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Srimadbhagvadgeeta

Pt Ramnarayan Pathak

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८१ श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या १ अर्जुन-मोह 30 - प्रकाशक- नेपाल गवर्नमेण्ट से 'कथावाचस्पति' की पदवी प्राप्त कोर्तन-कला-निधि, काव्य-कला-भूषण, श्रीहरि-कथा-विशारद, कविरत्नrati अली अध्यक्ष --श्रीराधेश्याम-पुस्तकालय, बरेली। मूल्य 0 आने 3) कंस-बध TTTT अन्य कथायें प०राधेश्यामजी कविरत्न लिखित नवीन कृति में मिलेंगे, तथा जिल्ददार गुखका ॥ में मिलेगा। डाक महसून गुडशा ।-) कुयायन अलग अलग भाग पर ।-) মাছ 1-)नन्द-महोत्सव।) महाभारत झमतीबाजा झन्हैया।--)गिरिबरधारी।-) ( राधेश्याम रामायण की खप में रासदहस्य 1-) भीष्म-प्रतिज्ञा नन्द-नन्दन-बसुदेब-लन्दन -) भीष्म-पराक्रम सम्पूर्ण खाती भाग एक सुन्दर जिल्द पाण्डव-जन्म में छ: पाने अधिक देने पर अर्थात तीन | पाण्डवों का वाल्य-काल रुपए में मिलेंगे। डाक महसूल ।) अनग पाण्डवों की शत्र-परीक्षा लातागृह रुक्मिणी-मंगल बक-संहार ( राधेश्याम रामायण की वर्ष में ) द्रौपदी-विवाह रुक्मिणी-प्रन्स सुभद्रा-हरण रुक्मिणी का कृष्ण प्रेम राजसूय-या रुक्मिणी की सगाई द्रौपदी-बस्न-हरण तक्मिणी का पत्र-लेखन किरातार्जन-युद्ध रुक्मिणी का गिरिजा-पूजन यक्ष-सम्बाद रुक्मिणी का भ्रातृस्नेह कीचक-बध रुक्मिणी विवाह - अभिमन्यु विवाह सम्पूर्ण सातों भाग एक सुन्दर जिल्द में छः आने अधिक देने पर अर्थात् तीन रुपए में मिलेंगे।डाक महसूल |2) अलग (राधेश्याम रामायगा की तर्ज में-) नरसी की हुंडी DI श्रीमद्भगवद्गीता श्रीसत्यनारायण की कथा रामेश्याम रामायण की खों में } प्रह्लाद-चरित्र अर्जुनमोह ॥ विराटूप-दर्शन।।। ध्रुव-चरित्र आत्मा की अमरता)॥ जीव-ब्रह्म-विवेक सुदामा चरित्र मोरबज-चरिणा कर्मयोग ।)। अर्जुन का समान।)। भर्तृहरि-चरित्र नोट-सम्पूर्ण ६ भाग एक सुन्दर जिल्द | महाराणा प्रतापसिंह में।) अधिक देने पर, अर्थात् २) में, सत्यवादी हरिश्चन्द्र मिलेंगे तथा जिल्दार गुटका शा)क० में सावित्री-सत्यवायू मिलेगा। खाक महसूल गुटका |-) अलग। मीराबाई अलग भाग पर ) भक्त-अस्लरी दुर्गा-चरित्र अभिमन्यु की बोर का राधेश्याम रामायण की खने गुरु गोविन्दसिंह महिषासुर-बध गुरु नानक शुरूम का उत्पाल बुद्ध-चरित्र वामुएलाका पराम द्रौपदी-लीना D॥ रक्त बीज का लड़ाई महाराजा दिबीर शुल्म और निशुरुष हा पक्ष सती स्वयम्बर नौट सम्पराई ५ भाग एक झुन्छन मिल्द सती मोह में छः श्राने अधिक देने पर अर्याल २) महर्षि वरिन (3) माग शा) A A A A A A A AA 1- TITIT पता-श्रीराधेश्याम-पुस्तकालय, छरेल्ली । २ श्रीमद्भगवद्गीता सर्वाधिकार प्रकाशक के आधीन हैं। वा ( कृष्णार्जुन-सम्वाद) संख्या-१ लेखक- प० रामनारायण पाठक 30४८ अर्जुन-मोह प्रकाशक- नेपाल गवर्नमेण्ट से "कथावाचस्पति" की पदवीप्राप्त- कीर्तन-कला-निधि, काव्य-कला भूषण, श्रीहरि-कथा-विशारद, कविरत्न- प. राधेश्याम कथावाचक, अध्यक्ष- - আলহীহুংegছাত্রে आठवीं बार २००० सन् १९४६ ई० मूल्य साढ़े चार प्रिंटर-पं० रामनारायण पाठक, श्रीराधेश्याम प्रेस, बरेली ।

PARENGERRESS
प्रार्थना
सुनोगे कबतक मेरी टेर ?
कहते हैं जो तुम्हें पुकारे सच्चे दिल से नाथ !
उसकी ओर बढ़ा देते हो, तुम भी अपना हाथ ॥
करी क्यों मेरी बेर अबेर ?
सुनोगे कबतक मेरी टेर ?
दुखभजन तुम हो भक्तों के दुःख निवारणहार ।
टूटा नहीं आजतक फिर भो मेरे दुख का तार ।।
उचित क्या है ऐसा अन्धे. ?
सुनोगे कबतक मेरी टेर ?
साधु पुरुष तो निज़ कर्मो से पाते हैं उद्धार ।
पात तुम्हारी तब है जब हों हम से पापी पार ।।
जरा लो नजर इधर भी फेर ।
सुनोगे कबतक मेरी टेर ?
नाना चिन्ताओं से जग की दुखी होरहे प्राण ! .
कष्ट-काटने वाली अब तो ले लो हाथ कृपाण ॥
हो रही दिन दिन दूनी देर ।
सुनोगे कबतक मेरी टेर ?
::::-
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इ. सुन्दर जिनके नाम से, पूर्ण होय सब काम । प्रथम उन्हीं गएराज को, श्रद्धा सहित प्रणाम । विमल बुद्धि-वरदायिनी, शारद दें वरदान । ललित लिखे तबलेखनी,कलित कथा कल गान।। एक बार जो आज फिर, कृष्ण करें उपकार । गूंजे घर घर देश में, गीता की गुञ्जार ॥ [ व्याख्यान- द्वापरयुग के अन्त में कुरुक्षेत्र के मैदान में एक महाभयङ्कर युद्ध हुआ था। इस युद्ध को महाभारत कहते हैं । जिस पोथी में इस महाभारत युद्ध का वृत्तान्त लिखा गया है उस का भी नाम महाभारत है। इस महाभारत के युद्ध का कारण था-भाई आई की अपुस की फूट । द्वापर युग में भारत के चन्द्रवंशी राजाओं में महाराज शान्तनु बड़े पराक्रमी राजा थे। उनके कुमार देवव्रत नाम के एक सुयोग्य पुत्र थे । जिन्होंने यह प्रतिज्ञा की थी कि मैं अपने जीवन में विवाह नहीं करूँगा। यह प्रतिज्ञा कुमार देवव्रत को अपने पिता को सुख्खी करने के लिए करना पड़ी थी । बात यह हुई कि कुमार देवव्रत के पिता 'महाराज शान्तनु' सत्यवती नाम की एक कन्या से विवाह करना चाहये थे कन्या का पिता महाराजा शान्तनु से कहता था कि आप यह प्रतिज्ञा करें कि राजगद्दी पर सत्यवती ही का बेटा, बैठेगा तब मैं अपनी कन्या आपको प्रदान करूँगा। महाराज इस प्रतिज्ञा से हिचके, किन्तु कुमार देवव्रत ने अपनी तरफ से उपर्युक्त प्रतिज्ञा करके कन्या के पिता को विश्वास दिला दिया कि सत्यवती को सन्मान के अतिरिक्त और दूसरा कोई गद्दी का अधिकारी उत्पन्न ही न होगा।

Anita MULLAILIALPLAZAELS AaratixRAwmar ( ४ ) * अर्जुन-मोह के [ श्रीसद्भगवद्गीता-संख्या-१ सत्यवती के चित्राङ्गद और विचित्रवीर्य नाम के दो पुत्र हुये और होकर लि:सन्तान ही परलोकवाली होगऐ । तब कुमार देवव्रत ने (जो अपनी भीष्म प्रतिज्ञा के कारण 'भीम' के नाम से प्रसिद्ध हागऐ थे } ब्रह्मर्षि वेदव्यास जी के तपोबल से अपने दोनों भाइयों की विधवाओं से पाण्डु और धृतराष्ट्र नाम के दो पुत्र उत्पन्न कराये । धृतराष्ट्र माता के पेट से अन्धे उत्पन्न हुए थे। इसलिए बड़े होने पर भी व गद्दों पर न बैठे । हाँ, पाण्डु राजा बने । महाराज पाण्डु के पांच पुत्र हुए-युधिष्ठिरः, भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव । पह पांवों पुत्र पांच पांडव कहलाये । महाराज धृतराष्ट्र के सौ पुत्र हुए जो कौरवों के नाम से प्रसिद्ध हुए, सौ कौरवों में दुर्योधन · सबसे बड़े थे महाराज पण्डु के देहान्त होजाने पर भाष्म को ही अपने पोतों का लालन पालन करना पड़ा जो उन्होंने बड़ी योग्यता से किया । द्रोणाचार्य नाम के एक विद्वान् धनुर्वेत्ता ब्राह्मण को उन्होंने अपने पोतों को धनुर्विद्या सिखाने को रक्खा । समय पाकर पाण्डव और कौरव दोनों ही युद्ध करने में निपुण हुए। किन्तु पाण्डव और कौरवों में मेल बिल्कुल न हुआ । कौरव अन्यायी थे और पाण्डवों को राज्य से बिल्कुल निकाल कर सारा राज्य आप ही लेना चाहते थे। इसलिए कुरुक्षेत्र को भूमि पर महाभारत का व संग्राम हुआ जिसका जिक्र ऊपर किया गया है। यह महाभारत युद्ध जब आरम्भ होने वाला था तब- घूमते फिरते ब्रह्मर्षि वेदव्यास जी महाराज धृतराष्ट्र के पास आये । उन्होंने 'सञ्जय' नामक अपने शिष्य को धृतराष्ट्र के पास इसलिए छोड़ दिया कि वह उन्हें घर बैठे ही युद्ध का सारा समाचार सुनाता रहे । अतएव सजय ने महाराज धृतराष्ट्र को सुनाया कि अर्जुन ने दुःखी होकर युद्धभूमि में लड़ने से जब मुंह मोड़ लिया तब अर्जुन के भाई और मित्र श्रीकृष्ण ने ( जो युद्ध में अर्जुन का रथ हांकते थे) अद्भुत और अनुपम उपदेश सुनाकर अर्जुन को फिर युद्ध करने को तैयार कर दिया । धृतराष्ट्र ने इस उपदेश को अक्षरशः सुनने की इच्छा प्रकट की। वासुदेव श्रीकृष्ण का वह उपदेश श्रीमद्भगवद्गीता के नाम से संसार में प्रसिद्ध है, और उसी उपदेश को हम यहां हिन्दी जानने वाले पाठकों के लिए सरल हिन्दी के छन्दों में लिखने की चेष्टा करते हैं ] सञ्जप से धृतराष्ट्र ने, कहा प्रसङ्ग चलाय । "महायुद्ध का हाल अत्र,कहो मुझे समझाय ।।

श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-१ * अर्जुन-सोह
( ५
कुरुक्षेत्र की भूमि में, जुटे जहां रणधीर ।
मेरे पुत्रों से भिड़े. कैसे पाण्डव दोर ?"
महाराज के वैन सुन, करके मन एकान्त ।
सञ्जय ने आरम्म यों, किया युद्ध वृत्तान्त ।।
"हे महाराज, क्या बतलाऊँ, था कैसा वह संग्राम प्रबल ।
थी एक ओर कौरव-सेना दूसरी ओर था पाण्डव-दले ॥
यह दोनों भारी सेनाएँ, अस्त्रों-शस्त्रों से सजधज कर ।
लड़ने को जब तैयार हुई प्राणों की ममता तज तज कर !
तब महाराज दुर्योधन ने, श्राचार्य द्रोण के सँग जाकर ।
अपनी सब सजित सेना की,देखा भाली की सुख पाकर ॥
फिर कहा द्रोण से-'महाराज', देखिये पाण्डवों का भी दल ।
प्राचार्य, सरसरी नजर डाल,जांचिए शत्रुओं का भी बल ॥
मैंने तो सारा पांडव-दल, जितना भी देखा भाला
उससे अपने मन में बस एक,अन्तिम परिणाम निकाला है ।।
वह यह कि पाण्डवों ने यद्यपि, कितने ही वीर बुलाये हैं
जो अपनी अपनी सेनाएँ, ले ले कर लड़ने आये हैं।
लेकिन वे सबके सब मिलकर, कुछ काम बना नहीं सकते हैं
यदि भीष्म पितामह डटे रहे तो हमें हरा नहिंसकते हैं।"
प
[ व्याख्यान-यहां शंका हो सकती है कि दुर्योधन और उसके भाई जब
पारडवों के साथ अन्याय कर रहे थे तो भीष्म पितामह' और द्रोणाचार्य से
बुद्धिमान और न्यायवान् योद्धा क्यों दुर्योधन के पक्षपाती होकर अन्याय के
भागी हुए। इस शंका का उत्तर महाभारत में अच्छी तरह से दिया गया है।
दुर्योधन राजा था और भीष्म पितामह तथा द्रोणाचार्य दोनों ही सज्जन, दुर्योधन
के धन से अपना भरण-पोषण करते थे । इसलिए युद्ध से पहले युधिष्ठिर जब

* अर्जन-मोह के [श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-१ भीष्म पितामह के पास उनका आशीर्वाद लेने गये तो उन्होंने आशीर्वाद देने के साथ ही साथ अपनी स्थिति समझाते हुए युधिष्ठिर से कहा- म अर्थस्य पुरुषो दासो ह्यर्थो दासो न कस्यचित् । इति सत्यं महाराज बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः ।। अर्थात् हे महाराज युधिष्ठिर, धन किसी का दास नहीं है । हाँ. पुरुष धन का दास है । सो मुझे कौरवों ने धन से ही लाचार कर रक्खा है । इस कथन से कोई यह न समझ लें कि भीष्म पितामह दुर्योधन के धन के दबाव में आकर उसके साथी बन गये । मुख्य बात यह है कि भीष्म पितामह अन्तःकरण से कभी दुर्योधन के साथ नहीं हुए। दुर्योधन के बुरे कर्मो की बराबर उसके मुंह पर ही निन्दा किया करते थे । साथ ही, उन्होंने यह भो प्रकट कर दिया था कि मैं मन से पाण्डवों का पक्षपाती हूँ और तन से कौरवों का । कौरवों के धन से भीष्म पितामह का शरीर पला था, सो तन उन्होंने कौरवों की सेवा में दे डाला। अन पर कौरवों का अधिकार कुछ नहीं था इसलिए मन उन्होंने पाण्डवों के लिए रक्खा । यह बात आगे चल कर भगवद्गीता में ही आयेगी कि यद मनुष्य किसी कार्य में अपना मन आसक्त न कर के केवल हाथ पैर से ही वह कार्य करे तो उस कार्य का पाप व पुण्य उसे नहीं भोगना पड़ता। भीष्म पितामह यह तत्त्व समझते थे, और इसीलिए वे शरीर से 'कौरवों की सेवा करते हुए भी मन से पाण्डवों का भला चाहते रहे, और इस तरह पाप के भागा नहीं हुए। ta KALA दुर्योधन की बात सुन, हुए द्रोण गम्भीर । सोच समझ कर अन्त में,यों बोले रणधीर ।। "राजन इसमें सन्देह नहीं, रणशूर भीष्म अति भारी हैं। अबतक जो रहे . ब्रह्मचारी, इसलिए अतुल बलधारी हैं लेकिन, फिर भी अपने मन में, रह रह कर संशय होता है । श्रीकृष्ण पाण्ड बोंके सँग हैं, इससे कुछ कुछ भय होता है । आवाज हृदय के भीतर से, उठ उठ कर कहती है निशप । 'है जहां धर्म बस वहीं कृष्ण हैं जहां कृष्ण बस वहीं विजय ॥' . स्वय

श्रीमद्भगवद्गीता संख्या-१ ] * अर्जन-मो*
( ७,
सुने जो यह प्राचार्य के, दुर्योधन ने वैन ।
तीर कलेजे में चुभा, हुमा हृदय बेचैन ।
क्रोध-भाव से होगया, मुख-मण्डल भी लाल ।
झुंझला कर प्राचार्य से, बोला यूँ तत्काल !
"प्राचार्य, आपकी बातें सुन,मुझको अति विस्मय होताहै ।
आश्चर्य श्राप सा धनुधारी, योद्धा यों साहस खोता है ।।
यह बात बड़ी लज्जा की है, ऐसी भी दहशत पाना क्या ।
एक मूर्ख अहीर छोकरे से ऐसा भारी अर खाना क्या ।
जिसमें बिल्कुल भी बुद्धि नहीं,जिसने साधा कुछ काम नहीं ।
उस हीन पुरुषसे क्या डरना,जिसमें बल का कुछ नाम नहीं ।।
जिसने ब्रज में दधि और मक्खन, चोरी कर करके खाया है ।
जिसने कि गोपियों के सँग में, यमुना-तट रास रचाया है ।।
उस चोर और नचकैये से, कहिये क्या होना जाना है।
रणभूमि है यह रणवीरों की, काले का कठिन खिलाना है।
॥
अगर कृष्ण की राय से, चला युद्ध-व्यापार ।
पाण्डव-सेना के लिए, निश्चय है तब हार ।।
देखिए कृष्ण का पागलपन, क्या नादानी की है उसने ।
अपनी नारायण-सेना सब, मेरे सँग करदी है उसने ।।
और आप अकेला ही बिल्कुल, पाण्डव लोगों का साथी है ।
गुरुदेव, श्राप ही बतलायें, यह कौन बुद्धिमानी की है ?
फिर और देखिए तो कितनी, बेढब उल्टी मति आई है ।
धनुवाण न लुगा लड़ने को, यह शपथ सरासर खाई है।

माधा युद्ध जीता हुआ उसी समय समझ लिया । 8 अर्जुन मोह ६ [श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-१ --कौरवों और पाण्डवों में जब युद्ध होना निश्चित हुआ तब दोनों पक्षों ने श्रीकृष्ण भगवान को अपनी ओर लेना चाहा । दुर्योधन इसो उद्देश से भगवान श्रीकृष्ण के यहां द्वारका पहुँचे। संयोग से भगवान् उस समय शयन किए हुए थे। दुर्योधन उनके जागने की प्रतीक्षा में बैठ गए। लेकिन अभिमान के वश बैठे सिंगहने की तरफ। उनके बैठ जाने के थोड़ी देर बाद अर्जुन पहुँचे, और भगवान् के पांयते बैठे। भगवान् जन जागे तो जागने के साथ ही उनकी दृष्टि पायते बैठे हुए अर्जुन पर पड़ी। अर्जुन ने भगवान् को जागा हुआ देख कर अपने उपस्थित होने का कारण बतलाया युद्ध सहायता चाही-भगवान् ने अर्जुन को सहायता देना स्वीकार कर लिया। पोछे से फिर दुर्योधन ने भी वही बात भगवान से कही और बतलाया कि मैं अर्जुन से पहले आकर बैठा हूँ भगवान ने जवाब दिया कि मैंने सबसे पहले अर्जुन को देखा और उसे सहायता देने का वचन दे दिया। अब तुम भी अगर सहायता चाहते हो तो मैं यह कर सकता हूँ कि अपनी नारायणी सेना तुम्हे दे दूँ ! दुर्योधन ने नारायणी सेना लेना मंजूर कर लिया और प्रसन्नतापूर्वक घर लौट आए । भगवान् ने यह भी दुर्योधन से कह दिया था कि मैं अर्जुन की ओर से अकेला तो रहूँगा ही पर शस्त्र भी नहीं धारण करूँगा । दुर्योधन भगवान की इस प्रतिज्ञा से इतने सन्तुष्ट हुए कि उन्होंने और में Na- जो कायर रण से डरते हैं, वे यों ही शान दिखाते हैं । सौगन्दे खाकर लड़ने से, बस अपनी जान चुराते हैं सो बिना बात का ही गुरुवर,यह खौफ आपने खाया है। एक महामूर्ख और कायर का, मुझको हौत्रा दिखलाया है क्या भीष्म-पितामह के बल को, अति तुच्छ आपने माना है? या अपने तीखे तीरों को. बेकार अापने जाना है ? फिर यह तो कहिये लड़ने में, क्या कर्णकिसी से भी कम है ? अर्जुन के होश उड़ा देगा, जबतक उसके दम में दम है । हैं ऐसे-ऐसे वीर इधर, जो रिपु का गर्व मिटा देंगे। दिक्षालों को दहला देंगे, पृथ्वी-आकाश हिला देंगे। PILctamasumiawwko w.remix www

श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-१]
९
* अर्जुन-मोह
गाना
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लड़ाई जब कि बीरों में छिड़ेगी ।
मेरे योद्धाओं की हिम्मत. खुलेगी ।
गुरो, तब देखियेगा तो इधर से ।
झड़ा बौछार तोरों की
चलेगो ।
पियादे से पियदा जा भिड़ेगा ।
सवारों से सवारों को ठनेगा ।
पितामह भीष्म के बाणों के आगे-
निहत्थे कृष्ण की क्या चल सकेगी ?
कहाँ तक पाण्डवों का दल लड़ेगा ।
यही होगा कि बस भगदड़ पड़ेगी।
पराजय पाण्डवों की है यों निश्चय ।
विजय फिर कौरवों ही को मिलेगी।"
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५iate
दुर्योधन ने जब कहे-ऐसे वचन सुनाय ।
वीर द्रोण प्राचार्य जी-पड़े तभी मुसकाय ॥
उत्तर में कुछ कह सक--जबतक वे रणधीर ।
तबतक भाई कान में शंखध्वनि-गम्भीर ।
कौरव-प्लेना की ओर भीष्म योद्धा अत्यन्त धुरन्धर थे
बाकी जितने भी योद्धा थे, बल में सब उनसे कमतर थे।
इसलिये कौरवों ने उनको सेनापति मुख्य बनाया था।
और इन्हीं भीष्म सेनापति ने यह अपना शंख बजाया था
यह किया गया था शंखनाद केवल यह सूचित करने को
कौरव-सेना सब है तयार पाण्डव-सेना से लड़ने को ॥

max- (१०) * अर्जुन-मोह ॐ [ श्रीसद्भगवद्गीता-संख्या-१ उस एक शंख के बजते ही बज उठे अनेकों शंख वहां । वह युद्धभूमि भी दहल उठो-जब बजे हजारों शंख वहां ।। मारू बाजों में जोश मरी मारू गत बजना शुरू हुई । चढ़ गए बाण धन्धाओं पर तल्वार निकलना शुरू हुई । श्रीभीष्मपितामह महाबली कौरव-सेना के अधिनायक। डट गये मोर्चे पर आकर हाथों में लेकर धनु-शायक ।। कौरव-सेना जब हुई इस प्रकार तैयार । पाण्डव-दल भी बढ़ चला, ले लेकर हथियार ।। उस कुरुक्षेत्र की धरणी में इसतरह चमक छवि-छटा उठी. ! मानो आमने-सामने से वर्षा की हो घनघटा उठी ।। शूरों वीरों की तल्लारें बिजली की तरह चमकती थीं । शंख-ध्वनियां योद्धाओं की बादल की तरह गरजती थीं। बांध रही थी इस ताइ सेनायें जब जोर । हुआ तभी एक मोर से घर घर-सा कुछ शोर ।। सब योद्धाओं ने क्या देखा तेजी से एक रथ अाता है । उस रथ के ऊपर लगा हुआ झंडा फर-फर फहराता है ।। हैं चार श्वेत घोड़े उसमें जो तेज भागते अाते हैं । और उस स्थ को सारथी बने श्रीकृष्ण हांकते आते हैं। फिर यह भी देखा वीरों ने वीरों का बाना किये हुए । अर्जुन उस रथ पर बैठे हैं-गाण्डीव धनुष कर लिये हुए । आपहुँचा कुछ देर में रथ बिल्कुल नजदीक । खड़ा होगया मानकर दोनों दल के बीच ।

Menit PAN MAA -ARO - ( ११ । श्रीमद्भगद्गीता-संख्या-१ ] * अर्जुन-मोह 8 अर्जुन और श्रीकृष्ण को, लखकर भले प्रकार । पाण्डव-सेना में हुआ-नव जीवन -सञ्चार ।। जिनके एक जरा इशारे से संसार. उदय हो जाता है । जिनकी भौं टेढ़ी होते ही सर्वत्र प्रलय हो जाता है । जिनके पाने के लिए सदा योगीजन साधन करते हैं जिनके चरणों में भक्तवृन्द तन, मन, धन, अर्पन करते हैं ।। जो अजर अमर अविनाशी हैं-सर्वव्यापी सुखराशी हैं । जो छिपे हुए होने पर भी सबके घट-घट के वासी हैं । जिनकी महिमा के लिये वेद नित नेति नेति कह गाते हैं। जिनके यश का कुछ ओर छोर नहिं शेष-शारदा पाते हैं ।। जो सबको सम्पत् देते हैं सम्पत्तिवान् श्रीमान् बने । वह अर्जुन का रथ हांक रहे भगवान् अाज स्थवान् बने । यह लीला प्रभु की देख देख-पांडव-सेना बलिहार उस युद्धभूमि में बार-बार जय सूचक जय जयकार हुई ।। सेना के उत्साह से सुखी हुए सुखकन्द । फिर अर्जुन से इस तरह बोले ब्रज-कुल-चन्द ॥ *6) गानाल "यह देखो अर्जुन भाई, कौरवसेना घिर आई । है सब विध सजी सजाई, लड़ने के लिए सवाई ।। तुम देखो धीरज धर कर, हैं कौन कौन धन्वाधर, लड़ने को तुम्हारे दर पा, Sonic ( १२ ) JAISALILKarki AAAAAALA * अर्जन-माह 8 [ श्रीमद्भगवद्ग ता-संख्या-१ लो भली भाँति सब जाँच, परखलो साँच, न आवे आंच, करो चतुराई । यह देखो अर्जुन भाई ।। । २ ) कस-कस कर तीर चलाना, गिन-गिन कर शीश उड़ाना, पूरा वीरत्व दिखाना, सब जगत् हो उठे दंग, जमे वह रंग, शत्रु हो तंग, रहे यश छाई । यह देखो अर्जुन भाई ॥ (३ ) नहिं गया समय फिर. आत्रे । पछतावा ही रह चिन्ता दिन-रात्रि सतावे । बस, अब तीरों को तोल, उठो जी खोल, बड़ी अनमोल घढ़ी यह आई। यह देखो अर्जुन भाई ॥ trict जावे ।। SEAN अर्जुन श्री भगवान के सुनकर ऐसे वैन । लगा देखने सैन्य को करके चञ्चल नैन । देखा उसने कौरव-सेना तैयार खड़ी है लड़ने को । बेताब होरहे हैं उसके योद्धा सब आगे बढने को। उस रण-मंद-माती सेना के मुखिया हैं भीष्म धनुर्धारी रणवीरों का सा ठाट किए हैं द्रोण भी उनके सहकारी॥ उस सेनादल में ऐसे भी कुछ बोर नज़र में आते हैं। जो अर्जुन के सम्बन्धी हैं, जिनसे अर्जुन के नाते हैं।

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(१३)
।
श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-१ ] * अर्जुन-मोह
इस तरह सभों को देख भाल और जांच तौल रिपु के बल को।
चञ्चल चित होकर अर्जुन ने देखा अपने सेना-दल को ॥
देखा अपनी सेना में भी, जो योद्धा सुभट पधारे हैं ।
उनमें भी कुछ सम्बन्धी हैं, कुछ सखा प्राण के प्यारे हैं ।।
दोनों दल में देखकर अपने ही सब लोग ।
अर्जुन दुःखित चित्त हो भूल गया सब योग ।।
कातर होकर कृष्ण से बोला यों बिलखाय ।
"कृष्ण, कहो तो दृश्य यह कैसे देखा जाय !
इन दोनों सेनाओं में जो योद्धा रण के मतवाले हैं ।
उनमें से कितने ही मेरे कुल वाले, आपुस वाले हैं।
इन प्रिय स्वजनों को देख देख सब साहस मेरा टूट रहा ।
सीने में धड़कन होती है, गाण्डीव हाथ से छूट रहा ।
निज बन्धु-नाश के लक्षण जो प्रत्यक्ष मुझे दिखलाते हैं ।
उससे मेरी अांखों आगे रह रह कर. चक्कर पाते हैं ।
रहने दो मुझ को क्षमा करो कुछ काम नहीं होगा मुझसे ।
हे कृष्ण, यहां से लौट चलो, संग्राम नहीं होगा मुझसे ॥
जो सारा परिवार यों, नष्ट होरहे आज ।
भोगेगा फिर कौन यह इन्द्रप्रस्थ का राज ?
जिन लोगों के सुख के निमित्त बहु साज सजाया जाता है ।
जिन लोगों के सुख के निमित्त धन खूब कमाया जाता है ।
जिन लोगों के सुख के निमित्त हम नाना कष्ट उठाते हैं ।
जिन लोगों के सुख के निमित्त धरणी और धाम बनाते हैं ।।
वे सभी लोग अब भाये हैं जीवन न्योछावर करने को ।
प्राणों की ममता छोड़-छाड़, तैयार खड़े हैं मरने को।

(१४)
* अर्जुन मोह 8 [श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-१
क्या इन सब लोगों को योंही, नांखों आगे मर जाने दूँ ?
और निज कुटुम्ब की हत्या का, पातक अपने सर आने दूँ ?
प्रिय जन तो सब पर मिटें,मुझे मिले अधिकार ।
हैं ऐसे अधिकार को लाख बार धिक्कार ॥
धिक्कार है उस धन दौलत पर जो मिले पाप का ढंग करके ।
धिक्कार मिले जो राजपाट यह हाथ खून में रंग करके ।।
लानत है उन सब भोगों पर जो मिलें बन्धु बान्धव खोकर ।
लानत उस अधम जिन्दगी पर जो रहे कलंकलित होकर ।
कौरव यदि पाप-पुण्य का कुछ मन में विचार नहिं करते हैं ।
यदि वे अधर्म से बिल्कुल भी रत्ती भर भी नहिं डरते हैं ।।
तो क्या मैं भी उनकी नाई, सारा संकोच मिटा डालूँ ?
क्या जान बूझकर भी अपने सब कुल का नाश करा डालू ?
कुल का सत्यानाश है महा भयङ्कर पाप ।
मिलते हैं कुल-नाश से बड़े बड़े सन्ताप ।
कुल के विनष्ट होजाने पर कुल-रीति नष्ट होजाती हैं ।
कुल-रीति-नष्ट होजाने पर नारियां भष्ट होजाती हैं।
नारियां चरित्र-भूष्ट होकर मनमाना पाप कमाती हैं ।
इस पाप-कर्म से सन्तानें जारज पैदा होजाती हैं ।
जारज सन्तानें होने पर, भारी अनर्थ घिर आते हैं ।
कुल-पुरुष सात पीढ़ी तक के सब नरकलोक में जाते हैं ।
हे कृष्ण, नाश होना कुल्ल का, कैसी दुखभरी बुराई है ।
रहने दो, बस, मैं बाज़ आया यह युद्ध महा दुखदाई है ।।
व्याख्या- अर्जुन के कहने का अभिप्राय है कि
जायेंगे, स्त्रियां नहीं। परिणाम यह होगा कि जन्ध पुरुषों, के मारे जाने से स्त्रियों
यह
युद्ध
में
पुरुष ही मारे

। श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-१ * अर्जन-लोह है (१५) ही स्त्रियाँ बाकी रह जायेंगो तब वे अपने निर्वाह के लिये करने और न करने के सभी उपाय कर सकती हैं, क्योंकि पेट तो भरना ही पड़ेगा ! इन उचित अनुचित उपायों को करती हुई स्त्रियां दुष्ट लोगों के फन्दे में फंसकर व्यभिचार के मार्ग में भी पड़ सकती हैं ! व्यभिचार के द्वारा कुण्ड 'और गोलक दो प्रकार की जारज सन्तान उत्पन्न होती हैं, मनुस्मृति में लिखा है कि- परदारेषु जायेते द्वौ सुतौ कुण्डगोलको । अमृते जारजः कुण्डः, मृते अर्तरि गोलकः ॥ अर्थात् पराई स्त्री में व्यभिचार करने से कुण्ड और गोलक दो प्रकार की जारज सन्ताने उत्पन्न होती हैं । पति के जीवित रहने पर व्यभिचार कराके जो जारज सन्तान स्त्री उत्पन्न करती है उसे कुराड कहते हैं, और जो पति के मरजाने पर जारज सन्तान उत्पन्न को जाती है वह गोलक कहलाती है। मनुस्मति में यह भी लिखा है कि यह कुण्ड और गोलक सन्तानें अपने पितरों को जलदान और पिण्डदान देने का अधिकार नहीं रखती; अर्थात् इनका किया हुआ जलदान और पिण्डदान पितरों को नहीं पहुँचती और पितरों की सुगति नहीं होती ] अपने हाथों आप ही करके कुल का हास । मैं भी पाऊँगा सखे, घोर नरक में वास ॥ कौरव नहिं देते राज मुझे, रहने दो मैं लेता भी नहीं क्या करूँगा उस दौलत का जो,नहिं गयी किसी के साथ कहीं ? मैं भिक्षा मांग मांग कर ही अपना सब जन्म विता दूंगा। कौरव तल्वार उठायेंगे तो नीचे शीश झुका दूँगा ॥ जब एक रोज मरना ही है तो मरने से क्या डरना है सबको मासँ और आप रहू', यह कर्म मुझे नहिं करना है ।। वह देखो कौरव-सेना में जो वीर नजर में आते हैं। उनमें प्राचार्य द्रोण के सँग, दादा भी शोभा पाते हैं । आचार्य द्रोण ही ने मुझको योद्धा और वीर बनाया है । आचार्य द्रोण ही ने मुझको सब धनुर्वेद सिखलाया है !! फिर दादा की क्या बात कहूं, जो बेहद लाड़ लड़ाते थे । बचपन में मुझको प्रेम सहित, पहरों तक गोद खिलाते थे।। Amrica

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अर्जन-मोह 8 [ श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-१
इन दोनों महानुभावों का मेरे शिर पर ऋण भारी है ।
इन दोनों से बढ़कर मेरा, कोई और नहीं हितकारी है ।।
है उचित मुझे इस. जीवन में इन दोनों की सेवा करना ।
इन दोनों के चरणों की रज सादर अपने शिर पर धरना ।।
से जिन हाथों से दोनों के पद-कमल चापना लाजिम है
क्या उन हाथों ही से उनके शिर भी उतारना लाजिम है ।।
माधव,मुझको यह बतलाओ, यह किस जग की मर्यादा है
इस महापाप का नियम कहां किस धर्मशास्त्र ने बांधा है ?
देते हों यदि शास्त्र भी यह अनुचित अधिकार ।
तब भी मुझको है नहीं यह पातक स्वीकार ।
इस एक लोक की दर तो क्या, तीनों लोकों का राज मिले ।
और चाहे इन्द्रलोक का सा सम्पत्ति भोग,सुख-साज मिले ।।
तब भी मैं बड़े बुजुर्गों पर नहिं अपना हाथ उठाऊँगा ।
हे कृष्ण, कहो तुम लाख बार पर मैं नहिंशस्त्र चलाऊँगा।
इस महापाप के द्वारा जो सम्पत्ति भोग सुख पाना है।
सो रुधिर मांस में सने हुए दूषित भोजन का खाना है ।।"
इतना कहकर रख दिए अर्जुन ने हथियार ।
छोड़दिया एक बार ही उसने युद्ध विचार ।।
अर्जुन, के उत्साह को देख इस तरह मन्द ।
अचरज में आकर लगे कहने यो ब्रजचन्द ।।
"अर्जुन, अब जबकि लड़ाई का सामान सामने ही सब है
तब तुम जो पीछे हटते हो यह बात बड़ी ही बेढब है
सच्चे योद्धा, सच्चे क्षत्री-जब ऐसा अवसर पाते हैं ।
तब मन में अपने .खुश होकर तन फूले नहीं समाते हैं ।।
ZONE
प्रारम-खमी

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श्रीमद्भगवद्गोता-संख्या-१]] * अर्जुन-मोह
लेकिन, खुश होना तो किलका,लुल हिम्मत बिल्कुल तोड़ रहे
क्षत्री योद्धा का धर्म भूल इथियार हाथ से छोड़ रहे ।।
यह कातरता, यह कायरता अर्जुन,तुममें क्यों कर आई ?
निज धर्म त्याग कर देने की यह कुमति कहां कैसे पाई ?
क्या, तुम्हें नहीं मालूम है-जो क्षत्री रण से भय खाता है ?
बदनामी उसको मिलती है, वह घोर नरक में जाता है :
इसलिए उठो अर्जुन,दृढ हो, कायरता तुम्हें नफरती है ।
बेमतलब की चिन्ता न करो,चिन्ता समति-गति हरतो है।।
अर्जुन ऐसे वैन सुन बोला तज कर धार ।
"कृष्ण,कहूं में किस तरह अपने मन की पीर ।।
जिनके जीवित रहने से मैं निज जीवन धन्य मानता हूं
जो रहे दयालु सदा मुझपर, जिनको मैं हितू जानता हूं !!
वेही सब सम्मुख आये हैं मर जाने को मिट जाने को ।
तब बोलो, कैसे हाथ उठे-उनपर इथियार उठाने को ।।
यद्यपि कहता है क्षात्र-धर्म आगे बढ़ दो दो हाथ करूँ।
सम्मुख मेरे जो भी प्रावे, उसको मारूं या आप मरूँ ॥
लेकिन, बस, धनुष उठाते ही रोमाञ्च मुझे हो आता है ।
मन की कुछ ऐसी हालत है-बिल्कुल ही बैठा जाता है ।।
बेढब द्विविधा में फंसे हुए व्याकुल होते हैं प्राण मेरे ।
जब सावधान ही चित्त नहीं तो क्या कर लेंगे बाण मेरे ॥
AAAAAAAA
गाना
हे कृष्ण,
क्या बताऊँ मुश्किल पड़ी हुई है ।
है युद्ध सामने. पर, हिम्मत छुटी हुई है।

U क लार जिस ओर दृष्टि पहुँची, उस ओर ही यह देखा । अपने कुटुम्बियों की सेना खड़ी हुई है ।। हथियार छोड़ दूं या सम्बन्धियों को मारू । कुछ भी समझ न पड़ता, उल्झन पड़ी हुई है ।। क्षत्री के वास्ते है-जो पुण्य युद्ध उपमें ही पाप की अब रङ्गत मिली हुई है ।। झंझट को छोड़ जाऊँ, धूनी कहीं । रमालू। बस एक बात यह ही मन में ठनी हुई है।" करना। प पाया अर्जुन को जभी, इस प्रकार बेचैन । वासुदेव गम्भीर हो, बोले ऐसे वैन anvar DOP "अर्जुन,मुझको विश्वास न था, तुम यों व्याकुल होजाओगे। अपना कर्तव्य कर्म, तजकर यो नासमझी दिखलाओगे जो इसी तरह क्षत्री सारे, डर जाया करें बुराई से । रिश्तेदारों को देख-देख, हट जाया करें लड़ाई से ॥ तो फिर धीरे धीरे जग से, मिट जाय युद्ध-विद्या सारी । रह जॉय नाम भर के क्षत्री, कोई न होय फिर धनु-बारी ।। योद्धा और योद्धापन दोनों जिस दिन नपैद होजायेंगे उस दिन अन्यायी दुष्ट पुरुष मनमानी कर दिखलायेंगे। इस युद्ध -कला के ही बल पर राजा करते हैं राज सदा । इस युद्ध-कला से ही बसता मर्यादित लोक-समाज सदा ॥ क्षत्री के बाणों के डर से संसार शान्ति से रहता है । जिससे कि अन्न,धन,वैभव काशुभ स्रोत सृष्टि में बहता है। ANAAMAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAA कम mamar श्रीमद्भग-द्गीता-संख्या-१ ] * अर्जुन-मोह ( १९ [ व्याख्यान-भगवान् यहां अजुन को शस्त्र-विद्या और शस्त्रधारी योद्धा का महत्त्व समझाते हैं। नीतिकारों ने कहा है कि- "शस्त्रविद्या स्वभावेन, सर्वाभ्योऽस्ति महीयसी । शस्त्रेण रक्षिते राष्ट्र, शास्त्रचिन्ता प्रवर्तते ।।' अर्थात् हथियार धारण करके युद्ध करने को विद्या सभी विद्याओं से श्रेष्ट है। क्योंकि हथियार के बल से जब एक जाति अपने आपको सुरक्षित बना लेती है तब कहीं उसे शास्त्रों को चिन्ता अर्थात् विद्या पढ़ने. पढ़ाने के लिए बेफिक्री और फुसत होती है ] इसलिए युद्धको घृणित समझ तुमको जो ग्लानि होरही है । सो सच पूछो तो हे अर्जुन, एक बेढब हानि होरही है ।। अर्थात्-भेद यह है देखो, समझो, समझाये देता हूं क्यों है श्रावश्यक युद्ध तुम्हें, यह तत्त्व बताये देता हूं। तुम यह तो खूब जानते हो-कोरव बेहद अन्यायी हैं। वे जितने प्रभुताशाली हैं, उतने ही सङ्कटदायी हैं। दिये उन्होंने हैं तुम्हें--कितने ही सन्ताप । भूलगये क्या इस समय-तुम वह कष्ट-कलाप ? जब तुम पाँचों पांडव मिलकर बचपन में खेल रचाते थे। तब यह कौरव ही तुम सबको क्या क्या नक्लेश पहुँचाते थे । उस दिन को याद करो अर्जुन, क्या कर उपाय रचाया था । जब भीमसेन को धोखे से इन सबने जहर पिलाया था। वह तो यह कहो कि ईश्वर ने कुछ ऐसी महिमा दिखलाई । जिससे कि भीम के प्राणों पर रचीभर जाँच नहीं आई। पर, कुटिल कौरवों ने फिर भी उत्पात नया एक खड़ा किया । लाक्षागृह में जा रहने को तुम सब लोगों के विदा किया ।। उस भीषण लाक्षागृह से जब जैसे तैसे कर पान बचा । तब मरजाने से भी बदतर, दुष्टों ने दुखद विधान रवा । ANASAAAAAAAAAAAAA

अर्थात्-पाण्डवों से पहले सर्वस्व जुए में हथियाया !
फिर बीर द्रौपदी का खींचा, अपमानित उसको करवाया।
ओह ! अबला की दुखभरी टेर जिस समय कान में आई है।
तब कुछ मत पूछो, कैसी कुछ तबियत मेरी घबर ई है।
क्षण भर मुझसे रुकते न बना, जैसा बैठा था उठ पाया ।
और छिप छिपे वह यत्न किया जोअन उसका खुल पाया ।।
भूली नहीं है द्रौपदी अबतक वह अपमान ।
रहता है इस बात का निशिदिन उसको ध्यान ।।
वह इस प्राशा में जीती है, मेरे पति युद्ध रचायेंगे।
अत्याचारी से अबला का बदला भरपूर चुकायेंगे।
अबला ही नहीं अाज सारा संसार प्रतीक्षा करता है।
अत्याचारी को दण्ड मिले, बस, यही कामना करता है ।।
अवसर तो ऐसा प्राप्त हुआ, पर, रण से चित्त हटाते हो ।
बाबाजी बनकर जंगल में जाने की बात सुनाते हो ।
अन्याय हुअा है जो तुम पर,वह बिल्कुल भूले जाते हो।
अत्याचारी के हेतु एक निष्कंटक मार्ग बनाते हो।
यह कार्य तुम्हारा वीरों के यश को कलुषित कर डालेगा ।
इतना ही नहीं, सदा को वह एक निन्द्य कुरीति चलादेगा।
वह निन्द्य कुरीति यही तो है जो बदले लिए न जायेंगे।
तो धागे को जो अन्यायी होंगे वे भय नहिं खायेंगे ॥
श्रीरामचन्द्र ने सतयुग में यह अपना धर्म विचारा था।
बस, इसीलिए तो रावण से पण्डित ब्राह्मण को मारा था ।
यदि रामचन्द्र चुपचाप कहीं अन्याय उस समय सह जाते ।
तो और लोग भी आगे को वैसे ही चुप रह रह जाते ॥
AAAAAAAAAAAAAAAAAAAAA
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AAAAAAAAAAAA
POSENESS

१
सारे शास्त्रों ने ब्राह्मण का बंध करना पाप बताया है।
ब्राह्मणघाती को महाघोर पातको पतित ठहराया है ।
लेकिन, यह भी शास्त्रों ही में कह दिया गया है समझाकर ।
सहता है जो अन्याय पुरुष, वह है अन्यायी से बदतर ।।
श्रीरामचन्द्र के कृत्यों का अबतक दुनिया गुण गाती है ।
आदर-समेत अब भी उनके चरणों में शीश नवाती है ।।
लेकिन, तुम अपनी कहो तुम्हें दुनिया किस तरह पुकारेगी ।
कायर, कापुरुष, कदाचारी, कह कहकर नित धिक्कारेगी।
इसीलिए यह है उचित, अर्जुन, करो उपाय ।
कायर होकर मत सहो--दुराचार अन्याय ।।
तुम भी हो जब राज्य के प्राधे हिस्सेदार ।
किस निमिच हो छोड़ते फिर अपना अधिकार ।।
भाना, तुमको है नहीं राजपाट से प्रेम ।
किन्तु, चाहिए तो सही घर को योगक्षेत्र ॥"
अर्जुन बोला-"गोविन्द,मुझे अब भी सन्तोष नहीं होता।
माना, अन्यायी दुष्टों से लड़न में दोष नहीं होता।
दुर्योधन से इसलिए मुझे लड़ने में बिल्कुल सोच नहीं ।
उसके संगियों साथियों से भिड़ने में कुछ संकोच नहीं ।।
पर, भीष्म पितामह स्वयं उधर श्राचार्य द्रोण को लिए हुए ।
जब खड़े हुए हैं शस्त्र बाँध संकल्प युद्ध का किए हुए
तब दुर्योधन के साथ-साथ उन पर गांडीव उठाऊँ मैं
यह किस प्रकार से सम्भव है ? यह हृदय कहां से लाऊँ मैं |
जो वयोवृद्ध और ज्ञानवृद्ध सजान, सुन्दर सुखदायी हैं
वे दुर्योधन ही की नाई कैसे कहदू अन्यायी हैं ?"
मा

oad ... अर्जुन को अब भी रहा बाकी जब सन्देह । इस प्रकार भगवान् तब बोले सहित सनेह ।। "अर्जुन, यह भीष्म पितामह की चिन्ता जो तुषको व्यापी है । सो सोच समझकर देखो तो, वह चिन्ता यहां वृथा सी है। पाण्डव तो पहले ही उनसे आज्ञा सप्रेम ले चुके हैं। प्राज्ञा के साथ साथ जय की आशिष् वे स्वयं दे चुके हैं ।। यदि कहीं तुम्हारे लड़ने में कुछ दोष समझते वे अर्जुन ! तब यह तो जरा विचार करो आशिष् वे क्यों देते अर्जुन ? तुम वयोवृद्ध और ज्ञानवृद्ध जल मन में उन्हें समझते हो २ तब फिर उनकी आज्ञा पर भी क्यों रण के लिए झिझकते हो ? इसके अतिरिक्त बात यह है, वे स्वयं युद्ध में आये हैं । तल्वार, तीर, बरची, भाले, सत्र शस्त्र युद्ध में लाये हैं ।। इन शस्त्रों का वे लड़ने में निश्चय जौहर दिखलायेंगे। तुम उनके सम्मुख जायोगे तो तुम पर तीर चलायेंगे। जब दादा अपने पोते पर निर्भय हैं शस्त्र चलाने में । तब पोते को क्या शंका है दादा से युद्ध रचाने में ? युद्ध-भूमि में हैं सभी योद्धा एक समान । नाते रिश्ते का नहीं रण में होता ध्यान ।। इसलिए भेद यह है इसमें, जो अब मैं तुम्हें बताता हूँ। आये हैं भीष्म युद्ध में क्यों, यह तत्व तुम्हें समझाता श्रीभीष्प पितामह ने जो अब दुर्योधन को अपनाया है । तो क्या अाखिर दुर्योधन को निर्दोष उन्होंने पाया है ? नहिं, नहिं, ऐसी कुछ बात नहीं, जो बात है वह इतनी सी है । अबतक दुर्योधन ने उनको नाना प्रकार सेवा की है। đô th. YEARCWCOM • CPM more

दुर्योधन के हाथों अबतक सत्कार उन्होंने पाया है।
दुर्योधन ही का आज तलक नित अन्न उन्होंने खाया है ।।
जो देह उन्होंने पाली है दुर्योधन का भोजन खाकर ।
वह देह समर्पण करते हैं वे अब दुर्योधन को लाकर ।।
पापी का भोजन पा करके वे मन में ग्लानि भर रहे हैं।
इसलिए युद्ध करने प्राकर ने प्रायश्चित्त कर रहे हैं।
वे खू.ब जानते हैं पाण्डव लड़ रहे धर्म को लिए हुए ।
इसलिए हृदय से वे तुम पर हैं भाव प्रीति का किए हुए ।।
उनको यह निश्चय है रण में पाण्डव पाचों जय पायेंगे ।
और वे शरीर के बन्धन ले यों अनायास छुट जायेंगे।
उनको योद्धा ही मत समझो, वे पूर्ण शास्त्र-ज्ञाता भी हैं
नीतिज्ञ भी हैं धर्मज्ञ भी हैं और योग-तत्व-द्रष्टा भी हैं ।
मालूम उन्हें वह है विद्या, जिससे कि ताप मिट जायेगा।
वे कितना ही संग्राम करें,फिर भी न पाप लग पायेगा ।।"
इस प्रकार के जब वचन बोले गोपीनाथ ।
अर्जुन ने पूछा तभी उत्कण्ठा के साथ ।।
"गोपाल, मुझे भी बतलादो, कैसी विद्या वह होती है
जो किए हुए सब कर्मों का क्षण भर में कल्मष खोती है ।
जो बात भीष्म से पण्डित को निश्शङ्क युद्ध में लाती है।
वह बात जान लेने को अब तबियत मेरी अकुलाती है ।
मैं विनय तुम्हारी करता हूं, गोविन्द, मेरा उपकार करो ।
मैं जिस उल्झन में उल्झा हूँ, उससे मेरा उद्धार करो ।।

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(२४)
[ श्रीमद्भगवद् गोता-संख्या-१
* अर्जुन-मोह
गाना
कीजिए अब मेरा उद्धार ।
यदु-कुल-तिलक ललाम श्याम, करुणानिधि-करुणागार ।। कीजिए।
अन्धकार में
मति मेरी,
समझ पड़े
नहिं सार ।
सरल ज्ञान-दीपक को करिए, प्रचुर प्रभा-विस्तार ।। लीजिए ।
झंझरी नैया है. विवेक की-भ्रम पारावार ।
तत्त्व-ज्ञान का डाँड लगे तब हो संकट से पार ।। कीजि !!
शरण तुम्हारी आया हूँ मैं सब प्रकाई लाचार ।
अपना जान बांह गह लीजे, हो मुझ पर उपकार !! कीजिह ॥
के
Thco
بهتر
इजि.
नोट--इससे आगे की कथा दूसरे भाग आत्मा को अमरता' नामक पुस्त 5 में पदये ।
TANT

१८ - - मशरिक़ी हूर पं० राधेश्यामजा कविरत्न अन्य नाटक द्वारा लिखित नाटक महाराजा भर्तृहरि १०) पृथ्वीराज ) भजन गाने व राजले वीर अभिमन्यु १॥ श्रीराधेश्याम-गीताञ्जलि ॥ महर्षि वाल्मीकि २॥) राधेश्याम विलास सती पार्वती २॥) | राधेश्याम-कीर्तन ईश्वर-अक्ति १॥) राधेश्याम भजनमाला परम-भक्त प्रहाद. १॥) प्राचीन भजनमाला परिवर्तन १॥) मोहन-कवितावली श्रीकृष्ण-अवतार १॥) मुसाफिर की पाकेट बुक ॥ रुक्मिणी-मङ्गल १%) प्रेम-रत्नावली द्रौपदी-स्वयम्बर २॥) निजानन्द प्रदीपिका श्रवणकुमार १%) गृहिणी गीताञ्जलि आनन्द-लहरी ऊषा-अनिरुद्ध १%) मीरा भजनमाला बोध-प्रकाशी भारत-माता पद्य-पुष्पांजलि कृष्ण-सुदामा प्रारती संग्रह शान्ति के दूत भगवान् श्रीकृष्ण ग़ज़लों का गुलदस्ता सेवक के रूप में भगवान श्रीकृष्ण ।-) ग़ज़ल-सागर ॥ घण्टा-पन्थ नोट-नाटकों में वीर अभिमन्यु, मोहन गीतावली मोहन भजनमाला श्रवणकुमार, और मशरिक्की हूर, उर्दू में मोहन संगीत शिक्षा भी छपकर तैयार हैं। दाम बही जो | सीताराम-कीर्तन 11) हिन्दी में हैं। समर-गीत-माला न्यू अल्फ्रेड थियेट्रिकल कम्पनी श्राफ | मीठी गुञ्जार ) मधुर मुरली ) बम्बई द्वारा खेले गये रसीली तान ३) कुसुम-कुंज असली व मुकम्मिल नाटक वसंतवाटिका है) पद्म-पराग भूलभुलैयाँ १) दिलफरोश १) अन्य पुस्तकें चलता पुर्जा १) शरीफ बदमाश १) भक्त स्त्रियाँ -) स्बावे हस्ती १) अछूता दामन १) सतलड़ी ॥) पञ्चों का प्याना।) खूबसूरत बला१) हिन्दू बिधवा १०) अजायब घर ॥) धनुर्विद्या || भारत व्याकुल थियेट्रिकल कम्पनी प्रेत-लोक १॥) नौलखाहार ॥) लिमीटेड श्राफ मेरठ द्वारा स्खेले गये ज्योतिष-प्रकाश ॥) दृष्टांत महासागर ) असली व मुकम्मिल नाटक दियोग-कथा /-) मोहन माला ) तेरोसितम १-) सम्राट्चन्द्रगुप्त १-) हनुमानचालीसा -)। सुन्दरकाण्ड ।) 1%) पद-पुञ्ज 1) अमरकोष पता-श्रीराधेश्याम-पुस्तकालय, बरेलो । WA V नकली किताबों से बचिये हमारी रामायण और हमारे नाटकों का काही प्रचार देखकर लोगों ने उसी रंग और रूप की नकली किताबें छाप छापकर प्रकाशित करदी हैं । नळालों की कई बरस की कोशिश का नतीजा यह है कि बाज़ार में नकली किताबों की भरमार है। यह नङ्गली किताब )॥ में बुक्सेलर को दी जाती है, जिसे खुक्सेलर -) यो ) या ) में बेचकर शायदा उठाता है और इस प्रकार प्राहक को धोखा दिया जाता है। प्राहक जब ऐसी किताब को घर ले जाता है तो पछताता है । प्राहक का ऐसी धोखेबाज़ी से बचाने के लिये अब हम अपनी हर एक किताब के ऊपर अपनी तस्वीर देने लगे हैं,जैसी कि इस किताब पर श्राप देख रहे हैं। अब श्राइन्दा से श्राप धोखा न बाहयेगा- ध्यान रहे- जिन किताबों पर-राधेश्याम” या-राधेश्याम वाशिष्ठ" या "तर्ज-राधेश्याम छपा रहता है, वह हमारे यहाँ की नहीं हैं। हमारे यहाँ की किताबों पर हमारे यह दस्तखत भी रहते हैं। इन्हें पहचान लीजिये- - झापEATRE preparatang भवदीय- राधेश्याम कथावाचक मालिक-श्रीराधेश्याम पुस्तकालय छ प्रेस, बरेली।

श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या आत्मा को अमरता प्रकाशक- नेपाल गवर्नमेण्ट से "कथावाचस्पति" की पदवीप्राप्त कीर्तन-कला-निधि, काव्य-कला--भूषण, श्रीहरि कथा-विशारद, कविर न. कति अध्यक्ष श्रीराधेश्याम -पुस्तकालय, मूल्य ॥ आने LILI 1-) अन्य कथा ५०राधेश्यामजी कविरत्न लिखित नवीन कृति । में मिलेंगे, तथा जिल्दार गुटका |) में मिलेगा। डाक महसूल गुटका । कृष्णायन अलग अलग भाग पर |-) जन्माष्टमी |-) नन्द-महोत्सव महाभारत मलीवाला कन्हैया।गिरिवरधारी रासरहस्य 1) कंस वध राधेश्याम रामायण की तर्ज में ) नन्द नन्दन-वसुदेव-नन्दन 1-)| भीष्म-प्रतिज्ञा सम्पूर्ण सात भाग एक सुन्दर जिल्द | भीष्म-पराक्रम में छःआने अधिक देने पर अर्थात् तीन | पाण्डव-जन्म रुपए में मिलेंगे। डाफ महसूल!) अलग पाण्डवों का वाल्य-काल पाएडवों की शस्त्र-परीक्षा रुक्मिणी मंगल लाक्षागृह बक-सहार (राधेश्याम रामायण की तर्ज में) द्रौपदी-विवाह रुक्मिणी-जन्म सुभद्रा हरण रुक्मिणी का कृष्ण प्रेम राजसूय यज्ञ रुक्मिणी की सगाई द्रौपदी-वस्त्र-हरमा रुक्मिणी का पत्र-लेखन किरातार्जुन-युद्ध रुक्मिणी का गिरिजा-पजन यत्त-सम्बाद रुक्मिणी का भातृस्नेह कीच-बध रुक्मिणी का विवाह - अभिमन्यु-विवाह सम्पर्ग सातों भाग एक सुन्दर जिल्द में छै आने अधिक देनेपर अथात तीन रुपए में मिलेंगे। डाक महसूल ।) अलग ( राधेश्याम रामायण की तर्ज में-) नरसी की हुण्डी শিল্পীরা श्रीसत्यनारायण की कथा (राधेश्याम रामायण की तर्ज में) अर्जुनमोह ॥ विराटरूप-दर्शन।)। धव-चरित्र आत्मा की अमरता।)। जीव-ब्रह्म-विवेक।। सुदामा चरित्र कर्म-योग ।।। अर्जुन का समाधान ।। मोरध्वज-चरित्र नोट-सम्पूर्ण ६ भागा एक सुन्दर जिल्द सत हरि-चरित्र 1) अधिक देने पर, अर्थात् :) में महाराणा प्रतापसिंह मिलेंगे,तथा जिल्ददार गुटका ११) रू० में सत्यवादी हरिश्चन्द्र मिलेगा। डाक महसूल गुटका।) अलग सावित्री-सत्यवान् अलग आग पर ।) मीराबाई दुर्गा चरित्र भक्त-अम्बरीष ( राधेश्याम रामायण की तर्ज में अभिमन्यु की वीरता महिषासुर-बध शुम्भ का उत्पात गुरु नानक बुद्ध-चरित्र चामुण्डा का पराक्रम रक्त-बीज की लड़ाई द्रौपदीलीला शुम्भ और निशुम्भ का बध महाराजा दिलीप रोटु- सम्पूर्ण ५ भाग एक सुन्दर जिल्द | शिव चरित्र ४ भाग) ११) में छै आने अधिक देने पर अर्थात् २) | महर्षि चरित्रं ( ४ भाग ) श) पता-~श्रीराधेश्याम-पुस्तकालय, बरेली । महाद-चरित्र - गुरु गोविन्द सिंह २ RSOC MAawnerx * श्रीमद्भगवद्गीता * संख्या-२ सर्वाधिकार स्वरक्षित है। लेखक- प० रामनारायण पाठक R PRODJADOOT प्रात्मा की अमरता DeOUSER.OR.. । on -- प्रकाशक- नेपाल गवर्नमेण्ट से "कथावाचस्पति” की पदवीमाप्त कीर्तन-कला-निधि, काव्य-कला-भूषण, श्रीहरि कथा-विशारद, कविरत्न प० राधेश्याम कथावाचक - अध्यक्ष Cana কাইফSAshoাহিঙ্গাতেহা दसवीं बार १०००] सन् १९४६ ई० [ मूल्य साढ़े चार अने प्रिंटर-प० रामनारायण पाठक, श्रीराधेश्याम-प्रेक्ष, बरेली।

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Hosteroin
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प्रार्थना
मन-भवन में मेरे भगवन् ! श्राप क्यों आते नहीं ?
ताप और सन्ताप मेरे मेट क्यों जाते नहीं ?
है सुना मैंने कि तुम शरणागतों के त्राण हो ।
शरण आया हूँ क्यों मुझको भी अपनाते नहीं ?
आप अपने पुण्य-बल से ही तरे होते जो सब ।
विश्व के जन आपकी यों कीर्ति फिर गाते नहीं।
याद हैं अबतक भी वृन्दाबन के वह सारे चरित्र ।
अपने भक्तों से क्या अब वह आपके नाते नहीं ?
आये हो नर-देह लेकर भूमि पर जब बार-बार ।
आज “निर्गुण" से सगुण, क्यों आप हो पाते नहीं ?

---- --- M । अर्जुन यों करके विनय दोनों कर निज जोर- लगा देखने एकटक कृष्णचन्द्र की ओर ॥ अपना प्रियजन जानकर प्रेम-भाव के साथ- धीरे-धीरे यों-लगे कहने गोकुलनाथ ॥ "अर्जन, इस समय तुम्हें सचमुच एक मिथ्या भ्रम होगाया है। उस मिथ्या भ्रम के ही कारण तुमने मिथ्या दुख पाया है ।। तुम कहते हो मैं अपनों पर किस तरह कठोर प्रहार करूँ ? किस तरह पितामह का-गुरु का-सेना-समेत संहार करु ? इससे यह जाहिर है-तुमको अपनों का मोह सताता है ! 'घरवाले सब मरजायेंगे'. यह क्लेश प्रवल होपाता है । जिन बातों का है शोक तुम्हें, ज्ञानी उनसे नहिं डरते हैं। वे कभी किसी के मरने और जीने का शोक न करते हैं । जीने और मरने का जैसा-यह पड़ा गले में फन्दा है सो तीसों दिन होनेवाला मिथ्या माया का धन्धा है। मैं-तुम-और यह सारे योद्धा जो यहाँ युद्ध में छाये हैं- सो अब से पहले बार बार होते और मिटते आये हैं आगे भी इसी तरह यह सब पैदा होंगे मिटजायेंगे जबतक जग है तबतक जग में यह जन्म-मरण भी पायेंगे। LESTARUUSTELUN ALAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAA साय :522-420 डा THANcIRRO.COMSASHUKRIONE ( ४ ) आत्मा की अमरता है SARKARATALABANAAAAAAAAAAAABAAddn [श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या २ पैदाहोने और मिटने का यह चक्कर योंही चलता है । क्या जानें, अर्जुन, क्यों तुमको होती इससे व्याकुलता है ? एक बात है और भी उसपर करो विचार । हाड़-मांस की देह यह होय-जाय बहु बार ।। पृथ्वी, प्रकाश, जल, तेज, वायु, यह पाँच तत्व कहलाते हैं यह पाँच तत्त्व ही मिल-जुलकर प्राणी की देह बनाते हैं। इस पाँच तत्व की देह-बीच चैतन्य पुरुष एक रहता है । यह पुरुष अंश ईश्वर का है, सिद्धान्त-शास्त्र यह कहता है । बस, पाँच तत्त्व की बनी देह बनती है और मिटजाती है। यह ईश्वर अंश वस्तु वह है-जो अमर-अमिट कहलाती है- तो जो पदार्थ यों बार-बार बनता है और मिट जाता है । उसके निमित्त ज्ञानी कोई नहिं कभी कष्ट कुछ पाता है।" अर्जन बोला-'श्रापका कथन सत्य ब्रजचन्द । लेकिन फिर भी वित्त यह हुआ नहीं निर्द्वन्द ।। प्रिय लोगों के प्राण हो-आँखों-भागे नष्ट । कहाँ तलक फिर भी न हो अपने मन को कष्ट ?" यह सुनकर बोले मधुसूदन-"मन क्लेश-कष्ट जो पाता है। वह मन का क्लेश-कष्ट अर्जुन, माया से होता-जाता है । यह हाथ-पैर और आँख-नाक-जो चीजें देखी जाती है। ये चीजें गिनती में दस हैं, इन्द्रियाँ दसों कहलाती हैं। दुनिया की विविध वस्तुओं का होता इनसे सम्बन्ध जमी । आनन्द, शोक, सर्दी, गर्मी-होते बहु सुख और दुःख तभी। यह सुख और दुःख नित्य होते और नित्य नष्ट होजाते हैं जो इन सबको सहलेते हैं, वे उत्तम नर कहलाते हैं। AAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAA ayan

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श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या २ ] 4 आत्मा की अमरता
इन सुख और दुःखों का सहना जिस वीर पुरुष को जाता है ।
बस, वह ही सच्चा ज्ञानी है. बस, वही अमृतफल पाता है ।।
तुम भी सुख और दुःख सब सहलो घरकर धीर ।
अर्जुन, उठ आगे बढ़ो, युद्ध करो बलवीर !
एक भेद और है उसको भी समझो-समझाता हूँ अर्जुन !
यह मृत्यु वास्तव में क्या है, यह गुर बतलाता हूँ अर्जुन !
मैं तुमसे अभी कहचुका हूँ, सिद्धान्त-शास्त्र यह कहता है ।
इस पाच तत्त्व के चोले में चैतन्य पुरुष एक रहता है
यह पुरुष देह में रहने के कारण-भात्मा कहलाता है।
लेकिन परमात्मा से इसका-पूरा और पक्का नाता है।
परमात्मा जैसे अजर-अमर, आनन्दकन्द, सुखराशी है ।
यह प्रात्मा भी बस उसी तरह सच्चिदानन्द अविनाशी है।।
अविनाशी होने से इसका उद्भव या नाश नहीं होता ।
यह देह नष्ट होने पर भी प्रात्मा का नाश नहीं होता।
परमात्मा के तुल्य है-अात्मा पूरणकाम ।
अज-अनन्त-अच्युत-अनय और अकर्ता नाम ॥
यह अात्मा न तो स्वयं मरता-नहिं किसी से माराजाता है ।
इस जड़ शरीर में माया के चक्कर में पड़कर पाता है।
जो कुछ कि इन्द्रियों का सुख-दुख इस जड़ शरीर में रहता है ।
उस सुख-दुख को भ्रम से प्रात्मा अपना ही सुख-दुख कहता है।
यदि यह भ्रम-मूल दूर करदे तो आत्मा फिर परमेश्वर है ।
जगदीश्वर है, अखिलेश्वर है, भुवनेश्वर है, भूतेश्वर है ॥
अात्मा ही बस देह में है पदार्थ एक नित्य ।
पञ्च तत्त्व की देह है-नश्वर और अनित्य ॥
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AARAAMA आत्मा की अमरता [श्रीमद्भगवद्ग ता-संख्या २ जो शै अनित्य और नश्वर है; वह सदा नहीं रहपायेगी। हो आज या कि सौ बरस बाद; निश्चय विनष्ट होजायेगी। जो चीज़ नष्ट होगी निश्चय, उसके निमित्त दुख पाना क्या ? जो एक रोज मिटजायेगी, उससे यों मोह बढ़ाना क्या ? यह देह वास्तव में अर्जुन, ऐसी धोखे की टट्टी है। है अभी भली और बनी हुई-और अभी-अभी फिर मट्टी है। हो, अात्मा जो इस देह में है, वह ही नित रहनेवाला है। मिटजाय भले ही देह किन्तु वह कभी न मिटनेवाला है। ज्यों पुरुष पुराने वस्त्र छोड़ नूतन पोशाक बदलता है त्यों प्रात्मा भी एक देह छोड़ दूसरी देह में चलता है। यह भी बताया है मैंने, यह प्रारम सचमुच ईश्वर है। इसलिए ईश्वर के समान यह अच्युत है, जगदीश्वर है ।। हथियार इसे नहिं काट सके, पावक नहिं इसे जला सकती । जल इसे नहीं तर कर सकता और हवा न इसे सुखा सकती। यह नित्य और सर्वव्यापी; स्थिर-अचल, सनातन, पावन है । इन्द्रिया जिसे नहिं जान सकें. यह वह अव्यक्त गुप्त धन है ॥ होता है इसको नहीं कोई कभी विकार । सारहीन ज देह में यही एक है सार ।। । गाना - देह है नाशवान् निस्सार, एक आत्मा है उसमें सार । पञ्च तत्त्व की देह तो हो-होकर मिट जाय । आत्मा ही वह वस्तु है जो कि न कभी नसाय ।। यही कहते हैं शास्त्र पुकार; एक आत्मा है उसमें सार ।। जब होना है देह का निश्चय एक दिन अन्त । उचित नहीं उसके लिए-दुख पाना अत्यन्त ॥ पण्डितों का है यहीं विचार; एक आत्मा है उसमें सार । AAAAAAAAAAAAAAAA Dura

( ७ )
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श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या २] आत्मा की अमरता
आत्मा मरता है नहीं; है वह अमर अनूप ।
कहते हैं। मुनिजन उसे-परब्रह्म का रूप ।
वृथा यह सारा हाहाकार, एक आत्मा है उसमें सार ।।
अत्मा में और देह में है यह पूरा भेद ।
ज्ञानी उसको जानकर मन नहिं धरते खेद ।।
तत्त्व यह है सुख का आधार; एक आत्मा है उसमें सार ।।
-
::-
इस सारे वक्तव्य का अर्जन, है यह अर्थ ।
आत्मा की या देह की चिन्ता करना व्यर्थ ।
जज देह एक दिन मिटनी है, तब वह न सदा रहपायेगी।
वह अभी मिटे. या कभी मिटे-मिटकर मट्टी हो जायेगी।
इस मिटनेवाली मट्टी की चिन्ता से कुछ उपकार नही ।
इसके मिटजाने पर रोना ज्ञानी पुरुषों का कार नहीं
फिर यह भी एक नासमझी है-जो तुम कहकर समझाते हो ।
इस मट्टी का तुम अपने ही हाथों से नाश बताते हो।
जो स्वयं नाश होजायेगी, उसका तुम नाश क्या करोगे ?
जोनिश्रय एक दिन जायेगी, उसको कबतक धर पकड़ोगे ?
अब रही बात एक प्रात्मा की सो वह मारे नहिं मरता है।
तुम बाण चलायो कितने ही उसपर प्रभाव नहिं पड़ता है।
इसलिए बताभो अब अर्जन,लड़ना क्यों तुम्हें प्रखरता है ?
तुम किसे मारते हो आखिर और क्या मारे से मरता है ?"
अर्जुन कुछ करनेलगा-मन में सोच-विचार ।
उसी समय-फिर कृष्ण ने किया और विस्तार ।
बोले-"अर्जुन, हम क्षणभर को मानेलेते हैं इतना भी ।
नश्वर शरीर की तरह यहाँ होती-मिटती है आत्मा भी।

.. है (८ ) आत्मा की अमरता [श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या २ तब वही बात फिर कहना है, क्यों बेजा शोक किया जाये ? जो वस्तु होय और मिटे नित्य उसके निमित्त क्यों दुख पाये ? फिर कितना ही तुम यत्न करो; पर कुछ भी नहीं बसायेगी । जो चीज कि होनी-मिटनी है, वह होकर मिट ही जायेगी। इसलिए शोक का त्याग करो, नहिं शोक ज्ञान का लक्षण है। वह पुरुष शोक नहिं करता है--जो ज्ञानी और विचक्षण है। फिर यह भी तो सोचो मन में; साहस क्यों तुमने हारा है ? जो युद्ध कर्म है क्षत्री का, वह ही बप्त धर्म तुम्हारा है । क्षत्री के लिए युद्ध करना वैकुण्ठ-द्वार कहलाता है । क्षत्री को बड़े पुण्यफल से यह युद्ध कहीं मिलपाता है। क्षत्री अपने धर्म को यदि छोड़े निश्शंक- तो बस भूतल पर उसे-निश्चय मिले कलंक ॥ जितने योद्धा यहाँ आये हैं और युद्ध जिन्होंने साधा है । वे सब यह मन में समझेगे- अर्जुन डरकर ही भागा है ॥ अबतक तुमसे डरते थे; कहते थे, अर्जुन योद्धा है । वे अब यह कहदेंगे खुलकर--अर्जुन कायर और बोदा है । इस निन्दा के दुख से बढ़कर बोलो, जग में क्या दुख होगा ? अर्जुन, बदनामी फैलगयी तो कहो तुम्हें क्या सुख होगा ? बदनामी की कुछ बात न हो- यह लक्ष्य नीतिवानों का है । बदनामी से तो मौत भली-यह कथन बुद्धिमानों का है ।। जो मारे गये युद्ध में तुम तो स्वर्गलोक को जानोगे- और जीते तो इस पृथ्वी का सब राज-पाट सुख पायोगे ॥ सुख-दुख और हार-जीत यकसा मानो तो ताप नहीं होगा। इस समबुद्धी से युद्ध करो अर्जन, तो पाप नहीं होगा। AAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAA A श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या २] आत्मा की अमरता है। ( 8 ) [ व्याख्यान-भगवान् ने अर्जुन को बतलाया कि शरीर तो नाश पाने वाली मट्टी है और आत्मा जो इसमें रहता है वह अमर है। दोनों के लिए शोक नहीं होना चाहिये । अन्त में भगवान ने युद्ध करना अर्जुन का धम बतलाकर यह भी समझाया कि युद्ध से हटजाने से बदनामी होगी। बदनामी वास्तव में मरजाने के बराबर है। भगवान ने कहा- "अर्जुन, तुम युद्ध छोड़कर हट जाने से वह हालत अपनी करलोगे जो मरने के बराबर है ।" भगवान् अर्जुन को लड़ाने के लिए यह चाल चलते हों सो बात नहीं, बल्कि सर्वदा और सर्वत्र ही बुद्धिमानों ने बदनामी को मौत से बढ़कर दुःखदायी बताया है। त्रेता में महाराज रामचन्द्र ने बदनामी के हो कारण अपनी उस प्राणवल्लभा पत्नी को वन में भेजदिया था, जिसके बिना वे अपना जीवन व्यर्थ समझते थे। महाकवि कालिदास ने महाराज राम चन्द्र के इस कार्य की आलोचना करते हुए कहा है:- । AAAAAAAAAAA अपि स्वदेहात् किमुतेन्द्रियार्थात् यशोधनानां हि यशा गरीयः । अर्थात्-जो यशोधनी हैं—यश ही जिनका सर्वस्व धन है-वे यश को अपनी इन्द्रियों की सुख-सामग्री तो क्या, प्राणों से भी बढ़कर मानते हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी इसी भाव को यूँ प्रकट किया है:- "सम्भावित कहूँ अपयश लाहू कोट मरणसम दारुण दाहू।। " । युद्ध में अपने सम्बन्धियों और कुटुम्बियों को देखकर अर्जुन के हृदय में कष्ट उत्पन्न हुआ था। उस कष्ट से व्याकुल होकर उसने युद्ध छड़देने और वैराग्य लेलेने की इच्छा प्रकट की थी। वह इच्छा ठीक उसी तरह की थी जैसी कि सांख्यशास्त्र के मानने वाले विद्वानों की होती है। सांख्यशास्त्र के मानने गले कहते कि मनुष्य जब संसार में रहेगा तो कुछ न कुछ कर्म करने ही पड़ेंगे। और जब वह कुछ न कुछ कर्म करेगा ही तब उसे कुछ न कुछ फलं भी उन कर्मों का भोगना पड़ेगा। इसलिए उचित यह है कि कर्म करे ही नहीं। संसार छोड़कर जंगल में चलाजाय तो कर्म अपने आप छूट जायेंगे, और जब कम ही न होंगे तो उनका फल भी न भोगना पड़ेगा । अर्जुन के मन में सांख्यशास्त्र कालों की बात बैठी हुई थी, इसलिए भगवान् ने सांख्यशास्त्र के सिद्धान्तों के अनुसार अबतक यह बतलाया कि प्रात्मा किसी तरह नहीं मरता और शरीर हर तरह से नाश होनेवाला है, इसलिए किसी की मृत्यु का शोक करना व्यर्थ है। अब आगे भगवान् अर्जुन को यह बतलाते हैं कि किसी तरह युद्ध में शत्रु का नाश करने पर भी हत्या का पाप नहीं होता। ] AAAAAAAAAAAAAAMAA army । (१०) * आत्मा की अमरता [श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या २ अबतक मैंने हैं किये-जितने प्रकट विचार । अर्जुन, हैं वे उक्तियाँ -सांख्यशास्त्र अनुसार ।। मतलब उनका है यही होय न ज्ञान-विहीन । कभी किसी की मृत्यु पर करे न चित मलीन ।। अब वह उपाय बतलाता हूँ, जिससे विषाद मिट जाता है । जो चाहे कम मनुष्य करे, पर, फल उसका नहिं पाता है ।। अर्जुन, वह खूब समझलो तुम-जितने भी कर्म कहाते हैं । बेसिक किए जाने से ही नहिं हानि-लाभ पहुँचाते हैं कारण यह है-इस दुनिया में जो चीज़ कम कहलाती है वह चीज़ अगर सच पूछो तो बिल्कुल जड़ मानीजाती है । बिल्कुल जड़ है वह इसीलिए सुख-दुःख नहीं कुछ पहुँचाती । वह स्वयं विश्व में किसी समय नहिं भली-जुरी मानीजाती ।। अब उसके करने से प्राणी जो भला-बुरा फल पाता है। वह भला बुरा फल भली-बुरी बुद्धी से होता-जाता है ।। यदि भली बुद्धि से कियेजाय तो कर्म भले फल देते हैं यदि बुरी बुद्धि से कियेजाय तो वही बुरे फल देते हैं ।। लेकिन,यदि बुद्धी भली-बुरी कुछ न हो तो मन निर्मल होगा । कैसा भी कर्म मनुष्य करे, कुछ कभी न उसका फल होगा। बुद्धी के ही दोष से होती सदा झमेल । कर्मों का इल भोग है-वृद्धी काही खेल। तात्पर्य यही है कहने का-इस बुद्धी को साधाजाये । वह निर्मल और एकाग्र बने ऐसा कुछ यत्न कियाजाये ॥ इस बुद्धी को जो चीज़ सदा बहकाती और फुसलाती है । वह चीज़ 'वासना है मन की और 'इच्छा' भी कहलाती है । AAAAA Aure सामRIRAM AARL MPPSDEN.:- Lo-maa { ११) है ॥ . श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या २] 8 आत्मा की अमरता है इस इच्छा के वश विवश बुद्धि कठपुतली होकर रहती है । इच्छा जो वायु बहाती है, वह वायु बुद्धि में बहती है। इच्छा पहले सुख पाने का लालच उत्पन्न कराती है। तब बुद्धी उस सुख के निमित्त कुछ न कुछ यत्न चबाती है । इच्छा मनुष्य से कहती है-वह काम करो जो द्रव्य मिले । तो बुद्धी सम्मति देती है-बस यज्ञ करो तो द्रव्य मिले ।। इच्ला मनुष्य से कहती है वह कार्य करो जो पुत्र मिले-- बुद्धी सम्मति देती बस यज्ञ करो तो पुत्र मिले इच्छा मनुष्य से कहती है-वह काम करो जो स्वर्ग मिले- तो बुद्धी सम्मति देती है बस यज्ञ को तो स्वर्गमिले ।। यों कभी द्रव्य और कभी पुत्र और कभी स्वर्ग की इच्छा है। बुद्धी को इन इच्छात्रों ने बेहद विचलित कर रक्खा है।। इच्छाओं के सन्तोष-हेतु बुद्धी बहु कर्म कराती है सब आयु मनुज की इसी तरह कर्मों में क्षय होजाती है। इच्छाओं के वश किए हुए-यह कर्म विविध फल देते हैं । और इन्हीं फलों के भोग हेतु नर जन्म विविधविध लेते हैं।" वासुदेव के वाक्य यह सुनकर भले प्रकार । अर्जुन यों कहनेलगा होकर चकित अपार ।। "यज्ञ आदि जब शास्त्र में कहे सहो कर्तव्य । कृष्णा, कहो क्या बोड़दे मनुज वही कर्तव्य ? अद्भुत यह अापका नंदनन्दन, प्रादेश। मिलता जिससे यज्ञ की निन्दा का उपदेश ।।" यह सुनकर कहनेलगे कृष्णा-'कर्तव्य नहीं छुड़वाता आजुन, यज्ञों की निन्दा का उपदेश नहीं बतलाता हूँ। A THANI

( १२ )
आत्मा की अमरता [श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या २
मैं तो बस इतना कहता हूँ-जो यज्ञ मनुष्य रचाते हैं ।
उन यज्ञों के फल की इच्छा पहले मन में ले आते हैं।
फल की इच्छा रखके मन में जो यज्ञ रचायाजाता है।
वह यज्ञ कर्म है मतलब का; इसलिए निकृष्ट कहाता है।
मतलब के यज्ञ रचाने का नहिं उत्तम शास्त्र समर्थक है ।
मतलब से यज्ञों की रचना अर्जुन, इसलिए निरर्थक है ।
कारण यह है-इन यज्ञों से जो सुख भी प्राणी पाते हैं।
वे सारे सुख माया के हैं-जो होते और मिटजाते हैं।
माया के सुख की झंझट में ज्योंही मनुष्य फँस जाता है ।
तब लख चौरासी चोलों में भारी से जाता-भाता है।
योंही चक्कर बनजाता है-दुनिया में आने-जाने का ।
प्रात्मा को कभी नहीं मिलता संयोग मोक्ष के पाने का ॥
अर्जुन, इतनी बात मैं करता हूँ स्वीकार ।
वेदों में है यज्ञ का वर्णन और विस्तार ॥
जो यज्ञशास्त्र के पण्डित हैं-वे यज्ञों के गुण गाते हैं ।
यज्ञों का करना ही जग में सर्वोपरि धर्म बताते हैं ।
लेकिन सुख-सम्पत् के निमित्त वे यज्ञ रचायाकरते हैं ।
जो यज्ञ कभी करते उसके फल को ललचायाकरते हैं।
बस, नानाविध फल पाने को नानाविध यज्ञ हुअाकरते ।
वे रोज-रोज़ इन यज्ञों में प्रासक्त-प्रसक्त रहाकरते ॥
उन यज्ञशास्त्रियों की बुद्धी थिर कभी नहीं रहपाती है ।
है कभी इधर, और कभी उधर, बस इधर-उधर मँडराती है ।
यद्यपि यह माना वे अपने इन यज्ञों का फल पाते हैं ।
वन-धान्य, इष्ट-सन्तान, स्वर्ग उनको निश्चय मिलजाते हैं।
म

AAAAAAAAAAA HOROID AAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAA AAAAAAAAA AAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAA श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या २] आत्मा की अमरता (१३) पर जब उनके यज्ञों का फल पूरा समात होजाता है । तब लौट-पलट भवसागर में बेड़ा उनका फिर पाता है। वेदों में यज्ञ बताया है तो यज्ञ अवश्य कियाजाये पर, फल पाने की इच्छा को बिल्कुल ही त्याग दियाजाये ॥ यदि यज्ञ-शास्त्री यज्ञों के फल की इच्छा न करें मन में- तो कभी न फंसने पायें वे उन यज्ञों के फल-बन्धन में। फल इच्छा से जिस तरह यज्ञों का फल होय । उसी तरह इच्छा-विवश कर्मों का फल होय ॥ जिस तरह कि फल की चाह छोड़ यज्ञों का करना अच्छा है । बस. उसी तरह फल बेचाहे कर्मों का करना अच्छा है। फल पाने की इच्छा तजकर जो कर्म रचायेजायेंगे । वे कर्म मनुज की बुद्धी को चंचल नहिं करनेपायेंगे। चंचल न होयगी बुद्धी जब तब उदासीन होजायेगी। जो कार्य किये भी जायेंगे, उनमें नहिं फँसनेपायेगी। जब कर्मों में नहिं फंसे बुद्धि तब कर्म नहीं कुछ फल देता । अर्जुन, फल से बचकर प्राणी बस मोक्षधाम को चलदेता ॥ कर्मों के फल से बचने का अर्जुन, यह यत्न निराला है यह यत्न कर्म का सारा फल करदेय भस्म वह ज्वाला है। तुम भी अब यह ही यत्न करो और रण करने को बढ़जायो । रण करने का फल क्या होगा, इसमें मत बुद्धी उल्झायो॥ फल की इच्छा से जब रण में तुम बुद्धी नहीं फंसायोगे तो निश्चय जानो लड़कर भी कुछ पाप-पुण्य नहिं पाओगे। यह .खूब याद रक्खो अर्जुन, तुम जो दुनिया में आये हो- तो बस कर्मों के करने का अधिकार साथ में लाये हो॥ । h Guindian PRETARNAVR EIO Are- Paam (१४) 8 आत्मा की अमरता 8 [श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या २ अनुचित है कर्मों का करना-फल पाने की इच्छा करके । सब कर्मों के फल देने का अधिकार हाथ है ईश्वर के सो तुम तो केवल कर्म करो और फल जो हो उन कर्मों में । यह फल लेकर अर्पण करदो-अर्जुन, ईश्वर के चरणों में । ईश्वर उस फल को प्रेम-सहित सब अपने ऊपर लेलेंगे। और तुम्हें कर्म-फल बन्धन से बिल्कुल छुटकारा देदेंगे। कमों के फल की न हो इच्छा का जो रोग। अर्जुन, तब मिलता नहीं कर्मों का फल भोग ।। अबतक जो कुछ समझाया है, वह फिर समझाये देता हूँ। अर्जुन, थोड़े से शब्दों में मतलब दोहराये देता हूँ। हैं कर्म जगत् में जितने भी वे स्वयं न कुछ फल पहुँचाते । करनेवालों की बुद्धी हो----जैसी, बैला वे फल पाते ।। कर्मों के फल से बचना हो तो जुद्धी नर वश में लाये । जिससे वह बुद्धि कर्म-फल को पाने के हेतु न ललचाये ।। कमों के फल की ललक जभी बिल्कुल जड़ से मिटजायेगी । बस, तभी बुद्धि में निश्चलता, दृढता और समता पायेगी। जब बुद्धी सम होजायेगी तब कर्म जो कियाजायेगा । प्राणी को जग का सुख और दुख सा एकी-सा दिखलायेगा ।। जब यह हालत होजायेगी ला कर्म जो कियाजायेगा। उसका फल करनेवाले के सिर पर न कभी भी आयेगा। कर्मों के फल की चाह छोड़ जो बुद्धी वश में लाते हैं। ने पुरुष कर्म करने पर भी कर्मों का फल नहिं पाते हैं। बुद्धी का है साधना ऐसा सुधर उपाय । कर्म करे और कर्म के फल से भी छुट जाय ।। AARAAAAAAAAAAAAAAAAAAAA AN

( १५)
AS
श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या २] आत्मा की अमरता.
अर्जुन, इस समय तुम्हारी बस एक बुद्धिमलीन होरही है ।
वह कर्मों की फल-इच्छा के बिल्कुल प्राधीन होरही है।
कमों के फल की इच्छा से अब उसे हटालायो अर्जुन !
करलो उसको एकान अभी और योगी बनजानो अर्जुन !"
बोलठा अर्जुन तभी-'यह तो कहिये तात !
अभी कहा जो मापने-'योगी सो क्या बात ?"
৩য়
में बोले कृष्ण-"सुनो अर्जुन, योगी वह होता है-
जो जग के सोने पर जगता, जग के जगने पर सोता है।
अर्थात् जगत् के लिए चीज जो व्यर्थ समझ में आती है
वह चीज़ लाभदायक-अच्छी योगी के लिए दिखाती है।
जिस तरह इस समय यहाँ तुम्हें यह युद्ध नहीं मन को भाता ।
यदि योगी होता तो अर्जुन, लड़ने में एकदम लगजाता ॥
योगी मन की इच्छाओं को इस तरह दवाये रहता है ।
जैसे लगाम से घुड़सवार घोड़े को नवाये रहता है।
इससे योगी की इच्छाएं चक्कर नहिं उसे खिलाती हैं।
बुद्धी-समेत लेजा उसको गड़हे में नहीं गिराती हैं।
वह योगी अपने प्रापे में पाप ही आप खुश होता है
सुख में इतराता कभी नहीं; दुख में धीरज नहिं सोता है।
जिसका मन लगा नहीं रहता दुनियादारी के पचड़ों में
जो भय और क्रोध नहीं करता फँसजाने पर भी झगड़ों में।
जो भली-जुरी बातों का कुछ अानन्द शोक नहिं करता है ।
जो किसी वस्तु या प्राणी का नहिं मोह चित्त में धरता है ।।
जो सभी इन्द्रियों को अपनी इस तरह हटाले भोगों से ।
कछुआ ज्यों अपने हाथ-पाँव भीतर करले चोरों से ॥
MARY

(१६) आत्मा की अमरता [श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या २ अर्जुन, वह ही योगी होता; जग में निर्द्वन्द्व विचरता है- और मन को बिना फँसाये ही सब काम जगत् के करता है। अर्जुन, इसी प्रकार तुम योगी बनो विशुद्ध । फल की इच्छा छोड़कर करो शत्रु से युद्ध ॥ E đã , đi đi गाना - फल की इच्छा में मन अपना न फंसाओ। अर्जुन, तुम योगी होकर युद्ध रचाओ ।। ( १ ) कर्मों का करना पाप-पुण्य नहिं लाता ! फल-इच्छा से ही पाप-पुण्य लगजाता। जो फल-इच्छा के लिए नहीं ललचाता । उसपर कर्मों का पाप-पुण्य नहिं आता। फल की इच्छा को त्याग अभय होजाओ। अर्जुन, तुम योगी होकर युद्ध रचाओ ।। ( २ ) जब कर्मों के फल की इच्छा छुट जाये । तब कर्मों की फल-बाधा नहीं सताये ।। फिर करे कर्म प्राणो जो मन में आये। नहिं उनका वह फल-भोग भोगनेपाये। बस, कर्म करो फल-इच्छा मन मत लामो । अर्जुन, तुम योगी होकर युद्ध रचाओ ।। ( ३ ) यह आँख-कान और नाक इन्द्रियाँ सारी । नित नई-नई इच्छा करतीं भारो॥ इन इच्छाओं ने फँसी बुद्धि बेचारी । नित नये-नये कर्मों की करे तयारी।। इच्छाओं से कर्मों की बुद्धि हटाओ । अर्जुन, तुम योगी होकर युद्ध रचाओ ।। Od LALAA. KARNE श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या २] आत्मा की अमरता है.. .47 (१७) ४ इन्द्रियों को जो नर वश में लेाता है । तब उनकी इच्छाओं से बचजाता है ।। जब इच्छाओं को मन नहिं ललचाता है । तब बुद्धी में कल्मष नहिं लगपाता है। इस तरह बुद्धि को निमल-विमल बनाओ अर्जुन, तुम योगी होकर युद्ध रचाओ ॥ ( ५ ) जब बुद्री उज्ज्वल-निर्मल होजाती है । तब विषय-वासना में नहिं फँसपाती है ।। फिर कभी विषय-सुख को नहिं पतियाती है । कर्मों के फल को भी नहिं ललचाती है ।। इस तरह बुद्धि लो साध न फिर घबराओ । अर्जुन, तुम योगी होकर युद्ध रचाओ।" AA AA धैर्य-सहित भगवान के सुनकर वचन उदार । अर्जुन यों करनेलगा अपने प्रकट विचार ।। "फल-इच्छा को छोड़कर मनुज करे सब कर्म । इस दुनिया में कृष्ण ! यह-महाकठिन है धर्म ।। इससे है जो देह में-विविध इन्द्रियाँ पाँच । नाना भोगों के लिए जो कि नचाती नाच ।। व्रत-उपवासों से उन्हें-करडाले बलहीन । भोगेच्छा भी बस तभी होजायेगी क्षीण ॥" यह सुनकर कहनेलगे कृष्ण- हे पार्थ, राय यह ठीक नहीं । बलहीन इन्द्रियाँ करने का बेढव उपाय यह ठीक नहीं । नत-उपवासों के करने से निश्शक्त इन्द्रियाँ बनजाती । और इस प्रकार से मनचाहा-चे भोग भोगने नहिं पाती ।। लेकिन, मन में जो भोगों की अभिलाषा घर कर जाती है । वह इस उपाय से किसी तरह अर्जुन, नहिं कम होपाती है। SARI - inariedonianRS HTTERana

।
१८ )
8 आत्मा की अमरता
[श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या २
भोगों की इच्छा बनीरही और काया ने भी दुख पाया-
तो अर्जुन, व्रत-उपवासों को करके भी लाभ न कुछ पाया ॥
इसलिए उचित है मार्ग यही बस बुद्धि विमल करलीजाये
जिससे मन की भोगेन्छा को वह वश में अपने लेाये ।
मन की भोगेच्छा भली भाँति-जब काबू में आजायेगी-
तो फल पाने की व्याकुलता मन में हलचल न मचायेगी।
मुख्य बात अर्जुन, यही ऐसा करे विधान ।
इन्द्रिय भोगों की तरफ पहुँच न पाये ध्यान ॥
भोगों में ध्यान पहुँचते ही झट उनमें मन फँसजाता है-
और उनके पाने के निमित्त नर नाना कर्म रवाता है।
जब नाना · कर्मों की रचना यों एक बार रचजाती है।
तब कर्मों का फल पाने की अाशा मन में होनाती है।
यह आशा ज्यों-ज्यों बढ़ती है-त्यों धीरज मिटता-जाता है-
और कर्मो का फल पाने को मन अकुलाता-घबराता है ।
इस तरह कर्म फल मिलने में जब देरी होनेलगती है-
तब नित्य-नित्य थोड़ी-थोड़ी गुस्से की प्राग सुलगती है।
गुस्से के पैदा होते ही अौसान नष्ट होजाता
औसान नह होजाने से नर ज्ञान भ्रष्ट होजाता है।
ज्योंही नर होता ज्ञान-अष्ट-त्योंही बुद्धी चकराती है।
बुद्धी चकराते ही चहुँधा दारुण विपत्ति घिर आती है।
इसलिए भलाई चाहे तो इन्द्रिय सुख के प्राधीन न हो
बचना विपत्तियों से हो तो विषयों में नर लवलीन न हो।
हैं कर्म इन्द्रियों के जो कुछ, उनमें न द्वेष या राग रहे ।
वे कर्म होय तो हुआ करें; बस मन अपना बेलाग रहे ।
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( १६ )
श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या २] . आत्मा की अमरता .
करता है इस रीति से जो मनुष्य व्यवहार ।
होजाता भव-सिन्धु से बेड़ा उसका पार ॥
जो इन्द्रिय-सुख के भोगों में मन को त्रासक्त बनाता है ।
वह मूर्ख मनुज इस जीवन में नहिं कभी शान्ति-सुख पाता है।
भोगों में साथ इन्द्रियों के यह मन भी जब फसजाता
तब बुद्धि नाव को भँवर-बीच अाँधी होकर लेाता है ।
हाँ, इन्द्रिय-सुख के भोगों में मन उलझ नहीं जिसका जाता ।
उस नर की बुद्धि विमल रहती; वह बुद्धिमान नर कहलाता ॥
अर्जुन. इस पृथ्वी-मण्डल पर जो नदियाँ शोभा पाती हैं -
वे वर्षा में मर्यादा से बाहर बहने लगजाती हैं ।
लेकिन, जिस सागर में इन सब नदियों का पानी ज ता है ।
वह सागर निज मर्यादा से बाहर होने नहिं पाता है।
योंही इन्द्रिय-सुख-भोगों की नदियाँ इस जग में बहती हैं ।
जिसमें साधारण पुरुषों की बुद्धियाँ नहीं थिर रहती हैं !!
लेकिन, मन-बुद्धी को अपने वश में जो नर लेाता है ।
वह सागर-सम मर्यादा में रहता है डिग नहिं जाता है।
ज्यों नदियों का जल पाकर भी सागर में अहला नहिं माता-
त्योंही जिसका मन वश में है, वह भोगों को नहिं ललचाता ॥
जो मर्यादा में रहता है- बस मोक्ष वही नर पाता है ।
विषयों में फंसजानेवाला चौरासी में फँसजाता है।
इसलिए विषय की इच्छा को छोड़ो मन को वश में लायो ।
मन को वश में ला बुद्धी से एकाग्र और दृढ होजाओ।
फिर अर्जुन, इन्हीं इन्द्रियों से निष्कंटक करते कर्म रहो ।
जो कर्म तुम्हारा निश्चित है; पालन करते वह धर्म रहो ।
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आत्मा की अमरता 8 [श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या २
मन-बुद्धी वश में रहने से कर्मों का फल नहिं बाँधेगा ।
कर्तव्य-कर्म यों करने से अर्जुन, नहिं पाप सतायेगा।
मन अलग हटाकर कर्म करे; हैं यत्न यही दुख हरने का ।
ज्ञानी पुरुषों के करने का; ससार-सिन्धु से तरने का ॥"
निश्चय यों सिद्धान्त जब बोले गोपीनाथ ।
अर्जुन ने इस भाति तब कहा विनय के साथ ॥
"अच्छा, मन और बुद्धि ही है जब परम प्रधान ।
वश में लाने का इन्हें करना उचित विधान ॥
वश में लाते ही इन्हें-मिलजाये जो इष्ट---
तब क्यों मतलब करूं-युद्ध कर्म अति क्लिष्ट ?"
इसपर फिर कहनेलगे कृष्ण-सुस्पष्ट और समझाता हूँ
क्यों युद्ध तुम्हें करनाचहिए अर्जुन, वह नीति बताता हूं।
जबसे जग की यह सहि चली तबसे दो मार्ग चले आते ।
वे ज्ञान-मार्ग और कर्म-मार्ग, इन नामों से जानेजाते ॥
जो ज्ञान-मार्ग से चलते हैं, वे सन्यासी कहलाते हैं ।
जग से सब नाता-नेह तोड़ा बन में जाकर बसजाते हैं ।।
वे सब कर्मों को छोड़-छाड़ ईश्वर की चिन्ता करते हैं।
जो कर्म तो फल होगा; इसलिए कर्म से डरते हैं ।
बस्ती में रहने से लालब कर्मों का मन में प्रायेगा
और कर्म किए तो फल उनका भोगना विवश पड़जायेगा।
ऐसा विचारकर वे जग से अत्यन्त दूर हटजाते हैं-
और सब कर्मों से हाथ खींच ईश्वर में ध्यान लगाते हैं।
पर बात वास्तव में यह है--- कर्मों का फन्द न छुटता है ।
है कर्मशील नर इसीलिए---केर कर्मों में आजुटता है ।
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( २१ )
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श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या २] आत्मा की अमरता
यह मत समको बन में रहकर कुछ भी न कर्म करना पड़ता।
इसलिए कि जीवन रखने को, है पेट नित्य भरना पड़ता--
सो एक पेट भरने को ही पग-हाथ हिलायेजाते हैं।
यह कहना मिथ्या है, बन में-नर कम नहीं करपाते हैं।
फिर और बात यह है, बन में-जब नर बनवासी होजाता-
तो माना, वह करने लायक वन में कुछ कर्म नहीं पाता।
कुछ कर्म न पाने से उसकी इन्द्रिया नहीं कुछ करती हैं ।
पर, मन की इच्छाएँ अब भी भरपूर कुलाचे भरती हैं ।
मन की हो जब यह दशा तो सब व्यर्थ प्रयास ।
जैसा घर का वास है-वैसा है बनवास ॥
मन वश में नहीं हुआ है तो वह कभी न तप में रमता
कितना ही यत्न करो लेकिन तप का आसन नहिं जाता है ।।
पर, जिसका मन वश में है वह निईन्दू हिरे बाजारों में ।
घर में ठहरे, या चलाजाय-जंगल में या कि पहाड़ों में।
प्रारम्भ न करके कर्मों का, नैष्कर्य नहीं कुछ मिलपाता ।
कर्मों को तजदेने पर भी नर सिद्ध नहीं है होपाता।
होता यह है कि इन्द्रियों से जब कर्म किया नहिं जाता है।
तब फिर भीतर ही भीतर नित भोगों को मन ललचाता है।
ऊपर से कर्मों को तजकर भीतर से जो ललचाते हैं।
तो अर्जन, वे नर पाखण्डी, कपटी, ढोंगी कहलाते हैं।
इसलिए दूसरा मार्ग ठीक जो कर्म-मार्ग मानाजाता ।
उस कर्म-मार्ग में चलकर ही नर जन्म सफल है करपाता।
इस कर्म-मार्ग को जो मनुष्य इच्छापूर्वक अपनाते हैं-
वे घर में ही नित रहते हैं, निर्जन बन को नहिं जाते हैं।
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s ( २२ ) 28 आत्मा की अमरता 8 [श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या २ यह कर्म-मार्ग वह है जिसमें मन वश में लाना होता है । विपयों से उसे हटाकर के एकाग्र बनाना होता है। मतलब यह है इस कहने का हों सारे कर्म इन्द्रियों से । पर, मन को राग-द्वेष न हो, हो, उन होनेवाले कर्मों से। मन को जो यो जीतले-वही श्रेष्ठतम वीर । बन में जाना कुछ नहीं-उपयोगी तदबीर ॥ सच्चा साधक है वही, मन को रक्खे हाथ । कर्म करे संसार के निर्भयता के साथ ।। - से जब मन ही न हो वश में कर्मों से बचा तो क्या ? और गेरुआ रंगा कर पाखण्ड रचा तो क्या ? कहने को कर्म छोड़े; पर, चाह नहीं छोड़ी। घर-द्वार छोड़कर सब-जंगल को चला तो क्या ? मन को है जिसने बाँधा-बन्धन छुटगया वह फिर घर में रहा तो क्या और बन में रहा तो क्या ? गर इन्द्रियों के सुख में मन डूब नहीं जाये । तत्र इन्द्रियों से जग का सब कर्म किया तो क्या ? एकाग्र होगया मन तो फिर हैं सब बरावर । एकान्त हुआ तो क्या ? बाजार हुआ तो क्या ? S कों के सम्बन्ध में एक और है मर्म । जिससे रहसकता नहीं बिना किए नर कर्म । इस जग में नर के साथ-साथ ब्रह्मा ने यज्ञ बनाया है। जिस दिन बायी यह सृष्टि यहाँ. यह यज्ञ उसी दिन आया है। यह यज्ञ बनाकर ब्रह्मा ने समझाया यही मनुष्यों को । सुख से जग में रहना हो तो करते-रहना इन यज्ञों को ॥ यज्ञों के द्वारा होते हैं--सन्तुष्ट देवतावृन्द जभी । देते हैं नित्य मनुष्यों को सुख-सौ.य और धन-धान्य सभी ॥

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(२३)
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श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या २] . आत्मा की अमरता 8-
सो यज्ञों के द्वारा जग का पोषण और पालन होता है-
और सृष्टि-चक्र का सुख समेत सन्तत सञ्चालन होता है ।
अब विना कर्म के बतलायो-किस तरह यज्ञ चलसकते हैं ?
और यज्ञ बिना इस भूतल के किस तरह जीव पलसकते हैं ?
इसलिए जगत् के जीवों को यज्ञों की आवश्यकता है ।
और यज्ञ होंय इसलिए सदा कर्मों की आवश्यकता है।
देवता सुखी करते हैं जब-देकर धन-धान्य मनुष्यों को ।
तब यही उचित है यज्ञों से सन्तुष्ट करें हम देवों को
जो बिना दिये कुछ बदले में देवों से सम्पत् पाता है ।
वह नर पापी है, पामर है; पृथ्वी का भार बढ़ाता है ।
इसीलिए यह है उचित-यज्ञ होय स्वच्छन्द ।
यज्ञों से ही बीतता-जीवन यह सानन्द ॥
अब बात मुख्य इतनी-सी है-यज्ञानुष्ठान अवश्य करे ।
लेकिन, उन यज्ञों के फल की इच्छा अपने मन में न धरे ॥
बस, यही समझकर करे उन्हें-बे सृष्टि सदैव चलाते हैं
उनके द्वारा जग के प्राणी सब पोषण-पालन पाते हैं।
जो यह धारणा हृदय घरके यज्ञानुष्ठान रचाता है ।
उसको उन यज्ञों के फल का कुछ बन्धन नहिं लगपाता है ।
त्रेता में मिथिला के राजा जो जनक विदेह कहाते थे---
वे इसी भाव से इस जग के सारे कर्तव्य निभाते थे।
मुझको ही देखो हे अर्जुन, मैं कुछ इच्छा नहिं रखता
ऐश्वर्य-भोग-सुख-सम्पत् की कुछ भी आशा नहिं रखता हूँ ॥
लेकिन फिर भी निर्लिस हुआ इस जग के बीच विचरता हूँ
फल-आशा किए बिना ही सब कमों को करता-धरता हूँ।

RATमा TELAN.ANTO. (२४) आत्मा की अमरता [ श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या २ यदि आज त्याग , को को मर्याद न फिर रहपायेगी । मेरी देखा-देखी दुनिया सत्र कर्मों से हटजायेगी। दुनिया के कर्म छोड़ते ही सब नियम भ्रष्ट होजायेंगे । बौदहों भुवन जीवों-समेत अति शीघ्र नष्ट होजायेंगे। कर्म छोड़देना नहीं उचित सुनो हे पार्थ ! स्वार्थ न हो, फिर भी करे कर्मों से परमार्थ ।। जो ज्ञानीजन इस जीवन में नित करते कर्म दिखाते हैं। वे अपने लिए नहीं करते, औरों को राह बताते हैं । उनके आचरणों से शिक्षा लेते हैं जग के जीव सभी--- और कर्मों के करने से फिर, नहिं खींचा करते हाथ कभी। इसलिए कर्म से हे अर्जुन तुम हाथ खींच नहिं पाओगे । यह प्रकृति करायेगी तुमसे सत्र कर्म, कहाँ बवजारोगे?" अर्जुन बोला-“हे सखे यह तो कहिए आप । किस कारण संसार में नर करता है पाप ?' उत्तर में इस भाति से बोलउठे-नंदलाल--- "काम क्रोध ही जीव को दे पाप में डाल ॥ उत्पन्न रजोगुण से होते अति ऋर कराल कटोर हैं यह । बरजोरी पाप करादेते; ऐसे दुर्जय शहजोर हैं यह ॥ AMA AneneranARAL काम और क्रोध बड़े शहज़ोर । खींच-खींचकर पाप करादेते हैं। यह बरजोर ।। काम || संग्रह करता है मनुष्य जो सुकत क्टोर बटोर । यह सब क्षणभर में हरलेते ऐसे पक्के चोर ॥ काम० ।। ज्यों सूरज को ढकलेती है सघन घनघटा घोर- त्यों ही यह भी ढकलेते हैं बुद्धी को चहुँओर ॥ काम० । इनसे बचना हो तो श्रद्धा-निष्ठा की कर डोर । इसी डोर से मन को खींचे हरि-चरणों की ओर ।। काम०॥" 8 इति -- 699 ALAM रुक्मिणी-सङ्गल M मशरिक़ी हूर भारत-माता प० राधेश्यामजी कविरत्न अन्य नाटक द्वारा लिखित नाटक महाराजा भर्तृहरि १%) पृथ्वीराज ) भजन गाने व ग़ज़लें वीर अभिमन्यु १॥) श्रीराधे माम-गीताञ्जलि ११) महर्षि-वाल्मीकि १) राधेश्याम विलास १०) सती पार्वतो १॥) | राधेश्याम-कीर्तन ईश्वर-अक्ति शा) राधेश्याम भजनमाला परम-मक्त-प्रसाद श) प्राचीन भजनमाला परिवर्तन श) मोहन-कवितारली श्रीकृष्ण-अवतार १) मुसाफ़िर की पाकेट बुक १-)| प्रेम-रत्नावली द्रौपदी-स्वयंबर निजानन्द प्रदीपिका गृहिणी गीताञ्जलि श्रवणकुमार १८) ऊषा-अनिरुद्ध १२) आनन्द-लहरी मीरामजनमाला १ बोध-प्रकाशी पद्य-पुष्पांजलि कृष्ण-सुदामा 12) आरती संग्रह शान्ति के दूत भगवान् श्रीकृष्ण --)| ग़ज़लों का गुलदस्ता सेवक के रूप में भगवान् श्रीकृष्ण ।-) गजल सागर घण्टा-पन्थ 13) पद-पुञ्ज नोट-नाटकों में वीर अभिमन्यु, मोहन भजनमाला मोहन कवितावली श्रवणकुमार और मशरिक़ी हूर,उर्दू में मोहन गीतावली भी छपकर तैयार हैं। दाम वही जो | मोहन संगीत शिक्षा हिन्दी में हैं। सीताराम-कीर्तन न्यू अल्फ्रेड थियेट्रिकल कम्पनी आफ भ्रमर-गीत-माला बम्बई द्वारा खेले गये सीठी गुञ्जार 2) मधुर मुरली असली व मुकम्मिल नाटक रसीली तान ) कुसुम-कंज भूलभुलैयाँ १) दिलफरोश बसंतवाटिका पद्म-परांग चलतापुर्जा १) शरीफ़ बदमाश १) अन्य पुस्तकें ख्वाबे हस्ती १) अछूता दामन १)| भक्त स्त्रियाँ 1) अमरकोष) खूबसूरत बला १) हिन्दू विधवा १-) सतलड़ी m) पञ्चों का प्याला ) भारत व्याकुल थियेटिकल कम्पनी अजायब घर ) धनुर्विद्या लिमीटेड आफ मेरठ द्वारा खेले गये प्रेत-लोक १११, नौलखाहार । ज्योतिष-प्रकाश ) दृष्टांत महासागर ।।) असली व मुकम्मिल नाटक वियोग-कथा /-) मोहन माला :) तेरोसितम १-) सम्राट् चन्द्रगुप्त १८) हनुमान चालीसा -)। सुन्दर काण्ड ।) =USEU YE १) पता-श्रीराधेश्याम-पुस्तकालय, बरेली। RAN 452 LEARNAMRATALABERevarunacidenENSAANEAAAAAppAAAAAAA नकली किताबों से बचिये हमारी रामायण और हमारे नाटकों का काफी प्रचार देखकर लोगों ने उसी रंग और रूप की नकली किताबें छाप छापकर प्रकाशित करदी हैं। नजकालों की कई बरस की कोशिश का नतीजा यह है कि बाज़ार में नकली किताबों की भरमार है। यह नकली किताब ) में बुक्सेलर को दी जाती है, जिसे बुक्सेलर -) या -) या =) में बेचकर फायदा उठाता है और इस प्रकार प्राइक को धोखा दिया जाता है। प्राइक जब ऐसी किताब घर ले जाता है तो पछताता है। ग्राहक को ऐसी धोखेबाज़ी से बचाने के लिये अब हम अपनी हर एक किताब के ऊपर अपनी तस्वीर देने लगे हैं, जैसी कि इस किताब पर आप देख रहे हैं । अब आइन्दा से श्राप धोखा न खाइयेगा-- Agro VITTE जिन किताबों पर-"राधेश्याम' या--"राधेश्याम वाशिष्ठ" या "तर्ज-राधेश्याम” छपा रहता है, वह हमारे यहाँ की नहीं हमारे यहाँ की किताबों पर हमारे यह दस्तखत भी रहते हैं इन्हें पहचान लीजिये-- Tha/ ar स vel purchase भवदीय- राधेश्याम कथावाचक मालिक-श्रीराधेश्याम-पुस्तकालय, व प्रेस बरेली ।

श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या ณช कर्म-योग - . १ - प्रकाशक- नेपाल गवर्नमेण्ट से 'कथावाचस्पति' की पदवी प्राप्त- कीर्तन-कला-निधि, काव्य-कला-भूषण, श्रीहरि-कथा-विशारद, कविरत्ल- Prastan अध्यक्ष --श्रीराधेश्याम-पुस्तकालय, बरेली। मूल्य D॥ श्राने प०राधेश्यामजी कविरत्न लिखित नवीन कृति में मिलेंगे, तथा जिल्दवार गुवा में मिलेगा। डाक महसूजा गुलका सुहणायन अलग अलग भाग पर ।-) जन्माष्टमी -) नन्द-महोत्सव महाभारत अमन्त्रीबाजा कन्हैया।-)गिरि बरधारी।-) ( राधेश्याम रामायम की हार 1%) कस-बंध भीष्म-प्रतिज्ञा दन्द-नन्दन-धसुदेब-जन्दन 12) भीष्म-पराक्रम सम्पूर्ण छाती भाग एक सुन्दर जिल्द पाएहब-जन्म में छः श्राने अधिक देने पर अर्थात् तीन पाण्डवों का बाल्यकाल ऋपर मिलोंगे। डाक महसूल ।) अलग पाण्डवों की शस्त्र-पहीचा लाक्षागृह इक्मिणी-मंगल बुक-संहार (वायाम राखारा की ली में । द्रौपदी-विजा रुक्मिणी अन्य শু-হা राविममी का छष्ण प्रेम राजसूय-यक्ष रुक्सिसी की सगाई द्रौपदी-बस्न-झा अभियाशी का पन्न-लेखन किरातार्जन-युद्ध रुक्मिणी का गिरिजा-पूजन यक्ष सम्बाद रुक्मिणी का भ्रातृस्नेह कीचक-वध रुक्मिणी विवाह 12} | अभिमन्यु विवाह सम्पूर्ण सातों भाग एक सुन्दर जिल्द अन्य इयार्थे में छः आने अधिक देने पर अर्थात् तीन राधेश्याम रामायण की तर्ज रुपए में मिलेंगे।डाक महसूल ।=) अलग | लरसी की हुंडी श्रीमद्भगवद्गाता श्रीसत्यनारायसी कथा श्याम राबाया की वो प्रह्लाद-परिश्न अर्जुनमोह 1)॥ विराटप-दर्शन।।। ध्रुव-परिन्न आत्मा की अमरता)। जीव-ब्रह्म-विवेक ।। सुदामा-चरित्र নৗজহাব कर्म-योग ।)। अर्जुन का समान ।। भर्तृहरि चरित्र नोट-सम्पूर्ण दे माग एक सुन्दर जिल्द महाराणा प्रतापसिंह अधिक देने पर, अचात् २) म জন্দ্রোণী ছবি सिलेंगे तथा जिन्ददार गुरुका ||) सावित्री सत्यवान मिलेगा। महसूल गुलरका -- ). ना मीराबाई प्रक्षन आउन मन -- अब आपदीय अभिमन्यु की नारा { হাৰহস্থা ত জ য় ) गुरू नहोबिन्दा शाहि पासुर-अक्ष पारिन रम POP- A 1.) | महाराजा और निको मत - ती दर चनपुग माग सुइप बिश्वबती मोह में छः बाद अधित मेले पर अर्थात २) महर्षि परिव १ ) साउद AMER ::.-.--म Aman श्रीमद्भगवद्गीता संख्या ३ सर्वाधिकार प्रकाशक के आधीन है। लेखक- पं० सामनारायण पाठक IIIIIIIIIIIIIII कर्म-योग IIIIIIIIIII LTE TTTTTS प्रकाशक- - IIIIIIIMMITHIII IIIIIIMIII IIIIIIIIIIIIII नेपाल गवर्नमेण्ट से "कथावाचस्पति" की पदवी प्राम- कीर्तन-कला-निधि, काव्य-कला-भूषण, श्रीहरि-कथा-विशारद, कविरत्न- प० राधेश्याम कथावाचक, अध्यक्ष- 1) जनालाया २ पाँचौं बार २००० ] सन १९४५ ई० [ मूल्य साढ़े चार आने निटर-पं० रामनारायण पाठक, श्रीराधेश्याम देस, बरेली ।

प्रार्थना
प्राण
प्यासे हैं मेरे बाँसुरीवाले आजा ।
नाव मझधार में है नाथ बचाले आजा ॥
बल है निर्बल का तुही धन है तुही निर्धन का ।
जग का जीवन है ओ जीवन के उजाले आजा।
होता जाता है दिनोंदिन तेरा गोकुल ऊजड़ ।
अपने उस धाम को फिर धाम बनाले आजा ।
अब भी शिशुपाल से फिरते हैं अनेकों पामर ।
फिर उसी चक्र सुदर्शन को सँभाले आज़ा ॥
आज भी देवकी भारत की है बन्धन में दुखी ।
शीव्र आकर उसे . बन्धन से छुड़ाले आजा ॥
तेरा 'निर्गुण' तुझे ढूँढे है सुदामा बनकर ।
आप आकर उसे छाती से
लगाले आजा ॥
--20:30
A

PROGRecure25aKASSAULix
सुनकर यह श्रीकृष्ण की, ज्ञान-गिरा गम्भीर ।
अर्जुन यों कहने लगा, विनय सहित बलवीर ॥
"अद्भुत है यह आप का, युक्ति-पूर्ण व्याख्यान ।
कृष्ण, सुना मैंने नहीं, अब तक ऐसा ज्ञान ।
कैसी अनुपम रीति है, कैसा लुधर उपाय ।
बहु विधिकों को करे, और फल से बच जाय ॥"
MAR
उत्तर में बोले कृष्ण-सुनो, अर्जुन, जो तुम्हें बतायी हैं ।
सो बड़ी पुरानी बातें हैं, कुछ नयी नहीं समझायी हैं ।
यह ज्ञान वही है जो मैंने, जब पहले पहल सुनाया था ।
तो विवस्वान ने प्रेम सहित,सुनकर उसको सुख पाया था।
फिर विवस्वान ने ज्यों का त्यों, वह बतलाया मनु मुनिवर को ।
मनु मुनिवर से यह प्राप्त हुआ, इक्ष्वाकु राजराजेश्वर को ॥
यों ही आगे चलते चलते, ऐसा युग आया एक नया ।
जब माया के पचड़े में पड़, संसार ज्ञान यह.भूल गया।
सो वही ज्ञान अब सुलझा कर, मैंने तुमको समझाया है
अर्जुन, है तुमसे प्रीति सुके, इसलिये तुम्हें बतलाया है।
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.

( ४ ) Cur , * कस-योग * [श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या ३ अर्जुन बोला- उस समय, आप कहां थे तात ? विवस्वान का जन्म तो, है सतयुग की बात ? प्रकट हुए हैं आप जब, द्वापरयुग में धान । दिया आप ने किस तरह, विवस्वान को ज्ञान ? मधुसूदन मुसका कर बोले,-'सतयुग में विवस्वान थे जब अर्जुन, यह सच जानो मैं भी, इस जग में वर्तमान था तब ॥ मैंने और तुमने बार बार, बहु जन्म लिये हैं भूतल पर । उन जन्मों का वृत्तान्त सभी, मुझको मालूम योगवल पर । यद्यपि मैं जग का स्वामी हूं, लेकिन हूं जग से बचा हुआ । जीने और मरने का झगड़ा, मेरे पीछे नहीं लगा हुआ। फिर भी जब कभी बड़ी भारी, आवश्यकता मैं पाता हूं। तो अपनी माया से जग में, एक देह बना आजाता हूं।" पूछा अर्जुन ने तभी,-"दीजे कृष्ण, बताय । आवश्यकता आपको, कब और क्यों होजाय ? पड़ती ऐसी कौनसी, अतिशय भारी भीर ? पाते जिससे आप हैं, घर कर मनुज शरीर ?" बोले गोपाल-"सुनो अर्जुन, जब पाप बहुत बढ़ जाता है । और दुष्ट मनुष्यों का समाज, ऊधम अत्यन्त मचाता जब निर्धन प्राणी को धनाब्य , निर्बल को सबल सताते हैं । जब दुर्जुन को आदर मिलता, और साधु निरादर पाते हैं । अबलात्रों और अनाथों का, जब पीडन होने लगता है निशि-दिन मेरे प्रिय-भक्तों का, जब क्रन्दन होने लगता है। जग के अधिकांश व्यक्तियों की,जब बुद्धि बिगड़ने लगती है गो ब्राह्मण के प्रतिपालन में, जब बाधा पड़ने लगती है wisdomovi । * * *.

MARA A.IN श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या ३] ॐ कर्म-योग के व्यभिचार झूठ चोरी हत्या, जब ऊँचा शीश उठाते हैं । जब नर-नारी मर्यादा से, उल्टे चलने लग जाते हैं । तत्र पाप पंज-का क्षय करने, उद्धार धर्म का करने को । मैं मनुज-देह धर आता हूं, पृथ्वी का बोझा हरने को ।। अन्याय अनीति दबा करके, फिर सुमति सुनीति चलाता हूं। सङ्कट में पड़े साधुओं को, सङ्कट से शीघ्र छुड़ाता हूं। मेरे आने से दुनिया को, एक नव-जीवन मिलजाता है । पापों और अत्याचारों का, भय से प्रासन हिलजाता है। धर्मधुरा सुस्थिर रहे, चला चले संसार । लेता हूं मैं इसलिए, बारबार अवतार ।। । •indi -armathOIMME पृथ्वी पर पापाचार जभी होता है। अर्जुन, मेरा अवतार तभी होता है । [१] जब उचित मार्ग से जनता हट जाती है। और न्याय नीति की महिमा घट जाती है। मर्यादा जब सब उलट-पलट जाती है जब सत्य सनातन की जड़ कट जाती है। कर्तव्य-भ्रष्ट संसार जभी होता. है। अर्जुन मेरा अवतार तभी होता है । [२] पापी जब परधन परदारा हरते हैं। नहीं स्वर्ग नरक का ध्यान कभी करते हैं। बल से निर्वल को सबल जसी धरते हैं । और देते उनको त्रास नहीं डरते हैं। यों जग में हाहाकार जमा होता है । अर्जुन, मेरा अवतार तभी होता है । LORA A ... a sa tratta ah. T2 Adana u tra tasan antara Krishna (६) BaramininatantanRLINEational * कम-योग * [श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या ३ [३] अधिकांश जगत जब नास्तिक हो जाता है। स्वच्छन्द किया करता जो मन भाता है। अज्ञान जब कि जगतीतल पर छाता है। और विश्व जभी भ्रम में चक्कर खाता है ।। जीवों में मलिन विचार जभी होता है । अर्जुन, मेरा अवतार तभी होता है। [४] सत्कर्मों से जब श्रद्धा कढ़ जाती है। पापों में सब की रुचि जब बढ़ जाती है। विद्या पर जभी अविद्या चढ़ जाती है। विद्वानों की जब कला बिगड़ जाती है। सज्जन सब विधि लाचार जमी होता है । अर्जन, मेरा अवतार तसो होता है। [५] जब अनाचार की वायु खूब बहती है। जब प्रजा दुराचारों में फंस रहती है। ब्राह्मण समेत जब गो संकट सहती है। चर अचर सृष्टि जब त्राहि त्राहि कहती है। वेतार धर्म का तार जमा ॥ अर्जुन, मेरा अवतार तभी · होता है। RTSunncomemar CONDOMARATORS MicrotumawatTHAN a है मेरे अवतार का, अर्जुन, बस यह भेद । हेतु यही अवतार का, मिटे जगत् का खेद ।। जिस को मेरे अवतारों का, यह मेद विदित हो जाता है। जो मन मेरी इस लीला से, पूरा परिचित हो जाता है। उस ज्ञानीजन को अनायास, सुख्ख सहित मोक्ष मिलजाती है । बौरासी लाख योनियों की, झंकट नहिं उसे सताती है। कितने ही जन या ज्ञानी हो, मन राग द्वेष से विलगाकरः । वित्त ध्यान मेर घरते धरतें, मिलगाये हैं मुझ में ही आकर NALARYDASHAISALMANI STERevi KatrinaEAL nauka ( ७ ) EmaiIAN श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या ३] * कर्म-योग के लेकिन जो कर्म किया करते, मन में फल की इच्छा लाकर । उनको मिलती है मोक्ष नहीं, वे सुकमें नहिं मिलते आकर ॥ सन्तुष्ट देवताओं को जो, करते हैं यहों के द्वारा। उनके उन यज्ञा का उनको, देता हूँ मैं ही फल सारा ॥ कारण यह है वे यज्ञ सभी, अन्त में मुझी को आते हैं। इसलिये यज्ञ करनेवाले, फल भी मुझ से ही पाते हैं ।। जिस फल के लिये यज्ञ होता, वह फल बस मैं देदेता हूँ। जो जिस विधि मुझतक आते हैं, मैं उन्हें उसी विधि लेता हूँ। जो फल की प्राशा को तजकर, यज्ञों का साधन करते हैं। वे यज्ञों का फल नहिं पाते, हाँ-मोक्ष उपार्जन करते हैं। फल इच्छा तजकर करे, यज्ञादिक व्यवहार । जन्म मृत्यु से बस तभी, मिलता है उद्धार ॥ अर्जुन, मैंने इस दुनिया में, जड़ चेतन सभी बनाये हैं। ब्राह्मण क्षत्री और वैश्य शुद्ध, यह चारों वर्ष रचाये हैं। लेकिन मेरा मन उन सब में, अणुमात्र नहीं विलमाया है। इससे यह भी मैं कहता हूँ, मैंने कुछ नहीं बनाया है । कारण यह है जो कमों में, मन अपना नही फँसाते हैं । वह उनको करके भी उनके, कर्ता नहिं माने जाते हैं। सो मेरी तरह कर्म जो नर, करते हैं वे सुख पाते हैं। कों के भोगों से छुटकर, भवसागर से तर जाते हैं । मोक्षार्थी पहले सभी करते थे यों कर्म । अर्जुन, तुम पालन करो, इसी तरह निजधर्म" ।। इतना भाषण कर चुके, जब कि सच्चिदानन्द । अर्जुन ने पूछा तभी, करके चित्त अमन्द ॥ zrancan h का PHOTraदर IRHABESIRTHER ५ Fre (८) 8 कर्म-योग * [श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या ३ “समझाकर कहिए मुझे, सखे, जरा यह मर्म । कहते हैं किसको यहाँ, कर्म, अकर्म, विकर्म ?" सुनकर गोविन्द लगे कहने,-"अर्जुन, समझाये देता हूँ । सब कर्म अकर्म विकर्मो की, पहचान कराये देता हूँ। अच्छे अच्छे पण्डितजन भी, इस जगह भूल कर जाते हैं और कर्म अकर्म विकर्मों को, पहचान ठीक नहीं पाते हैं। प्रायः, यह माना जाता है, यदि कर्म न कुछ हो पायेगा । तो यही न होना कमों का, जग में अकर्म कहलायेगा। लेकिन अर्जन, यह सब श्रम है, सब उल्टा समझा जाता है। कमों के करने का त्यागन, बिल्कुल न अकर्म कहाता है । सच्चा अकर्म तप है अर्जुन, जब सारे कर्म किये जायें । लेकिन उनके फल पाने की, इच्छायें नहिं मन में आयें। इससे निश्चय यह सिद्ध हुआ, जितने भी कर्म कहाते हैं । वे ही यदि ढंग से किए जाँय तो सब अकर्म होजाते हैं। अब सुनो कर्म तज देने से, जो लोग अकर्म मानते हैं उनका अकर्म भी होय कर्म, यह भेद नहीं वे जानते हैं। वह भेद इस तरह है देखो, दृष्टान्त सुनाकर कहता अर्जुन, तुमको समझाने में, आनन्द अमित में लहता हूँ। तुम जरा देर को यह मानो, कुछ दुष्ट कहीं से बाजाएँ । और घर में घुसकर शठता से, घरवालों को दुख पहुँचाएँ । उस घर में यदि उस अवसर पर,तुम भी अर्जुन, मौजूद रहो । लेकिन बैठे बैठे सब कुछ, देखते रहो और कुछ न कहो ॥ तो कहने को तो यह होगा, तुमने इस तरह अकर्म किया। पर इस अकर्म में हे अर्जुन, लुमने सचमुल हक कम किया ।। MERA MATTERNER , कर्म-योग ( ६ ) १ श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या ३] दुष्टों की तुमने रोक न की, यह पाप तुम्हारे सिर आया । कुछ नहीं किया तुमने लेकिन, फिर भी सब कुछ कर दिखलाया॥ अर्थात् अकर्म तुम्हारे में, एक पातक कर्म हुमा भारी । उस पातक का फल प्रागे को, पाओगे तुम अति दुखकारी। पंडित है अर्जुन वही, जो समझे यह मर्म । देखे कर्म अकर्म में, और अकर्म में कर्म ।। अब यह भी तुम्हें बताता हूँ, कुछ ऐसे कर्म कहाते हैं । जो बुरी नियत से होते हैं, और तामस माने जाते हैं । व्यभिचार, झूठ, चोरी, निन्दा, हत्या हिसादिक कर्म सभी । तामसिक विचारों के पल हैं, कहलाते घोर अधम सभी ।। इन घोर अधर्मों को बुधजन, विपरीत कम बतलाते हैं । और यह विपरीत कर्म ही सब, अर्जुन विकर्म कहलाते हैं । इन धर्म विरुद्ध विक्रमों से, सर्वथा अलग रहना चाहिए । अज्ञान विवश इनको करके, नहिं कष्ट कमी सहना चहिए ।। [ व्याख्यान- भगवान ने अर्जुन को यह बतलाया कि कर्म, अकर्म और विकर्म किसे कहते हैं। अब तक जितना उपदेश भगवान ने दिया है उसका तात्पर्य यह है कि कर्मों का करना छोड़कर खाली वैठे रहना 'अकर्म नहीं कहलाता। यद्यपि साधारण रीति से 'कर्म' का अर्थ कर्मों का न करना होता है, तथापि जव कर्मविपाक के मत से विचार करते हैं तब खाली बैठे रहना 'अकर्म' नहीं सिद्ध होता । इसका उदाहरण भी भगवान ने यह दिया है कि घर में चोर बदमाश आदि दुष्ट पुरुषों के घुस आने पर और उनके द्वारा घर के लोगों के मारे पीटे जाने पर घर के मालिक का नुपचाप बैठे देखते रहना और उनके बचाने का कोई उपाय न करना अकर्म नहीं कहा जायगा, बल्कि यह भी एक कर्म होगा और पाप-कर्म होगा इस पाप कर्म का बुरा फल घर के मालिक को भोगना पड़ा तो ठाली बैठना भी एक कम होगया कहने को जो अकर्म था वही वास्तव में बुरा फल देने वाला एक कर्म । सिद्ध हुआ। इसे व्याख्यान से निश्चित हुआ कि कहने में जो 'अकर्म' है वही वास्तव में 'कर्म' होसकता है। और मन की लगाबट और फल पाने की इच्छा कर जो कर्म किया जाता है वह फल का न देने वाला होने से 'अकम हो सकता है को त्याग HERE REEEES SENTEZARASHTRA WIMATRA LATuttituna Scense 59 (१०) * कर्म-योग * [श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या ३ कर्म का अकर्म और अकर्म का कर्म कैसे हो सकता है यह बतला चुकने पर भगवान् ने अर्जुन को यह बतलाया कि 'विकर्म' किसे कहते हैं । भगवान ने कहा कि जो कर्म बुरी नियत से किए जांय और दूसरे को दुःख पहुंचाने वाले हों वे सब के सब विकर्म होते हैं। उदाहरण के लिए चोरी, व्यभिचार, कञ्चना, हत्या और हिंसा यह सब 'विकर्म' हुए । 'विकर्म' की यह व्याख्या सुन कर अर्जुन चौंक पड़ा। उसने सोचा कि हिंसा जब 'विकर्म' है तब युद्ध करने में तो हिंसा बच नहीं सकती। तब फिर युद्ध का उपदेश देकर कृष्ण मुझसे विकर्म क्यों करा रहे हैं ? इस सन्देह के उत्पन्न होते ही भगवान् से उसने शंका कर डाली। अर्जुन की इस शंका और भगवान् के द्वारा होने वाले उस शंका के समाधान को लेकर ही आगे का प्रसंग चलता है ] अर्जुन बोले-“जब कि है, हिंसा घोर अधर्म । तब तो अनुचित है मुझे, रण करने का कम ।। रण में हिंसा होयगी, हिंसा घोर विकमः । कृष्ण कराते श्राप यह, क्यों मुझ से दुष्कम मुरलीधर मीठी बोली में, बोले-"हां युद्ध कराता हूं। हिंसा होगी लेकिन फिर भी, अर्जुन मैं रण रचवाता हूं। पर ध्यान रहे यह कहता हूं, बुद्धी को साध लिया जाये । कर्तव्य समझ समबुद्धी से, अर्जुन यह युद्ध किया जाये। क्षत्री के लिए युद्ध करना, आवश्यक कृत्य बनाया है । लाचारी है जब ऐसा ही, क्षत्री का धर्म बताया है। क्षत्री का यह हिंसावाला, यदि धर्म जगत् से हट जाए । तो क्षण भर में बहु क्लेशों से, अर्जुन यह पृथ्वी पट जाए। व्यभिचारी, चोर,लवार, धूर्त, मिलकर अन्धेर मचा डालें। सब न्याय का राज मिटा करके, अन्याय का राज रचा डालें। जग की रक्षा को ईश्वर ने, क्षत्री जग में उपजाए हैं । क्षत्री वीरों के साथ साथ, क्षत्री के बाण बनाए हैं। क्षत्री के बाणों के भय से, अन्याय न बढ़ने पाता है । क्षत्री के बाणों के भय से, दुष्टों का दल दब जाता है NamsadhanAAAAAAAAAAAELTS १.

Sindi HAVESHWAurana artoPAIYAMpsxevinARTS . विश्व में विख्यात हुआ है। एक और नीतिकार ने कहा है कि-"राजा प्रकृतिरञ्जनात्। श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या ३] ॐ कर्म-योग (११) क्षत्री के बाणों के बल से, मर्यादा सुस्थिर होती है । क्षत्री के बाणों के बल से. सब प्रजा चैन से सोती है। ईश्वर ने अपनी माया से, जब यह संसार रचाया था । तो इसका रक्षक सञ्चालक, चत्री का वाण बनाया था। क्षत्री का संसार में, है हिंसामय कर्म । लेकिन है इस कर्म से, रहता जिन्दा धर्म ।। इस तरह देखने पर अर्जुन, नहिं दोष समझ में आता है । सूत्री का हिंसा-कम सखे, एक श्रेष्ठ कर्म बनजाता है ।। क्षत्री अपनी हिंसा द्वारा, उपकार जगत् का करता है। इसलिए मृत्यु उपरान्त कभी,वह नरक भोग नहिं भरता है।। सब कर्मों की रक्षा को जब, क्षत्री का धर्म विराजा है। तब ही तो जग के जीवों में, जत्री कहलाया राजा है। यह सिद्ध हुश्रा इस से अर्जुन, हिंसा की श्रावश्यकता है। क्षत्री जग के कल्याण हेतु, निर्भय हिंसा कर सकता है। [ व्याख्यान-कवि-कुल-कुमुद-कलाधर, संस्कृत के प्रतिभाशाली महाकवि श्रीपंडित कालिदासजी ने अपने रघुवंश महाकाव्य में क्षत्रिय शब्द की प्रशंसा में एक स्थल पर लिखा है:- Vक्षतात्किलत्रायत इत्युदनः क्षत्रस्य शब्दो भुवनेषु रूढः" अर्थात् दूसरों को पीड़ा और दुःख से बचाने के कारण ही क्षत्रिय का नाम अर्थात् राजा इसलिये कहाता है कि वह अपनी प्रजा का रञ्जन अर्थात् उसको प्रसन्न करता रहता है । इन दोनों ही प्रमाणों से यह सिद्ध हुआ कि क्षत्रिय का युद्ध-कर्म संसार में सुख शांति बनाए रखने और प्रजा की जान माल बचाने को है । ऐसी दशा में हिंसायुक्त होने पर भी क्षत्रिय का कर्तव्य बड़े ऊंचे दर्जे का है। यह कर्तव्य ऊँचे दर्जे का न होता तो संग्राम में प्राण खोने वाले क्षत्रियों को स्वर्ग का अनायास मिलना किसी तरह सम्भव नहीं हो सकता था। अब आगे भगवान् यह बताते हैं कि इस हिंसा कर्म को भी संसार की भलाई के लिए क्षत्रिय किस तरह से करे । ARTISreetizattarn ALANCaestraRUARLALA.ORASARAM AMITIcom anSCARE - (१२) कर्म-योग * [श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या ३ ह्यं इतनी बात जरूरी है, यह हिंसा ऐसे की जाये। बस हाथ पांव सब कर्म करें, पर मन उसमें न उलझ पाए। मन उसी समय नहिं उल्झेगा, जब बुद्धि उसे कुछ रोकेगी । यह कार्य करेगी बुद्धि तभी, जब पहले निमल होलेगी। बुद्धी को निर्मल करने का, साधन बस एक ज्ञान ही है। इसलिए साधने में मन के, आवश्यकता बस ज्ञान की है। मन को अपने साधकर, कर्म करें जो लोग। मिलता है उनको नहीं, कभी कर्म का भोग ।। जब मन अपनी मुट्ठी में है, और भली भांति है सधा हुा । इन्द्रयां कर्म जो करती हों, उनमें न जरा है फंसा हुअा।। तो सब कुछ करलेने पर भी, तुम कर्ता नहीं कहानोगे। अर्जुन उन कर्मों के फल से, तुम कभी न बाँधे जानोगे ।। पर जिसका मन अज्ञानी है, वह कभी नहीं बच पायेगा । ठाली भी कुछ कर डालेगा, और फल उसका पाजायेगा । [व्याख्यान-अष्टावक्र ऋषिने भी अपनी अष्टावक्रगीता में एक जगह कहा है- निवृत्तिरपि मूढस्य, प्रवृत्तिरुपजायते । प्रवृत्तिरपि धीरस्य, निवृत्तिफलमागिनी॥ अर्थात् मूर्ख पुरुष यदि कर्मों को छोड़ भी देंगे तब भी कुछ कर्म उन से होता जायगा और वे उस कर्म के फल से बँधते जायगे। विपरीत इसके जो ज्ञानी पुरुष हैं वे कर्मों का त्याग न करके भी इस ढंग से काम करते हैं कि उन्हें उसका फल न भोगना पड़े। वे मन को कर्मों में आसक्त नहीं होने देते। बल्कि केवल इन्द्रियों से, अर्थात् हाथ पाँव आदि से, उन कामों को करते हैं जो उनके सामने अाजाते हैं । इन्द्रियों के द्वारा काम करते हुए अपने मन को उस के फल से प्राप्त होनेवाले आनन्द. या क्लेश से वे बिल्कुल अलग रखते हैं। इसी रीति से उनके कर्मों का फल उन्हें कभी नहीं मिलता । यह नियम हमारे नित्य के व्यवहारों में भी काम आता है। उदाहरण के लिए मानलो कि हमारे हाथ में तल्वार देकर कोई ज़बर्दस्ती किसी की हमसे हत्या करा दे। तो ऐसी अवस्था में हमारा मन उस हत्या के कर्म में कभी शरीक न होगा। हमारा मन , । , , LELENxkJr.dex ..

Sister Rar.aaa..22224AEkhe NTar (१३ ) । श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या ३] * कर्म-योग के जब कि शरोक नहीं हुआ है, और वह हत्या हम से जबर्दस्ती और बेमन के करायी गयी है तो न्यायालय में हमारा अपराध नहीं माना जायगा और हम साफ़ छोड़ दिये जायेंगे। यही बात कर्म-विपाक शास्त्र में भी है। जिस काम को हम मन से न करके सिर्फ हाथ पैर से कर देते हैं, अथवा प्रकृति करा देती है तो उस कम का फल हमें नहीं मिलता है ] लिया न चाहे कर्म फल, तो रटले यह मन्त्र । कर्म करें सब इन्द्रियाँ, पर मन रहे स्वतन्त्र ।। गाना - जिसे इस माति से कर्मों का करना नित्य आता है। उसे अर्जुन, न फिर कर्मों का फल कुछ भी सताता है ।। जगत् यह कर्स-सागर है यहाँ पर जीव आकर के । विना कर्मों के ठाली एक क्षण भी रह न पाता है ।। बुराई कुछ नहीं है इन्द्रियाँ यदि कर्म करती हैं। बुराई है तो यह है कर्म में मन फँस जो जाता है ।। मला अथवा बुरा जो फल हुआ करता है कर्मों का । सो तब होता है मन में फल का लालच जब समाता है ।। जो बचना चाहता है कर्म-फल से उसका यह कि कर्मों में वह अपना मन नहीं तन्मय बनाता दिखाने को करे सब कर्म और मनको अलग रक्खे । वही पण्डित कहाता है वही योगी कहाता है। ढंग है। है। कर्मों का फल जब कि है. यों अपने आधीन । तव अर्जुन तुम किसलिए, होते चिन्तालीन ! ज्ञानवान होकर करो, संशय सभी निवृत्त । होजाप्रो बस युद्ध में, परिकर बाँध प्रवृत्त ।। जो ज्ञानी है वह कर्मों के, करने में भय नहिं खाता है । उसकी प्रचण्ड ज्ञानानल से, सब फल उनका जल जाता है। वह अपने कर्मों का बदला, कुछ भी नहि चाहा करता है । इसलिए उसे उन कर्मों का, कुछ फल न दवाया करता है।

Radiationalisapanilentinels kinashlukhalavicationsksirndianslatasai talentectoratilindireast (१४) 5 कर्म-योग * [श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या ३ mube n निन्द्र, सुखी, सन्तुष्ट, शान्त, निष्काम, निराश्रय रहता है । इस जगके सुख और दुःखों को, वह धीरज धर कर सहता है। मन से वह कर्म नहीं करता, हाँ काया से कर लेता है । उन कर्मों का फल लेकर के, हरि-चरणों में घर देता है। ज्ञानी जन की चित्त-वृत्ति, ऐसी निर्मल हो जाती है । जिससे यह सारी सृष्टि उसे, बस ब्रह्म दृष्टि में आती है। वह अपने को और औरों को, ब्रह्मस्वरूप ही लखता है । नम पृथ्वी को-जड़ जंगम को, जल-थल को ब्रह्म समझता है ।। इस ब्रह्म-भावना से उसके, सब कर्म ब्रह्म होजाते हैं। वह अपने को भी ब्रह्म गिने, इसलिए न कर्म सताते हैं। यज्ञादिक जो कुछ कभी, करता यह सज्ञान । रहता उनमें भी यही, उसका भाव प्रधान ।। प्रायः यज्ञों के करने में, कुछ हव्य बनायी जाती है । आहुति उस हव्य की देने को, यज्ञाग्नि जलायी जाती है। दूसरी तरह का यज्ञ एक, इस तरह मनुष्य रचाते हैं । 'जिसमें संयम की अग्नि बना, उसमें इन्द्रियाँ तपाते हैं। फिर इस प्रकार से भी जगमें, एक यज्ञ देखने में आता। जिसमें अपान में प्राण, प्राण में फिर अपान होमा जाता। यों द्रव्य-यज्ञ और योग-यज्ञ, स्वाध्याय-यज्ञ बतलाए हैं । उपवास-यज्ञ और तपो-यज्ञ, नाना विधि यज्ञ कहाए हैं। इन सारे यज्ञों में उत्तम, ज्ञानी का यज्ञ कहाता है। जिससे कर्मों का सारा फल, ज्ञानानल में जल जाता है ।। ज्ञानी की प्रासक्ति है ---और, धारणा और । श्रद्धानिया योग्यता और भावना और ।।

Destinhibiticianskaanciniksamitrakhanchitramatranichetakindialisakedditionary XSAENUyhunwww.at [vahaar ..wwwmumurture-AVAILAndAur-MANANDNLINirA श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या ३] ॐ कर्म-योग $ . -- माना कहने को तो दुनिया में रहा करता है ज्ञानी । पर उसमें नहीं लीन हुआ करता है ज्ञानी ।। काया से किया करता है वह काम जगत् मन से न कमा उनमें फंसा करता है ज्ञानी ।। चन्दन में समायी हुई पावक है जिस तरह । करा. कंण में त्यों ही ब्रह्म लखा करता है ज्ञानी ।। तिल चावलों से घृत से जो करते हैं लोग यज्ञ । उस यज्ञ को बेकार गिना करता है ज्ञानी ।। है हव्य ब्रह्म, होता ब्रह्म, अग्नि ब्रह्म है। यों ब्रह्म-यज्ञ नित्य किया करता है ज्ञानी ।। आनन्द शोक हर्ष द्वेष मन में न लाकर । संसार में निर्द्वन्द्व फिरा करता है ज्ञानी ।। वह आप भी है ब्रह्म चरा पर भी उसे ब्रह्म । बस ब्रह्म ब्रह्म ब्रह्म रटा करता है ज्ञानी ।। इच्छाएँ, लालसाएँ, उसे कुछ नहीं होतीं । हाँ, ब्रह्म पे मर मर के जिया करता है ज्ञानी ।। ज्ञानवान् जो जीव है, वही जगत् में धल्य । रहता है वह ब्रह्म से, होकर नित्य अनन्य ।। अर्जुन, यह ज्ञान वस्तु वह है, जिससे अन्तर्पट खुलजाते । और सब पदार्थों के विशुद्ध, सच्चे स्वरूप हैं दिखलाते ।। ज्ञानी बन जाने पर अर्जुन, तुम दिव्य दृष्टि पाजाओगे । सब में मुझ ही को देखोगे, सबको मुझ ही में पाओगे। यह ज्ञान जिसे उत्पन्न होय, वह फिर चक्कर नहि खाता है । कर्मों के फन्दे से छुटकर, मेरे पद तक प्राजाता है। ज्ञान जिसे होजाय फिर, उसे न कुछ दरकार । ज्ञान जगत् में सार है, बाकी सब निस्सार ।। कितना भी हो पाप का, गहरा पारावार । प्राणी ज्ञान जहाज में, होता उस से पार" ।। AASARAL mamerimeter A KartarzastesamATEST HTIBIEO १६ AALA REEN * कमें-योग [श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या ३ व्याख्या यह भगवान की, सुनकर सहित सनेह । और हुमा उत्पन्न एक, अजुन को सन्देह ।। लगा पूछने इसलिए, वह एक प्रश्न महान् । चित देकर सुनने लगे, प्रश्न वही भगवान् ।। पूछा उसने-- हे मधुसूदन, में जितना सुनता पाता उतना ही तत्व समझने में, रह रह कर उल्झा जाता हूँ। यह अन्तिम बात ज्ञान की जो, आपने मुझे समझायी है उस से मैंने यह समझा है, बस ज्ञान बड़ा सुखंदायी है। लेकिन इससे पहले मुझको, जो गुर आपने बताया था । उसमें कमों के करने का, माहात्य खूब दर्शाया था। इस से मेरे मन में अब यह, उत्पन्न हुई जिज्ञासा है। जो कर्म ज्ञान दो चीजें हैं, इन में पद किस का ऊँचा है। पहले वतलाया कम बड़ा, फिर कहा आपने ज्ञान बड़ा । निश्चय कर कहिये दोनों में, है आखिर किसका मान बड़ा। यदि ज्ञान बड़ा कहलाता हो, तो बस मैं ज्ञानी बन जाऊ । सब कर्मों का त्यागन करदं, लड़ने से भी छुट्टी पाऊँ" । अर्जुन के इस प्रश्न पर, मुसकल्ये गोपाल समझाने उसको लगे, कह कर बचन रसाल ॥ बोले-"अर्जुन, मन बस में कर, जोतन से कम रचाते हैं। वे लोग कम ---योगी. अथवा केवल योगी कहलाते हैं। अब और लोग कुछ ऐसे हैं, जो ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं भार ज्ञान प्राप्त कर कर्मों का, करना बिल्कुल तज देते हैं। यह ज्ञान प्राक्ष कर कर्मों के, त्यागी जितने होजाते हैं। के लोग जगत में रहकर भी, सब सल्यानी कहलाते है ।। यान HINR a DRETIREMErect xxH-74LLL मदर

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( १७ )
श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या ३] कर्म-योग के
सन्यासी और योगियों के, यो जुदे-जुदे दो रस्ते हे ।
पर जुदे जुदे होने पर भी, दोनों मोक्ष तक पहुँचते हैं ।।
इन दोनों में से योगी का, जो कर्म-मार्ग कहलाता है ।
वह कर्म-मार्गही उत्तम है, और अच्छा समझा जाता है।
'योगी का मार्ग नहीं सच्चा, सन्यास-मार्ग ही सुच्चा है ।
यह झगड़ा और वादानुवाद, अर्जन,अनुचित और वेजा है।
बाहे तो योग मार्ग से चल, फल इच्छा तज कर कर्म करे ।
और बाहे सन्यासी होकर, दे त्याग कर्म वन में विचरे ।।
पण्डित इन दोनों मागों का, माहात्म्य एकसा गाते हैं।
दोनों से निश्चय मिले मोक्ष यह साफ साफ बतलाते हैं।
पर बात वास्तव में यह है, सन्यासी बनना सहज नहीं।
तन मन वाणी से कर्मों का, सचमुच में तजना सहज नहीं।
सन्यासी के वास्ते, है प्रधान जो ज्ञान ।
उसी ज्ञान की प्राप्ति को, चहिये कर्म-विधान ॥
जब ज्ञान प्राप्त करले मनुष्य, तब सन्यासी बन सकता है।
सब कर्मों का त्यागन करके, पूरा त्यागी बन सकता है ।।
अधिकार उसे है सब प्रकार, चाहे जैसा साधन करले ।
जी चाहे तो जग में विचरे, चाहे बनवास ग्रहण करले ॥
पर अच्छा यह है ज्ञानी हो, कर्मों का करना तजे नहीं ।
बस इस उपाय से कर्म करे, जो फल से उनके बंधे नहीं।
इस विधि कर्मों के करने से, नर योगी माना जायेगा।
कर्मों में लगा हुआ भी वह, सन्यासी ही कहलायेगा।
सच्चा सन्यास यही है बम, फल इच्छा तजकर कर्म करे ।
यह नहीं कि दे सब कर्म छोड़ और बिना कम जग में विचरे ।।

(१८)
* कर्म-योग [श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या ३
यह वह उपाय है जिससे कुछ, नहि काम सृष्टि का पिछड़ेगा।
और मोक्ष प्राप्त कर लेने का नहि ढंग मनुष्य का बिगड़ेगा।
ज्ञानी होकर भी सखे, है आवश्यक कर्म ।
ज्ञानी का ही कर्म है, ठीक तरह का धर्म ॥
तुम यह पूछोगे ज्ञानी को, आवश्यकता क्या झगड़े की ।
जब ज्ञान मिला तब रही उसे, क्या गरज कर्म के रगड़े की।
इसका उत्तर यह है अर्जुन, यह जग है जैसा रचा हुआ ।
सो सब कमों के ही बल पर, है आदिकाल से रुका हुआ ।
यदि जग का सारा जन-समाज, कर्मों को तज हट जायेगा।
तो फिर यह जगत् घड़ी भर भी,चालू नहि रहने पायेगा ।
व्यापार सभी मिट जायेंगे, जीवन-धारा रुक जायेगी ।
पृथ्वी के कोने कोने में, सब उथल पुथल मच जायेगी।
अधिकार नहीं है प्राणी को, यों जग को ऊजड़ करने का ।
है उचित न ज्ञानी को कुछ भी, सृष्टि-क्रम गड़बड़ करने का ॥
यह सृष्टि-क्रम वह है जिसमें, जब गड़बड़ कुछ होजाता है ।
तो उसे मेटने को ईश्वर, अवतार स्वयं ले आता है ।
इसलिए उचित है ज्ञानी को, पालन योगी का धर्म करे ।
संसार बनाये रखने को, सारे सांसारिक कर्म करे ॥
यह समझे जो कुछ करता हूँ, नहि अपना काम बनाता हूँ ।
बस अपनी करनी से जग में, ईश्वर का काम चलाता हूँ।
ज्ञानीजन को देखकर, करता इस विधि कर्म ।
और दूसरे लोग भी, पालेंगे निज धर्म ॥
इसलिए कर्मयोगी होकर, जो अपना समय बिताता है ।
वह कर्मों के करने पर भी, सन्यासी माना जाता है ।
AAAAAAAAAAAADMAAAAAAAAAAAAAAAAAA

(१६)
Deupasana
श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या ३] * कर्म-योग *
सन्यासी कर्म छोड़ता है, फल से उनके बचने के लिए ।
योगी भी कर्म नहीं करता,फल-बन्धन में बंधने के लिए।
योगी जब यों सन्यासी की-नाई' फल से बच जाता है ।
तब अर्जन, तुम्हें कर्मयोगी,होना फिर क्यों नहि भाता है ?
सन्यासी रागद्वेष कभी, मन में अपने नहिं लाता है ।
योगी भी रागद्वेष छोड़, कर्मों में चित्त लगाता है ।
सन्यासी और योगी में कुछ, अन्तर है तो यह अन्तर है ।
सन्यासी कर्म नहीं करता, योगी कर्मों में तत्पर है।
योगी सब कर्म इन्द्रियों से, करता है मन वश में करके ।
रहता है स्वस्थ प्रसन्न चित्त, सब हर्ष शोक मन से हरके।
खाना पीना चलना फिरना, सोना जगना व्यापार सभी ।
कठपुतली सम बस करता है,योगी दुनिया का कार सभी ।
वह ऐसा माना करता है, मन की सम्पूर्ण वृत्तियों से ।
मैं कुछ भी काम नहीं करता, होते सब काम इन्द्रियों से ।।
इसी भावना में रहा, करता योगी तृप्त ।
जग में रहकर भी नहीं, होता जग में लिप्त ॥
पानी में जैसे कमल सदा, रहता पानी से बचा हुआ ।
त्योंही जग में रहकर योगी, रहता है जग से हटा हुआ।
योगी की तरह कर्म करके, प्राणी नहिं पुण्य पाप पाता ।
श्रासक्त कर्म में मन हो तो. बस पुण्य पाप है लगजाता ॥
इसलिए बड़ा पुरुषार्थ यही, मन लिक्ष न होवे कर्मों में
बस रहें, इन्द्रियां रहें अगर, आसक्त कर्म के झगड़ों में ।
नाना भोगों की धारा में, जिसका मन कभी न बहता है।
वह पुरुष देह के मन्दिर में, निन्द्र चैन से रहता है।
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CARDoori TRIA (२०) * कर्म-योग * [श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या ३ कर्मों का फल या स्वयं कर्म, ईश्वर ने नहीं बनाए हैं। यह गोरखधन्धे और फन्दे, सब माया ने फैलाए हैं। कर्मों का भला बुरा कुछ फजईश्वर न किसी को देता है । और कभी किसी को पाप पुण्य, वह स्वयं न देता लेता है ।। यह तत्व समझता है वह ही, जो मन को विमल बनाता है। और जिसकी आँखों आगे से, माया का पट हट जाता है ।। जब सभी कम माया के हैं, तो मन इनमें जो फंसाएगा। यह निश्चय है वह माया के, चक्कर में पड़ चकराएगा। इस चक्कर से बचना हो तो, बेलाग रहे सब झगड़ों में । हाथों पैरों से कर डाले, पर मनन फँसावे कर्मों में ।। हो जाता जिस जीव को, इस प्रकार अभ्याल । कमी न फिर उस जीव के, दुःख फटकता पास ॥ रहता कुछ उसको नहीं, बाकी करना सिद्ध । योगीजन के नाम से. होता वही प्रसिद्ध ॥ चेष्टा उस योगी की सारी, और की और होजाती है । भूमण्डल की सब सृष्टि उसे, और की और दर्शाती है। समदर्शी वह बन जाता है, कोठे उसके खुलजाते ब्राह्मण, चाण्डाल मनुज, या पशु एकी से उसे दिखाते हैं। जग के नाना व्यापारों में, मन उसका नहिं घबराता है । कारण यह है वह कमों के फल कोन कमी ललचाता है। जो कम सामने आते हैं, उनको न कभी तज देता है। लेकिन उनको कर्तव्य समझ काया से बस करलेता है। जड़ चेतन द्रव्यों में उसको, ईश्वर का तेज चमकता है । सब जीवों में सबसमय उसे, ईश्वर का विम्ब फलकता है ।। MONE- PICASHENDE PARLAMVEALAAmartana varo SAVATARNAKSHESHANMENLARLoanslatinoker-Pandens-01.01..chike .. PratyaksniloninthianterAnimavita ENJinsaathisanntarika COMMKSamremsarma श्रीमद्भगवद्गीला-संख्या ३] * कर्म-योग (२१) वह अपने का भी ईश्वर से, क्षण भर नहिं पृथक् समझता है । आपे को लखता ईश्वर में, प्रापे में ईश्वर लखता है वह कभी "तत्वमसि कहता है, "सोई" धनिकभी लगाता है। और कभी ज्ञान गद्गद् होकर, यों झूम झूम कर गाता है। माना M Imut पाया। है तव stic id Dhoo sito सर्वत्र चराचर में, तू ही तू समाया चैतन्य में और जड़ में तेरी ही तो छाया है।। संसार में अगर वस, कुछ सार है तो तू है। जब ध्यान से देखा तो, यह ध्यान में आया है ।। ऐश्वर्य-भोग पाया, तब कुछ नहीं था पाया सब कुछ, जब से तुझे पाया है ।। ढूंढा तुझे बहुत कुछ, दर दर भटक भटक कर । अब भेद खुला तू तो, घट घट में समाया जो मैं हूँ वही तू है, जो तू है वही मैं हूँ । सब तत्त्वदर्शियों ने, यह तत्त्व बताया है। धन मेरा धाम मेरा, सुत मेरा नारि मेरी । इस मेरा मेरो में ही, बस जीव भुलाया है। 'मैं कर्म कर रहा हूँ, मैं जग चला रहा अभिमान है यह जिसने, सब जग को दबाया है। 'मेरामेरी' से बच कर, अभिमान जिसने तोड़ा। देखा तुझे उसी ने, औरों को दिखाया है। Vहों कर्म इन्द्रियों से, फल भोगे जीव उनका । क्या खब यह तमाशा, माया ने रचाया है। निर्लिप्त हो गया हूं, अब कर्म यों करूँगा । जिससे न उनका फल कुछ, पाऊँ कि जो पाया है। हे विश्व के विधाता, आवागमन जीवन मरण ने "निर्गुण", भरपूर सताया है ।। होजाते जिस जीव के, ऐसे विमल विचार । सच मानो उस जीव ने जीत लिया संसार।। संसार उसी ने जीता है, दुख से वह ही बच पाया है । जिसको योगी होकर अर्जुन, कनों का करना आया है। छुड़ा दे। ---- D-

Llish ARALAAM
( २२ )
के कर्म-योग * [श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या ३
योगी के उर में ज्ञान-- सूर्य, भरपूर उदय होजाता है ।
माया के अन्धेरे में वह, फिर ठोकर कभी न खाता है
सब चीजों की सची सूरत, दिखलाई उसको पड़ती है।
मद-लोभ-मोह-क्रोधादिक की,बेड़ी उसको न जकड़ती है।
वह मनमें यही समझता है, दुनिया एक विस्तृत नही है ।
इस नदी में जल के बदले, कर्मों की धारा बहती है।
कर्मों का यह धारा-प्रवाह, जो कर्म बहा ले आता है।
वह बहकर आया हुआ कम, मेरे हाथों हो जाता है ।
यों कर्मों के बह आने की, वह कभी न चाहत करता है ।
अापही आप श्राजाते हैं, तो कर देता नहिं डरता है।
लेकिन उन कर्मों में उसका, मन कभी नहीं तन्मय होता ।
इसलिए उसे उनके फलके, होने का भी नहिं भय होता ॥
जबतक वह जग में जीता है, बस योंही करता रहता है ।
सुख दुख जब जो आपड़ते हैं, सब धीरज धरकर सहता है।
इस भाँति बिताकर आयु सभी, जब देह छोड़ बह जाता है।
तो फिर न लाख चौरासी के चक्कर में पड़ने आता है ।।
योगी की और योग की महिमा बड़ी अपार ।
कहा किन्तु संक्षेप में, मैंने तुमसे सार ।।
अर्जुन, कुछ संशय नहीं, उत्तम योगाभ्यास ।
अच्छा होसकता नहीं, उससे कुछ सन्यास ॥
सच तो यह है योगी जैसे, कर्मों को कर दिखलाता है ।
वैसे ही कर्मों का होना, सन्यास बखाना जाता है।
सच्चा सन्यास उसी का है, वह ही सच्चा सन्यासी है ।
जो कर्म करे पर कर्मों के, फल की इच्छा का त्यागी है।
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PORato PESDAmte श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या ३] * कर्म-योग * ( २३ ) सन्ध्या पूजा जप होम यज्ञ, यदि छोड़ दिए तो क्या छोड़ा। अर्जुन, छोड़ना तभी है जब, फल इच्छा से हो मुँह मोड़ा । दिखलाने को तज दिए कर्म तो हुश्रा न सन्यासी त्यागी । हां, मन की ललक लालसाएँ, छुट जायँ तभी है सन्यासी । इससे यह सिद्ध हुश्रा अर्जुन, सन्यास धर्म बस मन का है । मन से सन्यास सधगया तो बेकार साधना तन का है। अर्जुन, तुम भी मन को साधो योगी की नाई युद्ध करो। और यों सच्चे सन्यासी का, परिपालन धर्म विशुद्ध करो। है अपने ही हाथ में, इसका पूर्ण उपाय । जो चाहे अर्जुन, वही, योगी बस बन जाय ॥ अपने ही उद्योगों द्वारा, जन अपना हित कर सकते हैं । चाहें तो ऊपर चढ़ सकते, चाहें नीचे गिर सकते हैं। दुनिया में अपना आपा ही, है अपना शत्रु मित्र सच्चा । प्रापे को जिसने मित्र किया-कहलाता वह ही नर पक्का ॥ प्रापे को मित्र बनाने से, नर, जन्म सफल हो जाता है । आपे को शत्रु बनाने से, प्राणी गढ़हे में आता है । आपा जिसकी मुट्ठी में है, वह ही सच्चा सिद्धात्मा है । कहने को आत्मा कहलाए, पर वास्तव में परमात्मा है। यह परमात्मा पद ही सच्चा, योगी का पद कहलाता अभ्यास करे और लगा रहे तो फिर यह पद मिलजाता है । है इस पद की प्राप्ति का, जो एक सरल उपाय । अर्जुन, उसी उपाय को, सुनलो कान लगाय ॥ क्रम क्रम से यह पद पाने को, इस तरह जीव अभ्यास करे । प्रतिदिन कुछ क्षण को नियम बना,एकान्त भवन में वास करे ॥ कम्मरमरपाका AAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAA -ALKAL nirmirachibacils kissetisatirikthakyides TRUT PranoranvrIAHILMsrxxture (२४) SHARMA 4. कर्म-योग* [श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या ३ एकान्त भवन में बैठे तो, एक समथल आसन पर बैठे। कुश पर मृगछाला, छाला-पर-एक कपड़ा फैलाकर बैठे। फिर मन को खींच सब तरफ से,निश्रय शरीर को कर लेवे। प्रांखों को मूंद नासिका के, कोने पर दृष्टि जमादेवे ।। इस तरह समाधि-पूर्ण हो जब, तब उर में अपने मान करे । भगवत् की दर्शनीय सुन्दरं, मनहर भूरति का ध्यान करे ।। प्रतिदिन यह नियम चलाया तो, भीतरी नयन खुल जायेंगे । मैं कौन है ? क्याहूं। कहां का हायड भेद समझ में आयेंगे। आनन्द बढ़ेगा नित्य नया, मन में थिरता आजायेगी। नाना विधि प्रबल विकारों से, बुद्धी छुटकारा पायेगी ।। उस समय हृदय से एकोऽहं, एकोऽहं की ध्वनि प्रायेगी । भाणी की प्रतिभा प्राणों में, गुन गुन करके यो जायेगी ।। गाना wr- का अहो ! क्या हो गया है मैं नहीं हूं। किसी ने कह दिया है में नहीं हूं। पड़ा पर्दा था. जब, तब मैं ही मैं था। जो अब पर्दा उठा है मैं नहीं हूं। यह आँखें हैं यह मुख हैं कान हैं यह । अरे, यह नासिका है। मैं नहीं है जगत् यह जो पसरा है . पसारा । क्या बला बला है मैं नहीं हूं। समझता था कि हूँ कि हूँ मैं भी यहीं पर । पता अब यह लगा है मैं नहीं हूं। कि चलना फिरना खाना पीना सोना । ये कोई कर रहा है मैं नह; हूं। जो करके कर्म उनका फल भी चाहे। वो कोई दूसरा है मैं नहीं हूं। न जाने uvrai पं. राधेश्यामजी कविरत्न द्वारा लिखित नाटक महाराजा भर्तृहरि १%) पृथ्वीराज |) भजन गाने छ सजले वीर अभिमन्यु १) श्रीराधेश्याम-गीताञ्जलि महर्षि वाल्मीकि १॥) राधेश्याम बिलास सती पार्वती ३) राधेश्याम-कीर्तन III) ईश्वर-भक्ति ३॥) | राधेश्याम भजनमाला परम-भक्त प्रहा शा) | प्राचीन भजनमाला परिवर्तन १) मोहन-कवितावली श्रीकृष्णा-अवतार ११) मुसाफिर की पाकेट मुक रुक्मिणी-माल १%) प्रेस-रत्नावली द्रौपदी-स्वयम्बर निजानन्द प्रदीपिका गृहिणी गीतानि श्रवणकुमार आनन्द-लहरी ऊषा-अनिरुद्ध १) मीरा भजनमाला मशरिकी हूर १॥) बोध-प्रकाशी SEE AAAAAAADIMAL आरत-माता पद्य-पुष्पांजलि कृष्णा-सुदामा भारती संग्रह शान्ति के दूत अगवान् श्रीकृष्णा ग़जलों का गुलदस्ता सेवक के रूप में भगवान श्रीकृष्णा ।-) गजल-सागर घण्टा-पन्थ -) पद-पुज मोहन भजनमाल नोट-~~नाटकों में वीर अभिमन्यु, | मोहन गीतावली श्रवणकुमार, और मशरिक़ी हूर, उर्दू में मोहन संगीत शिक्षा भी छपकर तैयार हैं । दाम दही जो | सीताराम-कीर्तन हिन्दी में हैं। समर-गीतमाला न्यू शाल्मल थियेट्रिकल कम्पनी प्राफ मीठी गुजार ) अधुर मुरली बम्बई द्वारा खेले वाये रसीली तान 2) कुसुम-कुंज असलीच मुकम्मल नाटक बसंतबाटिका पल-पराग भूलभुलैयाँ १) दिलमहोश १) अन्य पुस्तकें चलता पुर्जा १) शरीक बदमाश १) अक्त जिया 2) बलाने हस्ती १) प्रवृत्ता दामन १) सतलड़ी १) पथ्यों का प्याना॥ खूबसूरत बला१) हिन्दू विधवा १) अजायब घर ) धनुर्षिया ॥) भारत व्याकुल धियेट्रिकल कल्पनी प्रेत-लोक १!!) नौलखाहार ) लिमीटेड आफ मेरठ द्वारा लेले गये ज्योतिष-प्रकाश ) दृष्टांत महासागर ॥) असली व सुकरिमल नाटक वियोग-कथा । मोहन साला ) लेदोसितम १०) सम्राट्चन्द्रगुप्त १०) हनुमानचालीसा-)। सुन्दरकाण्ड ।-) 1) अमरकोष पता-धीराधेश्याम-पुस्तकालय, बरेल्लो ।

नकली किताबों से बचिये हमारी रामायण और हमारे नाटकों का काशी प्रचार देखकर लोगों ने उसी रंग और रूप की नलली किताचे छाप छापकर प्रकाशित करदी हैं। नालों की कई बरस की कोशिश का नतीजा यह है कि बाजार में नकली किताबों की भरमार है। यह नकली किताब )॥ में शुक्सेलर को दी जाती है, जिसे बुक्सेलर -) या =) या ) में बेचकर कायदा उठाता है और इस प्रकार ग्राहक को धोखा दिया जाता है। प्राहक जब ऐसी किताब को घर ले जाता है तो पछताता है। प्राहक का ऐसी धोखेबाजी से बचाने के लिये अब हम अपनी हर एक किताब के ऊपर अपनी तस्वीर देने लगे हैं,जैसी कि इस किताब पर आप देख रहे हैं । अब श्राइन्डा से पाप धोखा न खाइयेगा--- ध्यान रहे- जिन किताबों पर-राधेश्याम था--राधेश्याम क्षाशिष्ठ' "तर्ज-राधेश्याम' छपा रहता है, वह हमारे यहाँ की नहीं हमारे यहाँ की किताबों पर हमारे यह दस्तखत भी रहते हैं। इन्हें पहचान लीजिये- - Preferralasa । P4 भवदीय- राधेश्याम कथावाचक मालिक-श्रीराधेश्याम पुस्तकालय छ प्रेस, रेली।

श्रीमद्भगवद्गीता संख्या ४ विराट-रूप-दर्शन प्रकाशक- नेपाल गवर्नमेण्ट से 'कथावाचस्पति' की पदवी प्राप्त- कीर्तन-कला-निधि, काव्य-कला-भूषण, श्रीहरि-कथा-विशारद, कविरत्न- अध्यक्ष-श्रीराधेश्याम-पुस्तकालय, बरेली । मूल्य ॥ आने प०राधेश्यामजी कविरत्न लिखित नवीन कृति में सिलेंगे, तथा जिन्ददार गुरु। ११॥ में मिलेगा । डाक सहसून गुहा !--) अलग अलग आग पर /-) अन्मामी 1) नन्द-महोत्सब।-) महाभारत. अमलीबाला झन्हैया। गिरिबरधारी) ( राधेश्याम रामायण की समय से राख-रहस्य 13) कंस-बच 1) श्रीष्म-प्रतिज्ञा. नन्द-नन्दन-यसुदेव-नन्दन भीष्म-पराक्रम खम्पूर्ण साता भाग एक सुन्दर जिल्द पाण्डव-जन्म में छः श्राने अधिक देने पर अर्थात् तीन पाण्डवों का बाल्यकाल रुपए में मिलेंगे। डाक महसूल) अलग पाण्डवों की शस्त्र परीक्षा लाक्षागृह रुक्मिणी मंगल बक-संहार ( राधेश्याम रामायण की तर्ज में) द्रौपदी-विवाह रुक्मिणी-सम्म 1) सुभद्रा-हरण शामिनी का कृष्ण प्रेम राजसूय-या रुक्मिणी की सगाई द्रौपदी-बस्न- रुक्मिणी का पत्र लेखन किरातार्जुन युद्ध रुक्मिणी का गिरिजा-पूजन यक्ष सम्बाद रुक्मिणी का भ्रातृस्नेह कीचक-वाब रुक्मिणी विवाह 1) अभिमन्यु विवाह सम्पूर्ण सातों भाग एक सुन्दर जिल्द में छः आने अधिक देने पर अर्थात् तीन ( राधेश्याम रामायण की तर्ज है..) रुपए में मिलेंगे।डाक महसूल ।) अलग बरसी की हुंडी Ou श्रीमद्भगवद्गीता श्रीसत्यनारायण की कक्षा । राधेश्याम रामायगा श्री में) अर्जुनमोह ॥ विराटूप-दर्शन )|| ध्रुव चरित्र आत्मा की अमरता)। जीव-ब्रह्म-विवेक।)। सुदामा चरित्र मोरध्वज-चरित्र कर्म-योग 1)। अर्जुन का समान।। अनुहार-चरिन्न नोट-सम्पूर्ण ६ भाग एक सुन्दर जिल्द में।) अधिक देने पर, अर्थात् महाराणा प्रतापनि सत्यवादी हरिमन्द्र मिलेंगे तथा जिल्ददार गुटका |) में सावित्री-सत्यवाद मिलेगावामहसूल गुरुका ।) अलग मीराबाई श्रद्धा आग पर - স্বল্পী दुर्गा-परिक्ष अभिमन्यु की कारखा হাহুত্বঙ্গ বন্য জ্ঞ ই ঈ गुरु गोविन्ददि महिषासुर-वधा द्रौपदी-लीला हा कालाई महाराजा दिलीप যাক প্লীহ লাঞ্চ ক্লা স্বস্ত্র सती स्वायद बोल-जम्मूग ५ भाग एक सुन्न जिद । सती मोह में छः श्राने अशिल देने पर सह २।) महर्षि पारिन (3) मा স্ম ত্যা प्रहाद चरिश AAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAA २) - शु-अरि TTTTT 50 স্বামী-তলাক্ত, ঞ্জৈী।

-- श्रीमद्भगवद्गीता संख्या ४ सर्वाधिकार प्रकाशक के आधीन है। लेखक- प० रामनारायण पाठक विराट्रप-दर्शन प्रकाशक AT नेपाल गवर्नमेण्ट से "कथावाचस्पति" की पदवीप्राप्त--' कीर्तन-कला-निधि, काव्य-कला भूषण, श्रीहरि-कथा-विशारद, कविरत्न- प० राधेश्याम कथावाचक, अध्यक्ष- यामधास्ताकालय -सातबार १००० ] सन् १९४५ ई० [ मूल्य साढ़े चार आने प्रिटर ----६० रामनारायण पाठक. श्रीराधेश्याम-प्रेस, बला ।

Dhko . 22ce .xcoortoon प्रार्थना 00mARO-0- WEIR विकल होगया जब पड़ी भोर भारी । इसी से हूँ आया शरण अब तुम्हारी ।। उबारा है लाखों ही भक्तों को तुमने । उबारो मुझे आज है मेरी बारी॥ कहाते हो दुख-द्वन्द्व-भजन निरजन । चलादो न फिर मेरे दुख. पर भी आरो ? वही करता हूँ जो कराती है माया । नहीं दोष है कुछ भी मेरा मुरारी ! जो हैं हर्ष और शोक, मद, मोह, माया । सो प्रत्येक क्षण मेरी-करते हैं स्वारी ॥ कभी इन विकारों से पीछा न छूटे । हरो इन विकारों को हे निर्विकारी ! जो अपने ही कर्मों का फड़ मैंने पाया । तो करुणा तुम्हारी हुई क्या बिहारी ? अजामिल या गणिकः सा पापी नहीं हूँ। थोड़े हो हैं पापहारी ! इधर भी तुम्ही हो उधर भी तुम्ही हो । तुम्ही हो जिधर देखता हूं निहारी ।। हृदय को मेरे धाम अपना बनालो । तो मिट जाय 'निगुण' विपति मेरी सारी ।। -20:30:00 मेरे पाप NEथ आगे को कहने लगे-फिर यों यदुकुलराय- "अर्जुन, मैंने योग की, दी बिधि तुम्हें बताय ॥ होना चाहे व्यक्ति जो, योगी योग-निधान । वह इस विधि से चित्त को, वश में करे सुजान । जो योगी होने के निमित्त, इस विधि को अंगीकार करे वह प्राणी एक मर्यादा में, अपना आहार-विहार करे ॥ अर्थात् अधिक भोजन न करे, और बिल्कुल भूखा भी न रहे । अत्यन्त अधिक सोवे न कभी,और बिल्कुल जगता भी नरहे । खाना, पीना, सोना, जगना, एक दमन तजे इन कर्मों को । धीरे-धीरे वश में करले, सारे इन इन्द्रिय-धर्मों को ऐसा करने से प्राणी के मन में थिरता आजायेगी । नानाबिधि भोगों की चाहत, मन को उसके न चलायेगी । दीपक हाथों में लेकर जब, प्राणी बाहर को जाता है । तब उसे हवा के झोंके से, पन देकर खून बचाता है ।। उस समय चित्त उसका बिल्कुल, दीपक ही में लग जाता है । जैसा मन थिर तब होता है, वैसा न कभी हो पाता है ।। लेकिन जो ऊपर की विधि को, भरपूर काम में लाता है। उसका मन सदा सर्वदा को, वैसा ही घिर होजाता है। AURAN RAVEE

(४ )
* विराट्रप-दर्शन [श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-४
जैसे मछली के चलने से, सागर नहिं उथल पुथल जाता ।
वैसे ही थिर होजाने पर, अन्न श्री नहि चंचल हो पाता।
सागर-समान जब जिसका मन, गम्भीर धीर हो जाता
अर्जुन, वह ही नर बस पूरा, पक्का योगी कहलाता है।
योगी को वह ज्ञान भी, सहज प्राप्त होजाय ।
जिससे करनी का उसे, फल न कभी मिल पाय !!
योगी के इस ज्ञान को, पाता वही प्रवीन ।
होता मेरा भक्त जो कर मन को आधीन ।
जिसने मेरी भक्ति की, बना वही निद्वन्द ।
कभी न उसको बांधता, फिर माया का फन्द।।
अर्जुन बोला- हे कृष्ण ! मुझे, यह महाकठिन दिखलाता है ।
पाणी का योगी बन सकना, सम्भव न समझ में आता है।
कारण यह है यह मन जो है, सो क्षण भर थिर नहिं रहता है ।
वह चञ्चल पवन-समान सदा, बा इधर-इधर को बहता है।
जिस तरह किसी में शक्ति नहीं, इतनी कि पवन को बांध सके ।
बस, उसी तरह यह शक्य नहीं, जो मन को कोई साध सके।
जब मन न सध सका तो कोई, योगी भी नहिं हो पायेगा
और फिर करनी के फल से भी, वह भला कहां बच जायेगा।
इससे है सहज उपाय यही, कर्मों को बिल्कुल करे नहीं ।
करने से भरना पड़ता है. सो करे नहीं और भरे नहीं" ||
"यह अम-पूर्ण विचार है", बोले कृष्ण सुजान ।
"कर्मों का यों त्यागना, उत्तम नहीं बिधान ।।
मन चञ्चल पवन-समान अगर, नाना मार्गों में जाता है।
और नाना भोग भोगने को, प्रत्येक समय ललचाता है।
--
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भार M श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-४] * विरट्प-दर्शन तब कर्मों का तज देना भी, कुछ लाभ नहीं पहुंचायेगा । कर्मों के फल के बन्धन से, पाणी न कभी बच पायेगा । कारण यह है कर्मों का फल, अर्जुन, जो कुछ भी होता है । वह सब का सब अपने मन की, इच्छाओं से ही होता है ।। यदि मन वश में होता है तब, इच्छाएँ भी नहिं करता है । कर्मों को करके भी प्राणी, कर्मों का फल नहिं भरता है ।। [ व्याख्यान- मन को वश में करके ओर फल को इच्छा न करके कर्मों के करने के विषय में किसी पंडित का कहा हुआ एक बड़ा अच्छा दृष्टान्त है। वह इस तरह कि- किसो नगर में एक निर्धन पुरुष रहता था। उस निर्धन पुरुष ने नगर के अनेक अमीर आदमियों को उत्तम वस्त्र पहनते और अच्छा भोजन करते हुए देखा तो उसका भी मन अच्छा खाने और पहरने को ललचाया । मन की इच्छा तो उसकी इस प्रकार हुई पर उसके पास इतना धन नहीं था कि अच्छे-अच्छे कपड़े और उत्तम-उत्तम भोजन प्राप्त कर सकता। किन्तु धन न होने पर भी उसकी इच्छा कम न हुई; बल्कि दिन दूनी बढ़ती गयी। यहाँ तक कि उसने चोरी करके धन लाने और अच्छे-अच्छे कपड़े पहनने तथा बढ़िया-बढ़िया भोजन करने का मंसूबा बाँधा । एक दिन रात के समय वह नगरी के एक बहुत बड़े अमीर के यहाँ चोरी करने के प्रयोजन से घर के बाहर निकला। काले कपड़े से अपने आपको ढके हुए वह इधर उधर को देखता हुआ उक्त अमीर आदमी के घर की ओर चला । लेकिन जब वह अमीर आदमी के घर के पास पहुंचा तो पहरेदारों को जागता पाया। पहरेदारों को जागते देखकर उसकी हिम्मत न पड़ी और वह अपने घर को लौट पड़ा । जब वह घर को लौटा आरहा था तो उसे मार्ग में सामने से आते हुए राजा के चौकीदार मिले, जिन्होंने आधीरात छो इसे अकेले घूमते देखकर सन्देह किया और पकड़ लिया। पकड़े जाने पर उसने चौकीदारों से कहा कि-"भाई, मुझे छोड़ दो। मैं आज दिनभर व्रत रखकर इस समय कामेश्वरी देवी के मन्दिर में दर्शनों को जारहा हूँ; और दर्शन करके सीधा घर को ही लौट जाऊँगा। किसी बुरे विचार से मैं घर के बाहर नहीं निकला हूँ।" मगर चौकीदारों ने उसकी बात पर विश्वास नहीं किया। वे बोले कि हम सब तुम्हारे साथ मन्दिर तक चलेंगे और फिर तुम्हें तुम्हारे घर पहुँचाकर हम तुमसे अलग होंगे । लाचार उस्ले यह बात मानना पड़ी, नार के बाहर कोई दो कोस पर कामेश्वरी देवी के मन्दिर में उसे दर्शन करने जाना पड़ा। दर्शनों से लौटकर अपने घर में जब आगया तब चौकीदारों ने उस्ले छोड़ा।

TANDA cokomairandom ( ६ ) * विराटप-दर्शन [श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-४ संयोग ऐसा हुआ कि थोड़े दिनों बाद उसे एक भयंकर रोग हुआ और उससे उसके प्राण निकलने लगे । अन्त समय में उसने विचारा कि मैंने कोई पाप नहीं किया है, केवल चोरी करने का एक बार विचार किया था सो कर नहीं पाया इसलिए उसका कुछ बुरा फल मुझे नहीं भोगना पड़ेगा, बल्कि उस दिन कामेश्वरी देवी के दर्शन करने का मुझे कुछ न कुछ अच्छा ही फल मिलेगा। इन्हीं विचारों में उसके प्राण छूट गये। जब प्राण छूट गये तो उसकी आत्मा यमलोक में पहुंची। वहां जब उसके पाप कर्मो का वृत्तान्त उसे सुनाया गया तो उसे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि पोरी करने का पाप तो उसके नाम लिखा है, पर देवी के दर्शन का पुण्य बिल्कुल नहीं । उसने कारण पूछा तो उसे बताया गया कि हाथों पैरों से तुमने चोरी नहीं की तो क्या हुआ मन से तो की । यदि पहरेदार जागते न होते तो हाथों पैरों से तुम चोरा अवश्य करते। इसलिए चोरी तुमसे अवश्य होगयो । और देवी के दर्शन का तो तुमने मन में विचार ही नहीं किया था । चौकीदारों से बचने के लिए तुम केवल पैहों से देवी के मन्दिर में गये और हाथों से प्रणाम करके जिह्वा से देवी का स्तोत्र पढ़ दिया । मन तुम्हारा देवी की उपासना का बिल्कुल उस समय इच्छुक न था। परिणाम यह हुआ कि उसे चोरी का दण्ड भुगतना पड़ा। इस दृष्टान्त से यह स्पष्ट है कि मन ही मुख्य है । मन में यदि पाप मौजूद तो हाथों पैरों से पाप न करने पर भी उसका फल मिलेगा। इसलिए हाथ पैर से कर्म करना छोड़कर भी यदि मन निर्विकार नहीं किया गया तो पाप पुण्य प्राणी मन से भी करता रहेगा और उनके फल पाता रहेगा । 'कर्मो को छड़कर उनके फल नहीं भोगेगा' यह विचार इस राति से भ्रम-पूर्ण है । इसीलिए मन को करे, वश में भली प्रकार । रोगी ज्ञानी हो मनुज, किया करे व्यवहार ।। यद्यपि यह सच बात है, सहज न मन वश होय । पर विराग अभ्यास से, सध जाता है सोय" ।। अर्जुन ने पूछा-"कृष्ण, मुझे, यह तो कहिए इच्छा भी हो ! और मन को भी वश करने की, प्राणी में तत्परता भी हो ।। लेकिन चञ्चल होने से मन, पूरा पूरा सध पाय नहीं । और उधर यत्न करते करते, जीवन समाप्त हो जाय कहीं ।। तो सारा यत्न व्यर्थ रहकर, कुछ सफल नहीं हो पायेगा । होकर न कहीं का भी प्राणी, बीच में टंगा रह जायेगा। है ने KAM Russasr स

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श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-४] * विराटरूप-दर्शन
(७
जब ऐसा है तो किस प्रकार, योगी कोई बन सकता है ?
किस तरह योग के साधन में, उसका विचार ठन सकता है?
इसके उत्तर में लगे, कहने यों नन्दलाल ।
"अर्जुन,कुछ चिन्ता नहीं, हो यदि ऐसा हाल ।।
यदि योग-सिद्धि में प्राणो की, सब आयु पूर्ण होजाती है ।
तो आत्मा उसकी इधर-उधर, बिल्कुल न भटकने पाती है ।
होता यह है उस प्राणी को, बस स्वर्ग सहज मिल जाता है ।
वह दीर्घकाल तक सुखपूर्वक, आवास स्वर्ग में पाता है।
जब स्वर्ग भोग चुकती है तब,आत्मा उसकी फिर बाती है ।
और श्रेष्ठ प्रसिद्ध घराने में, वह जन्म जगत् में पाती है ।
यों जन्म प्राप्त करके उसकी, इच्छा फिर वह ही होती है
योगी बनने के ही निमित्त, चेष्टा फिर उसकी होती है
यो एक जन्म में नहीं सधे, तो दुसरे में सब जाता है
जो पुरुष लगा रहता है वह, योगी एक दिन बन जाता है
अर्जुन, जो प्राणी योगी है, वह उत्तम है सन्यासी से ।
उत्तम हैं सदा तपस्वी से, और यज्ञों के अनुरागी से ॥
योगी में भी वह उत्तम हैं, जो भक्त मेरा कहलाता है ।
मुझको अपना करलेता है, और आप मेरा हो जाता है ।।
अर्जुन, अब तुम भी बनो, मेरे योगी भक्त ।
योगी उत्तम है वही, जो मुझमें अनुरक्त ॥
योगी बन जाने की जग में, होती है सबको चाह नहीं ।
जो करें योग के लिए यत्न, वह लाखों में दो एक कहीं
इन लोगों में से भी अर्जुन, कितने ही नर रह जाते
पूरे और पक्के योगी तो, बस एकी दो हो पाते हैं

है muaa (८) * विराट्रप-दर्शन [श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-४ सच्चा योगी वह है अर्जुन, जो सारा भेद जानता है । अपना मेरा और दुनिया का, सच्चा स्वरूप पहचानता है ।। अब मैं अपना और दुनिया का, अर्जुन,सरूप बतलाता हूं ! जिससे तुम योगी बन पाओ, वह ज्ञान तुम्हें समझाता हूं। पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश, वायु बुद्धी, मन,अहङ्कार भी है । निचले दर्जे की प्रकृति मेरी, अर्जुन यों आठ प्रकार की है। अब मेरी ऊ'चे दर्जे की, जो प्रकृति बखानी जाती है । वह प्रकृति जीव है काया में, जो जीवात्मा कहलाती है। यह निचजे ऊँचे दर्जे की, मिलती है मेरी प्रकृति जभी । जड़ चेतन सचर अवरवाला, बन जाता है यह जगत तभी। यह जड़ चेतन का जगत् सभी, मुझमें से बाहर आता है । और फिर कुछ समय बाद अर्जुन, मुझही में लय होजाता है । माला के सुभग मोतियों में, ज्यों तार पिरोया रहता है। त्यों ही मेरा सारे जग में, अस्तित्व समाया रहता है । मैं सबके ऊपर रहता हूं, मेरे ऊपर कोई न कहीं। मैं सबका मालिक हूं लेकिन, मेरा मालिक कोई भी नहीं । होता सबका अन्त पर, मेरा होय न अन्त । व्यापक हूं मैं सब जगह, सबमें सदा अनन्त ।। वेदों में प्रोङ्कार जो है, अर्जुन, मैं ही कहलाता हूं। मिट्टी में गन्ध और जल में इस मैं हो माना जाता मेरी ही ज्योति चमकती है, चन्द्रमा सूर्य और तारों में । मेरा ही तेज दमकता है, आगी के लाल अंगारों में ।। आकाश में शब्द भी मैं ही हूं, पुरुषार्थ भी मैं हूं पुरुषों में हूं तपस्वियों में तप मैं ही, और प्राण जगत् के जीवों में। mak Aanimonax ... ।

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श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-४] विरारूप-दर्शन
( १ )
इस सकल सृष्टि का बीज हूं मैं और बल हूँ सब बलवानों में है
तेजस्वी में हूँ तेज भी मैं, और काम विशुद्ध कामियों में ।
सात्त्विक, राजस और तामस गुण, तीनों मैंने उपजाये हैं ।
लेकिन मैं उन में रहूं नहीं, यद्यपि मुझमें वे समाये हैं ।।
इन सात्त्विक, राजस और तामस गुण में ही सब जग फूला है ।
दिन रात गुणों में फंसा हुश्रा, रहता मुझको बस भूला है ।
यह गुण मेरी माया के हैं, जो प्रकृति मेरी कहलाती है
और उन्हीं गुणों की रस्सी में,सब जग को नाच नचाती है ।।
इस रस्सी से बच जाने का, बस एकमात्र जो साधन है ।
अर्जुन वह मेरा भक्ति-सहित.और प्रेम-सहित पाराधन है ।।
होते. चार प्रकार से, जीव मेरे अनुरक्त !
अर्जुन, हैं इससे मेरे, चार तरह के भक्तः ।।
पहले वे हैं जो रोगों से, भय पाकर मुझे बुलाते हैं ।
दूसरे हैं वे जो धन-धरणी पाने को मुझे रिझाते
तीसरे ज्ञान के इच्छुक हो, गुण मेरा गाया करते हैं
चौथे वे हैं जो योगी बन, मुझ तक आजाया करते हैं।
इन चारों में सबसे पिछला, बस योगी-भक्त मुझे भाता ।
अर्जुन,वह एक न एक दिवस,निश्चय मुझतक है आजाता ॥
योगी अपने मन से मुझको, माना करता परमात्मा
और मैं यह माना करता हूं, योगी बस मेरा अात्मा है ।।
लेकिन जग के अधिकांश जीव, माया के चकर में आकर ।
नाना देवों को भजते हैं, नाना भोगों की इच्छा कर ।।
मुझको तज दुसरे देवों में, जब जनता ध्यान लगाती है ।
तब उन देवों में ही उसकी, श्रद्धा दृढ हो जम जाती है ।।
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NEW R-Reirmanaraura (१०) * विराट्प-दर्शन [श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-3 जिस मनोकामना को लेकर, जन उनमें भक्ति बढ़ाते हैं उस मनोकामना को अपनो, वे निश्चय ही पा जाते हैं । लेकिन यह मनोकामना सब, यद्यपि मुझसे दी जाती है । पर जनता यही समझती है. वह सब देवों से आती है। मनोकामना किन्तु यह, सदा न रहती साथ । रह जाता फिर एक दिन, प्राणी खाली हाथ ।। इसलिए कामना पाने की, अभिलाषा जो चित धरते हैं। और उस अभिलाषा से पूजा, नाना देवों की करते हैं। अर्जुन, वे थोड़े दिन तक ही, ऐश्वर्य भोग बस पाते हैं । उन भोगों का होते ही अन्त, बस ज्यों के त्यों रह जाते हैं फिर और बात यह होती है, वे लोग न सुझतक आ पाते । बस जिनकी पूजा करते हैं, उनहीं तक जाकर रह जाते ॥ जो मूर्ख और अज्ञानी हैं, वे ठीक नहीं जाना करते । अांखों को दीख पड़े ऐसा, वे रूप मेरा माना करते वास्तव में मेरा रूप कमी, आंखों आगे नहीं पाता है। है माया-पट में ढका हुआ, इसलिए नहीं दिखलाता है । में पैदा कभी नहीं होता, और मरता भी हूं कभी नहीं । श्रारम्भ नहीं होता मेश, होता न अन्त भी कभी कहीं ।। जो बीत चुका या बीत रहा, या मागे बीतेगा सेई । मैं सदा जानता रहता हूं, पर मुझे न जान सके कोई ।। अनुराग द्वेष और हर्ष, शोक, इनमें संसार भुलाया है । इसलिए मुझे उसने अबतक, पहचान जान नहिं पाया है ।। पहचाना करते वही मुझे, जो मुझसे प्रेम बढ़ाते हैं श्रद्धा से अपने तन-मन की, जो मुझ पर भेंट चढ़ाते हैं RAAMAnkhreshachammadseasranAsushtiessonnieenetratoPRASKATHALALALAMLASSMANAastanARAcauasabasunALAAAAAAAAAAAAAAE ruwaon , , xi. HAK:

Murrn. rat tar andom ASTRO श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-४] विराटूप-दर्शन (११) ऐसे मेरे भक्त भक्त जो, होते श्रद्धावान । मोक्ष-प्राप्ति के हेतु चे, करते मेरा ध्यान !! अघिदेह और अधिषज्ञ तथा, अधिदेव जान पाते हैं वे अध्यात्मकर्म और ब्रह्म है क्या, यह मर्म समझ जाते हैं वे ।। इन बातों का सब तत्व जान, वे मुझमें तन्मय रहते हैं। और अन्त समय मुझमें रत हो, मुझका निस्संशय लहते हैं अर्जुन अन श्रीकृष्ण से, पूछ उठा यह मर्म । "कृष्णा, मुझे बतलाइये, ब्रह्म क्या ? क्या कर्म ? होता है अध्याला क्या, क्या अधिभूत कहाय ! कहलाता अधिदैव क्या ? कहिये सब समझाय? वस्तु कौन अधियज्ञ है, किसे कहें अधिदेह ? समझादें यह आप तो, मिटे मेरा सन्देह" ? गोपी-बल्लभ बोले-"अर्जुन, जो नाश न होने पाता है । वह अविनाशी और श्रमर तत्स, इस जग में ब्रह्म कहाता है। जिस चीज का जो होता स्वभाव, अध्यात्म वही माना जाता । जग रचना का व्यापार जो है. बस वही कर्म है कहलाता ।। मिटजाना गुण है जो जग का,अधिभूतवही जाना जाता । जीवों में जो चेतनता है, अधिदेव वही बस कहलाता ।। अधियज्ञ यज्ञ का स्वामी है, सो अर्जुन कहलाता हूँ । सब देहों में अधिदेह एक, बस मैं ही माना जाता हूं जो मुझे याद करता करता, प्राणी शशेर तज देता वह सीधा मुमतक भाकर के, निश्चय मुझको पालेता है। प्राणों को तजते समय जीव, जिसमें भी ध्यान लगाते हैं । परलोक पहुंचकर उसको ही, वे जीव अन्त में पाते हैं । Aroctor । TAARAM

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(१२.) * विराटप-दर्शन* [श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-४
इसलिए उचित यह है अर्जुन,तुम मेरी ही नित भक्ति झरे ।
और फिर निश्चिन्त चित्त होकर,संग्राम करो मन में न डरो !
मुझमें चित्त लगाय कर, जपते मेरा नाम ।
उन्हें सताते हैं नहीं, लोभ-मोह-मद-काम ।।
उनको मन के नाना विकार, आकर फिर नहीं सताते हैं ।
वे राग-द्वेष या सुख-दुख से, विचलित नहिं होने पाते हैं ।।
दुनिया के व्यापारों में फिर, मन उनका नहिं फँस पाता है ।
ऊपर से कर्म किया करते, भीतर से चित हट जाता है ।
सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग, यह युग जो चारकहाते हैं ।
सो चारों आपुस में जुड़कर, चौकड़ी एक कहलाते हैं ।।
ऐसी हजार चौकड़ी होंय, तो ब्रह्मा का दिन बन पाता।
और इतना ही अतिदीर्घकाल, ब्रह्मा की रात कहा जाता !!
ब्रह्मा का दिन जब होता है,तब दुनिया यह र च जाती है ।
फिर जबकि रात होने लगती,तब सबकी सब मिट जाती है ।
यह होना मिटना दुनिया का, ऐसे ही चलता रहता है ।
प्राणी भी होने मिटने की, झज्झटें सदा ही सहता है ।।
लेकिन अर्जुन जो जीव कभी, मुझतक बाजाने पाते हैं ।
फिर वे होने और मिटने को, जग में न लौटकर आते हैं ।
अस मेरे धाम में रहते वे, बन्धन से छुटकारा पाकर
यह धाम मेरा वह है अर्जुन, लौटता न जीव जहां आकर ॥
बतलाता हूं अब तुम्हें, अर्जुन मैं वह ज्ञान ।
सहज नहीं जिस ज्ञान की, होती है पहचान ।।
सच तो यह है मैंने अर्जुन, यह सारा जगत् रचाया है ।
मेरे अव्यक्तरूप में से, माया ने उसे बनाया है।
nasi AnantonantanathachestincensesannindiminanatanAMGAAAAAR

HTTA Arics श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-४] * विराट्रूप-दर्शन (११) मुझमें हैं जग के सब पदार्थ, पर मैं उनमें रहता हूँ नहीं । जब सब जग से न्यारा हूँ मैं,तो जग में रह सकता हूं कहीं ? जिस तरह वायु सारे जग में, सब समय विचरती रहती है। लेकिन उसका जो ठिकाना है, वह ऊपर को आकाश ही है ।। बस, उसी तरह सब चीजों का, पालन-पोषण मैं करता हूँ। लेकिन अपने इस धन्धे में, मन को न फंसाकर धरता हूँ॥ ब्रह्मा की रात बीतने पर, माया मेरी जग जाती है कर्मानुसार बहु जीवों को लेकर वह जगत् रचाली है ।। बस, माया सब कुछ करती है, मैं करता कुछ भी कर्म नहीं । वह जो कुछ करती है उससे, होता न मुझे सुख-दुःख कहीं ।। मन में कुछ राग छ द्वेष न ला, मैं सब कुछ देखा करता हूँ। प्रासक्त नहीं होता उसमें, इसलिये न फल कुछ भरता हूँ। लेकिन अज्ञानी लोगों को, होती न ज्ञात यह बात कमी । वे नही जानते,-करता हूँ उनकी नाई मैं कर्म समो॥ उलको यह ध्यान नहीं रहता, मैं इस जग में परमेश्वर हूँ । चर-अवर सृष्टि का स्वामी हूँ ,सब भुवनों का भुवनेश्वर हूँ ॥ अज्ञानी ऐसे सभी, रहते सदा मलीन । नाचा करते नाच वे, माया के आधीन !! आशायें उनकी व्यर्थ रहे, सब कर्म गर्थ होजाते हैं। वे ज्ञान,भूष्ट और बुद्धि-भूष्ट, होकर सद्गति नहिं पाते हैं । सद्गति तो उनही जीवों को, मिलती है अर्जुन जीवन में । जो मुझे समझ सबका स्वामी, भजते हैं मुझको निज मन में ।। * गाना * प्राप्ति होती है उन्हीं जीवों को मेरे धाम की । प्रेम से माला जपा करते जो मेरे नाम की। - M A दफा -- JAMPur Pasrmware Darprakreonymwpal बस, यही सूरत है ASTRO uzuur * विराट्रप-दर्शन [श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-४ जो शरण आते हैं मेरी, छोड़ जग-जंजाल को । उनको फिर होती न बाधा क्रोध मद या काम की । दे दिया हो अपना सब कुछ जिसने मेरे हाथ में । उसको कुछ चिन्ता नहीं फिर कर्म के परिणाम की ।। मुझको जाने मुझको माने मुझको पूजे हर समय । मन की शान्ति की विश्राम की । विश्व में रहकर रहे निर्लिप्त जो व्यवहार में । मिलती है "निगु" उसी को शान्ति मोक्षाराम की । है जो कुछ इस विश्व में, अद्भुत और अनूप । माया के पट से ढका, है मेरा ही रूप ।। मैं यज्ञ भी हूँ यज्ञाग्नि भी हूँ, यज्ञों का इख्यमन्त्र भो हूँ। हूँ सबका माता और पिता, सन्त्रों के बीच स्वतन्त्र भी हूँ सबकी गति हूँ सबकी मति हूँ ,सनका स्वामी और त्राता हूं जो शरमा मेरी आजाते हैं, उनको निश्चय अपनाता हूं उत्पन्न शुझी से होते सब, मुझमें हो लय होजाते हैं धन, शाम, धान्य घाणी के सुख, प्राणी सुझमे ही पाते है मैं जल बरसाया करता हूं, और फिर रोका भी करता है। जैसी आरश्यकता जा तम वैसा करता धरता अमृत,विष,सत् और असत् सभी,अर्जुन,मुझको ही मानो तुम सबके पीछे सजनी जड़ बस मुझको ही पहचानो तुम जो लोग यज्ञ प्रादिक इरके, सन्तुष्ट बनाते देवों को। और बाल करते यज्ञों से, सुख मिले उन्हें और जीवों को अर्जुन, वेलोग कुछ समय तक बस स्वर्गमोग ही पाते हैं वह स्वर्गभोग होजाने पर, फिर पर्त्यलोक में प्राते हैं। लेकिन जो अपने यज्ञों का, सन फल मुझको दे देते हैं वे पाणी मुहतक आकर के, बस मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं ।। CANCE METAIMITENAMMAR ARUY.V AAAAHainikheADEMAMALAndh.de DEPRE Dee HAMAREmmmmmmm AR NEET ladiealinatorNARANASALoanimandanteractateagendantimatlab Bankas श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-४] ॐ विराटप-दर्शन 8 (१५) अब केवल इतनी बात रही, देवता यज्ञ नहीं पायेंगे। तो सुख सम्पति देकर जगको, सम्पन्न न कभी बनायेंगे। सो यह विचार कुछ ठीक नहीं, सब जीव मुझो से पाते हैं भोजन और वस्त्र आदि सबको, मुझसे पहुंचाये जाते हैं। मैं अभी कह चुका हूं तुमसे, होते यज्ञादिक जितने भी । वे लोगों के सब किये कृत्य, सब पाया करता हूं मैं ही। जिन भागों की प्राप्ति को, यज्ञ रचाते लोग। देता हूं मैं ही उन्हें, वे नाना विध भोग । बस, बात यहां इतनी ही है, जब मुझको नहीं रिझाते हैं । तन भोग प्राप्त करके भी वे, प्राणी मुझतक नहिं आते हैं जाते हैं उन ही देवों तक, जिनके वे भक्त हुश्रा करते । जिनको सन्तुष्ट बनाने को, वे नाना यज्ञ रचा करते ॥ जो करते देवों को प्रसन्न, वे देवों के लिंग जाते हैं । पितरों के प्रेमी पितरों को, जा पितर लोक में पाते हैं। अनुराग जिन्हें है भूतों से, भूतों को प्राप्ति उन्हें होती। जो जिनके प्रमी हैं उन ही देवों की प्राप्ति उन्हें होती। तो अर्जुन, यद्यपि जीवों के, सब सुकृत मुझे मिल जाते हैं। लेकिन भावना न होने से, सब जीव मुझे नहिं पाते हैं । जो मुझे प्राप्त कर लेने की, भावना हृदय में रखता है । वह भक्त मेरा निश्चय जानो, बस मुझे प्राप्त कर लेता है ।। मुझको पाने के लिए नहीं, यज्ञों की आवश्यकता है। अर्जुन,बस एक प्रेम ही से, प्राणी मुझको पासकता है । हो प्रेम तो मैं बस पान फूल से ही प्रसन्न होजाता हूं। कुछ न हो जीव पर प्रेम हो बस,तो मैं उसतक खिंचाता हूं। armire ma * विराम-दर्शन के [श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-४ र गाना वृथा धन वैभव सारा है, प्रेम ही मुझको प्यारा है । चाहे जितने मूल्य का दे कोई उपहार । किन्तु न दे जो प्रेम से तो न मुझे स्वीकार ।। प्रेम से सब कुछ हारा है, प्रेम ही मुझको प्यारा है ।। वश में अपने कर सके मुझे न कोई वीर । प्रेमी मेरे पांव में डाल सके जजीर ।। प्रेम पर वारा न्यारा है, प्रेम ही मुझको प्यारा है । मुझ पर ही निर्भर रहे, ले मेरा ही नाम । मिलता है उस जीव को, निश्चय मेरा धाम || वही पाता छुटकारा है, प्रेम ही मुझको प्यारा है ।। फले सारा देकर मुझे, करता जो नर कर्म । पालन करता है वही, जग में सच्चा धर्म उसी ने धर्म संवारा है, प्रेम ही मुझको प्यारा है । प्रेमी होकर जो मेरा, है मुझमें अनुरक्त । बस वह मेरा भक्त है, और मैं उसका भक्त ॥ भक्त ही मुझे दुलारा है, प्रेम ही मुझको प्यारा है । mammummeromansar । " MATPORape d अर्जुन, अब तुम भी बनो, मेरे प्रेमी भक्त । होजाओ सब भूलकर मुझमें ही अनुरक्त ।। खाना-पीना-सोना-जगना, लेना-देना-जो करो कमी प्रतिदिन का वह व्यापार-कार्य, अर्पण कर डालो मुझे सभी। इन कर्मों का फल क्या होगा, यह चिन्ता मन में मत लायो ।। सब छोड़ भरोसे पर मेरे, तुम सभी कर्म करते जाओ।। जो मेरे भरोसे रहता है, मैं उसको सदा बचाता हूं। जो मुझको अपना करता है, मैं भी उसको अपनाता हूं।

AAAAAAACASSEMINS Ajink SANDH o ...- । श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-४] ॐ विरटप-दर्शन 8 (१७) जो भक्ति किया करते मेरी, मैं उनमें भेद नहीं करता । वह ऊँचा है या नीचा है, कुछ इसका ध्यान नहीं करता ।। जो मुझको भजने लगें न वे फिर रहते पापी पामर हैं । द्विज शूद्र नारि वेश्यादिक भी, हों भक्त तो मुझे बराबर हैं अर्जुन, तुम बर्य लोक में हो, यह मर्त्य लोक अति दुस्तर है । नाना-विध क्लेशों कष्टों का, भाकर ये लेक सरासर है उन सब क्लेशों से बचने को, बस भक्त मेरे तुम बन जाओ । सन विषयों से मन अलग खींच, मेरी सेवा में ले पाओ ।। सुख-दुख 'शम-दम' उत्पत्ति-नाश,सन्तोष-अहिंसा जीवों में । तप दान-ज्ञान-यश-अयश-बुद्धि-भय अभय समस्त मनुष्यों में अर्जुन, जितने भी भाव हैं यह सबको ही मैं उपजाता हूं इसलिए सृष्टि का एकमात्र, कारण मैं ही कहलाता हूं। सप्तर्षि-सहित मन्वन्तर में, जो मनु संसार चलाते हैं वे भाव हैं मेरे ही मन के, मुझसे उपजाये जाते हैं !! मेरी इस प्रभुता महिमा का, जो प्राणी तत्व समझ जाते । वे ही इस जग में ज्ञानी हो, सच्चे योगी हैं बन जाते ।। सबका कर्ता सबका स्वामी,जो समझ मुझे अति श्रद्धा से । मुझमें ही ध्यान लगा निशिदिन,भजते मुझको अति निष्ठा से ॥ उनके विचार मन बुद्धि सभी, यों अमल विमल बनजाते हैं । जिससे वे बिना परिश्रम के, मेरे समीप आपाते हैं"। अर्जुन ने भगवान के, सुने वचन चितलाय । फिर बोला यों कृष्ण से,विनय-सहित शिर नाय ।। "परम ब्रह्म पावन परण, आदिपुरुष श्रीमान् । जगन्नाथ जगदीश हैं, आप स्वयं भगवान ।। --

(१८)
* विराटप-दर्शन [श्रीमद्भगद्गीता-संख्या-४
हैं विभूतियां आपकी, जितनी अद्भुत सोय ।
जानें उनको श्राप ही, और न जाने कोय ।।
कहिये इससे आप ही, उन सबका विस्तार ।
जिससे मैं भी पा सकूँ ,कुछ कुछ उनका पार ।।
चाहूं तो भी आपकी, कैसे हो पहचान ?
जगकी किस २ वस्तु में,धरूं तुम्हारा ध्यान ?"
यह सुनी प्रार्थना अर्जुन की, तब कृष्णचन्द्र ने सुख पाया ।
अपनी विभूतियों का स्वरूप,क्रम क्रमसे फिर यों समझाया
बोले-"अर्जुन, जब पूछा है, तब कहकर तुम्हें बताता हूं।
मेरी विभूतियां हैं अनन्त, जिनमें से मुख्य बताता हूं।
सब जीवों में आत्मा हूं मैं, और सबका आदि अन्त हूं मैं ।
ऐश्वर्य जगत् में हैं जितने, सबका स्वामी भगवन्त हूं मैं ।।
बारह आदित्यों में से जो श्रादित्य विष्णु कहलाता है।
वह विष्णु रूप मेरा ही है, मुझ ही से शोभा पाता है ।।
सब तेजधारियों में अर्जुन, मैं सूरज माना जाता हूं।
जो उनचास हैं पवन यहां, उनमें मारुत कहलाता हूं।
आकाश के उज्ज्वल तारों में,शोतल और सुन्दर चन्द्र हूं में ।
वेदों में हूं मैं सामवेद, देवों में देव इन्द्र हूं मैं ।
मन समझो मुझे इन्द्रियों में, चेतनता जानो जीवों में ।
ग्यारह रुद्रों में से शङ्कर, समझो कुवेर बस यक्षों में ।
मैं आठों वसुओं में पावक, पुनि मेरु हूं सात पर्वतों में ।
अर्जुन, मैं सुभग बृहस्पति हूं, विद्वान् पुरोहित गुरुओं में।
सेनापतियों में मुझे, समझो स्कन्दकुमार ।
जलाशयों में सिन्धु हूं, मैं गम्भीर अपार ॥
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कायम

( १९) ETV AAAAAAAAAAAAMAN हूँ श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-४] * विराट्प-दर्शन मैं हूँ वाणी में ओंकार, भृगु ऋषि हूँ सब महर्षियों में । जम-यज्ञ हूँ सारे यज्ञों में, हिमगिरि हूँ अवल वस्तुओं में । वृक्षों में पीपल अर्जुन, नारद देवर्षिगणों में गन्धर्व चित्ररथ भी मैं ही, कहलाता गन्धर्षों में हूँ ॥ सिद्धों में कपिल मुझे समझो, घाड़ों में उच्चश्रवा मुझे। हाथियों में समझो ऐरावत, दीपक में समझा प्रभा मुझे। मनुजों में बस राजा हूँ मैं, हूँ बन सभी हथियारों में । हूँ कामदेव मैं सन्तति के मिषसे रति करने वालों में। सों में वासुकि सर्प हूँ मैं, हूँ शेषनाग मैं नागों में । पितरों में हूँ अर्यमा पितर, यम हूँ सब संघमवालों में ।। जल में रहते जो देव सदा, उन में मैं वरुण कहाता हूँ । दैत्यों में सुन्दर मतिवाला, प्रह्लाद बखाना जाता हूँ । नाशक पदार्थों में प्रधान, सबका नाशक बस काल हूँ मैं पक्षियों में श्रेष्ठ गरुड हूँ मैं, पशुओं में सिंह कराल हूँ मैं ॥ गौत्रों में हूँ मैं कामधेनु, और पवन तीन गतिवालों में हूँ रामचन्द्र सा धनुधारो, धनु धारण करने वालों में । सकल सृष्टि का एक मैं,श्रादि मध्य अवसान । मत्स्यों में समझो मुझे, अर्जुन मकर-समान ॥ नदियों में गंगा मैं ही हूं, अध्याता हू सब विद्याओं में । हूँ मैं ही वाद-विवाद मुख्य, वादानुवाद कर्ताओं में।। अक्षरों में "अ" अक्षर हूँ मैं, हूँ द्वन्द्व समास समासों में । घटिका पल वाला समय हूं मैं,जो व्यापक युग युगान्तरों में । ब्रह्मा हूँ चार मुखोंवाला, वह मृत्यु हूँ जो सब . खाती । मरकर जो प्रजा जन्म लेती, वह प्रजा मुझी है आती ॥ AAAAAAAAAAAAR mr. --- हूं (२०) * विरारूप-दर्शन [श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-४ नारियों में समझो स्मृति मुझका.धृति-क्षमा कति और श्रीसमझो समझो मुझको मेवा शक्ती और मुझका हा वाणी समझो । मैं वृहत्साम हूँ गानों में, गायत्री छन्द हूँ छन्दों में । हूँ अगहन बारह मासों में और हूँ वसन्तऋतु ऋतुओं में । छलियों में छल भी मैं ही हूँ, और तेज हूँ तेजनिधानों में । विजयी वीरों में विजय हूँ में, मैं ही बल हूं बलवानों में । वृष्णी लोगों में कृष्ण मैं, पाण्डवों में अर्जुन भी मैं मुनियों में व्यासदेव मैं हूं, गुणियों में सद्गुण भी मैं हूं ॥ कवियों में शुक्राचार्य हूँ मैं, हूं दण्ड प्रचण्ड शासकों मैं । हूँ मौन भी. मैं ही हे अर्जुन, इस जग के मौनताधकों में। मैं ज्ञान हूँ पूर्ण ज्ञानियों का, हूँ नीति परम नीतिज्ञों की । हूं बीज समस्त पदार्थों का, गति हूँ मैं सारी गतियों की ।। अर्जुन, मेरी विभूतियां हैं अत्यन्त अपार । बतलाया मैंने तुम्हें, यह थोड़ा विस्तार ॥ है जो कुछ इस विश्व में, मुख शोभा सम्पन्न । उसमें मेरी ज्योति हो, रहती है प्रच्छन्न । अथवा इतना जानलो, छोड़ो सब विस्तार । मेरे बस एक अंश से, चमक रहा संसार । गाना 0 marati , अंश से चमक रहा संसार । केवल एक अंश से मेरे फैला यह विस्तार ।। अंश० ।। हैं जितनी वस्तुएँ जगत् में नयनानन्द अपार । व्याप रहा हूं अर्जुन, उनमें होकर मैं शृङ्गार ॥ अंश० ॥ जहां तलक जग के जीवों का दीख पड़े प्रस्तार । पिरा हुआ हूं मैं ही उनमें हो प्रतिभा का तार ॥ अंश । Sati १ . MOSCOVEReमाया'Mera श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-४] * विराटरूप-दर्शन * (२१) मैं छाया हूँ मैं कमलदलों पर बनकर सुघर निबार । मैं उमङ्ग हूं जिन से उनपर भ्रमर करें गुजार ॥ अंश० । वह गति हूँ जिससे चलती नदियों में जल धार । सिन्धु-तरङ्गों में करता हूं मैं हो नित्य बिहार ॥ अंश । मैं ही भैरव रादा मनोहर. मैं गौरी केदार । वर्षा ऋतु का मैं ही अर्जुन ! भंजुल मृदुल मलार || अंश० ।। कलित कुसुम की कलियों में हूं, कल सुगन्ध भण्डार । मैं ही बहता हूं जो बहती शीतल मन्द बयार ॥ अंश० ॥ कण कण में यों देखा करता है जो मुझे निहार । जगज्जाल से वही सक्त मेरा पाता उद्धार ॥ अंश० ।" - MALAMAALAAAAddandAAAAAAD सुनकर यों श्रीकृष्ण के, वचन कुतूहल जन्य । बोला अर्जुन कृष्ण से-“नाथ, आपको धन्य ।। किया अनुग्रह आपने, कहकर यह वक्तव्य कुछ कुछ आया ध्यान में, रूप आपका भव्य ॥ है मेरा अनुमान यह, सब विभूति के साथ । बड़ा अलौकिक होयगा, रूप आपका नाथ ! इच्छा है मेरी बहुत, साधन यदि बन जाय । अतुलित अद्भुत रूप वह, दीजे कृष्ण, दिखाय।" अर्जुन के विनय-वचन सुनकर, भगवान् चित्त में मुसकाये । बोले--"अर्जुन, इन आँखों से वह रूप मेश नहिं दिखपाये ॥ इसलिए तुम्हारी दिव्यदृष्टि, कुछ क्षण के लिए बनाता हूं। और फिर वह विश्व-विराटप, प्रत्यक्ष तुम्हें दिखलाता हूं। इतना कहकर कृष्ण ने, योग काम में लाय । अर्जुन के सम्मुख दिया, निज स्वरूप प्रकटाय ॥ उस अतुलरूप की झांकी का, लेखनी न वर्णन कर सकती प्रतिमा उस अद्भुत दर्शन का,नहिं चित्र खींचकर घर सकती। क PRALHARAT (२२) के विराट्प-दर्शन [श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-४ अगणित मुखअगणित नयनोंका,अगणित असंख्यपद करवाला था रूप वह धारण किये हुए, अद्भुत वस्त्राभूषण माला ॥ अगणित सूर्यों की प्रभा-तुल्य,था उस स्वरूप का उजियाला । और उस स्वरूप में समाविष्ट, यह जग था जड़ चेतन वाला वह विस्मयवर्द्धक रूप देख, अर्जुन विस्मय में ग्रसित हुआ । दोनों कर जोर लगा करने,यों विनय चित्त में चकित हुआ । " - हैं ८ •rum । और कर है ॥ अद्भुत अतुलित अनुपम अति विस्मयकारी । यह रूप आपका प्रभु, विराट् अति भारी ॥ इस विराट् में देव सभो दिखलाते । ब्रह्मा भी कमलासन पर शोभा पाते ॥ नाना प्रकार के जीव दृष्टि में आते । जो बहु विधि कर्मो को हैं करते जाते ॥ इस स्वरूप को बार-बार बलिहारी । यह रूप० ॥ १ ॥ इस विकट रूप में अगणित मुख उन सभी करों में लिए आप बहु शर हैं । वैठे इस में बहु किन्नर विद्याधर हैं । देखे जाते कितने ही अचर अचर सचर सचर हैं। कुछ ओर छोर दीखे इसका न मुराशी ! यह रूप०॥ २ ॥ प्रत्येक आप शीश किरीटोंवाला । जिसने, रविशशि का गर्व खर्व करडाला ।। ग्रीवा में आपके झूल रही वनमाला । और सभी मुखों में धधक रही है ज्याला ॥ छवि शंख चक्र और गदा पद्म की न्यारी । यह रूप- ॥ ३ ॥ हैं ऋषि-महर्षि और पितर जो कि कहलाये । इस रूप आपके. में हैं सभी समाये ॥ का NagarcaartmATARATran MEANINumnonrsaram श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-४] * विराट्रप-दर्शन 8 (२३) इस उग्र AAAAAAAAA रूप को देख देख भय पाये । कर रहे तुम्हारी विनय सभो शिरनाये ।। सब ओर व्याप्त हो रहे आप अवहारा ! यह रूप० ॥ ४ ॥ जो भीष्म द्रोण आदिक कौरवभट भारे । जा रहे आपके मुख में हैं वे सारे ।। आ आ के आपको दाढ़ों में बेचारे । पिस रहे विवश हो सभी जा रहे मारे ॥ यह सबका सब व्यापार घोर भयकारी । यह रूप०॥५॥ कहिये मुझसे हैं कौन आप नँदनन्दन ! है कहाँ आपका आदि अन्त खलगञ्जन ! मति मेरो होतो चकित राधिकारजन ! यह चरित झापका है क्या, दुष्ट-निकन्दन ? मैं करता तुम्हें प्रणाम सुदर्शन-धारी ! यह रूप० ॥ ६ ॥ 17 11 अर्जुन के इस प्रश्न पर, [जी गिरा अनूप । उत्तर यों देने लगा, वही कृष्ण का रूप ॥ "हे अर्जुन, मैं अति उग्ररूप, विकराल काल कहलाया हूं। इस जगमें जगके जीवों का, क्षय करने को मैं आया हूं। यह जितनी कौरव-सेना है, इस सबको ही खालूंगा मैं । यदि तुम न किसी को मारोगे, तो स्वयं मार डालूँगा मैं । इसलिए उठो संग्राम करो, क्यों हो तुम मन में डरे हुए ? तुम जिन्हें मारते डरते हो, वे हैं पहले ही मरे उठ बैठो अब सन्देह त्याग,धनुवाण चलाओ जय पात्रो कौरव निश्चय मर जायेंगे, तुम केवल कारण बन जात्रो"। अर्जुन ने श्रीकृष्ण को, किए अनेक प्रणाम । पुनि श्रद्धा और प्रीति से, बोला यों बलधाम ॥ हुए

(२४)
4
की विराटप-दर्शन [श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-४
"मैंने जाना और पहचाना,अब भली भांति से स्वामि! तुम्हें ।
तुम परब्रह्म परमेश्वर हो, हे विश्वम्भर ! प्रणमामि तुम्हें ।
हे आदिपुरुष, अबतक मैंने, नहिं रूप तुम्हारा जाना था ।
इसलिए मित्र और ब्रजवासी, करके ही तुमको पाना था ।
हे जगन्नाथ, हे जगनिवास, क्षमिए, उन सब अपराधों को ।
और मोर मुकुट की झांकी में, फिर दर्शन दीजे आंखों को"!!
तब योगेश्वर कृष्ण ने, रूप विराट् छिपाय ।
पहले का सा रूप सब, अपना लिया बनाय ।
बोले-"अर्जुन, यह रूप मेरा, जो तुम्हें आज दिखलाया है ।
वह रूप मेरा जप तप से भी. कोई न देखने पाया है।
इन्द्रादिक देववृन्द उसके, दर्शन को नित ललचाते हैं ।
लेकिन वह विश्व-विराट रूप, बिल्कुल न देखने पाते हैं ।
पर जो मेरे ही हो रहते, मुझमें ही ध्यान लगाते हैं ।
बस, वही देख पाते उसको, जो मुझ ही में रम जाते हैं ।
सारांश यही है इस सबका, सब कर्मों को करता जाये।
पर करे हाथ पैरों से ही. मन कभी न उनमें उल्झाये ॥
उन कर्मों का फल पाने की, इच्छा कुछ मन में करे नहीं ।
यह इच्छा तब मिट सकती है, जब ज्ञानी हो ना डरे नहीं ।
ज्ञानी बनने का मार्ग यही, बस मेश निशिदिन मनन करे ।
सर्वस्व भेंट करके मुझको, मेरा बन मेरा भजन करे ।
होता मेरी भक्ति से, सुलभ ज्ञान-भण्डार ।
ज्ञानी होकर ही मनुज, पाता है उद्धार ।
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समाप्त

pa मशरिकी हर - AARI पं० राधेश्यामजो कविरत्न नाटक द्वारा लिखित नाटक महाराजा भर्तृहरि १०) पृथ्वीराज ॥) भजन गाने व राजले वीर अभिमन्यु १॥) श्रीराधेश्याम-गीताञ्जलि महर्षि-बाल्मीकि २) राधेश्याम विलास १०) सती पावती १) राधेश्याम-कीर्तन ईश्वर-भक्ति १॥} हाधेश्याम भजनमाला परम-सक्त प्रहाद १॥) प्राचीन अजनमाला परिवर्तन ३॥) मोहन-कवितावली श्रीकृष्ण-अदतार ११) मुसाशिर की पाकेट बुक रुक्मिणी-मङ्गल १%) प्रेम-रत्नावली द्रौपदी-स्वयम्बर २) निजालन्द प्रदीपिका गृहिणी गीताखल अबणकुमार मानन्द-लहरी अषा-अनिरुद्ध १०) मीरा भजनमाला १॥) बोध-प्रकाशी भारत-माता -) पद्य-पुष्पांजलि कृष्ण-सुदामा भारती संग्रह शान्ति के दूत भगवान् श्रीकृष्ण 1-) गजलों का गुलदस्ता सेवक के रूप में भगवान श्रीकृष्ण ।-) गजल-सागर पद-पुख मोहन अजनमाला नोट-नाटकों में वीर अभिमन्यु, | मोइन गीतावली श्रवणकुमार, और मशरिकी मोहन संगीत शिक्षा भी छपकर तैयार हैं। दाम बही जो सीताराम-कीर्तन हिन्दी में हैं। अमर-गीत-माला न्यू अल्मड थियेट्रिकल कम्पनी प्राफ मीठी गुञ्जार) मधुर मुरतो बम्बई द्वारा खेले गये रसीली तान ) कुसुम-कुंज ) असली व मुकस्मिल नाटक बसंतबाटिका ) पम-पराग भूलभुलैयाँ १) दिलफरोश १) अल्य पुस्तके चलता पुर्जा १) शरीफ बदमाश १) भक्त सियाँ ) अमरकोष 12) खबारे हस्ती १) अछुता दामन १) सतलड़ी |||) पत्रों का प्वाला) खूबसूरत बला१) हिन्दू विधवा १८) अजाया घर अजायच घर ..।।) धनुर्दिया !!!) भारत व्याकुल थियेट्रिकल कम्पनी १) नौलखाहार ) लिमीटेड आफ मेरठ द्वारा खेले गये ज्योतिष-प्रकाश || दृष्टांत महासागद १।।) असली व सुकस्मिल नाटक लियोग-कथा 12) मोहन माला ) तेरोसितम १-) खनाट्चन्द्रगुप्त १-). हनुमानचालीसा -)।। सुन्दरकाण्ड ।) S घण्टा-पन्थ हूर, उर्दू में प्रेत-लोक पता---श्रीराधेश्याम सुस्तकालय, बरेली । ..

नकली किताबों से बचिये हमारी रामाया और हमारे नाटकों का काझी प्रचार देखकर लोगों ने उसी रंग और रूप की नकली किताबें छाप छापकर प्रकाशित करदी हैं। नहालों की कई बरस की कोशिश का नतीजा यह है कि बाजार में नकली किताबों की भरमार है। यह नकली किताब )॥ में बुक्सेलर को दी जाती है, जिसे बुक्सेलर -) या =) या ) में बेचकर शायदा उठाता है और इस प्रकार प्राहक को धोखा दिया जाता है। प्राहक जब ऐसी किताब को घर ले जाता है तो पछताता है। प्राहक का ऐसी धोखेबाज़ी से बचाने के लिये अब हम अपनी हर एक किताब के ऊपर अपनी तस्वीर देने लगे हैं,जैसी कि इस किताब पर आप देख रहे हैं। अब आइन्दा से श्राप धोखा न खाइयेगा- ध्यान रहे- जिन किताबों पर-राधेश्याम” या- राधेश्याम वाशिष्ट या "तर्ज-राधेश्याम” छपा रहता है, वह हमारे यहाँ की नहीं है। हमारे यहाँ की किताबों पर हमारे यह दस्तनत भी रहते हैं। इन्हें पहचान लीजिये- - pilparslaan भवदीय- राधेश्याम कथावाचक मालिक-श्रीराधेश्याम पुस्तकालय व प्रेस, परेकी গাব্দ में •/- पं०राधेश्यामजी कविरत्न लिखित नवीन कृति में मिलेंगे, तथा जिन्ददार गुलदा १॥ में मिलेगा। डाक महसूल गुलजा । अलग अलग भाग पर) मन्माष्टमी 1) नन्द-महोत्सब ।) महाभारत समलीपाला झन्हैया।-गिरिवरधारी।) ( राधेश्यामं रामायण की साई राख-रस्य 13) ईस-दान 1) भीष्म प्रतिज्ञा बन्द-लन्दन-बसुदेव-नन्दन 12) भीष्म-पराक्रम सम्पूर्ण रुगतो भाग एक सुन्दर जिल्द पारखल-जन्य छः प्राने अधिक देने पर अर्थात तीन पाण्डको का बाल्यकाल रुपए में मिलेंगे। डाक महसूल) अलग पारडबों की शस्या पहीला लाक्षागृह ক্তিক-মহাত্তর नक हहार ( राधेश्याम रामायण की लई में) द्रौपदी-बिबाह रुक्मिणी-म. 1- सुभद्रा-हरण হজিবত্ব হা করে प्रेस रुपियगी की सगाई द्रौपदी-वस्त्र-हरम सक्मिो का पन्न-लेखन किरातार्जन-मुह रुक्मिणी का गिरिजा-पूजन यजसम्वाद रुक्मिणी का भ्रातृस्नेह कीचक-वध रुक्मिणी विवाह अभिमन्यु विवाह सम्पूर्ण सातों भाग एक सुन्दर जिल्द में छः लाने अधिक देने पर अर्थात् तीन ( राधेश्यास रामावा की तर्ज ई.) रुपए में मिलेंगे । डाक महसूल =) अलग वरती की हुंकी श्रीमगवद्गाता श्रीसत्यनारायण की का । राधेश्याम रागाह प्र में । अर्जुनमोह iyn विराटप-दर्शन।)| ध्रुब चरित्र आत्मा की अमरता)। जीव-ब्रह्म-विवेक । सुदामा चरित्र पोरध्वजदिन कर्म-योग 1)। अर्जुन का समान।।। महरि बनिन्न लोट--सम्पुर्ण ६ भाग एक सुन्दर जिरव | महाराणा प्रतापछि में।) अधिक देने पर, अर्थात् २) में, सत्यवादीहार मिलेंगे तथा जिन्ददार गुटका |) सावित्री-सरधना मिलेगा! डाक महसूल गुस्का ।} अन मीराबाई असा भाग पर 1-) म साबरी জুতা-জ্বাক্সি अभिमन्यु की चोरी (राधेश्याम रामाया में गुरु गोविन्दविह महिवासुदन যু কা ভৰা चामुएखाका पराकार बोपदी-लौना रक्त-बीज ही लड़ाई IIা ব্রিজ शुन्म नीर निशुमा साली स्वाद नोट स्वस्या भू आगल सम्र विन्द खती मोह में छः श्राने अबिल देने पर वास २) महर्षि भरिन ) हा । মান্দ্রায় . F शुद्ध-क्षरित्र 15a पता- श्रीराधेश्याम-पुस्तकालय, चरेस * বাবা सर्वाधिकार प्रकाशक के आधीन हैं। संख्या-५ IIIIIRA लेखक- ५० रामनारायण पाठक IIIIIIIIIIII जीव-ब्रह्मा-विषक प्रकारक- १ नेपाल गवर्नमेण्ट से "कथावाचस्पति" की पदवी प्राप्त- कीर्तन-कला-निधि, काव्य-कला-भूषण, श्रीहरि-कथा-विशारद, कविरत्न- प० राधेश्याम कथावाचक, अध्यक्ष- লাইফSilvহমস্তিত্ব सन् १९४६ ई० सातवों बार २००० [ मूल्य साढ़े चार आने प्रिंटर-६० रामनारायण प ठक, और श्यामरेख, बरेली । .

ॐ
axx xoxoxox
प्रार्थना
DHAN
हैं ।
-
ऐसे हैं. नँद-नन्दन, सब. कष्ट हटा देंगे ।
इ जन ! वे तेरे मन की, सब साध मिटा देंगे ।
उत्साह लेके बढ़ चल, दर्शन खुले हुए
माला नहीं है तो क्या, तन मन ही चढ़ा देंगे ।
केवल गया अयोध्या, काशी नहीं ठिकाने ।
वह सब जगह है यह हम, वेदों से दिखादेंगे ।
क्या बात है अनोखो, वह याद तब करेंगे ।
जब याद में हम उनकी,अपने को भुल देंगे ।
है मार्ग यों अँधेरा, आपा न अपना सूझे ।
तू चाहे तो दीपक, की, हरि ज्योति जगा देंगे ।
व्याकुल है कि पलिये यों, क्यों धैर्य खो रहा है ।
बिगड़ी हुई तेरी सब, 'निर्गुण' वह बना देंगे।
-20RC
SEANING

AAAAAE.SAL.
Avaumar
बथामा
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The
Patnanatara
विश्व-रूप भगवान का, लखि लेने के बाद ।
अर्जुन ने कुछ सोचकर, पूछा यो साहाद ।
"भगवन् , मैंने यह समझ लिया,मन ही करता सब गड़बड़ है ।
वह फल इच्छा जो करता है, सो यह ही दुःखों की जड़ है ॥
इस मन के वश में लाने को, आवश्यक है वैराग करे ।
वैशग प्राप्त यह तब होगा, जब नर तुमसे अनुराग करे ।
सो अब यह बतलायो केशव,किस विध तुम में अनुरक्ति करे ?
किस रूप तुम्हारे का प्राणी, पूजन-वन्दन और भक्ति करे ?"
अर्जुन के इस प्रश्न को, सुनकर आनँदकन्द ।
समझाने सादर लगे, यो उसको ब्रजवन्द ।
"अर्जुन, यह बात याद रक्खो, हैं दो प्रकार के रूप मेरे
साकार और एक निराकार, दोनों ही रूप अनूप मेरे ।
असली स्वरूप है निशकार, जिसका किशोर और छोर नहीं ।
जिसमें गुण और विकार नहीं, गोरे काले की कोर नहीं ।
ज्ञानी बस ज्ञान-नेत्रों से, यह रूप मेरा लखि लेता है।
पर यों साधारणतः सबको, यह नहीं दिखाई देता है।
हाँ, दूसरा जो साकार रूप, माया का है, वह ऐसा है ।
मुख, नेत्र, नाक, पग, कर वाला, होता लोगों का जेसा है ।।
VAR

Indane in intAKARisiness Aurt 'CANADA ruarzar.XaRASENTENAM --- ---८LDom TAGENDura है । ( ४ ) * जीवन-ब्रह्म-विवेक श्रीमद्भगवद्गता-संख्या-५ वह रूप मेरा अति सुन्दर है, दर्शन से मन सुख पाता है । प्राणी का चित कैसा भी हो, छवि से उसकी खिंच जाता है।। पलिये यही साकार रूप उत्तम काम बनाने को चित शीघ्र सफल होजाता है, इस रूप में ध्यान जमाने । जो भक्ति मेरी प्रारम्भ करे, वह इसी रूप का ध्यान घरे । है निराकार का ध्यान कठिन, इसलिए कठिनता में न पड़े ।। मन में अपने धार ले, रूप मेरा साकार । मूर्ति बनाले या मेरी, सुन्दर शोभागार ॥ { व्याख्यान-~भगवान् अपनी मूर्ति बनाने का उपदेश यहाँ करते हैं । जिस व्यक्ति का मन अभी सधा नहीं है और जिसे कुछ ज्ञान भी नहीं है, वह भगवान् के निराकार निर्गुण और सर्वव्यापक स्वरूप को ध्यान में लाकर समाधि नहीं लगा सकता। आंखों को दीखनेवाले साकार रूप पर अवश्य उसका ध्यान जम सकता है। पर यह ध्यान रहे कि साकार रूप भगवान का असली रूप नहीं, बल्कि माया का रूप है, और यह माया का रूप केवल इसलिये है कि उसके सहारे से ध्यान लग सके और मन एकाग्र हो सके। इसी साकार रूप की मूर्ति बना ली जाती है। शास्त्रों में यह मूर्ति आठ प्रकार की वही है, अर्थात्:--- शैली दारुमयी लौही लेप्या लेख्या च सैकती । मनोमयी मृण्मयी प्रतिमाश्चाष्टविधाः तात्पर्य यह है कि भगवान् की प्रतिमा यानी मूर्ति पत्थर की, लकड़ी की, लोहे की, रोली या केशर से खिंची हुई ,तस्वीर कढ़ी हुई, बालू की, मन के भीतर की और मिट्टी की-यों आठ प्रकार की हो सकती है । यह प्रतिमाएँ सब आरम्भ के अभ्यास के लिए हैं । अभ्यास करते करते जब मन शान्त होजाता है और ज्ञान की प्राप्ति होजाती है तो सर्वत्र व्यापने वाले भगवान के निराकार-स्वरूप की झाँकी आप से आप होने लगती है । उस समय फिर प्रतिमा की आवश्यकता नहीं रहती ] मूर्ति बनाये जो मेरी तो करके उपचार । करे विविध विध मेम से, उसका नित शृङ्गार ॥ उसको सुन्दर मन-हरण बना, ऊँचे आसन पर पधरावे । समझे मेरा प्रतिविम्ब उसे, और चित अपना उस पर लावे ॥ स्मृताः॥

- 4MNA IMALAAAAAAAAAAdesibadaszadARMinichatai E- ( ५ co । । श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-६] जोवन-ब्रह्म-विवेक है जो कर्म करे निज जीवन में,वह सब के सब अर्पन कर दे । ममता तज कर के भेंट उसे, अपना तन मन और मन करदे । मुझको उद्देश बना अपना, पूजन. उपचार करे उसका । वह मूर्ति नहीं है मैं ही हूँ, इससे सत्कार करे उसका ॥ मैं सर्वव्यापक होने से, उस मूर्ति-ममा प्रा जाता हूं वह पूजा-सेवा भक्तों को, सब लेकर के सुख पाता हूं जितनी सेवा के साथ भक्त, मेरा यों अादर करता है । उतना ही मेरा प्रिय होकर, मेरे मन में घर करता है ।। ज्यों ज्यों यह पूजा चलती है, त्यो त्यो दुख हटते जाते हैं धीरे धीरे माया वाले-बादल सा बटते जाते हैं । चञ्चल मन थिर हो जाता है, बुद्धो भी सम हो जाती है सुख-दुख में हर्ष-विपादों में, मर्याद न जाने पाती है । इस श्रेष्ठ अवस्था को पाकर, कोई नीचे नहिं गिरता है । मुझको मजकर प्राणी का चित,फिर कभी न मुझसे फिरता है ।। जो मुझे प्यार करने लगता, होता वह मेरा भी प्यारा । मद-लोभ-काम-क्रोधादिक से, होजाता उसका छुटकारा ॥ वह ज्ञान उसे मिल जाता है, जो ज्ञान मोक्ष का साधन है । असली स्वरूप का भी मेरे, होता उसको फिर दर्शन है । यह असली रूप देख मेरा, संकट समाप्त हो जाता है। मैं उसे प्राप्त हो जाता हूं, वह मुझे प्राप्त हो जाता है । अर्जुन, मेरी भक्ति में, है यह इतनी शक्ति । इसीलिये प्रारम्भ में, करे बस मेरी भक्ति । आवश्यक इस भक्ति में अधिक न कुछ सामान । बस एक मन का भाव ही, होता परम प्रधान ॥ ARE A • --- 18CAMES ----- Catensure Donatakadioission HATAR Uplus * जीव-ब्रह्म-विवेक ॐ [श्रीमद्भगवद्गोता-संख्या-५ ई गाना SENarcomsekadasticariamondscannesasterseas भाव का भूखा हूँ मैं, और भाव ही बप्त सार है । भाव से मुझको भजे तो भव से बेड़ा पार है ॥ अन्न धन और वस्त्र भूषण, कुछ न मुझको चाहिए । आप होजाए मेरा, बस यह मेरा सत्कार भाव-बिन सब कुछ भी दे डाले तो मैं लेता नहीं । भाव से एक फूल भी दे, तो मुझे स्वीकार है ।। भाव से रीती पुकारें, मैं कभी सुनता नहीं। भाव-पूरित टेर ही, करतो मुझे लाचार है॥ जो मुझी में भाव रखकर, मेरी लेता है शरण । उसके और मेरे हृदय का, एक रहता तार है ! भाव जिस जन पर नहीं, उसकी मुझे चिन्ता नहीं । भाववाले का भरपूर मुझ पर भार है। बाँध लेते हैं मुझे भावुक मेरे जजीर में । इसलिए इस भूमि पर होता मेरा अवतार है ॥" !! अक्त Arcasis: भार और यों भक्ति की महिमा सुन सुख पाए । अर्जुन ने श्रीकृष्ण से पुनि पूछा सिर नाय ।। "गोविन्द, कृपा करके मुझको,अबतक समझाया जो तुमने । सुन्दर है भक्ति भाव का यह व्याख्यान सुनाया जो तुमने ।। अब मुझे पूछना है तुमसे, यह देह मनुष्यों की क्या है ? इस देह बीच जो आत्मा है, वह कौन ? कहाँ का ? कैसा है?" यह सुनकर बोले वानदेव,-"अर्जुन, जो देह तुम्हारी है । सो हाड़ मांस और लोहू की, तैयार हुई तैयारी है। यह देह क्षेत्र कहलाती है, पण्डित यह बात समझते हैं । प्रात्मा जो इसमें रहता है, क्षेत्रज्ञ उसे वे कहते हैं । Poron

( ७
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श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-५] * जीव-ब्रह्म-विवेक *
क्षेत्रज्ञ. क्षेत्र इन दोनों का, मैं भेद तुम्हें हूँ समझाता ।
ज्ञानी वह ही होता अर्जुन, जो इनका भेद समझ जाता ॥
पृथ्वी,जल,पावक, पवन,गगन,मन,अहंकार और बुद्धि सहित ।
इच्छा, चेतनता, राग, द्वेष,सुख,दुख जो नित्य करें विचलित ।।
इन्द्रियां पांच मुख नयन आदि, फिर उनके पांच विषय न्यारे ।
और ज्ञान इन्द्रियां सूक्ष्म पांच, वृत्ति प्रकृति हुए इकतिप्त सारे ।
यह इकत्तीस मिलकर पद र्थ, बनते हैं क्षेत्र मनुष्यों का ।
इस क्षेत्र में जो क्षेत्रज्ञ रहे, वह ईश्वर है सब जीवों का ॥
ईश्वर ही क्षेत्रज्ञ है, क्षेत्रों बीच समान ।
मैं और ईश्वर एक हूँ, भेद नहीं कुछ मान ।।
यह ईश्वर यद्यपि एकी है, पर सब क्षेत्रों में समा रहा ।
इसलिए एक होने पर भी, सब को अनेक सा दिखा रहा ।
इस ईश्वर के सब ओर शीस, सब ओर चरण हैं और कर हैं ।
सब ओर कान मुख हैं उसके, सब ओर नेत्र अति सुन्दर हैं ।।
पर उसके आंख कान आदिक, होते हैं सब कहने भर के
वह कर्म इन्द्रियों के करता, यद्यपि इन्द्रियां न ईश्वर के ॥
सबसे रहकर वह अलग विलग, पालन जीवों का करता है ।
निर्गुण है लेकिन फिर भी वह, उपभोग गुणों का करता है ।
वह दूर भी है और पास भी है, भीतर भी है बाहर भी है।
ऐसी कुछ लीला है उसकी, वह गुप्त भी है जाहिर भी है ।।
सकल विश्व की सृष्टि कर, सबकी करे संवार ।
अन्त श्राप ही से करे, उन सबका संहार ।।
उसके तेज प्रकाश में, सब प्रकाश हैं म्लान ।
ज्ञान है वह और ज्ञान से, है उसकी पहचान ।।
AAD AARAME

(८) * जीवन-ब्रह्म-विवेक [ श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या- अर्जुन, अब सुनो ध्यान देकर, एक मुख्य बात समझाता हूँ । जो वस्तु ज्ञान कहलाती है, से क्या है यह बतलाता हूँ। पहचान ज्ञान की यही कि बस, जो नर ज्ञानी हो जाता है । मन उसका उसे इन्द्रियों के-भे गों में फिर न फंसाता है। सन्तान-भार्यादिक में चित उनका नहिं अटका रहता सुख दुख या हानि लाभ का कुछ,जप्तको नहि खटका रहता है ।। नम्रता, सरलता, निश्छलता, दृढता भी उसमें रहती हैं। यों होती चित्त-वृत्ति उसकी, शिर पर भाये से सहतो है । अभिमान नहीं होता उसमें, पाखण्ड उसे न सुहाता है। सन्तों की सेवा और संगति पाने को बह खलवाता है। बाल्यावस्था वृद्धावस्था और जन्म-मृत्यु अति दुखकारी वह इन्हें जानता है यह हैं-प्राणी के संग दोष भारी ।। नित क्षमाशील और दयाशील और पुण्यशील होकर रहना। बस,होता उसका चलन यही, प्रिय बनना, करना,और कहना। लक्षण है बस ज्ञान का ऐसा यह व्यवहार । बिना ज्ञान के जीव का होश न यों भावार । 8 गाना । DHARMERO आचार। ज्ञान-बिन होय न यह एक ज्ञान-बल से ही 'संध सकता है यह व्यवहार ॥ ज्ञान ।। ज्ञान सिखाता है प्राणी को, कवना उचित विचार | जिससे जग में दीखे उसको परमेश्वर ही सार । ज्ञान ।। हर्ष-शोक-सुख-दुख का मन में रहता जो कि बुखार । ज्ञान जड़ी के द्वारा सो सब मिट जाता शाजार ॥ ज्ञान० ।। मेरो बेटो मेरा बेटा, मेरा यह घरद्वार । ज्ञान छुड़ा देता है क्षण में--यह बकबक बेकार ॥ ज्ञान || ---

AHAMAARREAKimanthamsin
श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-५ ] जीव-ब्रह्म-ववेक
( ९ )
सुध मिट जाती आपे का, बढ़ता आनन्द अपार ।
ज्ञान बजाता है जब लेकर अपना सुखद सितार ।। ज्ञान ।।
जादू के समतुल्य ज्ञान का; यों होता व्यापार ।
तन रहता इस पार जगत् के, मन जाता उस पार ।। ज्ञान ॥
rea
ज्ञान, क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ की, व्याख्या भले प्रकार ।
यहां तलक सुनकर हुआ, अर्जुन मुदित अपार!
धीरे-धीरे फिर कहा, उसने यों सविवेक ।
"कृष्ण, पूछना है मुझे ,प्रश्न और दो एक ।
यह बतलानोअब भेद मुझे, यह जगत् जोकि दिखलाता है ।
से। कैसे और कब बनता है, और कैसे कब मिट जाता है !
जल थल जड़ जंग का जो यह विस्तार हो रहा सारा है।
से आँखों के आगे किसका- पसराया हुआ पगारा है ?'
अर्जुन का यों प्रश्न यह, सुना ध्यान के साथ ।
सुन कर यों कहने लगे, उत्तर में यदुनाथ ॥
"अर्जुन, जो मेरी माया है, से योनि मेरी कहलाती है ।
और यही योनि चर अचर सभी, जगतीकी सृष्टि रचाती है।
इस माया-रूप योनि में मैं-करता वीर्यदान ज्योंही
जल थल और जड़ जंगमबाला-उत्पन्न जगत् होता त्योही ।।
इस जग के देहधारियों की-जीवात्मा है जो काया में ।
वह जीवात्मा है अंश मेवा, पर फैला हुआ है माया में ।।
सत्,रज,और तम यह अलग अलग हैं प्रबल तीन गुण माया के ।
कहलाते यह तीनों विकार, अर्जुन, प्रणी की हाया के।।
काया के इन्हीं विकारों में, बंधकर जीवात्मा रहता है ।
यो अंश मेवा होने पर भी, वह जन्म-मरण दुःख सहता है ।
हूँ
PAPATRA

* ज.व-ब्रह्म-विवेक * [ श्रीमद्भगवद्-गीता-संख्या-4
जब सत् का अंश अधिक होता,तब जीवशांति सुख पाते हैं ।
लेकिन रज अधिक रहे तो फिर, तृष्णा में वे फँस जाते हैं
यदि अधिक तमोगुण होगा तो, बस ज्ञान नष्ट होजायेगा ।
आलस्य, मोह, और दुर्मति से, नर मार्ग-भष्ट होजायेगा ।
माया के यह तीन गुण हैं अति प्रवल विकार ।
इनके वश में जीव नित, रहता है लाचार ॥
जब सत् का अंश अधिक हो-तब, यदि जीव देहत्यागे कोई ।
तब सुख सम्पतिमय स्वर्गलोक, निश्चय या जाता है सोई ।।
यदि रजका अंश अधिक है तो,जीवात्मा स्वर्ग न जायेगा।
छोड़ेगा एक शरीर इधर, और उधर दूसरा पायेगा
पर रहे तमोगुण अधिक अगर,तो फिर मिलता है दुख भारी ।
पशु पक्षी आदिक की मिलती,प्राणीको योनिक्लेशकारी ।।
सत् गुण का फल है सुखदाता, रजगुण का फल दुखदाता है ।
लेकिन तम गुण के फल से तो, नर पशु बनकर रहजाता है ।।
माया के गुण यह सत् रज तम, बहुविध कौतुक दिखलाते हैं ।
जीवों को लाकर बन्धन में, नट-मर्कट-तुल्प नचाते हैं।
जो इन्हीं गुणों को सब जगका, कर्ता कारण जाना करता ।
सुख दुख जीवन मरणादिक का,जो हेतु इन्हें माना करता ।
हे धन्य वही प्राणी अर्जुन, बन्धन से वह छुट जाता है ।
भवसागर से झट पार उतर, मेरे समीप में आता है
सारांश यही है कहने का, यह सृष्टि जो कि दिखलाती है ।
सो उक्त गुणों से माया के होती है और मिट जाती है।
वल्याण उसी का होता है,जो इन त्रिगुणों से हटा रहे ।
हो अलग विकारों से उनके, निर्द्वन्द्व क्षेत्र में डटा रहे ॥"

११
श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-५] जीव-ब्रह्म विवे 518
अर्जुन यों कहने लगा- कहिये कृष्ण, सुजान ।
गुण से जो नर मुक्त है, उसकी क्या पहचान "
१
सुन करयह वचन कृष्ण बोले, "अर्जुन, पहचान बताता हूं
होता गुण से जो मुक्त जीव, उसका लक्षण समझाता हूं।
वह जीव गुणों की लीला में,-मनको अपने न फँसाता है
इसलिए जगत् के सुख दुख में, वह सुख दुख नहीं मनाता है ।
धन धान्य धाम धरणी पर वह, होता बिल्कुल अनुरक्त नहीं
नारी या पुत्र पौत्रों में, निज मन रखता प्राप्तक्त नहीं !!
होजाय हानि यदि उसकी तो, वह कुछ भी शोक नहीं करता।
और लाभ अगर कुछ हो तब भीमन में अानन्द नहीं भरता ।
बस उदासीन रहकर जगकी, सब चहल पहल देखा करता ।
और चहल पहल को माया की मिथ्या लीलालेखा करता ।।
मिट्टी, पत्थर, सोने का वह, एकी सा मूल्य लगाता है ।
बैरी और मित्रों से अपना, रखता एकी सा नाता
बदनामी नामवरी की भी, करता है कुछ पर्वाह नहीं ।
और कभी किसी के प्रतिमन में रखता नफरत और चाह नहीं ॥
आदर में और निरादर में, वह गर्व क्रोध नहिं करता है ।
जगकी बलवती शक्तियों की दहशत से कभी न डरता है।
,
*
करता वह संसार के, यद्यपि कर्म सुजान ।
पर बिल्कुल फँसता नहीं, उनमें उसका ध्यान ।।
रहता है इस भाँति जो, मुझ में चित्त लगाय ।
अर्जुन,वह नर विश्व में, त्रिगुणातीत कहाय ।।
TH
PREDICHERE

1 A A A A A A A : AAAAAAALAnnant Donu * जात्र--ब्रह्म-विवेक आमद्भगवद्गीता-संख्या-५ गाना में शत्रु - मित्र गुगों से बिल्कुल जो बच जाय । वही जन त्रिगुणातीत . कदाय ।। सब प्रकार के कर्म करे जो फल इच्छा को त्याग । कभी किसी से करे न मन में द्वेष या कि अनुराग ।। रहे निर्लिप्त सदा सुख पाय। वही जन० ।। भेद न देखे समझे उन्हें सशन । निर्मल चित से च हे सारे जीवों कल्यान । सभी से मिले प्रेम से धाय । बहो जन०॥ यश-अपयश में होय जिसको अहङ्कार या रोष । मन वाणी और कर्मो' में जिसके न रहे कुछ दोष ।। सरापर निर्मल जो दिखलाय । वही हानि-लाभ की चिन्ता से जो चञ्चल कभी न होय । सुख-दुख मर्यादा अस्नो दे न हाथ से खोय ॥ धैर्य जिसमें इतना होजाय । वही जनः ॥ माया के गुण सत, रज तम हैं ग है उनका खेल। इसीलिये जो करे न जा से अपने मन का मेल ।। रहे जो जग में मोह मिटाय । वही नश्वर जग में अविनश्वर है ईश्वर एक पुनीत । अजर-अमर उस परमेश्वर से करता जो जन प्रीत ॥ उसी के रंग में जो रंग जाय । वही जन० ॥ में जन० ॥

ra PRE-L2414tLOHOROADED: १३ श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-५ ] * जीव-ब्रह्म-विवेक * अन अर्जुन, आगे सुनो, कहता हूं समझाय । वर्णन इस संसार का, फिर समझो चितलाय ॥ कवियों की भाषा में समझो, संसार एक यह पीपज है। जिसकी जड़ ते ऊपर को है. नीचे शाखाओं का दल है। पत्ते इस पीपल के वह हैं, जो वेद पवित्र कहाते हैं । इसकी शाखाओं के समूह, ऊपर नीचे को जाते हैं । सत्, रज, तम यह माया के गुण, शाखें पौड़ाया करते हैं। इन शाखाओं में विषयों के कल्ले नित आया करते हैं ! कर्मों की सूरत में उसकी, जड़ भी नोचे को पाती है। और नीचे आकर इस जग में, सब तरफ फैलती जातो है ।। यह वृक्ष बड़ा ही अद्भुत है, ज्यों का त्यों नज़र नहीं आता । अाधार नहीं मिलता इसका,और श्रादि अन्त नहिं दिखलाता। यदि इसको काटा चाहे तो, वैराग्य कुल्हाड़ी से काटे । शाखों को और टहनियों को, अच्छी प्रकार चुन चुन बाटे ॥ जब काट छांट से निबट जाय. तब प्राणी मेरी खोज करे । यह वृक्ष मुझी से उगता है, लेकिन मैं उससे रहूँ परे ।। मुझको पाता है वही, जो होता निष्काम । मिलता त्रिगुणातीत को, निर्मल मेश धाम ।। यह धाम मेरा यह है अर्जुन, जो स्वयं प्रकाशित है सारा । यह नहीं कि जैसे मयं लोक, चमके है सूर्य चन्द्र द्वारा ।। जो मेरे धाम में प्राजाते; वे मुझ ही से होजाते हैं । फिर कभी न माया ठगनी के, जादू उन पर चल पाते हैं। है जीव अंश सच्चा मेरा, वह जब शरीर में आता है। तो पाच ज्ञान इन्द्रियों सहित, मनको अपने सँग लाता है SHARMA AAMANARAAAAAAAAAAAAAAAAA । ATTERNATAARARIA HOM ROHI TRA TIme

LARAKAR ALESE.Sandesh
* जीव-ब्रह्म-विवेक * { श्रीमद्भगवद्गीता-रख्या-५
मन आँख कान,नासिका,जीम और त्वचाबीच वह रह करके ।
इन्द्रिय विषयों का भोग करे, सुख दुख जीवन के सह करके ।।
फिर जब जाता है देह छोड़, तो नहीं अकेला जाता है ।
उन चीजों को सँग लेजाता. जिन चीजों को सँग लाता है।
यो जीवात्मा के सँग प्राली, और फिर उसके सँग जाती हैं ।
सो सूक्ष्म वस्तुएँ हैं सारी, और लिङ्ग देह कहलाती हैं ।
इस लिंगदेह में फँसा जीव, नित चक्कर खाता रहता है ।
चौरासी लाख योनियों में, पाता और जाता रहता है।
माया के गुण जीव को, गोही चक्कर दें ।
जन्म-जन्म तक बाँधकर, निज वश में कर लेंग।।
लेकिन जीवात्मा निर्मल है, और मेग अंश सुहाता है ।
जैसा स्वतन्त्र मैं हूँ वैसा-वह भी स्वतन्त्र कहलाता है ।
यह भेद समझते हैं वे ही, जो पुरुष विज्ञ और ज्ञानी हैं ।
लेकिन कुछ नहीं समझते वे, जो अज्ञानी अभिमानी हैं ।
निर्मल मति वाले यत्न करें तो चट यह भेद समझ जाते ।
पर मूर्ख यत्न करने पर भी, रहते हैं नित चक्कर खाते ॥
जीवात्मा का सच्चा स्वरूप, जिसने समझा वह छूट गया ।
माया के त्रिगुण विकारों का फन्दा भी उसका टूट गया ।
चन्द्रमा अग्नि और सूर्य बीच, जो उज्ज्वल तेज समाया है ।
अर्जुन, तुम यह निश्चय जानो, वह तेज मुझी से आया है ।
मैं इसी तेज से पृथ्वी के, भीतर सँचारण करता हूं।
और इस प्रकार से भूतल की सृष्टी को धारण करता हूँ।
मैं चन्द्र-किरण का अमृत हो, ओषधियों को उपजाता हूं।
जठरानल होकर जीवों के उदरों में अन्न पचाता हूं।
BREAST
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NAA344AAAAAAAAAAD - ( १५ । श्रीमद्भगद्गीता-संख्या- ] * जोव-ब्रह्म-विवे* सब के हृदयों में रहूँ देता सर को ज्ञान । वेद और वेदान्त का, मैं ही हूँ विद्वान ।। जो भी पदार्थ हैं नाशवान् वह क्षा' पदार्थ कहलाता है । और मूल में जो रहताक्षर के,वह 'अक्षर' माना जाता है ।। 'अक्षर और नर'इन दोनों से, अजुन, मैं अलग सुहाता हूं। इसलिए तत्व यह समझो तुम, मैं पुरुषोत्तम कहलाता हूं। यों मुझको पूरा पुरुषोत्तम, जो समझेगा, और पायेगा । वह माया-जनित विकारों से छुटकर मुझ तक आजायेगा । AA . १ गाना माया जगत् को नचाती, जगत् को नचाती । परवश हो जाय प्राणी जगत् को नचाती ।। सत् रज तम हैं गुण महा प्रबल, जो सीधी राह भुलाते हैं । ईश्वर का अंश जीव है सो यह बौरा उसे बनाते हैं । बुद्धो,-मलिन कर देते, मलिन कर देते । इनसे बच जाय तो फिर सुगति हो जाती ।। माया के वश नर कहते हैं घर तेरा है घर मेरा है । पर तेरा और न मेरा है बस चिड़िया रैन-बसेरो है ।। ज्ञानी, न धोखा खाते, न धोखा खाते । जग की कोई बात उनके न मन को भुलाती ।। बेटे पोते भाई बान्धव जीते जीके नाते हैं । जब प्राण गले में आ अटकें तब काम न काई आते हैं। इनकी करे नहिं ममता, करे नहिं ममता । यह ममता नित्य आवागमन में फंसाती ।। धन धान्य धाम धरणी अथवा सामान विविध सुख भोग भरें। सब ठाट पड़ा रह जाता है जब जीव जगत् से कूच करे । हंसा,-अकेला अकेला जाता । सँग ले र धर्म जिससे लिपति मिट जाती ॥ सब जाता, BREALRSS - prmarwar- HAIReg

2. जीव-ब्रह्म-विवेक * [ श्रीमद्भगवद्गीता संख्या-५
संसार असार
सरासर है जो चीज़ यहां है नश्वर है ।
इसकी तह में जो ईश्वर है, बस केवल वही अनश्वर है ।।
उसकी शरण जो जाये, शरण जो जाये ।
माया फिर भूलकर भी न उसको सताती ।।
अच्छा, अब भागे सुनो, और बात है एक ।
माया के गुण और भी, खेलें खेल अनेक ।।
इन खेलों के कारण से ही, बहु भेद-विभेद दिखाते हैं ।
गुण शील आदि सब जीशे के, एक से नहीं बन पाते हैं
दैवी आसुरी प्रकृतिवाले, होते प्राणी उत्पन्न सदा ।
इन दो प्रकार के जीवों से, रस्ता यह जग सम्पन्न सदा ।
जिसकी दैवी प्रकृति सुधर, वह होता निर्मल चितवाला ।
रहता उसके उप अन्तर में,नित ज्ञान-ज्योति का उजियाला
वह कर्म जगत् के करता है और रखता वित्त विलग उनसे ।
इन्द्रियां कर्म करती उसको, पर रहता चित्त विलग उनसे ।
वह ज्ञान-यज्ञ और जप तप में अपनी शुचिनिष्ठा रखता है।
ईश्वर के पाद-पंकजों में, शादह और श्रद्धा रखता है ।।
जीवों पर सदा दया करता, मृदु वाणी बोला करता है !
अच्छे कर्मों के करने में, अगुआ बनते नहिं डरता है ।।
कर्मों का फल कुछ मिले मुझे यह उसको बाहनहीं होती।
होनी से जो दुख सुख मिलते, उनकी पर्वाह नहीं होती।
शुद्धता, सरलता, धैर्य शान्ति-रहती उसके व्यापारों में !
मन उसका कभी नहीं पता,माया के त्रिगुण-विकारों में ।
तेजस्वी होने पर भी वह, हिंसा या क्रोध न करता है।
औरों को सुख पहुंचाने में, बहुभा अपना दुख भरता है ।।

هههههههه CATE ( १७ ) । - श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-५ ] * जीव-ब्रह्म-विवेक लजा, गुरुता, सत्य का होता वह आगार । निरभिमान निश्चल सदा, रखता हृदय उदार ॥ अब जो आसुरी प्रकृति के हैं, वे होते क्रोधो अभिमानी । निष्ठुर होकर बोला करते, खु खुरी जात वे अज्ञानी ॥ जिनकी दैवी प्रकृति ही सुख सहित मोक्ष पद पाते हैं । लेकिन आसुरी प्रकृति वाले, बस बँधे हुए रह जाते हैं । कारण यह है जो जीव यहां, आसुरी प्रकृति के आते हैं । वे भले बुरे कामों की कुछ, पहचान नहीं कर पाते हैं । शुद्धता नहीं रहती उनमें, रखते प्राचार अधूरे ईश्वर को नहीं मानते हैं, इससे बस नास्तिक पूरे हैं इस जग में वस्तु सत्य कोई, उनकी न समझ में आती निष्कारण और निराश्रय सी, यह सृष्टि उन्हें दिखलाती है । जीवन का कर्तव्य वे, यह माने मतिमन्द । खाना पीना खेलना, करना नित आनन्द ।। अासुरी प्रकृति के यह प्राणी, दुष्कर्म अनेकों करते हैं । उनके दुष्कर्मों के कारण, जगमें नित संकट बढ़ते हैं ।। नाना भोगों के लिये उन्हें, दरकार रहा करती धनकी । इच्छाएँ तङ्ग किया करतीं, उनको नित नयी-नयी मनकी ॥ वे काम-क्रोध-मोहादिक के बन्धन में जकड़े रहते हैं । अपनी ही बात बड़ी करके, अपनी हठ पकड़े रहते हैं । होना उनके चित्त में, दर्प घमण्ड अपार । अपने भागे और को, गिनते तुच्छ असार ।। ऐसे अज्ञानी मूढ़ों की, निर्मल न कभी मति होती है । जा जाकर बुरो योनियों में, उनकी बहु दुर्गति होती है। - --- (१८) AVEALS SOURCE * जीव-ब्रह्म-विवेक * [ श्रीमद्भगवद्गीता संख्या ५ इस दुर्गति से बचना चाहे तो काम क्रोध और लोभ तजे । यह तीनों द्वार नरक के हैं, इनसे बचकर नर मुझे भजे ॥ इन द्वारों से बचकर प्राणी, उज्ज्वल निर्मल हो जाता है । आचार सँभल जाते उसके, जिससे वह सद्गति पाता है । यह मत है सकल शास्त्रों का, हैं शास्त्र इसलिये हितकारी। जो चलता शास्त्रविरुद्ध मनुज, होता है उसको दुख भारी॥ इस सारे व्याख्यान का, बस इतना है सार । दैवी प्रकृति मनुष्य का करती है उद्धार । .. माना । में इस जगमें आने पर प्राणी, जो देवो प्रकृति बनाते हैं। उनका ही मन निर्मल होता वे ही भव से तर जाते हैं ।। हैं काम क्रोध और लोभ कठिन, प्राणी को यह ठगते निशि दिन । जो इनके चंगुल से बचते, वे ही उत्तम पद पाते हैं ।। अपने मुंह अपना गुण गाना, धन जन के मद इतराना। इन दोषों से मुझ तक प्राणी आते हों तो नहिं आते हैं । जो केवल नाम कमाने को, करते हैं धर्म दिखाने को । वे. अपना सब कुछ किया धरा, अपने ही आप मिटाते हैं । निष्ठुर पर-निन्दक नीच तिरा, रहता जिनका मन मैल भरा । वे दारुण दुःख उठाते हैं, और पीछे से पछताते हैं । जो मुझको भजत प्रीति-सहित, श्रद्धा निष्ठा और रीति सहित । उनको ही मैं अपनाता हूँ, जो यों मुझको अपनाते हैं । अर्जुन ने भगवान् से, अब पूछी यह बात । "शास्त्रीति को छोड़कर, क्या फल होता तात ? यज्ञ करे श्रद्धा सहित, तजकर शास्त्र-विधान । तो क्या होता व्यर्थ सब, प्राणी का सामान ?" ,

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श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-५ ] * जीव-ब्रह्म-विवेक *
(१९)
मधुसूदन बोले-“हे अर्जुन, श्रद्धा ही नर में सर्वस है ।
पर, सत् रज तम से श्रद्धा यह,सात्विक राजस और तामस है ।।
सात्विक श्रद्धावाला प्राणी, करता है यज्ञ देवतों का ।
राजस श्रद्धावाला करता, अाराधन यक्ष-राक्षसों का ।
श्रद्धा जिसमें तामस होती, वह तामस यज्ञ रचाता है
भूतों को और पिशाचों को भजता है और रिझाता है ।।
अब शास्त्र-विरुद्ध लोभ-वश हो, जो प्राणी यज्ञ रचाते हैं ।
उनके वे सारे अनुष्ठान-भासुरी यज्ञ कहलाते हैं ।।
श्रद्धा के समतुल्य ही, सत्-रज-तम से युक्त ।
होते हैं संसार में, सारे क्रम उपयुक्त ।।
आहार-यज्ञ--तप-दान आदि,सब सत्-रज-तममय होते हैं ।
जैसा स्वभाव होता वैसा, यह सब निस्संशय होते हैं !!
अब अलग अलग बतलाताहूं,सात्विक भोजन वह कहलाता।
जो आयु बढ़ाए,बल देवे, चिकना हो, प्रिय हो, सुखदाता ॥
राजसी प्रकृति के जीवों को, ऐसे भोजन्हें लगते प्यारे ।
जो होते हैं चरपरे तीक्ष्ण, खट्टे, रूखे, सूखे सारे ।
अब तामस प्रकृति प्राणियों के मन का वह भोजन माता है।
जो गन्दा जूठा होता है, ठण्डा बासी कहलाता है।
ऐसी ही बात यज्ञ की है, सात्विक वह यज्ञ कहाते हैं ।
जो फल का लोभ दूर करके, विधि-विहित रचाये जाते हैं ।।
लेकिन वे यज्ञ राजसी हैं, जो किए जायें फल पाने को ।
अथवा अभिमान जताने को, या धन दौलत दिखलाने को।
तामस यज्ञों की गिनती में, वह यज्ञ गिनाए जाते हैं ।
जो बिना दान दक्षिणा दिए विधि-रहित रचाये जाते हैं ।
AAAahan

AA A A A A 2 KARANA ( २० ) * जोव-ब्रह्म-विवेक * [ श्रीमद्भगवद्-गोता-संख्या-५ कायिक,वाचिक, मानसिक तप के तीन प्रकार । तीन-तीन हर एक के भेद त्रिगुण अनुसार ।। सात्तिक तप उसको कहते हैं, जो मनका कल्मष खोता हो । जो बदले में कुछ पाने की इच्छा से कभी न होता हो । राजस तप का बस यह ढंग है, वह होता है दिखजाने को। या प्राणी उसे किया करता, अपना कुछ काम बनाने को । तामस तप वह कहलाता है, जिससे आपा दुख पाता हो । जो मोहन मारण जारण की, औरों पर घात चलाता हो। इसी तरह प्रख्यात हैं, तीन तरह का दान । पण्डितजन हैं जानते-तीनों की पहचान !! जो ठीक पुरुष को ठोक समय, श्रद्धा के साथ दिया जाता बदला जिसका चाहा न जाय, वह सात्त्विक दान कहा जाता। लेकिन जो बदले की खातिर, देता है और जताता है । अर्जुन, वह उसका दान, निरा, राजसी दान कहलाता है। अब तामस है वह दान कि जो,अपमान समेत किया जाये। जब जहां जिसे मिलना चाहिए, तब वहां न उसको मिल पाये सत् रज तम का यह हुआ,अब तक जो विस्तार । समा रहा है ब्रह्म में, वह सारा व्यापार ।। सत् रज और तम यह तीनों गुण, जो माया के कहलाते हैं । सो तीनों परब्रह्म-द्वारा, जग में उपजाये जाते हैं। माया जो परब्रह्म की है, वह रहती सत् रज तम गुण में । और गुण यह रहते ब्रह्म बीच, पर रहता ब्रह्म नहीं उन में । कहते हैं शास्त्र "ओतत्सत्”,सो है यह वाक्य पवित्र सुघर । ब्राह्मण हैं, वेद हैं, यज्ञ भी हैं, इस एक वाक्य ही के अन्दर ।। AAAAAAAAAAAAABAR:: ... ܩ 2.AAAAAAAAAAA ७

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श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-५ ] * जीव-ब्रह्म-विवेक *
अब ब्राह्मण, वेद, यज्ञ, यह सब, त्रिगुणात्मक माने जाते हैं ।
सत् रज और तम में बिंधे हुए सत्-रज-तम-मय कहलाते हैं !
इसलिए जगत् में प्रलय तलक, यह गुण चलते ही जायेंगे।
इच्छा करने पर भी प्राणो, इन सबको मेट न पायेंगे ।
बस एकी ऐसा है उपाय, जो करता काम हजारों में ।
वह यह कि मनुज कामनन फसे,त्रिगुणों के विविध विकारों में ।
फिर कहता हूँ है ठीक यही, जगके सब कर्म किये जायें ।
बस इतना ध्यान रहे उनमें, मनकी वृत्तियां न फंस पायें ।।
कर्मों के फल को पाने की, जिसके जी में कुछ चाह न हो ।
जिसको जीने या मरने की, सुख और दुख की पर्वाह न हो ।
वह प्राणी त्रिगुणों से छुटकर, सर्वदानन्द बन जाता है ।
जीते ही जी इस जीवन में, सच्चिदानन्द कहलाता है।"
बोला अर्जुन-"आप हैं, कहने योग्य समर्थ ।
"ॐ तत्सत्" इस वाक्य का,कहिये मुझसे अर्थ ।।
भगवान् बोलने लगे वचन "अर्जुन, जो "ॐ' कहाता है।
उस "30' का अर्थ ब्राह्मण है,जो प्रथम सृष्टि में आता है।
यह ब्राह्मण और नहीं कोई, ब्रह्मा हैं वेदों के ज्ञाता ।
जिन ब्रह्मा के द्वारा यह सब, पूरा संसार रचा जाता ॥
"तत्' शब्द का केवल अर्थ यही, जो जप तप यज्ञ किये जायें ।
उन जप तप यज्ञों के फल की, पाणी न करें कुछ इच्छायें ।
अब रहा अर्थ "सत्" का बाकी,से। “सत्" अच्छे को कहते हैं ।
सुन्दर, अनुकूल, सरल, सुखकर, यह अर्थ भी उसमें रहते हैं ।
जो भाव यज्ञ के हित होवें, वह भी "सत्" माने जाते हैं ।
यज्ञार्थ कर्म जितने हैं वे, सबके सब 'सत्' कहलाते हैं ।
N
AAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAA

( २२ )
AAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAMARIA
* जाब--ब्रह्म-विवेक * [ श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-
"ॐ तत्सत् वाक्य यह, है सब जग का मूल ।
तत्त्व समझ इस वाक्य का, मिटे मोह का शूल ॥
इस मधुर वाक्य को ज्ञानीजन संकेत ब्रह्म का लखते हैं ।
इससे अपने सब कामों का प्रारम् "30' से करते हैं ।
अब बस केवल यह कहना है, कुछ 'असत् कर्म"कहलाते हैं ।
यह वह हैं जिन्हें तमोगुण से, प्राणी जग बीव रचाते हैं ।
श्रद्धा के बिना यज्ञ करना, या जप तप होम दान करना ।
अर्जुन, सब असत् कर्म हैं यह, होता है इन से दुख भरना ॥
यह असत् कर्म हैं व्यर्थ सभी, इनसे उद्धार नहीं होता।
इस लोक में या परलोक में भी, नर का उपकार नहीं होता है
इस प्रकार तुम से कहां-जो मैंने वक्तव्य ।
फिर बतलाता हूँ तुम्हें, उस सब का मन्तव्य ॥
थोड़े शब्दों में यों समझो, दुनिया धोखे का धन्दा है ।
जीवों को बांध फँसाने को, फेंका माया ने फन्दा है।
यह माया में उपजाता हूँ, जो त्रिगुणमयी कहलाती है ।
सत् रज तम अपने गुण लेकर,जड़ चेतन जगत् बनाती है।
यह ही तीनों गुण माया के व्यापक स्वभाव में रहते हैं ।
जिससे कि स्वभावों को ज्ञानी, उत्तम मध्यम लघु कहते हैं ।
जो होता है जिसका स्वभाव, वह वैसे कर्म किया करता ।
जो जैसे कर्म किया करता, वह फल भी वैसे ही भरता ॥
लेकिन यह फल भरनेवाला, ज जीव है सो अविनाशी हैं ।
हे अंश तेज का मेरे ही, इससे वह स्वयं प्रकाशी है ॥
यह स्वयं प्रकाशी अंश मेरा, ऐसे चक्कर में आया है ।
जिससे इस दीन बापुरे ने, अपने को आप भुलाया है ।।

श्रीमद्भगवद्गीता संख्या-2] * जीव-ब्रह्म-विवेक
( २३
आवश्यकता बस इतनी है, यह निज स्वरूप को जान सके ।
और माया की मोहिनि मूरति, अच्छी प्रकार पहचान सके ।
यह कार्य साधने को प्राणी, ज्ञानी होवे और मनन करे ।
यदि ज्ञान मनन बन पड़े नहीं तो फिर बस मेरा भजन करे।
ORMALLERBALRALELKAMALISA
ध्यान धरे मन से मेरा, करे न चित्त उदास ।
समझे मुझको हर, समय, हर दम अपने पास ।
घट घट में संसार के व्यापक मैं भरपूर ।
प्रेम से नित्य समीप हूं, प्रेम नहीं तो दूर ॥
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गाना -
ज्ञानी को कहीं रहता हूँ, भक्तों को कहीं हूँ
यह बात मुझी में है कि हूँ और नहीं हूँ ।
संसार मेरा रूप है मेरा ही रंग है।
जल हूँ, मैं अनल हूँ,मैं अनिल हूँ,मैं जिमी हूँ ।
गोलोक में रहता हूं न वैकुण्ठ में रहता ।
रखते हैं मुझे भक्त जहाँ भी मैं वहीं हूँ।
क्यों जाते हो शैलों में गुफाओं में बनों में ।
"निर्गुण" जो मुझे ध्यान से देखो तो यही हूँ ।।
नोट-- इससे आगे कथा "अर्जुन का समाधान" नामक पुस्तक में पढ़िये ।

कविरत्न प० राधेश्याम कथावाचक द्वारा लिखित नाटक 20 १ " " " " वीर अभिमन्यु (यह नाटक हिन्दी के अतिरिक्त उर्दू में भी छपा है) १॥) महर्षि वाल्मीकि ( सिर्फ हिन्दी में) १॥) सती पार्वती १॥) ईश्वर-भक्ति १॥) परमभक्त प्रह्लाद परिवर्तन १॥) श्रीकृष्ण-अवतार २॥) रुक्मिणी-मङ्गल १०) द्रौपदी-स्वयम्बर १॥) श्रवणकुमार (यह नाटक हिन्दी के अतिरिक्त उर्दू में भी छपा है) १०) ऊषा-अनिरुद्ध (सिर्फ हिन्दी में) १०) मशरिक्की हूर (यह नाटक हिन्दी के अतिरिक्त उर्दू में भी छया है) १॥) भारत-माता ( सिर्फ हिन्दी में) कृष्ण-सुदामा शान्ति के दूत भगवान् श्रीकृष्ण सेवक के रूप में भगवान् श्रीकृष्ण 12) घण्टा-पन्थ 1-) । ११ . FET . MOS योगायेश्यामा पस्तकालय चरोली मशरिकी हर पं० राधेश्यामजी कविरल अन्य नाटक द्वारा लिखित नाटक महाराजा भर्तृहरि १०) पृथ्वीराज ॥) भजन गाने व राजलें वीर अभिमन्यु १० श्रीराधेश्याम-गीताञ्जलि ॥) महर्षि-वाल्मीकि २॥) राधेश्याम विलास १%) सती पार्वती १॥) | राधेश्याम-कीर्तन ईश्वर-मति २॥) राधेश्याम भजनमाला परम-अक्त प्रहार १) प्राचीन भजनमाला परिवर्तन १) मोहन-कवितावली श्रीकृष्णा-अवतार १॥) मुसाफिर की पाकेट बुक रुक्मिणी-मजत १%) प्रेम-रत्नावली द्रौपदी-श्वयम्बर शा) निजानन्द प्रदीपिका श्रवणकुमार १%) गृहिणी गीताञ्जलि प्रानन्द-लहरी ऊषा-अनिरुद्ध १) मीरा भजनमाला १॥) बोध-प्रकाशी भारत-माता पद्य-पुष्पांजलि कृष्ण-सुदामा भारती संग्रह शान्ति के दूत भगवान् श्रीकृष्ण ग़जलों का गुलदस्ता सेवक के में भगवान् श्रीकृष्ण ।-) गजल-सागर घण्टा-पन्थ 12) पद-पुज मोहन अजनमाला नोट-नाटकों में वीर अभिमन्यु, मोहन गीतावली श्रवणकुमार, और मशरिकी हूर, उर्दू में मोहन संगीत शिक्षा भी छपकर तैयार हैं। दाम बही जो सीताराम-कीर्तन हिन्दी में हैं। अमर-गीत-माला न्यू अल्फ्रेड थियेट्रिकल कम्पनी प्रात मीठी गुञ्जार ) मधुर मुरली ) बम्बई द्वारा खेले गये रसीली तान ) कुसुम-कुंज असली व मुकस्मिल नाटक वसंतवाटिका ३) पल-पराग भूलभुलैयाँ १) दिलकरोश १) भान्य पुस्तके चलता पुर्जा १) शरीफ बदसाश १) भक्त स्त्रियाँ ।) अमरकोष 12) खजावे हस्ती १) अछूता दामन सतलड़ी 1) पञ्चों का प्याला।) रखूबसूरत बला१) हिन्दू विधवा १-) अजायब घर !) धनुर्विद्या 11) भारत व्याकुल थियेट्रिकल कम्पनी प्रेत-लोक ११) नौलखाहार .॥ लिमीटेड आफ मेरठ द्वारा खेले गये ज्योतिष-प्रकाश ।।) दृष्टांत महासागर ॥) असली व मुकम्मिल नाटक वियोग-कथा /-) मोहन माल। :) तेरोसित्तस १-) सम्राट्चन्द्रगुप्त १-) हनुमानचालीसा --)। सुन्दरकाण्ड ।) FFIED . - - पता-श्रीर शेश्यान-पुस्तकालय, ३ . नकली किताबों से बचिय স্থলাহী খান্সা। স্ত্রী দুই লাক্কা স্কা জ্বী স্নগ্ধাই देखकर लोगों ने उसी रंग और रूप की नाली किताबें छाप छापकर प्रकाशित करदी हैं। नहालों की कई बरस की कोशिश का नतीजा यह है कि बाजार में नकली किताबों की भरमार है। यह नकली किताब )॥ में बुक्सेजर को दी जाती है, जिसे एक्सेलर -) यो ) या ) में बेचकर शायदा उठाता है और इस प्रकार प्राहक को धोखा दिया जाता है। प्राहक जब ऐसी किताब को घर ले जाता है तो पछताता है । ग्राहक का ऐसी बोलेबाज़ी से बचाने के लिये अब हम अपनी हर एक किताब के अपर अपनी तस्वीर देने लगे हैं, जैसी कि इस किताब पर आप देख रहे हैं। अब आइन्दा से आप घोल्हान माइयेगा- ध्यान रहे जिन किताबों पर-राधेश्याम” या--"राधेश्याम पाशि" या "तर्ज-राधेश्याम" छपा रहता है, वह हमारे यहाँ की नहीं है। छमारे यहाँ की किताबों पर हमारे यह दस्तल्लत भी रहते है। इन्हें पहचान लीजिये- - Preference orm भवदीय- স্থাহ্মহত্বা থাঙ্ক मालिक-श्रीराधेश्याम पुस्तकालय व प्रेस, बरेली। AAAAAAAAAAA TOMATTER श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या ६ अर्जुन का समाधान : - प्रकाशक- नेपाल गवर्नमेण्ट से 'कथावाचस्पति' की पदवी प्राप्त- कीर्तन-कला-निधि, काव्य-कला-भूषण, श्रीहरि-कथा-विशारद, कविरत्न- - mar rala अध्यक्ष--श्रीराधेश्याम-पुस्तकालय, मूल्य ॥ आने जिल्द IN D স্বচ্ছ অত্যান্ত राधेश्यामजी कविरत्न लिखित नवीन कृति में सलगे, तथा जिददार गुरका १||) में मिलेगा। डाक सहसूल मुरझा -) अलग अलग भाग। पर ।) ভ্রাগুঞ্জী 1)नन्द-महोत्सव ।) महाभारत कमलीबाला कन्हैया।-गिरिवरधारी।-) ( राधेश्याम रामायण की बात में 13) इंस-ध भीष्म-प्रतिज्ञा नन्द-जन्दन-धसुदेश-नन्दन भीष्म-पराक्रम सम्पूर्ण खातो आग एक पारालव-जन्म सुन्दर में छः श्याने अधिक देने पर अर्थात् तीन पाण्डवों का बाल्यकाल रूपए में मिलेंगे। साक महसूल ।) अलग पाण्डबों की शस्त्र परीक्षा लाक्षागृह इक्मिणी-मंगल बक-संहार ( राधेश्याम रामाचरण की खपी में ) द्रौपदी-विवाह कश्मिणी-जन्म सुभद्रा हरण शल्मिकी का छष्ण प्रेम राजसूय-यक्ष रुक्मिणी की सगाई द्रौपदी-बस्न-हरमा इलिसणी का पत्र लेखन किरातार्जन-युद्ध रुक्मिणी का गिरिजा-पूजन यक्ष-सम्बाद रुक्मिणी का भ्रातृस्नेह कींचक-बध रुक्मिणी विवाह 1- अभिमन्यु विवाह सम्पर्ण सातों भाग एक सुन्दर जिल्द में छः आने अधिक देने पर अर्थात् तीन (राधेश्याम रामायण की तर्ज में- रुपए में मिलेंगे।डाक महसूल ।=) अलग नरसी की हुंडी শ্রীতৰতা श्रीसत्यनाराया हो या { राधेश्याम दामादल की बी में) प्रह्लाद-चरित्र अर्जुनमोह ॥ विराटप-दर्शन ।)। ध्रुव-चरिन आत्मा की अमरता)। जीव-ब्रह्म-विवेक)ो। सुदामा चरित्र मोनज-बहिन कर्म-योग ।)। अर्जुन का समान॥ भर्तृहरि चरित्र नोट-सम्पूर्ण भाग एक सुन्दर जिल्द महाराणा प्रतापखिइ में अधिक देने एन, मार्थात् २) में, सत्यवादी विचार मिलेंगे तथा जिल्दवार गुडका ॥) में साबित्री-सत्यमा मिलेगा। खाक महसूल गुटला !) अलग श्रीराबाई मलामा पूर সুখস্মৃদ্ধ छुर्गापरिच अभिमन्यु की नीरा ( राधेश्याम रामावच्खरहे । गुरु गोबिन्द सिंह महिलासुर-क्ष बारु नानक शुल्भका सुत्पा सामुहवा का दाम बोपदी-लीला रत-ची की लड़ाई महाराजा दिलीप शुभम और निशुल्क अप सती स्वयम्बर नोट- सम्पूर्ण समाग एक सुन्दर छिरद । खली मोह में छः श्राने अधिक केन्द्र पर अशी २१) महर्षि पवित्रा (5) आग १) 13 প্রায় । বার্মার্শালা, २ waSen * श्रीमद्भगवद्गीता * सर्वाधिकार प्रकाशक के आधीन हैं। संख्या-६ लेखक- प० रामनारायण पाठक IIIII अर्जुन का समाधान .. सम्पादक और प्रकाशक- - नेपाल गवर्नमेण्ट से "कथावाचस्पति" की पदवी प्राप्त- कीर्तन-कला-निधि, काव्य-कला-भूषण, श्रीहरि-कथा-विशारद, कविरत्न- पर राधेश्याम कथावाचक, अध्यक्ष- ফালাহুম্বg.egjলা/ सातौं बार २००० ] सन् १९४६ ई० [ मूल्य साढ़े चार आने प्रिंटर-६० रामनारायण पाटकर श्रीराधेश्याम प्रेस, बगेली । -

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प्रार्थना
1
सुनता ही रहूँ अपनी व्यथाओं की क । कबतक ?
बता दो, धैर्य होजाए, करोगे तुम कृपा कबतक ?
सुखी सन्तुष्ट इस संसार में रहते हैं जब लाखों ।
मेरे जीवन-मरुस्थल में न ब लेगी सुधा कश्तक ?
ठिकाना आजतक अपनी प्रतिष्ठा का नहीं कोई।
उचकता झाँकता फिरता रहूँ यों जा बजा कबतक ?
कहीं का राज दे दो याचना मैं यह नहीं करता।
पर अपने काम को औरों का ताकं आसरा कबतक ?
तुम्हारा हूँ तुम्हारा हूँ तुम्हारा हूँ तुम्हारा हूँ ।
मुझी
का दाबे-रहेगा दबदबा कबतक ?
तुम्हारे
देखने को कुछ न पूछो
कितनी चाहत है।
तुम्हारा मिल सकेगा. ऐ मेरे 'निर्गुण' पता कबतक ?
-~:00:0-
को दुःख
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Radha
URLhanssa sarsinasasanatha
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B6:08
सुन सुनकर नँदनन्द का, कथन अमोल अमन्द ।
अर्जुन के मन में बढ़ा, क्रम क्रम से आनन्द ।
पुलकित बोला अन्त में-“हे यदुपति यदुराय !
'त्याग' और 'सन्यास' का,कहिये तत्व बुझाया।"
यह सुनकर बोले कृष्णचन्द्र-"जो काम्य कर्म कहलाते हैं ।
जो मन की किसी कामना के पाने को लोग रचाते हैं।
ऐसे कर्मों के फल से ही, माया का बन्धन आता है ।
इन कर्मों का तज देना ही, सच्चा 'सन्पास' कहाता है ।।
अब रहा 'त्याग'सो हे अर्जुन कहलाता सच्चा त्याग तभी ।
कर्मों के फल पाने की जब, इच्छायें दे नर त्याग सभी ।।
कुछ लोगों का कहना यह है, बस कर्म बखेड़े की जड़ हैं
इसलिए छोड़दे कर्मों को, फल करते उन के गड़बड़ हैं !!
पर उधिन बात यह है अर्जुन, छोड़ना कर्म का अनुचित है ।
हां,जिना चित्त शासन किए, उनका करना ही समुचित है ।।
जो कर्म बनाये हैं जग में, वे करने योग्य बनाये हैं।
यह करने योग्य कर्म तजकर, नर सन्यासी न कहाये हैं !

KosingRAR AAAA A4 न अर्जुन का समाधान 8 [श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-६. तीन तरह का त्याग है, इस जग बीच प्रगान । तामस, राजस, सात्त्विक, जानें इसे सुजान ।। तामस वह त्याग कहाता है, जो होता ज्ञान-दीनता से। और राजस त्याग उसे कहते, जो हो पुरुषार्थ-हीनता से ॥ हां करने योग्य कर्म करके, फल उनका त्याग करे कोई । तो सात्त्विक त्याग कहायेगा, अर्जुन, उसनर का त्याग सोई ॥ जो अप्रिय कर्मों से न डरे, प्रिय कर्मों में तल्लीन न हो । वह ही त्यागी सन्यासी है, जिसका मन विषयाधीन न हो । कर्मों को छोड़ नहीं सकता, जो प्राणी कायाधारी है। इसलिए कर्म को तजे नहीं, फल तजे यही हितकारी है। फल इच्छा को चित्त रख,कर्म करें जो लोग । पाते वे परलोक में, तीन तरह का भोग । यह भोग कभी अच्छा होता और कभी बुरा भी होता है।। पुनि कभी बुरा अच्छा मिलकर, वह मिला-जुला भी होता है । यह फल उसको ही मिलता है,जो कर्मों में बिंध जाता लेकिन, त्यागी या सन्याप्ती, कुछ भी फल कभी न पाता है । इसलिए भलाई इसमें है, सच्चा त्यागी सन्यासी हो । कणे के फल की अभिलाषा, तज दे सर्वथा उदासी हो । बतलाया है शास्त्र ने, कर्मों का यह मर्म । पांच कारणों से सदा, होते हैं सत्र कर्म ।। पहला कारण तो हे अर्जुन, अस्थान बताया जाता है। दुसरा कारण वह ऋर्ता है, जो सारा कर्म रवाता है। तिसरा कारण साधन होते, चौथा व्यापार हुआ करते । पांचवें मुख्य कारण को सब, इस जग में दैव कहा करते ॥ NAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAA H ROMAAS LEAAAAAAAAAAAAAABALAAAAAAAAARAN म

मद्भगवद्गाता-संख्या-६ ] अर्जुन का समाधान *
संमार बीच अच्छे बोदे, मन से, शरीर से, वचनों से ।
होते हैं जितने कर्म सभी. होते इन पांच कारणों से ॥
लेकिन, जो जन अज्ञानी हैं, वे वृथा दर्प मन भरते हैं
अभिमान--सहित कह देते हैं, हम कर्म जगत् के करते हैं॥
जो ज्ञानी है और पण्डित है, वह सच्चा तत्व जानता है ।
अपने कर्मों का, अपने को, कर्ता वह नहीं मानता है
ऐसे ज्ञानी को कर्मों का फल कभी न दुख पहुंचाता है।
वह कभी किसी का बध करदे, तो भी न पाप कुछ आता है ।
और सुनो विस्तार से, अर्जुन, भले प्रकार ।
इसी विषय पर और भी, हैं कुछ गूढ विचार ॥
ज्यों नभ में बादल आते हैं, बूंदों के होने से पहले ।
त्यों कर्म-प्रेरणा होती है, कर्मों के होने से पहले।
जैसे कुम्हार को मट्टी का, जब घड़ा रचाना होता है।
तो पहले वह गुनता मन में, जो उसे बनाना होता है।
यह मन के भीतर का गुनना, बस कर्म-प्रेरणा है अर्जुन ।
गुनने के पीछे जो होता, वह कर्म-साधना है अर्जुन !
इस कर्म-प्रेरणा के अन्दर, ज्ञाता कुम्हार कहलायेगा ।
और वह जो घड़ा बनाता है, वह घड़ा ज्ञेय होजायेगा ।
पुनि घड़ा बनाने की रीती, बस ज्ञान बखानी जाती है ।
यह ज्ञाता, ज्ञेय, ज्ञान, मिल कर, कर्म-प्रेरणा कहाती है ।
कर्म-प्रेरणा की यही, रहती है पहचान ।
कर्म-साधना का सुनो, अब आगे व्याख्यान ॥
ज्यों कर्म-प्रेरणा के मैंने, तीन ही अंग दिखलाये हैं।
त्यों कर्म-साधना के भी बस, तीन ही अंग कहलाये हैं।
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* अर्जुन का समाधान -[ श्रामद्भगवद्गीता-संख्या-६
पहला कर्ता, दूसरा करण, तीसरा कर्म माना जाता
अर्जुन, यो कर्म-साधना का, है त्रिविधरूप जाना जाता !
का बह है जो काम करे, और करण काम का साधन है ।
अमरहा कर्म सो वह है जो, इन दो से होता पूरन है
पहले वाली उपमा फिर लो, 'कर्ता' कुम्हार कहलायेगा ।
जो चाक घूमता है उसका, वह करण बखाना जायेगा।
बर्तन जो चाक उतारेगा. वे वर्तन 'कर्म' कहायेंगे।
इस सबका 'कर्म-साधना' ही, पण्डित-जन नाम बतायेंगे।
अब अर्जुन, आगे सुनो, इरो चित्त का खेद ।
कर्ता कर्म अरु ज्ञान के, तीन तीन हैं भेद ।।
सत् रज,तम, गुण जो माया के हम पहले बतला पाये हैं।
सो सर्वव्यापक ईश्वर की नाई सर्वत्र समाये हैं।
वे कर्ता-कर्म-ज्ञान में भी, देखे और पाये जाते हैं. ।
सो कर्ता, कर्म, ज्ञान,तोनों, सत्-रज-तममय कहलाते हैं ।
साविक वह ज्ञान कहाता है, जिससे कि दृष्टि खुल जाती है ।
जिससे बस केवल ईशश की सत्ता सबमें दिखलाती है।
उस ज्ञान को राजस कहते हैं, जिससे विभिन्नता होजाए ।
जगके अनेकशः रूपों में, मन को अनेकता दिखलाए ।
वह ज्ञान कहाता है तामस, जो आंखों पर पदी कर दे।
सच्चाई बिना बताये ही मन में अन्धी श्रद्धा भर दे।
यह तो बतलाया तुम्हें, तीन तरह का ज्ञान ।
अर्जुन, यों ही कर्म भी, तोन तरह का जान॥
जो बिना चित्त बासक किये हैं धर्म समेत किये जाते ।
जिनमें कुछ घृणावप्रीति नहीं, वह सात्त्विक कर्म कहेजाते ।।
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श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-६ } * अर्जुन का समाधान *
लेकिन, जो कुछ कल पाने की, अशा से कर्म हुअा काले ।
उन सब कर्मों को पण्डितजन, बस, राजस कर्म कहा करते।
अब बिना विचारे शेखी से, जो कर्म रचाया जाता है।
जो होता भूम-अज्ञान-पूर्ण, बहं तामस कर्म-कहाता है
अब कर्ता को भी बात सुनो, सात्विक कर्ता वह कहलाता ।
जो निर्विकार निर्लिप्त हुआ, सइ कर्म करे मन हर्षाता ।।
फल पाने की इच्छा समेत, सुख दुःख जिसके उप सहते हैं
पण्डितजन ऐसे कर्ता को, राजल कर्ता लित कहते हैं।
आलसी, विषादी,शोक-पूर्ण, अभिमान ऐंठ में भरा हुआ ।
ऐसा कर्ता बस तामस है, अर्जुन, जीते जो मरा हुआ।
इसी तरह से बुद्धि के तीन भेद हो जाय ।
धृति के भी यों ही यहां, तीन प्रकार कडाएँ ।
पहले कहता हूँ बुद्धि-भेद, सात्त्विक वह बुद्धि कहाती है ।
जो भले बुरे की प्राणी को, सच्ची पहचान कराती है
लेकिन, जो बुद्धि राजसी है, वह ठीक न मार्ग दिखाती है ।
क्या धर्म है और अधर्म है क्या, यह निश्चय नहीं बताती है ॥
तामस जो बुद्धि कहाती है, उसका ढंग निपट निराला है।
काले को वह गोरा कहती, गोरे को कहती काला है ।
अब धृति का हाल बताता हूं, सात्विक धृति उसको कहते हैं ।
जिससे मन वश में कर प्राणी, सब धन्धे करते रहते हैं।
राजस धृति वह कहलाती है जो फल इच्छा उपजाती है ।
कर्मों का फल पा लेने में, प्राणी को सफल बनाती है।
वह धृति तामस होती अर्जुन, जिससे कि ज्ञान खोजाता है ।
निद्रा-भय-शोक-बिषादों में, प्राणी निमग्न हो जाता है ।।
AAAAAAAAA
AAAAAD

। श्रामद्भगवद्गग ता-सख्या-६
* अर्जुन का समाधान १
यों ही होता विश्व में, सुख भी तीन प्रकार ।
इसके भी सम्बन्ध में, सुनो शब्द दो चार ।।
१
है
जो पहले तो दुख पहुंचाता, पीछे से सुख पहुंचाता है ।
वह सुख सात्त्विक सुख है अर्जुन, उत्तम लुख माना जाता
लेकिन, जो पहले तो सुख दे, और पीछे से दुख पहुंचाये ।
ऐसा विषयों का सुख अर्जुन, जगमें राजस सुख कहलाये ॥
जो पहले पीछे सभी समय, बालस्य-मोह का कारण है ।
वह तामस सुख कहलाता है, जीवों के सुख का जारण है।
अर्जुन, इस संसार का, जहां तलक विस्तार ।
सत्-रज-तम का चल रहा, वहां तलक व्यापार ।।
JAAAAAAAAAAMAAAAAAAA.
इन सत्-रज-तम के ही कारण, नानाविध कर्म सुहाये हैं।
जीवों के प्रकृत स्वभाव देख, उनके बहु कर्म बताये हैं ।।
ब्राह्मण क्षत्री और वैश्य शूद्र, यह चार वर्ण जो कहलाते ।
इन चारों के हैं अलग अलग, कर्तव्य कर्म माने जाते ।।
कर्तव्य ब्राह्मण का यह है आस्तिक पगिडत ज्ञानी होना ।
शम-दम-ता-शान्ति-सरलता से, सारे जीवों का दुख खोना ।।
क्षत्रिय का कर्म बताया है, जनता पर नित शासन करना ।
दानी, तेजस्वी, दन, शूर, होकर रण से न कभी डरना ।
वैश्यों के लिए कहा है यह, वे खेती कर भण्डार भरें ।
गौत्रों का पालन प्रेम सहित, करके बहु विध व्यापार करें ।
है कर्म शूद्र का वह जिससे, वह जन्म सफल कर सकता है।
ब्राह्मण क्षत्री और वैश्यों की, भरपूर टहन कर सकता है ।

ANTHoम:
श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-६ ] 8 अर्जुन का समाधान *
(९)
अपने अपने कर्म को, करके जीव तमाम ।
पाते हैं सुख सिद्धियां, विविध भांति आराम ।।
जो जग की रचना रच करके, व्यापक जग में हो जाता है ।
वह जगन्नाथ और जगदीश्वर, माना जाता कहलाता है ।।
ब्राह्मण क्षत्री और वैश्य शूद्र, अच्छे अच्छे आचरणों से
पूजें यदि उस जगदीश्वर को, अपने अपने नित कर्मों से ।।
तो चारों वर्गों के प्राणी, चारों पदार्थ पाजायेंगे।
सच्चे प्राणी सच्चे मनुष्य, सच्चे योगी कहलायेंगे।
जो भी हों अपने कर्म नित्य, नित्यप्रति उनको किया करे ।
यदि मरे तो उनपर पराकरे, यदि जिए तो उनपर जियाकरे ।।
दुसरे वर्षों के कर्मों को ललचाना कभी नहीं अच्छा ।
औरों के कर्मों से अर्जुन, है अपना कर्म कहीं अच्छा ।।
और यों देखा जाये तो फिर, निर्दोष किसी का कर्म नहीं ।
जिसमें बिल्कुल भी धुनां न हो, होती ऐसी भी अग्नि कहीं ?
ज्ञानी और सुजान पर, है यह बात प्रसिद्ध ।
यों ही अपने कर्म कर, होते हैं नर सिद्ध ।
-
'र
आसक्ति छोड़ कर्तव्य समझ, निजकर्म किया करता है जो ।
वह पहले तो हो जाय सिद्ध फिर रहे ब्रह्म में तन्मय हो ।।
जो कर्म करे उन सबका फल, मुझको अर्पण करता जाए ।
जग की सुख दुख की भीर पड़े, तो धीर धरे नहीं घबराए ।
चित से नित भजता रहो मुझे, तो सभी विघ्न मिट जायेगा ।
छुटका प्राणी भव-बन्धन से, कल्याण परम पद पायेगा।
SENT

Accessardiathursdisher
Imudram.-1
* अर्जुन का समाधान 8
[ श्रीमद्भगवद्गात:-सख्या६
गाना
AAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAD
भजे जो मुझको चित्त लगाय, जीव वह बन्धन से छुट जाय ।
काम क्रोध और लोभ मोह से निर्मल रक्खे मन को ।
विषय भोग का मूल्य न दे, अपने अमूल्य जीवन को ।।
इन्द्रियां रक्खे जो कि दबाय, जीव वह बन्धन से छुट जाय ।।
जिसके-उर में इच्छाओं का, द्वन्द्व युद्ध नहिं होय ।
जिसके हृदय-भवन में जागे, ज्ञान-दीप की लोय ।।
मर्ग में लोकर वह नहिं खाय, जोव वह बन्धन से छुट जाय ॥
मेरे इस उपदेश पर, चल करके स्वच्छन्द ।
अर्जुन, तुम रह सकोगे, सब प्रकार सानन्द ।।
लेकिन, यदि माना नहीं, मेरा यह उपदेश !
तो फिर सहने होयँगे, नये नये नित क्लेश ॥
पर मुझको है निश्चय पूरा, उपदेश मेरा तुम मानोगे
इस कुरुक्षेत्र में इसी समय, घनघोर युद्ध तुम ठानोगे।
कारण यह है इस दुनिया में, यद्यपि नर है स्वेच्छाचारी
लेकिन फिर भी रहता है वह, निज स्वभाव का प्राज्ञाकारी ।।
तुम क्षत्री हो नत्रीपन का, जब भाव प्रबल हो जायेगा ।
तो तुम्हें तुम्हारा ही स्वभाव, रण करने को उकसायेगा ।।
जग के जीवों का जुदा जुदा, जो यह स्वभाव कहलाया है ।
सो मेरे द्वारा रची
रची हुई, मेरी ही अद्भुत माया
मैं इस माया ही के बल से, जग के व्यापार रचाता हूं
इस माया से ही जीवों को, प्रेरित कर कर्म कराता हूं।
इसलिए युद्ध से हट जाना, लुमसे न कभी हो पायेगा ।
तुम सोचोगे मैं लड़ नहीं, पर ईश्वर तुम्हें लड़ायेगा।

AAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAA श्रीमद्भावद्गीता-संख्या-६ ६ अर्जुन का समाधान * (११ अस अन्तिम निर्णय यही हुअा, सब बात छोड़ दो ईश्वर पर । और अपना निश्चित कर्म करो, निर्लिप्स और निर्भर होकर ।। बतलाया मैंने तुम्हे, यह अति उत्तम ज्ञान । जिसे ज्ञान होजाय यह, वह नर मुक-पमान ।। ऐसा नर मुक्त- समान जो हो, वह मन्धन से छुट जाता है । जैसे भी चाहे कर्म करे, पर फूल उनका नहीं पाता है ।। यह बात बड़े हो गुर की है, जो मैंने प्रक्ट बतायी है। जिसने यह बात समझली है. उसने उत्तम गति पायी है। अब सुनो, मित्र हो तुम मेरे, इसलिए साझ अतलाला हूं। जो लाख गुरों में का गुर है, बस वही तुम्हें समझाता हूं। तुम सारी चिन्ताएँ तजहर, मेरी शरणागत हो जाओ। मैं तुम्हें बचालू गा निश्चय सब पापों से-मत घबरायो । बड़ी सुघर यह बात है, गुप्त गुह्य और गूढ़ । ज्ञानी इसको जानते, किन्तु न जाने मूढ़ ।। यह मेरी गुप्त बात अर्जुन, धारण करलो उर अन्तर में । और उठा शस्त्र ले युद्ध करो, इस कुरुक्षेत्र के संगर में !! इस मेरे सुधर ज्ञान को तुम, सबको कहकर मत बतलाना । जो भक्त न हों श्रद्धालु न हों, उनको न पत्ल कर समझाना । कारण यह है जो जन, शानिन्दक है और अभिमानी है यह अमल विमल ज्ञानोपदेश, उसके नजदीक कहानी है ।। ऐसे जीवों को मेरा यह, यदि ज्ञान सुनाया जाता है । तो महिमा मेरी घटती है आत्मा मेरा दुख पाता है ।। हां, मेरे प्यारे भक्तों को, जो जन यह ज्ञान बताते हैं । वे मेरे प्रेमी होते हैं, मुझमें प्राकर मिल जाते हैं ।। GHasya AAAAAAAAAAAAA mikanummaNamewom ΑΑΑΑΑΑΑΑΑ स्पष्टOW

(१२) * अर्जुन का समाधान . [ श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-६
इस विस्तृत भूतल पर होते, मेरे अति हितकारी साई ।
उनसे बढ़कर प्यारा मुझको, दूसरा नहीं होता कोई ।।
कहें सुनें जो प्रेम से, यह सुन्दर सम्बाद ।
उन्हें सताता है नहीं, भवभय विषम विषाद ।।
जहां कि इस सम्वाद की, कथा बखानी जाय ।
ज्ञानयज्ञ. स्से वह मेरी, पूजा मानी जाय ।।
व्याख्यान-भगवान् को जितना उपदेश करना था कर चुके । श्रीमद्भगवद्गीता
के नाम से जो पवित्र और पुनीत उपदेश संसार में प्रसिद्ध है, वह यहां पूरा होगया ।
अब सम्पूर्ण गीता के सार को संक्षेप के साथ भगवान् फिर कहते हैं-]
अर्जुन, अबतक मैंने जितना, यह ज्ञान तुम्हें समझाया है ।
कहता हूं फिर संक्षेप--सहित, साद्यन्त जो कि बतलाया है ।
पृथ्वी,जल,अनल,अनिल और नभ,यह पांच तत्व कहलाते हैं।
इन पांचों से ही जीवों के, प्रस्थूल देह बन जाते हैं।
मेरी माया निज लीला से, यह पांचों तत्व रचाती है।
और तत्त्व रचाकर फिर वह ही, जीवों की देह बनाती है।
इस देह-रूप कठपिंजरे में, जीवात्मा प्रा फँस. जाता है ।
माया के चलते चक्कर में, पड़कर के चक्कर खाता है
लेकिन जब देह नष्ट होती, तो उसका नाश नहीं होता।
वह अंश मेरा अविनाशी है, सो उसका हास नहीं होता।
प्रस्थूल देह जब नष्ट हुई, तो उसका नाश न हो पाया ।
जब एक-देह से निकला तो, दुसरी के बीच चला आया ।
इसलिए किसी के मरने का, कुछ शोक चित्त में मतलाश्रो ।
जड़ देह अगर मिटती है तो, मिट जाने दो मत दुख पायो ।
दुख और सुख जो होंय सो, उनका है यह मर्म ।
आंख कान इन्द्रियों के, अर्जुन, हैं यह धर्म ॥

JALILAM DHAR DAMOH JARA MASAKAAAAAA श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-६ ] * अर्जुन का समाधान * ( १३ ) सम्बन्ध बाहरी चीजों का, जब आंखन से होता है । तब ही प्राणी सुख दुख पाकर, इर्षित होता या रोता है ।। इन सुख दुख को जो दृढता से, सइते हैं वे सुख पाते हैं । जो सुख दुख में नहिं डिगते हैं, वे हा यागो कहलाते हैं ।। बेटे पोते भगिनी भाई, प्यारी सुकुमारी वर नारी । यह जग को नातेद रो हैं, जीते जी की नातेदारी ।। जब प्राण पखेरू उड़ जाता, तब यह नाते छुट जाते हैं । केवल कर्मों के अंकुर हो, जोगों के सँग जा पाते हैं । इसलिए मोह घरवालों का, अर्जुन,कुछ लाभ न पहुंचाता । इस मोह फांस में पड़कर ही, नहिं जीव मोक्षपद पर जाला ॥ इसी मोह की भांति हैं, और झञ्झटें चार काम क्रोध मद लोम जो, मनके चार विकार । मन के इन बुरे विकारों से, बुद्धी दूषित हो जाती है । जिससे जगमें प्राणी की कृति, निर्मल नहीं होने पाती है । फल यह होता है नाना विध, ऐश्वर्य भोग सुख पाने को । नाना विध रहता मनुज व्यस्त, नाना विध कर्म रचाने को ।। और चूँ कि कर्म यह होते हैं, कुछ स्वार्थ साधने को मन का । इसलिए न बीते यक क्षण भी, सुख से जीवों के जीवन का ।। कर्मों की धुन में जब कि जीव, इस विध तन्मय हो जाते हैं । तब उनका. भोग भोगने को, चौरासी में भरमाते हैं अतएव उचित है प्राणी को, मन रखे दूर विकारों से । सच्चा सुख नष्ट न होने दे, जग के झूठे व्यवहारों से ॥ सच्चे सुख का है रूप यही, सन्तोष शान्ति मनमें पाए । पैदा होने और मरने का, आजार जीव का छुट जाए ॥ . AAAAAAAAAAAAAAAL है.

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( १४ ) * अर्जुन का समाधान [ श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-६
यह बात तभी होसकती है, जब मन काबू में बना रहे ।
अानन्द शोक सुख और दुख में, यकसां हालत में सधा रहे ।
यो मन को साध जीव अपने, निश्चित कमों को किया करे ।
पर, हां, उनके फल पाने की, अभिलाषा कुछ मन में न धरे ।।
अभिलाषा जब हो न कुछ तब मन रहे विरक्त ।
हो जग के व्यापार में, कभी न वह प्रासक्त !
रहता जो संसार में, कर इस तरह उपाय ।
भव-बन्धन उसका छुटे, और मोक्ष मिल जाय ॥
अब केवल इतनी बात रही, मन किस प्रकार सध पायेगा ।
यह बिजली जैसा चंचल है, कैसे मुडी में प्रायेगा ।
सो इसका है बस यल यही, क्रम क्रम से दूर विकार करे ।
थोड़ा थोड़ा अभ्यास नित्य करके मन पर अधिकार करे ।।
सजन पुरुषों की शिक्षा से, मन का घोड़ा दब जाता है ।
जप--तप--यज्ञादिक द्वारा भी, प्राणी मन पर जय पाता है।
बस इतनी बात याद रक्खे, यह काम नहीं पल छिन का है।
मन को काबू में लाने का उद्योग तो तीनों दिन का है ।।
यदि लगा रहेगा साधन में तो सिद्धि प्राप्त हो जायेगी ।
माया की अड़चन फिर उसके, नहिं पास फटकने पायेगी ।
मन पर काबू पाने का यह उद्योग व्यर्थ नहिं जाता है ।
हे पार्थ, जन्म-जन्मान्तर में, यह अपना फल दिखलाता है।
इसलिए उचित है प्राणी को, मन वश करने का यत्न करे ।
मन वश में जब होजाये तो, कर्मों को भी करते न डरे ।
मन वश में आ जाने पर नर कितनी ही बातें जानेगा ।
अपना और इस सारे जग का सच्चा स्वरूप पहचानेगा ।

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यामद्भगवद्गीता-संख्या-६ ] अर्जुन का समाधान *
मन वश करने का न जो, यह बन पड़े उपाय ।
तो फिर सीधी लीक है, शरण मेरी पाजाय ।
अपने मन और बुद्धि को, करे मेरे आधीन ।
अपनी सारो वृत्तियां, कर दे मुझ में लीन ।
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समझे मुझको जगका स्वामी, सबका कर्ता सब का भी ।
फिर उचित समय के आने पर, सम्पूर्ण सृष्टि का लयकती ॥
सर्वत्र झलक देखे मेरी, कतरे में भी . सागर में भी।
जुगनू में भी सूरज में भी, नारी में भी और नर में भी॥
जलचर थलचर नभचर सबमें, सब समय मुझे व्यापक माने ।
इस नश्वर जगमें मुझको ही, अविनश्वर परमेश्वर जाने ।
यह मन के भाव रहेंगे तो, सारी बातें सघ जायेंगी
निर्मलता दृढता और थिरता, क्रम क्रम से मन में आयेंगी।
जब नर मेरा हो जाता है, तो मैं उसका हो जाता
वह मेरे गुण नित गाता है, मैं उसके गुण नित गाता हूं।
* गाना
AAAAAE
मेरा नाम हरदम जो गाता रहेगा।
मुझे भी वह नित याद आता रहेगा ।।
बनेगा जो मन के विकारों का बन्दा ।
वो सुख शान्ति मन की गवाता रहेगा।
न सच्चे हैं सुख और दुख इन्द्रियों के ।
अगर इनमें धोखा तू खाता रहेगा।
तो इसमें नहीं कुछ भी सन्देह अर्जुन !
कि चोलों में तू आता जाता रहेग ।।

2010 M CouTITVN प (१६ ) AAAAAAMA * अर्जुन का समाधान ? [ श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-६ पिता माता भाई बहन को है ममता । तू कबतक युही डगमगाता रहेगा। यहाँ के यह नाते यहीं पर रहेंगे। वहाँ पर किसी से न नाता रहेगा। न है कोई ते। न तू है कि सो का। समझ ले इसे, चैन पाता रहेगा। नियत कर्म तेरे जो हों उनको करले । करेगा न तो धर्म जाता रहेगा। मगर याद रख उनमें मन फँस न जाये । नहीं तो तुझे दुख सताता रहेगा। रहेगी न बाधा कोई कोई तेरे आगे। जो गोविन्द को तू मनाता रहेगा। चलेगा जगत् में जो इस भांति 'निर्गुण' । तो जीवन तेरा जगमगाता रहेगा।" व्याख्यान-श्रीमद्भगवदगीता का सार दो शब्दों में है-'ज्ञान' और 'भक्ति' । बारंबार जन्म लेने और मरने की जो झंज्ञट जीव के पंछे लगी हुई है, वह तभी छूटती है जब जीव को ज्ञान होजाय । ज्ञान होने पर हो प्रणी को यह मालूम होता है कि मैं जगत् के व्यापारों से बिल्कुल अलग हूँ यह व्यापार मेरे नहीं बल्कि माया के हैं। मेरा उनसे रत्तो भर सम्बन्ध नहीं । ऐसो धारणा जब उसकी होजाती हैं तब जगत में रहत' हुआ भी वह जगत के व्यापारों में मन नहीं फँसाता । और इसलिए जगत के दुःख सुख उसे व्याकुल और अधीर नहीं बनाते । किन्तु जो अज्ञानी पुरुष हैं वे भूल से जगत के व्या गरों में मन बुरी तरह से फंसा देते हैं और जो चोज उनको नहीं है उसे वे अपना मानते । यह अपना मानने को धारणा हो जगज्जाल से नहीं छूटने देतो। और होता यह है कि वे एक चोले से निकलने पर अपने धन, वैभव और कुटुम्ब आदि की ममता साथ साथ रखने के कारण फिर दुनिया में आ फँसते हैं और कर्मानुसार मनुष्य, पशु या पक्षो का चोला पाकर माया के दुख सुख फिर भोगते हैं । ज्ञान प्राप्त करने के लिए बार बार यह विचार मनमें लाते रहना चाहिये कि सँसार नाश होने वाला माया का व्यापार है, और मैं उप भगवन की महान

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श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-६ ] अर्जुन का समाधान *
आत्मा का अंश है जो कभी नाश नहीं होता और जो जगत् के सारे व्यापारों
से अलग थलग रहता हुआ सदैव सुख शान्ति और आनन्द से पूर्ण है। इस
भाव को सदैव अन्तःकरण में बनाये रखने के लिए संस्कृत के एक ज्ञानी कवि
का निम्नलिखित श्लोक कण्ठ कर लेना चाहिए। वह श्लोकयों है:
श्लोकार्द्धन प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ग्रन्थकोटिभिः ।
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नाऽपर ।।
अर्थात्- जो बात करोड़ों ग्रन्थों में कही हुई बातों का निचोड़ है वह मैं आधे
श्लोक के रूप में कहे देता हूँ। वह बात यह है कि' संसार झूठा है, केवल एक
ब्रह्म ही सच्चा है, और जीव जो है वह इसी सच्चे ब्रह्म का अंश है, और
कुछ नहीं]
या तलक श्रीकृष्ण ने, वर उपदेश सुनाय ।
पूछ। अर्जुन शिष्य से, प्रेम--साहित गुप्तकाय ।।
"अर्जुन, बोलो उपदेश मेरा, यह सुना है तुमने चित जाकर ।
सो मन का संशय दूर हुया, या नहीं उसे सुन लेने पर !!
यदि अब भी शंका बाकी हो, तो करपट उसे दूर करलो !
देरी होरही शीघ्र उद्यो, धन्वा पर तीन तीर घरलो।"
मधुसूदन के इस तरह, सुने जमी वर वेन ।
अर्जुन यों कहने लगा, भरे प्रेम-जल नैन ।
"शंशा संशय सन्देह सभी, मिटगए हृदय के भीतर के ।
हे नाथ, आपकी कृपा हुई, खुलगए नेत्र र अन्तर के !
उपकार प्रभो, उपकार किया, भूले को मार्ग दिखाया है।
फैला था बहुधा अन्धकार, दोएक से उसे मिटाया है ।।
आज्ञा है आपकी शिरोधार्य, धनुषाण उठाता हूं भगवन् ।
स्थ भागे और बढ़ा दीजे, रण-रङ्ग रचाता हूं भगवन् ।।
अब से अपने तन मन धन के, जीवन के सब व्यापारों के ।
गोविन्द, आपही मालिक हैं, काया के सारे कारों के ॥

AA.A sea आधीन आपके होऊँगा । ( १८ ॥ * अर्जुन का समाधान [ श्रीमद्भगवद्गता-संख्या-६ विश्वास आप में दृढ करके कर्मों में हाथ लगाऊँगा । फल उन कर्मों का अापी के चरणों में भेंट चढ़ाऊँगा। कर एक श्राप से आपे को, पापे की चिन्ता खोऊँगा ।। बस, विनय आपसे इतनी है, अपना जन मुझे बना लीजे । भक्तों के भव-भय-अञ्जन, मेरी भव--श्रीति भगा दीजे ॥ योगिजनों के जिस तरह, रामविदित प्राराम । मेरे भी होजाइये, आप वही घनश्याम ! गाना POL RAVINAAAAAAAAADAKAMACAKALA वैनों में रहा करना, नैनों में बसा करना । जीवन-मरुस्थलो में, अमृत हो बहा करना । मैं प्रेम से तुम्हारा, होता हूं अब पुजारी । तुम मेरे मन-भवन में, ठाकुर : हो रहा करना ।। विषयों के विकारों से, पीडित हो जब पुकारूँ । तब कान लगा देना, बसं इतनी दया करना । मैं भक्ति से भ्रमर हो, विचरूँगा कमल-बन में । मकरन्द होके प्रभु, तुम, कमलों में मिला करना ।। कमी की बेड़ियां जो, मुझको कभी जकड़ लें । तो नाथ, छुड़ा लेना, उपकार इतन्ना करना । जब सब तरफ से मुझको, आशायें छोड़ जायें । तब आश का दीपक हो, तुम मन में जमा करना ।। माया से लड़ते लड़ते, हो जाऊँ मैं शिथिल जब । तब मेरो ओर होकर, माया से. लड़ा करना । अपना करो तो स्वामिन, अपना बना के रखना । भव की विपत्तियों से, उद्धार मेरा करना ।। yatrikaRamakanAmAhAAAAAAAAA KALAnandhaRARIAttacks.co.tha.ki.saksiminimasadananakamanaADAARima Masalasana -- . AaoSLREAST स्थORam ( १९ ) RUESTRoaaNARY S श्रीमद्भगवद्गीता-संख्या-६ ॐ अर्जत का समाधान * इतनी यह पावन कथा, कहकर भजो प्रकार । संजय यो धृतराष्ट्र से, बोला वचन विचार ।। "राजन् यह परम पवित्र कथा, जो मैंने तुम्हें सुनायी है। यह कथा वही है अर्जुन से, जो स्वयं कृष्ण ने गायी है। श्री व्याप्तदेव की महिमा से, यह कथा ज्ञान से भरी अक्षरशः मैंने सुनली है, माधव मुख से कही हुई श्री वासुदेव और अर्जुन की सम्बादमपी यह गाया है ज्योज्यों करता हूंस्मरण इसे.त्यो त्यो मन में सुखाता है ।। फिर वह विराट और विश्वरूप,जो दिखा चुके हैं गिरिधारी । जब उसे ध्यान में लाता हूं, तब होता है विस्मय भारी॥ मेरी तो है बस राय यही, श्रीकृष्ण और अर्जुन हो जहां अक्षय कल्याण कीर्ति लेकर, सन्तत राजेगी विजय वहां उपसंहार पूर्ण हुमा भगवान् की गीता का आख्यान । अब उसके माहात्म्य का करना सारे उपनिषदों को मानों, एक उत्तम गाय बनाया है । उस गाय के नीचे अर्जुन को, बछड़े को भांति लगाया है। गोविन्द पाप ग्वाले बनकर, उस गाय को दुहने लगे जभी । यह प्राप्त हुआ अमृत-समान, गीतारूपी मृदु दुग्ब तभी ॥ इस दुग्ध को पण्डित पी पीकर, प्रात्मा बलवान बनाते हैं । हरपाते हैं हुलसाते हैं, पुल काते हैं सुख पाते हैं । इस गीता को जो जन गाते, उनको कुछ पाप न लगपाता । जिस तरह जलाशय के भीतर, जल रहे कमल से बिलगाता॥ Aurum है कुछ गान Maner PAALAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAACKET HTTA * अर्जुन का समाधान * [ श्रीमद्भगवद् गोता-संख्या-६ गीता का ज्ञान हृदय घरके, भगवान स्वयं सुख पाते हैं । गीता के ज्ञान सहारे से, सादा संसार चलाते हैं । गीता की पुस्तक रहे जहां, सब तीर्थ वहां नित आते हैं । श्रीकृष्ण श्राप उस जगह पहुँच, अपना शुबधाम बनाते हैं ।। गीता में ज्ञान कहा है जो, वह अत्यद्भुत है अनुपम है । पापों का कल्मष धोने को, वह निर्मल गंगाजल-सम है ।। सारांश यही अति पुण्यपूर्ण पावन और परम पुनीता है । कलिमलहारिणि,भवभयदारिणि,दुखदुरितनिवारिणिगीताहै।। गाना MADAALAAAAAAA ॥ TOP । गीता तारिणी है, विपद् -विदारिणो है । मंगल-कारिणी है, सुख- संचारिणी है । गीता को नित पढ़ता जो नर , श्रद्धा-सहित सप्रीति । उसे सताती कभी न आकर, भीषण भव की भोति । कल्मष-हारिणी है, क्षेम-प्रसारिणी है । गीता तारिणी विमल ज्ञान-गङ्गा है यह, जो कलिमल करती नाश। थोड़े से हो श्रवणमात्र से, छूट जाय यमपाश ।। माया मारिणी है, दुरित-निवारिणी है । होता तारिणी ॥ जहां कथा होती गोता की सुन्दर सुखद रसाल । वहाँ निवास करें निशि वासर, स्वयं कृष्ण गोपाल !! बाधा-वारिणो है, पातक--जारिणी है । गीता तारिणी ॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु % समाप्त - T पं. द्वारा लिखित नाटक महाराजा भर्तृहरि १-) पृथ्वीराम || भजन गाने व राजले वीर अभिमन्यु १) श्रीराधेश्याम-गीताञ्जलि ११॥ महर्षि वाल्मीकि १) राधेश्याम विलास १%) सती पावती १) राधेश्याम-कीर्तन ईश्वर-भक्ति १॥) राधेश्याम भजनमाला परस-अक्त प्रज्ञा १) प्राचीन भजनमाला परिवर्तन २॥) मोहन-कवितावली श्रीकृष्ण-अबतार ११॥) मुसाफिर की पाकेट बुक रुक्मिणी-मङ्ग १०) प्रेम-रत्नावली द्रौपदी-वयस्कर निजानन्द प्रदीपिका. श्रवणकुमार गृहिणी गीताञ्जलि १%) आनन्द-लहरी ऊषा-अनिक १) मीरा भजनमाला मशरिकी हूर १) बोध-प्रकाशी भारत-माता पद्य-पुष्पांजलि कृष्ण-सुदामा आरती संग्रह शान्ति के दूत भगवान् श्रीकृष्ण -) ग़जलों का गुलदस्ता सेवक के रूप में भगवान श्रीकृष्ण ।-)| राजाल-सागर घण्टा-पन्थ 13) पद-पुस मोहन भजनमाला नोट-नाटकों में वीर अभिमन्यु | मोहन गीतावली श्रवणकुमार, और मशरिक़ी हूर, उर्दू में मोहन संगीत शिक्षा भी छपकर तैयार हैं। दाम बड़ी जो सीताराम-कीर्तन हिन्दी में है। अमर-गीत-साला न्यू अल्फ्रेड थियेट्रिकल कम्पनी प्राफ़ मीठी गुजार ) मधुर मुरली ) बम्बई द्वारा खेले गये रसीली तान ) कुसुम-कुंज असली व मुकस्मिल नाटक बसंतवाटिका ) पक्षा-पराग भूलभुलैयाँ १) दिलफरोश १) अन्य पुस्तके चलता पुर्जा १) शरीफ बदमाश १) -) सुबाले हस्ती १) श्रकृता दामन सतलड़ी il) पश्चों का प्याला।)। खूबसूरत बला१) हिन्दू विधवा १८) अजायब घर ill) धनुर्विद्या 1) भारत व्याकुल थियेट्रिकल कम्पनी प्रेत-लोक. १॥) नौलखाहार ॥) लिमीटेख प्राक मेरठ द्वारा खेले गये ज्योतिष-प्रकाश ||) सृष्टांत महासागर १॥) असली इ मुकस्मिल नाटक | वियोग-कथा 12) मोहन माल ) तेगोसितम १०) सम्राट चन्द्रगुप्त १-) हनुमानचालीसा ---)|| सुन्दरकाण्ड ।। ܣܙܕܝܪ A PMPM भक्त नियाँ 1) अमरकोष पता-श्रीराधेश्याम-पुस्तकालय, बरेलो ।

नकली किताबों से बचिये हमारी रामायणा और हमारे नाटकों का कानी प्रचार देखकर लोगों ने उसी रंग और रूप की नकली किताबें छाय छापकर प्रकाशित करदी हैं। नदालों की कई बरस की कोशिश का नतीजा यह है कि बाजार में नकली किताबों की भरमार है। यह नकली किताब )॥ में बुक्सेलर को दी जाती है, जिसे बुक्सेलर -) या ) या ) में बेचकर शायदा उठाता है और इस प्रकार प्राहक को धोखा दिया जाता है। माहक जब ऐसी किताब को घर ले जाता है तो पछताता है। श्राहक को ऐसी धोखेबाज़ी से बचाने के लिये अब हम अपनी छर एक किताब के ऊपर अपनी तस्वीर देने लगे हैं,जैसी कि इस किताब पर आप देख रहे हैं। अब श्राइन्दा से श्राप धोखा न बाइयेगा- ध्यान रहे- जिन्द किताबों पर-"राधेश्याम” या--"राधेश्याम वाशिष्ठ या "तर्ज-राधेश्याम' छपा रहता है, वह हमारे यहाँ की नहीं हैं। हमारे यहाँ की किताबों पर हमारे यह दस्तखत भी रहते है ! इन्हें पहचान लीजिये- - Preharatana भवदीय- राधेश्याम कथावाचक मालिक----श्रीराधेश्याम पुस्तकालय व प्रेस, बरेली।

Srimadbhagvadgeeta

Author
Pt Ramnarayan Pathak
Title
Srimadbhagvadgeeta
File name
Srimadbhagvadgeeta
Text
OCR done
Citation
1946
Publisher
Shree Radhayshayam Press Bareli
Language
Sanskrit
Pages
163
Library
Bb Library Allahabad
Classification
Literature
DLI number
273817
Barcode
5990010894429.00
Scanning centre
IIIT, Allahabad
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