञ्चन । यदधर्मेण वर्धयुरधर्मरुचयो जनाः वर्धत्यधर्मेण नरस्ततो भद्राणि पश्यति ततः सपत्नाञ्जयति समृलस्तु विनश्यति मया हि दृष्टा दैतेया दानवाश्च महीपते वर्धमाना ह्यधर्मेण क्षयं चोपगताः पुनः पुरा देवयुगे चैव दृष्टं सर्व मया विभो चौरानोवा अध्याय ॥१४॥ उन्होंने मार्ग में लोमश ऋपि से पृछा हे महाराज! हे युधिष्ठिर । अधर्मी पुरुषों को अधर्म करने पर भी यद्यपि हम ऐसे दु ख में पड़े है, कि दूसरे राजाओं बढते हुए देखर तुमको दुखी होना उचित नहीं को कभी ऐमा दु ग्व न हुआ होगा तो भी हम हे, हा एमा अवश्य होता हे कि अधर्म करने पर , अपने को उत्तम गुणों से हीन नहीं समझते है। हे भी मनुष्य की वृद्धि और कल्याण होता है और शत्रुओं हैलोमश हम जानते हैं कि हमारे शत्रु रोग अधर्मी को भी जीत रेता है परन्तु अन्त में मूल सहित आर गुणहीन हैं तो भी न जाने उनकी वृद्धि क्यों धूल में मिल जाता है ॥१४॥ होती जाती है । यह सुनकर लोमश ऋषि ने कहा-- मैंने देखा है कि देत्य और दानों ने अधर्म रोमश उवाच- NAVacuWriMIXxxxseveis - .
[ वनपर्व PUGNUARMA .. - - १९१६ म हा भारत anty अरोचयन्सुरा धर्म धर्म तत्यजिरेऽसुराः तीर्थानि देवा विविशुर्नाऽविशन्भारताऽसुराः तानधर्मकृतो दर्पः पूर्वमेव समाविशत् दर्पान्मानः समभवन्मानाकोधो व्यजायत क्रोधादहीस्ततोऽलज्जा वृत्तं तेषां ततोऽनशत् ॥ ८ ॥ तानलज्जान्गतहीकान्हीनवृत्तान्वृथावतान् क्षमा लक्ष्मीः स्वधर्मश्च न चिरात्प्रजहुम्ततः ॥ ९ ॥ लक्ष्मीस्तु देवानगमदलक्ष्मीरसुरान्नृप तानलक्ष्मीसमाविष्टान्दोपहतचेतसः देतेयान्दानवांश्चैव कलिरप्याविशत्ततः तानलक्ष्मीममाविष्टान्दानवान्कलिना हतान् दर्षाभिभूतान्कौन्तेय क्रियाहीनानचेतसः मानाभिभूतानचिराद्विनाशः समपद्यत निर्यशस्कास्तथा दैत्या. कृत्स्नशो विलयं गताः । देवास्तु सागरांश्चैव सरितश्च सरांसि च अभ्यगच्छन्धर्मशीला: पुण्यान्यायतनानि च तपोभिः क्रतुभिर्दानैराशीर्वादैश्च पाण्डव ॥ १४ ॥ करक बड़ी वृद्धि पाई परन्तु अन्त में ये जड़ पेड़ मे कर दिया ॥५॥९॥ नाम हो गये और देवयुग में मैंने यह भी देखा था और इन तीनों के न होने पर उन देत्य दानवों कि देवताओं ने धर्म में रनि की आर दैत्यों ने धर्म के हृदय में, जिा जिनका चित्त गर्व से नष्ट हो रहा का त्याग रिया।मो धर्म करने माण से देवता था, करि ने प्रवेश किया । इस प्रकार दरिद्रता से नार्थ में प्रकाश हो गये और दन्य नहीं होने पाय आविष्ट, करि से हत, घमण्ट से तिरस्कृत होने के क्योंकि उनके मन में अधर्म में उत्पन्न हुआ गर्व प्रवेश कारण उन बियाहीन, निर्बुद्धि,और मानी दैत्य दानों हो रहा था। उम गासे मान और बोध की अधि का नाम हो गया । और देस्ता रोग जो धर्मात्मा पनाह और ग्रोध में गोटे कर्म करंग गे और और शील पान थे सागर, नदी, मरोघर आदि पुण्य जा जानी गी। इस प्रकार में उनका मन नष्ट हो म्थानों में चले गय और वा उन्होंने तप, यज्ञ और गया। इगोपीर, नव दत्य नहीन और निरज दान कर करक अपने मय पाप दूर कर दिये और । गंय नपसमागमी और धर्म ने उनका परित्याग करयाण प्राप्त किया।सोदे राजा युधिष्ठिर जिस प्रकार - , - अध्याय ९४] म हा मारत २८ LArwAANAMASSAMAVI - प्रजहुः सर्वपापानि श्रेयश्च प्रतिपेदिरे एवमादानवन्तश्च निरादानाश्च सर्वशः ॥ १५ ॥ तीर्थान्यगच्छन्विबुधास्तेनाऽऽपुर्भूतिमुत्तमाम् । तथा वमपि राजेन्द्र स्नात्वा तीर्थेषु सानुजः ॥ १६ ॥ पुनर्बत्स्यसि तां लक्ष्मीमेप पन्थाः सनातनः यथैव हि नृगो राजा शिविगेशीनरो यथा ॥ १७ ॥ भगीरथो वसुमना गयः पूरः पुरूरवाः चरमाणास्तपो नित्यं स्पर्शनादंभसश्च ते तीर्थाभिगमनात्पूता दर्शनाञ्च महात्मनाम् अलभन्न यशः पुण्यं धनानि च विशांपते ॥ १९ ॥ तथा त्वमपि गजेन्द्र लम्वा सुविपुलां श्रियम् । यथा चेन्वाकुरभवत्सपुत्रजनवान्धवः ॥ २० ॥ मुचुकुन्दाऽथ मांधाता महत्तश्च महीपतिः कीर्ति पुण्यामबिन्दन यथा देवस्तपोबलात् देवर्षयश्च कात्मन्यन तथा त्वमपि वेत्स्यसि ॥ २१ ॥ धाराष्ट्रास्त्वरण मोहेन च वशीकृताः न चिराटे विनश्यन्ति देत्या इब न संशयः इति श्रीमन्महामारने आरण्यकपगि तीर्थयात्राणि लामगीर्थयात्रायां धनुर्नवतितमोऽध्यायः ।। ९४ ॥ नियमपूर्वक तीर्थयात्रा करने के कारण मे देवताओं तुमको मोडर्मा प्रकार से लक्ष्मी मिलेगी और तुम्हारा को परम ऐश्वर्य प्राप्त हुआ था।तुम भी टमी प्रकार पुण्य और तुम्हारी कनि राजा इभ्वाकु,राजा मुचुकुन्द, मे अपने छोटे माटयों मदिन इन तीयों में म्नान गजा मान्धाता और गजा मस्तकी भी होगी। तुमको करकेभिर अपनी रश्मी पाओगे यह मनातन धर्म है। मब प्रश्वयं और लक्ष्मी उमी प्रकार में मिलेंगे जैसे देखा, गजा नृग, मिवि, नगीग्ध व सुमना. गय, पुरु देवता और देवर्षियों की तपस्या करने से मिले थे और और राजा पुग्दा ने तीर्थयात्रा,नाम्या पोर महामाओं ये धृनगद पुत्र जो मोह के वा में हो रहे हैं घोड़े ही के ढगन कान में ही पुण्य, या और दिनों में दन्या की नन्द नागहो जायगे॥१०॥२२॥ वनपर्व का चांगनवां अध्याय ममान हुआ ।। ९१ ॥ WARANASIAN । द्रव्य पाये थे। AGAR ८MAN-~- १९१८ महा मारत [ वनपर्व ८८७ ७~~~~ an.SVARIANSAANrn अथ पश्चनवतितमोऽध्यायः ॥ ९५ ।। वैशम्पायन उवाच-ते तथा सहिता वीरा वसन्तस्तत्र तत्र ह क्रमेण पृथिवीपाल नैमिषारण्यमागताः ततस्तीर्थेषु पुण्येषु गोमत्याः पाण्डवा नृप कृताभिषेकाः प्रददुर्गाश्च वित्तं च भारत तत्र देवान्पितृन्वितांस्तर्पयित्वा पुनः पुनः कन्यातीर्थेऽश्वतीर्थे च गवां तीर्थे च भारत कालकोट्यां विपप्रस्थे गिरावुष्य च कौरवाः ॥ ३ ॥ वाहुदायां महीपाल चक्रुः सर्वेऽभिषेचनम् प्रयागे देवयजने देवानां पृथिवीपते ॥ ४ ॥ ऊपुराप्लुत्य गात्राणि तपश्चाऽऽतस्थुरुत्तमम् गङ्गायमुनयोंश्चैव सङ्गमे सत्यसङ्गराः विपाप्मानो महात्मानो विप्रेभ्यः प्रददुर्वसु तपस्विजनजुष्टां च ततो वेदी प्रजापतेः ॥ ६ ॥ जग्मुः पाण्डुसुता राजन् ब्राह्मणै. सह भारत । तत्र ते न्यवसन्वीरास्तपश्चाऽऽतस्थुरुत्तमम् सन्तर्पयन्तः सततं वन्येन हविपा द्विजान् ततो महीधरं जग्मुर्धर्मजेनाऽभिसत्कृतम् पिचानवां अध्याय ॥ ९५ ।। 'मम्पायन ने कहा- राजा जनमेजय : प्रयाग को जो देवताओं के यज्ञ का स्थान है गंयं । पाण्डव उक्त प्रकार म अनेक प्रकार की बातें करने वहा जाकर कुछ काल वास करके तपस्या की और हुप और क्रमपूर्वक अनेक स्थानों में ठहरते हुए गगा और यमुना के संगम पर ब्राह्मणों को धन का दान म साथियों मदिन नमिप वन में और गोमती के दिया। इसके उपरांत ये पाण्डव मय ब्राह्मणों सहित , अंक नाया मम्नान करके गादान और धन दान ब्रह्मा जी की वेदी को गये और यहां रहकर कुछ दिगा और होने कन्या नार्थ, अध तीर्थ और तपस्या की। वहां च नित्य वन-फल, लाकर ब्राह्मणों आँकनार्य में विधिपूर्वक तर्पण करके कालोटि को भाजन करत थे। ब्रह्मा जी की वेदी से चलकर और विषप्राय पनों पर वाम किया । दमके पछि गयगिर नाम पर्वत पर गये जो गयनामी पुण्यात्मा , पाहदा नधि में जाकर टन मय ने मान दिया और वहां और धर्म राजमापिस सम्कार किया हुआ है और ॥ - काल N अध्याय ९५ ] महा मारत १९१९ 208 PAN - राजर्पिणा पुण्यकृता गयेनाऽनुपमद्युतिम् सरो गयशिरो यत्र पुण्या चैव महानदी वानीरमालिनी रम्या नदी पुलिनशोभिता दिव्यं पवित्रकूटे च पवित्रधरणीधरे ॥ १० ॥ ऋपिजुष्टं सुपुण्यं तत्तीर्थं ब्रह्मसरोऽतुलम् अगस्त्यो भगवान् यत्र गतो वैवस्वतं प्रति उवाच च स्वयं तत्र महाराजः सनातनः सर्वासां सरितां चैव समुद्भेदो विशांपते ॥ १२ ॥ यत्र संनिहतो नित्यं महादेवः पिनाकधूक तत्र ते पाण्डवा वीराश्चातुर्मास्यैस्तदेजिरे ॥ १३ ॥ ऋपियज्ञेन महता यत्राऽक्षयवटो महान् अक्षये देवयजने अक्षयं यत्र वै फलम् ते तु तत्रोपवासांस्तु चक्रुनिश्चितमानसाः ब्राह्मणास्तत्र शतशः समाजग्मुस्तपोधनाः चातुर्मास्येनाऽयजन्त आर्षेण विधिना तदा तत्र विद्यातपोवृद्धा ब्राह्मणा वेद पारगाः कथां प्रचक्रिरे पुण्यां सदसिस्था महात्मनाम् ।। १६ ॥ तत्र विद्यावतस्नातः कौमारं व्रतमास्थितः शमठोऽकथयद्राजन्नामूर्तरयसं गयम् वड़ा पवित्र और दिव्य है। वहीं बड़ी रमणीक एक धारी शिव जी भी सदा वास करते हैं। पाण्डवों ने । महानदी भी है जिसके तट वानीर वृक्ष और पुलिन वहा जाकर चातुर्माम्य और ऋपि यज किये और वहा , अर्थात् बालके टापुओं से सुशोभित हारहे थे ॥१॥१०॥ जो अक्षयवट है जहा यज्ञ करने से यज्ञ का फल अक्षय उसी स्थान पर ब्रह्मसर नाम का एक तीर्थ भी है बना रहता हे उसके नीचे वास करके पाण्टनों ने , जहा ऋपियों के अनेक स्थान हैं। वहीं से अगम्त्य जी उपवाम किये । वहा पाण्डवों के यज्ञ में मैकड़ों तपम्धी, यमराज के पास गये थे। इसी स्थान पर सब नदियों विद्वान् ,वेदपारग और महात्मा ब्राह्मण लोग भी आये का आविर्भाव अर्थात् प्रकट होने की जगह है और सभा में बैठकर अनेक पुण्यरूपी कथा कहने लगे। है यमराज ने भी वहीं वास किया था। यही पिनाक उनमें से शमठ नामी ऋषि जो विद्यावान् , व्रती और ENBALMUBABA carINATEasierrent Ge - १९२० म हा भारत [ वनपर्व WLAN । -- १०८ - शमठ उवाच-अमूर्तरयसः पुत्रो गयो राजर्पिसत्तमः पुण्यानि यस्य कर्माणि तानि मे शृणु भारत ॥ १८ ॥ यस्य यज्ञो वभूवेह बह्वन्नो बहुदक्षिणः यत्राऽन्नपर्वता राजञ्च्छतशोऽथ सहस्रशः ॥ १९ ॥ घृतकुल्याश्च दनश्च नद्यो बहुशतास्तथा व्यञ्जनानां प्रवाहाश्च महाहीणां सहस्रशः ॥ २० ॥ अहन्यहनि चाऽप्येवं याचतां संप्रदीयते अन्ये च ब्राह्मणा राजन् भुञ्जतेऽन्नं सुसंस्कृतम् ॥ २१ ।। तत्र वै दक्षिणाकाले ब्रह्मघोषो दिवं गतः न च प्रज्ञायते किंचिद्ब्रहाशब्देन भारत ॥ २२ ॥ पुण्येन चरता राजन् भूर्दिशः स्वं नभस्तथा आपूर्णमासीच्छन्देन तदप्यासीन्महाभुतम् ॥ २३ ॥ यत्र स्म गाथा गायन्ति मनुष्या भरतर्षभ अन्नपानैः शुभैस्तृप्ता देशे देशे सुवर्चसः ॥ २४॥ गयस्य यज्ञे के त्वद्य प्राणिनो भोक्तुमीप्सवः । तत्र भोजनशिष्टस्य पर्वताः पञ्चविंशतिः ॥ २५॥ न तत्पूर्वे जनाचकुर्न करिष्यन्ति चाऽपरे अमचारी थे राजा गय का इतिहाम कहने लगे और थे । जिम समय दक्षिणा के बटने का समय होता चले कि हे भरतवनी युधिष्ठिर! तुममे अमूर्तरयम के था उस समय ऐसी वेदध्वनि होती थी कि जिससे गय नामी पुन का इतिहास कहता हूं जो गजऋपिया आकाश गुंजन लगता था और कोई किसी की बात गंटतम और पुण्यकर्म करनेवाला था॥११॥१८॥ को सुन नहीं सकता था। और पुण्याहवाचन के शब्द इम गना ने इम स्थान पर पमा यज्ञ किया म मब पृथ्वी, दिशा और आकाश पूर्ण हो जाता था। या उममें अनन्त दक्षिणायन हुई थीं। टम राजा वह ममय बड़ा अद्भुत जान पड़ता था ॥११॥२३॥ की मेरी दरियां पर्यन क ममान लगा दी उमराजा के यन में प्राणी तृप्त होने के कारण थी और पीधा दी कांगकड़ों नदिया भरवा दी मंदेश देश में ठमके यश को गाते हैं। भला जिसके थी और मांगनवाग को भाजन मिलने के लिये महगं। यज्ञ में पच्चीस पर्यत भोजन गप बच रहे उसके यज धान नियत कर दिय छ । जो ब्रामण यानक न घे में ऐसा कौन देगा जो बिना भोजन किये हुए रह टन मन् मगर मय हुए भोजन कराये जाने गया हो। युधिष्ठिर! राजा गय का मा यन्न ग तो अध्याय ९६] म हा मा र त १९२१ AL Nareer गयो यदकरोद्यज्ञे राजर्षिरमितद्युतिः कथं तु देवा हविषा गयेन परितर्पिताः पुनः शक्ष्यन्त्युपादातुमन्यदत्तानि कानिचित् ॥ २७॥ सिकता वा यथा लोके यथा वा दिवि तारकाः। यथा वा वर्पतो धारा असंख्येयाः स्म केनचित् । तथा गणयितुं शक्या गययने न दक्षिणाः ॥ २८ ॥ एवंविधाः सुवहवस्तस्य यज्ञा महीपतेः बभूवुरस्य सरसः समीपे कुरुनन्दन ॥ २९ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि गययज्ञकथने पञ्चनवतितमोऽध्याय । ९५ ॥ ६ पहले किसी ने किया था और न ही कोई करेगा। वर्षा की बूंदों. बालू के कणों और आकाश के तारा- देवना भी उसके किय हुए हविष से अति तृप्त होने गणों को गिनना असम्भव है। सो हे राजा युधिष्ठिर! के से दूसरे के दिये हुए हविष को न ले गजा गय ने ऐसे कई एक यज इसी नदी के तट पर १ मकेंगे और जो दक्षिणा गय के यज्ञ में दी गई थी किये थे ॥२४॥२९॥ १ उमकी मंग्या होना इस प्रकार में अमम्भव है जैसे वनपर्व का पिचानवा अध्याय समाप्त हुआ || ९५ ।। कारण ---- अथ पण्णवतितमोऽध्याय ।। ९६ । वैशम्पायन टवाच ततः संप्रस्थिता राजा कौन्तेयो भूरिदक्षिणः । अगस्त्याश्रममासाद्य दुर्जयायामुवास ह तत्रैव लोमशं राजा पप्रच्छ वदतां वरः अगस्त्यनेह वातापिः किमर्थमुपशामितः ॥ २ ॥ आसीद्वा किंप्रभावश्च स दैत्यो मानवान्तकः किमर्थ चोदितो मन्युग्गस्त्यस्य महात्मनः छियानवा अध्याय ॥१६॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय! इमके वातापी को मारा था)वहा ठहरे। उम समय महाराज पश्चात् बहुत दक्षिणा देनेवाले कुन्तीपुत्र महाराज युधिष्ठिर ने रोमन मपि से प्रश्न क्यिा कि अगम्त्य युधिष्ठिर वहा से चले और अगम्त्य ऋपि के आश्रम मुनि ने इस स्थान पर वातापी को क्यों मारा था? में पहुँचकर दुर्जया म्यान ( जहा अगम्त्य जी ने कहिये, उस मनुष्यों के नाम करनेवाले राक्षस में MANImmunomen - १९२२ म हा भारत [ वनपर्व ARNAL । .. - - लोमश उवाच-इल्वलो नाम दैतेय आसीत्कौरवनन्दन मणिमत्यां पुरि पुरा वातापिस्तस्य चाऽनुजः ॥ १ ॥ स ब्राह्मणं तपोयुक्तमुवाच दितिनन्दनः पुत्रं मे भगवानेकमिन्द्रतुल्यं प्रयच्छतु तस्मै स ब्राह्मणो नाऽदात्पुत्रं वासवसमितम् । चुक्रोध सोऽसुरस्तस्य ब्राह्मणस्य ततो भृशम् ॥ ६ ॥ तदाप्रभृति राजेन्द्र इल्वलो ब्रह्महाऽसुरः मन्युमान्भ्रातरं छागं मायावी ह्यकरोत्ततः मेपरूपी च वातापिः कामरूप्यभवत्क्षणात् संस्कृत्य च भोजयति ततो विप्रं जिघांसति स चाऽऽह्वयति यं वाचा गत वैवस्वतक्षयम् स पुनर्देहमास्थाय जीवन्स्म प्रत्यदृश्यत ततो वातापिमसुरं छागं कृत्वा सुसंस्कृतम् तं ब्राह्मणं भोजयित्वा पुनरेव समाह्वयत् ॥ १० ॥ तामिल्वलेन महता स्वरेण वाचमीरिताम् श्रुत्वाऽतिमायो वलवान्क्षिप्रं ब्राह्मणकण्टकः तस्य पार्श्व विनिर्भिद्य ब्राह्मणस्य महासुरः वातापिः प्रहसन्त्राजन्निश्चक्राम विशांपते ॥ १२ ॥ पया शक्ति थी। और महात्मा अन्त्य मुनि को क्रोधित हो गया । हे गजेन्द्र ! उसी दिन से ब्राह्मण किम प्रकार में क्रोध उत्पन्न हुआ था ? लोमश मे वैर मानकर वह ब्राह्मणों को मारने लगा। वह दैत्य ऋपि चोर-है कौग्यनन्दन ! इम मणिमति पुरी में बड़ा मायावी था और उसके पास ऐसी विद्या थी पहले ममय में इस्पर नामक एक दैत्य हुआ था। कि जिम मरे हुए को वह बुलाता था वह फिर शरीर दम दस्य के छोटे भाई का नाम यातापी था ॥१४॥ पाकर उसके ममीप चला आता था। निदान उम दैत्य एक दिन इस वानाधादित्य ने एक तपम्वी ब्रामण ने यह उपाय रचा कि अपने छोटे भाइ वातापी को मे कहा- महाराज! आप मुझको एक एमा पुत्र माया मे पक्रा बना देता और उसको मारकर उमके दानिए जो इन्द्र के समान दाइम ब्राह्मण ने ऐमा माम को बनाता और घायण को न्योता कहकर वह पुत्र देने में निषध दियानिय यह इल्वर दत्य महा माम ठमे बिलगता। जब वह ब्राह्मण भोजन कर RecVAGAGeasumeramme - -- अध्याय ९६] म हा भारत १९२३ 1 - - . - एवं स ब्राह्मणानाजन्भोजयित्वा पुनः पुनः । हिंसयामास दैतेय इल्वलो दुष्टचेतनः अगस्त्याश्चापि भगवानेतस्मिन्काल एव तु पितृन्ददर्श गर्ते वै लम्बमानानधोमुखान् सोऽपृच्छल्लम्बमानांस्तान्भवन्त इव कंपिताः संतानहेतोरिति ते प्रत्यूचुर्ब्रह्मवादिनः ते तस्मै कथयामासुर्वयं ते पितरः स्वकाः गर्तमेतमनुप्राप्ता लम्बामः प्रसवार्थिनः ॥ १६ ॥ यदि नो जनयेथास्त्वमगस्त्याऽपत्यमुत्तमम् स्यान्नोऽस्मान्निरयान्मोक्षस्त्वं च पुत्राऽऽप्नुया गतिम् ॥१७॥ स तानुवाच तेजस्वी सत्यधर्मपरायणः करिष्ये पितरः कामं व्येतु वो मानसो ज्वरः ॥ १८ ॥ ततः प्रसवसंतानं चिन्तयन्भगवानृषिः आत्मनःप्रसवस्याऽर्थे नाऽपश्यत्सदृशीं स्त्रियम् ॥ १९ ॥ स तस्य तस्य सत्वस्य तत्तदंगमनुत्तमम् संगृह्य तत्समैरङ्गैनिममे स्त्रियमुत्तमाम् ॥ २० ॥ स तां विदर्भराजस्य पुत्रार्थं तप्यतस्तपः चुकता तब वह इल्वल दैत्य उस वातापी को बुलाता । की इस नरक से मोक्ष हो जाय और तुम भी मोक्ष और वह वातापी ब्राह्मण के पेट को फाड़कर हॅसता के अधिकारी हो जाओ। यह सुनकर अगम्त्य जी हुआ बाहर निकल आता । इस प्रकार से उम इत्पल जो परमतेजम्बी, सत्यवादी और धर्मपरायण थे, कहने दैत्य ने कई एक ब्राह्मण मार डाले ॥५॥१३॥ रगे-हे पितृ लोगो । मैं आपकी कामना अवश्य इसी अवसर में अगम्त्य जी ने अपने पितरों पूरी करूँगा । आप अपने मन की चिन्ता को दूर को एक गटे में नीच को मुख किये लटके हुए देखा। कर दीजिये ॥१४.१८॥ उनको देखकर अगम्त्य जी ने पूछा-आप कौन हैं। इसके पश्च त् भगवान् अगम्त्य ने विचारा कि और इस गढे में स्टके हुए क्यों काप रहे है । वे | मैं कॉनसी स्त्री से विवाह करू ? उन्होंने पुत्र उत्पन्न गोले कि हम तुम्हारे पितर है। केवल मन्तान उत्पन्न करने के निमित्त कोई स्त्री अपने समान न पाई । न होने के कारण से ही इस गढे में लटके हुए उन्होंने जिस-जिस प्राणी के जो-जो अङ्ग उत्तम है हैं । यदि तुम्हारे एक पुत्र उत्पन्न होतो हम लोगों ! है उन भागों को लेकर, उन्हीं-उन्हीं भागों - एक १९२४ म हा भारत [ वनपर्व -- CILLAINA निर्मितामात्मनोऽर्थाय मुनिः प्रादान्महातपाः ॥ २१ ॥ सा तत्र जज्ञे सुभगा विद्युत्सौदामिनी यथा विभ्राजमाना वपुषा व्यवर्धत शुभानना ॥ २२ ॥ जातमात्रां च तां दृष्ट्वा वैदर्भः पृथिवीपतिः प्रहर्षेण द्विजातिभ्यो न्यवेदयत भारत ॥ २३ ॥ अभ्यनन्दन्त तां सर्वे ब्राह्मणा वसुधाधिप लोपामुद्रेति तस्याश्च चक्रिरे नाम ते द्विजाः ॥ २४ ॥ ववृधे सा महाराज विभ्रती रूपमुत्तमम् अविवोत्पलिनी शीघ्रमग्नेरिव शिखा शुभा ॥ २५॥ तां यौवनस्थां राजेन्द्र शतं कन्याः स्वलंकृताः । दास्यः शतं च कल्याणीमुपातस्थुवंशानुगाः ॥ २६ ॥ सा स्म दासीशतवृता मध्ये कन्याशतस्य च आस्त तेजस्विनी कन्या रोहिणीव दिवि प्रभा ॥ २७ ।। यौवनस्थामपि च तां शीलाचारसमन्विताम् न बत्रे पुरुषः कश्चिद्भयात्तस्य महात्मनः सा तु सत्यवती कन्या रूपेणाऽप्सरसोऽप्यति । नोपयामास पितरं शीलेन स्वजन तथा ॥ २९ ॥ वैदर्भी तु तथा युक्तां युवतीं प्रेक्ष्य वै पिता मनसा चिन्तयामास कस्मै दद्यामिमां सुताम् ॥ ३० ॥ इति श्रीमन्महाभारतेआरण्यकपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायाअगस्त्योपाख्यानपण्णवतितमोऽध्यायः त्री ग्नी। टनका रचकर महाताम्वी अगस्त्य मुनि बहुत प्रसन्न हुए और उम कन्या का नाम लोपामुद्रा न म बी को नप करते हुए विदर्भगज को अपने रयग्वा ॥११॥२४॥ निमिराद दिया। ई, राजन् ! बह कन्या विजरी गजन् ! यह सुन्दर रुपवाली कन्या अपने म. ममान मुन्दर बागवारी और उत्तम मुखारविन्द पिना के घर में ऐसे बढ़ने लगी, जैम जल में कमलिनी दारी गजाक पर में सन्नई, रामा विदर्भ में और अमि में ज्वाला। जब वह यौवन अवस्था को प्राप्त उमको टा दुई दम्ब प्रमन्नतापूर्वक मय वामणी दुई तब अरशार महित मी कन्या और सी उत्तम मेरा गुनाए । पृथ्वीनाथ ! यह मुन मब ब्राह्मण दासी उसके संग रहने लगी। वह तेजम्बिनी लीपा- VALPrem. NALKrise । दे ८- अध्याय ९७] म हा भारत १९२५ मुद्रा टन सौ कन्या और मौ दामियों के बीच में ! लोपामुद्रा ने अपने रूप से अप्मराओं को और शील ऐमी शोभित हुई जैसे आकाश में गहिणी । हे महाराज! से अपने पिता और वग के पुरुषों को प्रसन्न किया। उस शील और पवित्र आचार से भरी हुई कन्या को अपनी पुत्री को यौवन अवस्था में देख विदर्भ राजा यौवन अवस्या आने पर भी महात्मा अगम्त्य के भय ने विचार किया कि इमे रिसको दूं ॥२५॥३०॥ से किसी ने अपनी स्त्री न बनाया। उस इत्यवती वनपर्व का छियानवेंवां अध्याय ममान हुआ ॥ ९६ ।। ARAAMArena THTRREINANDEZ - अथ सप्तनवतितमोऽध्याय ॥ ९७ ।। लोमश उवाच-यदा त्वमन्यताऽगस्त्यो गाहस्र्थे तां क्षमामिति । तदाऽभिगम्य प्रोवाच वैदर्भ पृथिवीपतिम् राजनिवेशे बुद्धिमें वर्तते पुत्रकारणात् वरये त्वां महीपाल लोपामुद्रां प्रयच्छ मे एवमुक्तः स मुनिना महीपालो बिचेतनः प्रत्याख्यानाय चाऽशक्तः प्रदातुं चैव नैच्छत ॥ ३ ॥ ततः स भार्यामभ्येत्य प्रोवाच पृथिवीपतिः महर्वीिर्यवानेप क्रुद्धः शापाग्निना दहेत् तं तथा दुःखितं दृष्ट्वा सभार्यं पृथिवीपतिम् लोपामुद्राऽभिगम्येदं काले वचनमब्रवीत् न मत्कृते महीपाल पीडामभ्येतुमर्हसि प्रयच्छ मामगस्त्याय वाह्यात्मानं मया पितः ॥ ६ ॥ सत्तानवां अध्याय ॥ ९७ ॥ श्री मा मुनि बोले- ले-जय अगम्त्य मुनि ने देखा पश्चात् राजा ने अपनी सी से सब समाचार कह सुनाया कि लोपामुद्रा विवाहने के योग्य हुई तब विदर्भराज और यह भी कहा कि यदि मुनीश्वर क्रोध करेंगे तो के पास जाकर कहने लगे-हे राजन् ! पुत्र उत्पन्न सबको भम्म कर देंगे ॥१४॥ होने की इच्छा मे मैं विवाह करना चाहता हूं । माता पिता को इस प्रकार से दुःखी देख लोपामुद्रा इमी निमित्त आपके यहां आया है । आप लोपामुद्रा बोली कि हे पिता जी ! आप मेरे निमित्त कुछ दुःख को मुझे दे दीजिये । मुनि के ऐसे वचन सुनकर राजा मत कीजिये । मुझे अगम्त्य को देकर आना उद्धार चेतना रहित हो गये और कुछ उत्तर न दे सके । कीजिय । हे प्रजानाथ ! पुत्री के वचन सुनकर विदर्भ- राजा ने मुनि को लोपामुद्रा देना स्वीकार न किया। राज ने विधिपूर्वक लोपामुद्रा का विवाह अगम्त्य के । - ANA.00 [ वनपर्व । १९२६ म हा मारत सन दुहितुर्वचनाद्राजा सोऽगस्त्याय महात्मने लोपामुद्रां ततः प्रादाविधिपूर्व विशाम्पते ॥ ७ ॥ प्राप्य भार्यामगस्त्यस्तु लोपामुद्रामभाषत महार्हाण्युत्सृजैतानि वासांस्याभरणानि च ततः सा दर्शनीयानि महार्हाणि तनूनि च समुत्ससर्ज रम्भोरूर्वसनान्यायतेक्षणा ततश्चीराणि जग्राह वल्कलान्यजिनानि च समानवतचर्या च बभूवाऽऽयतलोचना गगाद्वारमथाऽऽगम्य भगवानृषिसत्तमः उग्रमातिष्ठत तपः सह पन्याऽनुकूलया सा प्रीता बहुमानाच्च पति पर्यचरत्तदा अगस्त्यश्च परां प्रीति भार्यायामचरत्प्रभुः ततो वहुतिथे काले लोपामुद्रां विशांपते तपसा द्योतितां स्नातां ददर्श भगवानृषिः ॥ १३ ॥ स तस्याः परिचारेण शौचन च दमेन च श्रिया रूपेण च प्रीतो मेथुनायाऽऽजुहाव ताम् ॥ १४ ॥ ततः सा प्राञ्जलिर्भूत्वा लज्जमानेव भाविनी । साथ कर दिया । अगम्त्य मुनि ने लोपामुद्रा को प्राप्त भी अपन पति से परम मान पाकर उसकी सेवा करने करके उसमे ऐसे वान कहे कि तुम बहुत मूल्यबारे लगी भगवान् अगस्त्य जी भी अपनी स्त्री से परम वस्त्र और भूपण को उतार दो। उसने अपने पति प्रम करने मे ॥१०॥१२॥ के वचन सुनकर मु दर और बहुत मूल्यवाले वस्त्र इस प्रकार बहुत समय बीतने पर भगवान् अगस्त्य आर भूषण उतार दिये ॥४॥ मुनि ने तप में भरी हुई लोपामुद्रा को एक समय मतु अनन्तर उस कमरंगनी को रेकर म्ये देश, के पश्चात् खान दिय हुए देखा । भगवान् अगम्त्य गोमायमान् जहावाली रोपामुद्रा ने वराल के बोहुए मुनि उमकी सेवा, पवित्रता, इन्द्रियनिग्रह, शोभा और वान और हरिण कीगार को ओढ़ा। वह विशारनैनी रूप में प्रसन्न होकर उससे मैथुन करने की इच्छा टीम अपने पनि कममान सवारी बन गई । अनन्ता करने लगे । तर लापामुद्रा हाथ जोड़कर रजा में मदारमा अगाय मुनि आनी अनुर स्त्री सहित भरकर नयभार से भगवान् अगम्त्य जी से ऐसे वचन महाद्वार में जाकर महापार तप करने लगे। रोपामुद्रा कहे-निम्मन्देह पति सन्तान ही के निमित्त स्त्री से rnnelNGLear - - TVN अध्याय ९७] म हा भा र त १९२७ सदा सप्रणया वाक्यं भगवन्तमथाऽब्रवीत् असंशयं प्रजातोर्भार्यां पतिरविन्दत या तु त्वयि मम प्रीतिस्तामृये कर्तुमर्हसि यथा पितुहे विप्र प्रासादे शयनं मम तथाविधे त्वं शयने मामुपैतुमिहाऽर्हसि ॥ १७ ॥ इच्छामि त्वां स्रग्विणं च भूपणैश्च विभूषितम् । उपसर्तुं यथाकामं दिव्याभरणभूपिता ॥ १८॥ अन्यथा नोपतिष्टेयं चीरकापायवासिनी नैवाऽपवित्रो विप्र भूषणोऽयं कथञ्चन अगम्स्य उवाच-न ते धनानि विद्यन्ते लोपामुद्रे तथा मम यथाविधानि कल्याणि पितुस्तत्र सुमध्यमे ॥ २० ॥ लोपामुद्रोवाच -ईशोऽसि तपसा सर्व समाहर्तुं तपोधन क्षणेन जीवलोके यद्वसु किंचन विद्यते ॥ २१ ॥ अगस्त्य उवाच एवमतद्यथाऽऽत्थ त्वं तपोव्ययकरं तु तत् यथा तु मे न नश्येत तपस्तन्मां प्रचोदय ॥ २२ ॥ लोपामुद्रोवाच-अल्पावशिष्टः कालोऽयमृतोर्मम तपोधन न चाऽन्यथाऽहमिच्छामि त्वामुपैतुं कथंचन ॥ २३ ॥ विवाह करता हैं और जो आपकी इच्छा है मो काम हे सुमध्यमे ! मेरे और तेरे घर में इतना धन नहीं आप मेरे सङ्ग कर सकते है। परन्तु हे विप्र! मैं है कि जितना तेरे पिता के घर में था । लोपामुद्रा अपने पिता के घर में बहुत अच्छे स्थान में रहती थी। बोली-हे तपोधन ! आप अपने तप के बल से जगत् आप मे ही स्थान और शय्या पर मेरे सङ्ग मैथुन का जितना धन है उम सबको एक क्षण भर में ला करने को योग्य है । मेरी इच्छा है कि उत्तम भूषणों मक्ते है । अगम्त्य मुनि बोले-यह तुम्हारा कहना मे भूपित, उत्तम मालाधारी आपके सङ्ग मै भी दिव्य सत्य है, परन्तु ऐसा करने से मेरा तप क्षीण हो आभूषण पहनकर इच्छानुमार विहार का। अन्यथा जायगा । इमलिये ऐमा कोई उपाय बतलाओ कि यह गेरु के रङ्गे वस्त्र पहनकर मैं आपके सङ्गविहार । जिममें मेरा तप नष्ट न हो ॥२०॥२२॥ नहीं करेंगी। विप्र ऋपि! यह वस्त्र और आभूषण लोपामुद्रा बोली-हे तपोधन ! मेरी ऋतु का समय के योग्य नहीं हैं।॥३॥१९॥ बहुत थोडा ममय बाकी रहा है और दूसरे प्रकार अगम्त्य ऋषि बोले-हे लोपामुद्रे ! हे कल्याणि ! मे मैं तुम्हारे पास आने की कदापि इच्छा नहीं Vabariivaninchen Inn RNRC A १९२८ { वनपर्व म हा भारत न चाऽपि धर्ममिच्छामि विलोप्तुं ते कथंचन । एवं तु मे यथाकामं संपादयितुमर्हसि अगम्त्य उवाच-यद्येप कामः सुभगे तव बुद्धया विनिश्चितः हर्तुं गच्छाम्यहं भद्रे चर काममिहस्थिता ॥ २५ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि तीर्थयानापर्वणि लोमशतीर्थयानाया मप्तनवतितमोऽध्याय ।। ९७ ॥ करती हूँ और तुम्हारे धर्म को भी नष्ट करना नहीं तुमने अपने मन में ऐसा ही निश्चय किया है, तो चाहती हूँ, इमलिये मैंने जो कहा है सो पूरा कीजिये । मै धन रेने को जाता हूँ तुम यहीं रहो।।२३।२५।। अगस्त्य मुनि बोले-हे सुभगे । हे कल्याणि । यदि घनपर्व का सत्तानवा अध्याय समाप्त हुआ ।। ९७ ।। . Marwrur अथ अष्टनवतितमोऽध्याय ॥ ९८ ॥ रोमश उवाच-ततो जगाम कौरव्य सोऽगस्त्यो भिक्षितुं वसु । श्रुतर्वाणं महीपालं यं वेदाऽभ्यधिकं नृपः स विदित्वा तु नृपतिः कुम्भयोनिमुपागतम् । विषयांते सहामात्यः प्रत्यगृह्णात्सुसत्कृतम् तस्मै चाऽयं यथान्यायमानीय पृथिवीपतिः प्राञ्जलि प्रयतो भूत्वा पप्रच्छाऽऽगमनेऽर्थिताम् ॥ ३ ॥ अगम्त्य उवाच वित्तार्थिनमनुप्राप्तं विद्धि मां पृथिवीपते यथाशक्त्यविहींस्याऽन्यान्सविभागं प्रयच्छ मे ॥ ४ ॥ लोमश उवाच-तत आयव्ययौ पूर्णो तस्मै राजा न्यवेदयत् अतो विद्वन्नुपादत्स्व यदत्र वसु मन्यसे अट्ठानया अध्याय ॥ ५८ ॥ रोमन नापि बाले-हे राजा युधिष्ठिर । इसके ले आया और विधिपूर्वक अर्घ्य देकर कहने पश्चात् अगम्त्य जी धन मागने की इच्छा से राजा रगा-हे महाराज आएका आना किस कारण से भुनर्वाण के पास गये जिसको च सय राजाभों मे हुआ है ? अगस्त्य जी ने कहा-हे राजन् ! मैं तुम्हारे अधिक परवान् जानते थे । वह राजा उन महामपि पाम धन की इच्छा से आया हूँ। तुम मुझको यथा- को अनि देश की मीमा पर आया हुआ जानकर शक्ति अपने अधिक धन में से धन दो जिसमें किसी गस्त्रियों महित आगे गया और आदरपूर्वक अपने दूसरे को दुम्ब न हो ॥१४॥ घर ~1ALL अध्याय ९८] महा भारत १९२९ ८८ NewsNrn .. तत आयव्ययौ दृष्ट्वा समौ सममतिर्द्विजः सर्वथा प्राणिनां पीडामुपादानादमन्यत ॥ ६ ॥ स श्रुतर्वाणमादाय ब्रनश्वमगमत्ततः सच तो विपयस्याऽन्ते प्रत्यगृह्णाद्यथाविधि तयोरयं च पाद्यं च नश्वः प्रत्यवेदयत् अनुज्ञाप्य च पप्रच्छ प्रयोजनमुपक्रमे अगम्त्य उवाच-वित्तकामाविह प्राप्तौ विद्यावां पृथिवीपते यथाशक्त्यविहिंस्यान्यान्संविभाग प्रयच्छ नो ॥ ९ ॥ रोमश उवाच-तत आयव्ययो पूर्णी नाभ्यां राजा न्यवेदयत् । अतो ज्ञात्वा तु गृहीत यदत्र व्यतिरिच्यते तत आयव्ययौ दृष्ट्वा समौ सममतिर्द्विजः सर्वथा प्राणिनां पीडामुपादानादमन्यत पोरुकुत्स्यं ततो जग्मुत्रसदस्युं महाधनम् अगस्त्यश्च श्रुनर्वा च नश्वश्च महीपतिः ॥ १२ ॥ त्रसदस्युस्तु तान्दृष्ट्वा प्रत्यगृह्णाद्यथाविधि अभिगम्य महाराज विषयान्ते महामनाः अर्चयित्वा यथान्यायमिक्ष्वाकू राजसत्तमः यह मुनकर उम राजा ने कहा-हे महाराज मागने के लिये आये हैं। तुम अपने अधिक घन में मेरा लाभ और व्यय घरावर हे इममे जो कुछ आप से हमको भी यधागक्ति घन दे दो निससे किसी अधिक समझें सो ले लीजिए । अगम्त्य जी ने उमके दूमो को दु ख न हो ॥५॥९॥ आयव्यय को बराबर देखकर विचार किया कि इमसे उस राजा ने भी कहा-हे महाराज | मेरा लाभ घन लेने में प्राणियों को कैग होगा। यह विचारकर और व्यय बराबर है जो कुछ आप अधिक समझ उन्होंने उस मुनर्वाण से धन नहीं लिया और उसे ! मो रे लीजिए । अगम्त्य जी ने यह सुनकर टमके माय लेकर राना बन्नश्च के पाम गये । उभ राना ने और व्यय के बराबर होने पर धन लेने में प्राणियों भी अगम्त्य जी को अपने देश की मीमा पर जाकर को दुम्ब होना विचारकर धन नहीं लिया और लिया और बड़े आदर और मत्कार से घर राकर अर्य, टमको भी माय लेका तीनों गजा त्रसदम्यु के पास पाद्य देकर उनमे आने का कारण पूछा । अगम्त्य गये । उम राना ने भी अगम्त्य जी और उन दोनों जी ने कहा-हे राजन् ! हम दोनों तुम्हारे पाम धन राजाओं को अपने देश की मीमा पर जाकर लिया और AAALTURA ITALIANA - राभ PAN १९३० महाभारत [ वनपर्व L SAMS समस्तांश्च ततोऽपृच्छत्प्रयोजनमुपक्रमे ॥ १४ ॥ अगम्त्य उवाच-वित्तकामानिह प्राप्तान्विन्द्वि नः पृथिवीपते यथाशक्त्यविहिस्यान्यान्संविभागं प्रयच्छ नः लोमश उवाच तत आयव्ययौ पूर्णों तेषां राजा न्यवेदयत् एतज्ज्ञात्वा ह्यपादध्यवं यदव व्यतिरिच्यते तत आयव्ययौ दृष्ट्वा समौ सममतिर्द्विजः सर्वथा प्राणिनां पीडामुपादानादमन्यत ततः सर्वे समेत्याऽथ ते नृपास्तं महामुनिम् इदमूचुर्महाराज समवेक्ष्य परस्परम् अयं वै दानवो ब्रह्मन्निल्बलो वसुमान्भुवि तमनिकम्य सर्वेऽद्य वयं चाऽर्थामहे वसु ॥ १९ ॥ लोमश उवाच-तेषां तदासीदुचितमिल्वलस्यैव भिक्षणम् ततस्ते सहिता राजनिल्वलं समुपाद्रवन् इति श्रीमन्महाभारतेआरण्यकपर्वणितीर्थयात्रापर्षणिलोमगतीर्थयात्रायांअगस्त्योपाख्यानेअष्टनवतितमोऽध्यायः? बड़े आदर से घर लाकर उन सब की विधिपूर्वक पूजा | इस राजा का लाभ और व्यय बराबर है, इससे धन करके तीनों से आने का कारण पूछ। ॥१०॥१४॥ लन में जीवों को क्लेश होगा, यह विचारकर उन्होंने यह सुनकर अगम्त्य जी बोले-हम तीनों धन धन नहीं लिया। इसके पीछे वे तीनों राजा आपस मांगने के लिये आये है। तुम अपने अधिक धन में विचारकर अगस्त्य जी से कहने लगे-हे महाराज! में से हमको कुछ धन दो जिसमें किसी दूमरे को यहां जो इल्लल दैत्य रहता है वह बड़ा धनवान् है । दुःख न पहुँचे । यह सुनकर उम राजा ने भी कहा- । चलिये, हम सब उसके पास जाकर उमसे धन मागें। গল! নং গাখ জথৰ গাণালী আঁ यह सुनकर अगस्त्य जी ने इल्बल से ही बन मांगना सचे बराबर है, आप जो कुछ अधिक समझें सोल उनिन समा! | अब चे चागे धन मांगने के लिये लीजिए। यह सुनकर अगम्त्य जी ने विवा] कि उस दैत्य के पास गये ॥१५॥२०॥ वनपर्व या अट्टानववा अध्याय ममाप्त हुआ ॥ ५८ ।। -VVVXNCXANNUALAC- -- अथ एकोनशततमोऽध्यायः ॥ ९९ ।। मा बाग-दृल्बलस्तान्विदित्वा तु महर्षिसहितान्नृपान् । उपस्थितान्सहामात्यो विपयानो ह्यपूजयत् अध्याय ९९] म हा भारत १९३१ -COAL. .. -- तेषां ततोऽसुरश्रेष्ठस्त्वातिथ्यमकरोत्तदा सुसंस्कृतेन कौरव्य भ्रात्रा वातापिना तदा ॥ २ ॥ ततो राजर्षयः सर्वे विपण्णा गतचेतसः वातापिं संस्कृतं दृष्ट्वा मेषभूतं महासुरम् अथाऽब्रवीदगस्त्यस्ताव्रजर्षी नृषिसत्तमः विषादो वो न कर्तव्यो ह्यहं भोक्ष्ये महासुरम् ॥ ४ ॥ धुर्यासनमथाऽऽसाद्य निषसाद महानृषिः तं पर्यवेपदैत्येन्द्र इल्वलः प्रहसन्निव अगस्त्य एव कृत्स्नं तु वातापिं वुभुजे ततः भुक्तवत्यसुरोह्वानमकरोत्तस्य चेल्वलः ततो वायुः प्रादुरभूदधस्तस्य महात्मनः शब्देन महता तात गर्जन्निव यथा धनः वातापे निष्क्रमस्वेति पुनः पुनरुवाच ह तं प्रहस्याऽब्रवीद्राजन्नगस्त्यो मुनिसत्तमः ॥ कुतो निष्क्रमितुं शक्तो मया जीर्णस्तु सोऽसुरः । इल्वलस्तु विषण्णोऽभूद् दृष्ट्वा जीणं महासुरम् ॥ ९ ॥ निन्यानवें अध्याय ॥ ९९ ॥ लोमश ऋषि ने कहा-हे राजा युधिष्ठिर! इल्वल का माम अगम्त्य जी के आगे परोस दिया। अगम्त्य दैत्य अगस्त्य जी को तीनों राजाओं सहित अपने जी अकेले उमके मांस को खा गये । जब वे भोजन राज्य की सीमा पर आये हुए जानकर वहा गया कर चुके तब इल्पल ने वातापी को पुकारा । उसके और विधिपूर्वक उनकी पूजा करके अपने स्थान पर पुचरने पर अगम्त्य जी की गुदा से वायु मेघ के ले आया और अपने भाई वातापी के मास को अच्छी समान गर्जती हुई निकली । उसको सुनकर इल्पल तरह बनाकर उनका आतिथ्य किया। वे राजा लोग बरावर पुकारने लगा-हे वातापी ! निकल । तर मेषरूपी वातापी के गाम को जानकर व्याकुल अगम्त्य जी ने हसकर कहा कि वातापी कहा से निकले अचेत से हो गये। उस समय अगम्त्य जी ने उनसे उसको तो हम पचा गये । यह सुनकर वह दैत्य कहा कि तुम लोग चिन्ता मत करो मैं चातापी को व्याकुल हो गया। वह अपने मन्त्रियों सहित अगम्त्य पचा जाऊँगा ॥१४॥ जी से हाथ जोड़कर कहने लगा-हे महागज! आप इसके पीछे इल्बल ने आसन पर बैठाकर वातापी किम कार्य के लिये यहां पधारे है और मैं आपका teleAVAILAntr७NavBASABi और -- १९३२ म हा मारत | વન ન MMABOU१८ । प्राञ्जलिश्च सहामात्यैरिदं वचनमब्रवीत् किमर्थमुपयाताः स्थ ब्रूत किं करवाणि वः प्रत्युवाच ततोऽगस्त्यः प्रहसन्निल्वलं तदा ईशं ह्यसुर विद्मस्त्वां वयं सर्वे धनेश्वरम् एते च नाऽतिधनिनो धनार्थश्च महान्मम यथाशक्त्यविहिंस्याऽन्यान्संविभागंप्रयच्छ नः ॥ १२ ॥ ततोऽभिवाद्य तमृषिमिल्वलो वाक्यमब्रवीत् । दित्सितं यदि वेत्सि त्वं ततो दास्यामि ते वसु ॥ १३ ॥ अगम्त्य उवाच-गवां दशसहस्राणि राज्ञामेंकैकशोऽसुर तावदेव सुवर्णस्य दित्सितं ते महासुर मह्यं ततो वै द्विगुणं रथश्चैव हिरणतयः मनोजवौ वाजिनौ च दित्सितं ते महासुर ॥ १५॥ जिज्ञास्यतां रथः सद्यो व्यक्त एष हिरण्मयः । ततः प्रव्यथितो दैत्यो ददावभ्यधिकं वसु विरावश्च सुरावश्च तस्मिन्युक्तौ रथे हयो ऊहतुः सवसूनाशु तावगस्त्याश्रमं प्रति सर्वाताज्ञः सहागस्त्यान्निमेपादिव भारत क्या प्रिय कार्य कम्॥५॥१०॥ दो और मुझको इससे दुगुना धन, एक सुनहरी यह सुनकर अगम्त्य जी ने हमकर कहा-मुझे ग्य और ऐसे दो घोड़े जिनका वेग मन की गति के बहुन से धन की आवश्यक्ता है । ये गजा लोग समान हो, दो ॥११११५॥ १ धनवान नहीं हैं। तुमको हम धन का मामी और यह सुनकर उस दैत्य ने उन सबको कहने ममर्थ जानते हैं । मो तुम अपने अधिक धन मे से से भी कुछ अधिक धन दिया और आस्त्य जी को टगशे धन दो जिमंग रिमी दृमो को परेश न पहुँचे । उनकी इच्छा के अनुसार एक सुनहरी रथ भी दिया यद मुनकर इसर ने अगस्त्य जी को दण्डस्त जिममें विरार और सुगव नाम के दा घाड़े जुते हुए पी भार पा-आप जितना धन नाहन में आपको थ। अगम्त्य जी एस रथ में टन राजाओं और इत्पर म भी अधिक धन देगा। आप कहिये, क्या चाहने के दिये हुए धन सहित बैठकर चल दिये और शीम है । जगमय भीगे कहा-तुम इन प्रत्येक राजाओ। अपने आश्रम में जा पहुँचे । उपरान्त वे राजा रोग को दम-दम हमार गाजार इतना ही इतना सुवर्ण अगत्य जी की आज्ञा पाकर अपने अपने देशों को ।
अध्याय ९९ ] म हा मारत १९३३ vn८. Aeroe अगस्त्येनाऽभ्यनुज्ञाता जग्मू राजपयस्तदा कृतवांश्च मुनिः सर्वं लोपमुद्राचिकीर्पितम् ॥ १८ ॥ लोपामुद्रोवाच-कृतवानसि तत्सर्वं भगवन्मम कांक्षितम् उत्पादय सकृन्मह्यमपत्यं वीर्यवत्तरम् ॥ १९ ॥ अगस्त्य उवाच-तुष्टोऽहमस्मि कल्याणि तव वृत्तेन शोभने विचारणामपत्ये तु तव वक्ष्यामि तां शृणु सहस्रं तेऽस्तु पुत्राणां शतं वा दशसंमितम् । दश वा शततुल्याः स्युरेको वापि सहस्रजित् ॥ २१ ॥ लोपामुद्रोवाच-सहस्रसंमितः पुत्र एकोऽप्यस्तु तपोधन 1 एको हि बहुभिः श्रेयान्विद्वान्साधुरसाधुभिः ॥ २२ ॥ लोमश उवाच-स तथेति प्रतिज्ञाय तया समभवन्मुनिः समये समशीलिन्या श्रद्धावाञ्च्छूद्दधानया ।। २३ ॥ तत आधाय गर्भ तमगमद्वनमेव सः तस्मिन्वनगते गर्भो ववृधे सप्तशारदान् ।। २४ ॥ सप्तमेऽब्दे गते चापि प्राच्यवत्स महाकविः जबलन्निव प्रभावेन दृढस्युर्नाम भारत ॥ २५ ॥ सांगोपनिषदान्वेदाञ्जपन्निव महातपाः चले गये और अगम्त्य जी ने लोपामुद्रा की मनो- साधू पुत्र एक ही होना बहुत से असाधु पुत्रों से कामना पूरी की । इसके उपरान्त लोपामुद्रा ने अगस्त्य श्रेष्ठ होता है । यह सुनकर अगस्त्य जी ने कहा जी से कहा-हे महाराज ! आपने मेरी सब मनो- तथास्तु अर्थात् ऐसा ही हो और समय के आने पर कामनाएँ पूरी की अब एक बलवान् पुत्र मुझे और उस समान शील रखनेवाली लोपामुद्रा के साथ सङ्गम दीजिए । यह सुनकर अगम्त्य जी बोले-हे सुन्दरी ! किया । लोपामुद्रा के गर्भ रह गया। अगस्त्य जी गर्भ तुम्हारे व्रत से बहुत प्रसन्न हूं तुम बताओ कि कैसा धारण कराकर वन को चले गये और वह गर्भ उन पुत्र चाहती हो ? यदि तुम कहो तो तुम्हारे एक के पीछे सात वर्ष तक बढा किया। जब सातवां चर्प हजार पुत्र हो अथवा उन हजार के तुल्य सौ पुत्र हों व्यतीत हुआ तब एक बालक बड़ा तपम्बी और या इन सबको जीतनेवाला एक ही पुत्र हो॥१६॥२१॥ ज्वलन स्वरूप वेदों को अङ्गों और उपनिषदों सहित यह सुनकर लोपामुद्रा बोली-मै सहस्र पुत्रों पढता हुआ गर्भ से उत्पन्न हुआ। मुनि ने उसका नाम के तुल्य एक ही पुत्र चाहती हूं क्योंकि विद्वान् और दृढम्यु रक्खा । परन्तु इसके पीछे जब वह बाल अवस्था AimeeeeeeeeeenenemEANAoe - - १९३४ महाभारत [ वनपर्व VALIA - WER2017 तस्य पुत्रोऽभवदृपेः स तेजस्वी महाद्विजः ॥ २६ ॥ स वाल एव तेजस्वी पितुस्तस्य निवेशने इध्मानां भारमाजहें इध्मवाहस्ततोऽभवत् ॥ २७॥ तथायुक्तं तु तं दृष्ट्वा मुमुदे स मुनिस्तदा एवं स जनयामास भारताऽपत्यमुत्तमम् ॥ २८ ॥ लेभिरे पितरश्चाऽस्य लोकानाजन्यथेप्सितान् । तत उर्ध्वमयं ख्यातस्त्वगस्त्यस्याऽऽश्रमो भुवि ॥ २९ ॥ प्राहादिरेवं वातापिरगस्त्येनोपशामितः तस्याऽयमाश्रमो राजन् रमणीयैर्गुणैयुतः ॥ ३० ॥ एषा भागीरथी पुण्या देवगन्धर्वसेविता वातेरिता पताकेव विराजति नभस्तले प्रतार्यमाणा कूटेषु यथा निम्नेषु नित्यशः शिलातलेपु संत्रस्ता पन्नगेन्द्रवधूरिव ॥ ३२ ॥ दक्षिणां वै दिशं सर्वां प्लावयन्ती च मातृवत् । पूर्व शंभोजटाभ्रष्टा समुद्रमहिपी प्रिया अस्यां नद्यां सुपुण्यायां यथेष्टमवगाह्यताम् ॥ ३३ ॥ युधिष्ठिर निवोधेदं त्रिपु लोकेपु विश्रुतम् भृगोस्तीर्थ महाराज महर्पिगणसेवितम् ॥ ३४॥ में इंधन का बोझ उठाकर आश्रम में ल आया तर युत्त आश्रम उन्हीं का ॥२२॥३०॥ से अगम्त्य जी ने उसका नाम इमराह रखा। यह भागीरथी गहा है जिसके तट पर देवता आम्त्य जी ने इस प्रकार से म तान उत्पन की और और गन्धर्म यास करते है । देखो, इसकी धारा कैसी उस मन्तान को वेद आदि के पाठ में तत्पर देसकर बह रही है गाना वायु से प्रेरित पताका उड़ रही है । आप अत्यन्त प्रसन्न रहने लगे। तब से यह आश्रम और पर्वत के शिखरों और शिराओं के नीचे से होकर अगम्त्य जी का कहना है । सन्नान के टपन्न होने सी निकरती हुई जा रही है मानों सर्पिणी है। यही मे अगन्य जी के पिनरों की इच्छानुमार से मिल गला दक्षिण दिशा के देशों को माता के समान पानी गये हे गजा युधिष्ठिर ! मात्य जी ने वानापी को देती हुई गई है और शिव जी की जटा से निकलकर वा रीनि म नष्ट किया था वह रमणीक और गुण- समुद्र की पटरानी पनी है। हे युधिष्ठिर ! इस पवित्र evenyra teen 3 .
अध्याय ९९ ] महा भारत १९३५ - । यत्रोपस्पृष्टवान्रामो हृतं तेजस्तदाप्तवान् img अत्र त्वं भ्रातृभिः सार्धं कृष्णया चैव पाण्डव ॥ ३५ ॥ दुर्योधनहृतं तेजः पुनरादातुमर्हसि कृतवरेण रामेण यथा चोपहृतं पुनः वैशम्पायन उवाच-स तत्र भ्रातृभिश्चैव कृष्णया चैव पाण्डवः स्नात्वा देवान्पिति॒श्चैव तर्पयामास भारत तस्य तीर्थस्य रूपं वै दीप्ताहीप्ततरं वभौ ॥३७॥ अप्रधृप्यतरश्चाऽऽसीच्छात्रवाणां नरर्षभ अपृच्छच्चैव राजेन्द्र लोमा पाण्डुनन्दनः भगवन्किमर्थं रामस्य हृतमासीद्वपुः प्रभो कथं प्रत्याहृतं चैव एतदाचक्ष्व पृच्छतः रोमश उवाच-शृणु रामस्य राजेन्द्र भार्गवस्य च धीमतः जाता दशरथस्याऽऽसीत्पुत्रो रामो महात्मनः ॥ ४० ॥ विष्णुः स्वेन शरीरेण रावणस्य वधाय वै पच्यामस्तमयोध्यायां जातं दाशरथिं ततः ॥ ४१ ॥ ऋचीकनन्दनो रामो भार्गवो रेणुकासुतः तस्य दाशरथेः श्रुत्वा रामस्याऽक्लिष्टकर्मणः ॥ ४२ ॥ नदी में आप म्नान करो । देखो, यह तीनों लोकों का रूप दीप्त से भी दीम अर्थात् प्रकाशमान ओर म विरयात् भृगुतीर्थ है जिसमें महर्षि रोग रहते। उसके शत्रुओं का का अदृश्यतर हो गया। इसके उपरात युधिष्ठिर ने लोमश ऋपि से पूछा-हे महाराज परशुराम जी ने इसी तीर्थ में स्नान करके अपने मुझको यह सुनाइये कि परशुराम जी का तेज किस गये हुए तेज को पाया था। तुम भी अपने भाइयों और लिय हर लिया गया था और फिर क्योंकर मिला दोपदी सहित इसमें स्नान करो। इसमें स्नान करने से परशुराम जी की भाति तुम भी दुर्योधन से हारे हुए यह सुनकर लोमश जी बोले-हे युधिष्ठिर । मैं अपने तेन को फिर पाओगे । वैशम्पायन ने कहा-हे तुमको भार्गव परशुराम जी के चरित्र को सुनाता । राना जनमेजय' इसके पीछे युधिष्ठिर ने द्रोपदी और हूँ। पहले समय में श्री विष्णु भगवान् ने रावण को भाइयों सहित उस तीर्थ में स्नान करके देवता और मारने के रिये अयो-यापुरी में राजा दशरथ के यहा पितरों का तर्पण किया। उसमें स्नान करने से युधिष्ठिर रामचन्द्र के नाम से अवतार लिया था । हमने भी AVAIBAILABOUGUVIVUPoe । - हैं ॥३१॥३४॥ ॥३५॥३९॥ 000000AL.
अध्याय ९९] म हा मारत १९३७ ... । ज्याशब्दमकरोच्चैव स्मयमानः स वीर्यवान् तस्य शब्दस्य भूतानि वित्र सत्यशनेरिव अथाऽब्रवीत्तदा रामो रामं दाशरथिस्तदा ॥ ५२॥ इदमारोपितं ब्रह्मन्किमन्यत्करवाणि ते तस्य रामो ददौ दिव्यं जामदग्न्यो महात्मनः । शरमाकर्णदेशान्तमयमाकृप्यतामिति लोमश उवाच-एतच्छ्रुत्वाऽब्रवीद्रामः प्रदीप्त इव मन्युना श्रूयते क्षम्यते चैव दर्पपूर्णोऽसि भार्गव ॥ ५४॥ त्वया ह्यधिगतं तेजः क्षत्रियेभ्यो विशेषतः पितामहप्रसादेन तेन मां क्षिपसि ध्रुवम् पश्य मां स्वेन रूपेण चक्षुस्ते वितराम्यहम् ततो रामशरीरे वै रामः पश्यति भार्गवः आदित्यान्सवसून्रुद्रान्साध्यांश्च समरुद्गणान् । पितरो हुताशनश्चैव नक्षत्राणि ग्रहास्तथा ।। ५७॥ गन्धर्वा राक्षसा यक्षा नद्यस्तीर्थानि यानि च । ऋपयो बालखिल्याश्च ब्रह्मभूताः सनातनाः ॥ ५८ ॥ देवर्षयश्च कात्स्न्येन समुद्राः पर्वतास्तथा वेदाश्च सोपनिषदो वपट्कारैः सहाध्वरैः !! ५९ ॥ दिव्य धनुप ले लिया ॥४७॥५०॥ धनुष को कान तक खींचो । तब रामचन्द्र जी ने उन्होंने मन्द मन्द मुस्कराते हुए इस प्रकार से उस कहा-हे भार्गव ! हमने जो सुना था कि आप बड़े धनुष को चढाकर टंकाग में कोई-बालक खेलते घमण्डी है सो मत्य है । इस पर भी आपकी यात हम खेलने कोई काम कर डाले। उसके बन्न के समान क्षमा ही करते हैं। आपने ब्रह्मा जी की कृग से रंकारने के गन्द से सब प्राणी दर गये और रामचन्द्र क्षत्रियों से अधिक तेज पाया है इमी कारण मे आप । जी ने परशुराम जी से कहा कि मैंने धनुष आपके मेरी निन्दा करते हैं ॥५१॥५५॥ १ कहने से चढ़ा दिया अब आप और क्या चाहते हैं ? अब तुम मेरे निज म्बन्ध को देखो मैं तुमको । यह सुनकर परशुगम जी ने एक दिव्य वाण रामचन्द्र दिव्यदृष्टि देता हूँ। इसके उपरान्त परशुराम जी ने 1 जी को दिया और कहा-इसको धनुष पर चार रामचन्द्र जी के शरीर में बारहों मूर्य, आटों वमु, महा भारत { वनपर्व LALAtu. । कोतूहलान्वितो रामस्त्वयोध्यामगमत्पुनः धनुरादाय तद्दिव्यं क्षत्रियाणां निबर्हणम् ॥ ४३ ॥ जिज्ञासमानो रामस्य वीर्य दाशरथेस्तदा तं वै दशरथः श्रुत्वा विषयान्तमुपागतम् ॥ ११ ॥ प्रेषयामास रामस्य रामं पुत्रं पुरस्कृतम् स तमभ्यागतं दृष्ट्वा उद्यतास्त्रमवस्थितम् ॥४५॥ प्रहसन्निव कोन्तेय रामो वचनमब्रवीत् कृतकालं हि राजेन्द्र धनुरेतन्मया विभो समारोपय यत्नेन यदि शक्कोपि पार्थिव इत्युक्तस्त्वाह भगवंस्त्वं नाऽधिक्षेप्तुमर्हसि ॥४७ ।। नाऽहमप्यधमो धर्मे क्षत्रियाणां द्विजातिपु इक्ष्वाकूणां विशेषेण बाहुवीर्येण कथनम् ॥ ४८ ॥ तमेवंवादिनं तत्र रामो वचनमब्रवीत् अलं वै व्यपदेशेन धनुरायच्छ राघव ततो जग्राह रोपेण क्षत्रियर्पभसूदनम् रामो दाशरथिर्दिव्यं हस्ताद्रामस्य कार्मुकम् ॥ ५० ॥ धनुरारोपयामास सलील इव भारत उस समय अयोध्या में रामचन्द्र जी के दर्शन किये जो तुम अपने को समर्थ जानते हो तो लो थे। परचीक और रेणुका के पुत्र परशुराम जी उन इस धनुप को चढ़ाओ । यह सुनकर रामचन्द्र जी दशरथनन्दन रामचन्द्र के अहिट कम्मों को सुनकर बाल-हे महाराज । मुझको आपका अनादर करना उनके पराक्रम की परीक्षा लेने के लिये बड़े आश्चर्य उचित नहीं है। मे क्षत्रियों के धर्म में अधम नही के माध क्षत्रियों के नाश करने वाले दिव्य धनुप को हूँ । मै जानता हूँ कि ब्राह्मग के निमित्त में क्षत्रियों यि हुप अयोध्यापुरीको गये । राजा दशरथ ने अपने का क्या धर्म है और इसके सिवाय इक्ष्वाकु वंशी देश दो मोगा पर परशुराम जी को आया हुआ राजा रोग कभी अपने परामाग को श्लाघा नहीं करते गुगकर अपने पुत्र रामचन्द्र जी को उनके पास भेजा। हैं। यह सुनकर परशुराम जी बोले-यह बात मत जप रामनन्द्र जी परशुराम जी के पास पहुँने, तब पहो और धनुप को रेकर नदाओ। यह सुनकर परगम जीने गर कदाकिदम्बा मैंने इस धनुष दशरथनन्दन रामचन्द्र जी ने घोषित होकर परशु. नियों को कार नुस्य महे॥१०॥१६॥ राम जी के हाथ से यह क्षत्रियों के नाश करनेवाला 11. ९९] म हा मारत VN८. AAJAVAN- ज्याशब्दमकरोच्चैव स्मयमानः स वीर्यवान् ॥ ५१ ॥ तस्य शब्दस्य भूतानि वित्र सत्यशनेरिव अथाऽब्रवीत्तदा रामो रामं दाशरथिस्तदा ॥ ५२ ॥ इदमारोपितं ब्रह्मन्किमन्यत्करवाणि ते तस्य रामो ददौ दिव्यं जामदग्न्यो महात्मनः । शरमाकर्णदेशान्तमयमाकृष्यतामिति ॥ ५३॥ लोमश उवाच-एतच्छ्रुत्वाऽब्रवीद्रामः प्रदीप्त इव मन्युना श्रूयते क्षम्यते चैव दर्पपूर्णोऽसि भार्गव ॥ ५४॥ त्वया ह्यधिगतं तेजः क्षत्रियेभ्यो विशेषतः पितामहप्रसादेन तेन मां क्षिपसि ध्रुवम् पश्य मां स्वेन रूपेण चक्षुस्ते वितराम्यहम् ततो रामशरीरे वै रामः पश्यति भार्गवः आदित्यान्सवसून्रुद्रान्साध्यांश्च समरुद्गणान् । पितरो हुताशनश्चैव नक्षत्राणि ग्रहास्तथा ॥ ५७॥ गन्धर्वा गक्षसा यक्षा नद्यस्तीर्थानि यानि च । ऋपयो वालखिल्याश्च ब्रह्मभूताः सनातनाः ॥ ५८ ॥ देवर्षयश्च कात्स्न्येन समुद्राः पर्वतास्तथा वेदाश्च सोपनिषदो वपट्कारैः सहाध्वरैः ॥ ५९ ।। दिव्य धनुष ले लिया ॥४७॥५०॥ धनुष को कान तक म्बींची । तय रामचन्द्र जी ने उन्होंने मन्द मन्द मुस्कराते हुए इस प्रकार से उस कहा-हे भार्गव ! हमने जो मुना था कि आप बड़े धनुष को नद्राकर टाग मे कोई-बालक खेलते घमण्डी है सो मत्य है। इस पर भी आपकी बात हम वरने कोई काम कर डाले। उसके वन के समान क्षमा ही करते है । आपने ब्रह्मा जी की कृपा से टकारने के गन्द से सब प्राणी दर गये और रामच द्र क्षत्रियों से अधिक तेज गाया है इमी कारण मे आ. जी ने परशुराम जी से कहा कि मैने धनुष आपके मेरो निन्दा करते हैं ॥५१॥५५॥ करने में चढ़ा दिया अब आप और क्या चाइने हैं। अब तुम मेरे निज म्पसा को देखा मैं तुमको २६ मुनार परशुगम जी ने एक दिव्य याण रामचन्द्र दिन्यदृष्टि देता है। इसके उपरान्न परशुराम जी ने भी को दिया और कहा-दमको धनुप पर चढ़ार रामचन्द्र जी के शरीर में चारही मूर्य, आठों यमु, aaruMDNpNNNNNN ।
१९३८ महाभारत [ वनपर्व ABVLAVNAGARMANPUCCOM 3-03-८ Muviwewere .. चेतोमन्ति च सामानि धनुर्वेदश्च भारत मेघवृन्दानि वर्षाणि विद्युतश्च युधिष्ठिर ॥ ६० ॥ ततः स भगवान्विष्णुस्तं वै वाणं मुमोच ह । शुष्काशनिसमाकीर्ण महोल्काभिश्च भारत पांसुवर्षेण महता मेघवश्व भूतलम् भूमिकम्पैश्च निर्घातै दैश्च विपुलैरपि ॥ ६२ ॥ स रामं विह्वलं कृत्वा तेजश्चाऽक्षिप्य केवलम् । आगच्छज्ज्वलितो वाणो समबाहुप्रचोदितः ॥ ६३ ॥ स तु विह्वलतां गत्वा प्रतिलभ्य च चेतनाम् । रामः प्रत्यागतप्राणः प्राणमद्विष्णुतेजसम् ।। ६४ ॥ विष्णुना सोऽभ्यनुज्ञातो महेन्द्रमगमत्पुनः भीतस्तु तत्र न्यवसद् बीडितस्तु महातपाः ॥६५॥ तत. संवत्सरेऽतीने हतौजसमवस्थितम् निर्मदं दुःखितं दृष्ट्वा पितरो राममब्रुवन् पितर ऊचु --न वै सम्यगिदं पुत्र विष्णुमासाद्य वै कृतम् स हि पूज्यश्च मान्यश्च त्रिषु लोकेषु सर्वदा ॥६७॥ गच्छ पुत्र नदी पुण्यां वधूसरवताहयाम् ग्यारहोस्द्र, सायगण, मस्दण, पिनर, अग्नि, नक्षत्र, आया। इसके पीछे जय परशराम जी की विह्वलता दूर ग्रह, गन्धर्व, सक्षम, यक्ष, नदी, नमी सनातन, हो गई तब उन्होंने प्राणों को फिर पाकर विष्णु भगवान् चालखिल्य ऋषि, देव नापि, समुद्र, पर्वत, वफ्ट कार, के तन को प्रणाम किया और रामचन्द्र जी की यज्ञ वेद, उपनिषद् , माममन्त्र, धनुर्वेद, मेघ, चारों आज्ञा के अनुकूल महेन्द्र पर्वत पर चले गये और प्रकार के वर्ष और शिजरिया देवी ॥५६॥६०॥ भयभीत और रजिन होकर रहने लगे ॥६११६५|| उसी समय रामचन्द्र जीने मचाण को खींचकर जब एक वर्ष इमी प्रकार व्यतीत हो गय। तव छोर दिया। उसको छोड़ने ही पृपी शुष्क हो गई, परशुगम जी के पितरों ने उन्हें दुम्वी और तेज. हा गिरे, धूल और में की वर्षा हुई. मी कापने । रहित देखकर कहा-दे पुत्र! तुमन विष्णु भगवान् नमा धीर दिशाओं में बिना वजाय गन्द होने लगा को पाकर जो उनका आमान दिया था यह अच्छा और यह मस्ति वाण परशुराम जी के तेज को सींच-नहीं किया क्योंकि विष्णु भगन् तीनों रोकों में पर विहार कावन्द्र जी के पास रोट मान्य और पूज्य है । अब तुम बसरा नामी नदी Purwwermete - - ।
अध्याय १००] म हा भारत १९३९ Vr८.४५८ ॥ ६८॥ - तत्रोपस्पृश्य तीर्थेपु पुनर्वपुरवाप्स्यसि दीप्तोदं नाम तत्तीर्थं यत्र ते प्रपितामहाः भृगुर्देवयुगे राम तप्तवानुत्तमं तपः ॥ ६९ ॥ नत्तथा कृतवान्नामः कौन्तेय वचनारिपतुः प्राप्तवांश्च पुनस्तेजस्तीर्थेऽस्मिन्पाण्डुनन्दन ॥ ७० ॥ एतदीशकं तात रामेणाऽक्लिप्टकर्मणा प्राप्तमासीन्महाराज विष्णुमासाद्य वै पुरा ॥ ७१ ॥ इतिश्रीमन्महाभारतेआरण्यकपर्वणितीर्थयात्रापर्वणिलोमगनीर्थयात्रायांजामदग्न्यतेजोहानिकथनेएकोनगततमो को चले जाओ वहां के तीर्थों में म्नान करने से युधिष्ठिर ! परशुगम जी ने पितरों की आना से यहा तुम्हारा तेज फिर ज्यों का त्यों हो जायगा । उम आकर इस तीर्थ में स्नान किया था और फिर अपने तेज तीर्थ को दीप्तोद भी कहते हैं। तुम्हारे प्रपितामह को पाया था । परशुराम जी विष्णु भगवान् से मिलकर अर्थात् बाबा ने वहां बड़ी तपस्या की थी । सो है । इस प्रकार से इस तीर्थ को आये थे ॥६६/७१॥ वनपर्व का निन्यानववा अध्याय समाप्त हुआ ।। ९९ ॥ ECIANRNNNNNN NRBALAMWALL - अथ शततमोऽध्यायः ॥ १० ॥ युधिष्ठिर उवाच भूय एवाऽहमिच्छामि महर्पस्तस्य धीमतः कर्मणां विस्तरं श्रोतुमगस्त्यस्य द्विजोत्तम रोमश उवाच शृणु राजन् कथां दिव्यामदभुतामतिमानुपीम् । अगस्त्यस्य महाराज प्रभावममितौजसः आसन्कृनयुगे घोरा दानवा युद्धदुर्मदाः कालकेया इति ख्याता गणाः परमदारुणाः ते तु वृत्रं समाश्रित्य नानाप्रहरणोद्यताः समन्तात्पर्यधावन्त महेन्द्रप्रमुखान्सुरान् माँ अध्याय ॥१०॥ युधिष्ठिर ने कहा-हे हिनश्रेष्ठ । महर्षि अगत्य जी किक वृतान्त का वर्णन करता हूँ। मत्ययुग में कारय ने जो-जो काम किये हैं उन्हें में फिर विस्तारपूर्वक नाम के देवगत्रु दानवों ने वृत्रासुर को अपना म्वामी मुनना चाहता हूँ। रोमग ऋषि ने कहा-हे महाराज! बनाया और ये अनेक अम्ब-गम लेकर चारों ओर मुनिए. मैं महातजम्धी अगम्त्य जी के प्रभाव के अगे. मे देवताओं पर आक्रमण करने लगा वृत्रासुर कानाग - १९४० महा मारत [ वनपर्व 2Vravina - tereauna perennmanenta ततो वृत्रवधे यत्नमकुर्वस्त्रिदशाः पुरा पुरन्दरं पुरस्कृत्य ब्रह्माणमुपतस्थिरे कृताञ्जलीस्तु तान्सर्वान्परमेष्टीत्युवाच ह विदितं मे सुराः सर्व यद्वः कार्य चिकीर्पितम् ॥ ६ ॥ तमुपायं प्रवक्ष्यामि यथा वृत्रं वधिप्यथ दधीच इति विख्यातो महानृविरुदारधीः तं गत्वा सहिताः सर्वे वरं वै संप्रयाचत स वो दास्यति धर्मात्मा सुप्रीतेनाऽन्तरात्मना ॥ ८ ॥ स वाच्यः सहितैः सर्वेर्भवद्भिर्जयकांक्षिभिः स्वान्यस्थीनि प्रयच्छेति त्रैलोक्यस्य हिताय वै ॥ ९ ॥ स शरीरं समुत्सृज्य स्वान्यस्थीनि प्रदास्यति । तस्याऽस्थिभिर्महाघोर वज्रं संस्क्रियतां दृढम् ॥१०॥ महच्छत्रुहणं घोरं पडस्त्रि भीमनिःस्वनम् तेन वज्रण वै वृत्रं वधिष्यति शतक्रतुः एतद्वः सर्वमाख्यातं तस्माच्छीघ्र विधीयताम् । एवमुक्तास्ततो देवा अनुज्ञाप्य पितामहम् ॥ १२ ॥ नारायणं पुरस्कृत्य दधीचस्याऽऽश्रमं ययुः सरस्वत्याः परे पारे नानाद्रुमलताबृतम् ॥ १३ ॥ साइनाले देवता, इन्द्र को अपना अनुमा बनार. नियोकी के हित के लिए अपनी हड्डिका हमें दे दीजिए हाथ जोड़कर भगवान् ब्रह्मा की आराधना करने लगे। अपना शरीर त्यागकर उनके हड्डियाँ देने पर तुम उन तब ब्रह्मा जी ने प्रकट होकर कहा-हं देवताओ ! मैंने हड्डियों से छ कोनावाला, भयानक धनि पूर्ण, सुदृढ़ तुम्हारा अभिप्राय समझ लिया है। जिस उपाय मे तुम यज बना लेना । इन्द्र उसी वज से वृत्रासुर को ४ पृवासुर का नाम कर सकोगे या मैं बतलाता हूँ। मॉरंगे । मैने तुमको यह सम्मति दी है | तुम शीघ्र दर्धाचि नाम से प्रसिद्ध उदास्युद्धि एक महातपम्मी हमके अनुमार कार्य को ॥१॥११॥ मारि। उनके यहा जाकर तुम वरदान मागो । नव नारायण प्रमुख सब देवता, ब्रह्मा जी की अनु. व महात्मा जय ममन्नचित होकर पर देने के लिए मनिलेकर, सरस्वती नदी के उस पार तपोधन दधीचि प्रागुन हो नर तुम लेगों ने यह कहना कि आप के आश्रम में पहुँने । अनेक प्रकार के वृक्षों और EVValtARAVNAVNAVRATA - vNAPAGAI.VANPrevNAGAL अध्याय १०० ] महा भारत १९४१ .. पटपदोद्गीतनिनदैर्विघुष्टं सामगैरिव पुस्कोकिलरवोन्मिभं जीवञ्जीवकनादितम् ॥ १४ ॥ महिपैश्च वराहैश्च सृमरैश्चमरैरपि तत्र तत्राऽनुचरितं शार्दूल भयवर्जितैः करेणुभिर्वारणैश्च प्रभिन्नकरटामुखैः सरोवगाडैः क्रीडद्भिः समन्तादनुनादितम् सिंहव्यां|महानादान्नदद्भिानुनादितम् अपरैश्चापि सलीनैBहाकन्दरशायिभिः ॥ १७॥ तेषु तेववकाशेषु शोभितं सुमनोरमम् त्रिविष्टपसमप्रख्यं दधीचाश्रममागमन् ॥ १८ ॥ तत्राऽपश्यन्दधीचं ते दिवाकरसमद्युतिम् जाज्वल्यमानं वपुपा यथा लक्ष्म्या पितामहम् ॥ १९ ॥ तस्य पादौ सुरा राजन्नभिवाद्य प्रणम्य च अयाचन्त वरं सर्वे यथोक्तं परमेष्टिना ॥ २० ॥ ततो दधीच. परमप्रतीतः सुरोत्तमांस्तानिदमभ्युवाच करोमि यद्वो हितमद्य देवाः स्वंचापि देह स्वयमुत्सृजामि ॥ २१ ॥ स एवमुक्त्वा द्विपदां वरिष्ठः प्राणान्वशी स्वान्सहसोत्ससर्ज । लनाकुञ्जों से उस तपोवन की अपूर्व शोभा हो रही अपने शरीर की कान्ति में प्रकाशित हो रहे हैं। थी। माम-गान सा करते हुए भरि गुंजार कर रहे देवताओं ने जाकर उनके चरण छुए और ब्रह्मा जी थे । कोकिलाओं की कूक सुन पड़ती थी । सुअर, का बनाया हुआ वर माँगा ॥१२॥२०॥ भेमे, नीलगाय और बाघ आदि पशु निटर होकर देवताओं की प्रार्थना से परम प्रमन्न होकर महर्षि चारों ओर विनर रहे थे। जिनके कपोली से मद वह दचि ने कहा-हे देवताओ ! मैं आप लोगों का रहा था ऐमे हाथियों के झुण्ड के झुण्ड मरोवर में मान उपकार करना चाहता हूँ। मैं तुरन्त मग्ने के लिए करके हथिनियों के साथ क्रीड़ा कर रहे थे। कन्दगओं तैयार हूँ। तुम्हाग माँगा हुआ वर देने में मैं नाही में नेगें और बाघ का गम्भीर गर्जन चारों ओर न गा । अव परोपकारी महानपाची धाचिन , प्रतिध्वनित हो रहा था । म्या के ममान गोभायमान् उमी ममय अपना गरीर त्याग दिया। मुनि के मरने उम आश्रम में पहुंचकर देवनाओं ने देखा कि मूर्य पर उनकी हड्डियां लेकर प्रमन्नता मे मय देवना के ममान महर्षि दधीचि, नपोधन ब्रमा जी की नरह, अद्भुत कर्म करनेवाले विश्वकर्मा के पास गये । NAVALALLAain.MMovt.w.ww.८ । ८८.८rt [ वनपर्व BPMALA KPAL १९४२ म हा भारत LDEREN ततः सुरास्ते जगृहुः परासोरस्थीनि तस्याऽथ यथोपदेशम् ॥ २२ ॥ प्रहृष्टरूपाश्च जयाय देवास्त्वष्टारमागम्य तमर्थमूचुः स्वष्टा तु तेषां वचनं निशम्य प्रहृष्टरूपः प्रयतः प्रयत्नात् चकार वजं भृशमुग्ररूपं कृत्वा च शकं स उवाच हृष्टः अनेन वज्रप्रवरेण देव भस्मीकुरुष्वाऽद्य सुरारिमुग्रम् ततो हतारिः सगणः सुखं वै प्रशाधि कृत्स्नं त्रिदिवं दिविष्ठः । स्वष्ट्रा तथोक्तस्तु पुरन्दरस्तद्वनं प्रहृष्टः प्रयतो ह्यगृह्णात् ॥ २५ ॥ इति श्रीमन्महाभारसेआरण्यकपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां वजूनिर्माणकथनेशततमोऽध्यायः१०० उन्होंने विश्वकर्मा से जाकर अपना सब तात्पर्य कहा। कहा-हे सुरराज ! इस वज्र के द्वारा आप देवशत्रु सुनकर विश्वकर्मा बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने दधीचि असुगें को मारकर देवताओं-सहित सुखपूर्वक राज्य की हड्डियों लेकर उनसे भयानक प्रभावाला भीमरूप भोगिए । विश्वकर्मा के ये वचन सुनकर इन्द्र ने एक वज्र बनाया। फिर वह वन इन्द्र को देकर उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक वह वज़ ले लिया ॥२१।२५|| वनपर्व का सौ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १०० ।। । - अथ एकाधिकशततमोऽध्यायः ।। १०१ ॥ रोमश उवाच-ततः स बजी वलिभिर्देवतैरभिरक्षितः आससाद नतो वृत्रं स्थितमावृत्य रोदसी कालयमहाकायैः समन्तादभिरक्षितम् समुद्यतप्रहरणैः सहरिव पर्वतैः ततो युद्धं समभवद्देवानां दानवैः सह मुहर्त भरतश्रेष्ट लोकत्रासकरं महत् उद्यतप्रतिपिष्टानां खङ्गानां वीरवाहुभिः आसीत्सुतुमुलः शब्दः शरीरेवभिपात्यताम् ॥ ४ ॥ एक मांएक अध्याय ॥ १०१॥ रोमा प्रापिकहते है-इन्द्र वृत्रासुर पर आक्रमण शाम्ब हाथ में लिये, उन्नतशरीर कालय राक्षसों के करने की उमकी और चमका दाई । बीच महाअमुच आका और अन्तरिक्ष को रोक गरधारी दवना चारों ओर से उनकी रक्षा करते हुए बड़ा था। देवनाओं को आग बदले हुए देखकर हुग चल । उपम रे शिवणवान पर्वनगज के तुल्य अमुर रोग क्रोध में अधर दो टटे। अनेक अम्म.
अध्याय १०१] महा भारत १९४३ ~ A.४८ शिगेभिः प्रपतद्भिश्चाऽप्यन्तरिक्षान्महीतलम् । तालैरिव महाराज वृन्ताभ्रष्टैरदृश्यत ते हेमकवचा भूत्वा कालेयाः परिघायुधाः त्रिदशानभ्यवर्तन्त दावदग्धा इवाऽद्रयः तेषां वेगवतां वेगं साभिमानं प्रधावताम् न शेकुस्त्रिदशाः सोढुं ते भग्नाः प्राद्रवन्भयात् ॥ ७ ॥ तान्दृष्ट्वा द्रवतो भीतान्सहस्राक्षः पुरन्दरः वृत्रे विवर्धमाने च कश्मलं महदाविशत् कालेयभयसंत्रस्तो देवः साक्षात्पुरन्दरः जगाम शरणं शीघ्रं तं तु नारायणं प्रभुम् तं शक्रं कश्मलाविष्टं दृष्ट्वा विष्णुः सनातनः खतेजो व्यदधच्छके बलमस्य विवर्धयन् ॥ १० ॥ विष्णुना गोपितं शक्रं दृष्ट्वा देवगणास्ततः सर्वे तेजः समादध्युस्तथा ब्रह्मर्पयोऽमलाः ॥ ११ ॥ स समाप्यायितः शक्रो विष्णुना दैवतैः सह । ऋपिभिश्च महाभागैलवान्समपद्यत ॥ १२ ॥ ज्ञात्वा वलस्थं त्रिदशाधिपं तु ननाद वृत्रो महतो निनादान् । शम्न उठाकर दोनों दल परम्पर भिड़ गये । घोर संग्राम बहुत ही सकपकाये और भगवान् नारायण के शरणा- में परस्पर तलवारें चलाने से टूटे हुए तालफलों के गत हुए। मव प्राणियों के स्वामी विष्णु ने इन्द्र को समान देवताओं और दैत्यों के सिर कट-क्टकर व्याकुल देखकर अपना तेज देकर उनकी सहायता पृथ्वी पर गिरने लंग ।।१।५।। की। यह देखकर देवताओं और ब्रह्मपियों ने प्रमलता- सुवर्ण के कवच पहने ओर परिघ आदि शम्न पूर्वक अपना अपना तेज देकर इन्द्र के बल को हाथ में लिये कालकेय नाम के असुरों ने देवताओं और भी बढ़ा दिया ॥१०॥ पर हमला किया। प्रबल पराक्रमी कालकेयगण अभि इन्द्र को विष्णु के तेज से रक्षिन देखकर मान क माथ देवताओं की ओर दौड़े।देवता घरा- वृत्रासुर बहुत क्रोधित हुआ और बट बारम्बार दि. कर इधर-उधर भागने लगे। उनको भागते और नाद करने लगा। उसके चिल्लाने के भयानक शब्द दैत्यों को उनका पीछा करते देग्वार इन्द्र व्याकुल हो को सुनकर सर दिशाएं कार उटी और सारा संमार गये । वे दम भर में मम्भलकर वृत्रामुर के डर से माहित हो गया । वृत्रासुर का गहनाद के समान vavAIMeeNavitBABMamta १९४४ महा भारत [ वनपर्व .. - - तस्य प्रणादेन धरा दिशश्च खं द्यौनगाश्चापि चचाल सर्वम् ॥ १३ ॥ ततो महेन्द्रः परमाभितप्तः श्रुत्वा रवं घोररूपं महान्तम् भये निमग्नस्त्वरितो मुमोच वजं महत्तस्य वधाय राजन् ॥ १४ ॥ स शकवजाभिहतः पपात महासुरः काञ्चनमाल्यधारी यथा महाशलवरः पुरस्तात्स मन्दरो विष्णुकराद्विमुक्तः ॥ १५ ॥ तस्मिन्हने दैत्यवरे भयार्तः शक्रः प्रदुद्राव सरः प्रवेष्टम् वज्रं स मेने न कराद्विमुक्तं वृत्रं भयाच्चापि हतं न मेने सर्वे च देवा मुदिताः प्रहृष्टा महर्षयश्चेन्द्रमभिप्नुवन्तः सर्वांश्च दैत्यांस्त्वरिताः समेत्य जघ्नुः सुरा वृत्रवधाभितप्तान् ॥ १७ ॥ तैस्त्रास्यमानास्त्रिदौः समेतैः समुद्रमेवाऽविविशुर्भयार्ताः प्रविश्य चैवोदधिमप्रमेयं झपाकुलं नक्रसमाकुलं च तदा स्म मन्त्रं सहिताः प्रचकुस्त्रैलोक्यनाशार्थमभिस्मयन्तः । तत्र स्म केचिन्मतिनिश्चयज्ञास्तांस्तानुपायानुपवर्णयन्ति तेषां तु तत्र क्रमकालयोगाद्धोरामतिश्चिन्तयतां बभूव ये सन्ति विद्यातपसोपपन्नास्तेषां विनाशः प्रथमं तु कार्यः ॥ २० ॥ लोका हि सर्वे तपसा ध्रियन्ते तस्मात्त्वरध्वं तपस. क्षयाय ये सन्ति केचिञ्च वसुन्धरायां तपस्विनो धर्मविदश्च तज्ज्ञाः गम्भीर मन्द मुनकर इन्द्र बहुत ही भयभीन और देखकर मय देवना और महर्षि हपमूचक शब्द करके चवित हुए। तब उन्होंने वृत्रासुर को मारन के रिए इन्द्र की प्रशसा करने लगे । वृत्रासुर के मर जाने या गया । इन्द्र का बन गंत ही मोने की मे व्यायुट असुरी को देवताओं ने तुरन्त ही एकत्र माग पहने हुए हा अमुर वृत्र, विष्णु के हाथ में हार माग । देवताओं के हाथों मार खाकर चे र पर्वनगन गन्दगचल के ममान, पश्ची पर गिर भयानक जन जन्तुओं में पूर्ण, गम्भीर ममुद्र में घुसकर पहा ॥११॥१॥ ग्रगण्य के नाम के शिय आपम में सम्मान करने त्रामा में इन्द्र बनना डरे हुगनि उन्हें लगे । बहुत देर तक सम्गनि करने पर यह निश्चय अग्न मनरय हुए यम में भी वृत्रासुर आ कि मय मे पहल नोपलगाली मप मास्त्रों के मरमदद कना ।। नये प्राण बचानक माना गंगों को माना चाहिएक्योंकि नपा ही Pए मंगवर में पागदार । वृत्रासुर की रक्षा का प्रधान कारण। अनएर आओ, मय , बस माम मान और पीपा पड़ा मा एकमत होकर पहने की पर रहने पान. पार्मिकों और - - अध्याय १०२ ] म हा भारत १९४५ तेषां वधः क्रियतां क्षिप्रमेव तेपु प्रनष्टेपु जगत्प्रनष्टम् ॥ २२ ॥ एवं हि सर्वे गतवुद्धिभावा जगद्विनाशे परमप्रहृष्टाः दुर्ग समाश्रित्य महोमिमन्तं रत्नाकरं वरुणस्याऽऽलयं स्म इतिश्रीमन्महाभारतेआरण्यकपर्वणितीर्थयात्रापर्वणिलोमशतीर्थयात्रायावृत्रवधोपारयानेएकाधिकाततमोऽध्याय तपस्वियों काही संहार करें । तभी सारा जगत् नष्ट नाग करने के लिए इस प्रकार सम्मति करने लगे। हो सकेगा । दुस्तर तरङ्गों से पूर्ण दुर्भद्य समुद्र के ॥१६॥२३॥ दुर्गम दुर्ग(किले ) में रहकर सब दानव मंमार का वनपर्व का एक मौ एक अध्याय ममाप्त हुआ ॥ ११ ॥ अथ द्विधिकशततमोऽध्याय ॥ १०२ ॥ रोमश उवाच-समुद्रं ते समाश्रित्य वरुणं निधिमम्भसः कालेयाः संप्रवन्त त्रैलोक्यस्य विनाशने ते रात्रौ समभिकुद्धा भक्षयन्ति सदा मुनीन् । आश्रमेषु च ये सन्ति पुण्येवायतनेषु च वसिष्टस्याऽऽश्रमे विप्रा भक्षितास्तैर्दुरात्मभिः । अशीतिः शतमष्टो च नव चाऽन्ये तपस्विनः ॥ ३ ॥ च्यवनास्याऽऽश्रमं गत्वा पुण्यं द्विजनिपेवितम् । फलमृलाशनानां हि मुनीनां भक्षितं शतम् ॥ ४ ॥ एवं रात्रौ स्म कुर्वन्ति विविशुश्चाऽर्णवं दिवा । भरद्वाजाश्रमे चैव नियता ब्रह्मचारिणः एक सौ दो अध्याय ॥१०॥ रोमा ऋषि ने कहा-टे राजा युधिष्ठिर ! इस ग्वा निया। च्यवन ऋपि के आश्रम में जाकर एक प्रकार समुद्र के भीतर रहकर, बिग-महार के लिए सौ फर मूलादारी ताम्बियों का नाश क्यिा ॥१४॥ नरह तरह की सलाह कर, अन्त को कुपित सक्षम भाद्वाज ऋपि के आश्रम में जाकर केवल जल लाग गत्रि के समय आश्रमों और पुण्यस्थानों में और वायु के आधार पर तपम्या करने वाले बीम रहनेवाले ब्राह्मणों को मारकर याने लगे। दुष्ट राक्षमा ब्राह्मणों का नाश कर डागा देगक्षस रात्रि को दम ने महात्मा वशिष्ठ जी के आश्रम में घुमकर एक मौ प्रकार मे अत्याचार करते थे और दिन को समुद्र के सतानरे व झगों और अन्यान्य तपम्पियों को मारकर भीतर छिपजाते थे। इस प्रकार ऋपियों के आश्रमों ANANAGVAVVANIMALVI महा मारन [ वनपर्व NAL51510 .. - नम्य प्रणादेन धरा दिगश्च वं यौनगाश्चापि चचाल सर्वम् ॥ १३ ॥ नता महन्द्रः परमाभितप्तः श्रुत्वा वं घोररूपं महान्तम् भये निमग्नम्त्वरितो मुमोच वनं महत्तस्य वधाय राजन् ॥ १४ ॥ माकरज्ञाभिहतः पपान महासुरः काञ्चनमाल्यधारी यथा महागलवरः पुरस्तात्म मन्दगे विष्णुकराद्विमुक्तः नन्मिन्हन देत्यबरे भयानः शनः प्रदुद्राव मरः प्रबष्टुम् गजं म मेने न कगद्विमुक्तं. त्रं भयाचापि हतं न मेने ग र देगा मुदिनाः प्राटष्टा महर्षयश्चन्द्रमभिष्ट्रवन्तः मांध दरयांम्परिताः समेत्य जानुः मुग त्रयधाभिनप्तान् ॥ १७ ॥ नयाम्पमानानिटीः मगनः ममुद्रमेयाऽविविशुभयानाः प्रविष्य नगदधिमप्रमेयं झपाकृलं नकसमाकुलं न मटा म मन्त्र महिना. प्रमुग्लोरपनाशार्थमभिम्मयन्तः । नन म पनिनमनिनिधयनाम्नांग्नानगयानुपरर्णयन्ति नेपा न नाम.मयाव्यांगागमनिधिन्नयनां यभव मन्नि गितानपनापपापां पिनाशः प्रथमं तु कार्यः गवाह नपमा धिपन्न नामात्र नपम याय गि पनि नमाधगयां नपग्गिनी धमविध नसाः ॥ २० ॥ 1 अध्याय १०२] महा मा र त १९८५ २८) तेषां वधः क्रियतां क्षिप्रमेव तेषु प्रनष्टेपु जगत्प्रनष्टम् ॥ २२ ॥ एवं हि सर्वे गतवुद्धिभावा जगद्विनाशे परमप्रहृष्टाः समाश्रित्य महोमिमन्तं रत्नाकरं वरुणस्याऽऽलचं स्म ॥ २३ ॥ इतिश्रीमन्महाभारतेआरण्यकपर्वणितीर्थयात्रापर्वणिलोमगतीर्थयात्रायावृत्रवर्धापारयाने एकाधिक्यततमोऽध्याय नाम्बियों का ही संहार करें । तभी सारा जगत् नष्ट नाग करने के लिए इस प्रकार सम्मति करने लगे। हो मकेगा । दुस्तर तरङ्गों से पूर्ण दुर्भद्य समुद्र के ॥१६॥२३॥ दुर्गम दुर्ग (किले) में रहकर मय दानव संमार का वनपर्व का एक मौ एक अध्याय ममाम हुआ ॥११॥ .. ॥ २ ॥ अध द्विधिकटाततमोऽध्यायः ॥ १२ ॥ नोमग उवाच-समुद्रं ते समाश्रित्य वरुणं निधिमम्भसः कालेयाः संप्रवर्नन्त त्रैलोक्यस्य विनाशने ने रात्रौ समभिकुद्धा भक्षयन्ति सदा मुनीन् । आश्रमेषु च ये सन्ति पुण्येवायतनेषु व वसिष्टस्याऽऽश्रमे विप्रा भक्षिताम्तैर्दुरात्मभिः । अशीनिः शतमष्टो च नव चाऽन्ये तपस्विनः ॥ ३ ॥ च्यवनास्याऽऽश्रमं गत्वा पुण्यं द्विजनिषेवितम् । फलमूलाशनानां हि मुनीनां भक्षितं शतम् ॥ ४ ॥ एवं रात्रौ स्म कुर्वन्ति विविशुश्चाऽर्णवं दिवा । भरद्वाजाश्रमे चैव नियता ब्रह्मचारिणः MarwAL.WAL-~l. गेमा ऋषि ने कहा-हे राजा युधिष्ठिर ! इस पर ममुद्र के भीतर रहकर, त्रिगा-महार के रिए नम्ह-तरह की मलाहें कर, अन्त को कुरित राक्षम एक मादी अध्याय ॥1॥ ग्वा रिया । च्यवन ऋषि के आश्रम में जाका एक सोफर मूसादारी ताम्बियों का नाम क्यिा ।।२ ।। भरद्वाज ऋषि के आश्रम में जाकर माग गति के ममय आश्रमों और पुण्यन्धानों में और वायु के आधार पर नपस्या कग्नेबाने याम रहनेवाले वामगों को मारकर म्बाने लगे। दुष्ट रानमा ने महात्मा वशिष्ठ जी के आश्रम में घुसकर एक मी मनान वझगों और अन्यान्य तपम्बियों को मारकर ब्राह्मणों का नाश कर डागारक्षम गति के म प्रकार मे अत्याचार करते थे और दिन को ममुद्र भीतर सिजाते थे।रम प्रारपियों ने आप महा मारत [ वनपर्व GPAL - । -- ॥ BeriAIIMeriental वायवाहाराम्बुभक्षाश्च विंशतिः संनिपूदिताः एवं क्रमेण सर्वांस्तानाश्रमान्दानवास्तदा निशायां परिवाधन्ते मत्ता भुजवलाश्रयात् कालोपस्पृष्टाः कालेया घ्नन्तो द्विजगणान्बहून् ॥ ७ ॥ न चैनानन्वबुध्यन्त मनुजा मनुजोत्तम एवंप्रवृत्तान्दैत्यांस्तांस्तापसेषु तपस्विपु प्रभाते समदृश्यन्त नियताहारकर्पिता: महीतलस्था मुनयः शरीरैर्गतजीवितैः क्षीणमांसविरुधिरैर्विमज्जांत्रर्विसंधिभिः आकीर्णेरावभौ भूमि शहानामिव राशिभिः ॥ १० ॥ कलशैविप्रविद्धश्च सुवर्भग्नेस्तथैव च विकीर्णेरग्निहोत्रैश्च भूर्वभूव समावृता नि स्वाध्यायवषट्कारं नष्टयज्ञोत्सवक्रियम् जगदासीन्निरुत्साहं कालेय भयपीडितम् ॥ १२ ॥ एव सक्षीयमाणाश्च मानवा मनुजेश्वर आत्मत्राणपरा भीताः प्राद्रवन्त दिशो भयात् ॥ १३ ॥ कचिद्गुहाः प्रविविशुर्निर्झरांश्चाऽपरे तथा में कारस्य दानवों के उपर से बचनी फैल गई । की क्रियाए पृथ्वी पर से मानों उट गई । इस प्रकार सरहा ब्राह्मण अकार में ही काल का कौर बन गये। से कराल कारकयों की दुष्टता से साग जगत् शक्ति मितु काई उन दानवों का पता न लगा सका । और चिन्तित हा उठा ।। ५॥१०॥ , दुष्ट दानवों । अत्याचार धार धीरे चारों ओर फैनन दिन प्रति दिन कालय दानवों के उपद्रर गा। नित्य मयर देग पनि रगाकि नियत आगर मनुष्यों का नाश होते देकर बचे हुए मब प्राणी अपने म दुर्वर शरसाने मनिया की ठठरियां पृथ्वी पर प्राण रकर, म्यान छ। डर, इधर उधर भाग गये । पड़ी हुई हैं। सब तपोवना में रक्त की धाग, हड्डी, कोई पर्वतों की कन्दगी में, कोई वन में, और मंदा, माम और मजा नादि दव पड़ी गी। कोई झरनों के पास छिपकर रहने लगे। अनेक रोग १ अगिदात्र स्थान नष्ट-अष्ट देग पड़ने रंगे । यही मृत्यु के भय से आप ही आप मर गये । फेवर दो 2 दमा और सही सदा हट पंड थे। वदपाठ, परमार पफ वीर पुरस धनुष वाण हाथ में लेकर दुष्ट दानयों , बीपी, यम, समय और अन्य मच कर्मकाण्ट का पता लगाने गापरवे तो आनन्द से बेग्यटके । । । ।
अध्याय १०२] म हा भारत १९४७ : १८ - । अपरे मरणोद्विग्ना भयात्प्राणान्समुत्सृजन् ॥ १४ ॥ केचिदत्र महेष्वासाः शूराः परमहर्पिताः मार्गमाणाः परं यत्नं दानवानां प्रचक्रिरे न चैतानधिजग्मुस्ते समुद्रं समुपाश्रितान् श्रम जग्मुश्च परममाजग्मुः क्षयमेव च ॥ १६ ॥ जगत्युपशमं याते नष्टयज्ञोत्सबक्रिये आजग्मुः परमामाति त्रिदशा मनुजेश्वर ।। १७॥ समेत्य समहेन्द्राश्च भयान्मन्त्रं प्रचक्रिरे शरण्यं शरणं देवं नारायणमजं विभुम् ॥ १८ ॥ तेऽभिगम्य नमस्कृत्य वैकुण्ठमपराजितम् ततो देवाः समस्तास्ते तदोचुर्मधुसूदनम् ॥ १९ ॥ त्वं नः स्रष्टा च भर्ता च हर्ता च जगतः प्रभो। त्वया सृष्टमिदं विश्वं यच्चेझं यच्च नेगति ॥ २० ॥ त्वया भूमिः पुरा नष्टा समुद्रात्पुष्करेक्षण वाराहं वपुराश्रित्य जगदर्थे समुन्दृता ।। २१ ॥ आदिदैत्यो महावीर्यो हिरण्यकशिपुः पुरा नारसिंहं वपुः कृत्वा सूदितः पुरुषोत्तम ॥ २२ ॥ अवध्यः सर्वभूतानां वलिश्चापि महासुरः वामनं वपुराश्रित्य त्रैलोक्यादभ्रंशितस्त्वया ॥ २३ ॥ समुद्र के भीतर रहते थे, इस कारण उनका कोई जगत् के म्बामी ! एकमात्र तुम्ही जगत् की मृष्टि, कुछ नहीं कर मका । बल्कि दानवों की खोज में पालन और नाम करते हो ॥११॥२०॥ लगातार घूमने के कारण वे ही थककर मर मिटे । हे कमलनयन ! पदने यह ब्रमाण्ड समुद्र के पृथ्वी पर यज्ञ-याग आदि के बन्द होने और मनुष्यों जल में इया हुआ था। उस समय तुमने वराह का के मारे जाने से देवता अत्यन्त पीड़ित हुए । इन्द्र आदि रूप धारण करके जल में इसी हुई पृथ्वी का उद्धार देताओं ने मिलकर सम्मति की। फिर सब भगवान् किया है। तुमने नृसिंह रूप धारण कर आदित्य नारायण की शरण में गये । हाथ जोड़कर प्रणाम हिरण्यकशिपु को मारा। तुमने बामन म्र धारण करके विनीत वचनों से ये कहने लो- मनानन : कर रहण्ट राजा पनि कोधिगेकी के गज्य में प्रष्ट NavBALRAINIssi - । PANA~NALLY १९४८ म हा भारत [ वनपर्व UAR AMAVANMASHA 3ASTAL PART0 । - दवा ऊचु असुरश्च महेष्वासो जम्भ इत्यभिविश्रुतः यज्ञक्षोभकरः कृरस्त्वयैव विनिपातितः ॥ २१ ॥ एवमादीनि कर्माणि येषां संख्या न विद्यते अस्माकं भयभीतानां त्वं गतिर्मधुसूदन ॥ २५ । तस्मात्त्वां देवदेवेश लोकार्थ ज्ञापयामहे रक्ष लोकांश्च देवांश्च शक्रं च महतो भयात् ॥ २६ ।। इतिश्रीमन्महाभारतेआरण्यकपर्वणितीर्थयात्रापर्वणिलोमशतीर्थयात्रायाविष्णुस्तवेद्विधिकशततमोऽध्याय १८० किया है । तुमने सब यज्ञों को मिटानेवाले जम्भासुर कारण इम विपत्ति को दूर करके हम भय से पीड़ित को मारा है । हे मधुसूदन ' इस प्रकार अनेक अद्भुत शरण में आये हुए देवताओं की, इन्द्र की और काम करके तुमने जगत् का भला किया है। इस ससार की रक्षा करो ॥२१॥२६॥ वनपर्व का एकमो दा अध्याय समाप्त हुआ।। १२ ।। अथ विधिकशततमोऽध्याय ॥ १०३ ॥ तव प्रसादाद्वर्धन्ते प्रजा. सर्वाश्चतुर्विधाः ता भाविता भावयन्ति हव्यकव्यर्दिवौकसः लोका ह्येवं विवर्धन्ते ह्यन्योन्यं समुपाश्रिताः । स्वत्प्रसादान्निरुद्विग्नास्त्वयैव परिरक्षिताः इदं च समनुप्राप्तं लोकानां भयमुत्तमम् न च जानीम केनेमे रात्रौ वध्यन्ति ब्राह्मणाः ॥ ३ ॥ क्षीणेषु च ब्राह्मणेपु पृथिवी क्षयमेष्यति ततः प्रथिव्यां क्षीणायां त्रिदिवं क्षयमेष्यति ॥ ५ ॥ स्वत्प्रसादान्महाबाहो लोकाः सर्वे जगत्पते परमा तीन अध्याय ।।१०३॥ देवनाओं ने कहा हेगनाय तुम्हारी ही रा य दाना । बड़ी भारी विपत्ति में पड़कर चिन्तित म नागें वों की प्रजा परती और फनती है। घर होगहे है। हम नहीं जानते कि कौन दुष्ट रिपकर रात्रि मजा य और काय के द्वारा देवताओं को प्रसन्न को आंत और ब्राह्मणों की हत्या करके भाग जाते कानी है । गाध । तुम्हारे ही मुष्टि कागल स है। इस प्रकार धीरे धीरे ब्राह्मणों का नाशन से वा भी परम्पर की सहायता से पदर और प्रवी चौपट हो जायगी। पृथ्वी के नष्ट होने पर मुम्ही मानेपानिहोन है। कितु हम समय निम्मन्देहम्पर्ग की भी यही दशा होगीदि विश्वनाथ! । - अध्याय १०३ ] म हा भारत Arial NovnNWNAL विनाशं नाऽधिगच्छेयुस्त्वया वे परिरक्षिताः विष्णुरुवाच-विदितं मे सुराः सर्व प्रजानां क्षयकारणम् भवतां चापि वक्ष्यामि शृणुध्वं विगतज्वराः कालेय इति विख्यातो गणः परमदारुणः तैश्च वृत्रं समाश्रित्य जगत्सर्वं प्रमाथिनम् ते वृत्रं निहतं दृष्ट्वा सहस्राक्षेण धीमता जीवितं परिरक्षन्तः प्रविष्टा वरुणालयम् ते प्रविश्योदधिं घोरं नक्रयाहसमाकुलम् उत्प्तादनार्थं लोकानां रात्रौ घ्नन्ति ऋपीनिह ॥ ९ ॥ न तु शक्याः क्षयं नेतुं समुद्राश्रय गा हि ते । समुद्रस्य क्षये बुद्धिर्भवद्भिः संप्रधार्यताम् अगस्त्येन विना को हि शक्तोऽन्योऽर्णवशोपणे । अन्यथा हि न शक्यास्ते विना सागरशोपणम् ॥ ११ ॥ एतच्छ्रुत्वा तदा देवा विष्णुना समुदाहृतम् । परमेष्टिनमाज्ञाप्य अगस्त्यस्याऽऽश्रमं ययुः ॥ १२ ॥ तत्राऽपश्यन्महात्मानं वारुणिं दीप्ततेजसम् तुम्हारी ही कृपा से मब लोकों का पालन और रक्षा रहनेवाले वही गक्षम रात्रि को बाहर निकटकर सोरे होती है। हममे वही कीजिए जिममें मघ लोक नष्ट मंमार के नाश के लिए ऋपियों की हत्या करने है। इस कारण उनका नाश करना अत्यन्त आवश्यक विष्णु ने कहा- हे देवनाओ! जिम कारण प्रजा है। किन्तु वे अथाह समुद्र के भीतर छिी हुई। का भय हो रहा है मो मैं जानता हूँ। मैं तुम लोगों इमरिए उन्हें नष्ट करना महज नहीं है। ममुद्र को में यह कारण कहना है, मन लगाकर सुनो। कालकेय सोचना ही उनके नाम का एकमात्र उपयरम. नाम से प्रसिद्ध बड़े भयानक कुछ दानव थे। ये निगमा कोई उपाय बोजना चाहिए जिममें ममुद्र । वृत्रासुर को अपना अगुवा बनाकर मय जगत को का जन मूम जाय । समद को सुना मरनेवाले मनाने फिरते थे। इस ममय वृत्रानु को बुद्धिमान् केवल आम्न्य ऋषि है । न निगम ऐमा श्रीर इन्द्र ने मार डाला ये सक्षम अपने प्राण बचाने कोई नहीं ॥६॥१०॥ रिप ममुद्र के भीतर भाग गये हैं। मगर-पड़ियाल विगु भगवन् के ग बनन मुनर मय देवता आदि भयानक जन-जन्तुओं मे पूर्ण ममुद्र के भीतर द्रमा जी म. वृतान्न काका भगी - न हो ॥१५॥ - १९५० म हा भारत [ वनपर्व LAB - NAGreanews उपास्यमानमृपिभिर्देवैरिव पितामहम् तेऽभिगम्य महात्मानं मैत्रावरुणिमच्युतम् आश्रमस्थं तपोराशिं कर्मभिः स्वैरभित्रुवन् ॥ १४ ॥ देया ऊचुः-नाहुपेणाऽभितप्तानां त्वं लोकानां गतिः पुरा भ्रंशितश्च सुरैश्वर्यात्स्वलॊकाल्लोककण्टकः क्रोधात्प्रवृद्धः सहसा भास्करस्य नगोत्तमः वचस्तवाऽनतिकामन्विन्ध्यः शैलो न वर्धते तमसाचाऽऽवृते लोके मृत्युनाऽभ्यर्दिताःप्रजाः। स्वामेव नाथमासाद्य नितिं परमां गताः ॥ १७॥ अस्माकं भयभीतानां नित्यशो भगवान्गतिः ततस्त्वार्ताः प्रयाचामो वरं त्वां वरदो ह्यसि ॥ १. इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि अगस्त्यमाहात्म्यकथने व्यधि अध्याय १०४ ] १९५१ महा भारत तं तु दृष्ट्वा तथा विन्ध्यः शैलः सूर्यमथाऽब्रवीत् । यथा हि मेरुर्भवता नित्यशः परिगम्यते प्रदक्षिणश्च क्रियते मामेवं कुरु भास्कर एवमुक्तस्ततः सूर्यः शैलन्द्रं प्रत्यभापत नाऽहमात्मेच्छया शैलं करोम्येनं प्रदक्षिणम् । एप मार्गः प्रदिष्टो मे यैरिदं निर्मितं जगत् एवमुक्तस्ततः क्रोधात्प्रवृद्धः सहसाऽचलः सूर्याचन्द्रमसोर्मार्ग रोधुमिच्छन्परन्तप ततो देवाः सहिताः सर्व एव विन्ध्यं समागम्य महाद्रिराजम् । निवारयामासुरुपायतस्तं न च स्म तेषां वचनं चकार अथाऽभिजग्मुर्मुनिमाश्रमस्थं तपस्विनं धर्मभृतां वरिष्ठम् अगस्त्यमत्यद्भुतवीर्यवन्तं तं चाऽर्थमूचुः सहिताः सुरास्ते ॥ ८ ॥ सूर्याचन्द्रमसोर्मार्ग नक्षत्राणां गतिं तथा शैलराजोऽवृणोत्येप विंध्यः क्रोधवशानुगः तं निवारयितुं शक्तो नाऽन्यः कश्चिद् द्विजोत्तम । एक सौ चार अध्याय ।। १०४॥ उक्त क्था को सुनकर राजा युधिष्ठिर ने पूछा-हे इच्छा से सुमेरु की प्रदक्षिणा नहीं करता। जगत् के महाराज ! विन्ध्याचल किस कारण से कुपित होकर उत्पन्न करनेवाले ईश्वर ने जो मार्ग मेरे लिए बना दिया एकाएक ऊँना हो गया था ? मै इम उपाख्यान को है मै उमी में घूमा करता हूँ ॥१॥५॥ विस्तार के साथ सुनना चाहता है । लोमग ऋषि हे धर्मगज ! सूर्य के इस कथन से विम्याचल ने कहा-हे राजा युधिष्ठिर! भगवान् मूर्य नित्य उदय को कोध चढ़ आया । वह सूर्य और चन्द्र की गति और अम्त के समय गर्वनी के राजा कनक पर्वत रोकने के लिए अम्मात् ऊपर की ओर बढ़ने लगा। अर्थात् मुमरु पर्वत की प्रदक्षिणा किया करते है। यह देखकर सब देवता विध्याचल के पास गये और यह देखकर विंध्याचल ने सूर्यनारायण जी से कहा- अनेक उपायों से उमका बदना रोकने का उपाय , हे सूर्यदेव ! तुम नित्य जिम तरह सुमेरु पर्वत के करने लगे। परन्तु विन्ध्याचल किमी तरह उनका , चारों ओर घूमकर उसकी प्रदक्षिणा करते हो उमी कहना मानने को प्रसन्न नहीं हुआ। नर मय देवता , प्रकार से मेरी भी प्रदक्षिणा किया करो। विम्यानल मिन कर अत्यन्न अद्भुन परक्रमवाले, धार्मिक्श्रेष्ठ, , के यों कहने पर मूर्य ने कहा-दे पर्वतगज! मैं अपनी महातसम्बी अगम्त्य के पास गये । वहाँ मय वृत्तान्न 000 CALAMMARIA १९५० [ वनपर्व महा मारत 20UBAI उपास्यमानमृपिभिर्देवैरिव पितामहम् तेऽभिगम्य महात्मानं मैत्रावरुणिमच्युतम् आश्रमस्थं तपोराशिं कर्मभिः स्वैरभिष्टुवन् ॥ १४ ॥ देवा ऊचुः-नाहुषेणाऽभितप्तानां त्वं लोकानां गतिः पुरा । भ्रंशितश्च सुरैश्वर्यात्स्वलॊकाल्लोककण्टकः ॥ १५॥ क्रोधात्प्रवृद्धः सहसा भास्करस्य नगोत्तमः वचस्तवाऽनतिकामन्विन्ध्यः शैलो न वर्धते तमसा चाऽऽवृते लोके मृत्युनाऽभ्यर्दिताःप्रजाः । त्वामेव नाथमासाद्य निर्वृत्तिं परमां गताः अस्माकं भयभीतानां नित्यशो भगवान्गतिः ततस्त्वार्ताः प्रयाचामो वरं त्वां वरदो ह्यसि ॥ १८ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि अगस्त्यमाहात्म्यकथने त्र्यधिकशततमोऽध्याय ॥१३॥ आश्रम को गये । वहा जाकर उन्होंने देखा कि देवता सब लोकों की रक्षा की थी । सूर्य की गति रोकने जैसे भगवान् ब्रह्मा जी की उपासना करते हैं वैसे के लिए ऊपर को उठा हुआ पर्वतराज विन्ध्याचल ही वहुत से ऋषि महर्षि अगम्त्य जी की उपासना आपकी ही आज्ञा से अबतक पृथ्वी पर पड़ा हुआ कर रहे हैं । तपोगशि महात्मा गम्त्य जी को आश्रम है; खड़ा नहीं हो सकता । उस समय सूर्य का प्रकाश में पठे देखकर सब देवता उनके पास गये और उन्हीं न पाकर अंधेरे से अत्यन्त पीड़ित प्रना आपकी कृपा के किये कर्मों का वर्णन करके उनको स्तुति करने से परम आनन्दित हुई थी। इस कारण हे भगवन् ! लगे। उन्होंने कहा-हे ऋषिश्रेष्ठ ! जब राजा नहुष के आप ही इस ममय भयभीत देवताओं की एकमात्र कार्य मे सब लोक व्याकुल हो गये थे तब आपने ही गति हो। इस समय हम भय से पीड़ित होकर आपसे इम लोककण्टक की इन्द्र के ऐश्वर्य से प्रष्ट करके यही वर माँगने आये है ॥११॥१८॥ घनपर्व का एकमो तीन अध्याय ममाप्त हुआ ॥ १०३ ।। . २.92 अथ चतुरधिकशननमोऽध्यायः॥ १०४॥ निष्ठिर उवाच-किमर्थं सहमा विन्ध्यः प्रवृद्धः क्रोधमूछितः । एनदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण महामुने गेमा वाय-अद्रिराज महाशेलं मेहं कनकपर्वतम् उदयास्तमने भानुः प्रदक्षिणमवर्नत Mauvera अध्याय १०४ ] १९५१ म हा मारत तं तु दृष्ट्वा तथा विन्ध्यः शैलः सूर्यमथाऽब्रवीत् ।। यथा हि मेरुर्भवता नित्यशः परिगम्यते प्रदक्षिणश्च क्रियते मामेवं कुरु भास्कर एवमुक्तस्ततः सूर्यः शैलेन्द्र प्रत्यभापत नाऽहमात्मेच्छया शैलं करोम्येनं प्रदक्षिणम् । एप मार्गः प्रदिप्टो मे यैरिदं निर्मितं जगत् एवमुक्तस्ततः क्रोधात्प्रवृद्धः सहसाऽचलः सूर्याचन्द्रमसोर्मार्ग रोवृधुमिच्छन्परन्तप ततो देवाः सहिताः सर्व एव विन्ध्यं समागम्य महाद्विराजम् । निवारयामासुरुपायतस्तं न च स्म तेपां वचनं चकार अथाऽभिजग्मुर्मुनिमाश्रमस्थं तपस्विनं धर्मभृतां वरिष्ठम् अगस्त्यमत्यद्भुतवीर्यवन्तं तं चाऽर्थमूचुः सहिताः सुरास्ते ॥ ८ ॥ सूर्याचन्द्रमसोर्मार्ग नक्षत्राणां गतिं तथा शैलराजोऽवृणोत्येय विध्यः क्रोधवशानुगः तं निवारयितुं शक्तो नाऽन्यः कश्चिद द्विजोत्तम । एक मौ चार अध्याय ॥ १४ ॥ उक्त क्था को सुनकर राजा युधिष्ठिर ने पूछा-हे इच्छा मे सुमेरु की प्रदक्षिणा नहीं करता। जगत् के महाराज ! विन्ध्याचल किस कारण से कुपित होकर उत्पन्न करनेवाले ईश्वर ने जो मार्ग मेरे लिए बना दिया एकाएक ऊँचा हो गया था ? मै इस उपाख्यान को है मै उमी में घूमा करता हूँ ॥११५|| विस्तार के साथ सुनना चाहता है । लोमश अपि हे धर्मगन ! सूर्य के इस कथन से विम्याचल ने कहा-हे राजा युधिष्ठिर! भगवान् मूर्य नित्य उदय को क्रोध चढ आया । वह सूर्य और चन्द्र की गति और अम्त के समय पर्वनों के राजा कनक पर्वत रोकने के लिए अम्मात् ऊपर की ओर बढ़ने लगा। अर्थात् मुमरु पर्वत की प्रदक्षिणा किया करते है । यह देखकर सब देवता विभ्यानल के पास गये और यह देखकर विंध्याचल ने सूर्यनारायण जी मे कहा- अनेक उपायों से उमका बढ़ना रोकने का उपाय हे सूर्यदेव ! तुम नित्य जिम तरह सुमेरु पर्वन के करने लगे। परन्तु विन्ध्याचल किमी तरह टनका चारों ओर दूनकर उसकी प्रदक्षिणा करते हो उमी कहना मानने को प्रमन नहीं हुआ। नर मर देवता प्रकार से मेरी भी प्रदक्षिणा किया करो। विन्ध्याचल मिलकर अत्यन्न अद्भुत पर कामवाले, धार्मिक्श्रेष्ठ, के यों कहने पर मूर्य ने कहा-हे पर्वनराज ! मैं अपनी महातपम्बी अगम्त्य के पाम गये । वहाँ मव वृत्तान्त 007 १९५२ म हा मारत [ वनपर्व ALBUGADG NAVNAVALPuuuu - .. देवा ऊचु -ऋते त्वां हि महाभाग तस्मादेनं निवारय तच्छ्रुत्वा वचनं विप्रः सुराणां शैलमभ्यगात् । सोऽभिगम्याऽब्रवीविंध्यं सदारः समुपस्थितम् ॥ ११ ॥ मार्गमिच्छाम्यहं दत्तं भवता पर्वतोत्तम दक्षिणामभिगन्ताऽस्मि दिशं कार्येण केनचित् ॥ १२ ॥ यावदागमनं मह्यं तावत्वं प्रतिपालय निवृत्ते मयि शैलेन्द्र ततो वर्धस्व कामतः ॥ १३॥ एवं स समयं कृत्वा विंध्येनाऽमित्रकर्शन अद्यापि दक्षिणाद्देशाद्वारुणिर्न निवर्तते एतत्ते सर्वमाख्यातं यथा विध्यो न वर्धते अगस्त्यस्य प्रभावण यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥१५॥ कालेयास्तु यथा राजन् सुरैः सर्वैर्निपूदिताः । अगस्त्याद्वरमासाद्य तन्मे निगदतः शृणु त्रिदशानां वचः श्रुत्वा मैत्रावरुणिरब्रवीत् किमर्थमभियानाः स्थ वरं मत्तः कमिच्छथ एवमुक्तास्ततस्तेन देवता मुनिमब्रुवन् ॥ १७॥ वर्णन करके वे कहने लगे-हे महाभाग ! पर्वतगज | इच्छा के अनुसार जितना चाहो उतना बदना । विध्याचल ने काध से उन्मत्त होकर सूर्य, चन्द्र और धर्मराज ! बि-याचल से यो प्रतिज्ञा कगकर महर्षि नक्षत्रों कीगति रोक ली है । हे द्विजश्रेष्ठ ! आपके अगस्त्य जी दक्षिण दिशा को चले गये पर वे अभी मियाय और कोई उसे इस अनर्थ मे रोक नहीं सकता, ' तक उधर से नहीं लौटे। इस कारण विन्ध्याचल इसलिए उमे गेकिए ॥१०॥ भी तब से अब तक फिर बढ़ नहीं सका। हे महाराज। देवताओं के ये वचन मुनकर अपनी बी को । जिम कारण अगस्त्य जी के प्रभाव से विन्ध्याचल माथ लिये अगम्य जी किल्यावर के पास गये । बद नहीं मका मी आपके प्रश्न के अनुपार मेने कह यहां जाकर उन्होंने विध्यानल मे पहा हे पर्वतगन' सुनाया। अब जिम तरह देवताओं ने महर्षि अगस्त्य में मिमी कार्य में दक्षिण दिशा का जाता हूँ। तुम से वरदान पाकर बालकेय दानों को माग था वह मृज जान की राह दी और जबतक में टकर न वृत्तान्त कहना हूँ, मुनो ॥११०१६।। आऊ नयनक तुम और मत बदी; मेरी माजा को महर्षि अगात्य जी ने देवताओं की स्तुति मुग- माना । जप में घर में रीट आऊँ तब तुम अपनी का पछा- आ7 लोग किमलिप गरे पास आयदे! - . --- -- अध्याय १०४] महा मारत १९५३ W८. - एवं त्वयेच्छाम. कृतं हि कार्य महार्णवं पीयमानं महात्मन् ततो वधिण्याम सहानुवन्धान्कालेयसंज्ञान्सुरविद्विपस्तान् ॥ १८॥ त्रिदशानां वचः श्रुत्वा तथेति मुनिरनवीत् करिष्ये भवतां कामं लोकानां च महत्सुखम् ॥ १९ ॥ एवमुक्त्वा ततोऽगच्छत्समुद्रं सरितां पतिम् । ऋषिभिश्च तपःसिद्धैः सार्थ देवश्च सुव्रत ॥ २० ॥ मनुप्योरगगन्धर्वयक्षकिंपुरुषास्तथा अनुजग्मुर्महात्मानं द्रष्टुकामास्तदभुतम् ॥ २१ ॥ ततोऽभ्यगच्छन्सहिताः समुद्रं भीमनिःस्वनम् । नृत्यन्तमिव चौसैभिवल्गन्तमिव वायुना ॥ २२ ॥ हसन्तमिव फेनौधैः स्खलन्तं कन्दरेपु च नानाग्राहसमाकीर्णं नानाद्विजगणान्वितम् ॥ २३ ॥ अगस्त्यसहिता देवाः सगन्धर्वमहोरगाः ऋपयश्च महाभागः समासेदुर्महोदधिम् ॥ २२ ॥ इनि श्रीमन्महाभारने आरण्यकपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि अगस्त्योपाख्याने चतुरधिकशततमोऽध्यायः ॥१०॥ और केमा वरदान मुझमे मांगते हैं ? महर्षि के पूछने महर्षि अगम्त्य देवताओं और तपस्या मे मिद्ध ऋषियों पर देवताओं ने कहा-हे महात्मा जी ! हम आपमे के साथ समुद्र की ओर चले । टम अमुन घटना यही प्रार्थना करते हैं कि आप समुद्र का सारा जल को देखने के लिए मनुष्य, नाग, यक्ष, गन्धर्व और पी लीजिए। तब हम देवशत्रु कालकेय नामक दानवों किन्नर महर्पि अगस्त्य के पीछे-पीछे चले । मच रोग को उनके मित्रों-पहित मारकर निश्चिन्त हो जायगे । समुद्र के किनारे पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि अनेक देवनाओं के वचन सुनकर, उनका मनोग्य सिद्ध प्रकार के जलजन्तुओं और पक्षियों में पूर्ण ममुद्र करने के लिए, मुनि ने उनकी बात म्बीमार कर वायु की थपेड़ों मे रहराना हुआ नान मा रहा है गे। मुनिवर ने देवनाओं से कहा-मैं आप लोगों फेनरागि देखने में वह हमना मा जान पड़ना का अत्यन्न अभीष्ट और मब लोगों के हित का यह ॥१७॥२४॥ काम अवश्य करुंगा हि धर्मराज ! इसके उपरान्त वनपर्व का एक मां चार अध्याय ममात हुआ ॥७॥ Nexu0.BNNIMN. - १ Rivierenler vererer १९५४ महाभारत [ पनी veeMANUAL - Bewa अथ पश्चाधिकशततमोऽध्याय ॥१५॥ रोमश उवाच-समुद्रं स समासाद्य वारुणिर्भगवानृषिः उवाच सहितान्देवानृपींश्चैव समागतान् अहं लोकहितार्थं वै पिचामि वरुणालयम् भवद्भिर्यदनुष्ठेयं तच्छीघ्रं संविधीयताम् एतावदुक्त्वा वचनं मैत्रावरुणिरच्युतः समुद्रमपिबत्नुन्द्रः सर्वलोकस्य पश्यतः पीयमानं समुद्रं तं दृष्ट्वा सेन्द्रास्तदाऽमराः विस्मयं परमं जग्मुः स्तुतिभिश्चाऽप्यपूजयन् ॥ ४ ॥ त्वं नस्त्राता विधाता च लोकानां लोकभावन । त्वत्प्रसादारसमुच्छेदं न गच्छेत्सामरं जगत् स पूज्यमानस्त्रिदशैर्महात्मा गन्धर्वतूर्येषु नदत्सु सर्वशः । दिव्यैश्च पुष्पैरवकीर्यमाणो महार्णव नि सलिलं चकार दृष्ट्वा कृतं निःसलिलं महार्णवं सुरा समस्ताः परमप्रहृष्टाः । प्रगृह्य दिव्यानि वरायुधानि तान्दानवाअनुरदीनसत्वाः ते वध्यमानास्त्रिदशर्महात्मभिमहावलैगिभिरुन्नदद्भिः न सेहिरे वेगवतां महात्मनां वेगं तदा धारयितुं दिवौकसाम् ॥ ८ ॥ ते वध्यमानास्त्रिदशैर्दानवा भीमनि स्वनाः एक सौ पाच अध्याय ॥ १०५॥ रोमश कहते हैं कि भगवान् गहर्षि अगम्त्य आप लोकरक्षक और हम रोगों के प्रतिपालक ने समुद्र के पास पहुँचकर आये हुए देवताओं और विधाता हो । आपकी ही कृपा से आज सब जगत् मापयों में कहा में समार के भले के लिए इस की रक्षा हुई । इस प्रकार देवताओं के स्तुति वाक्य समुद्र के जर को पिये रेना हूँ। आप रोगों को सुराने हुग. महर्षि ने समुद्र का सारा पानी पी रिया । जो पुरा करना है। सो तुरन्त करें। अब वे उम समय देयता म्वर्ग से उनके मानक पर पूरी रोगी के आगे समुद्र का जर पीने लगे। यह देग्य की वर्षा करने लगे। गन्धर्व मानने लगे । समुद्र कर इन्द्र आदि देवता बहुत ही नाराये और अनेक को सूम्बा हुआ देख कर देवता बहुत प्रसन्न हुए और प्रकार व तुनिचाश्याम महर्षि को प्रमन करते दिय अस्त्र शब रेकर दानवों को मारने लग गये। सुपरहन एगे ॥१॥ ६ भरतश्रेण । महायली देवताओं ने जम वेग से PurwAlALR00Amar सब MUNNY अध्याय १०५] म हा भारत १९५५ . MALAMNNN .. चक्रुः सुतुमुलं युद्धं मुहूर्तमिव भारत ते पूर्व तपसा दग्धा मुनिभिर्भावितात्मभिः । यतमानाः परं शक्त्या त्रिदशैर्विनिपूदिताः ॥ १० ॥ ते हेमनिष्काभरणाः कुण्डलाङ्गदधारिणः निहता बह्वशोभन्त पुष्पिता इव किंशुकाः हतशेषास्ततः केचित्कालेया मनुजोत्तम विदार्य वसुधां देवीं पातालतलमास्थिताः ॥ १२ ॥ निहतान्दानवान्दृष्ट्वा त्रिदशा मुनिपुङ्गवम् तुावुर्विविधैर्वाक्यैरिदं वचनमब्रुवन् त्वत्प्रसादान्महावाहो लोकेः प्राप्तं महत्सुखम् । त्वत्तेजसा च निहताः कालेयाः क्रूरविक्रमाः ॥ १४ ॥ पूरयस्व महावाहो समुद्रं लोकभावन यत्वया सलिलं पीतं तदस्मिन्पुनरुत्सृज ॥ १५ ॥ एवमुक्तः प्रत्युवाच भगवान्मुनिपुङ्गवः जीर्णं तद्धि मया तोयमुपायोऽन्यः प्रचिन्त्यताम् ॥ १६ ॥ पूरणार्थं समुद्रस्य भवद्भिर्यत्नमास्थितेः एतच्छ्रुत्वा तु वचनं महर्भावितात्मनः ॥ १७॥ आक्रमण किया तब दानव लोग उनको रोकने में ' खोदकर प.तान को भाग गये । दानवों को विनष्ट बिल्कुल असमर्थ हुए । किन्तु इस प्रकार मार जान देखकर मन देवता महर्षिश्रेष्ठ अगम्त्य जी कीम्तुनि पर भी कुछ देर तक भयकर याद करते हुए दानवों करने लगे-हे महाबाहो ! आपकी कृपा सेटी सय ने घोर युद्ध किया ॥५॥९॥ रोगों को परम शान्ति मिली है। दिनपी ! ये राक्षम पहले ही विशुद्ध मुनियों के नपाचन आपने जिम तरह मर जल पकिर ममुद्र को मुम्बा मे भम्म हो चुके थे । इस कारण इम ममय प्राण दिया है उसी तरह जल छोड़र ममद को हिर पण म यन करने पर भी ये अपने को बना नहीं भर दीजिए ॥२०॥१५॥ मके टनको देवताओं ने नष्ट कर दाना । मुवर्ष के देवताओं ने जब अगम्य जी में या प्रार्थना पहुन मे गहने पहनने वान ये दानव, मारे जापर, की तब उन्होंने कहा- देवताओ! मैंने ममुद्रा हरे हुप ढाक के वृक्ष के समान देव पड़ने थे। हे मर जर पापना गया। मपि अब तुम ममुद्र नम्श्रेष्ठ ! मृत्यु से बने हुए कोई-कोई दानव पृथ्वी को फिर भाने के लिए कोई दसरा उपाय मानी। - - - !
१९५६ म हा भारत [ वनपर्व ८.८८LALPUR VRAN । AAOORUR.- विस्मिताश्च विषण्णाश्च बभूवुः सहिताः सुराः । परस्परमनुज्ञाप्य प्रणम्य मुनिपुङ्गवम् ॥ १८ ॥ प्रजाः सर्वा महाराज विप्रजग्मुर्यथागतम् त्रिदशा विष्णुना सार्धमुपजग्मुः पितामहम् ॥ १९ ॥ पूरणार्थं समुद्रस्य मन्त्रयित्वा पुनः पुनः उचुः प्राञ्जलयः सर्वे सागरस्याऽभिपूरणम् ॥ २० ॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि अगस्त्योपाख्याने पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ॥१०५।। महर्षि अगस्त्य जी का यह उत्तर सुनकर सब देवता के सम्बन्ध में बार-बार सम्मति करके जब कुछ ठीक बहुत विस्मित और उदास हुए । फिर सब लोग मुनि नहीं कर सके तब विष्णु भगवान् को साथ लेकर को प्रणाम करके परम्पर विदा होकर अपने-अपने ब्रह्मा जी के पास गये । वहाँ जाकर हाथ जोड़कर म्यान को चले गये। देवता रोग समुद्र को पूर्ण करने उन्होंने सब वृत्तान्त कह सुनाया ॥१७॥२०॥ वनपर्य का एक सौ पांच अध्याय समाप्त हुआ ।। १५ ।। अथ पद्धिकशततमोऽध्याय ॥ १०६॥ रोमश उवाच-तानुवाच समेतांस्तु ब्रह्मा लोकपितामहः गच्छध्वं विबुधाः सर्वे यथाकामं यथेप्सितम् ॥ १ ॥ महता कालयोगेन प्रकृतिं यास्यतेऽर्णवः ज्ञातींश्च कारणं कृत्वा महाराज्ञो भगीरथात पितामहवचः श्रुत्वा सर्वे विवुधसनमाः कालयोगं प्रतीक्षन्तो जग्मुश्चापि यथागतम् युधिष्ठिर उवाच-कथं वै ज्ञातयो ब्रह्मन्कारणं चाऽत्र किं मुने । कथं समुद्रः पूर्णश्च भगीरथप्रतिश्रयात् एक मी. अध्याय ॥१६॥ मिश मुनि कहते हैं-हे धर्मराज ! रोक पितामह अपने-अपने लोक को चले गये और उस समय की बामा ने देवताओं से कहा कि देवनाओ इम ममय पाट जोहन लगे। राजा युधिष्ठिर ने कहा-हे ब्रह्मन् ! गुमरोग अपने अपने म्यान को जाओ। बहुन दिनों महाराज भारथ के पुरस्वा कौन थभगीरथ ने के बाद महाराज गीरथ अपन पुग्यों को तारने के किम तरह ममुद्र को फिर जल से भर दिया। इसका नि.माकानी पर रायगे । इममें समुद्र पूर्ण हो सारण क्या है? मब बातों को विस्तार के साथ जायजा । ममा जी ये वचन मुनर सय देवता मुनन की मुझं बड़ी इच्छा है । आप कृपा करके उन VALM Nare अध्याय १०६] महाभारत १९५७ curacie .. एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण तपोधन कथ्यमानं त्वया विप्र राज्ञां चरितमुत्तमम् ॥ ५ ॥ वैशम्पायन उवाच-एवमुक्तस्तु विप्रेन्द्रो धर्मराज्ञा महात्मना कथयामास माहात्म्यं सगरस्य महात्मनः लोमश उवाच - इक्ष्वाकूणां कुले जातः सगरो नाम पार्थिवः रूपसत्त्ववलोपेतः सचाऽपुत्रः प्रतापवान् ॥ ७ ॥ स हैहयान्समुत्साद्य तालजंघांश्च भारत वशे च कृत्वा राजन् यान्स्वराज्यमन्वशासत तस्य भार्ये त्वभवतां रुपयोवनदर्पिते वेदी भरतश्रेष्ट शेव्या च भरतर्षभ स पुत्रकामो नृपतिस्तप्यते स्म महत्तपः पत्नीभ्यां सह राजेन्द्र कैलासं गिरिमाश्रितः ॥ १० ॥ स तप्यमानः सुमहत्तपो योगसमन्वितः आससाद महात्मानं त्र्यक्षं त्रिपुरमर्दनम् ॥ ११ ॥ शङ्करं भवमीशानं पिनाकिं शूलपाणिनम् त्र्यम्बकं शिवमुग्रेशं बहुरूपमुमापतिम् ॥ १२ ॥ स तं दृष्ट्रव वरदं पत्नीभ्यां सहितो नृपः प्रणिपत्य महाबाहुः पुत्रार्थ समयाचत मय राजाओं के चरित्र का वर्णन कीजिए ॥१५॥ सुन्दरी रानियों थी । महागज मगर पुत्र की इच्छा वैशम्पायन जी कहत है-धर्मराज युधिष्ठिर ने जब मे दोनों वियों को माथ गियगय पर्वन के गियर , ग्रनपिं रोमग से यों पूछा तर वे टम प्रकार महात्मा पर गये और वहाँ घार तर ग्ने रगे ॥१०॥ महागज सगर का माहात्म्य वर्णन बग्ने गकि ना के प्रभाव में उन्हें त्रिपुगरि विरोचन इध्या के वंश में मगर नाम के एक अत्यन्न प्रतापी महादय के नगन हुए। दोनों गानों-मदित गना । गजा थे। उनके कोई पुत्र नहीं था । उन्होंने हैहय मगर ने वग्दानी साहको मते ही प्रगाम दिया और नालजय आदि शत्रुओं को जड़-मूल मे मिटाकर और पुत्र पाने के निप उनमे प्रार्थना की। गनी-मदिन 2 और अन्य गनाओं को अपने अधीन करके गाय राजा पर प्रपन होर दा ने कहा- राजन् : किया। वेदी और गन्या नाम की उनके दो परम तुमने म महुर्त में मुझमे यह दर मांगा है कि तुम्हार ANAMANASANNABANANAVRAN - १९५८ म हा भारत [ वनपर्व AL -- NRNALVAN3. SHNAsaanaaaaAAANNNNN - .. तं प्रीतिमान्हरः प्राह सभायें नृपसत्तमम् यस्मिन्वृतो मुहूर्तेऽहं त्वयेह नृपते वरम् पष्टिः पुत्रसहस्त्राणि शूराः परमदर्पिताः एकस्यां संभविष्यन्ति पत्न्यां नरवरोत्तम ते चैव सर्वे सहिताः क्षयं यास्यन्ति पार्थिव एको वंशधरः शूर एकस्यां संभविष्यति एवमुक्त्वा तु तं रुद्रस्तत्रैवाऽन्तरधीयत स चापि सगरो राजा जगाम स्वं निवेशनम् ॥ १७ ॥ पत्नीभ्यां सहितस्तत्र सोऽतिहृष्टमनास्तदा तस्य ते मनुजश्रेष्ठ भार्ये कमललोचने वैदर्भी चैव शैव्या च गर्भिण्यौ संबभूवतुः ततः कालेन वेदी गीलावू व्यजायत ॥ १९ ॥ शैव्या च सुपुवे पुत्रं कुमारं देवरूपिणम् तदाऽलावू समुत्स्रष्टुं मनश्चक्रे स पार्थिवः ॥ २० ॥ अथाऽन्तरिक्षाच्छुभाव वाचं गम्भीरनिःस्वनाम् । राजन् मा साहसं काीः पुत्रान्न त्यक्तुमर्हसि ॥ २१ ॥ अलावुमध्यान्निप्कृष्य वीजं यत्नेन गोप्यता सोपस्वेदेषु पात्रेषु घृतपूर्णपु भागशः ॥ २२ ॥ ततः पुत्रसहस्राणि पष्टिं प्राप्स्यसि भारत घड़े पराक्रमी साठ हजार पुत्र उत्पन्न होंगे, किन्तु और गन्या, दोनों रानियाँ, गर्भवती हुई । टी+ समय ये ममी एक साथ मर जायेंगे । और दुमरी स्त्री के पर बैदी के गर्भ से एक तूंची निकली और शैव्या एक, वश का चगने वारा, यड़ा शूरवीर पुत्र उत्पन्न के गर्भ से एक परम सु-दर पुत्र उत्पन्न हुआ। राजा देगा ॥११॥१६॥ ने जब इस चूची को फेंक देने का विचार किया तब इतना कहकर न्द्रदेव अन्तर्धान होगये तर राजा आकाग से देवाणी सुन पड़ी कि हे राजन् ! पुत्रों का मगर बहुन मन्तुष्ट होकर नानां मियों के साथ अपनी त्याग करना ठीक नहीं है । आप इस तृषी के मब नगरी को रोट गये । हे धर्मगज ! कुछ समय के चीज निकार लीजिए | साठ हजार हिस्स करके उन्हें दान कमर दर के ममान मुन्दर नत्रावानी यदी घी से भरे और पानी के भीतर रक्ये हुए, घड़ी में त अध्याय १०७ ] महाभारत १९५९ महादेवेन दिष्टं ते पुत्रजन्म नराधिप अनेन क्रमयोगेन मा ते वुद्धिरतोऽन्यथा ॥ २३॥ इतिश्रीमन्महाभारतेआरण्यकपर्वणितीर्थयात्रापर्वणिलोमशतीर्थयात्रायांसगरमंततिकथनेपधिकशततमोऽध्यायः । रख दीजिए । उनसे आपके साठ हज़ार पुत्र उत्पन्न हजार पुत्रों के होने का वर दिया है। इसलिए आप होंगे। हे राजन् ! शङ्कर ने इभी प्रकार से आपको साठ उलट-पलट न कीजिएगा ॥१७॥२३॥ वनपर्व का एक सौ छ: अध्याय समाप्त हुआ । १०६॥ । अथ ममधिकशततमोऽध्यायः॥ १०७ ।। लोमश उवाच-एतच्छ्रुत्वाऽन्तरिक्षाच्च स राजा राजसत्तमः यथोक्तं तच्चकाराऽथ श्रद्दधद्भरतर्षभ एकैकशस्ततः कृत्वा वीजं वीजं नराधिपः घृतपूर्णेपु कुम्भेयु तान्भागान्विदधे तनः धात्रीश्चैकैकशः प्रादारपुत्ररक्षणतत्परः ततः कालेन महता समुत्तस्थुमहावलाः पष्टिः पुत्रसहस्राणि तस्याऽप्रतिमतेजसः रुद्रप्रसादादाजः समजायन्त पार्थिव ते घोराः क्रूरकर्माण आकाशपरिसर्पिणः बहुत्वाच्चाऽवजानन्तः सर्वांल्लोकान्सहामरान् ॥ ५ ॥ त्रिदशांश्चाऽप्ययाधन्त तथा गन्धर्वराक्षसान् सर्वाणि चैव भूतानि शूराः समरशालिनः एक मीमात अध्याय ॥१७॥ लोमा ऋषि कहते है-हे नरश्रेष्ठ ! महाराज साठ हज़ार पुत्र उत्पन्न हुए । ये पुत्र डाके, फा मगर ने जब आसाम से यह देववाणी सुनी तय कर्म करनेवाले, आकाशमार्ग पर नर सनवाने उन्होंने श्रद्धापूर्वक उस ची के बीज निकाले । माट और मय मिलकर देव, गन्ध आदि सर के माध इनार हिम्मे करके टन सब को घी स भरे घड़ों में झगड़ा करनेवाले हुए ॥१३॥ रखवा दिया । हर एक घड़े की देखरेख के लिए तब मब रोग मगर के पुत्रों के उपद्रा को महने पक-एक धाय नियत कर दी । बहुत दिनों के बाद, में अममर्थ होकर देवताओं के माय माजी के पास महादेव के प्रसाद मे, उन पड़ों में बड़े पगकमी पहुंचे । पितामह ब्रह्मा जी ने देवनाओं में कहा- ANVIPMALAIMNCLICCenter - PARAN 20..
१९५८ महाभारत [ वनपर्व SHANA । AMALALI whata anainnt nasaannnnn तं प्रीतिमान्हरः प्राह सभार्य नृपसत्तमम् यस्मिन्वृतो मुहूर्तेऽहं त्वयेह नृपते वरम् ॥ ११ ॥ पष्टिः पुत्रसहस्त्राणि शूराः परमदर्पिताः एकस्यां संभविष्यन्ति पत्न्यां नरवरोत्तम ते चैव सर्वे सहिताः क्षयं यास्यन्ति पार्थिव । एको वंशधरः शूर एकस्यां संभविष्यति ॥ १६ ॥ एवमुक्त्वा तु तं रुद्रस्तत्रैवाऽन्तरधीयत स चापि सगरो राजा जगाम स्वं निवेशनम् ॥ १७ ॥ पत्नीभ्यां सहितस्तत्र सोऽतिहृष्टमनास्तदा तस्य ते मनुजश्रेष्ठ भार्ये कमललोचने ॥ १८ ॥ वैदर्भी चैव शैव्या च गर्भिण्यौ संबभूवतुः ततः कालेन वैदर्भी गर्भालायुं व्यजायत ॥ १९ ॥ शैव्या च सुपुवे पुत्रं कुमारं देवरूपिणम् तदाऽलावू समुत्स्रष्टुं मनश्चक्रे स पार्थिवः अथाऽन्तरिक्षाच्छुश्राव वाचं गम्भीरनिःस्वनाम् । राजन् मा साहस कार्षीः पुत्रान्न त्यक्तुमर्हसि ॥ २१ ॥ अलायुमध्यान्निष्कृष्य वीज यत्नेन गोप्यता सोपस्वेदेषु पात्रेषु वृतपूर्णपु भागशः ततः पुत्रसहस्राणि पष्टिं प्राप्स्यसि भारत बड़े पराक्रमी साठ हजार पुत्र उतान्न होंगे, किन्तु और शया, दोनों रानियाँ, गर्भवती हुई । ठी+ समय वे ममी एक माथ मर जायेंगे । और दृमी वा के पर वैदी के गर्भ से एक लॅबी निकरी और या क, वश का चगने गाग, बड़ा शूरवीर पुत्र उत्पन्न के गर्भ में एक परम सुन्दर पुन उत्सन्न हुआ। राजा होगा ॥११॥१६॥ मे जम उम तूंची को फेंक देने का विचार किया तब इतना कहकरदेव अन्त न होगये। तर राजा आकाग मे देवाणी सुन पड़ी कि हे राजन् ! पुत्रों का मगर यहुन मन्तुष्ट होरदोनों स्त्रियों के साथ अपनी त्याग करना ठीक नहीं है । आप इम तूची के सम नगरी को सेट गये । हे धर्मगन। कुछ समय के वीज निकाल लीजिए। साठ हजार हिस्स करके उन्हें पान कमन दल के ममान मुन्दर नाबार्ग बंदी घास भरे और पानी के भीतर रखमे हुए, घड़ी में ॥ २० ॥ ॥ २२ ॥ - . । ANNA: "ANNAR अध्याय १०७ म हा भारत १९५९ ८८८ महादेवेन दिष्ट ते पुत्रजन्म नराधिप अनेन क्रमयोगेन मा ते बुद्धिरतोऽन्यथा ॥ २३ ॥ इतिश्रीमन्महाभारतेआरण्यकपर्वणितीर्थयात्रापर्वणिलोमातीर्थयात्रायांसगरमंततिकवनेपधिकशततमोऽध्यायः रख दीजिए। उनसे आपके साठ हजार पुत्र उत्पन्न हजार पुत्रों के होने का वर दिया है। इसलिए आप होंगे। हे राजन् ! शङ्कर ने इभी प्रकार से आपको साठ उलट-पलट न कीजिएगा ॥१७॥२३॥ वनपर्व का एक मौ छ: अध्याय ममाप्त हुआ ।। १०६॥ - । अथ मनधिकगततमोऽध्यायः ॥ १७ ॥ लोमश उवाच-एतच्छ्त्वाऽन्तरिक्षाच्च स राजा राजसत्तमः यथोक्तं तचकाराऽथ श्रद्दधद्भरतर्षभ एकेकशस्ततः कृत्वा वीजं चीजं नराधिपः घृतपूर्णेषु कुम्भेषु तान्भागान्विदधे ततः धात्रीचकैकशः प्रादात्पुत्ररक्षणतत्परः तनः कालेन महता समुत्तस्थुमहावलाः पष्टिः पुत्रसहस्राणि नस्याऽप्रतिमतेजसः रुद्रप्रसादाद्राजः समजायन्त पार्थिव ते घोराः क्रूरकर्माण आकाशपरिसर्पिणः बहुत्वाचाऽवजानन्तः सर्वांल्लोकान्सहामरान् ॥ ५ ॥ त्रिदशांश्चाऽप्यवाधन्त तथा गन्धर्वराक्षसान् । सर्वाणि चैव भूतानि शूराः समरशालिनः एक मी मात अध्याय ॥१०॥ लोमग ऋपि कहते हैं-हे नरश्रेष्ठ ! महाराज माट हज़ार पुत्र उसन्न हुए । ये पुत्र रहाके, मूर मगर ने जब आरा से यह देववाणी सुनी तय कर्म करनेवाले, आकाशमार्ग पर नन सक्नेवाले उन्होंने श्रद्धापूर्वक उम तूंबी के बीज निकाले । माठ और मय मिलकर देव, गन्धर्व आदि सब के माथ हज़ार हिम्मे करके टन मब को घी से भर घड़ों में झगड़ा करनेवाले हुए ॥१॥५॥ रखवा दिया । हर एक घड़े की देखरेख के लिए तय मय गेग मगर के पुत्रों के उपद्रव का महने एक-एक धाय नियन कर दी। बहुत दिनों के चाट, में अमर्थ होकर देवताओं के माथ ब्राजी के पाम महादेव के प्रमाद से, उन पड़ों में बड़े पराक्रमी पहुंचे । पिनामह ब्रह्मा जी ने देवनाओं में कटा-दे ArrivinemwarALAIMirmire -- MAL" ND [वनपर्व म हा भारत -TARNad - । AUNAWABGURASANNAMANANNN तं प्रीतिमान्हरः प्राह सभार्य नृपसत्तमम् यस्मिन्वृतो मुहूर्तेऽहं त्वयेह नृपते वरम् पष्टिः पुत्रसहस्त्राणि शूराः परमदर्पिताः एकस्यां संभविष्यन्ति पल्यां नरखरोत्तम ते चैव सर्वे सहिताः क्षयं यास्यन्ति पार्थिव । एको वंशधरः शूर एकस्यां संभविष्यति एवमुक्त्वा तु तं रुद्रस्तत्रैवाऽन्तरधीयत स चापि सगरो राजा जगाम खं निवेशनम् ॥१७॥ पत्नीभ्यां सहितस्तत्र सोऽतिहृष्टमनास्तदा तस्य ते मनुजश्रेष्ठ भार्ये कमललोचने ॥ १८ ॥ चैदर्भी चैव शैव्या च गर्भिण्यौ संबभूवतुः ततः कालेन वेदर्भी गीलावू व्यजायत शैव्या च सुपुवे पुत्रं कुमारं देवरूपिणम् तदाऽलावू समुत्स्रष्टुं मनश्चक्रे स पार्थिवः ॥ २० ॥ अथाऽन्तरिक्षाच्छुश्राव वाचं गम्भीरनिःस्वनाम् । राजन् मा साहस कापीः पुत्रान्न त्यक्तुमर्हसि ॥ २१ ॥ अलावुमध्यान्निप्कृप्य वीजं यत्नेन गोप्यता सोपस्वेदेषु पात्रषु घृतपूर्णषु भागशः ॥ २२ ॥ नतः पुत्रसहस्राणि पष्टिं प्राप्स्यसि भारत चर पराक्रमी मार मार पुत्र इरान होग, किन्तु और शव्या, दोनों रानियां, गर्भवती हुई । टीक समय ये मभी एक साथ गर जायंगे । और दुमी वी के पर वैदर्गी के गर्भ से एक तूपी निकली और शेन्या , यश का नगर्नबाना, बड़ा गुरवीर पुत्र उत्पन्न क गर्ग मे एक परम सुन्दर पुत्र प्रसन्न हुआ। राजा दामा ॥११॥१६॥ में जब उस तूंची को फेक देने का विचार किया तब इतना कहादिदेव अन्नदान होगये। तब गजा आकाग दवाणी सुन पड़ी कि राजन् ! पुत्रों का मगर यदुन मन्तुष्ट दोनों पियों के साथ अपनी त्याग करना ठीक नहीं है । आप हम तूंची के मन गारी वा संघट गय । धर्मगज! छ समय के पीज निकाल लीजिए। साठ हजार हिम्से करके उन्हें साम्न पगादन व गमान गन्दा नागरिरभी घी मे भरे और पानी के भीतर योग एण, घड़ी में 1 - -१.१ अध्याय १०७] म हा मा र त १९५९ ८ महादेवेन दिष्ट ते पुत्रजन्म नराधिप अनेन क्रमयोगेन मा ते बुद्धिरतोऽन्यथा ॥ २३ ॥ इतिश्रीमन्महाभारतेआरण्यकपर्वणितीर्थयात्रापर्वणिलोमगतीर्थयात्रायांसगरमंततिकथनेपद्दधिकशततमोऽध्यायः रख दीजिए। उनसे आपके साठ हजार पुत्र उत्पन्न हजार पुत्रों के होने का वर दिया है। इसलिए आप होंगे। हे राजन्! शङ्कर ने इमी प्रकार से आपको साठ उलट-पलट न कीजिएगा ॥१७॥२३॥ वनपर्व का एक मो छः अध्याय ममाप्त हुआ ।। १०६॥ अथ मनधिकाततमोऽध्यायः ॥ १७ ॥ लोमश उवाच-एतच्छृत्वाऽन्तरिक्षाञ्च स राजा राजसत्तमः यथोक्तं तच्चकाराऽथ श्रद्दधद्भरतर्षभ एकैकशस्ततः कृत्वा वीजं बीजं नराधिपः घृतपूर्णेषु कुम्भेषु तान्भागान्विदधे ततः धात्रीश्चैकैकशः : प्रादारपुत्ररक्षणतत्परः तनः कालेन महता समुत्तस्थुमहावलाः पष्टिः पुत्रसहस्राणि तस्याऽप्रतिमतेजसः रुद्रप्रसादाद्राजर्षेः समजायन्त पार्थिव ते घोराः क्रूरकर्माण आकाशपरिसर्पिणः बहुत्वाच्चाऽवजानन्तः सर्वांल्लोकान्सहामरान् ॥ ५ ॥ त्रिदशांश्चाऽप्यवाधन्त तथा गन्धर्वराक्षसान् सर्वाणि चैव भूतानि शूगः समरशालिनः एक मामात अध्याय ॥ १८ ॥ लोमा ऋषि कहते हैं-हे नरश्रेष्ठ ! महाराज साठ हजार पुत्र उसन्न हुए । ये पुत्र लड़ाके, कर सगर ने जब आग से यह देववाणी मुनी तब कर्म करनवाले, आकाशमार्ग पर नन सक्नेवाले उन्होंने श्रद्धापूर्वक उम तूंबी के बीज निकाले । माट और मत्र मिलकर देव, गन्ध आदि सब के माथ हजार हिम्मे करके उन सब को घी मे भरे घड़ों में झगड़ा करनेवाले हुए ॥१॥५|| रखवा दिया 1 हर एक घड़े की देखरेख के लिए तव मय लोग मगर के पुत्रों के उपदव को महने एक-एक धाय नियन कर दी । बहुत दिनों के बाद, में असमर्थ होकर देवनाओं के माथ ब्रह्मा जी के पाम महादेव के प्रसाद मे, उन पड़ों में बड़े पगामी पहुंचे । पितामह ब्रह्मा जी ने देवताओं मे कहा- ANTENNNNNNNaravnNienn . 21. 10 १९६० म हा भारत .८R- । evneerimentarvArabenzas वध्यमानास्ततो लोकाः सागरैर्मन्दबुद्विभिः ब्रह्माणं शरणं जग्मुः सहिताः सर्वदेवतैः । तानुवाच महाभागः सर्वलोकपितामहः गच्छध्वं त्रिदशाः सर्वे लोकैः साधं यथागतम् ।। नातिदीघेण कालेन सागराणां क्षयो महान् भविष्यति महाघोरः स्वकृतैः कर्मभिः सुराः ॥ एवमुक्तास्तु ते देवा लोकाश्च मनुजेश्वर पितामहमनुज्ञाप्य विप्रजग्मुर्यथागतम् ततः काले बहुतिथे व्यतीते भरतर्षभ दीक्षितः सगरो राजा हयमेधेन वीर्यवान् तस्याऽश्वो व्यचरभूमि पुत्रैः स परिरक्षितः समुद्रं स समासाद्य निस्तोयं भीमदर्शनम् रक्ष्यमाणः प्रयत्नेन तत्रैवाऽन्तरधीयत ततस्ते सागरास्तात हृतं मत्वा हयोत्तमम् आगम्य पितुराचख्युरदृश्यं तुरङ्गं हृतम् तेनोक्ता दिक्षु सर्वासु सर्वे मार्गत वाजिनम् ॥१ ततस्ते पितुराज्ञाय दिक्षु सर्वासु तं हयम् अमान्त महाराज सर्वं च पृथिवीतलम् ॥ १ देवताओ। तुम इन रोगों के माथ अपने-अपन स्थान पृ.पीमण्डल पर विचरने लगे। वह को जाओ । सगर राजा के पुत्र अपने ही कमों के भीतर ज कर गायब हो गया । रे दाप से शीघ्र नष्ट हो जायेगे हे धर्मराज ! देवताओं कि घोड़े को कोई हर ले गया है में ब्रह्मा जी ने जब या कहा तय ये सब दृमरे लोक- के पास आकर उन्हें सब हार र निसासियों के माथ अपने-माने रोक को चले गये। ने सुनकर उनसे कहा-तुम रो ॥१०॥ । पता लगाभी। मगर के पुन पिता यहुन ममय बीतने पर तेजस्वी राजा सगर ने को खोजते हुए पृ.पी भर में घूम मधमेध यज की दीक्षा साउनके यज्ञ के घाड़े को घोडे का या घोडे कोरे जानवारे पर टमकी रक्षा करते हुए टन पुत्र इधर-उधर तब सय मिरर फिर पिता के पास 3.ADIVAS UN902L- अध्याय १०७] महा मात ८.८६८- । ततम्ने सागराः सर्व समुपेत्य परस्परम् नाऽभ्यगच्छन्त तुरंगमबाग्मव च आगम्य पिनरं चोचुस्ततः प्राञ्जलयोऽग्रतः ससमुद्रवनद्वीपा सनदीनदकन्दग सपर्वतवनाद्देशा निखिलेन मही नृप अन्माभिर्विचिना गजन् शासनात्तव पार्थिव न चाऽश्वमधिगच्छामो नाऽश्नहर्नान्मव च श्रुत्वा तु वचनं तेषां स राजा क्रोधमृळिनः ॥ १९ ॥ उवाच वचनं सर्वास्तदा देवत्रशान्नुप अनागमाय गच्छवं भूयो मार्गत वाजिनम् यज्ञियं ने विना ह्यनं नाऽऽगन्तव्यं हि पुत्रकाः । प्रनिगृह्य तु संदेवां पितुम्ने मगगरमजाः ।। २१ ।। भूय एव महीं कृत्वां वितुमुपचक्रमुः अथाऽपझ्यन्न ने बीगः पृथिवीमबदारिताम् ॥ २२ ॥ समासाद्य विलं नचाऽप्यम्वनन्मगगत्मजाः कुहालहपुकचव समुद्रं यत्नमास्थिताः स खन्यमानः सहितः मागवणालयः अगच्छत्पग्मामानि दीर्यमाणः समन्ततः ॥ २० ॥ - •m.x.huwalawwvirll.mr 298 SuN32U7313 १९६० महा भारत [उनपर GA८४८RM New czarnaxalanerne Crnunar । वध्यमानास्ततो लोकाः सागरैर्मन्दबुद्धिभिः ब्रह्माणं शरणं जग्मुः सहिताः सर्वदेवतैः तानुवाच महाभागः सर्वलोकपितामहः गच्छध्वं त्रिदशाः सर्वे लोकः सार्धं यथागतम् ॥ ८ ॥ नातिदीर्घण कालेन सागराणां क्षयो महान् भविष्यति महाघोरः स्वकृतैः कर्मभिः सुराः ॥ ९ ॥ एवमुक्तास्तु ते देवा लोकाश्च मनुजेश्वर । पितामहमनुज्ञाप्य विप्रजग्मुर्यथागतम् ।। १० ॥ ततः काले बहुतिथे व्यनीते भरतर्षभ दीक्षितः सगरो राजा हयमेधेन वीर्यवान् तस्याऽश्वो व्यचरभूमि पुत्रैः स परिरक्षितः । समुद्रं स समासाद्य निस्तोयं भीमदर्शनम् ॥ १२ ॥ रक्ष्यमाणः प्रयत्नेन तत्रैवाऽन्तरधीयत ततस्ते सागरास्तात हृतं मत्वा हयोत्तमम् ॥ १३ ॥ आगम्य पितुराचख्युरदृश्यं तुरङ्गं हृतम् तेनोक्ता दिक्षु सर्वासु सर्वे मार्गत वाजिनम् ॥ १४ ॥ ततस्ते पितुराज्ञाय दिक्षु सर्वासु तं हयम् अमान्त महाराज सर्वं च पृथिवीतलम् देवनाओ! तुम इन लोगों के माथ अपने-अपन स्थान पीमण्डल पर विचरने लगे। वह घोड़ा सूखे समुद्र के को जाओ । सगर राजा के पुत्र अपने ही कमों के भीतर जाकर गायब हो गया । रामकुमारों ने समझा दोप से शीघ्र नष्ट हो जायगे 'हे धर्मराज । देवताओं कि घोड़े को कोई हर ले गया है । तब उन्होंने पिता मे ब्रह्मा जी ने जब यो कहा तब ये सब दृमरे रोक- के पाम आकर उन्हें सब हाल कह सुनाया । राजा निवासियों के साथ अपने-अपने रोक को चले गये। ने सुनकर उनमे कहा-तुम लोग जार घोड़े का ॥६॥१०॥ । पता लगाओ। सगर के पुत्र पिता की आजा से घोड़े यहुन ममय बीनने पर तंजम्पी राजा मगर ने को खोजते हुए पृ.पी भर में घूम आय किन्तु कहीं अश्वमेध यज्ञ की दीक्षारी। उनके या वे घोड़े को घोडे का या घोडे को ले जानेवाले का, पता न लगा। लेकर टमकी रक्षा करते हुए उनके पुत्र इधर-उधर तब सब मिलकर फिर पिता के पास आये और हाथ PRAVACHARMA ANANDANA BUNU अध्याय १०७ ] म हा मारत १९६१ No - । MANAwaericnewneANANKAment । ततस्ते सागराः सर्वे समुपेत्य परस्परम् नाऽध्यगच्छन्त तुरगमश्वहर्तारमेव च आगम्य पितरं चोचुस्ततः प्राञ्जलयोऽग्रतः ससमुद्रवनद्वीपा सनदीनदकन्दरा ॥ १७॥ सपर्वतवनोद्देशा निखिलेन मही नृप अस्माभिर्विचिता राजन् शासनात्तव पार्थिव ॥ १८ ॥ न चाऽश्वमधिगच्छामो नाऽश्वहारमेव च श्रुत्वा तु वचनं तेषां स राजा क्रोधमूछितः ॥ १९ ।। उवाच वचनं सर्वांस्तदा दैववशान्नृप अनागमाय गच्छध्वं भूयो मार्गत वाजिनम् ॥ २० ॥ यज्ञियं तं विना ह्यश्वं नाऽऽगन्तव्यं हि पुत्रकाः । प्रतिगृह्य तु संदेशं पितुस्ते सगरात्मजाः ॥ २१ ।। भूय एव महीं कृत्स्ना विचेतुमुपचक्रमुः अथाऽपश्यन्त ते वीराः पृथिवीमवदारिताम् ॥ २२ ॥ समासाद्य विलं तच्चाऽप्यखनन्सगरात्मजाः कुद्दालैहपुकैश्चैव समुद्रं यत्नमास्थिताः स खन्यमानः सहितः सागरैर्वरुणालयः अगच्छत्परमामात दीर्यमाणः समन्ततः 11 २४ ॥ जोड़कर,सामने खड़े होकर, कहने लगे-हे महागज ! राजकुमार बार-बार पृथ्वीमण्डल पर घूमते हुए घोड़े हम आपकी आज्ञा से समुद्र, नद, नदी, द्वीप, पर्वत, का पता लगाने लगे । मूखे हुए समुद्र के भीतर वन, उपवन आदि-महित सारी पृथ्वी पर हँढ आये, घूमते-घूमते उन्हें एक गढ़ा देख पड़ा । कुदाल आदि किन्तु कहीं पता नहीं चल। । उनका उत्तर सुनकर से वे उमे ग्वादने लगे। उनके ग्वादने से महासमुद्र क्रोधान्ध और होनहार के वश होकर राना मगर बहुत ही पीड़िन हुआ । अमुर, राक्षम, नाग आदि ने कहा-पुत्रो ! तुम फिर जाकर घोड़े का पता लगाओ उसके नीचे रहनेवाले प्राणी सगर के पुत्रों के कुदाल ॥११॥२०॥ आदि शम लगने मे अत्यन्त दुखी होकर मरने लगे। बिना घाई का पता लगाये मेरे सामने मत अनेक प्रकार के प्राणियों के मानक कट गये, प्राण आना। अपने पिता की यह आना पाकर साट हजार निकल गये, और हड्डियां चूर-चूर हो गई। इस प्रकार heroenouTEAUTKALAMAUAL - १९६२ म हा भारत [सनपर्व - - NAVALABUA असुरोरगरक्षांसि सत्वानि विविधानि च आर्तनादमकुर्वन्त वध्यमानानि सागरेः छिन्नशी विदेहाश्च भिन्नत्वगस्थिसंधयः प्राणिनः समदृश्यन्त शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २६॥ एवं हि खनतां तेषां समुद्रं वरुणालयम् व्यतीतः सुमहान्कालोन चाऽश्वः समदृश्यत ॥ २७ ॥ ततः पूर्वोत्तरे देशे समुद्रस्य महीपते विदार्य पातालमथ संक्रुन्द्राः सगरात्मजाः ॥ २८॥ अपश्यन्त हयं तत्र विचरन्तं महीतले कपिलं च महात्मानं तेजोराशिमनुत्तमम् तेजसा दीप्यमानं तु ज्वालाभिरिव पावकम् ॥ २९ ॥ रोमश उवाच--ते तं दृष्ट्वा हयं राजन् संप्रहृष्टतनूरुहाः अनादृत्य महात्मान कपिलं कालचोदिताः ॥ ३० ॥ संक्रुद्धाः संप्रधावन्त अश्वग्रहणकांक्षिणः ततः क्रुद्धो महाराज कपिलो मुनिसत्तमः वासुदेवेति यं प्राहु. कपिलं मुनिपुङ्गवम् स चक्षुर्विकृतं कृत्वा तेजस्तेपु समुत्सृजन् ददाह सुमहातेजा मन्दबुद्धीन्स सागरान् बहुत समय तक सगर के पुत्र सागर के भीतर सोदते तर काल की प्रेरणा से वे सगर के पुत्र कुपित रहे, परन्तु घोड़े का पता न चरा । तब वे राजकुमार होकर महात्मा कपिल को गालियाँ देने हुए घोड़े को अत्यन्त प्रोधित होकर सागर के पूर्व-उत्तर कोने को लेने के लिए दौड़े । हे महाराज । मुनिश्रेष्ठ जिन्हें खादन रगे। यहाँ सोदने पर उन्हें देख पड़ा कि उसी वासुदेव विष्णु का अश कहते है उन मुनिवर महा स्थान पर घोड़ा विचर रहा है और पास ही प्रचलित तेजम्बी कपिल ने आँखे खोरका सगर के पुत्रों की अपि के समान अमाधारण तेजाजी मह पि कपिर बैठे ओर देखा। उनके मोधागि से वे दुर्बुद्धि राजकुमार हे महारान वे राजकुमार उस घोड़े को दम भर में भस्म होकर राख का ढेर हो गये । महा देवार बहुत ही आनन्दित हुए । उनके शरीर में । तपन्या मह पि नारद ने उन्हें भस्म होते देखकर महा गेमाच हो आया ॥२१॥३०॥ राज सगर के पाम जाकर सत्र वृतान्त कह सुनाया। viewroacherNASAs - .. ...AOG । NAINANGLANGALAM अध्याय १०७] महाभारत १९६३ VAN - - तान्दृष्ट्वा भस्मसादभूतान्नारदः सुमहातपाः ॥ ३३ ॥ सगरान्तिकमागच्छत्तञ्च तस्मै न्यवेदयत् स तच्छ्रुत्वा वचो घोरं राजा मुनिमुखोद्गतम् ॥ ३४ ॥ मुहर्त्त विमना भूत्वा स्थाणोर्वाक्यमचिन्तयत् । अंशुमन्तं समाहृय असमञ्जसुतं तदा ॥ ३५॥ पोत्रं भरतशार्दूल इदं वचनमब्रवीत पष्टिस्तानि सहस्राणि पुत्राणाममितौजसाम् ॥ ३६ ॥ कापिलं तेज आसाद्य मत्कृते निधनं गताः तव चापि पिता तात परित्यक्तो मयाऽनघ धर्म संरक्षमाणन पौराणां हितमिच्छता युधिष्ठिर उवाच-किमर्थं राजशार्दूलः सगरः पुत्रमात्मजम् त्यक्तवान्दुस्त्यजं वीरं तन्मे बेहि तपोधन ॥ ३८ ॥ गेमा टवाच-असमजा इति ख्यातः सगरस्य सुनो ह्यभूत् । यं शेव्या जनयामास पोराणां स हि दारकान् ॥ ३९ ॥ गलेषु क्रोशनो गृय नयां चिक्षेप दुर्बलान् तनः पोराः समाजग्मुर्भयशोकपरिप्लुताः ॥ १० ॥ सगरं चाऽभ्यभापन्त सर्व प्राञ्जलयः स्थिताः । त्वं नम्ब्राना महाराज परचक्रादिभिर्भयात् ॥ ११ ॥ महर्षि नारद के मुंह मे यह दारुण ममाचार सुनकर गजा युधिष्ठिर ने कहा-ई भगवन् महाराज पल भर तक महागज मगर दुःमित रहे और महादेव सगर ने किम कारण अपने वीर पुत्र को त्याग दिया के चास्य कोनरण करन रगे। फिर अममन्नम के था। पुत्र को तो कोई नहीं त्यागनाः शिर उन्होंने ' पुत्र और अपने पोते अंशुमान् को बुगकर उन्होंने । क्यों मा किया । यद सब विम्नार के माय आप कहा- निप्पार ! वे बड़े पगामी साठ हजार सहिए। गमग जी करने है-गनी गन्याक गर्भ गजकुमार मेरे ही कारण कपिल ऋषिके तेज मे मम्म मेगन मगर के अम्माम नाम का एक पुत्र होगामने नगग्वामियों के दिन के लिए और हुआ था। वट नगरवामियों के दरबारकों को , माने धर्म सीमा के लिए तुम्हारिना (अमनम) ५. गनदया, नदी में टुसा देना और दर को त्याग दिया है॥३१॥२७॥ बहादेना था। टम कारण हा और मोर में दिन MIRMANNovesveerwww - ।
म हा भारत [ वनपर्व 32GBA0202 ICALAM । असमञ्जोभयादोरात्ततो नस्त्रातुमर्हसि पौराणां वचनं श्रुत्वा घोरं नृपतिसत्तमः ॥ ४२ ॥ मुहूर्त विमना भूत्वा सचिवानिदमब्रवीत् असमजाः पुरादद्य सुतो मे विश्वास्यताम् । यदि वो मत्प्रियं कार्यमेतच्छीघ्र विधीयताम् ॥ ४३ ॥ एवमुक्ता नरेन्द्रेण सचिवास्ते नराधिप यथोक्तं त्वरिताश्चकुर्यथाऽऽज्ञापितवान्नृपः एतत्ते सर्वमाख्यातं यथा पुत्रो महात्मना पौत्राणां हितकामेन सगरण विवासितः ॥४५॥ अंशुमांस्तु महेवासो यदुक्तः सगरेण हि तत्ते सर्व प्रवक्ष्यामि कीर्त्यमानं निबोध मे ॥ ४६॥ सगर उवाच-पितुश्च तेऽहं त्यागेन पुत्राणां निधनेन च अलाभेन तथाऽश्वस्य परितक्ष्यामि पुत्रक तस्माद्दुःखाभिसंतप्तं यज्ञविताच मोहितम् । हयस्याऽऽनयनात्पौत्र नरकान्मां समुद्धर अंशुमानेवमुक्तस्तु सगरेण महात्मना जगाम दुःखात्तं देशं यत्र वै दारिता मही ॥ ४९ ॥ सब नगरवासी महाराज सगर के पास गये और हाथ के लिए महात्मा सगर ने अपने पुत्र को निकाल दिया जोड़कर कहने लगे-हे महाराज ! आप दूसरे राजाओं सो मैंने तुमसे कह दिया है । अब मै वह कहता के आक्रमण से और अन्य प्रकार की आपत्तियों से हूँ, जो उन्होंने अपने पोते अंशुमान् से कहा था। हमारी रक्षा करत आ रहे है। इस समय राज कुमार तुम मन लगाकर सुनो ॥३८॥४६॥ अममम से हमें जो संग मिल रहा है उसे दूर सगर ने कहा- हे वत्स ! तुम्हारे पिता को त्यागने करके हमारी रक्षा कीजिए । नगरवामियों के एमे से, साठ हजार पुत्रों के अचानक मर जाने से और कानर वचन मुनार राजा सगर घड़ी भर उदास यज का घोड़ा न मिलने से मैं बहुत ही दुखी तथा रहे । फिर उन्होंने मन्त्रियों से कहा-हे मन्त्रियो ! यज में वितहाने से माहित सा हो रहा है। अतएय यदि तुग रोग मेगाप्रिय करना चाहते हो तो राज अब तुम जार घोड़े को राओ और इस प्रकार से सुमार श्रममनमको अभी गरे राज्य में निकाल दो। । नरक में जान से मुझको बनाओ। महात्मा सगर के धर्मगन ! जिस तरह और जिम कारण प्रजा के हित ये बचन सुनकर अंशुमान् को बड़ा दु ग्ब हुआ । था, । XN अध्याय १०७] महा भारत १९६५ ८ -- ALANA Daya - स तु तेनैव मार्गेण समुद्रं प्रविवेश ह अपश्यञ्च महात्मानं कपिलं तुरगं च तम् ॥ ५० ॥ स दृष्ट्वा तेजसो राशिं पुराणमृपिसत्तमम् प्रणम्य शिरसा भूमौ कार्यमस्मै न्यवेदयत् ततः प्रीतो महाराज कपिलोंऽशुमतोऽभवत् । उवाच चैनं धर्मात्मा वरदोऽस्मीति भारत स वने तुरगं तत्र प्रथमं यज्ञकारणात् द्वितीयं वरकं बने पितृणां पावनेच्छया ॥ ५३॥ तमुवाच महातेजाः कपिलो मुनिपुङ्गवः ददानि तव भद्रं ते यद्यत्प्रार्थयसेऽनघ ॥ ५४ ॥ त्वयि क्षमा च धर्मश्च सत्यं चापि प्रतिष्टितम् । त्वया कृतार्थः सगरः पुत्रवांश्च त्वया पिता ॥ ५५ ॥ तब चैव प्रभावेन स्वर्ग यास्यन्ति सागराः पौत्रश्च ते त्रिपथगां त्रिदिवादानयिष्यति पावनार्थं सागराणां तोषयित्वा महेश्वरम् हयं नयस्व भद्रं ते यज्ञियं नरपुङ्गव यज्ञः समाप्यतां तात सगरस्य महात्मनः व यहा से उसी स्थान को गये जिसे साठ हजार पितरों के उद्धार की प्रार्थना की। महानेजम्बी कपिल- राजकुमारों ने खोदा था । उसी मार्ग से वे सागर । देव ने उनमे कहा-हे पुण्यात्मन् ! तुमने मुझमे के तले जा पहुँने । वहां जाकर अंशुमान् ने उम जो दो वरदान मागे हैं वे मैं तुमको देता है तुम । घोड़े को और वहीं पर महात्मा कपिल को देग्या । में क्षमा, धर्म और मत्य स्थिर है। महाराज सगर ॥४७॥५०॥ तुममे कृतार्थ होंगे। तुम्हारे पिना का पिता होना तेजोराशि महर्षि कपिल को देखकर राजकुमार तुम्ही से मफल हुआ । मगर के यह साट हजार ने साप्टान प्रणाम किया और चपन आने का तात्पर्य पुत्र तुम्हारे ही प्रभाव से वर्ग की गनि पाचंगे। । कहााहे महागज! महानुभाव धर्मात्मा कपिलदेव ने तुम्हार पात्र भगीरथ इन अपने पुरमों को तारने के अंशुमान् के जार मत होकर कहा-म तुमको वर रिप महेश्वर को मन्तुष्ट करके आभाग से पृथ्वी देने के लिए तैयार है। अंशुमान ने पहले या पा गहा जी कीरावगे नयेष्ठ ! तुम्हाग करूयाण के लिए घोड़ा मांगा और फिर अपने माट हजार हो ! तुम इस यज पाई को कर गना मगर म हा मारत [ पनप MALAN८. । SAGARMARRHenर अंशुमानवमुक्तस्तु कपिलेन महात्मना आजगाम हयं गृह्य यज्ञबाट महात्मनः सोऽभिवाद्य ततः पादौ सगरस्य महात्मनः मूर्ध्नि तेनाऽप्युपाघातस्तस्मै सर्वं न्यवेदयत् यथादृष्टं श्रुतं चापि सागराणां क्षयं तथा ते चास्मै हयमाचष्ट यज्ञवाटमुपागतम् तच्छ्रुत्वा सगरो राजा पुत्रजं दुःखमत्यजत् ॥ ६१ ॥ अंशुमन्तं च सम्पूज्य समापयत तं क्रतुम् समाप्तयज्ञः सगरो देवैः सर्वेः सभाजितः ॥६२ ॥ पुत्रत्वे कल्पयामास समुद्रं वरुणालयम् प्रशास्य सुचिरं कालं राज्यं राजीवलोचनः ॥ ६३ ॥ पौत्रे भारं समावेश्य जगाम त्रिदिवं तदा अंशुमानपि धर्मात्मा महीं सागरमेखलाम् ॥ ६४ ॥ प्रशशास महाराज यथैवाऽस्य पितामहः तस्य पुत्रः समभवहिलीपो नाम धर्मवित् तस्मै राज्यं समाधाय अशुमानपि संस्थितः । दिलीपस्तु ततः श्रुत्वा पितॄणां निधनं महत् ॥ ६६ ॥ के पास जाओ और उनके यज्ञ को समाप्त करो। देवताओं से आदर पाकर राजा मगर ने समुद्र को महर्पि कपिल ने अशुमान् से जब यों कहा तब ये अपना पुत्र माना | कमलनयन राजा सगर ने बहुत उस घोड़े कोरेकर राजा सगर के यज्ञमण्डप में गये । ममय तक राज्य किया। अन्त को अपने पाते अशु उन्होंने राजा के चरणों में प्रणाम क्यिा । महात्मा मान् को राजगद्दी देकर वे स्वर्गवासी हुए । धर्मात्मा मगर ने प्यार मे उनका माथा सूंघा । अशुमान् ने अशुमान् भी अपने पितामह सगर की तरह राज्य कपिर जा से जिस तरह मुना था उसी तरह राज करने लगे । फिर कुछ दिन बीतने पर उनके दिलीप वृमारी के नाम का वृत्तान्त मगर को कह सुनाया। नाम के धर्मात्मा तेजम्वी कुमार उत्पन्न हुए । दिलीप यह भी कहा कि यत के घोड़े को मेरे आया को राज्य देकर अशुमान् परलोकगामी हुए।।६१६६५।। हैं ॥१६॥ अपने पुरखों के नाश की दारुण क्या सुनकर महागज मगर ने सब मुनकर, गोक त्यागका, महाराज दिलीप अत्यन्त दुसित हुए । वे अपने अनुमान की महायता से यज मम किया । सब पुस्यों के द्वार का उपाय सोचने लगे। अत को LNAGAndBALAGArse NAMAN ।
अध्याय १०८] महा भा र त १९६७ ८८८ -- पर्यतप्यत दुःखेन तेषां गतिमचिन्तयत् गगावतरणे यत्नं सुमहच्चाऽकरोन्नृपः ।। ६७॥ न चाऽवतारयामास चेष्टमानो यथावलम् तस्य पुत्रः समभवच्छ्रीमान्धर्मपरायणः भगीरथ इति ख्यातः सत्यवागनसूयकः अभिपिच्य तु तं राज्ये दिलीपो बनमाश्रितः ॥ ६९ ॥ तपःसिद्धिसमायोगात्स राजा भरतर्षभ वनाजगाम त्रिदिवं कालयोगेन भारत ॥ ७० ॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि अगस्त्यमाहात्म्यकथने मताधिकशततमोऽध्यायः।।१७।। म्वर्ग से पृथ्वी पर गहा के लाने के बारे में उन्होंने सत्यवादी, द्वेपहीन एक कुमार उत्पन्न हुए। गजा मावधानी से अनेक उपाय किये । बहुत उपाय करके दिलीप भी भगीरथ को राज्य देकर आप जल को भी वे अपने उद्योग में सफल नहीं हुए। हे भरतश्रेष्ठ ! रवाना हुए। निश्चित समय पर वहाँ तपम्या से मिद्धि कुछ ममय में उनके भगीरथ नाम के धर्मात्मा, श्रीमान् , प्राप्त करके आप बर्गलोक को मिधार ॥६६७०॥ वनपर्व का एक मा मात अध्याय ममान हुआ ।। १०७ ॥ अथ अष्टाधिकशतनमोऽध्यायः ॥१८॥ लोमन उवाच-स तु राजा महेष्वासश्चक्रवर्ती महारथः वभूव सर्वलोकस्य मनोनयननन्दनः स शुश्राव महाबाहुः कपिलेन महात्मना पितृणां निधनं घोरमप्राति त्रिदिवस्य च स राज्यं सचिव न्यस्य हृदयेन वियना जगाम हिमवत्पाचं तपस्तप्तुं नरेश्वर आरिराधयिपुगङ्गां तपसा दग्धकिल्विपः एक मी आठ अध्याय ॥२८॥ सोमा ऋपि जी हन ई-हे नगेन्द्र ! गजा म्पर्ग को नदी वा मके। हे नगेन्द्र ! नय व्यथिन चक्रवनी महारथी भगीरथ मर गंगों के मन और नत्रों होकर उन्होंने मांग राज्य का भार मन्त्री को मार के आनन्द को बढ़ानेवाले हुए। महाबाहु भगीरथ ने दिया वि तप के दाग पारनाग और गहा की आगधना । भी मुना कि उनके पुरमे कपिल के कोप की आग कान पिहिमाग्य पर्वत पर गय । वहाँ जाकर में भम्म हो गये हैं और हम अपमृत्यु के कारण व उन्होंने देखा कि शिक्षी धतुओं में न २ ॥ - - मदा मा र त [ बनपर navadilanDannentrica SAURAHAMAL. - अंशुमानेवमुक्तस्तु कपिलेन महात्मना आजगाम हयं गृह्य यज्ञवाटं महात्मनः सोऽभिवाद्य ततः पादौ सगरस्य महात्मनः मूर्ध्नि तेनाऽप्युपाघ्रातस्तस्मै सर्वं न्यवेदयत् यथादृष्टं श्रुतं चापि सागराणां क्षयं तथा ॥ ६० ॥ तं चास्मै हयमाचष्ट यज्ञवाटमुपागतम् तच्छ्रुत्वा सगरो राजा पुत्रजं दुःखमत्यजत् ॥ ६१ ॥ अंशुमन्तं च सम्पूज्य समापयत तं तुम् समाप्तयज्ञः सगरो देवैः सर्वेः सभाजितः ।। ६२ ॥ पुत्रत्वे कल्पयामास समुद्रं वरुणालयम् प्रशास्य सुचिरं कालं राज्यं राजीवलोचनः ।। ६३ ।। पौत्रे भारं समावेश्य जगाम त्रिदिवं तदा अंशुमानपि धर्मात्मा महीं सागरमेखलाम् प्रशशास महाराज यथैवाऽस्य पितामहः तस्य पुत्रः समभवदिलीपो नाम धर्मवित् तस्मै राज्यं समाधाय अंशुमानपि संस्थितः । दिलीपस्तु ततः श्रुत्वा पितॄणां निधनं महत् ॥ ६६ ॥ के पास जाओ और उनके यज्ञ को समाप्त करो। देवताओं से आदर पाकर राजा सगर ने समुद्र को महर्षि कपिल ने अशुमान् से जब यों कहा तब ये अपना पुत्र माना । कमलनयन राजा सगर ने बहुत उम घोड़े कोरेकर राजा सगर के यजमण्डप में गये। समय तक राज्य किया। अन्त को अपने पाते अशु- उन्होंने राजा के चरणों में प्रणाम किया। महात्मा मान् कोगजगद्दी ढकर वे स्वर्गवासी हुए । धर्मात्मा मगर ने प्यार मे उनका माथा सूंघा । अशुमान् ने अशुमान् भी अपने पितामह सगर की तरह गज्य कपिल जी से जिस तरह सुना या उसी तरह राज करने लगे । फिर कुछ दिन बीतने पर उनके दिलीप कृमागें के नाम का वृत्तान्त सगर को कह सुनाया। नाम के धर्मात्मा तेजस्वी कुमार उत्पन्न हुए । दिलीप यह भी कहा कि यन के घोड़े को मै ले आया को राज्य देकर अशुमान् परलोकवामी हुए।।६११६५।। हैं ॥५१॥६॥ अपने पुरखों के नाश की दारुण क्या सुनकर महागज मगर ने सब मुनकर, गहाराज दिरीप अत्यन्त दुखित हुए । वे अपने अगमान् की महायता से यन ममम दिया। मय पुग्नों के उद्धार का उपाय सोचने लगे । अन्त को । गोक त्याग, N7N ८८८४ - - ममग्न हो गये हैं और हम अप के कारण अध्याय १०८] म हा मा र त १९६७ पर्यतप्यत दुःखेन तेषां गतिमचिन्तयत् गङ्गावतरणे यत्नं सुमहचाऽकरोन्नृपः ॥ ६७॥ न चाऽवतारयामास चेष्टमानो यथावलम् तस्य पुत्रः समभवच्छ्रीमान्धर्मपरायणः ।।६८ ॥ भगीरथ इति ख्यातः सत्यवागनसूयकः अभिपिच्य तु तं राज्ये दिलीपो वनमाश्रितः ॥ ६९ ॥ तपःसिद्धिसमायोगात्स गजा भरतर्षभ वनाजगाम त्रिदिवं कालयोगेन भारत ॥ ७० ॥ इति श्रीमन्महाभारने आरण्यकपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि अगन्यमाहात्म्यस्यने मताधिस्ततमोऽध्याय: । म्वर्ग में पृथ्वी पर गया के लाने के बारे में उन्होंने मन्यवादी, द्वेपटीन एक कुमार उत्पन हुए। मजा मावधानी में अनेक उपाय किय । बहुत उपाय करके दिलीप भी भगीरथ को राज्य देकर आप जल को भी वे अपने उद्योग में सफल नहीं हुए । हे भग्नश्रेष्ठ ! ग्वाना हुए। निश्चित समय पर वहाँ ताम्या मे मिद्धि कुछ ममय में उनके भगीरथ नाम के घर्मात्मा, श्रीमान, प्राप्त करके आप वर्गगेको मियां ॥३६७०|| वनपर्व का एक मा मान अध्याय ममान हुआ ॥ १०॥ अथ अष्टाधिकाननमोऽध्याय 1200 गेमा उवाच-स तु राजा महेष्वासश्चक्रवर्ती महारथः बभूव सर्वलोकस्य मनोनयननन्दनः स शुश्राव महाबाहुः कपिलेन महात्मना पितॄणां निधनं घोरमप्राप्तिं त्रिदिवस्य च स राज्यं सचिव न्यस्य हृदयेन वियना जगाम हिमवत्पार्श्व तपस्तप्तुं नरेश्वर आरिराधयिपुगतां तपसा दग्धकिल्बिपः कमी आठ अध्याय॥८॥ रोमम ऋषि जी कहने ई-हे नगेन्द्र ! राजा म्वर्ग कानटी जा मझे। नंगेन्द्रनब ग्यान चव महारथी भगीरथ मनमोहन मारे गाय का मा मन्त्री की में अनन्द को बढ़ानेवाले हुए। महाबाहु भगीरथ ने दिया विना के द्वारा पानगा और हाकी अ गधनग भी सुना कि उनके पुग्ने कपिल के कोप की आग कान के निपनिारय पर्वत पर गये। मांगा उन्होंने देखा कि पि धनुभा में न ॥ - -- १९६८ [वनपर्व म हा भारत । retreeNavarane. LALPG । - सोऽपश्यत नरश्रेष्ठ हिमवन्तं नगोत्तमम् शृङ्गेवहुविधाकारैर्धातुमद्भिरलंकृतम् पवनालम्बिभिर्मेधैः परिपक्तं समन्ततः नदीकुञ्जनितम्बेश्च प्रासादरुपशोभितम् गुहाकन्दरसलीनसिंहव्याघ्रनिषेवितम् शकुनैश्च विचित्राङ्गैः कूजद्भिर्विविधा गिरः । भृङ्गगजैस्तथा हंसत्यूहैर्जलकुक्कुटैः मयूरैः शतपत्रेश्च जीवजीवककोकिले चकोरैरसितापाहैस्तथा पुत्रप्रियैरपि जलस्थानेषु रम्येषु पद्मिनीभिश्च संकुलम् सारसानां च मधुरैाहृतैः समलंकृतम् किन्नरैरप्सरोभिश्च निपवितशिलातलम् दिग्वारणविषाणाप्रै समन्ताद् घृष्टपादपम् विद्याधरानुचरितं नानारत्नसमाकुलम् विषोल्वणभुजङ्गैश्च दीप्तजिह्वनिषेवितम् कचित्काननसंकाशं क्वचिद्रजतसनिभम् क्वचिदञ्जनपुजाभं हिमवन्तमुपागमत् ॥ १२ ॥ अनेक आकार के शिखरों से पर्वतराज की अपूर्व है । शिलाओं के ऊपर किन्नर और अप्सराएँ टहला गोमा हो रही है । वायुवेग से इधर-उधर उड़ते हुए करती है । किसी और भयानक शरीरवाले गजराज मेघ उस पर चारों और पानी का छिड़काव कर रहे अपने दाँतों को वृक्षों पर घिस रहे हैं ॥१.१०॥ है। इसके उपर की नदी, कुञ्ज और कन्दराएं बड़ी विद्याधर चारों ओर विचर रहे है । कहीं पर दी मुहावनी हैं। उन कन्दगओं के भीतर सिंह, वाघ बहुत સે रत्न अपनी प्रभा फैला रहे हैं। किसी जगह चीने आदि पड़े हुए हैं । हम, पपीहा, जर कुक्कुट, पर लपलपाती हुई जीभवाले विषले साप पड़े हुए मार, शतपत्र, जीवजीवक, कोक्लि, नकोर, खञ्जन दें। किसी म्धान पर सोने का सा रङ्ग, विविध विचित्र मायाले, पक्षी चारों ओर मधुर म्बर पर चाँदीका सारा और कहीं पर अञ्जन का सा मे बाल रहे है । मारे गुन-गुन कान हुए. इधर-उधर रा है। महाराज भगीरथ उम पर्वतगज पर रहकर किर रहे हैं। कमलिनीमण्डित परम रमणीय जराशयों कन्द मूर-फल खाकर और जल पीरदिन्य हजार ये पिनारे सारमा के गुण्ड मधुर वाणी में बोल रहे वर्ष तक कठोर तप करते रहे । तय महानदी गहा - - - किसी जगह । ALON अध्याय १०८ ) महा भारत CURN । स तु तत्र नरश्रेष्ठस्तपो घोरं समाश्रितः फलमूलाम्बुसंभक्षः सहस्रपरिवत्सरान् ॥ १३ ॥ संवत्सरसहस्त्रे तु गते दिव्ये महानदी दर्शयामास तं गङ्गा तदा मूर्तिमती स्वयम् ॥ १४ ॥ गहोवाच-किमिच्छसि महाराज मत्तः किं च ददानि ते । तद्ब्रवीहि नरश्रेष्ठ करिष्यामि वचस्तव ॥ १५ ॥ एवमुक्तः प्रत्युवाच राजा हेमवतीं तदा पितामहा मे वरदे कपिलेन महानदि अन्वेपमाणास्तुरगं नीता ववस्वतैक्षयम् पष्टिस्तानि सहस्राणि सागराणां महात्मनाम् ॥ १७ ॥ कपिलं देवमासाद्य क्षणेन निधनं गताः तेषामेवं विनष्टानां स्वर्ग वासो न विद्यते ॥ १८॥ यावत्तानि शरीराणि त्वं जलेर्नाऽभिषिञ्चसि । तावत्तेपां गतिर्नास्ति सागराणां महानदि ॥ १९ ॥ स्वर्ग नय महाभागे मत्पितॄन्सगरात्मजान् तेषामर्थन याचामि त्वामहं वे महानदि ॥ २० ॥ रोमश वाच-एतच्छुत्वा वचो राज्ञो गङ्गा लोकनमस्कृता । भगीरथमिदं वाक्यं सुप्रीता समभापत ॥ २१ ॥ करिप्यामि महाराज वचस्ते नात्र संशयः जी गरीर धारण कर उनके आगे प्रकट हुई और पूर्वनों के निगा यही प्रार्थना करता हूँ कि आप मेरे कहने लगी-महाराज! तुम मुझ से क्या चाहते हो। पुग्मों को तारकर वर्ग की गनि दीजिए ॥११॥२०॥ मागो, मैं तुमको यदी दूंगी। ये वचन मुनर महाराज मत्र रोक निनकी वन्दना करते हैं उन गनाजी भगीरथ बोले-हे महानदी । मेरे पुरखे अपने पिता ने महागन भगीरथ के वचनों में परम समन होकर मगर के यन के घोड़े को खोजने-खोजने महात्मा कहा-महाराज ! में अवश्य ही तुम्हारी इन्छा पूर्ण कपिल के कोर की अमि में भस्म हो गय है । इम नंगी । किन्तु जब में आकासमा म पृष्पीमण्टन 2 अपमृत्यु के कारण उन्हें वर्ग की श्रेष्ठ गति नहीं मिगी पाणिगी नवनीलाण्ट महेश्वर + मिरा मेरे उम है वरदायिनी ! भार अपने जर के मर्ग मे जनता अमय वेग को और कोई नहींगे मगा ।इमरिए उनके दागर की गम्म को नहीं पवित्र कांगी तब तक हमदाबाहो तुम तम्या करके मदाशिव कोम.नष्ट यवर्ग के अधिकारी न हो मगाह पहाभाग! में इन गे तो फिर गिरने ममय मेरे वेग को अग्ने vorivaliniewwwsanelineIATIL - १९७० म हा मारत [ पनपत्र AWAR -Amarnake । वेगं तु मम दुर्धार्य पतन्त्या गगनाभुवम् ॥ २२ ॥ न शक्तस्त्रिषु लोकेषु कश्चिद्धारयितुं नृप अन्यत्र विबुधश्रेष्ठान्नीलकण्ठान्महेश्वरात् ॥ २३ ॥ तं तोपय महावाहो तपसा वरदं हरम् स तु मां प्रच्युतां देवः शिरसा धारयिष्यति ॥ २४ ॥ स करिष्यति ते कामं पितृणां हितकाम्यया एतच्छ्रुत्वा ततो राजन् महाराजो भगीरथः ॥ २५॥ कैलास पर्वतं गत्वा तोपयामास शङ्करम् तपस्तीवमुपागम्य कालयोगेन केनचित् ॥ २६ ॥ अगृहाच वरं तस्माद्गङ्गाया धारणे नृप स्वर्गे वासं समुद्दिश्य पितृणां स नरोत्तमः ॥ २७ ॥ इतिश्रीमन्महा० आरण्यकपर्वणितीर्थयात्रापर्वण्लिोमशतीर्थयानायांअगस्त्योपाख्याने अष्टाधिकशततमोऽध्याय' है गाय पर रोक लगे। वे तुम्हारे पुरखों की भलाई के घोर तप करके उन्होंने शङ्कर को प्रसन्न किया। फिर लिए अवश्य ही तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार करेंगे। पितरों के उद्धार की इच्छा से उन्होंने शङ्कर से गङ्गा हे राजन् ! गगा जी के ये वचन सुनकर महाराज के चंग को रोकने का वरदान मागा ॥२१॥२७॥ भगीरथ कैलाश पर्वत पर गये। वहा कुछ समय तक धनपर्व का एक सौ आठ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १०८ ॥ अथ नवाधिकशततमोऽध्याय ॥ १०९ ॥ रोमश उवाच-भगीरथवचः : श्रुत्वा प्रियार्थ च दिवौकसाम् । एवमस्त्विति राजानं भगवान्प्रत्यभापत धारयिष्ये महाभाग गगनात्प्रच्युतां शिवाम् । दिव्यां देवनदी पुण्यां त्वत्कृते नृपसत्तम एवमुक्त्वा महाबाहो हिमवन्तमुपागमत् वृतः पारिपर्दोर नाप्रहरणोद्यते एक सौ नो अध्याय ।। १०९॥ रोगा जी कहते हैं-हे राजन् ! भगवान् महादेव शूरपाणि महारज भगीरथ से यों कह कर अनेक ने भगीरथ के वचन मुगकर देवनाओं का प्रिय कार्य अस्त्र-शस्त्र-धारी गणों के साथ हिमाचर पर गये । पा के लिए यहा कि गृपश्रेठ ! तुमने जो कहा बदाजार उन्होंने राजा भगीरथ से कहा-हमहाराज' टीम अपक्ष्य परंगा । पहायाहो ! भगवान् हिमाननदिनी गङ्गादेवी से पृथ्वी पर आने की .COMrural N अध्याय १०९ ] म हा भारत १९७१ .. ८.vi. तत्र स्थित्वा नरश्रेष्ठं भगीरथंमुवाच ह प्रयाचस्व महाबाहो शैलराजसुतां नदीम् पतमानां सरिच्छेष्ठां धारयिष्ये त्रिविष्टपात् एतच्छ्रुत्वा वचो राजा शर्वेण समुदाहृतम् ॥ ५ ॥ प्रयतः प्रणतो भूत्वा गङ्गां समनुचिन्तयत् ततः पुण्यजला रम्या राज्ञा समनुचिन्तिता ॥ ६ ॥ ईशानं च स्थितं दृष्ट्वा गगनात्सहसा च्युता तां प्रच्युतामथो दृष्ट्वा देवाः सार्धं महर्षिभिः ॥ ७ गन्धर्बोरगयक्षाच समाजग्मुर्दिदृक्षवः ततः पपात गगनाद्या हिमवतः सुना समुद्धृतमहावर्ता मीनग्राहसमाकुला तां दधार हरो राजन् गङ्गां गगनमेखलाम् ललाटदेशे पातितां मालां मुक्तामयीमिव । सा वभूव विसर्पन्ती त्रिधा राजन् समुद्रगा ॥१०॥ फेनपुजाकुलजला हंसानामिव पंक्तयः क्वचिदाभोगकुटिला प्रस्खलन्ती क्वचिक्वचित् ॥ ११ ॥ सा फेनपटसंचीता मत्तेव प्रमदाऽवजत् क्वचित्सा तोयनिनैदर्नदन्ती नादमुत्तमम् ॥ १२ ॥ एवंप्रकारान्सुबहुन्कुर्वती गगनाच्च्युता पृथिवीतलमासाद्य भगीरथमथाऽब्रवीत प्रार्थना करो । मैं स्वर्ग से गिरती हुई गङ्गा के वेग बड़े भैरों से भरी भगवती गहा जी भी एकाएक को रोकूगा । शिव जी के ये वचन मुनकर पवित्र और वेग के साथ आकाग से गिर रही थी। इस प्रकार नम्र होकर महाराज भगीरथ गहा जी का व्यान करने आकाशमण्डल की मेम्बरारपिणी गगाजी के गिरने रगे । तर पवित्र जल पाली गङ्गा जी भगीरथ के पर महादेव ने मोनियों की माग के ममान टनको ध्यान करने पर, सदाशिव को उपम्धित दम्बर, ' माथे पर धारण कर निया | गहा जी गिरकर तीन एकाएक स्वर्ग से पृथ्वी पर गिरने रगी । देवना, धाराओं में यही ॥११॥ महर्षि, गन्धर्व, नाग और यक्षगग आराम से उसपर फेनयुक्त गगा जी का निर्मन जर गिरती हुई गगा जी को देखने के लिए जाने लगे। हमा की कनार के समान जान पड़ना था। वहीं पर मन्छ, ग्राह आदि जर नन्तुओं से पूर्ण और बड़े ग्गा जी की धाग नागिन की सीटेदी नार मना LAINALA larannnnnAUNANNT ॥ - AL १९७२ म हा भारत [वनपर्व दर्शयस्व महाराज मार्ग केन ब्रजाम्यहम् त्वदर्थमवतीर्णाऽस्मि पृथिवीं पृथिवीपते एतच्छुत्वा वचो राजा प्रातिष्ठत भगीरथः यत्र तानि शरीराणि सागराणां महात्मनाम् ॥ १५ ।। प्लावनार्थं नरश्रेष्ठ पुण्येन सलिलेन च गङ्गाया धारणं कृत्वा हरो लोकनमस्कृतः कैलास पर्वतश्रेष्ठं जगाम त्रिदशैः सह समासाद्य समुद्रं च गङ्गया सहितो नृपः ॥ १७ ॥ पूरयामास वेगेन समुद्रं वरुणालयम् दुहितृत्वे च नृपतिर्गगां समनुकल्पयत् ॥ १८ ॥ पितृणां चोदकं तत्र ददौ पूर्णमनोरथः एतत्ते सर्वमाख्यातं गङ्गा त्रिपथगा यथा पूरणार्थं समुद्रस्य पृथिवीमवतारिता समुद्रश्च यथा पीतः कारणार्थं महात्मना ॥ २० ॥ वातापिश्च यथा नीतः क्षयं स ब्रह्महा प्रभो अगस्त्येन महाराज यन्मां त्वं परिपृच्छसि इतिश्रीमन्महा०आरण्यकपर्वणितीर्थयात्रापर्वणिलोमशतीर्थयात्रा अगस्त्यमाहात्म्यकथनेनवाधिकशततमोऽध्याय रही थी, कहीं पर ऊपर से नीचे गिर रही थी और ताओं के साथ कैलास पर्वत को चले गये । राजा कहीं पर मनोहर शब्द करती हुई मतवाली सुन्दरी भगीरथ गङ्गा जी के साथ सूखे हुए सागर के भीतर के समान जा रही थी। अनेक प्रकार के आकारों गये । समुद्र गङ्गाजल से भर गया। राजा का मनोरथ से आकाश से पृथ्वी पर आकर गङ्गाजी ने भगीरथ पूरा हो गया । राजा ने गङ्गा जी को अपनी पुत्री मे कहा-हे राजन् ! मै तुम्हारा कार्य करने के लिए मान रिया। उन्होंने भागीरथी में पितरों का तर्पण 2 वी पर आई हैं। मैं किस राह मे किधर चलू, किया । हे महाराज ! सागर को भरने के लिए त्रिपथगा मां मुझे दिखा दो । तर गङ्गा जी के पवित्र जल गगा जी जिस तरह पृथ्वी मण्डल पर आई और जिस , में अपने पुरवों को तारने की इच्छा से कारण महात्मा अगम्त्य ने समुद्र को पी लिया और भगीरथ उसी ओर चर निधा कपिट के कोप से ब्राह्मणों की हत्या करनेवाले वातापि दानर को मारा, जले हुए. मगर पुत्र पड़े थे । इधर रोकान्दित भग मो सब मैंने आपको सुना दिया ।।११।२१॥ यान् गर गहा जी का वेग रोकने के उपरान्त देव- वनपर्य या एप मा नो अध्याय समाप्त हुआ ॥ १०९॥ महाभारत का चतुर्थ अहः समाप्त हुआ । । महाराज ----