Sanmati Library, Jaipur
Lavani Brahma Gyann
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॥ भूमिका।
"
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कोई इसको लारनी कहते हैं और कोई : मरहटी वा
ख्याल कहते हैं असल में हमजा बनाना और गाना दक्षिण
से उत्पन्न हुआ है और इसके दो की हुये एकका नाम तुकन
गिर और दूसरे का नाम शाहअली था उन्हों ने दो मत
खड़े किये तुर्रा और कलंगी तुकनागर तुरे को बड़ा कहते
थे और शाहअली लगी को बड़ा रखते थे आपस
में विवाद किया करते थे और अपना अपना पत्य उन्हों
ने चलाया यहां तक कि आज ताई उनके मत वाले बहुत
से लोग इस देश में भी बनाते गाते हैं उनमें पढे लिखे
भी हैं परन्तु बड़ा अफसोस है कि गाली ही गुफता बकते
हैं इस कदर से कि आपस में लड़भी पड़ते है इसी सतव
से इसको कोई भला आदमी पसन्द नहीं करता है और
में भी इसी विषय में बाल अवस्था में मशगूल था जय
ईश्वर ने मेरे ऊपर अपनी कृषा करी तो इस पाप से मुझको
छुड़ाया और फकीर बनाया अपना जलना
दिखलाया उसको देखते ही वह मस्ती का आलम हुआ
कि आली आली मजमून नजर आने लगे तो मैंने अपने
दिल में यह विचारा कितृ इसी लावनी से भगवत आरा-
धना कर तो उर्दू बोली में मैंने इश्कमारफत मतलवताहीद
और हिन्दी में उपासना ब्रह्मज्ञान को कहा इस वास्ते
कि जो कोई इसके असल मतालिब को पायेगा यह जीते
मुझको
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हो जी उस में मिल जायगा और वही ईश्वर मेरे दिल में
बैठके ये सब बात बनाता है में कुछ पढ़ा लिखा नहीं परन्तु
जो कोई इसके पजमून को सुनते हैं वह तमज्जुब
समझते है और पसन्द करते हैं इसी सक्द से मैंने थोडीसी
लावनी छपवाई है कि जिसमें सब अमीर व गरीब पढ़े और
इसको समझें और जो कोई इसको अपनी तबीमत लगा के
पहेंगे तो उनका भला होगा।
दो पदी
जो कहता हम करते वो दुःख भरता है।
जो करता जग के कार वही करता है।
श्रीमत्काशीगिरि बनारसी परमहंस आशकेहक्कानी ।
गागा ॥ श्रीगणेशायनमः॥ लावती Rememe- STREArthamimarikansweats. हृदय में है हिंगलाज कर कान लाज रखने वाली । नयना देवी नयन में बसें हँसें देदे ताली । शीशमें सीता सती विराजें सावित्री सङ्कटारानी । मस्तक में रहे आय श्री म- हाविद्या औं महारानी ।। भृकुटी में कर दास भैरवी भयमाने सब अभिमानी । ब्रह्म में अपने विराजे विन्ध्याचल और न- मानी । बसें नासिका में नवदुर्गे नगरकोट लाटों वाली। नयनादेवी नयन में बसे हँसे देदेताली।मुखमें बसें मंगला देवी सन कारज करदे मंगल । होट में हेमावती रहे क्षण काटिदेवें कलिमल |जिह्वामें जाहवी और यमुना सरस्वती सब से निर्मल गले में गौरी और गायत्री का उपनाम अटल ।। कण्ठ में वसे कालिका देवी कंकाली और महाला ली। नयना देवी नयन में बसे हस देदेताली || कानमें कर मला और कत्यायिनी क्रियारूप अहुत माया । दोनों भुजा में बसे भवानी बड़ामुख दिखलायान में बसे उमा उत्रानी उग्रतेज उनका छाया। कहांलों वणी लखी नहीं जातीहै अपनी काया ॥ बुद्धि में बसें विधाता मातारही Loa लावनी बुद्धिं देने वाली नयना देवी लयन में बस हस देदे ताली॥३॥रोम रोम में रमी रम्भा और नाभि काल में निरवानी । कहें देवीसिंह इसे कोई पहिचाने चातुरज्ञानी ।। श्वासर में शक्की बोले ध्यानधरेपूरे ध्यानी। बनारसीयहकह भ- गवतीझी भक्ती मनमानी। मेवा और मिष्टान हारफूलोंकीनित चढतीडाली । नयना देवी नयन में बसे हसें देदे ताली ॥२॥ सर्व धर्म से परे नेद में लिखाह सुन सन्यासी का धर्म । च्या कोई जाने पण्डित के सन्यासी का कौन हैं शर्म ॥ अहणकरें तो बने नहीं और त्याग कर तो क्या त्यागें। सोचे तो निद्रा नहिं आवै जागे तो सोबत जाग ।। युद्ध करें तो धर्म घटे और पाप लगे रण से भागें । लोकीके दाताह फिर क्यों भिक्षा घरघर मांग ।। उनकी गती वोही जाने नहीं मिले किसीको जिनका धर्म क्या कोई जाने पण्डित के सन्यासी कौन कर्म ॥ १ ॥ मौन रह पर वोलें सबसे बरसतह और सन खावें । आसन दृढ है बाट चलें जित चाह वह उतही जावें ।। पढ़े नहीं एको अक्षर और वेद शास्त्र निशि दिन गावें। आंख मंद देखें सबको पर आप दृष्टि में नहिं आवै । वह क्या देखेंगे उनको जिनकी दृष्टि में लगा है चर्म क्या कोई जाने पण्डित के सन्यासी का कौन है कम् ॥ २॥ योग विषे वह भोग करें और भोग विषे साध वह योग । शोक विषे वह हर्ष करें और रोग विषे रह सदानि- योग | वियोग में सयोग करें, संयोग विधे रह बिना वि. योग लोक विषपालीक सुधार इसको समझे ज्ञानी लोग ।। जिनकी माया' से 'सृष्टी में व्याप रहा है सबको भर्म । Phoni लावनी क्या कोई जाने पण्डितके सन्यासीवता कौन कर्मा | देवति वह रहें विदही माया में रह निर्माया देवीमिह ये कद्दकि उन का पार किसीने नहिपायाचारवेद पट शास्त्र अठारों पुराण ने याही गाया । सब धर्मसे बड़ा धर्म सन्यास मेरे मनमैया बनारसी तीनों गुण से हे रहित न समझ धर्म अधमक्या कोई जाने पति के सन्यासी का कोन है कर्म ।। ४ ।। मन मुरशद से मिलके अब त्रितको अपने रेट पर । दुई दूरकर हमेशा निभय पदमें खेला कर ॥ देख तो अपने आपकोतू है कौन कहांसे आया है । किसने पैदा किया और किसने तुझे बनाया है। जो तू कहूं वाप से पैदा माने मुझको जाया है। यह तो गलत है अरे तु आपी में चाप समाया है ।। दुविधा को कर अलग और सब दिल का दुर झमेलाकर । दुई दरार हमेशा निर्भय पदमें खेला कर।।१।। जवतकहे ज्ञान तभीतक कुटुम्ब कबीला भाई है । ज्ञान हुआ तो आतमा आप में आप समाई ॥ कोई बना ब्राह्मण । क्षुत्री कोई वैश्य शुद्ध कहनाई है। हम ने देखा तो सब के बीच कुँवरकन्हाई है। समदर्शी हो विचर पड़े जो दुस सुख तन पर झेलाकर । दुईदुर कर हमेशा निर्भय पद में खेलाकशातु उसको पहिचान तेरे इस शरीर में बसता है जो। किस गफलतमें पड़ा ओ कॉन नीद भर रहाइको ।। खोलके अपनी आंख देख वह एकहै उसको समुझ न दो। कोन है तेरा और तु किसका है इसे तुम समझो तो ॥ आ तममें परमातमको अव देख के दर्शन मेला कर । दुईदुर कर हमेशा निर्भय पदमें खेलाकर ॥३॥ एक ब्रह्म और दि. Mon- ६. लवनी तीयोनास्ति यही वेदनकी बानी है। इसको समझे वही नरजी पुरा विज्ञाली है। जैसे जलझी तरंग फिर जलही के वीच म. मानी । कह देवीसिंह बात यह बनारसी ने जानी है। छोड़ तुरे कालंगी का गाना निर्गुण के डंड पेलाकर । दुई दूरकर हमेशा निभय पद में खेलाकर ॥४॥ संत खेलते होली जिसमें इजत हुमत लाज रहे । गुणी जनों के अगाडी अनहद बाजे बाजरहे । ज्ञानगुलाल के वा दल छाये मे गनित पायें । बडानादसों लडें और भभधूल कोउड्डावें ॥ धीरज का डफवाजे संग में नाम नारायणका गा. वें । कोष कुम्कुमा पार के काम शत्रको टट्टावें । दयाकी दो. खत देते सबको साथ में सवी समाज रहे । गुणी जनों के अ- गाडी अनहदबाजे बाजरह।। अमर अवारको साधुलगाये सुक्तरूप पहिले माला । मसाले भूपण झलकते तनपर मन में उजियाला। पत्र मिठाई संत पारते बहुत खूब सर से आला। अमृतरसको पिरों और खोल घट का ताला। नेह नाचको देखें हरिजन सत्य साजो साज रहे।गुणी जनो के अगाड़ी अनहद बाजे वाजरहे ॥ २॥ लोकी लकड़ी लुटले आप आतम की अगनीकरते । हरहर होली जगाद वही नहीं जनमें मरते।। विज्ञान की गाली देते हैं सन्तकिसीसे नहिं डरते । बाटोक पडे पहिनके काया को निर्मल करते । शील सितार सुनाने साधु नाम नरकारे गाजरहे। गुणीजनोंके अगाडी अनहदनाजे बाजा।। रामनाम का शोर चलावें पदस्वास्थकी पिचकारी जिसको मारें उसी के मुख पर लगती है प्यारी । मिले गले गोविन्द से चल के नाप ज गिरिवरधारी भाव भोग को -- लावनी करें है वही यती वही ब्रह्मचारी ! शुद्ध मिहाननपर तीनलोक में राजरहे । गुणीजनों के अगाडी अनहद बाजे बाजरहे ॥ ४॥तीरथकी फेती फिरतेहैं सुमत समग्री लेजाते। पूजेहोली गुणीजन ब्रह्मज्ञान में मदमाते । देवीसिंह यों कहें कि ऐसी होली जो कोई गाते । भवसागर के पारही परम धाम पदवी पाते । बनारसी ने हरिको पाया किसीके नहि मुहताजरहे।गुणीजनों के अगाडीअनहद बाजे वाज रहे ॥५॥ इस तनमें आत्माकृष्ण है और गोपी बालो का दल । सुनो कानंद बनाहे तन में मेरे रहसमडल ॥ विश्वकर्मा ने आज्ञापाके शीश महल तयार किया । अनहद वानों का उसमें संपूरण विस्तार किया ।। चारों खम्भे लगाये उस में ऐसा सुन्दर कार किया । खुशी हुये हम तो अपने रहम का वहीं विचार किया ।। सबको लाथले आया में दिखलाया उन्हें भवनउज्ज्वल । सुनो कानदे बना है तनमें मेरे रहन मंडला। मन ऊधनी मित्र हमारे सदासे हैं आज्ञाकारी। बुद्धि राधिका सो मेरे प्राणोंको है अति प्यारी । नैन करण मुख दन्त कण्ठ सब सखा हमारे हितकारी । लगन हेल लिता नहुत सुन्दर शोभाहै सबसे न्यारी ।। बलहै सो बल. भद्रहमारे भाता जिनका अटूटबल । सुनो कानदे बनाई तनमें मेरे रहसमंडल || २ हजार इबशीस बसे श्वासा मो सबसखियां संग आई। वोतो समझो हमीये कृष्ण हमारे ! हैं साई। गलसेमेरे लपट लपट क्यास्याही तान सुन्दर गाई। बजाईबंशी जो मैंने अनहद तोसब विलमाई ।।।। में मगन भई व्रजवनिता कामने किया बहुत बेकल । मुनों - बलाबनी कानदे बनाहे मेरे तनगे रहसमंडल ॥ ६॥ नानारगी पतिमता सोमी तब आई पासमेरे । रोम रोमकी सखासमझो या स- मझो दासमेरे । मेरी लीला देखदेख नहीं होते मित्र उदास मेरे । वर्णन करते हैं गुणको जगतमें वेदव्यास मेरे ॥ भंतो हुँ आत्माकृष्ण यह शरीर मेरा मंडल । मुनो कानदे बना तनमें मेरे रहस मंडल आये वहां गोपिका बलके ज्ञानरू- पधर गोपेश्वर । हमने उनको लखाये गोपी नहींहै शिवशं- कर । पूजन करके पास विठाया रहस दिखाया अतिसुन्दर । कहलग बणनकरूं इस काया में है चराचर । बनारसी सच्चिदानन्द चैतन्यरूप निर्गुणनिर्मल । सुनो कानदे वना है तनमें मेरे रहस मंडल ॥ ६ ॥ पुरेजोहरी संत परखते पनौमणि और लालरतन ।हित काहीरा खरीदें जिसका नहीं कुछमोल वजन ।। ब्रह्मवजार ल. गाया घटमे कृपाकमरवांधी कसके । सांचे जोहरी साधुसंत गुरु समजा सा, हँस हँस ॥ ज्ञान की गठरी लगी पंट मेंज सनहीं नीचे खमके ! करते सौदा सदा वो दया दुकानों पर बसके। लगलकी लडियां लटके जिसमें मुक्तरूप मोती लट कन् । हितकाहीरा खरीदें जिसका कुछ नहीं मोल वजन् ।। चतुराईकीचुन्नी ले आपसमें सबको दिखलाते। भेलका मुंगा स्वरीदें हर भक्तोंसे मिलजाते ।। दिनपर दिनहो मोल सवाया कभी नहीं घाटा खाते । सांचे जोहरीके आगे सभीजवाहिर शर्माते ।। तप करने का लिया तामडा पास में रक्खाकरके यतन् । हितकाहीरा खरीदें जिसका नहीं कुछ मोल वजन ॥ २ ॥ यश करने का जागा पहना घर से निकल बाहर 4 लागनी M 1-x-ma... -HT PAR ३ थाये । बड़ीदरपर जायकर अकीक हिकमतका लाये । पुण्य पापसे न्यारेहोकर लाखों पारस बनाये। फतेनाम के फिराने हरभक्षों के अनभाये । मनका मनका परें गनमें श्याम श्याम करके सुमिरन् । हितमा हीरा खरीदें जिसका नहीं कुछ मोल वजन ॥३॥ हमने अब इस दिल को जौहर किया है यह सच्चादाना । वही जौहरी कि जिसने अपने दिलको पहिचाना । इसके बीच में सबकी खानि है मुल्क मुल्लका खज्जाना।। देवीसिंहबोही मालिक जिसका कुलजन्माना!! बनारसीने दिल परखा कई लाख बजेके लगायधन् । हित का हीरा खरीदें जिसका नहीं कुल मोल वजन् ॥ ४॥ योगी होय जो सकल में रेटे देखें दशवें द्वारको वो । कारज करै जगतके सर और लखै अलख कतारको यो। नाचे गावे गाल बजावै ध्यान आत्मा में धरके सबमें और सब में न्यारा पूरणहोय योग करके । निर्भय होके विवरे निशदिन कबहू नहीं चले डरके। अपने शापये आपको देखा धन्यमान है वो नरक । जा यह काया मार्ग तम फेर पहुँवे परले पारको वो कारज वारे जगत के सब आर लले अलख कार को वो ॥ १ ॥ प्रसन्न नित शो बुद्धी निर्मल वर्म अकर्म न कुछ जाने। ति भातसे अलग रहे अतज्ञान की बखाने । सनदशी और सुद्धसमाधी अपने को आपीमाने । जीव वनमें एक भावकर अपने मन में पहिचाने । भूमीभार उतारच कारन घरे आप असतारो वो । कारजकरे जगत्के सम और लखे अलख कार को वो।रात्रिगुणकोजीते औं चौथे पदस्थपर अपनी कारेमती । नं M
१०
Sure
लावनी
पूर्णसृष्टिको भोगजो करे बोहोहो बालयती । चाचा में
अपने आपको देखे सबसे उसकी होयगती । आपी पिता
और पापी पुन्नहै आपत्रिी आपपती । चाहकरे वह प्रलय
और चाहेरचे सकल संसारको वह ! कारज कर जगत के
सन्न और लले अलख कतार को वहाघुण्य पापसे अलग
रहे दुख सुखका नहीं विचार करे ।। ब्रह्मज्ञानकी चर्चा अपने
सुखनो सेरचारकरें । आत्मदशाहोय तो अपने सब कुलका
उद्धार करें । बनारसी ये कहे वह जो चाहै सो आप कार
हरे। चाहकर वह नरपैदा और चाहे बनाये नारिको वह
कारजकरे जगतक सब और लखे अलख कतारको वह गधा
कालवलीसे लडके कुस्ती जीते जगतमें साधुसन्त । उनक
दांचना किसीने आज तलक नहिंपाया अन्त । बांध लगोटा
बने जितेन्द्रिय कमी न देखें परनारी । गमके भोजन करें
जय चवदनपर तैयारी । कामक्रोध मद लोभ मोह इन
इन पांचोंकी कुश्ती भारी । कालके ऊपर जायके वाधी अ
एनी असवारी । मनको किया मुराद पेंच बतलाये उसके
तई अनन्त । उनमें दविका किसीने आजतलक नहिंपाया
अन्त ॥ १ ॥ रामनामकी कसरतसेजबहुआ बदन में जोर बडा।
उदय अस्ततक हुआ उनकी कुस्ती का जोर बडा । पहल
वाल है वही जगतमें जोकोईहै गमखार बड़ा । उसके सानी
कोई नहीं हुआ कहीं शहजोर बड़ा । लोग लडे दुनिया में
कुश्ती कालको जीतें सन्त तुरन्त । उनके दांवका किसी
ने आज तलक नहिं पाया अन्त ॥२॥ जो कोई उनसे दस्त
सिलावै उसके हाथमें यश होजाय । कमी पडा. जगत
में गौतभी उसके वश होजाय । काल फांससे बचे वह
।
१. -- --- amanna लायनी जिसकी रसनामें हरिरस होजाय । कपट की कवी तजें तो पहलवान चौरसहोजाय। वह नहिगिरे किसीके गिराये जो सदगुरुको पद्वैपढ़न्त । उनके दविका किसीने आज तलक नहिंपाया अन्ताशाहतकोडा गल लपेट कुश्ती और पेंच सर झूठे खेल। इन्हें छोड़के तु भज हरनाम और दंड निर्गुण कपेल । शीलसत्यका बांधींगडा जो गुजरे वह दिल पर खेल। कहेंदेवीसिंह अरेनरमूढ़त करसद्गुरु से मेल ॥ बनारसी सन्तोंका सेवक कई वातजो हो। तन्त । उनके दायका किसीने आजतलक नहिं पाया अन्त ॥ ४॥ हिरदय में हरिहर हीरामन परखें जौहरी संतरता प्रीतिकापारस पासमें अलख लाल का करें भजन । दोर के वस्तर पहनें तनपर नयेनये सजकें सुपन । यशका जामा पहरके कुजकुंजमें फिरें मगन् । पुण्यपोटली फेंट लगाई बासा रखते तेरी परन् । तेज तत्वका तामडा झलके जो दिव्यजगन् । मुक्तकी माला अमोलदाने परम र पहिरे पारस पास में अलख लाल का करें भजन् ।। ।। जपताहूं मैं नाम उसी का सत्य शब्दका गहि म मिरन् । सादा दिल था खरीदा सद्गुरु सवजा शुन्दपरन् । तुरियापदकी पाय तुरमुली झ्यामा स्याम के गहें वरन् ।। लगन लाडली मिलिगये मोर मुकट वाले की शरद लोकालाल लसुनियां पाया कहाये हमने सत्य वरन् । भीतिका पारस पासमें अलख लाल का करें भजन ।। हरिनामका अकीक इस बयान करना बहुत कठिन । बुरे कामसे वाज आगमन रूपे सुगेका पहिन वरन। ऐसा रस यतछोडो साधो राधावर हैं शिरं रतन ॥ मती विजारो सज्जन । भीतिका ।
. १५ लावनी नाम सुलभ लक्षण का पहिलो लटकन । जुम्निश नहीं खाते हैं संतचित्त चुन्नीको करके धारन । प्रीति का पारस पास में अलख लालका करें भजन ।।शापरमारथ का पहिन के पन्ना जातिलिये अवतीनोपन । कोई कहै कुछ भी अपना मेरातो है वहीवतन । कहें मार अपने मनको अन पहिन जमुरंद जस जीन्न । देवीसिंह ये कह कह खयाल दुमानी नयाचलन ।। मैंने तो अब लखाहैमनमें मुक्तरूप मोती भग. एन । प्रीतिका पारस पास अलख लालका करें भजन ॥ ४॥ त्रैलोकी है जिवा पर अब और किसी से काम नहीं। कोटिजन्मतक कमीजीसूलै शिवका नाम नहीं। इसीजिह्वा पर गंगा यमुना सरस्वतीकी है धारा । इसी जिह्वा पर र- वाया तीनलाक का पंसारा ।। ब्रह्मा विष्णु महेश ने अब जिहवापर आसन मारा। चांद और सूरज रहे इस जिवा पर नवलख तारा । नारायण गोविन्द शब्द जिसने जि वासे उच्चारा । उसीके ताई हुआ माझम हाल घटकामारा।। चारधाम, इस जिवापर जिहबा सा कोई धाम नहीं । कोटि जन्मतक कमी जो भूले शिवका नामनहीं। हीरे मोती लाल औ पारस जिवापर अकसीर दसे । दई देवते इसी जिवापर, पांचों पीरवसे । नौनाय चौरासी सिद्ध जिह्या पर इसमें वामन बीरवसे ॥ ऋषी मुनी सब इस जिवा साधु, फकीर बसे । शत्रुहन हनूमान जो जिया में रघुवीरवसे । समुद्र सातों इसी जिवापर अमृत नीर वसे । रामचन्द्र है जिहबापर और कहीं आराम नहीं। कोटि जन्मतक कभी जो भुलै शिवका नाम नहीं।२। चार वेदपट शास्त्र अठारह पुराण जिवा के भीतर । सातदीप हैं ओ पर लावनी १३ AS- चौदह भुवन रतन चौदह सुन्दर । जब जिसे कहा तो आई श्रीगंगारहदासके पर। अनामीलनेकहा नारायण मुखम। गया वो तर । मोर कहा का नहींह प्यारे जोकुलोजिला पर। इस जिद्वापर गायत्री पार्वती शङ्कर हरहर । आठयामहे इसजिह्वाएर जियासाकोई यापनहीं। मोटि जन्म तककमी जोमूले हरकानामनहीं ॥३॥श्रीकृष्णाने इसजिवापर तीनलोक को दिखलाया । देखके अर्जुन रूपको अपने मनमें घबराया हाथवाधिक प्रस्तुतिकरता सब कुछ है तेरीमाया । अभेदह द तेरातो भेद किसीने नहि पाया। जो कोई पूछे भेद किरीका उसेभेद कुछनहिं आया। कहे देवासिंह ज्ञानविज्ञान मेरेमनमें भाया। बनारसी कहे राम राम रट मुले सुवह थोर शाम नहीं । कोटिजन्मतक कभी जो सुलै शिवज्ञानाम नहीं ॥ ४ ॥ श्रीकृष्ण गोपाल गोकुलानन्दन गुगिश्वरधारी। गांधी गोचर ज्ञानविज्ञान आत्या अवतारी। पूरणब्रह्म अखण्ड सचि- दानन्द सदा आनन्दकरें। कालको जीते और जंजालपाप सब बन्दकरें ।। दुष्टोको हनहनके पारें राक्षसभी मतिमन्दकरें भावभक्तको देय और सन्तोको निद्वन्दकरें ।। वेदशास्त्रगीता को गावें और नये नये छन्द करें। मुखधर मुरली बजाउँ म स्तुतिउनकीनन्दकरें ॥ मातु यशोदा करें आरती ध्यानधरें नित त्रिपुरारी । गोधीगावर ज्ञानविज्ञान आतमा अवतारी।। मोरमुकुट मकराकृत कुण्डल कण्ठ कौस्तुभ मणी लसे । उहाँ मुक्तमाल औरकटिपीताम्बर पीतकले । श्यामगात छवि स्व. रूप सुन्दर सन्तोंके हिरदयमें बसे । चरणमें झलके व सुन्दर पद्मपद्मिनी देखहँसे । सब दुखदुर होय उनके जो हरिकी A ११ लावनी भक्ती माहिस । गोविन्द गोविन्दकहै जो उन्हें न काला कालडसे | परमहंस सब करें अस्तुती ब्रह्मानम कई ब्रह चारी। गोदी गोचर ज्ञानविज्ञान अतमा अवतारी ॥२॥ नारायण वोही सत्य नारायण अनेक रूप अनन्त नयन् । मोहनीराति मोहेमनको हँसबोले मधुर वयन् । शेष नाग की शध्यापर करें क्षार सिंधुमें हरी शयन् । ब्रज में प्रकटे चराई नदनाबा की कामयल । वृन्दावनमें रहस रचाया उजयाली खिलरही स्यन् । सब सखियनको साथ ले उनके संग में करें चियन जितनी ग्यालिनखड़ारहसमें उतनेदि वन गये बनवारी । गोधी गोचर ज्ञानविज्ञान आत्मा अवतारी।। ॥३॥पीन कर्म बराहकहीं नरसिंहरूप हस्ने धारा । नामन बन के छला बाल इन्द्र को राज्य दिया सारा ।। परशु- राम हो क्षत्रिय जीते सहस बाह को संहारा । राम रूप धरि छेद ' रावण को एक पल में मारा।। कृष्ण रूप सोलहों कला बल पण्डोंका किया निस्तारा बनाई गीता इसी से दुर्योधन का दलहारा । बोधरूपघर बने हैं बोद्ध निष्कलंककी तैयारी। गोधी गोचर ज्ञानविज्ञान आत्मा अवतारी ।। ४॥ अपारमाया अलखलखी नहीं जाय कृष्ण अ. वतारी की। कवीच्यावर्णनकरे जो महिमाननी सुरारी की। सहस्रमुख से रट शेष नहींपावै थाह बिहारी की। बाल रूप धरि कामना बसुदेवकी सारीको ।। रखी देवकीको लज्जा कंसाको मार बहुभारी की। कह देवीसिंहप्रभू अब हमने शरणतुम्हारीकी ॥ बनारसी जै जै करता ब्रह्माने अस्तुति उधारी गोधी गोचर ज्ञानविज्ञान आत्मा अवतारी ॥५॥ ।
-nomen लागनी ११ विश्वरूप लिखरहा वाग में जिसमें आदमी की गुल जारी । रंग रंगके फूल हैं तरह तरह की फुलवादी । परम पश्चिम उत्तर दक्षिण ये चारों दीवार बनी । हर एक तरफ से नदियों की छटी है जो नहर घनी । सात सिन्धु मोई तालाब सातों सबका मालिक वही धनी । नाहं वनाव चाह एक पलमें करदे फनाफनी। विश्न बागका मालिक है वहीं श्री कृष्ण गिरवरधारी। रंगरंग के फूल है तरह तरहकी फुलवारी।। १॥नव खण्डों के महल बनाये दशादिशा के दशदारे । त्यार किये हैं बाग में चौदह भुवन न्यारे न्यारे ।। आसमानकी छत्त लगाई जिसमें जड़ दिये हे वारे । गरज गरज धनकर छिडकाव छोड़ते फवारे ॥ चांद और सूरज चारों तरफ की करते हैं चौकीदारी। रंग रंग के फूल हैं तरह तरह की फुलवारी ॥ २ ॥चमत्कार का चमनलगाया पर ब्रह्मने आपहि आप । हरज़रें में झलकता हरशय में वही र हा है ब्याप। इसी.बागके भीतर बैठे ऋषी मुनी सब करत जाप। कोई गावते भजन और कोई रहे पंचग्नी ताप । सा धुसन्त करें सैर वागमें परमहंस और ब्रह्मवारी : रंग रंगके फूल हैं तरह तरह की फुलवारीशा तोते मना लालहस सन सैर बाग की करते हैं। जो नर हरहर स्टैं वह नहिं जन्में नहिं मरते हैं। देवीसिंह ये कई ध्यान जो उस मालिनका घर- ते हैं । भवसागर के पार वह सहजहि जाय उनरत हैं। बाग जहां के बीच में उसके सुदरत की फेली क्यारी। रंगरंगके फूल हैं तरह तरहकी फुलवारी ॥ ४ ॥ यह काया कल्पवृक्ष तीनों गुणझी तीनों डाली। हर --
क
'लावनी
एकफल हैं इसी में हरीनामंकी हरियाली । प्रेमगीति के
पत्र लगे और परस्वास्थके फूले फूल । उन फूलों में कोई
नहीं कांटाहै और सोई न शूल । शील सत्यकी शाखा है
आनन्दरूप कहें जिसका मूल । मोर हंस सब और तोते
मैना उसमें रहे है मूल । कल्पवृक्ष काया को सींचे निरा-
कार निर्गुणमाली । हर एक फलहें इसी में हरीनाम की ही
रियालीसमदृष्टीकी सुगन्ध सुन्दर परम तत्वकी चले.
एवन । छमाकी छाया में बैठे सत्त हरी का कर भजन ।।
छविरूपीहे डालवृक्ष में बैठे बोले हीरामन । ब्रह्मवीर्य से
हुआ उत्पत्ति कियायह सत्यमयनासवशाखाह भरी फूलसे कोई
डाल नहीं है खाली। हर एक फल, इसमें हरीलामक्री हरि
याली सरजीवन जलभरा वृक्षमें हरीहरीकर हुआ हरा ।
नवसे शिखलों वृक्ष यह भावभक्ति रो रहे भरा । कल्पवृक्ष
काया में बैठ के जिसने जिसका भजन करा । अजर अमर
वह हुआ और भवसागर में सहज तरा। रंग रंगके बने
जाल और तरह तरह की है जोली । हरएक फलहै इसीमें
हरीनामकी हरियाली मुक्तरूप फल लगे वृक्षम भजन
करे सोई पावै । जन्म मरण से होने वह रहित नहीं. आवे
जावे । राम राम रस बरा फलों में जो कि राम सों लव
लावे ।। कह देवीसिंह होय वह अमर नहीं मरने पायें ।।
कल्पवृक्ष काया का है वह निराकार निर्गुणमाली। हरएक
फलहें इसीमें हरी नाम की हरियाली ।। ४ ।।
अमरनाथ ने अमर कथा ,जब ही सुने थी पार्वती।
उत्तराखण्ड में लगाआसन बैठे लासपती॥ अविनाशी
लावनी
कैलासी काशी उत्तराखण्डौ बसाई । ठे गुफामें गौर को अ
मरकथा जव सुनाई । अमृतवाणी सुनी उमारे नेत्रमें निद्रा
भरि आई। वही कथा फिर एक तोतेथे बच्चे ने सुनिपाई।
दिया हुंकारा शिवजी को शिवा अर्थ कर मसुझाई । सु-
आ सुनताथा औ वहीं सोती थी गौरा माई । परब्रह्म का ले
लहुआ पर उस तोते की बड़ी रती । उत्तराखण्डमें लगाआ
सन बैठे कैलाशपनी।।।हुई कथा सम्पूरण शिवके पार्वती को
बोलाया। उठी गौरजा कहाशिव मैंने कुछ नहीं सुनिपाया ।
फिर शिवजी ने कहा हुंकारा किसने मुझको सुनाया। और
तीसरा यहां पर कौन विधी करके घाया । बढ़ा क्रोधशिव ।
शकरको करसे त्रिशुलको उठाया । उसीवक्त फिरवहतातेका
बच्चा उठके धाया|दौडेशिव उसके पीछे वह निकल गया रूर
समुत मती । उत्तराखण्ड में लगाआन बैठे लाशपतीशाती-
नलोकमें उड़ा वह तोता कहीं मिला नहीं ठिकाना । उड़ते
उड़ते बहुतही अपने मनमें घबड़ाना। पतिव्रता थी
खड़ी करै स्नान उसी को पहिचाना । दौड़के तोता जाय
फिर उसके मुखमें सामाना ! वहां किसी का जोर चले
नहीं क्योंकर हो उसका पाना । फिर शिवजी ने दिया
वरदान कहा यह है स्याना ।। वही हुये शुकदेव व्यास के
पुत्र बडे भये यती सती । उत्तराखण्ड में लगा आसन बैठे
कैलासपतीशामर कथा का बड़ा महातम है जो कोई
सुनने जावे । श्रवण कियमे होय वह अमर नहीं मरने
पावे ॥ चारवंद षटशास्त्र अठारहपुराण सब इनमें आ ।
अमरकथा को आप शुकदेव सदा मुखमे गावें। वह प.
4-
A-- लावनी ण्डित है बड़े किजो कोई अमरकथा को सुनायें। और दूसरे बोल नहीं कल्ब मेरे मन भावे ।। जिस दिन शिवने कही कया कौन बार तिथि कौन हती। उत्तराखण्ड में लगा आसन बैठे लातपती॥ ४ ॥ योगी साधे योग योगमें कायाकाई खेद बड़ा । हमने जा ना योगसे वियोगका भेद बड़ा । योग किया रावणने यो- गीवन सीतामाता हरलाया। रामचन्दने किया वियोगवड़ा एक यशपाया । योगकिया हिरण्यकशिपुने प्रह्लाद भक्तको डरपाया। वियोग करके बने नरसिंह दुष्टको गिर्राया। योग किया अस्मारने शिवशंकरको अतिमत्ताया। वियागकर के विष्णुने उसेभस्म कर जल्लाया। योगी पढ़ाते योग शास्त्र वियोगी का है वेद बड़ा । हमने जाना योगसे वियोगका भेद बड़ा ॥ ४ ॥ योगीवन के चला जलन्धर हरसे युद्ध कीना मारा। वियोग करके हरी ने छली जलन्धर की दारा । उ सला योगघटगया पहले शिवने दुष्ट कोसंहारा। इसीसे क हतेयोगसे वियोग का रस्ता न्यारा । योग शियो कंसाने भागे श्रीकृष्णको वीचारा | वियोग करके कृष्णने केशपक- इ उसको मारा ॥ योगी करते योग विधी से वियोगी का है निषेध बड़ा । हमने जाना योगसे वियोग का भेदवड़ा ॥२॥ योगकरनकी श्रीकृष्णने सत्रियों को भेजी पाती । क हती सखियां ऊबो यह बात नहीं मनमें भाती ।। योगी धार अस्म हमने वियोगमें जाली छाती। योगी मदको पीवें हम वियोगमें हैं मदमाती ।। योगी बाधे सेवली ह. मने बियोगकी बांधी गाती। जायके उचो कृष्णसे कहो .
लावनी १० यह मखियां समझाती । वियोगी बेधे हीया योगी तो कान में करते बड़ा । हमने जाना योग से वियोगना है भेद बड़ा ।। शायोगी कहते ज्ञानषियोगी फिर इसमें दीवाने । वि. योग जिसको नहीं वह योगकै रस्ता क्या जाने । योगी तो जंगल में बैठे चढ़ावते अपना माने । वियोग करके वियोगी घटमें आतम पहिचाने ॥ योगीके शिर जटा-वियोगी शिर से पर है मस्ताने । कह देवीसिंह योगी से वियोगी हंगल याने । बनारसी ने वियोग साधा योगों देखा खेद बड़ा। हमने जाना योगसे वियोग का है भेद बड़ा ॥४॥ ब्रह्मारचते सृष्टि पालना विष्णूकरें शिव संहारें। धन्य धन्य श्रीगंगाजी जी अधमपापियों को तारें। गणेशजी विद्या का वरदें बुद्धिबुद्धिका दान करें। सूर्य तेज देवे शरीरमें जगरों सब सन्मान करें। शीतलताई देखें चन्द्रमा सतगुण का पर धानकरें। हनुमानजी चाहे तो एक पलभरम वलबान करें। भैरोजी भयहरे डरें नहिं दुर्जनको पलमें मारें । धन्य धन्य श्रीगंगाजी जो अधूप पापियोंको तारें ॥१॥ इन्द्रका सुमिरन करे तो पावे सुन्दरसी अवलानारी। दुर्वासाजीपवन अहारी कामी को करें ब्रह्मवारी।। कुवरके हैं भक्त जो वह तो बड़े बड़े मायाधारी। धनराजनी धर्मवता जो हैं उनके हितकारी शेषनी अपने सहन मुससे नये नाम नित उच्चार। धन्यधन्य श्रीगंगाजी जो अधमपापियोंको ता॥२॥ तनुका रोगदर करदेते बड़े वैध अश्विनीकुमार । वेदव्यास्त पुराण मुनिहें वेदका निारी दिनकरें विचार । वालपन मे त्याग बचावें सनकसनन्दन सनतकुमार । करो शनवर का ---44m- 1 - २० । लावनी पूजन तो सकल बिपदको देवेटार । जितने देवते हगे सो तो गुरुवृहस्पति को धारें । धन्य धन्य श्री गंगाजी जो अधन पापियों को तारें ।। तेतीस कोट देवते सब अ पना अपना देते हैं फल। अतिप्रसन्न होते हैं उनपे जव बढ़ता है गंगाजल ।। देवीसिंह यह कह न मुलं में श्री गंगाको यकपल में सबसे ऊ शिवजी उनके शीश के ऊपरगंग अचल ।। बनारसीके अघम पापको धोने गंगा की धार। धन्यधल्य श्रीगंगाजी जो अधर पापियों को तारे ।।४ पापी एक भरा गंगापर हुई वहां उसकी तव्यारी। महिमासुनी कानदे जैसी निकसी वाकी असवारी । आ शा कंचन का विमान सुन्दर और वामें रत्न जड़े। ब्रह्मा विष्णु महेश शेष सनकादिक सन लेने को खड़े । उधर से आये यम के दूत वह ले ले हाथमें शख्न बड़े । देखतेही दल श्रीगंगाका भागे यमके पांवपड़े। वह जो पापीया सो तो तनुत्याग के बन गया त्रिपुरारी । महमा सुनो कान दे जैसी निकली वाली असगारी ॥१॥ अहुत भूषण कुरेजी झटपट से प्रापी ले आये। पीत वन्न नद शिखलों उत्तम उसके तनुमें पहिराये ।। चोवा चन्दन इतर अगरजा सवी देवते ले धाये। पत्र शुष्प से पूजनकर कर मग्नभये मंगल माये ॥ तीन लोक बांदेहों भुवनकी पाई उसने सरदारी। महिमा सुनो कानदे जैसी निकली वाकी असवारी ॥२॥ मोरमुकट मकरा कृत कुण्डल गले में वैजन्ती माला। शीशचत्र सुवरण का झूमे जयजय शब्दकी धनि माला ।। कंठ कौस्तुभमणी हार गजमुक्तोंका उरमें डाला । बाजूबन्द लावनी नौस्तन और करमें कंगनका उजियाला । सरे अटल संचार उसे गंगा ने मायादी सारी। महिमामुनो कानदे सोनिकाली वाकी असवारी हाजववो बैठा विमान में तो ब्रह्माजी मुस्कल लाये इन्द्रडुलावे पंखासब देवतोंने पुष्प अति परसाये। शि- व और विष्णुने करी शशध्वनि ऐसे फल उसने पाये। धन्य भाग्य है उनके जो कलिकाल गंगानी न्हाय । करनृत्य गंध व सकल मिलिवाजे बजनलगे भारी । महिमा सुनोकानदेजरी निकली वाकी असबारीमानहासिद्धि नौनिद्ध सभी करजो रिजोरिआई आगे। जिन त्यागे गंगाकेतीर ततु उनके भाग्य ऐसे जाग। जबवह बैठाविमान तो गोले अनहदके दगने लागे नन्दीगण अरु गरुडसिंगज निमानके नीचे लागो और स- कल वाहन कांधा देनेलागे कारीवारी। महिमा सुनो कानदे जैसी निकली वाकी असवारी ।। ५ ।। हनुमान जी सास बनगये भैरव बनगये अगवानी । गणेशजी डंका ले आगे चले महायोगी ध्यानी। छप्पन कोटि मेघने मिलके रस्ते में छिड़का पानी । इन्द्र सूर्य ने करी रोशनी सब देवता के मनमानी ॥ तेतीसकोटि फौजसन संगमें चली औं छवि न्यारी न्यारी । महिमा सुनो कान दे जैसी निकली वाकी असवारी ॥६।। जब वह पहुँचा अमरलोकपुर तब फिर आये | अपने धाम । मिली ज्योति में ज्योति रूप हैं श्रीगंगा को करो प्रणाम ॥ याहीते मैं कहत जात हों जपो सकल गंगा का नाम । और कोऊ नहि अन्त समय में आयगा अब तुम्हरे काम। बनारसी यह कह कभी तो आवेगी मेरी बारी । महिमा सुनो कानदे जैसी निकली वाकी असवारी ।। ७ । Ammar लावनी आजु युद्ध की करो तय्यारी श्रीगंगाजीतुमममसे । में पापीतुम तारणहारी बनिहै पाप बहुत इससे । मेरो पापहें पहाडकसम समर करन वीर वो। देखों अब आयके सेहँगो तु म्हारो तारबड़ो। रणमें लडे हटनहि कम मेरो पाप रणधीर बड़ो ! तुमतो यही कहतहो सुखसे मेरीरेणुका नीरवडो । देखो उनको पारथ जोलडि थाय मेरे तनसे । मैं पापी तुम ता दशहारी पनि पाप बहुत हमसे || जरने जन्म भरो पृथ्वी पर कभी न हरको नामलिगो । सैराशी नहिं मातु पिताकी साधुनको नहिं कामकियो । हरो बहुत धन ठग ठग नहीं साथले एकहु दामदियो । कियो बहुत विषपान अमृत को भी एकहु यामपियो । से बविहीं कालसे में अब कोन छुटइहे स्वहि यमसे । में पापी तुम तारणहारी वनि पाप बहुत हमसे ॥ २॥वेद पुराण वखानत निशिदिन अश्रा पापियाको तारा । किया बहुत संग्राम कालमे और यमदतों दो मा रा। सुनीवात यह श्रवणसे मैने कियेपाप अपरम्पारा । करि हाँ और बहुतसे अघदेखों कैसेहो निस्तारा । अपतो. यही लडाई ठानी है गंगाजी मैं तुमसे । मैं पापी तुम तारणहारी व- निह पाप बहुत हमसे (अहहैं जदयमदतठनको बढ़ेश्योद्धा आदी । तब तुम माहिंवचेही तो में जहाँ तुम्हरी बलिहारी। तुम्हरे गणहें पुष्पलिये और यमके दृत शस्तर धारी ।। इसका उत्तरदेव कि सेना किसविधि से यमकी हारी। कहीं मुझे ससुझायके झटपट छूटजाऊँ में इस भूमसे । में पापी तुम तारण हारी बनिहैं पाप बहुत हमसे ॥ ४॥ भगि सन यमदत दुलहा मैं तुमको मेनके विमान ।
-andiarriSTERS LAR लावनी २३ एक बिन्दु गंगाजलसे जलजाय पापनाहिर निशान । दिया पदेवी सिंहने वह पापभी होगये पुष्प समान । बारम्बार पर कहत जातहो क्यों बनारमी तुम मनसे में। पापी तुम नारा णहारी बनिह पाप बहुत हममे ॥६॥ ब्रह्मा विष्णु महेश शेष सनकादिकने बदकियामनन । त- बआई ब्रह्ममण्डलसे श्री गंगाजी तारण तरन । ब्रह्मरूप नि भय निवाणी अखण्डगंगाक्षी धारा । विष्णुजीसे नहाकेला सआई तबाशिवजीनेधारा । जटाको उनके शोगादी ओसरूप भी सुन्दर सुद्धारा । आगे कहूंगा तान्त जिसनिधि तीन लोकको उद्धारा । अस्तुतिकरके आप ईशने शीशचढ़ाई भये मगन।तिबआईब्रह्ममण्डलसेश्रीगंगाजीतारणतरत ।। १ भागी रथने करी तपस्या मगनभये शम्सुमोला। कहामागहमसे तब भागीरथ सुखसे यों बोला। गंगादेउनाथजी हमको शु द्धकरौं कुलकीचोला । तबफिर अपनीजटाको शिवनेअपने हाथनसेखोला। एक बूंदगंगाजल निकला जटाले जन अति किया यतन । तब आई ब्रह्ममण्डल से श्री गंगाजी तारण तरन ॥२॥एकडूंदकी तीनधार भई धाराएक गई पाताल । शेषनागने दर्शनपाये जीवनमुक्तमये सवव्याल । एकधार आकाशगई सब देवत देख भये खुश हाल । हाय जोरि द ण्डवतकरी गंगाने उन्हें तारा तत्काल । एक धार भागी- स्थलाये मृत्युलोक तारन कारन । तब आई ब्रह्ममण्डल से श्री गंगाजी तारण तरन । मृत्युलोको चलीवगततय समुद्रने किया विवाह । हाथजोड गंगसे कहा तुम्हारे वलका नहिं वारा पार॥ ये मुझसे नहिं जाय सहारा बहुन -- Sabina apan D ।
MALNIRN * लाबनी सिन्धुने करी पुकार । तब गंगाने प्रसन्न हैके धारा अपनी करी हजार । नाम पड़ा गंगासागर कह बनारसी नितकर दर्शन । तबआईब्रह्ममण्डलसें श्रीगंगाजी तारण तरन ॥४॥ और सकल देवतन से फलजो मांगोगे तब पावोगे । बिन मांगदेहेंगंगाजीजोएकवारतुमन्हावोगे । शिवजी की जो करो तपस्या मनमें ध्यानलगावोगे। और श्रीगंगाका जल जव उन के शीशचढावोगावलपत्र और आक धतूरादि में लेजावोगे। तव वह है हैं प्रसभ जवतुम दोनों गाल बजावांगे। वोकहिं हैं कछुमांगोहमसे तब तुम उनसे मांगके लावोगे । बिन मांगे हैं गंगाजी जो एक बार तुम न्हागोगे।शाठाकुरबोरेजाय जायजब विष्णुको शीश झुकावोगे । पत्रपुष्पसे पूजन करके माला को पहिरोचोगे। धूप दीप नैवेद्य लगाकर और विष्णुपद गावो गे। तब वह रीझेंगे तुमसे जब उनको भजन सुनावोगे। बह कहि हैं कछु मांगो तुम हमसे तय मांगोगे शर्मावोगे । दिनमांगे देहँ गंगाजी जोएकबार तुमन्हाबोगे ॥ २॥ ब्रह्मा जीका सुमिरण करके लाखों बरप वितायोग । कन्दमूल फल स्वाय खाय के बहुतहि कष्ट उठावोगे । यह काया कञ्चनतन अपना इसको खुब सुखाचोगे । तब वो दर्शन देहँ पइहो फल जो कुछ तुम चाहोगे । वह कहि हैं कुछ हम से लो तब तुम करको फैलावोगे । बिन मांगे देहे गंगाजी जो एकबार तुम न्हावांग ॥३॥ करिहो पृथ्वी प रिकामा और चारों धाम फिरावोगे। जगन्नाथ और रामेश्वर में जायके पांव थकावोगे। और द्वारकामें छाप खाखाकर बदन जलावोगे ! जहाँ बद्री किदार तब तुम - * लावनी २५ क्योंकर शीत बचावोगे । वहां तो तुम आपही मांगिहो मागं न में बहुत लजावोगे । बिनमागेदेहें गंगाजी जो एक वास्तुम न्हावोगाऔर कहींजोपामकर्म करिहों तो पाप उठावोगे। गंगाजी में देहभी धोयहाँ तोमी नहिं पचितावोगे । लात लगाइयो फाँदियो कूदियो बहुलहि धूममचावेगे । तभी माता प्रसन्नहोयगी वाकपुत्र कहावोगे । बनारसी कहें अन्त में गुक्ती आपीसे तुम पावोगे । विन मांगे हैं गंगाजी जो. एक वार तुम न्हावोगे ॥५॥ भोजनकर या मुखारहु या वस्त्र पहर याफिर नंगा । जॉली जिये तु कह इस मुख से जयगंगा श्रीजयगंगा । नेम धर्म औ कर्म अकर्म में योग भोगमें कहुंगगा : दुख में सुख में भलेबुरे रोग अरोगमें कहुगंगा। प्रोवत जागत राह बाट में हर्ष शोक में कहुगंगा। मातु पिता दारा सुत बिछुड़े तो वियोग में कहुगंगा । धन दौलत या राजपाटहो या फिर ननजा भिखमंगा । जोली जिये तू कहु इस मुख से जयगंगा श्रीजयगंगा।। रोवत हंसते नगरअरुवन में जहां रहे तू कहु गंगा । सम्पत् विपत कुपत और पतनरसवी सहे तू कहगंग इबत तिरत मरत या जीवत मेरे कहे तुकहु गंगा। ये मनमदा समझ अब झटमेरो मन कह तु कहु गंगा । जोतेरे मन वसे. कार यह लगे तेरे चितमें चंगा । जोलों जिये तु कहुइसमुख से जय गंगा श्रीजयगंगा ।।खेलतकरत उछलत फांदत अ पने मनमें कहु गंगा । बाल जानी और बुढ़ापा तीनों मनमें कहु गंगा । धावत गावत ताल बजावत हररागन में कहु गंगा ।। सात दीप नवखण्ड और चौदह भुवन में - +- ३६ % 2 लावनी कहु गङ्गा । अधाहो या बहराहो या बूला हो या इकटंगा जोली जिये तू कह इस मुखसे जयगङ्गा श्रीजयगङ्गा ॥३॥ घटो नफे में दिवस रात्रि में आदि अन्त में कहा गगा। मंग असंग और रंग कुरगं में साधु सन्त में कहु गङ्गा !! चरा चर चैतन्य औ जड़में तू अनन्त में कहु गङ्गा । चाहे सत्रमें बैठिके कहु चाहे एकान्त में कहु गङ्का । बनारसी यों कहें चहे तू गरीब बन या करंदगा । जौली गिये तू कहु इस मुखसे जयगला श्रीजयगंगा॥ ४॥ सागरकी गिनी जाय लइर गिने जांय तारे । नहीं जांय गिने श्रीगंगाजीके तारे । पट्शास्त्र गिने जांय गिनेजांयसब नरनारी । दशादिशागनीजांय सृष्टिगिनीजांय सारी । सिद्ध साधु गिनेजाय गिनेजाय आत्रारी । राजा रानी गिनेजाय गिनी जांय खलक सरकारी । गिनेजाय शाह शाहानी गि नेजांय हलकारे। नहीं जाय गिने श्रीगंगाजीके तारे।।। गि नेजाँय नदी नद सिंधु गिनेजाय नाले । गिननीय श्वेतरंग लाल गिनेजांय काले । दरखत डाली जांय गिनी गिनेजांय ये डाले। छतीसरागिनी रागसकल गिनढाले । गिनते २ कई हजार शायर हारे । नहीं जाय गिने श्रीगंगाजी के तारे खग चरन्दजाते गिने गिनेजाय चातर । हरजात गिनी- जांय नगर गिनेजांय घरघर । कागज स्याही जाय गिनी गिनेजाय अक्षर सरदारगिनेजांय गिनेजायसागरसराक्याजाने गंगा ने कितने शठ निस्तारे। नहीं जांय गिने श्रीगंगाजी के तारे।। ३ ।। दिन रातगिनी जांय गिनीजांय तिथि घड़ी। शायरी गिनी जाय गिनी जाय छन्दकी लड़ी । शायर
म
ॐ लावनी
कायर जांय गिने गिनीजांय कही। जंगल खेला जाय
गिनी गिनीजाय जड़ी। यह सत्य सस्य छन्द काशीगिरि
ललकारे । नहीं जाय गिने श्रीगंगाजी के तारे ।। ४ ।।
अव विष्णुसे जाकरयमने यही पुकारा । गँगाने बॅद करदि
या नरककादारा । लाखोंपापी पृथ्वीपरोजमरतेहैं । क्या रहूँ
मैवह एकक्षणभरमें तरतहैं । मेरे भयसे भी जरा नहीं डरते हैं
गंगा के गण उनकीरक्षा करतहीविन भजनकिये होता उनका
निस्तारागिगावदकरदिया नरककाद्धारा । हिन्दयातुया
बेहना डोम कसाई । भैगी घोबी हडफोड़ या होवे नाई|गंगा
की लहर जिसे दरसे दी दिखाई। फिर अंतसमय में उसने मु.
नगपाई । दर्शन करते ही तरा महाहत्यारा। गंगानेवेदकरदि
या नरकका दाराशाजो मेरेदूत पापियों को जाँय पकडने।
तो गंगाके गण आवे उनसे लड़ने । वह देख देख दूतों
को लगे अकड़ने । और मारे बाण तनवीच चले वह
लडेन । में लड़लड़ कई लाख लड़ाई हारा । गंगाने
करदिया नरकका द्वारा ॥६॥ गंगासे सौ योजन पर एक
नगरथा । उस नगरमें एक पापी ऊँचा का घर था।यह पाप
कर्मकर करता रोज गुजरथा । मरगया तो उस पर पड़ा
एकबस्तरथा । गंगाका धोया उसीने उसको तारा । गंगा
ने बन्द करदिया नरकका द्वारा॥४।। यह सुनी बात तब
विष्णुजी यमस वोले । गंगाकी महिमा कहाँ लों कोई
खोले । इस नेत्रसे दर्शन श्रीगंगा के जोले । घेण्ट में
वह फिर झूले सदा हिंडोले। कुछ बरा नहीं मेरा चले
न चले तुम्हारागिंगाने बन्द कर दिया नरककाद्वारा ॥५।'
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ARETTISIN
लामनी
जब मृत्युलोकसेगंगा थाय सिधरि हैं : तव वह पापी फिरको
नविधी करि तरिहै । उस कालमें जो कोई पाप कर्मकरि म
रिहैं । वह आन आनकर नरक तुम्हारो भरिहें । यमराजजी
अब थोडे दिन करो गुजारा । गंगा ने बंदकरदिया नरकका
दारा। यह सुनीवात यमराजने घरफिरआये। कुछहँसे और
कुछ कुछ मनमें पछिताये। मनमारके यह गंगाकवचनसुना
ये । अब तो तुम्हरे थोडेदिन रहिनेपाये । कहननारसी कुछ
यमका चला न चारा । गंगानें बंदकरदिया नरककादारा)
जालों पृथ्वीपर है श्रीगंगा की धारा । तौलौं यमराजा
करिहै कहा तुम्हारा । मत डरो कोई यम दूतसे मेरे भाई ।
रक्षा करने को है श्रीगंगामाई । जबसे शंकरने अपने शीश
चढ़ाई । तब ईश और जगदीश की पदवीपाई । शिववना
वोही जिसने एक गोता मारा । तौलौं यमराजा करिहें
कहा तुम्हारा ।। ।। कुछजोर नयमका चले पाप नहिं लागे
और कालभी देखै दुरसे तो वहभागे । जो गंगा के दर्शन
कर कायात्यागे । वह अमर लोकपुर बस अलख है जागे।
यह निश्चय करके मानों वचन हमारा । तौलों यमराजा
करि हैं कहा तुम्हारा ॥३॥ चाहे हो पुत्र कुपुत्र तो माता
पाले । कुछ कर्म अकर्म न उसके देखे भाले । जो इकबार
प्राणी गंगा में न्हाले । वह जन्म जन्म के सकल पाप
को टाले । है श्री गंगा की महिमा अपर पारा । तोला
यगराजा करि
कहा तुम्हारा । मतचलो हमारे मित्र
किसीसे डरके । निर्भय हो दर्शन नीगंगा के करके। कह
देवीसिंह गगाको ध्यान में धरके । जइहौ भवसागर
२६ लावनी सहजाहि पाप उतरके ॥ गंगाके बलसे दल सब यमका हारा । तौलों यमराजा करिहं कहा तुम्हारा ॥४॥ श्रीगंगाजी के तीर नीरपीनेको नाग इकआया था बडाबो विषधर नागभागकुछ उसदिन वाकेजागे। वह जलपानेजव लगातों मेढक देखदेखकरभागे। इतने में आयेगरुड चोंबसे पकडकखानेलागे । झटपटवाके गये निलकपाण तत्कालही । उसनेत्यागे। मरतेहि विष्णुतनधारा । चढिगरुड़प यहीपुका- रा। तूबाहनहुआहमारा धनधन गंगाको विन्दुमुझे गोविन्दहि आपबनाया। श्रीगंगाजीकेतीर नीरपीनेकोनागइकआया।।।। शिर मोरमुकटकी लटक कानमें कुण्डल अधिक विराजे। गलमें वैजयतीमाल पीत पीताम्बर तन पर साजे । वह शखचक्र और गदा पद्मकी सम्पूरण छविधाजे । ये चरित्र वाके देख देखके गरुडजी मनमें लाजे। कुछ कहते नहीं बनिआवे । गंगा जो चाहे वनायें। चाहे शिवका रूप ध. रावे । है महिमा अपरम्पारपार नहिंसुरनर मुनिने पाया। श्री गंगाजी के तीर नीर पीनेको नाग इक आया ॥ २ ॥ तव श्री गंगाकी भाप स्तुति करी गरुड़ मुख से । हुई प्रसन्न गंगा मातु तो बाणी वोली एक सन्मुख से ॥ या बहुत कष्ट में नाग छुटाया मैंने इसको दुख से । अब तुम इसको वैकुण्ठ पहुंचाओ बसे जाय यह अति सुख से । ये गरुड ने आज्ञा मानी । गंगा की महिमा जानी । तब उड़े बड़े बलवानी एक पल में पहुंचे जाय उसे वैकुण्ठ में तुरत विठाया। श्री गंगाजी के तीर नीर पीने को नाग इक आयाशा जो यह अस्तुति गंगाकी कान देय सुनै और मुख से गांव । वह PAMPA ने मुख ॥
लावनी भुक्तिमुक्ति सम्पूर्ण पदारथ मन माने पावै । नंगा से पर न और देव कोई दृष्टि में आवे । है धन धन वाके भाग जो दर्शनकर और गंगा-हावे । कह देवीसिंह भजु गंगा। तब तेरा मन होवे चंगा । मन वनारसी ने रंगा। गंगाजी में तन बोरबोर झकझोरके पाप बहाया। श्री गंगा जी के तीर नीर पीनेको नाग इक आया ॥ ४ ॥ हरेक ढूढते जंगलमेंदवा रसायनकी बूटी। नारायण हैं सर जीवन भई वह बूटी हमने लूटी। कोईढूंढताउस ाबूटको जिस में पारा तुरत मरे । कोई खोजता जड़ीको जोकोई तनकायाके दुख हरीबहुत लोग खाद पृथ्वीको वृक्ष काटते हरेभरे । उनको भीफिर यम काटेगा कहैं शब्दये खरेखरे। हरीहरी बूटीहसमझो हरी नामहै सबसे परे। उस बूटीको जिसने पाया वह भव- सागर सहज तरे ।। रामरसायन पाई हमने और रसा' यन सब छूटी। नारायण हैं सरजविन भई वह बूटी हम ने लूटी ॥ १॥ कोई कहै सिंगरफ मारें और काढ़े ग न्धकका तेल । कोई देखते जड़ी बाही कोई कोई ढूंढते अम्बर बेल । हमने सबको देखा यारो येतो हैं सब झूठे. खेल । अमर नामहै दत्त निरजन उसको अपने मनमें मेल । मनको मारके बनाले कुरता जोगुजरे वह दिलपर झेल। तनको शोधके शुद्धकरो तुम तजो झूठ और तजो झमेल । जौन शख्श फूंके धातुको उनके हिये की है फुटी। नारायणहै सरजीवन भई वह बूटी हमने लूटी ।। २॥ कोई मारते अवरख तावा कोई फूंकते हरताल । हमने अपने मनको मारा मिले हमें गोविंद गुपाल । कोई कहैं हम लावनी - ३१ चांदीमारें जिसमेंहो कुछ धन और माल । इन कर्माको जोई करता उसका होता हाल बिहाल । कोई कहे हम सोना मारे और करें पैसेको लाल । ठग ठगके लूटें दुनियाँको उनको एक दिन ठगेगा काल । बहुत घोटते खरलमें धातू सन्तोंने काया कूटी । नारायण है सरजीवन भई वहबूटी हमनेलटीशाकाई मारतेहैं कलहको जिस में होवे पुष्ट शरीर । घरको फूंककेत बाह किया वह अमीर से होगये फकीर । साधूका नहिं धर्म जौनमारे धातु करके तदवीर । कहें देवीसिंह हरीहरी कहो जो जिह्वा हैगी अकसीर । स्वामसारको जवां रमायन इनमहें हर यक तासीर । जबांसे वह सुरदेको जलादे जवांस दे डालें जहांगीर । बनारसी ये कहे हमारो रामनाम हंगी चूंटी। नारायण है सरजीवन भई वह बूटी हमने लूटी ॥ ४ ॥ बहुत दिनों पर बिछी है चौसर सँभल के खेलो यह चाल क्या है । जो फेंकृपांसा तो छूटे छक्के नलोदमनकी मजा ल क्याहै । मैंहूं जुवारी सुघर खिलारी हमेराह जीतूं कभी न हारूं । सदा पड़े औदुई दरहो चौरासी घरकी नरद मारूं । पडे अगरचे जो तीन काणे तो अपने दिल मैं यह विचारूं । ये तीनगुणहें सबी के तनों में इनसे चलके अलग सिधारूँ। चारकोण वह चौथापद है मिला अब हमको मलाल क्या है। जो फैझ पाने तो छूटे छक्के नलोदमनकी मजाल क्याहे ॥ १ ॥ है इसमें पजडी सो पांचतत्व हैं मैं इनसे गोटी चलो बचाइके । और फेंक छकड़ी ले ग्राऊं सत्ता सतको सतगुरु पासजाके । हैदाव अठासी आठसिद्धि नवनिधिको में रक्खं मनाके ।।
लावनी
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३२
पड़े अगर छ: चहार दशतो दशोदार देखं दिल लगाके । न
रंग अपनामरे किसी से मैं अब समझाताहूं काल क्या है। फे
· पांसे तो छुटै छक्कै नलोदमनकी मजाल क्याहै। सा आये
हमारे वह दश पौ ग्यारह सो ग्यारहों रुद्र हैं वदनमें । और
बारहारों सो दोनों बारह समझ शोचकुछ तू अपनेमन में ।
बड़े हैं इनमें वह दोनों तरह मैं तेरह तेरह कहूँहू मनमें। तु
चौधरी जहाँका मालिक नज़र पडै चौदहों भुवनमें । क
ॐ भजन में ये पन्द्रहोंदिन माया मोह का वह जाल क्या है।
जो फेंकं पांसे तो छूटें छक्के नलोदमनकी मजाल क्या है ।।
आत्मा सोलहों कला ये सो पासमें सोलहों बनाये । वह
आये सत्रह ये सत्रहों अब हरी हरी हरिके गुणगाये। पढ़े अ
ठारह पुराण हमनें औं अर्थ उसके थे दिलमें पाये । उठेरंग
बदरंग भी उठगये वह सारी मायाको जीतलाये । बनारसी
का सदा बनारस बनाहुआ है बबाल क्या है। जो फेंकू पांसे
तो छूटै छक्के नलोदमनकी मजाल क्या है ।। ४ ।
लाललाल तन झलकत ललकत चलत दलत दल
गर्जतघन । करतसकल जगहर्ष करै जयजय श्री अजनी
नन्दन । तरण तारण तरण तारण घरणी धारण है कष्ट
दलन । रक्तरंग अंगजंगजद करत लगत संसार हलन ।
जल थल हल चल करत घरत जन चरण गजिकर ल
गतचलन | झल झल झलकत जलत गढ़ लँक दैत्य
शठलगत जलन । इतहत गत करदेत शठनकी जड़त
शम्रकाटत नसतन । करत सकल जग हर्ष कर जय जयश्री
अजनीनन्दन ॥१॥ गर्जत लर्जत धरण चरण जद हलत
लावनी ३ धरणिडगडगकरनन । शेष थकत अतिक्कत मतानिन्धु देखि जिनके चरनन । हरी जरी नहीं देर करी मिरिलाये सकल कर दिये जरनन । सेतुहेतुकर रचाया ऐसे हैं संकट हरनन । तनितनि हनिहनि रणदल छेदत राक्षस की का. टत गरदन । करत सकल जग हर्षकर जय जय श्री अं जनीनन्दन ॥ २॥ कर, घर गदारकरगाहकर झट जलदी से लेतजगन । कड़ककड़क कर कड़कधरणिसे क्षण अन्दर चढिजात गगन । रण अन्दर घुसघुसकर कसकस जडत गदाधर धरके लगन । हरेक अस अति चलत शट दल के अन्दर लगत अगन । अस अस करत सकल नर यशकर हरहर रटत हंसत इरजन । करत सक ल जग हर्षकर जयजय श्रीअंजनी नन्दन ॥ ३ ॥ चढ़िवादि जात हाथ गिरिलेकर करके घात जद लगत अड़ न। झट छत छोडत हाथ हठ नाथ ताक तक लगत जड़न । दरद शरद करदेत करद जद करसे गहिकर जात लड़न । असंख्य गर्जत शंख अनहद गतंडते लगत झलन । का. शीनन्दन आनन्द छन्द कथ कहत अधर नित नई कथन । करत सकल जग हर्षकर जयजय श्री अंजनी नन्दन ॥ १ ॥ महावीर मस्तकं ललित सिंदूर कुम् कुम्अगरं । ज्ञान- वान अभिमान रहित निर अहंकार हरयोगी । इन्द्री. जात कामिनी त्यागी नवकामी नवभोगी ।। रूपयनन्द परमानन्दं । महावीर मस्तकं ललित सिंदरं कुमकुम अगरं ।। १ ।। दशकन्धर अभिमान हनन लादाइन वज रंगी। पूरण ब्रह्म अखण्ड सच्चिदानंद साधु सत संगी। नामउचारत - नितगोविंद ॥ महावीर मस्तक लालित AN लावनी सिंदुर कुमकुम अगरं ।। २॥ रक्त चीर गदाकर शोमित पु- प्प माल उर धारन । दानव दलनं हनन दुष्ट दल सक ल शत्रु संहारन । शब्द धनि गर्जत हरि हरी नम्बम् । महावीर मस्तकललित सिंदुरं कुमकुम् अगर ॥ ३ ॥ शिव सङ्कर सर्वज्ञ स्वरूप विश्वेश्वरसु विशालम् । परम वैष्णव शुद्ध श्रात्मा कालंकाल अकालम् । बहुविस्तारं मम किं वरणम् । महावीर मस्तकं ललित सिंदुरं कुमकुम अगरं ॥ ४ ॥ जटाजूट मकराकृत कुण्डल रत्न जटित अ. ग भूषण । पँचम मुख सुखदायक दाता देवपती निरङ- पण । छन्द काशीगिर शास्तर कथित । महावीर मस्त के ललित सिंदुरं कुमकुम अगरं ॥६॥ नन्दनंदन नजराज की छवि अब कोटिन भानु प्रकाश करें। उदित करें चन्द्र कोटिन अरु कोटिन तमका नाश करें। कोटिन शीश नेत्र कोटिन अरु कोटिन कर्ण हरी के । कोटिन हँ नासिका हरी की कोटिन वर्ण हरीके हैं। कोटिन मुख कोटिन जिह्वा कोटिन गति शरण हरी के हैं। कोटिन भुजा उदर कोटिन अरु कोटिन चरण हरी के हैं । शैर-कोटिन हरी के मुकुट हैं कोटिन हैं तिलक भाल । कोटिन हरी के कण्ठ हैं कोटिन हैं मुक्त माल ॥ कोटिन मणी हरी की है कोटिन हरी के लाल । कोटिन हरी के भाव में कोटिन हरी की चाल ॥ कोटिन पग पाताल छवे अरु कोटिन आश अकाश करें। उहित करें चन्द्र काटिन अरु कोटिन तमका नाश करें। ३ । कोटिन कर्म हरी के हैं अरु कोटिन नाम हरी के हैं। कोटिन रूप हरी के हैं अरु कोटिन नाम हरी के है
लावनी
कोटिन ग्राम हरी के हैं अरु कोटिन धाम हरी के हैं। को-
टिन शैव हरी के हैं अरु कोटिन वाम हरी के है ।।
शेर-कोटिन हरी के बंद है कोटिन हरी के मन्त्र ।
कोटिन हरी के शान हैं कोटिन ही के तन्त्र ।।
कोटिन हरी की पूजा हे कोटिन हरी के यन्त्र ।
कोटिन से हरी अन्त है कोटिन से है निरन्त्र ।।
कोटिन को सुख देंय हरी कोटिन के मन में त्रास करें
उदितकरें चन्द्रकोटिन अरु कोटिन तमका नाशकोश|कोटिन
इन्द्र हरी के हैं अरु कोटिन राज हरी के हैं। कोटिन है
गन्धर्व हरी के कोटिन साज हरी हैं । कोटिन माया
हरी की है कोटिन समाज हरी के हैं। कोटिन मित्र हरी के
है कोटिन मुहताज हरी के हैं।
शेर-कोटिन हरी के गज हैं और कोटिन खड़े तुरंग।
कोटिन हरी के रथहैं और कोटिन हे स्थके संग ।।
कोटिन हरी के वेष हैं कोटिन हरी के रंग ।
कोटिन हरी की लहर हैं कोटिन उठे तरंग ।।
कोटिन हरि वैकुण्ठ करें चाहँ कोटिन कैलास करें। उहि-
तकरें चन्द्रकोटिन अरु कोटिन तमका नाशकरें ।। ३ ।। कोटिन
हैं गोपिका हरी की कोटिन ग्वाल हरी के है । कोटिन धेनु
हरी के हैं कोटिन गोपाल हरी के हैं। कोटिन सिंधु हरी के
है अरु कोटिन ताल हरी के है । कोटिन रत्न हरी के
अरु कोटिन थाल हरी के हैं।
शेर-कोटिन हरी के देत्य है कोटिन है देवतं ।
कोटिन हरी के नाम को है मुख से लेक्ते ।।
है। लावनी कोटिन हरी के नाव हैं कोटिन हैं खेचते । कोटिन हरी के चरण को हैं करसे सैवते देवीसिंह कहै बनारसी के घटमें हरी निवास करें। अदिद त करें चन्द्र कोटिन अरु कोटिन तमका नाश करें ।। ४ ।। ब्रह्म में ब्रह्मा ब्रह्मा में हैं विष्णु, विष्णु में शिव शंकर। शिव शकरमें शक्ति शक्ति में सृष्टि सृष्टि में उसी का घराघर मैजन्म जन्म में बालक बालकमें है मनमोहन । मनमोहन में मोहनी मोहनी में रस रसमें भोलापन । भोलेपनमें खेल खेलमें खुशी खुशी में नन्दनँदन। नन्दनँदन में राधे राधे में सखियाँ सखि यों में लगन । लगन में प्रेम प्रेम में प्यारी प्यारी में सोलह लक्षन । लक्षन में शोभा शोभा में रूप रूपमें चन्द्रवदन । चन्द्र बदन में श्याम श्याम में सुन्दर सुन्दर में वह दमक । दमक में कृष्ण कृष्ण में दामोदर । ब्रह्म में ब्रह्मा ब्रह्मा में विष्णु विष्णु में शिवशंकर ।।१।।दामोदरमें दयादयामें धर्म धर्म में रहे सुमत सुमत में सुख और सुख में सम्पति में है सारा जगत।। जगतमें थल और थल में पृथ्वी पृथ्वी में आकाश रहत । आकाश में पवन पवन में अग्नी अग्नी में पांचों तत्व । तत्व में त्रगुण त्रैगुण में है तीन लोक लोकों में सत्त्व ।। सत्वमें सारा विश्व विश्व मेंरचनारचना में है भक्त। भक्त में भाव भावमेंसाधूसाधुकेमनमें ईश्वराईश्वर इच्छाइच्छामरहितरहित, रहे अमर । ब्रह्म में ब्रह्मा ब्रह्मामें है विष्णु विष्णु में शिव शंकर ॥२॥ अमर मैं आदि आदि में प्रातम आतम में है आतम ज्ञान । ज्ञान में गोविन्द गोविन्द में गिरधर गिरधर में श्री भगवान । भगवान में निर्गुण निर्गुण में है सगुण सगुण म हवेसुध्याना ध्यान में योग में योग में योगी Am- लावनी योगीके मनमोविज्ञान । विज्ञानमें चैतन्य और चैतन्यमें वि. त्त चित्तप्रान । प्रानमें जीव जीवमें जपतप जपतप में है यज्ञ औ दान । दानमें मान मान आदर आदर में है हरि और हर । हरमेंउमाउमामें लक्ष्मी श्रीलक्ष्मीमें चराअवर । ब्रह्ममें ब्रह्मा बूमामेंहै विष्णु विष्णुमें शिवशंकर ।। ३ वरावर वीर्य वीर्यमे वृक्ष वृक्षों भराहेजल जलमें शाख शाखमें पत्र पत्र में पुष्प पुष्पमें फल । फलमें रस और रसमें अमृत अमृत में है स्वाद अटल। अटलमें अलख अलख में माया माया में वह है निर्मल । निर्मलमें है शुद्ध शुद्धमे बुद्धि बुद्धि में है उज्वल । उचल में उपमा उपमा में शान्त शान्त मे बड़ा है बल। बलमें वीर वीर में योद्धा योद्धा में हैं जोरा. वर । जोरावर में बनारसी और वनारसी में परमेश्वर । ब्रह्ममें ब्रह्मा ब्रह्मा में है विष्णु विष्णु में शिवशंकर ।। ४ ।। बाजी खेली इश्ककी हमने जरा किया शशपज नहीं । खेलले हर कोई जिसको यह वह बाजी शतरंज नहीं । शकलका यों कुछ ज़ोर नहीं जो घोड़े से चल कर जीते। फीलकी क्या ताकतहै जो इस बाजीको बलकर जीते । ये तो इश्कका दिल है इसको क्या पैदल दलकर जीते । रुखकारुख फिरजाय न वह इस वाजीको छलकर जीते । मेरे सिवा कोई और जहां में उठासने यह रंज नहीं। खेलले हरकोई जिसको यह वह वानी शतरंज नहीं ।।।। वजीरका क्या जिकर इश्कमें बादशाह तक हुए गदा । जोकि चाल चुका वह मारा गया मरा है यही सदा । हम ने अपने शिर की बाजी लगाके इसमें दांव वदा । जान ३० " + लावनी बेचक जो खेला वह जीता उसको मिला खुदा । वह क्या करेगा मातकि जिसके काबूमें शशपज नहीं । खेलले हरकोई जिसको यह वह बाजी शतरंजनहीं ॥२॥ अरदबमें न ही आया बादशाह अपनेकीली चोटबचा।उसने तोडा किला जहां कोई न उससे कोट बचा । तिरछेहोकर चलोगो तो क्या करकेसकोगे गोटबचा। उसका माल लुटगया रखीथी जिस ने जरकी पोटबचा । मुझे किस्त नहीं लगी किमने जमाकि या कोईगंज नहीं । खेलले हरकोई जिसको यह वह वाजी शतरंजनहीं।शायह शतरंज इश्ककी इसको खेले सोई सया नाहैं । बड़े बड़े होगये जिच्च नहीं भेद किसीने जाना है। यहतो इश्कका ख्यालसदा आशिकोंके मनमें माना है। वना रसी अन जीतेजी निर्गुणके बीच समाना है । रामकृष्ण के शीरी सखुनको पाये शीर बेरंज नहीं । खेलले हरकोई जिस को यह वह वाजी शतरंज नहीं ॥४॥ बन कायामें मन मृग चारों तरफ चौकड़ी भरताहै ।विना पैरसे खूब दौडता विनमुख चारा चरता है। बिना नेत्रसे देखे सबको मिना दाँत दाना खाने । सब कहीं जावे और यह कहीं नहीं आवे जावे । बिन जिह्वासे वातकर और विना कण्ठ गानागावे। बिना सींगसे लडे भगे नहीं बडे बडे दल हट्टावे । बहुत सिंह डरते इससे यह किसी से भी नहिंडरताहै । विनापरसे खूबदौड़ता बिन मुख चारा चरता है।॥ १॥विनखुरखोदे सकल जगत्को ऐसा यह मदमाताहै। बिन इन्द्रीसे भोग करतहै यही यती कहलाता है। नहिं इस के कोई तात मात नहिं कुटम्म कबीला नाता है । आप - . 4 -
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लावनी
पैदाहोय आपमें श्रापेआप समाता है । सब रंगों में न्यारा
है और हरेकरूपको धरता है । विना परसे खूब दौड़ता दिन
मुख चारा चरता है।॥२॥बिना जीवकामांमखाय यह किसीको
भी नहीं मारे है। जिसको मारे एक पलभर में उसको फेर
सुधारे हौविना कानसे सुनतासबकी जो कोई उसे पुकोरहें।
ऐसे ज्ञानको कोईभी साधू संत विचारेहै। तीनलोक में फि-
रता यह मृग भवसागर में तिरता है। बिना परमेस्वादाडता
विनमुख चाराचरताहै।।३॥विना नाशिका लेवे वामना हरके
चीज़की खुशबोई । आपही आपहै अकेला और इसके नहीं
संग कोई ॥ देवीसिंह यह कहै कि जिसने बुद्धि निम्मलकर
धोई । अपनी आत्मा जानता इस मृगको जाने सोई । न.
नारसीने देखा यह सृग नहीं जन्मे नहीं परता है । विना
परसे खूब दौड़ता विनमुख चारा चरता है।।४।।
यह काया है काम धेनुकर प्रेम प्रीति हमने पाली । सबी
पदारथ हैं इसमें इच्छा फल देनेवाली । मगन रूप मस्तक
झलकत सन्तोष सुमति के सींग खड़े । नहीं वह मारे कि
सीसे नहींमरे और नहीलड़े । हीरे मोती लाल और हर
एक रत्न रसनामें जड़े । कृपा और करुगा के दोनों कान
नहीं छोटे औ बडे । त्रियगुग के हैं तीन चिह्न कहीं श्वेत
श्याम कही है लाली । सबी पदारथ हे इममें इच्छा फल
देनेवाली ॥दया धर्म के दृग दोनों जैसे रवि शशिका
उजियाला । बनी नासिकानाम निश्चयरूपी सबसे आला ॥
अपाइ महिमा का सुख जिसमें मन्त्ररूप फिरती माला ।
अपती काया हमने कामधेनु करकेपाला "जिस जिहा और
PRA
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लावनी दिव्यदन्त कल्याण कण्ठ रेखाकाली ।। सबी पदारहें इसमें इच्छा फल देनेवालीशा परमतत्वकी पीठबनी ओर उग्रतेज का उदर भला । परशरथकी पूंछहिलरही कर हरएक कला ॥ चतुराई के चारोंथन समदृष्टी समदत ढला। चर्चा रूपी चरण चारों सुन्दर सबसे अबला ॥ जगमगातहिरदयमें जगमगब- झज्योतिकी उजियाली । सबी पदारथ हैं इस में इच्छा फल दैनवाली ॥ ३ ॥ हमने धारदुही धीरजकी अब अपना उद्धारक रा। छानछान के दूधको हिरदय की हांडीमें भरा ॥ ज्ञान से गरसकिया उसको सरजीवन जीवन बीचधरा । जमा दही को मथा छलछिन छांछ नहीं रही जरा ॥ मुक्तरूप माखनपाया हुई पूरी मनसा मनवाली। सभी पदारथ हैं इसमें इच्छा फल देनेवाली g" जो मांगे सौपावै इससे ऐसी काया काम धैन । विश्वरूपहै जो देखे इसको उसको हो। चैनावनारसीकहें इसदेखकर खुशीहमारे हुएनयन ॥ रंगरंगकीपहै वाणीऔर बोले हैं मधुरवयन । सबकी मनसा पूरणकरती कोई को नहीं फेरै खाली । सबीपदारथहैं इसमें इच्छाफल देनेवाली ॥५॥ हरि प्रथमवाई जब बसुरी राधावर कुंजविहारी ने । ध्वनिसुनत अचानक उठिधाई तजि काजसकल बजनारी ने। पडीभनक श्रवण मुरलीकी जन सब सखियां उठि धाय चली। कोउ एकदृगमें सुरमादेकर कोउ एककर मुँह दोलाय चलीं ॥ कोंउ आधीसार तनढांके कोउ योवन खोलि दिखाय चलीं। कोउ के आधेदातन मिस्सी कोउ आधाशीश गुंधाय चलीं ॥ कोउ लट लटकायली लटपट ललातजिसकलं विचारीने । वनिसुतन अचानक उठि ॥
DhCE लावनी धाई ताजकाज सकल वृजनारीने ।। : ।। कोउ पांयनवांधे ची कोउ हाथन पायल डोलवलीं । कोड कण्ठम धारेकिहित णिको और कोउटिपहिने मालवली । कोऊके कानननथु नी लटकन कोउखोलेशिरकेचालचलीं। कोउ नाकन वा ली झुमकेहँ जोचलींतोसत्वहालवली ।। जब पहुंची कृष्ण निकट युवती तवहीं लखा गिरधारी ने । धनिमुनत अचानक उठधाई तजिकाज सकल वजनाग ने ॥ २॥ फि र बोले कृष्ण कौनहीं तुम कैसे तुमने शृगार किये । पांय न पहुंची हाथन पायल और फटिमुक्खाके हार किये । का ननमें नथुनी और लटकन ये सुपण निना विचार किये ॥ नाकनमें वाली और झुमके काहे तुमने ब्रजनारि लिये। ये सुनत वचन तब दिया ज्यान वृनकी युवती दो वारीने । ध्वनि सुनत अचानक उठिधाई तजिकाज सकल जनारीने ॥३।। जव तनकी सुधि कुछनाहिरही तब भूषण कौन सुधार चले । मनतो अटका इस वंसुरी में दृगसे असुवनकी धार चले । ऐसा राग बजावो रासकरो ऐसा कोउ नहीं बिहारकरे । मंझधारमें नावपड़ी हमरी तुम बिनको बेडापार करे ।। तुमपति हमरे हम दासी सब ये दिया ज्वाब दुखियारी ने । धनि सुनत अचानक उठिधाई तजिकाज सकल वजनारीने ॥ ४॥ लाखप्रेम सकलबजव. निता फिर कृष्णने मुरली अधरधरी। मोहनभी वादिन मोहिगये वहतान जो निकली रागभरी ।। तनमनकी मुधि कुछनाहिरही जब श्रीराधेपर दृष्टियो । कहें काशीगिरि बोलो सन्तो जय कृष्ण राधिका हरी हरी । ऐसी लीला नहिकरी कोउ जैसी करी हरि अवतारी ने । धनि सुनत -- AAKm mp4 2 - लावनी अचानक उठिधाई तजिकाज सकल वजनारीने ॥५॥ हरि बँसुरी ध्वनि सुन ब्रजयुवती चली झुण्ड के झुण्ड मग नमनकर । धन धन्यहरी धन धन्यसखी धन धन्य वसुरी तन मनलियोहर । मन प्रेम प्रबल अति तन सुन्दर सब वेद श्रुति अस गुणगावें । तजलाज सकल गृहकाज छोड़ चली हरि पदपंकज मनभावें। हरि आनन चन्द्र चकोर सखी छवि नि रखि निरखिकर सकुचावें । कुछकहि न सके चितकी बतियां अति लज्जित मन में मुस्श्यिावें । अति व्याकुल गात मद न मदकर सखि चाहतं मिलें मनोहर बर । धन धन्य हरी धन धन्यसखी धन धनबसुरी तन मन लियोहर ।। १।। मनकी.बां. छालखि मुरली धर ब्रजयुवतिन संग विहार करें। एक एक हरी एकएक सखी एक एकके कर एक यक पकरें। एकएक मुरली दई गोपियन को हरि कहत बजावो तबहि वरें। ये प्रेम कथा सुनि हँसि इसि करि मुख धरत न वजत प्राण वि. खरें। कहें ब्रजयुवती.हम कीन्ह कहा अब तुमही बजावो नट नागर । धन धन्य हरी धन धन्य सखी धन धन बँसुरी तुन मन लियोहर ॥२॥ यक यक तरवर तर यक येक हरी यक यक युवती संग बातकरें। इत घर आव यशुदा के पास उत गापियन वीच प्रभातकरें । हरी ढीठ पकड़ कर मुखने और वातसखी सकुवात करें ॥ यहिमांगत बर नि नती करकर विधना नित ऐनी रातकरें । युवतिनके जो पति आवत सब गृहपावत अपनी पत्नी घरघर धन धन्य हरी धनधन्य संखी धनधन वसुरी तनमन लियो हर ॥३॥शिव नारद आदि सकल ऋषि मुनि सब देखत १३ लावनी गगन विमानधरे । कौतुक गिरिवर के लख न परें तन मा नुष बम्हनखण्डतरें । युक्ती तन नारी वेदश्रुति रवि लीला ब्रजमैं खेलकरें । हरि पुण्य पाप न दुख सुख कछु वेदान्तके करतावेदपरें । रचिछन्द यह काशीगिरि अस्तुतिकर मांगत भ क्तिपदारथ वर । धनधन्यहरी धनधन्य सखी धन धन में सुरी तन मन लिया हर ॥ ४॥ किसीका बाना कलंगीतुर्रा ये नहीं गानाहै (फक्त देखलो यहापर निगुणे गुणका गानाहै। कम अक्कलोने का असली कर माया कलगी वनाई ब्रह्मको तुर्रा जौन कहते वहतो सौदाई । माया तो है निराकार नहीं देय किसीको दिख लाई। वोही ब्रह्मा है कि जिसकी थाह किसी ने नहीं पाई । तु वाले कहतेहैं कलंगीको तुरेकी छुगाई । कलँगी वाले कहै तुरेकी कलंगीई माईयेतोहैं सब झूटे हमने सच्चेकोपहिचाना है। फकत देखलो यहांपर निर्गुण गुणका गाना है ।। १ ।। क्या गाते पाखण्डीको कलंगी तुर्रा भी मिट जावेगा । अनघड़ छ तर और हुंडाभी कोई नहीं गावेगा। माया ब्रह्मकी निन्दा करते फिर पीछे पछतावेगा। लख चौरामी योनिसे तन कहीं कौन बचावेगा । शिव शक्ति को एक समझता वह ज्ञानी कहिलावेगा। भवसागर के पारहो परमधाम को पावोगी ।। हमने उसका किया भजन तब अपने को पहिचाना है । फ. कत देखलो यहाँपर निर्गुण गुणका गाना शागरपूछो तो बानामेरा सातदीपहै चौदहभुवन । नवक्षपडहे मेरे बाने में जल अग्नि पवन । तीनलोक मेरे वानेमें सबसे त्यास मेरा बतन । अज्ञानी नहीं सुझे जाने अगर करें चाहे लाख ४४ लावनी यतन | जिसको तुम कहतही शिव सो मेरा रूप है मेरा ही तन । अपने आपको मेंही जान हूँ रहे मन सदा मगन । चाहै कोई माने नहीं माने हम को तो समझाना है । फकत देखलो यहाँपर निर्गुण गुणका गानाहै ॥ ३॥ कोई बना हिंदु और कोई सुसलमान होकर बैठा । कोई फिरङ्गी बना कोई किरिष्टान होकर बैठा। सबकी बात सुन सुन में कर बन्द कान होकर बैठा । अपना दिलतो मियां अब लामा कान होकर बैठा । एकान्त गिरि एकान्त में उसका घरके ध्यानहोकर बैठा । पक्षपातका में दिलसे तज गुमान हो कर बैठा। बनारसी कहँ एकनाम सोई मेरे मनमें माना है । फकत देखलो यहांपर निर्गुण गुणका गाना है।॥ ४ ॥ जिसने नहीं कुछदिया जहां में मियांवह खाली हाथ चला। लुटाया जिसनेमाल वहमाल उसी के साथ चला । बलख बु. खारेका वह वादशाह छोड़ सलतनत गदा हुआ। लुटे वह क्योंकर जो था उसकी किस्मते में बदाहुआ। गया विया वां को वह निकला नहिं दिलमें हैरतजदाहुआ । जोकि कॉल थारब्बसे किया वह उससे अदाहुआ। नजर पड़ा सामान ऐ शइशरतका आगे लदाहुआ। कहाखुदा ने ले अब ये तेरेवा स्ते सदाहुआ। उसीकी संगजाती है हश्मत जो भीरके जर को लादचला । लुटाया जिसने माल वह माल उसीके साथ चला। जोकि हम जूसह वह तो हाथ पसारे जाते पकड़मवक्कल उन्हेंले यमके दारे जाते हैं। अग्नि खम्भ से बांधके बहकोडोंसे मारे जाते हैं । डरते रहियो यहाँ पर हम ये पुकारे जाते हैं ॥ खांय खिलावें देखें दिलावें वह नर तारे जाते हैं । भव सागर के पार , ५५ Frk लावनी एक क्षणमें उतारे जाते हैं । मुक्ति मुक्ति पाना. वह। बदिता दिन औ रात चला। लुटाया जिसनमाल वह माल उनी साथचला।।२।। वीर विक्रमादित्य ने परस्त्रात्यम अपना नाम किया। जैसा जिसने कहा वसाही उसका काम किया । ही फकीरी करी कहीं पर उसने राज्य तमाम किया । पराये दुःखको आप दुख सह सह उसे आराम किया ॥ बहुत तप स्था करी हरीका सुमिरण आठों याम किया । परस्वास्थ में नाम उसने अपना सरनाम किया। सखावत का बड़ा है दरजा जो करता खैरात चला । लुटाया जिसनेमाल वहमा. ल उसीके साथ चला ॥३. उसीके संग जाती हैं लक्ष्मी जिम ने जरको लुटाया । इन हाथों से दिया सो शांखों के आगे आया। क्या कोई लेगया यहां से और क्या कोई वहां से लाया । जिसने पाया उसीने कुछ अपना देके पाया। देवीसिं हका छंद रंगीला कुल आलमके मन भाया। बनारसी ये कहें मैंने सबके तई ये समझाया । कोई वला उठरातको यारो कोई उठि परभात चला । लुटाया जिसने माल वह मा- ल उसी के साथ चला।॥ ४॥ देहभाव गया छुट आतमारामको जब से पहिवाना । निराकारमें निराकारहो मिले छुटा आनाजाना .। हर आंतम स्वरूप है कुछनहीं देहसे काम मेरा । शरीर ता जड़वस्तू चैतन्य आतमा नाम मेरा । रवि शशि अग्नि आकारा से है परे निरन्तर धाम मेरा ॥ अनन्त अव्यय अविनाशी अद्वैतरूप शिवराम मेरा । कायाकार का त्याग के हमने सत्य आतमाको माना ।निराकारमें निराकारहो मिले छुटा आना जाना ॥१॥ जीव ब्रह्म एकी स्वरूप पर. wa-Rah.
४६ मलामनी है अज्ञानकाभेद । आज्ञानीतोजीवबन और ज्ञानी वनता ब्रह्म अभेद । त्रयगुणसे जो रहितहैं उनकी कौन विधी और को न निषेध । जो चाहे सोकरे वोह वेदान्तके कथिता अथिता वेद । चाहे वह बोले चाहे हँसे और चाहे लगे गानेगानानि- राकारमें निराकारहोमिले छुटाआनाजाना ॥२॥ आतम सत्य और शरीर मिथ्या इस विधि करैहै जिसके ज्ञान । वह मा णी आपीईश्वर ब्रह्ममें उसमें भेद नजान । कामक्रोध मद लोभमोह अंहकार कपटतज मान गुमान । मिले ब्रह्ममें ब्रह्मा- प होकरके सबछोड़ाआममान । ज्यों पानी से उठे बुल्ला फिरजल अन्दरसामाना ! निराकार में निराकार हो मिले छ टाआनाजाना ॥३॥ जलतरगहएकनामहैदोइनकोएकीजानो। इसी तरहसे अपने जिवको परब्रह्म कर पहिचानो।जीव ब्रह्ममें भेद नहींहै वेदवाक्य सुनलोकानो। देतभावदो छोड़रहो अ दैतकहामेरामानो। काशीगिरि ज्योतिस्वरूपने तत्त्वज्ञानयह बाखाना। निराकारमें निराकारहामिले छुटाआनाजाना॥४॥ द्वापदी विपति में करुणा निधिको टेरी । पति चली विपतिमें नाथ राखो पतिमेरी । इस दुयोधन पापीने भला क्याकीता। करिकपटसे मेरे पांचों पति को जीता । सब राज्यपाटहरलि या मुझे हरलीता । श्री कृष्णतुम्हारी कहां गई वह गीता । क्यों मेरे काजको लगाई तुमनेदेरी। पति चली विपतिमें नाथराखोपतिमेरी ॥ ॥ अबमेराचीरऐंचने दुशासन आया । दुर्वासाजी के बरने शमा दिखाया। जब उस पापीने चीरको हाथ लगाया । तब श्री कृष्णने दिखलाई वह माया। ऐचत ऍचत लगगई चीर की ढेरी।
tam Namaina लावनी पतिचलीविपतिमें नाथ राघोपतिमेरी ।। १ । ज्यो २ हपापी चीरखीचताजावे त्यात्यावह बढ़ताजाय नघटनेपावे । ये दे खदुष्टकोसारीसभाधवरावे । तिसपर वहपापी मनमें दया न ला वे ॥ लगीचीरकाढेरी परटेरी बहुतेरी । पति चली विपतमनाथ राखापतिमेरी॥२॥वत खंचन वलयकत दुसासनहारा । तव । श्रीकृष्णने मनमें यही विचारा॥ लिया उस पापीकोपकड़हाल । कहोसारा। येचीरकभीनहिंतुमसेजायउतारा। कहें मनमें द्रोप दीकृष्णमैं तुम्हरीचेरी । पतिवली विपतमें नाथराखोपति मेरी फिर चार हाथसे छोड़ा सब धनराये । और नीचाशिरकर लिया बहुत शरमाये । द्रोपदीकी लज्जा रही कृष्णगुणगाये। वहतरेजो कोईछन्द ये सुननेआये । कहबनारसी करोकृष्णचंद्र की फेरी। पति चली विपतिमें नाथ राखो पति मेरी॥२॥ कान्हाने लटलट काके लटका लटका नया निकाला। श्रीकृष्णकी अलके अलक केशस शेप लजत धरणीध- र। धनघटा देखकर घटत निशा अति छकत कहतध- रणीधर । काळी काली लाट कलाकरें चिन हरत तकत धरणीधर । रसना सहस्र मुखसै रटत रटत दिन रात थकत धरणीधर । करसैगहिकर छिटकाई । नागिनी देखिलह- राई । कालीने शंका खाई । लेखनी लेख ना लिखत अ- लक जद दिखत कृष्णकोआला। कान्हाने का लटका के लटकालटका नया निकाला ॥ १ ॥ दृग बनत चतुरहरी के नेत्रलागत खजनते नीके । करे लहर लकीरें लाळ लगत कारे अजनते नोके । गड़गये कलेजे आयधायक चन्द्रकिरणते नीके । रममागरते अतिमरस हरणचित लावनी लगतहरिणते नी । शरचलत नेत्रसे नीखे। जदलइतेदृगन ते दीख । हरि बत्रि कैसे सीखे । कसकत हृदय दिनरैननयन ने अयन कन्तजाशाला । कान्हाने लटलटकाके लटका लटका नया निकाला ।। ||आननकी पटदशलळा दन्तते हीमालाल लजाये। दर्शन कारण पटदर्शन आसन त्याग त्यागकर आ यै । शकर इन्द्रादिक सहित चरणनंगे करकरकेधायोश्रीकृष्ण की लीला देखि छन्द आनन्दसे कय कयगाये। तनुचन्दन हारचढ़ाये । अक्षतले शीश लगाये । हृदय चरणन चित लाये । नंदलाल कंसकेकाल काट दिया अंतर का ताला । कान्हाने लटलटकाके लटकालटका नयानिकाला ॥ शाहरि निराकार निराधार चारकर त्रयकालके कर्ता। पटराग तीसरागिनी नारायण तीन तालके कर्ता । सच्चिदानंद कालके काल कालके का है आदि अनादि अगाध कृष्ण अक्षय अकाल के कर्त्ता । कहकाशीगिरि हरीहर हरी हर दिनरेन ध्यान हृदय घर । रज चरणन की अंजनकर । कहा अधरछंद घरध्यान ज्ञानहे दान नेदके लाला। कान्हाने लद लटकाके लटका लटका नयानिकाला ॥४॥ श्रीगिरिधरने लटकाली लटकाली आनन पर आला । अतिविचित्र लटकी लटकलटककर अमृत रसको चाखें ।। जो सप्प ओस जिह्वासे चाटके प्राणको अपने राखें। शारी मंडलकीली शोभा उपमा वेदभी ऐसी भाखें ।। राधे सखि यनसे कह घूमके मनको मेरे सुलाखें । मोहनी अलकनमें वसी। छविभांति भांतिकी फसी ।। मानों ने कृष्ण महेश पहनकर नागनकीसी माला। श्री गिरिधर ने लटकाली --- ॐलावनी लटकाली आननपर आला।। 1 ।। कोई वांबी में से लपक करे कोई गिंडली मार के बैठे। कोई उगिल के गणीको खड़े और कोई संगनारि के बेठे । कोई फणमे फुफुकार और कोई केंचुली उतारके बैठे । मानों विप भरे भुजेगा वह मलयागिरि विचारके बैठे। कोई श्वेतलाल कोई पीले । रंग रंग के सर्प रँगीले । रोली केसर चन्दन से वर्चि अद्भुत रंग निकाला। श्रीगिरिधरने लटकाली लटकाली आनन पर आला ॥ २ ॥ उपमा एक और कहूं जो सुनो कोउ कवि के कही न जायें। मानो कजली वनसे सुगन्ध नाना प्रकार की आवे । एक तो मनउलझा काव्यमें दुजे कृष्ण की लट उलझावं । जो कुंज कुंज में परदेशीभुला नहिं रस्तापावे । हरिकी लट भू लनी वारी । भूले ब्रजके नरनारी । जो प्रेम जाल में फंसा वहीं वह बसा न गया निकाला। श्रीगिरिधरने लटकाली लटकाली आननपर आला||अतिउत्तम छवि अलकन की सुन्दर श्याम घटासी दरसे । जब कृष्णकरे अस्नान तो मोती झूम झूमके बरसे । वह धूवरवाले केशलायचहुँदेश बसे अमर से । अस्तुति करकरके थके शेष और महिमा को जी तरसे। जो इसपदको कोउगावै । वह मुक्ति मुक्ति सब पावै । कहे व नारसी भज रामकृष्ण गोविन्द और श्री गोपाला । श्रीगि रिधरने लटकाली लटकाली आनन पर आला ॥ ४ ॥ शरीर से है भिन्न आत्मा सोहं श्रातमराम । देह से हमें नहीं कुछ काम जी । जैसे जला कमल रहे वह जल में जलसे दूर । आत्मा ऐसे रहै भरपूरजी । आतम तो चैतन्य है और यह जड़शरीर हैं धूर । आत्मा रहा सर्प में पूरजी ।। 4- ५० ॥ लाबनी दोहा । शरीरकह रंग भिन्न भिन्न प्रात्मा एकही रंग । जो ज्ञानी पुरुषकर वह आतम से सत्संग ॥ आत्म परब्रह्म का नामजी । शरीरसे है भिन्न आत्मा सह आत मराम । देहसे हमें नहीं कुछकामजी।। त्रैगुणमेहै रहित आत्मादश इन्द्रोसे परे । आत्मा नहीं जन्म नहीं मरे । शरीरका दुखसुख है आत्मा दुख-सुख कुछनहींगआत्मापुण्य पाप नाहिकरैजी ॥ दोहा ।। देहबढ़े और घटैदेह होतीदुबली मोटी । रहै आत्मा ज्यों की त्यों नहिं होवे बड़ी नहिं छोटीदरहै सबसे आत्मा घामजी। शरीरसह भिन्न आत्मा सोहं आतमराम । देहसे हमें नहीं कुछ कामजी॥२॥ देहमिले मिट्टीमें औरयहदेह अगिनमें जलें आ स्मानहीं जलैनहीं बलैजी। देह पवनसे सूर्ख और यहदेह जले अन्दरगले आत्मा नहीं किसीमें रलैजी । दाहां। अखण्ड अ व्यय अविनाशीहै आत्मा आदि अनाद । नहीं शस्त्रसे छिदे नहीं कुछ इसमें बाद विवाद ॥ आत्मा कृष्ण आत्मा रामजी । शरीर से है भिन्न आत्मा सोहं आतमराम । देहसे नहीं हमें कुछ कामजी । ३ । गीता हे लिखा श्रेष्ठ है सबमें आतमज्ञान । ध्यान में यही बडाहे ध्यान । शरीर का अभिमान तजै जो बनै आप भगवान । होय एक क्षणभरमें कल्याणजी ॥ दोहा ॥ पानी का बुलबुला फूट जैसेहोता पानी मिले ब्रह्मने ब्रह्म रूप हो करके नरज्ञानी।। छन्द काशीगिरिके सरनामजी । शरीर से है भिन्न आ. स्मा सोहं आतमराम । देइसे नहीं हमें कुछ कामजी ॥४॥ श्रीकृष्ण शिव एक रूप रहते एकीसंग हरीहर दोनों हैं अद्धग भला । आधा अंगहै श्रीकृष्णका आधा शिव 1
लावनी
५१
का जान कहाये परम पुरातन ज्ञान मला । कृष्ण करें शिम
का सुमिरण शिवधरै कृष्णका ध्यान आतमा एक एक अ.
स्थानभला ॥ दोहा।। शिवजी साधयोग कृष्णजी करें भोग
विलास । योग भोग दोनों यकी दोनों का ब्रह्म में बाम । वो
पहिने भूषण वो रहें नंग भला ।।। कृष्णपढ़ें गीता और शिव
जी पदै आप वेदान्त । वो करते क्रोध वो रहते शांत भला ।
कृष्णकरें कीडा ब्रजमें शिव रहें सदा एकांत । दोनोंकी मुन्दर
शोभा कातिभला ॥ दोहा । शिवका सुमिरण करते करते
कृष्णजीहोगये श्याम । शिवजी होगये श्वेत जपा करते है
कृष्णकानाम । ऐमानहीं कोई का सतसंग भला ।।२॥ कृष्ण
बजावै मुरली मुखधर शिवजी गातेगान । निकले दोनों में
एकांतान भला । कृष्ण भरै भण्डारजक्त के शिव देते वरदा
न करें दोनों जनका कल्याण भला ।। दोहा ।। कृष्ण करें
वैराग्यतीब्र और शिव धारें सन्यास । वो उनके सेवक हंगे
और वो हैं उनके दास । करे राक्षसों को दोनों दंग भला
॥३॥कृष्ण सोवते शेषकी शय्यापर करके आराम । कर शि
व मसान में विश्राम भला । कृष्णकरें शिवकी सेवा शि
व करें कृष्णकाकाम । रटो दोनोंको आठोयामभला ।।दोहा ॥
शिव पूजें कृष्णके चरण कर कृष्णलिंगपूजा । हरीहर पातम
एक मूरती और नहीं दुजा । उनके शिर मुकुट उनके
शिर गंगभला ॥४॥ गुण से गिर रहित कृष्ण है तीन
लोकमें परे । भजो चाहै हरिकहो चाहे हरेभला । शिव
ने त्रिपुरासुरको मारा कृष्णसे कौरव मरे । दोनों में कोई
से नहीं डरेंभला ॥ दोहा ॥ शिवके संगर, सदा योगिनी
५२ * लाबनी और भूत वैतालाकृष्णालिये ग्वालिनी संग में ब्रजके सारेग्वा ल।वह पिवें दुध वह पीवें भंग भला॥३॥कृष्ण बनेगौराजीशि बजी बने लक्षी पाप । उनको पुण्य न उनको पाप भला । कृष्ण हरॆ वाधा तनुकी शिवदुरकरसंताप । मेरामन दोनों में रहा व्यापमला ॥ दोहा ।। कृष्ण बने नंदीगण शिवजी गर इरूप लियेधार । वह उन पर औं वह होते उनपर अस वारा।ये दोनों एक है और बहुरंगभला।।कृष्ण पार्थिवपूर्जे शिवजी पूजें शालग्राम । बना दोनों का सुन्दर धाम भला। शिवकी काशी वसो बना श्रीकृष्णका गोकुलग्राम । देवीसिंह दोनों का लैना नामभला ।। दोहा । शिवका शिगलावना कृष्णका है ठाकुरद्वारा । बनारसी यह कहै मुझे दोनोंका ना म प्यारा । उठीह मनमें यही तरंगभला ॥७॥ वहीलक्ष्मी वहीगौराजी चारवेदमें देख । शक्तिहेएक जुदे दो बेष भला । विष्णु के संग रहे सदा लक्ष्मी शिव के सँग रहे पार्वती। लखी नहिं जाय दोनों की गति भला । लक्ष्मी के पति इन्द्रजीत है गौरा के पति यती । लक्ष्मी कुमारगौरासतीभला ॥ दोहा ।। लक्ष्मी को चढ़े पुष्प और गौरी को चढ़ें बेलपती । उनकी बुद्धि निर्मल है और उनकी है मती सुमती । रूप दोनों का अलख अलेख भला ॥१॥ लक्ष्मीके मस्तक पर सोह सुन्दरबंदीभाल । गौरि के मस्तक चन्द्र विशाल भला । लक्ष्मी के उर पड़ा हार है जिसमें मोतीलाल । गौरिके कण्ठ मुंडकी माल भला ॥ दोहा।। लक्ष्मी के दोनों करमें है कड़े जड़ाऊ पड़े। गौरि के कर सोहैं कंगन दोनों के हैं भाग्य बड़े । लिखीविधनाने ऐसी Pho -A-PA- ORDERATE लावनी ५५ रेखाभला ॥२॥ लक्ष्मीके सेवकह सो मेपक ते सुन्दर भागा गौरिके सेवक साधे योगभला । लक्ष्मी को जो सुमिरै उसको कभी न व्याप शोग । गौरिको भजे सो रहें निरांग भला ॥दोहा॥ क्षारसिन्धुमें बसे लक्ष्मी नारायण के पास । गों रिगसें शिवसंग जहां सुन्दर पर्वत केलाश । सक्तजन ते उन्हें परखभला ॥ ३ ॥ लक्ष्मीका शीतल स्वगाव जल और चन्द्रमाजान । गौरिको समझो अग्नी भानुभला । लन्मी के पासमें हीरालाल मोतिनकी खानि । गोरिकी विभूतिहे, धनवान् भला । लक्ष्मीमें बसे गोरि गारिम करें लगीवाम । सुनो इधरधर ध्यान तुम हमसे उनकी रास । हैं उनकी कुम्भ और इनकी मेषभला ।। ४॥ श्री लक्ष्मी पहिने तनुके उपर बस्तर लाल । गौरिजा ओढिरही सृगछाल भला कहीं भाविनी कहीं जननी हो करें प्रतिपाल । वनी कहीं अन्तकालका काल भला ।।दोहा ।। ब्रह्म लिखते थक शे- षजी ने नहीं पाया पार । वनारसी यह कह कहूँ में कहां तलक विस्तार । मुझे दानोंकी भक्ती विशप भला ॥ ५ ॥ शिव गौराको सब कोई कहते ये दोऊ उनके अंग । कृष्ण शिव हम कहते अईगभला । आधु शीशपर जटा औं आधे लटके लटकाली । आधे शिव आने वनमाली जी भला । आये मुख वेदान्त ओं आधे वेदकी पनि आली । करें आपुस में बोलाचालीजी भला ।। दोहा ॥ करें गौरिजा सुनो लक्ष्मी देखो पतिकारूप ।। ऐसा रूप नही देखाथा सो देखो अाज स्वरूप ।। आधे शिरमुट आधे । शिर गंग भला !! १ ॥ श्राधे शीश पर चन्द्र और आध
.
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लावनी
चन्दनकाहै खौर । इधर मुर्बल और उधर हो चवरभला ।
आधे मुख माखन और आधे धतुरेका है कौर । आधा अंग
श्याम आधा अंग गौर भला ॥ दोक्ष। आधे अंग में भस्म
लगी औ आधे लगे सुगन्ध । आधा अंग है क्रोधवन्त और
आधाहै आनन्द । आधे अंग वस्त्र और आधा भगला ||२||
आधे मुखमुरली बाजै आधेमुख बाजेनाद । न उनका अंत न
उनका आदि भला । आधे सुख अमृत और आधे हलाहल
का स्वाद । दुरकरें क्षणमें विघ्न विख्यात भला ॥ दोहा ।
आधे अंगमें सर्प और आधे अंगमें भूषण हेम । आधा
अंग है कर्म रहित और आधे अंगमें नेम । प्राधा ब्रह्म
चर्य आधासभंगमला ॥३॥ आधे कमर में लँगोटा आधे क
टिकछनी कसे। दोनों अंग एक अंगमें बसे भला । आधा
आसन करुड़प आधा नन्दीगण पर लसै । यह शोभा देख
मेरा मन इसे भला ॥ दोहा ।। अर्द्धस्वरूप है महाकाल औ
आधा पालनहार । बनारसी यह कहै है उसकी महिमा
अगम अपार । देख सुर नर होगये दंग भला ।। ४॥
घरमिलै उसे जो अपना घर खोवै है । जो घर रखे
घरघरमें रोवैहै । जो राज्य तजै वो महाराज्य करता
है । और जान तजै सो कभी नहीं मरता है। सुखत्यागे
तो वह औरका दुख हरताहै। धनतजै तो फिर दौलत से
घरभरताहै । जो पलँग तजै वह फूलोंपर सौंवेहै । जोपर
रक्खै वह घर घरमें रोवैहै ।। ।।जो परदारा को तजे वह
पावै रानी। और झूट वचन में छोड़ सिद्ध होय बानी।
जो दुर्बुद्धी को तजे वही हो ज्ञानी । मनसा त्याग तो मिले
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लावनी
ऋद्धिमनमानी। जो सर्वतजै उसको सबकुछ होते हैं। जो घर
रक्खे वह घरघर में रोवेहे ॥२॥ जोकुछ इच्छा नहि करवह
इच्छापा । औरस्वादतजै तो अमृत भोजन खावें । नहिंमांगे
तो फलपावे जोमनभावै । है त्यागमें तीनों लोक वेद यो गा.
वे । जो भेलाहोके रहे वह दिल धोवेहे ।। जो घर रखे वह
घर घरमें रोवेहैं ।। ३ ।। जो पक्षपातको तजे वह सबकोजीते ।
औ कामतजे तोहोय काममनचीते ॥ है देवीसिंह हरनाम
जिन्हों ने लीत । उनको गोविन्द ने ब्रह्मलोकपुर दीते । अब
बनारसी घरखोके ब्रह्महोवहे । जो घररक्खे वहघरघरमेरोवेहें।।
वह आपी आपहै एक और नहिं कोई । कहु कलंगी
तुर्रा कहांसे आये दोई । वही ब्रह्मा विष्णु महेश वही है
शक्ती । निश्चय कर मानो करो प्रेमसे भक्ती ।। सुन किसी
कि निन्दामुझे भली नहीं लगती। हैं सबमें पूरणब्रह्म
ज्योतिसी जगती। क्यों झुरबाद करकरके बुद्धी खाई।
कहुकलँगी तुर्राकहांसे आये दोई ।। १ ॥ माया बसता ब्रह्म
ब्रह्ममाया ॥हैं चारवेदने इसीतरह से गाया । माया से
सृष्ठी की औ जवरचाया ॥ माया के बीच में करगीतुर्ग
आया ॥ है ब्रह्मफूल माया उसकी खुशबोई। कहकलेंगी
तुरी कहांसे आयेहोई ॥ २ ॥ वही अलख निरंजन निराकार
अविनासी । है सबसे न्यारा सबबटघटका वामी ॥ वह
बडी दुरपर बसै ओ सबके पासी । निमजिसने उनको
लखा वही सन्यासी । क्यों निन्दाकर के पापभिगठरी ढोई।
कहकरूंगी तुरी कहाँसे आये दोई ।।३ कोई अनघड इ.
सर हण्डा डुडगावै ।। जो पक्षशतको करें यह गौते खाने
munera
५० लावनी कोईकलगी तुर्राबहुतै ख्यालबनावै । कहै देवीसिंह नहीं भेदज्ञा नकापावै । कहै बनारसी यह सोहं पद से सोई । कहु कल. गी तुर्रा कहांसे आयेदोई ॥ ४॥ कहिं पुण्य करो तो बडा पाप होता है । कहिं पाप किये से पुण्य आप होता है । कहिं अग्निमें रहके शीतलतनु होता है। कहिं जलमें बसके रूपअग्नि होता है । कहि दुखमें सु. खहो प्राणमग्न होता है । कहिं दान किये तो अतिनिधन हो ताहै।। कहिं गातीदेनेसे भी जापहोता है । कहिं पापको तो पुण्य प्राप होता है ॥ १॥ कहिं भूलजाय तो सबाविद्या आ वे है। कहिं पढ़े तो वह फिर सभीभूल जावै है।कहिं प- वन अहार होके सब खावैहैं । कहि भोगीहो जितइन्द्रीक हलावैहै ।। कहिं अशीश देने से भी शाप होताहै । कहि पापकरो तो पुण्य आप होता है ॥२॥ कहिं झूठ बोलके सच्चा कहलाता है । कहिं सत्य वचन कह नरकचीच जाता है | कहिं गुरुसे लड़केवला फरख पाता है । कुछ उसका भेद लखने में नहिं आता है। कहिं वियोग करके भी मिलाप होताहै ।।।। कहीं पापकरो तो पुण्य आप होताहै ॥ ३॥ कहिं दुर्बलजायके पर्वत लेय उठाई । कहिं अति बलवान् से उठे न एको राई। कहे देवीसिंह सच है उसकी प्रभुताई । अय वनारसी तेरी गति लखी न जाई ।। जो होताहै वह आपी आप होता है । कहिं पापकरो तो पुण्य आप होताहै ॥ ४॥ सबके बीच में है और दिखाईनहिं दे गोविन्द । हुआ दुनियांको मोतियाबिंदुजी । भीतरकी गई फूट देवाहर से दिखलाई । कहैं ये बापहै ये माईजी । मरजावै तो कोई Pho RAMMAR Mrmwamanharm लावनी साथ नहीं चलै नहिं चले बहिन भाई । या त्राचा हो या हो ताईजी झूठबात नहीं कहते बोले सत्य वचन परिन्द ।। हुआ दुनियांको मोतिया विन्दुजी॥ १॥ अरेमुढ़ अज्ञानत क्यों भटके है चारो धाम। तेरे घटमें आतमारामजी। उन्हें तु क्यों नहिं देखे जो हृदय में करे विश्राम । नाम जपतो तेरा हो नामजी ॥ घटमें आतमा सझपड़े नहीं योंही याही गंवाई जिन्द । हुआ दुनियांको मोतिया विन्दुजी ॥ २॥ गोदी लड़का औ ढिंढोरा शहरमें फिरवाते । मसल जो हैं वही हम गातेजी ॥ इसीतरह से घटमें हर बाहर खोजन जाते । मिले नहीं उलटे फिर आतेजी।मुसलमान मक्केजीमटकोहिन्दू भटके हिन्द।हुआ दुनियांको मोतियाविन्दुजी॥३॥जगन्नाथ औबद्री नाथ सब हमभी फिर आये ॥ कृष्ण इस हिरदयमें पायेजी। देवीसिंहने ज्ञान ध्यान के सदा छन्द गाये । रागके चरण चित्त लायेजी ॥बनारसी ने ज्ञान दृष्टि से दिया जक्त को निन्द ॥ हुआ दुनियां को मोतियाविन्दुजी ॥ ४ ॥ जो चाहै सो कर प्रभू उसकी गति लखी न जाय । कर्म के लिख को देय मिटाय जी। कितने ही मरगये तो उनको पल में दिया जलाय । काल को देखो कालई खा यजी ॥ लूलाचढ़े पहाड़के ऊपर विन पोरूपसे धाय । एक तृण त्रैलोक समायजी ॥ सेतु बांध के समुद्र में हरिप- स्थर दिये तराय । कम लिखे को देय मिटायी ॥ एक मू. रख चातुर को देता एक पल में वेद पढ़ाय । जिये वह सदा. जो विषको खायजी । मीन घूपमे मरन रह नहिं पानी उसे सुहाय । कहो कोई इसका अर्थ बताया । लोहा 3 लावनी कंचन बने जो उसको पारस देउ छुवाय । कर्मक लिखे को देय मिटायजी ।।६ ॥ विधवा होय सुहागन उपजे पुत्र सो कर सहाय ॥ श्रागिको पानी देय जलाय जी। भूखा भो जन नहीं कर औ पेटभरा सब खाय । शेर को भेड़ी देय भगायजी ॥ संगी कीड़े को अपने सम लेता आप गना' य । म लिख को देय मिटायजी ।। ३ ।। मार्कण्डेयजी बा. रह बर्षकी आये उमर लिखाय । लिखी विधना ने बहुत चित लायजी ।। सोती होगये विरजीव में सत्य सत्य कहुँ गाय । प्रभुके आगे कर्म लजाएजी ।। बनारसी कहे नरसे प्राणी नारायण होजाय । कर्म के लिखे को देयामिटायजी॥१॥ मनपतङ्ग बढ़ गया सन्तका घूम रहा चहुओर ॥ काल के ऊपर की जोरजीहवाजाय पश्चिमको तो यह पूरवको जा- वै॥ वाके बशम नहिं आवैजी। पवन जो दक्षिण जाय तो यह उत्तर की सुधि लावे ।। किसी से जरा न भय खावेजी [॥ दोहा ।। सातदीप नवखंड औ चौदह भुवनों में फिरता । जहांचाहे जहांजाय गिराये किसी के नहीं गिरता ।। तीनों लोकोंमें करता शोरजी । मन पतव बढ़गया सन्तका घूमरहा चहुँ ओर । कालके ऊपर का जोरजी ।। १॥ चाई जवले उतार औ चाहे जब दे चढ़ाय ॥ उड़ावे योगी ध्यान लगा' यजी। जहाँ कालका गुज़र नहीं है वहां ये तुक्कल जाय। त्यारकी अद्भुत लेप लगायजी ॥ दोहा ॥ लगी इसमें अद्वै. त की जोड़ी ठड्दा ठीक छिला । और कोई नहीं रंग हे इसमेंनिगुण रंगमिला। दवे नहीं कहीपर इसकी कोरजी। मन पतङ्ग बढ़गया सतका घूमरहा चहुँऔर । कालके ऊपर पांजोरजी ॥२॥ कृष्णनामकी लगाई कंछी कभी न कत्री लावनी लगे।सातवें अकाशपर जगमगैजी । ब्रह्मपुछल्लेसे डरडर पापी कनकवभगे । गये वहयमके लोकमें ठगेजी ।' दोहा ॥ ज्ञान कागोला ध्यानकामांझा ज्यों खांडेकी धार । गदगुरु की मह लगी तो होगये भवसागरकेपार । नट्टे सत्तशब्दकी डोरजी मन पतंगवढगया संतकाघूमरहा चहुंओर । कालके ऊपर क. ा जोरजी॥३।। शुद्ध आत्मा बनायह तुक्कल चोथेपदखड़ी। हैमहिमा इस तुक्कल की बडीजी। पुण्यपापसे अलगहें यहनहीं नर्मनहींकड़ी। काटाउसको जो इसमे लडीजी ॥ दोहा ।। देवी सिंह यों कहे जो इसके पेचमें कोई आवै । झटपटले लपेटवी च अपनेवरमैलावे । कह छन्दवनारसी चितजोरजी । मन प- तंगवद गया सन्तका धुमरहाचहुँओर । कालके ऊपर काजो रजी॥४॥ ग्वालिनसे कृष्णजी कहैं मधुर बोली में । यह कहा चु. राये जातहो तुम चोली में ॥ गई दधि वेचन यह कहां से गठरी पाई। इसमें मोहि मोती माणिक दे दिखलाई ॥ यह सुनत वचन तवतो ग्वालिन मुसुक्याई । और लगी गालियां देने बहुत रिसाई ॥ मत बोलो ऐसा वचन मेरी टोलीमें । यह कहा चुराये जातहो तुम चोलीमें ॥ १॥ फिर कह कृष्ण तुम हमको तनक दिखाओ। जो चोरी नहींह की तोक्यों शरमाओ। योंकहै ग्वालिनी हटो उधर को जाओ। कतकरो हँसीकीबात न मोहि लजाओ ।। फिरकह कृष्ण अपनीवतियां भोली में । यह कहा बुराये जातहों तुम चो. ली में । २। उस वक्त कृष्णने ऐसी मोहिनीताली । वालिन मदमें भईघुर न बोली चली ।। सब खोलि के अगिया उम 1 लावनी की देखी भाली। दोनों कुच लीन्हे पकड़ हँसें वनमाली ।। नि त ऐसी लीला करें कृष्ण होलीमें । यह कहा चुराये जातहौतु मचोलीमोशथी यही इच्छा ग्वालिनकी कृष्ण मिलजावें । ओं पकड़के बहियां मोको गले लगाव।कह देवीसिंह जो कृष्णकी अस्तुतिगावें । वह जीतेहीजी जीवन्मुक्ति फलपावें ॥ कहें व नारसी क्या है अगिया पोली में । यह कहा चुराये जातही तुम चोली में ॥४॥ नहीं मेरा यह शरीर है नहींहै मुझको दुखदुन्द । मेराहरूप सचिदानन्दजी।। नहीं लोभ नहीं मोह नहीं बुद्धि नहीं अह कार । नहीं आचार औ नहीं विचारजी ॥ नहीं रात नहीं दिन नहीतिथिघडी लग्ननहींबार । नहींहै अपना पारावारजी "न होऊजडनहींजंगल नहीं वस्ती कुटुम्न घरवार । नहींदारासुत नहीं परिवारजी । दोहा । नहीं शीश नहीं मुख नहीं जिह्वा नहीं वाणी नहींहाथ । नहीं इदर नहीं लिंग चरणनहीं नहीं वर्ण नहीं जात । नहीं वेद नहीं शास्त्र नहीं श्लोक नहींपरछ न्द । मेराह रूप सच्चिदानन्दजी । १। नहीं काम नहीं क्रोध नहीं कुछ ज्ञान नहीं अज्ञान । नहीं कोई मन्त्र तन्त्र नहीं ध्या नजी ॥ नहीं नेम नहीं संयम पूजानहीं तीर्थस्नान । नहीं व्रत होम यज्ञ नहीं दानजी । नहीं योग नहीं सोग नहीं संयोग मान अपमान । नहीं बनवासी नहीं स्थानजी । दोहा । न ही सीधा नहीं गोल नहीं दुबला औं नहीं मोटा । नहीं टेढा नहीं बड़ा बहुत नहीं मोटा नहीं छोटा । नहीं तुर्श नहींलौन अलौना नहीं कडुवा नहीं कन्द । मेरा है रूप सच्चिदानन्दजी ॥२॥ नहींमुखनहीं दुःखनहीं धनवान नहीं कंगाल । नहींमंत्री * लावनी ६१ और नही भूपालजी ।। नहीं सिधु नहीं नदी नहीं है कृष वा. वडीताल। नहींआकाश नहीं पातालजी। नहीं वंत नहीं पीत नहीं है कपोत नीलालाल : नहीं है वृक्ष फूल फल बाल जी॥ दोहा-नहीं हीरा नहीं मोती माणक नहारत्नकी खान । नहीं खर्ग नहीं चक्र नहीं त्रिशुल धनुपनहीं वान ।। नहीं जान त नहीं स्वप्न सुषुप्ति नहीं खुला नहीं वन्द । मेरा है रूप स- च्चिदानन्दजी॥ ३ ॥नहीं त्रिपुण्डों नही बनखण्डी नहीं ब्रह्म चारी । नहीं मुण्डित न जटाधारीजी। नहीं अग्नि नहीं पवन न पानी नहीं मीठा खारी। पशु नहीं पुरुप नहीं नारीजी नहीं शैव नहीं शक्ति नहीं वैष्णव नहीं आनारी । नही हल का नहीं भारजिी ॥ दोहा-नहीं मिमांसक नहीं जैनी नहीं उदासीन मतबाद । नहीं देव गन्धर्व यक्ष नहीं विनविख्यात। नहीं विजुली नहीं धन नहीं तारे नहीं सूर्य नही चन्द । | मेराह रूप सच्चिदानन्दजी ॥१॥ नही शिष्य नहीं गुरु न माता पिता नही भ्राता नहीं रिश्ता और नहीं नाताजी।। नहीं बैठा नही खड़ा नही पाता है नही जाता। नही सूखा है नही खाताजी॥नही लेय नही धरै नदी देते नहीं दिला ता। सखी नही सुम नही दाताजी॥ दोहा-नही कर्म की रेख लेख नही नहीं पढ़ाजाता। नहीं मौन होरहे नहीं बोलें नहीं बुलवाता॥ नहीं पक्षी नहीं फेद कहै नहीं जाल नही फर फंद । मेरा है रूप सच्चिदानन्दजी ॥५॥ नही हिन्दु नही मुसलमान याहूदी नही फिरंग । नही कोई रूप नहीं कोई रंगजी ॥ नही पीन वांसुरी नही करताल ताल मृदंग । नहीं जलतरंग नही उपचंगनी ॥ नहीं कलंगी नही Arian at tandas Tri a Lada Lanchana albattant when she ।
। १२ कलावनी तुर्रा नहीं अनघड हुण्डा नही चंग नही कोई संग है न ही आसंगजी ॥ दोहा-बापी आप में आप है रहा आप में व्याप । नहिं स्वर्ग नही नरकह नही पुण्य नहि पाप ।। बनारसी कहै रूप हमारा अखण्ड परमानंद । मेरा है रूप सच्चिदानन्दजी ॥६॥ है उपरकुवा ओ नीचे जिसके डोरी । पानी भरती पनिहा रिन चोराचारी । डोरी के ऊपर घिरनी चक्कर खावें। वह मधुरमधुर ध्वनि बोले मोहि सुहावै । जबतक वह डोरी कुवां से आवै जातिवतलक कुवां वह नही सूखने पावे।। उस कुत्रे केउ.पर खड़ी हजारोंगोरी। पानी भरती पनिहारिन चोराचौरी शमुँहबंद कुवे का रहै औ पानी दरसे । वह देख जिसकी डोर लगी है हरसे । जब पनिहारिन कुछ काम न राखें घर से। तब अमृतजलको छकै छुटै सब बरसे। वह नित उठि गागरिभरै बनी रह कोरी।पानी भरती पनिहारिन चौरा चो री। जब उलटा डोल वह जाय तो पानी आ । फिर सीचे अपना बाग अमर फल पावै ॥ है काहेका वह डोल औं कौन बनावें । जो पूरा योगी होय तो मोहि बताने ।। उस कुये के ऊपर नहीं चलै दरजोरी । पानी भरती पनिहारिन चोरा-चो उस कुये पैगंगा यमुना सरस्वती है । औ महादेव अविनाशी पार्वती हैं । भोलानाथ चौरासी सिद्ध और बाल यती हैं नानाप्रकारकी उसमें बेलपती हैं । है राह वहां की बहुतै सांकरखोरी। पानी भरती पनिहारिन चोरी चोरी ।। मा लाखों पनिहारिन एक है हां पनिहारा । उस पनिहारे ने सबको भरदी धारा।। जिसने पाया. वह नीर MARAL लावनी ६३ तो जन्म सुधारा । कहे वनारसी उसकी गति अपरम्पारा । इन्हावे उसमें जिसका पंथ अवोरी । पानी भरती ए. निहारिन चोराचोरी ॥५॥ क्याही झलक देदोंगेहुई प्यारे तेरे मुसुस्याने से । बाढ़ फनेलगा अखतररहे मुँहदिखलानेस अजब तिलस्महुआ जा लिम तेरे उसपानचवानेसे । मरजं गोहर जसुर्रद निकलपड़े हर्षानेसे ॥ शफक्कादमफकहुवा बहुत फूलीथी वह सुखीपाने से । अनारके भी दाने मौताज होगये दानेसे ।। देखतेरेददा कीझलक उठिगये लौलाल जमानेसे ! वर्कतड़पनेलगी म खतररहेमुँइदिखलानेसे ॥ १ ॥ भूलजायजौहरी वह परख ना रत्न औ फिर दिवाने से । ददां तेरे देखपांय गर किसी बहाने से। कितनेही गये इन वह सागरमें भी गोता खाने से।परनहींवाकिफहुये वहभी ऐसेदुर्दानेसे । मुखगया वहलहू तेरे दांतों की सिफत सुनानेसे । दतड़पनेलगा अखतररहे मुँह दिखलानेसे ।। २ ॥शरामिन्दा होगयेजवाहर दांतोंकेचम कानेसे ) खूनउगलनेलगहीरे क्याहोपछतानेसे ।। देख मुरस्से साज तो रहजाय अपनाकाम बनानेसे। यह वह जइत है न ड़ी वस खुदाके हाथलगानेसे ॥ आजतुझे मिलगया मजा इस हँसीमें तुम्हें हँसानेसें । बर्कतडपने लगा अखतर रहे मुंहदिखलानेसे ॥३॥ टुकडेहोयाकूत तेरे दांतों केरूबरू आनेसे करें चमेली नात यह अपने और वेगाने से। पानननेभी पाई लाली उसमहालकाके खानेमे । इसी वास्ते वह बस्ती में आये वीरानेसे । यहदन्दानिकले बेबहाखुदाके सुनो खजाने से । वर्क तड़पने लगी अखत्तर --- लावनी रहेमुहदिखलानेसाबनारसीने कहा हाल यह अपने मन मस्तानसे । इनददों में देखले खुदामेरे दिखलानसे । थकजा यगा औ नादां तू लामकानकैजानेसे । यही देखलेनुरदंदामें यारके आने से ॥ ऐसी सिफतदातों की किसीसेवने नहीं मेरे जानेसे । वर्कतड़पनेलगी अखतर रहे मुंह दिखलानेसे ॥५॥ पानकी लाली से वल झलक ददाम तेरे लालों की बनी । लालेबदख्शां देखकर जिसेखांय हीरेकोकनी ॥ आज तू जो हंसके बोला तो दहन में वह दंदाचमके। जिगर छिदगया हर एक गोहरका सुनो मारे गमके ॥ सुनतेही यकासिफत सूखकर होशउडगये शवनमके । क्या ताकत है मुकाबिल दन्दांके अखतर दमके । हरएक जवाहर के ऊपर प्यारे तो दंदा हैं गनीं । लालेबदख्शां देखकर जिसैखांय हीरेकीकनी ॥ १ ॥ अगरचमेलोको देखू तो उसका सुर्ख लिवासकहाँ । मरजांटुकड़े हुवा उसको जीनकी आशकहां ॥ छंठ नहीं बोलेंगा सनम् मुझको कोईका पास कहा । सचकहताहू मुकाबिल दंदाके इ- लमासकहां। क्या ताकत गर इसके रूबरू चमक सके कोई और मनी । लालेबदख्शां देखकर जिसखाय हीरे कोकनी ॥ २॥ इन्हें देखकर वर्कतडफती है वह आसमांके ऊपर । सदके कर, शफककोभी इन दंदांके उपर । किसी से निशवत कभी न दं नहीं लाऊं इसे जबांके ऊपर । दंदांतेरे झलकते. वह लामकाके ऊपर । शायकतू पी- से जो दांत तो दममें करदें फनाफनी। लाले बदख्शां देखकर जिसे खाय होरेकीकनी ।। ३ ।। गरजोकोई याकूतकहै लावनी तो जबांको उसकी कटवाऊं । अनार के भी कहें दाने तो काटके में खाऊं। और जो गौहरकी लड़ी तो उनको भी में छिदवाऊँ । किसी से निस्वत नदु नहिं सुनं न खातिर में लाऊं ॥बनारसी गरकहै तो क्या दिलमें उसके अव यही ठ नी। लालेबदरुशां देखकर जिसे खायँ हीरेकी कनी ॥ ४॥ कहर नाज़ो अन्दाज गजब है अजब हुस्न दमके दम् दम् । चालमें छल बल इशारे नहीं तेरे आफत से कम् ।। गरचे हुस्न तेरे की सिफ़त कोई लाख तरह से करें रकम् । क्या ताकत है जो उसके हाथ से ठहरे लहेकी लम् ॥ जाये ताज्जुब है जलवा तेरा जलवेगर बना सनम् । तेरे नूरसे हुआ कोह तुर में वह मूसा वेदम् ॥ हाथ मला यक मलें हरहैरत खाखाके छुयें कदम् । जिनो वसर सब तेरी तावेदारी करते हरदम् ।। सरतापा तस्वीर खिंची कुदरत की तेरी बिना कलम् । चालमें छलबल इशारे नहीं तेरे आफुत से कम् ॥ १॥शिर तेरा है हरशिर का सर दार तुहे शाह आलम् । उसके ऊपर ताज कलँगी औं छत्र छलके झमझम् ॥ जुल्फ मुसल सिल में वह पेंच हैं और तेरे हरवाल में ख़्म । गोया नागिनी माहपर आई वा टन को शवनम् ॥ यामै जलवा को अब कहूं या लाभ अ लिफ या नसर नजम । याम उनको कहूं जुलमात याके जादुये सितम्। आगे लाखों तिलिस्म, जुल्कों में तेरे तेरी कसम् । चालमें छल बल इशारे नहीं तेरे आसत कम् ॥ २ ॥ देखतेरे माथेको फलकपर आफताब खाता है शरम् । चीनजवीं से किरन खुरशैद की काय होके व से ६६ लावनी हम् ।। सिफतकलं अवरूओंकी तो शमशीरपर हो शमशीरे अलम् । याके कमां बनी सुलतान्की याहै तेगे दुदम् । मिजतीर पै कांहै या नशतरहै या वरची बल्लम् । यक पलमें वह करें कतलाम करें एकपलसें रहम् ।। तेरी नजर गर फिर तो फिर होजाय ऋतल लाखों रुसतम् । चालमें छलवल इ शारेनहीं तेरे आफतसेकम् ॥३॥ चेहरा गोल अनमोल के जि स्से रश्ककमर को होवेगम । चश्म वह नरगिस कवल से खिलेहँगोया बागे इरम् ।। देखके वैनीकी तेजी की हरयक का हो नाकमें दम् । ग़जव फड़क है तेरे नथुनों की कहें किसतौर से हम् ।। रुखसारों पर छुटा पसीना जैसे दोदरियाये अगम् । बात बात में दिल्लगी शोरी सखुन प्रोजवानरम् । हरएक आ नमें जान निकाले अदाअजायन हुस्नयम् । चालमें छलबल इशारे नहीं तेरे आफतसेकम्।।और जोकरूं तारीफ़तेरेंददो की ए दिल जाने दिलम् । या वह गोहर है वेश कीमत याने हीराकी किसम् ॥ देखलबोंपर पान कि लाली ला। लोका रुतबा होकम । खाले जकन पर कर उगद सुरैया हुआ खतम् ॥ चाहे जनखदां देखके तेरी चाहमें हुमा कुल आलम् । कदवह कयामत की जिस्से सर्रासही को हो मातम ॥ गला सुराही दार नौ सीना साफ आईनासा उत्तम् । चालमेंछल वल इसारे नहीं तेरे आफतसेकम् ॥५॥ दस्तवह नाजुक गोल कलाई हिना हथेली में रहीरम् । देख वहसुखीखून दिल कितनों काहो दममैदम् । नाखूबो गोया हिलाल औं मखमली मुलायम बना शिकम् । नाफ वह सागर कमर चौतसी वह जानू नरके थम् । देख झलक --- लाबनी कदमों की तेरे पैरोंमें आमकर पड़ा पदम् । बनारमा रहे में आशिक तेरे नाम काहूं हम दम् । नारंगीसी गढीतलुसे मलैं तेरे वावा आदम् । चालमें छल बल इमारे नहीं तेरे आफतसे कम् ॥ ६॥ कूचेजानाकी दिलपर गरजरा किसीके हवा लगी। रहानी- मजां न उसको तावे उम तक दवालगी । अवाहुवा जी जान से जिसको प्यारीतेरी अदालगी। गदा हुआ वह इश्क की जिसके दिलपर गदालगी। मदा अनलहक कहूं जवांसे मु झे वह प्यारी सदा लगी। खुदी मिटगई खुदाकी याद दिलपर खुदालगी|चोट इश्क की जिसके दिल पर जरा लगी या मि. वालगी। रहानीमजां न उसकोतावे उम्रतक दवालगी।। 1 ।। तिला कर दिया मिसकोखाकपा तेरीउसे यक तिला लगी दि लादे अपनादीद तबीअत तुझसे ऐ दिलालगी। सिलाय क्यों कर जखम जिगर पर जिसके इश्क की सिला लगी। मिली खाको खाकसारी जिसको शामिलालगी । इश्क के बीमारों को और कोई दवा न तेरे सिग लगी। रहा नीमजां न उस को तावे उम्र तक दवालगी२ ॥बला करे दिन रात इश्यकी जिस केपीछे बला लगी। भलाहो क्योंकर वह जिसको तंग इश्ककी बला लगी।मलाकरूं तळुये तेरे मुझको यह वाह व मला लगी। चलालामकांचाल कदमोमें मेरे चला लगी। तह समांमें परवाना मुझको तो लौ तेरा वह आयलगी। रहा नीमजाँ न उसको तावे उम्तक दवा लग।। ३॥ अथाह दरिया इश्कका कहो इसको किसको थाह लगी। नथा इन्क में वहहना हरगिज इसकी नथालगी। कहाचंद देवीहि New N - ६८ लावनी ने उन्हेंइश्ककी प्यारी कथा लगी।जत्थावाले, जो शायरउन्हें बात यह यथालगी॥बनारसीकोसिवाइइश्कके और वात नहिं रबालगीरहानीमजाँ न उसको ताबेउमृतक दवालगी।॥ ४ ॥ रहे उभ्रमर दरियामैं निकले तो खुश्क गौहर निकले। सद आफरी है जो मेरी चश्मसे मोती तर निकले । मिर्ज की नौकापर जिस दस वह अश्क हमारे तुल निकले। अजव ताज्जुबहुआ ज्यों खारके ऊपर गुल निकले ।। च- श्महमारे उन्हें देखने को जो यह खुल खुल निकले । अश्क जो गुलरू बने तो दीदेभी वुवुल निकले ॥गर निकले इल्मास तो क्यों वहभी सूखे कंकर निकले । सदाफ- री है जो मेरा चश्मसे मोतीतर निकले ।। १ ।। कहाँ क्या क्या तशवीदें जो बनबनकर आटू निकले । में वहदतम किगौयाकरते बिहिश्तसैनिकले । मैंने कहा ऐ अश्क मेरी चश्मों से जिस तरह तु निकले । क्या ताकत है जो ऐसी लड़ी वनके लूळू निकले।। कहा जवाहर निकले तो वह भी श्यामल पत्थर निकले । सद आफरी है जो मेरी चश्म से मोती तर निकले ॥३॥रोया फिराके यार में तो क्या क्या अलकनन्दन निकले । यकी यह हुआ कि दरिया इसी में गगोयमुननिकले।। और भी कुछ कहता हूं सुनो इस जबाँ से जोकि सखुन निकले। अब पुतलियाँ बनी तो चश्म भी दासी बननिकले । अश्क मेरे पुरआव हैं गौहर खा- लो खुश्क जिगर निकले। सद आफरी है जो मेरी चश्म से मातीतर निकले ।। ३ ।।फुरकतजानांमें जो कभी हम रोते जोरजार निकले । तार न टूटा हार से तोफा गुथा हार -- लावनी 18 निकला।क्या ताकत इस दरिया के गर वारसे कोई पार निक- ले। बनारसी कहै जोनिकले मगर तो हमी यार निकले। और जो निकले रतन वह भी अश्कों से मेरे वतर निकले । सद भाफ़री हैं जो मेरी चइम से मोती तर निकले । ४॥ तेग लगै तरवारलग औ तीर लग तो न पड़े। नन के मारे मारे तड़पते हैं कितने वैचैन पड़े ।। एक झलक मसा को नजर गर पड़ी तो वह लगगई नज़र । गिरा कोह पर न उसको तनोबदन की रही खबर । जिसे इशारे राज कर वह क्योंकर उसका होवे गुजर। जिये किस तरे और फिर मरे भला वह कहो किस पर ॥ दिलका हाल दिलही जाने जो जख्म जिगर पर ऐन पड़े। नैनके मारे तड़पते हैं कितने बैचेन पड़े। ॥ तोप लगै बन्दूक लगै तो इसकी भी हो दवा कहीं । अगर दुगाड़े नैन के लगे तो फिर वह व नहीं। बरबी से बचगये कटारीकी चोटें कितनों ने सही । नोक पलक की जराभी चुभी तो वह रोदिये वहीं ।। नीद कहां आती है जागते हेंगे तो दिन रेन पड़े । नैन के मारे तडपते हैं कितने बचैन पड़े । २॥ वांकमें है क्या बांक प. ना और खजर में वह आव कहां । चश्मके आगे दिखाई दे किसी का रुआव कहां । अगर नशेकी कहो तो देखी ऐसी भला शराव कहां । मस्तानों से भी गर पूछो तो आये जवाब वहां। लाखों दल कट जाय मेरे कातिल की जि- धरकोसैनपड़े। नैनकमारे तड़पते हैं कितने न पडे ।। ३ वहाँचश्मखरेज अब इनसे खन का दावा कौन करे। दार में बढके बोला मन्सूर अवहम नहीं मरे । उसे मिले KANEne लावनी दीदार जो आसक मस्ताने हैं सरसेपरे । बनारसी कहें हम सर मदके पीरसुनहरे भरे ।। शबोरोज हरवक्तजबां से कहतेहैं यही बैन पड़े। नैनके मारे तड़पते हैं कितने बैचेन पढे ॥ ४॥ मनकामार के बनाया मुर्दा जब यह तनु आवाद किया पहनके कफनी फकीरोंने तो कफन याबाद किया । ब- स्तीको समझें उजाड सहरा औ बन आवाद किया । मालखजाना तर्ककर फकरकाधन आबाद ॥ किया ॥ लामें शोलेनूर के अपना जलाके मन आवाद किया। आह से अपना मेहर औं चरख को हन आबाद किया। जिसे कहें वीराना सब मैंने वह वतन प्राचाद किया। पहन के कफ- नी फकीरोंने तो कफन आजाद किया ॥ १ ॥ गुल खाबा गुलबदनपै मने वह गुलशन आवाद किया । जिस गुल. शन से गुलोंका हुस्न चमन आबाद किया। कहके ज- वांसे वह कुमबेइजनी अपना सखुन आवाद किया । जिलाया मुर्दा हुकुमसे उसका कफन आवाद किया । जीतेजी जो मरा उसीने तो मुर्दन आवाद किया । पहन के कफनी फकीरों ने तो कफन आबाद ॥ २॥ गम खाखा इस दिलपर हमने रंजों पहन - आबाद किया । दीवानों को पढ़के दीवानापन आवाद किया ।। तख्त स- ल्तनत छोड़ खाकपर वह आसान आबाद किया । जिस आसान से इन्द्र का इन्द्रासन आबाद किया । तर्क किया दुनियां का रस्ता ओर चलन आबाद किया । पहन के कफनी फकीरों ने तो कफन आबाद किया ॥३॥ अश्कसे अपने दुर्वेशाने दुरे रत्न अावाद किया । इश्क
लावनी
में पैदा किया गम गमसे जन आवाद किया। जिसमा आरा
क बैठरहे उसजा मसकन् आवाद किया । है देवीसिंह नाम
अपना रोशन आवादकिया ।। बनारसी ने करके इश्क आश
कीका कफन आवादकिया। पहनके कफना फारोंने नो
कफन आवाद किया।।४॥
मेरी आहका तीरतोड गरदुकोगयालामकांतलक । वेअदबी
अबबहुतसीहई कहूं, कहांतलक । हुआइश्क काजोर जबड्स
दिल में तो मैंने आहकरी। सातॉफलक को चीरकर लामको
की राहकरी ।। वहांजो देखो नूरखुदा को उसने पाके निगाह
करी। और जहाँ नहीं फिरकिसी की मैंने चाहकरी ।। आश
क सादिक नाम मेरायह रोशन कुल जहांतलक । बेअदबी
अवबहुतसी हुई कहूमैं कहांतलकाअजब मजापायाहै हम
ने अपनी आहसोजांकेवीचाहुस्न खुदाइदिखाईदहेमेराजांकेवी
च ॥ नहींवह जलवा मुलकमदेखा और न हूर गिलमांकेवीच
नहीं मेहरमें नहीं वह झलक माहतावां के बीच ।। मेरी
आह रोशन हे सातों नमी औं कुल आसमां तलक। वे
अदबी अन बहुतसी हुई कहमैं कहांतलक ॥ ३ ॥इसी आह
से इश्क यह पैदाहुआ और आशक नाम हुआ। इसी
आइसे जहांमें सारे में बदनाम हुआ। इसी श्राहसे हुआ
सखुन मस्तानी मस्त कलाम हुआ। इसी आहसे वह
पैदा भये वहदताका जामहुआ । मेरी आहहै लिखी देख
लो के कलमेकी राहतलक । वेअदवी अब बहुतमी
हुई कहूँ, कहांतलक ॥ ३ ॥ इसी आहसे कुफुलतोडका
फरका माराहमने। इसी आइसे किया दुश्मन पारा पारा
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- लावनी हमने ।। इसी आहेसे पाया वह दिल में दिलवर प्यारा हमने । इसी आहमें करादिया फनारज सारा हमने ।। बना रसी कहे जहाँ वहकहै मेरी आहहै वहांतलक । वेअ- दवी अन बहुतसी हुई कहूं मैं कहांतलक ॥४॥ हम आशकहें हमनछेड़ो छेड़केपछतावोगतुम । आहसेगरदं गिरपड़ेगा तोदबजावोगतम । गरमको छेड़ोगे तो निकले गी इस दिलसे आतिशे आह । आगलगेगी वह जिससेकुलल हान होवेगा तबाह । कहां भाग के बचोगे तुम फिर कहींनहीं पावोगेराह । हाकुलायेबाते हैं इसकाहे अल्लाही गवाह । जि- सने आशक को छेड़ा वह नहीं बचा हरगिज बल्लाह । कसमसुखदा की बात यह कुल जहान में है अगाह ।। शैर-तुम्हें बाजिवनहींहैं श्राशकोंकी जार दिखलाना। जोहो नातवा उसको न जोर औ शौर दिखलाना ।। अगरतुम जोर दिखलावोतो फिरमतकोर दिखलाना। जो मांग इश्क से मैदा तो उसको गोर दिखलाना।। आशकेदिलको की सतानेसे न चैन पावोगे तुम । आह से गर, गिर पड़ेगा तो दव जावोग तुम ॥ १॥ शवो रोज हम आप परे रहतेहैं हितगमकेमारे । हमें सताना तुम्हें नही वाजिब है मेरे प्यारे। अभी आहगर करूंगा तो वर- संगे फलकसं अंगारे । कोई बचेगा नहीं मरजायंगे कुल निन मारे ।। मारे ग्राह से डरें अवलिया पीर पैगम्बर भी सारे । इसी वास्ते नही भरता हूँ में आहोंके नारे । शैर-अभी अगर उफकरदं कुल जहां पलमें उलट जाये। जमी ऊपरहो और ये आसमा पलमें उलट जाये ।। ये मोसम बस उलट जाये समापलमें उलट जाये ।
..
लावनी
हर दरिया उलट जाये तवां पल में पलट जाये।।
हम तो आपा जले हैं हमको और जलायोगे तुम । श्राह से
गरइंगिरपड़ेगातो दवजाओगेतुम ॥२॥छेडोशम्म तब रेजका
वह मुल्तान अब तलक जलतीहै । वहांसे आतश देखलो अब
तक नहीं निकलती है ।। और छेडा सरमद को दिल्ली इधर से
उधर उछलती है । आशिक सादिक के आगे रुस्तमकी नहीं
चलती है ।। मेरी आह से शमा है रोशन आतश अबतकाल.
ती है। काफर को ये जला देती है ओ मुझको फलती है ।।
शैर-निकालू दिल से मैंगर यारव अपनी आह सोनां को।।
जला डालूं हजारों कोसतक जगल वियावां को ॥
करू में खाक सा इस आह से वस्ती व वीरां को।
कयामत आह से करदूं दिलाऊं मैं वह तुफां हो ॥
छेडछाड गर करोगे आशिक से तो घबराओंगे तुम । आह
से गरहूँ गिरपड़ेगा तो दवजाऔगेतुम ॥३॥ जिसने आशक
को छेडा फिर उसका घर आवाद हुआ । गया शहरको नहीं
वह दुनिया में आबाद हुआ ॥ दोजख उसको मिला और
वह विहिश्त से बेदाद हुआ। नाम उसी का जहां में काफर
और जल्लाद हुआ । यह सखुन श्राशिकों का इस पर जिस
जिसका एतकाद हुआ। दोनों जहां में उसीका भला हुआ
दिल शाद हुआ।
शैर-सदा ये आशिकों की है भला होवे भला हो ।
अदा पर उसका ए दिल देत्रिय किसदिन अदाहोवे ।।
उसी का नाम रोशन हो जो उलफतगें जलाहोवे ।
कहै ये छन्द देवीसिंह मेरा दिलबर खुदा हो ।
बनारसी यह कहै अगर नापाक इस गावोगे तुम ।।
॥
७४ MINJAN लावनी आह से गरदू गिर पडेगा तो दवजावोगे तुम ॥ ॥ खुदा तुहे बरहक तो मैं भी हक जवांसे कहताहूं। आवजोत है तो मैं भी लहर बहर में रहताहूं।अगर तू है पातश तो में भी उसीका अँगाराहूँगा।तिला जो तूहेतो जेवरतेरा प्यारा हंगा॥ गरतहै सीमावतो मैं भी सनम पारा पाराहूंगा। आइ नतूहै तो भी वनातेरा आपाहूंगा।जोतृहै दरियावतो मैंहवा मोजरवाहो बहताहूं। आव जोतहै तो ममी लहर वहरमें रह. ताह ॥१॥तुहीतो दममें दम तो मैंभी आदम कहलाताहूं । हु स्न जोतृहै तो मैं जलवा तेरा दिखलाताहूंगरचेनू खामोश रहे तोमैं नहीं जवां हिलाताहूं। तुहीहै मेरा तो में प्यारे अब तैरा कहाताहूँ । तुही नहीं गम खायतो फिरमें जहामें किस की सहताहूं। आवजो तूहै तो मैंभी लहर बहमें रहताहूं २॥ तेरा नहिं कोई दील तो मेरी जातका कौन ठिकाना है। तुझे न जानातो फिर मुझको किसने पहिचाना है ॥ तूहे फसतो मेराभी दिलफकीर तेरा दीवानाहै। तू है लामका तो मेरे मका को किसने जानाहै ।। तूह शामलिया शाहतो प्यारे में नरसी महताहूं। आवतो तूहै तो मैंभी लहर बहरमें रहताहूं ॥ ३ ॥ है शश तो मैंभी शम्ब तबरेज जहाँ में थायाहूं। मुझ तूहे औरमैं तेरे बीच समायाहूं ॥ गस्तू नापैदा तों में भी नहीं किसी का जायांहू । बनारसी कहै जो तू कुदरत तो मैं भी मायाहूं। तुने पकड़ा हाथ मेरा में बाजू तेरा गहता हूं आब जो तू है तो मेंमी लहर वहर में रहता हूं ॥ ४ ॥ खुदा तु गर है इश्कतो मैं आशकहूं हूर नूरानी का शान AM लावनी जोत है तो मैं पुतला हूँ तुझ लासानी का ।। गरतू राजानहा है तो मैं पोशीदा इसतनमें हूँ। तुहै गुलिस्तांतो तभी गुंचा उसगुलशनमें हूँ ।। तूई चाह तो ममी डबा प्यारे चाहे जक नमें हूं । मला तु लौह तो मैंभी हरदम उसी लगन में हूं ॥ तेरी नहीं तस्वीर मुझे खींचे यह नरुतवा मानीका । शानजो तू है तो मैं पुतला हूं तुझलासानी का ॥ ॥ तू है पाकतो मेराभी दिल साफ मिल्ल आईना है। औ जान जो है तो मेरा दानावीना है । बुलंद है तू तो मेरा तेरे वाम पर जीना है ॥ तू है मौज दरियाती में भी हूं वह बुलबुला पानी का। शान जो तु है तो मैं पुतला हूँ तुझ लासानी का ॥ २ ॥ खुदा तो मभी तेरेसे जुदा नहीं जीजान से हूं । यकीन तू है तो मैं सावित अपने ईमान से हूँ ॥ तू है दोस्त मेरा तो मैं तेरा यार भी हरएक आन से हैं। तु है तसव्वर तो में भी पूरा अपन ध्यान से हूँ ।। तू है लिवासे नंग शोकहेमुझे तेर उरयानी.का। शानजो तू है तो में पुतलाहूं तुझलासानी काशातुहे एक तो मुझसा दुसरा और जहां में कौनसाहे कल्मा तु है तो मेरे सिवा कुरा में कौनसा है। देवीसिंह कहे वगर तेरे मेरी जर्जा में कौनसा है। नातवानी में और ताकतत मामें कौनसा है। यही सखुनहे विदआशके बनारसी हक्का नी का शाल जो तू है तो मैं पुतलाहूं तुझ लासानीता। तुरुमलाल याकूत की टहनी वर्गजसुरंद मोती गुल्ल । फल लटके मणियों के जिसमें जो देख लेले विल्कुल ॥ शवनम् है इलमास कि उसके वर्गवर्ग पर पड़ी हुई । ४. 899 पह 106 HAIR । ---- ७६ है लावनी रैक शाख कुन्दन औ नीलम से है उसकी जड़ी हुई। जिसके हाथमें उस दरख्तकी एकभी यारव छड़ी हुई । सात बादशाद से भी वह कीमत उसकी बड़ी हुई । उस दरख्त के मेवे से हरदम टपके तौहीद कि मुल ।। फलल टके मणियों के जिसमें जो देखे लेले बुबुल ।। १ ।। बनी मुरस्सेकी जमीन और फोवार बिल्लौर के हैं । उस दरख्त के ऊपर बैठे हरक जानवर नरके हैं । फुनगी है पारस की उसमें रखवाले सव हुरके हैं। वह दरख्त नजदीक उसके खरीदार सब दूरके है ॥ सौदा उनके बने वहां पर करो न जो कोई शोरोगुल । फल लटके मणियों के जिसमें जो देखे लेले बुलबुल ।। २ ॥ उस दरख्त को हमने तो श्राबेहयात से सींचा है। बड़ी मसक्कत करीरे अपनी करामात से सींचा है। किसी से कुछ नहीं काम लिया अपनी ही जातसे सींचाहै । क्याकोईजाने इसको की कॉन धातु से सौचाहै ॥ हुआ वह जव तैयार तो शैदा बना मेरा ये दिल बुल्बुल । फल लटके माणियोंके जिसमें जो देखे लेले बिलकु ल॥३॥ उस दरख्तकी साया में हम टांग पसारे सोते हैं। अग. जायें कहीं तो फिर हम उसी तुरूमको बोते हैं। जहां पर अपना दिलचाहै वैसाही सजर सब होते हैं। बनारसी यह कहै कि उसपर कुरान पढ़ते तोते है ।। उस दरख्त के हवा लगे तो जंगर की आंखें जायें खुल । फल लटके मणियों के जिसमें जो देखे लेले बिल्कुल ॥ ४ ॥ तुम खुदा और शाख पयगम्बर बर्ग औलिया बली है गुल । फलहैं फकीर उसमें पूरे फर्क न वह समझे बिलकुल । - लावनी ऊपर उसकावीजह और नीचे जिसके लटके डाली। अब तरकी शवनम्है उसके बगवर्गपर उजियाली ।। माहो मेहर चौकीदेते दिनरातकरें हैं रखवाली । नस्शा उसका नवीन है जिनकी दोजहां में है लाली । अपने अपने दीन के पश्री करे हैं उसपर शोरोगुल । फल, उसमें फकीर पूरे फर्क न यह समझें बिल्कुल ॥ १।। जमीन उसकी ग्राससान है जहां से कुल जहांहुआ। वहांसे टपकानूर तो में माआकर पैदायहांह आ। फलहैं उसकी खुशबू जिसने पाई वह फिर निहां हुआ शरैहै उसकी तरहतरहदारी से शजरवहनयां हुआ ॥ वदत की लज्जत उसमें लेता है मेरा यहदिल बुल्बुल । फलहेडसमें फकीर पूरे फर्क नवह समझें विल्कुल ॥ २॥ जड़ उसकी वा- बा आदम जिससे इस आदममें दरहै । साया उसकी कुदरत और आलम जिसका यक आलम है। हवा है मामा हवा जिसे छूगई उसे फिर क्या गम है। याद इलाही जो कि कर वह इन बातों से मरहम है ।। नजर उसी को आये जिसकी गफलत का परदा गया खुल ।। फल है उसमें फ- कीर पूरे फर्क न वह समझे बिल्कुल । ३ ॥ सदा हैं उसकी कुरान जिसने सुनी उसे फिर होश हुआ। दिलमें अ- पने गौरकिया कुछ समझके यह खामोश हुआ । राज उसी को खुला कि जिसका जरा उधर को होश हुआ जी से कुछ नहिं कहसक्ता जो दिलमें जुनू और जोश हुआ। बनारसीकहैं उसके मेवेमें तो भारी हैं रहमका मुल फलहैं उसमें फकीरपूरे फर्क न वह समझें बिल्कुल ।। ४ ।। बुरा किया तो भला हुआ चोरी करने से माह वन m-T- ७८ लावनी गदा से होगये बादशाह बन्देसे अल्लाह बने ।। जात से हो बेजात जो कोई तो उसका वह दीनबने । शकल शवाहत बिगाड़े तब चेहरा रंगीनबने । इमानसे छोड़े इमान को पू- राजभी यकीन बने । लोमें सोल लूरके जले तो वो लो लीनबने । जबांकटी तब बोलने लागे फुटे नयन निगा- ह बने । गदाले होगये बादशाह बन्देसे अल्लाह बने ॥१॥ करके गौर देखा हमने तो आजाव से बड़ा सवान बने । ला जवाब गरसनमसे होतो खब जवाव बने । मय वहदत कहतेह उसे जो अश्कसे मेरे शराबबने । लज्जत शीरीमिले जब जलके जिगर कवाबबने । बुतखानेसे विहिश्त और मयखाने से दरगाहबने । गदासे होगये बादशाह बन्देसे अल्लाह बने ॥२॥ शिरको काटके अपने दस्तपर रक्खे तो सरदारबने । मालमुल्क सवतककर बैठे तो जरदारबने । तायर दिल्को क- भी न उड़नेदेतो वह परदारवने ।। जिन्दा उसको समझते हैं। हम जो मुर्दार बने । चलन से जब वदचलन हुए तो लाम कानकी राहबने । गदासे होगये बादशाह बन्देसे अल्ला- हबने ॥३॥लिसे कह सब हराम हमने देखा वही हलाल बने । घोलके जिसने लगा लिस्याही वह फिर लाल बने । जो कि हुये पैमाल जहां में वह साहने कमालबने । वना रसी के सखुन परं क्या ताकत कोई ख्याल बने । जमी से होगये आसमान और अखतरसे हम माइ बने । गदा से होगये बादशाह बन्दे से अल्लाहवने ॥ ४ ॥ मैं आशक हूँ रंजो अलम का गरये मेरे पास न हो। मुझ मरीज को तो फिर यकदम जीने की प्रास न हो।
AHMA । लावनी बेनी से उल्फत वेकली से याराना अपना । हि है अपना दोस्त ओ वतन् है वीराना अपना 1 आदी नकदी पास है खाना है गमखाना अपना । जीना यही हैं किसीके ऊपर जीजाना अपना ।। शेर-फुरकते यार वह क्या त्या मजे दिखाती हैं। वेकरारीही मेरे दिलको बहुत भाती हैं । नस्ल होताहे जो वो बात चली जाती है। इन्तज़ारीसे यह तविअत नहीं घबराती है। रंगर्जद नहींहो अपना ओ चेहरामेरा उदाम न हो । मुझ मरीजको तो फिर यः दम जीने की आस नहीं ॥१॥ जो आ शक सादिकहँ उनकी जीस्तजानका खोना है। यहीं खुशी है जो उसदिलबरकी यादमें रोनाह खाककेसोने से बत्तर पन्ना औचांदी सोनाहै । बजूसे बेहतर हमें अश्कोंसे मुंहका धोना है। शेर-पटक के आंसू जो रुखसार पर ढलको है। तो मेरी आंखमें जौहर एक चमकते हैं ।। ये मस्त दोनों हैं और दोजहाँको तकते हैं। दीवानादीदके हैं अब ये कब झपकते हैं। जोरजुल्म और जफामें अपना दुरुस्त होश हवाम न हो । मुझमरीजको गोफिरयकदम जानकी आस नहीं ॥ २ ॥ प्यास हमारी बुझती है इस खुने जिगरक पीनेस । वा फिक हुाहूं मैं अपनी बाहके जस शरीनेते । काम नहीं काशीसे मुझे नहीं सक्के और मदीनसे । और न भारत हमें मरने की न मतलन जीनसे । शेर-आतिशे इश्मसे जलके जिगर तरहोता है । - । प्रार लावनी जरसाये से शवनम के ये जबर होता है ।। श्री बेखवरीसे दिलहर्गिज न सबर होता है। नफा है इश्क में यही जो जरर होता है ।। गर्ने कल नहीं होवे हमतो काम इश्कका रास न हो। मुझ परराजको तो फिर यकदम जीनेकी आस नहो ॥ ३॥ दर्द है मारा दिल्बरहै हरवक्त इसीसे यारी है । वेदोंसे भी अपनी कु छ नहीं गल्ल गुजारी है। सूलीपर मंसूर न वो अनलहक सदा पुकारी है। जानगई तो वलासे नामतो उसका जारीह।। शेर-इश्कबाजी में अगर जानकी बाजी हो जाय । तो तबीअत यह मेरी खुबसी राजी हो जाय ।। चाहेहमपर हो जफा या दगावाजी हो जाय । रजाराजी है उसके जो वह राजीहो जाय ।। बनारसी कहै अगर्चे मेरा मुरशद देवीदास नहो। मुझमरी जको तो फिर यकदम जीनेकी आस न हो ॥ ४ ॥ कहा ये मुझसे रंजने गर्ने आशक मेरे पास न हो । तो दुनियां आशकी आशककी फिर रास नहो । इश्क है मेरा मकों ओ में रहताहूं उसीके खाने में । वह नहीं आशक कि जिसके द- द न होवे सीनेमें । तीरमें क्या है लुत्फ मजा मिलजाय जो निशानेमें । वस्तीमें नहीं गुजर आशकहें मस्तवीराने में सूखगया मजनू औ वह ताकत बनीरही मस्ताने में । अव ! तक जिसकानाम राशनह सुनो जमाने में । शेर-है कहां तकलीफ व तलुवोंमें जो चुभतेहैं खार । हँस पड़ा मंसूर तो शरमा गई उस जायेदार ॥ रंजये कहताहै श्राशक वह करे जो जो निसार । हरकदमपर तीरहो परदिल मेंहों वह जिक्रयार ।।
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लावनी
वोट न आशकसह औं अपना रंबूपानेकी प्यास नहीं । तो
दुनियामें आशकी आशरुकी फिर हास नहीं ।। ।। दम्भर
काहे रंज औ फिर राहत है कयामत तक वाच । उठाने
शिर पर अलम तो देख लुक इसमें क्या क्या। रंज यही
कहता है जो आशक पक्का हो तो इधर को आ। जुल्म से
मुतलक न डर और खौफ न अपने दिलमेंखा । शिरकोका-
टकर सरमदने जिसवक्त हथेली पर रक्खा । उसी वक में
नाम मुतलक न बादशाह का रक्खा ॥
शैर-करदिया तख्तातवाह देहलीकी अवउड़ती हैं धूल।
क्या खतासरमदकी थी थी शाहकी मुनलक ये भूला।
देखिये अब इसगुलिस्तां से वह कब आयेंगे फुल ।
गर करेथे अर्ज आशक तो खुदा को हो कल ।।
रंजने ये फरमाया आशक को मेरा कुछ पास न हो। तो
दुनियां में आशकी आशककी फिर रास न हो ॥ २ ॥ आरे
से चिरजांय नहीं धवरांय जो आशक है पसे । सीना सामने
करें दिलबर चोट मारे तक के। कभी न निकले मकांसे गर
वह लाख गजैके दे धक्के । दरे यारको छोड़नहीं जांयवह कारे
औ मक्के ।। जैसे जुआरी जोरू खोरक होजाद हैं भववरके।
तो भी अपनी जबांसे कहाकरें वह पौछक्के ।
शैर-इश्क में वाजी है शिर की काम दौलत का नहीं ।
इस्से बहतर खेल हगने और कोई देखा नहीं।
जिसने अपनाशिर न बेचा कुछ मना वरूघा नहीं।
आशको ने जीतेही जी तनु बदन रसवा नहीं।
लाखबजेके सदमोंमें गर दुरुस्त होश हवाश न हो।
तो दुनियां में आशकी आशककी फिर रास न हो॥३॥ खाक
में गर मिलजाय गौरसे गुल होकरके निकलते हैं । अजह
८२ 8 लावनी है आशक मर्ग के बादभी फूलेफलते हैं रोशनहो कुल आल में जो खडे इश्कमें चलते है। उन्हें देखकर जो पत्थरहों तो वह भी पिघलते हैं। देवीसिंह के सखुनपर शायर हरेक हाथको मलते हैं। चारों तरफ से वाह वाह करें औ बहुत उछलते हैं। शेर-ये कलामे मारफत है रंज से राहत मिले। जोकि डूबा चाह में तो फिर उसे चाहत मिले । गमअगरखाये तो उसको रोजाफरन्यामत मिले। दीदउसदिल्बरकाजीतेजी औं ता कयामत मिले। रंज ये बोला बनारसी से गर तू मेरा दाम न हो । तो दुनियां आशकी श्राशककी फिर रास न हो ॥ ४ ॥ वाग बाग हुआ आगे आलम आये बाग इरम के बीच । फल फूलके गिरपड़े हरएक फूल हरकदमके बीच ॥ जुल मुस- लिसल देख पेंच में आया सम्बुल चमनके के बीच । नननेतेरे शरमदी नरगिस कालेहिरणके बीच ॥ फूलरहीहै फुलवारीवो प्यारे तेरी फवन के बीच । कद पर सदके करूं में सर्वसही गुलशन के बीच ॥ शैर-करूं तलवपर तसदुकलाल गुललाल के दो टुकडे । औ ददां मोतियां देखें तो उनकी आव सब उतरे ॥ अग मुमुकराके और करै गर कुछ बात तू हंसके। तो होवे वेकली हरएक कली फूटै खिलें गुंजे ।। कौनवोहखुशबू जो वखी है नहीं तेरे दम कदमके बीच । फूलफूलके गिरपडे हरएक फूल हरकदम के बीच ॥ १ ॥ खसारों को देख गले गुरु गुलाब तेरे। लगन के वीच। सदा सुने तो धुनेशिर तूती आगिलगे अगन के बीच ॥ भरा हुऔह चाह हुस्नका आपकी चाहे जकनके बीच ।
८३ morammarAmw- ६ लावनी हुव गये हम न दहशत करी जरा इन मन के बीच ।। शेर-फिदा दिल है गुलेराना तेरे ऊपर हरेक गुलका । दिखादे बहारी और पिलादे जाम उस मुलका ।। मचै वो कहकहे और चहचहे गुल होतजम्मुलका। खुले परवाल कुमरी के कहा लेमान बुल्धुलका। शाख शाख हो हरी शजरकी लगें कमल हर कमलके बीच फूल फूल के गिर पड़े हर एक फूल हर कदम के बीच ॥ २॥ नज़र पड़ी जिसवक्त गुलिस्तां की तेरे परहनके बीच । चाक गरेतांकिया गश खाके गिरे कुल धरन के बीच वह नजाकत आपमें ये हैं कहाजुही या समनके बीच । मनवन के सब फूल फूले हैं तेरे योवन के बीच ॥शर ॥ हुआ मुर्गाने चमन का दिमागतर बूसे । महकआनेलगी उलफतकी वो तुझ गुलरुसे। सिफतमें किस तरह तेरी करूं कोंन मुंहसे । खार की बातन तूने करी कभी मुंहसे ।। लगी चाटने तलवे तेरे आह तेरीश- बनम के वीच । फूल फूल के गिरपड़े हरएक फूल हर कदमक बीच ॥३॥ सुरझाया दिल हरा हुआ हुई गुलजारी गुलबदन के बीच । खिजां का मुतलक नाम नहीं रहा गुलों के वतन के बीच ।। झुक झुक के सब करें डालियां सिजदा तेरे वरन के बीच । कहै देवीसिंह ख्याल तौहीद मारफत सबुन के बीच ॥रीर ॥ खिचा नक्शा मेरे दिल पर है वह तेरी सफाई का । वसी तस्वीर आंखों में भार हैं जन्नग इलाही का ॥ किसी को ताज बख्शा और किसी को तख्त शाही का । गदाई हम को दी जिस में दिया दात्रा खुदाई का ॥ वनारसी कहे गजव झलक है तेरे कदम WALK r लावनी के पदम के बीच । फूल फूल के गिर पडे हरएक फूल हर कदम के बीच ॥ ४॥ कुचे जाना में गर कोईधरके जरा कदम निकला। फिर वां न निकला उसी कूचे में उसका दम निकला । ये है रास्ता सख्त गर कोई इसमें नागहा श्रान पडा। जानबूझ के फिर वो देताहै इसी में जोन पडा।कहीं तपिश में तपे कहीं काटों का नजरमैदान पड़ा। कदम कदमपर अब हमको लुक्क इश्क का जानपड़ा। शेर ।। हमें गुलशन से भी वहतर है इश्क के कांटे। ये फर्श खारके तोफा है मुझे मखमल से। कहूं में किस्से सुनेकौन इश्क के किस्से ॥ जो देखें हाल हमारा तो कैसाभी हो ससकारहा. वहांका वहीं देखने जो अपना हमदम निक- ला । फिर वो न निकला उसी-चेमें उसकादम किकला॥१॥ मजा चाहका जिसने देखा होगा वह इवाहोगा । वहरे इश्क में जो तेरा होगावहहबाहोगा । अश्क चश्मसे जिसके बहता होगा वह हवा होगा। चाहे जनकपर जो शैदा होगा वह डूबा. होगा।शैिर.।। बहरे उलफतका किसी को भी किनारा न मिला । या खुदा ना खुदा का वहाँपर इशारा न मिला ।। किश्ती हरगिज न मिली कुछ भी सहारा । मिला न थाह मुलकत, न मिली दम भी गुजारा न मिला ।। लगा न थल बेड़ा उस जापर से न कोई आदम निकला । फिर वह न निकला उसी कूचे में उसका दम निकला ॥२॥ इश्क को 'जो देखा तो खड़ा है मेरे शिरपर दार लिये । हुस्न को देखा तो वह धमकाता है तलवार लिये । जल्फ यही कहती है कि मैंने कितनेही आशक मार - लिये । चश्म ॥ लावनी इशारेकरें हैं जाद के हथियार लिय।। कीन इस काल के मैदान निकल जायेगा। किसतरह काकुलेपेचां से निकल जायेगा । कोई नइश्क के तूफां से निकल जायेगा। न निकल जायेगा गर जांसे निकल लायेगा।। तानके अवरू त जिनपर वहलेके तेगे दुदम निकला। फिर वह न निकला उसी कूचे में उसका दम निकला ॥३॥करल हुआ वह जिमने इस मैदां में आके कदममारा । गिरा जमी पर न उसने आहकी औ न दममारा।। उसके हुस्नके आलमने एक आलमका आलम मारा । कई देवीसिंह गया मभी इस्में उसदममारा ॥ इश्क ने दारपरमंसूर को चढ़ाया है । हुस्न ने यार के कोहनर को जलाया ।। तर ने जिसके हरयस नूरको बनाया है । शहूर उसने वेशहर को बताया है बनारसी करतर्कजहां को सीधा राह अदमनिक- ला।फिर वह न निकला उसी कूचे में उसका दम निकला। जुलक सिआसे मार सिआ है चश्म से लाली मुल में हैं। कश कदका कयामत धूम यह आलम कुल में है ॥ सर से हर सरदार बने पेशानी से जलने खुरशीद । त्रीने ज. बींकी यह है तहरीर न जिसकी दीदो सुनीद ॥ श्रवरू भुकी कमां औ पैदा हुआ फलकपर माहेदई । खजरे बुर्राने पाई बाढ़ किया लाखों को शहीद ॥ शर॥ है कुरा वह जो बिस्मिल्लाः अवरू से वनी । ओं चली की तेग भी बल्लाह अबरू से बनी। और सिफ्त क्या क्या क में कहा जाता नहीं । जो चला झुमके तो उन की रात अबरू से बनी ॥ तुझ गुलका चर्चा गुलेराना यही नो हर बुलबुल में है । नकशा कदका कयामत धृम यह आ. । HAIRAMROMAMR.
८६
लावनी*
लम कुलमें है ॥ १॥ मिजैसें पैकावने ओ नस्तर चुभेरंग
जांपर आकर । खार भी उसदर खटकने लगे मेरे वहां पर
आकर ॥ निगाह से वह तलवार चली सो लगी नीमजांपर
आकर । आहवी मुतलक न ठहरी मेरी जवां पर आकर
।। शैर ।। है शरारत वह तेरी चितवनमें ऐ रशके कमर । हो
रहा जीसे जहाँके बीचमें जादूसे हर ॥ लड़गई जिस शख्स
की वह आंख तेरी आंखसे । फिर उसे तेरे सिवा कुछ भी
नहीं आया नजर। वही जिक्र मय खानेमें औ यही सदाकुल
कुलमेंहै । नकशाकदका कयामत धूम यह पालम् कुलमें है
॥२॥ वीनी से बना अलिफ तेरे रुख से वह पैदा नूर हुआ।
जिसकी झलकसे गिरामूसा औं खाक काहे तुरहुया ! लब
से लाल यह मन बने याकूत वह वहीं ज़रूर हुआ। औं द.
न्दांसेबने गौहर तो क्याही जरूर हुआ। शेर ।। है झलक
हीरोंमें ऐप्यारे तेरे दन्दान से । बर्क भी चमकी वही दांतों में
तेरी शान से ॥ो जवा से वर्गगुल पैदा हुआ रंगीन वोह ।
हरसखुनशी तेरा निकले है क्याही आनसे । वादे सबा कह
ती है यही औ वही जिक्र हर गुल में है । नकसा कदका कः
यामत घूम यह आलम् कुलमें है ।। ३। चाहे जकन से आ.
शक सादक के दिलमें वह चाहहुई । लगा झांकने कुएँ जिस
जिस को उधर निगाह हुई ।। गले से मीना बना सुराही भी
उसके हमराह हुई । कहैं देवीसिंह सिफत किस्से तेरी
अल्लाह हुई । शेर ॥ थक गये लाखों हि शायर करके सब
तेरावयां । पर न पाया राज- तेरा तृतो है राजे नियां।
किसकी ताकत है जो हो आगाह तेरे हुस्न से। यक
लावनी झलकमें गिरपड़ा मूसा भी होकर नातवां ।। बनारमी न यही लिखा कवि काशी गोकुल में हैं। नक्शा कदका कयामत धूम यह आलम कुलमें है ॥४॥ आशक मैं हूं उस गुलका जिसपर फिदा है सारे गुल ! वहार में भी न जिसके नाम खिजाँका बिलकुल ॥ सदार सरसन्ज वह उसकी महक से मस्तानापन हो । दीद उस गुल की करता दिलमें दीवानापन हो । अदासे उस शमशादकी आशकमें तो आशकाना पनहो । क्यों नहीं गुंचे खिले जर उसमें मुसकराना पन हो । शैर ॥ बनाये क्योंन उसगुलशन में कुमरीआसियां अपना। गुले गुलजार गुलरू और जहां हो बागवांअपना। नहींसयादकाडरकुछ न मुतलकखौफना अपना ॥ मकाहे लामका अपना निशा है वे निशां अपना। गुचेभी यही चटक चटकके करें चमन में शोरो गुल || बहार में भी न जिसकेनाम खिजांकाह विल्कुल ११ पेंच से जुलकोसियः फामसेदाम इश्क पंचा बनजाय । सुरक्षेखुतन भी महके जुलो से वह परेशां बनजाय । बालसे आये वह वाल सम्बुल प- रजा जल्फ वा बनजाय ॥ नाफै आहू का मुँह काला हो घासे रेहा बनजाय ॥ शेर ॥ पडे झुमर वो उस्के रुखार ज- फोका जो मुँह खोले । तो अशरत का हिंडोला देखकर खाये वह झकझाले ॥ और काकुल सम्धुले कालना मुँह से अपने कुछ बोले । यकीए है कि पनिके लिये जहर घोले ॥जुल अम्बरीहे या सोसन गुलहे नेरीकाली का दुला बहार में न भी जिसके नाम खिजांका है बिलकुल ॥२॥ वस से नागिप शमिन्दा हो सर को झुकाये खड़ा रहे ।। 444M-RAN
बावनी
आँख उस गुलसे कभी मुतलक न मिलाये खड़ा रहै । कदसे
सर्वसनोवर गुलशनमें गड़जाये खड़ा रहै । दहनसे गुंचातंग
होक शमोया खड़ा रहै ।। शेर ।। सफाई देखकर उसकी समन
में लाहो गुलशनमें । वो नाजकपननही में जो कुछ है यार
केतनमें ।। बिनादेखे हथेलीको तो खु उगला कर मनमें । सदा
उसकी सुने तूतीतो फिर भाग कोई बनमें।। शाखशाखपै यही
चहचहा करताहै शैदा बुलबुल । बहारमें भी न जिसके नाम
खि नाका है बिलकुल ॥३॥रश्के चमन गुलबदनको मुलदेखेतों
गरेवाँ चाककरै । हरएक गुलिस्तांको वो यकदम् भरमें दम
नाककरै । गर्नुकोईमुर्गाने चमन्जो उससे मुहञ्चत पाक करें।
बहरे इश्क का खुदा उस आशक को पैराक करें ।। शैर ।।
सवा आई जो गुलशनमें तो उसकी क्या बिथा बन आईहै।
नही वाकिफ था जिस वू से वो सब उसमें समाईहै ।। न मुत
लकखार गुलशन में न कुछ गुलकी बुराई है। नहीं दिल
में लगा वो बुल वहां जलवे खुदाई वनारसी को उस
गुलरू ने पिला दिया वो जाममुल । बहार में भी न जिस
के नाम खिजा काहे बिलकुल ।। ४ ॥
जल्फ को तेरी मार कहै तो मार मार से कटवाऊं । स-
म्थुले पेंचा कहै तो पेंचमें मैं उसको लाऊं ॥ कदसे सबकी
निस्बत दे तो खोदके उसको गाडूं मैं । अगर सनोवरकहै
तो चमन से अभी उजाडूं मैं ॥ चालसे निस्वत दे जो फील
कीलातसे उसे लताडूं. मैं ॥जये मरजाँ कहै तो दस्तकेअभी
उस्वाइँ में । काकुल को गर दम कहै तो जाल में उसके
जलजाऊं। सम्बुले पेंचा कहे तो पेंच में मैं उसको.लाऊ॥१॥
लावनी चश्म तेरे नरागस जो कहतो अांखलो उसकीफोहमें । दल्दा गौहर कहै तो दांतसव उसकेतो. । दहनको गुचा कडेतो उसके मुंहको पकड़मरॉइम । जानके निरवत येदें तो जानन उसकी छोईमें । अगर तेरीकाकुल उलझे तो क्योंकर उसको सुलझाऊं। सम्वुलेपेचांकहैतो पेंचमें में उसको लाऊं ॥२। जकन को तेरे चाह कहै तो कुए में उसे डुवाऊ में । पेशानी को कह खुरशेद तो उसेघुमाऊं गलेकोमीनाकहतो गर्दनउसकी अभी कटाऊमें।। गेसूको कहै घटा तो उसका वटाके सतवाम आ सम्वुले पेचा कहै तो पेंवमें मैं उसको लाउं ।।।। जवांको तेरी कहै बर्गगुल उसकी जवां निकालू में । हिलाले अवरू कई उसके टुकड़े करडालूं में ॥ सीने को कहे आईना तो उसे न देखू भालू में । कमर को तेरी अगर मुह रहे तो उसे छिपाल छिपाले में ।। बनारसी कह तेरे वालकी कहीं भी निस्वत सुनपाऊं ॥ सम्बुल पेचा कहें तो पेत्र में में उसको लाऊं ॥४॥ रंज को हम राहत समझे और दर्द को हम दिल्वर समझें। गमको अपनी गिजा समझें और सुफललीको जर समझें । अलम को समझें ऐश और मरने को जि- न्दगानी समझे जिफा को समझेवफा खफाको महरनानी समझें मुठको सचतमझेंलेवास हम ततुकीउरियानी समझे। आवको समझें हमपातश आतश को पानी समझेजर को समन जवर औरकमजोरको जोरावरममझेगम को अपना गिजासमभीर लावनी मुफलसीको जरसमझें।। १॥मुर्देको जिन्दा समझे औरसितमको बडारहमसमझें । फनाजहांकोसमझें हरदमकोमुल्क अदम सम झैं ।। बदीकोसमझें नेकी दुश्मन को अपनाहमदमसमझें। जहां समझें वहां पर हमतो वोही सनम समझे। नादा को दाना समझें और फिकको बड़ा फखर समझे ।। गमको अपनी गि जा समझे और मुफलसी जर समझे ।। २।। गुल को समझें दाग दाग को हम अब गुलदस्ता समझें। उजाड सम झे शहर को सहरा को बस्ती समझे। जख्म को गुल लाला समझें औ रोते को हंसता समझें । दीवाना को अल्कवर सिडी को हम मस्ता समझे ॥ आहको समझें याद यार की अश्कों को गौहर समझें ॥ गम को अपनी गिजा समझें और मुफलसी जर समझें ॥ ३॥ मार को समझें प्यार पार को गाली वही दुआ समझें । बेजाको हम बजा समझें औ मर्ड को सफा समझें ॥ झक हम आशक समझें माशक को वही खुदा समझें ।।। क्या कोई समझे जो हम समझें वो और कोई को क्या समझें ।। वना रसी का हरके सखुन आशक का खूने जिगर समझें। गमको अपनी गिजासमझें और मुफलसी जरसमझें ॥४॥ चाह को समझे चाहे जकन जंजीर को हम जेबर समझे । खाक को समझे पैरहन जमीं को फरशे तर सम झै । सत्र को समझे शुक्र और नातवानी की ताकत सम- झे। खार को समझे चमन औ हिज को हम उल्फत समझे ॥ तलख को समझे शारी दिल में जहर को हम इसरत समझे। सङ्ग को समझे मोम और आफत को mum +--- । लावनी ९१ अशरत समझे ।। दार को समझे शार का जीना तीर को। तेरी नजर समझे । खाक को समझे परहनजमी को फर. शेतर समझे ।। १ ।। सुबह को समझ शाम शाम को अब हम : परवाना समझे । माह को समझे मेहर और धृय शामियाना समझे ॥ वहशत को वहदत समझे रोने को तान ! गाना समझे। गन को समझे मुसलमां मौत दो जी जाना समझे ।। मां को अपने समझे लामझ मनम का डूंचादर समझे । खाकको समझे हरन जमी को फरशेतर समझे ॥ २ ॥ जुल्म को समझे जशन सुते खूखार को अब खूबा समझे । तेग को समझे अबरू नस्तर को मिजगां समझे ॥ कयामत को दुनिया समझे कातिल को अपनी जां समझे । कैद को समझे रिहाई विजां को बागेजही समझे ॥ रुसवाई को इज्जत तौकीर बड़ा वर समझे । खाकको समझे पैरहन जमीको फरशे तर समझे । ३ । खौफको समझे खुशी औ हैरानीको शेरआलम समझें। ग- दा को समझे शाह गदिशको फजलोकरभ समले। दोन- खको समझे वाहिश्त औ पाप को बड़ा धरम समझे । और जहां कोई नहीं समझे जो कुछ हम समने ॥ देवीसिंह को बनारसी के सखुन को कौन बशर समझे । खाद को समझे पैइरन जमी को. फरशेतर समझे । ४ । इश्कहे खानेरज पर इसखानये रजमें राहत है । न्नुक उसी को हो हासिल जिसे इश्क की चाहत है। इसमें जो जाना है हम्ने समझा है यही जीजाना है। जानाजाना के दर पर जान बेंच कर जाना है । उल्फत में सलवा होना Marvtawwaran १ ९२ लावनी बस यही आबरू पाना है । नादाँको दिले दिया जिस जिसने बोः पाशक दानाहै शेर।. फंसे तो इश्कके फन्दे में वो दुनियाँसे कुलछूटे मजेलूटे । उन्हों ने जिनके सब घर दर गयेळूटे । हमेंबोखार देते हैं जो गुलशन में हैं गुल बूटे । खटकतेहैं मेरे दिल पर वो काँटें लगके जो टूटे । इश्क के बीमारोंकी रोशन आलम बीच शवाहत है । लुत्फ उसी को हो हासिल जिसे इश्ककी चाहत है । १ । जिगर जलाना आशक के हकमें ये बडी तरावट है। आतशे गमक अवअप- नी श्राठोपहर लगावट है । तनुकी उरियानीको हम समझे ये खुज सजावटहै । इश्कमें बिगडे जो आशक उन्हीं की बनी बनावट है ॥ शेर । हुआ जो इश्क में मुफलिस वही जरदार होता है। कटाये शिर जो उल्फत में वही सरदार होता है। जो दिलको छीनले दिल्बर वही दिल्दार होता है । और आंखें बन्दकर देखे उसे दीदार होता है । जोरावर है वही इश्कमें जोके हुआ न काहत है । लुत्फ उसीको हो हासिल जिसे इश्ककी चाहत है ॥ २॥ कैद जहां से छूटै वही जो दामे मुहब्बतमें फंस जाय । निकळे दोजखसे जो इश्ककी आत- शमें घसजाय ।। किसी के बशसें कभी न हो गर वो दिलबर दिलमें बस जाय । करै उसी से रसाईं कभी न जिस गुळका रसजाय ॥ शेर ।। सुहब्बत मे जोदिलदगा वही बेदाग होता है। नफाहोता है उसको जो कि जर उल्फत में खोताहौ।वो हसता है सदा जो उस सनम के गममें रोता है । मिलाये तनुको मिट्टी में वो अपने मनको धोता है । मजा इश्क का यही कभी राहत है कभीकराहतहै। लुत्फ उसी को हो हासिल ६६ लावनी जिसे इश्ककी चाहत है । ३ । गमखाना आशया के हवाले ये न्यामत से बहतर है। हरयकमकां है उसीका जिम्मा कही न घरदर है।। उसे खौफनहीं किसीकाहं जिसको उस दि-1 लबरका डरहै । अपने आपको जो पहिचान वही अल्ला अकबर है। शेर । पढ़े नहीं इल्म का दफ्तर अलिफ वे ते न हम सीखे । न तख्ती हाथसे पकड़ी न कुछ ना क- लमसीखे । फकत इस इश्क के मस्तव में हमनामे सनम सीखे । सिवा उल्फत के और हम कुछ नहीं अपनी कसम सीखे ॥ देवी सिंह कहै वनारसी के सखुन में बड़ी पमाहत है । लुत्फ उसीको हो हासिल जिसे इश्ककी चाहत है।॥ ॥ जिधर को देख इधर रोशनी आफताब तपाम हैं । पिऊँ न मय में क्योंकर जिन्दारहूं मेरायह कलाम है ॥ चश न- ही है हमें खुदाने आप गुलावी जाम दिये । मये दीदके प्याले भर भर मुझे बरसरे आम दिये ॥ चली वह नादेशमा इसकदर हाथ इमारे थामलिये । तौभी परी पैंकर ने मेरेमुह लंगावो आठो जाम दिये। कहै जो इसको हराम उसका खानापीना हरामह। पिऊँ न मयमैं क्योंकर जिन्दारह मेरायह कलाम है। एक तरफ भातशभड़के औं एक तरफ वा रिश आवहै । मेरे दिलके. मय खाने में दोनों तरफा हिलान है। जिगरमें शोला उठ और चस्मोंसे टपके शराब । जना यही कहती है मेरी लज्जत इसकी लाजवाब है। मुन्टजहानों सुना हो मस्ताना मेरा नाम है। पिऊन मय में क्योकर जिन्दा रहूं मेरा यह कलाम है। २। दिलमें गर देखी तो फिर दारे हमारा आयाहै। आज हमें साकीने दुवारा सागर आप -
लावनी
पिलाया है । देख मेरी बदमस्ती को मोहसिबने यह फ.
माया है । यहजोश वहशत कहाँ से तेरी नजरो बीच समाया
है। कहा यह मैंने आंख हमारी मय वहदत का गुदाम.
है । पिऊ न मय मैं क्यों कर जिन्दा रहूं मेरा यह कलाम है
॥३॥ सुना सखुन योहतसिब ने यह तब उसके दिल में
होश हुआ। या तो मने करता था मुझे या आपी वहम
बनोश हुआ ॥ चढ़ानशा जब इश्कका उसको जहां से वो
बेहोश हुआ। कहा पिऊंगा में हरदम इतना कह कर खामोश
हुआ। बनारसी कहै हमैं तो इसदारूका पीना मुदाम हुआ
पिऊँन भयं मैं क्योंकर जिन्दा रहमेरा यह कलामहै ।।४।।
आतश इश्ककी भड़क रही है इस दिल के मयखाने में।
मये मुहब्बत पिलादे साकी उल्फत के पैमाने में || यक ताई
का आलम हो औ वहदतका हो रंगभरा । तुझ गुलकी
हो खुशबू जिसमें वह शराब तू पिला जरा । गमकी होने
गिजा साथमें वह खासा हो पास धरा ! और सारफत का
हो मीना करामात का कामकरा ॥ आफतापकी होवे रो.
शनी मेरोदिल दीवाने में । मये मुहब्बत पिलादे साकी
उल्लत के पैमाने में !! ९॥ मस्ती का हो शब्द हरदम दादे
सबाभी चलती हो। और गुलाबी मोसमही हरगुल से
महक निकलती हो ।। बाजे वीन औ स्वार औ काफूरी
शमा भी बलती हो । जिस महिफिल को देखके हरमोहत
सिबकी छाती जलती हो ॥ भड़क उठे शोलएनर पहलू
में मेरे शाने में । मये मुहब्बत पिलादे साकी उल्फत के पै.
माने में पास हमारे दिलबर हो फिर और सदाएकुल
।
ह लावनी कुलहो।। जोश जनूभी दिल्में दो कहकहा भीहो शोरोगलहो। शीशा सागरसुराहाहोओरगुलस्तान गुंगुलहो । हायमें हो दिल्बर का हाथ हरवात में वह जिकरे सुलहो । कवाय की लज्जत हुई हासिल अपना जिगर ललान में। मये मुहध्यत पिलादे साकी उल्फत के पेमानेमें।।शादीदार तेरा दारू सपा जिसे मिला वह मस्तहुआ। बदमस्तो में बैठ वैठकर बना रसी अलमश्तहुधा । चांदसा चेहरा देखतेही तेरा वह सूरज अस्तहुआ। दस्तगीरवहहुना कि जिसका तेरे दस्तम दम्त हुआ। कहै विश्भरनाथ मज़ाहकमारफत गाने में । मये मुहब्बत पिलादे साकी उल्फत के पैमाने मे ॥४॥ पानकी लालीसे जो मेरे वहदिलवरके लबलाल हुये। लाल वदखशां से भी वहतर पैदा अब लाल हुये ॥काकुल से काल हुये पैदा जुल्फ से अफई मार हुये । पेशानी मे नूर टपकता तो फरिस्ते चारहुये ।। अवससे खम खाखा के खजर बिछुये खमदार हुये । औं मिजगां से तीर पवार शतर पुरकारहुये ॥ शैर ॥ चश्मसे पैदा हुआ नरगिम हरेक गुलजारमें। और वो वीनी से अलिफ खीचा गया हरकार में॥है वह जल्वा कुदरती दोनो तेरे रुखसार में। जिस में रोशन चांद औ सूरज है इस संसार में पानी की रंगन पाकर ददां गौहर से जब लाल हये । लाले बदखशा से भी बेहतर पैदा अब लाल हये ।।१॥ जवांसे पैदा करी हुआ औ अक्ल से इल्म हजार हुये। चाहे उजनकमे चाहक दिल में खुद ब खुद गार हुये । गुलसे बनीसुराही गुलशन तेरे गले के हार हूये । हुस्न से तेरे परी पैकर बनकरतयार लावनी हुये । शेर ।। तेरे सीने की सफाई से सफाई होगई। ताकते वाजू से अब ताकतसवाई होगई हाथसे तेरे सखावत की सखाई होगई । पजये मरजाँसे लग लाल हिनाई होगई ।। देख के रंगी लाखुनोंकी शरामिन्दा तपलाल हुये। लालबद. खशांस भी बेहतर पैदा अब लालहुये ॥२॥शिकमसे नरमी बनीकमरसे पोशीदा सब हालहये । औ जानुस तेरेदो नरके थम्भकमालहुये । कदमसे सिजदाबना और पा छूने को सात पताल हुये । चालसे तेरी बनगये फीलन वह वैचाल हुये ।। ॥शेर। कसैतेरे अबतळक सर्वेचमन आबाद है। औरअदा तेरीसे आशकका सदादिलशादहै । नाजसेतेरे बनी अदाज की बुयदहै । इरसराय से सरापतिराही ईजादहै । जो पत्थर तलुओं से तेरे लगगये वह तो सब लाल हुये ॥ काले बदखशां से भी बेहतर पैदा अब लाल हुये ॥ ३॥ ठोकर से तुझ जाना की लाखों मुर्दै उठ खड़े हुये । आपके पायेन. कश है मेरे दिलपर पड़े हुये ।। तेरी चचलाहट से सद में वर्क के दिलपर बडे हुये । कदम वोसीमें तेरी हम दिलों जान से लड़े हुये । शैर । शेरहक्कानीका कहना कुछनहीं आसान है । यह सखुन समझे वही जो आशके मस्तान है। देवीसिंहकी शायरी पर दिलोजां कुर्वान है । जिस के हरनुक्ते के ऊपर हर शख्स का ध्यान है। बनारसी के खने अस्क सब टप के यारबलाळ हुये । लाले बदखशां से भी बहतर पैदा अब ळाल हुये ॥४॥ काकुलपुरखम आरिज रोशन दोनों को क्या यार लिख । मार जुल्फका औ रुखको हरदम शोलेमार लिखू ।
- में . लावनी निस्बत है ये बेजा गरचे मुंजीपूर शरार लिहूं । दाम हुमा का जुल्कको रुखको हुमा इजहार लिवू ॥ अच्छा नहीं है ये भी तशी क्या तायर परदार लिखें । मन्बुले, तर जुल्म को वरगे समन रुखसार लिखे ॥ ये मजे हैं। जीके इनको होके लाचार लिन् । मार जुल्म और रुखको हरदम् शोलेमार लिम्बू ।। १ ॥ काकुल का में कालीघटा औ रुखको बर्क आसार लिम्वू । घटाके नि. स्वत न इन्से दून बर्क बेकार लियूँ । उसको तो जुल- मात लिखू और हवां उसे हरवार लियू । वह तो पुर. खमनहीं और वां नये जिनहार लिखें ।। काकुल को में लैललिखू आरिज के तई निहार लिखा। मार जुल्फ को और तावको हरदम शोले मार लियू ।। २ ॥ गरदिश में लैलोनिहार हैं कहां तलक दिल्दार लिखु । उसको ही नौ उसको सुनिये लाले जार लिंबू । तशनी उसो हेरा पुरदाग है वह क्या खालि । रुसको कुरजां विरह पन काकुल को जुत्नालिस् ।। इनसे झगड़ा हिन्दू मुसल्मा हंगा क्याइसरार लिखू । मार जुल्फको और रुखको हरदम शोले मार लिख ॥ ३ ॥ रुख को हरदम् शमये रौशन काइल को घुआंधार लिन । येभी गलत है और तशभी इसझी यक बार लिस् । उसको. मौजे बहर लिरन उसे आईना देदार लिस् । मौजनयकजाँ आईना हैरां ये क्या शार लिर्वे ।। इ, फ सुर्वेदा बनारसी रुख नरे हक्क गुल्जार लि । माद जुल्फ को और रुखको हरदम शोले मार लिदै ।। ४ ।। नाजो अदासे चली नाजनी दो जुल्ल लटका लटका । .
Fe लावनी8 लटका आला दिखाया जब उसले लटका लटका ॥ देख तमाशा उन जुल्लोंको फैमा दाम में कुल आलम् । पेंचमें उसके पड़ा है यारो ये विनकुल आतम् ।' ऐसा बांधा खेंच जुक में मबारहा है कुल आलम् उसके फन्द से कहो अब क्योंकर जाये खुल आलम् ।। नशेमें है सर सार पीकर गेसु ये जहरका सुल आलस् । हुआ दिवाना देखकर उसकी वह काकुल आलम् ।। फेर में जुल्कों के फिरता है कुल जहान भ- टका मटका । लटका आलम् दिखाया जब उसने लटका टळका ॥ १ ॥ गदा अम्बिया शाह औलिया और जुल्फ देख गरदं । महक से उसकी होवे सब मस्त औ आये दिल में जन ॥ जुल्कों अम्बरी देखके आलस् आशक होगया गना धूलाम कहूं मैं या इनको लामकान अलिफ लिखू | जिस दम उसने बाल मरोड़े लाखों अफईका आखू । सबके जह र को निचोड़ा क्या ताकत कर कोई चूं ।। कालने शिरको पटका जिसदम् उसनेलटको झटका। लटका आलम दिखाया जब उसने लटका लटका ॥२॥ हिला हिलाके जुल्फ दुता कितनों के तई हलाल किया। मारमारके मार सदहा को हा ल बेहाल किया। मशरिक से मगरिव तक उसने अजबजु. लका जालकिया। उसके बीच में डालकर कितना. पेमाल किया। जिसदम् उसने जुल्फवनाके टेढ़ा बांकाबाल किया कालभी उसको देखकर डरा औ अपना काल किया ।। फटकारा जब जुल्कको उसने कोई सामने नहिं फटका । लटका आलम दिखाया जा ने लटका लटका ॥ ३ ॥ दोनों रुखसारों के ऊपर लटलटकी बूंघरवाली। गोयामाहके --- ॐलावनी गिर्द घिर आई घटा काली काली ॥ लटकाके जब दुल सनमने इधर उधर रुखपर डाली । क्या क्या कर बनाई अजब यह कुदरत की जाली ॥ देवीसिंह के छन्द रंगीले और सदा भोली भाली । सुने से जिस के हुई हत्या शायर को खुशयाली । गतलब है तोही जुल्फ में और मारफतका खटका । लटका आलम् दिखाया जब उसने लटका लटका ॥४॥ फकीरीखुदाकोप्यारी है। अमीरीकोननिवारी हैं ॥ बदन पर खाकहै सो अक्सीर । फकीरोही है यहीजागीर ॥ हाय बांधखडेरहअमीर । बादशाहहोया होवेवजीर। सदायहसच्च हमारीहै । गदाकीखुदासेयारीहै । फकीरी खुदाको प्यारीह।।१।। है इनकानाम सुनोदुर्वेश । कोई नहिं पाये इनसे पेरा। खुदा सेमिलेयहरहहमेश । कोहनहिंजानेइनकावेश । कभीगिरियां औजारीहै ॥ कभीचश्मोंमें खुमारीहै । फकीरीखुदा को प्यारी है। ।। है इनका रूतबाबहुतवलन्द । खुदा के तई यहहुआ पसन्द ॥ पादशाहसे भी यह बनेदुचन्द । इन्हें मत चुरा कहो हरचन्द ॥ इनकी दिलपरअसवारीहै । ऐसीनहिं कहीतयारी है। फकीरी खुदाकोप्यारी है।। ३॥ चीघदेशाळमे हैं आला । चश्म हरतालसे हैं आला ॥ चनेभी दालसे हैं आला । लन हर चालसेहें भाला ॥ जखम जो जियरपरकारी है वहीदिलपर गुजारी है । फकीरी खुदाकोप्यारीह || ४ || पी वमें पड़ा जोहे छाला। वहमी मोतियों मेहे घाला ॥ हाथ में वटासा प्याला । जाम जमशेदसे भी आला ॥ अगरकोई हफ्तहजारी है । वह भी इनकाही भिखारीह 1 फरारीमुदा . - लावनी * को प्यारी है । ६ । मकालामकाफकीराका । निशांवनिशांफ- कीरों का । फखहै निहांफकीरोंका। खुदाहैइमांफकीरोंका । ताकत सब वह भारी है । मौततक जिनसे हारी है । फकीरी खुदाको ग्यारी है ।६। बढगये बालतो क्या परवाह । उतर गई खालतो क्यापरवाह । आगया मालतो . क्यापरवाह ।। हुये कंगालतो क्यापरवाह ।। खुदा तु जनावे वारीहै। का- शीगिरिको यादगारीहै । फकीरी खुदाको प्यारी है ।। ७॥ कहो किस्में देखदेखाआलम में कुलहमीतोहै। कहीं पैगुल, कहींपरआशके बुल्बुल हमीतोहैं। कहीं अनलहक बनें कहीं मनसूर कहीं परदारह हम । कहीं पर सरमदकहीं सरलेनेको तलवारहै हम । कहीशमतबरेजकहीं खुरशदउसीके यार हम । राहीएक है कहींपर देखो विनाशुमार हैं हम कहीं बनेखामोश किसी जां पर शोरगुल हमतिा है। कहीं पैगुल, कहींपर आशके बुल्वुल हमींतोहैं।।।किसी जगह पर शेरे कहीवेशमें बोले हमी तो है । कहीं ३ स्याने कहीं पर बोले भोलेहमी हे तो। कहीं पर आतिश आव कहींपर पड़े फफोले हमी तोहैं । कहीपरत्ती कहीपरमाशे तोले हनींतो हैं। कहाँ व नेमयखोर किसी जापर साकी मुल हमीतो है । कहीपर गुल है कहीं पर आशंके बुल्वुल हमीतो है ।२ । कहीं. पै बन्देवने कहीं परं खुदा खुदा का नूर हैं हम। कहीं पर मुसा कहीं जल्ला और कहीं कोहनुर है हम ॥ कही किसी के पास और कहीं किसी से दुरहै , हम । कहीं मलायक कहीं पर परिस्तान और हूर है हम | कहीं बने पेशानी कहीं उस रुखपर काकुल हमींतो हैं । वहीं पे गुल है कहीं पर 1356 obaa 4r Dammam - लावनी आशके बुल्बुल हमीतो है ।। ३ ।। कहीं बादशाहब ने कहीं पर आकरहुये फकीरहँ हम । मुरीदभी किसीनां और बढी पर पीरहें हम । कहीं निशानावने कहीपर कमां कमां के तीर हैं हम । कहीं शमाहें कहीं पर परवाना गुटगीर हम । बनारसी कहैं मुझे अगर देखो तुम विल्कुल ही तो हैं । कहीपैगुलहे कहींपर आशकबुलबुलहमीता है ।। १॥ ऐगुलतनी उल्फतमें गुलजारभी है और खारभी हैं। बड़ा लुत्फहै इश्कमें मारभी है और प्यारभी है ।कभी इशारा अब- रूकाहै और कभी तलवारभी है । कभी वस्ल का हमले इ- करारभी है इन्कारभी हैं। कभी गालियां झिड़की है और कभी शीरीगुफ्तार भीहै । कभी खिजाह सभी गुल्यन है बागबहारभी है ।। बोला ये मंसूर दार भीह दीदारभी है. बड़ा तुकहै इश्को मारभी है और प्यारभी है ॥ १ ॥ कभी तोंक गर्दनमें पड़ा और कभी फूलोंका हारभी है । कभी वि. रहना बदनहें कभी तनपर सिंगार मोही कभी सर यहवाह और कमी कवा ताजार मीहीकली है राहत कभी रंजीदा दिल वीमारमाहै ॥ कहा लैलासे अब मजनूं ने अब मुलहमी , तकरारभी है । बड़ा लुत्फ है इश्क में मारह और प्यारभी है। कभासी दिल्लगी कभी रोना अश्कों का नारी है। कभी नज़र का छिपाना कभी निगाहें वारमा है । कभी गले से लगे कभी वह करता दारोमदारभी । कमी जलागे कभी यक अदासे डाले मारमी है ।। कमी करे ऐयारी भी वह बनता यारभी है। बड़ा लुक है इश्क में मारी और प्यारभी ॥ ३ कभी जस्म पुर हायें जिगर के कमी दनावर -- 4 m १०३ लावली गारभी है। कभी करे खुश कभी वो करता दिल बेजारभी है ॥ देवीसिंह ये कहै मेरा वह शोखशितम गर यारभी हैं। जो चाहै सो करें अब वही दिल्का मुख्तारभी है ।। बना- रसी कह नेकी बदी दोनों का उसे अखत्यारभी है । बड़ा लुत्फहै इश्क में मारमी और है प्यारभी है ॥ ४ ॥ कुरानकी आयतें हम उमके रुखनापाव से लिखते हैं । लाजवाब उसको हम अपने इस जवाब से लिखते हैं। अलिफको हमनहिं लिखेंगे बीनी उस गुलरूकी लिखते हैं। बिसमिल्लाको छोड सिफत उसके अवरूकी लिखते है । लाम से कुछ नहीं काम झलक उसके गेसूकी लिखते हैं । ऐनको करके अलग आंख हम उसमहरू की लिखते हैं। ते को तर्ककर चीनेजबीं दिलको किताब से लिखते हैं । लाजवाब उसको हम अपने इस जवाबसे लिखते हैं। १ । नुक्तों को कर अलग हम उसके रुखे लाल को लिखते हैं। हरेक इस्म से बेहतर उसके हरएक वालको लिखते हैं। कोई लिखें से जीम हे खे कोई दाल जाल को लिखते हैं। हम इनको गये सुल सिर्फ उसके जमाल को लिखते हैं । अरवी फारसी हि न्दी तुरकी सब सिनाबसे लिखते हैं। लाजवाब उसको इम अपने जवाब से लिखते हैं।२। कुल्ला कला मुल्लाः हम उसके सारे खतको लिखते है । और मायने कुरान के उसकी उ फत में लिखते हैं । जेरजवरसे जबरदस्त उसकी ताकतको लिखते हैं। पेशसेनेहतर पेसानी उसकी किस्मतको लिखते हैं। रुख रोशन आला हम उसका महताब से लिखते हैं। लाजवाब उसको हम अपने इस जवाबसे लिखते हैं। कलम TH लारनी १०६ से पढ़कर अपने दिलवर की बात को लिखते हैं । मुसलमान हिन्दुओं से आला उसकी जात को लिखते हैं 1. वो हंगे नादान जो उसकी तायदादको लिखते है । देवीहि दिलएर उस की हर करामात से लिखते हैं।। बनारमी तो हिलारस का वे हिसाब से लिखते हैं । ला जबाव उस को हम अपने इस नवान से लिखते हैं ॥४॥ ला मकां है आशकों का कहीं नहीं मका है जहां खुदा है मस्तों का दिल सदी वहां है ।। मालूम है मुझ को जो किसी चीज निहां है । वाकिफहूं औकहताहृवो यारकहहि ॥ १जईफ. पर दिलमेराबड़ा जवाहै । नाताकतहूं पर मुझ में दुद्दीतराहे। जहां फना है मेरे लेखवहीजहाँहै ।जहाँ खुदा है मस्तीका दिन सदा वहा है। १ । जहाँ खामोशीहै वहींपरशोरोफिगाहजहाद नारा वहीं आतिशे सोजाँ है । जहां हिज्र, उलतका भी वहीं समाहै। जहां लहर बहरहै वहींखडानूफाँहै । क्यारहूँ मैं कहती मेरी यहीजवाँहै । जहांखुदाहै मस्तोंका दिल सदाँ वहां है। २ । लिबास पहने पर यहतनउरियाँ है । वस्ती को समझताह में येवी है । जहाँ मुमल्मानहै वहींपर हिन्दुस्ताहै ।ममजिद में मेरे उस बुतका बना निशाँ है ।। आशक की आह यही तो एक अजीहोजहां खुदा है मस्तोंका दिल सदां वहां है ।।३।। जिन्दा है. वही जो जानसे भी वेनाही करता है सैर वह इस में जो हराँ है |नादान को भी कहता हूँ मैं वह इन्मा है । ये अक्लहै मेरी और यह फहम कहाँ है है बनारसी हर पिमरा मेरा कुरा है। जहां खुदा है मस्तों का दिल सदा वहाहै ||| चलते चलते थक गई यह मेरी डिलिया । लामा wrinakamanane TRAATTACT - १०४ लावनी समझकर किरे यारकी गलियभासमा समझकर जमीपे खाक उड़ाई।औरऐससमझकरकरता फिरागदाई।लेलावन करमजन की सूरतपाई । इज्जतको सभझ कर उठाली अबरूं साई ।। मन्सुर जानकर अपनी जान गंवाई । दीदारके खातिरदारपे करी चढ़ाई ।। सुखमाना मैंने दुखीजो मेरी नलियां । लामका समझकर फिरे यारकी गलियां ॥१॥ गुलज़ार समझकर खार जिगरपरखाया। राहतको समझार जोअलम उठाया।इसने को समझ रोनेका तार लगाया। औ सत्र किया तो अपना दिल घबराया ॥ नजदीक समझकर बड़ी दुर फिर आया। पाया तो जहां में अपना ही आपाया । ठोकर से पांकी टूटी सी अंगुलियां । ला मकां ससझकर फिरे यारकी गलियां ॥ २॥ कावे को समझकर बैठे बुतखान में वस्ती को समझ जा पहुँवे बोराने मे ॥ जुल्फों को देखकर उलझा दिल शाने में बातें जो सुनी तो पड़गये गम खाने में जिन्दगी समझली अपना नजाने में । वहदत को समझ मुलपीरी पमौन में । गिर पड़े दौड़ कर दिल को हुई तलमलियाँ। लामको समझकर फिरे यारकी गलियाँ ॥ ३॥ मय समझ के पीले लो अस्क रो रोके । और होश समझ बे होश रहे हम सोके ।। समझे थे नफा अब बैठे गांठ को खोके । वे बोझ हुए सर पर पत्थर ढोढों के ॥. इकताई हासिळ हुई भरोसे दोके । कह बनारसी.यह पाल 'खुशी हो होके । उस गुलके वास्ते उठाली सब वैकलियाँ । लामको समझकर फिरे यारकी गलियां ॥४॥ जो दिलवर का बेटे की तरह मुँह चूमें। उस आरा क के --- -N 3 लावनी संगसारी खुदाई में !! जिसजा देखे जलयये खुदाई देखें। माशकको अपना करके भाई देख । तन बदन मे उनी र सफाईदेखे । सिरशे भी पैरतक सन रानाईदेख्ने । कभी देखें वस्ल और कभी जुदाई देखे । इरसूरत से उसकी इस नाह देखें । जो उसका जलवा कोई देख हरनमें । उस आशा के संग सारी खुदाई में ।। जानी को अपनी जान ज्यादा चाह । प्यारे को अपने प्राण से ज्यादा चाहे ॥ दोनों दुनिया ईमानसे ज्यादाचाहै । उससनम को इस जहान से ज्यादाबाहे वेदऔर पुराण कुरान से ज्यादा बाई। हर तीरथके स्नान ज्यादाचाहे ।। करइश्कमहकता रहे गुलाकी चूम उम आशक के सँग सारी खुदाई घमे । १ । जिसजापर देखे उसके नरको देखे । चाहेपरीको देखे चाहै हरको देखे ।। जामये मुहब्बत के सुकूरकोदेखे । वोआशकतो फिर बड़ी दूरको देखे।जो अपने दिलमें उस जुहूरको देखे । वह खुदाको देखे ओ गफूरको दग्ने वोहीमुसल्मीनमें वोही देखहिन्द उस आशक्क सँगसारी खु. दाई घूमें | ३ |गर आशकहोतो हकमा मस्तानाहो । दीवानों को जो पढ़ेतो दीवानाही ॥ लोलगा वहांपर जहां में यह जाना हो । जानाहो जहाँफिर वहांसे नहिं आना हो । एदेवीसिंह तेरासखुन आशकानाहो । वह समझे इमेनो कोई शहर दाना हो ॥ गर दिलको पाये उसके कपा में। उस आशिक के संग सारी खुदाई धूम | 2 ! तजिस्मानगर और जान नहीं जानाना। किसी नहीं कहता खुदा जो तू है दाना ।। किसने तुमच बनाजो बंदा । और कौन पेत्रका पड़ा है तुम पर रहा। iner Maidaa-Mere-- oranguinones en weten A
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® लावनी
तू अपने आपको देखनहो मतिमंदा। है कौनसी वहबदबू जो
हुआ तू गंदा ।। गरतुने अपनेतई जिस्मनहिं जाना फिरक्यों
नहिकहता खुदाजो तू है दाना।।१।।यहहाथ पांव औ सर भी
नहिं कुछत है। सीना और वापरभी नहीं कुछतूहैं।। जनखा
औरत औरनरभीनहीं कुछतूहै । जिनदेव परी पैकर भी नही
कुछ तूहै ॥ तू अपने बीचमें आपी आप समाना। फिरक्यों
नहिंकहता खुदाजो तू हैदाना।२ । रोना और तड़पना आह
नहिंकुछतुहै । मुंह जबत्रिम वल्लाह नहीं कुछ तू है । कावा
किवलादरगाह नहीं कुछतू है । और हरामकीभी राहनहीं कुछ
तू है । मसजिद भी नहिं बनाहै नहिं बुतखाना । फिर क्यों
नहिं कहता खुदा जो तू हैदाना। ३। तकदीर और पेसानी
भी तूनहिं है । आतिश और हवा गिलमानी भी तु नहिं है
अर्वाह और गिलमानी भी तू नहिं है । इस जिस्मकी जरा
निशानी भी तू नहिं है । यह बनारसी का समझ सखुन
मस्ताना । फिर क्यों नहिं कहता खुदा तो तू है दाना। ४ ।
चश्मों में भरोहरंग गुलाबी गुलका । अश्काको पियेगे
काम नहीं कुछ मुलका ।। यह आंख मेरी बहदत का पैमाना
है। अब इसीको हमने समझा मयखाना है। चश्मों से
ज्यादा कोई न मस्ताना है । देखतो इसमें क्यार रंग स्याना
है। है भरानशा आंखों में आलम कुलझा । अश्कों को
पियेंगे काम नहीं कुछ मुल 61 ॥ १॥ जब चुवेगे आश मेरे
चश्मा गिरयांसे । समझ के हम पावेंगे इन्हें दिलजांसे ॥
मैखोरीका नहीं लेंगे नाम जबांसे । रोरोके पियेंगे अश्क
लबेबिरियांसे । हिचकियांसे मेरे होगा शोर कुल कुल का ।
। AML । -- लावनी अश्कोंको पियेंगे काम नहिं कुछ मुलका ॥ २ ॥ बादाम भी ये हैं नरगिस के प्याले हैं । देखा मने यह पूरे मतवान्ते है ।। यह नयन हमारे गुलशन गुल्लालेहैं । मके इनमें भररहे नदी नाले हैं। जब चाहे खुमके खुन्दम में दे टुलका । आ श्कोंको पियेंगे कामनहीं कुछमुलका ।।३॥ उस परी का आ. लम आंखोंमें छायाहै । इस वादेकशी से अब दिल व. राया ॥ मैसे ज्यादा अस्कों में मजापाया है । मज़मून यह देवीसिंहने नया गाया है ।। है यही सखुन आशक सादिक वुल्खुलका । आश्कों को पियेंगे कामनहीं कुछ मुलका ।४। साकिया पिला सागरे दाद उसमुलका । वहदत हो जिसमें भरा बस्ल तुझगुलका । अवमये मुहव्यत आकर मुझे पिला दे। औरजामतू अपनी दीदका मुझे पिलादे । दिल से दिल अपने जिगरसे जिगर मिलादे ! दीदार की दास्से तु मुझे जिलादे गुलहो गुलशनमें मचे शोर कुलकुलका । वहदत हो जिसमें भरावस्ल तुझलका । । । शाके शराब का भर कर पैमाना ला । इश्कका सुराही हाथ में जाना नाला ।। मैपिलासुझे उसनृरका मैखानाला । गुलशनमें गुलाबी रंग तु शाहाना ला ॥ मालूम हालहो नशे में आलम कुलका । वहदतहो जिसमें भरा वस्ल तुझ गुलका । २। में तुम पिलाऊं तूमे मुझै पिलादे । जब लुत्फ इसका बुब वृन दुआये। मैंकहूं औरदे तूमी यही फरमाये । वह बान जिसकी बात न कोई पाये। कुदरत का कपमा मर जाम में दुलका ) वहदत हो जिसमें भरावस्ल तुझ गुलया । ३ । शीशे दिलमें भरदे तू मेरे अंगूरी । इस लिय दिलकी हो दरकदूरी ।। वह जल्वा अपना दिखाये मुझको नरी को . हा - १०६ लावनी 8 बनारसी दिल्की मुराद हो पूरी ॥ मैपीकेचहकतारहै यहदि- लबुलबुलका । वहदतहो जिसमें भरा वस्लतुझगुलका ॥४॥ बिन पिये जहांके बीच जिऊ में कैसे । भरदे प्याला लव रैज साकियामैसे।। मैं वहदलका मुस्ताकहूं यकमुद्दत से। वा किफहूँ मैं कुछमलानोंकी आदतसे ॥ जिस वक्त नशासरसार हुआ शिद्दतसे । बेहोशहुआ इसदुनियांकी विद्दतसे ॥ हरव- क्तजबांसे कहा करूम ऐसे । भरदे प्याला लबरेज साकिया मैसे। १ । शोलये नूर दिलमें मेरे भबकेहै । अशरत की में हरदम उसमें टपके हैं ॥ लोलग है और दिल उस लौमें लपके है । इसनधासे अबकब आँख मेरी झपकेहै ।। आती है यही आवाजहर जगह नैसे । भरदे प्याला लबरेज साकिया मैसे ।२। मालूम हुआ मैं मौतकी यहदारूहै । हर गुलोंकी रूहै खिंचीहै वहगुलरूहै। रिन्दानोंकी महफिल में यहीमहरू है। और इससे बहतर नहीं कोई खुशबू है ॥ तू पिलादे मुझको थार बन पड़े जैसे । भरदे प्याला लबरेज साकिया मैसे॥३॥ एकरोज सामने मेरे मोहत सिव आये । बोळे मै पाना कौन तुझे सिखलाये । औं देख कढ़ावे मैके वह घबराये बोले मैके यह क्या ख़ुदाने नहीं बनाये ।। फिर कहने लगे मोहित सिबभी मुझसे ऐसे । भरदे प्याळा लबरेज साकिया मैसे॥ ४॥बीनो रवाव मिरदँगकी तय्यारी हो। मीनेमें मी नेकी मीनाकारी हो । गुलपास में बैठे हों औ गुलज़ारी हो कहै बनारसी उस वक्त वह मैं जारी हो। हर वक्त राग फिरव जाकरे इस लेंसे । भरदे ण्याला लबरेज साकिया मैसे ॥५॥ आतही इश्कने यही मचादी होली । वह आतिश और , १ -- लावनी तनसजलादीहोली ॥ चौसवरसने लगानग पानी । औरइश्कभी करने लगावह ऐंचातानी में हमूनी गाली देर मुझेदिलजानी। और लोगवजावेंतालीमुनाकहानी।। नीदेवी थीसोमुझे दिखादीहोली । वह आनिशऔर तनफमजलादी होली। ।। गमकेगुलालने ऐसीधून उडाई । श्रवसिवाखुदा कुछनहिं देयदिखाई ।। तनवदन में जीतहीजी आगलगाई। जो होनीथीसो होली मेरे भाई ।। शावासइश्कने रामलगादीहोली आतिशऔर तनफूस जलादीहोली । २ । जिसवक्तवहआया दिलमेंइश्क रंगीला । था।हरेका रँगलालसो पडगया पीला। और जामा जोथा खिंचा वह होगया ढीला । इसपर भी दोस्तोंने करदिया यह गीला । हजरत इश्कनेमुझे खिला दी होली । वहआतिश और तनफूस जलादी होली ।। दिल तड़प तड़प कर अपना नाच दिखाये । यह इसन अपनी कुछ खातिरमें लाये ।। दिन आदाहकर शोर और धूम मचाये । परइश्कनइसकी मुतलकसुनेसुनाये ॥ लो सुनो दोस्तो तुम्हें सुनादी होली । वह आतिश और तनफस ज- लादीहोली । ४ । ठगगयेइश्ककोकवीरगातेगाते। जिनको खावह आये ढोलबजाते ।। कोई शिरपरडाले खालकोई त्रि ल्लाते। कह बना सीहम इश्क में है रंगरात।।जोहकुल्लाथी मेरे गादी होली । वह आतिशऔर तन फूम जलादीहोला। हम तेरे इश्कमें यार बहुत दिन भटके । अव मिला सनम तू हमें खुले पट घटके ।। कई बारगया सर तेरे इहकमें इटको फिर पाया हमने नाम तुम्हारा रटके । किये रंज दरलग मंजर जरा नहिं टटके ।। दिलकी दहशत सन निकल गई, ॥ Hatemakesident - ११० लावनी छटछटके । कई लाख वजहके दियेहैं तुनझटके ।। अवमिला सनमतूहमें खुलेपटघटके ॥ १ ॥जिसवक्त तेरी वह जुल्फनागि नीलटके। कोई घरसे होजाय उधर उधरसे चटके । गर देखो कालानाग तोशिरकोपटके । चढ जाय जहर जुल्फोंकावहघर कोसटके । इमआशकहैं मजबूतकहांजांय हटके । अवामिला सनस तूहमें खुले पटघटके । २। लैला से लगाया दिलमजनू नेडटक । तनबदन भला सब कांटउसीसे अटके ।। मूली पर चढ़ामन्सूर उसीपरमटके । नहीं जरा नोंक मूलाकी जिगर में खटके ।। देखाजो तुझे दिलगया जहां से फटके । अबमिला 'सनमतू इमैं खुले पटघटके ।। ३ ।। जबखुलेकिवाडे यारकपटके पटके । दिल में पायेदीदार वह बैशीबटके | शिर मोरमुकुट कटिकस जरीकेपटके ।। कह देवीसिंह है अजब खेल नटखटके कहै बनारसी हम आशक नागरनटके । अब मिला सनम तूहमें खुले पट घटके।।। सखियों से कहै यह बात कृष्णहोलीमें । चोरीसे कुम- कुमेधरे हैं क्यों चोली में । कुछरंग इनमें है भरा या ये खा ली हैं । योईसके बातयह पूछत बनमाली है ॥ तव सखियां हस करदें ताली हैं। वह गालीदें जो कुछ भोली भा. ली हैं। कहै कृष्णभरे गुलालया रोली में | चोरी से · कुम 'कुमेधरे है क्यों चोली में। १ । यह कहकर अपनी कृष्णने भुजा बढ़ाई। तब सखियों ने कुच अपने लिये चुराई । मनमें कुछ ऊपर से कुछ बात बनाई ॥ चित चाहे लज्जासे दियो हाथ हटाई । यही कृष्ण कहै हँस हँस ब्रजकी बोली में । चोरी से कुंमकुमे धरे हैं क्यों चोली में ॥ २ ॥ कहसखीकृष्ण TO लावनी ११३ अवहमको मतील जाओ। चितवोरहो तुम क्यों हमको बारे बनाओ । नितचोरी करकरके दधि माखनखाओ । अब वर बस क्यों अगिया में हाथ लगाओ।। स्याने हो बालोहो वतियां भोली में । चोरी से कुमकुम घरहें क्यों चोली में ॥ ३ ॥ यह सुनीबात तब हँसे नन्द के लाला । वंशी ये व नालान में जाद् डाला ।। लगगई गले से आप सकल बमबाला । को देवीसिंह में जपूनाम गोपाला ।। क. बनारसी कुछ गोलहें ह. स गोलीमें। चोरी से कुमकुम धर' क्यों चोली में ।। ४॥ हर जगपं देखा कहीं नहीं तू देखा। जहां याद है तेरी वहीं वही तू देखा ॥ गये बहिश्तों हम वहां न तुझको पाया। बुतखानेमें भी नहीं नजर तु आया । कावा कि बला मक्कामसीत हुँढ़वाया । काशी मथुरा में बहुत दिनों भर. माया। जा जाकर गंगासागर सिन्धु नहाया । में तेरे इश्क में चारों तरफ उठाया। नहीं हमने प्यारे और कहीं तू देखा। जहां यादहै तेरी वहीं वही तू देखा ॥ १॥ ज. गल बस्ती सब सब उजाड़ हमने छाना। नहिं देखा तुमने देखा सीजमाना । कोई भतवाला कहता है कोई मस्ताना जो जो कुछ जिसने कहा वह हमने माना। फिर दर दरका हुआ दिवाना । नहिं पाया प्यारे तेरा कहां टिकाना अव याद करी तो दिलमें यही तू देखा । जहां याद तेरी वहीं वहीं तू देखा ॥ ६॥ शिर पटकपटक कर पहाडपर देगा रा। और आह आहकर करके बहुत पुकारा दिखा देवलदेहरा भोर ठाकुरद्वारा । सर तापा सनको देख देखकर हारा. घरबार तजा आलम से किया किनारा। जैसी कुछ गुजरी param Ama -- En लावनी वसई कियागुजारा। यह बातेंहमकोयाद रही तृदेखा। जहां याद तेरी वहीं वहीं तू देखा ।। ३ ।। सब देखाहमने गुलश. न और गुल्लाला । बन फकीर बनबन फिरा पहिन बनमा- ला ।। देखा पत्तापत्ता और डालीडाला। हैं सब में तू औरसब से रहै निराला ।। यह बनारसी का कलाम रस का ढालहो अरज मेरी यह सुनो नन्दकेलाला ।। तुझ दिल्लरपर आशक हूँ यहीं तू देखा । जहांयाद तेरी वहीं वहीं तू देखा ॥ ४ ॥ इश्कहजरत ने की हमपै मेहरबानी । करं में क्या क्या महेमानी ॥ नजर देनको दिल अपना में लाया। इश्क के बहुत पसंद आया । इश्कने मेरा जब लखते जिगरखाया। तो मैंने और भी बतलाया । खून आशकका यह है ताजा पानी। पीजिये इश्क मेरेजानी॥ ॥ अश्क गौहरका जब गले हार डाला। इश्कने कहा ये है भाला। चशममें भरभर कर वह गुल्लाला। इश्कके तई दिया प्याला ॥ बनपड़ी मुझसे जा कुछ नि कदरदानी। इश्ककी सबीबात मानी।। २ ॥ जिगरपर मेरेजो थे उलफतकैमार । दिखाया इशकका वह गुल्जार ॥ और सीने पर गुलखाये कई हज़ार । दिखाई हरकके तई बहार ॥ मालेजर सारा देकरके यही ठानी । किया तन अपना उरयानी ॥ ३॥ और एक तोफाजोथी सब में भारी । जान होती सबको प्यारी ।। इश्कके ऊपर वह भी मैंने बारी । नजीर देने से हुआआरी । कहूँ मैं इसके आगे अब क्यावानी। इश्कके हाथ जिन्दगानी ॥ ४॥ कि मैं हूँ अाशक है इस्कमेरा सरदार । हम, उसके फर्मावर दार । बजुज आशकी के कुछ और न मेराकार । इश्कके --- लावनी सिवा न कोई यार ॥ कहे देवीसिंह है बनारसी ज्ञानी । हरेक छन्द जिसकी सकानी ॥ ५॥ भेदकोई वुतोंका क्या पावें । पाक मुहब्बत करो ना जल वे खुदानज़र आवै ।। अगरये बाह कर दिलसंग । तू कादि लकोमोम तो फिर यह हो जाय तेरेसंग ॥ यह लेके तेगवार चौरंगात दे सिरको झुका तो फिर देखे उल्फतका रंग ॥ यह है गरसमा तो तहो पतंग । लगादे लो में ली अपनी मतमम इसदिलकातंग ॥ दोहा ।। अव्बलतो यह जलानलाकर क. हे तुझे ताजीर । फिरपीछे हो दोशन तेरा नामबने अकसी र ॥तूमत इसदिलमें घवरावे । पाकमुहलतकरो तो जल्दै खुदा नजरआवे ॥१॥ यहदिलबरहै मेरे दिल । खुदामिला पीछे हमको पहले इनसे मिलके ॥ हालसुन इस दिल पिरिमलके कतलहुये तो भी शिकवे नहीं किये उस कातिलके । यह गुल सबवने आवेगिलके ( अब्बलथे गुंचेले गुलहुवे वितबि. लके ॥ दोहा ।। बाग इश्कमें अयदिल बुल्चुल गुलोकी केस बहार । खार अगचै चुसेतो उन कांटों पे आसनमार ।। यती फिरगुलशन होजावै । पाकमुहब्बत करो तो जलवे बुदा न जरआवे ॥ २॥ वहह जुल्फोंसे जहर इनके । इसे नहर मत समझ यही है लहर बहर इनके ॥ लगे वोवो इतर इन। हरेकतरावट से बहत्तर रहेंगे सूरतइनके । पत्र मेंपहें अगर इ. नके । हरेक फन्दसे वाफिक होवे वोही मगर इन ॥ दोहा ।। जिसका दिल दिलदारकी जुल्फों में शिखरे । देवदिवरे बाल निरख कर तो ये दिलनिखरे । वोही उलझाये सुमारे । पाक मुहब्बत करो तो जलवे खुदा नज़र आवे ॥ ३ नई - Ramnna A- , लावनी ११४ अजब करील नैन । कर चोटपै चोट बने, गज़ब चुटाल नैन । बुताके छैल छबीले लैन । काले गोरे लाल रंग में रंगरंगीले लैन ॥ बहुत रस भरे रसीले नैन । सबके ऊपर इनकी नौकहै यहहै नुकीले नैन । दोहा ।। जो कोई इनको पाक निगहसे देखे आशक आन । उन्हें दिखाई इन्हीं बुतोंमें देव उसकीशान ॥ रूप वह अपना दिखलावे । पाक मुहव्वत करो तो जलने खुदा नजर आवै ।। ४ ॥ जिसने इन बुतोंको जाना है । उसीको जाना मिलाहुआ जिसकावहा जाना ।। इनका लामका ठिकाना है । वहांसे उतर नूर वह इनके बीच समाना है ।। सनुन मेरा आश्काना है। जि सने सुनाइतकादसे वह आशक मस्तानाहै ॥ दोहा ॥ समझ आश्कोंकी रमनें और कर दिलको होशयार । देवीसिंह यो कहै हुआ तौहीद छन्द तैयार ॥ पार्फत वनारसी गावे । पाक मुहब्बत करो तो जलवे खुदा नजर आवै ॥ ५ ॥ आनके हमने देदी अपनी जान तुम्हारे कूचे में 1 जानः भी बाकी नहीं रही दिलजान तुम्हारे कूचे में ॥ मार मार करते हैंगे मुमार तुम्हारे कुचे में। वारकरे लेकर अबरू तलवार तुम्हारे कूच में । मिजअकी नोकोंसे हुई दारनादार तुम्हारे कूचे । हरेक बजे के यार चले हथियार तुम्हारे कूचे में ।। मान न-मुतलक रहा अरमान तुम्हारे कूचे में । जान भी बाकी नहीं रही दिलजान तुम्हारे कूचे में।। १.॥ जाल जुल्फका विछाहै वह जंजाल तुम्हारे कूचे में । बाल देखकर दिलको हुआ बबाल तुम्हारे कुवे में | लालल- बॉपर सदके कर, लाल तुम्हारे कूचे में । कितने माल वाले होमये पामाल तुम्हारे कूचे में । वान आपकी यही
लावनी
चले नितबान तुम्हारे कृचे में। जानी वाली नहीं रही
दिलजान तुम्हारे कूचे में ॥ ५ ॥ यादमें दिल बुल्नुलह फला
सैयाद तुम्हारे कूचे में । दाद न उसको मिली रहा वेदाद
तुम्हारे कूचे ।। शाद करो आशक को यह नाशाद तुम्हारे
कुंचे में। बादमर्गके लाश नहो वरदाद तुम्हारे कुत्रे में।
तानपै तेरी फिदाह हिन्दुस्तान तुम्हारे कुंचे में । जानभी।
बाकी नहीं रही दिलजान तुम्हारे कुंचे में ॥३॥ नाम बहुत
सा हुआ मेरा बदनाम तुम्हारे कूचे । रामराम कहताह कब
हो आराम तुम्हारे कूचे में । आम, आशक बनारमा सरे
आम तुम्हारे कूचे । हम्भी होगये श्याम अाक घनश्याम
तुम्हारे कूचेमें ।। ध्यान लगाके करते हैं मध्यान तुम्हारेको
में । जानभी बाकी नहीं रही दिलजान तुम्हारे कुंचे में ||
गरचे इश्कमें रंज होवे तो कोई इसका नाम नले
आशक बोहै रंजके सिवा कहीं अराम न ले । लाखों
सदमे सहे जिगरपर जवां से निकले आह नहीं । वाहने
वालको रंजके सिवा किसी की चाह नहीं ।। गममे खुशी
होवे सोई आशक दिलसे दूर हो दाह नहीं । सिवा इझरके
दूसरी तरफ को करे निगाह नहीं ॥ जोकि लुत्फ है रंजमें
ऐसा मज़ा कोई बल्लाह, नहीं। वह क्या जाने जो इसकी
लज्जतसे आगाह नहीं ॥ जफाको समने वफा अलमको
छोड़ और कोई काम न ले । आशक वहहें रंजके सिवा कही
आराम न ले ॥ १॥ जिसने इश्क को वाहा उसने गमन्त्री
ना इस्त्यार किया। सरपर आरे चलें हम पर भी नही इन्कार
किया ॥ आशक उसीका कहि ये जिमने जानामान्त निमार
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. लावनी किया। दाग इश्कसे जिगर सीना अपना गुल्जार किया दममैदमको दम करकर अपने दमको दमदार किया। जिगर जलाया तो उससे रोशनदिल दिलदार किया ।जफाको स. मझे वफा अलमको छोड़ और कोई काम न ले आशक वहहै रंजके सिवा कहीं आराम न ले।। २ ।। दर्जाइश्कका हुआ रंजसेगरइसमें कुछ रंज न हो। फिर कोई इसकोकरें क्यों वह जवाब तुम हमको दो ॥ आशक था मंसूर दारपर चढ़ाजान अपनी दी खो । लुत्फ उठाया इश्कका रंजको राहत समझाजो ॥ आहइश्कने कियेहैं क्याक्या सितम कहूं मैं क्या इसको। गमके दरियामें जिसने लाखोंई आशक दिये डुबो ।। मुझसे भी कहताहै कि तु अब चैन सुवहऔर शाम न ले। आशक वह, रंजके सिवा कहीं आराम न ले ।। ३ ।। मजा इस्कका रंजमेंहै गरइसमें रंज नहीं होता। फि र कोई आशक अश्क अपने से मुँह क्योंकरधोता ॥ क्योंमर- ता शीरी पै कोहकन और मजनूक्योंकरराता । अपनेसरका हाथसे वह सरमदभी क्यों खोता ॥ बनारसी गर मज़ा न पाता तुरूम मुहब्बत क्यों बोता । बहरे इश्क में लहर देखी तोफिर मारा गोता ॥ में सलाम करताहूं रंजको चाइवह मेरा सलाम न ले। आशक वहाँ रंजकेसिवा कहीं आराम न ले। गमे इश्कमैं मरगये, हम तिसपर भी नहीं यह गमनि कला । आहसे आतिश लगी खामोशहुए तो दम निकला जन्तकरूंगर आह सोजांकोतोदिलवेताबहोवे ।। आहकरूं जो जिगर जलभुन के मेरा कबाब होवे । यूभी मरे औं ! भी मरे किसतरह से दिलको तारहोवे ।। इनक सनमने किया आजाद यह उसे सवाव होवे । क्या ताकत अगर उसके रूबरू जवांसे मेरा जवाब होवे ।। जो चाहे सो करो अव म लावनी उसकाभला शिताव होवे । लाखों सदमे सहे परमेरे दिल से न रंजोअलम निकला आहसे आतिशलगी खामोश हुये नोंद निकला |॥ १॥कभी तो गममे घबराकर सहराकी नरम चलतहैं । कहीं बैठकर हम अपने कफे दस्तको मलनेह गगने निकला चाहे तो बस दमसे अभी निकलते हैं। हमहंआराक्त हमेशा गमी में फूले फलते हैं ॥ शोलेनुर समाया इस दिलो तो हम्भीबलते हैं। दिलको रोशन किया इस सबबसे इसमें जलतेहैं । आशिक सादिक जानके मुझपर करने इमक रित न निकला । आहसे आतिशलगी खामोशहुये तो दम निक- ला॥२॥ हम आशकहैं इसकेगमखाना और खूनदिलपी नाहै। जहां पं देखा वहां आशकका यही करीनाहै ॥ आहे. करूं तो जिगरजले चुपरहूं तो धडके सीना है । कहोस्यारें हुआ मुशकिल अपना जीना है ।। सूलीपर मन्सुरने अपनेम्वन से लिखा सफीना है। मौत नहीं है दार यह यार के घरका जीना है । अनअलहककहने से देखने मुझको मेरा सनम निकला। ग्राहसे आतिशलगी खामोशहुये तो दम् नि- कला ॥३॥इस्कनहीं आसान वहुत मुशकिल इस इसका। करनाहै । दिलको देना मौल गम लैना और दुख गरना है । और किसीका खौफनहीं वस सिर्फ उसी से डरना । यहां जोबिगडाहुआ फिर उसका वहां सुधरनाहि ।। देवी । सिंह यह कहे इश्कमें जीतेहीजी मरताहै। इस दिल ऊपर वही गुजरेगी जोकि गुजरना है। बनारनी सुर कोद स्तपर धरकर साहे अदम निकला । आह आदिश लगी खामोश हुए तो दम निकला ।। ४ !!
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लावनी
वोनूरे रोशन कमरसै बहतर तबक तबकपर खिला उजाला ।
या ताबो ताकत गर उसको देखे मेरा वो दिल्वरहै सब बा.
ला। वोजुल्फउसकी अगरचे देखे तो पेंच ख़ाये चमनमें स
मछल ।। हरेक बलम हैं. उसकी छलबल वो दामे उल्लत है उ
सकी काकुल । वो गैसू उसके तो सुश्कची है गोया गुलि
स्ता सोसने गुल ॥याह वो अवर सिया फलक पर याहें आ
यत कुरान बिलकुल । फँसा है उसमें यह तायरे दिल अजी.
बफंदाहै मुझपड़ाला ॥क्या तावो ताकत गर उसको देखें मेरा
वो दिल्बर है सब नाला ।।१॥ है नौ जवानी में वो पेसानी
और उसका माथा मेहरसे रोशन् । वोचीने उसकी किरन है
खुरका चमक दमक में कमरसे रोशन् । और बी ‘सफाई हु-
स्नेखुदाई हरेक जिन और बसरसे.रोशन् । और वो पसीना
गोया नगीनाहोकआवे गौहरसे रोशन् । सुनीहउसकी सिफत
यह जिस्ने सुकाके माथा जमी पं डाला ।। क्या ताबों ताकत
गर उसको देखें मेरा वो दिल्वरहे सबबाला ॥२॥वो दोनों
अनरू झुकेहैं उसके गोया कमां यकताहै खिचीभी । और
तीर मिजगां चढे जिसपर नज़र यह किस पर अब है कहर
की ।। अगर खफा होकर उस सनमने जराभी अपनी वो भों
सकोड़ी। तो गिर पड़े 'लाखों सर जमीपर लगी न एक
पलभी उसमें देरी ॥ या हैं वो देगे दुदम चमकते या खं
जरे जुर्राह निकाला । क्या तावे ताकत गर उसको देखे
मेरा वो दिल्लरहे सब पै बाला ॥ ३॥ वो चस्म आहू अगरचे
देखे तो आंखहरगिज़ न हो मुकाविल । और सरझुका
कर खड़ाहो नरगिस उसीकी आंखों पर होके मायल व
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13.
लावनी
खुनी नैना औं टेढ़ीचितवन पड़ेजिघरको तो क्या हो हानि
ल। कोईहो मुरदा कोई तड़फता कोई मिसकता औरवाईवि
स्मिल ।।वोमस्ते दोनों पिये हुयेमें भरे नशेमें लिये हैं प्याला ।
क्या तावो ताकत गर उसको देखे मेराको दिल्बरह गया
ला ॥ ४॥वो बानी उसको अलिफकी सूरन जो उसको देयके
हैं वो अल्लाह । फड़क वो नथुनोंकी इसकदरहे कि दिल नड़
पताहै मेरावल्लाह । लभायशीरी में है वो लज्जन कि होट बाट
हरेकशैदा । हैवातमोली और वो ठठोली ना ऐसीबोली कहीं
होपैदा ।। सुने अगरचे जो गोशकरके वो उसके बातोंकी -
रेमाला क्या तावो ताकत गरउसकोदेखमेरा वो दिल्बर है म
बवाला ॥५॥ कभी अग. वो हँस के बोले ली चमके उस
गुलके ऐसे ददां । जिगरगौहरकाथिदे जो देखे और दांन पी
से लाले बदखशां। यह सिफतसुनतेही सूनसूखा विवावेक
दर जहांमें मिरजां । औं वर्क ऐसागिरी तइफ के बेहोश उ.
सकाहुआपरेशां ॥ बयां करूं क्या दहनही उसके हुआग
दिल न बोला चाला। कथा ताबोताकत गरउसको देखें
मेरावह दिल्बरहै सवाला । ६) यह शकत चेहरेकी एक
सिफतहै जो अल्क अपनी में कुछथा आया । बयां वहाँने
किया जवांसे में भेद उसका ज़रान पाया। कोई जितान
बनाके थक गये किसीने सीखा किसीने गाया । हजारों
मुल्ला करोड़ों स्याने कोई इन्तहा न उसकी लाया । फिनल
उसीका हुआतो देखा बनारसीने बोबारीताला । पाताची
ताकत गर उसको देखे मेरावहादियर सपनोला।।
अकबराबादके वीच मण्डवी जिवनी कामे मेरावाम ।
११० लावनी हरिके भरोसे तहांमैं अहरनिशाकरता विश्राम ।। राधाकृष्ण, नाम जहां लिखनेकाही करतानिष्काम । उदर हेतु ये यत्न करि मुखसे करता रामहिं राम । इसमें ही कहताह गुजारा जो विधनाने दीने दाम ॥ लाख यत्न कोईकरतोउसे मिलेन हिं एकछदाम । और किसी से काम नहीं है विधनाको भाज आठोंयाम ॥ हरिकेमरोसै तहामें अहर निशा करता विश्राम ।। लिखनेका है पारश्रमजैसा करसोई इसकोजाने । जा नते पण्डित सभासद बड़ी कठिनता बखाने । पण्डितजन के सिवा और नहीं कोई भी इसकोजाने । ऐसभीनरबहुत है विनासमझ अपनीवाने । बिनइच्छा भगवतकी क्योंकर जा नेगा अक्षर का नाम । हरिकभरोसे तहाँमें अहरनिशा कर तो निश्राम । २ । सिन्धु फांदनासहज न समझे वडीकठिन होसक्ताहै । हनुमान के सिवानहीं और कोईकहसता है। जिस के तनपरे पीर वहीपीर.सभी सहसता है।क्याजाने कोई पीर औरकी जिसे तीर नहिं लगता है । जो कुछ विधना लिखीभा लमें ताविधिसे निबहै ये काम । हरिके भरोसे तहां मैं अहर निशाकरता विश्राम । ३।। करकट ग्रीवा नयनशीशमुखनीवा करि दुख सहे सुजान । ये लक्षण हैं लेखक के पण्डित जन करते हैं वखान ॥ जो कोई सज्जन सुने सुनावे सुन समझे मनमें रख ध्यान । परम दृष्टि से कामना तिनकी पुजवे श्री भगवान ॥ पढ़ो सकलहरि भक्त पियारे राधाकृष्ण करतापर- नाम हरिके भरोसे तहां मैं अहर निशा करता विश्राम॥४॥ इति 1
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H है आलंड स्लण्ड असली। (२३ लड़ाई और ९२ गंदकी मार सहित ) यद्यपि आल्हखण्ड बहुतसी जगह छपेहैं परन्तु यह अ. पने ढंगका निराला ही है इसके रचियता पं० लक्ष्मणप्रसाद फतहपुर निवासी ने पूर्वी राह पर इसको ऐसा मनोहर व- नाया है कि इसके पढ़ने वाले के पास श्रोताओं की भीड़ लगजाती है तथा पुस्तक हाथमें लेतेही मनुष्य ऐसा वे सुध होजाता है कि खाने पीने तक की सुध नहीं रहती इसमें वामन गढ़की मार, संयोगिन स्वयम्बर महोवे की पहिला लड़ाई, माड़ों की लड़ाई आदिसे बेला सती संग्राम तक जिसमें पृथीराज तथा आल्हा दोनों ओर के बहुत से शुर नीर काम आगये वर्णन है । इसके अतिरिक्त भूमिका में आल्हा, ऊदल, मलखान, ढेवा, ब्रह्मा, पृथ्वीराज, लाखन धांधू, इत्यादि सव शुर बीरों का हृदय गाही जीवन चरित्र दिया गया है यह वात और आल्दखण्डों में बहुत कम पाई जाती है । जिल्द इसकी मनोहर सुनहरी टप्पेकी मज़ बूत बंधी है, कागज इस बार बहुत मोटा लगाया है ७७४ पृष्ठ पर पूर्ण हुई है इसपर भी मूल्य २) रु० है । पुस्तक मिलने का पता- लाला श्यामलाल हीरालाल श्यामकाशी प्रेस मथुरा ।
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