Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur

Sarvarth Sidhi Vrati Khand-1 Ka 2-3 Va Adhyay

Sahay, Jagrup · 2011/07

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माप सिद्धि TOONau BIDOARDOARDOINDOIROOHOGIN यात्मनि क्मण स्वशक्त कारणवशोदनुभूतिरुपशम । यथो कतकादिद्रव्यसम्बन्धादम्भसि पदम्य उपशम ॥ नय प्रात्यन्तिको निवृत्ति ॥ यथातस्मिन्नेवाम्भसि शुचिभाजनान्तरसकान्ते पकस्यात्यन्ताभाव ॥ उभयात्मको मिश्र । यथा तस्मिन्नेवाम्भसि कतकादिद्रव्यसम्बधारपङ्कस्य नीगानीणवृत्ति || द्रव्यादिनिमित्तवशात्कर्मणा फलप्राप्तिरुदय॥द्रव्यात्मलाभमानहेतुक-परिणाम॥ पदण्टेद और रिभफत्पर्य सहित प्रथम स्मपर सस्रुत समाप्तिहिचिका शम्दशः दिदी भनुपाद ।। माग्मनि , मण!" सशक्तो कारणपशात मात्मा में कर्म की निम सामर्थ्य के निमित्त पश से सामाश्रय स भनुभूति ।। उपशम ।' यषा : वकादिदम्पसमात् ।' =उदप न होना(सो)उपशम है। मैसे निर्मशी भादिक पस्तु के संयोग से मम्ममि," पदुस्प ," उपराम =मसमें कीमका शान्ति पा समवा रोना भयात् कीपर का नीचे पैठ माना ऊपर से मल का निर्मम होना सो उपशम 5. भास्पन्निकी " निति ॥ कोकामत्यत नारा सा सयर (कर्मका सपा से उठमाना सो आयो) पपानस्मिन् ।" पर मम्मसि,"षिमामनान्वरसक्रान्ते," असे उसी मश को निर्मल भन्य पात्र में बनेपर परप " सस्पन्न प्रभाष उमयमात्मा मिनः। कीपर का भत्यन्त प्रभावोगावाहै। उपशम पका मिशाहुभास्वरूप मिश्र पपास स्पिन मम्मसि !" कनकादिद्रम्पस पान् -जैसे उसी मन में निर्मनी मादि पस्त के सयोग से परम्प " मीण-मनोपनि काम फी क्षीण भक्षीणि स्थिति डोनावी हैमर्थात् कुछ कीचड़ पैदे में बैठ जाती कुछ गदनी रा जाती है। कुछ पार निकल जाती है (नेम प्रयापशप १) भावार्य फादों एक नाविका धान्य विशेष है पा मादक पदार्य है। मिस समय उसे मस से पो दिया जाता ( उम समय पान स ह मादशक्ति के जीण माने पर भोर कर के वदपस्थ रने पर मिस प्रकार कादो पदार्थ मिश्र मादक गति । पारक का माता है। उसी प्रकार कर्मों तप करने पाछे कारणों से उपस्थित होने पर कर्म की कुछ शक्ति नष्ट समान पर मार पर सना में मौजूद रान पर एप इछ : उदप रहने पर मा मात्मा की (दही गर के समान) मिल्छी हुई माओं को मास्था रानी है उस भवस्या का नाम मिम है। दम्पमादिनिमितरशान् । कर्मणाम् !" फल प्राप्ति , =म्प प्रकास भार के भरण पश से कर्मो के रसका खाम उदए । दम्पारपनाममात्र नुस् । परिणामः। -सोज्दपार पस्तुकेनिमस्तस्प(मात्म)की प्राप्तिमानिमिचासापरिणामी 109200D OLID CARD 0.00000DORO!

-तीय पानमाल- रmate सिदि peoan@DIT.DOROOARDOI - एटानिमासी मगरमसाय पटेल के पदपद भार मारपसारा जोपासावर पा उपशम प्रयोजनमस्येश्यौपशमिक । एव क्षायिक, तायोपशमिक , प्रौदयिक., पारिणा- मिकश्च ॥ त एते पञ्च भावा असाधारणा जीवस्य स्वतत्वमित्युच्यन्ते । सम्यग्दर्शनस्य प्रकृतत्वा तस्य त्रिषु विकल्पेषु औपशमिकमादो लभ्यत इति तस्यादौ ग्रहण क्रियते । तदनन्तर क्षायिक. महणतस्य प्रतियोगित्वात् मर्थात् मिससे द्रम्प के निम का पापना होय सा पारिणामिक है। उपशमः पयो मनम् । भस्म। इवि भौपशमिका उपशम है भयोनन मिसफा ऐसा भौपशमिक है। एवम् नायिका। पापोपशमिक , मौदयिक। उसी मकार नायिक, नापोपशमिक मौदपिक परिणामिका -ौर पारिणामिक है अर्थात् इन सब में प्रयोमन भर्प में इमत्पप है। ते । एते । पथ । मामा असाधारणमीपस्य!! =ये पांचों मारमसाधारण भीमके अर्थात् मोर होमें होनेभन्यकिसीमेंनहींहावे समस्पम् ॥ इति सच्यन्ते =निम भार ऐसे कागये है। सम्पग्दर्शनस्प मावतात् ॥ वस्य ॥ त्रिपु । सम्यग्दर्शन का प्रकरणमा अपिफार होन से विससम्पर्शन के वीन रिझम्पेषु । भोपशमिकम् ॥ पादौ । सभ्यते T =भेदी भोपशमिक मादि में रा पनि प्राप्ति किया भाता है इवि तस्य ।। पादौ । प्राणम् ॥ क्रियते ? -इस प्रकार विस (मौपशमिक) का सूत्र में प्रथम मादान(ग्राण) किया गया? भर्यात मनादि मिथ्यारष्टि मीच के प्रथम ही उपशम सम्पहत्व होता है इस लिए स्म में परिले यी कहा गया है वदनन्तरम् ॥ चायिक प्राणम् ॥ यस्य km =सिस(भोपशमिक)के मस्पन्द समीप क्षायिकका ग्राण फ्योंकि सिसौपशामिफकी (निर्मच वाई में पवियोगी है परापरी होड़ पा स्पर्धा करने पाखा प्रायिक भावार्य मिथ्यास्व,सम्पर मिथ्यात्व भौर सम्यक महवि मिथ्यास्त ये सम्यग्दर्शन की पिरापी प्रकृतिये है इन तीनों के सर्पया नाश होन पर सायिक सम्पकत्व होता है भवः क्षायिक सम्यकत्ल की रिगुदवा उपशम सम्पमत की वियरता से अधिक है इस लिए सूत्र में भोपशमिक के पमात् सायिक फा ग्राण किया है। ११) लम- म्यादि प्रथम गर का सकम मात्मने पदी पातुकर्मसि प्रधान प्रयोग में या (प) माप ओर ते साप पुरुप एफ Img.OOARDOT COOPEROUrODAIBOARDow tureOERDOHROOHOORT प्रतियोगितात् ॥

मवार्य सिद्धि पगनिरामा गम्पसाय पील कत पद छेद मार पिभवत्पर्य सहित सरार्य समिति का शम्दश हिन्दीमनुपाद मध्याय • मूत्र १ ससार्यपेनया द्रव्यतस्ततोऽसख्येयगुणत्वाच । तत उत्तर मिश्रग्रहण तदुभयात्मकत्वात्ततोऽ मरत्येय गुणत्वान । तेपा सर्वेपीमनन्तगुणत्वादौदयिकपारिणामिकग्रहणमन्तेक्रियते । . ImaOORNOONAME ONINDORRHOIROENDONER Om oमला गंमापनपा दम्पतः । वन • भसंग्यय गुणस्वात् ॥ घमौर संसारी नीव को विपनाकरि द्रष्य अपक्षास तिस भोपशमिफ- वाले जी से (चायिक पालमीप) असस्यान गुणेभी है मा० उनरम् । 'मिन्न प्राणम् {" तभयारमकत्वात् ," =तिस(सायिक)सेपीजे (उच्चरम्)मिश्नका ग्रहण देवाचायापशमिकाग्रहण, पोंकि उस (मिश्र) के धोना (सायिफ भौर उपशम) स्मरूप नन ० मसग्ययगुणवान् ।" म. =और उस (नायिक) से प्रसस्पात गुणें जीव भी है। मा : म पाम" भन तगुणवान् ।" =विन सम(मोपशामिक प्रायिक, मिश्र) के अनन्त गण (भीष) होने से भादपि गरिणामिक-प्राणम् ॥ अन्न,' प्रियते | मौदयिक पारिणामिक का प्राण भन्त में किया गया है "OUROOxDanceDepoENDOORDERRORDAR (१) उपराम सम्पश्य का पास सन्नर मुकुन माय है लिस स श्रीय कल्प ही पष्टे धने पाते है और पापिझ सम्पत्य का कोस सेतीस गागर RT अधिर है अर्थात् उपग्रम स तायिफ फार प्रसंन्यात गुणा है । जिस से उस म जीपों की सम्पा मी प्रसंन्यात गुमा दुई। जायाप गरिसराप गासर मागर है जिन मचाया सम्यग् पपियों मे य अपेक्षा से पापापरा मेझ सम्पगारि मसंम्पात गुण हैं। मरण रह कि सपा मम्पादिया म पापापममिक सम्पम् , पिलाय की अपक्षा संस्पय गुण है भाव फा अपेक्षामही माकि विशुशी की अधिकता से पायाप यमिक सम्पमय की भाजपा पर सम्पपश्य मात गुणा माना है इस लिए भाव की प्रपता कायापमिक सम्पपि जापिक सम्पपियों म मगा गुणमही मान ग सन । तथा शायापशमिस मम्यपत्य संमय बाल इपासठि सागर प्रमाण है और उस में प्रथम समय से मारिकार समप ममप पाल की ममाति पपन पद दान याल यहुत स सायापशमिक सम्यगापि होते रहते है इस लिए यहां पर मी मायली मंगन माग मनात गुणा र मानने म सापक मम्परयों की अपचा पापापरामिक सम्पापि उस गुणकार प्रमाण है। इस प्रकार सापरवा पेशा पाप गमिर सम्पा-पियों के प्रपि हामे सबमें पायिक के पीछे मिम शमा रमप (पासपर पक्षनिबारस) दाने वाले गलको मानने चापि पम्पनीले DORED whhre Tere arरीमापी पा य सिद्धि BAPOORBOHTOBOOKODAMO: एयनिवासी जगरूपसाप बकीस कृत पदच्छेद और विभक्त्यर्थ सहित सर्वार्थसिदि का शम्दश हिन्दी भनुवाद मध्याय २ स्त्र । अत द्वन्द्वनिर्देश कर्तव्य । औपशमिकक्षायिकमित्रोदयिकपारिणामिका इति। तथा सति द्विश्रशब्दो न कर्तव्यो भवति ॥ नैव शक्यम् । अन्यगुणापेक्षया मिश्रइति प्रतीयेत । वाक्ये पुन सति चशब्देन प्रकृतोभयानुकर्ष कृतो भवति ॥ भवन्द्र निर्देश । कर्वम्य || भोपरामिक- (प्रश्न) भत' इन्द समासका उधारण(निर्देश)करना चाहियो भोपशामिक शायिसमियांदपिकपारिणामिका ।। इति मापिकमिश्रभादपिकपारिणामिका ऐसा (मथ) होता तथा सति दिपशम । न कर्तव्य' ।। मवसि T =ऐसा होने पर दो 'प'शमन करने होते अर्थात् स्त्र में दो चकार न्यूनहोनाते न पर्व शरपम् ।। अन्य गुण- (उपर) एसी शंफान करो (भौपशमिक और क्षायिफसे)मन्य (दो)भायोंकी अपेक्षया १ मिम इति प्रतीयेत । अपेसासे मिभ ऐसा निर्णय वामतीति फियामाय (यदि मिश्र शब्द के पमान सूत्र में प शमन होवा तो) पारये । पुन सति ॥ शम्देन । और "वशम्द" सहित स्त्र (बाक्ये) होन पर (म्सवि) महत । उमयानुक । कत' । मवि T अपिकार किये गये वा विषयभूव दोनों(भौपरामिक क्षापिफ)का ग्राणकियाई इस समस्तमश्नोत्तरकामाष या(प्रश्न) भूत्रकारने भोपशमिक सायिको भावी मियम मीपस्य स्वतत्वमौदयिफ पारिणामिको च' ऐसा पडा है परन्तु उदने सम्बे चोरे स्म्रके स्थान पर 'भौपशमिक सायिक पिभोदयिफ पारिणामिका' ऐसा स्त्र पनाना ठीक था। ऐसे स्त्र के पनाने में दो जगह दो पशष्द करने पड़े है वे भी न काने पड़वे महामारी सापत्र होता जोकि स्ध कारों के मत में मान शाम माना गया है इसलिए पैसा खम्बा चौड़ा स्त्र नो पनाना चाहिए (उत्तर) भोपामिक मापिफी भामा मिश्रमस्यादि जैसा सूत्र फार ने मूत्र पदा है उस में प शम्द से पहिले को गये मौपशमिक और सायिक भावों का मनुकर्पण होता है और उस से प्रोपरामिक और क्षायिक माणों की मिली हुई भवस्था मिषभाव लिया आता है किंतु मंसा सूत्र न का कर पदि भापयमिक सायिक मिश्रेत्यादि इंदगर्भिव स्त्र किया नायगा वो च शब्द के अभाव में भोपशमिक और सायिक का मर्पण न होने पर भोपामिक भौर क्षायिक को मिली हुई भरस्या वो मिश्र भाव की नहीं जायगी। प्रतीपेता प्रति ग्पसर्ग रामदादिगणका पातु मामा मय में प्रति +r= प्रती मणि प्रपानका य जोड़ कर और पिपिलिजन्य पुरुष एकवचम मारममे पदी वि मत्यप जोड़कर प्रता+प+त-प्रतीपेव रूप बना जिस का अर्थ मानावाप" DOMI DOTTOMOCIOCILITOINDCROOR सिद्धि मनार न० AROOPRDOINDEAD PDontacORED DRIANDROIN पानिमामी महासाप पाल कन पदखेद और सिमरस्पये सहित सवार्य सिदिय शम्मश हिन्दी अनुसाद मध्याय २ सुन ? तहि नायोपशमिकग्रहणमेव कर्तव्यमिति चेन्न।गौरवात्॥मिश्रग्रहण मध्ये क्रियते उभयापे नार्थम् । भव्यस्य औपगमिफ्नायिको भावौ । मिश्र पुनरभव्यस्यापि भवति औदयिकपारिणा- मिकाम्या सह भव्यस्यापीति ॥ किंतु उनते भिम मन्य ती दो भागों की मिली हुई भवस्या मिथ की मापगी मोकि विरुद्ध इसलिए गर्भित मत्र न काकर जमा सूत्रकार न सूप बनाया है वही ठीक है और उसमें च सम्दसे मौपशमिक मौर सायिक मावों की पिलो र भवस्या ही स मिश्रमाव का मर्य लिया जासकता है अन्य का नहीं । नरिसापारयिष्यास कर्नव्यम् इति पेत् (परनीता(सूत्र में) सपापशमिक (शम्ब)का पदण दी करना चाहिए ऐसी शका है (उचर मिश्र शम्द के स्थान में सायोपथमिक शब्द का प्रास)नहीं करना चाहिए) गागन मिभप्राणम् । मध्य । क्योंकि (मत्र) गौरस गोमाता पा पदमासा । मिम(शन ) का मादान पीचमें उभयापचार्यम् । क्रिपत पम्पस्य ।। -दानों (परिज विछन) की पिपताके लिए रियागया है। मम्प(नीव) के मा मिसापिकी, मागी =मापगमिक सायिक (दोनों) भाव में मिभान यमम्पस्प | मपि मरवि T बहुरि मिश्र(मा) मभव्य के भी होणारे मापिडपारिवापिस भ्याम्समग्णस्य'। मौदपिक पारिणामिक(भागों) सरिस मन्प(मोष) =मीर( प्रभम्य भी) सीनों वारयों की म्याम्या ऐसे कि पौपशामिक मोर नायिक पर पुग्म भार भादपिर पारिणामिक या युगत,इन दोनों युगोंके पीप मिझ माव पाठ रक्खा है ऐसा करनेस इतनी पमानन समझलना पारिए कि भम्प मापशमिक मादि पारों भापत मर्याद(१)मोपशमिफ सम्यक्स्प भौपशमिक पारित (२)शायिक सम्परत भार पापिर पारिम(३)शापोपशपिक सम्पक्स भोर पान एव चापापशपिक चारिम(४)मौदयिक मौर(५) परिणामिक पपीनों मार पप्पीत भार प्रमों के चायोपामिफ मौदविक भौर पारिणामिक ये वीनदी मान होते हैं। भारपिक मार जापित यश भार अपस्यो नी विरे WIDToe.ro Orden . DOOR OEDONO भनि सिद्धि पानिरासी मगरूपसाप पीस कात पदरछेद पौर विमात्पर्य सदिस सार्थसिमितिका शन्नश हिन्दीभनुवाद अध्याय २ प १ भावापेक्षया तल्लिङ्गसख्याप्रसङ्ग स्वतत्वस्येति चेन । उपात्तलिङ्गसख्यात्वात् ॥ तद्रावस्त त्वम् । स्व तच्च स्वतःवमिति॥ अत्राहतस्यैकस्यात्मनोये भावा औपशमिकादयते किं भेदवन्त उताभेदा इति । अत्रोच्यते भेदवन्त । यद्यव, भेदा उच्यन्तामित्यत आह- I DOBOJKDENHL ONROERO BRDORTED बायोपशमिश भायों में भी शान भौर दर्शन दो ही मार हसरत रेशान दर्शन से विध्या मान और मिथ्या दर्शन समझना चाहिय पनि सम्पन्दर्शन के बिना सम्यगान मादिनी ॥ मापापनपा सदा विसंमया-प्रसा। परन)माम(शब्द)की अपेक्षासे उस(भारशम्मा लिा और संस्था का संयोग स्मतस्वस्य 11 इवि पद स्वतत (शब्द) के होता है ऐसी शंका है (-पेर) प्रश्न का भावार्य पाहै कि भापशम पुनिश इसलिए स्मतत्व शम भी इनि पारिए और माषों की गणना पाव इसलिए सतत्व शम्न के भी यह यमन पारिए, स्वत्व शम्द नए सकलिङ्गमौर एक पपन है सो न पाहिए नपातलिय समयात्वात् ।। (उचर)नी marrयोति (स्मतत्व शम्द के) गृहीतनिध सस्या मर्याद स्ववस्त्र शन की लिज भौर सल्या पलटती नही पर भारपाची होनेसे एक पचन और नपुंसकचित्र होता है। वासनम् । स्वम् । ससम्वतापम् ।।इवि-मसका भाष सोतसरे । निममा(सोसवत्स ऐसे (स्मवत शन्दकी प्युत्पचिहै ) मत्रमावस्या एक्स्पोमात्मना। या (शिप्प पपया (फिउस एक चेतन के ये । मारामामोपामि मादयामाते क्रिम् भेदयन्त =ये (पांच)मार भोपरामिक भादि पेद सहित ग्वामभेदाइवि मप्र प्यता मेदयन्ता। -अपया (-उता) भेद रहित (घर) या कामाचा कि मेद सहित है परि०एपम् भेदा उपताम् गावि मत मार T ='मरन) मो पसे है (वो उनसे) मेद का जाना चाहिये। अतः कावे हैं कि AARowarooIDOSROOOOOOreoaDAEGO सिद्धि मपार । GARDOIRDORINDORADOMADODel पनिगामी नारामापीन कुन पदम्छेद और रिमास्यथ सहित सार्य सिविका शम्दश हिन्दी अनुराद मध्याय २ सूत्र ? नहि नायोपशमिकग्रहणमेव कर्तव्यमिति चेन्न । गौरवात्॥मिश्रग्रहण मध्ये क्रियतेउभयापे नार्थम् । भव्यस्य औपगमिकनायिका भावौ । मिश्र पुनरभव्यस्यापि भवति औदयिकपारिणा- मिकाभ्या सह भव्यस्यापीति ॥ किंतु उनसे भिम भन्य सी टो मारों को मिली हुई भवस्या मिश्र की नायगी जोकि विरुदौ इसलिए गर्भित भवन कार मा सत्रकार न सत्र बनाया है यही ठीक है और उसमें प शम्दसे मौपशमिक मार सायिक भावों की मिली हुइ मास्या की स मिभभाव का अर्थ खिया जासकता है अन्य का नहीं। नासापरापावागतकतमम् ॥इति चेत् (मरन)ता(स्य में) क्षयापशमिरु (शम्द)का माण ही करना चाहिए ऐसी शुका है (उत्तर) मिम शम्द के स्थान में बायोपशमिश शम्द का प्राण नहीं करना चाहिए) गारान् मिभप्राणम् । पप । =पयोंकि (स्त्र) गौरप होनाता था परमाता । मिभ( शम)का मादान बीचमें उभपापनापम् । किरन पम्पस्य ।। धानों (परिल पिएस) की रिपक्षाके लिए कियागया है। भम्प(नीर) के भोरगपिनापिका पानी =मापशमिक सायिक (दोनों) भापों पिभी पन मपणस्प । मपि मावि र बहुरि मिश्र(मार) मभव्य क भी होता पिपारिणामि पाम्समन्यस्य'। प्रौदयिक पारिणामित्र(मारों) सहित भष्प(मोप) =पीर( अमम्प मी) वीनों पाक्यों की म्यारम्पो ऐसे कि गौपशमिक और शापिक पा पुग्म भोर भादपिर पर पारिणापि या युगन,इन दोनों युगलोंके बीच मिन माप पाठ रक्सा है ऐसा फरनेस सनी में सामन समझलना मारिए कि मन्यके भौपशुमिक मादि पांचों भाव होते हैं मर्यात्()मौपशमिक सम्यक्स्प औपशामिक पारित (२,वापिक सम्पत्त मार हायिक पारिम(३)नायोपशामिक सम्पक्त और शान एय ज्ञायापमिस चारित्र(४)मोदयिक मौर(५) परिणापि प पारों भार सम्परीन और ममम्पों के सायोपशामिक औदारिक और पारिणामिक ये तीन की मार होता है। मोरपि भार सापिक पे दा भार भभग्य मार्ग दावे OMRON OXIDOARD Omro. Harm OUDOIRO ONAOMMODI - वि HDOOFROOHADHApro - पानिपासी मगासाप पखात पाद और पिभरस्पर्प सहित सपिसियिका शम्पशा हिन्दी अनुसाद पाय २ म २ द्वौ च नवच अष्टादश च एकविंशतिश्चयश्च हिनवाटादशेकविंशतित्रयस्त एव भेदायेषामितिवा वृत्निहि नवाटादरीकविंशतित्रिभेदा इति यदा स्वपदार्थे वृत्तिस्तदा श्रीपशमिकादीना द्विनवाष्टादशै कविंशतित्रयो भेदा इत्यभिसम्बन्धः क्रियते अर्थवशाद्विभक्तिपरिणाम इति।यदाऽन्यपदार्थेवृत्तिस्तदा निर्दिष्टविमक्स्यन्ताएगमिसम्बध्यन्तेोनोपशामिकादयोभावा हिनवाष्टादशैकविंशतित्रिमेदा इति॥ यथाकमवचन ययासख्यपोतपत्त्यर्थम् ॥ औपशमिको द्विभेद । नायिको नवभेदः मिश्रोऽष्टादशमेद। यौदायिक एकविंशतिमेद । पारिणामिक स्त्रिभेद हो। पन्ना १०मयावम०एशिविप परिदो और ना तथा मारा और सीस प्रयमाप०दिनसमष्टादशपिविषया और वीन दो नर-मारासपीस और बीन ये इन्नपिपाइन्दसमासडमा) नेता परमेदा । यपाम्।। इति पा.पुति । मोमेद मिन ऐसी (मन्यपदावधि ) भवा दिनपाठविशेविंशतिप्रिपेदाइवि. दो-मप-भारतीस तीन भेद ऐसे २ (येस्तपदावधि ) पवास्तपदा, एप्ति तदा भोपशमिकमादीनाम्।। -भर स्वपदा मृत्ति है घर भोपामिक प्रादिकों के दिनराशेकरिंगविप्रमादि दा-नर-महारा इलीस-सीन मेदर इनि भमिसम्म क्रिपसे T -पेसा समम्म किया गया है (भर्यात मेद शम्द सस्या का सम्पन्पी मा और पांचों मावों पपन पष्ठीविभक्तिकरि काना मो ये मेद पार भाषों के है भरशाद विक्ति परिणाम मि. -मर्थ के भाषारसे कामयोमन के मानप से विभक्ति का मिमपनापा परिणमन पदा मन्पपदार्थे ति सदा निर्दिष्ट विभपत्यन्तामा पाभिसम्मम्पन्वे । नप भन्यपदार्थ में वृत्ति जिसे वे ही हैं भद मिनफे वग(सूभम) काही अन्तराखी सिमतिसमझी माय पदमारोफे रही विभकिसीमोसूमी भोपरामिडाद: मारा: । द्विनाशादरा -प्रोपरामिक भादि भाप रे दो नष-मगर एपरिंशतित्रिमदातम्ययाप्रमचनम् । नाहीस पीन ऐसेक्षि)मेद । (सभम)पमाळम पारप पपासण्यपतिपस्यम् । भोपरामिक सम्पानुसारकी माप्ति (असिपपि) के लिए भयात् भोपरामिक दिभेदा बापिकानपभेद मिश्रा । अष्टादशभेद। दो भेद ससायिक नो भेद पवायोपथमिक भवारय मेद सारे मोरपि। पशिविमेद: पारिणामिक। मिमदा औरपिए इकोस मेद रूप है पारिवामिक वीन भेद कमरे BAPBOROTHEORADOORopIRRORTOta TIRDOUROOFD सर्या सिरि WLONDODuOCHROORDER पानिरामी गपसाप पकील कव पदरछेद और रिमरस्यर्थ सहित सार्थसिद्धिका शमशः हिन्दीमनुनाद भष्पाप २ सूत्र २ ॥ द्विनवाष्टादशैकविंशतित्रिभेदा यथाक्रमम् ॥२॥ द्रयादीना सख्याशब्दाना कृतद्वन्द्वाना भेदशब्देन सह स्वपदार्थेऽन्यपदार्थे वा वृत्तिवेदितव्या ।। द्विनपाष्टादशैकविंशतित्रिभेदा यथोक्रमम् ॥२॥ मापगमिमदीना भावानां दिनवाटादशेफ विशवि प्रिभेदा यथाक्रमम् भवन्ति ।।२।। पदर -मापरामिकाटीना भावानां द्वि-नव-मष्टादश-एफपिशति - त्रिमदा' ययाक्रमम् भवन्ति मसाए =भापगमिगदीनाम् ।। भावानाम् ।। -मापशमिक क्षायिक मिभ भौदायिक पारिणामिक मावों के हिना-मष्टादश-एकविंशति-विमेदा। चो, नव, भगरा इफ्फीस और तीन भेद पपाम्मम् ० भवन्ति T अनुक्रम से होते हैं मर्यात् भोपशामिक भाव दो मकार का मायिक भाष नर प्रफार का मिथ माषमगरह प्रकार का मौदयिक भाव श्कीस प्रकार का है भार पारिणामिक माव तीन प्रकार का है पदलेद और विभक्त्यर्प सहित दितीय सूत्र पर सस्कृत सर्वार्थसिद्धिवृत्ति का शब्दश हिन्दी अनुवाद प्रपाटीनाम्।। संख्याशनानाम्।। तानानाम् ।।दा मादिक गिनती शब्दों का पनाहुभावन्दु समास (कवदन्द्वानांसचि) मेदशप्दन। म सपनाउँला भन्यपदाचा और भेट शम केसरित(सह) स्वपदार्य में भयवा अन्य पदार्य में रपि । वदितम्या वृत्ति मानना योग्य मावार्य दानन मठारामादि सरस्पाभों का इन्द्र समास भार थमेंमदशनके स्वपदार्थ चिया भन्यपदार्यत्ति मानना 760GBarceoDAODOOTOMODAL ८ मग सानो सार मानाय और दिगम्बर मानाप में पाठ और कप पफमा है।

सिद्धि DAMOROPDEO HALDARADDaregarOOOOOOD एटानिवासी साप्ताय पफोन कर पदद मौर विमारपर्व सडिस सार्पसिदिप रामग्र हिन्दीअनुवाद मध्याय २ सूत्र ३ दर्श नमोहस्य योभेदा सम्यक्त्व,मिथ्यात्व सम्यमिथ्यात्वमिति,आसा सप्तानां प्रकृतीनामुपशमा- दौपशमिकसम्यक्त्वम् ॥ अनादिमिथ्यादृष्ट व्यस्य कर्मोदयापादितकालुष्येसति कुतस्तदुपशम । काललब्ध्यादिनिमित्नत्वात्। तत्र काललब्धिस्तावत्-कर्माविष्ट आत्मा भव्यकालेऽर्द्धपुद्गलपरिवर्तना- ख्येवशिष्ट्र प्रथमसम्यक्त्वग्रहणस्ययोम्यो भवति, दर्शनपोहस्य अप । मेदा ॥ सम्परस्वम् । प्दर्शनमोरनीयफे वीन भेद सम्पम्दर्शन मिथ्यात्वम् । सम्पर मिप्पास्वम् ॥ इति . पिम्यादर्शन और सम्पमिप्यादर्शन ऐसे भासाम् ॥सतानाम् मरुतीनाम् ।। उपरामात् ।। मन सामकवियों के सपशम से भोपयमिकम् । सम्परत्वम् ॥ अनादि मिथ्या औपशामिक सम्पम्दर्शन होता है (मश्न) भनादिमिथ्याष्टि मम्पस्य फर्म + उदय+मापादिव+काप्पे, सविसम्मष्पजीवफे कर्मके उनेकफरि कलपवावेसवे इव+उपयम। क्यों कर (पूर्वोक साव प्रकवियोंका ) नसके उपशम पोता है कालखम्पि-प्रादि निमिसला । (उचर) कारम्भि भादिके कारण से वर फालम्पिक सावत् । वा मयम ( म्वावस् ) काशवधि कर्म+माविष्टात्मा । मन्य। कर्मकार दवायागया मध्यनीव (आत्मा) भाद् कर्मसहित मम्यनीष काले । भर्दपुदलपरिपर्वनाख्ये । भवशिष्ट । संसारकालमें पीपल परिवर्समनाम (कास) अवशेष राने पर प्रयमसम्परत्वग्राणस्य 11 योम्प । मवसि T पहिले उपशम सम्पदर्शन के प्राणफरने योम्प होवारे (९) शिव रेगप से सम्यमत्पगुणध म्न मत तो महों परन्तु यह मत प्रमा, ये कोप सत्पथ से आप पर सम्पमाति है। जिसके रखपसे सम्यग्दीमका सर्वया घाव स्वस्प जीव के स्वभयान हो यह मिष्यात मावि है। और जिस गयसेसम्पदर्शन के सर्वधा पात स्पाप मिए परिणाम हो मिग विमसम्यवापसरे और म मिप्यारा परसपासम्यमिप्यारल प्रतिपद मिम परिणाम मोवैभाषियमापन। ODOHKOORIDOTOCIKLIDONIOCO मिद्धि मवा CARDOIRDOIROGIRIDERCOIRRITOHDom इसलिये काते हैं कि . पटनिरासो नगरपसाप मील कृत पदच्छेद भोर निमारपर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका शब्दरा हिन्दी अनुवाद अध्याय २ स्त्र ३ इति॥यद्येवमौपशमिकस्य को हौ भेदावित्यत आह- ॥ सम्यक्त्वचारित्रे ॥३॥ व्याख्यातलनणे सम्यक्त्वचारित्रे॥औपशमिकत्व कथमिति चेदुच्यते। चारितमोहो विविध कपायवेदनीयो नोपायवेदनीयश्चेति ॥ तत्र कपायवेदनीयस्य भेदा अनन्तानुवन्धिन क्रोधमान- मायालोभाश्चवार, इनि. -ऐसे (पयासरप या क्रमसे दो नव भठार मादि संख्याय भोपामिफ सायिक मिल मादिकों पर लगाये नावे) पदि० परम् परामिास 1 फोन मेदो ॥ परन) मो इस मकार है (वो) भोपामिफके कौनसे दो मेद में पनि मन' भाइ सम्यक्त्वचारित्रे ॥ ३ ॥ सम्यक्त चारित्रे दावोपशमिको मावो मवत ॥३॥ मसालपारियो ऑपशमिको मागमप' । सम्पत्य वया चारित्र दो भोपामिक भावर-भोपामिक सम्परत्व भोपामिकचारित्रों परच्छेद और विभक्त्या महित तृतीय सूत्रपर. संस्कृत सर्वार्थसिद्धिवृत्तिका शब्दशः हिन्दी अनुवाद प्याटप्यानतरण सम्पसापारिने | -पूर्व निन के सम्मको सम्पत्य और पारियों भारपिताम् कथम् ०वि० प ० उच्यते । भीपरामिकपना फैसे है पेसा इति) संदेह-वेद होनेपर कहागपा(उच्यते कि पारियमार शिरिष पापवेदनीय। वारियमोह दो प्रकारका रेफपापपेदनीय गोपादनीप' | प. इति । और नाफपायवेदनीय इस प्रकार हैं। (किंचित् पाप-शिकपाय ) मघापारबेनीपस्य । मेदामनन्दानुगरिन । = वा फपायवेदनीयफे मेद अनन्वानुगन्धी पार पान पापा लामा पसार -फ्रोप-पान-पाया-लोभ पार ॥ मरारोमा दिगमरमार पनामरामायां में पाठ और मप पसारामारमा पोवाशिवरपरसेपर "मामा परिन मापन यापन प्रमता होती है पीछे बारिष पाप का उदय होता है इसलिए सम्परपी परिपारिमल मे मम्पमपातपनि प्रयोग किया गया Ko to ano ORO ORO UOOOOOO १० .

सिद्धि DAEIDARCOLEDEERDORPORANDEDNAURPeearPEO एटानिवासी गाय पडील का पद और विमवस्थ मावि सर्वसिद्धि शमश: हिन्दीभनुपाद अध्याय २३ दर्श नमोहम्य ज्योमेदा सम्यक्त्व,मिथ्यात्व सम्यमिथ्यात्वमिति,भासां सप्तानां प्रकृतीनामुपशमा- दोपशमिकसम्यक्त्वम् ॥ अनादिमिथ्यादृष्टव्यस्य कर्मोदयापादितकालुष्ये सति कुतस्तदुपशम । काललब्ध्यादिनिमित्तत्वात्॥ तत्र काललठियस्तावत्-कमाविष्ट प्रात्मा भव्यकालेऽर्द्धपुद्गलपरिवर्तना- ख्येवशिष्ट्र प्रथमसम्यक्त्वमहणस्य योम्योभवति, दर्शनमोरस्य प्रप' । भेदा ॥ सम्पपस्वम् । मर्थनमोहनीयफे तीन भेद सम्पम्दर्शन मिप्यात्वम् ।। सम्पद मिथ्यात्यम् । इवि. पिप्यादर्शन और सम्पमिथ्यादर्शन ऐसे भासाम् । समानाम् मिठतीनाम् ॥ पश्माद ।। इन सातमहादियों के उपशम से भोपसमिझम् 1 सम्यपत्वम् । प्रनादि मिप्याराग म्योपशामिक सम्पम्दर्शन होता है (प्रश्न) भनादिमिप्याष्टि मध्यस्य फर्म+दय+मापादिव+काप्य, सविता मन्यनीरफे कर्मके कारि कछपवारोवेसवे इव0+उपराम चयों कर (ोक साव प्रकवियोंका) उसके उपराम होवारे फारसम्धि-मादि निमिषस्वात् । (उपर) काखसम्म भादिके कारण से पर कानसम्मिवार ० यो मयम ( तावत् ) कालखप्पि फर्म+माविष्ट । भास्मा । सम्म। कर्मकरि दयापागया भव्यनीव (भारमा) अर्थात् कर्मसदिय मम्पमीव फाले , मर्दासपरिवर्तनास्प ।। अपशिष्ट । संसारकासमें मर्दशनस परिवर्तननाम (कान) अबशेप राने पर मयमसम्यक्त्वप्राणस्य ॥ पोम्य । भरवि । पहिले उपशम समयदर्शन के मरणकरने योग्य होता है (१) जिस पर उपप से सम्परत्पगुपका मूत होगहों पण्तु बल मल प्रसाद ये बोप सत्पथ हो साप पर सम्पमति है। जिस फर्मके गपसे सम्पम्पमा सर्पया पाच स्वरूप बी मादाम पर मिप्याच महति । और जिस कर्म उपपसे सम्यम्पन हे सर्मया परिणाम मी वैमाषिभाय ही। पास स्वाप मिसे हर परिणाम मिमको सम्पाप मारे मोर म मियाम्पकमा पार सम्पमिम्याप महतियामिन TOKOMODORO NOOITONIOCI ११ सिद्धि माप HADOHINDONALLONDOMURDGupebasutOAROOHRO पानिपासी नगरूपमाप सहीत कत परपद भार विभात्पर्य सहित सपार्यसिद्धि का शपय हिन्दी अनुवाद अध्याय २ सूत्र ३ नाधिके इति इयमेका काललब्धि ॥ अपरा कर्मस्थितिकाललब्धि । उत्कृष्टस्थितिकेषु कर्मसु जघन्यस्थितिकेषु च प्रथमसम्यक्त्वलाभो न भवति॥क्व तर्हि भवति ।अन्त कोटीकोटी साग- रोपमस्थितिकेषु कर्मसुबन्धमापद्यमानेषु विशुद्धपरिणामवशात्सत्कर्मसुचततःसख्येयसागरोपम महमोनायामन्त कोटीकोटीसागरोपमस्थितौ स्थापितेषु प्रथमसम्यक्त्वयोग्यो भवति ॥ नमभिः । इनि० इयम् साकारभि न कि भपिक (संसार काल के अपग्रेप राने) पर इस प्रकार एक पास सम्मिी मपगारपस्थिरिकाससम्म -इसरी फस्पिदि कालखम्मि भर्यान् पा काल सम्मि जिसका नाम फोकी रिशेपस्थिति पर निर्भर है मार्म स्थिति मागे जाते हैं एस्पिति कममा नफपस्थितिका, उत्तपस्थितिमाने कर्मों में तया (-घ) अपन्पस्थिति वाले कर्मो में मपममम्पस्पतामन मति । अधम उपराम सम्यग्दर्शन फी माप्ति नहीं होती है अर्थात् रस्तष्ट स्पितियाले पा मान्य स्थितिमाले कमाके दिपमान राव प्रथम सम्यक्त्व के प्राण की योम्पता नहीं होती। मानिाभन्नाकाटीपोयसागरापमस्पितिए, या प्रश्न) ता (मपम सम्पत्य की खाम, कहां होती है (एक) कोरी कोही सागरोपमके भीतर २ (अन्त) स्पिविलिये उपगुपिम्प मापपमाना कमाके यमाय को प्राप्त गने पर (भापथपाने) दिपरिणापर व मकर्मसु च तत'. मौर (महा) निर्मश परिणाम कमायर से सत्ता संबित कमाझी स्थिति ममयेपमागरापममइस+नापाम् ॥ सम्यातामारसागरोपमहीन मा मेसीसागरोपमम्यिता मा स्थापितात -मन्त कामाकोसी सागरोपपस्थिविर्भस) रा मानेपर (स्थापिते) अपमसम्पापाम्प । भवनि T मयम सम्पवस्व के (प्राण) याग्य (नीव) होता (मापाप) मापुवर्मके पिना पुणातरम्यापसे अंत' कोरिषोटिसागरममाणकर्म HOMRO JAROTOTIBUCIO COCO य १३ सिद्धि searBETABOOURIME CHHAMAKA UPCORahanu स्टानिमाप्ती नगरपसाय पीस कर पदरछेद मौर रिपरस्पर्य सहित सर्पसिमितिका शब्दशः हिन्दीमनुगाद मध्याय - मूत्र३ अपरा काललब्धिर्भवापेक्षया। भव्य पञ्चन्द्रिय सझी पर्याप्तक सर्वविशुद्ध प्रथमसम्य क्त्वमुत्पादयति ॥ श्रादिशब्देन जातिस्मरणादि परिगृह्यते॥कृत्स्नस्य मोहनीयस्योपशमादौपश- मिकचारित्रम् ॥ तत्र सम्यक्त्वस्यादौ वचन तत्पूर्वक वाचारित्रस्य ॥ य नायिका भावो नवविध उद्दिष्टस्तस्य भेदस्वरूपप्रतिपादनार्थमाह- उसी काल में घंप हाय मार पहिले के सचा में विद्यमान समस्वकर्म परिणामोंकी विशुद्धतासे संख्याद नार सागरोपम घाटि भंव' फापा फादी सागर प्रमाण होगये उस समय मपम सम्यक्त की याग्यक्षा होती? अपरा ॥ काल सम्पि ।। मय-मपेक्षया ।। मन्य काख सन्धि भवकी अपेमासेरे भय पन त्रिय संशी । पर्याप्तक । सर्वपिनुम। भव्य जीव पंचेन्द्रिय संशी पर्याप्त भवस्था पाला सर्वसे विशुद्ध परिणामपाता मयमसम्पररपम् । उत्पादयति । अपम सम्पग्दर्शनको उपनावा ।। मादिशम्दन पनाविस्मरणादिः परिमृमवे r (कास लम्यादि वास्यमें) भादि शन्द करि माति स्मरणादिकका ग्राणफियागया छत्स्नस्यामाइनीयस्याउपग्रमातामापरामिकम् -समस्त मोहनीय कर्मफे उपशमसे उपराम पारित्रम् ॥ वा सम्पयस्यामादौवचनम्। पारियहोवादवा(िसम्यक्त्वचारित्रेस्त्र)सम्परत्वकीमादिमेवापहिलेफयन(वचन)। तत्-पूर्वफत्वाद ॥ पारित्रस्य। क्योंकि चारित्रका होना उस सम्यक्त के निमित्त से है मर्याद मात्मा प्रयप सम्परतत अपस्यास्प होगा फिर पारिष मरस्यात्म या सायिक। भाषः। नरपिपमा वरिष्टः तस्या। मो मायिक मात्र नौ प्रकार का गया है विस (सायिक माप) के भेदसम्म प्रतिपादन+मर्थम् ॥ भार म्भेद स्वरूप के काने के लिए (कर) कि (1) मारकिया जातिस्मरण पास येइमासे पीड़ित र प्रयमउपशमसम्पफ्ल्प उपमा है। धोये नरफ से सावां मरक तक वेदना मोर माठिमरणदासी कारण है। पशुजाविमरण पर्मभपण सिनविष पनि तीन भारत है यही मनुष्य के है। भषमवासी देयों से देष विना तीनही कारण है। इससे म्पर मातिसरण धर्मप्रवण वो कारण है। वारा स्थर्गतक मातमरण धर्मभपस जिनर्षिय दर्शन रेषाफी अखिका देवमा चार कारण है। तेरहवस्वर्गसे सोलहस्वता PAROSCIRBOAROOPOONPORIEDOCOTOBAROO १३ सिद्धि मर्याय १४ RADDHADURPORATOONAMOHIRONITOCaCOM पानिरासी मगासाप बसीक्षकच पदच्छेद और निमरत्पर्य सरित सार्यसिदिका शम्दश हिन्दीभनुपाद मध्याय २ सूत्र । ॥ ज्ञानदर्शनदानलाभभोगोपभोगवीर्याणि च ॥ ४॥ चशब्द सम्यक्त्वचारितानुकर्षणार्थ ॥ ज्ञानावरणस्यात्यन्तनयास्केवलज्ञाननायिक तथा केवलदर्शनम् दानान्तरायस्यात्य तनयादनन्तपाणिगणानुग्रहकर क्षायिकमभयदानम्॥लाभान्तरी यस्याशेपस्य निरासात्परित्यक्त- ज्ञानदशनदानलाभमोगोपभोगवीर्याणि च ॥ ४॥ शानदशेनदानशापपागापभागीर्याणि सम्पपत्पपारिन मान दर्शन-दान-लाभ-भाग-उपमोग-पोर्याणि, सम्पक्त-चारित्रे च एत धायिकभाषस्य ना मेदाः भवन्ति मान-दान- -वायिक मान मर्याद वनशान, घायिकदर्शन प्रर्धात् केपखदर्शन, गान-नाप-म ग-उपभोग-बीयाणि ॥ प नायिकदान, पापिकलाम, घायिकमोग, सायिकउपमोग, सायिकवीर्य मौर सम्परत-पारित, एन नायिम्भावस्प | दायिक सम्यक्स्प, ज्ञायिक पारित्र, य सायिकमायके नप भदा ।। मरन्ति । =नर मेद होत है। ये ही नब मीपफे निम ज्ञायिक भार हैं। पशुग्दा सम्पारसगरिष-मनुर्पण-प्रर्य ।। (स्म) पशन सम्पन्दर्शन तपा (सम्य) यारित्र के प्राणक लिये है। मान-मारणस्प।मस्पन्त-अपात्। केवलगानम् आनापरणोपकर्म के भविश्य नासे कानमान प्रापिम् नया . फेरवदर्शनम् ॥ -नायिक होवा हैदर्शनावरणोपकर्म के (भत्यन्तनाशसे)कवलदर्शन(सायिक होताहै) नान+मनरायस्य गमत्यन्त-क्षयान्तामनन्नप्राणिगण-भान भन्तराप के भविशय नाश (होने ) से अनन्वनीषर्षाका मनुवाकरम् सापिम्म्॥ अभयदानम् ।। -उपकार फरनेवाला क्षायिक अभयदान होता है। लाम+मन्नरापस्पगमवशपस्यमानिरासान् परित्यक्त-शाम भतराय नामा कर्मके सम्पूर्ण प्रभाषसे किसी प्रकार से ना(िपरित्यक्त) (सताम्पर और निगमरदाना सम्प्रदायों में समान पाठ और पाय एकसा है। CIROOTOUTOONTROLTOOTOOTOOMICATOO १५ सिद्धि एटानिमासी भगरासाप महत पदघेद और विभक्त्यर्थ सहित पसिदिका गन्दशा हिन्दोमनुनाद अध्याय २ र ५ कवलाहारक्रियाणां क्वलिनां यत शरीरबलाधानहेतवोऽन्यमनुजासाधारणा परमशुमासूमा अनन्ता प्रतिसमय पुनला सम्बन्धमुपयान्तिसक्षायिको लाभ ॥ कृत्स्नस्य भोगान्तरायस्यात्य न्ताभावोदाविभूतोऽतिशयवाननन्तो भोग नायिक । यत समवृष्ट्यादयो विशेषा दुपार्भवन्ति ॥ निरवशेषस्योपभोगान्तरायस्य पलयात्मादुर्मू तोऽनन्त उपभोग नायिक । यत सिंहासनचामर च्छत्रत्रयोदय विभूतयः ॥ वीर्यान्तरायत्य कर्मणोऽस्य तनयादाविर्भूतमनन्तवीर्य नायिकम् ॥ १५ FDMROSERON.GOOGoineDMRODHEROLOD कवस+माहारक्रियाणाम् । फवखिनाम् ।। -कवखार की क्रिया मिनफे ऐसे फेवली भगमानके (फेरलिनाम्) यत' शरीरपसापानांतर ॥ अन्य मनुम+भसापारणा। जिससे (पत') शरीर केपलापानके कारण अन्य मनुप्पो न रहन पाली परमभुमा सुक्ष्मा' । अनन्तामसिसमय अत्यन्त शुभ माम समय समप प्रति अनन्वे प्रसार । सम्बन्धम् । उपयान्ति T -पद्रत के परमास (पुदगला ) सम्पन्ध को माप्त होस में समापिका सामरस्नस्य ॥ मागावरास्प। सो सायिक साम। समस्त भोगान्तराय नाय कमरे भस्पन्त-प्रभावात् ।माविर्भूतापामविश्यवान् । अनन्व- प्रशेपमय से प्रगरम भतिशयपान अनन्त भोगा । वापिस । यस -इसमष्टि-मादयः ।। सायिक भोग है भात् मिससे (-यमा)पप्प पुष्टि भादिक रिशेपामापन्ति र निरवशेषस्य । उपमोग विशेप प्रगट होते है पेसमस्त उपभोग मन्दरापस्पापक्षपाद ।। प्रादुर्भवः । मनन्ता। म्भन्तराप नामा कर्म के नाशसे प्रकाशरूप मनन्द उपमोगा। पापिकापता सिंहासन-पासर सायिक चपभोग में भर्याद जिससे सिंहासन पामर प्राय-भादयामिभूवयापीर्यान्वरापस्यापकर्मणः परमादिक विभूतिय (मगट)ोषी ।। (भौर वीर्यान्दराय नामा कम भस्पन्त पयाद माविभवम् सामनन्तवीर्यम् क्षायिकम्।।म्मत्यन्त नाशसे यायिक मनन्त वीर्य मगरगामा है। MOOMHODEOMAMRODEMOTIODOORNOONAD १५ मथ TWO A Den Oman graf Da + CW TO सिद्धि पानिमामी भगासाप मोलकर पायेद और विमरत्पर्य सहित सार्यसिदिसाशनश' हिन्दीभनुपाद मध्याय २ म । पूर्वोक्तानां सप्ताना प्रकृतीनामत्यन्तक्षयात्नायिक सम्यक्त्वम् ॥ चारित्रमपि तथा॥यदिनायिकदा नादिभावकृतमभयदानादि, सिद्धेप्वपितत्प्रसङ्ग ।नैपदाप । शरीरनामतीर्थकरनामकर्मोदयाद्यपे- नवानपा तदभावेतदप्रसङ्ग ॥ कथ तर्हि तेषा सिद्धेषुवृत्तिः । परमानन्तवीर्याव्याबाधसुखरूपेणैव तेपा तत्र वृनि । केवलज्ञानरूपेणानन्तवीर्यवृत्तिवत् ॥ य उक्त नायोपशमिको भागोऽष्टादशविकल्पस्तदनिरूपणार्थमाह- तिानाम् सप्तानाम् पिलानाम् ॥ मस्पन्वनपात् = परिल फही दुई(पोस्नीयकम दी) सासमहतियोंका अशेष नाशप्ते पापिापा मम्पारसम् पारिनम् । मन्तिया० नायिकसम्पन्दर्शनाता वैसे(चारित्रमाफममापसे)सायिकपारित्रभीरे यदि पापिसानारिमारकतम् । मभयदानादि =(परन)मो सायिक दानादिष्मावकरि कियेहुए प्रमयदानादिक हैं। सिमा भपि-तन्-RATHIन एप दोपः। तासिदोंमें भी उन(अभयदानादि) का संयोग है (उचर)पा पण नहीं है मीनामोरनामा उदयादिमपनत्तात् । भगतनिके शरीरनामानामकर्म वीर्यकरनामकर्मक उद्रेकविवक्षा सेरे पाम पतामभार , तद्-भप्रमा तिन(सिदनि) के उन(को) अमावानपर उन(अभयदानादिक)कामसरनी पपम्नतिपाम् पसिया । वृधि । (पश्न)तो(ति कैस तिन(भमयदानादिक मानों की)सिडोंमें मधिषास्थिति सामनन्तदीय-अम्पावाप-सम्परूपेण (उत्तर)रस्तष्ट अनन्तवार्य भम्पाप मानदस्वरूपसे राम् । भनि । तन(भमयदानादिक भावों की(सिमो में ) महति है। कावधानरूपण ॥ मनन्नवीम्ये वाचन केस मानस्परिमनन्तमार्य प्रतिके सरग(सिदनिकै प्रभयदानादिकयाष मापापशमिर मार भादविका -गो पापापरापि माष भारा महार नभद-निपणापम् | भाrr पाने क लिए(माता- समा MADUNIRDOMINOORBONDOIRDanceRECORDost PHOUR ८ ६ विर्षि • nभामा सिद्धि DXTBOOOOOODARBORROOCTORCOAROOT एटानियासी नगरूमसहाय कील व पदच्छेद और विमापय सहित सार्पसिरिका शब्दश हिन्दी मनुवाद अध्याय २ स्त्र ५ ज्ञानाज्ञानदर्शनलब्धयश्चतुम्रित्रिपञ्चभेदाः सम्यक्त्वचारित्रसंयमासँयमाश्च ॥५॥ ज्ञानाज्ञानदर्शनलब्धयश्चतुस्त्रित्रिपचभेदा सम्यक्वचारित्रसयमासयमाश्च ॥५॥ EARIशारभयरपततिषिपंप मेदाम्ययानमम् सम्पपलपारिप संयमासंयमा (इत्येवेदिश चायोपशामिक मावा पमरन्aिrmin परद-मान-मनान-दर्शन-सम्भय चतुधि-त्रि-पंच मेदा (यथाक्रमम् इसमभ्यायकेदूसरेस्यसे लियागपा)सम्परत्व-पारित्र-संयमा सयमा ति एवे अष्टादश क्षायोपशमिका' मावा' भरन्ति च ॥५॥ मान-मान-दर्शन-सम्पयाचितुर्-त्रि-त्रि-पव-भेदा'। मान, मान, दर्शन, सम्मि, पार,तीन,दीन और पांच प्रकार पपाळमम्सम्यपस्व, चारित्र- अनुमसे लायोपथमिक सम्परस्प, सायोपयमिक पारित्र (सराग पारित्र) संयमासंपमा साइविएमिष्टादशापिस संयमासयम (दशवव) ऐसे ये भटारा भी (-ब-जीरके) क्षायोपमिका मावा भवन्ति T -क्षापोपरामिफ भार भर्यात् मतिमान,भुवमान भवपिमान, पन' पर्यप भान ये पार मान मवि अयुष, भयपि ये वीन इमान,पषु दर्शन,प्रवाह' दर्शन, अपिदर्शन ये तीन दर्शन, भौर सायापशमिकदान,मायोपशपिकलाम,मायोपशमिकमोग,क्षायोपशामिकउपभोग,सायोपशपिक-चीर्य ये पांचमकार सन्मि, मायोपश- मिक सम्पक्स, सायोपयमिकचारित्र, सायोपथमिक सयमासयम ये सर्व भठारा मान भी मात्मा में कर्मों के सयोपशम से पोसे हैं। स्मरण रहे कि स्थ प शम्दसमुपयके लिये है इस लिये मिवने लायोपशमिक मापों का सूत्र में उल्लेखनहीं किया गया है इस प शम्दसे उनका समुघय करना चाहिये । भव इमने च शब्द का अनुवाद भी ऐसा किया है। तामर सम्प्रदाय समाप्यवत्वार्याधिगमनमे पायोपामिक भावो विषयमें जो यह पचिपा सत्र है उसमें हमारे यहां के पचियों परसे बामणाम दर्शन पास सगवा ही पामारि पास भपिक है रोप पाठ पुमका दोमो मानायोमें एक है।पामादि' गममपिक होने पर मी भय भेव योमा सम्प्रदायों में नहीं है क्योकि हमारे पहा 'लम्पया शमका अपं पायोपामिक्यानसम्धि पोफ्यमिक लामलम्बि पायोपामि मोपलागिन पायोपरामिक उपभोगसन्धि पायोपामिक पीबपि किया है और श्येताम्बर मामायके समाप्य में दानावि सम्पपा वासका यही तात्पर्य लिया है जो हमारे पहा लम्पया समधामका दोनों में भर्य मेष मी मही पाबानावि रामकेम दोन से सुध लादो माता OCTOOOOOOOR OTUOTTOTOO: १७ सिद्धि A सपाय -- । NEHRADHERAILERAEMORNIMOOMBONAeITRPORT पानिपासी नासा लान पदरद और मिस्त्पई सहिद पपिसिदिका शम्पशान्दिोमनुसार मपाय २ हम ५ चस्वार अत्रयश्च तयश्वपञ्च च चतुरित्रिपञ्चभेदा यासांताश्चतुम्रित्रिपञ्चभेदा ॥ यथाक्रममित्य- नुवर्तते । तेनामिसम्बन्धाचतुरादिभिर्ज्ञानादीन्यभिसम्बन्ध्यन्ते। चत्वारिज्ञानानि नोएयज्ञानानि,त्रीणि दर्शनानि, पर लब्धय इति ॥ सर्वघातिस्पर्वकानामुदयनयानेषामेव सदुपशमाहेशघातिस्पर्धकाना मुदयेनायोपशमिको भावो भवति ।। तत्र ज्ञानादीना वृत्ति स्वावरणन्तरायनयोपशमाद्व्याख्या तव्या॥सम्यक्त्वप्रणेन वेदकसम्यक्त्व गृह्यते । अनन्तानुबन्धिकषायचतुष्टयस्य T साप प्रपा पाप प पतुति -पार क्या तीन और दोन परि पारा इन्न समान चार तीन (प-पादा। पासाम्ला :मि-धि-परमेदाम्पीन पाप हुमा । ये हैं मेद मिनरे वे पार तीन तीन पाप येव ॥ पपासपम् गतिक मनुवे । वन । म्याक्रमम् ऐसी अनुपचि (दूसरे सूत्रस)निकलती है विग(यवाफममनुषिक भाषसमन्यादा परादिभिः संपाम स बार तीन तीन पाव(ये संख्यामों के साय) नादीनि ॥ भिसम्बगपत T भान भाान दर्शन खम्भि वासरूप लगाई नावी पसार प्रानानि 0 -अर्थात् पार जान दे(मति-श्रुव-मरपि-मन पर्पय) भीfण मनानानि प्रोणिसारनानि 11 म्भीन प्रदान(पति,भूति, भपि) बोन (पशु ,सपा, भयपि) दर्शन है, पायपाक्षिक पाप (दान, साम, मोग, उपमाग पीय)खम्मि ( ऐसे पर पना) ममयानि सानाम् रिदयसपान सपा एक पर्यपाति सर्यकानि के रदयामारी आपसे(विना रसदीये विरमाना)मौरविनती सन् जगमात्, शमादि-पदकानाम् ।। दये। सपाला उपशमसे और देशपाति सर्दकनिक रदय रोने पर पापापnिा पावि तप' म्वायापयामि भार होवावा मानादीनाम् ।। पिसा स-पारण-मम्पराप सानादिर की पधि अपने अपने भावरण तया अन्तराप- पापापरावाद ,म्पाम्यावस्या सम्पक्त प्राणेन बापापशमसे सभी गई मानी गई समे) सम्पमत बानेसे दासम्पतम् । दरसम्परसम्बापोपापियसम्पक्समरण किया गया मन्नानुम्पिकापरस्म ५ -अमदारापी आपके पास (भोप-पान-बाया-गोप) CCTOCOCOCKPOONIODINDORBINODEO 16 सिद्धि DICOONLINARODROIOCTOONOTIFORNIDIO मिथ्यात्वसम्पमिथ्यात्वयोश्चोदयतयात्सदुपशमाय सम्यक्त्वस्य देशघातिस्पर्द्धकस्योदये तत्त्वार्थश्रद्धानंदायोपशमिक सम्यक्त्वम् ॥ मनन्तानुबन्ध्यप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानद्वादशकषायो प्रप्यायरी दयनयात्सदुपशमात्र सञ्चलनकषायचतुष्टयान्यतमदेशघातिस्पर्दकोदये नोकषायनवकस्य यथासम्भवोदये च निवृत्तिपरिणाम प्रात्मन नायोपथमिक चारित्रम्॥अनन्तानुबन्यप्रत्योख्या नकषायाप्टकोदयनयात्सदुपशमाचमण्याख्यानकषायोदयेसज्वलनकषायदेशघातिस्पर्द्धकोदयेनोक- पापनवकस्ययथासम्भवोदये च विरताविरतपरिणाम नायोपशमिक सँयमासँयम इत्याख्यायते।। विष्यातसम्पमिप्यातयामा पदपत्रपाद ।। मार मिभ्यास सम्पग्मिध्यासोंके उदयसपसे सदापरामाद १. सम्पत्तस्य | जया सचारूप पापसे भौर सम्पमा प्रतिके देशवाविपदकस्य ।। पदये । वत्वार्पमानम् ॥ देशपाति पदकच यदय हानेपर ( मो तत्वार्य प्रदान (गोवा) पायापयमिकसम्मासम्॥मननानुगन्मि-अपत्याएपारम्पोसायोपरामिडसम्पग्दर्शन परिमनन्तानुपन्धी समस्यास्पान प्रत्यास्पानदारापाय-उदयसपाद । म्यस्यास्पान पारसार्योडो नदयामागी आपसे भौरदनहीबारापापोंग सवापरामात् ॥ पसंम्पसम पायपष्टसमन्यवम चास्स रपगपसे भौर संम्पसन पापके पतष्क में से किसी एकपापके दरापाविस रदपेप.नो साप मास्प in म्देशपावि सर्वनिका चदय होने पर महरि नईपरूमापोंके पपासम्भलपदये गए निषिपरिणाममा मात्मन!! -यपासम्मर रदय होनपर(मो)मात्मा का सागरण परिणाम(है सो) पायोपणमिपारितम् ॥ मनम्बानुगन्नि मापोपामिक पारित (मौर ) अनन्तानको भमत्साम्प्यानपाय-मटार-उदयधपाद । प्रमत्यास्पान मसायों मार के दयाभावीचपसे(मरिनारस दिपे सिरना) साशात् । चमत्यास्पानकपाय-दये। सपासप उपशमसे भौर प्रत्साम्पान पापके उदप होने पर सम्पनरूपाप देशपाविपदकरदयानापापनकस्य (और)संम्पसन पाप के देण्याविसदउदप होनेपर व नोकपापके वकको पपा सम्मा रदये । प०पिरव-अविरत परिणाम स्पपासम्मक पदय शेन पर (भारमा) पिरता शिव परिणाम (ोप है सो) प्रायोपथमिक। संपपासपमा विमास्यायते । म्यायोपिक संपपासपम है ऐसा पर्सन किया गया है OVOCI DIDIEN DUIDIDUNTO सवाय सिदि १८ SHMAawAAMDAIMORAMMEMORROR पानिपती नगरपसाप परीकन पदद और भिक्स्पर्य सरिव पायसिदिका शम्पराः रिन्दोमनुवार मध्पाप २ न ५ चत्वार प्रत्रयश्च वयश्च पञ्च च चतुरित्रिपञ्चमेदायासाताश्चतुरित्रिपञ्चभेदा ॥ यथाक्रममित्य नुवर्तते । तेनामिसम्बन्धाचतुरादिभिर्ज्ञानादीन्यमिसम्बन्ध्यन्ते। चत्वारिज्ञानानि नोएयज्ञोनानि,त्रीणि दर्शनानि, पब लव्धय इति ॥ सर्वघातिस्पर्वकानामुदयनयारेषामेव सदुपशमाद्देशघातिस्पर्द्धकाना मुदयेतायोपशमिको भावो भवति ।। तत्र ज्ञानादोना वृत्ति स्वावरणन्तरायनयोपशमाद्व्याख्या तव्या॥सम्यक्त्वमदणेन वेदकसम्यक्त्वा गृह्यते । अनन्तानुवन्धिकषायचतुष्टयस्य पतारःप प्रपा पर पत -त्रि =चार तया तीन और तोन पहुरि परिका दन्द समास पार वीम पि-पत्रमदा। पासाम्ना, पतुः प्रि-त्रि-पत्रभेदासीन पाप हुआ। ये रे भेद मिनके वे पार तीन तीन पाप भेद हुये ।। पपाश्रमम् माविक मनुनते । वन । =पयाक्रमम् ऐसी अनुपचि (दूसरे स्त्रस)निकलती है विय(यवाझममनुचिक भषिसम्मन्यात् । पराविधि संयाग स पार तीन वीन पान(ये संस्म्यामों के साप) नादीनि भमिसम्मपन्त र म्यान मान दर्शन लम्पि पवासस्प लगाई मावीरे परगतिनानि =अर्थात् चार शान (मति-भुत-मरषि-मन पर्यय) श्रीणि मनानानि प्रोणिया दर्शनानि ॥ भीन भान(कुपवि,भुविभपपि) वोन (पघु मचा, मषि) दर्शन है, परापमा विक पाप (दान, खाम, मोग, उपभाग पी)वधि ( ऐसे सर पदारे) सपपानि पर्दपानाम् ।उदयसपान । तेषाप । एक पर्वपाति पकनि फे उदयापारी आपसे विना रसदीपे विरमाना)मौरविनकोही मन्०रशपात शिपाति-पकानाम् ।। न्दये । =साचारूप उपशमसे भौर देशवाति स्पर्द्धकनि के उदय रोन पर पापापपिपा. परवि तपः -मायापमि भार वारे वा पानादीगम् च । स-मारण-मन्तराप- -दानादिर की महति अपने अपने भाषरण दपा भन्वराप- पापागाइ ,म्पास्पापम्पा सम्पपत्त प्राणेन पायोपशपस पर्थन दी गई है पाकी गई (एम) सम्परत गानेसे पहासम्परतम् | -वेदकसम्परता-पापोपणपिडसम्पपस्व प्रण किया गया है भनन्नानाविपापपवासस । -ममम्मादाम्पी सायके पर (कोप-माम-मापा-गोष) DOCCIDC'ar OCDISTINCT । १८ .

सिद्धि य २९ ORIEDUCEDDINOCanoeBANOGarOOHROmareENRO पटानिवासी नगरपसाप पकीयकृत पदच्छेद और विपक्त्यर्व सहित सर्मासिलिका शमशा हिन्दीअनुराद अध्याय २ सूत्र ६ यथाक्रममित्यनुवर्तते तेनाभिसम्बन्धात् । गतिश्चतुर्मेंदा नरकगतिस्तिर्यग्गतिर्मनुष्यगति- देवगतिरिति । तत्र नरकगतिनामकर्मोदयानारको भावो भवतीति नरकगतिरोदयिको । एवमि तरत्रापि ॥ कपायचतुर्भेद ,कोधो मानो माया लोमइति ॥तत कोधनिर्वर्तनस्य कर्मण उदयाकोध प्रोदयिक । एवमितरत्रापि। लिङ्ग त्रिभेद ,स्त्रीवेद पुवेदोनपुसक्वेद इति ॥ स्त्रीवेदकर्मण उदया रस्त्रीवेद प्रौदायिक । एवमितरत्रापि ॥मिथ्यादर्शनमेकमेद, दुस्पनुपादा-पयाम्पम् ॥इति मनुवर्तते । (पयाक्रमम् )ऐसी भनुचि इस अध्यायके दूसरे स्त्रसे माती। सनमा मभिसम्म पाव । गति । पर्मेदा:1} =विस(मनुषि)द्वारा संयोगसे गति पार प्रकार है। नररमणितिर्यम्गतिः मनुष्यगविभादेवगवि नागवि-विर्यपाति-नरगवि-देवगति इवित नरकविनायकम पदयात् नारक। एसे है वहां नरकगविनामा नाममा उदयसे नरकका भाषामविवि नरगति-मौदयिकी परम्मत्र भाव होता है ऐस नरकगति नाम मौदपिक मार सिरमपिकापापामायतर-भेदी ऐसे भन्यप्रमी है (विर्य पगवि इस्पादि) पाय पार मेद रूपरे झापा। माना पाया। नोपातिक कोप-पान-माया-योग-इस प्रकार है सप्रकोपनिनस्य या पदयात्।। तोप सम्पादन राम के सदयसे माया मोदपिकाएपम् इतरत्र'मपि कोष मौदायिक पाप है इस प्रकार अन्यत्र मी मात् मान माया खोम) रिप्रिमेयम्सीदास नेवारीनपसरदावि-लिा वीनभेद वीयेद पुरेद नपुंसद इस प्रकार तीणा उदयात् मासीवेद । मौदपिकाखीनेद कमरेने से नारीपेद भौदपिक मारे परम्वनरकमपि से भन्पत्र मी है (अर्थात् पुरुपवेद भौर नपु सम्मेद कमी के उदपसे क्रमानुसार पुरुप घेद भौर नासक पेद भौदायिक भाग) पिध्यादर्शनम् एकमेवम् । मिथ्यादर्शन पर प्रकार है॥ ODOPIOOTIKOTIDURDURDOSO २१ मवार्य सिद्धि एतानिमामी PIRTAIप एकील का परहद पार समा५५ सहित सार्यसिरिन शमशा हिन्दीमनुपाद अध्याय २ स्थ य एकविंशतिविकल्प प्रौदयिको भाव उद्दिष्टस्तस्य भेदसज्ञासङ्कीर्तनार्थमिदमुच्यते ॥ गतिकपायलिङ्गमिथ्यादर्शनाज्ञानासँयतासिखलेश्याश्रतुश्चतुस्त्येकैकैकैकषड्भेदा ॥ ६ ॥ पाएकविंशविरिकम्प । मौदपिकामावः उरिष्टः। मोवीस मेदरूप मौदपिक माव कहा है मस्या पदसशासडोनि-मर्यम् इदम् । उम्पते । -विसरे मेद और नाम नानेके लिए या कहा मावा कि गतिकपायलिङ्गमिथ्यादर्शनाज्ञानासँयतासिदलेश्याश्चतुश्तुस्ये कैकैकैकषड्भेवा ॥६॥ अतिसापशिपिम्पादर्शनासानासंपवासियलेश्यामनुषतरू पेपर पर भेदा-(पथाक्रमम् इस्पते एकविंशतिमौदपिक मागाभान्ति ।। मनापा-गनि-पाप-वि-विष्यादशेन-मान गवि,कपाप, मारतिपायद), मिथ्या दर्शन,मशान, परापन-प्रसिद-लरपामा पनुः-पतु -त्रि-एक -मसंयम भासदत्व तया मेरपा पार,पार तीन वा एक पर-ए-पर-पर- पाक्रमम् काति एवा'। म्एर,एकएक मौर का प्रकारा-मेरा) प्रमसे इस प्रकार ये एशिविमोदपिक मा मन्ति मकीस भौदपिक मार होते हैं अर्थात् मनुष्यगति, देवगति नरगति, मौर विर्यवगति पे पार गवि,कोप,मान,माया,धोम, प पार पाप, बोचेर पुरद,नपुंसर वेर, ये तीन लिा,विध्यादर्शन, मान, भंसपम, भसिदस्य, कृप्स, पीर, पोत पीव, पप, एक पहा सरपा प्रसिद्धसय माग समस्त मार्ग को उदय से हा॥ रामDONRBHADRASIROHTONKO RUCHOMONTCLOCROMODA १) शेतार मानाय समाप्य में भमिपमारे यह पाठ में मसिम है रोप पाठ परमारे यहाँ प्रसिपकार्य प्रसिदत्व जिारमा मप पा) मात्मा से रस पिपरिषयमा पाप ) पापाइपसे अनुरंशित योगों की प्रवृतिका नाम रोश्या: 11) कामादि पदों के पसे श्रीको पुरुष साप पुरुषको स्त्री साप और मपुसाकोसी और पुरुष दोनों के साप प्मण करमेकी जो रम्पास उस नाम सिंग। यह सिंग का कारण एक दम्पसिय दूसरा माप सिंग माम मंगवसे होनेवाले एना वियप मामाप सिंगाप्रत परिणाम है और यहां पर भरमारे परिक्षामा प्रकरण पसरत है इसलिपे जी में हिंग ना मंगला गया सम्प सिंग नहीं लिपा का सम्माणि भारमा प परिणाम सा मापसिंग पर भाष सिंग स्त्री पुरुष और नएमा तीनो सभापसमै रममाणका डा कप और ना पायबर चारित मोरनीयके उदयास एक स्त्रीचर पुरुपबर और नपुसक गरेपम को प्रनता होती सलिए मापति मीधिकमाव है २० सिद्धि २३ GAROBARODAROORADABOARD AMRATHI एयनिषामा नगरपसाप फील कृत परमोद और वियपत्यर्य सरित ससिदिफा शमश हिन्दी अनुसार अध्याय २ स्त्र ६ सयोगस्वलिनि च शुक्ललेश्योऽस्तोत्यागम तत्र कषायानुरञ्जनामावादौदयिक्त्वं नोपपद्यते॥नषदोष। पूर्वभावप्रज्ञापननयापेक्षया याऽसौ योगप्रवृत्ति कषायानुरञ्जिता सेवेत्युपचारादौदयिकीत्युच्यते । सयोग परलिनि। पशमलश्याशा मस्ति र इति =और सपाग केसी विरषा गुणस्थानगर्वी) में रामलापारे । ऐसा 'प्रामम' । तय० कपाप-मनुरंजन -प्रमावाद ।। शासफा पचन है । ( उपरोक्त गुणस्थान में ) पायमें लिप्तपनाफे न हानेसे मादपिकसम् १ नपपपवे नएप ॥ दापः। मौदयिकपना नहीं पापा नाता है (उचर) या पण नहीं है पूर्वमाषमापननपापक्षया या असौ यागमयति । (यहो) पहिले भाव नतारने की विवक्षाकरि जो या योगमवधि कपाय भरञ्जिता । सा एव इतिए -पायों करि अनुरञ्जिव (पहिले वा पूर्षे) यी पोर-सा) ही(एच)इसमकार(धि) उपनारात् । बदपिसी ।। इति उच्यते r उपचार से भादयिक (मेरपा) ही जाती है यहां ऐसा मावार्ष मानना कि उपरोक गुणस्थानों में पायनिय प्रभाष होते मी एक्स लेश्या कही पर पूर्व भाषों की अपेक्षा से कही है पहिले फपायनमरि संयुक्त याग ५ तदा समस्त पापनिभावो इन तीनों गुणस्थानों में मभाष हुमा परन्तु माग ग्यारावा भौर धारा गुण स्थान में नहीं रमौर तर में ७ योग रा इसलिए उपचार करि मोदपिक मेश्या कही है जैसे कदम करि गंगा पुमा रस पाने पर भी कसम्पल कासाता है स ही कपायों से दूर होने पर भी लेश्या कालानी है। (आगपाची मस्मा साप उदया रजियार म्यागप्रपाचश्या पायोवयानुरजिता मबति कमाय-पाणु-रशिपायोग पानी सेस्सा या पायपसे अनुरको योग प्रति सोलेश्या है। (२) स्पोति व सम्मानो एहतियमस्साह देसपिरतिये । तत्ता सपका मेस्सा अमोमिठास प्रसस्स। सपत ति पर संस्था मप्रयासस्या । हि देशपिरत प्रये 1 तत शुम्मा लेश्या । अपोगिस्थानम् मा मोश्य ।। असपत बोये गुण जान सकपरले म्याई । पीत-पम-शुक्ल पेशुम सेत्या देशपिरत ममतविरत प्रमत्तपिरत, तीन गुन साममि हमसे गरा सांगा तक गुस्सा है मयागी सस्या रहित (1) मगमनपा पर पूर्वमाव प्रयापन मेइ माना है और जो पाच परिसपी किंतु पतमाम में नही पापमान में हामा माम सेना या उस नपा विषय है। यपि उपर्युक तीनो गुरु सामोमें पोगों की प्रवृति पायोस अनुरंजित महातगापि पूर्व माप प्रशापनमएकीप्रपेक्षा मी पहिले पागों की प्रवृष्टि रूपार्यों से अनुरजित थी यह अब भी है ऐसा उपचार स मान सिया माता इस रीति मे उपग्रस्त कराय धोण राय और संयोप देवसी गुण खामों में होने वाली शुफ्त खेश्या मी जप सेस्मा सय घरजाता तय कोई भी नहीं। गोवा प्रयोग पी गुण सान में लेश्या का प्रभाव है क्योंकि वहां पर योगों की प्रचि नहीं है। MOTOCIKTIPORODANOORDOOOOOL!

माध ग्राणाय सिद्धि २२ OD IN OO O POMAN HOT ARIAT NOW ORIO मिथ्यादर्शनकर्मण उदयातत्त्वार्थाश्रद्धानपरिणामो मिथ्योदर्शनमौदयिकम्॥ज्ञानावरणकर्मण- उदयापदार्थानववोधो भवति तदज्ञानमौदयिकम् ॥ चारित्रमोहस्य सर्वघातिस्पर्द्धकस्योदयादसयत यौनयिक कर्मोदयसामान्यापेनासिन श्रौदयिक ॥लेश्या द्विविधा, द्रव्यलेश्या भावलेश्या चेति॥ जीवभागाधिकारात्द्रव्यलेश्या नाधिाता।भावलेश्या कपायोदयरञ्जिता योगप्रवृत्तिरिति कृत्वा प्रौदयि- कीत्युन्यते॥सापडविधाकृष्णलेण्या, नीललेश्या कापोतलेश्या, तेजोलेश्या पद्मलेश्या,शुक्ललेश्या चेति ॥ ननुच उपशान्तम्पायेक्षीणकपाये विपशनापण उदपात् ।। मिप्यादर्शन कमरे उदयसे (माद विप्यातनामा माहनीयकी प्रकृति पदयसे मत्ताप-मभदान-परिमाप मिथ्पादर्शनम् ! सनत्वोंक सकपका भयानरूप परिणाम न होना मो मिपादर्शन भातपिमानावरण मण वयात् पदापानाम् । भादयिक भाव है। शाना मरणनामा फर्मो उस पदार्यमा भन भरति 1 बदममानम् मादपिकमान नहीं बोने पाता है पर प्रशाननामा मौदपिक मावरे पारिमारस्प सरंपाति-मार्दास्पदयान ।। बारिपपास सर्पपाविर स्पर्दकनिक नट्रेसे प्रमपन पादकिम उमए-पामान्प प्रसपम(पाप)मौदयिक पार (परि) सामान्य कर्मनिक रदयकी मरमसिदा मोरपिसा मपंचास मसिदत्व भौदपिक भावरे परसाम्पिबरयानापारलरपासपातिक-शरसा दो मकार द्रष्पवरया और भाव लश्या भापमानमपिडगिदादप्पलपान मधिरुवानी भापके प्रकरण(गने से द्रम्पलेश्या भपिकत नहीं है या विषयभूव नही है भर्षात् ट्रम्पलरयाका मपिकार या प्रकरण नासकारणमाप खेश्याप्राणी भारतमाशापउदयग्रिनागपागपत्तिातिकृता-मावश्याकपायकेदयारिरभितरागनिफीमचिौसमार(पत्तिकर भावhिrurfarपासापलिया रुष्णलया। मौदायिती राखावी है साव मार (प्रतिहणलेरणा गोयलमा रातमाखरमाप्रसपा, नीमोरया-बापावरपा-पीनशेरपा पदमलेरपा रमरपापानिननुपरपशान्तालाप पीणकपाय | -ौपणापा(पश्न)।पशाम्बापापीर aimur mmunita OLOT OBROXOTITOIOIOITO! I २२ सिद्धि थि पाय २५ OURCEOOOOOOOONOTEORTHOREO अन्यद्रव्यांसाधोरणा आत्मनो वेदितव्या ॥कुत पुनरेपा पारिणामिकत्वम्।कर्मोदयोपशमन- यक्षयोपशमानपेनियात् ॥ जीवत्व चैतन्यमित्यर्थ । सम्यग्दर्शनादिभावेन भविष्यतीति भव्यः । तदिपरीतोऽभव्य । त एते त्रयो भावा जीवस्य पारिणामिकाः ॥ ननु चास्तित्वनित्यत्वप्रदेशत्वा दयोऽपि भावा पारिणामिका सन्ति तेषामिह ग्रहण कर्तव्यम् । न कर्तव्यम् । कृतमेव । कथ चेनशब्देन समुभितत्वात् ॥ यद्येवं, त्रय इति सख्या विरुध्यते । न विरुध्यते । मन्परम्प-प्रसारणामात्मना पेिदितम्या, समन्पदम्पसे मसापारणा पिनाम्यसे असमान भात्माओमाननाचाहिए Tपुन •एपाम् पारिणामिकस्वम् 111 नारि इन(तोनों भागों)ो कासे पारिवामिरूपना इन तीनों भाषामें) प्रमोदप-उपशम-पय-क्षरापशप-प्रपंसिस्माद, नमा उदय पशम सप सपोपशम की पिपता नही है भोगवतन्यति भसम्पमर्शनादि-मावेन वन)मावत पैतन्य पेसा भाराय है। सम्यग्दर्शनादिक मारहरि मपिप्पविाइवि.भम्पाद-विपरीवा ममस्या नोपमा अर्याद परिणगा ऐसा पम्प रे सरिद ममम्प है भर्याद सम्पग्दर्शनादिक जिसकेम हागे को अपम्प ते। पते, प्रियामागनीपस्परिणामिकामा से इवने पीन माप भीगो पारिणामिल हैं ननु प०मस्तित्व निस्पत्यप्रदेशत्वावयमा भपि. (मन)मस्विप निस्पस प्रदरास भादिक भी भाषालारिणामिकान्ति पाम् ॥ . भाष पारिणामिक विनका इस मगह में(1) भर्याद इस सूत्रमें प्राणम् ॥इतम्यम् । म पम्पिम् ॥ प्राण करना योग्प है। (चिन दरापार्योकाइसम्म) प्राण करना योग्यनारी कृतम् ॥ ए. (इसमें मस्तित्व नित्य मादिक दशमांगो माण) किया मी एक)है अपम्मेत् पाशम्दन । सोचेद कैसे पा किसमकार भयम्) लिया है। (प्र) पशन्दरे समुचिवसावायवि०म०प्रपामाइवि सम्पाn =सपियोनेसे (खानेसे) (मश्न) पदि ऐसा है घो तीन ऐसी मिन्दी पिम्दय न पिपवे T -रिरोपी माप (चर) (उपरोफवीनही संस्पा) नी सिरोपी भाप है (१) भासापारपपवन-परपमापारिवारि साधारपपारिवामिकभावापेक्षम् -यहाँ (सस्कन सवार्यसिदि पतिम ) असाधारण पाश्य ( - अनोखानेवाले अस्तित्व भादि-सापारप पारिपामिर-आप-अपेषम् -मस्तित्व भाविक (पर) सापारण पा समान पारिपामिक भाषों की भी। ORDIOHIRO.COMHIROHI २५ मा. सापारप-वचनम् पश्यमास- स सिद्धि OHMOONWOENRAAMROONONTON ONMORNING एरानिमासी गम्पसाप रहील कव पदग्मेद मौर विपस्त्यर्थ सहित सय सिदिका शम्दशः हिन्दीभनुपाद अध्याय २ सूत्र और तदभावादयोगकेवल्यलेश्य इति निश्चीयते॥ य पारिणामिको भावस्त्रिभेद उक्तस्तद्भेदस्वरूपप्र तिपादनार्थमाह- ॥जीवभव्याभव्यत्वानि च ॥७॥ जीवस्व भव्यत्वमभव्यत्वमिति त्रयो भावाः परिणामिका नद प्रभारान्। मपोगरती ॥ (भोर)उस (योग) ने दोन से प्रयोग केपची (चौदहवां गुणस्थानवर्षी) मनरप पनि०निधीयते पाहापारिणामिक मायः नश्या रहित है निमपकीमिए है मो पारिणामिक मार विभेद रक्त पद-भेदसरूपमविपादनमर्यादा तीन प्रकार सारे रसके भेद भौर सम्म के लाभ पर्व करते कि ॥ जीवभव्यामव्यत्वानि च ॥७॥ पापं -मीरमम्पामम्पस्तानि || प. जीमत्व भम्यत भमष्यत मी(प) पारिणामिक भाप नीमको मर्याद ,ये वीन माप भी मन्य दम्पसे असाधारण जीयक पारिणामिक माप महाभपेक्षा नीद्रव्य का भात्म सस्म की, मास्म परिणाम ही मिसको निमिच हो सो पारिवामिभाषरे भीमत्तम् । भम्पसम् ममम्पससम् ॥ =जीवपना पा चेवनपना मम्यपना भमम्पपना इनिध्यप माप: पारिणामिकामा इस प्रकार तीन पार पारिणामिक रे गरमप्पामापानिप ( समाप्प० मप्पाप २ मत्र ७) दोनों पाठोरे मिलानेसे जान पड़ता है कि इस सातयो सूत्रमें हमारे परिपत्रसे "मारिता पिर परतुम पर मोवानों मानापों में भय मेद नहीं है क्योंकि समाप्प० के पाठ में प्रादि सपकरि जीवके सामान्य वा मापारण पारिगामिछमाशेस सस मस्तित्व-पम्नुत्प-दम्यत्व-प्रमेयत्व मादि (रेको रिपणी प्रयाय १० सून ३) का प्राण पिारमारे यहां अपर पापारण पारिपामि माधोशा प्राणघ शद परि किया है। प्रसापारण पारिशामिक भाष पा सामान्य पारिवामिल माव अथवा पिरिणामि मात्र जीवापत जीव में पाए मा प्रम्य रिसी ब्रम्प में न पाप गा और वह तीन ही गोषत्व मप्यत्व मप्पावर पिकमही ये दोनों भाव अनादिकाल सिम है और साधारण पारिपामिच्माप पा सामान्य पारिवामित्र मा अपना नि रसि पारिगामिभाव गेरो जीप में होता और कोठन सम्पप्से पर्म इप्प मपर्म वप्प रयादिर में भी होने के समस्त पारिवामि गुणनेर और मनाविधान पिस । OTOOTHOSEMORCORDPRGONDOOD २१ - सिद्धि २७ W OKOMONID ORD CAROUD ONTHOUD OMKA पठानियासी नगरपसाय पीलात पदच्छेद और रिपरत्यर्ष सरिव ससिदिश शम्मश: हिन्दीभनुपाद मण्याप २ स्त्र ७ नायमेकान्त अमूर्ति रेवात्मेति। कर्मवन्धपर्यायापेक्षया तदावेशात्स्यान्मूर्त ।शु खस्वरूपापेनया स्यादमूर्तः ॥ यद्येवमवन्धावेशादस्यैकत्वेसत्यविवेक-प्रामोति।नैष दोष । बन्धं प्रत्येकत्वेऽविवेके) सायपि लक्षणभेदादस्य नानात्वमवसीयते ॥ उक्त च-बन्धपडि एयत्तं लक्खणदो हवइ तस्स णाणतं। तमा अमुचिभावोऽणेपतो होइ जीवस्स॥ १॥इति॥ यद्यव तदेवलक्षणमुच्यतां, येन नाना- त्वमवसीयत । इत्यत आह- नमयम् शएकान्तमतिमाएपमारमाविक =पार भयम्)एकान्त नही है कि पेवन अमूर्तीकी (एर ) है कर्म-बमपर्याय-अपेषपाहावद-भाषेशात् ।। कम पन्धनस्प पर्यायकी पिराकरि नस (कम एपन) के प्रदेशाोनेसे स्यात् दस्मकप-भपेनया स्यात् । मनः । कथाचित् मूर्तीक है (मौर) शुद्ध स्वरुपफी विपनाकरि कर्यषित् (स्यात्)अम्तीको यदि पवम्म पन्ध-मापेशा समस्य। प्रश्न)मो इस प्रकार वा फर्म पन्धनक पपनसे उस (मात्मा)के एकले सतिश भविषेश पामोविनिएपोष। एकपना होनपर भानपना प्राप्ति होता है (उचर) या दूषण नहीं है पन्धम् मनि एकत्ते ॥ (भविवेक )सतिगामपिक क्रमपन्धन पर्यायशान भपेचासे एकपना(-एकत्से)मर्यात् भविनेकपना होनेपर भी जपण-भेदाव मस्पानानास्वम्भरसीयवे T =षण मेदसे उस(वन) भनेकपना नियम किया जाता है उक्तम् प०पन्य परि(-पति.) और कहा भी है। पपकी अपेसासे एप पखणदो ॥ (एकत्यम्ससा) (मीय और कर्मक) एकल पा एकवा है और सत्रण (भेद) से मावस्स राणाणचम् ॥(यपति वस्प नानात्यम् विस(मीप)के भनेपनारे समा भत्तिभावो (वस्मात् भर्विमाया) -विस परणसे (वस्याव-वमा)भीकमार भणायनोसोशीपस्स(मनकान्वा मपति नीवस्य)-मनकान्त (नप से नीस होय रे मात् नीचके भकि भाप सिद्ध होता है -इस प्रकारसे सात सूत्रोंदरि भीष पाप भार वर्णन किये। यदि०पषम् (मरनोनो इसप्रकार है मर्मात् मन्मावि (वीर और कर्म के लाना है वो तद एव लघणम् सरपयवार उपनानानात्या-11(-उदएर) सण कोषाने योग्य है किनिस( आचण द्वारा भनेकपना मपसीपवा विमानाNT -निमय किपा मावा है इसलिए(भाषार्यनिम्न स्त्रम) कावे देखि TDOODIDIOCIDOIOCIDO २७ सिद्धि मथ २४ to tao पगनिगमो नगरपसाप पोलऊत पदद मौर रिभक्त्पर्य सहित सपिसिदिका शब्दशः गन्दीमनुनाद मध्याय २ सय ७ असाधारणो जीवस्य भावा पारिणामिकास्त्रयएव ॥ अस्तित्वादय पुनर्जीवाजीवविषयवा- रसाधारणा इति चशब्देन पृथग्गृह्यन्ते॥आह औपशमिकादिभावानुपपत्तिरमूर्तत्वादामन । कर्मब- न्धापेक्षा हि तेभावा । नचामूर्ने कर्मणा वन्धो युज्यत इति॥ तन, अनेकान्तात् ॥ मसापारणा' रस्म माग । (योंडि) असमान पा जो भौरमनपाएमा सो नीरफे मार पारिणामि । प्रयाएक०मस्तितादपाइनर पारिणामिक तीन ही हैं। परि (-पुनर् अस्तित्व, मादिक (दशभाष) नौर-मनीप-पिपत्ता | सापारणा =चैवन और महानि होनेसे साधारण (भर्यानीपौर ममीपमेंभीपाएमाते हैं) इति पराम्देनायकवापन्दामार -इसप्रकार परान्दकरि न्यारे प्राणरियेगये हैं (शिप्य)परनकरता है कि मौरविकमादिभावभनुपनिाममूर्वस्वात्मात्मनः भौपशमिक मादिमापोंकी चेतनके ममीक होन(के कारण)सेसिद्धिनहीं होती पम-मपसारिक पोलि()ि फर्मपन्नती भपेचारूप सामान पाममूर्ने। -वे(मौपशमिक मादि)मार हैं । पहुरि(-प) नीमीकके फर्मला या पुग्पत इतिश्वम् नर्माता पम्पन पुक्क पापित (उचर ) पा(मात्मा') न०मनाहानात् ।। भनेकान्त(नयकी अपेघा) से(मस्पेक भवस्थाम)भमूर्धक नहीं भनिरय परतुत्व दम्पाचे प्रयत्पमगुरुतपुत्व नित्यपगत्य मूतत्वममतत्व घेतमत्वमवेतनत्वं ते एयभावा । (१) सिम पनि मिमित्तम इप्पन भी मारा न हो उसका मस्तित्प गुपहते हैं जिस शकिके निमिरासे प्यमै प्रक्रिया हो उस पपस्तुत्य गुपपना जसेपाय अपरिया मल पारपशिस शकिके निमिरासे द्रम्य सर्वदा एस्सा मर और सिसकी पर्याय (साप सापहरमी एसो दम्पत्य हैMरिस गरि निमित्तसे प्रग्य पिसीम किसी के कामका विषय हो उसमो-प्रमेयत्व गवरते है rafसन्टिमिमितमे ट्रम्पको प्यता पिरमात् एक सप्प दुसरे द्रम्पाप न परिपमें भीर एक गण दूसरे गरारूपन परिपमें पापा मनापा मन्त गए वितर र सरे २मा आवे रस भगठसठ गुप हवे है। जिस शति के मिमिचसे इप्पका कप पपरम्पपदा म पामोपत गणपत है। ७ मा मारता (नामनिरापरता पा ममतपना- चेतमत्वम् = घेतमता (१०) अचेतनत्वम् सचेतनता अपना महता : DAONTOCHOOTOOTOOTOOETROOTE २ सिद्धि २६ TOTROPARDOICLES GaeeeeeB:DOORALrROERDERDOHROOMOTreora एटानिरासी मगरूपसाप पीस कर पदव और विभवत्पर्य सहित सर्वार्थसिदिका सम्दश हिन्दी अनुवाद अध्याय २ स्त्र ६ ॥ स द्विविधोऽष्टचतुर्भेदः ॥६॥ स उपयोगो द्विविध । ज्ञानोपयोगो दर्शनोपयोगटेति ॥ ज्ञानोपयोगोऽष्टभेदः। मतिज्ञानं, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मन पर्ययज्ञानं, केवलज्ञान, मत्यज्ञान, श्रुताज्ञान, विभङ्गज्ञान चेति ॥ दर्शनोपयोगप्रतुर्विध । चक्षुर्दर्शन अचक्षुर्दर्शनं, अवधिदर्शन, केवलदर्शन चेति॥ तयो कथ भेद ? साकारानाकारभेदात् । साकार ज्ञानमनाकारंदर्शनमिति ॥ तच्छद्मस्थेषु क्रमेण वर्तते। ॥ स द्विविधोऽष्टचतुर्भेद ॥६॥ सवा-सा द्विविधासमट चतुर्भेदी बा (उपयोग) दो प्रकार सममेंसे) एक प्रामका दूसरा पारसकार है सस्पनुपादा-सा उपयोगादिपियान-उपयोगा। पा वन्यसमार से प्रकार मान उपयाग वर्णन-रपयोगः । पातिवान-पपयोगा। मौर (न्य) वर्शन उपयोग इस प्रकार मान रपयोग भष्टौदी यतिमानम् भुतबानम् ॥ -माठ प्रकार है (प्रद ) मविज्ञान, श्रुतान, भापितमम् Imमन पर्पकानम् बलशानम् 1 मशिन, मन पर्पपशान, केबम, (वया) पतियानम् भुतभडानम् विभागान पाविकम्पतिमान माइमति,युतभावान पाइयुवभौर विमंगवान माइमबपिइसमकारों दर्शन-उपयोगासवरिपर्दर्शनम् ॥ दर्शन उपयोग पार है (मर्याद ) पमुर्दर्शन भरपुर्दर्शनम् अपिदमावदर्शनम् ॥ २० -मपार्दर्शन, भपपिदर्शन,ौर पक्षदर्शन इति वयो ।।। परम्भेदार म्स प्रकार इन दोनों (पान या दर्शनउपयोग) में से भेद है साभार-मनाकार भेदान् साकारम् मानम् !um (उचर) साभार और निराकार के भेदसे(भाव)माधार सहित भान है भनाभरदर्शनम् ॥ इति तपादयस्पेषु माक्रमणमा पर्वते निराकारदर्शन इसमका(अर्थाद) दर्शनसचामात्रभाकाररहितका प्राण म्योहान दर्शन)पयस्व भसर्पमनोयोम क्रम(मयम्दर्शनपीये शान) से रतते हैं CEORIODES २६ T . सवाय २८ सिद्धि सूत्रार्थ- TROOHADOHOOTWARO पनिगामी जगम्पमाप पसील त पदाद मार विमरत्पर्य सहित सपिसिदिका शम्दरा हिन्दी अनुवाद अध्याय २ सूत्र ८ ॥ उपयोगो लक्षणम् ॥८॥ उभयनिमित्तपशादुत्पद्यमानश्चैतन्यानुविधायी परिणाम उपयोग ॥ तेन वन्ध प्रत्येकत्वे सत्यप्यारमा लक्ष्यते । सुवर्णरजतयोर्वन्ध प्रत्येकत्वे सत्यपि वर्णादिभेदवत् ।। तन्नेददर्शनार्थमाह सूत्रम-उपयोगो लक्षणम् ॥ ८॥ -उपयाग ( भोपस्प) लघणम् (भरवि ) उपयोगा। पैतन्य सायरान पाल मास्माके परिणाम का नाम उपयोग है। (रपयोग) गोवस्या जत्रणम्भमति T-मीरा खत्रण है मर्याद माम मभ्यवर दोनों प्रकारके कारणों ययासमर समिपान रानपर पैतन्पगुणके सापरानेराला मोकोई भारमारा परिणाम है उसका नाम उपयोग है पदन्लेद और विभक्त्यर्थ सहित इस पाठवे सूत्रपर सस्कृत सर्वार्थसिद्धिवृत्तिका शब्दश हिन्दी अनुवाद उमप-निमिनाशान् । पस्यपपान दानों(पाय माभ्यन्दर) कारणों के भाभपसे (पैतन्यक) उपमा पैप-मनुरिपाची परिणाप । उपपोगा। मुद्रामा पैवन्य(ही)का परिणाम( सो) उपयाग रे मनमान्यम् पनि एक्ला सति, भपिकमात्मा -तिस(लघणकरि पप अपेत्रा(नीरमौर कर्म) पकवासोनेपर मी पैतन्य लापतामरणरमनपो माल मवि एकत्शासतिगुदाजस्लामावा है। नैसे सौना पादीफ पिंट(प)से(अति)एकपन होनेपर मपिपणारिभदर नदभवदर्शन-मर्थम् मा -मो(पीव-शल)पादिक मेदवत् ।। उसके मेद दिखाने के लिये दावे हैं कि १रम ग्राम रस दुसरे मप्यापर प्रपम से जीवस्य शाबी प्रति प्राप्ती है। (२) म्यविमोलवस्सुम्याइतिहेतुले समुप्यते मामा पापता प्पमितीमा-गापितुः १ -परस्सर मिसेसे पापोंमें जानके भेद-पान करानेमे तु है वा पहचान करानेवाला कारण सातदनमामाई भावाय परस्पर मिली हुई पस्नुभोसे किसीएच्यस्तुको भित्र रानमे गारण UTHAमाम लजिस प्रकार अनि रणपा पर पाप समूहसे अग्नि समारनेवाला उम्पत्यो marnस मुगापार और भय शेतासर और दिगमर नामापामें एपसा (6) पपागारमारा सम्पसमाय, मारमामा परिनाम भारमा परिलति भारमामा परिणमन । POOJONLOD.CO.BDORE - २८ सिदि २६ One o ORANORARO APIRO OURO OOREDOM एटानिससी जगरूपमाय पील कव पदच्छ और निमवत्पर्य सहित सर्वार्थसिद्रिका शब्दश दिन्दी भनुवाद अध्याय २ प ६ ॥ स द्विविधोऽष्टचतुर्भेदः ॥६॥ स उपयोगो द्विविध । ज्ञानोपयोगो दर्शनोपयोगश्चेति ॥ ज्ञानोपयोगोऽष्टभेदः। मतिज्ञानं, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मन पर्ययज्ञानं, केवलज्ञान, मत्यज्ञान, श्रुताज्ञान, विभङ्गज्ञान चेति ॥ दर्शनोपयोगश्चतुर्विध । चतुर्दर्शन अचक्षुर्दर्शन, अवधिदर्शन, केवलदर्शन चेति॥ तयोः कथ भेद 71 साकारानाकारभेदात् । साकारं ज्ञानमनाकारदर्श नमिति॥तच्छद्मस्थेषु क्रमेण वर्तते। ॥ स द्विविधोऽष्टचतुर्भेद ॥६॥ सूत्रा:-~साहिषिमा प्रष्टपादा। मा (उपयोग) दा मगर (उनमेंसे) एक मामका दूसरा पारसकार तस्यनुवाद-सापयोग दिपिपासामान-उपयोग । बा चैवन्पसभाष दो प्रकार मान उपयोग दर्शन-उपयोगा। पाविमान-उपयोगा। म्भौर (-प) दर्शन उपयोम इस प्रकार मान उपयोग भएभेदा पतिद्वानम् ।।भुवधानम् । मा प्रकार है (माद ) मविवान, भुतान, भरपिज्ञानम् मन पर्पज्ञानम्केवलज्ञानम् ॥ भरपिमान, मन पर्यपमान, केषरशान, (क्या) पनिमवानम् शाभुनमज्ञानम् पिभामान पाविषयतिममान मा उमति,भतमान पाइभुतौर विभगवान वाइपरपि इसमकारों दर्शन-उपयोगक्नुर्विपापामुर्दर्शनम् ॥ वर्शन उपयोग पार रे (माद ) पार्दर्शन भपाठदर्शनम् ॥भरभिदर्शन करलदर्शनम् ।। १० -मपर्दर्शन, मनषिदर्शन,भौर विशदर्शन इति तयोमा कपम्मेदारी -नस महार रेइन दोनों (पान वया दर्शननपयोग) में कैसे भेद है सागर-मनाकार भेदाद साकारम् ॥ मानम् ॥ (उचर) साकार मौर निराधार के मेदसे (अर्थात् भावार सहित शान है भनाकारम् दर्शनम् ॥ इति तपारपस्येषु ,मेखा पर्वते । निराकारदर्शन इसमका(अर्यात्) दर्शनसभामाश्रमाकाररदिवा प्राण पशान दर्शन)वपस्थ प्रवर्षमनीपोंमें क्रम(प्रथमदर्शनीमेशान) से पर्वते हैं TROSTDOODCEDIMO SODITII सवाथ सिदि ñ पट्यानिमी नगरूपमाप कील छत पदपद भार विमपत्त्पर्य सहित सर्यिसिदिका सदरा हिन्दी मगाद अप्पाप २ स्त्र ८ ॥ उपयोगो लक्षणम् ॥८॥ उभयनिमित्तवशादुत्पयमानश्चैतन्यानुविधायी परिणाम उपयोग ॥ तेन वन्ध प्रत्येकत्वे सत्यप्यारमा लक्ष्यते । सुवर्णरजतयोर्बन्ध प्रत्येकत्वे सत्यपि वर्णादिभेदवत् ।। तनेददर्शनार्थमाह सूत्रम-उपयोगोलनणम् ॥ ८॥ -उपयाग (मीपस्य) लवणम् (मरवि ) सूत्रार्थ- उपयोग -पैतन्यसायरान गाणे मात्माचे परिणाम का नाम उपयोग (उपयोग) भारस्यावरणम् सामरवि T=भीरका अन्नस है अर्थात् नाम मभ्यंतर दोनों मकारके कारणों पवासंभव सभिपाम रानपर पैन्पगणरे सापरानेवाला मोकोई मास्मात परिणाम है उसका नाम उपयोग है पदलेद और विभक्त्यर्थ सहित इस पाठवे सूत्रपर सस्कृत सर्वार्थसिद्धिवृत्तिका शब्दश हिन्दी अनुवाद उभप-निमित्तरशान् । उत्पपमान ।। दाना(पाप माभ्यन्तर) कारणों के माममसे (पैतन्य) उपमा पैगम्य-मनुविधापी परिणाम | उपपागः। -जुहामा पैतन्य(पी) परिणाम( सो ) उपयोग है मनायम् पनि त सति, भिपिकमामा विस(ससण)करि पन्ध प्रपेदा(मीरमौर ममें) एनाहोनेपर भी चैतन्य सपनामाणरमनपा परम्मति एकत्तासतिगामुदाखलामावा है। मैसे सौना पादीफ पिंट(गम्भ)से(पति)एकपन होनेपर मपिरणादिभदान्तदभवदर्शन-मर्थम् ॥मा मो(पीव-शलपादिक भेदरत है। उसके मेद दिखाने के लिये कहते हैं कि परम पुजम म सरे अप्पापमयम से जीवस्य सामग्री अनुचि प्राप्ती है। (२) ग्पतिकोणवस्तुम्यावृत्तिनुनपणमुपते परिवानुनमातिए । - परस्पर मिसोपे पहायोंमें जाग्न मेदवानराने हेतु वा पहचान करानेबम्हारण है पापम् पता समास नामा मापाथ परस्पर मिली हुई बस्नुभोमेसे पिसीएमवस्तुको मित्र हरनमें गरए सपनाम हल है। जिस पर पनि उप्पर पा पर पदाप सम्हसे प्रनिको हुदा परनेवाला उम्मको (पमा पार भोर अप शेतार भी दिगम्मर भामापोमै एम्सा (५) पराग-प्रारमा म्पसमाष भारमामा परिणाम प्रारमा परिधि भारमा परिषमन । VINOODeTO.COM २९ सिद्धि सन्तकला OOROODID OHROODEPERDUPOOHOO BOOTH पानिवासी नगलमाप वकील कत पदपदभार विमात्पर्य सहित सर्विसिदि का सम्मथ हिन्दी अनुवाद मम्माय २ सूत्र : ॥ स द्विविधोऽष्टचतुर्भेदः ॥६॥ स उपयोगो द्विविध । ज्ञानोपयोगो दर्शनोपयोगश्चेति ॥ ज्ञानोपयोगोऽष्टभेदः। मतिज्ञानं, श्रुतज्ञान, श्रवधिज्ञान, मन पर्ययज्ञानं, केवलज्ञान, मत्यज्ञान, श्रुताज्ञान, विमङ्गज्ञान चेति ॥ दर्शनोपयोगपतुर्विध । चतुर्दर्शन अचक्षुर्दर्शन, अवधिदर्शन, केवलदर्शन चेति॥ तयो कथ भेद । साकारानाकारभेदात् । साकार ज्ञानमनाकारदर्शन मिति तच्छद्मस्थेषु क्रमेण वर्तते। ॥ स द्विविधोऽष्टचतुर्भेदः ॥ ६ ॥ सपा-सादिषिधामपदद ।। या (उपयोम) दो प्रकार (ग्नमेसे) एक भाप्रकारे दूसरा पारपार है हत्यनुगाद-सरपयोगः द्विवियःसाहान-उपयोग | या पैवन्यसमाव दो कार मान उपयोग वन-उपयोग | पकाविमान-पपयोग। म्भौर (4) वर्शन रुपयोग इस मकार मान उपयोग भष्टमदनी पविज्ञानम् भुवधानम् ॥ माठ प्रहार (माद ) मविज्ञान, श्रुतमान, भाविज्ञानम् मन पर्यपज्ञानम् । केबलपानम् ॥ भपविज्ञान, मनःपयशान, केवनान, (वया) पानिज्ञानम् भुवभमानम् परिमासानाति मतिप्रज्ञान वा कुमति,श्रुतमान का भुवभौर पिभगान वाइमरपिइसमकारों दर्शन-उपयोग गर्विषापपुर्वर्शनम् ॥ दर्शन उपयोग पार रे (मर्थात् ) पधुदान भपर्दर्शनम् भवधिदर्शनवदर्शनम् । पर जमपर्दर्शन, भपपिदर्शन, और पवदर्शन इति तयोमा पपम्भेदार इस मकार में इन दोनों (सान क्या दर्शनउपयोग) में से मेरे साभार-मनाकार मेदाद साजरा मानम् ॥ (उचर) साहार और निराकार के भेदसे(मर्यादामाधार सरिस मान रे मनाकारमदनम् । इति निराधारदर्शन है इसमका(मर्याद)दर्शनसचामाप्रभाकाररहितका प्राण व भावपस्पेषु कमेणा पर्वते । मेझान वर्शन)वयस्प मसर्षवनीयोंमें क्रम(प्रथमदर्शनपीके शान) से वसते हैं OSHIDACEBO CATEGORT. २६ सिद्धि मया MueNRO - माणे GURDANMOPINIONIK एगनिरामी नगरपसाराप कोलकत पदच्छेद और विभक्त्पर्य सहित सपिसिदिका शम्दश हिन्दीमनुराद मध्याय २ स्त्र ६, १० निरापरणेषु युगपत् । पूर्वकालभाविनोऽपि दर्शनात् ।। ज्ञानस्य प्रागुपन्यासोऽभ्यहितत्वात् ॥ सम्यग्ज्ञानप्रकरणोत्पूर्वपचविधो ज्ञानोपयोगोव्याख्यात ॥ इह पुनरुपयोगग्रहणाद्विपर्ययोऽपिगृह्यते इत्यष्टविध उच्यते ॥ यथोक्तनानेनाभिहितपरिणामेन सर्वात्मसाधारणेनोपयोगेन ये उपलनिता गिनस्ते द्विविधा ॥ ससारिणो मुक्ताश्च ॥ १० ॥ कर्मस्पभाररण रहित सर्पवमीयोंमें मर्याद केवलज्ञानियोंमें पुगान् पूर्वकालमानिनामपिन्दशनात (मान-पर्शन)एकालमें होते हैं । प्रथम होनेवाले दर्शनोपयोगसे भी मानस्य वा उप याम मम्माविया ll (उप्र) ज्ञानका पहिले काना प्रपानपना भयवा मोटवाके फारणसे है मर्याद शान पान है इससे इस सूत्र वर्शनसे परिसे शानको का है मगवान प्रारणात् ॥ सम्परवानकेपिपप में गा सम्यग्वानमकरणमें पूरमा परिर । सानउपयाग । ग्यास्पात | =परिल(प्रथम मध्याप सप हमें) पाच प्रकार मान उपयोग करागया है न'सपागाणा II रिपययः अपि महरि यहा(नवपयोग शम्द सानसे मिपर्पयशान भी रातानि० मष्टरिए। सम्यते । प्राणक्रियागया है इस प्रकार (ज्ञानोपयोग) माठ प्रफार गया है। मनन । ममिनि-परिणामेन । (भव दशास्त्रकी नस्यानिका काव कि)प्राणकिया है परिणाम इसने गरायमापारणेनापपोकेन उपयागेन। (और) सर्वमात्मा सापारण (मपान) ययाक्क मो उपयोग है वोपरि परसविता । यागिन | द्विविधामा उपलचिव य योगी(=उपयोगी मो मास्पा ने दो प्रकार हैं मर्यात् भामा नवा दो सत्रों में रपिव या परिणाम पा उपयोग का सपस्वमीमों में सापारणतः दिखाया गपा है व भीर मिनथिव समानुसार दो प्रकार हैं ॥ "ससारिण! मुक्ताश्च ॥ १०॥ वे भीगा संसारिणो मुक्काम द्विविधाः भम्ति नानासंसारिणा मुकार दिविधामपन्ति ते मीरसंसारीमौर(ब)क्त दोपकारोवे रे । मर्यात्मोमीवकर्म परिवर (1) शेतामर और निगमरमाला मम्प्राण में रम गधा पाठ भीर मर्प पत्रमा है । (२)गणा-(प्रश्न) 'संसारिणो मुकारच पापिर UNDQraine COROZEC 210 0.00 DINO निर्णय ३१ सिद्धि SD KOOD HORDA PARA O HETOHID COLOCARD एनानिवासी मगरूपसाय पफीलकृत पदच्छेद मौर विमात्पर्य सहित सायसिदित शमशः हिन्दीमनुवाद मायाप २ स्त्र १० ससरण संसार परिवर्तनमित्यर्थ । कर्मों की परापीनवारे कारण भनेक माम मरणोंगो करते हुए संसारमें भ्रमण करते रावे घे संसारी का माते हैं और मो समस्त कोको काटकर सक होगये हैं उनको मुक्त पीर पा सिबमीर काते हैं पदन्छेद और विभक्त्यर्य महित इस पाठवे सूनपर सस्कृत सर्वार्थसिद्धिवृत्तिका शब्दश हिंन्दीअनुवाद पपर्य-संसरणम् संसार परिवर्तनम् ।। इति०मः। =परिभ्रमणरूप संसारी वही परिवर्तन ऐसाभयो भाभपनेपावकरिपांपे पापपसे सूमा उल्लेख मकर संसारिलाष मुकाश्ष ससारिमुक्काः ऐसा व समास मानना चाहिये लाम यह है कि पान कहना म पगा इसलिपे लापप होगा तया सूत्र का जो प्रय है रसमयमै किसी प्रकारकी वाचा मी म होगी (उचर) संसारी और मुक्त पोमो गयो मुक शम पूज्य और मल्पातर इसलिए मसमास करने पर मुकशम्पका ही पूर्व मिपात होनेसे मुक्कसंसारिसऐसा सूचकरना पड़ेमा म्या 'मुका संसारा येम मावेन स मुबससारतरतो मुकर्ससारिणः अर्थात् जिस स्यापसे संसारकास्ट जामा हो यह मुफससार और उससे विशिष्ठ पा सहित मुक मपारी पर मुनससारी शब्दका अप होगा एवं उससे शानदर्शनस्वरूप उपयोगयान मुफससारी अर्थात् सिमीप ही कायगे ससारी जीप म कहे जापगे इस रीतिसे बद समास मानने पर इस दूसरे भय की प्रतीविसे पिपरीत भर्य होगा व समास न मानकर मसारियो मुक्काश्य या पाक्याय ही उपयुक्त है। पवि यहाँ पर फिर ये शंकाकी आप कि संसारिणो मुखाश्व यहां पर पशब्द का मर्य समापय माना है तथा' 'मापस में विश्वविएप्प आपकी अपेक्षा न कर प्रमेक शनोका पाक्य में मित्र मित्र पसे रहमा' यह समुपय रामका भई यहां पर भी संसारी और मक्त मोमो राम मित्र मित्र है यह बात बतलाने के लिये परमे 'घ' रामका उरलेत किया है परन्तु जिस प्रकार पपिम्याप्त मापायुः इस पापमै पृथिपी मावि रामों में भापसमै पिपिराप्य माप नहीं है तथा अपं भी मित्र भिन्न है इस लिये ये मिश्र मिन माने जाते हैं उसी प्रकार संसारिशोमुक्का यहां पर भी आपस में पिरापण विशेष्य माप मही तथा अर्थ भी मित्र है इसलिये संसारी और मफ दोनों गग मिम मित्र है या उनमें भेद प्रकट करने के लिये समुघयापक पराव घ उत्सेव करमा प्पर्य है (उत्तर) प शमके समय और भवायप ये दोनों भय तथा पकको प्रधान और दूस को गोरा बतलाना पर अम्पायय राय का भय है सूपमें जो धाम है उसफा भय यहाँ अन्याय है और एकस्थान में उपयोग पोषप से रहता है और दूसरे स्थान में मुम्परपसे रहता है यह पाापर घशय पोतन करता है इसरीतिसे 'मध्ये पर देवापानय" अर्थात् मिता का भावरण करो और देवर को सेभाभो इस सवाषय के प्रसिय उदाहरण में जिस प्रकार मिका माषरण करना प्रपान है और देवपतका साना गौष है उसी प्रकार संसारी और मुखत्रीयों में संसारीजीप प्रधानतासे उपयोगपान है और मछलीप गौपाप से उपयोगवान है यह पानसे प्रदर्शित भय है। इस सिये स्वमै 'घरामप्यर्थ नहीं है। POORTORO:12C2OODCRDOTICIOTT १ मया सिद्धि OUR DORM ३० है ORNORTHADONLOD पनिगमी जगतसाप सकौलात पदपदेद और रिभक्स्पर्य सहित सापसिद्धिका शन्दशनीन्दीमनुनाद मध्याय २ सूत्र ६, १० निरापरणेषु युगपत् । पूर्वकालभाविनोऽपि दर्शनात् ॥ ज्ञानस्य प्रागुपन्यासोऽभ्यर्हितत्वात् । सम्यग्ज्ञानप्रकरणात्पूर्वपचविधो ज्ञानोपयोगोव्याख्यात ॥ इह पुनरुपयोगग्रहणाद्विपर्ययोऽपिगृह्यते इत्यष्टविध उच्यते । यथोक्त नानेनाभिहितपरिणामेन सर्वात्मसाधारणेनोपयोगेन ये उपलविता योगिनस्ते द्विविधा ॥ ससारिणो मुक्ताच ॥ १० ॥ निगा। कर्मस्पमापरण ररित सर्पनमीयोंमें मर्यात् फेवनमानियोंम पुनरवपूरेकालपारिन रामपिन्दशनात् ।। (मान-र्शनएककाल होते हैं ॥ प्रथम हानेमाचे दर्शनोपयोगसे मी TARITR० उप पाम सम्माविलाद ,in (स्त्र) मानका परिले पाना प्रपानपना भयवा भेटताके कारणसे है भर्पात् मान मपान है इससे इस सूत्रमें दर्शनसे परिने मानको का मम्पावान पारणा सम्यगानफेविषय में गा सम्परमानपकरणमें पुरमा रवि शानउपपाग । पारगाव । परिल(प्रथम अध्याय सम हम) पास प्रकार मान उपयोग करागयारे न समागप्राणान् In विपर्पय । मपित पहरि यहा( TOउपयोग शब्द नानस विपर्ययवान भी पनाानिक महरिपा रयन 1 प्राणकियागया है इस प्रकार (पानोपयोग) आठ प्रकार सागपा है। पनन । मिश्नि-परिणामेन । (मर दरापासपको उत्थानिका कहते है कि)प्राणकिया है परिणाम इसने मात्समारारणेनापयाक्तन उपयागेन। मौर) सपमात्मा सापारण (पमान) ययाक भो उपयोग है वाकरि प। मदिना पागिनः । दिक्षिणमा अपचतित ये योगी(=उपयोगी मो मात्मा है)ते दो प्रकार हैं मर्यात् भाग्गा नवा वा सूत्रों षिव या परिणाम पा उपयोग मा समस्वमीयोंमें सापारणत विनाया गया है व मीच निमपित सूत्रानुसार दो प्रकार ॥ "ससारिणा मुक्ताश्च ॥ १०॥ वे जीराःसंसारिणो मुक्काम द्विविधा भवम्ति भोसमारिणीमुक्ता र दिरिया भान्ति क्षेत्रीवसंसारीमौर(प)रक्त दोपकासोते हैं। मांझोमीरकर्मरतो (१) समासर और गिरायो पाप्रमाणे रम पार और पपना.(१)चरणा-(प्राम। संसारिणी मुकार परोपर CHOOSE DONDOOR CIBO ID COO110100 सिाद OKO KO JIRO OROHRMED ONYO ORE CHORD OM पानिरासी मगरूपसाप पफील कत पदच्छदार विममत्पर्य सहित सवार्यसिदिशा शम्श हिन्दी अनुयाठ अध्याय २ स्त्र १. अनन्तवारानतीत्यत एव तेनैव प्रकारेण तस्यैव जीवस्य नोकर्मभावमापद्यन्ते यावत्तावत्स- मुदितनोकर्मद्रव्यपरिवर्तनम् ॥कर्मद्रव्यपरिवर्तनमुच्यते -एकस्मिन्समये एकेन जीवेनाप्टविधकर्म भावेन पुद्गलायेगृहीता समयाधिकामावलिकामतोत्य द्वितीयादिषु समयेषु निर्जीर्णा पूर्वोक्तेनैव क्रमेण त एव तेनेव प्रकारेण तस्य जीवस्य कर्मभावमापद्यन्ते यावत्तावत्कर्मद्रव्यपरिवर्तनम् ॥उक्त च मनन्तसारान् मवीत्पावन्तेन एम० अनन्वरार प्राण मायामोंको रखपिकरि (मप) वही तिसही मकारणावस्यदीपराजीवस्यानाकर्ममारम्भापपन्ते प्रकारकरि विसही भीम नाकर्ममायका माप्त होते हैं मर्यात् पी गोर मिसन परिने समयमै परमाणुमरे ये वही से स्पर्शादिको मषिमागविप्ले दनिकी संख्या लिये वया विवने ही परमाणु को सिय समयमपद प्राण परे। पावनतामसामदिवम्।। नाकर्म म्य- सारा(म्याव) इतना(स्वायत् चाल)इकहा होय विक)नाकर्म दम्प- परिवर्तनम् ॥ कर्मद्रम्पपरिवर्तनम् ॥ रस्पते । -परिवर्तन होता है। (प्रा) कर्मद्रम्पपरिवर्तन का मासा है एकस्मिन् समपाएनामीपेनमाभाटविपकम (art) एक समपम पम्मीरपरि माटमकारकर्म- मापेन पला । ये प्राीवाना समापरि मे पुल प्राणझिये (वे) समप-प्रपिकाम् मालिकाम् ॥ मतीस समय मविक भावशीबानको सम्पर दिवीपादिपु समयमा निर्माणमा पूर्वोकेन । -द्वितीयादिक समोंमें निर्माण मये (फिर) परिने पित पप मेण । (नाकर्मद्रम्पपरिवर्तडीयों)ीपरि(मर्यात् भीतभौरमिभशीव भोर पप्यग्रीवपरमामुमोका प्राण परते करते मा कोई समय ऐसाय मिसमें) गएपनी एप०मकारमावस्य। भीरस्य । कम योग्य पद्धत) विस हो प्रचारपरि विस मीस (मर) पर्मभापम् नामापयन्ते 7 पावन वारक गर्म पापको प्राप्त हाते (सर)सारा(पाच)इवना(वार) कर्मपरिवर्तनम् । उकम् ॥ (कास)कर्म परिपतन है।पा गया मी (प) है (२) माधर्मद्रम्य परिवर्तनका और मे दम्पपरियाका समान ही पल है और नर्मद्रम्पपरिपर्टन में समस्त विपि मार्मथ्य परिपतन सीमांति है। प्पस भतर प्तमा कि नाकमप्यपरिकठनमें मोफर्मवर्गणाभोळ प्रहप है और धर्मद्रम्पपरिवर्तनमें धर्म बगसामोका प्रहण है। DEPOODID TOOTD:D:WOOROCK ३५ सिदि समार्थ ३ EPORRDPROMOPAON पानिरामी नगरपसाप फील कव पदग्छेद और रिमात्पर्य सहित सायंसिविधिका शम्दश हिन्दीमनुराद अध्याय २ सूत्र१० मएपामस्ति तेससोरिण ॥तत्परिवर्तनं पञ्चविधद्रव्यपरिवर्तन, क्षेत्रपरिवर्तन,कोलपरिवर्तन,भवप रिवर्तन भावपरिवर्तन चेति ॥ तत्र द्रव्यपरिवर्तन द्विविध नोकर्मद्रव्यपरिवर्तन कर्मद्रव्यपरिवर्तन चेति ॥ तव नोकर्मद्रव्यपरिवर्तन नाम त्रयाणा शरीराणा पएणा पर्याप्तीनायोग्यो ये पुद्गला एकेन जीवेन एकस्मिन्समये गृहीता स्निग्धरुक्षवर्णगन्धादिभिस्तीव्रमन्दमध्यमभावेन च यथावस्थिता द्वितीया दिए समयेषु निर्जीणी अगृहीताननन्तवारानतीत्य मिश्रकाश्थानन्तवारानतीत्य मध्ये गृहीताश्च ने फम विनक पशाकरि भपसे मनावरकी प्राप्तिको संसार करते हैं माम्भस्तिान । संसारिणः । तत् परिवर्तनम्। पा(संसार)मिनके.ते संसारी है। पर परिवर्तन संसग्ण या परिभ्रमण पपि परिवर्तन मा परिवर्तनं ।।। पाँच प्रकार है द्रव्पसंसरण, प्रससरण पसपरिरतनम् ।। मपरिपतनम् ॥ प. कारसंसरण, भवसंपरसौर पारिखननम् ॥निक सम्पपरिपर्तनम् ॥ =भारसंसरण इस प्रकार हैं वो द्रम्पपरिभ्रमण दिलिप नार्मद्रपारिवर्तन कर्मद्रम्पपरिचर्तनाप इति दामझार(दिरिधम्) है नार्मदम्यसंसरण भौर कर्मवम्पसंसरण इसमकारों नप नारदम्पपरिवर्तनम् । नाम {m वा नार्मद्रव्यपरिवर्तन नाम(इसप्रकार है कि) [पासोवास-भाषा-मन पाणाम् शरीराणाम् ।। पएषाम् ।। -वीन(मौदारिकमिपफ्भाहारक)शरीर भौर का (भागार-शरीर-न्द्रिप- पपामोनाम् ॥ पाग्याप | पला। एग्नमीवेन 1 =पर्याप्तिके याग्य मे पनख परमाणुरे स्कष एक चेतन परि एस्पिन | मवय । गृहीताः। निम्मरुतासंगन्यादिमि' एक समपर्ने प्राणहिये (ते) मिग्यरूपपर्णगंप मादिकरि गोममन्दमापपमान | पपपारस्थिता दिनीयादि। और वोम मन्द मध्यप पारकरि जैसे विष्ठते द्वितीयादिक सपप निर्माण भएतान -समय में खिरे (बहुरिदिनोयोदिक सपप) विनापरे (परमाणु) भननरारान् भतीप-विभकान् । प. मनन्तवार प्राणकिये का उपकरि भौर मिश्रपरमाणुमोको प्रयात् पहिल प्रा लिन प्रदीत भी परि नपे प्राणरिये समी मनमरागन् गमतीस-पप्प। गीतान् । -मनम्नपार(प्राणभाभौगोप करि और पीचवरीपरमाणु deldOOOOOOOOOOOOOTOM OARDORRORMA ३२ सिादे २५ ORD AMB AROUND OUR YOUTRE DIFCOOH परानिवासी नगरूपसाप सफील झव पद भार विभात्पर्य सीव सपार्यसिदिफा शम्दश हिन्दी अनुवाद अभ्याय २ व १. अनन्तवारानतीत्यत एव तेनैव प्रकारेण तस्यैव जीवस्य नोकर्मभावनापद्यन्ते यावत्तावत्स- मुदितनोकर्मद्रव्यपरिवर्तनम् ॥कर्मद्रव्यपरिवर्तनमुच्यते-एकस्मिन्समये एक्न जीवेनाष्टविधकर्म भावेन पुदला येगृहीता समयाधिकामावलिकामतोत्य द्वितीयादिषु समयेषु निर्जीर्णा पूर्वोक्तेनैव क्रमेण त एव तेनेवप्रकारेण तस्य जीवस्य कर्मभावमापद्यन्ते यावत्तावत्कर्मद्रव्यपरिवर्तनम् ॥ उक्त च मनन्दपारान् समतीय-भावकतेन एक० मनन्तपार प्राण मापाभोंडो उसधिमरि (अप) तेही तिसाही पभरणावस्मानीरस्यानाकर्म पापम् । मारयन्ते मारपरि तिसही भी नार्यपापका प्राप्त होते हैं मर्याद पी मीर मिसन परिव समयमें परमाणो ये सेती से सादिक भरिमागविच्छे दनिकी संस्म्या लिये सपा वितने ही परमाणु को खिय समपभनव प्राण करें। पागदवारसमदिनम् मापदम्प मारा(व्यावस्) इवना(वामन (STREET परसपनोकर्म द्रव्य- परिवर्तनम् । नर्मद्रम्पपरिपननम् ॥ तपते । परिवर्तन हाता है। (प्रक) कर्मद्रग्यपरिपतन का मावारे एस्मिन् समयदएरेन प्रीपेनामविपकम (त) एक समय एम्भीररि भामकारकर्म- भान नवा पेसप्रीवा। स्तमासरि जे पुन प्राणकिये (वे) सपप-मपिकाम् सामालिकाम् ॥ भवीस समय भरिक भापीकाजको सन्पार द्वितीयादिपु समय निर्माण केन । -दितीयादिक समयोंमें निर्सि भये (फिर) परिले रविव एम •झमेण मनोपर्मम्पपरिवर्वडीयो)ीमपरि(मर्यात् भरीवमौरसिमशीत मौर पम्पमीवपरमाणुमोजमाण करवे परवे का कोई समय ऐसाय मिसमें) वरपरसेना पर मकारेण वस्प मीरस्प म्वरम योग्प पख) विस हो मारहरि विस भीपक (मर) पर्ममारनामापयन्वे । यावदारक धर्म पापको प्राप्त हावे सारा(पार इसना(वार) धर्मपरिवर्तनम् ॥ वकम् ID दाख)कर्म परिवर्तन है। गया मी (प) (२) मोधर्मदम्य परिपर्तमा भीरमे प्रध्यपरियोनका समाम ही नल है और मद्रम्पपरिवर्तन में समस्त विधि माम्मेद्रप्प परिवसन फीमावि है। हेपत प्रतरसनामाम्मदम्पपरिवर्तममें मोर्मवर्गप्पामौका प्रहल है और पमद्रम्पपरिपतनमें कर्म मामाका प्रहण है। PO DORDOGNOORD ONDOLKOONDO ३३ सिदि सार्थ SURDERIPAD STARBAR एयनिराप्ती नगरूपसाय पकीस कृत पदपणेद और पिमात्यर्य सहित सार्यसिमितिका शम्दशः हिन्दीमनुवाद अध्याय २ सूत्र१० मएपामस्ति तेससारिण ॥तत्परिवर्तनं पञ्चविधद्रव्यपरिवर्तन, क्षेत्रपरिवर्तन,कालपरिवर्तन,भवप रिवर्तन,भावपरिवर्तन चेति ॥ तत्र द्रव्यपरिवर्तनद्विविध नोकर्मद्रव्यपरिवर्तन कर्मद्रव्यपरिवर्तन चेति ॥ तव नोकर्मद्रव्यपरिवर्तन नाम त्रयाणां शरीराणा षपणा पर्याप्तीनायोग्या ये पगला एकेन जीवेन एकस्मिन्समये गृहीता स्निग्धरुक्षवर्णगन्धादिभिस्तीव्रमन्दमध्यमभावेन च यथावस्थिता द्वितीया दिपु समयेपु निर्जीणी अगृहीताननन्तवारानतीत्य मिश्रकाश्वानन्तगारानतीत्य मध्ये गृहीताश्च ने कम विनकपोकरि भपसे भपांतरकी मातिको संसार करते हैं सापपाम्।। मस्तिावे । संसारिण । वन परिवर्तनम् ।। यह(संसार)मिनफेहै.वे संसारी हैं। पा परिवर्तन संसरण मा परिभ्रमण परिपा दम्पपरिवर्तनं । परिवर्तन ।। पाँच प्रकार है न्यससरण, प्रसंसरण पालपरिवर्तनम् । परपरिवनम् ।। १० कालसंसरण, भषससरण मौर पापपरिवर्तनम् । इविक सत्रयप्पपरिपतनम् ॥ =मारसं सरण इस प्रकार में तहाँ दम्पपरिभ्रमण दिनि । नार्मद्रम्पपरिवर्तन। धर्मदपपरिवर्तनाप इति दामकार(द्विरिपम्) नाकर्मद्रम्पसंसरण और कर्मदम्पसंसरण इसमकाएँ नर नारदम्पपरिवर्तनम् ॥ नाम से वा नार्मद्रम्पपरिपतन नाम(इसपकार मि) [भासोबास-मापा-मन पपाणाम् । शरीराणाम् ।। पपणाम् ।। -चीन(प्रौदारिकमैक्रियामाहारक शरीर और पा (मापार-शरीर-इन्द्रिय- पपामोनाम् ॥ पोम्पाय। पुनला। एम्न सामीपेन । पर्याप्तिके याग्य ने पद्म परपाणके स्कष एक चेवन गरि परस्मिन् । समय राशीनाः । निम्परतवर्णगन्मादिमि' । समपर्मे ग्राणहिये (से) मिग्मस्तपर्णगप मादिफरि नोग्रपन्दपायपमारनप पयारस्थितीदिनीयादिषु ।। सौर वोग मन्द मध्यप मारकरि जैसे तिष्ठते दितीयादिक सपप। निर्माण मशीतान् । सपप में सिरे (बहुरिदिवोयादि समय) पिनागरे (परमाणु) मननन् । मतीस-विभकान् । १० =मनन्तभार ग्राहियेमा उलरपरिमौर पिभपरमाणमोको अर्थात् परित पसे विनले प्रवीच भी बहुरि मपे प्राणरिये कमी घमारामतीस-पप्पे पूरीमान् प० -मनम्तमार(प्राणमधामोहोगकंप करिमौर पीचबीवपरमाणु Mea.doa.OOOOOOTOतायाaram ३२ सर्वार्थ erupeex .. सिाद 4 Grand QR CRC CUXO ODRE O RITO OM पानिरासी जगरुपसहाप पफीस कृत पदमन और विभपत्त्पर्य सहित सर्वार्थसिदि का शम्दशन्दा अनुयाद अध्याय २ सत्र १० अनन्तवारानतीत्यत एव तेनैव प्रकारेण तस्यैव जीवस्य नोकर्मभावमापद्यन्ते यावत्तावत्स- मुदितनोकर्मद्रव्यपरिवर्तनम्॥कर्मद्रव्यपरिवर्तनमुच्यते -एकस्मिन्समये एकेन जीवेनाप्टविधर्म भावेन पुद्गलायेगृहोता समयाधिकामावलिकामतोत्य द्वितीयादिषु समयेषु निर्जीर्णा पूर्वोक्तेनैव कमेण त एव तेनेव प्रकारेण तस्य जीवस्य कर्मभावमापद्यन्ते यावत्तावत्कर्मद्रव्यपरिवर्तनम् । उक्त च मनन्दपारान् मतीस्प-भाएप०वेन एस० मनन्दरार प्राण मायामोंको खंपिमरि (मप) ही तिसही मकारणवस्याएवजीवस्पीनाकर्मभारम्। मापदन्तायकारकरि विसही मीप नाकर्षभाषका माप्त होते हैं अर्थात् पी मौर मिसन पहिले समयमें परमाणु परे ये मेरी से स्पादिफ के भविभागप्रविष्य- दनिकी संस्पा लिये क्या दिवने ही परमाणु को लिय समयमपद प्राण करे। पापकतारसमुदितम्। नाकमद्रम्प सारा( पावन) इतना(धाचन (काल)इहा होप (प)नोकर्म द्रष्य- परिवर्तनम् । कर्मपपरिवर्तनम् ॥ उपवे । परिवर्तन गया है। (मर) कर्मद्रम्पपरिवर्तन का भावारे एकस्मिन् समीरिकन प्रीपेनामष्टविपकर्म (art) एक समयमें एम्भीररि भाउमकार कर्म- मायेन वाला ये प्रीवा। समावरि ने पुरख प्राणपिये (से) समप-भपिकाम् नामाविकाम् ॥ भवीस समप भरिक भावधीज्ञासको उन्तपर द्वितीयांदिपु समय निर्णिमा पूोलेन । दिवीपादिक समयोंमें निर्मि भये (फिर) परिले पिव एस पेण नार्मद्रम्पपरिचर्वीयर्यो)दीपकरि(भर्षात् भीतमौरमिश्रीत और पप्परगावपरमानुमोडा प्राण करवे करत भा कोई समय ऐसाय मिसमें) नापरवेनी पपसकारण तस्य । मीरस्य । (म योग्य पुल) विस हो प्राररि मिस भीरक (मर) भारम्बामापपन्ने त पापद वारक पर्मभावको मातहाते विष)सारा(यावद)श्वना(वायत्) पर्मपरिगर्वनम् ॥ उकम् ॥ काल) परिपर्वन है।का गया मी (प) रे (२) मोधर्मद्रम्प परिपतन और कमे दम्पपरिफ्लेमका समान ही बात है और पर्मवप्यपरिवर्तन में समस्त विपि मोफर्मवय परिवतम बीमावि है। संपत प्रतर इतना है कि मामयपरिवतनमें मोमवर्गलाका प्रहस है और कमद्रम्पपरिवर्तममें फर्म पगडाभोंका प्रहय है। DEBOOREDONDO PORTO DUROCOTOBARDOR ३३ समार्थ सिदि OUROOPRO smu रथनिरासी मगरूपसाय पडील कस पदरखेद मौर निमात्पर्य सहित सर्वार्थसिस्विचिका शमशः हिन्दीमनुराद अध्याय २ सूत्र१० स एपामस्ति तेससोरिण ॥तत्परिवर्तन पश्चविधद्रव्यपरिवर्तन, क्षेत्रपरिवर्तन,कोलपरिवर्तन,भवप रिवर्तन,भावपरिवर्तन चेति ॥ तत्र द्रव्यपरिवर्तन हिविध नोकर्मद्रव्यपरिवर्तन कर्मद्रव्यपरिवर्तन चेति ॥ तव नोकर्मद्रव्यपरिवर्तन नामात्रयाणाशरीराणा षण्णा पर्याप्तीनायोग्योये पद्गलाएकनजीवन एकस्मिन्समये गृहीता निग्धरुक्षवर्णगन्धादिभिस्तीव्रमन्दमध्यमभावेन च यथावस्थिता द्वितीया दिपु समयेपु निर्जीी अगृहीताननन्तवारानतीत्य मिश्रकाश्वानन्तनारानतीत्य मध्ये गृहीताश्च मेकम तिनक पराहाकरि भरसे भवावरकी प्राप्तिको संसार पाते हैं साताम्।। मम्तिाने । संसारिणः। तत् परिवर्तनम्।।। घा(ससार)मिनको से संसारी है। पर परिवर्तन संसरण पापरिभ्रमण परिपा दम्पपरिरतन । परिवर्वन । =पाप प्रकार है ट्रम्पस सरण, क्षेत्रसंसरण पासपरिपतनम् ।। मपरिवर्तनम् । प.. काससंसरण, भरसंसरण मौर पारपरिवर्तनम् ॥ इविक वामप्पपरिपर्वनम् ॥ मापसंसरण इस प्रकार वा दम्पपरिभ्रमण हिनि । नाकर्षम्पपरिवर्तन। फर्मद्रम्पपरिवर्तन प इति =दामकार(दिरियम्) है नार्मद्रष्यसंसरण मौर कर्मद्रम्पसंसरण इसमकाएँ नत्र नारपट्रम्पपरिवर्तनम् । नाप lan वा नार्मदम्पपरिवर्तन नाम(इसपकार है कि) [भासोषास-भाषा-मन प्रयाणाम् । शरीराणाम् । परणाम् 10 प्वीन(मौदारिम्पैत्रिपकमारक)शरीर मौर का (मागार-शरीर इन्द्रिय- पपासोनाम् II पापा ।। ।। मला। एग्न समीरेन । पर्याप्तिके पाग्य ने पुद्गल परमाणुरे रूप एक चेवन परि एकस्मिन् सम्पराग्रहीताः। निम्पहतार्मगन्मादिमि' पर समपमें ग्राणकिये (३) लिम्पस्तपर्णगंप मादिकरि गोगमन्दमापपमारन । म पारस्थिता दिनीयादित। और वोय मन्द मध्यम मारहरि जैसे विष्ठते द्वितीयादिक समया, निर्मार्णाः प्रतान् । -समय में सिरे (बहुरिदिनोयादिक समय) पिनागरे (परमाणु) मननवागन् । भनीत्स-विधान् । प. मनन्तवार ग्राणहियेका एपकरि मौर मिभपरमाणुमोको मर्यात् परिले प्रापे तिनले प्रीत मी महरि नप पाकिसे तभी मनारारान्सामनीस-पप्प पीतान् ॥१० -प्रनम्तवार(प्राण मारामांगोगग्सप परि और बीचबीवपरमाणु TUDI ODNO ODRADOIDONEO + २२ ORROHTA सिाद सर्वाधि MOON HOOD FRONTPEDOR OUTDOOR CORTO OR पानिरासी नगरूपसहाय वर्गल व परपदभार रिसपत्त्यर्थ सदित सार्थसिद्धिका शम्दश हिन्दी भनुपाद अध्याय २ व १. अनन्तवारानतीत्यत एवतेनेव प्रकारेण तस्यैव जीवस्य नोकर्मभावमापद्यन्ते यावत्तावत्स- मुदितनोकर्मद्रव्यपरिवर्तनम् ॥ कर्मद्रव्यपरिवर्तनमुच्यते--एकस्मिन्समये एकेन जीवेनाष्टविधकर्म भावेन पुरला ये गृहोता समयाधिकामापलिकामतोत्य द्वितीयादिषु समयेषु निर्जीर्णा पूर्वोकेनैव कमेण त एव तेनैव प्रकारेण तस्य जीवस्य कर्मभावमापद्यन्ते यावत्तावत्कर्मद्रव्यपरिवर्तनम् । उक्त च भनन्वारान भतीयसेन एR० भमनन्सार प्राण मायाभोंको संरिकरि (अब) ही तिससी मधारणवस्याएसजीपस्पीनाकर्ममारम्। भाषचन्ता व्यकारकरि तिसही भीष नार्ममारका प्राप्त होते हैं मर्यात् यही मोब मिसन परिते समयमें परमाणुप्रा पे ही वैसे स्पादिक भषिमागविच्छे- दनिकी संण्या लिपे तपा दिवने ही परमाणुसलिय समयमपद प्राण रे। पारवापत् समुदितम् । नाकम इम्प *सारा(न्यायव्) इतना(वान् शख)हा होय (तम नोकमद्रम्प- परिवर्तनम् । सर्मपपरिषरम् ।। उम्पते । म्परिवर्तन पारे। (प्रस) कर्मद्रम्पपरिवर्तन का भावारे एकस्मिन दासपठाएकनानीवनामविपकम (ant) एक समयमें पम्मीरकरि मामकारकर्म- मापेन सा ये दीवा। समाररि ने पुनस प्राषिये () सपप-मपिताम् सामाखिमम् मवीत्य म्समय भाषिक भाषजीकासको सम्वेषकर द्वितीयादिपु समय निर्णाि पूर्पोकेन । -दितीयादिक समयों में निर्मार्स भये (फिर) पहिले पित पर प्रमण ॥ (माकर्मद्रम्यपरिवर्यकीयों)ीपकरि(भर्वाद भगृहीतभौरमिमीय भौर पम्पोतपरपामुमो प्रक्षण करते करते मा कोई समय ऐसाशेप मिसमें) सापरक्वेनी पर०कारेण तस्य भीरस्य । धर्मपोग्य पस) तिस हो प्रकारपरि तिस नीर (मर) पर्यमापम् नामाषपन् । पागद वारदा भार्ममारको प्राप्त हावे (व)सारा(पाबदोश्वना(चावल) पर्मपरिवर्तनम् । उक्तम् me (A) परिवर्तन है।। काममा भी (प) है (श मोसमद्रव्य परिफर्तनका और मे दम्पपरियमका समान ही प्रत औरर्मदम्पपरिवर्तन में समस्त विपि नाम्मेवप्य परिधान पति वित प्रत तना कि मौसमम्पपरियानमै नार्मवर्गलानी का प्रदए है और फर्मदम्पपरिपतनमें धर्म वर्गक्षामोका प्राण OPPDEOREDEOOSEBERCOREDEEOHEROGE ३३ वार्थ सिद्धि सूत्र १. पाप२ सब्वेऽवि पुग्गला म्बलु कमसो भुत्तुझिया य जीवेण । असइ अगा नखुत्तो पुग्गलपरियट्टससारे ॥१॥ नेतपरिवर्तनमुच्यते- सूक्ष्मनिगोवजीवोऽपर्याप्तक सर्वजघन्यप्रदेशशरीरो लोकस्याष्टमध्यप्रदेशान्स्वशरीर- मध्यप्रदेशा कुलोत्पन्न तुदभवग्रहण जीवित्वा मृत स एष पुनस्तेनैवावगाहन दिरूपन्नस्तथा निस्तथा चतुरियेवं यावधनांगुलस्यासस्येयभागप्रमिताकाशप्रदेशास्तावत्कृत्वस्तत्रेय ॥ समरि पुग्गला स्तुमसो रतुरिझया य नीरेण । मसइ मणवस्तुको पुग्गलपरिपाससारे ॥ १॥ - पुग्गलपरिपहसंसारे मसह भणवमुत्तो सम्पति पुग्गला खन्नु कमसो सतुझिया य मोरेण ॥१॥ -पूगलपरिपहससारे , (पुनसपरिपर्वनससारे, मसा। इस (-मस-मस्मिन् ) परिपर्वनरूप संसारमें सगुप्ता (मनतम) अनत (मणत) कस्ता (जार) सामरिक पुरगला । (सः । मपिक पुरस्सा) -सपी शल सुसमुसो० (मलुक मरा.) निमपरि अनुक्रमसे अग्झिपा पळोवेणा (रक्कोग्झिताप मीपेन)-नीपहारा प्रण किय माकर छोड़ दिये गये हैं अर्थात् "इस पुनजपरिवर्तन रूप ससार विप इस पीपमें सबको पुनस निमपारि भनतबार मनुक्रमसे प्राण करि करि छोड़े प्रयद पपनिका पृष्ठ २४६ गिननम् । उपयत T पनिगादमीर ।। क्षेत्र परिवर्तन कहा मावा रे (मप) कोईमीप सूक्ष्म निगोदिया मपातर समपन्यपदेशशरीर । शोऽस्य । -प्रपातक समस्त मघन्य (भपगारनास्प) शरीरासा खोपके परमादशान् सिगरीणमध्यमवशानात्वा-उत्सममा माठ मध्यके मदेशीको अपने शरीरके मध्य प्रदेश करि उपना अर्थात् साकके भष्टमध्यप्रदेशोकोमपनेशरीरकामष्टमप्पप्रदेशपनाकरउत्पभभाभौर मपरप्राणम् । भीरिता-पता। पुद्रमार (सासक अठारह मागस्थिति राने वासा) पाय भीर मरा स। पुनर तनाएषकमगाइन । द्विः बहुरि यो(पीर)ी विसपी भागारनपरि दूसरी पार उत्सम तथाof क्या-पवर इति. -चपा वीसरीपार षषा पीपीवार भन्मा (मौर परा इस प्रकार) एस पार पनांगवस्य असंस्पेपमागममिता--- दो भिवना पनीरक प्रसस्यावां माग प्रमाणित(अमिता) भानाग-पदशा नान्यसमाएर मपाका प्रदेश विधम पार (1) वारी पाप स्पानोरी IODENDOTOIDUTOO: DELIDO:rord WOROOANDIAM ३१ arn सिद्धि स ३५ ETUHMOITOOL CATLONDOCAKDDI ORD पानिरासी जगरूपसप पीस कर पररपद मौर निभात्पर्प सहित सार्यसिद्धिविन शपया हिन्दीमनुसाद मध्पाप २ समी जनिखा पुनरेवेकप्रदेशाविकभावन सर्यो लोक श्रात्मनो जन्मक्षेत्रभावमुपनीतो भवति याव- नायक्षेत्रपरिवर्तनम् ॥ उक्त - सब हि लायवेत्ते कमसो त णात्य ज ण उपयण । श्रोगाहणेण पहुसो परिभमिवो वतमसारे ॥१॥ भर्याद पीप मनतवार अन्य प्रपनाना वा भम्प संप में उपमा पा इस परिवर्तन के प्रमाण रहित भनिता-पुन : एक-एक मदेश-भषिकसान पार गरि(पमानसत्रसे खोक)एक एक प्रदेश मनिकम(कमसेमन्मवेकर) सा: मोरपनः । समस्त जोक (पोनसेवैवासीस पनराज् प्रमाण)प्रात्मा वा अपने (प्रास्मना) जन्मवेप्रभारम् । उपनीतः पवित मन्म प्रपनकोमा भन्मषरूप समाप्त किया हुमा (थपनीवा) वारे मर्याद वही मीर उस क्षेत्रसे पभाव और एक पर प्रदश मणिम मन्म सहर समस्त मोरे सरमदेशों का प्रमानुसार ही (मनुश्य बिना मन्पसे पान गिनि) स्पर्शपरि अपना भन्म वारदा है पापना सेवा है। पापनान्त्रपरिपर्तनम् ॥ र प. मक) सारा (पान)इतना( ताम) क्षेत्रपरिर्वन है मारि कहा गया कि सव्यहि लोयखेने कमसोत णत्यि जण उप्पएण। योगाहणेण बहुसो परिभमिदो खेत्तससारे॥१॥ -योगाहणेण बहुसो परिभमिदो खेचससारे । सव्वहि लोयखेत्ते कमसोतं णत्थि जण उप्पएण भागास पहुसा (भपगानन पुरा •) =मनेर-ए)भवगाहना(मशरीर को पारि परिभमिदातालचससार(परिप्रमवा। त्रसंसार) चारों भोरसे(परि)भ्रमणामा (इस) क्षेप संसार सममि वापसचोसिस्मिनागाशोर) =समोर क्षेत्र ramo .तिया(पश ! नभस्ति) अनुपमस वहां पेमा स्थान नहीं है माणमणए(पEHIR नत्पन्नम् ॥) मजा(पानी)नी जन्माई मात् इसक्षेत्र संसार प्पैि भ्रममा पाभीष सोमने भरगाइनरूपशरीरफंपापास सर्पसोका क्षेत्रवि मनुक्रमदेउपमा वापिसासन या महान उपमा । सगान पर RTER गिर से मिला और 8 मे REE Bा मे नापाव भाव तितली पार । OLORIODETOn: ३५ सिद्धि पाथे सूष १. प्पिाप२ ३४ PANDITMMONTOOMEDITANDARDOIRDOIROON सब्बेऽवि पुग्गला स्वलु कमसो मुत्तुझिया य जीवेण । असइ अाननुत्तो पुग्गलपरियट्टसंसारे ॥१॥ नेतपरिवर्तनमुच्यते- सूक्ष्मनिगोवजीवोऽपर्याप्तक सर्वजघन्यप्रदेश शरीरो लोकस्याष्टमध्यप्रदेशान्स्वशरीर- मध्यप्रदेशा कृत्वोत्पन्न तुदभवग्रहण जीवित्वा मृत स एष पुनस्तेनैवावगाहन दिरुत्पन्नस्तथा ख्रिस्तथा चतुरिस्येवं यावदधनांगुलस्यासख्येयभागप्रमिताकाशप्रेदशास्तावस्कृतस्तत्रैव ॥ समरि पुग्गमा खसु पसो सम्झिया य नीरेस मसा भर्णवखुचो पुग्गजपरियहससारे ॥ १ ॥ पुग्गलपरिपासंसारे मसह भणवखुचो सम्मान पुगखा सम्म कमसा मसुन्झिया यमीषेण ॥१॥ पुग्गसपरिपहसंसारे , (नवपरिवर्मनससारे , असा ।इस (-प्रसाअस्मिन् ) पलपरिपर्वनरूप संसारमें पवितुमा ० (पनवासा) मनस (-मणत) उस्सा (पार) सारे । परिकममा । (सर्वे । भपिक पुरजा:10 सबही पुस मनु० मुसो० (सनु प्रमा०) निभयररि अनुमसे मनुझिया पीपेण (सक्कोग्झितासाप नीपेन।)-बीरारा प्राण दिय नाकर छोड़ दिये गये हैं मर्यात् "इस पुलपरिवर्वन रूप संसार पिपे इस भीषने सर्व ही इस निभपारि मनक्यार अनुभमसे प्ररण परि करि छोड़े है। अपचंद पनि पृष्ठ २४६ प्रशस्तिनम् | उप्पत सत्यनिगोदमीण। क्षेत्र परिपर्वन कहा मावा है (मब) बोईजीप सपनिमादिया पास सर्वमयन्यमदेशशरीरा । सोहस्य । अपर्यावक समस्त नपन्य (मरगाहनाम) शरीरमासा जोर भटमध्यमदशान्ता शरीखमम्पमशाना सा-उत्पमा माठ मध्यके प्रदेशोंको अपने शरीरके मध्य प्रदेश करि अपमा मर्याद लोकभष्टमध्यमदेशोकोमपनेशरीरकाभएमध्यप्रदेशवनाकरउत्पभहभापौर घमणाम् ।। गोपित्ता-मता। -शुदभव (सासके भारही मागस्थिति राने पाला) पाप मीर मरा सी एस०पुनरलेन एकमवगान 1 दि बहुरि यो(मीरजी विसी प्रवगाइनकारि दूसरी पार उत्सम तपातिया पर इति. सपा तीसरीवार तथा पौगीबार जन्मा ( मौर मरा इस मार) एम्पावन पनौगुसस्प II संस्पेयपागममिता सीमितना पनामक भसंस्थाको माग प्रमाणिव अमिता) माराग-पदशा नारत्यास एक माग प्रदेश तितने पार (कला) anीपा गप स्वामी qe DOSROOMDOUTONOMOTO 10 ३१ ' ३५ सिद्धि LEOOONLOpanearRODIO एतानिपासी मगरूपसाप पकीस रुख पदप्मेद भौर रिभक्त्पर्य सहित सार्वसिरिमपिता शम्दशः हिन्दीअनुसाद मण्याप २ सपना जनिस्वा पुनरेव प्रदेशाधिकमावन सर्वो लोक प्रात्मनो जन्मभावमुपनीतो भवति याव- तावक्षेत्रपारवर्तनम् ।। उक्त ब- सर्व हि लायवेत्ते कमसो त णात्थि जण उप्पण्ण । श्रोगाहणेण बहुसो परिभामिदो खेतससारे ॥१॥ अर्याद गीप में अनववार मन्य भगाना या अन्य क्षेत्र में सपमा पा इस परिसर्वन के प्रमाण सहित बनिस्पा-पुन: एक-एक प्रदेश-भपिकमान अपमार गरि(पमानसप्रसे खोकके)एक एक प्रदेश मधिकर्म क्रमसेमन्मवेकर) सर्पः ला भात्मनः समस्त लोक (पोनसेवैवासीस पनराज प्रमाण)मास्मा पा अपने (-भास्मना) भन्मनेप्रमाणम् । उपनीव र भयवि T जन्म क्षेत्रपनकोपा भन्मक्षेत्ररूप को पास किया हुभा (उपनीवा) होता है अर्याद वही पीर उस प्रसे पथात् शोरके एक एक प्रदेश भपिक मन्म सेकर समस्त यो सरप्रदेशों का प्रमानुसार हो (मनुफम विना मन्मले पान गिनि) सभी भपना जन्म क्षेत्र करणारे पापना खेवा है। यामत्तानत्मपरिवर्तनम् ३॥ timro (क) सारा (याव)इतना(वान) क्षेत्र परिवर्तन है । परिका गया हैकि सव्वहि लोयखेचे कमसो तणत्थि जण उप्पएण।श्रोगाहणेण बहुसो परिभमिदो खेत्तससारे॥१॥ =ोगाहणेण बहुसो परिभमिदो खेतससारे । सम्वहि लोयखेचे कमसोतं णत्थि नं ण उप्पएण भोगारण यसो (भमगाइनन पहुश.) भनेक बारा)भवगाहना(रुपशरीर को पारि परिममिदासस्वेतस सारा(परिम्रमव । खेत्रसंसार) -चारों भोरसे(=परि)घ्रपवादुमा (इस) क्षेत्र संसारमें सम्पमि हायखेचा(सर्पस्मिन्गालोकोत्रे ) =सर्पशोर पत्र मसालण स्थिा(पश व न०मस्ति) अनुक्रमसे पहा ऐसा स्थान नहीं है MPurप्पएण(पान रत्पमम् ) मायामीबी मन्मा भर्यात् इसक्षेत्र संसार पिप प्रमता पानीष सोभनेको भषगानिस्पशरीरपायास सर्पचोकका परिष अनुपमवेउपमा वापिसाक्षेपन सा महान उपमा । लगामे पर मानिस बतुर और पाम् से पबहसा वापद से वाहत्या प्रति लिटी पारस OMPORTOOTOOTOCTORIODIODIO 0 ODOHRO ३ ३५ सिद्धि २सूत्र IN0RRRROUNaOHUANDURIAORNOOR कालपरिवर्तनमुच्यते-उत्सर्पिण्या प्रथमसमये जात कश्चिज्जीव स्वायुष परिसमाप्तो मृत स सार्थ एर पुनहि तीयायाउत्सर्पिण्या द्वितीयसमयेजात स्वायुष क्यान्मृत स एव पुनस्तृतीयाया उत्सर्पि- अध्याय गयोस्तृतीयसमये जात एवमनेन कमेणोत्सर्पिणी परिसमाता, तथा अवसर्पिणीच। एव जन्मनै रन्तर्यमुक्त मरणस्यापि नैरन्तय तथैव प्रात्यम् प्रसारिपतन गाउपवारसपिएपा पमसमयेहा कालपरिवर्तन नावारे उत्सर्वियोजसके परिले समय रपमा पित्र स-मापामा परिसमाप्यौ मृता काई जोष अपनी मापफे परिपूर्णहोनेपर मरा समापदान दितीपाया गर्पिएया दिनीयसमयानास परियोग(मीष)दमोउत्सर्पिणीकालसरेसमपर्यतत्पमाभारमौर) स-माप धपान मासस परशुना नीपापा ममपनी भायु पूर्णकारि (पपात ) मरा । बहुरि रोशी (भीष) पीसरे समाविषपातीपसमा भाव एवम् मनना। मत्सपिजी(पा) के सीसरे समय उत्तम हुमा इसमकार इस प्रमण उत्सर्पिषीय परिचमात समस (दसकोड़ाबाड़ी सागरा) रस्सर्पिणी काय परिपूण किया भाद् उस्मारिणी काफे वय कोड़ा कोटी सागर के निदने समय न समस्त समयो प्रमानुसार उसी बीपने जन्म दिया कमको ओरार और समयोंमें जन्म लिया सा गिनवीमें नहीं मारे । कपा-मनमपिणी ॥ १० एपम्. गरितिया)सर्पिणी (पास) भी (प) इसीप्रार( परम् ) नम-नरन्तर्पम् कम् ॥ गावार या पपिद (-मैग्न्वर्यम् ) अनमखेने मागया है पर्याद मासर्पिणी दास के पकोड़ाड़ी सागर नितनेसमप उन सपस्मसमरों में प्रमानुसार उसी जीव ने अम्म विया भएको घोरपर मौर ममोजन्म लिया सोगणनामेंना मारे परवयमपि नैरन्नानपाएस०ग्रामम् ॥ सेउसीमीप)मरममी परिषद पालमातार प्राणयोग्यीमतीस मी सागर नासपिछी भोर मर्पिणी समितन समय न समय समयोंमें वही जीव निसने अनुम्मत पौसाड़ी मामा मत्सर्पिणी और भवसारिणी ससमयों में सम्म किया है प्रमानुसार ही मरण पलामाबाकरमौर और समर्पोरा परल गणना नही दिया भावारे। THOPEDODRO ORAD RODIDAD AND TO २५ O चाई अध्याय HAR सिद्धि २सूत्र erLoire ROOITO OFRO OPRO HERO GERT एतावत्कालपरिवर्तनम् । उक्त च उपसाप्पाणपसप्पिणिसमयावलियासु णिरवसेसासु । जादो मुदो यवहुसो भमणेण दुकालससारे॥ १ ॥ भवपरिवर्तनमुच्यते-नरकगतौ सर्वजघन्यमायुर्दशवर्ष- सहवाणि,तेनायुपा ततोत्पन्न पुन परिप्रम्य तेनैवायुपातत्रैवजात ,एवदशवर्षसहस्राणायावन्त सम- यास्तावत्कृत्वस्तत्रैवजातो मृत पुनरेकैकसमयाधिक भावेन त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि परिसमापितानि, एतापकालपरिपर्वनम् ।। नकम् ॥ नवना का परिवर्तन है और कहा मील उपसप्पिणिभवसप्पिणिसमयावलियासु पिस्वसेसासु । जादो मुदो य यहुसो भमणेण दु कालससारे ॥२॥ उपसप्पिणिश्रवसप्पिणिसमयावलियासु गिरवसेसासु । भमणेण दु कालससारे जादो मुदो य बहुसो॥१॥ एसपिणियामसप्पिणि(ग्त्सपिणियामपसपिणि)-उत्सर्पिणी भार अपसर्पिणी(काल)के जिससेसास (निररशेपासस) समय-भापलियास ॥ (समय-भारतिपाठ) -समय और भापतियों में भमणणदुलालससारेश(भ्रमणेन तुकालसंसार भ्रमण पा पर्यटनकरि(यामीम) कास परिवर्तनरूप संसारमें मादामुदापायल्पासोम(मातामाप पाशा) बहुतयार भर्याद भनेकपार मन्मा और (=प-च) मरा है।। मापरिपतनम् ॥ उग्य T नरगती भरपरिर्वन कामावा, नरकगतिपिप सर्पमपन्यम् गामायादशपसाखाणि II सरस कम भायु दशामार परसकी है वेनगामायुषा तश्वत्थामा पुन: परिभ्रम्प =विस भायु(समाप्त) करि ता उत्पमहमा (मीर) पारि परिभ्रमनकरि वेनाएक०मायुपासाला एक माताधाएरम्य -विस ती मायुफरि वाही उत्पम होता है इस प्रकार दशपर्पसहस्राणाम् पारन्ता समयाभावापकता दशहमारवर सकेत्रितनेसमपतितनीवार(दशदशाइनारपरसकोभायुमाप्तकरि) वम०एर मातासमसामान एक-ए-समय -वासी वस्पमावा (भोर) मरता है पारि एक एक समय मपिक-मायेन पयखिशवसागर- -मधिक (मायुषाला(एक एकनारमे)मन्पलेकरि(मायेन)ववीससागरकेसमय चपमाणियापरिसमापिवानिगा (फरोति) T -प्रमाण परिपूर्ण करता है मापार्य यह है कि नरकगवि वि सर्वमपन्य मायु दश सासरय है। तिस मायुको पाप वहां मयम नरक के परिखे पावड़े में चपना मीप पीछे जबलapeoamerCOACHIROIRBeapOED ३७ समार्थ सिद्धि सूत्र GHODEFIND कालपरिवर्तनमुच्यते-उत्सर्पिगया प्रथम समये जात कश्चिज्जीव स्वायुप परिसमातौ मृत स एव पुनहितीयायाउत्सर्पिगया द्वितीयसमयेजात स्वायुप-क्षयान्मृत स एव पुनस्तृतीयाया उत्सर्पि- अध्याय गयोस्तृतीयसमये जात एबमनेन कमेणोत्सर्पिणी परिसमामा, तथा अवसर्पिणीच। एव जन्मने रन्तर्यमुक्त मरणस्यापि नैरन्तयं तयैव प्राधम् पासपरिवारपास्तपिपपायप्रथमसपयामासपरिवर्तन का पाया है उस्सर्पिणीकामरे परिचे समपमें सपना पिन्कोर पाल-भायुषी परिसमाप्तौ । मृतामा कार जीव अपनी धायुफे परिपूर्णहानेपर मरा सभागपुनः द्वितीयाया सावत्सपिण्याम द्वितीयसपर्याभाव परिपोली(भीय दूसरस्सपिणीलकेदूसरेसमयउपनामा(भौर) -मापपिपाद मय समसामना-स्तीपापा अपनी भाष पूर्णारि (प्रपा) परा । बहुरि मोती (मोष) वीसरे रमविएपावतीपसमय बाद एम् मनन स्वरसपिणी(10) वीसरे सयपमें पत्सम हुमा समकार इस प्रमण उसाली परितमाता अपसे (इसाडाकोडी सागरका) रत्सर्पिणी काल परिपूर्ण लिया भर्याद उस्मानली बार दशकोहागड़ी मागर के मिदन समप है उन समस्त सपर्यो, क्रमानुसार उसी नीरन मन्म लिया व्यको कोहार और समपोंमें मन्य डिपा सो गिनवी नगी भारे ॥ सामास्किी परम्. नारि(चया भवसर्पिणी (कास) मी (प) सीमधर( एम् ) अर-नवर्पम् ।। उक्तम् । प्लगातार या परिषेद (नैरन्तर्यम् ) मनमक्षेने काया रे पर्यात् भवसर्पिणी पाल के दशकोहाड़ी सागरक मितनसम्प ग्न समस्तसमो प्रयानुसार पसी जीप ने जम्म लिया क्रमको छोडकर भौर ममोमिन्प लिया सोगणनामनामाकरे परणस्यापि नरवातया एव०प्रास्ता सेडी(उसीजीरका)मरणभो परिच्छरमा समावार प्राणयोग्यांपर्धात्वीस पारी सागरके नस्सर्पिणी और मरमर्पिणी पत्रितन समय र म सपस्व समयों नही भाष मिमने अनुरुप पीसोडी सागर सरसारिणी और अयसदिक्षी कापसमयों में जन्म लिया भनुमार री पाण मापदारमौर और समपोंगरण गणना प्रो चिया भागा। ASTROPRIEDOARDPADRBPORNFOTECED OIRAOMIEOTATOR सर्वार्थ सिदि OILOPOMOGELCOONDEIODIOBIDOEDO अधेयक तक पठानिवासी नगरूपसहाय पकील कव पदपद और पिमरत्पर्य सहित सवार्यसिदिका शम्दश हिन्दी अनुवाद अप्पाप २त्र १. णिरयादिजहष्णादिसु जावदु उवरिल्लिया दुगेवेज्जा। मिच्छत्तसंसिदेण हु बहुसो वि भव ठिदी भमिदो॥१॥ भावपरिवर्तनमुच्यते-पश्चन्द्रिय सञी पर्याप्तको मिथ्यादृष्टि कश्चिज्जीव सर्वजघन्यां स्वयोग्यां ज्ञानावरणप्रकृते स्थितिमन्त कोटीकोटीसज्ञिकामापद्यते, तस्य कषा- याध्यवसायस्थानान्यसंख्येयलोकप्रमितानि पट्स्थानपतितानि तत्स्थितियोग्यानि भवन्ति, जिरपादिनापणादिव (नरकादिमपन्या विधी) बरकत्री मपन्पस अगाय पपरिध्रिपा ० ( उपरिम् तु) उपरिम् पा उतष्ट वा (--) भारतु गेवेचा (पार प्रेवेपा) मिच्यत्तसंसिदण (मिथ्यात्वसंसर्गेण १०) मिप्यासा संसर्ग सहित (पा मोर) बहुसोलिभरहिदी ममिदा(बहुश भपिभपस्थिविप्रमिवाममों की स्थिति पा भायु पाय पापकर भने पार भ्रम्पारे भावपरिवर्तनम् गावप्पवे अपनेन्द्रियः। सन्नी। -भवपरिवर्तन कामावा है। पंचेन्द्रिय संघक पतिय मिप्याराप्ति कमिनीचा पर्याप्तक मिप्यारष्टि कोई मीप मपन्याम्नास्मपाग्याम मानावरणपकतामा अपने उपित सबसे मपन्य मानावरण कर्मी मरुतिकी स्पितिम् । भन्ताकोटीकोटीसम्मिकाम।। भापयते काम काही सागरके नीचे और कादिक उपर समापाखी स्पितिकोमातहोय है तस्परूपाप मपरसायस्वानानि सिस(मीप)के पापपारस्थान मसस्पेयबोकममिवानि कापस्थानपतिवानिमा -मसंस्पात लोक प्रमाण पास्थान प्रवि (भावगनिदिम) सहित तस्पिवियोग्यानि। मपन्तिा उस स्थितिके योग्य होते हैं अर्थात् उस भन्नाकोड़ा कोडी सागर की मपन्य स्थिति संपनेका कारण पाप मारके स्पान हैं और गणनामें असंस्मात सोको मितने प्रदेश होते हैं वितने है। तिस एक एक स्थान सिप भनवानव भषिमाग पविच्छ मिनमें मनन्दमागहानि मसंख्यामागहानि संख्यावमागहानि संस्पायगुणानि प्रसंस्पायगुणानि मनवगणानि भौरभनंदमागढदि भसस्पातमागदि संख्यामागहदि संख्यात एपनि मसंसपासरणदि मर्मवगुणद्धि इसमकार यह स्थान प्रति हानि हमि संभव है। art CTDOT DO CIEBUROHO सर्वार्थ सिदि TOONTIDOHINIROOTROOTOTTARACTEDOI रयनिगासी गपसपरोस कर पदद मौर विमरत्यर्प सरिव सार्थसिविधिक शम्दशः हिन्दीभनुगद अध्याय २ सूपर. तत प्रच्युष्यतिर्यग्गतावन्तमुहर्तायु समुत्पन्न पूर्वोक्तनैवक्रमेण त्रीणि पल्योपमानितेन परिस मापितानि,एवमनुष्यगतोच तिर्यश्ववत्, देवगतौ नारकवत् अय तु विशेष -एकत्रिंशत्सागरोप माणि परिसमापितानि यापत्तावद्रवपरिवर्तनम् ॥ उक्त च- मन्पगस्पादि रिक् प्रमण करते करते शिर मास रि विसीमापु को पाप विस पापड़े में उपमा एसे हो रशसाम परस गिवने समपय विवनीपार को विस की मापुसहित वर्ष की सत्सम दोवारको पीपमें अन्य सानो समहुमा सा गणना में नी भावा है। पीछे एक समय प्ररिक रगसास पती माय पाप उपमा पपाद दश हजार परस दो सपप भपिकसरी मापु पाप उपमा इसी मनुक्रमसे निवने देवीस सागरके समय में विनने मन्यसे तथा मरणसे पूर्ण करता है प गरित पीप पीच मन्पगति तथा अन्य मापुरि उपमै साविस गिनती में नी माते हैं। नामप्पुस्प-विर्यग्गतापमन्तर्मुहूर्वमापु ॥ (नरक) से निगरि विगदिम अन्तहमायुगाना सरत्पमा । पूर्णोदन ।एर इमेस। रत्पम शेवार पहिलो हुए को पारि गोमियोपमानिन । परिसमागितानि =ीन पन्य प्रमाण विस(प्री) करि परिपूर्ण है मर्याद वही जोर निर्परगनिमें मपन्य भाषभन्तर्मुहर्तकी पाप फिर समाप्तकरि भवर्मुहूर्वक नितन समय रेप विक्षनीवर मपन्य मापारि पोये एक एक ममय भपिक मनुक्रमरि दोन पम्प पर्यंत समस्त स्विविषिष भन्मपारिपरिपूर्ण एभनुप्यगनो दापतिपत्रमा इस प्रकार नरगांव में भी(प)विर्यच सारा रे रगतो नारामपम् । वरिण ज्यतिरित माको सरशारे परतु(-1) पेद पर (१) ररिंगत्मागराष्पणिया परिसमापितानि (इति)-किनीम सागर प्रमाण(पूगेक्कापसे) परिपूर्ण करता है(मा) इसवोस सागरस वापसभापुर पार नौ मनुदिशपर अनुचर ऐसे पौरा रिमानों के सपने देखी परिवर्तन मही वाई योगिरे सम्मको पम्भिारम्पपरिपननम् ॥ रचा. -साग (-पा) नमा-मामा) परपरिषदमाकानी पOOOOOOOLIDEOOPOE00:00 सिदि सत्र१० मणि प्याय DadeeBOBERAaareODOBCIROORE गनिवासी नगरपसाय पकीय इव परमाद और विभपापर्य सहित सपार्थसिदिका शम्दशन्दी भनुवाद मम्पाय २ सूत्र १ चतु स्थानपतितानि श्रेग्यसंख्ययभागप्रमितानि योगस्थानानि भवन्ति । तथा तामेवस्थिति तदेव कषायाध्यवसायस्थान च प्रतिपद्यमानस्य द्वितीयमनुभवाध्यवसायरथान भवति,तस्य च योगस्थानानि पूर्ववद्वेदितव्यानि । एव तृतीयादिप्वपि अनुभवाध्यवसायस्थानेषु आ असंख्येय लोकपरिसमाप्त एवं तामेव स्थितिमापद्यमानस्य द्वितीय कपायाध्यवसायस्थान भवति,तस्यापि पदस्पानपवितानिणयपसंस्पेपमागममितानि " चार स्थानमविधानि सहिद भेषीका प्रसंस्पावरांमागममाण योगस्पामानि मयन्ति T पागस्यान(अनुप्रयसे होते है)मर्याद दूसरे मपन्य योगस्थान अपमान वासरा योमस्पान हाप परन्तु मनुमागस्थान, पारस्पान, स्थिविम्यान, येवीनों मपन्य तरी पिये। पीछे धौथा पांव धना सात माठपारस्यादिक योगस्पान होते तर मेसीके प्रसम्म्पातापामवर असंख्यात मपाणगणनामें मनुकमसे पचतिमाप परन्तु मनुभाग पाय स्थिति ये वीनों मपम्प ही रहें और कोई दो नपन्य योगस्थान पीच भन्य कपायस्थान अन्य मनुमागस्थान मन्पयोग स्थान होत जाय ते गणना में नमा वपाल्वाम्गएपस्विविम् " सएम. प. सपा पोहोस्पिति भौर-4) पोती पापाप्यपसापस्थानमा प्रतिपथपानस्पी पायमापस्वानको प्राप्तकरनपाचे (जीर ) में दिवीयम् "मनुभय-मापरसापस्थानम् सामातिए दूसरा अनुभाग मध्यवसाय स्थान होता है वस्याम पागस्थानानि पूर्ववत् . और विसा दूसरे अनुपागमारस्थान) योगस्थान परमेत्री मावि (श्रेणीके भसरण्यातषांमाग प्रमाण-मसंस्पात ममाणगणनामें मनुकमसेदोना) पेदितम्पानिएसम्वतीयादि भपिक मानना पाहिए इस प्रकार वीन मादिर मी अनुपयमापपसापस्थानेषु मा. मनुमामबंप मध्परसाप स्पान(अनुक्रमसे) पोट होवे भसंस्पेपसोड-परिसमा म एसम्माम् ॥ एष प्रसस्पति वाफ परिपूर्ण होवे रे (प) वास्तविक (एवम्) पोड़ी स्पितिम् । भापधमानस्य दितीयम् ॥ -स्पिविस्पान को प्राप्त करनेवाले भीर रे (म्मापपमान) दूसरा फपाप-अध्ययसायस्थानम् भवति वसग अपिल पाप मध्यवसाप स्थान होता है विस(दिवीय कपायाध्यवसाय भावस्पानके) भी CTEDOTCOMANOARDowwe0DOREDUEED सूत्र TADIOFOXADILDCHIRDENROTAROBAERO एगनिवासी नगलासप वकीलान पदम्मेद और विभात्पर्य णीव सर्व सिदिका शम्दशाशीन्दीमनुपाद अध्याय २ सूत्र १० तत्र सर्पजघन्यकपायाध्यवसायस्थाननिमित्तान्यनुभागाध्यवसायस्थानान्यसंख्येयलोकप्रमि- सर्याय अध्याय तानि भवन्ति,एवं सर्वजघन्यां स्थिति सर्वजघन्य च कषायाध्यवसायस्थानसर्वजघन्यमेवानुभा- गवन्धस्थानमास्कन्दतस्तद्योग्य(एक)सर्वजघन्ययोगस्थानभवति,तेषामेव स्थितिकषायानुभाग- स्थानानां द्वितीयमसंख्येयभागवृद्धिसयुक्त योगस्थानं भवति,एव च तृतीयादिषुयोगस्थानेषु वसमपन्यापाय मप्परसापस्थामनिपिपानि att सपस्व अपन्पासायभावस्थान सारण गिनको ऐसे अनुपागमापरसापस्पानानिमसंस्पेयशोर- समनुमागप मध्यवसाय स्थान भसंपावलोप पपितानि भवन्ति -परिमाण हैं मर्यात् इनसर्वमधन्पकपाय मध्यरसाय स्थानके एक एक विप अनुभाग पपको कारण परिणामस्मनुभागमप्पासायस्थान) व भसंसपात सोरो मितने प्रदेश में सिक्ने माना। एवम्०सर्वमपन्याम् ॥ स्थितिमा सर्वप्रपन्यम् गचस महार सांगपन्यस्थितिको भौर सजफ्प पापमपरखापस्यानम्ता समपन्पम् एस. पापमापस्तान समपन्य हो भनुमापारस्पानम् ॥मारकन्दवा अनुभागस्थानकोमातहोनेवाले "दोग्यम् (एम्समपन्यायोगस्थानम् =विसक योग्प एक सर्वप्रपन्य योगस्थान भरतिवेलामा एस्थिति-पाप- होता तिनी(भाद पिनापनटे हुए सर्वनयन्य स्थिति साय भनुमागस्थानानाम् ॥ स्विीपम् ।। मापसाप मोर भनुपाम १५ मध्यसाय स्थानों के सरा मसनदयमानादिसंपृकमा पापस्पानापति-मसंस्पावभागनिसहित योगस्थान दावा है अर्थात् अनुमाग पाप स्थिति य तीनों वा मयन्यही वप परन्तु पामस्थान पनटि साप है और ये मपन्य योगस्थान को भेणीके मसपाव- साग परिमाण र गणना सम्पात और ये योगस्पाम अविभाग मविप्लेनि करि ल्यावमामादिमावमानानि सरुपानगुणादि भसम्पावगणपति सहित स्थान स॥ परम्०१०स्तीपादियोगस्थाने परिसर बीम मादिक बोगस्पामा TICLECTRIODOOTONDOROSCORE १० M . सिदि सत्र१० प्याय BACUPERDOREDGRANDOMHDBEROADGURDERFORO पगनिवासी जगरूपसाप पकील रुव पदच्छेद और विभपत्त्पर्य सरिव सवार्यसिदिका शम्दश हिन्दी अनुवाद मध्याप २ सूत्र १. चतु स्थानपतितानि श्रेग्यसंख्येयभागप्रमितानि योगस्थानानि भवन्ति । तथा तामेवस्थिति तदेव कपायाध्यवसायस्थान च प्रतिपद्यमानस्य द्वितीयमनुभवाध्यवसायरथान भवति,तस्य च योगस्थानानि पूर्ववद्वेदितव्यानि । एव तृतीयादिष्वपि अनुभवाध्यवसायस्थानेषु आ असंख्येय लोकपरिसमाप्त एव तामेव स्थितिमापद्यमानस्य द्वितीय कपायाध्यवसायस्थान भवति,तस्यापि पतु स्थानपवितानिनभेपयर्सस्येपमागममिवानि ॥ =पार स्पानमवि हानि सहित भेणीका मसंख्यावरांभागप्रमाण योगस्पानानि । मपन्ति T -पागस्यान(मनुक्रमसे हराते है।मर्याद दूसरे मपन्य योगस्यान पमान वीसरा योगस्थान राय परन्तु अनुभागस्थान, रूपायस्यान, स्थिविस्थान, येतीनों मघन्य ही पंपसे । पीछे पौया पापाषा सातवां भाठा इत्यादिक योगस्थान होते वे भेणोके असण्यातपांमागवा मसंम्पात प्रमाणगणनामें मनुक्रमसे पनटिनाप परन्तु मनुमांग पाय स्थिति ये तीनों मपन्य ही रों और कोई दो नपन्प योगस्थानक पीप भन्प पायस्पान भन्य मनुभागस्यान भन्ययोग स्थान होत माय वे गणना में न मारें सवान्ताम् । एप०स्थिविम् "ता एच. ५० चया पो ही स्थिति मौर(=घ) मोती कपापापरसायस्थानम्। प्रविषयमानस्य पायभाषस्यानको प्राप्त करनपाले (जीर ) में द्वितीयम्"मनुभर-मापनसायस्पानम् गामविT =दूसरा अनुभाग मंग्यवसाय स्पान होता है वस्पाम पागस्थानानि पूर्वगन् । और तिसादूसरे मनुमागमानस्यान) योगस्यान परिलकी मांति (भेणीके मसंख्यातांमाग प्रमाण-असंख्पात ममाणगणनामें मनुक्रमसेहोना) पेवितम्यानि एपम् तृतीपादिप पिक मानना पारिप इस प्रकार तीन प्रादिक भी मनुमनभम्पपसायस्थानेषु ॥ मा. मनुमागध भध्यवसाय स्पान(मनुक्रमस) होते होते मसंस्पपलोड-परिसमाप्त एपम्माम् ॥ एष संस्थात साफ परिपूर्ण तक होवे है (अप) वास्तविक ( एवम्) पोहो स्पितिम् । भापपमानस्पद्वितीयम् । -स्पितिस्पान को प्राप्त करनेवाले भीष के (=भापपमान) दूसरा फपाप-अभ्यरसायस्यानम् मनपि तस्यामपिक -कपाप मध्यवसाय स्थान प्रवाई विस(दिवीय फपायाभ्यवसाय मावस्यानके) भी CATIOODOO0ERODireedGOIDARBOARBOARD सर्वार्थ साय १२ ORIRDERINOORIROOMADIRAKOOTHONDARI 0:00ROOMBOONDOOROORDODOUDOTINO अनुभवाध्यवसायस्थानानि योगस्थानानि च पूर्ववदितव्यानि । एव तृतीयादिष्वपि कषाया सिद्धि ध्यवसायस्थानेषु या असख्येयलोकपरिसमा वृद्विक्रमो वेदितव्य । उक्ताया जघन्याया स्थिते समयाधिकाया कपायादिस्थानानि पूर्ववदेकसमयाधिक्क्रमेण श्री उत्कृष्टस्थितेंस्त्रिंशत्सागरोपम कोटीकोटोपरिमिताया कपायादिस्थानानि (पूर्ववत्) वेदितव्यानि॥ भनुमर-भापरमायस्थानानि पागस्पानानि अनुभाग अध्यरसाय स्थान और याग सान पारादिनम्पानि पहिलकी भांति जानना याग्प है। पारार्थ ऐसे मसरूपात लोक प्रमाण अनुभाग स्थाननिवि एक एकविष योगस्यान श्रेणी मसमपावनां-भाग असम्पावरमाण गणना अनुक्रमसे । ते भाप मौर भनुमागस्पान मसंख्यात लाकममाण अनुक्रमस रोयचुर्फे तप एक पाय स्पान पसुटता है (दूसरा पाय स्थान होता है) एसम्वनीपारि पिकापापमभ्यवसायस्थाने इस मांतिवीन मादिक भी पायमध्यवसायस्थान देहावे मा०मसम्पयापरिसमाप्त दिनमा दिवस्य -मसंम्पात खोकपरिपूर्णवक (आ) प्रमानुसार दि मानना योग्य है भर्पान तीसर कपापाधानषि प्रसंस्थ्याव लाक प्रमाण भनुपाग स्थान भन्नुकमसे होय और अनुभाग स्माननि एक अपि पीक भसम्पावा भाग प्रमाण मनुक्रमसे योग स्थान मेवे जाप है इसी प्रकार पांचा कपाय स्पान पक्षरे भौर पर प्रादिक उपाय स्थान प्रमानुसार हदि होत असंस्पातलोक प्रमाण होगाय भरपूऽपितमव काहा काली सागर स्थितिस एक समय मधिक मामारणीयम्र्मी स्पिति पपेरें। नापाप्रपन्यासास्थिते समय पिकाया की हुई मपन्य स्थितिसे समय प्रपिक पाप-मादिस्थानानि पूर्व चन्० +पापमारस्थान,मनुमागमध्यबसायस्थान,पोगस्पान,क्रमानुसारपरिजेडीमातिमोती परमपपषिपेण मानवरस्थिते ।। १२ वे) एमए)समप भषिक कपसे पक स्थिति पर्पन्न घिरमागरापमहापागेपरिमिनाया" म्तीस काहात सागरममाण (पपितापा) वा (अनुमसे) पापमागिन्यामानित पूषन्)पदिलप्यानि पापमोगस्थान,मनुभागमध्यरसाबस्थाम,पोगस्थान पहिली पाति भागो वार्थ ४३ सिद्धि २सत्र१० पटानिमासी मगस्पसहापपील कव पदच्छेद और विभपरपर्य सहित सौर्य सिदिका शम्दशाहीन्दीभनुगार मध्याय २ सूत्र १० अनन्तभागवृदि असख्येयभागवृद्धि संख्येयभागवृद्धि सख्येयगुणवृद्धि असख्येयगुण- वृद्धि अनन्तगुणवृद्धि इमानि षट्स्थानानि, वृदिर्हानिरपि तथैव । अनन्तभागवृद्धि अनन्तगुण- वृद्धिरहितानि चत्वारि स्थानानि ज्ञातव्यानि। एव सर्वेषां कर्मणां मूलप्रकृतीनामुत्तरप्रकृतीना च परिवर्तनकमो वेदितव्य । तदेतत्सर्व समुदित भावपरिवर्तनम् ।। उक्त च- भाद भेणी के प्रसस्पावांमाग प्रमाण भसंस्पातगणनामें मव योगस्पान क्रमसे पजटि नाय सप एकभनुमाग स्थानपरटे और मसंम्पाव सोकप्रमाण भए भनुमागस्थान पर एक करि प्रमानुसार पलटि मायषष ऐक कपायस्थानपनटे और मामसरूपात सोर प्रमाण (पायस्पानों पि एस एस पि असल्यासजोफ प्रमाणभनुभागस्पान फ्रमानुसार के होसे प समस्त प्रसंस्पायसो प्रमाण ) फपायस्पान क्रमानुसार पखटि माय वम एक समय भपिकाकर स्थिति पलटे ॥ भनन्दमागइदिय भससपेपभागवि" (पपि) अनन्तभागवि भसंसपेयमागहदि संस्पपभागदिम संस्पेयएणदि। सस्पेपमागद सस्पेपगुणदि मसस्ययगुणवदिमनन्गुणयविनामानि पदस्थानानि वृद्धि भसस्येयगुणविभनन्वगुणपिये वास्थानप्रविधि (मौरभनन्दमाग, भसंस्पेयमाग, सस्पेयमाग,संसपेपगुण भसरूपेयगुण,अनन्ताण) निमपिन्सयारामनन्तमागमसि आनिमी है वो भी भनन्दमागहदि अनन्वगुणादि। अनन्वाणष्टदि (और मनन्तमागानि भनन्सगुणानि प्रतिच्छेदोंमें रविवानिवपत्यारिस्पानानि अमित शेपचारस्पानमति(दिहानिइनमपन्ययोगस्थानोकेभविभाग मातम्पानि परम्०सर्वेपाम् " कर्मणामा मानना चाहिये इस प्रकार समस्व कर्मों की मुदपकवीनामधिरपकवीनाम् सपरिवर्तनक्रमः -मबमक वियोंका बहुरि उपरमकवियोंकी पखटनक्रम बेदिवम्पावदाएतद् सम्पासमदिवम् । -मानना चाहिय(वद्या( एवद्)समस्त इफटा होय वय मानपरिवतनम् । उक्त me =भावपरिपर्सन होता है। कहा भी है HOODBOD DRDO RODINOUE BORD Qum0 CUBO ४३ सिदि सवाय DORAEHUROOR एयनिरासी नगरूपसाब र पररखेद और विपरस्पर्ष सहित सर्भिसिद्धितिका शम्बया हिन्दीभनुराद पम्याप २ सूत्र. सव्वा पयहिठिदिओ अणु भागपदेसवधठाणाणि । मिच्छत्तसंसिदेण य भमिदा पुण भावससारे ॥ १॥ उक्तात्पञ्चविधालंसारान्निवृत्ता येतेमुक्ता । संसारिणां प्रागुपादान तत्पूर्वक- त्वान्मुक्तव्यपदेशस्य ॥ य एते संसारिणस्ते द्विविधा मया पपरि-विमा ( समरुति-स्पितप) =समस्त प्रकवि परमौर) स्विविध मणुमाग-पदस-44-(मनुभाग-प्रशान्य) सुमाग वन्म(मौर) प्रदेश बन्धक गणाणि पिणपसंसिदेस (स्थानानि मिथ्यात्नससर्गेण) -स्थान मिथ्यात्वके संसर्गकरि प०मपिदागपुणभारसंसार (प प्रमितापुन मारससारी(प-पोनिमय(-पुन)भाव ससार में अप्रमेमा मावार्य इस मीषने मार संसार वि प्रमाण करि करि मावि- पंप स्पितिवन्ध,मनुमागपन्ध और मदेशपषके समस्त स्पानोंको निमय करके माप्त किया है। रका परिपात् । संसारात । निरचा शयित (पा उपयुक) पाच प्रकार के संसारसे रविवारी पमा मुत्ता ससारिणाम् । माम्"पादानम् ॥ मे (जीव) वे एक (सिटौ संसारियोंका (इस सूत्र में) पहिले प्राण नत्यूपत्वात् मुक्तम्पपदेशस्प। पयोंकि मोक्षका कपन का रपदेश उस (संसार पूर्वक यो संसार निमित्तको भर्यात् मोक्षके प्यपदेशका संसार कारण है। यदि समार नहावा मोसमी न होती क्योंकि मोल ससारी नीयोसी होती है जब ही नहीं वो मोक्ष किसकी शादी भोर मा पास गमन न गता मपरा मोक्षका मस्तित्व नहोवा वो फिर म्पपदेश मोक्षका से सम्मन होवा) "एते समारिणदिविपा। को ये संसारी (जीव) पे दो प्रकार निम्नलिखित स्त्रानुसार संसारियो मेरगत और मोडीत मे नहाँसपा संसारी मीच अनुभव गीवर और मोष जीवन परोमरो पातोमपीमारियों पर प्रमोद शायरल. NECIDCROONDONOWANO O Dead FROONROEROLAN वार्थ अध्याय ४५ सिद्धि रसुत्र११ ण्टानिगमी नगरूपमाप पोल कव पदद पार विभात्त्यय सहित सार्यसिदिका शम्दश हिन्दी अनुवाद अध्याय २ मत्र ११ ॥ समनस्कामनस्काः ॥ ११॥ मनो द्विविध,द्रव्यमनो भावमनश्चेति॥तत्र पुद्गलविपाकिफर्मोदयापेक्ष द्रव्यमन ॥वीर्या- न्तरायनोइन्द्रियावरणक्षयोपशमापेक्षया अात्मनो विशुद्धिर्भावमन ॥ तेन मनसा सह वर्तन्त इति समनस्का । न विद्यते मनो येषां त इमे अमनस्का । समस्काऽमनस्का ॥ ११ ॥ ससारिणाममनमा ममनकामाप . ससारी(मीय समीपासैनी(-समनस्स) और(च) असमीयामसैनीभमनकी मर्याद जो मनसहित ये समनस्क सभी पा सैनी और मो मनररित है अमन प्रसंगी प्रसैनी ई मावार्य बा हिसमें प्रवर्तने और भरिससे दूर रहनेकी शिक्षाग्राण करता है पासमी है और मा शिक्षा क्रिया उपदेश इत्यादिकाप्राण नहीं करवा पा असशी है। मनप्तादिविषम्। दम्पमन मारमनपति- अन दा प्रकार है दम्पमन भोर भापमन नम पुनल-विपाकिफर्म उदय-मपेक्षमापदम्पमनाm eart पुनल विपाकीकर्ममकृविक उदपकी भता भिसको सो द्रव्यमन रे मर्थात् जो रदयस्यानपि भष्ट पाखुसीका फूलकमल के माफार सूक्ष्मपुनलका प्रषयरूप विष्ठवा है सो म्यमन है पौर्यान्तरायनाइन्त्रिप-मापरणत्रयोपशम वीर्यासराय तया नोइन्द्रियापरणनामा (पानावरणीयकर्म के प्रयोपशमके भपनयामात्मनः पिशुविमारमन वेन" कारणसे मात्माको पिदि सा भारमन मनमासापन्त (वर्तन्त )इमि समनका अनकर सरिता(वर्तन्त) इस प्रकार (इति)समनस्क हैं मारिपते मनापपाम)इमा यमनस्का नहीं है विद्यमान या वर्तमान(=विषवे)मन मिन से इतने अमनका (१) सममस्याऽमनस्का पह पाप सर समास है इसमें समुपाई उपसर्ग भार दर पर रियाजता है समासफा भासदनस ऐसा पाप हो माता (समनस्ताप मममस्कार घासी कारण me भनुपादमै मौर'शम हाये है (२इस स्त्रका पाठ तथा भय दानी सम्प्रदायोंमें एक है। DaROORBOTHROORPOORDOreo50IR AND OND APORTED १। उस ४५ सिदि सवाप GAMDARDGupeonePO4 एमनिरासी नामसारीख व पदम्मेद और विभपत्पर्य सहित सार्प सिदिका शम्दशःन्दिोमनुवाद भन्याय २ म ११, १२ एपमनसो भावाभावाभ्या ससारिणो द्विविधा विभज्यन्ते । समनस्काश्यामनस्काश्च समनस्काम- नस्का इति ॥ अभ्यर्हितत्वात्समनस्कशब्दस्य पूर्वनिपात ॥कथमभ्यर्हितत्व ? । गुणदोषविचा- रकत्वात् ॥ पुनरपि संसारिणां भेदप्रतिपत्यर्थमाह- संसारिणम्रसस्थावराः ॥१२॥ एसम्मनस "मार-मभागाभ्याम् इस प्रकार मनकी रिचमानता भपिपमानवा करि पा सदापममाप पारि संसारिणदिविपरिमग्पन्दासमनस्कासंसारी(मोब) दो प्रकारमें सिमाभित है पारिन्पनीय है और (प)समनका भमनस्मा • समनकामनस्मा इतिo और (च) अमनस्का पर्दाफा इट्समासमें समनस्कासनका ऐसा(वाक्य)हमा मम्पत्तिा -पूज्यपनासे वा भष्ठपनासे पामपानपन (फेरत) से (मम्पहित्वात्)(सत्र में) सपनस्कराम्दस्पतापूरनिपात रूपम् मम्पत्तिम्। समनस्क शनका पहिले ग्रहणहै (मन कैसे,येष्ठपना या पूज्यपना (समनशम्दको गुणदापरिनारकत्वात् ॥ (उत्तर) समनस्स गुण दोप का विचारवासा होनेसे अमनस्कसे श्रेष्ठ पा पूज्य है पुनःणमपि संसारिणाम् भेदमवित्त्ययम् माता-फिर भी संसारी नीवोंके भेद माननेफे निपे करते हैं कि संसारिणत्रसस्थावरी ॥१२॥ मसारिख । प्रसस्यावरा मान्दि T संसारी (नीव) अस और स्थावर रे मर्याद दोन्द्रिय (स्पर्शन और रसना सहित) श्रीन्द्रिय (स्पशन, रसना भार नासिकासहित) चतुरिन्द्रिय (स्पशन,रसना, नासिका, पपु सहित)मोर पंचेन्द्रिय(सर्शन,रसना,नासिका, चक्षु,मौर कान सदित),जीर्णोका अस कावे हैं और एकेन्द्रिप (त्यकमात्र सहित) नीयोंको स्पारर कहते हैं। पदच्छेद और विमत्त्पर्य सहित इस बारहवा सूत्रपर सय सिन्दि वृत्तिका शमशः हिन्दीमनुवाद (रासम्म पाउ रामो लाल और दिगम्मर सम्मशोम एकर मोर प्रर्ष भी एक रामसालिबमाचार न सतारी नीर सपारपापार एमालेग पर पसित माहि मुबीच ती बम और सामनी ममापतवापिगमा COOT.COM:BOAROOMDARBORDERDOSRO CORDow सिद्धि सुत्र १२ UNRDOdieo20001POORDERBOARDONERBOAR एयनिपासी नगरपसाप पकील उत पददेव और विमास्पर्पसदिय ससिसिविता शमशान्तिीअनुसार अध्याय २ मत्र १२ ससारिग्रहणमनर्थक,प्रकृतत्वात् ॥ क प्रकृती। ससारिणो मुक्ताश्चेति । नानर्थकम् । पूर्वा- वार्थ ध्याय पेक्षार्थ,ये उक्ता समनस्कामनस्काश्योति संसारिण इति ॥ यदि हि पूर्वस्य विशेषण न स्यात् समनस्कामनस्कग्रहण संसारिणो मुक्ताश्चेत्यनेन यथासख्यमभिसंवध्येत । एवं च कृत्वा संसारि ग्रहणमादौ क्रियमाणमुपपन्न भवति।तत्पूर्वापेक्षं सदुत्तरार्थमपि भवति ॥ भानार्यसे शिप्पका मरन) प्रकरण वा मसग मारके कारण से (इस सूध में ) संसारिमाणम् अनर्यकम् ॥१मकवम् संसारीका उपादान (प्राण) निरर्थक (सिप्पो प्रश्नपर भाषाप) का प्रकरण । संसारिण मुक्ता म० इतिक शिप्पका उमर) ससारिणो मुकाम ऐसा दगार सूत्र मारपरे (भाचायकाउसर) न०मनम्। पूर्व-भपेला-अपम " इस मममें ससारीका प्राण निरर्यक नारिइससे)पहितास्नके सम्यकेलियेप्राण येउता समनस्कामना पतिससारिणा इति=कि ये फयित समनस्क और अपना संसारी (जीव) हैं पदिक्षिणपूर्वस्पावित्रपणम् न स्यात् सिमनसायोंकि (1) मो (पदि) पहित ११ वे सूत्रका विपण न पाता तो समनस्क अमनाराणम्ससारिस मुक्ताबातिमनन-अमनस्का (इसमत्र) प्राणको संसारिणा मुकाब इस (सूत्र) से (मनेन) पपासरूपम् अपिसम्ममप T -पयासस्प समन्त्र माता (भावार्य) पदि इसपारावा सबसे ग्पारापा स्माविशेषण संसारो राम र नकिया भाव ता दशम सत्रके संसारी द ग्पामुमके समना शम्द स और एक शम्मका मनस्ता शमसे सम्पन्य और ऐसा मनिष्ट पर्थ माना है कि संसारी भीको घे ममा शमन सहित भौर मुक्त भार है ते अमनका मन रहित ॥ पपम्०म०कत्ता संसारिमाणम्भादौफिपमाणम्-ऐसे करकरसस्त्र संसारीका उपादान या प्राण भादिषिपैकरना (नियमाण) उपपमम्पति यहि मुकका प्रमाणसे मरा हुमा (-उस्म) शेता है व पूर्व-भषेधम् 11 सहा नस(संसारी शम)का (प्राण) प्रथम (म्पा सपा) अपेक्षा रोकर उपर-मयम् । भपि० पबति । अगले (भारला स्त्र) लिये भी होता है कि HOROSHOOROODOO BOOHOORO १७ सिदि वाप ORNO OPHO OPO ORIOADA एनिवासी मगसापपोच व पदच्छेद और विभरत्यर्य परिस साय सिदिक्षा शम्दशःन्दिोमनुपाद मध्याय २ सून ११, १२ एर मनसो भावाभावाभ्याससारिणो द्विविधा विमज्यन्ते।समनस्काश्चामनस्काश्च समनस्काम- नस्का इति ॥ अभ्यर्हितत्वात्समनस्कशब्दस्य पूर्वनिपात ॥कथमभ्यर्हितत्व ? । गुणदोषविचा- रकत्वात् ॥ पुनरपि ससारिणां भेदप्रतिपत्यर्थमाह- संसारिणत्रसस्थावराः॥१२॥ एसम्मनसा मार-ममापराम्पाम् ।। -इस प्रकार मनकी विधमानवा मषिधमानवा करि पा सदापममाप करि संसारिणदिरियामा रिभम्पन्दासमनस्कापक-संसारी(मोप) दो प्रकारमें सिमाभित हैं पापिकम्पनीय है भौर (प)समनस्का भमनकाम. समनकामनस्काः । इति =और (च) ममनस्का पोका दंदसमासमें समनस्कामनस्का ऐसा(वास्योहमा भम्पत्वित्ता -पूज्यपनासे वा श्रष्ठपनासे प्रधानपन (फेहत) से (मम्पत्विात स्त्र में) सपनरागम्दस्पापूर्वनिपाव कपम्मम्पहिरवम् =समनस्क शम्दका पहिले ग्रहण (प्रश्न/कैसे श्रेष्ठपना पा पूज्यपना (समनसशब्दके) गुणदापरिमारकत्वात् ॥ (उचर) समनस गुण दोप का पिधारवाला होनेसे अमनस्कसे भेष्ठ पा पुम्यो पुनः म्यपि संसारिणम् । भेदमवित्पर्यस्त भागा-फिर भी संसारी भीमोंके भेद जानने के लिये कहते हैं कि संसारिणत्रसस्थावरी ॥१२॥ मसारिण' सस्पारप परन्वि T संसारी (नीव) प्रस और स्पायर में भर्याद दोन्द्रिय (स्पर्शन और रसना सरित) प्रीन्द्रिय (स्पशन, रसना और नासिका सहित) चतुरिन्द्रिय (सशन,रसना, नासिका, पनु सहित)और पंधेन्द्रिप(स्पर्शन,रसना,नासिका, च,भौर कान सहित),जीरोंका प्रस करते हैं और एकेन्द्रिप (लकमात्र सहित) जीनोंको स्वापर करते हैं। पदन्छेव और विभक्त्यर्थ सहित इस वारहवा सूत्रपर सर्वाय सिदि वृत्तिकाः शमशः हिन्दीअनुवाद (११ प म पार रामोशेताल भीररिगार सम्प्रदायोमे पहभोर मर्प भी एक रनसारिपबमापार अर्थात् असारी नीच सपारपार एमालम पर फहित प्रारि गुन्द जीप सोपल और न बाबरी ममाप्यवरापिगममन DATORO DONDOTOCICROCIDOID KURURIOD सिमि वार्थ पाय POORDTKOTTOMIND रगनिपासी नगरूपसापास परवदे मार विसमस्पर्पसहित समिनिपिगम्दान्दी मगाद भापाप २ उलध्यानुपूर्वी स्थावरभेदप्रतिपत्यर्थमाह- ॥ पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतयः स्थावराः॥१३॥ स्थावरनामकर्मभेदा पृथिवीकायिकादय सन्ति, गप्प भावपूर्ण स्वार-भेद प्रतिपति-भर्यमामायिनकरनसाम(-मानुपू)मोहारस्पावरक मेदवानबिये कहते हैं कि पृथिव्यप्तजोवायुवनस्पतय स्थावरा ॥ १३ ॥ पपिसी-मप्-वनस्-वायु-वनस्पत्य स्थापराम्पपिपी कापिक,मपकापिकतेमाकायिक,वापुकायिक भौर वनस्पतिकापिकस्यावर(मीव) सपनुराद-स्पारनामर्मभेदा "गियोकायिक अस्पारनामा नामकर्म की महतिक पेइ पपिरोकाविक भारपा सन्धित म्भाविक, तेग कायिक, भायुकायिक, रनस्पदि कासिक (मादय)* (ोनो मामापोरे१५ १५ पास पाठ मेव और मर्प भेद पासाप सिमोसे सुगम होगा। इसलिये मी पानो मानापोके चारा पा लिबते है पिप्पत आवायुषनरपवासापरामय पर देयो। हीन्द्रिपाइपस्मसार नियतीनाद्रिय पारामिटय पापानियवामे प्रस पपिएमभ्यमम्पतया सापसभापतत्याप विगमसन पातळोदा मीन्द्रिपालयाश्व प्रसा समाप० में १५ को पत्र २ परिवीवापिस मामिल बस्पतिकापिकालावर जीव । तेगा पिकवायुवापिक और दो विपवास तीन प्रियवाले भाराधिपपात पापानिपपाले सीवानो मामायोंके और १५यो स्मोक मितानसे प्रमरोगितेजस्-वायु पो शव हमारे पहा मरे सेवामा मामापम्भिमै मन्तगत है पाता दोनों मेरा नमाम्मे हुमा। समाप्य०१५को सूत्र में हमारे पाके १५ एस तमा-बापु पिकप पाठ एकसा है। हमारे यहाँ सेरमपिक और वायुकापिक दोनों को मारी माना है भानु ताम्बर मानापमै समसजीप मानासा समाप्य०१५ प्रारमारे यहाँ १५ श से प्रकट है। भोप सम्पर्य मामो मामायके दोनों बानो सो सभात् पृथिवी पपिए अप (महाकायिक वनस्पति कापिकको सापर वोनोमै मामा मोर दियालोमतोमणिपणजीव चार इन्द्रियममा जीप पौराधिपमा जीपको रोगों में प्रस माना। भाषा समिसिपिजी पम्प सस सिलितम, पाय मुद्रित भाचिोम तपा रासपातिकमै पात है। जिसका air' मिलमयादी सोलापीरसरित हो तोवापिपापों पर श्रीव सहित से अभिप्रायवरपार्थ सोपातिक पृष्ठ ५५ मिम भापकापिण सापेपपिलीवामिनि माममोरपणयापिापादयो जीवाषियी कायिभावपासापरा प्रत्येतस्या न पुनर जीवास्तेपाममस्सुम्या : OARD Der DOT OTOTRBOARDORFOLD DONESEXRONIC सिद्धि २सुत्र १२ पयार्य अध्याय २८ सवOPOORBOEMODAIEDOMBIRDECORATKETAND ससारिणो द्विविधा (१)। नसा स्थावरा इति॥सनामकर्मोदयवशीकृतास्त्रसा । स्थावरना- मममंदियशवर्तिन स्थावरा॥त्रस्यन्तीतिनसा स्थानशीला स्थावरा इति चेन्न ।आगमविरो धात् ॥ श्रागमे हि कायानुवादेन सा द्वीन्द्रियादारभ्य आ अयोगकेवलिन इति । तस्मान्न चलनाचलनापेनं बसस्थावरत्वम् । कर्मोदयापेक्षमेव ॥ त्रसग्रहणमादौ क्रियते । अल्पाच्तर- त्वात्म्यहिंतत्वाच्च । सर्वोपयोगसम्भवादभ्यर्हितत्वम् ॥ एकेन्द्रियाणामपिवद्वक्तव्याभावात् मंसारिणः पहिरिश"प्रसा-मस्याररातिक संसारी मीर दो प्रकार प्रसई स्थावर में प्रसनामार्योदय-पशीकतावमा स्यारनामकर्म- असनामकर्मको प्रतिकेन्दयफेरशस हुए प्रसास्थावरनामानामकर्मीमाविक उदपाशनि स्परा बस्य-मन्ति(प्रस्पान्ति)ति, उदपके वशसे हुए स्यामर (पश्न)ररते है या भयपीव होते हैं ऐसे(इति) मास्थानशीला पारानि चेत् . प्रस(भोर) तिष्ठने समारजिनका (ऐसे)स्थावर में ऐसी शमा (-)रे 4.मागपरिगवान ! भागमा विकाय-मनुवादेन (उत्तर)शात केचिपरीतहानसे ऐपानादियोंकि(भिशास्त्र कायकोमपेनासे प्रपाद इन्दिपाद मारभ्य-प्रा.प्रपागनिन शनि-प्रम नोर दा इन्दिपस पारम्भकर मयागकरलीपर्यंत (-मा) हैं नम्मान न पमनापनन-मपन सस्पारतम् ॥ =तिमस च न न पचन झी भपेना से प्राप्त स्थावरपना नहीं है प-प्रपघम् ॥ एरप्रसारणम् ॥ कर्मचदपकी अपेक्षासे दी(प्रसस्यावरपना (इससप्रम) त्रसकाउपादान भादौ पितामापापरता मम्पस्तित्वातच =पूर्वमें किया क्योंकि(प्रसशम्दक स्थावरशन्दसे) वर थोड़े भौरमपानपनारे मर-पपागमम्मान प्रभावितम् ॥ क्योंकि(प्रस)समस्त उपयोग सम्मगानेसे पूण्यपनाभर्यातसोमपानपना सर्व रपयोग संमती उस उपयागकी अपेक्षासे है पादिपाणाम् 'मविपरकम्पममापान्त =एकोइन्द्रियों के भी बहुतण्यम या मेव(पतष्पानहानेके कारणसे (१) पिरेमाप पिपा प्रोसिंग पवनमा इमरण लाए कि स्थापना भी बहुत बात है भार पम भी अनक प्रकार के (१) पम् विवादिननुप गणध पानी परिकाप कमानचालके मिररमपम मातम मकार विमानस्यामा रसके पहिले पनि सपनगानगम्य-अस्तिता नुनि परिमाप दोमाताtuit गिजाता मलिप नस्पति वर्तमान काम पारमपर एपणन राम में रामपभात लामाल नाम गालात है। DAROONBOARDARDOI PODED वार्थ अध्याय सिद्धि सत्र १३ BOOEBOOBOORBOLL पथनिमासी मगरूपसाय पडोस व पदद भौर निभवपर्यसहित ससिविष्ट • भन्दा मनगद मायाप २ सूत्र १३ उलघ्यानुपूर्वी स्थावरभेदप्रतिपत्यर्थमाह- ॥ पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतयःस्थावराः॥१३॥ स्थावरनामकर्मभेदा पृथिवीकायिकादय सन्ति, रम्सम्य-मानुपूरिस्यावर-भेद भविपत्ति-मर्थममायनकरनस)मप(मानुपूपी)बोडकरस्यापरके भेद मानजिप करते हैं जि पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतय स्थावरा ॥ १३ ॥ पृथिवी-भप्-तेजस्-पायु-पनस्पतया स्थावरा-पूपियरी कापिक,मप्कापिक,वेमामायिक,पायुकायिफ और वनस्सतिफापिक स्थापर(जीप) रुपनुराद'-स्थापरनामकर्ममेदा पगियोकायि:--स्पाररनामा नामकर्मकी प्रातिक मेद पपियोकायिक मादपाः सन्ति म्मकायिक, वेन' कापिक, पायुकायिक, पनस्पति कायिक (-मादय') (१० रोगों मानापोके ॥ १५ सूत्रका पाठ भेव और भय भेद पसाप लिमनेसे सुगम होगा। इसलिये पीछे वोमी भानापोंके पारा पा लिगत है राषिप्यात आपायुषमस्पवासापराभप पर देतोयीत्रिपादपरसा कोप्रिय तीनान्द्रिय पारास्टिय पापानियपाले यस पपिायप्पनपतमा मापसभापतत्त्वाफ पिगमसम पर॥५तमोवाय मोम्द्रियावयाश्य पसा समाप्य० मे १४ यो पत्र पठ४२ प्रणिधीवापि भवापिक, वनस्पतिकापिक(पोलावर जीव है। सेना कापिकवायुकायिक और पायो इन्द्रियपास तीम इम्नियपाले पारादिपपास पाप वियपाले प्रसजीव मानो मामायोके ॥ यो और १५पा चौफे मितानसे प्रगर रितेजस् पापु पो राम मारे पहा हे १३ वा पूल के शेताम्मर भामाप के १५वा गण में मतमत है यातायोनौषो पूषपाठमेरमा। समाप्य०१४ यो सूत्रमै हमारे पार १५ मास तेजो-पायुद' भपिक रोप पाठ एकसा है। हमारे यहा रोगापिक और पायुकापिक दोनों को सापर जीव मामा है पातु श्वेताम्मर मानापमें मम स जीव माना है जैसा दिसमाप्प० २१५ पाएग पोर हमारे यहाँ १५ पोश से प्रकट है। प्रयोग तपर्णपानो प्रामापके दोमो पानी पगो का भांद पथिषी कापिक, मप (मसामपिफ यमस्पति कायिक कोसावर दोनोंमें माना मोरारम्लियपासमीप,तीन इम्बियपाल जीप पार इन्द्रिपपास सीव पाच त्रिपाले जीपोंको पोमो प्रस माना है। (२पाश्या साधसिवित्री एकत्ति हस्त सिन्तिम दाम मुद्रित भागृत्तिपोंमें तया राजपातिकमै पाते हैं। जिसका जीव' मिलगयाहो सोपीय सरित हो सो पापियो पर जीवसहित से अभिप्राय । वरपार्थ साकपातिक पृष्ठ स के मिन्न पारसमें कायिक राम साप है। प्रधिकी कापियति माममोवपक्शातापिप्पादयो जीयाथियो कापिकाया सावरn wन पुनर जीवास्तेषामप्रस्तुतत्वात् । CONTOONOAROON WROOT CHRONOEROT सिाद रसुत्र BROTAKOOMIMDOHOTO तदुदय निमित्ता अभी इति जीवेपु पृथिव्यादय सज्ञा वेदितव्या ॥ प्रथनादिप्रकृति निप्पता अपि रूढिवशात्प्रथनाद्यनपेक्षा वर्तन्ते ।। एपां पृथिव्यादीनामा चातुर्विध्यमुक्तम् । प्रत्येस्तत्कयमिति चेदुच्यते॥पृथिवी। पृथिवीकाय। पृथिवीकायिक । पृथिवीजीव इत्यादि । तत्र अचेतनावेश्रसिकपरिणामनिर्वता काठिन्यगुणात्मिका पृथिवी । अचेतनत्वादसत्यपि पृथिवीकाय- नामकर्मोदये प्रथनक्रियोपललितवेयम् । अथवा पृथिवी सामान्यम्- बर-दिप-निमिवामीविकमी ग्स (स्थाबरनामा नापमावि) के उदयके कारण इनमीयोंमें पपिपी-मादपमा पृथिषीसायिक,मपकायिक,वेज कापिक,पायुकायिम्बनस्सविकापिफ ("भादप) सम्हारेदितमा पन- संशा का नाम गानो(पृपियो,मप् ,वन ,वायु,पनस्पति ये पामो शम) प्रबन मादि-मरुति-नियमाः "मपि०कारिपसाव । समादिक(भिषभिभोपाभोंसे(अकृति)निकले हैं। फिरमी(म्भपि)सरिफे मामपसे परन-मादि-मनपेमान् (इनपाचौ शम्दोंगी सपनादिक भर्यात् विस्तारादिक (मर्ष) की विक्षा नही है सम्पपरी-पादोनाम।। पापार्मिष्पम् । =इन पपिसो भादिरों अपियों रपित पर्मशालय (मारे) पार चार मेद रक्तम् । "परपे नमविश्वेन उप्पते कोगपे चार-वत् परपेक कैसे हैं? ऐसी शंका हाने पर कागावा कि परिणापिपिसीमारिमपिरीमीरादि स्पपिपी, पूधिरीकाय, पपिरीमायिक, पथिवीपौर ऐसे पारिता और भी हैं मर्यान् मप्-भपाप, अपमायिक अपनीय, वेशः,वेमाकाप, वेमाकायिक,तेमोमीन, पायु-पायुकाप-पायुधायिक-वायुनीय पनसति-चनस्पतिकाप-बनस्पतिकायिचनस्पविभीवरे नयामना-मसिरपरिणाप-निववा वा अमेवन समावसिद (अप्रसि) परिणामसे रविव रागिन्यगुण-भासिमपिरीभवनरगत् ॥ =मान(=मारिय) कठिनवारणमरि सरित पपिपी है। बड़पनासे मनिमरि पपिपीजपनामार्मग्दयामपन-हिय-पृथिवीसपनामा मागकती माविक रवन न रामेरमी मपन पा फैलापनिया मारता-परायम्। भयका पिसापाम्पम्ममादिसे युक्त (परिम)पा(पि ॥ पा पविती सामाम्पा राम्) QRNOOOOROOROC ROTOCOCINIO प्तिद्धि 24 सुत्र १३ प्याय मानाOROOMORRORATORRC CERT OURCeम्या उत्तरत्रयेऽपि सनावात्। काय शरीर पृथिवीकायिकजीवपरित्यक्त पृथिवीकाय ।मृतमनुप्यादिका यवत्। पृथिवीकाय अस्यास्तीति पृथिवीकायिक ।तत्कायसम्बन्धवशीकृत आत्मासमवाप्तपृथिवी- कायनामकर्मोदय कार्मणाययोगस्थो यो न तावत्पृथिवी कायस्वेन गृह्णाति स पथिवीजीव उत्तरप्रये अपि -पोंकि अगले सपनों मेद (परिपीकाप, पपिपीफायिक, पपिपीमीय)में भी (पाशन्द) सादा कापा शरीरमा पृथिवीकापिकनीक मरिचमान है। काय या शरीर को पथिमी हायिक मीपकरि परित्यक म्यागित होगया है मर्यात् निसर्मेसे पृथिवी फायिक भीम मरकर निकल गया पपिरीमाया मत-मनुम्याविकायरत् । सो पृथिवी काप है। मरेहुपे मनुप्यादिकके शरीर सण ( पथिवी काय ) १ पृषिधीकाया भस्पद मस्ति इति विवो कायिक पुषिवीकाय मिस (जीव)के है ऐसा (जीय) पृथियो कायिक है ।। “सा यह जीव "पृथिरी शरीरके सरंप सरित है" मयल्पनिका पृष्ठ २५६ अर्थात् मिस मीरका उस पृपियरी कापसे संपंप यह पृथिवी कापिफ है।। परसाय-समयपशीहवा मास्मा | उस (पथिवी) शरीरफे समय पीभूत मात्मा ( अन्य कायफे शरीरसे छूटकर) समबाप्त(सम् भव आप्त) पृपिपीकापनामकर्मोदय पृथिवीकाय नामा नामकर्मकी प्रकृतिका उदय प्राप्त हुमा निसको कार्यणकापयोगस्पा ( मितने अंतरालमें ) कार्माण काययोगमें विष्ठा हुमा मो ( मीर जप तक) मसावदपिषौम्कायवेनः मुखाविस पृषिषीजीप पुषिषीको कायपनाकरि प्राण नहीं करवा व तक (नापत) पर पुषिरी जीव है भर्वाद जिस जीप पृथिवी कायिक नायर्मफा चदय परंतु पूपिषीफो काय- सस्पसे प्राण न फर पा फामाणकापयोगमें ही विधमान मा पृथिवी भीर है भागर्थ काई भीर किसी शरीर में था उसने अपनी भायु पूर्ण करने पर उस शरीर को स्पागफर पृ पक्षी काय नामा नामफर्मकी महषिके दपस पृथियो फायिक होने वाला है वो उस जीपको मिग्रागति (नया शरीर धारण करने के लिये गमन पस्या में कार्माण योग मितन काल तक पिसागतिक समता वा जीव पृथिवी काय वाशरीरको प्राणफरनेमें असमर्थ है उस काल तक उसको पपिवी जीव करेंगे । उक्त विग्रह काश किसी नीवका एक समय किसीनीपका दो समप,फिसी जीवका तीन समय का तीन समय से अधिक नहीं हा सक्ता है। भार विनर गति में (भीष) कार्मण पोग रावा है ।। BECORICORRECEROCEDU4600DOBOR DASI समार्ग भापाप२ ५० सिद्धी सत्र १३ OMOCRECORDOREPORRIORSHEDOARDOIRMAm उक्त घ-पुढयो पुढयोकायो पुढबोकाइय पुढविजीवो य । साहारणोपमुको सरीरगहिदो भरतरिदो॥१॥ एवमवादिष्वपि योज्यम् ॥ एते पञ्चविधा प्राणिन स्थावरा । कति पुनरेषा प्राणा । चत्वार। स्पर्शनेन्द्रियप्राण कायवलप्राण उच्छवासनि श्वासप्राण आयु प्राणश्यति ।। प्रय नसा के ते इत्यत्रोच्यते ॥ गई। "पुची मायापपिपी पक्षियोकाय बहरि गया है कि पृयिती, पृषिकाय, प्रलोयायपारिमारामाणिपिक पितीमीब ए) =पृपिरीमयिक भौर (व्यर) पृपिरानोर है [पृथिवी काय रे मारणापामाधारण-उपमुक्त) =(सा या पृथिवी) साधारण है। जिससे मीर ममी निकला है (सो मोरगरिदा (गरोरस शरीरग्रसित वा शरीर सस्ति मीच है (सा पृपिपी कापिक है) मतारिदा (पान्तरित ) भवान्तर भवस्वाराला पा विग्रागतिसहित मीमसो पथिवी जीव है) भाषायें पृथिवा पृथिवीकाय, पृथिवी छापित भौर पृपितो मीच ये पार मद पिवीनस भपतन समाषसिन परिणामस रचित मौर फठिनता मादिगुण सम्प पृथियो कमाती है इमानिस पारी पा एक साधारण भार सामान्यनाम हो ।। (२) माया भयं शरीर पृथिवी मायिक जीपने गि शरीर T BY दिया है पर गिरी गाय कामाता है या मरे हुए मनुप्यादिक कीआय(काया)के समान है, (३) शरीर पूरीन या शरीर असित जीप मर्याद वा पृथियो जिसमें इस समय भोष विपमान रैमा पृषिनीपिका ॥ (४) मिस पीक प्रपितोसपिक नाममकाउदय हे परतु पपियोका साप स्वम्पसे ग्रहण नरमाण माप पागो रिपमान । भयान् विप्रागति ममस्या में है याविषीमोय है। परम्मा-प्रावित मरिष्याम्यम् । -एस भप् मादिकममी(मार पार भेद) लगाना याग्य रे परिग माणिन स्पायरा पनि पमाणा १-५ पाच प्रकार माणवाल स्पारस पनि इनके विचन माण हैं ? परासादिमाण कापरमाण। प्प उपर)पार पाण (भर्यानसशन इनिपमाण, सलमाण, बामनिरासमाण मापा पनि उपासनारतासमा, भौर मापुपाण मामानि RT कमर प्रममारतकाम पमा परम नेपर पर्दा कामाता कि 406JDEREDODOBULDARDEROIRDATA ५२ सिद्धि सत्र १४ पिश ५ . IDEODORSEECIRCOUNTDOTKOOLADEIROINTM परानिवासी नगरूपसाप पकीय कृत पदद मौर विमास्पर्य सहित सर्वार्थसिदिका गप्पय हिन्दी मनुवाद मप्पाय २ मत्र १५ ॥ द्वीन्द्रियादयनसाः ॥१४॥ इन्द्रिये यस्य सोऽयं होन्द्रियः, होन्द्रिय आदिर्येषां ते होन्द्रियादय ॥ आदिशब्दो व्यवस्थावाची व्यवस्थिता ।आगमे । कथम् । द्वीन्द्रियस्त्रीन्द्रियश्चतुरिन्द्रिय पञ्चन्द्रियश्चति॥ तद्गुणसविज्ञानवृत्तिग्रहणात् द्वीन्द्रियस्याप्यन्तर्भावः ॥ पत्रम्- द्वीन्द्रियोदयबस' ॥१४॥ मधार्यविटिप-मादपावसा म्दो इन्द्रियोंशे भाविकर(पवेन्द्रिपतक)वस (मीब) मर्याद दोन्द्रिय कौनइन्दिप पाएनिय,पंपेइन्द्रिय भीष मागपमें प्रसनामसे म्पपस्पिवरें। त्पनुरावा-न्द्रिये पस्यसमपरहीन्द्रियको इन्द्रिय मिस सो या दो इन्द्रिय रे (भोर) दोन्द्रिपामादिपविहीन्द्रिय-भादया। दो इन्द्रिय रे भादिमें जिनके वे दीन्द्रिय प्रादि । मादिराम्दासम्पपस्पापापी। सत्रमें)भादिगन्दमर्यादानाची मर्याद इन्द्रियोंकी मणनाको परमितकरवादी पास्पिवाभाममाप्यम् -(मरन) म्पवस्या का मर्यादा है। (उचर शासॉम है (मरन) कैसे मैं होन्दिप वीन्द्रिपा चतुरिन्दिपाप पवेन्दिपारगति पचर)को इन्द्रिय तीन इन्द्रिय,वार इन्द्रिप और पांच इन्द्रिय,वाले भीव हैं सदगुणसंविमानचिप्राणा सदगुणसंनिशानबीरिसमास उपादानके निमिचसे है हौन्द्रिपस्स मिपिनमन्वायर दो इन्द्रियवालेका मी(माविसम्दरिषीप्राण भन्दायोमर्याद इस समास में जिस पदार्यके पीछे भारिशम्द माता है वो पर अपने पालेके पदार्थको प्राण करते पे दूसरी शेष पसभोंको भी गिना देवा से इस सत्र में भादि सम्बने अपने परिलेकी संस्था हिन्द्रियही गणना करवाय रोमां पापायोंमें इस पत्र पाठ और प्रम मो मेरी भनुवाद के एक स्वम विषागया है। (२) मयांवावासी तेम पशन्द्रियापूर्व विपारिसीवी मसात्ममिमाया Myayषसंविधानमामोदिसमासे गगार सम्मकामवगुणसंविधाने एपनाम DRENOMONDONEDOTODOOTEDURED पुनरेपी सपाय प्राध्यापन ५२ सिद्धी सूत्र१३ 810ONPROGRADIO उक्त च-पुढयो पुढवीकायो पुढवोकाइय पुढविजीवो य । साहारणोपमुको सरीरगहिदो भवतरिदो ॥१॥ एवमवादिष्वपि योज्यम् ॥ एते पञ्चविधा प्राणिन स्थावरा । कति प्राणा । चत्वार। स्पर्शनेन्द्रियप्राण कायवलप्राण उच्छ्वासनि श्वासप्राण आयु प्राणश्चेति ॥ अथ नसा के तेइत्यत्रोच्यते ॥ रळप । पुरणपुरोकपा (पविपिसोडाया महरि सगया कि पृथिवी, पितोलाप, इपोकायापुररिपौवाप(पपिचरी माविक विषमीकाप) =पृविपी कापिक मौर (=प-म) पपिरोनोगत [पुषियी काय है सारासामुमार(मापारण-अमृत) (मा पर प्रथिवी साधारण है। प्रिससे मीप मभी निकला (सो सीरीदा (शरीर शरीरप्रसिव या शरीर सहित प्रीपी (सो पपिवी कापिक) मातरिदा (पान्तरित) - पपान्तर मास्थाराणा पारिग्रागसिसरितमोगीसो पयियी जीव) भाषार्य पूपिणी,पूपिाप, पृथिवी कायिक भोर पषियोमीन य चार मर पिराग्नस भयसन समारमिर परिखापस रचित मोर कठिनता मादिगण सक्ष्म पृथिवी रीमानी है इसलिय परिसरी पा एक साधारण भार सामान्यनाम हीरे ॥ (२) साया भर्ष शरीर पृथिवी कापि नीपन निम परी सा दिया। पिता काय कामाता या मरे हुए मनुप्यादिक कोप(कापा)के ममान है, ( ३ ) शरीर परीसरा शरीर प्रसित मीच मर्यात् वा पधिरो मिसमै इस समय मोष विपमान रेगा पृषिशायिका॥ (४) निस श्रीरक पृषिपोकायि नाममापदप ा परतु परिवीका काप स्पम्पसे ग्राण नरवा कार्माण गप यागमो विषपान (अपान् विप्रगति भवस्था में वापियोमीप है। एसम्मा-भाविप मपि पाग्पम् ॥ एस भए मादिमी(मार पार भद) झगाना पाग्पी एनपिरिषा माणिन स्थायरा निभपुन पपा माणा -प पार प्रसार प्राणवास स्थानमा पनि इनमें किसान पाण! पसार सनन्दिपमाणवायरममाण (उचर)मार वाण मर्यात् सगुन त्रियमाण, पापबमाण, TOसनिवासमामाभासा पति. झापनियराममाण, और मामाण भप.प्रमागिपत पमा प्रसमीर मार पर पत रामाना मि OMBORRO9898 dRIDUALPAD mpdanimelie OROOROORDAN ५२ सिद्धि सुत्र.४ ५३ VESOBTABORATOROUNDCEBOOEDGEOS ग्यानिवासी नगरपसाप पकीब व पदपद और रिमापर्थ सदित सपिसिविक गुम्दरा हिन्दी अनुवाद मध्पाप २ मत्र १५ सार्थ ॥ हीन्द्रियादयत्रसाः॥१४॥ । इन्द्रिये यस्य सोऽयं होन्द्रियः, होन्द्रिय आदिवैषी ते दोन्द्रियादय ॥ आदिशब्दो यायश व्यवस्थावाची व्यवस्थिता । आगमे । कथम् । हीन्द्रियस्त्रीन्द्रियश्चतुरिन्द्रिय पञ्चेन्द्रियश्चति ॥ तद्गुणसविज्ञानवृत्तिग्रहणात् हीन्द्रियस्याप्यन्तर्भावः । सुत्रम्- हीन्द्रियोदयस्वस' ॥ १४॥ ममार्य-दि-मन्दिप भादप वसा दो इन्द्रियोंको भाविकर(पंचेनिपतक)यस (नीव) मर्याद दोइन्द्रिय बौनइन्द्रिय पारान्द्रिय,पेरेन्द्रिय भीष भागममें प्रसनामसे म्पपस्थित है। त्पनरापा-न्द्रियससमपादीन्द्रिय दो इन्द्रिय निसर्फ सो पर दो शनिप है (और) हौन्दिप भादिमायेचा विहीन्द्रिय-मादपाः प्यो इन्द्रिय रे भादिमें मिमक ते दीन्द्रिय मादि । मादिगम्दध्यास्पायाची (घ)मादिशन्द मर्यादावाची मर्याद इन्द्रियों की गणना परमितकरवाही पास्मिवा भामो कयम् मिरनावा म्पवस्था मा मर्यादा है। (उत्पशास्त्रों में रे (मरन) से हैं हौन्त्रिपत्रिीन्दिपारपतुरिन्द्रिय पपेन्द्रियावि० (उत्सर दो इन्द्रिय वीन इन्द्रिय,पार इन्द्रिय और पाप इन्द्रिय,माखे जीव । बदमुणसंविधानपिप्राणा स्वरगुणसंनिशानबहुप्रीदिसमास के उपादानके निमित्तसे है हन्द्रिपस मिमित्व दो इन्दिपवाखका भी(मादिशब्दरि)प्ररण मन्तर्मानमर्याद इस समास में जिस पदार्पक पीछे मादिशम्द माता है वो का भपने पारोके पदार्यको प्राण करवे दूसरी रेप पसभाको भी गिना देता है जैसे इस सत्र में मादि शन्दने अपने पहिलेकी संख्या द्विशन्द्रियही गणना परवडया (१) रोप भाजापा इस सब पाठ और भयमे ओ मेरे पास अनुवाद की पुनम दियागया है। (२) मपावापामोन पर दिपायुप्प परिन्द्रिपारिशीयो मयोत्पमिसापाबदापसपिराममोहिषमासे मार लम्सक।। मवगुणसंविधाने एपमा । DAANDOLONDONLODINEDANTOBORE सर्वि श्याप सिद्धि सत्र१४ OSHOCameuREMIND BORDINGBODFO AADIA । कति पुनरेपा प्राणायद्वीन्द्रियस्य तावत् पट् प्राणा पूर्वोक्ता एव रसनवाक्प्राणाधिका त्री- न्द्रियस्य सप्त त एव घ्राणप्राणाधिका । चतुरिंद्रियस्याप्टी त एव चक्षु प्राणाधिकाः । पचेन्द्रि- यस्य तिरश्चोऽसज्ञिनो नव त एव श्रोत्रप्राणाधिका सन्जिनो दश त एवमनोवलप्राणाधिकाः ।। आदिशब्देन निर्दिष्टानामनिर्ज्ञातसख्यानामियत्तावधारण कर्तव्यमित्यत आह मिन्द्रिय, पतुः इन्द्रिप परनिय, 1 मी अस मीपोंके भेदोंमें गिना दिया । विपिनाकपा माणा भरन पुनि कितने इन(प्रत्येक हीन्द्रिप-प्रोन्दिप-परिन्द्रिय-पचेन्द्रिय) प्राण. दि-इन्द्रिपस्या वापद परमाणाभोकाएप०अयम(वार)दीन्द्रिपमीर माणौं । प्रथम कवित हो(चार स्पर्शनेन्द्रिपमाण, पापवसमास,उवासनिारयासमाण, मौरभाषप्राणोएपेन्द्रियनीय गोते) रसन-पामाख-मरिका मरसनाइन्द्रिप,पपनस माण, भपिक हैं श्रीन्दिपस्य सनाखमाण-भपिका ध्वीनेन्द्रियमीप साव(पाण)। ये ही(बामौर) नासिका इन्द्रियमिन अपिकों परिन्द्रियस्यामष्टा एवमर्माण म्पनुरिन्दिपनीक,माठ (पाण) (-३)(-पर-सास) (और)पधुर्माणभिनफें भपिका पचन्द्रिपस्पतिस्माभिसशिनाना पिक । पदिय तिर्यप प्रसैनी नो (पाण) हैं समाएर०ाममास-मधिसचिन दणी (भाउ) मौर)कर्ण इन्द्रियमाण मिनमपिक (पेद्रिय सैनीफे दस(प्राण)* सपनोपसमाप-प्रधिका मादिराम्देन औ(नौमौर) मनरखमाण मिन भरि सम्व) भादि शम्दारि निर्दिष्टानाममितिभियानाम इपचा उपदेशमीह-निर्दिष्टानाम्) (परत) विनामानी हुई गणनामोंकी पर्यादा भरपारणम् इम्पम् श्याति. भवामा निश्प करना(अपपारणम्)म्प रे पा निपकरमा पारिपे भव कावेरे कि (२) मावापानी । तेन विपात् । मम्। मयादापायम्पपमायामो विस(मादि परि पंजाम्बियसेस पर पानिपारिजीक भनि लिमित्रापा सायिपादिजीप नहीं होते है । एमाप्रायपगर्मभाषिण्मयागोम्पपस्थावाचीहै, पगुनमपिशामसुमोहिममासेमामाहरवम् सम्मक' पहीगुसापच्यापीहि समासमें पन्त सम्म पा लम्बानवाला मागणसाने गुपना। (औरामगुपसविलमोरिखमासम)पावापनमिप.सा(मारप)। मादिस्य से पंचपापTHनुसार पचममेरमोरावस्थामै भरि गगन है पसेअनुवादगार BROMO #COPO COCKTIT म सवाय प्रध्याय ५५ सिदि २सुत्र१५ eaneOTODOROQuTROOTOBHOGANDROREOIND ॥ पञ्चन्द्रियाणि ॥ १५॥ इन्द्रियशब्दो व्याख्यातार्थ । पश्चग्रहणमवधारणार्थ पञ्चैव नाधिकसंख्यानीति॥कर्मेन्द्रि- याणां वागादीनामिह ग्रहण कर्तव्यम् । न कर्तव्यम् । उपयोगप्रकरणात् ॥ उपयोगसाधनाना- मिह ग्रहण कृत, न कियासाधनानामनपस्थानाच्च ॥ क्रियासाधनानामङ्गोपाङ्गनामकर्मनिर्वति- ताना सर्वेपामपि क्रियासाधनत्वमस्तीति न पंचैव कर्मेन्द्रियाणि ॥ सूत्रम्- पंचेन्द्रियाणि-पंचेन्द्रियाणि ( नाधिकानि) भवन्ति सपार्य-पंथन्द्रिपाणिन भपिकानिमामरन्तिामन्द्रिय (सबाप रे भषिक नहीं पती मर्याद इसप्रका मारम्भनियमकेचियो, औरषा भादिकी संस्पाकनिपेषक लिये है। नो"इन्द्रकरिये भात्मा(संसारोगोषवाकालिंगकरिये मनापनेका पिनतपाइन्दमोनामार्म वारि रपे मेमाकार ते इन्द्रिय है"०मय-सपनिकापg२५८ | पर्व-इन्दिपशम्पसम्पाप्पावमापवरणम्पन्द्रिप शम्मका भय परिखे चिपरण कियागया है। पपशम्दापादान भरपारणमपाएर न-मपिक-संम्पानिमावि-निमयके लिये है। पा(इन्द्रिया) हैं अधिक संख्या की गणना नहीं है कप-इन्दिपाणाम्याग-भादोनाम र प्राणम्। भन्दियें पपन,हाय-पान-गदा-लिंग( मादीनाम्)का यहां प्राण सवम्पम्न कम्पम् गाउपयोग-भकरणात करनापाहिये। (धर्मइन्दियोंकाप्राण)ना चाहिये । क्योंकिपा)रपयोगकाविषयो। उपपाग-सापमानापरप्राणं तम् ॥ (मन) उपपागके कारणों का यहां प्राण किया गया है [स्पामसग माता पानक्रियासापनानाम् मनपस्यानात् । म्भौरनडिक्रिपासापनोंका श्योंकि(यदि क्रियाकेसापनोंको इन्द्रियको वो)मन- लिपासापनानागमोपानामकर्मनिर्विवानाम्ग पोंकि क्रियाकेसापन भंगोपांगनामा नामकर्म परिरपित सनाम् अपि०मियासापनत्वम् मस्तिाइवि नसखिये-भपि-देखो वैपकोरापृष्ठ४१)समस्तकें किया सापनपना नगएर इन्द्रियाणि - मनकि पांचौड़ी कर्मइन्द्रियोंके (क्रिपा सापनपना) मारा ऐसा है कि (१)ो भामायोमे इस सूत्रका पाठ और प्रय एसादसान्यमवी पशु-पौत्र-प्राण-रसना-पद ये पांच बुचीन्द्रियापचन,दाय पाप, गुरुलिंग पांच कमेन्द्रियों और मन ऐसे म्पारह इन्द्रियो मानते हैं । बोपद्रियांमानते हैं उमडनार्य औरसम्याची पत्ता के लियेयासमो TOTOO OORDOOROO OURO ROUBO १ ५५ सर्वि ध्याय२/ सिद्धि सुत्र१४ . AUTO On Octs ORNO ORRO OR an Ammo कति पुनरेपा प्राणा । होन्द्रियस्य तावत् षट् प्राणा पूर्वोक्ता एव रसनवाक्प्राणाधिका ।त्री- न्द्रियस्य सप्त त एव घ्राणप्राणाधिकाः। चतुरिंद्रियस्याष्टौ त एव चक्षु प्राणाधिकाः । पचेन्द्रि- यस्य तिरश्योऽसज्ञिनो नव त एव श्रोत्रप्राणाधिका ।सज्ञिनो दश तएव मनोवलप्राणाधिका ॥ आदिशब्देन निर्दिष्टानामनितिसख्यानामियत्तावधारण कर्तव्यमित्यत आह हिन्द्रिय, पनुः इन्द्रिप पंचेन्द्रिय, को भी प्रस नीयोंके मेदोंमें गिना दिया । पति पुन एपा प्राणा (परन)पुनि कितने इन(प्रत्येक दीन्द्रिय-प्रीन्द्रिप-पहरिन्द्रिय-पयेन्द्रिय) माणहैं. हिन्दिपस्प तापन पदोमायाभोकामाएर० अपमाचार दोनियमीर पैमासौं । प्रथम कथित हो(पार स्मशनेन्द्रियमाण, कायपक्षमाण उच्चपासनिाश्वासमाण,ौरमायमाणमोपकेन्द्रियनीय कोते हैं) रसन-प्रमाण-मपिका रसनान्द्रिय, पचननल प्राण, भपिकरें श्रीन्द्रियस्प सप्तनि एम०माणभाण-मपिका सीनेन्द्रियभीरके साव(माण)। ये ही(छामौर) नासिफा इन्द्रिपमिन मषिकों परिन्दिपस्पामष्टो परमाण चतुरिन्द्रियजीवके,माठ (प्राण) (-३)ी-पव-सात) (भौर चघुर्माणमिनः मपिपरपन्दियस्पविरम मसगिनानमः। -मपिक रें। पंचेंद्रिय विर्यप असैनीके नो (प्राण ) वापर०माप्रमाण-मपिका सशिनाद बी(भाठ) (मौरकार्य इन्द्रियमाण जिनकें भपिक (पंचेद्रिय)सैनीफे दस(माण)रे पर मनोपनमाण-मतिमादिसम्बेन बी(नौपौर मनानमाण मिनकै भपिक (इसस्त्रम) प्रादि शम्बकरि निर्दिष्टानामनिर्भातसंस्पानामयचा उपदेशकीरनिर्दिष्टानाम्) (परतु) विनामानी हुई गणनामोंकी मर्यादा भरसारणम्णम्यम् ।।इवि. भव:०मा निमय करना(ममधारणम्)धर्वम्प रेरा निमकरना पारिये मतः कावे है कि (२) मर्यादावापी । तेन पंन्द्रियात् ।। सर्वम्। =मयादावापा(प्यवसायाची तिस(मादि शमी परिपंद्रियऊपर पानिपादिनीका नमवतिइतिप्रमिप्राया। घोष्ट्रियाविशीष मही रोतेहै । एसामारापसूणभादियनकायोप्यवस्थावाची 10वगुणमपिधानबमोदिसमासेदाउपाइपम्हसम्मा' =वहीगुणज्ञापनमामीहि समासमें प्रान्त सम्मपर्ण है पा लम्कानवासा सगुनषिधाने र गुपना। (ौरामागुमसचिवाम गुमोदिसमासम पतपमजिसम्मेसा(व्याहएक) । सिन्दिप से पंचेद्रियापदापात रमतामुपाद एसबनम मोरावस्थानीमाथि गबन है इससेअनुपावापन। LIRRBHIMe HarrDROIDIODI ५५ - सिदि सन१७ बर्वि गय ५७ ORDETOOGONDOROETDRESOAPOON तत्र द्रव्येन्द्रियस्वरूपप्रतिपत्यर्थ (निर्धापनार्थ ) माह- ॥ निवृत्त्युपकरणे द्रव्येन्द्रियम् ॥ १७ ॥ निर्वय॑ते निप्पाद्यते इति निति ॥ केन निर्वय॑ते? कर्मणा ॥ सा द्विविधा वाह्याभ्यन्तर- मेदात् । उत्सेधागुलीसख्येयभाग प्रमिताना कपदम्पन्द्रियरूपमतिपसिमर्थ (निज्ञापन-मर्यम् Mमा- दभ्येन्दिपलमके निणेय मा माननेक लिये करते हैं कि सूत्रम् 'निर्वृत्युपकरणे द्रव्येन्द्रियम् ॥ १७॥ नित्यपकरण (इदिपे-दिषिपदम्पन्दियम् -निचिन्द्रियम्-उपकरणेन्द्रियम् प दिलिप दम्पेन्द्रियम् परति ॥१७॥ मानिधि-दिपम्पनपकरणेन्द्रियम नितिन्द्रिय भौर उपकरणेन्द्रिय दिविपम्म्येन्द्रियम् भपति दामकार दम्पन्द्रिपरमा निमुचिमौरतएकरणफे भेदसे द्रष्येन्दिप दो प्रकार है। वापनुपादा -निर्वस्पतनिष्पापवेतिनिधि रचाया बनायागया है या निचि है निषतर्मणा (मरन)विससे रथगपा है। (उत्तर) कर्मर मिशेपो सोनिचि है) साति--विधामा-अपवर-भवाद। यहानिर्रति वाममभ्यन्सर भेदधे दो प्रकार (नामकर्म के उदयस मोरचना- उत्सेप-मंघल-भसंस्पपमागमपितानाम्।। उस्मेष पालक प्रसंस्पावामागप्रमाण (१॥ सूत्र १५१७ का पाठ और नई पोर्मो मानार्यो एकन्द्रिय और विभिगोकी अनुसूति मसे १५ १६ सयौसे इस स्त्रमेलीगई है। (शदासगुहमिति म्पपरागत मनरूपं करेवाश गाते। परमागमे देहगेहनामनरकाविम्मानमुत्सागुलनेनेति निपमितत्वात् । उत्सा-गुलम् जाति पयहार स्पलम् मनाउत्सेप गल(भाठाप्रमाप)साम्पयहार भेगलाई यमपासंबाई-चौड़ाईउमाईमेसम) पारा Tपमागमारोह-प्राम-पदी (हस्सप गम)पहा लियामया है। शास्त्र में शरीर यह माम मरक-प्रादि-प्रमाणम्, उसेष भंगुलेगा परफाविका प्रमाप उत्तेप एससी रवि०नियमितत्वात नोकि ऐसा मिममित वा वितिस उत्सेध गवसे पांय सी गुला प्रमाणांगलद ससे महापर्पत नदी धमुदाविमा परिमाण कहाबाता है । म ऐराषत क्षेत्रके मनुप्पोकर अपने २ पाहम जो म गुरु है उसे भामांगुस रहते हैं इससे भारी पाय धनुपादिका ममास होता है। DOORNPOORROCEEDERDOTODEOT ५७ सिद्धि HETOURBORG सूत्र सर्व मप्पाप BRONDOURO OINONDONOORDOORWir O OKITE पटानिरासी नगरपसराय कील कृत पदपद भौर विभपस्पर्प सहित सार्यसिदिका शम्दश हिन्दीभनुपाद अध्याय २ स्त्र १६ तेपामन्तर्भेदप्रदर्शनार्थमाह द्विविधानि ॥ १६ ॥ विधशब्द प्रकारवाची, ौ विधौ येषां तानि द्विविधानि, द्विप्रकाराणीत्यर्थ ॥ को पुनस्तौ हौ प्रकारौ । द्रव्येन्द्रिय भावेन्द्रियमिति ।। मो पदार्य शान भौर दर्शन सरूप रूपयोग कारणों सोकानाम इन्द्रिय पाना । स्पर्शनमादि पाप इन्द्रियाँ सपयागमें कारणों इसलिये उन इन्द्रिय मानना युक्त है। पाक पाणि पार गदा और विंग उपयोग कारणनी,इसलिये तो इन्द्रिय नहीं कामासाता यदि याापर मोनियाके सापनहों वे मी इन्द्रिय है या इन्द्रिय सामान्यका पण किया नायगा तो पपपि गोसना मादि क्रियामोंके कारणहोनेसे गाभादिरन्द्रियो कीनावेगी परतु क्रिया सापन तौ मस्तक मादि सगी अंग सांग हैं। सपोडों इन्द्रिय काना पड़ेगाफिर किसको इन्द्रिय काना किसको नहाना भपपा बाद पाणि मादिपाचको कर्मेन्द्रिय पाना भौरोंका न काना य(भरस्पाली न पन सगी इस लिपे नो झिपाफ सापन हों पे इन्द्रियों या इन्द्रिय सामान्यका लक्षण न मानकर'मो सयोगमें कारण रों मेइन्द्रियो यही इन्द्रियका सण मानना चाहियो।मतामो सममें जीरे ये उपयोग कारण और इन्द्रिय ।। पाम् भन्तर्मेद-पाशन-मर्थम् "माT -उन(इन्द्रियों) के प्रभेद दिखाने के लिये (निम्नजिसिव सममें प्राचार्य)काते कि सूत्रम्-द्विविधानि-द्विविधानीन्द्रियाणिभवन्ति॥१६॥(इन्द्रिय'शब्दकीअनुवृत्तिपद्रहवांसूत्रसेली सार्व-पत्रिपाणिमादिविनियामपन्तिा मान्द्रियेंदोमेदपोभर्पापांचोइन्द्रियोंमेंसेमस्पेकान्द्रियदादम्पन्द्रियभौरभाषेन्द्रिपमेदों स्पर्य विपशम्दपकारवानी दी रियायनाम दिसम्त्रमें) विप'गद मकारमर्थ में है। दो रे भेनिम के नानि हिविपानि दिनकाराणिमातिम्भ ने द्विविधानि रे प्रवाद दोदो मकार सम इलिये है। ऐसाभाशप है IIT मराद्रव्येन्द्रिय पापेन्द्रियम्नति -फिर काम रा प्रकार द्रष्यन्त्रिप भार भाषेन्द्रिप ऐसे MONDA 3 सिद्धि श्सन१८ QADIKOOKOUTRO RECOOM0a DOO OOOHH DODOPADRO पानियासी प्रगासाप पीवत पदम्वेद और विमरत्पर्य सहित सर्वार्पसदिक्षा शमश हिन्दीमनुषाद मया २ सूत्र १८ सवाथ याया भावेन्द्रियमुच्यते- ॥ लब्ध्युपयोगी भावनन्द्रियम् ॥१८॥ लम्भन लब्धि । का पुनरसौ? । ज्ञानावरणक्षयोपशमविशेष ॥ यत्सन्निधानादात्मा द्रव्येन्द्रि- निधृतिप्रति व्याप्रियते तन्निमित्त आत्मन परिणाम उपयोगस्तदुमय मावेन्द्रियमिन्द्रियफलम् भाषेन्द्रियम् । योr भागान्द्रिय करीमावी है कि लभ्युपयोगी भावेन्द्रियम् ॥ १८ ॥ सवार्य:-अपि-उपयोगौमार-इन्द्रियम् ॥ =अम्भि और उपयोग (ये दो ) माप इन्द्रिय । उत्पनुराद'-मुम्मनम्किन मांजाम है। मी) जमिरे (मरन)फिर पा(मम्पि) क्या (1) मानापरण-यापशम-विशेष रिचर)बानापरणीय कर्मा सयापशमरूप म्पत्तिमा मकारा है (सोखम्पि)है। मर्यामानावरणीयकर्मविशेषक्षयोपशममेभास्माक्षेत्रापिशुदवारपीशक्तिीसोखम्भिर यत्सन्निपानाद"भामा दम्पन्द्रियनिधिम्पतिक-निसालम्पिकनिकटहोरिमात्मादपेन्द्रियरूप नि:चि प्रति म्पाप्रियते तत्-निमिचमात्मना परिणाम उपपागम्म्यापारकरवाद,मनवाद उस सम्मिनिमिन्तकमात्माका(रिपयाति परिणमन उपयोग मर्याद नो अपनाएर परिणयनमा सानो सो उपयोग है बद "उमयम्मानेन्द्रियम् इन्द्रिय-फलम् ॥ = दोनों नाप इन्द्रिय हैं। इन्द्रियका फल पा कार्य को (इस सूपका पाठ भार भई पोर्मों संप्रदायोंमें एस १८ वमन और स्परान-रसन-भाग-ध-धागाणि उभीसवां सूशके मध्यम राताम्मरमानायके समाप्यतत्वापाधिगमसूर 'पृष्ठ ४४ में उपयोग पनि' ऐसा स्थ अधिक है । स्पादिशु मतियानापपोगा एपर्क । स्परा-स-गप-वर्ष-समात्रियों के विषपोमविधानका उपयोग हावा । ऐसा मप इस सूचका है। हमारे यहाँ रसको मूलसूण नहीं माना है। समाप के धनुषायफने यह रिपसी इस पत्रमे दी है कि किसी किसी के मनमे यह महसूत्र नहीं है कोई कोई कहते हैं यह मून स्त्र हा हेमायनहीं। जिसे किसी जीवी इनकी गति है परंतु उपयोग यो ठम्यान परिषमम है सो भन्यत्रहो माप पस्तुओंमें सगरहा हो तौसुनतामही । और कोई सामनापाता और पोयम विनातान नही सबवा रससिपे सम्यि और उपयोग जब दोनों ही मिस तम मानकीसिदि होती है। TOOTDOO ५६ AD सर्वार्थ सिद्धि सुत्र१८ ५८ manMORROADCHOOTWAON एयनिगासी मगरूपसाप पकांच कर पदभेद और पिमफ्त्यर्यसहित सपिसिमितिको शन्दशः हिन्दी अनुवाद अध्याय २ र १८ शुद्धानामात्मप्रदेशानां प्रतिनियतचतुरादीन्द्रियसस्थानेनावस्थिताना वृत्तिरभ्यन्तरा निर्वृत्ति । पध्याय तेप्वात्मप्रदेशेप्विद्रियव्यपदेशभानु य प्रतिनियतसंस्थानो नामकर्मोदयापादितावस्थाविशेष पुदलप्रचय सा वाह्या निर्वृति । येन निवृते रूपकार क्रियते तदुपकरणम्॥ पूर्ववत्तदपि द्विविधम् तत्राभ्यन्तर कृष्णशुक्लमण्डलम् वाह्यमक्षिपत्रपक्ष्मद्वयादि ॥ एवं शेषेप्विन्द्रियेषुज्ञयम्।। शुदानाम मात्समनशानामिति- -शुद्धचेतनापामात्माफे प्रदेशोंसी(केमण भास्माके प्रदेशोंकी न्यारे न्यारे-पवि) निपतचामा दिइन्दिपसम्यानन भपस्थिताना विधि-निमितनप्रमादिकान्द्रियोंकेमाकारकरिमपस्थिवष्टचि(मर्याविष्टनेकीदशा) मम्पन्तरा"निचिः। सो अभ्पन्वर निधि । मर्यात्सेघमंगणके असल्यावांमागप्रमाण पिशुवमात्ममदेशोंका मो मिन भिन्न स्ससे नेत्र इन्द्रियमसूरफेमाचार,कर्ण इन्द्रिय मराठी मापनासोक भाकार सदश, नासिका इन्द्रियरे विश पुष्प भागार समान,रसना इन्द्रियके पद पन्द्रके भाकारसम, स्पर्शन इन्दिपके भनेक प्रकारक भिष मिन भाकारके समान,मौर इन सपका प्रमाण स्वस्म परिणव होना है पा भवरण निर्वति है। तपरमात्पपदपावन्दिपम्पपदशमाची -विन मात्माके(पिशुद) मदेशनिमें इन्द्रियनामके दियेमानेपर पा पारनेपर पातिनिपक-संस्थानानामस्म-उदय-मापादित- =मा प्रतिनियन(पार न्यारे पा विपित)माकार सहित नामकर्मकेउदयमनित भास्पारिशप परतपासायनिवृत्तिा॥ =विशेप दशा वा अवस्थासहिस पुगलके समूह सो परिंग निधि है। अर्थात् | उनी मात्माके विशुद्ध मदेशोंमें इन्द्रियों के नामसे कमानेबाने मिममिम भागार पाररु सस्पान नामक जदयसे होनेपाल भवस्या विशुपसे युक्त मोसपिर है ना पाप-निधि है ।। पन निलपकार क्रियते । ददृ॥ मिससे निषित पार रियामाता है या सहायता कीमाती है पर सहरसमापूर्वर ताणामपि विविधम् उपकरण । पाखेती मांति(मर्यात्नसे निष्टेपि दो प्रकार मामीदोपकार ? वत्र मभ्यन्तरम् कप्ण-शुक्र-पपरसम्वामम् ॥ =वा(िनेविषमतरंग(उपकरण)पला शुरवर्ण)संरत है। बाप (पाण) नाफनी(मावणी या विभीर भरिपत्र)मोर मौसके पचर (-प्रति-पदमना) इप मारिएरम्प" इन्दिप नामादिका ऐसे रोष(स्पर्शन-प्राण रसमा भोरप्रिोम नाममा पारि ONDDOTTA DOKOLOONID OPDOT OTT ५८ मविपत्र-पाप- सिदि २सन१८ RDaTOAAROOFACD पानिरासी मगासाय पीलरुव पदच्छेद और पिमरत्पर्य सहित सर्यसदिका शम्दशः हिन्दीअनुपाद मापा २ प १० सवाय याय भावेन्द्रियमुच्यते- ॥ लब्ध्युपयोगी भावनन्द्रियम् ॥१८॥ लम्भन लब्धि । का पुनरौ । ज्ञानावरणक्षयोपशमविशेष ॥ यत्सन्निधानादात्मा द्रव्येन्द्रि- निवृतिप्रति व्याप्रियते तन्निमित्त आत्मन परिणाम उपयोगस्तदुभय भावेन्द्रियमिन्द्रियफलम् मापन्द्रियम् । रपये 1 भापइन्द्रिय कहीमावी कि लभ्युपयोगी भावेन्द्रियम् ॥ १८ ॥ मार्य----अम्पि-उपयोगौभाग-इन्द्रियम् ॥ -सम्धि और उपयोग ( ये दो) मार इन्द्रिय । प्रत्पनुराद-जम्मन निकापुन मसौ-शाम (सी) लमि है ।(प्रश्न)फिर पा(जम्मि) पा(ना) मानावरण-सपापशम-विशेष (रघरमानावरणीय कर्मका वयोपशमरूप म्पक्तिया सका है (सोम्मि)है। मर्यादानावरणीयकर्मकेविशेषक्षयोपशममेभात्माहेबारिशुदवापीशक्तिदसोखम्भिर पत्सनिपानावमात्मासपेन्द्रियनिसिम्पविकनिस(सन्धि)कनिफठहोकरिमात्मादम्पेन्द्रियरूप निचि पति पारिपचे व-निमिया मात्पना परिणाम उपपागल म्यापारकरवाई,पणारे न्स सम्मिनिमितकमात्माफा(विषयमतिपरिणमन उपयोग अर्थात् को प्रेयरे भागार परिणमनरूप शानो सो उपयोग है वद "उमयम्"मारेन्द्रियम् इन्द्रिय-फचम्m पर दोनों मार इन्द्रिय हैं। इन्दिपका फल पा कार्य जो (१) इस स्त्रका पाठ और भर्ष दोमो समायोंमें एक है। इस वो सप और स्पराम-रसन-प्राण-प-मागाणि उप्तीसपा शके मप्पमें पताम्बरमामायके 'समाप्यतत्यार्याधिगम्भ 'पुर में 'उपयोग स्मारिशु' ऐसा सूत्र अधिक है । साविशु मतिमागापयोगा श्यर्थः । सपा-रस-गरप-पप-समात्रियों के विषय मोबानप उपयोग होता । पेसा भय इस सूझका है। हमारे यहो इसको मूलसूरा मही माना है। समापने मनुयाइकन यह टिप्पणी रस पत्र में दी कि किसी किसीके मतमें यह मूलमत्र महीं है कोई कोई कहते हैं या न सूत्रहा हैमाणनहीं (रास विसी जीपकी सुननेकी शक्ति परंतु उपयोग मो चैतम्य परिषमन है सो अन्यत्रहो अन्य पस्तुभौमें लगरहा हो वौसुनसानही मीर कौर आमनाचाताह और पोपशम चिनहीं है तो मा सक्ता इसलिपे सम्णि और उपयोग जब दोमो ही मिते तपमानकीसिदि होती है। DOQEBOTTOOTROCIEOCIEGOROOTI aCOUNDERGROORare ५६ सवार्थ सर्वा सिद्धि सुत्र१८ ५८ ANTOHIROEMOTIONALDOHOvautam एरानियासी मगरूपसहाप पोस मत पदभेद और रिमक्स्पयंसहित सार्यसिरितिका शवशा हिन्दी अनुपाद अध्याय २ व १८ शुद्धानामात्मप्रदेशानां प्रतिनियतचक्षुरादीन्द्रियसस्थानेनावस्थिताना वृत्तिरभ्यन्तरा निवृत्ति । तेप्यात्मप्रदेशेप्विन्द्रियव्यपदेशभातु य प्रतिनियतसंस्थानो नामकर्मोदयापादितावस्थाविशेष पुदलप्रचय सा बाह्या निवृति । येन निवृते रूपकार क्रियते तदुपकरणम्॥ पूर्ववत्तदपि द्विविधम् तत्राभ्यन्तर कृष्णशुक्लमण्डलम् बाह्यमक्षिपत्रपक्ष्मद्वयादि ॥ एव शेषेष्विन्द्रियेषुज्ञयम्।। गुदानाम्मात्ममशानाम्मति- -शुदधेतनापामारमा प्रदेशों की पख मात्माफे प्रदेशोंडी)न्यारे न्यारे(पति) नियवरामादिलियसम्पानन ॥ भरस्पिताना चिनिमितनप्रमादिकान्द्रियोंकेमाकारकरिभरस्थिवष्टचि(अर्यान्विष्टनेकीदया) मम्पन्तरानिचिः =सो भम्पन्वर निर्दृचि है । भर्यात्सेषमंगलके असम्पातांभागममाण विशुदभास्समदेशोंका भो मित्र मिल ससे नेत्र इन्द्रियोमसोभाकार,कर्ष इन्द्रिय मरकी मध्पनाखोक माकार सदश, नासिकाइन्द्रिय विल पुष्प प्राकार समान,रसना इन्द्रियके भर्द पन्द्रफे माफारसम, स्पर्शन इन्द्रिपके भनेक प्रकारफ मिम पिम माकारके समान,और इन सपका प्रमाण स्वरूप परिणव होना है या भवरण निर्मचि है। समारपमदराशरदिपम्पपदशमाचा -विन भत्मिा विशुद्ध) प्रदेशनिमें इन्द्रियनामके दियेमानेपर पा पारनेपर पश्मतिनिपत संस्थानानामर्म-रप-मापादित- मा प्रतिनियव(न्यार पारे पा निपिव)माकार सहित नामकर्मकेउदयमनित भवस्याविशप पलभपयः सामानिति विशेष दशा या भगस्पासहित पुद्गलफे समा सो परिरंग निर्दचि है। मर्यात् जी भास्माफे निशुद प्रदेशोंमें इन्द्रियों के नामसे कोनानेवाखे भिममिम भागारों के पारक संस्थान नामर्मउदपसे होनेपाल भवस्या विशेपसे युक्त मा सपिंड है पर पान-निति है। पन निरीन रिपकार क्रिया T नद्॥ समिससे निचिका उपहार हियामावापा सरायवा कीनावी रेया पारणम्"पूर्वदन् वदृष्णमपि विविध पारण । पालेकी भांति(मर्यात्मैसे नित्ति दो प्रकार मामीदोमकार है व मम्पन्तरम् कपण-शुक्र-मएरसम्वायम् =ता(नेविष) भंवरंग(उपकरणाला शुक(वर्ण)मरता है। पात्र (उपकरण) बाफनी(मावणी या विभीषिपत्र)मौर भालके परक (प्रति-पम्ममा) इप मादिगएरम्प इन्द्रिप"। या माविका ने रोष(सर्शन-माण रसमा भोगाधिपाम नाममा TOTALCONTROLIOONDOMOONROONDONLOAD ५८ भविषय-पम- " स्वार्थ अध्याय ekinBORRIDORENDOME सिदि सुत्र anNDO ॥ स्पर्शनरसनध्राणचक्षुःश्रोत्राणि ॥१६॥ लोके इन्द्रियाणां पारतन्त्र्याविवक्षा दृश्यते । अनेनादणा सुध पश्यामि, अनेन कर्णेन सुष्ट श्रृणोमीतिातत पारतन्त्र्यात्स्पर्शनादीना करणत्व। वीर्यान्तरायमतिज्ञानावरणक्षयोपशमा- स्पर्शनरसनघाणचनु श्रोत्राणि ॥ १९॥ -स्पर्शनरसनघ्राणपामाप्राणि (एतानि पम्वेन्द्रियाणि भवन्ति) । (पापा सूत्र भनुचि रूपमें इस मूत्र में भाताई। स्नाये --स्पशन-रसन-प्राण- चम्भोमाणि "एतानि त्वचा(वा) मीम,नाम(नासिका),नेत्र मौर कान ये पम्पन्द्रियाणि मपन्ति T -पाप इन्द्रियों में भर्याद मानकरानेमें सायक होनेसे इनको इन्द्रिय कारें मुत्पनुपादा-चाका इन्द्रियाणाम!"पारतनपा-पिता" -खोपमा ससारमें इन्द्रियोंके परापीन विषचा वा भपेक्षा रिपोभनेनीमणा मासष्टपपरपायि T देखीभाती है।इसनेप्रसे मजप्रकार देखवाई(भक्ष्णा भति'शम्दका । भनेन भवन मा.मृणापियामि तपारवन्ध्यान इस पानसे नीचे मुनवाई । वहां परापोनवासे स्पर्शनादीनाकरणस्त्वम् । त्पपा(इन्द्रिय)मादिफ फरणपना है अर्याद खोकमें इन्द्रियों के सकार्य करनेमें परसंप्रदा भनुमपमें भाती है इसलिये स्पशन मादि फरणसापन में क्योंकि जिस समय इन्द्रियोंकी परतापसे पिवताको भाती है और भात्माको स्यातम्य मानानावा है उस समय में इस भालदारा भले प्रकार देखता है। मैं इस फान द्वारा मजे मकार सुनवाई। 'में इस नासिका द्वारा मले प्रकार संघवाई। में इस भीम द्वारा मजे मकार पखवाई। इस हाय द्वारा पा शरीर के किसी अन्य भमपव द्वारा मले प्रकार स्पर्शनकरवाई ऐसा व्यवहार होया है। यदि इन्द्रियोको करणसापन न माना जाने वौ संसार म्पपार नहीं रोसफसा ।। (भाषार्य करण साधनको नीचे विशेषरुपसे समझाते हैं) वीर्यान्वरायमविमानापरणसपोपशम- बीर्यान्वरापनामा पविभानावरण धर्मका प्रयापशम और (२) त्येताम्मर भानाप समाप्यवरषायाधिगमसूत्र में पर सूत्र रामसायही है जो हमारे यह प्रथमी एक है परंतु समाप्पध्मे इस म को संम्या पीसह क्योकि अठारहवा सूधकेपीछे समाप्प में उपयोगा स्पषिपु' ऐसा उमीसा सूप है। और हमारे यहा ऐसा उन्तीसपा सूत्रनहीं है। MODUKO ORATORIO PODCROCIDOCOROAD 1920 ६१ मघा सिद्धि HOOD मध्याय सत्र१८ १० पानिरासी नगरूपसहाय मफीन कव पदच्यद और विमरस्पर्ष सहित सर्वार्थसिदिका शन्दश हिन्दीभनुपाद अध्याय २ सूत्र १८ उपयोग ,तस्य कथमिन्द्रियत्वम् कारणधर्मस्य कार्ये दर्शनात् । यथा घटाकारपरिणत विज्ञान घट इति ॥ स्वार्थस्य तत्र मुख्यत्वाच । इन्द्रस्य लिङ्गमिन्द्रियमिति य स्वार्थ स उपयोगो मुख्य । उपयोगलक्षणो जीव इति वचनात् । अत उपयोगस्येन्द्रियत्वं न्याय्यम्॥ उक्तानामिन्द्रियाणा संज्ञानुपूर्वीप्रतिपादनार्थमाह - उपयोग नस्यव्यम् इष्ट्रियत्वम् -उपयोग है । विस (उपयोग) के इन्द्रियपना कैसे है कारणर्मस्पन कार्य दर्शनाद ।। (उपयागको इन्द्रियका कार्य होक्सत ) पार्यमें पारणधर्मफे देखनेसे पा म्यपहारसे (उपयागः इन्दिपपनेश पचार किया मया ) है अर्थात् मो कारणका धर्मो विसको कार्य रि भो देखिये पपा पयारपरिणवरिशानं पाति-जैसे पटाफ भाकर परिणम्पासान घट ऐसा (फा मावा ) रे स-मपस्य वर० मुस्पला "प =मार क्योंकि वहां स्वमर्थक मपानपना है मर्याद कार्यमी बोकमें कारण मानागया? मिस प्रकार घटाफार परिणत मान घटसे जो समान होनसे घटका मार्य है तथापि उस विमानको पठ कादिया नावाईसी प्रकार उपयोग पयपि ईदियोंसे माययान हानेसे उनका फल तपापि वा(उपपागोइन्द्रिप कामासकता है इसलिये उपयोगको मावेन्द्रिय मानन में कोई भापति नही यस्प लिइन्दिपम् । इतिश्पसार्य -मास्मा(मन्द्र)का लिंग इन्द्रिय है। ऐसा नो स्त्र-मर्यरे मसामयाग सपासपागसपणा नौवा-सो रपयाग मुस्प है। उपयोग के लक्षण निसरा पहनीपर इतिगपनान् ।मन उपयोगस्य इन्द्रिपत्वम्-क्योंकि ऐसा रन है। इसलिये उपयाग इनिपपना न्याप्यम् रक्तानाम् इन्दिपाणाम् ॥ सपा--पपार्य पा ठीक है। पित इस्त्रियों माम ( और ग्ना) मानुपा(-मनुपूर्वी-मविपारमप्रमाभार-प्रम(मनी वा भाजलाने पर रेडि सार्थ पायाय TERPANDEO सिद्धि सुत्र GHORRIDORixeo-TOOMHDOxDOriRDONIRDOARDORAKe ॥ स्पर्शनरसनधाणचक्षुःश्रोत्राणि ॥१६॥ लोके इन्द्रियाणां पारतन्त्र्याविवक्षा दृश्यते । अनेनाक्ष्णा सुष्ट पश्यामि, अनेन कर्णेन सुष्ट श्रृणोमीतिातत पारतन्त्र्यात्स्पर्शनादीना करणत्व। वीर्यान्तरायमतिज्ञानावरणक्षयोपशमा- स्पर्शनरसनघ्राणचन श्रोत्राणि ॥ १९॥ स्पर्शनरसनमाणपतुःयात्राणि (एतानि पञ्चेन्द्रियाणि भवन्ति) । (पदहवां स्त्र भनुचि रूपये इस सूत्र में भावा) समाप -पशन-रसन-प्राण-पाभोपामिएसानि" -सचा(त्वक) नीम,नाक(नासिका),नेत्र मौर कान ये पम्पन्द्रिपाणि भवन्धि -पांच इन्द्रियों में भर्याद मानकरानमें सहायक होनसे इनको इन्द्रिय करते? प्रत्यनुराद -साकन्द्रियाणाम् पारवनया-विष" -लोक पा ससारमें इन्द्रियों पराधीन निषसाचा भपेक्षा एपवाभनन मणामुष्टुप्पश्यामि । देसीमासी हाइसनेप्रस भलाकार देसमाई(मक्ष्णा मति'शम्दफा है) भननावणेन ० भृणोमियातितकापारवनया" -इस कानसे नौके सुनवाई । वहां परापोनवासे सर्शनादीनामकरणतम् -त्वमा(इन्द्रिय)मादिफे करणपना १ अर्याल खोस्में इन्द्रियों के सकार्य करनेमें परवंत्रता भनुभपमें भाती है इसलिये सशन भादि करणसापन में क्योंकि जिस समय इन्द्रियोंकी परवयरूपसे विरताको भावी है और भात्माको स्पायय मानामावा है उस समय में इस माखदारा मले प्रकार देखता हूं। मैं इस कान द्वारा मने प्रकार मुनवाई। 'में इस नासिका द्वारा मले मकार संघताई। में इस मीम द्वारा मले प्रकार पखवाई। इस पय द्वारा पा शरीर के किसी अन्य भपयष द्वारा पचे प्रकार स्पर्शनकरवाई ऐसा व्यवहार होता है । यदि इन्द्रियोंको फरणसापन न माना माथै वो संसारमै म्यपार नहीं सकता ॥ (माघार्य करण सापनको नीचे विशेषरूपसे समझाते हैं) बीन्दिरायमविज्ञानावरणपोपशम- बीर्यान्धरापनामा मविज्ञानापरणं फर्मका सयापशम और (१) स्वेताम्र मानायकसमाप्यवरषायाधिगमन में यह सूत्र रामरावही है जो हमारे यहां है अर्थमी एक है परंतु समाप्यमे इस सूत्रफी संख्या पीसी पयोकि अठारहया स्वकेपी समाप्यमें उपयोगा स्पाविपु" ऐसा उन्नीसा है। और हमारे यहां ऐसा उन्तीसप ध नहीं है। 1.RPLIT IDOLOCADOR ६ मनाथ प्रध्याय सिदि २सुन२० DROOpeomoAMDeareena पगनिवासी नगमासहाय कोजकत पदच्छेद और विभात्पर्य सहित सर्पिसदिका शम्दशः हिन्दी मनुवाद अध्याय २ सूत्र १८ स्पर्शरसगन्धवर्णशब्दास्तदर्थाः ॥२०॥ द्रव्यपर्याययो प्राधान्यपिवताना कर्मभावसाधनत्व स्पर्शादिशब्दाना वेदितव्यम् ॥ द्रव्य- प्राधान्यविवक्षाया कर्मनिर्देश । स्पृश्यत इति स्पर्श ।रस्यत इति रस । गन्ध्यत इति गन्ध । वर्ण्यत इति वर्ण । शव्द्यत इति शब्द॥ पर्यायप्राधान्यविवक्षाया सूत्रम्- स्पर्शरसगन्धवर्णशब्दास्तदर्था "॥ २०॥ स्पारसगन्धवर्णशब्दा तद्-अर्था (यथाक्रमम्) ॥२०॥ गाय -स्पर्श-रस-गर-वर्ण-शन्दा ययाक्रमम्-स्पर्श,रस,गंध,रण,मौर शम्द (य पांच ) मस व-भयो । =उन(पांचो इन्द्रियों)क चिपय भर्यात् इनमें स्पर्शन इन्द्रियका विषय स्पर्श वा एना है,रसना इन्द्रियका पिपप स्वाद जना है,घाणान्द्रियका विपय मुगप और दुर्गप सपना है। नेत्र इन्द्रिया रिपय वर्ण अर्याद रंग है और भाप इन्द्रियफा विषय शम्दोका मुनना है। उत्पनुगद -दम्पपर्याययो मान्पपिवतायाम्फर्म-=ष्प और पयायकी मुख्य प्रपेनामें कर्म (साधनपना भार) मा-सारनतम् गपशादिगम्दानामिविवष्णम् =मान साधनपना(यथासस्पास्पशादिक शन्नोंके जानना चाहिये । इन्य-पापापविश्यायाम कम-निर्देश स्परपवेत म्यमधान पिवतापि कर्मणि प्रयोग है। मो सरर्या गावा? इतिवमर्श रस्पन विस =ऐसा सर्श है। मो भास्वादा मावा है ऐसा रस है गातातिगन्धवपर्यता इतिश्वर्ण मो संघामाया है ऐसागर है । भो देस्सा माता है ऐसा पर्ण है पताइतिकशासापाय माघान्यविरमायाम्।। =मा मनोमावा है ऐसा राम है। पापकी मुस्प अपेज्ञास (1) तयाः"पापपणाममें शेवाम्परनामापरे समाप्यतार्याधिगमन में पर्या 'पाक्य मापा है। इससे प्रय, का मे नही पड़ता पर कित्ता तात्पप तिनल, एमाप मर्प देवाम् जापान ममम तिन पाच दिपायपि OROORNO OSRD ONDONBONO ANO NOIROH MOAHATO १५ (२) गगनाममम्मीचमानिनीपानीरा नरामीन सिदि २सूत्र. HDGAGAIMBeneZIABORTOOARDOORDomaaseD भावनिश , स्पर्शन स्पर्श रसनं रस ।गन्धन गन्ध । वर्णनं वर्ण शब्दन शब्द एषां क्रम मवाथ इन्द्रियक्रमेणैव व्याख्यात अत्राह यत्तावन्मनोऽनवस्थानादिन्द्रिय न भवतीति प्रत्याख्यात व्याया तत्किमुपयोगस्योपकारी उत नेतितदप्युपकार्येव तेन विनेन्द्रियाणा विषयेषु स्वप्रयोजनवृत्य भावात् किमस्यैपां सहकारित्वमात्रमेव प्रयोजनमुतान्यदपीत्यताह- मापनिर्देश -मानेपयोगी मर्याद म्याकरणमे कर्मपाम्प, पाय मौर भावराप्य वीनप्रकारचे धातुओंक प्रयाग है। मन रमीसमें बहुत पिशपम्पस बर्मरपनका अनुवाद पृष्ठ६१ पंक्ति हसे १० वर और पृष्ठ २२ के पकिस १५ तक और कामचनका पृष्ठ६२ पंक्ति १४से १८त मौर पृष्ठ६३ क पंकि३ से - कक सम्स किया है। मापसापन,मावपचन, अपवा माषप्रपोग मर्याद किया इसमकारसे पाप खाना लिमिससे उसकी मारसपी मनस्या पा यया प्रगट होमाचे, इस पृष्ठ ६५ की पक्ति ११,१२ नीचे में जाते है कि स्पशन सरसन पारस स्पर्शना मा पना सो स्पर्श है। रसना सो रस गन्धमानपावणगावणम्दनम्शमा सपना सा गंप है। देखना सो वर्ण है। शम्बहाना सो शम पपाक्रिम दिपक्रयेण एव०म्पास्याव मनाविपयों का मनुवम इन्द्रियों के फ्रमकरिसी कहा गया मप्र०मारापावापत् मनोऽपस्थाना इन्द्रियाय पंथवा है कि मो मन वो (चावत् ) भनपस्पिव गनेसे इन्द्रिय नक्रमपवित नही रे मर्याद मनक अपस्पान या स्थिवि नती है इससे इन्द्रिय नहीं है इतिमत्याख्यात गव"किम् "पयोगस्परिपकारीम-पेसे(मनक इन्द्रियपना) निषेभ्या है। क्या (पा मन) उपयागका उपकारी उतम्न इविश्वमपि उपकारी एप तेन विना पानहीं (मोफोहितभी(म्तमपि बहमन)पकारीहीहफ्योंकिविस(मन)पिना इन्द्रियाणा विषयपुर स्वप्रयामनवृत्ति-प्रमावाद इन्द्रियों के विषयोंमें अपने अपने प्रयोजनम्प प्रवृत्तिका प्रभाव है किम् मस्सएपाम् सारिलमानम् क्या इन(इन्द्रियों) के इस(मन) सहकारिपन मात्र एस प्रपोमनात मन्यत् भपिकमत'मा भी प्रयोमन , प्रयया और भी (कुछ प्रयोजन) है। इसलिये कावे मापा स्पर्शन मादि इन्द्रियों के समान मनका कोई निश्रित स्थानना इसखियेवा दिया वियपनेका निपेप किया गया में OTODITOOTOURB JOIN नाम- सिद्धि सत्र २२ मवार्य मध्यया ८ DOE PRATOPOOM एक प्रथममित्यर्थ । किं तत् । स्पर्शनम् । तत्केषाम् । पृथिव्यादीनां वनस्पत्यन्ताना रेदितव्यम् ॥ तस्योत्पत्तिकारणमुच्यते ॥ वीर्यान्तरायस्पर्शनेन्द्रियावरणक्षयोपशमे सति शेफे न्द्रियसर्वघातिस्पर्धकोदये च शरीरनामलामावष्टम्भे एकेन्द्रियजातिनामोदयवशवर्तितायां च सत्यो स्पर्शनमेकमिन्द्रियमाविर्भवति ॥ इतरेषामिन्द्रियाणा स्वामित्वप्रदर्शनार्थमाह- कृमिपिपीलिकाभ्रमरमनुष्यादीनामेकैकवृद्धानि॥२३॥ स्पनराद-एममयमा विश्व किमावदा सूत्र एक शब्दा) पदिला,मवप ऐसा भपिमाप है। (परिणा) पारे। नम्न पाम पिरो-मादीनाम् । सर्शन मर्यात् सपा(इन्द्रिय)है। पह(सर्थन इन्द्रिय)किन है। पृथियो मादिक सनस्पति-मन्नानाम पदितम्पम् तस्या उत्पति निसरवि पर्यन मानना चाहिये । सिस (स्पर्शन इग्निप) का उत्पत्तिका परम्पपीताप-सन्दिप - कारण कामाता है। वीर्यान्तराय और स्पर्शन इन्द्रिय भारणपापा सति प० शप- माररणनामा(मानविरणार्मर परोपशम सनपर और रसना मादिमाशेष दलिप सरंपातिसर्प-उदपे। इन्दिप सकपी(शानापरण)समयाति सई कोस पप (होने) पर गरोरापनाप-प्रम्प शरीर नामा नाम:म रदयक जामका प्रपसम्पन(रोने) पर और-प) एन्दिपमानिनाय-उदय- पतिवापा। सकेन्द्रिय मावि नायक नापकरे दया पार्विपना वा पशीभूवपना सरगाम्पशनम् । दम्पन्द्रिपम्मानिर्भवति मानेपर( सस्पाम्) (मीर) एक सर्शन इद्रिय मगट दोषो रे।। सरपाम् मनिपासाम्पस्थापित प्रदर्शन भर्पmमार-मन्य इन्द्रियों के स्वामीपना दिम्मान के लिये करते हैं कि सूत्रम् कृमिपिपीलिकाधमरमनुष्यादीनामेकैकवृद्धानिा('स्पर्शनइन्द्रिय'कीअनुवृत्ति१९,१५सूत्रोंसेहै) मग-मि-पिपोनिध-प्रपर-पनुष्पादीनाय स्वा,गिहार(कमि)मादिर,पिटीमादिक,मौरामादि मनुष्यमादियो 1१) गपगारे भागे ऐमा जाम पाहिं पापमोचि इससे गोपात्ताप-स्थान्त्रिप-मापरणपोपरामसति वासन मिताना 'गवरनाASTRAREमे बाम स्थाल पाति में शरागापोगसामापभन्ने ससेपपासालानीने मा शरीरमाग मामा माममा काम पाहिला संता ऐमानुसार यिाशमस्या और भगोनाममा meODPORNOON MORMONS ----.-..-सीमनगमा कारभार सामगनप सिद्धि सत्र२३ , ANNONCOMOON ROONITORUM TO THE STAR OROA पटानिगासी मममसाय पीसकर पायेद और मिक्स्पर्व सहित सर्वार्यसदिय शमशा हिन्दी मनुवाद प्रापाप २ सत्र २३ सर्याय एकैमिति वीप्सायां द्वित्वम् । पकैकेन वृद्धानि एकैकवृद्धानि ॥ कृमिमादिं कृत्वा, स्पर्शना- धिकारात् स्पर्शनमादिं कृत्वा एकैकवृध्दानीत्यभिसम्बन्धः क्रियते ॥ आदिशब्द प्रत्येकं परिस- माप्यते । कृम्यादीनां स्पर्शनं रसनाधिकम् । पिपीलिकादीनां स्पर्शनरसने प्राणाधिके । एक-परुम समुदानि सिर्शन इन्द्रिय पमाद) एक (इन्द्रियाती प्रात् घट इस्मादिकों स्पर्शन और रसना दा इन्द्रिय । विगै स्वादिलों के स्पशेन, रसन, माण ये तीन इन्द्रिये मारा,पटिका,येसी,इस्पादिका सनसन प्राण-पतु ये पार इन्दिप है और मनुष्य,मत्स्प गौ, सर्प इत्यादिको सान-रसन-माण-पतुः भात्र ये पायौ ही इन्द्रियों में इत्यनुरादा-एकोमा विकासापादित्वम् एक-एक ऐसा पारपारकेभव (भीप्सापाम्) दावार (व) एम-एसनानदान एकएकरकमानसार दो इन्द्रिपस पाप दियमातीपा भषिक दोषी भावी एकपदानि सर्शन-मनिकाराद -तो"एकदानि"बाईसास्त्रमें) स्पर्शनान्द्रियकामकरणहोनेसे पारिपयानेसे कपिम्मादिम त्या- स्वर्शनम् ाभाविकृता (इससूत्रम) कृमिका भादिकर और (इन्द्रियनिमें स्पर्शन को भादिकर (कपसे) ए-दानिविभमभिसम्पन्ध मिया एक एक (इन्द्रिय) बटती है। इसमभार सम्पन्ध (इस सत्रमे) किया है मादिशम्या प्रत्येम्परिसमाप्यते । मादिशम्(इपि-पिपीलिका-पर-मनुष्य)प्रत्यकका गाया गाई वा मोहागया इस समस्त उपयुकता सरांग सा कि पनसस्पन्नानायकम् सरसे स्पर्शन एम् कीमनुषधि इस सूप्रमे खेर इन्द्रियों की अपेघासे स्पर्शन इन्द्रियको मवम प्राणार पोदार्शन--सन-प्राण-पत्र-प्रोप्राणि' इस सबसे प्रमानुसार एक एक इन्द्रियो दि रसना मे भार पर्यंत प्रत्येक कमिभादिक, मस्येक पिपिलिका आदिर, प्रत्येक भ्रमर प्रादिक और प्रत्येक मनुष्य मावि यथासप होतीमासी है जैसाकि चिमें निम्नलिन्ति उदारणों स प्रमट है।। कमियादीनाम स्पर्शनम् ॥रसना(रसन) भपिकम् ॥ कृमि मादिक रसनाभरि भषिक स्पर्शन इन्द्रिपोगकिमिमादि स्पर्शन-नसन दिवासि-मादीनाम् प्राण भधिक सर्शन-सने चिउटीभादिकॉनासिकाकरि,भधिकत्तपा,रसनादभिर्यानत्वचा,रमन,ौरमाण ABORTHDARDOINEDROORBOARDENROETDC मया ध्यया सिद्धि सुत्र२२ २३ OWOXIMO OXTA OMITOMOONTOORROOM NO mouTWOO एक प्रथममित्यर्थ । किं तत् । स्पर्शनम् । तत्केषाम् । पृथिव्यादीना वनस्पत्यन्ताना पेदितव्यम् ॥ तस्योत्पत्तिकारणमुच्यते ॥ वीर्यान्तरायस्पर्शनेन्द्रियावरणक्षयोपशमे सति शेषे न्द्रियसर्वघातिस्पर्धकोदये च शरीरनामलाभावष्टम्मे एकेन्द्रियजातिनामोदयवशवर्तितायां च सत्या स्पर्शनमेकमिन्द्रियमाविर्भवति ॥ इतरेषामिन्द्रियाणा स्वामित्वप्रदर्शनार्थमाह- कृमिपिपीलिकाभ्रमरमनुष्यादीनामेकैकवृद्धानि॥२३॥ रयनगद -एम्मपमम् इति०माकम् (मत्र एक शम्पा) पशिखा,प्रथम ऐसा ममिमाय है। पा(पशिखा) क्या है ? सानम् नमाम् पपिपी-मादीनाम्।। स्पर्शन अर्थात् सपा(इन्द्रिय)रे । पा(सर्शन इन्द्रिय)किन है। पृथियो भादिक पनस्पति-मन्नानामपिदिकम्पम् स्पा उत्पति जनसति पनि मानना पारिये । विस (स्पर्शन इन्द्रिय) का उत्पचिका पारणम्रप्पते पीपान्तराप-शनन्दिप कारण सामाता है । पीर्यान्सराय और स्पर्शन इन्द्रिय भारणमयाराम सति परोप- माररणनामा(मानापरण)कर्म वयोपशप होनेपर मोर रसना भादिमवशेष पटिय सम्पाविसक-उदये। इन्द्रिय सपपी(झानापरणर्मका)सपपासि सईको रदप (होने) पर गरीर नापलाम-ममटम्मेप -शरीर नामा नामकर्मफे उदयक लाभका भरसम्पन(होने)पर और(प) एन्दियमाविनाय-उदय-पशचर्वितापा। एकन्द्रिय मावि नापक नापकर्मरे उदय पशपविपना पा पशीभूतपना सरसाम्पशनम् एकम् इन्द्रियम्। मानिर्भवतिा डानेपर( सत्याम्) (मीवर्फ) एक स्पर्शन इदिय प्रगट होती है। इसरणाम दिगणाम् स्यापित्त-मदर्शन मामा-मन्य इन्द्रियों के सामीपना दिमापने के लिये कावे हैं कि मूत्रम् कृमिपिपीलिकाममरमनुष्यादीनामेकैकवृद्धानिा('स्पर्शनइन्द्रिय' कीअनुवृत्ति१९,१५सूत्रोंसेहै। स्वार्थ:-काम-पिपोलिय-भ्रपर-मनुप्यादीनानी जट,गिदार( कमि)मादिक,पिम्टोमादि मारामादि,मनुष्यमादियों 1१) ग' गपरे मागे पमा मान पाना 'सति पापोर पोंकि इससे पोपान्तराप-स्पहनेन्द्रिय-मापरणश्योपरामसति" पारय मितानबरो। (शरीरमामलामपम्मेवाक्पके स्थानमै रामवातिक मैंगरीपंगापगहामापप पार ससेपल्पनासालनीने पर गरारप्रयाग नामा माममतामय प्रामिलहोता सता ऐमामनुवाद दिया।सस्पारे अनुवाइने शरीर भीरमगोपांगनामकर्म माम गनपर एमा अनुषार किया है। रोताहर भोर दिगम्बर होना मामार्यों में रम मूगका पार और मयं एक साल ८ प्राध्याय सुत्र२३ QUTOKOOKOONHOEDDONDOOMDUNDONO पानिमासी मगरूपसाप परीवकत परच्छेद और रिसस्पर्य सरित सार्यसविका शमश हिन्दीभनुराद भध्याय २ सूत्र २३ एक्कमिति वीप्सायां द्वित्वम् । एकैकेन वृद्धानि एकैकवृद्धानि ॥ कृमिमादिं कृत्वा, स्पर्शना- धिकारात् स्पर्शनमादि कृत्वा एकैकवृध्दानीत्यभिसम्बन्ध क्रियते ॥आदिशब्द प्रत्येकं परिस- -माप्यते । कृम्यादीनां स्पर्शन रसनाधिकम् । पिपीलिकादीनां स्पर्शनरसने घ्राणाधिके । एक-एम् सदानि 1 (स्पर्शन इन्द्रिय पमाद) एक ए (इन्द्रिय)परती है भर्पाद खट इस्पादिकोंफें स्पर्शन और रसना दा इन्द्रिय हैं । चिठी इत्यादि स्पशेन,रसन, प्राण ये तीन इन्द्रिय रे मोरा,मतिका,टोरी,इस्पादिका स्पर्शन-रसन घ्राण-पनुः ये पार इन्द्रिये हैं और मनुष्य,पत्स्य गो, सर्प इस्पादिकों स्पर्शन-रसन-प्राण-पतुः भान ये पांचो ही इन्द्रिया रे वृत्त्यनुवादा-एकैकम् ॥ इविनाप्सायोपद्वित्वम्-एक-एक एसा बारपारफेमयमें (पीप्सायाम्) दो पार (सूत्रमें) एक-एकनावदानि एएम(प्रमानुसार दो इन्द्रिपस पाच इन्द्रियत)महतो ना अधिक होती मावीरे एकैपदानि सर्शन-भपिकारात म् सो“एकै कष्टदानि"बाईसरास्त्रम) स्पर्शनान्द्रियका प्रकरणहोनेसे वा पिपयहानसे कपिम्भादिम्। स्या-सर्शनम् मादिम्णता (इसमें) कृमिको भादिकर भौर (इन्द्रियनिमें)स्पर्शन का भादिकर (क्रमसे) एस-एक दानि विश्मभिसम्पन्ध शकिपता -एक एक (इन्द्रिय) परवी है । इसप्रकार सम्पन्ध (इस प्रमे) किया रे मादिशम्दा प्रत्येकम् परिसमाप्यते । मादिशन(कृमि-पिपीलिका-भ्रमर-मनुप्योमत्याकका लगाया गया है वा मोदागपारे इस समस्त उपर्युक्कका सरांश पर कि वनसत्पन्तानामेकम् सत्रसे स्पर्शन(-एकम् कीभनुचि इस सूप्रमे सकर इन्द्रियोंची अपेनासे स्पर्शन इन्द्रियको प्रथम ग्राणरि पमो स्पर्शन-रसन-प्राण-पक्षः-योपाणि' इस सूत्रसे क्रमानुसार एफ एफ इन्द्रियको सहि रसना से मात्र पर्यंत प्रत्येक कृमिमादिष, प्रत्येक पिपिनिका मादिर, मत्येक भ्रमर भादिक और प्रत्येक मनुप्प भादिकके ययासस्प होतीमावी है मैसाकि चिमे निम्नलिग्वि उदाहरणों स मगट है ।। कृमिमादीनाम स्पर्शनम् ॥रसना(रसन)मपिकम" कृमि मादिक रसनाकरि भधिक स्पर्शन इन्दियापार्यामिमादिकें स्पर्शन-रसन है पिपीलिका-भादीनाम् माण भपिके स्पर्शन--सने-चिउटीमादिकोंकॅनासिकाकरि,मधिकत्वमा,रसना।मत्त्वचा,रमन,ौरमाणे ANDONDONLOODarseasoURBOAROBAROO मवाय प्यपा२ सिद्धि सत्र२२ CARDOIRAO Our OARDOINDEAON एक प्रथममित्यर्थ । किं तत् । स्पर्शनम् । तत्केषाम् । पृथिव्यादीनां वनस्पत्यन्ताना वेदितव्यम् ॥ तस्योत्पत्तिकारणमुच्यते ॥ वीर्यान्तरायस्पर्शनेन्द्रियावरणक्षयोपशमे सति शेषे- न्द्रियसर्वघातिस्पर्धकोदये च शरीरनामलाभावष्टम्भे एकेन्द्रियजातिनामोदयवशवर्तितायां च सत्या स्पर्शनमेकमिन्द्रियमाविर्भवति ॥ इतरेपामिन्द्रियाणा स्वामित्वप्रदर्शनार्थमाह- कृमिपिपीलिकाभ्रमरमनुष्यादीनामेकैकवृद्धानि॥२३॥ उम्पनुगदा-एमयमा पतिकम किम्वद (मध एक शम्मका) पदिला,मयम ऐसा ममिमाय है। पा(पदिखा) क्या है ? पानम् मनपा पपिपरी-मादीनाम् स्पर्शन मर्यात् वपा(इन्द्रिय)है । पह(स्पर्शन इन्द्रियनिक है। पृषिषी मादिक पनस्पति-मन्नानादितम्यम् वस्प" उत्पत्ति जनसवि पनि मानना पारिये । विस (स्पर्शन इन्द्रिय) का उत्पत्रिका भरणम्रप्पते पोपान्तराप-सनिन्दिय - कारण कामाता है। पीर्यान्तराय और स्पर्शन इन्द्रिय भारणप्रयापशप समिप शप- =मापरणनामा(शानावरण)कर्मदे सोपग्रम होनेपर और रसना मादिमाशेष इन्द्रिय सर्पपातिसर्पह-दये। नन्द्रिय सपपी(मानापरणकर्मा)सपघावि सर्वका रदप (होने) पर शरीर नायताप-मम्मेप -शरीर नामा नाममर्मफे उदयफ नामका प्रपनम्पन(ने) पर मौर(-च) एकदिपमातिनाप-उदय-पशवर्तिवापा।" -रफेन्द्रिय मावि नापक नापकर्म के उदयक परावर्तिपना पा षशीभूतपना सस्गामा सशनम् एकम् ॥न्द्रियम्"मारिर्मगतिा मानेपर( सस्पाम्) (मीबई) एक स्पर्शन इंद्रिय प्रगट होती है ।। सरवान्द्रियाणाम्णस्यामित पदर्शन भर्यम्।।मा-मन्य इन्द्रियों के स्वामीपना दिमावनके खिय करते हैं कि सूत्रम् कृमिपिपीलिकाधमरमनुष्यादीनामेकैकवृद्धानिा('स्पर्शनइन्द्रिय'कीअनुवृत्ति१९,१५सूत्रोंसेहैं। मार्ग--मि पिपीलिका-भ्रमर-मनुप्पादौना। -जर, गिहार(कपि)मादिक,चिटोमादिक्के,मोरामादि,मनुष्यभादिकों ) गप गरे मागे एमा जान पाना 'मति वापराप पॉपि इससे बोपम्तियप-स्पानेन्द्रिप-प्रापरसम्योपरामसति पारमितामरागीरमामलाममाम्मे वापरे स्थानमे सवानिक मशागापांगतामापपाने पार ससेपम्पमालालानीने भर गार गापांग मामा मामलामी मामिलहोता सता ऐसाधनुपाद विपासप्याके अनुपापने शरीर और गोपागनामकर्म के माम नपर' पमा अनुवाद घ्यिा है।शेतार मोर दिगम्मर दाना मानापम रम का पाठ और मयं परमार OMROMODeeNOOOOOTI १८ सिद्धि सुत्र२३ . FOTOCHROBARABANDOLADOONILOOLBOADCAMD पानिरासी मगपसाप पकीसव पदच्छद मौर मिक्स्यर्य सहित सार्यसदिका शमशः हिन्दीमनुसाद मण्याय २ सूत्र २५ एक्कमिनि बीप्सायां द्वित्वम् । एकैकेन वृद्धानि एकैकवृद्धानि ॥ कृमिमादिं कृत्वा, स्पर्शना- अध्याय धिकारात् स्पर्शनमादिं कृत्वा एकैकवृध्दानीत्यभिसम्बन्ध क्रियते ॥ आदिशब्द प्रत्येक परिस- -माप्यते । कृम्यादीनां स्पर्शनं रसनाधिकम् । पिपीलिकादीनां स्पर्शनरसने घ्राणाधिके । ए-एम् दानि (स्पर्शन इन्द्रिय पपाद) एक ए(इन्द्रिय) वरती है अर्थात् बट इस्मादिकों सर्शन और रसमा दा इन्द्रियात् । चिटठी इस्पादिकों पशेन,रसन, प्राण ये तीन इन्द्रिय रे मोरा,मनिका,टीबी,इतादिका स्पर्शन-पसन प्राण-पधुः य पार इन्द्रिपेरे और मनुष्य,मत्स्य गो, सर्प इत्यादि स्पन-सन-प्रास-पचा भाग ये पायौ ही इन्द्रियां है इत्यनुवादा-परम्गाइवि०पीप्सारिणहित्यम्।।"एक-एक ऐसा पारवारफेभयमें (-रीप्सायाम्) दाभार (भम) है एक-एकनादानि -ए एक(क्रमानुसार रो इन्द्रियस पघि इन्दियतापरतोरे मा भरिक दोवी माती पदानि वर्शन-मपि कारावर -सो"एफैटदानि"पाईसास्त्रमें) स्पर्शनइन्द्रियका पकरणहोनेसे का विपयरनेसे कमिमा भादिम् । स्वासनम् ॥मादिमासा (इसध्यमें) कमिको मादिकर मौर (इन्द्रिपनि)स्पर्शन को मादिकर (मसे) एक-एक दानितिमपिसमन्य नियतT एक एक (इन्द्रिय) पाती है। इसमकार सम्पन्न (इस सूध) किया है मादिशम्दा मत्पेरुम्कपरिसमाप्पते मादिशम्मकमि-पिपीलिका-भ्रमर-मनुष्य प्रत्याशा लगाया गपाई मागोडागया इस समस्त नपर्पसका सरांश पर कि वनस्पस्पन्तानामेकम्'सपसे स्पर्शन(-एकम् फीभनुएपि इस सूप लकर इन्द्रियों मपेनासे स्पर्यन इन्द्रियको प्रथम प्राणरि पादस्पर्शन-रसन-प्राण-पचुः भोप्राणि' इस सबसे फ्रमानुसार एक एक इन्द्रियको हदि रसना से मात्र पर्यंत मस्पेक कमिमादिक, भस्पेक पिपिलिका मादिष, मस्पेक भ्रमर भावि मौर प्रत्येक मनुष्य भाविक ययासस्प होतीभाती है सावि पि नितक्षिन्ति पदारणों स प्रगट है ।। कमिमादीनामीपर्शनम् ॥रसना(रसन)मधिकम् "कमि पाविक रसनारि अधिक स्पर्धन इन्द्रियागदकपिमादिः स्पर्शन-रसन है पिपीलिका-भादीनाम् घास भषिक स्पर्शन-रसने पितटीमादिकोंनासिकाकरि,अधिकत्रपा,रसनाभित्त्विचा,रमन,मौरमाण CARLIER-BIRDONEBOBEROINOONFCeEO202 सवाय सिद्धि BAMBANDORIGIsmerGERIDGRIDERECORDARRORS पगनिगासो नगरूपसहाय फोल फत पदाद मार विमपत्यर्प सहित सवार्य सिदिफा शम्दश हिन्दी अनुवाद अध्याय २ सूत्र २३ धमरादीना स्पर्शनरसनघ्राणानि चतुरधिकानि । मनुष्यादीना तान्येव श्रोत्राधिकानीति यथासख्येनाभिसम्बन्धो व्याख्यात ॥ तेषां निष्पत्ति स्पर्शनोत्पत्त्या व्याख्याता उत्तरोत्तर- सर्वघातिस्पर्धकोदयेन ॥ एवमेतेपु ससारिपु द्विभेदेषु भ्रमर-मादीनाम् । यस अघिकानि ॥ स्पर्शन-रसन मारा भादिकोंके नेत्रकरि अधिक त्वचा-भीम और प्राणानि पनुप्पादीनाम् । भोप-भषिफानि ।। नासिकाईमर्थान्स्पर्शन,रसना,घाण,चक्षुः मनुप्यादिकोंफें थोत्रमरिभधिक मानिएरइति पपासंस्पन अभिसम्मन्ध म्याख्याता ने ही (स्पर्शन-रसन-प्राण-वधु) हैं। ऐसे क्रमानुसार सपन्य पर्णित हुभा तम् ॥ निप्पणि सर्शन-उत्पत्त्या तिन (रसनादिफ इन्द्रियों) की उत्पत्ति स्मशन इन्द्रियकी उत्पचिके साश म्पाग्याता उत्तरापर- (कमा निमियस)कही गई है। (सर्शन, इन्द्रियसे) भागे भागे (निन जीपोंके जो मो इन्द्रिय नहीं विनजीवोंक उन उन इन्द्रिया परणफर्मके) मर्यपातिरसदा-उदय न० सर्वपाति सदकोंक उदय हानेपर(विवक्षित इन्द्रिय)नहीं भर्षात् रसना- घाण-पत्रु -ओष इन्द्रियों की उत्पचि स्पर्शन इन्द्रियके समान है और "नांमागे मागेमान्दिय मिनफेनासरी,तिनकै तिनि इन्द्रियाररण कर्मका सर्पयावि स्पर्द्धकनिका उदय मानि जैना"पप०२६५ () पोतिराप मार रसनेन्द्रिया परण कर्मका सपापशम, प्राणादि इन्द्रिय संबंपी सर्वपातिया सर्दकोफा पदय शरीर और भगापांग नापा नाममा लाम रानेपर एवं दोदिप नाति नामकर्मफे उदय रहनेपर रसना इन्द्रियकी उत्पत्ति होती है। ( ) वीपीतराय भार घाणेद्रियावरण कर्मका क्षयोपशम चनुमादि इन्द्रिय संबंपी सर्वपातिया सर्दफोंका उदय, शरीर और भगापाग नामा नामर्मका नाम रहने पर एवं पींद्रिय नाति नामकर्मके उदय राने पर प्राण इन्द्रियकी उत्पत्ति होती है। () पोपानराप भार पघु इन्दिपावरण फमका यापशम भोगन्द्रिय सयधी सर्वपातिया स्पर्टफोंका उदय, शरीर और भंगापांग नामक नामकर्म का शाम एनपर एप पतुरिद्रिय नाति नाम नामकर्मफे उदपरानेपर पछु'एन्द्रियकी उत्पत्ति होती है ( ) धानिराप मार भादियावरण सफा सपापशप शरीर मार भगोपांग नामक नामर्मका खाम रानेपर और पयेंद्रिय मानि नाप नामस्मक उदय गहन पर पाय इन्दिपकी उत्पत्ति होती है। परम्०एम ममारिए । दि-मापा ओ भेद (संसारिण गमस्थायरा') में ROMANOronceaneeriBearnerBerliateAROOR0 म मगर ये tra ७० सिद्धि सूत्र२४ LABEOORBONDOE ADBONDERARMAAREReace इन्द्रियभेदारपचविधेषु ये पञ्च न्द्रियास्तदुस्यानुक्तस्य प्रतिपादनार्थमाह- ॥सज्ञिनःसममस्काः॥ २४ ॥ ૨ मनो व्याख्यातम् । सह तेन ये वर्तन्ते ते समनस्का ।सम्झिन इत्युच्यन्ते । पारिशेप्या- दितरे ससारिण प्राणिनोऽसज्ञिन इति सिध्दम् ॥ ननु च सचिन इत्यनेनैव गतार्थत्वात्स- मनस्का इति विशेषणमनर्थकम् । यतो मनोव्यापारो हिताहितप्राप्तिपरिहारपरीक्षा। सज्ञाऽपि सैवेति ॥ नेता क्तम् । सज्ञाशब्दार्थव्यभिचारात् । इन्द्रिप-पदान परिपेय पोन्द्रिया, मौर) इन्द्रिप मेदसे पांच मनों ( २२, २३ स्त्र ) में हैं। ये पंथेन्द्रिपमीर पद-भदस्य मनुकस्यमविपादन-अयम्मा विनक (मतद) भकषित भेद के काने के लिये उपर मप्रमे) करते हैं सूत्रम्-- सझिन समनरका ॥२४॥ (दोनोंश्राम्नायों में इस सूत्रका पाठ और अर्थ एकसाहै) पार्थ:-सबिन सपना मो जीप मनकारि सहित समना)संती ,सनी मर्याद मिनें अपने हित मरितका पा एण दापादिचा विचार तथा शिक्षा किया भाचापके प्राण परनेरुप समाज उनका समी पंचेन्द्रिय का१॥ एपनुवादा-मनापास्यातम् "सासन ये मन (इसीमध्याय ११सासूपमें) पर्णन किया गया है। विस(मन) सहित, मो पन्तिापनसम्मिल विकावन् परत ये समन रें। सैनी इसमभार फोगय हैं पारिशेष्यात इवरे मन(मनसदिय सैनी भीयों) से मवशेष पर्याद संशी समनसको छोड़कर भ पशेप संसारिण मासिनामसमिना विकसितम्। सासारीजीय प्रसनी । ऐसा सिममा मनु०प०मिन इति मनन पर गव मर्यत्वा परि मरन संग्री (सैनी) इस (शब्द) दाराही (सूपमें) मर्प प्राप्ताने (को) से समनसाभावि०पिशेषम्भनर्पकम् -'समनसा (संझीम) ऐसा पिशपण निप्पयोमन रे पन पनस्थ्यापारा दिवमाप्तिपरीधारण व्योंदिरपता) मनका व्यापार हितके माप्तिकी परीक्षा मौर मडिलपरिवार परीवारस मामपि पति मस्तिकपरिहारको परीक्षा(करना) समीभी सामर्यात्संगी मनाऔर दिम न०एनदपायुवम् संमाशम मर्प-म्पपिपारादा वातर)पर गैफ नगी क्योंकि सझा शब्दके भनक मर्य गनेसे दोप भावा है। IDOR DEM. OD ROKU DARI ORTODODEO सिद्धि सार्थ थध्याय ७२ ORTANDORROOR सुत्र२४ संज्ञा नामेत्युच्यते । तद्वन्त सज्ञिन इति सर्वेषामतिप्रसङ्ग ॥ सञ्ज्ञान सञ्ज्ञा ज्ञानमिति चेत् सपा प्राणिना ज्ञानात्मकत्वादतिप्रसङ्ग ॥श्राहारादिविषयाभिलाष सम्ज्ञति चेत्तुल्यम् तस्मात्समनस्का इत्युच्यते ॥ एवं च कृत्वा गर्भाण्डजमूर्च्छितसुषुप्त्याद्यवस्थासु समानामविकारयते विदन्त सम्मिनः (मस) समा नाम है ऐसा गया है। उस (नाम) नाले समोर इनिसपा मतिप्रसग । -ऐसे समस्त(मीगों) पवि प्रसगडुमा भर्यात् समाका भर्य नाम है रिसीका। नामस्प समा मिसकेंग सा सनी ऐसे कानेसे सर्पही माणी नाम सहित प्रयःमनसरित प्राणी मी संघीहुये भौर मनररितमी संबोडुये भव भविप्रसगमा सम्मानम् शार"मानम् इतिचे० पदिर-चत् संहान(मसामान)समा शान वा मपाम् पाणिनामशान-मात्मास्वागमतिमसा समस्तनी शानापम्प होनेस प्रतिप्रसंग (भावा) रे भार-मादिविषय-अभिसाप समा। इतिश्च० -यदि(-चेत् मागर मादिक भोगोंदी(=विपप) कामना (=अमिलाप) संसार दुयम्॥ (तौभी तुम्पद पा समान है अर्थात् वौमी पहोपात है भागार्य यौमी प्रतिमसंग भाता है क्योंकि भागोंडी भभिखापा तो सैनी प्रसैनी सपहरी बीचों होती गतीनोधमार्य ऐसाई मि(१)यदि संभा शम्दका भई महिनाम'माना मापगा वो पासैनी मसैनी समस्त प्राणियोंमें पाया मावा है क्योंकि नाम मिना काई मी पाणी नहीं। नौ मसैनी पोपोंको भी सही काना पड़ेगा(२) 'सानं संभा' मखाशाना संसारे दो मानमो सैनी भसैनी सब प्रकारक नीनोंमें नियमान है इमलिप प्रसनी नीपोंकोभी सही मानना पहुँगा ( ३ ) पदि माहार, भय, मधुन भौर परिग्रह संझी गम्दका मर्म माना माप ता य घाग माहार-भय-मधुन-परिया संमायें भी समस्त ससारी नोमोंक रिपमान है इसलिय संभासदका भातर मादि भये मानन परमी भसैनी भीषोंको म्याचि नहीं प्रासको इसन्निये मसैनी जीवोंकी व्यावधिक सिपे स्म समनका पदय उम्म्म सार्य है नस्सान०मपनमा पतिपत T एवम् प० =विससे (स्प्रम) समनकापेसा(पत्र) का गया है। मौर (८१) इस प्रकार उत्सा-गर्म-मपान-चिन-मुपुतिमादिभपस्पामा (म्यसपनस्माविशपणापाण)करकेगर्भ,भरम,मलित,शयम,मादिकवशामाम मिनमा मंगला पाकर खिमय माप सरेकेसाथ वामपमेशानदनका सबपहातादरमे प्रप्तगरते गोरस विपरीत बामतिप्रसंगरू OHOOTOCHOOHROOMIRDCRO BOARDAROOMDORINDOUND ७२ यर ७३ सिद्धि मन्त्र२४, २५ FB BOTTEDOMBOHOODA पटानिवासी मगरूपसाप चीखकर पदच्छेद और सिमक्स्पर्य सहित सपासबिमा शमशः हिन्दीमनुवाद अध्याय २ म २४,२५ हिताहितपरीक्षाभावेऽपि मन सन्निधानात्सज्ञित्वमुपपन्न भवति ॥ यदि हिताहितादिवि पयपरिस्पन्द प्राणिनां मन प्रणिधानपूर्वक अथाभिनवशरीरग्रहण प्रत्यागूर्णस्य विशीर्ण- पूर्वमूतॆनिर्मनस्कस्य यत्कर्म, तत्कुत इत्युच्यते- ॥ विग्रहगतौ कर्मयोगः॥ २५॥ दिव-महिव-परीक्षा-ममाषा भाषिक (मीषोंकी) हित माहिती परीक्षाफे प्रभार हानेपर मी पन -समिधानात समित्वम् उपपयम्मति मनके सन्नावसे सैनीपन सिद (उपपम)दोवा भाद सुझमें यदि समनस्क शम्द न साया मावा केवल संदी शब्दका ही उम्लण होता और संझी शम्दका भर्य रित भरितकी परीक्षा करनेवासा माना जायगा सो भो भीष गर्म पा भरके भीतर पा चिव श सोये हुये हैं मी पपपि मन उनकै विपमान हित महित की परीक्षासे शून्य हैं इसलिये वेमी सही न पोमागे इसलिये सत्रम समनस्क शम्दका सम्लेख सार्य। यदि०वि-भरित मादि विपप-परिस्सन्द (परन) मा रित प्रेरित मादिक विपयोंकी रचना पा दिन (=परिस्पन्द) माणिनाम् मना-प्रणिपान-पूर्वक समय -जीपोंके मनके प्रयन (मणिपान) निमिधा है तो भप (अय) अभिनय-गीर-प्राणम् प्रति मापूर्णस्य नया शरीर प्राण(रने को (अति) उपभी विशीर्णपूष मूनिमनस्कस्पा =ौर प्रथम शरीरके छ मानेसे पा प्रमाणहामाने से(=विशीर्ण)मनरहित(मात्माके) पदा कर्म ! कुवाति नपते T मोर्म(काभानामा कासि-वः)वा पर्योकर(स) ऐसेमरनपरफागयामि विग्रहगतौ कर्मयोगे ॥ २५॥ समाधी-विना- नपीन शरीर (प्राण ना पारण करने) के लिये गमन करनेमें (गतो) संपाग -बामण(शरीर ही)योग है मर्याद कार्मण शरीर द्वारा मात्माक पह मायाकार्मरण शरीर समस्तकर्म ग्रहणकरनेकापीमामौर मिग्रागति (१) शेताम्मर और दिगम्बर दोनों मामा GREBSIO 'पाठ मार्ग मप्याय२] RxDeisxe TOOTECEO सिद्धि सुत्र२५ ७२ OURCOR ANDIRAP निग्रहो देह । विग्रहार्था गतिविग्रहगति ॥ अथवा विरुदो ग्रहो विग्रह व्याघात कर्मादा- नेऽपि नोकर्मपुद्गलादाननिरोध इत्यर्थ । विमहेण गति विग्रहगति ॥सर्वशरीरप्ररोहणवीजभूत कार्मण शरीर कर्मेत्युच्यते । योगो वामानसकायवर्गणानिमित्त प्रात्मप्रदेशपरिस्पन्द । कर्मणा कृतो योग कर्मयोग। विग्रहगती भवतीत्यर्थ ॥ तेन कर्मादान देशान्तरसंकमश्च भवति ॥ अाह जीपुहलाना गतिमास्कन्दता त्पनुसाद विप्रदेश विनर-अपाणावि =विमाका भयं शरीर है। नरीन शरीरफे चिये गमन(पर) पिनिगमपारिस्त मणि -रिवागति र भयरा विरुद्ध प्राण है सो निग्रा मर्याद म्पापात र्म मादानामपिमाम-तु- =म्पापास ना रोकना है। कर्मका मासप दोनपरमी नोकर्म पुनसक मादान निगराप निकमरिग्ररेणा गवि मासर मा प्राणकी रोक ऐसा माराप पा अभिप्राय है । पिनारि गमन रिप्रागनि सशरीरमगाणीमभूतम् । -सा प्रिगति है। समस्त शरीराका उत्पमारने पाखा पीलमूत पापणम्"शरीरमतिकारपने पोम कार्मण शरीर रे सा (म्पमें) कर्म ऐसा सागपा है ।। योग (वा है कि) रामनमायागंणानिमिमा बचन मन कायफे प्रश्नच पर्गणा ( निमित मिसका (नवर्गणों द्वारा) भारम-पद-परिस्पन्द -ऐसे भारमा मदशीका पजापाना है मर्याद कापपर्गणा मापामौरमना पणा भाविक निमिषसे मात्मा प्रदेशों के अंदर भो इलनवान होना सो याग रे॥ रणन पोग हम याग सिगता काम शरीरसे कियायोग र्मयाग है। नत्रोन शरीरफे छिपे गमनारनेमें पनि निकमन-भादानम् ॥ (हार्मण शरीर होपाग)गता है ऐसा अभिमाय है। विस (योग) से कमका प्राण पार-संप परति -मौर देशांतरध माना मा संक्रयण गोवा मर्याद मास्साके मदयों के मीवर (घनपलनस्प पाग रिग्रहणविय कार्यण शरीर द्वारा हावा है सीयोगके सरा रियरगतिमें शात्मा कर्पोम मादान वया पनसे रहितपो उस पारपासी नगीन शरीर धारण करना थिये गति ये दोनों कार्य तरं॥ मारामीर पहनामानिमारनामा (शिय) मना कि नीर इनका मास-नेवार गविता मवार्थ याय FOam ७५ - सुत्र२६ ONOORNOONIO देशान्तरसकम किमाकाशप्रदेशकमवृत्त्या भवति, उताविशेषेणेत्यत आह- ॥ अनुश्रेणिगतिः ॥ २६॥ लोकमप्यादारभ्य ऊर्ध्वमधरितर्यक् च आकाशप्रदेशानां क्रमसन्निविष्टानां पक्ति श्रेणिरि- त्युच्यते । अनुशब्दस्यानुपूर्येण वृत्ति । पशान्तरसझम रिम"मामा-मदेरा-मम देशान्दर-गमन (गवि ) क्या भाकाशफे प्रदेशोंकमम- रत्याभरविश म्पर्तनारि होवा भाव प्रकारे प्रदेशोंके अनुमार श्रेणीपद होवारे उब मपिशेपेण वि०मत मा -प्रयवा भविशेपरि होता है इसलिये काते 'अनुश्रेणिपति =(अाकाशप्रदेशानाम्)अनुश्रेणि (जीवानाम् पुद्गलानाम् च)गति (भवति) बनाय -माकाशमदश भनुभणि माकाशके प्रदेशोंके श्रेणीरूम या सीपी पंक्किमें भीपानाम्प (मृत्युगनपर मपीन शरीर धारण करनके लिये) भीगेका तया घनसानामा (भप पौवारा शुद परमाए एक समयमें गमन करै तप ऐसे) पुन्नों का गसि भरति T गमन हाता है ।(माकाशमदेशानुषेणि नीवाना परवानां प गतिर्मवति) उत्त्यनुवाद जोऊमध्या भारम्प- अर्घम् ममाविर्यक्ष०८मारके पीघस लगाय ऊपर नीचे और तिर्यक (इघर उपर) भामाशपदेशानाम्फमसमिनिष्टानामा पक्किा -आकाशके मदेशीका अनुक्रमसे पंक्तिरूप भवस्यान थणि वि० वष्यते । मनुशम्दस्य मनुपूर्वेण ऋषि -ऐसी श्रेणी कीगई। भनुशम्दका मर्य (चि ) यया क्रमकरि है ११ पदका भय शरीरहे । उस शरीर के लिये जो गमन मियामाताहे वह थिप्रगति कही जाती है। जीव जिस समय दूसरा मयीन शरीर धारन करनके सिये प्रवृत्त होता है उस समय पहिले शरीरका परित्याग करिही प्रवृतहोता है तत्त्वार्यसार सोका योगोको वेधलता विमा शरीर सपी कभी हीमाधिस्वामही होमपाती इसलिये विभागतिर्मभी कोई याग होना चाहियोधिप्रगति कीदान अर्थातकर्मवघकाका और मदीन पर पारलरकाकाय ये योगार्य होते हैं मोकि कित्तीयोग अपेक्षा रमसे।दूसरा योग वहाँहो महीं सम्वा इसलिये उक दोनों का फार्मण पागही ऐसा भगवान जिनेस्वरने बारेमा केपि कामाम कामष शरोहे उसका प्रयायमसेकर मात्मा यहाँ उन दोनों कार्य करता है शोक ६७ ॥ (२) दोमो मानाया इससूत्रका पाठ और अप एकसा है पारिप से माफाशके प्रदेशोफी पंक्ति लीगई है इससे सम्पमें मापाहर किया है जीयानाम् भौर पुनसानाम् को मिसान के लिये ष समुपायी उपसर्गका मध्याहार किया 'मरेशा' वापयका अपाहार किया है । जीपामाम् की अनुसूतिप्रथम सबसे है। गतिः शूम सूत्र में पाया है इससे पुरलानाम् का OMON, ROCmdo KOOARD CORDOSE OHROOM ७५ मवार च्याय CREKO AURINOARD Ordenone ROTONDON 08:50 श्रेणेरानुपूष्यणानुश्रेणीति जीवानां पुहलानां च गतिर्भवतीत्यर्थ ॥ अनधिकृताना पुद्गलाना सिद्धि कथं ग्रहणमिति चेत्गतियहणात् । यदि जीवानामेव गतिरिष्टा स्यात् गतिग्रहणमनर्थकमधि- सुत्र२६ सारातत्सिद्दे । उत्तरत्र जीवग्रहणान पुइलसम्प्रत्यय ॥ येणे समानुपूर्पण मनुर्माण विभीमरानाम् श्रेणी मनुश्च सा भनुणि है। ऐसे भीषोंका परवानाममिति पविवि०म:। =ौर पदलोंका गमन(णिफ मनुश्न) होता है ऐसा माशय है अर्थात् मीषाको मृत्युबोनेपर नयीनशरीर पारणकरनके लिये गमन,मुक्तनीयोंकाऊर्ध्वगमन, जीरो का अध्येला कस भघालाकमाना, अघोलारस ऊर्बजोकनाना, विर्यगशो से अपोजोफगमन वा अर्पलाक गमन भणीके भनुरुल हागा, पहलके शुद परमाणुको एक समयमें पौदा रागमन भाफाशफ अणिफ भनुनी रागा भन्य अपस्याभोंमें भीष और पुगलोंका गमन ममनीय है श्रेणिके भनाल भी गमन करसक्त हैं। प्रतिकूल मी, काई नियम नहीं है। मनरिकतानाम पहलानामग्यम्प्राणम्॥ अकरण रहित पुगोसा(यहाँ) कैसे प्राण है। इतिक नतिग्ररणादापदि मीनानाम् एवर =ऐसी शंशानेपर (उत्तरमें फासे है किसप्रमे) गतिके भादानसेमो प्राणियोकाही गति या गतित्राणम्॥ मनर्षसम्॥ -गमन इच्छितोता सौ(इसमप्रमे) गति'शम्दका क्षाना निप्पयोजन होजावा भरिकारान्त सिद" क्योंकि (विग्रहगतीर्मयोग'स्त्रमें गमनकरनेम) प्रारणसेस('गतिः') कीसिदिद (फिरदसम्बगनुभेणि गसि 'मंगविशम्दनीखाते यदिपुरलगमनकामाशयनहावाती) पारवनीप्राणा भौर(-घ)श्योंकिरसम्बसे(-मत्र) भगवस्त्र भषिग्रह भीयस्प बधीरकाणकरनेसे र पहनसमस्यप मम्म)पद्नुका प्राण(पी) प्रतीति या प्रत्यय होगा। इससपका भागार्ययारक किमीत करनपर कि यहाँ तो जोसका पारण पा विपय रे पुननका गमन 'अनुभेणि गतिः' सब फैम मासमता तक उनमें करता है कि विग्रगती कर्मयोगा"बस मगगरियापर गतिका अधिकार * पयोंकि गतिका विषया मोर गति और तया पुद्गल दानों वो इसी कारण इस"मनुणिवि:"में गति शम्द थापेर यदि फक्त भोपको गति सी सत्रका अभिपाप हातातो पासव"मनुणि "श्वनाmall पोरि गनिप्रिती र्मया' मन पिपाम गरी मनाति इस सप भानावी ।। ननु पन्द्रादीनां ज्योतिप्पाणां मेरुप्रदक्षिणाफाले विचाभरावीमा in सम फिमुख्यते अनुश्रेणिगतिरिति? फालदेशतिता भन्याय ADOROKORROR KOLIKO BOLO ORKOURO OURDO TODOBNOORTO OURO RUOHKO ननु चन्द्रादीना ज्योतिष्काणा मेरुप्रदक्षिणाकाले विद्याधरादीना च विश्रेणिगतिरपि दृश्यते तत्र किमुच्यते अनुश्रेणिगतिरिति? कालदेशनियमोऽत्र वेदितव्य ॥ तत्रकालनियमस्ताव- सिद्धि ज्जीवानां मरणकाले भावान्तरसक्रमे मुक्तानां चोर्धगमनकाले अनुश्रेण्येव गतिःदेशनियमोऽपि सन२६ ऊर्ध्वलोकादधोगतिः।अधोलोकादूर्ध्वगति । तिर्यग्लोकादधोगति ।ऊर्ध्वा वा । तत्रानुश्रेण्येव ॥ पुगलानां च या लोकान्तप्रापिणी सा नियमादनुश्रण्येव । भौर भविग्रमा मीरस्प" सूत्रभी यदि इस प पीसा स्पर्म केरल भीपकी गतिसे मभिमाय गोसासा'भषिमाः'एसे रोता नीरस्य शम न होता भवाइनतीनों सोंको मिलाकर पहन और विषार फरनेसे यह फल हुभाकि पिनगवा कर्मयोगः' फरज जीवकीगसि मनुयणि गति मैं गवि शमशायागपारससे भीष भौर पुन्नब दानों कोगविजोगई। पमात्'मीपस्य पाएपका प्रयाग २७ स्यमें होनसे केरख शुद्ध प्रर्याद मुकमीप की होगवि पा गमनस मभिमाय है। मनुमन्द्रादीनाम्ग्याविष्काणाम्। मेक-प्रदक्षिणा भरन(नन शशि भादिफ ज्यातिपी (देय) निको मेरुपर्वतकी पदचिणाके फामा विद्यापरादीनामपि०पियशि- समयमें भोर (-प) सिपाघर मादिकों का प्राकाशके प्रदर्थोकी पक्ति के विरुद गतिनापिकदश्यते तत्र किम् "अनुणि गमन भी देगगया पा(मात्र या स्नम) पोफर श्रेणीके फ्रमानुसार गविविकतपते कालदेशनियमः भयपदिकम्पःगमन ऐसा कागया है।(उचर)पा(इससूत्रम) कालनियम तथा देशनियम मानो तमासनियम वि०मीरानाम्मरणकाज सहा फालनियम कि समस्त (सापत्) संसारी प्राणियोंका मृत्युसमयमें भपान्तर-संक्रमण मुक्तानाम् अर्ध्वगमनपाला मन्यभषको भानपर और मुक्तनीयों का ऊर्ध्वगतिकाल में भनुश्रेणीपरगविदेशनिपमा भपि. (माकारा के प्रदेशोंकी) पति रूपही गमन है। क्षेत्र नियम भी कि कार्मलोकातामपागतिः"मपालोका अर्थ- कर्णशोकस भयोलोक गमन,मपालोकसे कर्पलाक गतितिर्यो का भपागनिजात पा सामन(भौर)विर्यगजोकसे भपोशोक गमन भषया अर्थ (गमन ) व मनुभेणीसप०० पुद्गलानाम्या" =art श्रेणी मनुसार तया(-घ) पालोंकी मा शारमन्त प्रापिणीसागनियमानामनुश्रेणी एस-शोकका अन्त प्राप्तकरनेपानी (शुद्धपरमाण) है सा नियमसे थेणीके अनुकूल मर्याद जप पुनजकी शुद परमाणु एक समयमें चौदा राजू गमन करती है वर मा भाकाशके प्रदेशोंक पति रुपही सीपी गमन करती है गन्पपा श्रेणीरुप गमनका नियम नहीं?

सर्याय प्याय ७५ सिद्धि सुत्र२६ MDOHTOM श्रेणेरानुपूव्र्येणानुश्रेणीति जीवानां पुद्गलानां च गतिर्भवतीत्यर्थ ॥ अनधिकृताना पुद्गलाना कथं ग्रहणमिति चेत्गतिग्रहणात् । यदि जीवानामेव गतिरिटा स्यात् गतिग्रहणमनर्थकमधि- कारात्तत्सिद्दे । उत्तरत्र जीवग्रहणाच पुलसम्प्रत्यय ॥ घेणेगमानुपूर्येण मनुण इतिश्मीवानाम् । श्रेणी अनुम सा मनुश्रेणि है। ऐसे जीवोंका परवानामगिति परति वि०मः। और पुद्गलोका गमन(थेणिफ अनुशल) होता है ऐसा माशय है अर्याद मोर्षोंकीमत्युदोनेपर नवीनशरीर धारण करनफेशिये गमन,मुक्तजीयोंकाऊगमन, भीगेका कर्मनाकसे अपालामनाना, भघोलाकस ऊर्मलोकमाना, तिर्यग्लोगस अपोलोफगमन वा कार्यलोक गमन श्रेणीके अनुरुल हागा, पहलके शुद परमाणुको एक समयमें चौदा रागमन श्राफाशके भेणिके भनुनी गा अन्य भरस्थानोंमें नीम और पुनोंका गमन भमनीय है अणिफे अनुल भी गमन करसके हैं। प्रविन मी, फाई नियम नहीं है। मनपिहवानाम् परवानामई कथम्प्राणम्॥ पकरण रहित पदनोंका(यहाँ) फेसे प्राण है॥ इतिवमन्गविप्राणादायदिनीपानाम् "एवम -ऐसो शंकाहोनेपर (उधरम कावेरे किसपमें) गविके भादानसेमो प्राणियों काही गनिटाणगाव गविप्राणम्पयनर्थकम् =गमन इच्चितहोता तो(इसम्पर्म) गति"शब्दका खाना निप्पयोमन होमाता भपितारा व सिदे। पयोफि (विग्रगतीकर्मयोग म्यमे गमनफरनेस) मारणसेवस('गसि') कीसिदिर (फिरइसम्यगनुश्रेणि गति: गतिशम्दनहीलाते यदिपुरतगमनकामाशपनहोतातौ) म० उत्तरीपणा भौर(प)पाकिएसम्प्रसे(मत्र) मगछेस्त्र भषिग्रहा नीवस्प'मीषकमाणफरनेसे पनवसम्मत्यप इसम्पमें)पद्नुका ग्राण(भी) प्रवीति का प्रस्पप सेसा इससपका मामार्यपाकि मिसीत करनपर किया तो नोपमा पकरण पा विषय र पुनका गमन 'मनुश्रेणि गतिः' सबमें कम मासम्वा उसफ उपग्में करत किरियागतो फर्मयोगः"म्पस प्रगटोरियापर गतिमा अधिकार पयोंकि गतिका मिपयो और गरि जीप वया पुरन्च दानों तो इसी कारण इस"अनुणिवि"में गतिशिद खापेर यदि रूपा मोवी गति से राम पिपाप राता देता परस्प"मनुणि "ता भोगिनियमिप्रगती in. राकी भवाभि DarDONBOUReaucBEReateHOONOTrena , . rn सिद्धि सत्र२७ JOANDIDO ७६ BIRDCHRONOeadeoaRONIRDOSBorawaROREIRD गनिरासी जगरूपमाप पोल छत पदच्या भौर विमात्पर्य सहित सवार्य सिदिका रायश हिन्दी अनुवाद भध्याय २ सूत्र २७ नेवार्य पूर्वसूत्रे विश्रेणिगतिरपि क्वचिदस्तीति ज्ञापनार्थमिद वचनम् ॥ ननु तत्रैव देशकालनियम यायः उक्त किं न? अतस्तस्सिद्दे ॥ यद्यसङ्गस्यात्मनोऽप्रतिवन्धेन गतिरालोकान्तादवधृतकाला प्रतिज्ञायते, सदेहस्य पुनर्गति किं प्रतिबन्धिनी, उत मुक्तात्मवदित्यत आह- पूर्व-सम" कपिन्विधषि- (उचर) पदिशे(अम्मीमा प्रम(भनुमेणिगति) परंतु काही भेषीके विस गविमपि भस्ति इति मापनमर्पदम्पनीपभोर पुरोका गमन भी है। ऐसा स्मित करने के लिपे पा सफर मनु नत्र एप दशमासनिपपाउका परन गा (मनुश्रमिमविसबमें) ही क्षेत्र तया कामका नियम पा गया? भाव'मनमणिगति प्रमे काम और देश नियमको प्रहण किया और उसका मिपममें मुकमीयों के अर्म गमन करवेसमय थेणिके भनुशल गवि बसाई है इसलिये सकनीकी मौहाररित गधि भनुमेणिगति प्रसे सिदबोनेपर पुना माविबानीरस्य' इस मा निर्माण मा प्रतिपादन निरर्यती॥ गिम नot (चर)पा ? (पिवन सबमें देश,शासका नियम का भागयामर्याद) नहीं (बानपा) भाव सिद्ध इसलिय पस(देश, कालके नियम)को सिमिका (यहस्त्र)है मर्यात् भाचार्य उत्तर सते कि काश मौर देशका नियम' भनुथेगिति"सूत्रमे वो का नहीं गया रितु' भनिग्रहा नीरस्म' इसी सूपके द्वारा पापिर कास,देशके निपपड़ी सिदि, "डिम् "मिदा वा विरस्कारफे अर्प, भाषा मान पड़वा है परि०मसाप मारमनाभपतिबन्नदोगतिपदिकर्म रहित(भसगस्य)मात्मामा पन्धकरि रहिव गपन मा-मोकान्यात भरपृतकालाविया लोकके अंत ता(-मा) एकसमयमा कालवानगवि मविवारूप करिये है वा खोरके अपवक एकसमय मा कासोनियम कप विदिव (अविज्ञास्ते) दो रखवत-मारमावशतिकमत मात पुन सदेहस्पतिः किम्प प्रतिषम्पिनीसाफिर(पुन ) शरीरसहित (मात्मा) गमन पपा भटकाप सहित मा मोगसहित है म्या ( उत) मुक्तमात्मा सदृश है इससिपे (अग्रिमसूत्रम) कहते है कि । ORONSORRECTRONFO सर्वार्थ थापाय सिद्धि सूत्र२७ GIRreedMOONMHORT एटानिपासी मगरूपसाप पकीय कृत पदग्द भौर रिमात्पर्यसहित सार्यसिमिठपिका शमशः हिन्दी मनुपाद अध्याप २ स्त्र २७ इतरा गतिर्मजनीया ॥ पुनरपि गतिविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह- ॥अविग्रहा जीवस्य ॥२७॥ विग्रहो व्याघात कौटिल्यमित्यर्थ । स यस्यो न विद्यतेऽसावविग्रहा गति ॥कस्य जीवस्य॥ कीदृशस्य' । मुक्तस्य ॥ कथ गम्यते मुक्तस्येति । उत्तरसूत्रे ससारिग्रहणादिह मुक्तस्येति विज्ञायते ॥ ननु च अनुश्रेणि गतिरित्यनेनैव श्रेण्यन्तरसक्रमाभावो व्याख्यात । नार्थोऽनेन । इतरीमति ममनीया -अन्य गमन नियम रहिव है मर्याद सीपागमन मी रोसा रे पक भी होया है पुना पपि गधि-विशेष प्रतिपचि मर्यम्मा-फिरभी गमनके ममेद कयनफे लिये कावे कि सूत्रम् अविग्रहा जीवस्य ॥२७॥-विग्रहा(गति) मुक्तजीवस्य (भवति) म्वार्थ:-अविभागविमुकभीवस्यामपति -परखारहित,मौदारहित गमन मुक्तमात्माकाहोवाईमर्याद मुक्तमीप एक समयमै सीपासाद राज् गमन करवा हुमा सिद्ध क्षेत्रमें चा नाता है घर उपर मावा नहीं है रस्पनुराद -बिपापावटिम्पमावि-विग्रह सो न्यापाव, परवा पा इटिचमा एसा मपस पस्पोनरियामसोमविपा-ममें है। पर (निग्रह पा पमता)मिसमें पिपमान नहीं है सो भविग्रा गनिस्य मीपस्प गमन है। (पद माहाररित गति ) किसकी ? (पा पवारहित गति) पेवनकी पोरस्पतिस्पस्य गम्पदामुळस्पदिति रिस पार(मीर)की है। मोखमीवकी से मुक्त मीरा नाम कैसे भानामाप? उपरसूत्र संसारिन् प्राणा मग्रिम(२८वां भूत्रमें संसारी शम्दके प्राणकरनसे यहां (इस स्वमें ) वनस्पपिविणरिमापताननु०प०मनुणिमाति'माननीयका (प्राण) ऐसा मानाभाता है। अन्य प्रश्न भनुमेणिगति!' इति मनन गएर मणि-अन्तर-सक्रम-प्रभाषा इस (स्त्र)हरिही श्रेणीसे सिमागमनका ममाप प्पास्पात नभये । भनेन मर्णित (इसलिये) इस (सत्र) से( भनेन) प्रपोजन मही मर्यात इस सचाईसपा सम िबनानानिमा अभिभाप रवि पोंकि HTA से लदा एनी पीनापन गमनसिर 10EOROOMMOONIROORLDOTROCIT CHARIODOOD सर्य सिद्धि सुन२७ CARDOINDORaNDoOOAADOHTROPIEDORROGRO Tyी राणी देवगममा भयाण (ए) (R---- गनिवासी मगरूपसहाय पोल छत पदण्द और निमास्पर्य सहित सार्य सिदिका शदरा हिन्दी अनुवाद अध्याय २ सय २७ पूर्वसूत्रे विश्रेणिगतिरपि क्वचिदस्तीति ज्ञापनार्थमिदं वचनम् ॥ ननु तत्रैव देशकालनियम प्यायः उक्त किं न? प्रतस्तत्सिद ॥ यद्यसङ्गस्यात्मनोऽप्रतिबन्धेन गतिरालोकान्तादवधृतकाला प्रतिज्ञायते, सदेहस्य पुनर्गति किं प्रतिवन्धिनी, उत मुक्तात्मवदित्यत आह- पूर्व-सापित रिणि रिचर) पदिले(दमीसा सूप (मनुभेणिगतिः) है परंतु भी श्रेणीके विस्य गतिमपि भस्तिति शापमभइदम्पन(मीरमौर पुदलोंका)गमन भी है। पेसा सचिवकरनेके सिये पर समरे ननु तप एप दशकात निपमा उक्त म्परन पा (मनुधेणिगविसरम) ही क्षेत्र तयो फाखडा नियम का गया है भर्याद'मनमणिगवि'स्त्र में पान और देराफे नियमको ग्राण किया और उसका नियम मुक्तमी कर्म गमन करवेसमय श्रेणिके अनुभव गवि बदलाई है इसलिये मुक्तनीरोंकी मौड़ारहित गवि भानुमेणिगतिः स्प्रसे सिदहोनेपर पुनः परिग्रहामीवस्य' इस सत्रका निर्माण पो मविपादन निरर्यकर।। पिम् ॥ न? (उचर)पया ? (पिठन सूवर्षे देश, कालका नियम का फागपामाद) नहीं (कहानया मन तत् सिदा इसलिये उस(देश,बालके नियम)की सिमिका (पासूत्र) मर्यात् भाचार्य उत्तर पाते हैं कि पान मौर देशका नियम भनुणिगवि"सूत्रमें वो का नहीं गया किंतु' भमिग्रा भीवस्य' इसी सूत्रके द्वारा पापिर काल,देशकै नियमकी सिदिशा, "किम् " निंदा पाविरस्कारफे मर्यमें पाया जान पड़ता है पदिश्मसास्य'भारमन अपतित पेनगतिः =पदिकर्म रहित(मसंगस्य)मात्मामा पन्धकरि रहिव गमन भा-लोकान्ताद। अपपृवहाचा "प्रविमापते लोकके भव वक(-मा) एइसमयमात्र कालमानुगति प्रविमारूप करिये है का जोकके भववक एकसमय माप्र फालकेनियम रूप विदिव (अविनायके) है वो स्तमुक्त-मात्मस्वनवि०मवः माहा पुन सदास्पगति किम् प्रतिपन्धिनी"-फिर(पुनः) शरीरसहित (मात्मा) का गमन क्या भटकाप सहित पा मोगसहित है या (=उत) मुक्त्रमात्मा सदश है इसलिये (मग्रिमसत्रमें) कहते हैं कि POOTBOTTOOHORODEOOPENROT सार्य यापाय सुन२७ MOONRIODORORO ONKO पटानिरासो मगरूपसाय पकीय व पदग्मेद मौर पिभात्पर्यसहित सर्वार्षसिविधिका शम्मशः हिन्दी भनुगाद अध्याय २ सूत्र २७ इतरा गतिर्भजनीया ॥ पुनरपि गतिविशेषप्रतिपत्यर्थमाह- ॥अविग्रहा जीवस्य ॥२७॥ विग्रहो व्याघात कौटिल्यमित्यर्थ । स यस्यो न विद्यतेऽसावविग्रहा गति ॥ कस्य जीवस्य॥ कीदृशस्य? । मुक्तस्य ॥ कथ गम्यते मुक्तस्येति' । उत्तरसूत्रे ससारिग्रहणादिह मुक्तस्येति विज्ञायते ॥ ननु चअनुश्रेणि गतिरित्यनेनैव श्रेण्यन्तरसक्रमाभावोव्याख्यात । नार्थोऽनेन । विगविममनीपा अन्य गमन नियम रहित रे मर्यात् सीपागमन भी होता है पर भी होता है पुन अपि गति-पिशप प्रविधि मर्पम्पमा-फिरभी गमन के प्रमेद फयनके लिये कावे कि सूत्रम् अपिग्रहा जीवस्य ॥२७॥ अविग्रहा(गति) मुक्तजीवस्य (भवति) म्नाः-मषिप्रगवि मुक्तभावस्पमिरविवचारदिव,मौहारहित गमन मुक्त भास्माकारोबारमा सकमीप एक समय सीपासाव राज् गमन करवा हुमा सिद्ध क्षेत्रमें चहा माता है घर घर मुड़वा नही रे रस्पनुराद रिग्रामसम्पापाटिम्पम् विप्र-विग्रह है सो पापाव, बवा पाइटिसमा ऐसा अयं स पस्पारन पियते मसौमणिग्राममें है। पर (पिग्रह पा पवा)मिसमें पिपमान नी है सो भविग्रह मनिस्पोरस्प। गमन है । ( मोडावि गति ) झिसकी है। (पा पक्रवारहित गति) पवनकी है पीरापमुक्तस्य इय गम्पवेमुक्तस्पानविकसि प्रकारके(मीप)की है। मोघमीषकी ही मुक्तजीवका नाम कैसे भानामाय? उत्तरम्य संमारिन् प्रामा प्रग्रिम(२८पांत्र संसारी शम्बके ग्राणकरनसे यहां (इस मूवमें) उकस्माइवि०विकायत ननु वामनुणिमातिम् यासमीरमा (प्राण) ऐसा मानाभाता है। अन्य परन भनुभेणिगतिः' इनि मनाएर भणि-मन्दर-संक्रम-ममापः। स (सूत्र)करिडी भेणीसे विरुवगमनको प्रभाव म्पारम्पावनिमय भनेन। अर्णिव (इसलिये) इस (स्त्र) से(-मनन) प्रयोमम नहीं हैमर्याद इस साईसा समता माना मिमिमाप रहित रेपोधि MmAhीसी मारी श्रेणी मनीषा गमनसिर।। 10.00DIDOITOONID ORIDOARTE मर्य प्याय ado ७६ सिद्धि सुत्र२७ Barra GKOOAROOMROSARO GAROOTOOOOOODEROOPER (पपोलिस ग्रेजी पियागपमक पपाष -nिtra) स (ए) (-) भनी निगासी मगरूपमााय पोल कत पदद और रिमरत्पर्य सहित सवार्य सिदिका शमा हिन्दी अनुवाद अध्याय २ सूत्र २७ पूर्वसूत्रे विश्रेणिगतिरपि क्वचिदस्तीति ज्ञापनार्थमिद वचनम् ॥ ननु तत्रैव देशकालनियम उक्त किं न? अतस्तत्सिद्दे ॥ यद्यसङ्गस्यात्मनोऽप्रतिवन्धेन गतिरालोकान्तादवधृतकाला प्रतिज्ञायते, सदेहस्य पुनर्गति किं प्रतिवन्धिनी, उत मुक्तात्मवदित्यत आह- पूर्व-सपा कचिन्- विभेणि (उप्र) पदिले(दमीसा) सूत्रम(भनुणिगतिः) परंतु कहीं श्रेणीके पिस्स गविमपि भस्तिति मापनभर्यइदम्पन-(भीरमौर पुरखोंका)गमन भी है। ऐसा सचितारनेके लिये यह सूत्र है ननुनय पर दशकात निपमा उक्त म्भरन वहां (अनुणिगतिस्पर्म) ही क्षेत्र क्या कालका नियम का गया? भाद'मनुमणिगमिस्त्रमै काल और देशके नियमको ग्राण किया और उसकाल निपममें मुकमीपों उर्च गमन फरवेसमय येणिके मनुश्च गति पवसाई है इसलिये मुक्तनीयोंजी मौहारहित गवि'मनुश्रेणिगति प्रसे सिद्ध होनेपर पुना भनिग्रामीवस्प' इस मा निर्माण मा मविपादन निरर्यती॥ रिम्न! (उधर)क्या ? (पिघल सूत्रमें दशकासका नियम हो कागयामर्यान) नहीं (कहानया) मत सन् सिद इसलिये सरदेशबालके नियम)की सिदिका (पासत्र) मर्याद भाषार्य उचरम पाते कि कार और देशका नियम अनुणिगःि"सपमें वो का नहीं गया किंतु' भरिया नीवस्य' इसी सूत्रके द्वारा महापर काल,देशफे निपपकी सिदि, "किम् " निंदा पाविरस्कारफे भर्यमें माया मान पता है पदिश्मसायमात्मन भाविन्धेन गति =यदिकर्म रहिव(-मसंगस्य)मात्माका पन्धकरि रहित गमन मा-लोकान्तावा प्रमाणापतिमापते लोकके भव वा(-मा) एकसमयमात्र कालवानगति प्रविशारूप करिये है वा खोफके भवता एकसमप मात्र काखफेनियम रूप निदिव (अतिमायदे) वो उतामुक्त-मारमपदावि०मत मारा पुन सदेहस्यगतिः किम् प्रतिपन्धिना-फिर(=पुनः) शरीरसहित (भारमा)का गमन क्या भटकाव सहित का मौड़ासहित है घा (उत) मुक्तभात्मा मदृश है इसलिये (मग्रिमसमर्म) करते हैं कि सार्य अध्याय सिद्धि सुत्र२७ AXROORONDOKO ONA honi एयनिपासी नगरूपसाप पकौल व पदग्छेद मौर पिमात्यर्यसरिव सार्यसिमितिका शम्दशः हिन्दी भनुपाद अध्याप २ स्त्र २७ इतरा गतिर्भजनीया ॥ पुनरपि गतिविशेषप्रतिपत्यर्थमाह- ॥अविग्रहा जीवस्य ॥२७॥ विग्रहो व्याघात कौटिल्यमित्यर्थ । स यस्यो न विद्यतेऽसावविग्रहा गति ॥ कस्य । जीवस्य॥ कीदृशस्य' । मुक्तस्य ॥ कथं गम्यते मुक्तस्येति' । उत्तरसूत्रे ससारिग्रहणादिह मुक्तस्येति विज्ञायते ॥ ननु च अनुश्रेणि गतिरित्यनेनैव श्रेण्यन्तरसक्रमाभावोव्याख्यात । नार्थोऽनेन इतरी गगवि ममनीया अन्य गमन नियम रहित है अर्थात् सीघागमन भी होवार पक्र भी होता है पुना अपि गति-पिशप प्रविपचि भर्पम्मा-फिरभी गमन के प्रभेद कपनके लिये कावे हैं कि सूत्रम् अविग्रहा जीवस्य ॥२७॥ अविग्रहा(गति) मुक्तजीवस्य (भवति) मार्पः-भरिप्रभागविगतमीपस्मरविवारहित,पौड़ारहित गमन मुक्तमात्माकाहोवाईमर्याद मुक्त भीष पक समपदं सीषासात राज् गमन करता हुमा सिद क्षेत्र पचा माता रे घर उपर सहता नहीं है उत्पनुरादा- पिपासावटिम्पम् विश्-विग्रह है सो न्याघात, परवा पा इटिलता ऐसा मपे "स पस्पारन रिपतेभिसौगमविप्र-मर्थमें है। पर (मिग्रा पा पता मिसमें मिपमान नहीं है सो भविद्रा गति स्यजीसस्प गमन है । ( मादारवि गवि ) किसकी ? (पा पक्रवारशिव गति) पवनही है पोरयस्य एकस्पाय गम्पवेमुळस्पशिवि किस प्रकार (मीव)ी है। मोघमीरसी में सक्तमीषका नाम कैसे मानामापी उपरम्ब संसारिन् प्राणा" मग्रिम(२८मा स्त्रम संसारी शम्दफे प्राणकरनसे पहा (इस स्व ) उक्तस्परवि०विज्ञापन ननुमनुणिमातिमावभीषमा (मरण) ऐसा मानामावा है । भन्य परन'मनुणिगतिः' इति मननाएर पणि-मन्दर-संक्रम-मभाषइस (स्य)हरिसी श्रेणीसे रिरुद्धगमनका प्रभाव म्पास्पावन०मय भनेन । बर्णिव (इसलिये) इस (स्म) से(मनन) प्रयोजन नहीं है अर्याद इस सचाईसपा सब बनाना निष्पापभिमाप रहित रेम्पोंकि मणि पीना एकरी गोपनी गमनसिप HERPBOMDONTEDOHROOOOO . COCIOCN सर्य ANDAN सिद्धि सत्र२७ HARDOARDOMIRDOIMBOMROOMMOO स (मप्र)रिरीणी विषयगममा अपाष wiffmarat) ( --and गनियामी नगरपगार पोल हन परपद भार विमरत्पर्य सहित समार्य सिदिका दश हिन्दी अनुवाद अध्याय २ पत्र २७ पूर्वसूत्रे विश्रेणिगतिरपि कचिदस्तीति ज्ञापनार्थमिद वचनम् ॥ ननु तत्रैव देशकालनियम अध्याय) उक्त किं न? प्रतस्तत्सिद्दे ॥ यद्यसङ्गस्यात्मनोऽप्रतिवन्धेन गतिरालोकान्तादवधृतकाला प्रतिज्ञायते, सदेहस्य पुनर्गति किं प्रतिवन्धिनी, उत मुक्तात्मवदित्यत आह- पूर्व-समाग पिन- विभेणि (उत्तर) पहिले(धमीसा)स्वम (मनभेणिगवि:) है परतु भी भेणीके विस गनिमपि मस्तिाविज्ञापनभइदम्णापन-(मौरभौर पदों का गमन भी है। ऐसा सरितकरनके लिये या स्पर ननु नत्र एष दशकासनिपमा उतार परन पा (मनुश्रेणिगविासप4) ही क्षेत्र या कामका नियम का गया है भाद'मनुअणिगवि'स्त्रमै काल मौर देशके नियमको प्राण किया और उसकाय नियममें मुक्तपीयोंके जर्ष गमन फरवेसमप मेणिके अनुकूल गवि पवलाई है इसलिये मुक्तनीनोंडी मौड़ारहित गतिभनुमेणिगतिः'स्मसे सिदहोनेपर पुनः मविप्रामीवस्प' इस स्त्रका निर्माण वा प्रतिपादन निरर्यकसी। पिम् न. (उचर) क्या ? (पिछख सूत्र देश,कासका नियम कहां काागयामर्याद) नहीं (नागपा) मत तन् सिद इसलिये उस(पेश,कालके नियम)की सिविका (पासूथ)है भर्यात् भाचार्य उचरम पाते कि काल मौर देशका नियम मनुणिगतिः"सूममें वो का नहीं गया रितु' भनिग्रहा जीवस्य' इसी सके द्वारा पापर फाज,देशके नियमकी सिदिगी, "किम् " निंदा मातिरस्कारके ममें भाया भान पड़ता है दिमसाप'भारमन ममतिबन्पेनगवि =पदिधर्म रहित-मसंगस्य)मात्मामा पन्धकार रहित गमन मा-सामना भरपृषकाला "पवित्रायते लोकके भव वर(मा) एकसमयमात्र काखवानगवि प्रविज्ञारूप करिये है वा लोकके भवता एकसमय मात्र कालफेनियम रूप विदिव (अविझायदे) है वो जामुन-मात्माइविवमत मारा पुन सदास्यगिति "किम्। प्रविषन्धिनी-फिर(=पुन:) शरीरसहित (भारमा)का गमन क्या भटकाव सहित वा मौडासहित है म्या (८३स) मुक्तमात्मा सदृश है इसलिये (मनिमसूत्रमें) कहते हैं कि TOTUOMIOTOCIDC:I::ROOKBOK ONTHO I.. सार्य अपाय सिद्धि ७८ OrOUKOOKOODIKO सुत्र२७ एयनिवासी मगरूपसाप पकीस रुख पदपछेद और चिमात्यर्यसहित सर्यिसिद्धिविना शम्मशः हिन्दी अनुराद अध्याय २ स्त्र २७ इतरा गतिभंजनीया ॥ पुनरपि गतिविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह- ॥अविग्रहा जीवस्य ॥२७॥ निग्रहो व्याघात कौटिल्यमित्यर्थ । स यस्यां न विद्यतेऽसावविग्रहा गति ॥ कस्य जीवस्य॥ कीदृशस्य' । मुक्तस्य ॥ कथं गम्यते मुक्तस्येति' । उत्तरसूत्रे ससारिग्रहणादिह मुक्तस्येति विज्ञायते ॥ ननु च अनुश्रेणि गतिरित्यनेनैव श्रेण्यन्तरसक्रमाभावो व्याख्यात । नार्थोऽनेन । विरीपति ममनीया WONDORIOAKDRO -- वार्थ अप्याय ८१ पगनियास. गणपसाप पठीवरुप पदच्छेद और विमारपर्य सरिव सार्यसदिका शब्दशः हिन्दी मनुवाद भध्याय २ सूप ,२८ OURDERROOARDOI उसी प्रकार मिसगतिमें वोन मारेरोनेपड़ रहगो मूमिकागति है, और उसके हानेमें चार समप लगते है। चारोंगतियोंमें परिली सिद्धि २सुत्र२८ GRMOON BHALO ORODA VIDUMU और मिरारत है बितिमें खसारी जीप माहारकपना एसया है। पमनजीत गोम्मटसार गापा १७० के मीये निन्न लेख है। "भारका काल उन्हप मुम्पगुलके मसम्याव माग प्रमास है। सम्यगुसका मसप्यातयो भागके मेते मदेश होहि तितमे समय प्रमाण माहारा कालाहां मम जी मरण तो मायु पूरी मर पीई हार ही हा वहां ममाहार होर रहो माहारका काल इतना कैसे कमा ? ताका समाधान-जा मरण भए जिस जीप वरुप पिप्रहगति म होइ सभी एक समयरूप पति हो साफ मनाहारपसा म होई माहारफपणा दी रहे। तति माहारका पूर्वोक्त काल उपपनकरि प्रा है। परि माहारफमा जघम्पकाल तीन समय घाटि सांसमा अठारहवां भाग जानमा मान पुरमय विष पिप्रगति के समय घराय इतमा त हो है पुरि मनाहारक काल कामय गरीर पिप उत्कर टीम समय अघन्य पक ममय जानना मान पिप्रगति विप इतने कास पपवही मो कम यासानिमा प्रापन हो हैरो समबडी अनुवादित गाम्मरसार गाथा ६७० । ( )स महाासांपाम प शासमुपपाथ। पिमहपती याविनापती घेति' (सार्थसिविवृत्ति इसी सत्र मीच दमो)- घमण समुश्य या समूह, लिये है (ससारी जीयकीगति फ्पोकि पह भवासा स्नफेषत संसारी जीयोंसे संपन्य रसवा)पिप्रहसहित मी(घ)और विप्रहरहितभी(=य () तहाँ पुगति सो विमहरहित । तामात जसे ए पहिये तीर वा सो सूषा ठिकास पाच तेसे पुगतिहः याका काल एक समय ही है सासमारीमि भी हाद परि मुकभीय मी हा दी बहुरि पाणिमुकाविप एक मोड़ा होहीयाका बास दोय समयई, जपजीकृता पयनिफापृष्ठ२७८/ ( ) समुपपाया- २ पराग उपपाद में प्रति प्रावी गतिरषिप्रा कृतिला पिप्रस्वती"तत्त्वाप राजपातिक पाठ १७ स भवासिया मुरम धाम समुदय के लिये है भात पकार उपपाद शत्रप्रति श्रभ्योगति कहिये प्रविप्रहागति और पुटिसागति फहिपे विप्रपतीगति है तनके समुथयके लियेह भायार्प इस भट्ठाईसया सूचमें ओ केपत संसारी सोपोंके कथनमें ईसयगति(थिमहागति और भविप्रहगति)काप्रदाय के भय ' है। () 'भासा मसला गतीनामापांका पुगतिःपाणिमुका-ये भापक थारगतियों के माम है कि इपुगति पारिसमकागति सांगलिका गामूपिफा पति । तत्रापिपरा प्राथमिकी = लांगलिकागति और गोमूनिफागति ऐसे हातहमियमकी गति जोईसोतीप्रविमहागति अर्थात् मोडारहितगवि इषु जो पाप तिसके समान सरलईसीधीगति है श्रमगतिौर रापा विप्रयत्पा - अपशेप तीम(पाणिमुकागति सांगतिकागति गोत्रिकागति)षिप्रहपानीमोडासहित (पुगतिरिपेषुगति। (पुगतिमय पुगतिः) क उपमाय? = तिमम पुगतिके समाम जो है सो पुगतिहै । यहां उपमामय क्या है। पयोगविरालश्यरेशावग्यी,त्याससारिपासियांचमीपामां-जैसे पापकीगति सदयस्पामपयत सरल है से संसारिमिक तथा सिबाये जीवनि सग्गेगतिरफसमयित्री तत्याधराजपातिकम् पृष्ठम् ६७ =सरतगति सो एफ समयकीहै भायार्थ जिस प्रकार अपने लक्ष्यस्थानता पाणफीगति DIROENIRBORDEROSAROerireeMROOOOOOOARD ८१ का साथ ध्याय सिद्धि सुप्र२८ ८० CarNOGAPOOTOGROOMDOUNCERCOACETAMOATRE ॥ विग्रहवती च संसारिणः प्रावतुर्व्यः॥२८॥ विग्रहवेती ससारिण प्राकतुर्य ॥२८॥ -विग्रहस्तो(गवि ) भनिग्रा गसि.(च) संसारिण माफ-चतुर्म्यः ॥ २८ ॥ म्यार्थ -बिग्रावती गतिविग्रगति प०पोरेपगति पा विग्रहसहित गमन और विप्रारहित गमन मी (-च) संसारिण माफक पतु । =ससारी मीषका पार समयस परिने २ होता है भावार्य विग्रहगविमें सीधीगति, एक मोड़ापाजोगवि दो मोडापाचीगवि, दीन मोहापाजीगति ऐसे पे पारगविया राती । भागमम क्रमसे इन गतियोंकी इपुगवि, पाणिमुक्कागति, नांगनिकागवि, और गाप्रिया मवि इसपकार पार संशमानी है। पारोंगतियोंमें इपुगति मोहाररिस है और शेष गवियाँ पोडासहित । इन पारो गतियोंका स्पष्ट भर्य ऐसे है कि जिस प्रकार अपने लक्ष्य स्यानवक पाणकी गदि सीपी रोती है सो प्रकार संसारी और सिद्ध मीयों की मा मोदारहिव सोधीगति ऐसी है उसको पुगति करते हैं। इस पुगवि पि एक समय लगता है मर्याद एफी समयमें शरीर छाड़ना और दूसरा शरीर प्राण करना ये सब कार्य हामाते हैं । इसलिये इपुगनिमें संसारी मीप भनासरत नहीं होवादोमिस प्रकार आपसे तिरको भोर फेंके हुये पदार्यकीगति एक मोहालेकर होती है। उसी प्रकार ससारा जीपफी मो गति एक मोहालेकर हो या पाणिमुक्तागवि कालाती है और उसगतिमें दा समय लगते हैं । ()मिस प्रकार सांगतात दो मगर मोरराती है उसी प्रकार मिस गतिमें दो मोड़नेप? पसे जोगशिकावि कावे हैं। और उसने तीन समय लगते हैं। ( ) सपा मिस प्रकार गौक मप्र पहुव मोहराते हैं 1 १)विप्रपती-मोप माझ्यासी माहेसहित पक्रतामहिल विप्रहसहित कुरितगति (२) दामो मानार्याम इससूत्र का पाठ मौरपर्यएकसाई (३) माम माया या ग्पपाय नमें जानेरे लिये संपारी जीवों की सीधी भी गति होती है और मोदेबाली करितगति भी हाती है इस घर दोनों माविकी गतिक समुपय के लिये है भयात् संजारी बीवी भविप्रहगति मी होती है और विप्रहगति भी होतीहैपरंतु मुकजीवकी क्स अपिप्रागति होती है और यह समयावा' सूत्र के अनुक्स इस भविग्रहगतिका काल एक समय है मुकजीपका भी और संसारी शीयममी संपारीमीयमविप्रह गति में (भगत सीपीगति पुगति )पसी समपम शरीर त्याग कर सम्म सेसेताहमोर ऐसी अवस्था में मनाहारण नहीं होता माहारकपना रहता है। बहुतस महारा की जैसा कि हममा भनुम पा पारना है कि संसारीजीव जन्म लेनेमें अवश्यही पाया थापा तीन समय तक मनाहारक पर भी धीम्पावारा मारे अनुकत पता नारी जीव रगती पारपारे अनुसार पसा महसतामा रकम रोनाहा विप्रतिम भापमानाOTA समलि पर विणली विष कप मेपममिलियन MONOMIRONOem Co सिद्धि २सुत्र२८ ORDOHED OUR ONTOON OOOOO ARTO ORO पटानियासी जगहलसहाय पसौलकत परछेद भीर सिमास्पर्ष सवि सार्यसदिय शम्दया हिन्दी अनुवाद मध्याय २ सुन ,२८ चर्चि उसी प्रकार मिसगनिमें वोन पाखेनेपो पर गो विकागति है, और उसके होनमें चार समय जगद है। पारोंगतियोंमें पहिली यध्याय र मिसपल है कि मतिम संसारी जोष ग्राहक बना पसमारोहमसीहत गोम्मरसार गापा ३0 नीधे निम्न लेप है बाद पत गहप मुम्प गुलक असल्यावर भाम प्रमाण है। मुम्पंगुतका प्रसस्याता मागके जेते प्रदेश होहि तितने समप प्रमाण भारका काल हा हा मान जो मरत तो भायु पूरी म पीप होर ही वहां मनाहार हो माहारका पास इतमा कैसे कमा ? वाका समान-ओ मरस भए जिस जीप पाए यिप्रगति म होइ सभी एक समयसप गति होता मनाहारकपणा महोई माहारकपसा ही रही सात माहारकमा पूल पास समपनगरि कहा है। परि माहारकमा अभ्यास तीन समय घाटि सांसमा प्रतापपां माग सामना मार मय पिप विनागवि के समय भराय इतना करत दोपरि मनाहारा न कार्मव शरीर विष उत्कम तीन समय मघम्य एक ममप मानता विपरगति विप ने कास पपतही मोम पर्पयानिमा प्रासन हो होसमती अनुवादित गाम्मरसार गापा १७०' (म महासाप शाहसमुण्याय । विप्रहपती षाविप्रावती वि' (ससिरित्तिासी पत्रके मीचे देयो) = धराप समुश्य वा समूह सिरोसिसारी जीवीगति पोरियह भट्ठासया सरकेपल संसारी जीयास संप प रमतादेविप्रासरित भी(घ)और विप्रहरहितभी- () हा पुपति तो विप्रदरहित है । सात स एषु पहिऐ तीर चास सो स्पा ठिकाने पार्ष तैसे गतिही पागा काल एक समय ही है सामामि भी होई पारि मुकमीपर भी हारि पाविमुकाविप पर मोला होहीयाका काल दोपसमयदे अपचंदजीकृता पमिबापट२७/ ( ) परामसमुचपापा-१२॥ पणा उपपाद प्रति सम्वी गतिविपदा रिसा पिनवती तत्त्वाप रामपातिक पास इस भाईसा सबमें पशव समुप के लिये है मर्यात पार उपपाद पर प्रति अग्पीमति कपीपे भविमसामति भऔर कुटिलागति कहिय विप्रववीपति है समुपपके लिये मापाप इस महासया सूरमें जो केवल संसारी मोवोंके कपनमें सर्पगति(विप्रहाग और प्रविप्रहगति, कामरस भय" "मोसा मसला गतीनामाकाका पुगति पानिमुखा- ये भार्गक पारगतियों के नाम है कि इयुगति पालिमकागति सांगतिका गाभिनव इति । वाविप्रहा प्राथमिकी लांगलिकागति और गोविकागति ऐसे हस्तांप्रथमसीयुगति मोसोवोमविप्रहागरित अर्थात् मोडारहितगति जो पाल तिसके समान सरसईसीपीगति प्रगतिहार गरा पिपरपस्या - अपयेष तीन(पादिमुकागति सांगलिकागति गोत्रिकापति)षिप्रहवामदेमोडासहित पुगहिरिपुगति (पुगतिय पुगतिः) क उपमा? कतिनमें पुगति समान जो है सो पुगतिहै । यहाँ उपमामय क्या है। पगेगतिरालपपदेशावग्वी,तपासंसारिपासिष्यवाणीवाना असे वापरगति लत्यस्पालपयव सरल है तेसे संसारिनिया सिमाये मोवनिक भयोगविसमपिरी" वापरामवाति पम् परम् ७ =सरतगति सा एक समयफोहे भावार्थ मिस प्रकार अपने लक्ष्यस्थामवर पाणीगति RANDRENDOREDGIRCORROOHINBOARDOIEDORBAND 10 -- मर्थ प्रयाय२ । MBRIPOORIEDORAND सिद्धि सूत्र२८ कालावधारणार्थ प्राक्चतुर्य इत्युच्यते।प्रागितिवचन मर्यादार्थ,चतुर्थात्समयात्नाग्विग्रहवती गतिर्भवति न चतुर्थे इति । कुत इति चेत्-सर्वोत्कृष्टविग्रहनिमित्तनिष्कुटनेत्रे उत्पित्सु प्राणी निाकुरक्षेत्रानुपूर्व्यनुश्रेण्यभावादिषुगत्यभावे निष्कुटक्षेत्रप्रापणनिमित्तां त्रिविग्रहा गतिमारमते नोवा॑म् । तथाविधोपपादक्षताभावात् ॥ पुगवि संसारी भौर मुक्त दोनों प्रकारके जीवोंक होती है परतु शेप गतियां केवल ससारी जीवों होती है। वृत्त्यनुपाद-पाल-अवधारण- अप्राम-पतुपातिककार निभय फरने के लिये चार (समय) से पहिले ऐसा (वाक्य सूत्र में) उग्यत उपाएमतिकायनम् ।। मर्यादा-अर्यम् ॥ का गया है। माफ ऐसा पाय सीमा के लिये है चतुर्यात् समयात माविमारवी ॥ गविना मववि T -चौर्य समयसे पहिले विग्रह गति होती है न० धतुर्ये । इतिका पुत' ० इति चेत् । =चौथे (समय) वि (विना कहिये मौदा नहीं है। ऐसा क्योंकर वारे सक्तिए-विग्रह-निमित-निफर क्षेचे गटस्पिसु ॥ (उत्तर)सर्वोलए विग्रह है कारण मिसको ऐसे निप्पट क्षेत्रमें उपमनेवाला पाणी निष्पर-सत्र-मानुपूर्वी-भेणि प्रमानात् ।। -भीव निष्ठुर क्षेत्र (लाकका प्रकोण) भानुपूर्वी सहित भतुभेणीफे नहोनेसे शुगति-ममा निफरमध पापण-निमिधाम् ।। बाणगति वा सीधीगविफे प्रभाव होने पर निफूट क्षेत्र में पहुंचने के लिये त्रि-विग्रहाम् गतिम् ॥ मारमसे T न ऊर्जाम् । -वीन मोडेवाली गतिको मारम्भे न कि भपिक (मोदेवाली गति)को भारम्म) नयाविष--उपपादक्षेत्र--अमावान् । क्योंकि इसमकारसे(-याविघ)उपमनेका मायक्षेत्रविधमान नहीहै मर्यानिष्न्य क्षेत्रक उपराव को ऐसा क्षेत्र नहीं निसमें जीप तीन मोड़से अधिकल केउपमें मपी हातो है भी प्रकार पारी मार सिब बीवोमी मा मादारहित सीधी गति होती है उसे पुगन्ति का पापगति फहत है इस पुगठिमें एक समप सगाई मर्यात् परबी समप में शरोर फाइना और दूसरा शरीर प्रास करमा ये सप फार्म हो जाते है। इसीसिये इषु मतिम ममारी गीय मनाहारक हो माहाराही रहता है उद चायें गतियों में पहिली पुगति संसारी और मुक दोनों प्रकारके जीवोंद होती है परतु प्रार तीन गावपा यस संसारी मीप होती। ( ) यही बात कि समारी वीव और मजीव वोमों के प्रविमा गति होती है और भविप्रहगति एक समय है । प्रविग्रह गतिम संसारी बीच मनाहार नहीं रहना सोच्यातियो पूछ३५स और सपतिवित्तिक ३० सत्र के दमवापोसे कमावारिमित मलार समा उपपाद राम प्रति सम्प्यो गला आहारात शिपु समषु मनाहार - lalmanागर है कामेण शरीरकी विमानता ग्पसन एगी भार माहारदिवगमन (स्पति) में भीष मातरकोप तीन पमपीम (दिन एक माला पो मोडामा तीन मोड़े सिपे मत ६) जीप मनाहाकम्पनि मागिलति में भी मादाय है। LOCTODBTHROOODOORDOCOMONAL DOROORXOORXO ८२ पाय ८३ सिद्धि सूत्र२६ KOORDONCOURO चशब्द समुनयार्थ । विगृहमती चाविग्रहवती चेति ॥ विगृह्यत्या गते कालोऽवधृत । अविग्रहाया कियान काल इत्युच्यते- ॥एकसमयाऽविग्रहा ॥२६॥ एक समयो यस्या सा एकसमया। न विद्यते विग्रहो यस्याः सा अविगृहा ॥ गतिमतां हि जीवपुद्गलानामव्याघतेनैकसमयिकी गतिरालोकान्तादपीति ॥ पगम । समुनय-प्रय, (इस स्त्रमें) पकार समुदय (समथय) के लिये है मर्यात् संसारी जीवफी(गवि) मिग्रारती १०मविप्रपती ॥ १० इतिक -विग्रह सहित मी (म्प) है रिग्रह रहित मी इस प्रकार है रिप्रवरया "गने । माता माता -विग्रावाले (जीप) निफा गमनका काल निमय मा निणीत किया भनिहाया रिग्रहराहेत(मीप) निका(अर्थात् उन संसोरी जीरोहा जो विग्रहगतिमें प्रजुगवि धारण करते हैएफ ही समयमें शरीर छोड़फर उसी समय में जन्म धारण करले मोरपिग्रहगतिमा भी मनाहारक नहीं होते माहारक ही पने रासभोर मुक्तनीयोंकाजो सीधेमोसकोपधारनेर कियान कालति उच्यते ॥ -पया काल है इस प्रकार(प्रश्न होने पर)का नाता है कि एकसमयाऽविगूही ॥ २९॥ =एक समयाऽविगहा ( गति भवति ) ॥ २९ ॥ मार्य -एकसमपामविपा" गति॥ भवतिT -एक समय काल जिसका पसी मोडारहित गवि,रजुगति वा इपुगति है मर्यात् मोहा रहिव गवि एक समय मात्र ही होती है। गतिवान जीव और पुद्गय की मोड़ा रवि गति लोक के अग्रभाग पर्यंत मी एक ही समय में निप्पन्न हो जाती है। स.पर्व -परा समय यस्पासा"एकसमयान-एफ है समय जिसका सो एफ समया है। नहीं रे रिपोज निमा यस्पासा" भविनापियामान पा पर्वमान पिनर मिसफे सो अपियारे गतिपताम् तिमीव-पुलानाम्। भम्यापावेन गिविवान (आसिसहित) ही मौर भौर पुलोंको विग्रह शून्य या अपिग्रहकरि एकसमयिकी गतिमा-शोकमन्वादामपिथति एक समय माप गमन की अपेक्षा से लोक पर्यत भी है १९हारमानायके समाप्पवरपार्थापिगम पत्र में एक समयोऽविप्रहा = विगहररित गति एक ही समपमें होती है। दोनों मानायोमै एकमर्यह TODONEDOEDOHBANDOODOOT HINDORE ८३ सवाय सिद्धि सुत्र२६ मध्याय ३० COCONDOLOGICU800. ८९ अनादिकर्मबन्धसन्तती मिथ्यादर्शनादिप्रत्ययवशात्कर्माण्यादानो विग्रहगतावप्याहारक प्रसक्तस्ततो नियमार्थमिदमुच्यते- ॥एकं द्वौ त्रीन्वाऽनाहारकः॥३०॥ मनादिकर्मपन्पसन्तवादामियादर्शनादि प्रत्यय = प्रनादिफर्ममयकी संवानपि पिध्यादर्शनादिकफे कारण (-पत्यय ) यात माणिमादानाविवागतौ मपि० पशस (यहमीप) कर्मोको प्राण करता है। विग्रहगतिमें भी भारपिसका स्वतानिमयाजदम्॥ पच्यते-मातरक(का मसंग भाता है विस(ऐत से नियमके भर्य यह कहा भाता है कि एक द्वौ जीन्चाऽनाहारक -जीवो विग्रहगतौ एक हौत्रीन् वा समयाननाहारक भवति सपार्थ:-जीवा निग्रहगतो एक -जीव नवीन शरीर धारण करने के लिये गमन करनमें एफ समय दापोन सवा०समपान सामनाहारका मातिर -दो समय भया तीन समयवफ भनागरफ( नोकमेपर्गणाफे प्राणरहित)है। भाषा नो मीन सीपा जाय उपने भातरफ है। या भीष उसी समय शरीर त्याग करतापौर उसी समयमें अनुगति द्वारा जन्म लेखेवारमनारिष नहीं होता है भागारकही मना राता है और मो एक मोड़ालेकर उपमया है सो एक समय अनारक है समय माहारी मो दाय मागासकर उपजता है सो दोय समय मनापारक है वीमे समय माहार ग्रहण करता है और मा तीन मालखकर उत्तम होता है सा वीन समय सक मनाहारको चौये समय भारकर्षात् पौधे समयमें शरीर प्राप्तिको प्राण करक आहारक रोमाता है। (पपेनोमर मानायके समाप्य० में एस श्री पानाहारका ऐसा पाउ स सूत्रका है। हमारे पहां पाठसे त्रीन्" राव म्यूम है। इस पाठकेही अनुकूल उनके यहां एक या दो समय तक बीय प्रमाहारक रहता है ऐसा अप किया है हमार यहां के अनुसार एकसमय दोसमय पातोनसमयता सीप यिमहगति में प्रताहारक रहता है पही भर्यमेव । सम दोनों समप्रदायाका विप्रावती घसंसारिणमाफ षतुम्पा इस सुप पाठ और मय एक है तव श्मेवाम्बरों समाप्यतत्त्वार्थाधिगमनमै इससूशके पाठमै भीन् सम्म होना चाहिये नही ताविप्रपती पसंतान रिमा पनुम्प और इससूनमा भय मापसमें मेल नहीं पाता संभव है कि मीन राव रहगया हो । (२) महम-पदो तीन समय ताजीव मनाहार रहता है यहां पर मार लिया पिया है। महा प्राधिकरण मर्य होता है यहां पर सन्मी यिभन्दि रानोमलिये एक हो गोन्पापर पस्मिरी पु परको पिमति होनी चाहिये ? (पो सप्तम्पपिकरणे enns फसायापी पिर मामी चिमनितीमापारी अभियान प्रजिअर्प मापारranull AIRO HIRO OBERO OURD ORIES ORD GIPRO OURD OR FRDIRDERA so मार्ग यस्याय सिद्धि सुत्र३० एटानिमामी मगरूपसाप पकीय कन पदद मौर विमात्पर्पसहित सायसिरिचित शमशान्दा मनुसाद मप्याप २ सूत्र ३० अधिकारात्समयाभिसम्बन्ध । वाशब्दो विकल्पार्थ । विकल्पश्च यथेच्छातिसर्ग॥ एकंवा द्वौ वा बीन्या समयाननाहारको भवतीत्यर्थ ॥ त्रयाणां शरीराणां पण्णां पर्याप्तीनां योग्यपुद्गलग्रहण- माहार । तदभावादनाहारक ॥ कर्मादान हि निरन्तरं, कार्मणशरीरसद्भावे ॥ उपपादनेत्र प्रति ऋज्च्या गती श्राहारक । इतरेषु त्रिपु समयेषु अनाहारक ॥ एव गच्छतो एस्पनराद मपिणारा समय-भमिसम्म पापाशद-मकरण(पश)से (इसमस) समयका साप है। (प्रमे) पा शम्र विराम पिता प०पया इषा- =विकप खिये है। मौर(-१) विकम्प है सा रसानुकूल (पटना) भतिसर्गः (उऊ निरन्पो सोही) भतिसर्ग है (मो पारा सा फरो) परम्पादी' या पीन का समयान् । -एकको अथवा दोको भयरा वीन समयको (मीर) मनारम भवति । इति मर्य' प्रयाणाम् Hm -मनाहारक हावा ऐसा भाशय है। सीन (मौदारिफ वैक्रियिफ भारारक) शरीराणाम् पपणाम्। 'पर्याप्तीनाम् । शरीर,मा(माहार शरीर इन्द्रियश्वासाच्छ्वास-भाषा-मन)पर्याप्तों के गाग्प पहन-प्राणम्। "मार न ममापात म्याग्य पुनल(पगणाभों) का भादान सो मार है उसके पिधमान न हानसे मनासारका धर्म भादानम् परि निरन्तरम् ।। -मनापरक है। कर्मवर्गणमोका ग्राण लगातार है। कार्म शरीरसमा उपपादचेषम् "पवि० कार्मणशरीरफे रानेपर उपननेके पकी भोर फरम्पाम् गाभारतरपुर प्रिय म्मोदाररिवगमन(अजुगवि)में(जीव)मारक है। अन्य वीन सपा समयम(नीय) भर्यात् एक पिप्रधागति, दो विग्रहागविमें,वीन पिग्रहगतिमें मनारमा परम् गाठता।" (नोकर्म की अपेसा) अनारक है। ऐसे (भवान्तरपति) गमन करते हुये भीषको भरपात मयागी पियार्यात् एक समय को समय तीन समयो प्रारूपसे मनाहारक रहता है किसी एक परमे मही यह यहां पर विषादया तह नियम है कि महापर कासरत मपन्त संयोग रहता है यहाँपर अपिफरण भपके विधमान होते तिमी सप्तमी पिमतिकी पाप नितीया पिमति ही होती है इसलिये सामएकी भीन्'शितीया विभफिर्याक प्रयोग हो ठीक हैवितीया विमतिका प्रमाण यह है कि मासमपीता भराप्यापी२३॥ कालापनोरत्पम्त संयोगे(शिवीया,मरयम्त संयोग गम्पमानहो तो काल और मध्ययायी(मायापी) शोमै शिवीया पिमति हो। - मासम् अपीत)- प्रारुपसे मासमर पड़ता है। यहाँ मासे के स्थानमें मासम् द्वितीया विभति लाये हैं। माप्तस्य निरपीते-मासमा पोवार पदता शम्यरमेय पर्वत बोराके एक भागमे पर्वत यहां दोनोउयाहरणों में प्रत्यात संयोग मी ... 400ORD OORDOM:00:20 2:16 OMKOORI PORTO ८५ सवार्य श्रयाय२ सिद्धि सुत्र२६ ८४ ३ MMEND ORRNO Orape OERNOORBORIMOOXIMALHOONICORDNE अनादिकर्मबन्धसन्तती मिध्यादर्शनादिप्रत्ययवशात्कर्माण्यादानो विग्रहगतावप्याहारक प्रसक्तस्ततो नियमार्थमिदमुच्यते- ॥एकं द्वौ त्रीन्याऽनाहारकः॥३०॥ मनादिर्मपन्यान्ववादामिध्यादर्शनादि पस्यय = मनादिकमपपकी सतानविर्षे मिथ्यादर्शनादिकके कारण (-परयय ) पान, कोणिमादानःनिग्रागवीता भपिक पशस (यहमीर) कोशीमाण करता है। पिग्रहगवि, मी मारकापसक तनानिमपार्याइदम् । सरयते -भातरफा का प्रसंग माता है सिस(रेत से नियमके भर्य या कहा नाता है कि एक द्वोत्रीन्वाऽनाहारक" -जीवो विग्रहगतो एक द्वौ त्रीन् वा समयाननाहारक भवति पार्थ:-जीय विग्रहगो एकम् । -मीव नवीन शरीर धारण करने के लिये गमन करनमें एक समय दापोन्सपासमयान मनाहारक भरवित –दा समय प्रयया तीन समयता भनागारक(नोफर्मपर्गणा ग्राणरहित)है। भाषार्थ मो जीप सीधा माय उपमे है भागारक है। या जीव उसी समय शरीर स्पाग करवाईमौर उसी समयमें प्रमुगति द्वारा जन्म लेलेवाहेमनाहारक नहीं होता है मारकही बना रहता है और मो एक मोड़ासकर रपमवारे सो एक समय अनारफरे मसमप माहारक है जो दाय मादालेकर उपमता है सो दोय समय भनापारक पीने समय माहार प्राण करवा भौर मा तीन माहालकर उत्पन्न होता हैसा वीन समय तक मनाहारक है चौथे समय पाहारकर भर्यात् चौथे सपयम शरीर माप्तिको ग्रहण करक माहारक होमासा है। (साबर मानापसे समाप्य० में एकमो पानाहारक पेसा पाठ इस बा ।हमारे पहाँ के पाठसे प्रीन्" शव म्यूम है। इस पाठी मनुहल उनके यहां -एक पापो समय तक ग्रीव मनाहारक रहता है" ऐसा अप किया है इमार यहां के अनुसार एकसमय दोसमय पा तोमममयत गीय विप्रहगति में मनाहारक रहता है यही अयमेव है। जप दानों समप्रापाका विप्रावती प संसारिणमाक बनुम्या इस धम पाठ भीर मर्य पर है व श्वेताम्बरोंक समाप्पतत्त्वार्थापिगमस्शमें इससूशके पाठमें भीम शम्म होना चाहिये नहीं तो विप्रावती व संसा- रिपमा नम्प'मोरासम्मका प्रय मापसमें मेल नहीं पाता संभय है कि भीन् शुष्ट रहगया हो। (२) प्रश्न-एका तीन समप ताजीय प्रमागरक रहता है यहां पर माहार किया क्रिण का अहाँ प्रपिरत पर्थ होता है पहा पर मामी विमति रातोरामति एक मोमोन पर एकस्मिन् जो BIT परमिति नानी बारिप? (ची सप्तम्प्रधिकरणेच ins पापापीपिचरम परमी पिमन्दिानीदी मापारी पिपरम ॥॥॥। पिनाना नापार tari TOTDERDROMEBOROUPLORDROIROOaavaaneo ४ सिद्धि सुत्र३१ KOOR ROAD ONED ONKO CHOORXOOOXXOOXROAD मिश्रणगर्भ । मानोपभुक्ताहारगरणाद्वा गर्भ । उपैत्युपपद्यतेऽस्मिन्निति उपपाद । देवनारको पर्यार्थ त्पत्तिस्थानविशेपसज्ञा ॥ एते त्रय ससारिणा जीवानां जन्मप्रकारा शुभाशुभपरिणामनिमि याय तकर्मभेदविपाककृता॥ अथाधिकृतस्यससारिविपयोपभोगोपलभ्याधिष्ठानप्रवणस्यजन्मनोयोनिविकल्पावक्तव्याइत्यताह मिश्रणम् गभरामान उपमुझ भार- मिषित होना(=मिश्रण) सागर्म है । भपया मातासे गपहुये (उपमुक) माधारके गरपान गर्भ -निगमनसे ना सोगरे पर्याद पाताभारको अपना पाहार पनापा माय पैतिापत भरिमन्त इति उपपाद ममिसमें पापता है (-पैति या मिसमें उरभवा रे (पपयन) ऐसा उपपादरे मर्यात् मिममें पहुंचकर पा मिसको प्राप्तकर वपना सा उपपाद रे दर नारम्-उत्पत्ति-स्पान-शिप-सम्मा - भौर नारियोंक उपमनस स्थानका( उपपाद या विशेष नामरे एन पा संसारिणामीवाना मम्म-भाग- तीन भेद मसारी माणियोंके मन्मा मधारण करनेफे हैं। गुम-मशुम-परिणाप निमित्त-कर्ममेद- येवीनों मन्प)मन्ये पुरे पार्टी कारणसे कोंके मेदोके पिपासना उदपस लिये मासे रे मर्यात् परिणामों के कार्य कर्म वन्धके भेद और बन्यों के फल मन्म भेद में क्योंकि कारण मनुएला सोफ कार्य दोख पड़वाहै । गुममशुम निसपकारका कर्म होनार रसीके अनुकूल अन्मोंकी उत्पन्ति होती है। अपामशिकवस्या मा निस(मम्मका ऊपरसे अधिकार या प्रकरण पलाभारा और समारि-पिप-उपभाम-उपम्पि म्मो संसारी नीयोंका विपपभोगोंकी (मंसारि-पिपयोपमोग) मानि(स्वपक्षम्पि) के अधिष्ठान-मरणस्पनन्मन fm म्भधारभूत शरीरकी उत्पचि (-मपिप्ठान)कारण रेषा प्रवीण (मरणस्प) उसमन्मके पानिनियामकम्माकिमतामा पानियोंफे मेद(विकल्पा)मा चाहिये । इस लिये फरक (१ उपत- उप उपवर्ग समीप स्पर्म हपति में ए गुण विभवादि शितीप गडका धातु परस्मैपद' गाना के अर्थ है अध्यापर५५६ के अनुसार का गुस रहो कर ति सय पुरप पर पवन परस्मैपद वर्तमान कासको बोड़ो पति वना उपपतिउपविसमीप (= उप) जातादि पति शाशप समीप आता भयात् पासतारे उपपपते-उप पद-प-वे । उप-भारम्भ(पलसम्मकोरापु) पद दिपादि गनुप गया मारमन पदी पातु जिसका अर्थ प्राप्ति होगा-है।य विकरकरे जो वनुष गणको धातुओं के पीदे औरए- सेन्ते त्यादि प्रत्य पों के पहिले मोड़ा जाता है और ते भारमनेपद एक पथम अम्प पुरष यर्तमान कासका प्रत्ययहै उपपका शम्दार्थ भारम्भता को (संसारमै) मा पसा है पात् उपजता है। I.COCEBOEnerCOT.CHODeacBOEDEO ८७ OTERO समाथे यध्याय सिद्धि २सुत्र३१ KLEOORDET eTRIDERORNO उपपादान् । ऽभिनवमूर्त्यन्तरनिर्वृत्तिजन्मप्रकारप्रतिपादनार्थमाह- ॥ सम्मृर्छनगर्भोपपादाजन्म ॥ ३१ ॥ त्रिपु लोकपूर्वमस्तिर्यक् च देहस्य समन्ततो मूर्छन सम्मूर्छनमवयवप्रकल्पनम् । स्त्रिया उदरे शुक्रशोणितयोर्गरणं मभिनयमूर्ति मन्वर-निप्ति मन्य नवीन मन्प शरीरकी रचना( निष्ठचि) को भौर मन्मके मार-पतिपादन मम्तामा -भेद मनाउनके लिये था कानेक शिये कहते हैं कि 'सम्मूर्छनगर्भोपपादाज्जन्म॥३१॥ सम्मूर्च्छनात् गर्भात् उपपादात् "जन्म ॥ ३१ ॥ मा:-सम्मूर्द्धनात =सम्म्च्छन(मर्याद वीनलोफ मावा भवरष सहित शरीरके बनन ) से गया। =गर्भ (भयात् मावाकरम और पिवाफ पीर्यके सयोग वा समन्ध) से उपपाद ( अर्थात् मिस स्थानमें प्राकार उत्पनों गां) से-उपपादशय्यासे भथा उपपाद स्पानसे । (उपपाद-देवभोरनारिकियों के उपप रोनके स्थान) (मीरक) नवीन शरीरका धारण(=मन्म) है। इस स्त्रका सारांश पाकि सम्मथेनमन्म,गर्भमन्म, उपपादजन्म ये ही सीन मेद भापकरें। सूत्रकाअन्यपाठ -सम्मूर्च्छनगर्भोपपाढा जन्म ॥ ३१॥ म्याया-सम्मूमन-गमे उपपादानमा समर्थन,गर्म भार उपपादशय्यारूप (मीसकेये) सीन मन्म में उत्पनुरादः विपाशा कम् भपविर्षाप-तीनचाकमें ऊपर नीचे और (प) विर्यक दरस्या समन्तत मूर्धनम् सम्पूर्णम् ॥-सारी भोर पा मा सहा ( समन्तता) शरीरका धननाना ( मूर्च्छन)सो सम्पूर्ण्यन माया पापनम् (मर्याद दोक)भयपकी (सर्वत्र) रचना वा उत्पचिरमझम्प) सो सम्मान है। विगाउदगा-शाणिवपारम्प-नारी के दर पीर्य (शुभ) और योर (गोणिस) मिलना (गरण) , सागरम समायमे उपपपपके स्पानमः उपपातालापमा 'मम्म पगापाता माम ऐसा पार अवानोकाएका (२) पदापरम पाRh एषमनमे है मपारध्यानीमनी पर राम यांनी मारे पदार्जन गोगों im CONOUNDED मर्याय अध्याय मामलम dXDEE सिद्धि सुत्रहरु गाणादा गर्भ मिश्रण गर्भ । मानोपभुक्ताहारगरणाद्वा गर्भ । उपैत्युपपद्यतऽस्मिन्निति उपपाद । देवनारको त्पत्तिस्थानविशेपसज्ञा ॥ एते त्रय ससारिणां जीवाना जन्मप्रकारा शुभाशुभपरिणामनिमि तफर्मभेदविपाककृता॥ अथाधिकृतस्यससारिविपयोपभोगोपल्ब्ध्याधिष्ठानप्रवणस्यजन्मनोयोनिविकल्पावक्तव्याइत्यतआह पिणम्"गर्म मामात्र उपमुक भाार- मिभित होना(मिभण) सोगर्भ है । भयवा मातासे गयेहुये (उपमुक्त) भागारके =निगलनसे होना सोग मर्यात् मावाके भारको अपना माहार पनाया माय उपैति उपपपता भग्मिन् । इवि उपपाद'' मिसमें पहुपता है (उपैति)वा मिसमें मनता है (उपपयते) ऐसा उपपाद है अर्थात् जिममें पहुंचकर पा निसको प्राप्तहोकर उपमता है सा उपपाद है दर नार: उत्पत्ति-स्यान-पिशप-सम्मा दप भौर नारपियोंक उपमना स्याना( उपपाद या विशेष नामरे एन प्रय: संसारिणाग्नीवाना मन्म पहारा:-ये तीन भेद ससारी माणियों के मन्मा हैं पा मधारण करनेके हैं। शुभ-अशुभ-परिणाम-निमिष-कर्म मेद- येतीनों मन्म)मच्छे पुरे माफे फारणसे फों के भेदोंके विपासना उदयसे किये जाते है भर्यात् परिणामोंफे कार्य कर्म पन्धके भेद हैं और कर्म पन्योंके फल मन्म मेद में पोंकि कारणफे मनुछना लोकमें कार्य दोस्त परताहै। शुपमशुभ मिसमकारका कर्म होता सीके भनुछल जन्मोंकी उत्पन्ति होती है। मय० मपिकतस्प मप्र मिस(मम्मका अपरसे भरिकार पाप्रकरण घजाभारहाद मौर संसारि-विपप-उपभाग-उपम्भि- नो संसारीनीयोंका विषयमोगोंकी (संसारि विपपापभोग) माप्ति ( उपचम्धि) के भधिष्ठान-परणस्पजमना मधारभूत शरीरकी उत्पपि(-मपिप्ठान)कारण रेषा प्रपीणहै (अरणस्य ) उसमन्मके पानिमिरम्पकमाविमा पाहा -पानियों के भेद(पिफम्पा)काना पाहिये । इस लिये कर है कि (१ उपति-उप उपसर्ग समीप य र पति में ए गुणका है।ई भवावि दितीय गपका पातु परस्मैपद' जामा के अर्थमेह भप्यापरपृष्ठ ५१ के अनुसार गुण ए हो कर ति अन्य पुरुष पक यम परस्मैपद वर्तमान कालको जोड़ो पति पना उप०एतिरपति-समीप (= उप) जावा है एति समाप समीप जाताहै भयात् पोपता है (२) पपपते उप-पद-य-ते. उप-भारम्भ(पमन्द्रकोपडप) पद विवादि गतुप गसमा मात्मने पदी पातु जिसका अर्थ प्राप्ति होना है। य पिकरण है मोचमुथ गणकी धातुओं के पीछे औरए-से-ते इत्यादि प्रत्य माप्त होता है पेसा है पात् उपमता है। पों से पहिले मोड़ा जाता और ते प्रारमनेपर एक पषम सम्प पुरुष वर्तमाम कासका प्रत्यय । उपपदमा रापार्थ भारम्मता को (संसारम) ROGRANDOARDO oilaRDERBOADPARO - ८७ COCIR सार्थ दध्याय सिद्धि २सुन३१ 180018OREOTE: DOMORRBene ऽभिनयमूर्त्यन्तरनित्तिजन्मप्रकारप्रतिपादनार्थमाह- ॥ सम्मृर्छनगर्भोपपादाजन्म ॥ ३१ ॥ त्रिपु लोकपूर्ध्वमस्तिर्यक् च देहस्य समन्ततो मूर्छन सम्मूचनमवयवप्रकल्पनम् । स्त्रिया उदरे शुक्रशोणितयोर्गरणं अभिनयमूर्ति मन्तर-निति मन्य नवीन अन्य शरीरकी रचना(निधि) को भौर मन्मके प्रकार प्रतिपादन भयम्मा(r -भेद मनाउनके खिपे पा कानेके लिये कहते हैं कि 'सम्मूर्छनगर्भोपपादाजन्म॥३१॥ सम्मूर्च्छनात्-गर्भात् उपपादात्"-जन्म ॥ ३१ ॥ माया-सम्र्थना सम्म्च्छन(मर्याद वीनचोम महो वा भवन सहित शरीरफे पनन ) से गान् । -गर्भ (मर्थात् मावाकरम और पिताफ वीर्यके संयोग पा सरय) से उपपादान -उपपाद ( भर्यात् मिस स्थानमें भाकार उत्पमा पा) से-उपपादशय्यासे मयमा उपपाद स्यानसे । (उपपाद-देवभौरनारिकियों के उत्पन्न होनके स्यान) (नील) नवीन शरीरका धारण(=मन्म) है । इस स्त्रका सारांश यह है कि सम्मथेनमन्म,गर्ममन्म,उपपादमन्म ये ही सीन मेद म मफे हैं। सूत्रकाअन्यपाठ-सम्मळुनगर्मोपपादा जन्म ॥ ३१॥ माघ -सम्म् मन-गमे उपपादानन्य =सम्मन,गर्म और उपपादशम्यारुप (भीषकेये) वीन नन्म में रस्त्यनुवाद विशनारे पर्वम् भपस् विपाप-तीनखोकमें ऊपर नीचे और (च) तिर्यका दास्पात समन्तत मनम् सम्मानम् = गारो भोर पाना वहाँ (समन्ततः) शरीरका धनमाना (भूईन)सो सम्र्ण्यन रे भापर माननम् ॥ (अर्थात् देशक) अवयरकी (सर्वत्र) रपनाषा रत्पचि(मझम्प) है सो सम्पूर्णन है । निगा दरोगशुम शाणितयागरणम्"नारीके उदर वीर्य (शुक्र) और खोर (गोणित) मिलमा (भारण) (२२ पर्यापर अमक पपा पवन पान पर योगी एपमारे पri १ रवासास के समाप्यमे उपपपरे स्थानमरपपावासापेमान 'मम्मामापणता माम ऐसा पाठ है भोकाएकी MIUMLOCALMOOHD ANO पिणान अध्याय म सिद्धि सन ३२ DURG ROOARBOMPOSpeaRO DOCTOCICI TOOTCUT एयनिवासी जगरूपसहाय पीस कस पदरछेद और पिमरत्पर्य सहित सर्वार्थसिमितिका शम्दशः हिन्दी अनुवाद अध्याय २ सुभ ३२ श्रात्मनश्यैतन्यविशेपपरिणामश्चित्तम्। सह चित्त न वर्तत इति सचित्तः॥शीत इति स्पर्शविशेष शुक्लादिवटुभयवचनत्वात्तद्युक्त द्रव्यमप्याह। सम्यग्वृत सवृत । सवृत इति दुरुपलक्ष्य प्रदेश उच्यते ॥ सह इतरैर्वर्तन्त इति सेतरा ।सप्रतिपक्षा इत्यर्थ के पुनरितरे। अचित्तोष्णविवृता ॥ (७) संहनयानि-जीवका पर उत्पत्ति स्पान है जिसके पच भाग्यादित वा रके हों जैसे देव, नारकी भौर एकेन्द्रियमीर संवत यानि वान -मिस स्थान पर इनकी उत्पधि पाती है वह स्थान का हुभा रावाद उपड़ा हुभा नहीं राया है। (1) विस्त पानीवफा वा उत्पत्तिस्थान है मिसके पगलम्प सन्य प्रगट दीसे-जैसे मो जीप दा इन्द्रिय तीन इन्द्रिय और निवृनिपानि चा इन्द्रिय रेषे विनृत योनि वाले है-उनकी उत्पत्ति का स्थान उपहाडमा पा खुलाहुभा रहता है। (९) संमृतपिनुतपानि---जीवका पा उत्पत्ति स्थान मिसके पुद्नसके कप कितने ही रद हों कितने ही घो रूप हों जैसे जो जीव गर्भमावि संवृतस्टितरूप मिभयानि वाले उनकी उत्पत्रिका स्थान कुछ दकार्डमा यो अध उपहा हुभा रहताही। त्यनुराद'मात्मनः । पवन्य-विशेष-परिणामा पिमात्माका चैत या विशेषरूप परिणाम सो चिचहै सापिसन बसते सिमिच ॥ -मित्तकरि सहित(सा)ोता है ऐसा सपित है शीत हिनि स्पर्शविशेषाशुकादिवत् उमप शीव ऐसा स्पर्शका मेदो । श्वेवादिक(वर्णकभेद)साश दोनों(दष्पभोरगुण)का पपनस्वाद वद युक्तम् ष्यमा भाषक हानेसे उस(शीत)मिशित(-युक्त द्रम्प (मर्यात् शीवादग्य) को अपित्रमा भी(गीत)कावेरे भर्यात् शीवगुणषपन और द्रष्यपधन दोनों में इसलिये शीव शीषनद्रष्यका भी पाते हैं। सम्पग्टव संहत। -मले प्रकार पिराहमा माच्छादित पा भारत है सो सहर है दूर-उपलक्ष्य प्रदेश वि० संवनस्पता सह इतर वर्तन्ते वि० सेतरा" एनडीदेख्याभोरनहींशस्यागयारे मिसफा (-दुरुपचय )मदेशऐसासष्ठतकानाता उलटा करि सहित प्रपर्ववा है ऐसा सेवरा(शम्दका भर्य) है स-पतिपमा इति०मर्थः पुन 'इतरे । -विपक्षी या विरोधांजीपति है ऐसा मभिमाप है। और इसर फोन है मचित्त-उप-विहताः (उचर)भचित भौर उप्ण भौर पित(पपासस्य सचिच-श्रीव-सहव से उखटे) ८६ सवाय यध्याय POEBON ORIGNDROOMDOMINDOWROOMINDORDGIRDOIRD एमनिरामी नगरपसाय बीचकत पदम्मेद और सिमक्त्पर्य सरित सार्यसलिका शन्दशा हिन्दी मनुवाद भन्याय २ मम ३२ ॥सचित्तशीतसंवृताःसेतरा मिश्राश्चैकशस्तधोनयः ॥३२॥ सिद्धि मित्र३२ "सचित्तशीतसवृता सेतरा मिश्राश्च कशस्तद्योनय ॥ ३२ ॥ म्वार्थ -सपित्त-गीत-संहताना -सपित्त,शीत,संवत(और सचित्त-शीत-संवृत्त इन एक एफके) सा-विरा पतिपती,विपसी वा उमटे(मो भषिच-उप्ण-चिव) सहित (-सा) माएगा०मिश्रा मौर(सचित्त-शीत-सवत)एकएकके पिभ (नेसेसनित्तापित्त,शीतोष्ण,सवपित सहित द-योनपा -उन(सम्पूर्ण नादि भन्मों की योनिये पा उत्पचिस्पान ( योनयः) भाव (१) मपित्तपानि नीरा पर नत्यधिस्थान है जो चेतना सरित हो जैसे मसाधारण शरीर या नीयॉर्फे एकही गैरमें पहुव जीप तिससे परस्सर माथयसे सपिच हैं (२) मपित योनि भीषका यह सचिस्यान नदपदवपापुद्गलपपप भपित्त हों जैसेदेपनारिकीपों के उपमने फेस्पानमवितर (३) सरितामिच-मीवका पर उत्पसिस्थान है प्रा घेतना और मघतन पुनसके स्मन्मा जैसे मो मीर गर्मसे मायमान है गर्मम पे सपिचामिपसस मिभयोनिके पारकर पोंकि उनके उत्पत्तिक स्थानस्वरूप मासाके उदरमें घीर्य, और रम(लाह) भपित्त पदार्थ है ननका संपन्य सपेवन मावा भास्माके साय है। (५) शीतपानि-जीपका का स्त्पत्तिस्थान है मार्ग शीव स्पर्शरूप पुरखों जैसे किसी किसी देव और नारिकियों के शीतरूप पद्रसरकारी उत्पत्ति प्रस्थान ? (किसी किसी देव नारमियों के उप्णरूपही पनवक स्कन्म उत्पतिका स्थान है) दचनारकियोंकबहुताकेउपपादस्यान नष्णात पडतोरशीवरातमतःवेशीतपोनिषालेमीपावभौरम्प्ण यानिराखेमीहोतो (५) उप्णोनि नीर कारस्पषिस्थानी मारपणस्पर्शरूपपुरनामसग्निकायिकमावै मसायिकोंकेरत्पत्तिस्थानउप्णम ही रे (६) शीत प्णपोनि-जीवका वा उत्पत्तिस्थान है ना शीताप्णके मिश्ररुप पुतलों भर्यात् दष भौर नारकी और मग्निकाप मोरोस भिग्न मा भीर र उनमें पहुसस शीव पानिपाल होतो हुसस उप्णपानियाले होवेरमौर बहुतसे शीतोष्णस्वरूप मिभयानिपाले गते । इसमकार उनमें शीव,उष्ण,और शीताप्णतोनों प्रकारकी पोनियों का होना संभव है। इमार पहाँ श्री गुपा पुग्नोमै मन्ता पार ही पर माता) पाठ मारे पत्र (साता) पाठ है रसके भनुन रानो मामार्गापार परचमी परमान- मनाना माना भीर माना दोनों पाटीka सिद्धि सुन ३२ DONOUTOONRBOARBORiRDEIRDOIRO एटानिपासा मगरूपसाप पकीस कप्त पदपछेद और रिभवत्पर्य सहित सर्वार्थसिस्टिचिका शम्दशः हिन्दी अनुवाद अध्याय २ एम ३२ मर्य श्रात्मनश्चतन्यविशेपपरिणामश्चित्तमा सह चित्तन वर्तत इति सचित्ताशीत इति स्पर्शविशेप अध्याय शुलादिवदुभयवचनत्वात्तद्युक्त द्रव्यमप्याह॥ सम्यग्वृत संवृत । सवृत इति दुरुपलक्ष्य प्रदेश उच्यते ॥ सह इतरैर्वर्तन्त इति सेतराः।सप्रतिपक्षा इत्यर्थ ॥के पुनरितरे। अचित्तोष्णविवृता ॥ (७) संरतपानि-मीवका पर उत्पत्ति स्थान है जिसके पगल मा-श्रादित वा रके दो मैसे देव, नारको भौर एकेन्द्रियमीर सबव योनि वाल -निस स्थान पर इनकी उत्पधि होती है पर स्थान का पुमा रातारे ज्यदा हुभा नहीं रावा है। (८) पिरत पाजीवफा पा उत्पत्तिस्थान निसके पहलरूप स्मन्य प्रगट दीलें-जैसे मो जीप दो इन्द्रिय तीन इन्द्रिय और निवृतियोनि । मो इन्द्रिय रे थे विवृत योनि पाले है उनकी उत्पषि का स्थान उपनामा पा सुलाहुमा राता है। (९) संवृतषिमुसयोनि-जीवफा पा उत्पषि स्थानहै जिसके पुलके स्कप कितने ही ग्रहों फिवने ही पड़े रूप हो जैसे जो नीय गर्भमापे संवृत्तपिटवरूप मिभयोनि पासे उनकी उत्पत्तिका स्थान कुछ काहुमा तो कुछ उपग हुभा रहसाई।। प्रत्यनुगद प्रात्मन । पैसन्य-पिशेप-परिणाम मिर्च -मात्माका मैत यफा विशेषरूप परिणाम सो चित्तरे सालपिन वर्तते तिकसपिष चित्तकरि सदिव(धार) होता है ऐसा सपिचरे चीत ति स्पर्शमिशेषःशकादिवत् वमय शीव ऐसा स्पर्शका भेदौ । खेतादिक(पर्णक भेद)सदश दोनों(द्रव्य औरयण)का गनस्तान पद युक्तम् दम्पमा म्यापक हानेसे उस(शीव)मिनिस(युक्त द्रष्प (मर्षात् शीवसम्प) को भपिमा भी(शीत)कावे भर्याव शीवगुणवपन भौर इम्पवचन दोनों हैं इसलिये शीव शीवनाद्रम्पको भी करते हैं। सम्परगत संरत -भले प्रकार पिराहमा माच्छादित पा मारत है सो सम्व है तुर-उपजपा प्रदेश इति संववापयत । सासरे। पर्यन्ते वि० सेवरा" मनादेस्पामौरनहीं वसपागयारे भिसफा (-दुरुपचय )पदेशऐसासहवकहनावारी उलय करि सहित प्रपतवार ऐसा सेवरा(शब्दका अर्य) रे स-मविपना इतिकमा पुनः गवरे ? विपत्री का विरोपवालीपति का है ऐसा अभिमाय है। और इवर कोन है मपिष-उष्ण-पिता (घर)मपित भौर व भौर विडत(पपासंम्प सपिच-शीत-संवव से नचटे) COERO COCKCONDO: 0 FODESODERODE । सवार्थ अध्याय १० सिद्धि २सुत्र HORIRDOHORTOONOMIMOMein उभयात्मको मिथ। सचित्ताचित्त शीतोष्ण संवृतविवृत इति ॥ चशब्दः समुचयार्थ । मिश्राश्च योनयो भवन्तीति॥ इतरथा हि पूर्वोक्तानामेव विशेषण स्यात् ॥ एकश इति वीप्सार्थ ॥ तस्य ग्रहणं क्रममिश्रप्रतिपत्यर्थम्।यथैवं विज्ञायेतः सचित्तश्च अचित्तश्च शीतश्च उष्णश्च सवृतश्च विवृतश्रेति।मैव विज्ञायि सचितश्च शीतश्चेत्यादि। तद्ग्रहण जन्मप्रकारप्रतिनिर्देशार्थम् ।तेषा सम्म छैनादीना जन्मना योनय इति त एते नव योनयो वेदितव्याः।योनिजन्मनोरविशेष इति चेत् (सरिच-गीत-संवत को ययासस्य मचित्त-नप्ण-विवृतसे मिलाभो तौ) उभप-मात्मा मिना सनित्ताचित्तः शीवोपण " दोनों स्म मिभ हैं ।। (ब) सचिचापित, शीतोष्ण, भौर सारित इवि पराम्दा समुच्य भो। संवरित इस प्रकार(मिश्र) । चकार समुघय फेखिये है मिभाप पानय' । भान्ति इतिगतरया * हि. (मर्यान) मिभ मी (-प) पोनियें ऐसी है क्योंकि (मिन्यया होतो मर्याद (यदि च शन्द समुम्भय ना समाहारके लिये न हो वोऔर मिभयोनियनहोना) पूर उस्तानाम् । एव०पिशपणम् " स्यात् । परिख को हुपे (सपिच-शीव-संसव) काही (मिभशन्द) विशेपण हो माय।। पण तिमीमा-अर्यः अवस्य । प्राणम् ॥ एभएक(एक)ऐसा(शब्दापारबारखियेही विस(एकशम्यम्द)काभादान उप-पिम- -फमसे(सचिंच शीव-सवका ययासंम्प भविष-उप्ण विवके साप) मिश्रकी प्रतिपत्ति भर्यम्पया एवम्करिनायेत I माप्ति पा प्रहसिके लिये है। मसे इसमकार पानो कि सपिनास पिच पशीवा। प*प्या पर =सविध भौर प्रचित भौर (म्प) शीव और (म्पारण सरल पबिहुत पनातिकमा एवम् निशापि =ौर(च)संत औरघ)विश्व ऐसे(इनकापिभो। ऐसे पविमानो कि सपिता प शीतच इत्पादि"वद-प्राणम्॥ सपिच गौर शीत इत्यादिका(मिभ) है । (इसमें वद(शम्म) - भादान अन्य पार पनि निवेश-भर्पम् ।। तेषाम् । जन्मऊ मेदोंके जनापनके लिये है। विन सम्म्यनादीनाम् । जन्मनाम् योनया इति* -सम्र्थन मादिक मन्मही (पेनर पोनि वा उत्पचिस्पाम हैं तपन नम " पानप दिवघ्या "तु इतनी मग पोमिये नाममा चाहिये पानि मन्मनोना प्रविशतानि च वाधिनौर मम्म भदा ( मरिमाप) ऐसी शामिण - HDOTO DemID.00 में तेरे सिद्धि सुन्न३१ यायः ENDERDERRAORBOXABOOK न आधाराधेयभेदात्तनेद ॥ त एते सचित्तादयो योनय प्राधारा । आधेया जन्मप्रकाराः ॥ यत सचित्तादियोन्यधिष्ठाने आत्मा सम्मूर्च्छनादिना जन्मना शरीराहारेन्द्रियादियोग्यान्पु- दलानुपादत्ते ॥ देवनारका अचित्तयोनय । तेषां हि योनिरुपपाददेशपुगलपचयोऽचित्त ॥ गर्भजा मिश्रयोनय । तेषां हि मातुरुदरे । शुक्रशोणितमचित्त,तदात्मना चितवता मिश्रणा- मिश्रयोनि ॥सम्मूर्छनजास्त्रिविकल्पयोनय । केचित्सचित्तयोनय अन्ये अचित्तयोनय ।अपरे मिश्रयोनय ॥सचित्तयोनय साधारणशरीरा । कुत । परस्पराश्रयत्वात् ॥इतरे अचित्तयोनयो- न०मापार-मारेप-मेवाद। नी, (पानि और मन्म भेद) भाषार और भाधेप के मेर से वद मदः । ते । एते। सविस-मादय । गानमः। उन(योनि और भन्म)में भेद है। ने इसनी(-एवे)समिस मारिक (यानिये) भपारा । मायामन्म-मकारा' या सविभाषार पाभाभय हैं। मन्मके भेदने माय रामाभिवरें। क्योंकि सविध भादि-योनि भधिष्ठानमारमा सम्मानमादिना" -मादिक यानियोंके भापारपि पैतन्य (मात्मा) सम्मान भादिक भन्मनापरीर-माहार-इन्दिप-मादि योग्यान् । अन्यकार शरीर माहार इन्द्रिय भादिक योग्य पुलाव न । उपारदेव-नारका भविष-पोनपा -पुरखों की प्राण करना है। देव और नारिकी मविध योनिवाल में सपाम् रिस्पानि--उपपाददेश-पुनल-अपया गोंकि तिन(देष-नारकियों)कीयोनि उपभनेकास्योन(पपाददेश)पुलकास्कंप भपिच गर्भमा मिनपोनय देपा सिमानामपिसोगर्भसेवसमहुयेत्रीपमिश्र(मवित्तापित्त)योनिपाले योकिदिनकीमावाक उदाशुभ-शोणिसम्मपितम् दद-पिवयता, उदरमें वीर्य और लोहारम)मचिस है । उस(माया)का चितवान् मात्पना मिश्रणामिप्रपोनिासम्ममर्थनमा। =मात्मासे शुम शोणितमचितफे) पिकापसे मिश्योनि । सम्पर्धननन्मषाले त्रि-विकन्ययानय कोपित्-सचिच-योनपा मन्ये -तीन प्रकारके यानिपारे। कितने सचिच यानिषाचे हैं। दूसरे मपिच पोनया अपर। विभ-पोनय भचिरायोनिम । (इन)मिम मिथयोनिषाचे मर्यात् सचिचाचित योनिपाले हैं सषिष पोनप साधारणशरीरा -सवित्तपोनिम साधारणशरीरवासे मर्याद जिनएकीशरीरबहुतनीयहोते भाषयत्वा इतर भविष- क्योंकर(सापाराशरोरवाजे सघिसयोनिन ) क्योंकि भापसमें(पकमीपसरेक) पानया भाभयसेवा भाषारसे है ।(सागरण शरीरसे) मिम(सम्र्घननीच)भविष योनिपाले हैं मर्याद उनके उपमनका स्थान प्रवेसन एनसके सपती॥ OoOHEDOTCOIROOADINGaoreeD000 सवार्थ प्रध्याय BOT DOMIDOIDOIDHADOHORECORIADIRRORDao मिश्रयोनयश्च॥ शीतोष्णयोनयो देवनारका तेपा हि उपपादस्थानानि कानिचिच्छीतानि,कानि चिदुप्णानीति ॥ उप्णयोनयस्तेजस्कायिका ॥ इतरे त्रिविकल्पयोनयः केचिच्छीतयोनय केचि सिद्धि दुप्णयोनय अपरे मिश्रयोनय इति ॥देवनारकैकेन्द्रिया सवृतयोनय॥ विकलेन्द्रिया विवृतयो- सत्र३२ नय ॥गर्मजा मिश्रयोनय ॥तनेदाश्चतुरशीतिशतसहनसंख्या आगमतो वेदितव्या॥उक्त च। णिनिदरधादु सत्तय तरुदस वियलिदिएसु छचेवासुरणिरयतिरिय चउरो चोइसमणुए सदसहस्सा पिभयानयाम शीत-उष्ण-योनया देवनारकाः मौर(-घ) सचिचाचित यानिज हैं। देव भौर नारकी शीसोपण योनिम रे नपा परि उपपादस्यानानि कानिषित् । क्योंबिनी) विन (देव-नारग्नि) के उपमनेके ठिकाने कितने शीनानिकानिरि उप्णानि इतिवनः कापिका शीत मिलने उष्ण हैं। सैमसकायके जीप उपण-पोनप सतरे पिवित्रा-पानया केपि =उप्णयोनिगाले हैं। भिम पाणी पीन प्रगरफे योनिनाते हैं। नीतयानप कमित्तपणयोनया मारेर -शीव पोनिम रे । फेई उपण यानिन हैं। मन्प पिभयानया इतिष्दष-नारकपरन्द्रियामा - मिभाशीयोपण) योनिवाले हैं। देव और नारकी और एकेन्द्रिय मीच मनपानप विरुख-इन्दिया सवयोनिशाले हैं। पिकवान्द्रिय जीव पर्याद दिन्द्रियसे चौइन्द्रिपतक रिगृतपानमा गर्ममा पियपानया =विस्त पा निष्ठत यानिज हैं । गर्भम पिभयोनिम रे मर्याद गर्मसे उत्पम हुपे जीवोंकी सप्लुत पित योनि है मावार्य योनिके केवे प्रदेशगहों केतेपदेश उपड़े। ननदानुरशीनिशनसानसंख्या ॥ तिन(नरयोनियों)क भेद चौरासीसो सहस्त्र गणना अर्थात् चौरासीवान गिनवी भागमन गदिनम्मा उक्तम् ।। १० -शाख से मानना चाहिये । कामी है लिपिदरपार-नित्यनतर-पा) नित्पनिगोद,इवरनिगाद,घात(पृथिवीकायिक,महायिक,भम्निकायिक,षायुकापिक)की मना पश्नाइस प(-सप काशच) साव सात भौर (=प-घ) वनस्पतिकायिककी, दश और (-प) रियलिविएगा दम्ए(विक्लन्द्रियेषुः पण )-विम्लन्द्रिय नीववि छाती मर्याद दीन्द्रियमें दो,श्रीन्द्रियमें दो,पतुरिन्द्रिवमें दो सुर-णिरिप-निरिय पाउरा मुर-निरय तिपेर पतम "मुर-नारक और विर्यपोंकी पार पार( भौर) सरसपमुप सदमास्सा(पनदेशा पनुप्प रावसावाणि) पोदाखाख पनुप्यपि (मर्यान्४१+१०+६+१२+१४ सर चौरासीबास ।

DOE७ ३ सिद्धि सूत्र ३३ ParBOCRACIRBORDERHIRPOXIND एवमेतस्मिन्नवयोनिभेदसङ्कटे त्रिविधजन्मनि सर्वप्राणभृतामनियमेन प्रसक्ते तदवधारणार्थमाह- मर्यार्थ ॥ जरायुजाण्डजपोताना गर्भः॥३३॥ अध्याय मारायः-नित्यनिगाद,इतरनिगाद पृथियोकापिक,गजकायिक, भग्निकायिक, और पायुकापिक, इन बाकी सात सात साल यानि "ऐस४२खोलहवनस्पविकायिकी दशलाख यानिये,दोइन्द्रिपवाछे भीषोंकी दोलाख, वीनादिपवाले नीषों की दोबास,पारइन्द्रियपाले भाषों की दाहाल ऐसे इनविकलेन्द्रियों की छालास योनिये हुई। दनोंकी पारम्बास नारिकियोंकी पारलाल पंचेन्द्रिय विर्यचोंकी चारखाल ऐसे ये पाराखालयोनियें हुई मनुष्यों की चादरसाल योनि मिलकर एसर्प ( ४२+१०+६+१२+१४) चौरासीलाई एनम् एतस्मिन् ॥ नवयोनि भेदसारे । -ऐसे विस नषभेदस्पयानि सट रिप त्रिविधमन्मनिसर्गमाणमृताम्। अनियमेन तीन प्रकार मन्म समस्व ससारी मीरों नियमकरिरहित प्रसक्त-भरपारण मर्यम् ॥ मादा आमानेपर उस(नियम)के निधय करणफे लिये पर्याद निधये करनेफ लिये कहते हैं कि सूत्रम् जरायुजाण्ड ज्योतानागर्भ- जरायुजाण्डजपोताना गर्भ (जन्म) ॥ ३३ ॥ म्भाये -अरायुभ-भपडज मरायुमें उत्पन्नानमाले(मीन)निका,मौर भंटे में उपभनेगाने (जीव) निफा, मौर पातानाम् गर्भ मन्मा -पोस(मीव) निफागममन्मी भर्यात् भोमीप जाठा समान मांस भौर कपिर से व्याप्त एक प्रकारकी यैजियोंसे निपटेहुए पैदा होते हैं उनको जरायम करने से मनुष्य (5) माताफेरपिर पिसाफेषीर्य से नमकी सपाकेसमान कठिनसेगोल २ भाषरणको भरा फाते हैं और जो अंडेसे नो उत्पमहान भारत में से अमट (स)मिसकेपरमरा पा भंटा बमी भावरण नहीं होता, मावाले सदरसे निकलती चलने फिरने लगवार पा पातम रे से हाथी, विनी,सिंह,पंदर इत्यादि (१) मागगर पानि भीर गुण पामिके मेदसे यामि दो प्रकारकी है यहापर 4 मेद गुल यानिकी अपेक्षासे को है प्राकार योनिके तोम भेद है गप्पापत र्मोधव मोर पंगपत्रा संपावत पानिमें गम नहीं ठरवा । मोप्रत योनिमें तीपर,यमवर्ती बलम और उनके भाईयोंके अतिरिक या टत्पध नहीं होता और बंशपथ यानिमें शगर्म म्मवाने सर्व जीव उत्पन्न होते है। (रहनारे पहां कहीं घरों पर जरायुशाए और व्हो कहीं पर जरायुगाज पाठ हे दोनों पाठ ठीफनेस देखो मप्यायर पृष्ठ ५४० ५४१की टिप्पणी । इस मूमने 'मन रानकी मनुचिम्न ३१ यांस भाती है।शेवावर मानाय समाप्पका पाठ जरायपट पोवशा गर्मः ऐसा महमारे यहाँके पाग्न सपर सरापु और बारे साप समाप्प तस्यापिगमन के पाठमें पोत के साप है जो तीनों अरायु-र-पोत पर लागू है अर्थात् सारस्वगर्मः जम्न मरमस्य गनः मम पोतमस्य गर्माम ऐसे रूप होमाते है जिसस प्रगट है कि दोनों मानायोंमें अर्थ पफसा है। Cero ORDEROOTOCIROCCO - १३ सवाथ प्रध्याय १२ POROD OUKO BURDOVOGROMNO OMO OROMO ONI TORINO HOT मिश्रयोनयश्च ॥ गीतोष्णयोनयो देवनारका तेषा हि उपपादस्थानानि कानिचिच्छीतानि,कानि चिदुप्णानीति ॥उप्णयोनयस्तेजस्कायिका ॥ इतरे त्रिविकल्पयोनया केचिच्छीतयोनय केचि सिद्धि दुग्णयोनयः अपरे मिश्रयोनय इति ॥देवनारकैकेन्द्रिया सवृतयोनय॥ विकलेन्द्रिया विवृतयो- सुत्र३२ नय ॥गर्भजा मिश्रयोनय ॥तनेदाश्चतुरशीतिशतसहस्रसंख्या आगमतोवेदितव्या॥उक्त च। णिनिदरपादु सत्तय तरुदस वियलिंदिएसु छघेवासुरणिरयतिरिय चउरी चोइस मणुए सदसहस्सा मिभयानयााप शीत-उप्ण-योनयादरनारका-मौर(घ) सचिचापिच यानिज है । देव भौर नारकी शीतोष्ण योनिम हैं नपाम् froउपपादस्थानानिकानिचित्० क्योंबि(1) विन (देव-नारपिन) के उपननेके ठिकाने फितन गौनानि कानिपिन् उपणानि इविता कापिका गीत में कितने सप्ण हैं । तैमसकायके जीष उपण-पोनपातरपिरिकम्प-यानया केषित् =पणयोनिमाले हैं। मिन्न पाणी तीन प्रकारफे यानिवाले हैं। शीतयानय कमिन्नणयोनया मारे। शीव योनिम हैं। कई उष्ण यानिम हैं। अन्य पिथपानया इतिष्दव-नारकएकन्द्रिया - मिशीवोपण) योनिवाले हैं। देश और नारकी भौर एकेन्द्रिय भीम मरतमानप पिस्च-इन्द्रियाः। -सनु वयोनिपाल । पिलान्द्रिय नीव पर्याद द्विान्द्रियसे चौइन्नियतक मितपनप गर्भनामापिथयानया -विष्टत पा निवृत यानिम रें। गर्मम मिययोनिमा । भर्यात् गर्मसे उत्पम हुये जीवोंकी संरत विद्वत योनि । भावार्य योनिके केते प्रदेशगडो केवेप्रदेश उपड़े। नन्दा पारशीतिशतसाम संसया ॥ तिन(नषयोनियों) के भेद पौरासीसो सहन गणना भर्यात् चौरासीलाख गिनती भागपत पदिकम्पा उत्तम्॥ -शाख से मानना मारिये । कहाभी है विपिदरपा(-नित्य-इतर-पार) मनिस्पनिगाय, इतरनिगाद,षा(पृथिवी कायिक,सायिक,अग्निकायिक,वायुकायिक)की मत पाइस चा-सप्त'पत' प सास सात और (-य-घ) वनस्पतिकायिकी, यश और (घ) रिपनि दिपमा पर एक विकलन्द्रियपुर पर पर)-पिम्लन्दिय नीववि यदपी भर्थात् दीन्द्रियमें दो,प्रीन्द्रियमें दो,चतुरिन्द्रिपमें दो सुर णिरिप-तिरिय पारापुर-निरप-विया नसम्म ")-मुर-नारक भौर विषयों की पार पार( मौर) पारसमणुप सदमास्सा(पनुदेश मनुप्पे शतमामाणि) पादरवास मनुष्णविप (मर्याद+१०+६+१२+१४ सा चौरासीवाल) HDMROHOTO ૨૨ पर्याय ग्रन्याय CERAOMHIROEMBERBedeod CUDArease सिद्धि सुत्र ३३ DOOTEDO एवमेतस्मिन्नवयोनिभेदसङ्कटे त्रिविधजन्मनि सर्वप्राणभृतामनियमेन प्रसक्ते तदवधारणार्थमाह- ॥ जरायुजाण्डजपोताना गर्भः॥३३॥ मागर्य-निस्पनिगोद,इवरनिगाद, पृथिवीकायिक,नसायिक, मग्निकायिक, और पायुकायिक, इन बाकी सात सात तास यानियें "ऐसे४२वाखहरे वनस्पतिकायिकी दशनास यानिये,दोइन्द्रियवाछे भीमोंकी दोखाख, पीनइन्द्रियपाल मीयोंकी दोखाख,पारइन्द्रियवाशे मावोंडी दालाल एसे इनविरुखन्द्रियोंकी छालाख योनिये हुई। दयोंकी पारम्वास नारिकियोंकी पारलास पंचन्द्रिय विर्यचोंकी चारशाख ऐसे ये पारालासपोनियें हुई मनुष्योंकी पादरसाल योनिये मिलकर ऐसर्व ( १२+१०+६+१२+१४) चौरासीशाप हुई एवम् एतस्मिन् नेवपोनि मेवसरे ॥ -ऐसे विस नपर्मदरूपयानि सझट रिप त्रिविधमन्मनि सर्पमाणभृताम्। मनियमेन -चीन प्रकार मन्म समस्त संसारी जीपोंके नियमग्रिहित प्रसक्त पद-भरपारण मयम् । माहा याप्तहानेपर उस(नियम) निभप फरणके लिये भाव निमसे करनेक खिये करते हैं कि सूत्रम् जरायुजाण्ड ज्योतानागर्भ =जरायुजाण्डजपोताना गर्भ (जन्म)॥ ३३ ॥ सभायें - मेरायुम-मएस मरायुमें उत्पमानवाले(मोब)निका,भोर भंड में उपमनेपाजे (जीप) निफा, और पावानाम् । गभी जन्मा -पोव(मीष) निकागभमन्म अर्थात् पामीर नाटक समान मांस और रुपिर से व्याप्त एक प्रकारकी यैलियोंसे लिपटेहुए पैदा होते हैं उनको नरायुम करते है जैसे मनुष्प (क) मावाफेरपिर पिवाफेवीर्यसे नसकी सपासमान कठिनसेगान २ भाषरणको पटा करते हैं और जो भटेसे नो उत्पमहान भारत है जैसे इकट (ख)जिसफेऊपरजरा पा मंदा मी भाषरण नहीं होता, माग चदरसे निकलती पद्धने फिरने जगवारे या पावन है जैसे हायी, विनी,सिंह,पंदर इस्पादि (१) प्रामार पानि भोर गुण पानिके मेवसे यानि या प्रकार की है यहाँपर ये मेव गुस यानिकी अपेक्षासे कोई माकार पोनिके वोम मेदई प्रपाका एमोधत और वंशपत्ररामापर्व यानिमें गम नहीं ठहरता । मोयत पानिमें तीयार,वश्यती पलमान और उनके भाईयोंके अतिरिक कोई उत्पय नहीं होता और वंशपत्र पानिमें एगर्म समवाले सर्प जीप उत्पत्र होते है। (हमारे यहां की यहीं पर जरायुमापार भोर कहो कहीं पर जरायुजारन पाठ है दोनों पाठ ठीफन देखो अध्याय पष्ठ ५४० ५४१की टिप्पणी । इस सूपमें 'मम'रामी भनुचि स्त्र पसे भाती है । ताम्परं मानत्य समाप्पण्या पाठ"मराम्या पोतमार्मा गर्मः 'ऐसा हैमहमारे यहाँके पाठमें सकार जरायु और और के साथ समाप्य तत्त्वार्थाधिगमसूत्र के पाठमें पोत के साप है जो तीनो अपयु-र-पोत पर साग है अर्थात् जरायुसस्पगमा जम्म मरमस्य गर्मी मम्म पोतमस्य गर्म कम ऐसे रूप होगाते है जिससे प्रगटकियोमो मानायोंमें अर्थ पफसा है। CARBOX DarOSBE १३ पाथ मायाय सिद्धि सत्र३३ ORDOIROIe1un यज्जालवत्प्राणिपरिवरण विततमासशोणितं तज्जरायु । यन्नखत्वक्सदृशमुपात्तकाठिन्य शुझगोणितपरिवरण परिमण्डल तदण्डम् । किश्चित्परिवरणमन्तरेण परिपूर्णावयवो योनिनिर्ग तमान एपपरिस्पन्दादि सामोपपेत पोत जरायो जाता जरायुजा । अण्डे जाता अण्डजा। जारायुजाश्च अग्डजाश्च पोताश्च जरायुजाण्डजपोता गयोनय ॥ ययमीषा जरायुजाण्डजपोताना गभोऽवधूियते, अथोपपाट केपा भवतीत्यत आह- उत्पनुरादा-यदा नाचममाणि-परिवरण मो भाखफ सारा मीपका माच्छादन (=परिपरण) पिता-पास-पाणिवम् तद भराय पद नख =नो पास भौर रुधिर शाणिस)करि व्याप्तहो सो मरायु है। मो नौ (नस) के रा-साराम 0 उपाच-काठिन्पम् ॥ त्यचा मा छिमफेकेसमान कठोरखा षा फापन गृहीत (पाच) हो गुरु-शाणिन-परिसरणम् ॥ परिपपरनम् ॥ =मिस (सपा)में वीर्य बोह वेष्टित दो गोलाकारसा हो नद्प्रएटम् ॥ सो भट है भर्यात् नो नखकी छाखफे समान फठिनहो, पीर्य और रजसे मान्छादिवो भौर गोशाकाहो उसको भरकाते हैं निमित्-परिसरणम् मन्तरेण०परिपूर्ण-मवयवा कोई वस्तु (विचित्) भावरण रिना (-मन्तरेण) संपूर्ण भवयव सहित पानि-निर्गवमाएर०परिसद मादि-सामH =पानिस निकलने पराी इलन पद्धन मादि सामर्य उपपेन पात सहितका सा पोव है मर्यात् जिसक उपर जरा पा भर फुलमी प्रापरण नहीं हाता माताके उदरसे निकलतेती पलने फिरने लगता उसे पोस करते हैं निरागारजाना जरापुना मण्देश जाताः भणजा जरायु उत्पमये नरायुम रे । अरेवि उपर्ने सो भान हैं नरापुमा घमण्डमाः । च.पाता: प. =मौर मरायुसे उपननेपाले भौर अरेसे उत्पन्न होनेवाले और पोत जरापुन मरम-पाता गर्म-पानप =(पपासंख्य) मरायुम-भरम-पात (और ये सच) गर्मपोनिवाले हैं पदिश्मपीपा जरायुम-भान-पोतानाम्।। =जो इन (-अमीपाम्) मरायुम-बम-पोवाका (उपमनेका स्थान) गम समरधिपने T भय उपपार पाम् - =गम निषपझियागया है वो भप उपपाद (मन्म)किन(मीनों) भानिनि ममा भाइT पहोवाद इसरिपे (भाचार्य भगव इनमें) dt कि GLOCTICIDC:00 DODATTOODOXBO amoeaeiDMRomarane ६४ परापून-in-Hi नाम) सर्वार्थ प्रध्याय ६५ CareeGA सिद्धि सुत्र३४, POORBBARDORISROOMAROON ॥ देवनारकाणामुपपादः ॥ ३४॥ देवान नारकाणा च उपपादो जन्म वेदितव्यम् ॥ अथान्येपा किं जन्मेत्यत आह-- ॥शेपाणां सम्मुर्छनम् ॥ ३५॥ गर्भजेभ्य औपपादिकेभ्यश्चान्ये शेषा ।तेषा सम्मूर्धनजन्मेतिएते त्रयोऽपि योगो नियमार्था । सूत्रम्-"देवनारकाणामुपपाद -देवनारकाणामुपपाद (जन्म भवति ) ॥३४ ।। सूत्रार्य ज्य-नारमाणाम् (मपनपासी प्रादि पारों प्रकारकोदेर और नारपियों रपाद जन्माण भवति r -उपपाद जन्म हावा है। (मम्म शब्दकी अनुचि इक्वीसपा सूत्रसे इसमें भाती है। हत्त्यनुरादा-दानाम् नारफाणाम्प देव और ( च ) नारहियों उपपादमिन्नपेदितव्यम् भयभन्येपाम् =उपपाद जन्म जाननाचाहिये । मम दूसरे(मीय)नि अर्थात् जरायुज भटज भौर पानाको मौर देपनारिकियों को छोड़कर भरोप जीयाका किम् भन्म इति मत • मा T कौन जन्म है इस लिये(अप्रिय स्त्रम) काते हैं कि सूत्रम्-"शेपाणा सम्मूर्च्छनम् -शेषाणां सम्मूर्च्छनम् (जन्म भवति ) ॥ ३५ ॥ सूत्रार्य -शेपाणाई भमशेप(जीव)नि अर्याद गमन और उपपाद जन्मोंके अतिरिक सभ्मान जन्माण भवति । सम्ममर्थन जन्म होवा(जन्म शब्दकी अनुचि इकतीसवां स्वस इससूत्र भाषीहै) वृत्त्यर्प गर्भजेम्पा भोपपादिम्य पापभन्ये शेषाःगमननीयोंसे उपपाद जन्मपाले(देव नारकियों) से मिम शेष (भीष राते ) वेपाम् सम्मानम्। भन्म ॥ इति -विन (गर्भन और प्रौपपादिकों से अतिरिक्तजीमॉर्फे ) सम्मूर्छन मन्म होता है एवे प्रया' भतिक यागा नियमा ध्ये दोनों को युक्तिये मर्यात् वेवीसपो चौतीसवां,पैतीस स्त्र) नियमफे चिये हैं (१) हमारे यहाँ इस पर का पुर पाठ सर्वत्र एक है। नारकरेयानामुपपातः 'ऐसा पाठ समाप्य० का है दोनों भामायों में अर्थ एक सा है। (२) योनों भानायोंमें इस स्त्रका पाठ और भय एक्सा। तत्त्वार्या की प्रतियों में सम्मल्धम सम्मन सम्बन समर्मम ये धार पाठ प्राप्त है पापे ठीक है ( मप्पाय १ पृष्ठ ५४०, ५४१ ४03) सूत्र के अंतमे जहाँ समूम"हवह पाणिमि और शाफ्टायनकमवमे मधुर सम्बनम् चाहिये । PJ Homolo:.000.00: ROOIWO OUEDO १५ समर्थि सिद्धि सूत्र३३ अध्याय ट GAAORADIO यज्जालवत्प्राणिपरिवरण विततमासशोणित तज्जरायु । यन्नखत्वक्सदृशमुपातकाठिन्य शुक्रशोणितपरिवरण परिमण्डल तदण्डम् । किश्चित्परिवरणमन्तरेण परिपूर्णावयवो योनिनिर्ग तमात्र एव परिस्पन्दादि सामोपपेत पोत ॥जरायो जाता जरायुजा ।अण्डे जाता अण्डजा। जारायुजाश्य अण्डजाश्च पोताश्च जरायुजाण्डजपोता गर्भयोनय ॥ यद्यमीषा जरायुजाण्डजपोतानां गर्भोऽवधूियते, अथोपपाद केपा भवतीत्यत आह- उत्त्यनुनाद -यद मालमत्माणि-परिवरण =मो माचक सरश नीषका माछादन (=परिसरण) तिन-मास-शाणिवम् तद् मरायमापदः"नल =मो मांस भोर घिर शाणित)परि व्याप्तहो सो मराय है। जो नी (=नस) सक-सायम् ॥ उपाच-काठिन्यम् ॥ त्वचा का छिलकेसमान कठोरवा पा फरापन गृहीत (पाच) हो शुरु-शोषित-परिसरणम् ॥ परिमएरलम् ॥ =निस (सपा)में मीर्य छोह वेष्टित हो गाचाफारसा हो नद मपरम् ॥ सो भर है मर्याद मा नसकी छात्र के समान कठिनहो, पीर्य और रमसे माच्छादितहो भौर गोलाकारो उसको भटकहते हैं मिचिन्-परिवरणम् मन्तरेण परिपूण मपया कोई वस्तु (-किनिन्) भावरण रिना (अन्तरेण) संपूर्ण भषयष सहित पानि-निर्गतमात्र भएर०परिस्सन्द भादि-सामH -यानिसे निकलने पसी हनन घन मादि सामर्थ्य उपपेन पान सरिता सा पोत है मर्यात् जिसक उपर मरा पा स्पषमी भाररण नहीं हावा माताके उदरसे निकली घलने फिरने लगतारै उसे पोस पाते हैं गरायौदामाता जरायुजा भण्देशनाताः ममगाजरापुर्य उत्पमये मरायुन हैं। प्रदेविष उपर्ने सो भान हैं भरायुमा मण्टना प.पाता. और जरायुसे उपमनेपाने भौर घंटेसे उत्पम होनेमाने और पोस नरायन मण-पोता। गर्म-यानय । =(यवासंस्प) मरायुन-भटम-पात। (और ये सप) गर्मयोनिषाचे हैं पदिश्मयोपाम् ।। जरायुज-मरम-पोतानाम्।। मोइन (-ममीपाम्) मरायुम-अंदम-पोवोंका (पमनेका स्थान) गम मात्रियने T भप उपपा केपाम् । =गर्म निपपरियागया है तो अप उपपाद (मम्म)किन(मोना) भानिाइनि० मा मार T -रोना इसरिये (माचार्य भगवे स्भ ) कहते हैं कि SIDCINO.000.000.00001001100110 IMOOTORIZADORANDO ६४ सिद्धि सुन ३६ पष चाय OPROGRO EDEOCTOOTODESED HOMECHMOOGOHRODERCORD ॥ औदारिकवक्रियिकाहारकतैजसकामणानिशरीराणि ॥३६॥ विशिष्टनामकर्मोदयापादितवृत्तीनि शीर्यन्त इति शरीराणि ॥ औदारिकादिप्रकृतिविशेषदयप्राप्त. वृशिनि औदारिकादीनि ॥ उदारं स्थूलम् । उदारे भवमौदारम् । औदारं प्रयोजनमस्येति औदारिकम् ॥ अष्टगुणैश्वर्ययोगादेकानेकाणु- "औदारिकवैक्रियिकाहारकतैजसकार्मणानिशरीराणि ॥ ३६ ॥ [पोग्पवा ग्रामोदारिक-पेक्रिपिक- चन्द्रियोंसेदेखनेपाग्यस्यवशरीर,मिसएकमनेकस्थत्वक्ष्मान काभारीइत्यादिविकारहानेकी- मोसूक्ष्मपदार्थनिर्णय लिये वा फदिविशपया सझाव माननेकेलिये चा भसयमके एकरना लिये ममत्वको यसस्पानपी मुनियों के प्रगठहो [पा सन फर्मोका सम्मा नैनस-कार्पणानि म्मा देनफा कारणो का मिस वेम ससा होमानापरणादि भागोका मा पार्यो शरीराणि (संसारी बीवो ये मौदारिक, वैशिपिक, माधारक,नैनस,कार्मणि,कमसे पोप)शरीर हैं। प्रत्यर्थ विशिष्ट नामकर्म उदय भाषादित-वृधीनि शरीर नामा नापर्म के विशिष्टनापर्म) उदयसमो माप्त इये (-चौनि) शीर्पन्त इति शरीराणि मौदारिक- =सो गसते हैं-सहत में का कहते हैं (शीर्यन्ते) ऐसे शरीर को मौदारिक मादि-कृति- किषिक, माहारक, वैनस, कार्मण, (शरीरनामा नामकर्मकी) प्रकृवियों विशेप-नदय-मात-धीनि परिगेपस स्वयकरिर भदय मास प्रवर्तते । (स्तीनि) वे( प्रमानुसार) मौदारिक मादीनि उदारमधूनम् । मौदारिक,क्रिषिक,माहारक,तैमस,कार्मस । (-मादीनि वदार है सो स्यूत है उदार भवनोदारमण मौदारम्। महरि हो सो भौवार है। स्थानीय स्तपना है प्रयोजनम्"मस्या हवि मौदारिकम् ॥ अयोअनमिसका पेसा प्रौदारिक है भागण-पेपर्य-पोगाद एक-मन-भणु -"माठगुण पाविभूतियों के सपने के संयोगसे पा समन्यसे एक भनेक लोग (१) मारेपहा जहाँ शुग सेपोपहा सर्पत इस पुत्रका परीपाठ है। समाप में पंफिपिक' मफे साम में परिप"म है। दोनों भामायोमी गण पाठ और मप एक ही(रामाठ प्रकारको सिसिपी मोर पिमूतियों माम भमरकोश स्वावर्ग:सोकसमे ऐसई कि मषिमा मदिमा पेप गरिमा तधिमा तपा। प्राप्तिधासम्पमीशिय। पसीप पारसिया (प) मणिमम् (पु०) पोटापन मर्यात् जिसस जीव घोरासा रूपधर सप सानोमी माय प्यायर सिद्धि सुत्र३५ DIRDERWEIROGRADEIR ONFIBABHAIRNORMENDRA पगनिमासी जगरूपसहाय पकील कृत पदच्छद और विमरस्पर्य सरित सवार्य सिदिफा शम्दश हिन्दी अनुषाद अध्याय २ सूत्र ३५ उभयतो नियमश्चद्रष्टव्य ॥जरायुजाण्डजपोतानामेव गर्भ ।गर्भ एव च जरायुजाण्डजपोतानाम्।। देवनारकाणामेवोपपाद । उपपाद एव देवनारकाणाम् ॥ शेषाणानेव सम्मूर्च्छनम्। सम्मूर्च्छनमेव शेपाणामिति ॥ तेषा पुन संसारिणा त्रिविधजन्मनामाहितबहुविकल्पनवयोनिभेदानां शुभा- शुभनामर्मविपाकनिर्वर्तितानि वन्धफलानुभवनाधिष्ठानानि शरीराणिकानीत्यत आह- १. उमपत नियमाटम्या -भार (-घ) (इन गर्भज, भोपपादिक और सम्मनोंक) दोनों भोर नियम मानो जरायुन-मदन-पावानाम् । एव गर्भ' (सो उपर्युक्त नियम दोनों जग एसे है कि ) जरायुज, मटन, पोवनिकें ही गर्म है प० गम : एयनरायन-मण्डम-पावानाम् =और (प) गर्भ ही है (जन्म) जरायुज, अंग्न, पोसनि भावार्य दोनों वाफ्योंका या कि जरायुम, भहन भौर पोतनिके ही गर्म नाम है दूसरे प्रकारके नोवाक गर्म जन्म नहीं है या गर्भ जन्म ही न कि और कोई भन्म है जिनके ऐसे जरायुज भान पोवन । दर-नारकाणाम् । पर उपपादः -दर और नारपियों की उपपाद (जन्म) है ( नकि फिसी और जीवोंके ) उत्पाद ए० दरनाराणाम् । उपपाद ही है (जन्म न कि कोई और जन्म) निनके ऐसे देष नारकी में पाणाम् । एक सम्मूर्धनम् । बचे हुये (जीव) निके ही सम्मर्छन (जन्म) है ( न कि किसी मौर मीनोंक) मम्मम्बनम् ॥ एन० पाणाम् ॥ इति =सम्मन जन्म ( नकि पाई मन्य जन्म) देवघे हुये जीवों ॥ एनपिरिष जन्मनाम "तेपाम् माहित-बहु-विकल्प--और सोन मकारफेरे जन्म मिन भौर प्राण किये हैं (माहित) बहुत पिकल्स स्म नरपानिपदानाम्। संसारिणाम्। शुम अशुभ -नर योनिफे मेद गिनने ऐसे संसोरी जे सिनफें शुम, भशुम मम्म-निास निवर्विनानि सन्य फल भनुमर नाम कर्म करिरचे भार पंपको जा फल है विसके अनुभव करने के मपिष्टानानि गुरोराणिकानितिमतामा स्थान वा प्राधार शरीर (1) जिवन है। इस लिये कासे हैं कि भर्यात् गर्भ भावि तीन प्रफारफ जन्म और भनेफ भेदोंसे युक्त नामकारकी योनियोंफे पारक संसारीमीयोंकेगुमन भशुम नाम को से रपित भार कम पम्पके फलके अनुभव के स्पान शरीर किवन मनकार गिमानेर BRBeawareeeeee COMHOTO CROARD ORD ORKDOROORD मातारण DOLIDOCODILDO100 ODT ॥ औदारिकवैक्रियिकाहारतजसकार्मणानिशरीराणि ॥३६॥ सिद्धि मर्याय पाय विशिष्टनामकोटयापादितवृत्तीनि शीर्यन्त इति शरीराणि ॥ औदारिकादिप्रकृतिविशेषदयप्राप्त- सूत्र३६ शनि श्रोटारिकादीनि ॥ उदारं स्थूलम् । उदारे भवमौदारम् । औदारं प्रयोजनमस्येति प्रौदारिकम् ॥ अष्टगुणेश्वर्ययोगादेकानेकाणु. सूत्रम्- 'औदारिकवैक्रियिकाहारकतैजसकार्मणानिशरीराणि ॥ ३६ ।। [पोग्यवाहो; मगा। भौरारिक पिपिए इन्द्रियोंसेदेखनेपाग्यस्यम शरीर,जिसमेएकभनेजस्यूतसमालकामारीइत्यादिविकारहोने की- मनामस्मपदार्पकनिर्णपकेसिपेरा ऋदिशिपका समाप माननेकेलिपे या भसयमके एकरना लिये प्रपती एणस्पानपी सनियोंफ प्रगटदो [श उन फर्मोका समूहो नेमस-कामणानि मा तमका कारण मा मिसमें वेम राया हो,मानासादि भावोका मा कार्यो शरीरालि संसारी जीवो ये भौदारिक, पैझियिक, मारक,वेभस,कार्यणिपसे पाच)शरीर । परिशिष्ट नामकर्म उदय भापादित-सूचीनि शरीर नामा नामर्मके ( विशिष्ट नामकर्म) उदयसेमो प्राप्त इये (वृधीनि ) शार्पन्त इतिशरीराणिमौदारिक- =सा गसते -सरत रे का झड़ते हैं (शीर्यन्ते) ऐसे शरीर मा मौदारिक मादि-महति- -पैकिपि, माहारक, तैजस, कार्मस, (शरीरनामा नामकर्मकी) प्रकृतियोंक रिशेप-उदय-माप्त-वृत्तीनि विशेपरूम उदयकरि स्वदय प्राप्त अवससे हैं (सीनि) से( क्रमानुसार) मौदारिक मादीनि वारम् परसम्॥ मौदारिक,मियिक,माधारक,तैमस,कामण (मादीनि उदार सो स्पून है उदाय "भरपागा मौवारमा मौदारम्।। -स्पूनषिर्षे हो सो भौवार है। स्वदोना व स्पूनपना है ययोजनम् "मस्या इति मौदारिकम् । अयोजन भिसका ऐसा बौदारिक है मष्टगण-पररयं-पोगाद पर-मन-मणु- -"पाठगुण पारिदियोंफ ईस्चरपने संयोगस पा समन्यसे एक भनेक छोटा (१) हमारेपहाँ जहाँ गुरसार वह सब इस का एक ही पार है। समाप्प० में वैफिपिक रायमान में पश्यि"राम है। दोनों मानायोम पर पाठ और भय एफ (राभाउ प्रभारी सिदिया और विभूतियों के माम ममरकोरा स्वर्गवर्ग:सोका में पेस है कि महिमा महिमा चैव गरिमा लपिमा रूपा। मातिमालम्पमीरित्व । पशीर वासियया (4) अधिमन् (पु) पोरापम भर्यात् जिससे जीप छोटासा रूपपर सर सानोमा OHROORIKUDAI सार्थ घध्याय ORDIALOOLOONOLOONICORLDURima.DONLI एयनिरासी नगरूपसहाय पीज का पदच्छेद और विमरत्पर्य सहित ससिविपिका शम्दश हिन्दी अनुगद अध्याय २ व ३६ महच्चरीरविविधकरण विक्रिया,सा प्रयोजनमस्येति वैक्रियिकम् ॥ सूक्ष्मपदार्थनिर्ज्ञानार्थमसँ सिद्धि यमपरिजिहीर्पया वा प्रमत्तसँयतेनाहियते निर्वय॑तेतदित्याहारकम् ॥ यत्तेजोनिमित्त तेजसि सुत्र३६ ग भव तत्तेजसम् ॥ कर्मणां कार्य कार्मणम् ॥ सर्वेषां कुर्मनिमित्तत्वेऽपि पात्-शरीर-पिरिषभरणम् विफिया बहा शरीर अनरू मार(पिविष) करना सो पिक्रया है सापपोजनम् अस्पाई इविकिपिकम् =विकिपा (=सा) है प्रयोजन जिसका ऐसा वैक्रिपिक है सध्म-पदार्प-निर्शन-मर्थम् मा मसंयम- =सक्ष्म पदापों के निर्णयफे लिये अथवा मसयमके परिमिर्पिपा प्रमपसंपतेन -फरने की इच्छासे प्रमचपिरत छठयां गुणस्पानरवी मनिकरि भारियन नियते । रपामाता पा प्रगट रिया भाता है परिपूर्ण किया मावा रे गा सिदि किया बाबा सद इति भारकम् -सा ऐसा माहारक(शरीर)ोसारांशयाईकि छठवें गुणस्थानपी ही मुनितत्वों को न शंका दानपर कवची पा ध्रुवकेवखोके निकट मानेके लियेमुनिफे मस्तकसे मोप गायका पुजा निकलता है उसका भाारक शरीर काते॥ पदातास-निपिगम् वावप्रसिशामवम् =ो तेजा कारण मर्याद देवको दीप्ति रूप फरनेको निमिष भयवा सेमरिमया तदा नेमसम्मणाम् ार्यम् शाकाणम् =सो नेमस है। इस कार्य सो कार्मण है सरपाम् पर्यनिमित्त रामपि सर्च (शरीरों) फर्म कारण होनपर मी अर्थात् कर्मके कारण सर्प शरीर वोमी) पामा या गमन करस (र) मस्मिन् (पुलिंग) मात्प पड़ापम मिससे जीय बड़ी मूर्तिबम सार्नामें आसक (ल) गप्मिन् (पुभिग) भारीपन (ब)पिमन-हवालपन(प) प्राप्तिा (लो०)= मिससे मन मांगी पस्तु मिसती है (य) प्राकाम्मे (म०) प्राश्रम इन्धानमिपाव कप पेश्षय : (thod to शिता भय मादि भाउ परेवों मेंसे सयपर मासिक पमा (ह) वशित्व (Ro) = बग्रिदा स्वाधीमता अर्थात् निवेन्द्रिय शालय जिसने इन्द्रियमीतती है दूसरा सोक पयसम्द्रकोश ए मैं यह है अणिमा सपिमा प्राप्तिः । प्राकाम्यं महिमा तथा । शित्वंच परित्वंच या मा ममापिता दोनो सामिलामेस प्रगर हावा सिसाकी गरिमन के गानमें "कामषम्या (घा) पता:कामावणा- पिता = (स्त्री०) भरामादि माठ प्रकारले ऐश्पपमे सत्य संपवा (गोरक्षा सो पूरी हो माय) रुप ऐप : पसाद कोश पुत्र १०५ (१) पातमें प ओर भरमनपर प्रत्यय लगाने से मणि प्रयोग और माये प्रपोग बनाये जाते हैं परिपातक वा पर ऐसार हो निमरेपरिने सपाग जनमतोममें Rata-.-हिमा+ +hणाधिपतयनिए+ 'प+नित्यता - AMORRRRRORANGR - प an-n. -- वाय सिद्धि सुन३६ सत्यम्॥ मपन्ति T 'एगनिमासी मगरूपसाय महीलात पदच्छेद और सिमरस्पर्य सहित सार्यसविका शम्दशः हिन्दीमनुवाद भन्याय २ ३६ रुढिवशाद्विशिष्टविपये वृत्तिरवसेया ॥ यथौदारिकस्येन्द्रिय स्पलब्धिस्तथेतरेप कस्मान्न भव- घ्यायतीत्यत आह- ॥ परम्परं सुक्ष्मम्॥३॥ परशब्दस्यानेकार्थवृत्तित्वेऽपि विवक्षातो व्यवस्थार्थगति ॥ दिपशाद। विशिष्ट-विपये म्सक वासे रिशेपपनाम("कार्मणशरीर को कर्मकार्यसप) अधि"मासेयारण्ययामौदारिकस्म इन्द्रियः मनिक्ति बदलाई गई है। जैसे भौदारिक (शरीर) का इन्द्रियोंकरि उपलम्पिा ताइवरपाम् I ग्राण है (-उपायः) सेभन्य( पैझियिक मार-मस-कार्मण शरीर) निफा स्मात् ' मन्मपति त इति भवः मार T अपोंकर पाकिसलिय(इन्द्रियाद्वारा ग्रहण)नी रोया है। इसलिये काते हैं कि सूत्रम् परम्परसूक्ष्मम् =(तेपासूऔदारिकादिशरीराणाम्परंपरसू मम्(भवन्ति)।३७ स्त्रायः- "पाम् । परम् ॥ परम् ॥ चन(भौदारिक,पैफिपिक,माहारक, बस,फार्मण)पैसे भगले भग (पूर्वपूर्वकी अपेक्षासे सक्ष्म पा भस्पती मर्याद भौदारिककीमपेक्षासेक्रिषिकसूक्ष्मी, किपिडीभपेक्षासेमादारकस्मो,भागारकसेवजससूक्ष्म, वैमससेकार्मणसमी, ।। वृत्त्यनुवार -परशन्दस्य भनेक भर्ष-मुचित्यो अपि-परशम्दक पावसे मर्य होनेपर (चिस्व) भी विपनातासम्पवस्या -अर्थ-गति॥ -मिरघासे(पार पर) पपाया(मर्थात् पिशेप भवस्या) भर्यमें प्राप्ति का पर्व है। (एमप शरीरको कामण मिमित्त है तो वो या निमित्त वर्मा वामनदो मिमिची का जीयके परिणाम मिथ्यावरमादिकमिमिच्छा (२)श्यताम्पर सम्प्रदाय समाप्यमे तेपाम् राम हमारे पाठकले पाठस मषिकही अपपाठ पकई और अपभी एकदाहमारे यहां पावती पुस्वपमें पर र पमम् पेसा पाठ है ही बी पर पर पर मुम' पाठ है। कावासपमालाप्पाकरके अनुकूल यह पाठ भी शुस है परंतु पासिमिमुमि (भाषापेक्ष्या परवमिति परणपो म्यषस्थार्थः। ज्या शाळायनमुनित्यादिर मवमेन्शुयह (देबोरिप्पलीमप्पायर यह/पडीविमकि सप्तमीफेअर्थमनवेलोरिप्पसीमप्याय! पृष्ठा) पूर्व अपेक्षा परस्पम् ॥ -परिले (शरीर) की विवारि अगले (शरीर) का (एएम) होमा (पत्यम्) पिपपपस्या अर्थ ऐसेनम) पर राज विशेष ध्यस्थाके भय है (म्पपस्या मर्यमें भाया है। ROR ORORO FOCTOMOOTTITIETO सार्थ मायाय सिद्धि सुत्र३६ T पानिपाणी नगरूपसाप पक्कीच रुख पदणेद मौर सिमास्पर्पसहित सार्यसिदिपिका शन्दशः हिन्दी मनुनाद अध्याय २१३६ महच्छरीरविविधकरण विक्रिया,सा प्रयोजनमस्येति वैक्रियिकम् ॥ सूक्ष्मपदार्थनिर्ज्ञानार्थमस- यमपरिजिहीर्पया वा प्रमत्तसँयतेनाहियते निर्वय॑तेतदित्याहारकम् ॥ यत्तेजोनिमित्त तेजसि वा भवं तनेजसम् ॥ कर्मणां कार्य कार्मणम् ॥ सर्वेपां कुर्मनिमित्तत्वेऽपि पात्-शरीर-पिविधकरणम् विक्रिया। पड़ा शरीर मनामकार(विविध) करना सो पियारे सामयोजनम् । अस्पा" इतिक्रिपिकम् ॥ विकिपा (म्सा) रै भयोमन मिसका पेसी चैक्रिपिफरे एम पदार्थ-निर्शन-मर्थम् या भसंपप- सूक्ष्म पदायों के निर्णयफे सिपे भषषा मसयम परिशिपिा ममतसंपवन परने की इमदासे ममचविरव पठनो गुणस्थानपर्वा मुनिकरि भारिपत T निर्यो रपामाता पा मगट किया नाता है परिपूर्ण किया नावा है पा सिदि किया माता नाति माहारकम् ॥ -सा ऐसा माहारक(शरीर)दौसारांशयाईकिदउ गुणस्थानों की मुनिकतत्त्वोमेको शंका होनपर फेवशी पा श्रुतकेयलोके निकट मानेके लियेमनिफे मस्तकमसे भो एक पापका पुमशा निकलता है उसका मापारक शरीर करते हैं। पदा तेजस-निपिगम्गापावेसियामवम् मो क्षेत्रका कारण भर्थात् देशको दीप्ति रूप फरनेको निमिष भयया मफेविया वदुरलेमप्तम्। "कपणाम् कार्यम् गावामणम्सो नैस है। कर्मों का कार्य सो कार्यण है सपा निमिपये "मपि सर्प (शरीरों) या कर्म कारण होनपर भी मर्यात् धर्मके कारण सर्प शरीर सोमी) भामरे या गमन परम () मरिमन् (पुनिंग) मात्प पड़ापन जिससे जीप पड़ी मस्तिषम सामि जासफे (स) गरिमन् (पुलिंग) भारीपम (4)सपिमन सपुष तापम(३) प्राप्ति (प्रो०)- जिससे मन मांगी वसा मिलती है (प) प्राकाम्य (न०) प्राकाम लामिपात रूप पश्पय। (म) शिव (O) रिता मम मारि पाठ पश्पों मैसे सपपर मालिक पना () पशिप (म०) पशिता स्थापीमती अर्थात् मितेन्द्रिप सातश जिसने प्रियजीतती है इमरा सोक पपयम्दकोश ४ मे पद है मणिमा लघिमा प्राप्ति । प्राकाम्य महिमा सावित्वंय परित्यत तपापमा पसापिता रामोसोम मिलानस प्रगट हाता है कि सोमे गरिमन के माममै कामपाया (सा) पताकामापया- पिता = (स्त्री०) मनमानि माठ प्रभारके पेपणमें मत्य संम्वा (मोरमा सीपी दो माप) कप पेल पमनाय कोण पृष्ठ ११ (१॥ पातमें पोर मामा पप गाने पनि प्रयोग और भाये प्रगोग बना पाते है पनि पास मा पर ऐसा हो शिप गरिने संपाग प्जननी हा तापमानमै दिदीntarnर-हिमा+cि+c+Reमागितानि+पा+म+मिलता। COORRDOFOONPROHROODORO TWORLDARASOONROM 34 CAMDARDOI UNOOHORI सुत्र३६ ३७ सहमम। मपन्दि T 0:20pCORDER मगरपसाय पीलकत पदच्छेद और निमपत्पर्य सहित सर्वार्थसविध शमशा हिन्दीमनुनाद भण्याप २ सूत्र३६ 'सर्वार्थ रूढिवशाहिशिष्टविषये वृत्तिरवसेया ॥ यथौदारिकस्येन्द्रियैस्पलब्धिस्तथेतरेपां कस्मान्न भव- प्याय तीत्यत आह- ॥ परम्परं सूक्ष्मम॥३॥ परशब्दस्यानेकार्थवृत्तित्वेऽपि विवक्षातो व्यवस्थार्थगति ॥ करिषशाद रिशिष्ट-रिपपेश मदिक पासे विशेषपना("कार्मणशीर सी को कर्मका कार्यसप) चि"मवसेपायपा०मौदारिकस्पन्द्रिय नियक्ति बवाई गई है। जैसे औदारिक (शरीर) का इन्द्रियोंकरि उपलधि तपासवरेपाम् - म्प्राण (उपम्पिः) सेभन्य( पैफ्रिपिक माहारक-सैमस-कार्मण शरीर) निका स्मात् १ नमावि T इविम्मत "मार T -ज्योंकर पा किसलिय(इन्द्रियोदारा ग्रहण)नी दवा है। इसलिये फायरें कि सूत्रम् परम्परंसूक्ष्मम् =(तेषाम् औदारिकादिशरीराणाम् परंपरसूक्ष्मम(भवन्ति)।३५ मना- 'वेपाम् । परम् । परम् ॥ चन(भौदारिक,कियिक,माहारक, मस,कार्मण) से भगले भगो पूर्वपूर्वकी भपेसासे)सक्ष्म वा भस्थलों भर्या औदारिफकीभपेक्षासेवैफियिकसुक्ष्मी, वकिपिकीमपेधासभागारकसहमद,माहारकसेवमसम्ममरे, वैमससेकार्मणसममौ । उत्त्पनुगादा-परशम्दस्याभने-म-भूषितामपि-परशम्दक पावसे भर्य होनेपर (वृत्तित्व) मी रिक्षाताम्यवस्था -अर्थ-गति विपासेपहा पर) म्पवम्या (मर्याद विशेष अवस्था) भर्यमें मासिद पा पर है। एमप शरीरको बाब निमितही कामेपोसा निमित्त शिवार्मरमा काममहो निमित्त वा जीषके परिणाम मिप्पादनाविकमिमिच। (२२स्येताम्पर सम्प्रदाय के समाप्यमे तेपाम् गण मरि पाने पाठस भपिका अपपाठ एप और मर्यमी एकदमारे यहाँ पावसी पुस्तमे पर पर सम्मम् ऐसा पाठीव्ही पर' पर पर मुथम' पाठ है। कामरूपमालाप्यारके मनफूल या पाठ भी शुष है परंतु पासिनिमुनि (४)पूर्वापेक्ष्या परत्वमिति पयायो म्यपस्था। तथा शाफ्टापनमुमि इत्पादिमे मवमेमबहा(देखोटिप्पपीभप्यापर पपपपलीविमति सप्तमीके प्रथम माविमोटिप्पसीभप्याय१ पृष्ठ पूर्व प्रपेदया। परत्वम् । = पहिले (शरीराविषवापर ममले (शरीर) का (सूक्ष्म) होना (-पस्वम्) विपापपस्या प्रयास -ऐसास्त्रम) परसद विशेष अवस्था भय है (म्पपस्याफे पर्यमें माया है। MECONIRO CRODOO वार्य ध्याय GIRI १०० COOOOOOOOOalo पृथग्भूताना शरीराणा सूक्ष्मगुणेन वीप्सानिर्देश क्रियते परम्परमिति ॥ औदारिकं स्थूल, तत सूक्ष्म वैक्रियिक, तत सू दममाहारकं, तत सूक्ष्मं तैजस, तैजसात्कार्मणं सूक्ष्ममिति ॥ सिद्धि यदि परम्परं सूक्ष्म, प्रदेशतोऽपि नून परम्परं हीनमितिविपरीतप्रतिपत्तिनिवृत्त्यर्थमाह- मित्र३७ ॥प्रदेशतोऽसंख्येयगुणं प्राक्तैजसात् ॥३८॥ पूपरू' यूनानाम् ॥ = { संहा(नाम)लक्षण(स्पस्म) मयोभन मादिके भेदसे } प्रथग भूत शरीराणाम् । सक्ष्यगणेन । पीप्सानिर्देश । (भौदारिक मादिक) शरीरमे विनको सुक्ष्मण फरि वीप्सास्मनिर्देश झियते T परम्परम्।। कियागया है कि परे पर सहम हैं अर्याद नाम सहा प्रयोमन भादिके भेदसे मित्र पो मौदारिकमादिक शरीर में उनका यहाँ सूक्ष्मणके साथ मीप्साका निर्देश कि मागे मागे क शरीर सूक्ष्म सूक्ष्म है इति मौदारिक स्थल तत स्म"वैक्रियिकम् =इसमकारकि मौदारिक शरीर स्थल है । विस (मौदारिक)से सूक्ष्म वैक्रियिफ है सवाम्म्यम्" मापारकम् । वा सूक्ष्मम् ।। -तिस (क्रिषिक शरीर से सूक्ष्म भादारक (शरीर)रे । विस(भाहारक)से सूक्ष्म नै समग तैनसा " कार्पणसूक्ष्मम् ।। इति =वैगसशरीर है । विस तैमस(शरीर) से सूक्ष्म कार्मण (शरीर) है यदिःपरम्पर सक्ष्मम्।।" प्रदेशका जा भगो भग(शरीरपूर्वपूर्षकी मपेघासे) सूक्ष्म है तो परमाणुभोंकी भपेनासे चपि मनम् परम्परम्हीनम् in =मी निरसदोकरि (-नून उचर उच्चर शरीर हीनहोंगे अर्थात् प्रत्येक मग्रिमभग्रिम शरीर परिणे पनि शरीर से पोरे पोरे प्रदेश होंगें इनिविपरीत-प्रविपचि-निरचि-अर्वम्।।" मा ऐसी विन्द प्रषिके दूर करन के लिये पाते हैं कि प्रदेशतोऽसख्ये यगुण प्राक्त जसात्=परपर प्रदेशत असख्येयगुण प्राक्तजसात्॥३८॥ म्या:-परं परंप्रदेशवा मा मैत्रसाद॥ अग्रिम अग्रिम (शरीर) प्रदेशों की अपेक्षासे, बसस परिलेक (शरीर) भसरण्येयगुणम् १०० =मसंस्म्पात गणेरे मर्यात् मौदारिक शरीर भिवने परमाणु ने उनसे सस्यातपणे लामो खाताम्बर सपा दिगार मामापोमे रस समापार और एकता। पर पर बाप की अमुरति सतासां मनसे इसम्म में प्राप्ती। (पगार परम ममम्मकिपदापरन्दनम् सामचिन्न परीनम् कर भागे पूनम् भाभप भिसरणी मेपकोत पप 2 HDMOMOUPOOTOMORA सिद्धि erreeIRDOIROI:180eoneOneeROGRACEBOOK स्टानियाती अगम्पसाय वकील व पदरछेद और विमनस्पर्णसहित सायसिविरविका शम्दशः हिन्दी भनुवाद मायाय २ मप्र ३८ प्रदिश्यन्त इति प्रदेशा परमाणव । सख्यामतीतोऽसख्येय । असख्येयो गुणोऽस्य वायर तदिदमसख्येयगुणम्॥ कुत 'प्रदेशत। नावगाहत । परम्परमित्यनुवृत्त राकार्मणात्प्रसङ्गे तन्नित्यर्थमाह प्राक्तैजसादिति । परमाण छिपिक शरीरमें हैं भोर क्रियिक शरीर से पसरण्यात यणे परमाणु माहारशरीरम १ सत्यनुवादः प्रविश्पन्नातिकमदेशा परमाण मा भषिमाग्परोकर प्रस्पण कियगये है पेस प्रदेश में पा परमाणु ।। पा निनारि प्रमाणरिये है ऐसे प्रदेश में अर्थात् जिनके द्वारा मिन मिम मेशरिये जाय सो मदेश है। समपाम्ामतीत प्रसस्पेयामसंरूपयानपणा, मो गणनासे याहिशों से असंख्यात हैं असल्यान है गयाधारमा गुणक भस्य तदसण इयम् सम्पपयणम् Filot- जिस सा या भसंस्पेयरणा है क्योंकर पा कासे (प्रसस्पेयाणा) रे मरंशतभरमारता -परमासुभों (की भपेचा)स (मसमपेपरणा) है अवगाहना (की विपक्षा) से असंख्येयाणा) नामांव मौदारिकसे वैप्रिपिक शरीर मसंख्यातगुण है मौर सिमिकस भारिक भसंसपावराण सो बौदारिफसे गणनायें मैफियिककी परमाणंभोगी गणना असंस्पातगुणा) है कि उसकी ममगाना भसरम्यातगणी अधिक है इसी प्रकार बिपिसे मारक परमासुमो की गिनती पा मग्ग्या असंख्यासगणो नफि गारक शरीरसी भरगाहना वैफिपिक शरीरसे मसंस्पातपणी मरिक है परम्वरम् इति मनुस। पूर्व सैवीस सूत्रसे इससूत्रमें)"पर पर" ऐसी अनुत्ति(क कारण) से या कार्यमा प्रसार कामण (शरीर) पर्यन्त(म्मा) (इस परं परं की अनुचिम) संपानिपर सद-निधि-मम् । "विस (मसेग) के निपके सिप का निवारण के लिये ( इससूप) माफवेमसात् २० पनि मा मस शरीरसे पहिले पहिले (माफ भसाद ) ऐसा मास्प कारे (1 गुपपजिसकको युनिये असे यदि ११ को इसे गुणाकरमा पोतो १५ गुस्प है । साया गयाफार जिससे गुसापराया मलक वागाकार हे १५६-१७४ को गुसमफस कहते हैं। गुलाबरलेकी ज्यिाको गुलन करते हैं। ROBOCIDO 2010 DICH DODGED . नक .- वार्थ याय १०२ सिद्धि सुन३८ DareDarDreapoMOOARDSPORINCONORINBEOHAMAND SAHOBAEROBEROPERDOI एनिवासी जगरुपसाप मफोल कत पदण्पद भार विभपत्पर्य सहित सवार्य सिदिफा शब्दश' हिन्दी अनुवाद अध्याय २ स्त्र ३८ श्रोदारिकादसख्येयगुणप्रदेश वैक्रियिकम् ॥ वैक्रियिकादसंख्येयगुणप्रदेशमाहारकमिति ॥ कोगुणाकार ? पत्योपमासख्येयभाग ॥ यद्यव,परम्पर महापरिमाण प्राप्नोति । नैवम् । न धविशेपात्परिमाणभेदाभाव । तूलनिचयाय पिण्डवत्॥ अथोत्तरयों किं समप्रदेशत्वमुतास्ति कश्चिडिशेप इत्यत श्राह- मौदारिमात्मसंम्पयाम प्रदर्शन वैझियिर्फ ३७ (इसलिये) भौदारिफशरीरसे भसम्पावगुणे पदेशराखा झियिक शरीर चोकपिकान । मसस्पेयगुणपदेशम् । इति० वैफियिक शरीरसे मसंख्यासगुणे में परमाणु जिसके ऐसा मापारपम् ११॥ गुणाभारा ? माहारक शरीर है । (प्रश्न) क्या गुणक है अर्थात् जव भसंस्म्यातके असंख्यावे भेद | फिर किम प्रकारफे मसरुपात का गुणाकार पा गुणक याां पर मान पम्यापम भसंख्येप-मागः यदि०एम्. पम्योपमफ भसंस्पातवा भागमा है (सो गुणक या चैना ) यदि ऐसा है अर्थात् एकएक भग्रिम गाग्रिम शरीरफे परमाणु उसके पूर्व पूर्व शरीरसे भसरण्यात गुणे ईसौ परम्परम् महान् परिमाणम्" प्रामातिर =अग्रिम भग्रिप(परंपर)शरीर महान् भाकार वा स्यूलता को प्राप्तहोणारे (उत्तर) ऐसा नहीं . ( कि अगल भगखे शरीरके परमाणु भसरुयाव गणे पूर्व पूर्ण शरीरसे रोनेसे उन मग्रिम मग्रिम शरीरमै स्तपनाका मसंग माघे ) पर रिशपा, परिमाण मद-भमाना। नयोंकि पन्य विशेषतासे पा पन्धकरंगसे टीचरोखक मेदका भभाष गोमाता रे तूर-निषय-भयस्-पिगवन् दर्शका सम्। भौर लोहे पिरफे सदृश अर्थात् हक सम्बमें परमाणु योड़े हैं परंतु परिमाणमें पड़ा है उसलोरफे पिंडसे जिसमें परमाणुं उस के गर्छसे बहुत अधिक परंतु रोजौजमें छोटा है भय उत्तरपाम् मममदशस्त्रम्। मस्तित -मर-भय)मगल दो (समसशरीरमौर फार्मणशरीर) में क्या समान मदेशता है? उनलथिन् निशेष इति०मत मार T -भयग(उत) (-फमितोमेद है। इसखिपे (मग्रिम म्भमें) पाते हैं कि (१) मलमपपिदिये प्रथमा निमे मगलबार रात गा जितीयनपर्म और हातलिपित सधिसिवित्तिम 'महापरिमाग' tinार राति निना- न. एम् HIRONIO १०२ मेगी पारमे लिपा है।

वार्थ न्याय sagalen १०३ ORDAROO सूत्र ३६ %3D CROON ॥ अनन्तगुणे परे ॥ ३६॥ प्रदेशत इत्यनुपर्तते, तेनैवमभिसम्बन्ध क्रियते श्राहारकातेजस प्रदेशतोऽनन्तगुण, तेज साकार्मण प्रदेशतोऽनन्तगुणमिति ॥ को गुणाकार ? अभव्यानामनन्तगुण । सिद्धानामन न्तोभाग ॥ तत्रैतत्याचल्यक्वत् । मूर्तिमद्व्योपचितत्वात्संसारिणोजीवस्याभिप्रेतगति- सूत्रम्-- "अनन्तगुणे परे =(प्रदेशत पर पर) अनन्तगुणे परे (भवत) ॥ ३९ ॥ पार - परम् ॥ परम् । परे । मग्रिम मग्रिम ( पर पर ) मयशेप वा अन्य दो ( तैमस और फार्मण शरीर) मगन' भन गुणे ॥ भवन' T पदेशों की अपेसासे (पूर्व पूर्व शरीरोंसे ) भनन्वगुणे रे मर्याद माहारक शरीरसे सनसशरीरमें अनन्तगुणे प्रदेश अधिक है और तैमस शरीरसे कार्मण शरीरमें अनन्त गुणे प्रदश अधिक। प्रत्यनुवाद-मदरास .ति. (अदतीसा नपसे इससूप) प्रदेशतः (मदरोंकी अपेक्षासे) ऐसा (वाक्य) अनुराससे T तन" एपम् । -अनुवर्तसाहै पा भाकर्पित होता है । विस ( प्रदेशसः वाफ्य ) फरि इस प्रकार भभिसम्बन्ध । क्रियते T भाारकादा तेजसम्। संयोग कियागया है कि भाहारकशरीरसे पैनसशरीर प्रदशत मनन्तगुणम् ॥ सैनसा फार्मणम् ॥ परमाणुंमोंकी अपेक्षासे अनन्तगुण है वैमसगरीरसे फार्मणशरीर प्रदशन * भनन्तगुणम् वि * म्भदेशोंकी विवक्षासे मनन्वगुण है ॥ का गुणाकार मगुणाकार वा गुणफ कोंन भनन्त ? (फ्योंकि अनन्सफे अनन्य भेद ) अभयानाम् ।' मनन्तगुणः । सिद्धानाम्। अनन्त । (उत्तर) प्रभम्प राशिका मनन्तगुणा है सिद्धराशिफा भनवर्षा भाग शस्पस्पद म्भाग है (सो मनन्त गुणक है) (मश्न) माल वा वीरफे फाल (शल्पक) के समय तपापनका स्यात् ।। मूर्विवन्दम्यउपस्तित्वात आह यह होता होगा कि मूर्तिमान् वस्तुके सवय होनेसे समारिणनीवस्प भभिमेव-गति -(सेनस और फार्मण शरीर सहित) संसारी जीवके जानेयोग्य (ममिमेव) गमनमें (१) श्वेताम्मर और विगम्पर दोनों मामापो इस सत्रमा पाठ और भयं एफसाहै हमारे यहा कहीं कहीं पर 'मनन्तगुख परें पाठ है और कहाँ कही पर"मतगण पर पाठ है पोमो पाठ ठीको (प्रप्याय १ टिप्पणी पृष्ठ ५४० ५४१) पर पर की अनुपसि३७ वा सूज से और प्रदेशताफीम्यासेमातीहै। OM १०३ वर्षि याय सिद्धि सिद्धि सूत्र३६, ४० ४ पद-न० UPIONOR HOMEduROOMMOHARIDEUNKOCIETONum निरोपप्रसङ्ग इति । तन्न । किं कारणम् । यस्मादुभेऽप्येते- अप्रतीघाते ॥४०॥ निराप-प्रमा" इति. काय का प्रसग पता होगा । मर्यात् वाण मूर्तिमान द्रव्योंका पिस्वरूपहै इसलिये निस प्रकार पर्षत मादि से उसकी गतिका निरोप हो जावा-या मागे नहीं मा सकता है उसी प्रकार वैजस शरीर और फार्मण शरीर भी अनंते मनते मूर्तिमान परमाणुओंके पिरौ भौर संसारी जीप सदाफास उनका संबंप राता है (यह सपंप माग स्त्र ४१ में कहा जायगा) इसलिये उनके सघषसे संसारी जीवों भी जाने योग्य गतिका निरोध होगा ।। -उस (अभिमत गति) में (रुकावट) नहीं होती है।(प्रश्न)क्या कारणहै (किरुकावट नहीं होगी) किम्य कारणम्पस्मा उमई। 'मपिएत ॥ (उत्तर) इस कारणसे कि (तैमस और फार्मण शरीर) ये दोनों ही (ममतीपात हैं) सूत्रम् "श्रवतोघाते ॥४०॥ अप्रतीघाते (परे ) भवत म्भार्प-- पर " भावीघाव मवस: T-(तैनस शरीर और कार्मण शरीरये)शेपदो पाविम दा ममविपात मराफर मायनपान भी मूर्तिमान पदार्योस इनका रुकना नहीं होता मानार्थ मूतीक पदार्यसे मूर्तीक पदार्यका रुकनाना मतीयात है। अग्निका परिणमन सूक्ष्म है इसलिये कठिन भी जोरके पिंटमें सूक्ष्म परिणमनके कारण मिस प्रकार भग्निका प्रवेश नहीं लाता उसी प्रकार सेमस और कार्मण शरीरको परिणमन मी सक्षम है इसलिये पन परल मादि फैसे मी पटिन पदार्य नषोंन परे दोनों शरीरोंका हकना नहीं होता पे निम्पनिकास प्रशारमाव है इसलिये थे वेमस और फार्मण रोनों शरीर मपविघास कोमास हैं। (१) दाना मानापामे इस मूत्रका गाउ एक है। 'ममाप्पतत्त्वार्यापिगध में प्रतिपात शवगामर्थन रोकमा मेर मरममा ऐसा किया जैसाकि निम्न पाम प्रगट तेजस भार कामाप अम्तिमा शरीर मप्रतिपात प्रपत् प्रतिघात गुम्य है। तात्पप्य यह है कि दो तैजसोर काम कही लिस म दो रने औरन पे फिर्म को रातों पृष्ठ ५२॥ प्रतिपात (सासे रुकनवाला पा सरोको रामोवाला) होकर मप्रतिपाति हो क्या प्रति पानिहार प्रतिपातिदा। पर परशरीरकसपम्प सप । समाय० पृष्ठ ५७ उक्त शरीर म किर्स धे रास्तई ऐसा अथ इसका इस सपथ मिविपत्तिम तत्वाय रामपातिक उपमधी तावनिका प्रथ काशिमा सासुम्पजीकृत तरवार्थमगु टीका मै नही बियाह र म तरवार्थ राम पानिराश मनुवादा में मतिमी में पेमाई प० पयामासमी भनुपारित मोघशात कामय समाप्यन्मसे मिकता से उक्त मोरयामके Heart मा मम में दो पाश्चिमार राव नम मा. (HEम मेडम माराम राशीभी परमप पीमनरी पत्ती औरन सिमीप पदार्पको रोक सकते हैं सेएफस से भी पर पाराप LOO900ameRADHURCHOPROMOTainmeoRROENROL १०४ मी का हंगामही तोरोगामे ।

सिद्धि सुत्र४० सर्वार्थ पायर १०५ BELON BEDONOTECOLLECTRIANGOAT.COM मूर्तिमतो मूर्त्यन्तरेण व्याधात प्रतीघात । स नास्त्यनयोरित्यप्रतीघाते ॥ सूक्ष्मपरिणामा- दय पण्डेि तेजोऽनुप्रवेशवत्त जसकार्मणयोर्नास्ति वजूपटलादिषु व्याघात ॥ ननु च वैक्रियि- काहारकयोरपि नास्ति प्रतीघात । सर्वनाप्रतीघातोऽत्र विवक्षित । यथा तैजसकार्मणयोरा- लोकान्तात सर्वत्र नास्ति प्रतीपात।न तथा वैकियिकाहारकयो॥ पुत्पत्पादः मर्पिमतमी मूर्ति-मन्तरापायान-भूर्तिमानका (मूर्तिमत') अन्य मूर्तिमानकारि सापट (पापाव) है सो मनीपाव।सन० मति अनयो । म्पतिमात है। सा (प्रतिपासम्पतीपात) दोनों (वैनस और फार्मणशरीरी नहीं) तिमी मुक्ष्मपरिणामादभिपस पिगो वेगस्पेस दोनों प्रतिपात रहितौ । सूक्ष्मपरिणमन(केकारण) से लोडेके पिंजौ भन्निका भनुमपेशवत् तैनस-कार्मणपो।। पसेपरश(म्भनुप्रवेश) के समान वैगस और फार्मण(शरीरों)का (अमेश)ो ।। न०मस्तिापरतादिन्यापाव नही है (इन दोनों शरीरोंका पतिपात पा झार वमपटलारियोंमें भर्यात् भग्निका परिपपन सूक्ष्म है। इसलिये कठिन मी लोहके पिंटमें मपम परिणमनके कारण निसप्रकार मनिका ममेश नहीं सकता उसी प्रकार सेमस और कार्मण शरीरोंका परिप्समन मी सामी इसलिये वमपटा मादि कैसेमी फठिन पदार्य क्यान पौध माप दोनोंगरीरोंका सकना नहीं होता निरवच्छिमरूपसे प्रवेश परमाते हैं ननुकपर्वक्रिपिकभारयोः अपिनमस्विमतीपातम्यारि भरन वैशिपिक और माहारक(शरीर) निकें भी पायात ना कापट नहीं है सचममतीपावनविषसव ।' (चर) सब स्पानोंका सम्पापास या (इसमूत्रमे) भपेरित है अर्थात् इससूधमें इस ममविभावका कपन भो सब स्यानो संघ रववादो पपो-वैमस कार्यपयोगमा लोकान्ता सर्वत्र से वैजस भौर वार्मण(गरी)का खोकके भन्यवक(म्या लोकान्तात् सव स्पानोंमें नमस्तिमतीपातीनसयामियिक माहारको सम्पाघात नहीं है। वैसे नहीं है क्रियिक और मापारक (शरीरों) का (पापात) मर्याद खास पन्त पर्वत बैंमस और फार्मस शरीरीका की मी प्रविघाप्त नहीं होता क्रियिक और मारक परी का वैसा प्रतिपाव नहीं किंतु उनका प्रतिपात ऐसे रोमाता है कि केवली और भुप्त केपसी विमा जिसका समापान न हो सके ऐसी सावरिषयक गुर कादो जानेपर उसकी निचिके लिये प्रमच गुणस्यान पत्ती संयमी, PORTOROLOMIDCIRC १०५ कार्य ध्याय सिद्धि सुत्र४० KDONKID ORDEROOROORDOXO CHOTIOODOTROOMIC एरानिवासी नगरपसाप पकीस कस पदच्छेद मौर पिमपत्पर्यसहित सार्यसिविचिका शम्दशः हिन्दी अनुवाद अध्यायर मूत्र४०,४१ आह किमेतावानेव विशेष उत कश्चिदन्योऽप्यस्तीत्याह- ॥ अनादिसम्बन्धे च॥४१॥ चशब्दो विकरपार्थ । अनादिसम्बन्धे सादिसम्बन्धे चेति ।। मुनि भाारक शरीरफी माटता होती है और जहां फेवली या भुतफेरली पिराभवे है नाविक नाफर फिर भारफ शरीर चोट पाता है। रेसलियों की स्थिति दाई दीपसे पारित नहीं होती इसलिये माहारक शरीरका गमन अधिकसे भपिक गई दीप पर्यंत ही है। मनुष्योंका क्रिपिक शरीर मनुष्यलोक(मादीप) पर्यंत ही गमन करता है या देशोंका क्रियिक शरीर प्रसनाशी पर्यंत गमन फरखा है अधिक नहीं इसखिये ये दोनों शरीर पैमस और फार्मण शरीरों समान सर्प प्रमविघात नहीं है ॥ धनः इस सर्प गमनकी विशेष अपेनासे तैमस और फार्मण शरीरोंको इसमप्रमें अप्रतिघाव का है। भारत सिम् एतारान् एप०पिशेपा। -पूछता है फि ण्या(इन तैमस और फार्मण शरीरोंके विपयम)इवना हो विशेष उवामिन् भन्य । अपि प्रस्तिा इति माr-प्रयरा(उत) शव मौर (भन्य) मी है। (निम्नस्त्रमें) काते हैं कि सूत्रम्-'"अनादिसम्बन्धेचा॥४१॥-(परे जीवस्य) अनादि सम्बन्धे च भवत ॥४१ ।। स्वा:-पर नीरस्य । अन्य दा (=परे-वैमस भौर कार्पण शरीर) मीप मनादि-सम्बन्। प०मवतः अनादिकाउस भी(भौर मोन हानेस सपंघ रखनेवाले भर्यात् वैमस भोरकार्मण ये दो शरीर मीरकेसाप अनादिकारस मी संपपपाले सादिकालसे भी संबन्धपाले उत्पनुवाद पशम विकल्प-पर्ध मनादिसंबध (इसमस) पशव विविध कम्पनकेनिये है ( मर्यात् ) मनादि संपन्पचाने २०सादिसमापे ॥ इति मी(प) और सादिसम्बन्ध पालेर मानार्प सूत्रमें पराम्बरे उसका अर्थ विकम्प रे भौर वैनस भौर कार्मण इनदोनों शरीरोंका भारमाके साथ अनादिौर () तामर मार दिगमरमानों मानापोंमें रम गणका पाट और मर्प एकसारमारे पापीकरी पर संब'पाठ और कही कहीं पर 'पम्पे पाठपोनों पाठ रोकना मध्याप प्रपम रिलिपी पOn MROedia सवार्य यध्याय सिद्धि सूत्र १ ORDRDOO कार्यकारणभावसन्तत्या अनादिसम्बन्धे, विशेषापेक्षया सादिसम्बन्धेऽपि च वीजवृक्षवत् ॥ यथौदारिकवैक्रियिकाहारकाणि जीवस्य कादाचित्कानि, न तथा तैजसकार्मणे । सादिकाख से दोनों प्रकारका संपन्यो या उस पशब्द का प्रयोमनी । पशम्मका ऐसा मर्य प्रश्नोत्तर म्प में उसका शमश मनुवादशेने यो निक्ख भाताई कि भनादिसम्पन्धपाले मी(-1)वो प्रश्नउठवा है कि कोई और प्रकारका संयंपासेमी तैनसभोर कार्मण शरीषा संवपरपाईयोसादि संबंधोपशम्दकाया प्रमाषर।। कार्य-कारणमान-सन्वत्या मनादि-सम्पन्धे - कार्यकारण होनेरूप( माय)संवान (कीमपेत्रा) से अनादि समयपाले । परिशेप-अपेनपासाविसमा अपिल मौर(५) विशेष तिवमासे सादि सपपवाले भी पीमधवन कीम और उसके सारे अर्थात् मिस समय धीमसे वृक्ष,क्षसेवीम,पीमसेन,उनसे वीम, इस प्रकार सामान्यरुपसे कार्यकारणरूप ससंघकी विपनाकी जाती है उस समय भीम भोर का कार्यकारणरूप भनादि संबंध माना माता और मिस समय अमुक पीमसे भास,मायनसे,भमुफलीम इसप्रकार पिशेपम्पसे कार्यकारणकी पिपमा मानी माती है उस समय भीम और वृनका यह सम्बन्ध सादि माना नावा है उसी प्रकार मिस समय भास्माके साय वैमस फार्मण शरीरफे निमिध नैमिषक सम्बन्धकी समान्यस्पसे विसधा भीमाती है उस समय भारमा और सैमस,कार्मण शरीरोंका अनादि सबन्धी क्योंफि भनादिपावसे ऐसा कोई भी समय नहीं पीता मिसमें वैमस कार्मणफी मात्मासे पृथक्क्षा हुई हो और मिस समय अमुक तैनस धर्मिणको भमुक भवस्थापन मात्माक साय संबन्ध है पुरासन अनंघ परमाणु दोनों शरीरों की समय समय निर्म और नवीन नगीन मानत परमाणु संचपस्प होती इस विशेषकी अपेक्षासे ये मैनस और कार्मण दोनों शरीर सादि सरन्पपाछे हैं। इसप्रकार पिशेप विरक्षा है उस समय उनकी भापसमें निमियनैमिषा सम्मन्य सादि है। इस प्रकार सामान्य और विशेषकी अपेक्षा भात्मा और तैमस कार्मका अनादि सादि दोनों प्रकारका संबंध सिद्ध है। पया मौवारिकवैप्रिपिकमाहारकाणिनीचस्प जैसे मौदारिक,पेक्रियिक मौर माहारक शरीर भीष फादाधिकानिनवपानस-कार्मणे -कमी कमी होनेपाले होवे हैं नहीं है वैसे(कमी कमी होनेपाले ) वैमस कार्मण शरीर (१) कादमिक पमपाकोश पठ१३ में त्रिसिंगी इसका प्रत्यपुरुष (=प्रयम पुरुष) गुपचन,नपुसकलिंग'कावाविकानि' है। en PONOVOS १०७ पर्याय व्याय सिद्धि सुत्र४० ४१ ORTOONROOWROOTTOBUVO एयनिमासी नगरपसाप पडील कच पदच्छेद और विभक्त्यर्यसहित सार्यसिरितिका शब्दशः हिन्दी अनुवाद अध्यापर १४०,४१ आह किमेतावानेव विशेष उत कश्चिदन्योऽप्यस्तीत्याह- ॥ अनादिसम्बन्धे च॥४१॥ चशब्दो विकल्पार्थ । अनादिसम्बन्धे सांदिसम्बन्धे चेति ।। मुनि मारक शरीरकी प्रकटदा होती है और महा फेपली वा भुतफेरखी पिरामत है पतिक नाकर फिर माहारक शरीर खोट भावा है । फेवखिोंकी स्थिति गई दीपसे पादिर नहीं होती इसलिये भाहारक शरीरको गमन अधिकसे अधिक गाई द्वीप पर्यत ही है। मनुष्योंका वैक्रियिक शरीर मनुष्यखोक( नाईदीप) पर्यंत ही गमन करता है क्या देवोंका क्रियिक शरीर प्रसनाती पर्यंत गमन करणारे अधिक नहीं इसलिये ये दोनों शरीर वेभस और कार्मण शरीरोंक समान सर्प प्रमविपाप्त नहीं ॥ भवः इस सर्पन गमनकी विशेष अपेमासे वैमस भौर फार्मण शरीरोंको इसम्ममें अपविघात का है। मारा रिपतारान् । एम०विशेषः। -पृषता है कि पा(इन तैमस और फार्मण शरीरोंफ विपयमें)इसना ही विशेष उवामिन् भन्यः भपि मस्ति इति मा-प्रयरा(-दत) कुछ और (अन्य) मी है। (निम्नम्नमें) करते हैं कि सूत्रम्--"अनादिसम्बन्धेचा॥४१॥(परे जीवस्य) अनादि सम्बन्धे च भवत ॥४१॥ म्यापे'-परसा मीरस्य भन्य दा (-परेतैमस और कार्मण शरीर) भीमफें मनादि-सम्मन् पमवत । मनादिकाञ्चसे भी(मौर मोश हानतक)सर्षप रखनेराले में भर्यात् वैनस भोरकार्मण ये दो शरीर भीषफेसाथ मनादिकाल से भी संघवाले हैं सादिकाजसे मी संपघवाजह उत्पनुवाद पशमासिकम्प मर्थ मनादिसधा=( सत्र) पशब्द विरिय कम्पनके लिये रे (अर्थात् ) अनादि संप माले प०सादिसम्बा" इति म्मी(च) भोर सादिसम्बन्ध पालेर मापार्य सूत्र में चशम्द है उसका अर्थ विकम्प और देनस और कार्मण इनदानों शरीरों भारमाके साप अनादिौर (७ ताम्पर प्रार दिगम्बर मामा भानापोंमें इम पासा पाठ मोर मयं पयसा है.इमारे पहाड़ी पर सपंपे पाठ और कहीं पर 'सम्म पाठमो पाठ दानाम्याप प्रपमापी -५५ र रिनी पण) WONDOFOOD NO: 100 SHTROORBOARD सर्वार्थ अध्याय CROCIT सिद्धि सन४३, 1800 DHODINOR सम्भविशरीरप्रदर्शनार्थमिदमुच्यते- तदादीीन भाज्यानि युगपदेकस्मिन्नाचतुर्व्यः ॥४३॥ तच्छब्द प्रकृततैजसकार्मणप्रतिनिर्देशार्थ । ते तैजसकार्मणे श्रादिर्येषां सम्भरि शरीर प्रदर्शन भयम् इदम् तस्यता- एक मोवमें)एकसापोनेवाले सम्मविन शरीरोंके दिसाक्नेकेलिये पद का नाताई कि तदादीनि भाज्यानि युगपदेकस्मिन्नाचतुर्थ्य="तद् श्रादीनि भाज्यानि युगपद् एकस्मिन्ना चतुर्म्य स्मार्थ -सद मानि माग्पानि मान(तमस,कार्मण)को भादितेकर पिमाभितकिये हुये वा विफल्पस कियेहुये पुगपद(पुगप) एकस्मिना मा-पतुभ्यः भवन्ति T -एक कासमें एक(जीवों) में चार(शरीर)वक होते मर्याद दो शरीर होवो वैमस और फार्मण होते हैं। वीन हो वो भौदारिक वैमस और फार्मण होवे पा पक्रियिक,वैमस और कार्मण ये तीन भी होते हैं परन्तु ये देव तया नरक गवियोंमें होते है। यदि किसीफ एक साय पार शरीर हो वो भौदारिक, भारिक, तेजस, और कार्मण अपना प्रौदारिक, पमियिक,वैमस और कार्मण होते हैं। यह नियम है कि मिस फियिक होता है उसकें भारक नहीं होता और जिसके भाहारक होता है उसके क्रियिफ नहीं हावा है। एक शरीर पाला कोई भी मीव संसारमें नहीं है। उत्पनुगद तद् शम्दासमकव-मस-कार्पण-प्रवि = (इसम्म)वद शन्दो सो प्रकरण कियेहुये पा पिपयभूत वैमस और कार्मणको निर्देश मणौमस-कार्मणे/मादि पेपम म्भगट करनेके लिये है। ये वैमस और कार्मण शरीर हैं भादि जिनके (१) हमारे यहां गया पुस्त में उपर्युक्त पाठ है किसी किसी पुसाल मे( मेसे पं० पत्तासासगी पालीवास अनुवादित मोश शाल पृष्ठ १६ में) एमिन् परेसानमें एस्प राम है परंतु इस पाठ से मर्प भेद नहीं मा । पोकि एकमिन्+मा-चतुम्फा-एक (बीय) में चार तक हाते है परीवात्पर्य रखता है जो एकस्प-मा चतुर्पा एक (जीप)बारक होते हैं रमता है: स्वेताम्मर मानायके समाप्प तरवार्याधि गम सूत्र में एकत्याऽऽसतु पाउदै सो हमारे यहा के एक पाठ से मिलता है। ये मी सप उनके यहां वैजसको अनादि मानाद व एक है। परनु समाप्पतरपार्थापिगमन पप्ठ ५३मे यह मी लेखहै कि वैजसके मनादि सम्बन्धवाके संडन पक्षमें एक ही शरीर का अब मलादि संप वावस कामगरी एक हो सकता है।रोपी सत्तामै धर्मल और पौवारिक होसकते है अथवा कार्मन और वकिपिक हो सकते हैं। तपा वीमकी योग्यता में कार्मस मौशारिफ और क्रियिक हो सकते है पा कार्मस प्रोवारिक और माहारक हो सकते हैं और पारफी पोग्पता में पार्मण असमाचारिक और पेनियिक हो सकते हैं पा कर्मपतरस भौहारिक भोर माहारक होसते । परत कसा मी एक कालमेंपका पांचोनहींहोते। १०६ सर्वार्थ अध्याय सिद्धि सुत्र४१, ४२ QUOQURTO ORDIM 0:00 OUTODIDOT: नित्यसम्बन्धिनी हितेआसंसारक्षयात्।तएतेतैजसकार्मणे किंकस्यचिदेवभवतउताविशेषेणेत्यताहा ॥ सर्वस्य॥४२॥ सर्वशब्दो निरवशेषवाची। निरवशेपस्य ससारिणोजीवस्य ते अपि शरीरे भवत इत्यर्थ ॥ अविशेषाभिधानात्त रौदारिकादिभि सर्वस्य ससारिणो योगपद्यन सम्बन्धप्रसङ्गे 'निस्पसम्बपिनी वि-माससारखयादा पॉनि(हिनेदोना()निस्य संघपाले (नीप)संसारनाश होनेतक-मा) हैं। त। एता नसभामणे निस्पचित् = ( ये ) तेनस और फार्मण शरीर क्या किसी ( मीष ) के पर मन"उत मरिशेपेणावि.मसामा नी हाते (-भरतः)मयमा(=उन)रिशेपरदिव(सबजीपों) । इसलिये कसे है कि सूत्रम् सर्वस्य -सर्वस्य(ससारिणो जीवस्य)(परे तैजसकार्मणेशरीरेभवत) मयार्थ -सर्चस्वसंसारिणा मोरस्यर३॥ समस्त सारी मीर परेक दो नैनम पापणे। शरीर भरत T सैनस और कार्मण शरीर हाते मर्यात् तैमस और कार्यण ये दोनों शरीर सामान्यरूपसे सब संसारी नीपोंकते हैं यदि किसी दोनों शरीर नगे वौ वा मौष संसानी नहीं कहा जा सकता ॥ सर राम निर माप-पापी निरपशेपस्प =(इसम्बम)सर्वशद निर्षिशेप पानि शेपका पापक है । निखिल पा समरत संसारिणामीवस्य तपिशरीरभवः =संसारी नीचक(-मपिनी ये दो(वैनम और कार्मण)शरीर हो । पतिमय भविशेष मभिधानात् । -ऐसा माशप पा भमिमाप है। सामान्यम्स (मविशेप) कानेसे (-प्रमियानात ) में भौदारि गादिमि" सस्य जन प्रौदारिक पैझिपिक मारक नस कार्मण शरीरोंके साथ, सब संमारिण- पागपपेनसमन्प-प्रसार -संसारी(धीर) एककालमें (समका पौगपयेन) संबंपका प्रसंग मानेपर (१)ममपिन याद लिसिंगी पक्षिा में प्रपमा विमति एक पना सम्बन्धितीहै यह ते रामपुरणलिंग शिवचन त रामपाल और तेजस आर्मष रानो गरीपरे लियेभापामापर सम्पनी प्रामाशिष नपुसा हिंगो पालि सम्मायनका अपमाविमति शिवचनमपुरा सम्मारिपनीर (शमा(-मा) प दुराप्रपपुपर पिम मानवामी निपात होनेहमगरका पाठ और मप दोनों प्रामापीमरस kumपन पुगण सिारित हा परमसमें ऐमा प्रयोगा-ममता सतायोगपरिस-ए- COCITO प्रार्थ ध्याय १०६ सिद्धि सुत्र४३, DAMODITOIDEO.COMROOODURGAOMDEOARD सम्मविशरीरप्रदर्शनार्थमिदमुच्यते- तदादीन भाज्यानि युगपदेकस्मिन्नाचतुभ्यः ॥४३॥ तच्छब्द प्रकृततैजसकार्मणप्रतिनिर्देशार्थ । ते तैजसकार्मणे आदिर्येषां सम्भवि शरीर प्रदर्शन भम् इदम्। तस्यता (एक मोन) एकसायोनेराखे-सम्मचिन् गरीरोफे दिखावनेफेलिये या कहा मावा कि तदादीनि भाज्यानि युगपदेकस्मिन्नाचतुर्म्य =''तद् श्रादीनि भाज्यानि युगपद् एकस्मिन्ना चतुर्म्य प्राय:-उद-मादीनि माग्यानि उनालेजस,कार्मण)को मादिलेकर पिमामिवकिये हुये पा विकल्परूप किये हुये युगपद(पुगपत्) एकस्मिन् मा-पतुभमपन्ति T -एककास एक(मीरों में पार(शरीर)चक हो । पर्याद वो शरीर होतो तनस और कार्मण होते हैं। तीन हों वो भौदारिक बैजस और फार्मण सेवा मंप्रियिक,सैमस और फार्मण ये वीन भी होते है परन्तु ये देन क्या नरक गतियोंमें होते हैं। यदि किसीक एक साथ चार शरीर हों वो भौदारिक, माहारिक, तेजस, और कार्मण भयया भौदारिक, पक्रियिकतेनस मौर कार्मण होते हैं। यह नियम है कि मिस क्रियिक होता है उसके भाहारक नहीं होता और जिसके माहारक होता है उसके पैफियिक नहीं होता है। एक शरीर पाखा कोई भी जीव संसारमें नहीं है। इत्यनुपाद-चद शम्दासमकत-नस-कार्मण-पवि (इसस्थम)वद शन्नो सो मकरण कियेहुये या मिपयभूत वैनस और कार्मणको निर्देश भ प मस-कार्मणेसामादि पाम्। म्पगट करने के लिये है। ये वैजस और कामण शरीर में भादि मिनके (१) हमारे यहां एषा पुस्तक में उपर्युक पाठ है किसी किसी पुस्तक में से 40 पनालालजी वाफसीपाल भनुषाविव मोक्ष शाम पृष्ठ १६ मे) एपरिमन परेसानमें एम्स्य राम है परंतु इस पाठ से भर्थ मेदनी एमा। क्योंकि एकमिन+मा चतु= एक (जीव) में चार तक हात है वही वात्पर्य रखवाजो एक्स्प-मा चम्पा एक (जीव) पार तक होते है रमता है। श्वेताम्बर मानायके समाप्य तत्वार्यापि गम सूत्र में एफस्पाऽऽचतुर्पः पाठ सो हमारे यहा के एक पाठ से मिलवाद भी जब उनके पो जसका भनादि माना सब एक है। परतु समाप्यतस्यापिगमपत्र पठामे पह भी लेलहै कि वैजसके मनादि सम्बम्पताके परम पल्में एक ही शरीर का जब मनादि सपम वायत कार्मषही हो सकता।यो की सत्ता कार्मण और मौवारिक सकते हैं प्रथपा कार्मस और वैश्िियक हो सकते है। तया दीमकी योग्यता में कार्म मौवारिक और वैफियिक हो सस्ते है वा फार्मसमीदारिक और माहारक हो सकते है और पारफी योग्यता में कार्मल समोवारिक और वैश्िियक होसकते हैं या काम तेमस मोहारिक भोर माहारक होसकते। । परत चि मी एक फासपका पांचोनहींहोते। TOOOOOOOODTODAEEDIEODE - मार्च पाया GAre BRRIDOR: सिद्धि सुत्र५३ ४४ तानि तदादीनि। भाज्यानि विकत्पानिश्रा कुत।आ चतुर्थ्य । युगपदेकस्यात्मन ॥ कस्यचित् है तेजसफार्मणे । अपरस्य त्रीणि प्रौढारिकतैजसकार्मणानि,वैक्रियिकतैजसकार्मणानि वा । अन्यस्य चत्वारि पोटारिकाहारकतैजसकार्मणानीति विभाग क्रियते॥पुनरपि तेपां विशेपप्रतिपत्यर्थमाह- ॥ निरुपभोगमन्त्यम् ॥४४॥ मानिनवादीनि ॥ स्त वानि)वदादीनि मर्यात् तिन (तेजस-कार्मण शरीरों) को भादिमें लेकर है भाग्पानि ॥ रियानि मामा भाग्य रे सा विकल्पवारूप वा पिमागरूप करना (विमागरूप)स सक (मा) "मापन गप एरस्य मारयन । चार पर्यन्त एककालमें एक जीव हैं। फस्पपिन्देस-मार्पणे परस्य =किसी (मीय) के दा वैनस भौर कार्मण (मो विग्रहगतिहोत) हैं। दूसरे (जीव) के यो'मादारिक-मस-कार्मणानि। -तीन(मर्यामाय मनुष्य-तिर्यचौक)मौदारिक,सैमस मोर कर्मिण शरीर पाकिपि:-मै मस-कामणानि॥ - मथवा(देव-नारकियों) पैक्रियिक,वैमस,कार्मण (ये सीन शरीर) होते हैं मन्पस्प पत्तागि अम्य(मीर-मर्यात् ममच सयपी छठवां गुणस्पानी रिसीकिसीमनि) के पार बादारिक माहार:-जसकामयानि इविविभाग -ौदारिफ,भाधारक, तैमस, कार्मण हैं इसपकार विमाग पा पाट फिरत । पुन मपि तपाम् । =कियामाता है। फिरभी उन(भौदारिफ-क्रिषफ-भाधारक-नै जस-फार्मण शरीरों का शि पतिपति-पर्यम् ।। मा विशेष नाननफेखिये (मग्रिम प्रमें ) कहते हैं कि सूत्रम्" निस्पभोगमन्त्यम् ॥४४॥ =अन्त्यम कार्मणम् निरुपभोगम् भवति॥४४॥ साय:- (मौदारिक-मैझियिक मारफ तैमस, कार्मण छवीसपास्त्रमे कहहुये शरीरों में) भन्स्पम् ॥ निर-उपभागम् ॥ मन्तिम फार्मण शरीर (मन और इन्द्रियों द्वारा शम्दादिके) उपमागसे रहित है। मर्थात् जैसेभौदारिक,वैरिषिक,माधारक,शरीर भास्माको मन भौर पांच इन्द्रियोद्वारा उपमागाकारण तवम कार्मण शरीर पांच इन्द्रियमौर मनकी सहायता से भीषको उपमोगकाकारण नहीं है आप गमी शरीर मी हात और क्रियिक तया माहारक मी पफरासमें नहीं होते क्योकि चैरिपिक तथा माहारफकेम्वामीमै विशेग्मेदई मानामाना समम्बकापाठ व एहमार यहोरही कहीपर मारपम्रपानमें ममप है मोकातम्यापमाझा प्पारगणकमतमतिरिकासुर पापा - ITrain IN HIो भ्यरिमारा सा मानामातातीचा मीनरोगीप्रन्तिीमतीने मोमिया BIHEOXO7OOGOOOOOOOm लामCORRIDOACA BUDGADeziDCARDERRIDOUKOOLReetADORRORDRO RDOINDOREOGADeseeDabDEBIDOETHEATRE पगानिमामी मगरपसाय धोल रुन पदण्ण्द भार विसरत्यर्य सहित समार्य सिदिफा शमश' हिन्दी अनुवाद अध्याय २ सूत्र १ अन्ते भयमन्त्यम् । किं तत्। कार्मणम् ॥ इन्द्रियप्रणालिकया शब्दादीनामुपलब्धिरुपभोग। सिद्धि सवाथ ध्यायन तदभागान्निरुपभोगम् ॥ विग्रहगतौ सत्यामपि इन्द्रियलब्धी द्रव्येन्द्रियनित्यभावाच्छन्दाधु सूत्र ४ पभोगाभाव इति ॥ ननु तैजसमपि निरुपभोगम् । तत्र किमुच्यते निरुपभोगमन्त्यमिति ॥ वृत्त्पनुशवा-मन्द। भषम्।।" (चीस व प्रौदारिक, पेफियिक, माहारक, तैमस, अन्वमे जारी मन्त्पम् । रिम् वन" कार्मशम् सो मंतिम पा अंकका(म त्यम्) है । पर फ्या है() कार्मण (शरीर) है। इन्द्रिय-प्रणालियादेशम मारीनामवपखम्बिा-इन्द्रिपोक दारकरिपणाविकप शम्द,स्पर्श,रस,गप,पोका( मादीनाम् प्राण वपमोगा तन् भमानान्। निर उपभागम्। -सा उपभोग है। स(उपयोग)की अविषमानवासे 'निवपभोग'१॥ विना-ग इन्द्रिय- नदीन शरीरमरण पा धारण करन) के लिये गमन(भीम)इन्द्रियों की सम्धौर। ससाम् ॥ मपि -(हयोपशमरूप मावि होनेपर भी अर्याद सयोपशमस्प लम्पिफे निमिचसे भास्वरूप इन्द्रियों की रचना और उनके विमान एनपर भी दम्प-इन्द्रिप निति प्रभागात राम भादि उपभोग-ट्रष्यान्द्रियोंकी रचना-निर्दृचि) न होने (फहेत) से शमादिक उपमागा ममातिक सममाप है मर्याद विग्रागदिम मामस्वरूप इन्द्रियों के रातमी देखो सन १८) उम्पस्वरूप इन्द्रियोंकी रचना (देखो सूत्र १७) ममान है इसलिये शम्दादिका मनुमक न होनेसे कार्मण शरीर निरुपमोग ही सापयोग नहीं है स-उपभोगनी) ननुमसम्मपि निर उपमागम् तत्र परन सैमस(शरीर)मी उपमोगसे रहित है। ता (पिग्रगतिमें मापसरप इन्द्रियों रानेपर मौर द्रष्पसवप इन्द्रियोंक रचनाफे भनाषमे) (कम्पपता निर् उपभोगम्भन्त्यम् इवि० मतका(फार्पण शरीर)उपमोगरहित एसा क्यों नागपामरनफा भाशय यह है कि पिग्मागतिमें मैसे इन्दियोंद्वारा शम्दादिके ग्राणरुप उपभोगसे कार्मण शरीर भाषान्द्रियों करानेपर मी निरुपभोग है पैसेही सैनस भागर मी विप्रागतिमें भावान्द्रियों के होनेपर भी इन्द्रियोदारा एम्दादिफे प्राणरूप उपभोगसे रहित है। भव दोनों की अपस्था एफसी है फिर कार्मण शरीर ही निवपमोग वर्षों कागया, वैमसभी उसके साथ साप श्योंन निरुपोग कागया।

मर्याय पवाय सिद्धि, सूत्र४३ ४४ Gre GROORANDOLBOARPortONICCHO AROMA तानि तदादीनि। भाज्यानि विकत्पानिश्रा कुत।आ चतुर्थ्य । युगपदेकस्यात्मन ॥ कस्यचित हे तेजसफार्मणे । अपरस्य त्रीणि प्रौदारिकतैजसकार्मणानि,वैक्रियिकतैजसकार्मणानि वा । अन्यस्य चत्वारि पोटारिकाहारकतैजसकार्मणानीति विभाग क्रियते।पुनरपि तेषा विशेषप्रतिपयर्थमाह- ॥ निरुपभोगमन्त्यम् ॥४४॥ मानिनदादीनि -त(तानि तदादीनि प्रयात् विन (वैमस-कार्यण शरारों) को भादिमें लेकर माग्पानि ॥ विस्मानिया माना भाज्य है सा विकम्पवारूप पा रिमागरूप करना है (विमागरूप)काहां सक (मा) है 'मा पनुभ्य युगपत् परस्पमात्मन। -मार पर्यत एकमाल में एक जीप है। हस्पपिनन्तमप-कार्ममपरस्पर फिसी (मीव) के दा तैमस और कार्मण (मो विग्रहगविमरोत) है। दूसरे (मीव) के पौणिमादारिक-नशस-कार्मणानिका -चीन(मर्यात्मायामनुष्य-निर्यचौक)मौदारिफ,लैजस भौर कार्मण शरीर में रा०प्रियिष-तैजस-ठामणानिया - भयना(देव-नारकियों) पैक्रियिक,तैमस,कार्यण (ये सीन शरीर) होते हैं भन्यस्य पतानि -मम्य(मीर-मर्यात् प्रमत्त सयमी छठवां गुणस्पानपी किसीकिसीमनि) के चार प्रदारिक माारस-जसकामणानि यतिविभागा-भौदारिक,माहारक, वैमस,कार्यण इसमकार पिमाग या पाट पित । पुनः मपि तपाम् ॥ =फियाजाता है। फिरभी उन(मौदारिप-वैक्रिपफ-मापारक-मस-कामण शरीरों को मिनिपनि-मयम् ।। प्रार -विशेष माननकेलिये (मग्रिम मनमें ) कहते हैं कि सूनम् " निस्पभोगमन्त्यम् ॥४४॥ =अन्त्यम् कार्मणम् निस्पभोगम् भवति॥४४॥ गपापा- (मौदारिक पैफियिक माहारक तैमस, कार्मण पचीसांस्त्रमें फोहुये शरीरों में) अन्त्यम् ॥ निर-उपभागम् । मन्तिम फार्मण शरीर (मन मोर इन्द्रियों द्वारा शम्दादिक) उपमागस रहिव है। मर्याद जैसे मौदारिक,वैक्रियिक,माधारक,शरीर मात्माको मन भौर पांच इन्द्रियोदारा उपभागामारण तस्वस फार्मण शरीर पांच इन्द्रियमौर मनकीसाायवा से भीपो गमोगाकारण नहीं है अपरगामी शरीर मीनार त्रियिक तयामाहारक मी पपसातमें नहीं हात क्योंकि क्रिषिकन्या ग्राहाएको म्यामीमें विशपमेव नामानाशेम एमबापाठ पपपपरमारे यहाहीहीपर मारपम्पोरयानमै मात्र मोकासम्मयपमाता प्पारणमत प्रतिरिवार पार मा) Rsfiefatrn गा Trtra धिमालाप मानामामाती भाभीनगरीमपानीमाजात ओपनिगी BIOEBOOOOOOOOOERIEDODOBOTO मार्थ श्रध्याय OORT सिद्धि सत्र४५, MED ॥ गर्भसम्मुर्छनजमाद्यम् ॥४५॥ सूत्रकमापेक्षया आदी भवमाद्यम् । औदारिकमित्यर्थ ॥ यद्गर्मजं यत्र सम्मूर्च्छन तत्सर्वमा दारिक द्रष्टव्यम् ॥ तदनन्तरं यनिर्दिष्ट , तत्कस्मिन् जन्मनीत्यत आह- ॥ औपपादिकं वैक्रियिकम् ॥४६॥ उपपादे भवोपपादिकम् । तद्- सूत्रम्-"गर्भसम्मूर्च्छन जमाद्यम् -गर्भजम सम्मूर्छजम् च पाद्यम् भवति ॥ ४५॥ स्वार्थ:-गर्मशम् ॥ सम्पर्धनम् ॥ -जो गर्मसे उत्पनहोता है और सम्मूमनसे उत्पम होता है भापम भरवि -सो(बच्चीस सूत्रमे वर्णित)भादिका पा परिवा(मौदारिक शरीर) भर्याद पा मादिका मौदारिक शरीर गर्भप और सम्मपनरूप जन्ममें उत्पम सेवा भयका मिसकी उत्पधि गर्म और सम्मळुन मन्मसे है या मौदारिक शरीर है वृत्रनुराद'-स्थ-प्रम-अपेक्षया मादौगभगम्भापम् (भौदारिफ पैफिपिक भादिषचीसपत्रिकीकम विवधासे भादि हो सो माप मौदारिकम्मतिकमर्थ यगर्भभम् म्झौदारिक(शरीर)ो पेसा अभिपाय है। मो गर्भ से उत्पम होता है यदा०सम्पूनमम् तत् पर्षमामौदारिक द्रष्टम्पम् और भो सम्मुर्घनसे नपमता है सो सप भौदारिफ (शरीर) समझना चाहिये पद-मनन्तरम् ॥ यद गनिर्दिष्टम् ॥ (स मौदारिफ शरीर के अत्यन्त समीप जो वर्णन कियागया(पैफियिक शरीर) पदणकस्मिना जन्मनि इविक्रमवा मार T म्सो किस भन्म में है। इस लिये ( भनिय स्नमें ) करते हैं कि सूत्रम्-औपंपादिक वैक्रियकम्।॥४६॥=औपपादिक वैक्रियिकम् भवति ॥ ४६ ॥ स्मार्य -मापपादिकम् । क्रिपिकम्। मपति उपपाद नन्ममें हो सो पंक्रियिक ( शरीर ) होता है। इत्यनुसादः उपपादभवम्यामोपपादिकम्वद पपाद (मन्म ).वि हो सो भोपपादिक है। सो (उपपाद भन्म में) (१) इस सूत्रका पोनों सम्मवायोंमें पाठ और अप एक है। माम् के लाममें जहां पाहे यह मात्र पमाला प्याकरणमवके अतिरिक पशुपी (अपाय १ टिप्पणी पृष्ठ ५ देखो)(२)श्वेताम्बर प्रामापके समाप्प में "वैरिय मौपपातिकम् पाठ पाठ मिध होने पर भी दोनों का अर्थ एम्सा है। क.ODIT सर्वार्थ सिद्धि सुत्र४४ ध्याय OEMBOHIROENORRID तेजसं शरीर योगनिमित्तमपि न भवति, ततोऽस्योपभोगविचारेऽनधिकार ॥ एव तत्रोक्तलक्षणेषु जन्मसु अमूनि शरीराणि प्रादुर्भावमापद्यमानानि किमविशेषेण भवन्ति, उत कश्चिदस्ति प्रतिविशेष इत्यत आह- नेमसंगाशरी योगनिमित्तम् पिकन मातिा -(वचर) प्रस शरीर (पनावपन कायके ) योगका पारण भी नहीं होता है मतः मस्या उभाग-विचार मनपिसारा तिससे दव ) इस(तेमस)का उपभोग के निर्णयमें प्रकरण षा प्रधिकार नहीं है माचार्य योगके पन्द्रा मेदाचनमें भौदारिक,मौदारिकमिभ,वैक्रियिक,पैक्रिपिकमिय गारक,मागरकमिम और पार्मण पं साव मेद कायपागके मानेगये। इनमें वैमस योग नामका कोई मी भर नही है इसलिये वैजस शरीर योगन्धारण नहीं मानागपारे और यो पर नपभोगफे सिपारमें केपस रे शरीर प्रकरणमें लियेगा ये शरीर विषयभूव में नो योगका कारण भवः वैनस शरीर उपमोगरे विचार ममिकत पापकरणमत नदि। इसीदेवसे मौदारिक क्रियिक मापार और कार्मण योगनिमित्त शरीरों में स मन्त रानपाखा कार्मण शरीरका निपभोग का है। पेमार्य याविरवि thi भन्म भनि समकार वा गोगये हैं बघण मिनके ऐसे मन्मने है विनय पे (-प्रमूनि) । भविशेष भादुर्भारम्। बारीर या रिशेपारिरहित प्रगटपना का *भिवमसि प्रविपिशप प्राप्त रात है ( मर्याद उत्पन्न हात ) प्रयपा (ठत) पिशेष है। उत्तर (तीनों प्रकार के जन्मोंमें इन पांचों शरीरोंकी उत्पचिपिरोप)मतापेसे करते दिन सरला अपवागममेतदितराणि सापमापानीवि= निरपमागम् इति पनाह भयादापमम् एतद एतराणि स उपमोगानि राज पाति मनिपभेगम् एस पवनमे प्रयापति ममास ते यह लिखा कि और शरीर उपमाग सहित ग गम्पत-सामय्यात् प्रपत् स पमाग गम्य-सगतमथवास अपशरीर उपभाग सहित जानेकाते है तत्त्यार्य सोम- A मरम्प भनुमान मी यही हिताय शरीर उपभोग Grak मेरी समममें इन सबका पर अभिप्राय कारकी विपशास तीन मोहारिक, वैरिपिक माहारशरीर उपमाग सहित (सोपभोग और फार्मण शरीर उपमोगरहित भारतमसमा योगका कारण ससे सक्षम उस विषय प्रसरण पा मभिरस पार सममार उसमा विशपरपस कपन नही किया है। सामुखील अपमाशिम मत शरीर में लिप स शरीर यागका निमित्त मी नाही है या तेजस शरीर मिनरमपन ही पाने पाईमाम मामा पानी पिना माही निम्पमाम है । यस कामम शरीर अंगोपांग भी माही हैं यात पवन पालमा पुराना स्पारिक नहीं पाते ए मामी शरीर निरपभोग है। पतु समाप्यपाउ५७ में पत्यारि 'पाणि तु सोउपमोगानि ऐसाखर GOOTOCOOPOOTORCOTIO ११२ M सिद्धि - UDIEODE सुत्र, DDINGE ॥ गर्भसम्मुछेनजमाद्यम् ॥४५॥ अपाय सूत्रक्रमापेक्षया आदी भवमायम् । औदारिकमित्यर्थ ॥ यद्गर्मज यच सम्मूर्च्छननं तत्सर्वमौ गरिक द्रष्टव्यम् ॥ तदनन्तरं यनिर्दिष्ट , तत्कस्मिन् जन्मनीत्यत आह- ११३ ॥ औपपादिकं वैक्रियिकम् ॥४६॥ उपपादे भवोपपादिकम् । तद्- सूत्रम्- "गर्भसम्मूर्च्छन जमाद्यम् गर्भजम सम्मूर्छजम् च श्राद्यम् भवति ॥ ४५॥ मपाधी-गर्भगम् " सम्मूर्धनम् ॥ मा गर्भसे उत्तमहोता है और सम्पर्धनसे उत्पन्न होता है भापम्मरवित म्सो(पचीसमा प्रम वर्णित)मादिका पा पहिला(भौदारिक शरीर) मर्याद गाभादिका मौदारिक शरीर गर्मरूप और सम्पूर्छन रुप भन्ममें उत्पन्न वा भयवा मिसकी उत्पचि गर्भ भौर सम्मर्छन भन्मसे है या औदारिक शरीर है परनुराद'-सूत्र-फ्रम मपेक्षया भादगमरम्भापम् (मौदारिक पैफिपिक मादिदतीसाधकीमम विषनासे प्रादि हो सो भाथ है। भादारिकम्पतिमा पद गर्भभम् । मौदारिक(शरीर)। ऐसा मभिमाय ।मो गर्भ से उत्पम होता है पदसम्मगर्दनमम् तत् पर्वम् मौदारिक वष्टप्पम् म्भौर जो सम्पूर्खनसे सपमता है सो सब मौदारिफ (शरीर) समझना पाहिये व-मनन्तरम् । यद निर्दिष्टम् ॥ (स भौदारिफ शरीर के अस्पन्द समीप जो वर्णन कियागया(क्रिपिक शरीर) वास्मिना पनि इतिकमा मार T सो निस जन्म में है। इस लिये (मग्रिम सूत्रमे ) करते हैं कि सूत्रम्-श्रीपंपादिक वैक्रियकम्॥४६॥ औपपादिक वैक्रियिकम् भवति ॥ ४६ ॥ मनार्य -मापपादिकम् । क्रियिकम् । मरवि T उपपाद मन्ममें हो सो पक्रियिक ( शरीर ) होता है। त्यनुपाद उपपाद भवम्भीपपादिकम् ॥तद -उपपाद (जन्म ) नि हो सो भौपपादिक है। सो (उपपाद जन्म में ) (१) रम का दोनों सम्मवापीमें पाठ और भय एक है। प्रायम् रे सामने जहां माहे पर मात्र रुपमाला प्याकरणमवके अतिरिक्ष मनवी (मापाप १ रिप्पयो पृए । देगो)(श्वेताम्बर मानायके समाप्प में पकिय मोपपातिकम्"पाठ है पाठ मित्र होने पर मी वामो का भय एक्सा है। DOM मिनिमपि न भवति, ततोऽस्योपभोगविचारेऽनधिकार ॥ नानि किमविशेषेण भवन्ति, reaa.00 सत्सर्वार्थ ABELSBOO सिद्धि सुत्र४४ सर्ववक्रियिकवेदितव्यम् ॥यद्योपपादिक वैक्रियिक,अनौपपादिकस्य वैक्रियिकत्वाभाव इत्यत आह- सिद्धि ॥ लब्धिप्रत्ययंच॥४७॥ सुत्र भरमायायम ११८ चशब्देनक्रियिरुमभिसम्बध्यते।तपोविशेषादृद्धिप्राप्तिर्लब्धि । लब्धि प्रत्यय कारणमस्यलब्धिप्रत्या यमपैकियिकलब्धिप्रत्यय चभवतीत्यभिसम्बध्यते ॥ किमेतदेव लब्ध्यपेक्षमुतान्यदप्यस्तीत्यताह- ॥तैजसमपि ॥४८॥ सम्मोपिपपवेदितम्पम् । यदि समस्त पैफियिक(शरीर)माद कियेभाना पाहिये । मा गांपादिक शियिसम्मन् भोपपादिकस्या मठपपादजन्म वैक्रिपिक (शरीर) होता है सौ उपपादभन्म न होनपाले त्रिपिरस्प प्रभातिकमा T वैफ्रियिकपना राममाष दागा। इसलिये (अग्रिम समर्म ) कहते हैं कि सूत्रम् "लब्धिप्रत्यय च ॥ ४७il =लब्धिप्रत्यय च(वैक्रियिक भवति)॥४७॥ स्वार्थ:-सन्धि-मस्यपम्वकिपिरम् भवतिT=तपोषिशेषरूपदिकी माप्ति(सम्धि)कारणजिसको ऐसायोक्रियिक(शरीर)होता मर्याद वपकेदाराउत्पमई दिके निमिचसेमी वैक्रिषिक शरीर मनुष्प,विर्यचकें होगा उत्पनुराद मशदनपक्रियिकमा मभिसंगप्पता-(सम्भमे)व शम्दारि क्रिषिक शरीर सवपित रेरा चियागया तपस-रिशपाश्चदिमाप्ति मालम्पिासम्मितपके रिशेपस ऋदिको माप्ति सो सम्धि है। खम्पि प्रत्पपा कारणम्भस्पधिधि-मस्पपम् निपिच कारण त्रिसका सा लम्पिमत्सपरे पविपिन सम्पिमत्ययम् पति र इतिश्यनिपिक (शरीर) लन्धि निमिता मो (-म) होता है ऐसा ममिमापन दिएर सन्धि-भपसम् सम्मेप क्यिागया है । स्पा पा(वक्रिपिर शरीर) ही लम्पिक निमित्तसे है उन०मन्यन्ममिति इवि० मठ मा(T बा और भी(काई शरीर खम्भिमत्यपारे इसलिय(मग्रिम सूपमें )पाते हैं कि सूत्रम तेजसमपि" ॥४८॥ ११४ =तैजसमपि (शरीर लब्धिप्रत्यय भवति) ॥४८॥ (Orमा नासर मार दिगम्पर पामा मात्रामा पाठ भार मय परसासरसमाम रिमयिक रामवी अनुतिमाहीसाम्भसतीगर ममायाम पगप ममप मस विधामविरम् एत्यादि मादी पापामै समपि शरीर रिपसाप भाति ऐसाबाफ्यायामाता RAMOGARDOI OCTOONOCOC " सवार्य यध्याय OUKOOOOROORIN पटानिवासी मगरूपमाय पोल कृत पदच्छद और विमरत्यर्य सहित सवार्यसिदिका शब्दश हिन्दी अनुवाद अध्याय २ सूब४८ ४६ अपिशब्देन लब्धिप्रत्ययमभिसम्बध्यते । तैजसमपि लब्धिप्रत्यय भवतीति ॥ वैकियिकानन्तर यदुपदिष्टं तस्य स्वरुपनिर्झरणार्थं स्वामिनिर्देशार्थं चाह- ॥शुभं विशुद्धमव्याधाति चाहारकंप्रमत्तसंयतस्यैव॥४॥ सुन, ४६ थिARBOARO गाय -"तैमसं अपिशरीरं चम्धिमस्पयम् । तैमस शरीर मी (मरि) वपाविशेषरूपदि माप्तिक निमिपसे भगति r गोवा अर्थात् वैमस शरीर मो अमिनसे प्राप्तराताभिस' यहभी "जन्धिकारणक प्रत्यनुवादः-प्रपिशम्दन लम्निमस्प:ममिसंवध्यते (इसम्प्रमे)मपि शम्मकरि"खम्धिमत्पप" पाक्य (इसीसप्रमें) लगाया जाता है मैनस भपि लाम्पमत्पर्य भरति T इसि* तेजस(शरीर)मी ऋदिवमाप्ति-निमितक-(चा अदिकी प्राप्ति के कारणसे) होता मिपिठ-मनन्तरम् याउपदिष्टम् तस्य पक्रियिक (शरीर)क भत्पन्त समीप निर्देश कियागया (भातारकशरीर) विसके सरूप-निरिणावस्थापिन्-निर्देशा"भा-समाष निर्णय षा नियति भौर(तिसके)मधिपति के निरूपणके लिये काते हैं कि सूत्रम्- शुभ विशुद्धमव्याघाति चाहारक प्रमत्तसंयतस्यैव । ४६ ॥ -शुभ विशुद्दमव्याघाति चाहारकं प्रमत्तसंयतस्यैव मुनेर्भवति मूत्रार्थ मारकम् शुभम्।" माहारक शुमई-शुभकर्मध कारण है-इसकेहोत शुम प्रकविहरीका पन्म होता है (१) “जसके कोप भेद है। एक निः सरण स्वरूप । दूसरा अमिा सरण स्वरूप : तहाँ निामरस तेजस शुभाशुम भेदकार पोप प्रकार है । सिममें मा तपरवरण के धारक मुनि को पत्र पेग मारी दुर्मिसाविनर लोकनि दुःखी दपि मा करणा प्रत्यम्त उपजिमाव तदि दक्षिणक पमें हैं जमगिर निसिकरि माय याजम प्रमाण पत्र जीवनिका कुप मेटि मारमा में प्रवेश कर सो शुम तेजस है । भर को पत्र लाफमि पर भापत प्रेषित होप तदि शक्केि प्रमापते पाम फत सिंदूर समान रकपण अग्निरूप मारमा प्रवेश मिसे सो भावि मै तो सूख्यगुलके पर्स फ्यातपोमाग प्रमाण पर मत पयत ममत बपता काहलके (=वितावके) भावार मिकसि मावश योजन प्रमाण समस्त जीव पुनलनि भस्मरि उलटा शरीरमें प्रवेश करि मुनिक बग्प करे । सो मुमि वा मरफा प्राप्त होक है" : एसा शुभ मम मिा सरण स्वरूप तेमस शरीर है। पर भनि सरल स्वरूप तजस समस्त संसारी जीपनि रहकी दीप्तिका पारस है सो लम्धि प्रत्यय नहीं है। 'देखो अपप्रधशिकामे सत्र १२ पत्तीमा परे प्रमस तेजसके कथम मे परिसे माहारका कयम होमा चाहिये,परंतु लम्धिप्रत्ययको अनुपचि सेनेके लिये"वेमसमपि"प्रथमा कहा पीप माहारक (३) हमारे पाठ सर्प एक है समाप्य० में 'प्रमच संपतस्यैद" के साम में 'चतुर्दशपूर्वपरस्पव"याम है । रोप पाठ एक है। DeIONOR ११५ ससर्वार्थ निपिनमपि न भवति, ततोऽस्योपमोगविचारेऽनधिकार ॥ नि किमविशेषेण भवन्ति, Garbox सिद्धि सूत्र४४ मध्यप्याय सिन्द्रि सुत्र४७ ४८ सर्ववक्रियिकंवेदितव्यम् ॥यद्योपपादिक वैक्रियिक,अनौपपादिकस्य वैक्रियिकत्वाभाव इत्यत आह- ॥ लब्धिप्रत्ययंच॥४७॥ ११४ चशब्देनक्रियिकमभिसम्बन्यतोतपोविशेषादृद्धिप्राप्तिलब्धि । लब्धि प्रत्यय कारणमस्यलब्धिप्रत्या यमक्रियिकलब्धिप्रत्यय चभरतीत्यभिसम्बध्यते ॥ किमेतदेव लब्ध्यपेक्षमुतान्यदप्यस्तीत्यताह- ॥ तैजसमपि ॥४८॥ सम्वोकपिपवेदितम्यम्॥पदिक -समस्त पैफियिक(शरीर)गाव हिपेमाना पारिये । मा गांपादिम क्रिपिम्म्मन् भोपपादिकस्पा। उपपादनन्म पैक्रियिक (शरीर) होता है तो उपपादनन्म न होननाले प्रिपिरत ममाति०मा० मा T -बैत्रियिकपना का ममाप हागा । इसलिये (भप्रिम मप्रमें ) करते हैं कि सूत्रम् 'लब्धिप्रत्यय च ॥ ४७॥ =लब्धिप्रत्ययं च (वैकियिक भवति)॥ ४७ ॥ मग -सम्धि-मस्पपम्प क्रियिसम्मपतिातपोनिशेपपदिकी माप्ति(ब्लन्धि)कारणनिसको ऐसाभीक्रियिक(शरीर)होताहै भयात् वपकेदारातत्य भई अदिके निमित्तसेमी क्रियिक शरीर मनुष्य,विर्यय होता उत्त्यनाद - शम्दन मिपिकम्ममिसरप्पते । (इसम्म)च शन्दकरि पक्रियिक शरीर सप घिव है पा सियागया है नपस-रिशपात दिमाप्ति गलपि अधिवपके पिशपस ऋदिकी प्राप्ति सो सम्धि है । बधि है प्रत्पपा कारणम्प्रस्पतिमि-परपयम् ॥ =निमिष कारण मिसका सो सम्यिप्रत्यय पहिपित्रमा खम्भिमत्ययम्॥पति T इति-क्रियिक (शरीर) जम्पि निमिधा मी (-1)ोवार ऐसा भपिममायनादियाएवजग्धि-भपसम्-समय कियागया है। पावा(वक्रिपिक शरीर) ही सम्मिा निमिधसे है उन०मन्पन्-भवि०मस्ति इति मत मा(T मा भार मी(काई शरीर लम्पिमस्पयरे इसलिप(अग्रिम सूत्र ) is सुगम तेजसमपि ॥१८॥ तैजसमपि (शरीर लब्धिप्रत्यय भवति) ॥१८॥ (रम गत्रका श्वेताम्पर और निगम्पर राना मानापोंमें पाठ भार मय पदमाहासमप्रम शिपिकशमकी अनुपत्ति पानीसोनमेलीगाह (ममाय म पाप मप्रारम RR विमानमपि गुरम्पादि मगकी प्याटपामें तेजममपि शरीर लम्प्रित्यय मति एतापापणापामाता BRDOIROEN Tend ११४ सर्वार्थ थप्याय सूत्र एटानियामी नगरूपसहाय पाल कृत पदद और विमरत्पर्य सहित सवायासादका शब्दश हिन्दी अनुवाद अध्याय २ सय ४६ तन्तूना कार्यासव्यपदेशवत् ॥ उभयतो व्याघाताभावादव्याघाति ॥ न ह्याहारकशरीरेणा- न्यस्य व्याघात । नाप्यन्येनाहारकस्येति । तस्य प्रयोजनसमुचयार्थ चशब्द क्रियते । तद्यथा कटाचिल्लब्धिविशेपसद्भावज्ञापनार्थ,कदाचित्सूक्ष्मपदार्थ,निर्धारणार्थ सयमपरिपालनार्थं च । तन्नूनाम् "कार्पास-प्यपदशप (कपासक) पागे पादारोंका पास करनेफे सदई भापार्य जैस तंतु कपासके कार्यभार पास कारण रे तयापि उपचारसे कार्यका कारणमानकर सभोंको फपास करदिया भाता भोर फार्पासा वातप:'तु कपास ऐसा ससारमें व्यपहार होवार सही माहारक शरीर मी पिशुद्ध निमेश पा सम्मशालस्य)निर्दोप(-निरपयस्य)पुन्यकम का कार्य है इसलिये पर माहारक शरीरमी उपपारसे पिशुद्ध कादिया गया है। उमयत: म्यापात भमानाने मध्यापातिm योनों रीविसे कानफ ममावस (माहारक शरीर ) भम्पाघाति म.दिमागरफ-शरीरेण मन्यस्याम्पापाता क्योंकि (Aft) नी रे मारक शरीरसे दूसरेका काप नामपि भन्येन माहारयस्पात इति. (मौर)न दूसरेफरि मारक शरीरकामी (रुकावट या प्रतिपाव)ोता? तस्पप्रयोमम समुघय मापशमाफियते विस (माहारक)के प्रपोम के समवायफे लिये (सप्रम) पफार चायागया है तपपा पदाचिद लन्धि पिशेप-सन्नाप मापन- जैसे कमी शमिरम्भि) विशेषफी विद्यमानता (सन्न प) भाननके मर्थम् कदापित् सक्ष्म-पदार्थ निवारण भयेम्प लिये । फमी सूक्ष्म पस्तु के निर्णय षा नियपफरनेफ लिये पल्सयम-परिपासन मर्यम् ॥ -मीर(घ) (कमी) समपकी रक्षाफेलिये भर्याद किसी समय कोई विशेष लम्पि माप्त माय उस समय उसकी सचा माननेके लिये भारफ शरीर प्रयोगनीय हाताारसी समय सध्य-पदार्यके निर्धारणके लिये पाहारक परीरफा प्रयाजन पड़वारे, भसयम दूर करने के लिये भयरा सेपमको पालन लियेमी उसका प्रयोमन ।। संयमकी रक्षाफे लिये भाारक शरीर इस मांति प्रयोजनीय होगा कि मिस समय भरत और ऐरापत मोमें तीर्थरोंकी विषपानता न हो भौर प्रमच संयमी मनिको ऐसी सरव पिपपक शनो जाय कि निसका समापान फेवली पा श्रुतफेवजीके बिना न होसफे इसलिये महाविदेश घेत्रो महाफि फेवसी विराममान हों ORDOORD IRORO सर सार्थ ONDONO मिनमपि न भवति ततोऽस्योपभोगविचारेऽनधिकार ॥ नि किमविशेषेण भवन्ति, 00:10 सिद्धि सुत्र४४ अध्याय LOOXO सिद्धि सुत्र पटानिवासी नगरपसाप पकीन रुच पदपद भार विमक्स्पर्य सहित सरार्यसिदिका सन्दरा' हिन्दी अनुषाद मध्याय २ सय ४६ शुभकारणत्वाच्छुभव्यपदेश । शुभकर्मण आहारककाययोगस्य कारणत्वाच्छुभमित्युच्यते अन्नस्य प्राणव्यपदेशवत्॥ विशुदकार्यत्वाद्विशुद्धव्यपदेश । विशुदस्य पुण्यस्य कर्मण अश- वरस्य निरवद्यस्य कार्यत्वाद्विशुदमित्युच्यते। म० पिशुदम् ॥ पिशुद मर्यान् पिशुद्ध पा निर्दोष धर्मका कार्य रे भौर (-१) भम्पाषावि किसीदसरदारा रुफनेवाला नहीभन्यकिसी दूसरेको रोडनेपाखा भी नहरि (भोर) प्रमत्तसंपतस्प मुने परम्पपवित ध्यमसंयमी छठवां गणस्यानपी सनिफही (एष) होता है। अन्य किसी दूसरे गुणस्पानी पनि नहीं होता है। उक्तमुनि मौदोरिक, तैमस और कार्मण शरीर तो होते ही हैं। परंतु सब प्रमचसंयमी मनियोंके भागार नहीं वारे वृत्त्यनुवाद -शुप-कारणत्वादमाशुभ-प्पगदरा शुभका कारण होनेसे (पाहारक शरीर इससूत्र) शुभ-ऐसा नाम है (माद ) गुप-पर्मण-भावारकफायपागस्य कारणस्वाद-माहारककाययोग शुभकर्मका निमित्त होनेसे गुभम् विक्षारप =(इसके होसे) शुभ प्रगतिशीका पन्ध होता है (विसस) शुम ऐसा गागणारे भनस्पा माण-पपदयात अमन माण सनक समान है अर्थात् असे भन्न है सोमण ययाम नीर परन माणफे रखनका कारण है वैसेही भारिक शरीर वास्तविक शुभ की। शुभका कारण प्रमको माण काना और भारिक को शुभ ना दोनों स्थानों में कारण कार्य उपचार वा प्यार किया है रिगद कापतान् निशुर-मपदेगा -निपा-पिशुब) कार्पहानसे (इसम्ब) रिशुद्ध पेसा नाम (मादार हरीर)। पिशवपा मगलस्म निरपपस्या -पिशुद्ध, विशदवा निर्मन (मशमलस्य) वाप रहित (निरपपस्म) पएपम्प गरर्पण कार्यताविरमाविरुष्पवे पुन्यकर्मका (पाहारक कापयोग ) कार्यहोनेसे विशुद ऐसा का माता गम ममाप्य वापिगम मूत्र में यहां पाहार शरीर स्वामी कायम किया है प 'पाहारकरे स्मामी गोबर भारत मनुषी एमा पास पल मेसास से प्रगट शिशेताम्बर समान में प्रमत संपमी और प्रमात संपनी पीनो गुणमाला मुनियो माहार शरीर होता हमारे पास प्रमत्त सयमी पठवें गुरुनानकर्ती मुनिजी मार से पत्रोता.

र्थि दाय ७ सूत्र BREEDOCTORBOBano एटानियासी जगदपसाप पकोल तफरपद मौर विभरपर्य सहित सार्यसिदिका सदश हिन्दी मनुनाव अपाय २ सय ५६ तन्तूना कार्पासव्यपदेशवत् ॥ उभयतो व्याघातामावादव्याघाति ॥ न ह्याहारकशरीरेणा- न्यस्य व्याघात । नाप्यन्येनाहारकस्यति । तस्य प्रयोजनसमुच्चयार्थ चशब्दाक्रियते । तद्यथा कदाचिल्लन्धिविशेषसद्भावज्ञापनार्थ,कदाचित्सूक्मपदार्थ,निर्धारणार्थ सयमपरिपालनार्थ च। धम्तूनाम् कार्पास-प्यपदराव (कपासक) पागे धारामा पास कानेक सस्य भाषा जैस तत् प्रपासके कार्य और कपास कारण वयापि उपचारसे कार्यको कारणमानकर तमाको कपास कादिया जाता है और 'फार्पासा : कपास ऐसा ससारमै म्पमसार होवार सेसी माहारक शरीर मी रिशुद निमेश मा सपा(मशवसस्य निर्दोपरनिरपपस्य)पुन्पर्मक कार्य रे इसखिये या भार शरीरभी उपधारसे शिशुन्द कादिया गया है। उमयसम्पापान अमापद अध्यायाति ॥ -दोनों रीनिस उम्नेक ममापसे (माहारक शरीर ) अन्यामाथि नगीमा-शरीरणमन्पस्याम्पापासा -पोधि (सी)नी रे मारक शरीरसे सरेका सार म अपि मन्येन माहारस्प। इदि. (भोर)न दूसरेपरि भागारक शरीरकामी (कामट या प्रतिपात) होता है तस्पागाप्रपोमम-समुचय मापशम्मानियवेद पिस (मारक)के प्रयोगोंके समुदाय के लिये (पप्रम) नकार खापागया है तपपाकदाचित् लन्धि-विशेष-सन्नाप शापन- से कमी अलि(म्नम्पि) विशेष विधमानवा (सा) मानन मर्पम् कदाचित् सस्प-पदार्थ- निरप-अपेम् = लिये । कभी सूक्ष्म वस्तु के निर्दप पा निश्पकरनेके लिये पासपम-परिपासन मर्पम् । समोर(१) (कमी) समयकी रसाकेलिये अर्थात् किसी सपप कोई रिशेप लम्भि प्राप्त माप उस समप उसी सपा माननेके शिये मारक शरीर प्रयोमनीय हावारिसी समप सूक्ष्म-पदार्पये निरिणके लिये मारक शरीरका प्रयोजन परवाई, असपम दूर रशिये भयवा संयमको पालने के लियेमी उसका प्रपोजनौ ।। संयमकी रक्षाकेलिपे मारक शरीर इस मांति प्रयोजनीय होता है कि मिस समय भरत और ऐरोपव प्रोमें तीरोंडी विषपामता न हो और प्रमच संयमी मनिका ऐसी वाव पिपपप शको माय फि मिसका समाधान केपली वा भुक्केवली के विना न होसफे इसलिये महानिदेह चेत्रों भाकि केसी विराजमान हों 100.000 person00: 10pco:00. OBORU वानि किमविशषण मवान्त, सुत्र४४ स मवार्य अध्यायः EXCOMTIMRO. ११८ TOMORRO ORIXO ORANDOMAROONKO DIRECOLODINORTHODTEoad आहारकमिति प्रागुक्तस्य प्रत्याम्नाय "यदाऽऽहारकशरीर निर्वर्तयितुमारमते,तदा प्रमत्तोभवतीति अमत्तस यतस्येत्युच्यते॥इष्टतोऽवधारणार्थमेवकारोपादानमायथैव विज्ञायेत प्रमत्तसंयतस्यैवाहारकी सिद्धि नान्यस्येतिामैव विज्ञायि,प्रमत्तसयतस्याहारकमेवेतिामाभूदौदारिकादिनिवृत्तिरिति॥एव विभक्तानि शरीराणि विभूता संसारिणां प्रतिगति किं त्रिलिङ्ग- गगां उनके मानेकी इच्छा होगाय और यदि मैं मौदारिफ शरीरसे जाऊंगा वो जीरोंका पिघातस्प महर असंयम होगा ऐसा विचारफर पा सनि भौदारिफ शरीरसे जाना उचित न समझे उस समय पर संयमकी रक्षा लिये भाारक शरीरका निर्माण करते हैं, इसलिये सयमकी रसामी माहारक शरीरका प्रयोजन है। पाग-उक्तस्प"मापारम् "तिमस्पाम्नाय पहिले पा रपर्यु त कोहुये(शुभ-विशुद मध्यापाति)को(फेलिये सप्रमे)माहारकऐसापाई मर्याद् भाहारकशरीर घम,विशुदा मध्यापातिरे या बवानेको घमें 'भाहारक'कांग्रहण पदा०मारकशरीरमा निर्तयितुम् ॥ निस समय (मुनि) भाारक शरीर रचनको ( निर्वतयितम्-हेत्वर्यकदन्त है) भारपतेानदाभमसमरति निक भारम्म करता है। तष (सह पनि) प्रमादसहित वा प्रमादयुक्त होता है। (क्रियारूप पर्वनेको या प्रमादका है कि पिरतीज्यों प्रमादहोता है विसकोका) ममतसंगतस्प शाति उच्यते | (इसलिय) प्रमसंयमीमुनि (-अपचर्सयतस्य )ऐसा (पास्य स्पर्म) कहा गया है नाभरपारण अयम् एषार पाटानम् =पाम्हित नियमकेलिये (नमें) एव' शब्दका प्राण पापम् रिमायाप्रमससपतस्पर क्योंकि (-यया) ऐसा जाना ( रिवायेन ) कि प्रमससंयमी( मुनि ) के परमागरम्नअन्यस्पाइतिक भी मारक शरीर हावा नकि और किसी (गुणस्थानवी ) सनिफ माणपरम०विवापिगममतसपवस्प है। -इस प्रकार न जाना कि पपञ्चसयमी(अपांगुणस्मानपी) मुनि भारसम्पतिका मामूदा एकत्रखएका-एच) आहारक शरीर है। क्योंकि उत्तमुनिः ) नहीं होगया है ( मामूद ) भादारिक-मादि-निमिासिक मोदारिस गरीर,मस फार्पण शरीरोंच (आदि ) निषेध । एरमरिपक्तानि शरीराणिपिसवा समकार मिममित्र या पपक पृषक शरीर पारणकरनेवाले (विधवाम्) मंसारिणा पविगनिज किमपिचिा- संसारी (भीष) निकी प्रत्यकगतिमें क्या तीनोपेद (सी-पुरुष नपुंस) के (११'मा निएप पानी प्रणपगमारमीन नियाारेमाप मानेपर मुरोलोप रोमास्मिन अमा रमामाया (निगतिमारपीमा समामा भारत रानोमेमसम्माण होता।बात पहात सम्व गोको पिमनियाका ओपन A सर्वार्थ पध्याय सिद्धि सुत्र५० BROOAROBARORASIDOTKOol सन्निधान, उत लिङ्गनियम कश्चिदस्तीत्यत आह- ॥ नारकसम्मछिनो नपुंसकानि ॥५०॥ नरकाणि वक्ष्यन्ते, नरकेपु भवा नारका । सम्मूर्च्छनं सम्मूर्छ स येपामस्तीति सम्मछिन । नारकाश्च सम्मूर्छिनश्च नारकसम्मूच्छिन ॥ चारित्रमोहविकल्पनोकपायभेदस्य नपु सकवेद- स्याशुभनाम्नश्चोदयान्न स्त्रियो न पुमाँस इति नपु सकानि भवन्ति । सनिपानम् ॥ म्समिकपण पा निकट है अर्थात् प्रत्येक गतिमें वीनों सीनों सिंग होते है उसमनिनियमाकविमस्तिातिमतः भादा समयमा फोई और मित्रों का नियम है इसलिय { मग्रिम स्त्रमें )ते हैं कि सूत्रम्-नारकसम्मूर्छिनो नपु सकानि =नारकाश्च सम्मूर्छिनश्च नपु सकानि भवन्ति ॥ ५० ॥ सूत्रा:-नारकामा सम्म्पिटना प. मारकी नीष और सम्र्घन मीच मी नपुंसकानि भवन्ति | नपुंसक होते हैं । (उनमें कोई भीमीष सोनिंग और पनिंग नही होता है) उत्पनुनाद नरकाणि षड्यन्ते T नरक म्नर(सीसरे अध्यापफे मयमप्रमे)कोमावेंगे। नरकविप मा नारका मन्में पा उपले पाहाय(भा) नारक हैं। सम्पूर्खनम् ॥ सम्म भवयनसदिवशरीरका माता पा सर्वत्र पनजाना (समूचन ) सम्र्य है सम्पपा मस्तिति सम्म्पियन सो(सम्माई-भरपरसदिव सर्वत्र पाहुभा शरीर) जिन दो ऐसे सम्मूर्थिन में नारमा समर्शिनः पन्नारकसम्मर्थिनः-या नारकी और सम्मूर्धिन रे सा नारकसम्मर्थिनः (दैदसमास पद सप्र)। पारिप्रमोह-विकास-कानोपाय-भेदस्पद चारित्र मानीय कर्मकाभेद (-पिकप ) मो नो कपाय विस (नोकपाय) का भेद मपुंसकपदस्य भशुमनाना उदया नपुंसकपेद मोरे विसके और (-१) अशुमनामफ नामकर्मफे उदपसे नवनिय न"पुमासः इतिनपुंसकानिमन्तिब्न स्त्रिया नपुरुप हैं ऐसे नपुंसक होते हैं भावार्य मोहनीयकर्म लो शमका यमन स्त्रीलिंग सिपः है। (७) पुंस् (मनुप्प) राज्यका पुझिंग पापक्षन पुमास है। (१) दोमो सम्प्रदापों में इस सुभका पाठ और प्रथ एकसा है । (२)मोकपाय घेदमीय-पकपाप पेदमीय= मकगाय वेदमीय एकार्यपाधी वापर OTROKTOOBRO ORTOOSIO साथ यध्याय सिद्धि सत्र० PENBOLOGAROO १२० ORDONMDCHODAliesHDOE पानिरासी प्रगपसाप फौजफत पदच्छेद भौर विभयस्पर्थ सहित सर्वार्यसदिति शम्दशाहन्दी अनुवाद अध्याय २ सूत्र ५० नारकसम्मछिनो नपु सकान्येवेति नियम ॥ तत्र हि स्त्रीपु सविषयमनोज्ञशब्दगन्धरूप रसस्पर्शसम्बन्धनिमित्ता स्वल्पाऽपिसुखमात्रा नास्ति । यद्येवमवधूियते, अर्थादापन्नमेत दुक्तभ्योऽन्ये ससारिणस्त्रिलिङ्गा इति।। यत्रात्यन्तं नपु सकलिङ्गस्याभावस्तत्प्रतिपादनार्थमाह दा मकारका है एक दशन मोहनीय दूसरा पारिष योहनीय । दर्शन मोहनीयके मिध्यास, सम्पम्मिपात्र, सम्पमकविमिन्यात तीन मेद में भौर पारित्र मानीयके भी कपाय पेदनीय और नो पायवेदनीय दो भेद हैं। नोकपाय मदनीय हास्य रवि भरवि शोक भय मुगुप्सा सीवेद पुषेद भौर नपुंसफ संद ये नौदी उन में नपुंसक घेद और भशुमनामा नामकर्म ( इन दानों) के उदय से मो मीपन बीमा और नपुरुप वे नपुसक बोते है नारप-सम्मृदिन नपुंसकानिएर भति०नियम -नारम्भौर और सम्मृधिन जीप नपुंसकों ऐसा नियम ( स्वरूप प्रयन) तर of सी-पुमविषय- प्पयोंकि(रि)उस परसर में(भ)मर्याद नएमा मरमें सीपुरुपसर्पयो(विपय) मनाः-शन्दा प- मनाशम्द(कासनमा)मनाझग (कासंघना)मनोहर(मनाइ) रूप (कादेखना) रम-स-सम्बन्ध- इष्ट मनोज) रस(सपासना) मोर इष्ट मनोन)स्पर्शकास्पशनाना रूप(संगम) निमिधासप प्रपिक मुसमानमस्तिक मारणोंसे पानवाला पाड़ा मोमुख(नारकी और सम्मृद्धिन मोर्चाका) नहीं है पदि.पाम् भवधिपत मा इसमफार निधय कियागपा (किनारक और समर्थिन नपुंसक है वो) भपामापमम् एतद म्भयंस पा(-पद साप्तावा (मापन) मापा भापतिप्रमाणसे (मकरेगये अभिभाषका सपझनवाल पानसे)पर मिलता है कि • कोहुय(नार भौर सम्मदिन गीगा)निसे भवशेप पा यहुये (अन्य) मसारिणनि- शिति मस्पन्न " संसारीमीप वोन लिंगपास है। मा (मिसमन्ममें) भस्पन्त का अधिग्रप नपुमासिदस्यममाःतन्- नपुंसकलिंगका अस्तिस नारे । विस (अस्पन्न मसर लिगके प्रपाक) पनिपाइन-मश्यम् ॥ भारत समर्षनरसिया सरीरमा लिप मग्रिम प्रभ) काले कि SOOTERESTI सिद्धि सुत्र मार्य अध्याय ODOVICICCIONIT १२१ GEEDGEORROOOOOODUCEMOREOTICCEEG ॥न देवाः ॥५१॥ खेण पोम्न च यन्निरतिशय सुख सुर(शुभ)गतिनामोदयापेक्षं,तद्देवा अनुभवन्तीति न तेषु नपुसकलिङ्गानि सन्ति ॥ अथेतरे कियलिङ्गा इत्यत श्राह- ॥शेषास्त्रिवेदाः ॥५२॥ सूत्रम्-"नदेवो ॥५१ ।। न देवा (नपु सकानि भवन्ति) ॥५१॥ सूत्रार्थनगदेवाः। नपुंसकानि भवन्ति । (मपनवामी, म्पन्चर,ज्योतिपी,भौर कल्पवासी) देव नपुंसक चिंगी नहीं होते। अर्थात् सब मकारफे देवों में खीनेद और पुरपद फेवल दोही वेद होते हैं उस्पनुराइ संणगापोस्नपच पद निरवियर्पसुखम्सी सर्मपी क्या पुरुष संबपी जो परमोत्कर-निरविराप पोरार१५)मुसा और मुर(शम)गसिनाम-सदय अपेक्षम् JH मा(मली वा मच्ची सरगति नापक (नामकर्मसी प्रकविक) उदपकी विवक्षासे है पदादेगा मनुमपन्ति | इसिक्वेषा विस (मुख)का देव मोगवे हैं या अनुभव करते हैं। उन (देवों) में नपुसकलिङ्गानि सन्धि ? नपुसकलिङ्ग नहीं है (फेवल सीद और पुरुषवेद दोही वेद होते हैं) भप एवरे का किपत्-लिशा इतिगमता मार भवमन्य(नारक,सम्मृच्चिन,देवों के भविरिक कितने तिझ्याले दोइससिपे करते कि सूत्रम्-शेषास्त्रिवेदा" ॥ ५२ ॥ शेषा जीवा त्रिवेदा' भवन्ति ॥ ५२॥ मूत्राध-पाजीवा बहुपे मीप (भर्वात् नारक, सम्मूर्जिन और चारों प्रकारके देवोंके भविरिक्त में कर्ममिफे गर्मम मनुष्यगर्भम तिष चे खी पुरुष नपुंसक) मानो अनापमि स सूत्रमा पाठ और अर्थ एक विस्वार्थपबपातिकम तथा हस्त सिमित साथसिदिम "शुमतिमामोदयापे" स्यादि पाठ सरगर नहीं प० पनालाल पुनीयाोने 'शुमाविका भर शुमनामधर्मका उपयसी है अपेक्षा जावित्यादि मनुषाद किया है याद गुमर्गा और शुममाम धर्म के उदय की मपेक्षा मानकर कप होनेसे हमने फेवत मुरगति जो शुभ होती है उसके उपकी अपेक्षा मानी है मुदित पहिने मितीय सस्कर में गति नामोपपप"पाठ है। (३) किया मिसिगी गप किपाम् अपमाविमति पुलिंग एक पनबियती प्रथमा एक चम लीसिंग है और जियत् प्रथमा एक पचन नपुंसकलिप है यहाँ पर पपषम में प्रयोग है माद 'विपनिला किसने लिया है सिलिये हमने इस रिपहियो समाष मानकर अनुवाद किया है। (स्तामर प्रामापरे समायाम यह सब नहीं है। मायरल भाषा मास सत्रया माप लिया है। परिषदा पसास्त्र पं० सदाबाजी सममारा में प्रमुख है। १२१, FODETOO सवपि अध्याय DOOT રરર IDEODO एथनिपासी भगरूपसाप कीबात पदच्छेद और सिपात्पर्प सहित ससिदिति शम्दाहिन्दी अनुवाद मध्याय २ स्त्र ५२ त्रयो वेदा येषां ते त्रिवेदा ॥ के पुनस्ते वेदा।स्त्रीत्वं,पुस्त्वनपुसकत्वमिति ॥ कथतेषा प्तिदि।। सिद्धि वेधत इति वेद । लिङ्गमित्यर्थ ॥ तद् द्विविधं द्रव्यलिङ्ग भावलिङ्गचेति ॥ द्रव्यलिङ्ग सुत्र५२ योनिमेहनादिनामकर्मोदयनिवर्तितम् ॥ नोकपायोदयापादितवृत्ति भावलिंगम् ॥ स्त्रीवेदोद- यात् स्त्यायत्यस्या गर्म इति स्त्री । पु वेदोदयात् सूते प्रि-दामरन्ति । तीनो जिंगवाले ना वीनों जिंगसान होवे हैं (परन्तु मोगम्मिके उपले मनुष्य भौर विर्यपाक और मध्यसरके सीपुरपोक पुरुषसिंग और बीटिंग ये दा दही होते हैं। देखा भर्यमकाशिस्थि५१) उत्पनुराधान्त्रपदायेपाम् प्रियेदासीनौलिगमा वेद भिनवेभिवेदार या त्रिवेदापदकाविग्रह वा समासमर्पकायोतकवाक्य) पुन नपैदावीतम् पुस्तम्॥ =पुनि वे लिंग कोन है, सीपन भर्पात् स्त्रीलिंग, पुरुषपन अर्थात् पनिंग नमस्तम् वियम् वेपाम सिदि नसरूपन या क्लीपस ऐसे हैं। रन (वों ) की कैसे निष्पति पा व्युत्पतिरे पपते 7 इतिग्वेद जा"वेदिये"ऐसा वेद भयवा "मो अनुभपक्रियामाय"(व्यपदे) ऐसा बेद है लिम्पनिमयावद दिविपम् am -शिक ऐसा भर्य वा अभिमाय है। जिंग दो प्रकार रम्पलिभालिगपनि नष्पचिगम्पपस्सिंग भौर(-१)पावलिग ऐसा दम्पचिग पहरे पानि- मो(विर्यपनी वा सीक) मग मौर पेन-पादि-नाम-उदप-निर्तितम् । मनुष्य का विर्यचक)लिग( पेइन)मादि (शरीरके भाकार) नापकर्मके उदपसे निष्पादित पा अर्थात् नामकर्म के दपसे योनि, लिग रम, वीर्य, भादिका रचना दम्पलिंग रे भारपाय गय मापादिक- बीपेद-पुरुषवेद-नपुसकवेदानोपाय(चारित्र मोहनीपकर्म के रदपते मातहभा( आपादिव) हनि " पारसिगम् मात्माक भंतःकरण परिणामी मधि (Ari) सो मावखिग है मात् नोपाप कमरे रदयसे तो मादि सिगोरे प्रश्न माशोना सो मापलिंग रे १२२ मावर उदपान प्रयायनिरपस्पामगर्म । श्रीदक सबसे रोता र विपवाग हारतारे (स्पायतिगर्भ मिसमें निमी एवेद मामला -ऐसी भी। पुपरक रस गदर (-ते) OHRONIMO ON KOROWO ODOTTI 'सर्वार्थ J: अध्याय १२३ सिद्धि सुत्र५२ BERTOCOORDOO DOSKORO इतरपा०कि पगनिकासी मगरूपसाय पकील कृत पदच्छेद भौर विभपस्पर्पसहित सपिसिभिवृत्तिका शब्दशः हिन्दी अनुपाद अध्यापर मूत्र ५२ जनयत्यपत्यमिति पुमान् । नपुसकवेदोदयात्तदुभयशक्तिविकल नपुसकम् ॥ रूढिशब्दाश्चैते । रूढिपु च क्रिया व्युत्पत्यर्थेव। यथा गच्छतीति गौरिति ॥ इतरथा हि गर्भधारणादिक्रियाप्रधान्ये, वालवृद्धाना तिर्यमनुष्याणा देवानां कार्मणकाययोगस्थानां च जनयति अपत्यम् इति पुमान् । नपुंसक सवानो (मपत्यम्) उत्पम करता है (-मनपवि) ऐसा पुरुष है। नपुंसक पर उदपाद वद-उमर दफे उदयसे भो दोनों ( उदरमें गमकीस्थिति और संवान उत्समारनेकी) शक्ति-रिकसम्"नपुंसकम् गरि गन्दा पएका शक्तिसे रहिस,वा शक्तिसे मिहीन नपुसक मौर ये (खी-पुस-नपुंसफ) मवि शन्द में "शारदापारियायुत्पत्ति-मर्य-एर भौर चास्मी(शमों में क्रिया (भर्षात् घावका पर्य) । सो निरुक्तिमात्र (-एव)के शिये है पपापविगविगत वि. जैसे गमन करती ऐसी गापा मापार्य यदिगो' शम्मकी निरुक्ति पूर्णतासे ग्राणकी मात्र वो गाय(पशु मिससमय पने फिर उसकास ही गौ साना पाहिये और पी(पशु) मिस फाल सोताहा सगहो, खेटाहा, बैठगहो, उस समप पुस्पषिके अनुसार गौ नहीं करना पाहिये परन्तु ऐसा चोक म्यपारमें नहीं होता सर्पकालम रहिमा प्रसिदके वशसे उस पशुका गौ का मतः क्रियाका मर्य शम्दोंमें कोन म्युतपत्ति मात्र है॥ अपोंकि भन्पया अर्थात् यदि नामोंमें रूविकी प्रपानवा न मानी भावे पो गर्भ-पारण मादि-क्रिया-प्रधान्ये ॥ गर्भधारण क्रियाको क्या सन्तान उत्पादन फ्रियाको (-मादि) मुख्पमानने में (मर्यात् यही पातमाने कि भप गर्भपारणकी सामर्थ्य है सपनो पक्ष-फिरते-बैठते-उठत- रसोई पनाने इत्यादि क्रियामें खी नहीं है और मप संतान उत्पादनकी सामर्य है सवडीपुंस्वेदी भन्य भवस्थाों या अन्य किया जैसे व्यापार इत्यादिक पुरुषपेदी नहरितो सरदानाम् विर्षल्मनुप्पाणाम् देवानामपि व्याज-उद तियेचोंके भौर बालरद पनुप्पोंके भौर देवोंके भौर (4) कार्मणकापयोगस्पानाम् । कार्मणकाययोगमें स्थिति मीवोंक भर्याद पिग्रहगतिमें विपमान जीवोंके (एमटि गम स्रोलिंग है परंतु यहां पर गयों ऐसा इसके भागे पिपा मारे: मप हैटिशों में (तिपश्मनुप्पापा दयानां ये शपरमारी समम्मैप पर उपलसम्पर्म प्रयोग किस CROONDOOMOOTTO on DOI MOOTTO M -जि किमविशेषेण भवन्ति, ONT सिद्धि सत्र ४ सर्वार्थ श्रध्याय i सिद्धि एयनिरासी मगससाय कीलकन पदोई और चिमत्यर्य सहित सर्यिसविधिका शम्दया हिन्दी अनुपाद अध्याय २ स्त्र ५२ त्रयो वेदा येषा ते त्रिवेदा ॥ के पुनस्ले वेदा।स्त्रीत्वं,पुस्त्वं नपु सकत्वमिति॥ कथतेषा सिद्धि । वेद्यत इति वेद । लिङ्गमित्यर्थ ॥ तद् द्विविधं द्रव्यलिङ्ग भावलिङ्गचेति ॥ द्रव्यलिङ्ग योनिमेहनादिनामकर्मोदयनिर्वर्तितम् ॥ नोकषायोदयापादितवृत्ति भावलिंगम् ॥ स्त्रीवेदोद- यात् स्त्यायत्यस्यां गर्म इति स्त्री । पु वेदोदयात् सूते वि-पदामपन्ति तीनों खिंगपाले पा वीनों सिंगान होते हैं (परन्तु मोगम्मिके चपजे मनुष्य और विषयों भौर मल्लेवसरके स्त्रीपुष्पों पुरुपजिंग भौर बोलिंग ये दा दही होते हैं। देखो अर्थमकाशिकास्न५१) दत्यनुवाद-त्रय वेदा पपाई ने त्रिवेदाजीनालिग पा पेद भिनपे बिनेदार या त्रिवेदापदकाविग्रह वा समासकभर्यकापोतकवाश्य) गपुन-अपेदातीतम् पुंस्त्वम्॥ पुनि वे विंग कोन हैं, खीपन मर्याद बीजिंग, पुरुषपने भान पुलिंग नपुमारसम्भाविकपम् तेपासिदि नपुंसकपन या क्लीबस ऐसे हैं। सन (पेदों ) की कैसे निष्पत्ति या म्युवपत्ति पपते इति देश जा"वेदिये"ऐसा वेद है भयका "मो भनुमरियामाय"(पेपवे) ऐसा वेद है लिाममावि भयावहाद्विरिपम् im =सिंह एसा भर्य वा अभिमाय है। पा लिंग दो प्रकार है दम्पतिमापलियाविन्दम्पलिंगम्।। दम्पलिंग भोर(-प)पावलिग ऐसा है। दम्पलिग कारे नो(तिर्यपनी वा स्त्रीक) मग और मेहन-मादि-नापाय-उदप-निर्तिवम्॥ (मनुप्प पा विर्यप)लिग(मोन)मादि (शरीरके भाकार) नामकर्मके उदयसे निष्पादित पा भर्यात् नामर्मके उदयसे योनि, जिंग रन, वीर्य, भादिका रचना प्रम्पविगरे नापाप-उदप-मापादिक- (स्त्रीवेद-पुरुषवेद-नपुसकोद)नो कपाय(पारित्र मोहनीयकर्म)के उदयसे प्राप्तहमा( मापादिव) हनिमारलिगमा "मास्माफ भंत उरण परिणामी मचि (म्वति) सो मारखिंग रे मर्याद नोपाय कर्मरे वपसे खी मादि सिगारे अनुश्व इप्यारोमा सो मारखिगरे सीद उदयासस्स्यापति यस्यामाग: मीपदक इपसे इसमाहोवा है तिपता गारवा रे (पापनि गर्भ निसमें पनिम्मीद रदया, मनी -ऐसी भी है। रुपरेरके गदरसे पर (ते) १२२ 5/ पानिमा गम्पो सिद्धि सूत्र५२ TRONCI CRO.DIO:TO.NOOOOOOOOOOCITIU पानिवासी ममम्पसहाय कीस इन पदप्येव भौर विमस्पर्यसहित सर्पसिविधिका शम्पराः हिन्दी भनुपाद अम्पापर सूत्र ५२ जनयत्यपत्यमिति पुमान् । नपुसक्वेदोदयात्तदुमयशक्तिविकल नपुसकम् ॥ रूढिशब्दाश्चैते । न्याय रूढिपु च क्रिया व्युत्पत्यथैव। यथा गच्छतीति गौरिति ॥ इतरथा हि गर्भधारणादिक्रियाप्रधान्ये, वालवृद्धाना तिर्यश्मनुष्याणा देवानां कार्मणकाययोगत्थानां च मनपविभपत्पम् विपुमान् । नपुंसक सवानको (अपत्यम्) रत्तम करता है (जनपवि) ऐसा पुरप है। नपुंसक वेद-पदयादाकद-नमय बदके परपसे भो रोनों ( उदर गमतीस्पिति और संवान उत्समारनेडी) गति-पिकसम्"नपुंसकम्गासह शम्दापरतयक्तिसे रहिव,वा शक्तिसे विहीन नपुंसक और ये (सी-पुस्-नपुंसक) कवि शम्द "रिपायाव्युत्पति-पर्य-पर मौर(-पासी(शब्दों में किया (मर्याद पाका मर्प) सो निरुकिमात्र (-पर) के लिये पथागपतिविम्गौवा इति पैसे गमन करती ऐसी गापरे भावार्य यदिगो' शब्दकी निरति पूर्णवासे मायकी नावे यो गाप(पशु मिससमय परी फिरै उसकाल दी यो पाना चाहिये और पारी(पर) मिस काण सोताहो सदाहो, मेटाहो, गहो, उस सुपय पुस्पचिरे भनुसार गौ नहीं करना पाहिये परन्तु ऐसा सार व्यारमें नहीं होवा सर्पका भी पा प्रसिदके परासे उस पशु गौ पाते । भवः त्रिपाका मर्य राम्दोंमें केवल तपछि मात्र है। इवरया०रिक अपोकि भन्पपा प्रर्याद पदि नामोंमें सरिकी मपानवा न मानी मारे को गर्म-पारण मादि-क्रियात्मधान्ये " गर्भपारणझिपाहावया सम्वान उत्पादन क्रियाको (म्मादि) मुम्पमाननेमें (मर्यात् यो पातमा लिपप गर्भधारणकी सामर्म रेवतीर परते-फिरते-बैठते-उन्न रसोई बनाने इस्पादि मिया खी नहीं है और अब संघाम पस्पादनकी सामर्द है सबरीपुंस्पेदीदै अन्य अवस्थामा पा मन्यक्रिया असे म्मौपारस्पादिक पुरुपदी नादियो मालाबानाम्गदर्यम्मनुष्याणाम् देवानाम्पसमाज-नन्द विर्ययोंके और गाबहाद मनुष्योंक भौर देवों भौर (ग) कार्मकायपोगस्पानाम् । कामसत्रययोगमें स्थिति भीषों मर्याद निग्रगति रिपमान भीपोंके रहिमन सोलिग पतु पो पर 'शो" ऐसा इसके भागे विश भा है।प्रय है यदि यो में इससिपे हमने पुलिंग मे पा है। शिविपश्मनुष्याणां देवाना ये रान हमारी समझमेपरों परस्पतरूपमे प्रयोग किये गई । उपतनस पास पहारे और अपने सम्बन्ध RECORDINDORIROH सर्वार्थ अध्याय १२४ GAROOur सिद्धि सत्र २ BOOTDOO T Monoe-TOHDITME एमनिशसी मापसाप पकी इस पदपार भौर रिमपस्पर्य सहित सवायसिदिपिका शमय हिन्दी अनुवाद अध्याय २ सय ५२ तदभावात्स्त्रीत्वादिव्यपदेशो नस्यात् स (गर्भपारण भोर सन्सान उपपादन क्रिया) ममापसे वा सामय न होनेसे तदभमाग सील भादि-म्पपदशम्सीपणा भौर सपनाका नाम वा कपन खी-युस्की युत्पत्ति पृष्ट १२२, १२३ में देखो) नहोसकेगा मावार्य इसका यह स्पायवि यस्यां गर्म इति सी स्थितिहोता है गर्म मिसमें पानी है और मते नक स्पाद मनपति अपत्यम् इति पुमान् - उदरमें संतानको उपनावै सो पुमान् है (पुंस का प्रथमा विभक्ति एकवपन पुस्तिग पुमान् है (म्पुरप, मनुष्य ) उक्त प्रर्प केवल व्युत्पतिक चिये है मपानसासे नहीं है, यदि उरें मुल्पवासे माना मायगा तो मिस समय गर्भधारण किया और संतान उत्पादन क्रिया मादि होंगी उसी समय सो पुस भादि उनको फा सकते हैं किन्तु पालक, मालिकायें, अब पुरुष, हद विर्यन, वृद्ध तिर्यचनी, विर्यप तिर्यचनियोंफे पर और देवी देवतामाको भौर विग्रगति रिपमान जीयोंको मिनरें कि गर्मपारण सतान ग्त्सादन मादिकी सामर्थ्य नहीं स्त्रीवेदी या पुरुषवेदी भादि नही फासकवे इसलिये श्री, पुरुप, गौमादिक शम्म संदिरे ५ यौगिक व्युत्पम म्युत्पधिसरित सामासिक) शन्द नहीं हैं। मौर इन तीनों सी पुरुप भार नपुसक वेदोंमें श्रीदेदो मगर समान माना है । पुरुसवेदको फूसकी अग्नि सारा माना मौर्य रगम पासेशनशिससे ।जसे मोसे को पचापागाय" पर्वमा पर अपने और अपने से मिल कुते विही मादिका भी योपक है। सोपचापामा 'सिहा यह पाकिमही की रफा फेवस अभी से हीन कीप पल मित्रमे मी कचे-विशी-बदर और पर जीव जोशीभविमा लिप्ती स्वस्व मामाप सप से उसको पापा आप इसी प्रकार र पास में विपक तिपचनी समके ये मनुष्य, मनुप्पणी ग्नरे वर्ष यी देय इत्यादि मोर माप स्विने राप म्युत्पत्ति को प्याममें न रमकर दि में बाले माते है और उक से संभव सिव माजाते । मपराय जीन शिवाचते" से 'म्पपयेशान रपात्" 6 की ( इस अनुवाद के देयो पृ१२३ १३४) पक्षनिका मे मनुए मोर तिवय भोर देव समान पान में मगर उनकी नियों पर वाप्पो को ऐस संबंध मिपा है कि श्री पुरुष नपुंसक निकी Hntमाफी साप है। रजियपीभ्युत्पत्ति कीजिये है सोसिस म्युत्पतिमात्र मपोखमके भपि दी है।से पसराय की निकि पर जामाता कहिऐ। सो यह निधि सहिरीत माननी। बात पेठा सोचता गमला मी पम्ही हिपे। ऐसे दिसामनी । जो ऐसे म मानिपे बोगम पार किया प्रधान मानिये तोशाली तथा पुरली विसवनी मनुष्यपी तपा देवांगना तथा कार्मापयोग दिन मनराव तिलो नोमि गर्म पाप नाही तपश्री पक्षाका नाममदर वया पुनादिकपडा बिनो निता पुर पणा नाममयो। सामान पिनी ही प्रपाम है। पचमिरा (१) पौगिक-पातु और पत्यप मे समम पड़ने पोप बर्षको कामरान भयान सपा अपित राणा समितभर बना से गिधालय गोषपारी मावारी पासागर रख दत्त स्वस्त प्रमात तीन मेर १२५ पाय १२५ सिद्धि सत्र५२ BROOX.BORDO DOURO एटानिवासी मगरूपसाप पकोल रुत पदपद भौर विमरत्यय सहित स..पातापापका शन्दश हिन्दी भनुपाद अध्याय २ मत्र ५२ त एते त्रयो वेदा शेषाणा गर्भजाना भवन्ति ॥ य इमे जन्मयोनिशरीरलिंगसम्बन्धाहित. विशेषा प्राणिनो निर्दिश्यन्ते देवादयो विचित्रधर्माधर्मवशीकृताश्चतसृषु गतिषु शरीराणि धारयन्तस्ते किं यथाकालमुपभुक्तायुषो मूर्त्यन्तराण्यास्कन्दन्ति, उतायथाकालमपीत्यत आह- नपुंसफ वेदका ईटकी भग्निके अर्यात् भवेकी भग्निक समान मानाहै सारांश पड़ोहि पुरुपकी कामाग्नि फँसकी अनिके समान जल्दी शांत होमावी है। भगारकी अग्नि गुप्त भौर पुष गरनेवाली होती है। इसलिये स्त्रीकी कामाग्नि कुछ काखतफ ठारनेपाली होती है। जहां पर ईट पकाई माती है उस महकी भाग बहुत काखतक राती है और सर्पदा पषफती रावी है इसलिये नपुंसकफी कामानि भषिक कालतक रावी है। से पते वयादा पाणा गर्ममानामई सो ये वीन ( स्त्री-पुरुप-नपुंसक) लिंग अवशेष ने गर्मन उनमें भवन्तिाये मे जन्म-योनि-शरीर-लिंग-सम्पन्ध-बाये हैं। जो ये जन्म, उत्पषिस्थान (योनि) शरीर मौर वेदोंका सम्बन्धकरि मारिव-मिशेपा । प्राणिन' : देव मादयः प्राणहिये हैं (आरिवोमेद प्रभेद (-विशेष ) मिनने ऐसे प्राणी देवादिक निर्दिश्यन्ते विधिव-पर्म-अधर्म-पशीकवा। मदिखाये गये पा उल्लेख किये गये हैं से नानामकारके पुन्य और पापोंके वशीभूत चतसृप गतिपुरे शरीराणि धारयन्त । धारोगविमें शरीर धारणकरनपाले किम् गाउपभुक्त-भायुपश्ययाकाखम -क्या षे पूर्ण भुम्यमान भायुवाले होते हैं और ठीक समयपर (=पयाकासम् ) मूर्त्यन्तराणि "भास्कन्दन्ति | -मन्य या दूसरे शरीरोंको धारणकरते हैं प्रथया प्राणफरते हैं अर्थात् वे देर, मनुष्य, तिच नारकी,मादि जितनी भायु वाँप चुके है चवनी भायुके पूर्णहोजानेपर वर्तमान शरीरको छोड़कर मृत्युपानेपर दूसरे शरीरोंको धारण करते हैं उवभययाफासम्मपिइति भव'माहा म्या विना भायु पूर्णप्रिये मी(अन्य शरीरोंको पारण करते हैं ) इसलिये कहते हैं कि मरण किपमा सत्र का भर्ष पठिम है बड़े ही परिमम और अन्वेपण से सिमा गया है उस को बहुत प्याम पूर्वक पाठकों को परमा. पारिप नहीं तो कुषामित परिणाम म होगा कोई पाठक यदि इसपर मित्र प्रकाश रासे तो ये मुम्मो कृपया सुधिवरे । PROPEOPORTIODICODEO १२५ ORDC lal OENOKBOUT औपपादिकचरमोत्तमदेहाऽसंख्येयवर्पायुषोऽनपवायुषः॥५३॥ सर्वार्थ प्राण्याय सूत्रम्-श्रोपपादिकचरमोत्तमदेहाऽसख्येयवर्षायुषोऽनपवायुष ॥५३॥ द्वितीयपाठ")औपपादिकवरमदेहाऽसंख्येयवर्षायुपोऽनपवायुष ॥५३॥ DOITUDIOEMBER - , {१) सपाय सिविपत्ति प्रथम ससारस पृष्ठ १० ११४और किवीय भावृत्ति पप्ठर१५ में चरमपति पा पाठः प्रर्याद "परमोचम देहा स्थानमें विपरिये परमया ऐसा पाह। पाठ एक है। हत्यापराजपाधि पुष १११ मे परमहा पति पापित पाठा" प्रपत् परमहा ऐसा पाठ मिसनोका है। परमोचमदेवि मस्मिन् माने परमति बेचित् पटतीति' = 'धरमोसमदेशा ऐसे सस्थाममें परमपरा एमा एक पाठ मानते हैं। भुतसागरीटीका । मावा"परमात्मवेहा!"के स्थानमें 'परमहा 'अपर्मुल बम पदर जागा इसलिये पापीहावितीय पाठ पीहमा मा हमने ऊपर लिखा। (२१ ममाप्यवसायापिगमरमें मोपपातिकमोरामपुराव्येपरपायुपोऽमपपल्पायुषः" 1 ५३ ऐसा पाठ है। सम्या ५२वी मोपपादिक मानमें औपपातिक परमाचमरोहा पा 'परमय सानो चमोचमपुरुपरा ऐपपाठ एकसारेसम्म तीन राठामपर भी अप मस्त सा पसा पाठ भर होवेसे मर्य मेहमी मा क्योंहि रपएक दो पा चरमदेवा और परमोचमा मस ‘परमरक्षा" मपे पामारी अन्तिमारीरवाले उसलरस मापनानेवाल उमपमोक्षगामी जो पतमान शरीर पर संसारमें रहनेका पम (तिम ) शरीरात पी रेशमा शरीरसे मोलोमागे उसी शरीरसे सिर दोमाया ऐसा है स्वाय लोकवार्तिक पार म उमर पामस्पानुरामस्वायुरासाय सुभम रत्तम (सामान है सो पणी भरताके मितिफे लिये है मपाद को समी रामा पह उत्तम शरीरका पारी मयस्पदामा माघाप परमीक वा बाबमोडगामीक पप उराम (वसूलपमनारायसहन और समबसुरक्ष सत्तागपुनगर प्रश्पहाणा इसस पापरिणाम निश्मा किपरमदेहपारी(बरमहसय ग्राम परीरका धारकहोगा। भाजापमासमी पटनात्यायपातिक संसाप प्रकाशिवम सिखते है कि वास्वपमै परम शरीरका मथ यही है कि मच दूसरा शरीर पारस नहीं करना क्षणा इसी गरारममा प्राप्ताबापगी रसीलिये गोगरीर मापका सात कारख वा स्पर्क रचम उसको उत्तरामता प्रगटरमेक्षिय fot मा रानकी मावश्याता नहीं सहिपे पावित्रारम चामति मांचित् पाठ ऐसामो सासतिये सूत्र में जो इचम सम्बका ग्मा पिम्पपा र फेवत परम शरीर साप प्रगट परमके लिये है।परमात्मदा पास्यमे उत्तम रामसी मारसे अधिक से शिप्रातमान समयमान सूप में प्यपद स्पोकि सुप तास्वपम् को साकारती प्रसार मार तो पपम् ही बत्तमी ऐसा कोई परम सम जो मनुसम होठा हा। इसलिपे हममे प्रमोर विद्या मतानुहल 'उत्सम सामे मनाएपश्य माना है। पम्प अपपानिमारमारासंयव रोपा मनुष्याम्तियपानिया: घोपमा निपामारणपरायपीमपापुपारच मन्ति मनोपपानि परमाद और प्रपम्पयर्प मापुबालोसे रोप मनुष्प सपा सिपापानिय यो रपथमक्षि तथा परमशिव ने अपनप प्रापप्पा मोर प्रमापत्य मापप्पाक मी रोत ममाप्य पुष्प फहमियमा किसे हमारे पd पनाएकी परमवीरी मोगभूमिमा नियन मार मोगामिया पेमात मापुर नरोत मापुरी परिपुरी ममान गरीर त्याग सीमकार मोलार भाग - THBORROORNANDO TADAR सिद्धि सार्थ अध्याय EDRIBEODOBUND पगानिसी नगरपसाप वकीलाच पदम्पद भार विमरत्यय सहित सर्गसिदिपिका शप्पश' हिन्दी अनुवाद अध्याय २ व ५३ वाप-मापपादिक- हपाद जन्मसे उत्तम हानबाले भर्गद चारों पकारके देखें और समस्त नारी परम-धमना मन्तिम चकष्ट शरीर वाले अन्तिम श्रेष्ठशरीरकेभारत,महापर्यापनासा सचम शरीर पा र मर्यात् परमोचम शरोरी सदरमोतगामी,पूर्ण होगा ससार जन्म लिनका सी उत्तम देहसे उसी जन्म, परमाधम शरीरी, मसंख्येप-प-मापुप असल्यात पर्पको भायुषाशे, अपात् ग्यम,मप्यप,और ममन्य मोग भूमिफे मनुष्य निर्यप और मोम भूपिया मन्-अपवर्ति-आप परिपूर्ण प्रायुवा गोता पर्वाद देवनारको,परपाचम शरीरी, मोगभूमियां मोगममियों इन सपकी भाषु विप, राख, कटक,मग्नि,मह,सर्प,मभीर्ण भोजन, पमपात, एवी,सिक जीव और पनादिफ अभिपात मदिसे धया इन्दस (पापसे) भारम्भहोनपाचे पुत् विपासा और शीतोष्णसे पी न्यून नहीं होती है भाग पवनको नहीं होती है। दिलीपपार -मोपपादिर अपपाद संबक मन्ममें उत्पम सोनवाले मर्याद समस्त देष और समस्त नारको परमदेव (सादि) अन्तिम गरीर मासे,उसीमवस मास मानेवाले (मिस देहसे सिद होतो या परम देरमा शरीर कासावा) (पर्युड प्रोसे प्रगट है कि"परमवेगा पीपर्य है नो "परमोचदेश" क्योंकि उधम शरीर पासी मोधमापी हो सक अन्य नहा भौर परमदेवाले ममिक मनुष्य दो बारे अन्य देवादिक नहीं हो सके है। शेष दानों पार पकने भवा पनका भर्च मी एक है। घरम-मंतकी पर्याप, परपदाम्प्रविम पर्याय मामा शरीरमा दो। सभाप्यतत्वार्या पिणमसून मुक्त पेही मनपवार्य मापुस्ताले रोते सम संदेहनहीं कि इसी माप्यमे भोपपातिक, परमपेहमाद मम्तिम सरीरबासे उत्तमपुरुष और सम्पपपप भायप्पा ये पार्य प्रापवर्य (भपवर्तन म परम पोम्प) मायुप्ताले होते हैं। ऐसा तुरस पापडे नीचे रपर्पजमाप वा उस सका निपेप होता है क्योकि जो पश्चात हा गयादी ठीक समाजाता है और यह भी मोमधमान और मच पश्यति और पाप माविम प्रसंगी तीनोंको भाय अपवयहोवर भाव परकर म्यूमहोकर मकान मुत्यु पी और ये धीमी ग्रामपुरप पे। हम मी सित कि रसम साप पाम सानेसे कही म होता है जो न मानेमे इसलिये 'ग्राम' गलकी सूममें मावस्यकता महार सत्तम पवार माध्यमे अनुपायो पा टीकाकारोबो गक्ष अपने अपने भाप्प दीवा और मनुवादाम इस उत्तम राम महानुभागों ने इसको विधासि पवा वियपर और पियप्यमाना। सपप सिपना पड़ा। प्रथम इसरेविहम इसपर अपने स्वतंत्र विचार तथा यासानुल व रोगकर इसबावको सिमा किन किन शम विरोप (१) में राम विपक्ष परम शय पिप्प है। (म म दिपकर दे गप विशप (a ) में राम मा विशेष परमदेह विरोम है।ग) में परम सम विषपद ग्राम HERODECECTORATEERINESOUNDATION १२७ सर्वार्थ औपपादिकचरमोत्तमदेहाऽसंख्येयवर्पायुषोऽनपवायुपः॥५३॥ अध्याय सूत्रम्-औपपादिकचरमोत्तमदेहाऽसख्येयवर्षायुषोऽनपवायुष ॥५३॥ (हितीयपाठ") औपपादिकचरमदेहाऽसंख्येयवर्षायुषोऽनपवायुप ॥ ५३॥ सूत्र५३ १२६ QENDEBCHEDOIRD - (१) सर्प सिमिचि प्रथम संस्करण पृष्ठ १३ १६५ और दिलीप भाटि पठा५ में परमहा इति पा पाठा मर्यात् 'मरमाचम या के स्थानमें पिम्पपरिक परमोहा: ऐसा पाठ है। पपाठ एक है। तस्यापराममातिक पृष्ठ १११ में परमोहा इति पोषिल पाटर" प्रपत् परमदेहा ऐसा पाठ सिमौका है। परमोचमदेति मस्मिन् लाने घरमदेहति फेषि पठतीति = 'परमा उमदा पेसे इस स्थानमें बरमदेशा ऐसा एक पाउ मामते हैं। मुतसागरीरीका ३ भाषा परमासमवेहा के स्थानमें “सरमहम उपर्युक सूचमे पढ़ा जावेगा इसप्लिप उपप एक ही पाणितीय पाठ पदोभा जा हमने अपर लिया है। (२) सम्मप्यतत्वापापिगमसूबमे भोपपातिकवरमहासमपुरुषासस्येयपरायुपोऽनपपरपायुपः' : ५३ पेसा पाठ है । सूथ संख्या ५२ यी है। भोपपारिक के पानमें पापपाविषण्मातमहा पा चरम के स्थानमें 'परमोचमपुरुष है। रोपाठ एसा है। इससूमके तीन पाठ होनेपर भी भर्य अन्वमे सपा परसा है पाठ भर रोनेसे भम्प मे नही मा क्योंकि उपर्युक्त या पाठमें परमरहा और पप्माचमबहा" मेंसे 'परमदेहा" पेपरमशरीरी अम्तिमगरीरमासे उसासे मोहमानवासे तद्यमातगामी, जापतमान शरीर है पद संसारमें रहनका परम = अन्तिम ) शरीर है प्रात् इसी रेवा शरीरसे मोपोजागे इसी गरीरसे सिम दोमायेगे ऐसा है तत्वाय शोकपार्विक पप३४३ में समाए परमस्पानुत्तमत्वायुराधाए -सूभम रातम (सन् 17 प्रहल है सो परमी की अपेठताके मिपत्ति के लिये मर्याद जो घरमी हा उत्तम शरीरमा पारी अवस्यहोगा मावार्य परमीचा उपमादगामी सष उराम (सुपरममाराधसहमम और समयानुरक्ष समारयुकार प्रारहाणा तसे पापरिणाम मिकता कि परमहपारी घरमदासदेव उराम शरीरका पारबहागामापरतासमी पज सत्तापराजपवित्र संसाहारा प्रकाशितमें लिखते है कि वास्तवमें परम शरीरका अप पदी विभव दसरा शयेर धारण नहीं करना धागा उसी शरीरसे माह मातहासापगी सीक्षिये बा शरीरमाएका साक्षात कारण है वह स्वयं म उसरी रामता प्रगट कर लिये म्सिी भी रामकी प्रावश्यकता नहीं सरिये पार्तिसारन परमरहा इति पांचित् पाठ ऐसामी कहा। इसलिये सूत्र में जा उत्तम' एमका उसमसामयाबरवा परम शरीरके स्वरूप प्रगट पर लिऐ "परमात्तमा पाक्यमे उराम राम सी मारस अधिक से जिपमपमाम' मा 'प्रशास्यमान सूप में पप हस्यापि य तो स्वयम् ही सप्रकार उसी मकार परमार को स्वयम् ही उत्तमई पेसा काई बरम देख ही नहीं मा अनुत्तम होवा हाइससिपे हमने प्रयोक्सर विदामोश मवानुन 'उचम शगमोमनावरपीप मामा है। 'पम्प पपाविम्वरमदेससम्पपप रोपा मयुम्पास्तिपम्यानिशा सोपामा निरपमानापपापपानपत्यापुपाच मन्ति जनपपाति नरमार और प्रसस्पेयर्प मापवाहीसे रोष मयुष तथा निर्मग्पानिश मा रपमराहित पा उपनामपिता अपपा भाषामा चोर मापदप मापपुणाले मी होते हैं। सभाष्यन्पष्ठ तसे ५ फसमिकता दिने मारे पर देवनारकी भरमारीरी मोगभूमि मरण विपच और कमागभूमिण भात मृत्युबारे नबोते मादुरी परिपूरलमान शरीएका पागम पर पता INTELECONOOPANDRODUROOTODEODO POONADEMIO सर्वार्थ अध्याय सुत्र:३ ARBACOTCOIDTTB एनानिराप्ती नगरूपसहाय रकीशकत पदराद मार विभक्स्पर्य सरित सर्वार्थसिदितिका शम्दश' हिन्दी अनुगद भघ्या, ५२ प्राय:-भोपपादिक- उपपाद भन्मसे उत्पम हानवाले भर्याद पारों प्रकारफे दव और समस्त नारकी परम-उधम : नाम - -अन्तिम चन्क्रप्ट शरीर पाले, अन्तिम श्रेष्ठशरीरकेपारक,मंतकी पर्यायवाखा उच्चम शरीर वा देर मर्यात् चरमोधम शरोरी,वनबमोतगामी,पूर्ण होगा ससार अन्म निनका उसी उधम देहसे उसी जन्मम, परमाधम शरीरी, मसंस्पेप-वर्ग-मायुप प्रसस्पाव पर्पली आयुगले, मर्यात् उचम,मध्यम,ौर जपन्य भोग भूमिके मनुष्य विर्यच और कमोम भूमियां मन्-अपपति-पायुप परिपूर्ण भायुपा होने में भर्याद देवनारको,परमाचम शरीरी, भोगस्मियां भोगम्मियां इन सबकी भायु विप,शत्र, फटक, अग्नि,मल,सर्प,ममीर्ण मोमन,पमपात,राली,सिक मीष और ममादिफ अभिघाव भादिसे तथा इन्दस (- उपद्रवसे) भारम्माोनेवाचे मुद पिपासा और शीसोपणसे मी न्यून नहीं होती है मपाल सस्प इनकी नहीं होती है। द्विवीयपार -भोपपादिक उपपाद संगफ नन्ममें उत्पम होनमाने पर्यावर समस्त देव और समस्त नारकी परमदेव (इस्लादि) मन्तिम शरीर माले,उसीममसे मोक्ष जानेवाचे (निस देहसे सिद होते हैं का परम देह का शरीर पाखामा) (उपर्युक्त प्रर्योसे मगट है कि "परमवा"का बही भर्ष है भो "परमोचमा" का है क्योंकि उसम शरीर पान की वनप मातगामी हा सक्त में अन्य मां और परमदेहपाजे कर्मभूमिक मनुष्य ही हारे अन्य देमादिक नहीं हो सक्त हैं। शेप दोनों पार एक मतः उनका प्रर्य भी एक है। परम-भवकी पर्याय, परमदा-मंतिम पर्याय पाहा गरीर पा दो। समाप्यतत्यार्या धिगमस्परे अनुक्स येही रामपयत्य भायुष्याले होते हैं। इसमें संवेहनहीं किसी भाप्पम भोपपातिक, परमवह प्रात् मन्तिम गरीरवास उत्तमपुरुष और मसम्पेयवप भायुप्पाले पे पार नपपर्य (भपषतम म करने योग्य) भायुप्यासे होते हैं। ऐसा उसप है परंतु इस पाप के नीचे रपयुकमाप्प दिया है उसससा निषेप होता है क्योकि जो पश्चात् कहा जाता है वही ठीक सममाजाता है और यह भी है मृत्युई थी और ये तीनों उरामपुरुप ये। विभौमपति और मतम प्रवच पश्यति और वासुदेय माहिम प्रयी तीनोंकी माय अपपर्यहोकर अर्थात् घटकर म्यूमहोकर मकाल (१) हम प्रमो लिसषुके हैं कि उत्तम शप परमे लानेसे यही अर्थ होता है जो म सामेसे इसलिये 'उत्तम सापकी सूधर्म मावश्यकता मही सिराम रायके कारण माप्पकापेमे भनुषावको तया टीकाकारोको पातफष भपने अपने भाष्य टीका और अनुपादोमे इस 'उत्तम रायफ महानुमापो न इसमे किस पिस गणका विशप और वियप्यमामा। समें तिप्पमा पड़ा है। प्रथम इससे कि हम इसपर अपने स्यय विवार व्या शास्त्रानुस कप उमन पर सवातको लिसदें कि किन किन गण विरोप्य है (प) में उराम राम विशेषण है परम शम पिप्य है। (C) परम राम पिरोपण वेद राम्य विशप्प है () में उराम शन विशेषल है परमदेव विशेष्य है । (ग) में परम राम विशेपसह उत्तम anesxeoxOwner - ADLETTE १२७ सवार्थ औपपादिकचरमोत्तमदेहाऽसंख्येयवर्षायुषोऽनपवायुपः॥५३॥ अध्याय सूत्रम्-औपपादिकचरमोत्तमदेहाऽसख्येयवर्षायुषोऽनपवायुष ॥ ५३ ॥ द्वितीयपाठ")औपपादिकरमदेहाऽसंख्येयवर्षायुपोऽनपवायुष ॥ ५३॥ CADOUROO सिद्धि सूत्र५३ १२६ OXReOUND - (१) सर्वाप सिविवृत्ति प्रथम सत्र प्रम १ १६४ और द्वितीय भाप्ति पर११३ में पमहादति या पाठस भयात् “घरमाचम पहाः स्थानमें विपरि परमोबा" एसा पाठहै। ऐपपाठ एक है। तत्वापासवातिक पप १११ में " परमोहा इति केवायित् पाठः प्रयत् 'चरमशः ऐसा पाठ मिसनोंका है। 'बमोचमदेखि अस्मिन् साने सप्मदेहति फेविन पठनीति' = 'वप्माप्तमहा स स स्थानमें परमपना पेसा पर पाप्त मामत है। एतसारीटीका प्रभावार्य वग्मासमक्षा के स्पानम "घरमदेवा"उपर्युक्त धमे पढ़ा जायगा इसलिये अपपाठ एकही पा द्वितीय पाठ बही हमागहमने ऊपर लिया है। (२) समाप्पतत्त्वापापिगमपमें प्रोपपातिकसमवेतमपुरणासस्पेयवपायुपाऽनपवायुषा ३५३ ऐसा पाठ है। सूत्र सपा ५२ वी है। प्रौपपादिर के सामने भोपपातिकबरमोत्तमयेदा वा 'परमदेहम के पहानमै 'परमहोत्तमपुरुपा पपाट एकसा है।सम्नके तीन पाठ होनेपर भी भर्प मतमें सब एकसा पाठ भव होनेसे भय मेद नहीं हुमा क्योकि उपयुक्त पो पाठोंमें परमबदार और घरमाप्तमा मेसे 'वरमहा का भये परमशरी अम्तिमशरीरपाले रसीवेदसे मोबजानेवास वमोक्षगामी, मा पतमाम शरीर यह संसारमै पनका परम (अन्तिम ) गरीर है प्रर्यात् इसी देह वा शरीरसे मोक्षबायगे इसी शरीरसे सिर होगा ऐसातत्त्वाय सीकपातिक पृष्ठ३४२ में उत्तमपास परमापानुत्तमत्वादासाथै,-सूचम उत्तम (राम) का प्रारक है सा परमी की अभेटताके मिदृष्टि लिपे है अर्थात् मौसमी हापा वह उत्तम गरीरमा धारी भवस्यहोगा भाचार्य पमीचा अवमातगामीक सय ग्राम (पचूपपमनारायसहनन भीर समसतुरन सखामपुकार अवश्यहागा इससे यह परिणाम निकला विधामदेहपारी(बामहासव उत्सम शरीरका पारागा। पंभाजापरलालमी पठ सरवापरावाविक संस्थामारा प्रकाशिवमै हिनते हैं कि पास्सयम परम गरीरका भय पीमिव दूसरा शरीर पार नहीं करता हामारसी शरीरस मास मायामायगी इसीलिये मी शरीरमाक्षमा साचन कारणीय स्थर्य उत्सम है उसका रामता प्रारकरनके लिये सी भी हमी भावश्यकता नही हिप पातिककारने परमवाति देधित् पाठ ऐसाभी कहा है। इसलिये सूत्र में जा उत्तम' शपका बलियापयारिवल परम शरीरफे स्वरूप प्रगर रसिप'वरमाचमहा यापमें राम राम उसी मारसे अधिक से शिप्रापमान पर पचास्यमान सूर्य में प्यार क्योंकि स्प वा स्वयम् की समकारा उसी प्रकार परमार तो स्वयम् को ग्राम पेसा और परम दीन मो अनुसम होवा हााससिपे दमने प्रयोस्तर विशनोक मतानुहल 'राम' को मनापापकीय मामा है: "एम्य भोपपातिबामएसरपेयबाप! रोपा मनुपातियापानिमा मोपमा मिरपक्रमारलापपपिपोऽमपवायुपा भवन्ति" =दनमीपपातिक परम और प्रसंप्येय भायुप्पामोंसे ऐप मनुष्य तपा लियम्पानिज जो उपरमसहित तपा म्पमति ने अपनत्यं मायुमाल और प्रापपाप भापप्पाले भी ऐसभाप्यपष्ट १ ख वे फलनिकमा पिसे हमारे पत्र देकनारपी परमारीरी मोगामि मात्र तिएच और हमापमिपा ये मत्युगातो नहीं रोनापुर्ण परिपनीमान सरीमा स्थान बीमार IRANI ORYHOTO सिद्धि सुत्र५३ सर्वार्थ अप्याय १२७ OXIROLARKDIOie ROOMDHOODARDoraemuKORDedeio एग पामी नगर पसराय पीलात पर भार विमास्यय सहित सवार्थसिदितिका शम्दश' हिन्दी भनुराद अध्याय २ मत्र ५३ त्रा -मापादिश- उपपाद नन्यसे उत्पन्न हानवाल मर्यात् पारों प्रकारफे दर भोर समस्त नारकी परम उद्यम पदा- अन्तिम उकष्ट शरीर पाले, अन्तिम श्रष्ठशरीरफेधारक,मंतकी पर्यायपाला उचम शरीर पा दो अर्थात् चरमोत्तम शरोरी,वझपमातगामी,पूर्ण हागा ससार मन्म जिनका उसी उत्तम देहसे उसी अन्पमें,परमोत्तम शरीरी, भरण्यप-पर्प-मायूपी-प्रसंस्त्यात पर्पी मायुगले, अर्पात् उच्चम,मध्यम,ौर मपन्य भोग भूमिफे मनुप्प विर्यच मोर कुमोग भूमिया मन्-भपवनि-मायुप परिपूर्ण भावान रान मां देवनारको,चरमाचम शगरी, भोगभूमियाँ भागभूमियाँ इन सबकी भायु विप,शरा, फटफ,मग्नि,मस,सर्प,मनीर्ण भोमन,समपात राशी,सिक जीप भौर पनादिफ अभिघात भादिसे तया इन्दस (- उपद्ररस) भारम्भहोनेगाने सुत्र पिपासा और शीतोष्णसे भी न्यून नहीं होती है प्रभास सस्य इनकी नहीं होती है। दिलीपपारा-मोपपादिक उपपाद समक नन्ममें उत्तम नपाले मर्यात् समस्त देष भौर समस्त नारकी परमार (इलादि) =मन्तिम शरीर राल,उसीभरस मास जानेसारी (मिस देसे सिद्ध होते पाचम्म देह पा शरीर काखावा) (उपर्युक्त भोस प्रगट है कि"परमदेग" का पनी थर्प । नो "परमोचमदेश" का है क्योंकि उत्तम शरीर पानी तब मात्रगामी हा सक । मन्य नहां भौर परमदेवाने कर्मभूमिक मनुष्य ही हाई भन्य देवादिक नही सक्त है। शेप वानों पार एक रे मना उनका भर्य मी एक है। चरम-भवफी पर्याय, परमा-मतिम पर्याय बाला शरीर पा दो। मभाणतत्वार्था शिगमगपके अनुरूल यही प्रमाणार्य भायप्पास हात हा इसमें संवेहमहो कि इसी माप्पमें भोपपातिक परमयह माद मम्तिम गरीरपात उत्तमपुर और प्रसम्पपपप भापप्पाले ये पार्य ममपपत्य (अपवर्तन न करने पोम्य) भायुप्याले होते हैं। एसा उन्नत है परंतु इस पास्य मीप उपप हमाप्प दिया है उसस इसका निषेध होता है क्योकि जो पश्चात् कहा जाता है पही ठीक सममामाता है और यह भी है गत्यु दुई थी पार ये तीनो उत्तमपुराण थे। रिमुभीमपश्यति और 'तम प्रशदत्त मश्यति और पासुदेष मंतिम मयंघकी तीनोकी माय अपपत्यहोकर अर्थात् पटकर म्यूनहोफर प्रकास (1)हम ममी लिगा कि उत्तम राप मत्रमें क्षानेसे पही अर्थ होता है जो न लानेसे इसलिये 'उत्तम राम्वकी पूममे मावश्यकता नहीं है सिराम राम कारण भाप्पकामा अनुपादको तथा टीकारीका पातकुछ अपने अपने माप्प टीका और अनुपादोंमें इस 'उत्तम सपके पंचम सिमा पड़ा है। प्रथम इसके कि हम इसपर अपने स्वतंत्र विचार या शासानुकूल कप उसेसर सपाको लिवदें कि किन किम महानुभापो में इसमें रिम पिस शपका विराण और विराप्यमामा है। सप पिराप्य है (प) में उराम शप पिरोपण है चरम राम पिरोप्य है। 1) गरम उराम पिरोरण है वेह साप पिशप्प है (प) मै उत्तम रुप विशेषण है वामदेह यिशेप्प है । (ग) में परम शम्प पिोषण उत्तम RiळOEndDAROOOZarodoमलखम १२७ AH सर्वार्थ RECEEDTe औपपादिकचरमोत्तमदेहाऽसंख्येयवर्पायुषोऽनपवायुपः॥५३॥ मच्याय सूत्रम्-औपपादिकचरमोत्तमदेहाऽसख्येयवर्षायुषोऽनपवायुष ।। ५३ ॥ (द्वितीयपाठ")औपपादिकवरमदेहाऽसंख्येयवर्षायुषोऽनपवायुप ॥ ५३॥ सूत्र५३ CIDOODOOKOT: (१) सांप सिविपत्ति मपम सस्करप पृष्ठ १७ ११४ और द्वितीय भावृति पट में परमवहा इति या पठा" भयात् “घरमोत्तम पदा के स्थानमें रिसारिके पमहा" ऐसा पाठहै। पाठ एक है। तत्वाधरामपातिक पण १९१ में परमोश रति पापित् पार" भपात् परमहा ऐसा पाठ स्तिमौका है। चरमोधमक्षति अस्मिन् लाने वामदेति फेधित पटवाति ='परमोचमदेशा ऐसे इस स्थाममें परमवा पेसा एक पाठ मानते हैं। मुतसागरीतरीका A मावार्य बग्मासमदेहरा के स्थानमें "परमरोहा 'उपर्युक सबमें पढ़ा जागा इसलिये रापपाड एकवीपातीप पाठ होइमा सामने ऊपर लिया। (२। समाप्यवसायापिगमसूममे मौपपातिकधरमदासमपुरपाम्सम्येयवायुणेऽनपयांपुपा" । ५ एसा पाठ है। सूत्र सत्या ५२वीर मोपपादिर रेभान चौपपातिर है। परमात्तमदे पा 'वरमदेव मानमें परमरशेतमपुष्पा पाट एकसारे इससून तीन पाठानेपर मी पर्व मन्तम साता एकत्सा है पाठ भद होनेसेर्य मेद नारीमा फ्योंकि उपर्युव दो पाठीमें पप्मवहार और परमातमरहा" मेस 'वरदेश का प्रपे चरमशरीरी अम्तिमशरीरवाजे उसीपासे मोजतानपास समपमोचणामी, मा पतमाम शरीर पह संसारमै रहमका परप (अन्तिम ) शरीक है मर्याद सी देर पा शरीरसे मोगमायगे इसी शरीरसे सिर होजायेंगे ऐसा है सत्ताप लोपातिक पप२४३ मेरसममरस्य परमस्पानुत्तमात्सप्पुषामा सूत्रम रत्तम (राय) का पहरा सा धामी की भमेन्ता मिसिलिये मर्याद मा घमी हामा पर उत्तम शरीरका पारी पहोगा मापार्य बरामीबा पमपमाचगामीक सष राम (पमूपमनाराबहमन मोर समवतुरख समापुटार पहागा इससे या परिक्षाम निमा कि परमापाप-परमया)सविराम शरीरका धारक हागा। पंगामापसाससी पर सत्तापरसपातिक संसारा प्रकाशितमै हिलते है कि यास्तवमै परम शरीरका अप पड़ी कि दूसरा गरीर धारण नही करमा हागारसी शरीरस माह प्रामदाबायगी इसीलिये को गरीर माम साप यह स्वयं रक्षम है उसकी सरामता प्रगट फरल लिये किसी भी रानी मावश्यकता नहीं लिये पानिमारम चामति देगापित् पाठ ऐसामी फराससिये पुत्र का उत्तम रायमा गप पिसागपाए फेवत परम गरीरहे साप प्रगट रमेकेलिपेप्मातमा पाक्यमे उत्तम सासी मकारसे भपिसे प्रकापमान गए कारपमान रूप में प्पप है पाकिसूप तो स्वयम् से प्रकाश उसी प्रकार नमार तो स्वपम् ही उत्तम पेसा पर परमरहीन या अनुत्तम होता हससिपे हमने प्रयाबार विद्वाना मतानुएल राम गणको मनायापीय माना है "एम्प पपादिपरमारपेयपर पर्प रोग मनुप्याक्षियम्पानिया: सोपडमा मिस्परमारचापपत्पापपोऽनपत्यापुपार भवति नमोपपातिक माहौर अस्पपर्प प्रायुप्पामोस रोप मनुष्य पाठियोनिल मा उपम्मसरिख तपा म्पसमाहित भपक्रय भापुप्मा मोर प्रमपचाप मापस भी रोते। भाप्प पुष्टरसले कामिकालिमारे पाणी मरारी मोगभूमि मह तिपय और मागमूमिपो ये बात मत्पुमा नदीले मापुगे पनि एमाले नमानसा पास भीमबार श्राप COINLOOTED सिद्धि सूत्र५३ सर्वार्थ अध्याय १२८ यतिकर GIDDOXICORREDGEOBEEDOMFOOIROONDOOOL पठानिरासी मगम्पसहाय पीस कर पदच्छेद मोर पिमात्पर्यसरिस सपिसिनिद्वारिका शमशःन्दिी अनुवाद अध्यापर म्ञ ५३ प्रयम सलाम रस पावर पिधार करे किसूत्रफा पपाथ पाठ क्या है पिशवर्ष ६० भदवासमीने इससूनका अर्थ अपने रचित 'चर्या समाधान में रियादउसपर पुष समालोचना गपणा उनम तर समगार है कि भोपपविक परमोत्तमदेहा असभ्येपर्वायुषाऽनपयायुपा भय-पत मनपपार्यायुपा भपम्ति । इतने मनपवायुवाले मानमा। जिनकी मायुध अपवतन कहिये फेरफार म होय समय समयसी पूरी हार। पिर शरसादिक यांगरि उपक्रमसी पूरी न होर ते अनपायुषाले जानना । ते कोम ही औपपादिक परमोत्तमदेवा प्राप्तम्येप वर्णयुष औपपारिक पहिये देय मारकी परमोत्तमदेह कहिये तीधर असंम्पेयषपायमा कहिये मोग भूमिके तथा फुमागभूमिके जीया मावाष परमोरामवेहवाले तीयकर लिमरमरपाले गुरदरा पास्याविरु उपसाकार मुक्त हुये। उत्तमदेहषात सुमोमवक्री तथा मनराधीकी माह सत्य अरत्कुमारके पाप पयो की अपनत्य । इत्यादि सकस पी अपकीनिके मी मनपपायुका नियम माह! यह कदम म्याप कुमुद सम्प्रोवय नाम शालहै तथा राजपाविकासकार शारख वहाँ क्या या दामोधमदेव तीथरकी ही है। इस स्त्रदिप यह सिदान्त दुभा-देय नारकी दीपकर मांगमिरे जीप इनर थिर राणादिक पाग से प्राप्रफल के पास प्रायुझी उदीरमा न हो। इन पिमा कर्मभूमि मनुष्य तियधनिषिप हार जसप्रदीप उसमे भरा होर पवमके जोगस पुम माय तेसे पूर्ण मापुषी सिविका व मिमित्तान्तरसे हो जाय" राजपातिकम 'परमात्तमदेव से वोपर लिये गये है पहप हमको नहीं मिला है। उपपुर लेपसे क्या हमसे सम्प प्रम्य विधामोसे जो षासाप हुमा उससे यह परिणाम प्रथषा फल मिकहताई कि घरमदेह के प्रथ के संबंधों विशनों के यो मत हंकुष पते हैं कि घरमोह पाले समय मोड गामो तो होते है परंतु उनी अमाल मृत्यु हो जाती है जैसे अर्जुन भीम युधिष्ठर सिस इस पत्र में उत्तम पिरोपण धरम का है कि वामाराम पेह वासोको माल मृत्यु महीं होतीहै परंतु घरमवेद' पास्तों की भकाष मृत्यु हो जाती हैम्प पिवयों न मत है कि अप सपिसिमि पृष्ठ १४४ और तत्त्वापराजपाक पृष्ठ १११ 'परमवेहा इति या पाठम' 'घरमदेहा इति गपित्ताइस पत्र के प्रत्य पाठ ममसे दिये है तप यदि हम घरमदेह' पाखोकी अकाल मृत्यु मानले तो उपर्युक पाठ व्यर्थ हुये जाते हैं और तक यदि परमवहपालोफी अकाल मृत्यु माने तो समुद्रात तो पर कर नहीं सकते, क्योकि एक साथ या तत्कालही उपसर्ग उपम्प पत्यारिसे अमात मृत्यू हा जाती है और पह नियम है कि "मापुरे पर मास शेप पीले फेयस मान उपजै तते मुनी मियमयकी समुद्धात र जिनके यह मास पूर्व केयस बान उपमा दो ते समुपात को भी और मही मी कर करनेको सषया नियम नाही" और पलवकर कहते हैं कि सप समुदयातनग ता पा विमा पेदनीय गोत्र और मामफम के सिपायाये मोक्षपदको प्राप्त होंगे (उरार में कहते है कि) उपसगमें केयस बानो पत्यात् फेवसि समुद्घात के लिये को पात पापा नहीं जान पड़ती है । उक समुहमातम पाठ ही समय सगत, जो पाय थोड़ा का फ्योकि 'मसम्यान समप एक प्रापती वपानी पानी संस्य भावती मिस त होत एक स्वांस है। यदि घरमहा शिवा पाठा (='परमाप्तमबहा के स्थानमै चरमोहा ऐसा पाठ पिम्पसेह) भाप्यकाके मतमे म होता तो पंद्रदासजीका समापान दृश्यको बहुत पुरवा Himan यामि दरमहबाप्लामें उक्ततीन परिपाटी उपसर्गसहमार मोदई मात मृत्यूाई पापिये चरम गरीरीये और उत्तमदेहधारीयोंमें धोरण प्रसधपति मुमोमघम्वति इत्याधिको प्रकास मृत्युई इससे न वा फेवल परमवहषाले और म केवल उसमवेदपारी अमपयात्य भाय पास दास है फेयत पेही प्रमपपत्य मापुषाले होसकते है जिनमें दोनों गुणका ( परमवहत्व और उत्तमदेहत्यका) समावेश हो ऐसे नीयकर मोरयमी जीप तीय पत्रे प्रविरित होसके हैं क्योकर पवि वीर्य कोही उमास्वामीका ममिप्राय होवा तो पुत्र पेसाहोता और सायही समोर सा लिये हुये भी होमाता हि प्रापपादिक तीथफराऽसस्येषषर्पायुषोऽनपयत्यापुरा' । इसलिये यहाँपर अप प्रश्नया है कि तीमो TRADEOOEBOGOA:093DEO heapeOERDOM १२६ स -- किमविशेषेण भवन्ति, भार्थ ध्याय IRDOL सिद्धि सुत्र४४ ११८ पानिमासी जगाससाप पकीखकव पदपछेद भौर विभस्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिदृषिका शब्दश' हिन्दी अनुवाद अध्याय २ र ५३ सिद्धि सूत्र५३ 'ऐसा परम उराम देव जिमकै होय ते घरमोराम देश पहिये अपघजी पधनिका पृष्ठ (क) 'परम उत्रामो देहो पेषां ते चरमोत्रामदेहा" परमोसम है शरीर जिमका पेपरमोचम देव पाले है।( परमोत्तम ये देदके पिधपण है सर्वार्थसिशिपठरवत्वार्य सोपातिक पृष्ठ ३४३ प्रमेला उराम राम देह का विशेपस नहीं है क्योंकि यदि उराम शरीर थाले भनपयस्य तत्वार्थराजवातिकम् पृष्ठ १५१ वार्तिक मायुवाले होते तो प्रमत्त घरवर्ति और पासपेय प्रर्वधनीकी मास मृत्यु म हाती (4) षण्मस्य देहस्पोकनायमुत्तम रहा धरमदेहका उत्तम पिरोपणहै सो उत्कएपनाके भर्थि है मम्य अपे नाही "जप०पष०२६५ पास नातिर विशेपोऽस्ति । सर्वार्थसिनि पूर/प्रवके शरीरकी श्रप्ठयाके प्रतिपादन के लिये उत्तम (राणकास्त्र में प्राण है भम्पमयपिणपके वस्प (=परमस्य-देहस्प) उत्तमत्वप्रतिपादमर्थत्वात् (सिये नहींई 'उस परमदेह उत्तम पर्माको प्रतिपादनाथ पनाहैयत मत्रमंउसमयमकामहराई (उत्तमप्राणम्। राजवानिम्म्पष्ठ०१११पातिक र रेनो) अर्थात् यो धरम देह ही सपमै उत्तिम है सा मय पहिये है ० भाषाय परम पद समस्त होम उत्तम यह है इस वारपर्यके प्रगट करने के लिये स्पमें उत्सम शब्दका प्रहपकियागयाहै। उत्तममहल परमस्य-मनुत्तमत्व-म्पुषासायम् = (सूममें सप्तमारामाका प्रहस है सो सम्मी ममतताके मिसिके लिये है भात् मा परम- (तत्वापसाच्यातिम् पृ ३४) शरीरीहोगा वह उसम शरीरका पारी अपश्यहोगा परमीक पा तय मा गामा रत्तम शरीर अवश्य गा मावाय परम दहपारीक अनुचमपमा वादी नही रसलिय उत्तम शय सूत्रमें लाये हैं। इसलिपे यहा 'राम' शण विराषपद परमदर' यिरोप्पहै। (4) परमपिणवमुत्तमस्थावरमस्य निदरपथ परम विशपस रसम शम्मका है सा भयरम के नियारस के लिये है मपात् उत्तम पदपारी हो चरमणिपसम्-उत्तमम्य अधरमस्य-निवृत्ति- =और परम पारी न हो तो यह अनपवर्य भायुपासा न हागा जैसे मुभीमवम्यति भयम् । तत्वार्य सोमातिम्म् पाठ ३४३ और प्रतापच नमति और भतरे मर्यघकी वासदेव (फप्मजी) क्या इनके समान और मी जिमका उराम शरीर तो था परमुपाम शरीर मया उनकी पाखकारणोस अकाल मृत्यु हुई भायुका भपक्सन हागया। यहां परम राम पिरोपण उराम राम पिरोप्प है (4)प्रत्पापरवासुदेवादीनामापापवतवयमादम्याप्तिः ('उत्तम देहपारी मनगदस्य आयुप से होते है इसपर प्रस्न करता है कि यह प्रारच तत्त्वावरावातिमा सना वार्तिक ६ पृष्ठ १११) प्रतिम कति मोर छप्प भयपक्राति सुमोमवयतित्यादिमें मही परताईनही सागहोता पोषितीमा रचम देह पारी हान पर भी पास मत्युगो प्राप्तहुये उत्तरमै करले कि नवा परमाणस्योचमविएपनत्वात् BN -यह पोप नही क्योकिरमणका उराम एप्प विपण है। रसलिप जो परम और राम (देखो तत्वापरामवार्तिकम् पूर्व ५३, पार्तिक ७ पृप्ट१११) का परफोगा रही पदार्थ पापुष का हो सपना गितु मोरे राम का पारपदोगा पर मापवर्प मापुपाता नहीं हो ससा सभाममर्मिरत-ति ज्पनी मादि राम के पारी पंचम गरीरीनदीमने नीति grt. ROOTOOARDOIRDeao0IDIOHOOLOOD HI OLLOONDARD १२८ r 2 मिपासी जगताप पोचत पद मौरीपत्पर्य सहित सर्वार्थ TORTO 100 BETRO MODTIROCTOMOTO औपपादिका व्याख्याता देवनारका इति ॥ चरमशब्दोऽन्त्यवाची । उत्तम उत्कृष्टः । चरम उत्तमो देहो येषां ते चरमोत्तमदेहा। विपरीतसप्तारास्तजन्मनिर्वाणाऱ्या इत्यर्थ ॥ असंख्येय- सिद्धि सत्र५३ मप्याय- मतीतसख्यानमुपमाममाणेन पल्यादिनो गम्यम् तत्पनुसाद मौरपादिजनध्याम्पावामदेव-नारकासाविकम्पपाद मन्मसे उत्पमोनेराजे(४६वामममें करेगये । (पे) देव नारकी में पामशयमन्त्यपापी, उचमा उत्तष्टः (ब)परम शम्प भन्तकार-मन्स्प) बोपी उचम है सो उत्तष्टी, श्रेष्ठ है। परमः पादेश येपाम् । ते परमोधम-देश =अन्तिम श्रेष्ठ है शरीर मिनका परमोचन देवाचे हैं मर्यात् चरमाधम है शरीर मिनका वे चरमोत्तम देहफे पारी देशके विशेपण चरमरचम शम्द विपरीत-संसारा व भन्म-निर्माण-मः। टूटनेपामा ससार मिनका उसीनन्यमेनाभव मानोने योग्या(मा) इनि०मयमतीक-संम्पानम् मसस्पेयम् ॥ ८पसा अभिप्राय है। गणनासे रहित है सो असल्यास उपमा प्रमाणेन पन्यादिना ॥ गम्यम् ।। उपमाप्रमाणवकप्टममाणित)पम्पभादिसेभत्मिदापश्यादिकसेनानीनाया। (म मिसमें थोड़े पर हो जीसदहरहित अर्पवाला से सारगर्मित भोर पूया रायसे रहित हो उसकी खूब कहतसाफि निम लिमिठ सोक्स विरित और पारिलो परिब रचनेमें भाषा पा एक मात्रामा भी साम होगा तो उसको पुत्रके सम्म सदराप दवा है प जैसाकि मिनगर योग करता है जितने उपर्युज गुस सबमे होना चाहिपे ये समस्व सम्मपएिसे देखनेपर 'घरमदेहा. पाठमें गर्मित फ्योकि 'उपम' रायफे मसानेसे सपमा प्रथम गुख"पाड़े भवर' की निप्पत्ति होमाती है।इसी शपको पाठमै म लानेसे स्त्रका मथ सपा संदेहरहिव सीमा साधा स्पर और सरत हागाता हभप करमेमें इसको समझाने का भी संदेह नहीं रहता । पसे 'घरमदेवा पाठ सूचका दितीय गुरु कि संदेहरहित मप पासा हो पूर्ण करता है। उत्तम सपके मिकसद से सार-सत गर्मित सत्रणमाता है इसमकार स्त्रका वीसरा गुरु पूर्वमा अप उचमराद पाउस पृषद् करदिया तब पथ और निष्प्रयोजनीय भाग निकल जाता है और सुनके पोधेगण की कि सुशप्पथ गोसे रहितहो पूर्णता हो जाती है। साफ पावरमसदिय (सपमहरम् २० मसविण्यम् ॥)= घोड़े अक्षरों- संवेदरहित ( प्रथयुत ) हो सारपामिश्क्ती मु (सारषान् पिश्यतामुपम् ) - सत पा सार गर्मितहो सका। पिषता श्रेष्ठ (-मस्य) रो मस्वोभममवयं च (म-स्ताम ॥ मनवमnar)-निरपक राया ताम)दित [=] - पपस पस्तिहो पूर्व षषियो पिठा पा पापियमा विषा ]-सुगबाता रिसको सशकहते है॥१॥ सोक ।। पत्र पार्वमागाया पाया प्रमाणाया। ]- एक प्रपया भाषी मामाका शस्य रतितापवे -शस्य प्रतिभालाघा सुगको रखमामे लाभहानेपर या म्यूनहोनेपर पुगममात्समस्तुस्यो- पुग-सम-उत्सव' । मुत्या]-पुगके जन्म के हपसमान पा पुशके सामने हर्ष होनेके सदृश पेयाकरणो मम्पते [वैयाकरणा मम्यते T ]- प्याकरता वा व्याकरण की जाननेवाला मानता है ॥२॥ TOREDITOMORire मर्द अध्याय- सप DARBOARODERODMIRDOINODMRO H पयनिवासी मगरमसहाय पीला पदवेद और पिमफ्स्पर्प सहित ससिदिपिका शनशहिन्दी अनुपाद मध्याय २ प५३ (बामदेदमा पामोरमा वमोहोचमपुरषा)पाठो में से कोनसा पार उमास्वामी स्वर।वास्वपमें हम इस प्रश्नका उत्तर एनमें असमर्थ सिद्धि पौविसहरनेरेसिपमारे पास नदी सापनी मेरम समप ही है परंतु निम तितित हेनुमोसे यह काम परवाह कि दोनों मित्र५३ मामा "चरमप सप पायसे उत्तम और सारे मनाने की विधि अनुहौर यही पाठ उमास्वामी छत होना चाहिये पयोहर (4) पप्मदाम (स पर मारे पहर सांपतिनिधि वस्पायरामवाति भतवायरीटी या अपदमीमा यवनिकामे भी है और हम सिर परपुरेकरमदेवा" कापी भर्प है जो वमोचमदेहा"का श्वेताम्मर मानायकी मीयकी निप्पणीस प्रतिभास होवाद विरमक पय मी पपायम भरमार पाठ था मचिरमोतमपुम्पा' अपरमदेवा। वही प्रयासमोत्तमदेवा' का सप मापाय 'सहम गएका प्रपान निष्कारणों परते समीपपातिकस्यादि परमेस्पेताम्बरीप टिप्पणी पहाईकि"उचम पुरुषसे पहां तीपार पायर्ती मरेप वा मासुरेष माविका मार है। ईरते हैं कि सपमै उत्तमपुरका प्रहब नहीं है वो तीपकरादिषका माणस होगा? इसपर करते विपरमप्रारसे तीपराविका प्रहस होगा। परिषरमारीरी उरामपुरष अवश्य हाते है और रसम पुरगॅमा भमदेह प्राप्य है।सरेलुसे परम पुरुष प्राप मनाप है। दोनों प्रकार भाम्य है। भनिन्दित होमेसे प्रपम उराम पुटप ग्रहण किया और तीयकपदि उसका विषधिया और पुन तरपा राम पुषका माण पिया, परन्तु मिरुपक्रम सोपणम पनस या संबद भाप्यस होता है, भवएप उसी माप्यवार भाषक मसिमे रराम पुण्य प्राक्ष पिया।पा भी पही सममन्ना भारिप (क)श्वेतामर और दिगम्बर सम्प्रदायोंका परमपाठ मिसवा और परमोरामदेहा।" और "परमहोत्रामपुरपा" पाठ मिलान नहीं रते। (3) म परेवानेसे अपने पात ठिसा होगाती है और पमित्राय या परिणाम कुछ भी नहीं मिलता फ्याधिकोपरम उत्तम सवाला पिए पर राम रामो परम देवगायावा पिशेपद कात है) को परम शमका उत्तम शाप पिशेषस मासाते है।)रत्तम रामधे परम राबका पिएपण ते देवो पृष्ठ १५८ तनी कठिमाईयां उमास्वामी उपम' शापसाफर क्योऽपसाते (2) प्रसन्यासमायुकालमोचममूर्चया। दबाब नारफास्वैपामफमत्पन पिण्ा भी अमृतधारित तस्यायसारणासोपान १० गीपर शास्त्रीनीचे पक्ष मे अनुपार सरनेम इमारी समति अनुकूलधि 'परमवह वासे' सब मनपर्पभायुपा होते हैास प्रकार मनुषण किया सस्पात बरे प्रायुवाले भौगभूमिम मनुष्य र तियव कम मूमिफे उसी शामसे मुक्त होनेवाले मनुप्प वया, रेप मारक-ठने सीोचमी भायु मिपत गुमा हो उसमयमादि मिनितों से अपपात नहीं हो सकता है। पापि मम्तएव पती मादि पसेर बिपिनका शरीर उपसगों से विदीयं किया गया था परम्नु मोम मनपवायुवाल ही मानतई । सूत्रकारने तपा इस प्रपके अनि भी ग्न परमारीरी जीवों के मायुको प्रमपपत्य सिबाहिये उत्तम हो। परम्नु रामा मप चरमशरीरी फेवर प्रशंसा। भपिक इन मी नियम नहीं सममना बाहिपे मोवामी जीप पर ही मनपवायापुपाल मानने पारिपे । रोपजीपों का पात हो सन्ताओ होम गरमध प्रर्य माणामियोमेसे विपरिणताकाबले भयवा कामदेवादि पदवी युक्त ऐसा वर ठीकमही क्योंकि परमगरातो अनमो प्रधान पतिः पापबन भी जिनसेनादायके महापुपर पर्ष ३५ में हिनावी समर्प पाकिमण भोर पावती ये रोगो मोषणामी जीपाला नहीं बिगह तामात रमणीरी मेरा रिसाकर अप मानेसे मी यही बात सिरोपी पिाम पप्मपरी गीप कीमनपपत्यांची दोनी चारिसे । विष पना, रकमगलात वासावरोपापा मादार मिपेप ममप मरोबार (१०वीपर मनुवादित परवाचार शुदित पराम राबधिमा विसपा मुम्हाला भीरमी 184D OCOOOOOOOOOOMore औपपादिका व्याख्याता देवनारका इति ॥ चरमशब्दोऽन्त्यवाची। उत्तम उत्कृष्ट । चरम उत्तमो देहो येषां ते चरमोत्तमदेहा । विपरीतसतारास्तज्जन्मनिर्वाणाऱ्या इत्यर्थ ॥ असंख्येय- सिन्द्रि सत्र५३ न्याय, मतीतसख्यानमुपमाप्रमाणेन पल्यादिना गम्यम् उत्पनुपादः भोपपादिवाल्पाम्पावाप-नारका भाविक-उपपाद नन्मसे उत्पनहोनेगसे(४६पासूममें करेगये हैं () देव नारकी पम्मशम्दा मन्त्यमापी उचपा उलटा (मत्रमे परम शम्म मन्तका( भन्स्य) षोपी रचम है सो उस्कार, भेष्ठ है। १३१ परकाप देर । येपाम् । ते परमोचम-दश मन्तिम भेष्ठ है शरीर मिनका परमोचन देसाले हैं मर्याद परमोचम शरीर मिनका ये परमोचम देशके धारी हदेश पिशेषण परमतत्तम शन्दी। विपरीस-संसाराः वन-मन्म-निर्यात-मः, -छूटनेवाला ससार मिनका उसीजन्ममेंपामवौ माघहोने योग्य ( ज्मन इतिकममवीन संस्पानम्।"मसस्म्पेयम् ॥ -एसा भमिमाप है। गणनासे रहित है सो असण्यावर उपमा-प्रमाणेन पम्यादिना गम्यम् । -उपमाप्रमाण(-उत्तप्टममाणित पन्पमादिसभर्यात्मदापम्यादिक्सेनानीमाया (म)जिसमे थोड़े मर हो सो सहरहित भर्यवाहारो सारगर्मित और पृया राम्वसे रहित हो उसकी सूत्र कहतेईजेपाधि निम्न लिग्नित साकस विदित है और यारपको पदि के रखनमै मापा का एक माषाका भी साम रोशाय तो रसको पुरके सम्म सराल होता है अप जैसाकि निन पर रन परता है मितने उपर्युक गुण सूत्रमें होना पाहिये पे समस्त सम्मपिसे देखनेपर 'परमदेवा. पाठमें गमित हैं क्योंकि उत्तम सपके मसानेसे सबका प्रथम गुप योड़े अपर' की निप्पत्ति होजाती है। इसी को पाठमें म तानसे सूबका मर्य सम्पा संदेहवीत सोपा सापा स्पर और सरल होजावा हैम्प करनेमें इसको समझामेमें कप भी संवेदनहीं रहवा । एसे 'चरमदेवाः पाठ सूचका रिवीय गुण कि संदहरहित मप पासादो पूर्ण करता है। उत्तम सम्मके निकालभैसे सार-सत गर्मित सत्ररहजाता है इसमकार स्त्रका तीसरा गुण पूर्व एमा जप उत्तमराय पाठसे पयत् करदिया तब म्पप मौर निप्पपोसनीय भाग निकल जाता और सुरके बोयेगणकी कि साम्पथ रामोंसे रहिवहो पूर्णता हो जाती है। साफ ॥१॥ पाचरमसंदिग्ध (अपमवरम् ।। मसदिग्पम् ॥) पोड़े अपरहो- संवेदरहित ( अपपुक्त) सारवाविरक्ती मुर्व (= सारवान् विश्षतामुपम् ): स्त या सार गर्मितहो सर्वत-पिश्षता मेष्ट (मम्प) हा मस्तोमानव व (प्र-स्तोम मनप)-निरपरापास्तोमरहित [M] भोर-मापस पविदो सूर्य पूनषिदो पिपुर [-सा सूविया विषा J-गाहाता [उसका सशकहते हैं। सोपारा पकी पार्वमाशापा[पभषा भवमागाया। ] एफ मयया भाषी माशा सुगस्य हतिसावे [-समस्याहविनासावे व ]=सकी रचनामें खामहोनेपर या म्यूनहोनपर पुगसम्मोत्समस्तुस्पो[=पुग-सम्म-उत्सव नुस्पा ] -पुमके जन्म हर्पसमान वा पुसके सम्मम हर्ष हानेके सण वैयाकरपो मापते [पाकरण मम्यते T ]-प्याकरसाता वा म्याकरण को जाननेपाला मानता है ॥२॥ OT.COMORRO -- मार्थ अप्पाय सिद्धि सुन्न५३ १३२ FOOTBOAD आयुर्वेषो त इमे असख्येयवर्पायुषस्तिर्यस्मनुप्या उत्तरकुएंदिपु प्रसूता ॥ औपपादिकाश्च चरमोत्तमदेहाश्च असंख्येयवर्षायुपश्च औपपादिकचरमोत्तमदेहासंख्येयवर्पायुप ॥ वाह्यस्योप- घातनिमित्तस्य विषशस्त्रादे सति सन्निधाने ह्रस्व मवतीत्यपवर्त्यम्।अपवर्त्यमायुर्येपा ते इमे अपवायुष । न अपवायुष अनपवायुष । न ह्य पामोपपादिकादीनां वाह्यनिमित्तवशा- दायुरपवर्त्यते इत्यय नियम। इतरेषामनियम ॥ चरमस्य देहस्योत्कृष्टत्वप्रदर्शनार्थमुत्तमग्रहण नार्थान्तरविशेषोऽस्ति ॥ भायुपायपाविमासस्पेय-प-भायुपः समायु निनकी व ये भसंस्पात पर्पमी मायुवा विपर-मनुष्या उत्तर-अल-मादिपु मस्ता प्रतियध और मनुष्य उधर अरु मादि (मोगभूमि)वियु उत्तम होते हैं (-ममता) पामापपादिकानापरमा चमदमसंगपेय और भोपपादिक और घरमा समदहापौर प्रसस्पेय वर्षायुप भौषपादिपरमाचवेशा स्वयप है। सा (म्य ) भोपपादिकमरमोसमदेर- मसस्पवर्मायुपा पागलपघात प्रसस्पेएपायुपमानका एमा इन्दसमास) दुमा । पारिफ अपिपात (घातक) निमिषस्य विपशवाद सविसभिधानम्-निमिधमे माएर भौर शस्त्रादिपके वशमैहोनेपर परमाती भगवति पापम् भपवर्यम्"मायु'- 4। पेसा अपवर्त्य है। न्यन होमाती भाग यापपर्य-प्रायुपा =मिनकी ते इतने अपवर्प भावाले हैं न अपरर्विमायुपमा भन् भपरतिमायुप न्यून भापुर पारी नीर सा मनपवय,मायताले नयपाभिौषपादिर-मादीनाम् । नियपस(वि)नाइन मौपपाविक,परमाचमदेवपारी,मोगभूमियोंकी,कुमागमूमिपोंकी पाम निमित्त वयादी माया अपरयताइविम्परिंग कारणोंफे परास प्राय पन होती है ऐसा भयम् नियम । इतरेपान भनियमा म्पा नियमामन्य(भीगोंडी भायुका नियम नहभियांत् देवनारकी,परमोसमदेशपारी भागमूपियोंफे,मागम्मियोंफे भतिरिक्त अन्य जीवोंकीसपपपर पस्पो का अकालपस्पुरोगापे मोई नियम नीnl परमपवितस्पटल-प्रदर्शन-मर्षमा -मना शरीरकी येठताके प्रतिपादनके शिय उत्तम-प्राणम् ॥ मन्मान्तर-निमारस्थितमराणा(मम्प)म्पादाम भम्प(विपी) विशेष पपामा सिपे मर्स DARDOIPRODaroeanceARDOI समकालQacOBara COMPADLABOICC १३२ सिद्धि -- सुत्र ३ सर्वार्थ अध्याय Bdoardledio@eueilOADERGadeRNORGONO एटानिवासी मगरपसाप पकीन कस पदम्पद भार विभक्त्पर्ध सहित सरार्यसिदित्तिका शम्मय हिन्दी अनुवाद मध्याय २ मूत्र ५३ चरमदेहा इति वा पाठ ॥ २ ॥ जीवस्वभावलक्षणसाधनावपयस्वरूपभेदाश्च घरप-देश इतिवमापाग भयवा('घरमा चमदेव स्थानम) परमदेशः'ऐसा(मीस्त्रका अन्य प्रकारका पाठ जीपस्थभारा भीमसमानदा चेवनक निममार पा सतत्वमाव (मत्र१) चेतनके निजमावझेभेद (दूसरे से साना मन्त्र पफ) भीषका लक्षण अदि मानिन नो जीवा मेदनान अन्य पदार्योंसे करासफेदसा पाठवां स्त्र) मीपशक्षणम् ॥ नीरसमसमेदार जीवका उपयोगम्य लक्षणफे प्रमद भार मानके माठ भद और दर्शनके पार भेद देखा सूत्र ९) मीपसापनम् ॥ जीयोंकी मयावा अयमा प्रमाण अर्थात् जीवोंकी संसाररूप और मातम मांग परना(साम्ब१०) जीवसापनभेदा भीषक सापन रा उपकरणकेमेद अर्याद दो मर्यादा मो ऊपर फहींगई। तिनके भेद (देवा मत्र ११, २४, १२, १३, १४, १५, १६, १७, १८,१९, २२, २३) नीवविषय -मीर ( की इन्द्रियों ) के पिपय ( देसो मूत्र २० और २१) जीर-विषय-मेदा -मीर(की इन्द्रियों) के पिपयभेद भाव ) शोष,उपणास्त, सपिक्षनकगर, कामल; हलका, भारी; ये सर्शरिपयके पाठ मेद है। ()तिक्त,कटु,कपायला, सझा मार मीठा ये पाच रस पियफमेद हैं (i)सुगंध,दुर्गम दा गपिपयके मेद (v)स्वेत,पीत,नान,मम्ण,और कृष्ण पर्णविषयक पोप मेद । (१)मच्छी-पुरो मिय-भप्रिय इत्यादिध्वनिमारनादाविकपेशन्दरिपयफमेद येसवस्त्र २०,२१मॅगर्भित जीवस्वरूपाचनीयस्तरुपमैदा-तनके निमभाव वा स्वतत्यभाव(सर)मौर(प,चेतना निजभावके भेद (दूसरसे साता स्त्र तरु) ( १ )"मीवस्वमायसतरासापनविषयस्वरूपमेदाश्च गतिसम्मयानिहप्तिानपपतितायुकामेवाश्चाध्यापेऽस्मिनिरूपिता मपन्ति रति सम्पम्पा वे दोनों पास पठिन और गंभीरतपम है इससे पृथप पथक पन्धेर करके भय किये गये है । (२) हमारी सममम स्थाप शत्र इस पारपर्म पथ और ममिक भूलते रूपगयाहै फ्याँहि स्वरूप म स्वभावश्य निसर्गश्वाप पेपयुः अमरकाय ग साफ मां के प्रथमपास प्रगट विस्वमाय ससमय और निसम तीनों शाद समामाया मोर पंपथ का अप परथराना या पनेका है। हस्त सिनिय प्रतिम भी पही पाठद उक्त जीवस्याप जीवस्वरूपमेद के वेही मह जो इस जीवस्वभाव और सीपयमावमे'के भयों जैसाकिनुपायस प्रगर हापदि म्यपावस्यामी में ही ऐसो रसना की है वो सरपमा शप्प पारम्मम ही पाप किया तो फिर स्वरूप शण पयोहा और किस अथ में सापेापाठक निर्णयक्त HOO.COEDOAUReade80- R BROOKERGROED -- म मर्य सिद्धि सुत्र५३ अध्याय १३२ खOOMDOAADODC आयुर्वेषां त इमे असख्येयवर्पायुषस्तिर्यमनुष्या उत्तरकुर्वादिषु प्रसूता ॥ औपपादिकाश्य चरमोत्तमदेहाश्च असख्येयवर्षायुषश्च औपपादिकचरमोत्तमदेहासंख्येयवर्षायुप ॥ वाह्यस्योप- घातनिमित्तस्य विषशस्त्रादे सति सन्निधाने इस्व भवतीत्यपवर्त्यम्।अपवर्त्यमायुर्येपा ते इमे अपवायुष । न अपवायुष अनपवायुष ॥ न ोपामौपपादिकादीनां वाह्यनिमित्तवशा- दायुरपाय॑ते इत्यय नियम। इतरेषामनियम ॥ चरमस्य देहस्योत्कृष्टत्वप्रदर्शनार्थमुत्तमग्रहण नान्तरविशेषोऽस्ति । भायुपायेगामाप्रसस्पेय-पर्प-मायुपः। -मायु मिनकी से ये प्रसंस्पात वर्षकी भायुवाले तिपक मनुष्याः। उत्तर-ना-भादिपु मम्ता सिर्यच और मनुप्प उपर कुन भादि (पागमि)वि उत्पन्न होवे (पम्ना ) सम्मोपपादिभावपरमातमदेशप्रसंस्पेय--और भोपपादिक और परमातमदहा और असम्येय पापुप मौरपादिष्परमाचमदेवा- पापुप है। सा (मत्रमें) भोपपादिफपरमोगमदेह- पसम्पपपर्यायुपा, बासस्पतपघाव मसंस्पेयपायुपमइनका ऐसा दन्दसमास) हुमा । पारिरके भभिघात (पातफ) निमितस्मापिपरासाद सविसमिपानास्वम्-निमिदमे मार और शखादिरके परामहोनेपर पटनावी भवति जाति, भपवपम्पपरपम्गमायु - है। ऐसा अपवर्त्य है। न्यून होगाती है भायु पषा तिमीपत-मायुपा मिनकी त इवन अपवर्त्य भावाने हैं नरमपनर्वि-आयुपपन् भापतिमापुर म्न्यन भायुके भारी नी सा अनपर्यं,मायनाने हैं नी येफाम भोपपादिक मादीनाम्।। निमयसे-हिनी इन झोपपादिक,परमाचमदेहधारी,मागममियोंकी,भोगभूमिपोंडी वाम-निमित्त मशाद माया अपयर्पयाइतिक बदिरग परणोंक परास माप न्यून होती है ऐसा भपमा नियमान इवरेपाम्।' मनियमः। पर नियमीमन्य(नीयोंकी भाषाका नियम नाभिर्याद देवनारी,परमोत्तमदेहपारी मागभूमियों के भागममिर्पोफे अतिरिक्ता मन्य जीवोंकीसमपपर मृत्युरो पा भाजपस्युरोमा कोई मिपम नदि परमस्यामरस्य सप्टस-प्रदर्गम-भवम्।। -मन्द शरीरकी श्रेष्ठता मविशदमके लिये रचम-मरणम् नपान्तर- विमति माया(मम्ममारपादान मम्प(किसी विशेष प्रपोभमके लिये नही रे OUREDOERDOSHDOHORO DOOTONT DROOTTOTT सिदि ॥ अथ तृतीयोऽध्यायः॥ साधा भवप्रत्ययोऽवधिदेवनारकाणामित्येवमादिपु नारका श्रुतास्तत पृच्छति के ते नारका इति । तत्प्रतिपादनार्थ तदधिकरणनिर्देश क्रियते ॥ ॥ रत्नशर्करावालकापकधूमतमोमहातमः प्रभा भूमयोधनाम्बुवाताकाशप्रतिष्ठाः सप्ताधोऽधः ॥१॥ भप तृतीय । अध्यायः = (मोन शास्त्र वा वत्या सूत्र का) तीसरा अध्याय प्रारम्भ(= प्रय) 1 भरसम्मः । अपशि । दयनारकाणां 'इसि एपम् = नन्पनिमिचा मपपिमान दव भौर नारकियों के होता है एमडी (= एवम् ) सादिपु । नारकाः श्रुमाः, = प्रथम (भभ्याप १ सप्र २१, अध्याय २स्प३१,३४,४६,५०,५३) में नारकी सुनगय है व छनिएकात। मारफा ५ इति ० वद् = उस कारण से (= ववः) पक्षमा है कि व नारकी कौन है। उन (नारकियों) क मतिपादन-मर्ये ।। वन मधिकरण-निर्देश क्रिपत= मनापने पापवजा देने के लिये,उनके भाषार(= निवासस्पान) का फयन किया माता है सूत्रम्-रत्नशर्करावालुकापकधूमतमोमहातम प्रमा भूमयो घनाम्धुवाताकाश प्रतिष्ठा सप्ताधोऽध । पदच्छेद-रत्नप्रभा-शर्कराप्रभा-वालुकाप्रमा-पङ्कप्रभा-धूमप्रभा-तम प्रभा-महातम प्रभा- भूमय घनवात-अम्बुवात-(तनु)वात-आकाश-प्रतिष्ठा (भवन्ति) सप्त अधस् अधस् ॥१॥ साथ -नरेनममा-शर्कराममा चालुकाममा = रत्न के समान दीप्ति,शर्करा के सदश चमक, पाल के सम मेलफ, पडूममा मममा-वमा ममा- = कीपर के साश झा, मनन् ममा, भषकार के समान प्राकृति, महातम प्रमा । ममय । = महा अंधकार के समान मखक (यथा गुण क्या नाम की) भूमिग (नारकस्थान) (मिनके सरिनाम घम्मा, पशा, मेया, भजना, अरिष्टा, मपपी मोर गायी है) (१) सभायाम पारा मम्न मै प्रधिकार मिमका अर्थ पत्र प्रतिपय मषित पिशाम होतो गर है भर्यात् कार मार दोरी बोटी तमी पानिवासी जमस्ससहाय कीया पदरद भौर विमस्पर्प सहित सार्यसिदिाधिका शम्श हिन्दी अनुवाद अध्याय २ सय ५३ सर्वार्थ भध्याप BOU.BLEXILD सूत्र५३ गतिजन्मयोनिदेहलिहानपवर्तितायुष्कभेदाश्चाध्यायेऽस्मि- सिद्धि निरूपिता भवन्तीति सम्बन्धः।।इति तत्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धि- सज्ञिकायां द्वितीयोऽध्यायः॥ 4 बाठियदा जन्मभेदो पानिमे देरमेदाः। जिमेदा।। मनपपर्तिक-मायुपमेदा।। मध्यापास्मिना मिरविता मान्ति प्रतिसम्बया (4) और (नीर पुनस) गमनक भेद ( २५ से ३० मन पर्पत) (मीवर ) नया शरीर धारण करन भेद ( ३१, ३३, ३५, २५ मप्र) (नीप) उत्पषिके स्थान(नोमेद)पचीस स्म । शरीरोंकेमद (३६से ५६सत्र पर्पत) लिए वा पेरोंके मेद ( ५०, ५१, ५२, सूत्र ) म्नी पटनाग्य श न्यून हानेयोग्य भायुमाओंके मेवा देखा प५३) मस (अस्मिन् ) (इसरे ) अध्यायमें पणिस पा कांगये में (मपन्ति ) ऐसा संबंप मपरा सयोग र मर्याद इस दूसरे अध्यापमें उपर्युक पखमों मा रिपोका यम | REDIRLDOHOROLARKUKDGMOdARCORNDOOO ADONDI सज्ञिकायाम्। इतितत्त्वार्थ-वृत्ती" इसप्रकारतत्वोंकेस्वरूप(अर्थ)विवरणम[-वृत्तौ] सर्वार्थसिद्वि -सर्वार्थसिद्धि नामक(ग्रन्थ)में द्वितीयः अध्यायः" दूसरा अध्याय(समास)हुआ॥ * मंगलहो * सिदि ॥ अथ तृतीयोऽध्यायः॥ S993 भवप्रत्ययोऽवधिदेवनारकाणामित्येवमादिपु नारका श्रुतास्तत पृच्चति के ते नारका इति । तत्प्रतिपादनार्थ तदधिकरणनिर्देश क्रियते ॥ ॥ रत्नशर्करावालुकापङ्कधूमतमामहातमः प्रभा भूमयोधनाम्बुवाताकाशप्रतिष्ठाः सप्ताधोऽधः ॥१॥ भष सृनीय । मध्याप = (माज शास्त्र या सस्वार्थ सप्र का) तीसरा अध्याय प्रारम्म(= अप) र भरमस्ययः । अपधिः । देवनारकाणां वि एपम् = मन्पनिमिया भवपिज्ञान दम मोर नारकियों के शोवा । एमी (= एवम् ) लादिपु . मारका । शुमा, = मथम (अभ्याप १ सुप्र २१, अध्याय २स्प्र३१,३४,४६,५०,५३) में नारकी सुनगय हैं मतः प्रतिकात मारका!। इति वद् = उस कारण से (= तवः) पूछता है कि व नारकी फौन है। उन (नारकियो। क प्रतिपादन-भयं ।। तत् मधिकरण-निर्देश क्रियतT = गनापने या पतला देने के शिये,ननफे भापार(= निवासस्थान) का फयन किया माता रे सूत्रम्-रत्लशर्करापालुकापकधूमतमोमहातम प्रभा भूमयो घनाम्खुवाताकाश प्रतिष्ठा सप्ताधोऽध । पदच्छेद-रत्नप्रमो-शराप्रभा-वालुकाप्रभा-पङ्कप्रभा-धूमप्रभा-तम प्रभा-महातम प्रभा- भूमय घनवात-अम्बुवात-(तनु)वात-आकाश-प्रतिष्ठा (भवन्ति) सप्त अधस् अधस् ॥१॥ सत्रा-रत्नममा-शर्कराममा वास्तुकाममा = रत्न के समान दीप्ति शर्करा : साश समक, पान के सम झलक, पङ्कममा मामा-तमः प्रमा = कीपर के साश झलक, घमवन् ममा, अवमार के समान 'पारुत्ति, महातप प्रमाः । भूमयः । = महा अंधकार के समान झलक (यया गुण तथा नाम की) भूमिग (नारफस्यान) (निनके सरिनाम पम्मा, शा, मेया, प्रजना, मरिष्टा, पपपी मोर गायत्री ) (१) सगाप्य में शतरा अम्त में मभित दैजिममा अर्थ सम प्रतिकार मधिर शिल हातो गाई अर्यात् ऊपर पर पोरी छोदी तमी 1989222 स माभ सिदि पानिमासी गमपसाग खोल कर परसद और रिमास्यय सदित सर्वायसिदका शम्मश हिन्दी अनुवाद | अध्याय ३ सूत्र । रत्न च शर्करा च वालुका च पङ्कश्च धूमश्च तमश्च महातमश्च रत्लशर्करावालुकापङ्कधूम- तमोमहातमासि । प्रभाशब्द प्रत्येक परिसमाप्यते । पनानुशत-(१) =पन (= स्पस) उतरि (भम्यु, जस) (परन) भर्षाद घनोदपि वासबलप। = पन (सघन, स्थस) पात (= पान, पयार) अर्थात् यनरवरसप । (मन ) बाल-पाचश-प्रविष्ठाः । मनम्ति T =उनुपरन मा सम्पपायु अर्थात् सुस्मातरचर, और प्रकाश प्रापार का भाप रे भावार्य य भूमि घनोदपिपातरजय मो सघन पवन पोर नसमिथित है, माधार है, घनादपिताप्तरखप पनवातपय कमो स्पून-सघन रायुमाश्रय है, धनवानवलप तनु- पानस्लप के बा सदमपापुका है माशर और अनुपातपलय माकाश के भाषारी और भाकाश अपन भापार है और स्वयं भाषेप है उसका कोई भम्प भाशर नही इसलिय या अपन भाप भापार है। मा. - (प भूमि सर) सात (सी) (भौर मम स एफसर क) नीच नीच हरी पृष्पनुवाद पल शर्करा व पालुम । = और रन और शर्करा (करीसी) क्या गाभा पापमतमा २ पाप = महरि पा र पम भीर तम तथा मातम (शब्द भाषस में) का-प-म-तमा मातमांसि ; = रस्नशर्करामालुमाकरमतमोपहातमीसि रूप में इवरेइतर पोगदद समास है। पभागना प्रस्प परिसमाप्पवे T = प्रमा शब्द पृथक् पृथक रस्न, शरा, पाशुमा इत्यादि पर मोड़ा भाता है। मागे रसके गोब को विद्या पियास बराममा तपार्य गमवानिक पृष्ठ १२ कातिक ११ भमुमार यहो मी पिसी रिसी मावा मै 'शरा" पार मी मन परानो माम्मायों में सौर म एकसा दुमा । परन्तु पानिकारका मनकलप्रभा भूमिमै गाय प्रत्यय का मजाम् नाही बोलता TRI TARर मामन रम समायोकि हमसे माप पर भूमि विकार पना मायू रात तो रकममा से पूरा मामताwि सोतो नहीं इसलिये पुगतरा* लेख को मावश्यमानी (१) पासप वातपाटी पर यहां पर पणेष समास मामा पाप समासा पर नियम मिसपो में एक भवति माता मम मोप हो जाताभलिये पहां पर एक बात समभोगगया पबिऐ गमावान रामह पर पनामपि पात भोर धनबाद समझना चाहिपे तया पर मामा सनुल विशेष की भावना मEिI कार से पt कात का भी महप रेखमकार पनाम्पु वनोदधिषात पहाव और तनुपात रन तीन पातरी पाक रस्त शारापातका- . स सिदि %3D PIA एटामिषाप्ती नगरपसहाय पील कृत पदावेद मौर विमास्यर्थ सहित समार्यसिदिका शनशा हिन्दी अनुवाद मागाप ३ सप १ साहचर्यात्त'च्छब्द्यम् ॥ चित्रादिरत्नप्रभासहचरिता भूमि रत्नप्रभा, शर्कराप्रभासहचरिता भूमि शर्कराप्रभा, वालुकाप्रभासहचरिता भूमि वालुकाप्रभा, पकप्रभासहचरिता भूमि पक्प्रभा,धूम प्रभासहचरिता भूमि धूमप्रभा, तम प्रभासहचरिता भूमि तम प्रभा, महातम प्रमामहचरिता भूमि महातम प्रभा इति ॥ एता सज्ञा अनेनोपायेन व्युत्पाद्यन्ते॥ भूमिग्रहणमधिकरण विशेषप्रतिपत्त्यर्थम्॥ यथा स्वर्गपटलानि भूमिमनाश्रित्य व्यवस्थितानि, न तथानारकावासा । किं तर्हि भूमिमाश्रिता इति॥ सावत् ।। = (रत्न-शर्करा-वालुका भादिकी प्रपा ) सरशहानेस पा सहपारी दोन स सात्-शयम् ।। उन (भूमियों) फ (रत्नप्रपा, शराममा, पालुकाममा प्रादि) नाम परेगये है मिप्र-शादि-रत्नप्रभा-सारिता । ममि ॥ रत्नपमा। = विपादिक रस्नों की दीनि सहश पृथिवी सो रत्नममा। शर्करा-प्रभा-समरिता । ममि ॥ शर्कगपमा । = फरकी दीप्ति सदश पथिषी सो शगममा गाल काममा मारिना। भूमि ।। वालुकाममा ।। = व लका की धमफ सम पृथिवी सा वासमा प्रभा है। पशुपमा । मानग्तिा ममि ।। ममा। = बीयह भया रदम की मला सम पृथिवी मो पापमा ।। यमपमा । सामग्मिा । पमित है। घमममा । धंगा की दीप्ति समग पृथिवी गे घपप्रभा है। तम पपा ।। मामग्विा । भनि तम परा। = प्रसार फी मशक सम पृयिवो सो समप्रभा है। मातम पपा । सारिता ।। भूमि ।। = मपन्त भन्यकार की प्रमा तुम पीवी महातमा प्रमा।। इनि 1 पता । संज्ञा ॥ मनन । = सो महातमः प्रमा है। ग रत्नममा, शम्गममा मादि) TIR(= मनेन) उपागन । प्यूपायन्त | = साश्नकरि निरुक्ति मियाय है भपात ध्यातराको गतिम सिद्ध कियगप है। भूपि-चा|| परिका-विशा-निमि-प्रयम् ।।।। = इस सत्र में) भूमि शब्द)का पादान यापार नि नाम क लिय।। गया मा म नि !' भयिम्।। अनाविपस्थितानि = जैसे रसगर ल भूमि का मागा न र के पृषा व्यवस्थित पाठारे हुए नमधा माफ-भावासा" = वैसे नारकियों के पासस्थान नहीं है अयान उनक नासस्णन मयिक मापार है Ha भूपिन् । । अनि । इति . = तो ( = तरि) ममिको पपा मापार-माधारण मर्याद किसस विठी ३ समायरा ४ १ सिदि एनिवासी मगरूपसराय पीज कृत पढच्छेद भार विभस्त्यय सहित सर्वासिदिका शम्दश हिदी गनुपाद अध्याय ३ सत्र ताप्सा भूमीनामालम्बननिर्मानार्थ घनाम्बुवातादिग्रहण क्रियते ॥ घनाम्बु च बोतच श्राकाश च घनाम्बुवाताकाशानि 1 तानि प्रतिष्ठा आश्रयो योसां ता घनाम्बवाताकाशप्रतिष्ठा ॥ घन च घनो मन्दो महान् आयत इत्यर्थः । अम्बु च जल उदकमित्यर्थ । वातशब्दोऽत्त्यदीपकः । तत एव सम्बन्धनीय । घनो घनपात । वासा HI पीनां । पालमन-निदान-मथम् ॥ = तिन ममियों के भासम्बन क निणय लिय भर्यात् नो भूमि नरकॉरा भव- लम्पन पतलाई गई तन का भवत्तम्मन क्या है। या मार करन क लिय पन-मम्यु-पात भादि पाएं । फ्रिगत 1 = (सूम में) पन-मम्मु-पासादि (वाफ्य) का गदान किया गया । घन- भम्।।। च * चाप्त । प. भाभा * = पहुरि घन-प्रम्बु(= महान् उदक और माम और माकाश शम्दोका दद समास पनमम्बुरातभाकागानि ! ; तानि । = घनाम्बु-बात-माफाशानि है। त (घनाम्बुवात-प्राम) प्रतिष्ठाः भाथप १ पास पनाम्मु - मापार पा भाभप निन (ममियों) का सघनाम्युजाताकाश पातालाशपतिष्ठा ॥ = प्रतिष्ठा(कासाती)र भयात् सात नरकों को भूपिये मामलानमाराकमाया घन ॥ ५० घन । मन्द महान् | भापत १ = परिघन है सो गाढ़ा = घन) मोगा( = पन्दबहा (पान ) लम्बानीरा भायत इति-भय = एसा माशप रे, अर्याद घन, मन्द, महान् और भायत समानास्वापी गन्दी भम् ।। पमन ।। उदकम् । इति पः। = और ममा रेसोपानी,नीर ऐसा भमिमापी (अम्यु-मल-उदक एकापी ) पाव-शम् । अन्नप-दीपकः । = (सम में) पान शब्द (धन-प्रम्खु के) भन्स का प्रकाशक १ भयान् घन पौर मम्बु प्रस्पक शम्दफे भन्वय रानपाखा उसको प्रस्याक सापभोग्दो । नमक ए० सम्मन्यनीप। घन । फनपाता। = विस स ऐसे समन्म होना सरिये, कि ( घनाम्पात पापपमें) पन है सो पन पाती मर्यात् पनपावरबसपा सो गारा स्पक्षका सपन पवना है। पिनुपरसस्वा पाय वापत्र गुण एष वने-चीन में- ४ मेषि पेशा पानाप पर मिषित गन्ती नियमान है।

सिदि एटा निवासी मगरूपसाप बीस हच पदच्छेद और विमररपर्य सहित सार्यसिदिम शम्दशः हिन्दी अनुवाद अध्याप ३ स्म । अम्बु अम्बुवात । वातस्तनुवात । इति महदपेक्षया तनुरिति सामर्थ्यगम्य । अन्य पाठ ॥ सिद्धान्तपाठस्तु घनाम्धु च वात चेति वानशब्द सोपस्कियते । वातस्तनुवात इति वा ॥ ] भमा भम्पुपात = मम्युरे सो अम्बुमात है मर्याद सम में "घनाम्मुगात" पारप में मो भम शमा उसका मम्युगात के सपान पावशम के अन्त्य दीपक नसे समझना पाहिय या पायुमडल नल मिश्रा है भत इसको पनोदपि बातपलयकातर॥ बाव वनुवरातः । इति ० मा-अपेक्षया ।। = यावर सातनुमात ऐसे (सत्र में घन-सपन की (= माद) अपना स तनु । इदि सामर्थ्यगम्य = सझम ( = सन) सगत भर्यता से प्राप्य र भर्माद 'तनु' शम्मकी प्राप्ति यहां माशग क प्रसग सहुरे क्योंकि मप सप में धन (सघन बसालोधन तो पो विधमान सकतारमौर उसी समय सप्र में जासकते हैं मम उसका रिरीक सूक्ष्म या तनु हो । सनुपात सम्म वा पतल वायुमरल को कान हैं। अन्य । पाठ = (धनं प पनो इस्पादि सामर्थ्यगम्प पर्यन्त) दसग मा पिन्न पाठ हुभा सिद्धान्य-पाठ। * पन-मम्मु प पाई। प इति = परन्तु(= तु)सिद्धान्त का पाठ घनाम्मु भौर (= घ) प्राप्त एसा है पातराम्बी सोपफिपता = (घनाम्प) पातशमऊपर स माहागया (सब) पनामुषात, घनपात हुए पापाता। वनुमान। इति ॥] = मौर(= पा) पाव है सोतनु ‘सम्म) पात है य सय मिलकर घनाम्बुवात धनपाव तनुपात हुयं । 'पनामुपात' वाक्य का यही किया है मो सिद्धान्तक पाठक अनुक्ल लकर स" पा गया है (दसो ३ अध्याय पृष्ठ २) . ५ साया ( सिदि एटानिवासी मगरपसाप वकील कृत पदच्छेद और विमारपर्थ सहित सवार्थसिद्धका शम्मश हिन्दी अनुवाद । अध्याय ३ सूत्र १ सर्वा एता भूमयो घनोदधिवलयप्रतिष्ठा । घनोदधिवलय घनवातवलयप्रतिष्ठम् । घनवातवलय तनुपातवलयप्रतिष्ठम् । तनुवातवलयमाकाशप्रतिष्ठम् । आकाशमात्मप्रतिष्ठ,तस्यैवाधाराधेयत्वात्॥ त्रीण्यप्येतानि वलयानि प्रत्येक विंशतियो जनसहस्रबाहुल्यानि ॥ सप्तग्रहणं संख्यान्तरनिवृत्यर्थम् । सप्त भूमयो नाष्टौ न नव चेति ॥ अयोऽधोपचन सर्वाः। एता ' ममप || घनादपिरष्ठय = समस्त य पृथिवी घनोदपिवनय क (मो मल और पवन मिश्रय) मर्थात् धनादविवाम निसी गीली या भाद्रमायु। प्रतिष्ठाः ॥ घनोदपिनक्षयम् ।। धनपाववक्षप =भापार (= प्रतिष्ठा) घनोदधिषलय धनमातमलयफ (मो सघन पवनका १) मविष्टम् ।। धनरामरसय वनुरातचञ्चय = प्राश्रय र ।। बनवातपतय सनुवासयलपक (मो मन्म, पसली वायुका ) पनि नुवातपाय। पाकाश-पवि।। - मापार ॥ तनु रामपलय भामाशके भाधार । भामाशा मारम-भविष्ठा वस्पा पर भाचार माकाश अपन ( = भात्मन्) भाषार । पयोंकि तिस (भाकाश) फेदीमापार भाषपत्ता = भार भाषयमाषी अर्थात् पर स्पय हा माघार मौर स्वप ही माघेपरे श्रीणि॥ भपिएतानि पनपानिपत्यकम् = य तीनों ही वालवलप पृषा पृथक् विंशति-पोमन सासचाम्पानि। सप्तप्राणम् ॥1 -पीस हमार योगन मोर। सूप में 'सप्त' शब्द का उपादान संस्पा मंवर निवृति-मर्थम् । सप्त । ममः ।। = अन्य सरस्पा फ निराकरण के लिए है। सास की पूथिनी । +मष्टा । न नया पावि भर मय जानना =न भाठ और न नी । सत्र में भयो भगे (नीचे नीचे) वाफ्पी सो भूमय पनोदपिपाप प्रतिष्ठातावाश्मोक पार्तिको रमपिता और ध्रुवसागरिमरिक मतमें ये भूमिपर्ण पनपान सपके भापार है मोर मापनप सम्पुषातपाय (मर्थात् धनादपिपातपनप) भाधार है और प्रम्युषांतवलप उनुपातयलय के मापार है भाषा तायाराम पानिरपरक, सशसिविक सताम्बर माम्मापके समाप्यततार्थापिमममत्रा भनुमार तथा प.अपवनराम श्री सदासुन मी स्पारिक अनुसार ता य समस्त पपिषी पापिय माधार और पनारपिनातवमय पमपातपलप भापार और पनवातसवय तनुपातवलपके मापार नुवानयाप प्राचोभापार पगार• पीर पुनसागरोटोकाचे मनुमार भूमियो पनगतवलप मापार भीर पापमय पमोरपिसाप मापार प्रता निम्मतिविनाम से प्रगर ti(s) स तन माता पनातरण स्थिति तोपि मोति Erces HAKREE एरानियासी भगरुपसाय पडील मत पदन्छन भार रिभात्यथ सहित सपिसिद्धिका शम्दशः हिन्दी गनुपाद अध्याप ३ सूत्र १ सिदि मर्ग-प्राममय (-घनो विधालयमय) वा तमुपातबस्सप मापार है (सारे सम्पुयातयनपरि) धनवातसय की स्थिति का भारत और पद पवात (पलप) भूमि मिति काम है।मृमि को वितरितु पारादि नही पायसाकपातिक पृष्ट ३४ ॥ (a) mali सम भूमपा पमपात प्रतिष्ठा वर्तन स प पायात प्रभातप्रनिष्ठाऽस्ति । स प अनुपात तमुमतिप्रनिष्ठो पत। सप तनुवात मालयप्रतिष्ठो पर्तन एपादिमी सूप मोघ भुतिसागरिका पृष्ठ से ग्यतः सर्वार्थ सिविपत्तिकारका मत पृष्ठ । मैं रोज करदिपाई। सपना भमपा पनारधिकतपप्रतिष्ठापनारपिवसर पनयान ঘনঘমলি, ঘাষায নুদানবশিষ্ট সমন্বয় मानाशप्रतिष्ठम् राजपानिकपुष्ठ १५२ ॥ ताय सरपुषिषी पपतिष्ठा पापनाधियलयप्रतिष्ठा पनापिषलप प्रमयात सात भूमिया पसपप्रतिष्ठ । तता महातमा मनमाहाशम् । समाप्यतरपार्था साद ममियां धिमा पठ४ पमोरधिपातपात RECReceeeeeeeeGEEGREEGaseges घवातवमय अनोवधिपातवनय तनुपात तमुपातपसय तोमसो तमाम पमनाघर सपना पनापि पन(पान) तनुवात कमायार है। कविवर घागताप घरचाशतकसे ग्दाम । देसा। सर्वोघमाधिवातवलप (ओजस भीर पन मधित )ता मापार और घनादपिकातयलय यातायापार और घमसातवाहय तनुगामयाय मापार : "ए भूमि तो पनाभिवातयत्वयक माधार है। परि घनोदधिवातवरूप घनयावयापप्राधार वरि परमानवलप तमुवातपय माघार है । तनुपातयतप भावाशके प्रापार जपवम्बरायजी पता वधमिका पप्ठ मुदिन २६ । 'तोते समस्त पुगियो तो धनादधिवातवलपक मापार और घनोदपिघातपाय है सो घनयातवमया मापारमर पनपातयलप है सो तमुरातपाय रे मापार सासुबमोहना मानित ७ ए साय - एटानिधासी मगरमसहाय पीन कृत पदमाद और विभारपर्य सहित सपार्थसिद्धिका शमशः हिन्दीमनुगाद । अध्याय ३ सूप १ और २ तिर्यक्प्रचयनिवृत्यर्थम् ॥ किं ता भूमयो नारकाणां सर्वत्रावासा आहोस्वित्त्वचित्त्वचिदिति तन्निर्धारणार्थमाह- ॥ तासु त्रिंशत्पञ्चविंशतिपंचदशदशत्रिपंचोनैकनरकशतसहस्राणि पच चैव यथाक्रमम् ॥२॥ निर्पक अपप-निमृति-मर्थम् । = चौरस (तियक ) मा तिरछा । विर्यम् ) पलाव (= प्रचय) के निपप क लिय भर्थात् य पथिरी पर सरके नीन २ मा स्थित है तिरछे, पौरस,फैलास मा अर्थ में नीर किम्ता भूपया नारकासाम्'। समप्रमापासा: 1 = (प्रश्न) मा त भूमिये नागकियोंफ सर्वत्र पासस्थान रे भास्सित् पापित पित् इति • नद = प्रयषा (= मास्मिन् । फी फारी पर है। इस (आम) के निपारण भर्थम् । मा = निणय लिय (मनिम सप्र में कात कि- तासु त्रिंशत्पचविंशतिपचदशदशत्रिपचोक्नरकशतसहस्राणि पच चैव यथाक्रमम् ॥ २॥ = सानु विश्र्वनर कशवसामाणि पयविंशतिनरफशवसासाणि, पमदशनरस शवसामाणि, दशनरफशतसहस्राणि, पिनर कशवसामाणि, पपानएनरपशनसामाणि, प, १५ पर यथाप्रपम् ।। २ ।। सवार्य ---तासु शिवनरकशवसाम्माणि = उन (ममियों) में तीस लाम्य विज (= नरक) पारिंगनिनरमशतसामाणि पश =परपीस लाख पिड, पा नायतसामाणि दशनरकाशनसासाणि 'il - लास्व विज (= भाषास) दश शास्त्र रिल (= निमासस्थान) समामा माम्ना ममाप्पनस्वाचाधिगमसूत्र में इस सूचक स्थानमे सास नारा पलतमा सामाजिउम (अप्रभारि भूमियो) म मर और उममाप्प माप्पकारने इस पाकि प्रथम ममिम तीसलाण विमरीम पचीसबाब तीसरीमै में पदाबान बीयौमे शाम पापी मे मोमबाग पोमे परिपारि एमाण और सातपो भूमिमै पम पावरबिले पा निपामान माप्नमें अम्तगत कादिया मोर मी मप्र म पम पम विपरिभूमिमे तमामे पार नीराम नब गोगामे बात की पचि परमो में वोन सी एस प्ररमित । मातार स्वामी प्रमानापन इसो ममरा ति बिमामे मारे सद IRA पानिपातो मगलसराय रोल न पदपद मार विभारस्य सहित सायसिदिरा शमन हिन्दी मनुवाद प्रध्याय ३ सत्र २ तामु रत्नप्रमादिषु भूमिपु नरकारायनेन सख्याय ते यथाक्मम् ॥ रत्न भाया विरान्नरकशत सहस्राणि,शराप्रभाया पञ्चविंशतिर्नरकशतसहसायिा, चालुकाप्रमाया पञ्चदश नरकशतसहसाणि, पहप्रभाया दश नरकशतसहसाणि, मप्रमाया त्रीणि नरक रातमहसाजि, तम माया पश्चोनमेक नरकशतसहस्र महातम प्रमाया पञ्च नेरकाणि ॥ रत्तप्रभाया नरकप्रस्तारास्त्रयादश । मिनराशनसामाणि पंपानं-एनस =तान लाख (रिले), पर यानि एक सामा॥ ॥ १०एस०पमम् ॥ साम्य भोर (%3D ) पारसी एसकरानमार (नाहिपोक भाषास-निया सस्थान ) भवात् प्रयप पुधिोक भागात भागवि नीसलाम, इसरी पचीस लाय, नीसमें पढ़ा शास्त्र, पोधी में दश लाल, पांचों सीन लाल, मठपी में Rece५ पिस साली भूमि पाल पाप मिला। पृष्पर्य वासुररन प्रमादिपु मिपुर।। = उन ग्लममादि ममियों में राणि मनन । सरुपापन्त पाक्रममा = पिस पा नारियों निभासम्पान इस भनुक्रमस गणना फिय माना कि रस्नामापाम् । निशता मरकरातसासाnि = रत्नममा (प्रयमवि) चिप (भपात उसा भन्मात मागमे) तीसवाल रिलर शरामभाप पशिनि नराशतसामाणि||l = शफगमपा (दूसरी पथिषी) में पसीप लास विला पातुकाममा पथदरा नरसामाणि = पालकाममा तीसगी भूमि) में पन्दा सास नरक रिक्षरे पाममापा दशनाकशासासाणि॥ - पध्ममा (पापी पृथिवी) में दश लाल मिला पुममात्रीणि नरफरावसहसाण! - पपममा (परिवी ममि) में तीन लास नरकरिता समापमापी पम उन एम-नरक शतमास।।। - तप प्रमा (उनी पृविषी) में पार पाटि एक झारल रिलई मारावमापभाषा। पम नरमाणिया = महातमा प्रभा (साती भूपि) में पांच नरक पिता रस्नममा नरकमस्तारा प्रयोदशी रत्नप्रभा (ममि) में नरक परत तगर (परख पापा) मोस सपy raatrti पात्र मी पत्तिापन समास्त्र और उसके मापस मिजाता है इसलिये भासsatो मामाया तामपर्ण किन १० सिदि %3D एयनिवासी नगस्मसहाय पडील कृत पदस्पद भौर विमरस्पथ सहित समार्यसिदिका शम्पशः हिन्दीमनुमाद । अध्याय ३ सन २ भौर ३ ततोऽध आसप्तम्या द्वौ हौ नरकप्रस्तारो हीनौ ॥ इतरो विशेषो लोकानुयोगतो वेदितव्य ॥ मथ तासु भूमिषु नारकाणां क प्रतिविशेष इत्यत आह- ॥ नारका नित्याशुभतरलेश्यापरिणामदेहवेदनाविक्रियाः ॥३॥ तत भप भासप्तम्या ।। दादी दो नरम्भस्तारी। विस (प्रथम भूमि) से नीचे सातपी (भूमि) वा दो दो नरफ पटल जीनो। = न्यून रे भर्याद सावीं भूमि में एक, पनी में वीन, पापणी में पाप, धापी में साव, नीमरी ये नौ, दूसरी में पारा, पाखी में मेरा पटल पा पापरे है इतर पिशषः। खोप-मनु योगत .वेदितव्य ।। = (सान नरकों) पन्य मेद (विशप जोक नियुकपानिपोमिव शास्मसे माननापारिया भप नास | मुमिपुत नाराthanti भाग (= अप) उन मपियों में नारियोंक या पति-पिरोप। विमा भार = अन्य भद प्रभद (= पनिरिशेप) । इसलिए (अग्रिम सम में करते है कि सूत्रम्-नारका नित्याशुभतरलेश्यापरिणामदेहवेदनाविक्रिया ॥३॥ नाराः नित्य मधुमवरतरपा , नास निस्प भशुपतर परिणाम : नारा नित्य भशुमार दानारस निस्प भशुमवरपदना नारस नित्य मापनर शिक्रिया: (मारे पास मता को बनसा प्रति प्रतिरिम पर प्रति तथा का बामपनमा पसारा मुदिन ना प्राशित (स.पुमा में मर मरे पोय "प्रमाणाम्मतराप्रपोरणापापो हिदीना पेसा मन भपिकमरे पश्चात् मारा निया इत्यादि मूसा भोपालो भूमि में AT प्रतर मोर नीचे २ की भूमिपोमे या दो पाटि प्रणात प्रम मर भूमि में ता प्राइसरी में भाग तीसरी में को चोली में सात पाली में पारसी बीम और माता पर प्राय प्रमोम से मानो मामा तु ममla पति तत्वातजाति प.पामा वामप्रशिा स्पानि प्रशो में इसी मामी तिमें प्रपा रामे मना पार गर्भित कर रिमा है मेवा समिमि माkिe g.१४ Hanurपिगम पचमिका प ३०२ ।। माfor इन मर्य में उन्दर परलोभान है। रमारे रमपम और पताम्बर प्राम्नाप प्रमाप्प में मानी शेनो प्राणायाम एमा कममा तामा रे ममे तीसरे नूनमै प्रगति माती ना राम मोहन से पार लगभा सा माता नात्पर्य मोला- पानिमामी मगरूपसाप पकीस कर पवेद पार विभारपर्य सहित सपार्यसिदिका शमश हिन्दी अनुवाद । अध्याय ३ सय ३ मपा:-- ~-नारा पनि भशुभतर-मध्या! = नारकी मीर रे र निरन्तर भगुमतर लग्यामों सहित भर्थात् प्रशुभतर कापोत मी मार कृष्ण लश्यामों सहित निस्प प्रशुभार गरिणामा निस्प मापतर दा -निरन्तर मशुमतर परणतियुक्त, सदा अशुभतर शरीरपाल निश्प मापातर पाना नित्य मगुपतर पिक्रिया = सदेव भाभतर पोहा सति, सदा अशुभतर मिक्रिपा फरमे पाले होव है क्योंकि उनमें सदा प्रशुम कर्मका उदय इस कारण निरन्तर उनक लेश्या परिणाम, दा भार वदना मोर पिप्रिया मशुम ही होते हैं। इस सत्र का मापार्थ पा विर्यप गतिस मशुभतर लरपामोडी अपक्षास रस्नममा पयम भूमि भयुपतर सरपारे । रत्नममास शर्करापमा में भगुभार लरपा, परिणाम, देवेदना, विक्रिया है, शरामपा स पालुकाममा में प्रशुभवर लरपा, परिणाम, देश, वेदना बिक्रियार वालुकाममास पसभा भशुभवर बरया, परिणाम, दा, वरना, पिक्रिपा रे, पमभास धूमपभामें भगुपवरतरपा, परिणाम, दापेदना, (१) "मराभलर" तर मपिक नम-गल अपि । यदि वस्तुपोमेत प. राम गुण भषणा मयम गुणको मधिता प्रगर बनी हो तो उस पर मन में 'तर प्रणय लाते हैं जैसस मूत्र में भशुमार मेश्ण । और परि गुलसी (दा से भपिक) बम्भौमसे ए शुम गुप मा मयुम गुरुकी मपिता उन सर्पक मार प्रगर कामी हाता तम प्रापप बात है "स भयमतम सेरणा " इत्पादिसे आमना । (३) सोपा शपका पवन स्त्रीमिंग सेरणा शो सपथम स्रोलिंग 'सश्या एसा है। पतु समासमें "नित्यानुमतर मेरा भाषा है जिसका अर्थ पानिएतर भामतर है लेश्य जिना (एसे मारको है) अर्थात मारका सम्र का विशेषण । मता पुलिस पासपन पदा। मेरना मौरविकिपा मोगकम से एक वयम प्रोलित वेदमा मोर विक्रिया है ग्मा बारावन मोहित कमस वेरमा बिक्रिया होते हैं परन्तु समास में मिरपम्यमवरवेना' 'निस्पमयमतरपिक्रिया' भागेर नि कम से भय र निरन्तर भशुमार है ना मिनर और निरन्तर प्रयुमनर रविकिपा बिनके प्रति मारन शमा Im-*-- .. 'झिपा शादी का गुवन पुनित में मारे।

सिदि CERGREE एटानिकासी मगम्मताप एकास पदम्मेद भौर विभरत्यय सहिद सपार्यसिदिका शमयः हिन्दीभनुपाए । भष्पाप १ सूत्र २ मौर ततोऽध पासप्तम्या हो द्वौ नरकप्रस्तारौ हीनो ॥ इतरो विशेषो लोकानुयोगतो वेदितव्य ॥ भथ तासु भूमिषु नारकाणां क प्रतिविशेष इत्यत आह- ॥ नारका नित्याशुभतरलेश्यापरिणामदेहवेदनाविक्रियाः ॥३॥ na मा मासतम्पा!}} thी मरक प्रस्ता' = तिस (प्रथम भुमि) से नीने सातवी (पुषि) व दो दो नरक पदण - न्यून रे भात् सारी भूमि में एक, बी में तीन, पापी में पाप, पीपी में साव, नीमसी में नौ, दससी में ग्यास, पाली में तेरा पक्ष या पाप इतर शिष शास्अनुपोगत * वदितम्य ।। = (सात नरकीक) अन्य भेग (पिशप लोकनियुक्त मानियोजिव शास्त्रसे माममापारियो भए माम् ॥ मुभि नारकाण = मागे (प) उन भपियों में नाररिया पति-पिशामितभार अन्य भा प्रभव (= प्रतिविशेष) । इसलिए (भप्रिय सम में) का कि सूत्रम्-नारका नित्याशुभतरलेश्यापरिणामदेहवेदनाविक्रिया ॥ ३ ॥ माता निम्म मसुमदरसरपाः, ना निस्प भशुमवर परिणाम : नारका निस्प भगुमसा दा नारा निस्पषमतरवेदना, नारा नियमापनर विमिरा ॥ हमारे पास माता सीबलमा पनि तिमि पनि सा सालीलपानी वैपसारा मुदिन ना प्रति इम पुमा म मर मरे पोपे “प्रमाणपराभरापामोहिमा हाम भिस परमात मारामारपालि सूस महिपाली ममि में मेहतर और नीचे भूमिपो वो दो पारि मत प्रधम मर भूमि में तार मन मरी में पाया मौत को गो में सात पोरी में गांधी जी और माती पर सब प्रोम से मार माना tma Ratiafe पनि सवानिए अपना या प्रशिrt R में कमी सूत्री दलिम अथवा मामे मा भागर पर्मित र रिण १ मा समिनिष १६ तिचाप ११५ समास्याधिगमय । पृष्ठ 2 महाnि R१७ मन में उसनेर मन । मारे पत्र पर और धर्म ९rkhma नाम्नाय समाप. नारायणनीtar ma नाम एमा: सममा.. 'ताम्मर म मरे पर मीसरे मूवमै अनुभूति भानामा सम से समभग सा भाताk बाप दोनोगा.

सिदि %3D एग्रनिगासी मगरपसाप पकील रुव पदग्वेद भोर विमास्पये सहित सपायासादका शम्परा हिन्दीअनुगाद । अध्याय ३ स्म ३ प्रथमाहितीययो कापोती लेश्या,तृतीयायामुपरिष्टात्कापोती अधो नीला, चतुर्थ्या नीला,पञ्चम्यामुपरि नीला अब कृष्णा, पष्ठया कृष्णा, सप्तम्या परमकृष्णा । स्वायुष प्रमाणावधृता द्रव्यलेश्या उक्ता ॥ भावलेश्यास्तु अन्तर्मुहुर्तपरिवर्तिन्य ॥परिणामा स्पर्शरसगन्धवर्णशब्दा क्षेत्र विशेषनिमित्तवशादति- दु खहेतवोऽशुभतरा ॥ देहाश्च तेषामशुभनामकर्मोदयादत्यन्ताशुभतरा विकृताकृतयो हुएडसस्थाना दुर्दर्शना । तेषामुत्सेध ॥ प्रथमायासप्त धनूषि, त्रयो हस्ता पडगुलय । प्रथमा-दितीपयो । पापोती गलेरया ॥ तृतीया। = पहिली (रस्नमभा तथा दूसरी शफरामभा में आपोतनश्या। तीसरी(पालुकाममा) में परिणामापोती. = ऊपर (करिशम् रानपाल नारकियोंके) कापोव लश्या। अपनीला पतुपाम् ॥ = (इस वीसरी बालुपमा भूमिक) नीष नील लेश्या है।वोधी (पक्रममा भूमि) में नीला पजम्पाम् ।।उपरि० = नील नरया है। पांचवीं (घमपमा भूमि) में ऊपर (सिखों रहनवाले नारहियोंके) नीला भाकपणा नोलसरपा है। इसक) नीष (के बिलोंमें रामयाले नारकियों) फष्णलेरया है पष्ठपाम् ॥ कृष्णासप्तम्पाम् ।।परम कृष्णा = पठी (तम पयाममि) में कष्ण लेश्या है, सातवी (मभावम भूमि में सत्ताप कृष्णलेरपा समायुपः । ममाण प्रममृता । दम्प लश्यााउता अपनीर भायु परिमाण द्वारा निमित कीगई दम्प लरयायें की गई। भर्थात् नारकियों नपर्युक्त क्रमस कही गई इम्प लश्यायें भायुतक एकसी रातीहैं। पावसरपा ॥तु अन्तमुहर्व-परिवर्तिन्य । = पान्तु भाषलरया अन्तर्मुहत में पलटती रहती है। परिणामाः; सर्श रस-गन्फ्-वर्ण शमा घप-पिशप = परिणाम स्पर्श नस-गय-पर्ण और शमी । स्थानभदक निपिस-पशाव भनिएलोवष भशुभवरा । = निमिचक पशस (से परिणाम) प्रति दुख क कारण अशुपतर है। देशपाय भशुम-नापकर्म उदयात्।। और (D) उन (नारफी भीनों)क शरीर अशुग नामकर्मके उदयस परपन्त-भशुभतगः। विकृत मारुतपर = भतिशय अशुभतर है (और) पुरी भाकृतिपाले, हुक- संस्थाना दर्शना पाररसपा प्रथमायो ।। = संस्थानरूप कुदर्शनीय(%देखनमें पुर)। उन(मारहियों) की उमाई प्रथम भूमिमें सप्तापनर्षिय यस्ता पटायगुलप।। % DArत पाप तीन "गुश है। भर्यान् समा इस्तीस पाया है % 3D १३ सपा सिदि %3D एटानिपासी बससाप वकील छत पदच्छेद और विभात्पर्य सीव सायसिदिका शम्दश हिन्दी भनुपाद मपाय ३ स्म । लेश्योदयो व्याख्यातार्था ॥ अशुभतरा इति प्रकर्षनिर्देश । तिर्यग्गतिविषयाशुभलेश्याद्यपेक्षया, अधोऽध स्वगत्यपेक्षया च वेदितव्य ॥ नित्यशब्द भाभीचएयवचन ॥ नित्यमशुभतरा लेश्या- दयो येषा ते नित्याशुमतरलेश्यापरिणामदेहवेदनाविकिया नारका ॥ विकिपा है; पपप्रपा से समः प्रमा भशुमवर शेरपा, परिणाम, देश, बदना, पिक्रिया है, और उपभमासे महातमा ममाम (सानी भूमिम) प्रशुमतरखेरया, परिणाम, दा, वेदना, पिफ्रिपा २ ॥ पुस्प-शेरपा-भादप - लेरपा, परिणाम-दो वेदना-पिक्रिपा (मादय )२ पापपात मी = उनके मर्ध (दूसरे अध्याप के ६, ८, ३६ सत्रों की पृश्चिमें क्रमसे) कडेगये है भगुमवरा इति पर्प-निर्देश ३, वियफ = (इम सत्र में) भशुपता ऐसा (विशपण) भाविकपनाक अर्थ । तिर्यम- गसिविषय-मामलेरपा-मादि मपचपापमयामप = गतिपिपप, भशुपलेरयादियोंकी भपक्षासे सया (=प) नीचे २ (नरकों में) संगति भपचा = अपनी गति (भात् नरकाति) कोमपलासे (मधुभतर लेग्याभों की मपानता) पेदिवम्म । - माननी पारिये मापार्य जैसे तिर्यों के भशुमसरपादिरे उनकी अपेक्षासे नरक गति में प्रशुमतर लेरणारे भौर नारपियों के परस्पर की अपवासे ऊपर के नारपियोंसे नीचे नीपेक नारकियों पशुपतरोरया, पशुमतरपरिणाम, ममतरदो, अशुपतरवेदना भशुमसर पिक्रिया निस्प शम । भाभीभ्यर-अपन । निस्वम् । = (इप्स मप्र मे) निस्य शम्म पारपार भयमा निरन्तर होने का पात्रको निरन्तर मशुपवर सरपा प्रादय । पाम् । -अशुभवर में खरपा, परमति, शरीर, पीस, पौर विक्रिपा (मादप , मिनके निस्प प्रपतर-शेरपा परिणाम = नित्य भशुपतर सरपा वाले तथा निरन्तर भशुमसर परणतियुम और दन्दन =सदा प्रशुमार गरीर सहित तथा निरंतर प्रामवर पेदना पीडा सहित रिक्रिपा नारा =और सरदार भगुमार विप्रिपासति नारकी मार ॥ %3D १२ , सिदि पवामिमासी नगरूपसाप पकीम कल पदयदे और मिमरस्वयं सहित सपासिलिका शम्बरा हिन्दीमनुमाद । मायाप ३ सूत्र ३ प्रथमाद्वितीययों कापोती लेश्या, तृतीयायामुपरिष्टात्कापोती अधो नीला, चतुझं नीला,पञ्चम्यामुपरि नीला थप कृष्णा, पष्ठया कृष्णा, सप्तम्यां परमकृष्णा । स्वायुष प्रमाणावधूता द्रव्यलेश्या उक्ता ॥ मावलेश्यास्तुअन्तर्मुहूर्तपरिवर्तिन्य ॥ परिणामा स्पर्शरसगन्धवर्णशब्दा क्षेत्रविशेषनिमित्तवशादति- दुखहेतबोऽशुभतरा ॥ देहाश्च तेषामशुभनामकर्मोदयादत्यन्ताशुभतरा विकृताकृतयो हुण्डसस्थाना दुर्दर्शना । तेषामुत्सेध ॥ प्रथमायासप्त धनूपि, त्रयो हस्ता पडगुलय । मवम-दिनोपयोमा कारोवीरपानोपारा = परिसी (रस्लममालपा सरीशराममाकापोतस्वरया। तीसरी(पानुभाममा) उपरिशमापाती - अपर (विरानवाल नारहियों) कापोव खरया। भप नीता। माम् ॥ = (इस तीसरी पालुपमा पिक) नीष मीज लरपा पोपी (पकममा भूमि) में नौमा सम्माम्मपरिक = नील खरपा । पामी (ममपा भूमि) में ऊपर (विलोम रानेवाले नारडियो) नीसा माझा = मोखमरपा है । इस) नीम ( विलोमें रानवाले नारदिपोंकष्यलेरया है। • पष्ठपाम् । इप्ण साम्पाम् परम हप्णा। =ठी (तम प्रभाममि) में करण सेरपा, सातवी (मातम भूमि में सकारपाई सभामुप । प्रमाण भरपूतावा दम्प लश्यापारका अपनीर भायु परिमाण द्वारा निमित दीगई द्रष्य शरणायें कही गई भर्षात् नाररिक नपर्युक्त प्रयास की गा ट्रम्प सरपायें भापता एसी राखीरें। मावशपातु मन्तमार्व-परिवर्दिया । = परन्तु मानसरया पन्तर्मुहत में पलती रहती है। परिणाम सर्ग रस-प-पम् शम्दा खेम-विशेष = परिणा-स्पर्श-रस-पपर्ण और शमी । स्थानमा निमित्मशाद भितिखदेवयामशुभता । =निमिधा यशसे (वे परिणाम) पति दमा कारण भशुमार है। देव मशुभ-नामकर्म ग्वाद।। = और (D५) उन (नारकी भी शरीर भशुभ नामकर्म के उदपसे भापत पशुपहरा रिस्त मातयामार - अतिशय प्रगुपतर र (मौर) पुरी मारुतिवाने, रक- संस्थामा दर्शना तरसेपी मथमाया। समापनपि स्वामगुलपा = संस्थानरूप कुदर्शनीप( = देखनमें पुर) नानारकियों)ी नाई अपम भूमिमें = सात पाप तीन हाप भगुल है । अर्थात सपा इस्तीस दायरे ReceeceptECE८६८GERCE %3D सर्याय सिदि पटानिपासो भगम्पसाप पडील छत्त पदच्छेद भौर विमपत्पर्य सदिय सपिसिदिषा शम्दशः हिन्दी अनुवाद मध्याय ३ सत्र ३ लेश्यादयो व्याख्यातार्था ॥ अशुभतरा इति प्रकर्पनिर्देश । तिर्यग्गतिविषयाशुभलेश्याद्यपेक्षया, अधोऽध स्वगत्यपेक्षया च वेदितव्य ॥ नित्यशब्द आभीक्ष्ण्यवचन ॥ नित्यमशुभतरा लेश्या- दयो येषा ते नित्याशुमतरलेश्यापरिणामदेहवेदनाविक्रिया नारका ॥ पिक्रिपा, पपममा से समः प्रमा, भशुमतर खरपा, परिणाम, देश, पदना, विक्रिया है, और तमामभासे माविमः प्रमा (सातमी भूमिम) अशुभवरलेश्पा, परिणाम, दा, वेदना, विकिपा ॥ प्रापर्प-खेरपा-मादप = लेरपा, परिणाम दो वेदना विक्रिया (भादपः) रे पासपाद मः = उनके अर्ध (दूसरे अध्याप के ६, ८, ३६ सूत्रों की पृधिमें क्रमसे) करेगये हैं भगुभवरा इति समर्प-निर्देश तिपैप = (इम सम में) प्रामवर ऐसा (विशपण) भधिकपनाक म है। विर्यम- गतिविपप-मशुपलेरपा मादि अपनपा। पमप भघ = गतिषिपय, अशुभलरयादिकाकी अपघासे सया (=प) नीचे २ (नरकों में) सगति मपपपा = अपनी गति (मर्याद नरकगति) कोमपघासे (मशुभवर लेश्यामों की प्रधानता) परिवप्प। = माननी पारिये भाषार्थ जैस तिर्यों के अशुभलेरपादि उनकी प्रपन्नासे नरक गति में प्रशुभतर लेश्यारे भौर नारपियों के परस्पर की अपवासे ऊपर के नारकियोंसे नीचे नीपे नारकियों के भशुपतरलरया, प्रशुमतरपरिणाम, अशुभतरदो, अशुभतरवेदना अशुभतर विक्रियार निस्प-शन्द ।। भाभीएय-पपन । निस्पम् । = (इस सूप में) निस्य शम पारपार भयमा निरन्तर होने का पापको निरन्तर भशुपतराः । सरया मादया। पाम् ।। = अशुभवर ई अरपा, परमति, शरीर, पीड़ा, और पिक्रिया (=पादपा) मिनक नित्य-भशुमार-जेश्या परिणाम = व निस्प भशुभतर सश्या पाले तपा निरन्तर प्रशुमवर परणतियुक्त भार दो-दना- =सदा अशुमतर शीर सहित तथा निरतर मशुभतर पपना वा पीडा सहित विनिया नारा -भीर समय भशुमार पिप्रियासहिन नारपीनी॥ १२ सिदि एनिमामी मगरपसाप मोल छत पदच्छेद और विमरस्पर्य सहित सर्वार्थसिदिका शम्दश हिन्दी अनुवाद अध्याय ३ स्म । ॥ परस्परोदीरितदुःखाः ॥४॥ कथ परस्परोदोरितदु खत्वं नारकाणाम् । भरप्रत्ययेनावधिना मिथ्यादर्शनोदयाद्विभङ्गव्यपदेश- भाजा च दूरादेवदु खहेतूनवगम्योत्पन्नदु खा प्रत्यासत्तौ परस्परालोकनाच प्रज्वलितकोपाग्नय पूर्वभयानुस्मरणाचातितीनानुदवैराश्च शृगालादिवत्स्याभिघाते प्रवर्तमाना सूत्रम्-परस्परोदीरितदु खा ॥ ४ ॥ = (नारका )परस्पर-उदीरित-दु खा (भवन्ति) ॥४॥ सप्राप-नारकाः। परस्पर उदीरित साः समपन्ति = नारकी मीय परम्पर उत्पमडियाहुमा दुख (एक दूसरो) दनराले होत हैं। भषात् कुत्तों की मावि निरन्तर एक दूसरफ साय सरते झगड़त रहत है। स्पनुबाद -र्यकारस्पर उपरिव = (प्रश्न) कैस मापसमें (एक दूसरे को) लियाहुमा भया उपमापामा दालत्य । नाराणाम् । विश्या-दशन उदपाव। = नारफीमीयाक दुस्स दाता (= दुखत्म) है । मिध्या दर्शन के उदय होनसे निमग-पपाश-मामा मरमस्पयन | मरिना) (४)विमानामा वा भिंग नामकारक भपनिमित्तक भरपिझानकारि द्गन् । पर सोतन् । भवगम्य- - दूरस ही ( नारकी मीप ) दासक कारणों को नानफर उत्पन्न- स्वाः, म०पति-मासती । परम्पर = पोड़ा उपमा भार ( = पोमति निफर होनपर भाषसमें (एक दूसर को) मासोनाव ममालिन-कोप-मनपा १५० = सनम फारूपी भनि प्रज्मल है जिनमें मर्यात् तीन कापयुक्तामात । तया पूर्व पर मनुस्मरणात्।।। भनितीन = पदिल मन्मक मुर पा निकट (= मनु) स्मरणस भतिवीच भोर मनुषदौरा प० शृगाल माविषत् = ( = अनुपद) वैररूप होप ह और (= घ)सिपार भयमा गीदड़ मादिके सरश म मनिपात । प्रमर्वमाना। = अपन घाव (करन ) में प्रपतते हैं मर्याद जैसे गीदा कुरा मादि मय गीदड़ कुत्त थादिका दस कर निदयता पूर्वक झोप करत हैं पधा परस्पर दायका महाररत तसही नारकी मीच एक दूसरफ और अपने घात करनेमें पपर्वते हैं। (१) इस सप्रका पाठ भरपरानो मम्प्रदायोमे एक(२) रान एप प्रिलिंगी है। (३) भरगम्प र सम्पायक भूत यस है। (१) प पाम्प भुगताविप है। (५) मनु रापमा पर्थ पप्रचन्द्रधारा निए किया निरुष्ट स्मरलस' अभिप्राय है कि मारकी जीवोका कमविस माको दुरीमानको सुधि मानो र भनी बातो की नो। %D 22 १५ साप सिदि - एटानिपासो मगरपसाप पकील व पदम्बद और विमत्यर्थ सहित सायसिदिपा शम्दशा दिदी अनुवाद भम्पाप ३ सय ३ श्रयोऽवोद्विगुणद्विगुण उत्सेध ॥ अभ्यन्तरासदेद्योदये सति अनादिपारिणामिकशीतोष्णबाह्यनिमित्त- जनिता सुतीवा वेदना भवन्ति नारकाणाम् ।। प्रथमाहितीयातृतीयाचतुर्थीषु उष्णावेदनान्येव नरकाणि पचम्यामुपरि उष्ण वेदने दे नरकशतसहस्र। श्रध शीतवेदनमेक शतसहस्रम् । षष्ठीसप्तम्यो शीत- वेदनान्येव ॥ शुभं करिष्याम इति अशुभतरमेव विकुर्वन्ति, सुखहेतूनुत्पादयाम इति दु खहेतूनेवो- स्पादयन्ति । त एते भावा अधोऽधोऽशभतरा वेदितव्या ।। किमतेपा नारकाणां शीतोष्णजनितमेव दुखमुतान्यथोपि भवतीत्यत आह- भपस अप हिमुण-दिगुण । ररसेप । सम्पन्तर = जीप २ (पाफ नरकसे मस्क नरफमें ) दूनी २ पाई। भन्तरंग असन्मेप उदयसविपनादिपारिवापिस = मसाया पदनाप कमसे न्दग होनेपर अनादिकाल परिणमनम्प (भूमिका) शीत-प्स गप-निमिच मनितासामुामा घेदना पानिमिया शीव उपरि (नारकिगोंक) वीम पीड़ा परनि T नारापमा-दिलीपा-तृतीया %Dी नारकिषों के पदियो (भूमि) इसी (राप्रपा)में सीसरी (पाक्षुकाममा)में पीपु, रणरेदनानि ॥oमाणि = पापी (पटुपमा पृषिपी में उपण रदना प ही मिल सम्याम् उपरिकपणन ॥ = पापी (ध्यामाममि में उपर के उपदनारूप दो नरकराव- साप. शीतपेदनम्।। - शास्त्र रिन । पारसी भूमिक शेप) नीपेड शीवषेवनारस एम् ॥श-सासम् ।। पप्पी-सप्तम्पो । पर लाल (विले) हैं। छी (तम पमा भूमि) में और सावी (मातम पमा मूपि)में शीत पेइनानि एव शुभम्।।। कतिप्पा तिo aपदनामी (पिकिपा)हम करेंगे पसे (नारकी विपारे ।) भशुमार विचरन्ति । सुलातम्।। स्पादपाय 1 = परन्तु भामरती रते है । सुम के कारण इस पता करेंगे। पनि दापोवनी रत्सादयन्ति । =स प्रकार (नारकी मी विचार करता है परन्त) द ख कारणमी पावे। मा पनी पापा भषभपतरामा = ने य परिणाम (एक नरकको भपेसास मरेमें ) मीपे नीचे प्रशुभतर बदितम्या पिम्पेनपाम् ।। नारफाणाम्। =भाममा पारिपे ॥ (प्रश्न) क्या इन नारपियों गीत-सपा-जनितम् ।।11 एप नवम्।। n शीत भौर सप्यास रस्म हुमा तीसरे अपमा मन्पधा कमपि भवति निमार अन्य प्रकार मी नारकी मीषाको दम) रोता रे मामिनिम सभ में) का कि एटानियासी मगरूपसंहाय पहील एव पदग्वेद मौर निभासा सरिय ससिद्धिका शम्बन्दिी भनुनाद मध्याय ३ राप । १७ MERECECE सारी मनुसार हातामा सम्पन्धित सपायाहाता है मेस वीलिप राय मे पक्षपानि म प्रमा गिलि पहुगमम मपुर में दिमागलपनि विस ममा Mir पानमन नपुस लिगमे परमा सम्मान से सनसन (ज्योant को निति चौर गमग पहाता मापनको मायाको अस AR भूमा नभशेग गप पति (रस्त Tuto) पहा पर सभी ममतामोशी को बरामम प्रामा पिा (IN)ोमा भूमि परतु ममि राम का बहुपम सोलिय भूमप, लिंग सप्त-भीमपराप्यो का भी समरसा aif तीनोम पशुष ही मीर तीमो लिगो में एक ही का परमप भूमि लिये सूत्र में मान लिममा सपमा विमति साचतुर्णा परमो विमति Karin लागि पगा शपका पर यमुम्का पषभो गिराना मोर ग म मलिंगमरक पप पुझिंग इस भारति समर्म दूसरे सूत्रकार ARNOT Ataमरक राम दूसरे मग विमोसम रानगा रारामा लुकाममा पंड प्रगा पर्मममा तम प्रभा मदातमा अर्थ में हमारका रानीसरे रात में मार राम! RIT साम परमात गारकी मोसस गरक एनी मनुधि इस सूपमै सना भारत र पहिले सूधर्म भूमि म साप सस गमि शाकी मनुक्ति पापा एनमें मातीमहि। परिमाना एसा पाठ पता मर्ग मे मित्रता दोषो मात् गगि स्पाम गरक( - मारकिरविल) एमा म पासागा मागण पियरे प्यार मनुमार मराम मोहोजायगा । माया प्रपोली पाममा गमिस पदिम मा तीसरी गरी और पवित्रो गमि त मात भनुम्मागार(नरको पहिल मleोग गार विलोपस पस: पनु या गा+प परिसमाप तोसको सप्र में एकस्मिन मा मनुनी दूसरे मापाप भवारसपा सपमै संसारित प्रार पतुना मोर सत्र " या मार (AR) ताना पर्यम्त दे मोर प्राफ का पर्ष पहिल परिसमा भनुनी पहिला Mrt का विएपण मोनपु समगदूसरा मा धतुर्ग गोरो पिरोन शमसकसिंग है ।सरा प्राकममा समन शरथ गुरामापक समय शण पुशिगई। स्मरण रहे शिपापा पर सपको पंचमी विगक्ति पगमन नपुसकलिंग और पुडिंग दै भार पर राष्ट्रका पंचमीनिमलिमस और पुगिमे पाय "पारद करती है।मत "प्राकममा सीसिंग महो दोसकता है इसलिये वह मशुबह । १७ स पानिरासी मगमसाप पसीज कत पदभेद और रिमाप सहित सायसिदिका शन्दश: हिन्दीमत्वाव । भम्यार ३ सब ४ भोर ५ स्वविक्रियाकृतासिवासिपरशुभिण्डिमालशक्तितोमरकुन्तायोधनादिभिरायुधै स्वकरचरणदशनैश्च छेदनभेदनतक्षणदंशनादिमि परस्परस्यातितीव्रदुखमुत्पादयन्ति ॥ किमतावानेव दु खोत्पत्तिकारणप्रकार उतान्योपि कश्चिदस्तीत्यत आह- ॥ सक्लिष्टासुरोदीरितदुःखाश्च प्राक्चतुर्थ्याः॥५॥ सतरहिया प्रसि-सि-पर- अपनी कोई पिक्रिपास परवार(%DRसि पगारापाति) फरसा (पाशु) मिथिर-पाण-शकिलोपर-मन्त पत-मिति) पा(मास)शक्तिपीबोल(वोमर)माला सेक्ष(Dअन्त भपस्घन मानिमि-नामापुः ॥रसर = शोर मन भादिक मशस्त्र द्वारा(मायु) और (-१)भपने आप परण-शनैः । मदन भेदन-उसम-शन = पग दारिरि घनामेदना पीना(ण) काटना ( दशन) भादिमिनी परस्परस्पता मतितमम्॥ = मारिए (क्रिपा )स भापसदी मतितार पीडाको रत्यारपन्ति' दिम एतान् । परम्प-उत्पत्ति = उत्पन्न करते है। फ्षा इसने की इस उपमहान कारण मारमा भपिशाचित भस्विति - तु अन्य भेद र अपा का दूसरा ( = अन्य )भी है -इस लिये ( अग्निम सबमें) कावेर- सूत्रम्-संक्लिष्टासुगेदीरितद् खाश्चप्राक्चतुर्या = नारका सक्लिष्टा-असुर-उदीरित-दुःखाश्यप्राक नारका भापता -नारकीमीए पीपी (पंकममा मिसे पहिले) तीसरी ममि पर्पत - केश (परिणामोदर) युक्त असुरोद्वारा या क्रेप पारोके पारक भसुरोंकरि - उत्पादित (रदीरित) दुम्सा भी सात? (१) रामो सम्पापो (म मा म पार पा(२) अनुसारको पासम ममय बनौन सी मतिप है। सममे से महामुनीको यो प्रतिवाम मोरात्री मारिए प्रतिमें मामाभ्यः ऐसा पार और रोग प्रतिपोमे ' मामा ऐमा पार रवीन प्रतियोच पार पशित किया कि बस पर पण वाशिमोन पर्वत ए सिममा सम्मान स्वती TA नतिपय माता ए., बहानामा मरिमा समाय संधिय--असुर उसीरिव-दासाप पानिवासी नगरपसाप पडील व पदम्वेद और विमास्पर्य सवि सर्धिसिदिका शम्पशा हिन्दी अनुवाद अध्याय ३ सम ५ सिदि पाकरको घोर भनुसार हामो सम्पपित सण्या राता जैसनीलिपलपान इस वाक्य में बतयानि गप प्रथमा विमति पहुषमा नपुंसकसि वोलि राम मोगपतिपानि सदा नि प्रथमा विभक्ति पावन नपुस लिममें है परन्तु पम्पन् स मवरगन् (ग्योस) तबिमकि मोर पवन नही होता समापीहाने की मावश्यकता नहीं है जैस "मत भूमया न भयो मनप पति' (संस्स्त पृष्ठ १४.) पो पर सप्त भठो नब मोनो शमों का बहुगमन प्रथमा विमति (कारण) भूमि सपकारे परतु भूमि राम का गुरुवम सोहि भूमप सिंग सप्त मानव श्योर मी समझना योरियतामा मयुरपन होना और तीनो सिगो पास दीप पर तुर्थ गप भूमि के लिये सूत्र मे भागना सिप । भर प्राक राम साथ पपमो विभकिसाबमुः पचमी विभक्ति एक आलिम पी एम परतु तुम पचमो पिमाल रमन और पलिग अपना मपुसकसिंग है। मरक रात पुसिंगर इस अम्पायर बिसी संभमे दूसरे सूत्रधार र राप महा माय मरक शाम दूसरे सूत्रमे बियो अर्थ में रामप्रभा रामराममा वालुकाममा पंच- प्रमा पीप्रमा तम प्रमा महातमाममा पर्थ में नहीं है। मारका नासरे सूत्र में लाया। उसी र दुप सान करनवाल मारी गी। इससे नरक मी मनुवृत्ति रस में समा मयुमर पविले सूममें भूमि राव साप हैसस ममि को अमुपति पापा सूत्र मातीकिनर राम। यरिदम चातुर्मः एसा पाठ पर ताममें मिपता होपो अर्गात् ममि स्थानमै मर( मारपियोकरदनेपित) एमा म हानागाजा मागम वि सूत्र म्पारण मनुमार राव मोहोबारगा। प्राक् पमुष्पा-चौथी पम्प्रभा भमिस पहिले मान तीसरी दूसरो और पवितो ममिक प्राक थमुभ्य - पा(नरकोस पदिस अर्थात तोम पार विसोपाल पदले । पतुल पर पाय पदिल प्रपाय तोस मप्र में 'एकस्मिन् मा पतु इसरे म पाप मट्ठाइसो सममें संसारित प्राक चतु। मोरया मत्रमै "मा चतु।" साप मार (DRI)काम तक पा पर्यन्त और प्राक का पर्व गदिस परिसरमा पनी पहिला "शाम मा विशप मानपु सबलिंग है। दूसप मा चतुर्भ गरोरोग विशेष मामपुसलिम । तीसरा 'प्राक-चतुर्थः समप सपा गुलमा समय राम पुलिंगई। स्मरण र पितुः सर गपकी पंचमी विमक्ति बामधन मपुसकलिंग और पुलिंग है भर्यात् धतुर रापकी पंपमाविमति नपुसा और पुलिंग एसीप बतु "पार करती है मत प्राकपा- सोलिग नही होसकता है इसलिपे पर पशुबहै। १७ सा ५ सिदि D HERece- एगनिपासी मगरूपसाय पीन रुत पदच्छेद और रिपरस्पये सहित सपापसिदिका शम्दशः हिन्दीअनुपाद । मध्याप ३ सम ४ और स्वविक्रियाकृतासिवासिपरशुभिण्डिमालशक्तितोमरकुन्तायोघनादिभिरायुधै स्वकरचरणदशनैश्च छेदनभेदनतक्षणदंशनादिभि परस्परस्यातितीबदु खमुत्पादयन्ति ॥ किमतावानेव दु खोत्पत्तिकारणप्रकार उतान्योपि कश्चिदस्तीत्यत श्राह- ॥ संक्लिष्टासुरोदीरितदुःखाश्च प्राक्चतुर्थ्याः ॥ ५ ॥ समित्रिण कन-मसि-पासि-परशुः भपनी कीहई पिफ्रियास परमार(= मसि/ मुमारा(पासि) फरसा (परशु) मिपिट पाख-शविनोमर-कन्त = पन्क(मिदिर) (= मास) शक्ति पी खोरेक (तोमर)मासा सेल(कुन्त) भपस्यन मादिपि-मायुपे 'प०म-र = सोपे घन मादिक भस्म शस्त्र द्वारा( मायुपै) और (प) भपने पाप परण-शनैः। दन मेहन-तम-दशन = पग दाताररि छेदनामेदना छीलना(= सतण) काटना ( दशन ) भादिपिणी परस्परस्पा मतितीमास्यम् ।।।। = भादिक (क्रिपा ) से मापसकी पतिती पीडाको उत्सादपन्तिा स्मिक पतावान् । एर दास उत्पत्ति = उत्पन्न करते हैं। क्या इतनी दुल उत्पमानके परण-मार तापमपिकमित् भस्ति इसि तु भन्यमेदो भपमा रुष दूसरा ( = मन्प )भी है = इस लिय ( भग्रिम सप्रम) का रे - सूत्रम्-सक्लिष्टासुरोदीरितदु खाश्चप्राक्चतुर्या = नारका संक्लिष्टा-असुर-उदीरित-दुःखाश्चप्राक्-चतुर्थ्याः समाधा नारका माम्या 0 = नारकीमीप चौयो (पंकपमा भूमिसे पहिले) तीसरी भूमि पर्यंत = केश (परिणामोकरि) युक्त असुरोद्वारा पा क्रेश पापों के पारस मसुरोंकरि उदीरित-दला || १० = उत्पादित (= उदीरित) दाम मी सासे हैं (१) बानो सम्प्रोम इस मारा और पार एसा (२) अनुवापक के पास इम ममप मूब मुमो की एन सी प्रतिय है। मौके सासुबासी दो प्रतियाम और वानवामी बारिकी एक प्रतिमें " प्रातु ऐसा पाठ और लेप प्रतियों में 'माको ऐमा पाठ इम सीन प्रमिला पाठ मनुचित मान पातायोकि एक जिबरम नपा र राणाविमीस पन्त ए सपा शिन सम्पासे सम्मान रणधीरम मा पिप रबाती सकिए-असुर %3D १६ । २० मि चारमा संपामौतपदी बिमलिमीन और पनि संस्कामाचा सिदि एटा निवासी जगरूपसहाप पहील व पदच्छेद भौर विमरस्यर्थ सहित सर्वार्थसिदिका सम्मश हिन्दी अनुवाद मध्याप ३ सूत्र ५ अधिप्रदर्शनार्थ प्राक्चतुर्थ्या इति विशेषणम् ॥ उपरि तिसूप पृथ्वीपु सक्लिष्टासुरा बाधाहेतवो नात परमिति प्रदर्शनार्थम् ॥ चशब्द पूर्वोक्तदु खहेतुसमुच्चयार्थ ॥ सुतप्तायोरसपायननिष्टप्ताय- स्तम्मालिङ्गनकूटशाल्मल्यारोहाणावतरणायोधनाभिघातवासीद्धरतक्षणक्षारतप्ततैल- भारि पदोन प्रयम् मामतुर्पा ।। = मपादा दिखावना लिय ( इस सूपमें ) मा भतुभ्याः (मर्थात्-पोपी पकमभाभूमिस परिक्ष पहिले तीसरी वालुकाप्रभा पृथिवी पर्यंत) इति०विशपणम्।।। उपरिक्रतिसृषु॥ = एसा गुणपाचफ (पापप) है । कारकी सीन (रस्नप्रभा,रार्फराप्रमा,पालुकाप्रमा) पृषीपु.।। संविटा-मसुरामा पापातपः। - ममियो सनिष्ट परिणामपान मसुर (मारहियोंको) पीड़ा (उपमाने) के कारण नमत परम् = नही र इम (तीसरी पालुगममामि से भाग (पकप्रभा,मामा, तमाममा महातम प्रभा भूपियों में इन मसुरों द्वारा पीग उपमापनेका देव) इनिम्मदर्शन-मर्थम्। = एसा दिखापन कलिय (प्राक पतुभ्या पाम्प सप्र ) हैं। प-शनी पूर्व उक्त = (इस सप्रमे) गशम्न पहिले कोगय (तीसरे भौर पौये सोंमें कि भशुभवर- लरया परिणामानिस उपान तथा परस्पर कारणसे उत्पन) दुस-तु-समुगप मर्य। - दुखोंक कारणों क समयक शिय ह तात्पर्य या फि अशुभवर लरया परिणामादिकस उत्पन्न पदना पया परस्पर फारणस उत्पन्न पीड़ा पार मसुरो द्वारा (तीसर नरक तफ) उत्पम पापा इसमकार नारकी मीका तीन प्रकारक दुम्ब दाता। सुना-भयस् रम-पायन-निएत-मयस्- = प्रति संतप्त बोरे (मपस् )क रसक पिलानेस, भति संतप्त लोके स्तम्म प्रालिंगन-कूट = सम्भस प्रालिंगन करानसे, माया रचित अथपा मिथ्याभूत शारमलि (शान्मची)-मारोहण भरतरण = समक्षक वृक्ष अर्थात् शूलीपर चढ़ानस, बार स्वारनस, अपस्-गन-मभिपातमासी- मुरवण-झार-चप्तनेज- = लोदेके (मयस)पनस वाहनादि करि (भभिघास),कुमाग(पासी) वसला(वासी) तथा = छुरादारा फाटन सत्रण)छोजना(तत्रण)स, खारेपानी( = सार)तया मतिरप्णवलस 666CEReer %3D सिदि एरानिरासी मगस्मसाप बसील कव पदच्छेद और विमरस्पय सरित सायसिदिका शम्वध रिन्दीपनुसाद । मापाप ३ सय ५ देवगतिनामकर्मविकल्पस्यासुरत्वसंवर्तनस्य कर्मण उदयादस्यन्ति परानित्यसुरा । पूर्वजन्मनि सम्मावितेनातितीवेश सक्लेशपरिणामन यदुपार्जित पापकर्म तस्योदयात्सततं क्लिष्टा संक्लिष्टा । सक्लिष्टा असुरा संक्लिष्टासुरा । सक्लिप्टा इति विशेषणान्न सर्वे असुरा नारकाणा दुखमुत्पादयन्ति । किंतहि, अम्बावरीषादय एव केचनेति ॥ देशगति-नामकर्म विकम्पप॥ भसुरव-संवर्तनस्य ।। = देवगति नामक नामकर्मका मेद जो मसुरत्वसपर्वन तिस मण ॥ नदपाल ।। मस्पन्ति परान ।। इति मसुरा । = कर्यके ऊदयसे दूसरों को करते हैं भाद दुस देते हैं ऐसे असुर २ पूर्व-जन्मनि । सम्मापिटना। भवितीयेण! -परिने मनमें सकने योग्य पाहत तीय संयरिणामेनी पा उपानिन ॥ पापकमा -संजेश मापरि को पापम उपार्जन रिया' वस्पदयान् । सव कि संहिए - विसक ग्दय स निरन्तर क्रेशयुक्त पा जिशिव (=शिष्ट) से सक्रिय रे सक्रियामा भसुरा । संविटा मसुरा। = निरन्तर गयुस परिणामपाले (= सक्रिष्टा ) मसुर ( ) संनिया भर में सक्रिण पति पिणेपणा = सरिया पसे रिशेपण-स मद मसुरा शम्द के परिले मो 'सरिया' विशेषण उसस (भमिपाय रे )ि सरेंमसुरा नाराणा दुसम् | नानसादपति = सर भसुरकुमार नारकियोंकी पीरा नही सत्पम करते हैं डिम् मा = दो (नाहियों को) कौन (असुर कुमार पीड़ा देत) । मम भारीप भादस । पप केषन वि. = मम्म, भवरीप (= सम्मरीप) भादि (नातिके असुर) की कोई पेसें पीड़ा देवर (२) प्रमापरापादपक स्थान में समाप्यतत्यानाधिगममत्रमें मापारीपाप है। भाष मारोप श्याम शरद पम्पमस्प प्रसिपाव-भय, सम्पर्शप श्याम चल रद उपयर का मामा मसिपत्रपन कुम्भी पासुहरकी पर सर महोपोका -ग्मी परामुचा रेतरती पर मर और महापोष पपरापले समिपा ममुरा। -मे या मालिश परियामधारक मनुर मारपीताम्बरमा नगरपात -नारनिगेरेपना ( पीप (समापनत्वाभिगमसूमपन्त my GGEGREEEEEEEEEEE एटानिगासी मगरूपसाप पकीला पदरचेद और विमास्पर्यसहित साप सिद्रिका शम्दशः हिन्दीभनुपाद मायाय ३ सप्र ६ सिद्धि RBERALLERSee इस मप्रमें गत राम मनुवृत्ति सप्तमी विमति गुपचन पुसिंग सी और सत्तामा गण पष्ठी विमति गुपचन पुलिंग वा नपुसकनिगम साये जिसन भर्ष गोषोडी मोर पसगावस्थामोहन सरहातिम साताना गपो मत्रमै बानमा पर भरस बताण है कि तीन सप्त इत्वारिक सागरोजी मिति "भूमपा" शमसे सम्मापन परमाप पात ऐसा भर्ष पेमेरे लिए वापि तीन सप्त इस्पादिक सागरोधी स्थिति भूमिपणे वा पृषोमोसा पर प्राथप निस्सा लिप-तीन सात इत्यादि सामरोशी स्थिती मौवाही है 'पियो अपना भूमि को नही। (5) स्थितिमा सम्बाप भूमि राम साप जावे (प) तेषु (ग) सत्यानां ला संपधमै मा विचार और भाव मेरे सपने सस्पन हुए है उमभ गोख पारी सा नम्रतापूर्वसभरवि- (1) 'सम्मानतो विरापप्रतिपतिनदि समालपणम्'- (वाफ्या) पणार्थ भाशय - विश्वप्रतिपत्तिा) म्पपिपानसे (मर्यात परस्पर मोच संबंप का पचप परनेसे) निस्तारि (वायोमे) संदरम्प पा संदिग्पा शमसे (-सोसा) मतमता मर्यात अनिश्वितमाव वा मर्य (-प्रसपणम् ) नदी (दि) होता है इस परिमागरे अनुसार भारबियोंसे सिति रामन संपदामाता रेनकि ममि शमसे। (a) (-तिम उसमें)-रवेष (-मरमि) पूज्यपार मामीन 'तपुच यही मर्प लिदै । रक गार उमास्वामी मरे सूत्रमें 'विलोम प्रांत मार(-निवासस्थाम) से भी खाय है प्रशम लामा भूमिमै ऐसे तोसमास बिसवा निवासस्थान है। मोर इस माप परे किसी सममें मर गदमी भाग परमात पम्पपार स्वामीने 'मि'का पर्व मलिपाई जैसाकि त नरकेषु भूमिक्रमेण पणासम्पमेशापयास्थितयो ऽमि सम्माया लप्रमाणामुहटा स्थितिरेव सागरोपमा एमारि सात नागोस सम्पत्तिम प्रगट है। स्मरण हेलिप्रथम भूमिमें तीससाण दूसरीमै पचीसलाच त्यात नरक। तब भ पह एमा कि तीसमाच नरको एकसागरको गमप स्थिति नारनोवोगा। पपीमहापरकोमें मारजीतोडी महप स्थिति तीनसागरको बानि । 'तास्पेक (-तासुएक-तिन ममियों में एक्सागर स्मादि) पाठसे सब क्रिपतो बाती राती और पम्पाद म्वामी मनात सोपासापा मयं मिल पातातिन ममियों में। मसे रारुप स्पिति पर तीन इस्पादि सागते की। वासु-वासु भूमिपु । तासु शन दूसरे सूबमें भी पाया है। तासु रामको अनुगतिमी इस सूत्रमे सकता है परन्तु ते-तासु) सपना लिये। (ग) सामाजीकाको तीसरे नरस्त मसुरकुमारय स्वर्गक देव त्यादि भी जान है। इसलिये 'सस्वाना से पाण्य नारकापासस्थानां मापसे हैमर्यात् नारक गोषी भावार्य नारको पास मापापरे तीसरे सूनम पापा और रसकी अनुमतिनापे और पांच सूममें बीई। इस सूची मी पो विभक्ति पापमपम (मारका सम्पनी मनुचि) भातो।। मारनामा' पी अनुचिसे मी विमा सहाना गम खायेोये मम चल सकता था परातु ग्मा स्यामाने सातामा यमन प्रयोम सिफारमसे किपालमत्र स्पप हागाये और सत्तामा शपत्रे रेवकर पाठक २१ सरबतासे समम विसमें नारबाप को मनुषधि प्रवरप भावो । ससाना सवस काम महो चल सकता क्योंकि भ्रम उत्पन्न होता है कि भौर जीवोंकी गाप स्पिति किनारकी पोंजी(स्कर स्थिति हमारे मित्रोत विचारवियदि सागमा गमन नावे तौमी पापापसे उपयुक्त परिमापासे पाठक समम खेत किमाभियोड़ी स्थितिसे प्रपोजम है। EGREE सवावा सिदि %3D एटानिमासी जगरूपसाप वकील कृत पदरछेद और रिभरस्पय सहित सायसिदिका शम्मश हिन्दीमनुवाद । अध्याय ३ सप्र ५ भौर ६ ऽवसेचनाय कुम्भीपाकाम्बरीषभर्जनवैतरणीमजनयन्त्रनिप्पीडनादिभिरिकाणा दुःखमुत्पादयन्ति ॥ एवं त्नभेदनादिमि शकलीकृतमृर्तीनामपि तेषा न मरणमकाले भवति । कुत ? अनपायुप्क- त्वात् ॥ यत्येवं, तदेव तावदुन्यता नारकाणामायु परिमाणमित्यत पोह- तेष्वेकत्रिसप्तदशसप्तदशद्वाविंशतित्रयस्त्रिंशत्सागरोपमा सत्त्वानां परा स्थितिः ॥ ६॥ भरमेपन मपस मम्मी-पार सम्मरीप मनन = सीपनार मोडक घोंमें पकानस भूभनमें ममनेस वैतरणी-मजन-पन्य-निप्पीरन मादिमि । - पैतरणीनगीमें टुमानस, (कोन भादि) को (य प्र)में पेजनादि करि नाराणाम् दुख उत्पादपन्ति परदन मदनादिमि = नागीन पदना उपमाते है । इस प्रकार घदन भेदनानिक करि शम्नौकर-पूर्तीनाम् ॥मपि०मपाम् । = शरीरके बटबंड कियभानपर(= कुन)मी तिन(नारकियों)ी (पिना भायु पकियों नभरणम्।। मकाले । मपनि निक = अकालमें पाभरपग्में मत्यु नामोतीहै। (प्रश्न)पोकर(नारकियोंकीमकान मृत्युनहीं (इसर। क्योंकि (सर मापापा प्रपना सप्रम अनुसार नारकीमीप) भनभपवत्प भायुपत्वान्। = परिपूर्ण मायुषाल तर मथात् नारफी भीष भपनी भायु परिपूर्ण डिये पिना मृत्युका प्राप्त नहीं होना पदिवसम्नद-ए-नाग-नारमाणाम्।मायुए- = मो ऐसे (नारको पूर्ण मायुवाज) तो(= सावन मो(तद)ी(एस)नारकियोंकी भायुको परिमाण उच्यताम् इति भन मार = मर्यादा कीमाप (= उम्पताम् ) इसलिये (भाचार्य उत्तरसममें) फासे है कि सूत्रम्-तेप्वेकत्रिसप्तदशसप्तदशहाविंशतित्रयस्त्रिंशत्सागरोपमा सत्त्वाना परा स्थिति ॥६॥ तपु-रासागरोपमा-पिसागरोपमा सप्तसागरोपपा-दशसागरोपमा-सप्तदशसागरोपमा-दाविंशनिसागरोपमा-भपरिप्रशत्यागरोपमा सस्थानो परा स्पिति ( पयाक्रमम् ) ॥ ६ ॥ २० (१) रोमोमानानोमेममा भीरwrt'पपामम् की मनुत्ति समापाप मरेमसे सीntो रिपपी पर १ एनानिगासी नापसाप महासकृत पद और विपरस्पर्थसरिव ससिदिशा शम्मशः हिन्दीभनुपाद भायाप ३ ६ २१ SeceGARusenger इस मुत्रम मातम मनुबलि सप्तमी बिमति गुपन लिंग की है और सयामी गण पठी विमति बपषन पुलिंगा मसालिग साये मोर और परसरामस्थामोहन संरकनपतिम सताना गोममे नाम पर भरण पताण "तीन सप्त रथापित सागरी मिति "भूम" रामसे समय परगाय मात् ऐसा म रोकने लिए बाये किए तो मा स्थानिक नागरीकी स्थिति ममियोपुलोमोसो। सबा पर भाव मिला कि तीन सप्त इत्यादि सागरोशी स्थिती जीवोकोषिषो अपपा भूमि की नही। (5) स्थितिका सम्पाप भूमि म सायम राजा (1) तेषु (1) सत्तामा इनफ संभपमें जा विचार और भाव मेरे अपमें उत्पम हुए। उनमेष पाठ साम मप्रतापूर्वकास प्रभरक- (4) 'मापानतो विशपमतिपत्ति एवम् - (पापका) पण मारापा-विरारमतिपत्ति) पाल्पामसे (मर्यात परस्पर पोका संपवा परमेसे) मिलायोति (पास्पोमे) सीरप पा संदिग्पा शमसे (-मोहात) प्रसस्ता मर्यात अमिश्चितभाष पा अर्थ (-प्रायम् ) ही ( होती है इस परिमापा भनुसार मारराषिपासे स्थिति सपा संप रोमाधि भूमि शमसे। (a) पु(-तिनम गनमे)-गरकर (-मर)। पम्पपारम्बामाम पु पो मर्थ लिण है । मरफ शर उमास्तामो गुमरे सूत्रों 'भिमे मनात ना(-मिनासस्थान में सायराम रनममा भूमिमें ऐसे तोसलाच बिसवा निवासस्थान है। पौराम माय थक लिसी सरम नर मनी माग रात पम्पपार स्वामी भूमिका मसतिया जैमाकि पुनरहे भूमिकमेव पणसम्पबालकास्थित ऽमि सापता लप्रमाणामुकपास्थितिरेक सागरोपमा मारि सात नापोम परवत्तिम प्रगट है । स्मरणहकि प्रथम भूमिमै होसलाण इसरोमै पचीसनाव पारिरक है । तब मामा कि तीसलाब मरकाम एकसागरको मतपस्थिति नारोवोही। पपीसप्लायरकोमें मारकोसायोको सहप स्पिति तीरसागरीरबादि । 'ताम्मे (-वासपक-निज ममियो एमगर पादि) पाठसे सबमिती जाती रहती और पुरणपार स्वामी मनुका सापासापा भर्य निकल माताकतिम भूमियों मे।मसे सहम स्पिनि एक तीन पादि सागरी की। सासु-सासु भूमिपुरतासु राम दूसरे सूत्रम भी पाया है। तास रामको प्रमुतिमी इस सूत्रमे लसकत है पर तेषु-सासु) सपना लिये है। (घ) सावाना-melो तीसरे रक्तक असुरकुमारदेव स्वर्गक पत्पादि भी जाता है। इसलिए 'सस्थान से भापय मारमा सायाना' पापसे अपात् मारकी जीवोमी माषा भारदा प्यास अप्पाप तीसरे सत्र मापा और उसकी अनुपति बोथे और पांच सौ मोहे। इस सूत्रमे भी परी विमति पशुपनप (मारका रापी मनुति) प्रातो है । 'मारका अनुत्तिसे मा पिमा 'साय शारे सायेपे बाम त सम्ता पाउमा स्यामा मा म प्रयोग सरससे किया है कि सन सा बागाये और सत्तामा आपको देवकर पा २१ सरबतासे सममहिम नारा को मनुति माय मातोरे समान समेत काम महो पा सकता क्योकि मम यस्पा हाता गोको' उहप स्पिति किनारीवाटी(रकर स्थिति है। हमारे मित्रोत विचारपिदि सानो ममलाते तीमा पसे भौर पर परिभाशसे पाठ मममेव किनारपियोको स्पितिसे प्रपोजना है।

सपार्थ सिदि २२ 99229 एरानिपातो मगरूपसाप पकीलकृत पदग्छद भौर रिमारपर्थसहिव सरायसिरिता शम्दश हिदीमनवाद मायाय ३ सूत्र ६ यथाक्रममित्यनुवर्तते । तेषु नरकेषु भूमिक्रमेण यथासख्यमेकादय स्थितयोऽभिसम्बन्ध्यन्ते ॥ रत्नप्रमायामत्कृष्टा स्थितिरेकसागरोपमा । शर्कराप्रभाया त्रिसागरोपमा । वालुकाप्रमाया सप्त- सागरोपमा । पक्कप्रभायां दशसागरोपमा । धूमप्रभाया सप्तदशसागरोपमा । सपार्ष-वपुः। एकसागरोपया। पिसागरोपमा । = तिन (नरखों) में एकसागर प्रमाण तीनसागर प्रमाण सप्तसागरोपमा दशसामशेपमासप्तदशमागरोपमा ।। 3 सास सागर प्रमाण, दश सागर प्रमाण, सपा सागर प्रमाण दारिंशतिसागरोपमा प्ररस्त्रिशत्सागरोपमा वाईस सागर ममाण और सेवीस सागर प्रमाण नाराणसिरपाना परास्थिति ॥ ययामम् । = नारकी जीवों की उत्कृष्ट भायु पपासस्प भयवा क्रमानुसार भर्षात् पहिली रत्नप्रमा भूमिमें एकसागरकी उत्कृष्ट (नारकीभीषों)को भायु है। इसरी राममा पृथिवीमें तीन सागरकी उस्कृष्ट स्थिति है तीसरी पालुकाममा भूमिमें सातसागरकी उतष्ट स्थिति है। पौयी पक्षमा मुनि दश सागरकी उस्कए स्थिति है, पामीं घूमममा पृथिवी सपा सागरको उत्कृष्ट भायु है, छठपी तम ममा मपि पाईस सागरकी उत्कृष्ट स्पिति है और साक्षी महासम पुषियी वि वेतीस सागरको उत्कृष्ट स्थिति है ।। रुपानुवाद-पपाक्रमम्मति भनुपर्वत = (इस सममें दूसरे सप्रसे) 'पपाम' एसा भनुरूपण है प्रथया अनुचि मासी हैमर्याद दूसरे सप्रसे इस सप्रमें पयाप शन्द लियागया है तपुर नररत पूषि-अमेय = विन नरकम (रत्नमभा, शर्करामभा, इत्यादिक) पृषिषीयोंके क्रमसे पपासपम्पकादप । स्पिवय =एर मादिक (सागरोपमा) स्थिति पयासरुप भर्याद समपाके अनुसार पभिसमन्प्पन्ना लममापाम्॥ रस्कृष्टा । = लगाईमाती है मोटीमाती है (इसलिये) रस्लममा परिखी पृषिपी में उत्कर्ष स्थिति मा एसागरोपमा शराममायाम्।।। = मायु एक सागरोपमा है । शर्करापमा (दूसरी ममि) में (रक्तप्टस्थिति) = तीन सागरोपमा है । पातुकाममा (वीसरी पृथिवी) में (उस्कए स्पिति) सप्तसागरोपमा। पाममायाम् ।। दशसागरोपमा = सावसागरोपमा । पंपमा (पोपी भूमि) में (सर्प भायु) पयसागरोपमा पूमममायाम् ।। सप्तदा-सागरोपमा। -चूपममा (पाची भूमि) मे (एमा सगा भागरोपम है। %3D %3D %D विमागरोपमा मासुकाप्रमायाम् ।। २१ एटामिासी नगल्पसा की A पदप्मेद और विपस्पर्ष सरित सायसिलिका शम्दशः हिन्दी भनुपाद मध्याप ३ सूत्र तम प्रभायां हाविंशतिसागरोपमा।महातम प्रमाया त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमा इति॥परा उत्कृष्टत्यर्थः ॥ सत्त्वानामिति वचन भूमिनिवृत्यर्थम् ॥ भूमिषु सत्त्वानामियं स्थिति । न भूमीनामिति ॥ उक्त सप्तभूमिविस्तीर्णोऽधोलोक ॥ इदानी तिर्यग्लोको वक्तव्य । कथं पुनस्तिर्यग्लोक । यतो- ऽसख्येया स्वयम्भूरमणपर्यन्तास्तियक्प्रचयविशेषेणावस्थिता द्वीपसमुद्रास्ततस्तिर्यग्लोक इति ॥ के पुनस्तिर्यग्व्यवस्थिता इत्यत पाह- वपत्रमायरा द्वाविंशति-सागरोपमा ।। = समाप्रमा (बठगी पृषियी) में उत्कृष्ट स्थिति बाईस सागर प्रमाण है। महावपनपाय परिपशव-सागरोपमा इनिक = महातमामपा (सावी भूमि ) में स्किए मायुः तीस सागरप्रमाण रे पn enविक्रम | सन्मानातिकापना = (इस सप्रम) पग शम्द) उत्कृष्ट एस भर्यमें है। ससाना ऐसा पाप भूमि-निवृक्ति-पर्यम्। भूमिका (स्थितिक साप समन्य हो इस) निपेक खिये। पिता सत्त्वाना। पम्॥स्विति नभूमीनाग इति भूमियो वि औषोंकी या भायु नकि(परनपपा, शकरामभा इत्यादिमपियोंडी परवीन इस्पादि सागकी स्थिति सप्त-भूमि-विस्तीर्ण मस्त = सात (रस्नममा शर्करापमा इस्पादित) भूमिप विस्तार मिसका ऐसा भयो खोभाउकसायानी तिम्लोक पम्प पुन खानागपा है मा तिर्यग्खोड काना पाहिए । बहुरि कैसा विर्यम्बोसाय:सपम्मरमणपर्यंत = तिर्यम्बो भर्षात् तिर्यग्लोक ऐसा नाम कैसे हुमायोजिसपम्पूरपणसमुद्रव भसंसपेपा विपक्-मयप विशणमा भवस्थिता। = मसंपात विर्यफ पनपरूप विशपकरि (गोल वृत्ताकारमै फोहुए) स्थापित द्वीप-समझा तिर्यम्बोज । विori पुन: = दीप भोर समुद्र में विससे विर्यग्लोक एसा (माम) है। परि कौन वियेम्पपरियता विमा माइT %3Dवियग् रूप मवस्थित (दीप क्या समुद्र) हैं। इसलिप (ग्रिमसप्रम) मते है फि सिर्षशताब, मपोर निगमोक मनुप्पो विसोमवेतिगहोप मोर मायनो में क्या अन्तर है। प्रथम परिमापा दोगा। परवाताल सात प्रमाव दिपा गया। (तर) तामसीतेतीस पार जनमत एकस एकराको एक राम् ऊचे ऐसे तोमसोतवासीस मामवाले पेत्रको %3D २३ एयनिरासी मगस्पताय सीमा त पश्येद मौर रिभात्पर्य सरिव सपिसिदिका : हिन्दीअनुपाए । अध्याय ३ सत्र ६ पाय सिद्धि २ ९ जिस पनोदपियानचनप पातवाप और नुवावरताप मेरे हुए है। इसको ऐनको तिपेपमोच करते है क्योरितिषलोकपा जिम विपरा हो । मालोजी समा जो पा मम्मी और एम् राम् पौड़ी और धौरहरा दो और स्थापक ने कास्पान और ऐप माम मोम तौसीग्मतीम पार गजुभौम स्थावर राते है स्थापर मोतिपंच सखा ariat भता लोग, सामापक पौर तिवीर पोषिलोप मा सरस्पानीमें विप) पे तीनों समानार्य पाप रे मासजे है। असमामे स्वापर मी तो मी परिप्रधानता मे इसमें पम पाये इससे बसम्मो का है। 'समेमोकापापिस्वाप विमागोमोल सिर १४ २१२, यसपातिकमर पाvि५ मोर स्योकार्तिकसून २०२यो। सर्प बोको फैले हुए होनेसे विचार विमाम नहीबागपाते। पूरब परिचम पसरा धौड़ा और वचर दक्षिण सम्बे और मेरी बासे पार पास पाजन (भूमिका तक अधे क्षेत्रको मापसोयम्भूमीपसे सेवा सम्मरम समुतासिक प्रपपपरिपात पास पुलापार स्पर्म के हुए सम्पासे मीप समोथे wrana रनेदाम्य पास जिसमा सा विर्यग्बो (सावसिदिषति पुर २०१२ अनुसार मितीय सरकपुर ११७ अमुसारी ntीप को मनुप्पोक at: ग्पर्मुक परिमापामी प्रमाणात प्रालि FFECENE म सि पुना समापाप कर्षतिगमनुमोवाम् पसरवान्यामाप किमो- मामा-मपमान निर्मग-मनुस्मनोसान पंचसापाप्प माता पिते (पोम्मरसार और पापा सदाव नमुनपारे स्पादि ५४३माण पृष्ठ १४०) - पुनि सामापनोमो प्रभोलोरो, मोरको तिर्म मोसे मसुम्पत्तोलो, () पाचपन मम्मामा मन बिचाया ममम्त मोमो मामाम्य बोमपीतमाचे भो भयो समोसे परिमोच है। मनोवि एक चौडामा योगन मचा निर्यलोकतालीस मार बोजन चौडाबास योजन मंदा माम्पबोका पोम्मरसार औषण पृष्ठ १५ मा परि "मपखोsपि (मप्पलोकम) विर्य मोड मगर करते है कि सिगबोध पोरोबम्तमो मायोमे हैबसपा विमोनिसामा पापारा पमिलिमी विसे नामक मेश दूसरे शिपु और परमार पोजन मेसीमा मेरा चाहिनेपर (सावरिपरीवार पाप पुस्तियो" मेनपारनामी "तीमाभाम्भूरममाfentary पिचापस्थिता २४ एटामिनासो गरूपसाप कीसव पाद और विमारपसारित सर्विसिदिका शम्दशः हिन्दीमनुपाद अध्याय ३ सप्र ६ सिदि समुपास्ता स्तिमानित मत (जीपसे सवम्भरमण समुद्र पंत गोस पत्ताभरमै क्ले हुए स्थापित असल्याने मी तपा समुम तिससे निम्तो पेमा । ति यास शमन म रेष-भारी मनुष्योपासर मारोग जीयोका रे मोर सिपाहो हम सपा पर्व गोल-पलपानार नागर ऐसा लिया गण: ए २४ २ पिपमै मसको पूरपमै एबराम माना है मन को पश्चिम एसराज माना। श्रम का उत्तर पात समानारिखममें सात जसो मामाना प्रपसम" समस्त चित्र मापनोपोगा जिसमें अदपाबमा सम्मिलित है। पोरस बोनर -- (यो पृष्ठ २५) जो म्पपरमरम समुदा बाहर सम्मिलित है ("मंतिम स्पपम्भूरम योपो उत्तराम तथा समस्त पपम्मामय गगुदमें और पारों कोनोको मिवियोमे दमममिको सो रबमारे वेको धीमापनरिस्त भाषापार तथा जेनसियातप्रवेशिका पष्ट१२४), पातु निगला रेत पर हो सम्मिलित ह जिसमें क" जापोप और रसको पत्रयोहार घरे हुए लवनोदपि-धातु ीणा, भालोरधि और पुष्कराय भारि मसात मोप समुासम्ममप समुद्र मा (पेरे हुए ) सम्मिलित है। किती तो महाराने मामलोर और तिकबामको चार मही जामे एक बाप मी तिको हितमे रो महाराण मे पहलाप्प गाली सहसास होवपाजिगोगे मेगा प्रतिमाको उमाई पर dt की अपेक्षासे परसाब मप बर उमेरुपर्वतकी पाई रोनी और मालास मा पतिपकी नाई होजाती है। इसमें कई बात सारे वाली हो पाती। समस्तलोकको उचाई बौदह mसुम्मेरको जग मारमात गज मायला मिकासनसे स्तिकाचे लोक अंत पर्यंत सात राजम रुप म्पन यो जाता है पर परमालापासनी मपिपिसान पातोरा पोजन उत्त: समीप कुप मी महोदाते इसलिए साम्परुपस स्पग के प्रभम परसस गमा मोर पर्वत सातरा ही नही है। मेषको जस मोघे सात प्रधालाक है मिसका क्षेत्रफरा १६९ पाणी मात् एकराजलये एक कर पकाउने एस REATjमारे दुणे । मेची मास सिनामय पधत १४७पनाकार राजमात मेहकी गस ग्रझमझातर स्यर्गतका मनाचरम्बार प्रयोत्तरसे ऊपर सियालय पर्वत घनाकारण मौर++, सर्पयोग ३१ गता पुमा पुनम साधारण माले माले मा सपना" पपा है।करते हैं मापसासरप याहि पणा में तिरंगला'का प्राश करत करत तिपक्ष लोकमाने तो मौरसियालोका मापलो भव समभन हगे। विरालो जैसा कि हम सिय कर पुमपाका मागहै। वास्तविक नितोक रबिनालेय पर । eHEREKKERREAR. २५ पटानिमासी नगरपसाव पोल रूम परच्छेद और विमरत्पर्य सहित सार्थसिदिश सम्परा हिन्दी मनपाद अध्याय ३ सन ६ सिदि विवास्पिको विपापम मप्पोका मानना उचित है मतासमकारक मम्पसोबले मत्परत बीच पसाब पोमा चौड़ा गोल (गासरे भावार) मापदापरवाच एक मार पोजन कबा मुमेह पर्वत है । तिसका एक सासू पोजन भूमिके भीतर मम मिपायले हार भोजन पपिपी पर है। भौर पालीस पोजनकी लिका (पाली) है। संदीप बीपमै पश्चिम पर भोर लम्बे पक्ष या बापत पोपी। मिनसे अमीप सात घर हो गये है। इन सातो बहोरे माम इस प्रकार-भगत १ मवत २, हरि मिर रम्या ५ पित , और ऐरावत रिपत्र मेहले गतरको भार ग्चरकुस और दविपकी मोर ऐप कुर है। वीपणे पारो भोर पाली भांति परे हुए दो साथ पाउन चौहास समुदलपन समुदभारो मोरसे पेड़े इस पार साप पोगन पौड़ा पातकी परदीप । इस पातकी पाप को मेरपर्वत । और ये मानादिली साबमा बीपसे दूनो पातको पाको चागे भोरसे येथे ए माठ मात्र योगा बौड़ा पासोरपिंधमुत्र है। मोर पामोशिये पेट से मोहलाच पोजन गौड़ा पुकाशीप है। पुकानीपो बीचों बीच पनप पावार पोहाई पियापर एभरपाईस पोजन बीब सारासा म पोगन पर पारसोचीचोस पोजन मा सतासीरम पाजा और पियाले भीतर भारसीसा- तीस पोजन निमको गोमेसा मामुघरमामा पर्षन पाला है। जिसमे पुष्का शीप दोबारा गये हैं। पुष्पाजीप परिठे अस' भागमे भूपसे दुलो र मात् पारी सोप सरना महीप पातु रोप और पुणराब मांग तपासबोदपि समुद्र और अतो- पषि समुदाय पो भरखो पाते हैं । योपसे मांगे पार पसरेको हुए ने विस्तारपा माओबरे(पूर्वपश्चिम)मतपप दीप मोर समुत्र पाप मेन समाधी पांच भरत पार पावत व मौर उत्तर पुरको पोशर पार विममकार समिबर १५ कर्मभूमि है। [मत और पनि त न रोम साम्प मोगामि है। पांच रिीर पर रम्पक इन पोम मध्यम मोगभूमि है। और पावरे और पाप तथर करना चोमे रम भोग भूमि है। वापर प्रसि मसि हपि सेवा शिण भोर पाकिम्प पर मोकी प्रवृति हो गसममि गाते मालकी प्रबत्ति न हो उसका मोग ममि मन है । मनप्पक्षेत्र से बाहर के समस्त दीको अपग्य भोग भूमिकी सो रकमा kiरितु भन्तिम स्वयमग्माण शीप उत्तराय म त समस्त स्वपमामय समुद्र में और चारो कोमोसी पक्षियों में कर्मभूमिलता रचना व समय और कामोरपि समुदह aria है जिनमे इमोग भूमिमी पापा ममुप्पीते है । ममें मनुप्पोको माल नाना प्रकारका इसितपरिलरिपती प स स किमी प्रकार मरीता गाना मनोषित।

साप सिदि Fee पयनिमासी नमरूपसहाय एकील व पदरछेव और विभास्पर्य सहित 1.पासादका शम्दशः हिन्दीमनपाद । अभ्याप २ सभ७ जम्बूद्वीपलवणोदादयः शुभनामानो द्वीपसमुद्राः ॥७॥ जम्बूद्वीपादयो द्वीपा । लवणोदादय समुद्रा । यानि लोके शुभानि नामानि तन्नामानस्ते॥ तद्यथा- १ जम्बूद्वीपो द्वीप ।लवणोद समुद्र ।२धातकीखएडो द्वीप । कालोद समुद्र । ३ पुष्करबरो द्वीप । जम्बूद्वीपलवणोदादय शुभनामानो द्वीपसमुद्रा ॥ ७ ॥ = मम्मदीप-मादप खरणोद-मादयः । शुभ-नामान: । दीपसमा ॥ ७ ॥ समावे-मम्मदीप-मादपालपणोद मादप : १० = ( इस पिना पृथिवीपर ) ममुदीप भादिक तथा खपण समुद्र मादिक गुमनामानः । दीप-समदा । = उत्तम नामक धारक दोष भौर समुद्र है भर्याद समके पीपमें अम्मदीप रस । नदीप ) के पागे मोर खरण समुद्र है। उसक पागें भार पातुकी खर द्वीप है उस पारों भोर काखोदपि समुद्र (भागे मागे जैससे दीपका नाम है सर समुद्रका नाम है) उस (कालोदपि समुद्र के धागे मोर पुष्परमर द्वीप है और उसके पारो भोर पुष्कररर समुद्र है उस परमात् पारों भोर माणीवर दीप और उस पारणीपर दीपके चारों मोर येष्टिव वारुणीवर समुद्र । ऐसहा एकदूसरेको वोहुए भन्तक सपम्मग्मणसमुद्र पयत भसख्यात द्वीप और समुद्र हैं। मनदीप मादप । दीपा "लरणोद-भादप । सदा । = मम्मदीप मादिक दीप । लपणादपि मादिक समुद्र में पानि लोक शुमानि नामानि | भो शोक विप उसम उत्तम (-शुमानि ) नाम रे नद-नामान त तपपागम्मदीप । दीप ।। घे (द्रोप भौर समुद्र। उन नामोस युक्त जैस जम्मदीप दीप है सरासद = सुषणोदपि समुद्र है अर्थात् सपण ना नोन सारिखा मला योगसे खरणाद नाम भानुडी मगर । दीप ॥ काचोद । समय परमादीपः । घातुझी सएर दीप कालोदपि समुद्र है। पुप्फरपर दीप है (नामा माम्माप समाप्प ववापिगमसूत्रमे 'सपोवावय वाक्पके स्थानमें लवमादय है। शेष पाठ वामो भाम्मायोमे एक । भर्ष मोएको ( - ) अम- (पचन्द्रकोर पप्ठ ७२) मा वाम स्वादगुल असा योगसे मे समुद्र सो सबको %3D %D २७ सपा २८ - % 3D पानिरासी नगरपसाप सात पदस्छन् और विमात्पर्यसहित समार्थसिदिका शम्दश रिवीमनुपाद अध्याय ३ सूत्र ५, ८ पुकरवर समुद्र । ४ वारुणीवरो द्वीप । वारणीवर समुद्र । ५ नीरवरो द्वीप । वीरवर समुद्र । ६ धृतवरो द्वीप । घृनवर समुद्र । ७ इनवरो द्वीप । इक्षुवर समुद्र । नन्दीश्वरो द्वीप । नन्दीश्वरवर समद । । अस्णवरो द्वीप । अस्णवर समुद्र । इत्येवमसख्यया द्वीप- समुद्रा स्वयम्भरमणपर्यता वेदितव्या । अमीषां विष्कम्भसन्निवेशसस्थानविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाइ- ॥ द्विििवफम्भाः पूर्वपूर्वपरिक्षेपिणो वलयाकृतयः ॥८॥ र समुद्र पाठमोरदीप पुष्पर वर समुद्र । वामणीवर द्वीप खीर सह। पीरला दी। = पारुणीवर सपद है। सीरपर दीप सीर समद पुनपर दीप ३३ सीरवर साद्र । यमपर दीप एमवर समुद्र रही। = पर समुद्र है। इसपर दीप है विर समुद्रः । नन्दीसर । दीपः॥ = इबर समुद्र है। नदीवर टीम नन्दीश्मरमर ममुद्र । भस्वार दीपा -नदीश्वर समुद्र । भरुणपरदीप मम्सर । समुद्र पनि एपम् = भरणपर समुद्र । इमकार निश्पपसे ( = एवम् , प्रसस्पा दीपममदा । सपम्पुरपण - असमपात द्वीप तया समद सपम्भरमण ( सद) पपता पेदितव्या । अमीपा । विषम = H मानना पारियन (द्वीप पा सों) की पौड़ाई सनिश सस्मान-विशप-प्रविपति-प्रामा - मरस्यान (सनिश) और भाचार संस्थान) रिशेष माननशियातील हिदिविष्कम्भा पूर्वपूर्वपरिक्षेपिणोवलयाकृतय (नमदीप धरणोदाक्य )दि दि पिपम्पा पूर्वपूर्वपरिषेषिणः रखप भाकृतपः। सुमार्य -- मम्मदीप-भादो मरणोद-मादप १० महीप, भादिक और लवण समुद्र भादिक (प्रत्येक समुद्र तथा दीप एक दूसरेसे) - दुगन दुगने पिफम्म पाल रे और परिशे परिजे दीप और समद भप्रियमप्रिपसे) परिसर - पागे भोरम सिंहुए पा शिपरे हुए हैं (परि सपी दीप वमा सर) (म ममा पार भोपनी सामान एकालाल-पपासा नाकार-मप-चरस (अपरेसाना NEEEEEEEment हिदि निकम्मा पर सपाय २६ सिदि एटानिपासी मगरूपसाप मील व पदण्छेद और विपक्स्पर्य सहित सार्यसिदिका शम्श हिन्दी अनुवाद अध्याय ३ सूत्र हिर्हिरिति वीप्सायां वृत्तिवचनं विष्कम्भद्विगुणत्वव्याप्त्यर्थम् ॥ श्राद्यस्य द्वीपस्य यो विष्कम्भ तद्विगुणविष्कम्भो लवणजलधि । तद्विगुणविष्कम्भो द्वितीयो द्वीप । पलप भाकृतयः व्यलयाकार भपरा पृत्ताकार है भर्यात् लवण समुद्रके एक मोरके प्यासखर सम्म्दीपके प्याससे दुगण भोर जम्दीपको चारों भोरसे वोहुर है ऐसेही धानुकीख रके एक भोरके प्पाससारका प्रमाण लषणसमुद्रके ग्याससे दुगना है और सर्वव लवणसमद्रको लपहुए हैं ऐसेसी कालोदपि पप्फरपर इत्यादि भसंरण्यातदीपसमयों को स्वयम्मरमण समुद्रपर्यंत जानना "दिदि गतिमी-सायोपृत्ति पपनम् =दिर दि (गुण द्गुण) एसा गार पारके भयमें समासस्पर्मे द्वि. द्विः वाक्य है रिफम्म-दिगुणस- सो विस्वार भर्यान प्यास एक मोरके सरके प्रमाणका (=विप्फम्भ) दूनापनाके फैखानफे प्याति-मर्पम्पमापस्पादिीपस्य योनिष्कम्मा लिप है प्रथम दीरका जो प्यास प्रमाण है बद-दिगुण-विष्कम्म लवणमलपि उससे दुगुण प्यासभागममाण पाखा लपण समुद्र है भयात् जम्मूदीपफी परिधि पर एक पिन्दु लेकर उसीकी सीपमें दूसरा रिन्दु लवण समुद्र की परिधि पर लेफर यदि दोनों सिन्दुओंको मिशाफर सीपी रेखा खींच दें तो इस रेसाफी लम्बाई दो लाख योजनफी होगी ब्द-दिगुण-विष्फम्प दिवीयमा दीप । -उस (लग्नादषि) से इन प्यास मागवाला (=विप्फम्म)इसरा (धातुफी सद) दीप है (१) पामोरि समान है। गुमोरिसमास तीन प्रकारका तर पदार्थ प्रधान (ब) ग्मप पदार्थ प्रपान (ग) सम्पपदार्थ प्रपाम पहाँ पर प्रपमभेर उत्तर पदार्थ प्रपान है। जैसे शिपया। मौवारीपय इति विपन दो वारपरा जिसमें हो ऐसा विमा निसन म पास है। उमप पदार्थ प्रपान जिसमे मोमोरोपर प्रपा रोजैसे विषादी पापा वा विविध भावार्थ दो वा तीन । माप पदार्थ प्रपाम पर मिसमें मम्य मात् मसिम पर प्रपान हो जैसे पविया उपसमीपम् गता शिविर्यपामिति विप्रम- समीपको प्राप्त होगपी पीस बिलगमग वीस भर्य है। (२) विणाम-समर्प पत्र बन्द कोपके पास में विस्तार फैलाव का विस्तार वा फैलापका अर्थ पत्रफल मी सममा जाप्तके है परन्तु पॉपर परमाणप नहीं रेपोजिमापूदीपसे अपवादपि पत्रफल समम चोवीस गुणा अधिक होता है यहां पर विषम्म का माशप यह एसमोरचा पासणारेजो सम्सीपी परिपिपर एक विन्दु र उसको सीपमै दूसरा वितु लवमोदपिको परिषि परसे लेकर पोगो विग्युमोको मिलानेसे पनता है। जोपसे सवोरपि मगमग चौबीस गुणा और पानी का अम्मापसे लगभग एक्सी बयालीस गुणा है जैसा कि २४ सिदि २८ पानिवासी नगरपसाय वरीलकत पदोन और रिमात्पर्यसहित सायसिद्धिका शम्दश रिवीअनुपाद अध्याय ३ सूत्र - पुष्करवर समुद्र । ४ वारुणीवरो द्वीप । वारुणीवर समुद्र । ५ क्षीरवरो द्वीप । क्षीरवर समुद्र । ६ घृतवरो द्वीप । घृनवर समुद्र । ७ इनुवरो द्वीप । इतुवर समुद्र । ८ नन्दीश्वरो द्वीप । नन्दीश्वरवर समद्र ।। अरणवरो द्वीप । अस्णवर समुद्र । इत्येवमसख्येया द्वीप- समुद्रा स्वयम्भूरमणपर्यता वेदितव्या । अमीपाविष्कम्भसन्निवेशसस्थानविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह- ॥ द्विििवष्फम्भाः पूर्वपूर्वपरिक्षेपिणो वलयाकृतयः ॥८॥ पुपरवाः समुद्र सौरदीप पुष्कर पर समुद्र है। पाणीपर दीप पाणी समा। सीरपर दीप । = मारपीपर समुद्र है। धीरपर दीप ? मीना समुद्र तर दीप । - वीरवर समुद्र । पृमपर दीप रे एतसर । समुद्र । दी। = पर समुद्र है। इधुवर द्वीप है स्वर समुद्र नन्दीसर द्वीप इचरर समुद्र है। नदीसर दीप नदीसरसर । ममुद्रः ।। भरमार दीप । नदीवर समुद्र । भरुणपरही है भरणपर । समुद्र इतिएरम् = भरणपर सपद। इसमकार निश्परसे ( = परम् - मसम्म्या दीपममुद्राः ।। यम्मुरमण - मराम्यान दीप पा समर स्वयम्भरमण (समद्र) पता : पेदितष्पा । समीप विष्णम्म = तक बानना पारिये इन ( दीप सपा समुद्रों) की चौड़ाई सपिरश तस्मान-पिशप-मविपति-भगा भार = अवस्यान (समिवश) और भाकार संस्थान) विशेष माननकेशिये बात कि द्विर्हिविष्कम्भा पूर्वपूर्वपरितोपिणोरलयाकृतय (नम्वदीप शरणादादयः)दि हि विषम्मा पृषप्वपरिक्षेपिणः पक्षय भारुवा ।। सूत्रार्थ - नामदीप-भादप " जयणोद-मादय १५ : अम्बदीप, अादिक और बरण समुद्र माविक (प्रत्येक समुद्र तथा दीप एक दूसरेसे) - दगन दुगन विषम्म पाल हैं और पहिले पीले 'दीप भोर समुद्र मनिपनिमस) परितपणा = पार्टी प्रोरस मिस एप पा लिपटे हुए रे (परि सकसी दीप तपा सद) (१) इस सपना राठौरमा मोमो सम्प्रदा एकापायापार-तापार-पल तल परमात्मा दिदि विफम्माः । षष सिदि एगनिवासी मगरपसाप मीलहत पदरसर और रिमणस्पर्यसहित सर्वार्थसिदिका प्रमशः निरीमनुनाद भष्पाप ३ सुबह अत्राह, जम्बूद्वीपस्य प्रदेशसस्थानविष्कम्भा वक्तव्यास्तन्मूलत्वादितरविष्कम्भादिविज्ञानस्येत्युच्यते तन्मध्ये मेरुनाभिर्वृत्तो योजनशतसहस्रविष्कम्भो जम्बूद्वीपः ॥९॥ भरमार,मम्पूीपस्प मदरासस्पान-विफम्भावाच्या पापाई कि ममदीपका ठिकाना(प्रदेश) भाकार,पासपमाण काना चाहिए बताया।" म्स (नम्हीप के) स्थित मादिक होने से अर्थात् निर्णय भादिफ होने से इवर-रिष्कम्भादि-रिशानस्पतिकारपत्र -इसरादीप तवा समुद्र के विस्तारादिक माननेका इसमकार (मग्रिमसूत्रम)कहानाताई कि १९५ 'सूत्रम्-तन्मध्ये) मेरुनाभिर्वृत्तो योजनशतसहसविष्कम्भो जम्बूद्वीप ॥ ६ ॥ सूमार्य -वइपध्ये नाभि मान (दीर मादों के पीपापीय में मेरुपीस नामि मिसफी प्रभवा र पर्वत निसकी नामि (मध्य ) में ऐसा अछपाकार (सूर्य के मरल साश था इसाल के एक सारा भाकारमान ) "योजन शवमासू-विफम्म जम्मूढीपर रतन योजन पामधारक जमदीप है भर्याद मदीप मतर पटल मृत है शेष समुद्र और रीप सयम्भरमण समुद्र तक वलयाकार पदी, पक, भपया कड़े के भाकारपद है सो इस अन दीपक प्रत्येक म्यासकी लम्बाई एक खास योजन है और उस जम्दीप की परिधि तीन लास सोलह हमार रोसो सत्ताइस योजन तीन कोश एक माँ भवाइस पाप साई मेरा अंगुल स म अधिक है (योजन २००० कोशका है) (सेताम्बर और दिगम्मर रोगी मानायों में रस सुधा पाह और पसाहै। कही कहाँ पर हमारे यहां जमीप भी गाउ ठीक है। (२) मेनामिास पायदा प्रहार समास (1) मेपर्वतमामि जिसकी (२) मेह पपत जिसकी नामिम दामोरीति समानो का या भागलि मेनिस (प) के बीच में है। (३) वृत-इलाम पा साल यच होता है उसके पोचावीप में पर विगुरियत करे तो उत्त बिन्दुको क्षेत्र कहेगस पृतकी किमारेका बोगिता मोज रेशा परिपि पाते। इस परिधि पर दोरियासरे सामने लेकर दम होकर मोरेखा भाती है उसको म्यास या सुपी याण मनुवाद लिए मत पाप है। गा। (vari पाउन पासातू भेगम जानना चाहिये (५) पासमा भर्य () विस्तार (ब) फेलाप (ग) सूची है इसलिए यह ग्राम विकम्म सिदि 9922 एरानिवासी नगरपसाप पकील झव पदच्छेद भौर निभवत्पर्य सहित सपायसिदिका शन्दश हिन्दीमनुवाद । अम्पाप ३ सूत्र तद्विगुण विष्कम्भो द्वितीयो जलधिरिति॥हिहिर्विष्कम्भो येषा ते द्विदिविष्कम्भा ॥पूर्वपूर्वपरिक्षेपि- वचन ग्रामनगरादिवहिनिवेशो मा विज्ञायीति॥वलयाकृतिवचन चतुरसादिसंस्थानान्तरनिवृत्त्यर्थम्॥ सद-दिगुण-विष्कम्म ।। द्वितीय, जलपि ।। इति =विस (पाद की सर द्वीप) से दुगना व्यास खरका पारफ दूसरा समुद्र (फालोदपि) है दिदि विष्कम्म। येपाते दि दिः विष्कम्मा । =बना दना विष्फम्म है जिनका वे तूने इने पिफम्म माते हैं पूर्व-पूर्व- (इस सूममें) पहिले पहिले (दीप तया समर एक दूसरे फो) परिघपिन्-वचनम्।।" चारों भोर से भयषा सपथ यो हुए इस पाक्य(यषन) से प्रगट है कि पाप नगर-मादिनन् मिनिपेशामा०विशायि विश्राम क्या नगराविकके साश अमस्थान (इन दीप क्या समुद्रोंकों) मव मानो पलप-मावि चपन पतुरसू-मादि-सस्थान वृषाकार पा पलपाकार पाफ्य चौफोर मादिक भाकार (संस्थान) की भन्तर-निवृत्ति-मर्पम् ॥ -भयधिफे निपके लिये है पालतराव भागा निवासी विदोंने पर्मविसासाम्प सप १७ पूर्ण रिपा मारत 'इम्पादि पचीसी निम्मलिखित सयातीसासे प्रमरमा एक माणीयो दोनो भार बोनोदपि सब पांच सूची गुमो पीस फसाइये। मोप एक लौनिकार चौबीस समुदपार, सम्म मौ पौषोस गुरोगपि ताये । पात पर बार बार सब सभी तरह की मुगौ सौ सनातरि परचीस घराये। अम्मू सती एकसो वाम गुनी पात पामागे पियोपोरो जिनवानी गारपे। एक समुद्र पा दीप सिरे से और दूसरे सिरे तीरेखादे प्रमाण मोकिरेन्द्र होकर माती सुधीगस प्रकार १ साब माशीप दोनो मोर दो दरोगावर समुद्र सब मिलकर पाप बाबासकासी गुरमेसे पच्चीस ए इसमें अम्माशेप एक साहको पाने पर सम्मशीप समन मुम चौबीस गुणा मपा। इसी प्रकार समक्ष समुन दोनों मोर बार बार इसी प्रकार सर्वत्र वामना। पात की परिए इसको सोसे गुपनसे १६ प इसमें स पापीस घराने स १४ गुना अमाप से पातकी पर मपा विििम्मा - पूर्वोक्त पति पभोर पप्पास परीसम्माई दूनी दूनी एक दीप से उस मिटके समुद्र की उम पमा सोप वैसा ही प्यास घर उस समुनरे पास पर सेना से सम्ममाप पटल प अपवा प्रस्तर रूप वृत्त है और उसका पूर्व पास एकनाथ पोजमाप समुन्नका एक मोरका प्पासपर पोताच पोमन सम्या है। इसी प्रकार पातुही पर शेपा एमोरच पास पाजासमोरपि और पापी पंटो परिपियों पर परमोधर्म विधी से मिलने सबमाता रमाबदोशन और समाधिकार भारताप्पासपरोपापा और कासारपियो परिचिों पर एकमरे रेसीपमें दो मिण लेकर मिनामेसे पाना मामा बोनस इसी प्रभा मत पयम्भूमपसमुत्र पर्व मानना का मभिमाच मितिथिम वापरा. KEER सिदि 199245 एठानिवासी नगरपसाप सहत पदाद और वियरपर्यसहित ससिदिका शम्दशाहिदीभमुसाद अध्याय ३ सूत्रह प्रवाह, जम्बूद्वीपस्य प्रदेशसंस्थानविष्कम्भा वक्तव्यास्तन्मूलत्वादितरविष्कम्भादिविज्ञानस्येत्युच्यते तन्मध्ये मेरुनाभिर्वृत्तो योजनशतसहस्रविष्कम्भो जम्बूद्वीपः ॥९॥ भरमार,मम्मूदीपस्य मदेशसस्थान-निकम्मामलप्पा या प्रभो कि समुद्रीपका ठिकाना( प्रदेश) भाकार,व्यासममाण करना चाहिए छमूखत्पाद!" -उस (मनदीप के) स्थित प्रादिक होने से अर्थात् निर्णम भादिक रोने से इतर-निष्कम्भादि-विशनस्प" इति०अभ्यते। इसरो द्वीप तथा समर) के विस्तारादिक जाननेको इसमकार (मनिमसूत्रमें कहाभाताई कि "सूत्रम्-तन्मध्ये मेस्नाभिर्वृत्तो योजनशतसहसविष्कम्मो जम्बूद्वीप ॥ ६ ॥ सूत्रार्थ -वदयध्या पेल्नामिया -उन (समंदीर समदों) पीपातीवमें मेरुपर्वत । नामिनिसफी प्रयवा मे पर्वत जिसकी नामि (पम्प) में है ऐसा प्रखपाकार (सूर्प क माल साश वा अलाल के एक सदश भाफारपान ) * पोमन-शतसासू-पिकम्मा जम्बूद्वीप एकलन योमन प्यासपारफ अम्मदीप रे मर्याद मम्मीर मतर पटल वृध है शेप समुद्र पार बीप स्वयम्भ्रमण समय तक पलयाफार पड़ी, पक, अथरा कड़े के मारपरवद् । सो इस मनदीपके मत्पेफ प्यासकी लम्बाई एक खास योजन है और उस नम्मदीप की परिपि मीन लास सोसह हमार दोसौ सचाइस पोजन सीन कोश एफ मौ भाइस चाप साडे तेरा अगुल से सत्र अधिक है (योमन २००० कोशका है) (१) पेशाम्पर और विमरोमी भाम्नायों में इस सा पाठ और प्रपसा कही कहा पर हमारे ort गीप भी गाठ ठीक। (२) मेहमामा समापदा प्रहार समास (1) मेरुपर्वतमामि जिसकी (1) मेह परत जिसकी नाभि है दानो रीति समासोग पापाप कि मेरे शिम (सीप) के बीच में है। (1) -साब सय पच होना। उसके पीचाचीन में एक बिन्दु परिपत बरे हो उस विद्रोगस पुत्ती बिमारेका बौमिरा गोबरेवाको परिषिमतेइस परिषि पर दो विपकमरे के सामने लेबर वन दरोगर जो रेता जाती है उसको प्यास पा सूची गाहे भनुमलिए बहुत पाप। पाते। (e)rt बाजन वा सासू रोगका बाममा बाहिये (1) व्यासच भर्य () विस्तार (4) केसाप (प) सूची है इसलिए यह सम विषम्म 92 सायी सिदि ३२ एनानिवासी नगरपसाप वफीलरुव पवच्छेद भऔर विभक्त्पर्यसहित सार्यसिदिफा शम्दशः हिन्दीभनुवाद भध्याय ३ सूम तेपा मध्ये तन्मध्ये । केपा १ पूर्वोक्तद्वीपसमुद्राणाम् । नाभिरिव नामि । मेरु मिर्यस्य म मेनाभि ।वृत्त अादित्यमण्डलोपमान । शताना सहसम् शतसहसम् । योजनाना शतसहस योजनशतसहसम् । योजनशतसहस विष्कम्भो यस्य सोऽय योजनशतसहसविष्कम्भ ॥ कोऽसौ ? जम्बूद्वीप ॥ कथं जम्बूद्वीप १ । जम्बृवृक्षोपलक्षितत्वात् ॥ उत्तरकुरूणा मध्ये जम्बूवृक्षोऽनादिनिधन पृथिवी परिणामो RE प्यनुगाद-तेपामध्ये सन्म पेकपा विन(दीप-ममुद्रों के बीचालीचमें है सो वन्मध्ये है (मरन) किनके (मध्य में) है। पूर्व उक्त दीपसमुराणाम नाभि चकनामि (उचर) अपम पर्णित दीप क्या समझोंके तुररी मपया दगीके सत्श है सो नामि है मेर नापिकायस्प'िसमस्नामि। =मेरु पर्पत है टीके साश (जिस जम्बूदीप) फा सो मेक्नामि है। ("परमादित्य मण्डल उपमान वृस सूर्यफे विमान (मादित्प) साशा(उपमान) गोल (अपरल) है शिवाना" सास "शतसहसम्योजनानां शवसासू-सा गिर सो शत सासू है योजनों के सौ मार सो पोजन शत-सास योमन शत-सहस् "निष्कम्म पस्प-योजन शवसासू है अर्थात् लस योमन है । सो हमार योजन है विस्तार जिसका सभपम्पोनन राव सरस पिप्फम्मा ? सो या योमन शत सासू विष्कम्मर मा (सौ योजन पिस्तारराजा) कौन है भसीनमदीपक कम्पटीप जम्म् या मदीप है नम्वीप नाम कैसे है ।। (इस सत्र में) नम्नामा इस उपलचितत्वान" =न की विधमानता के सारे भया संयोगसे (यह जम्मदीप नाम) है उपर मध्या उत्सर कुरुमोग भूमि के बीच में भर्याद ईशानकोण में ना पूर्व उच्चरकोण में जम्मच मनादिनिपनापृथिवीपरिणाम जम्म पृत भादि भन्त रहित (अनादिनिधन) पृयिपीकापरूप (१) पहा पर वृत्त कामा इस नियम किस मारिहर शीप समुद्र पसयाचार पत्र और सम्मादीप प्रतापू। (२) सरण मयुत (-1. मत प्रपत= (ब) मई (-परि) अम्म(-म) पर निब(राव) भाव (ta) मम्प(पमा पप (गाय) राय (-) सरमनी मीर बन गप्प बत् मोसम विमसिनो में रो। २२ तिथि पटानिकासी गरूपसराय रील हल पदरछेद और रियरत्यर्थ सहित सार्यसिखिका शम्दशः पिन्दी अनुवाद मध्याय ६ सूप १० कृत्रिम सपरिवारस्तदुपलक्षितोऽयं द्वीप ॥ तत्र जम्बूद्वीपे पड्भि कुलपर्वतैर्विभक्तानि सप्त क्षेत्राणि कानि तानीत्यत श्राह ॥ ॥ भरतहैमवतहरिविदेहरम्यकहैरण्यवतैरावतवर्पाः क्षेत्राणि ॥१०॥ भरतादयः सज्ञा अनादिकालप्रवृत्ता अनिमित्ता ॥तत्र १ भरतवर्ष क्वसन्निविष्ट । दक्षिणदिग्भागे मापिमा स-परिवार अप्रिम परिवार (मर्याद अपने चारों भोर मार मारे प्रमाण लिये एक सौ भाठ बारे मम्मों सहित मद उपलचितमपीप उस (मयान वृक्ष) यागसे (उपललित) यादीप नामहीपनि नपान विभक्कानिm तामसावित या कुलाचलनिकरि (न्त पर्वत) निमाग कियेगये सम"शाणिनि तानिपातिकमत भा-सात वर्षी ते कौन है इसलिये (उत्तर सूप में) काव रे फि "सूत्रम्-भरतहेमवतहरिविदेहरम्यकहरण्यवतैरावतवर्षा क्षेत्राणि ॥ १० ॥ (जम्दीपोभरतवर्ष, मरतपः, परिवाः, रिदेवा, रम्पकपः रिपपरतवर्ष,, ऐरावतवर्षः, क्षेत्राणि भवन्ति॥ १० ॥ मार्ग-जम्मामामरतवर्ष पदमवतवर्ष =(मदीप पिन। मारत्ता, ईमवतवर्ष, हरिपर्प पिदेपरपारम्पकार्य । दारिता, विदेश्वर, रम्पवर्ष, परपान एरारतरामाणिमन्तिा रपयवनचर्प, एरावतत्रप(ये सात) क्षत्र पुरनुमान-परन भादपासना मनादिपातम-भरतादिक नाम मनादिमवस प्रवर्तते । भनिमिता कमरा निमियरहित भयात् स्वयम् (मरन) वाँ (जम्दीपमें) पहिला मारतर्प (भरतवर्ष) समिरिष्ट- दक्षिण दिग्मागर का स्थिति है (रसर) जमीपके दक्षिण दिशाके विभागों (परमारे पास सस पाठ मौर पर सत्र एकतार मानायके समापनागर्याधिगम सत्र भरत रेमवत इस्पादि पहिल तर तोntोरोमो साप्रापी में (स समर्थ । एपरिसित यापम a पाद सम्पनौपापहोवादप हत्यादि स साता सूत्र से सम्पाप' पेशी अनुचि रस सूत्रमें सपी सिदि ३२ एयनिवासी नगरपसहाय मफीलस्त पदगरेद भौर विभात्पर्णसहित सार्थसिदिफा शम्दशः हिन्दीभनुराद मापाप ३ सूप तेषां मध्ये तन्मध्ये । केपा ? पूर्वोक्तद्वीपसमुद्राणाम् । नाभिरिव नाभि । मेरुर्नाभिर्यस्य स मेनाभि ।वृत्त श्रादित्यमण्डलोपमान । शताना सहसूम् शतसहसम् । योजनाना शतसहस योजनशतसहसूम् । योजनशतसहस विष्कम्भो यस्य सोऽय योजनशतसहसूविफम्भ ॥ कोऽसो? जम्बूद्वीप ॥ कथं जम्बूद्वीप ? । जम्बृवृत्तोपलक्षितत्वात् ॥ उत्तरकुरूणा मध्ये जम्यवृतोऽनादिनिधन पृथिवी परिणामो पश्यनुरादा- नेपामध्ये सन्मभ्याकेपाम् ।। तिन(दीप समो)के पीनापी है सो तमध्ये रे (परन) फिनफे (मरूप में)॥ पूर्व उक्त बीपसमुद्राणानामि सबनामि। (उपर) मगम पणित दीप नया समुद्रों के गुरसरी मागा दूरीके सत्श र सो नाभि मेरा नामि यस्य सः मेरुनामि परु पर्वत र टुंदी के सरश (निस जम्पदीप) का सो मेनाभि है। (१ वृतमादित्य-पएदत्त उपमान पुण सूर्यके विमान (मादित्य) सारा उपमान) गोल (मएडल) (शताना " राहस "शवसहराम्।योमनाना शतसहसू सागर सो शत सासू योमनों के सामार सो योनन शत-राइस योमन शत-सास "निष्कम्भायस्प-योनन शतसहसू हैमर्थात् लस योमन है। गौरमार योजन हैगिस्तार भिसका सभाभपम्पोमन शत सासू गिप्फम्भ का! सो या योमन शत सइस विष्फम्भ है पा (सा गोमन विस्तारमाला) फौनी भसादनम्पाप-३'फकम्दीप जम् या नदीप रे मम्सीप नाम फसे है। (इस सप में) गम्मूनामा पूर्ण उपलवितत्यान प की विषमानमा के सारे भगमा संगोगरो (पा मम्पूदीप नाम) है रतर-मरण मध्ये मगर फुरुभोग भूमि के पीप में भगात् ईशानकोण में मा पूर्ण उपरकोण में नम्रा मनादिनिपनापृथिवीपरिणाम ।' नम्र पृच मादि मन्त रहित (=मनादिनिधन) पृपिपीकागरूप (१) पा पर पुल पना हग निपग रे मनसिपमा सेरोप पण याकार पुरा भीर मान प्रतात. (२), सरप, मगुत (-१..)प्रगुत-) भरनरामोरि) मात्र(-) का नियम) भारत (नाम) गम(पम पा (प) ml (14) nanfantीरगन र गत् लोग विभक्तिमा बने। ३२ 864geeRER पानिवासी प्रगम्पसाप सरदेव भौर विमरस सहित सर्विसिदिस शब्दशः हिन्दी अनुसाद मप्पार ६ सूत्र १ कृत्रिम सपरिचारस्तदुपलतितोऽयं द्वीप ॥ तत्र जम्बूद्वीपे पनि कुलपर्वतेर्विभक्तानि सप्त क्षेत्राणि कानि तानीत्यत आह ।। ॥ भरतहैमवतहरिविदेहरम्यकहरण्यवतैरावतवर्पाः क्षेत्राणि ॥१०॥ भरतादयः सम्क्षा अनादिकालप्रवृत्ता अनिमित्ता ॥तत्र १ भरतवर्षः क्वसन्निविष्ट । दक्षिणदिग्भागे माविमा स-परिवारमा समापिम परिवार (भषात् भपने चारों भोर माये मारे ममाण सिये एक सो भार घोटे जम्मपनों सहित पपसचिव प्रदीप रस (मपान मुसार योमस (अपललिता) या बीपी वरखनहीपनि विपरत विमाकानि जो जमीर बिग पास्चारलनिकरि (= पर्वत) पिमाग कियेगये समाप्रप्राणिकानिहानि इसिव समासात मप्र के कोन है इसलिये (सचर सूप में) करते हैं कि "सूत्रम्-भरतहेमवतहरिविदेहरम्यकहरण्यपतरारतवर्षा नेत्राणि ॥ १० ॥ निम्हीपे) परतवर्षः, हैमवतवर्पा, रि, रिवहनी, रम्परुवपः, रिपासर्प , ऐरावतवर्षः, सेप्राणि परन्ति॥ १०॥ भूभाई जहाभरतवर्ष मनतवर्ष जमदीप पिसी भारतवर्ष, मनववर्ष, परिभारिपारम्प मरिचम, विदेशर्मा, रम्पकार्प, रिपयरत वापरावलयपनासत्राणिमरन्ति रगपवसर्प, परावतवर्प(ये सान) सप गुप्यनुवाद परत मादयसम्मा"मनादिकासमता मरवादिक नाम भनादिकालसे मवर्तत र भनिमित्तामतिपयमरतमा निमिचरवि भयो स्वपम् (परन) तहाँ (मम्मूदीप) परिक्षा मारतपर्प (भरतवर्ष) समिविष्टा दक्षिण दिगपागर' या स्थिति है (सधरमम्बापो दक्षिण दिशाके विमागमें (हमारे पास मत पाठ मौर मर्थ म एकतर मामापडे समाप्पाराधिगम मनमै मरत दमबत यादि परिसे तर अधिक जिस का गपभमाँ पद समीपसपोरास पानि स सालमा सूर्व से 'बम्पनीप" ऐसी मनुषति इस मूममै लोगई। रोमी सम्पदापी में समर्थ है। यो। ३३ सर्वात सिदि ३४ 999) एटानिनामी नगरपसाग पडीमा हत पदगद मौर विमारय सहित सवायसिदिका शानशा हिन्दीअनुमाद । मध्याय ३ सूत्र १० हिमवतोऽद्रेस्त्रयाणा च समुद्राणा मध्ये पारोपितचापाकारो भरतवर्प । विजयान गङ्गासिन्युभ्याच विभक्त पट्खण्ड ॥ नुद्रहिमपन्तमुत्तरेण दक्षिणेन, महाहिमनन्तं पूर्वापरसमुद्रयोर्मध्ये २ हेमवत- वर्ष ॥ निषधरय दक्षिणतो महाहिमवत उत्तरत पूर्वापरसमुद्रयोरन्तराले ३ हरिचर्प ॥ निपधस्यो- त्तरान्नीलतो दनियत रिसरतामने प्रयाणाम् मकसदाणाम् ।। हिमरान-पर्पता (भदो) भोर (-१) बीन मोर (लमण) रामुद्रा मायरोपिक-पाप भाम्पर भरतपय मध्यमें महायेय धनुपफ भासर भारता विमपादनमाासियुम्पाम् प०मिभक्त । वैतापप तसे तथा गंगा मार सिपु नदिगों से पूषा पिगे दगे (विभक ) पटसपर उदादिमरन्त उपरेण र सारे दिमगन् लागलपी उपर दिशास (मार) दक्षिणेन पाहिमसन्तपूर्व भपर महादिमान् लाग्लरी दक्षिण दिशाम पूर्ण पधिमाके दानों मोर समुद्रयो पापमपन र लवण समुद्रके पीममें दसरा दमनन वर्षपर सेप है निपपस्पदचिणनामादिमरत सरतः मनिपप गुलालडी दक्षिण दिशासे और ममादिमगन् गलालफी उत्तर दिशास पूर्व-मपर-समुद्रपोई अन्तराले ३ इरिस -पूर्व पभिम दोनों मोरक लाण समुद्रक पीनमें (मन्तराल) तीसरा परि गई है। निपपस्पपिपरा नीखतपदविणता -निपप फलामलफी उमर दिशासे (मार) नील फलानलफी दक्षिण दिशारो मामोप ताप समुद्र मावि मीप और समुद्रात दोन मिrafiaafana नियमागुमार मिकल माता माए एक पचर जिसके बापाच एकसिig पृत्तकात मारया मोरया कहती। मगर न प्रापक पराबरपरकाका निग्या कोपा पागासाधक भर गाल वायुतको परिधि समारोहममे जादौन माना विकास एकमाल गाजगाम मोर मार और का गावर वेत्रको लपप समन माना है। याना माजीकाका से गुला भाममे गनपला पदीय है। जैसे अम्म्दीपको जाना पचास साल योजन सामी १ (५...)'x'- Ri................... Havatil मापापास पातभर पासीचरला गालीमसान मारमोना पराये सात पर्मोसन मा पेसेही मन परामिकामर समातारादे nihe mप मुरमा पनि मापता / - A प सिदि एगनिरासी जगासहाय पीला पदरहद और पिमारपर्षसहित सर्मार्थसिदिश शब्दश हिदीभनुराद भष्पाप ३ सूत्र १० पूर्णपरसमुद्रयोरन्तरे ४ विदेहस्य सन्निवेशो द्रष्टव्य ॥ नीलत उत्तरो रुक्मिणो दक्षिण पूर्वापर- समुद्रयोर्मध्ये ५ रम्यकार्प ॥ रुक्मिण उत्तराच्छिखरिणो दक्षिणात्पूर्वापरसमुद्रयोर्मध्ये सन्निवेशे ६ हेरगयवतवर्प ॥शिखरिण उत्तरतस्रयाणा समुद्राणा मध्ये ७ ऐरावतवर्प । स विजयादने रक्तारक्तो- दाभ्या च विभक्त पट्खण्ड ॥पटकुलपर्वता इत्युक्त, के पुनस्ते, कथं वा व्यवस्थिता इत्यत आह- पूर्व "मपर-समुद्रया- अन्तर विदेहस्य। =पूर्ण पत्रिम (लवण) समुद्रके भागोंके मध्य चौथा विदेश क्षेत्रकी समिरेश रनोखत उपर' सम्पफ स्थिति जानना योग्य है भयवा देखने योग्य है ।। नील कुलाचलसे उत्तर परिमणदक्षिणपूर्व-भपर-समुद्रयोई -हरमी वा स्पीलाचलसे दक्षिण (भौर) पूर्व और पमिम दोनों भोरके लवण समुद्रके मध्य रम्यकस रिमणः उमराव बीचमें पापो रम्यक वर्ष है ॥ रुक्मि फुलाचलके उपर दिशासे और शिसरण दक्षिणा पूर्व अपर-समुद्रयो । शिखरी कुलाचलके दक्षिण दिशासे पूर्व और पपिम दोनों भोरके लवण समुद्र के मध्यसमिरा रियरवर्पः । सतराल स्थितिमें छठया हैरपयपत वर्प है। शिसरिण उमरच त्रयाणाम् सिमुद्रा शिखिरी कलाचलकी उत्तर दिशासे (मौर) वीन भोर लपण समुद्रके मध्य ७ ऐरावासभा,साविभयान बीचमें सातवा ऐरावत वप रे ॥वर (ऐरावत सप्र) घेतादय पर्वतफरि रनारकाराभ्याम् ॥१०रिभक्त पदलपट था (1) रका रकादा दोनों नदियोंकरि छा खररूपमें पटा हुमा है। पर लिपीता पति पुनः० -घा लाचल पर्वत ऐसा फरा मया है भयका गणिव है। यहुरि पुन )ते फोन है। पेल्माम्यवस्थिताः। इवि०मत मार =अथवा किम मझार प्यास्सिा है। इसलिय (भाचार्य मग्रिम सूत्रमें) काते हैं कि (१) सप्प समुद्र पाल पामर सातः जामीप पेरे हुए एक ही है "समुद्राताम्" बहुपधन और समुमुयाः" विवधान इस कारणसे लाये है R समुदाणाम्" राम्पस सपा समुद्र तीन मोर भामोसे माशय रे मोर समुनयो गइसे सयवादधिके पूर्व और पधिमत्रो सीमामो मागोसे मभिप्रापसासिए मनुवाइम गाग रान मार है । (२) रुक्मिा, अषा दोनो हो सस्ते हैं पचमी विमतिमें अर्थ हामी कुवापमसे पशिस एसा होगा वोर पठो विगकिम (समी इसापतके) दक्षिण ऐसा भर्य है। ३५ सय सिदि पप्पाप KORBA ॥ तद्विभाजिनः पूर्वापरायता हिमवन्महाहिमवान्नपधनीलरुक्मि- शिखरिणो वर्पधरपर्वताः ॥११॥ तानि क्षेत्राणि विभजन्त इत्येवंशीलास्तद्विभाजिन ॥ पूर्वापरायता इति पूर्वापरकोटिभ्या लवण- जलधिस्पर्शिन इत्यर्थ ॥ हिमवदादयोऽनादिकालप्रवृत्ता अनिमित्तसज्ञा वर्षविभागहेतुत्वाहर्पधर- पर्वता इत्युच्यन्ते ॥ तत्र क हिमवान् । भरतस्य हैमवतस्य च सीमनि व्यवस्थित ॥ क्षुद्रहिम- वान् योजनशतोच्छ्राय हेमवतस्य हरिवर्षस्य च विभागकरो महाहिमवान् द्वियोजनशतोच्छाय ॥ सूत्रम्-तद्विभाजिन पूर्वापरायता हिमवन्महाहिमवन्निपधनीलरुक्मिशिखरिणो वर्षधरपर्वता ११ समाव-इ-विभामिना पूर्व तिन (परत, हैमवत, इत्यादिक सात क्षेत्रों) को पृपा करनेवाले पूर्व भपर-मायवाचदिमरत्-माहिमवाद-निपप परिषम झवणा-पितक लम्मे हिममान , महाशिमान, निपिप, नीश भक्मि-शिखरिणामपंपरपर्ववार म्नील, रश्मि (समी वा पी) शिसिरी (वर्षपर पर्वत, कुलपर्वतमालावल रे इस्पर्ष-वानिशाणि "रिमभन्ते इति एवं शीला-विन (परत मियत इत्यादि) पत्रोंको पृषा करते हैं ऐसे सगाव गा प्राति वाले हैं। परिमामिना पूर्व-अपर-मापातिक से सदिभाजन है (वा विभाग करने वाले है) (सूप) पूर्व पश्मि समर पैसे पूर्व अपर कोटिम्पामप्सरण-अलपि-स्पर्शिन' म्पूर्ण पमिमकी भनीपों करि ( फोरिम्पा) वरणादपिका ठूने पाले चै इलायत्त । इविकम । हिमवत् भादय मनादिकायमचा ऐसा भपिमाप रे ।। हिमपात भादिक ( पलानन) अनादिकालस मवती मनिपिचसमाधवपविभाग नुवाद" निमिवरहित नाम वाले पासपं नाम पारक सो पृया २ करनेके कारणसे पर्पपर-पनवा इतिठष्यन्ते,सप्रशाभीमगन्त। पर्पपर पर्पत ऐसे परे नाय रे । (प्रभ) दिमवार (पपव) का। भरवस्यामवनस्पाच-सीमनिणपरस्थितः (तर) भरत क्षेत्रकी महरि हेमपत सर्पको सीमामें भास्थित है पुद्र-दिसवान योजन-पाव उध्यापक म्युन हिमपान् है (पु-योग) जिसकी पोमन सौ पचाई (समाप) है। रैमरवस्य परिवर्पस्यायपियागकर मरत का नया रिपका दिमाग परमे वाला माहिमपान दि-पोमान-पासणाप पारादिपमान रेजिसकी वोमन दो सीकी रचाई २ ॥ RECORNER - सर सिदि ३० विदेहत्य दक्षिणतो हरिवर्पस्योत्तरतो निपधो नाम पर्वतश्चतुर्योजनशतोच्छ्राय ॥ उत्तरे त्रयोऽपि पर्वता स्ववर्षविभाजिनो व्याख्याता ॥ उच्छ्रायश्च तेषा चत्वारि द्वे एक च योजनशतं वेदितव्यम् ॥ सपा पर्वतानामुच्छ्रायस्य चतुर्मागोऽवगाह ॥ तेपां वर्णविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह--- ॥ हेमार्जुनतपनीयवैडूर्यरजतहेममयाः ॥ १२॥ निदा पनिणतारिसस्प उत्तरत. विदो प्रकी दक्षिण दिशासे परिपत्रक उपरदिशासे निपपनाम: "पर्वत चतुर्पोनन-शा उपाय निपपनाम पर्वत है जिसकी पारसो योजन ऊंचाई है। उपरप्रपामपिकपर्वतासन - चरदिशामें तीनोंही (नील, रश्मि, शिखरी पर्यत अपन(भपने) चोंके विभामिनमायाम्पानाम्यापापसपा पत्तारितविभाग फरने वाल फर गये। बहुरि विनफी ऊंचाई मार एमयोजन शनापदितम्पम् -दा तया एक सौ, पामन (झमसे) जानना चाहिए भयात् नील पावकी पारसी योमन उचाई रश्मि पर्वतकी दोसौ यामन रेप शिस्सरी पर्वतकी सौ योजनाई सवापिस्तानाम् दलापस्पयनुर्भाग' म्समस्त परतोंकी ऊंचाईका पोयाई भाग (मानुसार) पृथिवीमें भविष्ट है वा भूमिमें मवगार है । (लापर्य यह है कि हिमवान् परतफी नीवपक्षीस योजनकी है और सी योमन मभिके ऊपर है । महारिमान ५० योजन विधीमें प्रविष्ट है २०० योजन घरासे ऊंपा। निपत्र परतकी १०० योजन नीर है। और ४०० योमन घरातलके ऊपर है। इसीमकार नील पदवकी पृथिवीमें १०० पोमन नीर है । ४०० योभन भूमिके ऊपर है कमी परत ५० योजन पृथिवीमें भवगारे २०० योजन पृथिवीक ऊपर और शिवरी पात२५ योनन पृपिनीमें है १०० योमन भिस ऊचाई है। मेपा पर्णपिगप प्रतिपति मयममार तिन (पन् कुलापों) के, रंगोंके पद करने के खिर (उपर सूत्रमें) कहत है फि (१)सूत्रम्-हेमार्जुनतपनीयौर्यरजतहेममया। १२।हेमागच्न पैर्य पाठ भी “अपोरदाभ्याम् हे चा" प्रसे शुदाँ पपर परता) इसमय, अनुनमय, तपनीयमयः, पैर्यमयः, रमतमय ऐममयः, च (यथाक्रमम्) ।। १२ ।। ()इस बारमा १२ मधर्म मानस्थ भारि बाममा ५१ मत्र शेताम्बर माम्नाग समान्यतस्वाधिगम मधमे महा। सभाप्य पृट में है ३७ सिदि एयनिमासी भगरपसाय पफीलाम पदवेद और निभस्त्यर्थसहित सार्थसिदिका शम्दशः हिन्दीमनुवाद अध्याय ३ सूत्र १२ त एते हिमवदादय पर्वता हेमादिमया वेदितव्या यथाक्रमम्॥हेममयो हिमवान् चीनपट्टवर्ण । साप । अर्जुनमयो महाहिमवान् शुक्लवर्ण तिपनीयमयो निपधस्तस्णादिरयवर्ण ।वैडूर्यमयो नीलो मयूरग्री- चामा रजतमयो रुक्मी शुक्ल । हेममय शिखरी चीनपट्वर्ण ॥पुनरपि तद्विशेपप्रतिपत्त्यर्थमाह- सूत्रापा-पर्पधरपपतालयमय मर्नुनमय ऋचारल परत तर्ण साश मर्याद पीतरण शुभ्रसम अथात् स्तषण वपनीषमपभावयमय सप्तसुवर्णसरीखा अपान रक्तपण दर्य मणिपन् भयात् नीलवर्ण रमनपपदिममपश्चापपामसम्" कपा मा चांदी सय अर्थात्, पर्ण और कपन सश भर्षात् पातपण प्रमसे है। तात्पप्य या कि हिमान् पर्मच पीत पर्ण है पहारियवान परत सतवर्ण निपिध पर्वत रचयर्ण , नीलपरत नीलरण, रुविम (लमी, रुपी) पर्वत रामपर्ण । और शिस्लिरी परत, पीपर्ण है। पृष्पनुपादन एव हिम्मत् भादपभोपचारमारेप-मादि-से इतने हिमपान, मादिक परत भर्पात् पशापल वर्ण भाविक मयावदितम्यायवाझमम्शेममय- सश-प्रमानुसार मानना पाहिय । स्वर्ण सरीसा ( भय) विम्वावधीन-पा-कोमा मनमय हिमान् पर्वत पीला (धान) पार (सम) पर्ण है। राम सम महादिमवान शाम सपनीषमय निपिप म्महाहिमपान पर्वत स्पेत रंग है । तप्त पा नाये हुए सुवर्ण साश निपर पर्वत परळ-मादिस्य-वधि गर्यमपानील सुपारी पा पध्याके सूर्य वपा मर्याद रक्त है । घमणि समान नील पवत मपुर-बीरा-आमधारमतमपालमी मोरकेठसरण( भाभस्) नीला'चांदी या स्पा सरीला रिम,(रपपी,स्पी),पर्वत क्षम्य देममय शिसिरी पीन-पहनामा येत है । सुरपापनाशिसिरी) परत पीले पट वर्णरे ॥ पुन मपिद-रिश-पतिपविमर्षमा मार फिर मी विन (पटकुल्लापतों) का विशेष प्रतिपादन के लिए भनिभस्ममें करते है कि पारिणी सविस गानसे विधान सर्व और भी न समोरपना र रमा पारपान करत । विस्तार से इस लिये भाचार्य ने संपस पाता और मातुमे प्रतिपान सितारोमो चीन मरी है ऐसा पाते। और विस्तार होता ही परिमापारपसे मादीपा मिसार करतो मी पपा सितार पुमा पात् राजपा विस्तावना प्राधानमा मन गुपपुगलिया को निभातास ना मिमाप पैनापोta पEEEECE सिदि . ॥ मणिविचित्रपार्वा उपरि मूले च तुल्यविस्ताराः॥१३॥ नानापर्णप्रमादिगुणोपेतर्मणिमिर्षिचित्राणि पाणि येपा मणिविचित्रपार्था ॥ अनिष्टस्य सार्व स्थानस्य निवृत्त्यर्थमुपर्यादिपचनक्रियते ॥ चशब्दो मध्यसमुच्चयार्थ ॥ य एपा मूले विस्तार स उपरि मध्ये च तुल्य ॥ तेषा मध्ये लब्धास्पदा ह्रदा उच्यन्ते- (१)सूत्रम्-मणिविचित्रपार्श्व उपरि मूले च तुल्यविस्तारा ॥ १३ ॥ (पपरमणिपिपिप-पाः उपरि मले प तुम्प-विस्तारा ॥१३॥ समार्प -पर-परता पणि विविध = पपंपरपरत मणिपोरि पिषिमा रंग परगी। पारिक मूले १० बानो दोनों पार्षमाग वा पसमा मिना (प्रत्येक पर्वत) पर नीप मध्य में (-प) परिस्तारा - समान (पीत पा भिषि) बाईपास पनुपादानामा-पर्ण पमादि-गुण पत। = मना रग मार दीमि मादि गुखौंकरि सहित मलिमि रिपिाणिपाणि या - महिपोकरि सिरिमा भपरा रंग परग (दोनों दोनों)पसमा मिनके से परिण-रिमि-पामिमिष्टस्प। मसिविसिम्मा । भनिषिय, भषमा प्रमानित (मो प्रमाण से माना नहीं पा) संस्थानस निषि भम्रपरिमादि-पपन = प्राकार (-पुस्पानस्प)निराकरण के लिये उपरि भावि पारप (सम में) निपत ९० शम्म मप-समुपप मा शापा गपा (इम सप्र में) शम पीपर (चौडाउ) के समार के लिये है या मूलारिसार । सपरिकपमध्य पे मिना मद में (नाम) पौड़ाई परपौड़ाई) पर भौर (१) पीप में - समान रे (भर्वाद ये का हिमपान, महामिषान् , निपिप, नील, कामी, शिखिरी पषत नीप माप वा ऊपर समान पौर मीन के साश) तपास = विन (पटु फुलापलो) 5 मपमें अर्थात् पूर्व पमिम की सीमा के पीचापीना माग में हम्म्मासराभा नाम मिनने स्थान (मास्पदा) खाम (साप्त) किये से दा(उचर सम में) मावे कि (RAINER भामा समानावाविमस्म स सूत्र नहीं है। इस सूप भरमार पहा सर्वत्र एक पाठ भोर परम्त तयार- PRIधिमे विविविध पारा और परिमल व तुव पिस्त पा सूत्र माना गया है। SECRETREAGEदय: 18 सार्य - १० एयनिवासी मगरम्पसाय पडीम कत पदम्छेद और विमवत्पर्य सहित सबाथसिदिषा शम्दशः हिन्दीअनुवाद । अध्याय ३ सम १४,१५ आपद्ममहापद्मतिगिंछकेसरिमहापुण्डरीकपुण्डरीका ह्रदास्तेपामुप॥ि१४ पद्म महापद्म तिगिच्छ केसरी महापुण्डरीक पुण्डरीक इति तेपा हिमवदादीनामुपरि यथाक्र- ममेते हूदा वेदितव्या ॥ तत्राद्यस्य सस्थानविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह- ॥ प्रथमो योजनसहस्रायामस्तदर्द्धविष्कम्भो हृदः ॥ १५ ॥ सूत्रम्- पद्ममहापद्मतिगिंछकेसरिमहापुण्डरीकपुण्डरीका ह्रदास्तेपामुपरि ॥ १४ ॥ सूधाचे-पप-पापा-तिमिद-कसरि-महापुएररीफ =प, माप, तिगिंध, फ्सरी, पापुपीक, और पररीमाभागमा तेपाई उपरिभ्ययाम्मम् = एररीक (पे ) द्रा उन(छा इलाचओ) पर अनुमस हैं सल्यानुगादम्पमापन विगिम्यसरी पप, महापन, तिगिछ, कसरी, पारपुण्डरीकमपुपरीफइतिवादिसरत् पापुएररीक, पुएररीक इसपकार तिन सिमगार मादीनांरपरिक पपाकपंपादितम्यामादिक (बा कुलाचखों) फ अपर क्रमानुसार ये दा जानना चाहिये ।। मर्याद हिमपान पर्वतपर परसरोवर है महाधिमान् पर्वतपर महापस सरोवर निपपपपतपर निगिंध दूर नीलपर्वतपर केसरी दरी विमपर्षक्षपर महापुएररीक सरापर है भौर शिखिरी पतपरपुण्डरीकदार पत्रकायस्पा संस्थान-चिराप प्रतिपचि-अपमाral प्रथम (सरोवर पप) के भाफार निराप के कान के लिये काते हैं कि सूत्रम्-प्रथमो योजनसहसायामस्तदई विष्कम्भो हद ॥१५॥ मार्प-अपमझायमिन-सासू मायामन' -पदिला (पूर्व पथिम एकामार यामन लम्या (मार) व मर-विष्कम्मान उससे माया (भयात् पौषसो योमन उत्तर दक्षिण) पौड़ा सरोवर (१)श्वताम्बर मामलाप समापवाधिमममूहमे बोनो मरी8() मारे जानी पर प्रर्व पारी पर भरपाठ रोमो पार ही भर्प भवार प्रारम्बाम का" व मनसे सरल रोगमा परम्प एसा मा पर अपन'मनमति सिदि सा५ प्राक्प्रत्यक् योजनसहसायाम उदगवाक् पञ्चयोजनशतविस्तारो वजूमयतलोविविधमणिकनक- विचित्रततट पद्मनामा ह्रद ॥ तस्यागाहप्रकृत्यर्थमिदमुच्यते- ॥ दशयोजनावगाहः ॥१६॥ अगाहोऽध प्रवेशो निम्नता । दशयोजनान्यवगाहोऽस्य दशयोजनावगाह । तन्मध्ये किम् ? पृष्पर्धवामित्प गयोजन सास् मापामधन्दा"मपूर्वदिशा(माक् और पत्रिम दिया(अत्या इमार पोजन सम्माउचरदिशा(सदर) भामापवयोगनगन-विस्तारमारम-मय-समया) दक्षिण दिशा (मानचिसो पोमन पौड़ा पम् सम मिसफा वल বিধি-ভি নক্ষম - माना मगर (पिविष)परिणयों और सुपर्णपरि मिसभा निारा विचित्रित ऐसा परमापा स्प" मरना प्रकृति - पपनापा सगेपर है। विस(परनामा)की पहाई के सम्प(कृति) भर्पदम् ॥ रयते | सिय पा(नपर सभ में)का माता है कि ("सूत्रम्-दशयोजनायगाह ॥१६॥= (मयमो दयावश-योजन मगनाइ ॥१६॥ सूप पम या दश-योजन भरमा - परिमा(एपनामानिसकी गाराई दश पोपन है। वृत्पनुराद -- मगाम पानिम्नता भवमा सो नाचेको गमन भर्थात् गराई वा गहरापन (निम्नवा) पा-पोमनानि भगा प्रमा दशपोमन रे गाराई मिसडी सो पश-पोगन भरमा नद-पप्पा किम् दशयोमन भावगाह विसापरि पपदा) पीप में पया। गब बार मे पर गामा सिमित भदायापार मणपक पार ४ ( सपापायीके प्राराममै १५ सूत्र दिये दररो प्रम मा रापुर पूर्ण सुर भी मणि, से बना भाभदरो) स्थान में समर मा यी भए भयर(परिपतेनीष महर) परमात्मापारयोकि मरम्म २ जगदपपनपतपय एस्. हम नोोस अरोमे से जागो भर हो उसस्थाम मैग्नपरामरों में सपने अपने वर्ग के अनुसार से मात है पनि मायः मम परपजारसमे से काई भयर उसके पश्चात् भाष पर भराव (प्रयोगा देवा) सूत्र से पानी पर है प्रथम पायको झल प्रापाहार बोरीस महामिसे एक र और उसके पास भय मापार भतरो में से पाप मार भापासलिये प्रथम ए (मार्थान. प्रवाहार के जगत प्रवरी में से में जा रस वर्ग में से है पर भ प । (0 पासूखेवामा मानाप समापतवाधिषमस्व मीमारे पहा रस सूत्र का पाठ भोर भई एक।

साप मायायम ४२ सिदि EYEEKENGAGES सन १७ कुरस होनस ॥ तन्मध्ये योजनं पुष्करम् ॥ १७॥ योजनप्रमाणं योजनं, क्रोशायामपनत्वात्क्रोशद्वयविष्कम्भकर्णिकत्वाच्च योजनायामविष्कम्भम् ॥ जलतलाकोशद्वयोच्छ्रायनाल तावबहुलपत्रप्रचय पुप्फरमवगन्तव्यम् ॥ इतरेषा ह्रदाना पुष्कराणा चायामादिनिर्ज्ञानार्थमाह- सूत्रम्-तन्मध्ये योजनं पुष्करम् ॥१७॥ सत्रार्थ -द-माया। पोजन। पुपरी॥ = उप्स(पचनामाद्रा) के बीच में एक योमन(लया पोटा रत्नमयी)कमन रे मनुपाद -पोमन-प्रमाण- योमन क्रोश = योमन मर माप सो योजना है। (एक एफ)कोशकी (दोनों भोर मामने सामनेफ) भाषाम-पत्रत्वात् श्रोशप-मिषम्म कर्णित्वात् म लम्बाई पत्तों को होनस और दो कोशकी चोदाईकी कणिका अर्थात् (कमल क पीनका) पोमन भापाम-विमम्मम् ॥ - ऐसे एक योभन व भाषाम) चौड़ाई (विष्कम्मा अर्थात् कमन्नके एकमोर के कमल के पसे की लम्बाई एफ कोश और उसफ सामने क पपे की लंबाई एक कोश और इन दोनों पातोंके पीच क कुरख(कमल की कणिका) की लपाई पौराई दो कोश एसे पार काश मयमा एक योगन का म्पास होगा इस प्रकार सरमामन सामने क पचे भीर पीप की कर्णिका को मिलाकर एक वृत्ताकार बनवा रे मिसका प्रत्येक म्यास पार कोश पा एक योमन काोगा । एकयोमन समा, एक ही योगन पोरा सूर्यक मदतके सत्य मलपाकर मतर वृषस्य पदक मापने कपल है मामाचा फ्रोश-दप-उपयापनालंदा नीरफ तम दो कोशकी नाईकी(नग्यास) (कमल की नाल भषया नती है वावमास-पम-पत्र इतनी(मर्याद दो कोश की) मोटाई (के बहुल, पासपोंडा समा(चम) बाला पुष्परम् भवगनतमम् ॥ इवरेपी दाना समक्ष मानना पारि भन्प(शेप पपेपे पांच)सरोपों की पुराणमापाप-मादि निर्धान मामा- पा(-१)मनों की खाई मादिक निर्णपके लिपे (भावार्य रचर सूममें) राते हैं कि सेताम्बर माम्नापसमाप्ततापाधिमम्मी पान नीराचा रस प्रमापकी रिणको पृषक पर) %3D ५२ साथ पायम rgege सिदि ४३ सूत्र १८ तद्विगुणद्विगुणा ह्रदाः पुष्कराणि च ॥१८॥ स च तच्च ते, तयोगुिणा द्विगुणास्तद्विगुणद्विगुणा इति द्वित्वं व्याप्तिज्ञानार्थम्॥केन द्विगुणा ? अायामादिना॥ पद्महदस्य द्विगुणायामविष्कम्भावगाहो महापद्मह्रद । तस्य द्विगुणायामविष्कम्भा- वगाहस्तिगिलहूद । पुष्कराणि च किं? द्विगुणानि द्विगुणानीत्यभिसम्बन्ध्यन्ते ॥ (१)सूत्रम्-तद्विगुणद्विगुणाहूदा पुष्कराणि च ॥ १८ ॥ सपा:-सद-दिगुण-द्विगुणा = उन (प्रथमपनद्रा भौर कमस) से दुगने दुगने(शमाई, चौड़ाई या गहराई में अगले दो महापप मौर तिगिछ) दिा पुराणिक सरोपर (भोर (दुगने दुगने भग्रिम दो कमल भावार्य पानामावइसे दुगुण-महापचन्द्र है। भौर मापप से दूना तिगिंछ सरोवर इन वीनो द्रों क परापर ही उचरभोरके सीनों पवतों क तीनों द्वारे नया एदों के कमों के परापर कमल है प्रपनुवाद-सपायon" - बहुरि पा(पपदा)नया(=प युद्धात पुष्कर)वे दोनोरते सममें तद शम्दफरिगुरणकिया) वयोः दिगुणाः हिगुणातद द्विगुणदिगुणा - उन(पपत्रा भौर पुपर)का गुना दुगुना । सो सद्विगुणदिगुणा(सूत्रम) वि०द्वित्वम्।" म्याप्ति-शान भर्यम् ।। - ऐसा विस्त भथवा दना २ पना व्याप्ति पोषक की भर्याद सत्र में दो पार द्विगुण दिगुण एदो और कानों का विस्तार जनारने के लिये प्ररण किया है केनादिगुणामापापभादिना पपादस्प = किस स दो गुना है। समाई मादिक से पपदा की दिगुण मायाम विष्कम्भ भरगाह-पापा = दुगुणी सम्बाई(मायाम चौराई( विष्कम्भ गराई (-मषगाइ)का महापच सरोवर रे तस्मादिगुण मायाम-विष्कम्भ मरगा = विस(पापपद्रा)की दूनी जम्माई चौडाई गराई फा सिणिधर पुष्पाणिपकिम् दिगुणानि- विगिक दारे (परन) "पुष्कराणि च" एसा मारय सम में पषों दुगुने हिगुणानि इवि० ममिसमपन्ते । द्गुन ऐसा(पुष्करों के साथ) जगापा भाप भयवा नोड़ा आय है अर्थात् (१) इस स्पा हमारे पासा पाठहै। पतामर मानायके सभाप्यतरवाधिगमसपमे पासून नहीं है(इस अप्पापकी टिप्पणी पृष्ठ १७,३८) ४३ सर्वार्थ, मप्पापथ ४४ सिदि सूपर तन्निवासिनीना देवीना सज्ञाजीवितपरिवारप्रतिपादनार्थमाह- ॥तन्निवासिन्यो देव्यः श्रीहीधृतिकीर्तिबुद्धिलक्ष्म्यः पल्योपमस्थितयः ससामानिकपरिपत्काः ॥१९॥ तेषु पुष्करेषु कर्णिकामध्यदेशनिवेशिन शरद्विमलपूर्णचन्द्रद्युतिहरा क्रोशायामा क्रोशाईविष्कम्भा देशोनकोशोत्सेधा प्रासादास्तेषु निवमन्तीत्येवशीलास्तन्निवासिन्यो देव्य श्री हीधृतिकीर्तिबुद्धिलक्ष्मी- पद्ररके कम्बसे दनी लम्बाई चादाई भार मार्गा भादिका मापम द्राका कमल है और मा पपदाफे पुष्करस नी खम्बाई चालाई मागई मादिका विगिरदाका फरल है। इन तीनों दोफे परापर ही उत्तर भोरके तीनों पर्वतोंके तीनों दो और वीनों पदोंके कमलोफे परावर फमलरें। द-निवासिनीना देवीना "संशा भीवित-परिवार =तिन (फमलोंमें)निमासकरनेवाली दरियों नाम भायु भार परिवार पति-पादन-अयम् भारत कानेके लिये (भाचार्य उत्तर सूत्रमे) पाते हैं कि सूत्रम्-तन्निवासिन्योदेव्य श्रीहीधृतिकीर्तिवृद्धिलक्ष्म्य पल्योपमस्थितय ससामानिकपरिपत्का १६ सूत्रार्थ-पद-निमासिन्पप"देम्यः तिन(पद्रस्नमयी पुप्फरों के प्रसादों) में(प्रमसे) निवास करनेराजी(प देनियां भीनी-पृति कीर्तिमुदि-जदम्प पम्योपम-स्वितया यी,डी,भूति,फीति, दिलचमी,(मत्पेक)पन्योपम भायुकी धारकरे (मौर) स-सामानिक परिपस्काम -सामानिक जातिके देव भौर पारिपद जातिके देवों सहित चौभयान रहती रे वृत्यनुगाद-तेपुर पुष्करण कणिका-मध्यदेश निदेशिन । तिन कमलों में कणिकाके मध्य भागमें (देशस्थिति निषेशिनः) शरद-विमल-पर्ण-चन्द्र विभाग शरद अनुफे भयवा फुधार कार्तिक के निर्मल पुणे शशिकी शान्ति जीतनेवाले मोश भायामामोशभर्द्ध-विष्कम्मा देश-उन-नोश (एक) कोशकी लम्बाईक भाषे काशकी चौड़ाके कम हीन कोशकी उत्सेपाथ पसादामपुर निवसन्ति इति०एवम् संचाईके भेटगृह विनमें राती हैं । इस प्रकार शीलामावद-निगासिन्पा श्री-दी-पृति-कीवि सुधि-शमी- असमाषयाशी विनमें निवास करनेपाली भी हरी पति कीवि बुद्धि समीरी सेवाम्बर भाम्नापो समाप्य तत्त्वार्थाधिपमम्मे पर मानारत्मत्र नामा KHREKHA गरिन्पदी पृ.पर) सर्ग सिदि 5 % 3D एटानिरासी नगरूपसहाय पकीला पदपद और विभक्त्पर्यसहित सार्यसिदिका शम्दशः हिन्दीमनुषाद भन्याय ३ सूत्र १९ संज्ञिकास्तेषु पद्मादिषु यथाक्रम वेदितव्या॥ पल्योपमस्थितय इत्यनेनायुष प्रमाणमुक्तम् ।। समाने स्थाने भवा सामानिका । सामानिकाश्च परिषदश्च सामानिकपरिषद । सह सामानिकपरि- पन्निवर्तन्त इति ससामानिकपरिपत्का ॥ तस्य पद्मस्य परिवारपद्मेषु प्रासादानामुपरि सामानिका परिपदश्च वसन्ति ॥ यकामि सरिनिस्तानि क्षेत्राणि प्रविभक्तानि, ता उच्यन्ते- समित पवाविपुः पपाममध्यदितम्या नाम है जिनके सिन पनादियों में फ्रमानुसार मानना चाहिये(मर्यात् पचद्रा कमलके भष्ठ गुरमें श्री दपी महापपद पुष्करके उचप गो (प्रासाद)में ही देषी, तिगिंछ सरोपर कमलो प्रासादमें पृवि देवी और केसरि दा मलके उत्तम परमें नीति देवी मापुडरीक पद पुष्कर मवनमें पुदि दवी और पुररीकद्रा कमलके मासादमें लक्ष्मी मो राती॥ पम्पोपप-स्थितपनि०मनेन" मायुप, = पस्योपम स्थितिमानी इम(पाप) करि(मनेन) भायुकी प्रमाणम्"उक्तम् सपाना स्यानधामवा। = पयादा वा परिमाण का गपा है समान स्थानमें होनेराले भर्यात् ऐरपर्य में परापर हो सामानिका सामानिमय परिपद पर सो सामानिक है और सामानिका परि परिषदका इद समास सामानिक परिषद सह सामानिक सामानिक परिपद सामानिक माति क देव(अपवा समान ऐवर्य पाले देव) क्या परिपनि पर्वमा पारिपद मानि क देशों(अर्थात् समा में प्रधान वा सभासद) करि सहित पर्ने र इवि०ससामानिए परिपत्रका स्पषस्य = ऐसे(सम में) सप्तामानिक परिपरका(देषियां) रे ॥ सिस कमन के परिपार पपेशाप्रसादानाम् "उपरि तामानिका परिवार कमलों नि मरनों के ऊपर सामानिक परिपदः प बसन्ति पकामि "सरिमि" - मावि क दर तया परिपद मावि देर पसवेरे मिन नदियों कारि तानि शणिमिमकानि पन्त = ते सास) सप्र विभामित है (नदियां भागे क सत्र म)कसी माती है कि (१) पा स्मोबिंग पद एम में कम् (क) प्रापप ग्सो अर्थ में लगाया है मान्न -४) मगमी जाता है भयं भी शप का मही पलटतात = - सर्वि भम्पापथ १४ सिद्धि सूप तन्निवासिनीना देवीना सञ्ज्ञाजीवितपरिवारप्रतिपादनार्थमाह- ॥तन्निवासिन्यो देव्यः श्रीहीधृतिकीर्तिबुद्धिलक्ष्म्यः पल्योपमस्थितयः ससामानिकपरिपत्काः ॥ १९॥ तेपु पुष्करेषु कर्णिकामध्यदेशनिवेशिन शरद्विमलपूर्णचन्द्रद्युतिहरा क्रोशायामा क्रोशाईविष्कम्भा देशोनकोशोत्सेधा प्रासादास्तेषु निवसन्तीत्येवशीलास्तन्निवासिन्यो देव्य श्रीव्होतिकीर्तिबुद्धिलक्ष्मी- पचनाके कमलसे दनी लम्बाई चौड़ाई भौर मोगा मादिका मापप द्रापा कमल है और मा पपद्राके पुष्करस दूनी लम्बाई चालाई मागाई भादिका तिगिंद्राका कमल है। इन तीनोंदोंके परावर ही उत्तर भोरके तीनों पवतोंके तीनों दो और तीनों एदोंक कमलोंके परापर कमलई ।। कर निवासिनीना देवीना सझा नीति परिवार तिन (फमलोंमें)निवासकरनेवाली देवियों के नाम माय भोर परिसार प्रतिपादन मवम् भारत कानेके लिये (भाचार्य उत्तर सूपमें) कहते र फि सूत्रम्-तन्निवासिन्योदेव्य श्रीह्रीधृतिकीर्तिवृदिलदम्य पल्योपमस्थितय ससामानिकपरिपत्का १६ सूत्रार्थ-तद-निवासिन्य देभ्यः॥ तिन(पद्रनमयी पुप्फरोंके मसार्दो) में(क्रमसे) निवास करनेवाली(पदनिया भी-दी-पृति-कीविभुदि सरम्प पश्योपम स्थितयः ।। श्री,सी,कृति,कीति, दिलक्ष्मी, मत्येक)पम्योपम मायुकी पारक हैं (भौर) स-सामानिक-परिपत्का सामानिक जातिके देव भार पारिपद भाविक देवों सहित पाँभयान राहती मृग्यनुवादः वेता पुष्करेषुः।। कणिका-मध्यदेश निरशिन विन कमलोंमें कणिकाके मध्य भागमें (देशोस्पिविनिवेशिनः) शरद विमस पूर्ण कर पुतिनगम शरद ऋतुके भयवा कुंभार फातिकके निर्मल पूर्ण शशिकी कान्ति जीवनेपाले मोरा मायामामोशभर्द-विष्फम्मा देश-उन-नोग (एक) कोशकी लम्बाई भाषे कोशकी चौडाइके मन हीन कोशकी उत्सपापसादानेपुर निवसन्ति इति०एपम् चाईके श्रेष्टगृर विनमें राती हैं । इस प्रकार शीला खद-निपासिन्पा श्री-जी-ति-कीति-दि-सरपी- अणे समापवाली विनमें निवास करनेवाली भी ही पुति कोविं दिखामीले वाम्मर माम्नार समाप्प ववापिगममत्र वा बनातल्यन नगी माना (लागि प. "पर) ४४ सिदि एरानिासो मापसाप पोशात पदच्छेद और विमारपर्यसहित सार्यसिदिका पादश रिवीमनुराद अध्याय ३ सुभ २१ द्वयोहयो सरितोरेकै क्षेत्रं विपय इति वाक्यविशेपाभिसम्बन्धादेकन सर्वासा प्रसंगनिवृत्ति कुना ॥ पूर्वा पूगा इति वचन दिग्विशेषप्रतिपत्त्यर्थम् ॥ तत्र पूर्वा या सरितस्ता पूर्वगा । पूर्व जलधिं गच्छन्तीति पूर्वगा ॥ किमपेक्ष पूर्वत्व ? सूत्रनिर्देशापेक्षम् ॥ यद्येवं गगासिन्ध्वादय सप्त पूर्वगा इति प्राप्तम्। नैप दोप। योयोरित्यभिप्तम्बन्धात् ॥ इयोईयो पूर्वा पूर्वगा इति वेदितव्या ॥ इतरासा दिग्विभागप्रतिपत्त्यर्थमाह- यो सरियो एक पापिय = (साव युगली नदियों से दोदो एकएक तप विर्ष (ममे) । इतिपापविशेष प्रमिसम्पन्पाना एकासासा' = ऐसा धमन पिरोप मोड़नस एक स्थानमें सपके मसंग-निवृषिकतापूषा "पूर्वगा।" = संयोगका निराकरण किया जाय सप) पहिली परिली गमन करनेवाली इतिधमनदिक-रिशेष-मविपचि मधम् ॥ = एसा पास्प दिशाक निरोपके कान के लिये है।। सप्रपया सरित ता-"पूरगा। सह(सप्रमे) परिसीपहिलो नो नदिपार व पूर्व दिशाको मानेवाली है पूर्व मलिगिन्वित इतिक पुमगापूर्वमा = पूर्व समुद्रको गमन करती है ऐसी पूर्वगा(नदिय) (पश्न) पूर्वपन किम्बमालम्पसमनिस = पया अपेक्षा भाव किसकी अपेक्षानुसार परिजी (इस) सपके कयनकी अपसम्॥ = रिवना अर्थात् सम पाठमें प्रो पहिले फही तिसकी विषता से पहिली रे॥ भो ऐस हैं (भपाद मो नदियां सम्पाठ में परिले कपित है सो परिखी है) को गंगा-सिधु मादप-सगा पाविमाप्तम् = गंगासि पुरोहित रोहितास्या मादि सावपुरदिशाको बानपाक्षी ऐसामर्थ पाप्त हुभा नए दोप = या पदण नी है अर्थात् सप्रमें पूर्वा शन्न मानेसे गंगा सिपुरोहिद रोदिवास्या हरिद परिकान्ता-सीता-ये समझी मा सकती है। इयो पो मनिवसमाधादा = पोंकि युगल-युगामस पेसा(पूर्व शरदके साय) मोइनेस ना सम्बन्धकरनेसे दरोदयो पूर्वा:"पूगा इतिश्वदितम्या " = युग्म-युग्मजैसे पहिची पहिली पूर्व समुद्रको मानेवाली है इसमकार मानना पाहिये इतरेसाईदिर-विभाग प्रतिपचि मर्पम् ""माET = भन्य(मदियों) के दिशा मिकिके कहने जि(भापार्य भगले सूत्र में) काते हैं कि %D पदिक एपम् ४७ सपि मप्पापा ४६ सिदि २१ VEGETER गङ्गासिन्धरोहिद्रोहितास्याहरिद्धरिकान्तासीतासीतोदानारीनरका न्तासुवर्णरूप्यकूलारक्तारक्लोदा सरितस्तन्मध्यगा॥२०॥ सरितो न वाप्य । ता किमन्तरा उत समीपा १ इत्यत श्राह तन्मध्यगा । तेपा क्षेत्राणा मध्यं, तन्मध्यं तन्मध्येन वागच्छन्तीति तन्मध्यगा ॥एकत्र सर्वासा प्रसङ्गनिवृत्त्यर्थ दिग्विशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह- ॥ द्वयोर्द्वयोः पूर्वाः पूर्वगाः ॥२१॥ सूत्रम्-"गंगासिन्धुरोहिद्रोहितास्याहरिदरिकातासीतासीतोदानारीनरकान्तासुवर्णरूप्यकूलारक्ता- रक्तोदा सरितस्तमध्यगा ॥ २० ॥ सूचार्य:-गंगा-सिन्नु-रोदिव-रोदितास्या-दरिद परिकान्ता-सीता--आंगा, सिंधु,रोविरोहितास्पा, हरिद, परिकान्ता, सीता सीतोदा-नारी नरकान्ता-सुवर्णला-सप्पला-रक्ता सीतोदा, नारी, नरफान्ता, सुपणकला, एयरला, रक्ता रक्तोदामासरिवान-म यगा। -भौर रक्तोदानदियें उन सातोंपों) के बीच गमनकरनेवालीश बानेवाली मृत्यनुगादर-सरित"नम्माप्पा बसूममें सरित शब्दलानेसे परमभिप्राय दकिचौदानदिय रेनकितापड़िये । वामा किमर्थमन्तरातसमीपा-इतिवमा (नदियोक्पा अन्तराल-दर दर मन्दरा)पा पास २(इनषेत्रोंके रेइसीलिए भारत तेपासेमामिप्यतन्मय मान्यध्येन। काते हैं कि तिन नोंक पीच सो तन्मध्य रे ॥ (तिन क्षेत्रों के मध्यमेसेरे बामपन्विा इति तन्मध्यगाएकासासा" -भपा गमन करती है एसी सन्मध्यगा। एक ठीर सर (नदियों) के मसंग-निगृषि भ", दिपिशप मविपधि-अयम्। भारत संयोगके निपेपके लिय मोर दिशाके मेद करने के लिये(अग्रिमसूभमें करवा कि सूत्रम्-डयोईयो पूर्वा पूर्वगा ॥२१॥ इयोः दयोः सरितोः पूर्वाः कथिताः ( सूत्रे ) पूर्वगा' गप्पन्ति सूनाप-दयोई"इसोई सरिता ने (नदियों के प्रत्येक युगल युगलसे या युग्म पुग्म-से पीसा सूममें पूः 'पिता नापूर्वगाभापायन्ति पदिली परिवी पणित नदी) पर सम्मको माती भर्याद गंगा, रोहित, रिल-सीता नारी-सुषणक्षा और रका पे सातनदिय पूमकी भोर पाकर सरण समयमें मिलती हैं। (१) पेनाम्मर मानाय समापदाचापिमममममेदभमा राती ज्यमी ममम बापस्मी ची समार्य। सिद्धि 2 एरानिवासी जगरूपसहाय पीलान पदरछेद और विमारपर्यसहित सर्वार्थसिदिका शब्दशः हिदीअनुवाद अध्याय ३ सुभ २१ द्वयोहयो सरितोरेक क्षेत्रं विपय इति वाक्यविशेपाभिसम्बन्धादेकत्र सर्वासा प्रसंगनिवृत्ति कृना ॥ पूर्वा पूर्वगा इति वचन दिग्विशेषप्रतिपत्त्यर्थम् ॥ तत्र पूर्वा या सरितस्ता पूर्वगा। पूर्व जलधिं गच्छन्तीति पूर्वगा ॥ किमपेक्ष पूर्वत्व ? सूत्रनिर्देशापेक्षम् ॥ यद्येव गगासिन्ध्यादयः सप्त पूर्वगाइति प्राप्तम्। नेप दोप। द्वयोईयोरित्यभिसम्बन्धात् ॥ द्वयोईयो पूर्वा पूर्वगा इति वेदितव्या ॥ इतरासा दिग्विभागप्रतिपत्यर्थमाह- दयो यो. 'सरितोया-वाविपया = (सात युगक्ष) नदियों से दोदो एकएक सप्र विर्षे कमसे) है इतिभापरिशप मषिसमन्पादन एकप्र०सर्गसा" = ऐसा पपन विशेष मोडनस एक स्थानमें सपके प्रसंग निमि"कृता पूर्ण रंगा" = संपोगका निराकरण किया नाय सप्रमें) परिनी पहिली गमन करनपाली इनिकापनकादिरपिशप-प्रतिपचि भयम् ॥ = एसा पास्य दिशाफ विशेषके कानक लिये है। हमपारित वा "पवगा।" ता(सप्रमे) पहिलोपहिली मो नदियां है वे पूर्व दिशाको नानवाली है पूर मलिगिन्तिइतिक पूर्वा "पूर्वतं = पूर्व समुद्रको गमन करती है ऐसी पूर्वगा(नदिय) (मरन) पूर्व पन किम्मापूर्वस्वम्। सम-निर्देश = क्या अपना भर्यात् किसकी मपेशानुसार पहिजो (इस) सयके कपनकी भरपर" = पिवता भात् सपके पाठ भो परिजे कहीं तिसकी पिषता से पहिली है। = भो एस . (मर्याद मो नदियां स्प्रपाठ में परिले कषित है सो परिली) वो गंगा-स भादय "सप्तापूर्षगा विमाप्तम् = गंगासिन्युरोहित रोहितास्पा मादि सातपुपदिशाकोषानेपाली ऐसा अर्थ प्राप्त हुभा नए दोष = या पदण नहीं है भयाव सप्रम पूर्ण शम्द लानेसे गंगा-सिन्यु-रोहित-रोहिताम्या दारिकान्ता-सीता-य समझी जा सकती है। दपो दियो इनिकसम्मान = क्योंकि युगल-युगलसे ऐसा(पूर्व शम्बके साथ) मोड़नेसे घा सम्बन्धकरनसे या पदपो. गपूर्वा पूर्वगा-इतिश्यादिवम्या." युग्म-युग्ममें से पहिली पहिलो पूर्व समुद्रको मानेपाली है इसपकार मानना चाहिये इतरे दिर-विभाग विपति-मर्थम् शामा = भन्प(नदियों के दिशा विमक्तिके कानेक चिय(भधार्य भगले सप्र में) करते हैं कि यदि० एपम् ४७ सर्व मम्पायन १८ सिदि सूत्र२२ ॥शेषास्त्वपरगाः ॥ २२॥ हयोईयोर्या अवशिष्टोस्ता अपरगा प्रत्येतव्या ॥अपरसमुद्रं गच्छन्तीत्यपरगा ॥तत्र पद्मह्रदप्रभवा पूर्वतोरणद्वारनिर्गता गङ्गा॥अपरतोरणद्वारनिर्गता सिन्धु ॥उदीच्यतोरणद्वारनिर्गतो रोहितास्या॥ महापद्मह्रदप्रभवाअवाच्यतोरणद्वारनिर्गता रोहित् । उदीच्य तोरणद्वारनिर्गता हरिकान्ता तिगिंछह्रद- प्रभवा दक्षिणद्वारनिर्गता हरित् उदीच्य तोरणद्वार निर्गता सीतोदा केसरि ह्रदप्रभवा अवाच्य सूत्रम्-१ शेषास्त्वपरगा ॥ २२ ॥शपा-"-सरितः तु भपरगा (भवन्ति) सूमार्थ'-गोपा सरिता और शप नदियें (सि घुरोरितस्या इरिफान्ता सीतोदा नरफान्ता सपछला रक्कोदा) भपरगान मन्ति पत्रिम दिशाको गमन करनेवाली भर्यात् लरण समुद्र के पश्रिमपाकर मिलती हैं इयो दियो "यावाम"मपरगाभा भवशिष्टा " =युगल गुगलमेंसे बची हुई जो ( सात नदिय ) है ते पथिम दिशाफो मानेवाली प्रस्पेतप्पामाभपर-समुद्रगन्ति इविक्रमपरगा मानना चाहिये पधिम समुद्रको जाती है ऐसी अपरगा ( नदियें ) हैं। मत्र-पबाएर प्रममा पूर्व-तोरण-बार- सहा पदमा उत्पचिस्थानक एषतोरणदारसे निर्मवागा,मपर-सारण-दार-निगता। मनिकली हुए गंगानदी है।(उस पदयद्राके) पथिममें सोरणदारसे निकली हुई मिन्सुण,उदीन्य-वोरण-दार-निगतान -सिंधु नदी है। [उस परमद्राको उत्तरको उदीच्यावोरणदारसे निकली हुई रोदिवास्या,मापदपन ममगाईपाप्यतोरण-दार रोहितास्या नदी है। मापदमदा उन्नवस्यान के दक्षिण केवोरणदारसे निर्गनारोति । उढीच्य-तोरण-दार निकली ई रोदित् नदी है। [उस महापदमवाफे उत्तरके सोरणदारसे निर्गता परिमन्ना" तिगिबाद प्रभादक्षिणदार =निकली हुई रिफाता नदी है। तिगिषदा उत्पचिस्यानके दत्रिणदारसे निर्गवारमारित उदीप्यतोरणदार- निकली दर हरिद नदी है। उस तिगिंध सरोवरके उचरके तोरणदारसे निर्गवासीतोदा, केसरिसर ममवाप्रमाप्प- निकली हुई सीतोदा नदी है। केसरीदा उन्नवस्थानके दक्षिण मारास मापाठ सारासतम्बर माम्मा सभाध्यतत्वानाधिगम माम हमको मान माना। (२) व रामधाम "भोर पर (प.१७) मा मत ममरा ऐमा मोरोप प्राप्त गरिपश्चिम से बहनेपाली ७) भवाप-पपिए मोर माप-रपिचार और im-Tarun सिदि सार्य एयनिवासी नगस्पसहाय सकीलस्त पदच्छेद और निमरत्पर्यसहित सार्थसिद्धिका शमशः हिन्दीमनुवाद भ याप ३ सूप २२, २३ तोरणद्वारनिर्गता सीता ॥ उदीच्यतोरणद्वारनिर्गता नरकान्ता ॥ महापुण्डरीकहृदप्रभवा दक्षिण- द्वारनिर्गता नारी ॥ उदीच्यतोरणद्वारनिर्गता रूप्यकुला ॥ पुण्डरीकह दप्रभवा अवाच्यतोरणद्वार- निर्गता सुवर्णकूला ॥ पूर्वतोरणद्वारनिर्गता रक्ता ॥ अपरतोरणद्वारनिर्गता रक्तोदा ।। तासां परिवारप्रतिपादनार्थमाह- ॥ चतुर्दशनदीसहस्रपरिवृता गङ्गासिन्ध्यादयो नद्यः ॥ २३॥ सोरण-दार-निर्गतासीवा। तोरणद्वारसे निकली हुई सीता है। उदीप्य-तोरणदार -निर्गता"नरफान्दा।। उसकेसरीदरफे) उत्तरके तोरणदारसे निकली हुई नरफान्ता नदी है। महापुरररीकद प्रभवा "वसिण-हार-निर्गवा "नारी" -मरापुरदरीफद्रा उद्भवस्थानके दक्षिण दारसे निकली हुई नारी नदी है उदीप्य-शोरण-द्वार निगवा स्यकता" - उस महापुररीकद्ररफानचरक तोरण द्वारसे निकली हुई रुप्यक्ला नदी है। पुएरीकनाद मममा "मसारयतोरण-शर निर्गवा"सुपर्णखा=पुररीकदरके दक्षिणके तोरणदारसे निफची हुई मुवर्ण झला नदी है। पूर्व-तोरण-झर-निर्गवा "रका" - उस ऍश्रीकद्वारके) पूर्ण तारण दारसे निकली हुई रका नदी है। मपर-चोरणदार-निर्गवा-परतोदा।। (उस पुंडरीदाके) पमिमदारसे निकली हुई रक्तोदा नदी है वासा "परिपार मविपादन मर्यम्"भारत मीन नदियों केष्टुम्बकी नदियों के जानने के लिए भनिमसूधर्मे करते हैं कि सूत्रम्-१)चतुर्दशनदीसहसूपरिवृता गगासिन्भ्वादयो नद्य ॥ २३ ॥ सपा-धनुर्दश-नदी-सासू-परिवृताभगगासि । चौदर सासू नदियों फरि परिवारित गंगा वया सिंधु मादप नपा मादिक नदिय र मर्यात् गंगामें छोटीरचौदा सहसू नदियें माफर मिली। और सि पुमे भी मोटी २ पावर सहसू नदि मिली है। रोहित तथा रोहितास्या प्रत्येकषी महाईस र सासू परिवारकी नदिये हैं। इसीप्रकार हरित और परिका वाकी छप्पन छप्पन सरसू है ।। सीता और सीतोदाकी (तामा मानापा समाप्य तवायाधिगम सत्रमे पास नहीं 2ी ४४ सपा मम्पापा सिदि GEREGeet सन २० षडधिका विंशति षड्विंशति । पड्विंशतिरधिकानि येपु तानि षड्विंशानि । पड्विशानिपश्चयो- जनशतानि विस्तारो यस्य षड्विंशपञ्चयोजनशतविस्तार ॥ भरत किमतावानेव, नेत्याह । पट्चै- कोनविंशतिमागा योजनस्यविस्ता रोऽस्येत्यभिसम्बध्यते ।। सूत्रार्थ.-भरत पर्विशपायोमनश्शतविस्तारभारवपर्प (दक्षिण उच्चर में) पाँचसो धम्वीस योजन पिस्तारपाला वाचौदाईरूप पट् प०एक ऊन शिक्मिागापोननस्य। मौरयामाग योजनके सकीस भागों में से भौर मर्याद भारत क्षेत्रको दक्षिण उत्तरको चौदाई ५२६९ मृत्पनुनादः-पर-मधिका पिशविधापविंशतिः॥ =धा ऊपर बीस सो पम्बीस (पर्पिशति) हैं। पर्विशतिम"भपिकानिमायपुगतानि परमिंशानिपीस परती था भषिक हैं जिनमें ते पविंश (=पपिशानि) रे पशिानिपजपोननवानि विस्तारवयस्य इम्बीस और पांचसो योजन रे विस्वार या चौदाई जिसफी परशिपायोमनशवविस्तार परवा सो पांचसो सप्पीस योजन पौदाईवाला वा विष्कम्भरूप (परन) भरतक्षेत्र किम् एतान् एवानमाविल्मापद् गच० क्या इतनाही रे ।। (उपर) ऐसा नहीं करते है फि मोर बर माग एक-उन-शिविमागायोमनमा भमिसम्बध्यते। योजनके नभीसभागोंमसे पिलायनाय रे भयगा जोड़े जाय ॥ "मरता पाविशपाषणेबनशत विस्तार' पापा ससिसिको दानो मात्तिपो में और मदित तस्वागणवामि । 'ति' भपिशवरायोकियो पुचि इसके मोदी पर पिंजरापो और गमण पही मो सर्वार्थसिदि दोपपिशानिएर शप भाटि और 'पपरेपान में मससे विग्रह में और मई में बाई मेदनही होता। हमारी समझ में पड़ी पाठ उमास्वामी एतमा पाहिये कि (१) इस पाठमें '' एक मदर और भरनाम।। और पम्पपाद स्वामीको कति भनुपसापगप्पास महामाप्य तिरिक सबसे प्राचीन माम समत् । म मा पासा रोज कर पुरे मन मिस प्रति से पाठ बिया गोणावरगान ही प्राचीन प्रति होगी। गुपा पम्तों मै “परोजितिमामा पोजनम्म पापा तत्वावातिल में पढामणिविमागा योजनम्प मी पाठ भात् दोनों पाठ। गोनों ही पाठ ठीक एकाकिंगति (ना.) एरेनन विशनि न भावुक दस्प बान पीस की संका' पर एमपीस (पवादकोश प्रठ ५) में पचनविशति का ऐसा विमा और पुत्पतिको है परन्तु स्मरण रोकिएका गभर्थ (जोनि लिंगी सलमेवाण माप पत्र सादा भोसन प्रियामाता हैरिस्ठा बानेगला एकमतग । एकसाराम बापूत ऐसा अर्थ इस मूग होने से बचीस स्वपि.रिस्सा भरत भाषपामो ५५ अथवा इस सवा सूनको निधन पास्त्र रसके स्थान परदेठेती पर गलपासून पचाना और परापो मिकतमानित सिदि एगनिगमी मगमसाप सील व पदामाद और विपत्पर्य सहित समायसिदिका सम्वना दिदीभनुपाद । अध्याप ग २४, ३॥ विस्तारोऽस्येति इतरेषां विष्कम्भविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह-- ॥ तद्विगुणद्विगुणविस्तारा वर्षधरवर्षा विदेहान्ताः ॥ २५ ॥ ततो भरतात् द्विगुणो द्विगुणो विस्तारो येषा त इमे तद्विगुणद्विगुणविस्तारा ॥ केते ? वर्षधर- वर्या ॥ कि सर्वे सराय। । विस्वाभाविक ऐसा इस(मरवलेप) का विस्तार भर्षात् भरतका दक्षिण रेचर विस्तार ५२६ पोमन । इतरेमा विपम्प-शिप-मविपत्ति प्रयोगामा-मान्य (पो वा खापों) पिस्तारके भेद मारनेके सिप (मग्रिम सममें कावधि सूत्रम्-तद्विद्वगुणद्विगुणविस्तारा वर्षधरवर्षा विदेहान्ता ॥ २५ ॥ नादिगुण-गुण-विस्तारा- मास (मात नेप) स दुगुनी मुनी (दक्षिणम) पौड़ाई पाखे पराविदो अन्या- -पत्र वा पाव रिदेव सत्र पर्यव में प्रयाव भरवता २६ योगन गौड़ा मिद प्रवास एक सास पावन पोप्रम मा (२)। मयत सम दो सास एकसौ पाप योभन और पापणखा । मारियान सीपख भार साल दोसोदा पोमन दशारित माठ सांस पारसौलीस पोमन एक बायोमन है। निपम मुखापत सोला सान भाउसौ पया लीस वोमन दो कसा १९८४२१९ विदेश तीस सास सौ पौरासी पोमन पारकमा रे (२३६४पोगन) मत मरवाद पदिगुण दिगुणा विस मरवपत्र से गुमी गुमी रे (बक्षिण रचर ) विस्तार प्यासितिविदगुण-द्विगुण चौदाई मिनको ते ये (सूत्रम) पदिदगुण-द्विगुण विस्तारा पिस्तार पाछे है (भपाद मरत धन से दने २ पापाचे (परन) कौन? पपपर-पसास (घर)पर्मन और परापासप(सपके पर्वत भौर क्षेत्रमारवमपेसे दूनर हामि) सार्य सिदिदि ११ श्यामवासी नमस्मसाप बसीख रुव पदपणेद मौर विभात्पर्य सरित ससिदिका शम्दया हिन्दी अनुसाद मध्याप ३ सत्र २५, २६ नेत्याह, विदेहान्ता इति ॥ अथोत्तरेषा कथमित्यत आह- ॥ उत्तरा दक्षिणतुल्याः ॥ २६ ॥ नभवि०मापाचिदा मन्तामविक -ऐसा नाकात है कि (माठ) पिदो सेक्तक (मारवर्षसे पर्वत और क्षेत्र एक दूसरे से चरोचर दुगने दुगने) र मर्यात् मरत नेत्र ५२६६९ योमन चौड़ा है (१) हिमवान् कुलापन- १०५२ योजन चौड़ा है। (२)मवत् सेप-२१०५६, योमन चौड़ा है ।। (३) महाहिमवान् स्थान-१२१०११ योभन चौड़ा है ॥ (४) परिक्षेत्रम्-४२११, पोमन चौदा है। (५) निपप प्रलापन-१६८४२९ पोभन चौड़ा है। (६) रिदासप-३३६४ योमन चौड़ा है। अपवरेप वि०मत मारr =अब (विदेश्षत्र स) उत्तर दिशाभों का विस्तार) कैसे है इसलिय (मगला सूप में)कातरें कि (कसूत्रम्- उत्तरा दक्षिणतुल्याः ॥ २६ ॥ इसे सूत्र में यदि २५या सुमसे "पपर वर्षा" और "पिदेश" पापोंडा मनुवर्पण करें तो पाठ और भर्प निम्नलिखित (१) अनुच्छ होता है और यदि केवल "पिदे"सम्मकी भनुमृत्ति ले तो पाठ और भर्प (२) के अनुसार होता है पिटला भर्थ पुग्यपाद सामीको सार्पसिदिपत्ति के अनुसार है और परिक्षा भर्य बहुत विस्तृत भी है जैसा कि दोनों मावि के अर्थ मो नीचे लिखे भावे रे उनसे प्रगट है। (१) वर्षधरवर्षा विदेहोत्तरा दक्षिणतुल्या । पर्पपरवनिविदा उत्तरादपिठ पर्वत और क्षेत्र विदेश से उधर दिशा के दक्षिण दिशाके (पर्वव और पेत्रों ) उम्पा." समान र भषात् विदेश प्रसे सत्तरदिशाके तीन मील कापी और शिखरी परत और वीन रम्पक, हैरएप और ऐरावत क्षेत्र विदेशसे दक्षिण दिशाकेवीन निषिप, महा देमपत्रेमपत् पर्वत और तीन इरिमपद भरतनारे परावर विस्तारवाले हैं। ( हमारे पास मूत्रपात परततरवितुलारानी पर परोसेताम्मर माम्नाप रमत्रो मम नदी माना है।

सिदि एयनिवासी नगरपसाय पडील व पदच्छेद और विभवस्पर्ष सहित सर्विसिवित्र शम्शः हिन्दीभनुपाद । ममाप ३ सूत्र २६ उत्तरा ऐरावतादयो नीलान्ता भरतादिभिर्दक्षिणैस्तुल्या द्रष्टव्या । अतीतस्य सर्वस्याय विशेषो साप वेदितव्य । पाले पचीसा समर्म रजिसके पषत क्या पोल पृथक पृथक् विस्तार कसा सोही उचरके पर्वत या क्षेत्री समझना चाहिये। (२) विदेह-उत्तरा दक्षिण-तुल्या ॥ विदेश-परा विदरपसे रघरदिशाके (३ पर्वत, ३ क्षेत्र । द्रा समय पर नदियें और पारिवारिक नदि मादि) रक्षिण- नषिण दिशाके (३ पर्यव ३ सा ३ दर ३ पुष्कर का नदिय और पारिवारिक नदि भादिक) =समान है भात् परापर विस्तारवाले भौर परावर गणना पाले है॥ पतुर्दश मरियों से पीतानदी केसरी मासे निकलकर पूर्वी विदेशों विभाग करती हुई लवणसमदमें पूर्पकी भोर मार मिसवार और सौवोदा नदी विगिंवद्रासे निखार पपिपी विदेशोंके दिमाग करती खपणोदपिमें परिपकी भोर मार मिक्षती है। पर्यव, सम, हो, पुपरी भादित विस्तार और गणना मपम का पुरेपी मानना || सपनुवाद-विराऐरापत-भादपः (पिदेश पसे ) रवरदिगाके ऐरापत भादि (३पर्मव,३१,३वा, ३ पुष्कर, नदिये भौर इनडी परिवारकी नदिय मादि) नौल-मन्ताभीमरवादिमि. नीलमलापस कर मरवादिक(तीन इत्र, तीन मुखापत, तीन द्रा, तीन कमल, छ मदियों और इन नदिपोंडी परिवारकी नदिय मादि ) दपिगम्याटम्या भवीतस्य -दक्षिण दिशासे समान मानना चाहिये । मतीव मर्याद प्रयम वर्णित सबस्पभिगम् विशेषवेदिवम्पा म्सबरपस्सुमो केपा विशेष(कि उत्तर दिशाके पर्वतादिक दक्षिण दिशाके सुम्यो) भानना चाहिये (१) पनवम्न कोश में उत्तरा गमका अर्थ मवायः ऐसे । (ख)प्रेतको पितृत्वप्राप्ति होनेपर सपिएसीबरसो मनम्तर मो पितृसम्मापी किया माती सविसर पीदेशी भावकिया। पर रिण मारमम्प.) (सलिये अनुवाद उत्तर दिशा मर्पमें भम्पव माना RECEREEKse सार्व सिदि पटनिवासी नगमसहाय पीस रुत पदच्छेद और विमरस्पर्ष सरिव सार्यसिदिका शम्दशः हिन्दी भनुपाद अध्याय ३ सूत्र २५, २६ नेत्याह, विदेहान्ता इति ॥ प्रयोत्तरेषां कथमित्यत आह- ॥ उत्तरा दक्षिणतुल्याः॥२६॥ नभविभाषारिदा मन्वायवि० ऐसा नहीं है-कात रे कि (पाठ) पिदेश तक (भारतबर्षसे पर्पत और सेप एक दूसरे से उपरोपर दुगने दुगने) भर्याद मरस क्षेत्र ५२६६, योभन पौड़ा । (१) हिमवान् लापक्ष- १०५२३ योजन चौड़ा । (२)ोमवत् प्रेम-२१०५६, योजन पौड़ा है। (३) महाश्मिरान् महायश-४२१०६ पोमन पौड़ा है। () परिप्रे-४२११० योमन चौड़ा है।। (५) निपप कुलापन-१६८४२१योगन चौड़ा । (६) विदेोषेत्र-३३६८४योमन पौड़ा है। भावपाविकममा =भब (विदेहनत्र स) नधर दिशाओं का विस्तार) कैसे है इसलिप (भगवा सूप में)कातरें कि (१)सूत्रम्- उत्तरा दक्षिणतुल्या ॥ २६ ॥ इस सूत्र में पदि २५या सूत्रसे "वपपर बर्षा" और "विदेर" पाक्यों का अनुकर्पण करें तो पाठ और पर्व निम्नलिखित (१) मनुश्न होता है और यदि रेगस "विदेर"शम्दकी मनुचि ले तो पाठ और भर्ष (२) के अनुसार होता है पिछडा भर्य पुग्पपाद स्वामीकी सार्यसिविपत्ति में अनुसार है और परिवा भर्ष बहुत विस्तृत मी रे जैसा कि दोनों भाति के पर्थ जो नीचे लिखे नाव रेग्नसे प्रगट है। (१) वर्षधरवर्षा विदेहोत्तरा दक्षिणतुल्या पपपरभाविदा उत्तरादधिण पर्वत और धन विदेर से उत्तर दिशा दक्षिण दिशाके (पर्षद और क्षेत्रों ) तुम्मा समान रैभवात् विदेश क्षेत्रसे उचर दिशा तीन मीस रुपमी और शिखरी पवन और वीन रम्पर, हैरपप भोर ऐरापत क्षेत्र विदेशसे दक्षिणदिशावीन मिपिप, मा रेपपन ऐमवत् परत और तीन रिपबत् मरवारे परापर विस्तारमा (१) हमारे गा इस सूत्र अपाड एकतरा पतिपुरका प्रीची पर पाठवायर ताम्बर माम्नायमै रमो भूम नही माना सिदि एयनिपासी मगरूपसाब पडील व पददय और विपरस्पर्य सहित सभापसिदिफा शम्दरा हिन्दीभनुपाद । मध्याय ३ सूत्र २७ न तयो क्षेत्रयोवृद्धिहासौ स्त । असम्भवात् । तत्स्थाना मनुष्याणा वृद्धिह्रासौ भवत ॥ अथवा अधिकरणनिर्देश भरते ऐरावते च मनुष्याणां वृदिहासाविति ॥ किंकृतौ वृदिबासौ ? अनुभवायु प्रमाणादिकृतौ ॥ अनुभव उपभोग, आयु नश्वयो fuषया निरासी स्तर न वन (भरत, ऐरापत) के सत्रफल भयवा विस्तार की याती पाती है। मसम्मवाद सन् पोंकि (विस्तारफा पटना पटना) असम्भव है। विन (भरत ऐरावत) में स्थानाम मनुष्याणा पुदिनासौरममता (मक्या बाराले मनुष्यों की बढ़ती घटती होती है। अयपा (पप्ठी निर्देश छोड़कर) अधिकरणनिशभरकापरावर ससमी निमकिफ निम्पनमें भरतमें तपा ऐरावत, (राने वाले) मनुप्माण परिसासा इतिक मनुष्योंकी पाती घवी है एसा है “भावार्थ ऐसा है कि" सूत्र में "मरवरारवयो।" या पास्प पठी वा सप्तमी विमति में एक ही रूप पारण करता है इस नाक्य के साथ विरासो पापय फे मोरदेने स पप्ठी में या मर्षदासा कि भरत तपा ऐरावत की वृद्धि और प्रास भर्याद एफ प्रकारसे ऐसा भाशय समझा जासका है कि भरत भौर ऐरावत के विस्तारफी यादी क्या यादी रस्सर्पिणीफाल तया भवसर्पिणीकालमें होमीरे इस पूर्वोक्त संदाको दर करने के लिये भावार्य "मरदै रापवयो" वास्यको सप्तमीमें खेफर ऐसा कयन करते हैं कि मरत क्या ऐरावतमें (निरास करने वाले मनुप्यों की) पड़ती भौर घरती होती है न कि भारतरर्प तथा ऐरावतवर्ष के विस्तार भयका पफसकी पाती सपा पटवी होती है। किम्कता वृदि-दासौ (मरन) वृदिगम कौन छत वा जनित है । मर्याद घटना घटना किसके किये हुये है भनुम मापस प्रमाण प्रादि-चौर। उचर) अनुभम जीवनफालका परिमाण भादिकी की हुई (पदवी घटवी) है अनुभव उपभोगमायुक्षण अनुमर मर्यात् उपभाग या निपयों का सुसास्वादन भायु अर्थात् (१) पर मा गम्भमरवाशप १० मोड १२० मे "मायुस्, इस म्प नपुसक लिममें पाया जाता है सी प्रपमा विमति पवन "मायु" पुसलिममै पप गप सप बनेगी।

स्स्सस्ट सिदि सूत्र तेन हदपुष्करादीनां तुल्यता योज्या ॥ अत्राह, उक्तेषु भरतादिषुक्षेत्रेषु मनुष्याणां किंतुल्योऽनुभवादि। भाहोस्वित्कश्चिदस्ति पूतिविशेष इत्यत्रोच्यते-- भरतैरावतयोवृद्धिहासौ पट्समयाभ्यामुत्सर्पिण्यवसर्पिणीभ्याम्॥२७॥ वृदिश्च द्वासश्च वृदिहामौ । काम्या ? षट्समयाभ्याम् । कयो १ भरतैरावतयो । वन तिसाविप अर्थात् रचरा दषित सुम्पा) गरि स,कमल (पर्वत, वन, नदिये, परिवारकी नदिय) मादीनाम् Truarपोग्वाण । भन०माT =माविकोंडी समानता लगाई माय है । यहाँ (शिष्य ) पूछा है कि उपरापरतादिपुग'हपुर मनुष्याणविकथित मरवादिक पत्रोंमें मनुष्यों का क्या गुरुप मनुमप प्रादिसामाजस्थिवामित्० सुम्प भनुमय भादिक र भषमा छ भविपतिरिका विमापत -भिमवा(अविपिशेष ) इसजिये (इति)यहाँ (भप्रिपसूप) मा भाप है कि ।। सूत्रम्-मरतेरावनयोर्वृदिहासौ पट्समयाभ्यामुत्सर्पिपयवसर्पिणीभ्याम(२॥ २७ ।। साभा-भरप-ऐरावतपोश -भारतवर्ष और एरावतवर्षम ( निवास करनेवाशे पनुष्प भौर विनोदी भायु, आप, भनुपब,सपदा,ौर्य,पुरचादिका) परि-नासो उसी मपसपिसीमाम्।। बाना फना उस्सर्पिणीप भवसर्पिणीस्प पद-समपाम्याम् । से पास से (पपासस्प) होता है। नुवादादि पासपशिनासौगाम्यान और पाना वया पाना है सो पृद्धि हासौ है (भरन) दिन दोहेतुसे बड़ना पटना है। पट-समयाम्पाम् (उत्तर-उत्सर्पिणी तथा भवसर्पिणीक युगल छ कालोसे बढ़ना वमा पटना)। को परस-एरारवयो (परन)दिन दो बड़ना पटना ] (चर)भारत पेरापका ॥ (१) वाम्मर भाम्नाय समाप्यतसाधिगमनमे पर सत्र नरस अप्पापले पुष ३५ की रिपो देखो। (२) मर्पिीमाम्पसमातर्षिकोतारक मधारये भारची पिकापाव प्रथमwणेच मारेको पत्र पि सिद्धि पानिगामी नगरूपसराय पीलान पदग्छद भार विमरत्पर्यसहित सर्वार्थसिद्धिका शब्दश हिन्दीभनुवाद भन्याय ३ सूत्र २७ 'पविधैव भवति ॥ श्रमसर्पिण्या परिमाण दशसागरकोटीकोट्य । उत्सर्पिण्या अपि तावतेव ॥ याऽसौ उभयी (सोभयी) कल्प इत्याख्यायते ॥ तत्र सुपमसुपमा चतस्र सागरोपमकोटीकोट्य । तदादी मनुप्या उत्तरकुस्मनुप्यतुल्या ॥ तत क्रमेण हानी सत्या सुपमा भवति तिसू सागरोपम- कोटीकोट्य । तदादी मनुग्या हरिवर्पमनुप्यसमा पपिएप०भवति । या प्रकार की होती है भयात् भसिद्धाखमा, दालमा, दालमासुखमा, सुखमा दुस्समा, सम्ममा, सुसमासुस्वमा ऐस छा काम भासनिपया परिमाण दशसागरकोटीफाट्य." =अपसपिणी कालपी मयादा दश कोडाकोड़ी सागर भयवा १०००००००० गुणित १०००००००%3D१००००००००० है भर्यात् एक पा सागर है। उरसपिएपा "मपिता पर उत्सर्पिणी (पास) का मी तिनना ही (एक पपसागर मर्यादा) है। गाशमसौ( सामयी) कम = मो (=पा) पा (=प्रसा) दोनों (तमयी, कम्प काल है।। इनि०मात्यायनेलप्रसुपमसुषमावस ।। =एसा कहा गया है। सुस्वमसम्पमा घार सांगरोपमकोटीकोव्या गोड़ा कोरीसागर प्रमाण भर्यात् ४०००००००x१०००००००% ४०१०००००००००००० मालीस लाख नील सागर का। ब्द मादीसमनुप्पा उवरफुरु-पनुप्प-सुम्या : तिस (काल) की भादिमें मनुष्य उच्चरकुरुभोगभूमिक मनुष्यों के समान हैं। भर्षात् इस (काल) की मादि मनुप्पोंकी भायु, तीन पत्यकी होती । मनु झप स पन्ती र अन्त में दो पम्प की रहती । (२) शरीर की ऊचाई मादि में सीन कोस भनुम से मन में २ कोस(३)तीन दिन पश्चात् चौथे दिन बदरीफल सम भादार इत्यादि घटवा घटता माता रे तव कपणाहानांतसत्पा, सुषमा से अनुक्रमरा हानि होनेपर मुखमा कान भरवितिसागरोप कोटी कोटमगावद-भावामनुप्पा-धीन कोड़ा कोड़ी सागर ममाण होताहै । तिस (सुसमाकाल) को भादि पिपं मनुष्य परितप-मनुप्पनामा चरिवर्प मध्यम भागभूमिक मनुणोंक दृश्य । (२ फोश शरीर २ पन्य भायु इत्यादि।

सिदि । ५८ एटा निवासी मगरूपसाप पकीबाव पदग्छेद और विमात्पर्यसहित सर्वार्थसिद्धिका शन्दश दिन्दीभनुवाद भन्याय ३ सम २७ जीवितपरिमाणं, शरीरोत्सेध इत्येवमादिभिडिहासौ मनुष्याणा भवत ॥ किंहेतुको पुनस्तौ ? सर्पाची । कालहेतुको ॥ स च कालो द्विविध । उत्मर्पिणी अवसर्पिणी चेति ॥ तद्भेदा पट् ॥ अन्वर्थसझे चैते ॥ अनुमवादिमिस्त्सर्पणशीला उत्सर्पिणी । तैरेवावसर्पणशीला अवसर्पिणी ॥ तत्रावसर्पिणी पड्विधा-सुपमसुषमा । सुपमा । सुषमदुप्पमा । दुप्पमसुपमा । दुप्पमा। अतिदुष्पमा। उत्सर्पि- एयपि अतिदुप्पमाया सुषमसुषमान्ता नीरिवपरिमाया शरीर बत्मेपर जीवनकालमा परिमाण (भोर) शरीरफी ऊचाई इत्परम् भाविपि प्रशिासी मनुष्याणां भषत नत्पादिफ फरिही (इत्येवमादिमि ) उमती भौर पन्ती मनुष्योंकी होती है। पुन वा फिम्रेको मरन) परि ये (मृदिराम) कौन निभिक्षक अथवा जनित है। फालतका सभापका उत्सर) समयकारणक र मर्यात् समृद्धि और चतिका हेतुकाल है । वाभाचिकाल दिरिपाई मत्सपिणी भरसपिणीमभतिका -दो प्रकार है। उत्सर्पिणी भोर (-4) भयसपिणी पस। सद-भेदाप्रत्येकाप -उन 'उत्सपिणी मोर भवसर्पिणी) के भेद पृथक् पृथा (प्रत्येक) का रे भन्वामी चर। बहुरिच,ये उस्सपिणी वथा भवसर्पिणी)मंसा भर्प पेसा (-मन्व) नामधारक हैं भनुपरमादिमितत्सर्पण शीला नपूर्णा क) अनुभव भाविक सरित भागवदनेफा (-उत्सर्पण) है समार जिसका अपात् वृद्धि करनेकी प्राति जिसफी सो उत्पपिसी देशवक्ष्मसर्पण शीला उत्सपिणी है तिन (मनुमन, मादि) से ही (एच) पौधेटनेका (भवसर्पण) है स्वभार निसफा भवात् एस करने की है मावि जिसकी सो मरसपिण 'वामवसर्पिणी परिया"सुपमसुपमा=अवसर्पिणी र सहो भवसर्पिणी हा प्रकार में सुसमासुस्वमा सुपमा"सुपमदुप्पमा दुप्पमसुपमा" म्सुसमा, सुखमन्समा, स्वमसुखमा पुष्पमा मविदुष्पमा 1 उत्सपिणी मरिक पुरसमा भतिवमा उस्सपिणी [फास भी भविणणार"माया"सुपपसुपमा"मवा" भनिसकामनिममा(काल)पहिलाएं और सुसमसुलपा(कात सबसपि सा(भन्ता) CGLEASEMEENA सिद्धि सार्थ - एमनिरासी नगरूपसहाय पालन्च पदरछेद और रिसस्पर्षसीव सार्यसिदिय शमशः हिन्दीअनुवाद अध्याय ३ सूत्र २८, २६ ॥ ताभ्यामपरा भूमयोऽस्थिताः ॥२८॥ ताम्या भरतैरावताभ्यामपरा भूमयोऽवस्थिता भवन्ति, न हि तत्रोत्सर्पिएयवसर्पिएयौ स्त ॥ किं तासु भूमिपु मनप्यास्तुल्यायुप पाहोस्वित्कश्चिदस्ति प्रतिविशेष इत्यत आह- ॥ एकद्वित्रिपल्योपमस्थितयो हैमवतकहारिवर्पकदैवकुरवकाः॥२९॥ सूत्रम्-ताभ्यामपरा भूमयोऽवस्थिता ॥ २८ ॥ सूत्रार्थ -साभ्याम् भररा" तिन(परत तया ऐरावतों)से धन्य (मषत, हरि, पिदो, रम्पक, हरपपपत) पूमषामस्थिता पृथिवीर्य ग्पोंकीत्यानित्य र मर्याद इनके प्रों पृद्धि दास महीं होता है। पृश्यनुवाद मामा भारत-ऐरावताभ्याम्पmen उन पग्न सपा ऐराहत यॉस अन्य (मपत, रि, विदो, रम्यक, रिपपरत) ममरामास्विता "परन्तिा कृषिधीय ज्योकीस्पॉनिम्पपिथपान (-मपस्थिता)र (भवन्ति) नofero योंकि (बी) नी है तो (ोह पांच में) उस्सरिणी मस्सपिएपYि"पिपुर। मत्सपिणी क्या प्रमाविणीबाल (मश्न) या दिन (पांच) भूपियामि तुरुप मायुप मनुप्पामामागोविनश्चित समान अवस्था पाले मनुप्प ।। भयका (माहोरिक्त) भस्त्रिामविपिरोपवि०मा०माT भिन्नवा वा पुथफ्ना (अतिविशेष) है इसखिये (अग्रिम सूध) का कि सूत्रम्- १)एकद्वित्रिपल्योपमस्थितयो हैमवतकहारिवर्पकदैवकुस्वका ॥ २६ ॥ सुपार्थः-ए-दि मि-पम्पोपम-स्सिवयरमवार -एक दो और तीन पम्प प्रमाण मायुराले (कमसे) परत पत्र रानेवाले परिपपदेपहपका ||२६|| हरिपके मिरामारमयाले पनुप्प और देवमोगरमिक रसनेमाले पनुप्पो मपाद मक्त सप्र मो नपन्य भोग भूमि का क्षघ पामे सपमे मनुप्पोकी (Urमारे पान भोप पाठ एकसा सागर भागापडे 'समाप्पावधिमा में हम मोजमा माई (टिप्पती पृष्ठ परेचा) GGCCcCCESCE FERECEKCa ६१ 5 सिदि प्यानिवासी बगरमसाप पीख व परपद और विमस्पर्व सहित सर्विसिदिका सम्पया हिन्दी अनुसाद मप्पाप ३ सूम २७ ततः क्रमेण हानी सत्यां सुषमदु मा भवति हे सागरोपमकोटीकोव्यौ । तदादौ मनुष्या हैम- वतकमनुष्यसमा ॥ तत क्रमेण हानी सत्या दुष्षमसुषमा भवति एकसागरोपमकोटीकोटीद्विच- त्वारिंशद्वर्षसहस्रोना । तदादौ मनुष्या विदेहजनतुल्या भवन्ति ॥ तत क्रमेण हानौ सत्यां दुष्षमा भवति एकविंशतिवर्षसहस्राणि॥तत क्रमेण हानौ सत्यां प्रतिदुष्षमा भवति एकविंशतिवर्षसहस्राणि एवमुत्सर्पिएयपि विपरीतकमा वेदितव्या ॥ अथेतरासु भूमिषु काऽवस्थेत्यत भाह- वाणानीयसत्पा"सुपपद्गुष्पपा॥ या से क्रमसे हानि होनेपर सुसमसमाकाख मवविदोगसागरोपमकोटीकोव्यो-"भादो" दो कोडाकोड़ी सागरप्रमाण होता है। तिस (सुखप दुःखप) ही भादिमें मनुष्यामवतक मनुष्य-समा अनुप्प हैमवतक मपन्य मोगमृमिक मनुष्योंके सारिसे रे (मर्थात् एकप्रेश शरीर, एकपम्प भायु, पपदिन पीछे भाहार इस्पादि) ततामेनौ सस्थामा" स्वासे प्रकरि हानि होनेपर इषयसुषमा एकसागरोपपकोटी-मोटी- समसुसमा एक गोरी सागर प्रमाण से द्विक्त्वारिंशदर्भसास्रोमाइ"मवविध विपासीस सासवर्प न्यून पाहीन होता है ब-भादो"मनुष्मायापियो मम तुम्पा मन्तिः =तिस (समसुखमा) की मादि में मनुष्प पिदरपत्र के मनुयोरे समान होते हैं। तामेवानीशसस्थामा दुप्पमा मासे पागम हानि होने पर दुम्समाका पपवितएकपिति-पर्पसासाणितवाक्रमेण पीसो सास पर्षा होता है । वासे अपानुसार मनोयसत्ताम्"प्रविष्यमाएकशिकि मानि होनेपर प्रति दासकास कीस वर्ग-सासाविसमविपासपिभीमपि सानपत्र होता है। इस प्रकार प्रत्सर्पिणीकास मी विपरीवनमाम्यदिवम्या पासय भनुप्रारूप जानना चाहिये भवभवराम पिसाविमामा-मामे (प्याब) अन्य (भूमियों) जिला रक्षा (मस्सा) सिसिपे पाते है (रचनामाभिमानजीवनस्तार निदोगरा सराय। एयनिगासी मगरूपसाप बहीलात पदादेद और निमारपर्थसहित सर्वार्थसिदिका शम्दशः हिन्दीभनुपाद मध्याप ३ सम २६ तत्र मनुष्या एकपल्योपमायुपो द्विधनु सहसोछिता चतुर्थभक्ताहारा नीलोत्पलवर्णा ॥ पञ्चसु हरियषु सुखमा सदाऽवस्थिता । तत्र मनुष्या द्विपल्योपमायुपश्चतुश्वापसहसोत्सेधा पष्ठभक्ताहारा सिदि शखवर्णा ॥ पञ्चसु देवकुरुपु सुपमसुपमा सदाऽवस्थिता । तत्र मनुष्यास्त्रिपल्योपमायुप तपापम्योपपमायुपीमनुप्पा 11 मनुष्य एक पम्पोपम मायुवाछे दिपनुप्-मास उणिवा दो सास पाप अचे (इच्छित) गनुर्ण मत माराम मनीया(चतुर्य भोजन वा भमके(भक्त) खानेवाले (-माहार) भर्थात् तीनवारके मोनन(फे समप)को त्यागफर पोपीगरफा भो नन करनेवाले तात्पर्य एकदिनको पीचर्म घोड़फर मोजनमरनेवाले नील-उत्पल-पर्णा पयसुरहरिव पुर। म्भौर नीले कमल सम मपफेधारक है। पाचारि क्षत्रोंमें मुखमा"सदाभास्पिता॥ तमनुप्या दो-पम्योपम =सुखमाकाल सर्पफालमें वर्तमान है। वहां मनुष्य दापन्यप्रमाण मायुप- पवर-पाप-सासू-वत्सेपास म्भवस्याफे पारक पार सहस धनुष अंचे, सम्य भषया ऊंचाईवाले पा-मन्त्र-मागरा -ठवां भोनन प्राण फरनारे भर्याद दो दिनका बीचमें भवफारा देफर तीसरे दिन उसी समय भोजन करनेवाले शंख-पर्णा पश्चसुदेवपुरासुपमसुपमा।" -धवल भयवा श्वेत शरीर पारफरें। पांच देवान पोवि सुखमसुखमा स्वा०परस्पितानमनुष्या "पिम्योपममायुप, सर्प कालमें भपस्थित है। वहां मनुप्प तीन पन्य प्रमाण स्पिति वाल रे जो पुसममुबमाबान परबार मोमन साधारपत प्रत्यक दिन मनुप्प करता मोर पचमकासमै पापा दो बार मोबन मस्येक पुरम करता है। पोलिससिरिकी संस्कृति पम्पपार स्वामाम जिमका मम्म विफम सपत् १०८ स्पेष्ठ सुनी परामीको दुमा या पंचमकालमें रपोसार भोजन करनेवाले तारपप्प यह कि एक दिनका मन्तर रेकर भायन करनेवाला पक दिमक अवकाश से भोजन करमे बाला' 'पदिन बाग भोजन कर भोजन परमपासा' असे मानता कि पंथमाल के एक मनप्यमे मोर अपम्प भोग मार्मिके एक मनुध्यम साथसाप रविवार को भाजन सापस लिया हा पचमकामा पुष्प सोमपारको प्रात काममै एक माजम और दूसरा रासी दिवसको सायंकालको देगा मौरा ६३ पसी मनुष्य पर भाजम मंगलवार मात काम करेगा तबखग अपम्य भाग भूमिका मनुष्य को मानम नरेगा जब पंचमहालका ममुप्प मंगलको सायबालको चौपा मोजम करेगाहर भोग भूमिश्च पूर्वोत ममुप फिर मोमन करेगा इसलिये हाधिौथा भार करनेवाले भात वामपार का माजन पार पाप दिवस मन्तर पर दूसरे दिन भोजन करनेवाला । . --- सिदि सूत्र २६ वप्रः हेमवते मवा हैमवतका इत्येवं वुनि सति मनुष्यसम्प्रत्ययो भवति । एवमुत्तरयोरपि ॥ हैमव- तकादयस्त्रय । एकादयस्त्रय । तत्र यथासख्यमभिसम्बन्ध क्रियते । एकपल्योपमस्थितयो हैमव- तका । द्विपल्योपमस्थितयो हारिवर्षका । त्रिपल्योपमस्थितयो दैवकुरवका इति ॥ तत्र पञ्चसु हैम- वतेपु सुपमदुप्पमा सदाऽवस्थिता । एक पस्यकी भवस्था होती है। इरिसर्प मा मध्यममोग भूमिी या निपासी मनुप्योकी मायु दो पन्य की होती है। भौर दषकरु उधम भोगाषिके निपासकरनवाले नरोंग सीन पन्योपम जीवन काल है (रेमवतापमालाईयतका इत्येष० मयतवपमें दोनबाछे भर्यात् उपमन पाले वे देमपतका रे इस प्रकार मुलि सविधा बुथ् प्रत्यय (मधव शम के साय) होनमें (सति) (उसमें रोनेवाले) मनुष्य-सम्मस्पपा मपति एवंटचरयो. पिक मनुष्यों का ज्ञान पायोष होता है पसे अग्रिम दोमें (उचरयो) भी है। भर्याद परिवर्प और देवरु शम्दों के साथ दुष् मत्यप मान पर उन दोनों क्षत्रों में उत्पन्न होनेवाले मरोंचा बोध होता और रिचर्पक, दैवल्यकरूप होमाते हैं। रेमपतक-मादयः त्रय-एक मादयः प्रप.. (इस सत्र में) हेमरवक भादिक तीन है। एक मादिक तीन (संसपा) रे॥ - ममतक-नारिचर्पक और देवरूपक का एक दो तीन गणनामों के साय) पयासंस्पम् सख्या भनुसार घा अनुसरण (-यपासरूपम् भर्यात् पहिले को पहिली दूसरे को दूसरी तीसरे को तीसरी इस पसे), अमिसम्बन्ध क्रिपतेत एक-पम्योपम-स्थितय ।। समन्य पा सयोग किया माप (मैसे) एक पम्पोपपकी भायुधारक हेमबवडा चौमवत क्षेत्र (मपन्य मोगमृमि) के उपमे मनुष्य हैं। दि-पन्योपप स्थितपरिवर्पका दो पम्पोपप रे जीपनकायबाल हरिपर्पजन्य योग भूमि के निवासी मनुप्पो विपन्योपम-स्थितय देपवकातिक जीन पम्पोपमकी भवस्थापाले देवकुफ (उचम भोगभूमि के) राने वाले नरें पप्रसुमिपा सुपमदुप्पमा सदाम्मपस्पिदा या पाच मियत देशोंमें सुखमालम (काल) सर्पदाविषमान है। (१) हिमपद' रूपमै भक्ष (-प्रत्पप गोमेसे, हिमवत् गौरबी धिपरमात्+मना-मवत रस गुम परपप गोको पुम् । कार मद सहिोने से गोप मा मोरोस्थान में प्रभादेशमा मत मत+मरे प्रचारका लोप परमपरा Get १२ गा। - सिदि पानिपी नगरमाप पडीत न पडणेद मौर रिपरस्पर सरित सर्वार्थसिदिरा शम्दश हिन्दी अनुसाद मध्पाप ३ सूत्र ३० भौर३१) देवपुरवारोत्तरपुरया समारयाता ॥ अथ विदेहेप्वरस्थितेषु का स्थितिरित्यत्रोच्यते- ॥ विदेहेपु संख्येयकाला. ॥ ३१॥ मोपु पनस महाविदहेपु तापमानामा -दार शक उपने मनुष्योंस उत्तर कुरुक्षप्रा उत्पम हुए मनुप्य मप- भागरिदीपुर समान (=सम) पणित कियगय । (प्रश्न) भप दिनों में पाणि: स्पिनि लिभरपानमाल, मा निरासकरनालोंकी पपा भायु ऐस (परनपर) या कहा माता कि "सूत्रम्- निदेहेषु सख्येयकाला ॥ ३१॥ गाय-!ि मागय काला सिदासयो विष समगानी भपस्या ग मायुगाले होते हैं भषाद पांच मेरु समापी पागों विदा ना मनुष्य सम्पात परसही मायुवाल होते हैं पनवार -साँप महानिदरेष वान मरु समपी) समस्त पनि महाविदरों में (१) हमारे पाठामो पाठ होगी(भा पृष्ठ!५०५४१) श्यताम्बर माम्ना समाप्य में इसको सूत्र माना है। (vyfanमियो रेकर मुनोना पेतुन पिरे । प्रायेण मुक्तिसमाप्तिानुस्मात् । तदु विश्हपु पम्याना मेरा सापम्धिन पश्चर्य विरे HINR मितिमा पापमाविस कपात शिगन नियमपानीमा पिनयन हुपा (-विगता,पंस दुपा (-विनिष्ठः) गाव)जाप (आर)चपियों Fitni नामानि पर प्रालि -दिम देशों में) परिमाप पा पापा (प्राय) मोती लम्पिक गुणा मिlti -वारापास (यो माम विराविम विषम पाम मेर mfuntim froमपर विn -मापी पधि पूर्व विशाल विर पनि पभिम विशाल विश्व THARU मारिपातr -पामो मिलकर पाच महावितरपरकी पत्तिम) गप है या पर्णम दियेगये है।

सार्य १४ सिदि पयनिवासी मगस्पसाप पकीन कव पदच्छेद और विमात्पर्य सहित सवायसिदिका शम्दशः हिन्दीभनुमाद । मध्याप ३ सूत्र २६, ३० पधनु सहसोच्छ्ाया अष्टमभक्ताहारा कनकवणों ॥ अथोत्तरेषु काऽवस्थेत्यत आह- ॥ तथोत्तराः ॥३०॥ यथा दक्षिणा व्याख्यातास्तथैवोत्तरा वेदितव्या।हरण्यवतकाहैमवतकैस्तुल्या ।राम्यकाहारिवर्पकैस्तुल्याः पर-पनुप्-सहस्र-नप्यायामष्टममा माहारा या सास पाप ऊंचाईवाले भाठवां मोमन प्राण करने वाले भात् वीन दिन कापीप में मन्दर देकर पौथे दिन उसी समप भोमन प्ररण करनेवाले कनकपा माअप०उत्तरे स्वर्ण पा पपनस्परे (मरन) भर उत्तर दिशाभोंपि कामवस्थापणातिकमतभार =पा भवस्या है इसलिये (मापार्य उधर सूपमें) पाते हैं कि सुत्रम् (१ तथोत्तरा ॥ ३० ॥ =(पथा दक्षिणाः पाल्पावा.) तया (एस) उचराः (पदिवम्याः) सूत्रो:--यपादपिणापास्याचा तपा(पप) से दक्षिण पाखे वर्णन किये गये हैं से (ही) रचरामादितम्या- उच्चरदिशाके (वीन क्षेत्र हैरपयपत रम्यक और उधरपुर के) निमासकरनेवाले (पनुयोडो) समझना चाहिये भर्याद रिपपपवनष नो मपन्य मोगममिकाक्षेत्र पाकि उपमे मनुष्पोंकी एक पम्प की आयु होती है । रम्पक क्षेत्र मा पप्पम भोग भूमि पा के निवासी मनुप्पोंडी भापु दोपम्पनी होती है | और उसरकर मो उधम मोग भूमिका क्षेत्र पाा निपासकरने पाले नका तीन फल्योपमाकामीषनकाशइसमकार पापपेरसमन्धी दक्षिण भौर उत्तरदिशाभोंकी सर्प वीसमोगभूमिरे दृस्पनुपादभ्पपाण्यापिणा- म्यारूपावा वया पचरा से दक्षिणदिशाप (सोचाले पर्णन गियरे सेशी उत्तरदिशाके(मोबालोको दिवम्यामेरपपरका मानना पाहिये अर्थात् रिपपवत क्षेप्रकनिपासीमनुप्प कमवत पारम्पका वैपक्त पत्रके सनेवाले मनुष्यों से समान है। रम्यक प्रनिवासकरनेवासे मनुष्य परिवर्षमाम्या मारिवर्पले रानपाखे मनुष्पोंसे मुम्परे (१) हमारे पारस सूत्रा पार सब काखेताम्मर भाम्नाय समाप्पासाधिमत्रमे रसको मानी मान(पुपरिप्पी) (३) क्योकि वापर सात पति त्रितीपा बारकास हेतु से मनुवाइम 'मनुप्पोसे ऐसा सापे। जिसनही मिपाप । मो मनुष्यों के पाप सामेपर होदामाद मप पोरगावे मनापौर समान है। ६४ - साय सिदि सूम ३१ (१) जघन्येनान्तर्मुहर्तायुप ॥ तस्याश्च सम्बन्ध गाथा पठन्ति ॥ 'पुव्वस्स दु परिमाणं सदरिं खलु कोडिसदसहस्साइम् । छप्पएणं च सहस्सा बोदव्वा वासकोडीणम् ॥१॥७०५६०००००००००० उक्तो भरतस्य विष्कम्भ । पुन प्रकारान्तरेण तत्प्रतिपत्त्यर्थमाह- अपन्यन मन्तर्मुहूत मायुप- अपन्पकार भन्तर्मुहूर्त भायुगाले हैं। वस्थासम्पन्न गापपठन्तिा बहुरि विस (स्थिति) के संयोग, गापा पोपते पा पठन करते हैं। "पुमस परिमाण (पूषस्थानुरूपरिमाण) =मौर (--) पूर्वका प्रमाण सदस्स्सिसु०कोरि-सद-सहस्साइम्। निमपसे ( सलु) सचर खास करोर (सस्नु०सप्तवि- कोरि शत-सहस्राणि") चप्पणच सास्साग (प पर-पनाशव-सहसाणा) =ौर (च) अप्पन सास पोदम्मामास-कोरीणम्॥ बोदम्पापास-कोटय' (स-कोव्य) (१) करोर ((परस) सहित मानना पाहिये (सावनील पावस साठसास भर्ष) ७०५६०००००००००० =(एक पुत्र के ) सातनील पापवर्ष साठ साल भर्ष हुये रक्तामरवस्मविषम्म पुन समकार मन्तरेण =भरवक्षेत्र की काही दुई (दक्षिण उत्तर) चौदाई है सो पनि अन्य प्रकारफरि तत्-पविपति-मर्यम्मा -उस(पौराई)के मतलाने के लिये (अग्रिमसूत्र) काते हैं कि तत्-कोरीपूर्व मेरि (पारी) मसी। -येबरोर (पूर्व ) सा पूर्वकोटी है (जिसके) Utt................ ........अर्थात् सातसाल पप्पन शंख परसा (१) भस्पापम: -तिमबोरिवखि पटपक्षाशासान रिपति यदा मपम्ति तक पूर्षमुच्यते भस्य भपम् म । सप्ततिलपटि बावित -इसन्चपा ममिप्राप कि सरसाव करो बरस (भोर) पर पायाससन्न भेरि । वर्षामित पदा मम्ति T -पप्पन सहसू पररस बर होते हैं तदा एक/"पुषमापने T - एक पूर्ण कहा जाता(सपा 18000०.००००० ऐसे रखते हैं) (२)ोटि धेरी दोनो गण कर बोपोटिशपका पावन मति शम सापकोरपः है और कोटी शमत्रा दासी एम समान टप प्रथमाविमति पावन गिरे।(३)परस-सा मान पाता है जिनसे या मापां पर लिया गया है, उससे 'व' एप अनुपति समे datt का इस वर्ष राम नहीं लाये । अगुवार राण ताना भविमाषप। - RECE L.., .

सपा सिदि रस्सेपा। maegee एटानिवासी मगरपसाप पकीस व पदच्छेद भौर रिभक्त्यर्य सहित सवायसिदिका शम्दशः हिन्दीअनुमाद । भध्याय ३ सूत्र ३१ सख्येयकाला मनुष्या ॥ तत्र काल सुषमदु षमान्तोपम सदाऽवस्थित । मनुष्याश्च पञ्चधनु शतोत्सेधा । नित्याहारा । उत्कर्षेणैकपूर्वकोटीस्थितिका । (सरूपय-भाता-पनप्पानावप्रकाराम' =संस्म्यात पाल भायुक पारक मनुप्प होता है । वह (विदेश क्षेत्रों में) काल सुप-पम-मन्व उपम सदा०मपस्थिवा सुखपदारमा (बीसरे काल के) अन्सफे सरीखा (-उपम) सर्वदा पिपमान (भवस्थित मनुप्पा.वयन-मनुशत बहुरि मनुष्य पांचसो पनुप ऊपे वा खम्बे हैं अर्थात् पापसी पनुप उचाईम होवे रे नित्प माराम अति दिन (नित्य-पपपन्द्रकोश पृष्ठ २१३) भार वा भोजन करने वाले हैं। उत्तण एक-पूर्व-कोटी-स्थितिका उत्कृष्टपरि एक करोड़ पूर्वकी भायुके धारक हैं (२) संध्याप्त गरपितु सम्पते इति सम्मेप । सस्येप बालो गीवित पेपर्ण ने सोमवार संपापागापितुम् यति सस्पेप -पसमा योम्प (-सम्याफ्ठे) गिनामासका पेसा सस्पेपरे। संस्पेप मामीवित पासपेप-बानाः। -गिधेके योग्य है जीयन बाबा जिमका वे सस्येपाल (मायु) पाते हैं। (१) सुपमडपमाघमावासरयाप । मा 'दु पमपमादि इति पाठमेरस्तावपापुस्तके वर्तते । मुषम- पमा-गन-मन्त-बात सामाति-प्रया "सुबमाणमा (तीसरे) के अन्त समपके समान ऐसा भई वा माश्य है। भत्रा पम पम मादिपिम्मे। - पा दुबममुबम (कोपे) पास की मादिपा प्रारम्म (सारण) ऐसा पठन विरोध वास् पत्र-पुस्तकात वावृत (वास) के पत्तों पर लिखित पुस्तकमे (पुरातन पा प्राचीन समप में वर प्रगद के परत म पेसब तारपके पत्तोपर पा भोगपत्र स्यादि पर लिखाई होती थी) K०) पूर्वाह पालामणोतिनुत्त....मामत मापूर्व ७०५५..........तकोटी पूर्वपट्यसौwal.000000000000 पूर्व भागाव-बदामीतिर पत्तरा = पूर्वाग है (पह)बास मात्र प्रस्ती ऊपर( - Tranार है-अर्थात् पौरासीलाच पाई। -चौपसीनाथ संपादन (चौरासीमाव परसों) को गर्मित मत्पूर्व,usette.in.in -मापस में गुपिन (-पर्गित) हो (मवेद) सो पूर्व पात् चौरासी बाब चौरासी बायसे वापरनेसे बो गुषमफलदो उतने पोचपापोताईram.xv.. Gita.mmonमादा सानो परिप सारभरपरोस एक पूर्वोता। - Erom ६६ मा सिद्धि पिया १७ (. जघन्येनान्तर्मुहुर्तायुप ॥ तस्याश्च सम्बन्धे गाथा पठन्ति ॥ 'पुवस्स दु परिमाणं सदरिं खलु कोडिसदसहस्साइम् । छप्पएण च सहस्सा योदव्वा वासकोडीणम् ॥ १॥७०५६०००००००००० उक्तो भरतस्य विष्कम्भ । पुन प्रकारान्तरेण तत्प्रतिपत्त्यर्थमाह- हमपन्पन गमनमुहल-मायुपः। अपन्यकरि भन्तर्मुहत भापुपाले हैं। नमसमपठन्तिा बहरि विस (स्पिति) के संपोग गापा पते पा पग्न करते हैं। "पुनस्स"परिमाणपिस्पपिरिमाणा) =ौर (तु ) पूर्वका प्रमाण सददिबलुमारित्सव-सासाइम्॥ निमपसे ( सलु) सधर लाख करोड़ (सनुकसातति कोटि शत-सामाणिm) दणाप सहस्सा(प पर-पचाशत्-सामाणि) -पार (1) षप्पन सासू रोदनारा०स कोरीणम् ॥ (श पोदप्पा पास कोटपा (सोया) (१) करोड (३(वरस) सरित मानना पारिये (सातनीय परिसर्च साठसहस भर्ष) ७.५६.......... (एक परके ) सासनीच पापसर्व साठ सहस मर्ष हुये रसापरतसविसम्म । पुन मार मन्तरण भरतक्षेप की कसी हुई (दक्षिण रघर) पौदाई सो पनि भन्य प्रकारकरि तन्-मविपकिमर्थम्भाrr उस (पौदाई)क जतखानेकेशिये (अग्रिमसमम) काते हैं कि तत सारीपूर्ण भारि (भारी) असो - करोड (प्प है) सा पूर्व कोटी है (जिसके) -tem.mom........ भर्यात् सातसाल पन पर राव (१) मगम:-सतिलामोनिपालि परपशायमानकोरिपक्षि या मस्ति तक पूर्वमुप्पते भरप पम् । मततिलपटिकाegan -सा पर प्रमिप्राप कि सत्तरमाण परोए परस (भार) र पशमसारि पति पराक मास्ति T -पणन सासू बरोबरस बर दोते है तापमा परय: T -तर पर पूर्व कहा माता (सपा 100.00000.0 ऐसे रखते) (Risitinा दोनो गण करमापक है।कोरियप्पा गरदन मनि गरे साराकोरपा मोर कोठी रामभदासी' पर गमान कोटप मगमाविमल गुपपन iranti) परस-ऐसा ग्राम ताकिम से पाभार्या पर लिया गया, उससे 'प' कप की मचि इममै बdatt भकासमै पर्ष सम्म मही लापे । अनुपायमै वर्ष राम साना मति प्रापsts KEEEEEEEEEEEEEEE6666VgetECE - 41................

समा सिदि KKG एटानिपासी भगस्पसाप पडीच इव पदाधेद और पिमपरपर्य सहित समापसिदिका शब्दश हिन्दीमनुमाद । मध्पाय ३ सूत्र ३१ सख्येयकाला मनुष्या ॥ तत्र काल सुषमदुषमान्तोपम सदाऽवस्थित । मनुष्याश्च पञ्चधनु शतोत्सेधा । नित्याहारा । उत्कर्षेणैकपूर्वकोटीस्थितिका । (संस्पप-याला-मनुप्या प्रकाराम संस्पात काख भायुर पारक मनुष्य होव है । सहा (विदेश क्षेत्रों में) काल मुषपदापम-मन्त्र-उपमा सदा०मरस्थित =सुखमदुरूमा (तीसरे बाल के) भन्तके सरीखा (-उपम) सर्वदा रिपमान (अपस्थित)। पनुप्पा-चपन-मनु शव उत्सेषा बहुरि मनुष्य पांचसौ पनुप उसे पा सम्मे रे मर्थात् पचिसो पनुप उचाईम होत रें नित्प मारा- अवि दिन (नित्य-पपचन्द्रकोश पृष्ठ २१३) भार पा भोजन फरने पाले हैं। उत्तण एर-पूर्व बोटी-स्थितिका उत्तप्टपरि एक करोह पूर्वकी प्रायुके पारकरे (१) संस्थावते गपितु यायते इति सम्पप । सम्परालो बीवित येग ने सपनामा संस्पाफ्तेमपपितुम् पतेविसम्वेप ! -गवना के पोग्य है (-सम्पाफ्ते) गिनानासका पेसा संम्पेय है। संस्षेप मागवितायेपासस्पेय-बाबा - गिने पोम्पावन बाम गिनका पे सम्पेपसाब (भाय) पास है । (0) मुपमपमानातवासात्पर्य । मत्र "तुपमसुगमावि ' इति पाठमेवस्तापापुस्तके वर्तने । मुपम हुपमा मात्र मन्त-बाल सामति मा. " सुबमाबमा (तीसरे) काबरे भम्त समपके समान पसा भई पाभाश्प है। भानुपम मुपम-भाविभाति प ठ मेवा। -पहा दुधममुबम (बी) पान की प्रानि पा प्रारम्म (सरण) ऐसा पठन विशेष वालपत्र-पुस्तनापति -तारपू(-तास) के पत्तों पर लिखित पुस्तकमै (पुरातन का प्राचीन समय में जब कामदरे परत न ये तब वारपरके पत्तोपर या भोगपत्र स्थापि पर लिखाई होती थी) K0) पूर्वात सामोतियतुant... ाग मवेत्पूर्व उप........कोटी पूर्वकोट्यसौ५५00000000000 पूर्व-यावर्षमा मौरिग्तरा। -पूर्वाग है (Tarस माय भन्सी ऊपर( - उपचार भर्थात् चौरासीलाच वर्षा। -ौसीमा सस्था है। उन (चौपसोसाय बरसो)को पनि सामवेत्तsant.mm.in - मापस में गुपिन (-गित) से (मवेत) सो पूर्व अर्थात् पौरासी काम को बोरासी बापसे गृपा परनेसे मो गुरामफलको रतने पनी एपदोसtv.mxtreme witain.mm मा सातमी पांच वर्षबाट भरणपरतोच एक पूर्वदोताtal roma साप सिदि सूप (१) जघन्येनान्तर्मुहुर्तायुप ॥ तस्याश्च सम्बन्धे गाथा पठन्ति ॥ 'पुव्वस्स दु परिमाणं सदरिं खलु कोडिसदसहस्साइम् । छप्पण्ण च सहस्सा बोदव्वा वा सकोडीणम् ॥१॥७०५६०००००००००० उक्तो भरतस्य विष्कम्भ । पुन प्रकारान्तरेण तत्प्रतिपत्त्यर्थमाह- अपन्पना मन्तीहत-भायुषी जघन्यकरि अन्तर्मुहर्त भायुपाखे । पस्या समपगापिठन्तिा पहरि तिस (स्थिति के संयोगमें गाया पायवे पा पठन करते हैं। "पुम्मस्साएपरिमाण (पुषस्पपिरिमाण) -मौर (-) पूर्वका प्रमाण सदरिदासलुकारि-सद-साम्साइमा निमयसे (-लसु) सघर खाख करोड (सनुकसप्तति-कोटि शव-सामाणि") पप्पणपसासा(च पर-पधारा सामाणि) -ौर (=) छप्पन सहस पोटमा बास-कोडीणम् पोदम्पास कोटपा (मकोट्या) (१) करोर ((परस) सहित मानना पारिये (सातनीश पायवर्ष साउसासू भर्य) ७०५६०००००००००. (एक पुत्र के ) सावनीख पनिखर्व साठ सास भर्ष हुसे रकापरवस्यापिणम्मा पुनाकार भन्वरेण भरवतेत्र की कसी हुई (दक्षिण उत्तर) चौदाई है सो पुनि भन्प प्रकारफरि तत्-पविपषि-मर्पम्पमाला उस (चौड़ाई)के मतलानेकेलिये (मग्रिमप्र) करते कि तत् पोरापूर्ष टि (पाटी ) मसी। -ये करार (पूष है) सा पूर्व बोटी है (जिसक) -ontainion...... अर्थात् सातसाल पम्पन पपरसाते है (१) मस्यायमचा-समतिबारिवालि पठशाशासाप्रमोटिवालि पता भवम्ति तक पूर्वमुच्यते प्रस्थ अपम् । म सातिसमरि पालिका -सपा ममिप्राप है कि सत्तर लाख करो परस (और) पर पधाशाससघारि ववि पदा- भवन्ति -पम सहसू परोपपरस बहोते हैं मा. पुषमा T - एक पूर्व कहा जाता है (सपा 34400000.0000 ऐसे रखते है) (२) रिनारी। दोनों रामारोबोपोनि शमा गुपचन मेति रामडे सराकोटपा है भोरकोरी शमा दासी' समर समान टप प्रामाविमविषयम (३)परस-ऐसा नाम परताकिम से पा मार लिया गया है, उससे 'वर्ष' राम की अनुपति (समै वार मता इसमें वर्ष राम नहीं लाये । प्रमुपादमै चर्प गण साना पति भावपारे। PEE ForgetECE ६७ - प gesna सूत्र ॥ भरतस्य विष्कम्भो जम्बूद्वीपस्य नवतिशतभागः ॥३२॥ सार्थ जम्बूद्दीपविष्कम्भस्य योजनशतसहस्रस्य नवतिशतभागीकृतस्यैको भागो भरतस्य विष्कम्भ स पूर्वोक्त सिद्धि एव॥उक्तंजम्बूद्वीप परिवृत्य वेदिका स्थिता,तत परोलवणोद समुद्रो द्वियोजनशतसहसूवलयविष्कम्भ "सूत्रम-भरतस्य विष्कम्भो जम्बूदीपस्य नवतिशतभाग ॥ ३२ ॥ सूत्रार्थ -परतस्पपिवितम्मामम्मूदीपस्य। भारतपर्पकी(दक्षिण उत्तर)चौदाई मम्यदीपके (मिसकाम्यास एकलनपोमन है) नाविशत-माग =एकसौ नम्मे भागों से ( एक माग) हैमर्थात् (१२६योजन है) पृष्पनुपाव--सम्पद्वीप-मिष्कम्भस्यायोमन शतसासस्प मम्मूदीपके पिस्तारो लास योमन के नमविशव पागीतस्या एका पागः। भरतस्य ।। -एकसौ नवे भाग किय हुभोंमें से, एकभाग भरतमपली(दक्षिण चिर) विषम्म सः" पूर उक्त एक पक' मम्यूद्वीप -पौगई। सो परिसे पर्णितही है। पर्णित मम्मदीपको परिपुष्प पदिस्यिवा" घडर पेदी तिष्ठीभाव जम्बूद्वीपके चारो भोर वदिका उसकपीघेतरणोदपिर व पर विषणोद समट दिपोमनशतमास =सिस (पेदिका) से मागे सपणोदपि समुद्र दोखास योमन बलप-विषम्म असपाकार के भागार निस्तारण है अर्थात् अपणोदधि की परिधिपर एकपिंदु लेकर उसकी सीपमें महीपली परिपिपर दूसरा पिंदुलेकर दोनोपितुओंके मिलानेपानी रेखा दोलालपाभन लम्बी होगी। (हमारे पास साफा पाठ एक है। खेताम्मर भाम्नापरे 'समापनसाधिगममत्र में इसको सत्र नहीं माना है (रस मामायके पर को रिणको दबो)। ( २ ) सर्वपमन भूमरत है। (३) एक माममे मरतन यो मागो हिमाम् पर्वन बार मागों में रेमपतक्षेत्र माठ मामो में महात्मपाम् पर्वत सोम मागोमे रिपेट पोसभागों में निविप पर्यत और मठि भागो विरत विस्तार है। ऐसे गायोपडे एकमो सत्तारस (१५७) माग तो रित समापी औरतोस पर्वत पीस मागोमे मात्र सोबा मागोमे रुक्मी पर्वत पाठ मापोमे पात् पेत्र चार भागोमे शिण पर्वतरो मामों में तथा पेरात्र भागमे विमलऐसे तर समापो मह माग दोनों मिलानेसे (११७+1)-१• माम दीपक सूत्र के होते हुये कि मरतका सी भावना नहीं क्योकि एक मापारय पाठ :- - निधनसता जि११. वो माग भरत।भपवारस सूत्रको २४ासून परते तो लपमान चौबीस मूममो रससे पात्र माना ता"-"- भरती तर रविपकी भी मिल जाती। - २८ सा सिदि सूत्रा तत परो धातकोखण्डो द्वीपश्चतुर्योजनशतसहसूवलयविष्कम्भ ॥ तत्र वर्वादीना संख्याविधिप्रतिपत्त्यर्थमाह- ॥ द्विर्धातकीखण्डे ॥ ३३॥ भरतादीना द्रव्याणामिहाम्यावृत्तिविवक्षिता । तत्र कथं सुच् ।अध्याह्रियमाणक्रियाभ्यावृत्तियोतनार्थः वापर पातडीसा दीपापहर -उस (जवण समद्र) से भागे पातकीसंदीप पार योगम-शससास-पजप- बिजम्मा शाख पोमन पळयाचार पा करमाकार विस्तारपाला है। तहां वर्षादीनाम् संसपा-पिपिपतिपत्ति-मर्थम् IIIT -क्षेत्रादियों की गणनाक प (पिपि) के शान के लिय (मग्रिमसूत्रमें)करते हैं कि (१"सूत्रम्-द्विर्घातकीखण्डे ॥ ३३ ॥ =धातकीखण्डे द्वीपे भरतादयो हि संख्यायन्ते ॥३३॥ समार्यः पावकीलयारोडीप भरत भादय: पावकीलड द्वीपमें मारतवर्ष, नापस, परत, द्रा फमख भादि (मम्मूदीपसे) दिवसस्यापन्त ने दूने गिनेमाते हैं। अस्पनुपाद-भरक-मादीनाम्पाणामामभ्याचि मारवषप(कुलाचन,बा,कमल)मादिद्रव्यवाची शब्दोचा यहाका दुवारापन पिवत्रिवा" पातकीसदीपादिका)विषसासे कियागयामर्याद सूत्रअन्योंमें पा सत्रशास्रोंमें सप्रकार दुवाग कमी किसी पस्तुका म्यन नहीं करते, मब एकबार मरत,कुलाचल, माविका फ्यन भाषाय करचुके तव दुधारा कथन नहीं करना चाहियेपा, उस उत्तर गरें कि पावकीलएर भौर पुष्कार्ष मादिका कयनभपरपही करनाया उनका कपन मरवादि के विपरण किये रिना दोनहीं सकता है मगर ऐसा न करते वो पातकी खएर और पुष्कराई मादिका कपनरामावा, तस्वार्यसूत्र अधुरा होमाता सो ठीक नहींपा इसमपनाको खियहुये दुपारामरतादिकका क्यन करना पड़ा। वप्रायम्सुम्? वहारसूत्र दि शब्दको कैसे सुच्पत्यप(मो सान्दर होकरसुच्-सु-स्लोवा मध्यादिपपाण-किपा भम्पावृत्ति योवन-मर्य (इससमे) क्रियाके इम्पना द्वारा पिपरणकी स्पस्या मनापने के लिये (१) इस सत्रमा रामो माम्नायों में पाठ और भई एकसा।। (२)पहा पर मरतमारिद्रय है। म्यानरममै प्रकृति प्रत्यय लिंग संपा विशिष्ट सम्पदा बावा भरतादि शम जिंग सम्या विशिष्ट होनेसे दम्यवाचक शम (म्पारसमे)वर पदार्थ कि जिसका निज और सपा से मम्पय राप्रपा पनमन्त्रोण पृष्ठ पर ट्रम्प शमा प्रपदापरजीव,प्रशीव पर अधर्म भाकाश का प्रमोमेसे काईमी गति नहीं है। CKGREEHEEEER ॥ भरतस्य विष्कम्भो जम्बूद्वीपस्य नवतिशतभागः ॥३२॥ सार्थ जम्बूद्वीपविष्कम्भस्य योजनशतसहस्रस्य नवतिशतभागीकृतस्यैको भागो भरतस्य विष्कम्भ स पूर्वोक्त एव।उक्तंजम्बूद्वीप परिवृत्य वेदिका स्थिता,तत परोलवणोद समुद्रो द्वियोजनशतसहसूवलयविष्कम्भ। "सूत्रम-भरतस्य विष्कम्भो जम्बूदीपस्य नवतिशतभाग ॥ ३२ ॥ ६८ समार्प:-भरवस्य विषम्म 'नम्बूहीपस्वी भारतपर्पकी (दसिण उत्तर) पीलाई सम्बदीप (मिसकाप्यास एकलनपोषन है) सतिश माग एकसौ नम्बै पागों से ( एक भाग) भर्थात् (२६ पोमन है) सपनुगाव-जम्मूदीप-रिफम्भस्य पोमन शतसासस्थ प्रदीपके विस्तारके शास्त्र पोभनके नरतिरामागील मामा भरतस्प। -एकसी नम्मे माग किये मोमें से, एमाग भरससंगकी (दसिण-उधर) विष्णम्मा साप-उत्तएर रकमहीप मौगई। सो पहिले पम्विही है । मणिव मम्मदीपको परिवारबरिकास्थिता" बेड़कर पेदी तिष्ठी मर्याद मदीपके पारो भोर पदिकार उसकेपीदेखरणोदपि सतपर रखोद सादिपोमनरावसास तिस (पेदिका) से भागे सरसोदपि समुद्र दोसास योजन पक्षप-रिसम्म बलाकार र पार पिस्ताररूपरे पर्याद अपणोदपि की परिपिपर एकिंतु सेर रमकी सीपमें महीपत्री परिपिपर दूसरा विलेकर दोनोमिंदोरे मिलानेगली रेखा दोलालपोगन सम्बी रोगी। (Oमारे परसमस पारा श्रोताम्बर माम्नापरे 'समापनलार्याधिगममा मै इस सत्र मी मामा (स अप्पापले परिपती रेगे)।( २ ) सचम्म भूम्पन। (३) मागमें मानव दो मागोमें दिमाम् पर चार मापो रेमपतषेत्र पाठ माने में महरिमवार पांच सगरमागोमे वारिसमायोमें निषि पर्वत और रोमति मागोमें विर का विस्तार है। ऐसे माहोपरे एकमी मताम {१२५) माम तो नियम और मीन पर्वत पीस मामोमे गम्परतेन सोबर भागों में कमी पर्वत पाठ माणेमे हिमवत् पार मामों में, शिबरी पनरो मागोमे तण ऐरावत एक भाग निमक। ऐसे कर सम्मन्पोरेम भाग रोनो मिसाने (१३+१. माप संदीप १।२४ सूत्र होते हो कि भरतक्षेत्र पसी भावना नहीं क्योकिरण -निसाnिt माग मरत: प्रवास सूमोसन मनाते तो विधमान लीसा भूपयोपसमे पानावा और "" -- भरनीmnew भाती। सापापासप११ पापा सिद्धि वर्पधरपर्वता । एवं द्वौ भरतौ द्वौ हिमवन्तौ इत्यवमादिसख्यानं द्विगुणं वेदितव्यम् ॥ जम्बूद्वीप हिमवदादीना वर्षधराणा यो विष्कम्भस्तद्विगुणो धातकीखएडे हिमवदादीना वर्पधराणाम् ॥ वर्ष- धराश्चकारवदवस्थिता ॥ अरविवरसस्थानानि क्षेत्राणि ॥ जम्बुद्वीपे यत्र जम्बूवृत्त स्थित । तत्र धातकीखण्डे धातकीवृक्ष सपरिवार । तद्योगादातकीखण्ड इति द्वीपस्य नाम प्रतीतम् ॥ तत्प- रिक्षेती कालोद समुद्र टवच्छिन्नतीर्थ श्रष्टयोजनशतसहसू- मपप पर्ववान परम्झौ' भरवो दो अलापल है इस प्रकार दो भारतवर्ष दो हिमपन्ती इत्पेरम्मादि-संख्यानम् ॥ दिगुणम्" हिमपानपर्वत इत्येवं भादिक गणना (जम्मदीपसे घातुकीस स्में) दूनी पदिकम्पम्। मम्मदीप-हिमपत्-भादीनाम् । माननी चाहिये । जम्मदीपके हिमवान् भादिक पर्पपराणाम् ।' परिष्कम्म वहिद-गुण ८पर्यवोंका जो निस्तार है विससे दुगुणा पावकील दिमरत्-मादीना पर्पपराणाम् -यातफीसदमें, हिमवान् भादिक कुचामलोंका है पर्पपराघ" भरपदमपस्थिता" भर कुलापन पहियेफी भारफ भार पा रा ( मरा)के सदश तिप्ठे हुए है। मरोंके विवर-संस्थानानि आणि छिद्रोंके भाकार (संस्थान) (यत्) (भरतादिफ) सपरें । भर्थात् पहियेको पृथ्वीपर इसमकार परिये कि उसका समस्त घरा पृथ्वीको छूनाय पो उस परियेकी नामि (पुरी)मौर घेरेके धीचमैगम्प लकड़िये । वैसे पर्वत तिष्ठ र भौर पूर्वोक्त लकड़ियोंके मध्यका शय (खाली) स्थान रहता है वैसे क्षेत्र विप्ठे हैं जगदीप' या मनस्थित स सम्बदीपमें जहां जम्मवृक्ष अवस्थित है ना पातफीस घातकीसम सपरिवार तद घातकी वरमें घातकीच घाटे छोटे परिवार (के वृक्षों) सहित स्थित) है विसफे योगादा पातकीखातिदीपस्पद नाम" सयोगसे या उपलवणसे घातकीर ऐसी दीपकी संमा प्रतीतमा वद-परिसपी कालोद। असिद घामात है । विस (पावकीखंड दीप) को समस्त भोरसे घरे हुए कालोदः समुद्रमा सिन-तीप' भष्टयोमन-शतसासू समुद्र टाकीम छदे का वा उम्ले हुए जलफेस्पान समान(चीयोमाठलास योजन (१) पदिय नाम अपारीवादीबके गोलेकोमसे आज पहियक पर मोमे लगाई माती है उममेस प्रत्येक भारण, भादभरा अपवा बर है। हीरकपणे 23929 ७१ साप सुच् ॥ यथा द्विस्तावानयं प्रासादो मीयत इति ॥ एवं द्विर्धातकीखएडे भरतादयो मीयन्ते इति ॥ तद्यथा--द्वाभ्यामिष्वाकारपर्वताभ्या दक्षिणोत्तरायताभ्या लवणोदकालोदवेदिकास्पृष्टकोटिभ्या विभक्तो सिदि धातकीखण्ड पूर्वापर इति ॥ तत्र पूर्वस्य चापरस्य मध्ये हौ मन्दरौ । तयोरुभयतो भरतादीनि नेत्राणि हिमवदादयश्च (विशन्न पर) सुपो भर्यात् स् (काका पिन मो समय '' में पलट माता रे लगापा) भावार्य इस ममा दि' शम्न पर स् (-२) कर्ता कारकका प्रत्यय (मापना) क्रिया के (मायापार या सभके अन्त(पापना) क्रिया की विषमानवाको कम्पनाक लिये लायो । पपालदिवापान भयोमासामीपतेति से दोगुणादि )पाप (सामान् ) या रामभवन नापामाय रे पा परिमाण कियामापरे परमहिनावरीलपोमरव-मादयः।। इस प्रकार (मम्मदीपसे) द्विगुन (-दि) पावकीसंद दीपमें भरवक्षेत्रादिक पीपन्वाइति आपे माते हैं अपना गणना किये माते हैं भामार्थ-इस सत्र के विशद पर स(स)कर्ता का प्रत्यप छानेसे मौर सपके भव मापना क्रिपाका अध्यार करफ पा फलनिकासा कि ममदीपमेनो भरत क्षेत्र, सायन,दा पुफरादिकां उनकी अपेक्षा वातकीखद दुगुणे पादाम्पाम्पाकारर्वताभ्याम् । से दो इवाकार पर्पतीकरि (मो पारसौ पोमन अंचे और सौ पोनन पृथिवीमें प्रविष्टौ। खरसाद-प्रसोर-दिशा-स्पृष्टकोटिम्पाम् । पण समुद्र और कालोदपिकी वेदियों को छूनेवाले दोनों भटनिपो वा सिरों वक दक्षिण-पतर मायवाम्पाम्, 'पिपत-पातीसंदक्षिण उपर दिशामें (पार सास पोजन) लम्मे । पातकी संर पूर-मपर पवितस्पूनस्पषिमपरस्पपिप्पो' पूर्व पश्चिम (दो भागों में) बटा हुमा है वहा पूर्व और परिपपफ (भागों के बीच में दोमन्दारीतयोगमपच परत यो मेरु पर्पत है। दिन (दोनों मेर पर्वतों) के दोनों मोर मरत- भावी निगHिoदिपषट् मादपः । -मादिक परंभौर (4) लिममाम् मादिक 'भप्पारामाप ओपटना स समझ में नही भासा उसे किसी दूसरे रामकी रामापी पप करना। अनुवृति और मागार में परमारिनुपति मै गो गया पापसी पवित्र बाप में भागा । रमे रत्तर वापरा में होना भनुपरमार मारपस्ताtो उस पासपनीमापारिक मात्रा भार ममिमाप को सामना । पण् मापार में मोगराफ्प पहिले सूत्र में ता भाण नहरी पातु किसी भी मामी सिद्धि सूत्र ३३ . वर्पधरपर्वता । एवं द्वौ भरतौ द्वौ हिमवन्तौ इत्यवमादिसंख्यान द्विगुण वेदितव्यम् ॥ जम्बूद्वीप हिमपदादीना वर्षधराणा यो विष्कम्भस्तदिद्वगणो धातकीखएडे हिमवदादीना वर्षधराणाम् ॥ वर्ष- धराश्चकारवदवस्थिता ॥ अरविवरसस्थानानि क्षेत्राणि ॥ जम्बूद्वीपे यत्र जम्बूवृक्ष स्थित । तत्र धातकीखएडे धातकोवृक्ष सपरिवार । तद्योगादातकीखण्ड इति द्वीपस्य नाम प्रतीतम् ॥ तत्प- रिनेगी कालोद समुद्र टङ्कच्छिन्नतीर्थ अष्टयोजनशतसहसू- पपय पर्वता । एतमन्दो मरती दौरा कुचामल है इस प्रकार दो भारतवर्ष दो हिमवन्ती इस्पेरम्छमादि-संख्यानम् ॥ द्विगुणम्। हिमवान्पर्वत इत्येवं भादिफ गणना (जम्दीपसे धानुकीलस्म) दुनी बदितम्पम्। जम्हीप दिमषद भादीनाम् । माननी चाहिये । जम्मदीपके हिमवान् भादिक पर्पपराणाम् य पिप्फम्मा सहिद गुण पर्वतोंका जो विस्तार रे तिसस दुगुणा पातफीसर हिमपद मादीनां वर्पपराणाम् । -घातकीस्वरमें, हिमवान् भादिक ज्वाचनोंका है पर्पपराधक "भरलमपस्थिता भर लाचन पहियकी भारफ भार वा भरा (मरा)के सरश तिष्ठे हुए है। भरों के रिवर-संस्थानानि या क्षेत्राणि वियोंके भाकार ( संस्थान) (पत्) (मरतादिक) सत्र में । भर्थात् परियको पृथ्वीपर इसप्रकार परिये कि उसका समस्त घेरा पृथ्वीको छूजाय वो उस परियेकी नामि (पुरी)भौर घेरेके पीचर्मराम्प लकड़िये हे तैसे पर्यत तिष्ठ है और पूर्वोक्त लकड़ियोंके मध्यका शून्य (खाली) स्थान रहता है से क्षेत्र तिष्ठे है जम्बूद्वीपर' पत्रसमसयास्थित तमा अम्बदीपमें माँ जम्मवृत्त भवस्थित है वहां धावफीस पावफीवृतः। सपरिवारमा तद यावफीलरमें घातकीवृक्ष छाट छोटे परिवार (के वृत्तों) सरिस स्थित) है विसके योगादा घातकीपर विश्दीपस्या नाम। सयोगसे वा उपलक्षणसे पातकीखर ऐसी दीपकी संज्ञा मतीनमा तद्-परिपी कालोद असिद वा बात है। तिस (घातकीलर दीप) को समस्त भोरसे घेरे हुए फालोद समुद्र टास्थिम-वीप' भष्टपोमन शवसहस समुद्र टाफीम छदे काषा केले हुए जलकेस्थान समान(वीर्य)भाठलास योजन कहते हैं। (१) पदियका माम प्रयामापीर गोगामस जातरिया पश्यिक धेरक पलोमे सगाई जाती है रममेस प्रत्येकी रुपको मारक भार पराभव . ७१ सर्रा मप्याय सा ७० सुच् ॥ यथा द्विस्तावानयं प्रासादो मीयत इति ॥ एवं द्विर्धातकीखएडे भरतादयो मीयन्ते इति ॥ तद्यथा-द्वाभ्यामिष्वाकारपर्वताभ्यां दक्षिणोत्तरायताभ्या लवणोदकालोदवेदिकास्पृष्टकोटिभ्या विभक्तो सिदि धातकीखण्ड पूर्वापर इति ॥ तत्र पूर्वस्य चापरस्य मध्ये द्वौ मन्दरौ । तयोरुभयतो भरतादीनि क्षेत्राणि हिमवदादयश्च (द्विशम्द पा) सी भर्यात् स् (कर्ताका पिन भो सप्रमें 'र' में पलट पाता है लगापा) मापार्प इस सपक 'द' शम पर स् (२) कर्ता कारकका मस्यप (पापना) क्रिया के भयाहार या सभके भन्तमे (पापना) क्रिया की विधमानताकी कल्पना के लिये हायर पपादितारानी भयामासाद समीपतानि =असे दोगुणा(वि)पाप (वापान ) पा राममपन नापामाप मा परिमाण किपालाप है एवम्०दिक गावकीलपणे परत-भादय, इस महार (मनदीपसे) दिगुने (-दि) पासकोसंर दीपमें भरतनेमादिक पीपातिक जापे मारे रे भवमा गणना किपे माते है मावार्य-इस सूत्र के दिशन्द पर स(-)का का मत्पप सानेसे भौर सप्र मवमें मापना झिपाका मायार करक या निकाला कि महीपमो परवनेत्र, इलायत, पुष्करादिकर उनकी अपेक्षा पातकीखा दुगुणे। वयामाभ्याम्पाकारपर्वताभ्याम् । से दो इलाकार पर्षोंकरि (मो पारसौ योमन अंघे भौर सौ योप्रन पृपिवीमें परिष्ट है। सपणोदनालोत-नीदिशा स्पष्ट कोटिम्याम् । -शमण समुद्रमौर कासोदरिकी वेदियों को छूनेवाले दोनों भटनियों पा सिरों तक दसिख उचर भापवाम्पाम् विमत पावकीसंग दक्षिण-पर दिशामें (पार जाल योमन) उम्मे। पावकी संर पूष मपर पतितरमपूवास्तवि०मपरस्पपिम्प पूर्व पश्चिम (दो भागी ) पटा हुमा रेलका पूर्व और परिपक (मागों क) सीप में दोपदरी वयोपपत परक यो मेरु पर्वत है। दिन (दोनों मेरु पर्वों) के दोनों मोर परव मादीनि सत्राणिमित्-प्रादया -पादित सारे और (54) दिमवाम् भादिक 'भारपाय बो स्पपता से पाम नहीं भासा उसे किसी दूसरे एमडो कापी पपरोला । अनुक्ति मोर मयार में परमेर मिनुषधि में गोपा वाम किसी नाहिसे सूत्रावास में भाया म कसर बाबा में काम ना अनुकर्षण मा मोर भावमा tो उस पापी पप समेटेर विपी राम का रचनालो पोतtawi वारिसानी मामा । भाव भिमापो सममाना पण भार में गोल्पामा परिने सूत्र में तो भाणी Met भी की ७० " साया ७३ हिमवन्तौ इत्यादि। कुत ११ व्याख्यानत ॥ यथा धातकीखण्डे हिमवदादीनां विष्कम्भस्तथा पुष्कराधे हिमपदादीनां विष्कम्भो द्विगुण इति व्याख्यायते ॥ नामानि तान्येव, इप्याकारी मन्दरौ च पूर्ववत् । यत्र जम्बूद्वीपे जम्बूवृतस्तत्र पुकर सपरिवारम् ।तत एव तस्य दीपस्यानुरूद पुष्करद्वीप इति नाम ॥ यथ कय पुष्कराईसज्ञा मानुपोत्तरशैलेन विभक्तार्थत्वात्पुष्करार्धसज्ञा॥अत्राह किमर्थ जम्बूद्वीप-सूत्र ३४ हिमवदादिसख्या द्विरावृत्ता पुष्कराः कथ्यते ? न पुन कृत्स्न एव पुष्करद्वीपे ? इत्यत्रोच्यते- हिमपन्तास्यादिम्पिारम्यानता नीपान म्लामा प्रत्पादिक पोकर हैं (इससूषके) व्याख्यानसे ( मदीपस पुष्कराः वि दोवोमरस दोदोहिमवान कलापल स्पोदिक )२ पपाम्पावरीलपाहिमवत् मादीनाम् विपम्प मैसे पावकीर में हिमवान् मादिफ (नामलों का विस्तार है तपाकप"हिमस्त मादीनामी से पुष्करापपि हिमवान् भाविक (लायस) निफा विष्कम्मा दिगुणागतिक पारम्पायवे र नामानि विस्तार) दुगुना है इसप्रकार विवरण फियागया है। नाम वानिएवरूपाकारो मन्दिरी प. सही है दो हत्याकारपर्वत और दो (पूर्वये मन्दिर नामा भौर परिममे विद्युन्माली मेल पूर्ववत् पाक महीपमम्मपृत विष -परिच (पातकीपरदीय) के समान है। यहां नम्हीप जस्तृत । महा(पुष्करद्वीपमें) पुष्करम् सपरिवारम्।।तएर० तस्या -पुपरवृत (पारोभोर भपने छोर२) परिवार के मुखौ) सरित है। भास ही तिस दौपस्पभिनुभम "पुष्करदीपतिय नाम दीपकी सायफसंशा (अनुकर)पुष्करद्वीप ऐसानाम मा संश अयसम्पुकर मर्द संगमानुपोचर -भागे (अप)किसमकार (इसदीपका) पुफराद नाम रे (उपर) मानुपोचर- शैजनाविभक मर्दवाद "पुष्कराई पर्वतकारि विमाग मापे माधे होनेसे पुष्कराः समा नाम भर्यात् मानुपीपरपवन ने इसदीपके पम्प पतनपरि अथवा अवस्थित होकर दोभाग करदिये। इससे पुष्कराद ऐसा नाम अप्रथभारा किम्-अप'जम्मूदीपनीमचन् (मन) या पद्धता है कि किसलिये अगदीपके रिमवान्, मादिसम्पादिमावृषापुफराकप्पसेट-मानिककी गणना हुगुणीवार (दि माता) पुष्परादहीपविवर्णित है नपुन पास्ने एरव्युफरदीपे" बहुरि समस्त ( कृत्स्नी पुष्करीप (भरतादिफक्षेत्र) क्यों नहीं फोगये हैं। आपमें इविक्रमप्राप्यते पयों करेगय रे । (सत्स्ने भौर दीपे पुलिंग नपुसकलिंग दोनों लिंगोंमें आये हैं) ऐसा ( प्रश्न होने पर ) यहां (सभवसर पर) (पचर सूत्रम) कानावा है कि ७३ सा सिदि प्याय सा३३ ३५ भारत वलयविष्कम्भ ॥ कालोदपरिक्षेपी पुष्करद्वीप षोडशयोजनशतसहसूवलयविष्कम्म ॥ तत्र द्वीपाम्भोनिधिविष्कम्भद्विगुणपरिक्तृप्तिवद्धातकीखएडवर्षादिद्विगुणवृद्धिप्रसङ्गे विशेषावधारणार्थमाह ॥ पुष्कराड़े च ॥ ३४॥ (किं)हिरित्यनुवर्तते।किमपेक्षा हिरावृत्ति जम्बूद्वीपेभरतहिमवदाद्यपेनयैवाजम्बूद्वीपात्पुष्कराधेद्वौभरतौही बलप-विष्फम्मकालादपरिोपी पुष्करदीप गलयाकार (अर्थात् पोकेमाकार) विस्ताररूप है। कालोदधि को बेहए पुष्करदीप पोशपोनन-शवसास-बलय रिप्णम्मा सोलालासोमन वलयाकारभया फड़के भाफार चौराईका धारक है। वदीप-भम्भोनिधि रिष्कम्भ-दिगुण परिक्सप्तिवत् =सा(पुष्करदीपसेपूर्व दीप भौर सदों की दिगुणी दिगुणी रचनाके सदश (परिक्लृप्तिवद) বন্ধীবনস্মাক্তি মৃত भातकी सरके क्षेत्र (तया पर्वतों) मादिक से दुगुन (दुगुन भागेके क्षेत्र तया पर्वतोंकी) इदि-प्रसंग विशेप-मरपारण-अर्यम् ।। व तीके अवसर(मानाने) पर पृथक् भया सिम विशप) नियमके लिये 'भाचार्य, भग्रिम सूप्रमे) काते हैं। भावार्थ-जम्मूदीपस भगलेके समुद्र तथा दीपोंका विष्कम्भ दुना है और मम्म्दीपसे पावकी सटकी रचना नी है वो इस प्रसंगफे निपेपके लिये मर्याद एमानसमझ लियामा किपा की सरसे पुष्करदीपकी रचना इनारे । उपर सूम करते हैं कि पुष्करादें प" ॥ सत्रम्-'पुष्कराई च ॥ ३४॥ (= मरखादय दिः संस्थापन्ते ) पुष्कराः प सूपार्ष-पम्मरत भादपादि और -घ) मारतवर्ष (ताप-प्रा-कमल ) भादिक (जम्बूदीपसे) ने दूने पुष्पर मदासस्पास्ता पुष्करदीपके भारेमागमैं गिनाये गये हैं वृत्पनुषाद (किम्॥दिशतिश्मनुवर्तते सभ (क्या दि(शम्प) ऐसा (पहिले सुमसे इससूत्र भनुवर्तताई पाखाया गया है। किमयादि भावृत्तियाजादी भरत किस विवधा दिगुणना (भापति ) (उत्तर) जमाद्रीपमें मरतक्षेत्र वषा दिन-भादि-अपचयाए महिमाम्पत भाविककी अपेक्षामे बी(पुष्कराई में दन सपा ने कुवाबसारे अट्रीपादः पुष्कराह भरतारदा परन)मधीपसे पुफरार्दपि दो मरवा दो (१) स्वतार मानाप समाप्यतामाधिमममममें 'पप्पर ऐसा पाठबमार पडामा तताराम पासोमातिबममी परीपाठ " पुरा. सलो भोगी मानाala maratी म मोदरानो सम्मानौम एम मोरा समोरोt. , ७२ SEKKRE मापाया ३ हिमवन्ती इत्यादि। कुत । व्याख्यानत ॥ यथा धातकीखण्डे हिमवदादीना विष्कम्भस्तथा पुष्कराध हिमपदादीना विष्कम्भो द्विगुण इति व्याख्यायते ॥ नामानि तान्येव, इप्वाकारौ मन्दरौ च पूर्ववत। यत्र जम्बूद्वीपे जम्बूवृनस्तत्र पु कर सपरिवारम् ।तत एव तस्य द्वीपस्यानुरूद पुष्करद्वीप इति नाम ॥ अथ करें पुष्कराईसज्ञा मानुपोत्तरशैलेन विभक्तार्धत्वात्पुष्करार्धसज्ञा॥अवाह किमर्थजम्बूद्वीप- हिमवदादिसख्या द्विरावृत्ता पुष्करार्धे कथ्यते न पुन कृत्स्न एव पुष्करद्वीपे १ इत्यत्रोच्यते- रिमनन्तीमत्पावित भयासमानता भीमान लापन इत्यादिक पोफर रे (इससूमके) व्याख्यानसे ( नदीपसे पुष्करा मि दादापरत दोदोहिमवान पलायन इत्यादिक) ययापासकामरगदिममत् प्रादीनाम् विष्णम्म से पावकीस र हिमपात भादिफ (असायलों का विस्तार है समानुष्करा दिमवत्-मादीना। -वैसे पुष्करावि हिममान भाविक (अनायस) निका विसम्मादिमुणपतिक पारम्पायनापानि: (विस्तार) दुगुना है इसप्रकार विवरण किपागया है। नाम तानिएपायाकारी पन्दिरी प० ही दा इलाकारपर्वत और दो (पूर्वमें मन्दिर नामा भौर पपिममें विपन्माखी)मर पूर्ववत् पत्र जम्बूद्वीपमम्मुख कर पहिले (धातफीस रदीप) के समान है। यहाँ मम्मदीपमें जामृत है । पहा(पुष्करद्वीपमें) पुष्करम् सपरिवारम् माता एव० तपा -पुकरम (पागेओर भपने २) परिमारक पृषो) सहित है। वासेि ही विस हौपस्यभनुपम "पुष्करदीप इति नाम{दीपकी सार्थकसबा (भनुम पुष्करदीप ऐसानाय वा संहारे भषयमपुष्कर भर्द-संशई॥१मानुपापर आगे (प्रथास्सिप्रकार (इसदीपका) पुष्करा नाम है (उधर) मानुपोत्तर- गोन विभक्त मर्दवाद पुष्कराट पवकरि विभाग मापे मापे होनसे पुष्कराई सवाई नाम है भर्याद मानुपाचरपवन ने इसदीपके मध्पमें पतनकरि भयया भवस्थित होकर दोमाग करदिय । इससे पुष्कराद ऐसा नाम है मनश्या किम् अयम् गजम्मूदीप-रिमवद प्रश्न) यहां पुष्टता है कि किसखिय जगदीपके दिमान, भादिसंस्पानिमायूचा "पुष्करादीपाकप्यते-भादिकफी गणना दुगुणीवार (हिमावृषा) पुष्करादीपविषणित है नकपुन.स्ने एम०पुकरही?" पारि समस्त (कृत्स्नेगी पुष्करीप (मरतादिफक्षेत्र) क्यों नहीं फागये है। भाषेचे इतिकमायके क्यों कोगये है ? (कृत्स्ने भौर दीपे पुलिंग नपुसकलिंग दोनों लिंगोंमें भावे ) -ऐसा ( मन्न होने पर ) पहा (इसमवसर पर) (उचर सूत्र) कामाता कि ७३ 2 सब सिदि FREER एयनिवासी मगरमसहाय वीमकत पदरच्छेद भौर विभपत्पर्यसहित सर्वार्थसिदिफा शम्दशः हिन्दीअनुसाद मध्याप ३ सम ३५ ॥ प्राङ्मानुपोत्तरान्मनुष्याः ॥३५॥ पुष्करद्वीपबमध्यदेशभागी वलयवृत्तोमानुपोत्तरो नामशैल ।तस्मात्प्रागेवमनुप्यान वहिरिति। ततोन यहि पूर्वोक्तनेत्रविभागोऽस्ति। नास्मादुत्तरं कदाचिदपि विद्याधरा ऋदिप्राप्ता अपि मनुष्या गच्छन्ति अन्यत्रोपपादसमुद्घाताभ्यां।ततोऽस्यान्वर्थसझाएवजम्बूद्वीपादिप्वर्धतृतीयेपुढयोश्चसमुद्रयोर्मनुष्यान "सूत्रम्-प्राङमानुपोत्तरान्मनुष्या । (अन्यपाठ) प्राग्मानुपोत्तरान्मनुप्या ॥३५॥ सूत्रार्थ -माग-पानुपाचगनी मनप्पा -पानु पोचर पर्वतस परित परिले दश पास्थानमें मनुष्योमर्यात् जम्बूदीप,पातकीखद भौर पुग्दीप के उरक माघमागमें ऐम भदाई द्वीप मनुष्य हैं पुरयनपोद-पुकदीप-सह-मध्य-देश भागी -पुप्फरदीपक बहुतपीच (-धीपापीपी) का स्थान(देश) माग बनय-पृतनमानुपोत्तरनामशेल असयाकार वृत्तरुप मानुपोचर नामक पर्वत है तस्मान्मा०प०अनुप्या ' नदिसाविक =विस (मानुपाधर पवन) स परिलही मनुप्प पाहिर नहीं गत नबरिस्म्यूकि मप्र-विभाग मस्ति =तिस(मानुपात्तर पवत) स पारिर (पहिस्) पथमपणित सो फा विभाग नहीं है। न०मस्मान् उपग्म्दानित्वमपिकविपापरा। न इस (पानुपोचर) स भागे कभी भी विपापर (और) ऋदिमाता मपि मनुष्या गन्तिामन्पप्र -मृदिपारी मी मनुप्य, उपपाद और समपातोंसे भतिरिक्त, गमन करते हैं उपपाद-समुद्रयावाभ्याम् (मापार्य-मनदेशको न छोड़कर उपपादसे और समुदघाससमात्मा के प्रदेश भाई दीपसे पारिर भात है पिना उपपाद और समृदयातफे प्रत्माफ प्रदश पादिर नहीं जाते है) तत मस्मन्नर्थ-समाएवम् नदीपादिपुर तिससे इस (मानुपोत्तर पान)का सार्थक नाम है। इसप्रकार सम्पदीप मादिक मदतृतीयपुर दोष समुद्रयो।। मनुष्या। भदाई (दीपों)भारदो (नपणाद भौर कालोद) समुद्रोम ममुप्य (१)ोगो माम्मामोमेरसमसपाहीर व रसायममुरमा सात प्रकाराम मिशेवर भिसा भावाप राम राम FEBEEEEEKKEREN .. ७४ ५)पनि नानुमचारीत १४) aatarnो भारी अमो... समानित भीमगर भषचाय पिनामित सिदि मप्पाय ७५ वेदितव्या ॥ ते द्विविधा ॥ ॥ आर्या म्लेच्छाश्च ॥३६॥ साध गुणैर्गुणवनिर्वा अर्यन्त इत्यार्या । ते द्विविधा । ऋद्धिप्राप्तार्या अनृद्धिप्राप्ताश्चेिति ॥ श्रनृन्दि- प्राप्तार्या पञ्चविधा । क्षेत्रार्या जात्यार्या कार्याश्चरित्रार्या दर्शनार्याश्चेति ॥ ऋद्धिप्राप्तार्या सप्तविधा । बुद्धिविक्रियातपोवलोपधरसाक्षीणभेदात् ॥ म्लेच्छा द्विविधा । अन्तीपजा कर्मभूमि- जाश्चेति ॥ तत्रान्तीपा लवणोदधेरेभ्यन्तरेऽष्टासु दिच्चष्टौ । तदन्तरेषु चाष्टी, हिमवच्छिखरिणो- बेदितप्पा दिषित मानना पारिये (पनुप्प) दो प्रकार है। सूत्रम्-'श्रार्याम्लेच्छाश्च ॥३६॥ (मनुष्या) थार्या म्लेच्छाश्च भवन्ति ॥३६॥ समामा-मनुमायामानेणापन्निT मनुप्प मार्य भौर (म्प) म्लप्मोते हैं पवर्ष:-गुणे मुणन्ति बामपन्नातिकमार्ण गोपरि अथवा गुणपान पुरुषोकार समाय रे पैसे प्रापार कादिविषा यदिमाम- भाषामन्-शदिशाप्त =ो (शापा) दो प्रकार हैं। प्रदि मात भार्या और मनचदिपात भाभाविकमनदिमाता पिपरिया। प्रार्या । भनृद्धिमास भाप पाप प्रकार है। वन-मा पानि माम मा मारिषमात्र भार्य, गावि मार्य, कर्म भार्य, पारिप भार्य, मि मावि अदि माम मा -मौर (-1) दर्शन मार्प ऐसअदि प्राप्त भार्य सा-विषा-दिन क्रिया-सपस्नास भोपासस -सा प्रकार, मुदिदि, विकिपाधि,पोदि, पयदि,भोपपश्मदि, रसम्पदि मठीण-भवाद =मसीसद्धि मदोहरि, (इनके मन, प्रमेदर पास्सेदेसो प०मप.१० ३३१३५०) म्यादिना मन्तद्वीपमा मि मापाविम्लेच्छ (म्नष्ट मिलश) या प्रकार मन्तप उत्पनहुये, भौर कमभूमि उत्पभयो स०पन्तदीपमालरशोद, म्य मतदीपम सरणसमय के मम्पन्धरामप्यादि पप्ती भीतर (मम्पन्चर) पाठ (पूर्व, ईशान्य पा ईशान,रचर, गपम्प, परिचम, नैऋत्य पा नशा, दक्षिण, भाग्नेप मा प्रग्नि) दिशाम (विषु) माठ (मन्तदीप) बदमन्ता मोहिमपत् सिरियो । आपा विन(दिशाभों के चतराल पा पम्पमें भाठ (मंदीप)मौर हिमपद शिखिरीपर्वत ( १ )ोमो मामा ' मनुप्पामा ना एयनिगासी मगरूपसाय वकीलप्प पदच्छेद भौर विभक्त्पर्यसहित सर्वार्थसिदिफा शम्दशः हिन्दीभनुराद भध्याय ३ सभ ३५ ॥ प्राङ्मानुपोत्तरान्मनुप्याः ॥३५॥ H/ सिदि पुष्करद्वीपबहुमध्यदेशभागीवलयवृत्तो मानुपोत्तरोनामशैल ।तस्मात्प्रागेवमनुप्यान बहिरिति। ततोन वहि पूर्वोक्तक्षेत्रविभागोऽस्ति। नास्मादुत्तरं कदाचिदपि विद्याधरा ऋदिप्राप्ता अपि मनुप्या गच्छन्ति अन्यत्रोपपादसमुद्घाताभ्या।ततोऽस्यान्वर्थसञ्ज्ञा" एवजम्बूद्वीपादिप्वर्धतृतीयेपुद्वयोश्चसमुद्रयोर्मनुष्या- ("सूत्रम्-प्राङ्मानुषोत्तरान्मनुष्या । (अन्यपाठ) प्राग्मानुपोत्तरान्मनुप्या ॥ ३५॥ सूत्राचा-भाग-पानुपोत्तगदा मनुष्या मानुपोचर पर्वत से पहिले पहिले दश वा स्थानमें मनुप्पोभर्यात् जम्प दीप,पातकीखर और पुष्पग्दीपके उरक भाषभाग ऐसे भदाई दीपमें मनुष्य हैं पुष्पनुमोदा-पाकग्दीप-सह-पप्प-नेश भाग पुपरीपक बहुतषीप (बीचाचीही) का स्थान(देश) मागमें बालप-वृत्त ।मानुपोचर नामशेल वलयाकार चस्प मानुपोचर नामक पर्पत है तस्मा माकपर०मनुप्पानस्किातिक सिस (मानुपास्तर पषन) स परिनेही मनुष्य है पारि नारे बन नपरिस्पोक-सत्र-पिमाग मस्तिर =तिस(मानुपोप्चर पपत) स पारि (परिस्) मयमपणित पत्रों का निभाग नीरे। न०मस्साव पाचरम् ॥"कदापित्०मपि०विद्यापरा मन इस (पानुपोचर) स भागे कभी भी विधापर (और) प्यदिशामाधामपिक मनुष्या गच्छन्तिामन्यत्र उपपाद-समृदयाताभ्याम् । । (भाषा-पम्नदेवको न छोड़कर वापादस भौर समदयातस भात्मा के प्रदेश भाई दीपसे वारि नाता विना उपपाद और समयास प्रत्मा प्रदश पादिर नहीं जाते है) वन भस्पभिन्न-सभा एवम्छमहीपादिपुर विससे इस (मानुपोचर परत) का सार्थक माम । । इसमकार सम्पदीप मादिक भट्टतमीयपुर टोप मदाई (दीपों) भौर दो (जषणोद और कालोद) समोमें मनुष्प रममा पाट और न पसाराममनुपात वात प्रकार पर निरोप मिय बोमयाय मम पुरस RE()-रम्मNAho do yu) kafe को मारा मार्ग मो.नामित अप्पापक्ष ७५ 0 वेदितन्या ॥ ते द्विविधा ॥ ॥ आर्या म्लेच्छाश्च ॥३६॥ गुणैर्गुणवनिर्वाश्रर्यन्त इत्यार्या । ते द्विविधा । ऋद्धिप्राप्तार्या श्रनृद्धिप्राप्ताश्चेति ॥ अनृन्दि- प्राप्तार्या पञ्चविधा । क्षेत्रार्या जात्यार्या कार्याश्चरित्रार्या दर्शनार्याश्चेति ॥ ऋद्धिप्राप्तार्या सप्तविधा । बुद्धिविकियातपोवलोपधरसाक्षीणभेदात् ॥ म्लेच्छा द्विविधा । अन्तहीपजा कर्मभूमि- जाश्चेति ॥ तत्रान्तीपा लवणोदधेरेभ्यन्तरेऽष्टासु दिच्वष्टौ । तदन्तरेषु चाष्टौ, हिमवच्छिखरिणो- मेदितम्या विकास म्मानना पारिये (मनुष्य) को मकार ।। सूत्रम्-'आर्या म्लेच्छाश्च ॥३६॥ (मनुप्या) आर्या म्लेच्छाश्च भवन्ति ॥३६।। समाया-मनुमा म्यानपातित अनुप्प भार्प और (८३) म्लेम होते हैं दुरुपर्व-मु गुणपनि पापर्यन्ताविकभार्या गुणों कार भयका गुणगान पुरुपोंकार सेरेमाया ऐसे भार्या रे साहिरिपा दिमा- मापन-दिया- (भा) दो प्रकार है ! दि भाप्त भार्या और मनदिमाख भाविकमन्दिमातार्या पविषा) -मार्या । भरिमास मार्य पनि प्रकार है। चित्र- मामाविमा फर्म भार्या पारित्रभार्या मात्र भार्य, नादि भार्य, कर्म भार्य, नारिष मार्य, वर्शन भाभिचाविकादि-माल भाषा और (-१) दर्शन मार्य ऐसअदि प्राप्त भार्य सम-विधानबिनविकिपा-तपस्-वन-मोपपपस -साव मार, मुविचदि,मिमियादि तपोधादि, पलवदि मौपषश्चदि, रसादि अमीण-भेदादा मीसम्मति मेवोपरि (इन मेट, मभेदक वास्तेदेखो पाप-प० ३३१से३४० म्लेमामादि शमन्तदीपनाकर्मभूमिमा गाविस्तब्ध (म्च्यम्बिश) दो प्रकार मन्वपि नस्पमहुपे, और कर्मभूमि नपत्राये दमकमन्दीपमालपणोदः । ना मतदीपम सरणसम्बो सम्पन्ता मान्यता दिनु भयो। म्पीवर (मम्पन्तरे) माठ (पूर्व, ईशान्य वा ईशाम,सत्तर, पापम्प, परिथम, नैश्वस्प पा नशा, दक्षिण, मानप या भग्नि) दिशा (दिपु) माठ (मन्वीप) वबभन्दरेपुरा मरिम-शिलरियो सपा सिन(दिशाभो,के भवराम रा मध्यमें पाठ (संतप)और दिमवद शिसिरीपर्षस सर्थ मप्पापा भ सिदि रुभयोश्च विजयाईयोरन्तेष्वष्टौ । तत्र दिनु दीपा वेदिकायास्तिर्यक्पश्चयोजनशतानि प्रविश्य भवन्ति । विदित्वन्तरेषु च हीपा पञ्चाशत्पञ्चयोजनशतेषु गतेषु भवन्ति । शैलान्तेषु दीपा पट्सु योजनशतेषु गतेषु भवन्ति । दिनु दीपा शतयोजनविस्तारा । विदिच्वन्तरेषु च द्वीपास्तदर्धविष्कम्भा । उभयो परिजपाईयो मन्तपुः दोनोंके (पूर्व और पश्चिम) और दोनोंघेतान्यों के(पूर्व और पश्चिम के मन्तवि भग पाठ रे (भर्यात् सप मिखकर पोपीस भंतीपर) वश्वविक्षुदीपाश्रमदिवाया गतिर्यक a (माठ) दिशाचि मन्तदीप ( मम्मदीपकी) घेदिकाके तिर्यक पत्रपोजनशतानि पिरप - परन्तिपिदिषु १० =पांगसौ योभन (समुद्र में) प्रदेश होते रे भौर (घ)विदिशा भन्तरपाटीपापनाशपायोमनशातपुरा -अन्तराम्न में (भाठ) अन्तर्दीप (मम्मदीप की पेदिका से) पायसो पपास योमन गाभिनन्विा । शैम-अन्वेष दीपा =परे (समुद्रमें) हैं। पवतों के अन्त में (भाठ) अन्वीप (मम्मदीपकी पदीसे) पटप योजनशतपुरगतपः भवन्ति । दिन छासो पोमन परे (गतेपु) (समुद्र में) है । (माउ) दिशा में दीपा शवयोजन-विस्तारा । विदिचुमन्तरेपुर प० अन्तरदीप सौ सौ पोषन विस्तार वाले हैं। बहुरि (-घ)(भाठ)पिदिशाभंसराज दीपा द मर्प-विषम्मा =मन्तदपि उन (माठ माठ दिशा पाखे मन्तदीपों से) मापे माघ मर्यात् पचास पपास पोमन विस्तार पारे भामेप (७ ज्योतिष विषयमे भाठ रिण मानी गई । भोर पहा पर पम्पमार स्वामी ने ममता विस्तार के समयमै सामग्रम्पशन लिया है इसबि माठ दिशा मन्तदीपोरा मो जामीपसी विकासे पांचसो योजन समुद्र मे परे सौ सौ पोजम विस्तारमा परतुगा परि ससारमै चाररिया पूर्व र पश्चिम और रवि प्रसिया और बाती विदिशन पापम्प मेश्राप भाग्ने प्रसिर मलिप ५० अबावरानी ने सर्वार्थसिदिनिका पूर्व पर परिचम पहिचारी विद्या मानर और शनापय मत प्रापका विषिश मानकर विपत पापन रियाद Roar दिशानि(पार) योग ती मापदोपदीदी पचमी बोमन पर समुद्र में सिमका सीसी पोजन विस्तार। परिशिरिणमिवारीपरीमि पांचसो पोगन परे तिन दिनार पावन पचापन (५५) पोमन काहि (साम 2 DAD Poपिरिणाwिrauastiप रामना-पचारपोजन पर विमा विस्तार - -- सर्राया मापाप सिदि (कर्ष प्रापरण- शिलान्तेषु पञ्चविंशतियोजनविस्तारा । तत्र पूर्वस्या दिश्येकोरुका । अपरस्यादिशि लागूलिन उत्तरस्या दिश्यभापकाः । दक्षिणस्यां दिशि विपाणिन । विदिनुशशकर्णशष्कुलीकर्ण कर्णप्रावरण लम्बकर्णा शैल-मन्तपुर पिपान्-शिखिरी मौरदोरिमयार्द पर्वतो माउ धोरों में पा माठमान्तों में (भारदीप) परिंशतियोमम-विलास पीस पषीस योजन विष्फम्म पारकरे पत्रकपूषणाम् ादिशि एक रुका =1tt पुपदिशा (भो भन्तप है उसमें राने पाखे) एक पांघ के (ऊरुका) धारक भर्पात् एक टांगवाले मनुप्प पूर्ण मन्तदीपमें निषास करते है मपरस्पाम् "दिशि"चांगलिना पभिम दिशा में (भो मन्तदीप है उसमें बने पाले मनुष्य) पंछ वाले हैं उत्तरस्पाम दिशिामभापका अचर दिशा में (जो मन्तदीप है उसमें रहने पाले मनप्य) पचन रति गंगे है दक्षिणास्पाम्रदिशिविपाणिना -दक्षिण दिशा में (मो मतःप है उसमें रान पाले मनुष्य) सींग पाले हैं (विदि (गर) विदिशाभों (ईशान-पायम्प-नेत्यु-भाग्नेय) में (मो भवट्रोप है ननके मनुष्य) राशकर्ण- रहा के सरश फानराचे (-शशकर्ण) मनुष्य है (शशक-सरहा-ससा एका रे) शकलीपर्ण- =साफ पा शाकली करिये यकी नालीफ समान कान मिनके ऐसे मनुष्य भर्याद एक प्रकार क मच्छ सशी कान मिनके ऐस मनुष्य पाते। कान ही है मोरने और रहने का दुपट्टा पा उपकरण मिनर्फे मर्याद भंसर्दीप के राने वाले व मनुष्य जिनक पादरा पा उसस और पड़े बड़े कान है मिनर्मेसे कान पा विधा सकते हैं दूसरे को भोर सकते है समार्ण (मिम मिन) समाई के कानों सहित मन्तःप पासी मनुष्प है। (१) विrg -स शाम को मुख्यत्र पासोमवण देशहोम असावपानीसे किसी किसी रस्त विणित लिपिमें उत्तर वाफ्य सिंहसमयि पानि मे मिलावर' विरिपारसितमणि इस्पादि' विकदिपा है ता पापदिगा। किती किमी प्रतिमें इस एप मागे पीपेपर एकविराम का मिह रेल विरित एमा तिवारकरी पर दोनो पारणे श्रेपकर दिया जिससे यह नहीं मान पाकिया राप विपिशामों से संबम्प रणतामपवा विविधामो बोचर में जो दिया है उमसे सम्पाप रखना है हममे इसको सबसे प्रथममें लिणारे इसस पोमाय लिपा प्रथम पाप से ममाप वा। औरणान-पाशाप मैप प्राप्नेप विदिशामों का पोता है (२) 'कर्ष प्रातरणयान में प्राण ऐसा सोसिमिकी दोनों प्रावृत्तियों में भएर पा गया है । क्योकि हमने हस्तलिखित तीम प्रतिपीसे मिलाया तो सबमें सर्व-प्रावरण मिला दूसरे पर कि मुदित रामवार्मिक तथा प.पालालजी 'पायरिवाकर अनुवादित राजपातिक 22 ७७ साय मप्पापामा ॥ सिदि मर्श रुभयोश्च विजयाईयोरन्तेप्वष्टौ । तत्र दिनु द्वीपा वेदिकायास्तिर्यक्पश्चयोजनशतानि प्रविश्य भवन्ति । विदिच्वन्तरेषु च द्वीपा पञ्चाशत्पञ्चयोजनशतेषु गतेषु भवन्ति । शैलान्तेपु दीपा पट्सु योजनशतेषु गतेषु भवन्ति । दिनु दीपा शतयोजनविस्तारा । विदिच्वन्तरेषु द्वीपास्तदर्धविष्कम्भा । उमयो प०पिमपाईपो भन्तेपुर दोनोंके (पूर्व भौर पश्चिम) मोर दोनोंपैसाढ्यों फे(पूर्व और पश्चिम के)मन्ववि माउरे (भर्यात् सब मिलकर पौषीस भतीप) वत्रवि दीपा पेदिकापा तिर्पक० at (भाठ) दिशापि भन्सीप (अम्मदीपकी) वेविकाके सिर्यफ पनपोमनशतानि प्रविश्य - भवन्तिापिदिनुप० पिसौ योमन (समद में) प्रवेश होवे हैं और (-प)विदिशा मन्तरेषादीपा-पञ्जारात्पनयोजनशतपुर। मन्दराम्न में (भाठ) भन्सीप (मम्मदीप की वेदिका से) पायसो पचास योमन गतमरन्तिा । शैर-मन्तपुदीपा परे (समुद्रमें) है। पयतों के अन्त में (पाठ) मन्दीप (नम्बदीपकी वदीसे) षट्पु पोजमतपुर। गतपुर "भवन्ति । दिक्षुः' चासो पोमन परे (गतेपु) (समुद्र में) है । (पाठ) दिशाभोंमें दीपाशवपोभन विस्तारा विदिचा अन्तरेणाप =मन्सग्दीप सौ सौ पोजन विस्तार वाले हैं। पहुरि (-१)(भाउ)विदिशाभंवरालमें दीपानद मर्प-विषम्मा, मन्तदीप उन (भाठ भाउ दिशा राखे मन्तदीपों से) माघे भाप भर्यात् पपास पपास पोमन पिस्तार पारे भाम्प (१) ज्योतिष विपपमे भाठ विण मानी गई है और यहां पर पम्पपाद स्वामी में पता विस्तार सबम्पमें सामाम्प एपन रिया सबसे भाठ विण प्रतीपोत को बाबाको पेरिखासे पांचसो पोजन ममुप में परे। सौ सौ पोजन विस्तार मा परन्तु पारि संसारमै चारदिशा पूर्व र पश्चिम और पिस प्रसिर और वारदा विपिणन पापण मेश्राप भाग्ने प्रसिर इसलियअपरायजी ने सर्वामिविपनिकामे पूर्व चर, पश्चिम दहित चारही दिशा मानबर और ईशान पाय मत माग्नेपको विरिण मानकर विशेषत पान लिया froad रिणानि (नगर) मोर ती शामीप सीधेदी पचती बोमन पर नमन मे १ सिमका सोनी पोमन विस्तार ।। परिनिरिणमिरे(चार होप मेरी पोचलो पोमन परे नितरिनार पधावन पधापन ५) बोमनकारि 1102 202 HD ७६ Fror परिजन(मारगोममे पचासन पर सिमविस्तार पचा- पचासीमममrl सार शैल-मन्तपुर मम्मायभ सिदि CgEE6%es शैलान्तेषु पञ्चविंशतियोजनविस्तारा । तत्र पूर्वस्यां दिश्यकोसका ।अपरस्यां दिशि लागूलिन उत्तरस्या दिश्यभापकाः । दक्षिणत्यां दिशि विपाणिन । विदिक्षु शशकर्णशष्कुलीकर्ण कर्णप्रावरण लम्बकर्णा हिमान-शिखिरी मौरदोविनयापर्वाक भात)ोरों में पाभाठमान्यों में (भारद्वीप) पश्चरिंशतियोमन-विस्तारा पचीस पचीस योमन विडम्मरे वामपस्याम् दिगिए =tt पूषदिशा (मो मन्तदीप है उसमें गाने पाले) एक माप के (अरुबा) पारफ मर्याद एक गवाजे पनुप्य पूर्ण अन्तहोपमें निवास करते हैं भपदस्था दिशि मांगलिन गमिम दिशा में (भो मतदीप है उसमें रान वाले मनुष्य) पंछ पाले है उचरस्याम्मा दिशियममापक उपर दिशा में (मो भन्ठदीप है उसमें राने वाले पनष्प) पपन रहिस गंगेरे दपिणास्याम् विशिपिपासिना दक्षिण दिशा में (भो भतीप है उसमें राने वाले मनुष्य) संगि पाले। (पिदिषु॥ भार) विदिशाभी (ईशान-पापम्पनेशस्य-माग्नेय) में (मो मतदीप ननके मनुष्य) शशकर्ण- साश कानराशे ( शशकर्ण) मनुष्य रे (अशक-खरा-सा एका ) राप्पनीर्ण - साइल पा शाकसी करिये सबकी नाली समानो कान भिनक एसे मनुष्य भर्याद एक प्रकार के पथ सारे कान भिनके ऐसे मनुष्य होते है मान हीरे मोरने और दान का दुपट्टा वा उपकरण जिनमें अर्थात् अगदीपक राने पाले व मनुष्य जिनके पादरा पा उसस और परे पडे कान र मिनस एक कान पर विछा सकते दूसरे को मोर सकते है सम्बकर्ण (मिम मित्र) सम्माई के कानों सहित अन्तदीप पासी मनुष्य रे ॥ (१) विदिषु -सरा मुरणपत्र दामो तथा लेजर प्रसापानीसे शिक्षाविसील विजित लिरिम र वरपर मिसमयि पानि में मिलाकर विधिसितमणिपादित बिमादिया है तथा दापदिण।विसी किमी प्रतिमें इस मांगे पीछे र परिराम चरिकर विविध ऐमालिकाही पर दोनो पानी को पार दिया है जिससे यह नहीं जा पहनापह राप पिरिणों से संबम्प रमतामा पिरिणामी पौष २ गोविण है उनसे सम्माय रखा हमने इसको सबसे प्रथम, सिवा इमसे स्पसमा पिरमपम वापर समसाल बताई। और शानदारापत्य मानेप विनियमों का पोता है (२) कलमावरम स्थान में भारत पेमा सर्वार्थसिरिल बोनों भापतियों में मार पप गया है। क्योकि हमने इस्तलिपित तीम प्रतिपणे मिसागा वो परमे रस-प्रारद नियमा मरे पनि मुद्रित समातिर, तपा पंपालाल जो पानिपार अनुवादित रामपातिक बर्ष मापरण- साप सिद्धि अप्पापमा सून २६ रुभयोश्च विजयाईयोरन्तेष्वष्टौ । तत्र दिक्षु द्वीपा वेदिकायास्तिर्यक्पञ्चयोजनशतानि प्रविश्य भवन्ति । विदिच्वन्तरेषु च द्वीपा पञ्चाशत्पञ्चयोजनशतेषु गतेषु भवन्ति । शैलान्तेषु द्वीपा पट्सु योजनशतेषु गतेषु भवन्ति । दिनु दीपा शतयोजनविस्तारा । विदिक्ष्वन्तरेषु च द्वीपास्तदर्धविष्कम्भा । उभयोगपरिजपाईयो भन्दपुर दोनोंके (पूर्व भौर परिचम) और दोनों पैसाक्ष्यों पूर्व भौर परिरप के)मन्तवि मो उपाठ (अर्थात् सब मिलकर पीवीस मतीपर) दिदीपादिकापातिक (माउ) दिशावि मन्तीप (जम्मूदीपकी) रेदिका सिर्पक परपोजनशानियाविरप- मरन्वितरिदिप० पापसौ पोमन (समुद्र में) प्रवेश रोते हैं और (म्पपिदिशा मन्तरेषादीशपायस्पनयोजनशता। अन्तराज्य में (भाग) मन्तदीप (कमद्वीप की वेदिका से) पापप्तो पचास पोमन गमरन्तिा । रोल-मन्तपुर दीपा -परे (समद) । पदों के अन्त में (पाठ) अन्तीप (मम्पदीपकी पदीसे) पर "पोमनशासवपु: "मपन्ति । विचुट चासो पोजन परै ( गवेषु) (समर में) है । (पाठ) दिशामें शामरावपोमन-विस्वारा विदिवामन्तरेणाप =मन्तदीप सौ सौ पोमन विस्तार पाछे हैं। महरि (घ)(भाउ)विदिशाभंवराक्ष छीपा वामसीपम्मा" अन्तदीप ग्न (भाठ माठ दिगा पाखे अन्तदीपों से) माघे भाष मर्याद पपास पपास योमन विस्तार वाले पर मामीण {" ज्योतिए दिपपर्म मा यि मानी गई है और यह पर पायगार स्वामी मता विस्तारमबापमें मामायापन किया है ये मार गिरे भनीपो गो गोपली वेदिकासे परिसी पोजन समुद्र में पर सो सो पोजन विस्तारमा परतु पारि ससारमें पाररिणा पूर्व र पश्चिम और पचिव मसिर और पारी विरिणाम पापाय शाप मानव मसिर है सति ५० बराबराया न पासिरिनिलामे पूर्व पर पश्चिम रविवारीला मान पर और जापापम्प प्रभावको विरिता मानर पिरोपत परस्पा "तो दिमिरे (बार) होगही माहीती पोचमी शिन पर सत्र में सिमा मौसी पोमन मितार रिमि२ (बारावीपरीनित पाचसो पो परे। विनाािर पचास समापन (५)ोजमागिरि 110) FEATre 29 लिरिवासियोपOA+पचा-पोवन पर सिमभरलारपमा गमावीमा- सिदि ७७ सूत्र ३६ शिलान्तेषु पञ्चविंशतियोजनविस्तारा । तत्र पूर्वस्यां दिश्यकोरुका । श्रपरस्यो दिशिलांगुलिन उत्तरस्या दिश्यमापका । दक्षिणस्यां दिशि विपाणिन । विदितुशशकर्णशष्कुलीकर्ण कर्णप्रावरण लम्बकाः सर्व (हिपमान शिखिरी मौरदाविमपाईपोमाठ)ोरों में पा भाउ मान्यों मे(भावदीप) शेख-मन्त पविशतियोजन विस्तारा पीस पचीस योमन रिफम्म के पारकरे तमत्वस्यादिशिएक उरुमा =int पुपदिशामें (भा अन्वीप है उसमें गाने वाले) एक माघ क (ऊरका) पारक हैं भर्यात् एक टांगाले मनुष्य पूर्वी भन्तीपमें निपास करते है भपरस्याम्"विशिरसागनिन अभिप दिशा में (मो मन्दीप है उसमें रहने वाले मनुप्प) पंछ वाले हैं रचरस्पाम दिशिराप्रपाका असर दिशा में (जो अन्तीप है उसमें रान पाले पनप्य) वपन ररित गंगे है पिणास्पाम्पदिशिक्षाविपासिम ब्दचिण दिशा में (को भवदीप । उसमें रान पाले मनुष्य) सांग पालेर पिदिषः॥ पार) रिदिशाभों (ईशान-पापम्प ने स्यु भाग्नेप) में (मो मतदोपरे उनके मनुष्य) शशकर्ण- सरा के साश फानवाले (-शशकर्ष) मनुष्प है (शशक-खगा-ससा एकापी २) राप्तीर्ण - -साफल पा शाकली करिये पपकी नालीक समान कान मिनफे एसे मनुष्य अर्थात् एक प्रकार के पश्च सारा कान मिनके ऐस मनुष्य होते हैं महान ही है भोग्ने और उसने का दुपट्टा पा उपकरण मिनर्फे अर्थात् अंदीप के राने पाले प मनुष्य जिनके पादरा पा बससे और पर बड़े कान है जिनमेंसे एक कान पा विमा साते हैं दूसरे को मोट सकते है क्षम (मिम मिन) समाई के कानों सहित भन्न पासी मनुष्य है। (1) रिपु -सारको मुद्रसपत्र पायो म तपा मेखको मसावधानीसे किसी निसीरत विणित लिपिमै उत्तर पाप "मा सितमलिश स्पादि में मिलावर' विशिलसिसमडियायादि' बिजरिया तपासापरिग है । जिसी किसी प्रतिम इस शम भागे पोप एक एक विराम का विरेर विदिए ऐमा लिया। कहीं पर मोनो वालों को पार विधा है जिससे या नहीं मान पाल पर राण विनिशानो से संम्प रचतामा विरिणामी बोच २ मे जो रिणये हैं उमसे सम्पम्प रखना है मम पसको सबसे प्रथममे लिया । इससे रोमायपि मम वाक्य से समाप waltiभोरणाननापनेचय प्राय विदिशामों का पोतको (३) क-प्रारम्यान में ' प्राय पेसा सार्थसिदि दोनों भावृत्तिपो भशुम थप गया है। क्योकि हममे हस्तलिखित तीन प्रतियोंसे मिसापा तास प्रायरल मिकता दूसरे पर कि मुदित राबवाहिता पwium पर अनुवादित रामपातिक (कर्ण प्रापरण- ८८५६ मे ७७ सर्व मप्पायमा सिदि सूप ३१ रुभयोश्च विजयाईयोरन्तेष्वष्टौ । तत्र दितु द्वीपा वेदिकायास्तिर्यक्पञ्चयोजनशतानि प्रविश्य भवन्ति । विदित्वन्तरेषु च द्वीपा पञ्चाशत्पञ्चयोजनशतेषु गतेषु भवन्ति । शैलान्तेषु दीपा पट्सु योजनशतेषु गतेपु भवन्ति । दिनु दीपा शतयोजनविस्तारा । विदिच्वन्तरेषु च द्वीपास्तदर्धविष्कम्भा । ग्भपोलीप०विनपार्दपो मन्ता दोनोंके (पूर्व और परिचप) और दोनों वैवाढ्यों के पूर्व और पश्चिम के भन्तवि मणे =माठ रे (भर्याद सब मिलकर चौपीस मंदीप) वरवदिदीपा पवेदिकाया तिर्यक जा (माठ) दिशापि मन्तीप (प्रमदीपकी) येदिकाके विर्यक पनयोजनशतानि विश्प - मन्तिाविदिपक पांचसौ योमन (समुद्र में) मधेश होते हैं भौर (घ)विदिशा भन्तरदोषापचाशत्पवयोमनशतपुरा मन्दराम्ब में (भाउ) भन्वीप (मम्मदीप की पेदिका से) पाचप्सो पपास योमन गतेपुः परन्तिः । शेर-मन्तपुर दीपा ।' परे (समुद्रमें) हैं। पत्रों के अन्त में (भाउ) भन्यदीप (नम्बूद्दीपकी पदीसे) परप"योजनरामपुरगवपुः भवन्ति । दिषुः बासौ पोमन परै (गतेपु) (समुद्र में) है । (भाठ) दिशामोंमें दीपा शतपोजन-मिस्तारापिदिनु भन्तरपुर अन्तरदीप सौ सौ योमन पिस्वार वाले हैं। परि (-१)(पाठ)विदिशाभंतरालमें दीपा दम-विषम्मा- अन्वदीप रन (भाठ भाठ दिशा वाचे मन्तदीपों से) माघे माय मर्याद पपास पपास पोमन विस्तार पालेर (२ ज्योतिष विषयमें भाठ विण मानी गई है और यहां पर पम्पपाद स्वामी - पम्तीका विस्तार समापी भानेप सामान्य पन लिया सबि माठ दिशा प्रदीपो को जादोपको परिकासे पचिसो पोजन समुप में परे। सौ सौ पोगन विस्तारमा परातु पाषा परि ससारमै भाररिणा पूर्व उत्तर पश्चिम और पचित प्रसिर और चारही शिविणा न पायम्य मेश्राप भाग्ने प्रसिर । इसलिये पं० उपचन्द्ररापी ससिपिचनिधाम पूर्व पर परिषम पदिय चारदिशा मानबर और शान पापम्प प्रत माया विविता मानबर विशेषत पर रिपा कि मिणमिरे (गार) मोपती गाणीप की बेदी नाचमी पोरन पर समुद्र में तिनका सौ सौ बीमा विस्तार रिलिपिसमि(चारीपरी पचनो पोजन परे तिन विस्तार पावन पचावन (५५) पोमनागरि Foरितामिmus(wwोरम मे पचासौम पर विमिनारपणापासपोमममा. रेखाम 8. HEA 20 min वपिन ।

सिदि एयानिरासी मगरूपसहाय महान व पद६६ मा पा सहित सावसिदिका शमशः हिन्दीभनुमाद । अध्याय ३ सूत्र ३६ मत्स्यमुखकालमुखा हिमवत उभयोरन्तयो । हस्तिमुखा श्रादर्शमुखा उत्तरविजयाईस्योभयो- रन्तयो । गोमुखमपमुखा दक्षिणदिग्विजयार्धस्योभयोरन्तयो । एकोरुका मृदाहारा गुहावासिन शेपा पुष्पफलाहारा वृनवासिन सर्वे ते पल्योपमायुष ॥ ते चतुर्विंशतिरपि द्वीपा जलतलादेक- योजनोत्सेधा ॥ लवणोदधेर्वाह्यपाāप्येवं चतुर्विंशतिर्दीपा विज्ञातव्या ॥ तथा कालोदेऽपि वेदितव्या॥ मस्स्प एखाकास-पुस्खा मच्छ वा पप्पलीके समान मुम्बनाले भौर काले षा कालनीच (माया) मुखपाले हिमनवाग्मपोशमन्तपो पिवान् कुलापन के दोनों (पूर्व-पश्चिम) छोगे (दो भन्दपोंके रानेवाले) रे इस्ति-मुसा "मावशे-मुलाया -सी समान मुखमाले (मनुष्य) और दर्पन समान मुखराले (मनुष्य) सरविम्यादस्पद सपो-मन्वपो । उधर घेताट्य पर्वतक दोनों (पूर्व पश्चिम) छोरोंमें (अन्तदीपोम) र गो-मुलाः मेष-मुम्बा =गो साथ सम्ब पारक (मनुप्प) और मेटा पा भेर समान मुखपाले (मनुष्य) दनिण दिग्विजयारस्पमियो- मन्वयो. -दक्षिण दिशिक तारय पर्वतक दोनों (पृष-पश्चिम) मन्तों में (मन्सद्वीपोंमें)२ एक करकामामुव मारा भावासिनी -एक नांघराले मनुष्प मिटीका माहार करनेवाले हैं (मौर) गुफाओंमें रानेवारें शपापुष्प-फल मारा-पृत-मासिन माशेप मनुष्य (मो भंतदीपों में रहते हैं) फल फलक भारी रे पेड़ों के पासी है सपम्योपम-मायुपः । ते परिंगतिमा = समस्त परप ममाण मायुक मा स्पितिक धारक है। ये पौषीसी मपिदीपा-"मल-ववाद एम्-पोमन वसपा की (भन्तर) दीप मशक तससे एक योमन अंघे है या नोमनके उधाई पालेरे खरण उदप पाय-पारमपिएवम् जवण समुद्रक माहिरी पक्रया पाहिरी परिपि, (बाय-पारखे) भी ऐसे पारिपतिय दीपारिकासम्पा पौवीस (भन्तर) दीप मानना चाहिय भर्षात् पौषीस पन्तदीप को ऊपर करे भौर मो जमण समद्रकी भीतरी परिधिमें है भोर चौपीस ये पाहिरी परिधि सब ४८ मये॥ तपाकालेदमपिम्पेदितम्या । -वैस हो (जैसा कि ऊपर कानुफ ३) कालोदपि समुद्र में मी (४८ मन्तप) है अर्थात् पौषीस मन्तदीप कासोदधिकी भीतरी परिपि सम्बन्धी और पोलीस ही (१) काम- काला मालामालामिभित (मो पनपनकाय पठचमहाशयका भगपृष्ठ १८६) ३ (२) कर-घरक-जांधवाला आंघपारक सपि सिदि ७८ स्थानिकासी मगम्मसार सील त पदयेद और विभस्पर्य सरित सर्यसिदिका शम्दारिन्दी भनुषाद प्रध्याप ३ सूत्र ३६ अन्तरेषु अश्वसिंहश्चमहिषवराहव्याघूकाककपिमुखा । मेघविद्युन्मुखा शिखरिण उभयोरन्तयो पूध उचर-परिष-दक्षिण चार दिशाभों क्या ईशान-पापम्पनेचस्प माग्नेय चार रिदिशाभोफे मन्तरे दि) भवाखों भन्तर्दिशाभोम मर्याद चारदिशा पार विदिशामों के बीच बीच की(भाठ)दिशाभोंमें भो मतदीप है रनमें रानपाखे मनुष्य भरर-मुस्तामसिंह-मुलामुला घोड़ा साग खाने, सि सरीखे सुखपाने, इथा सप मुखबाले, परिष-मुसा रामस्वाम्मा-सा असा समान मुलपाने, मकर सप मुलधारक, पधेराफे साश मुलपारक (प-मुसापि-प्रसा। का समान एसपाले पा उमा सरण मुखके पारफ, वंदरके समान मुलपाने, होवे ॥ पेर-मुरला रिपु मस्सा ग्रिसिरिस मेघ मुखराज और बिनबोके सहश मुस्लमान (मनुष्य) शिसिरी पर्पदफे रमपो भन्यो बानों (पूर्व-पश्चिमक) मतो-बोरों में (दो भतीपों में बसन पाह) हैं वया पो हस्तलिखित मम्प प्रतिये नो मोनास्पा ममिसे प्राप्त सपने ही प्रापरस' पाठहै। इसके गोचकी थावस्यकता it'सेवा विधिपा शिवम्या मादि से सर्षे ते पस्योपमापुपा पम्न भर्विसिस्वृिषि मौर एसपातिककामे कपमा एकही। वीसरे पारि'मावरला दुपारखस भारत विमा कमाये ये धमी मनही सवामित पाठ शुरर लिया। (१) अन्तरेप कम समय में हमारी ही टिप्पणी गोदमने पुप में रिपिट गमरे मम्मच में दी। (गम पावत् 'पूर्व परोसिधित मधिसिमितियोंमे मिझापा गया उनमें विसीम नही है। पूर'का भय पुष्प गा। अपरानीने 'वान रे सा मुनपा पानमुग अपनी पचनियमे नही लिया है परन्तु ' तमुगमा मुबा लिया सम्मपनि बिस प्रतिसे रमने पचनिधीही रसमै समुवा महो और परमुला हो जैसा कि सच सिसि दानों मुदित भावृतियों से प्रगर है। पार्विको मुक्ति पा रस्ततिधित रोगों मपरका मतियो में "भवसिंह तदि-बराहम्पापू-गपूर पिमुला" ऐसा पाst मया "प्रमुबारे स्थान में गनुपमा म पम पर मालकि एमपारसी मसिम पूरा नावामुना संस्थान में मन मुसा पावसान प्राचीन सिविल सरिदिने पर पारन विा ter समनदी मरियमास्चिाप-प्रारkिana बाबा नदी दोभान होतो पाया पिर एटानासा मगमत्ता " '५-१ 8 मारपर्य सरित समायसिदिका शम्दशः हिन्दीअनुवाद | अप्पाय ३ सूत्र ३६ मत्स्यमुखकालमुखा हिमवत उभयोरन्तयो । हस्तिमुखा आदर्शमुखा उत्तरविजयाईस्योभयो- सार्थ । रन्तयो । गोमुखमेपमुखा दक्षिणदिग्विजयार्धस्योभयोरन्तयो । एकोरुका मृदाहारा गुहावासिन R| सिदि शेपा पुष्पफलाहारा वृक्षवासिन सर्वे ते पल्योपमायुप ॥ ते चतुर्विंशतिरपि द्वीपा जलतलादेक- योजनोत्सेधा ॥ लवणोदधेर्वाह्य पार्वेप्येवं चतुर्विंशतिर्दीपा विज्ञातव्या ॥ तथा कालोदेऽपिवेदितव्या ॥ मत्स्प-मुलाकास-मुखा मच्छ पा मथलीके समान मुलपाले और काले पा कालनील (काल) मुलवाले हिमवत उमयोगमन्वयोः । महिमवान् कुल्लापता दोनों (पूर्व-पश्चिम) बोरोंमें (दो मन्तवीपोंके रानेवाले) है हस्ति-मुस्ला "मावळ-मुसा इस्ती समान मुसाले (मनुष्य) भौर दर्पन समान मुखपाले (मनुप्प) चचारिमपादस्य समपो. मन्तपो" उचर पैनारय पर्वतके दोनों (पूष परिषम) बोरोंमें (मन्तीपोम) है गो-मुलाप मुम्बा गो सरश सम्ब धारक (मनुप्प) भौर मेग पा मे समान मुलपासे (मनुप्य) दपिदिग्विमपार्पस्य समयो मन्तयो.।। -वषिण दिशिके पैताच पर्वतके दोनों (पृष-पश्चिम) मन्त्रों में (मन्तदीपों) रे एक-कसका-मद माराराणा भागासिन एक मामाले मनुप्प मिट्टीका मार करनवाचे । (और) गुफा में रानपान शपाः पुण-फल माहारा वृक्ष-वासिना ममशेष मनुष्य (गो भतीपों में रहते हैं) फल फसा माहारी है पेड़ों के पासी है सर्वे नापम्पोपम-मायुषः । वे पर्विशति ने समस्त पल्प प्रमाण भायुक वा स्पिविक पारक है। वे नौवीसी मपिटीपा-मस-खाद एक-पोमन उस्सेपा' =नी (अन्तर) दीप मजा तससे एक योजन ऊंचे रे या मोमनके उपाई पाले है सारण दयाय-पारमापि०परम्। आपण समुद्रक बाहिरी १० वा वाहिरी परिधिमें (पाप-पारखें) भी ऐसे मशिविरदीपाश्पिशावष्पा गौषीस (अन्तर) दीप मानना पाहिये मर्षात् पोपीस अन्तरदीप मो ऊपर करे भौर मो समय सम्बकी भीवरी परिपिमें है और पौषीस ये बाहिरी परिपिके सप ४८ मये ।। तयाणालावा मपिवेदितम्या : चैस हो (मैसा कि ऊपर कापुक ) कासोदपि समुद्र में भी (४८ मन्तदीप) हैं अर्यात् चौवीस मन्तदीप कासोदषिकी भीतरी परिपि सम्पन्यी और पीपीसी (चत - चला सहामीलामिभिन (रो पाचनकोश पप्ठ १.६१चमहाशपका कारापृष्ठ १८५) । (२) मरु-आपकानाला धपारक ७६ सिदि एनिवासी नगरूपसराय पकीलात पदच्छेद और पिमत्पर्यसहित सर्वार्थसिद्धिका शब्दशः हिन्दीभनुवाद भध्याय ३ सूत्र ३६ पारिरीपरिधि सम्बन्धी एस सब कालादपि सम्पपी भदवालीस अन्तःपहुये । भव लवणोदधि औरफालोदपिके सन छयानवे भन्तीप हुये।। (१) मारे पहा भाचार्योंमे पम्पपार स्वामी ममम तथा श्रोमविधानदिक मतम विपाम महतामोस-सवमोदधि-सम्पापी और मातालीप्स गातोपि सम्मापी) अम्तीप राबपातिक रचपिता प्रोमदमा भन्सार मतमे भड़तालीस (चौबीस लपनोवधि सम्पापी भोर धौबीस कामोरपि सम्पधी)ऐसे रेवस भातानोस भम्तीप है । "अपधाराय मी ने महनाकोसका उमेश किया। 4. सदासुखजीने ५० गोपालदासजी गरि ने हिवाम ताम्बर माम्नाय रे सभाप्यतत्वार्यापिणमस्त्र में दिमषान् पर्वत सम्मपी पम्पन मवर्गीप माने है और 'सी प्रकार { मन्तप्पोप शिबरी पर्वत समपी मी माने हैं। समाप्मतरापिगसूत्र' के पष्ठ ७ देखो। तेस्तुशिविरपिद्धोपा अमतसादे योजनोत्सेपा । सपनोपयर्वाप्रपाऽप्पेर्ष चतुर्विशतिर्योपा विधातम्या तथा वालावेऽपि" वेदितम्या: समिति वृत्ति प्रगम सस्वरल पृष्ठ २१ और हितोपावधि पुप १३१ ॥ इसके अनुवाद के वास्ते देखो पृष्ठस्त मिलित सर्वार्थसियि भाभाराप पारे परम्तु पाठ तनिक मिन है। वाइस प्रकार ते चतुर्विशति दिलीप पक्षेपि रमपोस्तटपोचत्वारिणीपा जलसादेक योजनो सेवा नियमालोऽपि पेरिया -ये चौकीम मतप पक्षातरम (मात् दूसरी रुपमामे भौर दूसरे मतमे) मी (अपलोदपिक, दोनो मीतरी पारिरी तटो में चौबीस बीस मम्ताप गरे तब पोशन कासोदधिरेमी इतनेही जामना चाहिये। "माधास्तावलोदस्योमयोपवावारिगत् सपा बादस्प इति परपति -art प्रथम कहे हुपे तो वए समुवो दोनो पटोले भाताबोस (पम्वरशीप) । मोरवालोदपिक सपहार दिपाम है । सोकपातिक मुद्रित पृष्ठ १५७ जैसे आपण समुद्रमै मतदीप भड़तालीस रोक कर समायो, सेही असोबपि समयमै महतामोस जानना ऐसे समस्त पिासवे अन्तरशीपनिमें मोम भूमिया ममुप्प है। भर्ष प्राशिका पृष्ठ सपस समुद्र भोर कासोदपि समुद्र हा भग्वाप रे जिनमे माग भूमिका रखना है। मनुष्यही रहता है उनमें मनुष्योती भारुति मामा प्रभारी सित । सिमान्तप्रवेशिका पुट १४॥ ते धनुर्विशतिरपिदीपा समायोजनोत्सेधा तथा कामाऽपि वेरिनम्मा । मुद्रित वत्वापरामपानिक पापी पाठ हस्तलिखितम 1 -"गरि ये पीपीस मम्तया है म तलमें एक पर पोगा को है। जैसे सापिडेविले अन्तरमापनि सपनतेसही पायपि विषमी मानना 4. पचामालनीस्त भाषा पृष्ठ 4 "पारिए चौबीसी मोपमरे तब एप पोजन करें। पसेदोकाबोर ममुद्र विर्ष मानना अपनीयता पनिका मुदिन पर दिमवान् पर्वत समापी बप्पा मन्तदीप समाप्पा (प) गाने के पश्चात् गोडिया "सो प्रकार स्पन माता oिad पर्वत सम्पपी भी मानना पारि' समाप्ततापिगमनम पुटरमले गमात् परिपती ऐसेनाम्बर बाम्नाय भाषा परपटिणणी- "परमता माप्यमा मापा रिमामला मान्यमे ruit wिaranालिमार जीवाममारि५0Danापाथ पर नीति भरोमाथि विधान नाच गा.

सिद्धि सूम ७ अम्पापा १ तएतेऽन्तीपजाम्लेच्छा कर्मभूमिजाश्यशकयवनशवरपुलिन्दादय ॥का पुन कर्मभूमय इत्यत माह- ॥ भरतैरावतविदेहा कर्मभूमयोऽन्यत्र देवकुरूत्तरकुरुभ्यः ॥३७॥ मरा| मापन मन्नद्रोपनामाम्लेग्राफर्म भूमिमा वे इतने भन्वरदीपोंमें उत्पन्न हुये स्वच्छ भार (-च) फर्मभूमि उत्पमहुये शा-यरन रावर पुलिन्द मादय पुन:र्म शक-पवन शवर-पुलिन्द भादि (म्लेच) । (मरन) पुनि फर्म भूमपामाइनियमन भारत भूमिय क्या है। ऐसा (मरन ने पर) इसलिये (मग्रिम सूप्रम) काते हैं कि (सूत्रम्- = भरतैरावतविदेहा कर्मभूमयोऽन्यत्र देवकुरूत्तरकुरुभ्य (५) । -भरतैरावत विदेहा (पञ्च, पञ्च, पञ्च, एता) कर्मभूमय: भवन्ति,अन्यत्र(पञ्च)देवकुरुभ्य,(पञ्च)उत्तरकुरुम्य ॥३७॥ सुमार्यम्-पपदेयाम्प =(पांच मेक सम्बन्धी पाच देवकरु (जहां उत्तम भोग भूमि मवर्तती है मौर) पम्मउमरमभ्यामन्यन (पांघमेत सम्पपी पांच उत्तर कुरुप (जामी उच्चम भोग भूमि घर्ते )कोछोड़कर पम भरनामाप वापरास्ता (पाच मेह सम्बन्धी) पनि भरत क्षेत्र (पाप मेरु सम्बन्धी) पांच पेरास्त क्षेत्र पमा विदेश (पाच मेह समन्धी सामान्यस्पस) पाच (महा') सिदेह क्षेप (रिशपतास प्रस्पक मेश्सम्बधी पत्तीस पत्तीम विदेर ऐस एकसौ साठ विदे) एता हमभूमपम मरन्ति । -पे कर्म भूमिय" है। (इसकी विशेप टिप्पणी सम्म्या चारमें नीचे देखो) (१) पामो सम्ममाणमे स सबका पाठ और मई पस13 (२) पाच दल और पांच रत्तरकुरुक्षेत्र एसे पण पेसलिप सूत्रमै "देवताहरुम्प परामो पवन भायेरे परि एक पत्र राताना पश्चमी दिपधन 'दवकुस्त्तरकुरभ्याम्' ऐसा वाक्य हात । () पांच मेपसापायी पावरित और पांच रम्पत्र पे पण मणम भागमस्यि और पास मेहसम्पापी पधि हैमवत और पांच रगपत पेर जप मागभूमि मातालीस प्रताप मरण समुद्र सम्बयो भोर महतानास कासोदधि सम्बंधी से छिपान पम्प भागममिय हुई इस प्रचार रेवताका रुप मापम भौर पर उपम्य माग ममिप सर्प मिलकर एकसौ पप्पास हुई (७) पापनि पान मस मारापी र पातपिक में पाप विहे विपरपसे एकसो साठ और प्रस्पेशविहम पाम म्लेच्छ पर पौर पर माय बगा। और पाप मेकमम्मम्मी पाप भरतक्षेत्र और पषिही एरावत है और प्रत्येक मात्र मौर ऐराषत क्षेत्रमै पांच पान म्लेप्पा मोर एक एक मार्य परास प्रभर रिमौर भरत और परायत समस्त क्षेत्रों में १७० मार्य अपर। मोर. मध्य पपिपसे १७ ममि है । सामाग्गल से १५१ मत् १९. विदेहो पाय महाविर पाच मेक सम्बापी करत है। RECECCCEEKKRECEMBER सर्रा C. सिदि एयनिरासी जगस्पसहाय पकीलकृत पदच्छेद भौर विभक्त्पर्यसहित सर्वार्थसिद्धिका शब्दशः हिन्दीभनुवाद अध्याय ३ सूत्र ३६ पारिरीपरिपि सम्बन्धी ऐसे सब कालोदधि सम्म भी भड़तालीस अन्तद्वीपहुये । अतः लवणोदधि भौरकालोदधिके सब छयानवे अन्तर्दाप हुये।। (१) मारे पहा भाचार्योम पम्पपाव स्थामा मनमे तथा भीमदृषिधानदिक मत विपाम (मावासीस-सपनोदपि-सम्बाधी भोर महतालीस गातोपि सम्मापी) मतदीप पनपातिर रचपिता भीमद्भा भन्सस्येवर मत मातालीस (चौबीस सपनोदधि सम्बन्धी और चौबीस कोपि सम्पपी)ऐसे रेस महवासोस मन्तदीप है। "अपवाराप मो मे भरतामीसभा उमेव ख्यिा है। पं० सदासुखजीने ६० गोपालदासजी एपादि ने हिपालो सेताम्मर प्राम्नाय 'सभाप्यतस्तापिगमसूत्र में दिमवान् पर्वतके सम्बपी पप्पन भंतीप माने है और "इसी प्रकार पप्पन मन्तदीप शिबरी पर्वत समधी मी माने हैं। समाप्मतवाधिगसूत्र' के पृष्ठ ७कोरेको "ते पतुर्विशतिरपिटीपा: अमतलारे पोखनोरखेपा । माधवपाश्ऽप्येव चतुर्विशतिर्थोपा विधातप्पा तथा बालोदेऽपि" वेदितम्या सनिमिचि पृत्ति प्रम सस्करण पृष्ठ २२४ और द्वितीपाति पृष्ठ १३१ : रसके भनुवाद के वास्ते वेको पृष्ठ ७४ हस्त लिखित सर्वार्थ सिमि गभाराप पारे परन्तु पाठ तनिक मिपास प्रकार चतुरिणति द्वितीय पक्षेपि रमपोस्वरपीमत्वारिंशोपा अमतमादेक योसमो सेपा तपासोदेऽपि रेरितप्पा - चौवीस मन्तीप पोग्तरमै (अर्थात् दूसरी मयनामे भौर दूसरे मतमें) मी लवणोदधिक, दोनों मीतरी तिम पौबीस बीबीस प्रताप सारे तब एक योजन संचासोदपिडेमी इसमेही जाममा पाहिये। "वाधास्तावलीदस्योमयोग्यवत्वारिक वथा बाबादस्य इति पएलपति -तबा प्रथम कहे इसे तो लपण समुद्र के दोनो पोके भावातीस (मस्तानीप) । और बालोदपिकासप्रबार सिपामय है। सोपातिक मुक्ति पाठ ५७ जैसे सपल समुद्रमै मतदीप भड़तालीस AMR समापी सेही बालोदपि समुद्रमै महतास बामना ऐसे समस्त शियापर्य भतरोपनि इमोग भूमिपा ममुप्प है । म प्राधिका पृष्ठ वस समय भोर पासोदपि समुद्र में भावपाप रे बिन भोम भूमिकी रचना है। मनुष्यही रह रेग्नमें मनुष्यों की भाछवि माना प्रभारी कुरिसत है।सियाम्वप्रवेशिका पृष्ठ १५४ ते चतुर्विशतिरपिशीपा बलतमायोजनोत्सेपा तपासाहेऽपि वेदिनम्मा मुद्रित वरपासवानिक पायही पाठ (स्तलिक्षित गरि पीसह मन्तदीप है बस तम एक एक पोजन करे। असे भावारपिडेवि मतदीपनियमी सोरपिरविमी मानना' । पाहा नीत भाषण पृष्ठ 4 "पारिएबीवीसी दीपजस ववते एसएरपोजन रौ। ऐसेदोकामोर समुद वि भानमा पंपाच्या पानिमुदित पृष्ठ दिमवान् पर्वत संधीपन मन्वीप समाप्प० () मेले परवा महिपाtioमो परम wrainfore पर्वत सम्पपी मो जानना चारि 'समाप्तमार्यापिगमन पुपरसके पश्चात् परपरिणवा नेताम्पर भाम्मा भमाw.n परपरिणदी-"पर मसापच माप मारमा बिगतमा Real warमारा मीरगनानिmarwatiपपपपरराnिtrate लिन नारी - EKHAN सिदि साय पयनिवासी नगरपसाव पीस व पदग्वेद और विमक्स्पर्य सहित सपायसिदिका शब्दशः हिन्दीअनुवाद । मध्याप ३ सूत्र ३७ तत एवं प्रकर्पगतिर्विज्ञास्यते प्रकर्षेण यत्कर्मणोऽधिष्ठानमिति ॥ तत्राशुभकर्मणस्तावत्सप्तमनरक- प्रापणस्य भरतादिष्वेवार्जनं, शुभस्य सर्वार्थसिध्यादिस्थानविशेषप्रापणस्य पुण्यकर्मण उपार्जनं, तत्रैव कृष्यादिलनणस्य पविधस्य कर्मण दत अपपम्पकर्ष बा (कर्मभूमिमें कर्मका भाषारपना) पास्तमिक (=एष) उत्कर्ष गति विज्ञायते "प्रकणभ्यत् कर्मण ॥ दशा (आति) में जाना मावा है (भयात्) उत्कएपनासे जो कर्मका भपिष्ठनम्" इविश आभय है ऐसा भावार्य है कि भाघार्यके इस उत्तर पर कि फर्मके भाभयपनासे इन पन्द्रर चेक कर्म भूमिपना है शिष्यने फिर सर्फ की कि कर्मके भापार तो तीन लोकही है तो धीनों लोक कर्मभूमि प्यों न कहेगये इसपर कहते है फि फर्मका माधार तो तीनोलोकमें अवश्य है । परन्तु जिन स्थानों में फर्मका मात्रय मतिशयफरि भयवा उरणप्पनासे पायामाता है । उन पन्द्रा भूमिपोंको कर्मभूमि का है। (भागे इस उत्कृष्ट फर्मपनाके दो शान्त देते हैं) वामगुफ-कर्मणा सारद सप्तम-नरक यहां भशुभस्पकर्मसे सावां नर्क तफ (नावत् ) पापणस्प" भरतादिपु परमर्जनम्॥ पानेकी( पापणस्य)भरतादिकापन्द्राकर्मभूमियों में ही सिदिया माप्ति( भर्जनभोती है। यमस्याससिदि-स्थान-मिग्रेप-मापणस्याण (मौर) गुमम्प (कर्मसे) सर्वार्थसिदि (आदिफ) मिशेप स्थानोंके पानेके पुन्प-कर्मण उपार्ननम् वएव गुपपफर्मका उपार्जन है। वहां (कर्मभूमियों) ही पि-भादि-सघसस्पप-मिषस्पा। कर्मपाई। सेती फरना भादिक लक्षणस्प हा प्रकारफे फर्मका (१) प्रक' गम पुगिहै। अब ' प्रग और प्ररूपांत् परण कारक मोर प्रपादाम कारको पाचन सहपता वा प्रधानता ममे भात है तब महाप्रपाग मायपकी मांति होता है। इसलिये 'उरकप' मा परन्समै प्रम्पप विचा। देवो वैचबोस पृष्ठ ४५ । (२) () मसिर्मपि पिविधा वाणिज्य शिसपमिस्पपि । मावि पपानिम्यु प्रवासीपमहेतपः ।। () भत्रासिकर्म सपायर्या मपिलिपि विपी स्मता। पिम कपणे प्रोता विपा शास्रोपगोपागा पापिय पणिजो पिस्प स्पारकरौरानम् । तपवित्र सापंचवेवाविपापा स्मृतम् ॥ 22-जन ८३ साय सिदि मम्पापम भरतेरावतविदेहाश्च पञ्च पञ्च, एता कर्मभूमय इति व्यपदिश्यन्ते ॥ तत्र विदग्रहणादे- वकुरूत्तरकुरुयहणे प्रसक्त तत्प्रतिषेधार्थमाह "अन्यत्र देवकुरूत्तरकुरुभ्य” इति ॥ अन्यत्र शब्दो वर्जनार्थ । देवकुरव उत्तरकुरवो हैमवतो हरिव! रम्यको हैरण्यवतोऽन्तर्वीपाश्च भोगभूमय इति व्यपदिश्यन्ते ॥ अथ कथं कर्मभूमित्वं १ शुभाशुभलक्षणस्य कमणोऽधिष्ठानत्वात् ॥ ननु सर्व लोक त्रितय कर्मणोऽधिष्ठानमेव, रुपनुवादा-परत ऐरारत-विदेहापाप" भरत, ऐरावत और विदेशम पांच, पा"एतामाकर्मभूमय इतिहम्पपदिरयन्ता पांच । इतनी फर्म मि इसमफार विवरण कीगई हैं। नरहरिदेव-प्राणादारावर तहसम्म विदोके ग्रहसस देवकुमार उत्तर कुरुक मोजम्बुद्वीपकेचिदेवालेमागो प्राणप्रसक्त तस्यतिरेप- भादान भयरा उपलम्पिका प्रसंग होनेपर विस(ग्राण) के निराकरणके भर्यम् ।भाभन्यदेव उचरकृयभ्य इति लिये कहखे है कि देवपुरु और उचरखर को छापकर (पंद्रा कर्म भूमिये हैं) অবলম্বন। सूत्रमे) भन्पप रन्द निपेष के लिये है। देवकुष्प, उत्तरवरपरमपतवारियर्प-दरम्पकमरययवः उत्तरकायें, मिवत, हरिचर्प, रम्पक, रिचयपत, भौर भन्तोग मोमममय इतिश्प्यपदिश्यन्वे -अन्वीप, पोग भूमियें इस प्रकार व्याख्यानकीगई हैं। भावार्थ यह है कि पाप लिदा सम्बन्धी पाच देवकुर (उत्सम भोग भूमिय) और पांच उपरकर (उत्तम मोग ममिय) पांच मेक सम्बन्धी पांच हरिवर्ष और पांच रम्पक ये दश मध्यम भोग भूमि,और पांच मेर समभी पास हैमवत और पांच रिपयवत ये दश नघन्य भोग मि और भावाचीस भन्त- दीप लरपोदपि समुद्र सम्पपी मौर भासावीस ही काबोद समुद्र समन्पी ऐसे क्यानधे ये जघन्य कुमोग भूमिये, सर्प मिलकर एकसी छम्बीस रे । तिन सपको सार्थसिदिवृत्तिमें मोगभूमिय कही है। अपकर्म भूमितut मागे (अप) (पूर्वोक्त पंडा पक) फर्मभूमिपना से हैं। शुभमशुपक्षणसरमण अपिष्ठानरान् ।। (उपरशुम गौरमशुम रुपणम्पकमरेमाभपतास(पूर्वोक्तपदाचे नामकर्मभूमिपना) लनुभम मोर-मिनम्। कमणपिष्ठानम् पिरमरम (म) सलीमों (निगप) जोर (पा) को मापारी है। ८२ सार्थ सिदि ८३ एयानपासा नगपसाय पीत व पदपद और विमक्स्पर्य सहित सवायसियिका शम्दशः हिन्दीमनुनाद । प्रध्याय ३ सत्र ३७ तत एवं प्रकर्षगतिर्विज्ञास्यते प्रकर्पेण यत्कर्मणोऽधिष्ठानमिति ॥ तत्राशुभकर्मणस्तावत्सप्तमनरक प्रापणस्य भरतादिष्वेवार्जनं, शुभस्य सर्वार्थसिध्यादिस्थानविशेषप्रापणस्य पुण्यकर्मण उपार्जन, तत्रैव कृण्यादिलक्षणस्य पड्विधस्य कर्मण सवाईएनम्मक आ (कर्मभूमिमें कर्मफा प्राधारपना) पास्तयिफ (-एप) उत्कर्ष गति।" विझायो प्रकणभ्यत् कर्मणः =दशा (गति) में जाना मावा है (भयात्) उस्कृष्टपनासे जो कर्मका भपिठनम्" इविक भय है ऐसा भावार्य है कि भाचार्य के इस उत्तर पर कि कर्मके भाश्रयपनासे इन पन्ना क्षेकि कर्म भूमिपना है शिष्यने फिर तर्क की कि कर्मके भाषार तो तीन लोकही है तो तीनों लोक कर्मभूमि क्यों न कहेगये इसपर कहते है फि कर्मका भाधार तो वीनोलोकमें अवश्य है । परन्तु जिन स्थानों में कर्मका भाषय भतिशयफरि भयया उत्कृष्टपनासे पापाजाता है । उन पन्दा भूमिपोंको फर्मभूमि कहा है। (मागे इस उत्कृष्ट कर्मपनाके दो शान्त देवे है) तरामराम-कर्मणा तावत्छ सप्तम-नरक चा भाशुभस्पकर्मसे सातयां नर्क तक ( तावद ) पापणस्य" भरवादिपु एक्झममनम्।। पानेकी( आपणस्योभरतादिकर पन्द्रहकर्मभूमियों में ही सिदिवा प्राप्ति(मर्जन)ोती है। घमस्या सार्थसिद्धि-स्थान रिशेप मापणस्प) =(मौर) शुभम्प (कर्मसे) सार्यसिदि(मादिक) विशेष स्थानों के पानेफे पुन्य-कर्मण। उपार्जनम्॥ प्रभावक -पुपपकर्मका उपार्जन है। वहाँ (फर्मभूमियोम) ही किपि भावि-सघणस्य पद-घिस्या। कर्मण-खेती करना भादिफ लक्षणस्प का प्रकारफे कर्मका (१) मा राम पुहिंग है। जब 'मकग मौर 'प्रभात' करप कारक और अपादाम कारकों एवषम सहरना वा प्रधानताके ममें भात है तर उनका प्रपा प्रम्पपड़ी मांति होता है।ससिपे 'मकर राणा परम्पर्म अप्पप निगर। देखो वैवकोश पृष्ठ ४१ (२) (क) मसिमकिपिविधा पाविम्य शिरपमिरपपि । मावि परविषानिस्य प्रमाबीपमहेतवः । १ (क) अत्रासिकर्म संपायर्या मपिलिपि विपी स्मता । रुपि वर्षपे मोला पिया शास्रोपगोपनाता पाणिम्मे पति धर्म स्पिं स्पारोशनम् । तप चित्रकलापमन्दादिमुपा स्मृतम् ॥ KARKECE ८३ सिदि प्रप्पापण ८२ भरतैरावतविदेहाश्च पञ्च पञ्च, एता कर्मभूमय इति व्यपदिश्यन्ते ॥ तत्र विदेहग्रहणादे- वकुरूत्तरकुरुग्रहणे प्रसक्ते तत्प्रतिषेधार्थमाह “अन्यत्र देवकुरूत्तरकुरुभ्य" इति ॥ अयत्र शब्दो अधिक वर्जनार्थ । देवकुरव उत्तरकुरवो हैमवतो हरिवर्षो रम्यको हैरण्यवतोऽन्तीपाश्च भोगभूमय इति व्यपदिश्यन्ते ॥ अथ कथ कर्मभूमित्व १ शुभाशुभलक्षयास्य कमणोऽधिष्ठानत्वात् ॥ ननु सर्व लोक- चितय कर्मणोऽधिष्ठानमेव, अपनुरादा-भरत पेरार-विदेशनमपत्र। भरव, एरापस और मिवानेत्र पोच, पापकर्षमपातिकम्पपदिश्यन्तर आपरे। इसनी कर्म भमियें इसप्रकार विपरण कीगई हैं। परिवे-प्राणादा दिवानसरहरू तासूत्र में विदाफे माणसे देवा भौर उत्तर कुरुके(जोनम्बूदीपकेपिदेयालेमाग प्राणमसनातन-पतिरेर भादान भयका उपसम्धिका प्रसंग होनेपर तिस(प्राण) के निराकरणके मम् मा मन्परादेषवपरम्पमाविक लिये कारें कि देवरु और उघरकुरु को छोड़कर (पंद्रा फर्म भूमि है) मन्पा समपर्मन-भादवार:: (सूत्रम) अन्य एप्प निपेष के लिपे।। देशकरुयें, उमरकरुपमरन सिमरम्पकबरपयपत उपसवय, मरत, इरिवर्प, रम्पफ, रण्यवत, मौर अन्तभोगम्मयाम्पिपदिश्यन्वत अन्वीप, मोग ममि इस मकार म्पारम्पानकीगई है। मानार्य या कि पोच विदा सम्बन्धी पांच देवार (उसम भोग भूमिय) और पांच उधरवर (उत्तम भोग भूमिय) परि मेर सम्पन्धी पांच रिवर्ष भौर पांच रम्यक ये गय मध्यम भोग भूमिये और पांघ मेक सम्बन्धी पोच मिरत और पांच रणपयत पे दश मपन्य भोग : मियें और महताहीस भन्न दीप सरणोदधि समद सम्बन्धी भोर भावालीस ही कालोद समुद्र समापी ऐसे छयानये ये जपम्य अभोग मिर्ये, सर्व मिलकर एकसी मुवीस है । तिन सबको सार्वसिदिवृत्ति भोगमि कही। भपक शर्म पिता मागे (अव) (पूर्वोन्ह पर रोक) फर्ममूमिपना कैसे हैं। शुक्मशुप-जमणस्पकमण पियानसान। (उचर शुभ धौरभशुम सत्रणम्परम भाभपतासे पूर्वोक्ताने मिकर्मममिपमा) कमला पिठानमा पदम (a) सपनामों (त्रितप)ोर (क्या) बर्मर भापारी १॥ ८२ समा त सिदि एगनिमासी गपसाप पडील व परपद और स्मिात्पर्य सहित सरायसिादका शम्मश हिन्दीअनुनाद । मध्याय ३ सूत्र ३७ तत एवं प्रकर्षगतिर्विज्ञास्यते प्रकर्पेण यत्कर्मणोऽधिष्ठानमिति ॥ तत्राशुभकर्मणस्तावत्सप्तमनरक- प्रापणस्य भरतादिप्येगार्जनं, शुभस्य सर्वार्थसिध्यादिस्थानविशेषप्रापणस्य पुण्यकर्मण उपार्जनं, तर कृप्यादिलनणस्य पविधस्य कर्मण सम्म हो (कर्मभूमिमें कर्मका माधारपना) पास्तविक (=एवं) उत्कर्ष गनिम पिता प्रमाणाध्यन् पक्मण" दशा (गति) में माना जाता है (भधात्) उत्कृष्टपनासे जो कर्मका भपिठनम्" इति =भाषय है ऐसा भावार्य है कि मापार्यके इस उपर पर कि कर्मफे भाययपनासे इन पन्द्रा चेक कर्म मूभिपना है शिप्पने फिर सर्फ की कि कर्मके भाघार सौ सीन लोकही तो तीनों लोक कर्मभूमि फ्यों न करेगये इसपर कासे है कि कर्मका भाधार को तीनोलोकमै भषरय है । परन्तु मिन स्थानोंमें कर्मका भाथप भतिशयफरि अथवा उसपनासे पायानाता है। उन पन्ना भूमियोंको कर्मभूमि कहा है। (मागे इस उरष्ट फर्मपनाफे दो दृष्टान्त देते हैं) मप्र मगुम रमणाताव सप्तम-नरक हां भगुमरूपफर्मस साता नर्फ सफ (शावत् ) पापणस्या परनादिया मर्जनम्॥ पानेकी(आपणस्य)भरतादिकापन्द्राकर्मभूमियों) की सिदिचा माप्ति(मर्जन)होती है। गुममा सामिदि-स्थान विशेष मापणस्पा (भार) शुभम्प (फर्मस) सर्वार्थसिदि(मादिफ) विशेप स्पानों के पानेके पुन्यक्रमण- उपार्जनम्॥ RRY पुण्यफर्मका उपार्जन है। सहा (कर्मभूमियों) ही रुषि-मादि-लमणस्पर विपस्या कर्मणा सेती फरना भादिफ लवणरूप छः प्रकारके फर्मका (1) मग सिंगर और ' प्राण कारक और भावान भारत पायम हपना वा प्रधानताममे भात, न का प्रयाग मापाडी मानिसतासलिये प्राण गमका परमोद मध्यप विचारे। देबो वैचोय पृष्ठ ४५६ रिपो (२) (5) मसिमकिपिनिया पालिम्प विमिरपपि । मानि पीधानिभ्यु प्रमाजीयमहनपा १ (ख) मासिकर्म सपायो मपितिपि स्मृता मिल पाता पिया गान्प्रोपगोपागा पापिय पवित्रा बम विसं स्यारहरकोपनम् । तपवित्रलापत्रमादिगाधा स्मृतम् । ८३ सिद्धि " एयनिपासी भगरूपसहाय पीसकत पदव्येद भौर निमत्यर्यसविध मार्यसिदिका शब्दशः हिन्दी मनुवाद अध्याय ३ सम ३० पात्रदानादिसहिनस्य तत्रैवारम्भात्कर्मभूमिव्यपदेशो वेदितव्य ॥ इतरासु दशविधकल्पवृक्ष- कल्पितभोगानुमपनविषयत्वानोगभूमय इति व्यपदिश्यन्ते।उक्तासु भूमिषु स्थितिपरिच्छेदार्थमाह- पार-गन मानि-सादितस्पति सम-एसमारम्माद अयस्त दानादिक (हाफमा) सहित नाही मारम्पोने (फे निमिच) से । कर्म भूमि-य्यपदेशनापदिलम्प विरामः॥ (विन पन्द्राक्षेत्रोंका) कर्मभूमि नाम जानना चाहिये । अन्य पा दूसरों (क्षेत्र मर्याद उपर्युक्त कपान भोगभूमियोंमें भौर परोक्त तीस उत्तम,मध्यम जयन्यमोगम्मियों में विप कम्प-उन कम्पित-भोग-अनुयरन अश माविक कल्पवृक्षोंसे इच्छित वा पाखिव भोगोंफा भनुपरन भोगम्ममा विश्वम्यपदिश्पन्देवर -विपप रोनसे भोगभूमि ऐसे नाम कोनात रे (पपदिश्यन्वे) 'भूमिपुर स्थिति-परिच्छेद भयम्"मा! अपित (समस्त) ममियोंमें भायुक भवधिक (परिच्छेद) लिम करते हैं कि मपि पति वियपापिम्पणियातिपि भसि मशि मेवी, विद्या पातिभ्य और शिप ऐसे मी मालिका पानिपानि TT प्रमा-विनोबा ॥१॥ -11 मार कर्म प्रशारीविता (जीवन) र ते ३:१३ भवति । सेवायम् रामपिसिपि-विघो। - (मिमे) अमिका सेवानि (और) मसी (i) मेजकार्य में मुमा हा -मरत किया जाता है । (पती कपि म्वरनामोनिया शास्त्र उपाय - ममिले जातमम विवक्षित (ौरविचा(म) सोनका जीवन पा में है पातिमा विसर्मशिस्थादास -पादिपर्म पनिषों पपवा पापारियों का काम है। पि (म) की कोयम्॥ -निएसता पतुरता पा प्रबोलता प्रात्म्सस मामामा कामचतुगit -और-हास्पिर्मविध विचित्र प्रति पाणी मनिपालामा(चित्र) -नीसह सारा गाना मामा भारि (-मापर्षमपत्रा कागरमा या पास्मृतम् ॥ -रमा कारमा बगाना स्पादिपरकी निपुगता) स्मर समाती (१) रेनषा गुरुपादित स्पाम्पाप समता पान चेति गुस्थानो परमादिपिने दिने। रएप गुस्सास्तिला उपमा पार -२ मा गुरुपी उपासमा प्रति सेवा पारिताबासपचनसंबम तप माननिormनानाम् TriraRE किन -सन का गुस्सा परममि) । MP423929 सपार्य। मापापमा ८५ सिदि सूत्र ३८ ॥ नृस्थिती परापरे त्रिपल्योपमान्तर्मुहूर्ते ॥ ३८ ॥ त्रीणि पल्योपमानि यस्या सा त्रिपल्योपमा। अन्तर्गतो मुहूर्तो यस्या सा अन्तर्मुहूर्ता ॥ यथासख्येन सम्बन्ध ॥ मनुष्याणा परा उत्कृष्टा स्थिति त्रिपल्योपमा ॥ अपरा जघन्या अन्त- महुर्ता । मध्ये अनेकविकल्पा ॥ तत्र पल्यं त्रिविधं व्यवहारपल्यमुद्दारपल्यमापल्यमिति । सूत्रम्-नृस्थिती परापरे त्रिपल्योपमान्तर्मुहुर्ते-नृस्थिती-परापरे-त्रिपल्योपमान्तर्मुहुर्ते-(यथासंख्यम्) समार्य-नृस्थितीपरा-भपर"पिन्पोपप-मन्तहर। मनुप्योंगी भायु उत्कृष्ट और जघय वीन पन्पप्रमाण और भन्तमहर्व ययारियम्" अनुकमसे । भर्याद मनुष्योंकी भायु उत्कट (-परा) वीन पन्य प्रमाण और जघन्य (=अपरा) अन्तर्मुहर्त है। और मध्य भायुके भनेक भेद हैं। दृश्पनुरादा-त्रीणि पश्योपमानियस्पासा" श्रीन पम्य प्रमाण है जिसकी सो पिम्योपमा म सर्गमा मुहूर्त यस्या" पिम्योपमा है। भीतर पा सभ्यन्तर मूर्त जिसकी भर्याद महर्व या दो घड़ी के भीतर भीतर जिसकी सामग्तर्महा ययासस्पेन ॥ सो अन्तर्मुहता है। ययासंस्म्पकरि भयवा संरस्याफे फ्रमसे (इन-परा अपरा-रिपम्योपमा अन्तर्मुहर्ता शम्दोका परस्पर) सम्पमा =सम्पन्धा(मर्याद परा शब्दफे सापत्रिपन्योपमा का सम्बन्ध किया जाता और भपराके साय भवर्मुहर्ताका पय निम्नलिखित इसमकार भर्य होगा कि) मनुष्याणाम् पराउरकृप्या "स्थितिमपिन्योपमा" -मनुष्योंका सपसे भरिक जीवनकाल तीनपन्य प्रमाण है। भपराभप पाशमन्तरिमध्येमनेऊ-निकम्पा। सबसेपायिभायुवा)नघन्य(मायाम वर्माहत है । और मध्यविर्षे अनेक भेद है। तमपन्यम् विरिपोपहारपन्पम्।" मा पम्प वीन प्रकार है । ध्यवरारपन्य, उदारपन्यम् शानदापन्यम् इति उदारपम्य भौर भद्धापन्य ऐसे (१) परापरे, परापरे, पराठा, मावा परापरे समवाय ठोस । काई गी पाकर नृस्थिती पाप के पश्चात लिला मासका है। ५ सर्व सिदि ४ परानिसी नमरूपमापपीतव पदच्छेद भौर विपरत्पर्यसवि सर्वार्थसिदिका शम्दशः हिन्दीअनुपाद अध्याय ३ सम ३७ पात्रदानादिसहितम्य तत्रैवारम्भात्कर्मभूमिव्यपदेशो वेदितव्य ॥ इतरासु दशविधकल्पवृक्ष- कल्पितभोगानुभवनविपयत्वादोगमूमय इति व्यपदिश्यन्ते।उक्तासु भूमिपु स्थितिपरिच्छेदार्थमाह- पार-दान-भावि-सरितस्य तत्र-छमारम्मा। प्रशस्त दानादिक (वाका) महित पहारी मारम्म गाने (के निमिष) से पर्म भूमि-म्पपदशावनितम्प इतरास। (तिन पन्द्रानोका) फर्मभूमि नाम मानना चाहिये । अन्य का दूसरों (वेष भर्याद उपर्युक्त सपान उभोगभूमियोंमें और पूर्वोक तीस उच्चम,मध्यम जपन्पभोगभूमियों में दश-पिप-यप यस कम्पित-भोग अनुभपन यश भातिक फायतोंसे इच्छित वा पालिव मोर्गोका भनुमपन सिपपत्ता मोगम्मपामविकम्पपदिश्यन्ते विषय होनेसे मागम्मिय ऐसे नाम कोनाते है (ध्यपदिरपन्) उक्ताम"भूमिपुर स्थिति परिम्हदेद भर्यम् भाडा ऋषित (समस्त) भूमिपोंमें भायुके भषिके ( परिच्छेद) लिये कहत रे फि भनि मणि पापि विपाविमा मिति अपि प्रसि महिती विचा पाहिप और शिक्ष्य ऐसे मी riविता पारिभाnि IT प्रजा जाधमाका -या प्रकार कर्म प्रमार जीविका (शीनम) के कारण होते है। भासि ।। सेवापामा मपि प्रतिनि-विभोर - हो (धर्मभूमिमें) असिम सेवावि (मौर) मती (धर्म) सेवा मुस ! अपि -मरा किया जाता है। (ती)कषि भूमाप्रोमारिया शास्त्र उपजीवने ॥ - भूमि जोतमेम विवक्षिता (और)विधा(म) शोमती बीपबामे या पये में rine परि मिपास्यात्ार -वालिम्पर्म पनियो प्रथा पापारिपी का सम है।शिप (म) आपत्री -निपुसता तुला पा तामपान मास मानाप्रकारे कामगारे Kathaपित -और-वहास्पिचित्र विचित्र पत् वदरणी मूर्तियारमाना(चित्र) -सहमारा गाना AIR मादि (-40)प अपना कामाला परमानम् ॥ -पाना बारमा कमाना दारिमारकी मिकता) स्मरणमा (रेषपूमा गुमपास्त वापर सपमस्तपः । पानति गरस्थानो परमालिनि दिने रेवा गुम्मानिana सपमा तप मा गुरुरी पालना अर्थात् बा(nि) याापापयन यम तप मनिकनानामगर मसिन -हरिनार पर मेलमिनिस)। RAMECHECKR प्राचा मापापभ हिदि सूत्र ।। नृस्थिती परापरे त्रिपल्योपमान्तर्मुहूर्ते ॥ ३८ ॥ त्रीणि पल्योपमानि यस्या सा विपल्योपमा। अन्तर्गतो मुट्ठों यस्या सा अन्तर्मुद्रुर्ता ॥ यथासख्येन सम्बन्ध ॥ मनुष्याणा परा उत्कृष्टा स्थिति त्रिपल्योपमा । अपरा जघन्या अन्त- महुर्ता । मध्ये अनेकविकल्पा ॥ तत्र पल्य विविध व्यवहारपल्यमुदारपल्यमापल्यमिति । सूत्रम्-नृस्थिती परापरे त्रिपल्योपमान्तर्मुहुर्ते-नृस्थिती-परापरे-त्रिपल्योपमान्तर्मुहुर्ते (यथासख्यम् रापार्य-नृस्थितीमपरा-भप"म्पिन्पोपम-मन्तई हो। अनुप्योंकी मायु उत्कट और भघन्य वीन पन्यममाण और अन्तर्गत पथासंरूपमा अनुकमसे है मर्यात् मनुष्योंडी भायु उसष्ट (म्परा) तीन पम्प प्रमाण भौर मपन्य (-अपरा) अन्तर्गत है । और मध्य भायुके भनेक भेद हैं। पुष्पनुपादन-पाणिपल्पोपमानियस्या-सा सीन पत्य प्रमाण है जिसकी सो पिम्पोपमा मतर्गतसर्व यस्या" पिम्योपमा है। भीतर या भम्यन्सर मूहूर्त जिसकी भर्पाद महर्व वा दो पी के भीतर मीवर जिसकी सार"अन्तर्मुश्यियाप्तस्पन सो अन्तमेहता है। पयासंस्पफरि भयया सस्याके फ्रमसे (इन परा अपरारिपन्योपमा भन्धहर्ता शम्दोका परस्पर) समर समन्पोमर्याद परा शब्दके साप त्रिपन्योपमा का सम्बन्ध किया जाताहै और अपराके साय अंतर्महाका वन निम्नलिखित इसप्रकार भर्य होगा कि मनुष्याणामापराउहप्यास्पितिस्पियोपमा अनुप्योका सबसे भविक जीवनकाल तीनपन्य प्रमाण है। अपरा"मप या"भन्तर्महाशामप्पभनेरु-विकल्पा सबसेपायिभायुयानधन्य(माय)म सील है । भौर मध्यवि भनेक भेद है। तळपम्यम् विचिपम्पम्पहारपम्पम्।" कहां पन्य तीन प्रकार है । म्यवहारपन्य, पदारपम्पम्मदापत्यम्पति नदारपन्य भौर भदापश्य ऐसें (१) पपपरे परामरे, पराठा मावा पराऽपरे सब पाय inाई मी यास मूस्थिती वाप रेगरपात लिजा मासम्म नाम सिजि पानिवासी मगरूपसहाय मीतहत पदच्छेद और विमक्स्पयंसदित सार्धसिदिका शम्दशः हिन्दीअनुपाद अध्याय ३ सूच ३७ पायदानादिसहितस्य तत्रैवारम्भात्कर्मभूमिव्यपदेशो वेदितव्य ॥ इतरासु दशविधकल्पवृत्त- कल्पितभोगानुभवनविषयत्वादोगभूमय इति व्यपदिश्यन्ते।उक्तासु भूमिषु स्थितिपरिच्छेदार्थमाह- पान-आन मा-िसहितस्प। तम-एसमारम्भाव अस्व दानादिक (घाफाँ) सहित सहाही प्रारम्भ मेने (फे निमिस) से फर्य मि-म्पपदेशप-वदिक्थ्य इतरासुः" (विन पन्द्राओंका) कर्मभूमि नाम जानना चाहिये । अन्य वा दूसरों (क्षेप अर्याद उपर्युक्त छयान, मोगममियोंमें और पूर्वोक्त नीस रचम,मध्यम जयन्यमोगमियों में रस-रिप-सम्प-तस-यम्पिन भोग-भनुमवन दश मांतिक सम्पवृचोंसे इच्छित पा पांछित भोगोंका अनुभषन विपपसाव "मोमपूमप विशम्पपदिश्पन्त विपप होनेस मोगमूमि एसे नाम फोजावे हैं (म्पपदिश्यन्ते) उनाम् भूमिपुर स्थिति-परिष्द भयम्"माहा कपित (समस्त) मियोंमें भायुके भवपिफे(=परिच्छेद) जिये कहते हैं कि मानि पिसाप विवानिया मिति प्रपि. -प्रति महिमेती, विधा वालिम्प और शिप ऐसे भी राति परिपाक IT प्रमाबोवनीता। -11 मार कर्म प्रमाजीविका (-जीवन) पारखोरे प्रसिधर्म सेवाणम् ॥ पिलिपिपिपोत - (मैमि) प्रसिधर्म समावि (और) मती (म) असमाने मुना र - स्मरत किया भाता है। (ती)कपि मुहाविद्यालय शाम उपविया ॥ ममि गोतम विवक्षित (और)विधा(म) यानकी जीवकामे या पंधे में है पाकिपि मशिलास्यात्र वालिम्प बनियो भयवाप्यापारियो प्राम। (कर्म) सापकी नम् । -निपुचता परला पामीपना प्रोत्सतसे नानासा काममैतुगत नचित्र -और-foen)चित्र विचित्र भर्षात् मारली मूर्तियामाना(चित्र) समर गाना बनाना भारि ( -प्रया गरम कारगुणामृतम् ॥ -सरमा मरता मामा स्पादिपवार को निपुणता) मल antt(s (१) देवपूजा गुरूपास्ति सापाव सपमा पालेति पुरधानो परमपिरिने दिने । पपरा गुम्यति सवा सपमा anim - a गुरुभपासमार्थात् सा(गास्ति) माघम तप सम.thereणारा Ravati - समर्यि। मापापा ८५ सिदि सूत्र ॥ नृस्थिती परापरे त्रिपल्योपमान्तर्मुहूर्ते ॥ ३८ ॥ त्रीणि पल्योपमानि यस्या सा त्रिपल्योपमा। अन्तर्गतो मुहूर्तो यस्या सा अन्तर्मुहुर्ता ॥ यथासख्येन सम्बन्ध ॥ मनुष्याणा परा उत्कृष्टा स्थिति त्रिपल्योपमा ॥ अपरा जघन्या अन्त- मुहुर्ता । मध्ये अनेकविकल्पा ॥ तत्र पल्य त्रिविधं व्यवहारपल्यमुद्दारपल्यमापल्यमिति । सूत्रम्-नृस्थिती परापरे त्रिपल्योपमान्तर्मुहुर्ते-नृस्थिती परापरे त्रिपल्योपमान्तर्मुहर्ते-(यथासख्यम्) सपार्थ-नृस्थितीपरा-मपर"पिन्योपम-मन्तहते।। अनुप्योंकी मासु उत्कृष्ट और जयय तीन पम्पप्रमाण और अन्तर्महत यथासंस्पम् -अनुकमसे । भर्याद मनुप्योंकी भायु उत्कृष्ट (=परा) तीन पन्य प्रमाण और मघन्य (-अपरा) अन्तर्मुहूर्त है। और मध्य भायुके भनेक भेदरें। पुष्यनुपाद -श्रीणिम्योपमानियस्या सा॥ सीन पल्प प्रमाण है जिसकी सो पिम्पोपमा मतर्गत मतपस्या-" त्रिपम्योपमा है। भीतर पा अभ्यन्तर मूहूर्व जिसकी भर्याद महत पा दो घड़ी के भीवर मीवर जिसकी सामवहायपासस्येन सो भन्तर्मुहता है। ययासंख्यफरि भयपा सख्याके प्रमसे (इन-परा अपरा-रिपन्योपमा भवर्महर्वा शब्दोंका परस्पर) सम्म पा सम्बन्धर(मर्याद परा शम्दके साथ निपन्योपमा का सम्बन्ध किया जाताहै भौर मपराके साथ अंवाफा तब निम्नलिखित इसमकार मर्प होगा कि) मनुप्पाणापराप्य स्थिति नियम्योपमा अनुप्योंका सबसे भरिक जीवनकाल वीनपम्प प्रमाण है। भपराजपन्यामन्तहार मध्यो भनेक-विकम्पा सबसेघायिभायुयामपन्य(भागोमतर्मत है। और मध्यवि भनेक मेद है। व पम्पम्प निविषाणाम्यपहारपन्पम् म्तहाँ पन्य वीन प्रकार है । व्यवहारपस्य, पदारपन्यम्मदापम्पम् इति उदारपन्य और भद्धापम्य ऐसे । ८५ . (१) परापरे, पगारे, पराडारे, मावा पपावरे स पाप ठोक है। कई मी वापर मुस्थिती पाक्य रे पश्चात मिला जासका साध सिदि ८५ पद्मनिरासी मगरूपसाय पीलकट पदभेद और पिमपस्पर्षप्तरित सार्थसिदिका शब्दशः हिन्दीभनुषाद मायाप ३ सम ३७ पात्रदानादिसहिनस्य तत्रैवारम्भात्कर्मभूमिव्यपदेशो वेदितव्य ॥ इतरासु दशविधकल्पवृक्ष- कल्पितभोगानुमवनविषयत्वाद्भोगमूमय इति व्यपदिश्यन्ते।उक्तासु भूमिषु स्थितिपरिच्छेदार्थमाह- पार-दान मादि-सरितस्य वर-एप मारम्भाव। प्रशस्त दानादिक (बाकर्मों) सहित वही मारम्म होने (फे निमिच) से फर्म भूमि-प्यपदेशन परिसम्प, इतरामुः। तिन पन्द्राओंफा) कर्मभूमि नाप जानना चाहिये । अन्य का दूसरों (शेष भर्याद उपर्युक्त इपाना भोग मियोंमें भौर पूर्वोक्त वीस उच्चम,मध्यम मपन्यभोगभूमिपों में दश-रिष-पम्प-वृस कम्पित-मोग-अनुभवन दश मासिक फन्पवृक्षोंसे इस्थित पा पांधिव मोगोंका अनुभपन रिपयत्पाद मोगमपातिप्यपदिश्यन्ते' -विपप होनेसे मांगभूमियें ऐसे नाम कामाते है (ध्यपदिश्यन्में) उन्का भूमिपुर स्थिप्ति परिच्छेद-मर्थम् भार कषित (समस्त) भूमियोंमें भायुके अधिके ( परिच्छेद) लिये फावे है कि भनिामपि पि पियाापालिम्प पिति अपि. - मति मशि णेती, विधा पाविम्य भोर शिप ऐसे भी पानि पिानि IIT मा जीवनातपा।१। - मारकर्म प्रशारीविता (जीवन) कारण होते है। पसिन सेवाधाम मपि वलिपि-विषौ। - गहा (मिमें) मसिकर्म सेवावि (और) मसी (धर्म) लेखनकार्यमें मना ! हरि -स्मरत किया जाता है। (पेक्षी)पि भवनामाविका ग्राम उपमोय ॥ * भूमिके जोतनेमे विवति (और)विधा(कर्म) गोखली बीपत्र वा पंधे। पाकिला निर्म शिम्पाल्पातार -वालिम्पम पनिपो भयपा प्यापारियों का काम शिक्षा (कर्म) की -निपुखता परतावा प्रपीपता भयात् हम्सस नामाप्रमाणे काममेचातुराई। -मोर वाणिमित्र विचित्र अर्थात् पारी मनिपालामा(चित्र) -fस प्रकारका गाना मना मावि (पर्ष प्रपोगरा -ना बारना बनाना स्पादिगमञ्चको मिपुता) स्मरीमातar (१) देवप्मा गुरुपादित स्याम्पाप सपमस्तपादान रेसिगास्थान परम्मापि दिने दिने पिपरा पुष्पा सापासपमा तप -रोगबा गुरकी पासना अर्थात् पारित) शानबापम पप HARATAMILAI TRAal लिसिरिने -परिनke sat mirarम पारिन (रि)ो। ANS9999222 फ ranirtuषामनम् ॥

समा मापापा सिद्धि BEEGGEGRECEMBER ॥ नृस्थिती परापरे त्रिपल्योपमान्तर्मुहूर्ते ॥ ३८ ॥ त्रीणि पल्योपमानि यस्या सा त्रिपल्योपमा। अन्तर्गतो मुहूर्तो यस्या सा अन्तर्मुहूर्ता ॥ यथासख्येन सम्बन्ध ॥ मनुष्याणा परा उत्कृष्टा स्थिति त्रिपल्योपमा ॥ अपरा जघन्या अन्त- मुहर्ता । मध्ये अनेकविकल्पा ॥ तत्र पल्यं त्रिविध व्यवहारपल्यमुन्दारपल्यमद्धोपल्यमिति । सूत्रम्-नृस्थिती परापरे त्रिपल्योपमान्तर्मुहूर्ते-न-स्थिती परापरे-त्रिपल्योपमान्तर्मुहुर्ते-(यथासंख्यम्) समार्य-नृ-स्थितीपरा-भपर "पिन्योपम भन्तर्मुहतो। -मनुप्योंकी भायु उत्कृष्ट भौर जयन्य बीन पम्पप्रमाण और अन्तर्मुहर्त पपासख्यम्" =अनुकमसे । भर्याद मनुष्योंकी भायु उत्कृष्ट (=परा) तीन पन्य प्रमाण और जघन्य (=अपरा) अन्तर्मुहर्त है। और मध्य भायुके भनेक भेद है। पुण्यनुवाद'-प्रीणि पम्पोपमानियस्याभासा तीन पन्य प्रमाण है जिसकी सो नि-पश्योपमा "भतर्गत सहन यस्पा" पिम्योपमा है। मौतर या अभ्यन्तर मूर्त जिसकी भर्याद मत पा दो पड़ी के भीतर मीवर जिसकी सामसर्मुराययासंस्पेन =सो भन्तमहता है। ययासंस्पफरि भयमा संम्पाफे क्रमसे (इन-परा अपरा-पिम्योपमा म सहर्वा शम्दोंका परस्सर) समपा सम्बन्धमर्यात् परा शम्दके साथ त्रिपन्योपमा का सम्बन्ध फिया भावाई भौर अपराके साथ भतर्महाका वय निम्नलिखित इसमकार मर्य होगा कि) मनुप्पाणापरावरकृप्या स्थितिम्पिन्योपमा। मनुष्योंका सबसे भषिक जीवनकाल वीनपल्प प्रमाण है। भपराभपन्या"भन्तर्महामध्येभनेकरिफम्पा सबसेघायिभायुवा जपन्प(भाषाम तहत है। और मप्पविर्षे भनेक भेद हैं। सम्पन्यम् निषिम्म्यवहारपन्यम् वहां पम्प पीन प्रकार है । व्यवहारपस्य, उदारपम्पम्मदापन्यम् इति उदारपम्य और भदापन्य ऐसे (१) परापर, पापा वा परापरे सर वाम्प ठोक.- मी याफ्रनस्थिती वाश्य के ८५ लिया जासका साय सिद्धि CGLGEMBERCEAR एटानिवासी नगरपसाय वकील रुस पदच्छेद और विमरस्पर्य सरित सवायसिदिका शम्दशा हिन्दीअनुमाद । अध्याय ३ सूम ३८ अन्वर्थसज्ञा एता ॥ श्रायं व्यवहारपल्यमित्युच्यते उत्तरपल्यद्वयस्य व्यवहारबीजत्वात् नानेन किञ्चित्परिच्छेद्यमस्तीति। द्वितीयमुद्दारपल्यं । तत उध्दतैलॊमकच्छेदैर्दीपसमुद्रा सख्यायन्त इति । तृतीयमहापल्यमद्धाकालस्थितिरित्यर्थ ॥ तत्राद्यस्य प्रमाणं कथ्यते । तद्यथा-प्रमाणागुल भरर्य संग्रा-एताभ व्ये (तीनों पन्य) साफ नामवाले रे भर्याद जैसाजैसा जिसजिस पम्यफा नाम पैसा पैसा उस पम्प का भर्य है। भापम् । पसारपन्यम्।। इति उपवे उत्तर अपम व्यवहार पन्य (नाम) कहामाया है क्योंकि (पा व्यपहारपन्य) भग्रिम पन्प-ट्यस्पद म्परागार-पीमताव" म्दा पम्य (उदार तया भदा)के व्यवहार भयवा घर्तनेका कारण (श्रीजत्वाद) भर्या उदार और प्रदापन्यकी उत्पति जाननेके लिये व्यपारपन्य है। नमनन । किनिन् परिच्छयम्।मस्ति इति =न इस (व्यवहार पन्य) करि फोई वस्तु (किम्चद) प्रमाण कियेजाने योग्य षा विचारनीय है अर्थात् व्यवहार पन्य किसी वस्तु के नापनेके काममें नहींभावी है। केरल उसमें रोमोफी गणना ५५ मक प्रमाण होती है "प्रयम रोम गिनिदेय" द्वितीयम् ॥ उदारपन्पम् गतत जप खोमच्दै । मरी न्दारपस्यौ वासिलामकलंट निकालकरि पा उदारपरि (उध्दवैः) दीप-समुद्रामप्यायन्नाइतिअनृतीयम्"मदापन्यम्" श्रीप और मद्र गिने जाते हैं “सरि द्वीप समुद्र गिने” । तीसरी मदापन्य भदा-काल-स्थितिमा विश्वमर्थ ॥ बहुत पा उस्कृप (अदा) कालकी स्थितिवाली है ऐसा भाशय समापस्या प्रमाणम्" कथ्यते वपयाछ मा प्रथम (पन्य) का प्रमाण कहानाता है। जैसे -प्रमाण भगुल मर्यात् घर अंगुल जो उत्सेपभंगुल प्यपदारमंगुल, मलिक अंगुख भपवा भाठ मोके मध्यमागोंके प्रमाणस पचिसौगुणा है तिसके (३) तो मादि मप्प भावरि रहित निमा दूसरा पिमाग नो ऐसा प्रविमागो परवा परमाणु राणेदपकरि प्रणा नदी पाता। जिसमें एक स प प पर गाय दो पर पापांच गुप। ऐसा मनraria परमारे समावि भवनाम करतेभवमनासन पाठ मिस तप ए संहासन(पासासant बाट सामान मिले तब एक दररेण गोता। पाठ तुररेणुष एक मारेल (सरल) भोर भारतमा परेक(रोष मार परेणुभएकचम भाग भूमि मनुष्य पालमप्रमागमा समभोग भूमि अनुप्रगानMAnanान नियमनाग मामलोग भूमिकनगुम्बा मा गाम मिने प्रमाण-भगुल सर्या 1 एटानिगासी भगम्पसाप फीलकत पदपद और विभक्स्पर्यसहित सार्षसिदिका शम्दशः हिन्दीभनुवाद भन्याय ३ सूत्र ३८ परिमितयोजनविष्कम्भायामारगाहानि त्रीणि पल्यानि कुसूला इत्यर्थ । एकादिसप्तान्ताहोरात्र- जाताविधालाग्राणि तावच्छिन्नानि यावद्वितीय कर्तरिच्छेद नाप्नुवन्ति, परिमित-योजन-विषम्म भापाम अमाण करि भयषा नापे हुये योजन(योजन) मर चौड़ाई (विष्फम्मालम्पाई-भाषामामार भरगानि प्रीणि पम्पानि भाराईवाले (गोल गेलके भाकार) सीनि सारे या गड़े (=पन्यानि) इसूला इतिहमर्प महोले पा सत्ते (सूला अशूला) है ऐसा अभिप्राय भयपाभाशय है। एक-मादि-सप्त-मन्त मोरार माक्-भरि -एक से सात तक दिन रातके जन्मे हुये (उसम भोगममिके) मेगा पा मे ( अवि)के पाल-भप्राणिसावदक्षविभानियावदछ केशका(पासाल) भप्रमाग वव कक छेदफर फाटफर जव सफ (पावत् ) द्विनीपा कर्वरि-प्टे न भामुपन्तिा जूसरे (लघु) खंद कतनी ( कर्तरि,कर्सरी से प्राप्ति नहीं होसकते हैं (पूर्वोक्त गगहा) सप पर अपम्य मोम भमिक मनुष्य के बाल का भप्रमाण होता है । मघम्प मोगभूमिके ममुप्या पालो मप्रमाग पाठ मिले तब एक कर्म भूमि के मनुप्पो वाम मप्रमाग होता है। माठ गर्म ममि नरके बालके भप्रमाग मिले तब एक सोप(-लील)ो भाठ सोच मिसे तब एक पूजा (-3) अपवा तिमहो। पाठ सिम मिले तर एक पबमय भपवा यो का मम्पमाग के प्रमाव हो । माठ पषमप्प को एक तस्सेप अंगुल होता है। इस मंगल करिनारकी तिच मनुष्य देवांग शरीर तथा प्रहभिम प्रतिमाह मापिये है। परि पाँचसे पूर्वोद सत्सेप अंगुलका एक प्रमाण मगुरु होता। सो पा ममाप भनुन प्रपसचिौपारे पहिले वाकवाद हापरे भगुलाबराबर होता है । तिस समप विस अंगुलपरि गाव नगराविकका प्रमाण होता है। माप पास में मनुष्यों का अपना अपना मगुल का प्रभाव होता है। अर्थात् विस काम में जैसा मनुष्य । उसका भगुल इसको प्रारम भंगुन परत ।ससे मिष मिय समय के अनुसार गांव मगर, मवन घर प प भासम पुगा प्रादि का प्रमाण होता है। प्रमाण भंगुलसे मोप मम वा उमादी नदी पर्यंत विमान, नरको प्रस्तार, जैमपाम मादि मठनिम पस्तुगा विस्तार मायाम मादि मापे गाते हैं। यह भगुत पएक पार बारपुत्ता एफ बिस्ति (विनार विस्ति) यो विसाद सापक आप दो हाथ का पाइपु भयया गम, दो मापा एक धनुप को सानो प्रमास पोजन होगा। दो साल बापमा एक कोश चार गोगना पर पोमन रस लिये पांचसी म्पपहार योजना एक प्रमाण योजन होप है। अर्थात् रसेप अगुल के सार्य KORE सिदि एटानिरासी नगम्मसाप यकीन इस पदच्छेद और पिमरत्यर्थ सरिस सायसिदिका शब्दशः हिन्दीभनुपाद । अध्याय ३ सूत्र ३८ अन्वर्थसञ्ज्ञा एता ॥ श्राद्यं व्यवहारपल्यमित्युच्यते उत्तरपल्यद्वयस्य व्यवहारवीजत्वात् नानेन किञ्चित्परिच्छेद्यमस्तीति। द्वितीयमुद्दारपल्यं । तत उध्दतैर्लोमकच्छेदैीपसमुद्रा सख्यायन्त इति । तृतीयमन्दापल्यमहाकालस्थितिरित्यर्थे ॥ तत्राद्यस्य प्रमाणं कथ्यते । तद्यथा-प्रमाणागुल भरमसंग पसा व्ये (मीनों पन्य)सार्यक नामवाले रे मर्याद जैसानैसा जिसजिस पन्यका नाम पैसा पैसा उस पन्य का भर्य है। भापम् । प्यपसरपन्यम्।। इनिश्चच्यते। उधर अयम म्पपार पन्य (नाम) कानाता है क्योंकि (पह व्यवहारपम्प) भग्रिम पन्य दपस्पा पवार यीनलाद" दा पन्य (उद्धार तथा भदा) के व्यवहार भयया वर्वनेका कारण (-श्रीमत्पाद) भर्पा उदार भौर भदापन्यकी उत्पति जाननेके शिपे व्यवहारपन्य है। नश्मनन किनिन् परिपपम्।मस्ति इति =न इस (म्यवहार पन्य) करि कोई वस्तु (किञ्च) प्रमाण फियेजाने योग्य पा विचारनीय है भर्यात् व्यपार पन्य किसी वस्तु के नापनेके काममें नहीभाती है। फेरल उसमें रोमोंकी गणना ५५ अंक प्रमाण होती है "प्रथम रोम गिनिदेय" दिलीपम्प उदारपन्यम्। ततपत लोमडच्दै। दूसरी उदारपन्यो यहाँसशामकखंड निकालकरि पा गदारकरि (उध्दतैः) दीप-समुद्रामम्पायन्नातिनुतीयम्मदापन्यम्।" =ीप और समुद्र गिने जाते हैं "दूसरि द्वीप समुद्र गिनै" । सीसरी भद्धापन्य भदा-कास-स्थिति इतिश्रम अहत वा उत्कृप्प (भदा) कालकी स्पितिवाली है एसा माशप है। नयमापस्पा ममाणम्" कथ्यते तयया शो प्रयम (पन्य) का प्रमाण कहानाता है । जैसे पमास मंगुल अमाण भगत भर्याद था मंगुल जो उत्सेपमंगल व्यवहारमंगुल, प्रचलित अंगुल भपरा भाठ मोके मध्यमागोंके प्रमाणस पांयसागुणा तिसके (१) नादि माप मातहरि रहित जिसका दूसरा दिमाग को ऐसा भरिमागी पहल का परमासोन्यकरि प्राया नहीं जाता। जिसमे एक रस एक वर्ष एक माप रो पणे यह पांच गुप। ऐसा ममतामात परमारों के सम्मान प्रवास माना । अषमनामन भार मिले नए एप संहासं( मप्राममारोता: भार नाम मिले तब एक रेप पीनामा तुरा एक अपरेय (जनरल) बोर मारपमरमपए (परेका भार परेणुपएकसम माप भूमि मनुष्य पालका प्रमभागामार इत्तमभीग भूमि अमुप्पामा मिनेन भूमिमा नागोबार मामलोग भूमि मनुष्य के सभा भाग लिने ? सिद्धि एयनिरामी जगरूपसहाप सफीलात पदद और पिमरत्पर्यसहित सार्यसिद्धिका शम्दशः हिन्दीमनुवाद अध्याय ३ सूत्र ३८ परिमितयोजनविष्कम्भायामापगाहानि त्रीणि पल्यानि कुसूला इत्यर्थ । एकादिसप्तान्ताहोरात्र- जातानियालाग्राणि तापच्छिन्नानि यावद्वितीय कर्तरिच्छेद नाप्नुवति, परिमिन-पानन रिप्पम्भ मायाम अमाण करि भषवा नापे हुय योमन(योजन) मर चौड़ाई (विष्कम्मालम्वाई-भायाम)और भगारानि पीणि पम्पानि ॥ गाराईवाले (गोल ढोलके भाकार) वीनि साटे या गड़े (=पन्यानि) इस्लाम इतिश्मर्य महोले या सत्वे (इस्ला-शूला) ई ऐसा भमिमाय भयवाभाशय है। एस-मादि-सप्त मन्त-मोरास्नात्मवि -एफ से सात तक दिन रातफे मन्मे हुये (उत्तम मोगभूमिके) मेहा या मेह (-भवि)के पाल भप्राणिसानाविभानियावन्छ केशका(पाल-चाल) अप्रमाग तब तक छेदफर काटकर जप तक (यावद ) दिनीय कर्तरि कोई न भामुवन्तिा दूसरे (लप) संह कतनी (-कर्वरि,कर्तरी से माप्ति नहीं होसकते । (पूर्वोक्त गगहा) तब एक अपम्प मोम भमिके मनुष्य के पालका प्रप्रभाग होता है। अपम्प मोगभूमिके ममुप्यो बास भमभाग माठ मिस तप एक कर्म भूमि के मनुपरे पास माग होता है। माठ गर्म भूमिके मरने वालके अपमाग मिले तब एक सोप(-बीच)ो माठ बोल मिले तब एक पूषा (-3) भगवा मितहो । भाउ तिल मिस तक एक परमाय अथवा जो कामप्पमाग के प्रमाव हो। पाठ पषमय का एक सरसेप मंगुका होता है। इस गुद्ध परिमारको तिव मनुप्प देवाय शरीर तपा मानिम प्रतिमासा देव मापिपे है। बारि पाचसे पूर्वोत सेप भंगुसका एक प्रमान भगुल होता। सो पर प्रमाण मनुल भपसर्पिणी भात पहिले पक्रवाहापरेमगुसके बराबर होता है । विस समप तिस भंगुप्तकरि गांव नगरादिप प्रमाण होता है। पाल में मनुष्यो भपना अपना भगुल का प्रमाव होता है। भात् विस काल में जैसा मनप्प हो उसका अगुल इसने भात्म भंगुस बात ससे मित्र मिय समप + अनुसार गांव नगर मवन पर रप पत्र भासन पुणा मादि का प्रमाण होता है। प्रमाण भंगुलसे सोप समुद्र तथा उनकी ही नदी पर्वत विमान नरको प्रस्तार, अनपाम मावि भठत्रिम वस्तुको विस्तार भापाम-प्रापि नापे गाते हैं। यह अगुल पार पाल पुस ताप विवस्ति (विवार विसस्ति) रो विदा एकप दो हाथ का एक पु अपवा गा पो गजप एक धनुष कोठो सानो प्रमाण पालन होगा। रोसापाचारणा पर पोजन इस लिये पांच सौ म्यवहार योजना एक प्रमास योजन होप है। अर्थात् रसेप प्रगुसरे सराय सिदि पयानिवासी प्रगस्मसाप पीत रुच पदवेद मौर विभक्स्पर्ष सहित सपायसिदिका शम्दशः हिन्दी अनुवाद । अभ्याप ३ सभ ३८ अन्वर्थसञ्ज्ञा एता ॥ अार्य व्यवहारपल्यमित्युच्यते उत्तरपल्ययस्य व्यवहारबीजत्वात् नानेन किञ्चित्परिच्छेद्यमस्तीति। द्वितीयमुद्दारपत्य । तत उध्दतैलॊमकच्छेदैर्दीपसमुद्रा सख्यायन्त इति । तृतीयमबापल्यमहाकालस्थितिरित्यर्थ ॥ तत्राधस्य प्रमाण कथ्यते । तद्यथा-प्रमाणागुल भरसंशापरता -ये (वीनों पन्य) सार्थक नामसाजे रे मर्याद जैसाजैसा निसनिस पन्यका नाम पैसा पैसा उस पन्य का अर्थ है। भापम् पवारपल्पमा इतिछाप्यते रघर अयप प्यार फ्ल्प (नाम) कहानावा है क्योंफि (या व्यवहारपन्य) अग्रिम पम्पदपस्पति पदार-पीमताद" दा पन्य (उदार तथा भदा)के व्यपार भयया पर्वनेका कारण (श्रीजत्वाद) भर्थात् चदार और भदापन्यफी उत्पत्ति माननेके लिये व्यवहारपन्य है। नशमनन । प्रिनिन् परिपपम्तमस्ति इति न (ध्यमार पन्य) करि कोई वस्तु (किम्वद) प्रमाण कियनाने योग्य वा विचारनीय है अर्थात् व्यवहार पन्य फिसी वस्तु के नापने के काममें नहीभाती है। फेवन उसमें रोमोंकी गणना ४५ भक प्रमाण होली रे "अपम रोम गिनिदेय" दिनीपम् शारदारपन्यम् गानतातोपरच्दै । मरी उदारपन्य है पास लापकसर निकालकरि पा उदारकरि (उस्तै) दीप-महान सम्यापनापतितृतीपम् भद्धापन्यम् ।।दीप और समुद्र गिन मात है "इसरि द्वीप समुद्र गिनै" { सीसरी मदापम्प भदानाव-स्थिनि। इतिकमा बहुत या उत्कप (अदा) कालकी स्थितिपाती है ऐसा माशप है। नामापस प्रमाणम्!" इप्यते सपयाच मा प्रथम (पम्प) घ प्रमाण फडानाता है। जैसे प्रमाण मगुल भर्यात् षा मंगुल मो उत्सेधमंगल प्यवहारगुल, प्रचलित भंगुल अपरा माठ भोक मा यमागोंके प्रमाणस पायसांगणा रे तिम (न मानिस मम्सरविरहित जिस सम विभाग नरो पेसा प्रतिभागी पाबा परमानासो इन्द्रपरि प्रक्षा नहीं जाता।। जिसमें एक रप पर ये एक गारोप पर पांच गुण। ऐसा मनतात परमाएमो के सामान भार मिले तर मासmtiमार समा म त एक पूररेषु पनामाठ तुररेणा एमरे (प्रतम भोर माठ शमन कर लt (OROभार परेननए म माग भूमि मायामाम भार समभीष भूमि मागोमाnaamanोग भूमिमानुपाजामागमा मनोग भूमिरम्परामा भाग मिला प्रमाण मगुन एटानिवासी नगरपसाप दाल इव करमदेव भौर विमारपर्व सहित सपिसिदिफा शम्मा हिन्दीभनुवाद । मध्याय र सूब ३० या (रस ष स) सौ (सौ) परसमें शा सिद्धि साप ve . . . .. o . ६४४५४५ ४.०० .........१००००. .. . .. . ५१.६१४.५१५२५.. नपर्ग ममाह पोजन पेपर सोमवोधे गnt(बामको से गुपा कररिया आये तो घनाकार महा चोखन वाममारमा योगम रोमम्पर तास प्रमात मिसिमित विधि से मात्रै है: पोलि पाँच पड़ा मथमा परी गायोमास और हम जानते हैं रिमोसम कोराक सोमम्पर As... गुपन का एक नियम यह भी है कि गुरुप और पुषक मया दोनौमसे बिसी मतम साप एमनिरासी मगरूपसाप पकील व पदच्छेद भौर विभपत्यर्थ सरिव सर्वार्थसिदिका शन्दशः हिन्दी अनुवाद अध्याय ३ सूत्र ३८ तादृशैलॊमच्छेदै परिपूर्ण घनीभूतं व्यवहारपल्यमित्युच्यते ॥ स्वर-मालोमच्छदै परिपूर्णम वैसे ही (वारशैः) रोमसंदकरि सम्पूर्ण (परिपूर्ण) पनीनम् प्यवहार-पन्यम् ॥ इतिच्या ठोसरूप भरामाता है (यनीमन) सो व्यवहारपन्य इस मफार वर्णित की गई है। सिद्धि 1922 क (१) प्रथम एक माा योजन अपपा प्रमाण पोमन लाये पौड़ भोर गारे इस प्रकार घनाकार प महा पोमनके गरमाके लोमोसी सम्या मुमम मोर विस्तार पसे करते हैं। उनमारी सम्मा उतमाही घोड़ा उतमाही गहरा मापा जंघेको घमाकार कहते हैं । इस टिप्पणीका प्रमासभंगुलकी रिपती पार और समम पर पाना चाहिये । एक भनाभर प्रमाय योजना का एक पपहार योजम के पनाकार गदेसे पांयसौ गुना सम्म पारसौ गुना कौरा और पापसी गुहा गाग होता है। और एक प्यपहार योमम चारकोश का होता है। इसलिये प्रमाण पोजनका मदवा दो सदस पोजन मायबोसाय योजम घोड़ा और दो सान पोजम गहरा हुमा। या प्रकरण कुछ किप्टरसलिये निम्नषेत्र पाठकोको सुगमता के लिये है। समम पेत्रको प्रत्येक भुजारा गम घर । दो दो साल कीस की मामी गई है। एक प्रेस २००० पाप mm R.४५४-१५२०. गसेच मंगुल हुये इसलिये एक महायोजन अपवा दोसाप्रमोसले १६२००० ४ २०... umn ससेप भगुत हुयेण-ग-11-पर-पास.....x:-10७२०.....मारे मौसमान पुणे 100२...nx-२t.तिय २७t......x:-१६१.0000.00 बीच १३१५०.....mox E-RE६४... कर्मममिके ममुप्पो बामप्रमाग हुये । १५७२०१४.....०४८-१५८०४१२....० अपम्पमोग मामि ममप्य वासरे ममाग १९५२९१५......x:-१.३२४०... मप्यम गोगभूमि ममुप्पर पाबले भाममाम १Relim.mxnn... रत्तम मागभूमि मनुपरवा अप्रगात रस (EOINNEOOOOOD) संस्थाले एप्रमानासन मापाप मागासीमा रेवारे मोमणेर रस संसारसी संपासे गुणा पलेसे (क्योकि रेखा बगरेका metha th-Riwal मर्ग ममान योजन.. घ CS एयनिवासी मगरमसाय बीस रुप पदच्छेद मौर विमारपर्य सहित सबायसिविका शमशा हिन्दीभनुगाद । मप्पाप सूत्र ३८ तवर्ष शता या (ग्स कूप से) सौ (सौ) वरसमें सिद्धि सार्य ० -- o ० . ६४४२४५०६४५ . ०. .. . . २४१५३१११.४ .. . ... GEECEEG ..... .०० ६७४२५५०६५४ ४५१५११.५१५२... हर वर्ग ममा पोजन के सोमवौ पर(सोमददी से मुला करदिपा आरे तो घनाघर मा योजन पा भनागर प्रमाल पोगमले पेमश्र वैवास प्रमाण निम्नलिखित विपि से माते हैं। क्योकि पूर्वोक्त महा अपवार की गहराईयो सास बोगी और हम जानते है लियोन पोराके जोमम्र 1.monkyषन का एक नियम पर भी किएप मोर गुणा भाषा बोनौमसे किसी प्रतमें साप CC सिदि 1 पानिपासी मगरूपसाप पकील व पदच्छेद और विमत्यर्य सहित सर्वार्थसिदिका शम्दशा हिन्दी भनुमाद भध्याय ३ सम ३८ तादृशैलॊमच्छेदै परिपूर्ण घनीभूतं व्यवहारपल्यमित्युच्यते ॥ त्यसमा खोमच्दै परिपूर्णम वैसे ही ( तारशैः) रोमनटकरि सम्पूर्ण (परिपूर्ण) पनीमतम्।"व्यवहार-पन्यम् ॥ इतिकसयतेा ठोसरूप भराजाता है (अनीस्त) सो व्यवहारपम्प इस प्रकार वर्णित की गई है। (१) प्रथम एक महा योजन अपपा प्रमाप पोजन बम्बे चौड़ और गारे इस प्रकार घनाभर समायोजन गरके लोमडेपोको सम्या सुपम और विस्तार स्पसे करते हैं। उनमा बम्ब उतमाही मोड़ा उतनाही गहरा भरावा मधेको भनाकार करते। इस रिप्पणीका प्रमाणभगुतकी टिप्पनी पार और समम पर पढ़ना चाहिये । पर धमाकार प्रमाए पोजम प्रदा एक प्यपहार पोजम के पनाभर गदेसे पायसो गुना सम्म पांचसौ गुना पौड़ा भोर पापसौ गुणा गारा होता है। मोर एकम्पपहार पोजम चारकोशाता है। इसलिये प्रमाण योजमका गड़हा दो सहन पोजन सम्य पोसान योजन पौड़ा और रो सान योजन गरा हुआ। पार प्रकरण कुछ क्रिप्ट है इसलिये निम्नक्षेत्र पाठकोंबी सुगमता के लिये है। ज्याप पेरणी प्रपेड मुजारमाण पप पर दो दो साल कास की मानी गई है। बोस २००० पाप tn E.४२४१३२०. असेच भगुमाये इसलिये एक महायोजन भयवादोसाकोस १६२०००४ २००० New... रामेप प्रगुत हुये----- म्यासIEve....x:-१-७२......मारे औरेसमान हुपे १७२०.tonxcustom-तिन पे Rste.....x:-१to...जीव १४१५०० ....४ ८-११७२८१४र्मममि मनुप्पो वाला मप्रमाग हुपे । १५७२10 .....xE-१५२४१२०..... पपमोग भूमि के समुप्प के पास से मप्रमाग १५५२६१५....x:-१.२६९. ... मप्यम मोमभूमिके मनुप्पर वायके भप्रभाग। १Rimixrancom..तम मागमिरे ममुप्पो पास भप्रमाग इस (CORRUILEOO0000) सर एक प्रमास योशन भाषा एक महापासनीसम्म रेखा मोमणेत ये रस संका को री संस्थाले गुणा परोसे (पौषि म बगरेका रसपान tial पर्ष प्रसार पोजन योमर नि. FreesserreceGGEETER घ ।

एयनिवासी मगरूपसाप पडील व परम्पद और पिपात्पर्य सहित सपायसिदिका शमश हिन्दीभनुपाद । प्रप्याप ५ मा ३८ सिदि माती मम पुत्तमा बफ मारे पसे गसितकम निपमसे सिमापा जाता है विवक्षित वृत्त प्राधे सराको से गुणा करता गुनमको रस वृत्तपत्र प्रमावोगा। वस्तुकाममग पर दो प्रमावागा मोदि पदापर एक पास मामा मापे पर्ग'मा और मारे पमे १०४ वर्गमभ परिणामी और • मम पमे परिणाम सिम मापे ग्यासको गुणा करमा पहला उममें से गुणा बरमा पyat, सेमी पिक समाप को माप पारे प्रत्यौमे सममापा(सो मायापकी टिपली पठा। पररेगा एकपोजम प्रमाण मलिप इस प्रमापत्र मेधया एक योजन पका पाप फन गरास प्रथा करमेस निकलता है भात १x१- धन रूपरे। अब करके पैतालीम पपरकी संभालो मगमतासलिये पनसा मानो और पापिन निकलनेवाली सस्याको फल मानो का समभार ग्रेगशिष किस वही समाप मापनसल्याचे फासल्यास है अर्थात् १धनसतण फन संरपा इसलिपे फनसंख्या = फल संथाXXघन सम्मIX धन संस्पा । प्रथम १८ से गुहार के पश्चात् माग २४ का मन सम्याम वर्ग मात् =IXपन सम्पा ५२२२१५६५४-७५१६• 101201२०..............0 मामी दुई घन सध्या । इसको उप्नीस से गुणा किया तो गुलनपम -६८२२८५३१११६५४-०२६२१०:00m... 000000000 CEGREEeeeeecs २४ ७५ ७२ २१॥ एम ४८ EGEGeeREGC ISSETTEleisual RAFFlexaas #sASE last saxjTaileral ४८ २४ (16 ५२ ४८ ७२ ७२ NEERPIRETRINEEReten ............(४१३४१२६१०३०४२०३७INE५९२१६२0000000000........ इस प्रकार :पहार परपके समस्त रोम की सस्या निम्न पर प्रमाण ४१५1०:२०११७.४५१२१४२0 0.000000..... माम मरिम भजिसका अभिप्राय सबभोरगम्य शमसे एक मरे पर होगे चौरविप पा पांच पाय पट तीम है धार(पर)एक(ऐसेही)ीन चार पाचदा परतीमा मम तिप मम पसुरो मम तिपदीय है "म्प(-1म) तीम विंदु माठ, दो गिबु तीम पर सस सस सस पीनी पन पदो कहे -सात सात, सात घार, मी पांच एक दो, एक मोदी भागे ठारे सुख सरपलहे (विधानतराप) - मष दोप (फिर एज्यूसरे पर)सब मठारह एम्प पापस्या पैतालीस निकम मातkal .

सर्राय एट्यानिवासी नगम्पसहाय वीजात पदच्छद और विभक्त्यर्पसहित सर्वार्थसिद्धिका शम्दशः हिन्दीभनुवाद मध्याय ३ सूत्र ३८ 80 गो शम्प को रनको शप यो माप गुरु मेरे पमान गुबनना अंतमै उतनेही शम्य लगादो तो ठीक गुसनफम वैसाही मिकलमाता जैसा पर भी किपा से मिला है। जैसे ५० गुरुप और 10 गुणा तो ५ और गणमफल १५ के मम्त में दो शूम्प रखने से भी १५०० हो गावे १ और सिरोति से मी १५०० माते हैं मगमता के लिये हमने नीचे पहा विधि प्राख परे: सिदि ५१४२ 0. .. M १४८५१०३१३५ से गुणा करना वो निम्न लिवित मकाको गुलाधरके गुसमफलके भन्तम १० एम्प रखयो । १४८५ १८३४६३४१३५१४२५ ८.५३.१३१८ . 1११११ ०७E.५०१०३५४४ १६४५५ ५५.९.२४.५.२७२ 1:४१११.. ७.०४.१.८५४४ . ..... १४५५५५५.५४०२४०५४२७२ ५१८८४ ५.२२५५४५४ १४८.३१७.६८.२000000000000000000 हमारा महाप्रपार परपम गोसाइप मापार है। साकि वापर मोर्णाकार वो भीतर पर समे प्रमाविषयी एमोसन)मानी तिपत्रमा मिनरपने गुभारिपन मिचानेसे ही परिधि माती भात !xixt.-१०-१-(वर्गमून) x1-11 मताचामन पाण्णासाची मापाचाराप" सिद्धि HCECREE 81 एयनिवासी बाससा सोलाइव पदायर और विपणत्पर्यंतरित सर्यिसिदिश सम्पराः रिवीमनुपाद प्रापाप ३ सभा २८ पूर्णमहापल्यम् ॥ तत समये समये एकैकस्मिनोमच्छेदेऽपकृष्यमाणे यावता कालेन तद्रिक्त भवति तावान्कालोऽचापल्योपमाख्य ॥ एषामदापल्यानां दशकोटीकोटय एकमदासागरोपमम् ॥ दशाहासागरोपमकोटीकोटय एकावसर्पिणी ॥ तावतेवोत्सर्पिणी ॥ अनेनाद्धापल्येन नारकतर्यग्यो- नीना देवमनुष्याणां च कर्मस्थितिर्भवस्थितिरायु स्थिति कायस्थितिश्च परिच्छेत्तव्या ॥ पूर्णमदापण्यम् पर्ण एर्ण प्रदापय होती है भाद उपर्युक्त पदारपश्यफे एक एक रोम के इतने श्वने संरकिये जाय कि मिवने मितने सौ परसके समय होते है तव मदापम्पके रोमोफा ममाण होता है॥ समय समय एक एकस्मिन।' प्यासि समय समयमें भर्पाद प्रत्येक समयमें एक एक (पूर्वोक संड किये हुये) रोमददो अपकप्पमा पापला कालेना म्सोमच्छेद निकासनेमें जिस काशफरि बद- रिमपविातावान का भदा-पम्पोपम चा साक्षी गोमाता है। उतना काल भदापरयोपम (फे नाम) से भास्पदशकोटीकोटपाएपदा-पायानाम्पसिद्ध है। दश कोड़ा कोही इन मदापम्पोंका एभदासागरापमम् ।।दश भदासामरोपम्फोटी-कोटपा एक भदासागरोपम है। दश कोड़ा कोड़ी भदा-सागरोपमका पर भर-सर्पिषीवायएर. -एक भवसर्पिणीकाल है। तितनाही (दश कोरा काही भापम्योपमा) उत्सर्पिणी । भनेनगाभदा-पापेना नत्सपिणी साल है। इस भदापम्पकार नारक-पैन्पोनीनाम देव-मनुष्याणाम् प० म्भारफियों मार तिवृषोंकी और (-५) देव मनुष्योंकी कमस्पिविधा मनस्थितिमा कमस्थिति। मदस्यितिमा मात् एक भवकी स्थिति मापुस्विविय" कापस्थिति"पपरिणेचम्या -मापु स्थिति और (म) कारस्थिति जानना पारिये। (१) समपर्म मोहभप धारबारे तिमो भएस्पिति तसे पुषियी मग पापुलपिक गोगों पपरिपति प्रसंगमासमोर ममाप सिहोम ग्पन को पतासाजताई ग्पापी रेरि वनस्सविधामा मनम्न सो मसवात पुल परिवर्तनमा परि पिसक्यात सामरस है। पंचेविनितिक मनुजनिती पराटि पूर्व मषिक हानि पहल गरि अपम्प आयस्थिति antakमात्र एरिमालनि मास्थिति साप स्थित पसदेवनही दोवा नारकी मही रोता र नियम।

सध मम्पापा सिदि भरमाCEResect सूत्र ३८ एक्कलोमापकर्पणविधिना यावता कालेन तद्रिक्तं भवेत्तावान्कालो व्यवहारपल्योपमाख्य ॥ तैरेव लोमच्छेदै प्रत्येकमसख्येयवर्षकोटीसमयमात्रच्छिनैस्तत्पूर्णमुहारपल्यम् ॥ तत समये समये एकैकस्मिनोमच्छेदेऽपकृष्यमाणे यावता कालेन तद्रिक्त भवति तावान्काल उद्दारपल्योपमाख्य ॥ तेपामुद्दारपल्याना दशकोटीकोटय एकमुबारसागरोपमम् ॥ अर्धतृतीयोद्धारसागरोपमाना यावन्तो रोमच्छेदास्तावन्तो द्वीपसमुद्रा ॥ पुनरुदारपल्यरोमच्छेदॆवर्षशतसमयमात्रच्छिनै एक-ए-सोप भपकर्षण-विपिना यात्रता -एक एक रोम निकासकरि (अपफर्पणविधिना) जिस प्रलेन सह-रिक्तम्।। मरेन्। सालान्। काज कालकरि वा (प) वाली सोये उतना काल प्परहार-पन्यापम माम्पमा एपछचोमयदे सम्पपहार पन्य (के नामसे) प्रसिद्ध है। तिनही खोमच्छेदोंसे मत्पफम्मसंस्पय-वर्ष-कोटी-समय -एफ एकके असंख्यात करोड़ वरसोंके समयके मार-छि तामापूर्णम्॥ उदार-पन्यम् ।। समान भयवा वरावर (मात्र) स्वोंसे घर पूर्ण उदारपम्प होती है। पर्याद पूर्वोक्त पैतालीस प्रक प्रमाण व्यवहारपन्यफे पृषक पथफ रोमके इतने इतने संर किये आय कि नितने जितने मसंख्यात फोर परसके समय होते हैं वष उद्धारपन्पके रौमौका प्रमाण होता है और वन समय समयो एक-एकस्मिन् । रोमच्छेदा। यादसे समय समयमें भर्यात प्रत्येक प्रत्येक समयमें एक एकरपर्षषिमानित)योमछेद भपकप्पपाण। यारता कानपद रिकम् । मपति =निकासनमें मिस कालकरि बह रीवा रोमावा है ।। वारान कालम उदार-पम्पोपम मारूप पर काल उद्धारपम्पोपम(केनाम से प्रसिद्ध है। इतना समस्तकाल उदारपस्यका तपाई उदार-पण्याना दश-काटीको गएकादश कोडाकोड़ी तिन उदारपम्पोका एक ग्दारसागरोपमम्मतृतीया- उदारसागरोपम । भाई उद्धार उदारसागरोपमानामा यारन्त रोमखेदा।। सागर ममाणकेमिसने खोमप्पद रे वारन दीप-समुद्रा पुनझदार तितने दीप तथा समद्र (इस एक रामगाजे तिर्यगशोषम) रे महुरि ग्वार पन्य रामन् पर्प-शान-समग-मार गिर पापफेरोमोनास (१० एक) मौषरसके समयोंके बराबर (भाषालरोसे एन्फानीरा-हारकरमानामानन्तनास्तरकन्समाचारजनमान सराय है नस्प श्यनिरासी ममम्पसहाय पीलात पदपर और विभास्पसहित ससिविका शम्दश हिन्दीभनुपाद मायाय ३ सूत्र ३६ तिरचा योनिस्तिर्यग्योनि । तिर्यग्गतिनामस्मोदयापादितं जन्मेत्यर्थ । तिर्यग्योनौ जातास्तिर्य- ग्योनिजा । तेषां तियग्योनिजानामुत्कृष्टा भवस्थितित्रिपल्योपमा ॥ जघन्या अन्तर्मुहुर्ता ॥ मध्येऽनेकविकल्पा ॥ ॐ ॥ भूपिललेश्यायायुर्वीपोदधिवास्यगिरि- अपनगद -विरमान "पोनि विग्यानि॥ तियों का उत्पधि स्थान सो विर्यगयोनि है तियग-गति-नामकम दय-मापादिवम् । वियचगतिनामा नामकर्मऊ सदाहरि गृहीत भयया प्राप्त (प्रापादित) जन्माइविभवतिग्योनामाता जन्म (नसीन शरीर परना) ऐसा अर्थ है । तिपर योनि में उत्तम हुये तिपरपोनिमा नेपाम् विर्यग्पानिमानाम् । विपच योनिमा तिन तिर्यंच योनिमें उत्पम हुमाफी साप्याभवस्पिति मिपम्योपमा मयन्या -उका भवको भायु सीन पन्य प्रमाण भन्तमहामध्यो भनेक-रिकम्पा" मार्वर मध्यवि नानामद है। भूविनलेश्याद्यायुद्वीपोदधिवास्यगिरिसर सरिताम्॥माननृणाचभेद स्थितिस्तिरश्चामपितृतीयाध्याये (सात) भूमिये (इन सात भूमियों में पौरासी शास्त्र) विखे (देखो सूत्र १, २) घरया मादि म्कापात, नील-कपण) लेश्यादिक मर्याद (अणुभवरखेरपाषाले, भशुमतरपरिणाम पाचे अनुभवरदोके घारक, अशुभतर वेदना पाले, मशुपवर विक्रिया करनेवाल, परस्पर दुख उत्पन्न करनेपाखे नारकी मीच) (देखो सप्र ३, ४, ५) मापुत् (नारियों की उलप तया नपन्य) आयु (देखो सूप ६) दीप रदपि दीप सपा समुद्र मयात् जम्दीपसे स्वयम्भूमणदीपतफ असम्पासे दीप और चरमोदघिसे स्वयम्भरमण समन पयत मसंख्याते समुद्र, रनके विस्तार भौर भाकार (देखो सूत्र ७, ८,६) (नमदीपके भरतसश्से ऐगववक्षेप लग सात) सप (देखो सूम १०) -हिममान से शिखिरी लग घ) पर्वतापर्ण विस्तार सहित देसो सूम ११, १२, १३,) HEMEECREETgGeeeeeeeeRACKEEG ५ पास्प पक्ष । सिदि प्रगनियसी मममसराम सीब व पदच्छेद मौर विमरत्वयं परित सवसिदिका शम्दा हिन्दीभनुपादो भयाप ३ सप ३८, ३६ उक्ता च संग्रहगाया-ववहाल्बारदापल्ला तिएणव होति बोदव्या । संखादीव सम्मुद्दा कम्मछिदि वपिणदा तदिये ॥ १n यथैवते उत्कृष्टजधन्ये स्थिती नृणा तथैव- ॥ तिर्यग्योनिजानां च ॥ ३९ ॥ Ta पछा-गाया" बहुरि (पम्पकी कपनकी) सपफी हुई। भपा एकत्र की भार्या छदारसे एक (माया) कीमती परामदार दाधाप्यार म्दार मरा पम्पानि) ध्यार उदार अदा पन्ये तिपण-एपशोति मोरपानीलिमपन्तिपोदप्याl) श्रीनही है सो जानना सखा-दीप-समूह (संस्था द्वीप समदार ) संस्था द्वीप सम्म पम्प-सिदि-बपिछठा-नदिये (=-स्पिनि परिणताःवदिके ) और कम्मस्थिवि तिन (पयों) फरि पसिंत है। भावार्य पविती म्पबारपम्पसे रोपौंडी संस्म्या वर्णन फीगई है भाद पर सम्पाकी उत्पपि भानने के लिये है। उद्धारपम्पकार द्वीप और सद्र गिने जाते है और पदापय द्वारा कर्मस्थिति (पपस्थिति, यास्पिति, कास्थिति) का कपन होवा है । ययामा एमपन्य" स्विी नृणो वयापम जैसे ही ये स्म और जपन्य भाष मनुष्योकी र सेती ("सूत्रम्-तिर्यग्योनिजानां च॥३६॥ तिर्यग्योनिजाना चस्थिति परापरे त्रिपल्योपमान्तर्मुहूर्ते भवत मूग -निर्पर-योनिजानाम् ॥ भवियच योनिम पत्ता नेपालकी भी मर्याद तिमोकी पी (4) परा स्थिति सिम्योपमा पनि मारकर (परा) पायु तीन पाय प्रमास अपराग स्पिनि भन्नति भवतिः (और) नपत्य मापु मन्तमद है। (१७मय में पायाभोस पETRA Aarya पनि भार- (-Rोनिशाना मीरमरकर front is morning pawan relifinal aint और critet-fata-and) ५ सा सिदि म-पिल एयनिवासी जगरूपसहाय वकीलात पदच्छद और विमफ्त्यर्पसहित सार्यसिदिका शम्दशः हिन्दीअनुपाद अध्याय ३ सूप ३६ तिरश्चा योनिस्तिर्यग्योनि । तिर्यग्गतिनामोदयापादित जन्मत्यर्थ । तिर्यग्योनो जातास्तिर्य- ग्योनिजा । तेपा तियग्योनिजानामुत्कृष्टा भवस्थितिस्निपल्योपमा ॥ जघन्या अन्तर्मुहूर्ता ॥ मध्येऽनेकविकल्पा ॥ ॐ ॥ भूविललेश्याद्यायीपोदधिवास्यगिरि- अरपनुरादा-तिरमाम् "पोनि सिग्यानि॥ विपचों का उत्पधि स्थान सो तिर्यग्यानि है तिपग-गति नामकम खप मापादितम् ॥ प्रतियचगतिनामा नामकर्मके उदयफरि गृहीत अथवा प्राप्त (आपादित) मन्या इतिछमय तियम्पोनीनाता।' जन्म (नवीन शरीर परना) ऐसा भर्य है। विर्यच योनि में उत्पम हुये निर्यग्योनिमा नेपाम् तिर्यग्यानिजानाम् ।। ये सियच योनिन । तिन तिर्पच योनिमें उत्पम हुभोंकी उत्तपा मवस्पिति- प्रिपग्योपमामपन्या" का भवकी मायु तीन पन्य ममाण है जम्न्य भन्सहारमध्यो भनेक-विकम्पा" -मदत है मायवि नानामद है। भूपिनलेश्याद्यायुद्वीपोदधिवास्यगिरिसर सरिताम्॥माननृणाचभेद स्थितिस्तिरश्चामपितृतीयाध्याये (सास) भूमि (इन सास भूमियों में चौरासी शाख) विले (देखो सूत्र १, २) सरया-मादि (कापात, नील-कृपण) लेश्यादिक अर्थात् (भशुमवरखेरयापाले, भशुभतरपरिणाम वाले भगुभसरदेोक धारक, भामतर वेदना पाले, भशुमतर विक्रिया करनेवाले, परस्पर दुःख उत्पन्न करनेवाले नारकी जीव) (देलो सूत्र ३, ४, ५) (नारियों की उत्कृष्ट तया मघन्य) भायु (देखो सूप ६) दीप दषि श्रीप क्या समझ भयात् जम्बूद्वीपस स्वयम्भ्रमणदीपतफ असंख्यावे द्वीप भौर लवणोदषिसे स्वपम्मरमण समय पयत असंख्याते समुद्र, उनके विस्तार और माफार (देसा सूप ७, ८,६) (जम्मूदीपफे भरवक्षेपसे ऐरापतक्षेप लग सात) सत्र (देखो सुध १०) विमान से शिखिरी लग छा) पर्वत(पर्ण विस्तार सहित देखो सूप ११, १२, १३,) पास्प सिदि - सरावं CLACE ) एयनिरासी मापसाप सील इस पदच्छेद भौर रिमरत्पर्य सरित सर्वायसिदिका शम्दशः हिन्दीअनुपाद । मध्याय ३ सूत्र ३८, ३६ उक्ता च संग्रहगाथा-ववहारुद्धारदापल्ला तिएणव होति बोहव्वा । संखादीव सम्मुद्दा कम्महिदि वरिणदा तदिये ॥ १॥ यथैवते उत्कृष्टजघन्ये स्थिती नृणा तथैव- ॥ तिर्यग्योनिजानां च ॥३९॥ उत्तासामसपा-गाया।" बहरि (पन्यकी कपनकी) सपपकी हुई। भयवा एकत्र कीहुई भार्या बंदों से एक (गाया) कहीजावी है रसरामसार रा-पापप्पवारनदार प्रदा-पन्यानि 1) पपार नदार प्रदा पन्चे तिएरठ-प्वशाति-मोदमाजीणिपाएमवन्तिा योदप्या) तीनही हैं सो जानना संसा-दीन-समु (संम्पा दीप-समदान सरख्या दीप समुद्र कम्म-दिदि-परिषदा-तदिये (कर्म स्थिति-पणिवा सदिके ) (मौर कर्मस्पिति विन (पम्पों) करि पणित है। भावार्य पहिली व्यवहारपन्यसे रोमोंकी संख्या पर्सन कीगई। भाद या सण्याकी उत्पनि मानने के लिये है। उदारपन्यकरि क्षप और समुद्र गिने जाते है और भटापन्य द्वारा कर्मस्थिति (मपस्थिति, मापुस्थिति, फापस्थिति) का कथन होता है। पपापता एक उत्तमपन्य स्थिती नृणा तपास से ही ये उस्कृष्ट और जपन्य भायु मनुप्योंकी रे तैसेरी, ("सूत्रम्-तिर्यग्योनिजानां च॥३६॥ तिर्यग्योनिजाना चस्थिति परापरे त्रिपल्योपमान्तर्मुहर्ते भवत सूनार्म-तिर्यम्-पोनिनानाम् ॥ पळ विर्यच योनिसे उत्तम होनालों की भी भयात् नियोंकी मी (-1) पण स्थिति ॥ पि-पम्योपमा मतिर भरकट (म्परा) भायु सीन पन्य ममाण मपरा स्थिति मन्वमहामतिर (मौर) मपन्य भायु भइत है। समाप्णने तियेम्पाकी ऐसा परम मियापानिमा बयनि पाठ' (-निपावामिमा पेमा भी पा.) परब रिजाती पर मेलिनोनित गणपटीन मयुम-fan सिम्पोनिशान पापौर निमामि (-तिपंचमानीवार) रोमामिलोमी*.. CSeel सिद्धि म-मिल NAGAINGEEEEEEEEEG AREERBANEERE एमनिरासी नगरपसहाय यकीलात पदग्मद और पिमरत्पर्पसहित सर्वार्थसिदिका शब्दशः हिन्दीमनुयाद भण्याप ३ सूत्र ३६ तिरथा योनिस्तिर्यग्योनि । तिर्यग्गतिनामोदयापादित जन्मत्यर्य । तिर्यग्योनौ जातास्तिर्य- ग्योनिजा । तेपा तिर्यग्योनिजानामुत्कृष्टा भवस्थितित्रिपल्योपमा ॥ जघन्या अन्तर्मुहूर्ता ॥ मध्येऽनेकविकल्पा ॥ ॐ ॥ भूविललेश्याद्यायुर्दीपोदधिवास्यगिरि- पुण्यनुवाद -तिरपाम् योनि तियग्पानि =तिपचों का उत्पत्ति स्थान सो तिर्यग्योनि है तियग-गति नाम:म जप मापादितम् ।। तिपचगतिनामा नामकर्मके उदयफरि गृहीत अथपा माप्त (आपादित) जन्मापातिकमय तिर्यग्योना जाता, =भन्म (नबीन शरीर घरना) ऐसा भर्य है। तिपय योनि में उत्पम हुये तिर्यग्पानिमा मातातिर्यग्यानिनानाम् । च तियच योनिन । तिन तिर्यंच योनिमें उत्पन्न हुभोंकी रहणाभिमस्थितिमविपम्पोपमा जघन्या" =उका भवकी भायु तीन पन्य प्रमाण है मयन्य भन्तर्मुहसामपा भनेक निकम्पा" =मंतर्मुस है मध्यविष नानामद है। भूविनलेश्यायायुद्वीपोदधिवास्यगिरिसर सरिताम्॥माननृणाचभेद स्थितिस्तिरश्चामपितृतीयाध्याये =(सात) भूमियें (इन सात भूमियों में चौरासी लाख) विले (देखो सूत्र १, २) लरपा-मादि कापास, नील-कृष्ण) लश्यादिक भर्यात् (भशुभवरलेश्यावाले, भशुभतरपरिणाम पाले अशुभतरदेशक धारक, भरामतर वेदना पाले, भशुमतर विक्रिया करनेवाले, परस्पर दुःख उसम करनेवाले नारकी जीव) (देखो सूत्र ३, ४, ५) भायुस् (नारियों की उल्कए तपा मघन्य) भायु (देखो सूप ६) दीप उदपि श्रीप तया समुद्र भयाद जम्बू दीपस स्वयम्भ्रमणदीपतफ असल्याने द्वीप मौर लवणोदपिसे स्वयम्भरमण समुद्र पयत असंख्याते समुद्र, उनके विस्तार और भाकार (देखो सूत्र ७, ८,६) (जम्मदीपके भरवक्षेत्रस ऐरावतक्षेत्र लग सात) अप (देखो सूत्र १०) महिमवान् से शिलिरी लग घर) पर्वत(पर्ण विस्तार समीत देखो सूत्र" ०, १३, a साप सिद्धि ६६ एयनिवासी उगमसहाय पीलकन पदग्वेद भौर पियक्त्पर्पसरित सायसिदिका शम्दशः हिन्दीअनुमाद मध्याप ३ समाप्त सर सरिताम् ॥ मान नृणा च भेद स्थितिस्तिरश्चामपि तृतीयाध्याये ॥ १ ॥ ॥ इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिसज्ञिकायां तृतीयोऽध्यायः ॥३॥ (पथसं पुररीकखों उन बापर्वतोकबा) सरोपर, उन सरोवरों के पुप्फर, माप, परिवारसहित देविया) (सूम १५, १५, १६, १७, १८, १६ सरिताम् । -चौदा नदियें (उनके पानेकी दिशायें, भौर ननफी परिवारकी नदियें छोरीछोरी) (देखो सूत्र २०, २१, २२, २३) पान (प्रतया पर्वतोफे) माप, ना नाप (देखो सुप्र २४, २५, २६, ३२) माने समयकी प्रिया(पपचन्द्रकाप पृष्ठ २६५) भर्याद उत्सर्पिणी और भवसर्पिणी रूप का समय भवया फालोंकी पृदि बासस्प क्रिया (देसो सप्र २७, २८) (मान परिमाण अर्थात् मरतक्षेप वाचम,पर्वत,दा,आदि(देसो स्प३३, ३४,३५)कोका मम्दीपसे पानुकीसर और पुष्करा दना दना परिमाण है। और मनुप्पोकन परिमाणकि ये पुष्करदीपक भार मागक इयर रे (देम्वा सूत्र ३५) नृणाम् यहरि () मनुप्पोंका मद (देखो सूत्र ३६) (नृणाम् ) स्थिति अनुष्यों की स्पिति अर्थात् नीपन कान (देखो सूत्र २६, ३०, ३१, ३८) विस्पाम् भपिस्थिति) -तियोंकी स्थिति पा भायु (देखो सूच ३६) (ये सर्व दी) लौप-म पापी तीसरे मध्याय में (पर्णन किये गयी रे इतितत्त्वार्थ-वृत्तौसर्वार्थसिद्धि-=ऐसे तत्त्वार्थकी व्याख्यामें सर्वार्थसिद्धि सज्ञिकाया तृतीयःअध्यायः =नामाग्रथमें तीमगRemi

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Sarvarth Sidhi Vrati Khand-1 Ka 2-3 Va Adhyay

Author
Sahay, Jagrup
Title
Sarvarth Sidhi Vrati Khand-1 Ka 2-3 Va Adhyay
File name
Sarvarth Sidhi Vrati Khand-1 Ka 2-3 Va Adhyay
Text
OCR done
Citation
1925
Published
2011/07
Publisher
Avagarh, Shri Krishan Printing Press
Language
Sanskrit
Pages
332
Library
Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
DLI number
314013
Barcode
99999990312169.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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