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Itne Achhe Din

Kamleshvar · 2011/03

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इतने अच्छे दित

मूल्य : तीस रपये (30.00)
प्रपम संस्करण: 19890 कमलेश्वर
राजपाल एप सन्द, मदरमा रोड, करमीरी गेट, दिल्ली-6 द्वारा प्रकाशित
ITNE ACHHE DIN (Short Stories) by Kamleshwar
1SAN1-7023-061-3

इतने अच्छे दिन
कमलेश्वर
राजपाल एण्ड सन्ज़

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भूमिका सफ़र लम्बा था और उस लम्वे सफ़र के बाद मैंने यह कहानियां लिखी। लिखकर रखता गया। 'सारिका' छोड़ने के बाद एक लम्बा शून्य है" एक बेहूदे संघर्ष में में फंसा रहा- दोग़ली अर्थव्यवस्था में सांस लेने का सबक सीखता रहा और अपनी सामथ्र्य भर उत्तर देता रहा। "बम्बई जैसे शहर में रहने और शिद्दत से कार्य करते रहने के लिए क्योकि टाइम्स छोड़ने के बाद तत्काल कोई विकल्प मेरे सामने नहीं था-मुझे फिल्मों की तरफ पूरी रचनात्मकता और क्षमता के साथ जाना पड़ा 'जो कुछ फिल्में पहले लिखी थी, उनकी सफलता ने साथ दिया और फिल्मी दुनिया में आश्वस्त होकर काम करने का एक नया दौर शुरू हुआ। • फिल्मो की आमदनी से मैंने 'कथायात्रा निकाली-उसका स्वागत और प्रसार तो बहुत संतोषजनक हुआ परंतु 'कथायात्रा' ने भारी आर्थिक नुकसान पहुंचाया और जिन लेखक-पाठक मित्रों ने उसमें आंशिक आर्थिक सहायता या अनुदान दिया था उनका पूरा पैसा भी मैं नहीं लौटा पाया"कथायात्रा कार्यालय में मुझे कोई रिकार्ड नहीं मिला।" जो कुछ मेरी नोटबुक में नोट था, उसके आधार पर मैंने धीरे-धीरे फिल्मी आमदनी से सत्तर-अस्सी मित्रों का पैसा चुकाया, बाकी का नही चुका पाया, यह भी एक तकलीफदेह अध्याय है। तभी सन् 80 में दूरदर्शन ज्वाइन करने का प्रस्ताव आया और अधिकांश निरर्थक फिल्मी लेखन से मुक्ति पाने के लिए मैंने सरकारी नौकरी स्वीकार कर ली--दूरदर्शन में आने का प्रस्ताव जनवरी 80 के अन्त में आया था, पर मैं तत्काल इक्कीस फिल्मों को छोड़कर नहीं था सकता था, अत: ग्यारह फिल्में मैंने छोड़ी, निर्माताओं की अग्निम धनराशि लोटाई-शेप दस फिल्मों में से पांच अपने निर्माण की अलग-अलग स्टेज पर थी, उनकी स्क्रिप्टें लिखी जा चुकी थी-वाकी पांच फिल्में मैंने अगस्त 80 तक पूरी की और सितम्बर 80 मे मैं दूरदर्शन की नौकरी मे चला आया। मन मे कुछ आदर्श घे, सामने कुछ सिद्धांत भी थे, अधिक कारगर तरीके से जीने और काम करने के अवसर थे और मैं दूरदर्शन में यही तय करके गया था कि मैं भारतीय दूरदर्शन को सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन का एक सशक्त माध्यम बनाऊंगा और इसका प्रगाढ़ सम्बन्ध समस्त भारतीय साहित्य, रगमंच और लोक संस्कृति से जोडूगा ताकि दूर- दर्शन फिल्मी और व्यावसायिक प्रयोजनों से अपनी रक्षा कर सके। संतोष की बात यह थी कि उस अवधारणा को मूर्तरूप देने में मुझे मेरे तत्कालीन सूचना-प्रसारण मंत्री श्री वसंत साठे और प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को सम्पूर्ण सहमति मिली और काम करने की मौलिक धचारिक आजादी भी! फिर निहित स्वार्थों और मत्ता के आस-पास मंडराते तस्वों से सामना हुआ"यह भी एक रोचक पर लम्बी कहानी है। बहरहाल- इस नये संकलन में इतने अच्छे दिन" कहानी सन् '76-77 की है, 'अच्छा थीक है"" सन् '86 की, 'जामातलाशी' सन् 187 को और शेष सारी कहानियां सन् 189 भाचं से लेकर अब तक की लिखी हुई हैं। एक बात हमेशा मेरे लिए स्पष्ट रही है कि मुझे रचना के भीतर और रचना के माहर-दोनों स्थितिमो में जीना पड़ता है.."दोनो ही सघन स्थितियां हैं-एक रचनात्मक स्तर पर और दूसरी वैचारिक स्तर पर। लेकिन अंतिम रचनात्मक और मंतरिम वैचारिक उत्तर तो कहानियां ही दे सकती है. इसके अलावा और क्या कहूं? अपने समकालीनो और युवा कहानीकारों को धन्यवाद सहित--- क्योंकि शुन्य के दिनों में उनकी कहानियों ने ही मुझे पाक्ति दी हैं...जिन्हें में लगातार पड़ता रहा है। रस्त्यू-26, ग्रीनपार्क, नई दिल्ली कमलेश्वर 26.7.89

क्रम
इतने अच्छे दिन
अच्छा, थीक है...
जामातलाशी
इन्तजार
शोक समारोह
मेरा भारत महान
चार महानगरों का तापमान
दालचीनी के जंगल
स्टोरी
9
22
33
44
55
64
73
79
90

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इतने अच्छे दिन" सचमुच इतने अच्छे दिन तो कभी नहीं आये थे। पास में अगर हड्डी-गोदाम न होता, तो बहुत मुश्किल होती । सभी कुछ तो अच्छा था। तीन-चार गांव पास लगे हुए। सबके बीच में सूखे चरागाह । इतने सारे रिश्तेदारों के घर । तीन कोस पर बहती नदी। ऊचे- नीचे टोलों वाला बियावान । पास से जाती बस्ती की सड़क । खास सड़क पर रात में ट्रको के रुकने का अड्डा । उस अड्डे से मील भर बायें हड्डी- गोदाम । उससे भी तीन मील भीतर रेलगाड़ी का स्टेशन । चारों गांवों में अगर इतने रिश्तेदार, ढोर-डंगर और जानवर न होते तो भी काम नहीं चलता । और बीस मील दूर शहर में चीनी मिलें न होती तो भी दिक्कत होती। सड़क ऊंचे-नीचे टीले वाले बियाबान से न गुजरती, तब भी ठीक नहीं था। घर में छोटी बहन कमली न होती, तो कैसे काम चलता! उस विया- बान से ट्रक न गुजरते होते, तो भी दिक्कत होती । और बंतासिंह ट्रक- ड्राइवर अगर रात मे कमली को उठा न ले जाता तो उसकी ज़िन्दगी ही बरबाद हो जाती। सब कुछ अच्छा ही हुआ था। सबसे अच्छी बात तो यह हुई कि इलाके में लगातार तीसरे साल भी अकाल पड़ गया । अकाल न पड़े तो घर-गांव का आदमी बाहर निकलता ही नहीं । जिनके अपने खेत हैं, वे तो बाहर हो आते हैं। जिनके खेत नही हैं उनका तो कहो कुछ भी नही है। खेतवालों के खेत पर मजूरी करना और वहीं गाव में पड़े-पड़े मर जाना । कहां कुछ और होता है ! इतने अच्छे दिन'"19.

कमली के लिए तो और भी अच्छा हुआ। वह कब कहां निकल पाती? घाला के लिए तो फिर भी ऐसा है कि एकाघ गांव घूम आये, नदी तक हो आये । दर्जा पांच तक पढ़ने चला जाये। नदी तक बिना कहे-सुने बाला हो आये तो ठीक था। कह दिया तो मुश्किल होती थी। दादी उसे हटकने लगती थी--नदी पर मत जाया कर। जाये भी तो नहाना कभी मत। दादी बोलती थी तो पैर की उंगली में पड़े कांसे के छल्ले को घुमाती रहती थी। शायद वह उसके गड़ता था। दादा भी यही बोलता था। वे दोनों मानते ही नही थे कि वह नदी तक जायेगा और नहायेगा नही । और बाला को नदी मे उतरते हमेशा डर लगता था। ऊपर मै दादी झूठ बोलती थी-कहा न, पानी का रंग नहीं होता। बाला हमेशा कहता था -दादी, मेरी बात सुन । मैं देख के आया हूं। पानी का रंग लाल है-सून को तरह लाल! दादा ठठाकर हंस पडते ये-कैसी बातें करता है रे पानी का कोई रग नही होता। तू नदी पर मत जाया कर । जाये भी तो नहाना मत। दादा-दादी की ये बातें असल में अब बाला को याद आती हैं । हंसी भी आती है। उनके पास और बातें ही नहीं थी। अपन के पास तो बहुत कुछ है । बहुत कुछ क्या, सभी कुछ है। कभी सर्दी माली कुछ ज्यादा ही थी। जिधर से कथरी उठ जाती, उधर से ह्वा अर्जुन के तीर की तरह लगती। कमली खिलखिला रही थी। उसे लगा-चलो, सब ठीक है । कमली सुद तो नही पीती, पर ड्राइवरों की शीशी में से दो-चार चूंट बचा के रख देती है उसके लिए-और क्या चाहिए? साला क्लीनर श्यादा ही खुदर-बुदर मचाये हुए था। न सोता था, न' सोने देता था। बार-बार बोड़ो सुलगाता है। खांसता है। कयरी खीचता है । अबे, इतना जाड़ा लग रहा है तो मोनी आइल डाल के अलाव जला ले ! नीद तोड़ दी साले मे! कैसी मजे की नीद आती है यहां इस सरायः 10/इतने अच्छे दिन...

में ! कमली यहां है तो सब ट्रक वाले वस्तियां पार करते सीधे यही आते ट्रक-सराय के मालिक ने भी पूरा इन्तजाम कर रखा है । वडा-सा हाता घेरकर ट्रकों की सराय बना ली है । बाहर भी दस-बारह ट्रकों की जगह है। दिन में खाने की मेजें और वें पड़ जाती हैं, रात को खटियां और खटियों पर पटियां । थके-मांदे ड्राइवर और क्लीनर दिन में भी आराम कर लेते हैं। पूरी रात गुजारने के लिए तो पूरा इन्तजाम है ही। हर तरह का खाना । मुर्गा-शुर्गा खाना हो तो सामने दड़बे में से पसंद करो। अपने सामने बनवाओ, पकवाओ और खाओ। बीड़ी-सिगरेट की कमी नहीं । ग्रामोफोन भी बजता ही है । दांत खोदते खोदते तसवीरें देखना चाहो तो पचासो लगी हैं । भगवान की तसवीरें अच्छी लगें तो उन्हें देखो। गुरुवाणी सुननी हो तो रिकार्ड सुनो। औरतों की तसवीर देखनी हों तो वे भी लगी हैं ! लुगी-कच्छा धोना हो तो पटिया बिछी है, ट्यूबवेल लगा है । सुखाने के लिए तार बंधा है। दिशा-मैदान के लिए सूखे खेत पड़े हैं। -अबे, तू क्यों उठ के बैठ गया? सबेरा होने में बहुत देर है । जाड़ा लगता है ? अपन को बता! हे 55 5 माला बीड़ी सुलगा के खीचे जा रहा है । बीड़ी के जलते फूल में आंखें कैसी चमकती हैं कुत्तों की तरह-लखन क्लीनर की। कुत्ता भी साला बड़ा भला जानवर है। अकाल पड़ा तो भी नहीं भागे। वही गांव के बियाबान में लाशों को चीयते-चीयते मर गये। गिद्ध साता बहुत तेज होता है। चार-पाच कुत्ते न लगें तो एक गिद्ध को लाश पर से हटाना मुश्किल होता है। -तू यहां आया कैसे ? लखन ने पूछा। -तू बीड़ी पी ले, अच्छी तरह खांस ले। बताता हूं। बाला बोला था। -हां, बता -तो सुन ! तुझे नीद क्यों नहीं आ रही ? अच्छा-अच्छा, सुन! ये कमली मेरी बहन है न."एक शाम" इतने अच्छे दिन .. /11 -सच्ची? और लखन कमली की बात पर ही अटक गया। --अवे और चमा? -~-कमली लड़की अच्छी है । समझदार है। ड्राइवर कही और रुकता है तो भी उसी की बात करता है। एक रात ट्रक बिगड़ा तो पैदल लौटने को हुआ। तब हमी ने ड्राइवर को समझाया-अव दस किलोमीटर है। कोई उधर जाता ट्रक ले लो, सवेरे लौट आना। मैं तो हूं। फिर लदे हुए सामान की जिम्मेदारी भी थी। सो वह नहीं गया। -अच्छा! तो सुन-ये साला बोरा बहुत महक रहा है। पहले इसे -- हटा दें। --क्या है इसमें ? लखन क्लीनर ने पूछा था । ---है ? साली हड्डियां हैं ! लखन क्लीनर समझा नही। बीड़ी पीकर खांसने लगा। सर्दी मे उठने की हिम्मत नहीं पड़ी तो बोरे से आती बदबू को उसने सह लिया। क्लीनर बीड़ी पीता है तो बदबू दब जाती है । बीड़ी फेंककर क्लीनर ऊंघने लगा। अपन को क्या जरूरत पड़ी है किस्सा सुनाने की ? सोओ साले...! सुबह उठते ही बबूल की रहनी तोड़कर बाला ने दातून की। लखन अव आराम से सो रहा था। उसे जल्दी नही थी। तभी एक ड्राइवर रजाई में भालू की तरह हिला। उसने उठकर तहमद बांधा और दोनो बांहें छाती से चिपकाये दिशा-मैदान के लिए चला गया। लसन का ड्राइवर वंतासिंह पहले ही उठ गया था। वह मैदान से लौट रहा था । छप्पर में पड़ी कमली गठरी बनी सो रही थी। उसकी खाट के पाये पर बंतासिंह की पगडी अजगर की तरह लिपटी रखी थी। जल्दी उसे भी थी। उसने वोरा उठाया और सिर पर लादकर हड्डी- गोदाम की ओर चल दिया। साला बोरा बहुत महकता है । पर दाम तो अच्छे देता है-कमली भी चार-पाच रुपये बना लेती है। एक-सवा रुपया बोरे-भर हड्डियों का मिल जाता है। छ. रुपये रोजाना कोन कमाता है साला! यह तो अच्छा हुआ कि चीनी मिल खुल गयो और यह हड्डी-गोदाम 12/इतने अच्छे दिन..

.. भी ! चीनी चमकाने के लिए शोरे की जरूरत पड़ती है। पता नहीं, इन सूखी हड्डियो में से शोरा कहां से निकलता है ? निकलता होगा गोदाम के तक पर बोरा फंसाकर उसने मोटी-सी गाली देकर चदू को पुकारा"तौल कर "ये सालोसर्दी... चंदू कहीं दिखाई नहीं पड़ा। फिर गोदाम में भरी टनों हड्डियों के वीच से आता वह दिखाई पड़ा जैसे पिंजर उठकर चला आ रहा हो । आते ही उसने खीसें निपोर दी। -आज सबेरे-सवेरे आ गया, वाला? --शाम देर हो गयी थी। -कमली ठीक है? वह उसका मतलब समझ गया। चंदू के दिल में एक फांस है । नहीं तो पूछने की क्या जरूरत थी? तक के दूसरे पल्ले पर बाट पटकते हुए चंदू ने फिर कहा-ये दिन पहले आ जाते तो काहे हम तीन से दो रह जाते ! चंदू का कहना तो ठीक था। पर तब यह सब व्यापार शुरू कहां हुआ था? इसीलिए तो उसने समझा दिया था-देख चंदू, तू कमली की लगन मन से निकाल दे."खाने को दो के लिए नहीं है तो तीन के लिए कहां से आयेगा? अगर ये अकाल पहले ही पड़ गया होता और हड्डियों का धधा शुरू हो गया होता तो कौन-सी दिक्कत यी! वह यही सब सोच रहा था कि चदू ने तौल करके बोरा नीचे पटक दिया। चंदू के मन में बाला के लिए खयाल था। धीरे से बोला-इंगरेजी जमाने की एक कबरगाह तीन मील उत्तर में है। कबरों के पत्थर तो सब खोद ले गये, हड्डियां दबी पड़ी हैं, उन्हें खोद ला! -उनमें से शोरा निकलेगा? बाला ने पूछा था। ---सब चीज़ में मिलावट होती है, हड्डियों में भी मिला देंगे ! आंख दबाकर चंदू ने कहा था। साला ! बाला के मुंह से मन-ही-मन गाली निकली थी। देना चाहे तो एक के पांच रुपये भी दे सकता है । वह नहीं करेगा, पर यह सब बताकर अपनापन जतायेगा। पैसे लेकर वह चला आया था। इतने अच्छे दिन.../13 लेकिन चंदू ने कवरगाह की ठीक और सही खबर दी थी। हड्डियां ताजी तो नही थी, पर जैसे कोयले की खान हाय आ गयी थी! जहां खोदो वहीं हड्डियां निकलती थी! उसे लगा था, ऐसी दो-चार खाने और हाथ आ जायें तो जिंदगी ही बदल जाये। आदमी अच्छा है चंदू पर पुरानी हड्डियों से ज्यादा चला नही । । ! असल में जब तीसरे साल भी अकाल पड़ा, तब बाला को होश आया था। अपने रिश्तेदारों की हड्डियां कितनी कीमती हैं ! अपने रिश्तेहारों के ढोर-डंगरों की हड्डियां कितनी कीमती हैं ! हड्डियों के लिए तब महाभारत मचा था। लोग पहरा लगाने लगे थे-ये हमारे रिश्तेदारों की हड्डियां हैं. ये उनके ढोर-डंगरो की हड्डियां हैं । इन पर हमारा हक । तब बाला ने जमकर लडाई लड़ी थी। गाव-गांव में और आस-पास रहते रिश्तेदारों की हड्डियो के लिए वह लड़ताया । ढोर-डंगरो के पिंजरों के लिए उसने लडाई की थी... तभी दादा और दादी मरे थे। आठ दिनो की दूरी पर । और सत्ता- इसवें दिन बापू मरा था। अम्मा तो आठ साल पहले ही मर गयी थी। बापू ने बहुत कहा था, पर बाला नहीं माना था कि दादा की लाश को जलाया जाये। -जलाने से क्या मिलेगा? बाला बापू पर चीखा था। और बापू चीखा था-अरे कमीने ! तू हड्डियां भी बेच खायेगा? ऐसी औलाद से तो निपूता ही मरता ! बापू ने जो कुछ कहा हो, पर ये दिन कसे आते अगर बापू की बात मान लेता! खाने को क्या था? जीने को क्या था? सब तरफ तो धरती अलसी पड़ी थी। तभी तो उसने तय किया था कि झुलसी-तपसी धरती के नीचे अगर लाश दवा दी जायेगी तो हड्डियां जल्दी साफ हो जायेंगी। गिद्ध और कुत्ते साफ करने में देर लगायेंगे। इधर-उधर खीच के भी ले जायेंगे। पर रात में कोई हड्डिया खोद न ले जाये, इमी के लिए तो उसने कमलो को पहरे 14/इतने अच्छे दिन" - पर लगाया था, और वही से, सड़क किनारे से बंतासिंह उसे उठा ले गया था। यह भी अच्छा ही हुआ था। अच्छे दिन आते हैं तो एक साथ आते हैं। जब बाला को पता चला था कि कमली ट्रको की सराय में है तो वह गया था। वापू उस वक्त जिंदा तो था, पर इतना जिंदा नही कि सराय तक आ पाता। वह भूख से धीरे-धीरे मर रहा था। पर फिर भी जीने का कोई और रास्ता खोजने के लिए तैयार नही था। असल में यह बहुत भीतरी इलाका या जहां तक सरकारी मदद भी नहीं पहुंच पाई थी। जैसे खेत में मरकारी पानी जाता है न, जिस तक पहुंचा, पहुंच गया। उसके बाद" होना बहीं था। बापू को भी मरना था। पहले दादा,मरा, उसके बाद दादी, उसके बाद वापू ! रिश्तेदार और उनके ढोर-इंगर मर ही रहे थे। पर तब तक बापू नहीं मरा था। शायद उसके मरने से एक दिन पहले की बात है । बाला जानवरों की हड्डियां बटोर रहा था। गिद्धी और कुत्तों के बीच । साले घसीट-घसीटकर बहुत दूर ले जाते हैं। तब कमली उसे खोजती आयी थी । वह बाला को गिद्धों और कुत्तों के जमघट के बीच खोज ही नही पाई थी। उनके बीच वह घुटने मोड़े गिद्ध की तरह ही बैठा था। साफ हो गई हड्डियों को बीनता हुआ। जब दादी की लाश तपती जमीन के नीचे दबाने गया था तो कमली ने कहा भी था-दादी के पैर की उंगली में पड़ा चांदी का छल्ला निकाल -~चांदी नही, कांसा है ! उसने परखकर जवाब दे दिया था। कमली इतना जानती भी नहीं थी। कासा ही होगा। भला हो चीनी मिलों और बंतासिंह का। ये दोनो न होते तो ये दिन कैसे आते? हड्डियों को खदानें वह क्यों खोदता ? कमली ट्रको को सराय में इतने आराम से क्यों रहती? वह साला चंदू तो पागल है जो अब भी कही कमली की लगन लगाये बैठा है। जो कुछ कमली औरो से पाती है, वह चंदू से तो मिलने से रहा ! होगा वही, जो अब होता है, पर ऊपर से चंदू को खिलाना और पड़ेगा। इतने अच्छे दिन'/15 यही सब सोचता-सोचता वह हादियों की सदानों की ओर चला गया था। सात-आठ दिन तो इतना काम रहा कि फुसंत ही नहीं मिली। बोरा भर-भरकर पहुचाता रहा। चंदू तोलता रहा और कमली की बात करता रहा, पर साले ने न तोल में साप दिया, न पंसे में । है साला कमीना! हड्डियो की खदानो से वह आठ दिन बाद लोटा था, रात को। कमली फाम से पी। वह कथरी ओढ़कर लेट गया था। सिरहाने रखा हड्डियों का बोरा बहुत बुरी तरह महक रहा था। कमली कुलबुला रही थी। उसने पाम जाकर पूछा पा.-कौन है ? -बस्ती का लाला है ! कमली ने कहा था। -इस साले से दरा लेना! कहते हुए वाला अपनी खाट पर आ गया था। कुछ ही देर बाद सब कुछ शात हो गया था। यह अच्छा था। बस्ती का लाला जव भी आता था तो शुरू में शोर ज्यादा मचाता था पर आधा घंटे बाद ही सो जाता था। ड्राइवर तो रात भर हंगामा करते थे। कमली भी बुरी तरह थक जाती थी और दूसरे दिन सोती रहती थी। कमली तो सो गयी, पर उसे नीद नही पा रही थी। उस बोरे के कारण । मन बहुत उचटा हुआ था। रह-रहकर दादी की याद आ रही थी। आज सर्दी भी बहुत थी और वह गांव के पास वाले ऊंचे-नीचे बिया- बान टीले से दादी की हड्डियां खोदकर लाया था। कमली ने तो रात काट ली थी, पर वह अपनी रात नही काट पा रहा था "सड़क से ट्रक आ-जा रहे थे। कुछेक सराय पर रुक भी रहे थे। कड़कड़ाती सर्दी और अर्जुन के तीर की तरह चलती हवा। नीम भी बड़बड़ा रहा था। अधेरा इतना गहरा कि उठने की हिम्मत ही नही पड़ रही थी ! मन तो हुआ कि कमली को जाके जगाए और कहे-कमली! दादी की हड्डियां इसी बोरे मे हैं । बहुत महक रही हैं । इस महक के कारण सो नहीं पा रहा हूं। पर कमली थककर सोयी थी। बस्ती वाला लाला भी पड़ा था। 16/इतने अच्छे दिन.

उसने आंखें बंद कर सोने की कोशिश की। एक पल के लिए नीद आयी थी कि तभी कोई ड्राइवर चीखा था-अबे ओए, दीना चल। दीना सोता-ऊंघता जाकर ठंडी गद्दी पर अघलेटा हो गया था और वह ट्रक गुर्राकर चालू हुआ था । फिर हाथी की तरह झूमता सड़क पर जाकर कोहरे में खो गया था। कथरी ओढ़कर वह खाट पर बैठ गया था और सड़क पर भरे कोहरे को देखता रहा था। चारों तरफ सन्नाटा था। मुर्गे तक दरबे में चुप थे। कासनी फूलों को बेल पेट्रोल पप्प की गुमटी के सहारे कांप रही थी। सनसनाती हवा । मुह से निकलती भाप । ठिठुरे हुए पेड़ । सामने फैले मैदान में रोंगटों की तरह खड़ी हुई घास । बाला ने फिर लेटने की कोशिश की। लेट भी गया, पर नीद नहीं आयी। दादी! नाराज मत होना..'ये दिन तू भी देख लेती तो शायद कुछ आराम से मरती। अब कमली भी बच गयी है और अपन भी। व्यापार भी चल निकला है। यह अकाल न पड़ता और इतने ढोर-डेंगर, नाते-रिश्तेदार न मरते तो अपन का भी वही हाल होता। भला हो हड्डी-गोदाम का ! चंदू वही लग गया है। कमली भी समझदार हो गयी है, दादी। अपन से उसने बात की थी। कहने लगी-~चंदू से कह दे क्या फायदा? पर बसाऊंगी तो लौट के वही गांव के बाहर झोपड़ी डालनी होगी। कुआं सूखेगा तो फिर इधर ही भागना पड़ेगा। तब एक-एक लोटे पानी के लिए ब्राह्मण- ठाकूर छोड़ देंगे क्या? अकाल तो हम लोगों के लिए पड़ता है, बाकी सबके पास तो बरसों के लिए दाना है, पानी है. यहां कोई यह तो नहीं पूछता- कौन जात है ? अपनी जरूरत से लोग आते हैं, कल नही आयेंगे तो इसी सराय के बर्तन-भांहे मांज-धोकर चलता रहेगा। ऐसे दिन बार-बार हाथ नहीं आते.."चंदू से कह दे क्या फायदा ? कमली बहुत समझदार हो गयी है, दादी! तू सुन रही है न! अर्जुन का तीर फिर लगा तो उसने कसकर कथरी लपेटो । पता नहीं, कब उठके फिर बैठ गया था। कोहरे की गुफा से एक ट्रक निकलकर फिर कोहरे की गुफा में घुस गया। कुछ देर तक आवाज बजती रही। बाला उठा। कमली को जगाले। पर.. इतने अच्छे दिन./17 तभी उमके लिहाफ में हलचल और कुनमुनाहट हुई। लाला लिहाफ से निकल सुड़सुड़ाता हुआ खडा हो गया। कमली चोली-लेटा रह, बहुत जाड़ा है! - लेकिन लाला को तो अधेरे-संधेरे निकल जाना होता है। रात कहीं भी निकले पर उसका दिन बस्ती में ही निकलता है । टोपा चढाकर, चादर लपेटकर लाला पगडडी पकड़कर वस्ती की ओर चला गया। वाला वैसा ही बंठा रहा । बोरे की तरफ देखता हुआ। कमली की भरक टूट गयी थी। शायद उसने लिहाफ के भीतर से देखा होगा। वह पास आकर खडी हो गयी थी-अरे बाला! तू अभी तक जाग रहा है ? -नीद नहीं आ रही! -थोडी-सी उधर पड़ी है अद्ध में। पी ले भरक मिल जायेगी। सो जा“सो जा' कहते हुए कमली अपनी खाट की तरफ जाने लगी थी। -सुन ! बाला ने कहा था। -बोल! -दादी सोने नहीं दे रही है ! --दादी! कमली ने ताज्जुब से कहा था । -- हाँ.."उसकी काया इसमे बैठी है."बोरे में ! बाला ने कहा था। -अरे, हट ! कमली ने झिडक दिया था। --कमली ! वो अच्छा हुआ कि कोई और खोदकर नहीं ले गया। अपन ही पहुंचे सदान पर'"पूरा पिंजर निकाला! -ऐसे कह रहा है जैसे पहचान लिया हो ! कहते हुए कमली उसी की खाट पर आधी कथरी ओढ़कर बैठ गयी। -दादी के पैर की अंगुली मे वो कांसे का छल्ला अब भी पड़ा है." : बाला ने कहा तो कमली आगे नहीं बोली। बोरे की तरफ देखती रही। पैट्रोल के दोनों पम्प सफेद रजाई ओढ़े कानों में उगली डाले खड़े थे। छप्पर के वासो मे लटके टायर पुतली निकली आंख के कोटर की तरह देख रहे थे। सड़क किनारे खडे नीम के पेड़ो की गर्दने कोहरे की तलवार ने 18/इतने अच्छे दिन.

काट दी थी। ट्यूबदल के ठंडे पाइप की बांह कच्ची गुमटी की कमर में लिपटी हुई थी। और वे दोनों वही खाट पर चुपचाप बैठे थे। जाड़ा वरस रहा था। अब दोनों को नीद थी । वक्त का कुछ अन्दाज़ा नहीं था। घुटनों पर बांहें मोडे, ठोड़ी टिकाये कमली वैठी थी। पाटी का सहारा लिये बाला अघलेटा था। तभी सामने, दूर कोहरे के टुकड़ों के पीछे काले आकाश में कुछ हलचल-सी हुई थी। काले बादल | लोहे की किनारी थोड़ी-सी चमकी थी."जैसे उसके पीछे आग की भट्ठी की एक दहकती लपट उठी हो। पर फिर लोहा ठंडा पड़ गया था। एक पल बाद काले लोहे की कई किनारियों पर लपट के आसार दिखाई दिए थे."फिर वे बुझ गये थे। पर भट्ठी शायद बराबर धधक रही थी। गढिया लुहारों का कोई पडाव आसमान के पीछे है क्या ? धौंकनी चल रही थी और आग बढ रही थी। धीरे-धीरे लोहे की किनारियां पीली पड़ गयी थीं. "जगह-जगह बादलों के होंठ नीले हो गये थे। कोहरे के चकत्ते आग ने सोख लिए थे। आसमान में जगह-जगह चीरा लग गया था। तब घास के खडे रोंगटे सुरमई से सुनहरे हुए थे और गर्दन कटे पेड़ों के सिर नज़र आने लगे थे। बाला कसमसाकर सीधा बैठ गया था। कमली ने पूछा था-ये हड्डिया गोदाम ले जायेगा? -हां ! बाला बोला था। -सुन, बाला! ."इन्हें नदी मे सिरा दे ! बाला अचकचाकर रह गया। यही कुछ तो, कुछ इसी तरह की बात तो वह भी सोच रहा था, पर यह नही सोच पाया था कि दादी की काया को नदी में सिरा आये। -ठीक है न ! कमली ने कहा-बुरे दिन होते तो दूसरी बात थी। गोदाम में ही दे आता... -हां! वह बोला-तड़के-तड़ के निकल जाता हूं."नदी दूर है। दिन चढ़े तक लौट आऊंगा। और वह बोरा उठाकर सड़क पार करके मैदान में उतर गया था, उस पगडंडी पर जो नदी की ओर जाती थी। कमली उसे तब तक देखती रही इतने अच्छे दिन... 119 थी, जब तक वह पेड़ों के झुरमुट के पीछे अलोप नहीं हो गया था। कमली जाकर अपनी रजाई में गठरी बनकर लेट गयी थी। आदमी साथ होता है तो टांग पसारकर सोने में भी उतनी सर्दी नही लगती। भरक मिलती रहती है। पर नोंद बुरी तरह घिर रही थी। लेटते ही उसे नोंद आ गयी। बहुत गहरी नीद । । यह पता ही नहीं चला कि बादलों के बीच से निकलकर सूरज कब ठण्डा पड़ गया और दिन पूरी तरह कब निकल आया। शोर कब होने लगा। चारों तरफ जिंदगी अपनी रफ्तार पर आ गयी थी। दरबे में मुर्गे कुड़कुड़ाने लगे थे। कुत्ते पेट्रोल पम्प और सड़क तक दौड़ रहे थे। ट्रक- सराय की लची मेजें धुल गयी थी। सब्जियां कट रही थी । अंगीठियां जल गयी थी। रात को रुके हुए ट्रक वाले चाय पी-पीकर सफर पर निकल गये थे। ट्यूबवेल धक-धक कर रहा था। वल्कनाइजर के छप्पर में मशीन पर रवर का टांका लगानेवाले लड़के आ गये थे। सराय के मालिक ने जपुजी का रिकार्ड लगा दिया था। अगरबत्तियो की महक फैली हुई थी। कमली नीद की मारी थी। बाला लौटा, तब भी वह सो रही थी। आते ही उसने जगाया। आँखें मलते-मलते कमली ने पूछा-सिरा आया ? -हां! उसके दांत उब भी कटकटा रहे थे। अर्जुन के तीर तो चल हो रहे थे। -अच्छा हुआ ! कमली वोली। -तुझे याद है, दादी से अपन ने हमेशा कहा-दादी, मेरी बात सुन! मैं देख आया हूं, पानी का रंग लाल है । खून की तरह लाल! दादी मानती नही थी, जिद करती थी-पानी का रंग नहीं होता! सो भाज उसकी काया सिराते हुए अपन ने उससे कहा-ले दादी! आज देख ले. कमली ने उसकी तरफ भर-आख देखा और चूड़ी सरकाते हुए बांहों को भरकाने लगी। उसके चेहरे पर रात का बासापन था। या शायद ठंडक की सफेदी। वह अपने गालों को रगड़ने लगी तो वाला ने देखा-उसके 20/इतने अच्छे दिन..

वाएं गाल की सांवली चमड़ी पर खून की एक सूखी बूंद चिपकी हुई थी। वह उस पर उंगली फिराने लगी तो बाला ने पूछा -क्या हुआ? उस साले लाला ने फिर काटा इतने जोर से ? -नहीं। कमली ने मामूली तरह से कहा -उसका वो एक दांत सोने का है न, वही गड़ जाता है"कहते-कहते वह ट्यूब वैल की तरफ मुंह धोने लिए चली गयी। इतने अच्छे दिन"/21 .. अच्छा, थीक है यह एक ऐसा हिल स्टेशन है, जहां सैलानी घूमने आते हैं। एकाध दिन रुकते हैं, फिर चले जाते हैं । इन सैलानियो के सहारे यह हिल स्टेशन चलता है। मैं मुसलमान हूं और मुसलमानों पर इस देश के लोग बहुत भरोसा नहीं करते। इस अनभरोसे की जिंदगी जीते हुए भी मैं एक भरोसे की जिंदगी जीना चाहती हूं क्योकि इस देश के अलावा मेरा कोई देश नहीं है, इसीलिए मैंने एक स्कूल खोला है, ताकि अगली सदियो को रास्ता दिखाने वाले बच्चे मेरे पास आ सकें। मैं अगली सदी तो नहीं बना सकती, पर अगली सदी बनाने वालों को जरूर बना सकती हूं." मेरे सामने साहिल खड़ा है-एक साढ़े तीन बरस का बच्चा उसे उसको मा अभी छोड कर गयी है । साहिल अब मेरे बोडिंग स्कूल मे भरती जब साहिल की मा ने साहिल को छोडा, तो एक बहुत दर्दनाक मंजर मेरे सामने था । मेरे स्कूल में दाखिल कराके उसकी मां वापस क्यो और कहा जा रही थी, यह वह मासूम नहीं समझ पा रहा था "साढ़े तीन साल का साहिल-वह बराबर रो रहा था। उसकी मां भी बहुत रो रही थी। दोनो एक-दूसरे से अलग नहीं होना चाहते पे"मां की तकलीफ मैं समझ सकती थी, क्योंकि मैं खुद एक मां हूं और इस स्कूल की प्रिसिपल हूं, जिसमे पढ़ने के लिए बहुत से बच्चे हर साल आते हैं। लेकिन साहिल के बारे मे स्थिति बिल्कुल दूसरी थी साहिल को स्कूल में छोड़कर जाने के बाद उसकी मां के लिए एक शानदार कार स्कूल के फाटक के बाहर खड़ी थी और साहिल का पापा सामने एक धसस्टेंड पर 22/ इतने अच्छे दिन'" करती। चुपचाप खड़ा था--अपना एक सफारी झोला लटकाये हुए । उसकी आंखों में आंसू थे या नहीं, मैं इतनी दूर से नहीं देख सकती थी। जो नये बच्चे इस साल दाखिल हुए थे। उनमें साहिल ही सबसे छोटा था । बहुत तेज, जहीन और घुल-मिल जानेवाला। जब उसकी मां पहली बार स्कूल देखने के लिए आयी थी, तब साहिल भी उनके साथ था"हाथ ! मे दो कारें पकड़े हुए। उसकी मा मुझसे स्कूल के बारे में पूछताछ रही और साहिल फर्श पर बैठ कर अपनी कारें चलाता रहा "उस वक्त । भी साहिल मुझे बहुत अच्छा और प्यारा लगा था"उसके घने बाल बार- बार सरक कर उसकी आंखों पर आ जाते थे और वह उन्हें अपनी बांहों से समेट कर ऊपर कर लेता था। मैंने उससे पूछा था, "साहिल ! आपको और खिलौने चाहिए ?" तो उसने अपनी चमकती आखों पर से बाल हटाते हुए कहा था, "मेले पाछ बात छी कारें हैं आंटी "छायकिल, टक, जीप, फेंड..." मैं उसकी तुतलाती बात ठीक से नहीं समझ पायी थी, तो उसकी मां ने साफ कर दी थो, 'ये ट्रक को टक ही बोलता है, और इसका फंड है टेडीबीयर, फैड पुकारता है उमे।" साहिल को इन बातों से सरोकार नहीं था, वह तब तक उस कमरे में भाग गया था, जिसमें के०जी० के बच्चों के खिलौने रखे थे.. कांच की बड़ी खिड़कियों के उस पार सब कुछ दिखाई पड़ रहा था। इमारत के पीछे ही पहाड़ियां और चीड़ के पेड़ थे "और उस कमरे में अकेला खड़ा साहिल एक हवाईजहाज से खेल रहा था। शायद चीड़ के पेड़ो को देख कर ही मुझे साहिल के बालों का ध्यान आया था। उसके बाल चीड़ के गुच्छे की झालर की तरह थे वैसे ही ओस से घुले, चिकने और चमकदार । अपनी बातचीत, ढंग, उठने-बैठने और खिलौनों से खेलने और चीजें भागने और फिर स्कूल धार बच्चा लगा था। वह अपनी मां के लिए बोझ नही था। नही तो ज्यादातर चिड़चिड़े और जिद्दी बच्चे, या पैसे की ज्यादती और प्यार की कमी से बिगड़े हुए बच्चे ही हमारे पास पढ़ने, या समझिए, , अच्छा, थोक है...123 . . भरती होने आते हैं। उनके घरों से पैसे तो बराबर आते रहते हैं वक्त- वेवक्त स्कूल डोनेशन के लिए रुपये भी खुले हाथ से मिलते रहते हैं, लेकिन महीने में एक बार अपने बच्चे से मिलने के लिए उनके मां-बाप कभी-कभी नहीं आ पाते, माएं तो फिर भी आती हैं बाप शुरू-शुरू में एकाध बार आते हैं, फिर ज्यादातर नहीं आ पाते । साहिल को भी पहली बार लेकर स्कूल देखने के लिए शायद उसकी मां अकेली आयी थी, यही मैंने समझा था। लेकिन शाम को जब मैं कुछ मामूली-सी शॉपिंग के लिए निकली थी, तो बस्ती के सबसे बड़े डिपार्टमेटल स्टोर में साहिल की मां एक साहब के साथ कुछ खरीदारी कर रही थी। सूखे मेवे, ऊनी शाल और शहद वगैरह । उन्होने ही मुझे देखा था। "ओह आप ! "सुनिए"आप साहिल के स्कूल की प्रिसिपल हैं... और ये साहिल के पापा ! माई हस्बैंड..." "आप स्कूल देखने नही आये ?" मैंने साहिल के पापा से पूछा था। "जी, बच्चों के स्कूल वगैरह माओ को ही देखने चाहिए । इफ दे फील सेटिस्फाइड, देन इट्स ऑलराइट..." उसके पापा ने कहा था। "वैसे भी ये अभी दोपहर बाद यहा पहुचे हैं.."मैं तो साहिल को लेकर कल शाम ही आ गयी थी..." साहिल को मा ने बात साफ कर दी थी। "साहिल कहां है ?" मैंने पूछा था । "वही होटल में खेल रहा है, आया के साथ..." "बहुत प्यारा बच्चा है साहिल.. अपने बोडिंग स्कूल मे उसे रख कर मुझे बहुत खुशी हासिल होगी!" मैंने कहा था। "थैक यू"टीचर "ही विल नॉट बी ए प्राब्लम चाइल्ड फार यू..." साहिल के पापा ने बहुत विश्वास और पुख्ता तरीके से कहा था, "स्कूल कब से खुलेगा?" "अगले महीने 15 तारीख से..." मैंने जवाब दिया और नमस्ते करके चली आयी थी उस वक्त तक बस्ती का बाजार धीमा पड़ चुका था, अंधेरा उतर चुका था और चीड़ के चिकने मुलायम पत्तों के बीच से सर्द हवा बहने लगी थी, एक पल के लिए मुझे साहिल के वाल याद आये थे अगर वो बाहर सेल 1 24/इतने अच्छे दिन.

रहा होगा, तो चीड़ के पतों की तरह ही यह सर्द हवा उसके बालों को भी सहला रही होगी। मैं अपने बैंग का सामान संभालती हुई उतरती पगडंडी से अपने घर की ओर चली गयी थी। दूसरे दिन साहिल के मां-बाप दोनों आये थे। उन्होने साहिल की पूरे सेशन की फीस का चेक दिया था। उसके जरूरत के समान की लिस्टें मुझसे ली थी और साहिल के खिलोनो का एक बक्सा मेरे पास छोड़ कर चले गये थे, क्या फायदा" अगले महीने तो साहिल बोडिग हाउस मे आएगा ही, तब दोबारा लाना पड़ेगा। यह बक्सा हम यहीं छोड जाते है उसकी साइकिल और बडीवाली मोटरकार भी। "स्कूल में बच्चों के खेलने के लिए किसी चीज़ की कमी नहीं है..." मैंने कहा था, "साहिल अगले महीने आयेगा'"तब तक..." घर पर उसके पास और तमाम खिलौने हैं।" साहिल की मां ने कहा था और वे दोनों सब कुछ तय करके चले गए थे। यह अच्छा भी था। क्योकि पहली बार मे छोड़ा हुआ बच्चा कभी- कभी बहुत ही उदास हो जाता है उसकी दुनिया ही बदल जाती है और वह समझ ही नहीं पाता। तब इन बच्चों की मासूम आंखों के खामोश सवालों के जवाब देना बहुत मुश्किल होता है। इन्हें इनके बिस्तरों में सुलाते वक्त कोई थपकी काम नही देती "घंटों ये सुबकते रहते हैं, कभी वेहतर रो भी पड़ते हैं, पर कैद पंछियों की तरह सुबकते-सुवकतै सो जाते हैं । सुबह इनकी मासूम आंखो की पलकें भारी होती हैं और आंसुओं के हलके रेतीले निशान बाकी होते हैं फिर ये हिलमिल जाते हैं । दूसरे बच्चों को देख कर सब कुछ भूल जाते हैं और सुबह के उजाले में दिखाई पड़ती दुनिया के बारे में अचरज से भरे अपने छोटे-मोटे सवाल करने लगते हैं । 'आंटी वो त्या है?' 'मैडम वो क्या है ?' फिर शाम तक के लिए उनकी दुनिया बस जाती है । खूब मस्ती करते हैं। कंपाउड में सेलते हैं, अपने क्लाम में बैठ कर घर बनाते हैं। टूटे हुए पहिये जोड़ते हैं । कागज पर रंगीन पेंसिलों से अपनी दुनिया में रंग भरते हैं । चिड़िया, हाथी और मम्मी-पापा बनाते हैं । लेकिन सोने से पहले फिर बहुत अकेले हो जाते हैं। न सोने की जिद करते हैं। अच्छा, थीक है."/25 फिर अपने-आप उनकी पलकें भारी हो जाती हैं और वे एक मिनट में सो जाते हैं। कुछ दिनों बाद फिर खुद ही बोलने लगते हैं-"मैं छोने जा रहा साहिल के मां-बाप पलने लगे, तो एक ही बात मुझे खटकी थी। साहिल की मां का आंसुओ से भीगा हुआ छोटा-सा रूमाल कुरसी के पास पड़ा रह गया था। क्योंकि साहिल को बोडिंग में दाखिल कराने की बात. चीत के दौरान उसकी मा की आंखें कई बार भर आयी थी और उन्होने उस रूमाल से अपनी आंखों को सुखाया था। पड़े हुए रूमाल को साहिल के पापा ने देखा था और बलते-चलते अपनी पत्नी को उन्होने हलके से टोका था, 'तुम्हारा रूमाल !' साहिल की मां ने दो कदम पीछे पलट कर अपना रूमाल उठाया था, जिसे उसका पापा भी उठा कर दे सकता था। उस रूमाल में प्यार के आसुओ की कहानी लिखी हुई थी। लेकिन साहिल के पापा के लिए वह कहानी शायद जरूरी नहीं थी। बस, इतनी-सी बात मुझे खटकी थी। साहिल के मां-बाप अपने होटल चले गये थे। वे उसी दोपहर शहर लोट जानेवाले थे और अगले महीने साहिल बोडिंग हाउस में रहने आने घाला था। लेकिन एक सुबह इमी बीच, जब हवा जरूरत से ज्यादा सर्द थी और चीड के पेड सुबह के कोहरे मे सहमे हुए खहे थे, मैं अपनी बहन को रिमीव करने बसस्टैंड पर गयी थी। वह ओवरलाइट बस से आ रही थी। कोहरा बहुत गहरा था, और शायद इसी वजह से ओवरनाइट बस लेट हो रही थी। काफी लोग वसस्टेड पर बस के इंतजार मे खडे थे, क्योकि इमी बस से सब्जिया आती हैं, दूध आता है, कभी-कभी बस्ती को बाकी रसद और सुबह का एक दिन पुराना अखबार आता है। इस ओवरनाइट बस से बस्ती के व्यापारी ही ज्यादा सफर करते हैं । शहर से सारा सामान लाने के लिए। इसीलिए इस बस को हम लोग रसद- बस पुकारते हैं। मुझे ताज्जुब हो रहा पा कि इस रसद-बस से सफर करने की बात 26/इतने अच्छे दिन.

- मेरी बहन ने क्यों तय की? ज्यादा आरामदेह एयरकंडीशंड डीलक्स बसें भी चलती हैं और सैलानी व वस्ती के पढ़े-लिखे, खाते-पीते लोग ज्यादातर इन्ही अच्छी बसो में आते हैं। वसअड्डे पर चाय की दुकानों के पास छोटा-मोटा जमघट था। कुछ कुत्ते दुबके हुए सुलगती अगोठियों के पास बैठे थे। एकाघ मजदूर अपनी झल्लियां टिकाये, उन्ही के सहारे आराम कर रहे थे। बाकी दुकानें अभी बंद थी और कोहरे की चादर में लिपटी हुई थी। शहर से आनेवाली पहाडी सडक कोहरे को सुरग ही बन गयी थी और पीछे की पहाड़ियां बिल्कुल गायब थी। सर्द हवा से सिर्फ चीड़ के पेड़ कुछ रेशमी-सी बातें कर रहे थे। और चीड़ के पत्ते हलके से हाथ हिला-हिला कर शायद आनेवाली रसद-बस को बुला रहे थे। कोहरे की वजह से आने वाले की आहट पहले आती थी, उसके कदम बाद मे। तभी ऊपर को आतो कोहरे की सुरंग मे से घरघराहट की आवाज आई फिर बस की रोशनियां पिघलते हुए मोम की तरह झिलमिलाने लगी। रसद-बस पहुच गयी थी। बस के रुकते ही रात भर के थके लोग अपनी चादरें, कंबल और दोहरें ठीक करते उतर पड़े थे । दो-तीन लोगो के बाद मेरी बहन उतरी, उसके चेहरे पर थकान, या रात के सफर के कोई खास निशान नहीं थे। वैसे भी वह उम्र मे मुझसे छोटी है और शहर की यूनिवर्सिटी में लायब्रेरियन है । उसके पीछे उतरेनेवाले भादमी को मैंने तब जाना, जब उसने मेरी जान-पहचान करवायी। वह आदमी 29-30 से ज्यादा का नही था । पढा- लिखा जहीन, पर वक्त का मारा लग रहा था। वे दोनों ओवरनाइट बस से साथ-माथ आये थे और उनकी जान-पहचान बस में ही हुई थी। यह मुझे तब पता चला, जब हम घर पर बैठे चाय पी रहे थे। वहन ने बताया, "आपा, इनका नाम चद्रशेखर सिन्हा है। ये पहले यूनिसिटी कॉलेज मे लेक्चरार थे, फिर किसी प्राइवेट फर्म में चले गये । वहां से इनकी जिंदगी ने एक तकलीफदेह मोड़ ले लिया है और ये यहां अपने बच्चे की तलाश में आए हैं। इसी सफर में हमारी जान-पहचान हुई। मैंने कहा, मेरी आपा बच्चों के एक बोडिंग स्कूल की प्रिंसिपल हैं, वो अच्छा, थोक है"/27 आपकी शायद कुछ मदद कर सकें।" चंद्रशेखर ने मुझे देखा, मैंने उसे । बहन चाय पीती रही। "आप अपने बच्चे की तलाश में आये हैं। मैं बात को समझ नहीं पायी । आपका बच्चा खो गया है क्या?" मैंने पूछा! "जी नही । अब आपसे क्या छपाना । और इस झूठी इज्जत में क्या रखा है।" कहते-कहते चंद्रशेखर कुछ अटका, तो मेरी बहन ने शह दी, "वता दीजिए। बता दीजिए। आपा बहुत मॉडर्न हैं । इनके सामने आपको शर्मिदा नहीं होना पड़ेगा।" मैंने गौर से बहन को गौर चंद्रशेखर को देखा, कही पर कुछ अटकाव था, तो बहन ने बात को एक गहरा मोड़ दे दिया, "आपा, बस मे हमारी बातचीत अदव लिटरेचर से शुरू हुई थी। मैं मुंशी प्रेमचंद की ट्रांसलेटेड कहानियां पड़ रही थी, तो इन्होंने टोका था-आप मुंशी प्रेमचंद को अगरेजी में पढ रही हैं, बस, बाचचीत वहीं से शुरू होते-होते मुंशी प्रेमचंद के तमाम किरदारो से होते हुए हम प्रेमचंद के खयालातों-विचारों पर आ गए और उनकी महाजनी मभ्यतावाली बात पर अटक गये।" "जी हा।" चद्रशेखर ने कहा, "प्रेमचंद के अलावा और कोई लेखक ही नहीं, जिस पर मिल-जुल कर बात की जा सके। उन्हे सभी पढते हैं, या किसी वक्त पढ़ चुके हैं । नहीं तो, ज्यादातर जिस लेखक को आपने पढ़ा है, उसे मैंने नही पढ़ा है, या जिसे मैंने पढ़ा है, उसे आप नहीं जानती।' मुझे चंद्रदीयर की बात अच्छी लगी। क्योकि प्रेमचंद्र और गांधी के बाद एक फोम तो बन चुकी है, लेकिन इस मिली-जुली कोम के जहनी सवाल अभी कॉमन नहीं बन मके हैं। वो अभी तक हिंदू या मुसलमानों, या फिरकी के सवाल बने हुए हैं । क्योकि उनकी बुनियाद नही बदा पायी है." पसे की पैदावार और दौलत ने हिंदुस्तान के एक मेक्शन की शक्ल बदल दी है उसने पैसे को अपना मजहब, अपना धर्म बनारसा है, लेकिन वह पैसे को दूगरों का मजहब या धर्म नहीं बनने देता। वह क्लास उनके लिए मंदिर या ममजिद बनया देता है, ताकि वो धर्म को दीवारों में तलाशते रहें । अचान या भारती में खोजते रहें । हवा मदं पी। कोहरा काफी छंट चुका था और पीड़ के मालरदार 28/इतने अच्छे दिन. .

पत्ते अपने हाथ हिला रहे थे। मुझे एकाएक लगा कि चंद्रशेखर के बाल भी चीड़ के झालरदार पतों की तरह हैं और वह भी उस बच्चे माहिल की तरह अपनी आंखों से बाल हटाता रहता है, कि तभी चंद्रशेखर बोल पड़ा, "देखिए मैं एक हारा हुआ आदमी हू ! इस महाजनी सभ्यता में मैं भी अपनी बीवी और बच्चे को हार चुका हूं। यहां वही जीतता है । जिसके पास पैसा है।" और इतना कहते-कहते चंद्रशेखर तकलीफ की अंधेरी दुनिया में उतर चुका था, वह बोलता गया, "इसमें न मेरी गलती है, न मेरी बीवी की... लेकिन हम एक दोगली अर्थ-व्यवस्था में रह रहे हैं। यही वह महाजनी सभ्यता है; जिसकी तरफ प्रेमचंद ने बहुत पहले इशारा किया था। मैं प्रेमचंद के फलसफे मे नही जाना चाहता । मैं अपनी जिंदगी के सफे पलटना चाहता हूं।" और उसने-चंद्रशेखर ने—जो सफे पलटे, वो ये थे- सफा एक : मैं प्राध्यापकीय जिंदगी छोडकर कुछ और क्रिएटिव करना चाहता था, इसलिए मैंने कॉलेज की लेक्चररशिप छोड़कर एक प्राइवेट कम्पनी मे नौकरी खोज ली। यह प्राइवेट कम्पनी नयी थी और बहुत तेजी से विकास कर रही थी। उसके मालिक खेमराज ने देखते-देखते एक सल्तनत बना ली थी। पैसे से पैसा बनता है, यह वह मानकर चलता है। और जो वह तय कर लेता है, उसे हासिल करके रहता है। फैक्टरी की ब्रांच के लिए उसे एक प्लाट पसंद आ गया था। उस प्लाट को पाने में बड़ी दिक्कते आयी, लेकिन वह खरीद कर रहा। इस नयी नौकरी में एक सुविधा यह दी कि अपनी पत्नी साथ मैं कम्पनी के गेस्ट हाउस में रहने लगा। मेरी पत्नी विभा भी काम करने लगी। वह खेमराज की सेक्रेटरी के रूप में काम देखने लगी। विभा असम की है। यहां पश्चिम भारत में उसका कोई रिश्तेदार नहीं है, इसलिए हमारी जिंदगी चौबीसों घटे एक- दूसरे के इर्द-गिर्द ही घूमती थी। घरों के टूट जाने से, यानी ज्वाइंट फमिलीज के बिखर जाने से शायद एक अच्छी बात यह हुई है कि आदमी औरत के बीच में सच्चाई की जरूरत बढ़ गयी है। सफा दो : मुझे नही मालूम, कमजोरी के किन पलों में विभा और : अच्छा, ठीक है."129 खेमराज के सम्बन्ध हो गये और जैसा कि मैंने कहा कि आदमी औरत बीच सच्चाई की जरूरत बढ़ गयी है, उसी जरूरत के तहत विभा ने अपने सम्बन्धों वाली बात मुझसे मजूर की और यह भी उतनी ही सच्चाई से मंजूर किया कि वह इन सम्बन्धो को जारी नहीं रखना चाहती, क्योकि इस तरह के दोहरे सम्बन्धो के लिए उसकी आत्मा गवाही नहीं देती। सफा तीन : लेकिन खेमराज इसके लिए तैयार नहीं था। उसने जो पा लिया था, उसे वह छोडना नहीं चाहता था। नवनिकों ने अपनी नयी तहजीव की शर्ते पैदा कर ली हैं। यह शर्ते पहले नही थीं। सफा चार : खेमराज ने बिना हिचक मुझमे कहा था, "क्यो ? शेयर करने में क्या दिक्कत है ? मैं कीमत चुकाने को तैयार हूं। इस दुनिया में हर चीज बिकती आयी है, सिर्फ उसकी कीमत अलग-अलग होती है । मैं तुम्हारी बीवी और तुम्हारे बेटे, दोनों की कीमत चुका सकता हू !" मैडम यह आदमी का ईमान, या उसका विश्वास नहीं-उसका पैसा बोल रहा था। नयी महाजनी सभ्यता का पंसा, जो विश्वास और चाहत के रिश्ते बनाता नहीं खरीदता है। सफा पांच : इस खरीद-फरोख्त के बाजार मे मैं हार गया। मुझे नौकरी छोडनी पड़ी। सवाल रहने की जगह का था। सवाल घेटे की जिंदगी का भी था। नौकरी विभा ने भी छोड़ दी थी और हम भयानक अपमान और मजबूरी के हालात में फंस गये थे। हमारी सच्चाइयो के तीन टुकड़े हो गये थे। हर टुकड़ा सच्चा था, सही था या नहीं, यह बिल्कुल दूसरी बात है! अपनी जिन्दगी के ये पांच सफे खोल चुकने के बाद चन्द्रशेखर ने कहा, "मेरा बेटा खोया नहीं है। उसे यहा के किसी वोडिंग स्कूल में दाखिल कराने लाया गया है, मैं उसी की तलाश में आया हूं। मैं अपने बेटे से मिलना चाहता हूं।" कहते-कहते चद्रशेखर चाय का प्याला रखकर आंखों मे भर आये अपने आंसुओं का पूंट पी गया था। एक सदं झोका के पेड़ो के बीच से गुजर गया था। "यो अभी बहुत छोटा है, ममझेगा कुछ नही।" कहते-कहते चंद्रशेखर 30/इतने अन्दे दिन " का गला रुघ आया था, लेकिन उसने खांसने के बहाने बात बीच में ही छोड़ दी। "आपके बेटे का नाम क्या है ?" मैंने पूछा था। "साहिल सिनहा !" कहते हुए चन्द्रशेखर ने अपने बाल अपर किए थे, तो मुझे लगा था, साहिल अपनी बाह से अपने बाल ऊपर कर रहा है । "साहिल तो मेरे ही बोडिंग में आने वाला है।" "कब "कल ! कल 15 तारीख है। कल से स्कूल खुलेगा।" "वह पहले आया था ?" "हा। उसके मम्मी-पापा," कहते-कहते मैं अटक गयी थी। "मैं समझ गया "कोई बात नहीं। विभा ने खेमराज को अपना हस्बैंड बताया होगा । औरत को अपनी समाजी इज्जत रखने के लिए सब कुछ बोलना पड़ता है। मैं विभा की मजबूरी समझ सकता हू । साहिल तो अभी नासमझ है। तो कल साहिल आएगा!" चन्द्रशेखर की आंखो में युझी हुई चमक थी। "आना तो चाहिए, वो लोग उसकी साल भर की फीस का चेक भी जमा कर गये है।" मैंने कहा था। "आप एक एहसान करेंगी मुझपर ?" "क्या?" "साहिल की फीस के रुपये मैं भेजूंगा जा कर। कहीं से भी, कैसे भी और हमेशा भेजता रहूगा । आप खेमराज के पैसे मत लीजिए । प्लीज!" "यह कैसे हो सकता है । मैं तो उनका चेक ले चुकी हूं!' "तो उस चेक को आप रखे रहिए। मैं साहिल के पैसे आपको भेज दूंगा। प्लीज, कम-से-कम मुझ जैसे बदनसीब बाप की इतनी इज्जत तो रख लीजिए। "लेकिन मैं तो चेक केश करा चुकी हूं।" "ओह ! पैसे से तो मैं गरीव था हो." आज भावनाओं से भी गरीब हो गया। मैं मैं साहिल को शायद कभी नही समझा पाऊंगा कि मैं 'मैं उसके लिए क्या चाहता था। बड़ा होकर वो मेरे बारे में वही सच मानेगा, अच्छा, पीक है"/31 जो सच आज पैसे ने साबित कर दिया है। सर, गलत साबित होते रहने यो अलावा मैं कर भी क्या सकता हूं।" कहते हुए पन्द्रशेसर ने एक गहरी सांगलीपी। फिर वो मुझे और मेरी बहन को धन्यवाद देकर चला गया था। उसके बाद दूसरे दिन यह दूर बसस्टंड पर खड़ा नजर आया, जब साहिल की मां साहिल को छोड़कर जा रही थी... और साहिल वैतरह रो रहा था, वो अपनी मां को छोड़ ही नही रहा था। उसकी मां भी रो रही थी। तब मैंने साहिल की मां से कहा था कि बेहतर होगा, आप इसे बता कर न जायें "नहीं, साहिल बहुत समझदार है। बताकर नही जाऊंगी, तो ये मुझे कभी माफ नहीं करेगा!" साहिल की मां ने कहा था। "मम्मी, बताओ न, मुझे त्यों छोल के जा रही हो?" मासूम साहिल ने बिसूरते हुए पूछा था। साहित के वाल माधे से नीचे तक फैले हुए थे। सर्दी के बावजूद उमकी कनपटियो के रोयें पसीने से चिपक गये थे और उसकी आसू भरी आंखें बालों की मालर के पीछे से झांक रही थी। साढ़े तीन साल का साहिल जैसे अपनी मां से नहीं, पूरी दुनिया से ये सवाल पूछ रहा था-- मुझे त्यों छोल के जा रही हो ? त्यों-त्यों...? सच्चाइयों के तीनों टुकड़े मेरे सामने खड़े थे। लेकिन इन सच्चाइयों का सच वक्त की किसी सतह पर कही और था." तभी मैंने देखा, साहिल की मां ने मजबूर होकर उसे डांटा था, "साहिल ! ज्यादा जिद करेगा तो मार खायेगा। तुझे आंटी के पास रहना है और यही पढ़ना है समझा!" साहिल ने सहम कर अपनी मासूम आंखों से मां को देखा। "समझा ! ठीक है न!" साहिल को मां ने बहुत मजबूरी, लेकिन सख्ती से कहा था। "अच्छा ! पीक है।" और अपनी नन्ही-नन्ही हथेलियों पर अपने ही आसुओ के निशान देखता साहिल खड़ा रह गया था। 32/इतने अच्छे दिन'.

जामातलाशी ऐसा नहीं है कि हमारी बिरादरी नही है। पूरी कंट्री में हमारी बिरादरी फैली है। बापू जब कोकीन खाके बहकता था, तो बताता था लेकिन इससे पहले बापू के बारे में बता दूं ! मेरा बापू अखबार के कारखाने में फोल्डर था। उसका प्रमोशन जमादार से फोल्डर में हुआ था। जिस दिन उसका प्रमोशन हुआ, तो हमारे झोपर्डे में मछली की सिरी और तेल बना था"उसी दिन थोड़ी-सी चुस्की लेकर बापू ने कहा- "अपने बचवा को तो मैं आदी-द्राविड़ बना दूगा, मद्रास भेज के पढ़ी-लिखी लड़की से शादी करवा दूंगा."तव देखता हूं, इन साले बाहमनो को !..." बापू को चुस्की नहीं, गुस्सा चढ़ गया था. लेकिन इससे पहले आप यह तो जान लो कि बापू को ऐंगर क्यों चढ़ता था? ऐंगर होने का कारन था। बापू सैनिटरी कामगार मोरचा का संयोजक था । उसको सब नेताजी पुकारते थे। बापू ने प्रमोशन पर जो पार्टी दी थी, उसमें मोरू भी मौजूद था. लेकिन इससे पहले मोरू के बाबत इनफारमेशन दे दूं-मोरू हमारी बिरादरी का मेंबर है। मैं जब फोर इयर का था, तो हमारी मदर ने बापू को छोड़ दिया था। शी लीव माई बापू और वो मोरू के साथ चली गई पी। मेरी मदर बहुत समझदार औरत है"उसने मोरू को मौरिस करके बनाया और कश्मीरी गेट के एक होटल में बरा करके लगवा दिया। तभी से मोह तेल चुपड़े पत्तीदार बाल रखता है और मेरी मदर को बहुत रिस्पेक्ट करता है. पार्टी और औरत लोग का सवाल नहीं उठता। लेकिन मेरी मदर ने यापू मे वास्ते सालन भेजा था। उसको बापू की सव मादत और टेस्ट पता । जामातलाशी/33 है, तो अपना करके उसने सालन भेजा। सालन खाके बापू तिरुपति हो गया था। लेकिन इससे पहले बापू के बुरे डेज की बात बता दूं."अखबार के कारखाने में आटोमैटिक मशीन मा गयी थी "मशीन लगी, तो बापू वेकार हो गया। उसके साथ बीस-बाईस लोग करके भी बेकार हुए, उस टाइम मेरी मदर मोरू के साथ बापू को समझाने आयी-वो बहुत टीचर औरत है। उसने कहा--"मशीन से क्यों घबराते हो"मशीन कुछ दिन दुख देगी पर उसके बाद अपने लोग का उद्धार करेगी! जब ऊंची जात का आदमी अभी तक हमारा उद्धार नहीं किया, तो अब मशीन करेगी! .. पलश- संडास की मशीन दस बरस पहले देखी थी ? ."अभी फ्लश की जजीर- मशीन आई, तो हमारा उद्धार हुआ कि नही ? तब तक कोई और काम कर लो"फिर इसी मशीत से काम बढेगा, तो दूसरी तरह का काम मिलेगा!" हमने बताया न कि हमारी मदर बहुत टीचर औरत है। अब ऐसी टीचर औरत तो फोल्डरवाले की औरत करके नही रुकेगी? वो मोरू का वाइफ करके चली गई बापू बेकार हुआ, तो हमारी आदीन्द्राविड बनने वाली बात खतम हो गई। नहीं तो हम सेवेप भी पढ लेते, तो मद्रास जाके काम करते। आदी- द्राविड हो जाते, एण्ड उधर शादी बनाके लौट आते" खर वो तो नहीं हुमा। बापू और उसके वाईस लोग आफिस से लड़ते रहे "लेबर की छटनी कैसे हो सकती थी? आफिस वाले पगार देते रहे, पर काम नहीं दिया। इस यातिर बाईस लेबर उधर पिछली वाली सड़क पर गोल बना के बैठते, अखबार विछाते और दिन भर ताश-पत्ता गविल खेलते। गैबिल में बैठे. बैठे थक जाते, तो कोकीन साते. "उधर जामुन के नीच जिधर वर्कशाप बनी है, पीपल के नीचू उघर हो, जहाँ मठिया बनी है शंकर की। शंकर आदी-द्राविड है न, हम लोग का गौरा-पारवती का हस्वैड... उघर बापू बैठते, कोकीन पाते, तो हमारे को बधवा करके बुलाते। धीरे-धीरे कोकोन को घुटको चल निकली। बापू सबसे पैसा जमा करता, .. 34/इतने अच्छे दिन..

फिर हमारे को पान वाले के पास भेजता, उधर पुलिस के हेड-क्वाटर के पास । उधर चालू दुकान थी। रात तक माल मिलता था। लेकिन इससे पहले आपको बता दू कि उधर ही हमने जमुना के साथ पहला मीटिंग किया था। वह पान वाले का गलं था । उमका बापू कही कोकीन लेने गया, तो जमुना के साथ अपना मीटिंग एकदम जम गया। वो देखती, मैं देखता । मैंने बीड़ी मागी, तो उसने झिड़क दिया-~-बीड़ी मत पिया कर! "क्यों?" "सांस में बदबू आती है।" "तुझे जामुन अच्छी लगती है ?" "क्यों.. अच्छी लगती है, पर तुझे क्या ?" "क्यों, मुझे क्यों नही "फिर वोडी पीने को क्यों मना करती है ? तो जमुना की आंखें जुगनू की तरह चमकी और होंठ लाल हो गए." वो जल्दी-जल्दी पानो पर पानी छिड़कने लगी, तब तक उसका बापू आ गया और हमारा मीटिंग खत्म हो गया। उसके बाद तो जमुना बहुत बार मिली "मनी टाइम्स' राजघाट, विजयघाट"शातिवन "मैंने उसे हर घाट पर कसमे खिलावाई, उसने गांधीजी, नेहरूजी, शास्त्रीजी-सबकी कसमे खायो, लेकिन अपने को प्रामिज नहीं हुआ, अपना दिल प्रामिज नही करता था कि जमुना लाइफ लांग हमारा साथ देगी, फिर एक हम उसको बोला-~-देख जमुना, मैं दिल्ली शहर की लावारिस लाशें उठाता हूं."जिनका कोई नहीं, उन्हें मरघट तक पहुंचाता हूं." इससे पहले कि मैं आगे की बात बताऊं, जमुना के तपाक से पूछा लावारिस हो गयी, तो तू मेरी लाश उठायेगा?" मैं समझ गया कि जमुना प्रामिज नहीं निभायेगी। लावारिस लाशें उठाने के लिए मुझे दस रूपया मिलता था। दिन में दो-तीन लारों तो हो ही जाती थी."इनकम हमारी कम नहीं थी। वापू को हजार मिलता था, दो-ढाई हजार में सड़ा कर लेता.. "वापू हजार डेढ हजार तास-पत्ता गैविल मे हारता था, लेकिन उसका आधा वह कोकीन से जामातलाशी/35 - .. कमा लेता था पैसा तो ठीक ही था, लेकिन रिस्पेक्ट नहीं था। हमारे को कोई आदी-द्रविड़, वाल्मीकि, प्रणव या महार नही बोलता था। सब हमारे को मेहतर, चूडा और डोम ही बोलते थे! बापू को इसकी केयर नही थी। वह उस गदी सड़क पर अखबार बिछा कर ताश-पत्ता गैबिल खेलता, कोकीन खाता और ऊपर से जो जामुन गिरता, उसे गाली देकर एक तरफ फेंक देता जमुना को जामुन बहुत पसंद थी। मैं बापू की गे बिल पार्टी में कुछ समय के लिए चला जाता। खेलता नहीं था, पर जामुन वीनता था। जामुन में गूदा नहीं पड़ा था, गरमी बहुत थी और पावस भी नहीं हुआ था। जमुना जामुन तो ले लेती थी, पर अपने को प्रामिज बनता नजर नही आता था। काम तो हर दिन रहता था, लेकिन टाइम भी बहुत करके रहता था। जमुना का बापू जब अपनी दुकान का फट्टा बंद करके चलता था तो जमुना उसकी मोटरसाइकिल पर पीछे बैठती थी। आइ० टी० ओ० के पुल से पे जमुना-पार अपनी बस्ती में जाते थे। पीछे बैठी जमुना टार्च-बत्ती पकड़े होती। गयो रात पुल से क्रास करते, तो बहुत दूर से मैं उन्हें पहचान लेता था। जमुना को टाचं-वत्ती कही-कही जलती-बुझती रहती थी। यह तो जमुना को भी पता था कि आधी रात गमे में कभी-कभी उसके रास्ते में खड़ा रहता हूं। किसी अंधेरे टुकड़े में, उसने भागती मोटरसाइकिल से टाचं-बत्ती करके दो-चार बार हमारे को देखा भी था। उसका बाप तो पुलिसवाले की तरह दनदनाता चला जाता था। "कल तूने मुझे देखा था?" "नही तो!" जमुना कहती थी, तो मुझे प्रामिज टूटता लगता था। "तू-टा-वत्ती लेकर क्यो चलती है ?" "कही बापू की गाड़ी खराब हो जाए तो?" "मैं गाड़ी खरीद लूं ?" "क्यों?" "तेरा टाच-बत्ती धमकाना बहुत अच्छा लगता है।" "दिन में कोई टाचं जलाता है?" "क्यों, रात में कभी नहीं बैठेगी?" 36/इतने अच्छे दिन.

जमुना रेनो रिप्लाई कर दिया। उसके बाद मेरा टाइम ज्यादा करके मुर्दाघरों के आसपास ही पास होता । मुर्दो को महक, कच्चे बर्फ की महक और मुर्दाघरों से बहती मुर्दा गनी की नालियो लाशों के लोथड़े। मैं मदर के पास जाना चाहता था, उसका कंसल्ट जारी लगा। कोंपड़े पर पहुंचा, तो पता चला कि वो मि०मोरिस के साथ रहको पली गयी है। मोरू को रुड़की के किसी अच्छे होटल मे भांस मिल गया था। वस इसके बाद सब प्रोकन करके होता चला गया। मापू भाधा पागला-हॉफ मैड हो गया "वह इग्लिश बोलने लगा। झोंपड़े में बैठ के रोता रहता था। लेकिन इससे पहले आपको यह तो पता दूं कि झोपड़ा भी बापू का नहीं है। आपको दिल्ली आइ० टी० ओ० का पता है। उसी के अपोजिट पुलिस दफ्तर है। वही, जहाँ जमुना की दुकान है। उसी के बैंक पर टूटी- फूटी सड़कें पड़ी हैं । एक कचरा मैदान पड़ा है, जिस पर कोई आचार्य नरेंद्रदेव भवन नाम का पत्थर लगा है । अरुणा आसफ अली ने उसका इन- मागुरेट किया है, उस मैदान में हमारी बस्ती के चिल्डरल फटा कागज, प्लास्टिक, लोहा-लंगड़ करके, मतलब,कि रंग पिकिंग करते हैं । उगी कचरा मंदान से एक सडक जाती है। मोड़ पर टाइगरयाला पाइप लगा है । उसी मोड़ के पीछे बस्ती है । उसी बस्ती मे झोपडा है । यह झोपड़ा बापू का नही । ईमान करके बताऊं, तो यह झोंपड़ा मेरी भांटी मेरी बुआ का है। आंटी-बुआ का आदमी तमितनाडू में जा के तोटी हो गया तोटी से वह मादी-द्रविड़ बनता "बना, नही बना, इसका कोई इन्फार्म हमारे पास नहीं है। पर जब वह गया, तो आंटी-युआ के पास तीन घोतियां थी। वह नहीं लोटा, तो एक धोती रह गयो। टाइगरवाले नल पर तो नहाना मुश्किल है "चलती सड़क है। वैसे बस्ती के लोग ही गुजरते हैं और हमारी वस्ती में किसने किसको नंगा करके नही देखा, लेकिन टाइगर नल पर भगा नहाने में तो फरक है, इस खातिर आंटी-बुआ अखबार कारखाने के बाहर बने चुंगी के यूरीनल में नहाती थी। उधर बराबर करके पानी आता है। जब तक अपनी धोती सुखाती थी, तब तक वो यूरीनल में छुपने जामातलाशी/37 रहती थी। बस, उसका फायूँन खुल गया। लाटरी का टिकट बेचने वाले ने उसे देखा, दो धोतिया दी और अपने घर ले गया। तभी से बापू ने आंटी- बुआ के झोपड़े पर क्रोचमेट कर लिया। अब आधा पागल बापू चीखता है-इंग्लिश बोलता है--"हमारा बड़ा-बडा नेता लोग दादा सामंत, कोल्हटकर सब बोला "असवार कारखाने मे आटोमेशन से बेकारी बढ़ेगी "तुम कंपूटर लगा के लेबर के पेट पर लात मारोगे "आटोमेशन कंपूटर करने का है, तो नया बनता कागज मिल मे कंपूटर तगाओ। पुराने कारखानो में आटोमेशन मत लाओ! कपूटर इधर लगाने का है, तो लेबर को टेनिंग दो.. पर सब साला कान में तेल डाले घंठा है । साला.पूरा कंट्री बाहमन हो गया है। ऊपर से तेरी माई मुझको टीचिंग देती है-मशीन अपने लोग का उद्धार करेगी ! मेरा उद्धार करके खुद मोरू के पास चली गयी ! अरे तेरी माई बहुत अच्छी थी बचवा बहुत अच्छी थी रे" .. और वापू मदर को याद कर-करके रात भर रोता रहा। वाहमन हो गए कंट्री को कोसता रहा। । अपना दिल भी टूटता था। इस करके कि जमुना ने शादी कर ली थी। हमने उसका शादी मान लिया। तब सोचा, कुछ और किया जाए। हमने वर्कशाप का रास्ता पकडा। लावारिस लाश उठाना बंद कर दिया। वर्क- शाप में वही - पाना दे, आठ नंबर न्यूट्रल में डाल.."जब तक सीखा और सैलरी लगने का टाइम आया, तभी एक रोज-दिन मंगल करके था, कैटीन का बलराम आया, उसने बताया कि जमुना ने मिट्टी का आइन डाल के आग लगा ली है। मैं अस्पताल पहुंचा, तो जमुना वार्ड दो बलिंग में पड़ी हुई थी। उसका हस्वैड, बापू, रिलेटिव सब मौजूद थे। पुलिस बयान ले गई थी जमुना की जली हुई वॉडी नंगी पड़ी थी, ऊपर लाल कबल टेट था. आठ खाली बोतल ग्लोकोज को नीचे पड़ी थीं। वह पानी के लिए तरस रही थी चीखती थी मैं तो आधा बेहोश हो गया था। जनुना के जले हुए होठ बाहर तक फैल गए थे, जो कभी लाल हो जाते थे। ऐठी हुई अकड़ी हुई हाय की उंगलियां, जला हुआ पेट, पीठ पर पीपल के पीले पत्तो जैसे दाग, उघड़ी .. 38/ इतने अच्छे दिन...

और जली हुई खाल" मुझे उसके बापू के अलावा कोई पहचानता नहीं था। मैं कांच की खिड़की के पास चिपका उसे देख रहा था। उसका हस्बैंड बाहर खड़ा था। जमुना के होंठ कभी जामुन खाये लगते थे, कभी जले हुए ! पानी को तरसती. छटपटाटी... तभी दो लोग उसकी चूड़ियां और बिछुए काटने आए । जमुना की बॉडी फूल रही थी। चादी को चूड़ियां कलाइयों में कस रही थीं। कांच की चूड़ियां तो नसों ने पहले करके ही तोड़ दी थी। चूड़ी काटने वाले भीतर गए, उनके हाथ के गिरगिट की शकल जैसी कंची थी । मुझे मोड़ का टाइगर नल को याद करके आया। चूड़ी काटने वाले जमुना के बिस्तर तक जाकर लौट पड़े,"कुड़ी ते टुर गई !' डाक्टर आया । उसने अक्सीजन दी। कुछ देर बेट किया, पल्स देखी, आखें देखी और हाथ हिलाकर चला गया । तभी दरोगा मा गया। कुछ देर तो उसने कुछ नही बोला फिर कोई दफा बोलने लगा-308.498... उसने जमुना के हस्बैड और घरवालो के लिए पूछा, पता लगाया, पर उसके बापू के अलावा कोई नहीं था। जमुना के हस्बैड को पुलिस ने एक्यूज बनाया था। उसका हस्बैड पुलिस को तड़ी देकर भाग गया था। थानेदार चीखा था-"साला भाग के कहां जाएगा!" जमुना की नंगी लाश को तब तक अस्पताल के खलासियों ने चादर मे जैसे-तैसे लपेट दिया था। उसकी बॉडी दो चादरो के बाद भी इधर- उधर से निकल पड़ती थी। उस टाइम रात थी। पहिये वाले स्ट्रेचर पर उसकी बॉडी डाल कर वे उसे मुर्दाघर में ले जा रहे थे । मेरे पैर नही रुक पा रहे थे। अंधेरे में मैं पीछे-पीछे चलता गया । अस्पताल में सन्नाटा था। स्ट्रेचर के पहिये थे, उनकी आवाज थी और पानी की थैली की तरह थरथराती जमुना की बॉडी थी। मुर्दाघर में शायद बर्फ नहीं था, या जगह नही थी। स्ट्रेचर वाले उसे एक वापरूम में ठेल गए। कुछ देर वे बाहर बैठे बीड़ी पीते रहे, फिर शायद सोने चले गए। जामातलाशी/39 मैं अंधेरे में खड़ा रहा। तभी आइ० टी० ओ० के पुल से जमुना के वापू को मोटमाइकिल पास हुई । जमुना ने टार्च-बत्ती चमकायो । गाड़ी रुक गई । सिर्फ जमुना मेरे तक आई। पास आ के सॉफ्ट बोली, "सुनता है "मैं लावारिस हो गई, तो तू मेरी लाश उठायेगा?" मैंने तब बाथरूम का दरवाजा खोला । घुप्प अंधेरा था। एक पाइप धीरे-धीरे टपक रहा था। सिर्फ उसको साउंड थी। कांच की एक मटमैली खिड़की पर उजाला था। बाथरूम में जमुना की महक थी। मैंने बाथरूम का दरवाजा भेड़ दिया। मैं जमुना के पास खड़ा था। अपने को फिर प्रामिज नहीं हुआ, लेकिन में जमुना को जिलाना चाहता था। उसे छुओ, तो वह हिलती थी, पर उसमें सांस नहीं आती थी । नल सांस ले रहा था। मैंने जमुना को हलके से छुआ, तभी एक छिपकली जमुना की बॉडी पर से निकल गई। चादर का एक मिरा कांप गया। मैं भी शेक हो गया। अंधेरा और बढ़ गया । सन्नाटा भी बढ़ गया। गरमी और उमस भी। छिपकली भी दीवार पर जाकर बोलने लगी। मुझे नहीं मालूम, मैं बाथरूम में कब सो गया। वह तो तब पता चला, जब रात वाले हवलदार की आवाज ने मेरे को साला-हरातजादा' करके जगाया। स्ट्रेचर वाले भी खडे हुए थे। मुझे उमी वक्त हिरासत में ले लिया गया और थाने में एक जनजनाता हुआ थप्पड़ मेरी कनपटी पर पडा, "तलाशी लो साले की। चूडियां चुराने गया था ! जानता है, माले ये तिलक रोड थाना है !" फिर दूसरा मुक्का मुझे जमुना के हस्बैडवाली वस्ती के थाने में पडा, "जानता है साले, ये मंगोलपुरी थाना है !" तीसरा इंडा मेरे घुटनों पर पडा, "जानता है साले ये दिल्ली गेट थाना । और चौपा जब पड़ा, तो मुझे होश नही था। मैं मगह दिन बाद लौटा । टूटा-फूटा ब्रोकन । झोंपड़ा खाली पड़ा था। यापू नहीं पा । पांच-सात रुपये थे, वे भी तलाशी में निकल गए थे। मेरी 40/इतने अच्छे दिन बोन-बोन दर्द कर रही थी बेहोशी की तरह नीद सता रही थी। मैं लेट कर करवट बदलता कि किसी की आवाज आई, "ये तो यहां पड़ा है ! इसका बापू तो इसे खोजते-खोजते मर गया !" "कहां है बापू ?" "उधर पड़ा है।" "मैं तो समझा था, बापू कोकीन खा के कही पड़ा है । लेकिन वह तो मरा पड़ा था राजपाट वाली रिंग रोड पर वह किसी ट्रक से टकरा गया था । ट्रक वाला तो भाग गया। बापू पड़ा-पड़ा मर गया। कोई पढ़ा-लिखा होता, तो नंबर नोट करता। बापू की लाश एक मेली धोती से ढकी पड़ी थी। अब और कोई चारा नहीं था। मैं बापू की लाश लाद कर दिल्ली गेट चौराहे तक ले गया। उसे वहां कबूतर बाले तिकोने पर लिटा कर मैं कंडोलेंस करते बैठ गया था। उसका मुंह मैंने खुला रहा था । लोग प्रामिज कर सकें कि मेरा बापू सचमुच मर गया है। किरियाकरम के लिए रुपया-दो-रुपया मांगने में शाम तक करके थक गया था। कबूतर उड़ गए थे, लेकिन कबूतरों के दाने पड़े थे बापू की लाश पर वहुत-से पसे पड़े थे। मैंने पैसे बीने, काउंट किए, तो दो सो उन्नीस रुपये थे। दो सौ उन्नीस! तभी मेरे मन में खोट आई थी दो सौ उन्नीस रुपये ! यह कठिन घड़ी पी, करेक्टर का सवाल या। प्रामिज का सवाल था दो सौ उन्नीस रुपये ! अंधेरा हो रहा था। शंकर-आदी-द्राविड़ को मठिया का पुजारी भी तो चढ़ावे का पैसा ले कर भाग गया था फिर लाश और पत्थर में क्या चेंज है ? बापू की लाश भी तो पपरा गई थी। अब लोगों का आना-जाना कमती हो गया था। मिनेमा वाले लोग डिलाइट में घुस चुके थे । सट्टा बाजार सूना पड़ा था। अंधेरे में एकाध रिक्शा वाले को घंटो सुनाई देती थी। राजघाट तक सन्नाटा था। मैं बापू की लाश को वही छोड़ कर भागा था। जामातलानी141

निजामुद्दीन से गाड़ी पकड़ कर सीधे आगरा निकल गया था। तब से
पाठ बरस हुए। दो सो उन्नीस रुपये से घंधा चल निकला, घर बस गया।
लेकिन इससे पहले मैं आपको बता दूं कि जब दिल्ली दुबारा आके
बसा-यह लखनी तो मुझे आगरा में ही मिल गई थी"तभी से वाइफ है।
तो पुलिस ने मुझे पहचान के पकड़ा था । लखनी को भी। एक झापड़ मेरे
दिया था, "साले जानता है, ये अजमेरी गेट थाना है!"
"जानता हूं सरकार !"
"तब !" थानेदार कडका था, "अपने बाप को मार के भागा था!
वही है न साले"तेरी तो जन्मपत्री यहां रखी है। इसे कहां से भगा के
लाया है ?"
लखनी थरथरा गई।
"इधर खोचा लगाता है ! लोगों का धरम विगाड़ता है !"
"नही सरकार!"
"तब ! संभाल के रख अपनी औरत को, नहीं तो कोई भगा ले
जाएगा!" इस बार मैं भी शेक हो गया। लखनी ने मेरी वांह पकड़ ली।
"एक केस में गवाही देगा? पूछ ले अपनी औरत से..."
"कसा केस सरकार...?"
"यही कि तेरी औरत सो रही थी, तभी बग्गा मोटर वाले ने इसके
साथ बदसलूकी और जोर-जबरदस्ती की..."
"लेकिन साब..."
"पूछ ले अपनी औरत से...! डाक्टरी जांच में कोई परेशानी नहीं
होगी. कोई साथ चला जायेगा!"
मैंने बिना पूछे ही कहा था, "लेकिन साब..."
"क्यों ? रात सोया नहाया बाहर जा के पूछ से इससे, या के
बता!"
थाने के बरामदे में ही पागलों की तरह लखनी ने मुझे पकड़ लिया
था। मैं सड़ा था, पर लखनी ने बैठ कर मेरी टांगों में मह रस लिया था।
यह बुरी तरह सिसक रही थी। मैंने साथ वठकर उसे बहुत पेशेस दिया।
संघ-नीच हाई ऐड फाल बताया, पर लसनी कभी मेरे पैरों पर दोनों हाय
42/इतने अच्छे दिन...

रखली, कभी घुटनों पर । कभी हाथ पकड़ती, कभी बाहें थाम लेती, कभी मेरी खुली शर्ट में मुंह घुसा कर बिखलती... मैंने बहुत पेशेस दिया." उसने लाचार आंखों से मेरी आंखों में देखा"आंख हटा-हटाकर मेरे पूरे फेस, कंधों, बाहों, हाथों, घुटनों और नाखूनों को देखा । पता नहीं, वो मुझमें क्या देख रही थी, तभी उसने एक गहरी गरम सांस ली। मुझे लगा, वो मान गई है। लेकिन उसकी आंखों ने आखिर में बताया कि वह नहीं मानी है। इतना बहुत था। मेरा हाथ उठ गया और एक जन्नाटेदार थप्पड़ मार कर. मैं चीखा, "साली जानती है, मैं कौन हूँ ?" लखनी का बॉडी जैसे झुलस गया था। उसके होंठ अंगारों की तरह दहक रहे थे, बुझ रहे थे। वो चीख के बोली थी, "हमें नहीं मालूम, तुम कौन हो । मैं बयान न दूगी। मैं डाकदरी नहीं कराऊंगी। मैं मिट्टी का तेल खिड़क के मर जाऊंगी । देख लिया तुझे.. मेरी इज्जत नही है क्या ?" कह के लखनी थाने की सीढ़ियो से उतर गई थी। मैं भीतर पहुंचा । थानेदार ने देखा, "पूछ लिया ?" "वो नहीं मानती सरकार !' थानेदार कार्वन से लिखे कुछ कागज देख रहा था? उसी पर किसी की एक फोटो नत्थी थी। उसने बिना सिर उठाए जोर से 'हू' किया और फोटो को उंगली से टेढा करके उस तसवीर का हुलिया पढ़ने लगा--"कद पांच फुट आठ इंच, रंग सदली..." पड़ते-पढ़ते बीच मे थानेदार बोला, "बैठ जा, बैठ जा । चाय पी. इसे चाय देना!" चाय लेकर आए अर्दली से थानेदार ने कहा। मैंने राहत की सांस लेकर प्याला मुंह से लगाया । चाय में मिट्टी के तेल की महक आ रही थी। जामातलाशी/43 इन्तजार । रात अंधेरी थी और हरावनी भी। झाड़ियों में से अंधेरा झर रहा था और पथरीली जमीन में जगह-जगह गड़े हुए पत्थर मेंढकों की तरह बैठे हुए थे। विजिलांते के बूटों की आवाज से दहशत और बढ़ जाती थी। हवा हमेशा की तरह वीतराग थी. "लोगो में सनसनी या दहशत दौड़ जाती है पर हवा उसी तरह खामोश आवाज में गाती, सरमराती रहती है । हवा की आवाज तभी टूटती है जब विजिलाते टीम के बूट रेत या घूल के कार्पेट पर सप्-सप करते हैं या मेंढकनुमा बैठे.छोटे-छोटे पत्थरो से टकरा जाते पेरीज़ शहर के मोटाउन इलाके के बाहर तुमाहोल की बस्ती जाग रही थी। लेकिन घरो में रोशनी नहीं थी। विजिलांते के बूट रोशनी से बहुत घबराते हैं जहां भी कोई रोशनी टिमटिमाती है तो वे उसे बुझाने के लिए, उस पर धावा करने के लिए दौड़ते हैं, लेकिन वे पत्थरों से घबराते हैं. 'या तो पत्थरों से उनके वूट टकराते हैं या पत्थर आकर उनकी कन- पटी पर पड़ते हैं। मेंढकों की तरह जमीन पर बैठे हुए यह पत्थर रात मे कैसे उडने लगते हैं यह रहस्य विजिलाते की गश्ती टुकड़ियो को समझ मे नही आता इसीलिए गश्त वाले एक सिपाही ने पादरी के सामने कहा था- रात में यह पत्थर उड़ते हैं होली फादर ! यह देवी आपदा है "हमे अब फ्री टाउन इलाके के बाहर तुमाहोल की इस वस्ती में भेजा गया तो यह नही बताया गया था कि यहां भूत-प्रेत रहते हैं। हमसे कहा गया पा--तुमा• होल मे निगसं रहते हैं "लेकिन यहां तो पत्थर उड़ते हैं 44/इतने अच्छे दिन' था।

झोपड़ीनुमा चर्च में जलती मोमबत्तियों की रोशनी में काला पादरी मुस्कराया था-माई सन ! तुमाहोल भूत-प्रेतों की वस्ती नहीं है शैतान ने कही और जन्म लिया है"शैतान को पहचानो."तुम्हें शांति मिलेगी ! सिपाही अपनी सूजी आंख और कनपटी सहला रहा था। उसने अपनी नाक साफ की तो खून के कतरे देखकर वह घबरा गया था। अस्पताल के डाक्टर ने रिपोर्ट दी थी कि कैडिट श्री-जीरो-वन दिमागी रूप से कमजोर है । ताज्जुब है कि इस जैसे कायर को विजिलांते मे चुना गया। इसके दिमाग में भूत-प्रेत भर गये है और इसे पत्थर उड़ते हुए दिखाई देते हैं. अगर रानी के राज्य और गोरी सम्यता की हमें रक्षा करनी है तो श्री-जीरो-वन जैसे कायरो और अंध विश्वासियों से भी हमें अपनी रक्षा करनी होगी! चीफ वह रिपोर्ट देखकर भड़क उठा-इज इट ए ब्लडी मेडिकल रिपोर्ट ? डाक्टर तक हमें राजनीतिक रिपोर्ट देने लगे हैं"तुम् घायलों की रक्षा करो""गोरी सभ्यता की रक्षा के लिए हम तैनात किये गये हैं ! लेकिन यह तो बहुत वाद की बात है । वह रात तो बहुत अधेरी थी जिसमे स्तोम्पी सीपी ने तुमाहोल की बस्ती में पहला पत्थर उठाया था। हुआ यह था कि घर पर, दो कमरों की फूस की झोपड़ी को अगर घर कहा जा सके तो उस पर पर सौतेले बाप ने उसकी मां को बहुत मारा था। इल्जाम यह था कि स्तोम्पी सोवेतो में चल रहे विप्लव मे शामिल हुआ था। सौतेला बाप उसकी मां को पीटते हुए यही चीख रहा था-आजादी और बराबरी मैं भी चाहता हूं"पर उसके लिए यह जरूरी नहीं कि जान खतरे में डाली जाये ! तू कितना इंधन चूल्हे में डालती है ? बता! जरूरी है कि सारा इंधन एक बार ही डाल दिया जाये ? बता! और तेरा यह स्तोम्पी ! बारह बरस का छोकरा स्तोम्पी-वहां-~सोवेतो के विप्लव में शामिल होने गया था"खुद ही नहीं, छोटे भाई को भी साथ ले गया था। मा सिसक रही थी. बाद में उठकर वह साना परोसने लगी थी। उमने दोनों बेटों को आवाज लगाई."पर स्तोम्पी का मन उचट चुका था। मिदा कुछ वर्तनों की आवाज के और कोई आवाज उस रात के पहले पहर में नहीं थी। इंतजार/45 वस, रात बहुत अंधेरी थी और मां के मार खाने के बाद डरावनी भी हो गई थी। माडियां और झुरमुट सुस्ताते हाथियों की तरह अंधेरे में हाफ रहे थे कि तभी बाजार के कॉफे से मिरियम मकेवा की आवाज आई थी ..."मिरियम मकेबा के गीत के शब्द वीतराग हवा पर तरते आये ये" ज्यूकबॉक्स में किसी ने सिक्का डाला होगा ! स्तोम्पी सीपी को मिरियम मकेबा की आवाज़ और गीत बहुत पसंद हैं। जब भी कोई लडका सिक्का हाथ मे लेकर अपनी पसंद का गीत ढूंढता तो स्तोम्पी सीपी उसे मिरियम मकेबा का गीत सुनने के लिए प्रेरित करता"उमके पास तो पंसे होने का सवाल ही नही उठता था। मिरियम मकेबा के गीत पर वह दिल खोलकर नाचता था "कॉफै के लोग भी उसके नाच में रम जाते थे और कभी-कभी खुद उठकर भी नाचने लगते थे। उस रात कॉफे से गीत की आवाज़ आई तो स्तोम्पी चुपचाप बाजार की ओर निकल गया। वह गीत उसे खीच रहा था। रास्ते तो उसके लिए जाने-पहचाने थे । और फिर वे इतने ऊबड़-खाबड़ भी नही । वह तो तुमा- होल में ही पैदा हुआ था पर दूसरे मोहल्ले में रहता था। जब उसका वाप वह पांच साल का था। फिर मां ने दूसरी शादी कर ली तो वह इस मोहल्ले में चला आया। कॉफे में पहुंचकर स्तोम्पी ने देखा-कोई सात-आठ लोग जमा थे। उनमे से दो को उसने पहचाना । वे सोवेतो के विप्लवी दिनों मे उसे दिखाई दिए थे । वह तो यूं ही घूमता-धामता वहा पहुचा था"उसे पता भी नहीं था कि विप्लव क्या होता है. लेकिन उसने देखा पा तमाम लोग एक तरफ थे और कुछ लोग दूसरी तरफ। मेन स्ट्रीट पर भीड बढ़ती ही जा रही थी। वैसे तो दुकानें वद थी पर जो खुली थी, वे तडातड़ बंद होती जा रही थी "लोग घरों से निकलकर नदी की तरह मेन स्ट्रीट पर उमड़ रहे थे."और विजिलाते के दस्ते बंदूक ताने शिकारियों की तरह तैयार खड़े थे, स्तोम्पी की समझ मे तब कुछ-कुछ आने लगा था। उसका सौतेला वाप डरी-डरी आवाज में इन्ही दस्तों की बात किया करता था "मां को मारने के बाद वह खुद रोया करता था और बाद में उसे समझाता था कि डर के कारण उसके भीतर गुस्से का भूत जागता है" मरातो 46/इतने अच्छे दिन.. .

--तुम्हें खदानों से डर लगता है ? मां तब पूछती थी-खदानों के अंदर के अंधेरे से डर लगता है ? -नही.."खदान में किस बात का डर! वहां तो बहुत आराम है, लेकिन धरती पर आते-आते जब बूटो की या गालियों की आवाज सुनाई देती है, तब डर लगता है । सौतेला पिता तब बताता था। -गालियों कोन देता है ? ठेकेदार ? मां आगे पूछती। -~~-नही ठेकेदार तो पैसा और शाबाशी देता है. अगर दिन भर में पच्चीस ट्रॉली बजरी हमने काट ली तो वह साथ बैठकर कॉफी भी पिलाता है। गालियां तो विजिलाते के सिपाही देते हैं ! पिता बताता था। -- लेकिन तुम्हारा ठेकेदार तो गोरा है ! -तो उससे कमा हुआ। हर गोरा तो कामचोर या बदमाश नहीं होता "हमारा ठेकेदार हमसे काम लेना और हमें खुश रखना जानता है । -तो सिपाही गालियां क्यों देते हैं ? --उन्हें शक है कि हमारी खदानों में विद्रोही शरण पाते हैं." विजिलाते से बचने के लिए खदानों में छुप जाते हैं और हम मजदूर लोग उन्हें पनाह देते हैं ! -लेकिन तुम्हारे पास तो मजदूर होने के परिचय-पत्र रहते हैं । क्या वे सिपाही तुम्हें नही पहचानते ? -हमें सिर्फ नम्बर से पहचाना जाता है. अगर नम्बर एकदम न बोला, या याद करने में देर लगी तो च्यूइंगम खाते विजिलाते का बूट हमारे -धीरे बोलो "जगह बताने की क्या जरूरत है कि बूट कहां पड़ता है"कुछ तो लिहाज़ करो"बच्चे जाग रहे हैं ! -क्या बोली! पिता गुर्राया था। -~कहा न धीरे बोलो! -हरामजादी ! यहां भी धीरे बोलने को कहती है । तेरे एक लात लगाऊं वहां पर "वहीं पर "जहां "जहां मेरे पड़ी थी ! और पिता ने दो-तीन लातें मां के मार दी थीं."मां एकदम चीखकर कराहने लगी थी. और फिर पिता बिलख-बिलवकर रोने लगा था. "मां को संभालने लगा था"फिर मां खाना परोसा था। रेती के केकड़ो का इंतजार/47 शोरबा और जो की रोटी, जो वह तीन दिन पहले नानबाई की दुकान से लाई थी। रेती के केकड़े पकड़ने में स्तोम्पी माहिर था। अगर हवा न चल रही हो तो रेती पर उनके चलने के निशान कुछ देर बने रहते हैं । और फिर वे छेद तो दिखाई ही पड़ जाते हैं जिनमे वे टेढे होकर घुस जाते हैं. वे सागर के केकडो की तरह काले नहीं होते, वे रेत की तरह ही शबंती होते हैं. कभी-कभी तो किसी छेद को खोदने से केकड़ों की पूरी वस्ती ही मिल जाती है"भयातुर केकड़े तव भागते हैं कुछ रह जाते हैं, कुछ रेत में रास्ते बनाकर भीतर छुप जाते हैं। उस रात खाने के बाद पिता ने मां को सीधा लिटा लिया था और उसकी दोनों टांगो को फैलाकर वह उस जगह को सेंकता रहा था--जहा उसने मां को मारा था। और खुद भी अपनी उस जगह को सेंकता रहा था जहा उसे विजिलाते ने मारा था। सेंकने के लिए पिता ने लैम्प की लो बहुत ऊंची कर ली थी, इसी से लम्प का शीशा चटक गया था तो मां ने उसे कोसा था-दर्द तो ठीक हो जाएगा लेकिन यह शीशा कहां से आएगा? लम्बी लो के कारण शीशा तो उनके शरीर की तरह काला पड़ गया लेकिन उसकी चटकन ब्लेड की धार की तरह चमकने लगी थी। सुबह अपने पिता को बिना बताए स्तोम्पी खदानों के इलाके में गया ""यूं ही घूमता हुआ, पास जाने की हिम्मत तो नही थी."खदानो के अलग-अलग इलाके चहारदीवारियो या कंटीले तारों से घिरे हुए थे."गेट पर नये मजदूर भर्ती के लिए खड़े अपने-अपने सिटिजन पास लिए हुए । संतरी उनको रोके हुए थे। स्तोम्पी पास तक तो नही ना सका इसलिए वह एक टीले पर चढ़कर देखता रहा था'"खदानों के मुहाने छोटे-छोटे छेदों की तरह दिखाई दे रहे थे और उनमें उतरने वाले मजदूर केकड़ों की तरह ही गायब होते जा रहे थे। कटी हुई बजरी लेकर आने वाली ट्रालियां तो बहुत वाद मे ऊपर आती हैं । मजदूर तो केकड़ों की तरह नीचे ही छिपे रहते हैं। लेकिन उस दिन स्तोम्पी ने मेन स्ट्रीट मे लोगो को धरती के ऊपर था, था." 48/इतने अच्छे दिन..

देखा था। तब वह कुछ-कुछ समझ सका था और तभी अपने सौतेले पिता के प्रति उसके मन मे कुछ अपनापन-सा उभरा था. और तब स्तोम्पी ने विजिलाते के शिकारी सिपाहियों को आंख उठा- कर देखा था और दौड़कर भीड के आगे खड़ा हो गया था। उसे देखकर तमाशबीन बच्चे भी धीरे-धीरे भीड़ के आगे आ गए थे और उमड़ती नदी की पहली लहर की तरह विजिलाते के दस्तों के सामने खड़े हो गए थे। विप्लवी आदोलन के नेता ने चीखकर कहा था-~बच्चों को पीछे हटाओ! यह कहाँ से आ गए? तो उसी के बुजुर्ग साथी ने कहा था- नही ! ये दस-दस बारह बारह बरस के बच्चे हमसे ज्यादा साहसी हैं। इनके पास केवल भविष्य है... इन्हें सिर्फ पाना है, कुछ खोना नही ! हमारा वर्तमान हमे कायर बना सकता है."इन्हें नही इनके पास केवल भविष्य है ! और उसके बाद क्या हुआ यह तो स्तोम्पी को भी नहीं मालूम "उसे तो होश तब आया जब उसने अपने को डिटेंशन लॉकअप में पाया। मार- काट के बाद उसकी मरहमपट्टी कर दी गई थी लेकिन उसके शरीर में जगह-जगह दर्द था। तब उसे घर का लैम्प बहुत याद आया था और सपने में उसने देखा था-उसका सौतेला पिता उसे जगह-जगह उसी तरह सेंक रहा था जैसे उसने मां को सेंका था। आंख खुली तो देखा-डिटेंशन वार्ड मे अधेरा था। वहां कोई लम्प नहीं था, और न कोई लो.. ! दो महीने बाद स्तोम्पी को दो झापड मारकर छोड़ा गया। डिटेंशन कैम्प का जेलर राउड पर आया तो स्तोम्पी और दूसरे सात बच्चों को देख कर चोखा था--अवे गधो ! नाबालिगों को बन्द करके रखा है। ब्रिटिश कानून ग्रेट ब्रिटेन में चाहे नेस्तनाबूद हो चुका हो लेकिन प्रीटोरिया की सरकार मानव अधिकारों और आधारभूत कानूनों को अभी भी रक्षा करती है"नाबालिगों को हम अदालत की आज्ञा बिना डिटेंशन में नहीं रख सकते ! इन्हें इसी वक्त रिहा करो"नही तो मानव-अधिकारों के हनन का कलंक हम पर लग जाएगा। इन्हें छोडो.. आजाद करो "सफर के पैसे देकर इन्हें घर भेजो.. अभी... .."फौरन" इंतजार 149 और तब स्तोम्पी छोड़ा गया था। वह नही जानता था कि अब क्या करे? घर जाए या यही रुक जाए? उसे अंदाज़ था कि छोटे भाई ने घर लौटकर बता दिया होगा कि वह कहा है." और यह बात दोनों को पता हो गई थी-मां को भी और सौतेले पिता को भी, लेकिन दोनो एक-दूसरे से इस बात को छुपाते रहे थे और स्तोम्पी के इस तरह गायब होने को उसके आवारा हो जाने का नाम देते रहे थे और यही उन्होने विजिलाते के दस्ते से भी कहा था, जो स्तोम्पी को पूरते हुए आया था। -~-जी! उसका नाम स्तोम्पी सीपी है... "उम्र बारह साल । वो मेरा सौतेला बेटा और मेरी पत्नी का बेटा है"वह शुरू से ही आवारा रहा है .."घर से चीजें चुराकर भागता रहा है"जब भूखा मरने लगता है तो लौट आता है। इस वक्त हमें उसके बारे में कुछ भी पता नहीं कि वो कहा है ! लोटकर अगर आया तो हम आपके पास रिपोर्ट करेंगे। उसे आपके सामने हाजिर करेंगे। उसने हमें बहुत परेशान कर रखा है और साब ! हम तो वैसे ही बहुत परेशान लोग हैं... विजिलाते बहुत संतुष्ट होकर लौट गए--ही नोज हिज पास्ट । प्रेजेंट एण्ड फ्यूचर । हमने इन निगर्स को सभ्य बनाया, रोजगार दिया और चवं दिया। इन्हे इनका ईश्वर दिया। और स्तोम्पी जब तुमाहोल मे लौटकर आया तो वह पहले सीधे चर्च गया । काले पादरी ने उसे पहचाना और उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा--माई सन! जो मन और तन से आजाद नही है वो किसी भी धर्म का बंदा नहीं है। काले पादरी की बात स्तोम्पी समझ ही नहीं पाया । उसने उसी तरह आंखें फाड़कर काले पादरी को देखा जैसे उसने मेन-स्ट्रीट मे विजिलाते के दस्तो को देखा था। वह झोपड़ीनुमा चर्च से बाहर निकल आया था:मोमबत्तियो की रोशनी में काला पादरी बहुत सतुष्ट-सा मुस्करा रहा था। दूर कॉफे से तभी मिरियम मकेवा की पुकारती आवाज आई थी और 50/इतने अच्छे दिन...

स्तोम्पी उस तरफ खिंचा चला गया था। ज्यूकबॉक्स में किसी ने सिक्का डाला था और मिरियम मकेबा की आवाज़ा ---आओ प्यार करो तन के क्षणिक अनुराग से नही। वह भी जरूरी है... लेकिन पहले धरती से प्यार करो" इसके जंगलों, कछारों और हवा से प्यार करो जब तक जंगल, पहाड़ और हवा आजाद नहीं हैं... तब तक तुम्हारा तन भी आजाद नहीं है नश्वर तन को आजाद करो. आओ प्यार करो।"आओ प्यार करो! शब्द और अर्थ स्तोम्पी की समझ में नही आते थे पर मिरियम मकेबा की आवाज़ के अर्थों में एक कशिश थी वह पुकारती आवाज़ उसे खीचती थी... मिरियम मकेबा की आवाज के बीच उसे विजिलाते के दस्ते और काले पादरी के राहत देते वचन एक से लगते थे। काले पादरी के वे वचन आजादी का आसरा देते हुए सहने और सहते जाने की सीख देते थे। लेकिन यह उसके सौतेला पिता ने नहीं किया। उसने स्तोम्पी को बांहों में लेते हुए इतना ही कहा-स्तोम्पी बेटे ! मैं वहीं चाहता हूं जो तुम चाहते हो"लेकिन मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता! तुम्हारी मा भी तुम्हें खोना नहीं चाहती जिस दिन तुम खो जाओगे हम दोनों अजनवी हो जाएंगे ! हम तुम्हारा खो जाना'"तुम्हारा समाप्त हो जाना बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे! तुम बच्चों की विप्लवी सेना में सबसे आगे हो...लेकिन " इस लैकिन का उत्तर क्सिी के पास नहीं था। स्तोम्पी ने अपने सौतेले पिता से पूछा-लेकिन? -लेकिन "यही कि तुम विप्लव''इम क्रांति के पीछे रहो! तुम अभी बारह साल के हो"बहुत बड़ी उम्न है तुम्हारे पास । -वे मुझे इसी उम्र पर रोके रखना चाहते हैं। वे मुझे इस उन से आगे बढ़ने नहीं देंगे। इंतजार/51 -स्तीम्पी ! तुम अपनी उम्र से ज्यादा बड़ी बात कर रहे हो। पिता चीखा था। --अत्याचार और अन्याय सहने वालों की उम्र हमेशा बराबर होती है। स्तोम्पी ने बुजुर्गों की तरह चीखकर कहा था~मैं फ्यादा नही जानता, पर जब आप मा को मारते हैं तो मैं जानता हू वह मार कहां से आती है.. और यही वह रात थी जो अंधेरी और डरावनी थी जब विजिलाते टीम के बूट रेत या धूल के कार्पेट पर सप्-सप् कर रहे थे और कभी-कभी मेढकनुमा बैठे हुए छोटे-छोटे पत्थरों से टकरा जाते थे। मेढकों की तरह जमीन पर बैठे हुए यह पत्थर रात में कैसे उड़ने लगे थे, यह रहस्य विजिलाते के गश्ती दस्तों की समझ मे नही आया था। स्तोम्पी तो तब मिरियम मकैबा का गीत सुन रहा था तभी एक आदमी दौडता आया था और उसने कॉफे के मालिक से हाफते हुए कहा था-बत्ती बुझा दो "वे आ रहे हैं ! कॉफे की बत्ती फौरन गुल हो गई थी और उस अंधेरे मे कुछ लोग इधर-उधर निकल गए थे । ज्यूक बॉक्स से थोडी-सी हल्की रोशनी आ रही थी। आखिर वह रोशनी भी बंद कर दी गई और गीत की आवाज भी एकाएक बीच में टूट गई। स्तोम्पी की समझ में कुछ नही आया कि वह क्या करे । अंधेरे मे पड़ी एक वेंच पर वह बैठ गया था। तभी विजिलाते का एक दस्ता आया था... उनके हाथो में खदानों की टाचे थीं और वे कॉफे में लोगों को ऐसे तलाश रहे थे जैसे खदान में केकड़ों को तलाश रहे हो। अपनी जल्दबाजी में उन्होने बाहर बैठ स्तोम्पी को नही देखा था। लेकिन कॉफे का मालिक उन्हें मिल गया था। यही बहुत था। उन्होंने कॉफे के मालिक को बुरी तरह पोटा था बिजली के तार काट दिए थे, सारे वर्तन फोड़ दिए थे और ज्यूक बॉक्स तोड़ दिया था। जब वे लौट रहे थे तो एक उड़ता हुआ पत्थर आया था. फिर बहुत से पत्थर उड़ते हुए आए थे और कंडिट ग्री-जीरो-बन की कनपटी से खून बहने लगा था। आख सूज गई थी। उनके पास जानकारियां थी.. कैडिट धी-जीरो-वन को चौकी पर जमा करके वे स्तोम्पी के घर पहुचे थे। उन्होने वूटों से दस्तक देकर उसके 52/इतने अच्छे दिन' पिता और मां को जगाया था। छोटा भाई अंधेरे में दुबक गया था। एक आगे बढ़कर कहा था- -स्तोम्पी को बाहर निकालो! खदान की टाचं हाथ में देखकर उसका पिता तो पहले यही समझा था कि ठेकेदार आया है लेकिन इस वक्त तो वह कभी नहीं आता। पिता सब समझ गया था। -स्तोम्पी तो घर में नहीं है ! वह खाने के वक्त भी नहीं था। पता नहीं कब कहाँ भाग जाता है "एकदम आवारा हो गया है। -वो आवारा ही नही खतरनाक हो गया है. उसने डेढ़ हजार बच्चों को पत्थर मारना सिखाया है। विजिलाते का मुखिया चीखा था। -यह तो वह वचपन से करता था। पीछे खड़ी मां ने दबी आवाज़ में कहा था-बचपन मे वह मेढकों को पत्थर मारा करता था तब भी वो बहुत शैतान था. --अब वो पूरा शैतान हो गया है. डेविल ! वो जब भी घर आए, हमारे हवाले कर दिया जाए । तुम रोज़ चौकी पर आकर हाजिरी दिया करो"शाम होते ही! आदेश देकर विजिलाते लौट गए थे। लेकिन उस दिन से स्तोम्पी घर नहीं लौटा। मां कभी-कभी रोती थी -उसे मां की याद भी नहीं आती.. सौतेला पिता भी पछताता था-वो कभी छुपकर मुझसे मिलने ही चला आता... लेकिन ऐसा कुछ नही हुआ । वही हुआ जो ऐसे मे होता है । वह रात भी अंधेरी थी। विजिलांते के बूटों की आवाज से दहशत और बढ गई थी ...फिर चचं की झोपड़ी के पीछे गोलियां चली थी। काला पादरी घबरा- कर बाहर आया था । तुमाहोल की बस्ती को सांप सूंघ गया था। बुरी तरह से घायल स्तोम्पी खून की मटमैली चादर पर तड़प रहा था। डर से थरथर कांपती, चर्च की बुढ़िया टीचर एक मोमबत्ती थामे पास आई थी और उसे देखते ही डरी आवाज़ में चीख पड़ी थी यह तो स्तोम्पी है ! इस बच्चे को उन्होंने क्यों मार डाला! इंतजार 53

पादरी के चेहरे पर पूजा की उदासी थी।
बुढ़िया टीचर ने तब उसके पास बैठते हुए पादरी से कहा था---
स्तोम्पी के घर वालों को खबर कर दो "यह सिर्फ पांच-सात मिनट का
मेहमान है"
-नहीं! किसी को खबर मत करो'"कराहते हुए स्तोम्पी बोला
था। तब तक पादरी पवित्र जल ले आया था।
~खवर करना तो ज़रूरी है. पादरी बोला था।
---नही ! टूटतो आवाज़ में स्तोम्पी ने कहा था-मेरी मां सुनेगी तो
रोएगी "उसे मत बताना कि मैं मारा गया हूं। उससे यही कहना कि मैं...
मैं डिटेंशन मे हूं."मुझे विजिलाते ने पकड़ लिया है.
-माई सन"पादरी की आंखों में आंसू थे।
----मुझे चुपचाप यही कही दफना देना "मगर मेरी मां मेरे पिता
को मत बताना "उन्हें यही बताना-मैं डिटेंशन में हूं"
.."तब वे रोएंगे
नही, मेरा इन्तजार करेंगे।
-यस माई सन! जीसस क्राइस्ट ने भी यही कहा है-मैं मनुष्य का
शरीर धारण करके फिर धरती पर आऊंगा "मेरा इन्तजार करना...
-~-मुझे जीसस क्राइस्ट का इन्तजार नहीं है फादर' कहते-कहते
स्तोम्पी की आंखें पथरा गई थी।
बुढिया टीचर ने मोमबत्ती की कांपती लो में और पास जाकर देखा
.."और वह कसमसा कर वही बैठ गई।
काले पादरी ने अंधेरे मे ही क्रास बनाया।
रक्त की चादर पर स्तोम्पी पड़ा था।
उसकी पलकें बंद करने से पहले पादरी ने एक बार उसकी आंखो मे
देखा "तो बुढ़िया टीचर ने मोमबत्ती और पास कर दी। फिर उसने धीरे
से बुदबुदा कर पूछा-इसे किसका इन्तजार था ?
-पता नहीं!
54/इतने अच्छे दिन

शोक-समारोह उसको समझ में नहीं आ रहा था कि शोक का कितना अनुपात उसके चेहरे पर रहे जो मृतक के लिए भी ठीक रहे और उसके अपने व्यक्तित्व के लिए भी। गाड़ी पार्क करते-करते वह यही सोच रहा था, तब तक ट्रैफिक पुलिस-मैन ने उसे वहां गाड़ी पार्क न करने का इशारा करते हुए दूसरी जगह बताई। उसने गाड़ी हटा ली। उसे ट्रैफिक वाले का होना कुछ अजीब सा लगा, क्योकि ऐसी कालोनियों की बारह-चौदह फुट चौड़ी सड़कों पर ट्रैफिक वाले नहीं होते। लेकिन ऐसे मौके पर उप्तका होना ठीक ही था। वैसे कारें ज्यादा नही थी, लेकिन हो सकती थी। रिश्ते मे मृतक उसका साढू लगता था, पर साढ़ होने से ज्यादा वह मित्र था। एक जमाने में दोनो एक ही मिनिस्ट्री में साथ थे और वह जमाना उन रोटियों वाला था जो दोनों कागज़ में लपेट कर घर से लाया करते थे और लंच टाइम में रेड़ी से छोले खरीद कर साथ-साथ खाया करते थे। फिर उसका प्रमोशन हो गया और वह मिनिस्टर साहब के निजी स्टाफ में पहुंच गया। तब वो बच्चों के स्कूली डिब्बे में रोटियों के साथ-साथ कुछ सब्जी और अचार भी लाता था। रेड़ी पर खाने और खुद पत्ता उठा कर फेंकने के दिन लद गये थे। अब वो दिन थे जब वो मिनिस्टर या सेक्रेटरी के कमरे से हाथ में नोटबुक लिये निकलता था और आई० ए. एस अफसरों की तरह ठीक वक्त पर लंच लेता था। छोटे छेद से वह भाक लेता था कि साहब ने लच शुरू किया या नहीं और उसी के मुताबिक वो चपरासी को आवाज लगाता था- ---राम जी! लंच... रामजी अखबार उठाता था। विछाता था | उड़ते कोने में से एक पर शोक समारोह/55 पेपरवेट और दूसरे पर गिलास रखता था। फिर बीच में खाने का स्कूली डिब्बा रख देता था 1 छोटा तोलिया तो कुर्सी की पीठ पर लगा ही रहता था। इस बीच रामजी बड़ी चौकसी बरतता था"बीड़ी पीते हुए वह इस बात का खयाल रखता था कि वत्रा साहब को कोई परेशान न करे। आने वाले लोगों के नाम की स्लि या विजिटिंग कार्ड वह दरवाजे पर ही जमा कर लेता था-लंच ले रहे हैं..." .."आप उघर बैठिए। उसके बाद बत्रा का ओहदा और मतंबा इतना बढ़ा कि उसका लंच मिल्टन के गर्म डिब्बे में स्टाफ कार से आने लगा, जिसे कमरे तक ड्राइवर पहुंचाता था। फिर राम जी अंदर ले जाकर रखता था। 'प्लेटें और चम्मच धोकर रखता था और वाहर बैठ कर सिगरेट पीया करता था। राम जी के बीडी वाले दिन भी लद गये थे। फिर वो दिन भी हवा हो गये और बत्रा का पंक्ड लंच गेलार्ड या वोल्गा से आने लगा क्योकि उससे लंच का कोई बंधा हुआ समय ही नहीं रह गया था। वो सेक्रेटरी साहब को लांघकर मिनिस्टर साहब का विश्व- सनीय आदमी बन चुका था और मैहम उसे बंगले पर बुलाती ही रहती थी। बत्रा की तेज तरक्को तब हुई जब डाक्टर ने मिनिस्टर साहब को दो हफ्ते फा कम्प्लीट रेस्ट बताया। बत्राने हाथो हाथ हिल-स्टेशन पर सारा इन्तजाम किया । जिम्मेवारिया इतनी थी कि सारे इंतजाम के बावजूद तय तारीख को मिनिस्टर साहब नहीं आ पाये और बत्रा को ही मैडम और फैमिली के साथ जाना पड़ा "मिनिस्टर साहब वाद मे आने वाले थे। हिल-स्टेशन पर कोई क्या करे? पहाड़ों को कितना देखें। दह तो अच्छा हुआ कि कुछ नये-नये उद्योगपति उम्मीदवार भी इत्तफाक से उसी हिल-स्टेशन पर आ गये थे। दोपहर को बत्रा और क्या करता- उनके साथ क्लब में बैठकर बीयर पीता और ताश खेलता। हालांकि उसने ताश खेलना नया-नया ही सीखा था, पर किस्मत लगातार साथ देती रही-बत्रा हर दिन पांच-सात हजार जीत ही जाता फिर शाम को मंडम की शॉपिंग ! पैसे आते रहेगे महम"आपको जो पसन्द आता है, आप चुन लीजिए। "हम पैक करके आपके होटल में 56/इतने अच्छे दिन:

पहुंचा देंगे "खरीददारी में बना मैडम की मदद करता। दुकानदार बढ़ावा देते । फिर कही बाहर खाना खाकर मंडम लोटती या होटल में ही खाती.." बत्रा भी साथ ही खाता, मगर डायनिंग टेबिल पर तीन-चार कुसियां दूर छठता। रात उतर आती थी। रात भर चीड़ सरसराते और बातें करते रहते थे। मिनिस्टर साहब आये और एक रात आराम करके लौट गये। उन्हें वक्त ही नहीं मिलता। मिनिस्टर साहब जितने व्यस्त होते जाते थे, बत्रा की जिम्मेदारियां उतनी ही बढती जाती थी। फिर मिनिस्ट्री में एक धमाका हुआ-बत्रा मिनिस्टर साह्व का एडीशनल प्राइवेट सेक्रेटरी बन गया । यह पॉलिटिकल एपाइटमेट था और लोग देखते ही रह गये। फिर वत्रा ने बहुत लग कर काम किया अपनी कोठी बनवाई, कार खरीदी और इससे पहले कि उस पर सी० बी० आई० का साया पडता, बत्रा इस्तीफा देकर अलग हो गया। हार्न की एक हल्को आवाज ने उसके खयालों का सिसिला तोड दिया। मातमपुर्सी के लिए आई कारों की भी अपनी संस्कृति होती है। उसने सामने देखा-वह बत्रा की कोठी के गेट पर खडा था-सामने पीतल के बड़े चमकदार अक्षरों में लिखा था-वत्राज । बहुत से नौकर-चाकर घूम रहे थे। एक नौकर रावत की ट्रे लिए नि.संग भाव से शोकग्रस्त लोगों तक जाता और फिर आगे या पीछे पल देता। उसने आने वाले लोगो की चाल को देखा और अपनी चाल की रफ्तार तय की। घर गन्ने के खेत की तरह भरा हुआ था और उतना ही खामोश था। अपने भीतर दुःख और संताप पैदा करने की उसने कोशिश की और सड़े हुए लोगों को दबी निगाह से उसने देखा। वे भी अधखुली उदास खिड़की की तरह उसे देख रहे थे। उनके चेहरे उसने कुछ और मुमति हुए देखे तो वह निश्चित हो गया कि उसके अपने चेहरे पर आये संताप के भाव ठीक अनुपात में हैं। सभी बत्रा के बड़े लड़के ने अपने नंगे बदन पर जनेऊ ठीक करते हुए पोक समारोह /57 उसे रिसीव किया--माइए मौसा जी "मम्मी मौजी जी आये हैं । सुनकर मम्मी ने चाय का प्याला वहीं मेज़ पर छोड़ दिया और वे अपने दुख शामिल होने आये जीजा जी को रिसीव करने के लिए अपनी एकांत कुर्सी पर बैठ गई."उसने अफसोस जाहिर किया तो बत्रा की बीवी ने उसांस लेकर कहा-मैं तो लुट गई जीजा जी... तभी बाहर से सरसराहट का एक झोंका आया। फुसफुसाहट हुई कि मिनिस्टर साहव आये हैं, लेकिन मिनिस्टर साहब नहीं, उनका संवेदना तार माया था। छोटे बेटे ने अन्य तारो की गड्डी के साथ मिनिस्टर साहब का तार अपनी मां के हाथ में थमा दिया। --अब देखना क्या है "पोस्टमन को कुछ दे दो"वेचारा सुबह से चालीस चक्कर तो लगा चुका है। बत्रा की बीवी ने छोटे बेटे से कहा, फिर उसकी तरफ मुखातिब हुई-तार पर तार"मैं तो देखते-देखते थक गई जीजा जी.. और तभी पास से गुजरती पोती से उसने पूछा-पिकी, तार गिने तूने --हां दादी जी "वन थाउजेड् फोट्टी एट 'ये मिला कर तो इलेवन हंड्रेड हो जायेंगे । पिंकी ने तारो की गड्डी हाथ में लेते हुए कहा । -डेथ वाले दिन के तारों से अलमारी भरी पडी है । बत्रा के बड़े दामाद ने कहा-मैं तो पूरे दिन तार ही रिसीव करता रहा । तभी दाबत के लिए तैयार होतो, कचौड़ियों को चखाने ले लिए हलवाई आ गया-मेम साव. देख लीजिए, मसाला तो ठीक है। वत्रा की बीवी ने एक टुकड़ा तोड कर चखा-थोडी हीग कम है । और वे अपनी घी लगी उंगलियों को साफ करने की सोच ही रही थी कि तब तक दामाद ने रूमाल बढ़ा दिया। -बच्चे नहीं दिखाई दे रहे ! उसने कुछ बात करने के लिए बात की। -उन्हें हमने अप्पू घर देखने भेज दिया"थोड़ा एम्ज्वाय करेंगे" दामाद ने बताया। --सात गाड़ियां भर कर गई हैं। -नहीं, एक मेटाडोर और पाच गाड़िया!... 58/इतने अच्छे दिन..

-~~-बच्चों के साथ आइसबाक्स में ब्रिक्स रखवा दी थी? बत्रा की बीवी ने जानना चाहा। -द्रिक्स? -~-आइसक्रीम विक्स । -बच्चों का पंक्ड लंच निरुलाज़ से पहुंच जायेगा। तब तक हलवाई चटनी चखाने के लिए आ गया। पीछे हलवाई का असिस्टेंट मोतीचूर का लड्डू दिखाने और चखाने के लिए तैयार खड़ा था। बत्रा की बीवी कचौड़ी के साथ चटनी चख ही रही थी कि फिर सनसनी फैल गई। कनाडा वाले मामा जी आ पहुंचे थे।" -मैया का सामान ऊपर वाले कमरे मे जायेगा। देख लेना एयर- कंडीशनर ठीक है या नही "बत्रा की बीवी अभी यह कह ही रही थी कि कनाडा वाले भाई ने उसे कंधों से संभालते हुए कहा- तुम्हारी कोठी पर तो ट्रैफिक जम है दीपा'"अनबिलीवेविल "इण्डिया में कोई सिस्टम ही नहीं है ! .."अरे हां, इससे पहले कि भूल जाऊं. अरे कहां हो चंद्रिका और विनीता! मामा जी के पुकारते ही दोनों बहुएं आ गई "पर उस पल उनके साले साहब उनसे मुखातिब ये~-एण्ड हाऊ आर यू बड़े जीजा जी ? मुझे तो इन लोगों ने फोन पर खबर दी "इट वाज शॉकिंग''मैं चाहता तब भी क्रीमेशन पर तो पहुंच नहीं पाता।"ऊपर से इन सबने अपनी-अपनी फर्माइशों की लिस्ट लिखवानी शुरू कर दी "इट बाज़ फुल ट्वेंटी सेविन मिनिट्स ऑन फोन' 'येस। --एक बार तो फोन बीच में कट गया था। बहू विनीता ने चमकती आंखों से खबर दी, तो मामा जी ने दोनों बहुओं की ओर मुड़ते हुए कहा. तुम्हारी शॉपिंग करने में पूरे चार दिन लगे-येस, फुल फोर डेज़ ! वड़ा वाला सूटकेस तुम लोगों का है. 'सारे कास्मेटिक्स और बाकी सब चीजें - तभी नौकर विंदा ने आकर खवर दी-मम साब "बहुत भिखारी जमा हो गये हैं । बढ़ते ही जा रहे हैं"खाना दे दूं? -दीज़ रास्कल्स ! मामा जी ने भड़क कर कहा-इण्डियन बैंगसं. झोक-समारोह/59 इन रास्कल्स को मौत पर खाना भी चाहिए। -लोग जाना भी चाहते हैं ममी, ऊपर साना लग गया है. मामा जी, आप भी थोडा खा लीजिए । बड़े बेटे ने आकर कहा। --मामा जी की प्लेट में यही लगा लाती हू"अम्मा जी ने बारह दिनों से तो कुछ खाया नही "मामा जी के साथ ये दो कोर खा लेंगी। बडी बहू चन्द्रिका ने कहा और वह प्लेट लगाने चली गई... --आइए मौसा जी आप आइए । बत्रा के बड़े बेटे ने कहा तो वह ऊपर खाने चला गया। हॉल मे मेज़ों पर खाना लगा था। भीड़ बहुत थी । खाना भी गरमा- गरम था और लोग दिल से प्लेटों मे खाना ले रहे थे। पता नहीं नौकर विंदा को भिखारियो की ही फिकर थी-उसने बत्रा के बड़े बेटे के पास आकर अदव से पूछा -मैया साब' भिखारी खाना मांग रहे हैं."दे दू? --अभी जल्दी क्या है। ये जूटन बचेगी, कौन खायेगा? बत्रा के बड़े बेटे ने बिदा को झिडक दिया। उसने भी जैसे-तैसे अपनी प्लेट लगाने की कोशिश की लोग प्लेटें लगा कर खा भी रहे थे, पर वही मेज़ के पास ही खड़े थे...उन्हें दूमरो का खयाल ही नही था "गरम कचौड़ियां आती तो इससे पहले कि वह एक कड़क तली कचौडी उठाये, उसे कोई-न-कोई और उठा लेता • पनीर का टुकडा वह प्लेट पर परोसे कि उससे पहले कटेनर में सिर्फ पनीर का शोरबा रह जाता, वह सलाद की प्लेट से नीबू का टुकडा उठाये-उठाये कि तब तक सब टुकडे उठ जाते "रायते का जीरा-मिर्च पड़ा टुकडा छुए कि रायते की मसालेदार पतं खत्म हो जाती। आखिर मे पापड़ के कुछ टूटे हुए टुकड़े बचे थे जो उसने उठा कर इस तरह खाने शुरू किये कि वह एक बहुत ही सोफियाना आदमी लगने लगा था उस तरह का सोफियाना भादमी - जो बहुत कम खाते हैं और बड़े आदमियों की तरह बहुत सलीके से साते हैं। सब लोग अपनी तरह से खाते और खाना उठाते जा रहे थे और उसे यह पता नही चल रहा था कि कौन किसके हिस्से की कचौड़ी, पनीर या रायता खा रहा था। कुछ लोग थे, जो सचमुच खा रहे थे और कुछ लोग थे जो सचमुच नहीं खा पा रहे थे। 60/इतने मलेशित..

आखिर उमने पापड़ इस शालीनता से साये कि जसे उसने पेट भर खाना खाया हो। फिर उसने पानी पिया और चलने के लिए नीचे उतर आया।" नीचे यत्रा की बीवी दीपा कनाडा से आये अपने उन्ही भाई, यानी उसके साले को सब दिखा रही थीं। और बता रही थी-पुलिस कमिश्नर आये, आई० जी०, डी० आई० जी...'पूरा घर पुलिसवालों से भर गया था"लगता था जैमे रेड पडी हो."संकड़ों तो इंडस्ट्रियलिस्ट थे“सव इनके पुराने दोस्त थे "प्राइम मिनिस्टर फॉरेन में थे, नही तो उनका कंडोलेंस मैतिज जरूर आता। पता लगा था, वो टाइप किया रखा है... पर प्राइम मिनिस्टर तो है नहीं, दस्तखत कैसे हों! और ये देखिए मैया ! मालाओं के पहाड़ 'अव तो फूल सूख गये हैं. एक ट्रक फूल-मालाएं तो चुंगी वाले भर कर उठा ले गये "ये पहाड़ फिर भी यही पड़ा है। ताजे फूल तो वास्टई स ने जाके येच लिये होंगे."अब सूखे फूलों को उठाने क्यों आएंगे! कनाडा वाले मामा ने कहा। लॉन के कोने में पड़े फूलो के पहाड़ को दूर से देख कर वे भीतर मुड़ गये -वत्रा का बड़ा बेटा तीन थैलों में भरे तार उन्हें दिखाने लगा। तब तक बड़ी बहू चन्द्रिका ने एक बड़ा बैग और लाकर रख दिया। -हमारी तो सारी अलमारिया तारों से भर गई थी मामा जी! बड़ी बहू ने थैला दिखाते हुए कहा तो कनाडा वाले मामा ताज्जुब से भर गये, 1-वाऊ । इतने कागज़ से तो कोमेशन किया जा सकता था... लकड़ी की जरूरत ही नहीं पड़ती।"और अपनी ही बात पर उन्होंने ठहाका लगाया। सब धीमे-धीमे मुस्कराने लगे। उनके चेहरो से शोक की रेखायें लगभग पिघल गई । इस क्षण उसे लगा कि उसका चेहरा शायद इन लोगों के मुकाबले ज्यादा शोक-संतप्त लग रहा है जिसे शायद दिखावा भाना जायेगा । उसने शोक के अनुपात को कुछ कम किया तो चेहरे के तनाव में कुछ कमी आई। -ट्रैफिक जैम तो उस रोज़ हुआ था। आप देखते "तब अंदाजा लगता। एकदम बोले- सोक-समारोह / 61 - चीफ जस्टिस का रीथ आफे घंटे क्यू में रुका रहा । -चीफ जस्टिस आये थे । कनाडा वाले मामा ने पूछा । -वो"वो तो हार्ट पेशेंट है" आ रहे थे."हमने ही उन्हें रोका" बड़े बेटे ने बात साफ कर दी। -तेरह दिन से फोन लगातार बज रहा है । अब तक इन जानकारियों में दिलचस्पी रखने वाले कुछ और मातमी भी शामिल हो गये थे। कोई मिसेज़ मोहन साथ वाली सहेली की साड़ी सराह रही थी-बडी सोबर साड़ी है ! -ऐसी साडियां भी रखनी पड़ती हैं ! सहेली ने कहा। -सूती है, लगती नही "एम्पोरियम की है ? -हा! उत्कलिका की! वह औरों के पीछे-पीछे मेन हाल में चला आया। वहां बना की एक बडी तस्वीर ठिगनी मेज पर रखी थी। अगरबत्तियां जल रही थी वहुत- सी फूल-मालायें भी पडी थी- --आजकल, मेरा मतलब है इस मौसम में गंदे के फूल तो मिलते नहीं."किसी एक ने कहा। -बैंगलोर से आते हैं आजकल.. किसी ने उत्तर दिया। तब तक बच्चो के लौटने का शोर भीतर आया। -गाड़ियो के दरवाजे खुल-बद हो रहे थे."सारे बच्चे अप्पू घर से लौट आये थे। आकर सब अपनी मम्मी-पापाओं से लिपटने लगे-- -एज्योड बेटा! -यस डी...वरी मच... -क्या-क्या खाया? -आइसक्रीम ! पिज्जा!... -एण्ड मंगी.. "फूटी... --एवरी थिंग पापा... -सवली पिकनिक मम्मी... बढ़े दामाद का बेटा उसकी गोद मे चढ़ गया था। वह उनकी मूछों से खेलता हुआ पूछ रहा था-वो किसका फोटो है हंडी? 62/इतने अच्छे दिन.

उसके डैडी ने नहीं समझा तो उसने इशारा करके बताया-वो"वो. --यो.."तेरे नाना जी का है ! नाना जी का है ! कहते हुए बड़े दामाद ने अपने बेटे के गाल थपथपा दिये । बच्चा हंसने लगा। उसकी समझ में नहीं आया-बच्चा किस पर हंस रहा था"या यों ही हमने लगा था । बच्चे तो हसते हुए ही अच्छे लगते हैं। शोक-समारोह /63 मेरा भारत महान ! सुबह-सुबह उसका फोन आया। वो पंजाब नेशनल बैंक, शास्त्री नगर से बोल रहा था। -जी ! मैं अभी एयरपोर्ट से सीधा बैंक आया हूं."यही पंजाब नेशनल बैंक से बोल रहा हूं."जी हां मैं अनिल"आपने पहचाना आप तो अब तक भूल गए होंगे. मैं आपके लिए बीस हजार का ड्राफ्ट बनवा रहा हूं! ""आपको साइनिंग देना था न." मुझे कुछ धुंधला-सा याद आया"अनिल ! कौन अनिल ? एक अनिल प्रोडक्शन मैनेजर हुआ करता था। दूसरा अनिल इस वक्त नीरजा का असिस्टैट है."वह कभी-कभी फोन करता है। पर ये बंबई से आने वाला अनिल..'यह तीसरा अनिल कौन-सा है ? फिल्मो की दुनिया छोड़े अब कई बरस हो चुके हैं "और खोये या मूले हुए पेशेवर संबंध याद नही आते... तभी एक मकान याद में कौंधा.."उस घर की दीवारें और कमरे याद आए' ...सोफो की गद्दिगों की मैलभरी बासी महक याद आई "स्कॉच की बोतल मे भरी देसी व्हिस्की याद आई. उसका कड़वापन भी याद आया, पर अनिल का सरनेम भी याद नही आया और न उसकी शक्ल ही याद मे कौंधी। मैंने अपनी याददाश्त पर हलका-सा जोर डाला.""कुछ माफ नही हुआ । इस स्थिति में मुझे कुछ बुरा भी नही लगा, क्योकि जिसे मैं मूल जाना चाहता हूं उसे सचमुच भूल जाता हूं"यह एक अच्छी आदत मुझमें विकसित हुई है। बस, हलके-से इतना याद आया कि यह आदमी एक फिल्म प्रोजक्ट ले के आया था और बात बहुत ज्यादा करता था। यह वह दौर था जब मैं अधिकांश फिल्में लिखना छोड़ रहा था और नई फिल्में 64/इतने अच्छे दिन..

साइन नहीं कर रहा था। मैं अपना अधिकांश समय पत्रकारिता और लखन में लगाना चाहता था। इसी दौर में अनिल मेरे पास आया था- उस अधूरी फिल्म को खरीदा था, जो बंद पड़ी थी और जिमका लेखक मैं, पा। इसीलिए अनिल एक नैतिकता के तहत मेरे पास आया था। पर ये सब बातें तो मुझे बाद में याद आई थी। एकाएक इतने दिनों बाद और बिना किसी पूर्वसूचना के, जब उसका- फोन मिला तो मुझमें कोई उत्साह नही जागा। पर इस तरह से कोई अपना पुराना वादा याद करके पैसे देने चला आया है-यह मुझे अच्छा लगा। अनिल ने फोन पर कहा-आप से मिलना है"कास्ट मैंने तय कर ली है-विनोद खन्ना, रजनीकांत और ऋषि कपूर "तीन लड़कियों में डिम्पिल, पूनम ढिल्लो और फरहा "विनोद खन्ना ने महूरत की तारीख सत्ताइस जुलाई दी है, इसलिए स्क्रिप्ट का रिवीजन बहुत जल्दी करना है आपको मुझे ताज्जुब-सा हुआ कि अनिल यह सब बातें बैंक से क्यों कर रहा है"निश्चय ही वह बैंक मैनेजर के कमरे में बैठा होगा और इन तमाम नामों से उस पर अमर हाल रहा होगा। वह आगे बोला-तो आपसे मिलना जरूरी है... -~~-कल मिलिए । -~-कल तो मैं चण्डीगढ़ चला जाऊगा। आपको बताया था न, मेरे, ब्रदर-इन-ला वहां डी० आई० जी० हैं, डी० आई० जी०, पुलिस" मैंने दिल्ली लण्ड करते ही यह पहला फोन आपको किया, नहीं तो आप क्या सोचते होंगे कि कसा आदमी है, वादा करके नही लौटा तो ऐसा करते हैं, चीस की जगह तीस हजार का ड्राफ्ट बनवा देता 'एयर टिकट वगैरह सबके एक्स्ट्रा हो जाएगा. आपको बंबई तो आना-जाना ही पड़ेगा. -तो कल आप चण्डीगढ़ जा रहे हैं । मैंने उसकी बात काटी। -जी हां"कल चण्डीगढ, परसों जालंधर मण्डे को वापस । तो स्टैण्डर्ड मे मिलें, रीगल के ऊपर"जो समय आपको सूट करे"ठीक है दो और ढाई के बीच मे"ओ० के०... मेरा भारत महान/65 ... यात समाप्त हो गई । मैं अपने कामो में लग गया। करीब आधे घंटे बाद अनिल का फोन फिर आया-सॉरी, आपको फिर डिस्टर्व कर रहा ये बैंक वाले ड्राफ्ट नहीं बना रहे हैं. और कल बुद्ध पूणिमा की छुट्टी है, परसो मण्डे" इसलिए.. -लेकिन आप तो उन्हें ड्राफ्ट बनाने के लिए कैश दे रहे होगे! तव उन्हें क्या दिक्कत है ? मैंने थोड़ा चिढ के कहा। -कैश नहीं.. मेरे पास पचास हजार का ड्राफ्ट है ! उसने उत्तर दिया। -तब क्या दिक्कत है! ड्राफ्ट को बैक खरीद सकता है ! -वही तो, लेकिन ये कह रहे हैं-आज नही हो पायेगा"होगा भी तो मण्डे से पहले नहीं "खैर ठीक है, मैं मण्डे को आपको तीस दूंगा." आप जव स्टैण्डर्ड में आएं तो मेरे लिए एक-डेढ हजार कैश लेते आएं" टैक्सी मे चण्डीगढ जाऊगा तो कुछ लिक्विड मनी की जरूरत पड़ेगी तो दो और ढाई के बीच में स्टैण्डर्ड ! ओ० के० ! उसने फोन बंद कर दिया। मुझे ताज्जुब हुआ कि वह यह बात बैक में कैसे कर रहा था । हवाई जहाज से आया है। एयरपोर्ट पर उतरा है--- उतर कर सोधा बैक गया है। टैक्सी से चण्डीगढ और जालंधर जाने का प्रोग्राम है और इस आदमी की जेब में इतना भी कैश नही कि सफर की छोटी-मोटी जरूरतों के लिए पैसे मांगने लगा ! मुझे शक हुआ क्योकि यह पूछने पर कि वो कहा ठहरा है, उसने कोई पता नहीं दिया, बोला था-अभी तो सीधा बैक माया हूं." ठहरने का कुछ ठीक नही किया ! एक तो मई महीने की जलती गर्मी और रीगल के पास पाकिंग स्पेस की कमी दूर पर कही पाकिग करके स्टैण्डर्ड तक चिलचिलाती धूप में पैदल चलने की पेशकश-मैं इस शकपूर्ण स्थिति और गर्मों की अधिकता से इसी नतीजे पर पहुंचा कि मैं मिलने नही जाऊंगा। स्टैण्डर्ड मे उसका जो पचास-सी का बिल बनेगा, बनेगा.. मुन्नी का ऑपरेशन कल ही हुआ था। उमके लिए तो नहीं, पर तिमारदारी में लगे लोगों के लिए खाना लेकर जाना ही था। मुन्नी की 66/इतने अच्छे दिन...

. चिन्ता भी दिमाग पर हावी थी, पर पहले यही सोचा था कि साढे-बारह- एक पर खाना पहुंचा कर दो-सवा दो स्टैण्डर्ड चला जाऊगा । गाड़ी रेलवे हास्पिटल के कम्पाउण्ड में छोड़ दूंगा। वहां से स्कूटर ले लूंगा । लेकिन स्कूटर वाले नजदीक जगह जाने से इनकार कर देते हैं और उम धूप में ऐमा स्कूटर खोजना रीगल तक चला जाये और झख-झख न करे, मुझे थोड़ा मुश्किल भी लगा। आखिर मुन्नी के कमरे में पहुंचा। अट्ठारह को आपरेशन हुआ था--- आज उन्नीस थी और रात भर रुक कर मैं सुबह-सुबह ही अस्पताल से घर पहुंचा था--तभी अनिल का फोन मुझे मिला था। खाना लेकर अस्पताल पहुंचा तो दो बज रहे थे। जगदीश, पप्पू, दीपू और गोल ने खाना खाया, मैंने भी। मुन्नी के ग्लूकोज़ चढ रहा था और वह सेडेटिव लिए पड़ी थी। स्टैण्डर्ड न जाने की बात मन में तो तय कर ही घुका था-ठंडे कमरे और बाहर चिलचिलाती धूप ने उसे और पक्का कर दिया। मुन्नी की चिन्ता, दिमाग मे तनाव, किसी से बेवकूफ न बनने का मन का सुझाव "और तब तीनों बातो के मिल जाने से बड़ी गहरी नीद आई-पौने तीन सोया तो छ: बजे उठा। और जब उठा तब तक मैं यह भी मूल चुका था कि मुझे कही, किसी से मिलने जाना था। घर पहुंचा तो गायत्री ने बताया-किन्ही अनिल का फोन तीन बजे आया था। तुम्हें मिलना था, वे इंतजार कर रहे थे। दुबारा फिर फोन आया--करीब चार बजे, मैंने कह दिया-अस्पताल में अटक गये होंगे ! हमारी भतीजी का कल ही आपरेशन हुआ है। मैंने सुन लिया। कहना तो कुछ था नहीं। मन में सोचा बला टली। उसे चण्डीगढ़ जाना है तो लग्जरी बस से भी जा सकता है टैक्सी से जाने की जरूरत क्या है.. और फिर वह सुबह तो निकल ही जाएगा। लेकिन सुबह के अखबार के साथ ही अनिल घर पर आया। उसे अब मैंने पूरी तरह पहचाना-शकल भी याद आ गई—सामने थी ही। उसके चेहरे पर कोई खास भाव नहीं था। न इतने सुबह आ जाने का कोई संकोच । मैंने उसे बैठाया और सोचा कि हज़ार-डेढ़ हजार का इतजाम इसने कर ही . लिया होगा। मेरा भारत महान/67 मैंने कल न मिल सकने के लिए माफी मागी तो उसने कहा-नही" नहीं. मैं समझ सकता हूं। आप तो वादे के बड़े पक्के आदमी है । कहते हुए उसने बैंग रख दिया। --आप ठहरे कहां हैं ? -लोदी रोड पर एक दोस्त के यहां तो साहब अब ये प्रोडक्शन लांच हो गया है "यह डेफिनिट सममिए एक करोड़ लगेगा"या ज्यादा पच्चीस लाख तो महूरत पर ही समभिए । सबको साइनिंग देना पड़ेगा। .."ढाई-तीन लाख तो स्क्रिप्ट पर ही सर्चा होगा'"होटल है, आना- जाना.. एयर फेयर, इंसीडेंटल्स कम-से-कम दो लाख ड्रेसेज पर- महूरत की। पंसे का क्या है 'लगायेंगे तो आएंगे."पैसा तो बिखरा पड़ा . --लेकिन इतने दिनों बाद यह प्रोजेक्ट आपने रिवाइव क्यों की? इम समय तो इडस्ट्री का हाल ठीक नहीं है-पैसा आ ही नहीं रहा है । सब रियल एस्टेट मे लग रहा है ! मैंने कहा। -तभी तो, तभी तो आपने तो मेरा पलट देखा था 'ससुराल वालों की मेहरबानी पर कब तक पड़ा रहता"वैसे वो लखपती-करोड़पती हैं "आपने तो देखा है। मैंने वह पुराना फ्लट छोड़कर अपना नया फ्लट खरीद लिया है-सस्ता मिल गया--सोलह लाख का 'फर्नीचर, फिटिंग्स, आर्ट और डेकोरेशस मिला कर समझिए पच्चीस का पड़ा! वह कह रहा था और बैग में से एक फाइल निकालता जा रहा था। लेकिन मेरी समझ में नही आया कि मेरी कही हुई बात का उत्तर यह पच्चीस लाख का पलैट कैसे बन गया।मैंने उसकी तरफ देखा-उसने निर्विकार भाव से पुरानी स्क्रिप्ट की फाइल निकाल ली थी। मुझे देते हुए चोला-जरा देखकर राय दीजिए. मेन कास्ट के अलाव और कौन-कौन होगे, मैंने सोच कर नोट किए हैं । मैंने स्क्रिप्ट देखी। पहले पेज पर कंपनी के नाम के बाद फिल्म का --'दुनिया देखेगी !' और फिर बड़े-बड़े अक्षरो मे मेरा नाम था-रिटिन वाई "और हर पेज पर एसोसिएशन मे रजिस्टर्ड होने की मुहर थी। नाम था-- 68/इतने अच्छे दिन.

- -~-आपने फिल्म का नाम बदल दिया। -इसमें भी पच्चीस हजार लग गए। किसी और के पास था यह टाइटिल खर्चा तो होता ही है. इसी से इंडस्ट्री चलती है ! हम आप चलते हैं" मैंने उसे फिर देखा। वह कोई दूसरी फाइल निकाल रहा था। मैंने पूछा-आप पत्नी के साथ आए हैं ? -जी नहीं, वो घर पर हैं ! उसने कहा और एक एक्सरे मेरे सामने कर दिया- मैं आपसे इतने बरस नहीं मिल पाया "उसकी कहानी इस एक्सरे प्लेट में है। मैंने एक्सरे देखा-घुटने का एक्मरे था। टूटी हड्डी की जगह तीन पिनों वाली रॉड साफ दिखाई दे रही थी "जब तक मैं कुछ पूछू-उसने अपना घुटना नगा कर लिया था--आपरेशन और स्टिचिंग के निशान सामने थे। -ये "यहां रगड़ता है तो बहुत पेन करता है ! -मोह ! तभी आप लंगडा रहे थे ! मैंने सहानुभूति से कहा, उसका उत्तर फिर अजीब था। -जी हां - इसीलिए मैंने सोचा है, अब मैं खुद डायरेक्ट कान्टेक्ट रखूगा । आपने देखा था, मेरे चारों तरफ तरह-तरह के लोग चिपके हुए थे। मेरी वाइफ ने कहा~ये सब तुम्हें चोट कर रहे हैं, मैंने सबको अलग कर दिया। अब सब डायरेक्ट है... तभी मुझे वो दिन अच्छी तरह याद आ गए"उसकी बीवी सुंदर थी और ज्यादातर लोग भाभी जी-भाभी जी करते हुए उसी के साथ चिपके रहते थे। हर बात मै अनिल की जगह उसकी पत्नी को चढ़ाते रहते थे- कस्ट्यूम डिजाइनिंग तो भाभी जी ही करेंगी "हेयर स्टाइल्स भी आप ही तय कीजिएगा। मुझे लगा नहीं था कि उसकी पत्नी इन बातों से खुश होती थी। वह और प्रोड्यूसरों की बीवियो की तरह शौहरत की तेजाबी दुनिया मे नही रहती थी। वह एक निहायत घरेलू परन्तु सुंदर औरत थी। अपने अभीर घर का गुमान भी उसे नहीं था। - मेरा भारत महान/69 --हंसा आपको बहुत याद करती है ! उसने मुझे बताया । मुझे उसका नाम अच्छी तरह याद आ गया-हंसा ! हंसा ही नाम था उसका । --एक्सीडेंट में वह भी साथ थी। उसके चौदह स्टिचिज लगे। उसकी चैन खोई 'चालीस हजार की थी। मेरी घड़ी दस की थी शादी वाली थी। हॉस्पिटल पहुचे तो हंसा का एक्सरे करवाया"मशीन वाला चीखने लगा-पूरी मशीन खून से खराब कर दी! खून साफ करके याओ ! मैं चोखा-जान बड़ी है कि मशीन ! कितने की आती है मशीन-दो लाख ! चार लाख ! दस लाख ! पुलिस ने पूछा--एक्सीडेंट किसने किया "मैंने कहा पता नही-एक्सीडेंट तो खुद मुझसे हुआ"रात थी हो गया.. मैं फिर उसकी बात का सिर-पैर नहीं पकड पाया । वो अब चाय पी रहा था। बोला--इस बडी प्रोजेक्ट के साथ ही एक स्माल बजट फिल्म भी बनानी है. आपको ही लिखनी है, टाइटिल है-"मेरा भारत महान"। ये टाइटिल मैंने दिल्ली में लगे होडिंग्स से ही पकड़ा है"देशभक्ति की होगी "इसके लिए बजट रखा है चालीस लाख"जरूरत पड़ी तो पचास लाख तक भी ठीक है "उसने चाय का घूट लिया। बीच में फोन आ गया तो वह चुपचाप बैठा रहा। फिर बोला-आप तो बहुत समझदार आदमी हैं सर"बातों में जो नही कहा जाता, वह भी समझ जाते हैं "यही खूबी है आपको ! वह किस तरफ मुडना चाहता है, यह समझ कर मुझे शंका हुई। मैंने उसे सिगरेट दी। उसने सिगरेट सुलगाई । कश लेते हुए बोला-टॅक्सी दस बजे आएगी, वही लोदी रोड, वहां से डी० आई० जी० साहब" चण्डीगढ़ में "वही मेरे ब्रदर-इन-ला! उन्ही के साथ जालघर जाऊंगा। उन्ही को बुलेटप्रूफ कार में "पच्चीस-तीस लाख रुपया पकडूगा और लोट आऊंगा! लोग जानते हैं फिल्मों में कितना पैसा लगता है। डी० आई० जी० कहेंगे तो कोन मना करेगा! मैंने फिर उसकी तरफ देखा. उम्मीद की कौन-सी किरन उसकी आसों मे थी वहां न कोई किरन थी और न अघेरा। फिर एकाएक उसने वात बदली- आदमी के साथ औरत का जितना धक्त इज्जत से गुजर जाए, उतना 70/इतने अच्छे दिन.

ही वक्त अच्छा है"वह अपने आप बोलने लगा- --और उसने छोटा-सा कश लेकर फोन की तरफ देखा! -फोन करना है, कर लीजिए ! मैंने कहा। --एसटीडी है? --हां! -~-छोडिए"वैसे बाम्बे... • कर लीजिए... फिर कभी कर लूगा "चण्डीगढ़ से कर लूंगा! अब वह चुप बैठा हुआ था। मैं भी चुप था। खामोशी भी बहुत नार्मल थी। हम काफी बातें कर चुके थे। पर उसका उठने का कोई इरादा नहीं दिखाई दे रहा था। मैंने खामोशी तोड़ी.. चलिए इतने बरसों बाद आप फिर एक्टिव हुए हैं। -इपजत बहुत बड़ी चीज़ है सर ! मैं फिर चौंका। --किसी को कहना पड़े और तब काम हो"तो कोई इज्जत नहीं रह जाती और आज इज्जत के सिवा क्या बचा है किसी के साथ ! वह बोला। मैं फिर बात का सिरा नहीं पकड़ पाया परन्तु दूसरे ही क्षण मुझे लगा कि बात फिर लौट आई है। मैंने कुछ खुलासा करने के लिए पूछा-तो टैक्सी आपने लोदी रोड बुलाई है ? --हो"रास्ते में ड्राइवर मांग ही लेते हैं पेट्रोल के लिए। टैक्सी वही खडी रहेगी चण्डीगढ ! वहां से तो बुलेटप्रूफ कार में जाना है पच्चीस- तीस लाख तो समझिए पड़ा हुआ है, उठा के लाना है" -बैक आज बंद है। इसलिए मेरे पाम भी मैंने पैसे बचाने की नीयत से कहा। --पांच सौ भी काफी हैं ! उसने कहा । मैंने राहत की सांस लेते हुए पांच सौ पर समझौता करना ठीक समझा"यह जानते हुए भी कि मैं ठगा जा रहा हूं और ये आदमी लोट कर आने वाला नहीं है। मैं अलमारी से पैसे निकाल हो रहा था कि उसकी मेरा भारत महान/71 उसने आवाज़ आई"सर ! हंसा ने दूसरी शादी कर ली है ! अब आपसे क्या छुपाना.. मुझे शॉक-सा लगा। मैंने उसे पैसे देते हुए पूछा-लेकिन अभी तक तो आप कब कर ली हसा ने दूसरी शादी ? आपसे डायवोर्स... -हां! उसने डायवोर्स ले लिया था ! आखिर उसकी इपजत का सवाल भी तो था । किसी दिन अगर मैं उसकी इज्रत न बचा पाता- तो? वो मेरे लिए टोटली फेथफुल थी. इसलिए जरूरी था कि वो मुझे तलाक दे दे । और अपनी इजत की रक्षा करे ! सरपंसा तो लौट आता है-इज़्ज़त तो नहीं लौटती ! कहते हुए वह खड़ा हो गया। मैं करीब-करीब सकते में था! जूता पहना तो थोड़ा-सा लड़खड़ाया। मैंने उसे संभालना चाहा तो उसने दरवाजे का सहारा ले लिया। फिर वह कुछ नहीं बोला । रुपये जेब में रख कर और बैग उठा कर वह सीढियां उतरने लगा-अटक-अटक कर । मैं उसे देखता रहा । मैंने कहा-सीढियां आपको तकलीफ दे रही हैं नही सर ! उतरने में ज्यादा तकलीफ नहीं होती. "आखिरी सीढ़ी पर एक पल रुक कर उसने कहा- प्लीज तयार रहिएगा, पहली फिल्म रिवाइज करनी है और दूसरी आपको लिखनी है- 'दुनिया देखेगी !' और 'मेरा भारत महान -ऑल द बेस्ट भनिल ! थेक यू सर ! कहता हुआ वह गली मे पहुच गया । मैंने वारजे से उसे देखा--मेरा 'दुनिया देखेगी' और 'मेरा भारत महान !' का प्रोड्यूमर लंगड़ाता हुआ गली से मेन रोड की तरफ मुड़ रहा था। मैंने वेव किया लेकिन उसने पलट कर नहीं देखा। - मैंने कहा 72/इतने अच्छे दिन..

चार महानगरों का तापमान
गर्मी बहुत थी।
---ऐसी गर्मी तो पहले कभी पडी नहीं"
-गर्मी इतनी नही है "तुम्हारा शरीर ज्वालामुखी है."
उसके दिमाग मे गुलाबी जुगनू कौंध रहा था "कभी-कभी दिखाई
देने वाला गुलाबी जुगनू"गोलकुण्डा वाइन'"उसने कहा -रेड वाइन
चख के देखो, अच्छी है ! उसने होंठों से कप हटाया । उसने रेड वाइन से
भीगे हुए ओंठों को हलके से चखा।
उसने हलके से उसकी कमर पर हाथ रखा "वह पेट के बल आधी हो
गई। उसने कहा-रड रम ! नही समझी...लिख के देखो "समझ
जाओगी। कहते हुए उसने उमको अधनंगी पीठ पर लेटते हुए हाथ बढाकर
साइड टेबिल से कागज उठाया.. लिख के देखो...रड रम! वह समझ
गई.."हलके से मुस्कराई...
-खूबसूरती भी मुसीबत बन जाती है.
-तुम हो ही इतनी खूबसूरत !
-उन्हें मुझ पर नहीं, मेरी खूबसूरती पर शक है !
फिर वह दुबका हुआ गुलाबी जुगनू कौंधा।
--तुम्हें मेरी एक प्रेस्ट छोटी लगती है ?
उसने हाथ से महसूस करते हुए कहा-कौन कहता है ?
-वही कहते हैं. कई बार कह चुके हैं."
-सिलीकोन डस्ट से बराबर हो सकते हैं. नीचे, यहां से आपरेट
करते हैं। सोसायटी साइज से ग्रेस्ट बडी हो तो चर्बी का एक लेयर भी
निकाल देते हैं"
चार महानगरों का तापमान 173
--...

वह टांगें सिकोड कर बिल्ली की तरह हो गई...
--सोसायटी साइज""
-जैसी तुम्हारी हैं"परफैक्ट !
---आह"
उमने बांहें खोल दी--कम टु मी...
उसने उमे बाहो में भर लिया।
किशमिश एक"किशमिश दो...
कोंधता हुआ गुलाबी जुगनू-
--आई हैव ए क्रेन फॉर बिजनेस एण्ड ए बॉडी फॉर सिन ।
-ओह आई रियली लव यू...
---कितने ज्वालामुखी फूटते हैं तुम्हारे शरीर से.."
-और कितने घोड़े दौड़ते हैं तुम्हारे शरीर से."
ओह "मुम "मुम"
-~-जल्दी क्या है !
हलके-हलके अलाव जलने लगे।...
जगह-जगह रेशमी रास्ते खुलने लगे "वे रास्ते जो फोल्ड कर दिए
गए थे...
-तुम मदों को मेल सोसायटी मुझे पसंद नहीं है."
--क्यों?
-हर मदं सिर्फ विस्तर तक ले जाना चाहता है."
--पर हर औरत तभी विस्तर तक जाती है, जब यह जान लेती है कि
विस्तर से निकलने के बाद उसे क्या मिलेगा!
...
-रेड वाइन?
-ओ० के.
-खो, बहुत अच्छी है...
उसने देर तक वाइन से भीगे ओंठ चसे...
कही छपी चिड़ियां धीमे-धीमे बोलती रही."
हरमा
74/इतने अच्छे दिन"

लिख के देखो... और उसने कौंपते गुलावी जुगनू को देखा "दोनों बांहों में उसे कंधे से समेटा.."उसके ओंठों ने उसे गर्दन से कान तक छुआ कि वह ढीली-सी पड़ने लगी. "कुछ चौकन्नी-सी हुई... -क्या हुआ? -आवाज़ सुन रहे हो? -कैसी आवाज-उसने सुनने की कोशिश करते हुए कहा--कोई आवाज नहीं है! -- - रंड रम-- .. -- -ऐसी को है.."रेड रम-लिखू। -नही कोई आवाज है"वह और सिमट गई." -क्या हुआ है तुम्हें ? -मैं कहती हूं."कोई है'आहट सुनो" -लेकिन हो ही कौन सकता है." -~तुम्हारी बीवी हो सकती है... --वो कहा. वो तो बच्चों को लेकर ननिहाल गई है."डोट बी सिली! .."लिखू" --तुम्हें आवाज नही सुनाई देती! उसने चादर लपेटी। --कोई मावाज नही है "यह कहकर भी उसने सुनने की कोशिश की। कुछ शक उसे भी हुआ--कुछ लगता तो है। -~-लगता नहीं है। तभी एक हलकी ठक-ठक की आवाज़ हुई। है न! कोई खटखटा रहा है । -लगता तो है ! -कौन हो सकता है ? -तुम सोचो "लेकिन कोई होता तो वैल बजाता... -~वैल खराब भी हो सकती है ! -लेकिन इस वक्त कोन हो सकता है। यही तो! चार महानगरो का तापमान / 75 -- -- -तुम्हारा हस्बैण्ड भी हो सकता है । तुम अपने हस्बैण्ड की दस्तक नहीं पहचानती? कोई है तो जरूर! कहते हुए उसने वाइन की बोतल और प्याले बेड के नीचे खिसका दिए। दस्तक तेज होती गई! -कोई और भी हो सकता है-मिलने वाला। -अव तो दरवाजा खोलना ही पड़ेगा। तुम्ही देखो" -तुम जाके देखो"मुझे उठने में देर लगेगी! दस्तकें तेज होती जा रही थी। -ये तुम्हारा हस्बैण्ड ही है। --वो कैसे हो सकते हैं. --क्यों ? उसका घर है"वह कभी भी आ सकता है । --वो एक हफ्ते से पहले नहीं आएंगे, मुझे मालूम है। जाओ न दरवाजा खोलो। नहीं तो जो भी है, लगता है दरवाजा तोड़ देगा." -लगता है वह दरवाजे को चीर रहा है। दस्तक अब नहीं है । -कहान, जाके देखो प्लीज। -~और अगर वह तुम्हारा हस्बण्ड हुआ तो? दोनों ने एक-दूसरे को चिन्ता से देखा... --आखिर जो होना होगा, होगा, कुछ इस अंदाज से वह उठा। -अगर कोई और हुआ तो? -तो वह तुम्हें ही मेरा हस्बैण्ड समझेगा। उन्हें यहां कोई नहीं जानता। वे तो महीनों टूर पर रहते हैं। उसे कुछ राहत मिली। आखिर बह गया। उसने दरवाजा खोला। एक कुत्ता तेजी से कूदता हुआ भीतर आ गया और सीधा विस्तर की तरफ भागा। वह देखता रह गया-यह तो... --हां, जैकी है ! तब तक कुत्ता बड़े लाड़ से उससे लिपटने लगा पा। उसने भी कुत्ते को बांहों में भर लिया । कुत्ते ने प्यार से उसकी चादर इधर-उपर खिसका दी थी। वह कही से नगी, कही से अपनंगी थी। वह मुस्कराकर उसे और जैको को देख रहा था कभीड के ऊपर दीवार .. 76/इतने इच्छे दिन त पर लगी न्यूड पेंटिंग को देख रहा था । कुत्ते ने आज उसे बैडरूमे देखने का वक्त दे दिया था "नही तो वक्त ही कहां मिलता था। बडरूम कीमती चीजों से सजा हुआ था। सभी - लगभग विदेशी यो सामने वाली दीवार पर उसका एक बड़ा पोट्रेट लगा था। कुत्ते को और ज्यादा वक्त न देकर उसने पूछा--ये किस पेंटर ने बनाया है ? --मुझे नाम याद नहीं। इन्होने बनवाया थाः पचास हजार दिए थे। वह पेंटर इनका दोस्त था. दिक्कत में था। -बहुत खूबसूरत पोट्रेट बनाया है। -तभी तो कहती हूं-उन्हें मुझ पर नहीं, मेरी खूबसूरती पर शक . वह हंसा। जैकी अब तक शांत हो चुका था और खुद ही बैड से उतर आया था। जंकी ने उसे देखा तो मौका। -जैकी"नो... पर जैकी उसे देख-देखकर भोंकता ही रहा। -हम भी कितना डर गए थे। कहते हुए उसने बैंड में घुसकर उसे दोनों बांहों में थाम लिया... गुलाबी जुगनू कोधने लगा। किशमिश एक "किशमिश दो.. उसने बैड के नीचे हाथ डालकर रेड वाइन की वोतल घसीटी। बोतल से ही उसे दो-तीन छुट दिए। वाइन से भीगे ओंठों को उसने चखा "जैकी भौंका। ---कम टु मी. ----₹ड रम"लखू। --लिखो! लिखो !"ओह"आह" उसके शरीर के ज्वालामुखी फूटने लगे थे। तेज रफ्तार घोड़े दौड़ने लगे थे। जैकी लगातार भीक रहा था."तेज आवाज़ में भौंक रहा था। की चारों महानगरों मे भौंक रहा था। चार महानगरों का तापमान/77

-इसे रोको!
-जैकी! नो!
पर जैकी भोंकता रहा "सारे ज्वालामुखी फट-फट कर शांत हो गए।
सारे घोड़े दौड़ते-दौड़ते थक गए । गुलाबी जुगनू मसलकर मर गया।
जैकी चारों महानगरों में भौंक रहा था।
चारों महानगरों का तापमान उस दिन, उस दौर में, लगभग समान
था। गुलाबी जुगनू कौंध रहे थे, ज्वालामुखी फट रहे थे और जैकी भौंक
रहा था।
78/इतने अच्छे दिन...

दालचीनी के जंगल जब भी उसे मौका मिलता तो वह मुर्दाघर में जाकर बैठ जाता। वैसे उसे अस्पताल में कभी-कभी लोगों ने इधर-उघर बैठे या घूमते भी देखा था। किसी को कुछ भी पूछने की जरूरत नहीं पड़ती थी. "अस्पतालों या स्टेशनों पर कौन किसे पूछता है कि तुम कहाँ से आए हो? मरीज और मुसाफिर से कोई उसका नाम-धाम नही पूछता। उस दिन भी वह आराम से मुर्दाघर में ही बैठा था। वैसे जगह तो नहीं थी-~मुर्दे एक-दूसरे पर बोरों की तरह चिने हुए थे। मुर्दाघर-मुर्दा- घर में ज्यादा गोदाम-सा लग रहा था। उसे इस बात से राहत मिलती थी कि मुर्दे कुछ बोलते नहीं थे। इंसानी आवाजों से उसकी नसें फटने लगती थी.. दिमाग में आवाज धुंध की तरह गूजती थी तो उसे लगता था जैसे उसकी खोपड़ी में आतिशबाजी की चरखियां घूम रही हों "उड़ती चिन- गारियां कानो के रास्ते निकल रही हों.. ऐसा तभी होता था जब मुर्दाघर के बाबू के साथ कोई किसी मुर्दे की शिनाख्त पहचान के लिए आता था। कुछ आवाजें तभी आती थी और उसके दिमाग में चरखियां चलने लगती थीं। ज्यादातर मुर्दे ऐसे थे जो गैस को घुटन से मरे थे और अब सांस रोके हुए आराम से पड़े थे। उनमें से बहुत-से भुदो को वह अच्छी तरह पहचानता था'"बस, उनके नाम उसे याद नहीं थे। मुदों को भी उसका नाम याद नहीं था "अपने नाम को याद करने के लिए वह दिमाग पर बहुत जोर डालता था, पर उसे याद ही नहीं आता था। कभी-कभी तो अपना नाम याद करते हुए उसके दिमाग से खून के फव्वारे छूटने लगते थे और चरखियां भी चलने लगती थी-खून और आग के इस तमाशे में वह बेहाल और बदहाल हो जाता था और तब उसे मुर्दाघर में ही खामोशी बाजाIra .. और शांति मिलती थी । फव्वारे धीरे-धीरे सूख जाते थे और चरखियां बुझ जाती थी.. लेकिन फिर कुछ और होने लगता था उसके फेफड़ों में गरम लू के अधड़ चलने लगते थे और आंखें फुलझड़ियों की तरह चिटचिटाने लगती थी..सामने सलमा-सितारे उड़ने लगते थे। कभी-कभी मुर्दे आपस मे बात करते थे और किसी एक मुर्दे के दुःख- सुख में शामिल हो लेते थे-अच्छा हुआ, अब आराम से तो सो रहा है नही तो रोज आकर सूदखोर सताता था “वेचारा भागा-भागा छुपता फिरता था। पांच लड़कियां थी सामने और एक लंगड़ा बेटा.. -तीन लडकिया तो पार लग गई।"वे सुल्तानिया अस्पताल के मुर्दाघर में पड़ी हैं, दो का पता नहीं । दूसरा मुर्दा खबर देता, तो तीसरा पूछ लेता-इसे मालूम है ? --मालूम है, तभी तो इतनी वेफिक्री से पड़ा है। चन की नीद ले रहा । -कोई औरत नही आई अपने यहा? -वो सब सुल्तानियां मे पडी हैं। -आखिर इज्जत का सवाल भी तो है "मद-मुर्दाघर मे वो साज- शरम से मर जाती। जब मुर्दे बातचीत कर रहे थे, तब उसे अपनी बीवी का खयाल भी आया था. उसकी सूरत सामने नाच रही थी, पर नाम उसका भी याद नही माता था। वह उसे क्या कहके पुकारे ! किस नाम से आवाज़ दे ? उस रात तो वह बडे का गोश्त पका रही थी जिस रात गैस फटी । सदियों की रात थी और चूल्हा दोनो तरह से गर्मी दे रहा था। लपटों से भी और पकते गोरत की सुशबू से भी। उसकी बीवी रह-रहकर उसे देख के मुस्करा रही थी."वह दिन एक अच्छा दिन था जब इतने दिनों बाद दोनों गोस्त साने वाले थे...उसकी बीवी ने उसे बताए बिना जो पैसे बचाए थे, उन्ही से वो बड़े का गोरत लाई थी... -तुम्हें अगर दस दिन फलिया न मिले तो तुम मेरा कलिया बना देते हो! उसकी बीवी ने उसे मनुहार भरा ताना दिया था और पोसी से मुस्करा दी थी। उसकी सहेली ने विदा के वक्त उसे कन्नौज के इत्र की एक 80/इतने अच्छे दिन...

छोटी-सी शीशी दी थी जिसका चावल वरावर फाहा वह अपनी तुड़ी में दबा लेती थी और तब वह कस्तूरी की तरह महकती थी। उसकी बीवी को अपने तराई के जंगल बहुत याद आते थे."जिनमें हिरनों के झुंड धूमते रहते थे और जहा बरसात के दिनों में भीग कर दालचीनी के पेड़ महका करते थे। उन भीगते जंगलों की महक उत्तरी हवाओं पर तैरती आती थी "जिसके लिए उसकी बीवी भोपाल में बहुत तरसती थी। .."उसकी बीवी का तन-बदन भी दालचीनी के जंगलों की तरह भीगता और महकता था" मुर्दाघर में तेजाब महकता था."ठीक वैसा ही जैसा गैस फटने पर महका था लेकिन अब वो आदी हो गया था. इस तेजाबी गैस की महक का। यही महक तो पकते कलिया की सोधी महक में घुल-मिल गई थी और उसके बाद उसकी आंखों मे गंधक सुलगने लगा था। धुआं निकलने लगा था। और उस धुएं के बीच और बाद फिर उसे उसकी बीवी दिखाई ही नही पड़ी थी। उसके बाद तो अब चार साल हुए"हमीदिया अस्पताल का वह मुर्दाघर भी छूट गया, जहां वह राहत के लिए छुपकर बैठा करता था- उस दिन मुर्दाघर में गर्मी बहुत ज्यादा बढ़ गई थी। ठेकदार ने पूरा वर्फ ही नहीं दिया था और जितनी सिल्लियां आई थी, वे गल चुकी थीं। तेजाय की महक वाला गंदला पानी नालियो में बीमार सांप की तरह सरक रहा था गर्मी न बढ़ती तो वह नहीं निकलता। गर्मी भी थी और चौकीदार ने उसे देख भी लिया था, इसलिए निकलना ही पड़ा। जब दिमाग में फव्वारे नहीं फटते पे और चरखियां नही चलती थीं तो कुछेक टुकड़े उसे याद आते थे। उसके बाद उसे कुछ याद नहीं आता पा"अपना नाम तो कभी याद ही नही आता था. 'मुर्दाघर से निकलकर वह चुपचाप जहांगीराबाद की तरफ चला गया था. फिर छोला रोड से स्टेशन "ग्रीन पार्क "शाहजहानाबाद से घूमता हुआ लोहा बाजार और फिर ठण्डी हवा ने उसे खीचा था तो श्यामला हिल्स की तरफ निकल गया था। राहत तो कहीं मिलती नही थी मार मुर्दाघर का चौकीदार कुछ जरा । दालचीनी के जंगल/81 ... ज्यादा चौकस हो गया था। अब वो घुसने ही नहीं देता था और घुस भी जाए तो वह गालियां देकर निकाल देता था। गनीमत यही थी कि जब से गंस फटी थी, भला हो उन लोगो का जो मुफ्त लंगर पला रहे थे, इसलिए उसे खाना मिल जाता था। वे दवाइया भी देते थे पर वह तो दवाइयों से परे जा चुका था। लेकिन उसे कुछ भी तो पूरा-पूरा याद नही आता -टुकड़े-टुकड़े में याद आता है फिर खो जाता है-सब कुछ। एक भीड में तो यह भी शामिल हुआ था "हजारों की भीड़ थी- हाय ! हाय करती और मुआवजा मांगती । झण्डे थे, लोग थे, दफ्तियां थी 'कुछ पैसे भी मिले थे पर उसके बाद तो कुछ याद ही नही आता"तभी से तो वह सब कुछ भूला हुआ है. कई बार तो उसकी और जिस झुण्ड में भी वह शामिल हुआ था, उसकी तस्वीरें खिची थी"लोगों ने सिनेमा भी उतारा था'"एक अखबार में उसकी तस्वीर भी छपी थी, पर उस पर उसका नाम नहीं था। अगर होता तो कम-से-कम वह अपना नाम तो जान लेता। नाम की कमी ने उसे बहुत सताया था। इसी हाल में वह मुर्दाघर से बेदखल किए जाने के बाद निकला था। चौकीदार ने बहुत गालिया दी थी। अब वहां वह पुराने वाले और उतने मुर्दे तो नहीं थे मुर्दो की यह वस्ती भी उजड़ गई थी जिससे पहचान और नाम की मुसीबत और बढ़ गई थी। आखिर मुर्दो मे से शायद कोई उसे पहचानता"नाम लेकर पुकारता" आखिर हमीदिया अस्पताल के फाटक से वह जब निकल रहा था तो किसी ने उसे देखकर और चौंककर कहा था-अरे तू ! तब एक पल के लिए उसे लगा था कि कम-से-कम यह एक आदमी है जो उसे पहचानता भी था और नाम से जानता भी था -इसीलिए तो वह उसके पीछे भागा था, यही चीखता-पूछता हुआ-मेरा नाम तो बता दे1 लेकिन पहचानने वाला वह आदमी तो इस बुरी तरह डर के भागा था कि चौक बाजार तक पीछा करने के बावजूद वह उसे नहीं पकड़ पाया .. 82/इतने अच्छे दिन - था और फिर उसी तरह अनाम-गुमनाम रह गया था। इस दौड़-माग के बाद उसके दिमाग मे खून के फव्वारे फिर फूट पड़े थे और आतिश की चरखियां फिर चलने लगी थी। दौडते-दौड़ते वह हाफने लगा था और पस्त होकर तालाब किनारे बैठ गया था। इन्ही झीलों के कारण दक्षिणी भोपाल के लोग बच गये थे."नही तो शायद पूरा-का-पूरा भोपाल बेहोश पड़ा होता, अंधा हो जाता या हरेक के फेफड़े फट जाते । एक पूरा का पूरा शहर मर जाता । वही झील किनारे तब कुछ लोग बात कर रहे थे - बहुत बड़ी कंपनी है अमरीका की। उनके लिए हमारी जान की कीमत कीड़े-मकोड़ों से पादा नही। वे तो आज से तीस-चालीस वरम पहले अपना गेहू समुन्दर में फेंक देते थे, जब अपना भारत भूखो मरता था · इन्होने जान-बूझकर यह कंपनी भारत में लगाई थी और वे अपनी गैसो को आजमाना चाहते थे। वह होश में आते-आते यह सब सुन रहा था और फिर बेहोश-सा हो गया था। उसे सबसे ज्यादा अफसोस इसी बात का था कि वह आदमी जो उसे उसका नाम बता सकता था, भागकर भीड़ में खो गया था और अब उसे उसका नाम बताने वाला शायद कोई नहीं था। वह भोपाल को पहचानता था "भोपाल का नाम भी जानता था, पर भोपाल न तो उसे पहचानता था, न उसका नाम जानता था। इसी जान-पहचान और नाम के झमट को निपटाने के लिए उसने मोचा था कि वह अपनी ससुराल चला जाए-तराई वाले इलाके में, जहां दालचीनी के जंगल महकते थे और कस्तूरी वाले हिरन घूमते थे- पर उसे तो अपनी बीवी का नाम तक याद नहीं आ रहा था "न उसकी बस्ती का और फिर उसे वहां पहचानता कौन? पहचान भी लेता तो भी क्या वह उसका नाम उसे बता सकेगा? या उसकी बीवी का? यह होशी-बेहोशी का अजीब आलम था । न जाने कितने नीम-हकीम डाक्टरों को काम मिल गया था। वे हमीदिया, सुल्तानिया, जयप्रकाश और अब नेहरू अस्पताल में नौकरियां पा चुके थे और उसके या उम जैसों के नाम पर रोटियां तोड़ रहे थे लेकिन उसका नाम वे भी नहीं जानते थे.. दालचीनी के जंगल/83 भारत भवन में किसी बड़े जलसे के विरोध में उसे भी एक बैनर पकडा दिया गया था""भोपाल गैस त्रासदी! जशन मत मनाओ, हमारा मातम मनाओ! लेकिन भारत भवन वालों ने भी उसे नहीं पहचाना था। उसने सुना था कि उसका कोई शायर एक लाख रुपये की थैली उसी भवन से उसी जमों को रहनुमाई करते हुए ले आया था, पर न उसे अपने शायर का नाम मालूम था। न शायर को उसका खर, पैसे की उसे जरूरत नहीं थी। कभी सरकार दे देती थी, कभी कुछ अमरीका वाले चंदा करके भेज देते थे। लेकिन जो फवारे उसके सिर मे फूटते थे और सुलगती हुई चरखियां चलती थी, वे उसे जीने नहीं दे रही थी। और अब तो उसे दवा भी नहीं मिलती थी । डाक्टरो ने मिलकर उसे पागल करार दे दिया था। लेकिन किसी डाक्टर ने उसके पागल हो जाने का कारण नहीं बताया था। उस वक्त वह फटी-फटी आंखों से अपने चारागरो को देखता रहा था और एक पल बाद ही सैकड़ों फुलझड़िया उमकी आंखो से छूट पड़ी थी। तब से उसकी जिन्दगी बारहवाट हो गई- उसी दिन उसे एक बड़ा डाक्टर मिला था। वह मुर्दाघर के पिछवाड़े पीपल के नीचे रहता था। वह अस्पताल से फेंकी हुई टीके की छोटी-छोटी शीशिया जमा करता था और उन्ही से अपने मरीजों का इलाज करता था। जब डाक्टरो ने उसे पागल घोषित कर दिया, तो वह बड़ा डाक्टर खिड़की के पास, बाहर खडा हंस रहा था। और जब उसे गैस के मरीजों की लाइन से धक्के मार कर निकाला गया तो इसी बड़े डाक्टर ने उसे बांह से पकड़ा था और अस्पताल के कचरे के ढेर पर बैठा दिया था। वह बड़ा डाक्टर वही खिडकी के पास खडा बड़बड़ा रहा था-दुःख घोड़े की चाल सरपट आता है और चीटो की चाल जाता है ! दुःख घोड़े की चाल सरपट आता है "समझा! वह बड़ा डाक्टर उसे पीपल के नीचे ले गया था। उसका इलाज करने । टीके को पचामों शीशियां उसके पास थी। बड़े डाक्टर ने हवा मे से पर्चा और कलम उठाया, पूछा- 84/इतने अच्छे दिन..

नाम "उम्र"मोहल्ला" फिर खुद ही बोला था-कोई बात नहीं "कोई बात नही और तब उसने एक झन्नाटेदार थप्पड़ उसके जड़ दिया था और कटखने बन्दर की तरह चीखा था-कुड़,म-कुड़ म की भइयम-भइयम "मइयम- झइयम ! अबे साले ठीक से बजा। बहुत देर तक दोनों बैण्ड बजाते रहे थे। फिर बड़ा डाक्टर थककर चूर हो गया था और लेटते हुए बोला था-बेटा! मेहनत कर और दरिया में डाल अवे साले देश मे रहता है तो परदेसी की तरह रह ! कचरा खा और कुत्ते की तरह मर जा! फिर वह बड़ा डाक्टर हंसने लगा था और उससे बोला था -रो"जोर से - उसे रुलाई नही आ रही थी पर न जाने क्यों उसकी आंख मे आसू भर आए थे और बड़े डाक्टर ने उसकी आंख की कोर पर टीके वाली शीशी लगाकर उसकी आंख के आंसू निचोड़ लिए थे। --मैंने तेरे भासू ले लिए हैं ! जाच के बाद तेरी दवा तय करूंगा। सबकी जांच अदालत में चल रही है. फटे हुए फेफड़ों को दवा अदालत देगी. "फूटी हुई आंखों की दवा अदालत देगी जबलपुर की बड़ी' अदालत !" दु:ख घोड़े की चाल सरपट आता है"अपने दुःख का भाव बता! कित्ते रुपये किलो है तेरा दुःख, बोलता क्यों नही साले ! और बड़े डाक्टर ने हाय उठाया ही था और इससे पहले कि भन्नाटेदार एक और यामड़ उसके पड़ता, वह भाग खड़ा हुआ था। बाजार पहुंच कर उसे राहत मिली थी। बाजार में अखबार वाला चीख रहा था-~-भोपाल गैस काण्ड का निपटारा"सुप्रीम कोर्ट से साढ़े सात सौ करोड़ दिलवाया... और एक आदमीप्लास्टिक की अपनी थैली को गेंद बनाता बोला- -~~शाला मटन चालीस रुपये किलो हो गया। तभी एकाएक कलिया की सोंधी महक ने उसे घेर लिया"चूल्हे पर पढा कलिया और दालचीनी के भीगे जंगलों की तरह महकतो उसकी बीवी दालचीनी के जंगलों की तरह महकता उसका भोपाल "सव दालचीनी के जंगल/85 जीते-जागते थे, जंगल भी, वह भी और उसकी बीवी भी... उसने फिर दौड लगाई। बड़ा डाक्टर टीके की शीशियां हिला-हिला कर आसुओं की जाच कर रहा था। अभी उसकी जाच-रपट तैयार नहीं हुई थी। वहां से वह सेफिया कालिज की तरफ भागा और भागता-भागता जहांगीराबाद पहुचा। इस दौड़ में उसे चार साल लग गये थे। जहागीरा बाद की झोपड़पट्टी में जब वह पहुंचा तो अपनी झोपड़ी का रास्ता उसे नहीं मिला"उसे लगा कि वह अपने घर का रास्ता भी भूल गया है। यह तो कहो अच्छा हुआ कि जब वह बदहवास-सा रास्ता खोजता घूम रहा था तो किसी ने उसकी बाह पकड़ कर पूछा था- -तू कहां था अब तक? उस-किसी ने इतना पूछा ही था कि उसने कसकर उस-किसी को पकड़ लिया था ताकि वह भागने न पाये और उसका नाम बता जाये। उस- किसी ने सवाल फिर दोहराया- -तू अब तक कहां था? -तू मेरा नाम जानता है ? -नाम ! क्यों मसखरी करता है मुश्ताक ! -~-मुश्ताक ! मुश्ताक ! मुश्ताक ! ""यह आवाज सब दिशाओं में गूजती चली गई और इसी के साथ उसे रेलगाड़ी की सीटी, रिक्शे-तांगों की आवाज़ साफ-साफ सुनाई पड़ने लगी। सब कुछ जैसे नाम लौटने के बाद अपनी जगह लौट आया था। मुश्ताक दर्जी की दुकान में मशीन चलने लगी थी और कपड़े सिलने लगे थे और उसकी बीवी प्यार से झगड़ने लगी थी-तुम दूसरी औरत का नाप मत लिया करो"मुझे अच्छा नहीं लगता। -तूने इतनी मेहरबानी की है यार तो मुझे मेरे घर का रास्ता भी बता दे ! मुश्ताक ने उस-किसी से पूछा था । --तेरा घर । तेरा घर तो अब रहा नही मुश्ताक ! उस-किसी ने कहा। -क्यों? मेरी बीवी...और अपने दिमाग पर जोर डालने के बाद 86/इतने अच्छे दिन.

यार? -- भी जव फौरन मुश्ताक को अपनी बीवी का नाम. पाद-नही आया तो उसने आहिस्ता और शर्मिन्दगी से पूछा- मेरी बीवी का नाम क्याथा -वयों, उसका नाम भी भूल गया ? मूलना ही बेहतरे या अच्छा किया? -क्यो ? अच्छा क्या किया? खैर, वो बाद में पहले तो याद दिलायार! ---शबनम! - हां ! हां! शबनम ! शब्बो"शब्बो"और फिर दूर तक दिशाएं गूंजती चली गई-शब्बो! मुश्ताक ! शब्बो ! मुश्ताक " अपनी लौटी हुई खुशियों के जोश में उमे सब कुछ याद भा गया था। वह सब कुछ पहचान गया था। उसने उस किसी--जिसका नाम उसे अब याद आ गया था, उसी दुल्लन को छाती से लगा लिया था--मेरे दोस्त" मेरे यार"तूने मुझे मेरी सारी दुनिया लौटा दी ! ""चल, घर तो चल दुल्लन"शब्बो चाय बनाएगी --शब्दो अव इधर नहीं है ! दुल्लन ने मायूसी से बताया। -क्यों ? कहां चली गई ? मायके लौट गई ? मुक्ताक ने पूछा। नही"वो छज्जा देखता है मुश्ताक ! वो छज्जा जिस पर टीर्व की छतरी लगी है वो कबूतरों की छतरी वाला छज्जा नहीं वो" वो"दुल्लन बता रहा था। -~-शब्बो तीन साल से वही बैठती है। एक साल तो उसने जैसे-तैरे तेरा इंतजार किया फिर वही उस छज्जे वाले कोठे पर बैठने लगी। क्या करती ! नतू या, न जिन्दगी का कोई वसीला था। एक भयानक सन्नाटे में मुश्ताक का दिमाग सुन्ल-सा रह गया था फिर दालचीनी के जंगल नायलन की साड़ियों की तरह धू-धू करके जल संगे थे। दिमाग में सून के फव्वारे फूटने लगे थे और आतिशी चरखि चलने सगी यो · मांखें फुलझड़ियों की तरह चिटचिटाने लगी थी फेफड़े धौंकनी से आग को सुलगाने लगे ये "कानों से गर्म धुएं के बगू फूटने लगे थे. . दारचीनी के जंगल 187 मुश्ताक ने चारों तरफ देखा-हल्के-से मुस्कराया और फिर एकदम् चीखता हुआ दौड़ पड़ा। वह जगह-जगह रुकता या "चीख-चीख कर कहता था-फुल प्लेट चार हजार हाफ प्लेट पचास हजार क्वाटर प्लेट चार लाख ! कितना गोश्त हुआ? "हिसाब लगाओ"कितना गोश्त हुआ.. और वह फिर दौड़ पड़ता था। कहां, उसे खुद पता नहीं था। फिर कही रुककर वह चीखता था --हिसाब लगाशो! घटाओ, जोड़ो... तकसीम करो"सात अरब पचास करोड़ ! पैसों का पहाड़ ! श्यामला हिल्स नहीं."अमरीकी पैसों का पहाड़"फुल प्लेट चार हजार "हाफ प्लेट पचास हजार"क्वाटर प्लेट पार लाख ! कितना गोश्त हुआ ? हिसाब लगाओ "जोड़ो घटाओ... हमीदिया अस्पताल के गेट पर पहुचकर मुश्ताक लगभग भापण-सा देने लगा था- -सबकी जाच अदालत में चल रही है"मैथिली आइसो साइनाइट गैस एम० आई० सी० हवा में वह रही है। फटे हुए फेफड़ों की दवा अदालत देगी ! फूटी हुई आंखों की दवा अदालत देगी ! जानता है- दुःख घोड़े की तरह सरपट भाता है ! भोपाल गैस काण्ड का निपटारा... अमरीकी पैसों का पहाड़ "दालचीनी के जंगल जल रहे हैं-पता है तुम्हें ? मटन चालीस रुपये किलो! खरीदा तुमने "मस्ती करो बेटा... मटन चालीस रुपये किलो.."ताके देखो यारो! सात अरब पचास करोड रुपयो का पहाड़ "फुल प्लेट चार हजार जो टूट गई हैं, हाफ प्लेट पचास हजार जो घटक गई हैं, क्वाटर प्लेट चार लाख जो गैस की चपेट में पड़ी हैं. जोड़ो, घटाओ, तकसीम करो और हिसाब लगामो फिर हासिल बताओ.. वो बुत देखा है सालो तुमने "जो कहता है-हमे न हिरोशिमा चाहिए न भोपाल"हमे सिर्फ जिन्दा रहने दो “यह उनकी याद में है सालो जो गैस काण्ड मे दो और तीन दिसम्बर को रात सन चौरासी में मर गए या मार डाले गये"फुल प्लेट चार हजार हाफ प्लेट पचास हजार, क्वार्टर प्लेट चार लाख ! .."हा! हा! हा! अमरीकी कम्पनी यूनियन कार्वोइड का कमाल!"ये साले अपनी गैसों की तासीर हम पर आजमा - ! 88/इतने अच्छे दिन..

रहे है "जंगल कट रहे हैं इंसान कटे पेड़ों की तरह मुदों में बदल रहे हैं. गोश्त ही गोश्त"जिन्दा गोश्त, मुर्दा गोस्त''मरता हुआ गोश्त ! ... गोश्त की मण्डी खुल गई है यारो गोश्त की मण्डी 'मुर्दा गोश्त की मण्डी, जिन्दा गोश्त की मण्डी "एक बुत अपनी कहानी कहता खड़ा है" दूसरा चुत विस्तर में पड़ा है दालचीनी के जंगल देखे हैं मालो! औरत का जिस्म बीस रुपये रात-लगाया हिसाब, जोड़ा घटाया, भाग दिया, क्या हिसाव पड़ा? बताओ न, बहुत हिसाव आता है तुम्हें औरत का जिस्म बीस रुपये रात मटन चालीस रुपये किलो और इंसान का गोश्त ग्यारह रुपये किलो... इसी समय मुश्ताक के एक जन्नाटेदार झापड़ पड़ा। तमाशबीन देख- कर हंस पड़े-~-बड़ा डाक्टर मुश्ताक को पकड़कर ले गया था, वही पीपल के नीचे "जहा उसकी टीके वाली शीशियां रखी थीं। मुश्ताक वही बैठ गया। हंसता हुआ। तभी बड़े डाक्टर ने पूछा-क्या बक रहा था वहां? मुश्ताक ने उसे देखा फिर वड़बड़ाया-पैमों का पहाड ! औरत का जिस्म बीस रुपये रात'"मटन चालीस रुपये किलो! इंसान का गोश्त ग्यारह रुपये किलो.. -~-कित्ते रुपये किलो है तेरा दुःख, बताता क्यो नहीं साले ! बड़ा डाक्टर चिल्लाया था, फिर शीशी हिलाते हुए बोला था-जांच के बाद तेरी दवा तय करूंगा ! कुड़ म-कुडम की झइयम-झइयम ! कुड म-कुड़ म को झइयम-भइयम... और फिर बड़े उत्साह से दोनों बैड बजाते रहे थे। ! चार महानगरों का तापमान /89 स्टोरी फोन खराब था। मुझे टेलेक्स से मैसिज मिला। मामला सामूहिक बलात्कार का था। मुझे स्टोरी करनी थी। पड़रिया में हुए सामूहिक बलात्कार की स्टोरी एक लोकल साप्ताहिक ने छाप दी थी। मुझे ऐसी स्टोरी करने में मजा भी नहीं आता था और न मेरी दिलवस्पी थी। बलात्कार को ऐसी स्टोरियां आए दिन आती रहती हैं। इन लोकल अख- वारो के कारण नेशनल महत्व की स्टोरियो की कोई कीमत नहीं रह जाती। वे दब जाती हैं और हाहाकार मचाती बेमतलब स्टोरिया महत्वपूर्ण बन जाती हैं । और फिर इस तरह की घटनाओं में रखा ही क्या है-जब गाय या भैसों के झुण्ड के झुण्ड धरने जाते हैं तो क्या कोई रिपोर्ट करता है कि कितनी गायों या मैसों के साथ बलात्कार हुआ ? कितनी भेड़ों ने आज फरियाद की है? मैं कॉफी हाउस में चला गया। कॉफी पी ही रहा था कि सरकारी सूचना विभाग के नदा ने खबर दी-सर! एक जबरदस्त स्टोरी है... "कहां? —कहिए तो बुला ! नंदा ने उसे इशारे से बुलाया। और वो मरियल-सा फोटोग्राफर बगल वाली कुर्सी पर आकर बैठ गया। बड़े रहस्यमय तरीके से उसने मुझे देखा। कमरे वाला बैग यह गोद में दवाए बैठा था, कुछ इस तरह कि उसकी स्टोरी चोरी न भली जाए। मैंने कॉफी का मार दिया। नंदा ने कहा-बताओ! मैंने उत्सुकता से उस मरियल फोटोग्राफर की तरफ देखा। वो कोई पानदार आदमी नहीं लग रहा था। आजकल नेशनल प्रेस के फोटोग्राफरों 90/इतने अच्छे दिन.. - का रुतवा ही दूसरा है। ये लोकल फोटोग्राफर भी अब अपनी पुस्तनी दुकानो पर किसी को बैठा कर, कैमरे लटकाकर निकल पड़े हैं और बेमतलब की कोई-न-कोई स्टोरी लिए घूमते हैं। उन्ही लोकल लोगों की, जिन्हें न कोई जानता है न पहचानता है। लेकिन खैर "इन लोकी-लोगों से मिलना और एक प्याला कॉफी पिला कर इनकी स्टोरी सुनना महंगा नही लगता। न्यूरो से चलते हुए मैंने वाइफ को फोन कर दिया था । वो मेरी आदत जानती थी और खुद भी खयाल रखती थी। वह जानती थी कि किसी स्टोरी के लिए बाहर जाने से पहले मैं कॉफी हाउस में लाकर एक प्याला कॉफी जरूर पीता हू"वो ये भी जानती है कि लोकल स्टोरी के लिए कभी-कभी बहुत बेहूदे और अनहाइजोनिक इलाकों मे जाना पडता है, इस- लिए वी खासतौर से मेरा पीने का पानी जरूर भिजवा देती है। उसने यही किया था। नोकर मेरा बैग लेकर आ गया था। मैं जानता था, उसमें पीने का पानी होगा, सँडविचेज होगे, टावल और सौंफ, इलायची का डिब्बा होगा। कभी-कभी तो लोकल जगहों पर इतनी गदगी होती है कि मन मिचलाने लगता है तब ये डिब्बा काम आता है । आज तो उसने यूडी- कोलोन की एक शीशी भी रख दी थी जगह का नाम पड़रिया सुनते ही वह समझ गई होगी कि इस नाम की जगह या गाव कितना बेहूदा हो सकता है । यादातर तो नाम ही समझ मे नही आते। गाव-देहात के नाम तो छोड़िए औरतो-आदमियों के नाम तक इतने अजीव होते हैं कि बार-बार सुनकर ही उन्हें लिखा जा सकता है, फिर भी वे बहुत बार गलत हो जाते हैं । इन लोगों को नाम से पहचाना ही जाए, यह जरूरी भी नही । नाम से फ्यादा स्टोरी की जरूरत होती है। कभी-कभी स्टोरी इसलिए भी कच्ची रह जाती है क्योकि उनको भाषा भी समझ में नहीं आती और तब कोई थोडा-बहुत पढ़ा-लिखा लोको काम आ जाता है, वह स्टोरी के भीतर की स्टोरी बता देता है। स्टोरी तो मिल जाती है पर मजा नहीं आता। इससे नेशनल डेलीश की इमेज पर असर पड़ता है और फाइल की हुई स्टोरी एक्सक्लूसिव न रहकर करीब-करीव एजेंसी की स्टोरी बन जाती है । इस हलकी-सी झंझलाहट को मैंने सामने खड़े नौकर पर उतार दिया~खड़ा क्यों है? जाता क्यों नहीं। स्टोरी/91 वो मेम साद ने कहा है पड़रिया जाते हैं साब तो मामा जी से मिलते आएं। नौकर ने कहा । -~-ठीक है, ठीक है।''तुम जाओ और मुझे याद आया कि हां, पडरिया के डिस्ट्रिक्ट हेड क्वार्टर्स मे शकुन के मामा जी मजिस्ट्रेट है। एक कॉफी और सर ! नदा ने पूछा तो मैं फिर उनकी ओर मुखा- निव हुआ। मैं भूल ही गया था कि वो मरियल-सा लोकी फोटोग्राफर अपनी स्टोरी लिए बैठा था। तभी नदा ने रहस्यमय दग से वताना शुरू किया-सर! इनका नाम तिनसुखिया सिंह है । ये वनमत्री के परिवार के फैमिली फोटोग्राफर रहे हैं "दमियों साल से फोटो खीचते हैं। ''अब उन्ही की एक जबरदस्त स्टोरी है इनके पास "मय फोटोज के।'बताओ, सर को नंदा ने उस मरियल लोकी से कहा। उस लोकी फोटोग्राफर की आखो में चमक आ गई पर वह मुझमे कुछ घबराया हुआ-सा था। नेशनल डेली का ब्यूरो-चीफ होने के कारण मेरा रोब तो था ही, शायद इसीलिए वह लोकी झिझक रहा था। ---पहले पमा तय कर लीजिए। उस बद्तमीज़ लोको ने कहा - मैंने स्टोरी सुना दी तो ये सुनकर लिख देंगे.. -बास्टर्ड ! मेरे मुंह से धमाकेदार शन्द सुनकर नंदा उस मरियल को उठा ले गया । वे दोनों वाहर जाकर पड़े हो गए। मैं गाड़ी लेकर पडरिया की तरफ निकल पड़ा । देवघर तक रास्ता अच्छा था। मन्दिरों का शहर देवघर: वैसे भी कंट्री साइड मे जाकर अच्छा लगता है। बहुत डिफरेंट है सारा सीन फंसीनेटिंग ! अगर महा सिर्फ नेचर होती और इन कीड़ों-मकोड़ों ने इतनी गरीबी न पंदा की होती तो ये इलाके कितने ब्यूटीफुल होते "गरीबी-ही-गरीबी को पैदा करती है। -आप रोंग है साय ! पंचानन बोला। अमल में देवघर से पड़रिया का रास्ता बताने के लिए मैंने एक लडके को देवघर मे पकड़ लिया था। वह मेरे माय गाड़ी में बैठा हुआ पा-उगी का नाम पंचानन या। -~-कसे? मैं गाड़ी चलाता जा रहा था। 92/इसने अच्छे दिन...

-~-अंगर अमीरी ज्यादा अमीर न होती जाए तो गरीबी गरीव नहीं रहेगी ! पचानन बोला था । उसकी हिन्दी मुझे अच्छी लगी थी। ~~यहा तक पढे हो? ~~एम० ए० पॉलिटिकल साइंस ! -ओह ! मेरे मुंह से निकला। लेकिन देवघर के इस लड़के को देख- कर मुझे उसकी बात झूठी लगी। ये लड़का मुझे तूतिया समझ रहा था--- ये तूतिया शब्द मेरे और शकुन के बीच का बहुत प्राइवेट शब्द था। हम जब भी कभी पाटियो या डिनर पर जाते और किसी पर कमेट पास करना होता तो शान लगभग मेरे कान के पास लिपटते हुए यही कहती थी-- तूतिया ! और हम दोनो वेसाख्ता हंस पड़ते थे। एक बार डिप्टी मिनिस्टर ने यह शब्द सुन लिया था और शकुन के पीछे ही पड़ गया था-क्या कहा आपने ? क्या कहा आप ने ? तो मैंने उस डिप्टी मिनिस्टर को डांट दिया था-शी इज माई वाइफ "ह्वाई यू आर हैरेसिंग हर"हम आपम में कुछ भी कहें "दैट्स अवर प्राइवेट मामला! शकुन ने उसी डिप्टी मिनिस्टर को तूतिया कहा था। गर्मागर्मी में मामला बढ़ गया था और एक लम्बी बहस फ्रीडम आफ एक्स्प्रेशन और फ्रीडम माफ स्पीच पर शुरू हो गई थी-मेरे जैसे सभी साथियों ने हमारा साथ दिया था और डिप्टी मिनिस्टर दुम दबाकर भाग गया था। तव शकुन ने खुलेआम कहा था--जूतिया ! और सब हम पड़ें थे। बडे जोर का ठहाका लगा था। पंचानन हस रहा था--यो आपको विश्वास नहीं होता? मैंने उसे शक से छोटा होना मंजूर नहीं किया। बात चलाने के लिए पूछा--मिस्टर पंचानन, पॉलिटिकल साइंस ! आप करते क्या हैं ? -~-आप अब भी मेरी बात पर विश्वास नही कर रहे हैं। कहते हुए पंचानन ने अपनी मैलो-कुचली पंट की जेब से एक मुड़ा-तुड़ा कागज निकाला। मुझे दिखाते हुए बोला--- -ये देखिए ! पॉलिटिकल साइंस एम० ए० की डिग्री । पटना भूनिसिटी ! मैं अपने डिग्री सर्टीफिकेट को अटेस्टेड कापी हमेशा जेब में स्टोरी/93 रखता हूँ । पंचानन ने कुछ गर्मी से कहा--हमें आप लोग पढ़ा-लिखा समझते ही नही.. मुझे प्यास लग रही थी। पर मैं अपना पानी बरवाद नहीं करना चाहता था पता नहीं कितने पानी की जरूरत पर जाए."खुद पानी पीना और पचानन से न पूछना असभ्यता होती। मैं कोई ऐसी जगह तलाश रहा था जहां पानी का हैण्डपम्प वगैरह दिख जाए तो मैं वही गाड़ी रोक लूं। प्यास तो पंचानन को भी लग रही होगी "गर्मी तो थी ही और गर्मी में किसे पास नहीं लगती! आखिर दूर पर एक हैण्डपम्प नजर आया। मैं गाडी साइड पर लेने लगा कि एक बहुत बड़े हादसे से बच गया। एक आदमी सडक की किनारी का तकिया बनाए घने पेड़ की छांव में लेटा हुआ था, वह दबते-दवते बच गया। गाड़ी को झटका लगा, पर मैंने बघा- कर काट ली। लेकिन मैं इस हादसे से चीख पड़ा था-कमवस्त ! यहां लेटा है. अभी मरवा देता । यहां मरने के लिए लेट गया"साला.. -साला नही बेचारा! पंचानन बोला। उसकी हिन्दी मुझे वाकई अच्छी लग रही थी। -वेचारा कैसे ? मैंने हैण्डपम्प के पास गाड़ी रोककर पूछा। -ये 'अगर आपकी गाड़ी से दबकर मर भी जाता या घायल हो जाता, तब भी कही आपकी शिकायत करने नहीं जाता। पंचानन बहुत आमानी से कह गया। -लेकिन यह खतरनाक है ! आखिर ये लोग सड़क पर इस तरह लेटते क्यों हैं ? यह लेटने की जगह है क्या ? मैंने तुर्शी से कहा तो भी पचानन ने उसी आसानी मे जवाब दिया-इसलिए लेटते हैं कि घर-झोपडी में इतनी माफ जगह नहीं है. खेत किनारे थकते हैं तो सड़क पास पडती है"घर दूर ! और फिर गाव के पेड़ों में छाया भी तो नही है इन सरकारी पेडों में घनी छाया है ! पंचानन बोला- यहां दरख्तों के साये में धूप लगती है" चलो, यहा से चलें और उम्र भर के लिए! -ये लाइनें तुमने लिखी हैं ? लाइनें मुझे अच्छी लगी थी। -नही "लेकिन तेरे जैसे ही एक आदमी ने, जिसे लोग कवि कहते 94/इतने अच्छे दिन..

हैं."कवि दुष्यंत कुमार ने ! काश ! आप दुष्यंत होते ! वह बोला तो मुझे एकाएक शकुन का खयाल मा गया। शकुन ! शकुन्तला""कभी जब वो बहुत ही रोमेण्टिक मूड में होती थी, तो कहती थी-काश! तुम दुष्यत होते! लेकिन दोनों के शब्द एक होते हुए भी पंचानन के शब्दों ने मुझे भीतर तक तिलमिला दिया था"कितने कटखने हैं ये लोग"कल्चर'"लिटरेचर और ट्रेडीशन से कितने दूर" पचानन को हिन्दी मुझे सचमुच अच्छी लग रही थी लेकिन उसकी हिन्दी में स्लट कुछ दूसरा था "वह स्लेट मेरी समझ में नहीं आ रहा था "पर कुछ चुभता जरूर था। आखिर मैंने उससे पूछ ही लिया--तुम पढ़े-लिखे बेकार नौजवान । -जी नही.. मैं पत्रकार हूं! पेट तो कुत्ते भी भर लेते हैं। मैं भी भर लेता हूं.''पत्रकारिता में इसलिए करता हूं."क्योंकि हमारी भूख सदियों की भूख है. 'कहकर उसने मुझे देखा। वह हवाई बातें करने लगा था। मैंने गाड़ी स्लो की.."नदी आ गई थी। मैंने पूछा- यह कौन-सी नदी है ? -अजय नदी! इसी पर पुनासो बांध बन रहा है और यह पुनामी बांध एक रोज पड़रिया गांव को लील जाएगा ! फिर यहां कोई शिकायत करने वाला नही होगा."न दरिया देवी, न निमिया, न भगवतिया." वह बोल ही रहा था कि मुझे फिर शकुन की वह बात याद आ गई थी जिसे लेकर हम दोनों बहुत हंसे थे और वह बात हमारे बिस्तर की बड़ी इंटीमेट जोक बन गई थी। असल में हमारी एक नौकरानी थी--उसका नाम भी भगवतिया था। शकुन मुझसे बेहतर हिन्दी जानती थी। एक दिन मैंने उससे पूछा था--इस भगवतिया नाम का मीनिंग क्या होता है ? कुछ होता है क्या? होता है ! शकुन ने बहुत शोखी से देखते हुए कहा था-~म गवतिया का मतलब है--बड़ी भग वाली । फिर शकुन ने मुझे और अयं भी बता दिए थे और उस दिन के बाद जद भी भगवतिया काम करने आती तो हम स्टोरी/95 उसके वेढंगे कूल्हे और झुककर झाड़ लगाते वक्त उसे कभी-कभी पीछे से देखा करते थे.. और एक पाइंट पर आकर साथ-साथ हंस पड़ते थे."तब से यह जोक हमारे वेडरूम मे पहुच गया था । शकुन भी इस जोक को बहुत एन्ज्वाय करती थी। हमे भगवतिया जैसी वेढंगी और वेसलीका औरतो पर तरस भी आता था। काश! थोड़ी-सी कल्चर इन्हें मिल जाती। हम पडरिया पहुंच गए थे। मैं चाहता था कि पंचानन अव मेरा साथ छोड़ दे। वह भी तो लोकी ही था और ऊपर से पत्रकार ! पड़रिया के लोग मुझे अजीब तरह से देख रहे थे। मुझे यह कुछ अच्छा नहीं लगा। मैंने पंचानन से कहा-ये लोग इस तरह क्यों देख रहे हैं ? -क्योकि ये असली भारतीय हैं। -असली और नकली क्या.. मैं.. में भी तो भारतीय ह! -आप भारतीय होगे आप भारतीय हैं लेकिन आप इनके भारतीय नहीं हैं। पंचानन बोला, तो मुझे उसकी हिन्दी फिर अच्छी लगी लेकिन बात हवाई ही लगी। मैंने इधर-उधर देखा-गाव मे गांव जैसा कुछ था ही नहीं कुछ भी नही । सदियों से चली आती फोक कल्चर का टच तक नही'मधुवनी कला या अपनी लोकल कला का एक हाथी भी दीवार पर नहीं और फिर सामूहिक बलात्कार का कोई निशान भी कही नहीं ! आखिर स्टोरी तो लिसनी ही थी। पंचानन को मदद देना ज़रूरी लगा। मैंने उसे साथ ही ले लिया। वक्त तो ज्यादा लगाना नही था । बोतलों में काफी पानी था। जरूरत पड़ने पर मैं अब पंचानन को भी दस-पांच बूंट पिला सकता था। मैंने उसे साथ ही रखा और क्या करता। नेशनल डेलीज की अपनी जिम्मेदारियां हैं। -पंचानन ! मुझे रेप विक्टिम्स से मिलवाओ दोस्त ! मैं उनसे वात करना चाहूंगा। तब तक गांव का एक जिम्मेदार-सा भादमी चार-पांच लोगों के साथ आ गया। उसके हाथ में पुलिस रिपोर्ट की कापी थी। वह पंचानन से बोला-पंचानन बबुआ इन लोग का जरा ये रपट पढ के मुना देई."ई हम पर भरोसा नाही करते हैं"तुम तो पढा-लिसा आदमी है"आपन 96/इतने अच्छे दिन...

पढ़ाई का कागज़ जेब में राखत हो, ऊ इनका दिखाय दे बबुआ"ओ यह रपट पढ दे जरा" लो देखो पटना का कागज-पढाई का! अब तो मानोगे न"पटना तक पढ़ा बबुआ गलत नहीं पड़ेगा "हा" वह जिम्मेदार-मा आदमी पंचानन को पहचानता था। और पंचानन अपनी डिग्री का सर्टिफिकेट झण्डे की तरह उन चार-पांच लोगों को दिखा रहा था। मेरी नज़र फिर पड़ी तो मैंने इस बार सर्टीफिकेट की अटेस्टेड कापी फिर देखनी चाही। ये लोग जाली सर्टीफिकेट भी खरीद लेते हैं। उसकी डिग्री का वह मर्टीफिकेट जेन्युन ही लगा। और नीचे कोने में 'ट्र-कापी' के नीचे जो दस्तखत थे. उन्हें भी मैंने कुछ-कुछ पहचानावे शकुन के मामा जी के दस्तखत थे-रबर स्टाम्प से तो पूरी तरह और भी जाहिर हो गया था। पंचानन ने पुलिस में दर्ज कराई गई उस रिपोर्ट को पढ़कर उन लोगों को सुना दिया । वे जानना चाहते थे कि उनकी औरतो के रेप की पूरी और सच्ची रिपोर्ट दर्ज की गई थी या नहीं। मैंने भी जल्दी-जल्दी जरूरी पाइंट्स नोट कर लिए थे। जिनकी औरतें रेप हुई थी, उनके चेहरों पर कोई खास तनाव या शर्म नही थी। मुझे लगा कि ये काफी बेशर्म लोग है। खर "अब हम आगे बढ़ गए। पंचानन ने वे औरतें दिखाई.."देख- कर मैंने फस्टेटेड फील किया-ये गंदी. मैली-कुचली और बदसूरत औरतें ! दांत निकले हुए"आंखे टेढ़ी-कानी "पेट सेंड बैग्स की तरह हिलते हुए"छातियां मरे हुए चूहों की तरह लटकती हुई। - इन्हें कोई क्या रेप करेगा ! मैंने कड़वेपन से पचानन से कहा । -इनके शरीर मत देखिए"यह बदला इनके शरीर से नहीं, इनकी औकात और गरीबी से लिया जाता है"गरीबों में भी सबसे गरीब घर की औरत होती है ! उसे ही यह कीमत चुकानी पड़ती है. इसे भाप नही समझ सकते ! पंचानन का चेहरा इस बार कुछ तमतमा आया था। वही लोकी अखबारों और पत्रकारों की तरह । खैर, मुझे तो अपना काम निकालना था। मैंने अपनी भलमनसाहत स्टोरी/97 और कल्चर अपने पास रखी और धीरज से बोला-दोस्त पंचानन ! -जी! -~-भगवतिया से तो मिलवाओ ! मैंने कहा तो शकुन की बात मुझे फिर याद आ गई और हल्की मुस्कराहट-सी भी। मैं इस भगवतिया को भी देखना चाहता था। -जी आइए...पंचानन ने कहा और हम आगे बढ़ गए। बीच में मेरे मन की शका फिर उभरी और चलते हुए मैंने पंचानन से पूछ ही लिया --क्यो पंचानन "तुम्हें गंग रेप का मामला फेक नही लगता? पुलिस वाले इन औरतों को क्यों रेप करेंगे? -औरतों की इज्जत उतर गई और आपको यह इतना बड़ा हादसा फेक लगता है ? -सोचो जरा''क्या कोई सब-इंस्पेक्टर, दरोगा अपने मिपाहियों के सामने अपनी पैट खोल सकता है ? मैंने थोड़ी तल्सी से कहा। -सिपाहियों के सामने औरत की धोती तो खोल सकता है । पंचानन की आवाज़ में अब बहुत तुर्शी थी। मैं थोड़ा चुप ही रहा। हम भगवतिया की झोपड़ी पर पहुच गए थे। पंचानन ने आवाज लगाई तो एक औरत की 'हूं' की आवाज़ आई, पर वो सामने नही आई.."मैं इस भगवतिया को देखना तो जरूर ही चाहता था। शकुन को कुछ मजेदार बताने के लिए इसी तरह की मामूली बातों से हमारी जिंदगी के कुछ खूबसूरत जोक्स बनते रहते हैं। ----उसे बाहर तो बुलाओ"तभी तो बात कर पाऊंगा। मैंने पंचानन से कहा । वह झोपड़ी के दरवाजे के पास से लौटकर मेरे सामने खडा हो गया था। -वो बाहर नहीं आएगी। उसकी धोती रिपोर्ट दर्ज कराने के बाद योनि-द्रव और शुक्राणुओ की तहकीकात करने के लिए ले ली गई है। -मतलब! -नही समझे ! आप अंग्रेजी तो जानते हैं। बलात्कार-रेप के समय सीमन कपड़ों पर भी लग जाता है."उसी के लिए भगवतिया की धोती फारेंसिक जाच के लिए भेज दी गई है। पंचानन ने बात साफ की। 98/इतने अच्छे दिन...

--ठीक है! पर उससे बोलो"सामने आकर अपनी स्टोरी तो जरा चताए ! मैंने कहा। --वो बाहर नहीं आएगी."मैंने आपको बताया है न । अब पंचानन चिढ़कर बोल रहा था। ---क्यों? --क्यों! पंचानन एक बदतमीज और जंगली आदमी की तरह चीख पड़ा था"मन में तो आया कि एक जोर का झापड उसे मार ही दू और शराफत से बात करना सिखा दू । पर अपनी स्टोरी के लिए खुद पर काबू करते हुए मैंने धीमी पर सख्त आवाज में कहा-हां! आखिर उसने रिपोर्ट लिखाई है कि उसका रेप हुआ है.'तुमने खुद पढ़कर सुनाई थी. "तव वह अपनी स्टोरी बताने वाहर क्यों नहीं आ सकती? ...आखिर किस बात की शमं है अब ? मैंने थोड़ा कुरेदने के अंदाज में कहा। और वह लोकी पत्रकार दैट बास्टर्ड पंचानन पागलों की तरह चीखने लगा-शर्म ! शमं तो तुम्हें आनी चाहिए" शर्म की बात तो यह मुझे लगा कि उसने दांत पीस कर मेरे लिए 'तूतिया' शब्द का इस्ते- माल किया था और वह चीखे जा रहा था-शर्म की बात तो यह है कि उसकी एक ही घोती थी और वह धोती जांच के लिए गई है.. भगवतिया नंगी है। नंगी! नंगी समझते हो--नेकेड ! .. अगर भगवतिया बेशर्म होकर बाहर निकल आएगी तो बाबू"तुम्हारी 'तुम्हारी दुनिया की इज्जत धूल मे मिल जाएगी "सबकी इज्जत नगी हो जाएगी ! और ज्यादा बर्दाश्त करना मुश्किल था। पचानन फिर हवाई बातें करने लगा था। जिसका कोई सिर-पर नही था । और मेरी स्टोरी करीव- करीब हो ही गई थी। "मालूम तो सब पड़ ही गया था। मैं पंचानन को वहीं छोड़कर शहर लौट आया । स्टोरी/99.

चप्पल कहानी बहुत छोटो-सी है। मुझे आल इंडिया मेडिकल इस्टीट्यूट की सातवी मंजिल पर जाना था । आई० सी० यू० मे । गाड़ी पार्क करके चला तो मन बहुत ही दार्शनिक हो उठा था। कितना दुःख और कष्ट है इस दुनिया मे"लगातार एक लड़ाई मृत्यु से चल रही है । और उस दुःख और कष्ट को सहते हुए लोग--सब एक से है । दर्द और यातना तो दर्द और यातना ही है- चाहे वह किसी की हो। इसमे इंसान और इसान बीच भेद नहीं किया जा सकता। दुनिया में हर मा के दूध का रग एक है। खून और आंसुओ पा रग भी एक है। दूध, खून और आसुओ का रग नही बदला जा सकता "शायद उसी तरह दुःख, कष्ट और यातना के रगों का भी बंटवारा नहीं किया जा सकता। इम विराट मानवीय दर्शन से मुझे राहत मिली थी... मेरे भीतर से सदियां बोलने लगी थी। एक पुरानी सभ्यता का वारिस होने के नाते यह मानसिक सुविधा जरूर है कि तुम हर बात, घटना या दुर्घटना का कोई दार्शनिक उत्तर खोज सकते हो । समाधान चाहे न मिले, पर एक अमूर्त दार्शनिक उत्तर जरूर मिल जाता है। और फिर पुरानी सभ्यताओ की यह खूबी भी है कि उनकी परम्परा से चली आती संतानों को एक आत्मा नाम की अमूर्त शक्ति भी मिल गई है-और सदियो पुरानी सभ्यता मनुष्य के क्षुद्र विकारों का शमन करती रहती है "एक दार्शनिक दृष्टि से जीवन की क्षण मगुरता का एहसास कराते हुए सारी विषमताओं को समतल करती रहती है." मुझे अपने उस मित्र की बातें याद आई जिमने मुझे संध्या के सगीन आपरेशन की बात बताई थी और उसे देख माने की सलाह दी थी। उसी 100/इतने अच्छे दिन ने मुझे माई० सी० यू० में सध्या के केविन का पता बताया था- -आठवें फ्लोर पर आपरेशन थियेटर हैं और सातवें पर संध्या का आई० सी० यू० मेजर आपरेशन में सध्या की यडी आत काट कर निकाल दो गई थी और अगले अड़तालीम घंटे प्रिटिकल ... रास्ता इमरजेंसी वार्ड में जाता था। एक बेहद दर्द भरी चीस इमरजेंमी वार्ड मे आ रही थी "यह दर्द भरी चीख तो दर्द भरी चीख ही थी--कोई घायल मरीज अमय तकलीफ में चोस रहा था। उस चीख मे आत्मा दहल रही पो."ददं की चीख और दर्द की चीस में क्या अंतर था! दूध, सून और आंसुओं के रगो की तरह चीस की तकलीफ भी तो एक-मी थी। उममे विषमता कहां थी? मेरा वह मित्र जिसने मुझे संध्या को देस आने की फर्ज अदायगी के लिए भेजा था, यह भी इलाहाबाद का ही था। वह भी उसी सदियो पुरानी सभ्यता का वारिस था।ठेठ इलाहावादी मौज में वह भी दार्शनिक की तरह बोला था-अपना क्या है ? रिटायर होने के बाद गगा किनारे एक झोपड़ी डाल लेंगे। आठ-दम ताड़ के पेड़ लगा लेंगे."मछली मारने की एक बंसी "दो-चार मछली तो दोपहर तक हाथ आयेंगी ही""रात भर जो ताड़ी टपकेगी उसे फ्रिज में रख लेंगे.. -फ्रिज में? और क्या "मादनं साधू की तरह रहेगे ! मछलिया तलेंगे खायेंगे और ताड़ी पीयेंगे और क्या चाहिए.. पेंशन मिलती रहेगी। और माया-मोह क्यों पालें ? पालेंगे तो प्राण अटके रहेंगे."ताड़ी और मछली "बस, आत्मा ताड़ी पीकर, मछली खाके आराम से महाप्रस्थान जाएगी.. "न कोई दु:ख, न कोई कष्ट "लेकिन तुम जाके संध्या को देख जरूर आना'"वो क्रिटिकल है... मेरा मित्र अपने भविष्य के बारे में कितना निश्चित था, यह देखकर मुझे अच्छा लगा था। यह वात सोच-सोच कर मुझे अभी तक अच्छा लग रहा था, सिवा उस चीख के जो इमरजेंसी वार्ड से अब तक आ रही थी और मुझे सता चप्पल | 101 " रही थी इसीलिए लिफ्ट के आने में जो देरी लग रही थी वह मुझे खल रही थी। आखिर लिफ्ट आई। सेवेन-सात, मैंने कहा और सध्या के बारे में सोचने लगा। दो-तीन वार्ड ब्वायतीसरी और चौथी मंजिल पर उतर गए। पांचवी मंजिल पर लिफ्ट रुकी तो कुछ लोग ऊपर जाने के लिए इतजार कर रहे थे। इन्ही लोगो में था वह पांच साल का बच्चा- अस्पताल की धारीदार बहुत बड़ी-सी कमीज पहने हुए"शायद उसका बाप, वह जरूर ही उसका बाप होगा, उसे गोद में उठाए हुए था."उस बच्चे के पैरो मे छोटी-छोटी नीली हवाई चप्पलें थी, जो गोद मे होने के कारण उसके छोटे-छोटे पैरो में उलझी हुई थी। अपने पैरों से गिरती हुई चप्पलों को धीरे से उलझाते हुए बच्चा बोला-"बाबा! चप्पल..." उसके बाप ने चप्पलें उसके पैरो मे ठीक कर दी । वार्ड बॉय ह्वील- चेयर बढ़ाते हुए बोला--आ जा, इसमे बैठेगा ! बच्चा हलके से हंसा... वार्ड बॉय ने उसे कुर्सी में बैठा दिया""उसे बैठने में कुछ तकलीफ हुई पर वह कुर्सी के हत्थे पर अपने नन्हें-नन्हें हाथ पटकता हुआ भी हंसता रहा। दर्द का एहसास तो उसे भी था पर दर्द के कारण का एहसास उसे बिलकुल नही था। वह कुर्सी में ऐसे बैठा था जैसे सिंहासन पर बैठा हो "कुर्सी बड़ी थी और वह छोटा । वार्ड बॉय ने कुर्सी को पुश किया । वह लिपट में आ गया । उसके साथ ही उसका बाप भी। उसका बाप उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरता रहा। लिफ्ट सात पर रुका, पर मैं नहीं निकला। दो-एक लोग निकल गए। लिपट आठ पर रुका । यही आपरेशन थियेटर थे । दरवाजा खुला तो एक नर्स जिसके हाथ में सब पर्चे थे, उसे देखते हुए बोली-आ गया तू ! उस बच्चे ने धीरे से मुस्कराते हुए नर्स से जैसे-हो! उसको आँखें नर्स से शर्मा रही थी और उनमे वचपन की बड़ी मासूम दूधिया धमक थी। हीलचेयर एक झटके के साथ लिपट से बाहर गई"नसं ने उसका कंधा हलके से पपका" --बाबा ! पप्पल वह तभी बोला- मेरी पम्पल.. 102/इतने अच्छे दिन..

उसकी एक चप्पल लिफ्ट के पास गिर गई थी। उसके बाप ने वह चप्पल भी उसे पहना दी। उसने दोनों परों की उंगलियों को सिकोड़ा और अपनी चप्पलें परों में कस ली। लिफ्ट बंद हुआ और नीचे उतर गया। वार्ड बॉय बच्चे की कुर्सी को पुरा करता हुआ आपरेशन थियेटर वाले बरामदे में मुड़ गया । नसं उसके साथ ही चली गई । उसका बाप धीरे- धीरे उन्हीं के पीछे चला गया। तब मुझे याद आया कि मुझे तो सातवी मंजिल पर जाना था। संध्या वही थी। मैं सीढ़ियों से एक मजिल उतर आया। संध्या के डाक्टर पति ने मुझे पहचाना और आगे गढ़ कर मुझसे हाथ मिलाया। हाथ की पकड़ में मायूसी और लाचारी थी। कुछ पल खामोशी रही । फिर मैंने कहा- ---मैं कल ही वापस माया । तभी पता चला । यह एकाएक कैसे हो गया? -~नहीं, एकाएक नही, ब्लीडिंग तो पहले भी हुई थी पर सब कंट्रोल कर ली गई थी। पन्द्रह दिनों बाद फिर होने लगी। एक्सेसिव ब्लीडिंग। .. चार घंटे आपरेशन में लगे "एण्ड यू नो, वी डाक्टर्स भार वर्स्ट पेशेंट्स ! वो संध्या के बारे में भी कह रहे थे । संध्या भी डाक्टर थी। -~-यस ! आप तो सब समझ रहे होगे "सध्या को भी एक-एक बात का अंदाज हो रहा होगा! मैंने कहा। लेकिन वो बहुत करेजसली विहेव कर रही है ! संध्या के डाक्टर पति ने कहा। बोल तो सकती नहीं"पल्स भी गर्दन के पास मिली "आर्टी- फिशल रेस्पटेशन पर है। एक तरह से देखिए तो उसका सारा शरीर. आराम कर रहा है और सब कुछ आर्टीफिशल मदद से ही चल रहा है... संध्या के डाक्टर पति ज्यादातर बातें मुझे मेडिकल टम्स में ही बताते रहे और मैं उन्हें समझने की कोशिश करता रहा बीच-बीच में मैं इधर-उधर की बातें भी करता रहा। -संध्या का भाई भी आज सुबह पहुंच गया। किसी तरह उसे जापान होते हुए टिकट मिल गया! उन्होने बताया। चप्पल / 103 ---यह बहुत अच्छा हुआ। मैंने कहा। आप देखना चाहेगे? -~-हा, अगर पासिबिल हो तो... -~आइए · देख तो सकते हैं. भीतर जाने की इजाजत नहीं है... वैसे तो सव डाक्टर फ्रेंड्स ही है, पर -नहीं-नहीं, वो ठीक भी है." -वो वोल भी नहीं सकती. वैसे आज काशस है "कुछ कहना होता है तो लिख के बता देती है । उन्होंने कहा और एक केबिन के सामने पहुंच कर उन्होने इशारा किया। मैंने शीशे की दीवार से संध्या को देखा। वह पहचान मे ही नही आई। दो डाक्टर और नर्स उसे अटैण्ड भी कर रहे थे और फिर इतनी नलियां और मशीनें थी कि उनके बीच संध्या को पहचानना मुश्किल भी था। संध्या होश में थी। डाक्टर को देख रही थी । डाक्टर उसका एक हाथ सहलाते हुए उसे कुछ बता रहा था। मैंने संध्या को इस हाल में देखा तो मन उदास हो गया। वह किरानी लाचार थी। बीमारी और समय के सामने आदमी लाचार ही होता है कुछ कर नहीं पाता । मैंने मन-ही-मन संध्या के लिए प्रार्थना की-किमसे की यह नहीं मालूम-ऐमी जगहों पर आकर भगवान पर ध्यान जाता भी है और किसी के के लिए उसके अस्तित्व को स्वीकार कर लेने में अपना कुछ नहीं जाता-सिवा प्रार्थना के कुछ शब्दो के। हम आई० सी० यू० से हट कर फिर बरामदे में आ गए। वहां बैठने के लिए कोई जगह नहीं थी। बरामदे बैठने के लिए बनाए भी नहीं गए ये। संध्या या डाक्टर की बहन नीचे चादर बिछाये बैठी थी। डाक्टर के कुछ दोस्त एक गुच्छे में खड़े थे। -~-अभी तो, बाद में, एक आपरेशन और होगा."संघ्या के डाक्टर पति ने बताया--तब छोटी आंत को सिस्टम से जोड़ा जाएगा"सर पहले यो स्टेवलाइज करे, फिर रिकवरी का सवाल है. इसमें ही करीब तीन महीने लग जायेंगे. उसके बाद मैं सोचता हूं -उसे अमरीका ले जाऊंगा! 'शुभ 104/इतने अच्छे दिन.

। -यह ठीक रहेगा! इसके बाद हम फिर इधर-उधर की बातें करते रहे। में संध्या की संगीन हालत से उनका ध्यान भी हटाना चाहता था। इसके सिवा मैं और कर भी क्या सकता था। और डाक्टर के सामने यों खामोश खड़े रहना अच्छा भी नहीं लग रहा था। मैं यह जताते हुए कि अस्पताल वालों से छुपा कर मैं सिगरेट पीना चाहता हूं-मैं खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया। बाहर लू चल रही थी। नीचे धरातल पर कुछ लोग आ-जा रहे थे वे ऊपर से बहुत लाचार और बेचारे लग रहे थे और मेरे मन से सबके शुभ के लिए सद्भावना की नदियां फूट रही थीं. ऐसे में तुम सोचो लगता है मनुष्य ने मनुष्य के साय तो सघन और उदात संबंध बना लिए हैं पर ईश्वर के साथ वह ऐसा नहीं कर पाया है। मनुष्य अपने ईश्वर के दुःख-सुख में शामिल नहीं हो सकता। ईश्वर से उसका सबंध सिर्फ दाता और पाता का है । वह देता है और मनुष्य पाता है। कितना इकतरफा रिश्ता है यह और फिर अगर तुम यह भी मान लो कि ईश्वर ही मनुष्य को बनाता है तो ईश्वर की क्षमता पर विश्वास और घटने लगता है-सृष्टि के आदि से वह मनुष्य को बनाता आ रहा है परन्तु असंख्य प्राण बनाने के बावजूद वह आज तक एक सहज सम्पूर्ण और मुकम्मिल मनुष्य नहीं बना पाया। कुछ कमी कहीं तो ईश्वर की व्यवस्था में भी है"हो सकता है उनका आदि-कलाकार कुंभकार उन्हें मिट्टी सप्लाई करने मे कुछ घपला कर रहा हो।" इस रहस्य का पता कोन लगायेगा ? रहस्य ही रहस्य को जन्म देता है। शायद इसीलिए मनुष्य ने ईश्वर को रहस्य ही रहने दिया''जो सत्ता या शक्ति विश्वास के निकष पर खरी न उतरे उसे रहस्य बना देना ही बेहतर है... और किया भी क्या जा सकता." लू के एक थपेड़े ने मेरा मुंह झुलसा दिया। डॉक्टर अपने चिन्ताग्रस्त शुभ-चिन्तकों के गुच्छे में खड़े थे और सबके चेहरे कुछ ज्यादा सतर्क थे। --ब्लडप्रेशर गिर रहा है।" आई० सी० यू० में डॉक्टरों और नसों की आमदरफ्त से लग रहा था कि कोई कठिन परिस्थिति सामने है। कुछ देर बाद पता चला कि चप्पल/ 105 नीडिल कुछ ढीली हो गई थी. उसे ठीक कर दिया गया है और ब्लड- प्रेशर ठीक से रिकार्ड हो रहा है""सबने राहत की सांस ली। मौत से लड़ना कोई मामूली काम नहीं है। ईश्वर ने तो मौत पदा की ही है, पर मौत तो मनुष्य भी पंदा करता है"एक तरफ जीवन के लिए लड़ता है और दूसरी तरफ मौत भी बांटता है--यह द्वंद्व ही तो जीवन है यह द्वंद और द्वैत हो जीवित रहने की शर्त है और अद्वैत या समानता तक पहुंचने का साधन और आदर्श भी । आध्यात्मिक अद्वैत जब भौतिकता की सतह पर आता है और मनुष्य के प्रश्न सुलझाता है तभी तो वह समवेत समानता का दर्शन कहलाता है" सिगरेट से मुंह कड़वा हो गया था। लू वैसे ही थपेड़े मार रही थी। सीमेंट के पलस्तर का दहकता-चिलचिलाता तालाब सामने फैला था-- कोई एक आदमी जलते नंगे पैरों से उसे पार कर रहा था। मैंने पलटते हुए लिफ्ट की तरफ देखा । डॉक्टर मेरा आशय समझ गए थे, लेकिन तभी राजनीतिज्ञ-से उनके कोई दोस्त मा गए थे। शुरू की पूछताछ के बाद वे लगभग भापण-सा देने लगे- -~-अब तो अग्नि मिसाइल के बाद भारत दुनिया का सबसे शक्ति- शाली तीसरी देश हो गया है और आने वाले दम वर्षों में हमें अब कोई भी शक्ति महाशक्ति बनने से नहीं रोक सकती। इंग्लैंड और झांस की पूरी जनसख्या से प्यादा बड़ा है आज भारत का मध्यवर्ग.. अपनी सम्पन्नता में भारयीय मध्यवर्ग जैसी शक्ति और सम्पन्नता उन देशों के मध्यवर्ग के पास भी नहीं है. तभी एक चिन्ताग्रस्त नसं तेजी से गुजर गई और सन्नाटा छा गया। चिन्ता के भारी क्षण जब कुछ हलके हुए तो मैंने फिर लिफ्ट की तरफ देखा."डाक्टर साहब समझ गए- --आपको ढाई-तीन घण्टे हो गए"क्या-क्या काम छोड़ के आए होंगे. और वे लिफ्ट की ओर बढ़े। लिपट आया, पर वह ऊपर जा रहा था। डाक्टर साहब को मेरी खातिर रुकना न पडे, इसलिए मैं लिफ्ट में घुस गया। लिफ्ट आठ पर पहुंचा। वहां ज्यादा लोग नहीं थे। पर एक स्ट्रेचर 106/इतने मच्छे दिन.. .

था और दो-तीन लोग । स्ट्रेचर भीतर माया । उसी के साथ लोग भी। स्ट्रेचर पर चादर में लिपटा वही बच्चा पड़ा हुआ था। वह बेहोश था। वह आप- रेशन के बाद लौट रहा था। उसके गालों और गर्दन के रेशमी रोए पसीने से भीगे हुए थे - माथे पर बाल भी पसीने के कारण चिपके हुए थे। उसका बाप एक हाथ में ग्लूकोज़ की बोतल पकड़े हुए था... "ग्लूकोज की नली की सुई उसको थकी और दूधभरी बांह की धमनी मे लगी हुई थी ..."उसका बाप लगातार उसे देख रहा था. वह शायद पसीने से माथे पर चिपके उसके बालो को हटाना चाहता था, इसलिए उसने दूसरा हाथ ऊपर किया, पर उस हाथ मे बच्चे को चप्पलें उसकी उगलियों में उलझी हुई थी वह छोटी-छोटी नीली हवाई चप्पलें... मैंने बच्चे को देखा.. फिर उसके निरीह बाप को। मेरे मुंह से अनायास निकल ही गया- -इसका... - इसकी टांग काटी गई है। वार्ड बॉय ने बाप की मुश्किल हल कर दी। --ओह ! ""कुछ हो गया था? मैंने जैसे उसके बाप से ही पूछा । वह मुझे देखकर चुप रह गया"उसके ओंठ कुछ बुदबुदा कर थम गए." लेकिन वह भी चुप नही रह सका । एक पल बाद ही बोला- -जाघ की हड्डी टूट गई थी. -चोट लगी थी? -नही सड़क पार कर रहा था "एक गाड़ी ने मार दिया। वह बोला। और उसने मेरी तरफ ऐसे देखा जैसे टक्कर मारने वाली गाड़ी मेरी ही थी। फिर वह वीतराग होकर अपने बेटे को देखने लगा। पाचवी मंजिल पर लिपट रुकी। बच्चों का वार्ड इसी मंजिल पर था। लिफ्ट में आने वाले कई लोग थे। वे सब स्ट्रेचर निकाले जाने के इंतजार में बेसब्री से रुके हुए थे।"वार्ड बॉय ने झटका देकर स्ट्रेचर निकाला तो बच्चा बोरे की तरह हिल उठा, अनायास ही मेरे मुंह से निकल गया-- -धीरे से.. - चप्पल/107 -ये तो बेहोश है"इसे क्या पता?"स्ट्रचर को याहर पुरा करते हुए वाहं वॉय ने कहा। उस बच्चे का बाप खुले दरवाजे से टकराता हुआ बाहर निकला तो एक नर्स ने उसके हाथ की ग्लूकोज को बोतल पकड़ ली। लिफ्ट के बाहर पहुंचते ही उसके बाप ने उसकी दोनों नीली हवाई चप्पलें वही कोने में फेंक दी"फिर कुछ सोचकर कि शायद उसका बेटा होश मे आते ही पप्पलें मांगेगा, उसने पहले एक चप्पल उठाई"फिर दूसरी भी उठा ली और स्ट्रेचर के पीछे-पीछे वार्ड की तरफ जाने लगा। मुझे नहीं मालूम कि उसका बेटा जब होश में आएगा तो क्या मांगेगा -चप्पल मांगेगा या चप्पलों को देखकर अपना पैर मांगेगा... वेसग्री से इंतजार करते लोग लिफ्ट में आ गए थे। लिफ्टमैन ने बटन दवाया। दरवाजा बन्द हुआ । और वह लोहे का बन्द कमरा नीचे उतरने लगा।

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बच्चन 25.00%; सतरंगिनी :बच्चन 20.00; सोऽहं हंस : बच्चन 10.00%; त्रिभंगिमा: बच्चन 40.00; दो चट्टानें :बच्चन 25.00%; जाल समेटा : बच्चन 10.00; बंगाल का काल : बच्चन 10.00%; चुनी हुई कविताएं : अजेय 50.00; नदी की बांक पर छाया : अजेय 20.00; चट्टान के फूल : रामनिवास जाजू 3000; मालकास : अनन्त कुमार पाषाण 30.00%; एक परत घूल की : हरिशंकर पाठक 35.00%; आत्मकथा डॉ० हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा-चार खंडों में क्या भूलूं क्या याद करूं (प्रथम भाग) 60.00%; नीड़ का निर्माण फिर (दूसरा भाग) 60.00%; बसेरे से दूर (तीसरा भाग) 50.00; दशद्वार से सोपान तक (चौथा भाग) 70.00%; जीवन-यात्रा (पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह की आत्मकथा);डॉ० चन्द्रशेखर 125.00; स्वतन्त्रता आंदोलन और उसके बाद:40 कमलापति त्रिपाठी 75.00%; खानाबदोश : अजीत कोर 50.00%; (साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत) नाटक/एकांकी आपाढ़ का एक दिन : मोहन राकेश रामकुमार 25.00%; कर्मवीर : डॉ. रामकुमार वर्मा 15.00%; अग्निशिखा : डॉ० वर्मा 15.00; अंबपाली रामवृक्ष बेनीपुरी 16.00%; न्याय की रात : चन्द्रगुप्त विद्यालकार 8.00%3B अशोक : चन्द्रगुप्त विद्यालकार 20.00; सिकन्दर : सुदर्शन 25.00 युगे- युगे क्रांति : विष्णु प्रभाकर 12.00%; कोश शिक्षार्थी हिन्दी अंग्रेजी शब्दकोश : डॉ. हरदेव बाहरी 80.00%; अभिनव हिन्दी शब्दकोश : डॉ. बाहरी ; राजपाल अंग्रेजी-हिंदी शासकीय प्रयोग कोश : गोपीनाथ श्रीवास्तव 75.00%; सामयिक हिन्दी-अंग्रेजी शब्दकोश : डॉ. बाहरी: साहित्यिक सुभापित कोश : हरिवशराय शर्मा 150.00; साहित्यिक लोकोक्ति कोश : हरिवंशराय शर्मा 60.00%; सचित्र विज्ञान कोश : डॉ० बालकृष्ण 70.00; सचित्र विश्वकोश (तीन भाग) प्रत्येक का मूल्य 60.00%; धर्म/अध्यात्म/दर्शन भारतीय दर्शन (प्रथम खंड) :डॉ. राधाकृष्णन् 125.00%; भारतीय दर्शन (दूसरा खंड) : डॉ० राधाकृष्णन् 150.00%; पूर्व और पपिचम-कुछ विचार :डॉ. राधाकृष्णन् 30.00; उपनिषदों की भूमिका : डॉ. राधा- .. ..

कृष्णन् 30.00; गौतम बुद्ध जीवन दर्शन : डॉ० राधा कृष्णन् 6.00%; हिन्दू धर्म : नई चुनौतियां : डॉ० कर्णसिंह 30.00%; ज्योतिपय : बशीर अहमद मयूख 35.00%; संपूर्ण ग्रंथावली गय राधव यावली (दस खण्डाम) 750.00 अमृतलाल नागर रचनावली (दस खंडों में) शीघ्र प्रकाश्य जीवनी मेरा बचपन : रवीन्द्रनाथ टंगोर 6.00; क्रांतिकारी ऋषि कार्ल माक्स : लाल ह्रदयाल 5.00; या' और बापू : आचार्य चतुरसेन 5.00%; कृष्ण चरित्र : बंकिमचन्द्र 25.00; रामचरितमानस (टीका सहित) : डॉ. राजवहादुर पाण्डेय (टीकाकार) 100.00; सरदार पटेल : सत्यकाम विद्यालंकार 5.00; महापुरुषों की झाकियां : आचार्य चतुरसेन 10.00%; ईश्वरचन्द्र विद्यासागर : रवीन्द्रनाथ टैगोर 4.00%; छह युग पुरुष : अमृत- लाल नागर 10.00%; सभ्यता के निर्माता : अमृतलाल नागर 1000बाबा साहेब अम्बेडकर : प्रो. राधाकृष्णन् शर्मा 5-60%; महापुरुषों के संस्मरण: विश्वनाथ 6.00%; महाराणा प्रताप : विश्वनाथ 4.00%इंदिरा गांधी: विजय विद्यालकार 10.00; युग निर्माता : जवाहरलाल नेहरू : आसाराम माहेश्वरी 10.00%; 'आज के लोकप्रिय हिंदी कवि' पुस्तकमाला (कवियों के व्यक्तित्व एवम् कृतित्व पर) सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा, चञ्चन, अज्ञेय, दिनकर, नागार्जुन, भगवतीचरण वर्मा, माखनलाल चतुर्वेदी, भवानीप्रसाद मिथ, शिवमगस मिह 'गुमन', रामावतारस्यागी, श्रीकांत वर्मा : प्रत्येक का मूल्य 25 रुपये। शायर और शायरी शालिब, इसवाल, फिराक गोरखपुरी, जिगर मुरादाबादी, फैज, मीर तकी मीर, मजरूह सुल्तानपुरी, कील बदायूंनी, सरदार जाफरी, (सभी प्रकार पंडित द्वारा सपादित) प्रत्येक का मूल्य 20 रुपये; सरगम (पुनी हुई गजलें): फिराक गोरसपुरो 35.00; रूप (धनी हुई दवाइयाँ):फिराक गोरखपुरी 30.00 .. : .:रिन्द्र निटस, पारा, दिल्ली-110032 98107

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1590. मदरसा रोग, कामीरी मेह,

Itne Achhe Din

Author
Kamleshvar
Title
Itne Achhe Din
File name
Itne Achhe Din
Text
OCR done
Citation
1965
Published
2011/03
Publisher
Rajpal & Sons Kashmiri Get Dehli
Language
Sanskrit
Pages
116
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551101
Barcode
4990010031875.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
UrIisAn7Faz
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