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Kshatikratiyo Ka Kanun
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प्रश्नोत्तरमाला
क्षतिकृत्यों का कानून
(THE LAW OF TORTS)
[ नवीनतम अधिकृत निर्णयो से समन्वित सरल व्याख्या ]
सेन्ट्रल ला एजेन्सी
यूनिवसिटी रोड
इलाहाबाद
प्रकाशक
सेट्रल ला एजे सो
यूनिवसिटी रोड
इलाहाबाद
मर्वाधिकार प्रकाशक के आधीन
मुद्रा-
धोरमलप्रेरा
जीरो रोग,
साहायाद
अनुक्रमणिका
पृष्ठ
१
८०
अध्याय
विषय
१-सामाय पिद्धात (General Principles)
२-क्षतिकृया का वर्गीकरण मोर उनके प्रति उपाय (Classification
of torts and Remedies)
३-परीर के प्रति क्षतिकृत्य (Wrongs to person)
४-मानहानि (Defamation)
५-पारावारिक सम्वघों के प्रति क्षतिकृत्य (Torts to Domestic
Relations)
६-स्वतन्त्रता व प्रास्थिति पर प्रभाव डालने वाले क्षतिवृत्य
(Wrongs affecting freedom and Status)
७-सम्पत्ति के प्रति क्षतिकृत्य (Torts to property)
5-191 (Nuisance)
E-maumit (Negligence)
१. सविदा पर भाषारित क्षतिकृत्य ( Torts foundedon
Contracts)
११-व्यापार सम्बधी क्षतिकृत्य (Torts relating to business)
१२-विविष (Miscellaneous)
११२
१२५
१२८
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१ सामान्य सिद्धान्त (GENERAL PRINCIPLES) प्रश्न -'टाट' (क्षति कृत्य) श द की परिभाषा लिखिए और उसके विभिन्न तत्वों का वमन कीजिए। उत्तर परिभापा-टाट' शब्द को यो पत्ति लैटिन भाषा के 'टाटम' (Tortum) दाद म हुई है। इस शव का अग्रेजी पयायवाचा शर (Wrong) है मौर हिन्दी पयायवाची श- 'क्षतिकृत्य' है । अग्रेजी कानून व साहित्य में इस शब्द का प्रयोग सबप्रथप नामन विधिनास्त्रियों ने किया। उनक मतानुसार इस गब्द का प्रय उस कृत्य से है जिससे दि किसी व्यक्ति विशेष का विधिक क्षति - Legal dam. age) पहुँचे और दातिकर्ता को उसकी क्षतिपूर्ति करना पढे । ममाजगास्त्र को वृहत मान सहिता ( Encyclopaedia of Social Sciences) में कहा गया है कि टाट-सम्बन्धी दायित्व सविदा भगोकरण (Breach of Contract) दायित्व से भिन्न ऐसा दायित्व है जो कानूनी सामाच क्तयों का पालन न करन के कारण माता है पौर जिसका प्रतिकार क्षतिपूर्ति देर हो सकता है । चम्बस के शाप में 'टाट' पशब्दमा मथ इस प्रकार दिया है-'टार, वह क्षतिपूण या अनुचित कृत्य है जिसका उदय सविदा को भग करने के कारण न हुभा हो और जिसमें पहुँचो क्षति को पूरा करने का एकमात्र उपाय क्षतिपूर्ति देना हो।" प्रसिद्ध विधिशास्त्री डा. अरहिल (Dr Underhill) न 'टाट' को परि भाषा देते हुए कहा है कि 'टाट' सविना स पूर्णतया स्वतत्र एमा कृत्य है जो क्सिो व्यक्ति के पूरा अधिकार (Absolute right) को भग करता है या किसी व्यक्ति के परिमित पधिकार (Qualified right) को भग करके उसका क्षति पहुँचाता है अपवा विसी सावजनिक अधिकार (Public right) को इस प्रकार मवहननावरता है जिससे कि रिसी यक्ति विशेप का माम व्यक्ति या की अपेक्षा अधिक क्षति पहुंचती है मौर जिस परिणामस्वरूप वह तिरा (Tort feasor, के विरुद्ध क्षतिपूति के लिए मुकदमा चलाने का अधिकारी हो जाता है। उदाहरणार्थ, यदि कोई व्यक्ति विसो व्यक्ति को भूमि पर मनाधिकार प्रदेश (Trespass परे भोर उछ समय तक उस पर माधिपाय (Possession) रखने के २ क्षतिकृत्य विधि पर प्रश्नोत्तर बार बिना हानि पहेवाये पालो पर द तो एसी स्थिति में उस व्यक्ति का जिसकी भूमि पर मनाधिकार प्रदेश विया गया उम व्यक्ति पर जिमने मनाधिकार प्राशि टाट पानून र मन्तगत नाममा जाने पर पितार है मावि पनाचित प्रवेश (Trespasset) ने उमर इस कानूनी अधिकार को कि वह मरनी भूमि पर किसी पोन पान द, भग दिया। स्मरण रहा कि 'टाट' वो एक सुनिश्चित पोर पर परिभाषा देना पटिन है। इस कारण यह है । इस विषय का बातून प्रभा दिवस की परिपत्र मस्या को प्राह नहीं हमा है और न कानून की इस गया का पभो सहितारण (Codifi cation) हो पा है । इस विषय पागमन कानून इगनै ड क सपसाधारण बानून (Common law ) पर मामत है । भारत में भी अपनी टाट सम्बधी माई विधायर धिनियम (Legislative enactment) नही है। इसलिए मारत में भोगानुनम पाखा के य हो गिदा त सान रिय जाते है जा गले म प्रचलित हैं। लेपिस्थितियो । मनुमार भारतीय मायालयों का धिर है शिव मनजी पानुन वे ऐसे गिटातोपा उमक्षा पर सका है जो भारतीय जीवन य रोति रिवाज पादित मन नही खाते [वतार प्रति रामवर, ए. पाई. भार० १९५५ नाटा ५६४] वों की व्याया-उपयुस विवचना से यह मलामी त स्पष्ट है कि 'सर्ट' मयमा शातिरस राशि से पूणुनया स्वत र ऐमा प्राय है का विपी पति पानी धिमार को प्रत्यक्ष या परा प म मा परे पपवा पहनाकर शनि परपाय पोर गिरा द्वारा पयो क्षति को पूरा करने का मार बानूनी उपाय पहिपूर्वि देना होउसमे निम्नलिखित तीन तयों का हा पाया है- (१) प्रतिद्वारा पा लिया जाना जो किसी गति को l का नग पर हो शमिपूजन हो गया हा, प्रतिमा पर निगो यपि पन्तान न frया गया हा पोर प्रनियाको पापपरामा प्रत्यय या पल रूप में जाननी पपिरात न हो, (३) १५ गवा को प्रस या परोम विधि क्षति पहुँधो हा, पांड यो रियो मानी मधिर को भाया गया हो अथवा दो माहेलना र मापा गयोहा, एप (१) ऐem मोति का पूरा मा साना उपाय आपूरि क्षतिकृत्य के सामाय सिद्धात प्रश्न २-मन्तर स्पष्ट कीजिय- (म) क्षतिकृत्य (Tort)ोर मविदा भगावरण (Breach of Contract), (a) क्षतित्य (fort) और अपराध (Crime), (स) चातिकृत्य (Tort) और प्रयास भगाकरण (Breach of trust) उत्तर (अ) क्षति य (Tort) और सरिता भगीकरण (Breach of Contract) म अन्तर-क्षतिकृत्य मोर सविदा भगोकरए अलग अलग कोटि कृत्य हैं, जिनम म तर निम्नलिखित है (१) क्षतिकृत्य के मामले मे काई व्यक्ति उन पत्त-पों को भग करता है जिहें पानून ने प्रत्यक्ष मयवा पराक्ष रूप स निर्धारित किया है, लेकिन सविदा भगीकरण के मामले में यह उन क्त्तव्या का भग करता है जिहें करन या न करने का उसने स्वय वचन दिया है। (२) क्षतिकृत्य जनसाधारण के प्रति कानूनी पत्ता का उल्लघन है लेकिन सविदा भगोकरण में जिस मत्तय का उल्लघन दिया जाता है वह एमा त्तन्य होता है जो पिसो निश्चित व्यक्ति विशेष के प्रति हा। (३) क्षतिकृत्य के मामल में अक्सर अतिक्त्ता उद्देश्य पर विचार किया जाता है लक्नि सविदा भगोवरण व मामल में सविदा को शतों का तोरने वाले व्यक्ति क उद्देश्य पर विचार नहीं किया जाता है । (४) क्षतिगत्म क मामले म क्षतिपूर्ति ८० के रूप म दी जाती है, लेकिन सविदा भगाकरण के मामले में सविता की शो का उल्लघन बरनवाला व्यक्ति प्रतिपक्षी को उसकी हानिपूर्ति करन के लिए प्रतिकर (Compensation) के रूप में पधिकतर सविदार पन्तगत निधारित क्षतिपूनि देता है। (५) क्षतिपूति को धनरानिया मापाइ सतित्य एव सविता भगोकरण के मामलों में विभिन्न नियमा के भगत निश्चित हाता है । तिकृत्या व मामलों में सतिपूति को धनरातिमदा पूर्वनिश्चित नहीं हाती, जबपि सविदा भगीकरण के मामलों में वह प्राप पूर्व निश्चित होतो है। स्मरण यह कि पद्यपि दातिकृय पोर सविदा भगीकरण विभिन्न पोटि के कृत्य है, फिर भी एमे मामन हो सकते हैं जिनम ए हो कृत्य की क्षति कृश्य पौर सविदा भगीरण मतगत रखा जा सकता है । उदाहरणाय, कोई पिता पने बीमार पुत्र चिकित्सा क लिए रिसी शरर की नियुक्ति करता है पौर डॉक्टर के क्सिो अविवपूर्ण कृत्य से पुरमा मापात पहुंच जाता है, वो एमो स्थिति म पिता डक्टर सतिगृप विधि पर प्रश्नोत्तर थे विरद सविदा के माधार पर मुकदमा चला सकता है और पुत्र हाटर के मधियेक- पूण मृत्य से पहुँचे पापात को क्षतिपूर्ति के लिए अतिक्रय थे मापार पर मुकदमा घला सकता है । ग्लहवेल प्रति स्थगल, एल० ज० सी० पी० ३६१] । (था क्षतिपुष्य (Tort) और अपराध (Crime) में अन्तर-माधुनिक पानून मतगन क्षतिगृत्य और पपराध मे भारी मतर है जो निम्नलिखित है (१) अतिवृश्य रावसाधारण प्रति कानुनी पत्तव्यों का उल्लघन परने से उद्दीत होता है, सचिन अपराध वह गैरकानना कृत्य है जो कानून द्वारा इस धारण वजित है कि यह समाग लिए प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष र स घातक है । (२) क्षतिपय व्यक्ति विशेष के वानूनी अधिकारों को भग करता है, लेकिन मपराप समस्त गमात्र के विपरीत गैरवाननी व मनैतिक हरय है। (३) क्षतिपत्य के मामले में तिक्ता ( Tort fessor ) को सतिप्राप्त (Aggrneved) व्यक्ति मोक्षतिपूति देकर मुक्ति मिल जाती है, लेकिन पपरापी व्यक्ति की राग्य पिरत परता है। (४) शातिपय या मुदमा पलाना व्यक्ति वा व्यक्तिगत मामला है लेकिन अपराधी को देने के लिए उस पर मुपदमा पलाने का उत्तरदायित्व राम्प पर है। (५) सिप मामल में सतिपत मे जो धनराशितिपूनि मे रूप में प्राप्त भी जाती है यह पातिप्राप्त व्यक्ति को मिलती है, दिन पपराप के मामले में प्रपराधा सपपदण्टम जो धनराधि प्राप्त होती है वह रामयीय पोप में जाती है। (६) हतियप के मामले म धनिप्रात पति को क्षतिपूर्ति करना यायलासा गर उद्देय होगा। सनि मायब मामले माया I मुख्य उद्देश्य मारापाको दण्डहर प्राराप को प्रवृत्ति को राना। Fमरण रह किया जाय अपराध हाता है यह पसार क्षतिपरय भी होता है। उपपणाप, मानमा मनधिकार प्रवेग, गानरसानी व मानहानि मादिको प्रररर है। इन करनेगा दोषो यति विष्ट मुरमा पनार दीवानी पापामय से तिपूर्ति या प्रतिपर पौरिमी प्राप्त होना सरती है पौर पोरगरीमायामयमा पिापी बासरती है। (1) यि (Torr) और प्रन्यास भंगीकरण ( Breach of Trut) मेंr-गामा ( Salmond) रे मतामा नियमाप्रपा भगोरा म प्रतरत्र ऐतिहागिर है। शनिपाना पत पौत्री सप- क्षतिकृत्य के सामाय सिद्धात ५ साधारण कानून (English Common Law) का एक भाग है जिसका अधिक्षेत्र सर्वसाधारण यायालयो ( Common Couris) को प्राप्त था। इसके विपरीत प्रन्यास भगोवरण का दायित्व निरपेक्ष न्याय (Equitable justice) का विषय है जो वेवल चा सरी “यायालयो (Chancery Courts) के अधिक्षेत्र मे था । विनफोल्ड (Winfield)न क्षतिगृत्य और प्रयास भगोकरण में क्षतिपूधि के विषय में भी प तर किया है । उमरे मतानुसार प्रयास भगोकरण के मामले म क्षतिपूर्ति के लिए प्रतिकर को धनराशि गबन हुई प्र यासगत सम्पति के मूल्य के बरार होती है, लेकिन क्षतिकृत्य के मामल म क्षतिपूर्ति को पाराशि को निश्चित करने के लिए एसा कोई मापदण्ड नहीं है। प्रश्न ३-क्या एक ही कृत्य नविकृत्य, अपराध तथा सविदा भगी फरस तीनों हो सकता है ? उदाहरण हित व्यारया कीजिए। उत्तर व्याख्या-क्षतिकृत्य, अपराध तथा सविदा भगीकरण तीनों अलग अलग कोटि के कृत्य है । लेकिन ऐसा भी कृत्य हो सकता है जो एक साथ क्षतिकृत्य, मपराप तथा सविदा भगोकरण तोनो हो। उदाहरणाय, एक व्यक्ति एक मोटरकार सरीदता है और अपने नगर को नगरपालिका (Municipal Board) से यह यविदा करता है कि वह सविदा के मतगत निर्धारित गति से ही नगरपालिका के क्षेत्र में मोटरकार चलायगा। उस राज्य को दण्ड सहिता में यह प्रविधान भी है कि यदि कोई व्यक्ति मसावधानी और तीव्र गति से मोटरकार चलायेगा तो उम दण्ड दिया चायगा । मान लीजिए कि वह व्यक्ति उक्त सविदा में निर्धारित गति की उपेक्षा कर प्रसावधानो और तीव्र गति से नगरपालिका क्षेत्र में मोगरकार चलाता है और किसी व्यक्ति को घायन वर देता है तो उसके इस एक वृत्य के लिए उस पर अतिवृश्य, राप पौर पविता भगीररण तीनों प्रकार का दायित्व मा जायगा। क्षतिकरय कानून के मतगत वह पायल व्यक्ति उसके वि दीवानी न्यायालय में क्षतिपूर्ति प्राप्त करने के लिए दावा परेगा, राज्य को सरकार द- साहिता के प्रविधानों का उल्लघन करने के पाराध में उसके ऊपर फौजदारी यायालय म मुकदमा चलायगो पार नगरपालिका उस पर इस बात का मुकदमा चलायगो कि उसन सविदा को धता को तोड़ा है। इस प्रकार ए ही दृश्य में क्षतिकृस्य, अपराध पौर सविता भगोकरण तीनों का समन्वय हो सस्ता है। स्मरणीय बात यह है कि उपयुक्त कृश्य को वैयक्तिव दृष्टिकोण से देखने पर रोरानो दायित्व मोर सामाजिक दृष्टिकोण से देखने पर फौजदारी दापिरव उदित होता ६ शनिबार रिधि पर प्रश्नोतर है। सालम3 (Salmond) 7 वपन है कि दोनो और फोरदारी शामिर एक दूसरे के पेपर (Alternature) नहीं, बरि समवनों (Concurrent) हैं। इगलेण्ड में सन्न दामह रामद है कि इस प्रकार के मामले में दोषो जति पर उस समय र धोकानोन्यायालय में धम्पूिनि प्राप्त करने के लिए मुरदमा रही पतारा जा सरता व तारि उगक विस्त पारदारी बालात मे मुरदमा न चताराबार । मेरिन भारत में कानून का पर रा नहीं है। यही अतिप्राह कहि क्षतिषता में विस्त सोपा दीवानो न्यायालय में पूनि मान मरने के लिए दास र समता है और यह प्ररूरी नहीं है कि वह पहा फौजदारी कायालय में सरे विस्त मुषमा पलाये। उदाहरणाप, नुक्सान रसानी, मानहानि गोरी मारि मो में पावकारीवालत में मुस्दा पपारे दिना भारत मे पातीर पर दोवानी मायालय में सरिपूत के लिए दारारिया जाता है। प्रश्न ४-तिकृत्य (Tert) फे विमा भेटों की उदाहरण सहित व्याख्या कीजिये। अत्तर सविपत्य फे भेद-साधाररत मिरवदोकार के होने है- (स्वत अभिवोर विक (Torts actionable per ce), कति ऐसे धनिहरप जो स्वभिनय (Acronable) हैं और जिनमे प्रति यो मारिस्त करने की पार पाना नहीं होती एव (२) ऐसे सतित्व को स्वत अभियोग्य नहीं होते भौर जिनमें क्षति को प्रसारित करना अरूरी होता है। प्रम प्रसार के तिल को समझने के लिए माहासाप मान लीजिए कि माता कोई मिस निर्वाचन क्षेत्र से जिनके पाप निवामी हैं मार मारो मत देने का परि है विधान सभा को मरता के लिए सा होता है। भाप भी मतदान के लिए शते है । लेकिन मान-अधिकारी मापको मन देने से रोक देता है। चुनाव का परिणाम घोदित होने पर माको गात होता है कि मा मित्र जुनार मे विषयी हमा। एनो स्पिनि में पापको मतदान अधिकारी द्वारा मत देने सरोज देने पर भी पिसी प्रकार को पति नहीं हुए, क्योंकि जिस माह को पाप मत देश पाहते देवर सापके मन करिनामो विरसा हो गया। फिर भी मार दान-प्रधिकारी के विस्त रातिपादन के मन्तगत क्षतिपूति का सारा कर सकते है. लोंकि उसने भापके मत देने के रानी तिरा रिसा। इस प्रकार का नित्य स्वत अभियोर सातिपखों को कोटि में भारया) दूसरे प्रकार के निरसो के लिए हम नमो सतिपूति गदारा र सरते हैं पर हम यह प्रमाणित कर सकें कि मनुक साल से हमें वास्तव में क्षति पहुंची है।
क्षतिकृत्य के मामा म रिदात मानहानिकारक वचन (Slander) इसी प्रकार का क्षतित्य है, क्योंकि वचन द्वारा मानहानि करने वाले व्यक्ति पर हम तभी क्षतिपूति का दावा कर सकते हैं जब हम यह प्रमाणित कर दें कि हमें उसके रस वचन से वास्तविक क्षति पहुँची है । इस कोटि में वास्तविव' क्षति (Actual damage) का परिस्थिति म अभियो य क्षनिकृत्य रखे जायेंगे। - प्रश्न५ -क्षतिकृत्य सम्बन्धी दायित्व के थाधार के विषय में जो दो प्रतिद्वन्दी सिद्धान्त हैं उनसे आलोचनात्मक व्याग्या बीजिए। उत्तर क्षतिकृत्य सम्बन्धी दायित्व का आधार-मरिकृत्य सम्बधी दायित्व के माधार के विषय म वडा मतभेद है। हम मतभेद को दूर करने के लिए दो प्रतिद्धन्दी सिद्धान्त प्रतिपादित किए गए हैं जा निम्न प्रकार हैं प्रथम मिद्धान्त-यह सिद्धात सर 'डरिक पोलार (Sir Fredrick Pollock) का है । इस सिद्धान्त के अनुसार सभी प्रकार की क्षति जो एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को पहुँचाता है पौर जिमके लिए कोई काननी बचाव नहीं है क्षतिवृत्य सम्य धो दायित्व के मतगत पाती है। उदाहरणाय, यदि क' अपने पडोसी को कोई क्षति पहुँचाता है तो वह पडोमो 'क' के विरुद्ध क्षतिमृत्य कानून वे मतगत मुकदमा पला सकता है, पाहें उस धाति को प्रारमण, छल मानहानि यादि कोई विशेप नाम दिया जार मथवा कोई विशप नाम लिया हो न जा सक। ऐसी स्थिति में यदि 'क' कोई कानुनी बचाव प्रमाणित नहीं करता तो उस पर क्ष िकृत्य सम्बन्धी दायित्व मा जायगा । हम सिदात के एक समय लाइ वामडन (Lord Camden) ने कहा है किक्षातकृत्य मन त मोर उहे परिमित नहीं किया जा सकता | नए नए क्षतिकृत्यों पापाविर्भाव इस सिदात की विशेषता है । द्वितीय सिद्धात-म सिद्धान्त के अनुसार क्षतिकृत्यों का सत्या परिमित है पोर उनके पतिरिक्त प्रय विसौ कृत्य के लिए निकृत्य मरथी दायित्व नहीं पाता | इस मिदात के प्रमुग समय र मर जान मालम - (Sir Joha Salmond) पोर डार जैक्स (Dr Jenks) है । इस मिदात के समयन म मर जॉन सालम ह (Sir John Salmond) न एमे मामलों को उद्धृत रिया है जिनम विसो व्यक्ति द्वारा दिया गया कृस्प हानिकारण तो हो वितु भाटिपूण न हो। एम विना क्षति के हानिकारक कृत्य (Damnum sine injuria) क्षतिवृत्य सम्म यो दायित्व में प्रतर्गत नहीं माते । लेशित बिना क्षनि वे हानिकारक कृत्यों न य मामले जिन पर सालमाड (Salmond)का समापन निभर पाता है इस सिदात को पुष्टि नहीं करते।
क्षतिकृत्य विधि पर प्रश्नोतर - बात यह है वि वानव म कानून कानूनो मधिकारा के भगोवरण को ही विधि क्षति (Legal damage) मानता है । यह विधिक क्षति न तो वास्तविक क्षति (Actual damage) के अनुरूप है पौर न ही इसका तात्पय प्राणिय क्षति (Peruntary damage) से हाता है। वागे माननो अधिकारों को रिमो प्रकार भा भग परने को क्षतिकृत्य कानन क पतगत विविध क्षति पहग, पाहे उन प्रपितारा ने इस प्रकार मग करन से वादा को नारा प्रपवा प्राधिक क्षति न पहुँची हो। होकर जैक्म (Dr Jenk) का मत है कि इस सिमान्त का तात्पय यह नहीं है रि नए सानियत्यो वा प्राविभाव हा हो नहीं सकता, बहिल बात यह है कि नए क्षतिकृत्य माया प्राप्त मूल क्षतिकृत्यो से हो उदित होने हैं। इसका अभिप्राय यह है कि नए क्षतिपरयों का मूल इस सामाय सिद्धात पर निभर नही परता दि हरेक अनियमित हानि क्षातत्य सम्ब धो दायित्व व मन्तगत पाती है । डाक्टर जैक्म(Dr Jenks) को यह दलील बल गाली पवश्य है किन्तु सभी मामलो में समयानुकूल प्रतोत नहीं होती । उदाहरणाय, पशु मनाधिकार प्रवेश (Cattle trespass) के क्षतिकृत्य का दायित्व जैसा कि माधुनिक व प्राचीन कानूना में है उसम कोई बुनियादी समानता नही दीखती। रले इस प्रति पनचर, (१८६८) ३७ एल पार ३ एच एल ३५०] यह बात भी है कि क नन इतना शक्तिहीन प्रमाणित नहीं हुमा है कि नए दायित्व मोर नए वत्त यों का माविर्भाव न कर सके । [डाग्यू प्रति स्टोवेसन, (१९३२) एस सी ६१६] विकास कानून का नियम है। कानून ज्या-ज्यो विकसित हो रहा है भतिवृत्य सम्बधी दायित्व के लिए सामाय सिद्धान्त भी प्रतिपादित हो रहे हैं । प्रश्न ६-क्षतिपूस कृत्य और हानिपूर्ण कृत्य में क्या अन्तर है ? क्या न्याययुक प्रतियाग्यवा स पहुंची हानि के लिए क्षतिपूर्ति का दावा चल सकता है ? उदाहरण सहित विवेचना कीजिए। उत्तर क्षतिपूर्ण (Wrongful) कृत्य और हानिपूण ( Harroful) कृत्य-सरपरी दृष्टि से देखन पर अतिपूरण पृत्य व हानिपूण वृत्य एक ही प्रतीत होते हैं । लेकिन प्रपत्र में ऐसा नही है । क्षतिकृत्य कानून के सदभ मे क्षतिपूण वृत्या से तात्पय उन कृत्यों स है जो हमारे कानूनी मधिशारा को भग करते हैं, चाहे उन वृत्यों के परिणामस्वरूप हमे कोई हानि न पहुँचो हो । इसके विपरोत कुछ कृत्य हानि पूष तो होते हैं कि तु कानून की दृष्टि से वे क्षतिपूण नहीं हाते । ऐसे कृत्य पतिकृस्य कानून में हानिपूण कृत्य कहलाते हैं। धातिपूण कृत्यों के विषय में यह बात स्मरणीय है कि जब वोई क्षतिपूण कृत्य किया जाय तब क्सिो को वास्तविक हानि पट्टेचे हो, यह जरूरी नहीं है । इस कृत्य की अनिवृत्य के सामाय सिद्धात ६ एपमान पहचान यह है कि उससे हमारे किसी कानुनी अधिकार का उल्ल उन हान चाहिए । उहणाथ, अनाधिकार प्रवेश विना हानि पहुँचाये भो क्षतिकृत्य कानून के- मतगत अभियोज्य है। जब रिमो कृत्य द्वारा किमो शक्ति को हानि तो पहुँचो हो कि तु उसका कोई कानुनी भधिकार मग न हुमा हो तो हानि प्राप्त व्यक्ति का क्षतिपूर्ति पान का मधि- कार नहीं होता । दातिवृत्म पानून में यह बिना क्षतिपूण हानिकारक कृत्या (Dannum sinc injuna) का सिद्धान्त कहलाता है । इस सिद्धान्त के विपरीत एक और सिक्षात है जिसके मनुमार यदि किसी व्यक्ति का कानूनी अधिकार भग किया गया है और उसके द्वारा उसे कोई क्षति नहीं पहुँची है ता भी वह अपने कानूनी अघि कार को भग करने वाले के विष्ट क्षतिपूर्ति के लिए दावा कर सकता है । इम मिद्धान्त को बिना हानिकारक क्षतिपूण वृत्यो' (IDur1a sinc damno ) मा मिद्धात पहृत हैं । ऐसे मामलों में क्षतिपूर्ति का दावा करनेवान व्यक्ति को केवल इतना ही सिद्ध मरला होता है कि उसक कानूनी अधिकार को नग किया गया है और यह बात महत्व हीन है कि उस कानूनी अधिकार वे भग किए जान स उमको वास्तव में हानि हुई है अथवा नही। एसवी प्रति ह्वाइट, २ लिड रेयम० १३८] न्यायुक्त प्रतियोग्यता क्षतिपूस कृत्य नही~~याययुक्त प्रतियोग्यता को कानन में सव मा पता दी जाती है । अतएव ऐमा प्रतियोग्यता (Competition) के परिणामस्वरुप किसी को हानि पहुचे तो हानिरता उस हानि को पूरा करने के लिए पार नहीं है। मथात् उसरे विरुद्ध नमक हानिपूण कृत्य से पहुँचो हानि के लिए क्षति पूर्ति का दावा नहीं चत्रमा । एक प्रसिद्ध मामला इस स भ म उल्लेखनीय है । जल कुछ प्रतिद्वदो यम्पनियों म यह प्रतिमोग्यता हुई कि प्रतिपक्ष को कम्पनी को पसाप से मरलने पर विवश किया जाय। एक पक्ष को चार कम्पनियों के स्वामियो ने यह पोपहा कोहि प्रतिपक्षी की पांचवों कम्पनी द्वारा माल न भेजकर यदि सनको धार कम्पनियों क द्वारा माल भेजा जायगा वा विप छूट दी जायगो । इस पर पच जलयान कम्पनी को व्यापार म हानि हुई मोर उमन प्रतिद्वनी सम्पनिया पित तिपूर्ति का मुकामा पलाया। इस मामल में निणय हुआ कि व्यापारिक प्रतियोग्यता द्वारा पहुँचो हानि मभियोग्य { Actonabic) नहीं है, क्योंकि उससे पापी म्पनी का कोई कानुनी प्रपितार मग नहीं हमा मोगुल स्टीम शिप सापनी प्रति एम० प्रबर, १८८२ ए.सी. २५] -"जिस प्रकार ऐसे मामले हैं जिनमें शति विकृत्य के यानको क्षतिपय विधि पर प्रश्नोत्तर रूप में अभियोग्य नहीं होती उसी प्रकार ऐसे मामले भी हैं जिनमें किया नयाय मिना चानि पहुँचाये भी क्षतिकृत्य के रूप में अभियोज्य होता (खालमण्ड) उपर्युक्त क्थन को उदाहरण सहित व्यारया कीजिए। उत्तर व्यारा-पया न ४ का उत्तर दबिए और निम्नलिपिताना मतिरिक्त प्रध्धयन बौजिए। शातिहत्य कानून का यह सामा य उद्देश्य है कि व्यक्ति के पानी अधिकारो की गा की जाय। हम उद्देश्य को पूर्ति के लिए वह पाग देता है कि यदि किसो प्यक्ति कस्य स किसी भय व्यक्ति का पाई कानूनी अधिकार भग होना है तो वह विधिक क्षतिपूर्ति के लिए उत्तरदायी है, चाह उसके कृत्य से दूसरे व्यक्ति को कोई वास्तविक पाति न पहुँचो हो । सामड (Salmond) न इस उहप को व्याख्यापरते हा यह मिटान प्रतिपादित किया है कि जिस प्रकार कुछ मामलों म रिसो पिसी यो हानि पहुँचती है तो भी हानि पहुँचाने वारे क विरुद्ध शतिपूर्ति पामुदमा नही पनाया जा सकता । उसी प्रकार कुछ मामल ऐप भी होते हैं जिनमे विमी कृत्य के परिणामस्वरसिो प्रकार की कोई हानि न होते हुए मो शरिपूर्ति देय हो जाता है। एगे भामने जिनमें किसो कृत्य के परिणामस्वर सिी प्रकार की कोई हानि नही होनो पर फिर भी क्षतिपूर्ति देय होतो है, स्वत अभियाज्य क्षनियरय ( Tort actionable per se) होते हैं। उगहरणाप, एक मषितोपर - Banket)ने र व्यक्ति को बैन का साया देन से परारत हसार कर लिया जति में उसरा पमाप्त पाया जमा पा। रपया न मिनट में उस व्यक्ति को कोई क्षति तो नहीं पहुँको पितु उगो द्वारा पाए गए मुकदमे म पायापार नै निएम दिया fr यादीको माननी पपिार पाfr पाने का का रुपया जब पाहे तब से प्राप्त कर मोर पूविकारी ने उग इस काननो प्रपिता मो भग पिया है इसलिए वह वादी को जननि देन । लिए जिम्मार है। [मारजेरी प्रति मिनियम रोग मर निरिणामी शनि यि ये गे अभिपोप नो हामो शाप मानन में पनात र ताण नहा हो । म म म लामा मार सून (Gloucer Gram n rSchool 1 मामला उपाय उपमनोय है 1ों की ए पापा ममोर प्रतिया ने एक नवीन पाटगाना मोतो शिकारिता पुरानो पारामे अधिक विद्या नवीन पाठTTHI में दागिर हो गए और पुरानो पालास यामी को मारी हानि पहेगी।
क्षतिकृत्य के सामा य सिद्धात मामले म निणय दिया गया कि याययुक्त प्रतियोग्यता (Fair Competition) के द्वारा विपक्षी को चाहे कितनी भी हानि क्या न पहुचे पर वह मुकदमा चलाकर क्षति- पूर्ति प्राप्त करने का अधिकारी नहीं है। प्रश्न --कानूनी अधिकार' और 'कानूनी क्षनि' से श्राप क्या समझते हैं ? इस संदर्भ में निम्नलिम्वित्त सिद्धान्तों का विश्लेपस कीजिए (अ) पिना नानिकारक क्षतिपूर्ण कृत्य (Injuria sine damno , एव (५) विना क्षतिपूर्ण हानिकारक कृत्य (Damaum sine injuria)| उत्तर कानूनी अधिकार-बाननी मधिनारा की विशद यास्या विधि- शास्त्र ( Jurisprudence) का विषय है । लेविन क्षतिकृत्य कानून क मध्ययन के लिए भी कानूनो अधिकारों को मावृति को समझ लेना नितात प्रावश्यक है। विधि पास्त्रिया न कानूनी अधिकार को जो परिभाषाएं दी हैं वे लगभग सभी प्रपूण हैं । सालमड (Salmond) ने कानूनी अधिकार की परिभाषा दते हुए कहा है कि यह एक ऐमा स्वर ( Interest ) है जिसे कानून द्वारा मा यता प्राप्त है और जिसे कानून रक्षित करता है । पेग्न ( Paron ) के मतानुमार कानूनी अधिकार कानून द्वारा स्वीकृत ऐसा कृत्य है जो कि किसो क्षेत्र में एक निश्चित मान (Standard ) के मनुमार हो । हालैण्ड (Holland) ने कानूनी प्रधिकार को परिभाषा इस प्रकार दी है कि मानूनी मषिकार एक मनुष्य के द्वारा दूसरे मनुष्य के कृत्यों को समाज के मत पौर पति द्वारा प्रमावित करने की क्षमता को कहते हैं। उपयुक्त परिमापामों के चितन से यह निष्कप निकलना है कि कानूनी मधि पार ममाज में श्रेष्ठ जीवन व्यतीत करने स सम्बघित ऐमी मागें हैं जो कानून द्वारा माज हित की भावना से स्वीकृत कर ली गयी है। ऐमा मांग या मधिकार मनगिनती हैं। उनका वर्गीकरण दो भागों में किया गया है। एक बग १ मन्न गत व्यक्तिगत अधिकार ( Personal rights) पाने हैं मोर दूसरे वग में सावजनिक अधिकार (Public rights) हैं । व्यक्तिगत भपिकार ही क्षति कृत्य कानन के लिए सामग्री प्रस्तुत करते हैं । य निम्नलिपित तीन विभागों म विभाजित किए गए हैं (१) शारीरिक सुरक्षा तथा स्वतत्रता का अधिकार (Right of bodily security and freedom), (२) सम्पत्ति मा पपिकार (Right of property), एय (३) प्रतिष्ठा का अधिकार (Right of reputation), C दातिहत्य विधि पर प्रश्नोत्तर कानूनी क्षतिपानूनी अधिकारों के भगोवरण को कानूनी साति कहते हैं। यह न सा वास्तविक क्षति ( Actual damage) के भनुरूप है और न ही इसका तापय मायिक शनि ( Pecuntary loss) से होता है । वानी के कानूनी पितारी को पिसी प्रकार भो भग करन को क्षतिकृत्य कानून में सावनी शनि कहेंगे, चाहे उन अधिकार व इस प्रकार भग किए जान से वादो को पोई शारीरिक प्रयवा मायिक शनि ा पपा हो । यदि बातो यह सिद्ध पर दे कि उसब विसो कानूनी मधि पार ! मग किया गया है तो वाइन विधिक क्षति का अनुमान कर लेगा। शानूनी क्षति र म म म 'बिना हानिकारक क्षतिपूर्ण करय' (Inyarna sinc damno) पोर 'बिना क्षतिपूण हानिकारक पृरय' (Damnum sinc injuria) के सिद्धान्ता या विश्लेषण श्रेयस्कर होगा जो निम्नलिखित है (भ) 'चिना हानिकारक क्षतिपूर्ण कृत्य' (Injuria sine damao)- इस मिदा त मनुमार यह प्पत्ति जिसका कोई पूर्ण कानूनी अधिकार (Absolutc legal right) भग किया गया हो पोर उसने द्वारा भर ही उसे क्षति न पचा हो, पिर भा यह पतिपूप्ति के लिए दाया वर साता है । कानून व्यक्ति के कुछ धुनिया पषितारी को पति और समाज के हित में विगैप स्पसे पाव या मानता है । प्रत ऐग प्रधिारों का भगीकरण स्वत भभिमो य (Actionable per se) है मौर ऐग मामलों म यादी का येयन इतना ही सिद्ध करना होता है कि उसने इस प्रकार के दिमो कानूगौ मषिकार को भग किया गया है तथा यह बात महत्त्वहीन है कि उसे पोई यास्तविक या पापित ति प?पो है अपवा नहीं । मनापिकार प्रवेश, मानहानि पाटि इमो प्रकार के सत प्रभियाय शक्तियों के उदाहरण है। (4) मिना तिपूर्ण हानिकारक पृत्य' (Damnum sincinjuris)- म शिदान व पनुमा - पिसी व्यक्ति को किसी पर भ्यक्ति र पृश्य द्वारा हानि सो पहधी हा रितु उमस पोई कानूनी प्रधिकार भग ने हुमा हो ता उमातिपूति पान क लिए दावा करन का अधिकार नही है | धारिक प्रतियोग्यता के मामर इयो बाहरण है। वन उपयोगता हित में एम अरया का शातिरस्य महो मानना । प्रताप सिरानून ऐ मनगर ऐसे मामले प्रभियोग्य नहीं हैं। दोनो सिद्धातो में अन्तर-मोप में उरमुख दोनों मिलातों में पन्तर निम्नसिगित है क्ष कृत्य के सामा प सिद्धात बिना हानिकारक क्षतिपूर्ण कृत्य बिना क्षतिपूण हानिकारक कृत्य (Injurra sine damno) (Damnun sine injuria) १ कानूनी अधिकार का भगोकरण, चाहे हानि भयवा क्षति का पहुँचना, कितु हानि अथवा क्षति पहुँची हो या नही || कानूनी अधिकार भग न हुमा हो । २ स्वत अभियोग्य। अभियोज्य नही। ३ केवल कानूनी अधिकार का भगीकरण कानूनी अधिकार के भगीकरण के मित करना अनिवाय। बिना वास्तविक हानि का सिद्ध करना निरर्थक। ४ ऐसे कानूनी अपकृत्या को पल्पना ऐसे नैतिक उपकृत्यो को कल्पना जिनकी क्षतिपूर्ति के लिए कानूनी | जिनको क्षतिपूर्ति के लिए कानूनी उपाय उपाय उपलब्ध हैं। उपलब्ध नहीं हैं। ५ पानूनी अधिकारों का विषय । नैतिक अधिकारों का विषय । प्रश्न :--'प्रत्येक कानूनी क्षति के साथ साथ कानूनी उपाय भी अभिन्न रूप से सम्बद्ध हैं।"-(Ubi jus sbi remedium) उपर्युक कथन फा स्पष्टीकरण करते हुए कानूनी उपायों (Legat remedies) की व्यारया कीजिए। उत्तर स्पष्टीकरण -विधिशास्त्रियों का कथन है कि प्रत्यक कानूनी क्षति के साथ-साय कानूनी उपाय भी भिन्न रूप स सम्बद्ध हैं । उनके इस कथन ने 'जहाँ वही सतिपूण कृत्य है वहां उसका उपाय भी है' (Ubt jus tbt remedium) की कहावत का स्पल लिया है । क्षतिकृत्य कानून यी सगभग सभी सामग्री इसी कहावत का विकसित रूप है। प्रसिद्ध विधिशास्त्री श्री रत्नलाल घोरजलाल ने अपनी घातकृत्य कानून सम्बधी पुस्तक में यपाय हो रहा है कि जां कानूनी उपाय प्राप्त नहीं हैं वहाँ यह समझ लेना चाहिये कि कोई कानूनी क्षति भी नहीं हुई है। क्योंरि कानून में कोई अधिकार विना उपाय के नहीं है और यदि किसी मधिकार * भग किये जाने पर कोई भी उपाय उपलब्ध न हो तो समझ लेना चाहिए कि पानून की दृष्टि से वह मधिकार है ही नहीं । कानूनी उपाय (Legal remedies) पद्यपि यह सच है कि सभी सातिहरप दीवानी हाति (Civil injuries) है पर सभी दीवानी कायवाही क्षति- पृश्य पानून वे मन्तगत मनिवायत नहा माएगो । बात यह है कि अब तक किसी क्षतिकृत्य विधि पर प्रश्नोत्तर मुसदमें में क्षतिपूर्ति प्राम करने का प्रश्न न हो तब तक वह क्षतिकृत्य पान के मतगत नहीं पाता । प्रबार ऐसे मामले होते हैं जिनम मि वाली क्षतिपूर्ति पाने के लिय कानूनी कारवाही वरन 4 साप साप दूसरे कानूनी उपायों (Legal remedies के लिए भा कायवाही करता है। उदाहरणाय, यदि कोई व्यक्ति अगावधानी से मोर घलावर पिसी की सम्पत्ति को हाति पहुँवाये और साप-माय उस व्यक्ति को पारीरिक चोट भी पहेचाय तो पति प्राप्त यक्ति को पातिव" चे विस्त न येवल शानिपूर्ति या दावा करने का कानूनी उपाय हो उपल ध होगा, बल्कि वह पौजदारी यानून मग बायवाही परल व लिए भी राग्य का बाध्य कर सकता है। प्रश्न १०-द्वेप (Malice), सकल्प (Intention) और मन्तव्य (fotive) को व्याग्या करते हुए विकृत्य सम्बन्धी मामलों म उनको सगळता पर टिप्परली लिपिए। उत्तर द्वेप (Malice)-पामतौर पर टैप (Malice) दस 'ई' अपका 'वर' का भाव प्रकट होता है । सचिन कानून में यह दो विभिन्न पयों में प्रयुक्त किया जाता है । एव पथ म “स I' 8 तात्पय मे हानिपूण कृत्य से है जिम करने का कोई प्रौचित्य (Justimation) न हो तथा दूसर मय में इस से सापय रोग वानिपूण कृत्य स है जो frमो मनुचित उद्देश्य से प्रेरित हापरीया गया म प्रबार मा दा प्रथ होते हैं । एक तो जानबूझ पर किया गया एका सानिपूण पृरय जिपमें ईटया या यर व सध विद्यमान हो पौर दूसरा यह कि ऐसा शानिपूण रस जिममें ईर्षा या वर को पाई माग्ना न हो पर वह इस प्रकार के देय स किया जाय जिसमातून मनुचित मममता हो। उदाहरणाय, यदि ' विसी ये बानघर को पाक पर जहर दे दे तो यह नहा जायगा वि उसका ग्रह क्षतिपूण परप दयपूर (Malicious) है। [धाम प्रति प्रामू, (१८२५) ४ यो ए सा. २४० पर उपयत कानूनी भयों में भाधार पर विधियाख्यों ने उस दा भर गर िहै वा निम्नाति है (१) पास्तविक प (falice in fact,-साधारण बालबास में हम परमया या घर मानिराज ताय गुममत है यह वास्तविप (Malice in fact) है। यह वास्तविर पनवल निम्नलिपित पतियों में ही उमरा सपत खस (Relcrant element) गाना जाना है- (4) पण मिसन (Nalherous prosecution), () हानिकारक मिथ्याान (Injurious talsthood), क्षतिकृत्य के सामाय सिद्धात (स) पड्यत्र (Conspiracy), एव (द) किसी विशेष अधिकारयुक्त अवसर पर मानहानि (Defamation on a privileged occasion)। यह बात स्मरणीय है कि एक ऐसा कृत्य जो अयथा कानूनी दृष्टि से उचित है वह केवल इस कारण गैरकानूनी नहीं हो जाता कि उसको द्वेष मषवा हाह (Ill will) से प्रेरित होकर दिया गया है । इसा माघार पर यह एक सामाय सिद्धात है कि द्वेष धातिकृत्य के लिए एक प्रसगत (Irrelevant) तत्त्व है । एक अंग्रेजी प्रमुख मामले में इस विषय को व्याख्या करते हुए कहा गया है कि यदि सामायत किमी व्यक्ति का कोई कृत्य क्षतिकृत्य नहीं है तो वह कृत्य इस कारण क्षतिकृत्य नहीं बन जाता कि उसके वरन वाल ने उसे द्वेष से प्रेरित होकर किया है । [वेडफोड मेयर प्रति पिविल्स, (१८६५) ए० सा० ५६७] उपयुक्त विवचना से हम यह निष्कप निकाल सकते हैं कि क्षतिकृत्य कानून के मतगत स्वत द्वेष (Malice per se) से प्रेरित होकर दिया गया काई कानूनी पृश्य गैरकानूनी नहीं हो जाता, चाहे उससे वादी को हानि ही पहुँचो हो । (२) विधिक द्वेप (Legal malice)-विधिव द्वेप का प्रथ वास्तविक द्वेष पथ स सवपा विपरीत है । जब कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति के कानूनी मधिकार को भग पर उसको हाति पहुंचाता है तो दातिकृत्य कानून के मतगत दातिवर्ता का यह ऋत्य द्वेषपूण समझा जाता है, पाह उसन वह कृत्य क्षति पहुँचान का नीयत सन मिया हो या उस उसके कृत्य से किसी व्यक्ति को दाति पहुँचगी इसका पूर्वज्ञान न हो। महिल (Underhil) के मतानुसार यदि किसी व्यक्ति न याना का उल्लघन परक विसो व्यक्ति की भलाई के उद्देश्य से भी ऐसा कृत्य किया है जिसस उस दूगर व्यक्ति को गति पहुँच जाता है तो कानून की दृष्टि म एसा कृत्य द्वेषपूर्ण हो कहलाएगा । उताहरणाथ, यदि '4' बिना क्सिो मौचित्य के 'ख' को इस बात ये लिए प्रेरित करे हि वह 'ग' से अपना कोई सविदा तोड दे और इसके परिणाम स्वरूप 'ग' को क्षति पहुंचे तब यह कहा जायगा कि 'क' का मृत्य 'ग' के प्रति क्षति पृत्य है पोर 'क' यह दलील दकर अपन दायित्व से मुक्त नहीं हो जायगा कि उसने जो रिया वह सद्भावना से प्रेरित होकर रिया या यह कि उगो नियत 'ग' हाति पहुँचाने की नहीं थी। संकल्प (Intention)–गालमण्ड (Salmond ) मतानुसार जिस रा से कोई दृश्य किया जाप उस इरादे पा सकल्प (Intention) कहते हैं ।
- सतित्य विधि पर प्रश्नोत्तर इरादे मा पूयशान मोर उसको दृश्य द्वारा कार्यान्वित करने को पातामा सकल्प के पारश्यक तत्व है। यह बात विशेष रूप स स्मरणीय है कि कोई वश्य पूणतया सकल्पहीन (Un intenuonal) मा हो सकता है अथवा पूणरूपेण सकरपपूण (Intentional) भी हो सकता है । इसी प्रकार एमा कृत्य भी हो सकता है जिसका कुछ पा सकल्पहीन हो तथा कुछ म सक्ल्पपूण हो । विधिवास का यह एक बुनियादी पिडात है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने रिये हुए वृत्व मे स्वाभाविक परिणाम या नान होता है । उगहरणाप, यदि कोई व्यक्ति दिगो कुत्ते को भगाने के लिए उस पर गाली पलाए पोर पुत्ता गोली से मर जाय तो पानून यह कभी नहीं मानेगा कि गोली पलाने वाले व्यक्ति का रावल कुत्ते की हत्या परना नहीं पा । भतएव पिसी कृत्य को सरल्पहीन तभी यहा जायगा जब पर्ता को उग प्रत्य के स्वाभाविक परिणाम का पूर्वमान न हो। हम विषय में एष भग्रेजी मुरदम मा घनाएं विशेष रूप से उल्लसनीय हैं जो निम्न प्रकार है प्रतियादी ने वादी को जो एक सभ्रान्त महिला पो यह मूठी सूचना दी कि उसका पति जो विदेश मया बुरी तरह घायल हो गया है और उसके दोनों पैर टूट गए हैं। इस सूचना से पानी को स्नायुविक ठेम (Nervous Shock) पहुँची मोर कई दिन तर उसके प्रारण भी सपट में पह गए । प्रतिवादी द्वारा दी गई सूचना भूरी होने की बात पात होन पर बागी ने प्रतिवादी पर दातिपूर्ति का मुस्दमा पलाया। प्रतिवारी ने अपने बचाव में यह दलील दी कि उमफा रायीको निमा प्ररमो हानि पहुँचाने का नही था । विद्वान यायाधीश न म मामले का निएय देते हुए कहा कि योई व्यक्ति जब कोई कृरय परता है तो उसके स्वाभाविप परिणाम पूषनान रमता है। इस मामल में प्रतिवादी ने जानवम पर ऐमा प्रत्य किया है जिसस रियाको पारिवाति परेपो है और इस प्रकार उमरे य त्तिय सुरक्षा (Personal Safety)य कानूनी अधिकार को भग दिया गया है। प्रत० प्रतिवाय या विधिन हानि पहेगे है निराशे यातिपूतिमा दायिय प्रविवारी पर है मन हो यह प्रतिवाण र प्रति पियो प्रसारापपूण पाप न पा हो । विस्मिन प्रति डाउनटन, (१८९७) २ पू. यो. मन्तव्य (Mount) -यह एप गामार गिटात है कि पोई भी स्पेण्डा रोhिrपापस्य बिना मन्नम्य (Motire) 2 महीं हो ममता। सरिन म (Bentham) मानुसार उमाप स प्राप्त पत्र को उस कविय मान पन्तम्प महो प्रमभ मेना पादिए । यो प्रसार साधारण दोमपाल म मम (Mottre) क्षय वे मामाय सिद्धान्त मोर सकल्प (Intention) एव दूसरे के पर्यायवाची माने जाते हैं, पर कानून की दृष्टि म इन दोनों में मन्नर है । विधिशास्त्रियो का मत है कि म तव्य दूरस्थ (Ulterior) सकल्प है। पेटन (Paron) इस प्रकार क भेद से महमत नहीं हैं । क्षतिकृत्य कानून में म तव्य पर विचार किया जाना महत्वहीन समझा जाता है, क्योंकि इस कानून के मतगत केवल यह तथ्य विशेष रूप मे विचारणीय हाता है कि जो पृत्य किया गया है, वह कानून की दृष्टि से अधिकृत है अथवा नहीं । प्रतएव विसौ कृत्य किये जाने का मतव्य वितना ही भला क्यान हा, वितु यदि वह मृत्य किसी पानून के विपरीत दिया गया है तो क्षतिकृत्य कानून के मतगत उसस जो क्षति पहुँचेगो, उसके लिए सतवर्ता (Tot feasor) क्षतिपूर्ति के लिए जिम्मेदार होगा । उदाहरगाथ, यदि कोई विसान प्रश्न सेत में कुछ अनाज भूल जाय और उस पनाज की रक्षा के लिए काई यक्ति उसे खलिहान में रसवा दे तो भी वह किसान उस व्यक्ति के विरुद्ध प्रपन सेत में अनधिकार प्रवेग (Trespass) भोर प्रपन अनाज के प्रति मनधिकृत हस्तक्षेप (Unauthorised interference) क लिए मत- पूर्ति का मुकरमा चला सकता है । प्रश्न ११-क्या किसी गैरकानूनी नृत्य का किया जाना (Malhe' aance) किसी कृत्य का गैरकानूनी टग से किया जाना (Nisfeasance) तथा किसी कृत्य के करने अथवा न करने के कानूनी कर्त्तन्य की अवहेलना परना (Non feasance) नतिकृत्य कानून के अन्तर्गत एक समान ही अभियोज्य (Actionable) है? अपने उत्तर की अधिकृत निर्णया मे पुष्टि कीजिए। उत्तर-विवेचना-विमी गैर कानूनी कृत्य या किया जाना ( ifcasa. nec),विसो मृत्य मा गैर कानूनी ढग स किया जाना (lifeasince) तया किमी पपरो मपचा न करन प्रानूनी तव का अवलना वरना (Nor fe asance) मतिय वानून ६ मतगत एक समान हो भनियो य (Actionable) नहीं है । किसो गैरकानगो वृत्य का दिया जाना मतिय कानून म स्वत अभियाय (Actionable per se) है पोर ए मामले में किसी प्रकार की सावधानी (Negligence) तपाटेप इत्यादि को साबित करावा पाव यरता नहीं होती। गिगा मृत्य में परन पयवा न रन व निस्वाय पत्तव्य को पहलना परन से पत्ता पर कानूनी पसे घाइदायित नही मावा, लगिन दिसी वृरय वा गैर कानुनी दग स किय जाने पर पर्ता क्षतिपूति के लिय जिम्मदार होगा। [एलमी प्रति गुट बार (१७०३), ५ टी. पार०] । यदि किसी कृत्य को करन के वर्ता पर कानूनो दायित्व २ क्षतिकृत्य विषि पर प्रश्नोत्तर है पौर वह उस कानूनी ढग से न पर किसी व्यक्ति को शाति पहुँचाता है तो क्षति- पूनि पे लिए उसका वृत्य उसो प्रकार ममियाज्य है, जिस प्रकार किसी गैरकानूनी पृरय का किया जाना तिकृत्य कानून पन्तगत अभियोज्य होता है । [वैली प्रति भेट्रोपोलिटन रलवे कम्पनी (१८६५), क्यू० बो० ६४४] परन १२-~-उन व्यक्तियों का वणन कीजिए जो क्षतिकृत्य कानून के अन्तगन (अ) दागा करने के लिए अयोग्य ममझे जाते हैं, तथा (4) जिनके विरुद्ध दाना नहीं किया जा सकता। उत्तर-टिप्पणी-क्षतिरस्य माना के प्रतगत दावा करन मोर दिय जाने पौक्तिगत योग्यतामा मौर प्रयाग्यतामा के प्राधार पर समाज को तीन विभिन्न वो म विभक्त किया जा रास्ता है-पहल वग म वयक्ति हैं जिनको शातिपूर्ति क लिए दाया परन का धिमार प्राप्त है और जिन विस्त भी दारा किया जा सकता है। दूसरे वगम व व्यक्ति सम्मिलित है जा व्यक्तिगत भयोग्यतामा के कारण क्षतिकृश्य मानून व मतगत दावा करन को कानूनी क्षमता (Legal Competence) नहीं गते । तोसर वग म वे व्यक्ति है जिनय विरुद्ध क्षतिकृत्य कानून के मतगत दावाही दिया जा सकता। (अ) दाया करने के लिए अयोग्य व्यक्ति-निम्नलिखित वग व्यक्ति मग्नी पतिगत भयोग्यतामों कारण क्षतिक्त्य कानून के मतगत दावा करने को मानना क्षमता नहा रसते (१) विदशी शत्रु (Alien enemy)- यह ए सामाय गिनात है कि विशा पानु क्षातपरय कानुन मन्तगत मधिकार क रूप मे दावा करने का हक नहीं रसता लकि। भारत को दावानी प्रक्रिया सहिता (Civil Proceduro Codo) का धारा ८३ मन्तगत विशद्रीय सरकार की पूर्व मनुमति प्राप्त करन ये यादातरसरमा है। (२, दण्ड प्राप्त अपराया (Convict)-एर द प्राप्त अपराधी मप ।। सम्पत्ति र प्रात तय गतिपूर्ण कृत्य निया नहीं कर सकता, परतु यदि वह सातपूण प उसका राम्रा प्रति न हार उस प्याक्त (Person) कही प्राड हाता यह थनिधि या दावा हराका मधिकारी है । भारतलाल पारजलान गामार भारत म स २१६० तर यह नियम पानि छपारापोंगरा पार ६०. प्रारमपरापा त हस्तपत पर सीजी पोतु मय वह नियम समा! हा गया है। भारताय ग साहना (Indian Penal Codc)ी धारा १२१, १२३ मार प्राविधाना या हारमर सरति हस्तगउरामा नियम क्षतिकृय के सामाय सिद्धान्त १६- नहीं है । मन उक्त अरवादों को छोडकर दण्ड प्राप्त प्रपराधी भो भारत में क्षतिकृत्य कानून के अन्तगत माने घरीर भौर सम्पत्ति दोनों के विरुद्ध किये गय क्षतिपूण कयों के लिए क्षतिपूर्ति का दावा कर सस्ता है । (३) पति और पत्नी (Husband and wife)-क्षतिक्त्य कानन मे म ता पति अपनो पना के विरुद्ध पोर न परलो माने पति क विरुद क्षतिपूर्ति का दावा कर सरते हैं, क्योंकि कानून की दृष्टि म पति पत्नी एक इकाई (One Unt) मान जाते हैं । लकिन विवाह विच्छर हा जान पर पत्नी अपने पति के विरुद्ध उन क्षतिपूण बत्यों क लिए क्षतिपूर्ति का मुकदमा चला सकता है जिनका कि पति न उस समय दिया था जबकि उनक देवाहित सम्बध टूट नहीं थे। भारतीय विधिशास्त्री भी झाबवाला के मतानुसार भारत में पति-पत्नी के कानूनी एक्य (Legal identity) को बात लान न हान के कारण वे एक दूसर के विरुद्ध अतिक्त्व कानून के मन्तगत वायवाही कर सकते हैं। (४) निगम (Corporation)-कानून की दृष्टि म निगम व्यक्तियों का एक एसा सगठित सघ है जिसके पत्तव्य मोर अधिकार उन व्यक्तियों के व्यक्तिगत फत्तयों पोर मधिकारों स भिन्न होते हैं जिनस मिल कर निगम बनता है । क्षतिक्रय कानून वे अन्तर्गत निगम वैयक्तिक क्षति (Personal wrongs) क लिए क्षतिपूर्ति का दावा नहीं कर सकता, वितु एस मानहानिकारक लेस (Libel) के लिए जिसके द्वारा निगम की सम्पत्ति का क्षति पहुँची हा प्रयदा उसका व्यावसायिक हानि हुई हो चा वह क्षतिपूर्ति का दावा कर माता है । [मैनचप्टर का मार प्रति विलियम्म (१८६१), १ एल. वो०६४] (५) गर्भस्थ बालक (Child in womb)-माता के गभ क भीतर का वाला जम होने के पश्चात् उस सति के लिए क्षतिपूर्ति का दावा नहीं कर सकता जो उम उस समय पहेचो जवकि वह माता व गभ म पा। [वारर प्रति प्रेट नादन रेलवे, (१८८०), एल० भार० मायरिश ६६] (१) दिवालिया (Insolvent)-दिवालिया व्यनि माना सम्मति व प्रति विय गय धनिपूण य य क लिए शतिकता पर सतिपूर्ति का दावा नहा कर सपना, चिन्तु यतिर शनि (Personal wrong) को दा म उप पूण प्रकार है कि वह सतिस्ता परमतिपूर्ति व लिए मुर"मा चला। (२) यति जिन पर दावा नहीं चलता -निम्ननिमित व्यक्ति क्षति- पत्य रानन चे मतगः दावा क्यि जास न मुक्त (Immune) गम जान है (१) सम्राट (Crown)-प्रेता कहावत है कि सम्राट सरिसो का क्षति २. क्षतिपय विधि पर प्रश्नोतर नहीं पहुँच समती (King can do no wrong) मतएव सवैधानिक कानून का यह एक सामाय सिद्धान्त है कि सम्राट मयवा राज्याध्यक्ष (Head of the Govrnment) मक्सर कानूनी कारवाही से उ मुक्त समझे जाते हैं । इसका कारण यह है कि प्राय राज्याध्यक्ष मत्रिमण्डल (Cabinet) को सलाह पर काय घरता है पौर नो भी मानाएं पयवा पादेश दिय जाते हैं, उन पर केवल सरकार के प्रतीक रूप में उसका नाम होता है। (२) विदशी सत्ताधारी राज्याध्यत (Foreign Sovereigns)- साधारणतया यिदी सत्ताधारी राज्याध्यक्ष पर क्षतिकस्य कानून के प्रतर्गत दावा नहीं दिया जा सकता । लकिन यदि यह स्वयं ही अपनी उ मुक्ति (Immunity) का स्वेच्छा रा परित्याग कर दे तो उस पर मुकदमा चलाया जा सकता है । यह कानूनी उमुक्ति विदेगी सनापारियों में मतिरिक्त राजदूतो को भी प्राप्त है। भारतीय सविधान की धारा १६१ वे मनुमार भारत व राष्ट्रपति (Presidont of India), राया क राज्यपाल (Governors of the Srares), पा रायप्रमुमो पर क्सिी यायालय म मुक्दमा नहीं चलाया जा सकता। एक बात जा इस गम्बध म विशप रूप स स्मरणीय है वह यह है कि किसी भी दाद पाध्यक्ष पारे व पिसी छाटे दशक हा अथवा बडे दा, मदार समार हो मा जात हैं, पर्या दा के छोरे वढे होन 4 मापार पर उनमें रिपी प्रकार वा भाव नहीं माना जाता। (३) राजदत (Ambassador)-विटेगी सत्ताधारी राज्याध्यक्ष वी मान हा राजपूतो या भी वागी उ मुक्ति प्राप्त है तथा उस परिवार ग सस्या या भी यन सो दोयागी तपा फोडारी उमरिया प्रात होती है । मत उ7 पर पति परपमान मतगत शतिपूर्ति के लिए मुरादा नही मसाया जा साता यता लिपे स्वयं उन उमुक्तियामा परित्याग न पर। (क) राजकीय फमचारी (Public or State officialk)- नाई रातोप समपारीरपारो सवर की हैसियत सबोई एगा पृत्य पर जिसग मिमी तिमोक्षति पासो व. उगायरे लिए मलिका मानन में मन्तगत उत्तरदायी TE मा बायना । मपित-उसने ऐमा परप अपनी व्यक्तिमा हसियन म पिया है तो यह शतिपूति लिए जिम्मेदार होगा। यह भी मान रहिए कि परमारी रममा पपने प्रधान ममचारियों को प्रति उमदा म उत्तरतापी नहीं है जर ने उनसे पिता नयों करने का स्वर पाम दिया हो। [मी नारा दृस्टोग प्रतिनि (१८९६), एस. मार• मायटिस एप. एम. ३] क्षतिकृय के सामाय सिद्धात २१ (५) निगम (Corporation)-क्षतिक्त्व कानून के मन्तर्गत निगम पर शतिपूर्ति का दावा करन व लिए यह सिद्ध करना मावश्यक है कि वह पत्य जिससे सति पहुँची, निगम के अभिकर्ता (Agent) अथवा यमचारी ने अपनी व्यक्तिगत हैसियत म नहा, वरन् निगम के अभिकर्ता अपवा कमचारी की हैसियत में निगम के हित में किया है। (६) श्रमिक संघ (Trade union)-भारतीय श्रमिक सप अधिनियम, २६२६ (Indian Trade Unions Act, 1926) दे भन्नगत रजिस्टड श्रमिक सघ के विरुद्ध संघ के रजिस्टड नाम से दावा किया जा सकता है और उसके सदस्य व कमचारी क्वल कुछ विशिष्ट क्षतिक्त्यों के दायित्व से मुक्त हैं । (७) पागल व्यक्ति (Lunatic -यह एक सामाय नियम है कि पागल व्यक्ति क्षतिकृत्य कानून क मन गत उन कृत्यो के प्रति उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता जिनके प्रति वह फौजदारी कानून में उत्तरदायी नहीं है । यही चात मदाय (Drunk) व्यक्ति के लिए भी कहा जा सकता है । लकिन यह बात बचाव के लिए तब तक पर्याप्त नहा हागो जब तक यह सिद्ध न हा जाय कि उस व्यक्ति ने मद्यपान अपनी इच्छा क विस्त किया था। (८) शिशु (Infant)-साधारणतया पिया मल्पवयस्क व्यक्तियों पर सतिग्य कानून र मतग: मुममा नहीं चलाया जा सकता 1 जिस क्षतिपूण कस्य में पूर्वगान या देष मावश्यक तत्व हों, वहाँ गितु या मल्पवयस्क होना एक अच्छा बचाव (Defence) है। (६) विवाहित स्त्री (Matrned woman)-इगलैण्ड व सावजनिक कानून (Common law) में विवाहित स्त्री पर भने मुक्दमा नहीं चलाया जा साता जब तक कि उसके पति कोमो प्रतिवारी केस में सम्मिलित न पर लिया पाय, रिन्तु सन् १८८९ ६० विवाहित स्त्रियों को सम्पत्ति मधिनियम (Married Women's Property Act, 1882) वे पन्तगत विवाहित स्त्री पर परेले भी मुरतमा चलाया जा सकता है । मारत में भी विवाहित स्त्रियों को सम्पत्ति अधिनियम, १८७४ ५ मन्नगत विशहित स्त्री पर प्रबल भी मुकदमा चलाया जा सरता है। सरित पपिनियम हिर, मुसलमान, दोट, मेन भोर सिम स्त्रियों पर लागू नहीं होता। विवाहित स्त्रिया एव सतिकर्ता प्रधिनियम, १९३५ (Married Women and Tort fcasons Act, 1935) के पन्तगत स्त्रियों द्वारा दिय गये क्षनिवरयों के लिए उनरे पति उत्तरदायी नही माने जाते ।
२. सतिय विधि पर प्रश्नोतर नहीं पहुँच सरनी (King can do no wrong) प्रतएव संवैधानिक कानुन का यह एक सामाय सिद्धात है कि सम्राट अथवा राज्या या (Head of the Govinment) भमर कानूनी कायवाही से उमुक्त समझे जान हैं। इसका पारण यह है कि प्राय राज्याध्याप मत्रिमण्डल (Cabinet) को सलाह पर काय मरता है पोर ला भी मानाएं अथवा मादा दिय नाते हैं, उन पर केवल सरकार के प्रतीक रूप में उसका नाम होता है। (२) चिदशी सत्ताधारी राज्याध्यक्ष (Foreign Sovereigns)-- साधारणतया दिदगी सत्ताधारी राज्याध्यक्ष पर तिवस्य कानन ने पतर्गत दावा नहीं किया जा सकता। लेकिन यदि वह स्वय हो अपनी उ मुक्ति (Immunity) का स्वच्छा स परित्याग कर दे तो उस पर मुकदमा चलाया जा सकता है । यह मानती उमुक्ति विदेशी मनापारियो । अतिरिक्त राजदूतो को भी प्राप्त है । भारताय सविधान की धारा १६१ के अनुसार भारत के राष्ट्रपति (President of India) 1991 af 71399179 (Governors of the Scares), त्या रायममुनों पर किसी न्यायालय में मुक्रमा नही चलाया जा सकता। एक बात जो इस मम्ब घम विशम्पस स्मरणीय है वह यह है कि किमी भी दयन राज्याध्यम, चा व किती झार दर के हो अथवा व दा, सदा एक समान हा मान जात हैं, पर्यात् ण क छोर व हान व माधार पर उनम रिमो प्रकार कामे-भाव नहा माना जाता। (३) रानटूत (Ambassador)-विगो सत्ताधारा राज्याध्यक्षों की भावि ग राजदूता का भी वानूना उ मुक्ति प्राप्त है या उन परिवार व सस्यों को भी वन मा दीवानी तथा पौजदारी र मुनियाँ प्राप्त होती हैं । अत उन पर क्षति वरप कानन ३ पटगन क्षतिपूर्ति के लिए मुस्कान चलाया जा सकता सम तक कि व म्बय उन उ मुक्तिया का परित्याग न कर दें। (क) राजकीय कमचारी (Public or State cfficials)-~यति बाई राजमाप कमारी सरकारी मवर को हैमियन स का रामा वृष र निमम निमो मति को शनि पर तो वह उस य के लिए तिकृय कानुन अनगन उतरलायी नहीं माना वायगा । किन यति उमन ऐमा पत्य अपनी व्यक्तिगत हैसियत म किया है तो वह क्षतिपूर्ति बनिए जिम्मगार होगा। यह भी ध्यान दिए कि बाई सरकारी मम पारी मपन प्रधान मचारियों व त्यों के प्रति सम दशा में उत्तरदायी नहीं है अनि उगन उनका कपित क्यों करन का स्वप मान दिया हो। [मर्मी हास दृस्टोर प्रति सि (१८६६), एन. मार, भापरित. एच. एन. ६३] क्षति पदे सामाय सिद्धात 1 (१) निगम (Corporation)~क्षतिक्त्म कानून भतर्गन निगम पर क्षतिपूर्ति का दावा करन के लिए यह सिद्ध करना प्रावश्यक है कि वह पाय जिससे सति पर्दुवो, निगम में अभिकर्ता (Agent) अथवा कमचारी ने अपनी व्यक्तिगत हैसियत म नहा, वरन् निगम के अभिकर्ता अपवा कमचारी की हैसिपत्त में निगम के हित में लिया है। (६) श्रमिक मघ (Trade union)-भारतीय श्रमिक संघ अधिनियम, २६२६ (Indian Trade Unions Act, 1926) के मानर्गत रनिम्टड श्रमिक सघ के विरुद्ध मध के रजिस्टड नाम से दावा दिया जा सकता है और उसके सदस्य व कमचारी पवल कुछ विशिष्ट क्षतिक्त्यों के दायित्व से मुक्त हैं । (७) पागल व्यक्ति (Lunatic --यह एक सामाय नियम है कि पागल व्यक्ति तिकृत्य कानून के मन्तंगत उन कृत्यों के प्रति उत्तरदायी नही ठहराया जा सकता जिनके प्रति वह फौजदारी कानून में उत्तरदायी नहीं है । यही यात मदार (Drunk) व्यक्ति के लिए भी दहा ला सकती है । लकिन यह बात बचाव लिए तब तक पर्याप्त नहीं हागो जब तक यह सिद्ध न हो जाय कि उस व्यक्ति न मद्यपान अपनी इच्छा क विरद्ध किया था। (८) शिशु (Infant)-साधारणतया तितुतपा पल्पवयस् पक्तियों पर पति य कानून में मतग मुक्तमा नही चलाया जा सकता। जिस क्षतिपूण वृत्य में पूशान या ट्रेप मावश्यक तत्व हो, वहां शिशु या पल्पवयस्क हाना एक अच्छा बचाव (Defeace) है। (E) विवाहित स्त्री (Married woman)-गलेण्ड के सावनिक कानून (Common law) में विवाहित स्त्री पर प्रब ने मुकदमा नहीं चलाया जा सरता जब तक कि उसके पति को भी प्रतिवादी रे रूप में सम्मिलित न कर लिया जाय, किन्तु सर १८९ ई०६ विवाहित स्त्रियों को सम्पत्ति अधिनियम (Married Women's Property Act, 1882) पन्तगत विवाहित स्त्री पर मकेल भी मुरमा पलाया जा सकता है। भारत में भी विवाहित स्त्रियों को सम्पत्ति मधिनियम, १८७४ पन्तगत विवाहित स्त्री पर मरेले भी मुकदमा चलाया जा सकता है। सेक्नि यह मधिनियम हि, मुसलमान, बोट, रेन भोर सिप स्त्रिया पर लागू नहीं होता। विवाहित स्त्रिया एव हातिमा मधिनियम, १९३५ (Married Women and Tort feasors Act, 1935) रे मन्तगत स्त्रियों द्वारा दिय गये शातियों बेसिए उनके पति उत्तरदायी नहीं माने जाते ।
क्षतिवृत्य विधि पर प्रश्नोत्तर प्रश्न १३---उन परिस्थितियों का विवेचनात्मक उल्लेस कीजिए जिनमें क्षविर्ता क्षतिपूर्ति देने का उत्तरदायी होने पर भी इस उत्तरदायित्व से म्बर मुक्ति प्राप्त कर लेता है। अपने उत्तर में वसम्बन्धी अग्रेजी और भारतीय कानून का अन्वर भी स्पष्ट कीजिए। उत्तर-जातिकृत्य सम्बन्धी दायित्व से मुग्वि-निम्नलिखित परिस्थि- तियों म क्षतिपर्ता भतिपूर्ति रेन का उत्तरदायी होने पर भी इस उत्तरदायित्व से स्वत मुक्ति प्राप्त पर लता है (१) ननिक्र्ता या क्षनिप्राप्त यक्ति की मृत्यु- यानून या यह एक सामाय सिद्धात है वि विगो पक्ति पर मुकदमा तान का पतगत अधिकार यस पविल को मृत्यु के परिणामस्वरूप समाप्त हो जाता है (Actio personalis moritut cum Personam. A personal action dies with the parties to the cause)। यह सिद्धात अग्रेजी सावजनिर यानन (Fnglish Common Lam) का एक सामाय नियम पालदिन कानन सुधार (विविध प्राविधान) अधिनियम, १९३४ [The Law Refotrrs (Niscellaneous Provisions) Act, 1934] ने उक्त सिदा त म बहुत बुर परिवतन पर दिया है । इस मधिनियम ये बनने में बाद प्रप्रेजो कानून में यह एक सामा य नियम हो गया है कि प्रत्येक क्षति- पत्य के मामले म मातिप्राप्त पक्ति की मृत्यु हो जाने पर उस काननी उत्तराधियारी (Legal representative) को क्षतिपूर्ति का मुरदमा घला कर क्षतिकता से पातिपूर्ति प्राह परने का अधिकार होगा पोर क्षतिकर्ता की मृयु से यह अधिकार समाप्त न होगा। लेकिन निम्नावित पतिकरयों के लिए यह नियम लागू न होगा मौर पतिमात व्यक्ति को मृत्यु के साथ साथ क्षतिपूति प्राप्त परत या अधिकार भी समाप्त हो जायगा (म) जब ति प्राप्त व्यक्ति को मानहानि की गयी हो, (ब) जब बहसाव द्वारा क्षति पहुँचायी गयी हो, (8) जय दम्पत्ति म से किसी को अलग होने के लिए बहका पर हादि पहुवापी गयी हो, तथा (१) व्यभिचार (Adultery) द्वारा की गयो क्षति । प्रासधारक दुर्घटना अधिनियम, १८४६ (The Fatal Accidents Act, 1846) के मतगत यह प्राविधान है कि यदि किसी व्यक्ति को दुपटनापद्य मृत्यु हो काय विस प्यक्ति का क्षतिकृत्य उसी मृत्यु के लिए शिमर है, उसमें उपर क्षतिथय के सामाय सिदान्त सति प्राप्त मृतक व्यक्ति के पनि, पला, बच्चे या उसका सम्पत्ति वा व्यवस्थापक (Administrator) क्षतिपत्ति के लिए मुरमा चला सकते हैं। सेवायोजक दायित्व धिनियम, ... {The Employers Liability Act 1880) के मतगत यदि विमो कमचारी की नियुक्ति काल मे ऐम किमी भा कारण मृत्यु हो जाय जिनका वणन इस अधिनियम में है, ता मृता क्मचारी का काई को कानूनी उत्तराधिकारी सवायाज (Employer) पर क्षतिपूक्ति का मुकदमा चला माता है। श्रमिक प्रतिवर अधिनियम, १९२५ (The Wor men Compensation Act, 1925) ये प्राविधाना र भनुमार यदि किसी धमिव यमचारा की कारखान में काम करते समय दुघटनामा मृत्यु हा जाम ता उस अपित यमचारी के प्राधिठ (Dependent) व्यक्ति कारखान वे गालिय' से क्षति प्राप्त करन क लिए उम पर दावा कर सकत हैं। शतिकता (Tort feacor) की मृत्यु का परियय अग्रेजो वादन के अनुसार यह है लि उस क्षतिपूण १.य के लिए उसके कानूनी उत्तराधिकारियो पर मुकदमा नहीं चलाया जा माता लकिन यह नियम उस परिस्थिति म लागू नही होता है जयदि मृतक क्षतिकता न भपन जीवनकाल म सति प्राप्त व्यक्ति को सम्मति या उसकी पाय (Proceeds) का स्वायत्तीकरण (Appropstation) कर लिया हो पोर उस सम्पत्ति अथवा माय को अपना सम्पत्ति प्रयका प्राय मामिला लिया हो। भारतीय कानून भारतीय कानून में उपयु मत सामाय सिद्धान्त के, कि शाति प्राप्त व्यक्ति को मृत्यु क परिणामस्वरूप उसका मुकदमा चलाने का यतिगत मधिकार भी समाप्त हा जाता है, निम्ननिसित भपवा- (Exceptions) है (अ) कानूनी प्रतिनिधि वाद अधिनियम, १५ ( The L-gal Representatires suts Act, 1855) के भन्दगत किसी व्यक्ति का प्रतिनिधि भपका उत्तराधिकारी उसको मृत्यु हो जान के बाद भी सतिकर्ता कति क्षतिपूर्ति कावा कर साा है, पदि पानिपत्य क्षति प्राप्त मृत व्यक्ति को मम्मति के प्रति रिया गया हो। (ब) प्रासघातक दुर्घटना अधिनियम, १८५४ (The Faral Acci. dents Act, 1855) के अन्तगठ यह प्राविधान है कि यदि रिमा भक्ति की जो वारसाने में पाम परता है, काम करते समय क्सिी घटना मृत्यु हो जाय तो उसके उत्तराधिरारो, पति, परनो छ धन्धान शातिरों के विस्ट क्षतिपूति के लिए उस क्षाय विधि पर प्रश्नोत्तर व्यक्ति की मृत्यु के दिन स दो वध का अवधि के भीतर मुररमा चला सक्त है । नवीन अवधि अधिनियम, १६६३ (The Limitation Act, 1963) म अवधि दो वप निधारित की गयी है। (स) भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, १९५५ (The Indian Surtension inct, 1125) को पारा ७६ व अतगत विमा व्यक्ति व पुछ जा मकान प्रापबार उसकी मृत्यु के बाद भी ममाप्त नही हात । अतएव उसकी सम्त का व्यवम्याप (Administrator) म तिवृत्य के लिए जो उस मृतक “यति व जावनमाल म दिया गया हो और ना मानहानि !Dramation) भार मसया प्रहार {Assault) तथा यक्तिगत क्षति (Personal injury) * वग वा क्षतिकरय न ह', क्षतिकता क विरत क्षतिपूति का मुकदमा चला मक्ता है। क्षतिपा का मत्यु क परिणाम र विषय में भारतीय कानून यह है कि किसी straf i saaka 1979 (Administratur) as afafafar (Representative) पर सातवाय काहातिपूति wि मुपदमा चलाया जा सकता है जो मतक क्षनिस्तान अपन जीवन काल में क्यिा हा मोर जा मानहानि, पारमण या प्रहार तथा पक्तिगत क्षति कमा क्षतिकरयन रहा हो। (Onाचन द्वारा परित्याग (Waver by clection)-~जब किसी क्षति पार किन का रिसो क्षनिवृत्य का प्रतिकार करन के लिए अनेक कानूनी उमाम सरलर हो और वह उनम किसी एक का वायवाही के लिए चुन ल तो दूसरे उपायो क निरा यह सममा जायगा जिसन निर्वाचन के द्वारा परित्याग पर दिया है । उशाहरणाय, यदि वाई क्षतिपूण क्रय क्षति य मानन के मतगत भी मभिवाम्य (Actionable) हो और उस लिए सवितामगावरण (Breach of Contract) पन्तगत भी कायदारी की जा सब सपा क्षति प्राप्त व्यक्ति प्रतिम उशय श्री पायवाही वरना सुन ल ता वह फिर सतित्य चानन के मतगत क्षतिपूति का मुकदमा नहीं पा समा, परतु वह वर्गलपन दादरसी (Altera ative relters) व प ल सकता है। नीते प्रति हाडिंग (१८५१), सो. एक्स. ३vt] (3) समीता एम सन्तोष (Accord and satssfaction)-पदि या और प्रतिवादी म परहार समझौता हा जाता है जिसके फलस्वरूप प्रतिवारी हतिगत म क्षतिपूर्वि दरवार को सन्तुष्ट कर देना है तो वादो या अतिपूर्ति प्राप्त करन लिए मुकदमा चलान का अधिकार समाप्त हो जाता है । म्परा रह लि परस्पर मममौता बिना मतिपूति द्वारा बादी को सन्तुष्ट क्यि भो पनियमित नही अनिकृत्य के सामाय सिद्धात २५ है। [लो प्रति लकाशायर एण्ड या रेलवे कृपनी (१८७१), एल० प्रार० ६ चासरी हि०५२७] (४) मुक्ति (Release)-चादी अपने प्रति दिय गय शानिपूण कृत्य की क्षतिपूर्ति प्राप्त करने के मधिकार को स्वयं भी छोड सरता है । इस सम्बप म अग्रेजी कानून यह है कि इस प्रकार का मुक्ति पत्र या तो लिखित होना चाहिए या इस प्रकार की मुक्ति के लिए वादी को कुछ प्रतिदान (Consideration) मवश्य प्राप्त हाना चाहिए । लकिन भारतीय कानून में मुक्ति के बदल मे कोई प्रतिदान लेना मनिवाय नहीं है। (५) मौन सम्मति (Acqulescence)- पदिक्षति प्राप्त व्यक्ति अपने क्षति पूति पान के अधिकार को जानते हुए भी एक लम्बे समय तक कोई कायवाहो नहीं परता और चुप्पी साध लता है तो विपक्षी यह निष्कप निवान ममता है कि सम्भवत उसन अपना क्षतिपूति का मुकदमा चलान के अधिकार को त्याग दिया है। लेकिन मौन सम्मति का यह सिद्धात अधिकतर वादी व व्यवहार पोर अधिकार के प्रति सचेत पान पर पवलम्बित है। (६) न्यायादेश का निष्पादन (Execution of judgment)- कान का यह एक सामाय नियम है कि कोई भी एक व्यक्ति एक क्षातिकृत्य के लिए केवल एक बार ही उत्तरदायी ठहराया पा सकता है पोर उग पर बार-बार मुक्दमा नही पलाया जा सकता । लेकिन इस सामाय नियम क निम्नलिखित मपवाद (म) यदि रिसी शातिपूण वृत्य से लगातार किसो व्यक्ति को नित्य क्षति पहुँचती जा रही हो सो एव चार क्षतिपूर्ति प्राप्त कर लेने के बाद हातिपूर्ति के लिए पुन दावा किया जा सकता है । (4) मा एक ही सारिकृय द्वारा रिसो व्यक्ति ने दो विभिन्न प्रधिकाराको भग किया गया हो तो क्षतिकर्ता के विरुद्ध एक से अधिक मुरादम मग दिये गये अधिकारों वे मनुमार चलाये जा सकते हैं। (स) उन मामलों में जिनम वास्तरिक क्षति (Actual damage) मुक्दमे का मून तथ्य नहीं है पयवा उन मामलों म मिनमे सति हो अभियोग्य कृत्य का मूलाधार है, परिस्थिति व मनुमार मुरदम घलाय ना सकते हैं। (७) मादी (Bar of limitation)--यदि क्षति प्राप्त व्यक्ति क्षतिपूति के लिए निर्धारित अवधि के भीतर उचित यायालय में मुकदमा दायर करने में २६ धातिवृष्य विपि पर प्रश्नोत्तर असमय रहे तो तमादी द्वारा उसका मुकदमा चलाने का अधिकार समाप्त हो जाता है। भारत के 7वीन भवधि अधिनियम, १९६३ (The Limitation Act, 1963) में विभिन्न प्रकार के क्षहिकृत्यों की कायवाही के लिए विभिन्न सवधि निर्धारित को गयी है। प्रश्न १४-विदेश में किये गये क्षतिकृत्यों के कानून पर जैसा कि इगलैण्ट और भारत में चालत है, अधिकृत निर्णयों से पुष्टीकरस करते हुए सन्तिम दिप्परमी लिपि । उत्तर-विदेश म दिये गये चतिकृत्यों का कानून-विदेश म किये गय क्षतिक्त्या का कानन जो इगलण्ड में प्रचलित है, वही भारत में भी है । अग्रेजी कानन का यह एक सामाय नियम है कि यदि कोई ध्यक्ति विगो अचल सम्पत्ति (Immovable property) के प्रति कोई क्षतिपूण यत्य पर तो क्षति प्राप्त यत्ति क्षतिक्ता पर २ च तक क्षतिपूति या मुक्दमा नही चला सकता जब तर कि वह विदा म हो, भले हो क्षतिकर्ता इगल का नागरिक हो। लेकिन यदि धाति- पूण पत्य किमी की चल सम्पत्ति (Movable property) या गरीर (Person) के प्रति किया गया हो तो क्षति प्राप्त व्यक्ति को क्षतिक्र्ता पर क्षतिपूति प्रास करन क लिए केवल निम्नलिखित परिस्थितिया मे मुकदमा चलाने का अधिकार है, भले ही क्षतिवर्ता विदेश में हो (म) प्रतिवादी ने जो छातिपूरण करय क्यिा है, वह उस देश के कानुन विचार से गैरकाननी हो, जहाँ वह दिया गया है। उदाहरणाय, यदि कोई वस्य इगलैण्ड में गैरकानूनी है कि तु भारत में कानून सम्मत है तो ऐसे क्रय के लिए इंगलैण्ड म मुक्दमा नहीं चलाया जा सकेगा यदि वह क्रय भारत में किया गया हो । इस सम्श्य में एक प्रमुख मामले का मधिरत निणय उल्लेखनीय है। या ने जमैका के राज्यपाल (Governor of Jamaica) पर प्रवध कारावास (Illegal detention) लिए शातिपूर्ति का मुरदमा चलाया जिसमें राज्यपाल को मोर से यह दलील दी गमी कि उसने यादो को राजद्रोह का दमन करने के सिलसिले में बारावासित किया था मौर जमैका कानन के मन्तगत उसको एसा करने का मधिकार था। इस मामल म निणय देते हुए विद्वान् पायापो ने वहा कि यदि पिसी मय दापे कानून मे कोई क य वैघ (Lawful) है तो उसके लिए इगण्ड में शातिपूति का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, मल हो वह करय इगलैण्ड क मानन में पध हो। [फिलिम प्रति मायर (१९७०), ६ क्यू. बी.] .
क्षतिप के सामाय सिद्धान्त (ब) प्रतिवादी ने जो क्षतिपूए कृत्य किया है, वह इस प्रकार का होना चाहिए वि यदि वह इगलैण्ड मे दिया जाता तो अभियोग्य (Actionable) होता। उदाहरणाथ, यदि किसी अग्रेज ने भारत मे एसा य क्यिा है जो भारतीय कानून प्रतगत तो अभियोग्य है किंतु इगलैण्ड के कानून के Vतगत अभियोज्य नहीं है तो वादी पोजिमको चल सम्पत्ति या शरीर को क्षति पहुंची है, इगलैण्ड म उक्त वृत्य के लिए क्षतिपूर्ति का दारा परने का अधिकार नहीं है। कारण यह है कि इगलण्ड अपने दर का कानुन हो प्रपा देश में लागू कर सकता है, विदश का कानून नहा । एमय के लिए, यदि वादी को कानूनी क्षमता प्राप्त है, तो भारत म से क्षतिपूर्ति चा मुक्दमा चल सकता है। प्रश्न १५-- 'जान वृम पर आपत्ति लेना' (Volentu non fit Injuria) के सिद्धान्त को उदाहरण सहित व्याल्या कीजिए। उत्तर-जान बम पर आपत्निा (Voltatunon Daman क्षतिकृत्य कानून का यह एक बुनियादी सिद्धान है कि यदि कोई व्यक्ति जान बूझकर मापन पर भापत्ति लता है और उस दशा म उस कोई क्षति पहुँचती है तो उस क्षति के लिए यह स्वर ही जिम्मदार सममा जाना चाहिए । यह सिद्धात 'जान-बूझकर मापत्ति लना (Valenti nonnt injurya) का सिद्धात पहलाता है । इस सिद्धात पतगत नेवल शरीर {Person) का पहुँची क्षति हो विचारणीय नही है, प्रायुत सम्पत्ति को भी पहुंची पति पर विचार किया जा सकता है । लेकिन इस सिदान्त के लागू करने के लिए दो बातें विशेष रुप से विचारणीय है। एक तो यह कि सति प्राप्त व्यक्ति न पन पापका जान भवर मापत्तिजनक परिस्थिति में डाला हो, और दूसरी यह वि भापतिजनर परिस्थिति ५ जो क्षति उसको पहुँचो हो, उसका पूरमान भी उस हो। यह बात भी विचारणीय है कि क्षति प्राप्त व्यक्ति न प्रपन को भारत्तिजनक परिस्थिति में डालने को समति (Convent) 'दच्छापूर्वर और स्वत तापूर दी हो। इस सम्बन्ध में यह बात स्मरण रहे कि केवल जोखिम के शान होने का मर्थ हो सहमति नहीं है । हिस प्रति हारवाद, (१९३५), १० वी० १४६] उपयुस सिद्धान्त को भली प्रकार गमझने के लिए एक उदाहरण देना मावश्यक है। मान लीजिए कि किसी गीचे के मालिक ने अपने बगीचे की रक्षा लिए पुत्ते पास रो हैं और यगोचे के बाहर दरवाजे पर यह तम्नी लिख पर टांग दो है कि इस बगीचे में कुत्ते पल हैं। अव प-ि उम बगीचे में कोई पति मरण प्रवेश करता है और पुत्ते बसे काट लेते हैं तो वह व्यक्ति उन कुत्तों रे मालिग से गतिपूर्ति २८ क्षनिहाय विधि पर प्रश्नोत्तर प्राय नही कर समता, क्योंकि उसने अपने यो उस पापचिजक परिस्थिति म स्वय साता है और उस परिस्थिति को जोखिम वा उस पूर्व माा भी है। इमो प्रकार यदि पाई रोगो किसी पान १ पास जाय और वह सजन उम बतलाय वि प्रापरेशन म उसर प्रागो या सतरा है और इस पर भी वह रागी उस सजन स प्रापरेशन कराय ता पापरेशन म यदि रोगो वो वाद दाति पहुँचती है तो सजन क्षतिपूति देने का जिम्मटार नहीं है। ऐस मामन में जिसम प्रतिवानी की लापरवाही से वादो को क्षति पहुँची हो, उपयुक्त सिद्धान्त की दलील बचाव में कारगर न होगी। इस प्रकार का एक मामला उल्लसनीय है । प्रतिवादी ये नोकर ने एक घाडागाही सावजनिक माग पर छोड़ दी। घोडे गाडी को बिना किमो चालक के हो लेकर सडक पर भाग निकले । वादी ने जो एक पुलिस सिपाही पा, गाडी को विना पालक वे सडक पर भागते देखा । उसको उयूटो उस समय सहक पर नहीं पी बल्कि पुलिस स्टेशन पर थी । वह पुलिस स्टेशन सबाहर माया मोर उमन रेखा विसहब पर इस प्रकार बिना पालर के भागती हुई घोहागाटी वो यदि न रोका गया तो वह सहर पर चलने वाले एक स्त्री मौर कुछ बच्चों का तुरत बुचल देगा । वादी ने उन्हें बचाने के लिए अपने यो खतर मे हाल कर गाडो राय ली मोर इस प्रयत्न म वह बुरी तरह घायल हो गया । उसने क्षतिपूति के लिए गाये व स्वामी के विरुद्ध मुकदमा चलाया । प्रतिवारी ने उपयुक्त सिलात की दलील पपन बचाव म दी । विद्वान यायाधीश ने निणय दिया कि जिस भार की घटनाएं इस मुमतम म हैं, उन परिस्थितियों म प्रतियाती की दलील नितात लचर है, क्यादि जान-यूझ कर मापत्ति लेन (Volenti non fit injuria) या सिद्धान्त ऐसी परिस्थितियो म लागू नही होगा । प्रतिवादी ने वरत ही लापरवाही या व्यवहार किया है । मत वादी प्रतियाती सतिपूर्ति पाने का पानूनन अधिकारी है । [इस प्रति हारयुड (१९३५), १५० बो० १४६] प्रश्न (६-निम्नलिखित समस्याओं की समस्यापूर्वि कीजिए (प) य' यह जानते हुए कि ' धराब पिए हुए है, उसको कार म यिना भाडे यात्री की हैसियत से सफर परता है । 'स' शराब के नो में द्रतगति सवार चलाता है। राम्त में वह एक मय यात्री को पार रोप पर उतार देता है और फिर उमो द्रुतगति से पार पाने लगता है । '' फिर भी मपनो यात्रा यो, यह जानते हुए भी हिमे इस प्रकार वार चलान स सतरा है, जारी रखता है। मवस्मात् कार रिमी पेट मे बराती है जिप्सर परिणामस्वरूप '' बुरी तरह घायल हो जाता है। यह सतिपूति लिए 'स' के विष्ट मुदमा पलाता है । 'ख' प्रपने मचाय में क्षतिकृत्य के सामाय मिद्धात २६ जान बूझकर भापत्ति लेने (Volent1 nor it injuria के सिद्धान्त को दलील देता है। क्या उपयुक्त परिस्थितियों मे 'क' को क्षतिपूति के लिए 'ख' उत्तरदायो है । (ब) 'ख' अपनी घोडागाडी को सावजनिक माग पर बिना चालर के छोड कर समीप की दूकान पर सामान खरीदने चला जाता है । उस समय जबकि वह दूकान के भीतर खरीदारी कर रहा होता है, सहर पर चलता हुआ कोई व्यक्ति गरार तन पटाखा छोड देता है जिसके धमाके से विदक कर घोडे गाडी को लेकर भाग निकलते हैं । 'क' इस प्रकार बिना चालक के सहक पर भागती हुई घोडागाडी को जिससे सड़क पर चलते हुए लोगा के कुचले जाने का खतरा है, रोक्न का प्रयास परता है और परिणामस्वरूप उसको चाट पहचतो है । वह क्षतिपूति के लिए 'ख' विरुद्ध मुक्दमा चलाता है । 'ख' भपन बचाव में यह दलील देता है कि 'क' ने स्वेच्छा से जान बूझ कर यह मापत्ति ली और यह कि पटासा छोडन वाले व्यक्ति के अपकृत्य से यह घटना घटी है जिसकी जिम्मेदारी उस पर नहीं हो सकता। क्या उपयुक्त परिस्थितिया म 'क' का क्षतिपूति क लिए 'स' उत्तरदायी है ? (स) 'द' को रेलवे स्टेशन जाना है । वह 'ख' वे तांग म किराया दकर चलता है । 'ख' रलवे स्टेशन को सडक पर तांगा चलाते हुए एसे मोड पर पाता है जहाँ मरम्मत के लिए सहर बद होन की तस्ली लगी है । पतग का दूसरो पुमावार सडक स ले जान के लिए मोडता है । 'क' को रेलवे स्टेशन पहचन की जल्दी है । वह यह दपते हुए भी कि एक अन्य तागा उसा वर सहर को बगल स जहाँ एक सतरनार ढलान है, सुरभित गुजर जाता है , 'स' में भी उमा भोर मे तागा ले जाने को कहता है । 'समको वान मानवर उन मोर म तांगा ले जाने की कोशिश परता है । लेकिन लान पर तागा फिमल जाता है और दोनो घायल हो जात हैं । वह एक दूसर के विरुद्ध क्षतिपूर्ति का दावा करते हैं । उपयुक्त परिस्थितियो म 'क' अथवा 'स' म मे कौन क्षतिपति के लिए जिम्मेदार है। (द) सहर पर पेल पलठे हुए 'व' को 'प' मोटरकार सात हुए मिलता है। दोना मित्र हैं। 'प' 'क' से माटरवार में बैठन के लिए कहता है और 'र' उसकी बात स्वीकार कर लेता है। वो असावधानी से मोटरवार पिसी पड से टपरा जाती है जिसके परिणामस्वरूप २' को घोट पहुंचती है । वर 'स' के विरुद्ध सातिपति का दावा करता है। क्या उपयुक्त परिस्थितियों में 'क' को क्षतिपूर्ति के लिए 'स' जिम्मेदार है।
क्षतिकृय विधि पर प्रश्नोत्तर 1 उत्तर-समस्याएँ-(म) मामतौर से यदि किसी व्यक्ति को खतरे का पूर्व शान हो मोर वह फिर भा जाखिम उठाए तो यह समझा जायगा कि उसने जान दूभ करमापत्ति ली। लेकिन यदि किसी व्यक्ति को मय व्यक्ति के कानूनी क्त्तयों का पालन न करन के कारण क्षति पहुची हो तो उसको क्षतिपूति के लिए क्षतिकर्ता जिम्मर होगा और वह जान बुझ पर आपत्ति लेने (Volenti non fit inju ria) क मिक्षा त को दलोल अपने बचाव में नहीं दे सकेगा। [डेन प्रति हेमिल्टन (१९३६), १५० बी० ५०७] प्रस्तुत मामले म यद्यपि यह मही है कि 'क' को सतरे का पून पान था और उसने स्वच्छा से भापत्ति ली, परतु 'ख' ने भी शराब पीकर कार चलाते हुए अपनी कार के यात्रियों को सुरक्षा का अपना कानूनी पत्त य पालन नहीं दिया । कार को दुघटना जिसके परिणामस्वरूप 'क' घायल हुमा, 'स' के उक्त कानूनी पर्त य को भग करन के कारण हुई । मतएव 'प' 'क' को क्षतिपूति के लिए जिम्मेदार है। (व) प्रस्तुत मामल की घटनाए [हस प्रति हारवुड (१९३५), ' थे. बी० १४८] के मामल की घटनाप्रो से मिलती जुलती हैं । इस मामल म यह तय हुमा है मि जान मार प्रापत्ति लन (Volenti non fit injuria) का सिद्धात ऐसी परिस्थितिया में लागू नहीं होगा जिनमे पहुची क्षति के लिए प्रतिवादी मपनी लापर वाही के कारण जिम्मटार हो। प्रस्तुत मामले में 'ख' ने अपनी पाडागानीको सावजनिा माग पर धिना चालक के छाडकर बहुत ही लापरवाही का व्यवहार किया । उसे यह जानना चाहिए था कि ऐसी हालत में घाडे गाडी को लकर भाग सबते हैं जिसन परिणामस्वरूप सडक पर चलते हुए लोगो की जान व माल का खतरा हो सकता है तथा पाई व्यक्ति उहें राने की भी कोशिश कर सकता है । '' ने जिन परिस्थितिया मघोडा पो रोक्न को कोषित की और वह वायत हुपा उनम जा वूझ कर पापत्ति लन (Volenti non fit injuria) का सिद्धान्त लागू नहीं होता, क्यों िघटना सवया 'ए' को लापरवाही का क्षरण परिणाम है । यह दलाल भी रि घग्ना पटामा छोड़ने वाले व्यक्ति के अपकृत्य व कारण घटी, 'स' का जिम्मारी को हत्या पया कम नही परतो । पटाखा छोहने वाल पत्ति न एक अपत्य प्रवस्य किया। एक सही भिमाग नागरिक या हैसियत 4 उसे एसा भरारत नहीं करनी चाहिए थी। इस घटना का उत्तरदायित्व उन पर भा है। सविन 'ब' को मो यह जानना चाहिए यादि यह विता चार सावजनिक माग पर घोडा गाडी छाड़ रहा है और दिपिको स्पति को रारत स पाडे दिक गए तो लागो र जान क्षतिकृत्य के मामाय सिद्धान्त व माल को क्षति पहुँचने की सम्भावना है। मतएव 'ख' प्रत्येक परिस्थिति में 'क' को क्षतिपूर्ति के लिए जिम्मेदार है। (स) प्रस्तुत मामले म 'क' अपवा 'ख' में स काई भो एक दूसरे का क्षतिपूर्ति का जिम्मेदार नहीं है । '' न स्वय 'स' से उम खतरनाक हान स तागा ले जाने को कहा और स्वेच्छा स स्वय जान यूझकर प्रापत्ति लो तया 'ख' न तागा चलाते हुए कोई लापरवाही या भमाधानी वा व्यवहार नहीं किया। अतएव 'क' को क्षतिपूर्ति के लिए 'ख' बटापि जिम्मदार नहीं है । इमो प्रहार 'स' न मा पर मा पूर नान हात हुए 'क' को बात मानकर स्वच्छा सापत्ति ली इसलिए 'क' उसको क्षतिपूर्ति के लिए उत्तरदायी नहीं है। (द) प्रस्तुत मामले में यह स्पष्ट है कि दुघटना 'स' को असावधानी के पारण घटी | भतएव इस मामन में जान बूझ कर भापति लेन (Volentinon fir injuria) का सिद्धान्त लाग्न नहीं होता । डेन प्रति हेमिल्टन [ (१९३६) १ के. वी. ५०५] के प्रसिद्ध मामल में यह तय हुआ है कि यदि दुघटना प्रतिवादा को लापरवाही मा मसावधानो का तत्क्षण परिणाम हा तो वह बादो द्वारा जान बूझ कर मापत्ति मेन की दलोल पपन बचाव म नहीं दे सकता । प्रस्तुत मामले में 'क' ने भल ही स्वेच्छा से 'ख' की मोटर कार में चलना स्वीकार कर लिया विन्तु उसे 'य' की असावधानी से चोट पहुची । अतएव 'ख' उसको क्षतिपूर्ति के लिए जिम्मदार है। प्रश्न १७-ऐसे सामान्य अपवादों की तालिका प्रस्तुत कीजिए जिनमें किये गये क्षविकृत्य अभियोग्य नहीं होते। उत्तर--सामान्य अपवाद-यद्यपि व्यक्ति का कोई भी एसा कृत्य जिसके द्वारा उसन प्रय व्यक्ति के कानूनी पधिकार का भग किया हो या पय व्यक्ति के प्रति पानूनी पत्तय्य का पालन करने म असमय रहा हो, सतिकृत्य वानून के मतगत अभियोज्य है, लेकिन इस सामाय सिद्धान्त के कुछ अपवार भी हैं। ये प्रपा माव जनिक शाति प्यास्या तथा सार्वजनिक मुविधा मिदाना पर मापारित हैं । सर परिव पालक (Sir Fredrick Pollock) मतानुसार में प्रापवाद एमी उमुक्तियाँ Immunitics) हैं जो व्यक्ति के कानूना नायित्व को सामित वरती हैं। इन सामाय अपवारों पयवा उ मुक्तियों को तालिम निम्नलिग्नित है (१) राय पृत्य (Act of state), (२) बायपालिका (Executure), पायातित (Judiciary) एवं मपन्यायिक (Quasi Judicial) वृस्य, (३) माता पिता तथा अभिभावत्रों द्वारा किय गर कृत्य, ३२ क्षतिपय विधि पर प्रश्नोत्तर (४) पवश्यम्भावो दुघटनाप (Incvitable accidents), (५) सहमति से किये गये कृत्य, (६) मावश्यक तथा सावजनिक हित म किय गय पृत्य, (७) स्वरक्षा के लिए किय गय कृत्य, (८) सामाय मधिकारों के उपभोग + लिये किये गये कृत्य (Exercise of Common rights), (E) साधारण क्षतिपूण वृत्य, (१०) कानून सम्मत कृरप, (११) व्यक्तिगत उमुक्तियां (Personal immunities), ज्व (१२) ईश्वरीय कृत्य (Act of God)। प्रश्न १८-राज्य कृत्यों (Acts of Statc) के ऑचित्य (Justifica tion) की विवेचना करते हुए उन परिस्थितियों का वमन कीजिए जिनमें वे क्षतिकृत्य कानून के अन्तर्गत भाभियोज्य हो जाते है। उत्तर-राज्य कृत्यों का औचित्य-~सर जेम्स स्टीफन (Sir James Stephen) ने राज्य कृत्यो की परिभाषा देते हुए कहा है कि राज्य कृत्यों के पतगत सबाट प्रपया उस प्रतिनिधियों द्वारा किये गये सभी मधिकृत कृत्य सम्मिलित हैं। इगलैण्ड के कानून का यह एक सामाय सिद्धान्त है कि सम्राट कुछ भी मनुषित नहीं परता। इमो सामान्य सिद्धात के अनुसार सम्राट अपदा उसर प्रतिनिधियों द्वारा विय गय मधिन वृत्य क्षतिकृत्य वाताव मतगत अभियोग्य नहीं होते । यदि किसी व्ययित द्वारा य गय क्षनिहत्य को समाट ने कृत्य हो जान व बाद भी स्वीति दे दी तो वह भी राज्य पृत्य समझा जाता है और उमके विरुद्ध कायवाहा नहीं की पा राक्ती । बरुन प्रति हेमा (१८४७), २ एक्स. १६७] भारत में भी राय वृत्यों के मोचित्य के सम्बध में इगलैण्ड में प्रचलित गिद्धात ही मधिरतर लाग्न होते हैं। भारतीय मानून के अन्तगत सरकार अपने वम पारिया द्वारा किय गय ऐम क्षतिरत्या के लिए उत्तरदायो नहीं है । उन्होने अपने बानूनी व तभ्यो का मषित रूप से पालन वरन म दिये हों। इस उ मुक्ति का माधार यह सिक्षात है । कानन द्वारा बध घोषित किया हमा वृत्य मरने सक्सिी यो कानून की दृष्टि मकाई क्षति पहप हो नहीं सस्ती, पोर जव क्षति ही नहीं पहुँच मरतो तो क्षतिपूर्ति भी प्राप्य नही है पोर त हो मुकदमा चलान के लिए कोई माधार है । लरिन यह ध्यान रहे कि यदि यह सिद्ध कर दिया जाए कि ऐसा कृश्य सावधानी से किया गया है तो क्षतिपूर्ति के लिए मुदमा चलाया जा सरता है।
क्षतिकृत्य के सामान्य सिद्धान्त ३३ , उदाहरणाय, यदि विधान मडल (Legislature) ने किसी माग पर रेलवे चलाने का कानन बना दिया है तो उस रेलवे लाइन के स्टेशन के पास रहन वाले इस माघार पर क्षतिपूनि का मुकदमा नही चला सक्ते कि रेलो की पावाज से, उनका क्षति पहुँचती है । कि तु यदि यह रेलवे कम्पनी किसी वस्ती म अपना कारखाना खोल दे और उसके शोर स उस वस्तो म रहने वालो को क्षति पहुंचे तो क्षातप्राप्त व्यक्तियो को उस कम्पनी के विरुद्ध क्षतिपूर्ति का मुकदमा चलान के लिय अच्छा प्राधार होगा। [राजमोहन बोस प्रति ईस्ट इंडिया रेलवे ( १८७२) १० बी० एल० मार० ९४१ ] उपयुक्त परिस्थिति के अतिरिक्त राज्य कृत्य निम्नलिखित परिस्थितियो में भी अभियोज्य हो जाते हैं (१) जवि अचल सम्पत्ति पर अनाधिकार प्रवेश किया जाय (२) जबकि कानून द्वारा दायित्व स्वीकृत हो, ए५ (३) जवकि यह सिद्ध कर दिया जाय कि कमचारी द्वारा किय गय कत्य से सरकार को लाभ पहुँचा है। प्रश्न १६ –'अवश्यम्मानो टुर्घटनाएं क्या है ? क्षतिकृत्य कानून के अर्तगत उनके औचित्य पर टिप्पणी लिासए । १८-अवश्यम्भावी घटनाए- अब यम्भावी दुघटना (Inevitable Accident) यह दुघटना है, जिसको सतक, सावधानी (Reasonable predence) या सतक्ता (vigilence) वे वरतन पर भी न रोका जा सक । कानून का ( recnnical) भाषा म एमो दुघटना को जिम सावधानी या सतकता बरतन पर बचाया जा सक, अवश्यम्भावी दुघटना नहीं कहा जायगा। अवश्यम्भावी दुघटना के कारण बिल्कुल हो अप्रत्याशित ( Unforseen ) होने चाहिए। ऐमो दुघटना हो अवश्यम्भावी दुघटना की श्रेणी में रखी जा सकती है जो सावधानी या मतकता बरतने पर भी घटित हो जाय | उनाहरणाथ, यदि कोई ध्यक्ति अपने साथ स्वत प्राग लग जाने वाला पदाय (Explosive substance) वो जग रहा हो तो उस क्तव्य है कि वह भाग लगन वाल कारणों से बचने ये लिए मतक्ता बरत, विन्तु यदि प्रत्याशित वारण स उस पदाथ म माग लग जाय तो उसके परिणामस्वरूप जा सति किसी व्यक्ति या उसको सम्पत्ति यो पहुँचेगी उसका उत्तरदामिरव उस पदाय को ले जाने वाले व्यक्ति पर न होगा, क्योकि वह शनि मयसम्भावो दुघटनावश पहेको । सतक, क्षतिकृत्य विधि पर प्रश्नोत्तर उपयुक्त विषय के प्रकरण मे ब्राउन प्रति के डेल [(१८५०), ६ पासिंग २६२] का मुकदमा विशेष रूप स उल्लेखनीय है । इस मुक्दमे की घटनायें इस प्रकार है--- एक बार वादो और प्रतिवादो के कुत्ते मापस म लड रह थे। प्रतिवानी कुत्तों को एडात के लिए उनको मार रहा था पौर वागे वही खड़ा इस घटना को दस रहा था। इसी बीच प्रतिवादी द्वारा बादी को पास में चोट लग गई। वादी न सातिपूर्ति के लिए प्रतिवादी पर मुक्दमा चलाया। चायालय ने निणय दिया कि प्रतिवादी का त्य पून्या विधिपूण पा, पयामि त हुए ता वो अता करना एक चित राय था । बार एक विधिपूगा घोर उचित वस्य सतक्ता एव मावधानी से मरन पर भी यह घना हो गई और वाी को प्राख म चाट लग गई ता व पदयम्भावी दुघटना प्रौर इमरे लिए बाग को प्रतिवाना स क्षतिपूर्ति पार मा प्रधिकार स्मरण रह कि अवश्यम्भात्रा घटनाए प्राय दो कारणो स होती हैं । एक तो वे Ifrसा प्रारतिय तारणवश हुई हा, और दूगरी व जाकिमी मनुष्य द्वारा तो हों लेकिन उनको सतक्ता एव सावधानी बरतन पर भाराका जाना मनुष्य की सामय व बाहर हो । पहले प्रकार की अवश्यम्भानो दुघटनामा को हम वरीम Eri (Att of God) वहन है। एसो घटनाम्रो य उदाहरण के लिए यदि विसी ध्यक्ति पर ग में चलते समय बिना गिर पड पार उसस उसकी मृत्यु हा जाय तो हम उसे प्रागतिक दूपटना पहा । लपिन यति राह चलते समय विसा व्यक्ति या पैर पिपल र मौर यह गिर बर बाट खा जाय तो हम यहा कि यह दुघटा। मनुष्य पो सलक, सारधानी बरतन पर भी हा गई । सावधानी । मापस लिए कोई माप दत नन। है । पर सावधानो की प्राय तो काटियां (Degrees) हो सपती हैं- साधारण मेषम, साधारण और साधारण समधिक । साधारण सापपानी या सार-सावधानी उस सावधानों को कहते हैं ना कि साधारण यक्ति सामा यत साधारण परिस्थितियो म परतत है। प्र०२० ~क्षविकृत्य कानून के अन्तगत न्यायाधीशों की उ मुक्ति (Immunity) पर मक्षिप्त टिप्पणी लिपिए। ३०-न्यायाधीशों की उन्मुक्ति -तिकरय कानन 1 मत्गत कुछ विगिट पतिया का कानुनी दायित्वो स छूट या अमुक्ति प्रात होती है। इन उ मुक्तिया पा पाधार सावजनिव पान्ति व्यवस्था या सावजनिक सुविधा होता । यापापोगा वो इसी प्रकार को उन्मुत्तिया प्राप्त हैं। विसी यायाधीश पर किसी एम परय लिए दाठिवत्व शन्न क मन्तगत मुरतमा नहीं चलाया जा सकता १५ विकृत्य के सापाय सिद्धान्त जिसको,कि उसने, अपने कानूनी पत्तों को पूरा करने के लिये क्यिा हो ,भले श्री उमका व्यवहार क्षतिपूण क्यों न रहा हो । प्रत यदि किसी यायाधीश ने किसी मुकदम द फमले में किसी के प्रति कुछ अपमानकारी वार्ते निखी हो तो वे अपमान- पायाधीश विरुद्ध पारी लख (Libel) नहीं मानी जायेंगी और न ही उस मानहानि का मुकदमा चलाया जा सकगा। 'याया वो र मुक्ति या उद्देश्य यह है कि वह अपनग वाय निभयनापूरक सर सब 1 घी लसान धीरजलाल के मतानुसार यह उन्मुक्ति दिसा प्रष्ट या ईर्ष्यालु न्यायाधान हित 4 लिए नहीं है, बवि सावजनि- य यारण य लिय है। इसी माय कि ल्यागा में देय पर प्राधारित गभी प्राधुनिक मविधाना म यायाधीशों धो पाए प्रभाषा स गुम सा गया है और वह अपन याय सम्र धो बत यो के पालन करन म उ भा परत या कहत है, उमा यि उर किया प्रसार भो उत्तरदाया नही ठ राया जा सकता है। भारत । सविधान (Constitution of 'India) न भा यायाधीषा को इस प्रभार को उ मुक्तिया द पौ हैं। सविन यदि ६१६ यायाधIT जाम पर अपन अधिोत्र (Jurisdiction) स बाहर काय परता है पार गर परिणामस्वरुप विमा व्यक्ति मा क्षति पहुँचाना है ता क्षति प्राप्त व्यक्ति वो यायाधोग व विस्त क्षतिपूति क लिए मु मा चना अधिकार है । पच (Arbitrator) तथा जूरी (Jury man) भी यायाघात या श्रेणी में मान है । धन कापून उन। भो पायाधाना व रामक्ष मानता है और जो उगुतिया पायाधाना या प्राप्त है, व उनको ना प्राप्त है ! प्रस्न २१ -इश्वरीय कृत्य क्षति र कानून के अरागत कहाँ सब पानूनी पचार प्रस्तुत करते है ? महरम सहित व्याख्या यीजिए। उ०-श्वरीय कृत्य पराय पृत्यां म ताय एस प्रावित घटनामों से है जो प्रति रप से पाटन गाता है और जिह मनुष्य गत ता बरतन पर भी पहन ग नही जान सपना । उदाहरणार्थ, '' को पश्ट्रो में एक जनाय है जिसमें समापन भरा रहता है। प्रवान तेज वपा और नूफान म नलागय म किनार टूट जाते हैं जिगर परिणामस्वरूप 'स' व मकान में पानी भर जाता है पोर टसबा सात पचती है । ऐसी परिस्थिति म '' G' यो भटिपून के लिए निमगार नहीं है, पोरि 'शयत इश्वरीय दृश्य । पचा। मनुस् त को साधारण । पटनामाका रामद लिए सतपता बरत राबता है, तदिन उसकी सतरतास असाधारण नामोकाशे मारा नहीं की जा सकती । कानुन का यह स पतित्य विधि पर प्रश्नोत्तर सामाय नियम है कि जवकि कानून के मतगत किसी व्यक्ति पर क्सिी क्त्तव्य को पालन करने का दायित्व है और यह व्यक्ति सतक्ता बरतते हुए भी किसी ईश्वरीय कारणवश उस क्त्तव्य का पालन करने में समय नही हो पाता तो "नून उसको क्षमा कर देगा। प्र०२२-व्यक्तिगत स्वरक्षा (Private Defence) की परिभाषा देते हुए उसके यौचित्य पर टिप्पणी लिसिए । ३० -व्यक्तिगत म्वरक्षा -मक्सर एसी परिस्थितियां उपस्थित हो जाती है जब कि व्यक्ति को भपन मथवा अपने पर माश्रित विसी यक्ति की जान या माल के बचाव या सुरक्षा के लिए कानूनी उपाय की शरण लेना सम्भव नहीं होता । एसी परिस्थितियों में पानून ने व्यक्ति को व्यक्तिगत स्वरक्षा का मधिकार दिया है । इरा भधिकार का उपभोग करते हुए -यक्ति को वेवल उतना ही बल प्रयोग करना चाहिए जितमा विनितात प्रावश्यक हो। यह बात वि क्तिना बल प्रयोग किया जाना चाहिए परिस्थिति विशेष पर निभर है मौर इसी कारण उसकी माप निर्धारित करना सम्भव नही है। यह बात भी स्मरण रखनी चाहिए कि व्यक्तिगत स्वरक्षा म बस प्रयोग की अावश्यक्ता को मादित करने का उत्तरदायित्व बल प्रयोग करने वाले व्यक्ति के ऊपर है। जिस समय यक्तिगत स्वरक्षा में बल प्रयोग किया जा रहा हो, उस समय यदि किसी मय यक्ति को, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उस हद म भाग न ले रहा हो, किसी प्रकार का मापात पहुच जाय तो वह भास्मिर मापात (Accidental harm) माना जायगा। लविन व्यक्तिगत स्वरक्षा के नाम पर किसी पक्ति को ऐसा नाय रन का अधिकार नहीं है जिससे कि जान बूझ कर मय यक्ति का हानि पहुँचे । उदाहरणार्थ, यदि किसी साधारण पार मान के कारण किसी की भूमि पर बाढ़ का पानी माने वाला हा तो उस भूमि के स्वामी को अधिकार है नि पपनी भूमि का पानी स बचाने के लिए उस पर पहार दिवारी बनवा ल । लेकिन यति किसी को भूमि पर जल एकत्रित हो गया है तो वह उस जल को किसी भय व्यक्ति की भूमि पर नही पॅर सकता । यह बात भी स्मरणीय है कि जब विपत्ति को परिस्थिति समाप्त हो जाये तो उमर वा बल का प्रयोग माचित माना जाता है। मोरिस प्रति बजेट का मामला इस सदभ म उल्लेखनीय है । इस मामले की घटनाए इस प्रकार है कि प्रतिवादी वादी वे मका के पास से जा रहा था। जिस समय वह मकान के निकट पहुँचा, मकान से निकल कर कुछ कुत्तों ने राह चला वालों पर भूना शुरू कर दिया मोर प्रतिवारी जूतों के ऊपर पढ़ा हुया घमरे का पट्टा ( Ganet) भी पार क्षति य के सामाय सिद्धात लिया । जब प्रतिवादी न कुत्तों को बन्दूक दिवाई तो वे भयभीत होकर भागे, रिनु प्रतिवादी न गाली चला दो जिसके परिणामस्वम्प वा का कुत्ता मर गया । इस मामले का निरोप देत हुए विद्वान यायायो न यह तय किया कि प्रतिवादी को भागते हुए कुत्ते पर गाती चलाने का कोई मौचित्य (justification) नहीं था, चयोंकि उस समय विपत्ति की परिस्थिति समाप्त हो चुकी थी। मतएव प्रतिवादी वादी को क्षतिपूर्ति के लिए उत्तरदायी ठहराया गया। प्र०२३ - आवश्यक अथवा सावनिक हित में किये गए कृत्यों के चौचित्य पर टिप्पणी लिखिए । उ.-आवश्यक अथवा सार्वजनिक हित में किये गये कृत्य -धाठिकृत्य पानून मे प्रावश्यक प्रयवा सार्वजनिक हित मक्यि गय कृत्यों का मौचित्य एक मच्चा पानुनी बचाव समझा जाता है। अतएव मावश्या प्रपवा सावजनिक हित में किय गय हरयों द्वारा जो क्षति क्सिो व्यक्ति को पहुँचती है उसके लिय क्षतिपूर्ति का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। सावजनिक हित का उद्देश्य ही एमे पर्यो का मौचित्य है । बात यह है कि समाज के हित के लिए व्यक्ति की सम्पत्ति, स्वतत्रता एव प्राण मादि सभी कुछ को माहुति दी जा सकती है। वर्षाकाल में सावजनिक हित के लिए ही सरकार गिराऊ मकानों को गिरवा देती है। दूवते हुए जहाज को झूबने से बचाने के लिए मक्सर उमो ऊपर लाहुमा सामान समुद्र म पाना पड़ता है। लग्नि यह बात स्मरणीय है कि इस प्रकार के क्त्य तभी दिय जा सकते हैं जब दि वह किसी परिस्थिति में नितान्त मावश्यक हों और उनसे विसा सावजनिक हित पोरदा होती हो अथवा होने की सम्भावना हो । प्रश्न २५ -उन सिद्धान्तों की व्याख्या कीनिए जिनके आधार पर अन्य व्यक्तियों द्वारा किये गये इविकृत्यों का दायित्व किसी व्यक्ति पर आता है। ४०-अन्य व्यक्तियों द्वारा किये गये वित्यों का दायित्व (Vications liability) -क्षतिकृश्य कानुन के पन्तगत क्मो-वभो एसो परिस्थितियां भी उपस्थित हो जाती है जब कि किसी वृश्य का परन वारा प्रपन मृत्य द्वारा पहुंचाई गई क्षतिक सिये उतरायो नहीं होता, बलि उस कृत्य के लिए बोईपय पक्ति उत्तरायो ठहराया जाता है । पर रिसो कृश्य के लिए उसने का यो उत्तरतरी न ठहरा र पिसा पर व्यक्ति पर उमरा दायित्व डाला जाता है तो यह मय व्यक्तियों द्वारा किये गये सतिकरयों तदापिरव (VICAxions liability) ३८ रिकृय विधि पर प्रश्नोत्तर पहलाता है। उदाहरणाथ जब विसी यक्ति का नौकर प्रपा किसी कृत्य द्वारा क्सिी व्यक्ति को क्षति पहुँचाय तो उस नौबर को उस क्षति का उत्तरदायी न मान कर उसके स्वामी का हो उत्तरदायी माना जाता है । सामण्ड (Salmond) के मतानुसार माधुनिक 'याय प्रणाली में कानून दो प्रकार के कृत्यों म ही एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति के पत्य के लिए उत्तरदायी ठहरा सकता है। एक तो स्वामो को सेवक के त्य के लिये तथा दूसर मृतक यत्ति के जीवन काल में किये गए कृत्या के लि उसके प्रतिनिधि (Representative) का । क्षत्कृित्य फानन में पहले प्रकार के उत्तरदायित्वा का ही अध्ययन किया जाता है और दूसरे प्रकार के उत्तरदायित्व साधारणतया इस कानून के अतगत नही मात । अन्य व्यक्तियो द्वारा किये गय क्षतिक यो का दायित्व निम्नलिखित मिद्धातो पर मवलम्बित है (१) कोई व्यक्ति जव विसो अययक्ति द्वारा कोई कृत्य करता है तो कानन मे वह कृत्य क्सी व्यक्ति द्वारा दिया गया समभा जाता है । [Qur fact alium fact per se-"He who acts through another is deemed in law as doing it himself ] सबक के कृत्य के लिए स्वामी का उत्तरदायित्व इसी सिद्धात पर भरलम्बित है लेकिन यह बात स्मरणीय है कि सेवक द्वारा पिया गया कृत्य उसके नियुक्ति काल म क्यिा गया हो। (२) प्रधान (Principal) अभिवर्ता (Agent) के पयों के लिए उत्तर- दायी समझा जाना चाहिये-(Respondeat Superior-'The Superior must be responsible, or let the Principal be liable)| इस सिद्धान्त का मूलाधार यह है कि वे सभी कृत्य जो अभिकर्ता द्वारा किये जाते हैं, प्रधान को स्पष्ट (Express) अथवा गभित (Implied) सहमति से ही वानूनी तौर पर किये गये समझे जाते हैं और वे वास्तव में प्रधान द्वारा ही किये गये वृत्य हैं। (३) आधुनिक काल मे भय व्यक्तियो द्वारा किय गये क्षतिकृत्यों का प्रौचित्य उपयुक्त सिद्धान्तों के अतिरिक्त एक भय सिद्धात के प्राधार पर किया जाता है । यह सिद्धात उपयोगिता (Expediency) मोर सावजनिक नोति (Public policy) पर भवनम्विप्त है । कानन का यह एक सामाय नियम है कि प्रत्येक कृत्य का पता अपने वृय का स्वय उत्तरदायी है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति किसी प्रय व्यक्ति द्वारा कोई वृत्य कराता है तो उस स्क्य उस अन्य व्यक्ति द्वारा दिये गय पृत्य पा उत्तरदायित्व लेना चाहिय | मर फ्रेडरिक पोलक (Sr Frederict Pollock) पा कहना है कि कोई व्यक्ति अपने नारों या ममिक्र्तायों के पृत्यों के लिए पेयद क्षतिकृत्य के सामाय सिद्धान्त ३६ इसीलिए हो उत्तरदायी नहीं है कि उसने उन नौकरों या मभिक्तामों का वे कृत्य करने के लिए अधिकार दिया है अथवा वे उसके प्रतिनिधि हैं, प्रत्युत व १ प उसके अपने मामले हैं और वे वृत्य उचित रीति स किए जायें, यह देखना उमका पत्त य है । प्रश्न २५ -किसी व्यक्ति पर अन्य व्यक्ति द्वारा किये गये कृत्यों का दायित्न किन अवस्थामों में आता है ? उदाहरण सहित व्यारया कीजिए। उ.-विमी व्यक्ति पर प्रय व्यक्ति द्वारा किए गए वृया का दायित्व निम्नलिखित तोन अवस्थामा म आता है (१) पुष्टीकरण (Ratification) -जब कोई यक्ति कोइ कृत्य रिसी दूसर व्यक्ति के लिए करता है और वह दूसरा व्यक्ति उसके कृत्य वा पुष्टीकरण कर देता है तो उस पुप्टोकरण न बाट यह कृत्य उमो पुष्टि करने वाल व्यक्ति का समझा जाता है और उसका सारा उत्तरदायित्व उसी पर मा जाता है लेकिन यह बात भी स्मरणीय है नि प्रत्यक्ष पुष्टोवरण की परिस्थिति मे पुष्टिार्ता क कार सारी की सारा जिम्मेदारी पा जाय मौर कृत्य करने वाला पूणरूपग उत्तरदायित्व से मुक्त हा जाय, एसा सदा और हर परिस्थिति मे मावश्यक नहीं है । यह बात भी स्मरणीय है कि गैरकानूनो कृत्यों का पुष्टीकरण नहीं किया जा सकता तया वह वृत्य जिसका पुष्टाकरण किया गया है, मेवर न अपने लिए न किया हो। १२) विशेष सम्बन्ध ( Sp cial relationship ) -कुछ न्यक्तियो के परस्पर सम्बय इस प्रकार के होत हैं कि उनके इस परस्पर सम्बध मात्र स ही उनम से विमो एक व्यक्ति द्वारा दिये गये कृत्य का उत्तरदायित्व दूसरे यक्ति का भी उत्तरदायित्व समझा जाता है । इस प्रकार के विरोप सम्बघ निम्नलिखित हैं (प) स्वामी तपा सेवन (NMaster and Servant), (घ) मासिक तथा स्वतत्र ठेवदार (Owner and Independent Contractor) (स प्रधान तथा मभिरर्ता ( Principal and Agent), (६) अभिभावक तथा प्रतिपाल्य ( Guardhan and Vard), () सम्पनी तथा उसके निरेगाव ( Company and its Directors), (स) म तया उसके साभीदार (Firm and its par ners) (३) महायता (Abesment ) - विसा क्षतिपूरण वृष्य का वरने वाले व्यक्ति को सहायता करने वाला मा उस पृय द्वारा मजित किय गय दायित्व को पूरा परने का उत्तरदायी होता है। - क्षतिकृय विधि पर प्रश्नोत्तर प्रश्न २६ -स्वामी भौर सेवक के परस्पर सम्बन्ध पर प्रकाश डालते हुए सेवक द्वारा किये गये ततिक्त्यों के लिये स्वामी के उत्तर दायित्न की पिचना कीजिए। उत्तर- स्वामी और सेवक का सम्बन्ध -प्रास्वन (Osborn) का मत है लिदा व्यक्तियों के बीच स्वामी भोर सवक का सम्बघ तब हाता है जबकि स्वामी का यह अधिकार हो कि वह कृत्य विशेषवरत समग सवा ' ऊपर पूण नियंत्रण रख सके और उससे अपनी इच्छानुमार काम करा सके । क्षतिकृत्य कानून क अत्तगत स्वामी प्रपन सवर क वृत्य के लिए तमी उत्तरदायी होगा जबकि सवक ने वह कृत्य देवल उसी क्षेत्र म तथा उसी सीमा तक क्यिा हो जिसक लिए वह सवा में रखा गया है । यदि स्वामी न किसी मय यक्ति को अपना सेवक काम करने के लिए दिया हो तो उस सेवक के कृत्यों का उत्तरदायित्व उसके स्वामी पर न होगा, क्योकि सेवक का कृत्य न तो उसके निर्देशानुसार हुमा मौर न ऐसी परिस्थिति में उसका सवक के उपर कोई नियत्रण था। स्वामा भौर सेवन का सम्बध कानून में बहुत ही घनिष्ठ माना जाता है। एक प्रसिद्ध मामले मे यह सिद्धात प्रतिपादित किया गया है कि यदि कोई स्वामी अपने सवर को कोई काम करने का मादेश दे जिसम कि साधारण सावधानी या सतक्ता बरतन की मावश्यक्ता है भौर सेवक के सावधानी बरतन पर भी किसी व्यक्ति को क्षति पहुँच जाय तो एसी दाम भी उत्तरदायित्व स्वामी का होगा। [ ग्रेगरी प्रति पाइपर (१८२९), ६ बी० एण्ड सी. १९१] यदि सेवक स्वामी द्वारा प्रादेशित कृत्य करने मे पूण रूप स सतक न भी हो तो भी उत्तरदायित्व स्वामी का हो होगा। [जोस प्रति हाट, ११६९८)२ साल. ४४०, फिलीटर प्रति पियड, (१९४७), ११ क्यू० बी० ३४. ] स्मरण रहे कि यदि सेवक ने स्वामी का मादेश पालन करने में थोड़ा-बहुत हर पर किया है तो भी उत्तरदायित्व स्वामी का होगा, वितु यदि सबक ने मादेनों का पालन करने में बहुत बडा हेर फेर कर दिया है तो उसका उत्तरदायित्व स्वामी पर न होगा। [विलियम्स प्रति जोस, (१८६५१, ३ एव० एण्ड सी० ६०२] सवक के कृत्य के लिए स्वामी को उत्तरदायी ठहराने के लिए यह सिद्ध करना मावश्या है कि मवर ने स्वामी द्वारा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मागित कृत्य या उससे मिलता जुलता कृत्य ही रिया है मोर वह कृत्य उसन सवा भरते समय लिया है। नलनो रजन सन गुप्ता प्रति क्लरत्ता निगम, प्राई० एल० मार० ५०, बलवत्ता, ६८३] - क्षतिकृत्य के सामाय सिद्धात किसी कृत्य को सेवा के समय किया गया निम्नलिखित परिस्थितियों में समझा जाता है (4) जबकि स्वामी ने कृत्य क्यि जाने के लिए सेवक को अधिकृत क्यिा हो, (प' जबकि किसो मनधिकृत कृत्य (Unauthorised act) को सवक ने सेवा करते समय क्यिा हो । यदि किसी व्यक्ति को अपने अधीन क्सिी कानून के मन्तगत किमी विशेष व्यक्ति को अनिवायत्त नौकर रावना पड़ता है तो इस प्रकार रखे हुए नौकर के कृत्यों के लिए वह उत्तरदायी नहीं समझा जायगा । इमक अतिरिक्त जब स्वामी और सवक के 917 fanit158 (Head of the Departmen' ) 291 wata Fara ( Subordinate servant) का सम्बध हो तो स्वामी प्रपन एसे सेवक द्वारा किय गय क्षतिकृत्यों का उत्तरदायी नहीं होगा । उदाहरणाय, पास्ट मास्टर जनरल (Post master General) अपने मघोनस्य क्सिी डाकिए ( Post man) द्वारा किये गये क्षतिवृत्य का जिम्मेदार नहीं है। प्रश्न २७ --एक रेलवे कम्पनी ने अपने कर्मचारियों को मनाही कर दी थी कि वे अपनी व्यक्तिगत कारों को अन्य व्यक्तियों को जोखिम का धीमा कराये गिना कम्पनी के सेवा कार्यो म प्रयोग न करें। एक दिन कम्पनी का एक कर्मचारी अपनी विना वीमा फराइ कार से फम्पनी के किसी सेवा कार्य में जा रहा था । उसको असावधानी से उसकी कार से एक बच्चे को चोट पहुंच गई। उपयुक्त परिस्थितियों में धन्धे की क्षतिपूर्ति के लिए रेलवे कम्पनी और उसके उक्त कर्मचारी के बत्तरदायित्व की विवेचना कीजिए। उत्तर- समस्या -यह समस्या प्रिवी बासिल के एक प्रसिद्ध मामले पर भाधारित है। इस मामल म यह तप हमा है कि यदि सेवन सवा क समय अपने रातियत्य से किसी को क्षति पटेचाता है तो स्वामी सलिपूर्ति क लिए उत्तरदायी है। [पनाहियन पसोषिक रलव कम्पनी प्रति ल्योनाह लॉग हाट, १९४३ ए. एल. २७७ । प्रस्तुत मामले में यह स्पष्ट है कि क्षतिकर्ता कमचारी कम्पनी के सवा पाय में जा रहा था भोर कम्पनी ने व्यक्तिगत कार को भपन सवा याम में प्रयोग करन व लिए उस अधिकृत मा रिसा था मल हो रमन बिना वोमा फराई दारों का प्रयोग परने की मनाहा पर दो हो । पतएव समपारो के द्वारा किया गया अतिकृत्य उसके सेवा समय में ही प्रपित हप से किया गया समझा जायगा जिसके लिए रेलवे पम्पती कानूनी रूप स बन्चे को यतिपूर्ति के प्रति जिम्मेदार है।
४२ ा कृत्य विधि पर प्रश्नोत्तर प्रश्न २८-प्रतिवादी एक अस्तबल के स्वामी से दो घोड़े और एक कोचवान किराये पर लेकर अपनी गाड़ी में सेर को जाया करता था। वह कोचवान और घोडों के किराये में प्रति सप्ताह निर्धारित रकम अदा करता था। एक दिन कोचवान की असावधानी से घोडे विदक गये जिमके परिणामस्वरूप वादी को चोट पहुंची। क्या उपयुक्त परिस्थितियों में वादी को क्षतिपूति के लिए प्रतिवादी जिम्मेदार है? उनर-समस्या --प्रस्तुत समस्या में यह प्रग्न विचारणीय है कि क्या कोनवान प्रतिवादी बा नौकरी म थाइस प्रश्न का उत्तर दते हुए एक प्रसिद्ध मामन म जिमको घटनाए प्रस्तुत मामले की पनामा मे मिलती-जुलती हैं, यह निपय गिया गया कि वाचवान प्रतिवारी को नौकरी में नहीं था, मले हो वह कोषान को अपने इचित स्थाना की पोर घाटों को चलाने का निर्देश दे मक्ता पा पर घोहों को चलान की क्मिी विरोप रोति क सम्बय म वह कोई निर्देश नहीं दे सकता था। [वचरमैन प्रति बर्नेट, ६ एम. एण्ड डनू० ४८६] प्रतएव उपयुक्त परिस्थितियों म वानी की क्षतिपूर्ति के लिए प्रतिवारी जिम्मेदार नहीं है। प्रश्न E -'क' अपने मित्र 'स' को जो उसके साथ कार में बैठा था, कार चलाने की अनुमति दे देता है । 'स्व' जिस समय कार चला रहा होता है वह सिग्रेट जलाता है और जलती हुई तीली बाहर फेंक देता है जो परीय की एक मोपड़ी पर गिरती है और जिसके परिणामस्वरूप उस मोपड़ी में आग लग जाती है। फ्या 'क' मोपडी के मालिक की क्षतिपूर्ति करने के लिए जिम्मेदार उत्तर-ममस्या -प्रस्तुत मामले में दो प्रग्न रटने हैं-क्या '' 'क' नौकर की हैसियत में कार चलाता है ? (२) क्या 'स' नक्षतऋत्य मया के समय में दिया है। पहले प्रश्न के उत्तर के लिए यह वात विचारणीय है कि कि '' घय पर नियंत्रण रखता है तो उनके बीच स्वामी मौर सव का मम्बघ स्थापित हो जायगा | मान लीजिए कि कामपन मित्र 'म उक्त स्थिति म स्वामी मोर सना । सम्बघ स्थापित मा हो जाय तो भा दमरा प्रश्न कि 'म' या तिकृत्य उसके सेवा-पाय व सेवा-गाल के मन्तगत माता है या नहा, विचारणीय रह जाता है। प्रस्तुत मामल में 'स' का मिट जलाना मोर जलतो हुई तोली जिना उसका क्षयि के सामाप सिद्धात ४३ सेवाकाय पदापि नहीं कहा जा सकता, क्योकि यह कृत्य स्वय'ख' ने अपने स्वार्थ में किया है । प्रतएव 'इ' भोपही के मालिक को क्षतिपूर्ति का जिम्मेदार नहीं है। प्रश्न ३० ~(अ) मालिक और स्वतन्त्र ठेकेदार (Owner and Independent Contractor ) के आपसी सम्बन्ध पर प्रकाश डालते हुए न्न परिस्थितियों का वर्णन कीनिए जिनमें मालिक स्वतन्त्र ठेकेदार द्वारा किये गये क्षतिग्रयों की क्षतिपूर्ति के लिए उत्तरदायी होता है। (थ) एक कम्पनी ने जिसे किमी मड़क पर ग्मादयाँ गुदवाने । अधिकार नहीं था, उस सदा पर साडौँ सुदवाने के लिए एक ठेकेदार से ठेका लिया। ठेकेदार के नौकरों ने पाइयाँ सोर कर मल पा वहीं सड़क पर छोड़ दिया। पर व्यक्ति म मलने से टररा र गिर पडा जिसने परिणामस्वरूप प्रमको चोट पहुंची। क्या कम्पनी सतिप्राप्त व्यक्ति को नतिपूनि के लिए उत्तरदायी है ? उत्तर -(श्र) मालिक और स्वतन्त्र रेदार कानून का यह एक सामाय नियम है कि कोई भी यक्ति विमी पर व्यक्ति के कृत्य द्वारा पहची क्षत का उतरदायी नहीं हो सकता जब तक कि वह वृत्य या तो उसकी पूर्वानुमति से न किया गया हो या बाद प उसने उस कृत्य का प्रत्यक्ष या परोप में पुष्टीकरण अपवा समयन न किया हा ! यह नियम मामा यत स्वामी और सेवक के मामलों में लागू होता है । लेकिन स्वतत्र ठेवेदार पो सेवक की श्रेणी में नहीं रखा जाता है। स्वत न ठेदार से तात्पप ऐसे व्यक्ति से है जिसे क्मिी काम को करन का ठेका दिया जाय और उसके माय पर मालिश का किसी प्रकार का भी नियम न हो माम सौर पर जब किसी स्वतत्र ठेकेदार को काम पर लगाया जाता है और वह वा उसका कोई सेवक काम करने में कोई ऐमा काय करता है जिससे किसी तीसरे व्यक्ति को क्षति पहुँचती है तो वह व्यक्ति जिमन दि स्वत प्र टेकेर को काम का टेवा दिया है पतिपूति का उत्तरतायो नहीं होता है, पर इस सामाय नियम के निम्न- लिखित अपवाद है जिनम मालिक स्वतत्र तर या उसके सेवर येशतिकरयों की सतिपूतिथे लिए उत्तरदायी होता है (१) यदि विपी व्यक्ति ने विसी काम वे वरने का ठेग क्सिो टार को दिया है किन्तु ठोदार थे काय पर नियंत्रण रखने के साथ-साथ वह उमको निर्देश मी देता है और व्यक्तिगत स्प से उसरे काय मे भाग सेता है। (२) यदि ठेकेदार को जिस पाम दे करने का वा दिया गया है वह काम হয় রে । १ ४४ क्षतिकृय विधि पर प्रश्नोत्तर (३) यदि किसी मालिक पर कोई कानूनी क्तव्य पालन करने का दायित्व है तो ऐसे क्त्तम को किसी अन्य यक्ति पर डाल कर अपने दायित्व से छुटकारा नही पा सकता। . (४) यदि किमी काय का स्वरूप या प्रति हो ऐसी है कि उसके करने में दूसर को क्षति पहुँचने की सम्भावना है तो ऐस काय के लिए यह मावश्यक है कि ठेकेदार का काय देते समय मालिक हर सम्भव सतक्ता बरते । एसा काय यद्यपि स्वतत्र ठेकेदार द्वारा किया गया हो पर उत्तरदायित्व मालिक पर होगा। (५) श्रमिक प्रतिकर अधिनियम (Workmen s Compensation Act ) के मन्तगत की हुई व्यवस्था के अनुसार । स्मरण रहे कि यदि ठकेदार अपना कोई उप ठेकेदार (Sub Contrac tor ) नियुक्त करता है तो प्रधान ठकेदार ( Principal Contractor) ही उपठेकेदार क कृत्यो द्वारा की गई क्षति का उत्तरदायी माना जायगा। (२) समस्या -प्रस्तुत समस्या की घटनाए एलिस प्रति शोफोल्ड गैस मज्यूमस कम्पनी (२३ एल० जे० क्यू० बी० ४२) की घटनाओं से मिलती जुलती हैं । इस मामले म यह तय हुमा है कि क्योंकि कम्पनी को उस सडक पर साइयाँ सुदवाने का मधिकार नहीं था इसलिए कम्पनी का उस सडक पर खाइयाँ खुलवाने का ठेना देना ही एप मवध काम था। अतएव कम्पनी क्षतिप्राप्त व्यक्ति को क्षतिपूर्ति के लिए उत्तरदायी है। प्रश्न ३१ --(अ) सामूहिक नौकरी के सिद्धान्त ( The Doctrine of Common Employment ) की व्यारया कीजिए। (य) एक व्यक्ति ने जिसे एक कुत्ते की रसवाली पे लिए नौकर रसा गया था, अपने स्वामी की एक अन्य सेविका के साथ परिहास करने के निमित्त उसके उपर कुत्ते को ढीला छोड़ दिया। कुत्ते ने उम सेविका को काट लिया। क्या ऐसी परिस्थिति में सेरिका स्वामी के विरुद्ध क्षतिपूर्ति का मुकदमा चला सकती है ? उत्तर-(अ) सामूहिक नौकरी का सिद्धान्त (The Doctrine of Common Employment)-इग्लैण्ड के सब साधारण कानून के मनुमार यदि किसी स्वामी के एक से अधिक सेवक होते हैं और कोई एक सेवक दूसर सवक को अपनी मसावधानी द्वारा क्षति पहुंचाता है तो ऐमो क्षति के लिए स्वामी उत्तरलायो नहीं माना जाता है । सविन यह नियम कानून सुपार ( शारीरिक शाति) मधिनियम, २६४८ [The Law Reforms ( Personal Injuries) Act, exe] क्षतिकृत्य के सामrय सिद्धात दारा रद्द कर दिया गया है । इस नियम को रद्द करने का कारण यह है कि सेवा-काल में सभी प्रकार की क्षति प्राप्त करने पर सेवक को स्वामी से क्षतिपूर्ति प्राप्त परने का अधिकार होना चाहिए, चाहे इस प्रकार को क्षति सह सेवक (Fellow servant) की असावधानी हुई हो या क्षतिप्राप्त व्यक्ति को अपनी स्वय को मसावधानो के कारण हुई हो । सह सेवक द्वारा पहुँचाई क्षति के लिए स्वामी से क्षति- पूर्ति पाने का मुकदमा चलाने के लिए क्षतिप्राम सवक को निम्नलिखित शतें पूरी करना मावश्यक है (१) जिस सेवा को क्षति पहुँची हो और जिस सेवक द्वारा क्षति पहुंचाई गई हो, उन दोनो को सह सेवक होना अनिवाय है, अर्थात् दोनों एक ही स्वामी के सेवक हो, तथा (२) दुघटना के समय दोनो सामूहिक रूप से एक साथ काय कर रहे हो । सह-सेवर के भतगत एक स्वामी के ऐम दा सवक भी प्रात हैं जिनमे एक प्रवर (Superior तथा दूसरा उसका मधीन (Subordinate) हा । उपयुक्त कानून सुधार (शारीरिक क्षति) अधिनियम, १९४८ मतगत ऐसे सविदा (Contracrs) भो निष्प्रभाव (Void) माने जाते हैं जिनम कि स्वामी अपने सेववों से इस प्रकार का समझौता करे कि वह सह-नवर द्वारा पहुँचाई गई क्षति का उत्तरदायी नही होगा। सामूहिक मोररी का जो सिद्धान्त इग्न ड म प्रचलित है, उस भारत में लागू करने में भारतीय यायालयो म मतभेद है । बम्बई और नागपुर उच्च न्यायालयों की राय म सामूहिब नौकरी का सिद्धान्त भारत म लागू नहीं होता है । लक्नि इलाहावाद पौर क्लत्ता उच्च न्यायालयों की राय म सामूहिक नौकरी का सिद्धान्त भारत में लागू होता है। (4) समस्या प्रस्तुत समस्या की घटनाएं वार प्रति स्नल [(१९०८) २२० वी० ३५२] की घटनामों से मिलती जुलती हैं । इस मामले का निणय इस सिद्धान्त के माधार पर हुमा है कि किसी खतरनाक जानवर का रखवाला जो उस जानवर को सतरनार जानता है, अपनी जिम्मदारी पर रख सकता है और यदि उससे रिमी को कोई काति पहुँचती है तो वह क्षतिपूर्ति व लिए जिम्मदार होगा। इस मामले में सामूहिक नौकरी के सिद्धान्त को दसोल नहीं दी गई थी। सामूहिक नौकरी के सिद्धान्त के मन्तगत स्वामी सेविका यो क्षतिपूर्ति के लिए उत्तरदायी है, क्योंकि दुपटना सह-सेवा की मसावधानी के कारण हुई।
क्षतिम विधि पर प्रश्नोतर प्रश्न ३२ -स्वामी का सेवक के प्रति क्या उत्तरदायित्व है ? संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए । उत्तर-स्वामी का पुत्तरदायित्व सेवक के प्राते थमिव प्रतिकर मधिनियम, १६२५ ए५ १६४६ [The workmen's Compensation Acr, 1925 & 1946) के मन्तगत प्रत्यक गमी वा अपने सवर नो क्षतिपूनि दनी पडता ह यदि गर काय करते समय रिमो दुघटनाया वाय करने के प्रयाग्य हो जाय । दम अधिनियम म ह भा प्राविधा है कि यदि विगा अक्ति को सवा वरत समय मृत्यु । जाप ता उमा पानता (Dependents) को मृतक सबा व स्वामी हरा क्षतिपूर्ति र होगा। स्मर । रहे कितपात यक्ति वा क्षतिपूर्ति उमो अवस्था में दय हागो जबकि वह यह सिद्ध पर- (१) उगमा पटना द्वारा शारी'यक्ष त पठनी है, (२) तुप ना साकारत रामयह (३) घटना द्वारा पक्ष के कारण वह तीन दिन से अधिक क लिए अपना विकासन परन क अयोग्य हा गया हो, तथा (८) शारारिप क्ष त सवा सम्म ध व कारण हुई है। यह बात शिप स्पस स्मरणाय है कि यदि सेवक की गारीरिक क्षति सरक न क्त स ताना भी सम्बद्ध है ता यह शारारिपक्ष ने मेवा 4 कारण हुई समभी जाना चाहिए । इस विषय म निमवत प्रति रन एव बन [(१६१०) २० बी० ६८६] या मुरमा उल्नपनाय है । एक बार एक मजा वो जिमका का, यह था कि यह यहुन सा धन योन की सान 4 मजदूरी का बाटन व लिए ख जाय, राम्ते म मार माना गया । इस पर पजा ची के परिवार माथिनों ने उस मृ व क स्वामो पर क्षतेपूर्ति का मुममा चलाया | इम मुस्टम म यह निणय दिया गया विजाची योनारीरिक क्षत सबा वरन समय पहुँची है। मरहिल (Underhill) के मतानुगार यदि सवा दुध नावा घाम करने ५ लिए अस्थायी अयोग्य हो गया है और यह गिद्ध हा जाय कि घटना का कारण सेवा का जान बूझ कर दुराचार (Walful masconduct) है तो वह अतिपूति पाने का अधिकारी नहीं होगा। लदिन यति जान चूम कर किय गर दुराचरण के मारण सेवक को सवा करते समय दुपटना के कारण मृत्यु हो जाय ता स्थामा यो सातपूति देनी पडेगा।
- मतिय के सामाय सिद्धान्त प्रश्न ३३ -धयुक्त इविकर्वा की परिमापा देते हुए उन परिस्थितियों का उल्लेख कीजिये जिनमें स्युक्त दायित्व का उदय होता है। उत्तर --सयुक्त विका (Joint Tort feasors). -जब एस अधिक व्यक्ति मिलकर काइ क्षतिकृत्य करते हैं ता वह संयुक्त क्षतिकर्ता (Joint Tortfeasors) पहनान हैं । सयुक्त क्षतिकता सयुक्त स्पस तथा व्यक्तिगत समे क्षतिपूर्ति दन व स्तरामी । क्षतिप्राह पनि का अधिकार है कि वह मर धनि- मामा पर मुखमा चलावर नस सातपूर्ति प्राप्त र प्रचालनम न मिखो पर मुदमा नगर क्षतिपूर्ति को पूरा धनराशि वसूर परे । यनि क्षतिग्राम व्यक्ति न गयुत क्षतरताना पर एव माय मुरमा माया है मार हिमा प्राप्त कर ली है ता वर दिली का निशान लियो एज क्षमता के विरुद्ध जारी वरार पूरा राशि उमम बात पर मक्ता है सयुच दायित्व य होन बाली परिम्पितियाँ -2 परिस्थितियों जिनम वि मयुक्त दापिरका उदय होता है, निम्नलिधित है (१) एजेन्सी (Agency) --प्रधान और दानों ही एजेंट पूण कृत्य क लिए उत्तरदाया। (.) सयुक्त प य (Joint actions) -~-नर एक से अधिक “यक्ति पिलर मा धनिपूण या परत है ता य सभी क्षतिपूर्ति व उत्तराको हात है। (३) अन्य व्यक्तियों के कृत्य का उत्तरतायिय (Vrcarious 3iability ) -जर रमी योदक्ति र धनपूरए वृत्य परता- जिसका उत्तर- दायित्व मय व्यक्ति पर होता है तर वह परिस्थितिया में शरिपूरा यका परने याला तथा पर यति दानों ही उतरदायी ठहराए जाते हैं पार दानों हा रायुक्त क्षतिपता की काटिभ सो जा है। प्रश्न ३१ --(अ) सयुक्त क्षविराओं द्वारा दी जाने वाली क्षति पति का परस्पर विभाजन पिस प्रकार मिया जाता है ? सक्षित निवेचना पीजिए। य) 'भार 'A' के किसी तिपूर्ण पाय से 'ग के कारसाने को सति पहुँचती है और यह '' और 'स' के विरुद्ध विधि का मुस्लमा पला फर १००० रु० को ट्रिकी प्राप्त कर लेता है। लेकिन यह टिकी या उपया केपल 'क' से वसूल करता है। क्या 'च' से क्षतिपूर्ति के परस्पर विभाभन का अधिकारी है ?
क्षविरय विधि पर प्रश्नोत्तर उत्तर (अ) क्षतिपूर्ति की धनराशि का सयुक्त क्षतिकर्ताओं के बीच विभाजन -इग्लण्ड के सवसाधारण कानून (Common Law) का यह नियम था कि यदि सयुक्त क्षतिक्र्तामों में से किसी एक से क्षतिपूर्ति को पूरी धनराशि वसूल कर ली गई हो तो वह व्यक्ति मपने प्रय साथी क्षतिकर्तामों से उस धनराशि का कोई भी भाग वसूल नहीं कर सकता था। लेकिन यह नियम भव कानून सुधार अधिनियम, १९३५ (Law Reforms Act, 1935) के द्वारा रद्द कर दिया गया है । इस अधिनियम के मतगत पर यह प्राविधान है कि यदि सयुक्त क्षतिक्र्तामों में से किसी एक को पवेले ही क्षतिपूर्ति की सारी धनराशि दनी पडी तो वह मय सयुक्त क्षति- कर्तामों से इस धनराशि का उचित अनुपात वसूल कर सकता है। उदाहरणाय, यदि एक क्षतिपूण कृत्य के वरन वाल तीन सयुक्त क्षतिकर्ता हैं और यायालय ने उन पर ३०० रु. की डिग्री कर दी है तो जिस व्यक्ति ने डिमी की सारी धनराशि दी है, उसको अधिकार है कि वह मय दो व्यक्तियों से धनराशि का उचित अनुपात, अर्थात् २०० रु. वसूल कर ले। (य) समस्या ----सयुक्त क्षतिक्र्तामों मे क्षतिपूर्ति की धनराशि के परस्पर विभाजन का नियम यह है कि यदि सयुक्त क्षतिकर्तामों में म किसी एक को मकले ही क्षतिपूति की सारी धनराशि देनी पडे ता वह मय सयुक्त क्षतिर्तापों से उस धनराशि का उचित अनुपात वमूल कर मकता है । प्रस्तुत मामले म क्षतिपूति को मारी धनराशि मरेले 'क' स वसूल कर ली गई है । अतएव वह 'व' से क्षतिपूति के परस्पर विभाजन का मधिकारी है। प्रश्न ३५ -(अ) सयुक्त क्षतिकताओं द्वारा अर्जित किये गये दायित्व की प्रकृति (Nature) पर सक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (घ) क्षतिपूर्ति के एक मुकदमे में वादी ने सयुक्त क्षतिकताओं में से कुछ को प्रतिवादी नहीं बनाया। क्या वादी उन सयुक्त शतिकर्ताओं से जिहें उसने प्रतिवादी बनाया है, क्षतिपूर्ति की सारी धनराशि सूल करने का अधिकारी है ? क्या यदि वादी किसी एक मयुक्त क्षविक्ता से समझौता कर ले तो वह अन्य सयुक्त क्षतिकर्ताओं विरुद्ध कार्यवाही चालू रसने का अधिकारी नहीं रहेगा? उत्तर-(अ) सयुक्त क्षतिकर्ताओं द्वारा अजित किये गये दायित्व की प्रकृति -माववाला के मतानुसार मयुक्त सतिकर्तामों द्वारा भजित किय गये दायित्य की प्रकृति पर कानून मुधार (विवाहित स्त्री एव क्षतिकर्ता) अधिनियम, १६५५[The Law Reforms (Married Women and Tort feasors) क्षतिकृत्य के सामाय सिद्धात ४६ Act, 1935] का विशेष प्रभाव पड़ा है । इस अधिनियम ने भव यह निश्चित कर दिया है कि एक सयुक्त क्षतिकता के विरुद्ध निणय प्राप्त करने के बाद दूसरे मयुक्त क्षतिकर्नामो पर क्षतिपूति वसूल करो का अधिकार समास नहीं हो जाता है। (ब) समस्या -सयुक्त क्षतिक्र्तायों द्वारा अजित किया गया दायित्व सयुक्त एव "यक्तिगत दोनो है, अर्थात् सयुक्त क्षतिकर्ता सयुक्त रूप से तथा व्यक्तिगत रूप से क्षतिपूति देने के उत्तरदायी हैं । अतएव दादो न यदि क्षतिपूर्ति के मुकदमे म कुछ सयुक्त क्षतिपर्ताप्रो को प्रतिवादी नही बनाया है तो जिनका उसने प्रतवादी बनाया है उनसे भी वह क्षतिपूति की सारा धनराशि वामल करन का अधिकारी है । समझौते का प्रभाव उसकी शर्तों पर अवलम्बिन है । सयुक्त क्षतिकर्ताप्रो के विरुद्ध दावे का कारण एक ही होता है | प्रतएव किसी एक सयुक्त सविर्ता से समझौता कर लेने का प्रभाव दूसरे क्षतिक्र्तामो के विरुद्ध दावे के कारण पर पडता है । एक प्रमुख मामले में यह तय हुमा है कि यदि वा विमा एक सयुका क्षतकर्ता स समझोना वर ले मोर इस प्रकार उसे दायित्व से मुक्त कर दे कि तु उसका इराठा दूसरे सयुक्त क्षतिकर्तामो को उनके दायित्व से मुक्त करने का न रहा हो तो वह उसी भनुपात से दूसरे सपुक्त क्षतिकर्तानो के विरुद्ध क्षतिपूति की राययाही चालू रखने का मधिकारी रहेगा। [रामरत्न पाली प्रति मश्विना कुमार दत्त, प्राई० एन० मार• ३७ क्लात्ता, ५५६] ४ - १ २ क्षतिकृत्यों का वगीकरण और उनके प्रति उपाय CLASSIFICATION OF TORTS AND REMEDIES प्रश्न ३६-क्या अतिकृत्यों का कोई वैज्ञानिक वर्गीकरण हो सकता है ? क्षति हत्या का वर्गीकरण दीजिये। उत्तर - क्षतिक यों का यर्गावर रस 1 Classification of Torts) इस म म ह नहीं कि कुछ वग के क्षतिकृत्या को नाम दिया जाना सम्भव है, जैम मान हानि, बाधा (Nuisance), अपमानकारी लेख इत्यादि । परतु विभिन्न परिस्थितियों में उत्पन्न मिमिन प्रकार के क्षतिकृत्या का नाम दिया जाना सम्भव नहीं है । अतएव यह धारणा गलत नहीं है कि क्षनिकृत्यो का कोई वनानि वर्गीकरण नहीं हो साता। निर भी सुविधा लिए क्षतिकृत्यों को तालिका तैयार की जा सकती है जो निम्नलिखित है शरीर के प्रति क्षतिकृय ( Wrongs to Person) (प्र) मृत्यु (Death) (प्रा) मानसिक एव स्नायुविक प्राघात ( Mental and nervous shock), (ब) मारमण (Assault), (म) मप्रहार (Battery), () मग भग (May hem), है। मिथ्या पारावाम (False Imprisonment) २ प्रविष्ठा के प्रति क्षतिपृत्य (Wrongs to Reputation) मानहानि (Defama ion)निसके मतगत निम्नलिखित क्षतिकृत्य हैं (क) मामा पारो लप (Lib-1) (ख) मपमानवारी वन (Slander) ३ पारिवारिक सम्बन्धो के प्रति क्षविहत्य (Tons relating to Domestic relations) (म) मातृ पिर सम्म घी अधिकार के प्रति (Terts relating to par ental sigbes). (ब) दाम्पत्य अधिभार के प्रति (Torts relating to marital rights), क्षतिकृत्या का वर्गीकरण और उनके प्रति उपाय ५१ (स) स्वामी के अधिकार के प्राने (Torts relating to master's sights) ४ सम्पत्ति के प्रति क्षविकृत्य (Wrongs to property) (म) अधिकार प्रवेश (Tr-spass), व) निष्कासन (Dispossession), (स) परिवनन (Conversion) ५ शरीर एव सम्पत्ति के प्रति क्षतिकृय (Wrong. to person and property), (अ) छल ( deceit), (ब) प्रसावधानी (Negligence), (स) वाधा (Nutsance), (द) पडय - (Conspiracy), (4) द पपूण अभियाग (Malicious Prosecution), ६ सावदा पर आधारित क्षतिकृत्य (Torts founded on contract), ७ व्यापार सम्बन्धी क्षतिकृत्य (Torts relating to business) ८ विविध (fiscellaneous) प्रश्न ३४-न्यायिक (Judiciai) योर अतिरिक्त न्यायिक (Extra Judicial) नपायों से आप क्या समझते हैं ? क्षतिकृत्यों के प्रति निमिन उपायों का रएन दीजिए । उत्तर-न्यायिर (Judicial) और प्रतिरिक्त न्यायिक ( Extra. Judicial) उपाय -क्षति हत्या प्रति हमको दो प्रकार क आय उपलब्ध हैं। ये दो प्रकार के उपाय यायिर (Judical) पौर अतिरिक्त यामिर (Lxtra jud- 1c1al) उपाय प तात है । यायिन उपाय वे हैं जो याय प्रणाली द्वारा हमें प्राप्त हाते हैं । मतिरिक्त पापिस आय व हैं जिनमें शिक्षनि प्राम यक्ति क्षतिहत्य विचा लिए याप का प्रपन हाय मले लता है । हम देखते हैं कि एमो बहुत सा परिस्थितियों मानो हैं जिनम व्यक्ति को तुरत यायिक उपाय उपल ध नही हात । एमो परिस्थितियों म कानून व्यक्ति वा मतिरिक्त यायिर उपाया द्वारा प्रश्न कानूनो अधिकारों सा बचाव परने का छूट देता है । उदाहरणार्य यदि कोई व्यक्ति मारक कार मापन शारीरिक क्षति पहुँमाा 4 लिय माझमण करे ता मापा पाना स्वरक्षा के लिए मधिकार है Fि पाप उसी तुरन्त एमा शति प? गरि वह मारमण करने म प्रममय हो जाय ।
क्षतिकृत्य विधि पर प्रश्नोत्तर क्षतिकृत्यों के प्रति विभिन प्रकार के उपाय निम्नलिखित हैं न्यायिक उपाय (१) क्षति पूति (Damages) -पदि किसी व्यक्ति को किसी प्रय व्यक्ति के क्षतिकृत्य द्वारा क्षति पहुँची है तो क्षति प्राप्त व्यक्ति को यह अधिकार है कि वह क्षतिकर्ता पर क्षति पूर्ति वा मुक्दमा चलाएर उससे क्षति पूर्ति प्राप्त कर ले । (२) न्यायादेश (Injunction) -ग्राम तौर से यायाटेश क्षति को रोकने के लिय जारी किए जाते हैं, वितु म य परिस्थितिया में भी उनका प्रयोग लिया जा सकता है । पायाश द्वारा यायालय विसी क्षतिकृत्य की पुनरुक्ति (Repetition) या स्थिरता (Continuance) का भी रो साता है | कहा जा सकता है कि यदि क्षतिपूर्ति की गई क्षति प्रथवा हानि की पूर्ति के लिए उपल घ उपाय है तो याया वतमान क्षतिपूण कृत्य या भविष्य में होन वाल क्षति पूर्ण कृत्य के प्रति उपल ध उपाय है । स्मरण रह कि यायादा दो प्रकार के होते हैं एक तो निषेधात्मक (Prohibitory) तथा दूसरे प्रादेगात्मक (Mandstory) | निषेधात्मक 'यायाम पिसी क्षतिपूण वृत्य के किए जान की मनाही होती है और मादेगात्मक "यायादा मे प्रतिवादी को कोई विशेष काय करने का मादेश होता है । यह बात भी स्मरणीय है कि न्यायादेश चाहे निपधात्मक हो अथवा प्रादेशात्मक, दोनों या तो भतरिम (Interlocutory) होते हैं या स्थायी (Permanent or Perpetual) होते हैं | मतरिम यायादेश का उद्देश्य यह है कि मुक्दम के अन्तिम निणय तब क्षतिकर्ता को क्षतिपूण व त्य परन स राका गाए और यदि वह पत्य एक बार किया जा चुका है तो उसकी पुनरक्ति रोग दी जाए । इस प्रकार के 'यायादा मुक्दमे ये अन्तिम निर्णय से पूर्व जारी किए जाते हैं। इसके विपरीत स्थायी पायादा मुकदमे के निणय के उपरान्त हो जारी किए जाते हैं । (३) सम्पत्ति की पुनप्ति (Restitution of property) -यदि क्सिी व्यनि को चल अथवा प्रचल सम्पत्ति प्रतिवादी न मनुचित ढग से हथिया ली है तो वानीको मधिकार है कि वह अपनी सपत्ति का वापस ल ल और जितन नि उमवी सम्पत्ति प्रतियागे क अनुचित पन्ज म रही है और उसे जो क्षति पहुंची है उसरे लिए क्षतिपूर्ति का मुक्दमा चलाए। यह यायिक उपाय विशिष्ट सम्पत्ति (Specific Froperts) को पुनर्माप्ति के लिए उपलब्ध हाता है। अतिरिक्त न्यायिक उपाय (१) स्मरचा (Self-defence) -परिस्थिति के अनुसार व्यक्ति को अपने पानूनो पधिकारों के बचाव में लिए स्वरक्षा Self defence) या अधिकार प्राप्त है । स्वरक्षा मे किया गया क्षतिपूरण पृत्य क्षतिकृत्य नहीं है ।
क्षतिहरयों का वर्गीकरण और उनके प्रति उपाय (क) निष्कासन तथा पुर्नप्रवेश (Dispossession and re entry) जिस व्यक्ति का अपनी सम्पत्ति पर तुरन प्राधिपत्य (Possession) प्राप्त करने का अधिकार है वह मनधित प्रवेश देत (Tresparser) को सम्पत्ति से निष्कासित (Dispossessed) पर उस पर पुनप्रपा (Re-enmy) कर सकता है। लेकिन इस प्रकरण में पह म्मरण रहा कि इस प्रकार निष्कामित करन के लिए क्वल उतनी हो पत्ति का प्रयोग करना चाहिए जितनी विनितात यावश्यक है। (१) पुनमहरम (Recaption) ~यकाई यति रिसको अपनी सम्पत्ति पर तुरत प्राधिपत्य प्राप्त करन का अधिकार है एसो सम्पत्ति को अनधिकृत प्रबार्ता के पास देखता है तो उसे अधिकार है कि वह अपनी सम्पत्ति का उस मनधियति व्यक्ति से पुन ग्रहण करने । लेफिन इस काम म केवल उननी हो ति का प्रयोग किया जाना चाहिए जितनी वि नितात मावश्यक है क्या जिसम शान्ति भग होने की तनिक भी सम्भावना नहीं है। (४) बाधाओं का अवसान (Abatement of nuisance) -इस प्रतिरित न्यायिक उपाय के पन्तगत व्यक्ति हो जिसको भूमि पर बाधा उपस्पित की गई है. इस वाधा को समाप्त करन वा मधिकार है । उदाहरणार्थ, यदि किसी को भूमि पर वक्ष की शाखाए लटक रही हों जिनम उसकी भूमि वा क्षति पहुंच रही हो at उस मधिकार है कि वह पडोमा घृण को शापाए अपनी भूमि भी वापा दूर सरन लिय बरवाद । (५) अभिहरस (Distress damage fessant)~-यदि विसो पति का भूमि पर किसी पर व्यक्ति के द्वार (Cattle) भनधिकार प्रवेश कर जाएं पौर भूमि पर उगी हुई घास को क्षति पहेचाये तो भूमि के स्वामी का अधिकार है कि यह डा दारों का ममिहरण परल मोर उनको तब तक वापस न कर जब तक कि उन दोरो का स्वामी दोरों द्वारा की गई क्षति को पूरा न कर दे। यह नियम प्रत्येक चल सम्पत्ति के प्रति लागू होता है । सामण्ड (Salmond) के मतानुसार अभिहरा भूमि परमाधिपत्य (Por ssession) रसन वाल का वह पानूनो अधिकार है जिसक द्वारा वह अपनी भूमि पर मनमार प्रविष्ट को गई,एल सम्पत्ति पा मभिरण पर उक्ता है और उस अपने अधिकार में तव तर रो सकता है जब व दि मनधिकार प्रविष्ट की गई सम्मति का स्वामी क्षति पूतिन घर दे। ध्यान रहे कि भूमि के स्वामी को उक्त घस सम्पति वेयल गर लन भरा पिधार है और वह उसका विस्य नहीं तव क्षतिकृत्य विधि पर प्रश्नोत्तर प्रश्न ३८ क्षतिपूति (Darage) से क्या तात्पर्य है ? इसकी विभिन्न कोटियों का वणन कीजिये। उत्तर -क्षतिपूर्ति (Damage) क्षति वृत्य द्वारा की गई क्षात को पूरा करने के लिये दी गई धनराशि को क्षतिपूर्ति करते हैं । क्षपूर्ति क्षतिप्रास रक्ति को वास्तविक रूप में पहुँची क्षति तक ही सीमित रही है, बल्कि उमवार य क्षति को दण्ड देना भी होता है। प्रतिवादी अपने क्षतिपूण वत्य के परिणाम स्वरूप पहुँचो क्षति को क्षतिपति वरन का उत्तरदायी है, भले ही वह क्षति पहुँचान का इरादा म रसता हा प्रथवा सव इय स क्षति पहुंचेगो, प्सका पूर्वान उम न हो । क्षतिपति की कोटियाँ क्षतिपूति का साधारणतया चार कोटयो मे विमरा दिया जा सकता है जो निम्न प्रकार हैं (९) साधारण क्षतिपूति (Ordinary damage) - यह क्षतिपति प्रदान की जाती है जन किमी यक्ति को वास्तव म क्षति पहुँचती है । इसका वास्तदिव क्षतिपू त (Real damage) भी कहन हैं । सामण्ड (Sal mond) न इस प्रकार को क्षतिपूति को परिपा देते हुए कहा है कि साधारण मपया वास्तविक क्षतिपूति का उद्दश्य क्षतिप्राप्त व्यक्ति का हर्जाना देवर उसे वास्तवम पहुँची क्षति की क्षतिपूर्ति करना है। (२) उदाहरसनीय क्षतिपूर्ति (Exemplaxy damage) ~ यह पति- पूति प्रतिवादो के लिय एक प्रकार से भय दण्ड के रूप में होती है और इसका प्रभार पय व्यक्तियों के क्षतिपूण त्या का परन का प्रवृत्ति पर पड़ता है। सामण्ड (Salmond) के मतानुसार इस प्रकार की क्षतिपति देने का उद्देश्य वास्तविर क्षति से अधिक की धनरानि को देना है जिससे पि यनि वादी को भौतिक (farenal) हानि के भनिरिक्त किसी प्रकार को मानसिक टेस प्रारि सगी हो तो उस क्षति को भी पूर्ति हो जाये और वह मयदण्ड के रूप में भय व्यक्तियों के लिय भी उदाहरण हो जाय । उदाहरणाय, प्रतिवादी ने वादी को विवादित माया को प्रलोभन देवर उमसे विवाह कर लिया। इस प्रकार वादी अपनी या को समापो से वचित हो गया तथा प्रतिवादी व इस अनुचित वृश्य से अपमानित भी हुमा । एसी परिरिति में यात्री को पहुंचे दोहरे मापात पो क्षनिपुति में लिय न्यायालय उदाहरणनीय क्षतिपूर्ति (Exemplary damagc) प्रान र सकता है। (३) नाममात्र क्षतिपूति (Nominal damage) -इस प्रकार को सनिति तय प्रदान की जाती है जर वि क्षति का उद्देश्य पनि मास व्यक्ति के क्षतिकृत्यों का वर्गीकरण और उनके प्रति उपाय -- अधिकार को केवल मात्र मान्यता (Recognition) देना होता है । इसम धनराशि नवल नाममात्र पे लिय हा होती है। (४) तिरस्कारयुक्त क्षतिपूर्ति (Contemptuous damage) इस प्रकार को क्षतिपूर्ति एमी परिस्थिान म दी जाती है जा पायालय की दृष्टि में यादी को पहुँचो भनि बहुन हो तुन्छ हाती और पानी को ऐमी तुमने के लिय क्षतिपूनि का मुदमा ही चलाना चाहिय था। एमी क्षतेपू त माघारल्या मान हानि (Defamation) म मय यत मुस्मा में प्रदान को जारी है। अन्य वर्गीरण शनिपूनियों का वर्गीकररा भार प्रकार म मा विमा पाता है जिसके अनुसार क्ष पूनियों का निम्नलिपिन काटिया हैं (<) era glaga (General d mage) क्षतिपूर्ति एनो परिस्तिति म प्राया जाना है जिसम विपातन यह अनुमान कर रहा है रवानी वे कानूनी पधिकार का मग परत ५ कारा उसका मत पचा है। एम मामला म यह चान रिया है कि ग्राम्त म वा का क्षति पहुंचा है या नही । पानी का यह मिद परन का भा पावसाता नहा नै प्रनिबार व य १३ हानि -' (९) विशिष्ट क्षतिपूति (Special damage) -यह क्षतिपूति एकी परिस्थिति म दी जाती है सिम वाली यह मिद कर दना है कि वास्तव म नसे क्षति पटेया है । इस प्रकारको क्षतिपूति व तिय या प म दलोल का उल्लप हाना चाहिए। प्रश्न ३६ -शनि की दरम्यता (Remoreness of damage) मे आप क्या मममने है ? मादा टिप्पटी लिमि उत्तर-ति की दरम्यना (Remoteness of damage) मो दूरम्यान पर एमाले है जारिपरा वा मनपरे परिणाम हा। मसल में मानून य-सदन क्षत्रियों या पूपि वरात्रा गरि क्षतिपूरा कृत्य प्रा परिणाम पपईहामी जिमो ६२ देमक्ष परिणाम स्वरूप ताया। पासोई हानि न पहेची हरिनु परक्ष परिणाम म्बर 23६नि परेच गई हा सा एमा परिम्पिति मे कापून वापा प्रतियाम तिवृति दो गिलाएमा उदाहरणार्थ, पिसा सति दो मोटर गाडो । दुचन पर को, बाक्ति भर बार मा उ7 पार पता पु, या चाटrfarin अनि का प्रयाश्याती क्षतिकृत्य विधि पर प्रश्नोत्तर से मोटरगाडी चलाने का प्रत्यक्ष परिणाम है और वह क्षतिरता व्यक्त उस क्षतिप्राप्त “यक्ति को क्षतिपूति कनिय जिम्मेदार है । लेग्नि यदि उस कुचल हुए यक्ति पाकर मोरगाडो के स्वामी पर इस कारण मुक्दमा चलाय कि उस शक्ति के मर जाते स उसकी नौकरी समाप्त हो गई तो यह कहा जायगा कि नौकर या क्षति दूरस्थ (Remote) है और इसलिय उम शनिपूनि पान का अधिकार नहीं है । यह बात निश्चित करना कि रक्षति कृत्य या प्रत्यक्ष परिणाम है और पर परोक्ष, बहुत हा कठिन पाय है और इस विषय म काई निश्चित नियम हा लिया जा सकता । इस बात पर विचार करन कलिय प्रत्यक मामले का परिस्थिनिया मे यर प्रश्न यान म रसा चाहिए कि वह क्षति प्रतिवादी द्वारा किय गय क्षति पूरा पत्य वा परिणाम है भा भयवा नहीं । रललाल धीरज लाल मतानुसार निम्नलिखित परिस्थितियो में यह मान लना चाहिए कि प्रतिवादी क कृत्य का परिणाम दूरस्य है (१) पर विप्रतिवादी वे क्त्य के प्रत्यक्ष परिणामस्वरूप वादी का क्षति म पहुंची थे। (२) जव कि क्षति विशपकर वादो के अपन कृत्य का परिणाम हो । (३) जब कि क्षतिपूण ह य क्मिीमय स्वतत्र यक्ति (Independent tbud person) व व य का एसा पारगाम हो जिसका पूर्व प्रत्याशा नहीं की जा सकती थी भोर निराक विषय म यह नहीं कहा जा सकता था कि उस मय यक्ति कृत्य के परिणामस्वरूप वागे प्राचरण स ग प्रकार की क्षति होगी। स्मरण रहे पि यदि प्रतिवादी एक बार अपने किसी मनुचित कृत्य के लिय उत्तरायो मान लिया गया तो वह उस वृत्य द्वारा उत्पन्न सभी प्रत्यक्षा परिणामोगा भो उत्तरदायी माना जायगा चाह साधारण विवेक वाला पति उस कत्य द्वारा जनेत परिणाम को पूर्व प्रत्याग पर सबने की क्षमता रखता हो मया नहीं, मिम प्रति एल. एम० इवल्य रसर, (१८७०) एल. भार०६ सी० सति को दूरस्या। 4 विषय म सिमा ता या सारा निम्नलिखित है (१) यदि रिमा लक्ष्य को ध्यान में रख कर बोर व पिया गया हो तो उस र द्वारा वि स प प्राप्त हो गया है तब किसी भी परिस्थिति म यह नही पहा जायगास्य वा क्षति पूरग परिणाम दूरस्प है ।
क्षतिकृत्यों का वर्गीकरण और उनके प्रति उपाय ५७ (२) यदि कृत्य और उसके परिणाम के बीच बिहो मय तत्वों ने हस्तक्षेप किया है जिसके कारण हो वह कृत्य क्षतिपूरण हो गया है ता एम वृत्य का क्षतिपूर्ण परिणाम उस क्रय के प्रत्यक्ष परिणाम व अतगत नहीं माना जायगा । (३) पिसी कृत्य के सकल्प विहीन परिणाम अक्सर दूरस्थ परिणाम यह नात हैं। (४) यदि यह सिद्ध हो जाय कि प्रतिवाटा व वृत्य और उसके वानी र प्रति परिणाम के बीच वादी ने जो हस्तक्षेप क्यिा उसमे प्रमावधानी का तत्व वतमान था तो वादी ऐसी परिस्थिति में क्षतिपूति पान वा मधिकारा नहीं होगा। (५) प्रतिवादो के एसे कस्य द्वारा की गई क्षति जिसको काई साधारण विधक वाला व्यक्ति पूर्व प्रत्याया नहीं कर सकता साधारणत दूरस्थ क्षति पही जाएगा।
६० क्षतिकृत्य विधि पर प्रश्नोत्तर (२) यह प्रहार या स्पश उस दूसरे व्यक्ति की इच्छा एव माज्ञा के विरुद्ध होना तया (३) यह निरथव है कि गरीर का स्पर्श घोरे स किया गया अथवा इस प्रकार उस व्यक्ति का रिमी प्रवार का कष्ट हुमा या नहीं। थारमा (Assault) और सप्रहार (Battery) का अतर-पात्र मण योर सपहार दागो विभिन प्रकार के क्षतपूर्ण क य हैं । प्रारमण में केवल प्रहार की धमकी मात्र दो जाता है, जबलि सप्रहार मदारीर पर प्रहार अयबा उसा स्पश मा किया जाता है। रतलाल पोरन लाल के मनानुमार माक्रमण म सरार का वास्तव म स्पा रिया जाना प्रावश्यक नहीं है कि तु सप्रहार म ऐसा होना अनिवाय है । यद्याप दोना क्षतिपूण क्त्या में गति (Motion) मावस्यक है परतु जब एक “यक्ति द्वारा दुसर व्यक्ति के विरुद्ध बल का अनधिक्त प्रयोग किया जाता प्रपोग म उस दूसरे यक्ति के शरीर का स्पर्श हो जाता है ता वह काम जो बिना स्पर्श के प्राक्रमण हाता, सप्रहार मतगत पा जाता है। प्रश्न ४२ -अाक्रमण प्रोर सप्रहार किन परिस्थितियों म अभि योग्य (Actionable) नहीं है ? विवेचना कीजिये। उत्तर-प्रामस और मप्रहार का औचित्य -माझमण मार सत्रहार क क्षतिपूर्ण करय निम्नलिखित परिस्थितियों म अभियाज्य नहीं हैं। (१) स्वरक्षा (Self defence) -यदि किसी व्यक्ति ने प्रारमण या सग्रहार प्रानो स्वरमा लिप विधा है ता वह उना दायित्व स मुका समझा जाता है । लेकिन स्वरक्षा व मधिकार का सिद्ध करा दो जिम्मेवारी हमेशा प्रतिवादी पर होती है। (२) सम्पत्ति को सुरक्षा (Defence of Property) सम्मति की गुरक्षा में किया गया प्रारमण या मप्रहार क्षम्य ममझा जाता है । लाग्न सुरक्षा मनियमत्य करत समय क्वल उतना ही बल प्रयुक्त होना चाहिए जितना कि उस परिस्थिति में नितात मापायर हो। [हेलिंग प्रति ग्राम, (१८५३) ६० ५३१] (३) सम्पत्ति का पुनमहरम (Retaking of Property) -पिसा सम्मति स्वामी प्रथवा उसके प्रक्षित सबर को अधिकार है कि वह ऐसे व्यक्ति रोजिसने हि उमको सम्पत्ति को गैरकानूनी ढग से हपिया लिया हो वापस से से। एन मामन म दिया गया मारमण या सप्रहार क्षम्य है । [नाम प्रति हिम्म, । (१८६१) १० सा बो० १.१] क्षतिकृत्यों का वर्गीकरण और उनके प्रति उपाय (२) यदि कृत्य और उसके परिणाम के बोच लिहा माय तत्वों ने हस्तर किया है जिसके कारण ही वह कृत्य क्षनिपूण हा गया है ता एमे वृत्य का क्षतिपूण परिणाम उस कत्य के प्रत्यक्ष परिणाम प्रतगत नहीं माना जायगा। (३) क्सिी कृत्य के सकल्प विहीन परिणाम अक्सर दूरस्थ परिणाम यह नात हैं। (४) यदि यह सिद्ध हो जाय कि प्रतिदाना व वृत्य और उमरे वादी के प्रति परिणामक बीच वादा न जो हस्तक्षेप किया सम प्रसावधानी का तत्व वतमान या तो दादी ऐमी परिस्थिति मे क्षतिपूति पान का अधिकारी नहीं होगा। (५) प्रतिवादी दे एस कस्य द्वारा की गई क्षति जिसको दाई साधारण विवेक वाला व्यक्ति पूर्व प्रत्याशा नहीं पर साता साधारएन दूरस्थ क्षति कही जाएगी।
३ शरीर के प्रति क्षतिकृत्य (IV RONGS TO PERSON) प्रश्न ४० -(अ) पाकमम (Assault) की परिभाषा दीजिए और मन तथ्यों का उल्लेस कीजिये जो इस ततिकृत्य को सिद्ध परने के लिये आवश्यक है। (1) '' ने 'ख' के ऊपर आकमरा किया और उसके हाथ यो माधारण चोट पहुंचाई। अचानक य' को चोट का घाव मप्टिक (Sce ptic) बन गया जिसके परिणाम स्वरूप 'ख' एक लम्बे समय तक घीमार रहा। 'ग्य' ने 'क' के विरुद्ध सारी क्षतिपूर्ति पाने के लिय मुस्दमा चलाया। इम मुकदमे में क्षतिपूर्ति का माप क्या होगा? उत्तर (अ) आक्रमण (Assault) - प्रातमण से तात्रय ऐरो प्रत्य है जिसम कि एक व्यक्ति दूसरे यत्ति पंपारीर पर प्रहार करने की धमकी देते हुए प्रहार परोको स्थिति मे हो । इस कृत्य के लिये यह मावश्यक नहीं है कि माक्रमण करने वाला विपक्षी के शरीर पर प्रहार बरे अथवा उसके शरीर का स्पश परे । लकिन यह बात भी स्मरणीय है कि प्रत्येक घमकी को मारमण को कोटि में नहीं रखा जा सकता । उदाहरणाथ, यदि कोई यक्ति किसी व्यक्ति को ऐसी परिस्थि त में मात्रमण को धमकी दे जर कि वह उसकी पहुँच के बाहर हो तो यह मारमण नहीं माना जायगा। कोई बदी बन्दीगृह के घरे वे पीछे से बन्दीगृह के बाहर बहे किसी व्यक्ति पर प्रहार करने के लिये मुट्ठी तान पर प्रहार परन की धमकी दे ता यह गुट्ठो तानना भामण नही कहतायगा क्योकि इस प्रसार वटपरे म बस वदो पटघरे स बाहर खडे हुए यक्ति को पूसा मारो म पूर्णतया भममय है। पारमण को क्षतिमय के रूप म सिद्ध करने के लिय वा वो निम्नलिपित तप्यों को सिद्ध करना प्रारम्य है :- (१) यह वि प्रतिवादी चे व्यवहार घ भाव भगी माहिरो ऐगा प्रतीत होता पापि यह वादी के विरद्ध बम का प्रयोग करने वाला है।
शरीर के प्रति क्षतिकृय ५६ (२) यह कि प्रतिवानी के व्यवहार व भार भगो यादि इस प्रकार के थे कि वादो को यह भय हो गया कि प्रतिवादी उसके विरुद्ध अवश्य ही बल का प्रयोग परने वाला है, एव (३) यह कि प्रतिवादा पानी पर प्रारमण करन को स्थिति म था, पर्थात् वादो प्रतिवादी की पहुँच के भीतर था । (1) समस्या - क्षतिपूर्ति के लिये यह ए मामाय नियम है कि प्रति- चादी प्रान क्षतपूण पत्य के प्रत्यक्ष परिणामस्वरूप पाई गई सभा क्षति को क्षतिपूति करो का उत्तरदायी है चाह वह उस क्षति को पूर्व प्रत्यागा नहा रापता हो । प्रस्तुत मामल में 'प वो चाट 'क' के क्षतिपूण यत्य का प्रत्यक्ष परिणाम है और पाव मेप्टिल (Sceptic) बन जान पर उराका लम्ब ममय तक वीमा रहना ।' के क्षतिपूण पत्य के परिणाम का ही प्रग माना जायगा। प्रताव क' 'स' का सारी क्षति के लिय क्षतिपूति देने का उत्तरदायी है । प्रश ४९ ~मप्रहार (Battery) की परिभाषा देते हुए प्रारमए (Assault) और मप्रहार (Battery) अन्नर को म्पप्ट कीजिये। उत्तर-सप्रहार (Batters) • सपहार एमा पतिपूरा कत्य जिमम एक व्यक्ति दूगर पक्ति के पारार का अनधिकृत १ करता है। भारतीय रड साहिता की धारा ३५० म मप्रहार की परिभाषा इस प्रकार दी गई है --काई व्यक्ति गनहार का मपराधी तब होता है जब यह ग्रोधादा में किमी मय व्यक्ति को हराने या परेशान करने या हानि पहचान की नायत स उमक शरीर पर वास्तव में प्रहार पर या उस स्पर्ण कर।" इस क्षनिक पद लिय यह पात निरथक है कि इस प्रकार प्रहार द्वारा वादी के दायर को किसी प्रकार की चोट लगी या नहीं। यह बात भो पावश्यक नहीं है कि प्रतिवाने अपने किमी मग द्वारा ही वादी परीर पाश परे । यदि प्रतिवान वानी शरारा पिसो प्रय वस्तु माध्यम से किया है तो भो वह हर राप्रहार र मन्तगत मा जाएगा। उदाहरणाप, या प्रतादो एक हो द्वारा यानी क शरीर वा वर्ग करता है तो उसका यह य य समहार ही यहा रायगा । रिमी व्यक्ति प ऊपर पूब दना भी सप्रहार वे मतगत पाता है। [(१९२७) ४३ दो० एल० प्रार० ४६५] गवार दो उपयुका परिमापा थे प्र म उमा निम्मतिषित तत्व (Clements) हैं (१) एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति य परीर पर प्रहार या मार्ग होना, Nae ६० धातिकृत्य विधि पर प्रश्नोत्तर (२) यह महार या स्पश उस दूसरे व्यक्ति की इच्छा एव प्राना के विरुद्ध होना, तथा (३) यह निरयर है कि शरीर का स्पर्श घोरे स किया गया प्रथवा इस प्रकार उस व्यक्ति का सिी प्रकार वा षष्ट हुआ या नहीं। श्राममप (Assault) और समहार (Battery) का अतर --प्रार- भए यौर सप्रहार दानों विभिन्न प्रकार के क्षतिपूर्ण करय हैं । प्रारमण म केवल प्रहार की धमको मार दी जाती है, जब वि सप्रहार में शरीर पर प्रहार अथवा उमा सश भा किया जाता है। रत्ननार धारज लाल के मतानुमार मानमरा मार या वास्तव म स्पा किया जाना प्रावश्यक नहीं है दिनु समहार म एमा होना अभिवाय है । यद्यपि दोना क्षतिपूण क्त्या में गति (Motion) पावश्यक है परतु जब एक पक्ति द्वारा दूसर व्यक्ति के विरुद्ध बल का अनधिकत प्रयोग किया जाता है और ऐसे प्रयोग में उस दूसरे व्यक्ति के शरीर का स्पर्श हो जाता है ता यह कल्य जो बिना स्पर्श क भाक्रमण होता, सप्रहार के अनगत पा जाता है । प्रश्न ४२ ~याक्रमण और सप्रहार किन परिस्थितियों में अभि योग्य (Actionable) नहीं है १ रिवचना कीजिये। उत्तर-माम और सपहार का मौचित्य -प्राक्रमण पौर सम्हार र क्षतिपूर्ण करय निम्नलिखित परिस्थितिया म अभियोग्य नहीं हैं। (२) सरक्षा (Selt defence) -यति रिसा व्यक्ति न प्रारमण या सत्रहार प्रपनो स्परमा क लिय विया है ता वह उनके दायित्व से मुक्त समझा जाता है । लविन स्वरमा मधिकार का सिद्ध करन को जिम्मेवारी हमेशा प्रतिवादा पर (२) सम्पत्ति की सुरक्षा (Defence of Prop.ny) --सम्पत्ति की सुरक्षा में किया गया प्रारमण या सप्रहार क्षम्य सममा जाता है । लाग्न सुरक्षा निय पत्य करते समय नवल उतना हो बल प्रयुक्त होना चाहिप जितना कि उस परिस्थिति में नितात माश्या हा। हलिंग प्रति प्रोो, (१९५३) ३० ५३१ (३) सम्पत्ति का पुनमहाम (Retaking of Property) किसी सम्पति र शमी प्रपना मो अधिवन मा यो अधिकार है कि वह एग व्यक्ति स भियने fr उसको सम्पत्ति को गैरकानुनी दग से हथिया लिया हो वापस ल ले ए मामन म दिया गया मारमण या संप्रहार क्षय है। म प्रति हिम, (१८६१) १० सी० बी० १.१] शरीर के प्रति क्षतिकृय (४) अवश्यम्भावी दुर्घटना ( Inevitable Accident) -यदि क्सिी अवश्यम्भावी दुघटनावश किसी व्यक्ति को किसी अन्य व्यक्ति के शरीर का अनधिकृत स्पश उसकी इच्छा के विरुद्ध करना पडे तो कानून उसको एसे कृत्य के लिये क्षमा कर देगा। (५) विधिपूर्ण सुधार (Lawful correction) --माता पिता तथा अभिभावक अपने बच्चो को सुधारने के लिय विधिपूरण बल का प्रयोग कर सकते हैं और उनके वे कृत्य अभियोज्य नहीं होते । (६) अनुमति (Leave) -मनुमति से किये गय कृत्य क्षतिकृय होते हुय भी मभियोग्य नहीं समझे जाते हैं। ७) सार्वजनिक शान्ति को सुरक्षा ( Preservation of public peace) -सावजनिर शाति को सुरक्षा में लिए गए प्रारमण या सहार कानूनी म्पस क्षम्य हैं । लकिन यह मावश्यक है कि एसे मामलो में केवल उतना ही बल प्रयोग करना चाहिए जितना कि उपस्थित परिस्थिति मे नितात मावश्यक हो। (5) कानूनी व्यवहार में किए गए कृत्य (Acts done in legal process) -वानूनी “यवहार के लिए कृत्य करते हुए यदि किसी व्यक्ति को पारमण या प्रहार का प्रयोग करना पढे ता उसका वह कृत्य क्षम्य समझा जाता है भोर अभियाय नहीं होता है । प्रश्न ४३ -मानसिक एर स्नायविक आघात (Mental and Nervous shock) द्वारा पहुँची क्षति की क्षतिपूवि के कानून की विवेचना योजिए। उत्तर- मानसिक एव स्नायुविक आघात (Mental and Nervous shock) द्वारा क्षति -प्रमर ऐसी घटनाए घटती हैं जिह दस या मुनार अथवा भनुभव पर क्सिा व्यक्ति र मन म मास्मिय टेम लगती है और सभा-रभो सा परिणामस्वरुप उसा सवग इतने अधिक उत्तेजित हो जान हैं कि उगमे उसर स्नायुप्रो को बढ़त बडी क्षति पहुँचती है । लदिन भाभी क्वल मात्र मानसिक कष्ट ही पहुँचता है। प्रतएव कानून का नियम यह है कि जन किसा घटना को सन, मुनन या अनुभव करन से व्यक्ति को देवल मात्र मानसिक कष्ट ही पहचता है पोर बाई स्नायुविक क्षति नही पहुँचतो तो यानून के पन्त गत वह क्षति नहीं मानी जातो मोर वह मुकाम का कारण (Cause of action) नहीं बन सकता । इसका पारण यह है कि मानसिक बप्ट मथवा ममुविधा को मापन के लिए कोई यत्र उपलब्ध नहीं है । साक्न यदि किसी वृय से क्षतिप्राप्त व्यक्ति को सम्पत्ति या शरीर क्षतिकृत्य विधि पर प्रश्नोत्तर को हानि पहुंचने के साथ-साथ उसे मानसिर इष्ट भी पहुँचा हा तो ऐसी परिस्थिति मे क्षतिपूर्ति की धनराशि नियत करते समय साम्पतिव' या शारीरिक क्षति के साथ मानसिक वष्ट पर भी विचार किया जाता है। एक प्रमुख मामले में प्रतिवादी न एक स्त्री से मूठ मुठ कह दिया कि उमा पनि एक दुघटना में घायल हो गया मौर उपके दोनो पैर टूट गए। यह भूग समाचार पाकर उस स्त्री को बहुत दुस हुमापौर वह बहुत अधिक बीमार हो गई । उसक पति को उस इलान म बहुत सा धन खच वरना पडा । इस मुकदमे में यह निर्णय लिया गया कि प्रतिवादी वाली वी क्षतिपूर्ति का उत्तरदायी है। [विसिन प्रति डाउटन, (१८९७) २ मयू० वा० ५७] मानसिक एव स्नायुविक माघात क मामला म क्षतिपूर्ति यो धनराशि निर्धारित परने मे प्रतिवाती ये भाचरण का भी ध्यान रखा जाता है । यदि प्रतिवादी पा माचरण मनुचित रहा है या उसका उद्देश्य वतुषित रहा है तो क्षतिपूर्ति वो धनराशि बढ़ा दी जाती है। प्रश्न ४४ -थग भंग ( Mayhem) नामक क्षविकृत्य की परिभाषा दीनिए। उत्तर-अग भग (Mayhem)-दारीर के प्रति किए गए क्षनियों में मत्यु अतिरिक्त प्रगभग (May hem) हो सयस अधिर गम्भार क्षतिकृत्य समझा जाता है। यह एमी शारीरिक क्षति है जिसम कोई व्यक्ति अपनी पानद्रिय अथवा यद्रिय स वचित कर यिा जाता है जबकि किसा का इन्द्रिय स्थाया रूप य एष सामा य प स काय करन क लिए दुवल हो जाए । उनारणाय, यदि निसाध्यक्ति मा हाय पर, उगलो या दात ताड या वाट िए जाए या उसका भाव पोरदा जाए तो उस कानून की तरनीको माप म मगभग (Mayhe n) पहा । लगिनी पिसी यक्ति की नार या वान कुतर लिए जाए तो वह यानुन को तकनीकी भाषा में अगभग नहीं कहा जाएगा। इसका कारण यह है पिस्सिी व्यत्ति पहाय, पैर,उगली या दात न रहन स वह व्पत्ति सदेव व लिए दुयन हा जाता है कि तु नाम या मान पाट लिय जाने पर एसा नहीं होगा। यह पानी स्मरणीय है कि मगभग पता माराप भी है और उस लिए पोजदारी मानून व मनगत मा मुक्दमा चलाया जा सकता है पोर मपरापो को क्षतिपति के साथ साथ दण्ड भी मिलाया जा सकता है। प्रश्न ४५ -मिथ्या कारावास (Talse Imprisonment ) की परित भाग देते हुए सम तत्वों की विवचना कीजिए।
शरीर क प्रति घतिकृत्य उत्तर-मिथ्या कारावास ( False Imprisonment) की परिभाषा -मिथ्या पारावास ( ralse Imprisonment) का तात्पय क्सिी व्यक्ति की स्वतत्रता पर बिना किसी भौचित्य (Justification ) के पूण भवरोध लगाने का है। रत्नलाल धीरजलाल न मिय्या वारावास की परिभाषा इस प्रकार की है-"मिथ्या वारावास ऐसा क्षतिपूण कृत्य है जिसस कि विसी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर पूर्ण रूप से रुकावट डाली जाए तथा इस कसावट डालने के लिए कोई कानूनी यौचित्य न हो।" यदि कोई-पक्ति विसी व्यक्ति का एक भाम रास्ते पर एक विशेष दिशा म उसकी इच्छा के विरुद्ध चलने का मजबूर करे तो उसका यह कृत्य मिथ्या कारावास मन्तगत माएगा। लकिन यदि कोई यत्ति विसो व्यक्ति को केवल एक मोर जान हो उसको इच्छा के विरुद्ध रोग तब वह केवल आशिक कारावास (Partral Impr. sonment) कहा जाएगा और यह भाशिक कारावाम मिथ्या कारावास व मन्तगर नही पाता है, क्योकि मिथ्या कारावास के लिए यह मावश्या है कि व्यक्ति को सतत्रता पर पूर्ण प्रतियप हो । मिथ्या कारावास के वत्व -मिथ्या पारावास सिद्ध करने के लिए वादी को उसके निम्नलिखित तत्वो को सिद्ध करना चाहिए (१) यह रि उसको स्वतत्रता (Liberty) पर पूर्ण प्रतिद व लगाया गया, (२) यह दि वह प्रतिपय बिना किसी कानूनी मौचित्य व पा। वादी को यह सिद्ध करने की जरुरत नहीं है कि उसकी स्वतत्रता पर प्रवरोध पापो समय तर रहा अपवा उसे दिमी पारागार या इस प्रकार क पिसी प्रय स्थान में वास्तविक रूप म बद कर दिया गया। [ वह प्रति जोस, (१८४५) ७ क्यू० वी० ७४२ ] नविन यह बात रिट परना मार यक है कि उसकी स्वतत्रता पर अवरोध गैरकानूनी था और वह मवरोध पूण स्पस था। प्रश्न ४६ -पुलिस तथा जन साधारस द्वारा किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करन अथवा उसको स्वन्त्रता पर अवरोध लगाने के प्रचलित भारतीय कानून पर सक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। उत्तर-गिरफ्तार करने का भारतीय कानून -भारत में गिरफ्तार (Arrest ) परन । पातून प्रक्रिया सहिता (Criminal Procedure Code) अन्तगत व्यवस्थित है। माम तौर पर किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने के लिए गिरफ्तारी के पारट ( Warrant of arrest ) को मावश्यक्ता होती है तपा क्षतिकृत्य विधि पर प्रश्नोत्तर मोर सामा यत बिना उसके किसी पुलिस अधिकारी को क्सिो -यक्ति को गिरफ्तार करने का अधिकार नहीं है। लेकिन इस सामाय नियम वुछ अपवाद भी हैं और कुछ परिस्थितियों में पुलिस को बिना वारट के भी गिरफ्तार करन का मधिकार रहता है। भारत को दण्ड प्रक्रिया सहिता में अपराधों को दो वर्गों में बांटा गया है। एक तो अनुम धेय ( Cognizable ) अपराध हैं जिनके लिए जान पर सदिग्ध (Suspected ) यक्ति को पुलिस अधिकारी बिना किसी धारट क गिरफ्तार कर सक्ता है । दूसरे वग के अपराध निरनुस धेय (Non cognizable) हैं जिनक किए जाने पर सदिग्ध व्यक्ति को बिना वारट के गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। जन साधारण (Private persons) भी निम्नलिखित परिस्थितियो में किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने अथवा उसकी स्वत अता पर अवरोध लगाने का मधिकार रखते हैं (१) जब किसी •क्ति पर इस बात का सदेह किया जा रहा हो कि उसने हत्या मादि जैसा गम्भीर अपराध किया है अथवा जब किसी यत्ति न वास्तव मे ऐसा भपराध क्यिा हो, (२) जब किसी व्यक्ति को सावजनिक शान्ति (Public peace) भग करते अथवा करने की कोशिश करत देखा गया हो, (३) यदि किसी व्यक्ति को जमानत किसी व्यक्ति न की हो तो जिस -यक्ति की जमानत दी गई हो उस व्यक्ति को गिरफ्तार करके यायालय में लान पामधिकार जमानत करने वाले व्यक्ति को प्राप्त रहता है एवं (४) फरार और अपराध करने के प्रादी अपराधियों को बिना धारट गिरफ्तार किया जा सकता है। यदि कोई पुलिस अधिकारी भ्रमवा किमी एक व्यक्ति के बदले किसी दूसरे व्यक्ति को गिरफ्तार करले तो ऐसा करन पर वह पुलिस अधिकारी उस दशा में उत्तरदायी नहीं होगा जब यह मिद्ध हो जाए कि उसने वास्तव में उस व्यक्ति को पूर्णतया भ्रम वा गिरफ्तार दिया था। यह बात भी स्मरणीय है कि कोई व्यक्ति यायालय स विसी यक्ति के विड वारट प्राप्त कर किमो यक्ति को गिरफ्तार करले तो गिरफ्तार किए जाने वाला व्यक्ति गिरफ्तार करन वाले व्यक्ति के रिट मिथ्या बारावास की बापवाही नहीं कर सकता । सेति से मामले में गिरफ्तार करने वाले व्यक्ति को निम्नलिखित पप्प सिदारने होंगे
शरीर के प्रति धतिकृय
(१) यह कि वारट क्सिी अधिकृत यायिक सस्था (Competen
judicial tribunal ) द्वारा जारी किया गया था,
(२) यह कि उसने कानूनी रूप स जारी किए गए वारद द्वारा प्रविकृत होकर
गिरफ्तार किया, एव
(३) यह कि उसने जिस परिस्थिनि म गिरफ्तार पिया उम परिस्थिति में
पानून द्वारा उसको एसा करने का अधिकार प्राप्त था।
मान हानि (DEFAMATION) प्रश्न ४७ -मानहानि (Defamation) की परिभाषा दीजिए और उसके विभिन्न रूपों की विवेचनात्मक व्यारया वीजिए । उत्तर-मानहानि (Defamation) की परिभापा -किसी पक्ति या प्रतिष्ठा को हानि पहुँचाना उस यक्ति को मानहानि कहलाती है । मडरहिल (Underhill ) के मतानुसार मानहानि प्रतिष्ठा को कलकित करने वाला ऐसा झूठा क्यन है जिसका कि प्रकाशन (Publication) किया गया हो। इस कथन के लिए भावश्यक है कि उसमे वादी को प्रतिष्ठा को क्षति पहुँचो हो और उस कथन को प्रकाशित करने का कोई कानूनी भोचित्य न हो। दूसरे शब्दा म मानहानिकारी कथन उस कयन को कहते हैं जिसमें रिसो व्यक्ति के माचरण के विरुद्ध ऐसी बातें कही गई हो जिस कारण उस व्यक्ति वा समाज म निरादर हो या उस दह मिल या वह समाज में परिणत समझा जाए या जिसके कारण उस पर, उसके यवसाय अथवा पद के सम्बध में बुरा प्रभाव पडे । मानहानि के रूप -मानहानिकारी पथना के दो स्प हो सकते हैं- एक लिखित पौर दूसरा मौखिक । लिखित मानहानिकारी क्थन को अपमानकारी लेख (Libal) कहते हैं और मौखिर मानहानिकारी कथन को अपमानकारी वचन (Slander) कहते हैं। अपमानकारी लेय (Libel) -मपमानकारी लख का तात्पय देवल सचिन मयों में न होकर बहुत ही वृहत् पर्थो म लिया जाता है । इसका तात्पर्य ऐसे उन सभी विचारो से है जिनका किसी भी स्थाई रूप म परिणत पर दिया गया हो । उ हरपाय किसी व्यक्ति वा व्यङ्ग चित्र (Cartoon) बनाना मोर उस चित्र के मारा उसको अपमानित परना अपमानकारी लस हो मतगत पाएगा। इसी प्रकार रिसो व्यक्ति का पुतला बनाकर उसकी मानहानि करना अपमानकारी लेस (Libel) के हो मतगत माएगा। विसो व्यक्ति के विषय म सवेत पर यदि कोई ऐसा लस लिखा गया है जसमे रि सारेतिर पतिको मानहानि हो तो यह मपमान पारी लेस ही समझा मान हानि जाएगा। एक मामले में प्रतिवादी ने एक समाचार पत्र म एक विद्यालय को मध्यापिका के विषय म यह प्रकागिन दिया कि यदि वह उस विद्यालय म पढन वाली लड़कियों पो पढ़ाती रहगो ता वह वहाँ की सभी लडकिया का भविष्य बिगाड देगी। वह अध्यापिका वास्तव म उस विद्यालय म लडकियो पा अध्यापन वाय करती थी। इस मामले म यह निणय दिया गया कि प्रतिवादी का लेख अपमानकारी लस था। [ मिठन प्रति नुमरयां जा, ४३ वम्बई लॉ रिपाटर, ६३१] प्रामानवारो लस व मुस्य तत्व निम्नलिखित हैं (१) व्यक्त किया हुमा कथन मिय्या हाना चाहिये, (२) जिस माध्यम के द्वारा वह व्यक्त किया गया हो उसको स्थायी होना चाहिये , एव (३) उस कपन को ऐसा होना चाहिए कि उसके द्वारा वादो को मानहानि हो । इस प्रकरण में यह बात विशेष रूप से स्मरणीय है कि अपमानकारी लय के द्वारा क्यिा क्षतिकृत्य स्वत अभियोग्य (Actionable per se) है भोर उसमें यादो को यह सिद्ध करन को मावश्यक्ता नहीं है कि मानहानि के कारण उसको वास्तव में कुछ हानि पहुँची। अपमानकारी वचन (Slander) -अपमानकारी वचन (Slander) से तात्पर्य मौखिक रूप से बहे हुए ऐस वचन स है जिससे वादा को मानहानि होती है। मदरहिल (Underbill) के मतानुसार य मौखिक रुप से कह हुए एसे वचन हैं जिनका कि पस्यायो (Transsent) होना पावश्यक है। उदाहरणाय, मुह से फुसफुमाना, सकेत, मुह, मुद्रा या भावभगो द्वारा किसी व्यक्ति को मानहानि करना पपमानकारी पवन मन्तगत पाते हैं । इस प्रकरण में यह बात स्मरणीय है कि अपमानकारी पर पाम तौर पर स्मत अभियोग्य नहीं होते हैं। लेकिन निम्नलिखित परिस्थितियों में व भी स्वत पभियोग्य मान लिए जाते हैं और बाला को मानहानि परन वान अपमानकारी ययनों द्वारापास्तविक क्षति सिद्ध मरना मावश्यक नही होता है (१) जव प्रतिवादीन यादी पर बाद ऐसा पपराध परन का मिथ्या पारोप समाया हो जिसका पर हारिप दण्ड होता हो। (२) जब प्रतिपादोन वायो किसी ऐमी बीमारी स प्रस्त होने का मिथ्या पाराप लगाया हो प्रिया पारण वागे समाज म वहिपत कर दिया जाए और लोग उसरे साप उठना-बैठना पसदन करें। , क्षतिकृत्य विधि पर प्रश्नोत्तर (३) जब प्रतिवादी ने वादी पर यह मिथ्या भारोप लगाया हो कि वह समुप पद या व्यवसाय के अयोग्य है। (४) जब प्रतिवादी ने किसी स्त्रीवादी पर दुश्चरित्रता (Unchastity) का मिथ्या मारोप लगाया हो। (५) जब प्रतिवादी न वादी पर यह मिथ्या मारोप लगाया हो कि वह जिस पद पर काय कर रहा है उस पद से दुराचरण (Misconduct) के कारण पदच्युत किए जाने योग्य है। (६) जब प्रतिवादी ने वादो पर यह मिथ्या भारोप लगाया हो कि वह साब- जनिक विश्वास (Public trust) के प्रयाग्य है । यह बात भी स्मरणीय है कि भपमान कारी वचन मभियोज्य (Actionable) तभी हो सकत हैं जव यह सिद्ध हो जाए कि वे मिथ्या है और उनका प्रकाशन दिया गया है तब प्रकाशन के परिणाम स्वरूप वादी को विशेष क्षति (Special damage) पहुंची है। प्रश्न ४८ -अपमानकारी लेख (Libel) और अपमानकारी वचन (Slander) का अन्तर स्पष्ट कीजिए। उत्तर -अपमानकारी लेस (Libel) और अपमानकारी वचन (Slander) में अन्तर -अपमानकारी लेख भौर मपमानकारी वचन म निम्न- लिपित भातर हैं (१) अपमानकारो लेख लिखित या मुद्रित अपमानकारी पपन है जबकि मपमानवारी वचन बोला हुमा या दर्शाया हुमा अपमानकारी कपन है। (२) अपमानकारी लप भपराध और क्षति वृत्य दोना हैं, जबमिपमान पारी वचन मम तौर पर दीवानो कावा मतगत केवल भतिपूण कृश्य है । (३) अपमानकारी लेग स्वत अभियोज्य (Actionable per se) क्षति कृय है, रितु अपमानकारो वचन सामा यत विशेष क्षति (Special damage) वे सिद्ध होने पर ही ममियोज्य है। (४) भपमानकारी लम्प का वास्तविर प्रार' निदोष हो सकता है, रितु अपमानकारी वचन का प्रसार, यदि वह जान बूझ पर स्वा से प्रकाशन करता है तो क्षतिपूर्ति पा उत्तरदायी होगा। प्रश्न ४. ~मानहानि के विषय में भारतीय कानून पर सक्षिप्त टिप्पणी लिसिए।
भान हानि ६६ उत्तर--मानहानि के विषय में भारतीय कानून -मानहानि के विषय में भारतीय कानून अगरेजी कानून से वही रही भिन्न है। भारतीय कानून के मार्तगत अपमानकारी वचन दिना विशेष क्षति (Special damage) सिद्ध किए हुए भी अभियाज्य हैं। [ काशी राम प्रति मादू (१८७०) ७ वी० एच० सी० (ए. सी० जे ) १७ ] लेकिन साधारण प्रपशब्द यद्यपि गाली हो सकते हैं पर बिना विशेष क्षति सिद्ध किए अभियोग्य नहीं होते। अपमानकारी वचन या अपमानकारी लेख को पुनरावृत्ति (Repetition) एक नया प्रकाशन माना जाता है। यदि कोई अपमानकारी वचन या अपमानवारी ( लेख इस प्रकार के हैं कि वे स्वय मूलत अपमानकारी नहीं पे किन्तु उनवी पुनरावृत्ति क्षति पूण है तो ऐसी परिस्थिति मे उनका मूल वक्ता या लख क्षति पूति देने का उत्तरदायी होगा बल्कि उनकी पुनरावृत्ति परन वाला व्यक्ति उत्तरदा होगा। इस सामाय नियम के निम्नलिखित मपवार हैं (१) जब कि मूल वक्ता या लेखक ने मपमानकारी वचन या लस इस उद्देश्य से कहे या निसे हा कि वे अय व्यक्तियो द्वारा दोहराए जाएग। (२) जब Fि मूल वक्ता या लेखक ने अपमानकारी वचन या लेस इस उद्देश्य सह हा या लिखे हों नि उनको पुनरावृत्ति अवश्यम्भावी हो । मपमानकारी वचन या अपमानकारी लस यदि वास्तव में सत्य हैं तय एसे पा को वह पर या निरस कर प्रकाशित करन वान व्यक्ति पर क्षति पूर्ति का कोई उत्तरदापित नहीं होगा । चोर को चोर , व्यभिचारा वो व्यभिचारी व ग्रप्टाचारी को स्रष्टाचारी कहना या लिखना क्षति पूण वृत्य नहीं है । प्रतएव मानहानि व मुक्दमे म अपमानकारी वचन या अपमानवारी लेप की सत्यता सिद्ध करना पूण बचाव (Complete defence) है । यदि ’ सत्य है तो जिस उद्देश्य से वे कहे या लिखे गय हैं वह महत्वहीन है । यह बात भी ध्यान रखने योग्य है कि प्रतिवादी के लिए यह भाव पर नहीं है कि वह यह सिद्ध करे कि अपमानकारी विषय वस्तु (Slanderous or libclous matter) का प्रत्यर - सही है । यदि वह घेवल इतना हो सिट पर दे दि पपमानकारी विषय वस्तु या सारा सही है तो भी यह उत्तरदायित्व मे मुक्त हो जाएगा। सापजनिर हित (Public interest) म बी गई समालोचनाए अपमान. पारी (Dafamators) नहीं समझी जाती | राय सम्बपी मामल, पाय प्रशासन (Administration of justice), सावजनिक संस्थामा (Public Institutions) सपा स्वायत्त शासन (Local self Government) सम्बपो क्षतिप विधि पर प्रश्नोत्तर वात एव धार्मिक मामलो में की गई समालोचनाए सावजनिक हित की बातें मानी जाती हैं । क्ला सम्र धो कृत्य जसे साहित्य, संगीत, चित्रकारी, नाटक एव चित्रपट तथा भय सावजनिक मनारजन भी सावजनिक हित में अतगत मात हैं। इस प्रकरण में यह बात स्मरणीय है कि उचित मालाचना को स्वत प्रता प्रजातन का प्राण होती है । था पातलि गास्त्री वे मतानुसार वाय स्वात सय (Freedom of Speech) तथा प्रेम की स्वत त्रता सभी प्रकार त्र संस्थानों का प्राधार है, पयोनि स्वतन राजनीतिक वाद विवाद के बिना जनता को शिक्षा, जो कि प्रजातन्त्र चलाने के लिये बहुत प्राव*या है सम्भव नहीं है । यदि कोई लखक क्सिी सावजनिक पत्रिका या समाचारपय म किसी व्यक्ति के विषय म अपना मत प्रकट करता है तो कोई मापत्ति की बात नहीं है कि तु यदि वह उमको दुराचारो या भ्रष्टाचारी कहता है तो उसको अपने कथन का भौचित्य सिद्ध करना होगा। भारतीय कानून के अनुसार अपमानवारी वचन व अपमानकारी लख दोनों पातिकृत्य भी हैं और अपराध (Crime) भी हैं। समाचार पत्रो म प्रकाशित किए गए अपमानकारी लखो के लिए समाचार पत्र के स्वामी, सम्पाटक, प्रकाशप एव मुद्रक सभी व्यक्ति सयुक्त रूप से व व्यक्तिगत रूप से क्षतिपूर्ति के उतरदायी हैं | जिस समाचार पत्र में काई अपमानकारी लेस प्रमाणित होता है उसके प्रति की विनी एक अलग प्रकाशन माना जाता है । लपिन यदि प्रति बादी निम्नलिखित बातें सिद्ध परदे ता वह धातिपूर्ति के उत्तरदायित्व स मुक्त हो सस्ता है। (१) यह कि उसको इस बात का मान नहीं था कि समाचार पत्र में मपमान पारी लेख है एव (२) यह कि उमको यह अनमिनना उसकी मसावधानी का परिणाम नही था। लेकित प्रपमानारी वचनों वा प्रताप सामा यत किसी भी परिस्थिति म गदेव ही दोषी माना जाता है। इग्न म अपमानकारी वचन पोर मपमानकारी कस के विषय म मुकदमा चलाने के लिए विभिन अवधि निर्धारित है। मपमानवारो लप के लिए उगवे प्रकाशन 4६ महीन ये भीतर वार उपस्थित पर देना चाहिए पोर मपमानकारी वचन के लिए अवधि दो वप है । लकिन भारत में नवीनतम कानून नेमा वि प्रवधि अधिनियम १९६३म प्रतिपादित किया गया है अपमानकारी लेग तया अपमानकारी वा दोनों लिए ही वाद उपस्थित करने की अवधि एक वप है।
- मान हानि प्रश्न ५० -मानहानि के आवश्यर वन क्या हैं ? उनकी सक्षिप्त व्यारया कीजिए। उत्तर-मानहानि के प्रारश्यक तत्व -मानहानि करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध वादी को क्षतिपूर्ति प्राप्त करन के लिए जा बातें सिद्ध कराा मावश्यक हैं वे माहानि के श्रावश्यक तत्व कहे जाते हैं । इन तत्वा वी च्याम्या निम्नलिखित है (१) अपमानकारी लेप तथा अपमानकारी वचन के लिए यह आवश्यक है कि उनके द्वारा वादी को मानहानि हुई हो । (२) यदि वचन या तेल अरमानकागे ( Defamatory ) है तो सक्रप ( Intention ) या मतन्य (Mouve) जिसमे दिव कह या लिखे गए हैं तथ्यहीन ( Immaterial ) है। (३) मानहानि करने वाल वचन या लस वादी के प्रति कह गए या लिखे गए होने चाहिए । इस मदर्भ म इ० हटन कम्पनी प्रति जा स ( १६१० ए० सी० २०) का मामला उल्लखनीय है । इस मामले की घटनाए इस प्रकार हैं कि एक समाचारपत्र मे 'मार्टिमट जोस, शाप अतगत एक कहानी प्रकाशित हुई जिसमे कि यह का गया कि मार्टिमस जो स नाम या व्यक्ति जा कि एस गिरजाघर का सर था फास म एक स्त्रो के साथ अवयप में रहना पा । सयोगा मार्टिमस जोम नाम का वास्तव में एक व्यक्ति वैरिस्टर तथा पत्रकार था । यद्यपि वह गिरजाघर ग सरक्षक नही था, किंतु जिन व्यक्तियों न यह समाचार पत्र पढ़ा नहोंन यही समझा नि उस समाचार पत्र में छपी हुई कहानगे उमो -पक्ति के प्रति लिखी गई है। इस पर पार्टिमस जो स न समाचार पत्र पर क्षतिपूर्ति का मुकदमा चलाया । इस मुक्दम म यह निएप दिया गया कि प्रतिवादी वाला को हातिपूति देने के लिए जिम्मेवार है भली उसका इरादा वानी को मानहानि करा या नहा रहा हा । दम निराय म प्रतिपाति नियम पो माहानि मधिनियम, १९५२ ( The Defamation Act, 1952) द्वारा सगोपित पर दिया गया है | रा गायन व मनुमार पति कोइ पति अपमानकारी सरा मादि प्रकाशित करता है पोर का म यह करता है कि यह यादि मन मन जान म प्रकाशित घर लिए हैं तो उन इग बात का प्रवमर दिया जाता है कि यह अपनी भूल गुधार ले पौर जिस व्यक्ति की मानहानि हुई है उगमे हामा माग ने । इम अघि नियम , मन्तगत वानी को भी यह अधिकार प्रास है यह क्षमा याचना को स्वीकारपरले प्रयया मम्वीकार कर दे। समा याचना किन परिस्थितियो में स्वीकार पो जाए मोर दिन म नहीं, इस सम्बध में विशेप प्रविधान इस अधिनियम में गए हैं।
०२ क्षतिवृत्य विधि पर प्रश्नोतर । (४) मानहानि करने वाले गब्गे का प्रकाशन किया जाना मावश्यक है। विना प्रकाशन क मानहानि अमम्मा है। (५) मानहानि करने वाले वचन या लेस मिथ्या होने चाहिए । प्रतिवादी पर इस बात का मादित करा का भार है कि जो चुछ उसने कहा है अथवा लिखा है वह सत्य है। प्रश्न५१ ~ श्र। विशेषाधिकृत सन्देश (Privileged commun Ication ) से क्या वापय हे ? मानहानि के सदर्भ म सम्पूण विशेषा धिकार (Absolute privilese) और परिमित विशेषाधिकार (Qualip d Privilege) को व्यारया कीजिए। (1) 'क' 'स' की फर्म में नौकरी के लिए उम्मीदवार था। 'स'ने 'ग' से क' के सम्बन्ध मे मालूमात की। 'ग' ने 'स' को इस सम्बन्ध में जो पत्र लिसा उसम 'क' के चरित्र के विषय में कुछ मिथ्या अपमानकारी फयन भी था जिसे 'ग सत्य समझता था। 'ग की भूल से यह पत्र एक दूसरे लिफाफे में रखा गया जो 'घ' को मिला । 'घ' न 'क' को इस विषय में सूचित किया। क्या 'क' 'ग' के विरुद्ध मानहानि के लिए क्षतिपूर्ति का मुकदमा चला सकता है? उत्तर -(अ) विशेषाधिकृत सन्देश (Privileged Communica tion ) -विशेषाधिकृत मद (Privileged Communication) वह वयन है जो रिसो विपाधिकृत अवसर पर कहा जाए । समाज के कुछ व्यक्तियों ने कत्तय इस प्रकार के होते हैं कि जिनका समाज के हित मे ही इस बात को छूट देनी पड़ती है मि दे पपन क्तव्य पालन के लिए मावश्यकता पड़ने पर ऐमेोया अपना को मो यह सजा कि मयथा मानहानि करने वाल मान जाते हो। यह विशपाधिकृत स देश कवल विपाधिकृत अवसरों पर ही यह जा सकते हैं । विशेषाधिकार दो प्रकार के होते हैं-(१) सम्पूर्ण विशेषाधिकार, पोर (२) परिमित गिरोपाधिकार । इन दोनों प्रकार विशयाधिकारा को ध्याच्या निम्न लिखित है (१) मम्पूर्ण विशेषाधिकार (Absolute privilege ) --मम्मूग विशेषाधिकार वह है जिमम अवसर विशप पर व्यक्ति को पूग्ण वारस्वानप (Compl etc freedom ot speech) होता है और इस अवसर पर वह गरा ययनों या लिस गा लगा के प्रान टम पर मानहानि का मुम्मा हा चलाया जा ममता।
- मानहानि ७३ लिखित चार प्रकार की कायवाहियो के अवसर पर कुछ व्यक्ति विशेषों को सम्पूण विशेषाधिकार प्राप्त रहते हैं (क) ससदीय कार्यवाही ( Parliamentary proceedings) ससद के सभी सदस्यो को ससनीय कायवाही के दौरान मे बहे गए क्थना के लिए इस वात की पूरी छूट रहती है कि उन कथनो के अपमानकारी होने पर भी उन पर मुक्दमा हो चलाया जायगा । लेकिन यह बात स्मरणीय है कि समद सदस्यो का यह विशेषाधिकार ससद की कार्यवाही के समय ही प्रयुक्त हो सकता है । यदि ससद काकाई सदस्य अपमानकारी शादी का प्रयोग ससद को परिधि से बाहर करता है तो वह उस प्रति उत्तरदायी हो जाएगा। (प) न्यायिक कार्यवाही (Judicial proceedings) --यायिक कायवाही म कह गए कथनों और उनको कहने वालो को कानूनी उ मुक्ति ( Legal Immunity ) प्राप्त है । यह बात कोई महत्व नहीं रखती कि वह कथन जज, पोल, गवाह या पक्षाकार किसने पहा ] इस उमुक्ति का माघार सावजनिर नोक्ति (Public policy) है। (ग) सना तथा नौसेना सम्बन्धी कायवाही ( Military and Naval proceedings) -सना तया नौपना सम्ब घी मधिकारा तथा क्त्तव्यों के पालन मे कह गए, पथनां को भा सम्पूण विपाधिकार प्राप्त हैं । (प) राज्य की कायनादी (State proceedings) -राज्य में मामलो र सम्बघ म एक मधिकारी द्वारा दूसर मधिकारा का भेजे हुए समस्त सदगो को सम्पूर्ण विवाधिकार प्राप्त हैं, यदि इस प्रकार के सदा राज्य द्वारा दिए गए पत्तभ्यो व पालन म भेजे गए हैं। (२) परिमित विशेषाधिकार (Qualtied privilege) --परिमित विशेषाधिकार वह है जिसके अनुसार परिस्थिति विशेष में कह गए अपशब्दों के लिए उन मागेका बहने वाला तब तक उत्तरदायो नही होता जब तक कि वादी यह सिद्ध न पर दबि वे अपार प्रत्यक्ष द्वेष (NMalice) से प्रेरित होकर रह गए हैं। इस प्रकार के विशेषाधिकार निम्नलिपित परिस्थितियों में प्रयुक्त होते हैं। (क) फत्तव्य पालन में भेजे गए सन्देश (Communica 1on made in performance of duty) -यदि योई मश विमी मप व्यक्ति के पास बानो पत्तन्या पापातन वरने के सिलमिल म भजा जाए और वह सनेश मिमी व्यक्ति य लिए मामानकारी मिट हो तो एम। सा पानूनी कारवाही सर मुक्त समगा जाएगा। लेकिन दात यह है कि एमा सदेत जिस व्यक्ति के पास भेजा गया क्षतिकृत्य विधि पर प्रश्नोतर है उसका भी उस स देश को प्राप्त करन का कानूनी तय हो । उदाहरणाय, प्रार को अपने यापार के लिए विसी यक्ति को नौकर रखना है। वह व्यक्ति पहले किसी अन्य यापारिक सस्था में काम कर चुका है। माप उस सस्था के मैनेजर से उस व्यक्ति व चाल चलन के विषय म पूरताछ करत हैं । ऐसी परिस्थिति में उस सस्था का मैने तर पाप क पास उस व्यक्ति के विषय में जो कुछ भी लिखकर भेजेगा उसको परिमित विशेषाधिकार प्राप्त होगा। यदि उस सस्थामा मैनजर उस व्यक्ति के विषय में कोई एसी बात लिप भेजता है जिसस कि यह नात हो कि उसन द्वेपपूण नीयत से प्रेरित होकर एसा किया है तो वह व्यक्ति यह सिद्ध वर देने पर उस सस्था के मैनेजर से मान हानि के लिए क्षतिपूर्ति पाने का अधिकारी होगा। (स) किसी हित की रक्षा के लिए कहे गए कथन ( Statements in protection of an interest) -यदि तिमी हित की रक्षा के लिए किसी ने कोई इस प्रकार के क्थन कहे हैं जिससे किसी को मानहानि होती है तो वे कपन मो परिमित रूप से उन्मुक्त समझे जाते हैं । उाहरणाथ, यदि किसी न म्पनी सम्पत्ति की सुरक्षा के लिए किसी व्यक्ति को कुछ कहा और क्यन उसको मानहानि करने का कारण बन गया तो उस क्यन के कहने वाले को परिमित उमुक्ति प्राप्त होगी। जिस व्यक्ति को मानहानि हुई है यह तय तक क्षतिपूर्ति की कायवाटी नहीं कर सकता जब तक वह यह न सिद्ध कर दे कि इस प्रकार का कथन द्वेषपूरण नीयत से किया गया है। (ग) निष्पक्ष तथा सही रिपोट (Fair and accurate report) इस प्रकार की रिपार्टी के लिए यह जरूरी है कि वे कामवाही का सच्चा वणन करती हों। इन रिपोटों के मतगत ससदीय कायवाही का रिपोट तथा यायिक व ध यायिक कायवाही की रिपोर्ट मा जातो हैं । (ब) समस्या -प्रस्तुत मामल की परिस्थितियों के मतगत विसा नौर पथरिम के विषय म विमा यक्ति से की गई पूछ ताछ परिमित विशेषाधिकृत स मानी जाती है । [गाडनर प्रति स्लाइ १८ एल जे० पू० बा० ४] मतएर 'ग' का ग देवा यद्यपि प्रसय व अपमानधारी है, मितु 'क' न उम नवनीयती सप्रेपित किया है । भने हा 'ग' का असावधानी स उस रादा का प्रकाशन 'घ' का हो गया पर 'ग' ने उस स देशरा 'स' का जिमा पूछ Bछ या पो, प्रेषित किया था। ऐसी परिस्थिति म 'n' के विरुद्ध मानहानि के लिए निपूर्ति का मुकदमा नहीं चला सकता। प्रश्न ५२ -'क' ने अपनी नाटक कम्पनी में एक गाने वाली स्त्री को नोकर रया । 'ख' ने उस स्त्री के विरुद्ध एक अपमानकारी लेख प्रका. शित किया । उस स्त्री ने भयभीत होकर 'क' को नौकरी छोड़ दी।
मानहानि क्या '''क' की क्षतिपूर्ति के लिए उत्तरदायी है ? ममस्या -कानून का यह एक सामाय नियम है कि प्रत्येक व्यक्ति को उमके कृत्य द्वारा घटित साधारण व स्वाभाविक परिणाम पानान होता है एक उसका एमा इरादा होता है, यह समझा जाना चाहिए । लकिन यह नियम प्रस्तुत समस्या का घटनामा पर लागू नहीं होता, क्योंकि 'ख व द्वारा अपमानकारी लस प्रकाशित हान का यह साधारण व स्वाभाविक परिणाम नही है कि गार वाली स्त्री न 'क' को नौकरी छोडी । पाम तार पर एम कृत्य मे एम परिणाम की प्रा नहीं हो सकती । अतएव क को क्षतिपूात के लिए 'व' उत्तरदाया नहीं है। प्रश्न ५३ -मानहानि की यायवाही में बचान की सम्भर दलीलों पर क्षिप्त टिप्पणी लिसिए । उत्तर-~वचार को सम्भव दलीलें ( Possible defences) मानहानि को कार्रवाई म वचाव की सम्भव दलोलें निम्नलिवित हो सकती हैं (1) सत्य द्वारा घोचित्य (Juctification by truth)-अपमाकारी दादो को सत्यता मानहानि की पायवाही ग प्रतिवादी को गेर म बचाव को पूर्ण दलील है । इसका कारण यह है कि प्रत्या व्यक्ति को सच बोलो का अधिकार है। लेकिन यह मौचित्य मिद्ध करना प्रतिवारी का कर्तव्य है। (निपक्ष तथा न्यायोपित्त समालोचना (Faur and honsfide comment) -सावजनिक वाद विवा वे योग्य दिसो भा विषय पर निप्पल एप "यायोचित सपालाचना मानहानि नही मानी जाती । लनि र मह समालोचना विमा द्वेष की भावना प्रेरित होकर न की गई हो । (३) विशेषाधिकृत सदेश ( Privileged communications) कृपया प्रश्न ५. (म) के पन्नगत उत्तर दपिए। प्रश्न ५/ ~'प्रकाशन (Publicumn)' से क्या तापय है? क्या निम्नलिखित परिस्थितियों में कह गए अपशदप्रकाशित ? मम मे जाएगे- (अ) 'न 'स' से पहा कि वह (स) जारज सन्तान है। (३) प ने अपनी पत्नी से कहा कि 'पर' जारज सन्तान है। (; 'क ने 'स' की पत्नी में कहा कि 'म' जारज सन्तान है। उत्तर-प्रकाशन (Publication) -प्रवासन सतत्पर विमी चपन फो जानकारी पारी के मतिरिक्त पय व्यक्तियों को देना है। यध्यवित जिनको जान- मारी दो गा उस क्पन को समझने में समय होन चाहिए। - क्षरिकृश्य विधि पर प्रश्नोत्तर (अ) व (ब)-कानून का नियम है कि जब अपमानकारी स देश अपमानित व्यक्ति को या अपमानकर्ता वी पत्नी को दिया जाए तो प्रकाशन नही कहलाता। अपमानवत्ता और उसकी पत्नी दोनों कानून के मतगत एक ही व्यक्ति हैं। मतएव ''न 'स' स जो पहा मथवा अपनी पत्नी से जो कहा उस प्रकाशित होना नहीं समझा जाना चाहिए। (स) यह प्रकाशन कहा जाएगा। प्रश्न ५५ -मानहानि द्वारा क्षतिप्राप्त व्यक्ति को क्षतिपूर्ति के लिए धनराशि निर्धारित करने की व्यवस्था किन परिस्थितियों पर निर्भर करती है। व्याख्या कीजिए। उत्तर -मानहानि द्वारा की गई क्षति को क्षतिपूति -~मानहानि द्वारा क्षतिप्राप्त “यक्ति को क्षतिपूर्ति करने के लिए जो पनराति निर्धारित की जाती है उसकी व्यवस्था मनव परिस्थितियों पर निभर करती है जिनम मुख्य परिस्थि तियाँ निम्नलिखित हैं (१) अपमानकारी लेग या ववन की प्रकृति (२) वाटी पौर प्रतिवादी की हैसियत, (३) अपमानवारी लप या वचन का संचार, (४) क्या मानहानि जान बूझ पर की गई है या अकस्मात् एव क्सिी भय कृत्य क अप्रत्याशित परिणाम स्वरूम हो गई है। क्षतिपूर्ति की धनराशि निम्नलिखित परिस्थितियां सिद्ध करने पर कम की जा तथा सनतो है (१) देष की भावना वो मनुपस्थिति (Absence of the attitude of malice)। (२) मपना दोप मानकर क्षमा याचना की जाए। (३) वारी को निम्न कीति (Bad reputation)। (४) वादी द्वारा उत्तेजना (provocation) दिलाया जाना । प्रश्न ५६ -क्या पति पत्नी के बीच मानहानि की कार्यवाही हो सकती है. ? इस विषय के कानून पर टिप्पणी लिखिए । उनर-पति पत्नी के बीच मानहानि की कार्यवाहो -भारत म पति भौर परनी एक मारमा पदोन माने जाते हैं। पाइन भी इस विपार धारा का समपन परता है मोर पान को दृष्टि म भो पति मौर परनी एक इकाई (One Unt ) मान जाते हैं। इस कारण विमो व्यक्ति से सम्बपित प्रपमानारी अपना मानहानि - एक प्रतिवादी की पत्नी को ज्ञात होना प्रकाशन नहीं माना जाता । उदाहरणार्थ, यदि किसी को मानहानि करने वाली बातें उसका एक लिफाफे मे बद करके भेजी गई हैं मौर उन बातों की जानकारी भेजन वाले व्यक्ति का पत्नी को है तो प्रकाशन नही कहा जाएगा। इसी माघार पर सामा य नियम यह है कि पति और पत्नी के बीच मानहानि की कायवाही नहीं हो सकती। प्रश्न ५७ -टिप्पणी लिसिये- (म) अपमानकारी लेख या वचनो को पुनरक्ति । (ब) निगम (Corporation) को मानहानि । (स) क्सिी वग विशेष को मानहानि । -(अ) अपमानकारी लेस या वचनों की पुनरक्ति -यदि कोई अपमानकारी लख या वचन इस प्रकार का है कि वह स्वय मूलत अपमानकारी नही था कि तु इसकी पुनरुक्ति (Repetition) क्षतिपूण है तब एसी अवस्था म उस अपमानकारी लेख या वचन का मूल लेखक या वक्ता क्षतिपूर्ति देन का उत्तरदायी नही होगा बल्कि वह व्यक्ति जो उनकी पुनरुक्ति करने वाला है क्षतिपूर्ति क लिए उत्तरदायी होगा । इस नियम के निम्नलिखित प्रपवाद हैं (१) जवकि अपमानकारी शब्दों के मूल वक्ता ने मपमानकारी पद इस उद्देश्य से रहे हो वि वे मय व्यक्तियों द्वारा दाहराए जाए । (२) जवकि मूल वक्ता द्वारा कह गए अपमानकारी शद इम ढग से वह गए हों कि उनको पुनरुक्ति अवश्यम्भावी हो । कानून के अन्तर्गत मयेक पुनरत्ति को एक नया प्रशासन माना जाता है । उदाहरणार्थ, यदि एक समाचार पत्र म क्सिी व्यक्ति को मानहानि परन के लिए कोई वयन माज छपा और कल फिर छा तो प्रत्येक वार का छपना एक नया प्रकाशन माना जाएगा। लेकिन स्मरण रहे कि समाचार पत्र का वेचन वाला समाचार पत्र म एपे अपमानकारी लेस के लिए उत्तरदायी नहीं है पर यदि वह उस मपमानकारी लेख हो चिल्ला चिल्ला कर दोहराता है तो वह भी उत्तरदायी समझा जाएगा। (4) निगम (Corporation) को मानहानि -निगम एक काल्पनिक ध्यत्ति (Tictitious person) है । इस कारण उसक प्रति घणादि की भावना जागृत होना सम्भव नहीं है । मत उम पर मानहानि का मुक मा नही चलाया जा सरता। लेरिन यदि निगम के व्यक्तियों को व्यक्तिगत प से अपमानकारी वपन पर काई मापत्ति है तो वे इस प्रति वाद उपस्थित कर सकते हैं । विसी पपमानकारी लेस के प्रति निगम द्वारा मुरदमा चलाने के लिए यह सिद्ध करना जरूरी है कि उससे निगम को सम्पत्ति को क्षति पहुँची है या उसरे व्यवसाय को हानि पहुंची है।
क्षतिय विधि पर प्रश्नोत्तर (स) किसी वर्ग विशेष को मानहानि - यदि कोई अपमानकारी लख क्सिी वग विशेष के विषय में प्रकाशित किया गया है तो उस वग का कोई एक सदस्य ऐने अपमानकारी लस विरुद्ध साधारणतया मुक्दमा नही चला सकता जब तक कि मुकदमा दायर करने व ला यह न मिद कर सके कि उस लेस स विशेप कर उसके ऊपर एक प्राक्षेप है । उदाहरणार्थ, यदि क्सिो यक्ति ने लिखा कि सभा डाक्टर क र मार अविश्वसनीय होते हैं तो कोई डाक्टर विरोप एस लस के लिए मुकदमा नहीं चला सकता जब तक शिवह यह मिद न कर सके कि जिस सदभ म वह लस प्रमाणित पिया गय है उससे उसके ऊपर भाशेप हुमा है । लेकिन यह नियम उस परिस्थिति म लागू नहीं होगा जर मिक्सिो वग विशेप में क्वल दो चार व्यक्ति ही हो । प्रश्न ५८ -'क' एक अपमानकारी पत्र 'स' के नाम लिखता है जिसमे वह स' पर कुछ मिथ्या भारोप लगाता है और 'ख' के पते पर भेन देता है । वह पन स' के व्यक्तिगत सहकारी (personal assistant) को मिलता है जो उस पढ कर '' के समक्षा भारश्यक कार्यवाही के लिए पेश कर देता है। 'स' 'क' के विरुद्ध मानहानि का दावा करता है। क्या 'क' 'स' की मानहानि के लिए उत्तरदायी है ? उत्तर समस्या -प्रस्तुत समस्या में 'ख' को मानहानि के लिए 'क' उत्तरतायो नहीं है, क्यावि 'क' क द्वारा भेजे गए मपमानकारी पत्र का कानूनी पर्यो में प्रकाशन नहीं हुमा । 'क' ने 'ख' के पते पर सीधा पत्र भेजा था जो 'स' के व्यक्तिगत सहकारी को नही पढ़ना चाहिए था। प्रश्न ५६ -गवाह का बयान पराते हुए कम्पनी के वकील ने उससे पूछा "क्या यह सच है कि वह कम्पनी शहर को सबस बडी कम्पनी है?" गवाह ने हाँ में जवान दिया, लेकिन तभा प्रतिपक्षी के वकील ने रिमार्क किया, "और वह शहर की सबस नेईमान सस्था है।' कम्पनी ने प्रतिपक्षी के वकील पर मानहानि का दावा किया । क्या प्रतिपक्षो का वकील उत्तर दायी है? उत्तर-समस्या-न्यायिक कार्यवाही -(Judicial proceed ungs) के दौरान में कह गए अपमानकारी फ्यन और उनके पहन वाने को कानूनी उ मुक्ति प्राप्त होती है। ये सम्पूण विशेषाधित सदा (Absolute privileged communication) बहनात हैं। मनएव एसे अपमानकारी शम्ग के लिए TH, वयोल, गयाह एव पक्षकारों के विरुद्ध मानहानि का मुकदमा नहीं घन सरता। सेपिन इलाहाया उच्च न्यायालय ने एप प्रमस मामले में यह निराप दिया है पि गवाह का ययान होत समय प्रतिपक्षी के वकील का मानहानि ७६ अपमानकारी रिमाक उसके मवविकल के हित में नहीं कहा जा सकता और न उसके कानूनी पत्तव्यों के पालन मे ही किया गया समझा जा सकता है । प्रतण्व वह ऐसे अपमानवारी रिमा के लिए मानहानि का उत्तरदायी है। [वश प्रति बच्चा लात, ५१ इलाहाबाद ५०६] प्रश्न ६० -'' अपने एक सार्वजनिक मापस मे यह कहता है कि सभी वकील मिथ्याभापी होते हैं। 'स' जो एक वकील है और 'क' के भापण के ममय बैठक में उपस्थित रहता है, 'क' के विरुद्ध मानहानि का दावा करता है। क्या 'स' का दायरा चलने योग्य है ? उत्तर-समस्या कानून का सामाय नियम यह है कि यदि कोई अपमान कारी वचन किसी वग विशेप के विषय में कहा गया है तो उस वग का कोई एक सदस्य ऐसे वचन के विरुद्ध साधारणतया मुक्दमा नहीं चला सकता जब तक कि यह सिद्ध न पर सके कि वह अपमानवारी वचन विरोप पर उसके ऊपर एक माक्षेप है। 'व' भाषण के समय बैठन में उपस्थित था। मतएव इस सम्भावना के लिए स्थान है कि 'स' पर मालेप परने के लिए 'क' ने अपने भाषण में वकील वग के विस्त मपमानकारी वचन बोला हो। 'क' को मालोचना न तो सावजनिक हित म पही जा सकती है पोर न बिना द्वेषपूण मानी जा सकती है। ऐसी परिस्थिति में 'स' का दावा 'क' के विरुद्ध चलने योग्य है। वह - पारिवारिक सम्बन्धों के प्रति क्षतिकृत्य (TORTS TO DOMESTIC RELATIONS) प्रश्न ६१ -पारिवारिक सम्बन्धों के प्रति क्षविकृत्यों का वर्गीकरण कीजिये। उत्तर -पारिवारिक सम्बन्धों के प्रति क्षतिकृत्यों का वर्गीकरण- एसे क्षतिपूरा कृत्य जो पारिवारिक सम्बधो को शाति पहुंचाते हैं पारिवारिक सम्बधों के प्रति क्षतिकृत्य कहे जाते हैं। इन क्षत्कृित्यो को निम्नलिखित कोटियों म रख सकते हैं (१) दाम्पत्य अधिकारी के प्रति क्षतिकृत्य (Torts to marital rights), (म) परपली का अपहरण (Abduction of another's wife), (ब) परपत्नी वा गमन (Adultery), एव (स) पर पत्नी को शारीरिक क्षति पहुंचाना (Causing bodily injury to anothers wife)। (२) मातृ पितृ अधिकारा के प्रति क्षतिकृत्य (Torts to parental rights) (३) स्वामी के अधिकारा के प्रति क्षतिकृत्य (Torts to Master's rights) प्रश्न ६२ -दाम्पत्य अधिकारों के प्रति क्षतियों का विवेचनात्मक वर्णन कीजिये उत्तर --दाम्पत्य अधिकारों के प्रति क्षतिकृत्य-पति भौर पत्नी दोनों को एक दूसरे के साथ रहन और एक दूसरे की सेवामा का उपभोग परने घा जमजात अधिकार है। जो व्यक्ति पति या पत्नी के इस अधिकार को मग परता है वह कानून की दृष्टि में एक क्षतिपूण कृत्य करता है और धातिपूर्ति देने या उत्तर दायी होने के साथ साथ कभी कभी दण्ड का भी मागी होता है । दाम्पत्य अधिकारों को सामायत तीन प्रकार से भग किया जा सकता है जिनका विवरण निम्नलिखित है - पारिवारिक सम्घा के प्रति क्षत्रिय -- (१) पर पत्नी का अपहरण (Abduction of anothet's wife)- यति पाई यत्ति किसी को पी या बहा पुनाता पर धागे से या पनपूर भगा जाय और इस प्रकार पतिको पत्नी को माया पचि वर दे ता पति भगान वान व्यक्ति के विरुद्ध क्षतिपूति गमुरमा चना करता है। इसी प्रकार यदि वियो सो पनि का योई व्यक्ति उसी पलो व साय सपचित कर दता पत्नी का भी अधिकार होगा कि वह उस व्यक्ति व विरुद्ध निगन रिगा पति वा उसस वचित किया है क्षतिपूर्ति का मुरदमा तार ! सब साथ साय यह बात भी स्मरणीय है कि यदि बाई व्यक्ति बिना किसा कानूना प्रोचि य क किमी व्यक्ति की पत्नी को उसस अलग रहन को प्रेरित करता है तो भी वह पति के विरद्ध अनुचित वृक्ष परता है और इम वृप वलिय क्षतिपूर्ति का उत्तरदायो है। लगिन उस व्यक्ति या परकी या एम प्रेरित परत व परिणाम स्वम्प पत्नी पति के सहवास (Cor habitation) स दूर हो जाना चाहिय [धेट प्रति समुअल फारम एइ कम्पनी, (१९५२) ए० सी० ७१६] भारताय मानून य अनुसार यह वथ्यहीन है वि जिम समय पनी को उसके पति के घर त नगाया गया उस समय उसका पति उमी नगर म जिपम कि पत्नी थी, पा या नहा । [गाभाराम प्रति टापाराम (१६५६) ५५ इलाहाबाद,६०३] (२) पर पत्नो गमन (Adultery) -भारत म पर पली गमन (Adultury) भारतीय दंड सहिता (Indian Penal Code) को धारा ४८७ अन्नगत एक दहनोय अपराध है । इस अपराध म यद्यपि सो पोर पुरप दोनों ही समान र स भाग नते हैं किन्तु कुछ कारणवा व पल पुरुष हा मपरापी माना जाता है । इन म यदि काई पुरष दूसर यो पनी व साय पनि को अनुपति व बिना समागम (Scxual intercourse) मरता है ! वह दइ मा मागोन हारर उस स्त्री क पनि का क्षतिपूर्वि दन मा नरमाया होता है। भारत में यह दनीय पाराप है । विहित स्री देवल अपना ठामे अपन पति की मनुमति के बिना पर पुरा म गमागम परनय लिप स्वतत्र नहीं है। यह बात भो स्मरणोप है मिसाई नी रिसोय द्रो पर इस बात में लिप क्षतिपूर्ति का मुदमा नहीं घरगुरता कि उमन उमा पनि माप समागम दिया है। पानूना और पर प्रत्पर पतिका प्रपनी पत्नी साप ममागम करने का माधिकार है पाह मास में प्रेम भारना हा पान हा, और जा यक्ति पति को अनुपनि विग उमरी पीय साप समागम दरता है यह पनि र उन वानूनी ६ ८२ क्षतिवृत्य विधि पर प्रश्नोत्तर मधिकार को भग करता है और पति को क्षतिपूर्ति देने के लिये उत्तरदायी है। [बारला प्रति बारनेस (१९१६) १७२ क्लवत्ता ९८] (३) पर पत्नी को शारीरिक क्षति पहुंचाना (Causing bndiir Injury to another's wife - इगल ड दे सबसाधारण कानून (Cemron Law) के अतगत प्रत्यक पति को अधिकार है कि यदि कोई व्यक्ति उसकी पत्नी का शारीरिक क्षति पहुँचाय ता वह उस यक्ति के विरुद्ध मुकदमा चला कर क्षतिपूर्ति प्राप्त कर सकता है । इसी प्रकार पानी को भी इस समरक्ष अधिकार प्राप्त है । धानक दुघटना अधिनियम (Fatal Acciden s Act) मतगत यह प्राविधान है कि यदि गारीरिक क्षति के परिणाम स्वरूप पत्नी या पति की मृत्यु हो जाय तो मृतक की पत्नी या पति, जैसा भी हो, क्षतिपूर्ति पाने का अधिकारी है। प्रश्न ६३ -मात पितृ अधिकारों (Parental rights) के प्रति जति कृत्यों पर सक्षिप्त टिप्परसी लिसिये । उत्तर -मात पितृ अधिकारों के प्रति क्षतिकृत्य -माता पिता को अधिकार है कि उह अपने बच्चो को सेवा सदा उपलब्ध रहे । कानून की दृष्टि घे माता पिता का यह अधिकार ठीक उसी प्रकार का है जैसा स्वामी का अधिकार सेवक के प्रति होता है। यदि कोई व्यक्ति किसी की लडको या लडके को वहता कर माता पिता को उनकी सेवामो स वचित कर दे तो वह माता पिता को क्षतिपूर्ति दने के लिय उत्तरदायी होगा। कानून के प्रतगत प्रत्यक वह लडकी जो मपन माता पिता 4 साथ रहती हो माता पिता की सेवा में मानी जाती है। इसकीस वप रा कम को मनिहित सहयो यति रिसी प्रय सदा मनही है तो वह अपने माता पिता को मवा म मानी जाती है। इस सदन में एक प्रमुख मामला उनसनीय है । इस मामले की घटनायें इस प्रकार हैं कि एक लड़श नौररोस हटाय जान के बाद अपने पिता के घर वापस पा रहा थी। गस्त में उसको बनाया गया (Seduced) । लकी के पिता न वहकान वाल विरुर क्षतिपूनि का मुरादमा चलाया । इस मुक्दम म यह निरणय दिया गया कि पिता को क्षतिपूर्ति प्राप्त रन का मधिकार है । [टरी प्रति हटविनरान, १८६८ एस० मार० ३ क्यू० यो २९६ माता पिता को उनके बच्चों को सवा स क्सिी प्रकार वचित वर देना क्षतिकृम कानून के मन्तगत अभियोय है | ऐस मामलो में यह मिद वरना जारी है कि बच्चा मात पिता वो मवा में था और प्रतिवारी ने उसको सवा से माता पिता को चित कर दिया। [वैषम प्रति जेम्स (१९३७)२ ३० वी० ५२७] पारिवारिक सम्बषों के प्रति सतिकृत्य प्रश्न ६४-स्वामी के अधिकारों के प्रति क्षवियों का विवरण दीजिये। उत्तर •स्वामी के प्रधिकार के प्रति क्षतिकृय -प्रवर स्वामी को अपन सवा व मवाना वा सवाएं प्राप्त वरन का कानूनी प्रधिकार है और जो व्यक्ति किसी स्वामी वा उमके सबका व मविकानों वो मेवामों में वचित धरता है वह स्वामी के उक्त अधिकार का भग करता है और इमलिय क्षतिपूर्ति दा का उत्तरदायी माना जाता है। स्वामा वा भपन मेवों व सेविकामों को सामों से निम्नलिखित तीन प्रकार म वचित किया जा सकता है (१) सवक या सविका का कारावामित पर या उसयो चाट पहुँचा कर माहत कर जिसस कि वह सवा करने म मममय हो जाए। (५) सवक या सविका वो प्रनोमन देकर स्वामी को नौरा रा हटा दना। (३) एसे सवक या सविका का जिमन कि अपने स्वामी को नौकरी अनुचित ढग से छोड दा है, शरण दना । यदि किसी व्यक्ति ने किसी स्वामी की सेविका को वापर उस स्वामी को उम सेविका की सवामों स वचित किया है तो क्षतिप्राप्त स्वामा को क्षतिवावे पिरत मुक्त मे में यह सिद्ध करना पावश्यर है दि (1) जिस समय स्वामी को मपनी मेवितायोमेगामाम वचित दिया गया उस समय सेविका स्वामी ने पाम पिसी राविदा को पानी के अनगन बाय कर रही थी, तया (प) "बाब (Sucuc lon) परिणाम स्वम्म राविका मामा की सेवा कराम प्रगमय हो गई। बात भी fre सरना चाहिए कि वहबारे व परिणाम स्वाप वा प्टि अति (Spectal damage) पहुचा। बझाव वा मय वस सदिरा व नौयरी छाहार भयम चन जान मात्र मा नहीं है, बल्कि मविका को व्यभिचार मादि के लिए समान या भी होता प्रश्न ६५ -बहकावे के मामले में क्षतिपूर्ति का निर्धारगम (As ess. ment of damage) क्सि प्राधार पर होता है ? व्याग्या कोलिए। उत्तर -हाये के मामले में क्षतिपूति का निर्धारस - वहावे * मामले में यायालय मामायत उगहरएनीय क्षतिपूर्ति (Exempl rs damage) प्रदान करता है। बहाये के कृत्य में पेवन बहाना मात्र हा सम्मिलित नहीं है बल्कि बहाई हुई ममीको दुराचार पोर पभिचार करने के लिय प्रेरित क्षतिप विधि पर प्रश्नात्तर मरना नो है। रतएर क्षतिपूति निर्धारित करते समय इस पर भी विचार किया जाता है कि लगी र प्रति किय गर दुमहार से लड़या ५ पिता या मालिक बष्ट तया परमान भो हुमा है। बताने वान यत्ति व साय -पभिचार करने म लहरी गभरा भी हसरतो है । अनाव क्षतिपूर्ति देते समय उगो हान वानी जारज मसान पारन पारण क य का नो ध्यान रखा जाता है | इसरे मतिरिक्त मामले की मय परिस्थिनिया पर भी विचार किया जाता है ।
J ६ स्वतत्रता व परिस्थिति पर प्रभाव डालने वाले क्षतिकृत्य IVRONGS AFFEOTING FREEDOM AND STATUS (अ) द्वेषपूर्ण अभियोग (Malicious Prosecution) प्र०६६-द्वपपूर्ण अभियोग ( Malicious Prosecution) की परिभाषा देते हुए उन तत्वों की व्यारया कीजिए जिन्हें क्षतिपूर्ति के मुकदमे में सिद्ध करना वादी के लिए नितान्त आवश्यक है। उत्तर-द्वेपपूर्ण अभियोग (Malicious Prosecution; --उपपूर्ण अभियोग से तात्पय किसी व्यक्ति के विरद्ध पूण भावना से प्रेरित होकर फौजदारी या दिवालिया सम्बधी निराधार व मिथ्यापारोप लगाकर निष्फल कारवाही करने स है। द्वेषपूण अभियोग पे माधार पर क्षतिपूर्ति के मुकदमे मे वादी को जिन तत्वों पो मिद्ध परना निता त प्रायया है उनकी यात्या नीचे की जा रही है (१) प्रतिवादी द्वारा अभियोग चलाना (Prosecut on by the defendant)-द्व पपूण अभियाग प्राधार पर क्षतिपूर्ति का मुकरमा चलान के लिए सब प्रथम वालो को यह सिद्ध करना मावश्यक है कि प्रतिवादी न वादी के विरुद्ध भभियोग चलाया, अर्थात् प्रतिवादो के विरुद्ध चलाए गए अभियोग म अभियोक्ता (Prosecutor) था । भियाता कानून की दृष्टि में वह यक्ति है जो भभियोगका नियात्मव' रूप में प्रणेता हो । उदाहरणाथ, य िमैं किसी व्यक्ति से यह कहूं कि मेरी पड़ी चोरी पलो गई है और मैन बुछ देर पहले उस घडो को अमुक व्यक्ति के पाम देया है। यदि यह सूचना पास म खडा कोई अधिकारी सुन ले पोर उस व्यक्ति एसिद्ध अभियाग पला दे ता ऐगी परिस्थिति मे में अभियोता नहीं कहा जाऊगा। लेपित प िमैं जान बूझ पर उम यति विस्त पुलिस म रिपोट दज करादू'मोर उग पर उग व्यक्ति के विरुद्ध मभियोग चलाया जाए तो मैं अवश्य भभियोत्ता पहलाअगा। यति प्रतिवादी न स्वय या मपो अधिकृत एजेण्ट मथवा वकील द्वारा पारोप लगाया है ता वह स्पय उमक परिणाम के लिए उत्तरदायी है। [पनेल प्रति वाटसन (१८४१) ८ एम० एण्ड रन्नू० ६६१)। अभियोक्ता के प्रा पर विचार करने के लिए प्रतिवादी साभियोग से पहले पोर पमियोग के बाद में किया गया व्यवहार क्षतिय विधि पर प्रश्नोत्तर विशेष रूप से विचारणीय होता है । [गया प्रसाद प्रति भगत सिंह, माई० एल० मार० ३० इलाहाबाद, ५२५] फौजदारी के मामला म क्वल मारोप पत्र वा मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करना मभियोग का चलना नहीं कहा जाएगा। यदि मजिस्ट्रेट उस मारोप पत्र को प्रारम्भिर गवाही के प्राधार पर विना प्रतिपक्षी को तलबी विए सारिज करदे तो प्रतिवादी द्वारा मभियाग चलाया जाना नहीं समझा जा सकता। लेकिन यदि उसके कारण प्रतिपक्षी की तलबी हुए विना भी उस किसी प्रकार की क्षति पहुँची है तो मारोप पम प्रस्तुत करने वाला उसका क्षतिपूर्ति के लिए उत्तरदायी है। पटना उच यायालय ने इस सम्बघ में यह निणय दिया है कि जब कि प्रतिवानी के भारोप पत्र प्रस्तुत करने से वादी की तलबी तो नहीं हुई और मारोप पत्र खारिज कर दिया गया किन्तु उसके मकान को तलाशी हुई इमलिए यह बादी को क्षतिपूर्ति का उत्तरदायी है। [जय पाण्डे प्रति जलधारी रावत, ४ पी० एत० डब्लू. ६८] दण्ड प्रक्रिया सहिता (Criminal Procedure Code) को धारा ४७६ मतगत की गई कायवाही अभियोग समझो जाती है मौर अभियोक्ता उसके लिये उत्तरदायी है। (१) अभियोग में वादी की जीत होना (Fuvourable terminaprosecution) वाटी वा तपपूण अभियोग क पापार पर दातिपूर्ति के मुकदमे म यह सिद्ध वरना बहुत जरूरी है कि प्रतिवाली द्वारा चलाय गय अभियोग का निणय उसक (वादी के) पक्ष में हुमा। लकिन जब कि भभियोग का निणय वादी ये पक्ष में तो हुपा हो किन्तु निणय एकतरफा (Exparte) हो तो यह मावश्यक मही है कि वाटी ऐसे मभियोग के निणय क माधार पर भी द्वेपपूण मभियोग का मुक्दमा चला सके। द्वेषपूण अभियोग के माघार पर क्षतिपूर्ति के मुबदमे में दावे का कारण उस द्वेषपूण मुक्दमे के पलने की प्रारम्भिक तारीख स पैदा नही हाता बल्कि वाटी पक्ष में उसके निणय वो तारोस से पैर होता है। (३) अभियोग में निराधार व मिथ्या भारोप लगाना (Prose cution on the basis of false 2ccu 26! Or Without reason able or probable cause) -वाणे को यह सिद्ध करना भी मावश्यक है शिप्रतिया 17 उसरे विस्तजा अभियोग चलाया उमम जो प्रारोप याती पर लगाय गय थे ये सवा निराधार व मिथ्या या वादो का यह सिद्ध वरना भो मायया है गप्रतिवादी को उन मारोपों के निराधार व मिथ्या होन का पूर्वज्ञान था मोर उसने tion of स्वतत्रता व परिस्थिति पर प्रभाव डालने वाले क्षतिकृय ८७ पावजूद इसके वादो पर मभियोग चलापा । यदि प्रतिवादी मारोपो के सत्य व साधार होने की दलील देता है तो उसे सिद्ध करने का भार उसके ऊपर होता है, मायया वादो को यह सिद्ध करना पडता है कि प्रतिवादी द्वारा लगाये गये भाराप निराधार व प्रसत्य थे। (४) द्वेष (Malice) --जिस अभियोग को वादी दे पपूण बताता है उसे देषपूण सिद्ध करना वादी की जिम्मेदारी है। द्वेषपूण कृत्य का उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष को क्षति पहुँचाना रहता है । ऐसा होना भी सम्भव है कि कोई कानूनी कायवाही मारम्भ से ही द्वेषपूण न हो निन्तु वह कायवाही कुछ भागे चल कर रेपपूण हो सकती है। ऐसी परिस्थिति में यदि पभियोक्ता को यह ज्ञान हो जाये कि पह कायवाही द्वेषपूर्ण है किन्तु फिर भी वह उस बायवाही को अग्रसर करने में क्रियाशील रह तो कहा जायगा कि वह भभियोग प्रारम्भ में दे पपूण नहीं या पर मागे चल कर है पपूण हो गया। ऐसो वायवाही के लिए भो द्वेषपूण भभियाग का मुकदमा चलाया जा सकता है। (५) क्षति (Damage) --द्व पपूण भभियोग के मापार पर क्षतिपूर्ति का मुकदमा चलाने के लिए यह भी मावश्यक है कि वादी यह सिद्ध परे पि प्रतिवादी ने उस पर जो द्वेषपूण भाभियोग चलाया उसके परिणाम स्वरूप उसका क्षति पहुँची है। वह क्षति पारीर, सम्पत्ति या नीति मादि रिसीव मा प्रति विसा भी प्रकार की पहुंची हो। प्रश्न ६७ -द्वेपपूण अभियोग (Malicious prosecution) और मिथ्या कारावास (False Imprisonment ) में अन्दर स्पष्ट कीजिये। उत्तर -द्वेपपूर्ण अभियोग (Malicious prosecution) और मिया कारावास (False Imprisonment) म अन्तर - पपूण अभियोग मौर मिथ्या कारावास में मन्तर जानन के लिए निम्नलिखित वा उल्नसनीय हैं (१) पपूण पभियोग से तात्पय जान बूझ कर मिया माराप लगा कर रिसी व्यक्ति पर मुस्दमा घनाने का होता है, किन्तु मिथ्या कारावास किसी व्यक्ति को व्यक्तिगत स्वत मता पर मनुचित प्रतिवय लगान । बहत हैं। (२) देवपूण अभियोग में वारो को यह सिद्ध करना होता है कि वास्तव में ऐसी परिस्पिति जिमम उस पर अभियाग चलाया गया मौजूद नहीं पो, रिन्तु मिथ्या पारावास में यह सिल परने का मार (burden of proof) प्रतिवादी पर रहता है कि वह वास्तव में पिसी प्यक्ति को मारावासित परते समय अपन को ऐसा करने - ८८ क्षतिनिधि पर प्रश्नोत्तर के लिए कानूनी रप से समय समझना था, अर्थात् उसे अपने कृत्य का भौचित्य स्वय सिद्ध करना चाहिय। (३) द्वेष पूण मभियोग ग यादी को यह सिद्ध परना मावश्यक है कि प्रति वादी ने द्वेष को भावना से प्रेरित होर उस कार अभियोग चलाया, वितु द्वेष (Malice) मिथ्या कारावास की वायवाही का पावश्पर तत्व नहीं है । (४) क्षति (Damage) पपूण मभियोग को वायवाही का आधार है पर मिथ्या कारावास को वायवाही का नहीं है। प्रश६ ~'क' ने 'ख' के विरुद्ध द्वीपपूर्ण भावना मे प्रेरित होकर एक निराधार व मिरया आरोपपत्र भारतीय दण्ड सहिता (Indian Penal Code) को धारा ४०० के अन्तर्गत मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया। मजिस्ट्रेट ने 'क' का शपथपूर्यफ बयान लेकर दण्ड प्रक्रिया सहिता (Criminal Procedure Code) की धारा २०२ का सबूत की उपस्थिति में देने का आदेश दिया। इस श्रादेश के अन्तर्गत जारी किये गये नोटिस के आधार पर 'ख' उक्त सखुद को तारीम पर अपने वरील के साथ उपस्थित हुआ और से वकील के शुर कादि में व्यय करना पड़ा। मजिस्ट्रेट ने उक्त सचूत के आधार पर यह निणय दिया कि 'स' के विरुद्ध किसी अपराध का किया जाना सारित नहीं हावा चौर इसलिए दर मिया सहिता की धारा २०३ के अन्तर्गत का आरोप पत्र रद्द कर दिया गया। '' ने 'क' के विरुद्ध पपूण अभियोग फे आधार पर क्षतिपूर्ति का मुकदमा चलाया। 'क' नलील दी कि कानून के अन्तर्गत थभियोग का चलना नहीं माना जा सकता। क्या 'क' की दलील न्यायसगत है ? हत्तर समस्या पपूण मभियोग थे भाघार पर यतिपूर्ति का मुकदमा पलाने के लिए वादी को यह मिद परनामाव यक है कि प्रतिवादी 7 मक विरत देपण भभियोग चलाया। फौजदारी को कानूनी पायवाही विमी पर विशेष पर पर हो अभियोग मानी जाती है, यह माप पर नहीं है, बल्लि या उससे प्रति- पसी को किसी प्रकार भी, किसी भी प्रकार की, किसी भी घर पर क्षति पह पहरेपपूरण पभियोग से मतगत पाएगी [ मोहम्मद ममीन प्रति योगेद्र मार धनी ] प्रस्तुत मामले में 'द' को कारवाही से 'प' को दाति पहुँचौ । मनएप कानून को ष्टि में ''द्वारा ममियोग बसाया जाना माना जाएगा और उसकी नी है तो स्वतत्रता परिस्थिति पर प्रमाव डालन वान क्षनिवृत्य यह दलील कि कानून के मतगत मामले की परिस्थितिया म अभियाग का चलना नहीं मा जाना चाहिये, यायसगत नहीं है। प्रश्न ६६'क' के आरोप पर पर मजिस्ट्रेट ने 'स' के विरुद्ध समन और तलाशी का वारन्ट (Search warrant) जारी करने का आदेश दिया। लेकिन इससे पहले कि समन र तलाशी का वारन्ट जारी किया जा सके 'म' न्यायालय में प्रपस्थित हो गया और उसकी सुनवाई पर मजिस्ट्रेट ने अपना पूर्यादेश रद्द कर दिया। क्या 'स' 'क' के विरुद्ध द्वेषपूर्ण अभियोग के आधार पर क्षति- पूर्ति का मुकदमा चला सकता है ? मुत्तर समस्या -पानून मतगत प्रस्तुत मामले म मभियोग या पलना उसी समय से माना जायगा जिस समय मजिस्ट्रेट ने 'स' का समन व तलागी का यारट जारी करने का प्रादेश दिया। यह बात तथ्य हीन (Immaterial) है कि 'स' पहले ही यायालय में उपस्थित हो गया और उसका समन व तलागी वा वारट जारी न हो सका । यदि 'स' द्वेषपूण अभियोग के माधार पर क्षतिपूर्ति का मुकदमा चलान ये मावश्या तत्व-द्वेष, भारोगा का निराधार व मिथ्या होना, क्षति, इत्यादि सिद्ध करने में ममर्थ है तो वह '' विरुद्ध पपूरण अभियोग के मापार पर पतिपूर्ति का मुकदमा चलाइर क्षतिपूर्ति पाने का अधिकारा है। (1) द्वेषपूर्ण दीवानी कार्यवाही (Afalicious Civil Proceedings) प्रभ७०- क्या द्वेपपूर्ण दीपानी कायवाहियों (NMalicicus Civil proceedings) के लिए क्षतिपूर्ति की कार्यवाही हो सकती है ? विवेचना पौजिये। उत्तर -द्वेषपूर्ण दीवानी कायवाही (Malicious Civil Prectedings) - यदिकाई दीवानी का वाद (Sun) पपूण भावनास प्रेरित होर दिया गया है तो उसके लिए अलग मशतिपूर्ति का मुरदमा चलान की मावश्यकता नहीं है क्योंकि व्यवहार प्रक्रिया सहिता (Civil Precedure Code) या धारा ३५ (प्र)R मे ही यह ययस्था है पि यायालय एस यादा म जोन वाम का विश पूनि भी साय-मापात परसरता है। सक्नि यह स्मरण रहे कि मदि एमवार परिणाम म्प यत्ति यो पाति (Reputation) को पानि पहचा है अथवा उसरोटेपपूरण गिरफ्तारी या उसको सम्पत्ति यो दुर्गा (Attachment) प्रादि दुई है तो घर क्षतिपूर्ति के लिए प्रप्तग रोपायवा। परा वा भी पधिकारी है। [भूपद्रनाथ घटजी प्रति नियनी दासो, (१६) २ बलवत्ता ३५८। पपूर्ण सतिय विधि पर प्रश्नोत्तर अस्थायी न्यायादेश प्राप्त करने पर भी क्षतिपूर्ति के लिए मुस्दमा चलाया जा सकता है। (स) कानूनी प्रादेशकों का दुरुपयोग (Abuse of Legal Processes) प्रश्न ७१ -कानूनी आदेशकों के दुरुपयोग (Abuse of Legal Proresses) से क्या तात्पर्य है ? निर्णयों से अधिकृत व्याख्या कीजिए। उत्तर-कानूनी प्रादेशकों का दुरुपयोग (Abuse of Legal Processes) --कानूनी प्रादेशकों का दुरुपयोग तब कहा जाता है जब कोई व्यक्ति द्वेषपूण भावना से प्रेरित होकर निराधार कारणो से किसी यक्ति के विरुद्ध कानून को गति देता है । इस सम्बप में यह बात स्मरणीय है कि यदि कोई कानूनी कायवाही करने के लिए उचित मापारों का प्रभाव है तो यह समझा जाएगा कि ऐसो कार्यवाही करने वाले ने द्वेषपूण भावना से प्रेरित होकर वह कार्यवाही की है। [ग्राउन प्रति हाउक्स, (१८६१) के० एण्ड बो० ७१८] । कानूनी प्रादशकों के दुरुपयोग के माधार पर क्षतिपूर्ति के मुकदमे म बादी को यह सिद्ध करना मावश्यक है कि प्रतिवादी का कायवाही का निणम वादी के पक्ष में हुआ। निकोलस प्रति शिवरामा मम्पर, (१९२२) ४५ मद्रास ५२७) । भारत म हिनी के निष्पादन में की गई क्षतिपूण कुळं को जिम्मेवारी डिकोदार चे ऊपर होता है । व्यवहार प्रक्रिया सहिता (Civil Procedure Code) की धारा ६५. म यह प्राधिपान है कि जिस यक्ति को अनुचित गिरफ्तारी या उमको सम्पत्ति को पूर्व शिणय कुर्की (Attachment b fore judgment) से क्षति पह चो हो तो वह उक्त धारा के मतगत सक्षित कारवाहो (Summary proceeding: में प्रतिकर (Compensation) पा सकता है। यदि वह उक्त धारा क मन्तगत प्रतिकर न पा सरे तो वह क्षतिपूर्ति के लिए अलग से भी वार (Suit) प्रस्तुत कर सकता है । (गोदरपन मेघो प्रति मैनी चद्रदास (१८७४) २१ इन्चू० मार० ३७५] लेक्नि एसा वा उस स्थिति में प्रस्तुत नहीं पिया जा सकेगा जब कि वादी की सम्पत्ति का कुर्को उस जमानत न दाखिल करने के वारण की गई हो । [रामास्वामी मम्पर प्रति गाविद पिल्ल (६१५) ३० एम० एल० ० १८०]] क्षतिपूण कुर्की के लिए क्षतिपूर्ति की धन राशि कुन दो गई सम्पत्ति की दुरी क समय वो वोमत व घरापर होती है। यदि प्रतिवादी बाय द्वेषपूरण मोर निराधार है तो क्षतिपूर्ति दण्ड Penalty) मोर प्रतिकर (Compensation) दोनाम्पा में की जानी चाहिए। प्रभ७२-पपूण गिरफ्तारा (Malicious arrest) की भारतीय कानून के सदर्भ में व्याख्या कीजिए।
६१ स्वतत्रता व परिस्थिति पर प्रभाव डालने वाले पतिकृत्य उत्तर -द्वेषपूर्ण गिरफ्तारी (Malicious arrest)-द्वेषपूण गिरफ्तारी से तात्रय निराधार दीवानी पाशकों (Civil processes without reasonable cause) द्वारा कानून को गति में ला कर किसी व्यक्ति को गिरफ्तार कराना है। भारतीय कानून के अन्तगत क्सिी व्यक्ति को गिरफ्तार उस समय समझा जाता है जब कि उसे गिरफ्तार करन वाल ने वास्तविक रूप से छुआ या रोका हो । प्रतिवादी के द्वारा कराई गई पपूण गिरफ्तारी क्षतिपूर्ति के मुकदमे का कारण होती है। [ग्राहम प्रति हेनरी गुडरे (१९३३) ६० क्लक्त्ता, ६५५] द्वेषपूण गिरफ्तारी के माघार पर क्षतिपूर्ति के लिये कारवाई तव नही होगी जबकि प्रतिवादी ने सभी तथ्य गिरफ्तारी का मादश दने वाले अधिकारी के समक्ष उसके स्वविवेकपूण अधिकारो का प्रयोग करने के लिए प्रस्तुत कर दिए हों। इस प्रकार के क्षतिपूर्ति के मामलो मे वादी को यह सिद्ध करना मावश्यक है कि- (म) टेपपूण गिरफ्तारी को कायवाही का प्रतिम निणय उसके पक्ष में हुमा, (१) गिरफ्तारी प्रतिवादी ने निराधार कारणो से कराई, मौर (स) पहुँचाई गई क्षति उस क्षति के अतिरिक्त है जिसके लिए प्रतिकर वाद को दिनो मे दिया जा चुका है या दिया जा सकता था। (द) प्रास्थिति पर प्रभाव डालने वाले क्षतिकृत्य (Toris affecting Status) प्रश्न ७३ --प्रास्थिति (status) पर प्रभाव डालने वाले चतिकृत्यों की विवेचना कीजिए। उत्तर -प्रास्थिति (Status) पर प्रभाव डालने वाले क्षति कृत्य- कानून एसे कृत्यों को जिनसे किसी व्यक्ति को प्रास्थिति (Status) पर प्रतिकूल प्रभाव पढे क्षतिपूण मानता है। इस प्रकार क्षतिपूण 'यों को मुख्य रूप से निम्नलिखित वर्गों में रख सकते हैं (१) जाति से पहिष्कार (Exclusion from caste) -प्रत्येक व्यक्तिमो अधिकार है कि जिस जाति में उसका जन्म हुमा है उसका सदस्य बना रहे । यदि कोई व्यक्ति उसका इस प्रधिकार में वचित करता है तो उसका कृय क्षति- पूण मारा जायगा पौर यह क्षति पूर्ति देन का उत्तरदायी होगा। झारवाला के मतागार जाति स यहिलार व्यक्ति को प्राम्पिति (Status) पर प्रभाव डालन वाला धतिपूण तय है और इसीलिए पभियाग्य (Actionable) है। (२) सन या अन्य संस्था को सदस्यता मे यहिष्कार (Exclusion from membership of club or association) -सासर सब या मन्य - ६२ क्षतिकृत्य विधि पर प्रश्नोत्तर सस्थाए सदस्य बना के लिए कुछ शर्ते निधारित कर देती हैं और प्रत्यर एमो सापजनिक सस्या मी पुउन कुछ अपनी सपत्ति होती है । यह सम्पत्ति साधारणतया सदस्यो की सामूहिम सम्पत्ति मानी जाती है । मत प्रत्येक व्यक्ति जो सस्था का सदस्यता को निर्धारित गते पूरी करता है उसको मधिकार रहता है कि वह उत्त मस्था का सदस्य बना रह । यदि उसको बिना किमी यायाचिन कारण के सस्या की सदस्यता से निकाल दिया जाए तो उमे अधिकार होगा कि वह उस व्यक्ति के पर जिसने कि उसे सस्था की सदस्यता से वचित पराया है क्षतिपूर्ति का मुक्दमा चलाए । झाववाला के मतानुसार यह अधिकार इस कारण होता है कि सस्था को सदस्यता से यषित किए जाने कारण वह यक्ति क्लब या सस्था की सम्पत्ति पर उसका जो भधिकार है उससे भी स्वत ६पित हो जाता है । यदि सस्था के पास कोई सम्पत्ति न हो तो इस प्रकार का मधिकार भी उत्पन्न नहीं होगा। (३) पूजा पाठ आदि के अधिकार से वचित फरना (Exclusion from worship) प्रत्येक धर्मावलम्बियो क लिए सावजनिक पूजा-पाठ मादि के वास्ते मदिर, मस्जिद, गुरद्वारे या गिरजा घर मादि स्थान निर्धारित रहत हैं जिनम प्रत्येक व्यक्ति को अधिकार है कि यदि वह सम्बधित धर्म का मनुयायी है तो मायनिक पूजा पाठ या ईश्वरोपासना पादि कर सके । कानून पत्तिया के इस अधिाार को मायता देता है और यदि व्यक्ति के इस अधिकार को भग किया जाता है तो उस लिए क्षनिवर्ता क्षतिप्रास व्यक्ति को क्षतिकृत्य कानून वे मन्तगत क्षतिपूर्ति दने के लिए उत्तरदायी है। -
७
सम्पत्ति के प्रति क्षतिकृत्य
( TORTS TO PROPERTY )
(अ) अचल सम्पत्ति के प्रति क्षतिकृत्य
(Torts to Immovable Property)
प्रश्न ७४ -अचल सम्पत्ति के प्रति क्षतिकृत्यों का वर्गीकरण
कीजिये।
सत्तर -अचल सम्पत्ति के प्रति क्षति त्यों का वर्गीकरण
सम्पत्ति के प्रति किए गए क्षतिकृत्या का निम्नलिखित वर्गों में रखा जा सकता
-अचल
(१) अनधिकार प्रवेश (Trespass),
(२) वरपल या निष्कासन (Dispossession),
(३) भावी उत्तराधिकारी के अधिकारो को क्षति (Injury to rever
sionary rights),
(४) प्रारतिक भधियारो तथा सुवाधिकारों को क्षति (Injury to
Natural rights and Easements),
(५) नष्टीकरण (Vaste), एप
(६) वाया (Nursance),
प्रश्न ७५ --अनधिकार प्रवेश (Trespass) की परिभापा देते
हुए इस वित्य पर सक्षिप्त टिप्पणी लिखिए ।
उत्तर-अनधिकार प्रवेश (Trespass) -किसी यक्ति की भूमि पर
माधिकार प्रया परो पो या उसकी भूमि के माधिपत्य (Possession) म
विसी प्रकार का हस्तक्षेप करने को मनधिकार प्रवेश रहते हैं। रत्नलाल घोरजलाल
मिनधिकार प्रयाको परिभाषा देते हुए महा है कि-अनधिकार प्रवेश किया
म्यक्ति की भूमि पर मनपिार प्रवेश करन या उसके भाधिपत्य म पिसी प्रकार
हस्तक्षेप करापो कहत है।" डाक्टर माडरहित (Dr Underhill) के मतानुमार
मनधिार प्रवेश में यह मावस्पर नहीं है कि प्रवेशमा पक्ति का प्रयोग करे
क्षतिकृय विधि पर प्रश्नोत्तर ६४ पौर न हो क्षतिपूर्ण इरादा (Wrongful intention) या वासविक क्षति (Actual damage) का होना भनिवाय है । मक्षेप में कहा जा सकता है कि प्रय यति सम्पत्ति के प्रति दिया गया छोट से छोटा अनुचित क्रय अनधिकार प्रवेश के प्रतगत प्रा जाता है यदि उसने सम्पत्ति के स्वागो समाधिपत्य मे हस्तक्षेप होता हो। [एटिक प्रति वैरिंगटा, १७६५, १८ एस० टी० १०२६] अनधिकार प्रवेश क सदभ म यह बात स्मरणीय है कि जो "यक्ति भूमि के पटल (Surface of the land) वा स्वामी है वह भूपटल के नीचे की भूमि (Lnderlying strata) का भी स्वामी है । यदि कोई व्यक्ति भू-पटल के कितने भी नीचे के भाग म मनधिमार हस्तक्षेप करता है तो यह अनधिकार प्रवेश या यता माना जाएगा । यह भो स्मरणीय है कि यदि किसी पक्ति पो किसी माय व्यक्ति की भूमि पर किसी निश्चित समय तक ठहरो की अनुमति प्राप्त हुई है और वह व्यक्ति, जितने समय को अनुमति मिली है, उसके बाद भी भूमि पर ठहरा रहता है तो ऐमा यक्ति उस समय अनधिकृत प्रवेशा ही माना जायगा। मनधिकार प्रवेश के विषय में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अनधिकार प्रवेश जब तक कायम रहेगा क्षतिप्राप्त यक्ति तब तक प्रत्येक दिन के लिये क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का अधिकारी होगा, योगि अनधिकार प्रवेश एक बार किए जाने पर जब तक जारी रहे तय तक प्रत्येक दिन वह एक नया मनधिकार प्रवेश माना जाता है । उदाहरणाथ, यदि कोई व्यक्ति मापकी भूमि पर कूडा फेंग दे तो जब तब यह चूडा यहाँ पर रहेगा तब तक जिस व्यक्ति की भूमि पर बूटा पेंका गया है, प्रत्यक दिन की क्षतिपूर्ति पान या अधिकारी होगा और बूडे का व. पर रहना प्रत्यक दिन एक नया प्राधिकार प्रवेश माना जाएगा। प्रश्न ७६ ~यदि कोई यति रिसी व्यक्ति की भूमि के वायुमडल में अधिकार प्रापर तो क्या उसके इस कृत्य को अनधिकार प्रवेश नामर क्षनिय के अन्तर्गत रसा जा सकता है ? उत्तर --गायुमण्डत गें अनधिकार प्रवेश (Aerial trespass) - डा० अरहित (Dr Underhill) पाया है रियपि प्रत्येर व्यक्ति को अपनी भूमि के पर समस्त वायुमण्डल पर पूर्णाधिकार है, मितु यदि योई व्यक्ति दूगरे व्यक्ति की भूमि के ऊपर के वायुमंडल में मनधिकार प्रवेश करता है तो वह कृत्य मनधिकार प्रवेश को कोटि में रमा जाए या नहीं, यह निश्चित नहीं दिया जा सका है। इस प्रकरण में जहाँ तप किसी व्यक्ति को भूमि में अगर के वायुमण्डल में वायुपान (Aircraft) के उायो पात है इस विषय में वायु नौतरण सम्पत्ति के प्रति क्षतिप ६५ अधिनियम, १(Air Navigation Act, 1920) ने स्थिति बिल्कुल स्पष्ट कर दी है। इस मधिनियम के अनुसार यदि कोई वायुयान किसी व्यक्ति की भूमि क ऊपर वायुमण्डल म हार उडता है तो उम भूमि का स्वामी वायुयान के स्वामी के विरुद्ध अनधिकार प्रवेश व प्राधार पर मुकदमा नहीं चला सकता, वितु बात यह है वि वायुया7 भूमि स पर्याप्त उचाई पर रहे । यदि वायुयान के उडान लेत समय या उतरत समय भू स्वामा को किसी प्रकार की क्षति पहुँचेगो तो भू- स्वामी क्षनिपूति प्राप्त परन का प्रधिकारी हो जाएगा। भारत में भी इगले ह व वायु नौतरण अधिनियम (Air Navigation Act' के समान ही भारतीय वायुयान अधिनियम (Indian Aircraft Act) लागू है जिसक प्राविधान सामा यत इगल इ के अधिनियम के प्राविधानो व समान हैं । इस भारतीय अधिनियम के मतगत एक प्राविधान यह भी है कि यदि कोई व्यक्ति जान बूझ कर किसी व्यक्ति को या उसको सम्पत्ति को क्षति पहुँचान के इराद से उसको भूमि क ऊपर वायुयान स उढना है तो वह एक अपराधी कृत्य (Criminal offence) करता है तथा ६ महीन के कारावास या एक हजार रुपया मय दण्ड या दोनों के लिय जिम्मेदार है। प्रश्न ७७ (अ) अनधिकार प्रदेश के माधार पर छातिपूर्वि के मुकदमे में वादी फो किन बातों रा चिद्ध करना आवश्यक है ? (घ) मयुक्त स्वामी (Joint owners) क्या एक दूसरे के विरद्व अनधिकार प्रदेश का मुरमा चला सकते हैं ? उत्तर - (अ) अनधिकार प्रवेश का मयूत अनधिकार प्रोग मापार पर उपस्थित किए गए वाद म वानीको निम्नलिमित यात मिद्ध करना पाहिय (१) यह कि जिस समय प्रनपिवार प्रवेश किया गया उसका भूमि पर वास्तयिष प्राधिपरय था, तथा (२) यह कि उगवे भाषिपत्य मे प्रत्यम एव अनधिकार प्रवा दिया गया। यारी को यह सिद्ध करने की मावश्यकता नहीं है विग प्रकार के हस्तक्षेप ये परिणाम सरूप उसको वास्तदिव हानि पहुँची, क्योंकि अनधिकार प्रया स्वत भभियोग्य (Actionable per st) शतिकृत्य है। (घ) मयुर सामी का दायित्व - सयुक्त म्वामी (Joint owners) भी एप दूसरे पर मनपिकार प्रवेश पर पुदमा पता हरते हैं यदि उनमें से किसी ने सयुत स्वामित्व (Joint ownership)ो पता 7 उल्लपन रिया है। - क्षीय विधि पर प्रश्नात्तर - - मान -नधिकार प्रश के ीि को क्या उपाय ('emedies ) उपलन्ध हो साते हैं? उत्तर --उपाय (Remedics -प्रनधिकार प्रथा के सिद्ध वागे या निम्मलिपित 17 आय (Remedies) उपल पहा सात हैं (१) वह प्रनियादा रिद्ध वाद प्रतुन पर मरता है, या (२) यह परापूवर प्रपा भाधिपत्य (Possession) का रक्षा पर साता है पार अनधिकृत प्रवगवर्ता का अपनी भूमि स बलपूर्वक हटा सकता है, या (३) वह प्रतिवादा ६ विरुद्ध यायादा (Injunction) भारी बरार सम्भावित प्रनधिकार प्रवेश का हावा सरता है तथा पहल लिए गए प्रवेशवः कृत्य को समासि रकवा सरता है। प्रत ६ - अनधिकार प्रवेश के मुकदमे में प्रतिवादी को अपने घाव (Detence) को क्या दलील उपलब्ध हो सकती है। उत्तर -चाय (Defence) की दलील अनधिकार प्रवेश के प्रापार पर चलाए गए मुक्त मे म तिवारी अपने चार म निम्नलिखित दलीलें दे मरता है (१) पिरभोगाधिकार (Prescription) ~ प्रतिवादी अपन पवार म यह दलील दे सकता है कि जिस भूमि पर प्रवेश फरल में मारोप मे उस पर मन धिवार प्रदेश का मुक'मा चलाया गया है उस भूमि पर उसको चिरभोग के पारण प्रवेश करने का अधिकार था। (२) अनुमति एव अनुजा (Leave and Licence) --बारी की मनुमति पयवा मनुमा २ पन्तगत प्रतिवाीन उसकी भूमि पर प्रवेश किया, प्रनि वाली ५ बचाव को एक अच्छो दलील है। यह मनुमति अपवा मनु प्रत्यक्ष या लिखित प म को (Express) हो एकती है भयवा उपलक्षित (Implied) भी हा रास्ता है। (३) कानूनगव अधिकार (Authority under law)-इसमें पानूनी मागर (Lagal processes) तगा दिया गया प्रवेश या साव al भावयता पाया (Acts of Public necessxy ) म दिया गया प्रा माता जापानामा में अनधिकार प्रदेश नहीं माना जाना frr वह पापा वध हाना पानिए । मो प्रसार प्रति लिए यह एपच्छी ययार को लोल है कि उनने वाले को भूमि पर मावजनिक पापाता के वाया प्रवापिया। रणाप, यदि पिसी व्यक्ति र मकान में भाग लग गई हो और सम्पत्ति के प्रति क्षतिकृय ६७ पाप भाग बुझाने के लिए उसकी भूमि पर उसकी अनुमति के बिना प्रविष्ट हो जाएं तो ऐमा प्रवेश अनधिकार प्रवेश नहीं कहा जाएगा। (४) भूमि पर पुन प्रयेश (Re entry on land) --जो व्यक्ति अपनी भूमि से बिना किसी प्रोचित्य के वेतखल या निष्कासित कर दिया गया हो मोर वह अपनी भूमि पर पुन प्रवेश कर ले तो उसका वह पुन प्रवा मनधिकार प्रवेश नहीं कहा जाएगा। (५) घल सम्पत्ति की पुनर्माप्त ( Retaking of goods)-यदि कोई व्यक्ति किसी की चल सम्पति अपनी भूमि पर ले गया है तो जिस व्यक्ति को वह सम्पत्ति है उस मधिकार है कि उस सम्पत्ति पो वापस लने के लिए सम्पत्ति से जाने वाले व्यक्ति को भूमि पर प्रवेश करे । ऐसा प्रवा मनधिकार प्रवेश नहीं कहा जाएगा। (E) याघा को समाप्त करने के लिए प्रवेश (Abatement of Nuisance)-रिसी को भूमि पर बाधा ( Nursance) को हटान या बम परन के लिए जाने वाले व्यक्ति का प्रवेश प्रधिकार प्रवा नहीं कहा जाएगा। (७) सुसाधिकार (Exement)-जिस व्यक्ति की भूमि पर मन्य व्यक्ति पो मुखाधिकार (Easement) प्राप्त है उस व्यक्ति को भूमि पर वह मय व्यक्ति प्रवेग मर सकता है, किन्तु यह अधिकार कवल मावश्यक्ता पहन पर, मर्यात् जिस मावश्यक्ता के लिए वह मुम्पाधिकार प्राप्त है, प्रयुक्त किया जा सकता है। प्रश्न ८०-मनधिकार प्रवेश (भारम्भ से) (Trespass ab initio) की व्याख्या कीजिए। सत्तर-अनधिकार प्रवेश (भारम्भ से)-जव बाई -यक्ति विसो भय व्यक्ति की भूमि पर मषित रूप से प्रवरा करता है कि तु भूमि पर प्रवेश पले के पाद वहाँ पर कोई एसा नाय करता है जिसको करने या उस मधिकार नहीं दिया गया था तो उस व्यक्ति का प्रवेश प्रारम्भ से हो मनधिकार प्रवेश (Trespass abinitio) माना जाता है । लेकिन यदि प्रवेशपर्वा न भूमि क स्वामी या पन्जेदार पी मनुमति से भूमि पर प्रवेश दिया था न नि पानून द्वारा पनुमति पार, से प्रवेशावर्ता या प्रवेश प्रारम्म से ही मनधिकार प्रवेश नहीं रहा जाएगा। मनधिकार प्रयेश ( मारम्भ से) में लिए निम्नलिखित पतों का पूरा होना जरूरी है (१) यह प्रियेपानगत मधिरार मे रिया गा, मति पो मनुमति से - मही, सपा क्षठिकृत्य विधि पर प्रश्नोत्तर (२) प्रवेश करने के बाद का कृत्य गैरकानूनी ढग से किया गया। दूसरी शत के विषय में यह जान लेना जरूरी है कि किसी गैरकानूनी कृत्य ना किया जाता (Malfeasance) एक बात है मोर विसी सत्य का गैरकानूनी ढग स किया जाना (Nisfeasance) एक दूसरा वात है तथा विसो कृत्य के करने अथवा न करने क कानूनी पत्त य को प्रवलना करना ( Non feasance) एक प्रय बात है । मनधिकार प्रवेश (मारम्भ से) के लिए यह सिद्ध किया जाना मावश्यक है कि प्रवेगकर्ता ने प्रवेश करने के बाद का काय वानूनी ढग मे नही किया । इस सम्मघ म ६ बढइयो का मुकदमा विशेष रूप से उल्लसनीय है | इस मुकदमे को घटनाए इस प्रकार हैं कि एक बार ६ वढ़ई एक सराय म भाए । वहाँ पर कुछ पाराव उनको दी गई । उस राव ने पीने के याद उन्हान पुर मोर शराब के लिए कहा। इस शराब को पीने के बाद उन्होंने उसका मूल्य दन स इकार कर दिया। इस पर सराय वाले ने उनके विरुद्ध उह अधिकार प्रदेशावर्ता घोपित करान के लिए याद प्रस्तुत किया । इस वाद म यह निणय दिया गया कि शराब का मूल्य न देना केवल किसी वृत्य के करने मयवा न करने के कानूनी क्त्तव्य की अवहेलना मात्र ( Non Feasance) है पोर वह विसो वृत्य का गैरकानूनी ढग से किया जाना (Misfca sance) नही माना जा सकता | भतएव बढइयों को मनधिकृत प्रवेशापा घोपित नहीं किया गया। [सिक्स कारपेटस, (१९१०) एस. एल० सी० १४५ ] प्रश्न ८१-घेदसल अथवा निष्कासन (Dispossession) की परिभाषा देते हुए उसके आधार पर की गई कायवाही मे प्रतिवादी के बचाव की सम्भव दलीलों का वर्सन कीजिए। उत्तर-दसल अथवा निष्कासन (Dispossession) -जब कोई व्यक्ति किसी मय व्यक्ति की भूमि पर उसे वेदखल करके विशा विसो भघिरार के अपना माधिपत्य मा लेता है तो उसके इस क्षतिपूण त्य को बेदखल मपा निष्कासन ( Dispossession) की सपा दो नाती है । जिस व्यक्ति की भूमि पर इस प्रकार मनधिकार प्राधिपत्य जमाया गया हो उसे मधिकार होता है कि यह माधिपरय पले वाले व्यक्ति पर इस कृत्य के प्रति याद प्रस्तुत करे मोर उसे अंदराव शरा दे। यपाय की दलीलें - उपयुक्त प्रकार के मुवदमे में प्रतिवादी को मोर से समाव की सम्म दलोलें निम्नलिखित हो सस्ती हैं (१) यह रि प्रतिवादी पो भूमि पर वाली स पन्ग स्वरय (Better title) प्राप्त है, या सम्पत्ति के प्रति क्षतिकृत्य - (२) यह वि चिरमोगाधिकार ( Prescription ) के कारण प्रतिवादी का अधिकार वादी को भूमि पर हो गया है और बादी का साम्पत्तिा अधिकार समाप्त हो गया है। प्रश्न ८२ -सुग्माधिकारों (Easements) के अन्दर्गव थाने वाले अधिकारों पर मक्षिप्त टिप्परमी लिसिए । उत्तर -सुसाधिकारों के अन्तर्गत अधिकार - मुग्वाधिकारों (Easements) क मतगत पाने वाले वस तो प्रना अधिकार होते हैं किन्तु इनमें से मुख्य अधिकारों को विवचना नोच को जा रही है (१) जल प्राप्त करने का अधिकार ( Right to water)--प्रत्येक व्यक्ति को जो किसी नदी अथवा जलाशम वे जल स लाम उठाना रहा है उसको अधिकार है कि वह उसी प्रकार लाभ उठाता रहें । जल प्राप्त करन के इस अधिकार के साथ तीन प्रकार से हस्तमेप किया जा सकता है (म) पानी की धारा को रोककर, या (ब) पानी को गदा करके, या (स) पानी के स्रोत को रोस्कर। इस प्रकार ने मधिकारा को क्षति पहुँचाने वाले के विरुद्ध परिस्थिति के मनुमार कानूनी उपाय प्राप्त किये जा सक्त हैं। (२) प्रकाश प्राप्त करने का अधिकार (Right to light) प्रयाग प्राप्त करने का अधिकार क्सिी इमारत के सदभ में ही प्राप्त किया जा सकता है। खुले हुए मैदान या उद्यान के प्रति चिरभागाधिकार ( Prescription ) द्वारा प्रा प्राप्त करने का कोई मधिकार प्राप्त नहीं हो सकता । स्मरण रहे विजय सुपाधिकार ( Basement ) द्वारा प्रमाश प्राप्त करने का अधिकार मजित पर लिया जाए तो उसमें किमी प्रकार का हस्तक्षेप करना एक मभियोग्य दातिपूण मृत्य माना जाता है। (१) वायु प्राप्त करने का अधिकार (Right to ar) -वायु प्राप्त परले कामधिकार भो सामायत घिरभाग द्वारा भजित किया जाता है । इस अधिकार में हस्तप पिए जान पर वादी तभी वाद प्रस्तुत कर रास्ता है जब वह यह सिद्ध करने पा दावा कर सर कि वायु के प्रतिवारी द्वारा रारे जान से उसके स्वास्थ्य पो हानि पहुँपने को सम्भावना है। भारतीय ६४ सहिता ( Indian Penal Code) को धारा २७८ मतगत वायु को दूषित करना एक दयनीय पपराप भी है।
क्षतिकृत्य विधि पर प्रश्नोतर (४) पथ का अधिकार (Right to way)-दूसरे व्यक्ति की भूमि पर होकर रास्ता बनने का अधिकार प्राकृतिक अधिकार नहीं है । यह अधिकार स्वीकृति (Grant), प्राचीन रिवाज (Immemorial custom), पावश्यक्ता (Neces sity) प्रयवा चिरभोगाधिकार ( Prescription) द्वारा प्राप्त किया जाता है। यह बात भी स्मरणीय है कि यह भधिकार या तो सावजनिक अधिकार हो सकता है मथवा वैयक्ति। (५) गोपनीयता का अधिकार ( Right to privacy) -प्रत्यक व्यक्ति को प्रपन घरेलू काम घधा से सम्बन्धित बातों को गोपनीय रखने का अधिकार है। भारत में इस प्रकार का मधिसार स्थानीय रीति रिवाजो के माधार पर रक्षित दिया जाता है। लेकिन इस विषय में निश्चित ६प से कुछ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि भारत के उच्च यायालय इस विषय में एकमत नहीं हैं । भारतीय सविधान भी स्त्रियो का पर्दे मे रखने के पक्ष म नहीं जान पडता । पर्दे की प्रथा का वहिबार करते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सम्मानीय जज श्री धवन ने एक मुक्दमे का निणय दते हुए कहा है कि पर्दे की प्रया दिनों दिन समाप्त होती जा रही है मौर यहाँ तक कि बहुत से प्रगतिशील मुसलमानी देशो म भी इसका वहिष्कार किया जा रहा है । इस माघार पर कहा जा सकता है कि नागरिका को अपने मकानों को बनावट म केवल इस कारण परिवतन करने को बाध्य नही किया जा सकता कि उनके द्वारा किसी वे घर को स्त्रियो की वेपदगी होती है। बम्बई उच्च यायालय के मनुसार गुजरात में प्रचलित प्रथा के अन्तगत विसी व्यक्ति के घर की गोपनीयता के अधिकार को भग करना एक अभियोय कृत्य है। पत किसी भी व्यक्ति को यह अधिकार नहीं है कि वह अपन मकान में इस प्रकार ये दरवाजे या खिडक्या लगाए जिसके द्वारा उसके पहासियो ये मरान वे भीतर का भाग दिखाई दे और इस प्रकार उसने गोपनीयता ने अधिकार को प्रबहेलना हो। बलत्ता तया मद्रास के उच्च न्यायालया ने यह सिद्धात स्वीकार नहीं किया। पटना उय यायालय अनुसार भी गोपनीयता का मधिकार अचल सम्पत्ति का जन्मजात मधिकार नहीं है। प्रभ८३ -किसी अचल सम्पत्ति का नप्टीपर (Waste) किस प्रकार का सतिकृत्य है? उचर-नष्टीकरण (Waste) -विमी पचन सम्पत्ति का नष्टीकरण भी उस सम्पत्ति के प्रति रिए गए अतिवृरयों मतगत पाता है। यदि कोई व्यक्ति भय व्यक्ति की सम्पत्ति को कानूनी रूप स प्रयोग करने के बजाय उसको बर्वाद करे सम्पत्ति के प्रति क्षतिकृत्य १०१ मथवा उसमें तोड फोड करे तो ऐम कृत्य को नष्टीकरण (Waste) के मन्तगत रखा जाएगा। यह नष्टीकरण दा प्रकार का हो सकता है-एक तो सिो क्त्त य को म करन के कारण और दूसर क्षतिपूण वृत्य को करके उदित पिया हमा नष्टोकरण । (१) चल सम्पत्ति के प्रति क्षतिकृत्य (Torts to Movable Property) प्रत ८४ -पल सम्पत्ति के प्रति किये जाने वाले क्षतिकृत्यों का सक्षिप्त विवरण दीजिये। उत्तर चल सम्पत्ति के प्रति क्षतिकृत्य -चल सम्पत्ति १ प्रनि मुस्प रूप से निम्नलिखित क्षति य पिए जा सरत हैं . (१) चल सम्पत्ति को मनधिकृत इस्वगत करना (Trespass to goods) -सिो व्यक्ति को चल सम्पत्ति को भनधिकृत रूप स हस्तगत करने, उस पर प्रापि पत्य जमाने या उसक प्रति विसो प्रकार का हस्तक्षेप करन यो पल सम्पत्ति में प्रति मनधिहर हस्तरेप करना (Tresspass to goods) कहते हैं । इस प्रकार से क्षतिपूण कृत्य के प्रति चलाए गए मुक्दम म वादो को निम्नलिखित बात मिद करना चाहिए (म) यह विपिन पल सम्पत्ति उस प्राधिपत्य म पा, मोर (4) यह कि उमर प्राधिपत्य म प्रतिवारी द्वारा मनधिकार हस्तक्षेप किया गया। (२) अनधिकृत हस्तगत करना (भारम्भ से ) [Trespass ab- Initio] -जब पाई व्यक्ति नानूनी ढग से बाई चल सम्पत्ति प्राप्त करता है किन्तु प्रास वरन के बाद उसको वर्वाद वरन सरता है या जिस काम के लिए उसका लिया पासक पतिरिक्त क्सिो भय प्रयोग मे साता है पोर वह प्रयोग कानूनी पतों के विष्ट होता है तो यहा जाता है कि उस पल सम्पत्ति का हस्तगत परता मारम्भ ही पनधिकृत (Trespass ab initio) था। (३) अवरोध (Detention) ~भवरोप (Detention) स तात्पय पिसी दूसरे मी घल सम्पत्ति (Chattel) को बिना क्सिी पानूनी मौचित्य (Legal gustification) कपन पास रोर लेना है। इस वृत्य क मापार पर चलन वाले मुराँ म वादा मिद करना चाहिय नियह माधिपाप का भधिकारी है मौर प्रतिवारी ने वादी द्वारा मांगे जान पर सम्पत्तिको वापस दन इकार कर दिया है। (४) परिवर्तन (Conversion) ~74 योई पनि रिसो भय व्यक्ति पो पर सात्तिपा पनपिन से तार उसको प्रयोग म साता है अपना उमे या रसा है या उमरे माधिपत्य से विसो भय प्रकार वा हस्तरेर करता है -चल क्षतित्य दिघि पर प्रश्नोत्तर तो उसे परिवतन करना (Conversion) कहते हैं। परिवतन में पूर्व सम्पति । हस्तगत विया जाना मनिवाय है । यदि कोई व्यक्ति किसी भय व्यक्ति को सम्मति लेकर उसका अनधिकृत विनय करले तो उसका कृत्य परिवतन के मन्तगत ही माएगा। इस प्रकार के क्षतिपूण कृत्यों के विद्ध वादी को तीन प्रकार के उपाय उपलध हैं (म) वह उस चल सम्पत्ति को पुनििप्त ( Recaption) कर सकता है, या (ब) वर यायालय से उस सम्पत्ति की वापसी के लिए यायादश जारी करा सक्ता है, मा (स) वह क्षतिपूर्ति के लिए वाद प्रस्तुत कर सकता है । प्रभ ८५ ~चल सम्पत्ति की पुनर्माप्ति के लिए होने वाली विभिन्न कार्यवाहियों का विवरण दीजिए। उत्तर -चल सम्पत्ति की पुनाप्ति के लिए कार्यवाही सम्पत्ति को पुनति के लिए निम्नलिखित कायवाहियों को जा सकती है (१) रेप्लेविन (Replerin) -यह एक पुरानी कारवाही का रूप है जिसके मनुमार यादी प्रतिवादी से मपनी चल सम्पत्ति पुन प्राप्त भरता था। पायवाही का यह रूप भव बहुत कम प्रयुक्त होता है। (२) द्रोवर (Trover) ~~इस कायवाही के मनुमार वादी प्रतिवादी से क्षतिपूर्ति के रूप में, मौलिक चल सम्पत्ति के स्थान पर, धनराशि लेता था, यदि प्रतिवादी पल सम्पत्ति वापस करने को मना कर देता था। इस बायवाही के द्वारा वादी चल सम्पत्ति का मूल्य भर ही वसूल पर सरता था न कि वास्तविक सम्पत्ति । (३) डेटिन्यू ( Detinue) -स कायवाही के अनुसार वादो प्रतिवादी से पपनी वास्तविक सम्पत्ति को पुन प्राप्त करने मा प्रयत्न करता पा मोर साथ ही सम्पत्ति के प्रतिवादी के पास अनुचित रूप से रहने के लिए क्षतिपूर्ति भी बसून परता था। प्रभ६ ~चल सम्पत्ति को अनधिकृत रूप से हस्तगत कर लेने मुफदमे में प्रतिवादी को अपने बचाव में क्या सम्भव दलीलें उपलब्ध १विवरख दीजिए। उत्तर-बचाव की दलीलें -चल सम्पत्ति के मनधिकृत पसरतात पर लेने के मुरदमे में प्रतियाती पो बचाव में निम्नलिखित स्लो दे सकता है (१) सरक्षा अथवा सम्पत्ति की सुरक्षा (Self defence or defence of Property) ~नि व्यक्ति के पास पल सम्पत्तिमा माधिपत्य - सम्पत्ति के प्रति क्षतिकृय है उसुस यदि कोई सय व्यक्ति मनुचित ढग स सम्पत्ति छीनना चाहता है तो सम्पत्ति पर ग्राधिप य रसन वाल को अधिकार है कि वह ऐम व्यक्ति के प्रति बल का प्रयोग कर और अपने प्राधिपत्य की रक्षा करें। (२) प्रमाधिकारों तथा परिमित अधिकारों का उपभोग - इसका तापय यह है कि जिस अक्ति का किराया दूसरे व्यक्ति के जिम्मे बाकी है उसे अधिकार है कि अपन निराय को वमूल करन क लिए वह उसको सम्मत्ति ल ले । (३) कानूनी अधिकार कानून द्वारा अधिकृत हान पर एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को चल सम्पत्ति पर अधिकार जमा सक्ता है । (४) वादी के स्वय क्षतिपूर्ण एर असावधानीपूर्ण कृत्य - यदि कोई व्यक्ति क्सिो मय व्यक्ति की राह रोके, उदाहरणार्थ, उस माग पाहा या गाडी मादि खडी क माग ब द करने का प्रयत्न परे तो उस मधिकार होगा कि वह यल या प्रयोग करके अपना रास्ता साफ कर ले। (५) पुनप्राप्ति (Recaption) -~-जा व्यक्ति मनुचित ढङ्ग से अपनी चल सम्पत्ति माधिपत्य स ववित कर दिया गया है उस अधिकार है कि वह उस चल सम्पत्ति को जहाँ कहीं देसे या पाय वहाँ से वापस ले ले, कि तु एसा करन में उसे न तो सावजनिक पाति (Public peace) भग करने का अधिकार है पौर न हिंसात्मक ढग अपनाने का। (६) जय टटई Jus Teratin) -इस पद (Term) का शानिक प्रय है "प्रय व्यक्ति का अधिकार" । प्रतिवादी यह दलील नहीं दे सकता कि यादी जिस वस्तु के लिए मुकदमा चला रहा है उस पर वास्तविक स्वामित्व का अधिकार किसी प्रय व्यक्तिमा है न कि वादी का। एसी दलील प्रतिवादी तभी दे सकता है जब कि वह वास्तविक स्वामी द्वारा अधिकृत होकर काम कर रहा हो । यह बात भी स्मरणीय है कि प्रतिवादी उक्त दलील क्वल एमे वादी के विरुद्ध दे सकता है जिसके पास न तो पपित वस्तु का वास्तविक माधिपत्य (Actual possession) है मौर 7 रचनारमर माधिपत्य (Constructive possession) है।
बाधा (NUISANCE) प्रश्न ८७ -वाधा ( Nuisance ) को परिभापा देते हुए उसके विभिन प्रकारों का विवरण दाजिए। उत्तर ~ बाधा (Nuisance)- अग्रेजी भाषा का 'यूम स' निमा हिदी पर्यायवाची पा- 'बापा' प्रयुक्त हमा है, का सोसी भापा के नुई ( Nutre) शब्द से पैदा हुमा है । नुई (Nuire) शव का प्रथ हानि पहुँचाना या परेशात मरना है। रतनलाल धीरजलाल ने बाधा (Nursance) को परिभाषा देते हुए कहा है कि किसी पय व्यक्ति को भूमि, भवन या दासयोग्य सम्पत्ति को हानि पहुँचाना या उसमे इस प्रकार का हस्तक्षेप करना कि वृत्य मनधिकार प्रवेगा ( Trespass) मन्तगत न रखा जा सक 'वाधा' कहलाता है । ब्लैकस्टोन (Blackstoae) मनासार बाघा एमा कृत्य है जिसम रि विसी को हानि पहुँचती हो या मसुविधा अथवा क्षति पहुँचती हो । विनफोल्ड (Winfield ) का कपन है कि यद्यपि बाधा भी यथेष्ट परिभाषा दना सम्भव नहीं है, लक्नि क्षतिकृत्य कानून के उद्देश्यों के लिए मह एक ऐसा भनुचित कृत्य कहा जा सकता है जिससे किसी की भूमि माति में भनधिकार हस्तक्षेप का भान हो। इस प्रकार बाधा किसी व्यक्ति की भूमि के प्रति विपा गया अनुचित पृत्य है । इसके द्वारा किसी यक्ति को मसुविधा हो सकती है । यह वाघा भूमि या वास्तविक क्षति पहुंचा पर भी हो सकती है मयवा सुसाधिकार या भूमि द्वारा हाने घात लामो को क्षति पहुँचाकर भी हो सकती है। बाधा मसारपानी (Negligence ) ने कानून का भगोवरण नहीं है। प्रतएव बापा सम्ब पो वाद में प्रतिवामपन बचाव में यह दलोल नहीं द सस्ता कि सन उचित सावधाना से वृत्य दिया। बापा के दो प्रकार होते हैं जिनका विवरण नीचे दिया जा रहा है (१) सार्वननिक बाधा ( Public Nuisance)-मावनिर वाया मसी सावजनिक अधिकार के भग परन र धारण या उसम किमी प्रसार गैरकानुनी - बाधा १०५ हस्तक्षेप करने के कारण उत्पन्न हो सकती है । ऐसी बाधा के लिए यह मावश्यक नही दह भूमि विशेष के प्रति ही हो, बल्कि इसके प्रतगत व सभी परिणाम मा जान हैं जिनके कारण सवसाधारण को असुविधा, परेशानी या क्षति आदि पहुंचे या जिनस उनको सुरक्षा को खतरा पैदा हो । उदाहरणाय किसी सावजनिक माग को रोकना, काना को बुरी लगन वाली आवाज (Noise) उत्पन करना, वायुमडल को विपेली गैस यादि स दूपित करना तथा और किसी प्रकार का धु माधार मादि करना साव- जनिक बाधा कहलात हैं। सामण्ड (Salmand) के मतानुसार सावजनिन वाधा एक ऐसा गैरकानूनी वरय है जिस परन या न करन के कारण किसी को असुविधा होती है या किसी की सुरक्षा को खतरा पैदा होता है । इस सम्बघ मे मह बात स्मरणीय है कि सावजनिक बाधा के लिए यह अनिवाय नही है कि वह निश्चित सावजनिक अधिकारो मे इस्तक्षेप किए जान से ही उत्पन्न हो, प्रत्युत वे सभी कृत्य जो जन साधारण के स्वास्थ्य, सुरक्षा या सुविधा में किसी प्रकार का हस्तक्षेप करते हैं, सावजनिक बाधा के मतगत माने जाते हैं । लकिन शत यह है कि इस प्रकार का हस्तक्षेप किसी व्यक्ति विशेप के प्रति न होकर जन साधारण के प्रति होना चाहिए । यह बात भी स्मरणीय है कि किसी सावजनिक बाधा के विरुद्ध किसी व्यक्ति विशेष द्वारा कानूनी कायवाही नहीं की जा सकती जब तक कि उस व्यक्ति को सव साधारण मी तुलना में कुछ मधिक क्षति न पहुँची हा । सावजनिक बापा यह भी याद रखना चाहिए कि यदि कोई कृत्य कानून द्वारा स्वीकृति के पश्चात् किया गया है तो वह सावजनिक बाधा के अन्तगत नहीं पाएगा । यह बात भी याद रखना चाहिए किप्रय मधिकार दो चिरभोगाधिकार (Prescription) द्वारा प्राप्त किए जा सकते हैं पर सावजनिक थापाका अधिकार इस माधार पर मजित नहीं किया जा सकता । इसलिए साव पनिक बाधा के माधार पर चलाए गए मुकदमे प्रतिवादी मपन बचाव म यह दलोस नहीं दे सकता कि उसे सावजनिक बाधा उत्पन्न करने का अधिकार चिरभो गाधिकार (Prescription) द्वारा प्राप्त हो गया था। (२) व्यक्तिगत बाधा (Private Nursance)-जब कोई व्यक्ति अपनी सम्पति । उपभाग इस प्रकार करता है कि उसस मय व्यक्ति की सम्पत्ति को गैर- पानूनी रूप स क्षति पहुँनती है तो ऐसो क्षति को व्यक्तिगत वाघा महते हैं । इमरे अतिरिक्त यदि कोई व्यक्ति अपनी सम्पत्ति का इस प्रसार उपभाग मरता है जिसस दूसर को सम्पत्ति म गैरकानूनी रूप स हस्तक्षेप होता है तो वह भी व्यक्तिगत बाधा विपय में - क्षतिकृत्य विधि पर प्रश्नोत्तर के मन्तगत पाता है । स्मरण रहे कि सम्पत्ति में हस्तक्षेप मनधिकार प्रवेश (Tres pasi) द्वारा होने पर बाधा नहीं कहा जायेगा । प्रश्न :-सार्वजनिक बाधा और व्यक्तिगत बाघा का अन्तर स्पष्ट कीजिये। उत्तर -सार्वजनिक बाधा और व्यक्तिगत बाधा का भतर साथ जनिक बाधा भोर व्यक्तिगत बाधा में निम्नलिखित मतर हैं सावजनिक बाधा व्यक्तिगत बाधा (Public Nuisance) (Private Nuisance) १ यह ऐसा गैरकानूनी कृत्य है जिसे १ यह सम्पत्ति वा इस प्रकार उपयोग करने या न करने के कारण ग्राम जनता परना है जिससे मय व्यक्ति को सम्पत्ति को सुरक्षा, स्वास्थ्य या सुविधा में बाधा को गैरकानूनी रूप से क्षति पहचे या उसमें पढे। गैरकानूनी रूप से हस्तक्षेप हो । २ यह सावजनिक अधिकार भग २ यह व्यक्तिगत अधिकार म हस्त- परता है। होप करता है। ३ दाति सवसाधारण या उसके बडे ३ क्षति व्यक्ति विशेष को पहुँननी हिस्से को पहुचनी चाहिए। चाहिए। ४ चिरभोगाधिकार से यह भधिकार ४ चिरमोगाधिकार से यह अधिकार प्राप्त नहीं होता। प्राप्त हो सकता है। ५ जब कि व्यक्ति को विशेप क्षति न ५ व्यक्ति कानूनी मायवाही कर पहुची हो वह वाद प्रस्तुत नहीं कर सकता है। सवता। ६ वाघा उपस्थित करने वाले ये विरुद्ध ६ दाति प्राप्त ध्यक्ति बाधा पी फोजगारी "यायालय में भी वा प्रस्तुत समाप्ति के लिए सपा सतिपूर्ति प्राप्त दिया जा सकता है भोर उसे रोने में करने के लिए भायवाही कर सरता है। लिए याया (Injunction) भी जारी कराया जा सकता है। प्रश्न : -सावजनिर वाधा के आधार पर बाद प्रस्तुत करने का क्या नियम है? उत्तर -सायानि पाधा के प्रति याद -सारजनिक यापार विस्त सामायत रिसीव्यक्ति विशेष को वा- प्रस्तुत भरने का अधिकार नहीं है । लेकिन बाधा इस सामाय सिद्धात के कुछ अपवाद भी हैं । किसी सावजनिक वाधा के विरुद्ध काई व्यक्ति तव वाद प्रस्तुत कर सकता है जब वह यह सिद्ध कर दे कि- (१) सवसाधारण को अपेक्षा उसको विशिष्ट क्षति (Special damage) पहुँची है, (२) यह क्षति पषित वाया वा प्रत्यक्ष परिणाम है, तथा (३) जो क्षति पहुँची है वह तुच्छ (Petty) न हार पर्याप्न (Sub. stantial) क्षति है। प्रश्न -सार्वजनिक बाधा के प्रति उपायों (Remedies) पर टिप्पणी लिखिए। उत्तर -सार्वजनिक याधा के प्रति उपाय - सावजनिक वापा के प्रति दो प्रकार के उपाय उपल ध हैं। एक तो दीवानी न्यायालय से यायाग द्वारा घाधा को रोका जा सकता है और विशिष्ट क्षति की दशा में क्षतिपूर्ति भी प्राप्त की जा सकती है । दूसरे पौजदारी न्यायालय में भी सावजनिक वापा विरुद्ध पायवाही की जा सकती है । इगलैड में दीवानी वायवाही मटार्नी जनरल (Attor ney General) द्वारा की जा सकती है। भारत म भी व्यवहार प्रक्रिया पहिता {Civil Procedure Code) को धारा ६१ तथा ६३ में मम्वपित पानी का प्राविधान है। इन प्राविधानों के अनुसार पलकत्ता, मद्राम पोर बबई में एग्दोकेट जनरल (Advocate General) तथा माय नगरो में कलेक्टरों (Collectors) वो सावजनिर पापा के विरुद्ध कार्यवाही करने का मधिकार है। फौजदारी यायालयों में पायवाही करन के सम्बध म भारतीय दद सहिता (Indian Penal Codo) सपा६४ प्रक्रिया सहिता (Criminal Procedure Code) मे पपासगत प्राविधान किये गए हैं। प्रश्न ६१-~अनधिकार प्रवेश (Trespass) और धारा (Nutssance) में अन्तर स्पष्ट कीजिए। सचर -मनधिकार प्रवेश (Trespass) और बाधा (Nuisance) -इन दोनों में निम्नलिषित मतर हैं (৫) অনধিকার প্রবণ स्वत मभियोग्य (Actionable per se) है पर मापा सामायत नहीं। (२) मनधिकार प्रवेश प्राधिपश्य (Possessicn) के विपद अनुचित घरप है किन्तु याचा पापिपरय र सबधित अधिकारों घिर क्षतिपूण कृत्य है। में अन्दर इतिहत्य विधि पर प्रश्नोत्तर प्रश्न १२ ~व्यक्तिगत बावा (Private Nuisance ) के विरुद्ध कानूनी उपायों का विवरण दीजिए। उत्तर -व्यक्तिगत बाधा के प्रति उपाय -व्यक्तिगत वाधा (Private Nuisance) के विरुद्ध निम्नलिपित उपाय उपलब्ध होते हैं (१) समाप्ति (Abatement)-यदि किसी व्यक्ति को व्यक्तिगत पाया द्वारा प्रसुविधा हो रही हो तो वह स्वत सहायता (Self help) का सहारा लेकर उस वापा को समाप्त पर सकता है । लक्नि एसा करने में उस शातिपूर्ण ढग अपनाना भानश्यक है। (२) न्यायादश (Injunction) -यह उपाय तव उपलध हो सकता है जब वादा पाव्यक्तिगत बापा द्वारा होन वालो दाति इतनी स्थायो तथा अधिक हो कि उसको पूनि धन द्वारा क्षतिपूनि दरर न की जा सकती हो । (३) क्षतिपूर्ति ( Damages) व्यक्तिगत वाघा द्वारा होन पालो क्षति को पूरा करा का प्रतिम उपाय क्षतिपूति प्राप्त करना है। प्रश्न ६३ बाधा के लिए किन व्यक्तियों को उत्तरदायी ठहराया जा सकता है? उत्तर -बाधा का दायित्व-निम्नलिगित व्यक्तियों को वापा के लिए उत्तरदायी ठहराया जा सकता है (1) जा व्यक्ति वाधा उत्पन्न करता है वह उसक प्रति उत्तरदायी ठहराया जाता है । लक्नि भूमि जिस व्यक्ति के प्राधिपत्य म हा उसका पत्तन्य है कि वह वाघा या कायम न रहने दे, अन्यया दायित्व उस पर मा हता। (२) भामतौर पर जिस व्यक्ति व माधिपत्य को भूमि पर वापा का उदय होता है उसके विरुद्ध कानूनी कार्यवाही की जा सकती है। (३) मामतौर पर भूमि पर बसन वाले किरायदार के विरुद्ध हो उस भूमि पर उदित हान बालो वाधामों के लिए कानूनी कार्यवाही की जाती है । लचिन भूमि समालिक भी निम्नलिखित परिस्थितियों में उत्तरदायी होता है (म) जनकि भूमि के मालिक भूमि को किराये पर उठान से पहले ही वाया उपतराहा,या (ब) जम दियाघा भूमि के मालिक के पत्तों को न निमान के कारण पैग (स) जर भूमि के मारिन ने किरायेदार को गापा मनाए मान लिए प्रयाग या परोप मे मनुपति ददोहा।
बाधा प्रश्न ६४-बाधा के माधार पर चलने वाले मुकदमे में प्रतिवादी की ओर से बचाव की सम्भव दलीलों का विवरण दीजिए। उत्तर -बचाव की सम्भव दलीलें-वाघाये प्राधार पर चलने वाले मुकदमो में प्रतिवादी की पोर से बचाव की सम्भव दलोलें निम्नलिखित हो सकती हैं (१) स्वीकृति (Grant) -बचाव को यह एक अच्छी दलील मानी जाती है कि प्रतिवादी यह सिद्ध करे दि वादी द्वारा कथित वाघा किसी स्वीकृति को तो के मन्तगत प्रदान की गई है। (२) प्रतिवादी अपने बचाव मे यह दलील दे सकता है कि यथित वापा चिरभोगाधिकार (Prescription) द्वारा अजित प्रधिकार का परिणाम है। (३) प्रतिवादी प्रपने बचाव में यह दलील दे सकता है कि कानून ने प्रतिवादो को कथित पापा के लिए अधिकृत पर दिया है। लेविन यापा सम्ब पो मुस्दमों में निम्नलिखित दलीलें बचाव में नहीं दी जा सक्ती (२) यह विवादी स्वय बाधा के पास माया और इस कारण उसको क्षति -- (२) यह कि पाय यक्ति भी इस प्रकार को बाधा उपस्थित कर रहे हैं। (३) यह कि प्रतिवादी अपनी भूमि का तया उसस सम्बधित अधिकारों का उपभोग कर रहा है और यदि उससे कोई बाधा उत्पन्न होती है तो वह उसर लिए उत्तरदायी नहीं है। (७) यह कि वह माया रोकने के लिए सब प्रकार के प्रयल पर चुका है। प्रश्न १५-'क' एक मकान बनाता है। 'उसके मकान के धागे गदा पानी इस प्रकार से इकट्ठा कर देता है जिससे बाधा उत्पन्न होती है। 'क' जानता है कि 'र' को चिरमोगाधिकार ( Prescription) द्वारा पेसा अधिकार प्राप्त नहीं हुआ है । '' '' के विरुद्ध क्षतिपूर्ति तथा न्यायादेश (Injunction) के लिए दावा करता है। 'स' 'प्रपने घचाप में यह दलील दवा है कि 'क' यह सब जानते हुए भी उस मकान में रहता क्या 'र' को उपर्युक दलील पपाष प्रस्तुत कर सकती है? उत्तर -समस्या-प्रस्तुत मामले में 'स' की दसोस वधाव प्रस्तुत करने क्षतिप विधि पर प्रश्नोत्तर में असमथ है । वाघा को कायवाही में प्रतिवादी को यह दलील निरयक है कि वादी का बाधा का ज्ञान था और वह यह जानते हुए भी उसमें रहता रहा । प्रश्न ६६ -प्रतिपादी की भूमि में सडे एक वृक्ष की एक शासा सार्वजनिक माग के ऊपर करीन तीस फीट की ऊँचाई पर मुसी हुई थी। जाडों की सतु में अकस्मात् वह शासा वादी की गाड़ी पर जो उस मार्ग से जा रही थी गिर पड़ी जिसके परिणामस्वरूप वादी की गाडी को क्षति पहुंची। यह सिद्ध हुआ कि शाखा भीवर से खोसली हो गई थी किन्तु उसका सोखलापन उचित निरीक्षण द्वारा लक्षित नहीं हो सकता था। क्या वादी प्रतिवादी की तिपूर्ति के लिए उत्तरदायी है ? उत्तर -समस्या-प्रस्तुत मामन मे यह स्पष्ट है कि पासा माफी ऊचाई पर झुकी हुई यो मोर किसी प्रकार भी सावजनिक माग में बाधा उपस्थित नही करती थी। यह भी स्पष्ट है कि यद्यपि वह शाखा भीतर स खोसली हो गई थी पर मका खोगलापन प्रत्यक्ष लक्षित नहीं हो सकता था। शाखा के मकस्मात् गिरने का कारण उसपा मप्रस्पा खाखलापन था जिसके लिए प्रतिवादी को उत्तरदायी नही ठहराया जा सकता। प्रश्न ६७ -प्रविवादी एक स्थान पर अपनी मशीन को बीस वर्ष से अधिक समय से चला रहे थे। उस स्थान के करीब वादी, जो एक डाक्टर था, का बगीना था। वादी ने इस बगीचे के एक कोने पर अपने अध्ययन के लिए एक कमरा पनवाया। मशीन के शोर से उसफो घड़ी असुविधा हुई। क्या यादी बाधा के आधार पर प्रतिषादी के विरुद्ध दावा कर सकता है ? उत्तर -समस्या-प्रस्तुत मामले में वादो प्रतिवादी व विरख दावा पर सकता है यदि वह यह मिद कर दे कि प्रतिवानी की मशीन से उसे यहुत प्रसुविधा होती है । प्रतिवारी चिरभागाधिकार (Prescription) को दलील प्रपने बचाव में नहीं दे सकते, क्योकि यादी व मध्ययन का कमरा पनने से पहले मशीन का शोर बगीचे के लिए हानिकारक नहीं पा, किन्तु अध्ययन का कमरा बन जाने के कारण यह हानिकारक हो गया और इसीलिए वह अभियोज्य (Actionable)बन गया। प्रश्न •क' ने 'स' को अपनी भूमि फैमिफल पत्थरों को एसिह बनाने के लिए एकत्रित करने को किराये पर दी।'' के पत्थर एफनिव वापा करने की प्रक्रिया से निकलने वाली गेस वायुमंडल को विषैला करती है जिनसे पास पड़ोस के रहने वालों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है और उन्हें असुविधा होती है। अपयुक मामले में नाधा के लिए क्या 'क' उत्तरदायी है ? उत्तर --समस्या कानून के अन्तर्गत भूमि का स्वामी किरायदार द्वारा पैदा की गई वाधा के लिए तर उत्तरदायी ठहराया जा सकता है जबकि पापा उपस्थित करने को उसने अनुमति दी हो। प्रस्तुत मामल में 'क' न केमिकल पत्यरों वो अनि बरन के लिए अपनी भूमि को किराये पर दिया है । वह जानता है कि ऐसा करने से विषैली गैस वायुमण्डल में फैलेगी । अतएव वाघा उपस्थित परने के लिए उसका यह पूरय उमको प्रत्यक्षा मनुमति सिद्ध करता है, इसलिए वह उपयुक्त बाधा के लिए उत्तरदायी है।
६ - असावधानी (NEGLIOENOE) प्रश्न (अ) असावधानी (Negligence) और माशिक असावधानी (Conturbutory Negligence) की परिभाषाएँ दीजिए । (य) यादो ने एफ चलती हुई दाम गाडी पर चढने का प्रयत्न किया किन्तु अपने प्रयत्न में असफल रहा और इस प्रयत्न में ट्राम गादी के पहिये से उसके पैर का अँगूठा क्ट गया । वादी ने दाम वे कम्पनी पर क्षतिपूर्ति के लिए दावा किया । क्या वादी क्षतिपूर्ति पाने का अधिकारी उत्तर -असावधानी (Negligence) -चम्बस केन्द कोप में मसावधाना (Negligence) का प्रय उचित सावधानी का प्रभाव (Want of proper caro) दिया गया है । सामण्ड (Salmond) ने मसावधानी को परि भाषा देते हुए कहा है कि "मसावधानी रडनीय लापरवाही है (Negligence Is culpable carelessness)' । ग्लिस (Willes) के पनुसार मसावधानी से ऐसी सावधानी की कमी का बोध होता है जिसका वरतना प्रतिवानी या पत्तव्य हो । यहा जा सकता है कि पसावधानो एक ऐसा पृत्य है जिसम वि पर्ता अपने कृत्य के परिणाम को भोर से उदासीन हो । विनफील्ड (Winfield) ने पहा है यि असावधानी एक क्षतिकृत्य की हैसियत में उचित सावधानी बरतन में पावनो पत्तव्य को मवहेलना करना है जिराव परिणामस्वरूप प्रतिवादो के न चाहो पर भी वादी यो क्षति पहुँच जाए । दूसरे शो मे अपेक्षित सावधानी न बरतने के कारण मत्त ध्य से विमुरा होने को प्रावधानी रहत हैं । उपयुक्त विवचनाप माधार पर मसावधानी से तीन माव या तस्य (Ele ments) हैं। पहला तो कानूनी क्त्तव्य, दूसरा उस पतं य से विमुप होगा और तीसरा उस कानूनी करा प्य से विमुस होने ये परिणाम स्वरूप क्षति का होना । इस प्रारण म यह यात विशेष रूप से स्मरणीय है कि सावधानी बरतने का पराव्य बानगी पतप होना चाहिये । नतिक या पामिक पत्तव्य से विमुप हाने वाये के विष्ट हातिरप कानून के मतगत असावधानी का मारोप नहीं लगाया जा रापता।
असावधानी मिस परिस्थिति में सावधानी बरतने का क्त्तव्य विद्यमान है इस विषय पर दोनोपा प्रति स्टीवेसन का मामला विशेष रूप से उल्लेखनीय है । इस मुकदमे की घटनाए इस प्रकार हैं । एक जिजर रियर (एर प्रकार मा पेय) के निर्माता ने एक मपारदशक शीशे को बोतल मे वियर भर कर एर दुकानदार को बेच दी। दुकानदार ने उस वियर की बोतल को ज्यों को त्यों एक दूसरे व्यक्ति के हाथ बेच दिया। उस व्यक्ति ने वह चियर एक स्त्री को पीन के लिय दी। उस स्त्री ने योडी सी बियर पीने के बाद देखा कि उसम मडा हुमा पापा मिला था कि वार- खाने में व तल मरते समय बियर म मिल गया था। वह स्त्री वियर पीकर वोमार हो गई । उसने वियर के निर्माता के विरुद्ध क्षतिपूनि का मुकदमा चलाया। इस मुकदमे के निणय में कहा गया कि यद्यपि वियर निर्माता एव दियर प्रयोग करने वाली स्त्री के बीच कोई मनुव पाय क्त्त य (Contracrual datv), था तो भी बियर निर्माता मसावधानो के लिए उत्तरदायी है। सावधानी बरतन के प्रसग में एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि व्यक्ति को किस परिस्थिति में कितनी सावधानी बरतनी चाहिए। मानून वेतामों ने सावधानी का जो मापदण्ड (Standard) निर्धारित किया है, उसके अनुसार मनुष्य तीन प्रकार की सावधानी बरत सकता है। एक तो प्रत्येक परिस्थिति में प्रत्यधिक सतर्कता एय सावधानी बरती जाए, दूसरे उतनी सावधानी जितनी पि साधारण व्यक्ति अपने कार्यों को करने म परतता है मौर तीसरी वह, जो कि इस साधारण मावधानी से कम हो । इन तीनों काटि को सावधानी म से दूसरे कोटि को सावधानी पी प्रत्येक व्यक्ति से माशा को जाती है। लेकिन यह बात भी स्मरणीय है कि व्यक्ति को साधारण सावधानी भी परिस्थिति से अनुमार बदलती है । उाहरणार्थ, यदि कोई व्यक्ति अपने हाथ में बल्लम लेकर भीड़ में जा रहा है तो उसको उस व्यक्ति की तुलना में को उस भोट म छाता सेयर जा रहा है, यहत मधिक सावधानी बरतनी होगी। इरा सम्पाप में यह मात या रखिए किस पानी को कोटि इस बात पर निर्भर रहता है कि जिस पृत्य को दिया जा रहा है भौर जिम परिस्थिति में दिया जा रहा है, उसम स्तिनी सावधानी पी पायरता है। आशिक असावधानी (Contributory negligence) -मागिर पसाव पो परिभाषा देते हुए रसनत्तात पीरजलाल ने महा है कि माणिक पसायपानीस उग पसावधानो का बोध होता है जिसमें विवादी विशीपय व्यक्ति द्वारा हो वाल परिणामों को परित होने से न रोक जब दिम ऐमा करने का पूर्ण परसर प्राप्त हो । हावर महरहिल (Dr Underhill) मतानुसार वादीको ८ शतिकृत्य विधि पर प्रश्नोत्तर माशिव प्रसावधानो का दोपो तब बताया जाता है जब कि उसने अपनी लापरवाही द्विारा अपने को इस प्रकार क्षति पहुँचाई हो पिदि यह सावधानो से काय करता तो उसको प्रतिवादी द्वारा की गई पसावधानी के परिणामस्वरूप सति न पहुँचती। पाशिक सावधानो के विषय में विलेस (Willes) ने कहा है कि यदि वापी और प्रतिवादी दोनो बराबर-बराबर दोषी हैं और दोनों की समुक्त भसावधानी में कारण दुर्घटना पटो है तो वादो प्रतिवादी से क्षतिपूर्ति पाने का अधिकारी नहीं है। यदि यादी की सावधानी हो क्षति का कारण है तो भी वह क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का मधिकारी नहीं है चाह ऐमी परिस्थिति में प्रतिवादी वो कितनी भी भसावधानो रही हो। पातिक मसावधानी के सिद्धात को समझने के लिये डेवोस प्रतिमान [(१९४२) १० एम० ददलू. ५४६] पे मापल का उल्लेख करना हितकर होगा। इस मामले की पटनाए इस प्ररार हैं-ए वार एक व्यक्ति ने सारजनिम मार्ग पर एक गये का उस पैर बांध कर घाम चरने के लिए छोर दिया। एक मोटर ड्राइवर द्वारा राह पर चलते ममय उस गधे को पार पहुंच गई।गरे के स्वामी ने मोटर के स्वामी पर डिपूर्ति का मुकदमा चलाया। इस मुकदमे में कहा गया कि मोटर ड्राइवर को दुपटना बचाने का भवसर पा, भौर इम पवार के होते हुए भी उसने गधे को चोट परपाई । मतएव मोटर का स्वामी गधे के स्वामी को क्षतिपूर्ति दने के लिए उतरदायी है। माशिव ममावधानी सिद्ध करने का भार उसी व्यक्ति पर होता है जो यह बहना है कि उमा विपक्षी न ममावधानी स माय किया। सामायत प्रतिवादी हो परने यपार में वास को माशि मसावधानी की दलील देता है । यदि प्रतियादी ऐसा सबूत प्रस्तुन धरने में मसमय रहता है या मबूत के मापार पर दादी की प्राधिक पसावधानी सिद्ध नही होतो तावादीको यह पिटरने को प्रावश्यकता नहीं है कि यह प्राति भसावधानो का दोषी नहीं है । यदि पायालय इस विषय पर पहुँचन प्रामप रहे कि वारी मोर प्रतिवारी में कौन मसावपानी पादोपो है वो ऐसी परिस्पिति म पार प्रतिवादी पक्ष में होगा। (अ) समस्या -प्रस्तुत मामले की घटनाए एक प्रमुख मुकदमे तेमुल की अमोत को प्रति मई ट्राम बापनो (१६११) बम्बई को रिपोटर, ३४५) को पटनाए हैं। इस मुरदमे में यह निर्णय दिपा गया नि प्रतिवादी (झामदे सम्पनी) सारा पूति देने के लिए उत्तरदायी नहीं है, यदि पारी ने स्वय हो पापले पाय पिया है। - - प्रसावधानो प्रश्न १०० -आशिक मसावधानी के सिद्धान्त पर नवीन विद्यानों ने क्या प्रमार डाला है ? व्याख्या कीजिए !, उत्तर आशिक असावधानी पर नवीन विधानों का प्रभाव :- 'इंगलैण्ड के सव साधारण कानून (Common Law) क पाशिक मसावधानो के सिद्धान्त को सुधारन के लिय कानून सुधार (माशिव प्रसावधानी) अधिनियम, १६४५ [The Law Reforms (Contributory Negligence) Act] पास किया गया है। इस मधिनियम ने मासिक पसावधानी के सिद्धान्त म बहुत संशाधन पर दिया है। मव सशोधित कानून के अनुसार यह नियम बन गया है कि 'बर विसो व्यक्ति का प्रपनी तया मय किसी व्यक्ति को प्रसावधानी के परिणामस्वरूप पोई क्षति पहुंचे तो ऐसा परिस्थिति में उस क्षतिपूर्ति प्राप्त करने के अधिकार से पूर्णतया वचित नही दिया जाएगा। ऐस मामलो में न्यायालयों को अधिकार होगा विवे परिस्थितियों को देख कर यायानुकूल ढग स क्षतिपूर्ति की धनराशि कम पर दें। लेकिन क्षतिपूर्ति की धनराशि को कम करन स पहल यायालय को यह निश्चय करना मनिवार्य है कि यदि वादी ने मसावधानी से काय न क्यिा होता तो उसको वितनी क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का पपिकार होता। प्रश्न १८१ -असावधानी के आधार पर चलने वाले मुकदमे में 'बादी को क्या सिद्ध करना चाहिए ? उत्तर असावधानी का सपूत -प्रसावधानी के माघार पर चलने यान मुक्दम म वादो का निम्नलिपित बातें सिर परना चाहिय (१) यह कि प्रतिवादी पा कानूनी पत्तथ्य था कि वह उचित मात्रा में सावधानी बरतता, (२) मह कि प्रतिवारी का यह पतव्य घादी र प्रति या (३) यह कि प्रतिवारी ने अपने कानूनी पतंय का पालन नहीं पिया (४) मह किवादी को जो क्षति पहुँची, वह प्रतिवातो पो मसावधानी का भरया परिणाम (Direct consequence) पा (५) यह निवागेको प्रतिवानीको पयित मसावधानी के परिणामस्वरूप राति उठानी पगे। स्मरण रहे कि प्रमावधानी सम्म पो मुदमों में भी बानून का यह मामान्य नियम लागू होता है कि जो भक्ति रोई बात रहता है, उसको टिपरला रसो का . .
सतिवृत्य विधि पर प्रश्नोत्तर उत्तरदायित्व है। प्रतएव मादी को मह सिद्ध करना जरूरी है कि प्रतिवादी ने पसावधानी से काय किया मोर उसकी मसारमानी के कारण बादो क्षति पहुँची है। प्रश्न १०२ -'परिस्थितियाँ स्वय बोलती है। (Res upsa loqulrur) के सिद्धान्त की व्याख्या कीजिये । उत्तर -परिस्थितियां स्वय बोलती हैं ( Res ifsa Icqultur) असावधानी के माधार पर चलने वाले मुकदमों में वाली पर यह सिद्ध करने का भार (Oaus of proof) होता है कि प्रतिवादो क मसावधानी स काय करने के परिणामस्वरूप ही उसको ( वानी को) क्षति पहुची है । लकिन कभी कभी ऐसी परिस्थितियां भी मा जाती हैं जब बातो इतना तो सिद्ध कर सकता है कि उसको दुघटनावश क्षति पहुँची है किंतु यह यह सिद्ध करने की स्थिति में नहीं होता कि उसे प्रतिवादी को प्रसावधानी के कारण क्षति पहुची है, क्योंकि घटना को परिस्थितियों पूर्णतया प्रतिवादी को ही ज्ञात होती हैं और उनकी जानकारी वादी को पहुँच से परे होती है। ऐसी परिस्थिति में कानून का यह सिद्धान्त कि परिस्थितियो स्वय बोलती हैं (Res apsa loqultur) लागू होता है और वादी को प्रतिवादी की प्रसावधानी मिद्ध करने के भार से मुक्त कर दिया जाता है। उपयुक्त सिद्धाउ को सरलता से समझने के लिए वन प्रति बोरिल [(१८६३) २ एच० एण्ड० सी० ७२२] के मुकदमे का उल्लख करना हितकर होगा। इस मुघन में पी पटनाए इस प्रकार हैं कि एप पार वादी एक सहव पर जा रहा था। सहक के किनारे एक मकान में प्रतिवादीका माटे का भण्डार था। इस भण्डार की एक खिरी सहक पर खुलती थी। जब यादी उस पिडकी के ठीक नीचे से होरर सडर से गुजर रहा था तो माट या एक बोरा सिहको से निकल कर गिरा जिससे यादीयो पोट पहुँची । इस मुकदमे में निणय दिया गया कि घटना की परिस्थितियों से यह स्पष्ट है कि प्रतिवादी ने प्रसावधानी से काय दिया पोर इसी कारण यह दुपटना हुई, क्योंकि साधारणतया बिडमी से निक्म पर पाटे का बोरा सड़क पर तब तक नहीं गिर रास्ता जव तप प्रपत प्रसावधानो ग काय न किया गया हो । दुर्घटना स्वय ही इस बात या प्रत्यक्ष प्रमाण है रि प्रसारपानी से काय लिया गया है। म. मरहिल (Dr Underhill, उपयक्त सिद्धान्त की विवेचना परत हुए कहा है कि जब भी रिमी काय की व्यवस्था प्रतियाती या उस सेयकों देस रेरा म हाती है और दुघटना को प्रति इग प्रसार की होती है कि यदि उचित गावधानी स पाप रिया जाए तो इस प्रकार को दुर्घटना साधारणतया मसावधानी - पटिन नही हो सकतो तो ऐसी परिस्थिति में कानून यह निष्कप निकालता है कि प्रतिवादी को असावधानी के कारण हो दुघटना हुई है और वादो को क्षति पहुँची है इस सिदा त को उत्स भूमि यह है कि यदि कथित परिस्थितियों म असावधानी सिद्ध करन का भार वा पर ढाला जाए तो वह वारी के लिये केवल दुरुह या कठिन ही न होगा, वरन् प्राय असम्भव हागा क्योंकि जिन कार्यों को व्यवस्था पूणरूपेण प्रतिवादी को देख रेख में हुई है, व पूर्णतया उसके प्रधान होती है और वहाँ तक प्राय घाटी को पहुँच नही हो सकती । इसलिए ऐमो परिस्थितियो म कानून प्रतिवादी पो प्रमावधानो का अनुमान पर लेता है । लेकिन यदि दुपटना इस प्रकार है जैसा कि साधारणतया हो जाती है तो उपर्युक्त नियम लागू नहीं होगा । उदाहरणाय, यदि माप अपने कार में बैठे हों और माप पैर से जूता निकल फर सडर पर गिर जाए भौर किसी राह चलने वाल को चोट पहुंचे तो यह नहीं पहा जायगा कि यह एक अस्वाभाविक घटना है, क्योंकि पैर से जूता निकल कर गिर जाना कोई भस्यामाविक या अमाधारण बात नहीं है । इस सम्बध में विष्णु प्रति बडोदा से ट्रल इंडिया रेलवे कम्पनी (२५ बम्बई लॉ रिपोटर, ८८१)का मामला उल्लेखनीय है । एक बार एक व्यक्ति (वादी) एक रेल में यात्रा पर रहा था। इस यात्रा परत समय रेल को वर्थ (Berth) पर चढ़ने के लिए जो सोनी (Ladder) लगो होती है, वह वादी पर गिर पड़ी। वादी ने प्रतिवादी (रल पम्पनी) पर उक्त सिदात ५ माघार पर मुकदमा चलाया। इस मुकदमे म निर्णय दिया गया कि इस मामले म उक्त सिद्धान (Res apsa loqultur) सागू नही दिया जा सकता। प्रश्न १०३ --'ईश्वरीय प्रकोप या ईश्वरीय कृत्य (VIs Major or Act of God) से पाप क्या सममते हैं ? असावधानी सम्बन्धी मुकदमों में क्या यह पचाय को एक अच्छी दलील है ? उत्तर -ईश्वरीय प्रकोप या ईश्वरीय कृत्य (Vis Major or Act of God)-कानून को तकनीको भाषा में ईश्वरीय वृश्य का यह तात्पय नहीं है कि ससार में सभी वाय प्रापार ईश्वरीय धृश्य हैं । कानून की भाषा म जय हम ईश्वरीय परय' या 'वरीय प्रसार का प्रयोग करते हैं तो उनसे पापो, तूफान, भूकम्प, बिजली गिरना प्रादि सो घटनामों का तारपय समझा जाता है जिनसे बचना या मिनरी रोवना मोर मिन पर नियत्रण रखना मानव-पाक्ति स पर है। ये सभो पनाएं प्राातिक पटनाए है जिनमे होने वाली क्षति के लिए कोई बक्ति या सस्या उतरदायी नहीं ठहराई वा सकती।
क्षतिमुत्य विधि पर प्रश्नोत्तर १० माडरहिल (Dr Underhitl) मतानुसार ईश्वरीय प्रकोप या ईश्वरोप प्रत्य (Vis Mayor or Act of God) वे घटनाएं अथवा वृष्य हैं जिनके परिणामों से मानवीय दूरदर्शिता द्वारा नहीं बचा जा सकता। ये ऐसी घटनाएं पपता कृरय हैं जिनकी सम्भावना पो मानवीय बुद्धि कभी भी मान्यता नहीं प्रदान पर सक्ती।इम कारण ईश्वरीय घटनाए जब घटित होती है तो हम उनको भास्मिन सक्द कहते हैं और उनके द्वारा होने वाले परिणामों के लिए कोई उत्तरदायो नही माना जा सकता। रतनलाल धीरजलाल का कथन है कि वे कृत्य जो कि प्राकृतिक पाक्तियों में परिणामस्वरूप घटित होते हैं और जो मानवीय एध भय पत्तियों से पूर्णतया स्वतत्र होते हैं, ईश्वरीय पुरय की कोटि में से आते हैं, जैसे-धी, तूफान, पसाधारण वर्षा, मसाधारण बार भयवा धमाधारण पाला मादि । क्षतिकृत्य कानून के मतगत प्रसावधानी के प्राधार पर चलने वाले युवदर्मों में प्रतिवादी या अपने बचाव में यह कहना कि क्षति एक ईश्वरीय वृश्य द्वारा हुई है। एक पछी दलील मानी जाती है यदि तिवारी मपन कथन को सिर के विनफील्ड (Winfield) ने इस सदभ में निकोलस प्रति मामलेर का एक प्रसिद्ध मामला अपनो तरसम्बधी पुस्तक में उद्धृत किया है । इम भुगदमे की पटनाएं इस प्रकार है कि प्रतिवादी को कुछ पानी की झीलें थी। उनके बनाने में पिसी प्रकार की पसावधानी नहीं बरती गई थी भोर न उनकी देख रेत मे रिसी प्रकार की पसावधानी बरती गई। लेकिन एक बार पसाधारण वर्षा होने में पारण उन झीलों के चारों मोर के पाय टूट गए और झीलों का पानी दूर तक फा गया। इस प्रकार की असाधारण वर्षा पहले भी मही हुई थी और न ही प्रत्याशित की जा सकती पी। भीतो का पानी फैलने स चार यही नावें (Barges) यह गइ । नावों के स्वामी ने भीतों व स्वामी पर क्षतिपूर्ति का मुवामा धनाया। इस मुकदमे मे यह निर्णय दिया गया कि पानी । इस प्रकार बढ़ पर पहना एक वरीय घरप पा। मतएय भीलों का स्वामी नावों के स्वामी कातिपूर्ति देने के लिए उत्तरदापी नहीं ठहराया जा सकता। प्रश्न १०४ --प्रावधानी के संदर्भ में अवश्यम्भावी दुर्घटनाओं (Inevitable Accidents) पर टिप्पणी लिसिए । उत्तरअयश्यम्भावी दुर्घटनाएँ (Inevitable Accidents) पसापानी माघार पर चलने वाले मुकदमों में प्रतिवारी पो बचाव में पाप- ग्मावो दुपटना को दसोल दे रापता है। मयस्यम्माषौ दुपटनामों से तात्पर्य उन मसावधानी ११३ दुघटनामों से है जिनको कि साधारण सावधानो तया विवेक द्वारा होने से बचाया न जा सके । उदाहरणाय, माप मोटर से जा रहे हैं भौर एकाएक जोर का तूफान मा जाने के कारण एक वृक्ष टूट कर आपको मोटर पर गिर पडता है और मापको मोटर टूट जाती है । ऐसी परिस्थिति में प्राप वृप के स्वामी से क्षतिपूति प्राप्त नहीं कर सकते, क्योंकि वृक्ष का गिरना एक मवश्यम्भावी दुघटना है। इस सम्बध में रतनलाल धीरजलाल ने अवश्यम्भावी दुघटना की परिभाषा देते हुए कहा है कि अवश्यम्भावी दुघटना से उस दुघटना का तात्पय है जिसको साधारण सावधानी, सतक्ता या दक्षता द्वारा घटित होने से न बचाया जा सके | डा. मडरहिल (Dr Underhill) ने कहा है कि किसी व्यक्ति को अवश्यम्भावी दुघटना द्वारा होने वाली क्षति के लिए उत्तरदायी ठहराना यायोचित नहीं है। प्रश्न १०५ – 'क' जिस गैलरी में बैठा फुटवाल का मैच देख रहा था, उस गैलरी का एक भाग गिर जाने से घायल हो जाता है। क्षतिपूर्ति प्राप्त करने के लिए 'क' के अधिकार क्या है, यदि उसने- (अ) भादा देकर टिकट लिया हो, () केवल पास लिया हो तथा (स) अनाधिकार प्रवेश किया हो? उत्तर समस्याएँ -(प) ऐमी परिस्थिति म 'क' क्षतिपूर्ति प्राप्त करने कामधिकारी है क्योंकि उसको हैसियत निमत्रित (Invitee) व्यक्ति की है । यदि कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति को मारा लकर निमत्रित बरे तो वह स्थान के सुरक्षित होने का माश्वासन भी देगा मौर यदि निमश्रित व्यक्ति को कोई क्षति पहुँचती है तो वह उसको क्षतिपूर्ति के लिए जिम्मेदार होगा। (1) ऐमी परिस्थिति म 'क' को हैसियत केवल मनुज्ञा प्राम (Licenses) व्यक्ति की है। अनुमा प्राप्त व्यक्ति स्थान को जैसो भो दशा मे है वैसी हो दगा में उपभोग कर सकता है । यदि उसम कोई जासिम प्रत्यक्ष है तो उसे स्वय देखना पाहिए और पनि प्रत्याशित है तो उसे स्वय सतक्ता बरतनी चाहिए। प्रतएव '' धतिपूर्ति प्राप्त करना प्रधिकारी नहीं है। (स) बानून का यह सामाय नियम है कि अनाधिकार प्रवेशवा (Trespasset) के प्रति स्थान के स्वामी का काई क्त्तय नहीं है। मनाधिकार प्रयेस्ता जोखिम का स्वय जिम्मदार है । मतएव 'व' क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का पपिगारी नहीं है।
क्षतिकृय विपि पर प्रश्नोत्तर प्रश्न १०६-वादी एक चलती हुई दाम में पढने के प्रयत्न में गिर कर घायल हो गया । ट्राम का पायदान (Foot board) जिस पर होकर घरते हैं ढाला था और इसी कारण वादी या पैर फिसल गया था । क्या वादी क्षतिपूति प्राप्त करने का अधिकारी है ? उत्तर समस्या -प्रस्तुत मामन की घटनाए एक प्रमुख मामले हराराज प्रति बम्बई ट्रामवे कम्पनो ( ३ ( बम्बई, ४७८) को घनाए हैं । इस मामले में यह निणय हुपा है वि वाटी का यह तब वि ट्राम का पायदान ढीला होने के कारण हो वह गिरा पौर घायल हुमा नहीं माना जा सकता। यदि पडी ट्राम म सवार होते समय वादी गिर पर घायल हो गया होता तो ट्रामवे कम्पनी क्षतिपूति देने लिए उत्तरदायी होनी । लेकिन पलती हुई गाहो म सवार होते समय वानी स्वय मागिर श्रमावधानी (Contributors Negligence) मा जिम्मेार है । इसलिये यह क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का मधिकारी नहीं है । प्रश्न १२७ -शा का भाशि: मसावधानी (Contributory ngligence of Children) पर टिप्पणी लिपिए । उत्तर पचों की पाशिक असापभाना Contributory negligence of childeren) -जूति यच्च परिपक्व अयस्था के व्यक्तियों की तरह शोध नहीं सोच सात दि उनको विपदात्मय परिस्थिति मे किस प्रकार सावधानी बरतनी चाहिय, इगलिए मालिक पसावधानो (Contributory Negligence) का सिद्धान उन पर लागू नहीं होता। लॉिन एस मामलों में यह सिद्ध करना प्राव यव है fr बचा परिपार भवस्या को प्राप्त नहीं हुमा पा । साम (salmond) या कथन है वि जर पारी एक बया हो या कोई ऐसा व्यक्ति हो जो उसो की भाति प्रगमपना (Incapacity) रसने वाला हो तो येवन इतना सिर पर देना पर्याप्त है fr उसने सनी सतरता बरती जितना विस अवस्था वा व्यक्ति यरत सकता है । उपयक्त प्रारण में लिप प्रति नरहिन [(१८४१) ११० ० ३०] का मुनमा विशेष रूप मे उस्लेपनीय है । इस मुकदमे की घनाए इस प्रकार है कि एक बार प्रतिवादी नै प्राना घोडा और गाड़ी को सडर पर रेत छोड लिया। उस समय उसमें कोई भी भक्ति नहीं था। ए सात वर्षीय बालक उसमे रह गया मोर एर दूसरे पानव ने पाहे को चला लिया । परिणाम यह हुमा वि एक व्यक्ति (बारी) उस घोडागाडी से जख्मी हो गया। मुबम में बहा गया कि प्रतियारी (पोहागामा स्वामो) क्षतिपूर्ति देने । उत्तरायी है पनि यचा माविम प्रमारपानी का दोषी नहीं माना जा सरता।
असावधानी प्रश्न १०८ --'क' शराब पिए हुए एक जनमार्ग के सिरे पर पडा था। 'स' उस जनमार्ग पर मोटर चलाता हुआ आया और 'क' को कुचलता हुआ गुजर गया। जिस जगह 'क' पडा था, वह जगह सावधाना से देखने पर देसी जा सकती थी। क्या 'क' नतिपूर्वि प्राप्त करने का अधिकारी है ? उत्तर -समस्या-प्रस्तुत मामले में 'क' माशिम मसावधानी का जिम्मेदार है, इसलिए वह 'ख' से क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का अधिकारी नहीं है। लेविन मानून सुधार (माणिक प्रसावधानी) अधिनियम, १९४५ [Law Reforms (Contri butory Negligence) Act, 1945] के पन्तगत 'क' 'स' से उतनो क्षतिपूर्ति प्राप्त कर सकता है जितनी मसावधानी के लिए 'ख' उत्तरदायी है । इस अधिनियम के पन्तगत 'क' पूणतया क्षतिपूर्ति प्राप्त करने से वंचित नहीं दिया जा सकता। प्रश्न १०६ -सतरनाक जानवरों को रखने के दायित्व की व्यारया कीजिए। उत्तर । सतरनाक जानवरों के रखने का दायित्व -यदि मानवीय भनुभव के कारण जानवरों का कोई वग पतरनाक समझा जाता है, चाहे उस वग का कोई जानवर विशेष पालतू हो, तो वह व्यक्ति जो उसे पालता व रखता है, उसक द्वारा पहेवाई गई क्षति का उत्तरदायी माना जाता है। [पिल्वन प्रति प्यूपिल्स पेलस (१८६०) २५ एल० बी० डी० २५८] उदाहरणाथ-दर, चाता, भेडिया, बदर मौर हाथी मादि जानवर जगली मोर सतरनार समझे जाते हैं। जो व्यक्ति इन जगता जानवरों को पालता व रसता है, वह ऐसा मपनी जिम्म री पर कर सकता है पौर यदि उनसे किसी व्यक्ति को क्षति पहुँचती है तो वह उस व्यक्ति को क्षतिपूर्ति के लिए उत्तरदायी होगा। इस सम्म प म यह बात निरपक है कि ऐसे जानवरों का स्वामी उन्ह सतरनाक होना जानता है अथवा नहीं । जो जानवर भादमियों पर भाक्रमण मरने पोर रहें काटने के माहाते हैं उनके मालिक इस शान रे पाप हो उहें राण सकते हैं पौर ये उनके द्वारा हुई क्षति के उत्तरदायो मान जाते हैं । उपयत प्रकरण म प्राकुमार मुपी प्रति हेरे, (१९०६) ३६ पलकत्ता, २०२१] या मामला उद्धृत धरना हितार होगा। इस मामले मी पानाए इस प्रकार हैं प्रतिवारी मुख को उसरे नौरर को देख रेग में पलटे थे, नौकर मे. पाल में पादमियों पर भारमण परी मोर रह पाटने के मादी । एक दिन पहनाकर उन कुत्तोपो एष मनोरनन की जगह पर ले गया। पादरीबा सातवर्षीय मास्क दुओं को दे रहर गया और डर के कारण चिल्ला पडा । परिणामस्वरूप गुप्ता १२२ क्षतिकृय विधि पर प्रश्नोत्तर ने उस पर भाक्रमण कर दिया मोर उसे बुरी तरह काट लिया| यायालय ने कुत्तों के स्वामी को वादी पा क्षतिपूर्ति के लिए उत्तरदायी ठहराया और ४०० १० कष्ट का प्रतिकर मौर ६०० रु. इलाज के व्यय की धनराशि क्षतिपूर्ति में वारी को प्रदान की गई। स्मरण रहे कि खतरनार जानवरों को पालने का दायित्व सम्पूर्ण दायित्व (Absolute lability) नहीं है प्रत्युत वह प्रसावधानी पर निभर करता है। प्रश्न ११० -~-पुलिस के एक सिपाही ने देखा कि शाम के बाद भी प्रतिवादी के गोदाम के द्वार खुले हैं । अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए उसने सोचा कि गोदाम के भीतर देख लें कि सब कुछ ठीक है। इस आशय से वह भीतर गया और गोदाम के एक गढे में गिर फर जख्मी हो गया। क्या वह क्षतिपूर्ति पाने का अधिकारी है ? उत्तर समस्या -प्रस्तुत मामले में यह स्पष्ट है कि सिपाही अपनी इच्छा से गोदाम में गया और उसे गोदाम में जाने का अधिकार नही था, क्योंकि उसके पास वहाँ जाने के लिए कोई मनुज्ञा-पग (Licence) नहीं था। यदि यह मान भी लिया जाए कि उसको भीतर जाने का अधिकार था तो भी प्रतिवानी पर गोदाम के भीतर का भाग सुरक्षित रखने का राई क्त्तव्य नहीं था। मतएव सिपाही क्षतिपूर्ति पाने का अधिकारी नहीं है। प्रश्न १११ --विशेषज्ञ एव दक्षता प्राप्त व्यक्तियों (Persons pron fessing to have greater skill) के लिए सावधानी का क्या मापदण्ड है? व्यारया कीजिये। उत्तर विशेषज्ञ एवं दक्षता प्राप्त व्यक्ति यदि कोई व्यक्ति किसी ऐने व्यवसाय को करते हैं जिनमे उनको दक्षता एव विशेष योग्यता ही व्यवसायमा मापार है तो ऐसे व्यक्तियों को पाने पार्यो म पूण दक्षता एव विशेष योग्यतामा परिचय देना चाहिये । ऐसे व्यक्तियो को निम्नलिखित वर्गों में रखा जा साता है (१) एम्पनी के निदेशक ( Directors of Companies) बम्पनी निदेशका पर मय व्यक्तियों की सम्पत्ति का भारी विश्वास रखा जाता है। उनकी तनिक भी प्रयोग्यता इस साति को क्षणों मे डुबा समती है । मतएव पम्पनी के निदो मत्यधिक सावधानी से कार्य पर अपनी दाता एव योग्यताका परिषर देना मनिशय है। (२) पाहक (Carriers) -वाहक दो प्रकार होते हैं-एर ये पो सामान को एक स्थान पे दूसरे स्थान पर ले जाते है मार दूसरे ये जो यात्रियों को मसावधानी १२३ तथा उनके सामान दोनो को ले जाते हैं । जो व्यक्ति या सस्था वाहक का कार्य करती है, उसपर सामान तथा यात्रियों को उनके इच्छित स्यान ता सुरक्षित पहेचाने का उत्तरदायित्व माना जाता है । इस प्रकार के सावजनिक वाहक (Public carriers) सामान तथा यात्रियों को क्षति पहुंचाने पर क्षतिपूर्ति के उत्तरदायी होते हैं किन्तु केवल उन परिस्थितियों में जवकि क्षति ईश्वरीय कृत्य द्वारा या राज्य के पात्र द्वारा या वस्तु के स्वय के दोष के कारण न हुई हो । विशिष्ट सविता (Special Cortract) के द्वारा वाहक का दायित्व कम भी दिया जा सकता है। (३) चिकित्सक (Doctors or Physicians) ऐमे विशेष योग्यता के व्यवसाय में काय करने वालों से उच्चतम दक्षता को प्राण की जाती है। (४) कर्म Banktrs) -वस विश्वास योग्य व्यक्ति होने का दावा करते हैं और इस प्रकार जनता उनपर विश्वास एव भरोसा करती है। मपने ग्राहकों की चे का भुगतान करना तथा उनका हिसाब मादि रखना उनमा कत्तव्य है। नरलो चेक का भुगतान कर देने पर ही उत्तरदायी माना जाता है। (५) सालिसिटर्स (Solicitors) -डाक्टरों को भानि ही सालिसिटस मो कठिन क्त्तव्य का भार अपने ऊपर लेते हैं। वे अपनी सावधानी द्वारा दिए गए उन सभी परिणामों के प्रति उत्तरदायी हैं जिनसे कि उनके मुवक्किलों (Clients) को क्षति पहुंचता है। (६) सराय रक्षक (Inn keepers) सराय के पदर ठहरने वाले यात्रियों व वनको सम्पत्ति को रक्षा करना सराय रक्षकों का कानूनी वत्ताप है | सराप पदर यात्रियों व उनके सामान को यदि क्षति पहुँचती है तो मामतौर पर सराय- रक्षक ही क्षतिपूर्ति के लिए उत्तरदायी माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त वस्तुपों का निर्माण एय उत्पादन परनवालों पर भी एक भारी उत्तरदायित्व रहता है। मामतौर पर वरसुमों का निर्माण एक उत्पादन करने वाले तब ही उतरदायी ठहराये जा सकते हैं जब उन वस्तुमों का निर्माण करन म उन्होंने प्रत्यधिक प्रसावधानी से काय किया हो। इस सम्बंध में प्रार प्रति भारनियन नाइटिंग मिल्म (१९३६ ए० सी० ८ का मुकदमा उल्लेखनीय है। इस मुपदमे की घटनाएं इस प्रकार है कि वादी ने बाजार से कुछ गम पहा सरीदा। उसको पहनो से उगो धम रोग (Dermetitis) हो गया। उसने उस पहे को एर फुटकर व्यापारी से परीया। पडे में सल्फाइट (Sulphites) को मधिरता पारण ही वासी को चम रोग हुपा पार पडे मे इस दोपको फुटर विना नहीं - -- १२४ सतिकृत्य विधि पर प्रश्नोत्तर देख सकता था, क्योकि वह एक गुप्त दोष था। कपडा उत्पादक (Manufacturer) ने उमको ज्यों का त्या विना किसा परिवर्तन के पहने जाने के लिए बनाया था। इम मुरदमे में निणय वादी के पक्ष में दिया गया और प्रतिवादी को वादी को क्षति पूर्ति के लिए उत्तरदायो माना गया । प्रश्न ११२ --एक होटल के स्वामी ने अपने एक प्राइक की रुपयों की येली विना विसी स्वार्थ के अमानद में रस ली। जब कि थैली होटल के सामी की सुपुर्दगी में थी उसकी अमावधानी से गुम हो गई प्राइक ने होटल के स्वामी के विरुद्ध क्षतिपूर्ति का मुकदमा चलाया। होटल के स्वामी ने यह दलील दी कि थैली उसकी अमानव में बिना किसी बदल (Consideration) के रसी गई थी इसलिय वह उसके गुम हो जाने की क्षतिपूर्ति के लिए उत्तरदायी नहीं है। क्या होटल के स्वामी की उपयुक्त दलील न्यायसगत है ? उत्तर समस्या प्रस्तुत मामल म होटल के स्वामी की दलील याय सगत नहीं है। कानून यह है कि जब कोई व्यक्ति किमी को वस्तु बिना बदल में समानन में रखना है तो वह उस वस्तु के साप गैरकानूनी ढग स किए गए कृत्य (Misfeasance) क लिए उत्तरदायी है। इस सदभ में यह स्मरण रहे कि विना पदल (Without consideration) किसी चीज को अमानत में रखने वाला भी वरल (Consideration) पाने वाले प्रमोन की तरह ही उत्तरदायी माना जाता है। प्रस्तुत मामल में पेली होटल के स्वामी की मसावधानी के कारण गुम हुई है। अतएव होटल का मामी अपने क्षतिप्रात ग्राहक की क्षतिपूर्ति के लिए जिम्मेदार है। ।
. सविदा पर श्राधारित चतिकृत्य (TORTS FOUNDED ON CONTRACT ) प्रश्न ११३ --सविदा से स्वतन्त्र (Independent of Contract) और सविदा पर आधारित ( Founded on Contract) क्षविकृत्यों में अन्वर स्पष्ट कीजिए। उत्तर -सविदा से स्वतन्त्र और सविदा पर आधारित नतिकृया में अन्तर-सविदा सम्बधी क्षतिकृत्य दो प्रकार के होते हैं-एक तो वे जो कि सविदा से स्वतत्र तथा दूसरे वे जो सविता ने प्राधार पर उदित होते हैं । इन दोनों प्रकार के सठियों में मन्तर निम्नलिखित है - सविदा से स्वत क्षतिकृत्य सविदा पर माधारित क्षतिकृत्य १ वादी और प्रतिवादी के बीच किसी १ वाटी मोर प्रतिवाली में सदिदिक प्रकार का पानूनी सम्बप (privity) सम्बध (Contractual priv- नहीं होता। ty) का हाना मनिवाय है। २ इसमें कानून द्वारा निर्धारित पत्तव्य २ इसमें पक्षकारों के बीच समझौते के पीमबहेलना होती है। द्वारा निर्धारित वर्तव्य की अवहेलना होती है। ३ यह पत्तथ्य विना पसकारों की सह ३ यह क्वय पक्षकारों की सहमति मति के कानून द्वारा पाता है। पर माधारित होता है। ४ क्षतिपूर्ति की धनराशि भनिश्चित ४ क्षतिपूर्ति की धनराशि माम और पर (Unliquidited) होती है निश्चित (Liquidated) होनी है। प्रश्न ११४ -सविदा पर आधारित तिफयों का उदय सामान्यत किस प्रकार होता है। व्यारया कीजिए। उत्तर -मविदा पर मापारित विकृत्यों का उदय -मविदा पर पापारित पतियों काय दो प्रकार से हो सकता है-एव तो प्रतिवादी की पसावपानी पौर दूसरे प्रनिराको घोरोपानी (Fraud) से ।
पातिकृत्य विधि पर प्रश्नोत्तर प्रतिवादा की असावधानी -यदि कोई व्यक्ति किसी ऐसे कृत्य को करने में मसावधानी से काय करे जिसको करने का उसने सविदा क्यिा हो मोर इस प्रकार वादी को क्षति पहुंचाए तो कहा जायगा कि उसने सविदा पर माघारित क्षतिकृत्य क्यिा है। उदाहरणाय, यदि ए डाक्टर ने किसी व्यक्ति के मापरेशन करने का सविदा क्यिा हो कितु उसने मापरेशन बरन मे मसावधानी से काय किया हो जिससे रोगो को क्षति पहुची हो तो वह सविदा पर मापारित क्षतिपत्य होगा जो डाक्टर की मसावधानी से उदित हुमा माना जाएगा। प्रतिवादी की घोसेबाजी -यदि दो व्यक्ति किसी काय के लिए परस्पर सविदा करें मोर उनमे से एक व्यक्ति घासेवाजी परे तथा इस प्रकार दूसरे को क्षति पहुचे तो घोसेबाजी करने वाल व्यक्ति क विरुद्ध वादी को क्षतिपूर्ति का मुकदमा चलाने का अधिकार है। उपयुक्त दोनो प्रकार के क्षति यो के लिए वाटी को अधिकार रहता है कि वह चाहे तो सविदा के भगीकरण (Breach of Contract) के माधार पर मुकदमा चनाए या क्षतिकृत्य कानून के मतगत मुकदमा चलाए। प्रश्न ११५ --सविदा पर आधारित क्षविकृत्य की कार्रवाई म क्षतिपूर्ति किस प्रकार निधारित की जाती है ? उत्तर -क्षतिपूर्ति का निर्धारस-माम तौर पर सविदा पर भाषारित धातिकृत्य को कारवाई म सातपूर्ति वा निर्धारण उसी प्रकार हाना पाहिए जिस प्रकार सविता भगाकरण की कारवाई में दिया जाता है। ऐसे मामला में क्षतिपूर्ति मा मापण्ड (Measure of damage) यही होता है जोकि पक्षकारों ने सावदा के भतर्गत निर्धारित किया है । इसका कारण यह है कि ऐस मामलों म क्षतिपूर्ति दण्ड प्रयवा उगाहरण के रूप म नहीं, वरन् प्रतिकर (Compensation) के रूप मे प्रदान की जाती है। प्रश्न ११६ -संविदा से स्वतन्त्र और सविदा पर आधारित क्षति- कृत्यों के लिए वाद का समवर्ती कारस (Concurrent Causes of action) किन परिस्थितियों में पैदा होता है? उत्तर -पाद का समवर्ती फारस (Concurrent Causes of Action) -निम्नलिखित परिस्थितियों में सविदा स स्वतत्र भौर सविदा पर भाषा रित क्षतिपयों के लिए वार का समवर्ती कारण (Concurrent causes of action) होता है १२७ । सविदा पर माघारित क्षतिकृय (१) ऐसे मामलों में जब कि यह सदेहजनक हो कि सविदा किया गया है अपवा नही, मर्यात् वास्तविक रूप से तो सविदा न होने पर कानून के मतगत सविदा उपलसित (Implied) हो और एक ही कृत्य समान रूप से सविदा भगीकरण (Breach.of Contract) भी कहा जा सकता हो भौर क्षतिकृत्य भी माना जा सकता हो। (२) जवकि एक व्यक्ति मिही घटनामों के मतगत दूसरे व्यक्ति पर क्षति कृत्य के लिए मुकदमा चला सके मोर उन्हीं घटनामों के मतगत रिसी तीसरे व्यक्ति पर सविदा भगीकरण के लिए मुकदमा चला सके । ऐसे मामलों में वादी एक होता है पौर वाद के दो समवर्ती कारण होते हैं । (३) जवकि एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के किसी कृत्य के लिए जो उसके प्रति सातिकृत्य हो तया किसी तीसरे व्यक्ति के प्रति सविदा भगीकरण हो, मुकदमा चला सके । ऐसे मामलों में प्रतिवादी एक होता है और उसके विरुद्ध वाद व दो समवर्ती कारण होते हैं।
व्यापार सम्बन्धी क्षतिकृत्य (TORTS RELATING TO BUSINESS ) प्रश्न ११७ -व्यापार सम्बन्धी मिथ्या कथन की विवेचना कीजिए। उत्तर -व्यापार सम्बन्धी मिथ्या कथन (False statement relating to business) ~व्यापार सम्बधी मिथ्या कपन प्रकाशित करने पर प्रकाशक के ऊपर उस प्राशन द्वारा यापार को पहुँची क्षति के लिये क्षतिपूर्ति करने मा दायित्व पाता है, भले ही वह प्रकाशन अपमानकारी न हो। मिथ्या सवाद (Disparagement) का प्रकाशन ही द पपूण भावना का परिचायक है। यदि वह पिसी मानूनगत अधिकार से प्रकाशित हुमा है तो उसे प्रकाशित करने मे द्वपपूण भावना का मनुमान नही दिया जा सकता। यह रान स्मरणीय है कि यदि एक व्यापारी यह विनापन प्रकाशित भरता है कि उसकी वस्तुए माय व्यापारियों की वस्तुमों की अपेक्षा मधिर अच्छी है तो उसका यह प्रत्य ममियोज्य (Actionable) नही होगा पाहे यह मिथ्या एव देवपूण हो। [हाइट प्रति मिलिन (१८६५) ए० सी० १५४] प्रश्न ११८ -व्यापारिक प्रवियोग्यता (Business competition) पर संक्षिप्त टिप्परसी लिखिए। उत्तर व्यापारिक प्रतियोग्यवा (Basiness Competition) प्रत्येक व्यक्ति से यह मानूनो अधिकार प्राप्त है कि बह व्यापार गरे । यहि कानून द्वारा स्वीकृत व्यापार करने में वह मरने प्रतिद्वदी व्यापारियों के साथ होड लगाता है, उनके मूल्मों से कम मूल्य पर पती वस्तुओं को पैचवर उह बाजार से बाहर कर देता है तो उसका यह कृत्य कानूनी पृत्य कहलाएगा और इस प्रकार प्रतिदियों को जो हानि पदेगी, उस उत्तरदायित्व होड लगाने वाले व्यापारो पर कतई न होगा । इसका कारण यह है कि उचित प्रतियोग्यता (Fair Competition) बानून द्वारा स्वोरन है और ऐसी प्रतियोग्यता के परिणामस्वरूप किसी यो हानि परच तो हानिकर्ता उस हानि को पूरा करने के लिए बाध्य नही दिया जा साता, अर्थात् उसका हानिकारक पृत्य (Harmful act) अभियो य (Actionable) नहीं होगा। किन्तु यदि व्यापार समधी क्षतिकृत्य १२ प्रतियोग्यता द्वारा किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकारो यो भग किया जाए तव हानिकर्ता का कृत्य हानिकारक होन के साथ साय क्षतिपूरण (Wrongful) भी माना जाएगा और वह प्रतियोग्यता मनुचित प्रतियोग्यता ( Unfair competition ) कहा जापगी। एसी मनुचित प्रतियोग्यता वानून द्वारा स्वीकृत नहीं हैं । अतएव ऐसी अनुचित प्रतियोग्यता करने वाले के विरुद्ध क्षतिपूर्ति वसूल करन के लिए मुकदमा चलाया जा सकता है। एक सिद्धात के रूप मे यह बात स्मरणीय है कि मनुचित प्रतियाग्यता एक सामाजिक व प्राधिक बुराई है वितु वह कानूनी बुराई तभी मानी जाती है जब उसके द्वारा किसी के कानूनी अधिकारो का भगाकरण हो अथवा उसमें छल, कपट, क्षतिपूण मिय्या भाषण या मानहानि मादि के तत्व सम्मिलित हो जाए । प्रश्न ११६ -क्या सविदा भग करने के लिए प्रेरित करना एक भाभियोज्य क्षतिकृत्य है ? इस क्षतिकृत्य के तत्वों का वर्सन कीजिए। उत्तर -सविदा भग करने के लिए प्रेरित करना -किसी व्यक्ति को सवदा भग करन क लिए प्रेरित करना एक व्यापार सम्बधो क्षतिकृय है मोर पभियोग्य (Actionable) है । इस क्षतिकृत्य के मुख्य सत्व निम्नलिखित हैं (१) यह कि वादी तथा प्रय व्यक्ति के बीच एक कानूनी सविदा विद्यमान पा, (२) यह कि प्रतिवादी ने प्रय व्यक्ति को वादी स अपना सविदा भग बरन को प्रेरित क्यिा, एव (३) यह कि इस प्रकार का पृय परत के लिए प्रतिवादी के पास कोई काननी मौचिरय नहीं था। इस सदभ मे यह बात याद रखनी चाहिये कि वारी को इस प्रकार के मुकदमों में विशेष क्षति सिद्ध करना मनिवाय नहीं है । प्रश्न १२० -व्यापार सम्बन्धी क्षति कृत्यों के सदम में पड़यर (Conspiracy) की विवेचना कीजिय। उच्चर व्यापार सम्यन्धी इतिकृत्य और पड्यन्त्र -व्यापार करने के लिए दो या दो से पपित व्यक्तियों को कानूनो मधिकार है कि वे मिलकर एक सप मनाए या सामे गरी फ्म सोल में पोर इस प्रकार मिले-जुले प्रयास से व्यापार करें। यदि इस प्रकार मिलकर प्यापार परने से रिसो मय व्यापारी को सति पहेपठी है तो कोई व्यक्ति सतिप्राप्त व्यक्ति को क्षतिपूति देने का उत्तरदायी नहीं होगा। मेग्नि ऐमे व्यक्तियों को मिसार विसी प्रकार ऐसा पडपत्र रचने का अधिकार नहीं है, जिससे सिरिसी पर ध्यक्ति को अपने व्यापार में अति पहेथे । यदि दो या दो से मपिर प्यक्ति मिस पर रिसो गैर पादूनो कुल्य से करने के