Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Vayu Purana Khand-ii
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दो शब्द 'वायु पुराण' की विशेषतानी का वर्णन प्रथम भाग की भूमिया मे विरतारपूर्वक किया जा चुका है। इस दूसरे सण्ड में जो महत्वपूर्ण विषय पाठको यो मिलो उनसे पूर्ववर्ती धारणाओ यो और अधिक पुष्टि हो सकेगी। सृष्टि, प्रलय, जड-चेतन पदार्थों का पमा प्राविर्भाव, मानव-समाज का विकास, अनेकानेर राजवशी तथा उनको शाखामो का वर्णन आदि जो पुराणो वा मुख्य उद्देश्य माना गया है, वह इममे पूर्णम्प से पाया जाता है । पाठन जैसे-जैसे इस पुराण का अध्ययन करते जायगे उनको यह प्रतीत होता चला जायगा दि वास्तव में इस दृष्टि से इम पुराण वा स्थान अधिश पुराण पोर उपपुराणो से बहुत ऊँचा है। इम पुराण ये प्रतिपादित विपय यो अन्त तक देस जाने और विशेप कर इस दूसरे सण्ड के राज्य यशो ये विस्तृत वर्णन और गृष्टि तथा प्रलय के बुद्धिसगत विवेचन या पढने पर हमवो उन लोगो को यातो पर पुछ पाश्चर्य होता है जो इस पुराण को अटारह पुराणों में न मानकर 'शिवपुराण' वा एर अश मात्र बतलाते है। हममा ता इस पुराण को सम्पादन करने पर यह माम हुआ पि जहाँ अधिकांश पुराणो के बलेवर या एक बडा भाग साम्प्रदायिक दृयिोग मनिमो गई पयायो प्रयवा तोर्य, प्रत, दान आदि में विधानी से भरा पड़ा है यहाँ 'पायु-पुराग'मे इन बातो को यम से नम स्थान देकर उग वानो पा हो दिदिगन कराया है जो वास्तव में पुराणों के वयं पिय माने गये हैं। सृष्टि, जगत और मानव जाति के विकास पर विगार परना ही पुराण रचना का मुख्य उद्देश्य बतलाया गया है और वह हमको 'चायु-पुराण' मे अन्य पुराणो को अपेक्षा कहीं अधिक और समन्वयात्मक रूप से दिखाई पड़ता है। यद्यपि सभी पुराणो मे अलङ्कार, रूपक, उपमा, दृष्टान्त आदि की लेखन शैली पूर्ण मात्रा मे अपनाई गई है, जिससे कथा के रूप मे अपढ जनता को प्रापित करके धर्म तत्वो की शिक्षा दी जासके, तो भी इस दृष्टि से विभिन्न पुराणो के स्तर मे बहुत अन्तर दिखलाइ पडता है । अन्य पुराणो ने जहाँ लोगो को रुचि और पाकर्षण पर ही अधिक ध्यान दिया है 'वायुपुराण' में तथ्यो को प्रकट करने और प्राचीनता की एक प्रभावशाली झलक पाठको को दिखाने की चेष्टा की है। इसमें विभिन्न राजवयो की वशावलियो का जितने विस्तार के साथ वर्णन किया गया है वह इतिहास की दृष्टि से भी बहुत कुछ महत्व रखता है और अनेक इतिहास लेखको ने उसके आधार पर प्राचीन ऐतिहासिक युगो का निर्णय करने में पर्याप्त सहायता प्राप्त की है। इसी प्रकार लोक, परलोक, नर्क, स्वर्ग, भुवन आदि का वर्णन इसमे कथा और रूपको के बजाय विवेचनात्मक ढङ्ग से ही किया है, जिससे इमको गम्भीरता और प्रामाणिकता की वृद्धि ही हुई है। जो पाठक ध्यान पूर्वक इसका अध्ययन करेंगे वे, हमारा विश्वास है कि उपयुक्त निष्कर्षों पर पहुंचे बिना न रहेगे। --सम्पादक ।
विषय-सूची अध्याय पृष्ठ संख्या ६ - ४३ प्रजापतिता वीर्तन- सहिताभी के निर्माता ऋषियो के नाम, पाशवल्क्य का नवीन साहिता निर्माण, मायुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्वशास्त्र, अर्थशास्त्र, और चौदह विद्यामों का विकास । ४४. पृथ्वी दोहन- स्वायम्भुद, स्वारोचिष आदि-आदि १४ मन्व-नरो का वणन, राजा पृथु द्वारा अन्न की कृषि का मारम्भ । ४५ पृथुवा कीर्तन- विभिन्न मन्वन्तरो मे पृथ्वी का दाहन करने वाले मनुप्रो का वर्णन, दक्ष प्रजापति द्वारा मृष्टि की वृद्धि। ६७ ४६ वैवस्वत-सर्ग वर्णन- मरीदि, बश्यप से देवो तया परमपियो की उत्पत्ति । ४७ प्रजापति वशानुकीर्तन- ववस्वत मनवन्तर में देव, ऋषि, दानव, पिता, गन्धर्व, यक्ष आदि की मृष्टि और वृद्धि। ४८ ऋषि वशानुकीर्तन- द्विज, विश्वेदेव, प्रजापति, मस्त, दानव, यक्ष, राक्षस, पितृ, भूत, पशु, पक्षी, नाग, अप्सरा प्रादि के मधिपतियो का वर्णन । १०५ - . - अध्याय पृष्ठ-संख्या ४६ गन्धर्व-मूछना लक्षण- नाभाग, क्षुप, करन्धम, मरत राष्ट्रवधन, तृणविदु, रक्त प्रादि गजामों का वर्णन ५० गीतालङ्कार निर्देश- चावय, अर्थ. पारोहण, अवहोरण, वाच मादि का परिचय । १२८ ५१ वैवस्वत मनुवश वर्णन- राजा इक्ष्वाकु के वश में युवनाश मान्याता, मम्बरीप, पुरुकुरस, मुचकुन्द, हरिश्चन्द्र, सगर, दिलीप यादि रामायो का वर्णन । ५२ सोमोत्पत्ति वर्णन- निमि क दशके राजामो का नाम 'जनर' कहा जाना। सीताजी के पिता सीरध्वज का उल्लेग। (२) चन्द्रमा द्वारा दुध की उत्पत्ति और महर्षि प्रति द्वारा उमरी रोग मुक्ति धादि। ५३ चन्द्रवशकीर्तन-(१) राजा पुरूरवा और उर्वशी को रण। राजा एल द्वारा तीन अग्निया या विभाजन, जह नु का गढ़ापान, विश्वामित्र बा यश।' १७८ ५४ रजियुद्ध वर्णन~ धन्य तरि की उत्पत्ति, द्विारा दातवा या पराभव ! ५५ चन्द्राय भीतर-(२) राजा मरत, नहप, ययाति की क्या । पुरे भाग ययानि शे वृद्धावाधा रहण करने का उपायान। - अन्याय प्रय माया - १६ पाणी अर्जुन उत्पत्ति- बारवीर्य जुन द्वारा गाना सा की विनर, गाएको वाणाना, नियामयिा जाना। २२६ 10 जयागा था- मागीय जाग या जाता। ५८ पिया यगन ग्यालर मलि मा पपा । श्रीव या वर्णन । २१ शम्भुनर वाणी- भूपिया द्वारा पियारी शिनाया मा बगान पोर नाग पर- भार मामय ! पया। युगपति प्रोर गुrna ६० विष्णु माय पीती- माय मोर मी या IIR हाया । पर पाया गपणापा यस्य । ६. माराममारि- - - वर्णन, चतुष्पद, अध्याय पृष्ठ-संख्या ६३ शिवपुर वर्णन- भु भव प्रादि सात लोगो का वर्णन, वराजा कल्प वाले, अयुत, कोटि, अर्बुद निर्बुद, मादि को गणना, महालोक, जन. तोक भादि का विवरण, नरक, द्विपद, तिर्यक मादि को गणना, शिवपुर का परम ऐश्वयं । ३६५ ६४. प्रलयादि पुनः सृष्टि वर्णन सप्तद्वीप, समुद्र, पर्वत मादि का नष्ट होकर पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आदि पञ्चतत्वो का एक-एक करके दूसरे में लीन होते जाना । धर्म मधर्भ पोर तीनो गुणो की स्थिति । ६५ सृष्टि वर्णन- प्रलय के पश्चात् सृष्टि का फिर से विकाश बैसे होता है ? सम- विषय-व्यक्त भव्यक्त का कथन । ब्रह्मा की उत्पत्ति । वायु- पुराण का महत्व ६६ व्यास सशय वर्णन- निराकार ब्रह्म प्रकृति तथा भक्ति मार्ग मोर ज्ञान मार्ग का निरूपण । अक्षर ब्रह्म से परे और कोई नहीं है, वही सब कारणो कारण है। ६७ गया महात्म्य- श्री सनत्कुमार द्वारा गया तो की प्रशसा मौर महात्म्म । गया श्राद्ध द्वारा पितरो के उद्धार को कथा। - ४८० ४६५ वायु-पुराण [ दूसरा खराड ] ॥ प्रकर्ण ४३-प्रजापति वंश कीर्तन ।। भारद्वाजो याज्ञवल्क्यो गातवि साल स्तिथा । धीमान् शतबलाकरच नैगमश्च द्विजोत्तम ॥१॥ वायलिश्च भरद्वाजस्तिस्र प्रोवाच सहिता । रथोतरो निरक्तच पुनश्चक्र चतुर्थवम् ॥२॥ अयस्तस्याभन्दिन्या महात्मानो गुणान्विता. । धीमानन्दायनीयश्च पन्नगारिश्च बुद्धिमान् । तृतीयश्चार्यदस्ते च तपमा शमितव्रता ॥३॥ वीतरागा महातजा• सहिताज्ञानपारगा । इत्येते यह.चा प्राक्ता सहिता ये प्रयत्तिता ॥४॥ शम्पानगायोऽयो यजुर्वेद व्यकल्लयत् । पडशीतिस्तु येनोक्ता महिता यजुपा शुभा ॥ शिष्येम्प प्रददौ तान जगृहुस्ते विधानत । एक्स्तत्र परित्यक्तो याज्ञवल्क्यो महातपा । पडमोतिश्च तस्यापि सहिताना विकल्पका ॥६ सर्वेपामेय तेपा नै विधा भेदा प्रतिता । त्रिधा भेदास्तु ते प्रोता भेदेऽस्मिन्नवमे गुभे । पियो न रहा-मारद्वाज-यावलय-गार-मानरि-धीमार मान- रनार-नंगम जो हिना म अंध ये-यापलि-भरद्वाज-इनने तीन महिना रही पिर रयोगर न चतुर्य तिरुक्त किया या ||२|| उसके गुणरे मे
[ वायु पुराए
नन्दायनीय पनगारि और बुद्धिमान् तृतीय प्राचाय था। वे तप से शासित प्रत
वाले थे ।।३।। ये सब वीतराग महान् तज से युक्त और सहिताओ क ज्ञान के
पारगामी थे। ये सब वह वृच कहे गये हैं जिहोंने सहिताया का प्रवृत्त किया
था ॥४॥ यह वैशम्पायन गोत्र वाला था जिसन यजुर्वेद को विशेष कल्पना
की थी। जिसने यजुर्वेद की शुभ छयासी सहिताएं कही थी ॥५) उनको
शिष्यो के लिए दिया था मोर उहोने विधानपूब क उहे ग्रहण किया था। वहाँ
पर एक महा तपस्वी याज्ञवल्क्य परिपक्व थे। उसके भी छयासी सहिताको
के विकल्प थे ।।६। उन सबके तीन प्रकार के भेद प्रकाशित किए गए हैं । इस
शुभ नवम भेद में तीन प्रकार के भेद कहे गये हैं ।।७।।
उदीच्या मध्यदेशाश्च प्राच्याश्चैव पृथग्विधा ।
श्यामायानरुदीच्याना प्रधान सम्बभूव ह ॥८
मध्यदेशप्रतिष्ठानामारुणि प्रथम स्तुत ।
बालम्बिरादि प्राच्यागान्त्रयोदयादयस्तु त ॥
इत्यते भरका प्रोक्ता सहितावादिनो द्विजा।
ऋपयस्तद्वच श्रुत्वा सूत जिज्ञासवोऽव वन् ।।१०
चरवान्धर्यव केन कारण बाहि तत्त्वत ।
किञ्चीणं कस्य हेतोश्च वाचकत्वञ्च भेजिरे।
इत्युक्त प्राह तेपा स चरकरवमभूधया ॥११
कार्यमासीहपोरणाञ्च किञ्चिन्द्राह्मणससमा ।
मेस्पृष्ठ समासाद्य तस्तदा त्विति मनितम् ॥१२
यो नोऽत्र सप्तरात्रेग नागन्छेद्विजसत्तमा ।
स कुर्याग्रह्मवघ्या व सगयो न प्रकीर्तित ॥१३
ततस्त सगणा सर्वे वैशम्पाय नवजिता ।
प्रययु सप्तराए यत्र सन्धि कृतोऽभवत् ॥१४
उदीच्य मध्यदेश और प्राच्य पृथक् विध थे । उदीच्या म स्यामायनि
प्रधान हुआ था | मध्यदेश के प्रतिष्ठानो म अरुणि प्रथम वहा गया है।
प्रजापति वा पीतन ]
[ १९
प्राच्यो म मादि आलम्बि थे वे त्रयोदशी प्रादि थे ये सव द्विज जो कि
सहिनायो के वादी थे चरक कहे गए थे। ऋपिपा ने उनके वचन जो सुनकर
जिज्ञासु होते हुये वे सूतजी स वाले 11१०॥ चरक और प्राध्वयव किम से हुए।
इसका कारण तत्वपूर्वक बतलाइये । क्सिके हेनु मे क्या चौण और वाचकत्व
का सेवन किया था। इस प्रकार से वहे हुए उसने जैसे चरक्त्व उनका हुना
था कहा । ॥११॥ श्री सूतजी ने कहा है ब्राह्मण श्रष्ठा ! ऋपिया का क्या
काय था यह मेरु के पृष्ठ पर जाकर उहोने मत्रणा की थी ॥१२॥ हे द्विज
सत्तमा । जो यहाँ सात दिन ता नहीं पाये वह ब्रह्मवध्या करे। इसका समय
नहीं कहा गया है ।१३।। इसके पश्चात गरगो के साथ वे मब वैशम्पायन को
छोड क सात दिन में चले गये जहाँ दि धि यी हुई थी ।।१४॥
ब्राह्मणानान्तु वचनाद्ब्रह्मवध्याञ्चकार स ।
शिष्यानथ ममानीय स वशम्पायनोऽप्रवीत् ।।१५
ब्रह्मवध्यान्चरध्व वै मत्सृत द्विजसतमा ।
सर्वे यूय समागम्य दूत ने तद्धित वच ॥१६
अहमेव चरिष्यामि तिष्ठन्तु मुनयस्त्विमे ।
वनन्चोत्थापयिष्यामि तपसा स्वेन भावित ॥१७
एवमुक्तस्तत ऋद्धा याज्ञवल्क्यमथाब्रवीत् ।
उवाच यत्वयाधीत सर्व प्रत्यपयस्वमे ॥१८
एवमुक्त स रूपाणि यजू पि प्रददौ गुरो ।
रुधिरेण तयाक्तानि छदित्वा ब्रह्मवित्तम ॥१६
तत स ध्यानमास्थाप सूयमाराधयद्विजा ।
मर्यब्रह्म यदुच्छिन्न र गत्वा प्रतितिष्ठति ॥२०
तती यानि गता-यूद्ध यजू प्यादित्यमण्डलम् ।
तानि तस्म ददौ तुष्ट मर्यो वै ब्रह्मरीतय ।
अश्वरूपाय मार्तण्डो याज्ञवल्क्याय धीमते ॥२१
ब्राह्मणों के वचन मे उमने ब्रह्मवघ्या को दिया था। इसके प्रनतर
उस वंशम्पायन ने नियोको लावर वहा ॥१शाह द्विज सत्तमा ! मरे लिय
१२ ] [ वायु पुराण ब्रह्मवध्या को करो माप अब लोग पावर तक्षति वचन मुझे बोलो ॥१६॥ याज्ञवल्क्य ने कहा-मैं ही करूंगा ये मुनिगण टहरे। अपन तप से भाक्ति होता हुआ मैं बल को उत्थापिन करूगा ॥१७॥ इस प्रकार से बहे हुए वह कद होकर याज्ञवल्क्य से बोले कि जो भी तुमने पढा है उस सदको मुझे अर्पण कर दो-यह कहा ॥१८॥ इस प्रकार से कहे जाने वाले ब्रह्मवित्तम उसने रुधिर प्रक्त रूप यजु को यदि घर के गुरु को दे दिया था ॥१६। इसके अन. न्तर उप्सने हे द्विजा | ध्यान में स्थित होकर मूर्य पी माराधना की थी। जो उच्छिम सूर्यब्रह्म था और प्राकाम में जाकर प्रतिष्ठिन होता है। इसके पश्चात जो यजु ऊध्व भाग मे गए थे और आदित्य मण्डल मे स्पिति थे उनको मातुष्ट होने वाले सूर्य ने ब्रह्म रीति के लिए उसे दे दिया था। धीमान याज्ञवल्कर उस समय मश्व के रूप में थे। ऐसे याज्ञवल्क्य के लिए मातण्ड ने यजु दिए थे ॥२०॥२१॥ पजू प्यधीयन्ते यानि ब्राह्मणा येन केन च । अश्वरूपाय दत्तानि ततस्ते वाजिनोऽभवन् ।।२२ ब्रह्महत्या तु वैश्वी चरणाचरका स्मृता । वैशम्पाय शिष्यास्ते चरका समुदाहता ॥२३ इत्येते चरका प्रोक्ता वाजिनस्तानिबोधत । याज्ञवल्क्य स्वशिप्यास्ते कण्ववैधेयशालिम २४ मध्यन्दिनरच शापेयी विदिग्धश्चाप्य उद्दल । ताम्नायणश्च वात्स्यश्च तथा गालवरी शिरी। आटवी च तथा पी वीरगी सपरायण ॥२५ इत्येते वाजिन प्रोक्ता दश पञ्च च सस्मृता । शतमेकाधिक कृत्स्न यजुषा वै विकल्पका. ॥२६ पृत्रमध्यापयामास सुमन्तुमथ जैमिनि । सुमन्तुश्चापि सुत्वान पुत्रमध्यापयत्प्रभु । सुकर्माण सुत सुत्वा पुत्रमध्यापयत्प्रभु ॥२५ प्रजापति वश कौन ] [ १३ स सह्य मधीत्यागु मुकर्माप्यथ सहिता । प्रोवाचाय सहस्रस्य सुकर्मा सूर्यवर्चस ॥२८ जिस किमी के द्वारा ब्राह्मण जिम यजु का अध्ययन करते हैं वै अश्व- प पाने के लिये किये हुये हैं इसम वाजिन हुए और कहे भी जाते हैं ॥२२॥ जिन्होंने चरण में ब्रह्महत्या को चीणं किया था वे चरक कहे गए हैं। ये वैश- म्यायन के शिष्य हैं जो वरव' रहे गये हैं ॥२३॥ इतने पे चरख' कहे गये हैं अव उन वाजिनो को जान लो । याज्ञवल्क्य के वे शिष्य है जो करव वैधेयशाली हैं ॥२४॥ मध्यान्दिन--शायी - विदिाय • उद्दल ताम्रायण-- वात्स-पालव- शशिरी-आटवी-पर्णी-वीरणी-मयरायरण-ये इन्ने वाजिन इम नाम से यहे गये हैं ये दश और पांच कुल पन्द्रह होते हैं। यजुषी का पूर्ण विकल्प एक्सौ एक है ॥२५॥२६॥ इसके मनन्तर जैमिनि ने मुमतु अपने पुत्र को पढ़ाया था। सुमन्तु प्रभु ने भी अपने पुत्र गुत्थान से पढाया था। सुत्वा ने अपने पुष मुकर्मा नो पढाया था ।।२७। इसके पश्चात् मुकर्मा ने भी मोघ एक सहम महितामो का अध्ययन कर के मूर्य वर्चम सुवर्मा ने सहन को बोला था ॥२८॥ अनध्यायवधीयानास्ताजघान शतक्रतु । प्रायोपवेशमकरोत्ततोऽमो शिष्यकारणात् ।।२६ कुद दृष्ट्वा तत शको परमस्मै ददौ पुन । भाषिनी ते महावीर्यो शिघ्यावयलवर्चसौ ।।३० अधीयानो महाप्राज्ञी राहा राहितावुभौ। एतो गुरौ महाभागो मा मध्य द्विजसत्तम ।।३१ इत्युक्त्वा वासव थीमान्सुकर्माप यशस्विनम् । शान्तबोध द्विज दृष्ट्वा तत्रैवान्तरधीयत ॥३२ तम्य गिप्यो भवेद्धोमान्पोप्यम्जी द्विजसत्तमा । हिरण्मनाभ कौशिक्यो द्विजयोऽभूनराधिप ॥३३ मध्यापयत्तु पोष्यजी महस्रद्धन्तु सहिला । तेनान्योदीयामामान्या गिध्या पोष्यजिन गुभा ॥३४ [ वायु पुराण शतानि पञ्च कौशिक्य सहितानाच वीर्यवान् । शिष्या हिरण्यनाभस्य स्मृतास्ते प्राच्यसामगा ।।३५ अनध्याय के दिन में अध्ययन करने वाले उनको शतवतु (इन्द्र) ने मार दिया था। इसके पश्चान् शिप्य के कारण से इसने प्रयोपवेदा (भोजन का त्याग कर दिया था ॥२६॥ इसके पश्चात् फिर इसको कद्ध देख कर इन्द्र ने बरदान दे दिया था कि ये अलन, वर्चस दोनो शिष्य महान् वीर्य वाले होगे ॥३०॥ हे द्विज सत्तम । महा प्राज्ञ पढने वाले सहस्र सहिता वाले ये दोनो गुर महान भाग वाले है आप कोच न करें॥३१॥ यह यह वर श्रीमान् इन्द्रदेव यशस्वी और क्रोध के शान्त हो जाने वाले द्विज मुकर्मा को देख कर वहाँ पर ही अन्तर्धान हो गए थे ।।३२।। हे द्विज सत्तमा । उसका शिष्य बहुत ही बुद्धिमान् और पायजी हुप्रा--हिरएयनाभ--कौशिक्य और दूसरा मराधिप हुमा ॥३३॥ पोप्यजी ने भाधा सहत सहिता का अध्यापन किया था। इमसे अन्योदीच्य सामान्य पोप्पजी के शुभ शिष्य हुए और महितानो के पांच सौ वीर्यवान् कौशिक्य हुये। हिरण्यनाम के शिष्य प्राच्य सामग कहे गए हैं ॥३५॥ लोकाक्षी कुथुमिश्चैव कुशीती लाङ्गलिग्तथा । पौप्यजिशिध्याश्चत्वारस्तेषां भेदान्निबोधत ॥३६ राणायनीय स हि तण्डिपुत्रस्तस्मादन्यो मूलचारी सुविद्वान् । सकतिपुन सहसात्यपुत्र एतान् भेदान विरा लोवाक्षिणस्तु ॥५७ श्रयस्तु कुथुमे पुत्रा औरमो रसपासर । भागवित्तिश्च तेजस्वी त्रिविधा कौथुमा स्मृता ॥३८ ॥३८ शौरिद्यु, शृमिपुत्रश्चद्वावेतो चरितव्रतो। राणायनीय सौमित्रिः सामवेदविशारदौ ॥३६ प्रोवाच सहितास्तिन. श्रमिपुत्रो महातपाः । चैल, प्राचीनयोगश्च सुरालश्च द्विजोत्तमाः १४० प्रोवान सहिताः पटनु पाराशर्यस्तु कौथुमः। ग्रामरायणवंगाख्यो वेदवृद्धपरायणी ॥४१ प्रजापति व कीर्तन ] प्राचीनयोगपुत्रश्च बुद्धिमाश्च पतञ्जलि । चौथुमस्य तु भेदास्ते पारागर्यस्य पद स्मृता । लाङ्गलि शालिहोत्रश्च पट पट प्रोवाच सहिता ॥४२ पोप्यञी के चार गिप्य थे उनके नाम लोवाक्षी-बुथुमि-कुदीती और लागल थे । अब उनके भेद बतलाये जाते हैं उ हैं आप लोग समझ लेवें ॥३६॥ तरिड का पुत्र वह राणायनीय था। उससे अन्य मूलनारी था जो कि बहुत अच्छा विद्वान् था । सकति पुत्र सहमात्य पुत्र ये लोकाक्षी के भेद जानो ॥३॥ कुथुमि के तीन पुत्र औरस-रमपारम और भाग वित्ति ये तीन प्रकार वाले तेज- युक्त कोथुम कहे गये हैं ॥३८॥ शौरिद्य -ङ्गिपुत्र दो ये चरित प्रत वाले थे। राणायनीय और सौमित्रि में दो दोनो सामवेद के पण्डित थे ॥३६॥ महान् तपस्वी ऋङ्गिपुर ने तीन सहिता कही थी। हे द्विजोत्तमो ! चैल, प्राचीन योग, सुराल इनने छ सहिता बोली यो, इनमे पाराशयं प्रोर कोयुम भी हैं। प्रासुरायण और वैश नाम वाले दोना वेद वृद्ध मे परायण थे॥४१॥ प्राचीन. योग का पुत्र पतञ्जलि वढा बुद्धिमान था। बौघुम के वे भेद पाराशर्य के छ कहे गये हैं। लाङ्गनि और शालिहोत्र ने 2-छ महिना बतलाई हैं ॥४२।। भालुकि कामहानिश्च जैमिनिर्लोमगायिन । कण्डन वोलहश्च व पडेते लाडला स्मृता । एते लाङ्गलिन. शिष्या सहिता यै प्रमाधिता ॥४३ ततो हिरण्पनाभम्य कृतशिध्यो नृपात्मज । सोऽकरोच चतुर्विशत्सहिता द्विपदा वर । प्रोवाच चंव शिष्येभ्यो येभ्यस्ताश्च निवोधत ४४ राइश्च महवीयश्च पञ्चमो वाहतस्तथा । तालव पाण्डवश्चीप कालिको राजिवस्तथा। गौतमश्चाजबम्नध सरेमराजापतत्तन ॥४५ पृष्टघ्न परिकृष्टश्च उलूखलक एव च । यवीयसश्च वैशाली अगुलीयश्च कौशिक ||४६ सलिमअग्मित्यश्च वापीय कानिवनय ।
[ वायु पुराण - पराशरश्च धर्मात्मा इति क्रान्तास्तु सामगा ||७|| सामगानान्तु सर्वेपा श्रेष्ठो द्वौ तु प्रकोत्तितो। पोष्यश्चिश्च कृतिश्चैव सहितोना विकल्पको १४८ अथर्वाण द्विधा कृत्वा सुमन्तुरददद्विजा । क्वन्धाय पुन कृत्स्न स च विद्याद्यथाक्रमम् ॥४६ क्बन्धस्तु द्विधा कृत्वा पय्यायक पुनर्ददौ । द्वितीय वेदस्पर्शाय स चतुर्कीकरोत् पुन १५० भालुकि, कामहानि, जैमिनि, लोमगापिन, कराड, कोलह ये है लाइन पहे गये हैं। ये लाङ्गलि के शिष्य हैं जिहोने सहिताएं प्रसापित की हैं ॥४॥ इसके पश्चात् हिरएपनाभ के कृत शिष्य नृपात्मज हुए। द्विपदो म श्रेष्ठ उमने चोवीम सहिताऐ की हैं। और फिर उनको शिष्यो के लिये बोला था। जिन शिष्यो को बोला था उन्ह पाप मुभसे जानती ॥४४|| राड, महावीय, पचम, वाहन, तालक, पाण्डा, कालिक, राजिव, गौतम, प्राजवस्त, मोम राजापनन्, पृष्टप्न, परिकृष्ट, उलूपलक, यवीयम, वंशाल, सगुलीय, पौशिक मानिम, जरि- सत्य, कापीय, कानिक और धर्मात्मा पाराशर ये सब सामगा परिक्रान्त हुए है ॥४७॥ समस्त सामगो म दो अत्यन्त श्रेष्ठ प्रीतित हुए हैं। सहिनामो के विकल्पक वे दोना पोष्यन्जि और कृति हैं ॥४८॥ हे द्विजा । सुमन्तु ने प्रया को दो करके दिया था। फिर क्वन्ध के लिये मम्पूर्ण दिया था और उसने यथाक्रम उसे जाना है। कबध ने भी दो प्रकार का वरके उनमे स एक को फिर पथ्य के लिए दिया था। दूसरा वेदस्पन के लिये दिया था और फिर उसने उसे चार प्रकार का कर दिया था ॥४६॥५011 मोदो ब्रह्मवतश्च व पिप्पलादस्तथैव च शोधायनिश्च धर्मज्ञश्चतुर्थम्तपन स्मृत । देदस्पर्शस्य चत्वार शिध्याम्त्वेते दृढव्रता ॥५१ पुनश्चत्रिविध विद्धि पथ्याना भेदमुत्तमम् । जाजलि वुमुदादिव तृतीय शोना स्मृत ।।१२ शोनास्तु द्विधा कृत्या ददावैक्न्तु वभ्रवे ।
प्रगापति व कीर्तन ] [ १७ द्वितीया सहिता धीमान्सैन्धवायनस जिते ।।५३ सैन्धवो मुलकेशाय भिन्ना सा च द्विधा पुन, । नक्षत्र कल्पो वैतानस्तृतीय सहिताविधि । चतुर्थोऽङ्गिरस कल्प शान्तिकल्पच पचम ॥५४ श्रेष्ठस्त्वयर्वरणे ह्य ते सहिताना विकल्पना । पटश कृत्वा मयाप्युक्त पुराणमृपिसत्तमा ॥५५ आय मुमति/मान्याश्यपो ह्यकृतन्त्रण. । भारद्वाजोऽग्निवर्गाश्च वसिष्ठशे मित्रयुश्व य । मावणि सोमदत्तिस्तु सुशर्मा शाशपायन. ।।५६ एते शिष्या मम ब्रह्मन् पुराणेपु दृढव्रता । त्रिमिस्तिस्र कृतास्तित्र सहिता पुनरेव हि ॥५७ बेवस्पर्श के रढ व्रत वाने चार शिष्य हुए थे। ब्रह्मरल चाला मोद, पिप्पलाद, धर्म का ज्ञाता गौरवायनि और चौया तपन ये चारो के नाम पता गये है ।।११॥ फिर पथ्या के तीन प्रकार के उनग भेद जान लो । एक जाजलि दूसरा कुमुदादि पोर तीमरा पौनक कहा गया है । ५२॥ शौनक मे दो भेद परके उनमे से एक बभु के लिये दिया था। द्वितीय जो महिता था उसे उग परम बुद्धिमान् ने मन्धवायन नाम वाल को दिया था ॥५॥ मैन्धव ने मुज देश के लिये दी फिर वह दो प्रकार को भेद वाली हुई थी। नक्षत्र क्ला, वनान, तृतीय सहिता विधि, चतुर्थ अङ्गिरस क्ल्प, पचम शान्ति कल्प होना है ॥४४॥ ये जो महितारो के विकल्पन है उनमे अथर्वण श्रेष्ठ होता है । हे ऋपि मत्तमा छ प्रकार से करके मैंने भी पुराण को कहा है ॥५५॥ पाय, सुमति, धीमान्, काश्यप, प्रकृतत्रण, भारद्वाज, अगिवर्चा, वमिष्ट, मित्रयु, माणि, सामदत्ति, सुशर्मा, शाशयायन ये इतने पुराणा में दृढवत दाले मेरे मिप्य थे। फिर तीनो ने तीन सहितायां के तीन रिय ॥५६॥५॥ काश्यप सहितारर्ता सागि माशपायन । सामिका च चतुर्थो स्यात्मा चंग पूर्वमहिना १५ मस्तिाहि चतुष्पादा मश्चिकार्यवाचिका ।
१८ ] [ वायु पुराण पाठान्तरे पृथग्भूता वेदशाखा यथा तथा । चतु साहस्सिा सर्वा शाशपायनिकामृते ॥५६ लोमहपंणिका मूलास्तत वाश्यपिका परा । सारिणकास्तृतीयास्ता यजुर्वाक्यार्थपण्डिता ॥६० शाशपायनिकाश्चान्या नोदनार्थ विभूपिता । महस्राणि चामष्टौ पटगतानि तथैव च ॥६१ एता पचदशान्याश्च दशान्या दशभिस्तथा । वालखिल्या समप्रंसा (पा) मसावर्णा प्रकीर्तिता ॥६२ अष्टौ सामसहस्राणि सामानि च चतुर्दश। आरण्यक सहोमच एताद्गायन्ति सामगा ॥६३ काश्यप, सावणि प्रौर शाशपायन महितार्ता है और यह पूर्व सहिता चौथी मामिका होती है। वे सब चार पादा बाली हुआ करती हैं और मभी एकार्थ की वाचिका भी होती हैं। वेद की शाखाएं यथा तथा पाठान्तर में पृथव होती है । शाशपायनिका के बिना सब चार सहस्र वाली हैं 11५८॥५६॥ मूल लोमहपणिका है, इसके पश्चात् काश्यपिका होती हैं। तृतीय सापिका है वे यजु के वाक्याथ की परिडत होती हैं ॥६॥ मय जो शाशपायनिका शाखाऐ हैं वे मोदन के अर्थ से विभूषित होती हैं। ऐसे ये कुल पाठ सहस्र छ सो ऋचाएं हैं ॥६१॥ ये अय पचदा हैं और दूनी दश के माथ दश हैं बालखिल्या जो हैं वे समप्रपा समावर्णा कही गई हैं । ६२॥ आठ साम महल पोर चौह साम हैं। सामगा लोग इसको आरण्यक और सहोम गाया करत हैं ॥३॥ द्वादशव सहस्राणि छन्द प्राध्वर्यव स्मृतम् । यजुपा ब्राह्मणानाच यथा व्यासो व्यकल्पयत् ॥६४ सग्राम्यारण्यन्तस्यात्समन्त्रकरण तथा। अत पर क्थानान्तु पूर्वा इति विशेषणम् ॥६५ ग्राम्यारण्य समन्त्रच ऋग्न झणयजु स्मृतम् । हारिद्रवीर्याग्गा खिलान्युपम्बिलानि च ।
प्रजापति वा वीर्तन ] [ १६ तथैव तैत्तिरीयाणा परक्षुद्रा इति स्मृतम् ॥६६ द्वे सहस्र शतन्यूने वेदे वाजसनेयके । ऋग्गण परि सख्यातो ब्राह्मणतु चतुर्गुणम् ॥६७ अष्टौ सहस्राणि शतानि चाष्टौ अशीतिरन्यान्यधिकश्च पाद । एतत्प्रमाण यजुपामृचाव सशुक्रिय साखिल याज्ञवल्लयम् ॥६८ तया चरण विद्याना प्रमाण सहिता शृणु। पट साहस्रमृचामुक्तमृच पड्विंशति पुन. । एतावदधिक तेषा यजु काम विवक्षति ॥६E एकादश सहस्राणि ददा चान्या दशोतरा। चान्दश सहस्राणि अशीतिविशतानि च ॥७० सहस्रमेक मन्त्राणामृचामुक्त प्रमाणत । एतावद्भमुविस्तारमन्यचाविक बहु ॥७१ बारह सहस्र छन्द प्राध्वर्यद कहे गये हैं। यजु का और ब्राह्मणी का अर्थात बाहाया भागो का जिस तरह व्यास प्रर्थान् विस्तार कल्पित किया है।" ॥६४।। वह सग्राम्यारण्यक तया समन्त्रकरण होता है। इसमे पागे कथानी का तो पूर्वा यह विशेषगा होना है ।।६५।। ग्राम्यारण्य और ममन्त्र क्-ध्राह्मरण और यजु कहा गया है। इसी प्रकार से हारिद्रवीयों के खिलामि एव उपखि• मामि तथा तैत्तिरीयो के परशुद्रा कहा गया है ।।६६॥ सौ क्म दो हजार वाज- मनेयक वेद में ऋक् गरण की परिसध्या की गई है, ब्राह्मण भाग तो चौगुना होता है ।।६७।। पाठ महस्र प्राठमो प्रस्मी अन्यान्य और अधिक पाद होता है। यह प्रमाण यजु का और मशुक्रिया माखिल याज्ञवल्क्य ऋक् का है ॥६८)) उमी प्रकार में चरण विद्यानो का प्रमाण एव महिना का श्रवण करो। छ सहस्र छन्बीस ऋचायो का कहा गया है। इतना अधिक उनका यजु है जो काम को कहता है ॥६६॥ ग्यारह हजार दशोत्तर और अन्य दश है। दम सत्य तीन मी अस्मी ऋए हैं [७०।। ऋचायो, मन्त्रा का एक मह्य प्रमाग से कहा है । इतना ऋक का विस्तार है और अन्य बटुन प्राविक होता है 11७॥
२२ ] [ बायु पुराग प्रत्यूप का पुर कहा गया है ।।१४।। पर्यन और नारद ये दोनो कश्यप के पात्मन हैं। ये देशो को भूष करते हैं इसी कारण वे देवपि पह गये हैं 11८५ मानवे वैपये वो ऐलवदो च ये नृपा । ऐला ऐदवार नाभागा शेया राजर्षयस्तु ते ॥६॥ ऋपन्ति रजनाद्यस्मात्प्रजा राजर्पयस्तत । ब्रह्मलोकप्रतिष्ठास्तु स्मृता ब्रह्मर्पयो मता ॥७॥ देवलोकप्रतिष्ठाश्च ज्ञेया देवर्षय शुभा । इन्द्रलोकप्रतिष्ठास्तु सर्वे राजर्पयो मता. अभिजात्या च तपसा मन्त्रव्याहरणस्तथा। एव ग्रहार्पय. मोक्ता दिव्या राजर्पयस्तु ये ।।६।। देवपयस्तथान्ये च तेषा वक्ष्यामि लक्षणम् । भूतभव्यभवज्ञान सत्याभिव्याहत तथा ॥६॥ सम्बुद्धास्तु स्वय ये तु सम्बुद्धा ये च में स्वयम् । तपसेह प्रसिद्धा ये गर्भयंश्च प्रणोदितम् | मन्त्रन्याहारिणो ये च ऐश्वर्यारसनगाश्च ये। इत्येते ऋषिभिर्युक्ता देवद्विजनृपास्तु ये ॥२॥ एतान् भावानधोयाना ये चैत ऋषियो मता. । सप्तते ममभिश्चैव गुरणे सतर्णय स्मृता । ६३॥ मानव बंपय वश में और ऐल वा मे जो राजा हैं वे ऐन ऐक्ष्वाक और नाभाग राजर्षि जानने के योग्य हते हैं ॥८६॥ ऋप करते हैं और प्रजानो का रम्जन करते हैं इगलिये इन्हें राजपि वहा गया है। ब्रहा लोक प्रतिष्ठा बाते ब्रह्मपि माने गये हैं ॥८७) देवलोक म प्रतिष्ठा वाले शुभ देवपि कहे गये हैं। इन्द्र लोक में प्रतिष्ठा काले सब राजर्षि माने गये हैं 141) अभिजानि से और तप से तथा मन्त्रो के व्याहरणो से इस प्रकार से ब्रह्मर्षि दिग्य तथा राजर्षि कहे गये हैं ॥८६॥ जो अन्य देवपि हैं उनके लक्षण मैं बतलाऊँगा। भूत- भव्य भव का ज्ञान तथा सत्याभिव्याहुत भी बतलाया जायगा 1801| जो स्वय ही सम्बुद्ध हुए और जो य सम्बुद्ध हैं, यहाँ जो तप से प्रसिद्ध हुए और जिन्होने गर्भ म प्रजापति वश कीर्तन ] [ २३ प्रणोदित किया, जो मन्त्रो के व्याहरण करने वाले हैं और जो ऐश्वर्य से सर्वत्र गमन करने वाले हैं, ये देव-द्विज और नृप भूपियो से युके हैं। इन भायो का अध्ययन करते हुए और जो ये ऋपि माने गय हैं वे सप्त गुणो से युक्त सात ही हैं इसीलिए सप्तपि कहे गये हैं 18|||३|| दीर्घायुपो मन्तकृत ईश्वरा दिव्यचक्षुप । बुद्धा प्रत्यक्षयरिणो गोत्रप्रवर्तकाश्च ये ॥४॥ पट्कर्माभिरता नित्य शालिनो गृहमे धिन । तुल्यव्यंवहरन्ति स्म अदृष्ट वर्महेतुभि ||६|| अग्राम्यवर्तयन्ति स्म रसंश्चैव स्वयकृत । कुटुम्विन ऋद्धिमन्तो बायान्तरनिवासिन ।।६।। कृतादिपु युगाख्येपु सर्वेष्वेव पुन पुन । वर्णा श्रमव्यवस्थान क्रियन्ते प्रथमन्तु नै ।।७।। प्राप्त प्रेतायुगमुसे पुन रातर्पयस्त्विह । प्रवर्तयन्ति ये वर्णा नाथमाश्च सर्गश ! तेपामेवान्वये वीरा उत्पद्यन्ते पुन पुन IIEI दीर्घ धायु वाले–मन्त्री के करने वाले-ईश्वर-दिव्य चY पाने-मृद्ध- प्रत्यक्ष धर्म पाले-और जो गोत्रो के प्रवतक है-वह कर्मों म रत रहने वाले नित्यशाली-गृहमेधी-अदृष्ट कर्मों के हेतुओ से तुल्य व्यवहार किया करते हैं । वे जो स्वय कृत प्रप्राम्य रमा से वर्तन किया करते हैं वे--कुटुम्वी ऋद्धि वाले- बाह्य और मन्तर के निवास करने वाले कृनादिनाम वाल ममस्त युगो मे बार- बार पहिले वरणों और भाश्रमो की व्यवस्था जिनके द्वारा की जाती है । त्रेता युग के मुख के प्राप्त होने पर यहां पर पुन ये सप्तपि गण मवंत्र वर्गों और माश्रमो का प्रवर्तन करते हैं उन्ही के वश में वीर बार-बार उत्पन्न होते हैं ।।६४|| ॥६५॥६६॥७॥१८॥ जायमाने पिता पुत्रे पुत्र पितरि चव हि । एम समेत्याविच्छेदाद्वर्तयन्त्यायुगक्षयात् । अष्टाशीतिसहस्राणि प्रोक्तानि गृहमे धिनाम् ||६|| ।
२४ ]
[ वायु पुराण
अर्यम्णो दक्षिणा ये तु पितृयाण समाश्रिता. ।
दाराग्निहोत्रिणस्ते मे ये प्रजाहेतव स्मृता. ॥१०॥
गृहमे धिनाञ्च संख्येया श्मशानान्याथयन्ति ते ।
अष्टाशीतिसहस्राणि निहिता उत्तरायणे ॥१०॥
ये थू यन्ते दिव प्राप्ता ऋपयो झुद्ध रेतस ।
मन्यवाह्मणकर्तारो जायन्ते ह युगक्षये ॥१०॥
एवमावर्तमानास्ते द्वापरेषु पुन पुन ।
वल्पाना भाष्यविद्याना नानाशाखकृत क्षये ॥१०॥
भविष्ये द्वापरे चैव द्रोरिषद्वैपायन पुन ।
वेदव्यासो ह्यतीतेऽस्मिन् भविता सुमहातपा ।।१०४।।
भविष्यन्ति भविप्येषु शाखाप्रणयनानि तु ।
तस्मै तद्ब्रह्मण ब्रह्म तपसा प्राप्तमव्ययम् ।।१०५)
पुत्र के उत्पन्न हो जाने, पिता मोर पिता के विषय में पुत्र इस प्रकार से
अविच्छेद से मिलकर युग के क्षप पर्यन्त धर्तन किया करते हैं। ये ऐसे गृहमेवी
मछासी हजार बहे गए हैं ।।१३॥ मयंमा ये जो दक्षिण होते हैं वे पितृमाण में
समाश्रित होते हैं। वे दाराग्निहोत्री हैं और जो प्रजा के हेतु रूप पहे गये हैं
।।१०।। जो गृहमे धी श्मभानो का प्राश्रय लेते हैं उनकी मख्या करने के योग्य
है वे भी मासी हजार उत्तरायण में निहित होते हैं ॥१०॥ जो ऊद्धं रेता कृषि
दिय लोक में प्राप्त हो गये हैं और ऐसे मुने जाते हैं ये मन्त्र पौर ब्राह्मण के
पा युग ये थाय हो जाने पर उत्पन्न हुआ परते हैं ॥१०२॥ इस प्रकार से
द्वारो मे पुन पुन मावर्तमान होते हैं पौर क्षय में बल्यो-भाष्य विधामो रे
ना प्रकार के गावो के करने वाले होते हैं ॥१०३|| भविष्य द्वार मे फिर
द्रोणि पायन मुमहातपा वेदव्यास इसके मनीत हो जाने पर होगे ॥१०॥
भविष्यो मेमामा प्ररायन होगे। उगरे लिए उस ब्रह्मा के द्वारा तप से पाय
ब्रह्म प्राप्त दिया गया पा॥१०॥
तपसा कर्म सम्प्राप्त कर्मणा हि ततो पश.।
यममा प्राप्य मत्य हि सत्येनात हि चाव्यय ॥१०॥
प्रजापति वा कोतन
[ २५
अन्ययादमृत शुक्रममृतात् सब मेव हि ।
ध्रुवमेवाक्षरमिद स्वात्म येव व्यवस्थितम् ।
बृहन्वा हरणाच्चैव तद्ब्रह्मत्यभिधीयते ॥१०॥
प्रणवाव स्थित भूयो भूभुव स्वरिति स्मृतम् ।
ऋग्यजु सामाववरूपिणे ब्रह्मणे नम ||१०||
जगत प्रलयोत्पती यरात्कारणसज्ञितम् ।
महत परम गुह्य तस्मै सुब्रह्मणे नम ||१०६।।
अगाधापरमक्षय्य जगत्सम्मोहनालयम् ।
सप्रकासप्रवृत्तिम्या पुरुषाथप्रयोजनम् ॥११॥
साह्वयनानवता निष्ठा गति सङ्गदमात्मन ।
यतदव्यक्तममृत प्रकृतिब्रह्म गाचतम् ॥११॥
प्रधानमात्मयोनिश्च गुह्य सत्वञ्च शन्यते।
अविभागस्तथा शुक्रमधार बहु वाचकम् ।
परमब्रह्मणे तस्मै नित्यमेव नमो नम ॥११२॥
तास कम सम्प्रा दिया और यम के द्वारा फिर या का लाभ हुमा।
या स स य वो पावर पिर उस सत्य से अव्यय को प्राप्त किया।।१०६॥ पव्यय
स अमृत पौर अमृत से मभी शुक्र को प्राप्त किया। यह ध्रुव एकाक्षर अपनी
मामा म ही व्यवस्थित है। वृहत्त्व होने से और वृहण होने के कारण से ही
यह ब्रह्म ऐसे नाम से कहा जाया करता है ॥१०७॥ प्रणव के रूप में अवस्थित
पिर भूभु व स्व ऐमा कहा गया है। उस ऋय यजु-साम मोर मचव के रूप
बात ब्रह्म पे लिए नमस्कार है ।।१०८॥ इस जगह की प्रलय और उत्पत्ति मे
जो वह वारण को सपा वाला कहा गया है वह महत का परम गुह्य है उस
सुरहा के लिए नमस्कार है ॥१६॥ यह जगत् भगाप-अपार माय्य मोर
सम्मोहन का पर है। राप्रकाश प्रवृत्तियों स पुरुषाय के प्रयोजन बारा होता
है ॥११०॥ सांप के ज्ञान वालो को निष्टा गति-भामा का सङ्कट जो वह
अन्यक्त-अमृत प्राति ब्रह्म पाश्वत है वह प्रधान प्रारमयोनि गुह्य और सत्त्व इन
शम्भे से बहा जाता है। विभाग शुक्र है और पक्षर बहुन का पापक होता
है। उस परम ब्रह्म पे लिये निरम ही नमस्कार है ॥११॥११२॥
कृतं पुनः मिया नास्ति युत एवारतरिया । सहदेव कृतं स य मोये वृत्तामृतम् ।।११।। श्रोतव्य वं श्रुतं वापि तवामाधुसायुता। मातव्ययाय मन्तव्य म्प्रष्टव्य भोग्यमेव च। द्रस्त्यचाय श्रोगव्यं ज्ञानय्य वाय विश्मन ॥११॥ दगित पदनेनैव शान सद्ध मुरपिरणाम्। यईदनितयानेप पस्तदन्येष्टुमर्हति । सर्वाणि सर्यान्सर्याश्च भगवानेय सोऽग्रवीत् ।।११।। यदा यलियते येन तदा तरसोऽभिमन्यते । येनेद क्रियते पूर्व तदन्येन विभावितम् ॥११६।। यदा तु नियते विञ्चित्वेनचिद्वाड मय कचित् । तेनर ततत पूर्व पतं णा प्रतिभाति वै ॥११७।। विरक्तम्नातिरिक्तच्च ज्ञानाशाने प्रियाप्रिये। धर्माधमी सुप दुम मृत्युञ्चामृतमेव च। अर्द्धन्तियंगधोभागम्तस्य वादृष्टयारणम् ॥११॥ स्वायम्भुवोऽय ज्येष्ठस्य ब्रह्मणः परमेष्ठिन । प्रत्येक विद्यम्भवति तास्विह पुन पुनः ।।११।। वृत मे प्रिया नहीं है फिर भकृत की किया कैसे हुई ? एक बार हो जो राव किया गया है वह लोक में कृताकृत है ॥११३॥ श्रुत वो मुनना चाहिए उमी प्रकार से प्रसाधु साधुना है। जानना चाहिए --मानना चाहिए-स्पर्श के योग्य होना चाहिए-भाप करना चाहिए-देखना चाहिए-गुनना चाहिए-- कुछ जानना चाहिए ।।११४। जो इमी के द्वारा देखा गया वह सुरपियो का शान है । जिसने यह देखा है वह कौन है, वही ढूंढने के योग्य होता है । सबको- सबको भगवान ही हैं ऐमा वह वोले ॥११|| जिस समय में जो जिसके द्वारा किया जाता है उस समय उसके द्वारा वह माना जाता है। जिसके द्वारा यह पहिले किया जाता है वह भय के द्वारा विभावित होता है ॥११॥ जिस समय किमी के द्वारा कुछ वाहमय ही मर लिया जाता है वह उगी के द्वारा पहिले - प्रजापति वश कीर्तन ] २७ किया हुमा करने वालो को प्रतिभान होता है ।।११७॥ ज्ञान और प्रज्ञान मे- प्रिय और अप्रिय में विरक्त और अतिरिक्त-धर्म एव अधर्म-सुख-दुख-मृत्यु- अमृत-ऊद-तिर्यक् और अधोभाग ये मब उसी प्रदृष्ट का कारण होता है ॥११८॥ ज्येष्ठ परमेष्टो ब्रह्मा का स्वायम्भुव यहाँ वेतामा मे पुन -पुन प्रत्येक विद्य वाला होता है ।।११।। ध्यस्यते ह्यविद्यन्तवापरेपु पुनः पुनः। ब्रह्मा चैतदुवाचादौ तस्मिन् वैवस्वतेऽन्तरे ॥१२०॥ आवर्तमाना मृपयो युगाख्यासु पुनः पुनः । कुर्वन्ति सहिता ह ते जायमानाः परस्परम् ॥१२१।। अष्टाशीतिसहस्राणि श्रुतीणा स्मृतानि वै । ता एव सहिता ह्यते प्रावर्तन्ते पुन पुनः॥१२२।। श्रिता दक्षिणपन्थान ये श्मशानानि भेजिरे। युगे युगे तु ताः शाखा व्यस्यन्ते तैः पुन पुनः॥१२३।। द्वापरेप्विव सर्वेषु सहिताश्च श्रु तपिभिः। तेपा गोविमाः शाखा भवन्तीह पुनः पुन । ताः शाखास्तत्र कारो भवन्तीह युगक्षयात् ।।१२४॥ एवमेन तु विशेय व्यतीठानागतेयिह । मन्वन्तरेषु सर्वेषु शाखाप्रणयनानि वै ॥१२५॥ अतीतेषु प्रतीतानि वर्तन्ते साम्प्रतेषु च । भविष्याणि च यानि स्युर्वर्ण्यन्तेऽनागतेप्वपि ॥१२६।। द्वापरों में बार बार एक विद्य याला व्यवस्यमान होता है। मादि में वैवस्वत मन्वन्तर में ब्रह्माजी ने यह बोला था ॥१२०।। ऋषिगण बार-बार युगास्यामो मे प्रावर्त्तमान होते हैं और परस्पर मे जायमान होते हुए इन सहितामों को दिया करते हैं ॥१११॥ मट्टासी हजार धृतपि कहे गए हैं और वे ही सहिताएं बार-बार पावर्समान हुमा करती हैं ।।१२२॥ दक्षिण मार्गों का पाश्रय होने वाले जिहोंने मचानो का सेवन क्यिा या युग युग मे पुन पुन दे ही शाखामो को किया करते हैं ॥१२३।। यह सब २० ] [ यायु पुराग द्वारों में ग्यिो के द्वारा महिलाएं मोर उनके गात्री में पेशामाऐं बार-बार होती हैं। यहां पर सामाएँ वहाँ पर गरे करने वातं युग के भय से होते हैं ।।१२४॥ इसी प्रकार मे जो व्यतीत हो गये हैं उनमें मोर जो भागे होने यार्न मन्तर्गत है उनम राव जान लेना चाहिए। सब मन्वन्तरों में दाखामा के प्रणयन भी जान मेने चाहिए ॥१२५।। पनीता में मतीत होते हैं और मानो म पनि बरीमतों में और जो भविष्य है वे मनागतो में परिणत दिये जाते है॥१२६॥ पूर्वगण पश्चिम जय यतमानेन चोभयम् । एतेन ममयोगेन मन्वन्तरविनिश्चय ॥१२७।। एव देवाश्च पितर ऋषयो मनवश्व ये । मन्त्र सहोद्ध गच्छन्ति ह्यावर्तन्ते च तैः सह ॥१२॥ जनलोकात्सुरा सर्वे पशुकल्पात्पुन पुनः । पर्याप्तमाले सम्प्राप्ते सम्भूता नव नस्य (?) तु ।।१२६।। अवश्यम्भाविनार्थेन सम्वघ्यन्ते तदा तु ते। ततस्ते दोपवजन्म पश्यन्ते रागपूर्वकम् ॥१३०॥ निवर्तते तदा वृत्तिस्तेषामादोपदर्शनात् । एव देव युगानीह दशकृत्वा निवर्तते ॥१३१॥ जनलोकात्तपोलोक गच्छन्तीहा निवर्तनम् । एव देवयुगानीह व्यतीतानि सहस्रशः। निधन ब्रह्मलोके वै गतानि मुनिभिस्सह ।।१३।। न शक्यमानुपूर्येण तेषा वक्त सविस्तरान् । अनादित्वाच कालस्य असङ्खयानाच्च सर्वशः। मन्वन्तराण्यतीतानि यानि कल्पं पुरा सह ।।१३३।। पूर्व से पश्चिम जानना चाहिए और वर्तमान से पूर्व और पश्चिम दोनो को ही जान लेना चाहिए। इस क्रम वे योग से मन्द तरो का विनिश्चय हुअर करता है ॥१२७॥ इसी प्रकार से देव पितर-ऋषि और मनुगण ये सब मन्त्रो के सहित ऊ भाग को चले जाया करते हैं और उनके साथ ही फिर आप प्रजापति वंश वीर्तन ] [ २६ मान होते रहते हैं ॥१२८१ जनलो से समस्त देवगण पशुकल्प में बारबार- पर्याप्त काल के सम्प्राप्त होने पर सम्भूत हुया करते हैं और कभी नष्ट नहीं होते हैं ॥१२६। उस समय मे वे अवश्यम्भावी प्रथं मे सम्बद्ध रहा करते हैं । इमसे वे राग पूर्वक दोप वाले जन्म को देखा करते हैं ॥१३०॥ उस समय में उनकी वृत्ति दोष दर्शन तक निवृत्त हो जाती है। इस प्रकार से यहाँ पर देव युग दश वार निवतित हुमा करते हैं ॥१३१॥ यहाँ पर अनिवर्तन जनलोक से तपो सोच को जाता है । इस प्रकार से यहाँ देवयुग सहस्रो व्यतीत होते हैं। मुनियो के माप ब्रह्म लोक में निधन को गत होते हैं ।।१३१॥ आनुपूर्वी से उनके पूर्ण विस्तार का वर्णन नहीं किया जा सकता है क्योकि इनका कारण उनका प्रनादि होना और पालका सब भोर से प्रसध्यान होता है । पहिले जो मन्वन्तर व्यतीत हो गये हैं और पल्प हो चुके हैं वह सब परिणत नहीं किये जा मरते हैं ॥१३३॥ पितृभिमुनिभिर्देवै साद्धं सप्तपिभिश्च वै। पालेन प्रतिमृष्टाना युगानाञ्च निवर्तनम् ॥१३४॥ एतेन कमयोगेन कल्पमन्वन्तराणि तु । सप्रजानि व्यतीतानि शतशोऽथ सहस्रशः ।।१३।। मन्वन्तगन्ते सहारः सहारान्ते च सम्भव । देवतानामृपीरणाञ्च मनो पितृगणस्य च ॥१३६।। न शक्यमानुपूज्य गण वक्त वर्षशत रपि । विस्तरस्तु निमर्गस्य महारस्य च सर्वश । मन्वन्तरस्य सख्या तु मानुपेण निबोधत ॥१३७॥ देवतानामृपोणान्च सवयानार्थविशारद । विगत्वोटयस्त सपूर्णाः सहपाना सवयया द्विजैः॥१३॥ सप्तपष्टिस्त धान्यानि निय तानि च सवधया । विशतिश्च सहस्राणि पालोय सोधिन् विना ।।१३।। मन्वन्तरस्य राजपं या मानुण प्रशीतिता। पत्रा रेणेव दिव्येन प्रवक्ष्याम्यन्तरम्मनो ॥१४॥ पितर मुनिमण देश जो दिमापियो रे साप ही है-काल से प्रतिसृष्ट
[ वायु-पुराण
और युगो का निवर्त्तन इस क्रम के योग से कल्प तथा मन्दन्नर प्रजाप्रो के साथ
सैकडो ही तथा हजारो ही व्यतीत हो चुके हैं ॥१३॥ मन्वन्तर के अन्त में
सहार भोर सहार के अन्त मे जन्म देवों का-पियो का-मनुका और पितृगण
का होता रहता है ॥१३६॥ आनुपूर्वी से सौ वर्षों में भी इस निसग का विस्तार
और सब सहार बताया नहीं जा सकता है । मवितर की सख्या तो मानुष
जान लो ॥१३॥ अर्थ-विशारदो ने देवो तथा ऋपियो की सस्या तीस करोड
सम्पूरा द्विजो के द्वारा सख्या से सख्यात की गई है ॥१३॥ मधिको को छोड
कर वह काल सख्या से सहसठ नियुत बीस सहस्र होता है ॥१३॥ मन्वन्तर की
यह मख्या मानुप के द्वारा कही गई है। मब दिव्य परसर से मनुका जो अन्तर
होता है उसे कहूँगा ।।१४०॥
अष्टौ शतसहस्राणि दिव्यया सवयया स्मृतम् ।
द्विपञ्चाशतथान्यानि सहस्राण्य धिकानि तु ॥१४१
चतुर्दशगुणो ह्यष काल आहूतसप्लव ।
पूर्ण युगसहस्र स्यात्तदहहाण स्मृतम् ।।१४२
तत्र सर्वाणि भूतानि दाधान्यादित्यरश्मिभि ।
ब्रह्माण मरत कृत्वा सह देवपिदानवै ।
प्रविशन्ति सुरोध देवदेव महेश्वरम् ।।१४३
स स्रष्टा सर्वभूतानि क्ल्पादिपु पुन पुन ।
इत्येप स्थितिकालो दै मनोदेवपिमि सह ॥१४४
सर्वमन्वन्तराणा प्रतिसन्धि नियोक्त।
युगाख्या या समुद्दिष्टा प्रागेवास्मिन् मया तव ॥१४५
कृतप्रेतादि मयुक्त चतुयुं गमिति स्मृतम् ।
तदेक्सप्ततिगुण परिवृत्त तु माधिवम् ।
मनोरेमधीवार प्रोवाच भगवान प्रभु ॥१४६
दिव्य सम्या से प्रादमी महब बनाया गया है । तपा इगये दो पंचायत
सहस्र अधिक होता है ॥१४॥ माहूत सप्तव यह ममय चौदह गुग्गा होता है ।
पूराएर सहन युग ब्रह्मा का पूरा दिन हुअा करता है, ऐमा ३नाया गरी
.
[ प्रजापति क्या कीर्तन [ ३१ है ।।१४२॥ वहाँ पर समस्त प्राणी सूर्य की किरणो से तय हो जाते हैं । ब्रह्मा पो प्रागे करके देव-ऋषि और दानवो वे साय देवो के देव और गुरो के ईश्वर महेश्वर में प्रवेश किया करते हैं ।।१४३।। वह ही कल्पादि में बार-बार समस्त प्राणियो का सव होता है। यह ही देवपियों के साथ मनु को स्थिति का काल होता है ,१४४|| समस्न मन्वन्तरो की प्राप्ति सन्धि को समझलो । मैंने उसमे पहिले ही युगास्या जो तुम्हारे सामने ममुदिष्ट पी थी ॥१४॥ वृतनादि मयुक्त चतुर्युग कहा गया है । यह सत्तर गुणा परिवृत माधि मनु वा एका. घिवार भगवान् प्रभु ने बतलाया था ॥१४६।। एव मन्वन्तराणा तु सर्वेपामेव लक्षणम् । अतीतानागताना वै वर्तमानेन कीतितम् ॥१४७ इत्येप कीतित सर्गों मनो स्वायम्भुवस्य ह । प्रति सन्धिन्तु वक्ष्यामि तस्य व चापरस्य तु ।।१४८ मन्यन्तर यथापूर्वमृपिभिर्देवतं सह । अवश्यम्भाविनार्थत यथा तद्वं निवत्तंते ॥१४६ अस्मिन् मन्वन्तरे पूर्व लोक्यस्येश्वरास्तु ये। सप्तर्पयन देवास्तै पितरो मनवस्तथा। मन्वन्तरस्य वाले तु सम्पूर्ण साधास्तपा ॥१५० क्षीणाधिशारा सवृत्ता युदा पर्यायमारमन । महतोवाय ते सर्व उन्मुना दधिरे गतिम् ॥१५१ ततो मन्वन्तरे तस्मिन् प्रक्षोणा देवतास्नु ता । मम्पूणे स्थितियाले तु तिष्ठन्त्ये। कृत युगम् ।।१५२ उत्पद्यन्ते भविप्याश यावन्मन्यन्तरेश्वरा । देवता पिनरचं पयो मनुरेव च ॥१५३ इगो प्रकार गमभी मन्दानरोका लक्षण होता है। मनात प्रौर पन्त. कोपा वर्तमान में द्वारा पिया गया है ।१४॥ यह म्यापभुय मनु का गर्ग बत- या गया है। पब उगहो तथा दूसरे की प्रति मन्पि बतलाऊँगा १४EIm अग प्रसार गे पहिले ऋषि और देवों के गाय मन्वनर अवश्यम्भाषी प्रयं गे
३२ ]
[ वायु-पुराण
से वह निवृत्त होता है ॥१४॥ इस मन्यन्तर मे पहिले जो गैलोक्य के पर
हैं-सप्तपि-देव-पितर तपा मनुगरण ये सभी सम्पूर्ण मन्वन्तर के समय में
साधर होते हैं ॥१५०॥ क्षोण अधिकार वाले हुए प्राने पर्याय (पारी) को
जानकर वे सब महर्लोक के लिए उन्मुख होते हुए गति को धारण रिया करते
पे॥१५१॥ इसके पश्चात् उस मन्वन्तर प्रक्षीण हुए वे सब देवता एक कृत
युग मे पूरे स्थिति के समय मे ठहरा करते हैं ॥१५२॥ जितने मन्वन्तर के
ईश्वर है जैसे--देवता--पितर-पि लोग और मनु उत्पन्न होते हैं और आगे
होने वाले होते हैं ।।१५।।
मन्वन्तरे तु मम्पूर्ण यद्यन्यद्वा कला युगे।
सम्परते वृतं तेषु कलिशिष्टेषु वै तदा ॥१५४
यथा कृतस्य सन्तानः कलिपूर्व स्मृती बुध ।
तथा मन्वन्तरान्तेषु आदिमन्यन्तरस्य च ॥१५५
क्षीणे मन्वन्तरे पूर्वे प्रवृत्त चापरे पुनः।
मुखे कृतयुगस्याथ तेपा शिष्टास्तु ये तदा ॥१५६
सप्तर्पयो मनुश्च व कालावेवास्तु ये स्थिताः ।
मन्वन्तर प्रतीक्षन्ते क्षीयन्ते तपसि स्थिता ॥१५७
मन्वन्तरव्यवस्थार्थ सन्तत्यर्थञ्च सर्वश ।
पूर्ववत् सम्प्रयतन्ते प्रवृते वृष्टिसजने ॥१५८
द्वन्द्व पु सम्प्रवृत्तेपु उत्पलास्यौपधीषु च ।
प्रजासु च निकेतासु सस्थितासु क्वचित् क्वचित् ॥१५६
वार्तायान्तु प्रवृत्ताया सद्धर्मे ऋपिभाविते।
निरानन्द गते लोके नष्टे स्थावरजङ्गमे ।।१६०
अनामनगरे चव वर्णाश्रमविवजिते ।
पूर्वमन्वन्तरे शिष्टे ये भवन्तीह धामिकाः।
ससर्पयो मनुश्व संतानार्थ व्यवस्थिताः ।।१६१
सम्पूर्ण मन्वन्तर मे यदि अन्य कलियुग मे सम्पन्न होता है । कलियुग
मे शिष्ट उनके होने पर उस समय कृत होता है ॥१५॥ जिस प्रकार से बुधो
प्रजापति का कीर्तन ] ने कृत की सन्तान पलिपूर्व बताई है उसी प्रकार मे मन्वन्तरान्तो में मन्वन्तर का प्रादि हुमा करता है ।।१५५ पूर्व मन्वन्तर के क्षीण हो जाने पर और फिर दूमरे के प्रवृत्त होने पर वृतयुग के सुख में और इसके अनन्तर जो उनके निष्ट होते हैं ये उस समय म होते हैं ॥१५६।। सप्तपियो वा समुदाय और मनु जो बालापेक्ष स्थित होते हैं वे सर मन्वन्तर की प्रतीक्षा किया करते हैं और तप में स्थित क्षीण होते हैं ॥१७॥ मन्वन्तर की व्यवस्था करने के लिए मौर सन्तति प्राप्त करने के वास्ते सब ओर मे पूर्व की ही भांनि वृद्धि के सर्जन ने प्रवृत्त हो जाने पर ये मम्प्रवृत्त हुमा करते हैं ॥१५॥ दन्द्रो के मम्प्रवृत्त होने पर और भोपियों के समुत्पन्न हो जाने पर और वहीं-कही पर प्रजाओ मे मिरेतो से सस्थित होने पर ॥१५९१ वार्ता के प्रवृत्त हो जाने पर तपा सदमं के ऋषियो के द्वारा भावित होते पर-समस्त इस योर के प्रानन्द रहित हो जाने पर एष स्थावर (जड प्रचेतन) मोर जङ्गम (वेतन) के नष्ट हो जाने पर ।।१६00 ग्रामो मोर नगरो से रहित लोग के हो जान पर तथा चारो वर्ष पोर पात्रमों मे एपदम शून्य हो जाने पर पहिले मन्वन्तर को शिष्ट रहने पर यहाँ पर जो भी धर्म के मानने वाले व्यक्ति होतेहैं वे सहपियों के समूह मौर मनु सन्तान की वृद्धि परने के लिए व्यवस्थित थे।॥१६॥ प्रजाय तपता तेषा तप परमदुश्वरम् । उत्पद्यतीह सर्वेषा निधनेपिबह मवंश ॥१६२ देवामुरा पितृगणा मुनयो मनवस्तथा । सर्पा भूता पिशाचाश्व गन्धर्वा यक्षराक्षमा ॥१६३ ततस्तेपा तु ये शिष्टा शिष्टाचारान् प्रचक्षते । सप्तर्पयो मनुश्चेव आदी मन्वन्तरस्य ह । प्रारम्भन्ते च कर्माणि मनुस्या दैवतं राह ।।१६४ मत्वतरादो प्रागेव प्रेतायुगमगे ततः। पूर्व देवास्ततस्ते में स्थिते धर्मे तु सर्वगः ॥ १६५ ऋषीणा ब्रह्मायेंग गत्याप्यन्तु ये ततः। पिग्गा प्रजया चव देवानामिज्यया तपा ११६६ [ वायु पुराण शत वर्पमहस्राणि धर्मे वर्णात्मके स्थिता । अयो वार्ता दण्डनीति धर्मान् वर्णाश्रमास्तथा । रथापयित्वाथमाश्चैव स्वर्गाय दधिरे मती. १६७ पूर्व देवेषु तेष्वेव स्वर्गाय प्रमुसेपु च । पूर्व देवास्ततस्ते वै स्थिता धर्मेण कृत्स्नश. ॥१६८ प्रजा की प्राति करने के लिए तपश्चर्या करने वाले उनकी तपस्या अत्यन्त ही दुष्कर थी । यहाँ पर सब लोगो का निधन (मृत्यु हो जाने पर सभी प्रोर उत्पन्न हुआ करते हैं ।।१६२॥ देव नथा असुर-पितृगण-मुनि वृन्द तथा मनुगण-सर्प-भूत-पिशाच-गन्धवं-यक्ष और राक्षस इसके पश्चात् उनमे जो शिष्ट थे वे शिष्टाचारो को किया करते हैं । मन्वन्तर आदि में मप्तपियो का समु- दाय और मनु तथा देवो के माय हो मनुष्य कम्मों का प्रारम्भ किया करते हैं ॥१६३-१६४।। मन्वन्तर के प्रादि म पहिले ही त्रेतायुग के मुख मे पहिले देव होते हैं इसके पश्चात् मभी प्रोर से धर्म स्थित हो जाने पर ऋपियो के ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करने मे प्रानुण्य अर्थात् ऋण का चुकाया जाने को प्राप्त हुए फिर इसके अनन्तर सतान की समुत्ति करके उसके द्वारा पितृगण की अनृणता (ऋण का प्रभाव) प्राप्त की फिर इमके अनन्तर इज्या का यजन करने से देवो की अनृणता प्राप्त की थी ऋषि-ऋण पितृ-ऋण और देव-ऋण ये तीन ऋणो का भार सभी के ऊपर रहता है जोकि ब्रह्मवर्य-मन्तति और यज्ञ से क्रम से चुकाया जाया करता है ।।१६४-१६५-१६६।। सो सहस्त्र वर्ष तक वर्णात्मक धर्म में स्थित होते हुए उन्होने यी-वार्ता-दएड नीति वर्णों तथा प्राश्रमो के धर्मों को स्थापित करके और ब्रह्मचर्य-गार्हस्थ्य-वानप्रस्थ और सायास इन चारो प्राथमो की स्थापना करके फिर स्वर्ग के गमव करने की बुद्धि धारण की अर्थात् स्वर्ग म चले गये थे ।।१६७॥ पहिले देवो के और फिर उनके स्वर्ग के लिए प्रमुख हो जाने पर पहिले देव और इसके पश्चात् वे सब पूर्णतया धम के माथ स्थित हुए थे ॥१६८|| "न्तरे परावृत्ते स्थानान्युत्सृज्य सर्वश । सहोर्ध्वगच्छन्ति महर्लोकमनामयम् ॥१६६ प्रजापति वश कीर्तन 1 [ ३५ विनिवृत्तविकारास्तै मानसी सिद्धिमास्थिता । अवेक्षमाणा वशिनस्तिष्ठन्त्याभूतसप्लवम् ॥१७० ततस्तेयु व्यतीतेषु सर्वेष्वेतेषु सर्वदा । शून्येषु देवस्थानेषु लोक्ये तेषु सर्वश । उपस्थिता इहैवात्ये देवा ये स्वर्गवासिन. ॥१७१ ततस्ते तपसा युक्ता स्थानान्यापूरयन्ति । सत्येन ब्रह्मचर्येण श्रुतेन च समन्विता ॥१७२ सप्तपणा मनोश्च च देवाना पितृभि सह । निधनानीह पूर्वेपामादिना च भविष्यता ।।१७३ तेषामत्यन्तविच्छेद इह मन्वन्तरक्षयात् । एवं पूर्वानुपूर्येण स्थितिरेपानवस्थिता। मन्यन्तरेषु सर्वेष या वदाभूतसप्लवम् ।।१७४ एम मन्वन्तराणान्तु प्रतिसन्धानलक्षणम् । प्रतीतानागतानान्तु प्रोक्त स्वायम्भुवेन तु ॥१७५ मन्वन्तर के परावृत्त होने पर सब ओर से स्थानो का त्याग करके मन्त्री के माय मामय रहित अवं महलों को चले जाया करते हैं ॥१६॥ समस्त प्रबार वे विकारो के विशेष प म निवृत्त हो जाने वाले ये मानमी मिद्धि मे मास्थित होते हुए अवेक्षगाए और अपने आपको बरा में रखने वाले भूत सप्लव पर्यन्त ठहरा परसे हैं ॥१७०। इसके अनन्तर उन सबके भ्यतीत हो जान पर भोर मवंदा का गब शून्य देवो के स्थानो मे गेलोक्य में सभी भोर से उनम स्वर्ग में निवास करने वाले जो अन्य देव है वे मव यहाँ पर ही उपस्थित होते हैं ।।१७१।। गरे पश्चात् वे सत्य प्रतये द्वारा-ब्रह्मचर्य के पूर्ण प्रनिरासन के द्वारा पोर धृत के द्वारा पूर्णतया यवं समन्दिन और तप में मुक्त वे उन स्थानो को प्रातरित किया बरते हैं ।।१७२|| सप्तपियों या-मनु मा मोर पितृगण के माप देखो वो यहाँ पर मृत्यु पूर्व में होने पालो यो प्रादि मे और ति से होती है ॥१७॥ उनका सत्यन्त विाद यहां पर मतर में पाप से होता है। इस प्रकार से पूर्व की भानुपूर्षी से पद्द पनवस्थित ग्थिति [ वायु पुगण होती है जो कि समस्त मन्वन्तरो मे जद तक भूतो का सप्लव होता है हुमा करती है ।।१७४।। इस प्रकार से मन्वन्तरो का प्रति मन्धान का लक्षण जोकि मन्वन्तर अतीत होगये या अनागत है स्वायम्भुव मनु ने कहा है ॥१७५।। मन्वन्तरेप्वतीतेपु भविष्यारणा तु साधनम् । एवमत्यन्तविच्छिन्न भवत्याभूतसप्तवात् ।।१७६ मन्वन्तराणा परिवर्तनानि एकान्ततस्तानि महर्गतानि । महर्जनच्च व जनन्तपश्च एकान्तगानि स्म भवन्ति सत्ये ।।१७७ तद्भाविना तत्र तु दर्शनेन नानात्वदृष्टेन च प्रत्ययेन । सत्ये स्थितानीह तदा तु तानि प्राप्ते विकारे प्रतिसर्गकाले॥१७८ मन्वन्तरारणा परिवर्तनानि मुञ्चन्ति सत्यन्तु ततोऽपरान्ते । ततोऽभियोगाद्विषमप्रमाण विशन्ति नारायणमेव देवम् ॥१७६ मन्वन्तराणा परिवर्तन चिरप्रवृत्तेषु विधिस्वभावात् । क्षण रस तिष्टति जीवलोक. क्षयोदयाम्या परिवन्दमानः ॥१५० इत्युत्तराण्येवमृपिस्तुताना धर्मात्मना दिव्यदृशा मनूनाम् । वायुप्रणीतान्युपलम्य दृश्य दिव्योजसा व्याससमासयोगः ॥१८१ सर्वाणि राजर्पिसुरर्पिमन्ति ब्रह्मर्षिदेवोरगवन्ति चैव । सुरेशमप्तपिपितृप्रजेशयुक्तानि सम्यक् परिवर्तनानि ॥१८२ उदारवशाभिजना तीना प्रकृष्टमेधाभिसमेधितानाम् । कीर्तिच तिख्यातिभिरन्विताना पुण्य हि विख्यापनमीश्वराणाम्।।१८३ जो मन्वन्तर प्रतीत हो चुके हैं उसमे ग्रागे भविष्य में होने वाले मन्द- न्तरो का साधन होता है । इस प्रकार से भूतो के मप्लव तक मन्यन्त विन्धित हुमा करता है ॥१७॥ मन्वन्तरी के परिवर्तन जो हुमा करते हैं वे एकान्त से महर्लोव मे गत हुप्रा करते हैं । महो के पश्चान् जनलोक मे जन के बाद तपो लोक में और फिर सस्य लोक में एवान मै गये हुए हुमा करते हैं ।।१७७॥ वहाँ पर उमसे होने वालो के दर्शन में और नानाव के स्वरूप में देखे हुए प्रत्यय अर्थात् विश्वास से उस समय में सरय लोर में स्थित वे विरार स्वरुप प्रतिसगाल प्रजापति वा पोर्तन ] [ ३७ के प्राप्त होने पर यहां पर हुप्रा वरते हैं ।।१७८॥ मन्वन्तरों के परिवर्तन इसके पश्चात् अपरान्त मे सत्यलोर को त्याग दिया करते हैं । इसके अनन्तर अभियोग से विषय प्रमाण नारायण देव मे ही प्रवेश किया करते हैं ।१७६। मन्वन्तरो के चिरकाल से प्रवृत्त होने वाले परिवर्तनों मे विधि वे स्वभाव से यह जीवो या लोक क्षय और उदय से परिवन्दमान होता हुआ क्षणमार को रस में स्थित हुमा करता है ।।१८०॥ इस प्रकार से ऋषियों के द्वारा स्तुति दिये गये धर्मात्मा-दिव्य हरि वाले मनुप्रो के वायुदेव के द्वारा यहे हुए इन उत्तरो को प्राप्त करके व्यास और समास अर्थात् विस्तार पौर सक्षेप के योगो के द्वारा दिव्य ओज वाले के द्वारा देखने के योग्य हैं ।।१८१॥ वे समस्त परिवर्तन, जोकि मन्वन्तरो के हुमा करते हैं, राजपि और मुरपियो से युक्त हैं । और वे ब्रह्मपि-देव प्रौर उरगों वाले हैं । सुरो वे ईश-सप्तर्षि-पितृगण-प्रजा वे ईशो रो भी युक्त भली-भांति हुमा करते हैं ।।१८२॥ उदार वन-अभिजन और युति से युक्त-प्रष्ट मेघा से चारों ओर मे समेधित होने वाले-नीति युति और प्रसिद्धि से प्रन्वित ईश्वरो वा परम पुण्यप्रद पवित्र विस्थापन होता है ॥१८॥ स्वर्गीयमेतत् परम पवित्र पुत्रीयमेतच्च पर रहस्यम् । जप्य महत्पर्वसु चैत दन्य दु स्वप्नशान्ति परमायुपेयम् ॥१८४ प्रजेशदेवपिमनुप्रधानां पुण्यप्रसूति प्रथितामजस्य । ममापि विख्यापनसयमाय सिद्धि जुपध्व सुमहेशतत्वम् ॥१८५ इत्येतदन्तर प्रोक्त मनो स्वायम्भुवस्य तु । विस्तरेणानुपूर्व्या च भूय किं वर्णयाम्यहम् ।।१८६ यह उन ईश्वरो का विस्थापन स्वर्गीय अर्थान् स्वर्ग के ममान मुखपद- परम पवित्र और पुत्रीय अर्थात् पुत्रोत्पत्ति प्रदान करने वाला एव अत्यत रहस्य अर्थात् गोपनीय है । यह महान् पर्वो के अपमरी पर जप करने के योग्य और सबसे श्रेष्ठ है। यह दुरे स्वप्नों की काति करने वाला तथा परमायु प्रद होता है ॥१८४॥ जिसमे प्रजा के स्वामी-देवर्षि और मनु प्रधान होते हैं ऐसी प्रजन्मा की परम पुण्य प्रसूति को जोकि बहुत ही प्रसिद्ध है, विस्थापन के सयम के लिए मेरी भी सिद्धि को मौर सुमहेश तत्त्व को सेवन करो ॥१८॥रा
[ वायु पुराण
'यह स्वायम्भुव मनु का मन्तर विस्तारपूर्वक तया मानुपूर्वी से वह
दिया है अब भागे फिर मैं क्या वर्णन कई ॥१८६||
॥ प्रकरण ४४ पृथ्वी-दोहन ।।
अम मन्वन्तराणान्तु ज्ञातुमिच्छामि तत्त्वत ।
देवताना च सर्वेषा ये च यस्यान्तरे मनो १
मन्वन्तराणा यानि स्युरतीतानागतानि ह ।
समासाद्विस्तराच्चव द्रवतो वे निवोधत ॥२
स्वायम्भुवो मनु पूर्व मनु स्वारोचिषस्तथा।
औत्तमस्तामसदचव तथा रैवतचाक्षुषो ।
पटेते मनवोनीता वक्ष्याम्यष्टावनागतान् ।।३
सावर्णा पञ्च रोच्यश्च भौत्यो वैवस्वतस्तथा।
वक्ष्यान्येतान् पुर स्तात्त मचोवैवस्वतस्य ह ॥४
मनव पञ्च येऽतीता मानवास्तान निवोधत ।
मन्वन्तर मया चोक्त क्रान्त स्वायम्भुवस्य ह ॥५
अत ऊद्ध प्रवक्ष्यामि मनो. स्वारोचिपस्य ह ।
प्रजासर्ग समासेन द्वितीयस्य महात्मन.॥६
अासन् वै तुपिता देवा मनुस्वारोचिपेऽन्तरे ।
पारावताश्च विद्वासो द्वावेव तु गणो स्मृतौ ॥७
थी शारापायन ने कहा-मैं मन्वन्तरो के क्रम को तत्व पूर्वक जानने
की इच्छा करता हूं और जिस मनु के अन्तर मे जो सब देवत हुए हैं उनके
क्रम को भी जानने की इच्छा रखता हूं। ॥१॥ श्री सूतबी ने कहा-मनीत
और अनागत मन्वन्तरी के जो भी देवत होते हैं उनको सक्षेप मे मौर विस्तार
से बताने वाले मुझमे सब कुछ समझ लो ॥२॥ अब तक छ मनु व्यतीत हुए
हैं उनके क्रम से नाम ये हैं सबसे पहला मनु म्वायम्भुव हुअा था उसके पनाद
पृथ्वी दोहन ] स्वारोचिष मनु हुए फिर ओत्तम तामस-रैवत और अन्त मे चाक्षुप मनु हुए हैं । ये इतने छ मनु तो अब तक व्यतीत हो चुके हैं। अव जो अनागत अर्थात् भविष्य मे होने वाले पाठ मनु हैं उनको बताऊँगा ॥३॥ पांच सावर्ण-रोच्य. भौत्य तया वैवस्वत ये पाठ हैं । वैवस्वत मनु के पहिले इनको पताऊंगा ॥४॥ जो पांच मनु प्रतीत हो चुके है उन मानवो को श्राप लोग जान लो । स्वायम्भुव का क्रान्त मन्वन्तर मैंने कह दिया है ॥५॥ इसके मागे जो स्वारोचिष मनु है उस द्वितीय महान आत्मा वाले की प्रजा का सर्ग सक्षेप से बतलाऊँगा ॥६॥ स्वारोचिप मन्वन्तर मै तुपिता और विद्वान् पारायत देव हुए थे उस समय ये दो ही गण कहे गये हैं ॥७॥ तुपिताया समुत्पन्ना तो पुत्रा स्वरोचिप । पारावताश्च शिष्टाश्च द्वादशौती गणो स्मृती। छन्दजाश्च चतुर्विशद्देवारते वै तदा स्मृता ।। धवस्यशोऽय वामान्यो गोपा देवायतस्तथा। अजश्च भगवान् देवो दुरोणश्च महावल ॥ आपश्चापि महावाहुमहौजाश्चापि वीर्यवान् । चिकित्वान् निभृतो यश्च अशोयश्व व पठ्यते । इत्येते क्रतुपुत्रास्तु तदासन् सोमपायिन ॥१० प्रचेताचव यो देवा विश्वेदेवास्तथैव च। समो विधु तो यश्च अजिह्मचारिमईन ॥११ अजिह्मानमहीयानो विद्यावन्तौ तथैव च । अजोपौ च महाभागी यवीयश्च महावल ॥१२ होता यज्वा च इत्येते पराक्रान्ता परावता । इत्येता देवता ह्यासन्मनुस्वारोचिपेन्तरे ॥१३ सोमपास्तु तदा हताश्चतुविशतिदेवताः। तेपामिन्द्रस्तदा हासीधश्च लोकविश्रु तः॥१४ तुपिता में ऋतु के स्वारोचिप पुत्र उत्पन्न हुए। और शिष्ट पारावत उतान हुए ये द्वादश थे। ये दो गण कह गये हैं और दादज थे वे उस समय J वायु पुराण में चौबीस देव कहे गये हैं 14 वस्य-वामान्य-गोपा-देवायन-अज-भगवान् देव-दुरोण-महाबल-पाप-महावाहु-महोजा-वीर्यवान्-चिरित्वान्-निभृत- प्रशाय य सब पढ़े जाते हैं । ये सब व्रतु के पुत्र उस समय में सोमपायी हुए थे ॥६॥१०॥ प्रचेता देव-विश्वेदेवा-विश्रुत-अजिहन-मरिमर्दन-मजिह्मान- महीयान ये विद्यावान थे-दो भजोप जो महाभाग थे-पवीय-महाबल-होता और यज्वा ये सब परावत पराक्रान्त हुए है। ये सब स्वारोचिष मन्वन्तर मे देवता थे ॥११॥१२॥१३॥ उस समय में ये चोवीस देवता सोमपथे। उस समय में लोक विश्रुत वैध उनका इन्द्र था ॥१४॥ ऊों वसिष्ठपुत्रस्तु स्तम्भः काश्यप एव च । भार्गवश्व तदा द्रोणो ऋपभोऽङ्गिरसस्तथा ॥१५ पौलस्त्यश्च व दत्तात्रिरात्रेयो निश्चइस्तथा । पोलहस्य च धावास्तु एते सप्तर्षयः स्मृता ।।१६ चनः कविरुतश्च व कृतान्तो विभृतो रविः । वृहद्गुहो नवश्च व सुताश्च ते नव रमृताः ।।१७ मनोः स्वारोचिषस्यते पुत्रा वशवराः स्मृताः। पुराणे परिसङ्घघाता द्वितीय चैतदन्तरम् ॥१८ सप्तर्पयो मनुदेवाः पितरश्च चतुष्टयम् । मूल मन्वन्तरस्यैते तेपा चैवान्तरे प्रजाः ॥१६ ऋपीए। देवताः पुत्रा पितरो देवमूनवः । ऋपयो देवपुत्राश्च इति शास्त्रविनिश्चय ॥२० मनो क्षत्र विशश्च सप्तर्षिग्यो द्विजातयः । एतत्मन्वन्तरं प्रोक्त समामान तु विस्तरात २१ वशिष्ठ का पुत्र ऊर्ज-कश्यप का पुत्र स्तम्भ-भार्गव-द्रोण-माङ्गिा- अपभ-पौलस्त्य-दत्तानि प्राय-निधूल-पौलह का घावान ये सप्तपि पहे गये हैं ॥१॥१६॥ पत्र-ववि-उत-शतान्त-निभृत-रवि-वृहगुह-नव ये नो पुत्र रहे गये हैं । ये स्वारोचिष मनु के ये पद पर पुन रहे गये हैं। पुराण में ये पर परिसस्पात है। यह द्वितीय भन्तर होता है It के पन्तर
पृथ्वी दोहन ]
मे प्रजा हैं ||१६॥ ऋषियो के देवता पुत्र हैं और पितर देव पुत्र होते हैं। ये
सब ऋषि और देव पुत्र ही हैं ऐसा शास्त्र का विनिश्चय होता है ॥२०॥ मनु
से क्षत्र अर्थात् क्षत्रिय और वैश्य और सप्तर्पियो से द्विजाति हुए। यह मवन्तर
सरेप स पह दिया गया है विस्तार नहीं कहा है ।।२१।।
स्वायम्भुवेन विस्तारो ज्ञेय स्वारोचिपस्य
तु
न शक्यो विस्तरस्तस्य वक्त वपशतैरपि ।
पुनरुक्तबहुत्वात्त प्रजाना वै कुले-कुले ॥२२
तृतीयस्त्वथ पर्याय प्रौत्तमस्यान्तरे मनो ।
पञ्च चंव गणा प्रोक्तास्तान् वक्ष्यामि निवोधत ।।२३
सुघामानश्च देवाश्च ये चान्ये वशवत्तिन ।
प्रतई ना. शिवा सत्या गणा द्वादश वै स्मृता ।।२४
सत्यो धृतिदमो दान्त क्षम क्षामो धृति शुचि ।
ईयोर्जाश्च तथा ज्येष्ठो वपुष्माश्च व द्वादश ।
इत्येते नामभि क्रान्ता सुधामानस्तु द्वादश ।।२५
सहस्रधारो विश्वात्मा गमितारो वृहद्वसु ।
विश्वधा विश्वार्मा च मनस्वन्तो विराड्यमा २६
ज्योतिश्च व विभाव्यश्च कीर्तिमान् वशकारिण ।
अन्यानाराधितो देवो वसुधिरणो विवस्वसु ॥२७
दिनबनु सुधर्मा च धृतवर्मा यशस्विन ।
केतुमाश्च व इत्येते कीर्तितास्तु प्रमद्द ना ॥२८
स्वायम्भुव से स्वारोचिप का विस्तार जान लेना चाहिए । वस उमका
पूण विस्तार सौ वर्षों में भी बतलाया नहीं जा सकता है। कुल कुल मे पुनरुक्ति
का वाहुल्य प्रजापो का होता है ॥२२।। तृतीय प्रौत्तम मनु के अन्तर में पर्याप्त
होता है । इसम पाँच गण क्हे य उनको बतलाऊंगा उहे पाप समझ
लो ॥२३॥ सुधामान मोर दब जो प्रय वशवर्ती है-प्रतदन-गिव और सत्य
ये बारह गए बहे गये है ॥२४॥ सत्य-दम-दान्त-क्षम-क्षाम-धृति-सुचि-
ईपार्जा-ज्येष्ठ-मोर वपुष्मान ये बारह हैं। ये सब नाम स कहे गये हैं और
1४२ ] [ वायु पुराण सुधामान बारह है ॥२५॥ सहस्रधार-विश्वात्मा-शमितार-वृहदसु-विश्वधा विश्व कर्मा-मनस्वन्त-विराड्यशा-ज्योति-विभाव्य-कीर्तिमान से वभकारी हैं। अन्यानाराधित-देव वसुधिष्ण-विवस्व-दिन तु-सुधर्मा-गौर धृतवर्मा य सब यशस्वी हैं । केतुमान ये प्रमदन कह गये हैं ॥२६॥२७॥२८॥ हसस्वरोऽहिहा चैव प्रतर्दनयशस्करौ । सुदानो वसुदानश्च सुमञ्जसविपावुभौ ॥२६ जन्तुवायतिश्च व सुवित्तसुनयस्तथा । शिवा ह्यते तु विज्ञया यज्ञिया द्वादशापरा ॥३० सत्यानामपि नामानि निवोधत यथामतम् । दिक्पतिर्वाक्पतिश्च व विश्व शम्भुस्तथैव च ॥३१ स्वमृडीकोऽधिपश्च व वक्रेधा मुह्यसवंश । वासवश्व सदाश्वश्च क्षेमानन्दो तथैव च ॥३२ सत्या ोते परिकान्ता यज्ञिया द्वादशापरा । इत्येते देवता ह्यासनौत्तमस्यान्तरे मनो ३३ अजश्न परमुश्च व दिव्यो दिव्यौषधितंय । देवानुजश्वाप्रतिमो महोत्साहीशिजस्तथा ॥३४ विनीतश्च सुकेतुश्च सुमित्र सुवल शुचि । औत्तमस्य मनो पुत्रास्त्रयोदश महात्मन । एते क्षत्रप्रणेतारस्तृतीय चैतदन्तारम् ।।३५ औत्तमे परिसङ्घयोत सर्ग स्वारोचिपेण तु । विस्तरेणानुपूर्व्या च तामसस्तानिवोधत ॥३६ चतुर्थे त्वथ पर्याय तामसस्यान्तरे मनो । सत्या स्वरूपा सुधियो हरयश्चतुरो गया ॥३७ हम स्वर-महिहा-प्रतदन-यासर-सुदान-वसुदान-सुमञ्जस- -विप दोना-जलुबाहयति-सुवित्त सुनय-शिवाय यज्ञिय दूसरे द्वारा मानने चाहिए ॥२६॥३०॥ मत्र सत्यो क नाम भी यथामत जान लो। दिक्पति-वाक्पति- विश्व-शम्भु-स्वममृतीक मधिप योधा मुहा सवा-वासद-सदारव क्षेम भौर - पृथ्वी दोहन ] मानन्द ये मर वाह दूसरे यनिय रहे गये हैं। प्रौतम मन्वन्तरी में ये सब देवता थे । ॥३१॥३२॥३३।। प्रज-परशु-दिव्य दिव्योपधि--नप.-देवानुज-- अप्रतिम-महोत्माही शिज-विनीत-मुकेतु- सुमित्र मुबल दानि ये महान मात्मा वाले प्रोत्तम मनु के तेरह पुत्र हुए थे। इन्होने ही क्षत्र का अर्थात् क्षत्रियो का प्रणयन किया था और यह तृतीय अन्तर है । इस प्रोत्तम में स्वारोचिप के द्वारा यह सगं परिमन्यात हुआ है अब विस्तार से और मानुपूर्वी से तामस आता है उनको जान लो। ॥३४॥३५॥३६॥ इसके अनन्तर चौथे तामस मन्वन्तर के पर्याय मे सत्य--स्वरूप--मुधिय--हरय ये चार गए हैं ॥३७॥ पुलस्त्यपुत्रस्य सुतास्तामसस्यान्तरे मनो । गरणस्नु तेपा देवानामेकर पचविंशक ॥३८ इन्द्रियाणा शत यद्धि मुनय प्रतिजानते । सत्यप्राणास्तु शीर्ष ग्यास्तमश्चवाष्टमस्तथा। इन्द्रियाणि तदा देवा मनोस्तस्यान्तरे स्मृता ॥३६ तेपा च प्रभुदेवाना शिविरिन्द्र प्रतापवान् । समर्पयोऽन्तरे चैव ताग्निबोधत सत्तमा ।।४० काव्यो हर्षस्तथा व काश्यप पृथुरेव च । आयश्चाग्निरित्येव ज्योतिर्धामा च भार्गव ॥४१ पोलहो वनपीठश्च गोरे वासिष्ठ एव च । रस्तथापि पौलस्त्य ऋषयस्तामसेऽन्तरे ।।४२ जनुवण्डम्तथा शान्तिनंर म्याति यस्तया। प्रियभृत्यो ह्यावक्षिश्च पृष्टलोदो दृढोद्यतः । तश्च प्रानवन्धुश्च तामसस्य मनो मुता ॥४३ पचमे स्वथ पर्याय मनोरचारिणवेऽन्तरे । गरणास्तु सुसमास्याता देवताना निवोचत ।।४४ ममृता भाभूतरजोविकुण्ठा रासुमेधमः । चरियोस्तु गुभा पुषा वसिष्ठम्य प्रजापते । धनुदंश म चत्वारो गणास्तेपातु भास्वग ॥४५ - [ वायु पुराण स्ववियोनिभापश्न प्रत्येतिष्ठामृतस्तथा । सुमतिर्वा विगवश्च वाचिनोद सवस्तया ४६ प्रविराशी च वादश्च प्राशश्चेति चतुर्दश । अमृताभा स्मृता ह्यते देवाश्चारिण्णवेऽन्तरे ॥४७ पुलस्त्य पुष के पुत तामस मन्वन्तर में थे। चन देवो के गए एक-एक पच्चीस थे ॥३॥ जो इन्द्रियो के को मुनि प्रति सात है, सत्यप्राण-शीपएप तथा पाठवा तम है। उस समय में इन्द्रिय उस मनु के अन्तर में देव कहे गये हैं ॥३६।। उन प्रभु देवो का शिवि प्रताप वाला इन्द्र था । इस मन्वन्तर में जो सप्तर्षि थे, हे सत्तमा । उनको भव माप लोग जान लो ॥४०॥ काव्य, हर्ष, काश्यप, पृष, आत्रेय, मस्ति, ज्योतिषाना, भार्गव, पोलह, वनपीठ, गोत्र में वासिष्ट, नेत्र, पौलस्प ये इस मन्वन्तर मे ऋपि थे ॥४१॥४२॥ जनु चण्ड, शान्ति, नर, ख्याति, भय, प्रियभृत्य, भवक्षि, पृष्ठलोढ, दृढोद्यत, भृत, ऋतबन्धु, पे तामस मनु के पुत्र थे ॥४३॥ इसके अनन्तर चारिणव मनु के पांचवें अन्तर- पर्याय मे जो देवतामो के गण कहे गये हैं, उन्हें भव जान लो ।।०४॥ भमून, भाभून, रज, विकुण्ठ, ससुमेघस चरिष्णु के शुभ पुत्र थे। वसिष्ठ प्रजापति के चौदह और चार उनके भास्वर गण थे । स्वत्त विप्र, भग्निभाम, प्रत्येतिष्ठामृत, सुमति, बारिराव, वानिनोद, सब, प्रविराराशी, वाद, प्रादश मे चोदह हैं । चारि. पाच मन्वन्तर मे ये अमृताभ देव कहे गये हैं ।।४।।४६४७॥ मतिश्च सुमतिश्चंद तरात्यो तमेव च । प्रावृतिविवृत्तिश्च व मदो विनय एव च Ire जेता जिष्णु सहनं व तिमान् सवसस्तथा। इत्येतानीह नामानि प्राभूतरजसा विदु ॥४६ वृपभेत्ता जयो भीम शुचिर्दान्तो यशो दम । नायो विद्वानजेयन्न सो गोरो प्रयस्तया। कीर्तितास्तु विकुण्ठा भै सुमेधास्तु निबोधत ॥५० मेधा मेधातिविश्व सम्पमेधास्तव च। पृश्निमेघाल्पमेधाश्च भूयो मेपाक्ष्य प्रमु १५१ पृथ्वी दोन ] दीप्तिमेधा यशोमेघा. स्थिर मेघास्तथैव च । सर्वमेधाश्वमेघाश्च प्रतिमेघाश्च य स्मृत । मेघावान् मेघहर्ता च कीतितास्तु मुमेधस १५२ विभुरिन्द्रस्तदा तेपामासीद्विकान्तपौरप । पौलस्त्यो वेदवाश्च यजुर्नामा च काश्यप ||५३ हिरण्यरोमागिरसो वेदथीम्मेव भार्गव । ऊद्ध याश्च वासिष्ठ पर्जन्यः पौलहस्तथा। सत्यनेत्रस्तथाग्रेय पयो रवतान्तरे ॥५४ महापुराणसम्भाव्यः प्रत्यङ्गपरहा शुचि । बलबन्धुनिरामित्र केतुभृङ्गो दृढवत. । चरिष्णवस्य पुत्रास्ते पञ्चमञ्च तदन्तरम् ।।५५ मति, गमति, ऋत, सत्य, प्रावृति, विवृति, मद, विनय, बेता, जिष्णु, मह, धुतिमान, एवम, ये इतने बार मापन रजा र जान लो Viren वृषभेत्ता, जय, भीम, शुचि, दान, यश, दम, नाय, विद्वान्, पजेय, कृश, गोर तथा मुव ये वियुएल कहे गये हैं। मद मुमेपा आन लो ।।५७॥ मेघा, मेधा. तिथि, मस्यमेघा, धिणमेधा, मन्यमेपा, भूयोमेधादय, प्रभु, दीप्तिमेघा, यशोमेघा, स्पिरमेपा, रावं मेघा, अश्वमेधा, प्रतिमेधा, मंपावान्, मेघहर्ता ये सब सुमेधम हे गये है ।।११।१२। उनका विशाल पोप वाला उम ममय में विभु इन्द्र पा। पौरस्य, वेदवाह, यजु नाम वाला पौर पाश्यप, हिरएप रोमा, मानि- रग, पेयी, भाव, कारवाह, यामि, पर्जन्य, पोसह, सरपनेन, पाय रे वन मन्वन्तर म ऋषिये ॥५३॥५४|| महापुराण मम्भाध्य, प्रत्यक्ष परहा, तुषि, बलकाप, निगमित्र. तुभृग, सत ये परिपावरे पुत्र थे। यह पचम मवन्तर रे ॥५॥ स्वारोचिौत्तमश्चेव तामनी रयतामया। प्रियवनान्वपा होने परवारो मनवम्नया ॥५६ पछे गत्वय गर्याप देगा ये बास पेलरे। माया प्रमूना भाम्याश्च पृथुपारच दिवौकम. 1
[ बयु पुरार
महानुभावलेखाश्च पञ्च देवगणा स्मृता १५७
दिवारस सर्ग एप प्रोच्यते मातृनामभि ।
अत्रे पुनस्य नप्तार मारण्यस्य प्रजापते ।
गगाइच तेपा देवानामे को प्रष्टक स्मृत १५८
अन्तरिक्षो वसुयो ह्यतिथिश्च प्रियवर ।
श्रोता मन्ता सुमन्ता च पाद्या ह्यते प्रकीत्तिता ॥
श्येनभद्रस्तथा पश्य पथ्यनेत्रो महायशा ।
सुमनाश्च सुवेताश्च रेवत सुप्रचेतस ।
धु तिरपैय महासत्व प्रसूता परिकीत्तिता ॥६०
विजय सुजयश्चैव माधानी तथंव च।
सुमति मुपरिश्नव विज्ञातोऽर्थपतिश्च य ।
भाव्या द्य ते स्मृता देवा पृथुकास्तु नियोधत ॥६१
प्रजिष्ट शाक्यनो देवो वानपृष्ठस्तथैव च ।
साकर सत्यधृष्णुश्च विष्णुश विजयस्तथा ।
अजितश्च महाभाग पृयुकास्ते दिवौकस ॥६२
लेखास्तथा प्रवक्ष्यामि यवतो मे निबोधत ।
मनोजर प्रपासस्तु प्रचेतास्तु महायशा ॥६३
पातो ध्रुवक्षितिश्च च अद्भुतश्चैव वीर्यवान् ।
अवनो बृहस्पतिदयेव लेखा सम्परिकीर्तिता ॥६४
स्वागेचिप नम तामस तथा वित ये चारी मनु प्रियव्रत के अवय
पर्थात् वश ॥५६॥ अब छने पर्याप म चाशुप म वन्तर मे जो देव थे वे प्राय
प्रसूत भाष्य पृषक बिोकग और महानुभाव लेख ये पांच देवगण कहे गये
॥५॥ यह मातृ नामो के द्वारा दिवौक्स सग कहा जाता है। अत्रि के पुत्र
रजापति पारण्य के नाती हैं। उन देवो के गण एक एक अष्टक कहा गया
॥५६॥ अन्तरिक्ष वमृदय अतिथि प्रियव्रत श्रोता मता सुमन्ता य वाद्य
कहे गये हैं ॥५६॥ श्येनभद्र पश्य पध्यक्षेत्र महायशा सुमना सुवेता रेवत
मुप्रचेतस द्युति महामत्व ये प्रसून कौतित किये गये हैं ।।६०॥ विजय मुजय
पृथ्वी दोन । - मनोयान, मुमति, सुपरि, विज्ञात, अर्थपति ये भाव्य देव कहे गये हैं, अब जो पृथुक हैं उनको समझ लो ।।६१।। प्रजिष्ट, शाक्यन, देव, वानपृष्ट, शाङ्कर, सत्य- घृधा, विष्णु, विजय, अजित, महाभाग दे पृथुक दिवौकस अर्थात् देवता हैं। अब लेखो को बताऊँगा, पाप बनाने वाले मुभसे उन्हें समझ लो । मनोजव, प्रवास, प्रवेता, महायशा, बात क्षिति, अद्भुत, वीर्यवान्, अनन, वृहस्पति ये लेख कहे गये हैं ॥६॥६॥६॥ मनोजवो महावीर्यस्तेपामिन्द्रस्तदाभवत् । उन्नतो भार्गवश्व हविष्मानङ्गिर सुत ॥६५ सुधामा काश्यपश्चैव वासिष्ठो विरजस्तया। प्रतिमानश्च पौलस्त्य सहिष्णु पौलहस्तथा। मधुरात्रेय इत्येते सप्त वै चाक्ष पेऽन्तरे ॥६६ ऊर पूर शतद्य म्नस्तपस्वी सत्यवाक् ति । अग्निप्टुदति रात्रश्च मुद्य म्नश्चेति ते नव ।।६७ अभिमन्युश्च दशमो नाद्वलेया मनो सुता । चाक्ष पस्य सुता ह्यते पप्ठ चैव तदन्तरम् ।।६८ वैवस्वतेन सहयातस्तस्य सर्गो महात्मन । विस्तरेणानुर्वा च कथित व मया द्विजा ॥६९ चाक्ष पस्य तु दायाद सम्भूत कश्यपान्वये। तस्यान्ववाये येऽध्यन्ये तन्नो ब्रूहि यथातथम् ।।७० पास पन्य नित्तर्गन्तु समामान्ट्रोतुमर्हय । तस्यान्ववाये सम्भूत पृथुतेन्य प्रतापवान् ।।७१ भजाना पतयश्चान्ये दक्ष प्रचेतसस्तथा। उत्तानपाद जग्राह पुत्रमत्रि प्रजापति ॥७२ मनाजद महावीम उनका उस समय म हुआ पा। उम्मल, भार्गव, हविष्मान, भगिरा का पुत्र सुधामा, पायप, यामिष्ट, विरज, अतिमान, पौलस्त्य, महिपा, पोलह, मधुगत्रय ये सात चाप मन्वन्तर में पे॥६५॥६६॥ कर, पूर, सातधुग्न, तपस्वी, गत्ययार, कृति, अग्निान, मतिरात्र और मुगुम्न - .
[ वायुपुरारम वे नो हैं ॥६७।। और अभिमायु दाम पा । नालेय मनु के पुत्र थे। ये मब पाशुष के पुत्र थे और यह छटवा मन्व तर है । उस महाामा का यह सग वैव- स्वत ने परिसख्यात किया है । है द्विजो मैंने इमे विस्तार तथा प्रानुपूर्वी से कह दिया है ।।६८॥६६॥ ऋषियों ने कहा-चाक्षुष का दामाद कश्यप के वा मे उत्तम हुमा था। उसके अववाय म मोर जो भी कोई दूसरे हो उन्हें यया तपा रूप से बतलाइये ॥७०॥ श्रीमूतजी ने कहा-आप मोग चाक्षुप का निसग जो है उसे मक्षेप से सुनने के योग्य होते हैं। उसके अन्ददाय में प्रतापवान् चय पृथु हुमा था ।७१३अय दक्ष और प्राचेतस प्रजाओं के पति थे। अनि प्रजा- पति ने उतानपाद को पुत्र ग्रहण दिया था ॥७२॥ दक्षकस्य तु पुत्रोऽभ्य राजा घासीत् प्रजापते । स्वायम्भुवेन मनुना दत्तो कारण प्रति ७३ मन्वन्तरमथासाद्य भविष्य चाक्षुपस्य ह । पर तदनु वक्ष्यामि उपोद्घातेन वै द्विजा ।।७४ उत्तानपादाचतुरा सूनृता वित्तभाविनी । उत्पना चाधिधर्मेण ध्र वस्य जननी शुभा। धमस्य पल्या लक्ष्म्या व उत्पना सा शुचिस्मिता ॥७५ ध्रुवञ्च कीत्तिमन्तञ्च अयस्मत वमु तथा । उत्तानपादोऽजनयत् क्न्ये द्वे च गुचिस्मिते । मनस्विनी स्वराञ्चव तयो पुत्रा प्रकीर्तिता ॥७६ ध्रुवो वषसहस्राणि दश दिव्यानि वीयवान् । तपस्तेपे निराहार प्राथयन् विपुल यश ॥७७ त्रेतायुगे तु प्रथमे पौत्र स्वायम्भुवस्य स । आत्मान धारयन् यागात् प्राथयन् सुमहद्यश ७८ तस्मै ब्रह्मा ददो प्रीतो ज्योलिया स्थानमुत्तमम् । प्राभूतसप्लव हृद्यमस्तोदयविजितम् ।। तस्यातिमात्रामृद्धि च महिमान निरीक्ष्य है । देत्यामुराणामानाय श्लोकमप्युशना जगौ । ८० पृथ्वी दोहन ] इस प्रजापति दक्ष का पुत्र राजा या। स्वायम्भुव मनु ने अत्रि के कारण के प्रति दिया था ॥७३॥ इसके अनन्तर चाप के भविष्य मन्वन्तर को प्राप्त करके हैं द्विषो । इसके पश्चात् उपोद्धान के माय पष्ठ को दत- माऊँगा ।।७४॥ उत्तानपाद से चतुर मुनृत और वित्तभाविनी शुभ अधिधर्म से प्र.व को माता हुई । शुचि स्मित वाली वह धर्म की पत्नी सक्ष्मी में उत्पन्न हुई थी ।७४७।। उत्तानपाद ने प्रव-कीतिमात्-प्रपस्मान तथा वसु को उत्पन्न पिया था और शुचि स्मित वाली दो न्यानो को जन्म दिया था। एक मन- स्विनी और दूसरी स्वरा थी। उनके पुत्र कीर्तित किये गये हैं ।।७६। वीर्य वाले ध्र व ने निराहार रहते हुए विपुल यग को चाहते हुए दश हजार दिव्य वर्ष सत्र तप दिया था ॥७॥ प्रथम श्रेता युग में वह स्वायम्भुव मनु का पात्र * पा जिमन योग में आत्मा को धारण करते हुए महान् या की प्रार्थना की थी।७८) ब्रह्माजी ने प्रसन्न होकर ज्योनिगंगों का उत्तम स्थान उमको दिया पाजो कि सप्लव पर्यन्त परम सुन्दर पोर प्रतोदय से रहित था॥६॥ उमकी अत्यधिक मात्रा वाली मृद्धि पोर महिमा को देयार दैत्यामुरो के माचार्य शुक ने भी इमो यश का वर्णन किया था 1500 महोग्य तपमो वीर्गमहो थ तमहो हुतम् । स्थिता समय वृन्वा यदेनमुपरि ध्रुवम् । ध्र वे दिव ममासक्तमोश्वर स दिवम्पति ।।८१ घवानपुष्टिञ्च भव्यञ्च भूमि मा सुषुवे नृपो । स्वा पायामाह पुष्टिभव नागे तु ता विभु १२ सत्याभिव्याहते तस्य सद्य म्नो साभवत्तदा । दिव्यमहन नाच्छाया दिल्याभरणभूपिता 11८३ छायाया पुटिरापत्त पञ्च पुपानरमान् । प्राचीनगर्भ वृषा दृषञ्च पल निम् ।।४ पत्नी प्राचीनगभंग भूपर्चा मुषुवे पम् । नाम्नादारपिय पुमिन्द्रो य पूजन्मनि ।।८५ ५० 1 [ वायु पुगए सवत्सरसहस्रान्ते सकृदाहारमाहरन् । एव मन्वन्तर युक्तमिन्द्रत्व प्राप्तवान्विभु १८६ उदारधे सुत भद्राजनयत्सा दिवञ्जयम् । रिपुरिसुञ्जय जज्ञे बराङ्गी सा दिवअयात् ॥८७ शुक्राचार्य ने कहा था-ग्रहो। इस घव के तप का पराक्रम कसा अद्भुत है और इसका श्रुत तथा हुन भी कितना विलक्षण है कि इस घ व को प्राने से भी ऊपर करक सप्तर्षिगण स्थित होते हैं। ध्रुव मे समासक्त दिव है दिवस्पति ईश्वर है ।।६१॥ उम भूमि ने ध्रव से भव्य और पुष्टि के नृपों का प्रसव किया था। विभु पुधि ने अपनी छाया से कहा कि नारी हो जानी ।।२।। उसके सत्य अभिव्याहत होने पर उन ममय में वह तुरन्त ही स्त्री होगई थी जो कि छाया दिव्य सहनन से दिव्य भूपणो से विभूषित थी॥३॥ पुष्टि ने उम छाया में पांच निष्पाप पुत्र उत्पन्न किये थे। जिनके नाम-प्राचीन गर्भ-वृपक- वृक-वृकल पोर धृति ॥५४॥ प्राचीन गर्भ वी पत्नी भूवर्चा ने नृपको पुत्र उत्पन्न किया था जिसका नाम उदारधी था और जो पूर्व जन्म म इन्द्र था ।५। एक सहय वर्षों के अन्त मे एकवार आहार प्रहण किया था। इस प्रकार से विभु ने मवन्तर से युक्त इन्द्रत्व को प्राप्त किया था ।।८६।। भद्रा उसने उदारधी के दिवजय को जन्म दिया था। वराङ्गो उसने रिपुजय रिपू को उत्पन्न दिया या ॥७॥ रिपोराधत्त वृहती चाक्षुप सर्वतेजसम् । व्यजीजनत् पुष्करिण्या वारुण्या चाक्षुपो मनुम् । प्रजापतेरात्मजायामरण्यस्य महात्मन ॥८८ मनीरजायन्त दश नद्धलाया शुभा सुता । कन्याया वै महाभाग वैराजस्य प्रजापते IIFE ऊरु पूरु शतद्य म्नस्तपस्वी सत्यवाक् कवि । अग्निष्टुतिरात्रश्च मुद्य म्नश्चेति ते नव । अभिमन्युश्च दशमो नहलाया मनो मता ॥६० अरोरजनयत् पुत्रान् पडाग्नेयो महापभान् ।
पृषी दोस ] अङ्गसुमनस स्वाति ऋतुमङ्गिरस शिवम् ।।१ अङ्गात् सुनोथापत्य ने वेनमेक व्यजायत । अपचारेण वेनस्य प्रकोप मुमहानभूत् ॥६२ प्रजार्थमृपयस्तरूप ममन्युर्दक्षिण करम् । वेनस्य पारणो मथिते सम्बभूव महान्नृप । वैन्यो नाम महोपालो य पृथु परिकीर्तित ।।६३ सधन्वी क्वची जातस्तेजसा प्रज्वलन्निद । पृथुर्वन्य सर्वलोकान् ररक्ष क्षत्रपूर्वज ॥६४ रिपु से वृइती ने सर्व तेज वाले चाक्षुप को धारण किया था और पुनरिणी वाणी म चाक्षुप ने मनु को उतन्न किया था जो कि महात्मा प्ररएप प्रजापति की भात्मजा थी ॥८॥ मनु मे नहला में दश शुभ पुत्र उत्प दिए थे जो महाभाग प्रजापति बराज की कन्या थी ॥८६॥ अरु-पूरु-तद्युम्न-तपस्वी गरपवार-कवि-अग्निप्टुन-प्रतिराय और सुद्युम्न ये नौ हैं और दशम अभिमन्यु नदला मनु के पुत्र हुए थे 1500 माग्नेयी ने अरु से महात् प्रभा वाले छ पुत्रो को जन्म दिया था जिनके नाम-प्रङ्ग-सुमनस-स्वाति-तु-प्रागिरम और शिव ये॥१॥ मुनीथा न प्रङ्ग से एक मन्तान वैतको उन्पन्न किया था। मैन के प्रपचार के कारण में बड़ा भारी क्रोध उत्पन्न हुआ था ॥२॥ ऋषियो ने प्रजा के लिए उसके दाहिने हाथ का मन्यन किया । उम ममय वेन के हाथ के मन्यन दिये जाने पर एक महान नृप वन्य नाम वाला महीपाल उत्पन्न हुना पा जो कि पृथु इस नाम से वहा गया है ।।६।। यह पन्दी-वचधारी तेर मे प्रायलित करता हुमा उत्पन्न हुप्रा । क्षत्र पूर्वज वन्य पृथु ने ममस्त लोको को रसा की पो॥४॥ राजम्याभिषिक्तानामाद्य स यसुधाधिप । तस्य स्तवार्य मुरानो निगुणौ सूतमागधौ ॥६५ तेनेय गौमहाराजा दुग्धा सस्यानि धीमता प्रमाना नृत्तिामाना देौऋषिगण गह ।। .
५२ ] [ वायु पुराण पितृभिर्दानवैश्वं व ग-धर्वैरप्तरोगण । सर्व पुण्यजनंश्च व वोरुद्धि पतिस्तथा ॥६७ तेपुतेषु तु पापु दुह्यमाना वसुन्धरा । प्रादाद्यथेप्सित क्षीर तेन लोकास्त्वधारयत् ॥१८ विस्तरेण पृथोर्जन्म कीर्तयस्व महामते । यथा महात्मना दुग्धा पूर्व तेन वसुन्धरा HEE यथा देवश्च नागश्च यथा ब्रह्मविमि सह । यया यक्षं सगन्धवरप्सरोभिर्यथा पुरा॥१०० तेपा पाविशेषाश्च दोग्यार क्षीरमेव च । तथा वत्सविशेपाश्च तन्न प्रब हि पृच्छताम् ।।१०१ राजसूय यज्ञ के द्वारा अभिषिक्त होने वाले राजामो मे वह यन्य सबसे पहले माद्य वसुधा का स्वामी हुमा था। उसके स्तवन करने के लिए परम निपुण सूत और मागष उत्पन्न हुए थे ॥६५॥ उस बुद्धिमान महान राजा ने इस गो से सस्यो का दोहन किया था। वृत्ति की कामना वाले प्रजामो के देव -ऋपि गयो के साथ-पितर-दानव-न्धर्व-अप्सरामो के गण-समस्त पुण्य जन-विरुद् और पर्वतो के माय उन-उन पात्रो में दुह्य मान इम वसुन्धरा ने इच्छा के अनुसार क्षीर दिया था उससे लोगो को धारण किया था ।।६६६७ ॥१८॥ ऋपियो ने कहा-है महामते विस्तार के साथ पृथु के जन्म का वर्णन करिये। जिस प्रकार से उस महात्मा ने इस वसुन्धरा का दोहन किया था। 18 पहिले जिस तरह मे देव-नाग-बहषि-यक्ष-गन्धर्व भौर अप्सरामो के माथ उनके पात्र विशेपो को दोग्धा को और क्षीर को तथा वत्स विशेपो को इन सबको पूछने वाले हमको भली-भांति बतलाइये ॥१०॥१०१॥ यस्मिश्च वारणे पाणिर्वेनस्य मथित पुरा । कुद्ध म हपिभि पूर्व तत् सर्व क्थयस्व न ॥१०२ वर्णयिध्यामि वो विप्रा पृथोवेन्यस्य सम्भवम् । एकाग्रा प्रयताश्चैव शुधू पध्व द्विजोत्तमा ।।१०३ पृथ्वी-दोहन ] नाशुचे पि पापाय नाशिष्यायाहिताय च। यसययमिम पुण्य नाताय कथञ्चन ।।१०४ स्वयं यशस्यमायुध्य पुण्य वेदश्च सम्मितम् । रहस्यमृपिभि प्रोक्त शृणुयाद्योऽनसूयक ।।१०५ यश्चेम थावयेन्मय॑ पृथोन्यस्य सम्भवम् । ग्राहाणेभ्यो नमस्कृत्य न स शोचेत् वृताकृतम् । गोप्ता धमस्य राजासो बभूवापिसम प्रभु ॥१०६ अविवशसमुत्पनो ह्यङ्गो नाम प्रजापति । यस्य पुत्राभवढे नो नात्यर्थ धार्मिकस्तथा ।।१०७ जिस कारण के होने पर पहिले बेनका हाय मथा गया था और पहिले महर्षिया ने बहुत दुख होकर उसके हार का मन्थन रियर पा वह सब हमको बननादए ॥१.२॥ श्री सूतजी ने कहा- हे द्वितोतमो। हे विभो । मैं मापके सामने पत्र बन्य पृषु ने जाम कायरान कांगा। पाप लोग तम एकाग्र मन पाले पौर प्रयत होत हुए थवरण करो॥१०३॥ जो मनुचि हो पापयुक्त-प्रहित मात एष पनिध्य हो उसमे कभी भी इस परम पुरय चरित्र का वपन नहीं करना चाहिय ।।१०४॥ स्वग देने वाला या प्रदान करने वाला, आयु देने पाना पुण्य मोर समस्त देशे के द्वारा सम्मन यह ऋपियों के द्वारा परम रहस्य पहा गया है जो अमूया अर्थात् निदान करने वाला हो, उस ही यह थवण घराना चाहिए ।।१०।।जा मनुष्य वय पृथ का जम चरित्र के इस वृत्तानो सुनादे उसे ब्राह्मणो को नमस्कार रख ही गुनाना चाहिये पौर गिर माने कृन तथा मा का कुछ सोच नहीं करना चाहिय । यह राजा धर्म से रसापान वाला पति के ममान प्रभु हुमा या ॥१०६॥ भनि काम उत्पन्न हुमा पङ्ग नाम दाना प्रजापति हुपा पा । जिसका पुत्र वेन हुपा था, जोकि विशेष मधिक धार्मिक नहीं पा ॥१०॥ जातो मृत्युमुनाया ये सुनीयाया प्रजापति । स मातामहोपे वेन पालामजात्मज ॥१०%
५४ ]
[
बायु पुराण
स धम प्रयत कृत्वा कामाल्लोभे व्यवत्तत।
स्थापन स्थापयामास धपित स पार्थिव ॥१०९
वेदशास्त्राण्य तिक्रम्य ह्यधर्मे निरतोऽभवत् ।
नि स्वाध्यायवपटकारा प्रजास्तस्मिन् प्रशासति ।
आसन च पपु सोम हुत यज्ञ प देवता ॥११०
न यष्टव्य न होतयमिति तस्य प्रजापते ।
पासीत् प्रतिज्ञा क्रूरेय विनाशे प्रत्युपस्थिते ।।१११
अहमिज्यश्च पूज्यश्च सवयज्ञ द्विजातिभि ।
मयि यज्ञो विधातव्यो मयि होतव्यमित्यपि ।।११२
तमति जातमर्यादमाददानमसाम्प्रतम् ।
ऊबुमर्पय सर्वे मरीचिप्रमुखास्तथा ॥११३
वय दीक्षा प्रवेक्ष्याम सवत्सरशतान् बहून् ।
माऽधम वेन कास्त्वि नप धम सनातन ।
निवने च प्रसूनोऽसि प्रजापतिरसराय ॥११४
मृत्यु की पुत्री सुनीथा म प्रजापति ने जम ग्रहण किया था। वह बेन
मातामह के दोष स कालको पात्मजा का पुत्र हुआ था। ॥१०८।। उसने धम
को पीठ पीछे करने अर्थात् एकदम भुला कर ही काम से लोम में निमग्न
होगया था। उस राजा ने धम से रहित स्थापना वो ही स्थापित किया था
॥१०६॥ वेदो और समस्त गात्रो का अतिक्रमण करके वह भषम म निरत
होगया था। उसके प्रशासन परन पर समस्त प्रजा स्वाध्याय तथा वषटकार से
रहित होगई थी और उसके शासन कालम देवगण यज्ञो म उम सोमरस का
पान नहीं करत थ ॥११०॥ उस प्रजापति को ऐमी यह र प्रतिना विना
काल के समुपस्थित होने पर भी कि उसरे राज्य मकिणीक द्वारा भी पजन
तथा हवन नहीं करना चाहिए ॥१११॥ मैं यजन करने के योग्य सर्वोपरि प्रभु
हूँ में ही सब शिरोमणि पूजा के योग्य हूँ-द्विजातियो के द्वारा समस्त यज्ञ मादि
म समस्त देवादि का त्याग र मेरा ही भजन-यूजन करना चाहिये । मुझम
मज्ञ करना चाहिये पोर मरे लिय ही हवन वरला बाहिय ।।११।। उस समय
पृथ्वी दोहन । - प्रमुख मरीचि प्रादि समस्त ऋपियो ने मर्यादा का अनि प्रमण करने वाले तथा अनुचित वस्तु को ग्रहण करने वाले उससे कहा-||११३॥ हम दीक्षा का प्रवेक्षण करेंगे और बहुत संक्डो वर्ष तक परेंगे । हे वेन ! तुम अधर्म मत परो, यह मवंदा स चले पाने वाला सनातन धर्म नहीं है। और निधन होजाने पर बिना किसी सराय के प्रजापति तुम प्रमूत हुए हो ॥११४॥ पालयिष्ये प्रजाश्चेति त्वया पूर्व प्रतिश्रुतम् । तास्तथा वादिन सर्वान् ब्रह्मपीनप्रवीतदा ॥११५ स प्रहस्य तु दुदिरिद वचनकोविद । स्रष्टा धर्मस्य वश्चान्य थोतव्य वस्य व मया ।।११६ वीयंथ ततप सत्यर्मया वा वः समो भुवि । महात्मानमनून मा यूय जानीत तत्त्यत ।।११७ प्रभव सर्वलोकाना धर्माणाञ्च विशेषत.। इच्छन् दहेय पृथिवी प्लावयेय जलेन वा। सृजेय या असेय का नाम वार्या विचारणा ॥११८ पदा न शक्यते स्तम्भान्मानाच्च भृशमाहित । अनुनेतु नृपो वेनस्तत द्धा महपय ॥११६ निगृह्य त महावाहु विस्फुरन्त यथाऽनलम् । तताऽम्य यामहस्त ते ममन्यु शापिता ॥१२० तस्मात् प्रमध्यमानाद जज्ञे पूवमभिधत । ह्रस्वाऽतिमात्र पुम्प कृष्णश्चापि तथा द्विजा ॥१२१ तुमन पहिल प्रतिमा बी पी कि मैं प्रशापामा पालन करूगा । उस ममय गभार स बहन वाले समस्त प्रापियों से वह बोला-॥११॥ दुष्ट युधि वाला किन्तु बालने में परम चतुर वह बुध इंगकर यह बोला--प्राय पर्धा मुभम पनिरिक्त कौन धर्म का गृजन रन वाया है पौर मुझे मिली पास गुननी चापि अर्थात् ऐमा भी कोई नहीं है ॥११॥ इम भूमएल में परारमन्थन प्रति सामान-सारचर्या और सत्य इम पूर्ण गमुदाय में मेरी समता रान याला प्रयन है ? प्रर्यात कोई भी ऐमा मरे समान नहीं है।
[ वायु पुराण प्राप लोग सब भी मुझे तत्वमे पूर्ण महात्मा निश्चय रूप से समझें ॥११७॥ समस्त लोको के प्रभु मौर विशेष रूप से धर्मों के स्वामी हमही हैं । मैं इच्छा करता हुप्रा अर्थात् यदि मैं चाहूं तो इस पृथ्वी को जलाई अथवा जलमे प्लावित करदू-मृजन करूया अमन कर मुभमे यह सब शक्ति विद्यमान है । इसमे कुछ भी विचाराणा नहीं करनी चाहिये ।।११८।। स्तम्भ होने के कारण से या मान पी अधिकता से कोई प्रत्यन्त मोहित होजाने और उसका अनुनयन म किया जा साता हो तो वेन नृप उसे ठीक कर देगा। इतना सुनकर महपिवृन्द बहुन क्रुर होगये थे ।।११।। तब तो महाबाहु उसको विस्फुरित अग्नि के समान निगृहीत करके उन्होने अत्यन्त क्रोधित होते हुए उसके वाम हस्तका मन्यन किया था ।।१२०॥ उगके प्रमभ्यमान होने वाले से पहिले जो अभियुत हुमा है वह अर्थात् पृथु उत्पन्न हुमा । हे द्विजो ' और अत्यन्त छोटा एक कृष्ण चरण वाला पुरुप भी उत्पन्न हुआ था 11१२१॥ स भीत प्रअलिश्च व स्थितवान् व्याकुलेन्द्रिय । तमार्त विह्वल दृष्ट्वा निषीदेत्या वन् किल ॥१२२ निषादवशवासो बभूवानन्त विक्रम । धीवरानसृजत्सोऽपि वेनकल्मषसम्भवान् ॥१२३ ये चान्ये विन्ध्यनिलयास्तुम्बुरातुबरा खसा । अधर्मरुचयश्चापि सम्भूता वेनकल्मपात् ॥१२४ पुनर्महर्पयस्तस्य पाणि वेनस्य दक्षिणम् । अरणीमिव सरम्भान्ममन्युतिमन्यव ॥१२५ पृथुस्तस्मात् समुत्पन्न करास्फालनतेजस । पृथो करतलाद्वापि यस्माजात पृथुस्तत । दीप्यमान स्ववपुपा साक्षादग्निरिवोज्ज्वलन ॥१२६ माद्यमाजगव नाम धनुर्यह्य महारवम् । शराश्च विचंद्रक्षार्थ कवचञ्च महाप्रभम् ।।१२७ तस्मिनातेऽथ भूतानि सप्रहृष्टानि सर्वा । समुत्पन्ने महाराशि वेनश्च निदिवङ्गत ॥११८ पृथ्वी दोहन ] [ ५७ वह प्रत्यन्त भयभीन हाथ जोडे हुए व्याकुल इन्द्रियो वाला स्थित होगया था । उसको अत्यन्न पातं और विह्वल देख कर ऋपियो ने कहा—बैठ जाम्रो अर्थात् पिएरा हो जानो ॥१२२॥ यह अनन्त विक्रम वाला निपाय वश का परन थाना हुआ था। वेन के कल्मष से उत्पन्न होने वाले धीवरो पा उमने भी सृजन किया था ।।१२३।। और जो अन्य विन्ध्याचल मे रहने वाले तुम्बर-तुवर- खर और अधर्म की रचि वाले भी थे, वे भी सब येन के कल्मप से उत्पन्न क्रोध वाले होते हुए बहुन सरम्भ से प्ररणी काठ की भाति वेन के दक्षिण हाय का मन्थन करने लगे ॥१२५।। करने पर पारपालन तेज वाले उससे पृषु उत्पन्न हुा । अथवा जिस पृधु के करतल से पृथु उत्पन्न हुआ था यह अपने शरीर से दीप्यमान होते हुए साक्षात् प्रग्नि के तुल्य जलता हुआ था ॥१२६।। पाद्य आजगव नाम वाले और महान ध्वनि वाले धनुष को ग्रहण कर और रक्षा के लिये पारो वो धारण करते हुए तथा महा प्रभा वाले पवच को धारण किये हुए था ।।१२७॥ उसके उत्पन्न होने पर सभी ओर से समस्त प्राणी बहुत प्रसन्न थे 1 इस महान राजा के समुत्पन्न होने पर वेन तो स्वर्ग को चला गया था॥ १२८ ॥ समुत्पन्नेन राजपि स सत्पुत्रेण धीमता। पुरुषव्याघ्र पुग्नाम्नो नरवात्त्रायते तत १२९ त नद्यश्च समुद्राश्च रत्नान्यादाय सर्वश । समागम्य तदा वैन्यमभ्यपिश्चन्नराधिपम् । महता राजराज्येन महाराज महाद्य तिम् ॥१३० सोऽभिषिक्तो महाराजा देवंरङ्गिरस सुतं । आदिराजो महाराज पृथुवैन्य प्रतापवान् ।।१३१ पित्रापलितास्तस्य प्रजास्तेनातुरञ्जिता । सतो राजेति नामास्य अतुरागादजायत ।।१३२ प्रापस्तस्तम्भिरे चास्य समुद्रमभियास्यत । पर्वतान विशोर्यन्ते ध्वजमङ्गन नाभवत् ॥१३३ ५८ ] [ वायु पुराण अकृष्टपच्या पृथिवी सिद्धयन्त्यन्नानि चिन्तया। सवकामदुधा गाव पुटके पुटके मधु ॥१३४ एतस्मिन्नेव काले च यज्ञे पंतामहे शुभे । मत सुत्या समुत्पन्न सौत्येऽहनि महामति । तस्मिन्नेव महायज्ञ जज्ञे प्राज्ञोऽय मागध ॥१३५ वह राजपि धीमान् पोर सत्पुत्र के उत्पन्न होने से वह पुरुषो मे व्याघ्र के समान रहने वाला पु नाम वाले नरक से फिर बाग पा जाता है ।।१२।। समस्त नदियो-समस्त ममुद्र सब मोर से रलो को लाकर और वहां पावर उम नराधिय बन्य का उन सबने अभिषेक किया था जो कि महान् राजा के राज्य से महान राजा मौर महान अति वाला था ।।१३। वह महान रामा अगिरा के पुत्र देवो के द्वारा प्रादिराज-महाराज मोर प्रताप वाला वैन्य पृषु पभिषिक्त हुमाया ॥१३१।। उसके पिता के द्वारा अपरजित उमवी प्रजा उसके द्वारा अनुरजित हुई थी। तब मे ही मनुराण से इसका पजा यह नाम हो गया था ॥१३२।। समुद्र में अभियान करते हुए उसके जल स्तम्भित होगये थे और विशीणं होते हैं और ध्वजभङ्ग नहीं हुआ था ।।१३३।। उम समय पृथ्वी भष्ट पच्या हो गई थी मर्यान् विना जुनाई के हो फ्ग पैदा करने वाली पी निता कने मात्र से ही पानी की सिद्धि होती है । गोए समस्त कामो के दोहन बरने वाली थी और पुरक-पुटर मे मयु या ॥१३४॥ इम ही जन में शुभ पंतामह यज्ञ मे सौ य दिन मे मुनि मे सूत उत्पन्न हुए जोकि महामति वाले पे । उम ही महायज्ञ म प्राप्त मागध उत्पन्न हुए थे ॥१३॥ ऐन्द्रण हविपा चापि हवि पृक्त वृहस्पते । जुहायेन्द्राय देवेन तत सूतो व्यजायत ।।१३६ प्रमादस्तत्र सञ्जन प्रायश्चित्तश्च कम। शिष्यहम्येन यत्पृक्तभिभूत गुरोहंवि । अधरोत्तरचारेण जन तद्वर्णवेवृतम् ॥१३७ यच्च क्षमात्ममभवन्द्रह्मण्या हीनयोनित । गूत पूर्वेण साघमंतुल्यधर्म प्रवीतिन ॥१३८ ।
पृथ्वी दोहन ] [ ५९ मध्यमो ह्य प सूतस्य धर्म क्षत्रोपजीवनम् । रथनागाश्च चरित जघन्यञ्च चिकित्सितम् ।।१३६ पृयो स्तवार्थ तो तत्र समाहूतो सुरपिभि । तावूवुमुनय सर्ने स्तूयतामेप पार्थिव । कमैतदनुरूप वा पान स्तोतस्य चाप्ययम् ।।१४० तावूचतुस्तदा सर्वांस्तानृपीन्सूतमागधौ। पावा देवानृपी श्चैव प्रीणयाव स्वकर्मभि ।।१४१ न चास्य कम व विद्वो न तथा लक्षण यश । स्तोत्र येनास्य कुर्यायो राज्ञस्तेजस्विनो द्विजा ॥१४२ ऐन्द्र हवि के द्वारा वृहस्पति का भी हवि युक्त हुआ । देव के द्वारा इन्द्र के लिए हवन किया था। इसके बाद सूत उत्पन्न हुए ॥१३६।। वहाँ पर प्रमाद उत्पन्न हुआ और कर्मो मे प्रायश्चित उत्पन्न हुमा । शिष्य के हव्य से जो पृक्त हो वह गुरु का हवि अभिभूत होगया। ऐसे अधरोत्तर चार से वर्गों की विकृति उत्पन्न हुई ॥१३७॥ जो क्षत्रिय से ब्राह्मणी मे हीनयोनि से हुप्रा । पूर्व से साधम तुल्य धर्म वाला सूत प्रकीत्तित हुआ पा ।।१३८।। सूत का यह मध्यम धर्म है और क्षत्रोपजीवन है। रथ नाग चरित है और चिकित्मित जघन्य चरित होता है ॥१३६॥ सुरपियो के द्वारा वहाँ पर वे दोनो पृषु के स्तवन के लिए बुलाये गये थे और समस्त मुनियो ने उन दोनो से वहा कि तुम इस पृथु । राजा की स्तुति करो। यह भाप दोनो के अनुरूप ही कार्य है और यह राजा भी स्तोत्र का पात्र है अर्थात यह राजा भी स्तवन के योग्य है ।।१४०।। तब उन दोनो सूत और मागध ने उन समस्त ऋषियो से कहा- हम दोना प्रपने कमो के द्वारा देवो को और ऋषियो को प्रसन्न करते हैं ॥१४१|| हम इसके हम वो नही जानते हैं और न उस प्रकार के लक्षण वाना इसका यश ही है। वृन्द | जिससे कि इस तेजस्वी राजा का स्तोत्र करें॥१४२॥ पिभिस्तो नियुक्तौ तु भविष्य स्तूयतामिति । दानधर्मरतो नित्य सत्यवान् स जितेन्द्रिय । ज्ञानशीलो वदान्यस्तु सग्रामेप्वपराजित ।।१४३
६०
बायु पुराण
यानि वर्माणि कृतवान् पृथुश्चापि महावल ।
तानि शीलेन बद्धानि स्तुवभि मूतमाग, ७१४४
तत स्तवान्त सुप्रीत पृथु पादात् प्रजेश्वर ।
अनूपदेश यूनाप मगध मागधाय च ।।१४५
तदा वं पृथिवीपाला स्तूयन्ते सूतमागर्थे ।
माशीर्वाद प्रशेध्यन्त मूनभागधवन्दिभि ॥१४६
त वा परमप्रीता प्रजा ऊत्रुमहर्षय ।
एप वा वृत्तिदो बन्यो भवन्विति नराधिप ।।१४७
ततो वैन्य महाभाग प्रजा समभिदुद् वु ।
स्वनो वृत्ति विधस्वेति महर्षेवचनात्तदा ।
साऽभिद्रत प्रजाभिस्तु प्रजाहितचिकीर्षया ।।१४८
धनुरी हीत्वा वारणांश्च वसुधामाई यब्दली।
अस्याई नभय जस्ता गीभूत्वा प्राद्रवन्मही ॥१४६
ऋपियो क द्वारा व दोनी नियुक्त किय गये थे कि कि प्रागे होने वाले
कमो से इसका स्तबन करो। वह नित्य ही दान और धम म रल है-सत्यवात्
है और इद्रिया को जीतने वाला है । ज्ञानपील और वदाय अर्थात् दारा है
तथा मग्रामो म पराजित न होने वाला है ।।१४३॥ महान् बल वाले पृथु ने भी
जिन को को किया था वे सब स्तुति करने वाले सूत मागधा के द्वारा शीन से
बज होते है ॥१४॥ इगके अननर ग्तवन के अत म प्रजेश्वर पृथु ने बहुन
प्रसन्न होकर मूत पे लिये अनूप देश और मामध + लिये मगध दश वे दिया
था ॥१४५// उस समय में पृथिवीपाल सून मोर मागधा के द्वारा स्तुत किये
जाते हैं और मूत मागय वन्दियो के द्वारा ग्राशीर्वादों से प्रपौषित किये जाते
हैं ॥१४६।। उसको देखकर मत्यत प्रपन महपियों ने प्रजा से कहा--आप
सबका यह नराधिप व व वृत्ति देने वाला होवे ।।१४७॥ इसके अनन्तर समस्त
प्रजा महा भाग वैय की और दौडी और कहा-आप हमारी वृत्ति करो। तब
महर्षियो के वचन स प्रजात्रा के द्वारा अभिद्रुत वह प्रजा के हित करने की
इच्छा से उम बली ने धनुष और वाणों क लकर वसुघा वा का मादन किया
पृथ्वी दोहन ] था। इसके प्रार्दन के भय ये डरी हुई भूमि गौ वनकर भाग निकली ॥१४८ ता पृथुनुरादाय द्रवन्तीमन्वधावत । सा लोकान् ब्रह्मलोकादीन् गत्वा वेन्यभयात्तदा । ददर्श चानतो वन्य वाम कोद्यतधारिणम् ॥१५० ज्वलद्भिविशिग्वैर्वाणर्दीततेजसमच्युतम् । महायोग महात्मान दुईपममरैरपि ॥१५१ अलभन्तो तदा त्रारण दैन्यमेवान्वपद्यत । कृताञ्जलिपुटा देवी पूज्या लास्निभि सदा ।।१५२ उवाच वेन्य नावमं स्त्रीमधे परिपश्यमि। वथ धारयिता चासि प्रजा राजन् मया विना ।।१५३ मयि लोया स्थिता राजन मयेदाधार्यत जगत् । महत च विनरपेयु प्रजा पार्थिवसत्तम ।।१५४ न मामहसि वै हुनु अयश्चेत्त्य चिपीपसि । प्रजाना पृथिवीपाल शृणु चेद वचो मम ।।५५ उपायत समारब्धा मर्ने सिद्धन्त्युपत्रमा । हत्वापि मा न शक्तस्त्व प्रजाना पालने नृप ।।१५६ गजा पृथु ने धनृप लकर भागती हुई उसमा अनुपादन किया था। वह उस समय वै य क भय मे ब्रह्मादि नोकरी को जाकर भी उसने अागे धनुष र उद्यत वैन्य का देखा था ॥१४६ १५०॥ जनत हुए विखि बागा से दी तज बाल-महायोग-महान् आत्मा वार और दवो द्वारा भी दुध अच्युन का न प्राप्त करती हुई उम समय म रक्षा वै प की ही शरण म प्राप्त हुई थी। तीना लोको के द्वारा मदा पूजन के योग्य-ग्रजति पुर किये हुए वय मे वोली-क्या अाप स्त्री के वध म प्रथम को नी दख रहे है ' हे राजन् । मरे बिना प्रजा को कम घामा करने वाले हावगे । [१५१ १५२ १५३।। है राजन् । मुझ पर य गब लोग म्पिन हैं और मरे द्वारा यह सम्पूण जगत् धारण प्रिया जाता है। है पाथियो म था | मर विना तो ममस्त प्रज्ञा नष्ट हो जायगी। ११५४। यदि आप कल्याण यग्न की इच्छा रखते हैं ना मुमारन के याग्य पाप नही हान हैं । ह पृथ्वी र पालक ' हे प्रजा के पालक । प्राय मरस ६२ ] I वायु पुराणा धचन का श्रवण करो ॥१५५।। उपाय से भली भांति प्रारम्भ किये हुए समस्त उपक्रम सिद्ध होते हैं । हे नृप । मुझे मार कर भी आप प्रजामो के पालन समय नही हो सकते हैं ॥१५६।। अनभूता भविष्यामि जहि कोप महाद्य ते । अवघ्याश्च स्त्रिय प्राहुस्तियंग्योनिशतेष्वपि । मलौव पृथिवीपाल धर्म न त्यक्त महंसि ।।१५७ एक बहुविध वाक्य श्रुत्वा राजा महामना । क्रोध निगृह्य धर्मात्मा वसुधामिदमब्रवीद् ॥१५८ एकस्यार्थाय यो हन्यादात्मनो वा परस्य वा। एक प्रारण बहून् वापि काम तस्यास्ति पातकम् ॥१५६ यस्मिस्तु निहते भद्रे लभन्ते वहव सुखम् । तस्मिन्हते शुभे नास्ति पातञ्चोपपातकम् ।।१६० सोऽह प्रजानिमित्त त्वा वधिप्यामि वसुन्धरे । यदि मे वचन नाद्य करिष्यसि जगदितम् ॥१६१ त्वा निहत्याद्य वारगेन मच्छासनपराङ्मुखीम् । पारमान प्रथयित्वेह धारयिष्याम्यह प्रजा ॥१६२ सा व वचनमासाद्य मम धर्मभृता गरे । सञ्जीवय प्रजा नित्य शक्ता ह्यसि न सशय ॥१६३ हे महान् यति वाले । आप कोप को त्याग देवें-मैं पचभूता ह जाऊंगी। सैकडो तियग योनियों में भी स्त्रियाँ अवध्या ही कही गई हैं। हे पृथ्वीपाल । ऐसा मानकर आप धर्म का त्याग करने के योग्य नही होते हैं । ॥१५७॥ महान् मन वारे राजा ने इस प्रकार के वाश्या को सुनकर धर्मामा ने क्रोध को रोस्कर पृथ्वी से यह कहा-॥१५८॥ एक के अपने या पराये अय के लिये जो कोई हनन विया करता है चाहे किसी के एक प्राण का हनन करे मा बहुतो का हनन करे उसका बड़ा भारी अवश्य हो पातक हुआ करता है ॥१५॥ हे भट्टै । जिम हनन म बहुत से प्राणी मुख की प्राप्ति किया करते हैं । हे शुभे । उमके मारे जाने पर पातक और उपपातक कुछ भी नहीं होता - ।
पृथ्वीन्दोहन ] 1 है ॥१६०॥ हे वसुन्धरे । वह में प्रजा के कारण तुझे मारूंगा। यदि तू अब मेरे जगत के हित वरन वाले वचन को नही करेगी ॥१६१।। मेरे शासन के विरुद्ध जान वाली तुझे पाज वाण से मारकर यहाँ आत्मा की प्रार्थना करके मैं प्रजा को धारण करूंगा ॥१३२॥ हे धर्म धारण करने वालो मे थेठ । वह तू आज मेरे वचन को प्राप्त कर प्रजा को नित्य सज्जीवित कर, तू ममर्थ है- इमम कुछ भी मन्देह नहीं है ॥१६॥ दुहितृत्वञ्च मे गच्छ एवमेत महद्वरम् । नियच्छे त्वान्तु धर्मार्थ प्रयुक्त घोरदर्शने ॥१६ प्रत्युवाच ततो चैन्यमेवमुक्ता सती मही । एवमेतदह राजन् विधास्यामि न सशय ॥१६५ वत्सन्तु मम त यन्छ क्षरेय येन वत्सला । समाञ्च कुरु सर्वत्र मा व धर्मभृता वर । यथा विघ्यन्दमानञ्च क्षीर सर्वत्र भावये ।।१६६ तत उत्सारयामास शिलाजालानि सर्नश । धनुष्कोट्या ततो मैन्यस्तेन शैला विद्धिता ।।१६७ मन्वन्तरेवतीतेषु विपमासीद्वसुन्धरा । स्वभावेनाभवस्तस्या समानि विपमाणि च ॥१६८ न हि पूर्वनिसर्गे ने विपमे पृथिवीतले । प्रविभाग पुराणा ग्रामाणा नापि विद्यते ॥१६६ न सस्यानि न गोरक्षा न कृपिन गणिवपथ । चाक्षुपस्यान्तरे पूर्वमतदासीत्पुरा क्लि । चैवस्वतेन्तरे तस्मिन्सनस्यतस्य सम्भग ॥१७० समत्त यत्र यनासीद्भ यस्तस्मिस्तदेव हि । तत्र-तत्र प्रजास्ता नै निवसन्ति स्म सर्वदा ॥ ७१ पाहार फ्लमूलन्तु प्रजानामभवक्लि । चैन्यात्प्रभृति लोकेऽस्मिन्सनस्यैतस्य सम्भव ॥१७२ कृच्छण महता सोपि प्रनष्ठास्योप/पु नै।
[ वाय-पुराण स वरपयित्वा वत्सन्नु चाक्षुप मनुमीवर । पृथू'दोह सस्यानि स्वतले पृथिवी तत ॥१७३ हे घोर दर्शने । तू मेरी बेटी बन जा धर्म के लिये प्रयोग में लाई हुई तुमको में इस प्रकार से यह एक बहुत बडा दरदान देता हूँ ॥१६४।। उस तरह से कही गई पृथ्वी ने इसके पश्चात् वैन्य से कहा है राजन् । इस तरह से मैं यह सब करूंगी इसमे कुछ भी मशय नहीं है ॥१६॥ हे धम धारण करने वालो म श्रेष्ठ । ग्राप मुझ उसे वरस बनाकर दो जिसमे मैं वत्मला होकर क्षरण कर और आप मुझे सब जगह सम कर देखें जिममे यह विष्यन्दमान क्षीर सर्वत्र भाचिन र ५१६६॥ इसके अनन्तर वैन्य ने सब पोर से शिक्षा के समूहरे को उत्सारित किया था और यह कार्य पनुप पी वाटि से किया और उससे शैल विशेष रूप से वर्तित हो गये थे ॥१६७॥ बीते हुए भन्वन्तरों में यह वसुन्धरा विपमा थो । उसके स्वभाव से हो सम और विषम भाग हुए थे। ।।१६।। पहिले विसर्ग में इस विषम पृथ्वी के तल मे नगरो अथवा ग्रामो या कोई प्रविभाग नहीं है ।।१६९॥ चाक्षुप मन्वन्तर में पहिले यह ऐसी प्राधार यी कि न तो यहाँ सम्य ही थे, न गौत्रों की रक्षा हाती थी, न कृषि ही होती थी और न कोई वाणिज्य करने के मार्ग ही थे। फिर वैवस्वत मन्वन्तर म इस सबका यहाँ जन्म हुआ था ।।१७०॥ जहाँ-जहाँ पर समता थी वहां पर फिर वह सब हुमा मोर वहाँ पर ही सवंदा प्रजा निवास किया करती थी ।।१७१।। प्रजानो का थाहार-फल और मूल भी हुआ था। वन्य प्रादि राजा के होने के समय से लेकर इस लोक म इन सब वस्तुओं की उत्पनि हुई थी ।।१७२।। समस्त औषधिया के अगव हो जाने पर महान् श्रम से उसन यह सब किया था। अधिपति पृथु ने चाशुप मनु का दत्म कल्पित परके स्वताल में राग्यो का पृथ्वी मे दोहन दिया था ॥१७॥ सस्यानि तेन दुग्धानि बैन्येन तु बसुन्धराम् । मनुञ्च चाक्षप मृत्वा वत्सम्पाने च भूमये । तेनान्न न तदाता दे वर्तयन्ते प्रजा सदा ।।१७४
पृथ्वी दोहन ]
ऋपिभि स्तूयते वापि पुनर्दुग्या वसुन्धरा ।
वत्स सोमस्त्ववभूतपा दोग्धा चापि बृहस्पति ॥१७५
पानमासीत्त, छन्दामि गायत्र्यादीनि सवश ।
क्षीरमासोतदा तेपा तपो ब्रह्म च शाश्वतम् ।।१७६
पुन स्तुत्वा देवगणे पुरन्दरपुरोगमै ।
सौवर्ण पानमादाय अमृत दुदुहे तदा।
तेनव वर्तयन्ते च देवा इन्द्रपुरोगमा ।।१७७
नागैश्व स्तूयते दुग्धा विप क्षीर तदा मही ।
रोपाञ्च वासुकिर्दोग्या काद्रवेया महौजस ॥१७८
नागाना व द्विजश्रेष्ठ सारणाञ्च व सर्नश ।
तनव वर्त यन्त्युग्रा महाकाया महोल्यणा ।
तदाहारास्तदाचारास्तहोर्यास्तु सदाथया ॥१७६
श्रामपात्रे पुनर्दुग्धा व तनिमिय मही।
वत्स वैश्रवण कृत्वा यक्ष पुण्य जनस्तथा ॥१८०
दोग्धा च जतुनाभस्तु पिता मणिवरस्य स ।
यक्षात्मजो महातजा वशी स सुमहाबल ।
तन त वत्तयन्तीति परमपिरुवाच ह ।।१८१
उम राजा चेय ने इम वम धरा मे सस्पो का दोहन किया था उसने
चाक्षुप मनु
वो
बछा बनाया तवे इमभूमण्डल स्वरूप पात्र में उस समय उम
अन्न म वह समस्त प्रजा अपना वर्शन मा क्यिा करती है ।।१७। फिर यह
वसुधरा पिया के द्वारा स्तुन होती है और पुन दोहन की गई थी। रुम
समय सोम तो वत्स हुअा था और वृहन्यात दोहन करन वाले बने थे ६१७५||
उस समय भी मोर पद तथा गायत्री प्रादि पात्र बना था और उस समय
उनका शाश्वत तप तथा ब्रह्म ही क्षीर हुना था ।।१७६॥ इनव परच त् देवगण
के द्वारा जिमम पुरदर अग्रगामी ५ स्वपन करपे उम ममय म मुवण निर्मित
पात्र लकर अमृत का दोस्न दिया गया था और उमी से इद्र प्रादि देवा ने
अयन वर्तन ( वृत्ति ) किया था ॥१७७|| नागों के द्वारा नुन हुई पृवी ने
[ वायु पुराण पा। उससे । उस समप विप रूपी क्षीर दोहन में दिया था। उनका दोग्धा वासुक्ति पा और काय महान् भोज वाले थे ॥१७॥ हे दिजश्रेष्ठ नागो का और सभी सपो का उसी से वतन होता है। ये सब उग्र-महान् दागेर के धारण करने वाले प्रोर महान् उरवण थे। वही उनका आहार था और वसा ही माचार वही वीर्य और वही प्राश्य था 11१७६।। फिर यह पृथ्वी श्राम पात्र में अन्तर्धान मे दोहन की गई थी और पुण्य जन यक्षो के द्वारा वैथवरण को वत्स कल्पित कर दोहन किया गया था। उस समय मणिदर का पिता जतुनार यक्षात्मज- महान् तेज वाला, वशी पोर महान् बल वाला था, इसका दो वे अपनी वृत्ति किया करते हैं यह परमपि ने कहा था ॥१८०१ राक्षसंश्च पिशाचंश्च पुनर्दुग्धा वसुन्धरा । ब्रह्मोपेतस्तु दोग्धा वै तेपामासीत्कुबेरक ॥१८२ रक्षः सुमाली बलवान्क्षीर रुधिरमेव च । कपालपाने निदुग्धा अन्तर्धानञ्च राक्षस । तेन क्षीरेण रक्षामि वर्तयन्तीह सर्वश ॥१८३ पद्मपात्रे पुनदुग्धा गन्धर्वैरप्स रोगरण । वत्म चित्ररथ कृत्वा शुचीन् गधास्तथैव च ।।१८४ तेपा विश्वावसुस्त्वासीद्दोग्या पुत्रो मुन शुचि । गन्धर्वराजोऽतिबलो महात्मा सूर्यसन्निभ ॥१८५ शैलेश्च स्तूयते दुग्धा पुनर्देवी वसुन्धरा । तत्रोपधीमूत्तिमती रत्नानि विविधानि च'11१८६ वत्सस्तु हिमवास्तेषा मेरदर्दोग्या महागिरि । पात्रन्तु शैलमेवाप्तीत्तेन शैलः प्रतिष्ठित ॥१८७ स्तूयते वृक्षवीरभि पुनदुग्धा वसुन्धरा । पलाशपायमादाय दुग्य छिन्नप्ररोहणम् ॥१८९ यामधुन पुष्पित गल प्लक्षो वत्सो यशस्विनी । सर्वकामदुधा दोग्ध्री पृथिवी भूतभाविनी ॥१६ सपा पात्रो विधात्री च पारिणी च वसुन्धरा ।
पृथ-वक्षा कीर्तन ] । ६७ दुग्धा हितार्थ लोकाना पृथुना इति न थ तम् । चराचरस्य लोकस्य प्रतिष्ठा योनिरेव च ॥१६० इसके पश्चात् यह वमुन्धरा राक्षम तथा पिशानो के द्वारा दोहन की गई यो । उनका ब्रह्मोपेत कुवेर दोग्धा था॥१८॥ सुमाली बलवान राक्षस था, और उनका क्षीर रधिर ही था। राक्षसो के द्वारा कपाल मे पात्र में अन्तर्धान दोहन की गई थी। उसी क्षीर से राक्षम लोग अपनी वृत्ति चलाया करते हैं । ॥१८३॥ गन्धर्वो तथा अप्सरानो के समुदाय के द्वारा फिर यह वमुन्धरा दोहन की गई थी। उस समय विवरथ को वत्स बनाया था और शुचि गन्धो का दोहन किया गया था ।।१८४|| मुनि का पवित्र पुत्र विश्वावसु उनका दोग्धा था, जो कि गन्धर्वगज अत्यन्त बलवान्-महान् आत्मा वाला और सूर्य के तुल्य था ।।१८।। फिर यह पृथ्वी शैली के द्वारा स्तुत होती है और दोहन की गई थी। वहाँ पर मूर्तिमती बहुत सी पौषधियां तया अनेक प्रकार के रस्नो का दोहन हुआ था ॥१६॥ उनका उम समय हिमाचल वत्स बना था और महान गिरि मे उनका दोग्या मर्यात् दोहन करने वाला था। पात्र उन मनवा दोल ही था, उससे शैल प्रतिष्ठित हुए ॥१८७॥ फिर वृक्ष और लताओ के द्वारा यह भूमि स्तुत होती है और दोहन की गई थी। पलाग का पत्र लाकर छिन्न का प्ररोहण दुग्ध हुआ ण ।।१८८।। पुप्पित शैल कामधुक् था-प्लस वत्स हुआ था- यशस्विनो भूत भाविनी पृथ्वी समस्त कामो की दुघा दोग्धी यी ॥१८६।। वह यह धात्री-विधात्री और धारणी वसुन्धरा पृथ राजा के द्वारा समस्त लोको के हित सम्पादन करने के लिये दोहन पी गई थी-ऐमा हमने सुना है । यह इस ममस्त नर और पचर लोक की प्रतिष्ठा तथा योनि है, अर्थात् यह मवके उद्भव का स्थान है ॥१०॥ 1) प्रकरण ४-पृथु-वंश कीर्तन ॥ आसीदिय समुद्रान्ता मेदिनीति परिश्रु ता । वसु धारयते यस्माद्वसुधा तेन चोच्यते ॥१ [ वायु पुगण मधुरेटभयो पूर्व मेदमा रापरिप्लुता। ततोऽम्युपगमाद्राज्ञ पृथोवन्यस्य धीमत ॥२ इपञ्चासीत् समुद्रान्ता मेदिनीति परिश्रु ता । दुहितृत्वमगुप्राप्ता पृथिवोत्युच्यते तत ॥३ प्रथिता प्रविभक्ता च शोभिता च वसुन्धरा । सस्थाकरवती राज्ञा पत्तनाकरमानिनी! चातुर्वण्यसमाको रक्षिता तेन धीमता ।।४ एव प्रभावो राजासोढन्य स नृपसत्तम । गमस्यश्च च पूज्यश्च भूतग्रामेण सर्वश ॥५ ब्राह्मणश्च महाभागेर्गेदवेदाङ्गपारग. । पृयुरेव नगरकार्यों ब्रह्मयोनि सनातन ।।६ पाथिवीन महाभाग प्राथयद्भिर्महद्या । आदिराजा नमस्त्रार्य पृथुर्वेच्य प्रतापवान् ॥७ श्री मूतजी ने कहा-यह समुद्र के अन्त तक है और मेदिनी इस नाम वाली मुनी गई है। क्योकि यह बस अर्थात् पो को धारण किया करती है, इमी स बमुधा इम नाम स कही जाया करती है ।।१६। यह पहिले समय में मधु और केटभ ये मेद से सररिप्त थी फिर धीमान् वैन्य राजा पृथु के अम्युपगम से यह समुद्र के अन्त तक हुई थी और मेदिनी इस नाम से परिश्रुत हुई। यह दुहिता के भाव नो पास हुई भी, नव से हो यह पृथ्वी इन नाम से पही पाती है ।।२।३ । यह प्रथित हुई-प्रविभक्त हुई और शोभा से भी पुक्त हुई बसुन्धरा थी, जो कि सस्या के प्राररो वाली गजा के द्वारा पत्तनो के श्राफरो से माला बाली की गई थी। यह चारा वर्णो के ममुदाय से समावो उमौ राजा के द्वारा जो कि परम बुद्धिमान् था, रक्षित हुई थी।॥४॥ वह नृपा म परम घेव राजा बन्ध इस प्रकार प्रभाव से युक्त था। वह प्राणियो क समूह के द्वारा सवत्र नमन करने के योग्य तथा पूजा करने में योग्य था ॥५॥ वेद और वेद के समस्त अङ्गो के पारगामी महान भाग्य वाले ब्राह्मणों के द्वारा उयमानि एवं सनातन केवल पृथ ही नमस्कार करने के योग्य होता है ।।६।।
पृथु वय कीर्तन
जो राजा इस भू माइन में महार या पास करने के इच्छुर हा उन महाभागी
के द्वारा भी परम प्रताप वारा आदि राजा बन्य पृथु ही नमसार करने व
योग्य होता है ।।७॥
योगरपि च सग्रामे प्रार्थयानेजय युधि ।
आदिवा नराणा ने नमस्य पृथुरेव हि ॥
यो हि योद्धा रण याति कीर्तयित्वा पृथु नृपम् ।
स घोरम्पे सग्रामे क्षेमी तरति कतिमान् ।।६
दोश्यरपिन राजपिवैश्यवृत्तिसमास्थिते ।
पृथुरेव नमस्कार्यो वृत्तिदाता महायशा ॥१०
एत वत्सविणेपाच दोधार क्षीरमेव च।
पामाणि च गयोक्तानि रावीण्येव यथाक्रमम् ।।११
ब्रह्मणा प्रयम दुग्धा पुरा पृथ्वी महात्मना ।
वायु कृत्वा तदा वत्स वीजानि वसुधातले १२
ततः स्वायम्भुवे पूर्वन्तदा मन्वन्तरे पुन ।
वत्स स्वायम्भुव वृत्ला दुग्धा गोप्मेण वे मही ॥१३
मतौ स्वाराचिपे दुग्धा मही चैत्रेण धीमना ।
मनु
स्वारोचिप कृत्वा वत्म सस्यानि पुरा।।१४
जो योधा मग्राम भूमि म अपना जय प्राप्त करने की कामना रखने हैं,
उनव द्वारा भी मानवा का आदिकर्ता पृथ ही नमस्कार करने के योग्य होता
है ॥६॥ जो याधा राणभूमि में पहिने पृथु राजा या गुग गान करके जाया
करता है वह पिर वहाँ घार स्वरूप वाले मग्राम म झम वाला होता हुआ कोक्ति
प्राप्त करने वाला पार उतरता है ॥६॥ वैश्यों की वृत्ति म समाग्थिन रहने
वाले वैश्यो के द्वारा भी वह राजपि वृत्ति देने वारा और महान या वाला
पृथ हो नमस्कार वरने के योग्य होता है ।।१०।। ये सब वत्म विशेष, दाहन
करन वाल दावा गरण और पात्र नथा क्षीर मभी वस्तुएँ नम के अनुसार मैंने
रह दी हैं ॥११॥ पहिल मगन् आत्मा वाते ब्रह्माजी न इम पृथ्वी का दान
दिया था। उम ममप ब्रह्मा ने वायु को यत्म बनाया था मौर इम वसुधा ये
७० ] [ वायु पुराए तल में बीजो को दुहा था ॥१२॥ इसके पश्चात् फिर पहिले स्वायम्भुव मन्व- न्तर में म्वायम्भुव को वत्स बनाकर ग्रीष्म के द्वारा इस मही का दोहन किया गया पा ॥१३॥ स्वारोचिप मन्वन्तर में धीमान् चैत्र ने मही का दोहन किया था। स्वारोचिष मनु को वत्म बनाकर सम्यो का दोहन किया गया था ॥१४॥ उत्तमेऽनुत्तमेनापि दुग्धा देवभुजेन तु । मनु कृत्वोत्तम वत्स सर्वसस्यानि धीमता १५ पुनश्च पञ्चमे पृथ्वी तामसस्यान्तरे मनो । दुग्धेप तामस घत्स करवा तु बलबन्युना ॥१६ चारिणवस्य देवस्य सप्राप्त चान्तरे मनो । दुग्धा मही पुराणेन वत्सञ्चारिणव प्रति ।।१७ चाक्षुपेऽपि च सम्प्राप्त तदा मन्वन्तरे पुन । दुग्धा मही पुराणेन वत्स कृत्वा तु चाक्षुपम् ॥१८ चाक्षुषस्यान्सरेऽतीते प्राप्त वैवस्वते पुन । वन्येनेय मही दुग्धा यथा ते कीर्तित मया ॥१६ एतदुग्धा पुरा पृथ्वी व्यतीतेष्वन्तरेपु वै । देवादिभिमनुष्यश्च तथा भूतादिभिश्च या ।।२० एव सर्वेषु विज्ञ या ह्यतीतानागतेष्विह । देवा मन्वन्तरेष्वस्य पृथोस्तु शृणुत प्रजा ।।२१ उत्तम पोर धीमान् अनुत्तम देवभुज के द्वारा उत्तम मनु को वत्स बना कर धीमान् ने समस्त सस्यो का दोहन किया था ॥१शा फिर तामस मन्वन्तर से जो कि पांचवा मन्वन्तर या बलबन्धु के द्वारा यह पृथ्वी तामस मनु को वरस बनाफर दोहा की गई ॥१६॥ फिर चारिष्णव देव के मन्वन्तर प्राप्त होने पर पुराण ने चारिधाव को वत्स बनाकर इस पृथ्वी का दोहन किया था ।१७॥ फिर चाशुप मन्वन्तर के पाजाने पर पुराण के द्वारा ही चाक्षुष को वत्स कल्पित कर इस मही का दोहन किया गया ।।१८। फिर चाक्ष ष अन्तर के व्यतीत हो जाने पर इस वैवस्वत मन्वन्तर के सम्माप्त हो जाने पर यह मही वन्य राजा के द्वारा दोहन की गई है जैसा कि मैंने तुमको अभी सब बताया पृथ्वशकोत्तंन ] [ ७१ पा ||१|| पहिले इन सबके द्वारा मन्वन्तरो के व्यतीत हो जाने पर देव मादि- मानव और भूनादि के द्वारा यह भूमि दोहन की गई थी ।।२०।। इस प्रकार से प्रतीत एव अनागत सभी में मन्वन्तरो में देवो को जान लेना चाहिए। प्रब इस राजा पृथु की प्रजा का श्रवण पाप लोग करे ॥२१॥ पृयोस्तु पुत्री विक्रान्तो जज्ञातेऽन्तदिपालिनी। शिखण्डिनी हविर्धानमन्तर्दानाद्वयजायत ।।२२ हविर्द्धनात्पडा यी धिपणाऽजनयत्सुतान् । प्राचीनयहिप मुक पय कृष्ण प्रजागिनो ॥२३ प्राचीनहिभंगवान् महानासीत् प्रजापति । बलव ततपोवीय पृथिव्यामेपराडसो । प्राचीनाग्रा कुशास्तस्य तस्मात्प्राचीनयो सौ ॥२४ समुद्रतनयायान्तु वृतदार. सौ प्रभु । महतस्तमरा पारे सवर्णाया प्रजापते । सवर्णाज्यत्त सामुद्री दश प्राचीनवहिप ॥२५ सर्वे प्रचेतसो नाम यनुर्वेदस्य पारगा । मपृथग्धमंचरणास्तेऽतप्यन्त महत्तप । दशवपंसहयाणि समुद्रालिलेशया ॥२६ तपश्वरत्सु पृथिवी प्रचेत सु महीरहा । अरक्ष्यमाणामावय र्वभूवाथ प्रजाक्षय ॥२७ प्रत्याहते तदा तस्मिश्चाशुषस्यान्त रे मनोः । नागरन मारतो वातु वृत खमभवद में । दशवर्षसहस्राणि न दोयुश्चेष्टितु प्रजा ॥२८ पृषु गजा के दो विधान्त पुत्र उत्पन्न हुए थे जोरि प्रतिदियानी थे । गरिहनी हविर्धान भतर्शन गे उसन हुमा ॥२२॥ हविर्यान में पद्माग्नेयी धागा ने पुत्रों को जन्म दिया था। जिनरे गाम प्राचीन यहि-गुरु-जप-- sey- पोर अजिन पे ।।२३।। प्राचीन यहि भगवान महान् प्रानि । हि मस-या-ता और बीपं गे पृथियों में एक्षट् थे । प्राचीनान पुशा उसके ७२ । । वायु पुराण थे इमोसे यह प्राचीन यहि नाम यात्रा हुमाया ॥२४॥ वह प्रमृ ममुद्र तनया में सनदार दृया था पर समुद्र तनया को अपनी दारा बनाया था। महादतम में पार म प्रभापति में राव म दश मामुद्री प्राचीन वहिषों को मवर्णा न भाग किया पा॥२५॥ य गर धनुर्वेद के पारगामी प्रयतम ये । प्रत्यक धर्म पे भाचरण परले पान उनने दश सहस्र वर्ष तक महान तपश्चर्या वी यो जो समुद्र के जल म सपन ग वाले थे ॥२६॥ प्रचेताया के ताश्चर्या करने पर महीरुह प्रक्ष्ययाण पृथ्वी में बोले। इमो अनन्तर प्रजाशय हो गया या ॥२७॥ उम ममय चाक्ष प मचलर व प्रत्याहत हो जाने पर मारल दहन नबर सका मोरमो से प्राकार मान होगया था। दर सहा वप वा प्रजा कुछ भी चेष्टा न पर सरी यी ॥२८॥ तदुपश्च त्य तपसा सर्वे युक्ता प्रचेतस । मुरोभ्यो वायुमग्निञ्च समृजु तमन्यव IRE उन्मूतानथ तान् वृक्षान् कृत्वा वायुरशोपयत् । तानग्निरदहद्धार एवमासोद्र माय ॥३० द्र भदायमथो बुद्ध्वा विञ्चिच्छेषेषु शालिपु । उपगम्यायवीदेतान् राजा सोमः प्रचेतसः॥३१ दृष्ट्वा प्रयोजन सर्व लोकसन्तानवारणात् । वोपन्त्यजत राजान सर्व प्राचीनहिप ॥३२ वृक्षा क्षित्या जनियन्ति शाम्येतामग्निमाता। रत्नभूता तु क्न्येय वृक्षारण वरवरिणनी ॥३३ भविष्य जानता द्यपा मया गोभिविद्धिला। मारिपा नाम नाम्नपा वृक्षरेव विनिर्मिता । वो ह्येपासोमगर्भविद्धिता ॥३४ युप्माक तेजसोद्धन मम बानि तेजसः। प्ररया मुत्पत्स्यते विद्वान् दक्षो नाम प्रजापति ॥३५ तपस्या म युक्त समस्त प्रचेतानो ने यह सुनकर क्रोधित होते हुए मुखो और अग्नि को उत्सजित किया था ।।२६] वायु ने उन समस्त वृक्षों । भार्या भवतु मैं बापु पृथुवन कीर्तन ] 4 को उन्मूलित कर सुरवा दिया था और अग्नि ने उनको दग्ध कर दिया था। इस प्रकार से घोर द्रमों का क्षय हुआ था ।३०। कुछ शाखियो के गेप रह जाने पर द्रमो के क्षय को जानकर प्रचेतस सोम राजा उनके पास पाकर उनसे पहने लगा ॥३१॥ लोक मन्तान के कारण से समस्त प्रयोजन जानकर प्राचीन वहिंप राजा लोग को को छोड़ दो ॥३२॥ क्षिति में वृक्ष उत्पन्न होंगे। अग्नि और वायु शान्त हो जावे । रत्नभूता यह पन्या वृक्षो की वर वणिनी है ॥३३।। भविष्य अर्थात् आगे माने वाले समय को जानने वाले मैंने गोमो से विवदिन को है । नाम से यह मारिपा नाम वाली है और यह वृक्षो के द्वारा ही विनि- मित हुई है । यह मोम के गर्भ से विवद्धित हुई आपकी भार्या होवे ॥३४|| मापके प्राधे तेन से मोर माथे मेरे तेज से इसमें परम विद्वान् दक्ष नाम वाला प्रजापति उत्पन्न होगा ॥३॥ रा इमा दग्धभूयिष्ठा युध्मत्त जोमयेन में। अग्निनाग्निसमो भूयः प्रजा सवर्द्धयिष्यति ।।३६ ततः सोमस्य वचनाजगृहस्ते प्रचेतस । सहत्य कोप वृक्षम्य पत्नी धर्मेण मारिपाम् ।।३७ मारिपाया ततस्ते वै मनमा गर्भमादधुः। दशभ्यस्तु प्रचेतोम्यो मारिपाया प्रजापति ॥३८ दक्षो जन महातेजाः मोमम्यागेन वीर्यवान् । प्रमृजन्मानसानादो प्रजा दक्षोऽय मंथुनात् ॥३६ मचराश्व चराच व द्विपदोऽथ चतुष्पदान् । विमृज्य मनमा दक्ष पश्चादमृजत स्त्रियः ।।४० ददौ सदा धर्माय पश्यपाय योदन। पालस्य नयने युक्ताः सप्तविगतिमिन्दये ।।४१ एभ्यो दत्त्वा ततोऽन्या ये चनयोरिष्टनेमिने। नेर वाहपुत्राय देवाङ्गिरम तथा। पन्यामेवा शाश्वाय तेभ्योऽपत्य नियोधन ॥४२ प्रा त्रामय पनि मे दाय भूपिटा सको वह पनि मम होकर रि [ वायु पुराण प्रजा का सम्वद्धन बरेगा ॥३६।। इसके पश्चात् सोम के वचन से उन प्रचे- सामो ने वृक्षो मे कोप का सहार करके धम से मारिया को पनी रूप म ग्रहण पिया था ॥३६॥ इसके पनन्तर उन्होंने मारिपा में मन से गर्भ धारण कराया था।दरा प्रचेताओ से मारिया में प्रजापति महान् तेज बाला सोम के प्रा से घोर्यवान दक्ष उतान हमा था । मादि में मानम प्रजामो का सृजन दिया था इगके अनन्नर दक्ष ने मथुन से सृजन किया ॥३८-३६।। दक्ष ने घर-प्रचर- द्विरद और चतुष्पदो का मन से विशेष रूप से मृजन परके पीछे स्त्रियो का मृजन दिया था ४०|| उसने अर्थात् दश ने दातो धम के लिए दी-श्यप को तेरह और काल के नयन म युक्त सताईश इन्दु के लिए दी थी ।।४।। इनको देकर फिर मन्य चार मरिष्टनेमि को दो-दो वाहु पुत्र के लिए-दो प्राङ्गिरस के लिये और एक कन्या वृशाश्व के लिये दी। मव उनसे जो सन्तति हुई उसे भी प्राप लोग भली भांति समझ लो ॥४२॥ अन्तर चाक्षुपस्यात्र मनो पठन्तु हीयते । मनोवैवस्वतस्यापि सप्तमस्य प्रजापते ।।४३ तासु देवाः सगा गावो नागा दितिजदानवा । गन्धर्वाप्सरसश्च व जज्ञिरेऽन्याश्च जातयः ।।४४ तत प्रभृति लोकेऽस्मिन् प्रजा मैथुनसम्भवा । सङ्कल्पाद्दर्शनात्स्पर्शात्पूर्वेपा सृष्टिरुच्यते ॥४५ देवाना दानवानाञ्च देवर्षीणाञ्च ते शुभ । सम्भवः कथितः पूर्व दक्षस्य च महात्मन ।।४६ प्रारणात्प्रजापतेर्जन्म दक्षस्य कथित त्वया । कथ प्राचेतसत्वञ्च पुनले में महातपाः ।।४७ एतनः संशय सूत व्याख्यातु त्वमिहाहसि । स दौहित्रश्च सोमस्य कथ श्वशुरताङ्गतः ।।४८ उत्पत्तिश्च निराधश्च नित्य भूतेषु सत्तमा । ऋपयोजन मुह्यन्ति विद्यावन्तश्च ये नराः IME यहाँ पर चाक्षुप भनु का घदवा अन्तर हीयमान होता है। प्रजापति पृथुश-कीर्तन 1 [ ७५ सप्तम वैवस्वत मनु का भी समाप्त होता है। उन में देव-खग-गो-नाग-दितिज- दानव-गन्धर्व-अप्सरा और अन्य जातियों उत्पन्न हुई थी ॥४३-४४। इसके पश्चाद् तभी से लेकर इस लोक में मैथुनसे जन्म ग्रहण करनेवाली प्रजा हुई थी। इससे पहिन जो हुए थे उन पूर्व मे होने वालो की सृष्टि सङ्कल्प-दर्शन-स्पर्शन से ही कही जाती है ॥४५॥ ऋपिया ने कहा-मापने देवो वा-दानवो का और देवर्षियो का शुभ जन्म महात्मा दश वे पहिले बतलाया है ॥४६॥ प्रापने प्रजापति दक्ष का जन्म प्राण से बतलाया है। फिर महातपा ने प्राचेतरात्व को कैसे प्राप्त किया या ॥४७॥ हे सूत । यह हमको बड़ा सशय होता है। आप इसकी पूरी व्याख्या करने के योग्य होते हैं। वह सोम का दौहित्र श्वसुर कैसे बन गया था ||४८॥ श्री सूतजी ने कहा-है सत्तमो । प्राणियों में उत्पत्ति और निरोध नित्य ही होता है । इस विषय में ऋपि लोग और जो विद्या वाले मनुष्य हैं वे मोह को प्रप्त नहीं होते हैं ।।४६।। युगे युगे भवन्त्येते सर्वे दक्षादयो द्विजा । पुनश्च व निरुध्यन्ते विद्वास्तत्र न मुह्यति ॥५० ज्येष्ट्य कानिष्टयमप्येषा पूर्व नासीद्विजोत्तमा । तप एव गरीयोऽभूत् प्रभावश्च व कारणम् ।।५१ इमा विसृष्टि यो वेद चाक्षुपस्य चराचरम् । प्रजानामायुरुत्तीण स्वर्गलोके महीयते ॥५२ एप सर्ग समाख्यातश्चाक्षुपस्य समा सत । इत्येते पविसर्गा हि क्रान्ता मन्वन्तररामका । स्वायम्भुवाद्याः सोपाचाक्षुपान्ता यथाक्रमम् ॥५३ एते सर्गा यथाप्रज्ञ प्रोक्ता व द्विजसत्तमा । जैवस्वतनिमर्गेण नेपा ज्ञ यस्तु विस्तर ।।५४ अनन्ता नातिरिक्ताश्च सर्वेसर्गा विवस्वत । आरोग्यायुष्प्रमाणेन धर्मत कामतोर्थतः। एतानेव गुरणग्नेति य पठत्यनसूयक ॥५५ [ वायु पुराण वैवस्वतस्य वक्ष्यामि साम्प्रतस्य महात्मनः । समासाद्व्यासत सर्ग अवतो मे निबोधत ॥५६ है द्विज वृन्द ! ये समस्त दक्ष मादि युग-युग में होते हैं और फिर निरुद्ध हुमा करते हैं । उसमे विद्वान् पुरुष भी मोहित नहीं होता है ।।५०।। हे द्विनोत्तमो ! पहिले इनकी ज्येष्ठता और कनिष्ठना प्रर्थात् छुटपन और बडप्पन नहीं होती थी ! तप ही एव बहा हुमा या और प्रभाव ही कारण था ॥५१॥ जो चाशुप की इस घराचर विशेष सृष्टि को जानता है यह प्रजानों की मायु उत्तीर्ण होगया और स्वर्ग लोक मे प्रतिष्टित होना है ॥५२॥ मैंने यह धाधुप मन्वन्तर का सर्ग सशेष से कहा है । ये मन्वन्तरात्मक अर्थात् मन्वन्तर के स्वरूप वाले छ विसर्ग प्रान्त होते हैं । स्वायम्भुव के पाद्य बाजे नाशुप के अन्त वाले यथाक्रम सक्षेप में वपित हैं । मर्यात् इनमे से छ में स्वायम्भुव प्रथम है और पाशुप मन्तिम है ।।५३|| ये समस्त सर्ग प्रजा के अनुसार हे द्विजोत्तमो | मैंने कहे हैं । वैवस्वत निसर्ग से ही उनका विस्तार जान लेना चाहिये ।।५४।। ये समस्त सर्ग विवस्वान् से न तो मनन्त हैं और न अतिरिक्त ही हैं। भारोग्य मोर आयुषु प्रमाण से-धर्म से तथा काम से इनके ही गुण से जो मनसूयक इसे पढता है हो जाता है । भव साम्प्रत महात्मा वैवस्वत का सर्ग समास और विस्तार दोनो से मैं कहूंगा उसे आप लोग बताने वाले सुझमे जान लो ।५५-५६। प्रकरण ४६-वैवस्वत-सर्ग वर्णन सप्तमे त्वथ पर्याय मनोवैवस्वतस्य ह । मारीचाकश्यपाद् देवा जज्ञिरे परमर्पय..१ आदित्या वसवो रुद्रा साध्या विश्वे मरुद्गणा । भृगवोऽङ्गिरसश्च व ह्यष्टौ देवगणाः स्मृताः॥२ आदित्या मरुतो रुद्रा विज्ञया कश्यपारमजाः । साध्याश्च वसवो विश्वे धर्मपुत्रास्त्रयो गणाः ॥३ वैवस्वत-सर्ग वर्णन ] । ७७ भृगोस्तु भार्गवो देवो ह्यगिरोऽङ्गिरस सुत.। नैवस्वतेऽन्तरे ह्यस्मिन् नित्यं ते छन्दजा सुराः॥४ एप सर्गस्तु मारीचो विज्ञ यः साम्प्रत: शुभ । तेजस्वी साम्प्रतस्तेपामिन्द्रो नाम्ना महावल ॥५ अतीतानागता ये च वर्तन्ते ये च साम्प्रतम् । सर्ने मन्वन्तरेन्द्रास्तु विज्ञ यास्तुल्यलक्षणा: ॥६ भूतभव्यभवन्नाथ सहस्राक्षः पुरन्दर । मघवन्तश्च ते सर्वे शृङ्गिणो वचपाणयः। सर्वे ऋतुरातेनेष्ट पृथक् शतगुणेन तु ।।७ श्री सूनजी ने कहा-इसके अनन्तर वैवस्वत मनु के रातम पर्याय में मारीच से कश्यप से देव पोर परमपिंगण उत्पन्न हुए ॥१॥ मादित्य-वसुगण- दाम्य-विश्वे-मादमण-गु-महिरम ये पाठ देवगण कहे गये हैं ॥२॥ पादित्य-मरत मौर रुद्र मे पश्यप के पुत्र जानने चाहिए। साध्य-वसुगण- विश्वे ये तीन गण धर्म के पुत्र हैं ॥३॥ भृगु का भार्गव देव पुत्र है पौर अङ्गि- रसमा अङ्गिरा पुत्र हुमा । इस वैवस्वत अन्तर मे नित्य धन्दा सुर हैं ॥४॥ यह मारीच सगं जानना चाहिए जो कि माम्प्रत भोर शुभ है । साम्प्रत अर्थान इम वर्तमान ममय में होने वाला उनमें तेजस्वी और नाम से महाबल इन्द्र है ॥५॥ जो मतीन और अनागत है मौर जो इस समय में वर्तमान है वे सब मन्वन्नरेन्द्र तुन्य लक्षण वाले ही जानने चाहिए ॥६॥ भूत भव्य पौर भवतु के राह्मास-गुरन्दर और मघवन्त वे सब शृङ्गी-वच पाणि हैं । सरो के द्वारा पानातु से यजन दिया गया है जो कि पृथा गत गुण से युन है॥७॥ लोक्ये यानि सत्त्वानि गनिमन्स्यबलानि च । मभिभूयावतिष्ठन्ते धर्माय: कारगरपि ।। तेजगा तपमा बुद्धधा बलभुतपराममं । भूतभव्यभवन्नाथा यथा ते प्रभविष्णव । एनत्म प्रवक्ष्यामि यवतो मे नियोधत ।।
७८ ]
। वायु पुराण
भूत भव्यं भविष्यं तत् लोकत्रय द्विजै ।
भूर्लोकोऽय स्मृतो भूमिरन्तरिक्ष भुव स्मृतम् ।
भव्यं स्मृत दिन ह्यतत्तेपा वक्ष्यामि साधनम् ॥१०
घ्यायतः पुत्रकामेन ब्रह्मणाने विभाषितम् ।
भूरिति व्याहृत पूर्व भूलोकोऽयमभूत्तदा ।।११
भूसत्ताया स्मृतो धातुस्तपासो लोकदर्शने।
भूतत्वाद्दर्शनत्वाञ्च भूर्लोकोऽयमभूत्तत.।
मतोऽय प्रथमो लोको भूतत्वाद्भूद्विजे स्मृत १२
भूतेऽस्मिन् भवदित्युक्त द्वितीय ब्रह्मण। पुनः ।
भवत्युत्पद्यमानेन कालशब्दोऽयमुच्यते ॥१३
भवनात्तुमुवोको निरुक्तनिरुच्यते।
अन्तरिक्ष भुवस्तस्माद्वितीयो लोक उच्यते ।१४
लोक्य मे जो सत्त्व गतिमान् और प्रबल हैं उनका अभिभव रके
अवस्थित होते है । धर्माद्य कारणो से-तेज से-तपसे बुद्धिसे पौर बल-श्रुत मौर
पराक्रम से भूत-भव्य और भवन्नाम होते हैं वे उसी प्रकार से प्रभविष्णु भी
। यह मब मैं बतलाऊगा बोलने वाले मुझने माप लोग मब जानकारी पर
लो भूत-भव्य मोर भविष्य वह द्विजो के द्वारा लोकत्रय कहा गया।
यह भूमि भूलोंक कहा गया है मौर अन्तरिक्षा भुवनोक इस नाम से पहा
गया है। भव्य यह दिव कहा गया है अब उनके साधन तलाऊँगा ॥१०॥
पुत्र की वामना वाले ध्यान करते हुए ब्रह्मा ने सबमे मागे "भू" यह गोगा पा
तबसे ही यह भूला हो गया था ।।११॥ 'भू' यह धानु मत्ता अर्थ में कहा गया
है तथा यह लोव दर्शन में भूतत्व पौर दर्शनतत्व होने के कारण से तभी से यह
भूलोंक हुमा या । इसीलिये यह प्रथम लोक भूतत्व होने से दिजी के द्वारा भू
कहा गया है। हम भूत मै ग्रह्मा के द्वारा पुन द्वितीय भवत् १६ कहा गया है ।
भवनि इस उत्सयमान के द्वारा यह काल पान्द वहा जाता है ॥१२॥१३॥ भवन
होने से निष्क्त दे ज्ञातापो के द्वारा भुवलोन कहा जाता है । पन्तरिक्ष भुत्र
होता है इससे यह दिनीय लोग कहा जाता है ॥१४॥
वैवस्वत मर्ग वर्णन ]
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उत्पन्ने तु भुयलोंके तृतीयं ब्रह्मणा पुन ।
भव्येति व्याहृत यस्माद्भाव्यो लोकस्तदाऽभवत् ॥१५
अनागते भव्य इति शब्द एष विभाव्यते।
तस्मादम्यो ह्यसौ लोको नामतस्तु दिवा स्मृतम् ।।१६
स्वरित्युक्त तृतीयोऽन्यो भान्यो लोक्स्तदाभवत् ।
भाव्य इत्येप धातुर्व भाव्ये काले विभाव्यते ॥१७
भूरितीय स्मृता भूमिरन्तरिक्ष भुवस्मृतम् ।
दिव स्मृत तया भाव्य लोक्यस्यैप सग्रहः ॥१८
लोक्पयुक्ताहारैस्तिस्रो व्याहृनयोऽभवन् ।
नाथ इत्येप धातुर्य पातु पालने स्मृतः ।।१६
यस्माद् भूतस्य लोकस्य भव्यस्य भवतस्तदा ।
लोक्यस्य नाथास्ते तस्मादिन्द्रा द्विज स्मृताः ॥२०
प्रधानभूता देवेन्द्रा गुणभूतास्तथैव च ।
मन्यन्तरेषु ये देवा यज्ञभाजो भवन्ति हि ।।२१
भुवसोव के उत्पन्न हाने पर प्रह्मा ने फिर तृतीय को भव्य ऐमा वहा
जिस कारण से तव यह भय्य लोक हो गया था ॥१५॥ यनागत में मध्य यह
पारद विभाजित हाता है । इसम यह लोन भव्य नाम से कहा गया है ॥१६॥
स्प यह कहा गया है उन मन्य तृतीय भाय्यनो हुमा पा। भाव्य यह पातु
भाग्य पान में विमाशित होता है ॥१७॥ यह भूमि भू इस नाम से वही गई
है-अन्तरिया भुव इस नाम से कहा गया और भाव्य दिव इस नाम से बहा
गया है--पही लोप मा मग्रह होता है ॥१८॥ तोय से युक्त व्याहारो से
"भू व स्व" सीन व्याहनिया हो गई है। नाय'-इस नाम से एक धातु है
यह पातु वे मान रणने वालो ने द्वारा पालन प्रथं ग रहो गई है ॥१६॥ निस
मे भूत-भव्य और भवन मोर रे ग गमय में सीन मोर वे जो नाय पे
(मारे द्वारा येरबहे गये है । २०॥ प्रयान भूत देवेद्रा गुणभूत मन्द-
ग्नु। म जोस है ईयारे भागाही ही है ॥२१॥
८.] [ वायु पुराण यक्षगन्धर्वरक्षासि पिशाचोरगदानवाः। महिमानः स्मृता ह्ये ते देवेन्द्राणान्तु सर्वश ॥२२ देवेन्द्रा गुरवो नाथा राजानः पितरो हि ते। रक्षन्तीमा प्रजाः सर्वा धर्मणेह सुरोत्तमा ॥२३ इत्येतल्लक्षण प्रोक्त देवेन्द्राणा समासतः । सप्तर्षीन् सम्प्रवक्ष्यामि साम्प्रत ये दिवि स्थिताः ।।२४ गाधिजः कौशिको धीमान् विश्वामित्रो महातपा । भार्गवो जमदग्निश्च ऊरुपुत्र प्रतापवान् ॥२५ वृहस्पतिसुतश्चापि भारद्वाजो महातपा । प्रौनथ्यो गौतमो विद्वाञ्छरद्वान्नाम धार्मिक ॥२६ स्वायम्भुवोऽत्रिभंगवान् ब्रह्मकोशस्तु पन्चम । पष्टो वासिष्ठपुत्रस्तु वमुमान् लोकविथु तः॥२७ वत्सार काश्यपश्च व सप्तैते साधुसम्मता । एते सप्तर्पय सिद्धा वर्तन्ते साम्प्रतेन्तरे ॥२८ यक्ष-गधव-राक्षस-पिशाच-उरग-दानव-ये देवेन्द्रो के सब मोर से महिमा कही गई हैं ॥२२॥ हे सुरोत्तमो | दवेद्र-गुरु-नाप-राजा-पितर ये सभी यही पर घमं से प्रजा की रक्षा किया करते हैं ।।६३।। यह देवेन्द्रो का लक्षण सक्षेप से वतना दिया है । पव सप्तर्षियो के विषय मे बनलाते हैं जो कि इम समय दिवि में स्थित रहते हैं ॥२४ा गाधि से उत्पन्न होन वाले, कौशिक मोर धीमान महान तपस्वी विश्वामित्र-भार्गव जमदग्नि प्रताप वाला ऊरु का पुत्र-वृहस्पति का पुत्र महान तपस्वी भारद्वाज-पोतिथ्य गौतम जो कि वडा विद्वान् भारद्वान् नाम वाला परम धार्मिक है-स्वायम्भुव भगवान् मत्रि जो ब्रह्म का को और पांचवा है-बर्वे दामिष्ट पुत्र जो वसुमान और लोक मे पाम विश्रुत हैं-वत्सार काश्यप ये साघुत्रा के द्वारा सह्मत मान ऋषिवृन्द हैं । ये वर्तमान इम अन्तर मे सिद्ध हुए सप्तपि होते हैं ॥२॥२६॥२७॥२८॥ इक्ष्वाकुचव नाभागो धृष्ट मर्यातिरेव च । -रिष्यन्तश्च मित्यातो नाभ उद्दिष्ट एव च ॥
प्रजापति दर कीर्तन ] [८१ करुपश्च पृपध्रश्च वसुमान्नवम स्मृत। मनोवैवस्तस्यैते दश पुत्रा प्रकीत्तिता । कीत्तिता वै मया ह्यते सप्तमञ्चतदन्तरम् ।।३० इत्येपने मया पादो द्वितीय कथितो द्विजा । विस्तरेणानृपूा च भूय किं वणयाम्यहम् ॥३१ इक्ष्वाकु-नाभाग-प्र-शर्याति-नरिष्यन्त-विख्यात और उद्दिष्ट नाभ-- पृषध्र और नवम वमुमान ये इस वैवस्वत मनु के दस पुत्र कहे गये हैं। मैंने इनको कीतित कर दिया है और यह सप्तम अन्तर है । हे द्विजगए। यह मैंने द्वितीय पार कहा है। अब आप लोग ही मुझे वतलाइये पुन विस्तार से तथा पानुपूर्वी से मैं क्या बएन कहें ॥२६॥३०॥३१॥ ॥ प्रकर्ण ४७--प्रजापति वंशानु कीर्तन ।। श्रुत्वा पाद द्वितीयस्तु क्रान्त मूतेन धामता । अतस्तृतीय पप्रच्छ पाद वै शाशपायन ।" पाद क्रान्तो द्वितीयोऽयमनुपङ्गण यस्त्वया ! तृतीय विस्तरात्पाद सोपोद्धात प्रकोत्तय । एवमुक्तोऽब्रवीत्मूत प्रहृष्टोनान्तरात्मना ।।२ कीर्तयिष्ये तृतीयञ्च सोपोद्धात सविस्तरम् । पाद समुदयाद्विप्रा गदतो मे निबोधत ॥३ मनोवैवस्वतस्येम साम्प्रतस्य महात्मन । विस्तरेणानुपूर्व्या च निसर्ग शृणुत द्विजा ॥४ चतुयुगेकसप्तत्या सवयात पूर्वमेव तु । मह देवगणश्च व ऋपिभिर्दानो सह ॥५ पितृगन्धर्वपक्षश्च रक्षोभूतगणस्तथा। मानुष पशुभिश्च व पक्षिभि स्थावर सह ॥६ ९४ ] [ वायु पुगए ऊचु सर्वे ततोऽन्योत्यं जनलोके महर्पय । ऊचुरेव महाभागा वारुणे वितते ऋतौ ॥१८ सर्वे वय प्रसुयामश्चाक्षुषस्यान्तरे मनो । पितामहात्मजा सर्ने तत श्रेयो भविष्यति ॥१६ स्वायम्भुवेऽन्तरे शता समाथं ते भवेन तु । जज्ञिरे ने पुनस्ते ह जनलोकादिन गता ॥२० देवस्य महतो यज्ञ वारुणी बिभ्रतस्तनुम् । ब्रह्मणो जुह्वत. शुक्रमानो पूर्व प्रजेप्सया। ऋषयो जज्ञिरे पूर्व द्वितीयमिति न श्रुतम् ॥२१ ऋषियो ने कहा है श्रेष्ठतम | पहिले समुत्पन्न सप्तर्षिगण कैसे सात मानस पुत्रत्व से कल्पित हुए? यह हमे बतलाइये । इसके पश्चात् महान तेज- वाले पौराणिक सूतजी ने शुभ वचन बोले ॥१५।। सप्तपिंगण कैसे सिद्ध हुए जो स्वायम्भुव अन्तर म थे मवातर को प्राप्तकर जोकि वैवस्वत नाम बाला था भव के अभिशाप से सविद्ध होकर उन्होने उप्त समय म तप को प्राप्त नहीं किया था। एकबार आगामी चे जनलोक मे उपपन्न थे ॥१६॥१७॥ तब जनलोक मे सब महर्षिलोग आपस में एक-दूसरे से बोले और वितत वाहए प्रतु मे महाभाग बोले ॥१८॥ हम सब चक्षुष मनु के अन्तर मे प्रसूयमान होते हैं । सब पितामह के प्रात्मज हैं। इससे श्रेय होगा ॥१६॥ स्वायम्भुव अन्तर में सात के लिये वे शिव के द्वारा अभिशप्त हुए वे पुन यहाँ जनलोक से दिय को गये हुओ ने जन्म लिया था ॥२०॥ यज्ञमे वरुए के शरीर को धारण करने वाले महान् देव प्रजा की इच्छा से पहिले अग्नि में शुक्रका हवन करते हुए ब्रह्मा से पूर्व मे पिलोग उत्पन्न हुए थे। यह हमारा द्वितीय श्रुत है ॥२१॥ भृगुरङ्गिरा मरीचि पुलस्त्यः पुलह ऋतु । अत्रिश्च व वसिष्ठश्च अष्टौ ते ब्रह्मण सुता ।।२२ तथास्य वितते यज्ञे देवाः सर्वे समागता । यज्ञाङ्गानि च सर्वाणि वपटवारश्च मूर्तिमान् ॥२३ मूर्तिमन्ति च सामानि यपि च सहस्रश ।
प्रजापति वश वीर्तन ] ऋग्वेदश्चाभवत्तत्र पदक्रमविभूपितः ॥२४ यजुर्वेदश्च वृत्ताव्य ओङ्कारवदनोज्ज्वल । स्थितो यज्ञार्थसपृक्तमूक्तबाह्मणमन्नवान् ॥२५ सामवेदश्च वृत्ताव्य सवंगेयपुर मरः । विश्वावस्वादिभिः साद्ध गन्धर्वः सम्भृतोऽभवत् ।।२६ ब्रह्म वेदस्तथा घोरे कृत्याविधिभिरन्वित । प्रत्यङ्गिरसयोगश्च द्विशरीरशिरोऽभवत् ॥२७ लक्षणानि स्वराः स्तोभा निरक्तस्वरभक्तयः। आश्रयस्तु वपटवारो निग्रहप्रग्रहावपि ॥२८ भृगु-अङ्गिरा-मरीचि-पुलस्त्य-पुलह-तु-अत्रि और वसिष्ठ ये पाठ ब्रह्मा के पुत्र हैं ।।२२॥ उसी प्रकार से यज्ञ के वितत होने पर समस्त देवगण वहाँ पाये थे । ममस्त यज्ञ के प्रग मौर मूर्तिमान् वषट्कार-मूर्तिमान् साम- सहस्रो यनु और पद-क्रम आदि मे विभूपित ऋक्वेद वहां पर था ॥२३॥२४।। वृत्त से पाढ्य और प्रोड्वार के मुख से उज्ज्वल यजुर्वेद यज्ञ के अर्थ से सपृक्त मूक्त-ब्राह्मण मोर मन्त्रो वाला वहाँ पर स्थित है ॥२५॥ समस्त गाने के योग्यो मे अग्रणी वृत्त रो भाड्य सामवेद विश्वादावादि के साथ गन्धर्वो के द्वारा सम्भृत या ।।२६।। ब्रह्मवेद घोरकृत्या विधियों से युक्त और प्रत्यङ्गिरस योगा के द्वारा दो शरीर एव सिर वाला था ॥२७॥ लक्षण स्वर है, स्तोम निरक्त स्वर और भत्ति हैं । माश्रय वषट्कार है और निग्रह तथा प्रग्रह भी हैं ॥१८॥ दीप्ता दीप्तिरिलादेवी दिश प्रदिदागीश्वरा । देवकन्याश्च पल्यश्च तथा मातर एव च ।।२६ आयु सर्वत एवैते देवस्य यजतो मुसे। मूर्तिमन्तः स्वरूपाख्या वरुणस्य वपु त ॥३० स्वयम्भुवस्तु ता दृष्ट्वा रेत समपतद्भ, वि। ब्रह्मपर्भावभूतस्य विधानाच्च न संशय ॥३१ कृत्वा जुहाव सु म्याच स वेण परिगृह्य च । आज्यवज हुवाञ्चके मन्त्रवच पितामह ॥३२ ९४ ] [ वायु पुगए - ऊचु सर्वे ततोऽन्योन्य जनलोके महर्षय । ऊचुरेव महाभागा वारुणे वितते क्तौ ।।१८ सर्वे वय प्रसूयामश्चाक्षुषस्यान्तरे मनो । पितामहात्मजा सर्ने तत धेयो भविष्यति ।।१६ स्वायम्भुवेऽन्तरे शप्ता सप्तार्थ ते भवेन तु । जज्ञिरे ने पुनस्ते ह जनलोकाद्दिन गता ।।२० देवस्य महतो यज्ञ वारुणी बिभ्रतस्तनुम् । ब्रह्मणो जुह्वत शुक्रमानौ पूर्व प्रजेप्सया । पयो जज्ञिरे पूर्व द्वितीयमिति न थुतम् ।।२१ ऋपियो ने कहा-हे श्रेष्ठतम । पहिले समुत्पन्न सप्तर्षिगण कैसे सात मानस पुत्रत्व से कल्पित हुए? यह हमे बतलाइये। इसके पश्भात् महाव तेज वाले पौगणिय सूतजी ने शुभ वचन बोले ॥१५॥ सप्तर्षिगण कैसे सिद्ध हुए जो स्वायम्भुव अन्तर मे थे मदतर को प्राप्तकर जोषि ववस्वत नाम वाला था भव पे अभिशाप से सविद्ध होकर उहोने उस समय मे तप को प्राप्त नहीं किया था। एकबार मागामी वे जनलोक मे उपपन्न थे ॥१६॥१७॥ तव जनलोक मे सब महषिलोग आपस में एक-दूसरे से बोले और वितत वारुण क्रतु मे महाभाग बोले ॥१८|| हम सब चाक्षुप मनु के अन्तर म प्रसूयमान होते है । सव पितामह के मामज हैं । इससे धेय होगा ॥१६॥ स्वायम्भुव अतर मे सात के लिये वे शिव के द्वारा अभिशप्त हुए वे पुन यहाँ जनलोक से दिव को गये हुओ ने जन्म लिया था॥२०॥ यज्ञमे वरण के शरीर को धारण करने वाले महान् देव प्रजा की इच्छा से पहिले अग्नि मे शुकका हवन करते हुए ब्रह्मा में पूर्व म ऋपिलोग उत्पन्न हुए थे। यह हमारा द्वितीय श्रृन है ॥२१॥ भृगुरङ्गिरा मरीचि पुलस्त्य पुलह तु ) अत्रिश्च व वसिष्ठश्च अष्टौ ते ब्रह्मण मुना ।।२२ तथास्य वितते यज्ञ दवा सर्वे समागता । यज्ञाङ्गानि च सर्वाणि वपटवारश्च मूर्तिमान् ।।२३ मूर्तिमति च सामानि यजू पि च सहस्रम् । - [ ८७ प्रजापति वश कीर्तन ] पुत्रत्वे कल्पयामास महादेवस्तथा भृगुम् । वारुणा भृगवस्तस्मात्तदपत्यञ्च स प्रभु ॥३६ द्वितीयन्तु तत शुक्रमगारेप्वपतत्प्रभु । ग्रङ्गारेवगिरोऽङ्गानि सहितानि ततोऽङ्गिरा ।।४० सम्भूति तस्य ता दृष्ट्वा वह्निह्याणमब्रवीत् । रेतोधास्तुभ्यमेवाह द्वितीयोऽय ममास्त्विति ॥४१ एवमस्त्विति सोऽप्युक्तो ब्रह्मणा सदसस्पति । तस्मादङ्गिरसश्चापि प्राग्नेया इति न थ तम् ।।४२ उसमे शुर के सुत होने पर इसके अनन्तर महर्पिगण प्रादुभूत हुए थे जो शरीर से ज्वल त थे मौर ये सात प्रराव गुणो से युक्त थे ॥३६॥ अग्नि मे एक बार शुक के हुत किये जाने पर ज्वाला से कवि नि मृत हुए । ज्वाला का भेदन कर उसको निकला हुआ ब्रह्मा ने देखा और तू भृगु है ऐसा कहा इसीसे वह भृगु हुए हैं ॥३७॥ महादेव ने उसे इस प्रकार से उत्पन होता हुआ देखकर ब्रह्माजी से कहा हे प्रभो । पुत्र की कामना वाले दीक्षित मेरा यह है जो यह भृगुदेव उत्पन्न हुआ है यह मेरा पुत्र होजावे ॥३८॥ ब्रह्माजी न-एमा ही होवे- इम तरह से अनुज्ञा प्राप्त होजाने वाले महादेव ने भृगु को अपना पुत्र मान लिया या। इससे वारुण भृगु हुए और उमकी स तति प्रभु हैं ॥३६॥ इसके मनन्तर प्रभु ने द्वितीय शुक को अङ्गारो म डाला था। अङ्गारो मै अङ्गिर-प्रङ्ग सहित फिर उससे अङ्गिरा हुमा । उसको इस प्रकार की सम्भूति को देखकर अग्नि ने ब्रह्माजी से कहा मैं तुम्हारे लिये ही रेतोपा हुआ हूं । यह दूसरा मेरा होजावे ॥४०॥४१॥ ऐसाही होवे-इस प्रकार से वह सदसस्पति ब्रह्मा के द्वारा समनुज्ञात होगये थे । इमसे अङ्गिरस आग्नेय हुए ऐमा हमने श्रुत किया है ॥२॥ पकृत्यस्तु पुन शुक्र ब्रह्मरगा लोरकारिगा। हुत समभवस्तत्र पड् ब्रह्माण इति श्रुति ॥४३ मरीचि प्रथमस्तत्र मरीचिभ्य समुत्थित । क्रतो तस्मिन् सुतो जज्ञे यतस्तस्मात्स वे कनु ॥४ 1 - ] [ वायु पुराण अह तृतीय इत्यर्थस्तस्मादनि स कोयते । केशव निशितंभूत पुलस्त्यस्तेन स स्मृत ॥४५, केदौलम्बै समुद्भूतस्तस्मात्तु पुलह स्मृत । वसुमध्यात्समृत्पन्नो वसुमान् वसुधाश्रय 11४६ वसिष्ठ इति तत्वज्ञ प्रोच्यते ब्रह्मवादिभि । इत्येते ब्रह्मण पुत्रा मानसा: पण्महर्पयः ॥४७ लोकस्य सन्तानकरास्तरिमा द्धिता प्रजा। प्रजापतय इत्येव पट्यन्ते ब्रह्मरण सुता ॥४८ अपरे पितरो नाम एतैरेव महर्षिभि । उत्पादिता ऋषिगणा सप्त लोकेप विध्रु ताः ॥४६ लोक के पारण करने वाले ब्रह्मा के द्वारा शुक के छ भाग कर हवन करने पर वहाँ छ ब्रह्मा हुए थे ऐसी स्तुति है ॥४३॥ उनमे मरीचि प्रथम है जो मरीचियो से समृस्थित हुए हैं । उस क्रतु मे सुन उन्पन हुमा इसीलिए वह ऋतु हुए थे ॥४४॥ में तीसरा हूँ इस प्रर्य वाला इसीसे वह अत्रि कहा जाता है । निशित केशा से हुप्रा इससे वह पुलस्त्य कहा गया है ॥४५॥ लम्बे केशो से समुद्भूत हुआ था इससे वह पुलह-इस नाम से कहा गया है । वसु के मध्य से उतान्न हुमा इसमे वसुधा का भाथय वाला वसुमान हुआ था ।।४।। ब्रह्मवादी तत्वज्ञा ने वसिष्ट ऐसा कहा है। नने ये ब्रह्मा के छ मानस महर्षि उत्पन्न हुए थे।॥४७॥ ये इस लो के मन्तति के करने वाले थे और उनके द्वारा ही यह वदिन हुई है। ये ब्रह्मा के पुत्र प्रजापति इस प्रकार से भी पढ़े जाया परते हैं ।।४८।। दूसरे पितर भी इन्ही महपियो के द्वारा उत्पादित है को मात्र लोको मे विश्रुत ऋषिगण हैं ॥४६॥ मारीचा भार्गवाश्चैव तयवाङ्गिरसोऽपरे। पोलस्त्या पोलहान वासिष्ठाचव विश्रुता । आनेयाश्च गरणा मोक्ता पितृगा लोकविध ता ।।५० एते समासतरतात पुरेव तु गुणास्त्रय ! अपूर्वाश्च प्रकाशान ज्योतिप्मन्तध्न विश्रु ता ॥५१ नाम वाले
प्रजापति वशानु कीर्तन ]
[ ८९
तेपा राजा यमो देवो यमविहितवल्मपा ।
अपरे प्रजाना पतयस्ताञ्छणुध्वमतन्द्रिता ॥५२
कई म कश्यप पो विक्रान्त सुश्रु वास्तथा ।
वहुपुत्र कुमार विवस्वान् स शुचिश्रवा ॥५३
प्रचेतसोऽरिष्टनेमिर्वहुलश्च प्रजापति ।
इत्येवमादयोऽन्येऽपि वह्वश्च प्रजेश्वरा ॥५४
कुशोच्चया वालखिल्या सम्भूता परमपंय ।
मनोजवा सर्वगता सार्वभौमाश्च तेऽभवन् ॥५५
जाता भस्मव्यपोहिन्या ब्रह्मर्पिगरणसम्मता ।
वैखानसा मुनिगणास्तप श्रुतपरायणा ॥५६
स्रोतोम्यस्तस्य चोत्पन्नावश्विनो रूपसम्मितो।
विदुर्जन्माक्षरजसो विमला नेत्रसम्भवा ॥५७
ज्येष्ठा प्रजाना पतय स्रोतोभ्यस्तस्य जज्ञिरे ।
ऋपयो रोमकूपेभ्यस्तथा स्वेदमलोद्भवा ५८
मारोप-भार्गव-माङ्गिरम-पौलम्स्य-पौनह-वाशिष्ठ और प्राय ये गण
लोगो में प्रसिद्ध पितरो में कहे गये हैं ॥५०॥ हे तात । ये सशेप से पहिले ही
तीन गुण ये भपूर्व-प्रकारा और विश्रत ज्योतिष्मन्त पे कहे जाते हैं उनका राजा
देवयम है । यमा के द्वारा विहित कल्मष दूसरे प्रजामो के पति होते हैं उनको
पब मनन्द्रित होकर सुनो मैं कहता हूँ इसलिए तुम्हें सुनना चाहिये यह भावा
है ॥५१॥५२॥ कदम-वश्यप-दोष-विक्रान्त-सुधुवा-बहुपुत्र-कुमार-विवस्वान्-
सुविधवा-प्रचेतम-परिष्टनेमि-बहुल मोर प्रजापति एवमादि तथा अन्य भी बहुत
में प्रजेश्वर होते हैं ॥५३॥५४॥ कुशोचय-वालखिल्य परमपि उत्पन्न हुए तपा
मनोजव-सवगत मौर सार्वभौम वै हुए हैं ॥५५॥ ब्रापिगए मम्मत तप और
मे परामण देपानम मुनिगण भस्म व्यपोहिनी में उत्पन्न हुए थे ॥५६||
उसपे सोनो मे रूप गम्मित प्रश्विनीकुमार उत्पन्न हुए । उमो स्रोतो से विदुजं.
मार जम-विमल-नेर गम्भव-ज्येष्टा प्रजामो के पति उत्पन्न हुए । तपा स्वेदमल
से उदभव दाने ऋपि रोम कूपों से उत्पन्न हुए ॥५॥५८||
.
. [ वायु पुराण दारणा हि स्ते मासा निर्याशा पक्षसन्धय । वत्सरा ये त्वहोरात्रा पित्र ज्योतिश्च दारणम् ॥५॥ रौद्र लोहितमित्याहुरोहित कनक स्मृतम् । तन्मंत्रमिति विज्ञय घूमन पावः स्मृता ॥६० येऽच्चिपस्तस्य रद्रास्तथादित्या समुद्भवा । अङ्गारेम्य समुत्पन्ना ज्योतिषो दिव्यमानुपा ॥६१ आदिमानस्य लोक्स्य ब्रह्मा ब्रह्मसमुद्भव । सर्वकामदमित्याहुस्तम कन्यामुदाहरन ॥६२ प्रह्मा सुरगुरस्तन विदर्श सप्रसीदति । इमे वैजनयिष्यन्ति प्रजा सर्वा प्रजेश्वरा ॥६३ सर्ने प्रजानां पतय समें चापि तपस्विर । तत्प्रसादादिमाल्लोरान्धारयेयुरिमा क्रिया ॥६४ द्वन्द सवर्द्धयामास तव तेजो विवद्धनम् । देवेषु वेदविदास सर्वे राजर्षयस्तथा १६५ एतम मास दाग थे, जो निर्यास वे पक्षो की भिषा थी, जो वत्पर मोर पहोरात, पित्र दारण उपोनि रोह की तोहित रहते थे लोहित मो पनव कहा गया है । उगे मंत्र ऐगा जानना चाहिए और धूम पशु बहे गये हैं ॥५९-६०ा उसको चिया यो वे २ तथा प्रादित्य उत्सान हुए। महारो मे दिश्य भानुप ज्पोनिय समुत्पन्न हुई | माहिमान सोपा ब्रह्मा प्रा से गमुद्र तहमा । यहाँ पर बन्या पो उदाहन परत हुए गर्व वामद ऐमा महो हैं ॥६२॥ यही देवो रे माघ गुरगुरु ब्रह्मा मप्रगन्न होते हैं। गे प्रजेदार मरत प्रजामों से उसान्न बरंगे ॥६॥ये मय प्रजामो के थे और ये मयततायी 1ो प्रगादगे ये बियाणे न मागेको पारती ॥९) मारो क्षेत्र के विपनसे परागीरिया पादेयों में समस्त रामपिगरण पेय विद्वान् पे ॥६॥ वेदमन्त्र परा गर्ने प्रजापतिगुणोरमश । पनन्न ब्रह्मा गत्यरातपत्र परम भुवि , प्रजापनि वशानु कीर्तन ] [ ६ सर्वे हि वयमेते च तवैव प्रसव प्रभो। ब्रह्म च ब्राह्मणाश्चैव लोकाश्चैव चराचरा ॥६७ मरीचिमादित कृत्वा देवाश्च ऋपिभि सह । अपत्यानीय सञ्चिन्त्य तेऽपत्यकामयामहे ।।६८ तस्मिन् यज्ञ महाभागा देवाश्च पिभि सह । एतद्व शसमुद्भूता स्थानकालाभिमानिन ॥६९ न च तेनैव रूपेण स्थापयेयुरिमा प्रजा । युगादिनिधनाच्चैव स्थापयेयुरिमा प्रजा ७० ततोऽब्रवील्लोकगुरु परमित्यविचारयन् । एव देवा विनिश्चित्य मया सृष्टा न सशय । भवता वशसम्भूता पुनरेते महर्पय ७१ तेपा भृगो कीर्तयिध्ये वश पूर्वमहात्मन । विस्तरेणानुपूर्ध्या च प्रथमस्य प्रजापते ॥७२ सब प्रजापति के गुणों से उद्भव होने वाले वेदो के मन्त्रो म परायण ।। अनन्त और सत्य ब्रह्म-भू मे परम तप ये सब और हम हे प्रभो । पापका को प्रसव है जिनमें ब्रह्म और ब्राह्मण तथा चराचर लोक हैं ।।६६.६७॥ मरीचि पादि लेकर ऋपियो के साथ देवगण यहाँ पर सन्तति को चिन्ता कर उन सबने अपत्य (सन्गन) की कामना की थी॥६८ । उस यज्ञ में महान भाग वाले विता ऋपियों के साथ स्थान और काल के अभिमानी इस वश म समुद्भत २ ॥६९।। और उमी रूप से इन प्रजामो की स्थापना नहीं करनी चाहिए किन्तु युगादि निधन से इनको स्थापित करो ॥७०। इसके अनन्तर लोक गुरु से विचार न करते हुए कहा-मैंने इस प्रकार का विनिश्चय करके देवतामो को मृष्ट क्यिा है इसमे सराय नही है । फिर ये महर्षिगरण सबके वश मे सम्भूत हुए हैं ॥७१। उनमे से महात्मा भृगु के वग को पहिले बतलाऊँगा जो कि प्रथम प्रजापति है इसे विस्तारानुपूर्वो से हूगा ॥७२॥ भार्या भृगोरप्रतिमे उत्तमेऽभिजने शुभे। हिरण्यकशिपो कन्या दिव्या नाम परिथ ता। पुलोम्नश्चापि पौलोमो दुहिता वर वणिनी ।।७३
-
१२
[ वायु पुराण
भृगोस्त्वजनयदिव्या काव्य वेदविदा वरम् ।
देवामुरारणामाचार्य शुक्रङ्कविसुत ग्रहम् ।।७४
स शुभश्वोशना स्यात स्मृत काव्योऽपि नामत ।
पितृणा मानसी कन्या सोमपाना यशस्विनी।
शुक्रस्य भार्याङ्गी नाम विजने चतुर सुतान् ।।७५
ब्राह्मण तेजमा युक्त स जातो ब्रह्मवित्तम ।
तस्यामेव तु चत्वार पुत्रा शुत्रस्य जज्ञिरे १७६
स्वष्टा वरूत्री द्वावेतौ शण्डामको च तावुभो।
ते तदादित्यसङ्काशा ब्रह्मा क्ल्पा प्रभावत ७७
रञ्जन पृथुरश्मिश्च विद्वान्यश्च बृहृदगिरा ।
वरूत्रिण सुता होते बहिष्या. सुरयाजका ।।७८
इज्याधर्मविनाशाथं मनु मेत्याभ्ययोजयन् ।
निरस्यमान धर्म दृष्ट्वेन्द्रो मनुमद्रवीत् ॥७९
एतरेव तु काग त्वा प्रापयिष्यामि याजनम् ।
थत्वेन्द्रस्य तु तद्वाक्य तस्माद् देशादपाक्रमन् ॥५०
भृगु की भार्या हिरण्यकशिपु के उत्तम-शुभ-अप्रतिम अभिजन में दिव्या
इम नाम से परिश्रुत होने पानी कन्या से वेदो को वातानो में परमश्रेष्ठ काव्य
को उत्पन्न किया था जो कि देवासुरो के प्राचार्य थे और कषिसुन शुक्र ग्रह
है ।।७४॥ वह शुक्र उपना इस माम से प्रसिद्ध हुआ और नाम मे काव्य भी
वहा गया है । सो मय पितृगण की माचही यशस्विती कन्या जो कि की
अङ्गी नाम वाली भार्या थी उसने चार पुत्र उत्पन्न किये थे ॥७५।। ब्रह्म तेज से
युक्त वह ब्रह्मवेत्तानो मे ४ वह उत्पन्न हुआ था। शुक्र के चार पुत्र उमी में
से हुए हैं ।।७६॥ त्वष्टा-वरुत्री हो ये और शण्डा तथा मकं ये दोनो उत्पन्न
हुए। वे उस समय मादित्य के तुल्य और प्रभाव से ब्रह्मा के ही तुम्य थे १७७॥
रञ्जन-पृथुरश्मि और वृहदिरा ये वस्त्री के प्रयिष्ठ और सुरो वे यजन कराने
वाले पुन थे ११७८॥ इन्या के धर्म को विनाश करने के लिये मनु के समीप
जाकर योजना की । इन्द्र ने धर्म को निरस्थमान देववर मनु से कहा-७६)
प्रजापति वमानु कीर्तन ] [ ६३ इनके द्वारा ही इन्यापूर्वी यामन तुमगो प्राप्त कराऊंगा। इम इन्द्र के चावय को मुनकर उस देश से अपात्रान्त होगये ॥८॥ तिराभूतेषु तेजिन्द्रो धर्मपत्नीश्च चेतनाम् । ग्रहेण मोचयित्वा तु तत. सोऽनुसगार ताम् । तत इन्द्रविनाशाय यतमानान् यतीस्तु तान् । तत्रागतान् पुनदृष्ट्वा दुष्टानिन्द्र प्रन्यतु । सुष्वाप देवदेवस्य वेद्या पै दक्षिणे तत ८२ तेषान्तु भक्ष्यमाणाना तन शालावृवे सह । शीर्षारिण न्यपतस्तानि खराण्यभवस्तन ॥८३ एव वरूविण पुत्रा इन्द्रेण निहता पुरा । यजन्या देवयानी च शुनस्य दुहिताऽभवत् ।।४ मिशिरा विश्वरूपस्तु त्वष्टु पुयोग्भवन्महान् । विश्वरूपानुजश्चापि विश्वकर्मा यम स्मृत ।।८५ भृगोस्तु भृगयो देवा जज्ञिरे द्वादशात्मजा । देव्या तान्सुपुवे सर्वान्याव्यश्चैवात्मजान्प्रभु ॥८६ भुवनो भावनश्च व अन्यश्चान्यायतस्तथा । मतु थवाश्च मूर्दा च व्यजयो व्यथ पश्च य । प्रसव चाप्यजश्चैव द्वादशोधिपति स्मृत 10 इत्येते भृगवो देवा स्मृता द्वादश याशिता । पौसोम्य जनयसूत्र अहिष्ठ वशिन विभुम् 115 व्याधित सोष्टमे मासि गर्भक रेण वर्मणा। च्यवनाच्यवनासोश्य चेतनस्तु प्रचेतम । प्राचेतसाच्यवनक्रोधादयान पुग्पादजः ।। जनयामाम पुत्रोदो सुमन्यायाश्च मात्मवान दधीनञ्च तायुभो माधुगमती IMES उसो तिरोभूत हो जाने पर :ने धम की पत्नी घेतना को ग्रह में PRITर सो परमात् वह उगाही पनुगरण करने माग पा इमा भार्गव ।
[ बाम पुराण । पस्यात् इन्द्रो दिनाा बरने में लिये यत्न करते हुए उन पनियो को वहाँ माये हुए दुशे को पुन देवार इन्द्र उनका हनन कर देवे । पिर दक्षिण में देवदेव को वेदो मे सो गया था ॥२॥ शाला वृरो साथ पाये हुए उनके वहां पर भी गिर गये थे जो कि रिसर होगये थे १८३॥ इस प्रकार से पहिले वरूत्री के पुत्र इन्द्र के द्वारा मारे गये थे। पजनी में देश्यानी शुक्र की बेटी हुई पी ।।४॥ त्वष्टा के त्रिशिरा मौर विश्वर महाद पुत्र उत्पन्न हुआ। विश्वरूप या मनुज भी विश्वकर्मायम रहा गया है ॥८॥ मृगु के भृगर देव बारह पुत्र उत्पन्न हुए थे। प्रभु काश्य ने उन समस्त पुत्रों को देवी में उत्पन्न किया था ॥६॥ भुवन-भावन-मय-मापायन-अतुमुवा-भू -व्यनय-गथुप- प्रसप-प्रज और बारहयो मपिपति कहा गया है ॥८॥ ये इतने पारह यानिक भृश्य देव कहे गये हैं। पौलोमी नै अमिय-वशी-विभु पुत्र को उत्पन्न किया या ||८| गर्भ पूर कर्म से वह मष्टम मास में स्पाधि से युक्त हुआ था। च्यवन से ध्यवनास मोर प्रचेता से चेतन-प्राचेस्यस च्यवन कोष से पुरष से पज ने एम्बा को इस प्रकार भार्गव ने मुवन्या में दो पुत्रो को उत्पन्न किया पा जोकि पारमवान और दधीच थे दोनो बहुत ही साधु सम्मत्त हुए थे 1०६-१० सारस्वत सरस्वत्या दधीचाच्चोपपद्यते। गची पत्नी महाभागा प्रात्मवानस्य नाहुपी ॥६१ तस्य ऊोपिज्ञ ऊह मित्वा महायशा.। और्वश्वासीनीवस्तु दोमानिसहराधन ॥६२ जमदग्निचोकस्य सत्यवत्या व्यगायत । भृगोश्च रुचिपर्याये रौद्रवैष्णवयोस्तथा ॥६३ जमनादावस्याग्नेर्जमदग्निरजायत । रेणुका जमदग्नेस्तु शन्तुल्यपराक्रमम् । ब्रह्मक्षत्रमय राम सुपुवेऽमिततेजसम् ॥६४ भौर्वस्यासीपुत्रगत जमदगिनगुरागेमम् । तेपा पुत्रसहस्राणि भार्गवाणा परस्परात् ॥६५
সাদি यानु
कीनन ]
प्यन्तरेषु नै वाह्या बहवो भागया स्मृता. ।
वत्सो विश्त्रोश्विपेणश्च पाण्डः पथ्य सशोना ।
गोग्रेण गप्तमा ह्य ते पक्षाशयास्तु भार्गवाः ॥९६
शृणुतागिरगो वममग्ने पुत्रस्य धीमत ।
यस्यान्ववाये सम्भूना भारद्वाजा. सगौतमाः।
देवाश्चागिरमो मुम्ब्यास्त्विपुमन्तो महौजस. १६७
दघीच से सरस्वती मे सारस्वत पुत्र उत्पन्न होता है। भात्मवान की
महान भाग वाली नहुप की पुत्री रचि पत्नी हुई थी ॥१॥ महान् या वाले
ऋषि ने उसके ऊरपी का भेदन करने करनी से ग्रोवं ऋचीर दीप्स अग्नि की
प्रभा के महा हुप्रा था 18२॥ ऋचीक वे सत्यवती में जमदग्नि उत्पन्न हुए।
उमी प्रकार से रौद्र वणवा पे रचि पर्याय मे भृगु वे हुए ॥३॥ वैष्णव अग्नि
के जमन से जमदनि उत्पन्न हुए । जमदग्नि मे रेणुवा ने इन्द्र के ममान परा-
क्रम वाले ब्रह्म और पत्र मे पूर्ण अमित तेज वाले राम (परशुराम) यो उत्पन्न
रिया था ॥४॥ मौर्दये जमदग्नि स पहिले होने वाले सो पुष हुए थे उन
भागंवों के प्रापरा में एक सहस्र पुत्र उत्पन्न हुए पे ॥६॥ ऋप्यन्तरो में बहुत
से वाह्य थ वे भार्गव कहे गये हैं। वत्म-विश्व-अश्यिपेण-पाएड-पभ्या-सशौनक
गोत्र में ये भार्गव सप्तमा पक्ष जानने के योग्य होते हैं ॥६॥ मव प्रग्नि ने
भीमान् पुष अङ्गिरस के वश का धवण करो जिसके वश में मगोतम भारद्वाज
उत्पन्न हुए थे । इपुमान् महात् प्रोज वाले अङ्गिरस देव मुख्य थे 11६७॥
सुरूपा
चैव मारीचो कादमी च तथा स्वराट् ।
एथ्या च मानवी कन्या तिस्रो भार्या स्त्वथर्वण ।
इत्येतागिरस पल्यस्तासु वक्ष्यामि सन्ततिम् ॥१८
अथर्वणस्तु दायादास्तामु जाता कुलोद्वहा ।
उत्पन्ना महता चैव तपसा भावितात्मनाम् ।।
बृहस्पति सुरूपाया गौतम
प्रवन्ध्य वामदेवञ्च उतथ्यमुशिजन्तथा ॥१००
सुपुवे स्वराट् ।
वायु पुरा
विष्णु पुत्रस्तु पथ्याया सवतःचव मानस ।
विचित्त तथायस्य शरद्वाश्चाप्यतथ्यज ।।१०१
प्रशिजो दीर्घतमा वृहदुत्थो वागदेवज ।
धियो पुत्र सुधन्वान ऋपभश्च सुधन्वन ॥१०२
रथकारा स्मृता देवा ऋपयो ये परिश्रुता।
वृहस्पतेभरद्वाजो विश्रुत सुमहायशा ॥१०३
अङ्गिरसस्तु सवत्तों देवानङ्गिरस शृणु।
बृहस्पतेर्य-यासो देवा ह्यङ्गिरम स्मृता ।।१०४
औरसाङ्गिरस पुत्रा सुरुपाया विजज्ञिरे ।
औदार्यायुर्दनुर्दक्षो दर्भ प्राणस्तथैव च ।
विष्माश्च हविष्णुश्च ऋतु सत्यश्च ते दश ।।१०५
अयस्यस्तु उतथ्यश्च वामदेवस्तयोशिज ।
भारद्वाजा शाकृतिका गार्यकाण्वरयीतरा ॥१०६
मुद्गला विष्णुवृद्धाश्च हरिता वायवस्तथा ।
तथा भाक्षा भरद्वाजा पार्षमा किम्भयास्तथा ॥१०७
एते त्यङ्गिरस एक्षा विज्ञया दश पञ्च च ।
ऋष्यन्तरेषु चे बाह्या बहवोऽङ्गिरस स्मृता ॥१०८
सुरूपा-मारोबी-कादमी तथा स्वराट-पथ्या-मानवी और कन्या
तीन अथर्वा की भार्या थी। ये इतनो प्रगिरस की भाया थी उनम जो सननि
हुई उसको मैं अब बतलाता हूँ |RTI अथर्वा के दायाद कुलोद्वह उनम उत्पन्न
हुए थे और भावित प्रात्मा वाला के महान तप से उत्पन्न हुए थे ll सुरुमा
में वृहस्पति मे गौतम ने स्वराट अमृत किया। उसी प्रसार से अध्य-बामदेव
तथ्य और उशिजको उत्पान किया था ।।१००। पप्या में विष्णु पुत्र हुमा
सपर्स मानम हुआ ! निषित-तथा यस्य-पारद्वान-समाज-जि-नीचतमा-
बृहदुत्थ पे वामदेव से जम लेने वाल पे। विष्णु के पुत्र सुधन्वान-ऋपभ'
पौर
मुपवन थे ॥१०१।१०२॥ ये देव रयवार कहे गये हैं जो कि ऋषि परिश्रुत
पे । वृहस्पति से महान यश वाना भरद्वाज विश्रुत हुमा था ॥१३॥ पङ्गिरस
सप्तवर्पमहस्राणि तत सोप्रतिमोऽभवत् ।।११३ मन्वन्तरेपु सर्वपु ब्राह्मणाशेन जायते ॥११४ पश्य मद्य स्मृत विप्र वन्यपानात्त कश्यप ॥११६ समस्त स्थावर मोर बम जगत् उसनप्रा या॥१०६॥ उत्पन्ना और प्रधानाधा में उनके द्वारा ध्यान' प्रजापति यशानु कीर्तन ] [ ६७ मे सम्वत्तं हुमा अब अङ्गिरस देवो का श्रवण करो। वृहस्पति के जो छोटे देव हैं वे ही अगिरस कहे गये हैं ॥१०४॥ अगिरा के और पुत्र सुरूपा नाम वाली मे उत्पन्न हुए थे । प्रौदार्यायु-दनु-दक्ष-दर्भ-प्राण-हविष्मान-हविष्णु-ऋतु और सत्य वे दश थे ॥१०॥ अयस्य-उतथ्य-वामदेव-उशिज-भारद्वाज-शाकृ. तिक-गायं-काव्य-रचीतर-मुद्गल-विष्णु वृद्धहरित-वायव-भाक्ष-भरद्वाज- मार्पभ-विम्भय ये अगिरम दश और पांच पक्ष जानने के योग्य होते हैं । ऋप्य- न्तरो मे बहुत से वाद्य प्रगिरस कहे गये हैं ॥१०६-१०७-१०।। मारीच परिवक्ष्यामि वशमुत्तमपूरुपम् । यस्यान्ववाये सम्भूत जगत्स्यावरजङ्गमम् ।।१०६ मरीचिरापश्चफमे ताभिध्यायन्प्रजेप्सया । पुत्र सर्वगुणोपेत प्रजावान् सुरुचिदिति । सपूज्यते प्रगस्ताया मनसा भाविता प्रभु ॥११० आहूताश्च तत सर्वा आप समवसत्प्रभु । तामु प्रणिहितात्मानमेव सोऽजनयत्प्रभु ॥१११ पुत्रमप्रतिमन्नाम्नारिष्टनेमि प्रजापति । पुत्र मरीच मूर्याभ वधौवेशो व्यजीजनत् ॥११२ प्रध्यायन् हि सता वाच पुत्रार्थी सलिले स्थित । कश्यप सवितुषिद्वाम्तेन स ब्रह्मण सम । पन्यानिमित्तमित्युक्त दक्षेण कुपिता प्रजा । अपिवत्स तदा वश्य वश्य मद्यमिहोच्यते ॥११५ हाइचेागा हि विज्ञ या ग्रह्मणा वश्य उच्यते । पय मारीच उत्तम पुग्यो वान दश वो बतलाता हूँ जिम . मीकि १०० ] [ वाय पुराण यदास्य मनसा सृष्टा न व्यवद्धन्त ता प्रजा । अपध्याता भगवता महादेवेन धीमता ।।१२७ मैथुनेन च भावेन सिसक्षुर्विविधा प्रजा । असिवनी चावहत् पत्नी वीरणस्य प्रजापतेः १२८ सुता सुमहता युक्ता तपसा लोक्यारिणीम् । यया धृतमिद सर्व जगत् स्थावरजङ्गमम् ॥१२६ अत्राप्युदाहरन्तीमो श्लोको प्राचेतस प्रति। दक्षस्योदहतो भार्यासिवनी वीरिणी पराम् ॥१३० फिर धीमान ने अपने पापको मनुष्य-उरण-राक्षस देव-असुर-गन्धर्व- दिव्य सहननप्रजा-ईश्वर रूप-धन और तेज से अपने ही तुल्य विभाजित किया था॥१२४।। उसी प्रकार से परम मुदित होते हुए अन्य गतिमान् और ध्रुव मानम ही प्राणियो को एक अनेक प्रकार की प्रजानो का मृजन किया था ।१२५] ऋषियो को-देवों को-गन्धवोंको-मनुप्य-उरग और राक्षमो को, यक्ष-भूत और पिशाचो को पधी-पशु और मृगो को जिस समय इसने मनमे भृजन किया था तो वह प्रजा को वृद्धि नहीं हुई थी। क्योंकि वह प्रजा धीमान महादेव भगवान के द्वारा अपध्यान थी ॥१२७॥ फिर मैथुन के भाव से अनेक प्रकार की प्रजा का मृजन किया था। प्रजापति वीरण की असिक्नी पत्नी को वहन किया था ॥१२८॥ प्रजापति वीरण की मुला सुमहान तपमें युक्त थी और लोकोको धारणा करने वाली थी जिसने इस सम्पूर्ण स्थावर और जङ्गम जगन् की धारण किया था॥१२६॥ परम वीरिणी असिक्ती भार्या का उदहन करने वाले दक्ष प्राचेतम के प्रगति ये दो श्लोक हैं जिनको यहां पर भी उदाहृत किया जाता है ।।१३०॥ कूपाना नियुत दक्ष सपिरणा साभिमानिनाम् । नदीगिरिपु सजस्ता पृष्ठतोऽनुययौ प्रभु ।।१३१ त दृष्ट्वा ऋपिभि प्रोक्त प्रतिष्ठास्यति वै प्रजा । प्रयमान द्वितीया तु दक्षस्येह प्रजापते ॥१३२ तथागच्छद्यथाकाल कूपाना नियुते तु स ) असिक्ती वैरिणी यत्र दक्ष प्राचेतसोऽवहत् ।।१३३ प्रजापति वशानु वीर्तन ] अथ पुनमहल स वैरिण्याममितौजसा। असिकन्या जनयामास दक्ष प्रचेतस प्रभु ॥१३४ तास्तु दृष्ट्वा महातेजा स विवर्ट यिपून् प्रजा । देवपि प्रियसवादो नारदो ब्रह्मण. सुत.। नागाय वचन तेपा शापायवात्मनोऽब्रवीत् ॥१३५ य.स व प्रोच्यते विप्र. श्यपस्येति कृत्रिम । दक्षगापभयाभीतो ब्रह्मपिस्तेन क्मणा ॥१३६ य पश्यपसुतस्याथ परमेष्ठी व्यजायत । मानस. कश्यपस्येह दक्षशापभयात् पुन १३७ तस्मात् स कश्यपस्याथ द्वितीय मानसोऽभवत् । सहि पूर्वसमुत्पन्नो नारद परमेष्ठिन ॥१३८ येन दक्षस्य पुत्रास्ते हर्यश्वा इति विश्रुता । निन्दार्थ नाशिता सर्वे विनष्टाश्च न सशय १३६ तस्योद्यतस्तदा दक्ष बुद्धो नाशाय ने प्रभु । ग्रह्मन् वे पुरस्कृत्य याचित परमेष्टिना ॥१४० साभिमानी सी कूपो वा एक नियुत नदी पौर पर्वतो में सर्जन करते हए प्रभु दक्षने उनके पीछे अनुगमन पिया या ॥१३१॥ उसको देखकर ऋषियों ने पहा प्रजापाको प्रतिक्षित बरेगा । यहाँ प्रजापति दक्षको प्रथमा है, द्वितीया तो यथावाल उमी प्रवार मे बूपों में नियुन में पली गई उम प्राचतम दक्ष ने जहा पर वरिणी पमिवनी या उदहन पिया पा ॥१२॥१३३॥ गरे मनन्तर उग प्राचतग दश ने वैरिणी अमिनी मे मपरिमित भोर मे एर मह पुत्र उत्पन्न किये ॥१३४॥ महान तेजवाल उमन प्रजामो के बहाने की इच्छा वाले उनको देगार ब्रह्मा के पुत्र दरपि प्रिय मम्बाद याने नारद ने उन नाम के लिपे ही दमा बोला ॥१३॥ जो वह सत्यप का पिम मित्र है यह कहा जाता है। ब्रह्मपि उम वमं मे पक्ष मार में भय से डरगया ॥१३६। इसके मनन्तर जो पसप गुना परमेटी उपनमा पादश के शाप के भय से रिपक्ष पसमा माग पुत्र मा II गमे वह कार का दिनीय मानस हमा १०२ ] [ वायु पुराण था । वह परमेटी का नारद पूर्व में समुत्पन्न हुमा ॥१३८॥ जिससे दक्ष के वे पुत्र हर्यश्व इम नगर से प्रसिद्ध हुए थे । निन्दा के लिये नाम कर दिये गये थे और मभी विनय होगये इसमे सराय नहीं है ।।१३६।। उग ममय प्रभु दक्ष पद्ध होकर उसके नाश के लिये उद्यन होगये थे। तर परमेशे के द्वारा ब्रह्मपियो को प्रागे करणे उमसे याचना की गई थी।॥१४॥ ततोऽभिसन्धित चक्र दक्षस्तु परमेष्ठिना। कन्याया नारदो मह्य तव पुत्रो भवत्विति ॥१४१ ततो दक्ष सुता प्रादात् प्रिया वै परमेटिने। तस्मात् स नारदो जज्ञे भूय शान्तो भयादृषि ॥१४२ तदुपश्रु त्य विप्रास्ते जातकौतूहलाः पुन । अपृच्छन् वदता श्रेष्ठ सूत तत्त्वार्धदशिनम् ।।१४३ क्थ विनाशिता पुत्रा नारदेन महात्मना । प्रजापतिस्तास्ते वै प्रजा प्राचेतसात्मजा ॥१४४ स तथ्य वचन श्रुत्वा जिज्ञासासम्भव शुभम् । प्रोवाच मधुर वाक्य तेषा सर्वगुणान्वितम् ॥१४५ दक्षपुत्राश्च हयंश्वा विवद्ध यिपव प्रजा । समागता महावीर्या नारदस्तानुवाच ह ।।१४६ बालिशा बत यूय वैन प्रजानीय भूतलम् । अन्तमूर्द्ध मधश्चैव क्थ स्रक्ष्यथ वै प्रजा ॥१४७ किं प्रमाणन्तु मेदिन्या स्रष्टव्यानि तथैव च । प्रविज्ञायेह स्रष्टव्यमन्यथा कि नु स्रक्ष्यथ । अल्प वापि बहुपि तत्र दोषस्तु दृश्यते ॥१४८ इसके पश्चात् दक्ष ने परमेटी के साथ अमिमन्धित किया कन्या में नारद मेरे लिये तुम्हारा पुत्र होजावे ॥१४१॥ इमके अनन्तर दक्ष ने प्यारी पुत्री को परमेष्ठी के लिये दे दिया उसमे वह नारद ऋपि फिर भय से शान्त उत्पन्न हुए ॥१४२॥ उन विप्रो ने यह सुनकर कौतूहल वाले होते हुए बोलने वालो मे धेष्ठ और तत्वार्थ को देखने वाले मूतजी से पूछा ॥१४३॥ ऋषियो ने कहा-महान प्रजापति वशानु - वीनन आत्मा बाने नारद ने पुत्रों को कंगे विनाशित किया था ये तो सब प्रजापति के पुत्र और प्रातम के पात्मज थे ॥१४४। उसने शुभ मौर जानने की इच्छा में होने वाले ऋषियो के तथ्य वचनो को सुनकर उनको मधुर समस्त गुणों से मन्वित वाक्य बोने 11१४५|| प्रजा के विवद्धंन करने की इच्छा वाले हर्यश्व नाम वाले दक्षा के पुत्र जो महान् वीर्य वाले वहाँ आगये पौर नारद ने उनमे महा--॥१४६।। तुम सब महामूर्ख हो अन्त-ऊद्ध और अधस्तल अर्थात् नीचेरा भाग इस भूतल को नहीं जानते हो फिर तुम से प्रजा का मृजन करोगे ? ॥१४७। इस मेदिनी का क्या प्रमारा है तथा क्या प्रमाण वाले गृजन करने के योग्य हैं । यहाँ पर यह न जानकर प्रन्यथा मृजन करना चाहिये, क्या तुम सृजन करोगे ? अल्प है या बहुन है, वहाँ पर दोप स्पष्ट दिखलाई देता है ॥१४८।। । ते तु तद्वचन श्रुत्वा प्रयाताः सर्वतोदिशम् । वायुन्तु समनुप्राप्य गतास्ते वै पराभवम् ॥१४६ अद्यापि न निवर्तन्ते भ्रमन्तो वायुमिश्रिता । एव वायुपथ प्राप्य भ्रमन्ते ते महपय ।।१५० स्वेषु पुत्रेषु नष्टेषु दक्ष प्राचेतस पुन वैरिण्यामेव पुत्राणा सहस्रमसृजत् प्रभु ॥१५१ प्रजा विवद्ध थिपथ शवलाश्वा पुनस्तु ते । पूर्वमुक्त वचस्तत्र श्राविता नारदेन ह ।।१५२ तच्छ्रुत्वा वचन सर्वे कुमारास्ते महौजस । अन्योन्यमूचुम्ते सर्ने सम्यगाह महानृपि । भ्रातृणा पदवी चंद गन्तव्या नात्र संशय ॥१५३ ज्ञात्या प्रमाण पृथ्व्याश्च सुख सश्यामहे प्रजा । तेऽपि तेनैव मार्गेण प्रयाता सर्वतोदिशम् । अद्यापि न निवर्त्तन्ते समुद्रभ्य इवापागा ॥१५४ तत प्रभृति व भ्राता भ्रातुरन्वेपणे रत । प्रयातो नश्यति तथा तन्न कार्य विजानता ।।१५५ १०४ ] [ दायु पुराण उन लोगो ने नारद का यह वचन सुना और उसे सुनकर वे सब दिशामो मे चले गये । वायु को समनुप्राप्त कर वे पराभव को प्राप्त हुए ।१४। वे वायु से मिश्रित होते हुए आज तक भी भ्रमण करते हुए ही हैं और नही लौट पा रहे हैं । इस प्रकार से वायु के पथ को प्राप्त होकर वे मर्पिगरण भ्रमण किया करते हैं ॥१५० ।। अपने पुत्रो के नष्ट हो जाने पर प्राचेलस दक्ष ने फिर वैरिणी पली में ही उस प्रभु ने एक सहस्र पुत्र उत्पन्न किये थे ॥१५॥ प्रजा के विवर्तन करने की इच्छा वाले वे शवलाश्व फिर नारद के द्वारा वहाँ पर वह पूर्व में कहा हुग्रा वचन मुनाये गये थे ॥१५२॥ महान् भोज वाले वे सब कुमारी ने उस वचन को मुनकर आपस में एक दूसरे से बोले महर्षि ने ठीक ही बाहा है । भाइयो की पदवी अर्थात् मार्ग को जानना चाहिए, इसमे कुछ भी संशय नहीं है ॥१५३॥ पृथ्वी का प्रमाण जानकर प्रजा का सुख पूर्वक मृजन करेंगे । वे मब भी उसी मार्ग से सम्पूर्ण दिशाम्रो की ओर चले गये थे। समुद्रो मे गई हुई नदियो की भांति वे भी अभी तक नही लौट रहे हैं ॥१५४॥ तभी में लेकर भाई-भाई के अन्वेपण करने मे रत होता हुआ प्रयाण करता था और वहाँ नष्ट हो जाता है क्योकि उस प्रकार से कार्य की जानकारी नही रहती थी ॥१५॥ मष्टेषु शबलाश्वेषु दक्ष क्रुद्धोऽभवद्विभु । नारद नाशमेहीति गर्भवास वसेति च ॥१५६ तथा तेष्वपि नष्टेषु महात्ममु पुरा किल । पष्टिकन्याऽसृजद्दक्षो वैरिण्यामेव विश्रुता ।।१५७ तास्तदा प्रतिजग्राह पल्यर्थे कश्यप प्रभुः। धर्मः सोमस्तु भगवास्तथैवान्ये महर्षय ।।१५८ इमा विसृष्टिं दक्षस्य कृत्स्ना यो वेद तत्त्वत । आयुष्मान् कीर्तिमान् धप. प्रजावाश्च भवत्युत ।।१५६ सवलाश्व पुत्रों वे नष्ट होजाने पर विभु दक्ष बहुत ही अधिक प्रोधिन हुआ था और 'नारद नाश को प्राप्त होजा तथा गर्भ में मावाम अर्थात् गर्भ में निवाम प्राप्त कर' ऐमा शाप दे दिया था ॥१५॥ पहिी समय में उस प्रकार
। वभानु कीर्तन ]
[ १०१
उन महान मारमा वालों के नष्ट हो जाने पर दा न बरिणी पत्नी म हो
प्रमिद्ध साठ पन्यानो का मृजन किया था ।।१५७॥ उन समस्त कन्याप्रो ने
परनी के रूप में प्राप्त होने के लिये प्रभु पश्यप को स्वीकार किया था । भगवान्
धर्म-मोम और उमी प्रकार से अन्य महर्षिगण थे ॥१५८॥ जो कोई पुरुष दक्ष
प्रजा पति की इस विशेष रूप वाली मृटि को सम्पूर्ण रूप से तत्वपूर्वक जानता
है वह परमागु वाला-नीतिवाणा पोर प्रजावाला धन्य होना है ।।१५।।
प्रकरण ४---ऋपि वंशानु कीर्तन
एव प्रजामु सृष्टामु कश्यपेन महात्मना ।
प्रतिष्ठितामु सर्वासु स्थावरामु चरासु च ॥१
अभिपिच्याधिपत्येपु तेपा मुख्य प्रजापति ।
तत प्रमेण राज्यानि व्यादेष्टुमुपचक्रमे ॥२
द्विजातीना वीरधाश्च नक्षत्राणा ग्रहै सह।
यज्ञाना तपमाञ्चव मोम राज्येऽम्यपेवयत् ।।३
वृहस्पति तु विश्वेगा ददावझिरना पतिम् ।
भृगूरणामधिपञ्च व काव्य राज्यऽभ्यपेचयत् ॥४
प्रादित्याना पुनर्विष्णु वमूनामथ पावरम् ।
प्रजापतीना दक्षश्च मरुतामय वासवम् ।।५
दैत्यानामथ राजान प्रह्लाद दितिनन्दनम् ।
नारायण तु साध्याना रुद्राणा वृषभध्वजन् ।।६
विप्रचित्तिञ्च राजान दानवानामथादिशत् ।
अपातु वरुण राज्ये राज्ञा वैधवरण पतिम् ।
यक्षाणां राक्षसानाच पाथियानां धनस्य च ।।
था मूतजी ने कहा-महान प्रात्मा वाले कश्यप के द्वारा इस प्रकार से
प्रजामो का मृजन करने पर और समस्त स्थावर तथा जङ्गम प्रजानो के प्रति-
हिन किये जाने पर उनके आधिपत्य के स्थान पर उनमे से मुरथ को प्रजापति
१०६ ]
{ वायु पुगए
का पभिषेक करके इसके पश्चात् क्रम से राज्यो वा ध्यादेश करने का उपक्रम
किया या 1१-२॥ द्विजानियो के वीरुधों के ग्रहो और नक्षत्रो के साथ यज्ञो का
पोर तपो का राज्य में सोम को घभिषिक्त किया था अर्थात् उक्त सबका अधि.
पनि चन्द्र को बनाया था 1॥३॥ अङ्गिरम विश्वेशो का पति वृहस्पति और
भृगुमो का अधिप काव्य को राज्य में अभिषिक्त किया था।॥४॥ मादित्यो का
विष्णु को-वसुओ के पादक को-प्रजापतियो का दक्ष को और मरुतो का इन्द्र
को राज्य में अधिप अभिषित किया था ॥१॥ इसके पश्चात् दैत्यो का राजा
दितिनन्दन प्रसाद को साध्यो का अधिप नारायण को-रुदो का पधिप वृषभ
जज को बनाया था ॥६॥ दानवो का मणिप या विमिति को आविष्ट किया
थालो का स्वामी वरुप को और सब राजानो के राज्य में थवए
(कुवेर) को पति बनाया था यक्षो और राक्षसो वा-पाथिवा का और धन का
भी अधिप भी कुवेर को ही अभिषिक्त किया था 121)
ववस्वत पितृणाच यम राज्येऽभ्यषेचयत् ।
सर्वभूतपिशाचानां गिरिश शूलपाणिनम् ।।
शैलानो हिमवन्तञ्च नदीनामथ सागरम् ।
गन्धर्वाणामधिपति चक्रे निपरश तदा ॥
उच्च श्रवसमश्वानां राजान चाभ्यपेचयत् ।
मृगाणामथ शार्दूल गोवृपञ्च चतुप्पदाम् ॥१०
पक्षिणामथ सर्वेप गरुड पततां वरम् ।
गन्धानां मातुलञ्चद भूतानामगरीरिणाम ११
शब्दाकाशवलानाञ्च वायु बलवतां वरम् ।
सर्वेषां दष्ट्रिय शेप नागानामय वासुविम् ।।१२
सरीसृपारण सपरिण नागानाञ्च व तक्षकम् ।
सागराणा नदीनाश्च मेघाना पितस्य च ।
प्रादित्यानामन्यतम पर्जन्यमभिषिक्तवान् ॥१३
सर्वाप्सरोगणानाञ्च कामदेव तथैव च ।
ऋतूतामय मामानामातवाना तोव च ॥१४
ऋषि वशानु कीवन ] । १०७ पक्षाणाञ्च विपक्षाणां मुहूर्तानाञ्च पर्वणाम् । कलाकाष्ठाप्रमाणानां गते रयनयोस्तथा । गणितस्याय यागस्य च सवत्सर प्रभुम् ॥१५ पितृगण का स्वामी वैवस्वन यम का राज्य म अधिर अभिषिक्त किया या। समस्त भूतगणो और पिशाचो का स्वामी गूल पाणि गिरिश को बनाया 10 माला का स्वामी हिमाचल को-नदियो का पति सागर को-गधों का अधिपति उस समय में चित्ररथ को बनाया था ।।। अश्वो का राजा उच्च थवा को राजा बनाकर अभिषिक्त किया था। समस्त मृग प्रर्यात् पशुप्रो का राजा गार्दूल को और चतुष्पदो का प्रविप गोवृप को बनाया था ॥१०॥ समस्त पक्षियों का स्वामी पक्षिया मे परमश्रेष्ठ गरुड को बनाया। गधो के स्वामी को और विना शरीर वाले प्राणी शब्द-माकाश और वल इन मवका स्वामी बलवानो म श्रष्ठ वायु का तया मम्पूण दष्ट्राधारी जीवो का अधिप दोष को भौर नागा का स्वामी वासुकि को अभिपिक्त किया था ॥११-१२।। सरीसृप- नाग और मर्पो का राजा तक्षक को बनाया था । सागरो का-नदियों का-मेघो कारित का प्रादित्यो का प्रयतम पजय को स्वामी अभिषिक्त किया था ॥१३।। समस्त अ मराना के समुदाय का राजा कामदेव को अभिपिन किया था। ऋतुमो का-मागो का-प्रात्तवो वा-पशा का-विपक्षा का-मुहर्तों का- पर्वो का-कला एव काष्ठा प्रमाणो का-गति का नया दोनो अपना वा-गणिन का पोर याय का स्वामी मम्वत्मर को बनाया था 1॥१३ १४ १५॥ प्रजापति रजस पूर्वस्यान्दिशि विश्रु तम्। पुत्र नाम्ना सुवामान राजान सोऽभ्यपेचयत् ॥१६ पश्चिमाया दिशि तथा रजस पुत्रमच्युतम् । केतुमन्त महात्मान राजान सोऽभ्यपेचयत् ॥१७ मनुध्याणामधिपति चने चैव सुत मनुम् । तरिय पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपत्तना। यथाप्रदेशमद्यापि धर्मेण परिपाल्यते ॥१८ १०६ ] [ वायु पुराण स्वायम्भुवेऽन्तरेपूर्व ब्रह्मणा तेऽभिपेचिताः। नृपा ह तेऽभिपिच्यन्ते मनवो ये भवन्ति वै ॥१६ मन्वन्तरेवतीतेपु गता ह्यतेपु पार्थिवा । एवमन्येऽभिपिच्यन्ते प्रामे मन्वन्तरे पुन । प्रतीतानागता सर्वे स्मृता मन्वन्तरेश्वरा २० राजसूयेऽभिपित्तश्च पृयुरेभिर्नरोत्तमः। वेददृष्टेन विधिना कृतो राजा प्रतापवान् ॥२१ एतानुत्पाद्य पुवास्तु प्रजासन्तानकारणात् । रजका प्रजापति पूर्व दिशा मे बहुत ही प्रसिद्ध मुधामा नाम बाले पुत्रको उसने राजा अभिषिक्त किया था ।।१६।। पश्चिम दिशा में रजप के पुत्र अच्युत को महान् मात्मा वाले केतुमान को उसने राजा अभिषिक्त किया था ॥१७॥ और समस्त मनुष्यो का स्वामी मनु मुन को बनाया । उसके द्वारा यह समस्त सात द्वीपो वाली भूमि और पत्तनो(नगर)के सहित प्रदेश के अनुपार अाजनक थी धर्म के साथ परिपालित की जाती है ॥१८॥ स्वायम्भुव पतर म पहिने ये सब ब्रह्मा ने अभिपिक्त किये थे । जो मनु होते हैं ये नृप अभिपिञ्चिन किये जाते हैं ॥१६इन मन्वन्तरो के प्रतीत होजाने पर पार्थिव चले गये थे। फिर अन्य मन्वन्तर प्राप्त होने पर अन्य इसी प्रकार से अभिपिक्त क्येि जाते हैं। अलीत तथा अनागत समस्त मन्वन्तरेश्वर कह गये हैं ॥२०॥ इन धैठ मानवो के द्वारा प्यु मभिषिक्त किया गया था जोकि वेदोक्त विधि से प्रतापवान् राजा बनाया गया है ॥२१॥ पुनरेव महाभाग प्रजाना पतिरीश्वर ॥२२ वश्यपो गोत्रकामस्तु चचार परम तप । पुत्रौ गोत्ररो मह्य भवेतामित्यचिन्तयत् ।।२३ तस्य प्रध्यायमानस्य कश्यपस्य महात्मन । ब्रह्मणोऽदो सुतो पश्चात् प्रादुर्भूतो महौजसौ ॥२४ वत्सारश्वासितश्च व तावुभौ ब्रह्मवादिनी। चत्सारान्निध्र वो जज्ञे रम्यश्च स महायशाः ॥२५ । रारसूय में ऋषि वशानु कीर्तन ] [ १०९ रैभ्यस्य रेभ्या विज्ञ या निध्र वस्य नियोधत । च्यवनस्य सुकन्याया सुमेधाः समपद्यत ॥२६ निध्र वस्य तु या पत्नी माता वै कुण्डपायिनाम् । असितस्यवपर्णाया ब्रह्मिष्ठ समपद्यत ।।२७ शाण्डिल्याना वच श्रुत्वा देवलः मुमहायशा । निध्र वा शाण्डिल्या रेभ्यास्त्रय पञ्चात्तु कश्यपा ॥२८ वरप्रभृतयो देवा देवलस्य प्रजास्त्विमा ॥२६ प्रजा वी वृद्धि के कारण मे इन पुत्रा । को उत्पन्न कराकर पुन प्रजाम्रो के पति महान भाग वाले-ईश्वर श्यप बोई गोत्र की कामना रखते थे, परम तपस्या को धारण किया था और मनग यह सकल्प मोचा था कि दो पुत्र मेरे गोत्र के चलाने वाले उत्पन्न होजावें ॥२॥२३॥ प्रवृष्ट रूप से ध्यान करने वाले महात्मा श्यप के पोछे ब्रह्मा क प म्वरुप दा पुत्र महान् प्रोज वाले प्रादुर्भूत हुए ॥२४॥ वरमार और अमित य दोनो ही ब्रह्मवादी थे । वत्मार से निध्व उत्पन्न हुमा और महान् या वाला वह रैभ्य हुमा ॥२५॥ रम्य के जो हुए व भ्य कहलाये और निभ्र व वी अब जानकारी करो । च्यवन की सुकन्या म मुमधा समुत्पन्न हुए ॥२६॥ निघू व की जो पत्नी थी यह कुण्डपापियो की माता पी। अमिन बी परम ब्रह्मिण उत्पन्न हुमा ॥२७॥ शाएिडल्यो के वचन को गुनगर मुन्दर एव महान् यशवाले दवल ने निध्र व-शाण्डिल्य और रैम्प ये तीन और पीछे कश्या पौर यह प्रभूति देव ये सब देवल की प्रजा थी ।।२८॥२६॥ मानसस्य चरिष्यन्नस्तस्य पुत्रो दम क्लि । मानसस्तम्य दायादम्तृग्गविन्दुरिति श्रु त ॥३० त्रेतायुगमुमे गजा तृतीये सम्बभूव है । तम्य पन्या स्विडविडा रूपेणाप्रतिमाभवत् । पुलस्त्याय म गपिस्ता कन्या प्रत्यपादयन् ।।३१ ऋपिरिड विडायान्तु विधवाः ममपद्यत । तत्य पल्यतया पोतम्य नवर्दना ॥३२ [ वायु-पुगए बृहस्पतेव हत्कोतिर्देवाचार्यस्य कौत्तिनः । कन्यो तस्योपयेमे स नाम्ना वै देववणिनीम् ॥३३ पुप्पोक्टाञ्च वावाच सुते माल्यवत स्थितौ । केकसी मालिन. कन्या तासान्तु शृणुत प्रजा ।।३४ ज्येष्ठ वैश्रवण तस्य सुपुवे देववरिणनी। 'दिव्येन विधिना युक्तमार्पणव श्रुतेन च । राक्षसेन न रूपेण पासुरेण बलेन च ॥३५ त्रिपाद सुमहाकाय स्थूलशीर्ष महातनुम् । अष्टदष्ट्र हरिच्छ मधु शकुकरणं विलोहितम् ॥३६ ह्नस्वबाहु प्रबाहुन्च पिङ्गल सुविभीषणम् । वंवतंज्ञानसम्पन्न सम्बुद्ध ज्ञानमम्पदा ॥३७ एवविध सुत दृष्ट्वा विश्वरूपधर तथा । पिता दृष्ट्वाब्रवीत्तन कुवेरोऽयमिति स्वयम् ॥३८ चरिष्य मारण मानस उसके दम पुत्र हुआ । उसका दामाद मानम या जोकि तृणविन्दु दम नाम विश्रुत हुमा था ।।३०॥ तृतीय श्रेता युग ये मुम म राजा हुआ या उसकी इडविडा थी जोकि रूप में अप्रतिमा थो । उम राजपि ने उस परम सुन्दरी क पा को पुनस्त्य के लिय देदी थी ॥३१॥ ऋषि पुलस्त्य ने विडा म विश्रवा को जन्म दिया । पौलरस कुल के बढान पाली उसकी चार पलिया थी ॥२॥ देवो के आचाय बृहस्पति वा वृहकोति वहा गया है । नाम से देववणिनी उमकी कया के साथ उसने विवाह किया था ॥३३॥ माल्यवान् पी पुष्पोपटा और वाका दो मुताए थी-मानी की कमी पन्या थी, अब उनकी प्रजाम्रो का श्रवण करो ॥३४॥ देव वाणिनी ने उनके सबसे बहे वैश्रवण को उत्पन्न पिया जोवि दिव्य विधि और प्रार्पन ने पूगालया सम्पन्न था। साथ ही उममे राक्षस का रूप या प्रौर प्रसुर बल भी था ||३५।। तीन पैरो वाल-बहुत बड़े शरीर बाले-स्थूल शीर्ष से युक्त-महान तनुमे सम्पन-माठ दादा वाले-हरी रग को श्मथ से युक्त-राकुवरण-विलोहित-छोटी भुजामा वामे-प्रबाहु-पिङ्गन-मुविभीषण-वत्त ज्ञान स युक्त तथा सान को सम्पत्ति मे - ऋषि बगान कीनर ] पुरण प्रभार में विश्वरूप को धारण करने याने पुत्र को देखकर पिना ने यहाँ पर हैरान हुए वहा पर तो स्वयं चुपैर है ॥३६॥३७॥३८॥ पुस्सायां विपतिशब्दोग्य शरीर वेग्मुच्यते। युर्वरः दुसरोग्याताम्ना तेन च सो ट्विनः ।।३६ यम्माद्विधवमोपपत्य साहयाद्विश्रवा इव । तस्माईश्वो नाम नाम्ना लोरे भविष्यति ।।४० प्रादपा युरोगेजनयतिथ त नल रम् । रावण युम्भाश्च कन्या शूर्पणयालया। विभीषण चतुर्थान्तावस्वजनयत्नान it माकुरों दागीयः रिजलो रक्तमूर्वज । चतुष्पाविंशतिभुजी महावापो महायल ॥४२ जात्याशननिभी दष्ट्री लोहितग्रीच एव च । गजमेनो जययुक्तो रपेण च गरेन च १४३ गन्यबुद्धिननू राक्षगरेव रावण । निसर्गाहारण परो गरणादायगम्नु गः॥४१ हिरण्यामियामीरम गजा पूजन्मनि । अनुमानि राजा प्रयोदयाय गरम Ice ११२ । [ वायु पुराण पूरपा, रावण करने से ही वह रावण कहलाया है ॥४२॥४३||४४॥ तेरह वह राक्षस हैं ॥४॥ ता पञ्चकोटयो वर्षाणामारयाता सधया द्विजै । नियुतान्येकपष्टिश्च सहयाविद्भिरदाहृता ।।४६ पष्टिशतसहस्राणि वर्षारणान्तु स रावणः। देवताना ऋषीणाञ्च घोर कृत्वा प्रजागरम् ।।४७ त्रेतायुगे चतुर्विशे रावणस्तपस क्षयात् । राम दाशरथि प्राप्य सगण क्षयमोयिवान् ॥४८ महोदय प्रहस्तश्च महापाशुवरस्तथा। पुष्पोलटाया पुयास्ते कन्या कुम्भीनसी तथा ॥४६ विशिरा दूपणश्चैव विद्यु जितश्च राक्षस । कन्या ह्यसलिका चंव वाकाया प्रसवा स्मृता ॥५० इत्येते रवर्माण पौलस्त्या राक्षसा दश । दारुणाभिजना सर्ने देवैरपि दुरासदा ॥५१ सर्वे लब्धवरावं व पुत्रपौत्रसमन्विता । यक्षारणाचैव सर्वेपा पौलस्त्या ये च राक्षसा ॥५२ वे वर्षों की पांच कराड द्विजा के द्वारा सख्या से कही गई हैं। सख्या के ज्ञातामो के द्वारा इक्मठ नियुत कही गई है ।।४६।। साठसी हजार वर्ष तक उस रावण ने देवत'नो मौर ऋपियो का घोर प्रजागर करके चौबीसवें वेना- युग म तपस्या का क्षय होने मे दशरथ के पुत्र श्रीराम का प्राप्त किया और वह रावण गणो के साथ क्षय को प्राप्त हुआ था ।।४७-४८1) पुष्पोत्कटा के महोदय प्रहस्त-महापाशुखर पुत्र थे तथा कुम्भीनसी नाम वानी एक कन्या हुई थी।४६॥ त्रिशिरा-हूपण-विधु जिह्व रात्स तथा नाका के प्रसविका नाम वाली कया ये सब प्रसव कहे गये है ॥५०॥ ये दश पौलस्त्य राक्षस क्रूर कर्म करने वाले थे। ये सब दारुण अभिजन वाले और देश के द्वारा भी दुरासद थे॥५१॥ ये सभी वरदान प्राप्त करन वाले और पुत्रो तथा पोत्रो से युक्त थे अर्थात् पुत्र पौत्र वाले ये। और समस्त यक्षा के ये पौलस्त्य राक्षम थे॥५२॥ ।
वानु
कीर्तन ]
मागस्त्यवश्वामिधारणा रारणा ब्रह्मरक्षसाम् ।
वेदाध्ययनशीलाना तपोनिविणाम् ॥५३
तेवामंडविडो राजा पालस्त्य सम्यपिङ्गल ।
इतरे व यामुपास्तेन रक्षोगरण स्त्रय ॥५४
यातु धाना ग्रह्मधाना वाश्चि व दिवाचरा ।
निशाचरगरणास्तेपा चत्वार पविभि स्मृता ।।५५
पौरस्त्या नैतारचं प्रागत्स्या कौगितास्तथा ।
इत्येताः मप्त तेपा वं जातया राक्षसा स्मृता ॥५६
तेपा रूप प्रवक्ष्यामि स्वभावेन अवस्थितम् ।
वृत्तामा पिङ्गला व महाकाया महोदरा ॥५७
मष्टा गापर्णा ऊद्ध रोमागा एव च ।
भावपंदारितात्याश्च मुअधूमाद मूर्द जा ॥५८
म्यूनगी सिताभाच हम्पसाच प्रवाहमा ।
ताम्रास्या लम्पजिह्वौश नम्बभू स्थूलनासिका ॥५६
नौलाना लोहिनीया गम्भीराक्षा विभीपणा ।
महापोरस्वराव विष्टा यद्धपिण्डिया ॥६०
म्यूनाश तुलनामाच मितामहनना हडा ।
दारणाभिजना मरा प्राया रिलष्क्षमिग 11६१
मण्डलाङ्गापीडा मुकुटामणोपपारिग ।
विति यम्पामग्णाधिप्रयगनुपना ॥६०
पामादा पिशितादाभ पादाभ त म्मृता ।
ग्यता पमाधम्म राक्षमान युप स्मृतम् ।
नगमानवान युद्ध प मायात नि:
वायु पुराण गरण कवियों के द्वारा कह गये है ॥५५॥ पौरसत-पागस्त्य गौशिव पे उनकी मात जानियाँ है जो राक्षम कहे गये हैं ॥५६॥ अब उनका स्वभाव से व्यवस्थित रूप बनलाऊँगा । गोल मोखो वारे-पिङ्गल वणं वाले महान् काम से युक्त-महान उदर वाने-पाठ दाढा वाले शंकु के ममान कानो वाले-ऊपर का उठे हुए रोगो से युक्त-कानो ता पटे हुए मुखो वाले-मू ज तया या जैसे ऊई मझो वान-स्थूल माथे वाले-मित प्राभा बाले-छोटे कद वाले- प्रवाहक-नामम दश मुग्यो स यक्त-लम्बी जीभ पोर लम्वे होटा वाले-लम्बी और मोटी नाक पाले-नीले असो वाले लाहित वर्ण की पीवा (गर्दन) दाले-- गहरे ने श स युक्न-विशेष रूप म डरावने-महान घोर ध्वनि वाले-विट-वृद्ध पोडी वाले-माटे- तुङ्ग नासिका वाले-शिला के समान महनन वाले मजबूत दारण भभिजन वाले कर ओर बहुधा क्लिष्ट कम करने वाल तथा एडल- मजद और पापोड धारण करने वाले एव मुकुट मोर उधणीप को पारण करने वाले विचित्र वस्त्र एव भाभरण वाले -चित्र माला पौर मनुलेपन बाल-- अन्न भरण करने वात तया मांस खाने वाले एवं पुरुषों का भक्षण करने वाले चे मब बताये गये है। इस प्रकार डा रामसो के पा साघम्यं बुधजनो के द्वारा कहा गया है । यह ममस्त बल बुद्ध नहीं है किन्तु वह माया कृत भी होता है ११५७-५८-५६६०६१-६२६३॥ पुलहस्य मृगा पुत्रा सव यानाच इष्ट्रिण । भूता पिशाचा सांश्च भ्रमरा हस्तिमातथा ६४ बानरा किनरारचंव यमनिम्पुरपास्तथा । येऽन्ये चैव परिशान्ता मायानाधवशानुगा ॥६५ प्रनपत्य स्तस्मिन् स्मृतो वैवस्पतेनरे। न तस्य पुष पौत्रा वा तेज मक्षिप्य वा स्थित ॥६६ प्रोवंश प्रवक्ष्यामि नृनीयस्य प्रजापते । तम्य पत्त्यश्च मुन्दयों दर्गवामन्पतिव्रता ॥६, भदास्वम्प घृताच्या व दशाप्गमि गूनः । भदा नद्रा च महाच मालदा मलदा तथा ॥
पि यासीन ] वेला सला च मप्तता या च गोचपला स्मृता। तथा मानरसा चैव रलवूदा च ता दश ॥६६ प्रायवरावृत्तासां भर्ता नाम्ना प्रभार । भद्रायां जनयामास सोम पुत्र यशस्विनन् ।1७० स्वर्भानुना हने मूर्ये पतमानो दिवो महीम् । पुला के पुत्र समन भृग व्यान-दानी वाले भूत पिशाच-गई-भ्रमर- हायी-वानर-किन्नर-यम-रिपुरुष और जो भी माया नया कोप धनानुग होते हैं तथा वह गये हैं पे मब पुलह के पुत्र हुए थे ।।६४-६५।। उम वैवस्वत मन्वन्तर मनु एक ऐमा या जो आत्य हीन हुमा या । उसके न तो वोई पुत्र था मोर न कोई पात्र ही था। वह तेज का मझेर करवे स्थित रहता था।६६॥ प्रब तृतीय प्रजापनि अत्रि के वश को बतलाऊंगा। उसकी दा, परम पतिनना सुन्दरी पलियां पी ॥६७।। भद्राव रे धुनावी नाम वाली मगरा म दा सनान हुए। उनके नाम-भद्रा-दा-गदा-दालदा-मालदा-वेला मोर खला ये मान और गो चपला तथा मानरमा और रन दूग य दश है ॥६८-६६॥ पात्रेय वय वा करम वाला उनका भर्ती नाम से प्रभाकर पा जिमम भद्रा म यश वाले मोम पुत्र को जन्म दिया था ॥७॥ तमोऽभिभूते लोवेऽम्मिन् प्रभा येन प्रवत्तिता ७१ स्वस्ति तेऽस्थिति चोक्त स पतनिह दिवाकर । ब्रह्मवंचनातस्य न एपात दिवा महीम् ॥७२ अविथ ष्टानि गोत्राणि यश्चकार महातपाः । यज्ञेष्वविघनदचव सुरैर्यश्च प्रवत्तित ॥७३ स ताम्वजनपत् पुवानान्मनुल्याननामवान् । ददा ताम्वेव महता तपमा भावितप्रभा ॥४ स्वस्त्यात्रेया इति स्थाता ऋपयो वेदपारगा। तेषां वित्यातयगमो मिष्ठौ मुमहोजना १७५ दत्तात्रेयस्तस्य ज्येष्टो दुर्वापास्तस्य चानुज ।
। वायु पुगण
यवीयसो सुता तस्यामरला ब्रह्मवादिनी।
प्राप्युदाहरन्तीम श्लोक पौराणिका पुरा ७६
अत्रे पुत्र महात्मान गान्तात्मानमकल्मपम् ।
दत्तात्रेय तनु विध्यो पुराणज्ञा प्रचक्षते ॥७७
स्पर्भानु के द्वारा मूर्य के हत होने पर दिव म मही पर पतमान हुआ था।
इस लोक के उस समय अन्धकार मे एक्दम घभिभूत होने पर जिमन प्रभा को
प्रवर्तित किया था ॥७९यहाँ गिरता हुमा वह दिवार उम समय तेरा
फ्ल्यागा हा-इस प्रकार स कहा गया था। उस ब्रह्मानि के वचन से दिव से
मही पर नहीं गिरा ॥७२॥ जिम महान तपस्वी ने प्रविधेष्ठ गोत्रो को किया
था और जो अविधन यज्ञा म देवो के द्वारा प्रवत्तित किया गया था। उसने
महान् तप मे भावित प्रभा वाने उनमे ही पचानक अपने समान दश पुत्रो को
उत्पन्न किया था 11७३-७४।। स्वस्त्यावेय इस नाम से विख्यात वेद के पारगामी
ऋषिगण थे उनम विख्यात यग वाले महान् प्रोज से युक्त परम ब्रह्मिष्ट दो
पुष थे ॥७५।। उनम दत्तात्रेय सबसे बडा या मोर उसका छोटा भाई दुर्वासा
थे । उमकी छोटी अबला और ब्रह्मवाद वाली पुत्री थी। यहां पर भी पहिले
पौरागिब लोग इस श्लोक को वहा करते है ॥७६॥ महान् श्रात्मा वाले कल्प
रहित और शान्तात्मा अत्रि के पुत्र को जिमका नाम दत्तात्रेय या, पुराणों के
ज्ञाता लोग उन्हे विष्णु का तनु कहा करते हैं ॥७७।।
तस्य गोत्रान्वये जाताश्चत्वार प्रथिता भुवि ।
श्यामाश्चमुद्गलाश्च व बलारकगविष्ठिरा ।
एते नृणान्तु चत्वार स्मृता पक्षा महौजसाम् ।।७८
कश्यपानारदश्च व पर्वतोऽरुन्धती तथा।
जज्ञिरे च वहन्धत्यास्तातिवाधत सत्तमा ।।७६
नारदस्तु वसिधायारुन्धती प्रत्यपादयत् ।
अर्द्धरेता महातेजा वृक्षशापात्तु नारद ।।८०
पुरा देवासुरे तस्मिन्सग्रामे तारकामये।
-
[ वायु पुराल श्वेता वृष्णाश्च गोगा श्यामा धूम्रा सम्लिया। ऊप्मपा दारयानीलाच व पराभरा । पगगणामही ते पक्षा प्राता महात्मनाम् ॥ अन ऊ निवोषध्यमिन्द्रयतिमसम्भवम् । वमिष्ठम्य करिश्वत्या घृताच्या समपद्यत । कुशीतिय समात्यात इन्द्रप्रतिम उच्यते ॥८८ पृथो सुताया सम्भून पुत्रस्तस्या भवसु । उपमन्यु मुतस्तस्य यस्येमे उपमन्यव IIRE मियारुणयोश्च व युण्डिनो ये परिश्रुता । एकाप्यास्तधान्ये वसिष्ठा नाम विश्रु ता । एते पक्षा वसिष्टाना स्मृता एकादोय तु 180 इत्येते ग्राग्ग पुत्रा मानमा घष्ट दिश्रु ता । भातर सुमहाभागा तेगा वशा प्रतिष्ठिता ॥९१ श्रील्लोकान्धारयन्तीमान्देवगिरणमकुलान् । सपा पुत्राश्च पौत्राश्च शनशोऽथ सहस्रश । याप्ता पृथिवी सर्या सूर्यस्यैव गभस्तिभि ।।२ य छ शुर के पीवगै म उत्पन्न हात हैं-~-भूरिश्रवा-प्रभु-शम्भु-कृष्ण गौर पञ्चम गोर और बीतिमनी रन्या जा योगमाता हर प्रत वाली ब्रह्मादत की माता थी और सात्व गुह को परनी थी ८५1८६।। अंत-कृष्ण-गोर- श्याम-घूम-ममूलिप-उप्मप-द्वारक-नील और पराशर-महान् आत्मा बाने पगारो ये पाठ पक्ष कहे गये हैं ।।८७)} इसके ग्राम इन्द्र प्रतिम सम्भव का जान लो । वसिष्ठ की करिअली घृताची म कुशोधिय कहा गया उपन्न हुमा जोकि इन्द्र प्रतिम कहा जाता है ॥१८॥ पृथु यो सुना से उपका वमु पुत्र हुआ। उसका पुत्र उपमन्यु था जिसके ये सच उपमन्यु गण हैं ॥८६॥ और मित्रावरुणो के कुण्डिन हुए जो एकाय पग्धित डा थ। उसी प्रकार के अन्य मिष्ठ नाम से विवृत हुए थे। ये ग्यारह पक्ष यसिहो के कहे गये हैं ॥१०॥ये माठ पुत्र ब्रह्मा के मानस प्रसिद्ध हुए हैं । भाई सुन्दर एव महान् भाग वालेहैं और उनके पश १२० ] [ वायु पुराण एक ही प्रजानि-इग पाम से प्रसिद्ध पुत्र हुमा पा ॥४॥ प्रजानि य सनिज नाम वाना वीयवान पुत्र हुमा था। उमा श्रीमान् महान् या वानराशुप-इम नाम का पुत्र हुमा ॥५॥ध्रुप का पुत्र विग हुमा जिसकी कोई प्रतिमा नही थी । विंग का पुत्र कल्याण जिमरा नाम विवि था मौर वह बहुत धामिर था ।।६।। विविंश का पुत्र धर्मारमा और प्रताप वाला वतिनत्र था। उसका पुत्र राधम हमा जोगिता युग के प्रारम्भ म हुआ था ॥७॥ करन्धमसुतश्चापि प्राविक्षिनाम वीयवान् । प्राविक्षितो व्यनिजामत् पितरं गुणवत्तया १८ मरुत्तो नाम धमारमा चक्रवत्तिसमो नृप । सवर्तेन दिव नीत ससुहृत् सह बान्धव IIE विवादोन महानासीत् सवत्तस्य बृहस्पते । ऋद्धि दृष्ट्वा तु यज्ञस्य मुद्धस्तस्य वृहस्पति ॥१० सवर्तेन हृत यज्ञ चुकाप सुभृगन्तदा। लोकाना स हि नाशाय देवतहि प्रसादित ॥११ मरुत्तश्चक्रवर्ती स नरिप्य समवासवान् । नरिष्यन्तस्य दायादो राजा दण्डधरा दम ।।१२ तस्य पुत्रस्तु विक्रा तो राज सीपाष्ट्रवद्धन । सुधृती तस्य पुषस्तु नर सुधृतिन सुत ।।१३ केवलस्तस्य पुनस्तु वन्धुमान् केवतात्मज । अथ वन्धुमत पुत्रो धर्मात्मा वेगवान नृप ।।१४ करधम का पुत्र वीयवान प्राविदिश नाम वाला था। गुणा की सप नता से प्राविविध ने प्रपा पिता को भी व्यतिक्रान्त कर दिया था । मरुत्त नाम बाला राजा चक्रों के समान हुआ था। मित्रो और वाधको के सहित वह सवर्त के द्वारा दिव लोक को ले जाया गया था . इसम मवर्त बृहस्पति का महान् विवाद था । यज्ञ को ऋद्धि को देखकर बृहस्पति उसस बहुन ऋद्ध हुमा या ॥१०॥ सवत्त के द्वारा यज्ञ के हृत हो जाने पर उस समय वह बहुत ही अधिक कुपित हुआ और वह लोको के नाश करने के लिए उद्यत ॥१४ गान्धवं मूछना लक्षण ] [ १२१ होगया था। देवगण के द्वारा उमे प्रमन्न किया गया था ॥१॥ चक्रवर्ती जो महन्त था उमने नरिष्यन्त को प्राप्त किया था। नरिष्यन्त का दायाद् दणुधरद्धम राजा पा ।।१२।। उमका पुत्र परम विक्रम वाला राष्ट्रवर्धन राजा था। उसका पुत्र सुधूती था और उसका पुत्र नर या ॥१३॥ उसका वेवल पुत्र या पौर केवल का पात्मज व धुमान् था। इसके पश्चात् वन्धुमान का पुत्र धर्मात्मा राजा वेगवान् हुमा ॥१४॥ बुधो वेगवत पुत्रस्तृणविन्दुबुधात्मज । प्रेतायुगमुसे राजा तृतीये सबभूव ह ॥१५ कन्या तु तस्य द्रविडा माता विश्रवसो हि सा। पुत्रश्चास्य विशालोऽभूद् राजा परमधार्मिक ॥१६ विशालस्य समुत्पन्ना विशाला नयनिर्मिता। विशालस्य सुतो राजा हेमचन्द्रो महाबलः ॥१७ मुचन्द्र इति विख्यातो हेमचन्द्रादनन्तरम् । सुचन्द्रतनयो राजा धूम्राश्व इति विथ तः ॥१८ धूम्नाश्वतनयो विद्वान् सृञ्जय समपद्यत । सृञ्जयस्य सुत श्रीमान् सहदेव प्रतापवान् ॥१६ मारव सहदेवस्य पुत्र परमधामिक । कृशाश्वस्य महातेजा सोमदत्त प्रतापवान् ॥२० सोमदत्तस्य राजर्षे सुतोभूज्जनमेजय । जनमेजयात्मजश्च व प्रमति म विश्रत ॥२१ वेगवान का पुत्र वुध हुमा मौर वुध का पुत्र तृणविन्दु हुमा पाजो नि तृतीय नायुग के मुरा (पारम्भ) में राजा हुमा पा ॥१शा उसकी ग्या द्रविडा पीजो विविधा भी माता हुई थी । इगा पुत्र परम धार्मिक राजा विकास हुमा पा ॥१६॥ विशार को नव निर्मित विना उत्पन्न हुई थी और विगासरा पुत्र महाबलवान हेमचन्द्र राजा प्रापा ॥१७॥ हेमचन्द्र भनन्तर शुचन्द्र राम नाम से विख्यात पुत्र हुमा । मुचन्द्र का पुत्र राजा धूमार परम विग्यात हुपा ॥१८॥ धूमारष का पुत्र बहन विद्वान् मृत्रय समुत्पन्न हुमा १२२ ] [ वायु पुराण पुत्र उत्पन्न या। सृञ्जय वा पुत्र श्रीमान् एव प्रताप वाला सहदेव हुमा ।।१६।। सहदेव वा पुत्र परम धार्मिक कृशाश्व हुग्रा और कृशाश्व का पुत्र महान तेजवाला एव प्रतापी सोमदत्त हुमा ॥२०॥ राजर्षि सोमदत्त पे जनमेजय पुत्र उत्सान हुआ था। जनमेजय के प्रमनि इस नाम से प्रमिद हुधा ॥२१॥ तृणविन्दुप्रसादेन रावें वंशालका नृपा । दीर्घायुपो महात्मानो वीर्यवन्त सुधामिका ॥२२ शर्यातेमिथुन त्वासोदानातॊ नाम विथ त । पुत्र सुकन्या कन्या च भार्या या च्यवनस्य तु ।।२३ पानात्तस्य तु दायादो रेवो नाम्ना तु दीर्यवान् । मानों विषयो यस्य पुरी चापि कुशस्थली ॥२४ रेवस्य रेवत पुन ककुयी नाम धार्मिक । ज्येष्टो भ्रातृशतस्यासीद्राजा प्राप्य कुशस्थलोम् ॥२५ कन्यया सह श्रु त्वा च गन्धर्व ब्रह्मणोऽन्तिके। मुहूत्तं देवदेवस्य मात्यं बहुयुग प्राजगाम युवा चैव स्वा पुरी यादववृताम् । कृता द्वारवती नाम बहुद्वारा मनोरमाम् ॥२७ भोजवृष्टयन्धगुप्ता वमुदेवपुरोगमं । ताकथा रैवत श्रुत्वा ययातत्त्वमरिन्दम ।।२८ कन्या तु बलदेवाय सुव्रता नाम रेवतीम् । दत्त्वा जगाम गिखर मेरोस्तपसि सस्थित ॥२६ ये समस्त रामा तृणविन्दु के प्रसाद से वैशालक हुए थे। ये समस्त दीर्घ मायु वाले-महान मात्मा से युक्त-वीर्य वाले और भली भांति से धर्म के मानने वाले हुए ये ॥२२॥ शर्याति के एक जोडा हुअा था-एव पुत्र था जो मानार्स इस नाम से प्रथित था और एक क्या थी जिसका नाम मुराया था और वह च्यवन ऋषि की भार्या हुई थी ॥२३॥ मानात्त का दायाद अर्थात् दाय के ग्रहण करने वाला पुत्र वीर्यवान् रेव नाम वाला हुमा जिमका देश तो मानत्त था और पुरी दुशस्थली यो ।।२४।। रेव का पुत्र रेवत हुआ था जिसका नाम विभो ॥२६ गान्धर्व मूर्च्छना लक्षण ] [ १२३ ककुयी था और वह परम धार्मिक हुअा था जो सौ भाइयो का ज्येष्ठ था और कुशस्थली को प्राप्त कर राजा हुआ था ॥२॥ विभु देवो के देव के एक मुहूर्त मार समय तक जोकि मयों के बहुत से युग थे, ब्रह्मा के समीप में गन्धर्व को कन्या के साथ मे सुनकर युवा यादवो से वृत अपनी पुरी में प्रागया जोकि बहुत द्वारो वाली बहुत सुन्दर द्वारवती नाम वाली को गई थी, वसुदेव जिनमें अग्रणी थे ऐसे भोज बृष्टि और अन्धको के द्वारा वह पुरी सुरक्षित थी । उस कथा को शत्रुनो के दमन करने वाले रैवत ने यपातत्त्व मुना था ।२६-२७-२८। सुन्दर प्रत वाली रेवती नाम से युक्त कन्या को वलदेव को देकर तपश्चर्या में सस्थित होता हुमा मेरुगिरि के शिखर पर चल गया ॥२६॥ रेमे रामश्च धर्मात्मा रेवत्या सहित किल । ता कथामृपय थ त्वा पप्रच्छुस्तदनन्तरम् ॥३० कथ बहुयुगे काले व्यतीते सूतनन्दन । न जरा रेवती प्राप्ता पलितन्च कुत प्रभो ॥३१ मेरु गतस्य वा तस्य शाते सन्तति कथम् । स्थिता पृथिव्यामद्यापि श्रोतुमिच्छामि तत्त्वत ॥३२ क्यिन्ता वा सुरगणा गन्धर्वास्त न कीदृशा । यच्छुत्वा रेवत कालान् मुहूत्तमिव मन्यते ॥३३ न जरा क्षुत्पिपासा वा न च मृत्युभय तत । न च रोग प्रभवति ब्रह्मलोकगतस्य हि ।।३४ गान्धर्व प्रति यच्चापि पृष्टस्तु मुनिसत्तमा । ततोऽह सप्रवक्ष्यामि याथातथ्येन सुव्रताः ।।३५ सप्त स्वरास्नयो ग्रामा मूछनास्त्वेकविंशति । तालाश्च कोनपञ्चाशदित्येतत् स्वरमण्डलम् ॥३६ पड जर्षभी च गान्धारो मध्यम पञ्चमस्तथा। धंवतश्चापि विज्ञेयस्तथा चापि निपादवान् ॥३३ धर्मात्मा बलराम ने रेवती के साथ भ्रमण किया । उम कया को मुन पर गके अनन्तर ऋषियो ने पूछा ॥३०॥ ऋषिगए बोले-हे मूत नन्दन !
१२४ ] [ वायु पुराण यथातथ्य हे प्रभो । बहुत युगो बाले काल के व्यतीत हो जाने पर रेवती वृद्धावस्था को प्राप्त नहीं हुई और पलित कैसे प्राप्त नहीं हुआ है । ॥३१॥ जब शर्याति मेरु पर चला गया तो उसकी सन्तति कैसे हुई जोकि अाज तक भी हम भू मण्डल पर स्थित है। यह तत्त्व पूर्वक सब वृत्त सुनना चाहते हैं ॥३२॥ कितने सुरगण थे और किस तरह के गन्धर्व थे जिसको सुनकर रैवत कालों को मुहूर्त की भांति मानता था ॥३३।। श्री सूतजी ने कहा-ब्रह्मलोक मे जाने वाले को न बुढापा होता है और न भूख-प्यास ही लगती है । मृत्यु का भय भी नहीं होता है और न किसी रोग का भय ही रहा करता है ॥३४॥ है मुनिधेटो । गान्धर्व के विषय में जमा भी मुझसे पूछा गया है वह मैं हे मुद्रता से अर्थात् बिल्कुल ठीक ठीक बतलाऊँगा ॥३॥ सात स्वर पड्जादि होते हैं। तीन ग्राम और इक्कीम मूर्च्छनाएं होती हैं। उनचास ताल होते हैं-यह इतना स्वर मण्डल होता है ।।३६।। स्वरो के नाम-पड़न-ऋषभ-गान्धार-- मध्यम-पचम घेवत और निषाद ये सात है ॥३७॥ सौबीरी मध्यमग्रामो हरिणास्या तथैव च । स्यात्कलोपबलोपेता चतुर्थी शुद्धमध्यमा ।।३८ शाङ्गी च पावनी चैव दृष्टाका च यथाक्रमम् । मध्यमग्रामिका ख्याता पड्जग्राम निबोधत ।।३६ उत्तरमन्द्रा रजनी तथा या चोत्तरायता। शुद्धपड जा तथा चैव जानीयात् सप्तमा च ताम् ॥४० गान्धारग्रामिकाश्चान्यान् कीयमानान् निबोधत । आग्निष्टोमिक्माद्यन्तु द्वितीय वाजपेयिकम् ।।४१ तृतीय पौण्डक प्रोक्त चतुर्थ चाश्वमेधिकम् । पञ्चम राजसूय च पष्ठ चक्रसुवर्णकम् ।।४२ सप्तम गोसव नाम महावृष्टिक मष्टमम् । ब्रह्मदानच नवम प्राजापत्यमनन्तरम् ।।४३ नागपक्षाश्रय विद्याद्गोतरश्च तथैव च। हयक्रान्त मृगक्रान्त विष्णुकान्त मनोहरम् ॥४४ गान्धर्व मूच्छना लक्षण ] [ १२५ सूर्यकान्त वरेण्यञ्च मत्तकोकिलवादिनम् । सावित्रम सावित्र सर्वतो मद्रमेव च ॥४५ सुवर्णश्च सुनन्द्रश्च विष्णुवैष्णुवरावुभौ। सागर विजयश्च व सर्वभूतमनोहरम् ।।४६ हस ज्येष्ठ विजानीमस्तुम्बुरुप्रियमेव च । मनोहरमधाच्यञ्च गन्धर्वानुगतश्च यः ॥४७ अलम्बुपेष्टश्च तथा नारदप्रिय एव च । कथितो भीमसेनेन नागरारणा यथा प्रिय ८ करोपनीत विनता श्रीराख्यो भार्गवप्रिय । विंशतिमध्यमग्राम पड जग्रामश्चतुर्दश ।।४६ सौवीरी-मध्यम प्राम-हरिणास्या-कलोपवतोपेता-शुद्धमध्यमा चतुर्थी- पानी-पावनी-दृष्टाका ये यथाक्रम मध्यम स्वर की ग्रामिका हैं और इन्ही नामो से प्रसिद्ध हैं । अव पड्ज ग्राम को समभलो ॥३८॥३६॥ उत्तर मन्द्रा-रजनी- उत्तरायता-शुद्धषड्जा और सप्तमा ये जाननी चाहिये ॥४०॥ प्रब बतलाई जाने पाली अन्य जो गान्धार को ग्रामिका हैं उन्ह समझ लेनी चाहिये । पम्निष्टोमिका प्रथम है और द्वितीय वाजपेयिक है । तीमरी पौण्ड्रक कही गई है। चौथी प्राश्वमेधिक है । पांचवी राजसूय और छटी चक्र सुवर्णक है । सातवी गोसव महावृष्टिक पाटवी होती है । नवम ब्रह्मदान है इनके अनन्नर प्राजात्य है ॥४० ॥४१॥४२॥४३॥ नाग पक्षाश्रय-गोतर-ह्यकान्त-मनोहर-मृगक्रान्त-सूर्यकान्त- घरण्य-भत्तकोकिल वादी-सावित्र-मक्ष सावित्र-मर्वतोभद्र-सुवर्ण-सुमन्द्र-विष्णु बंधांवर-सागर-विजय-मर्वभूत मनोहर-हा को ज्येष्ठ जानते हैं-तुम्बुरुप्रिय- मनोहर--अधाश्य-गन्धर्वानुगत-प्रलम्बु वेष्ट नारद प्रिय--भीममेन के द्वारा नागरों को प्रिय कही गई है-रोपनीत विनता श्री-इम नाम वाली--भार्गव प्रिय- ये वीम मध्यम स्वर के ग्राम हैं । पड्ज के चौदह ग्राम हैं ||५|| ४६॥४७॥४८॥४६॥ तथा पञ्चदशेच्छन्ति गान्धारग्रामसस्थितान् । ससौवीरा तु गान्धारी ब्रह्मण्या घ पगीयते ।।५० ।
[ वायु पुराण
उत्तरादिस्वरस्यैव ब्रह्मा व देवतात्र च ।
हरिदेशसमुत्पन्ना हरिणास्या व्यजायत ।
मूच्छंना हरिरणास्यव अस्या इन्द्रोऽधिदेवतम् ॥५१
करोपनीतवितता मरुद्धि स्वरमण्डले ।
सा कालोपनता तस्मान्मारुतश्चाय दैवतम् ॥५२
मनुदेशसमुत्पन्ना मूर्च्छना शुद्धमध्यमा ।
मध्यमोन स्वर शुद्धो गन्धर्वश्चात्र देवता ।।५३
मृग राह सन्चरते सिद्धाना मार्गदर्शने ।
यस्मातस्माद स्मृता मार्गी मृगेन्द्रोऽस्याश्च देवता ५४
सा चाश्रमममायुक्ता अनेकान् पौरवान् रवान् ।
मूना योजना ह्य पा रजसा रजनी तत ॥५५
ताल उत्तरमन्द्रारा पड जदेवतका विदु ।
तस्मात्तरतालञ्च प्रथम स्वायतं विदु ।
तस्मादुत्तरमन्द्रोभ्य देवतास्य ध्रयो धम् ॥५६
इमी प्रकार मे गान्धार स्वर के ग्राम मस्थित पन्द्रह पाते हैं। मगो.
वोरा-गान्धारी जो ब्रह्मा के द्वारा उपगीन पा करती है । उत्तरादि स्वरा
यहाँ पर ब्रह्मा ही देवना होता है। हरिदेश समुत्पमा-दगिणारया ही मुलांना
और दगा अधिकारी देवता होता है ॥५०॥५१॥ स्वरों के मन म
मनोरे द्वारा परोपनीत विनना होती है। होपनता है में भारती
पहा पर अधिवत होता है ॥५२॥ मनु देश में गमुत्पन्न मूग्दना गुरु मध्यम
है । यहाँ मम्पम म्बर है मोर गुर गन्पर्य देवता है ॥५३॥ गिटारे मार्ग में
दगी म मृगोरे गाय मञ्चरण करती है । इमी वाण में यह मार्गीनही गई
है और इमा मृगेन्द्र देवता होता है ॥५४॥ पौर वह माधम में ममायुक्त होती
है और नेश पौवों रखवाये पर देनी है। यह गाना यात्रना है. रमने
रजनी होती है ४ा माग उत्तर मग होता है और ममोपान
६मापा जातोपामि र माम पम राया मान
पर उपर मारपोर मिथित देशा॥५॥
गान्धर्व मूर्दना लक्षण ] अपानादुत्तरलाच धैवतस्योत्तरायण । स्या दिय मूर्छना ह्य व पितर श्राद्धदेवता ॥५७ शुद्धपड जस्वर कृत्वा यस्मादग्नि महर्पय । उपतिष्ठन्ति तस्मान जानीयाच्छुद्धपड जिकम् ।।५८ य सता मूछना कृत्वा पञ्चमस्वरको भवेत् । यक्षीणा मच्छंना सातु याक्षिका मूर्छना स्मृता ॥५९ नागदृष्टिविया गीता नोपसपंन्ति मूर्छनाम् । भवन्तीव हता ह्य ते ब्रह्मणा नागदेवता । अहोना मूच्छना ह्यपा वरुणश्चात्र देवता ।।६० शकुन्तकाना कृत्वा च उपमा यान्ति किन्नरा । उत्तमा मूर्च्छना तस्मात् पक्षिराजोऽत्र देवता ।।६१ गान्धाररागशब्देन गा च धारयतेऽयत । तस्माद्विशद्धगान्धारी गन्धर्वश्वाधिदैवतम् ॥६२ अपान और उत्तरत्व होने से धैवत का उत्तरायण यह मूर्छना है। इस प्रकार से श्राद्ध देवता पितर होते हैं ॥५७॥ जिम कारण मे महर्पिगण शुद्ध पहज स्वर को करके फिर अग्नि का उपस्थान किया करते हैं। इसलिये उसे शुद्ध पड्जिक जानना चाहिये । जो सत्पुरुषों की मूच्छना को करके पञ्चम स्वर होता है वह यक्षियो की मूच्छना है और वह याक्षिका मूच्छना कही गई है ।५। ॥५६॥ विषागीता नागदृष्टि मूर्च्छना का उपसर्पण नहीं करती है और ये नाग- देवता ब्रह्मा के द्वारा हृत होजाते हैं । यह प्रहियो अर्थात् मागो की मूर्च्छना होती है और वरुग यहाँ देवता है ॥६॥ किन्नर पक्षियों को उपमा करके जाते हैं। इससे उतमा सूचना है और इससे पशिान यहाँ देवता है॥६॥ गान्धार गग वे शब्द से गा को अर्थ से धारण करताहे इमसे वह विशुद्ध गान्धारी होता है और उसका गधर्व अधिदेवता होता है ।।६२।। गान्धारानन्तर गत्वा मृष्टय मूछना यत । तस्मादुत्तरगान्धारी वसवश्वान देवता ॥६३ १२८ ] [ वायु पुराण सेय खलु महाभूता पितामहमुपस्थिता । पड जेय मूर्छना तस्मात् स्मृता ह्यनलदेवता ॥६४ दिव्येय चायता तेन मन्दपष्ठा च मून्छने। निवृत्तगुणनामान पञ्चमञ्चान धंवतम् ॥६५ पूर्णा सप्त स्वरा ह्यव मूर्च्छना सप्रकीत्तिता । नानासाधारणाश्च व पडेवानुविदस्तथा ॥६६ जिसमे गा घार के अनन्तर यह मूर्च्छना सृष्ट हुई उस का ण से उत्तर गा घारी हुई और यहाँ वमु अधिष्ठात्री देवता है ।।६३॥ वह यह महाभूता पिता मह को उपस्थित हुई यह पडज मुच्छना है और इससे यह भनल देवता वाली कही गई है ॥६४॥ यह दिव्या और प्रायता है इमसे मद पष्ठा मूच्छंनायें पञ्चम और धैवत की होती हैं जोकि निवृत्त गुण और नाम वाले हैं। इस प्रकार से सात स्वरो वाली पूर्ण मूच्छना कही गई है। यह अनेका औ साधारण चे ही अनुविद होती हैं ॥६६॥ प्रकरण ५०--गीता लंकार निर्देश पूर्वाचार्य्यमत बुद्धा प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वंश । प्रिंशत वै अलङ्कारास्तान मे निगदत शृणु ॥१ अलङ्कारास्तु वक्तव्या स्व स्वर्णं प्रहेतव । सस्थानयोगश्च तथा पादाना चान्ववेक्षया ।।२ वाक्यार्थपदयोगार्थ रलङ्कारस्य पूरणम् । पदानि गीतक्स्याहु पुरस्तात् पृष्टतोऽथवा ॥३ स्थानानि त्रीणि जानीयादुर कण्ठशिरस्तथा। एतेषु निपु स्थानेषु प्रवृत्तो विधिस्त्तम ॥४ चत्वार प्रकृती वर्णा प्रविचारश्चतुर्विध ! विकल्पमष्टया चैव देवा पोडगधा विदु ।।५ गीता लकार निर्देग ] [ १२६ स्थायी वर्ण प्रसचारी तृतीयमवरोहरणम् । आरोहण चतुर्थन्तु वर्ण वर्णविदो विदु ॥६ तौक सचरस्थायी सचरास्तचरीभवन् । अथ रोहणवर्णानामवरोह विनिदिशेत् ।।७ अब पूर्व में हुए प्राचार्यों के मत को जानकर पानुपूर्वी के साथ तीन सौ अलङ्कारो को वनलाया जाता है । उन्हे बतलाने वाले मुझमे आप लोग भली भांति जानकारी कर लेवें और श्रवण करे अपने अपने वणों में प्रकृष्ट हेतु वाले अलङ्कार सस्थान योगो से और पादो की अन्ववेक्षा से कथन कले के योग्य होते है ।।२॥ वाक्य-प्रथ-पद और योगार्यों से अलङ्कार की पूर्णता होती है । पृष्ठ से और मागे गीतक के पद कहे गये हैं ॥३॥ स्थान उर स्थल-एठ और शिर ये तीन जानने चाहिए । इन तीन स्थानो में उत्तम विधि प्रवृत्त होती है 1॥४॥ प्रकृति मे चार वणं और चार प्रकार का प्रविचार होता है । विरुप आठ प्रकार के तथा देव सोलह प्रकार के गाने गये हैं ॥५॥ स्थायो वर्ण प्रमचारी और तीसरा अवरोहण चतुर्थ प्रारोहण वर्ण वणों के वेना लोग जानते है ॥६॥ यहाँ एक मच रास्तचगे होता हुमा सचर स्थायी होता है । इसके मनन्तर रोहण वर्णों का प्रवगेहण विनिर्दिष्ट करना चाहिए १७ प्रारोहणेन चारोहवणं वर्णविदो विदु । एतेषामेव वर्णानामलङ्कारान्निबोधत ॥ अलङ्कारास्तु चत्वार स्थापनी मरेजिनः। प्रमादश्चाप्रमादश्च तेषा वक्ष्यामि लक्षणम् ॥ विस्वरोष्ट्रकलावं व स्थानादेकान्तर गता । प्रावतस्याकमोत्पत्ती द्वे कार्ये परिमाणत ॥१० कुमारमपर विद्याद्विस्तर वमन गतम् । एप वे चाप्यपाङ्गस्तु कुतारेक: कलाधिक ११ श्यनस्त्वेकान्तरे जात कलामात्रान्तरे स्थित । तस्मिश्च व सरे वृद्धिस्तिने तद्विलक्षणा ।।१२ १३०] [ वायु पुगग श्येनस्तु अपरोहस्तु उत्तरः परिवीत्तितः । पलाकलप्रमाणाञ्च स बिन्दु म जायते ॥१३ विन्दुरेककला कार्या यन्तस्यायिनी भवेत् । विपर्ययस्वरोऽपि स्याद्यस्य दुर्घटितोऽपि न ॥१४ वरणों के ज्ञाता लोग मारोहण से भारोह घणं जाना परते हैं । पर इन्हीं वणों के परवारो को समझ लो 11८॥ मलद्वार चार होते हैं-स्था- पनी-मरेजी-प्रमाद पौर अप्रमाद ये चार उनो नाम होते हैं। पर उनके लक्षण बतलाता हू | विम्वरोष्ट्रवला स्थान मे एक के मन्तर मे गये हुए पावर्त की अक्रम मोर उत्पत्ति परिणाम से दो करने चाहिए ॥१०॥पर मो विस्तर वमन को गया हुपा कुमार जानना चाहिए । मोर यही कुतारेर पला- पिर पपाङ्ग है ।१९।। जो श्येन होता है वह स्थित रहा है। पौर उमी स्वर मे उमगे विलक्षण वृद्धि स्थित हुमा मरती है ॥१२॥ श्येन और अपरोह नत्तर पहा गया है और पलाइन प्रमाण मे यह विन्तु नाम घाला होता है ॥१३॥ विन्दु एकमना परनी चाहिए पौर वर्णान्न स्थापिनी होती है। विपर्यय स्वर भी होता है जिसका दुटिन भी नही होता है ।।१४॥ एकान्तगतु वाद्यन्तु पड्जतः परमः स्वरः । आसेपासन्दन वायं पापम्वोचपुष्पलम् ।।१५ गन्तारी तो तु सचान कार्य या कारण तथा । पाक्षितमगेगापि प्रोक्षमयनया च ।।१६ द्वादार कतास्थानान्तरगतन्तन । प्रादोलिनमलद्वारमेय स्थरममन्वितम् ॥१. मम्मामराव सन प्रोत्तन्नु पुपलम् । प्रतिशतमेय मनया पादानीतरयोभंवे॥१८ द्विान वा यथा भून यत्तर हामिनमुन्यो । उजागतिस्पराम्मा सगा पाष्टम्परामाम् ॥१९ पाण्यादागही या मारतो गन्द्रनामी या। एमाला होगे गारमनः॥.
गार निता
मक्षिपच्छेदनो नाम नतुप्पलगरण. स्मृत ।
अनद्वारा भवन्त्येते विशद्य वै प्रकीतिता ।
पर्णम्मानप्रयोगेा कलामाा प्रमाणात ॥२१
एमालरा गय तो पहन गे परम स्यर होता है । माशेपारन्दन पार
को भाति म पुपाल बरला पाहिए ॥१५॥ ये दोनो मन्नार मञ्चार पले
ये योग्य पारण हो अपना कार्य हो । माक्षित वा परोहण परो भी उमी
प्रमार में प्रोसमय होना चाहिए ॥१६॥ एषान्तर में गया हुघा वारहवा कला
मा स्थान होता है। गो पागे इस प्रकार में प्रेगोरित भारद्वार स्वर से
गमन होता है। पर मार हाने गेही वह पिर पुतलवा
गया है। पानी गरमागप्रशित ही होता है 10 पपया दो
परापारा यह हामिल रहा जाता है । उन्नारगे विश्वगम्त तथा
पर मगर बामा होता है ॥१६॥जा मार पिया मन्द मे अवगंद होता
पेमाल रहिमा उमीर मसीहै ॥२०॥ मरिन नाम पाम।
पानमा परा गया है। मलद्वार जोतिगर गयो
परायोगामारे प्रमाण
मम्मानच प्रमापविशारोमक्षागपा।
गामिमियम पदारप्रयोजनम् ।।२
पचारमना नारा गिलोनियहिन ।
पामा पिम्मर
नानाभायोगापा नायर्या पिभागम् ।
१३२ ]
। वायु पुराण
प्रयोविंशत्य शोतिस्तु तेपामेतद्विपर्यय ।
पडजपक्षोऽपि तत्वादी मध्यो होनस्वरो भवेत् ।।२८
अलङ्कार का प्रयोजन चार प्रकार का जानना चाहिए जोगिमस्थान--
प्रमाण-विकार और लक्षण होता है ॥२२॥ जिस प्रकार से अपने शरीर का
अलझार विपर्ययस्त अर्थात् उल्टा-पल्टा हुमा अत्यन्त गहित अर्थात् बुरा हो
जाता है । प्रारम सम्भव होने मे वर्गों को भी अलकृत करने में विपम हो जाता
है ॥२३॥ अनेक प्रकार के पाभरणो के योग स जिस तरह नारी का विभूषण
हुआ करता है उसी प्रकार से वर्ण का भी प्रलष्ट्रवार होता है और यह भी यदि
विपर्यस्त होता है तो अत्यन्त गहित हो जाता है ॥२४॥ जिम तरह चरण म
कुण्डल कभी नही पहिने हुए देखे गये हैं और कभी कराठ में रसना अर्थात्
वरधनी (कोवनी) नही पहिनी जाया करती है । इसी तरह से विपरीत स्थिति
में रहने वाला अलङ्कार अत्यन्त बुरा हुआ करता है ॥२५॥ क्यिा हुअा भी
अलङ्कार जो राग को दिखा देवे यथादिष्ट मार्ग वाले कर्तव्य के लिए जिसका
विधान किया जाता है ।।२६।। लक्षण-पर्यवस्था और वणिकानो द्वारा प्रवर्तन
मामोद्भव और मुखोद्भव ठीक ठीक रूप से बतलाता हूँ ॥२७॥ उनका यह
विपर्यय तेईम और अस्सी होता है । तत्त्व के प्रादि मे पड्ज पक्ष भी मध्य और
हीन स्वर वाला हो जाता है ।।२०।।
पड्जमध्यमयोश्चैव ग्रामयो पर्य्ययस्तथा ।
मानोयोत्तरमन्द्रस्य पडेवाभाविकस्य च ॥
स्वरालप्रत्ययश्चैव सर्वेषा प्रत्यय स्मृत ।
अनुगम्य बहिर्गीत विज्ञात पञ्चदैवतम् ॥३०
गोरूपाणा पुरस्तात्तु मध्यमाशस्तु पर्याय ।
सयोविभागो गीताना तावण्यमागसस्थित ॥३१
अनुपङ्ग मयोद्दिष्ट स्वमारञ्च स्वरान्तम् ।
पर्याय सप्रवर्सेत सप्तस्वरपदक्रमम् ॥३२
गान्धाराशेन गोयन्ते चत्वारि मन्द्रकाणि च ।
गीता लकार निर्देश ] पञ्चमो मध्यमश्च व धैवतेत निपादजै । पडजपभश्च जानीमो मन्द्रकेप्वेव नान्तरे ॥३३ द्वे चापरान्तिके विद्याद्धयशुल्लाष्टकस्य तु। प्राकृते वैणवैश्च व गान्धाराशे प्रयुज्यते ॥३४ पदस्य तु य रूप सप्तरूपन्तु कोशिकम् । गान्धाराशेन कात्स्न्येन पर्ययस्य विधिः स्मृतः। एवञ्चव मोद्दिष्टो मध्यमाशस्य मध्यम. ॥३५ पड्ज पोर मध्यन ग्रामो का पर्यय मानोयोत्तर मन्द्र का भोर मात्रा. विक का होना है ॥२६स्वराल प्रत्यय सबका प्रत्यय बहा गया है। बहिर्गीत का अनुगमन करके पांच देवता जाने गये हैं ॥३०॥ गोरूपो के पहिले मध्यमा पर्यय होता है। उन दोनो का विभाग गीतो के लावण्य मार्ग में सस्थित होता है ॥३१॥ मैंने स्वरान्तर स्वमार मौर अनुपङ्ग को उद्दिष्ट किया है। पर्यम सप्तस्वर पदक्रम को सप्रवत्तित होता है ॥३२॥ चार मन्द्रक गान्धा- राश से गाये जाते हैं । पञ्चम भोर मध्यम ही घंवत निपादन-पड्ज़ पौर ऋपभो से मन्द्रको ही में जानते हैं, मनर मे नहीं ॥३३॥ और दो अपरान्तिक जानने चाहिए । हय सुल्लाष्टक वा प्राकृत मे वरणवों से ही गान्धारारा में प्रयोग किया जाता है ॥३४॥ पद के तीन रूप हैं मोर कौशिक मात रूप वाला होता है। पूर्ण गान्धारा से पर्यय की विधि कही गई है । इमी प्रकार से क्रमोद्दिष्ट पोर मध्यमाश का मध्यम होता है ॥३१॥ यानि गीतानि प्रोक्तानि रूपेण तु विशेषत । ततु राप्तस्वर कार्य सप्तरूपच कोशिवम् ॥३६ मगदगंनमित्याहुर्माने द्वे ममपे तया। द्वितीयभावाचरणा मात्रा नाभिप्रतिष्ठिता ॥३७ उत्तरे च प्रवृस्येव मात्रा तल्नीयते तथा। हन्तारः पिण्डरो यत्र मात्रापा नातिवर्तते ॥३८ पादेनकेन मानायो पादोनामति धोरणा। सस्यायाश्योपहननं तत्र पानमिति स्मृतम् ॥३८ [ वायु पुराण द्वितीय पादभगञ्च ग्रहेणाभिप्रतिष्ठितम् । पूर्वमष्टतृतीये तु द्वितीय चापरीतके ।।४० अद्ध न पादसाम्यस्य पादभागान्त पञ्चके। पादभाग सपाद तु प्रकृत्यामपि सस्थितम् ॥४१ चतुर्थमुत्तरे चैव मद्रवत्या च मद्रके । मद्रके दक्षिणस्यापि यथोक्ता वर्तते कला ॥४२ जो गीत विशेषता से रूप से कहे गये हैं वह तो सप्त स्वर करना चाहिए और कौशिक सप्त रूप करना चाहिये ॥३६॥ सम दो मान मङ्गदर्शन यह कहते हैं। द्वितीयभावाचरण मात्र अभिप्रतिष्ठिता नहीं है ।।३७॥ और उत्तर में प्रकृति से ही इस तरह मात्रा तल्लीन होती है जहाँ पर हन्तार पिण्डक मात्रा में प्रति- वृर्तन नहीं करता है ॥३८॥ एक पाद से मात्रा म पादोना मतिवीरणा है और सध्या का उपहनन होता है वहाँ पर यानम्-यह कहा गया है ॥३६॥ द्वितीय पादभङ्ग है जो ग्रह से मभि प्रतिष्ठित होता है । प्रष्ट तृतीय म तो पूर्व है और अपरीतक म द्वितीय है ॥४०॥ अर्द्ध से पाद साम्य का मोर पञ्चक म पाद भाग मे, पाद भाग सपाद तो प्रकृति में भी सस्थित होता है ।॥४१॥ उत्तर में चतुर्थ और मद्रवती म मद्रव और मद्रक म दक्षिण की भी यथोक्त पला होती है।॥४२॥ पूर्वमेवानुयोगन्तु द्वितीया वुद्धिरिप्यते । पादो चाहरण चास्मत् पार नाम विधीयते ।।४३ एक्त्वमुपयोगस्य द्वयोय द्धि द्विजोत्तम। अनेसमवायस्तु पताकाहरिण स्मृतम् ।।४४ तिमृणा चैव वृत्तीना वृत्तौ वृत्ता च दक्षिणा। प्रष्टौ तु समवायास्ते सौवीरा मूर्च्छना तथा। कुशत्यनुत्तर सत्य सप्त रावस्वर तु य .४५ पूर्व ही अनुयोग ता है द्वितीया बुद्धि इच्छित होती है। पाद पार पाहरण यहाँ पर प्रस्मत् पार वार का पिधान नहीं होता है ।।४।। हे दिनो. सम ! उपयोग का एक्त्व और जो दोबा है सपा प्रने का ममवाय है वह ववस्वत मनुवंश पणन ] [ १३५ पताका हरिण कहा गया है ।।४४॥ और तीन वृत्तियो का और वृत्ति मे दक्षिणा वृत्ता के पाठ समवाय हैं और सौवीरा मूच्छना होती है । कुत्यनुत्तर जो सत्य सात मत्वस्वर होता है ॥४५॥ प्रकरण ५१-वस्वत मनु बरा वर्णन कबुमिनस्तु त लोक रैवतस्य गतस्य ह । हता पुण्यजने सर्वा राक्षस सा कुशस्थली ॥१ त' भ्रातृशत तस्य धाम्मिकस्य महात्मन । निवध्यमाता रक्षोभिदिश सप्राद्रवन् भयात् ॥२ तेपान्तु ते भयाक्रान्ता क्षत्रियारतन तत्र हि । अवधायस्तु सुमहान् महास्तत्र द्विजोत्तमा ॥३ प्रयता इति विरपाता दिक्षु सर्वासु धाम्पिका । धृष्टस्य धाष्टक क्षत्र रगष्ट बभूव ह ॥४ शिसाहस्रन्तु सगरा क्षत्रियाणा महात्मनाम् । नभगस्य च दायादो नाभागो नाम वीयवान् ।। अम्बरीषस्तु नाभागिविरूपस्तस्य चात्मज । पृपदश्वो विरूपस्य तस्य पुत्रो रथीतर ॥ एते क्षणप्रसूता व पुनश्वाङ्गिरस स्मृता । रथोतराणा प्रवरा क्षात्रोपेता द्विजातय ७ श्री मूतजी ने कहा-मामी के उग लोक का रेवत के बले पाने म उसरी पो पुगस्थली थी यह सब पुएपजनो रायमो के द्वारा हत होगई ॥१॥ उमके जो सौ भाई थे जोरि बहा धम के मानने वाला मोर मदान पात्मा वाला था राशप्तो के द्वारा निवध्य मान होते हुए भप से गिामी म भाग गय थे ॥२॥ है हिजो म उत्तम । उनक भय स मात्रा 1 व क्षत्रिय वहाँ-वहाँ होगये पौर वह गुपहार प्रवदाय महान हो गया ।।३।। ममस्त दिलामो म धार्मिक लोग प्रसाश नाम से विरान हुए। भृका रणभूमि म उन वाला पाष्टक १३६ ] [ बायु पुराण क्षत्रिय हुआ था ॥४॥ महान् प्रात्मा वाले क्षत्रियो का सगण तीन हजार था। नभग के दाय का हकदार वडा पराक्रमी नाभाग नाम वाला हुमा ||५|| नाभागि अम्बरीप हुअा प्रौर उसका पुत्र विरूप हा । विरूप का पुत्र पृपदाव और उसका पुत्र रमीतर नाम वाला हुआ या ॥६॥ ये सब क्षत्रियो की सतति माङ्गिरस कही गयी है । रथीतरी में जो प्रवर थे और क्षात्र धर्म से समन्वित थे वे द्विजाति थे ॥७॥ क्षवतस्तु मनो पूर्वमिक्ष्वाकुरभिनि सृत.। तस्य पुत्रशतं त्वासी दिक्ष्वाकोभू रिदक्षिणम् 15 तेपा ज्येष्ठो विकुक्षिश्च नेमिर्दण्डश्च ते त्रयः । शकुनिप्रमुखास्तस्य पुत्रा पचाशतस्तु ते 118 उत्तरापथदेशस्य रक्षितारो महीक्षित. । चत्वारिंशत्तथाष्टौ च दक्षिणस्याञ्च ते दिशि ॥१० विशतिप्रमुखास्ते तु दक्षिणापथरक्षिणः । इक्ष्वाकुस्तु विकुक्षि वै अष्टकायामथादिशेत् ॥११ मासमानय थाद्धय मृगान् हत्वा महावल। श्राद्धमद्य नु कर्तव्यमष्टकाया न सशय ॥१२ स गतस्तु मृगव्या वै वचनात्तस्य धीमत । मृगान् सहस्रशो हत्वा परिश्रान्तश्च वीर्यवान् । भक्षपच्छशकन्तय विकुक्षिमृगयाङ्गतः ॥१३ आगते स विकुक्षौ तु समासे सहसंनिके। वसिष्ठञ्चोदयामास मास प्रोक्षयतामिति ॥१४ मनु के पूर्व क्षुब से इक्ष्वाकु अभिनि मृत हुए । उस इक्ष्वाकु के सौ पुत्र घे जोकि भूरि दक्षिणा वाले थे ।।८। उन एक शत पुत्रो मे जो सबसे बडा पुत्र था उसका नाम विकुक्षि था और नेमिदएड यो वे तीन थे। उसके शकुनि जिनमें प्रधान था ऐसी रीति से पांचौ पुत्र हुए थे । वे सब नृप उत्तरा पथ के रक्षा करने वाले थे। उनमे चालीस और पाठ दक्षिण दिशा मे गये थे॥१०॥ जिसमें विशति सबमे प्रमुख थे ऐसे वे दक्षिणा पथ के रक्षा करने वैवस्वत मनुवश वर्णन ] [१३७ वाले । इक्ष्वाकु ने विकुक्षि को प्रष्टका मे प्रादेश दिया था ॥११॥ राजा बोले-हे महान बल वाले । जगल में जाकर श्राद्ध करने के योग्य सामग्री लाना चाहिए। माज अष्टया मे श्राद्ध करना चाहिए। इसमे कुछ भी सशय नहीं है ॥१२॥ वह बुद्धिमान् इम वाक्य को ग्रहण कर वन मे जा पहुंचा । वह परम वीर्यवान् शिकार करते करते परिश्रान्त होगया था । मृगया करने गये हुए विकुक्षि ने यहां पर कुछ माहार कर लिया था ।।१३।। सैनिका के सहित विधि वे माने पर राजा ने वसिष्ठ जी को प्रेरित किया कि वे समाग्री का प्रोक्षण करे ॥१४॥ तयेति चोदितो राजा विधिवत्समुपस्थितः । स दृष्ट्वोपहत मास क्रुद्धो राजानमब्रवीत् ॥१५ शूद्ररेणोपहत मास पुत्रेण तव पार्थिव । शशभक्षादभोज्य वै तव मास महाद्य ते ॥१६ सशो दुरात्मना पूर्वमरण्ये भक्षितोऽनघ । तेन मासमिद दुष्ट पितृणा नृपसप्तम ।।१७ इक्ष्वाकुस्तु तत बुद्धो विक्षिमिदमब्रवीत् । पितृकमणि निर्दिष्टो मया त्व मृगयाङ्गत । शश भक्षयसेऽरण्ये निघृण पूर्वमद्य नु ॥१८ तस्मात्परित्यजामि त्वा गच्छ त्य स्वेन वर्मणा । एवमिक्ष्वाकुना त्यक्तो वसिष्ठवचनात् सुत ॥१६ इक्ष्वाको सस्थिते तस्मिन्छशी स पृथिवीमिमाम् । प्राप्त परमधर्मात्मा स चायोज्याधिपोऽभवत् ।।२० तदारोत्स राज्य के वसिष्ठपरिनोदित । तत स्तेनेन सा पूर्णा राज्यावस्था महीपते ॥२१ राजा पे द्वारा उम प्रकार प्रेरित पगिष्ठ मुनि विधिपूर्वर उपस्थित सामग्री का देवार दुरित होते हुए राजा से बहा-॥११॥ हे पार्थिव । है महान् पति याने । मापने पुत्र शूद्र ने सामग्री को उपहत कर दिया है । न भाण कर मेने से यह सामग्री मोजन परो के योग्य नहीं है ॥१६॥ हे मना ।
१३८ ] [ वायु पुराण हे नृपो म श्रेष्ठ । इम दुरान्मा ने पहिले ही जगन मे पाहार कर लिया है। इससे यह समस्त सामग्री दूपित होगयी है और पितरों के योग्य नहीं रही है ॥१७॥ तब तो इक्ष्वाकु बहुत ही बुद्ध हुआ और विकुमि से वोला-मैंने तुझे पितृ-कर्म मे निर्दिष्ट किया था और तभी तू शिकार बरने यहाँ से गया था। निरण तूने अाज पहिन ही जगल म पाहार कर लिया है ।।१८। इस कारण से मैं आज तेरा त्याग करता हूं और त्याग तेरे ही अपने कम से किया जा रहा है । इस प्रकार से वह पुत्र वसिष्ठ क वचन से इक्ष्वाकु के द्वारा त्याग दिया गया पा॥१६॥ इम इक्ष्वाकु क सस्थित हाने पर उस दाशी ने इस पृथ्वी को प्राप्त किया पौर परम धर्मात्मा वह अयोध्या का स्वामी हुअा था ॥२०॥ वसिष्ठ के द्वारा परिप्रेरित हुए उसने उस समय राज्य क्यिा था । इसके मनन्तर राजा की वह राज्यावस्था स्तेन से पूर्ण हुई ॥२१॥ कालेन गतवास्तव स च न्यूनतराङ्गतिम् । ज्ञात्वंवमेतदारयान ना विधिभक्षयेत्तु वै ।।२२ मास भक्षयितामुन यस्य मासमिहादम्यहम् । एतन्मासस्य मासत्व प्रवदन्ति मनोपिण ॥२३ शशादस्य तु दायाद क्युत्स्थो नाम वीर्यवान् । इन्द्रस्य वृषभूतस्य ककुत्स्यो जायत पुरा ।।२४ पूर्वमाडीवके युद्धे यकुत्स्थस्तेन स स्मृत । अनेनास्तु ककुत्स्थस्य पृयुरोमा च स स्मृत ॥२५॥ वृपदश्व पृथो पुत्रस्तस्मादन्ध्रस्तु वीर्यवान् । प्रान्ध्रस्तु यवनाश्वस्तु श्रावस्तस्तस्य चात्मज. ॥२६॥ जधावस्तको राजा थावस्ती येन निर्मिता। थावस्तस्य तु दायादो वृहदश्यो महायसा ॥२७॥ वृहदश्वसुतश्चापि युवलाश्व इति श्रुति । यस पु.घुयधाद्राजा पुन्धुमारपमागत ॥२८॥ पान व्यतीत होने ग वहाँ पर यह म्पूनतर गति को प्राप्त हुमा । इस प्रभार से इरा मास्यान को जानवर विना विधि रे भक्षण नहीं पा चाहिये वैवस्वत मनुवश वर्णन ] ॥२२॥ परलोर में मांस आदि क भक्षण करने वालो मे जिमके मास को मैं यहाँ भक्षण करता हूँ। वह इममे मांस को खायगा इस मॉम का मासव मनीपीगण पहा करते हैं ॥२३॥ शशाद का दायाद (पुत्र) वीर्यवान् क्वुत्स्थ हुआ । पहिले वृपभूत इन्द्र का कबुत्स्थ उत्पन्न होता है ॥२४॥ पहिले आडीवक युद्ध मे उसके द्वारा वह ककुत्स्य स्मरण किया गया था-अर्यात् कहा गया था। इसके द्वारा ककुत्स्थ क पृथुरोमा हुआ ॥२५॥ पृषु का पुत्र वृपदश्च और उससे वीर्यवान् अधमा । उसके पाघ्र-यवनरूप और श्रावस्त ये पुत्र हुए ॥२६॥ श्रावस्तक राजा हुआ जिसने श्रावस्ती नाम वाली पुरी का निर्माण किया था। श्रावस्त का दायाद महान् यश वाला वृहदश्व हुमा पा ॥२७॥ वृहदश्व का पुत्र भी कुबलाश्व हुमा यह श्रुति है । जो वह राजा धुन्धु के वध से पुन्यु मारत्व को प्राप्त होगया या ॥२८॥ धुरधुवध महाप्राज्ञ श्रोतुमिच्छामि विस्तरात् । यदर्थ कुरलाश्व स धुन्धुमारत्वमागत ॥२६॥ वृहदश्वस्य पुत्रारणा सहस्राण्येकविंशति । सर्वे विद्यासु निष्णाता वलवन्तो दुरासदा ॥३०॥ बभूवु मिया सर्वे यज्वाना भूरिदक्षिणा । कुबलाश्व महावीर्य शूरमुत्तमधार्मिकम् ।।३१।। वृहदरमोऽभ्यपिञ्चत्त तस्मिन् राष्ट्र नराधिप । पुत्रसवामितश्रीस्तु वन राजा विवेश ह ॥३२॥ वृहदश्व महाराज शूरमुत्तमधाम्मिकम् । प्रयात तमुत्तवस्तु ग्रह्मपि प्रत्यवारयत् ॥३३|| भवतो रक्षण कार्य तत्तावत् कर्तुमर्हति । निरद्विग्नस्तप क्तुं न हि शक्नोमि पार्थिव ॥३४॥ ममाश्रमममोपेपु समेषु मरधन्वसु । समुद्रो वालुवापूर्णस्तत्र तिष्ठति भूपते ॥३५॥ पियो ने वहा-हे महान् परिउन ' हम घुघु र यय को मुना चाहते हैं और पिस्तारपूर्वक श्रवण करने की इच्छा करत हैं जिम लिये वह १४. ] [ वायु पुराण दुबलाइव घुन्धु मारत्व को प्राप्त होगया या ॥२६॥ श्री सूतजी ने कहा- वृहदश्व के एक बीस सहस्र पुत्र थे । वे सब विद्यापो में निष्णात, बडे ही बलवाले और दुरासह थे ॥३०॥ सब बहुर दक्षिय वाले यज्दा परम धार्मिक हुए थे। वृहदश्व राजा ने महान वीर्य बाल-भूरवीर-उत्तम धर्म के मानने वाले उस मुबलाश्व को उस राष्ट्र में राजा अभिषिक्त किया था। जब पुत्र ने समस्त राज्य भी प्राप्त करलोया था तब राजा ने वन में प्रवेश कर लिया था ॥३१-३२॥ उत्तम धार्मिक मोर शूर महाराज वृहदश्व को वन में प्रयाण करने वाले को ब्रह्मपि उत्तव ने उसको रोका था ॥३३॥ उत्तङ्क ने कहा है पार्थिव 1 मापका रक्षा करना कार्य है, पापनो उसे करना चाहिये। मैं उद्वेग रहित होकर तप नहीं कर सकता हूं ॥३४॥ हे भूपते । मेरे पाश्रम के समीप सम मचन्दामो में वातुरा से परि- पूर्ण समुद्र यहां पर स्थित रहता है ॥३५॥ देवतानामवध्यस्तु महाकायो महावल । अन्तभूमि गतस्तत्र वालुकान्तहिता महात् ॥३६॥ स मनोस्तनय क्रू रो थुन्धुमि मुदारुण । शत लोपविनाशाय तपास्याय दारुणम् ॥३७॥ सवत्सरस्य पर्यन्ते स निश्वास प्रमुञ्चति । पदा तदा मही तत्र चलिता स्म सकानना ॥३८ तस्य निश्वासवातेन रज उद्ध यते महत् । मादित्यपथमावृत्य सप्ताह भूमिकम्पनम् ॥३६ सविस्फुलिङ्ग सज्वाल सधूममतिदारुणम् । तेन राजन्न शक्नोमि तस्मिन् स्थातु स्व पाश्रमे १४० त दारय महाबाहो लोकाना हितकाम्यया । तेजस्ते सुमहाविष्णुस्तेजसरप्याययिष्यति ॥४१ लौता स्वस्था भवन्त्वद्य तस्मिन् विनितेऽमुरे। त्व हि तस्य वायाध समर्थ. पृथिवीपते ॥४२ वह महान काया वाला मोर महान बल वाला देवताओ का अवघ्य है मर्थात् देवो ने द्वारा परल के योग्य नहीं है। यह भूमि के अन्तर्गत यहाँ वैवस्वत मनुवश लक्षण J बालुकाप्रो से छिपा हुप्रा रहता है ॥३६॥ वह मनुका पुत्र है, धुन्धु उसका नाम है और वह बडा दारण है । यह शललोको के विनाश करने के लिये दारुण रूप मे स्थित होकर रहता है ॥३७॥ वह सम्बत्सर पर्यन्त मे नि श्वास का मोचन किया करता है । जब वह अपना नि स्वास छोडता है तब यह समस्त भूमि वनो के सहित चलायमान होजाया करती है ।।३८)| उसके नि श्वास की वायु से बहुत रज उटती है और सूर्य के मार्ग को प्रावृत परलेती है तथा समाह तक भूमि का कम्पन हुआ करता है ॥३६) वह कम्पन भी सामान्य नहीं होता है उसमे स्फुलिङ्ग पर्थान् पग्निकरण होते हैं ज्वाला युक्त, धूम से समन्वित और अत्यन्त ही दारुण होता है । हे राजन् । इस कारण से उस अपने प्राथम में में ठहर नहीं सकता हूं ॥४० हे महान् वाहुप्रो वाले । उसका निवारण करो भार हमारे हितको कामना से उसे हटापो । प्रापका लेज महाविष्णु है आप तेजसे भी रोक देगे ॥४१॥ उस असुर के मृत होजाने पर प्राज लोक स्वस्थ होवें । हे पृथिवो के पति । प्रापही उसके वध करने में समर्थ होते हैं ॥४२॥ विष्णुना च वरो दत्तो मम पूर्व ततोऽनघ । न हि धुन्धुर्महावीय्यंस्तेजसाल्पेन शमयते ।।४३ निद्द ग्धु पृथिवीपाल अपि वर्षशत रिह। वोग्यं हि सुमहत्तस्य देवैरपि दुरासहम् ॥४४ एवमुक्तस्तु राजर्पिरुत्तङ्कन महात्मना । कुबलाश्व सुत प्रादात्तस्मिन् धुन्धुनिवारणे ।।४५ राजा सन्यस्तशस्त्रोहमयन्तु तनयो मम । भविष्यति द्विज श्रेष्ट धु.धुगारोन मशय ॥४६ स त व्यादिश्य तनय धुन्धुमारणमुद्यतम् । जगाम पर्वतायैव तपसे शसितवत १७ कुबलाश्वस्तु धर्मात्मा पितुवचनमास्थित । सहस्र रेकविशत्या पुत्राणा सह पार्थिव । प्रायादुत्तन सहितो धुन्धोस्तस्य निवारणे ।।४८ १४२ । [ वायु-पुराण तमाविशत्ततो विष्णुभंगवान् स्वेन तेजसा । उत्तकस्य नियोगात्तु लोकाना हितकाम्यया ।।४६ हे अनघ । विष्णु ने मुझे पहिले वरदान दिया था महान् वीयं वाला धुन्धु अल्प तेज वाले किसी के भी द्वारा मारा नही जा सकता है ॥४३॥ हे पृथिवी पाल | सौ वर्षों में भी यह निदग्ध नही किया जा सकता है। उसका पराक्रम बहुत ही अधिक है जिससे कि देवगण भी सहन नहीं कर सकते हैं ।।४४।। महात्मा उत्तङ्क के द्वारा इस प्रकार से कहने पर उस राजपि ने उस घुघु के हटाने के कार्य के लिये अपने पुत्र कुवलाश्व को दे दिया था ॥४३॥ मैं शस्त्र त्याग करने वाला होगया यह मेरा पुत्र राजा है । यह धुन्धु के मारने वाला होगा, हे द्विज श्रेष्ठ । इसमे कुछ भी समय नहीं है ॥४६॥ वह धुधु के मारण म उद्यत उस पुत्र को आज्ञा देकर स्वय मशित प्रतवाला होते हुए तए करने के लिये पवत पर चला गया था ॥४७॥ धर्मात्मा कुबलाश्व पिता के वचनो मे पास्थित होकर एक विशति मशस्त्र पुनो के साथ वह राजा उत्तव के साय धुधु के निवारण करने के कार्य मे दिया था ॥४८।। इसके पश्चात् भग- वान् विष्णु ने तेज के द्वारा उत्तङ्क के नियोग से लाको के हित की कामना से उसमे प्रवेश किया था ॥४॥l तस्मिन् प्रयाते दुद्ध' दिवि शब्दो महानभूत् । अद्यप्रभृत्येष नृपो धुन्धुमारो भविष्यति ॥५० दिव्य पुष्पैश्च त देवा सममसत अद्भुतम् । स गत्वा पुरुष व्याघ्नस्तनय सह वीर्यवान् ॥५१ समुद्र खनयामास वालुकार्णवमव्ययम् । नारायणेन रापिस्तेसाप्यायितो हि स ॥५२ बभूवातिवलो भूय उत्तकस्य वशे स्थित । तस्य पुत्रैः सनद्भिश्च वालुकान्तहितस्तदा ॥५३ धुन्धुरासादितस्तत्र दिशमाश्रित्य पश्चिमाम् । मुसजेनाग्निना बुद्धो लोकानुद्वत्तयन्निव ॥५४ -- विमाज ववस्वत मनुवा पक्षण ] [ १४३ वारि शुश्राव योगेन महोदधिरिवोदये। सोमस्य सोमपथ ष्ठ धारोमिलिलो महान् ॥५५ तस्य पुयास्तु नि ग्यास्थिभिरूनास्त राक्षसा । तत स राजातिवलो धुन्धुबन्धुनिबर्हण ५६ तस्य वारिमय वेगमपिवत् स नराधिप । योगी यागेन पह्नि वा शमयामास वारिणा ||५७ निरस्यत्त महावाय बलेनोदवराक्षसम् । उत्तर दशयामास कृतवर्मा नराधिप ।।५५ उम दुधप के प्रयाण करने पर दिव म एा महान गाब्द हुमा से कर यह राजा धुपु मार इस नाम से प्रथित हो पायगा । यह माकागावाणी हुई थी ॥५०॥ देवगण ने दिव्य पुष्पो के द्वारा प्रति अद्भुत उसका समपन दिया था और वह पुरुष व्याध बीय वाला पुत्रो वे साय यहाँ गया था ।।५१11 नारायण के तेज से प्राप्यायित उम रामपि ने वहाँ उग वानुवाणय भव्यय समुद्र का मनन किया था ॥५२।। यह मत्यात बलवान् राजा उत्त के वा मे स्पिन हुमा था। उस समय सनन परने वार उस गजा के पुषी ने यानुकामों मदिरा हुमा वह घुघु प्राप्त कर दिया था जोकि पशिम मि पाश्रम वना वर मुग उत्तम मति में मानो गोत्रो का उदतन करता हुमा पा बहुत ही ब्द हो रहा था ॥५३ ५४॥ सोम के उप म ममुद्र की भांति योग से जल छोडा हे सोम पान पाने वालो म श्र माद धार यो उमिया स परित होगया था॥५॥ उमरे पुत्र निम्य हो गय ५ राशम तीन ग यम ५ इगके पातर धुध के वधुओ का निवरण परने बास पनि बनान् नराधिप न उगरे पसमय येग को पीनियर था। योगी ने योग द्वारा मग्नि का जन से गमन पर पिा था ।।५६ ५७॥ बप से उदक्ष राना मगर नाम वार उमा भिरात पर न्यिा पौर नारिप ने अपना काप समाप्त कर उतद्धको दिपला दिया पा॥१८॥ उत्तपन यर प्रादात्तम्मे राम महात्मन । अदातम्यागय वित्त अभिवामकृष्णसार ५९ १४ ] [ वायु पुराण धम्म रतिञ्च सतत स्वर्गे वास तथाक्षयम् । पुवाणा चाक्षयाल्लोकान् स्वर्ग ये राक्षसा हताः॥६० तस्य पुत्रास्त्रय शिष्टा दृढाश्वो ज्येष्ठ उच्यते । भद्राश्व कपिलाश्वश्च कनीयासौ तु तो स्मृतौ ॥६१ धौन्धुमारि ढाश्वस्तु हश्वस्तस्य चारमज । हर्यश्वस्य निकुम्भोऽभूत् क्षत्रधर्मरत सदा ॥६२ सहताश्वो निकुम्भस्य श्र नो रणविशारद । कृशाश्वश्चाक्षयावश्च सहताश्व सुतावुभौ ॥६३ तस्य पत्नी हैमवती सता मतिदृपद्धती । विख्याता निषु लोकेपु पुषस्तस्या प्रसेनजित् ॥६४ युवनाश्व सुतस्तस्य विपु लोकेष्वतियु ति । अत्यन्तयामिको गौरी तस्य पत्नी पतिव्रता ॥६५ अभिशस्ता तु सा भी नदी सा वाहुदा कृता। तस्यारतु पोरिव बभूव ह॥६६ मान्धाता यौवनाश्वो वै टोलोक्यविजयो नृप । अप्राप्युदाहरन्तीमो श्लोको पौराणिका द्विजा ॥६७ यावत्सूर्य उदयति मावच्च प्रतितिष्ठति । सर्व तद्यौवनाश्वस्य मान्धातु क्षेत्रमुच्यते ॥६८ उत्तनु ने उस महान् आत्मा वाले राजा को वरदान दिया था और उमे अक्षय पन तथा शत्रुमो के द्वारा अर्धापन होने का भी कर दिया था। मुनि ने राजा को धर्म में प्रेम मदा स्वर्ग में निवास जोकि कभी क्षीण न हो, पुत्रो को अभय लोक जोकि स्वर्ग मे राक्षस दक्ष हुए, दिया था ॥६०॥ उसके तीन पुत्र शेष रहे उनमे हवास कहा जाता है । भद्राश्यप और कपिलाश्व दो छोटे कहे गये हैं ।।६१।। दृद्वाश्व धौन्धुमारि या और उमका हर्यश्व हुआ था। हयंश्व का क्षत्रधम मे रति रखने वाला निकुम्भ पुत्र हुआ था ॥६१-६२॥ निकुम्भ का रण विधाता परम पण्डित सहताश्व पुन हुआ था। महताश्व के कृशाश्व और अक्षपाश्व ये दो पुत्र उत्पत हुए थे ॥६३।। सायुरुपो की मति पुत्रश्चनवर्ती एते हङ्गिरम पुरा थानोपेता द्विजातय ॥७३ पुत्सस्य दायादस्वसद्दम्युमहापमा । गम्भूतम्यारमज पुत्री नरध्य प्रतापवान् । गहों पर वादे देतात मनोरको आहा करते हैं। महाद पामा वाता-पाल्पमितावाना पोषनानामापामा तो विनाश तनु गा गोरेशा ऐसे टपरी पायो भायापी वैवस्वत मनुवा वर्णन [ १४५ उपद्धती हैपदती प्राम वाली उपकी पत्नी थी जो कि तीनो लोरी में परम विश्यान थी, उगवा पुत्र प्रमेनजित हुआ या ॥६४|| उसका पुष तीनों लोको गे प्रत्यन्त प्रतिवाला पुवनाब हा या जोकि प्रत्यन्त धार्मिक था उसको पति- यता पत्नी गौरी पी ॥६॥ वह उसके स्वामी के द्वारा अभिशस्त हुई और वह बाहदा नदी कर दी गई यो । उमका पुत्र गौरिक चक्रवर्ती हुआ था॥६६।। मावाना यौवनाश्व शैतोक्य के विनाश करने वाला राजा हुअा था। यहाँ पर भी पौरागिणव द्विग दो श्लोको को कहा करते हैं ।६७। जब तर सूर्य उदित होता है और जब तक वह यहाँ प्रतिदिन रहता है वह समस्त यौवनाश्व माधाता माक्षेत्र कहा जाता है ॥६॥ अमाप्युदाहरन्तीम श्लोक वविदो जना। यौवनाश्व महात्मान पज्वानममितौजसम् । मान्धाता तु तनुर्विष्णोः पुराणज्ञा प्रचक्षते ।।६६ तस्य चयरथी भार्या शशविन्दो मुताभिवत् । साध्वी विन्दुमती नाम रूपेरणाप्रतिमा भुवि 190 पतिव्रता च ज्येष्ठा च भ्रातृरणामयुतस्य सा। तस्यामापादयामास मान्धाता श्रीन सुतान् प्रभु ७१ पुरतुत्तमम्बरीष मुकुन्दश्च विथ तम्। प्रबरीपस्य दाशदो युवनाश्वोपर स्मृत ॥७२ हरितो युवनाश्यस्य हारिता शूरय स्मृता । नमंदाया समुपप्न सम्भूतम्नम्य चारमज ॥४ गवान हतो यन त्रिसोगविजय पुरा १४८ ] [ वायु पुराए सोऽभवद्गालवो नाम गले बद्धो महातपा ! महर्षिः कौशिवस्तातस्तेन वीर्येण मोक्षित ॥६० भगवान् वमिष्ठ ऋपि ने इसको प्राथम नहीं दिया और धीमान् वह सत्यव्रत पिता के द्वारा मुक्त किया गया । वीर श्वपाको के घर के समीप मे रहने लगा और इसका पिता वन में चला गया था ॥५४॥ उसके उस देश मे इन्द्र ने वर्षा नही की और उम समय उम अधर्म से बारह वर्ष पूरे वर्षा नही हुई ।।८।। महान तपस्वी विश्वामित्र ने उसके देश में स्त्रियों को छोड कर सागरानूप मे बडा भारी तप क्यिा था ॥६॥ उसकी पत्नी ने मध्यम और सपुत्र को गले में बांधकर शिखा से मरणार्थ के लिये सौ गो बेचदिया था । नरों में श्रेष्ठ सुव्रत ने उसको गले मे बंधा हुमा और विक्रीत देख कर उस महर्षि पुत्र को धर्मात्मा ने मुक्त करा दिया था ।।८७-८८।। महान् बुद्धि वाले सत्य व्रतने उमका भरण किया था और यह विश्वामित्र के सन्तोप तथा अनुकम्पा के लिये ही किया था ॥८६॥ वह महा तपस्वी गले मे वद्ध गालव नाम वाला हुआ था। महपि कौशिक उसके तात थे क्योकि उसने पराक्रम से मुक्त कराया था ॥६०॥ तस्य व्रतेन भत्तथा च कृपया च प्रतिज्ञया। विश्वामित्रक्लवञ्च बभार विनये स्थित ॥६१ हत्वा मृगान् वराहाश्च महिपाश्च वनेचरान् । विश्वामित्राश्रमाम्याशे तन्मासमपचत्ततः ।।६२ उपाशुव्रतमास्थाय दीक्षा द्वादशवापिकीम् । पितुनियोगादभजन्नृपे तु वनमास्थिते ।।३ अयोध्याञ्च व राज्यञ्च तथैवान्त पुर मुनि । याज्योपाध्यायरायोगाद्वरिष्ठ परिरक्षित ॥१४ सयन प्रस्तु,वाल्यात, भाविनोऽर्थस्य व वलात् । वसिप्ठेऽन्यधिक मन्यु धारयामास मन्युना ६५ पिना रदस्तदा राष्ट्रात् परित्यक्त स्वमात्मजम् । न वारयामास मुनिर्वसिष्ठ कारऐन वै ॥९६ पालको सिम पर में होगी। चैवस्वत मनुषा वर्णन [ १४६ उमफे व्रत से-भक्ति मे-गपा में पार प्रतिमा में दिनय में स्थित होवर विश्वामित्र को स्त्री का भग्मण रिया था ||६१॥ मृगो को वराही को मौर धन विधाण परने वाले महिपो को मार पर विश्वामित्र के मायम के समीप में उन मास को पकाया या ||२|| उपागुनन में प्राधित होवर बारह वर्ष को दीमा यो राजा के वनमें चले जाने पर पिता की मात्रा से मेवन किया था अयोध्या को-गग्य से सपा यन्त पुर को याम्गताध्याय ये योग में मुनि बमिष्ट गपरिरक्षित किया पा IIEI सरयत ने वाल्पाताल मे भावि पथ के बल से पमिट पर अत्यधिक क्रोध धारण पिया था शारिता के द्वारा रोने हुए उग गमर राष्ट्र मे परिरपत पपने पारमन को मुनि यनिष्ट ने कारण वश धारण नहीं विपापा || पाणिग्रहणमन्त्राणा निष्ठा स्यात् सप्तमे पदे। एव सत्यवतस्तान् पै कृतवान् सप्तमे पदे ॥६७ जानन् पर्मान् वगिष्ठन्तु न च गन्यानिहेच्छति । इति सत्ययते रोप वसिष्ठो मनसाकरोत् 118 गुरचुदपा तु भगवान् मिष्टः कृतवास्तदा । न तु सत्यरतो युद्धमा उपासुनतमस्य वे 118 तस्मिनोपरते यो यत्पितुरासोन्महामना । सेन द्वादायरिण गावर्षन् पावशासनः ॥१.० मेन विदानी यया दीक्षा ता दुला भुवि । गुम्य निति म्यस्य नेपय मदिति ११ सतो निमो भगवान् पिया स्परा न्यवारयद। पभिवाम्यह राज्य पक्षादेमिति प्रमः ।।१०२ समुदायणि दीक्षान्तामुसहर यली। मरिचमान मागे गु मिष्टम्प महारमनः ॥१०॥ गगरामदुषी पेतु गं नृपात्मज.. तोपाच माहास प्रमाद सुपान्यत: 1ter १५० ] [ वायु पुराण सत्यव्रत ने सप्तम पद मे उनको किया था ॥१७॥ वसिष्ठ मुनि धर्मों को जानते हुए वहाँ पर मन्त्रो को नहीं चाहते हैं । इसलिये वसिष्ठ ने सत्यवत पर मन से रोप किया था ॥९८|| भगवान् वसिष्ठ ने उस समय वुद्धि से गुरु किया था। सत्यव्रत ने इसकी बुद्धि से उपाशुव्रत नहीं किया था II उसके उपरत होने पर जो जिसके पिता का महामना था उगसे इन्द्रदेव बारह वर्ष तक नहीं बरमे थे ॥१००॥ इमसे इस समय प्राय उस दुर्बल दीक्षा को भूमि पर कुलकी पौर अपनी निष्कृति यह की हुई होनी चाहिए ।।१०१।। इसके पश्चात् भगवान् वमिष्ठ ने पिता के द्वारा त्यक्त को निवारण किया था और प्रभु ने पीछे मे इसको राज्यासन पर अभिषिक्त वरूंगा-कहा-१०२॥ बली उसने द्वादमा वर्ष तक दीक्षान्ता को उद्वहन करते हुए महात्मा वसिष्ठ के मास के अविद्यमान होने पर नृपात्मज ने ममम्त कामनायो के दोहन करने वाली धेनु को देखा था और उसको देखकर क्रोधरो-मोहमे पौर थममे क्षुधा से युक्त हुमा ॥१०४।। दस्युधमं गतो दृष्ट्वा जघान बलिना वरः । स तु माम स्वय चैव विश्वामित्रस्य चात्मजान, १०५ भोजयामास तच्छुत्वा वसिष्ठस्त तदात्यजत् । प्रोवाच चैव भगवान् वसिष्ठस्त नृपात्मजम् ।।१०६ पातये क्रूर हे जर तव शकुमयोमयम् । यदि ते ग्रीणि शनि न स्युर्हि पुरुषाधम ॥१०७ पितुश्वापरितोपेण गुरोर्दोग्ध्रीवधेन च । अप्रोपितोपयोगाच विविधस्ते व्यतिक्रम ||१०८ एव स प्रीणि शनि दृष्ट्वा तस्य महातपा । त्रिशबुरिति होवाच विशकुस्तेन स स्मृत ॥१०६ विश्वामित्रस्तु दाराणामागतो भरणे वृते । ततस्तस्मै वर प्रादात्तदा प्रीतस्थिरावे ॥११० यरियो मे थेट ने देवघर दम्यु ने धर्म को प्राप्त हुए धेनु हुनन पिया भोर उसने स्वय मास को विश्वामित्र के प्रारमजो को खिलाया था। यह श्रवण परसे वमिष्ठ ने उगे उमी समय त्याग दिया था और भगवान् उग नर पे वैवस्वत म वश वणन ] पात्मज मे बोले ॥१०५-१०६॥ हे क्रूर । हे पुरुषो मे प्रधम ! यदि तुझे तीन शकु नही हो तो तुझे शकुमय अय मे पातन करता हू ॥१०७॥ पिता के अपरि- तोप होने मे-गुरु को दोग्नी धेनु के वध करने से और अप्रोपित के उपयोग से तेरा तीन प्रकार का व्यतिक्रम है ॥१०८।। इस प्रकार से उसके तीन शकुओ को देखकर महातपस्वी उमे निशकु इस नाम स बोले और इससे वह त्रिशकु कहा गया है ।।१०।। आये हुए विश्वामित्र ने दारामो के भरण करने पर तव विशकु स प्रसन्न होते हुए उसे वरदान दिया था ॥११०॥ छन्द्यमानो वरेणाथ गुरु नवे नृपात्मज । अनावृष्टिभये तस्मिन् गते द्वादशवापिके ॥१११ अभिषिच्य राज्ये पित्र्ये याजयामास त मुनि । मिपता देवतानाञ्च वसिष्ठस्य च कौशिक । सशरीर तदा त वै दिवमारोपयत् प्रभु ॥११२ मिपतस्तु वसिष्ठस्य तदद्भुतमिवाभवत् । अत्राप्युदाहरन्तीमो श्लोको पौराणिका जना ॥११३ विश्वामित्रप्रमादेन त्रिशकुदिवि राजते। देव साद्ध महातेजानुग्रहात्तस्य धीमत ॥११४ शनर्यात्यबला रम्या हेमन्ते चन्द्रमण्डिता। अलकृता त्रिभिर्भाव स्त्रिशकुग्रहभूपिता ॥११५ तस्य सत्यरता नाम भार्या केकयवशजा। कुमार जनयामास हरिश्चद्रमवल्मषम् ॥११६ बारह वप के अनावृष्टि के भय के चले जाने पर वर मे छन्द्यमान होते हुए नृपात्मज गुरु से वोला ॥१११॥ पिता के राज्य पर अभिषेक करसे कौशिक मुनि ने मिप होने वाले देवतामा के और वसिष्ठ के लिय यजन कराया पा। तव प्रभु विश्वामित्र ने उस त्रिश को शरीर के महित स्वा म मारोपित कराया था ।।११।। मिष होते हुए वसिष्ठ को वह एक अद्भुत काय जैसा हुमा पा। यहां पर भी पौराणिक पुरुष इन दो श्लाको को उदाहृन किया करत हैं ॥११३॥ विश्वामित्र मुनि के प्रमाद से त्रिशकु स्वग म शोभा देना है। पगा १५२ ] [ बायु पुराण धौमान उमके अनुषह से जोकि महान तेज से युक्त है वह त्रिशकु देवो के साथ स्वग मे विरानमान होता है ।।११४॥ त्रिशकु ग्रह से भूपित तीन भावो से अल- कृत चन्द्र से मण्डित रम्य प्रवला हेमन्त में शन शनै जाती है ॥११॥ उसको सत्य में रत रहने वाली अर्थात् सत्यरता इस नाम वाली भार्या जोकि केकय के वश म जन्मी थी उमने कल्पप से रहित हरिश्चन्द्र कुमार को जन्म दिया था ।।११६॥ स तु राजा हरिश्चन्द्रस्ौशङ्कव इति श्रु त । पाहर्ता राजसूयस्य सम्राडिति परिथ त ॥११७ हरिचन्द्रस्य तु सुतो रोहितो नाम वीर्यवान् । हरितो रोहितस्याय चचुहारीत उच्यते ।।११८ विजयश्च सुदेवन चघुपुत्रो बभूवतु । जेता सर्वस्य क्षत्रस्य विजयस्तेन स स्मृत ।।११६ रुरुक्स्तनयस्तन राजा धर्मार्थकोविद । रुरुकाघृततः पुत्रस्तस्मा ब्दाहुश्च जज्ञिवान् ॥१२० हेयस्तालजयश्च निरस्तो व्यसनो नृपः। शकैर्यवनकाम्बोजे पार पह्नवरतथा ॥१२१ नात्ययं धाम्मियोऽभूत् स धम्र्ये सत्ययुगे तथा। रागरस्तु गुता बाहाज सह गरेण वै। भृगोराश्रममामाद्य सुर्वेण परिरक्षित ।।१२२ आग्नेय मस्त्र लब्ध्वा तु भार्गवाद सगरो नृप । जधान पृथिवो ङ्गत्वा तालजधान सहेयान् ।।१२३ वह राजा हरिचन्द्र गडव इम नाम मे प्रमिद हुआ था। वह राजगूप का आहरण करने वाला तथा मम्राट् परिया हुमा या ॥११७।। सम्रार हरि- अटका पुन वीर्यवान् रोहित नाम वाला था। रोहित साहरित पानि पहारीत पहा जाता है ॥११८।। पचुहारीत ने विजय पौर सुदेव दो पुत्र हुए थे। समस्त पात्रियों को वह जीतने वाला था इसलिए यह विजय महा गया है ।११६॥ वहाँ रहर पुत्रहमा जोषि पर्म और मर्च पा पहिडन रागा पार करो - वैवस्वत मनुवश मनुश्य वर्णन ] हुनक पुत्र हुघा और उससे वाहु उत्सत हुग्रा ।।१२०।। वह व्यसनी राजा हैहय- तालजन-पाप-यवन-काम्बोज-गारद और पह्नवो के द्वारा निररत किया गया या ॥१२१।। वह प्रत्यल धार्मिक उस धर्म युक्त सत्य युग मे नही हुमा था। वाह का पुत्र सगर गरके माय उत्तम हुआ था। भृगु के बाथम मे पहुच कर तनं थे द्वारा परिरक्षित हुआ था ।।१२२।। उस सागर नृप ने भार्गव से पानिप प्रस्त्र को प्राप्त कर पृथ्वी पर जाकर उसने तावजवा को हैहयों का हनन किया या ॥१२३॥ शकाना पह्नवानाञ्च धर्मानिरसदच्युत । क्षत्रियाणा तया तेपा पारदानाञ्च धम्म वित् ॥१२४ क्थ स सगरो राजा गरेण सह जज्ञिवान् । विमर्थश्च गकादीना क्षनियारणा महोजसाम् । धर्मान् कुलोचिनान् ऋद्धो राजा निरसदच्युत ॥१२५ वाहोय॑सतिनस्तस्य हृत राज्य पुरा मिल। हैहयस्तालजपथ शव साद्धं समागतं ॥१२६ यवना. पारदाश्चैव काम्बोजा पह्नवास्तथा। हेहपाथ पराबान्ता एते पञ्चारणास्तदा ॥१२७ हत राज्य बलीयोभिरेभिः दात्रियपुगये । हतराज्यस्तदा बाहु सन्यस्य नु तदा नृप । बन प्रविश्य धर्मात्मा सह पल्या तपोचरत् ॥१२८ परयचित्वथ कालस्य तोयार्थ प्रस्थिती मा । वृक्षवाद बलत्वाच अन्तरा म ममार च ।।१२६ पत्नी तु यादवी तम्य सगर्भा पृष्टतोन्यगात् । सपल्या तु गरस्तस्यै दत्तो गर्भजिधासया ॥१३० मन्यत ने पहले दो तया पहलवा यो धामं मे निरस्त कर दिया था। धर्म के शाता न हसी प्रकार उन क्षत्रिय पारदो को भी कर दिया था ॥१२४॥ वियों ने रा-वह मगर राशगर २ माथ गि तरह उदास हमा था। और सिसि कस्सिपिय जो महान मोव वाले थे, अच्युत राजा ने १५४ ] [ वायु पुराण होकर कुलोचितो को धर्मों को निरस्त किया था ॥१२॥ श्री सूतगी ने कहा- पहिले ममय मे व्यसन वाले वस वाहु [जा का सम्पूर्ण राज्य हरण कर लिया था और उसके हरण वाले शब्दो के साथ माये हुए हैहय भोर तानजन थे। ॥१२६।। यवन-वारह-काम्बोज और पह्नव ये पांच गण उसम श्रेष्ठ अधिक चल वालो के द्वारा उसके राज्य का हरण किया गया था । जब उस समय वह राज्य हीन होगया तो यह वाहु राजा सन्यास ग्रहण करके वन में प्रविष्ट होगया और धर्मात्मा उसने अपनी पत्नी के माथ तपश्चर्या की थी॥१२॥ किमी काल के बल के लिये राजा ने प्रस्थान किया था किन्तु वह वृद्ध होने के तथा दुर्वल होने के कारण से बीच में मर गया था ||१२६॥ उसकी पत्नी यादवी गर्भ से युक्त थी वह भी उसके पीछे से गई थी। उसकी सपत्नी ने गर्भ के मारने की इच्छा मे उसे गर दे दिया था ॥१३०॥ सा तु भर्तु श्चिता कृत्वा वह्नौ त समरोहयत् । ओवंस्ता भार्गवो दृष्ट्वा कारुण्याद्विन्यवत्तं यत् ॥१३१ तस्याश्रमे तु तङ्गर्भ मा गरेण तदा सह । व्यजायत महावाहु सगर नाम धामिकम् ॥१३२ प्रौर्वस्तु जातकर्मादीन् कृत्वा तरय महात्मन । अध्याप्य वेदशास्त्राणि ततोऽस्त्र प्रत्यपादयत् ॥१३३ जामदग्न्यात्तदाग्नयमसुरैरपि दुमहम् । स तेनास्त्रवलेनैव वलेन च समन्वित । जधान हैह्यान् क्रुद्धो रुद्र पशुगणानिव ॥१३४ ततः शकान सयवनान् काम्बोजान् पारदास्तथा । पह्नवावे व नि पान क्तुं व्यवसितो नृप ॥१३५ ते वध्यमाना वीरेण सगरेण महात्मना । वसिष्ठ दारण मा प्रपन्ना शरण पिण ३१३६ वमिठस्तान् तथेत्युक्त्वा ममयेन महामुनि । मगर वाग्यामास तेपान्दत्त्वाऽभयन्तदा ॥१३७ इम यादवो ने अपने स्वामी की चिता बनाकर अग्नि में उसके साथ
ववस्वत मनुवा वर्णन ]
[ १५५
समास्ट होगयी थी। और्व भार्गव ने उसे देखकर करुणा से उमे निवारण किया
था ॥१३१।। उसके आश्रम मे उस समय उमने उम गर्भ को गर (विष) के
साथ महान् बाहुमो वाले परम धार्मिक सगर माम वाले को जन्म दिया था
॥१३२॥ पौर्व ने उम महात्मा वे जात वर्मादि मस्कारो को करके फिर वेद
शास्त्रो का पढाया और इसके अनन्नर प्रस्त्रो की विद्या मिसार अस्त्र दिये
॥१३३॥ जामदग्न्य स वह आग्नेय प्रस्त्र प्राप्त किया जाकि असुरो को भी
दु मह था । उसने उस प्रस्त्र के यल से ही तथा वरा से समन्वित होते हुए
प्रत्यन्त कुद्ध होकर जमे रद्र पशुगणो को हनन करते हैं उमी भौति उसने हैहयो
का वध कर दिया ।।१३४६। इसके अनन्तर गरी को-पवनो को-काम्बोजो को-
पारदो को तथा पह्नवी को सबको नि शेप करने का राजा ने स्थिर कर लिया
था ॥१३॥ वीर और महान् आत्मा वाने सार के द्वारा वध्यमान वे सब
शरण की इच्छा वाले होते हुए वसिष्ठ मुनि की दशरणागति में उपस्थित होगये
थे ॥१३६॥ वगिष्ठ मुनि ने उनको 'तुम्हारी रक्षा होगी' तथास्तु यह बहार
महामुनि ने प्रतिज्ञा की भोर उन सवत्रो अभय दाा देवर रागर को वध करने
म वारण वर दिया था ।।१३७॥
सगर स्वाम्प्रतिज्ञाच गुरोर्वाक्य निशम्य च ।
धर्म जघान तेपा वै वेपान्यत्व चवार ह॥१३८
श्रद्धं शकाना शिरसो मुण्डायत्वा व्यसर्जयत् ।
यवनाना गिर सर्व काम्बोजानान्तीव ।।१३६
पादा मुक्तशाश्व पह्नया श्मथ धारिण ।
नि स्वाध्याय पट्यारा वृतास्तेन महात्मना ॥१४०
शवा यवनसाम्बोजा पह्वया पारदै सह ।
लिस्पर्शा माहिपिया दाश्चिला पसास्तथा ।।१४१
स ते क्षत्रियगरणा धर्मस्तेपा निराकृत ।
वसिउवचनात्पूर्व सगरेण महात्मना ॥१४२
स धर्मविजयी राजा पिजिस्यमा यमुन्धराम् ।
प्रश्य विचारयामास वाजिमेधाय दीक्षित ॥१४३
१५६ ] [ वायु पुरा तस्य चारयत सोश्व समुद्र पूर्वदक्षिणे। वेलासमीपेऽपस्तो भूमिञ्च व प्रवैगित ||१४४ संगर ने अपनी प्रतिज्ञा को और गुरू के वाक्य को श्रवण कर उनके धर्म का हनन किया और वेपास्यत्व दिया था ॥१८॥ र जाति वालो का प्राधा शिर मुडदा पर उन्हें छोड़ दिया-यवन जाति वालो का समस्त गिर मुंडवा दिया और काम्बोजो को भी ऐमा ही दिया था ॥१३६॥ पारदो को मुक्त केश और पह्नवो को श्मश्र धारी-स्वाध्याय से हीन तथा वषट्कार से रहित उस महात्मा ने कर दिया था ॥१४०।1 वाक्-यवन-काम्बोज-पह्नव-पारद-वे लिस्पर्श- माहिपिर-दार्व-चोल और सम ये समस्त पात्रियो के जो गए थे इन सवका वसिष्ठ मुनि के वचन से महात्मा सगर ने धर्म निराकृत कर दिया था ॥१४॥ ॥१४२।। उस धर्म से विजय प्राप्त करने वाले राजा सगरने इस समस्त भूमण्डल को जीत कर बाजिगध यज्ञ के करने के लिये दीक्षित होते हुए उसने पज्ञ के भश्व को विचरण कराया था ॥१४३॥ उसका घुमाया जाने वाला वह अश्वमेध यज्ञ का घोडा पूर्व दक्षिण समुद्र पर वेता के समीप में अपहरण किया गया था मोर उसे अपहृत करके भूमि के अन्दर प्रवेशित कर दिया गया था ॥१४४।। स तन्देश सुते. सर्व खनयामास पार्थिवः । आसेदुश्च ततस्तस्मिस्तदन्तस्ते महागवे ।।१४५ तमादिपुरप देव हरि कृष्ण प्रजापतिम् । विष्णु कपिलस्पेण हस नारायण प्रभुम् ।।१४६ तस्य चक्षु समासाद्य तेजस्तत् प्रतिपद्यते। दग्धा पुत्रास्तदा सर्वे चत्वारस्त्ववशेषिता ।।१४७ बहिकेतुः मकेतुश्च तथा धर्मरतस्य । शूर पञ्चवनश्च व तस्य वशकरा प्रभो ॥१४८ प्रादाच्च तस्य भगवान् हरिनारायणो वरान् । अक्षयत्व स्ववशस्य वाजिमेधशत तथा । विभु पुन समुद्रञ्च स्वर्गे वस तथाक्षयम् ।।१४६ वैचातय मनुक्स वर्णन ] स समुद्रो श्वमादायय वन्दे (२) सरितापति । सागरस्य च लेभे स कर्मणा तेन तस्य वं ॥१५० त गाश्वमेधिक सोऽदव समुद्रात पाप्प पायिय । भाजहाराश्वमेघाना रात नंद गुन पून १५१ ग साट् सगर ने उमो स्थान को पृषो के द्वारा जो कि सम्या में साट हजार थे पुवाया था। इसके मनन्तर उग रथान में उसके नीचे महार्णव में उन्होंने देगा वि वहाँ आदि पुरुष हरि-वृष्ण-प्रजापति-विष्णु-हम-प्रभु नारा- पण कपिल मुनि के स्वरूप में स्थित हैं ॥१४५-१४६।। उनके नेत्र पे सामने प्राप्त होते ही उगमा सेज ऐका तीरथा हि उगी समय वे सब संसार दग्ध एव भग्मीभूत होगये येवल पारही प्रवशिष्ट यचे थे 11१४७॥ जो पार वनगये पे पे हो तु-गवे तु-धर्मरत ये तीन थे पोर पूर पश्चयन था जो कि उसके वा थे परने यान थे ।।१४८भगवान् हरि नारायण ने उमको वरदान दिया था सपने यसमा अक्षयय-मो-वाजिमेप-विभु पुत्र और समुद्र तथा स्वर्ग में मसोग नियाम हो ॥१४६॥ यह नदियो का पति समुद्र पश्य पो लेवर माया और यन्दना की। उग वर्म। उसने सागराव की प्राप्ति को पी ॥१५०।। उस रामाने गमुद्र मे उग पारसमणि प्रस की प्राप्ति पर पिर बार-बार गोमव- मप या रिये ॥१५॥ पष्टिपुत्रगहमणि दाधान्यस्यानुसारिणाम् । सेपा नारायण तेज प्रविष्टाना महात्मनाम् । पुनारगान्नु गयाणि पष्टिन्तु इति न श्रुतम् ॥१५२ मगरम्यात्मजा राज्ञ पथ जाता महाग्ला । विसाता पटिमात्या विधिना न वा वद ॥१५३ देपरन्यो सगरम्याम्तो तपमा दग्धविधि। ज्या विदर्भहिता वे गिनी नाम नामत ॥१५४ गलीपगीत या तस्य पाली परमयगियो । मरिष्टनेमिरिता रूपेणाप्रनिगा भवि॥१५५ - १५८ ] । वायु पुराण और्वस्ताम्या वरं प्रादात् नपमारावितः प्रभुः। एका जनिष्यते पुत्र वशकर्तारमीप्सितम् । पष्टिपुत्र सहस्राणि द्वितीया जनयिष्यति ।।१५६ मुनेस्तु वचन श्र त्वा केशिनी पुत्रमेककम् । वशस्य कारण श्रेष्ठा जग्राह नृपससदि ।।१५७ पष्टिपुनसहस्राणि सुपर्णभगिनी तथा । महात्मनस्तु जग्राह सुमति' स्वमतिर्यया ॥१५८ उम अश्वमेघ यज्ञ के प्रश्व के पीछे अनुमरण करने वाले उस राजा के साठ सहस्र पुत्र दाब होगये और उन महात्मायो में नारायण के तेज ने प्रवेश किया था। वे पुत्र साठ हजार थे ऐसा हमने सुना है ॥१५२।। ऋषियो ने कहा-- राजा सगर के महान् वलवाले परम विक्रान्त साठ महत सि विधि से उत्पन्न हुए थे कृपा करके यह हमे बतलाइये ॥१५३।। यी सूतजी ने कहा-राजा सगर की तपस्या से पापो वो दग्ध करने वाली दो पत्नियां थी। उनमें जो ज्येच थी वह विदर्भ की पुत्री नाम से येशिनी थी ॥१५४॥ छोटी जो उस राजा सगर की पत्नी थी वह बहुत ही अधिर धर्म वाली थी और परिष्ट नमि की पुत्री थी जो कि इस भूमि में अत्यन्त अप्रतिम रूप-मौन्दर्य से युक्त थी ॥१५॥ सप से पाराधना किये हुए प्रभु ग्रौवे ने उन दोनो को वरदान दिया था कि उनमें से एक तो वंश के चलाने वाला प्रभीष्ट पुत्र जनेगी और दूसरी माठ हमार पुत्री को जनन देगी ॥१५६॥ ये गिनी ने मुनि के वचन को मुनकर जो कि एक पुत्र वा चलाने वाला बनाया था उसी वरदान को नृप ममद में उसने स्वीकार कर लिया या ॥१५७॥ सुपर्ण की भगिनी ने जैसी अच्छी अपनी मति यी उग अनुगार महात्मा के माट महन पुगे वाले वरदान को ग्रहण किया था ॥१५८|| प्रथ वाले गते ज्येष्ठा ज्येष्ठ पुत्र व्यजायत । असमञ्ज इति यात काकुत्स्थ सगरात्मजम् ॥१५६ मुमतिस्त्वपि जजे वै गर्भन्तुम्ब यशस्विनी। पष्टियुवमहाणि तुम्नमध्याद्विनि मृता ॥१६० वैषम्नु मनुका वर्णन 1 | १५६ घृतपूर्णषु कुम्भेषु तान् गर्भान् न्यदयत्तन । धात्री या प्रादात तावती पोपणे नृप ॥१६१ सली नवमु मासेपु समुत्तम्थुपंथामुपम् । कुमारास्ते महाभागा सगरमी तिबर्द्धना ॥१६२ वालेन मना नंव गौवन प्रनिपेदिरे। पुत्रषष्टिमहस्राणि तेपामश्वानुमारिगाम् ।।१६३ स तु ज्येष्ठो नरव्याघ्र सगरस्यात्मसम्भवः । असमञ्ज इति म्यातो यहिकेतुर्महाबलः ॥१६४ पौराणामहिते युक्त पिका निर्वामित पुरा । तस्य पुनोऽशुमानाम असमञ्जम्ब वीर्यवान् ।।१६५ इस अनन्तर ममय पाने पर जो बड़ी रानी थी उमने ज्येष्ठ पुत्र को उत्पन्न किया और वह सगर का पुत्र यातुल्य असमजम इस नाम से प्रसिद्ध दृया या ॥१५६॥ यास्विनी मुमति ने भी गभ का एक तूमा पंदा किया जिम तुम्ब मे माठ हजार पुत्र निकल पटे थे ।।१६०॥ धृन मे भरे हुए कलगों में उन गों को प दिया गया था। गजान एक एक पाय उन सब के पोपण करने वैलिये ददी थी ॥१६॥ इगव बाद नौमाम वे समाप्त होने पर मगर को प्रीति ये बढान वारे महाभाग मे युन मुख पूर ये भमान वुमार उठ गडे हुए ये ॥१६२१) महान कान व व्यतीत हाजाने पर वे गर यौवनावस्या को प्राप्त हुए घ। उम भरसमय ये अश्व का अनुमाण करने या यही साठ मध्य सगर के पुष थे ॥१६३ जागव में बड़ा मगर का नर ध्यान पुत्र था वह 'मममनम- इग नाम मपात हा पा । वहिोतु महान बलवान् था ॥१६४। वह क्योंकि नगर निवागी जना प्रति पिया घरता था। इमलिय पिता ने उसको निरान दिया अर्थात दानिशाना ददिया था। उम मममन्त्रम का महा परा- ग्रमी प्रभुमार नाप याला पुष हुया या ॥१६॥ तग्य पुषस्तु धर्मामा दिलीप इति विश्रत । दिवोरात गाने या वीगे जा भगीग्य ।।१६६
| वायु पुगण
येन गङ्गा सरिच्छष्ठा विमानरुपशोभिता।
ईजाऽनेन समुद्राढे दुहितृत्वेन कलिता ।
अवाप्युदाहरन्तीम श्लोक पौराणिका जना. ॥१६७
भगीरथस्तु ता गङ्गामानयामास कर्मभिः ।
तस्माद्भागीरथी गङ्गा कथ्यते वशवितमै ॥१६८
भगीरथसुतश्चापि श्रु तो नाम बभूव है ।
नाभागस्तस्य दायादो नित्य धमपरायण ।।१६६
अम्बरीष सुतरतस्य सिन्धुद्वीपस्ततोऽभवत् ।
एव वशपुराणज्ञा गायन्तीति परिथ तम् ॥१७०
नाभागेरम्बरीपस्य भुजाभ्या परिपालिता।
वभूव वसुधात्यर्थ तापत्रयविवजिता ॥१७१
अयुतायु सुतस्तस्य सिन्धुद्वीपस्य वीर्यवान् ।
अयुतायास्तु दायाद तुपर्णो महायशा ॥१७२
उस अशुमान् का का पुत्र राजा दिलीप हुमा जोकि अत्यन्त प्रसिद्ध और
परम धर्मात्मा हुआ था। दिलीप से महान तेज के धारण करने वाला राजा
भगीरथ उत्पन्न हुमा ॥१६६।। जिसने समस्त नदियो मे परमश्रेष्ठ गङ्गा को जो
कि विमानो से उपशोभित इसने समुद्र से दुहिता के स्वरूप म कहिपत की थी।
यहाँ पर भी पौराणिक लोग इस श्लोक को उदाहृत किया करते हैं ॥१६७।।
भगीरथ कर्मों के द्वारा उस गङ्गा को यहां लाया था । इसीलिये उसके वश के
ज्ञातामो के द्वारा गङ्गा भगीरथी इस नाम से कही जाती है ॥१६८॥ भगीरथ
का पुत्र श्रुत नाम वाला हुआ था और उसका दायाद नित्य ही धर्म म परायण
नाभाग-इम नाम वाला हुआ था ॥१६६। उसका पुत्र राजा अम्बरीप हुआ
उसका पुत्र मिन्धुद्वीप हुआ था। इस तरह वश के पुण्य को जानने वाले गान
करते हैं-यह सुना है नाभाग के पुत्र अम्बरीष हुआ जिमकी भुजाओं से यह
वमुधा तीनो तापो मे रहित होती हुई परिपालित हुई थी ॥१७१। उस सिन्धु
द्वीप का पुत्र प्रयुनायु बडा बीर्यवान् हुमा था और अपुतायु का दायाद महान्
यदा वाला ऋतुपण हुआ था ।।१७२।।
१५२ ] [ वायु पुराण जन्म ग्रहण किया या ॥१७६11 ऐडिपड प्रतापवान् श्रीमान् कृतशर्मा था । उम पुत्री का पुन विश्व महान् उत्पन्न हुआ ॥१८०॥ दितीपस्तस्य पुत्रोऽभूत् खट्वाङ्ग इति विश्रुत । येन स्वर्गादिहागम्य मुहूर्त प्राप्त जीवितम् । अयोऽभिसहिता लोका बुद्धया सत्येन चैव हि ॥१८१ दीर्घबाहु सुतस्तस्य रघुम्तस्मादजायत । अज पुत्रो रघोश्चापि तस्माज्ञे स वीर्यवान् । राजा दशरथो नाम इक्ष्वाकुकुलनन्दन ॥१८२ रामो दाशरथिर्वीरो धर्मज्ञो लोरविथ तः । भरतो लक्ष्मणश्च व शनुघ्नश्च महाबल ॥१८३ माधव लवण हत्वा गत्वा मधुवनञ्च तत् । शनुघ्नेन पुरी तस्य मथुरा सन्निवेगिता ॥१८४ सुबाहुः शूरसेनश्च शत्रुघ्नसहितावुभौ । पालयामासतु सूनू वैदेह्यौ मथुरा पुरोम् ।।१८५ अगदश्चन्द्रकेतुश्च लक्ष्मणस्यात्मजावुभौ । हिमवत्पर्वताभ्यागे स्पीती जनपदौ तयो ॥१८६ अगदस्याङ्गदीया तु देशे कारवथे पुरी। चन्द्रकेनोस्तु मल्लस्य चन्द्रवक्ता पुरी सुभा ॥१८७ उमका पुन खट्वान इस नाम से प्रसिद्ध था जिमने म्त्रां से यहाँ भूमण्डल में आकर मुहूर्तभर जीवन पाकर बुद्धि से और सत्य से तीनों लोको को अभिसहित कर दिया था ॥१८१॥ उस खवाङ्ग का पुष दीर्घ वाह हुआ और फिर उस दीर्घवाह रघु ने जन्म ग्रहण किया था। राजा रधु का पुत्र महान् पराम्मी अज हुमा और उस अज से इक्ष्वाकु कुल का नन्दन दशरथ गजा हुना ॥१२॥ दशरथ के पुत्र दाशरपि राम बडे पोर-धमज्ञ पौर लोकविश्रुत हुए और महान बलवान् भरत-क्ष्मण प्रौर शत्रुघ्न हुए ॥१८॥ माधव लवण को मारकर और मधुवन को जाकर शत्रुघ्न ने उसकी पुरी मथुग को भनिवेगिन किया था ॥१८ गत्रुघ्न के माथ मुवाद और भूरमेन वैदह्य दिलीप हुमा जो चंत पतुरा । वर्णन ] दोनो पुत्रों ने मधुरापुरी पा पागा दिया था 1१८५! अक्षर और पाद्रोतु ये दो लक्षमाग के पुत्र हुए थे और उन दोनो के जनपद हिमाचल पर्वत वे ममीप में बिस्तर हुए थे ॥१८६॥ सङ्गर नी रपय देश में पड़ीया नाम वाली पुरी पो मोर कोतु की जोकि माल ये शुभ पवता नाम को पुरी धी।१८७) भरतस्यालजी वीगं नक्ष पुष्पर एव च । गान्धारविषये मिद तयो पुर्या महात्मनो ॥१८८ तक्षस्य दिक्षु विरयाता रम्या तक्षगिता पुरी। पुष्व रस्यापि वीरम्य विग्याता पुष्व गवती ॥१८६ गाथा चैवाय गायन्ति ये पुरागाविदो जना । रामे नियद्धास्सतार्था माहात्म्यातस्य धीमत ।।१९० श्यामो युवा लोहिनाक्षो दोप्तास्यो मिनभाषित । आजानुगह समुप सिंहस्पन्धो महाभुज ॥१९१ दशवसह्माणि रामो राज्यमकारयन् । कमामयजुपा धापा ज्याधोपश्व महास्वन १६२ अविच्छिन्नाऽभवद्राष्ट्र दीयता भुज्यतामिति । जनस्थान वसतु कार्य निदशानाञ्चकार म ॥१६३ तमागरकारिण पूर्व पौलस्त्य मनुजर्षभ । सीनाया पदविच्छन् निजधान महायशा १६४ भरत के पुत्र बहुत वीर तक्ष पौ. पुपार नाम वान दो थे । उन दोनो महान् आत्या वालोरी गान्धार देश म दिग्यिो गी॥१८॥ नभ की मामरस दिशामा म विष्यात नाशिला न म गे गुन मुदर पुरी थी। पीर पुष्कर की भी पुष्करावती नाम वाली पूरी विग्यान हुई थी ॥१८६॥ जो पुराणी के ज्ञान रखने वाले विद्वान है वे यहां इस विषय म गाथा का गान रिया करते है। धीमार गम वे माहात्म्य में राम म ममम्न सत्ताधं निबद्ध थे ॥१६॥ म्याम वर्ण वा-युवावस्था में मस्थित-लोहित नगा मे युक्त दीप्तियुक्त मुग्न चाल-मिन भाषण करने वाले-नातु पर्य न लम्बी भुनाना दाले-मुन्दर मुग वी प्रानि मे म वन-सिंह के समान यो वाो-महान् भुजायो वाल श्रीराम [ वायु पुगम थे ॥१६१।। उन श्रीराम ने दश रह वर्ष तक राज्य किया । श्रीराम के राज्य मे ऋक्-साम और यजुर्वेद की ध्वनि मवत्र होती थी और धनुप की प्रत्याक्षाप्रो की भी महान ध्वनि होती थी ॥१६२।। श्रीराम के राज्य म उनके शासन के समय मे सवत्र मर्वदा 'दान दो-भोजन करो यह ध्वनि अविच्छिन्न रूप से निरन्तर होती रहती थी। जनो के स्थान म निवास करते हुए उन्होंने देवो का कार्य पिया था ॥१६३।। मनुजा म परमश्रेष्ठ महान यश वाले श्रीराम ने सीता के पद अर्थात् स्थान को खोजते हुए पहिले अपराध करने वाले उस पुलम्त्य के नाती पौलस्त्य रावण का वध किया था ॥१६॥ सत्त्वान् गुणसम्पन्नो दीप्यमान स्वतेजसा । प्रति मूयञ्च वह्निश्च रामो दाशरथिर्वभौ ॥१६५ एवमेव महावाहुरिक्ष्वाकुकलनन्दन । रावण सगरण हत्वा दिवमाचक्मे विभु ॥१९६ श्रीरामस्यात्मजो जज्ञ कुश इत्यभिधीयते । लवश्चान्यो महावीर्यस्तयोर्देशौ निवोचत ।।१९७ कुशस्य कोशला राज्य पुरी वापि कगस्थली। रम्या निवेशिता तेन विन्ध्यपर्वतसानुपु ॥१९८ उत्तराकोशले राज्य लवस्य च महात्मन । श्रावस्ती लोकविख्याता कशवश निबोधत ॥१६६ बुदास्य पुनो धर्मात्मा ह्यतिथि सुप्रियातिथि । अतिथेरपि विख्यातो निपधो नाम पार्थिव ॥२०० निषधस्य नल पुत्रो नभ पुत्रो नलस्य तु । नभस पुण्डरीवस्तु क्षेमघन्वा तत स्मृत ॥२०१ सत्त्ववार और समस्त गुणगण से सम्पन्न एव दीप्यमान दाशरथि श्रीगम ने सूय को और वह्नि क अपन तेज से दीप्त किया था ॥१६॥ इसी प्रकार से महान् वाहु वाल और इक्ष्वाकु राजा के कुल को आनद देने वाले विभु राम न अपन गणा के साथ रावण को मारकर स्वा म भेज दिया था ॥१९६॥ श्रीराम का पुत्र कुग इम नाम वाले उत्पन्न हुए। और लब अन्य वंयस्वत मनुवा वर्णन ] महाए कोयं वाले पुत्र थे। अब उनके देशों को भी जान लेना चाहिए ॥१७॥ पुरा या राज्य बोशन या और उसकी पुरी का नाम बुगस्थली थी जिसको कि बहूत ही गुन्दर विध्य पर्वन के गिपरी म उमने निथगित किया था ॥१६॥ महात्मा लय वा राज्य उत्तरा कोमल में था मोर उमरी पुरी थावस्ती नाम थाली लौर म परम विट्याव थी। अब कुरु के वरा को श्रवण करो ॥१६ मुरका पर्मा मा सुत्रिय प्रतियि वाना मविवि पुत्र था। अतियि या निपप नाम वाबिर पुत्र था ॥२०॥ निषध वा नल पुत्र हुमा मोर नन का नम नाम वाना पुत्र दुमा था । नभ का पुण्डरी हुमा मोर उसका क्षेमधन्दा हुमा ॥२०॥ क्षेमधन्वगुतो राजा देवानीक प्रतापवान् । मासीदहीनगुर्नाम देवानी कारमज प्रभु ॥२०२ प्रहीनगोस्तु दायाद पारियानो महायगा । दलस्तस्यात्मजश्वापि तस्माज्ञ यलो नृप ।।२०३ मोवो नाम स धर्मात्मा बलपुत्रो यभूव ह । यखनाभः मुतम्नस्प सदगम्तस्य चात्मज ॥२०४ माणस्य गुतो विद्वान् ध्युपिताश्व इति त । ध्युपिताश्व गुतभाति राजा विरासह विल ॥२०५ हिरण्यनाभ योगल्या मिष्टस्तरमुनामवत् । पौरम्य जमिन शिष्यः स्मृत सव' शर्मसु ॥२०६ मातानि सहितानानुपश्च योऽयोतवास्तत । तम्मादधिगतो योगा पागल्ययेन धीमता ॥२०७ पुष्पातस्य गुतो विद्वान् ध यमधिन तरसुतः । गुदर्शनम्नम्य सुनो अग्निवणः सुदानात् ॥२०८ मधदा पुत्र प्रताप यानी गाहमा पौर देवानी बीर नाम दाना पुत्र या २-शा यही मुग दायाद महान पा वाला पारिवार का प्रारमरा पुत्र एम नामर का तपा एमम बम नाम पाना ना उपना या ॥२.|| ना पाए कोह-ग नाम दारा परम धानि १६६ ] [ वायु-पुगण बल का पुत्र हुआ था । उसका पुत्र बज नाभ हुआ और बजू नाभ क पुत्र शङ्खण उत्सत हुया था ।२०४॥ रावण का पुत्र परम विद्वान् ध्यु पिताश्व का पुत्र राजा विश्वमह हुअा ॥२०॥ हिरण्यनाभ कौशल्य वसिष्ठ उसका पुत्र हुग्रा जो ममरत शर्मों में जैमिनि के पौत्र का शिष्य कहा गया है ।२०६। जिसने पांच सौ सहितायो का अध्ययन किया था और उमसे धीमान् याज्ञवल्क्य न योग का ज्ञान प्राप्त किया था ॥२०७।। उसका पुत्र पुष्प था जो विद्वान् था और उसका पुत्र ध्रुव सन्धि नाम वाला था। उसका पुत्र मुदर्शन और सुदर्शन से अग्निवरा उत्पन्न हुमा था ॥२०॥ 'अग्निवर्णस्य शीघ्रस्तु शीघ्रक्स्य मनु स्मृत । मनुस्तु योगमास्थाय कलापग्राममास्थित । एकानविंशप्रयुगे क्षयप्रावत्तकः प्रभु ॥२०६ प्रमुथु तो मनो पुन. सुसन्धिस्तस्य चात्मज । सुमन्धेश्च तथामप सहस्वानाम नामत ।।२१० नासीत्सहस्वतः पुत्रो राजा विश्रु तवानिति । तस्यासीद्विश्रु तवत पुनो राजा वृहदवल ॥२११ एते इक्ष्वाकुदायदा राजान प्रायश स्मृताः। वशे प्रधाना ये तेऽस्मिन् प्राधान्येन तु कीतिता ।।२१२ पठन् सम्यगिमा सृष्टिमादित्यस्य विवम्वन । प्रजावानेति सायुज्य मनोवैवस्वतस्य स ॥२१३ श्राद्धदेवस्य देवस्य प्रजाना पुष्टिदस्य च । विपाप्मा विरजाश्च व ग्रायुष्मान् भवतेऽच्युत ॥२१४ राजा अग्निथग शीघ्र हुया और पीघ्र के मनु उत्पन हमा। तो योग म मास्थित होकर क्लाप ग्राम में मास्थित होगया था। यह उन्नीसवें प्रयुग में क्षात्र प्रावतंक में क्षात्र प्रावतंक प्रभु हुमा है ॥२०६सामनु का पुत्र प्रमुथुत पोर उसका पुत्र सुमन्धि हुमा । मुमधिका प्रमप नाम से सहस्वान् या महस्वान का पुत्र राजा विश्रुतवान् था पौर विश्रुनवान् का पुत्र राजा वृहदन हुमा । ये सब श्वाकु वा दायाद राजा प्राय कह गये हैं । जो वश म प्रधान थे वे यहाँ
सामापत्तिवणन ]
बताय गय हैं ! इन मादित्य को मृतिको भनी भौति पढत हुए प्रजावान् और
वैवस्वत मनु प तथा प्रजाम्रो पुटि दने वार देव याददेव व सायुज्य को प्राप्त
हाता है । विपामा पिरज तथा प्रामुष्मान एव अच्युत हाता है । २१० स २१४१
प्रकरण ५२--सामोत्पत्तिवर्णन
योऽसौ निवेशयामास पुरन्देवपुरापमम् ।।१
जयन्तामतिविरुपात गौतमस्याश्रमाभित ।
यस्वान्ववाय यज्ञ वै जनवादृषिसत्तमात् ॥२
नमि म सुधर्मात्मा सर्वसत्वनमस्कृत ।
प्रासीत् पुत्रो महाप्राज्ञ इक्ष्वासोभू रितजस ॥३
स शापेन वशिष्ठम्य विदेह समपद्यत ।
तस्य पुरा मिदिन म जनित पभिघिभि ॥४
प्ररण्या मध्यमानाया प्रादुभू ता महायशा ।
नाम्ना मिथिरिति स्याता जननाजनकोऽभवत् ।।५
मिथिमि महावीर्यो यनामो मिथिताभवत् ।
राजासो जनवा नाम जननाचाप्युद वसु ॥६
उदावमा सुधपारमा जनिता नन्दिवद्धन ।
नन्दियद नत शूर मुवतुर्नाम धामिय 113
मुपेतारपि धर्मात्मा देवराता महारत ।
दयरातरय धर्मात्मा वृहदुच्छ इति श्रुति ॥
गृतमो यात-निधो माई निमि क बा को ममभला । की
मन देवापुर व गमान पुर का नियेगित रिपा पा ॥१॥ जो गौनम कपाश्रम
सामन जपान-इन नाम म विस्थात था। जिगरे पाप यम म ऋषिया
मप्रष्ट मार म नमिता नाम कामा परपिर तत्र यात इवामु का पुत्र पा
जामती प्रारस धारया समस्त कालिया नारा नमान अर्थात् ममावर
[ वायु-पुराण प्राप्त करने वाला और महान् पण्डित था ।।२।।३।। वह वसिष्ठ के शाप से विदेह हो गये । उसका पुत्र मियि नाम वाला तीन पर्यों से जन्मा था | भरणी के मथन करने पर यह महान् यश वाला प्रादुर्भूत हुप्रा था । नाम से मिपि प्रसिद्ध हुआ और जनन होने स जनक हुए थे ॥५॥ मिथि नाम वाले महान पराक्रम वाले थे जिसमे यह मिथिला हुई थी। यह जनक नाम वाला राजा था मोर जनक से बदावसु हुआ ॥६॥ उदावसु से सुदर धर्नमय पात्मा वाला न िदवद्धन जमा । नदिवर्द्धन से धार्मिक मौर शूरवीर मुक्तु उत्पन्न हुमा 11७) सुरेनु से महान् बलवाला धर्मात्मा देवरात हुआ और देवरात के धर्मात्मा वृदुच्च हुआ-यह धृति है॥८॥ बृहदुच्चस्य तनयो महावीर्य प्रतापवान् । महावीर्यस्य धृतिमान् सुधृतिस्तस्य चारमज ॥६ सुधृतेरपि धर्मात्मा धृष्टकेतु परन्तप । धेष्टकेतु मुतश्चापि ह्यश्वो नाम विभुत ।।१० हर्यश्वस्य मरु पुत्रो मरो पुरे प्रतित्वक । प्रतित्ववस्य धर्मात्मा राजा वीत्तिरथ सत ॥११ पुत्र कीतिरथस्यापि देवमीढ इति श्रुत । देवमीढस्य विबुधो वियुधस्य सुतो धृति ॥१२ महाधृतिसुतो राजा कीर्तिराज प्रतापवान् । कोतिराजात्मजो विद्वान् महारोमेति विथु त ॥१३ महागेम्णस्तु विख्यात स्वग्गरोमा व्यजायत । स्वरोमात्मजश्चापि हस्वरामाभवन्नृप ॥१४ हम्वरोमात्मजो विद्वान् सीरध्वज इति श्रुति । उदिभमा वृपना यन मीता राज्ञा यमम्बिनी। रामम्य महिषी माध्यी मुग्रतातिपतियता ।।१५ क्य सीता समुत्पन्नाप्यमाणा यशस्थिनी। विमपंचायपद्राजा शेष यस्मिा बभूय है ॥१६ वैवस्वत मनु बम कीतन ] [ १६६ वृहदुच्छ का पुत्र प्रताप वाला महावीर्य हुआ और महावीय के धृतिमान हुमा और उसके मुधुति पुत्र हुआ था ॥६॥ सुधृति के धार्मिक और शत्रुनो को तपाने वाला धृष्टकेतु पुत्र हुआ। धृश्वेतु वा पुत्र भी हपश्व-इस नाम से विश्रुत होने वाला उत्पन्न हुमा था॥१०॥ रामा हर्यश्य के मरु पुत्र उत्पन्न हुआ और मह के प्रतित्वक हुमा तथा प्रतित्वक के परम धार्मिक राजा कीतिरथ पुत्र हुआ था ॥११॥ कीतिरय का पुत्र देवमीढ़ हुआ और देवमीढ के विबुभ तथा विवुध के धृति नाप वाला सुत उत्पन्न हुआ था ॥१२॥ महाधुति का पुत्र प्रतापी राजा कोतिराज हुमा । कोतिराज का पात्मज अत्यन्त निद्वान् महारोमा परम प्रसिद्ध हुआ था ।।१३।। महारोमा राजा का पुत्र परम प्रयिद स्वगारोमा उत्पन्न हुआ था। स्वर्णरोमा का पुत्र राजा हस्वरोमा हुआ ॥१४॥ स्वरोमा का प्रारमग विद्वान् सीरध्वज नाम वाला हुआ था-ऐमो श्रुति है । जिस राजा ने भूमिका कर्षण करते हुए अर्थात् जातते हुए परम यशवाली सीता को उद्भिन्न किया था जो जीना श्रीराम की पटरानी हुई थी और प्रत्यल माध्वी अति पातिव्रत धर्म का पालन करने वाली एव सुदर व्रत वाली थी ॥१५॥ शासपायन ने कहा- कृष्यमाण होनी हुई सौता किस प्रकार स समुत्पन्न हुई थी । जो कि परम यश- म्बिनी थी। राजा ने किम लिये भूमिका कपण किया था जिनक करने में वह हुई थी? ॥१६॥ अग्निक्षेत्रे कृष्यमाणे अश्वमेध महारमन । विधिना सुप्रयुक्तन तस्मात्सा तु ममुस्यिता ॥१७ सीरध्वजात जातस्तु भानुमान्नाम मंथिल । भ्राता कुशध्वजस्तस्य स काश्यधिपतिन प ॥१८ तस्य भानुमत पुत्र प्रद्युम्नश्चप्रतापवान् । मुनिस्तस्य सुतश्चापि तम्मादूर्जवह स्मृत ॥१६ ऊर्जवहाद सुतद्वाज शकुनि स्तस्य चात्मज । स्वागत शकुने पुत्र सुवस्तित्सुत स्मृत ॥२० श्रुतो यस्तस्य दायाद सुश्रु तस्तस्य चात्मज । सुश्रुतस्य जय पुत्रो जमस्य विजय गुतः ॥२१ १७. ] [ वायु पुराण विजयस्य ऋत पुन ऋतस्य सुनय स्मृत । सुनयाद्वीतहव्यस्तु वीतहव्यात्मजो धृति ॥२२ धृतेस्तु बहुलाश्वोऽभूद्वहुलाश्वसुत कृति.। इत्येते मथिला प्रोता सोमस्यापि निबोधत ।२३ थी मूतजी ने कहा-महान मात्मा वाल दे अश्वमेघ म पग्नि क्षेत्र के कर्पण करने पर और विधि को भली भांति मुन्दरता के साथ प्रयुक्त करने से उसमे से वह सीता समुत्थित हुई यो ॥१७॥ मोरध्वज मे भानुमान नाम वाला मैथिल उत्पन्न हुआ था। उसका भाई कुशध्वज था और वह काशी का स्वामी नृप था ।।१८। उस भानुमान का पुत्र प्रताप वाला प्रद्यन्न था। उसका पुत्र मुनि हुमा और उसमे कर्जवह हुमा था ॥१६॥ ऊर्जवह से सुनवाज हुमा पार उसका पुत्र शकुनि हुआ था । पाकुनि का स्वागत हुमा और स्वागत का मुव • नाम वाला पुत्र उत्पन्न हुमा पा ॥२०॥ उसका पर्थात् सुवर्चा का आयाद (पुन) भूत हुमा और उसका पुत्र सुश्रुत हुआ था। सुश्रुत मा पुन जप हुमा जय का पुत्र विजय हुआ ॥२१॥ विजय के ऋत नामक पुत्र था भौर भूत के मुनय पुत्र उत्पन्न हुमा था। सुनय से वीत हव्य हुमा मौर बीतव्य रा पुत्र धृति हुमा ॥२२॥ धृति से बहलाव हुमा मौर बहुलाश्व का पुत्र कृति नाम वाना था। उमम महान मारमा दाल बनका का वा मस्थित रहता है। ५ इतन मैथिल बताय गये हैं। पब सोमम वश जान मा ॥२३॥ प्रकरण ५३-सामोत्पत्तिवर्णन पिता सोमस्य में विप्रा जसेमिभगवानृपि । सोऽति तस्यौ सर्वलोभगवानस्वेन तेजसा ।। कर्मणा मनसा वाचा शुभान्येव समानरन् । पाटयुष्यशिलाभूत कहें बाहर्महाध ति ॥२ सुदुधर नाम तपो येन तम महासुरा। पारिग वर्पसह्माणि दिव्यानीति हि नः तम् ।।३
सामोत्पत्ति वर्णन [
तस्योद्ध रेतसस्तत्र स्थितस्यानिमिपस्पृहम् ।
सोमत्वतनुरापेदे महावुद्धि स वै द्विज ॥४
ऊर्द्ध माचक्रमे तस्य सोमत्व भावितात्मन ।
सोम सुनाव नेत्राम्या दश वा द्योतयन् दिश ॥५
त गर्भ विधिनादिष्टा दश देव्यो दधुस्तदा ।
समेत्य धारयामासुर्न च ता समशक्नुवन् ।
स ताम्य सहसवाथ दिगम्यो गर्भ प्रभान्वित ।
यथावभासयल्लोकाञ्छीताशु सर्वभावन ॥७
यदा न धारणे शक्तास्तस्य गर्भस्य ता थिय ।
तत स ताभि शीताशुनिपपात वसुन्धराम ॥८
श्री मूतजी ने कहा-हे विप्रा । सोम के पिता ऋपि पत्रिभगवान ने
जन्म ग्रहण किया था। वह अत्रि भगवान प्रपन तेज मे ममस्त लोगों में प्रति-
स्थित हुए थे ।।१२कम-मन और वचन के द्वारा शुभ का भी ममाचरण करते
हुए महान् धनि वाले ऊर्ववाहु होकर पाष्ट और कुडच शिला के समान होगय ।
॥२॥ हमने यह सुना है कि तीन हजार दिम्य वर्षों तक जिमने पहिले महान्
कठिन तप किया था ॥३॥ वहाँ पर स्थित ऊझरेता उमके अनिमिप स्पृह
सोमत्व तनु को महान् बुद्धि वाले उस दिन ने प्राप्त पिया या भावित
मात्मा वाल उमरे ऊपर गोमत्व चलना था। नेत्रो स दशो दिशाम्रो वा प्रका-
गित करता हुमा मोम श्रवण वरता था 10 उम नभ वो उम समय ब्रह्मा
के द्वारा मादेश प्राप्त गरन वाली दश देविया म एकथित होर धारण रिया
था किन्तु वे उम न महन कर मी ॥६॥ इम व अनन्नर उन दिगानो से वह
गा महमा ही प्रभा म युक्त हो गया जिसस मबया मन्या लगने वाला शीताशु
सारी को प्रवभासित कर रहा था। जब वे स्त्रिया उम गर्भ धारण
मरने में समर्थ न हुई तो फिर यह गौनाशु उनसे पृथ्वी पर गिर गया था।
पतन्त मोममालोक्य ब्रह्मा लोव पितामह ।
रममारोपयामास लोकाना हितकाम्यया ॥
NEL
१७२ ] [ वायु-पुराण स हि देवमयो विप्रा धर्थीि सत्य सङ्गर । युक्तो वाजिसहस्रण सितेनेति हि न श्रुतम् ॥१० तस्मिनिपतिते देवा पुग्ने परमात्मनि । तुष्ट बुब्रह्मण पुत्रा मानसा सम विश्रुता । तत्र वाङ्गिरसस्तस्य भृगोच वात्मजस्तथा । ऋम्भिर्य जुभिर्वहुभिरथर्वाङ्गिरसैरपि ॥१२ तत सस्तूयमानस्य तेज सोमस्य भास्वत । आप्यामाना लोकास्त्रीन् भावयामास सर्वश ॥१३ समेन रथमुख्येन सागरान्ता वसुन्धराम् । नुि राप्तकृत्वो वितुलश्चकाराभिप्रदक्षिणम् ॥१४ तस्य यच्चापि तत्तंज पृथिवीमन्वपद्यत । प्रोपध्यस्ता समुद्भुतास्तेजसा सज्वलन्त्युत ॥१५ ताभिर्धार्यत्यय लोकान् प्रजाश्चापि चतुर्विधा । पोष्टा हि भगवान् सोमो जगतो हि द्विजोत्तमा । समस्त लोको के पिता यह ब्रह्माजी ने सोम को गिरा हुमा देखकर लोको के हित की कामना से रय को मारोपित कर दिया था ॥६॥ हे विप्र- वृन्द | वह देवी से परिपूर्ण, धर्म का अर्थी, सत्य सङ्गार पौर श्वेत वर्ण वाले सहस्र पश्वो से युक्त था-ऐमा हमने सुना है ॥१०॥ उम परमात्मा अवि के पुत्र के निपतित होने पर जो सात ब्रह्म के प्रसिद्ध मानस पुष है उन्होंने स्तुति की थी ॥११॥ वहाँ पर ही प्राङ्गिरस भौर उस भृगु के पुत्र ने उमी प्रकार स ऋग्वेद-यजुर्वेद और बहुत से अङ्गिरसो म स्तवन क्यिा ||१२|| इसके अनन्तर भली-भौति स्तुति दिये गये उस भासमान सोम के तेज ने लोको को माप्यायित परते हुए सब भोर से भावित किया था ||१३|| उसने सम मुख्यरय के द्वारा सागर पर्यन्त वमुन्धरा की इक्कीस बार प्रदक्षिणा की थी ।।१४। उसका बो भी तेज पा वह पृथ्वी में अनुपम हो गया और वे औषधियो के स्वरूप में समु- स्पन्न हुई जो कि अपने तेज स भली भांति ज्वलित हो रही है ।।१५।। हे दिगो
मामोरगति वर्णन ]
[ १७३
समवृन्द । उन मोप धियों में यह मौका को धारण करता है और भगवान मोम
चार्य प्रकार की प्रजामो को तथा जगन् का भी परम पोपत है ||१||
स लक्ष्यतेजास्तपमा मस्तवस्तश्व कम्मभि ।
तपस्तेपे महाभाग पद्मानो ददातीदंश ॥१७
हिरण्यवर्णा या देय्यो धारयन्त्यात्मना जगत् ।
विभुम्तासाम्भवेत्सोम प्रस्थात स्वेन क्म्ममा १८
ततस्तस्मै ददी राज्य ब्रह्मा ब्रह्मविदा वर. ।
चीजौषधि विधारणामपाच द्विजसत्तमा ॥१६
मोऽभिषिक्तो महातेजा महाराज्येन गजराट् ।
लोकाना भावयामाम स्वभावात्तपता वर ॥२०
सप्तविंशतिरिन्दोस्तु दाक्षायण्यो महावता ।
ददौ प्राचेतसो दक्षा नक्षत्राणीति या विदु ॥२१
स तत्प्राप्य महदाज्य सोम सोमवता प्रभु ।
समाजज्ञ राजसूय सहनशतदक्षिणम् ॥२२
हिरण्यगर्भश्चाद्गाता ब्रह्मा ब्रह्मत्वमेपिवान् ।
सदस्यम्तन भगवान् हरि गयरणः प्रभु ।
मनत्कुमारप्रमुग्वेगा ब्रह्मपिभित ॥२३
दक्षिणामददत्सीमस्त्रील्लोकानिति न धुतम् ।
तेम्यो प्रापिमुख्यम्य मदस्येभ्यश्च वै द्विजा ॥२४
वह सस्तवो और उन को व द्वाग तथा बप से तेज प्राप्त करने वाला
होगया और उस महाभाग ने दशती दम पाता तपस्या की यी ॥१७॥ जो
हिरण्य वर्ग वानी देवियाँ थी उन्होने जगन का धारण किया है उनका विभु
मोम हुमा जो अपने वर्ग के द्वारा प्रस्यात है ।।१८|| ब्रह्म वेत्तापो में श्रेष्ठ ब्रह्मा
ने है द्विजा मे थे । बीजोषधियो मे विप्रो का और जलो का राज्य उने देदिया
था |१९|| नपस्या करने वाली में थेष्ट वह अभिषिक्त होता हुआ इस महान्
राज्य से राजाम्रो का राज्य तथा महान तेजस्वी स्वभाव में लोको पानन्दित
किया करता था । २०॥ प्राचन्म दक्ष ने इन्द्र को महान् वन वाली सत्ताईन
{ वायु पुगण दाक्षापणी दे दी जो दि नक्षत्र नाम से जानी गई है ॥२१॥ माम पालो के सामी उस सोमने उस महान राज्य को प्राप्त करवे सर यात दक्षिणा वाला राजमूय यश किया था ॥२२॥, उसमे हिरएय गर्भ उद्गाता हुए प्रौर महा ब्रहात्य को प्राप्त हुए अर्थात् ब्रह्मा बने तथा सनायुमार भादि प्रमुख प्रापियो से प्रत भग- वान् नारायण प्रभु हरि सदस्य हुए थे ॥२३॥ हमने ऐसा मुना है कि सोम ने उन ब्रह्मपि मुख्य सदस्यो के लिये, हे द्विज वृन्द | तीनो लोको को दक्षिणा मे था।॥ २४॥ त सिनी च कुहूश्च व वपुः पुष्टि प्रभा वसु । कीतितिश्च लक्ष्मीश्च नव देव्य सिविरे ।।२५ प्राप्यावभृथम-यन मर्चदेवपिपूजित । यतिराजातिराजेन्द्रो दशधातापयद्दिश ।।२६ तदा तत् प्राप्य दुष्प्रापमंश्वर्यमृपिमस्तुतम् । स विभ्रममतिविप्रा विनये विनयो हत २७ वृहस्पते सबै भार्यान्तारा नाम यशस्विनीम्। जहार सहसा सनिवमत्याङ्गिरःसुतान् ।।२८ स याच्यमानो देवश्च तथा देवपिभिश्च ह । नव व्यसर्जयत्तारा तस्मायाङ्गिरसे तदा ॥२६ उगनास्तस्य जग्राह पाणिमङ्गिरसो द्विजाः। स हि शिष्यो महातेजा पितु पूर्व बृहस्पते ॥३० तेन स्नेहेन भगवान् स्वस्तस्य बृहस्पते । पाणिग्राहोऽभव प्रगृह्याजगवन्धनु ॥३१ तेन ब्रह्मपिमुख्येम्य परमास्त्र महात्मना। उद्दिश्य देवानुत्मृष्ट येनपा नाशित यश ॥३२ उम राजा सोम की सिनी-कुह-वपु-पुष्टि-प्रभा-यमु-कीति-धति और लक्ष्मी इन नौ देवियो ने सेवा की थी ॥२५॥ अवभृत को प्राप्त करसे व्यग्रता से रहित और समस्त देव तथा ऋषियो के द्वारा पूजित अति गजाओं का अनि राजेन्द्र उसने दश प्रकार से दिशापो को तापित किया था ॥२६॥ हे विप्रो !
मामोत्यति वर्णन ! उस समय में शूपियों के द्वारा मनुन उम दुष्पास ऐश्वयं को प्राप्त करके वह विनय में हत एक मौनिहीन विशेष रूप से धान मनिवाला होगया था ॥२७॥ उमने ममन्न घागिर पुत्रीको पदमानिन कर वृहस्पति की भार्या परम यशस्विनी सारा नाम वाली पा सहमा हरण दिया था ॥२८॥ उग समय में देवों के द्वारा तथा ममन देवषियों द्वारा यह याचिन रिया गया पनि दाग वापिस दे देने थी याचा की गई थी किन्नु उमा उम पानिरस वा तारा नहीं छोडो यो ॥२६॥ हे दिन वृन्द । उस समय वग प्राहिम का पक्ष अयवा साय उसना ने हा या या यह महान तेजस्वी वृहस्पति के पिता का पहिला शिघ्या ।।३०।। उग स्लेट में भावान एट्र देव मनगद पनुप ग्रहण करके दग वृहस्पति पे पाणिपाह प्रान् महायता करने वाले हुए थे ॥३१॥ उम महात्मा ने ब्रह्मपि मुग्यों के लिये परम प्रम्प देवा को उद्देश पर घोडा था जिमने इनो या को मरार दिया था। तर तथ बमभवत् प्रत्यक्षताग्वामयम् । देवाना दानवानाच लारक्षयरर महत् ।।३३ नम मिष्टाम्त्रया देवास्तुपिता व ये स्मृता । ब्रह्मारग मरण जामुगदिदेव पितामहम् ॥३४ तो निवार्योगनम स्ट्र ज्याचरम् । ददावागिरमे तारा स्वयमेव पितामहः ।।३५ अन्तर्वानो प सा दृष्ट्या तारानाराधिपाननाम् । गर्भभुगृजगे नस्य विप्र प्राह वृदम्पति ॥३६ मदीयाया तनो योनी गमों पाय पपसन। प्रयो नायगृमसन्न पुमार दायुहलमम् ॥३३ पिराम्नम्यमामाच रवानमिव पावरम् । মাথায় মাখামাখি ॥ मन मापानागमापद मुरा सत्य नि मग पम्प गोमायाप रणने पर 1 १७६ ] [ वायु पुराण ह्रीयमाणा यदा देवान्नाह सा साध्वसायु वा । तदा ता शप्तुमारब्ध कुमारो दस्युहन्तम.॥४० उस समय वहा पर देव और दानवों का लोको के क्षय को करने वाला महान् प्रत्यक्ष तारकामय युद्ध हुप्रा था ॥३३॥ उम समय में तीन शिष्ट देव जो वि सुपिता कहे जाते हैं प्रादि देव ब्रह्माजी पितामह की शरणागति में प्राप्त हुए थे ।।३४।। इसके अनन्तर पितामह ने स्वय ही उशना को और ज्येष्ठ शकर रुद्र को निवारण र प्राङ्गिरस के लिये तारा देदी थी ॥३५॥ उस चन्द्रमुखी तारा को उस समय गर्भवती देखकर विप्र वृहस्पति ने उससे कहा कि तू गर्भ का उत्मर्जन मत करे ॥३६।। मेरे तनु योनि में किसी भी प्रकार से गर्भधारण करना चाहिये । इसके मनन्तर उस दस्यु हन्तम कुमार का अवमन नही किया था ॥३७॥ ईपिका-स्तम्ब को पाकर अग्नि की भांति उत्पन्न होते ही भगवान ने देवो के शरीर पर आक्षेप किया था ॥३८॥ तदनो सशय को प्राप्त होने वाले देवों ने तारा से कहा-तुम सत्य सत्य बतला दो-यह पुत्र किमका है ? बृहस्पति का है या मोम का है ? ॥३६॥ तब लज्जित होती हुई उमने जो ठीक या बेठीक था देवी को बतला दिया। उस समय कुमार दस्युहन्तम ने उसको शाप देने का भारम्भ किया था ॥४०॥ सन्निवार्य तदा ब्रह्मा तारा चन्द्रस्य संशय । यदत्र तथ्यन्तद्रू हि तारे क्स्य सुतस्त्वयम् ।।४१ सा प्रचलिरुवाचेद ब्रह्माण वरद प्रभुम् । सोमस्येति महात्मान कुमारन्दस्युहन्तमम् ॥४२ तत स तमुपाघ्राय सोमो दाता प्रजापति । बुध इत्यारोनाम तस्य पुत्रस्य धीमत १४३ प्रतिपूर्वञ्च गमने समभ्युत्तिष्ठते बुध.। उत्पादयामास तदा पुत्र व राजपुत्रिका ।।४४ तन्य पुत्रो महातेजा बभूवल. पुरूरवा । उर्वश्या जज्ञिरे तस्य पुत्राः पट् सुमहीजस. ॥४५ ।
चन्द्रवश वीनंन ] [ १७७ प्रसह्य धर्तितस्तन विवशो राजयक्ष्मरणा। ततो यक्ष्माभिभूतस्तु सोम प्रक्षोणमण्डल । जगाम शरणायाथ पितर सोऽत्रिमेव तु ॥४६ तस्य तत्पापशमन चकारात्रिर्महायशा । स राजयक्ष्मणा मुक्त श्रिया जज्वाल सर्वश ॥४७ एतत्सोमस्य व जन्म कोतित द्विजसत्तमाः। वगन्तस्य द्विजयोटा. कीर्त्यमान निवोधत ।।४ धन्यमारोग्यमायुष्य पुण्य कल्मषशोधनम् । मोमस्य जन्म थत्वव मर्वपापै प्रमुच्यते ॥४८ उम समय में ब्रह्माजी ने मनिवारण कर जो चन्द्र का समय था उसके विषय मे कहा-हे तारा । यहाँ पर जो भी तथ्य हो वह बतादो कि यह किमया पुत्र है ॥४१॥ वह प्राञ्जलि होकर प्रर्थात् हाथ जोडकर वर देने वाले प्रभु ब्रह्माजी मे यह बोली कि कुमार दम्युहन्तम सोम का ही है ।।१२।। इसके पश्चात् उनने अर्थात् ब्रह्मा ने उसका उपाघ्राण करव सोमदाता प्रजापति है और उनके धीमान पुत्र का नाम बुध यह ग्वखा था ॥४३।। और प्रतिपूर्व घे गमन मे वुधो से समम्युलियत होता है । नव गजिका ने पुत्र को उत्पन्न क्यिा या 1॥४४॥ उमा महान तेज वाला पुरूरवा ऐल पुत्र हुमा । उसके उनी मे महान् पोज वाले छ पुत्रो ने जन्म ग्रहण किया था ।४।। वहाँ बलपूर्वक राजयक्ष्मा के द्वारा विवश होते हुए धर्पित किया गया था। इसके अनन्तर राजयक्ष्मा में अभिभव पाने वाला होकर सोम प्रक्षोण मण्डल वाला होगया । इसके पश्चात् यह पिता अत्रि के हो शरण मे गया था ॥४६॥ महान् यश वाले अत्रि ने उसके उस पाप का शमन किया था और वह राजयक्ष्मा से छुटकाग पाकर मर्व प्रकार शोभा जाज्वल्यमान होगया था ॥४७॥ हे द्विज श्रेष्ठो। यह मैंने मोम का जन्म बतला दिया है । अब उमका वश द्विजा मे श्रेष्ठ पाप समझलो जिमको मेरे द्वारा कहा जा रहा है ॥४८॥ यह सोम के जन्म की कथा का वर्णन परम धन्य-प्रारोग्य मोर प्रायु देने वाला पवित्र है ! यह पापो वा नाशक है । मनुष्य मोम के जन्म की कथा को मुनार ही समस्त पापो म टूट जाता है ।।४।। 1 1
१७८ ]
[ वायु पुराण
प्रकरण ५३-चन्द्रवंश कीर्तन
सोमस्य तु बुध. पुत्रो वुधस्य तु पुरुरवा ।
तेजस्वी दानशीलश्च यज्वा विपुलदक्षिण ॥१
ब्रह्मवादी पराक्रान्तः शत्रुभियुधि दुर्जय ।
आहर्ता चाग्निहोत्रस्य यज्वनाञ्च ददो महीम् ॥२
सत्यवाक् कर्मबुद्धिश्च कान्त सवृतमैथुन ।
अतीव पुत्रो लोकेपु रूपेरगाप्रतिमोऽभवत् ॥३
त ब्रह्मवादिन दान्त धर्मज्ञ सत्यवादिनम् ।
उर्वशी वरयामास हित्वा मान यशस्विनी 11४
तया सहावसद्राजा दशवर्षाणि चाष्ट च ।
सप्त पट् मम चाष्टौ च दश चाष्टौ च वीर्यवान् ॥५
वने चैत्ररथे रम्ये तथा मन्दाकिनीतदे।
अलकाया विशाताया नन्दने च वनोत्तमे १६
गन्धमादनपादेपु मेरशृङ्ग नगोत्तमे ।
उत्तराश्च कुरून् प्राप्य क्लापग्राममेव च ।।७
एतेषु वनमुख्येषु सुरैराचरितेषु च ।
उर्वश्या महितो राजा रेमे परमया मुदा ।।८
श्री मूतजी ने कहा-सोम का पुत्र वुध हुआ और बुध का पुत्र पुरूरवा
हुग्रा जो बहुन ही तेजस्वी-दान देने के स्वभाव वाला-यजन करने वाला तथा
बहुत दक्षिणा देने वाला था ॥१॥ पुरुरवा ब्रह्मवादी था तथा शत्रुमा के द्वाग
पराक्रान्त हुप्रा एव युद्ध में वह दुर्जय था अर्थात् रणभूमि मे कोई भी प्रामानी
मे उसे जीन नहीं सकता था । वह अग्निहोत्र का प्राहरण करने वाला था और
यज्वानो को उमने भूमि का दान दिया था ॥२॥ वह सन्य वचन बोलने वाला,
मवृन मथुन, मुन्दर और कर्मों के सम्पादन मै बुद्धि रखने वाला हुमा था।
लोको में वह पुत्र अत्यन्त हीप में अनुपम हुआ था ||३|| उम दमनशील धम
ज्ञान वाले-मत्यवादी और ब्रह्म की चर्चा करने वाले राजा को उर्वशी ने
या नान वाले । उर्वशी देवी हो गग्य जाती की दी जानिदेवा की ही एक
चन्द्रवा कीर्तन ]
[ १७६
मान का त्याग र वरण किया जोकि उर्वगो बडे ही यश वाली थी।
वीर्ष वाला राजा उगो साथ पठारह वर्ष तमा नालोम-पौंठ और अस्गी
वर्ष तक रहा था ! मन्दाकिनी के तट पर, परम रम्य चत्राय वन में,
विशाल अलकापुरी में और वनो मे सर्वश्रेष्ठ नन्दन वन मे नियाम किया था ।६।
गन्धमादन पर्व की तगई मे, गिरियो म उनम मेरु के शिपरोपर और उत्तर
पुरुमा को प्राप्त कर तथा कलाप ग्राम में जाकर वाम किया या ॥७) इन उक्त
मुख्य वनो में जोति देवो के द्वारा मेदिन थे गजान प्रेयपी उर्वशी के साथ
रहने हुए परमानन्द के माथ रमण रिया था।
गन्धर्वा चोर्वशी देवी राजान मानुष क्थम् ।
देवानुत्सृज्य सम्प्राप्ता तन्नो ब्रूहि बहुश्रुत ॥६
ब्रह्मशापाभिभूता मा मानुप समुपस्थिता ।
ऐल तु त वरारोहा समयेन व्यवस्थिता ॥१०
ग्रारमन शापमोक्षार्थ नियम सा चकार तु ।
अनग्नदर्शनचव अामात् सह मैयुनम् ॥११
द्वौ मेपो दायनाम्यागे म नावव्यवतिष्ठते
वृतमान तथाहारः कालमेव न्तु पायिव ।।१२
यापममया राजन यावत्वालश्च ते हृढम् ।
ताववालन्तु वत्स्यामि एप न समय कृन १३
तस्यास्त समय मर्व म राजा पर्यपालयत् ।
एव मा चावमत् तस्मिन् पुग्वसि भामिनी ॥१४
वण्यथ चतु पष्टिं तद्भवल्या गापमाहिना।
उर्वशी मानुप प्राप्ता गन्धर्श श्चिन्नयान्विता ॥१५
चिन्तयध्व महामागा यथा मा तु वगगना।
प्रागच्छेत्तु पुन वानुवंगी स्वर्गभूपणा ॥१६
ऋषियों ने कहा- हे बहुत । अयाज बहुत प्रतिशता ये गुनने वाले
गायन करने वाली विशेर जाति है. उसने मनुष्य जाति के राजा को ममस्त
१८० ] [ बायु पुराण - - देवनानी को छोडकर किम नम्ह वरण किया था प्रर्यात् वह देवाङ्गना होते हुए मनुष्य को कैसे प्राप्त होगई--यह स्पष्ट बतलाइये ॥६॥ श्री सूतजी ने कहा- वह उवंशी ब्रह्म गाप मे अभिभूत होकर मनुष्यता को प्राप्त हुई थी उम बगरोहा ने (वह जिमके शरीर के अगों का प्रतम मागेहण होता है) कुछ ममय तक नियम पालनपूर्वक व्यवस्थित होकर ऐल के पाम निवास किया था ॥१०॥ उमने अपने शाप की मुक्ति के लिए कुछ नियम (गन। किये थे और वे ये थे- एक नो नानावस्था में दर्शन नहीं करना था और दूमरा विना काम की वामना वे मैथुन करने का था ॥११॥ वह राजा भयनाम्याम मे दो मेप तक व्यवस्थित रहना था और राजा केवल एरवार घृत का ही प्राहार करने वाला रहता था ॥१२॥ उर्वशी ने ये शत्तें तय करनी थी और राजा से कह दिया था कि हे गजन् । प्रापकी ये पर्ने जब तब हडता के माय पालन की जायेंगी उतने ही ममय तक मैं आपके माय निवाम करूंगी-यह हमारा किया हुमा समय पर्यान् नियम तथा धन है ।।१३। उम उर्वनी के द्वारा किए हुए उम नियम को उम राजा ने पूर्ण रूप से पालन किया था और इस प्रकार से बह भामिनी (उर्वगो) उस पुरुरवा के पाम निवास करती थी॥१४॥ इमके अनन्तर शाप मोहित उबंगो को उसकी भक्ति मे चोमठ व व्यतीत होगये थे। उवगी मनुष्य जाति के राजा में पाम चली गई-इस बात में गन्धर्व लोग अत्यन्त चिन्ता से युम होगये थे ॥१५॥ गन्या ने कहा-हे महान भाग वालो ऐमा कोई उपाय मोवो, निबह वराङ्गना उर्वशी जिम नि में फिर देवा ने पाम वापिस भाजावे क्योकि वह तो दम स्वर्गलोक की शोभा करने वाले भूपण समान है ॥१६॥ ततो विश्वावमुर्नाम तबाह वदता वर । नया तु समयस्ता क्रियमाणो मतोऽनघः ॥१७ समयव्युत्तमात् मा राजानत्यज्यते यथा। तबह यमि वः गर्व यथा स्यज्यति मा नृपम् ॥१८ महमा योगमेष्यामि युग्मार पायंगिये । एवमुक्त्या गनन्तम प्रतिष्ठान महायमा १९
चन्द्रवरा कीर्तन ]
[ १८१
स निशायामयागम्य मेपमेक जहार वै।
मातृवद्वर्त्तते सातु मेपयोश्चारहासिनी ॥२०
गन्धर्वागमन ज्ञात्वा शयतम्या यशस्विनी।
राजानमब्रवीत्मा तु पुत्रो मे ह्रियतेति वै ।।२१
एवमुक्तो विनिश्चित्य नग्नस्तिष्ठति व नृपः ।
नग्न द्रक्ष्यति मा देवी समयो वितथो भवेत् ।।२२
ततो भूयस्तु गन्धवा द्वितीय मेपमाददु ।
द्वितीय पत्ते मेपे ऐल देवी तमब्रवीत् ॥२३
पुत्री मम हतौ राजन्ननाथाया इव प्रभो।
एवमुक्तस्तदोत्याय नग्नो राजा प्रधावित ॥२४
इसके अनन्तर उस ममय वहाँ पर बोलने वालो मे श्रेष्ठ विश्वावसु नाम
वाला गन्पर्व घोला कि उसने वहाँ पर अप से रहित समय (नियम या शर्त)
पिया हुआ माना है ॥१७॥ उस किये हुए समय ( नियम ) के घ्युत्क्रम होने से
हो राजा को त्याग देगी भौर जिस तरह उस समय का पुत्रम हो सकता है
वह सब मैं तुमसे बतलाता हूँ कि जिसके कारण बह राजा का त्याग परदे
॥१८॥ मैं तुरन्त ही थाप लोगों के कार्य गरी सिद्धि के लिये योग को प्राप्त
होगा । यह कहकर वह महान् यावाला विश्वावसु उस प्रतिष्ठान पर पहुंच
गया था ।।१६। उसने रात्रि म भाकर उन दो मेषो में से एक का हरण कर
लिया था। वह चारु मर्यान् मुन्दर हास वाली उभी उन दोनों मेपो की माता
मी भनि रहती है ॥२०॥ दायन में स्थित रहती हुई यम्बिनी उस उर्वगी ने
राजा ग कहा मेरा पुत्र का हरण हागया है ॥२१॥ इस तरह कहा गया गजा
नग्न स्थित हो जाता है यह निश्रय वरक कि वह दबी मुझे नग्न वा देखेगी तो
जो समय था (मर्थात् शतं पी) वह प्रसत्य हो जायगा ॥२२।। इसके बाद पुन
गन्धयों ने दूसरा भेप भी ले लिया था । दूसरे मेप के अपहृत होजाने पर वह
देवो उर्वशी ऐल में धोसी ॥२३॥ हे प्रभो । हे राजन् ! प्रनाथा को मोनि मेरे
दोनो पुत्र अपहृत होगये हैं। ऐमा वहा गया राजा उम समय नग्न हो उट
परौरा ॥२४॥
१८२ ] [ वायु पुराण मेपाम्या पदवी राजन् गन्धर्वव्यु त्थितामथ । उत्पादिता तु महती माया तद्भवन महत् ॥२५ प्रकाशितन्तु सहसा ततो नग्नमवेक्ष्य सा। नग्न दृष्ट्वा तिरोऽभूत्सा अप्सरा कामरूपिणी ।२६ तिरोभूतान्तु ता ज्ञात्वा गन्धर्वास्तत्र तावुभौ । मेपो त्यक्त्वा च ते सर्वे तत्रैवान्तहिताभवन् ।॥२७ उत्सृष्टावुरणी दृष्ट्वा राजा गृह्यागत प्रभु । अपश्यस्ता तु वै राजा विललाप मुदु खित ॥२८ चचार पृथिवी चव मार्गमारणस्ततस्ततः । अथापश्यच्च ता राजा कुरुक्षेत्रे महाबल ॥२९ नक्षतीर्थे पुष्करिण्या विगाबेनाम्बुनाप्लुताम् । क्रीडन्तीमप्सरोभिश्च पञ्चभि सह शोभनाम् ॥३० अपश्यत्सा तत सुभ्र राजानमविदूरत । उर्वशी ता सखी प्राह अय स पुरपोत्तम ॥३१ यस्मिन्नमवात्स हि दर्शयामास त नृपम् । तत आविर्वभूवुस्ता पञ्चचूडाप्सरास्तु ता ॥३२ हे राजन् । मेपा के द्वारा बना हुई पदवी को अर्थात् मार्ग में राजा ने दौड लगाई थी और गन्धवों के द्वारा बडी माया उत्पन्न करदी गई थी कि वह महान् भवन सहमा प्रकाश से युक्त होगया और फिर उम उर्वशी ने राजा रो नग्न देख लिया था तथा नग्नावस्था म राजा को देखकर वह कामरूप धारण बरन वाली प्रमग मिरीभूत हागई थी [॥२५-२६॥ वहाँ पर उन गन्धयों ने जब यह जान लिया कि वह उर्वशी छिप गई है यानी तिरोहित होगई है तो ये दोनो मेषो वो वहाँ पर छाड कर वे मब भी वही मन्तर्धान होगये थे ॥२७॥ मेपो को लेकर राजा प्राया तो यहाँ उस मसरा उवशी कोन देखते हुए बहुत दुखित होकर विलाप करन लगा ॥२८॥ इमरे पश्चात् वह राजा उसे इधर-उधर खोजता हुमा पृथिवी पर विचरण कर रहा था और इसके पश्चात् महा बलवान् राजा न उमत्रा कुरक्षेत्र म देवा या ॥२६॥ यह उर्वशी उन त्यागे चन्द्रवश कीर्तन ] [ १८३ प्लक्ष तीर्थ में जो पुष्परिणी है उसमें खूब गहरे जल में प्राप्लुत थी और पांच अप्सरानो के साथ क्रीडा करती हुई परम शोभा से युक्त वहाँ उस को राजा ने देखा था ॥३०॥ उस मुभ्र ने निक्ट से राजा का देखा और इसके पश्चात् अपनी उन सहेलियों स उर्वशी ने कहा कि वह यह श्रेष्ठ पुस्प है ।।३१।। जिसके साथ मैंने निवास किया था-यह कहकर उनको वह राजा दिखला दिया था। इसके अनन्तर वे सब प्रकट होगई थी। पञ्चचूडा अप्सरा थी ॥३२॥ दृष्ट्वा तु राजा ता प्रीत प्रलापान् कुरुते बहून् । प्रायाहि तिष्ठ मतसा पोरे वचसि तिष्ठ हे ।।३३ एवमादीनि सूक्ष्माणि परस्परमभापत । उर्वशी त्वद्रवीच ल सगर्भाह त्वया प्रभो ॥३४ सवत्तरात् कुमारस्ते भविता नव सशय. । निशामेकान्तु वै राजा ह्यवसत्तु तया सह ॥३५ सन्प्रत्दृष्टो जगामाथ स्वपुरन्तु महायशा । गते सवत्सरे राजा उर्वशी पुनरागमत् ॥३६ उपित्वा तु तया सार्द्ध मेकरात्र महामनाः । बामातचा ब्रवीद्दीनो भव नित्य ममेति वै ॥३७ उर्वश्ययाववीच्चल गन्धर्वास्ते वर ददु । त वृणीष्व महाराज 5 हि चंतास्त्वमेव हि ॥३८ दृणे नित्य हि सालोक्य गन्धर्वाणा महात्मनाम् । ततेत्युक्त्वा वर वा गन्धर्वाश्च तथास्त्विनि ॥३६ स्थालीमग्ने पूरयित्वा गन्धर्बाश्च तमब्रुवन् । अनेन इष्ट्वा लोकन्त प्राप्स्यसि त्व नराधिप ।।४० राजा ने उसको देखकर परम प्रसन्नता प्राप्त की भोर वह बहुत से प्रलाप बग्ने लगा जमे-प्रानो, ठहरो, मनसे घोर वचन मे स्थित होजा, इत्यादि भनयंक बचन राजा ने बहे ॥३३1) इस प्रकार से बहुत-मी मूक्ष्म बातें प्रापम मे बोली पौर फिर उर्वशी ने ऐल से कहा-हे प्रभो ! मैं आपसे गर्भ वाली होगई है ॥३४॥ एक वर्ष में तुम्हारा कुमार उत्पन्न होगा-इसमें कोई भी सराय ८२ [ वायु पुराण मेपाभ्या पदवी राजन् गन्धर्वयु स्थितामथ । उत्पादिता तु महती माया तभवन महन् ॥२५ मााशितन्तु सहसा तता नग्नमवेक्ष्य सा। नग्न दृष्ट्वा तिरोऽभूत्सा अपारा यामर पिणी ॥२६ तिरोभूतान्तु ता ज्ञात्वा गन्धर्वाम्वत्र तावुभौ। मेपो त्यक्त्वा च ते सर्वे तवान्तहिठामवन् ॥२७ उत्सृष्टावुरणो दृष्ट्वा राजा गृह्यागत प्रभु । अपश्यस्ता तु ये राजा विललाप सुदु खित ॥२८ चचार पृथिवी चव मार्गमारणस्ततस्ततः। प्रथापश्यच्च ता राजा कुरो महाबल ॥२६ प्लातीय पुष्परिण्या विगाटेनाम्युनाप्लुताम् । क्रीडम्तीममरीभिश्च पञ्चभि सह शोभनाम् ॥३० अपश्यता तत सुभ्र राजानमविदूरत । उर्वशी ता सखी प्राह प्रय स पुरपोतम ॥३१ यस्मिन्नह्मवात्स हि दर्शयामाम त नृपम् । तत आविबभूवुम्ता पञ्चचूडाप्सरास्तु ता ॥३२ है राजन् । मेपा के द्वारा बनी हुई पदवी को अर्थात् मार्ग मे राजा ने । लगाइ थी और गायों के द्वारा बडो माया उत्पन्न करदी गई थी कि वह नि भवन सहसा प्रवास युक्त होगया मौर फिर उस उवमी ने राजा को देिख लिया था तथा नग्नावस्था मे राजा को देखकर वह कामम्प धारण न वाली मप्सरा सिराभूत हागई थी ॥२५-२६॥ वहाँ पर उन गधों ने पह जान लिया कि वह उवशी छिप गई है यानी तिरोहित होगई है तो वे 1ों मेषो को वहां पर छोड कर वे सब भी वही मन्तर्धान होगये थे ॥२७॥ त्यागे मेषो को लेकर राजा माया तो वहाँ उस अप्सरा उवदनी दोन ते हुए बहुत दुखित होकर विलाप करने लगा ॥२८॥ इमके पश्चात् वह हा उसे इधर उधर खोजता हुमा पृथिवी पर विचरण कर रहा था और इसके वान महा बलवान् राजा ने उसका कुरुक्षेत्र में देखा था ॥२६॥ वह उर्वशी चन्द्रव कीर्तन ] प्लस तीर्थ मे जो पुरारिणी है उसमें खूब गहरे जल में प्राप्तुत थी और पांच अप्सरानो के साथ क्रीडा करती हुई परम शोभा से युक्त वहां उस को राजा ने देखा था 1॥३०॥ उप मुझ ने निकट से राजा को देखा और इसके पश्चात् अपनी उन सहेलियो स उर्वशी ने कहा कि वह यह थेठ पुरुप है ॥३१॥ जिसके साथ मैंने निवास किया था-यह कहकर उनको वह राजा दिसला दिया था। इसके अनन्तर वे सब प्रकट होगई पी। पञ्चचूडा अप्सरा थी ॥३२॥ दृष्ट्वा तु राजा ता प्रीत प्रलापान् कुरुते बहून् । आयाहि तिष्ठ मनसा घोरे वचसि तिष्ठ हे ॥३३ एवमादीनि सूक्ष्माणि परस्परमभाषत । उर्वशी त्वववीच्चल सगर्भाह त्वया प्रभो ॥३४ सवत्सराव कुमारस्ते भविता नव सशय.। निशामकान्तु वे राजा ह्यवसत्तु तया सह ॥३५ सन्प्रत्दृष्टो जगामाथ स्वपुरन्तु महायशा । गते सवत्मरे राजा उर्वशी पुनरागमत् ॥३६ उपित्वा तु तया सार्द्ध मेकरात्र महामनाः । कामात श्वा ब्रवोद्दीनो भव नित्य ममेति वै ॥३७ उर्वश्यथाववीच ल गन्धर्वास्ते वर ददु । त वृणीष्व महाराज ब्रू हि चैतास्त्वमेव हि ॥३८ वृरणे नित्य हि सालोक्य गन्धर्वाणा महात्मनाम् । ततेत्युक्त्वा वर वव्र गन्धर्वाश्च तथास्त्विति ॥३६ स्थालीमाने पूरयित्वा गन्धर्वाश्च तमब्रुवन् । अनेन इष्ट्वा लोकन्त प्राप्स्यसि त्व नराधिप ।।४० राजा ने उसको देखकर परम प्रसन्नता प्रास की और वह बहुत से प्रलाप करने लगा जैसे-पाओ, ठहरो, मनसे घोर वचन में स्थित होजा, इत्यादि अनर्थक वचन राजा ने कहे ॥३३।। इस प्रकार से बहुत-सी सूक्ष्म बातें प्रापस में बोली और फिर उसी ने ऐल से कहा-हे प्रभो ! मैं आपसे गर्भ वाली होगई हूँ ॥३४॥ एक वर्ष में तुम्हारा कुमार उत्पन्न होगा-इसमे कोई भी सराय [ वायु पुराण मही है। पर रामा ए गत यहा उग गाथ रहा ॥३५॥ वह राना पाम प्रगत होता हुपा महान् या पाला पाने पुरको वारिम घना गया था। एक पर्ण गमात शेगाने पर रामा ऐन पुन यही उर्वशी पाम थापा पा ॥३॥ महान मन पाता यह गा गाएर राषिता वहाँ उगरे गाय निवाम सरक मोर राम गे भास होता हुमा दीन होर उगी से बोला तुम मेरी नित्य ही रहने बानी होगापो ॥१७॥ मोर इगो पन्नगंत उर्वशी ने ऐन से कहा उन गन्धयों ने वरदान दिया है-उमरा वरण पर-नो हे महाराज तुमही इनमे महो ॥३८॥ महामा गन्धयों से निरप गासोश्य को वरा । 'तथास्तु'-यह मह पर पर्यात ऐगाही होवे गन्धयों ने वर दिया ॥३६॥ पौर स्थाली को मग्नि से भर पर गन्धयों ने उसमे पहा-मरोरे स्वामी ! इसगे यजन करीतू उस सोयो प्राप्त हो जायगा ॥४॥ तमादाय वुमारन्तु नगरायोपचनमे। निःक्षिप्य तमरण्याच स पुत्रन्तु गृह ययौ ॥४१ पुनरादाय रस्याग्निमश्वत्य तत्र दृष्टवान् । समीपतस्तु त दृष्ट्वा ह्यश्वत्य तत्र विस्मित. २ गन्धर्वम्यस्तथास्यातुमग्निना गा गतस्तु स.। श्रुत्वातमर्थमपिलमररिंग तु समादिशत् ॥४३ अश्वत्थादरणि कृत्वा मथित्वाग्नि यथाविधि । तेनेष्ट्वा तु सलोक न. प्राप्स्यसि त्व नराधिप । मथित्वाग्नि त्रिधा कृत्वाह्मयजत्स नराधिप ॥४४ इष्ट्वा यज्ञैर्वहुविधैर्गतस्तेषा सलोक्ताम् । वासाय च स गन्धर्वस्त्रेताया स महारथ । एकोऽग्नि पूर्वमासीद्वं ऐलस्त्री स्तानकल्पयत् ॥४५ एवप्रभावो राजासीदलस्तु द्विजसत्तमा. । देशे पुण्यतमे चैव महपिभिरलकृते ।।४६ राज्य स कारयामास प्रयागे पृथिवी पतिः । उत्तरे यामुने तीरे प्रतिष्टाने महायशा ॥४७ चन्द्रमा को न ] [ १८५ । तस्य पुत्रा बभूवुहि पडिन्द्रोपमतेजस । गन्धर्वलोके विदिता प्रायुीमानमावसुः ॥४८ विश्वायुध मतापुश्च गतायुधौवंगोमुना.। अमावमोस्तु वं जातो भीमो राजाय विश्वजित् ॥४६ उग कुमार को लेकर नगर के लिये च न पिया था वह उम पुत्र को परगी में डालकर गृह पला गया || पिर लाार हस्य पनि पदवत्य (पीपन) को वहा देगा था। ममोप मे उमे परवस्य को देमार वहाँ विस्मित होगया ॥४२॥ गन्धवा में उग प्रकार में वर्षों के लिये अग्नि के द्वारा भूमि में गया हुपा यह उम गमस्त अयं को शरण पर मणि को माना दी ॥४॥ पसरप मे परगी में पर मौर अग्नि को यथा विधि वे पनुगार मथन पर है नगधिर मुम उगमे यवन पर्व पार हमारे मोर को प्राप्त हो जानोगे । अग्निशमन्यन पर उग राजा ने उगरे तीन भाग परवे यजन पियापा वह महान्य गन्धर्व दात प्रभार यहा दाग यजन पर प्रेता में उनत्री गगोरता को प्राप्त हुमा पौर वाम के लिये योग्य बना पा । पहिले एर पनि पागमन उम तीन बना दिगपा । इस प्रकार प्रभाव पाना वर, गगा ऐन हमा है।हे हिज होगा ऐन मद्दरियों के द्वारा in और परम पुण्य देश में एपा पा ॥४५॥ यह महान् पावारा भूपति पमुना में उसनट पर प्रविधान म प्रयाग में राज्य रिया का पाप्रति जाने परनी गरपानी प्रयागको बनाया शYn उपरे ममान सेतीपुए थे जोnि मोर विदिम पे । उनी नाप-पायु- भीमा-पमारगु-वार पर गाय जोr उमंडीपुर पे उमावगु मेममान गnिशेजोगने वाला या भीष उनलमा ॥४-४ धीमान भीमम्य दायादो गवामीररावनाम। विद्वांपाशनम्मारि मुहोपोभूमिहाया | गुरोगामामाजिगभगम्मरः। प्रतिपय तो गमाविले पारण !
१८६ [ वायु पुराण प्लावयामाम त देश भाविनोर्थस्य दर्शनात् । गगया प्लावित दृष्ट्वा यज्ञबाट समन्तत ॥५२ मोहोत्रिवरद क्रुद्धा गङ्गा सरक्तलोचन । पस्य गङ्गेऽवलेपस्य सद्य फलमवाप्नुहि ॥५३ एनते विफल सवं पीतमम्भ करोम्यहम् । राजर्षिणा तत. पीता गङ्गा दृष्ट्वा सुरपय ॥५४ उपनिन्युमहाभागा दुहितृत्वेन जाह्नवीम् । यौवनाश्वस्य पौत्रीन्तु कावेरोञ्जह्न रावहत् ।।५५ युवनाश्वस्य शापेन गङ्गा येन विनिर्ममे। कावेरी सरिता श्रेष्ठा जह्न भामिनिन्दिताम् ॥५६ जह्न श्च दयित पुत्र महोन नाम धार्मिकम् । कावे- जनयामास अजकस्तस्य चात्मज ॥५७ श्रीमान् भीम का दायाद अर्थात् पुत्र काञ्चनप्रभ राजा था और काञ्च- नप्रभ राजा का पुत्र महान् बलवान् तथा परम विद्वान् सुहोत्र नाम वाला हुआ था ।।५०॥ महोत्र का पुत्र केशिका के गर्भ से उत्पन्न होने वाला जलु नाम वाला हुआ । जिसके विस्तृत यज्ञ कर्म मे गङ्गा ने आकर उस भाग को होने वाले प्रयोजन के दर्शन के कारण से पूर्णत प्लावित कर दिया था। गङ्गा के द्वारा सब ओर से प्लाक्ति यशवाट को सुहोत्र के पुत्र जह्ल ने देखा 11५१-५२।। वरद जनु गङ्गा पर अत्यन्त क्रुद्ध हुमा और उसके नेत्र क्रोधावेशसे लाल होगये थे-उसने कहा-है गङ्गा 1 इम घमण्ड का तू तुरन्त ही फल प्राप्त कर ॥५३॥ यह मेरा जल मब पान कर मैं विफल कर देता हूँ। देवर्पियो ने उस राजर्षि के द्वारा गङ्गा को पोत अनि पान की हुई देवा ॥५४॥ पीत गङ्गा को देखकर महान भाग वाले सुरपियो ने उसको जहनु राजा की पुत्री उपनीत दिया था। जलु राजा ने यौवनाश्व की पौत्री कावेरी के साथ विवाह किया था ॥५५।। गुवनाश्व के जिम शाप से गङ्गा ने थेट सरिता कावेरी को जनु की प्रनिन्दित भार्या बनाया था ॥५६॥ जनु राजा ने दयित पुत्र जोकि परम धार्मिक था ऐमा मुहोष नाम बाला बाबेरी मे उत्पन्न किया था मोर उसका पात्मज अनक हुमा था॥१७॥ 1 चन्द्रवंश कोन [ १८७ अजकस्य तु दायादो बलाकाश्वो महायमा.। बभूवुश्च गय शीलः कुशस्तस्यात्मज स्मृत ॥५८ बुमपुत्रा वमूवृश्च चत्वारो वेदवर्चस । युशाश्व. कुगनाभश्च अमूर्तारयशोवमुः ॥१६ कुशस्तम्बस्तपस्तेपे पुत्रार्थी राजसत्तमः । पूर्णे वर्षसहस्र व शतक्रतुमपश्यत ॥६० समुग्रतपरां दृष्ट्वा राहनाक्ष पुरन्दरः । समथं पुत्रजनने स्वयमेवास्य शाश्वतः ।।६१ पुत्रत्व पल्पयामास स्वयमेव पुरन्दर । गाधिर्नामाभवत्पुत्र कौशिक. पाकशासनः ॥६२ पोरपुत्सामवद्भार्या गाधिस्तस्यामजायत । पूर्व कन्या महाभागा नाम्ना सत्यवती शुभाम् । ता गाधिपुर काव्याय ऋचीकाय ददौ प्रभु ॥६३ तस्या पुषस्तु वे भर्ता भार्गवो भृगुनन्दन । पुत्रायें साधयामास चर गाघेस्तथैव च ।।६४ तथा चाहूय सुधृतिऋचीको भार्गवस्तदा। उपयोज्यश्चररय त्वया मात्रा च ते गुभे ॥६५ प्रजा का पुत्र महान या वाला बनाताव हुमा था और उसके पुत्र गर-गीत तथा सुगम हए ।।५८॥ युग व वेदवचम वाले मुगाव-शनाम- प्रमूर्तार और यमोवा घे पार पुर हुए थे ॥५६।। रागमो में परमधे कुरा स्नाय ने पुत्र की प्राप्ति का न होते हुए पूरे एक महरा वर्ष तक तपस्या जी घी और इन्द्र का दान प्राप्त पिया या॥६॥ महप नेत्रो वारेन्द्र ने उगो उप्र तपश्चर्या परने वारे रो देसर इमरे पुष उत्पन्न होने मे स्वय ही शान मम होगा या १६१॥ एन्द्र ने स्वर हो पुत्र की पल्पना को पी पोर पारमामन () गाधि नाम दाना बोशित पुत्र हुपा पायो पुरमा नाम वाली भार्ग यो उममे गापि उरान हुए । पहिले महान भाग वाली मारपसी नाम पानी उम शुभ कन्या को प्रभु गाधि पुत्र ने ऋचौर माया १८६ ] [ वायु पुराण बुलाकर ऋचौक दी थी ॥६३।। उसमे भृगुनन्दन भरण करने वाले भार्गव पुर हुए। पुत्र के लिए गाधि से चकरा मापन दिया था ||६|| उस समय मुधृति को भार्गव ने कहा-हे शुभे ! इस चरु वा तुझे और तेरी माता को उपयोग करना चाहिए ॥६॥ तस्या जनिध्यते पुत्री दीप्तिमान् क्षत्रियपंम । अजेय क्षत्रिययुद्ध क्षत्रियपंभसूदन ॥६६ तवापि पुत्र पल्याणि धृतिमन्त तपोधनम् । दशमात्मक द्विजश्रेष्ठ चहरेप विधास्यति ॥६७ एवमुक्त्वा तु ता भार्यामृचोको भृगुनन्दन । तपस्यभिरतो नित्यमरण्य प्रविवेश ह ॥६८ गाधिः सदारस्तु तदा क्षचीकाथमम्यगात् । तीर्थयानाप्रसङ्गन सुता द्रप्टु नरेश्वर ॥६६ चरुद्वय गृहीत्वा तु पेः सत्यवती सदा। भर्तुबंचनमव्यमा हटा माने न्यवेदयत् ।।७० माता तु तस्य देवेन दुहिरे स्व चरु ददो। तस्याश्चरुमयाज्ञानादात्मन सा चकार ह ॥७१ अथ सत्यवती गर्भ क्षनियान्तकर शुभम् । धारयामास दीप्तेन वपुषा घोरदर्शना ॥७२ तमृचौवस्ततो दृष्ट्वा योगेनाप्यनुमृश्य च । तदावीद्विजयेष्ठ स्वा भायां वरवरिणनीम् ॥७३ मातुः सिद्धयति ते भद्रो चरुव्यत्यासहेतुना । जनिष्यति हि पुत्रस्ते क्रूरकर्मातिदारुण ॥७४ उममे ऐसा एक पुत्र उत्पन्न होण जो क्षत्रियो मे परमश्रे और दीप्ति- मान् होगा जिसको पुस मे क्षत्रियो के द्वारा जो नहीं पा पकता है, वह क्षत्रियर्पभ मूदन होगा ॥६६॥ हे कल्याणी । तुझको भी यह चति बाला- नपोधन, शम के स्वरूप वाला और द्विजो मे श्रेष्ठ पुत्र होगा ॥६७|| इस प्रकार में भार्या से कहकर ऋचीक भृगुनन्दन नित्य ही तपस्या में अभिनि रखने वाला चन्द्रश कोर्तन ] [ १८६ , होर अरण्य में प्रविष्ट होगये थे ॥६६॥ उम समय गायि पत्नी के साथ ऋचीक के प्राथम मे गये । वह नरेश्वर तीर्थ यात्रा करने से प्रमत मे अपनी पुत्री को देखने के लिये प्राश्रम में पहुंचे थे ॥६६॥ सत्यवती ने ऋषि के चरुद्वय अर्थात् दोनों वरुणो को लेकर सदा म्वामी के वचन से प्रव्यग्र रहती हुई प्रमन्न होकर अपनी माता मे निवेदन किया था ॥७०॥ माता ने देववशान् उस घेरी के लिए अपना चर दे दिया और यज्ञान से उमके चर को अपना कर दिया था ॥७२॥ इमके अनन्तर सत्यवती ने क्षत्रियो के अन्त तक कर देने वाला शुभ गर्भ धारण किया था जिसका दारीर अति दीप्त था और उगसे वह घोर दर्शन वाली थी ॥७२॥ वीर ने उसे देखकर और फिर योग के द्वारा भी विचार कर तव वह द्विजो मे अपनी वरणिनी भार्या से बोला ॥७३॥ हे भद्रे । चार के व्यायाम (उलट-पलट) के कारण से तुझे माता का चरु प्राप्त हुधा हे प्रत तेरे क्रूरकर्म करने वाला अत्यन्त दारुण पुत्र पैदा होगा ॥७४।। माता जनिष्यते वापि तथाभूत तपोधनम् । विश्व हि ब्रह्म तपसा मया तब समर्पितम् ।।७५ एवमुक्ता महाभागा भर्ता सत्यवती तदा । प्रसादयामास पति मुनो मे नेशो भवेत् । ब्राह्मणपिसदस्वन्य इत्युक्तो मुनिरब्रवीत् ॥७६ नेप सङ्कलित वामो मया भद्रे तथा त्वया । उनकर्मा भवेत् पुत्र पितुर्मातुश्च कारणात् १७७ पुन सत्यवती वाक्यमेवमुक्ताब्रवीदिदम् । इच्छेन्लोकानपि मुने सृजेथाः किं पुन सुतम् ।।७८ दामात्मक मृजु भर्त पुत्र मे दातुमर्हसि । काममेव विध पुत्रो मम स्यात्तु बद प्रभो । मय्यन्यथा न शक्य वै यमेव द्विजोत्तम । तत प्रसादमकरोत् स तम्यास्तपसो बलात् ।। पुत्रे नास्ति विशेषो मे पौत्र वा वरवरिणनि । त्वया यथोक्त वचन तथा भद्र भविष्यति ॥८१
१६०
[ वायु पुराण
।
तस्मात् सत्यवती पुत्र जनयामास भार्गवम् ।
तपस्यभिरतन्दान्त जमदग्नि शमात्मरम्॥२
तेरी माता ऐमा परम तपस्वी पुत्र पैदा करेगी मैंने वहाँ तप के द्वारा
ब्रह्म को समर्पित किया है ॥७]। इस प्रकार से अपने पति के द्वारा कही गई
सत्यवती उम समय पति को प्रसन्न करने लगी कि मेरा पुत्र इस प्रकार का जमन
लेवे । प्रय ब्राह्मणपसद है इस प्रकार से कहे गये मुनि बोले ॥७६।। हे भने ।
इस प्रकार की यह इच्छा मैंने नथा तूने कभी नहीं की थी। उनकम करने वाला
पुर पिता और माता के काररा से होता है ॥७७॥ फिर इस प्रकार से कही
गई सत्यवती यह वचन बोली-हे मुने । इच्छा करते हुए तो लोको का भी
सृजन करते हैं फिर पुन के विषय मे क्या बात है ।।७८।। हे स्वामिन् । सीधा
और शम स्वरूप वाला पुत्र मुझे देने के योग्य हैं। हे प्रभो । इच्छानुकूल इस
प्रकार का पुत्र मेरा हो जाये आप ऐसा कह दैवें ॥७६ है द्विजोत्तम' मुभम
अन्यथा नही किया जा सकता है । इसके अन तर तप के बल से उसने उस पर
प्रमनता की थी ८०॥ हे वरवगिनि । मेरे पुत्र प्रथवा पोर में विशेषता मही
है । तूने जैसा कहा है हे भद्रे । वैसा ही वचन होगा ।।८। इससे मत्यवती ने
तप मे भिरति रखने वाला-दान्त और गारमक जमदग्नि भाव गुज को
जम दिया था ।।२।।
भृगोश्चरुविपर्यासे रौद्रवंष्णवयो पुरा ।
यमनाणवस्याग्नेर्जमदग्निरजायत ।।३
विश्वामित्र तु दायाद गाधि कुगिरनन्दन ।
प्राप्य ब्रह्मर्पिसहिनो (सविता) जगाम ब्रह्मणा वृत ८४
मा हि सत्यवती पुण्या सत्यव्रतपरायणा ।
कौशिवीति समाख्याता प्रवृत्तय महानदी ॥८५
परिस्र ता महाभागा वौशिकी सरिता वरा।
इक्ष्वाकुवगे त्वभवत्सुवेणु म पार्थिव ६
तस्या कन्या महाभागा कामती नाम रेगुका।
।
चन्द्रवरा कीर्तन ] [१६१ रेणुकायातु कामल्यां तपोधृतिसमन्वित । प्रार्चाको जनयामास जमदग्नि सुदारुणम् ॥८७ सर्वविद्यान्तग श्रेष्ठ धनुर्वेदस्य पारगम् । राम क्षत्रियहन्तार प्रदीप्तमिव पावकम् ॥८८ प्रोर्वस्यैव मृचीकस्य सत्यवत्या महामना । जमदग्निस्ततो वौजिज्ञे ब्रह्मविदा वरः । मध्यमश्व शुन.शेफः शुन.पुच्छ कनिष्ठक ८E विश्वामित्रस्तु धर्मात्मा नाम्ना विश्वरथ स्मृतः । जज्ञे भृगुप्रसादेन कोशिकादशवर्द्धन ॥६० पहिले भृगु के गेंद्र और वैष्णव के चर के व्यत्यास होने पर बप्पाव अग्नि के यमन से जमदग्नि उत्पन्न हुए थे॥८३॥ कुशिक नन्दन गाषि ने दायाद विश्वामित्र को प्राप्त कर ब्रह्मपियो के सहित ब्रह्मा से वृत होकर गया था।८४ वह सत्यवती परम पवित्र और सत्य के व्रत मे परायण पी जोकि कोशिकी इम नाम से प्रवृत्त यह महानदी कहलाई थी ८५) सरितानो मे घेषु महान भाग बानी कोशिशी परिस्तुत हुई थी। इक्ष्वाकु के वश में वेणु नाम वाला राजा हुआ था ॥८६॥ उमको महान भाग वालो कन्या कामली नाम वाली रेणुका थी। रेणुका कामलीमे मार्चीक जमदग्नि ने जोकि तप और धृनि मे समन्वित थे, मुदारुण को उत्तन किया था ||२७|| जोकि समस्त विद्यानो का पारगामी- शेष और धतुर्वेद के परम पण्डिन थे जिनका नाम गम या तया प्रदीप्त पावक (अनि) के समान एव क्षत्रियो का हनन करने वाले हुए थे 11८८|| ब्रह्मवेत्तानो मे प. महान् मन वाले जमदग्नि ने सत्यवती मे और्व ऋचीक के बीर्य से राम को उत्पन्न किया था। और मध्यम शुन शेफ तथा सबसे छोटा शुन पुच्छ या ॥८॥ विश्वामित्र तो बहुत ही धर्मात्मा ये और नाम से निश्वरथ कहे गये थे। भृगु के प्रसाद से कोशिक से वश के बढाने वाले उत्पन हुए थे || विश्वामित्रस्य पुत्रस्तु शुन शेफोऽभवन्मुनिः। हरिश्चन्द्रस्य यज्ञे तु पशुत्वे नियुत स वै । देवदत्त स वै यस्माई वरातस्ततोऽभवत् ।। ।
१६२ ] [ वायु पुराण विश्वामित्रस्य पुवाणा शुन शेफोऽग्रज. स्मृत । मधुच्छन्दो नपश्च व कृतदेवौ ध्र वाष्टको २ कच्छपः पूरणश्च व विश्वामित्रसुनास्तु वै । तेषां गोत्राणि बहुधा कोशिकाना महात्मनाम् ।।६३ पाथिवा देवराताश्च याज्ञवल्क्याः समर्पणा । उदुम्बरा उदुम्बलानास्तारका यममुञ्चता. ६४ लोहिण्यो रेणव व तथा कारीपवः स्मृता । बभ्रव पाणिनव च्यानजप्यास्तथव च ॥९५ शालावत्या हिरण्याक्षा स्यटकृता गालवा स्मृताः । देवला यामदूताव शालङ्कायनवाप्कला. ॥६६ ददाति बादराश्चान्ये विश्वामित्रस्य धीमत । ऋप्यन्तरविवादास्ते वहव. कोशिका स्मृता ॥९७ कोशिकासोश्रु माश्च व तथान्ये संधवायनाः। पौरोरवस्य पुण्यस्य ब्रह्मः कोशिकस्य तु 1180 विश्वामित्र के पुत्र शुन शेफ मुनि हुए थे। वह राजा हरिश्चन्द्र के पत्र में पशुत्व में नियुत क्येि थे। देवो के द्वारा वह दिया गया था इससे तव देवराज हुए थे ||११|| विश्वामित्र के पुत्रो मे शुन शेफ सबमे वडा कहा गया था । मधु- मच्छन्द और नप, कृतदेव ध्रुवाष्टक-कच्छप और पूरण ये मब विश्वामित्र के पुत्र थे। उन महात्मा कौशिको के बहुत प्रकार के गोत्र हैं ॥१२-१३॥ पार्थिव- : रात-याज्ञवल्क्य-समर्पण-उदुम्बर-उदुम्लान-तारक-यममुञ्चत लोहिण्य-- 1011-बभ्रव-पाणिन-ध्यान जप्य-शालावत्य-हिरण्याक्ष-स्यकृत- 1-यामदूत-शालड़ायन-वाफल और वादर ये धीमान् विश्वामित्र पुत्रो के गोत्र कहे गये हैं। वे अन्य ऋषि के विवाह के योग्य बहुत कोशिक कहे गये हैं ॥१४ ६५-६६-१७) पौरोग्य, पुण्य, ब्रह्मपि वौशिक के कोशिशा- सोश्रम तथा अन्य संपवायन हैं ॥९॥ इपद्वतोसुतश्चापि विश्वामिनातथाष्टा । अष्टकस्य सुतो यो हि प्रोक्तो जह्न गयो मया ॥e .
चवश कीतन ]
[ १६३
कि लक्षणेन धर्मेण तपसेह श्रुतेन वा ।
वाह्मण्य समनुप्राप्त विश्वामित्रादिभिनु पं ॥१००
येन येनाभिधानेन ब्राह्मण्य क्षत्रिया गता ।
विशेष ज्ञातुमिच्छामि तपमा दानतस्तथा ।।१०१
एवमुक्तस्ततो वाक्यमब्रवीदिदमर्थवत् ।
अन्यायोपगतद्रव्यंगहत्य यजने धिया ।
धर्माभिकाक्षी यजते न धर्मफलमश्नुते ॥१०२
धर्म चैत समाख्याय पापात्मा पुरुषाधम ।
ददाति दान विप्रेभ्यो लोकाना दम्भकारणात् ।।१०३
जप कृत्वा तथा तीव्र धनलाभानिरकुश ।
रागमोहान्वितो ह्यन्ते पावनार्थ ददाति य ॥१०४
तेन दत्तानि दानानि अफलानि भवन्त्युत ।
तस्य धर्मप्रवृत्तस्य हिंमकस्य दुरात्मन ॥१०५
एव लब्ध्वा धन मोहाइदतो यजतश्च ह।
सक्लिष्टकर्मणो दान न तिष्ठति दुरात्मन ॥१०६
विश्वामित्र से हपद्धती का पुत्र अष्टक हुा । मष्टक का जो सुत था वह
जनुगण मैंने कह दिया है 1180 पियों ने कहा-विश्वामित्र प्रादि गजाम्रो
ने किस तरण वा धाम के द्वारा तपस्या से प्रथवा श्रुत मे ब्राह्मणत्व प्राप्त
किया था।॥१०॥ जिम जिम अविधान में क्षत्रिय लोग ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए
पे तप के द्वाा या दान के द्वारा हुए उसके विशेष को जानने की इच्छा है
॥१०१॥ इस प्रकार से कहे गये वे इसके पश्चात् यह प्रर्थ से युक्त वावय बोले-
मयार मे उपगन द्रव्यो को लाकर उनसे यजन परने म को बुद्धि से पर्म का
इच्छुक होकर यजन किया करता है वह धर्म का फल नहीं प्राप्त करता है ।१०२।
इमाो धर्म कहकर जो पामा मा प्रथम पुरुष लोको को दम्भ दिखाने के कारण
मे विनों को दान दिया करता है ।।१०३॥ धन के लोभ मे निरकुश होकर तथा
तोर तप पर राग और मोह से युक्त होता हुमा अन्त म पावन होने के लिये
जो दान देता है ।।१०४॥ उमके द्वारा दिय हुए दान विफल हाजाया करते हैं ।
१९४ ]
[ यायु-गुराण
हिंग-पुरारमा प्रौर धर्म में प्रति रखने वाले उसके इस प्रकार गे (अन्याय से)
पन को पार मोह मे दाा देने वाले और मजन भरने वाले एक जो विनष्ट
पर्म मे युक्त हो दुरात्मा का दान नहीं ठहरा परता है ॥१.५-१०६||
न्यायागताना द्रव्यागा तीयें सम्प्रतिपादनम् ।
पामाननभिगन्धाय यजते च ददाति च ।।१०७
स दानफ्लमाप्नोति तच्च दान मुयोदयम् ।
दानेन भोगानाप्नोति स्वगं गत्येन गन्दति ।।१०८
तपसा तु सुतप्तेन लोशन विष्टम्या तिठति ।
विष्टम्य स तु तेजस्वी लोके ध्वानन्त्यमश्नुते ।।१०६
दानाच्यास्तथा यज्ञो यज्ञाच्छ यस्तथा तपः।
सन्यामस्तपसःश्रेयास्तस्माज्ज्ञान गुरु स्मृतम् ।।११०
शू यन्ते हि तपःसिद्धा क्षात्रोपेता द्विजातय
विश्वामित्रो नरपतिर्मान्धाता सकृति कपि ॥१११
पेश्च पुरवुत्सश्च सत्यश्चानृहवानृगु ।
प्राष्टिोणाऽजमीढश्च भागान्योन्यस्तथैव च ॥११२
पक्षीवश्चय शिजयस्तथान्ये च महारथा ।
रथीतरश्च रुन्दश्च विष्णुवृद्धादयो नृपा ॥११३
क्षात्रोपेता. स्मृता ह्यते तपसा ऋपिताङ्गता ।
एते राजर्षय मर्वे सिद्धि मुमहतोङ्गताः ।
अत ऊद्ध प्रवक्ष्यामि अयोवंश महात्मन ||११४
न्याय से प्राय हुए द्रव्यो का तीर्थ स्थान मे भली-भानि प्रतिपादन करना
तथा अपनी कामनामों का अभिसधान न करके जो यजन करता है और दान
देता है ।।१०७॥ वह दान का फल प्राप्त करता है और वह दान सुख के उदय
वाला होता है। दान से भोगो की प्राप्ति किया करता म मौर सत्य से स्वग को
जाता है ।।१०।। अच्छी प्रकार से तपे हुए तप से लोको का विष्टम्भ करके
रहा करता है । वह तेजस्वी विष्टम्भ करके लोगो में मनानता को प्राप्त किया
करता है ॥१०६॥ दान से अधिक श्रेय करने वाला यज्ञ होता है और यन से
चन्द्रवदा पोर्तत ]
[ ११५
थेयस्कर तप होता है । तप से भी श्रेपान सन्यास ( अच्छी रीति से सबका
त्याग करना ) होता है । और उससे भी बड़ा ज्ञान कहा गया है ॥११॥ सुने
जाते हैं कि तपस्या में सिद्ध-क्षात्र धर्म में युक्त-निजाति राजा विश्वामित्र,
मान्धाता, सकृति, कपि और कपि का पुरुकुत्स,सत्य, मान्हवान्, ऋधु,आटिपेण,
अजमोद तथा भागान्योन्य, क्षीव, शिजय एव अन्य महारथ, रथोतर, रुन्द और
विष्णु वृक्ष प्रभृति राजा ये सब क्षत्रिय थे तपस्या के द्वारा ऋषिस्व को प्राप्त
होगये थे। ये सब राजपि थे जोरि महतो सिद्धि को प्राप्त कर चुके थे । इससे
प्रागे
महान प्रारमा वाले प्रयु के वश का वर्णन करूगा ॥१११ मे ११४।।
प्रकरण५४-रजियुद्ध वर्णन
एते पुत्रा महात्मान पञ्च वासन् महावला ।
स्वर्भानुतनया विप्रा प्रभाया जजिरे नृपा ॥१
नहुए प्रथमस्तेपा पुत्रधर्मा तत स्मृत ।
धर्म वृद्धात्मजच व सुतहोत्रो महायशा २
सुतहोयस्य दायादास्त्रय परमधाम्मिका ।
काश शलश्च द्वावेतो तथा गृत्समद प्रभु ॥३
पुनो गृत्समदस्यापि शुनको यस्य शौनक ।
ब्राह्मणा क्षत्रिया व वैश्या शूद्रास्तथैव च ॥४
सम्भूता
विचित्रौः कम्मभिद्विजा ।
शलात्मजो ह्याष्टिषेण श्वरन्तस्तस्य चात्मज ॥५
शौनकालाष्टियेरणाश्च क्षात्रोपेता द्विजातय ।
काशस्य काशयो राष्ट पुत्रो दीर्घतपास्तथा ॥६
धर्मश्च दीर्घतपसो विद्वान धन्वन्तरिस्ततः।
तपसा सुमहातेजा जातो वृद्धस्य धीमत ।
प्रथैनमृपयः प्रोवु मूत वाक्यमिम पुन ॥७
एतस्य वशे
[ वायु-गुराण
हिंगर-दुरारमा पोर धर्म म प्रति रगने वाले उमा प्रशारगे (पन्याय मे)
पन को पावर मोह से पा देने वाले पौर पमन करने यार एव जो निष्ट
वर्ग गे युरू हो दुगरमा नादान नहीं ठहरा बरला है ।।१०५-१०६॥
न्यायागतानां द्रव्यागा तीर्थ सम्प्रतिपादनम् ।
पामाननभिसन्धाय यजते च ददाति च ।।१०७
स दानफ्लमाप्नोति तब दान मुमोदपम् ।
दानेन भोगानाप्नोति स्वर्ग सत्येन गच्छति ॥१०८
तपसा तु मुतप्तेन लोरान विष्टम्या तिष्ठति ।
विष्टम्य म तु तेजस्वी लोके ध्यानन्त्यमश्नुते ।।१०६
दानाच्यास्तथा यज्ञो यमान्छ यस्तथा तपः।
सन्यामस्तपसः श्रेयास्तस्माज्ज्ञान गुरु स्मृतम् ॥११०
थूयन्ते हि तपःसिद्धा क्षारोपेता द्विजातय ।
विश्वामित्रो नरपतिमान्धाता सकृति कपि ।।१११
पपेश्च पुरुकुत्सश्च सत्यश्चानुहवानृगु ।
प्राष्टिषेणोऽजमीढश्च भागान्योन्यस्तथैव च ॥११२
वक्षीवश्चय शिजयम्तथान्ये च महारथा ।
रथीतरश्च रुन्दश्च विषणुवृद्धादयो नृपा ॥११३
क्षारोपेताः स्मृता ह्यते तपसा पिताङ्गता ।
एते राजर्षय सर्वे सिद्धि सुमहतीङ्गताः।
प्रत ऊद्ध प्रवक्ष्यामि अयोवंश महात्मन ।।११४
न्याय से पाये हुए द्रव्यो का तीर्थ स्थान में भली-भानि प्रतिपादन करना
तथा अपनी नामनामो का अभिसघान न करके जो यजन करता है और दान
देता है ॥१०७॥ वह दान का फल प्राप्त करता है और वह दान सुख के उदय
वाला होता है। दान से भोगो की प्राप्ति किया करता म मोर सत्य से स्वर्ग को
जाता है ॥१०८॥ अच्छी प्रकार मे तपे हुए तप से लोको का विष्टम्भ करके
रहा करता है। वह तेजस्वी विष्टम्भ करके लोगों मे अनन्तता को प्राप्त किया
करता है ।।१०६॥ दान से अधिक थेय करने वाला यज्ञ होना है और यज्ञ से
चन्द्रवा पोर्तन ]
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श्रेयस्कर तप होता है । तप से भी श्रेयान् मन्यास ( अच्छी रीति से सबका
त्याग करना होता है । और उससे भी बड़ा ज्ञान कहा गया है ॥११०॥ मुने
जाते है कि तपस्या म सिद्ध-क्षात्र धर्म से युक्त-निजाति राजा विश्वामित्र,
मान्धाता, सकृति, कपि और कपि का पुरुकुत्स सत्य, पान्हवान, ऋधु,माहिपेण,
भजमीन तथा भागान्योन्य, पक्षीर, शिजय एव अन्य महारथ, रयीतर, सन्द और
विष्णु वृद्ध प्रभृति राजा ये मव क्षत्रिय थे तपस्या के द्वारा पित्व को प्राप्त
होगये थे । ये मव राजपि थे जोकि महतो मिद्धि को पास कर चुके थे । इससे
प्रागे महान् प्रात्मा वाले प्रयु के वंश का वर्णन करूंगा ॥१११ से ११४।।
प्रकरण५४-~-रजियुद्ध वर्णन
एते पुत्रा महात्मान पञ्च वासन महावला ।
स्वर्भानुतनया विप्रा प्रभाया जज्ञिरे नृपा ॥१
नहुष प्रथमस्तेपा पुत्रधर्मा तत स्मृत ।
धम्म वृद्धारमजश्च व सुतहोत्रो महायशा ॥२
सुतहोगस्य दायादास्त्रय परमधाम्मिका ।
काश शलव द्वावेतो तथा गृत्समद प्रभु ॥३
पुस्रो गृत्समदस्यापि शुनको यस्य शौनक ।
ब्राह्मणा क्षत्रियाश्च व वैश्या शूद्रास्तथैव च ॥४
एतस्य वो सम्भूता विचिशः कम्मभिद्विजा ।
बालात्मजो ह्याष्टिपेण श्वरन्तस्तस्य चात्मज ॥
शौनकाश्चाष्टिपेरणाश क्षात्रोपेता द्विजातय ।
कागस्य काशयो राष्ट पुत्रो दीर्घतपास्तथा ॥६
धामश्च दीर्घतपसो विद्वान् धन्वन्तरिस्ततः ।
तपसा सुमहातेजा जातो वृद्धस्य धीमत ।
अनमृपयः प्रोतु मूत वाक्यमिम पुन ७
१९६]
[ वायु पुराण
पथ धन्वन्तरि यो मानुऐचिह जसिवान् ।
एतदितुमिच्छामस्ततो न हि प्रिय तथा ।
श्री मूतत्री ने कहा- ये महान बनवान महान पारमा वारे पान ही पुष
थे। स्पर्मानु के पुत्र विप्र नृप प्रभा में उत्पन्न हुए थे ॥१॥ उनमे पुत्र धर्म वाना
प्रथम न हुमा पा। महान या वाला धर्म वृद्धा मज सुनहोत्र हुमा ।।२।। गुतहोर
ये दामाद परम धामिन सीन हुए थे। पापा और शूम दो तो ये धे सपा तृतीय
प्रभु गरामद मा था ॥३॥ गृत्समद का भी पुत्र पुन प्रा जिसरा निक
हमा पा । प्राह्मण-क्षत्रियवंश्य मोर भूट इमके या मे हे द्विजगण । आपने
विचित्र वर्गों के द्वारा प्रसन्न हुए थे। पलक पुत्र प्राष्टिपेरण या और उसका पुष
घरन्त हुमाया ॥४-५॥ शौनक मोर मापेण ये क्षात्र धर्म में उपेत द्विजाति
थे। बावा वाशप-राष्ट तथा दीर्घनपा पुत्र हुए ॥६॥ दीपना का धर्म मौर
एमवे मनातर विद्वार धन्वन्तरि हुमा जो तपमे महान् एव मुन्दर तेज वाला
धीमान् वृद्ध पे उत्पन्न हुआ था। इसके अनन्तर ऋपिवृन्द ने फिर थी गूनजी से
यह वाक्य योले ॥७॥ ऋपियो ने कहा-देव धन्वन्तरि ने मप्यो मे वैसे यहाँ
जन्म लिया था। हम लोग यह जाना चाहते हैं सो माप यह प्रिय वान कृपा
परके बताइये 10
धन्वन्तरे सम्भवोऽय थ यतामिह वै द्विजा ।
म सम्भूत समुद्रान्ते मध्यमानेऽमृते पुरा 16
उत्पन्न सक्लात् पूर्व सर्वतश्च थियावृत ।
सर्वससिद्धकाय त दृष्ट्वा विष्टम्भित स्थित ।
अजस्त्वमिति होवाच तस्मादजस्तु स स्मृत ।।१०
अज प्रोवान विष्णु त तनयोऽस्मि तव प्रभो।
विधत्स्व भाग स्थानञ्च मम लोके सुरोतम ॥११
एवमुक्तः स हट्वा तु तथा प्रोवाच स प्रभुः।
वृतो यज्ञविभागस्तु यज्ञियहि सुरंस्तथा ।।१२
वेदेषु विधियुक्तञ्च विधिहोत्र महपिभि ।
न शक्यमिह होमो वै तुल्य वर्तु कदाचन ॥१३
रजियुद्ध वर्णन ] [ १६७ अर्वाक्मुतोऽसि हे देव नाममन्त्रोऽसि वै प्रभो। द्वितीयायान्तु सम्भूत्या लोके ख्यातिङ्गमिष्यसि ।।१४ अरिणमादियुता सिद्धिगर्भस्थस्य भविष्यति । तेनैव च शरीरेण देवत्व प्राप्स्यसि प्रभो। चारुमौतर्गन्धर्यक्ष्यन्ति त्वां द्विजातय. ॥१५ अथ च त्व पुनश्च व आयुर्वेद विधास्यसि । अवश्यम्भावी ह्यर्थोऽय प्राग्दिष्टस्त्वब्जयोनिना ॥१६ द्वितीय द्वापर प्राप्य भविता त्व न सशय । तस्मात् तस्मै वर दत्त्वा विष्णुरन्तर्दधे ततः ॥१७ द्वितीये द्वापरे प्राप्त सौनहोत्र स काशिराटू । पुरकाम स्तपस्तेपे नृपो दीघतपास्तथा ॥१८ श्री मूतजी ने कहा-हे द्विजगण 1 यहाँ पर धन्वन्तरि का यह जन्म मुनो । वह पहिले अमृत के लिये समुद्र का मन्थन करने पर समुद्र के मध्य से उत्पन्न हुए थे ॥६॥ सबमे पूर्व और सर्व प्रकार से श्री से प्रावृत वह उत्पन्न हुए थे । मब प्रकार से ससिद्ध काया वाले उनको देखकर सब विष्टम्भित होगये थे। माप मज है-यह वोले-इस कारण से वह मज कहे गये थे ॥१०॥ मज उन विष्णु से व ले-हे प्रभो । मैं प्रापका पुत्र हूँ । हे सुरो मे उत्तम । पाप लोक में मेरा स्थान और भाग का विधान कर देवें ।।११।। इस कारण से कहे गये वह देखकर इस तरह से बोले-यक्षिय सुरो के द्वारा यज्ञ का विभाग किया गया है ॥१२॥ वेदो में विधि से युक्त प्रौर विधिहोत्र महर्षियो के द्वारा यहाँ पर होम कभी तुल्य नहीं किया जा सवता है ॥१३॥ हे देव । हे प्रभो । पाप माक्मुत हैं और नाम मन्त्र हैं। पाप दूसरे जन्म मे लोक मे ख्याति को प्राप्त करेंगे ।।१४ पाप जब गर्भ मे स्थित रहेंगे तभी प्रापको प्रणिमा प्रभृति से युक्त सिद्धि प्राप्त हो जायगी और आप उसी शारीर से देवस को भी प्राप्त करेंगे। द्विजाति गण सुन्दर मन्त्रों से-पृत गे और गन्धो के द्वारा पापका यजन करेंगे ॥१५॥। इसके अनार फिर माप भायुर्वेद की रचना करेंगे। यह अवश्य ही होने वाला अर्थ है जोरि पहिने ही पायोनि ब्रह्माने प्रादिष्ट पर दिया है ॥१६॥ दूसरे द्वापर यो १६. ] [ वायु पुराण पाकर ग्राप होगे इसमें तनिक भी सराय नहीं है। इसमे उनको वरदान देकर फिर विष्णु भगवान् वही पर अन्तर्धान होगये घे ॥१७॥ दूसरे द्वापर युग के प्राजाने पर काशिराष्ट्र वह सीन होष तथा दीर्घतपा नृप ने पुन की कामना वाला होते हुए तप किया था॥१८॥ अज देवन्तु पुत्रार्थे ह्यारिराधयिपुनृप । बरेण च्छन्दयामास प्रीतो धन्वन्तरिनुपम् ॥१६ भगवान् यदि तुष्टस्त्व पुत्रो मे धृतिमान् भव । तथेति समनुज्ञाय तीवान्तरवीयत ।।२० तस्य गेहे समुत्पनो देवो धन्वन्तरिस्तदा। काशिराजो महाराज सर्वरोगप्रणाशन ॥२१ आयुर्वेद भरद्वाजचकार सभिपक्क्यिम् । तमष्टया पुनर्व्यस्य शिष्येभ्य प्रत्यपादयत् ।।२२ धन्वन्तरिसुतश्चापि केतुमानिति विश्रुत । अथ केतुमत पुत्रो विभो भीमरथो नृप । दिवोदास इति ख्यातो वाराणस्यधिपोऽभवत् ।।२३ एतस्मिन्न व काले तु पुरी वाराणसी पुरा । शून्या विवेशयामास क्षेमको नाम राक्षस ।।२४ शप्ता हि सा पुरी पूर्व निकुम्भेन महात्मना । शून्या वर्षसहस्र वै भवित्रीति पुन. पुन ॥२५ तस्यान्तु शप्तमात्राया दिवोदास प्रजेश्वर । विषयान्ते पुरी रम्या गोमत्या मन्यवेशयत् ।।२६ पुत्र के लिये बज देव की पाराधना करने वाले नृप को परम प्रसन्न धन्वन्तरि ने वरदान मागने के लिये कहा था ॥१६) राजा बोला-हे भगवान् यदि पाप मुभपर सन्तुष्ट हैं तो धृतिमान प्राप मरे पुत्र होवें। तथास्तु (ऐमा ही होवे ) यह कहकर वहाँ पर ही धन्वन्तरि अन्तहित होण्ये ॥२०॥ तव उसके घर मे देव धन्वन्तति समुत्पन्न हुए। काशिराज महाराज समस्त रोगो के नाश करने वाले थे ॥२१॥ भरद्वाज ने भिषर क्रिया के साथ पायुर्वेद को माठ ?
रजियुद्ध वर्णन ] [ १६६ प्रकार से ध्यमित करके शिष्यो के लिये प्रतिपादित किया था प्रर्थान् शिक्षा दी थी ॥२२॥ धन्वन्तरि का पुत्र भी केतुमान् इस नाम से विश्रुत हुआ। इसके मनलर वे तुमान् का पुत्र विभ भीमरथ नृप हुप्रा था । वह दिवोदाम इस नामसे विम्यान हुअा था और वाराणसी या म्वामी हुमा २३|| इस ही ममय के बीच मे पहिले वागणमा पुगेम शून्य में दोमर नाम वाले राक्षस न प्रवेश किया पा ॥२४॥ पहिले समय में महात्मा निकुम्भ के द्वारा वह पुरी शाप से मुक्त हुई थो हि बार-बार एक महत वपं तर यह शून्य होगी ।।२५।। उम पुरी के पाप मुक्त होने पर ही प्रजेस्वर दिवोदाम ने विषयान्त मे गोमती में रम्यपुरी को सन्निवेमित पिया था ॥२६॥ वाराणसी विमर्थन्ता निकुम्भ राप्तवान् पुरा । निकुम्भश्चापि धर्मात्मा मिडक्षेत्र शशाप यः ।।२७ दिवोदासस्तु राजपिनंगरी प्राप्य पार्थिव । वसते स महातेजा स्फीताया वं नराधिप ॥२८ एतस्मिन्नेव वाले तु वृतदारो महेश्वर । देव्या स प्रिपामस्तु वसानश्च सुरान्तिके ।।२६ देवाज्ञया पारिपदा विश्वरूपास्तपोधना । पूर्वोक्त रूपविटोपस्तोपयन्ति महेश्वरीम् ।।३० स्तृप्यति महादेवो मेना नैव तु हप्यति । जुगुप्सते सा नित्यश्च देव देवो तथैव च ॥३१ मम पार्वे वनाचारस्तव मा महेश्वरः। दरिद्र सयं एवेह भपिलष्ट लडतेन ॥३२ मात्रा तयोता वचसा स्त्रीस्वभावान चाक्षमत् । स्मित कृत्वा तु वरदा हरपार्वमथागमत् ॥३३ विषायदना देवी महादेवमभाषत । नेह परस्याम्यह देय नय मा स्य निवेशनम् ॥३४ हरियो ने महा-परित निशुम्भ ने शिनिय वाराणमा पुगेको गार दिया पानिशुम्भ भी या धर्मारमा पा जिगने fr उग मिड क्षेत्र को मार २०० ] [ वायु पुराण दिया था ॥२७।। मूतजी ने कहा-राजा दिवोदास ने जोकि राजपि था, उस नगरी को प्राप्त कर वह महान् तेज वाला राजा स्फोत अर्थात् फैली हुई पुरीम निवास करता था ।।२०।। इसी काल म दारा को करने वाले महेश्वर देवी के प्रिय कामना वाले वह मुगे के समीप में वास करने वाले थे ।।२६।। देव की प्राना मे तपोधन विश्वरूप परिषद् पूर्वोक्त रूप विशेषो के द्वारा महेश्वरी को तोप देते थे ॥३०॥ उनसे महादेव को प्रसन्न होते हैं किन्तु मेना प्रमन्न नही होती है। वह नित्य ही देवो और देव को बुराई करती है ।।३१।। मेरे समीप म अनाचार है तुम्हारा म्वामी महेश्वर जो दरिद्र है । हे अनथे । यहाँ सभी साधारण लाड करते हैं ।।३२।। माता के द्वारा उस प्रकार से वाणी से कही गई देवी सती स्व. भाव के कारण सहन करने मे समयं न हुई। वरदा ने स्मित करके उसके बाद हर के समीप मे गई थी ।।३३॥ विपाद से युक्त मुख वाली देवी ने महादेव से कहा-हे देव । मैं यहाँ वास नहीं करूंगी आप मुझे अपने घर पर ले चलिये ॥३४॥ . तथोक्तस्तु महादेव सर्वांल्लोकानवेक्ष्य है । वासायं रोचयामास पृथिव्या तु द्विजोत्तमा वाराणसी महातेजा सिद्धक्षेत्र महेश्वरः ॥३५ दिवो दासेन ता ज्ञात्वा निविष्टान्नगरी भव । पार्श्वस्य स समाहूय गग्गेश क्षेमक ब्रवीत् ॥३६ गणेश्वर पुरीङ्गत्वा शून्या वाराणसी कुरु । मृदुना चाभ्यु पायेन प्रतिवीर्य स पार्थिव ॥३७ तता गत्वा निकुम्भस्तु पुरी वाराणसी पुरा। स्वप्ने सन्दर्शयामास मह्वन नाम नापितम् ॥३८ श्रेपरतेन्ह रिप्यामि स्थान मे रोचयानष । मद्रपा प्रतिमा कृत्वा नगर्यन्ते निवेशय ॥३६ तया स्वप्ने यया दृष्ट सर्व कारितवान् द्विना । नारीद्वार्यनुज्ञाप्य राजानन्तु यथाविधि ४० रजियुद्ध वर्णन ] [ २०५ उत्पन्न हुमा । उस बालक पुत्र ने उसका फिर हरण कर लिया था ॥६४।। उस समय उस महान् राजा ने वैर वा अन्त करते हुए ऐसा किया था। प्रतद्दन के दो पुत्र हुए । एक वत्स नाम वाला और दूसरा गर्ग इस नाम से प्रसिद्ध था।६५॥ कत्ल का पुत्र अलर्क हुआ और उसका पुत्र सनति हुआ था। अतर्क के प्रति राजर्षि गीत इलोक पुरातन थे॥६६॥ काशिसत्तम अलवं युवा रूपसे साठ हजार छ मो साठ वप तक सम्पन्न रहा था ॥६॥ लोपामुद्रा के प्रसाद से मलक ने परमायु को प्राप्त किया था ॥६॥ शापस्यान्ते महावाहुर्हत्वा क्षेमकराक्षसम् । रम्यामावासयामास पुरी वागणसी नृप ॥६६ सलते रपि दायाद सुनीयो नाम धार्मिक । सुनीथस्य तु दायाद सुकेतुर्नाम धार्मिम ॥७० सुकेतुननयश्चापि धमकेतुरिति श्रुति । धर्मकेतोस्तु दायाद सत्यकेतुमहारय ।।७१ सत्यकेतु सुतश्चापि विभुर्नाम प्रजेश्वर । सुविभुस्तु विभो पुन सुकुमारस्तत स्मृत ॥७२ सुकुमारस्य पुत्रस्तु धृष्टकेत. स धाम्मिक । धृक्षेतोस्त दायादो वेणुहान प्रजेश्वर ॥७३ वेणुहोत्रमुतश्चापि गार्यों के नाम विश्रुत । गाय॑स्य गर्गभूमिस्तु वात्स्यो वत्सस्य धीमत ।।७४ ब्राह्मणा क्षनियाश्चैव तयो पुत्रा सुधार्मिका । विक्रान्ता बलवन्यश्च सिंहनुत्यपराकमा ७५ इत्येते काश्यपा प्रोक्ता रजेरपि निबोधत । रजे पनशतान्यासन् पञ्च वीर्यवतो भुवि । राजेयमिति विख्यात क्षत्रमिन्द्रभयावहम् ॥७६ नाप के अन्त होजाने पर महाबाह ने क्षेमर राक्षम का वध करके राजा ने रम्य वाराणसी पुरी को बनाया था ॥६६॥ मन्नति का भी दायाद (पुत्र) मुनीष नाम वाना बहुत ही धार्मिक था । मुनीथ का पुत्र मुवे तु नाम वाला २०६ [ वायु पुगण पामिल हुमा था ॥७०॥ गुरेनु का भी पुत्र धर्मरेतु हमा-~-एमी श्रुति है । धर्मवेतु का दायाद महारय गत्यरेतु हमा था ।७१।। मग्यवेनु वा भी पुन प्रजेश्वर विभु नाम थामा हुपा था। विभु का पुत्र सुविभु था और उगला पुष गुरुमार था॥७२॥ मुतुमार के पुत्र का नाम पृष्टानु था वह वही धार्मिक था। धृष्टवेतु के दायाद प्रजेसर येणुहोत्र हुमा पा घेणुहोर के पुत्र का नाम गार्य प्रख्यात था। मार्य की गर्गभूमि मोर धीमान बल का वारय था ७४॥ उन दोनो के पुत्र मुन्दर धर्म के पलन करने वाले प्राहाण भोर क्षत्रिय थे वे बडे विक्रम वाले तपा यलवान् एव मिह के रामान पराक्रम वाले पे॥७॥ ये इतने काश्यप बतलाये गये हैं भव रजि वे भी समझ ला । भूमण्डल में वीर्यवान रजि के पांचसो पुत्र थे । इन्द्र के भय देने वाला यह क्षत्र राजय-दस नाम से विख्यात था ॥७॥ तदा देवा सुरे युद्ध समुत्पन्ने मुदारुणे। देवाचं वासुराश्च व पितामहमथान वन् ।।७७ अग्वयोर्भगवान् युद्ध विजेता को भविष्यति । यूहि न सर्वलोकेश श्रोतुमिच्छामहे वयम् ।।७८ येपामर्थाय सग्रामे रजिरात्तायुध प्रभु । योत्स्यते ते विजेष्यन्ति त्रील्लोवान्नाश सराय use रजिर्यतस्ततो लक्ष्मीर्यतो लक्ष्मीस्ततो धृति । यतो धृतिस्ततो धर्मो यतो धर्मस्ततो जय १८० तवा दानवाः सर्वे तत थ त्वा रजेर्जयम् । अभ्ययुर्जयमिच्छन्त स्तुवन्तो राजसत्तमम् ।।८१ ते रदृष्टमनस सर्व राजान देवदानवा । ऊधुरस्मजयाय त्व गृहाण वरकामुकम् ॥२ अहष्यामि नो युद्ध देवान् शपुरोगमान् ! इन्द्रो भवामि धर्मात्मा ततो योत्स्यामि सयुगे ।।८३ अस्माकमिन्द्र प्रह्लादस्तस्यार्थे विजयामहे । अस्मिस्तु समये राजस्तिष्ट था देव नोऽदिते ।।८४ . रजियुद्ध वर्णन ] २०७ उम समय परम दारण देवासुर युद्ध के उत्पन्न होने पर देवगण मौर अमुरवृन्द इनके पनन्तर पितामह में बोले ॥७॥ हे सर्व लोवेचा ! भगवान् पतला कि हम दोनो पे युद्ध में कौन विजयी होगा-यह हम सुनना चाहते हैं ॥७८ब्रह्माजी ने कहा-जिनके लिये सग्राम में प्रभु रजि हथियार ग्रहण परने घाला होर युद्ध करेगा वे तीन लोगों को जीत लॅगे-हममे सदाय नहीं है ।७६१ जहाँ रजि है वही लक्ष्मी है पोर जहाँ पर लक्ष्मी है यही पर पुति होती है। जहा पर धृति है यहाँ धर्म रहता है और जहाँ धर्म है यही पर जय होती है 1८०॥ तब तो देवता लोग मोर दानव सभी रजि दी जय श्रवण कर जय की इच्छा करते हुए राजाप्रो मे परम श्रेष्ठ रजिदी स्तुति करते हुए यहाँ गये ।। वे सब देव पौर दानव प्रसन्न मन वाले राजा से बोले कि हमारे जय के लिये प्राप घेष्ठ धनुप ग्रहण कर ।।२।। रजि ने कहा-मैं इन्द्र जिनरा अग्रगामी है ऐसे देवो को युद्ध मे नही जीतू गा । धर्मात्मा इन्द्र होता है तब युद्धभूमि में सई गा ।।८३॥ दानवों ने कहा-हमारा इन्द्र प्रह्लाद है । उमषे लिये हम विजय स करते हैं। है राजन् । इस ममय म प्रदिति के यहाँ न ठहरिये ॥४॥ स तथेति वन्नेव देवरप्यभिचोदितः । भविष्यसीन्द्रो जित्वे त देव रपि निमन्त्रित ।।८५ जधान दानवान् सर्वान् समक्ष वज्रपाणिन । स विप्रनष्टां देवाना परमश्री थिय वशी॥८६ निहत्य दानवान् सर्वान् व्याजहार रजि प्रभु । त तथा तु रजि तत्र देवैस्सह शतक्तु ।'८७ रजिपुशोऽहमित्युक्त्वा पुनरेवाप्रवीद्वय । इन्द्रोऽसि राजन् देवाना सर्वेपानाग सशय । यस्याहमिन्द्रपुरस्ते ख्याति यास्यामि शत्रुहन् ।1८८ स तु शक्रवच श्रुत्वा वश्चितस्तेन मायया तथेत्येवानबीद्वाजा प्रीयमारण शतक्रतुम् ॥ तस्मिस्तु देवसदृशे दिव प्राप्त महीपतो दायाद्यमिन्द्रादाजह्न राचार तनया रजे ॥६० २०८ ] [ वायु पुराण तानि पुत्रशतान्यस्य तच्च स्थान शचीपत 1 समझामन्त बहुधा स्वगलोर त्रिविष्टपम् ॥६१ तत काने वहुतिथे समतोते महावल । त्दृतराज्योऽनवौच्छको हतभागो वृहस्पतिम् ॥६२ वह तथास्तु अर्थात् ऐसा ही होवेगा-यह कहता हुआ तथा देवो के द्वारा भी बहुत प्रेरित हुआ और देवो के द्वारा नित्रित होता हुग्रा जीतकर इन्द्र होगा यह कहा गया था 11१५॥ वजवाणि ( इद्र) के समक्ष म उसने समस्न दानवो का हनन किया था । देवो की विशेष रूप मे नष्ट हुई श्री को वा रखने वाला वह परम थी होगया ॥६६॥ समस्त दानवो को मारकर प्रभु रजि ने कहा वहाँ उस प्रकार से रजि को देवो क सहित इद्र ने मैं रजि का पुत्र ई- यह कहकर फिर वचन कहे । हे राजन् । पार समस्त देवों के इद्र है इसमें तनिक भी समय नहीं है । हे पत्रुहुन । जिस डेरा मैं इन्द्र पुत्र है-यह स्याति को प्राप्त करूगा ||८८1। वह इन्द्र के वचन को मुनकर उसके द्वारा माया स वञ्चित किया गया था। राजा ने तपास्तु-यह ही शन क्रतु ( इन्द्र ) को प्रसन्न करते हुए कहा ॥८६॥ उप राजा के जोकि देव के तुल्य मा स्वग में प्राप्त हो जाने पर रति के पुत्रो ने इन्द्र से दायाद प्राचार को ले लिया था ||10) इसके सन पाँचसौ पुत्रो शची के पति इद्र के उस स्थान त्रिविष्टप स्वग लोक को बहुत प्रकार से सक्रान्त कर लिया था ॥६॥ इसके मन तर बहुत काल के व्यतीत होजाने पर महान बल वाला राज्य के छिन जाने वाला भाग्यहीन द्र बृहस्पति से जाकर बोजा ॥२॥ वदरीफ्लमात्र पुराडारा विधत्स्व मे। ब्रह्म येन तिष्टेय तेजसाप्यायितस्तत ३ ब्रह्मन् कृशोऽय विमना हुतराज्यो हृताशन । हतोजा दुबगो मूढो रजिपुगे प्रसीद मे ।। यद्यच चोदित शा त्वया स्या पूयमेव नाभविष्यत् त्वत्प्रियाय नास्तव्य ममानर ॥५ - रजि युद वर्णन ] [ २०१ पूजा तु महती चैव नित्यमेव प्रयुज्यते । गन्धैधू गश्च माल्यश्च प्रेक्षणीयस्तथैव च ।।४१ हे द्विजोत्तमो,' उस प्रकार मे कहे हुये महादेव ने समस्त लोको को देवार वाम के लिए भूथिवी मे महान तेज वाने महेश्वर ने मिडक्षेत्र वाराणमी को पमन्द रिया । दिवोदाम के द्वारा उम नगरी को निविष्ट जानकर उन महा- देव ने पास में स्थित क्षेमक गणेग में कहा ॥३६॥ हे गणेश्वर पुरी में जाकर वाराणसी को शून्य करदो। और मृदु अम्युपाय मे.वह पार्थिव प्रतिवीर्य हो गया ॥३७।। इसके अनन्तर निकुम्भ पुरी वाराणसी म जाकर पहिले मर्न नाम नापित को स्वप्न में दिखाया या ॥३८॥ हे अतए | मैं तेरा श्रेय करूंगा, मेरे स्थान को गेषित करो। मेरेप वाली प्रतिमा को बनाकर नगरी के अन्त में निवेगित करदो ॥३॥ हे द्विज वृन्द | स्वप्न म जैसा देखा पा उम प्रकार का सब करा दिया था । और यथा विधि राजा को नगरी के द्वार पर अनुनापित करके नित्य ही महती पूजा गन्ध-पूप-दीप और प्रेक्षणीय मान्यो के द्वारा की जाती है ॥४० ४१॥ अन्नप्रदानयुक्तंश्च प्रत्यद्भुतमिवाभवत् । एव सम्पूज्यते तत्र नित्यमेव गणेश्वर १४२ ततो वरसहस्राणि नगराणा प्रयच्छति । पुमान् हिरण्यमायू पि सर्वकामास्तथोव च ॥४३ राज्ञस्तु महिपो श्रेष्ठा सुयशा नाम विश्रुता। पुनार्थमागता साध्वी राज्ञा देवी प्रचोदिता ॥४४ पूजान्तु विपुला कृत्वा देवो पुत्रानयावत । पुन पुनरथागम्य वहुश पूनारणात् ।।४५ न प्रयच्छति पुनास्तु निकुम्भ कारणेन तु । राजा यदि तत् क्रुध्येत तत विञ्चित् प्रवर्तते ।।४६ अथ दीर्घण कालेन क्रोधो राजानमाविशत् । भूत विद महाद्वारि नगराणा प्रयच्छति ।।१७ २०२ ] [ वायु पुराण प्रीत्या वराश्च शतशो न किञ्चित्तु प्रवर्तते । मामक. पूज्यते नित्य नगर्यां मम चैव तु ॥४८ ताञ्चितश्च बहुशो देव्या मे तत्र कारणात् । न ददाति च पुत्र में कृतघ्नो पहुभोजन ॥४६ अतो नार्हति पूजान्तु मत्सकाशाद कथचन । तस्मात्त नाशयिष्यामि तस्य स्थान दुरात्मन ॥५० एवं तु स विनिश्चित्य दुरात्मा राज किल्विपी। स्थान गणपतेस्तस्य नाशयामास दुर्मति ॥५१ भग्नमायतन दृष्ट्वा राजानमगमत् प्रभु । यरमाहतेऽपराध मे त्वया स्थान विनाशितम् ॥५२ और मन्न प्रदान से युक्तो के द्वारा प्रत्यद्भुत की तरह होगया था। इस प्रकार से वहाँ पर नित्य ही गणेश्वर की बहुत अच्छी तरह पूजा की जाती है ॥४२॥ इसके पश्चात् नगरो को सहस्र वरदान देती है । पुत्रो को-हिरण्य को- मायु को और समस्त प्रकार के कामो का वरदान देती है । राजा की महिपी (पहाभिषिक्ता रानी) श्रेध यी जोवि सुयशा इस नाम से विश्रुत थी। राजा के द्वारा प्रेरित होकर साध्वी रानी पुत्र के लिये वहाँ भाई पौ ।।४३.४४॥ देवी ने विपुल पूजा से उराने पुषी की याचना की थी और पुत्र के कारण मे यहुन वार वह पुन पुन वहाँ माती पी॥४५॥ निकुम्भ पुत्रो को तो कारणवश नहीं देता है । राजा यदि फूड हागा तो इसरे पश्चात् बुछ प्रवृत्त होगा I इमो मनन्तर लम्बे समय में राजा रे हृदय में बोष ने प्रवेश दिया था।नररों में मा द्वार पर यह भून को देता है ।।४७॥ प्रीति से सरो वरदान देना है जिन्तु कुछ होता नहीं है । मेरी नगरी में मेरे लोगों के द्वारा निरस ही यह पूनित भी frया जाता है ॥४८॥ मेरे कारण से देवी के द्वारा यह बहुत बार पूजित पा है जिन्नु कृतघ्न पौर वन भोजन करने वाला यह पुष नहीं देता है Itil इसलिए मेरे द्वारा रिमी भी प्रकार से यह पूजा करने के योग्य नहीं है। इससे दम दुरामा रे स्थान को मैं नष्ट करादूगा। इस तरह मे राजाओ में पापी दुष्ट उमने निश्चय के दुष्ट बुद्धि वाओ ने उग गणपति पे स्थान को नष्ट कर रजियुद्ध वर्णन ] [ २०३ दिया था ॥५१॥ प्रभु अपने आपनन को भग्न हुअा देखकर राजा के पास पाये कि जिससे बिना किमी अपराध के तूने मेरे स्थान को नष्ट करा दिया है ॥५२॥ अकस्मात् तु पुरी शून्या भविती ते नराधिपः । ततस्तेन तु शापेन शून्या वाराणसी तथा ।।५३ शता पुरी निकुम्भस्तु महादेवमथानयत् । शून्या पुरी महादेवो निर्ममे परमात्मना ॥५४ तुल्या देवविभूत्यास्तु देव्याश्च व महात्मनः । रमते तत्र व देवी रममाणे महेश्वर' ।।५५ न रति तत्र व देवी लभते गृहविस्मयात् । देव्या क्रीडार्थमीशानो देवो वाक्यमथाब्रवीत् ॥५६ नाह वेश्म विमोक्ष्यामि अविमुक्त हि मे गृहम् । प्रहस्येनामयोवाच अविमुक्त हि अविमुक्त हि मे गृहम् ॥५७ नाह देवि गमिष्यामि गच्छरवेह रमाम्यहम् । तस्मात्तदविमुक्त हि प्रोक्त देवेन वै स्वयम् ॥५८ एव वाराणसी शप्ता अदिमुक्त च कीर्तितम् । यस्मिन् वसति व देव सर्वदेवनमस्कृत । युगेपु त्रिपु धर्मात्मा सह देव्या महेश्वर ५६ अन्तर्धान कलौ याति तत्पुरन्तु महात्मनः । अन्तहिते पुरे तस्मिन् पुरी सा वसते पुनः ।।६० उन्होन राजा से कहा हे नराधिप । अचानक तेरी यह पुरी शून्य हो जायगी । इसके पश्व त् उम चाप से वा गरामी पुगे शून्य होगई थी ॥३॥ निकुम्भ शाप से युक्त उस पुरी मे महादेव को ले पाये थे । महादेव ने उस पुरी का परमात्मा के द्वारा निर्माण किया था ॥५४॥ वह पुरी देवो की विभूति के तुल्य थी और महात्मा की देवी के भी तुल्य थी । वहाँ पर महेश्वर के रमण करने पर देवी रमण करती है ।।५।। गृह के विस्मय के कारण से देवी को रति प्राप्त नही होती है। देवी की क्रीडा के लिए देव ईशान (महादेव) यह वाक्य बोले ॥५६॥ मैं गृह का त्याग नहीं करूंगा। मेरा घर प्रविमुक्त है। शून्य २०४ ] [ वायु पुराण इसके अनन्तर हम कर वोले मेरा गृह अविमुक्त हाना है ॥२७॥ हे देवि ! मैं नहीं जाऊंगा, तुम जामो, मैं यहाँ रमण करता हूँ। इमसे देव ने स्वयं उस विमुक्त कहा है ।।१८। इस प्रकार मे वाराणसी पुरी शाप मे युक्त है और वह अविमुक्न कही गई है । जिस पुरी में समस्त देवो के द्वारा नमस्कृत-तीनों युगो मे धर्मात्मा महेश्वरदेव देवी के साथ निवास किया करते हैं ।।५।। कलियुग म महान् प्रात्मा वाले का वह पुर अन्तति को प्राप्त हो जाता है और उस पुर के अन्त न होने पर वह पुरी पुन बस जाती है ॥६०॥ एव वाराणसी शप्ता निवेग पुनरागता । भद्रथं व्यस्य पुत्राणा शतमुत्तमधन्विनाम् ॥६१ हत्वा निवेशयामास दिवोदासो नराधिप । भद्रदेण्यस्य राज्यन्तु त्तन्तेन बलीयसा ॥६२ भद्रग्यस्य पुत्रस्तु दुर्दमो नाम नामत । दिवोदासेन वालेति घृणया स विवर्जित ॥६३ दिवोदामाइपद्वत्या वीरो जज्ञे प्रतई नः। तेन पुरेण वाले न प्रत्हत तस्य व पुन ॥६४ वरस्यान्त महाराज्ञा तदा तेन विधत्सता । प्रतई नस्य पुत्रो द्वौ वत्सो गर्गश्च विश्रुत (६५ वत्सपुनो ह्यलकंस्तु सन्नतिस्तस्य चात्मज । अलर्ष प्रति राजपिर्गीतश्लोको पुरातनौ ।।६६ पष्टिवर्पसहस्राणि पष्टिवर्पशतानि च । युवा रूपेण सम्पनो हलकं कागिसत्तम ।।६७ लोपामुद्रा प्रसादेव परमायुरवाप्तवान् ॥६८ इस तरह शाप युक्त हुई फिर निवेश को प्राप्त हुई भद्रयगय के उत्तम धनुपधारी सौ पुत्रो का हनन करक दिवोदाम राजा ने पुन इम निवाशित किया या । उस बनवान् न भद्रश्रेण्य व राज्य का हरण कर लिया था ॥६१-६२।। भद्र एय का एक पुत्र नाम से दुर्दम था। दिवोदाम ने उमे बालक है- इस पुणा से छोड़ दिया था ॥६॥ दियोसस से पदनी म प्रतर्दन नारक वीर पुष घद्रवश कोतन (२) ] [ २१३ योवत्सुदेशप्रभव कौरवो जनमेजय । कुरो पुनस्य राज्ञस्तु राज्ञ पारिक्षितस्य ह । जगाम स रथो नाश शापाद्गायत्य धीमत ॥२१ गाय॑स्य हि सुत बाल स राजा जनमेजय । दुर्बुद्धिहिंसयामास लोहगन्ध नराधिपम् ॥२२ स लोहगन्धो राजपि परिधापतितस्ततः। पौरजानपदस्त्यक्तो न लेभे शर्म वहिचित् ।।२३ तत स दु खसन्तप्तो नालभासविद क्वचित् । शशाप हेतुक्मृपि शरण्य व्यथितस्तदा ॥२४ वह रप मन के समान वेग वाले प्रश्वो रो युक्त था जिससे कया समु- द्वहन किया था। उसने उस मुस्य रथ के द्वारा मही को जीत लिया था ।।१।। ययाति देटता और दानवा के द्वारा युद्ध में अत्यन्त दुधा था। पौरवो म और राजापो म मवम वह रप हुआ था ॥२०॥ योवरसुदेश से उत्पन्न होने वाला कौरव जनमेजय था । राज कुरुके पुत्र और राजा पारिशित का वह रय धीमान् गाग्य के शाप से नाश को प्राप्त हुना था ॥२१॥ उम राजा जनमजय ने बालक की अवस्था में दुर्वृद्धि होकर गाय के पुत्र लोहगन्ध नराधिप की हिंसा की थी ।।२२।। बह गपि लोहगध इधर उधर दौडता हुअा पौरजन पदो के द्वारा त्याग हुमा कहीं पर भी शान्ति को एव कल्याण का प्राप्त नहीं हुआ ॥२३॥ इसके अनन्तर दुख से सतृप्त होते हुए कही पर भी मविद को प्राप्त नहीं किया था। तव अत्यन्त पथा स युक्न होकर उसने भरण्य हेतुक ऋषि का शाप दे दिया था ॥२४॥ इन्द्रोतो नाम विश्याता योऽसौ सुनिझदारधी । योजयामास चन्द्रात शोनको जनमेजयम् । अश्वमेधेन राजान पावनायं द्विजात्तम. ॥२५ स लोहगन्धो व्यनशत्तस्यावसथमेत्य है। स च दिव्यो रथस्तस्मादसोच दिपतेस्तथा ॥२६ तत शबरा तुष्टेन लेभे तस्माद्वृदय ।
११४ ] [ वायु पुराण ततो हत्वा जरासन्ध भीमस्त रयमुत्तमम् । प्रददी वासुदेवाय प्रोत्या कौरवनन्दन ॥२७ स जरा प्राप्य राजपिर्ययातिनंहुपात्मज । पुत्र ज्येष्ठ वरिष्ठञ्च यदुमित्यत्रवीद्वच ।।२८ जरावली च मा तात पलितानि च पर्यगु । काव्यस्योशनस शापान च तृप्तोऽस्मि यौवने ॥२६ व यदो प्रतिपद्यस्व पाप्मान जरया सह । जरा मे प्रतिगृह्णीष्व त यदु प्रत्युवाच ह ॥३० अनिर्दिष्टा मया भिक्षा ब्राह्मणस्य प्रतिभुता। सा च व्यायाममाध्या वै न ग्रहीष्यामि ते जराम् ॥३१ जराया बहवो दोपा पान भोजनकारिण । तम्माज्जरान ते राजन ग्रहीतुमहमुत्सहे ॥३२ जो उदार बुद्धि वाला मुनि इन्द्रात नाम से विरयात था उस इद्रोन और द्विजोत्तम शोनक न जनमेजय राजा का पावन होने के लिये अश्वमेध यन करने के लिए योजित किया था ।॥२५॥ उस लोहग ध ने उसके पावास म पाकर उस रथ का विनाश कर दिया था। और वह दिव्य रथ चेदिपति वसु से और इसके अनन्तर उससे वृहद्रथ तुष्ट होने वाले इन्द्र ने प्राप्त किया थ । इसके पश्चात् भीम न जरासंध को मार कर उम उत्तम रथ को कौरव नदन ने परम प्रसन्नता से वासुदेव को दे दिया था ।।२६ २७। वह राजर्षि ययाति नहुप का पुत्र वृद्धावस्था को प्राप्त कर अपन ज्येष्ठ एब वरिष्ठ पुत्र यदु से यह वचन बोला ॥२८॥ हे तात यह वृद्धता की अवस्था ने चारों मार से मुझे घेर लिया है पलित बना दिया है मेरी यह दशा उशना काव्य के शाप हो गई है और पौवन में अभी तृप्त नहीं हुआ हूँ ॥रा है यदी । तुम इम जरा अर्थात् के सहित पाप को ग्रहण करो नव मदु ने उत्तर दिया 11३०।। मैंने ब्राह्मण अनिर्दिष्ट भिक्षा की प्रतिज्ञा की है और वह व्यायाम के द्वारा ही साध्य है मापकी वृद्धता को ग्रहण नहीं करूंगा ॥३१॥ इन वृद्धता तथा भोजन करने काल बहुत से दोष होने हैं इस कारण से हे राजन् ! मैं उसे प्रहण करने को उत्साहित नहीं होता हूँ ॥३२॥ - मैं इस के पान
चद्रवा बीतन (२) 1
[ २१५
सितश्मधरो दोनो जरया शिथिलीकृत ।
वलीसनतगात्रश्च दुई शो दुवलाकृति ॥३३
अशक्त वायकरणे परिभूतस्तु यौवने ।
महोपभीतिमिश्च व ता जरानाभिकामये ॥३४
सन्ति ते वर्षों पुत्रा मत्त प्रियतरा नृप ।
प्रतिगृह तु धर्मज्ञ पुत्रमन्य वृणीष्व व ॥३५
स एवमुक्तो यदुना तीव्रकोपसमन्वित ।
उवाच वदता थठो ज्येष्ठ त गएन् सुतम् ॥३६
पाश्रम पश्च वान्योऽस्ति को वा धमविधिस्तव ।
मामनादृत्य दुर्बुद्ध यदात्य नवदेशिक ॥३७
एवमुक्त्वा यदु राजा शशापन स मन्युमान् ।
यस्त्व मे हृदयाजातो वय स्वन प्रयच्छसि ।।३८
तस्मात राज्यभाग मूढ प्रजा ते व भविष्यति ।
तुदसो प्रतिपद्यस्व पाप्मान जरया सह ।।६
न कामये जरा तात कामभोगप्रणाशिनीम् ।
जराया बहवो दोपा पानभोजनकारिण ।
तस्माज्जरा न ते राजन् ग्रहीतुमहमुत्महे ॥४०
वृद्धना स सफद दाढी मूछ वाला होकर दीन और तिथि 7 सा रहने
चाला-बलवान् भी सनत ( भुने हुए ) गात्रो वाला दुदमा रा युक्त एव दुवल
माति वाला पौवन म ही परिभूत होकर काय करने म अममय हो जाता है
पौर उस महान् उपभीनियाँ हुआ करती हैं इन कारणा स मैं पापको वृद्धता को
नही लना चाहता हूँ ॥३३ ३४।। हे राजन् । मुभम भी अधिक प्रिय मापके बहुत
स पुत्र हैं। ह धर्मम | वे इमे ग्रहण करें इमलिय किमी अ य पुत्र का वरण
करें ॥३५॥ एदुक द्वारा इस प्रकार से कहा गया वह बहुत ही तीव कोप से
युक्त होवर बोलो यानो म परम श्रेष्ट अपन ज्येत्र पुत्र को मिला करता हुआ
घोला 1॥३५॥ फोनमा वह आधम है प्रथया कानगी यह ती धम की विधि है ?
हे दुष्ट बुद्धिवार ! हे नवगित ! जोकि तू मेरा मनादर करके ऐसा बोल
२१६ 1 [ वायुनुराग है ॥३७॥ क्रोधसे युक्त यह राजा इस प्रकार से बहार उमन यदु को शाप दे दिया कि नू मेरे हृदय से उत्पन्न हुआ था और तू अपना यौवन मुझे नहीं दे रहा है ॥३८॥ हे मूड तू इस कारण से राज्य का मागी नही होगा। हे तुर्वगो । तू मेरी वृद्धता के साथ मेरे दाम पापको ग्रहण कर |॥३६॥ सुर्वमु कहा-हे तान । काम मोर भोगा का नाश करने वाली इस वृद्धता को मैं नही चाहता हूँ। पान तथा भोजन करने वाल इस जगमे बहुत मे दोप वरते है इसमें हे गजन् । मैं इस जग को ग्रहण नहीं करना चाहता हूँ ॥४॥ यस्त्व मे हृदयाज्जातो दय स्वन्न प्रयच्छसि । तस्मात् प्रजा समुच्छेद तुर्वमो तव यास्यति ४१ अमकी च धर्मण प्रतिलोमवरेषु च । पिशितादिपु चान्येषु मूढ राजा भविष्यसि ॥४२ गुरदारप्रसक्त पु तिर्यग्योनिगतेषु वा । पशुधर्मेपु म्लेच्छेपु भविष्यति न मगय ॥४३ एवन्तु नुवसु शप्त्वा ययाति सुतमात्मन । शर्मिष्ठाया सुत हा मिद वचनमब्रवीत् ।।४४ द्रुह्यो त्व प्रतिपद्यस्व वर्णरूपविनाशिनीम् । जरा वर्पसहस्र वै यौवन स्वन्ददस्व मे ॥४५ पूर्णे वर्षसहस्र ते प्रतिदास्यामि यौवनम् । स्वञ्चादास्यामि भूयोऽह पाप्मान जरया सह ।।४६ न गज न रथ नाव जीर्णो भुक्तन च स्त्रियम् । न सङ्गश्चास्य भवति न जरा तेन कामये ॥४७ यस्त्व मे हृदयाज्जातो वय स्वन्न प्रयच्छमि। तस्माद्रुह्यो प्रियः कामो न ते सम्पत्स्यते क्वचित् ।।४८ ययाति ने कहा-तू मेरे हृदय से उत्पन्न हुमा है और फिर भी अपना यौवन मुझे देना नहीं चाहता है इससे हे तुर्वसु । तेरी सन्तान का समुच्छेद हो जायगा ॥४१॥ तेरो प्रजा धम से प्रतिलोम वरो म अमङ्कीर्ण होगी। हे मूद मौर पर पिशित प्रादि मे राजा होपा ॥४२॥ गुरु की दारा में प्रमक्त प्रथवा - रजियुद्ध वर्णन ] [ २०६ प्रयतिष्यामि देवेन्द्र तद्धितार्थ महाधु ते । यथा भागञ्च राज्यञ्च अचिरात् प्रतिपत्स्यसे ।।९६ तथा शक गमिष्यामि माभूते विश्लव मन । तत कर्म चकारास्य तेज सबर्द्धन महत् ।।६। तेपाच बुद्धिसमोहमकरोद्धिसत्तम । ते यदा समुता मूढा रागोत्सना विम्मिरण ।।१८ ब्रह्माद्विपश्च सवृत्ता हतवीर्यपराक्रमा । ततो लेभे मुरंश्वर्यमंन्द्रस्थान तथोत्तमम् ॥६E ह्त्वा रजिसुतान् सर्वान्कामोधपरायणान् । य इद पावन स्थान प्रतिष्टान शतक्रतो । शृणुयाद्वा रजेर्वापि न स दौरात्म्यमाप्नुयात् ॥१०० हे ब्रह्म । मेरे लिए पदरी फल (देर) के बराबर पुरोडश परो जिमग मैं तेज में प्राप्पायित (तृप्त) होता हुआ ठहरू ॥६३॥ हे ब्रह्मत् । मैं कृश हूँ- उदाप्त हूँ-छिने हुए राज्य वाला और छिने हुए भोजन वाला हूँ । रजि के पुत्रो के द्वारा हुन योज वाला-दुर्बल तथा मैं मूढ किया गया है । आप मुझ पर प्रसन्न होइये ॥१४॥ बृहस्पति ने महा-है इन्द्र । यदि इस प्रकार मे तेरे द्वारा मैं पहिले ही प्रेरित होना तो हे अनघ । तेरे प्रिय के लिये मेरा मक्त्तव्य न होता ॥६५॥ हे देवेन्द्र । हे महान् चुति वाले । उम तेरे हित के लिए मैं प्रयत्न कगा जिममे दीघ्र ही तेरा भाग और राज्य प्राप्त हो जायणा ॥६६॥ हे शक्र । उस तरह से मैं जाऊ गा तू अपना मन विक्लव पूर्ण मन करे। इसके पश्चात् इसके महान् तेज के बढाने वाला कर्म किया था 30 बुद्धि मे परम श्रेष्ठ ने उनकी बुद्धि का सम्ोह कर दिया कि जिम ममय में पुत्रो के महिल उत्पन राग बाले-मूठ तथा विधर्मो होगये II वे ब्राह्मणो से द्वेष करने वाले प्रौर बीयं तथा पराक्रम के नाश कर देने वाने होगये थे फिर इसके बाद देवो के ऐश्वयं इन्द्र के स्थान को जोकि परमोत्तम या, प्राप्त कर लिया था Intel कामवासना और कोच की भावना में तत्पर रजि के समस्त पुत्रो को मारकर जो यह पावन 1 २१० ] [ वायु पुराण स्थान और इद्र का प्रतिष्ठान था प्राप्त कर लिया था। रजि के इस इतिहास को जो भी काई सुनता है वह कभी दुरात्मा को प्राप्त नहीं होता है ॥१०॥ प्रकरण ५५-चन्द्रवंश कीर्तन (०) मरुतेन कथ कन्या राज्ञे दत्ता महात्मना । क्विीयश्चि महात्मानो जाता मरुतकन्यका ॥१ आहवन् त मरुत्सोममनकाम प्रजेश्वरम् । मासि मासि महातेजा पष्टिमवत्सरान् नृप ॥२ तेन ते मरुतस्तस्य मरुत्सोमेन तोपिता । अक्षय्यान्न ददु प्रीता सवकामपरिच्छदम् ॥३ अन्न तस्य सकृत्पक्वमहोराने नक्षीयते । काटिशो दीयमान च सूर्यस्योदयनादपि ॥४ मित्राज्योतिस्तु कन्याया मरुतस्य च धीमत । तस्माजाता महामत्वा धमज्ञा मोक्षशिन ||५ सन्यस्य गृहधर्माणि वैराग्य समुपस्थिता । यतिधममवाप्येह ब्रह्मभूयाय ये गता ।।६ अनपायस्ततो जातस्तदा धर्म प्रदत्तवान् । क्षमधमस्ततो जात प्रतिपक्षो महाता ॥७ प्रतिपक्षसुतश्चापिरो नाम विश्रुत । सञ्जयम्य जय पुना जयस्तस्य जग्मिवान् 115 विजयस्य जय पुत्रस्तस्य हयन्द्वत स्मृत । हर्यन्दुतस्ततो राजा सहदेव प्रतापवान् सहदेवस्य धर्मात्मा अदीन इति वियत । अदीनस्य जयत्मेनस्तस्य पुनोऽथ सकृति ।।१० पिगरण ने कहा-महात्मा मरुत ने राजा को या कैमे दी। मोर महामा मरुन को क्याएँ जा महान प्रारमा वाली थी विम प्रसार रे मोय परमीन (२) ] [२११ वाईपी ॥१॥ श्री मूनवी ने कहा-माना ने पन्न मी सामना रखो हा प्रबेश्वर उग गाम का पाहपन रिसा पा । महान तेज वा राजा ने माग- माग में अर्थात् प्रस्पर माम मे गार वर्ष पर्यन ऐमारा पा॥२गगे पे मात मोम ये द्वारा सोषित रिय ग थे पोर परम प्राप्त होने हुए उन्ही समस्त पाममा परि पाप पारददिपा पाउमा एपचार पापा मा पन्न ए पहोगत्र म गीग नही होता है और गूप में मागे भी परोसो को दिया हा भी पारे को नहीं शीण नहीं होता है ।।४। गुदि. मान मरागी काया में मित्रायोलि पोर उमगे मोश ये देगने बारे परिमा महागाव उत्पन्न हुए ॥५॥ वे गृह धमों ा भनी-भानियाग पारेराम्य को प्रान हुए थे पहा पनि धम को पार ये मय ब्रह्म में स्वरप को न गये ॥६॥ इमरे पननर पापाय उत्पन्न हुमा नब उसमे पर्ण प्रसपान गंदा हमा उगमे पिर पर्म गहमर मोर उगगे महार सापाला नि पाने जन्म ग्रहण पिया था।जा विपक्ष का पुत्र भी गमय इस नाम से प्रमिरहमा पा। मजय के पुत्र का नाम जप या पोर उस जय विजय नाम वाला पुर उपम हुआ पा विजय पुत्र का नाम जय था और उमर पुत्र का नाम इयंन्दुत या था दयन्दावे पुत्र या नाम प्रतार वाला महदेव राजा पा ॥६॥ महो। 4 धर्मात्मा प्रदीन हग नाम मे विश्रृत हुपा था । भदोन पे पुत्र का नाम जप- एंगेन हापौर उपये सति नामर पुत्र हुपा था ॥१०॥ मकृतेरपि धर्मारमा वृतधर्मा महायगा । इत्येते क्षत्रधर्मागा नहपस्य नियोधत ॥११ नहुपस्य तु दायादा पडिन्द्रोपमतेजम । उत्पन्ना पितृकन्याया विरजाया महौजसः ॥१२ यतिर्ययाति मयातिरायाति पञ्च तुद्वय । यतिज्येष्टस्तु तेपा वै ययातिस्तु तनोजर ॥१३ काकुत्स्पकन्या गा नाम लेभे पानी यतिस्तदा। सपातिर्मो क्षमास्थाप ब्रह्मभूनोऽभवन्मुनि ॥१४ २१२ ] [ यायु पुराण तेषा मध्ये तु पञ्चाना ययाति पृथिवीपतिः । देवयानिमुशनस मुता भार्यामवाप ह ॥१५ शर्मिष्टा मासुरी चैव तनया वृषपर्वण. । यदु च तुर्वसुचव देवयानिव्यंजायत ॥१६ द्रुह्य ञ्चानुञ्च पूरुञ्च शर्मिष्ठा वापरणी। अजीजनन्महावीर्यान् सुतान्देवसुनोपमान् ।।१७ रथन्यस्मै ददौ रुद्र प्रीत. परमभास्वरम् । प्रसङ्ग काञ्चन दिव्यमक्षयौ च महेपुधी ॥१८ मस्कृति के पुत्र का नाम धर्मात्मा एव महान् यश वाला कृतघर्मा हुआ था । थे इतने क्षत्र धर्म वाले हुए थे अब नहुप के वश मे जो उस्पन हुए थे उनको समझ लो ॥११॥ नहुष के दायाददै हुए थे जोकि इन्द्र के समान तेज- स्वीये और वे सब महान् पोज वाले पितृ कन्या विरजा में उत्पन्न हुए थे ।१२। जिनके नाम यनि-ययाति-मयाति-प्रायानि और पञ्च एव तुद्वय थे । उन सबमें यति सबमे वहा था और ययाति उससे छोटा था ॥१३॥ तव गा नाम वाली काकुत्स्थ की कन्या को यति ने पत्नी के रुप में प्राप्त किया था। मयति मोक्ष के कार्य में स्थित होकर ब्रह्मभूत मुनि होगया था॥१४॥ उन पांचा के बीच में ययाति जो था वह पृथिवी का स्वामी बना था। उमने उशन्त की पुत्री देवयानी को भार्या के रूप में प्राप्त किया था ॥१५॥ और प्रामुरी वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा को प्राप्त किया था। देवयानी ने यदु और तुर्वसु का उत्पन्न किया था चार्य पर्वणी शमिष्ठा ने गुह्यमनु और तुरु को जन्म दिया था जोकि पुत्र महान् वीर्य वाले एव देव पुत्री के समान थे ॥१७॥ उसके लिए परम प्रसन्न होने वाले भगव न रुद्र ने अत्यन्त भास्वर-प्रसङ्ग और काञ्चन दिव्य रथ प्रदान किया था तथा दो पक्षय महेषुधो दिये थे ॥१८॥ युक्त मनो जवरश्वर्येन कन्या समुद्रहत् । स तेन रथमुरयेन जिगाय च ततो महीम् ॥१६ ययातियुघि दुद्धपों देवदानवमान । पौरवारणा नृपारणाञ्च सर्वेपा मोऽभवद्रथ ॥२० ।
चन्द्राश कोतन (२) ] [ २१७ नियंग्योनि में जाने वाले तथा यश धर्मों मे एवं म्लेच्छो मे तू होगा-इसमे तनिक भी साथ नहीं है ॥४३॥ श्री गूतजी ने यहा-ययाति हम प्रवार से तुर्यमु को शाप देकर जोकि अपना ही उराका पुत्र था फिर गर्मिष्ठा ये पुत्र द्र.ए. से यह वचन बोला ||४|| हे द्रा, तू हम मेरी यणं तथा रुप के विनाश वरने वाली जरा यो एक राइस वर्ष के लिये ग्रहण करले और अपना यौवन मुझे दे दे ॥४५।। ए हजार वर्ष पूरे होजाने के पश्चात् तुझे तेरा यौवन वापिस दे दूंगा और मैं फिर अपने पाप वे हित वृद्धता वो वापिस ले लूगा ॥४६॥ द्रुह्य ने यहा-जरासे जीणं पुरुष हाथी-घोडा-रथ और स्त्री किसी का भी भोग नहीं कर सस्ता है मोर इसषा राग भी नहीं होता है अतएव मैं आपकी जरा पो ग्रहण वरना नही चाहता हूँ ॥४७॥ ययाति ने पहा-जो तू मेरे हृदय से उत्पन्न हुपा है और इग समय मुझे अपना योपन नही देता है इसरो हे द्रुह्य. कहीं भी तेरा प्रिय पाम नहीं पूरण होगा ॥४॥ नोप्नवोत्तरसञ्चारस्तन नित्य भविष्यति । अराजधाजवशस्त्व तम नित्य भविष्यसि re मनो त्व प्रतिपद्यस्व पाप्मान जरया सह । एव यपंसहसन्तु घरेय यौवनेन ते ॥५० जीर्ण शिशुवर दत्ते जरया ह्याचि सदा। न जुहोति स कालेग्नि ता जराग्नाभिकामये ॥५१ यस्त्य मे हृदयाज्जातो वय स्वल प्रयच्छसि । जरादोपस्त्वयोत्तोऽय तस्मात्त प्रतिपत्स्यते ॥५२ प्रजा च यौवन प्राप्ता विनदिध्यत्यतस्तव । अग्निप्रस्वन्दनपर चाप्येव भविष्यसि ॥५३ पूरो त्वं प्रतिपद्यस्व पाप्मानअरया सह । जरायली च मान्तान पलितानि च पर्यगु. ॥५४ पाव्यस्योपानराः शापान्न घ तृप्तोऽस्मि यौवने पश्चिखालझरेय व विषयान वयसा तव ॥५५ ।
२१८ [ वायू पुराण पूर्णे वर्षसहस्र ते प्रतिदास्यामि यौवनम् । स्वञ्च व प्रतिपत्स्यामि पाप्मानअरया सह ।।५६ वहाँ पर नौकाप्लव का सञ्चार नित्य होगा और वहाँ तू प्रराज भ्राज वश वाला नित्य ही रहेगा ॥४६॥ हे अनो । मेरे पाप को जरा के साथ तू ग्रहण करने । इस तरह एक सहस्र वर्ष तक मैं तेरे यौवन से पानन्द प्राप्त करलू ॥५०॥ अनु बोला-जरा से जीणं व्यक्ति सदा जरा मे श्रेष्ठ वालक अशुचिता दिया करता है। वह समय पर अग्नि म हवन नहीं कर पाता है इसलिये में ऐसी जरा की इच्छा नहीं करता हूं ॥५१॥ ययाति बोला-तू मेरे शरीर एव हृदय से उत्पन्न हुआ है और मुझ अपने पिता को अपना यौवन नहीं देना चाहता है । तूने जो यह जरा के क्षेप बतला दिये हैं। अच्छा तू इन दोपो पो प्राप्त करेगा ॥५२॥ तेरी सन्तति जब यौवन को प्राप्त होगी तो नष्ट हो जायगी और तू भी अग्नि के प्रस्कन्दन मे हो परायण रहेगा ॥५३॥ हे पूरो तू मरे पाप को जरा वे साप ग्रहण करते हे तात ! यह जरावली ने मुभको मप मार से पतित कर दिया है ॥५४) उशना काव्य के शाप में मैंने अपने यौवन में कृति प्राप्त नहीं की है। तेरे यौवन से कुछ समय तक चरण बरलू और विषयो का उपभोग करू ॥५५॥ एक महर वर्ष के पूरे होजाने पर तेरा यौवन तुझे दे दूगर और अपने पाप के साथ बरा का वापिस ले लूगा॥५६॥ एवमुक्त प्रत्युवाच पुन पितरमासा। यथानुमन्यसे तात वरिष्यामि तथैव च ॥५७ प्रतिपत्स्यामि ते राजन् पाप्मान जरया सह । गृहाण यौवन मत्तश्वर वामान् यथेप्सितान् ।।५८ जरयाह प्रतिच्छन्नो वयोस्पधरस्तव । यौवन भवते दत्त्वा चरिष्यामि यथार्थपत 148 पूरो प्रीतोऽस्मि भद्रन्ते प्रोतवेद ददामि ते। सर्वकामसमृद्धा ते प्रमा राज्ये भविष्यति ॥६० पूरोरनुमतो राजा ययाति स्वा जगन्तत । रानामयामारा तदा प्रसादादागंवरम तु ॥६१ । चन्द्रवरा व तन (२) ] [ २१६ यौवनेनाथ वयसा ययातिनंहुपात्मज । प्रीतियुक्तो नरश्रेष्श्वचार विषयान् स्वकान् ॥६२ यथाकाम यथोत्साह यथावाल यथासुखम् । धर्माविरोधाद्राजेद्रो यथार्हति स एव हि ।।६३ देवानतपयद्यज्ञ पितृच्छाद्ध स्तथैव च । दोनाश्वानुग्रहैरिष्ट कामश्च द्विजसत्तमान् ।।६४ अतिथीनन्नपानश्च वैश्याश्च परिपालने । पानृशस्येन शूद्राश्च दस्यून् सनिग्रहेण च ॥६५ धर्मेण च प्रजा सर्वा यथावदनुरजयन् । ययाति पालयामास साक्षादिन्द्र इवापर ॥६६ थी मूतजी ने कहा-इस प्रकार से कहे हुए पुत्र | तुरत ही पिता से कहा-हे नात पाप जो भी कहते हैं मैं उसी प्रकार से करूंगा ॥५७॥ राजन् । मैं आपके पाप को जरा के सहित प्राप्त करलूगा । आप मुझसे मेरा यौवन ग्रहण वर लाजिये और यथेष्ट विषयो का उपभाग बरं ॥५८॥ मैं इस जरा म प्रतिच्छन हाता हुआ तुम्हारी वय के रूप को धारण करने वाला प्रापको यौवन दकर यथाथ की भांति चरण करगा ॥५६॥ ययाति बोला- है पूरो 1 मैं तुमसे बहुत ही प्रमन्न हू तेरा कल्याण हो मैं प्रसन होकर तुझे वरदान देता है कि राज्य म तेरी पजा समस्त कामनाओ से समृद्ध होगी ॥६०॥ श्री मूतजी ने कहा-पूरु से अनुमत हाने वाले राजा ययाति ने इमके अनतर पानी जरा को उस समय भागव के प्रमाद से सकामित करा दिया था ॥११॥ नहुष का पुत्र ययाति इसके अन तर यौवन की अवस्था स वह नरश्रष्ठ परम प्रसनता युक्त होत हुए अपने विषयो के उपभोगो को करने लगा था ॥२॥ यथा काम और उत्साह के अनुकून-यथा समय और सुगानुमार धम के अनुरोध से वह राजेद्र जा भी धाग्य होता है वही करता है ॥६३॥ यता के द्वारा देवो को तृप्त किया और श्राद्धो के द्वारा पितरों का सतु किया था और दीना पर उदे अनुग्रह करक तथा इष्ट की वामना को पूरा करख द्विज श्रष्टा का सतुष्ट क्यिा था ६४॥ पनि थियो को अन्न दान तया पान के द्वारा-वैश्यो को परि -- [ वाय-पुराण पूर्णे वर्षसहस्र ते प्रतिदास्यामि यौवनम् । स्वञ्च व प्रतिपत्स्यामि पाप्मानअरया सह ।।५६ वहाँ पर नौकाप्लव का सञ्चार नित्य होगा और वहाँ तू अराजधाज वंश वाला नित्य ही रहेगा ॥४६॥ हे अनो । मेरे पाप को जरा के माय तू ग्रहण परले । इस तरह एक सहस्र वर्ष तक मैं तेरे यौवन से मानन्द प्राप्त करलू ॥५०॥ अनु बोला-जरा से जीरा व्यक्ति सदा जरा से श्रेष्ठ बालक अशुचिता दिया करता है । वह समय पर अग्नि में हवन नहीं कर पाता है इसलिये मैं ऐसी जरा की इच्छा नहीं करता है ॥५१॥ ययाति बोला-तू मेरे शरीर एव से उत्पन्न हुआ है और मुझ अपने पिता को अपना यौवन नहीं देना चाहता है । तूने जो यह उरा दोष बतला दिये हैं । अच्छा तू इन दोपो को प्राप्त करेगा ॥५२॥ तेरी सन्तति जब यौवन को प्राप्त होगी तो नष्ट हो जायगी और तू भी अग्नि के प्रस्कन्दन मे ही परायण रहेगा ॥५३॥ हे पूरो । तू मेरे पाप को जरा के साथ ग्रहण करले है तात | यह बरावली ने मुझको मद और से पतित पर दिया है ॥५४॥ उशना काव्य के शाप से मैने अपने यौवन मे तृप्ति प्राप्त नहीं की है । तेरे यौवन से कुछ समय तक चरण परसू और विषयों का उपभोग करू ॥५।। एक सहस्र वर्ष के पूरे होजाने पर तेरा यौवन तुझे दे दूंगा और अपने पार के साथ जरा को वापिस ले लूगा ॥५६॥ एवमुक्त प्रत्युवाच पुत्र पितरमञ्जसा। यथानुमन्यसे तात करिप्यामि तथैव च ।।५७ प्रतिपत्स्यामि ते राजन् पाप्मान जरया सह । गृहाण यौवन मत्तश्वर कामान् यथेप्सितान् ।।५८ जरयाह प्रतिच्छन्नो वयोस्पधरस्तव। यौवन भवते दत्त्वा चरिष्यामि यथार्थवत् ।।५६ पूरो प्रीतोऽस्मि भद्रन्ते प्रीतश्चेद ददामि ते। सर्वकामसमृद्धा ते प्रजा राज्ये भविष्यति ॥६० पुरोरनुमतो राजा ययाति स्वा जरान्तत.। सकामयामास तदा प्रसादाद्भागवत्य तु ॥६१ चद्रवा कोतन (२) ] [ २२१ कामो के उपभोग म व्यतीत हुए एक सहय वर्षों का स्मरण किया था ।।७।। और काल को तथा कला एव काष्ठानो की परिगणना करके और उसी प्रकार से काल को । पूण मानकर फिर अपने पुत्र पूरु से बोला ॥७॥ हे अरिदम | सुख के अनुमार और यथोत्माह तथा काल के अनुकूल मैंन तुम्हारे यौवन के द्वारा हे पुत्र । विषयों को खूर सेवन किया है ।।७२।। हे यूरो। मैं तुमसे बहुत ही प्रसन्न हुआ ह तुम्हारा कल्याण हो भव तुम अपने यौवन को वापिस ग्रहण करो। और साथ ही इस राष्ट्र को भी तुम ग्रहण करो तुम ही मेरे प्रिय करने वाले पुत्र हो ॥७३॥ इस तरह नहुष के पुत्र ययाति राजा ने अपनी जरा को प्राप्त कर लिया था और पूर ने पुन अपना योवन प्राप्त कर लिया था ॥७४॥ अभिपेक्सुकामञ्च नृप पूल पुन कनीयसम् । ब्राह्मगप्रमुग्वा वर्णा इद वचनमव वन् ॥७५ वथ शुक्रस्य नप्तार देवयान्या सुन प्रभो। श्रष्ठ यदुमतिभ्य पूरो राज्य प्रद स्यसि ।७६ यदुष्ठस्तव सुतो जातम्तमनु तुवसु । शमिष्टाया सुतो द्रुह्य स्तताऽनु पूरुरेव च ७७ क्या ज्येष्ठानतिकम्य पनीयान् राज्यमहति । अत सम्बोवयामि त्वा धम्म समनुपालय 1195 जाह्मागप्रमुखा वा सर्वे शृण्व तु मे वच । ज्येष्ठ प्रति यथा राष्ट्र न देय म कयञ्चन ॥७६ माता पित्रावचनकृरस हि पुन प्रशस्यते। मम ज्येष्टेन यदुना नियोगो नानुपालित 1180 प्रतिकूल पिनुयश्च न स पुन सता मत । स पुत्र पुत्रवद यश्च वत्तते पितृमातृपु १ यदुनाहमवज्ञातस्तथा तुवंसुनापि च । द्रुह्य गा चानुना चैवमप्यवना कृता भृशम् ।।८२ अपने छारे प्रिय पुरु पुत्र को राज्याभिषेक करने की इच्छा वाले राजा ययानि से ब्राह्मण प्रमुख सभी वण वार यह वचन बोलें ॥७॥ है प्रभो । शुक्र २२० ] । दायु पुराण पालन के द्वारा तथा शूदो को क्रूरता के प्रभाव के द्वारा एवं दस्युमो को भली मांति निग्रह के द्वारा सन्तुष्ट विया करता था ॥६५॥ धर्म पूर्वक अपनी समस्त प्रजा का अनुरञ्जन करते हुए साक्षात् दूसरे इन्द्र के समान राजा ययाति ने प्रजा का यथावत् पालन किया या ॥६६|| स राजा सिंहविक्रान्तो युवा विषयगोचर । अविरोधेन धर्मस्य चचार मुखमुत्तमम् ॥६७ स मार्गमाणः कामानामन्तःपनिदर्शनात् । विश्वासहेलो रेमे वै वैधाजे न-दने वने ॥६८ अपश्यत्स यदा ता व वद्ध माना नृपस्तदा । गत्वा पूरो. सकाश वै स्वा जरा प्रत्यपात ।।६६ स सम्प्राप्य तु तान कामास्तृप्त खिन्नश्च पार्थिव । काल वर्षसहस्र व सस्मार मनुजाधिपः ।।७० परिसङ्घयाय कालञ्च कलाकाष्ठास्तथैव च। पूर्ण मत्वा तत काल पूरु पुत्रमुवाच ह ।।७१ यथासुख यथोत्साह यथाकालमरिंदम । सेविता विषया पुत्र यौवनन मया तव ।।७२ पूरो प्रोतोऽस्मि भद्र ते गृहाण व स्वयौवनम् । राष्ट्रश्च त्व गृहाणेद त्व हि मे प्रियकरसुत ॥७३ प्रतिपेदे जरा राजा ययातिनहुपात्मज । यौवन प्रतिपेदे च पूरु स्व पुनरात्मन (१७४ वह राजा सिंह के समान विशन्न-युवावस्था से पूरा विपप गोचर या किन्तु धर्म के विरोध न करने से उमने उतम सुख का चरण किया था ।।६।। वह कामा की अन्न पो के निदर्शन से खोज करता हुआ अपन विश्वास के हेतु से वैज नन्दन वन मे रमण वरता था ॥६॥ जद उस राजा ने उस काम- वामना को बढनी हुई ही देखा तो उस समय पूरु के पास जाकर अपनी वृनता या पुन उसन प्राप्त कर लिया था ॥६६॥ उस राजा ने उन कामो को भली- भांति प्राप्त करपे तृप्त हुपा और खिन्न भी हुमा । उस मनुजो ये स्वामी ने अपने चन्द्रवरा कीर्तन (२) ] । २२३ दिशि दक्षिणपूर्वस्या तुर्वमुतु न्यवेशयद । दक्षिणापरतो राजा यदु श्रेष्ट न्यवेशयत् ॥९८ प्रतीच्यामुत्तरस्याञ्च द्रुह्यश्चानुश्च तावुभौ । सप्तद्वीपा ययातिस्तु जित्वा पृथ्वी ससागराम् । व्यभजत् पञ्चधा राजा पुनेभ्यो नाहुपस्तदा ।।९ तैरिय पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपत्तना। यथाप्रदेश धर्मधर्मेण प्रतिपाल्यते ॥६० एव विमृज्य पृथिवी पुगेभ्यो नापस्तदा । पुत्रसका मितश्रीस्तु प्रीतिमानभवन्नृपः ॥६१ धनुन्यस्य पृपत्वाश्व राज्यञ्च व मुतेपु तु । श्री रामाननवाजा भारमावेश्य बन्धुपु ॥१२ पूरु ने मेरे बचन का पूर्ण पालन किया और मेरा पिता को भौति विशेष रूप से सम्मान किया था। मेरा यह छोटा पुत्र है विन्तु इसने मेरी प्राज्ञा मानते हुए मे वृदना को स्वय धारण किया था। पुत्रकारी पूर ने मेरा समान काम किया और सभी कुछ किया है ॥८॥ और उपना काव्य शुरु ने स्वय बरदान दिया था नि हे महामते । जो पुत्र तुम्हारे अनुकूल व्यवहार करे वही राज्य का राजा होगा ।1८३॥ इस तरह से पूर मारा भी अनुमत है उसे राष्ट्र में अभि. पिक्त कर दो। जो पुत्र गुणो से सम्पन्न हो और सदा माता-पिता का हिल करने वाना हो वह छोटा भी प्रभु ममस्त कल्याए प्राप्त करने के योग्य होता है ।१५। पूरु इम राष्ट्र के प्राप्त करने को योग्य है जो आपके प्रिय करने वाला पौर प्रापका प्रिय है । शुक्र के वरदान से अब कोई भी उत्तर कहा नहीं जा सकता है 11८६|| उस समय पौरजान पदो के द्वारा पूर्णतया सन्तुष्ट होते हुए नहुप के पूत्र ययाति इस प्रकार से कहे गये और उन्होंने अपने पुत्र पूरु को राष्ट्र में अभि- पिक्त करके दक्षिण पूर्व दिशा में तुर्वसु वो निदेशिन वर दिया था और दक्षिण मे अन्य दिशा में राजा ने श्रेष्ठ या को निर्वाचन रिया ॥८७८८॥ पश्चिम में और उत्तर मे घु और अनु इन दोनों को को निवेशित किया था। ययानि ने मागर के महित मान द्वीप पाको पृथ्वी को जीत का पांच प्रकार में उसका २२२ ] [ वायु पुराण । के नाती पौर देवयानी के पुत्र श्रेष्ठ यदु का अतिक्रमण करके पूरु को राज्य विस तरह आप दे देंगे। ॥७६॥ यदु प्रापका सबसे बडा पुत्र उत्पन्न हुआ था। उसके पश्चात् उनसे छोटा तुदंसु पुत्र है। शमिष्टा का पुत्र द्रुह्यु बडा है उसके पश्चात् उमसे छोटा पूरु है ।।७७॥ प्राप वडे पुत्रो का मबका अतिक्रमण करके छोटे पुत्र को राज्य कैसे देने को योग्य होते हैं ? इमलिये हम अापको सम्यक प्रकार से ज्ञान देते हैं कि पाप धर्म का पूर्ण पालन करे ॥७८|| राजा ययानि ने कहा है ब्राह्मण प्रमुखौ । आप समस्त वर्ण वाले मब मरे वचन का श्रवण करे । जैमा कि ज्पष्ट को राष्ट्र दिया जाता है किन्तु मुझे वह किमी प्रकार मे भी नहीं देना है ।।७६।। जो माता और पिता के वचनो का परिपालन करने बाला होता है यह पुत्र प्रशसनीय माना जाता है। मेरे ज्येष्ठ पुत्र यदु ने मेरे नियोग का अनुपालन नहीं किया था |८०1। जो पिता के प्रतिकूल हो वह मजन पुरुषो ने पुत्र नहीं माना है । पुत्र वह ही है जो पुत्र की भांति पिता पौर माता के विषय में व्यवहार किया करता है ।In यदु ने नथा तुर्वमु इन दोनो ने मेरी अवज्ञा करदी थी और छोटे द्रुह्यु ने भी इसी प्रकार से मेरी बहुत ही अधिक अवज्ञा की थी ॥२॥ पूरुणा तु कृत वाक्य मानितश्च विशेषत । क्नीयान् मम दायादो जरा येन धृता मम । सर्वकाम सर्वकृत पूरगा पुनकारिणा ।।२३ शुक्रेण च वरो दत्त काव्ये भौशनमा स्वयम् । पुत्रो यस्त्वानुवर्नेत स राजा ते महामते ॥४ भवतोऽनुमतोप्येव पूरू राष्ट्रऽभिषिच्यताम् । य पुनो गुणमम्पन्नो मातापित्रोहित सदा । सर्वमहति कर ण वनीयानपि स प्रभु १५ ग्रह पूररिद राष्ट्र य प्रिय प्रियकृत्तव । वरदानेन मुनस्य न शक्य वक्तुमुत्तरम् ॥८६ पौरजानपदस्तुष्टरित्युक्तो नाहुपस्तदा । अभिपिच्य तत पूरु स्वराष्ट्र सुतमात्मन II Naiन (२) ] ( ૨૨ नगारपाररता है। मामा भोग में गो उम्टे ये हरि सामने में पानी बारिऔर पति माया का पर्या विशेष प्रदीमा um जो भी ग धितो में मोहि-य-गुण- पोर fal पारिया गय एमपूर्णए पर्याप्त ना-याने हा मोर को प्राग नहीं होता है। Next मि गमप में समान भूतो पास भारला पोर पर भी पसं. मन भोर यपन गनी प्रकामे freTAR तवा बस कोमात मरता है IIII जब परमे मीसा और सप पपने गं परसो नहीं देता है। जव बोई भी पानी करता है पौरन पपरतात पर वो प्राण पाता है। बुद्धिवानो भाग दुगपत्र । घोर जो स्यय औगं होगाने पर जोणं नीता है या दोगामाता है पनि भागों में पन्न समय ता रहन वाया ग होता है उग मृगारयाग पाने वारेको ही 'गुम होता है जग मे जोग्ने वा गुणसभी जीरगं होगाते हैं, मया साप ही जगमी नाना मदन जीर्ण-शीग से जापाने ! fry जीतराम को भागा और घर पास रखमी मामा जीणं हाजाने पर को जीग नही हमा काम 10 ओगमार कामपभोगमा गुम है पोर जो दिया महान् मुर है दोनों मृष्णा याग के गुग की मामीला बगवर भी नही है ॥१०॥ एयमुपमा म राजर्षि गदार प्रस्थितो यनम् । भृगुतुह्नतापम्नएवा न य च महायशा । पालयित्वा प्रतशत तत्रय स्वर्गमाप्नुयात् ।।१०१ . तम्य वशास्नु पञ्च ते पुण्या देवपिमरसताः। पामा पृथिवी वृत्या गूर्यस्येव गभस्तिभिः । १०२ धन्य प्रजावानायुप्मान कीर्तिमान भवेन्नरः । ययातेरित मर्व पठम्वृण्वन् द्विजोत्तम ।।१०३ राजगि ने इस प्रकार में रहार पानी के माप वन में प्रस्थान कर दिया पा । भृगु तुद पर लप करके ो महान् पश वा ने यहां पर ही मौता का पावन पर वहाँ पर ही स्वर्ग की प्राप्ति की थी ॥१.१॥ उसके ये पाच २२४ ॥ [ वायु पुराण महुप के पूष ने उम ममप मे पुत्री के लिये विभाजन कर दिया था उनके द्वारा यह समस्त पृथ्वी जिमम मात दीप हैं उमे पत्तनो ( नगरो) के सहित प्रदेशो के अनुसार धर्म के ज्ञातानो उनने धर्म पूर्वक पालन किया था । इस प्रकार मे नहुष के पुत्र ययाति ने उस समय पत्रो के ऊपर पृथ्वी का भार छोडकर वो म राज्यभी को राकामित करने वाला गजा बहुत ही प्रमन्नता को प्राप्त हुआ था 18| धनुप और पृपत्तों को त्याग पर तथा पुत्रो को राज्य को सौप कर बन्धुओं पर अपना भार छोडकर राजा बहुत ही प्रसन्न हुआ था ॥६॥ अत्र गाथा महाराज्ञा पुरा गीता ययातिना। योऽभिप्रेत्याहन कामान् कूमोङ्गानीय सर्वरा ॥६३ न जानु कामः काम नामुपभागेन शाम्यति । हविषा कृष्णवमव भूय एवाभिवर्तते ॥६४ यत् पृथिव्या प्रीहियव हिरण्य पगद स्त्रिय । नालमेकस्य तत्समिति पश्यन्न मुह्यति ॥९५ यदा तु कुरुते भाव सर्वभूतेषु पावकम् । कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा ।।६६ पदा परान्न विभेति यदा त्वस्मान्न विम्यति । यदा नेच्छति न द्वेष्टि ब्रह्म सम्पद्यते तदा । १७ या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीयति जीयंत । दोपाप्राणान्तिको रागस्ता तृष्णान्त्यजत सुवम् ॥ जीय॑न्ति जोर्यत केशा दन्ता जीर्यन्ति जीयतः। जीविलाशा घनाशा च जीय॑तोपि न जीर्यति ॥ यच्चाकामसुस लोके यच्च दिव्य महद सुखम् । तृष्णास्य च मुखस्यैव कला नाहति पोडशीम् ॥१०० यहाँ पर पहिले महान् राजा ययानि ने यह गाथा गाई है जिमने अभि- प्राय करके समस्त कामनायो को वूम के द्वारा अपने प्रगो की भांनि सब ओरसे सकुचित कर लिया था।६३॥ कभी भी कामो के उपभोग करने उनका समन वार्तवीर्य अर्जुन उत्पत्ति ] [ २२७ । । मुझ्ने उमे आप लोग जान लो ॥१॥ यदु के देव पुत्रा के समान पाँच पुत्र हुए थे । उनके नाम सहस्रजित्-श्रेष्ठ-कोप्टु नौल-जित और लघु होते है | सहस्रजित का पुत्र श्रीमान शतजित् नाम वाला राजा हुया था और शतजित के परम धार्मिक तीन पुत्र विख्यात हुए थे ॥३॥ जिनके नाम हैहय-हय और वेणु- यि ये थे। हैहय का पुत्र धमतत्त्व नाम वाला राजा हुम्रा था ॥४॥ उसके पुत्र धमत त्र-कोत्ति और सज्ञेय थे। स प रे पुत्र का नाम महिमान जा था (५।। महिष्मान् के पुत्र का नाम भद्रधण्य या जोकि बडा प्रताप वाला हुआ है। यह वाराणसी का स्वामी राजा था जिगको कि पहिल ही बता दिया है ६ भद्रश्रेण्य का दायाद दुमद नामक राजा या। फिर दुमद के धीमान कनक नाम वाले पुत्र ने जन्म ग्रहण किया था ॥७॥ कनक राज्य के चार लोक में परम प्रसिद्ध पुत्र उत्पन्न हुए थे जिनके नाम कृतवीर्यपातवीय-वृत्तवर्मा और चौथा कृत है ॥८ कृतो जातश्चतुर्थोऽभूत्कृतवीर्यात्ततोऽर्जुन । जा बाहुसहस्र ण समद्वीपश्वरा नृप IIE स हि वर्षायुत तप्त्वा तप परमदुश्वरम् । दत्तमाराधयामास कार्तवीर्योऽत्रिसम्भवम् ।१० तस्मं दत्तो वरान् प्रादाचतुरो भूरितेजम । पूर्व बाहुमहस्रन्तु स व प्रथम वरम् ॥११ अधम्म दीयमानस्य सद्भिस्तस्मान्निवारणम् । धर्मेण पृथिवीजित्वा धर्मेणवानुपालनम् ॥१२ संग्रामास्तु वहन् जित्वा हत्वा चारीन् सहनश । संग्रामे युद्धद्यमानस्य वध स्यादधिकाद्रणे ।।१३ तेनेय पृथिवी कृत्या सप्तद्वीपा सपत्तना । मतोदधिपरिक्षिप्ता क्षाण विधिना जना ॥१४ तम्य वाहुसहस्रन्तु युद्धधत किल धीमत । योद्धो ध्वजो रथनं व प्रादुर्भवति मायया ॥१५
२२६ ।
[ वायु पुराण
वश हैं जो बडे पुण्य है और देवपि के द्वारा सत्कार पाने वाले हैं जिनो यह
समस्त भूमण्डल बात हो रहा है जिम प्रकार सूर्य की किरणो से समस्त पृथ्वी
च्याप्त होती है ।।१०२॥ जो द्विज श्रेष्ठ राजा ययाति के इन समस्त चरित्र को
पढना या सुनता है वह परम पन्य-प्रतावाला-पायु मे युक्त और वह मनुष्य
पीर्तिमान होता है ।।१०३॥
प्रकरण ५६ -कार्तवीर्य अर्जुन उत्पत्ति
यदोवंश प्रवक्ष्यामि श्रेष्ठस्योत्तमतेजस ।
विस्तरेणानुपूर्वेण गदतो मे नियोधत ॥१
यदो पुत्रा वभूहि पञ्च देवमुतोपमा ।
सहमजिदथ श्रेष्ठ कोप्टुर्नी नो जितो लघु २
सहस्रजित्सुत श्रीमाञ्छत जिन्नाम पार्थिव ।
शतजित्सूता विख्यातास्त्रय परमधार्मिका ॥३
हैहयश्च यश्च व राजा वेणुह्यश्च य ।
हैहयस्य तु दायादो धर्मतत्त्व इति श्रुति ॥४
धर्मतन्त्रस्तु कीतिस्तु सज्ञेयस्तस्य चात्मज ।
मज्ञेयस्य तु दायादो महिमान्नाम पार्थिव ॥५
बासीन्महिप्मत पुत्रो भद्रश्रेण्य प्रतापवान् ।
वाराणस्यचिपो राजा कथित पूर्व एव हि ॥६
भद्रश्रेण्यस्य दायादो दुर्मदो नाम पार्थिव ।
दुर्मदस्य ततो धीमान् कनको नाम विश्रु त ७
कनकस्य तु दायादाश्चत्वारो लोकविश्रुताः ।
वृत वीर्य कार्तवीर्य कृतवर्मा तथैव च ॥८
थो सूप बोले- अब मैं उत्तम तेज वाले-परम श्रेष्ठ यदु के वश का
न काँगा और उसे विस्तार से तथा अनुपूर्वो + साथ बताऊँगा । कहने हुए
कातवीय अर्जुन उत्पत्ति ]
[ २२९
न नून कार्तवीर्यस्य गति यास्यन्ति मानवा ।
योनिस्तपाभिश्च विक्रमण थु तेन च ॥२०
द्वीपेषु सप्तसु स वै खड्गी वरशरासनी।
रथी राजाप्यनुचरोऽन्यागाच्चैवानुदृश्यते ॥२१
अनष्टद्रव्यश्वं वासोत शोको न च विभ्रम ।
प्रभावेण महाराज प्रजा धर्मेण रक्षत ॥२२
पञ्चाशीतिसहस्राणि वर्षाणा स नराधिप ।
सप्त सप्त वारान् सम्राट् चक्रवर्ती वभूव ह ॥२३
स एव पशुपालोऽभूत् क्षेत्रपालस्तथैव च ।
स एव वृष्टया पजन्यो योगित्वादर्जुनोऽभवत् ।।२४
सवै बाहुसहरण ज्याघातकठिनेन च ।
भाति रश्मिसहस्रण शारदेनेव भास्कर ॥२५
स हि नागसहस्रण माहिष्मत्या नराधिप ।
कर्कोटकसभाजित्वा पुरी तत्र न्यवेशयत् ॥२६
उस राजा को गाथा को गधव तथा नारद गाया करते थे जिहाने उस
राजपि के चरित और महिमा को देखा था ।।१६॥ यज्ञ-तप-दान और विक्रमो
के द्वारा तया श्रुत के द्वारा मानव निश्चय ही कात्त वीय की गति को नहीं जा
सकेंगे ॥२०॥ मातो द्वीपा म ऐमा अनुरश्यमान होता है कि यह ग्वङ्गधारी-
श्रेष्ठ धनुर्धारी-रथी-राजा और मय अनुचर भी हुआ था ।२१। धम पूर्वक प्रजा
की रक्षा करने वाले उम महान् राजा के प्रभाव स सब द्रव्य नष्ट न होने वाले
थे और कोई शोक तथा विभ्रम उमको प्रजा में नही था ॥२२॥ वह नरो का
स्वामी पिचामी हमार वर्ष तर मात मात वार मम्राट और चक्रवर्ती हुआ था
॥२३॥ वह ही पशुपों का पालन करने वाना हुपा- वह ही क्षेत्रो का पालक
हुपा और वृष्टि मे यह हो पजन्य पोगी होने के कारण हुमा था--वह ऐमा
अर्जुन था ॥२४॥ वह मर वाहओ स और ज्या (प्रत्यज्ञा) के पात पठिनता
से शरसाल के महल किरणों से सूर्य के समान सोमा देता है ।॥२५॥ उग
२२८ 1 । वायु पुराण । दशयज्ञसहस्राणि तेषु दीपेपु मतम् । निरर्गला स्म नित्ता धूम यन्ते तस्य धीमत. ॥१६ सर्वे यना महाबाहोस्तस्यासन भूग्तिजस । सर्वे काञ्चनवेदीका. सर्वे यूपंश्च याञ्चनं ॥१७ सर्वे देवमहाभागविमानस्थरलता । गन्धब्बरप्सरोभिश्च नित्यमेवोपशोभिता ॥१८ चतुर्य पुत्र वृत उत्पन्न हुआ। इनमे कृन वीर्य से अर्जुन उत्पन्न हुआ जिसके एक सहय वाहु थी और यह मानो द्वीपो का स्थायी राजा हुमा था 18 उम वार्नवीर्य ने दस हजार वर्ष वा अत्यन्त कठिन तपस्या करके अत्रि के पुत्र दत की आराधना की थी॥१०॥ उमके लिए दत्त ने अधिक तेज से युक्त चार वरदान दिये । उसने सबस प्रथम सहस्र वाहु के होजाने का वर बोला था ।११। प्रधर्म में दीयमान का सत्सुरुषो के द्वारा उसमे निवारण करना । धर्म से समस्त पृषी को जीतकर धर्म के द्वारा ही उसका अनुपालन करना ॥१२॥ बहुन गे संग्रामो को जीतकर और सहस्रो गत्रुमा का हनन करके सग्राम में युद्ध करते हुए का रणभूमि में अधिक से वध होना ॥१३|| उसके द्वारा यह पृथ्वी समस्त मात द्वीप मोर पत्तनों से युक्त सालो समुद्रो से परिक्षित क्षात्र विधि से प्राप्त की और इसका पालन किया था ॥१४॥ उस बुद्धिमान के युद्ध करते हुए महस्र वाहु-यौद वज और रथ माया से प्रादुर्भूत होते थे ॥१५॥ ऐमा मुना जाता है कि धीमान् उसके दश सहस्र यज्ञ उन सात द्वीपो मे बिना ही प्राला वाले निवृत्त हुए थे॥१६॥ महा। वाहु वाले उसके जोकि एक विशेष तेज बाला था, ममस्त यज्ञ सुवर्ण की वेदी वाले और समम्न सुवणं के विरचिन भूगो से युक्त थे ।१७। 'मन यज्ञ महान् भाग वाले देवो के द्वारा जोदि विमानो मे स्थित होकर वहाँ आये थ मलत हुए थे तथा गन्धर्व और अमरामो के द्वारा तो वे नित्य ही शोभिन रहा करते थे 1॥१८॥ राज्ञो जगौ गाथा गन्धर्वो नारदस्तथा। तस्य राजमहिमान निरोक्ष्य च ॥१६ कार्तवीर्य अर्जुन उतात्ति ] [ २३१ कारण दुसह विद्ध फेनो के समुदाय में गिर गये थे ॥३१॥ राजा ने अपने सहर वाहुप्रो के समूह से सागर को क्षोम पैदा करते हुए देव और असुरो के द्वारा परिक्षिप्त क्षीरोद सागर के समान उम समुद्र को कर दिया था ॥३२॥ मन्दर पर्वत के क्षोभण से क्यि हुए और ममृतोदक की शङ्का वाल भयानक उस नृपो में बेष्ठ को देखकर डरे हुए तुरन्त उत्पादित हुए थे ॥३३|| महान् उरग नीचे की ओर झुके हुए निश्चल मस्तक वाल होगये थे जिस तरह सन्ध्या के समय में निर्वात से स्तिमित बदली के पण्ड हो उसी तरह महान बन गये थे ॥३४॥ सवै बद्ध वा धनुर्यान उन्सिक्तः पञ्चभिः शतं । लङ्काया मोह गिला तु सवल रावण वलात् । निजित्य बद्ध वा चानीय माहिष्मत्या बबन्ध तम् ॥३५ ततो गत्वा पुलरत्यस्तु अर्जुन च प्रसादयत् । मुमोच राजा पौलस्त्य पुलस्त्येनानुपालितम् ॥३६ तस्य वाहुसहस्रस्य बभूव ज्यातलस्वन । युगान्तेऽम्बुदवृक्षस्य स्फुटितस्याशनेरिव ॥३७ अहो मृधे महावीय भार्गवो यस्य सोऽच्छिनत् । मृधे सहन वाहूना हेमतालवन यथा॥३८ तृपितेन कदाचित्स भिक्षितश्चित्रभानुना। सप्त द्वीपाश्चित्रभानो प्रादादिक्षा विशाम्पतिः ॥३६ पुराणि घोषान् ग्रामाश्च पत्तनानि च सर्वश । जज्बाल तस्य वागेयु चिनभानुदिधक्षया ४० म तस्य पुरुपेन्द्रस्य प्रभावेण महायशा । ददाह कार्तवीर्यस्य गैलाश्चापि वनानि च । ४१ स शून्यमाश्रम सर्व वरुणस्यात्मजस्य वै। ददाह सवनद्वीपाश्चित्रभानु महैहय ॥४२ वह पांचसौ घनुर्यानी के द्वारा दोधार उलित हुथा और मदल रावण को लका मे मोह युक्त कराकर बलपूर्वक जीतकर तथा वाँधकर और माहिष्मती पुरी में लाकर उसे बांध दिया था ॥३|| इसके अनन्तर पुनम्त्य ऋषि वहाँ २३० ] [ वायु पुराण नराधिप ने सहस्र नागो मे पृक्त माहिमती म कोटा-सभा को जीतकर वही पुरी को निवेशित पर दिया था ॥२६॥ स व वेगे समुद्रम्य प्रावटकालाम्बुजेक्षण । श्रीडनिव सुखोद्विग्न प्रावटकालञ्चकार हे ॥२७ लुलिता मोडता तेन हेमनग्दाममालिनी । अम्मि भ्र बुटिसन्नादा शङ्किताम्येति नर्मदा ॥२८ पुरा स तामनुसरन्नवगादो महागवम्। चकारोदात्त्य वेलान्त स काल प्रावृणोद्वनम् ॥२६ तस्य वाहु सहस्रए क्षोभ्यमारणे महादधौ । भवन्ति लीना निश्चेष्टा पातालस्था महासुरा ॥३०॥ चूर्णीकृत महावी चिलीनमीनमहाविपा | पतिता विद्धफेनोघमावर्तक्षिप्तदुस्सहम् ।।३१ चकार क्षोभयाताजा दो.सहरण सागरम् । देवामुरपरिक्षिप्त क्षीरोदमिव सागरम् ।।३२ मन्दरक्षोभणकृता ह्यमृतोदवशङ्किता । सहसोत्पादिता भीता भीम दृष्ट्वा नृपोत्तमम् ॥३३ नतनिश्चलमूर्धाना बभूवुश्च महोरगा । सायाह्न कदलीपण्डा निर्वातस्तिमिता इव ॥३४ वर्षाकाल के कमल के समान नेत्रो वाल उसने ममुद्र के वेग म मुख उद्विग्न होते हुए खेल की भांति प्रावृट काल कर दिया था ॥२७।। क्रीडा करते हुए उसने हेमस्रग्दाम मालिनी को लुलित कर दिया था। कमि रूपिणी भृत टियों के मन्नाद वाली नर्मदा शङ्कित होती हुई पाती है ॥२८॥ प्राचीन काल में उसने उमका अनुसरण करते हुए महार्णव को अवगाढ दिया था। वेला के अन्त तक उत्तित कर उम वाल ने वन को प्रावृत कर किया था ॥२६)उमके एक सहस्र बाहुनो से महोदधि के क्षोभ्यमाए होने पर पाताल मे रहने बाने महामसुर निश्चेष्ट होकर लोन होगये थे ॥३०॥ चूर्ण किये हुए वडी तरङ्गो में लीन है मछतियो का महाविप जिन ऐसे वे मावत्तौ (म्रमर) से क्षिप्त होने के वार्तवीर्य अर्जुन उत्पत्ति ] [ २३३ । जयध्वजश्च वै पुना अवन्तिपु विशापते । जयध्वजस्य पुत्रस्तु तालजवः प्रतापवान् ॥५० पहिले वरुण ने भास्विन उत्तम पुत्र को प्राप्त किया था। वह वसिष्ठ नाम वाला मुनि जनों का पाश्रय लेने वाला विम्यात सुना गया गया है ॥४३॥ वहाँ पर मापतियों पाई तो विभु ने कोष से मन को सस किया था। हे हैह्य । यह तेरा वन जिस कारण से मेरे यहाँ वर्जित नही है ।।४४॥ इमी कारण से तेरा यह दुष्पर कर्म है और इसको कृतमन्य हनन करेगा। पर्जुन नाम वाला कौन्तेय राजा नहीं होगा ॥४५॥ हे अर्जुन । प्रहार करने वालो में परमश्रेष्ठ महान् वीर्य वाले परशुराम जो बली है गोन ही तुझको छेदकर तेरी राहय वाहनो को प्रमथित करेंग ।।६। महान् बलवान् तपस्वी और ब्राह्मण तेरा वध करेगा। धीमान् उम मृत्यु भाप से उम समय राम थे ।।४॥ उम राजा ने पहिरे स्वय ही यर प्राप्त पिया था। उसके मौ पुत्र थे बिनम यहाँ पाँच महारय थे ॥४८॥ भस्त्री के प्रभ्याम करने वाले बलयुक्त-शूरवीर-यशस्वी और धर्मात्मा वे गव थे। सूर मोर भूमेन-वृष्टचाद्य और वृप तथा जयध्वज पन्नियो मे उम विशाम्पति के पुत्र थे। जयध्वज का पुत्र तालजय प्रतापवाला था।४-५016 तस्य पुत्रशत ह्य व तालजड्डा इति श्रुतम् । तेपा पञ्च गणा ख्याता हैहयाना महात्मनाम् ॥५१ वीरहोय ह्यसङ्घघाना भोजाचावतंयस्तया। तुण्डिवे राश्च विक्रान्तास्तालजवास्तथैव च ॥५२ वीरहोत्रसुनश्चापि अनन्तो नाम पार्थिव । दुर्जयस्तस्य पुत्रम्तु बभूवामित्रदर्शन ॥५३ प्रनष्टद्रव्यता चैव तस्य राज्ञो बभूव है। प्रभावेण महाराज.प्रजास्ता. पम्यंपात्तयत् ॥५४ न तम्य वित्तनागाव नष्ट प्रतिलभेत स.। यातवीयस्य या जन्म क्यदि धीमत ॥६५ २३२ ॥ [ वायु पुराण गये और उन्होंने अर्जुन को प्रमन्न किया था। तय गजा ने पुलस्त्य के द्वारा अनुपालित उम पौलस्त्य (रावण) को छोड दिया था ॥३६॥ उमरे वाहू महल का ज्या तल का शब्द युग के अन्त में स्फुटित अम्बुद वृक्ष के वज्र की भांति था ॥३७॥ अहो ( बडे आश्चर्य की बात है ) युद्ध में महान् वीर्य वाले जिसके वाहुनी के सहस को हेमताल वन के समान युद्ध में भागव ने छेदन कर दिया था ॥३८॥ किमी समय प्यामे चित्रभानु ने उममे भिक्षा मांगी थी। विशाम्पनि ने चित्रभानु को सात द्वीपो की भिक्षा देदी यी ॥३६॥ चिनभानु ने दिक्षता से उराके वाणो मे पुर-पोप-ग्राम और पत्तनो को मव ओर से जला दिया था ॥४०॥ उस पुरुपेन्द्र के प्रभाव से महान् यश वाले उसने कार्तवीर्य के दौल और वनो को भी दग्ध कर दिया था ।।४१॥ हैहय के साथ उस चित्रभानु ने वारा के आत्मज के समस्त शून्य पाश्रम का और वनो के सहित द्वीपा को जला दिया था ॥४२॥ सलेमे वरण पुन पुरा भास्विनमुत्तमम् । वसिष्टनामा स मुनि रयातश्चाप धित थ्रत ॥४३ तत्रापदस्तदा क्रोधादर्जुन शप्तवान्विभु । यस्मान्न वजितमिद वन ने मम हैह्य ।।४४ तस्मात् ते दुष्कर कर्म कृतमन्यो हनिष्यति । अर्जुनो नाम कौन्तेयो न च राजा भविष्यति ॥४५ अर्जुन त्वा महावीर्यो राम प्रहरता वर । छिन्वा बाहुमहस्र वै प्रमथ्य तरसा बली ।।४६ तपस्वी ब्राह्मणव बधिध्यति महाबलः। तस्य रामस्तदा घासीन्मृत्युशापेन धीमत ॥४७ राज्ञा तेन वरश्च व स्वयमेव वृत पुरा । तस्य पुत्रशत ह्यासीत् पञ्च तर महारया [४९ शूरा धर्मात्मानो यशस्विन । शूरश्च शूरसेनश्च वृष्टयाद्य बृप एव च ।।४६ कृतास्त्रा बलिन वावीयं अर्जुन उत्सति । [ २३३ परमश्रेष्ठ महान् . जयध्वजश्च वै पुत्रा अवन्तिपु विशांपते । जयध्वजस्य पुत्रस्तुतालजङ्घः प्रतापवान् ॥५० पहिले वरुण ने भास्विन उत्तम पुत्र को प्राप्त किया था। वह वसिष्ठ नाम वाला मुनि जनो का प्राथय लेने वाला विख्यात सुना गया गया है ॥४३॥ यहाँ पर प्रापत्तियां पाई तो विभु ने क्रोध से अर्जुन को सप्त किया था । हे हैहय ! यह तेरा वन जिस कारण से मेरे यहाँ वजित नहीं है ।।४। इसी पारण से तेरा यह दुष्कर कर्म है और इसको कृतमन्य हनन करेगा। पर्जुन माम वाला फोन्तय राजा नहीं होगा ॥४५॥ हे अर्जुन ! प्रहार करने वालो मे वीर्य वाले परशुराम जो बली है शीघ्र ही तुमको छदार तेरी सहस्र वाहुमो को प्रमथित करेंगे ।४६। महान् बलवान् तपस्वी और ब्राह्मण तेरा वध करेगा । धीमान् उसके मृत्यु साप मे उस समय राम थे ।।४७॥ उस राजा ने पहिले स्वय ही वर प्राप्त किया था। उसके सौ पुत्र थे जिनमे वहाँ पांच महारथ मे ॥४८।। प्रस्खा ये अभ्यास करने वाले वलयुक्त-यूरवीर-यशस्वी पौर धर्मात्मा वे सब थे । शूर और शूसेन-वृष्टचाच पोर वृष तथा जयध्वज पन्नियो म उस विशाम्पति के पुत्र थे। जयध्वज वा पुन तालबद्ध प्रतारवाला था ।।४६-५०॥ तस्य पुत्रशत ह्ये व तालजवा इति श्रुतम् । तेषा पञ्च गणा स्याता हैह्याना महात्मनाम् ॥५१ चीरहोत्र ह्यसङ्घयाता भोजाश्चावर्तयस्तथा। तुण्डिकेराश्च विक्रान्तास्तालजवास्तथैव च ॥५२ वीरहोत्रमुतश्चापि मनन्तो नाम पार्थिव । दुर्जयस्तस्य पुत्रस्तु बभूवामियदर्शन ॥१३ प्रनष्टद्रव्यता चैव तस्य राज्ञो बभूव है । प्रभावेण महाराजः प्रास्ता. पर्यपालपत् ॥५॥ न तस्य वित्तनामश्च नष्टं प्रतिलभेत स. । पार्तवीर्यस्य यो जन्म क्यारेदिह धीमत ॥५५ २३४ ] [ वायु पुराण वित्तवान भवत्यत्रैव धर्मश्चास्य विवर्द्धते। (वटा भवेत् यथा दाता तथा स्वर्गे महीपते ।।५६ उमके सौ पुत्र ही तालजङ्ग थे यह हमने सुना है। उन महात्मा हैहयो के पांच गए परम विख्यात थे ॥५१॥ वीरहोत्र-सस्यात गोज-पारतंय- तुण्डिकेर तथा विक्रान्त तालजङ्घ थे ॥५२॥ वीरहोत्र का पुत्र भी राजा अनन्त नाम वाला हुआ था। उसका पुत्र दुर्जय था जोकि अमित्र दर्शन हुआ था ।५३१ उस राजा के कभी नाश को न प्रास होने वाले धन का होना था। वह महाराज उन समस्त प्रजामो का प्रभाव से परिपालन किया करता था ।।५४|| उस वित्त का कभी नाश नहीं होता है और जो कुछ भी नष्ट भी होगया हो तो वह उसे प्राप्त कर लेता है । यहाँ बुद्धिमान् कार्तवीर्य के जन्म की कथा को जो कोई कहता है वह वित्त वाला यहाँ पर ही होजाता है और इसके धर्म की वृद्धि होती है। वह जिस प्रकार से त्वष्टा और दाता हो उसी तरह से स्वर्ग मे प्रति वित हुमा करता है ।।५५-५६।। प्रकरण १-ज्यामध वृत्तान्त कथन विमर्थ भुवन दग्धमपवस्य महात्मनाम् । कार्तवीर्येण विक्रम्य तन्न प्रव्र हि पृच्छताम् ॥१ रक्षिता स तु राजर्षि प्रजानामिति न थुतम् । क्थ स रक्षिता भूत्वानाशयत्तत्तपोवनम् ।।२ आदित्यो विप्ररूपेण कार्तवीर्यमुपस्थित । तृप्तिकाम प्रयच्छानमादित्योऽह न सशय ॥३ भगवन् केन ते तुष्टिर्भवेद् यू हि दिवाकर। पीदृश भोजन दनि श्रुत्वा च विदधाम्यहम् ॥४ स्थावर देहि मे मर्वमाहार ददता वर । तेन तृप्तो भवेय व न तुष्यऽन्येन पार्थिव ॥५ ज्यामघ वृत्तान्त क्थन ] [ २३५ न शवय स्थावर सर्व तेजसा मानुपेण तु। निई ग्धु तपता श्रेष्ठ त्वामेव प्रणमाम्यहम् ।।६ सुष्टस्तेऽह भरान् दधि अक्षयान् सर्वत सुखान् । प्रक्षिप्ताः प्रज्वलिप्यन्ति मम तेजःसमन्विताः ।।७ पादिष्ट तेजसा मेघसागर शोपयिष्यति । शुष्क भस्म करिष्यामि तेन प्रीतो नराधिप ।।८ सृषियों ने कहा-पात वीर्य ने विक्रम करके महात्मामो के अपवस्य भुवन को किस निये जलाया था-वह सब पूछने पाले हमको पाप बनलाइये ॥१॥ हमने मुना है कि यह राजर्षि तो प्रजाभी की रक्षा करने वाला था फिर वह रक्षक होकर किस पारण मे उमने तपोवन का नाम किया था ॥२॥ मूतजी ने कहा-गूर्य भगवान् ब्राह्मण के रूप म वार्तवीयं से पास उपस्थित हुए थे-मैं हप्ति की कामना भाला ई-मुझे अन्न दो-मैं प्रादिस्य हूँ । इसमे कुछ भी मभय नहीं है ॥३॥ राजा ने कहा है दिवाकर । यह बतलाइये मापी सुरिकिसमे होगी । मैं मापो दिरा प्रसार का भोजन हूँ और यह मुनकर मैं परूगा ॥४॥ सूपं ने कहा-हे दान देने वालो म श्रेष्ठ । मुझे समस्त माहार स्थावर हा । उसमे मेरी तृप्ति होगी हे पार्थिव ! माय किसीसे भी मैं सन्तुष्ट नहीं होऊगा ॥५॥ राजा ने पहा-हे सपने यात्रा में थेष्ठ ! मानुप तेव से समस्त स्थावर निदंग्य रिया नहीं जा सकता है । मैं आपको ही प्रणाम भरता।। मादित्य ने कहा-तुष्ट हुमा मै तुझे सर्व मोर गे मुप प्रद-प्रक्षय पारो को देता है वे फो हुए मेरे तेज से ममन्वित होने वाले प्रमलिन हो जायेंगे ||७|| हे नराधिप तेज में प्रादिए मेघ-सागर वो पोपित कर देगा। उससे प्रसन्न मैं गुप्त को भस्म पर दंगा ॥८॥ तत गरानयादित्यस्त्वर्जुनाय प्रयच्छति । तत मप्राप्य मुमहत्स्यावर सर्वमेव हि ॥ पायमानय ग्रामात्र घोषान नगराग्गि च । तपोवनानि म्यागि वनान्यपवनानि च ।।१० २३६ ] [ वायु पुराण एव प्राचीनमदहत्ततः सूर्यप्रदक्षिणम् । निवृक्षा निस्तृणा भूमिदंग्या सूर्येण तेजसा ।।११ एतस्मिन्नव काले तु पो निलयमाश्रित । दशवपसहस्राणि जलवासा महानृपि ॥१२ पूणे व्रते महातेजा उदतिष्ठत्तपोधनः। सोऽपश्यदाश्रम दग्धमर्जुनेन महानृपि । क्रोधाच्छयाप राजाप कीतित वो यथा मया ॥१३ इसके अनन्तर प्रादित्य अर्जुन के लिये गरो को दे देता है। फिर उह पाकर सुमहान् समस्त स्थावर को-पाथमो को-घोपा को और नगरीको-पो- बनी को-रम्यतम बनो को सौर उपवनो को सबको इस प्रकार से प्राचीन को सूर्य प्रदक्षिण को दाह कर दिया था । ममस्ठ यह भूमि बिना वृक्षो वाली-नृण रहित सूर्य के तेज मे जली हुई होगई यो 18-१०-१४। इसी समय मे महाद कृषि जल के घर में आश्रित होगया और दश सहा वप तक जल म ही वाम करने वाले हुए थे ॥१२॥ व्रत के पूर्ण होजाने पर महान् तेज वाले तपोधन उठकर खडे हुए थे। उन महान् ऋपियो ने अजुन के द्वारा दग्य पाश्रम को देखा था। तब क्रोध से राजवि को शाप दे दिया था जैसा कि मैंने तुमसे वहा था ॥१३॥ मोटो शृणुत राजर्वेशमुत्तमपूरपम् । यस्यान्ववाये मभूतो वृष्णिवृष्णकुलादह ।।१४ मोष्टोरेकोऽभवत् पुत्रो वृजिनीवान् महायशा । वाजिनीवतमिच्छन्ति स्वाहि स्वाहोवता वरम् ।।१५ स्वाहे पुत्रोऽभवद्राजा रशादुईदता वरः। घृतम्प्रसूतमिच्छन्ति रशादोरग्ध मात्मजम् ॥१६ महारतुभिरीजे स विविधरामदक्षिण । चियश्चित्ररथस्तस्य पुत्र कर्म भिरन्वित ॥१७ एव चित्ररथो वोरो यज्ञान् विपुलदक्षिणान् । शश विन्दु पर वृत्तो राजर्षीणामनुष्ठित ॥१८ ज्यामघ वृत्तान्त कथन ] चक्रवर्ती महासत्त्वो महावीर्यो वहुप्रज । तत्रानुवशश्लोकोऽय यस्मिन् गीत पुराविद ॥१६ शशविन्दोस्तु पुवारणा शतानामभवच्छतम् । धीमतामनुरूपाणा भूरिद्रविणतेजसाम् ॥२० सूतजी ने कहा-प्रव राजर्षि क्रोष्टु के उत्तम पूरप वाने वश वा श्रवण करो जिसके अन्वाय मे वृष्णि कुरा का उदह वृष्णि उत्पन्न हुअा था ॥१४॥ क्रोष्टु के एक ही पुत्र था जोकि वृजिनी बाल्य और महान यशवाता था जो वाजिनी वाल स्वाहि को स्वाहो वालो म श्रेष्ठ को चाहता था ।।१५।। स्वाहि का पुत्र दान देने वालो म उत्तम रसादु का मवसे पहिला पुत्र घृत प्रमूत हुमा था ॥१६५९ उसने बडे बडे महान् व्रतुषों के द्वारा यजन किया था जिनमे बहुत ही अधिक दक्षिणा प्राप्त की गई थी तथा अनेक प्रकार के थे। उसका कमों से अवित चित्ररथ हुमा था ॥१७॥ इस प्रकार से चित्ररथ धीर ने विशेप अधिक दक्षिणा वाले यज्ञो को करके गर्पियो द्वारा अनुप्रित शशविन्दु नाम वाला पुत्र प्राप्त क्यिा या ॥१८)। वह शविन्दु महान् मत्व वाला-चक्रवर्ती- महावीर्य और बहुत सी सन्तति वाना हुआ था । वहाँ पर उगके वश का यह श्लोक पुग वेत्तानो के द्वारा गाया गया है |॥१६शशविदु के परम बुद्धि- मान्-बहुत धन एव तेजवाले तया अनुरूप सौ पुत्र हुए थे ॥२०॥ तेपा पट व प्रधानास्तु पृथुपाटका महाबला । पृथुधवा पृथुयशा पृथुधर्मा पृथुञ्जय ॥२१ पृथुकीत्ति पृथुन्दाता राजान. शाशिबिन्दवा । शसन्ति च पुराणानि पार्थथवसमन्तरम् । अन्तरः स पुरा यस्तु यज्ञस्य तनयोऽभवत् ।।२२ उशना सुतधारमा अवाप्य पृथिवीमिमाम् । प्राजहाराश्वमेधाना शतमुत्तमधाम्मिक ॥२३ मरुत्तस्तस्य तनयो राजपीणामनुष्ठित । वीर कम्वलहिस्तु मरुत्ततनय स्मृत ॥२४ २३८ ] | वायु पुराण । पुनस्तु रुक्मकवचो विद्वान् कम्बलवहिप.। निहत्य खमक्वच पुरा कवचिनो रणे ।।२५ धन्विनो निशिताणरवाप श्रियमुत्तमम् । ब्राह्मणेभ्यो ददौ वित्तमश्वमेधमहायशा ॥२६ राज्ञस्तु रुक्मकवचादपरावृत्त्य वीरहा । जज्ञिरे पञ्च पुत्रास्तु महासत्वा महाबला ॥२७॥ रुक्मेषु पृथुरुक्मश्च ज्यामघ परिधो हरि.। परिधश्च हरिश्च व विदेहे स्थापयत्पिता ॥२८ उन सौ पुत्रों में महान बल वाले पृथुपाटक छ पुत्र प्रधान थे जिनके नाम ये हैं-पृथुधवा-पृयुयशा-पृथुधर्मा-गृथुञ्जय-पृथुकीति और पृथुन्दाता, ये सब शाशि विन्दव राजा थे । पुराए पृथुधवा के अन्तर नामक पुत्र को बतलाते हैं । अन्तर वह था जो पहिले यज्ञ का पुत्र हुमा था॥२१-२२।। मुनधर्मा का प्रात्मा उाना ने इस पृथ्वी को प्राप्त करके उत्तम धार्मिक उमने सौ अश्वमेध यज्ञ किये थे ॥२३॥ राजर्षियो का अनुष्ठित मरुत्त नाम वाला उसका पुत्र हुआ था । भरत वीर कम्बलवहिं कहा गया है ॥२४॥ कम्वलवहिं का पुत्र परम विद्वान खम क्वच हुआ था। लम कवच ने पहिले अपने तीखे वाणो के द्वारा रण में धन्त्री तथा कवच पारियो को मारकर उत्तम थी को प्राप्त किया था और मध- मेषो से महान यश वाले उसने बहुत सा धन ब्राह्मणों को दान मे दे दिया था ॥२५-२६॥ राजा खम नबर से महान सत्त्व वाले तथा महान् बल वाले पाँच पुषो ने नाम ग्रहण किया था ॥२७॥ जिनके नाम एवमेपु-पृथुरुतम-ज्यामध-- परिघ और हरि ये थे। परिघ को और हरि को पिता ने विदेह में स्थापित किया था ॥२॥ ब्रह्मपुरभवद्राजा पृथुरवमस्तदाश्रयः। तेभ्य प्रवजितो राज्या ज्यामघोऽभवदाथमें ।।२९ प्रशान्तस्तु वने घोरे ब्राह्मणेनावबोधितः । जगाम धनुरादाय देशमध्य रथी ध्वजी ॥३० का पुत्र ज्यामधदत्तातपयन । [ २३६ नम्मंदानूप एकासी मेक नावृत्तिका अपि । मृक्षवन्त गिरि गरवा गुक्तिमन्यामयाविशत् ॥३१ ज्यामघस्याभवद्भार्या शैव्या वलवती भृगम् । अत्रोऽपि स वै राजा भार्यामन्या न विन्दति ।।३२ तम्यासीद्विजयो युद्ध तत कन्यामदाप स । भार्यामुवाच राजा म स्नुपेति तु नरेश्वर । ३३ एवमुक्ता प्रवीदेव काम्ये यन्ते स्नुपेति सा। यस्ते जनिप्यते पुत्रस्तस्य भार्या भविष्यति ॥३४ तम्य सा तपमोग्रेण शव्या वैरा प्रमूयत । पुत्र विदर्भ सुभगा शैव्या परिणता सती ॥३५ राजपुत्रौ तु विद्वासो स्नुपाया युवौशिकौ। पुत्री विदर्भोऽजनयच्दूरी रणविशारदो ॥३६ ब्रह्म पु राजा हुआ था उमा पाश्रम म रहने वाला पृपुकाम था । राज्य से प्रति ज्याभय पाथम म हुमा पा 1२६पोर वन में प्रशान्त और ब्राह्मण द्वारा प्रोधित वह रथ नया ध्वज वारा धनुष लेकर देन के मध्य म गया पा ॥३०॥ नर्मदा के अनूप म एकाको माला वृत्तिवाला भवान् पर्वत म जाकर एर भन्य मुक्ति म प्रवेश कर गया था ॥३१॥ ज्यामघ वी भार्या बहुन ही बल वासीन्या थी वह राजा पुत्र होन भी था रिन्तु उमन दूसरी भार्या को प्राप्त नहीं किया था ।।३२।। उमपी युद्ध म विजय हुई थी। इसके पश्चात् उसने एर बन्या प्राप्त की थी। वह नरेश्वर राजा प्रग्नी भार्या से यह स्नुपा है-ऐमा बोला था ॥३३॥ इस प्रकार से कही जान वाली उमने कहा यह पाही हुई मास्नुपा है सो जो भापता पुत्र उत्पन्न होगा यह उमकी भार्या होगी ||३४|| उगके उग्र तामे दम्या ने वंश को प्रमून लिया था। परिणत सती भपा ने विभं नामर पुत्र को उत्पन्न किया ॥३५॥ विदर्भ ने स्नुषा र विद्वान् अयु पोर जोगिक दो पुत्री को उत्पन्न रिया पाजोरि गण विशारद तपा बरे ही पूरवीर थे ॥३॥ लोमपाद तृतीयन्नु पचान सुपामिर । लोमपादारमनोवस्तुगहनिम्तस्य वात्मज ॥३७
२४० ]
[ वायु पुराण
कौशिकस्य चिदि पुस्तस्माच्नद्या नृपा. स्मृताः।
क्योविदर्भपुत्रस्तु कुन्तिस्तस्यात्मजोऽभवत् ॥३८
कृन्तर्धष्टसुतो जज्ञे पुरोघृष्टः प्रतापवान् ।
धृष्टस्य पुत्रो धर्मात्मा निवृति परवोरहा ॥३६
तस्य पुत्रो दशार्हस्तु महाबलपराक्रमः ।
दगार्हस्य सुतो व्योमा ततो जीमूत उच्यते ॥४०
जोमूतपुत्रो विकृतिस्तस्य भीमरथ सुत ।
अथ भीमरथस्यासीद पुत्रो रथवर क्लि ॥४१
दाता धम्मरतो नित्य शीलसत्यपरायण ।
तस्य पुत्रो नवरथस्ततो दशरय स्मृत.।।४२
तस्य चैकादशरय शकुनिस्तस्य चात्मजः।
तस्मात् करम्भको धन्बी देवरातोऽभवत्तत ॥४३
देवक्षनोऽभवद्राजा देवरातिर्महायशा ।
देवक्षत्रसुतो जज्ञे देवन क्षत्रनन्दन ॥४४
तोसरा पुत्र लोमपाद नाम वाला पीछे उत्पन्न हुआ था जो बहुत ही
धार्मिक वृत्ति वाला था। लोमपाद का पुत्र वस्तु हुमा और उसका भात्मज
माहृति हुआ था।॥३७॥ कौशिक का पुत्र चिदि था उससे चैद्य राजा कहे गये
है । क्रयु का पुत्र विदर्भ हुम और उसका पुत्र कुन्ति नाम वाना हुमा था ।३८)
कुन्ति के धि सुत ने प्रताप वाला पुरोधृष्ट उत्पन्न क्यिा था । घृष्ट का पुत्र
धर्मारमा परपीरहा निवृति हुआ था ॥३६|| उमका दर्शाह हुआ था जो बल
तथा पराक्रम मे महान् था। दर्शाह का पुत्र व्योमा नामक था और फिर उसका
पत्र जीमूत नाम वाला कहा जाता है ।४11 जीमून का पुत्र विकृति नामक हुमा
उस का पुत्र भीमरथ हुआ था। इसके अन तर भीमरथ का पुत्र रयवर
'पा ॥४यह बहुत ही दान देने वाला तया धर्म में रति रखने वाला
र नित्य ही शील एवं सत्य में परायण रहा करता था। उसका पुत्र नव
मा और फिर उमका पुत्र दशरय हुआ था ॥४२॥ उमकै पुत्र का नाम
शरथ या तया उसके प्रात्मज शकुनि नाम वाले ने जन्म ग्रहण किया
रिपगु वा वर्णन ] [ २४१ था। उममे धन्दी करम्भक हुग्रा और इसके पश्चात् उसके देवरान पुत्र उत्पन्न हमा पा ।।४३|| देवक्षत्र राजा हुआ था और देवराति महान् यश वाला था। देवदात्र के मुन ने क्षत्रियों को प्रानद देने वाला देवन पुत्र को जन्म दिया था ।४४॥ देवनात् सु मधुर्जज्ञ यस्य मेधार्थसम्भवः । मोश्चापि महातेजा मनुमंनुवरास्तथा ॥४५ नन्दश्च महातेजा महापुरवशस्तथा । ग्रामीत् पुरुवशात् पुत्र. पुरुद्वान् प्रपोद्यम. ॥४६ जज्ञे पुरुद्वत पुत्रो भद्रवत्या पुम्द्वह. । ऐक्षाकी त्वभवद्भार्या सत्त्वस्तस्यामजायत । मत्त्वात् सत्त्वगुणो पेत सात्त्वत कीर्तिवद्धन I४७ इमां विमृष्टिं विज्ञाय ज्यामधस्य महात्मन. । प्रजावानेति सायुज्य राज्ञः सोमस्य धीमत ॥४८ देवन से मधु ने जन्म ग्रहण किया जिमरा मेपार्य सम्भर है। मधु के भी मदान तेज वाला मनु तथा मनुवश हुमा ॥४५॥ और नन्दन तथा महान् तेज घाना महा पुरवश हा था। पुरुषश मे पुरुषोत्तम पुरु विद्वान पुत्र हुमा था ॥४॥ पुग्दान में भावनी में पुरुवह पुत्र ने जन्म लिया था। उनकी भार्या ऐशा हुई थी उममे सत्त्व पैदा हुप्रा पा । गत्त्व मे सत्त्वगुण से युक्त यीत्ति- पर्सन मात्दत हुमा या ॥४॥ महात्मा ज्यामघ की इस विशेष मृत्रि का ज्ञान माप्त पर पुरुष प्रजा वाला होता है मोर धीमान राजा मोम ये सापुश्य को प्रास करता है ॥४॥ प्रकरण-५% विष्णु वंश वर्णन मारवती सम्पन्न यौशल्या मुपुर गुनम् । भजिन भगमानं च दिम्य देवावृध नृपम् ॥१ अन्धनच महाभोज धिगच यदुनन्दनम् । सपा हिमांशपार मणुष चिन्नरेश यं ॥२ २४२ ] [ वायु पुराण भजमानस्य शृञ्जय्या वाह्यश्वोपरि बाह्यक शृञ्जयस्य सुते ? तु बाह्यवस्ते उदावहत् ॥३ तस्य भायें भगिन्यो ने प्रामूतेति मुतान् बहून् । निमिश्च पणवश्वव वृष्णि परपुञ्जय ॥४ ये बाह्य कार्यशृञ्जय्या भजमानाद्विजज्ञिरे । अयुतायुतसाहस्रशतजिदथ वामन ॥५ बाह्यकाभिगिन्या ये भजमाना द्विजज्ञिरे । तेषा देवावृधो राजा चचार परम तप ॥६ पुन सर्वगुग्गोपेतो मम भूयादिति स्म ह । सयोज्यात्मानमेव सवर्णा सा जलमस्पृशत् ॥७ सा चोपस्पर्शनात्तस्य चकार ऋपिमापगा। कल्याणश्च नरपतेस्तस्य सा निम्नगोत्तमा ।। श्री सून जी ने कहा-सात्वी कोगल्या ने रूप मे सम्पन सुन का प्रसव किया था । भजिन-भजमान दिव्य देवावृघ नृप को उत्पन्न किया था॥१॥ मधर-सहाभोज और वृष्णि यदुन दन को उत्पन्न किया था। उनके चार सर्ग थे उनको प्रब विस्तार से सुनो ॥२॥ भजमान के शृञ्जयी म बाह्य और वाह्यक हुए। शृञ्जय के दो पुत्री थी उन दोनो के साथ वाहक ने विवाह कर लिया था ॥३॥ उसकी दोनो बहिन भार्यायो ने बहुत से पुत्रो को जम दिया था । निमि-पणव-वृष्णि और परपुरञ्जय थे ॥४॥ जो बाह्यक की प्राय शृञ्जयी म भजमान से उत्पन्न हुए थे। अयुत-अयुत साहस्र-शतजिन्- नामक थे ।५ जो वाह्यक की आर्य भगिनी म भजमान से उत्सत हुए थे । उनका देवावृध नाम वाला राजा था जिसने परम तपस्या की थी ॥६॥ मेरे समस्त सद्गुणों से युक्त पुत्र उत्पन्न होदे-इस प्रकार से अपने प्रापको सयोजित करके सवा उसने जल का स्पश किया था ॥७॥ उस मापगा ने उसके उप स्पान से भूपि को किया था और उम निम्नगोत्तमा ने उस नरपति का कल्याण किया था । बाद मे ।
विष्णु बम वर्णन 1 [.२४३ चिन्तयाभिपरीतागा जगामाय विनिश्चयम् । नाधिगच्छामि ता नारी यस्यामेवविध. सुत । भवेत्सर्वगुणोपेतो राज्ञो देवावृधस्य हि । तस्मादस्य स्वय चाह भवाम्यद्य सहवता। जजे तस्या. स्वय हस्तो भावस्तस्य यथेरितः ।।१० प्रय भूत्वा कुमारी तु सावित्री परम वच । चिन्तयामास राजान तामियेप स पार्थिवः ॥११ तस्यामाधत्त गर्भ स तेजस्विनमुदारधी । अथ सा नवमे मासि सुपुये सरितावरा ॥१२ पुत्र सर्वगुणोपेत यथा देवावृधेप्सित । तत्र वदो पुरागजा गाथा गायन्ति वै द्विजा ॥१३ गुणान् देवावृधस्यापि कीत्तं यन्तो महात्मन । यधय शृणुते दूरात सपश्यति तथातिवात ।।१४ वभ, हो मनुष्याला देवदयावृध सम । पुरा पश्चपष्टिश्च सहस्राणि च मप्तति । येऽमृतावमनुप्राप्ता बभ्रदेवावृधादपि ॥१५ या दानपति रो ब्रह्मण्यः सत्यवाग युध । वौतिमाश्च महाभाग सात्वताना महारथ ॥१६ चिमा से परिपरीत प्रली यानी उगने विशेष रूप में नियरिया या fr उग नारीपराधिगमन नहीं पता है निगम इस प्रकार का पुत्र हो ॥६॥ रास देशापा ममम गुणों से उपेत होगा गो पात्र पसी स्वप ही में सरना होगा। मरे वय हल ने जन्म दिया था उसरा पाव चमारित पापा ॥ गो मार गावित्री कुमारी होर परम वपन वा राग पिननकाने मगी थी। यह पत्रा स्वर उगको नाता पा॥११उदार पुतिमा उगने उगमे तेसो गर्भ धारण गिदान गरे पनन्तर नाम माम में समन्तिाय ने प्रमादिमाग रंगा देगपारा पित पागा हो ममल में गुग पुरको उमा र म दिया पायाश में २४४ ] [ वायु पुराण पुराण पेशाता दिजगण गाया का गान पिया करते हैं ॥१३ । महान् प्रात्मा वाले देववृष के भी गुणो का कीतन परते हुए जैसा ही दूर से सुनत हैं वैसा ही गोप म आकर देते हैं ॥१४॥ वन मनुष्यो म श्रेष्ठ देको के समान देवावृध था। पांच हजार गत्तर वर्ष तक जो पुरुष प्रभृतदव को प्राप्त हुये थे। वन देव वृद्ध सभी मधिवा यज्वा-दानपति-वीर-ब्रह्मएय-मत्यवचन याला-परिस्त- कात्तिमान् मोर महान भाग वाला माधतो म महारथ का ।।१५ २६।। तस्यान्ववाये सुमहाभोजयेमातिकावला । गान्धारी चैव माद्री च वृष्णे ये बभूवतु ॥१७ गान्धारी जनयामास सुमित्र मियनन्दनम् । माद्री युधाजित पुष सा तु वे देवमीडपम् ॥१८ अनमित्रा मुतञ्च व तावुभौ पुरपोत्तमौ । अनमित्रसुतो निघ्नो निघ्नस्य द्वो बभूवतु ॥१९ प्रसेनश्च महाभाग सजिच सुतावुभौ । तस्य शाजित पूर्व गखा प्राणसमोऽभवत् ।।२० सक्दाचिनिशापाये रथेन रथिनावर । तोयकलादप स्प्रष्टुमुपस्थातु ययौ रविम् ॥२१ तस्योपतिष्ठत सूर्यो विवस्वाननत. स्थित । अस्पष्टमूर्तिभंगवा स्तेजोमण्डलवान् विभु ॥२२ अथ राजा विवस्वन्तमुवाच स्थितमग्रत । यथैव व्योम्नि पश्यामि त्वामह ज्योतिपाम्पते ।।२३ तेजोमण्डलिनञ्च व तर्थ वाप्यप्रत स्थितम् । को विशेषो विवस्वस्ते साक्षादुपगतेन वै ॥२४ उसके मन्ववाय म आत्ति करने वाली प्रदलाएँ भलीभांति भोग के योग्य थी। गान्धारी पोर माद्री ये दो भार्या वृष्णि की हुई थी ॥१७॥ गान्धारी मित्रो को प्रानन्द दने वाला सुमित्र पुत्र को उत्पन्न किया था । माद्री ने धाजित पुत्र को जम दिया था और उसने तो देवमीढुप को उत्पन किया था १८॥ और मन मित्र पुत्रको जम दिया था। वे दोनो उत्तम पुरुष थे । अनमित्र - 4 विष्णु दश वर्गन ] । २४५ बापुर विन हुमा और विघ्न के दो पुत्र हुए थे ॥१६॥ प्रसेन और महाभाग शामिल दो पुत्र थे । उस शक्रजिन् दा पूर्व प्राण के समान सखा हुआ था ।२०। वह किसी समय निशा के समाप्त होजाने पर रथियो मे श्रेष्ठ रथ के द्वारा जल के रिनारे से जला स्पर्श करने को और रवि का उपस्थान करने के लिये गया पा॥२९॥ उपस्थान करने वाले उसके प्रागे विवस्वान् सूर्य स्पष्टता से रहित मूर्तिदारे-विभु और तेज के मण्डल वाले भगवान थे ॥२२॥ इसके मनन्तर मार्ग स्थित रहने वाले विवस्वान् मे राजा बोला-जिस प्रकार से प्राकाश मे मैं पाएको देयता हूँ हे ज्योतिषों के स्वामिन् ! उसी प्रकार से तेज के मण्डल वाले पापो प्रागे स्थित होते हुए भी देख रहा हूँ । हे विवस्वन् प्रापके साक्षात् माने पर भी क्या विशेषता हुई है ॥२३-२४॥ एतत्वा म भगवान् मरिणरत्न स्यमन्तकम् । स्वकण्ठादवमुच्याथ बवन्ध नृपते स्तदा ॥२५ ततो विग्रवन्त त ददर्श नृपतिस्तदा । प्रतिमामथ ता दृष्ट्वा मुहूर्त कृतवारतथा ॥२६ तमतिपस्थित भूयो विवस्दन्त स शब जित् । प्रोवाचाग्निसवणं त्व येन लोवान् प्रयास्यति । तदेव मणिरत्न तन्मा भवान् दातुमर्हति ।।२७ स्यमन्तक नाम मणि दत्तवास्तस्य भास्वर । स तमावद्धय नगर प्रविन महीपतिः ॥२८ त जनाः पर्यधावन्त गूर्योन्य गच्छनीति ह । सभा विस्माययित्वाय पुरीमन्त पुर तथा ॥२६ त प्रमेनिजिते दिव्य मांगाग्रन स्यमन्तवम् । ददी नारे नरपति प्रेम्णा दामजिदुत्तमम् ॥३० स्थमन्तको नाम मग्गियस्य राष्ट्र स्थितो भवेत् । पासप पर्जन्यो न ध व्याधिमय तदा ॥३१ सिमां पर प्रमेनात मरिगगन स्पमन्तयम् । गोमिनोग प म गंभ गातोपि न नहार च ॥३२ [ वायु पुराण यह सुनकर उन भगवान् सूर्य देव ने स्यमन्तक नाम वाली श्रेष्ठ मणि को अपने एठ से उतार कर राजा के कराठ में उस समय बाँध दी थी॥२५॥ तव तो उस समय में राजा ने देहधारी उनका दर्शन दिया था। इसके बाद उम प्रतिमा को देखकर मुहूतं भर राजा ने वैसा ही किया ॥२६) फिर प्रति प्रस्थित उन सूर्यदेव से शक जित् ने कहा-अग्नि के सवर्ण पाप जिससे लोको को जायगे उस समय वह मणि रत्न आप मुझे देने के योग्य होते हैं ॥२७॥ भास्कर ने स्यमन्तक नाम वाली मरिण उराको देदी थी और वह राजा उसे अपने कएट में बाँध कर नगर मे प्रविष्ट हुमा था ॥२८।। मनुष्य उसके चारो मोर दौड लगाते थे कि यह सूर्य जा रहा है । राजा ने अपनी पूरी सभा को विस्मय मे डालते हुए तथा पूरी पुरी को विस्मित करके फिर वह अन्त पुर मे गया था ॥२६॥ उस परम दिव्य उत्तम मणिरस्न स्यमन्तक को राजा शक्रजिन् ने प्रेम से अपने भाई प्रसेनजित को देदी थी ॥३०॥ जिसके राज्य मे स्यमन्तक नाम वाली मणि स्थित रहती है वहां पर पर्जन्य (मेघ) समय पर वपने वाले होते हैं और तब फिर कोई भी व्याधि का भय नहीं रहता है ॥३१॥ भगवान् गोविन्द ने प्रसेन से उस स्यमन्तक मणि के स्वयं प्राप्त करने की लिप्सा की थी कि तु उसे नहीं प्राप्त किया था और सर्वतो भाव से शान्ति सम्पन्न होते हुए भी उनका हरण नहीं किया था ॥३२॥ कदा चिन्मृगया यात प्रसेनस्तेन भूपित । स्यमन्तककृते सिंहाद्वध प्राप्त सुदारुणम् ॥३३ जाम्बवानृक्षराजस्तु त सिंह निजघान वै । आदाय च मरिण दिव्य स्व बिल प्रविवेश ह ॥३४ तत्कर्म कृष्णस्य ततो दुष्ण्यन्धकमहत्तरा । मणौगृघ्नुन्तु मन्वानास्तमेव विशशविरे ॥३५ मिथ्याभिशस्ति तेभ्यस्ता बलवानरिसूदन । अमृष्यमाणो भगवान् वन स विचचार ह ॥३६ स तु प्रसनमृगयामचरत्तत्र चाप्यथ । प्रसेनस्य पद गृह्य पुरुष रातकारिभि. ३७
विष्णु वश वर्णन ]
[ २४७
ऋक्षवन्त गिरिवर विन्ध्यञ्च
नगमुत्तमम् ।
अन्वेषणपरिथान्त स ददर्श महामना ॥३८
साव हत प्रसेन त नाविन्दत्तत्र वै मणिम् ।
अथ सिंह प्रसेनस्य शरीरस्याविदूरत ॥३६
ऋक्षेण निहतो दृष्ट पादक्षस्य सूचिताम् ।
पदैरन्वेषयामास गुहामृक्षस्य यादव.॥४०
किसी समय उस स्यमन्तक मरिण को धारण कर भूपित हाते हुए शिकार
सरने के लिये गया पा और स्यमन्तक के लिये ही मुदारुण वध को सिंह से
प्राप्त होगया था ॥ ३॥ रीछो के राजा जाम्बवान् ने उस प्रमेन के वध करने
वाले मिह को मार डाला और उस दिव्य मणि को लेकर अपनी गुहा में प्रविष्ट
होगया था ॥३४॥ इगरे पश्चात् उस कर्म को कृष्ण का सभी दृष्णि-अन्धक
मदतर यादव लोग रहो लगे पोर मणि के लेने वाले कृष्ण को मानते हुए
उही पर गड़ा करते थे ॥३५॥ उन सभी लोगो की इस तरह अपवाद पूर्ण
भूटी चर्चा को बलवान् परिसूदन भगवान सहन न वरते हुए वन में विचरण
करने लगे ॥३६॥ौर उनने प्रमेन की खोज करने का वाम frया था। प्रसेन
से घरण चिन्हो वो दर पर प्राप्तकारी पुरुषो के द्वारा बताये जाने पर गिरियो
मे थंठ ऋक्षवान तथा उत्तम पर्वत विन्ध्य को खोज से थके हुए उन महामन
वाले ने दमा था ॥३८॥ प्रश्व व सहित मरे हुए उम प्रमेन को देया मितु उरा
मणि को नहीं देखा था। इसके पश्चात् प्रमेन के मृन सगेर के निकट ही ऋक्षा
के द्वारा मार हुए गिह को देखा । रीछ के चरण चिन्हा मे सूचिन भगवान्
श्रीकृष्ण ने वृक्षाराज की गुहा को योग की थी ॥३६-४०॥
महत्यतिविले वाणी सुथाव
प्रमदेरिताम् ।
धाश्या युमारमादाय सुत जाम्बवतो द्विजा ।
प्रीतिमत्याय मणिना मारोदीरित्युदीरिताम् ॥४१
प्रसेनमवधीत सिंह गिहो जाम्बवता हन ।
मुकुमार मागेदोस्तव हाप स्यमन्तव ॥ ४२
२४६ ] । वायु पुराण व्यक्तीकृतञ्च शब्द त पूर्ण सोऽपि ययौ बिलम् । अपश्यच्च विलान्याशे प्रसेनमवदारितम् ॥ ४३ प्रविश्य चापि भगवास्तदृक्षबिलमञ्जसा। ददर्श ऋक्षगजान जाम्बवन्तमुदारधीः ।। ४४ युयुधे वासुदेवरतु विले जाम्बवता सह । बाहुम्यामेव गोविन्दो दिवसानेकविंशतिम् ॥४५ प्रविप्टै च विल कृपणे वासुदेव पुर सरा । पुनरिवतीमेत्य हत कृष्ण न्यवेदयन् ।।४६ वासुदेवस्तु निजिस्य जाम्बवन्त महाबलम् । लेभे जाम्बवती कन्यामृक्षराजस्य सम्भताम् ।।४७ भगवत्तेजसा प्रस्तो जाम्बवान् प्रसभ मरिणम् । सुता जाम्बवतीमाशु विष्ववसेनाय दत्तवान् ॥४८ उस बहुत बड़ी गुफा म प्रमदा के द्वारा कही हुई वाणी को सुना था। कोई धात्री कुमार पुत्र को लेकर हे द्विजगए । जाम्बवान की प्रामि वाली मणि के द्वारा (मर्थात् उसे दिखाते हुए ) यह वह रही थी कि बच्चे ! रोल मन करे । इस प्रकार कही हुई वाणी श्री कृपा ने सुनी थी ॥४१॥ पाली ने कहा- सिंह ने प्रसेन को मार दिया भौर जाम्बवान ने उस सिंह को मार डार डाला है। हे गुरुमार ! मब तू रदन मत कर-यह मणि स्थमन्तक तेरी ही है।॥४२॥ उस पद को स्पष्ट तया मुनकर शीघ्र ही वह श्रीकृष्ण विल में मदर घने गये थे और बिल के गमीर में प्रवदारित प्रमेन को देखा पा ॥४३॥ भगवान ने उम गुपा में प्रवेश कर मोकि वृक्षराम ये रहने की थी उन उदार युधि पारे श्रीकृष्ण ने गैहो के राजा जाम्बवान् का वहाँ देसा ॥ वासुदेव मे उम गुपा में इस दिन तब जाम्बवान् के साय वाहुओं से युद्ध frपा पा ॥४५॥ वासुदेव के पुरस्गर साथ में जाने वाले लोगो ने गुफा में श्रीकृष्ण प्रसवग्ने पर द्वारा में पापिस आर वृषा मारे गय ऐमा सवगे वह दिया था 1४६॥ वासुदेव न उम महान वानवान् जाम्वाद को बीता क्षरान दाग मम्मन बाम्धवती पन्या प्रालिको यो ।।४। भगवान् बरी रस हो जाने विष्णु दश वर्णन ] [ २४६ बात जाम्बवान् ने वलात् स्यमन्ता मणि को मोर अपनी पुत्री जाम्बवती को विश्वक्सेन के लिए दे दिया था ॥४८॥ मणि स्यमन्तक चैव जग्राहात्मविशुद्धये । अनुनीय ऋक्षरान निर्ययौ च तदा विलात् ।।४६ एव स मरिणमादाय विगोधात्मानमात्मना । ददौ सत्राजिते त मरिण सात्वतसनिधो ॥५० पन्या पुनर्जाम्बवतीमुवाच मघुसूदन । तस्मान्मिथ्याभिशापाव स व्यमुच्यत जनार्दन ॥५१ इमा मिथ्याभिशस्ति य कृष्णस्येह व्यपोहिताम् । वेद मिथ्याभिगस्ते स नाभिशस्यति वहिचिव ॥५: दश स्वमृभ्यो भार्याभ्य. शवजित्त शत सुता । ख्यातिमन्तस्त्रयस्तेषा भङ्गवारस्तु पूर्वज । वीरो व्रतपतिश्च व छपस्वान्तच सुप्रिप ॥५३ मथ द्वारवती नाम भङ्गकारस्य सुप्रजा । सुपुवे सा कुमारीस्तु तिस्रा रूपगुणान्विता ।।५४ सत्यभामोत्तमा स्त्रीणा प्रतिनीव दृढनता। तथा तपस्विनी चंब पिता कृष्णस्य ता ददौ ॥५५ पत्तत् मत्राजित कृष्णो मणिरत्न स्यमन्तकम् । प्रादातदाहरदन भोजेन शतधन्वना ॥५६ तदा हि प्राथयामास सत्यभामामनिन्दताम् । परो रलमन्विच्छन् मरिणञ्च व स्यमन्तरम् ॥५७ भद्रकार तता हत्वा पतधन्वा महाबल । रात्रौ त मरिणमादाय तताऽ गय दत्तवान् ॥५८ पानी मात्मा की विशुधिर लिए स्यमन्तर मरिण मा उनने ग्रहण किया पा और ऋगरात्र से उमर लिये पनुनय किया पा! हलो पश्चात् वह उस दुरा से बाहर निरम गरे पे हम तरह उनने मणि को मार अपने प्रारमा रे द्वारा अपन मारमाप वाद का चोपन पर समस्त मात्वतारी समिति । वायु पुराण में जाग्याना मणि को मानिन् को दे दिया था | फिर मधुसूदन ने जाग्यवती नाम यागी पन्या में कहा कि उम मिया भभिशाप से जादिन अर्थात् में प्रव विपुग होगया हू ॥५॥ इम कृष्ण के उपर व्यपोहित मिध्यराभिनम्ति जा काई जानता है अर्थात् इसे पढ़ना या मुनता है वह अभी भी मिया मावाद गे दूपित नही होता है ॥१२॥ दश बहिन भार्यामो मे सजिन में गौ पुष बहन ही प्रगिनि वाने हुए थे उनमे भङ्गार पदम बडा या । वह बोर वनपति- अपम्फाल भोर मुप्रिय पा ॥५३॥ इसके अनन्नर भङ्गकार की सुन्दर सन्तति द्वारदनी नाम वाली न तीन रूप और गुण में यक्त कुमारियो का प्रसव दिया था ॥५४॥ स्तियो मे प्रति उत्तम व्रत वाली की भांति दृढ व्रतवानी मत्यभामा जो परम नरम्बिनी थी उमन उसके पिता ने श्रीकृष्ण को दे दिया था ॥५॥ जो मणियो से पर्व श्रेष्ठ म्पमन्ना मणि वृपा ने सत्राजित को दे दी थी उसे शत- धावा ने भोज से हरण कर लिया था ।५६उस समय स्पमनकमरिण को चाहते हरा प्रकर ने प्रतिदिन सत्यमामा से प्रार्थना की थी।। ५७॥ तब दानधन्दा ने जोति महाद बनवान् था, भद्रद्वार को मारकर रात्रि म उस मरिण को लार पर 41 दे दी थी ॥५॥ प्रक रस्तु तदा रत्न मादाय स नरर्षभ । समय कारण चर वोध्यो नान्यस्त्वयेत्युत ॥५६ वयमभ्युपपत्स्याम कृष्णेन व प्रधर्पित । मम च द्वारका सर्वा वशे तिष्ठन्त्यसशयम् ।।६० हते पितरि दुग्वार्ता सत्यभामा यशस्विनी। प्रपयो रयमारुह्य नगर वारणावतम् ॥६१ सत्यभामा तु तवृत्त भोजस्य शतधन्वन । सतस्त्वरितमागम्य द्वारका मधुसूदन ! पूर्वज हलिन श्रीमानिद वचनमब्रवीद ।।६४ विष्णु का वर्णन ] [ २५१ हत प्रमेन मिहेन सत्राजिच्छतधन्वना । स्यमन्तकमह मार्ग तस्य प्रहर है प्रभो ॥६५ तदारोह रथ शीघ्रम् भोज हत्वा महाबलम् । स्यमन्तो महाबाहो तदास्माक भविष्यति ॥६६ उग नरो में श्रेष्ठ प्रकर ने उस समय उस रन को लेकर प्रतिज्ञा पराई या पातं पराली थी कि इसके प्राप्त होने का कारण तुझे अन्य विमी को भी नहीं जात पराना चाहिए ॥५६॥ हम अभ्युपपन्न करेंगे । तुझको कृष्ण ने प्रधापन रिया है। पर यह समम्त द्वारा निस्मगय मेरे यश में रहेगी ॥६॥ अपने पिना के मारे जाने पर यशस्विनी सत्यभामा दुख से पीडित हुई रथ पर सवार होकर वारणावत नगर में गई थी ॥६१।। मत्यभामा ने शनधन्वा भोज का वह गमस्न वृन भर्ता मे निवेदन किया और दुम से मात होपर पाग मे स्थिन गते हुए प्रपात किया था ॥६२॥ दग्ध हुए पाए डवों की उदक प्रिया वो हरि । पूर्ण करवे भाइयो के तुल्य भयं म मात्र को नियोजित किया था ॥६३॥ इमा पश्चात् मघुसूदन तुरन्त ही दारखा म माकर अपने बड़े भाई बलगमजी में यह वचन बाल-६४॥ हे प्रभो ! सिंह ने प्रमेन को मार दिया था और तपन्या ने गाजित् को मार दिया है। उमरे स्यमन्तक को मैं सोजता ह, श्रा प्रहार गरिय ॥६५।। सा प्रव प्राप रप पर मारोहण परिये पोर महान् बनवान् को भोज यो पीन मार पर है महावाहो । तब पह स्यमन्ता हमारी हो जायगी ।।६६॥ तत प्रवृत्ते युद्ध तु तुमुले भोजवृधायो । पतधन्या न चार रमवक्षन् सर्वतो दिशि ॥६७ प्रनष्टा वायरोहन्तु कृत्वा भोजजनाईनो। मत्तोऽपि गाघ्यावाद पयानात गेऽभ्युपपद्यत ।।६८ प्रायाने ततो वृद्धि भूपचके भयान्यितः। योजनाना दात मात्र यया च प्रत्यपद्यत ॥६६ विशातहदया नाम बनयोजनगामिनी। भोजम्य यदवादियों यया कृपामयोपयत् ।।३०
२५२ ]
[ वायु पुराण
प्रवद्धवेगा बडवा स्वध्वना शतयोजनम् ।
दृष्टा रातिस्तस्य शतधन्वानमई यत् ।।७१
ततस्तस्य यास्ते तु श्रमात खेदाच्च वै द्विजा ।
समुत्पेतू रथप्रारणा वृष्णो राममथाब्रवीत् ॥७२
तिष्ठस्वेह महाबाहो दृष्टदोषा मया हया ।
पभया गत्वा हरिप्यामि मणिरत्न स्यमन्तकम् ।।७३
पझ्यामेव ततो गत्वा शतधन्वानमच्युत ।
मिथिलाधिपति त व जघान परमास्त्रवित् ।।७४
इसके पश्चात् भोज और कृष्ण का तुमुल युद्ध प्रवृत्त हो जाने पर गत
धवा ने समस्त दिशामो म प्रक्रूर को नही देखा था॥६॥ भोज पोर जनादन
नष्ट न होने वाले प्रश्नों का प्रबरोह करके शक्त होते हुए भी साध्य बाधक्य से
अक्रूर सभ्युपपा नहीं हुआ ॥६॥ भय मे युक्त होते हुए फिर उसने अपमान
करने में बुद्धि की थी । सो योजन मागे जिससे प्रतिपन्न होगया ॥६॥ विज्ञात
हृदया-इस नाम वाली सो योजन तक गमत करने वाली भोज की बडवा थी
जिसके द्वारा उसने श्री कृष्ण के साथ युद्ध किया या ७०॥ बढ़े हुए वेग वाली
बडवा (घोडो) थी जिसने उसके रथ की गति माग के सो योजन म देखी थी
उसने शतवा का अदित कर दिया था 11७१।। हे द्विजगए । इसके पश्चात्
रथ के प्रारा स्वरूप उसके पाडे श्रम से और खेद के होने से आकाश में उड गये
थे। धीकृष्णा राम से बोले ॥७२॥ हे महावाहो ! यहाँ पर ठहरो मैंने प्रश्नो के
दोपो को देव लिया है । मैं पैरों से जाकर मणिरत्न स्यमन्तक का हरण करू पा
॥७३॥ इसके पश्चात् पैरो से ही जाकर अभ्युत ने मिथिला के अधिपति शत
धवा को मन्त्र विद्या के परम पण्डित श्रीकृष्ण ने मार दिया था ७४||
स्यमन्तक न चापश्यद्धत्वा भोज महाबलम् ।
निवृत्त चाब्रवीत् कृष्ण रत्न देहोति लागली ।।७५
नास्तीति कृष्णश्वोवाच तता रामा रुपान्वित ।
धिक्छन्दमसत् पूर्व प्रत्युवाच जनाद्द नम् ॥७६
विष्णु वंश वर्णन ] [ २५३ मातृत्वान्मर्पयाम्येप स्वस्ति तेऽस्तु व्रजाम्यहम् । कृत्य न मे द्वारकया न त्वया न च वृष्णिभि १७७ प्रविवेश ततो रामो मिथिलामरिमईन. । मर्वकामम्पहृतमथिलेनैव पूजितः ॥७८ एतस्मिन्न व काले तु बन्न मंतिमतावर । नानारूपान् ऋतुन् सर्वानाजहार निरर्गलान् ।।७६ दीक्षामय सकवच रक्षार्थ प्रविवेश ह । स्यमन्तककृते राजा गाधिपुत्रो महायशाः ।।८० अर्थान् रत्नानि चाग्रचारिंग द्रव्याणि विविधानि च । पष्टिवपंगते काले यज्ञपु विन्ययोजयत् ।।८१ अक्र रयज्ञ इत्येते ख्यातास्तस्य महात्मन । वनदक्षिणा सर्वे सर्वकामप्रदायिनः ॥५२ और महान बलवान् भोज को मार कर स्यमन्तक मरिण को नहीं देखा था। लौटे हुए कृष्ण से लागलधारी बलराम ने कहा रत्न को देदो ॥७॥ श्रीकृष्ण ने कहा वह मरिण नहीं है । तब तो बलराम क्रोध से युक्त हो उठे। बार बार धिक्-इस शब्द को पहिले कहते हुए जनार्दन मे वोले ॥७६॥ मेरे भाई के होने के कारण से मैं यह सहन करता हूँ। तुम्हारा कल्याण हो-मैं तो प्रब जाता हूँ । मुझे द्वारका से कोई काम नहीं है न तुझसे और न वृष्णियो से कुछ प्रयोजन है ॥७७।। इसके पश्चात् बलराम ने जोकि शत्रुनो के मर्दन करने वाले थे मिथिला में प्रवेश किया था और वहाँ समस्त कामना वाले उपहनो के द्वारा मैथिल से ही पूजित हुए थे ||७८॥ इसी वीच मे बुद्धिमानो मे श्रेष्ठ बभ्रू ने भनेक रूप वाले निरगंल सभी ऋतुप्रो को प्राहृत किया था ।।७।। महान पश वाले राजा गाधि पुत्र ने स्यमन्त के लिये दीक्षामय सक्वच को रक्षा के लिये प्रविष्ट किया था ||८०॥ साठ वर्ष के काल मे यज्ञो मे धनो को-रलो को पौर उत्तम विविध भौति के द्रव्यो को विनियोजित किया था 1८१|| उस महान् आत्मा वाले ये सब 'मकर यज्ञ' इस नाम मे ख्यात हुए थे। जिनमे बहुत मा मान और दक्षिणा वाले तथा समस्त कामनामो को देने वाले वे यज्ञ पे ॥२॥ ।
२५४ ]
[ वायु पुगर
अथ दुर्योधनो राजा गत्वाऽथ मिथिला प्रभु ।
गदाशिक्षा ततो दिव्या बलभद्रादवासवान् १८३
प्रसाद्य तु ततो विप्रा वृष्ण्यन्धकमहारय ।
आनौती द्वारकामेव कृष्णेन च महात्मना ।1८४
अक्रू रमन्धक साद्धं मुपायात् पुरुषर्षभ ।
युद्ध हत्वा तु शत्रुघ्न सह बन्धुमता बली ६५
श्वपल्कतनयायान्तु नराया नरसत्तमो।
भङ्गवारस्य तनयो विश्रुतौ सुमहायलो ॥८६
जज्ञातेऽन्धकमुख्यस्य शत्रुघ्ना बन्धुमाश्च तौ।
वधार्थ भङ्गकारस्य कृष्णो न प्रीतिमान् भवेत् ॥८७
शातिभेदमयादीत समुपेक्षितवास्तथा ।
अपयाते तथान रे नावपत्पाक्शासन ।।
अनादृष्ट्या हत राष्टमभवत्तद्वघोचतम् ।
तत प्रमादयामासुरकर बुकुरान्धका ८६
पुनरवती प्राप्ते तदा दानपतौ तथा।
प्रववर्ष सत्राक्ष कुक्षौ जलनिधेस्तत ॥६०
इसके पश्चात् प्रभु राजा दुर्योधन ने मिथिला में जाकर बलभद्र से।
गदा की शिक्षा को प्राप्त किया या ॥३॥ हे विप्र वृद । इसके अनतर दृषि
अथक और महारयों के द्वारा दलरामग्री को प्रसन्न करने महारमा कृष्ण
द्वारा उन्हें फिर द्वारकापुरी में हो वापिस ल आये गय ॥४॥ उस पुरुषो
थेष्ट बली बलराम ने युद्ध म वधुमान के साथ म शत्रुघ्न को मार कर अब
के साथ प्रक्रूर के पास पहुंचे थे।५11 श्वपल की तनया मनरामे भगवा
नरपेठ महान बर बाल एव प्रसिद्ध दा तनय हुए॥१६|| उस अधवा म मुर
शत्रुघ्न और वधुपाद ये दो पुत्र थे । भङ्गकार के वध के लिये कृष्ण प्रोति वा
नही हुए थे॥८७॥ ज्ञाति के भेद के भय से डरे हुए उसकी उस प्रवार स र
करदी थी। प्रक्रूर पे अपयात होजाने पर इद ने वर्षा नहीं की थी |
अनावृष्टि से हत हुए राष्ट्र ने उसवे वर वरदने की तैयारी की थी। तब पुरा
विष्णु वा वर्णन ] [ २५५ वो ने भर को प्रसन्न किया था II तब उम ममय फिर दानपति के द्वारका पुरी में प्राप्त हो जाने पर फिर जतनिधि की दुक्षि मे द्रन्द्र देव ने म्यूब वर्मा की थी ॥३०॥ वन्याञ्च यामुदेवाय स्वसार भोलसम्मनाम् । अकरः प्रददो श्रीमान् प्रीत्यर्थं यदुपुङ्गवः ॥६१ अथ विज्ञाय योगेन कृष्णो बभ्र गत मरिणम् । सभामध्ये तदा प्राह तमन र जनार्दन ॥१२ यच रत्न मणिवर तव हस्तगत प्रभो। तत् प्रयच्छस्व मानार्ह विमतिञ्चार मा वृथा ॥६३ पष्टिवर्पगते काले यद्रोपोऽभूनदा मम । सुसरूढ सकृत् प्राप्तस्तत्वालाश्रित्य स महान् ॥९८ तत करणस्य वचनात् सर्वंसात्वतससदि। प्रददी त मणि वभ्र रक्लेमेन महामति ॥६५ तत मार्जवसप्राप्तवध्र हस्तादरिन्दम । ददौ प्रदृष्टमनसा त मरिंग बभ्रवे पुन ॥६६ राक्रएहस्तात् सप्राप्य मणिरत्न स्यमन्तकम् । मावद्धघ गान्दिनीपुत्रा विरराजागुमानिव ।।६७ इमा मिथ्याभिशस्ति यो विशुशामपि चोत्तमाम् । वेद मिय्याभिशस्ति स न वजेच वचन ॥९८ यदुपो में यह मयूर ने अपनी कन्या पौर शील से मम्मन वहिन को पागुदेव के लिये उनकी प्रीति के लिये ददी थी ॥१॥ इगो पनतर धोरया नयोग द्वारा यभरे पास मणि होने की जानवर जनार्दन ने मभारे मध्य में उम पर में बहा ॥१२हे प्रभो । भोर रत्न अंध मणि तुम्हारे हाय लग गई है। माना । उसे देशो मोर ग काम मे पहा कोई भी विमति मम मागे HT साठ वर्ष गमय मे तर जो मुझे गेर हुदा है एक बार प्राप्त होजाने पासा पर इस साये रामबागहारा पार यह बात पास होने हुए मनीमाति होगा। इससे पारा गमान गारों को ममद में श्रीकृष्ट
२५६ ]
[ वायु पुराण
इन वचनो से महा बुद्धि वाले बभ्र ने विना विनी क्लेश के उस मणि को दे
दिया था ॥६५॥ इसके पश्चात् सरलता से वभ्र के हाथ से प्राप्त हुई उस मणि
को परिन्दम ने बहे हो प्रसन्न मन स पुन उस मरिण को वन को देदी थी ।।६।
उस गान्दिनी पुत्र ने श्रीकृष्ण के हाथ से उस मणिरत्न स्यमन्तव को पाकर
और भएठ मे बांधकर पशुमान की तरह सुशोभित हुए । इस मिथ्याभि-
शास्ति को जो कोई विशुद्ध को भी उत्तम को पानेगा वह कभी मिथ्याभिशस्ति
को प्रास नहीं होगा ॥६८)
अनिमित्राच्छिनिर्जज्ञ कनिष्ठावृष्णिनन्दनात IIte
सत्यवान् सत्यसम्पन्न सत्यवस्तरय चात्मज ।
सात्यकियुयुधानस्य तस्य भूति सुतोऽभवत् ॥१००
भूतेयुगन्धर पुत्र इति भोत्या प्रकोतिताः ।
जज्ञाते तनयो पृश्ने दवफल्कश्चित्रकश्च य ।।१०१
श्वफल्कस्तु महाराजो धर्मात्मा यत्र वर्तते ।
नास्ति व्याधिभय तत्र न चावृष्टिभय तथा ॥१०२
कदाचित काशिराजस्य विभोस्तु द्विजसत्तमा ।
प्रीणि वरिण विपये नावपत्पाकशासन ॥१०३
स तत्र वासयामास श्वफल्क परमाचितम् ।
श्वफल्कपरिवासेन प्रावर्षत्पावशासन ॥१०४
श्वफल्क काशिराजस्य सुता भार्यामनिन्दिताम् ।
गान्दिनी नाम मा सा हि ददौ विप्राय नित्या ॥१०५
सा मातुरुदरस्था वै बहुवर्ष शतान किल ।
वसति स्म न वै जज्ञे गर्भस्थान्ता पिताब्रवीत् ॥१०६
राजा अनमित्र से शिवि का जन्म हुआ जोकि वृष्णि का मबसे छोटा
पुत्र या १६ उमके पुत्र सत्यवाक्-सत्यसम्पन्न और सत्यक थे । युयुधान का
सात्यकि पुत्र हुआ था। और उसका पुत्र भूति नाम वाला उत्पन्न हुमा था
11१००॥ भूति का पुत्र युगन्धर नामक हुआ। ये सब संसार मे भौत्य इस नाम
से प्रसिद्ध हुए थे। प्रश्न के श्वपल्क और चित्रक ये दो पुत्रो का कम हुमा था
. विप्शु वंश वर्णन ] [ २५७ ॥१०११३ जहाँ महाराज श्वफल्य तो धर्मात्मा हुए हैं। वहां पर विसी भी व्याधि का कभी कोई भय ही नहीं हुआ था तया न कभी अनावृष्टि ( वर्षा होने का प्रभाव) ही हुई थी ॥१०२॥ हे द्विजगण ! किमी समय में विभु काशिराज के समय में तीन वर्ष तक देश में इन्द्र देव ने वर्षा ही नहीं की थी ॥१०३|| उमने वहाँ पर श्वपल्क को भली भांति समर्पित करके बमाया था। फिर श्वफल्क के परि निवास होने से पाकशासन ने वर्षा की थी ॥१४॥ श्वपल्क ने काशिराज पी मुता को मानन्दित भार्या मान्दिनी नाम बालो की थी। वह एक गो रोग ही ब्राह्मण को दिया करती थी।॥१०॥ वह माता के उदर मे ही वहत से संबडो वर्ष तक स्थित रही थी और उसने जन्म ही ग्रहण नहीं किया था तब उदर में स्थित उससे उसके पिता ने कहा था ॥१०६॥ जायस्व शीघ्र भद्रन्ते किमर्थ चापि तिष्ठसि । प्रोवाच चन गर्भस्था सा कन्या गोदिते दिने ॥१०७ यदि दत्ता तदा स्या हि यदि स्यामीहता पित । तथेत्युवाच ता तस्या पिता काममपूपुरत् ।।१०८ दाता यज्वा च शूरश्च थु तवानतिथिनिय । तस्या पुत्र स्मृतोऽक र वफल्को भूरिदक्षिण ॥१०६ उपमगुस्तथा मगुमृदुरश्चारिमेजयः। गिरिरक्षस्ततो यक्ष शत्रुघ्नो वारिमई नः ॥११० धर्मभृच्च शृष्टचयो वर्गमोचस्तथापर । भावाहप्रतिवाही च वगुदेवा वराङ्गना ॥१११ प्रक रादुप्रसेन्यात्तु सुती द्वौ कुलनन्दिनी । दैवश्वानुपदेवध जज्ञाते देवसमिती ॥११२ चित्रकस्याभवन् पुत्रा. पृथुविपृथुरेव च । भश्वनीवोभववाहुश्च सुपावनगवेपणौ ॥११३ परिष्टनेमिरविश्व सुवर्मा वर्मचर्मभृत् । अभूमिभूमिश्च श्रविष्ठायवणे स्त्रियौ ॥११४ २५% ] । वाय पुराण हे गुपी ! तुम उन्म प्रहण करो, तुम्हारा कल्याण होगा । क्या कारण है निगमे तुम उदर से बाहिर नहीं निकल रही हो और वहाँ पर बंटी हो ? तब उम गर्भ में स्थित पन्या ने इस प्रपने गिता मे पहा था हि यदि रोज-रोज गौ का दान करने वाला हो तो मैं जन्म लूगी । हे पिता ! मैं यही चाहती है। तर उगके पिता ने 'ऐना ही होगा-पर कहार उरी कामना को पूर्ण प्रिया था ॥१०५-१०८॥ उरवा पुत्र पर अपर बहुत साता-यदा-पूर-शास्त्रों मा भाता-बहुत दक्षिणा देने वाला पोर पतिथियो का प्रिय हुपा था ॥१०॥ उपमगु-मगु-मृदुर-मादिमेजय-गिरिरक्ष पौर उमरो यक्ष-शत्रुघ्न-वारि मन- धर्मभृत्-मृष्टचप तथा दूगरा नर्गमोच-आवाद और प्रतिवाद तथा गगना यमुरेवा हुए थे ।।११०-१११॥ भकूर मे उनमेनी में कुल को मानन्दिन करने वाने दो पंदा हुए थे जिनका नाम देव और अनुपदेव था और वे दोनो देवों धे ममान धे ॥११२॥ चित्रा के पृथु-विपृथु-प्रश्वग्रोव-प्रश्ववाह-गुपावक- गदेगरण-प्ररिष्टनेमि-प्रश्व-मुवर्मा-वर्मचर्यभृत्-प्रभूमि-वभूमि पुत्र उत्पन्न हुए थे। विद्यापौर थबरणा दो त्रियां थी ॥११-११।। सत्यकात् काशिदुहिता लेभे सा चतुरः मुतान् । वकुद भजमानञ्च शमीक्वलवहिपो॥११५ पदस्य सुनो वृष्टिस्तु तनयोऽभवत् । पोतरोमा तस्याथ रेवतोऽभवदात्मजः ॥११६ तस्यासीत्तुम्बुरसखा विद्वान् पुरोऽभवविल। स्यायते यस्य नाम्ना स चन्दनोदक्दुन्दुभिः ।।११७ तस्माच्चाभिजित पुत्र उत्पन्नस्तु पुनर्वसु । अश्वमेधन्तु पुत्रार्थे प्राजहार नरोत्तम ।।११८ तस्य मध्येऽतिरात्रस्य सदोमध्यात्समुत्थितम् । ततस्तु विद्वान् धर्मज्ञो दाता यज्वा पुनर्वसु ॥११६ तस्यापि पुत्रमिथुन बाहुवाणाजित विल। पाहुकश्चाहुकी चव स्यातौ मतिमतावरौ ॥१२०
भूमिपालस्य भोजस्य उत्तिष्ठेत् किङ्किणी दिल ||१२६
विधा व वर्णन ]
[ २५६
इमाशोदाहरन्यय श्लोकान् प्रति तमाहुरम् ।
सोपासनानुसारिणा सधजाना वपिनाम् ।।१२१
रथाना मेयोपारणा सह्माणि दांव तु ।
नामन्यवादी त्वासीत्तु नायग्या नामयदः ।।१२२
गाशुचि प्यधर्मात्मा नाविद्वान वृशोभिवत् ।
ग्राहक्स्य धृतिः पुत्र इत्यमेवमनुगुथ म ॥१२३
मत्यक मे कागि दुहिता ने चार पुत्रों को प्राप्त रिया या सिने नाम
बकुद-मनमान प्रौर मीक तथा वलवयि पे ॥११५॥ कद का पुत्र वृष्टि
नाम वाला हुआ और वृष्टि का पुत्र कपोतराम हुभा या और उसका पुत्र रेवत
हुमा या ॥११६॥ उगो नुम्बुक गया परम विद्वान् पुत्र उत्पन्न हुमा था जिसके
नाम मे चन्दनोदर दुन्दुभि प्रमिन होता है ।।११७॥ पोर उसमे अभिजित् पुष
हुमा और पुनर्वसु उत्पन्न हुमा था? उस नरोत्तम नै पुत्र व लिय अश्वमेध यज्ञ
किया था ॥११॥ उम तिगर के मध्य मे मदोमध्य मे समुथित हुपा था।
उमसे परम विद्वान-दान देने वाला-धर्म का ज्ञाता और यया पुनर्वसु माया
।।११।। उमरे भी पुत्रा का जोडा वाहु वाणाजित हुमा जोकि प्राहुर और
आहुरि-इन नामा स मनिमातो म परमश्रेष्ठ स्यान हुए थे ।।१२०॥ यहां पर उन
पाहुक ये प्रति ये श्लोक उदाहृत होने है । उमके उपामइ मुक्पण के सहित
तथा ध्वजारो के सहिन बरूधियो दे और मेघपोप वाले रथो व दा मत्स थे।
वह अमत्यवादी नही था वह अयज्वा तथा असहस्रद नही था, न वह प्रशुधि
और न प्रधर्मात्मा ही था, वह प्रविद्वान् तथा प्रकृा भी नहीं हुआ था। प्राहुर
का पुन ति हुआ था-~यही हम सुनते हैं ॥१२१ १२२.१२३||
श्वेतेन परिचारेण विशोरप्रतिमान् हयान् ।
अशीतियुक्तनियुनान्याहुकप्रतिमोऽद्रजत् ॥१२४
पूर्वस्यान्दिगि नागाना भोजस्य प्रतिरेजिरे।
रूप्ययाञ्चनक्क्षामा सहस्राण्येवाविंशति ॥१२५
तावन्त्येव सहस्राणि उत्तरस्यान्तथा दिशि।
२६० ] [ वायु पुराण आहुकश्चाहुकान्वाय स्वसार त्वाहुकोन्ददौ। आहुकान्धस्य दुहिता द्वौ पुत्रौ सम्बभूवतु ॥१२७ देवक श्चोग्रसेनश्च देवगर्भसमावुभौ । देवस्य सुता वीरा जज्ञिरे त्रिदशोपमा. ।।१२८ देवानामपि देवश्च सुदेवो देवरञ्जिता। तेपा स्वसार सप्तामन् वसुदेवाय ससदौ ॥१२६ वृकदेवोपदेवा च तथान्या देवरक्षिता। श्रीदेवा शान्तिदेवा च महादेवा तथापरा ॥१३०॥ सप्तमी देवकी तासा सुनामा चारुदर्शना। नवोग्रसेनस्य सुता क्सस्तेपान्तु पूर्वज ॥१३१ श्वेत परिचार मे युक्त किमोर प्रतिमा वाले अस्सी की मस्या से युक्त नियुत प्रश्वो को लार आहक प्रतिम जाया करता था ॥१२४॥ पूर्व दिशा मे चांदी पौर मुवर्ण मी कक्षा वाले भोज के नागो की इक्कीस हजार गग्या प्रति- रेजित हुई थी ।।१२।। उत्तर दिशा में भी उतनी ही मरूपा पी। भूमि के पालर भोज की किङ्किणी उटनी थी॥१२६|| पाहुन ने आहुरग्य माहुकी बहिन को दे दिया था। माइगाय की दुहिता मोर दो पुत्र हुए देवक और उग्रमेन ये दोनो देवगभं के समान थे। देवर के देवो के समान वीर पुत्रो ने जन्म ग्रहण किया था ॥१२७.१२८।। देवो के भी देव-गुदेव पौर देव रजित हुए थे। उनके गात बहिनें थीं जोरि वमुदेव के लिए देवी थीं ॥१२॥ उनले नाम दृषदेवा-उपदेवा-देवरक्षिता-श्रीदेवा-पातिदेवा तया महादेश एवं उनमें मातकी देवरी यी जो मुन्दर नाम दानी पोर देखने में बहुत सुन्दर भी। उग्रसेन के नौ पुत्र थे उन गद में बम सबसे बड़ा था ॥१३०-१३१॥ न्यग्रोधन सुनामा च बहमन भूमयः। गूनन राष्ट्राश्व युद्धतुष्ट गुपुष्टिमान् ॥१३२ तेपा स्वमार पचय कर्मधर्मवती तथा। गतान्क राष्ट्रपाला प पुता पंव घराङ्गना ।।१३३ के लिये
पण वश वन ]
।
२६१
उग्रसेनो महापत्यो विरयात कुकुरोद्भव ।
कुकुराणामिम वश धारय नमितौजसाम् ।
प्रात्मनो विपुल वश प्रजावाश्च भवेतर ॥१३४
भजमानस्य पुत्रस्तु रथिमुख्यो विदूरथ ।
राज्याधिदेव शूरश्च विदुरश्च सुतोऽभवत् ।।१३५
तस्य शूरस्य तु सुता जज्ञिरे वलवत्तरा ।
वातश्च व निवातश्च शोरिगत श्वेतवाहन ॥१३६
शमी च गदवर्मा च निदात शक्रशक्रजित् ।
शमिपुत्र प्रतिक्षिप्त प्रतिक्षितस्य चात्मज ॥१३७
स्वयम्भोज स्वयम्भोजाद्ध दिक सम्बभूव ह ।
हदिकस्य सुतास्त्वासन दश भीमपराकमा ॥१३८
कृतवर्मा कृतस्तेषा शतधन्वा तु मध्यम ।
देवाहश्च वनाहश्च भिपग द्वैतरथश्च य ॥१३६
सुदान्तश्च धियान्तश्च नव वान् कनकोद्भव ।
देवाहस्य सुतो विद्वान् जज्ञ कम्बलवहिप ॥१४०
असमौजा सुतस्तस्य सुमहौजाश्च विश्रु त ।
मजावपुत्राय तत प्रददावसमौजसे ।
सुदष्टूश्च सुरूपञ्च कृष्ण इत्यन्धका स्मृता ॥१४१
अन्धकानामिम वश कीत्तयानस्तु नित्यश ।
मात्मानो विपुल वश लभते नात्र संशय ॥१४२
उग्रसेन के नाम ये हैं -न्यग्रोध-सुनात-कदाकु-भूमय-सुतनु-राष्ट्रपाल
युद्धतुष्ट और सुपुरिमान् थे ।।१३२ । उनको पाँच कम धमवती-शतादू-राष्ट्र
पाला-कुता और वराङ्गना ये वहिने थी ॥१३३।। कुकुरोद्भव उग्रसेन बहुत
पधिक मन्तति वाला विख्यात था । कुकुरो के इस महान दश को जोकि महान
प्रोज वालो का वश है धारण एव श्रवण करने वाला मनुष्य अपने बडे वश को
धारण करने वाला नया सतति सम्पन्न हुआ करता है ।।१३४॥ भवमान का
पुत्र रथियो म मुख्य विदूरथ या जो राज्य का अधिदेव मौर यूर गा । उसका
२६२ [ वायु पुराण विदुर पुत्र हुआ था । उस शूर वे अधिक बलवान पुत्र उत्पन्न हुए थे जिनके नाम वात निवात-शोणित-श्वतवाहन-शमी-गदवर्मा-निहात और दशकमनजिन् थे । शमी के पुत्र प्रतिक्षिप्त हुआ और प्रतिक्षिप्त का प्रात्मज स्वयम्भोज हुमा तथा स्वयम्भोज स हृदि पुत्र उत्पन्न हुआ था । हृदिक के भीम के ममान परा- क्रम वाल दश पुत्र हुए थे ॥१३५ से १३८॥ उनके नाम ये हैं-कृतवर्मा-वृत जाकि उनम मध्यम था-देवाह-वनाह-निपक्-वैतरण-सुदान्त-धियान्त- नरवान्-नोद्भव ये नाम हैं। देवाह का पुत्र बडा विद्वान् कम्बलवहिप नाम वाला हुआ था ।।१३९ १४०॥ उसका पुत्र असमौज और सुमहौजा विश्रुत हुए अपुत्र असमौजम के लिय अज दिये थे। मुदष्ट्र-मुरूप और कृष्ण ये सब अधिक कहे गये हैं ।।१४१।। अन्धको के इस वश का नित्य ही कीर्तन वाला पुरुष अपना बहुन वश प्राप्त किया करता है-इसम कुछ सशय नहीं है ॥१४२॥ अस्मक्या जनयामास शूरो वै देवमानुपिम् । माध्यान्तु जनयामास शूरो वै देवभीढुपम् ॥१४३ माध्यान्तु जज्ञिरे शूराद्भोजाया पुरुषा दश । वसुदेवो महावाहु पूवमानकदुन्दुभि ॥१४४ जज्ञ तस्य प्रसूतस्य दुन्दुभि प्राणदद्दिवि। मानकानाञ्च सह्लाद सुमहानभवद्दिवि ।।१४५ पपात पुष्पवपञ्च शूरस्य भवने महत् । मनुष्यलोके कृत्स्नेऽपि रूपे नास्ति समो भुवि ॥१४६ यस्यासीत पुस्पाग्र यस्य कोत्तिश्चन्द्रमसो यथा। देवभागस्ततो जज्ञे ततो देवश्रवा पुन ॥१४७ अनादृष्टिक्ड व नन्दनश्च व भृजिन । श्याम समीको गण्डूप चतस्रस्तु वराङ्गना ।।१४८ पृथा च थ तवदा च श्रुतकीत्ति श्रुतश्रवा । राजाविदेवी च तया पञ्चता वीरमातर ॥१४६ पृथा दुहितर चक्र कुन्तिस्ता पाण्डुरावत् । अनपत्याय गृद्धाय वुन्तिभोजाय ता ददौ ॥१५० विष्णु वश वर्णन ] [ २६३ शूर ने अस्मकी मे देव मानुषी को जन्म दिया था । और मापी में भूरने देवमीटुप को ममुत्पन्न किया था |१४३|| मापी मे भोजा में यूर से दश पुरुषो ने जन्म ग्रहण किया था। महान् बाहु वाले वसुदेव पहिले प्रानक दुन्दुभि हुए ॥१४४॥ उमदे प्रसूत होने के समय मे देवलोक मे दुन्दुभि बजाई गई थी और प्रानको का बड़ा भागद दिवि मे हुआ था ॥१४५॥ उम समय शूर के भवन में पुष्पा की वर्षा हुई थी। ममात मनुष्य लोग मे रूप मे उसके समान कोई भी नहीं था ॥१४६॥ उस पुरुषों में श्रेष्ठ की कोत्ति चन्द्रमा के समान थी। इसके पश्चात् देवभाग ने जन्म लिया और फिर देवधवा ने जन्म ग्रहण किया था ।१४७ पनादि कह-नन्दन-भृब्जिन-श्याग-शमीर-गएप और चार वराङ्गना जोकि नाम से पृया-थुनबेदा-श्रुतकीति-श्रुतश्रवा और राधिदेवो ये पांच वीर मातायें हुई हैं ।।१४८-१४६।। दुहिता पृथा कुन्ति को पाण्डु ने व्याहा था। अनपत्य अर्थात् बिना सन्तनि वाले वृद्ध कुन्ति भोज के लिये उसको दे दिया या ॥१०॥ तस्मात् कुन्तीति विख्याता कुन्तीभोजात्मजा पृथा। कुरुवीर' पाण्डुमुख्यस्तस्माद्भार्यामविन्दत ।।१५१ पृथा जज्ञे तत पुत्रान् त्रीनग्नि समतेजस । लोवेऽप्रतिरथान् वीरान् शक्तुल्यपराकमान् ॥१५२ धर्माद्य धिष्ठिर पुत्र मारुनाच वृकोदरम् । इन्द्राद्धनञ्जयञ्च व पृथा पुनानजीजनत् ।।१५३।। माद्रवत्यान्तु जनितावाश्विनाविति विश्रु तम् । नकुल सहदेवश्च रूपसत्त्वगुणान्वितौ ।।१५४ जज़ च श्र तदेवाया तनयो वृद्धशर्मरणः । वरूपाधिपतिर्वीरो दन्तवक्त्रो महाबल ॥१५५ कैकेया श्रुतकीर्यान्तु जज्ञे सन्तर्दन पुन । चेकितानबृहत्क्षत्री तथवान्यो महावलौ ।।१५६ विन्दानुविन्दावावन्त्यो भ्रातरो सुमहावलो। श्रतश्रवाया चंद्यस्तु शिशुपालो बभूव ह ॥१५७ २६४ ] [ वायु पुराण दमघोपस्य राजपः पुत्रो विख्यातपौरप । य पुरासीद्दशग्रीव सबभूवारिमर्दन ॥१५८ इसी कारण से वह कुन्नी-इस नाम से विख्यात हुई थी क्योकि वह पुतिभोज की मात्मजा पृथा पी। कुरुमो में वीर पाएदुमुस्य ने इससे उसे भार्या के रूप मे प्राप्त किया था ||१५|| उससे पृया ने अग्नि के समान प्रदीस तेज वाले तीन पुत्रो को जन्म दिया था जोकि ससार मे अप्रतिरथ-वीर मोर इन्द्र के समान पराक्रम वाले हुए थे ॥१५२।। पृथा ने धर्म से युधिष्ठिर पुत्र को मारुत से वृकोदर को मोर इन्द्र से धनञ्जय को इस तरह से पृथा ने पुत्रो को जन्म दिया था ॥१५३॥ माद्रवती में दो प्रश्विनी-इस नाम से विश्रुत रूप तथा गुण से प्रन्वित नकुल और सहदेव उत्पन्न हुए थे ।।१५४॥ ौर व तदेवा मे वृद्धार्मा का पुत्र रूप का मधिपति-वीर एव महान बलवाला दन्तवक्त्र उत्पन्न हुमा था ॥१५५।। कैकेय श्रुत कीति मे फिर मन्तर्दन उत्पन्न हुमा या । तथा अन्य महान् बल पाले चेस्तिान भार बृहत्क्षत्र उत्पन्न हुए थे ॥१५६॥ विन्द और अनुविन्द अन्त में उत्पन्न होने वाले मर्थात् सबसे छोटे सुमहान बल बाले दो भाई थे । तथवा मे चंद्य शिशुपाल हुआ था ॥१५७॥ यह राजपि दमघोष का विख्यात पोरष वाला पुत्र था जो पहिले शत्रुनो का मदन करने वाला दशग्रीव रावण हुमा था॥१८॥ यदुथवानुजस्तस्य रुजकन्योऽनुजस्तथा। पत्न्यस्तु वसुदेवस्य त्रयोदश वराङ्गना ॥१५६ पौरवी रोहिणी चैव मदिरा चापरा तथा । तथैव भद्रा वैशाखी देवकी सप्तमी तथा ॥१६० सुगन्धिर्वनराजी च द्वे चान्ये परिचारिके। रोहिणी पौरवी चैव वाल्मीकस्यात्मजाभवत् ।।१६१ ज्येष्ठा पत्नी महाभागा दयितानक्दुन्दुभे । ज्येष्ठ लेभे सुत राम सारण निशव तथा ॥१६२ दुई म दमन शुभ्र पिण्डारवकुशीतको । चिना नाम कुमारीञ्च रोहिण्यष्टौ व्यजायत ॥१६३ r विष्णु वश वर्णन ] २६५ पौत्री रामस्य जज्ञाते विज्ञातौ निशितोत्सुकौ । पाव: च पार्वनन्दी च शिशु सत्यधृतिस्तथा ॥१६४ मन्दवाह्योऽथ रामाणगिरिको गिर एव च। शुक्लगुल्मेति गुल्मश्च दरिद्रान्तक एव च ॥१६५ कुमार्यश्चापि पञ्चाद्या नामतस्ता निबोधत । अचिष्मती सुनन्दा च सुरसा सुवचास्तथा ॥१६६ तथा शतवला चैव सारणस्य मुतास्त्विमा । भद्रश्वो भद्रगुप्तिश्च भद्रविघ्नस्तथैव च ॥१६७ भद्राबाहुर्भद्ररथो भद्रकल्पस्तथैव च । सुपाश्र्वक कीतिमाश्च रोहिताश्वश्च भद्रज ॥१६८ दुर्मदश्वाभिभूतश्च रोहिण्या कुलजा स्मृता । नन्दोपनन्दौ मित्रश्च कुक्षिमित्रस्तथाचल ।।१६६ चिनोपचिने कन्ये च स्थित पुष्टिरथापर । मदिराया सुता ह्यते सुदेवोऽथ विजज्ञिरे ॥१७० उमका अनुज यदुधवा था तथा अनुज रुजकन्या हुआ था। वसुदेव की वर अङ्ग वाली तरह पत्नियां थी ॥१५६॥ उन पलियो के नाम इस प्रकार हैं- पौरवो-रोहिणी और अन्य अमरा तथा मदिरा थी । उसी प्रकार से भद्रा- वैशाखी-सातवी देवकी थी ॥१६॥ मुगन्धी-वनराजी और दा अन्य परिचारि कायें थी। राहिणी और पौरवी वाल्मीर की आत्मजा थी ॥१६१।। मानक दुन्दुभि की ज्येष्ठ पत्नी महभाग वाली दयिता थी। उसने ज्येष्ठ पुत्र राम को तथा शारण और निगम को प्राप्त किया था ।।१६२॥ दुर्दम-देमन-शुभ्र-पिएडा- रक और कुशीतक और कुमारी चित्रा का इस तरह रोहिणी ने पाठ को उत्पन्न किया था ॥१६३॥ राम के दो पौत्र प्रसिद्ध निशित और उत्सुक नाम वाने उत्पन्न हुए थे। पानी-पाव नन्दी-गिशु सत्यधृति-मन्दवाह्य-रामारण-गिरिक मौर गिर-शुक्लगुल्मा-और गुल्म दरिद्रान्तक ये पुत्र तथा पांचाध कुमारियां भी उत्पन्न हुई थी जिनको नाम से समझ लो । चिप्मती-मुनन्दा-मुरमा-गुवचा तथा धानबला ये सारण की पुत्रियां थी । भद्राश्व-भद्रगुहि-तया भद्रविघ्न-भद्र- ।
[ वायु पुगरण बाहु-भदरय-मद्रकल्प-सुपाश्व य-कीतिमान् और रोहिताश और भद्रह-दुमद- और अभिभूत य सब रोहिणी के वुनज है गय हैं । नन्द-उपनन्द-मित्र-कृभिः मिन-तथा अवल-चित्रा और उपचित्रा दो फन्यायें स्थित और दूमरा पुष्टि ये पुत्र मदिरा के उत्पन्न हुए थे इसके मनन्तर मुदय हुआ पा ॥१५४ १६५-१६६- ॥१६७-१६८-१६६-१७०॥ उपविम्वोऽथ विम्बश्च सत्त्वदन्तमहाँजसो । चत्वार एते विस्याता भद्रापुमा महाबलाः ।।१७१ वंशाच्या समदाच्छोरि पुत्र पौशिक्मुत्तमम् । देवक्या जशिरे शौरि सुपेरण कीर्तिमगनपि ।।१७२ तदयो भद्रसेनश्च यजुदायश्च पञ्चम । पठो भद्रविदेवश्व कम सञ्जिघान तान् ।।१७३ अथ तस्यामवस्थायामायुष्मान् सबभूव ह। लोक नाथः पुनर्विप्णु पूर्वकृष्ण प्रजापति.॥१७४ अनुजाताऽभवत् कृपणा मुभद्रा भद्रभापिणी। कृष्णा सुभद्रेति पुनव्याख्याता वृष्णिनन्दिनी ।।१७५ सुभद्राया रथी पार्थादभिमन्युरजायत । वसुदेवस्य भार्यामु महाभागासु सप्तसु । ये पुत्रा जज्ञिरे शूरा नामतस्तानिबोधत ॥१७६ प्रताऽस्य सह देवाया शूरो जज्ञम्भयासख । शाङ्गदेवाजनत्तम्यु शौरी जज्ञ कुलोद्वहम् ।।१७७ उपसङ्ग वसुञ्चापि तनयो देवरक्षिती। एव दश सुतास्तस्य कसस्तानप्यघातयत् ।।१७८ उपविम्ब-विम्ब-सत्त्वद त-महोजा ये चार पुत्र जो महान् बल वाले थे के मुन कहे गये थे ॥१७॥ वैशाखी म समद से शोरनि ने उत्तम कौशिक को उत्पन किया या । दवको म गौरि-सुषेणवीत्तिमान्-तदय-भद्रमेन- पोचदा तथा छटा भद्रविदेक था। कस ने उन सभी पुत्री को मार दिया था ॥१७२ १७३।। इमक अनन्नर उस अवस्था म प्रायुप्मान हुना था । लोक- विष्णु वा वर्णन ] [ २६७ । नाय-फिर विष्ण-पूर्व कृष्ण और प्रजापति हुए ।।१७४।। पीछे उत्पन्न हाने वाली कृष्णा-मुभद्रा-भद्रभापिणी-कृष्णा-सुभद्रा ये फिर ब्यास्यात वृष्णि नन्दिनी थी ॥१७५।। सुभद्रा में पार्थ (अर्जुन) से रथी अभिमन्यु उत्पन हुग्रा था। वसुदेवकी महान भाग वाली सात भार्यानो मे जो पुत्र उत्पन्न हुए थे उन्हें अब नाम से समझ लो ।।१७६।। इसलिये इसके सहदेवा में शूर अभयासस उत्पन्न हुआ था। शौरी ने कुल का उद्वह बरने शाङ्गदेवाजनन्तम्बु को जन्म दिया था ।।१७। उपसङ्ग और वसु भी दो तनय (पुन) थे भी दो तनय (पुन) थे जो देवों के द्वारा रक्षित हुए वे । इस प्रकार स उसक दश पुत्र थे। मम ने उनको भी मार गिराया ॥१७८॥ विजय रोचनव वर्तमान तथैव च। एतान् सर्वान् महाभागानुउपदेवा व्यजायत ॥१७६ स्वगाव महात्नान वृर देवी पाजायत । श्रागाही च स्वसा चंब सुरूपा शिशिरायणी ॥१७० सप्तम देवकीपुत सुनासा सुपुवे भुवम् । गवेपण महाभाग सड ग्राम चित्र योधिनम् ।।१८१ श्राद्धदेव पुरा येन वने विरचिता द्विजा । शंब्यायामददच्चौरिः पुत्र कौशिवमव्ययम् ॥१८२ सुगन्धी वनराजो च शोरेरास्ता परिग्रह । पुण्डश्व कपिलश्च व वसुदेवात्मजी हि तो। तयो राजाऽभवत् पुण्डः अपिलम्नु वन ययौ ॥१८३ तस्या ममभवहीरा वसुदेवात्मजो वली। रात्रा नाम निपादोऽपो प्रयम स धनुर्द्धरः ॥१८४ विख्यातो देवरातस्य महाभाग सुनाऽभवन् । पण्डिताना मत प्राहुर्देवयवसमुद्भवम् ।।१८५ अस्मक्या लभते पुत्रमनाइदृष्टि यशस्विनम् । निवत्तं शनशन श्राददेव महावलम् ॥१८६ उपदेवा ने विजय-रोचन-दमन इन सबसे महान भाग ना.
२६६ ] । वायु पुगए बाहु-भद्ररथ-भद्रकल्प-सुपार्श्व-कीतिमान् और रोहिताश्व और भद्रज-दुर्मद- और अभिभून ये सब रोहिणी वे बुलज़ कहे गये है। नन्द-उपनन्द-मित्र-कुभि- मित्र-तथा यचल-चित्रा और उपचित्रा दो क्न्यायें-स्थित और दूसरा पुष्टि ये पुत्र मदिरा के उत्पन्न हुए थे इसके प्रनन्तर सुदव हुआ था ||१९४-१६५-१६६० ॥१६७-१६८-१६६-१७०॥ उपविम्वोज्य विम्बश्व सत्त्वदन्तमहोजसो । चत्वार एते विस्याता भद्रापुत्रा महावलाः॥१७१ वंशाख्या समदाच्छोरि पुत्र कोशिकमुत्तमम् । देवक्या जज्ञिरे शौरि सुपेण कीर्तिम्मनपि ।।१७२ तदयो भद्रसेनश्च यजुदायश्च पञ्चम । पठो भद्रविदेकश्च कस.सर्वाञ्जघान तान् ॥१७३ अथ तम्यामवस्थायामायुष्मान् सबभूव है। लोक नायः पुनर्विष्णु पूर्वकृष्ण प्रजापतिः॥१७४ अनुजाताऽभवत् कृष्णा सुभद्रा भद्रभापिणो । कृष्णा मुभद्रति पुनर्व्याख्याता वृष्णिनन्दिनी ॥१७५ सुभद्राया रथी पार्थादभिमन्युरजायत। वसुदेवस्य भार्यामु महाभागासु सप्तम् । ये पुत्रा जशिरे शूरा नामतस्तानियोधत ।।१७६ अताऽस्य सह देवाया शूरो जनऽभयासख । शाङ्ग देवाजनत्तम्वु शौरी जज्ञे कुलोद्वहम् ।।१७७ उपसङ्ग वसुश्चापि तनयो देवरक्षितौ। एव दश सुतास्तस्य कसस्तानप्यघातयद ।।१७८ उपविम्ब-बिम्ब-सत्त्वदन्त-महोजा य चार पुत्र जो महान् बल वाले थे कसुत कहे गये थे ।।१७११॥ वैशाली मे समद से सौरनि ने उत्तम कौशिक को उत्पप्त किया था। देवी ग चौरि-मुषेण-कीत्तिमान् तदय -भद्रसेन- पांचों तया छटा भद्रविदेक था । कसन उन सभी पुत्रो को मार दिया ११७२ १७३।। इसके अनन्तर उस अवस्था मे प्रायुप्मात् हुमाया । लो- - विष्णु वा वणन ] [ २६६ देवक्या वसुदेवेन तपसा पुपरेक्षगा । चतुर्वाह स विज्ञ यो दिव्यरूप श्रियान्वित ॥१६३ प्रकाशो भगवार योगी कृष्णो मानुपमागत । अव्यक्तोऽव्यक्तनिङ्गस्थ स एव भगवान् प्रभु ॥ १६४ क्योकि ऐमा श्रुत है विश्राद्धदेव निषध के पहिल हुप्रा था । महान वीय वाला एकलव्य निपालो के द्वारा परिवर्तित पिया गया था ॥१७॥ विना सतति वाले गएट्रप के लिये स तुष्ट कृष्ण । दोनो पुत्र दे दिये थे। ये दोनो चार देण और माम्ब थे जो कृतास्त्र एव शस्त्र लक्षण वाले थे।॥१८॥ तन्तिज और तनिगाल वस्ताबनि कनक के अपने दो पुत्रो को प्रतापवान वसुदेव ने पुत्र हीन के लिए दे दिया था और सोन ने वीर गौरि मौर कौशिक पुत्र का दे लिया था ॥१८६॥ तपा-बोधनु विरजा-"याम और मृञ्जिम हुए उनम श्याम म तति हीन था मो वह श्याम वन म चला गया था। भोजत्व की जुगुप्मा परता हुपा उमने राजपि होन वा पद प्राप्त कर किया था ॥१६०॥ जो इस वृषण के जन्म वा नियत प्रत चाना होते हुए पटना है और किसी ब्राह्मण को इसे श्रवण कराता है वह महान सुख को प्राप्त किया करता है ।।१६१॥ महान तेज वाले देवो के भी देव प्रजापति कृया पहिल विहार बरने के लिय प्रभु नारायण ने मनुष्या म जम ग्रहण किया था ।।१२।। वसुदेव स देवकी मे तप पे द्वारा पुष्पर के समान मुर नेत्रो वाला-श्री से प्रबित-धार भुजामा से युक्त तथा दिव्य रूपधारी वह विजय है ॥१६॥ प्रकार योगी भगवान कृपया मनुष्य के स्वरूप में प्राण होगये थे। वह प्रभु भगवार ही जो अध्यक्त हैं मोर अव्यक्त चिह्नो मस्थित है मानुपएम पाप पे ॥१९॥ नारायणा यतश्च प्रभव पायो हिस । देवो नारायणो भूत्वा हरिरासीत्मनातन ॥१६५ या मृज हादिपुरप पुरा चा प्रजापतिम् । अदितेरपि पुत्रत्वमत्य यादवनदन । देवा विष्णुरिति रयात शमादवर जाऽभवत् ।।१६६ २६८ ] [ वायु पुराण उत्पन्न किया या ॥१७६।। वृकदेवी ने महान् प्रात्मा वाले स्वगाहब को उत्पन्न किया था। मागाही एक स्वसा भी थी जो सुन्दर रूप वाली शिशिरावणी थी ॥१८०। सुनासा ने सातवें देवकी के पुत्र को भुव को प्रसूत किया था । गवेपण महाभाग और संग्राम मे चित्रयोधी और श्राद्धदेव को उत्पन किया था जिसने कि पहिले वन म द्विज बनाये थे । शव्या में गौरि ने अव्यय कौशिक दिया था ॥१८१-१८२२) सुगपि और वनराजी ये शौरि का परिग्रह था । पुरद्र और कपिल ये दो वसुदेव के पुत्र थे । उन दोनों मे पुए तो राजा हुमा था पोर कपिल वन मे चला गया था ।।१८३१। उसमे वीर असुदेव का पुत्र हुआ था जो बहुत बल वाला था। यह निपाद नाम वाला राजा जो प्रथम धनु धर हुमा था ॥१८४॥ देवरात का महाभाग विख्यात पुत्र हुआ था । देवथव म समुद्भव वाला पण्डितो का मन कहते हैं ।।१८।। निवत्त ने अस्मी म प्रना दृष्टि-यशस्विनी-पान शत्रुमो के नाशक एव महा वलवान धाददेव पुत्र को प्राप्त किया १५६॥ अजायत श्राद्धदेवो निपघादिर्यत श्रुत । एकलव्यो महावीर्यो निपाद परिवद्धित ॥१८७ गण्डूषायानपत्याय वृष्णस्तुष्टोऽददत् सुत। चारदेष्णश्च साम्वञ्च कृतात्री दास्तलक्षणौ ॥१८० तन्तिजस्तन्तिमालश्च स्वपुत्री बनवस्य तु । वस्तावनेस्त्वपुत्राय वसुदेव प्रतापवान् । सौतिदंदौ मुक्त वीर गौरि कौशिक मेव च ॥१८६ तपाश्च कोधनु चव विरजा श्यामसृश्चिमी । अनपत्योऽभवच्छयाम श्यामवस्तु वन ययो। जुगुप्समानो भोजत्व राबपित्वमवाप्नुयात् ॥१६० य इद जन्म कृपगस्प पठते नियतव्रत । श्रावयेद्दाह्मणवापि मुमहत्मुसमाप्नुयात् ॥१६१ देवदेवो महातेजा पूर्व वृपण प्रजापतिः। विहारायं मनुष्येणु जजे नारायण प्रभु ॥१२ विष्णु वा वर्णन ] [ २६६ देवक्या वसुदेवेन तपसा पुषरेक्षण । चतुर्बाहु. स विज्ञ यो दिव्यरूपः श्रियान्वितः ॥१६३ प्रकाशो भगवान् योगी कृष्णो मानुपमागत.। अव्यक्तोव्यक्तलिङ्गस्थ. स एव भगवान् प्रभु ॥ १६४ क्योकि ऐमा ध्रुन है कि याददेव निषध के पहिले हुआ था। महान वीर्य वाला एकलव्य निपादो के द्वारा परिवदित किया गया था ॥१८७॥ विना मन्तनि वाले गएहप के लिये सन्तुष्ट कृष्ण ने दोनों पुत्र दे दिये थे। ये दोनों चारु देखा और माम्ब थे जो कृतास्त्र एव मन्त्र लक्षण वाले थे ॥१८॥ तन्तिज और तन्निमाल वस्ताबनि कनर वे अपने दो पूतो को प्रतापवान् वमुदेव ने पुत्र हीन के लिए दे दिया था और मौन ने वीर मोरि और कौशिक को दे दिया या ॥१८॥ तपा-फोरनु विरजा-याम और मृञ्जिम हुए उनमे श्याम मलति हीन था मो वह शामत्र वन म चला गया या। भोजत्व की जुगुप्मा करता हुमा उमने राजपि होन का पद प्राप्त कर त्रिया या ॥१०॥ जो इस वृषण के जन्म को नियत व्रत वाला होते हुए पढ़ता है और किमी ब्राह्मण को इसे अदरण कराता है वह महान् मुख को प्राप्त पिया करता है ।।१६१।। महान् तेर वाले देवो के भी देव प्रजापति कृष्ण पहित विहार करने के लिये प्रभु नारायण ने मनुष्यो म जन्म ग्रहण प्रिया पा ।।१६।। वमुदेव से देवकरी मे तप के द्वारा पुपर के ममान सुन्दर नत्री वाला-श्री म पन्धित-चार भुजानी से युक तथा दिव्य पधारी वह विजेय है ॥१६३।। प्रराम, योगी, भगवान कृष्ण मनुष्य के स्वरूप म प्राप्त होगय थे। वह प्रभु भगवाए ही जो अव्यक्त हैं पोर पव्यक्त बिहो मे स्थित हैं, मानुष च मे पाय थे ॥१४॥ नारायणों यतश्चक प्रभव चाव्ययो हिस । देवो नारायणा भूत्वा हरिरासीलनानन ॥१९५ योन्जबादिपुरप पुग चक्र प्रजापतिम् । मदिनरपि पुत्रत्वमेत्य यादवनन्दनः। देवो विष्णुरिति ग्यात. शबादवरजोऽभवत् ॥१९६ २७० ] [ बायु पुराण प्रसादज यस्य विभोरदित्या पुत्रकारणम् । वधार्थी सुरशवणा दैत्यदानवरक्षसाम् ॥१६७ ययातिवशजस्याथ वसुदेवस्य धीमत । कुल पुण्य यत कर्म भेजे नारायण प्रभु ॥१६८ सागरा समवम्पन्त चेलुश्व धरणीधरा । जज्वलुश्चाग्निहोत्राणि जायमाने जनार्दने ॥१६६ शिवाश्च प्रववुर्वाता प्रशान्तिमभवद्रज । ज्योतीप्यम्यधिक रेजुर्जायमाने जनार्दन ।। २०० अभिजिन्नाम नक्षन जयन्ती नाम शर्वरी । मुहूतों विजयो नाम यत्र जातो जनार्दन ॥२०१ अव्यक्त शाश्वत कृष्णो हरिराियण प्रभु । जायते स्मैव भगवान् नयनर्मोहयन् प्रजा ॥२०२ क्योकि भव्यय नारायण ने प्रभव क्यिा अर्थात् जम ग्रहण किया था देवनारायण होकर सनातन हरि हुए थ ॥१६५। जिमने पहिले प्रादि पुष्प प्रजापति का सृजन क्यिा या वह यादव नन्दन अदिति के भी पुन के स्वरूप को प्राप्त कर देव विष्णु नाम से प्रसिद्ध हुए थे और इन्द्र के छोटे भाई बन गये थे ॥१९६।। जिम विभु के अदिति के पुत्र होने का कारण केवल प्रसाद ही है। जोकि देवो के शत्रु दैत्य-दानव और राक्षमो के वध करने के लिये ही हुमा था ॥१९७॥ राजा ययाति के वश म ज म लेने बाले धीमान् वसुदेव का कुल बहुत पुण्य शाली है और पवित्र है जिसमे कि प्रभु नारायण ने जम ग्रहण कर बम किया था ॥१९८) भगवान् जनादन के उत्पन्न होने के समय में समस्त सागर कम्पमान हागये थे और मब पवन चलायमान हागये थे और चारो भोर अमि- ज्वलिन हागय थे ॥१६६ क्ल्याण कर वायु ब्रह्म करन लगी रज ने 1 प्राप्त वरली भी भगवान् जनादन के जायमान होने पर ज्योतियाँ प्रत्य- रूप से प्रकाश वाली होकर शोभित हो रही थी ॥२००। उस समय में अभिजित् नाम वाला नभत्र था-जयन्ती नाम की दादरी थी और विजय नाम वाला मुहत्तं था जिम समय म भगवान् जनादन ने अपना जम ग्रहण दिया विष्णु का वर्णन ] [ २७१ था ॥२०१॥ प्रायन-शाश्वत-प्रभु नारायण हरि श्रीकृष्ण भगवान् नेत्रो ये द्वारा प्रजा को मुग्ध करते हुए उत्पन्न हुए थे ॥२०२॥ आकाशात् पुष्पवृष्टीश्च ववर्ष विदशेश्वर । गोभिर्मङ्गलयुक्ताभि स्तुवन्तो मधुसूदनम् । महर्षय सगन्धर्वा उपतस्थु सहयश ॥२०३ वसुदेवस्तु त रात्री जात पुत्रमधाशगम् । श्रीवत्सलक्षण दृष्ट्वा दिवि दिव्य. सुलक्षणे । उवाच वसुदेव स्वरूप सहार वै प्रभो ॥२०४ भीताऽह क्सतस्तात एतदेव वाम्यहम् । मम पुना हतास्तेन ज्येष्ठास्तेऽद्भुतदशना ॥२०५ वसुदेववच श्रुत्वा प स हृतवान् प्रभु । अनुज्ञात पिता त्वन नन्दगापगृह गत । उग्रसेनमते तिष्ठन् यशोदाय तदा ददौ ।।२०६ तुल्यकालन्तु गमिण्यो यशोदा देवकी तथा। यशोदा नन्दगोपस्य परनी मा नन्दगोपते ।।२०७ विदगश्वरो ने भाकाश म पुप्पो की वर्षा की थी और भगवान् मधु- मूदन की मङ्गलमयी वाणियो के द्वारा स्तुति की थी। उस समय सहस्रा ही महर्षिगण-गधव लाग वहां पर स्तवन गान वरन वे निये उपस्थित होगय धे ॥२०३।। वसुदेव ने तो रात्रि के ममय म भगवान् अधोक्षज को पुत्र के रूप म उत्पन्न हुए देग्वार जोकि श्रीवत्म के चिह्न म युक्त और समस्त अन्य दिव्य लक्षणों में प्रवित ५ वसुदेवजी न कहा-है प्रभो। इस समय पाप इम अपने स्वम्प या सहरण कग्यि ।२०४। हे तात | मैं राजा कम से भयभीत हो रहा हूँ यही कारण है कि मैं इस समय पापम यह निवेदन कर रहा है। इस कस न अद्भुन दान बारे मेरे पापम ज्यष्ठ पुत्रो को मार अगा है ॥२०५।। वसुदेव के इम विनिवदित वचन गो मुनकर भगवान ने अपने उम स्वरूप का सवरण कर लिया था। उनके द्वारा पिता वमुदैव अनुज्ञात होकर इनको लेकर न दगोप के गृह पर चल गय थे । उनमन क मत मे रहते हुए उस समय उन्हे यशोदा के २७२ ] [ वायु पुराण लिये दे दिया था ।२०६॥ योग और देवकी दोनो ही एक ही समय में गर्भिणी हुई थी। वह यगोदा गापनि नद को पली थी ॥२०७॥ यामेव रजनी कृष्णो जन वृष्णिकुलप्रभु । तामेव रजनी कन्या यशोदापि व्यजायत ।।२०८ त जात रक्षमाणस्तु वसुदेवा महायशा । प्रादात् पुत्र यशादायै कन्या तु जगृहे स्वयम् ।।२०६ दत्त्वेन नन्दगापस्य रक्ष मामिति चाब्रवीत् । सुतस्त सबकल्याणो यादवाना भविष्यति । अय स गर्भो देवक्या अस्मत्वलेशान हनिष्यति ॥२१० उग्रसनात्मजायाञ्च कन्यामानकदुन्दुभे । निवेदयामास तदा कन्येति शुभलक्षणा ॥२११ स्वसाया तनय कसो जात नवावधारयत् । अथ तामपि दुष्टात्मा ह्य त्समज मुदावित ॥२१२ हता वै या यदा व या जपत्येप वृथामति । क्या सा ववृधे तन वृष्णिसद्मनि पूजिता ॥२१३ पुत्रवत्परिपाल्यन्ता देवा देवान् यथा तदा । तामेव विधिनोत्सनामाहु क्या प्रजापतिम् ।।२१४ एकादशा तु जज्ञ व रक्षार्थ केशवस्य ह । ता वै सर्वे सुमनम पूजयिष्यस्ति यादवा । देवदेवो दिव्यवपु कृष्ण मरक्षितोऽनया ॥२१५ वृष्णि कुल के स्वामी जिम रात्रि म उत्पन्न हुए थे उमी रात म योग ने भी एक बन्या को जाम दिया था ॥२०॥ उन समुत्पन्न श्रीकृष्ण बाला की रक्षा करते हुए वमुदेवजी न धिनका महान् या था वह बाल कृष्ण पुत्र तो श्री योग को द दिया था मौर उम यगाटा रे गभ ग प्रसूत या गोस्वय ग्रहण कर लिया था । २०६। इस बालकृष्ण शालय को नदगोप को देवर नमु देवजी ने कहा-मरी रणा करिये । नुम्हारा यह पुत्र ममम्न वल्याणी न करने धारा है जोरि मान्या का मङ्गल वरदाला हागा यह दवकी वा वह भ है जा विष्णु वश वर्णन ] [ २७३ ममस्त हमारे क्लेशो का हनन कर देगा ॥२१०॥ और उग्रसेन की पात्मजा देवकी को प्रानक दु-दुभि ने वह कन्या लाकर दे दी थी और उस समय में वह वन्या शुभ लक्षण वाली उत्पन्न हुई है-ऐमा ज्ञात कराया गया था ॥२११॥ कस ने अपनी बहिन के पुत्र हुमा है-यह निश्चय नहीं किया था। इसके अनन्तर उस दुष्टारमा ने मुदान्वित होते हुए उसको भी उन्ष्ट कर दिया था । जिम समय मे जो वन्या हन हुई यह वृथा बुद्धि वाला मन मे विचार करता है कि वृष्णि के घर मे पूजिन वह कन्या बडी हुई है ॥२१२-२१३३॥ उस समय देवो की भांति देव पुत्र के समान परिपालन करते हुए विधि के द्वारा उत्पन्न पन्या को प्रजापति मे वोले ।।२१४॥ यह ग्यारहवी केशव की रक्षा के लिये उत्पान हुई है। उसको फिर सभी सुमनस यादव पूजेंगे कि देवो के देव कृष्ण इसके द्वारा रक्षित हुए हैं ॥२१॥ किमर्थ वसुदेवस्य भोज कमो नगधिप । जपान पुत्रान् वालान् (वै तन्ना व्यास्यातुमर्हमि ॥२१६ शृणुध्व वे यथा कस पुनानानकदुन्दुभे । जाताजाताञ्छिसून सर्लान् निष्पिपेप वृथामति ।।२१७ भयाद्यथा महावाहुर्जात कृष्णा विवासित । तथा च गोपु गोविन्द स वृद्ध पुरुपोत्तम ॥२१८ उक्त हि विल देवक्या वसुदेवस्य धीमत । सारथ्य कृतवान् कसो युवराजस्तदाऽभवत् ।।२१६ तनोऽन्तरिक्षे वागासीदिव्या भूतस्य कस्यचित् । कसो यया सदा भीत पुष्कला लोक्साक्षिणी ॥२२० यामेता वहसे क्स रथेन परकारयात् । अस्या य सप्तमो गर्भ स ते मृत्युभविष्यति ।।२२१ ता श्रुत्वा व्यथितो वाणी नदा कसो वृथामति । निष्म्य सङ्ग ता कन्या हन्तुवामोऽभवत्तदा ॥२२२ तमुवाच महाबाहुर्वसुदेव प्रतापवान् । उग्रमेनात्मज कम सौददात्मण येन च ॥२२३ २७४ ] [ यायु पुराण । ऋषियो ने वहा-नरी स्वामी भोत्र का ने रिम लिये यमुदेव के बासर पुत्री को मार डाला था-यह माप पूरी तरह मे याम्या बरसे हम गमभाने के योग्य हाने । ॥२१६॥ श्री मूलजी योर-मुनो, जिम सरह में वृया युधि वा का ने आश दुभि वे पदा होने वाले सभी शिशुमो को निस्पिष्ट पर दिया पा ॥२१७॥ जिग तरह भय में महावाह ऋषण उत्पन्न होते हुए ही विवामित कर दिये गये थे पर्यात पन्य स्थान गोकुल म मेज दिये गय थे। और उनी प्रसार मे गोविन्द पुरोत्तम वहाँ गौग्रो मे सबर्षित हुए पं ॥२१८देवकी और धीमान यसुदेव दे यह कग सारथि का काम करता था उम ममय म यह युवराज ही पा---ऐमा कहा गया है ॥२१॥ उम गमय म किमी प्राणी की माIT म दिन वाणी हुई थी जिमगे मदा भयभीत रहा करता था क्योंकि वह ममस्त सौर की माझी पुष्कल पारगी हुई थी ॥२२०॥ आवारा म होत वाती याणी यह थी हे कम पर कारण मे जिमको तू रथ के द्वारा वहन कर रहा है पर्यात् रय मे विटा वर ले जा रहा है इसका जो मानवों गर्भ होगा वह तरा मृ यु होगा अर्थात् वही तुझे मारने वाला होगा ॥२२१॥ उम मास मे होने वाली दिव्य वाणी को मुनार वह कम बहुत ही व्यथित हुआ था क्योकि यह वृथा बुद्धि वाला उस समय में पा । उमने अपना मज निकाल कर उम समय में उनके मार देने की इच्छा की थी ॥२२२॥ उस ममय म महाबाहु प्रतापी वमुदेव ने उममे कहा और उस उग्रसेन के पुत कम मे बडे ही सौहार्द तथा प्रणय का प्रदर्शन करते हुए निवेदन किया था ॥२२३॥ न स्त्रिय क्षत्रियो जातु हन्तुमर्हति कश्चन । उपाय परिदृष्टोऽत्र मघा यादवनन्दन ॥१२४ योप्या भविष्यति गर्भ सप्तम. पृथिवी पते । तमहन्ते प्रयच्छामि तत्र कुर्घा यथानमम् ॥२२५ त्व विदानी यथेष्टत्व बर्तेया भूरिदक्षिण। सनिम्यास्तु वै गर्भात सत्य नेष्यामि ते यगम् ।।२२६ एव नरश्रेष्ठ वारणी नपरामिथ्या भविष्यति । एवमुक्ताऽनुनीतः स जग्राह तनयास्तदा ॥२२७ विष्णु वग वर्णन ] [ २७५ वसुदेवध ता भार्यामवाप्य मुदितोऽभवत् । पसश्चास्यावधीत् पुनान् पापकर्मा वृथामतिः ।।२२८ क एप वमुदेवश्च देवकी च यशस्विनी। नन्दगोपस्तु कस्त्वेप यशोदा च महायता । यो विष्णु जनयामास या चैन चाम्यवद्धं यत् ।।२२६ हे यादव नन्दन | कोई भी क्षत्रिय कभी भी किमी स्त्री को मार देने के योग्य नहीं होता है । इस भय के जोकि तुम्हारे हृदय मे उत्पन्न होगया है मैंने उमक निवारण का उपाय भली भांति देख लिया है ॥२२४|| हे पृथिवी के पति । इसका जो सातवां गर्भ होगा उसको मैं पापको देदूगा। उसम प्राप यथाक्रम कर ॥२२५३॥ हे भूरि दक्षिण । इस समय प्राप जैसा चाहिए वैमा ही व्यवहार करे । इसके सभी गर्भा को आपके वश म प्राप्त कर दूंगा ।।२२६।। है नर श्रेष्ठ | इस प्रकार से यह वाणी मिथ्या नहीं होगी। इस तरह अनुनय किये हुए उसने सब पुत्रो को ग्रहण कर लिया था ॥२२७ । और वसुदेव तो उस अपनी भार्या को प्राप्त कर बहुत प्रसन हुए। और कम ने जाकि पाप कर्म करने वाला तथा वृथा बुद्धि से युक्त था, इसके पुत्रो का मार डाला था ।२२८। ऋपिया ने कहा-यह वसुदेव कौन था और यशस्विनो देवकी कौन थी, नन्द- गाप कोन था तया महान् यशपाली यह यशोदा कौन थी जिमने विष्णु को उराप्त किया था और जिसने इनका पूर्ण रूप से अभिवर्द्धन किया था ।।२२।। पुरुषाः कश्यपस्यामनादित्यास्तु स्त्रियाम्तथा । अथ कामान् महावाहुर्देवक्या समवर्द्धयत् ।।२३० अचरत् स मही देव प्रविष्टो मानुगो तनुम् । मोहयन् मर्वभूतानि योगात्मा योगमायया ।।२३१ नप्टे धर्मे तदा जज्ञे विष्णु रिणवुले स्वयम् । वतु धर्मव्यवस्यानममुरारणा प्रणाशनम् ॥२३२ पारस्ता रुक्मिणी वन्या सत्या नग्तजितस्तदा। सामाजिती मत्यभामा जाम्बवत्यपि रोहिणी ॥२३३ २७. [ वायु पुराण ऋगियों में रहा-नरी में स्वामी भोर कानै गि लिये यगुदेव के यासर पुत्री को मार बना पा-यह पाप पूरी तरह गे माया पर हमें गमभाने से योग्य होते हैं ॥२१६॥ श्री गूतमी योन-गुनो, जिस तरह से वृया पुदि पाल पाने यार दुन्दुभि में पेश होने वारे मभी गिशुपी को निप्पिष्ट पर दिया था ॥२१७॥ जिग तरह भय में महावाह गया उत्पन्न होते हुए ही वियामित पर दिये गये , पर्यात मन्य स्थान गोडुन में मेन दिये गये थे । मोर उमी प्रपार में गोविन्द पुरोसम वहाँ गोमो मे मधित हुए थे ॥२१८।। देखत्री और धीमान् यमुन वे यह कम मारथि का पाम बरता या उम समय में यह युवराज ही था-ऐगा नहा गया है ।।२१।। उम गमय में किमी प्राणी की पारराम में दिल वाणी हुई पी निमगे गदा भपभीन रहा परता था करोकि वह समस्त मोर की साक्षी पुषल वाग्गी हुई थी ॥२२०॥ आम होने वानी यानी यह थी हे कम । पर पारण में प्रिमको नू रय के द्वारा वहन कर रहा है पनि रय मे पिडा कर ले जा रहा है इसका जो माना गर्भ होगा वह तेरा मृत्यु होगा अर्यात् नहीं तुझे मारने वाला होगा ॥२२१॥ उम मापारा में होने वाली शिष वाणी को सुनार वह वाम बहुत ही व्यथित हुआ था क्योकि यह वृथा बुद्धि गला उस समय में था। उसने अपना बग निकाल कर उम ममय में उगो मार देने की इच्छा की थी॥२२२॥ उग ममय में महावाह प्रतापी यमुदेव ने उममे पहा और उस उग्रसेन के पुत्र कम मे बडे ही मौहादं तथा प्रणय का प्रदर्शन करते हुए निवेदन किया था ॥२२३॥ न स्मिय क्षत्रियो जातु हन्तुमर्हति कश्चन । उपाय परिदृष्टोऽत्र मया यादवनन्दन ।।१२४ योप्या भविष्यति गर्भ सप्तमः पृथिवी पते । तमहन्ते प्रयच्छामि तत्र कुर्या यथाक्रमम् ॥२२५ त्व विदानी यथेष्टत्व वर्तेया भूरिदक्षिण । सर्वानस्यास्तु वै गर्भान् सत्य नेष्यामि ते वगम् ।।२२६ एव नरश्रेष्ठ वागी नेगामिथ्या भविष्यति । एवमुक्ताऽनुनीतः स जग्राह तनयास्तदा ।।२२७ विष्णु वम वर्णन ] [ २३५ वसुदेव ध ता भार्याम पाप्य मुदितोऽभवन् । व सश्चास्यावधीद पुत्रान् पापकर्मा वृथामतिः ।।२२८ क एप वमुदेवश्च देवकी च यशस्विती। नन्दगोपस्तु कस्त्वैप यशोदा च महायता । यो विष्णु जनयामास या चंन चाभ्यपद्धयत् ॥२२६ हे यादव नन्दन । कोई भी क्षत्रिय वभी भी रिमी स्त्री को मार देने के योग्य नहीं होता है । इस भय के जोरि तुम्हारे हृदय में उत्पन्न होगया है मैंने उसके निवारण का उपाय भली-भांति देख लिया है ॥२२॥ है पृथिवी के पनि | इमका जो माता गभं होगा उसको मैं आपको देदूगा। उममें प्राप पथाझम कर ।।२२।। हे भूरि दक्षिण । इम ममय पाप जसा चाहिए पैमा ही व्यवहार करे । इसके सभी गर्मों को प्रापके वश में प्राप्त कर दूंगा ।।२२६।। है नर श्रेष्ठ । इस प्रकार मे यह वाणी मिघ्या नहीं होगी। इस तरह अनुनय किये हाए उमने सब पुत्री को ग्रहण कर लिया था ।।२२७ । और वमुदेव तो उम अग्नी भार्या को प्राप्त कर बहुत प्रसन्न हुए। और कम ने जोकि पाप कर्म करने वाला तथा वृथा बुद्धि में युक्त पा, इसके पुत्रो का मार डाला था ।२२८। पियों ने कहा-यह वमुदेव कौन था और यशस्विनी देवकी कौन पी, नन्द- गोग कोन था तथा महान् यशवाली यह यशोदा कौन थी? जिगने विष्णु को उदान किया था और जिसने इनका पूग्ण रूप से अभिवर्द्धन किया था ।।२२।। पुरुषाः कश्यपम्यामन्नादित्यास्तु स्त्रियास्तथा । अथ कामान् महाबाहुर्देचक्या ममवद्ध यत् ॥२३० यनरत् स मही देर प्रविष्टो मानुपी तनुम् । मोह्यन् सर्वभूतानि योगात्मा योगमायया ।।२३१ नप्टे धम्म तदा जज्ञे विष्णु रिणकुले स्वयम् । व धर्मव्यवस्थानमपुराणा प्रणाशनम् ।।२३२ ग्राहता रक्मिणी कन्या सत्या नग्नजितस्तदा । साताजिती सत्यभामा जाम्बवत्यपि रोहिणी ॥२३३ २७६ ] । वायु पुराउ शंच्या गुदयी माद्रीच मुगीना नाम चापग। यालिन्दी मित्रबिन्दाग लक्ष्मणा जालवामिनी ॥२३४ एवमादीनि देयाना महमाणि च पोडश । चतुईया सु ये प्रोक्ता गणाभाप्मरमा दियि विचिन्त्य देवः शकरण विशिष्टास्त्विह प्रेपिताः ॥२३५ गुनगो ने कहा-वस्या पुरष धे और अदिति यो स्त्रिया थीं। इनके मनन्तर महावाहु ने देवकी के कामो पा रामधन पिया या ॥१०॥ योगात्मा उसने अपनी योगमाया से समस्त प्राणियों को मोहित करते हुए मानुष शरीर में प्रवेग बरसे उम देव ने भूमि में विचरण विमा पा ॥२३१॥ धर्म के नष्ट हो जाने पर भगवान विष्णा ने स्वय वृष्णि कुल मे उम समय जन्म लिया । वह अन्म प्राण धर्म से व्यवरथा यग्ने पे निपे तपा ममुरामा विनाश करन क लिये हो हमा था॥२३२॥मिगो कन्या का प्राहरण किया गया था उम समय म नग्न जितकी गग्या सत्राजित् को मत्यभामा, जाम्बवती पौर रोहिंगी लाई गई थी ॥२३३॥ दोव्या-मुदेवी-माद्री-गुदीला-बालिन्दी-मित्रविन्दा- लक्ष्मणा-जालवामिनी-एवमादि देवो की मोलह हजार थी। चौदह तो दिवलोर में भामरामो के गण कहे जाते थे, देवो के द्वारा मोर इन्द्र के द्वारा विशेष रूप से चिन्तन करके जो विशिष्ट यो वे यहाँ प्रेपित परदी गई थी ।।२३४.२३५॥ पल्यर्थ वासुदेवस्य उत्पमा राजवेश्मसु । महाभागा विष्वक्सेनस्य विथु ता ।।२३६ प्रद्य म्नश्चारुदेष्णश्च सुदेष्ण शरभ स्तथा। चारश्च चारुभद्रश्च भद्रचागस्तथापर ।।२३७ चारुविध्यन रुक्मिण्या वन्या चारुमती तथा। मानुर्भानुस्तथाक्षश्व रोहितो मन्त्रयस्तया ॥२२८ जरान्धकस्तानवक्षा भौमरिश्च जरन्धम । चतस्रो जज्ञिरे तेपा स्वतारो गरडध्वजात् ॥२३६ भानु मरिवा व ताथपर्णी जरन्धमा । सत्यभामामुतानताञ्जाम्बवत्या प्रजा शृणु ।।२४० एता पल्यो बिष्ण वश वर्णन J [ २७७ भद्रश्च भद्रगुप्तश्च भद्रविन्द्रस्तथैव च । सप्तपाहुश्च विख्यात कन्या भद्रावती तथा। सम्बोधनी च विख्याता ज्ञेया जाम्बवतीसुता. ॥२४१ सग्रामजिच्च गतजित् तथैव च सहस्र जित् । एते पुत्रा सुदेव्याश्च विष्वक्सेनस्य वीतिता ॥२४२ वृको वृकाश्वो वृष जिवृजिनी च तुराङ्गना। मित्रबाहु सुनीथश्च नाग्नजित्या प्रजास्त्विह ॥२४३ ये सब यहाँ राजामो के भवनो म वासुदेव को पली बनने के लिये उत्सन हुई थी। ये महान भाग वाली पत्नियो विश्वरमेन की प्रसिद्ध हुई थीं ॥२३६॥ प्रद्युम्न-चारदेष्ण-सुदेष्ण-शरभ-चार-चारुभद्र और चारविध्य रुक्मिणी में पुत्र उत्तन हुए तया एक चारुमती नाम वाली कन्या उत्पन्न हुई थी। मानुर्भानु- अक्ष-रोहित-मन्याय-जराधक-वाघ्रवधा-भौमरि प्रौर जरन्धम ये सत्यभामा के पुत्र हुए थे और इनकी चार वहिने गरुड्ध्वज से उत्पन्न हुई थी जिनके नाम भानु-भौमरिका-ताम्रवर्णी और जरन्धमा थे-सत्यभामा के सुत तो बतला दिय गये हैं अब जाम्बवती के पुत्रो को धवरण परो ।।२३७-२३८-२३६-२४०।। भद्र-भद्रगुप्त-भद्र विन्द्र-सप्तबाहु ये मब जाम्बती के विस्यात पुत्र थे। भद्रावती कन्या थी जाति सम्बोधनी-इस नाम से विरयात जाम्बवती के जानने योग्य थे ॥२४१॥ संग्राम जिन्-शतजित्-सहस्रजिन् थे सुदैवी के पुत्र थे जोकि विष्वक्सेन के कहे गये हैं ।।२४२॥ वृक्ष-वृकाश्व- वृजित और वृजिनी सुराङ्गना-मित्रयाहु- सुनीथ ये नाग्नजिती को सम्नति यहाँ पर हुई थी ॥२४३॥ एवमादीनि पुत्रारणा सहस्राणि नियोधत । प्रयुतन्नु समास्यात वासुदेवस्य ये सुता ॥२४४ अयुतानि तथाष्टौ च शूरा रग्गविशारदा । जनार्दनस्य वशो व वत्तितोऽय यथातथम् ॥२४५ बृह्ती नर्तकोन्नेयी सुनये सङ्गता तथा । कन्या सा वृहदुच्छस्य शौनेयस्य महात्मनः ॥२४६
२०० ]
[ यायु पुराग
अनिरुद्धश्च पञ्च ते वशवीरा प्रवीतिता ।
सप्तर्पय पुरश्च यक्षो मरिणबरस्तथा ॥२
शालयो यदरश्च व विद्वान् धन्वन्तरिस्तथा।
नन्दिनश्च महादेव गालवायन उच्यते ।
प्रादिदेवस्तदा जिष्णुरभिश्च सह दैवत ॥३
विष्णु विमर्थ सम्भूत स्मृता सम्मूतय कति ।
भदिप्या पति यान्य तु प्रादुर्भावा महात्मन ॥४
ब्रह्मक्षेने युगान्तेपु विमर्थमिह जायते ।
पुन पुनम्मनुप्येषु तन प्रा हि पृच्छताम् ।।५
विस्तरेणव सर्वाणि पर्गाणि रिपुपातिन ।
श्रोतुमिच्छामहे सम्यग् देहै वृष्णस्य धीमत ।
बम्मयामानुपूव्यंश्च प्रादुर्भावाश्च ये प्रभो।
या चास्य प्रवृति सूत ताश्यास्मान् वक्त महसि ॥७
पथ स भगवान् विष्णु सुरेप्वरिनिपूदन ।
वसुदेवकुले धीमान वासुदेवत्व मागत ॥
मनुष्य की प्रकृति वाले देवो को अब बतलाया जाता है उन कीत्यमानो
को भती भानि ममा लो। मदुपग-चामुदेव-प्रधुम्न-माद और भनिम्द ये
पाँच वयवीर कहे गये हैं। सपि कुवेर-यक्ष-मणिवर-शालकी-बहर-विद्वान्
धवतरि-नदिन-महादव और शायङ्कायन कहे जाते है । उस समय इन देवो
के साथ जिप्णु प्रादि देव थे ॥१२॥ भूपिया मे कहा--भगवान् विष्णु ने
किम प्रयोजन की सिद्धि के लिये जम ग्रहण किया था और उन कितन जमा
वतार हैं तथा महान् पारमा वारे विष्णु के प्रय कितने प्रादुर्भाव भविष्य म
होने वाले हैं ॥४युगातो में ब्रह्माक्षेत्र म यहाँ किस कारण से ज म लेत हैं
मनुष्या म बार बार जन्म मानया से लिया करते है इसका क्या कारण
यह पूछने वाले हमका सब बतलाइये ॥५शत्रुनों के धात करने वाले
कृष्ण शरीरो के द्वारा जो कम होते हैं उन मदको विस्तार के साथ
लोग मुनना चाहते हैं ॥६॥ हे प्रमा! उनके क्मों की प्रानुपूर्वी-प्रादुर्भाव
१
देवलोक समुत्सृज्य गम्भुस्तव कीर्तन ] [ २८१ और जो इनकी प्रकृति है वह सब हे मूतजी ! हमको प्राप बताने को योग्य होते हैं ॥७वह भगवान् सुरो म शत्रुओ के नाश करने वाले धीमान् विष्ण वसुदेव के कुल में वासुदेवत्व को कैसे प्राप्त हुए थे? ॥६॥ अमरै सूत कि पुण्य पुण्यद्भिरलकृतम् । मर्त्यलोकमिहागत ॥ देवमानुपयोता भूर्भुव प्रसवो हरिः। किमर्थं दिव्यमात्मान मानुपे समवेशयत् ।।१० यश्चक्र वतंयत्येको मनुध्यारणा मनोमयम् । मनुध्ये स क्थ वुद्धि चक्र चकभृता वर ॥११ गोपायन यः कुरुते जगता सावलौक्किम् । स क्य गा गतो विष्णुर्गोपमन्वकरोत्प्रभु ॥१२ महाभूतानि भूतात्मा यो दधार चकार ह । श्रीगर्भ स क्था गर्ने स्त्रिया भूचरया घृत ॥१३ येन लोकान् क्रमै जित्वा त्रिभिस्नीस्त्रिदशेप्सया। स्थापिता जगतो मार्गास्त्रिवर्गप्रवरास्त्रय ॥१४ योऽन्तकाले जगत्पीत्वा कृत्वा तोयमय वपु । लोकमेकार्णव चक्र दृश्यादृश्येन वर्मना ॥१५ य पुराणे पुराणात्मा वाराह वपुरास्थित । ददी जित्त्वा वसुमती सुराणा मुरसत्तम ॥१६ है मूतजी । पुण्य करने वाले देवो से प्रलयत पुरयतम दवलाद का त्याग करक यहाँ मनुप्य लाव में प्राय थे प्रर्यान् विष्णु ने मनुष्या में अवतार लिया था | भूभुव प्रमष हरि जो देव और मनुष्यों के नता हैं उनने किस लिये अपने दिव्य भात्मा को मनुष्य रूप में सन्निविष्ट किया था ॥१०॥ जो एक मनुष्यो ने मनोमय चक्र को चलाता है उम चक्रभृतो में परम अंट ने मनुष्य बुद्धि कैसे की पी ॥११॥ जो प्रभु जगतो का मा लौकिक गोपायन अर्थात् सरक्षण किया करता है वह प्रभु विष्णु किस निमित्त से भूमि मे जाकर अर्थात् मानुषावतार लेकर गोप का अनुकरण करता या॥१॥ जो भूनो की प्रारमा
२८२ ]
[ वायु पुराण
महाभूतो को बनाता है मौर धारण रिया करता है श्रीगर्भ वह भूचरी पे द्वारा
गर्भ में से धारण दिया गया था। ॥१३॥ देवो की इच्छा स जिसन तीन
प्रदमो से भर्यात् तीन पंड मे तीन लोको को जीतकर जगत् के त्रिवर्ग प्रपर तीन
मागं स्थापित क्यि थे ॥१४॥ जो अन्न समय म तोयपूर्ण शरीर बनाकर इस
समस्त जगत् का पान कर लोक को दृश्य और अदृश्य मार्ग से एक ममुद्र के
स्वरूप में कर देता था ॥१५॥। जो पुराण मे पुराण प्रात्मा वाला है और वाराह
ये परीर मे स्थित हुआ था तया सुरो मे थेठ ने बमुमती को जीत कर जिमने
सुरो को दैदी थी॥१६॥
येन संह वपु कृत्वा द्विधा वृत्वा च यत्पुन ।
पूदत्यो महावीर्यो हिरण्यकशिपुहंत ॥१७
य पुराह्यनलो भूत्वा प्रौवं सवतको विभु ।
पातालस्थोऽवगत पपी तोयमय हवि ॥१८
सहस्रचरण देव सहस्राशु सहस्रश ।
सहस्रशिरस देव यमाहुर्वे युगे युगे ॥१६
नाभ्यारण्या समुद्भूत यस्य पैतागह गृहम् ।
एकागवगते लोके
तत्पङ्कजमपङ्कजम् ॥२०
येन ते निहता दैत्या सग्राम तारकामये ।
सर्वदेवमय कृत्वा सर्वायुधधर वपु ॥२१
गण्डस्थेन चोसिक्त कालनेमिनिपातित ।
उत्तराशे समुद्रस्य क्षीरोदस्यामृतोदधे ।
य शेते शाश्वत योगमास्थाय तिमिर महत् ॥२२
पुगरगी गर्भमत्त दिव्य तप प्रकदिदिति पुरा यम् ।
शाश्व यो दैत्यगणावरुद्ध गर्भावमानेन भृश चकार ॥२३
जिमने सम्भ को फाडकर अपना सिंह और नर का दो प्रकार का स्वरूप
बनाया या प्रौर पहिले देस्य महान् पराक्रमी हिरण्य कशिपु को मार डाला या
॥१७॥ जो पहिले मबत्तक विभु औवं अर्थात् पृथ्वी या अनल होकर पानाल मे
स्थित तया प्रणेव गत होता हुआ तोपमय हर्षि का पान पर गया था ॥१८॥
गम्भुम्तव बीतन ] [ २८३ । युग-युग म जिमको महम चरण वाला देव-सहा प्रशु मे युक्त-महस्र शिर वाला कहत हैं ॥१९॥ जिसकी नाभि की प्ररणी से अर्थात् कमल नाल से पितामह का पर उत्पन्न हुमाया और वह विना हो पडू के उत्पन्न होने वाला पङ्कज एगणव लोक मे या ॥२०॥ जिमने तारवामय सग्राम में सर्वदेव पूर्ण मौर समम्न प्रायुधा के धारण करने वाले पपु को बनाकर देत्यों का हनन किया था 1॥२१॥ गरुड पर स्थित जिमने अमृत का उदधि क्षीर सागर समुद्र के उत्तरारा मै उम्मित वालनमि को निपानित कर दिया था जो महान् तिमिर (अन्धकार) म याग में पास्थित होकर गाश्वत गयन किया करता है ॥२२॥ पहिले अरणी ने जिमको दिय गर्भ के म्प में धारण किया था और तपस्या के प्रपं से जिमको पदिति न गर्भ धारण किया था। जिमने गर्भ के अवमान मे इन्द्र को त्य रे द्वारा प्रवद्ध किया था ॥२३॥ यदानिलो लाक्पदानि हात्त चकारदत्यान् मलिलेशयास्तान् । कृत्वादिदेवस्त्रिदिवस्य देवाश्चा सुरेग पुन्हूतमेव ॥२४ गार्हपत्यन विधिना अन्वाहारण कर्मणा । अग्निमाहवनीयञ्च वेदिञ्च व बुशमवम् ।।२५ प्रोक्षणीय व वञ्च व अवभृथ तयंव च। अथ श्रीनिह यशो हव्यभाग प्रदान्मम्वे ॥२६ हयादाश्च मुराचक्र वव्यादाञ्च पितृनपि । भागार्थ यज्ञविधिनायो यज्ञा यज्ञामणि ॥२७ यूपान् ममित्य व मोम पवित्र परिधीनपि । यजियानि चद्रयागिग यमीयाञ्च तथानान् ।।२८ मदम्यान् यजमानाच अश्वमेघान् प्रतूत्तमान् । विवभाज पुरा यश्च पारमेष्ठपन कम्मरणा IPL युगानुरूप य गृत्वा कोलोरान् हि ययात्रमम् । क्षणा निर्मपा याच मनास्त्र कालमेव च ॥३० मुहत्तास्तिययो मासा दिनसवत्सराम्तया। ऋतद पालयोगाचप्रमाण विवियन्तथा २८४ । [ वायु पुराण आयु क्षेत्राण्युपचय लक्षण रूपसौष्ठवम् । मेधा वित्त च शौर्यञ्च शास्त्रस्येव च पारणम् ||३२ जब अनिल ने लोक पदो का हरण करके उन दैत्यो को सलिलेशय कर दिया था तब प्रादि देव ने बिदिव के देवो को करके पुरुहूत को ही मुरो का ईश कर दिया था ॥२४॥ गाहपत्य विधि से और सन्वाहाय वम से अग्नि को आहवनीय को और वेदि को, कुशवद को-प्रोक्षणीय सव को तथा अव- भृथ को जिसने पहाँ तीन को मख म ह य भाग को देने वाला किया था ॥२५- २६॥ और हव्य के लेने वाले देशो को बनाकर कन्य के लेने वाले पितृमो का किया था। यज्ञ के कर्म में यज्ञ की विधि से भोग के लिये जो यज्ञ स्वरूप है ॥२॥ यूप-समितू-स्व-पवित्र सोम और परिधियों को यशिय द्रव्यो को और यज्ञीय अनलो को-सदस्यो का पोर यजमानो को-श्रेष्ठ ऋतु अश्वमेघा पारमेष्ठय कर्म से जो पहिले विभाजित करता या ॥२६॥ जो युगो के अनुरूप यथाक्रम तीन लोको को बनाकर क्षण-निमेष-काठा-कला और तीन वालों को जिसने बनाया था।३०॥ मुहूत-तिथियां-माम-दिन-सम्बत्सर-ऋतुऐ-बाल- योग और तीन प्रकार के प्रमाण जिसने सृजित किये थे ॥३१॥ मायु-क्षेत्र उपचय-लक्षण-रूप का सौश्व-मेधा-वित्त-शूरता मोर शास्त्र का पारण जिसने रचाया॥३२॥ प्रयो वरियो लोकास्त्र विद्य पाववास्त्रत । बाल्य त्रीणि कर्माणि तिस्रो मापास्त्रयो गुणा ॥३३ सृष्टा लोवा सुराश्च व येनात्यन्तेन कम्मणा। सम्बंभूतगणा मृष्टा सर्वभूतगणात्मना ॥३४ नृणामिन्द्रियपूर्वेण योगेन रमते च य । गतागताना यो नेता सर्वत्र विविधेश्वर ।।३५ यो गतिधमयुक्तानामगति पापकम्मरणाम् । चातुर्वस्य प्रभवश्वातुवर्णस्य रक्षिता ॥३६ चातुविद्यस्य यो वेत्ता पतुराधमराश्रयः । दिगन्तर नभो भूमिरापो वायुविभावसु. ॥३७ गम्भुन्तव कीनन ] २८५ चन्द्रमूर्य्यद्वय ज्योतियुगेश क्षणदाचरः। य पर श्रूयते देवो य पर श्रूयते तप ॥३८ यः परन्तपसः प्राहुर्य । परम्परमात्मवान् । आदित्यादिस्तु यो देवो यश्च दैत्यान्तको विभु ॥३६ युगान्तेष्वन्तको यश्च यश्च लोकान्तकान्तक । सेतुर्यों लोकसेतूना मेध्यो यो मेध्यवर्मणाम् ॥४० वेद्यो यो वेदविदुपा प्रभुर्य. प्रभवात्मनाम् । सोमभूतस्तु भूतानामग्निभूतोऽग्निवर्चमाम् ॥४१ मनुष्याणा मनोभूतस्तपोभूतस्तपस्विनाम् । विनयो नयतृमाना तेजस्तेजस्विनामपि ॥४२ तीन वर्ण-तीन लोक-तीन विद्या-तीन पावक-तीन काल-तीन कर्म- तीन माया और तीन गुण निसने निमित किये थे ॥३३॥ जिसने अत्यन्त कर्म मे लो और सुगे का सृजन किया था । सर्वभून गणात्मा ने समस्त भूतगणो को बनाया था ।।३४|| नरो के इन्द्रिय पूर्व योग से जो रमण करता है गत और मागतो का जो विविधेश्वर सर्वत्र नेता है ॥३५॥ जो धर्म मे युत्तों का गति है और पाप कम वालो का प्रगति है । चातुर्वण्य का जो प्रभव है और चारो वों का जो रक्षा करने वाला है ॥३६॥ जो चार विद्यानो का जानने वाला और चारो आश्रमो का मश्रय है जो दिशाओ का अन्तर-नभ-भूमि-जल-वायु- विभावमु है ॥३७॥ जो चन्द्र और सूर्य दोनो की ज्योति-युगो का स्वामी- क्षणदाचर है और जो परदेव सुना जाता है और जो पर तप सुना जाता है ॥३८॥ जो परन्तपस मोर जो परम्परमात्मवान् कहा जाता है। जो देव प्रादि- त्यादि है जो विभु दैत्यान्नक है ।।३६॥ युगो के भन्न मे अन्त करने वाला है और जो लोको के अन्तक का भी अन्न करने वाला है। लोक्सेतुओ का जो सेतु है और जो मेध्य कर्मों का मेध्य है ॥४०॥ वेद के विद्वानो का जो जानने के योग्य है और जो प्रभवारमाओ का प्रभु है । भूनो का जो मोमभूत है और अग्नि- वर्चसो का जो अमि भून है ॥४१॥ जो मनुष्यो का मनोभूत और तपस्वियो - २८६ ] [ वायु पुराण का तपोभून है । जप से तृप्त पुरुषो का विनय और तेजस्वियो का भी जो तेज है ॥४२॥ विग्रहो विग्रहाणा यो गतिगतिमतामपि। आकाश प्रभवो वायुर्वायुप्रारणा हुताशनः ।।४३ दिवा हुताशन प्राणा. प्राणोग्नेमधुसूदन । रसोऽभवच्छोरिणत वै शोणितान्मासमुच्यते ।।४४ मासात्तु मेदसो जन्म मेदसोऽस्थि निरूप्यते । प्रार्थना मज्जा समभवन्मज्जात शुक्रसम्भव ४५ शुक्राद्गर्भ समभवद्रसमूलेत कम्र्मणा । तथापि प्रथमञ्चापस्ता मौम्यराशिरच्यते ।।४६ गर्भोप्मसम्भवो यो द्वितीयो राशिरुच्यते । शुक्र गोमात्गक विद्यादातव पावकात्मकम् ॥४७ भावी रसानुगावेतो वोये च शशिपावको। कफ्वर्गेऽभवच्छुक पित्तवर्ग च शोणितम् ॥४८ कफस्य रहृदय स्थान नाभ्या पित्त' प्रतिष्ठिनम् । देहस्य मध्ये त्दृदय स्थानन्तु मनस स्मृतम् ।।१६ नाभिकोष्टान्तर यत्तु तत्र देवो हुतागन । मन. प्रजापतिज्ञेय कफ सोमो विभाव्यते ॥५० जो विग्रहो का विग्रह है मौर गतिमानी का भी गति है। आराम में उत्तन्न होने वाला वायु है मौर वाय प्राण वाया नारान (मग्नि)है | ४ा हुना- शन का प्राण दिवा है और मग्नि का प्राण मधुसूदन है । रम में शोणित (रा) हमा और गोरिणत मांग को कहा जाता है ॥४४॥ माम से भेद यी उत्सत्ति होती है और मैद में प्रस्थि निरूपित की जाती है। मस्थि से मना हुई और मजा में शुक्र का जन्म हुमा करना है ॥४५॥ शुक्र से गर्भ रस मूल कर्म से हुधा था। वहीं पर भी प्रथम प्राप (जल) है वह मौम्य रामि कहा जाता है ॥४॥ ग्रीष्म की उष्मा में मम्भव वाला द्वितीय रागि है । शुक को मोमारमा जानो पौर मानव से यावशात्मक जानना चाहिए ॥४७॥ रमानुग ये दोनो मात्र - मम्मुता कीर्तन ] [ २८७ होते हैं पौर वीर्य मे शागि नया पाया है। कफ वर्ग मे शुत्र होता है और पित्त वर्गम गाणित होता है ॥४८॥ क्फ का स्थान हृदय है और पित्त नाभी में प्रतिधित रहा करना है । देह के मध्य मे हृदय होता है जो मन का स्थान कहा गया है 11४11 नाभिवोप का अन्तर जो होता है वही देव हुतागन रहता है । मन को प्रजापति जानना चाहिए और कफ मोम विभाजित किया जाता है।५०। पित्तमग्नि स्मृतावेतावग्निसोमात्मक जगत् । एव प्रवतितो गर्भो वर्ततेऽम्बुदसग्निभ ॥५१ वायु प्रवेगन चक्र सङ्गत परमात्मना । स पञ्चधा शरीरस्यो विद्यते बर्द्ध येत् पुनः ।।५२ प्राणापानी समानच उदानो व्यान एव च । प्राणोऽम्य परमात्मान वर्द्ध यन् परिवत्तते ॥५३ अपान पश्चिम वायमुदानो शरीरगः। व्यानो व्यानस्यते येन समान सव्वन्धिपु ॥५४ भूनावामिस्ततस्तस्य जायतेन्द्रियगोचरा। पृथिवी वायुराकाशमापा ज्यातिश्च पश्चमम् ॥५५ सर्वेन्द्रिया निविष्टान्त स्व स्व याग प्रचक्रिरे । पार्थिव देहमाहुम्त प्राणामान च मारुतम् ॥५६ छिद्राण्यापागयोनीनि जलाया प्रवर्तते। नेजश्रविता ज्योत्या तेषा यन्नामत स्मृतम् । मडग्रामा विषयाश्च व यस्य वीर्यात्प्रयत्तिता ।।१७ इत्यतान् पुरुप मच न् मृजेलोकान् मनातन । नंधनेऽम्मिन् यथ गोके नरस्व विष्णुगगन ॥५८ पिन अग्नि है। ये दोना पग्नि पोर माग चे पाए दाना उगत् वहा गया है। इस प्रकार ग प्रनित गभं भावुद (भप) र ममान होता है ॥५१॥ गममा गे मगन वाप ने प्रवेगन लिया था । वह वाय परीर में स्पिन पाच प्रभार का होता है और पिर बनाना है ॥५२॥ प्राण-प्रशान-ममान-प्रदान को ध्यान ये गाय वास है । गापामारमा गोदित परना हुमा परि २८८ ] [ वायु पुराण वत्तित होता है 11५३|| प्रपान पीछे को गरीर के और उदान प्राधे भरीर में गमन करने वाला होता है । ध्यान वह है जिसस यह ब्यानस्यमान किया जाता है और शरीर की समस्त सन्धियो मे रहा करता है ॥५४॥ इसके पश्चात् उमको भूतावाप्ति इन्द्रिय गोचर होती है । पृथिवी-वायु-माकाश-जल और पाचवा ज्योति ये भूत होते हैं ||५|! समस्त इन्द्रिया उसमे निविष्ट होती हुई अपने अपने योग को क्यिा करती हैं । उसको पार्थिव देह कहते हैं और मारुत को प्राण स्वरूप कहते हैं ।।१६।। छिद्र पाराश योनि होते हैं जिनमे जलासाव प्रवृत्त होता है। तेज चक्षुप्रो मे होता है जो माम मे उनकी ज्योत्स्ना कही गई है । सनाम और विषय ही मे जिसके वीर्य से प्रवत्तित होते हैं ॥५४॥ सनातन प्रभु इन सब लोको को मृष्ट करता हुमा इस नंधन (मृत्युशील) लोक में विष्णु कैसे प्रागये थे? ॥५॥ एप न सशयो धीमन्नेप वै विस्मयो महान् । कथ गतिर्गतिमतामापन्नो मानुपी तनुम् ॥५६ श्रोतुमिच्छामहे विष्णो कर्माणि च यथानमम् । पाश्चारिण पर विष्णोर्वेददेश्च कथ्यते ॥६० विष्णोरत्पनिमाश्चयं क्थयस्व महामते । एतदाश्चर्यमाख्यान कथ्यता वै मुखावहम् ।।६१ प्रख्यातबलवीर्यस्य प्रादुर्भावा महात्मन. । कम्मंणाश्चय्यभूतस्य विष्णो सत्वमि होच्यताम् ॥६२ अहञ्च कीर्तयिष्यामि प्रादुर्भाव महात्मन यया स भगवाक्षातो मानुषेषु महातपा ॥६३ सप्तसप्ततप प्रोक्ता भृगुशापेन मानुपे । जायते च युगान्तेषु देवकार्यार्थ सिद्धये ।।६४ तस्य दिव्यतनु विष्णोर्गदतो मे निबोधत । युगधर्मे परावृत्त काले च शिथिले प्रभु १६५ कर्नु धर्मभ्यवस्थान जायले मानुपेटिवह । भृगो शापनिमित्तन देवासुरकृतेन च ॥६६ गम्भुम्नव कीर्तन ] [ २८६ तनु कथ देवासुरकृते अध्याहारमवाप्नुयात् । एतद्वेदितुमिच्छामो वृत्त दैवासुर कथम् ॥६७ दवासुर यथावृत्त त्रुवतस्तन्निवोधत । हिरण्यकशिपुदैत्यस्त्र लोक्य प्रार प्रशासति ॥६८ हे घीमान् ! यह ही हमारा एक बहुत भारी मंशय है और एक बहुत अधिक विस्मय भी होता है । गतिमानो को मानुषी की गति को कमे प्राप्त हुमा था॥५६॥ हम सब भगवान् विष्णु के कर्मों को यथाक्रम सुनना चाहते हैं । विष्णु ही इस परम प्राश्रयो को जानते हैं और वेदो के द्वारा कहे जाते हैं ॥६०॥ हे महामते । विष्णु की उत्पत्ति एक बडा प्राथर्य है उमे आप बताइये यह प्राब्धान आश्चर्य पूर्ण है सो सुग्न देने वाले इमे आप कहे । ॥६१।। प्रख्यात बल और वीर्य वाले महान मात्मा से युक्त भगवान् विष्णु के जोकि कर्म से माश्चयं भूत हैं, प्रादुर्भावो को और उसके सत्त्व को यहाँ बनाइये । श्री सूनजी ने कहा-मैं उम महान् पारमा वाले के प्रादुर्भाव को कहूगा जिस तरह महानप बाले वह भगवान् मनुष्यो मे उत्पन्न हुए थे ॥६३।। मप्त मप्त तप कहे गय भृगु के शाप गे मानुप लोक में युगो के अन्त समयो में देवो के कार्यों की मिद्धि के लिये जन्म ग्रहण करते हैं ॥६४॥ बतलाते हुए मुझसे तुम लोग उम विष्णु के दिव्य तनु को भली-भांति समझ लो। प्रभु युग धर्म व परावृत्त हो जाने पर और काल के शिथिल होन पर धर्म की व्यवस्था करने के लिये यहाँ मनुष्यो मे जन्म लिया करते हैं वह जन्म ग्रहण भी देवासुरो के द्वारा कृन और भृगु के शाप के निमित से होता है ॥६६।। ऋषियो ने कहा-देवासुर कृत युद्ध म कैस अध्याहार को प्राप्त होते हैं । हम यह जानना चाहते हैं कि देवासुर युद्ध कैसे हुआ पा ॥६॥ मूतजी बोले-देवासुर युद्ध जिस तरह से हुआ था यह बताने वाले मुझसे मब तुम जान लो। पहिल हिरण्यकशिपु गजा तीनो लोको पर प्रशामन करता था ।।६८॥ बलिनाधिष्टित राष्ट्र पुनर्लोक्त्रये प्रमात् । सम्यमासीत्पर तेपा देवानाममुरैः सह ॥६६
२६० ]
[ वायु पुराण
युग व दसवीर्णमासीदव्याहत जगत् ।
निदेशस्थायिनश्च व तयोर्देवासुराभवन् ।।७०
बनवान् वै दिवादोऽय सप्रवृत्त सुदारुणः ।
देवासुराणा च तदा घोरक्षयकरो महान् १७१
तेपा दायनिमित्त व सग्रामा बहवोऽभवन् ।
वाराहेऽस्मिन् दम द्वौ च पण्डामाकर्वोत्तरा स्मृता ७२
नामतस्तु समासेन शृणुध्व तान् विवक्षत ।
प्रयमो नारसिंहस्तु द्वितीयश्चापि वामन ||७३
तृतीय स तु वाराहश्चतुर्थोऽमृतमन्थन ।
सग्राम पञ्चम व सुघोरस्तारकामयः ।।७४
पष्टो झाडीबकम्तेपा सप्तमस्त्रपुर स्मृत..
अन्धकारोऽष्टमस्तेपा ध्वजच नवम स्मृत ॥७५
वार्तश्च दामो ने यस्ततो हालाहल स्मृतः।
स्मृतो द्वादशमम्लेषा घोरकोलाहलोऽपर 1}७६
फिर राजा बलि ने क्रम में तीनो लोगो में राष्ट्र को अपने अधिष्ठित कर
लिया था। उस मम र उन देशो का अमुगे के साथ अत्यधिक मख्य भाव था
॥६६॥ युग दश मदीर्ण और जगत् अव्याहत था। उन दोनो के निदेश स्थायी
देव मौर असुर हुए थे ।। ७०॥ यह एक बंडा जबर्दस्त एव सुदारण विवाद मप्र
वृत्त होगया था और उस समय यह देवो तथा अमुगेरा घोर एव महान् सर
करने वाला होगया था॥१॥ उनके भय के निमित्त रा बहन मे ममाम हुए
। इम वाराह मे वाह पगडा मानर रहे गये है ॥७२॥ नाम से मशेष में
रहने हुए युभमे उनका प्रवण का लो। प्रथम नासिंद है और द्वितीय दामन
है ।।७३।। मृतीय वह वागह है और पौया ममृा वा मन्थन करने वाला होता
है। पञ्चम मुघोर तारवामय मग्राम है ।।७४॥ एटा माडीवा मोर मतम अपुर
पहा गया है । मधार पाठवा है और उनम नवम घजहा गया है | sur
वातं दमाम जाना चाहिए इमरे पश्चात् पाहर मारहव! पहा गया है।
बारहवां उनमें घोर कोलाहम होता है 11७६||
-
[ २६१ "मुन्नव कीतन ] हिरण्यकशिपुर्दैत्यो नमिहेन मूदित । वामनेन वलिबद्धस्त्रलोक्याक्रमणे कृते ।।७७ हिरण्याक्षो हतो द्वन्द्व प्रतिवादे तु देवतै । महाबलो महासत्व सग्रामेष्वाराजित ॥७८ ददायान्तु वराहेण समुद्राद्भर्यदा कृता। प्रालादा निजितो युद्ध इन्द्रणामृतमन्थने 11७६ विराचनस्तु प्राह्लादिनित्यमिन्द्रवधोद्यत । इद्रणव स विक्रम्य निहतस्तारकामये 1150 भवादवध्यताप्राप्य विशेषास्त्रादिभिस्तु य । सञ्जभो निहत पष्ठ शमाविष्ट न विष्णुना ।।८१ अगवनुवता देवेषु पुर गोप्तु निदैवतम् । निहता दानवा मर्वे मिपुरस्त्र्यम्बकेण तु ।।८२ हिरएप काशिपु नाम वाला देस्य नरसिंह के द्वारा मारा गया था। वामन के द्वारा राजा बलि बांधा गया था जबकि इस नोग्य का आक्रमण किया गया था ॥७॥ महान् वन वाला पौर महान् मन्च से युक्त मग्राम म अपराजित हिरण्याक्ष प्रतिवाद म देवताग्रा के द्वारा दद में मारा गया था 1130 जिम ममय म यह भूमण्डल ममुद्र म वगह के द्वारा दंष्ट्रा म किया गया या प्रहाद ममृत के मथन म इद्र के द्वारा युद्ध म निजित हुआ था ॥७६।। प्रसादि विरोचन ता नित्य ही दद्र के साथ युद्ध करने के लिये उद्यत रहा करता पद द्वारा ही वह तारकामय म विक्रम करक मारा गया था 10॥ जो तिर प्रत्र मादि म भव (शिव) मे मनध्यता का प्राप्त कर छ म इन्द्र म अवित्र हुए विष्णु के द्वारा सञ्जभ मारा गया था ॥८१॥ त्रिदेवन पुर की रक्षा करन मे देवो म प्रममय हो जाने वाले ममस्त दानव मारे गए थे और निपु अम्बा के द्वारा मारा गया था ॥२॥ अष्टमे त्वसुगश्च व राक्षश्रान्धवारवा । जितदेवमनुष्यन्तु पितृभिनं व मननान् ।।३
२९२ ]
[ वायु पुराण
संवृतान् दानवाश्च व सङ्गतान् कृत्स्नशश्च तान् ।
तथा विष्णुमहायेन महेन्द्रण निहिता ।।८४
हतो ध्वजो महेन्द्रण मायाच्छन्नश्च योधयन् ।
ध्वजे लक्ष्य समाविश्य विप्रवत्तिमहाभुज ८५
दैत्याश्च दानवाश्च व सहतान् कृत्स्नशश्व तान् ।
रजिः कोलाहले सर्वान् देवैः परिवृतोऽजयत् ।
यज्ञामृतेन विजितौ पण्डामाकों तु दैवतं ॥१६
एते देवासुरा वृत्ता. सग्रामा द्वादशैव तु ।
देवासुरक्षयकरा प्रजानामशिवाय च ।।८७
हिरण्यकशिपू राजा वर्षाणामबुंद वभौ।
तथा शतसहस्राणि ह्यधिकानि द्विसप्ततिः।
अनीति च महस्राणि त्रैलोक्यस्येश्वरोऽभवत् ।।८८
पर्याये तस्य राजाऽनु वलिवर्षार्बुद पुन ।
पष्टि चैव सहस्राणि त्रिंशत नियुतानि च 11८६
बने राज्याधिकारस्तु यावत्काल बभूव ह।
प्रह्लादेन गृहीतोऽभूतावत्काल सदासुरै १६०
अष्टम में असुर-राक्षन और अन्धकारक जीत हुए मनुष्य भौर देवी
तथा पितृगणो से सगत तथा सवृत दानवो को पोर पूर्ण रूप से सङ्गत उन
सवको विष्णु की महायता प्राप्त करने गले इन्द्र ने निहित किया था 1154
८४॥ माया मे पाय-प्रध्वज युद्ध करते हुए महेन्द्र ने मारा था। ध्वज मे लक्ष्य
को समावेश करके महाभुज विप्रवत्ति हुना था 110 दैत्य भौर पूर्ण रूप से
सहन ममस्त दानवो को देवो के द्वारा परिवृत रजि न कोलाहल में जीता था
पनामृत मे देवो ने पएडामानों को जीता था।८६।। ये इतने प्रजाग्री के
करन के लिये देव भोर प्रमुगे के भय करने वाले वारह मग्राम हुए
थे
जोकि देवासुर इस नाम से कहे गये हैं ॥८॥ हिरण्यकशिपु राजा एक प्रर्बुद
१ वर्ष नक सुशोभित रहा या पार इमो प्रकार मे मौ महन-बहत्तर अधिक भोर
प्रम्सी महल तक नौलोवप का स्वामी रहा था ॥८६॥ पर्याय मे उसके पश्चात्
शम्भुम्नव कोतन ] [ २६३ राजा बलि फिर एक अर्बुद वर्ष तक तथा साठ हजार तीन सौ नियत पर्यन्त रहा था IIEI बलि का राज्याधिकार जितने समय तक रहा था तब तक उस समय प्रमुरो से वह प्रहलाद के द्वारा गृहीन रहा या ॥१०॥ इन्द्रास्त्रयस्ते विख्याता असुराणा महौजस । दंत्यसस्थमिद सर्वमासीद्दायुगं किल IIE१ असपत्न तत सर्व राष्ट्र दशयुग पुरा । त्रैलोक्यमव्ययमिदमहेन्द्रण तु पाल्यते ॥६२ प्रह्लादस्य तनवादस्त्रलोक्य कालपर्ययात् । पर्यायेण च सप्राप्त लोक्ये पाकशासनः।।६३ सतोऽमुरान् परित्यज्य यज्ञे देवा उपागमन् । यज्ञे देवानय गते काव्य ते ह्यसुराव वन् ।।६४ कृत नो मिपता राष्ट्र त्यक्त्वा यज्ञ पुनर्गता. । स्थातु न शक्नुमो ह्यद्य प्रविशामो रसातलम् ।।६५ एवमुक्तोऽब्रवीदेतान् विषण्ण सान्त्वयन् गिरा। माभेष्ठ धारयिष्यामि तेजमा स्वेन चासुरा ६६ वृष्टिरोषधयश्च व रसा वसु च यद्वयम् । कृत्स्ना मयि च विष्ठन्ति पादस्तेषा सुरेपु वै । युष्मदर्थ प्रदास्यामि तत्मवं धार्यते मया ॥६७ ततो देवासुरान् दृष्ट्वा धृतान् काव्येन धीमता। अमन्त्रयस्तदा ते वै मविग्ना विजिगीषया । वे महान् प्रोज़ वाले प्रसुगे के तीन इन्द्र विरुपात हुए थे। यह समस्त दश युग तक दैत्यो के कब्जे मे रहा था ||६१॥ पहिले यह समस्त राष्ट्र शत्रुनो से रहित रहा था। यह अव्यय लोक्य महेन्द्र के द्वारा ही पातित होता था ॥१२॥ इसके पश्चात् प्रह्लाद के कालपर्यय से इस शैलोक्य पर पर्याय से पाक- पापन (इन्द्र) ने शासन प्राप्त कर लिया था ॥६३|| इसके अनन्तर असुरो का स्याग कर देवगण यज्ञ मे उपागत हुए थे। देवो के यज्ञ में जाने पर काव्य (शुक) से प्रमुगे ने कहा ॥६॥ राष्ट्र को त्याग कर भूल करने वाले हमारे ।
२६४ ]
[ वायु पुराण
किय हुए यज्ञ को पुन चले गये । अाज हम टहर नही सकते हैं रसातल में प्रवेश
करे ।।६। इस प्रकार से कहे गये विषाद युक्त शुक्र ने इनसे वाणी द्वारा
सान्त्वना देते हुए कहा- गत, वह सब हे असुरो । मेरे द्वारा अपने तेज से
धारण किया जा रहा है ॥६६॥ वृति-रस-औषधियां और जो दोना प्रवार
का धन है ये सब पूर्ण मुझमे ही रहा करते हैं उनका चतुर्थ भाग देवगण मे
रहता है । तुम्हारे लिये मैं दूगा । वह अब मरे द्वारा धारण रिये जाते हैं
॥६७॥ इसक अनन्तर धीमान् काव्य के द्वारा घृत देवामुरो को देखकर तब
उन्हान विशेष रूप मे जीतन को इच्छा से मविान होते हुए मन्त्रणा की
थो 18511
एप काव्य इद सर्व व्यावर्तयति नो वलात् ।
साधु गच्छामहे तूर्ण क्षीणानाप्याययस्व तान् ।
प्रसह्य हत्वा शिष्टान् वै पाताल प्रापयामहे ||६६
ततो देवा सुमरब्धा दानवानभिमृत्य वै ।
जध्नुस्तं वंध्यमानास्ते काव्यमेवाभिदुद्र तु ॥१००
तत काव्यस्तु तान्इष्ट्वा तूर्ण देवैरभिद्र तान् ।
समरेऽस्त्र क्षता स्तान् देवेभ्यस्ता दिते सुतान् १०१
काव्यो दृष्ट्वा स्थितान् देवान् तत्र देवोऽभ्यचिन्तयत् ।
तानुवाच ततो ध्यात्वा पूर्ववृत्तमनुस्मरन् ।।१०२
नलाक्य विजित सर्व वामनन त्रिभि मं ।
बलिवंद्धो हतो जम्भो निहतश्च विरोचन ॥१०३
महापु द्वादशसु मग्रामपु सुरहंता ।
तस्तैरुपायभूयिष्ठा निहता य प्रधानत ।।१०४
विश्विच्छिष्टास्तु वै यूय युद्ध प्वन्त्येषु वै स्वयम् ।
नीति वो हि विवास्यामि काल कश्चित्यतीक्ष्यताम् ॥१०५
यह काव्य इस सबको वलसे हमको बचा दे। अच्छी बात है दीघ्र'
मौर उन क्षीणो को भी तृप्त करे बलपूर्वक शिष्टो का हरण करके पाताल
में प्रवेश करा देवे IEET इसके देवो न मुसंरस्य होने (ए दानवो पर मभि-
। लोग कुछ थोडे शम्भुम्तव कीर्तन ] सरण करके मार दिया था और उन देवो के द्वारा वध्यमान वे पाव्य वे ही पाम हाने घे ॥१००। इसके पश्चात् देवो के द्वारा भगाये गय उनको शुक्र ने शीघ्र देवकर जोरि मभर अस्रो वे क्षता से दु सिन थे और वे दिति के पुत्र देवो के द्वारा अभिद्रुत किये हुए थे ।।१०१॥ वहाँ पर स्थित हुए देवो को वाट्य ने देखकर सोचा और फिर ध्यान करके पूर्व वृत्त का अनुस्मरण करते हुए उनसे वोने ॥१०२॥ वामन ने इस ममस्त लोक्य को तीन कदमो से ही जीत लिया है । वलि को बांध दिया गया है और जम्भ तथा विरोचन को मार दिया गया ॥१०३।। महाहं बारह सग्रामो म देवो के द्वारा ये मब मारे गये हैं। जो प्रधान थे वे उन-उन उपायो के द्वारा बहुत से मारे गय हैं । तुम रो शेष रह गय हो । अब अन्तिम मुद्धा में आपकी नीति को मैं स्वय ही धारण करूंगा बुछ समय प्रतीक्षा करो ॥१०४-१०॥ यास्याम्यह महादेव मन्त्रार्थ विजयाय व । मग्नि माप्याय येतोता मन्त्रैरेव वृहस्पति ।।१०।। ततो यास्याम्यह देव मन्त्रार्थ नीललोहितम् । युष्माननुग्रहीष्यामि पुन पश्चादिहागत ॥१०७।। यूय तपश्चरव वै सवृता वल्क्लवने । न वै देवा वधिध्यन्ति यावदागमन मम ।।१०८।। अप्रतीपास्ततो मन्त्रान् देवात् प्राप्य महेश्वरात् । योत्म्यामहे पुनर्देवास्तत प्राप्स्यथ वे जयम् ।।१०।। ततस्ते कृतसंवादा देवानू वुम्ततोऽसुरा । न्यस्तवादा वय सर्वे लोवान् यूप प्रमन्तु वै ॥११०।। वय तपश्चरिष्याम, सवृता वल्कलंवने । प्रह्लादस्य वच थत्वा सत्यव्याहरण तु तत् ।।१११॥ तता देवा निवृत्ता व विज्वरा मुदिताश्च ह । न्यस्तरास्त्रेषुदैत्येषु स्वान् वे जामुयंथागतान् ॥११२।। ततस्तानववीसाध्य पश्चिलालमुपास्यताम् । निग्त्सुस्तपोयुवत बाल वार्याथमाधवं ।। पितुममाश्रमस्या ये सर्ये देया सवामवा ॥११३|| २६१ । { वायु पुराण म सन्दिश्यामुरान् वाथ्यो महादेव प्रपद्य च । प्रणम्यनमुवाचाथ जगत्प्रभवमीश्वरम् ॥११॥ पार लोगों की विजय के लिए मन्त्रार्य में महादेव के पाम जाऊंगा। होता हानि मात्रो मे ही प्रनि को प्रादादिन करते हैं 11१०11 इमसे में मनार्य के लिए नोल लोहित (महादेव) ने गमीप में जाऊंगा। आप लोगो के कार अनुग्रह कहेंगा पौर फिर पीये यहाँ माऊँगा ॥१७॥ तुम लोग वन म परला मे गवृत होते हुए मर्यान् वृक्षो को डाल के वस्त्र पहिनते हुए तपस्या को फिर देवता लोग वध नहीं करेंगे जब तक कि मेरा आगमन यहाँ होता है ॥१०॥ महेश्वर देव में प्रतीप पात्रो को प्राप्त करने पर्थात् शत्रु नाशर मन्त्री को जानार फिर देवा के साथ युट करेंगे पौर फिर अवश्य ही विजय प्राप्त करेंगे ॥१६॥ इसके मनन्तर सम्बाद करने वाले ममुर देवगण स बाले- हम लोग मब भगडा छोडने वाले हो गये हैं अब तुम साग समस्त लोको को प्राप्त कर भोग बरो॥११०॥ हम लोग मब तपस्या करते हैं और लाल वमनो से सवृत होत हैं । प्रहलाद के वचन को सुनकर जो शिविल्कुल स य ही कपन पा ॥१११।। इसके पश्चात् दुख रहित एव परम प्रसन्न देवता लोग निवृत होगय थे । दैत्यो के शास्त्र त्याग देने वाले हो जाने पर देवगण अपने स्थानो को जैसे वे पाये थे पले गये थे ॥ ११२ । इसके अनन्तर शुक्राचार्य न उन से (दैत्यो से) कहा कि तुम लोग कुछ समय तक निरुन्मुक-तप से युक्त मोर कार्यार्थ के साधक होते हुए उपासना करो। इन्द्र के सहित समसा देव गण इस समय में मेरे पिता के प्राश्रम में स्थित हैं ॥११३।। यह काव्य (शुका चार्य -दैत्य गुरु) प्रमुरो को सन्देश देकर महादेव के पास गय और वहां पहुंच वर हमको प्रणाम करके समस्त जगत् प्रभव ईश्वर महादेव से कहा-॥११४॥ मन्त्रानिच्छाम्यह देव मे न सन्ति वृहस्पती। पराभवाय देवानामसुरेप्वभयावहान् ॥११५।। एवमुक्तोऽब्रवीद्देवो मन्त्रानिच्छसि वै द्विज। व्रत चर मयोद्दिष्ट ब्रह्मचारी समाहितः ॥११६।।
शम्भुस्तब कीर्तन ] [ २१७ पूर्ण वर्षसहस्र व कुण्डघूममवाशिराः । यद्य पास्यसि भदन्ते मत्तो मन्ममवाप्स्यसि ॥११७॥ तथाक्तो देव देवेन स शुक्रस्तु महातपा । पादौ सस्पृश्य देवस्य वाढमित्यभ्यभाषत ।।११।। व्रत चराम्यह शेष यथोद्दिष्टोऽस्मि वं प्रभो। ततो नियुक्तो देवेन कुण्डधारोऽस्य धूमकृत् ।।११।। असुराणा हितार्थाय तस्मिञ्छुक गते तदा । मन्त्रार्य तत्र वसति ब्रह्मचर्य महेश्वरः ॥१२०।। तद् वुध्वा नातिपूर्वन्तु राज्य न्यस्त तदासुरैः । सस्मिञ्छिद्रे तदाम देवास्तान् समभिद्रवन् । निशितात्तायुधा सर्वे बृहस्पतिपुरोगमा ॥१२१॥ दृष्ट्वासुरगणा देवान् प्रगृहीतायुधान् पुनः । उत्पेतु सहसा सबै सन्प्रस्तास्ते ततोऽभवन् ।।१२२।। हे देव । मैं मन्यो को चाहता हूँ बृहस्पति के रहते हुए मेरे पास मन्त्र नहीं हे मैं ऐसे मन्त्री को चाहता हूँ जो मसुरो को अभय देने वाले हो और देवो पा पराभव करने वाले हो ॥११५। जब इस तरह से महादेवजी से यहा गया तो महादेव बोले-हे द्विज ? यदि इस प्रकार क मन्त्रो को चाहते हो तो मेरे बनाये हुए ग्रज का ब्रह्मचारी मोर पूर्ण समाहित होते हुए भाचरण करो ॥११६।। पूरे एक सहर वर्ष तक अवाक् गिग होते हुए कुएर घुप की यदि उपासना मरोगे तो तुम्हारा कल्याण होगा और मुझ से मन्त्री को प्राप्त कर सोगे ॥११॥ उस प्रकार से देवो वे देव महादेव के द्वारा कहे जाने पर महान् तपस्वी सुधानाय ने महादेव के चरण. या सरपर्म करके "बहुन पच्या"-पह पहा पा ॥११८॥ मैं शेष व्रत का चरण क्रूगा हे प्रभो ! बंमा भी प्रापके दाग आदि किया गया है। इसके पश्चात् महादेव ने इसको धूम त कुण्ड पार नियुक्त पिया था ॥११॥ असुरो के हित के लिये तब उम शुक्राचार्य के परे जाने पर मन्त्र के लिए महेश्वर वहाँ ब्रह्मचर्य में निवास पर हैं ॥१२॥ यह बानारप्रति पूर्व मे सब मगुरो के द्वारा राग्य नहीं व्यस्त किया गया २६८ ] । वायु पुराण था। उस छिद्र मे उमके प्रा वाले देवो ने बृहस्पति को अग्रगामी बनाकर पौर तीक्षा आयुधा को ग्रहण करके उन असुरो को खदेड दिया था ॥ १२१ ॥ तब असुरो ने दवो को पुन आयुध ग्रहण करने वाले देखकर सहसा सव उत्पन्न करने लग पोर वे एक्दम सत्रस्त हो गय थे प्रति बहुत ही डर गये थे 11१२२॥ न्यस्तशस्त्रे गये दत आचार्यव्रतमास्थिते । सन्त्यज्य समय देवास्ते सपलजिघाव ॥१२॥ अनाचार्यास्तु भद्र वो विश्वस्तास्तपसि स्थिता। चीरवल्काजिनधरा निष्क्यिा निप्परिग्रहा ॥१२४।। रणे विजेतु देवान् वै न शक्ष्याम कथ ञ्चन । अशुद्धन प्रपद्याम शरण काव्यमातरम् ॥१२॥ ज्ञापयामस्ततमिद यावदागमन गुरो । विनिवृत्त सत काव्ये योत्स्यामो युधि तान् सुरान् ॥१२६।। एवमुक्त्वा सुरान् योग्य शरण काव्यमातरम् । प्रापद्यन्त ततो मीतास्तदा चंव तदाऽभयम् ।।१२७।। दत्तन्तेपान्तु भीताना दैत्या नामभयार्थिनाम् । न भेतव्य नभेतव्य भयन्त्यजत दानवा ॥१२॥ मत्सन्निधौ वर्तता वो न भीभवितुमहति । भयाच्चाप्यभिपन्नास्तान् दृष्ट्वा देवासुरास्तदा ।।१२।। अभिजग्मु प्रमह्य तानविचार्य बलाबलम् । तास्त्रस्तान वध्यमानाश्च देव ष्ट्वासुरास्तदा ।।१३०॥ देवी क्रुद्धानवोदेनाननिन्द्रत्व करोम्यहम् । सस्तम्य शीघ्र सरम्मादिन्द्र साऽभ्यवरतत ॥१३॥ मसुरो द्वारा शस्त्रो के त्याग देने पर जप के दे देने पर मोर प्राचार्य व्रत मे प्रास्थित होने पर उन देवताओं ने शत्त का त्याग करके शत्रुप्रो के न की इच्छा करली थी।१२३। प्राचार्यतत्व महीन-मापका कल्याण हो इम शम्भुस्तव कीर्तन ] [ २६९ तरह से पूर्ण विश्वस्त तपश्चर्या में स्थित चीर और बल्कलो के धारण करने वाले, क्रिया से रहित और बिना परिग्रह वाले हम किसी प्रकार से भी देवो को युद्ध 'मे जीत नहीं सकेगे इसलिये अव अशुद्ध के द्वारा काव्य की माता के शरण में चलें ।।१२।। जब तक गुरु का आगमन हो इस मत को ज्ञापित करें। शुक्राचार्य के वापिस लोट पाने पर हम उनसे देवो से रण भूमि मे युद्ध करेंगे ॥१२६।। इस प्रकार से देवों से कहकर योग्य शरण (रक्षक) शुक्राचार्य की माता को शरणागति म प्राप्त हुए थे उस समय वे एकदम डरे हुए थे । अभय के चाहने वाले भीत उन दैत्यो को उस समय में ही अभय दिया गया । हे दानवो । मत डरो मत डरो, भय का त्याग कर दो ॥१२७.१२८।। आप लोग मेरे पास रहो, आपको कोई भी भय नही हो सकता है । भय से अभिपन्न उन देवासुरो को उस समय में देखकर देवी ने ऐसा कहा था ॥१२६।। बलावल का विचार न करके इनके ऊपर बल करके अभिगमन किया था। उस समय मे डरे हुए और देवो के द्वारा वृध्यमान होते हुए उन असुरो को देखकर क्रुद्ध होते हुए देवी इनमे बोली मैं अनिन्द्रत्व अर्थात् इन्द्र का सर्वथा मभाव कर दूंगी। उसने शीघ्र ही इन्द्र को सरम्भ से (क्रोध सें) स्तम्मित करके अभिचरण किया पा ॥१३१॥ तत मस्तम्भित दृष्ट्वा शक देवास्तु यूपवत् । व्यद्रवन्त ततो भीता दृष्ट वा शक्र वशीकृतम् ॥१३२।। गतेपु सुरसधेपु विष्पगुरिन्द्रमभापत । मां त्व प्रविश भद्रन्त नेध्यामि त्वा सुरेश्वर ॥१३३।। एवमुक्तस्ततो विष्णु प्रविवेश पुरन्दर । विष्णुना रक्षित दृष्ट्वा देवी ऋद्धा वचोऽवदद ॥१३४॥ एपा त्या विष्णुना साद दहामि मघवानिव । मिपता सर्वभूताना दृश्यता मे तपोवलम् ॥१३॥ तयाभिभूतो तो देवाविन्द्रविष्णू जजल्पतु । क्थ मुच्येव सहितौ विष्णुरिन्द्रमभाषत ।।१३६।।
२९८ | । वायु पुराण या। उस छिद्र म उसके प्रमप वाले देवो ने बृहस्पति को प्रगामी बनाकर मोर तीक्षण प्रायुधो को पहण करक उन असुरों को खदेड दिया था ॥ १२१॥ तव असुरो ने देवो को पुन आयुध ग्रहण करने वाले देखकर सहमा सव उत्पन्न करने लगे और वे एक्दम सत्रात हा गये थे प्रयान बहुत ही डर गये थे ॥१२२॥ न्यरतशस्त्रे जय दत्त आचार्ययतमास्थिते । सन्त्यज्य समय देवास्ते सपत्नजिघापय ॥१२॥ अनाचार्यास्तु भद्र वो विश्वस्तास्तपसि स्थिता। चीरवल्वाजिनधरा निष्क्यिा निष्परिग्रहा ॥१२४॥ रो विजेतु देवान् वै न शक्ष्याम कथञ्चन । अशुद्ध न प्रपद्याम शरण काव्यमातरम् ॥१२॥ ज्ञापयामस्ततमिद यावदागमन गुरो । विनिवृत्त तत वाव्ये योत्स्यामो युधि तान् सुरान् ।।१२६।। एवमुस्त्वा सुरान् पोय शरण काम्यमातरम् । प्रापद्यन्त ततो भीतास्तदा चंव तदाऽभयम् ॥१२७॥ दत्तन्तेपान्तु भोताना दैत्या नामभयार्थिनाम् । न भेतव्य नभेतव्य भयन्त्यजत दानवा ॥१२८।। मत्सन्निधौ वतता वो न भीमवितुमर्हति । भयाचाप्यभिपन्नास्तान् दृष्ट्वा देवासुरास्तदा ॥१२॥ अभिजग्मु प्रसा तानविचार्य वलायलम् । तास्त्रस्तान् वध्यमानांश्च दवंष्ट्वासुरास्तदा ।।१३०॥ देवी प्रदायवीदेनाननिन्द्रत्व वरोम्यहम् । मस्तम्य शीघ्र सरम्मादिन्द्र साऽभ्यपरत्तत ॥१३॥ पगुगें द्वारा सम्बों रे त्याग दन पर जान देने पर और मापार्य बन म मास्थित होने पर उन देवतामों ने रात वा स्याग सपोरे मान कीया करणी ची ।१२३॥ पाचायलमहीन माया होग सम्भुम्तव वीर्तन ] [ २९६ तरह से पूर्ण विश्वस्त तपश्चर्या में स्थित-चीर और बल्बलो के धारण करने वाले, क्रिया से रहित और विना परिग्रह वाने हम किसी प्रकार में भी देवों को युद्ध म जीत नहीं सकेंगे इमलिये अब मसुद्ध के द्वारा बाय्य की माता के पारण म पलें ॥१२५।। जब ता गुरु का भागमन हो इम मत को शापित करें। शुक्राचार्य के वापिस लौट पाने पर हम उनसे देवों से रण भूमि में युद्ध करेंगे ॥१२६।। इस प्रकार से देवो से कहकर योग्य शरण (रक्षक) शुभराचार्य की माना का शरणागति में प्राप्त हुए थे उस समय दे एक्दम डरे हुए थे । अभय चाहन वाले भीत उन दरयों को उस समय मे ही अभय दिया गया । हे दानवो । मत हरो-मन हरो, भय का त्याग कर दो ॥१२७-१२८। आप लोग मेरे पास रहो, प्रारको कोई भी भय नहीं हो सकता है । भय मे अभिपन्न उन देवामुरो को उम समय म देखकर देवी ने ऐसा कहा या ॥१२॥ बलावल का विचार न करक इनके ऊपर बल खे अभिगमन दिया था। उस समय में पौर देवो के द्वारा वृध्यमान होत हुए उन असुरों को देखकर युद्ध होते हुए देवी इनमे बोलो मैं अनिन्द्रत्व अर्थात् इन्द्र का सर्वपा प्रभाव कर दूंगी। उप्तने शीघ्र ही इन्द्र को सरम्भ से (काय सें) स्तम्मित करके प्रभिचरण किया पा ॥१३१॥ तत सस्तम्भित दृष्ट्वा शन्न देवास्तु यूपवत् । व्यद्रवन्त ततो भीता दृष्ट्वा शक्र वशीकृतम् ॥१३२।। गतेपु सुरसधेषु विप्णुरिन्द्रमभापत । मां त्व प्रविश भदन्त नभ्यामि त्वा सुरेश्वर ॥१३३।। एवमुक्तस्ततो विष्णु प्रविवेश पुरन्दर । विष्णुना रक्षित दृष्ट्वा देवी क द्धा वचोऽवदत् ।।१३४॥ एपा त्या विष्णुना साद्ध दहामि मघवानिव। मिपता सर्वभूताना दृश्यता मे तपोवलम् ।।१३।। तयाभिभूतो तो देवाविन्द्रविष्णू जजल्पतु । क्थ मुच्येव सहिती विष्णुरिन्द्रमभाषत ।।१३६॥
[ वायु पुराण
इन्द्रोडवीज ह ाना गवनी न दहेद्विभो ।
विशपेणाभिभूतोऽहमतस्त्वञ्च हि मा चिरम् ॥१३७।।
तत समीक्ष्य ता विष्णु स्त्रीवध क्त्तु मास्थित ।
अभिध्याय ततश्चक्रमापन सत्वर प्रभु ॥१३॥
तस्या सत्वरमगाया शीघ्रकारी मुरारिहा ।
स्त्रिया विष्णुस्ततो देव्या क्रूर बुद्धा चिवीर्पितम् ।
बदस्तदस्त्रमाविद्धय शिरश्चिच्छेद माधव ॥१३॥
इसका अनन्तर देवों ने यूप की भानि इद को सस्तम्भित दखकर डरे
हुए होकर शक्र को वशीकृत देखकर दे रही स भाग दिये थे ।।१३२॥ देव सो
के चले जाने पर विष्णु इन्द्र से बोल-है सुरेश्वर | तुम मुझ म प्रवेश कर
जामा-तरा मना होगा-मैं तुमको पजाऊँगा ॥१३३।। इस प्रकार म विष्णु
क द्वारा वहन पर इद्र ने विष्णु मे प्रवेश दिया था। विष्णु के द्वारा रक्षिन
इद्र की सार देवी ने क्रुद्ध होकर यह वचन कहा ॥१३४॥ यह मैं पाज
समस्त भूतो के देखते हुए मघवान की तरह तुझको विष्णु क साथ जलाती हूँ
यह मेरा तपोवन देखो ॥१३५॥ उस देवी के द्वारा अभिभून वे दोनो देव इद्र
और विष्णु बोने । सहित दानो कैसे छोडें यह विष्णु ने इन्द्र से कहा था ॥१३६
इन्द्र ने कहा इत्रियो ! इसे त्याग दो जब तक हम दोनो दम्प न होवें । मैं विदोष
रूप से अभिभूत हूँ और तुम अधिक मत होमो ॥१३७।। इसके पश्चात् उस देवी
यो देखकर भगवान विष्णु स्त्री का वध करने के लिए मस्थित हो गय थ । यह
कहकर इमर उपगत प्रभु विष्णु ने शीघ्र चक्र को उठाया था ।। १३८ ।।
सलरमाण उमसे भी शीघ्रकारी मुर पत्रुयो क नारा विष्णु ने देवी स्त्री के
चिकीपित वो जानार वोष किया और उम प्रत्र को चलार माधव ने
गिर काट डाला था॥१३६)
त दृष्ट्वा स्त्रीवध घोर चुकोप भृगुरीश्वर ।
ततोऽभिशस्ता भृगुणा विष्णुर्भायावधे तदा ॥१४॥
यस्मात्ते जानता धर्मानवघ्या स्त्री निपूदिता ।
तस्मात्त्व सप्तरत्वा वै मानुयु प्रपत्स्यमि ॥१४॥
शम्भुसाव कीर्तन ] [ ३०१ ततस्तेनाभिशापेन नष्टे धर्मे पुन पुनः। लोके सर्वहितार्थाय जायते मानुस्विह ॥१२॥ अनुव्याहृत्य विष्णु स तदादाय शिर स्वयम् । समानीय तह काये अपो गृह्ये दमब्रवीत् ॥१४३|| एप त्वा विष्णुना सत्ये हता सजीवयाम्यहम् । यदि कृत्स्नो मया धर्मश्चरितो ज्ञायतेऽपि वा। तेन सत्येन जीवस्व तद्धि सत्य वीम्यहम् ॥१४४।। रात्याभिव्याहृता तस्य देशी सजीविता तदा । तदा ता प्रोक्ष्य शीताभिरद्भिर्जीवेति सोऽग्रवीत् ॥१४५।। ततस्ता सर्भभूतानि दृष्टवा सुप्रोत्थितामिव । साधु साध्विस्यदृश्याना वाचस्ता सस्वतुर्दिशः॥१४६।। दृष्ट्वा सञ्जीवितामेव देवी ता भृगुणा तदा । मिपता सर्वभूताना नदद्भुतमिवाभवत् ॥१४७॥ असभ्रान्तेन भृगुणा पत्नी सञ्जीविना तत । दृष्ट्वा शको न ले भेऽथ शर्म काव्यभयात्तत १४८।। प्रजागरे ततश्चेन्द्रो जयन्तीमात्मन सूताम् । प्रोवाच मतिमान् वाक्य स्वा कन्या पारशासन ॥१४६ । एप काव्यो ह्यनिन्द्राय चरते दारुण तप । तेनाह ध्याकुल पुवि कृतो धृतिमता दृढम् ॥१५०।। उस घोर स्त्री के वध को देखकर ईश्वर मृगु बडे ही क्रोधित थे फिर उस समय मे भार्या के वप हो जाने पर भृगु के द्वारा गिष्ण को मभिशाप दिया गया था ॥१४०।। क्योकि धर्मों को जानने वाने, तुमने न वप करने के योग्य स्त्री का वध किया है इसलिये मैं यह शाप देता हूँ तुम सात वार मानुपो में उत्पन्न होकर रहांग ॥१४१॥ इमवे मनन्तर उम अभिशाप से लोक में बार-बार धर्म के नष्ठ हो जाने पर मव के हित सम्पादन के लिए यहाँ मनुष्यो में भगवा जन्म लिया करते हैं ।।१४२॥ उसने इस तरह विष्णु से अनुष्याह- रण कर के उस समय स्वय भार्या के उस गिर को लेकर उसे शरीर पर समा-
३०२ ]
। वायु पुराण
नीत करके जल लेकर यह बोले ॥१४३।। यह विष्णु के द्वारा सत्य मे हर
तुझे मैं सनीवित करता हूं । यदि मैंने पूर्ण धर्म का प्राचरण स्थिा है और
धर्म को ज्ञान रखता हूं तो उस सत्य से जीवित हो जा-यदि मैं यह सत्य बोलता
॥१४४॥ सत्य से अभिव्याहृत उसकी देवी उस समय संजीवित होगई यो।
फिर इसके पश्चात् उस समय उसका शीतल जल से प्रोक्षण करके जीवित
रहोयह शुक्राचार्य ने कहा था ॥१४॥ इसके अनन्तर समस्त प्राणीवृन्द
सोकर उठी हुई की भांति उम देवी को देखकर-"साधु साधु" अर्थात बहुत
अच्छा-प्रच्छा ऐसी वाणियां जो अदृश्य थे उनरी मब दिशाम्रो से सुनाई दी
थी॥१४६।। इस प्रकार से भृगु ने उस समय मे उस देवी को सज्जीवित देस
कर समस्त प्राणियो के देखते हुए वह कार्य एक अद्भुत की तरह हुआ था
॥१४७।। मसम्भ्रान्त भृगु के द्वारा उनकी पत्नी को सजीवित देखकर काव्य के
भय से फिर शान्ति प्राप्त नही को थो॥१४८॥ प्रजागर मै इन्द्र ने अपनी पुत्री
जयन्ती से कहा। जयन्ती उस मतिमान् पाक शासन को कन्या थी। उसने कहा
यह शुक्र इन्द्र के प्रभाव के लिये दारण तप कर रहे हैं। हे पुनि ! इस कारण
से मैं बहुत ही अधिक व्याकुल हूँ। उस घृतिमान ने यह पा इगदा कर लिया
है ॥१५०॥
गन्छ सम्भावयस्वनं श्रमापनयन: शुभ.।
तस्तैमनोनुकूल व ह्य पचाररतन्द्रिता ॥११॥
देवो सा हीन्द्रदुहिता जयन्ती शुभचारिणो ।
युक्तध्यानञ्च शाम्यत दुर्बल घृतिमास्थितम् ॥१५२||
पिया यथोक्त कान्य सा काव्ये कृतवती तदा।
गोभिश्चैवानुकलाभिः स्तुवती वल्गुभापिणी ॥१३॥
गायसवाह्न काले सेवमाना मुखावहै ।
गुथपन्त्यनुहलाच उवास बहुला: समा ।।१४।।
पूरों धूमव्रते चापि घोरे वर्षसहसिके।
वरेण च्छन्दयामास पाव्य प्रोतोऽभवत्तदा ॥१५॥
दाम्भस्तव कोतन ]
[ ३०३
एव व वंस्त्वयैकेन चोणं नान्येन केनचित् ।
तस्मात्त्व तपसा सुद्धया श्रुतेन च बलेन च ॥१५६।।
तेजसा चापि विबुधान् सर्वानभिभविष्यसि ।
यच्च किश्चिन्मम ब्रह्मन् विद्यते भृगुनन्दन ॥१५७।।
साङ्गञ्च सरहस्यञ्च यज्ञोपनिषदान्तथा।
प्रतिभास्यति ते सर्व तच्चाद्यन्त न कस्यचित् ॥१५८!!
सो तुम वहाँ जामो पोर इसको शुभ थम के अपनयनों के द्वारा मम्मा-
वित करो। उन-उन उनके मन के अनुकूल उपचारो से उमे प्रसन्न करो किन्तु
इस कार्य में मतन्द्रित अर्थात् पालस्य रहित होकर लग जाना ।। १५१ ।। वह
देवी इन्द्र की दुहिता जयन्ती शुभ चारिणी थी। युक्त ध्यान गला शाम्य-दुर्वल-
धृति मे पास्थित उम काव्य का जैसा पिता के द्वारा कहा गया था उसने काव्य
के विषय मे उम समय किया । अनुकूल वारिणयो के द्वारा वल्गुभापिणी उसने
उसकी स्तुति की थी॥१५२-२५३।। मुख प्रदान करने वाले गात्र मवाहनो के
द्वारा समय पर सेवा करती हुई मौर मुथ पा करती हुई तथा अनुकूल रहती
हुई बहुत वर्षों तक उसने वहाँ निवाम क्यिा ।। १५४ ॥ एक सहस्र वर्ष वाले
परम घोर धूमयत के पूर्ण हो जाने पर तव महादेव ने प्रमग्न होकर काव्य के
वरदान मे समन्वित पिया था ॥१५५।। वरदान देने के समय मे ऐसा कहते
हुए कि यह मन तुझ एक ने किया है अन्य किमी ने पूर्ण नही किया है। इस
लिए तू तप, बुद्धि, यत, वन और तेज से भी समस्त देवो को अभिभूत क
देगा और जो भी कुछ है भृगुनन्दन 1 है ब्रह्मन् । मेरे पाम है माङ्ग मोर रहस
के सहित यह सब तथा यज्ञोपनिषद् तुझे प्रतिभामित हो जायगे और वह पात
से अन्ततक किसी को भी नहीं होते है ।।१५६३१५७।१५८।।
सर्वामिभावी तेन व द्विजश्रेष्ठो भविष्यसि ।
एव दत्वा वरास्तस्मै भार्गवाय पुन पुनः ॥१५६।।
अजेयत्व धनेशत्वमवध्यत्व च वै ददौ।
एतान् लब्ध्वा वरान् वान्य सम्प्रहृष्टतनूव्ह ॥१६०॥
। वायु पुराण
हर्षात् प्रादुर्वभौ तस्य देवस्तोत्रं महेश्वरम् ।
तदा तिर्यविस्थतस्त्वेव तुष्टुवै नीललोहितम् ॥१६१
नमोऽस्तु शितिकण्ठाय सुरापाय सुवर्चसे ।
रिरिहारणाय लोपाय वत्सराय जगत्पते ॥१६२
कपदिने ह्य द्ध रोम्णे हयाय करणाय च ।
सस्कृताय सुतीर्थाय देवदेवाय रहसे ।।१६३
उपगीपिणे सुवक्त्राय सहस्राक्षाय मीढुषे ।
वसुरेताय रुद्राय तपसे चीरवाससे ॥१६४
ह्रस्वाय मुक्तकेशाय सेनान्ये रोहिताय च ॥१६५
कवये
राजवृद्धाय
तक्षकक्रीडनाय च।
गिरिशायार्कनेत्राय यतिने जाम्बवाय च।
सुवृत्ताय सुहस्ताय धन्विने भार्गवाय च ।।१६६
इसमे तू सबको अभिभूत करने वाला द्विजश्रेष्ठ हो जायगा । इम प्रसार
से भार्गव के लिये बार-बार वरो को देकर अजेयत्व-घनेशत्व और अवध्यत्व का
भी वरदान दे दिया था। इन समस्त वरो को प्राप्त कर काव्य सम्प्रहृष्ट तनूरुहो
वाला अर्थात् अत्यन्त प्रसन्नता से प्रफुल्लित होगये ॥१५६-१६०॥ हर्ष के प्रतिरेक
होने से उसके हृदय में महेश्वर हेमस्तोत्र का प्रादुर्भाव हुग्रा । तब तिरछा स्थित
होकर इस प्रकार से नीललोहित की स्तुति की थी ॥१६१॥ सुरापान करने वाले
सुन्दर वर्चस वाले तथा शितिकण्ठ से युक्त के लिये नमस्कार है । रिरिहाण-
लोप-वत्सर और जगत् के पति के लिये नमस्कार है ॥१६२॥ कपर्दी-उद रोम
वाले-हय-और करण के लिये नमस्कार है । सस्कृत-सुतीर्थ-रह मौर देवो के
भी देव के लिये नमस्कार है ॥१६३॥ उणीपी सुवक्त्र वाले-सहर नेत्रो वाले.
मीढुष-वसुरेता-तथ-चीरों के वस्त्र धारण करने वाले रद्र के लिये नमस्वार है
॥१६४॥ ह्रस्व-मुक्त केशो वाले-सेनानी-रोहित के लिये नमस्वार है ॥१६५||
कवि-राजवृद्ध-तक्षक के खिलौने वाले-गिरिश-पद्धनेत्र-यति-जाम्बव के लिये
नमस्कारहे ॥१६॥
विष्णु वश वर्णन ] [ ३०५ सहस्रवाहवे चंद सहस्रामलचक्षुषे । सहस्रकुक्षये चैव सहस्रवरणाय च ॥१६७ सहस्रशिरसे चैव बहुरूपाय वेधसे । भवाय विश्वरूपाय श्वेताय पुरपाय च ॥१६८ निपङ्गिणे कवचिने सूक्ष्माय क्षपणाय च । ताम्राय चव भीमाय उग्राय च शिवाय च ।।१६६ बभ्रवे च पिशङ्गाय पिङ्गलायारणाय च । महादेवाय शवाय विश्वरूपशिवाय च ॥१७० हिरण्याय च शिष्टाय श्रेष्ठाय मध्यमाय च । पिनाकिने चेपुमते चित्राय रोहिताय च ॥१७१ दुन्दुभ्यायपादाय अाय वृद्धये तथा। मृगव्याधाय साय स्थाणवे भीषणाय च ।।१७२ बहुरूपाय चोग्राय गिनेत्रायेश्वराय च। कपिलायक्वीराय मृत्यवे त्र्यम्बकाय च ।।१७३ वास्तोपते विनाकाय शङ्कराय शिवाय च । पारण्याय गुहस्थाय यतिने ब्रह्मचारिणे ॥१७४ सहस बाहुओं वाले-महस्र निर्मल नेत्रो वाले-सहस्र कुक्षि और महल चरणो वाले के लिये नमस्कार है ।।१६७।। सहन शिर वाले बहुत से रूप वाले वेधा-भव-विश्वरूप-श्वेन और पुरुष के लिये नमस्कार है ॥१६॥ निषङ्गी- क्वची-सूक्ष्म-क्षपण-तान-भीम-उग्र और शिव के लिये नमस्कार है ॥१६६॥ वभ्र-विगह-पिङ्गल-मरण-महादेव-शर्व मोर विश्वरूप शिव के लिये ममस्कार है ॥१७०॥ हिरण्य-शिष्ट श्रेष्ठ-मध्यम-पिनाकी-पुमान्-चित्र और रोहित के लिये नमस्कार है ॥१७॥ दुदुभ्य-एक पाद-प्रहबुद्धि-मृगव्याघ-सर्प- स्थाणु और भीषण के लिये नमस्कार है ॥१७२।। बहुरूप-उप्र-त्रिनेत्र-ईश्वर-- कपिल-एकवीर-मृत्यु और त्र्यम्बक के लिये नमस्कार है ॥१७३।। वास्तोपपति- विनाक-राकर-शिव-पारण्य-गुहा मे स्थित रहने वाले पति और ब्रह्मचारी के लिये नमस्कार है ॥१७४।।
[ वायु पुगए साङ्खयाय चव योगाय ध्यानिने दीक्षिताय च । अन्तर्हिताय शर्वाय मान्याय मालिने तथा ॥१७५ बुद्धाय चैव शुद्धाय मुक्तये केवलाय च । रोधमे चेकितानाय वह्मिष्ठाय महर्पये ॥१७६ चतुष्पादाय मेध्याय धमिणे शीघ्रगाय च । शिवण्डिने कपालाय दष्ट्रिणे विश्वमेधसे ।।१७७ अप्रतीघाताय दीप्ताय भास्कराय सुमेधसे । क्रू राय विकृतायैव बीभत्साय शिवाय च ॥१७८ मौम्याय चैव पुण्याय धार्मिकाय शुभाय च । अवघ्याय मृताङ्गाय नित्याय शाश्वताय च ॥१७६ साद्याय शरभायैव शूलिने च विचक्षुषे । सोमपायाज्यपायव धूमपायोमपाय च ॥१८० शुचये रेरिहाणाय सद्योजाताय मृत्यवे । पिशिताशाय खर्वाय मेधाय वैद्य ताय च ॥१८१ व्याश्रिताय श्रविष्ठाय भारतायान्तरिक्षये । क्षमाय सहमानाय सत्याय तपनाय च ॥१८२ त्रिपुरघ्नाय दीप्ताय चक्राय रोमशाय च । तिग्मायुधाय मेघ्याय सिद्धाय च पुलस्तये ।।१८३ साख्य-योग-ध्यानी-दीक्षित-अन्तहित-शब-मान्य तथा मासी के लिये नमस्कार है ॥१७॥ बुद्ध-शुद्ध-मुक्ति-केवल-रोधा-चेकितान-बहिष्ठ पोर महपि के लिये नमस्कार है ।।१७६॥ चतुष्पाद-मध्य-धर्मी-दीन गमन करने वाले-शिखएडी-पाल-दष्ट्री और विश्वमेधा के लिये ममस्कार है ॥१७७॥ भप्रतीधात-दीस-भास्कर-सुमेधा-करविकृत-वीभत्स और शिवके लिये नमस्कार है ॥१७॥ सौम्य पुण्य धार्मिक-शुभ-अवध्य-भूनाग-नित्य और शाश्वत के लिये नमस्कार है ॥१७६|| साद्य-शरभ-शूली-सीन नेत्रो वाले-सोमशान करने वाले-घृतपान करने वाले-धूमय-ऊष्मप के लिये नमस्कार है ॥१८०॥ शुचि- रेरिहाणा-सद्योजात-मृत्यु-मास या प्रशन करने वाले-खवं-मेघ मौर वंद्य त के [ ३०७ पप्णु वश वर्णन ] लये नमस्कार है ॥१८॥ व्याधित-श्रविष्ठ-भारत-अन्तरिक्षि-क्षम-सहमान- सत्य और तपन के लिये नमस्कार है ॥१२॥ त्रिपुर के नाश करने वाले-दीप्त- वक्र--रोमश-तिग्मायुध वाले-मेध्य--मिद्ध और पुलस्ति के लिये नमस्कार ॥१८३ ॥ रोचमानाय खण्डाय स्फीताय ऋषभाय च । भोगिने पुञ्जमानाय शान्तायैवोद्ध रेतसे ॥१८४ अघघ्नाय मखघ्नाय मृत्यवे यज्ञियाय च । कृशानवे प्रचेताय वह्नये विमलाय च ॥१८५ सिकत्याय प्रसन्नाय वरेण्यायेव चक्षुपे । क्षिप्रगवे सुधन्वाय प्रमेध्याय पिवाय च ॥१८६ रक्षोनाय पशुघ्नाय विघ्नाय शयनाय च । विभ्रान्ताय महन्ताय अन्तये दुर्गमाय च ।।१८७ दक्षाय च जघन्याय लोकानामीश्वराय च। अनामयाय चोर्द्धाय संहत्याधिष्ठिताय च ॥१८८ हिरण्यवाहवे चैव सत्याय शमनाय च । अमिकल्याय माषाय रीरिण्यायकचक्षपे ॥१८६ श्रेष्ठाय वामदेवाय ईशानाय च धीमते । महाकल्पाय दीप्ताय रोदनाय हसाय च ॥१६० वृतधन्वने कवचिने रथिने च वरूथिने। भृगुनायाय शुभाय वह्निरिष्टाय धीमते ॥१९१ अघाय अघशसाय विप्रियाय प्रियाय च । दिग्वास कृत्तिवासाय भगघ्नाय नमोऽस्तु ते ॥१६२ रोचमान-हरड-स्पीत- पभ -भोगी- पुन्जमान--शान्त -- उर्द्ध रेता-- अघो के नाशक-मय वे नाश करने वाले-मृत्यु- यनिय-वृशानु- प्रचेत -वह्नि पौर विशलप के लिये नमस्कार है ॥१८४१८५। मिवत्य- प्रसन्न--बरेय चक्षु- क्षिप्रगु-सुधन्वा-प्रमेध्य-पिव-सोन -पशुप्रो के हनन करने वाले--विघ्न-रायन विभ्रान्त-महन्त अन्ति और दुर्गम के लिये नमस्कार है ॥१६६.१८७॥ दक्ष- ३०८ ] [ वायु पुगण जघन्य-लोको के ईश्वर--अनामय-ऊद और महार का प्रधिधित होने वाले के लिये नमस्कार है ।।१८८॥ हिरण्यबाहु--सत्य-शमन-प्रमिकल्प-माघ--गरिएय- एकचक्षु--श्रेष्ठ-वामदव-ईशान--धीमान्--महाकल्प-नीप्त--गेदन और इसके लिये नमस्कार है ॥१८६-१९०॥ वृतधन्वा-कवच धारण करने वाले-रथी-बर्थ- भृगुनाथ-शुक्र-वह्निरिट और धीमान के लिये नमस्कार है ॥११॥ अप-अप सशाय-विप्रम-प्रिय-दिवासा-वृत्तिवासा-भगन के लिये नमस्कार है ।।१६॥ पशूनां पतये चैव भूताना पतये नमः। प्रणवे ऋग्यजु साम्ने स्वधायै च सुधाय च १६३ वपटकारतमार्गव तुभ्यमन्तात्मने नम । स्रष्ट्र धात्रे तथा हो। हरेंच क्षपणाय च ॥१६४ भूतभव्यभवायेव तुभ्य कालात्मने नम । वमवे चैव साध्याय रुद्रादित्याश्विनाय च ।।१६५ विश्वाय मरुते चंद तुम्यन्देवात्मने नम । अग्निसोमविगिज्याय पशुमन्त्रौपधाय च ॥१६६ दक्षिणावभृथायैव तुम्य यज्ञात्मने नम । तपसे चैव सत्याय त्यागाय च शमाय च ॥१९७ अहिंसायाप्यलोभाय सुवेशायातिशाय च । सर्वभूतात्मभूताय तुभ्य योगात्मने नम ॥१९७ पृथिव्यो चान्तरिक्षाय दिवाय च महाय च । जनस्तपाय सत्याय तुम्य लोकात्मने नम ||१६६ अव्यक्तायाथ महते भतार्यवेन्द्रियाय च । तन्मात्राय महान्ताय तुभ्य तत्त्वात्मने नम ॥२०० नित्याय चालिङ्गाय मूक्ष्माय चेतनाय च । मुद्धाय विभवे चंब तुम्य नित्यात्मने नम ॥२०१ नमस्ते विपु तोकेषु स्वरान्तेषु भवादिपु । सत्यान्तेषु महान्तेषु चतुर्यु च नमोऽस्तु ते ।।२०२ विष्ण माहात्म्य कीर्तन ] [ ३०६ मम स्तोत्रे मया ह्यस्मिन् सदसन्धाहत विभो । मद्भक्त इति ब्रह्मण्य सर्वन्तत् क्षन्तुमर्हसि ॥२०३ पशुप्रो के पति के लिये और भूतो के पति के लिये नमस्कार है । प्रणव- शत-यजु और सामवेद के लिये-स्वघा और सुख के लिये नमस्कार है ॥१६॥ वषट्कार तम के वास्ते और मन्त्रात्मा तुम्हारे लिये नमस्कार है । स्रष्टा-घाता- होता-हर्ता और क्षपण के लिये नमस्कार है ॥१९४॥ भून-भव्य-भव तुम्हारे कालात्मा के लिये नमधार है। वमु-साम्य-रुद्रादित्याश्विन के लिये नमस्कार है ॥१६॥ विश्व-मस्त-देवारमा तुम्हार लिय नमस्कार है। अग्निमोम- ऋस्विक्-इज्य-पशुमन्त्र और प्रौषध के लिये नमस्कार है ॥१६६।। दक्षिणा वभृय-यज्ञात्मा तुम्हारे लिये नमस्कार है । तप-मत्य-त्याग-शम के लिये नमम्बार है ॥१९७॥ अहिंस-प्रलोभ-मुवेश-प्रतिश-सर्व प्राणियों के आत्मभूत-- योगस्वरुप तुम्हारे लिय नमस्कार है ॥१९८) पृथिवी- अन्तरिक्ष-दिव-मह- जनस्नप-मत्य और लोकात्मा के लिय नमस्कार है ||१६|| अव्यक्त-महान्- भूत-इन्द्रिय-तन्मात्र-महान्त तत्वात्मा तुम्हारे लिये नमस्कार है ।।२००। निप्य- मयंलिद-मृदम-चेतन-शुद्ध-विभु और नित्यात्मा तुम्हारे लिये नमस्कार है ॥२०१॥ तीनो लोको मे-स्वरान्तो मे-भवादिम–सत्यान्तो मे और चारो महान्तों में तुम्हारे लिये नमस्वार है । हे विभो । मैंने इस स्तोत्र म जो भी मद् पौर ममत् कहा है ऐसे तुम्हारे निय नमस्कार है। मेरा भक्त है-ऐसा जानकर हे बहराप । वह मय क्षमा करने के पाप योग्य होत हैं ॥२०२-२०३॥ प्रकरण ६०-विष्णु माहात्म्य कीर्तन एवमाराध्य देवेशमीशान नीललोहितम् । ब्रह्मति प्रगतस्तस्मं प्राञ्जलिक्यिमब्रवीत् ।।१ काव्यस्य गाय सस्पृश्य हस्तेन प्रीतिमान् भव । निकामं दर्शन दत्त्वा तवान्तरधीयत ॥२
[ वायु पुराण
ततः सोऽन्तहिने तस्मिन् देवेशानुचरे तदा ।
तिष्ठन्ती प्राञ्जलिर्भूत्वा जयन्तीमिदमब्रवीद ॥३
यस्य त्व सुभगे का वा दु.खिते मयि दुखिता।
महता तपसा युक्त किमयं मान्जुगोपसि ।।४
अनया सतत भत्तया प्रथयेए दमेन च ।
स्नेहेन चैव सुश्रोणि प्रीतोऽस्मि वरणिनि ॥५
किमिच्छसि वरारोहे वस्ते काम. समृध्यताम् ।
त ते सपूरयाम्यद्य यद्यपि स्यात् सुदुर्लभम् ।।६
एवमुक्ताऽब्रवीदेनं तपसा ज्ञातुमर्हसि ।
चिवीपित मे ब्रह्मिहत्व हि वेस्थ यथातथम् ॥७
श्री मूतजी ने कहा-इस प्रकार से देवो के ईश नीललोहित ईशान की
पाराधना परके उसके लिये ब्रह्म इस भावसे प्रगत हुआ था पौर हाप जोमर
बोला ||१|| महादेव ने परम प्रीति युक्त होकर अपने हाथ से शुक्राचार्य के शरीर
का स्पर्थ पिया था और पूर्ण रूप से दर्शन देकर फिर वह वहाँ पर ही पन्तदान
होगये थे ॥२॥ इसके पश्चात् देवेशानुचर उसके मन्तस्ति होजाने पर यह सामने
खडी हुई जयन्ती से प्राञ्जलि होकर यह बोला-॥३॥ हे मुभगे । तू किसी की
है और कौन है प्रथया दुहित होरही है ? महान तपसे युक्त मुझतो तू गि
प्रयोजन के लिये रसा परती है ? ॥४॥ इस तेरी निरन्तर होने वाली भक्ति से--
प्रपय-दमन भौर स्नेह से है मुधोणि ' हे वरवरिणनि ! में बहुत ही प्रसन्न हुआ
हूँ ॥५॥ हे वरारोहे । तू क्या चाहती है और तेरी या काममा बनी हुई है।
में तेरे उम मनोरप को पूर्ण वगा चाहे भले ही वह संसा भी दुसंभ क्यो न
हो ॥६॥ जब इस प्रकार में वह जयन्ती कही गई तो उसने एक से महा पाप
मेरे मनीरप को तोबार से जानने के योग्य होने हैं। हे अमिर माप मेरे
चकीपित को टौर-टी जानते हैं ।।७।।
एवमुक्ताऽब्रवीदेना दृष्ट्वा दिव्येन चक्षुषा ।
माहेन्द्री ल वरारोहे मद्धितार्थ मिहागता ।
विष्णु माहात्म्य कीर्तन ] 1 ३११ मया सह त्व सुश्रोणि दश वर्षाणि भामिनि । अदृश्य सर्वभूतस्तु सप्रयोगमिहेच्छसि ॥ देवेन्द्रानलवर्णाभे वरारोहे सुलोचने । इम वृणीश्व काम ते मत्तो वै वल्गुभापिरिण ॥१० एव भवतु गच्छामो गृहान् वै मत्तकाशिनि । ततः स्वगृहमागम्य जयन्त्या सहित: प्रभु ॥११ स तया सव सद्दव्या दश वर्षाणि भागशः । अदृश्य सर्वभूताना मायया सवृतस्तदा ॥१२ कृतार्थमागत दृष्ट्वा काव्य सर्वे दितेः सुता । अभिजग्मुगृह तस्य मुदितास्ते दिदृक्षव ।।१३ गता यदा न पश्यन्तो जयन्त्या सवृत गुरुम् । दाक्षिण्य तस्य तबुध्वा प्रतिजग्मुर्यथागतम् ॥१४ जब जयन्ती ने इस तरह शुक्र से कहा तो उमने दिव्य चक्षु से देख कर इससे कहा-हे वगरोहे । तू महेन्द्र की पुत्री है और मेरे हितके लिये ही यहाँ पर आई है ।।८।। हे भामिनी । हे सुश्रोणि | तू मेरे साथ जोकि ममस्त प्राणियो से अदृश्य रहगा, दश वर्ष तक सम्प्र योग की इच्छा करती है ॥६॥ हे देवेन्द्र ! प्रनल प्रभो । हे वरारोहे । हे मुन्दर नेत्रो वाली ' हे वल्गुभाषण करने वाली । तब ही तू मुझसे इस कामना को प्राप्त कर ॥१०॥ हे मत्तकाशिनी । ऐमा होवे मवग्रहो को घले । इसके अनन्तर अपने घर मे भाकर प्रभु शुक्र जयन्ती के साथ रहे ॥११॥ फिर वह उस देवी के साथ भागश दश वर्ष तक निवास कर रहे थे और उस समय वह समस्त प्राणियो के मदृश्य तथा माया में सवृत रहते ये ॥१२॥ समस्त दिति के पुत्र देश्य सफल होकर पाये हुए काव्य को देखकर उसके घर में देखने की इच्छा रखते हुए परम प्रसन्न होकर गये थे ।।१३।। वे सद वहाँ गये सो जयन्ती के द्वारा सवृत गुरु को उन्होंने जब नहीं देखा था तो उसके उस दाक्षिण्य को जान कर जैसे ही आये थे वापिस चले गये ॥१४॥ बृहस्पतिस्तु सरद्ध ज्ञात्वा काव्य चकार ह । पियर्थे दस वर्षारिण जयन्त्या हितकाम्यया ॥१५ ३१२ ] [ वायु पुराण बुद्ध्वा तदन्तर सोऽथ दत्यानामिव चोदित । काव्यस्य रूपमास्थाय सोऽसुरान्समभापत ॥१६ तत समागतान् दृष्ट्वा बृहस्पतिरुवाच तात् । स्वागत मम याज्याना सप्राप्तोऽस्मि हिताय च ॥१७ मह वोऽध्यापयिष्यामि प्राप्ता विद्या मया हि सा । ततस्ते दृष्टमनसो विद्यार्थमुपपेदिरे ॥१८ पूर्णकामस्तदा तस्मिन् समये दशवापिके। ययौ च समकाल स सद्योत्पन्नमतिस्तदा ॥१६ समयान्ते देवयानी सद्यो जाता सुता तदा। बुद्धि चक्र ततश्चापि याज्याना प्रत्यवेक्षणे ॥२० वृहस्पति ने तो यह जान लिया था कि हित को कामना व ली जयनी के द्वारा पिता के लिए काव्य को सरुद्ध किया गया है ।।१५। इसके अनतर वह जानकर दैत्यो की भांति प्रेरित होकर काव्य के स्वरूप को धारण कर असुरों से बोला ॥१६॥ फिर आये हुए उनमे वृहस्पति ने कहा-मेरे पाप प्रति यजमानो का स्वागत है। मैं तुम्हारे सबके हित सम्पादन करने के लिये यहाँ आगया हूँ॥१७॥ मैंने जो वहाँ विद्या प्राप्त की है उसे मार लोगो को सबको बताऊँगा। इसके प्रसन्न वित्त वाले वे सब अमुर विद्या ग्रहण करने के लिये उपस्थित हुए ये ॥१८।। उस समय म दश धावि समय मे पूर्ण काम सद्योत्पन्न मति वाला समकाल ही म वहाँ गया था ||१६|| समय के अन्त में तब देवयानी मुना मद्य उत्पन्न हुई गौर इसके पश्चात् याज्यों के प्रत्यवेक्षण करने के कम्य में अपनी बुद्धि की थी ॥२०॥ देवि गच्छामहे द्रष्टु तव याज्यान् शुचिस्मिते। विभ्रान्तप्रेक्षिते साध्वि विवयितलोचने ।।२१ एवमुक्तात्रवीद्देवी भज भक्तानु महानत । एप ब्रह्मन् सता धर्मो न धर्म लोपयामि ते ॥२२ ततो गत्वामुरान् दृष्ट्वा देवाचार्येण धीमता। वश्चितान काव्यरूपेण वेधसाऽमुग्मत्रवीत् ।।२३ विष्णु माहात्य कीर्तन । [ ३१३ काव्य मा तात जानोव एप ह्याङ्गिरसो भुवि । वश्चिता बत यूयं वै मयि शक्त तु दानवाः ।।२४ श्रु त्वा तथा व वारपन्त सम्भ्रान्ता दितिजास्तत । प्रेक्षन्ते स्म ह्य भी तत्र सितासितशुचिस्मितौ ॥२५ सम्प्रमूढा स्थिता. सर्वे प्रापद्यन्त न विञ्चन । ततस्तेषु प्रमूटेषु काव्यस्तान् पुनरववीत् ॥२६ प्राचार्यों वो यह काव्यो देवाचार्योऽयमङ्गिरा. । अनुगच्छन मा सर्वे त्यजतन वृहस्पतिम् ॥२७ श्री शुक्र ने कहा-हे देवि । हे शुचिस्मित वाली! तेरे याज्यो को देखने के लिये अब जाते हैं हे विभ्रान्त प्रेक्षित वाली । हे माबि । हे त्रिवर्णा- यन लोचने हम चलते हैं ॥२१॥ जब इस प्रकार देवी मे पहा गया तो वह बाली हे महावना अपने भक्तो पो देखो। हे ब्रह्मन् । यह मत्पुरुषों का धर्म होता है और में प्रापके धर्म का लोप नहीं करूंगी ॥२२॥ मूतजी ने कहा- इसके पश्चात् शुभचार्य ने जाकर प्रमुगे को देवा जोकि परम धीमान देवो के प्राचार्य बृहस्पति के द्वारा वश्चित किये गये थे और काव्य के स्वरूप को धारण करके यह प्रवञ्चना वी पी । तब वेधा अमुरो से बोले ॥२३॥ हे तात ! मुझे ही ययायं में काव्य समझो यह तो भूमि में अगिरा का पुत्र वृहस्पति है । हे दानयो । माप लोग समयं मेरे रहते हुए वञ्चित किये गये हो ॥२४|| उस तरह से बोलते हुए उनका वचन सुनकर उग ममय मे दिनि के पुत्र मब बहुत ही भालि में पूर्ण होगये थे। तब वे वहाँ उम समय म उन दोनो को जो मिन एव अमित शुविस्मित वाले थे उनको दैत्य देख रहे थे ॥२५॥ वे मद मम्प्रमूड होत हुए स्थित होमय पोर किसी निर्णय पर नहीं प्राप्त हुए । इसके अनन्तर उन प्राष्टकम से मूड हो जाने पर वाध्य ने उनसे पुन वहा ॥२६॥ मापका पाचार्य मैं हूँ और यह प्रङ्गिरा देवाचार्य है । पाप सब मेरा अनुगमन करो भोर इम वृहस्पति का त्याग कर दो ॥२७॥ एवमुक्तामुग सर्वे तावुभौ ममवक्षत। तदाऽमुरा विगेपन्नु न व्यजानंम्तयो यो ।
[ वायु पुराण बृहस्पतिरुवाचतानसम्भ्रान्तोऽयमगिरा। पाव्योऽह यो गुरुदत्या मटू पोऽय वृहस्पति ॥२६ स मोहपति रूपेण मामयेनंप कोमुरा । त्या तस्य ततन्ते व समन्ध्यार्थवचीय पन् ॥३० अयप्नो दश वर्षाणि सतत शास्ति वे प्रभुः । एप वै गुरुरस्मारमन्तरेप्पुरय द्विज ॥३१ ततस्ते दानया सवे परिणपत्याभिवाद्य च । वचन जगृहुम्तस्य चिराभ्यासेन मोहिता ॥३२ कस्तमसुराः सर्वे अदाः सरतलोचनाः। अपड गुरहितेऽम्माक गच्छ त्व नासि नो गुरु ॥३३ भार्गवोऽगिरसो वाय भवत्वेवंप नो गुरु । स्थिता वयं निदेशेऽरय गच्छ त्य साघु मा चिरम् ॥३४ एवमुक्रवासुरा सर्वे प्रापद्यन्त वृहस्पतिम् । यदा न प्रतिपद्यन्ते तेनोक्त तन्मद्धितम् ॥३५ इम तरह से बहे गये सब ममुर उन दोनो को देखने लगे। तब प्रमुगे ने उन दोनो में विशेषता कुछ भी नहीं जानी थी ॥२८।। बृहस्पति ने इन अमुगे से पहा-यह गिरा है और मेरा स्वरूप इमो धारण कर लिया है ऐसा इसे वृहस्पति समझो । हे दैत्यो । जो तुम्हारा गुरु है वह में ही काव्य हूँ ॥२६॥ है मसुरो। यह यह है जो मेरे रूप से प्रापको मोहित कर रहा है। इसके पश्चात् उन्होने श्रवण पर और उसके प्रथं वचन को भली भानि विचार कर वे बोले ॥३०॥ इसने दश वर्ष तक निरन्तर प्रभु ने हमको शिक्षा दी है। इसी हेतु से यही हमारा गुरु है और यह द्विज अन्तरेप्सु है ।।३१। इसके अनन्तर वे समस्त दानव प्रणिपात एव अभिवादन करके चिरकाल से मोहित होते हुए उनके अर्थात् बृहस्पति के वचन को ग्रहण करने लगे थे ॥३२॥ समस्त मसुर लाल नेत्रो वाले पत्य त कुद्ध होते हुए उससे बोले-यह हमारे हित में गुरु है तुम चले जाओ, तुम हमारे गुरु नही हो ।॥३३॥ चाहे भार्गव हो अथवा प्राङ्गिरम हो हमारा यह ही गुरु है । हम इनके ही निदेश मे ही स्थित हैं, तुम जाम्रो श्व
विष्णु माहात्म्य कीर्तन ]
भलाई इमी में है कि अपने चले जाने में विलम्ब मत परो ॥३४॥ इस प्रकार
शुक्र से समस्त प्रमुगे ने कहार वे बृहस्पति को ही प्राप्त हुए थे । वे प्रतिपन्न
नहीं होते हैं जब उमने उनका महान् हित कहा था ।।३।।
चुकोप भार्गवस्तेपामवलेपेन वै तदा।
वोधिता हि मया यस्मान्न मा भजत दानवा ॥३६
तस्मात् प्रनष्ट सज्ञा वै पराभवङ्गमिष्यथ ।
इति व्यादृत्य तान् काव्यो जगामाय यथागतम् ॥३७
ज्ञात्वाऽभिशस्तानसुरान् काव्येन तु बृहस्पतिः ।
कृतार्थः स तदा त्दृष्ट स्वरूप प्रत्यपद्यत ।
बुद्ध्वा मुरास्तदा भ्रष्टान् कृतार्थोऽन्तरघीयत ॥३८
तत प्रनष्ट तस्मिस्ते विभ्रान्ता दानवास्तदा ।
अहो धिगवञ्चिता स्मेह परस्परमथाय वन् ।।३६
पृष्ठतो विमुखाश्च व ताडिता वेधसा वयम् ।
दग्धाश्च ववोपयोगाच्च स्वेस्वे चार्थेषु मायया ।।४०
ततोऽमुग परिवस्ता देवेभ्यस्त्वरिता ययु ।
प्रनादमग्रत वृत्वा काव्यस्यानुगम पुनः॥४१
तब तो भार्गव गर्व से उन पमुगे पर अस्पन्त प्रोधित हुए। मैंने उन्हे
सूत्र गमभाया तो भी दानव मुझो नही भत्रने हैं ॥३६॥ इम काराण मे मना
नष्ट परने वाले निगन्देह वे पराभव को प्राप्त होग। पाव्य में इस तरह ये वचन
उन अगुगे में बहे भौर जंगे ही वह प्राये थे चले गये ॥३७॥ काव्य के दाग
अभिमस्त मसुरो यो वृहस्पति ने बानर अपने पापो परम मफ्न मममते
हुए मत्यन्त प्रसन्न होरर माने है स्वरूप को प्राप्त हुए । तव अमुरो को भ्रष्ट
जानार कृतार्थ हुए पनन होगये थे ॥३८॥ इमरे बाद उमो प्रनष्ट होने पर
उग ममप दाना विधान होगये और वे पापम में पहने लगे कि हम लोगो को
शिर मात्र पनिर होगये है ॥३१॥ पोये मे हम विमुख होगये और वेषा
रे द्वारा हम ताहित हुए है । और पपने-अपने उपरोग से हम अर्यो में माया में
[ वायु पुराण दम होगये हैं ॥४०॥ इसके अननर देवो से परिसस्त असुर प्रह्लाद को माग करके शीघता वाले होर कान्य के अनुगम को पुन गये ।।४१॥ सत. काव्य समासाद्य अभितस्थु रवाइ मुखाः। तानागतान् पुनदृष्ट्वा काव्यो याज्यानुवाच ह ।४२ मयापि वोधिता काले यतो मानाभिनन्दय । ततस्तेनावलेपेन गता यूय पराभवम् ।।४३ प्रहलादस्तमपोवाच मान व त्यज भार्गव । स्वान् याज्यान् भजमानाश्च भक्ताश्च व विशेपत ॥४४ त्वया पृष्टा वय तेन देवाचार्येण मोहिता । भक्तानहसि नस्त्रातु ज्ञात्वा दीर्पण चक्षुपा ११४५ यदि नस्त्व न कुरुपे प्रसाद भृगुनन्दन । अपध्यानास्त्वया पद्य प्रवेक्ष्यामो रसातलम् ।।४६ ज्ञात्वा काव्यो यथातत्व कारुण्येनानुकम्पया। एवमुक्तोऽनुनीत. स स्तुत वोप न्ययच्छत ।।१७ उवाचेदन भेतव्यं न गन्तव्य रसातलम् । अवश्यम्भावी ह्यर्थोऽय प्राप्ती वो मयि जम्नति ४८ इभरे अनन्तर वाव्य के समीप म जाकर नीचे की ओर मुख वाले होते हुए बैठ गये। उन याज्यो को फिर आये हुए देखकर काव्य उनस बोले ।।४।। मेरे द्वारा भली भांति समझाये हुए भी नुम लोगो ने समय पर जिस कारण से अभिनन्दन नहीं किया था उमी हेतु के फल से तुम अभिमान के वश होकर परा भव को प्राप्त हुए हो ॥४३॥ इसके उपरान्त प्रह्लाद ने उनसे कहा-हे भागव । पाए मन मान को परित्याग कर दीजिएगा और अपन याज्यो को जो यजमान हैं और विशेष रूप से भक्त है अङ्गीकार कीजिएगा ।।४४।। पापन जब पूछा था उस समय हम उस देवाचार्य वृहस्पति के द्वारा मोहित होगये थे। प्रब दूर की लम्बी दृष्टि से सभी बात जानना हम भत्ता की रक्षा करने के माप योग्य होते हैं ॥४५॥ हे भृगु नन्दन । यदि माप हमारे ऊपर प्रसन्न नही होने हैं ता हम मन मापके द्वारा प्रष ध्यान हाते हुए माज ही रसातल म प्रवेश कर जायगे ॥४॥ - विप्णु माहात्म्य कीर्तन ] मूतजी ने कहा- का य ने यथा तत्व को सब कुछ जानकर करुणा और कृपा से इस तरह कहे जाने पर बहुत अनुनय किया हुअा होकर तथा स्तुत होते हुए उसने जो असुरो पर बडा भारी क्रोध हो रहा था उसको त्याग दिया ।।४७॥ और वह यह बोला-इरा मत और रमातल को भी नहीं जाना चाहिए । मेरे जाग्रत रहते हुए भी यह कुछ अवश्यभावी अर्थ ही था जोकि आप लोगो को प्राप्त होगया है ॥४८॥ न शक्यमन्यथा तु दिष्ट हि बलवतरम् । सज्ञा प्रनटा या बोध काम ताप्रनिलप्स्यथ ।।४६ प्राप्त पर्यायकालो व इति ब्रह्माऽभ्यमापत । मत्प्रसादाच युष्माभिभुक्त लोक्यमूज्जितम् ॥५.० युगाख्यो दश मपूर्णो देवानाम्य मूर्धनि । तावन्तमेव काल दे ब्रह्मा राज्यमभापत ५१ सावणिके पुनस्तुभ्य राज्य किल भविष्यति । लोकानामोश्वरो भावी पौत्रस्तव पुनलि ॥५२ एव किलमह प्रोक्त पौत्रस्ते ब्रह्मणा स्वयम् । तथाहतेषु लोकेषु तपोऽम्य न किलाभवत् ।।५३ यस्मात् प्रवृत्तयश्वास्य न कामानभिसन्धिता । तस्मादजेन प्रीतेन दत्त सावणिकेऽन्तरे ।।५४ देवराज्य बले व्यमिति मामीश्वरोजवीत् । तस्माददृश्यो भूताना कालाकाक्षी स तिष्टति १५५ प्रीतेन चामरत्व वैदत तुम्य स्वयम्भुवा। सम्मानिरुत्सूरस्त्व व पर्याय मह माकुल ५६ सब अन्यथा नही किया जा सकता है क्योकि भाग्य सबसे अधिक वन. वान होता है । भाग जो आप लोगो की मना प्रनष्ट हुई उनको फिर कामना पूर्वक प्राप्त करलोगे ॥४॥ प्रापका पर्याप्त कास प्राप्त होगया है-पह ब्रह्मा पहा-और मेरे प्रसाद में इस अजित प्रेतोश्य का पाप लोगो ने भोग क्यिा है ॥५०॥ देवो को प्राकान्त करके उनके मूर्दा पर सम्पूर्ण दश युगाख्य होगया ३१८ ] [ वायु पुगण है। उतने ही काल तक ब्रह्मा ने राज्य बोला था ॥५१॥ साणिक मनु के समय में फिर तेरे लिये राज्य होगा। तुम्हारा पौत्र वलि फिर लाको का ईश्वर होने वाला होगा। ५२॥ ब्रह्मा के द्वारा स्वय तेरा पौत्र इस तरह से मुझे कहा गया है। तथा माहरण किये गये लोको म इसका तप निश्चय ही नहीं हुआ था ॥५३॥ जिस कारण से इसकी प्रवृत्तियां कामो को अभिमन्वित नहीं थी इससे प्रसन्न होने वाले प्रज ने सावणिक मन्तर मे दिया है ॥५४॥ ईश्वर ने मुझमे कहा है कि बलि का देवराज्य होगा। इससे भूनो को अदृश्य वह काल की भाकाडक्षा रखने वाला स्थित है ॥५५॥ रवयम्भू ने परम प्रसन्न होकर तेरे लिये अमरत्व को प्रदान किया है इगलिये निरुत्सुक तू पर्याय को सहन कर और बेचैन मत हो ॥५६॥ न च शक्य मया तुभ्य पुरस्ताद विसर्पितुम् । ब्रह्मणा प्रतिपिद्धोऽस्मि भविष्य जानता प्रभो ॥५७ इमौ च शिष्यो द्वौ मह्य तुल्यावेतौ बृहस्पते । दैवते सह सरब्धान् सर्वान् वो धारयिष्यतः ॥५८ एवमुक्तास्तु देतेया काव्येनाक्लिष्टकर्मणा ततस्ताम्या ययु साद्ध प्रह्लादप्रमुखास्तदा ।।५६ अवश्यम्भावमर्थत्व श्रुत्वा शुक्राच्च दानवाः। सकृदाशसमानास्ते जय काव्येन भाषितम् ॥६० दमिता सायुधा सर्वे ततो देवान् समाह्वयन् । अथ देवासुरान् दृष्ट्वा सग्रामे समुपस्थितान् ।।६१ तत सवृत्तसन्नाहा देवास्तान समयोधयन् । देवासुरे ततस्तस्मिन् वर्तमाने शत समा । अजयन्नसुरा देवान् भग्ना देवा अमन्त्रयन् ।।६२ पण्डामाक्प्रभाव न जानीमस्त्व सुरैर्वयम् । तस्माद्यज्ञ समुद्दिश्य कार्य चात्महितञ्च यत् ॥६३ तज्ज्ञानादृतावेतो कृत्वा जेध्यामहेऽसुरान् । प्रथोपामन्त्रयन् देवा पण्डामाकों तु तावुभौ ॥६४ गु माहात्म्य कीनन ] [ ३१६ - मुझमे नेरे लिये पहिले विमर्पण नहीं किया जा सस्ता है ब्रह्मा के द्वारा मैं प्रनिषिद्ध किया हुअा हू हे प्रभो । क्योकि ब्रह्माजी समस्त भविष्य मे होने वाली बातों को जानते हैं ॥५७॥ वे दो शिष्य मेरे लिये बृहस्पति के तुल्य हैं देवों के साथ मरन्ध आप सबको धारण करेंगे ॥५८॥ प्रक्लिष्ट धर्मा पाव्य के द्वारा इस तरह कहे गये दिति के पुत्र उम ममय वे मव जिनमे प्रहलाद प्रमुग थे उन दोनों के माय उम ममय चले गये थे ॥५६॥ दानवो ने शुक्राचार्य गुरु रो अवश्यम्भाय अर्थत्व को मुनकर काव्य के द्वारा भापित जय को एक्वार कहते हुए पा रहे थे ॥६०॥ दशित और आयुधो से मुमन्त्रित उन्होने देवो का समाहा दिया। इसके पश्चात् सग्राम भूमि मे उपस्थित असुरों को देखकर मवृत्त समाद देवगण ने उनसे वहाँ आवर युद्ध किया था। उम देवासुर संग्राम में जो लगा. तार मौ वर्ष ता चरता रहा था प्रमुगे ने देवो को जीत लिया था और भग्न हुए देवो ने विचार किया था ॥६१-६२।। देवो न वहा-हम असुरो के द्वारा पएहायक का जो प्रभाव है उसे नही जानते है इमसे यज्ञ वा उद्देश्य परी भोर जो मात्महित हो उमे ही करना चाहिए ॥६३॥ मो इन दोनों को माना- हन पर मगुरो वो जीत लगे। इसके उपरात दवगण ने उन दोनो पण्डामावों पो उपामन्वित दिया था ॥६४॥ यज्ञे समाह्वयिष्यामस्त्यजतममुरान् द्विजो । ग्रह त वा ग्रहोप्यामो ह्यनुजित्य तु दानवान् ॥६५ एव तत्यजतुम्ती तु पण्डामाकों तदासुगन् । तनो देवा जय प्राप्ता दानवाश्च पराभवम् ॥६६ देवासुरान् पराभाव्य पण्डामावुपागमन् । काव्यगापाभिभूताश्च ह्यनाधाराश्च ते पुन ।।६७ वध्यमानास्नदा देवविविशुस्ते रमातलम् । एव निरुद्यमाम्ते व वृता दाकण दानवा । ततःप्रभृति शापेन भृगुनैमित्तिवेन च ॥६८ ज यतुं धम्मव्ययम्थानमधर्मस्य च नागनम् ॥६६ पुन पुनविषाणुर्या च मिथिले प्रभु ।
३२० ] [ वायु पुराण प्रह्लादस्य निदेशे तु येऽमुरा न व्यवस्थिता.। मनुष्यवध्यास्तान् सर्वान् ब्रह्मा व्याहारयत् प्रभुः ॥७० धनिारायणस्तस्मात् सम्भूतवाक्ष पेऽन्तरे । यज्ञ प्रवर्तयामास चत्ये वैवस्वतेऽन्तरे ।।७१ है द्विजो हम आप दोनो को यज्ञ में बुलायेंगे अत असुरो को छोड दो। अथवा जम ग्रह को दानवो को जीत कर ग्रहण कर लेंगे ॥६५॥ इस तरह से उम समय मे उन दोनो पण्डामाकं ब्राह्मणो ने अमुरो को त्याग दिया था। इसके पश्चात् देवता जप को प्राप्त होगये और दानव सब पराभूत होगये थे ।।६६।। देवासुरो को पराभूत कराके पण्डामा मागये थे किन्तु वे काव्य के शाप से अभिभून और फिर वे निराधार होगये थे ॥६७॥ तब उम समय में देवगणो के द्वारा वध्यमान होते हुए वे असुर रसातल में प्रवेश करने लगे थे। इस तरह से उद्यमहीन उन अमुरो के समूह इन्द्र के द्वारा बेकार कर दिये गये थे । तब से लेकर वे भृगु निमित्तक शाप से पूर्ण प्रभावित होगये थे ।।८।। भगवान विष्णु ने बार बार यज्ञो के शिथिल हो जाने पर धर्म की व्यवस्था करने के लिए तथा अधर्म का समूलोन्मूलन करने के लिये जन्म ग्रहण किया था ॥६६॥ जो असुर प्रहलाद के निदेश मे स्थित नही रहे थे उन सबको प्रभु ब्रह्मा ने मनुष्यों के द्वारा वध्य करने के योग्य बताया था ७०॥ चाक्षुप पनर मे धर्म से नारायण सम्भूत हुए थे और वैवस्वत मन्तर मे चैत्य में उन्होंने यज्ञ को प्रवृत्त कराया था ॥७॥ प्रादुर्भाव तदान्यस्य ब्रह्म वासीत् पुरोहित । चतुर्यान्तु युगाख्यायामापन प्वमुरेवथ ॥७२ सम्भूत स समुद्रान्तहिरण्यकशिपोर्वधे । द्वितीयो नरसिंहोऽभूद्रद्र सुरपुरस्सर ।।७३ वलिसस्थेषु लोवेषु त्रेताया सप्तमे युगे। दैत्यस्त्रलोक्य अाक्रान्ते तृतीयो वामनोऽभवत् ।।७४ सक्षिप्यात्मानमङ्ग पु बृहस्पतिपुररसरम् ।
वगु माहात्म्य पीतंन ] । ३२१ यजमानन्तु दैत्येन्द्रमदित्याः कुलनन्दन । द्विजो भूत्वा शुभे काले बलि वरोचनम्पुरा ।।७५ लोक्यस्य भवान् राजा त्वयि सन्दं प्रतिष्टितम् । दातुमर्हसि मे राजन् विक्रमास्त्रीनिति प्रभु ७६ ददामीरयेव त राजा बलिवैरोचनौऽप्रवीत् । वामनन्त च विज्ञाय ततोऽनुमुदितः स्वयम् ।।३७ रा वामनो दिव ख च पृथिवी च द्विजोत्तमा । बिभि क्रमविश्वमिद जगदानामत प्रभु ॥७८ प्रत्यरिच्यत भूतात्मा भास्कर स्वेन तेजसा । प्रकाशयन् दिग सा प्रदिशश्च महायमा INSE इमरे उपरान्त चतुर्थी युगामा म प्रयुगे मारन हान पर उस समय अन्य के प्रादुर्भाव होने पर ब्रह्मा ही पुरोहित हुए थे ॥७२॥ हिरएपशिपु के वह समुद्र के मध्य मे मम्भून हुए थे । द्वितीय मुर पुरम्मर द्रनसिंह हुआ पा ॥७३॥ मतम युग में प्रेता म सोको के बनियम्य होन पर देन्यो के द्वारा तीना लोगों को भाक्रान्त कर लेने पर तृतीय वामन के प में प्रवतीर्ण हुए पे 11901 वृहस्पति के पुरस्मर भया में मरने मारा मक्षिप्त पर अदिनि के कुन नन्दन न देयो के स्वामी यलि यो यजमान बनाया था। स्वय व द्विज होकर शुभ समय पहिल वैशेवन पति के पास पहुंचे थे । ७।। पौर राजा बलि में वामन देव ने जवाह्मण के स्वरूप मजार कहा-पाप तीनो सारा के राजा है । आपम सभी कुछ प्रतिष्ठित है प्रर्थान् मापत्रे पाम मभी कुए है। ह राजन् ! प्रभु मा मुझे तीन पंह भूमि को दान देन व योग्य होते हैं ॥६॥ उस समय में देरोवन राजा तिने उनसे यह वरन पहा-हाँ में पाएगे सोन पर भूमि दान देता हूँ। और उम मायण का वामन (बौना) जानकर पप अनुमुदित हुपा या ॥७॥ हे शिवगणो । उम वामन देव न दिव-प्रावास मोर पक्षियों को तीन ही पैडो में प्रभु न इम विच ममस्त जगन् पो मात्राल पर लिया था 1361 उम भूनों में आरमा ने भएन नत्र म भाषर को भी वष में
[ वायु पुराण
शक्योऽसौ मधुसूदन
--
और विश्वामित्र को पुरस्मर रखने वाला या प्रातार था 18 ॥ चौबीसवे
प्रेतायुग में पुरोहित वयिष्ठ के द्वारा श्रीराम हुए थे। यह दारय महाराज के
पुत्र श्री राधव रावण के लिये अर्थात् दशग्रीव के वध करने के लिये माता
अवतार हुमा या ।।१॥ अट्ठाईशवे युग मे द्वापर में पराशर से विष्णु का
पाठवा अवतार हुआ या । इसके पश्चात् जातकणं पुरस्मर थी वेश धाम ने
जन्म ग्रहण किया था 18!उसी प्रकार से नवम कश्यप ऋषि का पुत्र अदिति
से विष्णु का अवतार हुमा या ॥६६||
अप्रमेयो नियोज्यश्च यत्र कामचरोदशी।
कीडते भगवाल्लोके बाल क्रीडनकैरिव ९४
न प्रमातु महाबाहुः
पर परममेतस्माद्विश्वरूपान्न विद्यते ॥६५
अष्टाविंशतिम तवापरस्याशसक्षये।
नष्ट धर्म तदा जज्ञे विपणुवृष्णिकुले प्रभुः ।।६६
क्नु धर्मव्यवस्यानमसुराणा प्रणाशनम् ।
मोहयन् सर्वभूतानि योगात्मा योगमायया ॥६७
प्रविष्टो मानुपी योनि प्रच्छन्नचरते महीम् ।
विहारार्थ मनुष्येपु मान्दीपनिपुर सरम् ।।६८
यन कमञ्च शारवञ्च द्विविदञ्च महासुरम् ।
अरिष्ट वृषभचव पूतना केशिन यम् IIRE
नाग कुवलयापीड मल्लराजगृहाधिपम् ।
दत्यान् मानुपदेहस्थान् भूदयामास वोर्यगन् ॥१००
पमुदेव से देवको मे ब्रह्म मोर गार्य को पुरस्सर रखने वाला पतार
हुमाया जो मप्रमेय पर्थात् बुद्धि में न माने में योग्य मोर नियोग्य पा 1 जिम
अवतार में कामरर यशो भगवान वाल स्वरूप में स्थित होते हुए मोर मोरन
को अर्थात सिनोनो मे कोडा क्यिा करते हैं । यह महावाहू यधुसूदन
भगवान प्रमा का विषय नही हो माना है। इस विश्वस्य से परम पर कोई भी
नहीं है ।।६५ प्रछाईमा उम द्वापर युग के पक्ष के मक्षर के समर मे धर्म रे
विषणु माहात्म्य कीर्तन
[ ३२५
।
नष्ट हो जाने पर उस समय म प्रभु विष्णु ने वृष्णियो के कुल में अपने जन्म को
ग्रहण किया था ॥६६॥ भगवान् विम्य ने विनष्ट धर्म को सस्थापित करने की
व्यवस्था करने के लिये और महान् दुष्ट असुरा वा नाग परने के हेतु योगारमा
ने अपनी योग माया से समस्त प्राणियो को मोहित करते हुए इस मानुपी योनि
में प्रवेश किया था और वह प्रच्छन्न होते हुए ही भूमण्डल में विचरण करते
हैं। मान्दीपनि के पुरस्मर मनुष्यो में विहार करने के लिय ही उनने जन्म
लिया था '१६७ ६८। जहां पर कस-शाल्व-द्विविद महासुर-अरिष्ट-वृषभ--
पूतना-हयकेशी-कुवलयापीड हाथी मालराजगृहाधिप इन सब मानुप देह में
स्थित देत्या को वीर्यवान् न निहत किया था ॥६९-१०॥
छिन बाहुसहरञ्च वाणस्याद्भुतकर्मण ।
नरकच हत सङ्खम यवनश्च महावल ॥१०१
रहतानि च महीपाना सर्वरत्नानि तेजसा ।
दुराचाराश्च निहता पार्थिवा ये रमातले ॥१०२
एते लोकहितार्थाय प्रादुर्भावा महात्मने ।
अस्मिन्ने व युगे क्षीगे सन्ध्यादिलेप्टे भविष्यति ॥१०३
कल्कि वि॰णुयशा नाम पाराशर्य प्रतापवान् ।
दशमो भाव्यसम्भृतो याज्ञवल्क्यपुर सर ||१०४
अनुकर्पन सर्वसेना इस्त्यश्वरथसहकुलाम् ।
प्रगृहीतायुधविप्रेत रातसहस्रशः ।।१०५
नात्यर्थं धार्मिका ये च ये च धर्मद्विप क्वचित् ।
उदीच्यान्मध्यदेशाश्च तथा विन्ध्यापरान्तिकान् ।।१०६
तथय दाक्षिणात्यान द्रविडान् सिंहल सह ।
गान्धारान् पारदाश्च व पहलवान् यवनाञ्छान् ॥१०७
तुपारान् बर्वराश्वं व पुलिन्दान् दरदान खसान् ।
लम्पाकानन्धकान् रुद्रान् वि राजाश्च व स प्रभु Mor
प्रवृत्तचको बलवान् म्लेच्छानामन्तवली।
अदृश्य सर्वभूताना पृथिवी विचरिष्यति ।।१०६
३२६ ] [ वायु पुराण अत्यन्त अद्भुत कर्म करने वाले वाण के सहस्र वाहुआ का छेदन किया था और युद्ध भूमि म नरकासुर का वध कर दिया था तथा महान् बलगन यवन का हनन किया था ॥१०१।। अपने तेज से महीपालो के समस्त रत्नो का हरण कर लिया था। जो रसातल म दुष्ट प्राचार वाले राजा थे वे सब मार डाले थे ॥१०२॥ महान् पात्मा बान विष्णु भगवान के समस्त प्रादुर्भाव लोको के हित-सम्पादन के हुए थे । विष्णु का यह अवतार इस ही युग मे सन्ध्या से श्लिष्ट एव क्षीण हो जाने पर होगा ॥१०॥ विष्णुयश नाम वाला प्रतापवाला पाराशर्य कल्कि दशम याज्ञवल्क्य पुरस्सर असम्भूत है जोकि भविष्य म हाने वाला है ।।१०३।। आयुध ग्रहण करने वाले सहस्रो की संख्या म ब्राह्मणो स युक्त अर्थात् घिरे हुए कलिक न हावी-प्रश्व और रयो से सकुल समस्त सेना को मनु कर्पित कर दिया था ॥१०५।। जो राजा अत्यन्त धार्मिक नही थे और वो रही धर्म मे द्वेप करन वाल लाग थे । उत्तर दिशा में होने वाले-मध्य देश के रहने वाले तथा जो विन्ध्यापतिक थे और उसी प्रकार से दाक्षिणात्य एव मिहलों के साथ द्रविड थे गान्धार-पारद-पह्नव-यवन-शक-तुपार-बबर-पुलिद-- दरद खम-लम्पक-अन्धक-रुद्र और किरात इन सबसे उस प्रभु ने ध्वस्त करने के लिये जो चक्र को चलाने वाले-महादल वाल-वली प्रौर म्लेच्छो बत करने वाले थे, समस्त प्राणियो के द्वारा न देखन योग्य होते हुए पृथिवी पर विचरण करेंगे ॥१०६ मे १०६॥ मानव स तु सजज्ञे देवम्याशेन घामत । पूर्वजन्मनि विष्णुर्य प्रमिति म वीर्यवान् ।।११० गाए वे चान्द्रमम पूर्ण कलियुगेऽभवत् । इत्येतारतम्य देवस्य दश सम्भूतय स्मृता ॥१११ त त कालञ्च कार्यश्च तत्तद्दिश्य कारणम् । प्रशेन त्रिपु लोकेषु तास्ता योनी प्रपत्स्यते ।।११२ पञ्चविंशोयिते वल्पे पञ्चविंशति वै समा । विनिघ्नन् सर्वभूताति मानुपानेव सम्बंग ।।११३
विगु माहागर गीतंन ।
वृत्वा वीजायगेपानु मही करेण व मंगा।
मगातापत्वा वृपलान् प्रायगनानधामियान् ।।११४
तन. मयं तदा वविधरितार्थ. गर्म निर.।
मंगा निहता ये तु सिद्धान्ते तु पुन म्वयम् ११५
अपस्मान गुपितान्योन्य भविष्यन्ति र महिनाः ।
शायित्वा तु तान सर्यान् भाविनायन नोदिनान् ।।११६
गद्गायमुनयोमध्ये निष्ठा प्रापयति मानुगः।
सनी व्यतीते पन्यो त गामान्यं सह गनिमः १११७
नृपेयय विनष्टेषु मदा प्रमहा प्रजा ।
रक्षणे यिनितं तु हत्या चान्योन्यमाहवे ॥११%
-३२८ ]
[ वायु पुराण
परस्पररहतारवासा निरानन्दा. मृदु.विता.।
पुरागिण हित्वा ग्रामाश्च तुल्यास्ता निपरिग्रहा ।।११६
प्रनष्टय तिधर्माश्च नष्टधर्माश्रमास्तथा ।
हस्वा अल्पायुपश्च व वनीक्स इमे स्मृताः ॥१२०
सरित्पवंतसेविन्यः पत्रमूलफलाशनाः ।
चीर पयाजिनधरा. सदर घौरमास्थिता ।।१२१
अल्पायुषणे नष्टवात्ता बहुवायाः सुदु खिताः।
एव धमनुप्राप्ताः पिसन्ध्यशके तदा ॥१२२
प्रजा. क्षय प्रयास्यन्ति साद्धं कलियुगेन तु ।
क्षोरणे कलियुगे तस्मिन् प्रवृत्ते च कृते पुन ॥१२३
प्रपत्स्यन्ते यथान्याय स्वभावादेव नान्यथा ।
इत्येतद कौतित सर्व देवासुरविचेष्टितम् ।।१२१
यदुवंशप्रसङ्गन महतो वैएव यश ।
तुवमोस्तु प्रवक्ष्यामि पूरोद्ह्योरनोस्तथा ॥१२५
परस्पर मे रहताश्वास-निगनन्द मर्यात् निरन्तर रदन करने वाले और
परम दुसित लोग नगगे वो मोर ग्रामो को त्याग करके सव समान निप्परिग्रह
हो जायगे ।।११९|| सब लोग ऐसे हो जायगे जिनका निधर्म नष्ट होगया है
पौर प्राथम धर्म नष्ट हो जाने वाले हैं-३द में बहुत ही छोटे-अल्प प्रायु वाले
एकतरह जगली जीवा की भांति ये कहे गये हैं ) १२० ॥ नदी और
पर्वती पर रहने वाले-पत्ते-मूल और पनो को भक्षण करने वाले चोर पत्र
तथा चर्म को धारण करने वाले और पदम घोर सङ्कर अवस्था में प्रास्थित
हो जायगे ।।१२१॥ बहत ही थोड़ी उम्र वाले नष्ट वार्ता वाले बहुत
बाधामो
से युक्त-मत्यन्त दुखित होते हुए उम समय में कलियुग को सन्धि के प्रश में
सब लोग कष्ट को प्राप्त होने वाले होगे ।।१२२।। इस घोर कलियुग के साथ ही
समस्त प्रजा क्षय को प्राप्त हो जायगी । उस कलियुग के क्षीण होजाने पर पौर
पुत्र कृत युग की प्रवृत्ति होती है ॥१२३) जब कृत युग प्रवृत्त होगा तो फिर
न्याय के अनुसार स्वभाव से ही गव टीक होजाय और कोई भी प्रन्यथा नही
अनुगङ्गपाद समाप्ति ] रहेगा। यह समस्त देवासुर विचेष्टित का वर्णन कर दिया है ॥१२४॥ अब मैं पदुवग के प्रमङ्ग से मार लोगों से महान् वैष्णव यश तुर्वसु-पूर द्रापौर मनु का या वर्णन करूगा ॥१२॥ प्रकरण ६१-अनुषंगपाद समाप्ति तुर्वसांस्तु सुतो वह्निवहोभानुरात्मजः । गोभानोस्तु सुतो वीरस्त्रिसानुरपराजित ॥१ करन्धमस्त्रिसानोस्तु मरुत्तस्तस्य चात्मजः । अन्यस्त्ववीक्षितो राजा मरुत कथितः पुरा ॥२ अनपत्यो मरुत्तस्तु स राजासीदिति श्रुतम् । दुष्कृत पौरव चापि सर्वे पुत्रमकल्पयन् ॥३ एव ययातिगापेन जराया मक्रमेण तु । तुर्वसो पौरव वश प्रविवेश पुरा क्लि ।।४ दुष्कृतस्य तु दायादः पाख्यो नाम पार्थिव । दारुथातु जनापोडश्चत्वारस्तस्य चात्मजा ।।५ पाण्ड्यश्च केरलचं व चोल वुल्यस्तथंव च । तेपा जनपदा पुल्या पायाचोला सकेरला ॥६ दयोन्तु तनयो वीरो बभ्र : सेतुश्च विथ तो । भरद्ध मेपुषस्तु पाभवो रिपुरुच्यते ।।७ यौवनाश्वेन समिति पृच्छण निहतो बली। युद्ध सुमहदासोतु मामान् परि चतुर्दश । थी मूतजी ने कहा-सुर्वमुपा पुत्र यहि पा मोर हिमापारमय पोभानु हमा पारि गोभानु पुत्र अपराधिस तथा बोर त्रिभानु नाम बाला उत्सम हुमा पा ||१॥ विगानु वा पुत्र परन्थम हुमा मौर उसका पुत्र मस्त नामा लापन हुमा । पहिले मरस रामा भन्यायाधिन कहा गया था ।।२।।
३३० ]
[ वायु पुराण
ब
वह मरुत्त राजा सन्तान हीन था- ऐसा सुना गया है । दुष्कृत और पौरव ने
भी सबने पुत्र को कल्पित किया था ॥३॥ इस प्रकार से ययाति के शाप से
जरा के सक्रमण से तुर्वसु से पौरव वश मे पहिले प्रवेश किया था ॥४॥ दुप्पत
का दायाद अर्थात् पुत्र शस्थ नाम वाला राजा हुआ और शस्थ से जनापोड
हुमा । उसके चार पुत्र हुए थे ॥शा पारड्य-केरल-चाल और कुल्य
ये उन
चारो के नाम थे। उनके जनपद भी कुल्प-पाएङ्या-चोल और सकेरल इन्हीं
नामो से हुए थे ॥६।। द्रुह्य के दो वीर पुत्र हुए थे जो मोर सेतु इन नामों
से प्रसिद्ध थे। सेतु का पुन अरद्ध था और वभ्र, का रिपु इस नाम से कहा
जाता है ।।७॥ यौवनाश्व के द्वारा समिति कठिनाई से वली सिहत हुअा था और
चौदह मास तक बहुत बडा युद्ध हुया था ।।८।।
अरुद्धस्य तु दायादो गान्धारो नाम पार्थिव ।
ख्यायते यस्य नाम्ना तु गान्धारविपयो महान् ॥६
गान्धारदेशजाश्चापि तुरगा वाजिना वरा ।
गान्धारपुनो धर्मस्तु घृतस्तस्य मुताऽभवत् ।।१०
घृतस्य दुर्दमो जज्ञे प्रचेतास्तस्य चात्मज.।
प्रचेतस पुत्रशत राजान. सर्व एव ते ।।११
म्लेच्छराष्ट्राधिपा. सर्वे ह्य दीची दिशमाश्रिता ।
अनो पुत्रा महात्मानस्त्रय. परमधाम्मिका. ॥१२
सभानरश्व पक्षश्व परपक्षस्तथैव च।
सभानरस्य पुषस्तु विद्वान् कालानलो नृप ॥१३
कालानलस्य धर्मात्मा मृञ्जयो नाम धार्मिक.।
सृञ्जयस्याभवत् पुयो वीरो राजा पुरजय ॥१४
जनमेजयो महा सत्व पुरज्जयसूताऽभवत् ।
जनमेजयम्य राजमहासालोऽभवन्नृपः ॥१५
पासीदिन्द्रसमो राजा प्रतिष्ठितयशा दिवि ।
महामनाः सुतस्तस्य महासालस्य धार्मिक. ॥१६
[ ३३१ अनुराङ्गपाद समाप्ति ] माद का दायाद गान्धार नाम वाला नृप हुमा था। जिसके नाम में एरवहन यहा देश प्रसिद्ध है । । गान्धार देश में उत्पन्न होने वाले पोडो में परम धेट तुरग होते हैं । गान्धार या पुत्र घाम या मोर उसका मुन घृन नामक हुधा था ॥१०॥ धृतरे दुर्दम ने जन्म लिया मोर दुर्दम ने जन्म लिया और दुम पा पुत्र प्रचेता हुमा । प्रचेता रे एक सौ पुत्र हुए थे भौर वे सभी राजा हुए थे ॥११॥ ये गय म्लेच्छ राष्ट्रो रे स्वामी हुए थे और उनने उत्तर दिया का पाश्रय रिया था। मनु के परम पामिर महान् पात्मा वाले तीन पुत्र हुए ये ॥१२॥ उन तीनो नाम मभानर-गश भौर पर पक्ष पे। समानर के यहाँ उपरा पुत्र परम विद्वान् कालानन नृप हुमा पा ॥१३॥ वालानन का धर्मात्मा गृजप नाम पाना पामिर पुत्र हुमा पा । गृञय या पुत्र वीर पुरज्जय ? राजा पा पा ॥१४॥ महान् मत्त वाला जनमेजय पुरचर या पुत्र उत्तान हुमा था। पि जनमेजय वा पुत्र महागार नाम वाला नृप हुमा था ॥१॥ यह गा दिवसार प्रतिनिया वाला इन्द्र गमान हुमा या । उम महा. गाना महामना नामा परम पापिन पुत्र माथा ॥१६॥ माद्वीपेश्वगे गजा चक्रवर्ती महाया । महामनाम्नु पुत्री दी जनयामाम विथ तो उमीनरच धमा नितिशय धामिरम्। उशीनरम्य पल्यस्तु पच गजपियाजा ॥१८ मृगामी नया दर्वा पशमीन पद्धती। उगीनरम्य पुषास्तु पर तानु कुमोदहा । तपमा ते गुमहना जातसाध धामिरा १६ मृगापास्त मृग पुत्रा नवाया नय एयत । मुम्या मिनाया मुखतो नाम धार्षिय ॥२. हातीगुतमापिपिगैगीनरो दिजा । गि शियार ग्यान योधपन्न मृगम्य ॥२१ नरम्य नरागमा समेत अमिना पुगे। मुशागता शतिविधानियोधन ॥१२ [ वायु पुराण । शिवेस्तु शिवय पुत्राश्चत्वारो लोक्सम्मता । वृषदर्भ सुवीरस्तु केक्यो मद्रवस्तथा ॥२३ तेषान्जनपदा स्फीता. केकया माद्रकास्तथा । वृषदर्भा सूचिदर्भास्तितिक्षो शृणुत प्रजा ।।२४ यह महामना सातो दीपो का स्वामी महान् यश बाला चक्रवर्ती राजा हुमा था । उस महामना ने परम प्रसिद्ध दो पुत्रो को जन्म दिया था पर्थात् उत्पन्न क्यिा था ॥१७॥ एक का नाम धर्म का ज्ञाता उसीनर था और दूसरा परम धार्मिक तितक्षु हुआ था। उशीनर की राजपियो के वश म उत्पन्न होने वाली पांच पत्नियां थी ॥१८॥ उनके नाम मृगा-वृमी-नवा-दर्वा मोर पाचवी इशद्वती था । उशीनर के उन पलियो मे कुलके उद्वहन करने वाले पांच पुत्र हुए थे। वे महान तपसे जातवृद्ध मोर धार्मिक हुए थे ॥१९॥ मृगा वे मृग पुर था पौर नवा के नव-इस नाम वाला ही पुत्र हुअा था। कृमी के कृमि पौर द के धार्मिक सुव्रत पुत्र हुमा ॥२०॥ हे द्विजगणो । हपद्धती का पुत्र भी मौशीनर शिवि हुमा था। शिवि का शिवपुर और मृग का योध्य पुर हुए ॥२१॥ नव का नवराष्ट्र था मोर कृमी को मिला नाम माली पुत्री थी। मुक्त की वृष्टा पुरी थी। अव शिवि के पुत्रो को बतलाया जाता है उन्हें समझ लो ।।२२।। राजा शिवि के शिवय नाम के चार पुत्र लोक सम्मत हुए थे जिनके नाम- दृपदर्भ-मुवीर-वेकय पौर भद्रक य थे ॥२३॥ उनके बड़े ही विस्तृत (पंहुए) जनपद के फ्य-मादक-दृपदर्भ मौर मूचिदर्भ इन नामो वाले हुए थे। पद मागे तितिशु के सन्तान के विषय म थवण करो ॥२४॥ तंतिक्षुरभवद्वाजा पूर्वस्यादिशि विथ त । उसद्रयो महावाहुस्तस्य हेम सुतोऽभवत् ।।२५ हेमस्य मुतपा जज्ञगुत सुतयशा बली । जातो मनुष्योन्या व क्षीण वशे प्रजेप्मया ॥२६ महायोगी स तु बलियंदो य स महामना । पुत्रानुत्पादयामारा चातुर्वयंवरान भुपि ॥२७ ।
[ ३३३ मनुषङ्गपाद समाप्ति ] अङ्ग स जनयामास वङ्ग सुह्न तथैव च । पुण्ड्र कलिङ्गञ्च तथा वालेय क्षत्रमुच्यते ॥२८ वालेया ब्राह्मणाश्च व तस्य वशकरा प्रभो । वलेस्तु ब्रह्मणा दत्ता वरा प्रीतेन धीमते ॥२९ (महायोगित्वमायुश्च कल्पायु परिमाणकम् । सिग्रामे चाप्यजेयत्व धर्म चैव प्रभावना ॥३० प्रैलोक्यदर्शनञ्च व प्राधान्य प्रमवे तथा। वले चाप्रतिमत्व वै धर्मतत्त्वार्थदर्शनम् ॥३१ चतुरो नियतान् वर्णान ला नै स्थापयितेति च । (इत्युक्तो विभुना राजा बलि शान्तिम्परा ययौ ॥३२ तितिक्षु पूर्व दिशा मे परम प्रमिद राजा हुमा था । उशद्रय महाबाहु उसका हेम पुत्र हुआ था ॥२५॥ हेम का मुतपा बली मुतयशा उत्पन्न हुमा था। जो वश ये क्षीण होजाने पर प्रजा वी इच्छा से मनुष्य की योनि में उत्पन्न हुमा था ॥२६॥ पद्धलि जो पा वह महामना मौर महायोगी था। उसने भूमि मे पारो वणों के करने वाले पुत्रा को उत्पन्न किया था ॥२७॥ उसने मङ्ग-वङ्ग- मुल-पुण्ड-कनिङ्ग तथा बालेय को जन्म दिया था जो क्षत्र कहे जाते हैं। वालेय और ब्राह्मण उम प्रभु के वश करने वाले थे। बुद्धिमान् बलि के लिये प्रसन्न होने वाले ब्रह्मा ने वह दान दिये थे ॥२६॥ वे वरदान ये थे--महान् योगि व का होना पौर कल्पायु परिमाण वाली पायु-सग्राम म मजेय रहना पौर धर्म में प्रकृष्ट भावना का रहना ॥३०॥ त्रैलोक्य का दर्शन और प्रसव मे मापाय-बल में मनुपम होना तथा धर्म के तत्त्वाथ का दर्शन-पे घरदान देने हुए ब्रह्माजी ने कहा था तुम नियत चार वर्षों का स्थापित परने वाले हो- इस तरह मे विभु क द्वारा जब वहा गया तो राजा बलि को परम शाति प्राप्त हुई थी ॥३१-३२॥ वालेन महता विद्वान् म्ब वै स्थानमुपागत । तेपा जनसदा स्पीता वगानमुलवास्तथा ॥३३ ३३४ ] [ वायु पुराण पुण्ड्रा कलिङ्गाश्च तथा तेपा वशं नियोधत । तस्य ते तनया सर्वेक्षेनजा मुनिमम्भवा । सम्भूता दीर्घतमस सुदेष्णाया महौजसः ३४ वृहद्भानो सुतो जज्ञे नाम्ना गजा बृहन्मना । तस्य पत्नीद्वय चासीच्चद्यस्योभे च ते सुते ॥३५ यशोदेवी च सत्या च तान्या वशस्तु भिद्यते । जयद्रथस्तु राजेन्द्रो यगोदेव्या व्यजायत ॥३६ ब्रह्मक्षत्रातर सत्याविजयो नाम विश्रुत । विजयम्य धृति पुत्रस्तस्य पुनो धृतवत ॥३७ धृतव्रतस्य पुनस्तु सत्यकर्मा महायगा । सत्यकर्ममुतश्चापि सूतस्त्वधिरथस्तु वै ॥३८ स कर्ण परिजग्राह तेन वर्णस्तु सूतज । एतद्व कथित सर्व णे यह प्रचोदितम् ।।३६ एतेऽङ्गगशजा. सर्व राजान कीर्तिता मया। विस्तरेणानुपूर्व्या च पूरोस्तु शृणुत प्रजा ॥४० बहुत काल के पश्चात् वह विद्वान् अपन स्थान में आगया था। उनके जनपद बहुत ही विस्तृत एव विशाल थे जिनके नाम पग-वन-मुह्नर-पुराड़- कलिङ्ग थे । अब उनके बम को जानली । उमके वे सब पुत्र मुनिया मे जम- ग्रहण करने वाले क्षेत्रज हुए थे और महान प्रोज वाले दीर्घतम मुदेष्णा म उत्पन्न हुए थे ॥३३ ३४॥ श्री मूतजी ने कहा-वृद्भानु का पुत्र बृहन्मना नाम वाना राजा हुआ था। उमकी दो पलिया थी और वे दोनो चंद्य की पुत्रियों थी॥३॥ एव का नाम यशोदेवी था और दूसरी का नाम सत्या पा। इन दोनो से वा भिद्यमान होता है । राजेन्द्र जयद्रथ यशोदेवी को मुनि से ममुराम हुआ था । सत्या से ब्रह्म शावानर विजय नाम वाला विश्रत हुमा था। विजय के पुत्र धुनि हुमा मोर उमा पुत्र घृतवत हुमा था ॥३६-३७॥ धनात या मामा महान् या वाना मत्यवर्मा नाम वाला उत्पन्न हुमा था। मत्यवर्मा का पुष मधिरय मून उत्पन्न हुमा पा ॥३८॥ उमने वर्ण का परिग्रहण पिया था ।
अनुरागपाद ममाप्ति ] [ ३३५ इसीलिये वणं सूनज हुआ था। यह मव कर्ण के विषय मे प्रेरित किया गया यह मैंने वर्णन कर दिया है ॥३६॥ ये अङ्ग के वश में उत्पन्न होने वाले सभी राजा मैंने बतला दिये हैं। अब विस्तार के साथ मोर भानुपूर्वी के अनुसार पूरु की मलनि का नुम सब मुझसे श्रवण क्रो॥४०॥ पूरो पुत्रो महावाहू राजासीजनमेजय । अविद्धस्तु सुतस्तस्य य प्राचीमजद्दिगम् ॥४१ अविद्धत प्रवीररतु मनस्युरभवत्सुत । राजाथो जयदो नाम मनस्योरभवत्मनः ।।४२ दायादस्तस्य चाप्यामीद्ध न्घुर्नाम महीपति । धुन्धोर्वहुगवी पुत्र सञ्जातिस्तस्य चात्मज ॥४३ सज्जातेग्थ रौद्राश्वस्तस्य पुत्रान्निवारत। रोद्रावस्य घृताच्या वै दशाप्सरमि मूनव ।।४४ रजेयुश्च कृतयुश्च वक्षेयु स्थण्डिलेयु च । घृतेयुश्च जलेयुश्च स्थलेयुचव सप्तम ॥४५ धर्मयु मन्नतेयुश्च वनेयुद्द शमस्तु म । स्दा शूद्रा च मद्रा च शुभा जामलजा तथा ॥४६ तला मला च सप्तता या च गापजना स्मृता तथा नाम्ररमा चैव रत्लयूटी च ताशी ।।४७ प्रायो वातस्तामा भर्ता नाम्ना प्रभाकर । प्रनादृष्टस्तु राजपी रिवयम्यस्य चारमज ॥४८ श्री मूनजी ने महा-पूर या पुत्र महान् बाहना वाला राजा जनमेजय पा। उमा मात्मज भपिद नाम धारी हुमा था त्रिमने पूर्व दिशा का विजय पिया था ॥४॥ भविडम प्रष्ट वीर मनग्य नाम वाला मुन हुआ था और मनस्यु पुत्र जयर नाम धागे राजा हुमा था ॥४२॥ उम जयद का दायाद प्रति उत्तराधिकारी पुत्र धुपु नामर महीपनि हुआ पा । पुषु राजा का पुत्र बहनदी नाम वाला हुमा भौर उग महगवी का पुत्र मजाति नाम वाला ममुत्पन्न हपाशा ॥४३॥ मजाति वा पुत्र दास नाम वागा ममुगम हुमा पा प्रब ।
[ वायु पुराण उस रोदारव के पुत्रों का भी ज्ञान प्राप्त करती। रोद्राश्व के शुक्र मे घृताची नाम घाली अप्सरा मे दश पुत्रो ने जन्म ग्रहण रिया था |॥४४॥ उन दश पुत्रों के नाम-रजेयु-कृतेयु-वक्षेप-स्थण्डिलेय--पृतयु-जलयु और सातवां स्थलेय था ॥४५॥ धर्मयु-मन्नतेय तथा ददावा वनेयु था। रुद्रा-शूद्रा-मद्रा-गुभा-जाम- लजा-तला-खला -ये सात और गोपजला कही गई थी तथा तामरसा और धेसी ही रत्नकूटी थी ॥४६-४७॥ वश से प्रात्रेय प्रभाकर नाम वाला उनका स्वामी था। अनहष्ट राजपि रिवेयु उमका पुत्र था ॥४८॥ रियोज्वलना नाम भार्या व तक्षवात्मजा । यस्या देव्या स राजर्षी रन्ति नाम त्वजीजनत् ।।४६ रन्ति र सरस्वस्या पुत्रानजनयच्छुभान् । ग्रम तथा प्रतिरथ ध्र वश्च वातिधार्मिकम् ।।५० गौरी कन्या च विख्याता मान्धातुर्जननी शुभा। धुर्य प्रतिरथस्यापि कण्ठस्तस्याभवत् सुत ।।५१ मेधातिथि सुतस्तस्य यस्मात् काण्ठायना द्विजा । इतिनानुयमस्यासीत् कन्या साजनयत्सुतान् ॥५२ त्रसु सुदयित पुत्र मलिन ब्रह्मवादिनम् । उपदात ततो लेभे चतुरस्त्विति मात्मजान् ।।५३ सुप्मन्तमथ दुष्यन्त प्रवीरमनघन्तथा। चक्रवर्ती ततो जज्ञे दौप्यन्तिनुं पसत्तम ।।५४ शकुन्तलाया भरतो यस्य नाम्ना तु भारतम् । दुप्यन्त प्रति राजान वागुवाचाशरीरिणी ।।५५ माता भस्ना पितु पुत्रो येन जात स एव स । भरस्व पुत्र दुष्यन्त सत्यमा शकुन्तला ॥५६ रेतोधा पुल नयति नरदेव यमक्षयात् । त्वञ्चास्य धाता गर्भस्य मावमस्था शकुन्तलाम् ॥५७ रिवेयु की 'ज्वलना-इस नाम वाली तक्षक पुत्री भार्या हुई थी। उस जिपि रिवेयु ने जिस ज्वलना देवी म रन्ति नाम वाला पुत्र उत्पन्न किया था
अनुपङ्ग पाद समाप्ति ]
[ ३३७
॥४६॥ नार रन्ति ने सरस्वी में शुभ पुत्रो को ममुत्पन्न किया था। उन पुत्रो के
नाम हैं-वसु-प्रतिरथ और अनिधार्मिक ध्रुव ॥५०॥ और गौरी विख्यात
कन्या थी जोकि मान्याता को शुभ माता हुई थी। प्रतिरप का पुत्र धुर्य हुमा
और उमका पुत्र कण्ठ नाम धारी हुमा ॥५१॥ । उमका पुत्र मेधातिथि हुआ
जिससे काएठान द्विज हुए । इतिनानु पम वी कन्या थी उमने पुत्रों को जन्म
दिया था ॥५२॥ प्रमु ने सुदयित पुत्र को जो मलिन, ब्रह्मवादी और उपदात
था, प्राप्त किया। इसके पश्चात् उसने चार पुत्रो की प्रामि की ॥५३॥ सुष्मन्त
इसके उपरान्त दुष्यन्त-प्रवीर और अनद्य ये उनके नाम थे। इसके अनन्तर
नृपश्रेष्ठ पक्रवर्ती दौप्यन्ति उत्पन्न हुआ था ॥५४॥ शकुन्तला मे भरत ने जन्म
ग्रहण किया था जिसके नाम से इस देश का नाम भारत हुआ है। राजा दुष्यन्न
से मूतिमती वारणो ने कहा था १५५।। माता भस्मा पिता का पुत्र है, जिससे
उत्पन्न हुआ है वह वही है, पुत्र का भरण करो, भकुन्तला दुप्यन्त से सत्य
कहती है ॥५६॥ हे नरदेव । यम क्षय से रेतोधा पुत्र को प्राप्त करता है और
तुम इसके गम के पाता हो, शकुन्तला का अपमान मत करो ॥५७।।
भरतस्त्रिसृषु स्त्रीषु नव पुत्रानजीजनत् ।
नाभ्यनन्दच्च तान् राजा नानुरूपान्ममेत्युन ।।५८
ततस्ता मातरः कुद्धा पुत्राग्निन्युर्यमक्षयम् ।
ततस्तस्य नरेन्द्रस्य वितन पुत्रजन्म तत् ॥५६
ततो मरुद्भिरानीय पुत्रस्तु स बृहस्पते ।
सडबा मितो भरद्वाजो मरुद्भि तुभिविभु ॥६०
तनवादाहरन्तीद भरद्वाजस्य धीमत ।
जन्मसर मणञ्च व महद्भिर्भरताय वै ॥६१
भरतस्तु भरद्वाज पुत्र प्राप्य तदाब्रवीत् ।
प्रजाया सहताया व कृतार्थोह त्वया विभोर
पूर्वन्तु वितथ तस्य कृत वे पुरजाम हि ।
सन स वितथा नाम भरद्वाजस्तथाऽभवत् ॥६३
३३८ ] [ वायु पुराण तस्माद्दिव्यो भरद्वाजो ब्राह्मण्यात् क्षत्रियोऽभवत् । द्विमुख्यायननामा स स्मृतो द्विपितृवस्तु वै ।।६४ ततोऽथ वितथे जाते भरत स दिव ययो। वितथस्य तु दायादो भुवमन्युर्वभूव ह ।।६५ महाभूतोपमाश्चासश्चत्वारो भुवमन्युजा । बृहत्क्षनो महावीर्यो नरो गाग्रश्च वीर्यवान् ।।६६ नरस्य साकृति पुत्रस्तस्य पुत्रौ महौजसौ। गुरुवीय स्त्रिदेवश्च साकृत्यायवरी स्मृतौ ।।६७ दायादाश्चापि गाग्रस्य शिनिबद्धात् वभूव है। स्मृताश्च ते ततो गागृया क्षात्रोपेता जिातयः ॥६८ भरत ने तीन स्त्रियों में नौ पुत्रो को उत्पन्न किया था किन्तु गजा ने उनका अभिनन्दन नही किया था ये मेरे अनुरूप नहीं हैं ॥५८।। इमरे अनन्तर माताऐ बहन क्रुद्ध हुई और उन्होंने पुत्रो को यम क्षय को प्राप्त कर दिया था। इमके उपरान्त उस गज्य का वह पुत्र जन्म विनय होगया था ॥५६॥ इसमें पश्चात् मरतो ने वृहस्पनि मे वह पुत्र नार क्तु मरुनो ने विभु भरद्वाज को मनामित किया ।।६०। वहाँ पर ही धीमान भरद्वाज का यह महतों के द्वारा भरत के लिये जन्म का सामग्ण उदाहृत करने हैं ।।६१।। भरत ने सो भरद्वाज को पुत्र प्राप्त करके उम समय कहा-हे विभो । मेरी प्रना के महन हो जाने पर मापन मुझे कृतार्य किया है ॥६२॥ उमका पहिले तो पुत्र जन्म वितय कर दिया था। इसके पश्चात् वह भरद्वाज पितय नाम वाला होगया था ॥६६॥ इममे दिवा भग्द्वान ब्राह्मण्य से क्षत्रिय होगया था तब वह हिमुस्यायन नाम वाला और विपितृ पहा गया है ।।६४॥ फिर उग विनय के उत्पन्न होने पर यह भरत दिवलीन वो चला गया था । वितय का दायाद (पुत्र) भुवमन्य हुपा था ॥६शा महाभून के गमान भुवमन्यु गे जम्म ग्रहण करने वाले पुत्र धार हुए थे । उन चागे के नाम वृहात्र-महावीर्य-नर मोर वीवान् अस्य ये ये ॥३६नर पे पुत्र माइति नामधारी हुमाया । उस गांति रे महान पोर वाले दो पुत्र हए थे दिन माम गुरुवीर्य और यिदा येथे जो गौरवार रे
अनुपन पार समाप्ति ]
[ ३३६
गपे हैं ॥१७॥ गाग्रस्य शिनि गद्ध में भी दायाद हापौर ये क्षात्र धर्म गे युक्त
दिशानि गाय बहे गये हैं ।।६।।
महायायमुनश्रापि भीमस्तस्मादुभक्षय ।
तस्य भार्या विशाला तु सुपूर्व वे मुतास्य ॥६६
अय्याणि पुग्गिा तृतीय सुपुर्द कपिम् ।
पे क्षत्रवरा ह्यते तयो प्रोक्ता महर्पय ॥६०
गाना सायनया वीर्या धानोगेता द्विजानय ।
माश्रितागिरम पक्ष वृहत्क्षत्रस्य वश्यति ।।७१
वृहदक्षत्रस्य दायाद मुहोगी नाम धामिर ।
मुहावस्यापि दायादो हम्ती नाम बभूर ह ।
तेनेदं निर्मित पूर्व नाम्ना व हाम्तिन पुरम् ।।३२
हस्तिनश्रापि दायादास्त्रय परमधामिया ।
प्रजमी हो द्विमीश्न पुग्गीढम्नथैव च ॥७३
प्रजमीदम्य पुत्रान्तु गुभा गुभवुलोहा ।
तपमोऽन्ने सुमहतो राज्ञो वृद्धस्य धामिया ।।७४
भरद्वाजप्रसादेन शगुध्ध नस्य विम्बरम् ।
अजमीढस्य गिन्या वठ समभवविल ।।७५
मेधातिथि मुतस्तस्य तम्मात् चण्ठायना द्विजा ।
अजमीढम्य धूमिन्या जज्ञे वृहदमुन्'५ ।।७६
महावीय का पुत्र भी भीम नामा प्रा और उगमे फिर उभक्षयमा
मी मायां विगाना नाम पाली ये तीन पुत्री का प्रसव frया था 11६२।। एप
रानाम प्रशारणि पा. दूगरा पुनरिण और तृतीय वायं पा पार गरि
पात्र नर एए और उन दोनों ने मनिह गय है 1000 गार-मालय,
घोपं सात धम मे या दिजाति प्रालिग ये पर या माश्य मेकर र.
भागे ७१ र रासायर मुहरोत्र नाम पारी परम पारि
1गुगंध का भी दायाराग्नी नाम वाला मापा । उगन ही यह हानिन
पुरानाम पर माया या ॥२॥ो भी मी पुन गमुगमा
३४. ] [ वायु पुराण थे जोकि परम धर्म के मानने वाले थे। उन तीनो के नाम प्रजभीड-द्विभीड तथा पुरुमीढ ये थे ॥७३॥ अजमीढ के जो पुत्र हुए थे वे बहुत ही शुभ मोर कुल के उद्वहन करने वाले थे । सुमहान तप के अन्त में वृद्ध राजा के धार्मिक हुए थे।७४।। वे भद्वाज के प्रसाद से ही हुए थे अब उनका विस्तार वा श्रवण करो। अजमीद नाम वाले के केशिनी में एठनाम धारी उत्पन्न हुआ था ॥७॥ मेघातिथि नाम वाला उसका पुत्र था । उमसे फिर एटायन दिन उत्पन्न हुए थे॥७॥ बृहद्वसोवृहद्विष्णु. पुत्रस्तस्य महाबल. । वृहत्कर्मा सुतस्तस्य पुत्रस्तस्य बृहद्रथ ।।७७ विश्वजितनयस्तस्य सेनजित्तस्य चात्मजः। अथ सेनजित. पुत्राश्चत्वारो लोकविश्रु ता. ७८ रुचिराश्वश्च काव्यश्च रामो दृढधनुम्तथा। वत्सश्चावन्तको राजा यस्य ते परिवत्सरा ॥७९ रुचिराश्वस्य दायादः पृथुपेणो महायशाः । पृथुपेणस्य पारस्तु पारानीपोऽथ जज्ञिवान् ८० यस्य चैकशयञ्चासीत् पुत्राणामिति न थू तम् । नीपा इति समाख्याता राजान सर्व एव ते ८१ तेपा वशकरः श्रीमान् राजासीत्कीतिवद्धन । काम्पिल्ये समरो नाम स चेष्टसमरोऽभवत् ।।५२ समरस्य परः पार सत्वदश्व इति त्रय.। पुत्राः सर्वगुणोपेता. पारपुत्रो वृपुर्वभौ ।।८३ वृपोस्तु सुकृति म सुकृतेनह कमणा । जज्ञ सर्वगुणोपेतो विधाजस्तस्य चात्मजः ।।१४ अजमीढ के धुमिनी में वृहदसु राजा ने जन्म ग्रहण किया था ।।७।। वृहमु मे वृद्विष्णु पुत्र हुअा था जो महान बल वाना था उसका पु वृहत्कर्मा । हुप्रा और फिर उसका पुत्र वृदय नाम वाला हुआ था। उमका अर्थात् बृहद्रप का तनय विश्वजिन हुआ मोर उसका सेनजित मारमज हुप्रा था। इसके उप-
।
पनुषड्न पाद ममाप्ति ]
[ ३१
रान्त फिर सेनजित् के लो मे परम प्रसिद्ध चार पुत्रो ने जन्म ग्रहण किया था
१७८।। उन पारो पुत्री के नाम पिराश्व-काव्य-राम मोर हड़पतु ये थे । वत्ग
भावन्तक राजा पा जिसके ये परिवत्सर हुए हैं ॥७९॥ रचिराश्व का दायाद
महान यश पाला पृथुपेन था । पृथुमेन का पार हमा मोर पार से नीप ने जन्म
लिया था 1०॥ जिसके एक शत पुत्र हुए थे यह हमसे मुना गया है । वे
समस्त राजा मोग नीपा-नाम से समारूपात हुए थे। उनके वश को
करने अर्थात् पलाने वाला श्रीमान् कोतिबद्धन राजा हुमा या काम्पित्य में
समर नाम वाला यह सवेष्ट उमर हुमा या ॥२॥ समर के पर पार भोर
सत्त्वद ये तीन मात्मज हुए थे। ये समस्त पुत्र मर्वगुण गण से सम्पन्न थे। पार
का पुन वृषु मुशोभित हुमा था ॥३॥ वृष का मुक्ति नामा पुष यहाँ मुन
कर्ष के दारा समस्त गुणो से युक्त हुमा या मोर उसका पुत्र विभ्राज नाम वाला
हमा पा॥
विभ्राजस्य तु दायादरस्वरगृहो नाम पार्थिव ।
बभूव शुक्जामाता चोभा महायशा ८५
मगुहस्य तु दायादो ब्रह्मदत्तो महातपा ।
योगमूनु सुतस्तम्य विष्वक्सेनो ऽभवन्नृपः ॥६६
विभ्राजपुत्रा राजान सुकृतेनेह वर्मणा ।
विप्वव मेनस्य पुत्रस्तु उदक्सेनो बभूव ह ॥८७
भल्लाटस्तस्य दायादो येन राजा पुरा हत ।
भन्नादम्य तु दायादो राजासीग्जनमेजय ।
उग्रायुधैन तस्या सर्वे नीपा प्रणाशिता ।।
परीक्षितस्य दयादो बभूव जनमेजय ।
अतसेनस्य दायादो भीमसेनोऽपि नामत. ॥
जहनुम्त्वजनयत्पुत्र सुरय नाम भूमिपम् ।
गुरथस्य तु दायादो गोरी राना विदूरय ।।१०
विदूरपगुतश्चापि मा मोम इति अति. ।
सार्वभौमात्रयरमेन माराधिन्नम्य वात्मज !
३४२ ] [ वायु पुगण । पाराधितो महासत्त्व अयुतायुस्तत स्मृत । अकाधनाऽयुतायोऽस्तु तस्माद्द वातिथि स्मृत ९२ देवातिथेस्तु दायाद मक्ष एव बभूव ह। भीमसेनस्तथा ऋक्षादिलीपस्तस्य चात्मज ॥६३ दिनीपमूनु प्रतिपस्तस्य पुनास्नय स्मृता । देवापि गान्तनुश्च व बालीवश्च व ते त्रय ॥६४ विभ्राज का दायाद अगुह नामधारी राजा हुमा था। शुकजा माता थी और महान् यावाला ऋचीक भत्ता ॥८॥ अणुह का दायाद (पुत्र) महान् तपस्वी ब्रह्मरन हुप्रा था और उसका तनय योग सूनु और उसका पुत्र विष्वक सन नृप हुपा था ।।८६|| विभ्राज के पुत्र सर यहाँ सुकृत कम क द्वारा राजा हुए थे । विष्वक्मेन का पुत्र उदकमेन हुआ था ॥८७|| उसका दामाद भल्लाट या जिमने पहिले राजा का हनन किया था भल्लाट का दायाद राजा जनमजय था। उसके लिए उग्रायुध ने समस्त नीपा प्रपष्ट कर दिया था ।।८८॥ श्री मूतजी ने कहा-परीभित का दायाद जनमजय नाम बाला हुमा पा । श्रुतसेन का पुत्र नाम स भीममेन हुआ था l जह्नु न सुरथ नाम वाला रागा पुत्र म उत्पात किया था। सुरथ का दायाद परम वीर राजा विदूरथ हुमाया 1०11 विदूरथ का पुत्र स कभीम या-ऐमी श्रुति है । सावभौम स जयगन उत्पन्न हुआ और उस जयत्मन का पुत्र आराधि नाम वाला हुमा था ॥६॥ पारामि से प्रयुताय हुआ था जो महान सत्त्व वाना कहा गया है। फिर उम मयुतायु का प्रकोधन पुत्र हुआ और उम प्रकोपन से दवानियि पुत्र हुपा था 18|| दवातिथि का दायार ऋक्ष नाम वाला हुमा पा । ऋक्ष स भीमरान की उत्पत्ति हुई और उसका पुत्र दिलीप नामधारी हुमा था || ग्लिीप का पुत्र प्रनिप हुमा मोर उस प्रतिप नीन पुत्र पर गय हैं। जिनके नाम देवारि- दाननु पौर वाताव य तीन थे 18i वाहतीवम्य तु विज्ञ य सप्तवालीश्वरो नृप । वाहतीकम्य सुनश्च व सोमदत्ता महायशा ॥६५
अनुपग पाद समाति]
[ ३४३
जज्ञिरे सोमदत्तात्त भूरिभूस्थिवा शलः ।
देवापिस्तु प्रवद्वाज वन धर्मपरीप्सया ९६
उपाध्यायरतु देवाना देवापिरभवन्मुनि ।
च्यवनोऽस्य हि पुनस्तु इष्टर श्च महात्मन ।।७
शान्तनुस्त्वभवद्राजा विद्वान् वै स महाभिप ।
इम चोदाहरन्त्यत्र श्लोर प्रति महाभिपम् 185
य य राजा स्पृशति व जोर्ण समयतो नरम् ।
पृनयुवा स भवति तस्मात्ते शन्तनु विदु IIRE
ततोऽस्य शन्तनुत्व वै प्रजास्विह परिश्रुतम् ।
स उपयेभे धर्मात्मा शन्तनुर्जाह्नवी नृप ॥१००
तस्या देवव्रत भीष्म पुत्र सोऽजनयत्प्रभु ।
सच भीम इति ख्यात पाण्डवाना पितागह ॥१०१
काले विनिरवीर्यन्तु शन्तनु जनयत्सुतम् ।
शन्तनोर्दयित पुत्र प्रजाहितकरम्प्रभुम् ।
कृष्णद्वैपायन व क्षेत्रे वैचित्रवीर्यके ॥१०२
धृतराष्ट्रच पाण्डुश्च विदुरञ्चाप्यजीजनत् ।
धृतराष्ट्रात्तु गान्धारी पुत्राणा मुपुवे शतम् १०३
तेषा दुर्योधनी ज्येष्ठ सव्वक्षत्रस्य स प्रभ.।
भाद्री राज्ञी पृथा चंब पाण्डार्यि बभूवतु ||१०४
बालोक का पुत्र वालीश्वर नृप हुआ था। और वाह्लीक बा भुत
महान् या वाला मामदत्त था [HEII मोमदत्त से भूरि-भूरिश्रवा और शल
नाम वाल तीन पुत्र रत्न समुत्पन्न हुए थे। देवापि तो धर्म की इच्छा से वन म
चला गया था ॥१६॥ देवापि मुनि वहाँ वन में जाकर हागण का उपाध्याय
हागपा था। इसका पुत्र च्यवन और महान आत्मा वाले का इष्टक हुआ था
॥६॥ गान्तनु तो राजा हुअा या वह महात् विद्वान् भोर महाभिए था। महा-
भिप के प्रति यहाँ पर इस श्लोक का उदाहरण किया करते हैं Ital ममय
से जीर्ण जिस-जिप भो मनुष्य को राना सा किया करता है वह फिर अपने
३४ ]
[ वायु पुराण
उस वाक्य का त्याग वर यदा हो जाता है इमी मे उसे शन्तनु बहा करते
थे :६६। इसके पश्चात् इमका शन्तनुत्व प्रजानो में यहां परिधृत है । उस
शन्ननु राजा ने जोकि अत्यन्त धर्माश था जाह्नवी के साथ विवाह किया था,
जनु राजा की पुत्री गङ्गा को जाह्नवी कहा जाता था ॥१००॥ उभ प्रभु
शान्तनु ने उस जाह्नवी मे देवव्रत नाम वाले भीष्म पुत्र को उत्पन्न किया था ।
वह पाण्डवों का पितामह भीष्म-इस नाम से ही प्रख्यात था ॥१०१।। समय
प्राने पर शन्तनु ने विचित्र वीर्य पुत्र को उत्पन्न किया था। यह शन्ततु को
परम प्रिय और प्रजा का हित करने वाले प्रभु पुत्र था। इस विचित्र वीर्य के
क्षेत्र में कृष्ण द्वैपायन ने घुतराष्ट्र-पाएडु मोर विदुर को उत्पन्न किया था।
धृतराष्ट्र से उसकी पत्नी गान्धारी में मौ पुत्र समुत्म हुए थे ॥१०२-१०३।। उन
एक सौ पुत्रो मे सबसे बडा सर्वक्षत्र का प्रभु वह दुर्योधन या। रानी माद्री और
पृथा ये दो पत्नियां पाण्डुकी हुई थीं ॥१०४।।
देवदत्ता सुतास्ताभ्या पाण्डोरर्थे विजजिरे
धर्माद्य धिष्टरो जज्ञे वायोज्ञ वृकोदरः १०५
इन्द्राद्धनञ्जयो जज्ञ शक्रतुल्यपराक्रमः ।
अश्विभ्या सह देवश्च नकुलश्वापि माद्रिजो ॥१०६
पञ्चव पाण्डवेम्यश्च द्रौपद्या जजिरे सुता ।
"द्रौपद्यजनयज्ज्येष्ठ शु तिविद्ध युधिष्टिरात् ॥१०७
हिडम्बा भीमसेनात्तु जज्ञे पुत्र घटोत्कचम् ।
काश्या पुनर्भीमसेनाजज्ञ सर्ववृक सुतम् ।।१०८८
सुहोत्र विजया माद्री सहदेवादजायत ।
करेमत्यान्तु वैद्याया निरमित्रस्तु लाङ्गलिः ॥१०६
सुभद्राया रथी पार्थादभिमन्युरजायत ।
उत्तरायान्तु वैराश्या परीक्षिदभिमन्युज ॥११०
परीक्षितस्तु दायादो राजासीज्जनमेजय ।
ब्राह्मणान् स्थापयामास वै वाजसनेयिवान् ॥१११
अनुपङ्ग पाद समाप्ति ] [ ३४५ असपत्न तदामाद शम्पायन एव तु । न स्थास्यतीह दुर्बुद्ध ततद्वचन भुवि ।।११२ यावत्स्थास्याम्यह लोके तावनतत्प्रशस्यते। अभित सस्थितश्चापि तत: स जनमेजय. ॥११३ पौर्णमास्येन हविषा देवमिष्ट्वा प्रजापतिम् । विज्ञाय सस्थितोऽपश्यत्तद्वधीष्टा विभोर्मखे ।।११४ उन दोनो पत्नियो से देवों के द्वारा दिये हुए पाएडु के अर्थ में पुत्र समुत्पन्न हुए थे । धर्म से युधिष्ठिर-वायु से वृकोदर-इन्द्र से धनञ्जय जो इन्द्र के समान पराक्रमो था-अश्विनी कुमारो से सहदेव भोर माद्री से जन्म लेने वाले न कुल ये दो पुत्र हुए थे ॥१०५-१०६।। इन पांचो पाण्डवो से पांच ही द्रौपदी में पुत्र उत्पन्न हुए थे । द्रौपदी ने सबसे बडा पुत्र युधिष्ठिर से श्रुति विद्ध नाम वाला समुत्पन्न किया था ॥१०७॥ दिगम्बा ने भीमसेन से घटोत्कच नाम वाला पुत्र उत्पन्न किया था । काशी से भीमसेन का सर्ववृक नामक पुत्र उत्पन्न हुआ था ॥१०८|| सहदेव से विजया माद्री ने सुहोत्र नाम वाला पुत्र जन्माया था। करमती वैद्या मे निरमित्र जाङ्गलि उत्पन्न हुमा ||१०६।। सुभद्रा मे रथी अभिमन्यु पार्थ अर्जुन से समुत्पन्न हुआ था। वैराटी उत्तग मे अभिमन्यु का पुत्र परीक्षित उत्पन्न हुआ ॥११०॥ परीक्षित् का दायाद राजा जनमेजय हमा था। उसने वाजसनेयो ब्राह्मणो की स्थापना की थी ॥११९॥ तव अमर्प से वंशम्यायन ने कहा है दुर्बुद्ध । भूमि म यहाँ तेरा यह असपत्न वचन नहीं रहेगा ॥११२॥ मैं जब तक लोक में रहूंगा तब तक यह प्रसस्त नहीं होगा। चाहे सब प्रकार से वह जनमेजय सस्थिन भी था ॥११३॥ पौवंमास्य हवि से प्रजापति देव का यजन करके और जानकर विभु के मस मे सस्थित होते हए उमकी तरह अधीष्ट को देखा था ॥११४१॥ परीक्षित्तनयश्चापि पौरवो जनमेजय.। द्विरस्वमेधमात्हत्य ततो वाजसनेयकम् । प्रवर्त्तयित्वा तद्ब्रह्मत्रिसर्वी जनमेजय ॥११५ । ।
[ वायु पुराण सर्वमश्वकमुन्याना खन्दमङ्गनिवासिनाम् । खर्वश्च मध्यदेशाना त्रिखर्वी जनमेजय । विपादाद् ब्राह्मणं साद्ध मभिशस्त क्षय ययौ ॥११६ तस्य पुत्र शतानीको बलवान् सत्यविक्रम । तत सुत शतानीक विप्रास्तमभ्यपेचयत् ॥११७ पुत्रोऽश्वमेघ दत्तोऽभूच्छतानीकस्य वीर्यवान् । पुनोऽश्वमेधदत्ताद जात परपुरजय ॥११८ अधिसामकृष्णो धर्मात्मा साम्प्रतोऽय महायशा । यस्मिन् प्रशासति मही युष्माभिरिदमातहतम् ।।११६ दुराप दीघसत्र में त्रीणि वर्षाणि दुश्वरम् । वर्षद्वय कुरुक्षेत्रे दृपद्वत्या द्विजोत्तमा ॥१२० परीक्षित के पुत्र पौरव जनमेजय ने दो प्रश्वमेध यज्ञो का प्राहरण करके इसके पश्चात वाजमनेय को प्रवृत्त पराकर तव जनमेजय ब्रह्मत्रिसर्ती होगया था ॥११५॥ मुख्य अश्वो की एक सव सख्या-अङ्गनिवासियो का एक सव और मध्य देशो का एक सब इस तरह से जनमेजय त्रिी हुपा था। विषाद से ब्राह्मणों के माथ मभिशस्त होता हुमा क्षय को प्राप्त हुमा था ॥११६॥ उसका पुत्र शतानीक था जो बहुन बलवान् मोर सत्य विक्रम वाला या। इसके पश्चात् ब्राह्मणो ने उस पुत्र शतानीक को राज्य पर अभिषेक कर दिया था ॥११७॥ शतानीक का पुत्र प्रश्वमेघ दत्त बहा वीयवान् हुआ था । अश्वमेघ दत्त से परपुरजय पुत्र उत्पन्न हुआ था ॥११८॥ यह महान् यसवाला साम्प्रत बहुत धर्मात्मा अधिसाम कृष्ण है जिसके भूमिपर प्रशासन करने पर तुम लोगो ने यह माहृत किया है। जोकि तीन वप पपन्त बडा दुश्चर एव दुराप यह दोष सत्र है। है द्विजोत्तमो । दो वप तक कुरुक्षेत्र मे हपद्धती मे हुआ था ॥११६ १२०॥ श्रोतु भविष्यमिच्छाम प्रजाना वं महामते। सूत साद्ध नृर्भाव्य व्यतीत कीतित त्वया ॥१२१ यतु सस्थास्यते कृत्यमुत्पत्स्यन्ति च ये नृपा। वर्षानतोपि प्रवहि नामतश्च व तान्नृपान ॥१२२ अनुपङ्गपाद समाप्ति ] ३४. काल युगप्रमाणञ्च गुणदोपान् भविष्यत । सुखदुखे प्रजानाञ्च धर्मत कामतोऽयंत ॥१२३ एतत्सर्वं प्रसह्वयाय पृच्छता ब्रूहि तत्वत । स एवमुक्तो मुनिभिः सूतो बुद्धिमता वर । प्राचचक्षे यथावृत्त यथादृष्ट यथाथ तम् ॥१२४ यथा मे कीर्तित सन व्यासेनाद्भुतरम्मया । भाव्य कलियुगञ्च व तथा मन्वन्तराणि तु ॥१२५ अनागतानि सर्वाणि अवतो मे निवोधत । अत ऊद्ध्वं प्रवक्ष्यामि भविष्यन्ति नृपास्तु ये ॥१२६ ऐलाश्च व तथेवाकून् सौद्य म्ताश्च व पार्थिवान् । येपु सस्थाप्यते क्षेनगक्ष्वाक्वमिद शुभम् ॥१२७ तान् सर्वान् कीर्तयिष्यामि भविप्ये पठितान्नृपान् । तेम्य परे च ये चान्ये उत्पत्स्यन्ते महीक्षित ॥१२८ क्षत्रा पारशवा शूद्रास्तथा ये च द्विजातय । अन्धा शका पुलिन्दाश्च तूलिका यवन सह ॥१२६ कैवर्ताभीरशवरा ये चान्य म्लेच्छजातय । वर्षाग्रत प्रवक्ष्यामि नामतश्च व तान्नृपान् ॥१३० ऋपियो ने कहा-हे महान् मति वाले । अब हम लोग प्रजाम्रो का मागे पाने वाला भविष्यकाल सुना की उत्कट इच्छा करत हैं । हे सूत । मापने प्रद तक तो जो होगया और होरहा है वह हो वणन किया है ॥१२१॥ जो कृत्य सस्थित होगा और जो राजा लोग उत्पन होगे। उन समस्त राजानो को वर्षाय से भौर नाम से बतलाइये ॥१२२॥ वाल और युग वा प्रमाण तथा होने वाले गुण एव दोषो को बताइये । घम से प्रौर काम से प्रजामों के सुख तथा दुखो को भी बताइये ॥१२३।। यह सब प्रसस्यान करके पूछने वाले हमको माप कृपा करचे तात्विक रूप से बताइय । बुद्धिमानो म परम श्रेष्ठ इस तरह से मुनियों के द्वारा पूछे गय श्री सूतजी ने जैसा भी हुमा जमा देखा मौर जिस प्रकार से मुना था वह कहना प्रारम्भ कर दिया था ॥१२४॥ श्री मूतजी ने
३४८ ]
[ वायु पुराण
कहा-अद्भुत कर्म करने वाले थी व्यासजी ने जिम तरह से मुझगे यह सब कहा
था । भाव्य-कलियुग और मन्वन्तर उन सद अनागतों को मुझसे जान तो।
इसके प्रागे जो नृप होंगे उनको बताऊँगा ॥१२५.१२६॥ ऐलो को-दविकुमो
को मोर सौद्युम्न राजामो को जिनम यह शुभ ऐक्ष्वाकन क्षेत्र सस्थापति किया
जाता है उन सब भविष्य में घटित राजाओं का वर्णन करूगा। और उनके
मागे जो अन्य राजा लोग उत्पन्न होगें ॥१२७१२८॥ पारशव क्षत्रियो का
समूह तथा शूद्र और जो द्विजातिगए थे, अन्ध-शफ-पुलिन्द-यवनो के साथ
तूलिक कैवत्त-अभीर-शबर और जो अन्य म्लेच्छ आदि वाले लोग इन समस्त
नृपो को वन तथा नाम से बतलाऊँगा ॥१२६-१३०॥
अधिसामकृष्ण सोऽय साम्प्रत पौरवान्नृप ।
तस्यान्ववाये वक्ष्यामि भविष्ये तावतो नृपान् ।।१३१
अधिसामकृष्णपुनो निर्वस्त्रे भविता किल ।
गगयापहते तस्मिनगरे नागसाहये ।
त्यक्त्वा च त सुवासच कौशाम्ज्या स निवत्स्यति ॥१३२
भविष्यदुष्णस्तत्पुत्र उष्णाचित्ररथ स्मृत ।
शुचिद्रवितरथावृतिमाश्च शुचिद्रयात् ॥१३३
सुपेगो मै महावीर्यो भविष्यति महायशा ।
तस्मात्सुपेणाद्भविना सुतीर्थो नाम पार्थिव ॥१३४
रुच सुतीर्थाद्भविता विचक्षो भविता तत ।
त्रिचक्षस्य तु दायादो भविता वै सुखीवल ॥१३५
सुखोवलसुतश्चापि भाव्या राजा परिप्लुत।
परिप्लुतसुतश्चापि भविता मुनयो नृप ॥१३६
मेधावी सुनयस्याथ भविष्यति नराधिप ।
मेधाविन सुतश्रापि दण्डपाणिभविष्यति ॥३७
दण्डपागोनिरामिनो निरामिनाच क्षेमद ।
पञ्चविंशनृपा ह्यते भविष्या पूर्वराजा ।।१३८
। 1 अनुषङ्गपाद समाप्ति ] [ ३४६ अघिमाम कृष्ण वह यह साम्प्रत पौरवो का राजा है। उसके अन्वय में भविष्य मे उतने राजानो का वर्णन करूंगा ॥१३१॥ अधिसाम कृष्ण का पुत्र नियंत्र में होगा । नागस नामक उस नगर के गङ्गा के द्वारा अपहृत होजाने पर वह उमका निवास त्याग करके वौशाम्बी में निवाम करेगा ॥१३२।। उसका पुत्र उष्ण होगा और उप्ण से चित्ररथ होगा । चित्ररथ का पुत्र शुविद्रथ होगा और घुचिद्रय से वृत्तिमान होगा ॥१३३|| सुषेण निश्चय ही महान् यशवाला होगा। उम सुषेण का पात्मज सुनीथं नामधारी राजा होगा ॥१३४॥ सुतीर्थ से रुष का जन्म होगा और फिर उमसे त्रिचक्ष होगा । त्रिचक्ष का दायाद सुखी- बल नाम वाला होगा ।।१३५।। सुखीवल का पुत्र परिप्लुत नामक राजा होगा। फिर परिप्लुत वा पुत्र सुनय नाम वाला राजा होगा ॥१३६॥ सुनय का पुत्र मेधावी नामव राजा होगा और मेघावी का पुत्र दण्डपाणि नाम वाला जन्म प्रहग करेगा ॥१३७॥ दण्डपाणि से निरामित्र होगा और निरामित्र से क्षेमक नाम वाला जम प्राप्त करेगा। ये पचीस राजा पूर्व वशज होंगे ॥१३८।। आननुवशश्लोकोऽय गीतो विप्रै पुराविदै । ब्रह्ममयस्य यो योनिशो देवपिसत्कृत ॥१३६ क्षेमर प्राप्य राजान सस्था प्राप्स्यति वै कलौ। इत्येप पोरवो वशो यथावदनुकीत्तितः ।।१४० धीमत पाण्डुपुत्रस्य ह्यर्जुनस्य महात्मन । प्रत ऊद्ध प्रवक्ष्यामि इक्ष्वाकूणा महात्मनाम् ।।१४१ वृदयस्य दायादो वीरो राजा वृहत्दाय । तन क्षय सुतस्तस्य वत्सव्यूहस्तन क्षयात् ॥१४२ यत्मव्यूहात्प्रतिव्यूहस्तस्य पुत्रो दिवाकर । यत्र माप्रतमम्यास्त अयोध्या नगरी नृप ॥१४३ दिवाकरम्य भविता सहदेवो महायता । महदेवस्य दायादो वृहदको भविष्यति ॥१४ तस्य भानुरषो भाव्य प्रतोतारवन तस्सुन । प्रतोतागुननापि गुप्रतीतो भविष्यति ॥१५ 1 110 | पाप पुगार गदेष मुण्य गुरगुतः।।१४६ मरर Trum friग मनु न पा है जाकीदौनिवrnfid मामा util पपाए पनिर पद पोय काका को लियुग में गयाamrt 01 पाम मिान महान मामा यार पारे Tejan पहाणे पाणे महमा भोंगा पान TAM:पा दोराहारि गरे पाप उमा पुष दरमहापxy u मरममा प्रतिमा और उगरा शिरा पोग गमप में मारा गरीरा राणा man for Tमरा पगवामा गहन हो गया fr पुत्र मागस हागा ||१|| उप पृहमा राम का पूष भानुरप होगा पौर रात्र प्रताप नीनार पुत्र गुप्रो नाम दाना पर पहण परेगा ॥१४ उपपुरा पुत्र महोप होगा पोर महरा पूष गुनक्षत्र कम सेगा ॥१४॥ विमररनु गुनादविष्यति परतप । ममिता पान्तरिदास्तु यिमरस्य सुनो महान् ॥१७ मन्तरिक्षात्नुपरणंस्तु सुपरवाप्यमित्रजिन् । पुषस्तास्य भरद्वाजो धर्मी तम्य गुा स्मृन । पुत्र तायो नाम पषिण रा भविष्यति । कृतअपमुतो बातो सस्य पुत्रो रगञ्जय 111४८ भविता अयशावि वीरो राजा रणअयात् । सअयस्य सुत शाक्य शापयाच्छुद्धोदनोऽभवा ॥१४६ गुस्योदनस्य भविता शाक्मा राहुल स्मृत । प्रसेनजित्ततो भाव्य शुद्रको भविता तत ॥१५० शुद्रपात्शुलिको भाय धुलियात्सुरथ स्मृत । सुमिम सुरथस्यापि मन्त्यश्च भविता नृप ॥१५१ अनुराद ममाप्ति ] [ ३५१ एते ऐक्ष्वाकया प्रोक्ता भवितार यलो युगे। वृहदलान्वये जाता भविनार क्लो युगे। भूराश्च कृतविद्याश्च सत्यसन्धा जितेन्द्रिया ॥१५२ गुनधार का पुन पिलर नामागे परन्तप होगा। और मिनर पा पूत्र बृहन ही महान् अन्तरिक्ष होगा ॥१४७॥ अन्तरिक्ष से गुपणं नामर पुत्र जन्म मेगा पौर गुपर्ण का पुत्र प्रमित्रजिन नामधारी होगा । उसरा पुष भरद्वार पौर उममे महा पर घी नामव पुत्र होगा। फिर धर्मो पा वृतजय नाम वाला पत्र गमुत्पन्न होगा । कृतजय का पुत्र प्रात नामा होगा और इमा १२ रणजय नाम याला जन्म ग्रहण करेगा ॥१४८! रणजय मे गञ्जय नाम का पोर राजा होगा। सञ्जय वा पुत्र चावय होगा पार पाक्य रो गुटोदन नाम पाला हुपा था ||१४६॥ शुसोदन माया में राहुल नाम मे रहे जाने पाना पुष होगा । उममे पिर प्रमेनजिन् होगा और उग प्रमेनजिन् मे भुरक Pोगा ||१५०।। शुदरा पुत्र शुलित होगा पौर शुनिल गे गुरप नाम मे पहा जाने वाला पुत्र जन्म धाराण करेगा। मुरथ मे मित्र नामा पन्त मे होने याला रारा होगा ॥१५१॥ य इतने इक्ष्वादु से 47 म होने वाले बताये गये हैं बोषि पागे सनियुग मे जाम पाग पर न करेंगे। ये मग बृहन्दन ये वा में अस पहन माँगे और कलियुग में ही होंगे ये गभी रामा पूरवीर पे-नावित पर्याय विधा पोहए- मर गरय गन्या प्रतिमा यारे और हरियों को जीतने । पारे ॥११॥ मानुपातीकोऽय भविष्यवाहत । समानूपामप वा सुमित्रानो भविष्यति । गुमित्र प्राप्य राजानं गम्यां प्रापपनि यसती। तन्मानय दोमंस मगुहारहतम् ॥१५३ पार कर प्रपयामि मागधेयान्यादपान् । जगमन्याय पे यो महदेवान्य नृपा ॥१५४ पतीला गरमाना भविष्याभ तथा पुनः। प्राधान्या प्रययामिगलों में नियोपत ॥१५५
३५२ ।
[ वायु पुराण
सग्रामे भारते तस्मिन् सहदेवो निपातित ।
सोमाभिस्तस्य तनयो राजपि स गिरिव्रजे ॥१५६
पञ्चाशत तथाटौच समा राज्यमकारयत् ।
व तश्रवा चतु पष्टिसमास्तस्य सुतोऽभवद् ।
अयुतायुस्तु पड्विश राज्य वांग्यकारयत ।
समा. शत निरामित्रो मही भुक्त्वा दिवङ्गत ॥१५७
पञ्चाशत समा पट् च मुकृत्तः प्राप्तवान्महीम् ।
प्रयोविंश बृहत्कर्मा राज्य वर्षाण्यकारयत् ॥१५८
सेनाजित्साम्प्रत चापि एता व भुज्यते समा ।
श्रु तआयस्तु वर्षाणि चत्वारिंशद्भविष्यति ॥१५६
महावाहुर्महाबुद्धिमहाभीमपराक्रमः ।
पञ्चविंशतु वर्षाणि मही पालयिता नृप ॥१६०
यहां पर भविष्य के शासानी के द्वारा यह मनुवश इतोक उदाहृत रिया
गया है कि इक्ष्वाकुमो का यह वश सुमित्र के अन्त तक ही होगा। मुमित्र राजा
को मात करके कलियुग में सरणा को प्राप्त करेगा । यह इतना ऐन का मानव
उदाहृत लिया गया है ।।१५३।। इमवे मागे मागधय वृहद्रयो का वर्णन करूंगा
जो सहदेव के पन्वय में जरासप के वश मे राजा ये 1५४॥ जो व्यतीत होगये
मौर जो इस समय मे वर्तमान हैं तथा जो भविष्य म रामा होंगे मैं इन सबको
प्राधान्य रूप से बताऊँगा। बताने वाने मुझमे इन सबमा ज्ञान प्राप्त परी
॥१५॥ उस भारत मग्राम मे महदेव निपानित होगपा था। उसला पुत्र
राजपि सोमाधि हुमा उमने गिरि व्रज म अट्ठावन वर्ष पर्यंत राग्य रिया था
फिर धीमठ वर्ष तक उसका पुत्र शुनना नाम वाला हमारा प्रयुनाए ने छोर
वर्ष राज्य किया था। निरामिर सो पता राग्य करके दिम हुमाया
।।१५६-१५७॥ पचाम पौरई पपन पता गुात मे दम भूमि को पास
रिया पा । तेईस व गृहकर्मा ने राम शासन किया था ॥१५॥ ग समय
सेनजित म भूमएडा को भोग रहा है। प्राध्यय धामीम पर ता भाग्य में
३५३ अनुपन पाद समाप्ति ] राज्य शासन करेगा ।।१५।। महान् बुद्धि वाला मौर महान् भीम पराक्रम धाला महावायु नृप पंतीम वर्ष तक भूमि का पालक होगा ॥१६०॥ अष्टपञ्चाशत चाब्दान् राज्ये स्थास्यति वै शुचि । अष्टाविंशत्समा पूर्णा. क्षेमो राजा भविष्यति ॥१६१ भुवतस्तु चतु पष्टीराज्य प्राप्स्यति वीर्यवान् । पञ्चवर्षाणि पूर्णानि धर्मनेत्रो भविष्यति ।।१६२ भोक्ष्यते नृपतिश्च व ह्यष्टपञ्चाशत समाः। अष्टाविंशत्समा राज्य सुव्रतस्य भविष्यति ॥१६३ चत्वारिंगद्दशाष्टौ च दृढसेनो भविष्यति । प्रयस्त्रिशतु वर्षाणि सुमति प्राप्स्यते तत ॥१६४ द्वाविंशतिसमा राज्य सुचलो भोक्ष्यते तत । चत्वारिंशत्समा राजा सुनेत्रो भोक्ष्यते तत ।।१६५ सत्यजित्पृथिवीराज्य त्र्यशीति भोक्ष्यते समा । प्राप्येमा वीरनिवापि पञ्चनिगद्भविष्यति ।।१६६ परिश्रयस्तु वरिण पञ्चाशत्प्राप्स्यते महीम् । द्वारिंशच नृपा ह्म ते भवितारो वृहद्रथा ।।१६७ पुनि नाम वाला राजा महावन वर्ष ता गग्य में स्थित रहेगा पौर होम नामधारी राजा भट्टाईम वर्ष तर होगा ।।१६१॥ वीर्यवान् भुवन चीमठ वर्ष सर राज्य को प्राप्त करेगा। पूरे गौच वर्ष तक धर्मनेत्र राजा रहेगा ॥१२॥ भट्टावन वर्ष तर नाति हम भूमि का उपयोग करेगा । महतीस वर्ष तर मुन पाराग्य होगा ॥१६॥ चालीम दश और पाठ वर्ष तक हदगेन राजा होगा। सेतीम वर्ष पनि गिर गुमति नाम वाला भूमि को प्राप्त करेगा ॥१६॥ इगो उगल बाईम वर्ष तर मुवन नाम वाला भूमि के गायन का उपभोग रेगा। पालीम वर्ष तक गुनेत्र भूमएहन रा भोग करेगा ॥१५॥ गरपत्रिन रामसिमी व परंन भूमि भोग परेगा । frर इस भूमि को प्राप्त करणे भीम यावीररित गया होगा। १९९० परिचय गरा पाम पता - ३५४ ] [ दायु पुराण इम भूमण्डल पर शासन करेगा। ये बत्तीस राजा बृहद्रथ नाम वाले इस भूमि पर होगे।॥१६॥ पूर्ण वर्षसहस्र वै तेपा राज्य भविष्यति । वृहद्रथेप्वतीतेषु वीतहोनेपु वतिषु ।।१६८ मुनिक स्वामिन हत्वा पुत्र समभिपेक्ष्यति । मिषता क्षत्रियारणा हि प्रद्यातो मुनिको बलात् ।।१६६ सवै प्रणतसामन्तो भविध्ये नयवस्जित । प्रयोविंशत्समा राजा भविता स नरोत्तम ॥१७० चतुर्विशत्समा राजा पालको भविता तत । त्रिशाखयूपो भविता नृप पञ्चाशती समा ॥१७१ एकनिशत्समा राज्यमजकस्य भविष्यति । भविष्यति समा विशत्तरमुतो पत्तिवर्द्धन ।।१७२ अष्टाविंशच्छत भाव्या प्राद्योता पञ्च ते सुता । हत्वा तेपा यश कृत्स्न शिशुनाको भविष्यति ॥१७३ वाराणस्या सुतस्तस्य सप्राप्स्यति गिरिव्रजम् । शिशुनावस्य वर्षाणि चत्वारिंशद्भविष्यति ॥१७४ शववरण सुतस्तस्य पटग्रिशच्च भविष्यति । ततस्तु विशति राजा क्षेमवर्मा भविष्यति ॥१७५ अजातशत्रुभविता पञ्चविंशत्समा नृप । चत्वारिंशत्समा राज्य क्षत्रीजा प्राप्स्यते तत ॥१७६ पूरे सौ वप पयन्त उनका राज्य होगा। वृहदपी के व्यतीत हो जाने पर पौर वीत होत्रो को समाप्त होने पर मुनिव स्वामी यो मारवर पुत्र मा पनि पेश करेगा । क्षत्रियों को हटाकर मुनिक वसपूवर राज्य को छीन लेगा ॥१६८ १६वहनयनित प्रगत समस्त भविष्य मनरोतम तेईस वपसा गत्रा होगा ॥१७॥ पिर इगरे उपरान्त पाना नाम वाला इस भूमि का राजा होगा । विगावयूप नाम वास पचास वप त राजा होगा ||१७१।। इनौग वानर यहा पर प्रजय का राज्य होगा । पिर उसके पुत्र प्रतिवदन वा राम्प अनुपन पाद समाति ] बीस वर्ष तक रहेगा ॥१७२॥ वे पाँच प्राद्योत पुत्र अडतीस सौ वर्ष तक होगे फिर उनके समस्त यश को समाप्त कर शिशु नाक वाना राजा होगा ॥१७३।। उसका पुत्र वाराणमी मे गिरिवज को प्राप्त करेगा। शिशु नाक का राज्य चालीस वर्ष तक होगा ॥१७४॥ उसका पुत्र शक वर्ण छत्तीस वर्ष पर्यन्त राज्य करेगा। फिर इसके उपरान्त क्षेम वर्मा बीस वर्ष तक राज्य शासन करेगा ॥१७॥ पच्चीस वर्ष तक इसके पश्चात् प्रजात शत्रु नामधारी राजा रहेगा। फिर चालीस वर्ष पर्यन्त क्षत्रीजा इस राज्य को प्राप्त करेगा ॥१७॥ अष्टाविंशत्समा राजा विविसारो भविष्यति । पञ्चविंशत्समा राजा दर्शवस्तु भविष्यति ॥१७७ उदायी भविता तस्मात्ययस्त्रिशरसमा नृप । स वै पुरवर राजा पृथिव्या कुसुमाह्वयम् । गङ्गाया दक्षिणे कूले चतुर्थेऽन्दे करिष्यति १७८ द्वाचत्वारिंशत्समा भाव्यो राजा भै नन्दिवर्द्धन चत्वारिंशत्रयञ्चत्र महानन्दी भविष्यति ॥१७६ इत्येते भवितारो मै दोशुनाका नृपा दश । गतानि श्रीणि वर्षाणि द्विपप्टयभ्यधिकानि तु ॥१८० शशुनाका भविष्यत्ति तावत्वाल नृपा परे । एते साद्धं भविष्यन्ति राजान क्षत्रवान्धवा ॥१८१ ऐवाकवाश्चतुविशत्पाञ्चाला पञ्चविंशति । कालकास्तु चतुविशचतुविशत्तु हैहया ॥१८२ द्वात्रिशद वलिङ्गास्तु पञ्चविंशत्तथा शया । वुरवश्वापि पड्विशदष्टाविंशति मैथिला ॥१८३ सूरदशेनास्त्रयोविंशद्वीतिहोत्राश्च विशतिः । तुरयकाल भविध्यन्ति सर्व एव महीक्षित. ॥१८॥ महानन्दिमुतश्चापि शूद्राया वालमत. । उतात्म्यते महापद्म मात्रान्तरे गप ॥१५५ ३५६ । [ वायु पुराण तत प्रभृति राजानो भविष्याः शूद्रयोनय । एकराट् स महापद्य एकच्छत्रो भविष्यति ॥१८६ अष्टाविंशतिवर्षाणि पृथिवी पालयिष्यति । सर्वक्षवत्तोघृत्य भाविनोऽर्थस्य वै वलात् ॥१८७ अट्ठाईस वर्ष तक विविमार यहाँ का राजा होगा। इसके पश्चात पच्चीस वर्ष तक दर्शक राजा होगा ॥१७॥ वह राजा इस भूमि पर कुसुम नाम वाला एक श्रेष्ठ मगर गङ्गा के दक्षिण तट पर चौपे वर्ष मे बनायेगा ॥१६८॥ नन्दि वर्द्धन राजा बयालीस वर्ष तक रहेगा। फिर तालीस वर्ष तक रहेगा । फिर तैतालीस वर्ष तक महानदी राज्य करेगा ।। १५६।। ये इतने रोशुनाक नाम वाले दश राजा होंगे । दर्शगुनार राजा लोग तीन सौ बासठ वर्ष तक रहेगे तावत्काल तक दूसरे राजा होगे और वे इनके माथ क्षत्रवन्धु राजा होंगे ।१८०-१८१॥ ऐक्ष्वाकु राजा चौवीस और पाञ्चाल पच्चीस तथा कालक चौबीस एष हैहय चौबीस होंगे ॥१८२॥ कलिङ्ग नामधारी राजा सत्या में बत्तीस होंगे तथा शक जाति वाले पच्चीस होंगे । कुख भी श्वीस होगे और मैथिल राजा अट्ठाईस होंगे ।।१८३॥ शूरसेन नाम वाले तेईम होंगे और वीति होत्र नामक राजा सख्या में बीम शासन करेंगे । ये सभी महीप तुल्य काल ही मे होगे ॥१८४॥ महानन्दि का पुत्र काल मवृत शूद्रजाति की सती मे उत्पन्न होगा । महापम नृप सर्वक्षत्रान्तर मे होगा ॥१८५।। इससे ग्रादि लेकर शूद्र योनि वाले राजा होगे महापद्म एकराट् औरच्छत्र राजा होगा ॥१८६॥ यह मट्ठाईस वर्ष तक पृथिवी का पालन करेगा और समस्त क्षत्रियो से हृत का उद्धार करके भावी प्रर्थ का बल से उपभोग करेगा ॥१८॥ सहस्रास्तत्सुता ह्यष्टौ समा द्वादश ते नृपा.! महापद्मस्य पर्याय भविष्यन्ति नृपा क्रमात् ॥१८॥ उद्धरिष्यति तान् सर्वान कौटिल्यो वै हिरष्टभि. । भुक्त्वा मही वर्षयत नन्देन्दु स भविष्यति ॥१८६ चन्द्रगुप्त नृप राज्ये कौटिल्य स्थारयिष्यति । चतुर्विशत्समा राजा चन्द्रगुतो भविष्यति ॥११० मनुषङ्ग पाद ममाति ] [ ३५७ भविता भद्रसारस्तु पञ्चविंशत्समा नृप । पड्विशत्तु समा राजा ह्यशोको भविता नृपु ||१६१ तस्य पुत्र कुनालस्तु वर्षाण्यष्टौ भविष्यति । पुनालसूनुरप्टौ च भोक्ता वै वन्धुपालितः ।।१९२ बन्धुपालितदायादो दशमानीन्द्रपालित । भविता सप्तवर्षारिण देववर्मा नराधिपः ।।१६३ राजा शतधरश्वाष्टो तस्य पुत्रो भविष्यति । वृहदश्वन वर्षारिण सप्त वै भविता नृपः ॥१६४ इत्येते नव भूपा ये भोध्यन्ति च वसुन्धराम् । सप्तविंगच्छतं पूर्ण तेभ्यस्तु गोभविष्यति ।।१६५ उग राजा के एक महय पुत्र होंगे वे आठ वर्ष तक बारह राज्य महा- पपरे पर्याप में कम मे शासन बरंगे ॥१८॥ दो और पाठ के द्वारा उन मामोटिल्य उसार मरेगा। वह मो वर्ष तक इस भूमि के मुख का उपभोग पर नन्देन्दु हो जायगा ॥१८९l कौटिल्य पर्षात् चाणक्य राज्य शासन में सरगुप्त चोपोर वर्ष पनि मामा रहेगा ॥१६०॥ मद्रमार तो सचीस वर्ष पर राम होगा। फिर एबीम वर्ष तक मानवों पर राजा प्रभोजमा शासन रहेगा ॥१९११ उम मप्राट् पशोर का पुत्र कुनाल तो देवल माठ ही वर्ष तक मोरमोग करेगा । फिर इस कुनास का पुत्र बन्युरालित नाम वाला पाठ पर्प Cr भूमिमा भोना रहेगा ॥१६२॥ बन्धुपालित का दायाद इन्द्रालित दस वर्ष तक रहेगा। फिर इमरे पश्चात् देव ममं नरापिष्ट सात वर्ष तक शामन करेगा uttn गप पुत्र राम पर पाठ वर्ष पर्यन्न होगा। वृहरप गाल वर्ष राहेगा ॥१४॥ सने ये नौ राजा इन गुन्धरामा मोग परेंगे। पूरे एक गोपीग व ता यह पृषी उन उपभोग के पिये रहेगी ॥१६॥ पुमित्रानु मैनानीग्दपृश्य यं वृहदपम् । मारपियति राम्प ममा पष्टि गवतु ।।१९६ पुषमित्रमुगामाटो भरिपनि रामा ना। भाषा पापिनट मनपाणि सर १७ -
३५८ ]
[ वायु पुराण
वमुमित्र मुनो भाव्यो दशवर्णगि पार्थिव ।
ततो ध्रव समा द्वे तु भविष्यति सुतश्च वै ॥१६८
भविष्यन्ति समास्तस्मात्तिस्र एव पुलिन्दवा ।
राजा घोपसुतश्चापि वर्षाणि भविता वय १EE
ततो वं विमिनस्तु समा राजा तत पुन ।
द्वात्रिंशद्भविता चापि समा भागवतो नृप ॥२००
भविष्यति मुतस्तस्य क्षेमभूमि समा दश ।
दर्शते तुङ्गराजानो भोयन्तीमा वसुन्धराम् ।।२०१
शत पूर्ण दश द्वच तेभ्य दिवा गमिष्यति ।
अपायिवसुदेवन्नु वाल्याद्यसनिन नृपम् ॥२०२
देवभूमिस्ततोऽन्यच शृङ्गयु भविता नृप ।
भविष्यति समा राजा नव कण्ठायनस्तु स ॥१०३
भूतिमित्र सुतस्तस्य चतुविशद्भविष्यति।
भविता द्वादश समास्तस्मानारायणो नृप ।।२०४
सेनानी
पुष्प मित्र वृहद्रप का उद्धार करके साठ वर्ष तक सदैव राज्य
शासन करायेगा ॥१६६। पुष्पमित्र के पुत्र पाठ वर्ष तक राजा होंगे। उनम
जो सबसे बड़ा है वह सात वर्ष तक राम का शासन करेगा ॥१६॥ वमुमित्र
पुत्र दश वर्ष तक इस भूमि का राजा होगा। इसके पश्चात् सुन भ्रक दो वर्ष
तक शासन होगा ॥१९८।। इससे सीन पुलिदक राजा होंगे। राजा घोर सुन
तीन वर्ष तक रहेगा ॥१९इमके मनन्तर विवामित्र राजा होगा फिर भाग
वत राजा बत्तीम बर्ष तक उपभोग करेगा ॥२०॥ भागवत राजा का पुत्र
क्षेम भूमि नाम वाला दस वर्ष पर्यत इस भूमण्डल का भोग करेगा । ये दश
तुङ्ग नामधारी राजा इस वमुघरा का सुखोपभोग करेंगे ॥२०१॥ अथवा एक
सौ बारह वर्ष तक यह वचपन से व्यासजी अपार्थिव सुदेव नृप की यह रहेगी
॥२०२।। इसके पश्वात् एक अय देवभूमि नृप शृङ्गो मे होगा । वह पएठायन
राजा सौ वर्ष तक रहेगा ॥२०३।। उसका पुत्र भूतिमित्र होगा और वह चौबीस
।
अनुपङ्ग पाद समाप्ति ]
वर्ष तक भूमि का शासन करेगा । उससे फिर नारायण नाम वाला राजा
बारह वर्ष तक भूमि का भोग करेगा ॥२०४॥
सुशर्मा तत्सुतश्चापि भविष्यति समा दश ।
चतुरस्तुङ्गकृत्यास्ते नृपाः कण्ठायना द्विजा.॥२०५
भाव्या प्रगतसामन्ताश्चत्वारिशच्च पञ्च च।
तेपा पर्यायवाले त तरन्धा तु भविष्यति ।२०६
वण्ठायनमघोधृत्य सुशाण प्रसह्य तम् ।
शृङ्गाणा चापि यञ्चिष्ट क्षययित्वा बल तदा ।
सिन्धुको धन्ध्रजातीय प्राप्स्यतीमा वसुन्धराम् ।।२०७
प्रयोविशत्समा राजा सिन्धुको भविता त्वथ ।
अष्टो भातश्च वर्षाणि तस्माद्दश भविष्यति ॥२०८
थीसातवणिर्भविता तस्य पुनस्तु वै महान् ।
पञ्चाशत समा. पट् च सातकरिणभविष्यति ॥१०६
मापादवदो दश वे तस्य पुत्रो भविष्यति ।
चतुविशत्तु वरिण पट् समा व भविष्यति ॥२१०
भविता नेमिकृष्णस्तु वाणा पञ्चविशतिम् ।
तत सवत्सर पूर्ण हालो राजा भविष्यति १११
उसका पुष गुपी नामधारी दश वर्ष तर रागा होगा । हे द्विजवृन्द ।
पे पार परायन नुङ्गाय राजा होगे ॥२०६॥ गंगालीरा प्रणन सामन्त होगे।
उनरे पर्याय बाल म तरन्या होगा ॥२०६॥ बरएठायन मुगर्मा को वपूर्वक
उदातर मौर शगो का जो भी कुछ रोप पा उम बल को क्षीण पर
मान्न जाति वाला सिन्धुर नामा राजा इम वसुन्धरा को प्राप्त करेगा ॥२०॥
गो पनगर वह गिगुरु तेग यपंता राम पा शामा नृप होगा । शिर
भात अदारह वर्ष ता रहेगा ॥२०॥ उमा महान पुत्र श्री माताणि पपन
वर्ष पर्यन राय-शामारने वाला होगा ॥२०६॥ दा पापार बद उगा
पुग होगा। वह तीस वर्ष यहाँ भूमि । रारा हागा ॥२१॥ शिर नेमि
प्ति नाम वाला पम्चीग पर्ष सा गा रहेगा। पिर पूरे पर वर्ष
'हाम'-ग नाम दासा गया होगा ॥२१॥
३६० ]
[ वायु पुराण
पञ्च सप्तर राजानो भविष्यन्ति महावला ।
भाव्य पुत्रिकपेणस्तु समा सोऽप्येकविशतिम् ॥२१२
सातवरिपर्वपमेव भविष्यति नराधिपः ।
प्रविशतु वर्षारिण शिवस्वामी भविष्यति ॥२१३
राजा च गौतमीपुत्र एकवियत्समा नृषु ।
एकोनविशति राजा यज्ञश्री सातकण्यथ ।।२१४
पडेव भविता तस्माद्विजयस्तु समा नृप ।
दण्डश्री सातकर्णी च तस्य पुनः समास्त्रय ।।२१५
पुलोवापि समा सप्त अन्येषाञ्च भविष्यति ।
इत्येते व नृपास्त्रिशदन्ध्रा भोक्ष्यन्ति ये महीम् ॥२१६
समा शतानि चत्वारि पन्च पड़ वै तथैव च।
अन्ध्रारणा सस्थिता पञ्च तेपा बशा समा पुन ।।२१७
सप्तव तु भविष्यन्ति दशाभीरास्ततो नृपा ।
सप्त गर्दमिनश्चापि ततोऽथ दश वैशका ॥२१८
यवनाटो भविष्यन्ति तुषारास्तु चतुर्दश ।
त्रयोदश गरण्डाश्च मौना ह्यष्टादशैव तु २१६
अन्ध्रा भोक्ष्यन्ति वसुधा शते द्वे च शत च वै।
शवानि त्राण्यशीतिञ्च भोक्ष्यन्लि वसुधा शवा ॥२२०
पञ्च सप्तका महान बलवार राजा होगे । एक पुत्रिकर्षण होगा वह भी
एक और बीस वर्ष तक राजा रहेगा ॥२१२॥ सातकणि एक ही वर्ष तक
नराधिप होगा। मट्ठाईस वर्ष तक शिव स्वामी राजा होगा ॥२१३|| गौतमी
पुत्र नाम वाला राजा मनुष्यो पर इक्कीस वर्ष पयन्त शासन करेगा । उन्नीम
वर्ष तक राजा यज्ञ श्री और इसके अनन्तर सातकरिण होगा ॥२१५।। उमसे
फिर छ ही राजा होगे। विजय-दएड श्री और सातकरिण उसके ये तीन पुत्र
होंगे ॥२१५।। सात वर्ष तक पुलोवापि होगा और दूमगे का भी होगा। ये
तीस पन्ध्र राजा इस मही का भोग करेंगे ॥२१॥ चार सौ ग्यारह उन
प्रन्ध्रो के समान पाँच वश मस्थित होंगे ॥२१७॥ सात ही दशाभीरद नृप होंगे ।
'अनुरङ्ग पाद समाति ] [ ३६१ साल मई भी होगे फिर इनके पश्चात् दश शक होगे ॥२१॥ पाठ यवन राजा होंगे फिर चौदह तुपाद नाम वाले राजा होगे । तेरह गरूड पोर इनके परचाह अठारह मौन होगे ॥११६॥ तीन मौ वर्ष तक अन्न शानि वाले लोग इस वमुधा का भोग परेंगे और फिर तीनसौ अस्मी वर्ष तक पक जाति वाले इम मुन्धरा का भोग करेंगे ॥२२०11 प्रशीतिश्च व वरिण भोक्तारो यवना महीम् । पञ्चवर्षशतानीह तुपाराणा मही स्मृता ।।२२१ शतान्यद्ध चतुर्थानि भवितारस्त्रयोदश । गरण्डा श्रेपल सादभाव्यान्याम्लेच्छजातय १२२२ दानानि श्रोणि भोक्ष्यन्ति म्लेन्छा एकादशव तु। तच्छन्नेन च कालेन तत कोलिविला वृपाः ॥२२३ ततः कोलिकिलेभ्यश्च विन्स्यशक्तिभविष्यति । समा पति ज्ञात्वा पृथिवी च समेष्यति ॥२२४ वृपान् दिशकावापि भविष्याश्च निचोधत । दोपस्य नागराज्यस्य पुत्र स्वरपुरञ्जय ॥२२५ भोगी भविष्यते राजा नृपो नागवुलोदह । सदाचन्द्रस्तु चन्द्राशो द्वितीयो नखवास्तया ॥२२॥ धनधमा ततश्चापि चतुर्थो विराज रभृत । भूतिनन्दस्ततश्चापि यदेने तु भविष्यति ॥२२५ प्रड्डाना नन्दनस्यान्ते मघुनन्दिविष्यति । तस्प माता यवीयास्तु नाम्ना नन्दिपर विन ।।२२८ सस्यान्वये भविष्यन्ति राजानस्ते त्रयस्तु में। दोहित शिशुको नामपुरिसाया नृपोऽभवत् ।।२२६ विघ्यशक्तिमुतत्रापि प्रवीरो नाम वीर्यवान् । भाष्यन्ति च ममा पष्टिं पुरी काचनकास 1॥२३० यस्यन्ति वाजपेयश्च ममाप्तवरदभियं । तस्य पुमास्तु चरवारो भविष्यन्ति नराधिपा २१ ३६२ ] [ वायु पुराण विन्ध्यवाना कुलेऽतीते नृपा वै वालिकास्त्रय । सुप्रतीको नभीरस्तु समा भौक्ष्यति त्रिशतिम् ।।२३२ अस्सी वर्ष तक यवन लोग इस मही को भागेंगे। यहां पांच सौ वर्ष तक तुसारों की यह भूमि कही जायगी ।।२२।। अर्द्ध चतुर्थ सौ वर्ष तक तेरह मरुएड वृपला के साथ होगे जो अन्य म्लेच्छ जाति वाले होगे ॥२२२।। ग्यारह म्लेच्छ तीन सौ वर्ष तक इस भूमि का भोग करेंगे। और उनके अन्तकाल में कोलिक्लि वृष होगे ।।२२३।। फिर उन कोलिकिलो से विध्य शक्ति होगा। छयानवे वर्ष तक पृथिवी को ज्ञान प्राप्त करके पायेगा ॥२२४।। भव वृषों को और दिशको को जोकि आगे होने वाले है भली मांति समझ लो । नागराज शेप का पुत्र स्वरपुरञ्जय नाग कुलका उद्वहन करने वाला भोग करने वाला राजा होगा । चन्द्राश सदाचन्द्र पौर दूसरा नखवान है ।।२२।। इसके बाद धनधर्मा और चौया विंशज कहा गया है । इसके पश्चात् भूतिनन्द जोकि देश में होगा ॥२२७।। भगो के नन्दन के अन्त मे मधुनन्दि राजा होगा । उसका छोटा भाई नन्दियश नाम वाला है ।।२२८।। उसके अन्वय मे (वश में) तीन राजा होगे। शिशुक नाम वाला दौहित्र तुरिसा मे राजा होगा ॥२२॥ निध्य शक्ति का पुत्र वीर्य वाला प्रवीर नामधारी होगा और साठ वर्ष तक काञ्चनका पुरी का भोग करेंगे ॥२३०॥ वे श्रेष्ठ दक्षिणा देकर समाप्त करने वाले वाजपेयो के द्वारा यजन करेंगे। उसके चार पुत्र नराधिप होगे ॥२३॥ विन्ध्यको के कुल के व्यतीत होजान पर तीन बालीक राजा होंगे। सुप्रतीक नभीर तो तीस वर्ष तक पृथ्वी का भोग करेगा ॥२३२॥ शक्यमा नाम वै राजा माहिपीना महीपतिः। पुष्पमित्रा भविष्यन्ति पट्टमित्रास्त्रयोदश ।।२३३ मेवलाया नृपा सप्त भविष्यन्ति च सत्तमा । कोमलायन्तु राजानो भविष्यन्ति महायला ॥२३४ मेघा इति ममाम्याता बुद्धिमन्नो नवैव तु । नंपधा पार्थिवा सर्वे भविष्यन्त्यामनुक्षयात् ॥२३५ - अनुपग पाद समाप्ति ] नलवशप्रसूतास्ते वीर्यवन्तो महावला । मागधाना महावीर्यो विश्वस्फानिर्भविष्यति ॥२३६ उत्साद्य पार्थिवान सन्सिोऽन्यान् वर्णान् करिष्यति । कैवर्तान पञ्चकाचं व पुलिन्दान् ब्राह्मणास्तथा ।।२३७ स्थापयिष्यन्ति राजानो नानादेशेषु तेजसा । विश्वस्फानिमहासत्त्वो युद्ध विष्णुसमो चली ।।२३८ विश्वस्फानिनरपति क्लीवाकृतिरिवोच्यते । उत्सादयित्वा क्षनन्तु क्षत्रमन्यत् करिष्यति ।।२३६ देवान् पितृ श्च विप्राश्चा तयित्वा सकृत्पुन । जाह्नवीतीरमासाद्य शरीर यस्यते वली ।।२४० सन्यस्य स्वशरीरन्तु शकलोक गमिप्यति । नवनाकास्तु भोक्ष्यन्ति पुरी चम्पावती नृपा. ।।२४१ शक्यमा नाम वाला राजा माहिपिपो का महीपति होगा । पुष्पमित्र होगे और तेरह पट्टमित्र होगे ॥२३३॥ मेकला में सात श्रेष्ठतम राजा होगे । कोमला मे तो महान बन वाले राजा होमे ।।२३४॥ मेघ इस माम से समाख्यात होने चाले नो बुद्धिमान् राजा होगे । मनुक्षय पर्यन्त सत्र नपध पार्थिव होंगे ॥२३५।। वे सव नल के वश मे उत्पन्न वाले महान् बलवान् और वीर्य वाले राजा होंगे। मामधो में विश्व स्फानि नाम वाला महान् वीर्य बाला राजा होगा ।।२३६॥ वह समस्त पायिवो को उत्मादित परके प्रम्य वरों को करेगा। संवत्तों कोपञ्चको को-पुलिन्दको तथा ब्राह्मणो को अनेक देगो म तेज से राजामो को स्थापित करेंगे । विश्वस्फानि महान् मत्व वाला और युद्ध मे विष्णु के समान बली पा ॥२३७-२३८॥ विश्वम्फानि जो राजा होगा वह क्लीव के समान माकृति वाला कहा जाता है । क्षत्र को उत्मादित करके प्रत्य पत्र को करेगा ॥२३६।। यह चली देवो को-पितरो को और ब्राह्मणो फिर एक बार तृप्त करके अन्त के तट पर पहुंच कर शरीर को त्याग करेगा ॥२४०॥ अपने शरीर का त्याग कर फिर इन्द्र के लोग को चला जायगा । बद नाक रादा चम्पावती पुरी पा भोग करेंगे ॥२४॥ मे [ वायु पुराण मथुराञ्च पुरी रम्यां नागा भोक्ष्यन्ति सप्त नै । अनुगङ्ग प्रयागञ्च साकेत मगधास्तथा । पताञ्जनपदान् सर्वान् भोक्ष्यन्ते गुमवशजा ॥२४२ निधान् यदुकाश्च व शंशीतान् कालतोपकान् । एताजनपदान् सर्वान् भोक्ष्यन्ति मणिधान्यजा ।।२४३ कोशलाश्चन्ध्रपौण्ड्राश्च ताम्रलिप्तान् ससागरान् । चम्पा चंव पुरी रम्या मोक्ष्यन्ति देवरक्षिताम् ॥२४४ कलिङ्गा महिपाश्चैव महेन्द्रनिलयाश्च ये। एताञ्जनपदान् सर्वान् पालयिष्यति वै गुह ॥२४५ स्त्रीराष्ट्र भक्ष्यकाश्चय भोक्ष्यते कनकाह्वय । तुल्यकाल भविष्यन्ति सर्वे ह्य ते महीक्षित ॥२४६ अल्पप्रसादा ह्यनृता महाक्रोधा हवामिका.। भविष्यन्तीह यवना धर्मतः कामतोऽर्थतः ॥२४७ नैव मूर्धाभिपिक्तास्ते भविष्यन्ति नराधिपा । युगदोपदुराचारा भविष्यन्ति नृपास्तु ते ॥२४८ स्त्रीणा बलवधेनैव हत्वा चंव परस्परम् । भोक्ष्यन्ति कलिशेपे तु वसुधा पार्थिवास्तथा ॥२४६ परम रम्य मथुरा नगरी को सात नाग उपभोग करेंगे। गङ्गा के साथ- साग प्रयाग-मावेत तथा मगध देशो को-इन जनपदो को सबको गुप्त वश मे उत्पन्न होने वाले नृप भोग करेगे ॥२४२॥ परिणवान्यज लोग निषध देशो को- यदुको को-शंशीतो को-काल तोपको को-इन समस्त जनपदो को भोग करेंगे कलिङ्ग-महिप और जो महेन्द्र निलय हैं वे कोशल देशों को-प्रान्ध्र पौएडो को- साम्रलिप्तो को सागरों के सहित तथा सुरम्य चम्पा नगरी जोकि देवों के द्वारा मुरक्षित है, भोग करेंगे इन समस्त जनपदों को गुह पालन करेगा ॥२४४-२४५।। भनक नाम वाला स्त्री राष्ट्र पोर भक्ष्यको का भोग करेगा। ये समस्त राजा सुन्य काल में ही होगे ॥२४६।। यहाँ पर धर्म में और काम से अन्य प्रमाद वाले- भूठे-महान् क्रोध करने वाले और प्रधार्मिक यवन होगे ॥२४०॥ ये राजा मूर्स- बनुषङ्गपाद समाप्ति ] भिषिक्त नहीं होगे। वे समस्त नृप युग के दोपो से दुराचार वाले होंगे ॥२४॥ पे समस्त राजा स्नियो का बलपूर्वक वध के द्वारा भापम मे हनन करक पलियुग के शेप में वसुधा का भोग करेगे ॥२४६।। उदितोदितवशारते उदितास्तमितास्तथा। भविष्यन्तीह पर्याये कालेन पृथिवीक्षित ॥२५० विहीनास्तु भविष्यन्ति धर्मत कामतोऽर्थत । तैविमिथा जनपदा म्लेच्छाचाराश्च सर्वश ॥२५१ विपर्ययेन वर्तन्ते नाशयिष्यन्ति व प्रजा । लुब्धानृतरताश्च व भवितारस्तदा नृपा ॥२५२ तेपा व्यतीते पर्याये बहुस्त्रीके युगे तदा । लवातिलव भ्रश्यमाना प्रायूरूपवलश्रु ते ॥२५३ तथा गतास्तु वै काष्टा प्रजासु जगतीश्वरा । राजान सम्प्रणश्यन्ति कालेनोपहतास्तदा ।।२५४ कल्किनोपहता सर्वे म्लेच्छा यास्यन्ति सर्वश । अधार्मिकाश्च तेऽत्यर्थ पापण्डाश्च व सर्वश ॥२५५ प्रनष्ट नृपशब्दे च सन्ध्याश्लिप्टे क्लौ युगे। किञ्चिच्छिष्टा प्रजास्ता वै धर्म नष्टेपरिग्रहा ।।२५६ समय के प्रभाव से राजा लोग उदितोदित वश वाले तथा उदितास्त- मित यहाँ पर्याय मे होगे ॥२५०॥ ये ममस्त काम से भोर अर्थ मे विहीन होंगे। उनके द्वारा विशेष रूप से मिश्रित म्लेच्छो के समान आचार करने वाले सभी प्रकार से दूपित जनपद हो जायगे ॥२५१।। ये सभी विपरीत व्यवहार करते हैं तथा हर प्रकार से प्रजापो का नाश करेगे। उस समय में राजा लोग लोभी पौर मिया मे रति करने वाले हो जायगे ॥२५२॥ उनके पर्याय के व्यनीत हो जाने पर और उस समय में बहुत स्त्रियो वाले युग मे क्षण मे क्षण में प्रायु- रूप-वल मोर थुत सभो भ्रश्यमान हो जायगे ।।२५३|| इस प्रकार से प्रजामो के विषय मे परम सीमा को प्राप्त हुए राजा लोग उस समय कालवश सब उप- हत होते हुए नष्ट हो जायगे ॥२५४॥ समस्त नेच्छगण कल्कि के द्वारा सद । वायु पुराण पोर मे उपहन होंगे। वे मभी परम अधाम्मिा और सब सरह से पाप एट युक्त होंगे ॥२५॥ कनियुग सम्या लिष्ट होने पर 'नुग'--यह मन ही प्रष्ट हो जायगा जे दुध यो गी प्रथा शेष रहेगी वह भी धर्म क नष्ट हो जान पर पिना परिग्रह वाली हो जायगी ॥२६॥ मसाधना हताश्वान व्याधिशोकन पीडिता। अनावृष्टिहताश्च व परस्परवधेन च ॥२५७ मनापा हि परित्रस्ता वार्तामुत्मृज्य दुखिताः। त्यक्त्वा पुराणि प्रामाश्च भविष्यन्ति वनौवस ॥२५८ एव नृपेषु नष्टेपु प्रजास्त्यवत्वा गुहाणि तु । नप्टे स्नेहे दुरापमा घटस्नेहा सुत्हनना ॥२५६ वधिमपरिभ्रष्टा सवरं पोरमास्थिता । सरित्पवंतसेविन्यो भविष्यन्ति प्रजास्तदा ॥२६० सरितः सागगनूपान् सेवन्ते पर्वतानि च । मङ्गान् वलिङ्गान् वङ्गाश्च वाश्मोरान् वाशिकोशलान् ।।२६१ पिवान्तगिरिद्रोणी सायप्यन्ति मानवा । वृरस्न हिमवतः पृष्ठ कूल हि लवरणाम्भस ॥२६२ अरण्यान्यभिपत्स्यन्ति वार्या म्लेच्छजन सह । मृगौनविहङ्गश्च श्वापदस्ताभिस्तया। मधुशाफ्लम लवत्तयिष्यन्ति मानवा ॥२६३ समस्त प्रजा साधनों से यूप-हताश्वास और व्याधि तथा शोक से परम पीडित-वर्षा के विलुल ही प्रभाव होने के कारण हत तया मापस में ही एक- दूसरों के वध करने मे अनाथ-भयभीत-रोगी का त्याग करके सत्पन्न ही दुसित प्रजाजन नगरो का तथा ग्रामो का त्याग करके वन मे निवास करने वाले जगली जैसे हो जायगे ॥२५७ २५८॥ इस प्रकार से समस्त नृपों के नष्ट हो जाने पर प्रजा अपने अपने घरो को त्याग करके स्नेह के नष्ट हो जाने पर दुरापन-भ्रष्ट स्नेह और मुहुजनों से रहित हो जायगी ॥२५६।। वर्णो नया माधमो से परिभ्रष्ट होते हुए घोर सद्दर अवस्था मे प्रास्थित, नदी तथा पर्वतो अनुपगपाद समाप्ति ] [ ३६७ के सेवन करने वाली उस समय समस्त प्रजा हो जायगी । २६०।। मनुष्य नदियो को-मागरो को-अनूपो गो और पर्वतो को सेवन करते है ! अङ्ग-वजयलिज काश्मीर-वाशि कोशलो दो सेवन करते हैं ०६ तथा मानव ऋशिकान्त गिरि द्रोणी का मथय ग्रहण करेंगे। पूरा हिमवान् पर्वत का पुत्र माग तथा धार ममुद्र का तट और अरएयो को यार्य लोग म्लेच्छो के साथ चले जायगे । मोर मानव मृग-मोन-विहङ्ग तथा श्वापद तथा तथगो से एक मधु-शार-पल- मूलो से अपना उदरपूर्ति का निर्वाह करेंगे ।।२६२ २६३।। चोर पञ्च विविध यल्पालान्यजिनानि च । स्वय कृत्वा विवस्यन्ति यथा मुनिजनो स्तथा ॥२६४ वीजान्नानि तथा निम्नेप्वीहन्त कापराड कुभि । अजैडक खरोष्ट्रञ्च पालयिष्यन्ति यलत ॥२६५ नदीर्वत्स्यन्ति तोयार्थे कूलमाश्रित्य मानवा । पार्थिवान् व्यवहारेण विवाधन्त परस्परम् ॥२६६ बहुमन्या प्रजाहीना शौचाचारविवजिता । एव भविष्यन्ति नरास्तदाधर्मे व्यवस्थिता ॥२६७ होनाद्धीनास्तथा धर्मान् प्रजा समनुवत्तते । आयुस्तदा त्रयोविश न कश्चिदतिवर्तते ॥२६८ दुर्वला विषयग्लाना जरया सपरिप्लुता । पत्रमूलफलाहाराचीरकृष्णाजिनाम्बरा ॥२६६ पीर-पर्ण (पत्ते) विविध प्रकार को पेडो की छाल और चमडी को स्वय काट कर मुनिजनो की भोलि धारण करेंगे ॥२६४॥ वीजानो को निम्न भागो काठ तथा शकुप्रो से इच्छा करते हुए अर्थात् निकाल कर प्राप्त करने की चेष्टा करते हुए बकरी-भेड-गधा उँटो को बडे यत्न मे पालेगे ॥२६१) मानव जल के प्राप्त करने के लिए नदियों के किनारे के निकट मात्रय ग्रहण कर वाम किया यरेंगे। व्यवहार ऐमा होगा कि उनके द्वारा परस्पर में राजामो को विशेष वाधा पहचायगे ॥२६६१ प्रपने भापको बहुत कुछ मारने वाले-मन्ननि से होन भौर शौच (शुद्धि) और प्राचार से रहित प्रधर्म में पूर्ण रूप से व्यव.
३६८ ] [ वायु पुराण स्थित रहने वाले ऐसे ही उस समय में मनुष्य हो पायगे। १२६७। इस समः मे प्रजा हीन से भी होन धर्मों का समनुवर्तन करेंगे । उस समय मे तेईस वर्ष की मायु को कोई भी पार नहीं करेंगे अर्थात् परमायु इतनी कम हो जायगी ॥२६॥ मनुष्य उस समय में प्रत्यन्त कमजोर हो जायगे मोर वह ऐसा भीषण समय यायेगा कि सभी विषयो मे लिप्स और जरा से (बार्ट फ्य से) सपरिप्लुत होंगे। पत्र-फल पौर मूली के प्राहार वाले होंगे तथा पीर कतीर और कृष्णाजिन के वस्त्र वाले हो जायगे ॥२६॥ वृत्त्यर्थमभिलिप्सन्तश्चरिष्यन्ति वसुन्धराम् । एतत्कालमनुप्राप्ताः प्रजा कलियुगान्तके ॥२७० क्षोणे कलियुगे तस्मिन् दिव्ये वर्षमहसके । निशेपास्तु भविष्यन्ति साद्ध कलियुगेन तु । ससन्ध्याशे तु नि शेपे कृत वै प्रतिपत्स्यते ॥२७१ यदा चन्द्रश्च सूर्यश्च तथा तिघ्यबृहस्पती। एकरात्रे भरियन्ति तदा कृतयुग भवेद ॥२७२ एप वपक्रम कृत्स्न कोतितो वो यथाक्रमम् । अतीता वर्तमानाश्च रार्थवानागताश्च ये ॥२७३ महादेवाभिपेकात्तु जन्म यावत्परिक्षित । एतद्वपंसहस्रन्तु ज्ञेय पञ्चादशदुत्तरम् ॥२७४ प्रमाण के तथा चोक्त महापद्यान्तर च यद। अन्तर तच्छतान्यष्टी पट्त्रिंशन्न समा स्मृता ॥२७५ एतत्वालान्तर भाव्या मन्ध्रान्ता ये प्रकीर्तिताः। भविष्यस्तत्र सहयाता पुराणजे श्रुतपिभि ।।२७६ सप्तर्षयस्तदा प्राहु प्रतोपे राज्ञि वै शतम् । सप्तविशे. शतर्भाव्या अन्घ्राणा ते त्वया पुन ॥२७७ माविशतिपय्यं ते कृस्ने नक्षत्रमण्डले । मायस्तु तिष्ठन्ति पर्यायेण शत शतम् । सप्तपणा युग ह्य तद्दिव्यया सवधया स्मृतम् ।।२७८ मनुषङ्गपाद समाप्ति । । ३६६ अपनी दृनि (रोजी) के लिये अत्यन्त ललायित होते हुए पृथ्वी पर विवरण रिया करेंगे। कलियुग के अन्त में समस्त प्रजा ऐसा समय प्राप्त करने वाले होगे ॥२७०।। दिव्य एक सहस्र वर्ष वाले कलियुग के क्षीण होजाने पर कलियुग के साथ ही सब नि शेप हो जायगे । सन्ध्या के सहित नि शेष होजान पर फिर कृतयुग की प्रामि होगी ।।२७१। जिस समय मे चन्द्र और सूर्य तथा विष्य मोर बृहस्पति एक ही दिन मे भर जायो तब कृतयुग का प्रारम्भ होगा ॥२७२।। मैंने यह वश का क्रम आप लोगो के सामने यथाक्रम वगित कर दिया है । जो व्यतीत हो चुके हैं और वर्तमान है तथा जो अनागत अर्थात् भविष्य में होने वाले है सबका पूरा वर्णन कर दिया है ।।२७३।। जन्म को पाशित महादेव के अभिषेक से जितना भी ममय है वह एक सहस पचास वर्ष जानना चाहिये ॥२७४।। इसका प्रमाण महापमान्तर में कहा गया है वह अन्तर पाटसो छत्तीस वर्ष कहा गया है ।।२७५।। यह कालान्तर मे जो अ.प्रान्त कहे गये हैं वे होगे। वहाँ पर होन वाले धूतपि पुगणो के ज्ञातायो के द्वारा सख्यात हुए हैं ॥२७६॥ उस समय में मप्लपियो ने वे प्रतीप राजा सौ वहे हैं और मापने अन्धो के सत्ताईस सो होने वाले वताये हैं ॥२७॥ सहविगति पर्यन्त पूरे नक्षत्र मण्डल में पर्याय से सौ सौ सप्तपिगण रहा करते हैं। यह युग दिव्य सम्या के द्वारा सप्तर्षियों का कहा गया है ।।२७८11 सा सा दिव्या रमृता पष्टिदिव्याह्नावं व मप्तभि तेभ्य प्रवर्नते कालो दिव्य सप्तपिभिस्तु ते ॥२७६ सप्तपरिणान्तु ये पूर्वा दृश्यन्ते उत्तरादिशि । ततो मध्येन च क्षेत्र दृश्यते यत्सम दिवि ॥२८० तेन सप्तपयो युक्ता या मोम्नि शत समा । नक्षत्राणामृपीरणाच योगस्यतनिदर्शनम् ।।२८१ समर्पयो मपायुक्ताः काले पारिक्षिते दातम् । अन्प्राशे स चतुनि भविष्यन्ति मते मम ॥२८२ इमास्तदा तु प्रकृतिापत्स्यन्ति प्रजा भृशम् । मनृतोपहता. सर्वा धर्मतः वामतोऽयंत २८३ ३७० ] [ वायु पुगर श्रौतस्मात प्रशियिले धर्म वर्णाश्रमे तदा । सङ्कर दुर्बलास्मान प्रतिपत्स्यन्ति मोहिता ॥२८४ ससक्ताश्च भविष्यन्ति शूद्रा साद्धं द्विजातिभि । ब्राह्मणा शूद्रयष्टार शूद्रा वै मन्त्रयोनयः ॥२८५ वह-वह दिव्य पष्टि कही गई है और सातो के द्वारा दिव्याह्न कहे गये हैं । उन सप्तपियो के द्वारा दिल्यकाल प्रवृत्त होता है ॥२७६॥ सप्तर्षिया के पहिले उत्तर दिशा में जो दिखलाई देते हैं और उसके मध्य से जो दिव म क्षेत्र दिखलाई देता है ॥२०॥ उससे माकाश म सौ वर्ष युक्त मपिगण जानने चाहिये । और भूपियो का तथा नक्षत्रो का जो योग है उसका यही निदर्शन होता है ।।२८१॥ पारिक्षित काल मे मघा से युक्त सो मतपिंगण हैं । वह मेरे मत में चौबीमवें अन्धाश में होगे ॥२२॥ उस समय ये प्रकृति बहुत अधिक प्रजा को प्राप्त करेगी। धर्म म और काम स तथा अर्थ से मभी प्रजा पन्त (मिथ्या) से उपहत होगी ॥२८॥ उस समय में श्रौत (वैदिक) तथा स्मात वों और ग्राश्रमो के धर्मों के विशेष रूप से शिथिल होजाने पर दुबल यात्मा वाले एव मोहका प्राप्त होजाने वाले मनुष्य सहरावस्था को प्राप्त हो जायगे ॥२८४।। शूद्र लोग द्विजातियो के साथ मसक्त हो जायगे । ब्राह्मण लोग तो शूद्रयष्टा हो जायगे और शूद्र लोग म योनि वाले हो जायगे ॥२८॥ उपस्थास्यन्ति तान् विप्रास्तदा व वृत्तिलिप्मव । लव लव भ्रस्यमाना प्रजा सर्वा क्रमेण तु ॥२८६ क्षयमेव गमिप्यन्ति क्षीणशेषा युगक्षये। यस्मिन् कृष्णो दिव यातस्तस्मिन्नेव तदा दिने ।।२८७ प्रतिपन कलियुगस्तस्य सङ्खधा निदोघत । सहस्राणा शतानीह त्रीणि मानुपसङ्ख्यया। पष्टिं चव सहस्राणि वारणामुच्यते वलि ॥२८८ दिव्ये वपसहस्रन्तु तत्सन्ध्याश प्रकीतितम् । नि शेपे च तदा तस्मिन् कृत चे प्रतिपत्स्यते ।।२८९ अनुषङ्ग पाद ममाप्ति ] [ ३७१ ऐल इक्ष्वाकुवंशश्च सह भेदः प्रकीनितौ । इक्ष्वाकोस्तु स्मृतः क्षत्र सुमित्रान्तं विवस्वतः ।।२९० ऐल क्षयं क्षेमकान्त सोमवशविदो विदुः। एते विवस्वत. पुत्राः कीर्तिता कीर्तिवद्धं नाः ॥२६१ अतीता वर्तमानाश्च तथैवानागताश्च ये। ब्राह्मणा: क्षत्रिया वैश्या शूद्राश्च वान्वये स्मृताः ।।२९२ युगे युगे महात्मान समतीता सहस्रम । बहुत्वानामधेयाना परिसख्या कुले वुले ॥२६३ विप्रगण अपनी वृत्ति के लालच मे रहने वाले होने हुए उम समय में उन शूटो के समीप में जारर स्थित होंगे । क्षण-भाग में अपने कत्तंय्य में भ्रष्ट होते हुए समस्त प्रजा जन प्रम मे क्षय को प्राप्त होंगे को भी उम या के क्षय में औरण होने से शेष रह जायगे । जिग दिन में श्रीकृषा मन्नहित होकर दिव- मोर पो गये उमी दिन पोर उमी ममय मे वरिपग प्रतिपन्न होगया अब उसकी मस्या यो पाप लोग जान लो । मानुष मन्या मे कलियुग तीन मौ हजार प्रया सोन लाप माठ हजार वर्ष की कही जानी है ॥२८६-२८.२८ दिम्य में ए महय वर्ष उगवा मध्याग कहा गया है। फिर उस समय मा मैं नग प्राप्त हो जायगा ॥२८॥ ऐन का घोर इक्ष्वाकावाट प्रमोतित किये गये हैं। विवस्वान् इशा वा क्षत्र मुमित्र बन्द कर गया है ॥२९॥ ऐन पात्रिय वा को मोमका के जाना मांगन -
३७४ ]
। वायु पुरा
ता मन्बतर का क्षय होता है युगास्या का अनुगमन करते हैं ॥३०७॥ जमदग्नि
के पुत्र परशुराम के द्वारा क्षत्रियो को निरवदोपित करने पर सभी वसुधा के
स्वामी क्षत्रियों के द्वारा वशकुल और दो वशकरण थे उनको मैं अब बतलाऊँगा
उनका ज्ञान प्रास करलो ॥३०६॥ इक्ष्वाकु के पुत्र ऐल की प्रकृति परिवत्तित
होती है । यणिबद्ध राजा लोग तथा अ य क्षत्रिय नृप १३०६। जो कि ऐल
वा के ख्यात थे उसी प्रकार से इटवाकु के वश के नृप थे। अभिषेक प्राप्त करने
वाले कुलो की पूण संख्या एक्वान यो ।।३१०॥
तावदेव तु भोजाना विस्तारो द्विगुरण स्मृत ।
भजते निशक क्षत्रा चतुर्धा तद्यथादिशम् ॥३११
तेप्वतीता समाना ये वक्तस्तानिवोधत ।
शत वै प्रतिविन्ध्याना शत नागा शत या ॥३१२
धृतराष्ट्राश्च कशतमगीतिजनमेजया ।
सतश्च ब्रह्मदत्ताना शीरिणा वोरिणा शतम् ॥३१३
तत शत पुलोमाना श्वेतकाशवुशादय ।
ततोऽपरे सहल वै येऽतीता शतबिन्दव ॥३१४
ईजिरे चाश्वमेधस्ते सर्वे नियुतदक्षिण ।
एव राजषयोऽतीता शतशोऽय सहस्रश ॥३१५
मनवस्वतस्यास्मिन यमानेऽन्तरे तु ये ।
तेषा निबोधतोपना लोके सन्ततय स्मृता ॥३१६
न शक्य विस्तर तेपा सन्तानाना परम्परा ।
तत्पूर्वापरयोगेन वस्तु वपशतैरपि ॥२१७
अष्टाविराध गाख्यास्तु गता ववस्वतेऽन्तरे ।
एता रानपिभि साद्ध शिष्या पास्ता निबोधत ॥३१८
उतना ही भोजो का विस्तार दुगुना कहा गया है । वह दात्र तीस थे
जो यथा दिशा में चारों ओर घे ॥३११॥ उनमें जो प्रतीत होगये मोर जो
ममान हैं उह बतलाने वाले मुझ से भली भांति जान लो । नौ सो प्रतिवियों
मा पा और एक सौ नागा थे तया सौ हम थे ॥३१२॥ धृतराष्ट्र के एक सय
अनुपङ्ग पाद समामि । [ ३७५ तथा जनमेजय के प्रस्मी थे। ब्रह्मदत्तो के एक सौ थे तथा शीरि और वीरियो के एक शत थे ॥३१३।। इसके अनन्तर पुलोमो के सौ श्वेत काश कुशादि थे। इसके पश्चात् दूसरे एक सहस्र थे जो शतविन्द व प्रतीत हो चुके हैं ॥३१४।। उन सब ने नियुत दक्षिणा वाले प्रश्वमेघो के द्वारा यजन किया था। इस पार से मंक्डो तथा सहस्रो ही राजर्षि गण प्रतीत हो चुके हैं ॥३१॥ वस्वत मन्वन्तर में तो जो उत्पन्न हुए उनकी सन्तति लोक में कही गई है, उसका ज्ञान प्राप्त करलो ॥३१६॥ विस्तार से वह नहीं कहा जा सकता है। उनके सन्तानो की परम्परा तथा उमका पूर्वा पर योग यह सब संक्डो वर्षों में भी नहीं बनलाया जा सकता है ॥३१७॥ वैवस्वत अन्तर से प्रहाईस युगाख्या पन होगई । यह राजपियो के साथ जो शिष्ट है उरो जानलो ।।३१।। चत्वारिशच्च ये चैव भविष्या सह राजभि युगाख्याना विशिष्टास्तु ततो वैवस्वतक्षये ॥३१६ एतद्व कथित सव्वं समासव्यासयोगत । पुनरुक्त बहुत्वाच्च न शक्यन्तु युग सह ॥३२० एते ययातिपुसाणा पञ्चविंशा विशा हिताः । वोत्तिताश्वामिता ये मे लोकान् ने धारयन्त्युत ॥३२१ लभते च वरेण्यश्च दुर्लभानिह लौकिकान् । मायु कीत्ति धन पुत्रान् स्वर्ग चानन्त्यमश्नुते ॥३२२ धारणाच्छवरणाञ्च व ते लोकान् धारयन्त्युत । इत्येष वो मया पादस्तृतीय कथितो द्विजा । विस्तरेणानुपूर्वी च किम्भूयो वत्तं याम्यहम् ॥३२३ जो चालीस राजामो के साथ मागे होगे इमरे पश्चात् वैवस्वत के क्षय युगास्यापो के वे विशिष्ट है ॥३१॥ यह गब कुछ मझेप मोर विस्तार में ने दिया है । बहुत होने के कारण मे पुन बहना यगो के साथ नहीं हो रता है ॥३२०॥ ये विशोरे हित करन वाले ययाति के पुत्रो से पचीम हाए उन्हें मेरे दी बता दिया गया है और जो लोको को धारण पिया करते '॥३२॥ वे वरेएयता को प्राप्त पिया रते हैं और यहाँ पर सोगिक दुर्लभ -
। वायु पुराण
पदार्थों को प्राप्त करते हैं । माय-वीति-धन-पुत्र-स्वर्ग और अनन्तला को भी
प्राप्त किया करते हैं ॥३२॥ धारए करने से तया यवरा करने से वे ल'को को
धारण किया करते है । हे हिजदृन्द । यह मैंने तृतीय याद कह दिया है जोकि
विस्तार पूर्वक तथा मानपर्वो के सहित ही कह दिया है । अब पुन क्या में
कहूँ ॥ ३२
प्रकरण ६२-मन्वन्तर क्थन
नि शेपेषु च सर्वेषु तदा मन्वतरेविह।
अन्तेऽनेक युगे तस्मिन् क्षोणे सहार उच्यते ॥१
सप्तंते भगवा देवा अन्त मन्वन्तरे तदा ।
भुक्त्वा त्रैलोक्यमध्यस्था युगास्था ह्य कसततिम् ।।२
पितृभिर्मनुमिव साढे सप्तपिभिस्तु ये।
यज्यान व तेऽप्यन्ये तद्भाताचे व ते सह ॥२
महर्लोक गमिध्यन्ति त्यक्त्वा प्रैलोक्यमीश्वरा ।
ततम्लेपु गतेपूर्व क्षीणे मन्वन्तरे तदा ।
अनाधारमिद सर्व लोक्य वै भविध्यति ॥४
तत स्थानानि चन्यानि स्यानिना तानि में द्विजा ।
प्रभ्रश्यन्ति विमुक्तानि ताराक्षग्रहैस्तथा ।।५
ततस्तेषु व्यतीतेपु त्रैलोक्यस्येश्वरेविह ।
सेन्द्राष्टषु महर्लोक यस्मिन्ते कलावासिन ॥६
जिताद्याश्च गणा पत्र चाक्षुपान्ताश्चतुदंश ।
मन्वन्तरप सर्वेषु देवास्तु वै महोजस १७
ततस्तेषु गतेपद सायोज्य वल्पवासिनाम् ।
समेत्य देवास्ते म प्राप्ते सरलने तदा ॥
श्री मूलजी ने कहा-~यहाँ उम समय सब मन्वन्तरो के निशेष होजाने
पर मर युग मान में उसके क्षीण होजाने पर सहा कहा जाता है ॥1॥
मन्वन्तर कथन ] [ ३७७ । उस ममय मन्वन्तर के अन्त में ये मान भार्गव देव हुए जो त्रैलोक्य के मध्य में मे स्थित होते हुए एक राप्तति अर्यान् इकहत्तर युगारया का भोग करने वाले थे ॥२॥ पितरगण-मनुवृन्द और सप्तर्षियो के माथ जो यज्वा थे और जो अन्य उनके भक्त थे उनके साथ इस लोक्य का त्याग करके महर्लोक मे वे ईश्वर चले जायगे । इसके पश्चात् उनके ऊर्द्ध को चले जाने पर उम ममय मन्वन्तर के क्षीण होने पर यह समस्त त्रैलोक्य अनाधार हो जायगा ।।३-४॥ हे द्विज- गा तब स्थानियो के वे देव ममस्त स्थान भूय होते हुए तारा ऋक्ष और ग्रहो के द्वारा विमुक्त होकर प्रभ्रष्ट हो जायगे ॥५॥ इसके अनन्तर नोक्य के व्यतीत हो जाने पर जोकि इन्द्र के महित पाठ थे, वे मभी बल्प तक महर्लोक में वास करने वाले हैं यहाँ पर जिताद्य और चाक्षुपान्त चौदहगण हैं समस्त मन्वन्तरो मे वे महान् प्रोज वाले देव थे ॥७॥ इसके पश्चात् उनके ऊपर चले जाने पर कल्प वामियो के सायोज्य को प्राप्त कर उस समय सकलन प्राप्त होने पर वे सब देव जो थे ।।८।। महर्लोक परित्यज्य गरणास्ते नै चतुर्दश । सशरीराश्च थ यन्ते जनलोक सहानुगा ॥ एव देवेष्वतीतेपु महर्लोकाजन प्रति । भूतादिप्ववशिष्टेष स्थावरान्तेप चाप्युत ॥१० शून्येषु लोवस्थानेषु महान्तेषु भूरादिप । देवेषु च गतेपूद्ध सायोज्य कल्पवासिनाम् ।।११ सत्दृत्य तास्ततो ब्रह्मा देवपिपितृदानवान् । सस्थापयति नै सर्ग महदृष्ट्या युगक्षये ॥१२ तत्र युगसहस्रान्तमयद्ब्रह्मणो विदुः। रात्रि युगमहस्रातामहोरात्रविदो जनाः ॥१३ नैमित्तिा प्राकृतिको यश्चैवात्यन्तिकोथत । विविध सर्वभूतानामित्रोप प्रतिसञ्चरः ॥१४ ब्राह्मो नैमित्तिस्तस्य कल्पदाह प्रसयम.। प्रतिसर्गे तु भूताना प्राकृत करणक्षय, ॥१५ ३७८ 1 [ वायु पुराण ज्ञानाच्चात्यन्तिय प्रोक्त कारणानामसम्भव । तत सत्दृत्य तान् ब्रह्मा देवास्तोक्यवासिन ॥१६ अहरन्ते प्रकुरुते सर्गस्य प्रलय पुन । सुपुप्सुभंगवान् ब्रह्मा प्रजा सहरते तदा॥१७ वे सब देव महों का परित्याग करके सशरीर चौदहगण अनुगों के साथ जनलोक में गये ऐमा मुना जाता है | इस प्रकार मे महर्लोक से उन देवो के जनलो के प्रति चले जाने पर अवशिष्ट भूतादि और स्थान रागो के साथ लोक स्यानों के एन महान भू प्रादि के शूय होजाने पर फिर उन देवो के ऊपर जाने पर कल्प पर्यन्त वाम हुप्रा और उनको सायोज्य प्राप्त हुअा था ||१०-११॥ इसके उपरात उनको वहाँ से सहन करके ब्रह्माजी देवधि-पिट तथा मानवो को युगक्षय म मद्दष्टि स सगं को सस्थापित करते हैं ।।१२।। वहाँ एक सहर युग तक जो ब्रह्माजी का दिन कहा जाता है और रात्रि का युग सहा पर्यन्त होता है । इस प्रकार से ब्रह्मा के अहोरात्र को मनुष्य जानते हैं 1॥१३॥ नैमित्तिक-प्राकृतिक और जो अर्थ से प्रात्यन्तिक यह तीन प्रकार का समस्त प्राणियो का सञ्चार होता है ॥१४॥ ग्राह्य नैमित्तिक होता है उमा कल्पहार प्रसपम होता है। प्राणियो के प्रत्येक सर्ग मे करण क्षय प्राकृतिक होता है ।।१५। और ज्ञान प्रात्यन्तिक कहा गया है जो कारणो का असम्भव होता है । इसके पश्चात् ब्रह्माजी भैलोवय वासी उन देवो को सहृत करके दिन के मन मे मर्ग का प्रलय किया करते हैं। सोने की इच्छा वाले ब्रह्मा उस समय मे प्रजानी का सहार किया करते हैं ॥१६-१७॥ ततो युगसहस्रान्ते सप्राप्ते च युगक्षये। तनात्मस्था प्रजा वतुं प्रयेदे स प्रजापति ॥१८ तदा भवत्यनावृष्टिस्तदा सा शतवार्षिकी। तथा यान्यल्पसाराणि सत्त्वानि पृथिवीतले ।।१६ तान्येवान प्रलीयन्ते भूमित्वमुपयान्ति च सप्तरश्मिरयो भूत्वा ह्य दतिः द्विभावसु ॥२० मन्वन्तर क्थन ] [ ३७६ असह्यरश्मिभगवान् पिवन्नम्भो गभस्तिभि । हरिता रश्मयस्तस्य दीप्यमानास्तु सप्तभिः ॥२१ भूय एव विवर्तन्ते व्याप्नुवन्तो वन शने । भौम काष्ठं धन तेजो भृशमद्भिस्तु दीप्यते ॥२२ तस्मादुदक मूर्य्यस्य तपतोऽति हि कथ्यते । नावृष्ट्या तपते मूर्यो नावृष्टया परिविष्यते ॥२३ इसके पश्चात् सहस्र युग के अन्न मे युग क्षय के सम्प्राप्त होने पर वह प्रजापति वहाँ पर अपनी भात्मा मे स्थित प्रजा के करने के लिये प्रस्तुत होते हैं ॥१८॥ उस समय मे सौ वर्ष पर्यन्त अनावृष्टि हुआ करती है। इस प्रकार से अल्पसार वाले जो जीव इस पृथ्वी तल में होते हैं वे यहां पर ही प्रलीन हो जाया करते हैं और भूमि मे मिल जाया करते हैं । इसके उपरान्त विभावसु (मूर्य) सप्तरश्मि होकर उदित होता है ॥१६-२०॥ भगवान सूर्य बहुत ही तीक्ष्ण किरणो वाले होते है । जिनको कोई सहन नहीं कर सकता है। वे अपनी किरणों के द्वारा जन का पान किया करते है । उसको हरित रश्मियां मत्यन्त ही सप्नो के द्वारा ही दीप्यमान होती है ॥२१॥ शनै शनै बन मे व्याप्त होते हुए फिर विवत्तिन होती हैं । भूमि के पाठ, धन, तेज को बहुत ही भधारण करते दीप्त होते हैं ।।२२। इसम तपते हुए सूर्य का उदक कहा जाता है । अनावृष्टि मे मूर्य तपता है और नावृषि से परिविष्ट होता है ॥२३॥ नावृष्टया परिचिन्वन्ति वारिणा दीप्यते रवि । तस्मादप पिवन् या वै दीप्यते रविरम्बरे ॥२४ तस्य ते रश्मय सप्त पिवन्त्यम्भो महार्णवात् । तेनाहारेण सन्दीप्त मूर्य सप्त भवत्युत ।।२५ ततस्ते रश्मय सप्त सूर्य्यभूताश्चतुर्दिशम् । चतुलौकमिम सर्वं दहन्ति शिखिनस्तदा ।।२६ प्राप्नुवन्ति च भाभिरतु दं चाधश्च रश्मिभिः। दोप्यन्ते भासराः सर युगान्ताग्नि प्रतापिनः ॥२७ ३८० ] । वायु पुगत ते वारिणा च सदीप्ता बहुसाह्मदमयः। स समावृत्य तिन्ति निर्दहन्तो वसुन्धराम् ।।२८ ततस्तेषा प्रतापेन दह्यमाना वसुन्धरा । साद्रि नद्या पृथ्वी विलेहा समपद्यत र दीहामि सन्ततामिश्न चित्राभिन समन्तत । अपनोवंञ्च तिर्यक् च सरुद्ध मूर्यरश्मिभिः ॥३० नादृष्टि से रवि परिदिन्वित होता है और वारि (जन) से दीप्त हमा करता है । इससे जो जल का पान करती हैं उमसे मूर्य मम्बर में दीप्त हुआ करता है ॥२४॥ उगको सात रसिया महाजन मे जल का पान पिया वरती हैं । उस माहार में सन्दीप्त होने वाला मूर्य मप्त होता है ॥२।। इसके मनन्तर सात रदिमयो चारो दिशाओं मे मूर्य मूत होती हुई उस समय शिघी ( अग्नि प) वे इस चतुर्मोक को सर्व को वाघ रिया करती हैं ॥२६॥ कार मर नीचे अपनी दीप्तिया से रमिया सर्व प्राप्त हो जाती है । प्रताप वाले मूर्य की युगानि सप्त भागार दीप्यमान होने हैं ॥२॥ ये वह महर रदिमयो न के द्वारा मदीप्त हो जाया करती हैं । इस वसुन्धरा को जलाती हुई माय को पावृत करके रहा करती है ॥२८॥ इमो धनन्तर उनके प्रताप से यह समस्तु बमुन्धरा दह्यमान हो जाया करती है। पर्वतों के महिल नदी पोर समुद्र से युक्त यह समस्त पृथ्वी दिना स्नेह वाली पर्यात् एवम गुप्त हो जाती है ॥२६॥ दोज-मत्र फैली हुई-विचित्र तेव से युक्त मूर्य की किरणो मे नोत्र वै माग पोर कार का भाग मोर निन्दै भाग मभी माद हो जाते हैं ॥३०॥ मूग्निीना प्रवृद्धाना समृष्टाना परस्परम् । एकत्वमुपयातानामेषज्वाल भवत्युत ॥३१ गर्वलोणारा गोग्नमूत्वा तु मण्डली। चतुर्कोमिद मदं निम्हत्या तेजसा ॥३२ ततः प्रलोयते सव्यं जगम ग्यावर तदा। निक्षा निम्मृणा भूमि पृष्गमा भवेत् ॥३३ 1 अम्बरीपमिवाभाति सर्व मारिपित जगत् । सर्वमेव तदाचिभिः पूर्ण जज्वाल्यते नमः ॥३४ पाताले यानि भूतानि महोदधिगतानि च । ततस्तानि प्रलीयन्ते भूमित्वमुपयान्ति च ॥३५ इस प्रकार से बढी हुई और परस्पर मे ममृष्ट अर्थात् मिली हुई मूर्य को प्रचियो का जोरि मभी मिलकर एक स्वम्प को प्राप्त हो गई हैं फिर सबकी एक ही महान् ज्वाला का स्प हो जाया करता है ॥३१॥ वह मण्डली इस प्रकार भीय अग्नि का स्वरूप धारण करके तेज से ममस्त लोको का प्रष्ट नाम किया करता है और इस चतुर्लोक को समस्त को शीघ्र ही तेज मे निर्दग्ध कर देता है ।॥३२॥ इसके पश्चात् यह ममस्त स्थावर और जङ्गम उस समय प्रलीन हो जाता है। यह भूमि ऐगो हो जाती है कि इस पर एक भी वृक्ष नही रहना है तथा तृणो से हीन दूर्म के पृष्ठ के गमान एकदम पट्ट सी होजाती है ॥३३॥ यह समस्त मागैपित जगत् अम्बरीप की भाति प्रतीत होता है। उस ममय में अचियो के द्वारा यह समस्त आकाश मण्डल परिपूर्ण रूप से जाज्व- ल्पमान हो जाता है ॥३४॥ पाताल मे जो प्राणी हैं और महा ममुद्र मे हैं वे भी उम ममय प्रलीन हो जाते हैं और भूमित्व को प्राप्त हो जाया वरते हैं अर्थात् भूमि में मिलकर अपना अस्तित्व खा दते हैं॥३५॥ द्वीपाश्च पवंताश्च व वर्षाण्यथ महादधि । सर्व तद्भस्ममाच्चक्र मत्मिा पावस्तु स ॥३६ समुद्रेभ्यो नदीभ्यश्च पातालेभ्यश्च सर्वत । पिवनप समिद्धोऽग्नि पृथिवीमाधितो ज्वलन् ।।३७ तत सवर्तव शलानतिकम्य महास्नथा। लोकान् सहस्ते दीप्तो घोर सवत्तमोऽनल ॥३८ तत म पृथिवी भित्त्वा रसातलमगोगयत् । निर्दय ताम्तु पातालानागलोक मथाददत् ।।३६ अघन्तात्पृथिवी दाध्या राईस दहते दिवम् । योजनाना सहस्राणि ह्ययुनान्यर्बुदानि च ॥४० ३८२ ] ! वायु पुराण उदतिष्ठन्छियाम्नस्य वह्वय सवर्तकस्य तु । गन्धर्वाश्च पिशाचाच समहारगराक्षसान् । तदा दहति स दीप्तो गोलव चैव सवंश ।।४१ भूलॊकन्तु भुवर्लोक स्वर्लोक्च महस्तथा। घोर दहति कालाग्निरेव लोकचतुष्टयम् ॥४२ व्याप्तपु तेषु लोकेषु तिर्यगूर्ध्वमथाग्निना। तत्तेज समनुप्राप्त कृत्स्न जगदिद शनै । प्रयोगुडनिम सर्वं तदा ह्य व प्रवाशते ।।४३ ततो गजकुलाकारास्तडिद्धि समलकृता । उत्तिष्ठन्ति तदा घोरा योम्नि सवत्तं वा घना ॥४४ मामा उम पावक न द्वीप-पवंत-वप और महा समुद्र इन सबको भस्म सात् कर दिया था ।३६।। ममुद्रो स-नदिया से और पातालो से मब मोर से जल का पान करते हुए समिद्ध हुआ वह अग्नि जलता हुमा पृथिवी में आश्रित होगया था । इमके अनन्तर वह महान सवत्तक अग्नि गेलो का अनि क्रमण करके प्रत्य त घोर तथा दीप्त होता हुआ लावा का सहार करता है ॥३७ ३८॥ इसके पश्चात् वह इस पृथ्वी का भेन्न करके रमातल में पहुंचता है और उसने उसकागापरण कर दिया था। उन पाताल लोकोको निर्दग्ध करके उसके पश्चात् उमने नागलोक को भी जला दिया था ॥३६॥ नीचे के समस्त भाग में पृथ्वी को दम कर वह फिर ऊद्ध भाग म दिवलोक जना देना है। सहस्र प्रयुन और अर्बुद योजनो तर उस सवर्तक अग्नि की बहुत सी शाखाऐ उठ गई थी। फिर वह गधों को-पिशाचो को-महोरगो को और रामों को उस समय सन्दीप्त होता हुआ जलाता है ॥४००४१॥ भूर्लोक-भुवर्लोक-स्वोंक और महर्लोक इन चारों लोको को इस प्रकार से यह घोर काताग्नि दग्ध कर दिया करता है ॥४२॥ नियंग और अद्ध्व भाग म उन अग्नि के द्वारा उन लोको म व्याप्त हो जाने पर वह तेज धीरे धीरे सम्पूण इम जगत् म प्राम हो जाता है। उम ममय यह सब प्रयोगुड के समान प्रकाशित होने लगता है ।।४।।
मारवपन [ ३८३ इमक पश्चात् हाथियों के समान ग्राकार वाले विशुन् से अलकृत उस समय आगाम परम घार स्वरूप दाले सक्त्तव मेघ उठ आते हैं ।।४।। विन्नीलात्पलश्यामा वेचित्युमुदसनिमा । केचिद्वंद्वयमकामा इन्द्रनीलनिभा पर ।।४५ महाकुन्द निभाश्चान्ये जात्यनुन निभास्तथा । धूम्रवर्णा धना केचित्वे चित्पीता पयाधरा ॥४६ केचिद्रामभवर्णाभा लाक्षारक्तनिभाम्तथा। मन शिलाभास्त्वपरे पाताभास्तथाम्बुदा ४७ इन्द्रगोपनिमा केचिदुत्तिनि धना दियि । केचित्पुरधराकारा केचिद्गजकुनापमा (१४८ कचित्पयतसमाशा केचित्स्थल निभा धना । कुण्डागारनिमा केविले चिन्मी कुलापमा ४E उन मेघो म कुछ तो नील कमल के मह "याम होते हैं और कुछ कुमद पै ममान हुमा करते हैं। कुछ वैदूय व तु य को दूसरे द नीर के सहा होत हैं ।।४।। अय प और पुद के तुल्य मा कुछ प्रजन के समान हाने हैं। कुछ मेष धून वण बार होते है तो इन यप पीन हैं ॥४६॥ दुध राराम (गधा, के दाग मे वगा वाले हैं तो कुछ नाख के जमे रन पण वाल हैं । कुछ मनमिल के समान प्राभा मे युक्त है नया बुद्ध मध कान (बूमर) की सी मामा याने होत हैं ॥४॥ पुछ बादर गार के तुष इस मा म उठने हैं । कुछ पुग्घर रे मामार वान हैं तो कुछ गजा + समूह के समान होते हैं [४८॥ वुछ पवना ने ममान है ना कुछ स्थल के महा मध हात है 1 कुण्डा गार तुच कुन्द है तो मीन कुत्रानुराते हैं ॥४६॥ बहुरूपा घोररूपा घारम्वरनिनादिन । तदा जनधग मा पूग्यति नभ म्यानम् ॥५० ततस्ते जलदा पोरा नवीना भास्वरात्मिा। मसभा मता मानम्तर्मात शमयन्युन ।।५१ ३८४ ] वायु पुराण ततस्ते जलदा वर्ष मुञ्चन्ति च महोद्यमम् । सुघोरमशिव नाशयन्ति च त पावकम् ।।५२ प्रवृष्टश्च तथात्यर्थं वारिभि पूर्यते जगत् । अद्भिस्तेजोऽभिभूतञ्च तदाग्नि प्राविशत्यप.॥३ नष्ट चाग्नौ वर्षशते पयोदा पाक्सम्भवा । प्लावयन्ति जगत्सवं बृहज्जालपरिस्रवै ।।५४ बहुत से रूपो वाले तथा घोर स्वरूप धारी पौर प्रति घोर निनाद करने वाले जलधर उस समय म नभ के रथल भर दिया करते हैं ॥५०॥ इसके अनन्तर भास्करात्मिक वे नये मेघ जिनका कि परम घार स्वरूप है मात प्रकार से सवृत पात्मा वाल उस अग्नि को शमन कर देते हैं ॥५। इसके उपरान्त वे जलधर महान् उद्यम वाली वर्षा का त्याग किया करते हैं अर्थात् अत्यन्त जोर से बरसते हैं और उस परम घोर अमङ्गल उम पावक का नारा कर देते हैं ॥५२।। प्रकृष्ट रूप से वर्षा करने वाले अनि जलो के द्वारा यह जगन् पूरित हो जाता है। फिर वह तेजोऽभिभून अग्नि जलो के द्वारा जल ही में प्रवेश पर जाता था ॥५३॥ पाक से समुत्पन्न वे जलद वृन्द मौ वर्ष तक बरमते हुए पग्नि को शान्त कर देने पर वृहत् जल के समूह के परिस्रवो के द्वारा इस समस्त जगत् को प्लावित कर दते हैं ॥५४॥ धाराभि पूरयन्तीम चोद्यमाना स्वयम्भुवा। अन्ये तु मलिलोपस्तु वेलामभिभवन्त्यपि । साद्रिीपान्तर पृथ्वी ह्यद्धि सछाद्यते तदा ॥५५ तस्य वृष्टया च ताय तत्मव्वं हि परिमण्डितम् । प्रविशत्युदधौ विप्राः प्रोत मूर्यस्य रश्मिभि ॥५६ प्रादित्यरश्मिमि पीत जलमनेषु तिष्ठति । पुन पतति तद्भूमौ तेन पूर्यन्ति चार्णवा ॥१७ तत समुद्रा स्वा वेला परिनामन्ति मन । पवंतान विशीच्यन्ते मही चाप्णु निमग्जति ।।५८
मन्वन्तर क्यन ]
। ३५
ततस्तु महसोद्भ्रान्त पयोदास्तानभस्तले !
सवेष्ट्यांत घोरात्मा दिवि वायुः समन्ततः ॥५६
तस्मिन्न कार्णवे घोरे नप्टे स्थावरजङ्गमे।
पूर्ण युगसहस्र वे नि शेप वल्प उच्यते ॥६०
प्रयाम्भसा वृते लोके प्राहुरेवाएंव वुधा ।
प्रय भूमितल खञ्च वायुश्च कार्णवे तदा ।
नप्टे भावेऽवलीन तत्प्राज्ञायत न विश्चन ॥६१
पार्थिवास्त्वथ सामुद्रा पापो हैमाश्च सर्वग ।
प्रसरन्त्यो वजन्त्येव सलिलाख्या भजन्त्युत ॥६२
स्वयम्भ के द्वारा प्रेरित हुए ये मर्च अपनी मूमलाघार घारानो के द्वारा
इस जगन् यो भर दिया करते हैं। अन्य तो अपने जल के पोधो के द्वारा वेला
को भी अभिभूत कर देते हैं। उस समय में पर्वत मौर द्वीपो के अन्तरी के
सहित यह पृथ्वी जनो के द्वारा ममाच्छादित हो जाया करती है ।।५५।। और
उममी वृष्टि से हे द्विजगण । परिमण्डित यह समस्त जल मूर्य की किरणों के
द्वारा पान पिप गये ममुद्र म प्रवेश करता है ॥५६॥ मूर्य के द्वारा पीया हुआ
यह जन मेघो म स्थित हो जाता है फिर वही जन्न यहाँ पर भूमि में पहना है
उमसे गमुद्र भर जाया करते हैं ॥५७। इसके उपरान्त य समुद्र अपनी वेला
को गभी पोर न परिवाल पर दिया करते हैं । तव पर्वत विगीर्ण हो जाते हैं
पोर समस्त भूमि जल म टूब जाया करती है ॥५॥ इमरे पश्चात् महमा
उधान वाय सभी ओर से घोर रूप धागण वसे पाया में उन मेघो को
गटित पर लेना है ॥५६॥ उम गमुद्र म गमस्त स्थावर मोर जनम चे नष्ट
हा जाने पर पूरे र सहय युग म निमेष पल कहा जाता है ।।६।। इसके
भनन्नर एकमात्र जन से द्वारा ममस्त लोक के आगृत हो जान पर बुध एवा-
गंव हा करते हैं और इस भूनन तपा माराम को वायु पद एकाव बना
देता है तब उस समय मे भाव रे नष्ट होने पर कुछ भी नहीं जाना जाता था
॥६॥ पापिय-पामुद्र और हिम में होन याने जल मभी पोर फैले हुए एक
मलिया वो प्राममिया करते हैं ॥६॥
३५६ ]
[ वायु पुराण
पागतागतिक वैव तदा तत्मलिल स्मृतम् ।
प्रच्छाद्य तिष्ठति महीमणवास्य च तज्जलम् ॥६३
प्राभान्ति यस्मात्ता भाभिभाशब्दव्याप्तिदीप्तिपु ।
भस्म सर्वमनुप्राप्य तस्मादम्भो निरुच्यत ॥६४
नानात्वे चैव शीघ्र च धातु अर उच्यते ।
एकार्णवे तदा यो वैन शीघ्रास्तेन ता नरा ॥६५
तस्मिन् युगसहस्रान्ते दिवसे ब्रह्मणो गते ।
तावन्त कालमेव तु भवन्येवार्णव जगत्
तदा तु सर्वव्यापारा निवर्तन्ते प्रजापते ॥६६
एवमेकावे तस्मिन्नप्टे स्थावर जङ्गमे।
तदा स भवति ब्रह्मा सहस्राक्ष सहस्रपात् ।।६७
सहस्रशीर्पा सुमना सहस्रपात् सहस्रचक्षुर्वदन सहस्रवाक् ।
सहस्रवाहु प्रथम प्रजापतिस्त्रयीपथे य पुरुपो निरुच्यते ॥६८
प्रादित्यवर्णो भुवनस्य गोप्ता ह्यपूर्व एकः प्रथमस्तुरापाट् ।
हिरण्यगर्भ पुरुषो महान् वै सपद्यते वै तमस परस्तात् ॥६६
चतुयुगसहस्रान्ते सर्वत सलिलप्लुत ।
सुषुप्सुरप्रकाशा स्वा रानि तु कुरुते प्रभु ॥७०
उम समय म वह जल अागतागतिक कहा गया है। प्रणव के नाम
वाला वह जन इस भूमि को ढक कर स्थित रहना है ।।६३।। क्योकि वह भामो
के द्वारा भी इस शश्द की व्याप्ति की दीप्तिमो म प्राभा युक्त होता है सबको
भम्म में मनु प्राप्त करता है इमलिय वह मम्भ कहा जाता है ॥६४ा और
नानास म एव शीन मे भरधातु कही जाती है। उस समय मे एकार्गव म जो
शीन नही है इससे वह नर कहा गया है ॥६५॥| ब्रह्मा के युग सहस्र वाले उम
दिन के गन होने पर उस समय तक ही यह जम्त एकाएक रहता है और तब
प्रज पति के समस्त व्यापार निवृत्त हो जाया करते हैं ॥६६।। इस प्रकार से
उम एक मात्र मे समस्त स्थावर और जङ्गम के नष्ट हो जाने पर तब ब्रह्मा
महम नेत्रा और महान चरणा वाले होते हैं ॥६७।। सहस्र सीपं वाले-मुमना-
मवार क्थन ]
[ ३८७
महय पादो म युक्त सहर चक्षु और सुखो मे पूर्ण- महर नाक-सहस्र वाहुमो
याना श्योपथ म प्रथम प्रजापति हाता है जानि पृरुप कहा जाता है ।।६।।
मादित्य के ममान वणं वाला-इम भुवन को गोप्ता प्रथम तुरापाट एक अपूर्व
ही होता है । वह हिरण्य गभं पुरुष तम से परे महान् मम्पन्न होता है ।।६।।
एर मह्य वारो युगा के म त में सब पोर म पल म नुन म सोन की इच्छा
करने वाला वह प्रभु प्रकार हीन उम अपनी रात्रि को दिया करता है ।।७।।
चनुविधा यदा ते प्रजा सण्डिमण्डिता ।
परयन्ते त महात्मान काल मत महर्पय ७१
जनलोक विवर्तन्तस्तपमा लब्धचक्षुप ।
भृग्वादयो महात्मान पू! व्यारयातलक्षणा ॥७२
सत्यादीन् सप्तलोकान् वै त हि पश्यन्ति चक्षुषा ।
ब्रह्माण त तु पश्यन्ति महाब्राह्मोपु रात्रिपु ७३
पल्पाना परमेष्ठित्वात्तस्मादाद्य स पठ्यते ।।७४
स यष्टा सर्गभूताना कल्पादिषु पुन पुन ।
एवमावसयित्वा तु स्वात्मन्यव प्रजापति ।।७५
प्रथात्मनि महालजा सर्वमादाय सत् ।
ततस्त वमत रात्रि तमस्येमागवे जले ।।७६
तता रानिक्षये प्राप्त प्रतिबुद्ध प्रजापति ।
मन मिमृक्षया युक्त सर्गाय निदधे पुन ।।७७
एव मनोरे नित उपशान्त प्रजापतो।
ब्रह्ममित्तिो तस्मिन् कल्पित ने प्रमयम ।।७८
देहेवियोग सत्वाना तस्मिन् वे कृत्स्ना स्मृत ।
रातो दग्धेषु भूतषु सवादित्यरश्मिभि ।
दवपिम नवय्येप तस्मिन् सहलने तदा 16
गपर्वादीनि रात्वानि पिसावान्तानि म श ।
बल्यादावप्रततानि जनमवाथयन्ति दे ८०
त्रिम ममर म गगि मरिडा पार प्रकार या प्रमा गरन करती है
३८८ ] । वायु पुराण तो सप्तपिंगण उम महान् मामा वाले काल को देखा करते हैं ।। ७१।। जल लोग में विवर्तमान और तप के द्वारा नेत्रो की दृष्टि को प्राप्त करने वाले भृगु স্নাহি महात्मा होते हैं जिनका पूर्व मे लक्षारणो की व्याख्या करदी गई है । मस्य प्रभृति सातो लोगो को वे ही पशु के द्वारा देवा करते हैं ! उन महा ब्राह्मी रात्रियों में वे ब्रह्मा को भी देखा करते हैं ।।७२॥ सप्तपिंगण अपनी रात्रियों में मोये हुए वाल को देखते हैं । कल्यो का परममेटी होने से वह प्राद्य पडा जाया करता है ॥७३-७४11 वह समस्त प्राणियो का क्ल्पो के आदि मे पुन पुन यष्टा होता है । इस प्रकार से प्रजापति अपनी मारमा मे ही प्रावेशयित होता है ॥७५। इसके अनन्तर महान् तेज वाला सबको आत्मा मे लाकर सब कुछ के करने वाला इसके पश्चात् एकााब जल में जोकि एकदम अन्धकारमय है वहाँ रात्रि में वाम किया करता है ।।७६॥ इसके उपरान्त उस राति के क्षय हो जाने पर वह प्रजापति प्रति वुद्ध होता है और फिर सृजन करने की इच्छा से मनको युक्त करके पुन मगं के लिये निश्चित किया करता है ॥७७॥ इस तरह से सलोक के निवृत्त होने पर और प्रजापति के उपशान्त होने पर तथा ब्रह्म नैमित्तिक उम कल्लित के प्रसयम होने पर सत्त्वो का देहो से वियोग होता है और उसको पूर्णरूप में कहा गया है। इसके पश्चात् सूर्य की किरणा के द्वारा समस्त प्राणियो के दग्ध हो जाने पर उस समय मे मनुज श्रेष्ठ देवर्षियो के उम मङ्कलन में गन्धर्व प्रादि जीव और पिशाचान्त तक कल्प के आदि में अप्रतप्त होत हुए जन्म लोक का पाश्रय लिया करते हैं ।।७८-७६-८०॥ तिर्यग्योनीनि सत्वानि नारकेयानि यान्यपि । जने तान्युपपद्यन्ते यावत्सप्लवते जगत् ।।८१ व्युष्टायान्नु रजन्या तु ब्रह्मणेऽव्यक्तयोनये । जायन्ते हि पुनस्तानि सर्वभूतानि कृत्स्नश ।।२ ऋपयो मनवो देवा प्रजा सश्चितुर्विधा । तेपामपीह सिद्धाना निधनोत्पत्तिरुच्यते ॥८३ यथा सूर्यस्य लोकेऽस्मिन्नुदयास्तमन स्मृतम् । तथा जन्मनिरोधश्च भूतानामिह दृश्यते ।।८४
मन्यन्नर कपन ]
प्राभूतसप्लवात्तस्माद्भव. ससार उच्यते ।
यथा सर्वाणि भूतानि जायन्ते हि वर्षास्विह ।।५
स्थावरादीनि सत्त्वानि यल्पे रपे तथा प्रजाः ।
यथार्तावृतुलिङ्गानि नानारूपाणि पर्याये ।।८६
दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा ब्रह्मातरानिपु ।
प्रत्याहारे च सर्गे च गतिमन्ति ध्र वाणि च ।।८७
निष्क्रमन्ते विशन्ते च प्रजापार प्रजापतिम् ।
ब्रह्माणं सर्वभूतानि महायोग महेश्वरम् ।।८८
जो तिर्यक पोनि यात जीव थे और जो नारकीय जीप थे उग गमय
में मभी सब प्रकार से नष्ट पापो वाल होने हुए दग्ध होगये थे। जव तर
गंप्लारित रहना है तब तक वे मभी मत्त्व जनसार में उत्पन्न हुमा करते
है ।।८।। पश्यत यानि ब्रह्मा के लिए रजनी के गुष्ट हो जाने पर पिर वे
समम्म प्राणी पूर्ण रूप से उत्पार होते है ॥२॥ पिण-मनुहन्द-देवता-
जमा ममस्त पारो प्रसार मी-इन सबा पौर यहाँ पर मिनो पा भी निधन
होना तया उत्पन्न होना पड़ा जाता है । जिम तरह मे इस सोनम
मा उदय होना पोर मरम होना कहा गया है-उसी तरह में प्राणियो का
कम पोर निरोप दिसताई देता है ॥ उम भून गणव स संबर मन समार
हामाया है। बंगे गमन प्रापी य! वर्ण म उन हमारत है ।।८
निगम अनुगमय में पपंप हाने पर मनर प्राार रे अनुचि
मोह-मदार यासिरा पोर मामासने हैं ।।६।।
समारोपात रात्रियो म ये-ये ही प्रयाहार र भोर मर्ग में प्रव और गान.
फार
मिले हैं 100 मान याम बापे मार प्रसारमा
की प्रापि यया में ममम प्राणी प्रमेश पाने पर मिपम fri
10
गया गाना मनापि पुन. पुन ।
सामामामा गामि जगा tet
। ३६० ] [ वायु पुराण येनैव मृष्टा प्रथम प्रयाता पापो हि मागरेण महीतलेऽस्मिन् । पूर्वप्रयातेन तथा ह्यपोऽन्यास्तेनैव तेनैव तु सबजन्ति ।।६० यथा शुभेन त्वशुभेन कमणा तत्रैव च तेन विवर्तमाना । मास्तु देहान्तरभावितत्वाद्रवेशादूर्द्ध मघश्चरन्ति ।।६१ ये चापि देवा मनव प्रजेशा अन्येऽपि ये स्वर्गगताश्च सिद्धा । सद्भाविताख्यातिवशाच धा. पुननिसर्गेण भवन्ति सत्त्वा ॥२ अत ऊद्ध प्रवक्ष्यामि कालमाभूतसप्लवम् । मन्वन्तरारिण यानि स्युारयातानि मया द्विजा । सह प्रज्ञानिसर्गेण सह देवैश्वतुर्दश ।।६३ स युगाख्या सहस्रनु मण्येवान्तराणि वै। अस्या सहस्र द्वपूर्णे निःशेष कल्प उच्यते ।।१४ एतद्ब्राह्ममहो ज्ञेय तस्य सख्या निवोधत । निमेषस्तुल्य मात्रा हि कृतो लध्वक्षरेण तु । ९५ मानुपाक्षिनिमेपास्तु काष्ठा पञ्चदश स्मृता । लव क्षणास्तु पञ्च व विशत्काष्ठा तु ते त्रय ॥९६ कल्पो के प्रादि कालो में समस्त प्राणियो का बार बार सस्रष्टा, व्यक्त और अव्यक्त महादेव हैं और उसका यह सारा जगत है ॥८६जिस मार्ग के ही द्वारा प्रथम सृष्ट किये हुए जल इस महीतल में गये है उसी प्रकार म पूर्व प्रयात मार्ग से अन्य जल भी जाया करते हैं ||६०॥ जैसे शुभ और अशुभ कर्म से वहाँ-वहाँ पर ही विवर्तमान मनुष्य अन्य देहों मे भावित होने के कारण मे रवि के वश से ऊर्व मे तथा अधोभाग में विचरण किया करते हैं ॥६॥ जो भी देव-मनुगण-प्रजेश और अन्य भी जो स्वर्ग मे गये हुए सिद्ध हैं वे सब । सद्भावित प्राख्याति के वश होने से पुन निसर्ग के द्वारा धर्म से युक्त जीव होते हैं ।।२।। हे द्विजगए | मैंने मन्वन्तरो की व्यारया जोमि यह भली भांनि करदी है अब इस से आगे आभून सप्लव काल को बतलाऊंगा। मनुगण प्रज्ञा निसर्ग के साथ और देवो के साथ चौदह हुए थे ॥६३॥ वह सब अन्तर युगारया सहन है। इसके दो राहस्र पूर्ण नि शेष रूप कहा जाता है ॥६४॥ यह ब्राह्म नाम मवन्तर क्यन ] [ ३६१ दिया वाला जानना चाहिये उसकी मस्या का ज्ञान प्राप्त करलो । लध्वक्षर के द्वारा हमा निमप तुल्य मात्रा वाला हाता है ॥६५॥ मनुष्यो की आँखो के निमेप तो पन्द्रह काष्टा कही गई है। पांच क्षण का नव होता है और तीन लवो की बीम काष्ठा होती हैं 16|| प्रस्थ सप्तोदकाश्च व साधिकास्तु लव स्मृत । लवास्त्रिंशत्कला ज्ञेया मुहूर्तस्त्रिशत कला ॥६७ मुहूर्तास्तु पुनस्निशदहोरानमिति स्थिति । अहोरान कलानानु व्यधिकानि शतानि पट ।।६८ ताश्चेव सख्यया ज्ञेय चन्द्रादित्यगतिर्यथा। निमेपा दश पञ्चव काशस्तारिंशत क्ला । त्रिंशत्कला मुहूत्तस्तु दशभागः क्ला स्मृता। चत्वारिंशत्कलानान्तु मुहूर्त इति मजित ॥१०० मुहूर्त्ताश्च लवाश्चापि प्रमाणशं प्रबल्पिता । तत्स्थाने नाम्भसाश्चापि पलान्यथ त्रयोदश ॥१०१ मागधेनैव मानेन जलप्रस्थो विधीयत । एते चाप्युदप्रस्थाश्चत्वारो नालिको धट ॥१०२ हेममाप कृतच्छिद्र श्चतुभिश्चतुरगुल । समाहनि च रात्रौ च मुहूर्तों व द्विनालिको ॥१०३ रवेगतिविशेपेण सर्वेषु नृपु नित्यश । अधिक पट् शत पञ्च कलाना प्रविधीयते ॥१०४ सप्तोदक का प्रस्थ होता है और साधिका लब यहा गया है तीस लव की एक क्ला जाननी चाहिये तथा नीम क्ला का मुहुर्त होता है ।।६ा तीस मुहूस का अहोगत्र होता है। एक सौ क्लायो का प्रहारात्र होता है ॥१८|| उनको मस्या से चन्द्र और सूर्य को गति की भांति जानना चाहिये । पन्द्रव निमेष्ठ और तोस काष्ठानों की कला होती है ॥६॥ तीम क्ला का मुहत्त और दश भाग क्ला कही गई है । चालीस बनायो कामहत्तं यह सज्ञा वाना होता हैं ॥१००॥ प्रमाण के ज्ञातामो के द्वारा मृत तथा लव प्रकत्पित किये गये
३६२ ।
[ वायु पुराण
हैं। उस स्थान वाल जल से भी तेरह पत होते है ॥१०॥ मागघ मान के
द्वारा ही जल प्रस्थ का विधान होता है। ये चार, उदक प्रस्थ हैं और नालिक
घट होता है ॥१०२॥ छेद किये हुए चार अगुल वाले चार हेममापो के समान
दिन मे और रात्रि मे द्विनालिक मुहूर्त होता है ॥१०३।। सूर्य को गति विशेष
से समस्त मनुष्यो मे नित्य ही पांचसौ के क्लाप्रो का विधान होता है ॥१०४।।
तदहानुप ज्ञेय नाक्षत्रन्तु दशाविकम् ।
सावनेन तु मासेन ह्यब्दोऽय मानुप स्मृत ॥१०५
एतद्दिव्यमहोरात्रमिति शास्त्रविनिश्चय ।
अह्नाऽनेन तु या सख्या मासवयनवापिकी ॥१०६
तदा वदमिद ज्ञान सज्ञा या हा पलक्ष्यताम् ।
कलाना सुपरीमाणात्काल इत्यभिधीयते ॥१०७
यदहारण प्रोक्त दिव्या कोटी तु तत् स्मृता।
शतानाञ्च सहस्राणि दगद्विगुणितानि च ।
नवति च सहस्राणि तथैवान्यानि यानि तु ।।१०८
एतच्छत्वा तु ऋषयो विस्मय परमाद्भुतम् ।
सस्थासम्भजन ज्ञानमपृच्छमन्तरन्तदा ॥१०६
सप्लावनस्य कालस्तु मानुपेरणव सम्मतम् ।
मानेन श्रोतुमिच्छाम सक्षेपार्थपदाक्षरम् ।।११०
तेपा श्रुत्वा स देवस्तु वायुलोकहिते रत ।
सक्षेपाद्दिव्यचक्षुष्मान् प्रोवाच भगवान् प्रभु ।।१११
एते राभ्यहनी पूर्व कोत्तिते विह तौकिके।
तासा सख्याय वर्षान ब्राह्म वक्ष्याम्यह क्षये ।।११२
वह मानुप दिन जानना चाहिये और नक्षत्र तो दश अधिक घाला होता
है। सावन माम मे यह मानुष दाब्द कहा गया है ॥१०१। यह दिव्य अहोरात्र
होता है-ऐमा शास्त्र का विनिश्चय है । इस दिन से जो सभ्या है वह मास भयन
ऋतु और वर्ष की है ॥१०६।। उस समय यह बर ज्ञान जो सज्ञा है उसे उप-
लक्षित करो। क्लाभो के सुपरीमाण मे काल ऐमा नामसे कहा जाता है ॥१०॥
मन्द तर क्यन । [ ३६३ - जो ब्रह्मा का दिन वहा गया है वह दिव्यबोटी यही गई है। सौ महस्र दम और दो से गुरिणत होते हैं । और नव्वे सहस्र तथा जो अन्य हैं वे इस कार के होते है ।।१०८। इसे श्रवण करके ऋषिगण परम अद्भुत विम्मय को प्रास हुए यह सस्या का सम्मजन ज्ञान ऐसा ही अद्भुत था। उस समय अन्नर वो पूछा ॥१०॥ पियो ने कहा-सम्प्लावन होने का समय मानुष के द्वारा ही सम्मत है। हम मान से प्रवण करने की इच्छा करते हैं जो कि सक्षेपार्थ पदाक्षर है १११०॥ लोक वे हित म रति रखने वाले उस वायुदेव ने उनकी इस बात को सुनकर भगवान् प्रभु जो कि दिव्य नेपो वाले थे, सक्षेप से बोले ॥११॥ ये रात्रि और दिन यहाँ लौक्कि पहिले कोत्तित किये हैं। उनके वन को सख्या फरके प्रब दिन के क्षय में जो बाह्म है उसे बताऊंगा ॥११२॥ कोटिशतानि चत्वारि वारिग मानुपाणि तु । द्वानिशच्च तथा कोट्य सङ्ख्याता सङ्ख्यया द्विजै ॥११३ तथा शतसहस्राणि एकोननवति पुन । आशीतिश्च महमापि एए काद प्लवस्य तु ॥११४ मानुपाख्येण सङ्ख्यात कालो ह्याभूतसप्लव । सप्त सूर्यास्तदाऽग्र पु तदा लोकेषु तेषु वै ॥११५ महाभूतेषु लीयन्ते प्रजा साश्चतुविधा । सलिलेनाप्लुते लोके नप्टे स्थावरजङ्गमे ।।११६ विनिवृत्तं च सहारे उपशान्ते प्रजापतो। निरालोके प्रदग्धे तु नगेन तु समावृते । ईश्वराधिष्टिते ह्यस्मिस्तदा ह्य कार्णवे तदा ।।११७ तावदेकार्णवो ज्ञ यो यावदासीदह प्रभो । रात्रिस्तु सलिलावस्था निवृत्तौ चाप्यह स्मृतम् ।।११८ अहोरात्रस्तथैवास्य क्रमेण परिवर्तते। आभूतसप्लवो ह्यप ग्रहोरात्र स्मृत प्रभो ॥११६ अलोक्ये यानि सत्वानि गतिमन्ति ध्रुवाणि च । भाभूतेभ्य प्रलीयन्ते तस्मादाभूतसप्लव ॥१२० । वायु पुराण चारसो कोड मानुप वर्ष तथा बत्तीस कोटि तय के द्वारा सस्या में म्यात दिये गये हैं ॥११३॥ तथा सो सहर नवासी पौर अस्मी सहर यह काल प्लव का होता है ॥११४|| यह प्राभूत मप्लव काल मानुपास्य के द्वारा सम्यात किया गया है । उस समय उन अग्रलोको मे सप्त सूर्य होते हैं ॥११५।। चारो प्रकार की समस्त प्रजा महाभूनो मे लीन होजाती है। जबकि लोक जल से पाल्पुत होजाता है पौर स्थावर मोर बङ्गम सब नष्ट हो जाते हैं ॥१६॥ सहार के विनिवृत्त होने पर और प्रजापति के उपशान्त होजाने पर बिना प्रकाश वाले प्रकृष्ट रूप से जले हुए होने पर तथा रात्रि के अन्धकार समावृत होने पर उस समय यह एकाण व फेवल ईश्वर से प्रधिक्षित होता है 10१७) उसका जब तक दिन रहता है तब तक यह एकारणव जानना चाहिये । जलकी अवस्था ही रात्रि है और उसकी निवृत्ति होजाने पर दिन कहा गया है ॥११८॥ उम प्रकार से इसका अहोरात्र क्रम से परिवत्तित हुप्रा करता है। यह माभूत मप्लव प्रभु का महोरात्र ही कहा गया है ॥११॥ त्रैलोक्य म जो गति बाले ध्रुव सत्त्व हैं वे अभूता से प्रलीन हो जाया करते हैं इस कारण से इसका नाम माभूत सप्लव ऐमा कहा गया है ।।१२०।। अग्रे भूत प्रजानान्तु तस्माद्भत प्रजापति । प्राभूत प्लवते चव तस्मादाभूतसप्लव ॥१२१ शाश्वते चामृतत्वे च शब्दे चाभूतसप्लव । अतीता वर्तमानाश्च तथैवानागता प्रजाः। दिव्यसङ्ख्या प्रसहयाता ह्यपरार्धगुणीकृता ॥१२२ पराधद्विगुणञ्चापि परमायु प्रवीतितम् । एतावान् स्थितिकालस्तु ह्यजस्येह प्रजापते. । स्थित्यन्ते प्रतिसर्गस्य ब्रह्मण परमेडिनः ।।१२३ यया वायु प्रवेगेन दोपाचिरुपशाम्यति । तथैव प्रतिसर्गेण ब्रह्मा समुपशाम्यति ॥१२४ तथा ह्यप्रतिसमृप्टे महदादौ महेश्वरे । महत्प्रलीयतेऽव्यक्त गुग्णसाम्य ततो भवेत् ॥१२५ शिवपुर वर्णन । [ ३९५ इत्येप च समात्यातो मया ह्याभूतसप्लव । ब्रह्मन मित्तिको ह्यप सप्रक्षालनसयम ॥१२६ समासेन समास्यातो भूयः किं वर्तयामि व । य इद धारयेन्नित्य शृणुयाद्वाप्यभीक्ष्णश । कीर्तनाच्छवणाच्चापि महती सिद्धिमाप्नुयात् ॥१२६ समस्त प्रजाभो के भागे हुमा या इससे प्रजापति भूत है और माभूत सप्लवित होता है इस कारण से माभूत मप्लव इस नाम से इसे कहा जाया करता है ।।१२१।। और शाश्वत ममृतत्व शब्द मे माभूत मप्लव है । जो व्यतीत होगये हैं वे-वत्तमान मे रहने वाले और उसी प्रकार से मनागत मर्थात् भविष्य मे होने वाले समस्त प्रजा की अपराध गुणीकृत दिव्य सख्या होते हैं ॥१२२॥ परादिगुण भी परमायु कही गई है । प्रजापनि मजका इतना ही स्थिति का काल होता है। प्रत्येक सर्ग की स्थिति के अन्त मे परमेष्ठी ब्रह्म का स्थिति काल होता है ॥१२३।। जिस तरह वायु के प्रवेग वाले झोके से दीपो की प्रचि (लो) उपशान्त होजाया करती है उसी प्रकार से प्रत्येक सर्ग से ब्रह्मा भी उपशान्त होजाया करता है ।।१२४।। तथा महदादि मे महेश्वर के अप्रति समृष्ट होने पर महत् भव्यक्त मे प्रलीन हो जाता है तब गुणो की साम्यावस्या होजाया करती है ॥१२शा इस तरह मैंने यह भाभूत सप्लव समाख्यान कर दिया है यह सम्प्रक्षालन सयम ब्रह्मा के निमित्त बाला होता है ।।१२६॥ मैंने यह सक्षेप से कह दिया है । मब मागे माप लोगो को क्या बताऊँ ? इसे जो नित्य ही धारण किया करता है अपवा बार-बार श्रवण किया करता है। इसके कीर्तन करने मे तथा श्रवण करने से महतो सिदि को प्राप्त होता है ॥१२७॥ । प्रकरण ६३-शिरपुर वर्णन असाधारणवृत्तस्तु हुतशेपादिभिद्विज । धर्मवैशेषिकेश्च व ह्याचूर्णमूक्ष्मदर्शिभि ॥१ ३६६ ] [ वायु पुराण ते देवं सह तिष्ठन्ति मर्लोकनिवासिनः । चतुर्दशैते मनव कीत्तिता वोत्तिवर्धना ॥२ अतीता वर्तमानाश्च तथैवानागताश्च ये ऋपिभिर्देवतश्च व सह गन्धवराक्षस ॥३ मन्वन्तराधिकारेपु जायन्तीह पुनः पुन । देवा: सप्तर्पय व मनव पितरस्तथा ।।४ सर्वे ह्यपि क्रमातीता महर्लोक समाश्रिता । ब्राह्मणः क्षत्रियवश्यर्धार्मिक सहित. सुराः ।।५ तैस्तथ्यकारिगियुक्त: श्रद्धावद्भिरदर्पिते । वर्णाश्रमाणा धम्मषु श्रौतस्मात्तषु सस्थितः । विनिवृत्ताधिकारास्ते यावन्मन्वन्तरक्षय ॥६ महलोंकेति यत्प्रोक्त' मातरिश्वस्त्वया विभो । प्रतिलोके च कर्तव्यमनेक. समधिठिता ॥७ यावन्तश्च व ते लोका दह्यन्ते ये न ते प्रभो। एतन्नः कथय प्रोत्या त्ल हि वेत्य यथातथम् ।। श्री वायुदेव ने कहा-असाधारण चरित्र वाले हुत शेप यादि द्विजो के साथ तथा धर्म के वैशेषिक प्राचूर्ण मूदम दशियों के साथ और देवो के साथ वे महर्लोक के निवामी होते हुए रहा करते हैं । ये कीत्ति के बढ़ाने वाले चौदह मनु बताये गये हैं ॥१-२|| अतीन-वर्तमान और चनागत जो हैं वे ऋपियों के- देवतो के और गन्धों के एव राक्षसो के साथ मन्वन्तरों के अधिकारो म बारम्बार उत्पन्न होते हैं। इसी तरह देव-सप्तपिगण-मनु और पितृवृन्द हुमा करते हैं ॥३-४॥ सभी क्रम से प्रतीत हुए महर्लोक में समाश्रित होते हैं । ब्राह्मण-क्षत्रिय और वैश्यों के सहित सुर वहाँ आश्रय किया करते हैं ॥१॥ तभ्यो के करने वाले श्रद्धा से युक्त-दपं से रहित-युक्त-वर्णाश्रमो के धर्मों में तथा श्रोत एव स्मातं धमों में से स्थित उनसे विनिवृत्त अधिकार वाले ये जब तक मन्वन्तर का क्षय होता है वहां रहा करते हैं ॥६॥ ऋपियों ने कहा-हे मातरिश्वन् । हे विभो । पापने महर्लोक-यह कहा है और प्रतिलोक मे अनेको शिवपुर वर्णन ] [ ३६७ के द्वारा क्नंव्य मे समधिष्टित बताये हैं ।।७।। हे प्रभो । और जितने वे लोग हैं उनम जो नहीं दग्ध होते हैं-यह सब हमको वताइये और प्रेम के माय वर्णन करिये क्याफि आप सभी कुछ ठीक ठीक जानते हैं ||८|| एवमुक्तस्ततो वायुमुनिभिविनयात्मभि । प्रोवाच मधुर वाक्य यथातत्त्वेन तत्त्ववित् ।। चतुई शव स्थानानि वरिणतानि महपिभि । लोकाख्यानि तु यानि स्युर्येपु तिष्ठन्ति मानवा ॥१० सप्त तेषु कृतान्याहुरकृतानि तु सप्त वै। भूरादयस्तु सङ्ख्याता सप्त लोका कृत्तास्त्विह ।।११ अकृतानि तु सप्तव प्राकृतानि तु यानि वै। स्थानानि स्थानिभि सार्द्ध कृतानि तु निवन्धनम् ।।१२ पृथिवी चान्तरिक्ष च दिव्य यच्च मह स्मृतम् । स्थानान्येतानि चत्वारि स्मृतान्यार्णवानि च ॥१३ क्षयातिशययुक्तानि तथा युक्तानि वक्ष्यते । यानि नैमित्तिकानि स्युस्तिष्ठन्त्याभूतसप्लवम् ।।१४ जनस्तपश्च सत्यञ्च स्थानान्येतानि श्रोणि तु ! ऐकान्तिकानि सत्त्वानि तिष्ठन्तीहाप्रसयमात् ॥१५ व्यक्तानि तु प्रवक्ष्यामि स्थानान्येतानि सप्त वै। भूर्लोक. प्रथमस्तेपा द्वितीयस्तु भुव स्मृत ।।१६ विनय स युक्त आत्मा वाले मुनियो के द्वारा इस तरह कहे गय वायु देव मधुर वाक्य बोले क्योकि वे तत्वो के बेत्ता थे मत यथा तत्त्व ही उनके वचन भी थे ।।६।। श्री वायु ने वहा~महर्पियो ने चौदह ही स्थानो का वर्णन किया है जो कि लोक-इस नाम से प्रसिद्ध हैं और जिनमे मनुष्य निवाम की स्थिति किया करते हैं ॥१०॥ उनम सात तो कृत हैं और सात प्रकृत हैं । मूर्लोक प्रादि नामा से जो सख्यात होते हैं ये ही सात लोक यहाँ कृत होते हैं ॥११॥ और प्रकृत तो सात ही होते हैं जो कि प्राकृत हैं। स्थानियो के साथ ये स्थान कृत हैं और निवन्धन होते हैं ॥१२॥ पृथिवी और मन्तरिक्ष और दिव्य ओ । वायु पुराण महर्लोक कहा गया है ये चार स्थान प्रारम्वक रहे गये हैं ॥१३॥ ये यातिशय से युक्त होते हैं तया युन्न कहे जायगे। जो नैमितिक होते हैं वे माभूत सप्लव तक रहा करते हैं ॥१४ जन-तप और सत्य ये तीन स्थान है जहाँ पर मार- सयम से एकान्तिक सत्त्व ठहरा करते हैं ॥१५॥ ये सात स्थान व्यक्त हैं इनको मैं बताता है भूलोक उनमे प्रथम है, दूसरा तो भुवोक रहा गया है ।।१६॥ स्वस्तृतीयस्तु विज्ञेयश्चतुर्थों ने मह स्मृत । जनस्तु पञ्चमो लोक्स्तप षष्ठो विभाव्यते ॥१७ सत्यन्तु सप्तमो लोको निरालीक्स्तत परम् । भूरिति व्याहते पूर्व भू.क्श्च ततोऽभवत् ॥१८ द्वितीय भुव इत्युक्त अन्तरिक्ष ततोऽभवत् । तृतीय स्वरितीत्युक्त दिव प्रादुर्वभूव ह ॥१६ ध्याहार स्त्रिभिरेतैस्तु ब्रह्मलोकमकरुपयत् । ततो भू पार्थिवो लोक अन्तरिक्ष भुवः स्मृतम् ॥२० स्वर्लोको नै दिव ह्यतत्पुराण निश्चय गतम् । भूतस्याधिपतिश्चाग्निस्ततो भूतपति स्मृत ॥२१ वायु वस्याधिस्पतिस्तेन वायुभुवपति । भव्यस्य सूर्योऽधिपतिस्तेग सूर्यो दिवस्पति ।।२२ महेतिव्याहतेनैव महलोंकस्ततोऽभवत् । विनिवृत्ताधिकाराणा देवाना तर वं क्षय ॥२३ जनस्तु पञ्चमो लोकस्तस्माज्ायन्ति चै जना । तासा स्वाय भुवाद्याना प्रजाना जननाज्जनः ।।२४ तृतीय स्वलॊक होता है भोर चतुर्थ पहलोंक जानने के योग्य बहा गया है। जनलोक पांचवा होता है और एटा तपलोक होता है ॥१७॥ सस्पलोक नाम वाला सप्तम लोक होता है इमवे भागे निरालोक होता है। पूर्व मे भू- यह ध्याहृत होने पर इससे ही भूलॊ हुभा ॥१८॥ फिर दूमरा भुव-यह वहा गपा वह अन्तरिक्ष भुव रहा गया है । तीमग स्व-यह कहने पर दिवा प्रादुर्भाव प्रा था ॥१६॥ इन तीन स्याहारों के द्वारा ब्रह्मलोक कल्पित हुमा शिवपुर वर्णन ] [ ३६६ था। इसमे भू पाथिय लोक है और भुव यह अन्तरिक्ष यहा गपा है ॥२०॥ और स्वलॊक यह दिव है-ऐमा पुराण में निश्चय को प्राप्त हुमा है । भूत का अधि पनि अग्नि है इसके पश्चात् भूत पति कहा गया है ॥२१॥ वायु मुव पति है । भव्य का प्रधिपति मूर्य होता है इससे सूर्य दिवस्पति वहा गया है ॥२२॥ यह इस तरह व्याहृत होनेसे ही इस प्रकार स महर्लोक फिर हुआ था। विनिवृत्त अधिकार वाले देवो वा वहां पर क्षय होता है ॥२३॥ जन पांचवां लोक है उमसे जन उत्पन्न हुआ करते है। उन स्वायम्भुवादि प्रजानो के जनन से जन होता है ॥२४॥ यास्ता स्वायम्भुवाद्या हि पुरस्नात्परिवीत्तिता । पल्पदग्धे तदा लोके प्रतिष्ठन्ति तदा तप ॥२५ ऋभु सनत्कुमाराद्या यन सन्त्यूर्द्ध रेतस । तपसा भावितात्मानस्तम सन्तीति वा तप ।।२६ सत्येति ब्रह्मणः शब्द सत्तामात्रस्तु स स्मृत.। ब्रह्मलोक्स्ततः सत्य सप्तम स तु भास्कर ॥२७ गन्धर्वाप्सरसो यक्षा गुह्यकास्तु सराक्षमा । सर्वभूतपिशाचाश्न नागाश्च सह मानुष । स्वर्लोकवासिन सर्वे देवा भुवि निवासिन ॥२८ ममतो मातरिश्वानो रुद्रा देवास्तथाश्विनी । अनिकेतान्तरिक्षास्ते भुवलो क्या दिवौकस ॥२६ आदित्या ऋभवो विश्वे साध्याश्च पितरस्तथा ।. पयोऽङ्गिरसश्च व भुवर्लोक समाश्रिता ॥३० एते वैमानिका देवास्ताराग्रहनिवासिन । इत्येते क्रमश प्रोक्ता ब्रह्मव्याहारसम्भवा ॥३१ भूलोकप्रथमा लोका महदन्ताश्च ते स्मृता । प्रारभ्यन्ते तु तन्मानं शुद्धास्तेषा परस्परम् ।।३२ जो स्वायम्भुवादि पहिले कहे गये है कल्प के दग्ध होने पर उस समय लोक मे तप को प्रतिष्ठित किया करते है ॥२शा ऋभु सनत्तुमार आदि जहाँ पर ४०० ] [ वायु पुराण ये ऊद्ध रेता लोग होते है जो तप के द्वारा भावित पात्मा वाले वहाँ पर है इसमें तप कहा गया है ॥२६॥ सत्य-यह बह्म का गब्द है और वह मत्तामात्र कहा गया है । इससे सत्य लो जो है वह ब्रह्मलोर सप्तम है और वह भास्कर है ॥२७॥ गन्धवं-प्रप्तराय-यक्ष-गृहक राक्षसो २ महित-समस्त भूत और पिनाथ माग मनुष्यों के सहित ये सब देव स्वलोक के निवास करने वाले हैं जोकि भुवि निवासी है ॥२८॥ मरत-मातरिश्वान-रुद्र-देवता तथा अश्विनीकुमार होमो के प्रनितान्तरिक्ष हैं और दिन में स्थान याने राब भुक्तो कम होते हैं। ॥२६॥ मादित्य ऋभु-विश्वेदेव-साध्य-पितर-ऋषिगण और अङ्गिरस ये सब भुवर्लोक मे समाश्रित होते हैं ।।३०॥ ये ताराग्रह निवासी देव वैमानिक होते है। ये सब क्रम से बहा के ध्याहार से उत्पन्न होने वाले वह दिये गये हैं ॥३१॥ भूर्लोक प्रथम लोक है और महदन्त ये कहे गये हैं। परस्पर म उनकी तन्मात्रामी से शुद्ध मारब्ध किये जाते हैं ॥३२॥ शुक्राद्याश्चाक्षुपान्ताश्च ये व्यतीता भुव श्रिता । महर्लोक्श्चतुर्थस्तु तस्मिस्ते कल्पवासिन ॥३३ भूर्लोक्प्रथमा लोका महदन्ताश्च ये स्मृता । तान् सर्वान् सप्त सूर्यास्ते अचिभिनिंदहन्ति वै ॥३४ मरीचि कश्यपो दक्षस्तथा स्वायम्भुवोऽङ्गिरा । भृगु पुलस्त्यः पुलहः क्रतुरित्येवमादयः ।।३५ प्रजाना पतय सर्वे वर्तन्ते तत्र ते सह । नि सत्वा निर्ममाश्च व तन ते ह्यद्ध रेतस ॥३६ ऋभु सनत्कुमाराद्या राज्यास्ते तपोधना.। मन्वन्तराणा सर्वेषा सावराना तत. स्मृताः। चतुईशाना सर्वेषा पुनरावृत्तिहेतव ॥३७ योग तपश्च सत्यश्च समाधाय तदात्मनि । पष्ठे काले निवर्तन्ते तत्तदाहविपर्यये ॥३८ सत्यन्तु सप्तमो लोको ह्यपुनर्मार्गगामिनाम् । ब्रह्मलोक समाख्यातो ह्यप्रतीपातलक्षण ॥३९ शिवपुर वर्णन ] पर्यासपारिमाण्येन भूलॊक समिति स्मृतः । भूम्यन्तर यदादित्यादन्तरिक्ष भुवः स्मृतम् ॥४० सुकाध और चाक्षुषान्त जो व्यतीत है वे भुट मे प्राश्रित होते हैं । महर्लोक तो चौथा है उसमे वे कल्प वासी रहते हैं ॥३३॥ भूर्लोक से प्रथम लोर जो महदन्त कहे गये हैं उन सबको सप्त सूर्य अपनी प्रचियो के द्वारा निर्दग्ध कर दिया परते हैं ॥३४॥ मरीचि-कश्यप-दक्ष-स्वायम्भुव-अङ्गिरा-भृगु- पुलस्त्य-पुलह और ऋतु इत्येवमादि हैं ॥३५॥ वे सब प्रजाप्रो के पति हैं और वहाँ पर वे उनके साथ रहते हैं । वे वहां नि सत्त्व और निमम एव ऊ- रेता होते हैं ॥३६॥ ऋभु और सनत्कुमार प्राद्य वे सब तपोधन वैराज्य हैं। मावर्ण समस्त मन्वन्तरो के वे कहे गये है जो कि चौदहो लोको के सव के पुनरा- वृत्ति होने के हेतु होते हैं ।।३७११ उम समय मे योग-तप और सत्य को प्रात्माम समाधान करके पष्ठ काल मे उस अह वे विपर्यय म निवृत्त होजाते हैं ॥३८॥ मत्य तो सप्तम लोक है जो कि अपुनर्मार्ग गामियो का लोक होता है । वह अप्रतीघात लक्षण वाला ब्रह्मलोक कहा गया है ॥३६॥ पर्यास पारिमाण्य मे भूलॊक ममिति कहा गया है। भूमि के अन्तर म जो प्रादित्य से अन्तरिक्ष है वह मुव कहा गया है ।।४।। सूर्यध्र वान्तर यच्च स्वर्गलोको दिव स्मृत । ध्र वाज्जनान्तर यच्च महलोंक्स्तदुच्यते ।।४१ विख्याता सप्तलोकास्तु तेपा वक्ष्यामि सिद्धय । भूर्लोकवासिन सर्वे ह्यन्नादास्तु रसात्मका ॥४२ भुवे स्वर्गे च ये सर्वे सोमपा प्राज्यपाश्च ये । चतुर्थे येऽपि वर्तन्ते मर्लोक समाधिता ॥४३ विज्ञ या मानसी तेपा सिद्धि पञ्चलक्षणा । सद्यश्वोत्पद्यते तेपा मनसा सबमीप्सितम् ।।४४ एते देवा यजन्ते वै यज्ञ सर्व परस्परम् । प्रतीतान् वतमानाश्च वर्तमानाननागतान् ॥४५ [ वायु पुराण । । प्रथमानन्तरंरिष्ट्वा ह्यन्तरा. साम्प्रतं पुन. निवर्ततीत्यासम्बन्धोऽतीते देवगणे ततः ।।४६ विनिवृत्ताधिकाराणा सिद्धिस्तेपान्तु मानसी तेपान्तु मानसी ज्ञया शुद्धा सिद्धिपरम्परा ॥७ उक्ता लोकाश्च चत्वारो जनस्यानु विधिस्तथा । समासेन मया विप्रा भूयस्त वर्तयामि द. ॥४८ और जो मूर्य धूवान्तर मे है वह स्वर्ग लोक दिन कहा गया है । ध्रुव से जनान्तर जो है वह महर्लोक कहा जाता है ॥४१।। ये सात लोक विख्यात हैं अब उनकी सिद्धियो को बताता हूँ। भूर्लोक के निवास करने वाले सभी अन्न खाने वाले रसात्मक होते हैं ॥४२॥ भुव में मोर स्वर्ग मे जो सब हैं ये सोम पान करने वाले और प्राज्य पान करने वाले होते हैं। चौथे में जो रहा करत हैं जोकि महर्लोक को प्राश्रय किये हुए है ॥४३॥ उनकी पांच लक्षणो वाली मानसी सिद्धि जानने के योग्य है। उनके मन से जो भी कुछ प्रभीष्ट होता है वह तुरन्त ही उत्पर हो जाता है ॥४४॥ ये देव समस्त यज्ञो के द्वारा परस्पर में यजन किया करते हैं । जो प्रतीत होगये हैं-जो वर्तमान है और जो अनागत हैं उन सभी को करते हैं ॥४५।। प्रथमो को अन्तरो के द्वारा यजन करके फिर साम्प्रतों के द्वारा अन्तरो को करते हैं फिर देवगण के मनीत होने पर मासम्बन्ध निबत्तित हो जाता है ॥४६|| उन विनिवृत्त अधिकार वालो की मानसी मिद्धि हुमा करती है । उनकी शुद्ध मिद्धियो की परम्परा मानमो जाननी चाहिए ।।४७॥ चार लोक कह दिये गये हैं तथा हे विप्रवृन्द । जनकी अनुविधि भी सक्षेप से मैंने बतला दी है मैं पुन उसको तुम्हारे सामने कहता हूँ ॥४८॥ मरीचि कश्यपो दक्षो वसिष्ठश्वाङ्गिरा भृगु । पुलस्त्य पुलहश्चैव क्तरित्येवमादय ॥४६ पूर्व ते सप्रसूयन्ते ब्रह्मणो मनसा इह । तत. प्रजा प्रतिष्ठाप्य जनमेवाश्रयन्ति ते ।।५० कल्पदाहप्रदीप्तेपु तदा कालेषु तेषु वै । भूरादिपु महान्तेषु भृश व्याप्तेष्वथाग्निना ।।५१ - शिवपुर वर्णन ] शिखा सवतका ज्ञ या प्राप्नुवन्ति सदा जना । यामादयो गरणा सर्वे महर्लोकनिवासिन ॥५२ मोक्ष दीप्तेषु जनमेवाश्रयन्ति ते । सर्वे सूक्ष्मशरीरास्ते तग्रस्थास्तु भवन्ति ते ॥५३ तेषा ते तुल्यसामर्थ्यास्तुल्यमूत्तिधरास्तथा । जन लोके विवर्तन्ते यावत्सप्लवते जगत् ।।५४ व्युष्टायान्तु रजन्या व ब्रह्मणोऽव्यक्तयोनिन । अहरादी प्रसूयन्ते पूर्ववत्रमशस्त्विह ॥५५ स्वायम्भुवादय सर्वे मरीच्यन्तास्तु साधका । देवास्ते वै पुनस्तेपा जायन्ते निधनेष्विह ॥५६ श्री वायुदेव ने कहा-मरीचि-कश्यप-दक्ष-वसिष्ठ-अङ्गिरा-भृगु-पुल- स्त्य-पुनह और क्रनु इत्येवमादि लोग पहिले यहाँ ब्रह्मा के मन से उत्पन्न होते हैं फिर ये प्रजाम्रो को प्रतिष्ठापित करके जन का ही प्राश्रय लिया करत हैं ।।४६ ५०॥ कल्पदाह के प्रदीप्त उन कालो मे भू से प्रादि लेकर महान त अग्नि के अच्छी तरह व्याप्त हो जाने पर सत्तिका शिखा जाननी चाहिए जिसको कि मनुष्य सदा ही प्राप्त किया करते हैं । यामादि समस्तगण जो महर्लोक के निवास फरने वाले हैं ॥५१-५२॥ वे महर्लोक के दीप्त होजाने पर जन नोक का प्राश्रय ग्रहण कर लेते हैं। वहां पर वे सभी मूक्ष्म शरीर वाले होते हुए वहाँ ही अपनी स्थिति किया करते हैं ॥५३॥ उनके वे तुन्य मामर्थ्य वाले और समान ही मूत्तियो को धारण करने वाले जब तक यह जगत् सप्लावित होता है जनलोक में ही विशेष रूप से रहा करते हैं ॥५४॥ अव्यक्त योनि ब्रह्मा की रजनी के व्युट होजाने पर दिन के मादि म यहाँ पुन पूर्व की भांति क्रम से उत्पन्न किया करते हैं ॥५५॥ यह निधन होने पर ममस्त स्वायम्भुवादि और मरीच्यन्त साधक देव वे फिर उनके जन्म ग्रहण किया करते हैं ॥५६ । यामादय मेणव कनिष्ठाद्या प्रजापतेः। पूर्व पूर्व प्रसूयन्ते पश्चिमे पश्चिमास्तथा ॥५७
४०४ ]
[ वायु पुराण
देवान्वये देवता हि सप्त सम्भूतय स्मृता।
व्यतीता कल्यजास्तेपा तिस्रः शिष्टास्तथापरे ।।५८
आवर्तमाना देवास्तु कमेगते न सर्वशः।
गत्वा जवन्तवीभावन्दशकृत्वः पुन पुन १५६
ततस्ते वै गणा सर्वे दृष्ट्वा भावेप्वनित्यताम् ।
भाविनोऽयंस्य च बलात् पुण्याख्यात्तिवलेन च ॥६०
निवृत्तवृत्तयः सर्वे स्वस्था सुमनसस्तथा।
वैराजे तुपपद्यन्ते लोकमुत्सृज्य तज्जनम् ॥६१
ततोऽन्येनैव कालेन नित्ययुक्तास्तपस्विनः ।
क्थनाच्चैव धर्मस्य तेपा ते जज्ञिरेऽन्वये ॥६२
इहोत्पन्नास्ततस्ते वै स्थाना प्रापूरयन्त्युत ।
देवत्वे च पित्वे च मनुष्यत्वे च सर्वश ॥६३
एव देवगणा सर्वे दशकृत्वो निवत्यं वै ।
वैराजेपूपपन्नास्ते दश तिष्ठन्त्युपप्लवान् ।।६४
पूर्णे पूर्णे तत कल्पे स्थित्वा वैगजके पुन. ।
ब्रह्मलोके विवर्तते पूर्वपूर्वक्रमेण तु ॥६५
यामादि और निष्टाद्य क्रम से ही प्रजापति होते हैं । जो पहिले हैं प्रथम
वे प्रसूत होते हैं और जो पीछे वाले हैं वे पीछे समुत्पन्न हुमा करते हैं । देवो के
अन्वय में देवतानो की सात मम्भतियाँ कही गई हैं। उनके व्यतीत कल्पज होने
हैं तीन शिष्ट हैं तथा अन्य होते हैं ॥५८|| वे देव क्रम से पावर्तमान होते हैं
सभी नहीं होते हैं । ये पुन पुन दशवार जान्तवीभाव की प्राप्ति किया करते हैं
वे सब गए। भावी में अनित्यता का दर्शन करके भावी अर्थ के बल से और
पुण्यास्थाति के बल से सब निवृत्त वृत्ति स्वस्थ मुमनम उम जनलोक का त्याग
कर वैराज में उत्पन्न होते हैं ॥६०.६१। इसके अनन्तर अन्य पाल से ही ये
नित्य युक्त तपस्वी धर्म के कथन से वे उनके वश में उत्पन्न हुए हैं ।।६२॥ यहाँ
पर उत्पन्न हुए वे फिर निश्चय ही स्थानो को पारित कर देते हैं कही देवस्व
में तो कही ऋपित्व के रूप में और सब मौर मनुष्यत्व के स्वरूप मे उत्पल हमा
1 थायु पुराण वाले पासजी के पुत्र पोर पुराणो के पूर्ण माता सूत्री से कहा--110010 अपिवृन्द बोर-ये राज जिम माहार वारे जिन मस्यो वाले और बिग भाषय वाले होकर रहते हैं और शितने समय तक ठहरते हैं वह हममे ठीक पहिए ॥१॥ तदुक्तमृपिभिर्वाक्य श्रुत्वा लोकार्थतत्वविद । मूत पौराणिको वाक्य विनयेनेदमब्रवीत् १७२ ततः प्राप्यन्त ते सो दिगुद्धतमाश्च ये। पाभून मप्लवास्तम दस तिष्ठन्ति ते जना.३ समें महमशरीरास्ते विद्वानों घनमूतंय. । पितलोकास्पिनत्याच तंपा भूत न विद्यतं ॥७४ का मनत्तुमाराधा. सिद्धास्त योगवामिगा। म्यानि नमितिकी तंपा पर्याय समुपरियते ।।७५ स्थानत्यागे मनमापि युगपरमप्रवर्तते । ऊचु: मध्ये तान्योन्य राजाश्मयुद्धपः ।।६ एवमेय महाभागाः प्रणव सम्प्रविश्य है। बझनो प्रवरिम्तमः यो भविष्यति । एवं मुरपा तदा मा बसाने व्यवगायिनः । योजयित्वा तास पतले योगम्मित:55 तव मम्मलोपन्ने माला दीपरिषोयपा। प्राणायमपतंग पुनरावृतिभर It सोम त समनुप्राप्य माय ते भापनामम् । मानन्द पाग. प्राप्प मनापाप से मना गरम्पको मनरे पदगुणेन । HIT:समागता यत्र या परोहिल !
शिवपुर वर्णन ]
[ ४०७
माभूत सप्लव तक ठहरा करते हैं ।।२३।। वे सब सूक्ष्म शरीर वाले विद्वान् और
धन मूत्ति वाले हैं और स्थित लोक मे भास्थित होने से उनका भूत नहीं होता
11७४।। सनत्कुमार प्राद्य मिद्ध पोर योग धर्मी उनके पर्याय के समुपस्थित
होने पर नैमित्तिकी ख्याति को कहते हैं ॥७॥ स्थान के त्याग करने पर मन
भरे एक ही माथ सप्रवृत्त होता है । उस ममय शुद्ध बुद्धि वाले सब अन्योन्य मे
वैराजो को कहते हैं ॥७६।। इसी प्रकार से ही महाभाग प्रणव में सप्रवेश
परके ब्रह्मलोक मे प्रवर्तन करने वाले हमारा श्रेय होगा ॥७७॥ इस रीति से
पहार उस समय में सब ब्रह्मान्त में व्यवमाय करने वाले योजित करके तब
सब योग धर्मो होने हैं ॥७८|| वहाँ पर ही जैसे दीप की चियाँ शान्त होजाया
परती हैं ये सम्पनीन हो जाते हैं |७६॥ वे मब उस भावनामय लोक को अनु.
प्राप्त करके मोर ब्रह्म के प्रानन्द की प्राप्ति करके वे अमृतत्व को प्राप्त हो जाया
करते हैं ॥५०॥राजो से उसी प्रकार से ऊद्ध मे पड्गुण अन्तर मे ब्रह्मलोक
त है जहाँ ब्रह्मा पुरोहित हैं ।।८१॥
ते सर्वे प्रणवात्सानो बुद्धशुद्धतपास्तथा ।
प्रानन्द ब्रह्मण प्राप्यामृतत्वञ्च भजन्त्युत ॥२
द्वन्द्व स्ते नाभिभूयन्ते भावत्रयविवज्जिता ।
आधिपत्य विना तुल्या ब्रह्मणस्ते महौजस ॥३
प्रभाववियश्वयंस्थितिवैराग्यदर्शने ।
ते ब्रह्मलोविका. सर्वे गति प्राप्य विवर्तनीम् ॥८४
ब्रह्मणा सह देवश्च सम्प्राप्त प्रतिसश्चरे।
तपमोऽन्ते क्यिात्मानो युद्धावस्था मनीपिणः ।
प्रव्यक्ते सप्रलीयन्ते सर्व ते क्षणशिन ॥५
इत्येतदमृत गुर नित्यमक्षयमव्ययम् ।
देवर्षपो ब्रह्मसत्र मनातनमुपासते ॥६
मपुनर्मागंगादीना तेपा चंबोद्ध रेतमाम् ।
पर्माभ्यासता शुक्रियेदान्तेषूपलक्ष्यते ।।
- वायु पुराण शतमाहु परिदृढ सहस्र परिपाकम् । विज्ञेयमयुत तस्मानियुत प्रसृत ततः ।।१०० अर्बुद निर्बुदञ्च व सदञ्च तत स्मृतम् । खर्वश्च व निखर्वञ्च शडकु पन तथव च ॥१०१ समुद्र मध्यमञ्च व परार्द्ध मपर तत । एवमष्टादशतानि स्थानानि गणनाविधौ ॥१०२) शतानीति विजानीयात् सजितानि महपिभि । कल्पसस्या प्रवृत्तस्य पराद्ध ब्रह्मरण स्मृतम् ॥१०३ तावच्छेपोऽपि कालोऽस्य तस्यान्ते प्रतिसृज्यते । पर एप पराद्धञ्च सख्यात सख्यया मया ॥१०४ सौ सहस्र करोडो को शत्रु-इस नाम से कहा जाता है । सहस्रो करोडो के सहस्र को फिर दशवार गुणित कर देन पर सख्या के वेत्ता लोग उसे समुद्र इस नाम से रहते हैं ॥९॥ कोटियों का सहप्त मयुत है-यह मध्य कहा जाता है। कोटि सहस्र नियुत जो है वह 'अन्त'-इस सज्ञा वाला होता है कोटियों के कोटि सहस्र पराई इस नाम से कहा जाता है । पराद्ध का दुगुना भी मनी- पियो के द्वारा परम कहा जाता है | रात को परिदृढ कहते हैं और सहस्र को परिवघ्नक कहते हैं । उससे अयुत जानना चाहिए और फिर नियुत तथा प्रयुत होता है ॥१०॥ प्रवुद-निवुद और सवुद कहा गया है। सर्व-निखर्व पौर फिर शकु तथा पन कहा जाता है ।।१०१॥ समुद्र और मध्यम मोर इसके पश्चात् पराद्ध होता है । इस तरह से इस गणना की विधि के मठारह स्थान होते हैं ।।१०२॥ शतानि-यह जानना चाहिए जोकि मनीषियो के द्वारा सज्ञा वाले हुए हैं । कल्प सख्या में प्रवृत्त उस ब्रह्मा का पराद्धं कहा गया है ॥१०३।। उतना उसका शेष काल भी उसके अन्त में प्रति सृष्ट किया जाता है । यह पर मौर पराद मैंने सस्या से गिना हुप्रा क्यिा है ॥१०४॥ यस्मादस्य पर वीयं परमायु परन्तपः । परा शक्ति परो धर्म परा विद्या परा धृति ॥१०
शिवपुर वर्णन ]
पर ब्रह्म पर ज्ञान परमेश्वर्यमेव च ।
तस्मात्परतर भूत ब्रह्मणोन्यन्न विद्यते ॥१०६
परे स्थितो ह्यप परः सर्वार्थेषु ततः परः।
सख्यातस्तु परो ब्रह्मा तस्याद तु परार्द्धता ।।१०७
सख्येय चाप्यसख्येय सतत चापि त त्रिकम् ।
सख्येय सख्यया दृष्टमपारार्दाद्विभाप्यते ॥१०८
राशी दृष्टे न सख्यास्ति तदसस्यस्य लक्षणम् ।
प्रानन्त्य सिक्ताम्येषु दृष्टवान् पञ्चलक्षणम् ॥१०६
ईश्वरस्तत्प्रसग्यात शुद्धत्वादिव्यदृष्टिभि ।
एव ज्ञानप्रतिष्टत्वात् सव्वं ब्रह्मानुपश्यति ॥११०
एतच्छ्रुत्वा तु तं मा नमिपेयास्तपस्विन ।
वाप्पपाकुलातास्तु प्रहपद्गिद्गदस्वरा ॥१११
पप्रच्छुमतिरिश्वान सर्बो ते ब्रह्मवादिन ।
ब्रह्मनोवस्तु भगवन् यादमात्रान्तर प्रभो ॥११२
योजनाय ग सख्यातः साधन योजनस्य तु ।
मोशस्य च परीमाण श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥११३
जिस कारण से इसकी पर वीर्य है-परम माय-परम तप-परा शक्ति-
पर धर्म-परा विद्या-परा -परम ब्रह्म-परम मान पोर परम ऐश्वयं होता
है उपसे परतर भूव होता है जोकि यहा से मान्यत् कोई नहीं है ॥१०५-१०६४
पर में स्थित यह पर है मोर समस्त मयों में पर है उमो पर ब्रह्मा सल्यान
होता है और उसका भई ही पराईता होती है ॥१०७॥ मम्या करने के योग्य
मौर मम्यानमारने के भी योग्य सदंदा उप विकको गम्या में सख्या करने में
योग्य देखा है जो पपरार्ट में विभापित किया जाता है ।।१०९]] राति
देगने पर यश्या नहीं है वह पमन्य का लक्षण है। मिक्ता नाम वालों का
पर सक्षण वाला माननय देखा है ॥१६॥ दिव्य टि वाले ईश्वरी के द्वारा
गुद होने में वह प्रगम्यान है । इस प्रकार में मान प्रतिष्ट होने मे मद ब्रह्मा
मनुस्मन करता है ॥११॥ पह याण पर दे सर नमिषेय सपस्वी लोग बाणों
४१२ ]
[ वायु पुराण
से प्राकुल नत्रो वाले प्रष्ट हर्ष से गदगद स्वर वाले होगये थे ॥११॥ उन
समस्त ब्रह्म वादियो ने वायुदेव से पूछा--हे प्रभो । हे भगवान् । ब्रह्मलोक
जितना अन्तर वाला है वह योजनान से सन्यायात किया गया है। योजन का
साधन और कोस का परीमाण तत्त्व पूर्वक हम लोग सुनने की इच्छा करते
हैं ॥११२-११३॥
तेपा तद्वचन श्रु त्वा मातरिश्वा विनीतवाक् ।
उवाच मधुर वाक्य यथादृष्ट यथाक्रमम् ॥११४
एतद्वोऽह प्रवक्ष्यामि शृणुध्या मे विवक्षितम् ।
अव्यक्तान्यक्तभागो गे महास्थूलो विभाप्यते ॥११५
दशैव महता भागा भूतादिः स्थूल उच्यते ।
दशभामाधिक चापि भूतादि परमाणुक ॥११६
परमाणु सुमूक्ष्मस्तु भावग्राह्यो न चक्षुपा।
यदभेद्यतम लोके विज्ञय परमाणु तत् ।।११७
जालान्तरगत भानोर्यत्सूक्ष्म दृश्यते रज ।
प्रथम तत्प्रमाणाना परमाणु प्रचक्षते ।।११८
अष्टाना परमाणूना समवाया यदा भवेत् ।
त्रसरेणु समाख्यातस्तत्पधरज उच्यते ॥११६
प्रसरेणवश्व येऽप्यष्टौ रथरेणुस्तु स स्मृत ।
तेऽप्यष्टौ समवायस्था बालाग्र तत्स्मृत वुधै ॥१२०
बालाग्राण्यष्ट लिक्षा स्याा का तन्वाष्टक भवेत् ।
यूकाष्टक यन प्राहुरङ्ग लन्तु यवाष्टकम् ॥१२१
उनके उस वचन का श्रवण कर विनीत वचन वाले वायुदेव जैसा भी
देखा है उसे यथाक्रम से मधुर वाक्य कहने लगे ॥११४॥ वायु ने कहा-यह
मैं आपको बतला दूंगा मेरे विवक्षित को पाप सुनिये । अव्यक्त भाप निश्चय
ही महान स्थूल विभाषित होता है ।।११५॥ महता के दश ही भाग हैं । भूनादि
स्यूल कहा जाता है । दश भागो से अविक भी भूतादि परमाणुक होता है
॥११६।। परमाणु बहुत ही मूदम होता है और वह भावग्राह्य है बशु क द्वारा
शिवपुर वर्णन ] । ४१३ प्राहा नही होता है । जो लोक म अभेद्यनम होता है उमो को परमाणु जानना चाहिए ॥११७१ भानु के जान के अन्तगत जो सुक्ष्म रज के कण दिम्बलाई देने हैं । प्रथम उसके प्रमाण वालो को परमाणु कहते हैं ॥११॥ पाठ परमाणुमो का समवाय जव हो जाता है तो उसे त्रसरेणु इस नाम से समात्यात करते हैं वह पधरज पहा जाता है । पाठ त्रसरेणुओं का रथरेणु कहा जाता है । पाठ रयरेणुगो का जब समवाय होता है तो वुधो के द्वारा बलान कहा गया है ।।११६ १२०॥ माठ बलाग्रामों का एक लिक्षा और पाठ लिक्षाओ का एक यूका होती है । पाठ यूकामो का एक यव और माठ यवा का एक अगुल होता है।॥१२॥ द्वादमागुनपर्वाणि वितस्तिस्थानमुच्यते । रनिश्चागुलपर्वाणि विज्ञेयो ह्य कविंशति ।।१२२ चत्वारि विशतिश्च व हस्त स्यादगुलानि तु । किकुद्विरलिविज्ञ यो द्विचत्वारिंशदगुल (६१२३ पणवत्यगुलञ्च व धनुराहुमनीषिण । एतद्गम्यूतिसख्याया पादाना धनुप स्मृत ॥१२४ धनुर्दण्डा युए नाली तुल्यान्येता यथागुले । धनुपस्त्रिशत नल्वमाहु सस्याविदो जना ॥१२५ घनु सहस्र द्वे चापि गन्यूतिरुपदिश्यते । अष्टौ धनु सहस्राणि योजनन्तु विधीयते ।।१२६ एतेन धनुपा चैव योजन तु समाप्यते । एतत्सहस्र विज्ञेय शक्कोशान्तरन्तथा ।।१२७ योजनानान्तु सख्यात सख्याज्ञान विशारद । एतेन योजनानण शृणुध्व ब्रह्मणोज्तरम् ॥१२८ महीतलात्सहस्राणा शतावं दिवाकर । दिवाकरात्सहस्रेण तावदूर्ध्व निसाकर ॥१२६ पूर्ण शतसहस्रन्तु योजनाना निशाकरान् । नक्षत्रमण्डल कुलमुपरिष्टात्प्रकाशते ॥१३० [ वायु पुराण द्वादश भगुली के पर्वो का एक वितस्ति होता है। जोकि वो के द्वारा वितस्ति स्थान कहा जाता है । इक्कीम प्रगुली का एक पर्व जानना चाहिये ॥१२२॥ चौबीस अगुली का एक हस्त होता है। दो रात्रियो वा जिसमे बया लीस प्रगुल हुमा करते हैं एव विप्नु होता है ॥१२३॥ छयानवे प्रगुल वाला जो होता है उसे मनीषी लोग एक घनु कहते हैं । यह गन्यूति सस्या में पादों का कहा गया है ॥१२४॥ दो धनुदंएड वाला नीली है जैसे अगुली के तुल्य हैं। तीनसौ धनुषो का नल्व सस्या के विद्वान् जन कहते हैं ॥१२५॥ दो सहस्र धनुनौं का एक गब्यूति कहा जाता है। माठ सहस्र धनुषों का एक योजन होता है ॥१२६।। इस धनुष से योजन समाप्त किया जाता है। यह जब एक सहन हो तो शक्र क्रीमान्तर होता है ॥१२७ सस्या के ज्ञान रखने वाले पण्डितो के द्वारा योजनो की संख्या की गई है। इस योजना से ब्रह्मा का अन्तर श्रवण करो॥१२८।। महीतल से सौ सहस ऊपर दिवाकर होता है । दिवाकर से सहस्त्र कपर निशा कर होता है ॥१२६॥ निशाकर से ऊपर एक पूरे सौ सहस्र समस्त ताराग्रहो का नक्षत्र मण्डल होता है जोकि प्रकाश करता है ॥१३०॥ शत सहस्र संख्यातो मेरुद्विगुरिणत पुन । ग्रहान्तरमथकैमूवं नक्षत्रमण्डलात् ॥१३१ ताराग्रहाणा सर्वेपामधस्ताच्चरते वुध । तस्यार्ध्वञ्चरते शुक्स्तस्माद्ध्वं च लोहित ॥१३२ ततो बृहस्पतिश्योद्ध्वं तस्माद्ध्वं शनैश्चर । ऊद्ध्वं शतसहस्रन्तु योजनाना शनैश्चरात् ।।१३३ सप्तपिमण्डल कृत्समुपरिष्टात्प्रकाशते । ऋपिभिस्तु सहस्राणा शतदूर्ध्व विभाव्यते ।।१३४ योऽसौ तारामये दिव्ये विमाने ह्रस्वरूपके । उत्तानपादपुत्रोऽसौ मेटिभूतो ध्रुवो दिवि ॥१३५ त्रैलोक्यस्यप उरसेघो व्याख्यातो योजनर्मया। मन्वन्तरेषु देवानामिज्या यव लौक्किी ॥१३६ शिवपुर वर्णन ] 1 ४१५ वर्णाश्रमेभ्य इज्या तु लोकेऽस्मिन्या प्रवर्तते । सर्वपा देवयोनीना स्थितिहेतु स व स्मृत ॥१३७ लोक्यमेतद्वयात्यातमत ऊवं निबोधत । ध्र वावं महर्लोको यस्मिस्ते कल्पवासिन । एकयोजनकोटी सा इत्येव निश्चय गतम् ॥१३८ सो सहस्र संख्या से मेरु द्विगुणित बताया गया है । ग्रहो का एक-एक मे ऊपर नक्षत्र मण्डल से अन्तर होता है ॥१३१॥ रामस्त साराग्रहो के नीचे के भाग मे बुध रहता है। उसके ऊपर शुक्र है और उसमें ऊपर लोहित चरण करता है ॥१३२॥ उससे पर बृहस्पति और उससे ऊपर शनैश्चर होता है । पानश्चर से सौ सहस्र योजन ऊपर ससपियो का मण्डल हुमा करता है जोकि पूर्ण रूप से प्रकाशित हुमा करता है। पियो से मी महत्र ऊपर हस्वरूपक इम दिव्य तागमय विमान में जो यह मेदिभूत उत्तानपाद राजा का पुत्र ध्रुव दिय में प्रकाशित होता है ॥१३३,१३४-१३५४४ मैंने यह रैलोक्य वा उल्येय , (ऊंचाई) व्याख्यात कर दिया है अर्थात् खुलामा वतला दिया है जोकि योजना के द्वारा होता है। मन्वन्तरो मे जहाँ पर ही लौकिकी देवो की इग्या होती है ॥३६॥ जो इज्या यहाँ लोक में वर्णाश्रमो मे प्रवृत्त हुआ करती है। समस्त देव योनि वालो की वह हो स्थिति का हेतु बताया गया है ॥१३७॥ मैंने यह इस तरह लोश्य की व्याख्या करदी है पब इसमे पागे समभलो। ध्रुव से कार महलोंक है जिसमे वि वे कल्पवामी रहत हैं। वह एक कोटि योजन है इसी प्रकार निश्चय दिया गया है ॥१३॥ दे कोट्यौ तु महर्लोयास्मिस्ते कल्पवासिन । यत्र ते ग्रहाण, पुत्रा दक्षाद्या साधना स्मृता ॥१३६ सगुणोत्तरादाय जन नोगातप स्मृतम् । वराजा यत्र ते देवा भूतदाहविवर्जिता ॥१४० पड्गुणन्तु तपोलोवात्मत्यलोरान्तरं स्मृतम् । मपुनरियामाना ब्रह्मलोग स उच्यते
४१६ ]
[ वायु पुराण
यस्मान च्यवतै भूयो ब्रह्माण स उपासते।
एक्कोटिर्योजनाना पश्चाशग्नियुतानि तु ।।१४२
ऊद्ध्वं भागस्ततोऽण्डस्य ब्रह्मलागरात्पर स्मृत ।
चतुरश्च व कोट्यस्तु नियुता पञ्चपष्टि च ।।१४३
एपोद्ध'शप्रचारोऽस्य गत्यन्तश्चापर स्मृत ।
ध्र वाग्रमेतद्वयाख्यात योजनाग्राद्यथाथ तम् ।।१४४
अधोगतीना वक्ष्यामि भूताना स्थानक्ल्पनाम् ।
गच्छन्ति घोरकर्माण प्राणिनो यत्र कर्मभि ॥१४५
नरको रौरवो रोष सूकरस्ताल एव च ।
सप्तकुम्भो महाज्वाल शवलोऽय विमोचन ॥१४६
कृमी च कृमिमक्षश्च लालाभक्षो विशसन ।
अध शिरा पूयवहो रुधिरान्धस्तथैव च ॥१४७
तथा वैतरण कृष्णमसिपत्रवन तथा।
अग्निज्वालो महाघोर सदशोऽथ श्वभोजन ॥१४८
तमश्च कृष्णसूत्रश्च लाहश्चाप्यसिजस्तथा।
अप्रतिष्ठोऽय वीच्यश्वनरका ह्यवमादय १४६)
महलोंक से दो कोटि ऊपर नहीं वे क्ल्प पर्यन्त वास करने वाले हैं और
one .ला के पुत्र दक्ष प्रादि साधक कहे गये हैं ॥१३६॥ जनलोक से चतुगु ए
ऊपर तपोलोक गताया गया है जहां पर वैराज देव रहते हैं जोकि भूत दाह स
रहित रहा करते हैं ॥१४०॥ तपोलोक से पड गुण ऊपर सत्यलोक का मतर
होता है । जो अपुनारको का ब्रह्मलोक कहा जाता है ॥१४१॥ जहाँ से फिर
कोई भी च्यवन नहीं किया करता है और वह ब्रह्मा की उपासना किया करता
है । एक करोड योजन और पचास नियुत ऊपर उससे अएड का भाग है जो
ब्रह्मलोक से भी पर कहा गया है चार कोटि और पैसठ नियुत है ।।१४२ १४३॥
इसका यह भर्तीश प्रचार अपर गत्य त कहा गया है। यह जैसा भी सुना गया
है योजनाय से घृवान की व्यास्था करदी गई है ॥१४४॥ प्रब अधोगति वाले
प्राणियों की स्थान कल्पना को बतलाता हूँ । जहाँ पर भोर कम करने वाले
शिवपुर वर्णन ] [ ४१७ प्राणीगण अपने कर्मों के द्वारा जाया करते हैं ॥१४४ १४।। नरको क नाम ये हैं- गैरव-रोध-सूकर-ताल-सप्तम्भ-महाज्वाल-शबल विमोचन-वृमी-वृमि- भदा-लालाभक्ष-विधमन-प्रशिरा-पूयवह-रधिरा ध-वैतरण-कृष्ण-परिपत्र पन-अग्निज्वाल-महाघोर-सदश-श्वभोजन-तम-कृष्णमूत्र-लोह - प्रमिज-अप्र- तिष्ट-वीच्यश्व इस प्रकार से ये नरक होते हैं ॥१४६ से १४६।। तामसा नरका सर्वे यमस्य विपये स्थिता । येषु दुष्कृतवर्माण पतन्तीह पृथक्पृथक् ॥१५० भूमेरधस्तात्ते सर्वे रौरवाद्या प्रकीर्तिता । रोरवे बूटमाक्षी तु मिथ्या यश्चाभिशमति । रग्रहे पक्षवादी ह्यसत्य पतते नर ॥१५१ रोधे गोध्नो भ्रमहा च ह्यग्निदाता पुरस्य च । सूबरे ब्रह्महा मज्जेत्सुराप स्वर्णतस्वर ॥१५२ ताले पतेत्तनियहा हत्या वैश्यञ्च दुर्गतिम् । ब्रह्महत्याञ्च य पुर्याद्यश्च म्याद्गुरतल्पग ॥१५३ मप्तकुम्भी स्वसागामी तथा राजभटश्च य । तप्तलोहे चाश्ववरिणवतथा बन्धन रक्षिता ।।१५४ साध्वीविनयकर्ता च यस्तु भक्त परित्यजेत् । महाज्वाले दुहितर स्नुषा गच्छति यस्तु य समस्न सामग मरक यमराज वे गम स्थित होते हैं। उन नरों मे जो पाप रमों में करने वाल पृथक होत है, वे अपने प्रपन न कर्मों के अनुसार पृपा पृथक् परित होते है ॥१५०॥ वे सब नरव भूमि के नीच भाग म रौरव पादिहाल है। जो कूटगासी मान् भूटी गवाही देने वाला है भोर मया मिण्या घोता है यह कापह और नाम नए म मिण्यावादी सपा पक्ष में पालने वाला जापर गिरता है ।।१५१॥ रोप नाम नर म गौ की हत्या करन पाला तया भूगा का वध करने वाला पौर नगर में भाग लगने वाला जाया परमा, है । पाहाणा व पग्ने याना मार म गिरता है । गुगतान रन बारा पौर स्वण गाभुराने वाला सान नाम या नरा म गिरता है । शानिय वं।।
४१८ ] [ वायु पुराण का हनन करन वाला तथा वैन्य की दुगति करने वाला और जो ब्रह्महत्या करता है एव जो गुरुपत्नी का गमन करता है वह तप्तकुम्भ नरक में जाता है। स्वसा का गमन करने वाला और जो राजभट होता है वह मोर मश्वो का बेचने वाला तथा बन्धन रक्षिता ये सब तप्तलोह नामक नरक म पतन प्राप्त किया करते हैं ॥१५२-१५३-१५४॥ स्वाध्वी के विक्रय करने वाला और भक्त का परित्याग कर देता है तथा पुत्री एव स्नुपा का गमन किया करता है वह महा- ज्वाल नाम वाले नरक में गमन करके पापो के फ्ल को भोगता है ।।१५।। वेदो विक्रीयते येन वेद दूपयते च य । गुरू श्वं वावमन्यन्ते वाक्क्रोशेस्ता डयन्ति च ।।१५६ अगम्यगामी च नरो नरक शवल व्रजेत् । विमोहे पतिते चौरे मर्यादा यो भिनत्ति वे ॥१५७ दुरध्व कुरुते यस्तु कोटलोह प्रपद्यते । देवब्राह्मणविद्वष्टा गुरूणाश्चाप्यपूजक । रत्न दूपयते यस्तु कृमिभक्ष्य प्रपद्यते ॥१५८ पर्यश्नाति य एकोऽन्यो ब्राह्मणी सुत्दृद सुतात् । लालाभक्षेस पतति दुर्गन्धे नरके गत. ॥१५६ काण्डका कुलालश्च निवर्ता चिकित्सक । पारामप्वग्निदाता य पतते स विशसने ॥१६० असत्प्रतिग्रही यश्च तथैवायाज्ययाजक । नक्षनर्जीवितो यश्च नरो गच्छत्यधोमुखम् ।।१६१ बिमके द्वारा वेदो वा विक्रय क्यिा जाता है और जो वेदों को दूषित किया करता है तथा गुरुगरण का जो अपमान करता है एक वाकोशो के द्वारा जो ताहना पिया करते हैं एव प्रगम्या गमन करते हैं वे सभी गवस नामक नरक मे जाया करते हैं । चार विमोद नार में पतित होते हैं और ओ मर्यादा को तोडते हैं ये भी उमी नरक म जाते हैं ।।१५६-१५७॥ जा दुरध्य करता है वह कीटलोक नरक में जाता है । देवा-ग्राह्मणो काटेप करने वाला तथा गुरुपो की पूजा न करने वाला और जो रस्न को दूषित पिया करता है वह कृमिभक्ष्य शिवपुर वर्णन ] नामर नरस में प्राप्त हुआ करता है ।।१५८।। जो एक अन्य ब्राह्मणी और मुहृद की पुत्री का उपभोग करता है वह दुर्गन्ध वाले लागाभक्ष नामक नरक में जाकर गिरता है ॥१५६॥ काण्डबर्ता-बुम्हार-निष्प का हरण करने वाला तथा चिक्रिमा करने वाला एवं बाग में आग लगाने वाला व्यक्ति जो होता है वह विरामन नाम वाले नरक मे गिरता है ॥१६०॥ अमत् वस्तु के प्रनिग्रह का लेने वाला भौर उसी तरह से जो याजन के अयोग्य है उमको याजन कराने वाला तया नक्षत्रो के द्वारा जो जीविका चलाता है अर्थात् गणर ज्योतिषी मनुष्य होता है वह मधोमुख नामक नरक में जाता है ॥१६१॥ क्षीर सुरा च मास च लाक्षा गन्ध रमन्तिलान् । एवमादीनि विक्रीणन्धोरे पूयवहे पतेव ॥१६२ य कुक्कुटानि बध्नाति मार्जारान्सूकराश्च तान् । पक्षिणश्च मृगान्छागान्सोऽप्येन नरक प्रजेत् ॥१६३ माजीविको माहिपवस्तथा चक्रध्वजी च य । जगोपजोविको विन मानिग्राम याजक ॥१६४ प्रगारदाही गरद पुण्डाशी सोमविनयी। सुरापो मासभक्षश्च तथा च पशुघातर ॥१६५ विश (श्व) स्ता महिपादीना मृगहन्ता तथैव च । पर्वधारश्च मूची च यश्च स्याम्मित्रघातर । रपिरान्धे पतन्त्येते एवमात्मनीषिण ॥१६६ क्षीर (दूध)-पुरा-माम-नाम-गध (मुगपित पदार्थ)-ग पौर निती को एव इस प्रारको वानुमों को बेचने वाला व्यक्ति घोर पूय यह नामद मरस में जाकर गिरता है ।।१६२।। जो मुगा को वष बरमा है तथा मागे पौर गूरों गो-पक्षियो को-मृगो को तथा धागो को वष पिया करता है यह भी हमी नरस में गिरता है ॥१६३॥ आमिर-माहिपिक और बीया पत्री होता है-गो रङ्गो मे उपजीविका करने वाला हैि मपा पाहुनि एवं माम माजर होता है-प्रगार यो दाह करने वाना-विर देन वामा-गडाशी- गोमा नि वामा-मदिरा पीने वाता-मांग माण करने वाता- ४२० ] [ वायु-पुराण पशुप्रो का वध करने वाला-महिप आदि का विशस्ता-मृगो का हनन करने वाला-पर्व कार-सूची और जा मित्र घातक होता है-ये सब रुधिराज्य में जाकर गिरा करते हैं ऐसा मनीषीगण कहते हैं ॥१६४-१६५-१६६।। पतन्ति नरके घोरे विड भुजे नात्र संशयः ॥१६७ मृपावादी नरो यश्च तथा प्राक्रोशकोऽशुभ । पतेत्तु नरके घोरे मूत्रावीणे स पापकृत् ॥१६८ मधुग्राहाभिहन्तारो यान्ति वैतरणी नरा । उन्मत्ताश्चित्तभग्नाश्च शौचाचारविवर्जिता. ॥१६९ बोधना दुखदाश्च व बुहका कृष्टगामिन । असि पनवने छेदी तथा ह्यौरभ्रिवाश्च ये। क्तंनंश्च विकृध्यन्ते मृगव्याधा सुदारणं ॥१७० पाथमप्रत्यवसिता अग्निज्वाले पतन्ति वै । भोज्यन्ते श्याम रावल रयस्तुण्डं श्च वायस ॥१७१ इज्याया यतमालोपात्सन्दशे नरके पतेत् । स्कन्दन्ते यदि वा स्वप्ने प्रतिनो ब्रह्मचारिण ।।१७२ पुरध्यापिता ये च पुर्यराज्ञापिताश्च ये। ते सर्वे नरक यान्ति नियतन्तु श्वभोजने ॥१७३ वर्णाश्रमविएतानि नोघहपंसमन्विता । कर्माणि ये तु कुर्वन्ति सर्वे निरयगामिन ||१७४ एक ही पक्ति में बैठे हुए व्यक्ति को जो विषम भोजन करता है। यह विभुज नामक पोर नरव में गिरता है इसमे कुप भी समय नहीं है ॥१७॥ जो मनुष्य मिथ्यावाद करने वाला होता है तथा जो अशुभ एव मातोश बरन वाला होता है । वह पापी मूमाकीणं नामक नरक मे जोषि वहाही पोर हाता है गिरता है ॥१६॥ मधुपाह के प्रभि हनन करने वाले नर पेरणी मे जाया करते हैं। जो उन्मत्त-भान-चित वाले-शौच एवं आचार से रहित-म यन्न पवारल बोध करने वामे-दुम देने वारे-नुहए और पामी मनुष्य है ये ममि पत्रवन नाम वाले नरा में जाया करते हैं। जो पेन परत याने या गिवपुर वर्णन ] [ ४२१ और भित्र एक वर्तनी (छुटियो) के जैसे सुदारुणो प्रयो से मृग एव व्याधी का विश्पण किया करते है वे अपने आश्रमसे प्रत्यवसित होते हुए अग्निज्वाल नामक नरक में गिरते हैं। जो श्याम और शवल अपस्तुण्ड और वायसो के साथ लाया करते हैं इग्या में प्रत के पालोप से सन्देश नामक नरक मे गिरते हैं । व्रतधारी बहाचारी गण यदि स्वप्न में भी स्कन्दित होते हैं और जो पुत्रो के द्वारा अध्यापित एवं पुत्रो के द्वारा प्राज्ञापित होते हैं वे सब श्वभोजन प्रामक नरक मे नियत रूप में जाकर पड़ा करते है ॥१६६ से १७३।। बोध तथा हर्ष समन्वित होते हुए जो लोग वर्षों तया पाश्रमो के विपरीत कर्मों को किया करते हैं वे सब नरप के गामी हुआ करते है ॥१४॥ उपरिष्टारिसतो घोर उधरणात्मा गैरवी महान् । सुदारुणस्तु शीतात्मा तस्याधस्तात्तए स्मृत ॥१७५ एवमादि क्रमेणव वर्ण्यमानानिबोधत । भूमेरधस्तात्सप्तव नरका परिकीर्तिता ॥१७६ अपमंसूनवस्ते स्युरन्धतामिस्रकादय । रोरव प्रपमस्तेपा महा रौरव एव च ॥१७७ अस्याध पुनरप्यन्य शीतस्तप इति स्मृत । तृतीय कालसूत्र स्या महाहविविधि स्मृत ॥१७८ अप्रतिउ चतुर्थ स्यादवीची पञ्चम स्मृत । लोहपृष्टम्तमस्तेपामविधेयस्तु सप्तम ॥१७६ घोरत्वाद्रौरव प्रोक्त साम्भको दहन स्मृत । सुदारुणस्तु शीतामा तस्याधस्तात्तपोऽधमः ॥१८० सो निकृन्तन प्रोक्त कालमूति दारुण । अप्रतिष्ठे स्थिति स्ति भ्रमस्तस्मिन्सुदारण ॥१८१ अवीचिरुण प्रोक्तो यन्त्रसपीडनाव स । तस्मात्सुदारुणो लोहः वर्मणा क्षयणाच स ॥१८२ पर से गिन-पोर उष्मा स्वरूप वाला महार रोरव नरक होता है। गुहारण तो शोतारमा होता है रितु उस नीचे तप कहा गया है ।।१७।।
४२२ ] [ वायु पुराण एवम विक्रम से ही वर्णन किये हुए नरको का समझ लो। भूमि के नीचे के भाग म सात ही नरक कहे गये हैं ॥१७६।। वे मध तामिस्तकादि प्रधम के सूनु हैं । रौरव और महा रौरव उनम प्रथम है ।।१७७॥ इसके नीचे फिर भी पन्य शीनस्तय कहा गया है । तीसरा काल मूत्र होता है जो महा हवि बिधि कहा गया है ॥१७८] प्रति चौया और पांचवा अवीची नाम वाला होता है। उनम लोह पृष्ठ स्तम जो अविधेय है सातवा होता है ।।१७६॥ घोर होने से गैरप कहा गया है और साम्भक दहन कहा गया है । मुदारण तो शीतात्मा होता है उसके नीचे अधम तप होता है ॥१८०॥ सप निकृन्तन कहा गया है। काल सूत्र यह दारुण है । मप्रतिष्ठ मे स्थिति नहीं है उसम मुदारुण भ्रम होता है ।।१८१॥ मवीचि नरक दारुण कहा गया है क्यो बह यात्र पीडिन करता है। उसमे भी मुदारुण कर्मों के क्षय के कारण लोह नामक नरक होता है ॥१२॥ तथाभूतो शरीरत्वादविधिभ्यस्तु स स्मृत । पीडवन्धवधासङ्गादप्रतीकारलक्षण ॥१८३ ऊर्ध्व दौलमितास्ते तु निरालोकाश्च ते स्मृता । दुखोत्वपस्तु सर्वेषु ह्ययमस्य निमित्तत ॥१८४ ऊवं लोक समावेतो निरालोको च तावुभौ । कूटाङ्गारप्रमाणश्च शरीरी मूवनायक ॥१८५ उपभोगसमर्थस्तु सद्यो जायन्ति वर्मभि । दुस प्रर्पश्चोग्रत्व तेषु सर्वेषु ने स्मृतः ॥१८६ यातनाश्चाप्यसत्येया नारकाणा तथा स्मृता । तत्रानुभूयत दु ख क्षीणे कमरिण नै पुन ॥१८७ तियंग्योनौ प्रमूयन्त कर्मोपे गते तत । देवाश्च नारवा व यू दर्य नाथन सस्थिता ॥१८८ धर्माधर्मनिमित्तेन सद्या जायन्ति मूर्तय । उपभोगार्थमुत्पत्तिरोपपत्तिमंत ॥१८६ पश्यन्ति नारवान्देवा घोवक्यान् धोगतान् । नारवाश्च तया दवान् मन्पिश्यन्त्यधो मुगान् ।।१६० शिवपुर वर्णन ] [ ४२३ । अनग्रमूलता यस्माद्धारणाश्च स्वभावत । तस्मादूर्वमधोभावो लोकालोके न विद्यते ॥१६१ एपा स्वाभाविकी सज्ञा लोकालोके प्रवर्तते । अथाव वन्पुनर्वायु ब्राह्मणा समिणस्तदा ॥१६२ सर्जेपामेव भूताना लोकालोकनिवासिनाम् । मसारे ससरन्तीह यावन्त प्राणिनश्च तान् ।।१९३ सड ख्यया परिसङ्ख्याय तत प्रवू हि कृत्स्नश । ऋषीणा तद्वच श्रुत्वा मारुतो वाक्यमब्रवीत् ।।१६४ तथा भूत शरीर होने प्रविधिभ्य ह कहा गया है। पीढवन्ध और वध के मामङ्ग होने से प्रप्रतीकार लक्षण वाला होता है ॥१८३।। वे ऊपर मे शैल को गये हुए तथा विना आलोक वाले वहे गये हैं। अधर्म के निमित्त होने से सब में दुख का उत्कर्ष हुमा करता हैं ॥१८४॥ ऊर्व भाग में ये लोको के ममान होते हैं तथा ये दोनो निरालोक होते हैं। और कूटागार प्रमाणो म पारीरी मूत्र नायक होता है ॥१८५।। उपभोग मे ममर्थ कर्मों से तुरन ही होते हैं। उन मब मे दुखो का प्रकर्प और उग्रता कहे गये हैं ॥१८६॥ नरको मे होने वाली यातनाऐ अमख्य कही गई हैं । वहाँ पर फिर क्षोण कम मे दुस का अनुभव किया जाता हैं ।।१८७॥ इसके पश्चात् कम्ों के शेष रहने पर जीवात्मा नियंर योनि में जन्म लिया करते हैं। देवगण प्रौर नारदीगण ऊपर और नीचे से भागो म सस्थित होते हैं ॥१८॥ धर्म मौर मधर्म के निमित्त होने से तुरन्त मूत्तिया उत्पन्न हो जाती हैं। मोपपतिक कर्म से उपभोग करने के लिये उत्पत्ति होती है ||१८६॥ देवगण प्रघोगत और नीचे की भोर मुन्न करने वाले नारकी प्राणिया को देखा करते हैं । मोर नारव ममस्त देवों को अधो मुख क्येि देगते हैं ।।१६०॥ जिम पारण से पनामूलना पोर स्वभाव मे धारण होती है उममे लोकालोक में उदयभाव तथा अधोभाव नहीं होता है ।।१९११॥ लोकालोक मे यह स्वाभाविकी सजा होती है । इमरे अनन्तर उग ममय मे मत्र करने वाले प्राह्मणो ने फिर वायुदेव कहा-॥१२॥ अपियो ने कहा-सोपालोर के निवाम परमे पाने सभी प्राणियों में से यहाँ पसार म तिन प्राणी समरण
४२४ ]
[ वायु पुराण
रिमा परत हैं उनको मन्या समस्पान को इसके पश्चात् पूर्ण रूप से बता
इय । ऋषियों उम वचन को मुनगर मारुत देव न कहा-१६||
न शाक्या जन्तय कृत्स्ना प्रसस्यातु क्यञ्चन ।
अनाद्यन्ताच सकी ह्यप्यूहेन व्यवस्थिता ।
गणना विनिवृत्त पामानन्त्यन प्रकीत्तिता ॥१६५
न दिव्यचक्षुपा ज्ञातु शक्या ज्ञानेन वा पुन ।
चक्षुपाचे प्रसन्यातुमतो ह्यन्ते नराधिप ॥१९६
अनाध्यानादवेद्यत्वान्ने प्रश्नो विधीयते ।
ब्रह्मणा सजित यत्त
यत्त सरयया तन्निबोधत ॥१६७
य सहस्रतमो भाग स्थावराणा भवेदिह ।
पाथिवा कृमयस्तावत्ससेकाद्यपु सम्भा ॥१९८
मसरजानाम्भागेन सहस्र गव सम्मिता ।
प्रौदका जन्तद सर्ने निश्चयात्तद्विचारितम् ॥१६६
राहस्र गव भागेन सत्वाना सलिलोक्साम् ।
विहङ्गमास्तु विज्ञया लौकिकास्त च सर्वश ॥२००
वायु देव बोरे--मम्पूण जन्तुगए किसी भी प्रकार से प्रसस्यान नहीं
किये जा सकते हैं । वे मब अनाचन्त-सकोण और ऊह से भी व्यवस्थित हैं।
इनकी गणना मानन्त्य होने से विनिवृत्त कही गई है ॥१६॥ अथवा दिव्य
घर में भी ज्ञान के द्वारा नहीं जानी जा सकती है । इसलिये अन्त मे नराधिप
सल्यान करने के लिय लिया गया है ॥१९६॥ मनाध्यान होने से तथा प्रदेद्यत्व
होने से यह प्रश्न ही नही किया जाता है। ब्रह्मा के द्वारा जो सख्या से सजित
किया गया है उसको जान लो ॥१९॥ यहाँ पर स्थावरो का जो सहस्रतम भाग
होता है उतने ससकादि मे होन वाले पार्थिव कृमि होते हैं ।।१९८|| समेकजो
के सहस्रतम भाग के सम्मित समस्त प्रौदक (जल म रहने वाले) जतुगण होते
यह निश्चय से विचार किया गया है ||१९| सलिल म रहने वाले सत्त्वो के
पहल ही भाग से विहङ्गम जानने चाहिए और वे सब लौकिक हैं ॥२०॥
शिवपुर वणन] [ ४२५ य सह्मतमो भागस्तेषां व पक्षिणा भवेत् । परावस्तत्समा ज्ञेया लोविपास्तु चतुष्पदा ॥२०१ चतुष्पदाना सर्नेमा सहस्रणव समता । भागेन द्विपदा ज्ञेया लौकिकेऽस्मिस्तु सव्यश ॥२०२ य सहस्रतमो भागो भागे तु द्विपदा पुन । धार्मिकास्तेन भागेन विज्ञ या सम्मिता पुन ॥२०३ ससस्रणव भागेन धाम्मिकेम्यो दिवङ्गता । य सहस्रतमो भागो घाम्मिकाणा भवेदिवि । समितास्तन भागेन मोक्षिणस्तावदेव हि ।।२०४ स्वर्गोपपादकैस्तुल्या यातना स्थानवासिन । पतिता पूर्णमुद्दे शादुरात्मनो म्रियन्ति ये । रोरवे तामसे ह्यते शीतोष्ण प्राप्नुवन्ति ते ॥२०५ वेदनाक्टुकास्तव्या यातना स्थानमागता । उन्णस्तु रोरवो ज्ञ यस्तेजो घोररसात्मक 11००६ तता धनात्मिश्चापि शीतात्मा मतत तप । एव सुदुर्लभा सन्त स्वर्गे च धाम्मिका नरा ॥२०७ एपा सरया कृता सरया ईश्वरेण स्वयम्भुवा । गणना विनिवृत्तपा सङ्ख्या ब्राह्मी च मानुपी ॥२०८ जो उन पनिया का हमारवा हिस्मा हो। है उनके घराबर नौकिक चतुष्पद पशु जानने चाहिये ।।२०१समस्त चतुष्पदो के सहस्र भाग से मम्मित इस समस्त लोरिकम द्विपद जतु जानन चाहिए ।।२०२॥ फिर उन द्विपदो म भाग म जो सहनवा भाग होता है उस भाग मे धार्मिक जानने चाहिए ।।२०३॥ हजारवें भाग स ही उन धार्मिको म मे प्राणी दिवलोक में प्राप्त होने वाले हाते हैं । उस दिवलोफ म भी उन गये हुए धार्मिको म से हजारवां भाग मोक्ष प्राप्त करन वार हुआ करते हैं ॥२०४|| स्वग के उप- पादका व तुन्य यातना स्थान दामी की है । उद्देश्य से पूर्ण की पतित दुष्ट पात्मा वारे मरत हैं ये सब गैरव तामस मे गिरत है और शीतायण को वे
४२६ ]
[वायु पुराण
प्राप्त किया करते है । २०५॥ वेदना से क्टुक एग स्तब्ध यातना के स्थान को
प्राप्त हो गये। उष्ण तो रौरव जानना चाहिये जो कि घोर रमात्मक
रोज है ॥२०६॥ इसके पश्चात् घनामिक भी शौतारमा सतत तप है। इस
प्रकार से सुदुर्लभ होते हुए भी स्वर्ग में घाम्मिक नर होते हैं ।।२०७॥ यह
सख्या स्यय ईश्वर के द्वारा की गई है। यह संख्या ब्राह्मी और मानुषी है।
यह गणना विनिवृत्त हो गई है ।।२०८।।
महोजनस्तप. सत्य भूतो भाव्यो भवस्तथा।
उक्ता ह्यते त्वया लोका लोकानामन्तरेण च ।
लोकान्तरञ्च यादृग्ने तन्नो ब्रूहि यथातथम् ।।२०६
तेपा तद्वचन श्रुत्वा ऋषीणामूर्ध्वरेतसाम् ।
स वायुटतत्त्वार्थ इदन्तत्त्वमुवाच ह ।।२१०
व्यक्त तर्केण पश्यन्ति योगात्प्रत्यक्षदशिन।
प्रत्याहारेण ध्यानेन तपसा च क्रियात्मन ॥२११
ऋभु सनत्कुमाराद्या सम्बुद्धा. शुद्धबुद्धयः।
व्यपेतशोका बिरजाः सन्तो ब्रह्म वसत्तमाः ।।२१२
अक्षया प्रीतिसयुक्ता ब्रह्म तिष्ठन्ति योगिनः।
ऋपोरणा वालसिल्याना तैर्यथाहृतमी श्वर. ।।२१३
यथा चैव मया दृष्ट सानिध्यन्तन कुर्वता।
अनासत्कृतार्थानामालय नेश्वरस्य यत् ॥२१४
ईश्वर परमाणुत्वाद्भावग्राह्यो मनीपिणाम् ।
ज्ञान नैराग्यमश्वर्यन्तप सत्य क्षमा धृति ।।२१५
द्रष्टत्वमात्मसम्बन्धमधिष्टानत्वमेव च ।
अव्ययानि दर्शतानि तस्मिस्तिष्ठति शङ्करे ।।२१६
ऋपियो ने कहा-मापने मह-जन तप-मत्य-भूत भाव्य और भव ये
मब लोग हमरो बताये हैं । अव लोको वे मन्तर से अन्य जिस प्रकार के लोक
हैं उन्हें ठीक-टोक हमको बताइये ।।२०६॥ उन ऋषियों ने जो विउदरता
थे उस वचन का थवए र तत्वायं को देख लेने वाले उन वायुदेव ने उस
शिवपुर वर्णन ]
[ ४२७
तत्व को कहा था 1॥२१०॥ वायुदेव ने कहा-प्रत्यक्षदर्शी योग से तर्क के द्वारा
व्यक्त को देखा करते हैं और क्रिया के स्वरूप वाले प्रत्याहार-ध्यान तथा तप
के द्वारा देखते हैं ।।२११॥ ऋभु सनत्कुमार आदि सब भली भांति ज्ञान युक्त
तथा सम्वुद्ध बुद्धि वाले हैं। ये सब शोक रहित विरज ब्रह्म की भाँति ही श्रेष्ठ
हैं ॥२१२॥ ये क्षय से रहित-प्रीति से सयुक्त योगी हैं जो ब्रह्म में ही प्रास्थित
रहा करते हैं । उन परम समर्थ प्रभुप्रो ने बालखिल्य ऋपियो से जैसा कहा था
और उनका सानिध्य करने वाले मैंने जिस तरह से देखा था कि ये लय पर्यन्त
ईश्वर के असत्कृत वाले नहीं होते हैं ॥२१३||२१४।। ईश्वर परम अणु होते
के कारण से मनीषियो के भाव के द्वारा ही ग्रहण करने के योग्य होता है ।
उस शकर म ज्ञान वैराग्य ऐश्वर्य तप-सत्य क्षमा-घृति-द्रष्ट्रत्व होना-प्रात्म मम्बन्ध
और अधिष्ठानरव य अयय दश बातें स्थित रहा करती है ।।२१।।२१६॥
विभुत्वात्खलु योगाग्निम्र ह्मणोऽनुग्रहे रत ।
स लोकविग्रहो भूत्वा साहाय्यमुपतिष्ठते ।।२१७
अक्षर ध्रुवमव्यग्रमष्टमन्त्वौपसगिकम्।
तस्येश्वरस्य यन्मात्रस्थान मायामय परम् ॥२१८
मायया कृतमाचष्ट मायी देवो महेश्वर ।
देवानामुहसहारस्तत्प्रमारग हि कोत्यते ॥२१६
विस्तरेणानुपूा च अवतो मे निबोपत ।
त्रयोदशव कोटयस्तु नियुता दश पञ्च च ।
भूर्लोकाद् ब्रह्मलोको नै योजने सम्प्रकीर्त्यते ॥२२०
एक्योजनकोटी तु पञ्चाशनियुतानि च ।
ऊर्द्ध भागयताण्डन्तु ब्रह्मलोकात्पर म्मृतम् ।।२२१
एपोद्धंगप्रचारस्तु गत्यन्तञ्च तत स्मृतम् ।
नित्या हयपरिमख्येया परस्परगुणाधया ॥२२२
मुक्ष्मा प्रसवर्धामण्यस्तत प्रकृतय. स्मृता ।
येभ्योऽधिकर्ता सजझं क्षेत्रज्ञो ब्रह्मससित ॥२२३
४२८ ] [ वायु पुराण विभु होने के कारण वह योग को अग्नि वाला प्रभु ब्रह्म के अनुग्रह म रत रहते हैं। ये लोग विग्रह होकर सहायता दिया करते हैं ॥२१७। उस ईश्वर के प्रभर ध्रुव अव्यग्र अष्टम प्रोपमगिक परम मायामय यमात्र स्थान है ॥२१८।। महेश्वर देव माया से युक्त हैं और माया के द्वारा ही सब कुछ किया करते हैं। देवा का उप सहार भी इसी प्रकार किया करते हैं । उसका प्रमाण अब कहा जा रहा है । मैं विस्तार क साथ उसे आनुपूर्वी से कहता हूँ। आप लोग उसे मुझसे जान लेवें। इस भूलोक से ब्रह्मलोक त्रयोदय कोटि तथा पद्रह नियुन योजनो से युक्त कहा जाया करता है ॥२१॥२२०।। इम ब्रह्म लोक से भी ऊपर एक पराड पचास नियुत योजन भागवताणु स्थित है ऐसा कहा गया है ॥२२१॥ यह इनसे उपर गमन करने वाला प्रचार है और वहा गति का मत होता है ऐसा बताया गया है । परस्पर म गुणा के प्राश्रय जो है वे नित्य हैं और अपरिमस्यय होते है ॥२२२॥ प्रसव के धम वाली जो प्रकृतिया हैं व परम सूक्ष्म हैं जिनमे अधिकर्ता ब्रह्म ही सना वाला क्षेत्र उत्पन होता है ॥२२॥ तासु प्रकृतिमत्सूक्ष्ममधिष्ठातृत्वमव्ययम् । अनुत्पाद्य परन्धाम परमाणु परशेयम् ।।२२४ अक्षयश्चाप्यनुयश्च अमूतिमूत्तिमानसौ । प्रादुर्भावस्तिरोभाव स्थिति वाप्यनुग्रह ॥२२५ विधिरन्यरनौपम्य परमाणु महेश्वर । मतेजा एप तममो य परस्तात्प्रकाशक ॥२२६ यदण्डमासीतत्सौवर्ण प्रथमन्त्वीपसर्गिकम् । वृहत मर्वतोवृत्तमीश्वराद्वयवजायत ।।२२६ ईश्वरदा बीजनिर्भेद क्षेत्रज्ञो बीज प्यते यानि प्रतिमाचप्टे मा च नारायणात्मिका ॥१२८ दिभुर्लोक्स्य गृष्ट्यर्थ लोक्सस्थानमव च । सन्निसर्ग स तन्वा च लोकधातुमहात्मन ॥२२६ शिवपुर दर्गन ] [ ४२६ पुरस्ताद्ब्रह्मलोकस्य घण्टादविच ब्रह्मरणः । तयोर्मध्ये पुरं दिथ्य स्थान यस्य मनोमयम् ॥ २३० तद्विग्रहयत स्थानमीश्वरस्यामितीजमः । शिव नाम पुर तत्र शरण जन्मभीरणाम् ॥ १३१ उनमें प्रति वाला मूक्ष्म एवं अध्यय अधिशतृत्व होता है । वह पर- मागु परमेय परधाम अनुत्पादन के योग्य होता है ।।२२।। यह क्षय से रहित- उहा करने के प्रयोग्य विना मूत्ति वाला और यह मूनिमार है जिसका प्राविर्भाव भौर निरोभाव तथा स्थिति भी एक प्रकार वा मनुपह ही होता है ॥२२५।। यह परमाणु महेन्दर प्रन्यों के द्वारा अनुपम विधि होता है। यह तमो परम प्रकाश करने वाला तेज से युक्त होता है ।।२२६॥ जो यह प्रथम मौवर्ण एव मोपगिक प्रणु होता है । ममी ओर से वृत्त और परम विशाल वह ईश्वर से उत्पन्न हुआ या ॥२२७।। ईश्वर से वीज का निर्भद होता है। जो धोत्रज्ञ होता है वही बीज होता है । प्रकृति को उम बीज को धारण करने वाली योनि कहा जाना है और यह भी नारायण के स्वम्प वाली होती है ॥२२८॥ विभु ने लोक की मृष्टि के लिय लाक सस्थान दिया है लोको के पाना उम महात्मा के शरीर मे ही यह निमम होता है ॥२२६॥ मय पहले ब्रह्म होता है और फिर ब्रह्म का पण्ड है । इन दोनों के मध्य म पुर जिसवा मनोमय परम दिवा स्थान होना है ।।२३०॥ अपरिमित प्रोज वाले विप्रधारी उम ईश्वर का स्थान है । वह शिव नाम वाला पर है और वहा पर जन्म मरण के भय से भी न जीवा की रक्षा होती है अर्थात् वहीं शिवपुर उनका दारण है ।।२३१॥ सहस्राणा शत पूर्ण योजनानां द्विजोत्तमा । अभ्यन्तरे तु विस्तीणं महीमण्डलसस्थितम् ।।२३२ मध्याह्नार्कप्रकाशेन परतेजोऽभिमदिना । शातकोम्भेन महता प्राकारेणार्कवर्चसा ।। २३३ द्विरश्चनुभि सौवर्णमुक्तादामविभूषितः । तपनोयनिभ शुभ्रर्गाढ सुकृतवेष्टनम् ॥ २३४
४३०]
[ वायु पुराण
तच्चाकाशे पुर रम्य दिव्य घण्टादिनादितम् ।
न तत्र क्रमते मृत्युनं तपो न जरा श्रमाः॥२३५
न हि तस्य पुरस्यान्यरुपमा कर्तुमर्हति ।
सहस्राणा शत पूर्ण योजनाना दिशो दश ।।२३६
तत्पुर गोवृपाङ्कस्य तेजसा व्याप्य तिष्ठति ।
भावेन मनसो भूमिविन्यस्ता निकामयी ।। २३७
रत्नवालुक्या तत्र विन्यस्ता शुशुभेऽधिकम् ।
शारदेन्दुप्रकाशानि बालसूर्यनिभानि च । २३८
अर्घ श्वेताद्ध रक्तानि सौवर्णानि तथैव च ।
रथचक्रप्रमाणानि नालमरकतप्रभ ।।२३६
सौकुमारेण रूपेण गन्धिनाप्रतिमेन च ।
तत्र दिव्यानि पद्मानि वनेपूपवनेषु च ॥ २४०
भृङ्गपत्रनिकाशानि तपनीयानि यानि च ।
अर्घ कृष्णार्ध रक्तानि सुकुमारान्तराणि च ।। २४१
आतपत्र प्रमाणानि पङ्कजै सवृतानि च ।
भूय सप्त महानद्यस्तासानामानि बोधत ॥ २४२
वरा वरेण्या वरदा वगर्हा वरवरिणनी।
वरमा वरभद्रा च रम्यास्तस्मिन्पुरोत्तमे ॥ २४३
पद्मोत्पदलोन्मिध पेनाद्यावत्तं विग्रहम् ।
जल मरिणदलप्रख्यमावहन्ति सरिद्वरा ॥२४४
हे द्विजोत्तमो । वह सो महस्र योजनो से पूर्ण हैं । उसके अन्दर एव परम
विस्तीणं महीमण्डल सस्थित होता है ॥२३२।। मध्याह्न के सूर्य के प्रकाश
का भी अभिमर्दन करने वाला वहा तेज का प्रकाश है। उसका सुवर्ण का
विशाल प्राकार होता है जो सूर्य के वचम जैसा है ॥२३३।। सुवर्ण निर्मित
पार उसम द्वार हैं जो कि मुक्ताओ की मालानो से समलङ्कृत हैं। सोने के
समान परम भास्वर वस्त्रो से भली भाति वेष्टित हैं ।।२३४।। वह पुर प्रत्य त
रम्य मानाश म है जो कि घण्टानाद से निनादित एव प्रति दिव्य है । वहा
[ ४३१ शिवपुर वर्णन] पर मृत्यु ताप-जरा और श्रम ये कोई भी नहीं पहुंच मक्ते हैं । ऐमा प्रय कोई भी पुर या स्थल नहीं है जिसकी उपमा इस पुर को दी जा सके अर्थात् साराश यह है कि यह अत्यन्त मनुपम है । दशो दिशामो में यह सौ सह्म योजन तक फैला हुआ है ॥२३६।। वह पुर गोवृपा के दिवा तेज से व्याप्त होता हुआ सस्थित रहता है । मन के भाव के द्वारा वहा कनकामयी भूमि विन्यस्त की गई है ॥२३७।। रलो को बालुका के द्वारा वह और भी अधिक शोभा से शोभित है । बाल सूर्य के समान शारदीय चन्द्र के प्रकाश वाले प्राधे श्वेत पोर आधे रक्त सुवण निर्मित जैसे वन और उपवनो म पद्म हैं जिनका प्रमाण रथ के चक्र के समान है और मरक्त मारिणको प्रभा के तुल्य उनके नाल हैं । परम सौकुमार रूप है और अप्रतिम गन्ध से युक्त हैं ऐसे दिवा पद्म वहा पर हैं ॥२३८॥२३६॥२४०॥ भृग पत्र के तुल्य जो तपनीय थे चे आधे कृप्या और प्राधे रक्त थे और सुकोमल अन्तर वाले थे ॥२४१॥ प्रातपत्र (छत्र ) के प्रमाण वाले तया पङ्कजो से स वृत थे। अब सात जो महा नदिया हैं उनके नामो को समझ लो ।।२४२।। महा मदियो के नाम ये हैं- चरा-वरेण्या वरदा-बराही वर वाणिनी- वरमा और वरभद्रा । ये सात महानदी उस उत्तम पुर मे परम रम्य हैं ॥२४३।। ये श्रेष्ठ नदिया मरिणदल के समान प्रति स्वच्छ जल के प्रवाह वाली थी वह जल पद्मोत्पल दलो मे उन्मिश्च था और फेन मादि प्रावतों के स्वरूप से युक्त था ॥२४४।। न तु ब्रह्मर्पयो देवा नासुरा पितरस्तथा । न खल्वन्येऽप्रमेयस्य विदुरीशस्य तत्पुरम् ॥ २४५ तन ये ध्यानमव्यग्रा सुयुक्ता विजितेन्द्रिया । पश्यन्तीह महात्मान पुरन्तद्गोवृपात्मन ।।२४६ मध्ये पुरवरेन्द्रस्य तस्याप्रतिमतेजस । सुमहान्मेरुसङ्काशो दिव्यो भद्रश्रिया वृत ॥ २४७ सहन पाद प्रासादस्तपनीयमय शुभ । अनुपमेय रत्नश्च सवत स विभूपित ॥२४८ ४३१] [ वायु पुराण स्फटिकश्चन्द्रमवाशर्वेदूय सोममप्रभ । वालसूर्यप्रभश्च व सौवर्णश्वाग्निसप्रने ।। २४६ राजतैश्चापि शुशुभे इन्द्रनीलमय शुभै । दृढर्वज्रमयश्च व इत्येव सुमहाहित ।।२५० ईशा के उस परम सुन्दर पुर की ब्रह्मपि-दैव-अमुर-पितर तथा अन्य कोई भी नहीं जानते हैं क्या नि ईश स्वय अप्रमेय हैं अर्थात् प्रभा के विषय नहीं हैं ॥२४॥। उस गोवृपात्मा प्रभु के उम पुर को ऐसे ही महान धात्मा याले ही पुरप देखते हैं जो ध्यान म सदा भव्यग्र रहते हैं गुयुक्त पौर विजित इन्द्रियो वाले होते हैं ।।२४६॥ उम परम रमणीय श्रेष्ठनम पुर के मध्य म अमित तेज वाले उम ईश्वर का भद्रश्री मे वृत-प्रतिदिन और मुविशाल मेर के सदृश मलपाद् प्रासाद हैं जो परम शुभ एव मुवर्ण के समान हैं । यह प्रासाद ( महल ) अनुपम रलो के द्वारा सभी भोर में गुविभूषित हैं । २४७॥२४८।। चन्द्रमा के तुल्य स्फटिक मगि मोर सोम के सहा प्रभा वाली बंदू मरिणयों से वह मुशोभित था। वालमूर्य अर्थात् प्रात कालीन सूर्य की प्रभा याली तथा प्रग्नि में समान प्रभा से युक्त एव मुवणं को मोर राजन (चादी को ) वस्तुप्रो स वह विभूपित था और शुभ इन नील मणियो में मुन्दर शोभा से युक्त हो रहा था। हीरा से जटित परम हद एव शोभा से मम्पन्न वह पुर था ।।२४६॥२०॥ जलेश्च विविधाकारर्दी प्यद्भिरविवासितम् । चन्द्ररश्मिप्रकाशाभि पनाभिरलकृतम् ॥२५१ रवमघण्टानिनादैश्च नित्यप्रमुदितोत्सव । किन्नराणामधीवासै सन्ध्याघ्राकारराजितं ।।५२ परिवारममन्तातु हेमपुष्पोदक प्रभं । यथा हि मैग्शलेन्द्रो हमशविराजत ।।२५३ नामीवरमपीभिस्तु पनायाभिस्तथा पुरम् । एव प्रामादराजोपो भूमिराभिषिराजने ॥२५४ शिवपुर वर्णन ] -- बसन्नप्रतिमा यत्र त्र्यम्बरस्य निवेशने। लक्ष्मीः श्रीश्च वपुम्माया वोति. शोमा सरस्वती ।।२५५ देव्या व सहिना यता सगन्धममन्धिता । नित्या ह्यपरिसहयाता परम्परगुणाश्रया । भूपण सर्व रस्नाना योन्य कान्ति विलासयो ॥२५६ कोटिशत महाभागा विभज्यात्मानमात्मना । भगवन्त महात्मानं प्रतिमोदन्त्यतन्द्रिता ॥२५७ विविध आवार वाले जलो से पर्थात् जलादायो में वह युक्त था जोषि दीप्यमान थे । चन्द्रमा की गिरणी के तुल्य प्रकाश याली पनावानो मे वह पुर गायन होरहा था ॥२५१॥ गुवर्ण के बने हुए घण्टा यही पर थे जिनकी पनियों मे मदा ही प्रमुदिन उत्सवो वाला रहना है । विनगे ये वही अथियाम प जो मध्यागल के मेघो ये ममान शोभा दाने मौर हम पुपोदामी प्रभा मे गयुन परिवार वाले महाँ चार बार रहा करते थे। जिम नरह मेह गिरि- राज हो उगी भौति यह मुदणं पिरो मे युत्त विराजमान है ॥२५२-१५३।। मुवाण को पनारामा म वह पुर जिम तरह गुगाभिन पा उमी भाति यह प्रासाद राज भी भूमिरामो म विभूपिन था । २५ ।। जहा पर भगवान श्ययको नियन (पाय ) म वगन्त की प्रतिमा पानी सक्ष्मी-श्री-वपुर्माया नीति- साभा-मरावती -मायरपर गन्ध ते गर्माक्त ये सब देवी माहित हो सम्वन्धित पी। नियतया पग्गिायात (प्रगगित) पी जोकि परम्पर में गुणोपी प्राधार थी। य ममस्त प्रभार ये रत्ना की भूपण तशालि मोर विनाप को योनियों थीं ॥२५५ २५६|| 4 मान भाग वागी आग्मा ममामा सोभित बस मेस की पी जाति पनि हारा पा पति ममाहित होती महान मम भाशन सपनिमोहित पिया पती ॥५॥ सागा मरयमचान्या पृन परियारिया। पिण्या श्रिया युक्ता गर्ग वमनमोचना ॥२५८ लीवाधिनागमयुन निमनोहर । गर्णता गद मादले पायोमं ॥१६ स ४३४ ॥ [ वायु पुराण बुन्जा कामनिकामश्च वरगाया हयानना । पुण्डाश्च विक्टाश्च व करालाश्चिपिटानना !॥२६० लम्बोदरा हस्वभुजा विनेत्रा ह्रस्वपादिका । मृगे द्रवदनाश्चान्या गजवक्त्रोदरास्तथा ॥२६१ गजाननास्तथैवान्या सिंह व्याघ्राननास्तथा। लोहिताक्षा महास्त य मुभगाश्चारलोचना ॥२६२ ह्रस्वकुञ्चितकेशाच सुन्दय्यश्चारुलोचना । अन्याश्च कामरूपिण्यो नानावेपधरा खिय ॥२६३ अभ्यन्तरपरिस्कन्धा देवावासगृहोचिता । रराम भगवास्तत्र दशबाहुमहेश्वर ।।२६४ भी पीछे भय महनों ही परिचारिकाए थी जो परम मुदर रूप वाली श्री सम्पन और सभी कमल के ममान लोचनो वाली हैं ॥२५८।। लीला के विलासो से मयुक्त अत्यात मनोहर भावो के द्वारा वे सब शैल के ममान प्राभा वाले तथा अग्नि के तुल्य तेज से युक्त गणा के साथ मानद बिहार किया करते हैं ॥२२६॥ उन विलामिनियो के विभिन्न रूप थे-कुब्जा हैं और काम निकामो से श्रष्ठ गात्रो वाली हैं। कोई हय के समान मुख वाली हैं । पुएडा-विक्टा- कराल भोर चिपिट मुख वाली हैं ।।२६०।। उनमे कुछ लम्बे उदर धाली-छोटी भुजाओ से युक्त-विनेत्रा ह्रस्व पादो वा लो-मृगेद्र के समान बदन से युक्त तथा अय गज के ममान मुख तथा उदर वाली हैं ॥२६१।। कुछ गज के जैसे आनन वाली तथा प्राय सिंह और व्याघ्र के समान मुख वाली हैं। कुछ ऐसी हैं जिनको माखे एकरम लोहित हैं और कतिपय महान् स्तना वाली हैं तथा परम मुभगा और सुदर नेत्रो वाली हैं ॥२६२।। कुछ विलासिनी ऐमी थी जिनके के छाटे और कुश्चित थे । कतिपय वहां पर परम सुदरी तथा चारु लोचनो वाली थी। अय ऐसी थी जो अपनी इच्छा से ही मनावाछित रूप धारण कर लिया करती थी। ऐसे वहाँ नाना प्रकार के वैपो को धारण करने वाली स्त्रियां थी ॥२६॥ य सब अदर ही रहने वाली और देव वाम गृह के उचित थी। दाबाहुप्रो वाले भगवान् महेश्वर वहाँ पर इन सबके साथ रमण दिया करते थे ॥२६४।। ।
शिवपुर वर्णन
[ ४३५
नन्दिना च गणे. सार्द्ध विश्वरूपमहात्मभि ।
तथा रुद्रगणश्चापि तुल्यौदार्यपराक्रम. ।।२६५
पावकात्मजसकाश यूपदष्ट्रोक्टानने ।
वन्द्यमानो विमानश्च पूज्यमानश्च तत्परः ।।२६६
सर्वर्तु कुसुमा माला जिघ्रमाणोरसि स्थिताम् ।
नीलोत्पलदलश्याम पृथुताम्रायतेक्षणम् ।।२६७
ईपवराललम्बोष्ठ तीक्ष्णदप्ट्रा गणाञ्चितम् ।
पडूर्व नेत्र दुष्प्रेक्ष्य रुचिरश्चीरवाससम् ॥२६८
पाहवेप्वपरिक्लिष्ट देवानामरिनाशनम् ।
बाहुना बाहुमावेश्य पाश्व सव्येऽन्तरे स्थितम् ॥२६६
राजापदिशन्तस्य वामाग्रकरगोचरम् ।
महाभैरव निर्घोष बलेनाप्रतिमौजसम् ।
दशवणधनुश्च व विचित्र शोभतेऽधिकम् ॥२७०
त्रिशूल विद्युताभासममोघ शत्रुनाशनम् ।
जाज्वल्यमान वपु परम तस्विपा युतम् ।।२७१
वहाँ पर नन्दी तथा अन्य गणो के साथ भगवान् महेश्वर रमण करते हैं
जोकि विश्वरूप वाले तथा महान् प्रामा वाले है। समान प्रौदार्य और पराक्रम
मे समन्वित हदगण भी वहा है ॥२६५।। जा पावकात्मज के तुल्य हैं और यूप
के समान दष्टा तथा उत्कट मुखो वाले हैं । ये मब महश्वर की सेवा में परायण
रहा करते हैं । इनके द्वारा भगवान् सर्वदा वन्द्यमान एव विमान और पूज्यमान
रहते हैं ।।२६६।। समान ऋनुग्रो के कुमुमो की माला उनके वक्ष स्थल में धारण
है उसकी गन्ध का धारण करते हुए हैं । प्रापका वर्ण नील उत्पन्न के दल के
समान श्याम है और नेत्र अत्यन्त ताम्र वर्ण के समान रक्त हैं ।।२६७॥ थोडे
कराल एव लम्बे ओष्ठ वाले-तीदण दष्ट्रा वाले गणो के द्वारा पूजित हैं।
ऊवं नेत्रो वाले-दर्शन करने में असह्य-परम रचिर और चीर धारण करने
वाले हैं ।।२६८।। युद्धों में अत्यन्त परिक्लेश से रत्ति तथा देवो के शत्रुओं का
नाश करने वाले हैं । बाहु से वाह को प्राविष्ट करके सव्य पावं के अन्तर में
४३६ ] | वायु पुगण । स्थित हैं ॥२६६।। वामान करमे गोचर होने वाले अपदेश करते हुए सुशोभिन हो रहे हैं । आएका निर्घोप महान् भैरव हैं और बल के द्वारा अप्रतिम (अनुपम) पोज वाले हैं । दगवर्ण धनुष जोकि परम विचित्र है अत्यधिर शोमा दे रहा है । भगवान् महेश्वर का निशूल विद्युत् की प्राभा के समान एवं प्रमोघ मायुध जोकि शत्रुओ का एक्दम नाश कर देने वाला है। उमकी कान्ति से युक्त वायु से जाज्वल्यमान हैं ।।२७०-२७१॥ असिश्च वौजसा श्रेष्ठ शीतरश्मिः शशी तया । तेजसा वपुपा कान्त्या देवेगस्य महात्मनः शुशुभेऽभ्यधिक तत्र वेद्यामग्निगिखा इव ॥२७२ स्थित पुरस्ताद् देवस्य शातकौम्भमयो महान् । शुशुभे रचिर श्रीमान्सोदक सक्मण्डलु ॥२७३ अमिमावेश्य चाङ्गपु पाण्डुराम्बर धारिणी। उरश्छदेन महता मौक्तिकेन विराजिता। चतुर्मुजा महाभागा विजया लोवसम्मता ॥२७४ देव्या आद्य प्रतीहारी थोरिवाप्रतिमा परा। विभाजतो स्थिता चव कृत्वा देवस्य चावलिम् ॥२७५ तस्या पृशनुगाश्चान्या स्त्रियोऽप्मरोगुणान्विताः । ता बल्वभिनवं. कान्तरपतिष्टन्ति शङ्करम् ।।२७६ सर्वलक्षणसम्मना वादिय स्पवृहिता । उपगायन्ति देवेणं गरमा गन्धर्वयोनयः ॥२७७ अभ्युनतो महोरस्क. शग्न्मेघममद्य ति.। गोभते नन्दमानन गोनिस्तम्य वेश्मनि २७% भगवान् महेश्वर प्रोजस्वियों में परम घेट हैं और प्रमि के प्रायुध को धारण किये हुए हैं नया गीत विगणों वाला चन्द्र भी विगममान है । तेज और अषु तथा कान्ति मे महार प्रात्मा वाले देवा के स्वामी महेश्वर वहाँ पर वेदी में अग्नि को मिला ये ममान अश्यति मोभा मे युक्त हो रहे थे ।।२०२।। भग. वान महेश्वर देव र आगे का मुवणं का निर्मल महान् परम सुन्दर तथा जन मिवपुर बरांन ] [ ४३७ से भरा हुअा एक कमण्डलु स्थित है जिसकी एव प्रत्यद्भुत शोभा हो रही थी ॥२७३. अपने अहो में अमि को धारण किये हुए तथा पारडर वर्ण के वस्त्र धारण करने वाली एव महान् मोतियो के उरश्छद से विराजित-चार भुजानो वाली महान भाग वाली लोक सम्मता विजया वहाँ पर विद्यमान है ।।२७४॥ यह देवी की सर्व प्रथम प्रतीहारी है जोकि अनुपम दूसरी थी पे ही तुल्य है । यह देव के प्रागे अञ्जलि करके अति विभ्राजमान होती हुई सस्थित रहा करती है ॥२७५।। उसके पृष्ट भाग में अनुगमन करने वाली अन्य स्त्रियाँ हैं जोकि अप्स- रामों के गुण से युक्त हैं। वे सब अभिनव एव अति कान्त वाद्यादि के द्वारा भगवान् शङ्कर का उपस्थान क्यिा करती हैं ।।२७६।। समस्त शुभ लक्षणों में सम्पन तथा अनेक वादिनो से उपयहिन गन्धर्वो की योनियां एव गण भगवान् देवेग का उपगायन किया करते हैं ।।२७७।। भगवान् गोपति अपने वेश में परमानन्द करते हुए शोभित होते हैं । अत्यन्त उनन प्रापका कलवर है तथा विशाल वक्ष स्थल है और शरत्काल के मेध के समान आपके शरीर की कान्ति है ॥२७॥ स्कन्दश्च सपरीवार पुनोडम्यामितवीर्यान् । रक्ताम्बरधर श्रीमान्वराम्बुजदलेक्षण ॥२७६ तस्य शाखा विशाखश्च नैगमेयश्च चाष्टवान् । व्यपेतव्यसनारा प्रजाना पालने रता ।।२८० ते सार्द्ध स महावीर्य्य शोभते शिखिवाहन । व्यालकीडनकस्तत्र क्रीडते विश्वतोमुख ॥२८१ ये नृपा विधेन्द्राणा काञ्चनस्य प्रदायिन । ये च स्वायतना विप्रा गृहम्या ब्रह्मवादिन ॥२८२ गूढस्वाध्याय तपसस्नथा चयोच्छवृत्तय । एते सभासदस्तस्य देवेशस्य च सम्मता ॥२८३ मन्वन्तराण्यनेकानि व्यवत्तन्त पुन पुन । श्रूयता देवदेवस्य भविष्याश्चर्यमुत्तमम् ।।२८४ - ४३८ ] [ वायु पुराण व्याघ्राश्च वानुगास्तत्र काञ्चनाभास्तरस्विन । स्वच्छन्दचारिण सर्वे स्वय देवेन निम्मिता ॥८५ मृत्योर्मृत्युसमास्ते तु यमदर्पापहारिण । विभूतिमप्यसख्यया को न खल्वभिधास्यते ॥२८६ अत परमिद भूयो भवेनाद्भुतमुत्तमम् । भूतानामनुकपार्थ यत्कृत तन्निबोधत ।।२८७ भगवान् महेश्वर के पुत्र स्कन्द हैं जोकि अमित वीर्य-पराक्रम से युक्त हैं। यह भी परिवार के सहित वहां पर विराजमान हैं। स्कन्द रक्त वर्ण से वस्त्र धारण करने वाले हैं ! थी से सम्पन्न मोर कमल दल के तुल्य नत्रो वाले हैं ॥२७६।। उनके परिकर मे शाख-विशाख-नंगमेय-प्रष्टवान् है जोकि व्यसन रहित एव क्रूर हैं तथा प्रजा के पालन करने में सदारत रहने वाले हैं ।।२८०॥ इनके साथ वह महान् वीर्य वाले शिखिवाहन स्कन्द शोभित होते हैं । यह विश्व- तोमुख स्कन्द व्यालों (सों) के खिलौनो से वहाँ क्रीडा किया करते हैं ॥२८॥ काञ्चन के प्रदान करने वाले विवुधेन्द्रों के जो नप हैं तथा जो गृहस्थ ब्रह्मवादी स्वायतन विप्र हैं तथा गूढ स्वाध्याय में जो रत रहने वाले–तपश्चर्या करने वाले और उग्र वृत्ति वाले लोग हैं वे ही सब उन देवो के देव भगवान् के समा- सद हैं । भगवान् ऐसे ही मभासदो को पसन्द किया करते हैं ॥२८२-२८३॥ अनेक मन्वन्तर बारम्बार व्यतीत हो जाते हैं । अब देवो के देव महेश्वर या उत्तम भविष्याश्चर्य का आप लोग श्रवण करे ॥२८४॥ यहां पर व्याघ्र और काचन क समान पामा वाले तपस्वी (वेग वाले) अनुगामी गण मभी स्वरधन्द धारण करने वाले हैं मोर इन सबको रचना स्वयं ही देव के द्वारा हुई है ॥२८॥ वै मृत्यु को मृत्यु के ममान हैं और यमराज के भी दर्प के हरण करने ' वाले हैं । अगस्य अपरिमित विभूति या देवदेव ने निर्माण किया था उसे कोन वह सकता है ? पर्यात् वह प्रदर्शनीय है ।।२८६॥ हमके भी मागे भव ने मह एक दूमरी वस्तु बहुत ही अद्भुत एव उत्तम की थी। यह सब भूतो पर मनु- कम्पा के ही लिये जो कुछ भी है किया है। उसे भी आप लोग समझ र पान लेवे ॥२७॥ . -- शिवपुर वर्णन ] [ ४३६ मन्दरादिप्रकाशाना बलेनाप्रतिमोजसाम् । हारकुन्देन्दुवर्णाना विद्यु द्धननिनादिनाम् ॥२८८ चूडामणिधारणा वै मेघसन्निभवाससाम् । श्रीवत्साङ्कितवचारणामड्गुलीशूलपाणिनाम् ।।२८६ एन दिशाना देवाना रूपेरणोत्तमशालिनाम् । तस्य प्रासादमुख्यस्य स्तम्भेपूत्तमशोभिपु ॥२९० सयताग्निमयीभिस्तु शृङ्खलाभि पृथक्पृथक् । मायासहस्र सिंहाना सुख तत्र निवासिनाम् ॥२६१ स्तम्भेऽप्यपासृतापष्ठ त्र्यम्बकस्य निवेशने । अथ तत्प्रतिसपूज्य वायोर्वाक्य सुविस्मिता.। ऋपय प्रत्यभापन्त नैमिपेयास्तपस्विनः ।।१९२ भगवन्सर्वभूताना प्राण सर्वत्रग प्रभो। के ते सिंहमहाभूता. क ते जाता किमात्मकाः॥२६३ सिंहा. कनापरान भूताना प्रभविष्णुना। श्वानरमय पाश सरुद्धास्तु पृथक्पृथक् ।।२६४ तेपा तद्वचन श्रुत्वा वायुर्वाक्य जगाद है । यह सहस्र सिंहानामीश्वरेण महात्मना । ध्यपनीय स्वकादेहात्क्रोधास्ते सिंहविग्रहा ॥२९५ मन्दिर मादि के प्रकाश वाले-बल के द्वारा ममित मोज से युक्त-हार, पुष्प मौर चन्द्रमा के तुल्य वर्ण वाले विद्युत के घन निनार से समन्वित- मिरिण को धारण करन वाले-मेघ के समान वस्रो वाले-श्री स्म से प्रक्ति से युक्त तथा पगुली युक्त मूल हाथ में रखने वाले दिशामा मोर देवो के से उत्तमता युक्नो के मध्यमे उस देव के मुख्य प्रामाद वे उत्तम शोभा वाले म हैं ॥२८८-२८६.२६०। उन स्तम्भो में सयत मग्निमयी शृङ्खलामो से २ माद माया से सहस सिंह हैं जोरि वहाँ पर मुख पूर्वक नियाम करते २९१॥ भगवान् ग्यम्बद में निवेशन म वे स्तम्भ में भी मामृता पठ है । मनन्तर वायुदेव के इस वाक्य का भली भांति ममार सति रके ४४० ] [ वायु पुराण मुविस्मिन होते हुए फपियो न जोकि नैमिपाण्य म रहा करत थे और तपश्चर्या करने वाले व वायुदेव में रहा-॥२६॥ हे भगवन् ! आप सो सम्पूर्ण प्राणियों के भी प्राण म्वरूप है-मर्वत्र गमन करने वाले हैं तथा प्रभु हैं । यह कृपा कर हमको बनाइये कि वे मिह महाभूत कौन हैं और वे कहाँ ममुत्पन्न हुए हैं और उनका क्या स्वरूप है ॥२६३।। वे सिंह किम अपराध से भूतो के प्रभविष्णु अर्थात् समुत्पन्न करने वाले समर्थ स्वामी ने अग्निमय पागो मे पृया पृथक उन्हें सरुद्ध कर क्या था? ||२९४ा उन तापस पियो के इस वचन का पवरण कर वायुदव यह वाक्य वहा या । महान् पारमा वाले ईश्वर न अपन देह से व्यतीत ( अलग ) करके उन्ह जो रक्सा था वे क्रोध है और उनका विग्रह सिंह का है अर्थात् वे सिंह के शरीर को धारण करने वाले है ॥२६॥ भूजनामभय दत्त्वा पुरा वद्धाग्निवन्धने । यज्ञभागनिमित्त च ईश्वरस्याज्ञया तदा ।।२९६ तेषा विधानमुक्त न सिंहेनकेन लीलया। दव्या मन्यु कृत ज्ञात्वा हतो दक्षस्य स तु ।।२९७ नि सृता च महादच्या महाकाली महेश्वरी। श्रात्मन पर्मसाक्षिण्या भूतं साद तदानुगै ॥२६८ स एप भगवान्त्रोघो रद्रावासकृतालयः। वीरभद्रोअमेयात्मा देव्या मन्युप्रमार्जन ॥२६८ तस्प वेश्म सुरेन्द्रस्य सर्वगुह्यतमम्य वै । पनिवेशवनापम्यो मया व परिकीतित ॥१०० अत पर प्रवक्ष्यामि ये तत्र प्रति वामिन । रम्ये पुरयरष्ठे तस्मिन्वहायभूमिषु ॥३०१ नानारत्नपिचिपु पनायायलेषु च । सवरमगधेपु वनोपयनमोनिपु ॥३०२ राजतपु महान्तपातमीम्ममयषु च । गन्ध्याघ्रगनियारूप यंग्लामप्रतिमान ।।३०२ ४४२ ] [ वायु पुराण चुक्रुशुम पय थुत्वा नैमिषेयास्तपस्विन । आपन्नसशयाश्चम वाक्यमूचु समीरणम् ॥३०६ शब्दादि इष्ट भागो क द्वारा जो भगवान् भव के अनुसरण करने वाले हैं वे सुन्दर व्रत वाले उन प्रसादो मे परम श्रेष्टशे में प्रानन्द विहार क्यिा करते है ॥३०४॥ वहाँ पर अविरत रूप से ब्रह्मघोष अर्थात् वेदध्वनि हुप्रा करती है और निरन्तर विविध प्रकार की परम शुभ कथायें हाती रहा करती हैं । सर्वदा गीत तथा वादिलो के वहाँ पर घोप हुमा करते हैं और चारो ओर बहुत से सस्तवन सुनाई देते हैं ॥३०५।। ये सब सहत रहते हैं तथा अतुल होते हैं और नाना आश्रमो मे किय जाया करते हैं। उन प्रामादो के ऊपर के भाग म इसी प्रकार के अनेक प्रानन्द प्रद प्रमोदोत्सव होते रहा करते हैं 11३०६।। यह प्रासाद सहस्र पाद है और सुवर्ण के सहश परम शुभ एव मुन्दर है । अनुपम जो थेष्ठ तम रत्न हैं उनसे यह सभी ओर से परिभूपित है ॥३०७॥ इस प्रामाद म स्फटिक मणियां जटित हैं जोकि चन्द्रमा के तुल्य देदीप्यमान एव मनोरम हैं । वंदूर्य मणियों में ममान प्रभा वाली मणियो से यह सुभूपित है। अग्नि के तुल्प प्रभा से परिपूर्ण सुवणं से तथा बालसूर्य की प्रभा स पूर्ण मणियो के द्वारा यह समलकृत है ॥३०८॥ मिपारएप निवासी तपश्चर्या करने वाल समस्त पि- गण इसका श्रवण करके बहुत ही हैरान होगये थे। उनके हृदय में बडा भारी सशय समुत्पन्न होगया था। उन्होने उन वायुदेव से यह वचन कहा था ॥३०६।। के तु तत्र महात्मानो ये भवस्यानुसारिण । अनुग्राह्यतमा सम्यक् प्रमोदन्ते पुरोत्तमे। ऋपीणा वचन श्रुत्वा वायुक्यिमथाप्रवीत् ॥३१० श्रू यता देवदेवस्य भक्तिर्यरनुमल्पिता। ह्रीमन्त. सूजिता दान्ताः शौर्ययुक्ता ह्यलोलुपा ॥३११ मध्याहाराश्च मात्राश्व ह्यात्मारामा जितेन्द्रिया । जितद्वन्द्वा महात्साहाः सौम्या विगतमत्सरा ॥३१२ भावस्था मन्वंभूनानामव्यापारा अनाकुला । - शिवपुर वर्णन ] I ४४३ कर्मणा मनसा वाचा विशुद्धेनान्तरात्मना । अनन्यमनसो भूत्वा प्रपन्ना ये महेश्वरम् ॥३१३ तैलब्ध रुद्रसालोक्य शाश्वत पदमव्ययम्। भवस्य स्पसादृश्य नीता व ह्यनुत्तमम् ।।३१४ ऋपियों ने कहा है भगवन् कृपा करके हमे यह बताइये कि वहां पर वे कोन से महात्मा लोग थे जो भगवान् भव के अनुसरण करने वाले थे। जोकि परम अनुपाह्य धे अर्थात् भव के अनुग्रह के पात्र हुए थै प्रौर अति श्रेष्ठ पुर में मानन्द-विनोद किया करते हैं। ऋषिगण के इम वचन का श्रवण करके वायु- देव ने यह वाक्य कहा पा ॥३१०१ वायुदेव ने कहा-हे ऋषिगण । अब भाप मुझो सुनिये, देवो के देव को जिन्होने भक्ति अनुल्पित की थी। वे लजायुक्त -मूगित-दमनमील-शूरवीरता से समवित्त और अलोलुप थे ।।३११।। ये लोग मध्य पाहार करने वाले-मानात्मक-प्रात्मा म ही रमण करने वाले और इद्रियो को जीतने वाले थे। गीतोष्णादि द्वन्दो पर विजय प्राप्त करने वाले- महान उपमाह से पूर्ण-परम सौम्य स्वरूप वाले तथा मात्मर्य में बिल्कुल रहित रहने वाले थे। ३३१२॥ समस्त भूनो यो भावनाओ मे स्थित रहने वाले थे। ये व्यापार से शून्य तथा प्राकुलना मे रहित थे। कर्म के द्वारा मन से और चन के द्वारा ल्या वचन से विशुद्ध अन्तरात्मा के द्वारा अनन्य मन वाले होकर भगवान् महेश्वर की शरणानि म प्राप्त होने वाले थे ॥३१३॥ उन्होंने भगवान रुद्वारा सालोक्य प्राप्त किया है जोकि शाश्वत अनन्य पद है और वे सब मर्वोत्तम भगवान् भव के रूप की सहशता को भी प्राप्त हुए हैं मर्यात उन सब' का म्वरूप शिव के ही सहमा होगया है ।।३१४॥ श्वानरमुखाः रार्ने विश्वरूपा. कपर्दिन । नीतकण्ठा मितग्रीवास्तीधरणदष्ट्रास्त्रिलोचना ॥३१५ मई चाद्रकृतोष्णोपा जटामुकुटधारिण.। मर्ने दशभुजा वोरा पनान्तर सुगन्धिनः ॥३१६ तरादित्यसलामा सर्ने ते पीतवाससः । पिनाकपागप सर्वे श्वेतगोदृषवाहना. ॥३१७ - ।
[ याय पुराण श्रियान्विताः कुण्डलिनो मुक्ताहारविभूपिताः । तेजसोऽभ्यधिका देवैः सर्वज्ञाः सर्वशिनः ॥३१८ विभज्य बहुधात्मानं जरामृत्युविजिता । मीटन्ते विविधर्भागभॊगान प्राप्य सुदुर्लभान् ॥३१६ सब के सब वे वैश्वानर के मुख दाले है और विश्वरूप-चपी-नोल- पठ वाले-वेत ग्रीवा से युक्त-तीदण दादी वाले तथा तीन नेत्रो वाले हैं ॥३१॥ मभीवे मस्तक पर माधे चन्द्रमा से उप्पोप बना हुमा है भौर जटा तथा मस्तक पर मुकुट शिव के ही समान धारण करने वाले हैं : सभी ने दश भुज में हैं-सव महान् वीर हैं और पद्यान्त को सुगन्ध वाने हैं ॥३१॥ ये मा भग- वाद भय के सालोक्य को प्राप्त होने वाले भक्त ताण मूर्य के समान तेज से युक्त हैं मोर मबने पीतवर्ण के वस्त्र धारण कर रश्मे हैं। उन सब ये हायो में भगवान् भव की ही भांति पिनाव धनुप लगा हुमा है । मयचे याहन भी गोवृष होने हैं ॥३१७॥ मब धी मे समन्वित होते हैं मोर सभी ने पानी में पुरग्स धागा पर वगे हैं। उन मय भतो ने मोतियो के हार धारण कर माने पाप यो विभूषित बना रवया है। ये मव देवी से भी अधिक तेज बारी है । गमस्त भन जो वहाँ नियाग परते हैं गर्व एव गवंदी हो है । मत गभी गुण भूत-भविष्य यत्र्तमान ये जानने वाले और गब कुछ यो प्रसनी मानिदेयने यारे हैं ॥३१॥ सब अपनी मारमागोपनासार विभागन्धिार रहा करते हैं मोर वृद्धता तपा मृत्यु से रहिन हो । विविष प्रसार में भावों के द्वारा प्रोडा पिया करते हैं और परम मुदुभ योगों को प्राप्त करे गनदास्वादन करते है ॥३१॥ स्वच्छन्दगतय. गिद्धा गिधधान्यवियोधिता । एमासानां दागा फोटो नंय महात्मनाम् ॥३२० एमि. सर महात्मा हि देवदेवो महेश्वर. । भत्तानुाम्पी भगवान्मोदते पार्थतीप्रिय. ॥३५१ नाहानेपानुग्दागा भयम्य च महागनः । नानारयमनुस्यामि गायमेननवामि च ॥३१२
शिवपुर वर्णन ।
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मातरिश्वाऽब्रवीत्पुण्यामित्येतामीश्वरोऽप्युत ।
अथ ते पय मर्वे दिवाकरसमप्रभा ।
श्रुत्वेमा परमा पुण्या कथा यम्बकी तत ॥३२३
भृशञ्चानुग्रह प्राप्य हपं चैवाप्यनुत्तमम् ।
सम्भावयित्वा चाप्येना वायुमूचुर्महाबलम् ।।३२४
समीरण महाभाग ह्यस्माष च त्वया विभो ।
ईश्वरस्योत्तम पुण्यमष्टमन्त्वीपसर्गिकम् ॥३२५
तस्य स्थान प्रमाणञ्च यथावत्परिकोत्तितम् ।
यो गन्न समृद्ध वै परम परमात्मन ||३२६
महादेवस्य माहात्म्य दुविज्ञेय मुरैरपि ।
स्वेन माहात्म्ययोगेन सहस्रस्यामितौजस ॥३२७
स्वच्छद गति वाले सिद्ध और अन्य सिद्धो के द्वारा विशेष रूप मे
वोधित किये हुए हैं । अनेर महात्माओ एकादश रुढो की कोटियां हैं ।।३२०॥
इनके साथ महात्मा देवो के देव महेश्वर जो भक्तो पर दया करने वाले पार्वती
के प्यारे भगवान प्रसन्न होते हैं । ६११।। मैं तो उन स्ट्रो का महात्मा मन का
नानात्व देखता हूँ यह मैं आपसे बिल्कुल सत्य कहता हूँ ॥३२२॥ मातरिश्वा
अर्थान् वायुदेव ने दग पुरय कथा को कहा था और ईश्वर ने कहा था। इसके
अन तर दिगकर के समान प्रभा वाले वे ऋपिगरा मब इस परम पुण्य कथा
को जोकि याम्बिकी है, मुनकर और बहुत ही अनुग्रह प्राप्त करके तथा
अनुपम हर्प प्राप्त करके और इसका बहुत प्रादर करक महान बलवान् वायु
से वोले ॥३२३ ३२४॥ पियो ने कहा है समीरण । हे महाभाग । है
विभो ! आपने हमको ईश्वर वा उत्तम अष्टम मोपमगिक उमके स्थान को और
प्रमाण को यथावत् बतलाया है। जो परमात्मा के गन्ध से परम ममृद्ध
है ॥३२५-३२६।। महादेव का माहात्म्य देवो के द्वारा भी दुपिज्ञ य है अर्थात्
अमित भोज वाले भहस का अपने माहात्म्य के योग मे सुरो के द्वारा भी
पटिनना से जानने के योग्य है ॥३२॥
[ दायु पुराए यस्य भक्त प्वसमोहा ह्यनुकम्पार्थमेव च । ग्राहालक्ष्म्या स्वय जुष्टा या साप्रतिमशालिनी ॥३२८ ज्योत्स्नया व्याप्य स चन्द्र विन्यस्ता विश्वरूपधृक् । विभूतिजितेन्ययं देवदेवम्य वेश्मनि ॥३२६ महादेवस्य तुल्याना रद्रागान्तु महात्मनाम् । तत्सर्व निखिलेनेद वक्त्रादमृतनिववम् ।।३३० अपीत्वा खलु सर्वस्य भवत्यास्माभिस्तु मुव्रता । नास्ति किश्चिदविज्ञ यमपच्चवानुगामिन । प्रश्न देववर प्राण यपावक्तुमर्हसि ॥३३१ स खल्वाच भगवानिक भूयो वर्तयाम्यहम् । वि मया चव वक्तव्य तद्वदिप्यामि सुव्रता ॥३३२ मादित्या पारिपाया सिंहा व क्रोधविक्रमा । वैश्वानरा भूगरणा न्याघ्रा बानुगामिन ॥३३३ प्राभूतसप्लवे घोरे सर्वप्राण भृता क्षये। विमवस्या भवन्त्येते तनो यूहि यथार्थवत् ।।३३४ मनुस्म्पा के लिए ही जिम मक्तो मे ममोह का प्रभाव होता है । जो ग्राह्यलक्ष्मी के द्वारा स्वय मेदिन है वह अप्रतिमशालिनी होती है ॥३२॥ ज्योत्स्ना में मारा ध्यास करणे चार में विन्यस्त विश्व रे रूपको धारण करने वाली विभूति देने के देव में घर में बहुत ही पपिस पात्रमान है ।।३२६॥ महारमा द्रों रे तुल्य महादेव का वह मय निखिल के द्वारा दम्र अमृत का नियव है ॥३३०॥ हम भक्ति मे गब पापान न करर गुन्दर वन याते हैं । अनुगमन करने वाले मान्य कुछ भी न जानने के योग्य नहीं है। हे देववर है प्राण । इस प्रश्न को यपावा मार बोरने पे योग्य है ।।३३१॥ थी मूतत्री ने रहा-वह भगवान् दाने दिमागे फिर में पा मवहार मर' पौर मुमै का कहना चाहिए। हे मुखर वालो पर ₹गा 13२॥ रियो ने महा-पादिस्य-पारिपाप-मिह येशीप त्रिम है देवानर- भूनाए और अनुगामी सान पोर आभाममय में गमाः प्राणपारियो शिवपुर वर्णन [ ४४७ क्षम हो जाने पर ये मृण् किम अवस्था वाले होते हैं इसे प्राप यथार्थवन हमको घोलें ॥३३३-३३॥ एते ये व स्वया प्रोक्ता सिंहव्याघ्रगणे सह । ये चान्ये सिद्धिमम्प्राता मातरिश्वा जगाद ह ॥३३५ इदञ्च परम नत्व ममाख्यास्यामि एवताम् । विज्ञातेश्वरसभावमव्यक्त प्रभव तथा ॥३३६ तत्र पूर्वागतास्तेषु कुमारा ब्रह्मरण सुता । सनकश्च सनन्दश्च तृतीयश्च सनातन ॥३३७ वोदुश्च न पिलरतेपामाप्सुनिश्च महायगा । मुनि पञ्चशिसवे व ये चान्येऽप्येवमादय ॥३१८ तत काले व्यतिक्रान्त कल्पाना पर्यये गते । महाभूतविनागान्ते प्रलये प्रत्युपस्थिते ॥३३६ अनेकद्रकोटयस्तु या प्रसन्ना महेश्वरी । शब्दादीविषयान्भोगान्सत्यस्याष्टविधययात् (१) ॥३४० प्रविश्य सर्वभूतानि ज्ञानयुक्त न तेजसा । वैहायपदमव्यग्र भूतानामनुकम्पया ॥३४१ तत्र यान्ति महात्मान परमाणु महेश्वरम् । तरन्ति सुमहावर्ता जम्ममृत्यूदवा नदीम् ॥३४२ तत पश्यन्ति सर्वाण पर ब्रह्माणमेव च । देव्या ने सहिता मम या देव्यः परिकीतिता ॥३४३ यत्तत्महव सिंहानामादित्याना तथैव च । श्वानरभूतभव्ययाघ्राश्नं वानुगामिन ॥३४४ ये मब मापन मिह म्याघ्र गगा के साथ बताय हैं और जो प्रत्य सिद्धि को सम्प्राप्त होने वाले हैं वायुदेव ने जिनको कहा था। इस परम तत्त्व को पहूंगा, पाप गुलिये। विज्ञान ईश्वर मद्भाव और अव्यक्त प्रभाव को भी पहूँगा ॥३३५-३३६॥ रहा पर उनमे ब्रह्मा के पुत्र कुमार पूर्वगन है जो मनक- मनन्द और तृतीय मनातन है ॥३३७।। उनम वोटु-कपिल और महान यश ४४८ ] [ वायु पुराए वाला ग्रासुरि और पञ्चशिख मुनि और जो अन्य इमी प्रकार के है ॥३३॥ इसके पश्चात् काल के व्यतिक्रान्न होने पर तथा कल्पो के पर्याय के गत होने पर महाभूतो के विनाश हो जाने पर तथा प्रलय क प्रत्युपस्थित होने पर अनेक न्द्रो की कोटियां और प्रसन्न महेश्वरी शब्दादि विपयो को तथा भोगो को सत्य के अष्टविधयय से ज्ञान से युक्त तज के द्वारा समात भूतो में प्रवेश करके प्राणियो पर अनुकम्पा करने से अव्यग्र वैहायम पद को प्राप्त होते है ॥३३६-३४०।। वहा पर महान ग्रात्मा बान परमाणु महेश्वर मे चले जाते हैं और महान् आवतों वाली नथा जन्म और मौत के जल वाली नदी को पार किया करते हैं ।।३४१॥ इसके अनन्तर वहा महादेव को तथा परब्रह्म का दर्शन किया करते है। देवी के साथ सात को देखते है जो देवियों कोत्तित की गई हैं। जो वह सिंहो तथा प्रादित्यो का सहस्र हैं तथा अनुगमन करने वाले वैश्वानर-भूत भव्य व्याघ्र हैं उनको भी देवत हैं ॥३४२-३४३-३४४।। प्रकरण ६४-प्रलयादि पुनः सृष्टि वर्णन प्रत्याहार प्रवक्ष्यासि परस्यान्ते स्वयम्भुव । ब्रह्मण स्थितिकाले तु क्षीणे तस्मिस्तदा प्रभौ ॥१ यथेद मुरुतेऽध्यात्म सुसूक्ष्म विश्वमीश्वरः । अव्याक्ताग्रसते व्यक्त प्रत्याहारे च कृत्स्नश २ पर तदनुकल्पानामपूर्णे कल्पसझये। उपस्थिते महाघोरे ह्यप्रत्यक्षे तु वस्यचित् ॥३ अन्ते द्रमस्य सम्प्राप्त पश्चिमस्य मनोस्तदा। अन्ते कलियुगे तस्मिन्क्षीणे सहार उच्यते ॥४ मम्प्रक्षाले तदा वृत्ते प्रत्याहारे ह्य पस्थिते । प्रत्याहारे तदा तम्मिन् भूततन्मात्रसक्षये ॥५ प्रलयादि पुन मृष्टि वनि] [ ४४६ महदादेधिकारस्य विशेपान्तस्य सक्षये । स्वभावकारिते तस्मिन्प्रवृत्ते प्रतिसञ्चरे ॥६ आपो नसन्ति वै पूर्व भूमेगन्धात्मक गुणम् । प्रात्तगन्धा ततो भमि. प्रलयत्वाय कल्पते । प्रविष्ट गन्धतन्मात्रे तोयावस्था धरा भवेत् ।।७ आपस्तदा प्रनष्टा व वेगवत्यो महास्वना । सर्वमापूरयित्वेद तिष्ठन्ति पिचरन्ति च | श्री मूतजी ने कहा-अब मैं पर स्वयम्भू के अन्त मे जो प्रत्याहार होता है उमको बतलाऊँगा । उम स्थिति काल के क्षीण हो जाने पर जो उस समय में प्रभु ब्रह्मा का हुमा करता है ।।१।। जिस प्रकार से ईश्वर इस अध्यात्न-मुमूक्ष्म विश्व को रचा करता है वही प्रभु प्रत्याहार के समय में यह व्यक्त पूर्ण रूप में अध्यक्तों को ग्रम लिया करता है ॥२।। किन्तु उसके अनु- वल्लो का पूर्ण सक्षय होन पर किमी के अप्रत्यक्ष महाघोर में उपस्थित होने पर अन्त में उस समय मनु के पश्चिम द्रुम के सम्प्राप्त होने पर अन्त में उस पनियुग के क्षीण हो जाने से समय मे सहार कहा गया है ॥३-४।। उस समय में मम्प्रक्षाल के होने पर प्रत्याहार के उपस्थित हो जाने पर उस समय म उम भूनतन्मापापो के समय वाले प्रत्याहार में मद आदि विकार के विशेषान्त के मक्षय होने पर और स्वभाव पारित उम प्रतिसञ्चार के प्रवृत्त होने पर गर्व प्रथम जल भूमि के गन्ध स्वरूप वारे गुण को प्रसता हैं। फिर वह पात्त गन्धराली भूमि प्रनय होने के लिए कल्पित होती है। गन्ध तन्मात्रा के प्रविष्ट हो जाने पर यह भूमि जन की अवस्था में हो जाया करती है। ॥५-६-७॥ उम समय में प्रनष्ट जल वेग वाला पौर महान पद वाला इस सत्रको मापूरित पर स्थित रहता है मोर विचरण पिया करता है ।।६।। अपामस्ति गुणोयन्तु ज्योति लोयते रम । नश्यन्त्यापस्तदान्ते च रसतन्मात्रमडक्षयात् ।। तेजसा सहतरमा ज्योतिष्ट्र प्राप्नुवन्त्युन । मन्ते च मलिले तेज सब्बतोमुगमोश्यते ॥१० ४५.० । [ वायु पुराण प्रथाग्निः सर्वतो व्याप्त आदत्ते तज्जलन्तदा। सर्वमापूर्यतेऽचिभिस्तदा जगदिद शनै ॥११ अचिभिः सन्तते तस्मिस्तियं गूर्वमधस्तत । ज्योतिपोऽपि गुण रूप वायुरन्ति प्रकाशकम् । प्रलीयते तदा तस्मिन्दीपाचिरिव मारुते ।।१२ प्रनष्ट रूपतन्मात्रे हृतम्पो विभावसु । उपशाम्यति तेजो हि वायुना धूयते महत ।।१३ निरालोके तदा लोके वायुभूते च तेजसि । ततस्तु मूलमासाद्य वायु सम्भवमात्मन ।।१४ ऊर्ध्व चाधश्च तिर्यक्च दोधवीति दिशो दश । वायोरपि गुण स्पर्शमाकाश ग्रसते च तत् ॥१५ प्रशाम्यति तदा वायु खन्तु तिष्ठत्यनावृतम् । अस्पमरसस्पर्शमगन्ध न च मूर्तिमत् ।।१६ जलो के अन्दर जो गुण होता है यह रस तेज मे लीन होजाया करता है । तब अन्त मे रस तन्मात्रा में सक्षय होने से जल नष्ट हो जाया करते हैं 118।। तेज के द्वारा सहरण वाले जल तेज के स्वरूप को ही प्राप्त कर लिया करते हैं। सलिल के ग्रस्त हो जाने पर सभी पोर तेज ही दिसलाई दिया करता है ॥१०॥ दमवे पश्चात् सभी भोर व्याप्त तेज स्वरूप मन्ति उस जल को उस समय ग्रहण कर लेता है। धीरे धीरे यह समस्त जगत् सब मचियो से पूरित हो जाता है ।।११।। तब ऊपर-नीचे मोर इधर-उधर प्रचियो फेल जाने पर ज्योति का जो प्रकाश रूपी गुण है उमे दाय खा जाता है भोर वह प्रलीन हो जाता है जैसे वाय झोरे में दिये की लौ नष्ट हो जाया " है ॥१२॥ रूप तन्मात्रा के प्रनष्ट हो जाने के बाद विभा वस्तु नष्ट + वाला हो जाया करता है। तेज वायु के द्वारा उपशान्त होता है तथा वायु खूब बहा करती है ॥१३॥ तेज के वायु स्वरूप हो जाने पर यह समस्त लोक प्रभावहीन निरालोक हो आया बरता है। इसके पश्चात् यह वायु भी अपने उत्पत्ति म्यान धूत वो प्राप्त होकर ऊपर नीचे और तिरछा दहा दिशामो A
प्रलयादि
पुन मृष्टि वर्णन ]
४५१
को पम्पित रिपा करता है। उस वायु का जो स्पर्म गुण है उसे प्रावास
ग्रस लिया करता है ॥१४-१५॥ तब यह प्रशमित हो जाता है और अनावृत्त
पाकाश में रहा करता है । रूप-रम स्पर्श और गन्ध तथा मूत्ति से रहित
होता है ।।१६॥
सर्वमापूरयनाद सुमहत्तत्प्रकाशते ।
परिमण्डलन्तत्सुपिरमाकाश शब्दलक्षणम् ॥१७
शब्दमाग तदायाश सर्वमावृत्य तिति ।
तन्तु शब्दगुणन्तस्य भूतादि ग्रसते पुनः ॥१८
भूतेन्द्रियेषु युगपद् भूनादौ सस्थितेषु वै ।
अभिमानात्मको ह्यप भूतादिग्नामस रगृत ॥१६
भूतादि असते चापि महान्वै बुद्धिलक्षगा ।
महानात्मा तु विज्ञय सकल्पो व्यवसायक ॥२०
बुद्धिमनश्च लिङ्गश्च महानक्षर एव च ।
पर्यायवानकै शब्देस्तमाहुस्तत्त्वचिन्तका ॥२१
सम्प्रलीनेप भूतेषु गुणसाम्ये तमोमये ।
स्वात्मन्यव स्थित चव कारण लाक्पारणे ॥२२
विनिवृत्त तदा सर्गे प्रत्यावस्थितेन वै।
तदाद्यन्तपरोक्षत्वाददृष्टत्वाच्च वस्यचित् ।।२३
अनाख्यानादबोधत्वादज्ञानाज्ञानिनामाए ।
मागतागतिकस्वाच ग्रहण तन्न विद्यते ॥२४
भावग्राह्यानुमानाब चिन्तयित्वेदमुच्यते ।
स्थिते तु वारणे तस्मिन्नित्ये सदसदालिके ।।२५
प्रनिर्देश्या प्रवृत्ति स्वात्मिका कारणे न तु ।
एव सप्तादयोऽभ्यस्तारतमात्प्रकृतयस्तु वै ।।२६
सबको नादों के द्वारा मापूरित कर वह मुमहन् प्रकाशित होता है ।
परिमण्डल मुपिर पावात का शब्द गुण ही लक्षण अर्थान् स्वरूप होता है ।।१७॥
उस समय शब्द मात्र वह प्राकान मवको पावृत करके स्थित रहा करना है।
४५२ ] [ वायु पुराण उसके उम शब्द गुण को भूनादि ग्रम लेते हैं ॥१८॥ भूतेन्द्रियो के एक साथ भूतादि मे सस्थित होने पर अभिमानात्मक यह भूतादि तामम कहा गया है ॥१६॥ और बुद्धि लक्षण वाला महान भूतादि को भी ग्रस लेता है । महान् स्वरूप बाला व्यावमायक सङ्कल्प जानना चाहिए ॥२०॥ तत्त्व के चि तक लोग बुद्धि-मन-निङ्ग-महान् और अक्षर इन पर्याय वाचक शब्दो मे उसको कहते है ।।२१।। तमोमय गुणो के माम्प मे भूतो के सम्प्रलीन होने पर और लोको के कारण को अपनी प्रात्मा में ही स्थित होने पर उम ममय म सर्ग के विषय प मे निवृत्त हो जाने पर प्रकृति से अवस्थित होने में किसी के प्राद्यन्त परोक्ष हाने के कारण मे-पौर अदृष्ट होने से-अनाग्यात होने से-अवोध होन से तथा ज्ञानियो को भी अज्ञान से एव अनागतिक होने से वह ग्रहण नहीं होता है ॥२२ २३ २४।। और भाव ग्राह्य अनुमान स यह सोचकर कहा जाता है । उम नित्य सद् और अमन स्वस्प वाले कारण के स्थित होने पर कारण म निश्चय ही स्वात्मिक प्रवृत्ति अनिद्देश्य होती है । इस प्रकार से अभ्यस्त क्रम से ससादि प्रकृतियां होती हैं ॥२५ २६॥ प्रत्याहारे तदा सर्गे प्रविशन्ति परस्परम् । येनेदमावृत सर्व मण्डलन्तु प्रलीयते ॥२७ सप्तद्वीपममुद्रान्त सप्तलोक सपर्वतम् । उदकावरण यच्च ज्योतिपा लीयते तु तत् ॥२८ यत्तजस चावरणमाकाश ग्रसते तु तत् । यद्वायव्य चावरणमावाश ग्रसते तु तत् ॥२६ आकाशावरण यच्च भूतादिनसते तु तत् । भूतादि असते चापि महान्दै बुद्धि लक्षण ॥३० महान्त असतेऽव्यक्त गुरगसाम्य तत परम् । एतो सहारविस्तागे ब्रह्माव्यक्ती तत पुन. ॥३१ मृजते ग्रसते चैव विकारान्सर्गसयमे । सहारकार्यकारणा ससिद्धा ज्ञानिनस्नु ये ।।३२ ४५. ] । यायु पृगण यस्मात्प्रतिगरीर हि मुमदु योपनचिता । तस्मात्सुरपनानात्न विज्ञय तु विजानता ॥३८ पदा प्रयतते चंगा भेदाना व सयमा । स्वभावकारिताः सवें वालिन महता तदा ।।३६ निवर्तते तदा तम्य स्थितिगग स्वयम्भुव । सहमा योग्यवं सौ ब्रह्मलोय निवासिमि ॥४. विनिवृत्ते तदा रागे स्थितावात्मनिवासिनाम् । तत्कालवासिना तेपां तदा तद्दोपदचिनाम् ॥४१ उत्पद्यतेऽय भैराग्यमात्मवाद प्रणामनम् । भोज्यमोनतृत्वनानात्वे तेपा तद्भवशिनाम् ॥४२ पृथग्ज्ञानेन क्षेत्रज्ञास्ततस्तै ब्रह्मलौकिवा । प्रवृती वारणा नीताः मर्ने नानाप्रदशिन ॥४३ स्वात्मन्येवावतिउन्ते प्रशान्ता दर्शनात्मका । सुद्धा निरसना सर्वे चेतनाचेतनास्तथा ॥४४ समय परिनिर्वाणा स्मृता नागामिनस्तु ते । निर्गुणत्वानिरात्मान प्रकृत्यन्ते व्यतिकमाव ॥४५ क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ इन दोनों का विषयाविषयत्व कहा गया है । ब्रह्म' विषय तो जानना चाहिए मोर क्षेत्र परिषय बहा जाता है ॥३६॥ क्षेत्र से प्रविष्ठित क्षेत्र क्षेत्र के लिए ही होता है । शरीरो के बहुत अधिक होन के कारण से यह दारीरी भी बहुन प्रकार का कहा जाता है ॥३७।। भौर प्रन्यूह पाकर मे ही ज्योतिर्वत् व्यवस्थित होता है । इससे प्रत्येक शरीर सुम्ब और दुय को उपलब्ध करने वाला होता है। इस कारण से विज्ञान रखने वाले को पुरुषो का माना होना जानना चाहिए ॥३८॥ जिस समय म इन भेदो के सयम प्रवृत्त होते हैं उस समय म महान् काल स सब स्वभावकारी होते हैं ॥३६॥ तब उम स्वयम्भू का स्थिति राग निवृत्त हो जाता है पौर समम्त ब्रह्मलोक के निवासी योज्यको के साथ सहन ही निवृत्ति होती है ॥४०॥ उस काल में चार करने वाले प्रात्म निवासी मोर उमक दो को देखने वाले उनका उम प्रलयादि पुन मृधि वर्णन ] [ ४५५ समय में स्थिति में राग के विनिवृत्त हो जाने पर प्रात्मवाद का प्रकाश करने वाला भोक्ता और भोज्य के अनेक प्रकार होने मे तद्भव को देखने वाले उनका पैराग्य उत्पन्न हो जाता है ॥४१-४२॥ पृथर ज्ञान से इसके पश्चात् नाना प्रदर्शी वे समस्त ब्रह्म लौविक प्रति मे करण नीत हुए ॥४॥ परम प्रशान्त शुद्ध दर्शनात्मक-निरञ्जन तथा चेतन चौर अचेतन स्वरूप वाले अपनी आत्मा मे ही प्रवस्थित होते हैं ॥४४॥ यहाँ पर ही परिनिर्वाण निर्गुण होने से निगत्मा और प्रकृति के अन्त में व्यक्ति क्रम से वे आगामी नही कहे गये हैं ॥४५॥ इत्येन प्राकृत प्रोक्त प्रतिसर्ग स्वयम्भुव । भिद्यते सर्वभूताना करणानि प्रसपमे ॥४६ इत्येप सयमञ्च व तत्त्वाना करण सह । तत्त्वप्रसयमो ह्यप स्मृतो ह्यवत्तं को द्विजा ।।४७ धर्माधौ तपो ज्ञान शुभे सत्यानृते तथा । उर्ध्व भावो ह्यधोभावो सुखदु से प्रियाप्रिये ।।४८ सर्वमेतत्प्रयातस्य गुणमात्रात्मक स्मृतम् । निरिन्द्रियाणा च तदा शानिना यच्छुभामुभम् ।।४६ प्रत्या चंच तत्मर्व पुण्य पाप प्रतिष्ठति । योन्यवस्था स्वभावे च देहिना तु निपिश्यते ।।५० जन्तूना पारपुण्यन्तु प्रती यत्प्रतिक्षितम् । अव्यक्तम्यानि तान्येव पुण्यपापानि जन्तव । ये जयनि पुनर्देहे देहान्यावे तथैव च ॥५१ धर्मापौ तु जन्तूना गुणमात्रात्मानुभो। करणं संप्रचीते कायवेनेह जन्तुभि ॥५२ मुनेनना प्रलीयन्ते क्षेत्रवाधिष्टिता गुणा. । मर्गन प्रतिमर्गच गमारे चंच जन्तवः । सयुज्यन्ते वियुग्मन्ने पररां मचरन्ति च ॥१३ [ दायु पुगए - राजसी तामसी चैव सात्विकी चव वृत्तय.! गुणमाना प्रवर्तन्ते पुरुषाधिष्ठिताबिधा ॥५४ ऊवं देवात्मक सत्त्वमधोभागात्मक तमः । तयो. प्रवर्तक मध्ये इहैवावर्तक रजः ॥५५ इस प्रकार से यह स्वयम्भू का प्राकृत प्रतिसर्ग कह दिया गया है। समस्त प्राणियो के प्रसथम मे करण विद्यमान होते है ।।४६।। हे द्विजवृन्द यह ही तत्वो का करणो के साथ सयम है। और पायक रात्व प्रसपम यही कहा गया है ।।४७॥ श्री सूतजी ने कहा-धर्म, अधर्म, नप-ज्ञान तथा शुभ सत्य और अन्त ऊर्ध्व भाव और अधोभाव-मुख तथा दुख-प्रिय और अप्रिय यह सव प्रयाण किये हुए का गुणमात्रात्मक कहा गया है । और उस समय में बिना इन्द्रियो वाले ज्ञानियो का जो भी कुछ शुभ तथा प्रशुभ है वह मात्रात्मा होता है ।।४८-४६।। वह सब प्रकृति मे पुण्य और पाप प्रनिनि होना है । और देहधारियों के स्वभाव म योन्यवस्था निपिक्त होती है ।।५०।। जन्तुम्रो का पुण्य और पाप जो प्रकृति में प्रतिष्ठित है। जन्तुगण जो उन्ही अव्यक्त में स्थित पुग्य और पापो को जीत लेते है जोकि पुनदेह म तथा देहान्यत्व में होते हैं ॥५१।। जन्तुमो के धर्म और अधर्म दोनो गुणमात्रात्मक होते हैं । यहाँ पर करणो के द्वारा जन्तुप्रो से वायं के होने से बढ जागा करत हैं ॥५२।। मुचेतन क्षेषज्ञो में स्थित गुण प्रलीन हो जाया करते हैं । मर्ग म मोर प्रतिसर्ग मे समार में जन्तुगरण सयुक्त और वियुक्त होते हैं और करणा के साथ मञ्चरण किया करते हैं ॥५३।। राजसी-तामसी और सात्त्विकी वृत्तियां पुरुषो म अधिक्षित गुणमात्रा तीन प्रकार मे प्रवृत्त होती हैं ॥५४॥ उद्ध्वं मे देवात्मक सत्त्व है और अयोभागात्मक नम है । उन दोना व मध में प्रवतंक यहाँ पर ही भावतंक रजोगुण होता है ॥५५॥ इत्येव परिवत्तन्ते त्रय बोतागुणात्मका । लोकेषु सर्वभूताना तन्न कार्य विजानता ॥१६ अविद्याप्रत्ययारम्भा प्रारभनो हि मानव । एतास्तु गतयस्तित्र गुभा पापात्मिकाः स्मृताः ॥१७ प्रलयादि पुन मृष्टि वर्णन ] [ ४५७ तम साभिभवाजन्तुर्याथातथ्य न विन्दति । अतत्तद्दनात्सोऽथ निविध वध्यते तत ॥५८ प्राकृतेन बन्धेन तथा वैकारिकेन च । दक्षिणाभि स्तृतीयेन बद्धोऽत्यन्त विवर्तते ॥५६ इत्येते नै त्रय प्रोक्ता बन्धा ह्यज्ञानहेतुका । अनित्ये नित्यसज्ञा च दुखे च सुखदर्शनम् ॥६० अस्व स्वमिति च ज्ञानमशुचौ शुचिनिश्चयः । येपामेते मनोदोपा ज्ञानदोषा विपर्ययात् ।।६१ रागद्व पनिवृत्तिश्च तज्ज्ञान समुदाहृतम् । अज्ञान तमसो मूल कर्मद्वयफल रज । वर्मजस्तु पुनर्देहो महादु ख प्रवर्तते ॥६२ थोत्रजा नेजा चैव त्वग्जिह्वाधारणतस्तथा । पुनर्भवकरी दुखा कर्मणा जायते तु सा ॥६३ इस प्रकार से य तीन योत गुणात्मक लोको म समस्त प्राणियो के परिवर्तित होते हैं। इसको विशेष रूप से जानने वाले को नहीं करना चाहिए ॥५६॥ मानवो के द्वारा मविद्या प्रत्यय प्रारम्भ भारव्य रिये जाया करते हैं । य तीन गतियाँ शुभ मोर पापामिका कही गई हैं ॥५७॥ तमोगुण से अभिभव होने से जन्तु पाथातथ्य को प्राप्त नहीं होता है । इसके पश्चान् वह सनन् दर्शन के न होने में तीन प्रकार का वद्ध होता है ॥५८॥ प्राकृत बन्ध से तया वैचारिक वन्ध से और तीसरे दक्षिणाभि से वद्ध हुमा अत्यन्त वित्तित होता है ॥५॥ ये तीनो बन्ध प्रज्ञान के हेतु वाले कहे गये हैं । अनित्य में नित्य होन की सजा मौर दुख में सुख का देवता यह मनोदोप है ॥६०॥ जो अपना नहीं है उम अस्व में सपना है ऐमा ज्ञान रखना तथा पशुचि मे शुधि अर्थात् पवित्र होने का निश्चय कर लेना जिनके ये मनोदशेष और विपर्यय मे ज्ञान दाप होने हैं ॥६१।। राग तथा द्वेष को निवृत्ति वह ज्ञान कहा गया है। मनान तम का मूल होता है। मं दय का फन रज होता है । फिर वर्म से उत्पन्न होने वाला देह होना है मौर महा दुःख प्रवृत्त होता है ॥६२॥ यार में जन्म लेने वाली-नेत्री से - ४५८ ] [ वायु पुराण उत्पन्न होने वाली तथा त्वत्रा, जिह्वा और घ्राण अर्थात् नासिका से पुनर्जन्म करने वाली दुस स्वरूपा वह कर्मों की उत्पन्न होती है ॥६३॥ सतृष्णोऽभिहितो बाल स्वकृतः वर्मरण फल । तैलपालीकवजीवस्तव परि वत्तं ते १६४ तस्मात्स्यूलमनानामज्ञानमुपदिश्यते । त शक्तमवधायक ज्ञाने यल समाचरेत् ॥६५ शानाद्विजयते सर्व त्यागावुद्धिविरज्यते । पैराग्याच्छुद्धत चापि मुद्धः सत्वेन मुच्यते ॥६६ पत ऊर्ती प्रवक्ष्यामि राग भूतापहारिणम् । अभिपङ्गाय यो यस्माद्विषयोऽप्यवशात्मन ।।६७ मनिष्टमभिषङ्ग हि प्रीतितापविपादनम् । दु.सलाभे न तापञ्च सुखानुस्मरण तथा १६८ इत्येप चैपयो राग सम्भूत्या कारण स्मृतम् । ब्रह्मादौ स्थावरान्ते नै ससारे ह्याधिभौतिके । अज्ञानपूर तस्मादशानन्तु विवर्जयेत् ॥६६ यस्य चापं न प्रमाण शिष्टाचार तव च । वर्णाश्रमविरोधी य शिष्टशास्त्रविरोधक ७० एप मार्गो हि निरधितियंग्योनौ च कारणम् । तिर्यग्योनिगतञ्च व कारण स निरुच्यते ॥७१ विविधा यातना स्थाने तिर्यग्योती च पडि वधे । कारणे विपये चैव प्रतिपातस्तु सवंश I७२ धनश्रय॑न्तु तत्मवं प्रतिघातात्मक स्मृतम् । इत्येपा तामसी वृत्तिभूतादीनां चतुर्विधा ।।७३ अपने किये हुए कर्मों क पलो मे बाल मतृष्ण कहा गया है । संल पानीक्वन् वीर वहाँ पर ही परिवर्तित होता है ॥६४॥ इससे पनों का स्कूल पमान ही उपदिष्ट होता है । उस एक को सात समझ पर शान में यान परला पाहिए ॥६५॥ शान मे सदनी विजय होती है और त्याग से बुद्धि विरचित ' प्रलयादि पुन सृष्टि वर्णन । [ ४५६ होती है तथा वराग्य से शुद्धि होती है और जो शुद्ध होता है वह सत्व से मुक्ति प्राप्त किया करता है ॥६६॥ इमसे प्रागे भूनाप के हरण करने वाले राग को बतलाऊँगा। जो जिससे अवश्य आत्मा वाते का विषय अभिपन के लिये होता हैं ॥६७॥ अनिष्ट अभिपङ्ग निश्चय ही प्रीति ताप का विषाद करने वाला होता है । दुख लाभ मे ताप तथा सुखानुस्मरण नहीं होता है ॥६८॥ यह वपय राग सम्भूति का कारण कहा गया है । ब्रह्मा से प्रादि में स्थावरो के अन्त में इस प्राधिभौतिक ससार में अज्ञान पूर्वक सब है इसलिये प्रज्ञान का त्याग करना ही चाहिए ॥६६॥ जिसके लिये ऋपियो के द्वारा कहा हुमा प्रमाण नहीं होता है अर्यात् कोई प्रमाण के रूप मे नहीं माना जाता है और शिष्टाचार भी नही होता है । जो वणों और पाश्रमो का विरोध करने वाला होता है तथा जो शिष्टो के निमित्त शास्त्री का विरोध करने वाला होता है ।।७। यह मार्ग निरपि पौर तिर्यक् योनि में कारण वना करता है । वह तिर्यक् योनि गत कारण कहा जाया करता है ।।७१॥ छ प्रकार के तिर्यक् योनिगत कारण वहा जापा करता है ॥७१।। छ प्रकार के तिर्यक् योनि के स्थान में अनेक प्रकार की यातनाएं होती हैं । वारण और विषय में सब ओर से प्रतिघात होता है ।।७२।। इस प्रकार से वह ममस्त प्रनश्वयं प्रतिघात क स्वरूप वाला कहा गया है । यह प्राणियो को तामसी वृत्ति चार प्रकार की होती है ॥७३॥ सत्त्वस्थमात्रक चित्त यथा सत्त्वप्रदर्शनात् । तत्त्वानाञ्च तथा तत्त्व दृष्ट्वा व तत्वदशनात् ।।७४ सत्त्वक्षेत्रज्ञनानात्वमेतज्ज्ञानार्थदर्शनम् । नानात्वदर्शन ज्ञान ज्ञानाद्वं योगमुच्यते ७५ तेन वदस्य नै बन्धो मोक्षो मुक्तस्य तेन च । समारे विनिवृत्ते तु मुक्तो लिङ्गन मुच्यते ॥७६ नि सम्बन्धो ह्मचैतन्यः स्वात्मन्येवावतिष्ठते । स्वात्मव्यवस्थितश्चापि विरूपास्पेन लिप्यते ॥ इत्येतल्लक्षण प्रोक्त समासाक्षानमोक्षयो.। सचापि विविध. प्रोक्तो मोक्षो व तत्त्वदशिमि।। - [ वायु-पुराण पूर्व वियोगो ज्ञानेन द्वितीयो रागसक्षयात् । लिङ्गाभावात्तु कैवल्य कैवल्यात्तु निरञ्जनम् 186 निरञ्जनत्वाच्छुद्धस्तु ततो नेता न विद्यते । तृष्णाक्षयात्तृतीयस्तु व्याख्यात मोक्षकारणम् ॥८० निमित्तमप्रतीघाते इष्टगव्दादिलक्षणे। अष्टावेतानि रूपाणि प्राकृतानि यथाक्रमम् ॥८१ केवल सत्व में स्थित रहन वाला चित जिस प्रकार से सत्त्व स दर्शन से होता है उमी प्रकार से तत्व को देखकर तत्व दर्शन से तत्वो का होता है 11७४।। सत्त्व क्षेत्रशो का नानात्व होता है और यह ज्ञानाथ दर्शन है। नानात्व के दर्शन को ज्ञान करते हैं और उस ज्ञान से योग दर्शन होता है जोकि योग कहा जाता है ।।७।। उसमे जो पद्ध होता है उसका बन्धन होता है और जो उससे मुक्त होता है उमना मोक्ष हा करता है । रागार के विनिवृत्त होने पर मुक्त लिङ्ग से छुटकारा पा जाया करता है १७६॥ नि सम्बन्ध अर्थान् सम्बन्ध से रहिन प्रचंतन्य अष्टनी पारमा म ही अवस्थित दृपा परला है । पौर स्वारम व्यवस्थित ही विरुप्रास्य के द्वारा लिखा जाता है ।।७।। यह इतना ही सक्षेप से ज्ञान और मोक्ष का लक्षण वहा गया है । वह मोक्ष भी तत्वो के दरखने वाले पुरषो के द्वारा तीन प्रकार का बहा गया है ।।७॥ प्रथम ज्ञान के माप वियोग है। दूसरा राग के सक्षय से होता है लिङ्ग के प्रभाव से कैवल्य होता है पोर कैवल्य से तो निरजन होता है | निरजन होने से शुद्ध होता है पिर नेता नहीं होता है । तृष्णा क क्षय से तीसरा होता है जोकि मोस का कारण ध्यास्यात किया गया है ॥८॥ इष्ट शन्द धादि स्वस्प बाते प्रतिपात में निमित्त होता है । इसके माठ रूप होते हैं जोरि यथाक्रम प्रारन होत हैं ॥१॥ क्षेत्रमंप्ववसज्यन्ते गुणमात्राममानि तु । प्रत उद्ध्वं प्रवक्ष्यामि वैराग्य दोषदर्शनात् ।।१२ दिव्ये च मानुपे चव विपये पश्चलसग । अपद्वे पोनभिप्वन वत्तंन्यो दोपदर्शनान् ॥३
समस्त दोषो को रुद्ध कर दता है॥६८७11 प्रागा के स्थानों को भेदन वरठा
वायु स समोरित हो जाता है वह गरीर म उपाधिन हार
श्लयादि पुन मृधि वर्णन ]
तापप्रीतिविपादाना वाय॑न्तु परिवर्जनम् ।
एव वैराग्यमास्थाय शरीरी निर्ममो भवेत् ।।८४
अनित्यमशिव दु खमिति बुद्धवानुचिन्त्य च ।
विशुद्ध कार्यकरण सत्वाभ्येति तरान्तु य ॥८५
परिपककपायो हि कृत्स्नान्दोपान्प्रपश्यति ।
तत प्रयाणकाले हि दोपैमित्तिकैस्तथा ॥८६
ऊष्मा प्रकुपित काये तीववायुसमीरित ।
स गरीरमुपाश्रित्य कृत्स्नान्दोपारुणद्धि वै 115७
प्राणस्थानानि भिन्दन्हि छिन्दन्मर्माण्यतीत्य च ।
शैत्यात्प्रकुपितो वायुरूव॑न्तु क्रमते तत ।।८८
स चाय सर्वभूताना प्राणस्थानेप्ववस्थित ।
समासात्सवृते ज्ञाने सवृतेषु च कर्ममु ८६
स जीवोऽनभ्यधिान कर्मभि स्व पुरावृतं ।
अष्टाङ्गप्राणवृत्ती स विच्यावयते पुन ॥६०
परीर प्रजहसो वै निरुच्छवासस्ततो भवेत् ।
एव प्रागण परित्यक्तो मृत इत्यभिधीयते ॥६१
गुणमात्रात्मक क्षेत्रो में अब सज्जिन होते हैं। अब इससे मागे दोप
दर्शन से वैराग्य को बतलाऊंगा ॥२॥ दिव्य और मानुष पञ्च लक्षण विषय में
दोप दर्शन से प्रदेष अनभिषन करना चाहिए ||८३॥ ताप-प्रीति और विपादो
का परिवजन करना चाहिए। इस प्रकार से वैराग्य म प्रास्थित हाकर यह
दारीर धारी निभम हो जाता है। अर्थात् इस गरोगे वो ममता से रहित हो
जाना चाहिए ।।८४|| बुद्धि के द्वारा दु ख प्रनित्य अशिव है इस प्रकार से अनु
चिनन करके जो विशुद्ध कार्य का करना है वह सत्त्व की प्राप्ति करना है
॥५॥ फिर परिपक्व कपाय वाला होरर समम्न दोगा को देख नता है।
प्रयाण करने के ममय म निश्चय ही नमित्तिक दापो मे काया म प्रति उष्मा
होते
तीन
४६२ ] [ वायु पुराण । हुमा और मर्मों को छेदन करता हुआ आगे चलकर शैत्य से प्रकुपित होने वाला वायु ऊदल भाग को फिर क्रान्त किया करता है ॥८॥ और यह वह समस्त प्राणियो के प्रारण स्थानो मे मवस्थित रहा करता है । मक्षेप से ज्ञान के सवृत हो जाने पर और समस्त कमों के मवृत होने पर वह जीव पुरा कृत अर्थात् पहिले जन्म में किये हुए अपने कर्मों से अनभ्यधिष्ठान हो जाता है। फिर मष्टाङ्ग प्राण वृत्ति वाला वह विच्यावयित हो जाता है ||८९-९०॥ शरीर को प्रकृष्टता से त्यागता हुआ वह पिर विना उच्छवासो वाला होता है । इस रीति से प्रागो के द्वारा परित्यक्त होने वाला मृत इस नाम से कहा जाता है ॥६॥ यथेह तोके खद्योत नीयमानमितस्तत । रञ्जन तद्वधे यत्तु नेता नेता न विद्यते ॥९२ वृणाक्षयम्तृतीयस्तु व्याख्यात मोक्षलक्षणम् । शब्दाद्य विषये दोपविषये पश्चलक्षणे ॥६३ अपद्वे पोऽन भिष्वङ्ग प्रीतितापविवर्जनम् । वैराग्यकारण ह्यते प्रकृतीना लयस्य च ।।६४ अष्टौ प्रकृतयो ज्ञेया पूर्वोक्ता वै यथाक्रमम् । अव्यक्ताद्यास्तु विज्ञ या भूतान्ता प्रकृतेर्लयाः ॥१५ वर्णाश्रमाचारयुक्ता शिष्टा शास्त्राविरोधिन । वर्णाश्रमारणा धर्मोऽय देवस्थानेषु कारणम् ।।६६ ब्रह्मादीनि पिशाचान्तान्यष्टौ स्थानानि देवता। ऐश्वर्यमणिमाद्य हि कारण ह्यष्टलक्षणम् ।।९७ निमित्तमप्रतिघात इप्टे शब्दादिलक्षणे। अष्टावेतानि रूपाणि प्राकृतानि यथाक्रमम् ॥६८ जिम प्रकार से यहाँ लोर म इधर उधर ले जाया गया खद्योत (जुगुनू) रम्जन होता है पौर उमदे वध होने पर नेता नेता नहीं रहता है ॥२॥ तृपणा का क्षर तीसरा मोक्ष का लक्षण व्याख्यात किया गया है। शमादि विषय म पञ्चलक्षणों वाल दोष विषय में अप्रपा प्रजाभिषङ्ग प्रीति मौर ताप विव.
[ ६३ प्रलयादि पुन मृटि वर्णन ] जन होना ये वैराग्य के कारण और प्रवृतियो के लय के कारण होते हैं ।।६३. ६४॥ पूर्व मे वयित की हुई माठ प्रकृतियां क्रम के अनुसार जानलेनी चाहिये । अन्यक्त भादि प्रकृति लय भूतान्त होते हैं ॥६५॥ शिष्ट जो होते हैं वे वर्णो मौर माश्रमो के धर्मों से युक्त हुमा करते हैं तथा वे शास्त्रो के भी विरोध न करने वाले होते हैं। चार वो मोर धारो माश्रमो का यह धर्म देयो के स्थानो मे कारण होता है ॥६६॥ ब्रह्मा से मादि लेकर पिशाचो के मन्तक पाट स्थान देवता होते हैं । ऐश्वयं तथा मणिमा मादि मष्ट लक्षण वाला कारण होता है ॥७॥ शब्दादि लक्षण इष्ट मे जो अप्रतिघात होता है वह निमित्त होता है। ये माठ यथाक्रम आठ प्राकृति रूप होते हैं ॥१८॥ क्षेत्रज्ञेष्वनुसज्यन्ते गणमात्रात्मकानि तु । प्रावृट्वाले पृथक्त्वेन पश्यन्तीह न चक्षुपा REE पश्यन्त्येव विध सिद्धा जीव दिव्येन चक्षुषा । श्वाविती श्वानपानश्च योनी प्रविशतस्तथा ॥१०० तिर्यगूद्ध मधस्ताच्च धावतोऽपि यथाक्रमम् । जीवप्राणास्तथा लिङ्ग कारणञ्च चतुष्टयम् ॥१०१ पर्यायवाचक शब्दै रेकार्थे सोऽभिलिख्यते । व्यक्ताव्यक्ते प्रमाणोऽय स वै रूप तु कृत्स्नश ॥१०२ अव्यक्तान्त गृहीत च क्षेत्रज्ञाधिष्ठितञ्च यत् । एव ज्ञात्वा शुचिर्भूत्वा ज्ञानाद विप्रमुच्यते ॥१०३ नष्टञ्च व यथा तत्त्व तत्त्वाना तत्त्वदर्शनम् । यथेष्ट परिनिर्याति भिन्ने देहे सुनिवृते ॥१०४ गुण मात्रात्मक क्षेत्रज्ञो मे अनुमज्जित होते हैं । प्रावृट् अर्थान् वर्षा के समय में यहाँ पर पृथक्त्व होने से नेत्र के द्वारा नहीं देखते हैं | इम प्रभार वाले जीव को सिद्ध लोग दिव्य चक्षु के द्वारा देखा करते हैं। श्वाविनि पौर श्वान के पान वाला तथा तिर्यक् योनियों में प्रवेश करता हुआ ऊपर भौर नीचे की और दौड़ता हुआ भी यथाक्रम जीव प्राण तथा लिङ्ग यह चार कारण हैं ॥१००-१०१॥ एक ही अर्थ रखने वाले पर्याय वाचक शब्दो से प्रभि- वह
४६४ ॥
[ वामु पुराण
लिखित किया जाता है । व्यक्त और अव्यक्त में यह प्रमाण है और वह पूर्णतया
रूप होता है ॥१०२।। जो अव्यक्त के अन्त तक ग्रहण किया हुआ है और
क्षेत्रज्ञ से अधिष्ठित है इस रीति से ज्ञान प्राप्त करके और गुचि होकर निश्चय
ही ज्ञानमे प्रकृष्ट रूपसे मुक्त होजाता है ॥१०३॥ जैसे ही तत्त्व और तत्वों का
तत्वदर्शन नष्ट होता है वह भिन्न निवृत देह में स्थित होता है और वह चला
जाता है ।।१०४॥
भिद्यते करणश्चापि व्यक्ताज्ञानिनस्तत ।
मुक्तो गुणशरीरेण प्रारणाद्य न तु सर्वश ॥१०५
नान्यन्छरीर मादत्ते दग्धे बीजे यथाकुर ।
जीविक सर्वससाराद्वीजशारीरमानस ॥१०६
ज्ञानाच्चतुर्दशाच्छुद्ध प्रकृति सोऽनुवर्तते ।
प्रकृति सत्यमित्याहुविकारोऽनृतमुच्यते ॥१०७
तत्सद्भावोऽनृत ज्ञेय सद्भाव सत्यमुच्यते ।
अनामरूपक्षेत्रज्ञनामरूप प्रचक्षते ॥१०८
यस्मात्क्षेन विजानाति तस्मात्क्षेत्रज्ञ उच्यते।
क्षनप्रत्ययतो यस्मात्क्षेत्रज्ञ शुभ उच्यते ।।१०६
क्षेत्रज्ञः स्मयंते तस्मात्क्षेन तज्जैविभाध्यते।
क्षत्रत्वप्रत्यय दृष्ट क्षेत्रज्ञ प्रत्ययी मदा ।।११०
क्षयरगात् वरणाच्चैव क्षतत्राणात्तथैव च ।
मोज्यत्वाद्विपयत्वाच्च क्षेत्र क्षेत्रविदो विदु ॥१११
महदाय विशेषान्त सवैरूप्य विलक्षणम् ।
विकारलक्षण तद्व साक्षरक्षरमेव च ॥११२
तमेव च विकारन्तु यस्मा क्षरते पुन ।
तस्माच्च कारणाचंव क्षरमित्यभिधीयते ॥११३
इसके अनन्तर जो अव्यक्त ज्ञानी होता है उसका वरण भी भिद्यमान
होता है । गुण शरीर प्राणाध से सभी प्रकार से युक्त होता है ।।१०।। फिर
वह मुक्त हुमा प्राणी अन्य शरीर को धारण नहीं किया करता है जिस तरह
[ ४६५
प्रलयादि पुन सृष्टि वर्णन ]
बीज के दग्ध होने पर फिर उमसे अकुर नहीं होते है उमी रीनि से यज्ञीयात्मा
वीज शारीर मानस ससार से चतुर्दश ज्ञान से शुद्ध हुअा वह प्रकृति का अनुवर्तन
किया करता है । सत्य को प्रकृति कहते हैं और जो विकार होता है वह अनृत
कहा जाता है ॥१०६-१०७॥ उसका सद्भाव अनृत जानना चाहिये और सद्भाव
सत्य कहा जाता है। अनाम रूप वाले क्षेत्र का नाम रूप कहा जाता है ।१०।
जिमसे क्षेत्र को जानते हैं उमम वह क्षेत्रज्ञ कहा जाया करता है । जिस क्षेत्र के
प्रत्यय मे क्षेत्रज्ञ शुभ कहा जाता है ॥१६॥ उससे क्षेत्रज्ञ का स्मरण किया
जाता है। उम ज्ञातायो के द्वारा विशेष म्प से कहा जाया करता है। क्षेत्रत्व
का प्रत्यय जब दृष्ट होता है तो क्षेत्रज्ञ मर्वदा प्रत्ययी होता है ॥११०॥ क्षयण
से और करण से ही तथा क्षन त्राण से भोग्य होने से और विषय के होने से
क्षेत्र के वेत्ता लोग क्षेत्र जानते है ॥१११॥ महत से प्राद्य और विशेष के अन्त
तक विलक्षण सर्वरूप्य होता है। वह निश्चय ही विकार लक्षण साक्षर क्षर ही
होता है ॥११२॥ फिर उस ही विवार को जिमसे यह क्षर होता है और ठसही
कारण मे क्षर एमा मभिहित हुप्रा करता है ।।११।।
मुखदुखमोहभावा भोज्यमित्यभिधीयते ।
अचेतत्वाद्धि विपयस्तद्धि धर्मविभु स्मृत ॥११४
नक्षीयते न क्षरति विवारप्रसृतन्तु तत् ।
अक्षर तेन चाप्युक्तमक्षीणत्वात्तथैव च ॥११५
यस्मात्पुर्यनुशेते च तस्मात्पुरुप उच्यते ।
पुरप्रत्ययको यस्मात्पुरपेत्यभिधीयते ।।११६
पुरप क्थयस्वाथ वाथन्तज्ज्ञविभाध्यते ।
शुद्धो निरञ्जनाभासो ज्ञानाज्ञानविवर्जित ।।११७
अम्ति नास्तीति सोऽन्यो वा बद्धो मुक्तो गत. स्थितः।
नहेंतिकान्त निद्देश्यमूक्तमस्मिन्न विद्यते ॥११८
शुद्धत्वान्न तु देश्यो वैदृष्टत्वात्ममदर्शन ।
प्रात्मप्रत्ययकारी सारनूनञ्चापि हेतुवम् ।
भावग्राह्यमनुमान्य चिन्तयन्न प्रमुह्यते ॥११६
[ वायु पुराण यदा पश्यति ज्ञातार शान्तार्थ दर्शनात्मकम् । दृश्यादृश्येपु निद्देश्य तदा तदुदर वरम् ।।१२० मुख-दुख और मोह के भाव भोज्य इस नाम से कहे जाते है । अचेत के होने से जो विषय है वह ही धर्म विभु कहा गया है ॥११४॥ वह विवार का प्रगृत न तो क्षीण होता है और न क्षर ही होता है और उस हो रीति से उमसे पक्षीण होने के कारण से अक्षर ऐमा वहा गया है ।।११। जिससे वह पुरी मे मनुगयन विया करता है उम वारण से वह पुरुप ऐमा कहा जाया करता है । पुर प्रत्यधिक जिससे होता है वह पुरुष हम नाम से बोला जाया करता है ।।११६।। पुरुप कहो इसके मन तर उसके ज्ञातामो के द्वारा वह शुद्ध- निरजनाभाम मोर ज्ञान तथा प्रज्ञान से रहित को विभापित किया जाता है ॥११७॥ है भोर नहीं है-इमसे अथवा वह अ य है, वद एव मुक्त गया हुआ स्थित है । उमम नेहेंतिकात निर्देश्य सूक्त नहीं होता है ॥११८।। शुद्ध होने से वह देश्य नही है भोर हृष्ट होने से समदर्शन होता है। मात्मा का प्रत्यय कारी होता है। सारनून हेतुन भाव ग्राह्य एव अनुमाय का चिन्तन करता हुमा मोह को प्राप्त नही हुआ करता है ॥११६। जब जिस समय शान्तार्थ दशनात्मक जाता को देख लता है तब उस समय दृश्यादृश्यो म निद्देश्य उसका श्रेष्ठ उद्धार होता है ॥१२॥ एव ज्ञात्वा स विज्ञाता तत शान्ति नियच्छति । कार्ये च कारणे चंव बुद्धयादी भौतिके तदा ।१२१ सप्रयुत्तो वियुक्तो वा जीवतो वा मृतस्य च । विज्ञाता न च दृश्येत पृथक्त्वेनेह सर्चश ॥१२२ स्वेनात्मान तमात्मान कारणात्मा नियच्छति । प्रकृतौ कारणे चैव स्वात्मन्येवोपतिष्ठति ॥१२३ अस्ति नास्तीति सोऽन्यो वा इहामुत्रेति वा पुनः । एकत्व वा पृथक्त्व वा क्षेत्रज्ञपुरुऐति वा ॥१२४ यात्मवान् स निरात्मा वा चेतनोऽचेतनोऽपि वा। वर्ता वा सोऽप्यकर्ता वा भोत्ता वा भोज्यमेव वा ।।१२५
प्रलयादि पुन मृष्टि वर्णन ]
[ ४६७
-
यज्ज्ञात्वा न निवर्तन्ते क्षेत्रज्ञ तु निरञ्जने।
अवाच्य तदनाख्यानादग्राह्यत्वादहेतुनि ||१२६
इस प्रकार से वह विशेष रूप से ज्ञान रखने वाला फिर शान्ति को प्राप्त
किया करता है। कार्य में पोर वारण मे तथा बुद्धि प्रादि भौतिक मे उस समय
मप्रयुक्त प्रयवा पियुक्त होता हुआ, जीक्ति का अथवा मृत का विशाला यहाँ मब
प्रकार से पृयक्त्व होने से दिखाई नही देता है ॥१२१-१२२॥ वारणारमा यह
प्ररने से आत्मा को और उस पात्मा को प्राप्त करता है। प्रकृति में और कारण
में अपनी ही प्रात्मा में उप तिष्ठमान होता है ।।१२३॥ है और नहीं है-यह
मथवा वह पन्य है-यहाँ अथवा परलोक में है-एकत्व है प्रथवा पृथक्त्व है-
क्षेत्रज्ञ है पथदा पुरुप है-वह प्रात्मवान् अषया निरामा है-चेतन है अथवा
प्रचेतन है-वह कता है किम्बा वह अवर्ता है-वह भोक्ता अथवा भोज्य ही है-
यह जानकर क्षेत्रज्ञ निरञ्जन मे निवृत्त नहीं होते है । अपितु उममे अनाख्यान
होने से तथा अग्राहा होने में यह कहने योग्य नहीं है ।।१२४-१२५-१२६।।
अप्रतवर्ममचिन्त्यत्वादवाप्यत्वाच्च सर्वश.।
नाभिलिम्पति तत्तत्त्व सम्प्राप्य मनसा सह ।।१२७
क्षेत्रज्ञे निगुणे शुद्ध शान्ते क्षीणे निरञ्जने ।
व्यपे(ये)तसुखदुःखे च निरद्ध शान्तिमागते ॥१२८
निरात्मने पुनस्तस्मिन्याच्यावाच्यो न विद्यते।
एतो सहारविस्तारी व्यक्ताव्यक्ती तत पुन ॥१२६
सृजते ग्रसते चंव ग्रस्तः पर्यवशिजते ।
क्षेत्रज्ञाधिष्ठित सर्व
पुन सर्व प्रवर्तते ॥१३०
अधिष्ठानप्रवृत्तेन तस्य ते बुद्धिपूर्वकम् ।
साधाय वैधय॑वृतसयोगी विधितस्तयो.।
प्रनादिमान स सयोगो महापुरुषज स्मृत ॥१३१
पावन सर्गप्रतिमर्गकालम्तावच्च तिष्ठति सुसनिरुध्य ।
पूर्व हितव्ये तदबुद्धिपूर्व प्रवर्तते तत्पुष्पायमेव ।।१३२
. ४६८ ] [ वायु पुराण एपा निसर्गप्रतिसगंपूर्व प्राधानिकी चेश्वरकारिता च । अनाद्यनन्ता ह्यभिमानपूर्वक विलासयन्ती जगदभ्युपैति ॥१३३ इत्येप प्राकृत सर्गस्तृतीयो हेतुलक्षणा । उक्तो ह्यस्मिस्तदात्यन्त कविभिस्तत्प्रमुच्यते ॥१३४ अचिन् य होने से और सर्व प्रकार से अवाप्य होने से अप्रतवर्य है । मन के साथ उस तत्त्व को सम्प्राप्त करने वह अभिलिप्त नहीं होता है ॥१२७॥ क्षेत्रज्ञ- शुद्ध-निर्गुण-शान्त-क्षीण-निरञ्जन मे सुख और दुख व्यपेत होते हुए निरुद्ध होकर शान्ति को प्राप्त होजाते है ॥१२८॥ वह निरात्मा होता है इसलिये उसमे फिर कुछ भी वाच्य तथा प्रवाच्य नही रहता है। ये सहार और विस्तार तथा व्यक्त और अव्यक्त फिर सृजन करता है और प्रसन करता है और ग्रस्त होता हुमा पर्यवस्थित रहता है । क्षेत्रज्ञ मे मधिष्ठित सभी फिर प्रवृत्त होता है ॥१२९. १३०।। अधिष्ठान प्रवृत्त होने से उसके बुद्धिपूर्वक माधर्म्य और वैधयं से रिया हुआ सयोग उन दोनो का विधि से वह अनादिमान सयोग होता है और महा. पुरुष मे जायमान कहा गया है ।।१३१।। और जितना सर्ग तथा प्रतिसर्ग का काल है उतना सुमनिरुद्ध होकर रहता है । पहिले हितव्य में वह मवुद्धि पूर्वक प्रवृत्त होता है और पुरुपार्थ ही होता है ॥१३२॥ यह निसर्ग घोर प्रतिसगं पूर्वक प्रायानिकी ईश्वर कारिता है जो अनाद्यन्त वाली अभिमान पूर्वक विलास करती हुई जगत् को प्राप्त होती है। यह हेतु लक्षण वाता तृतीय प्राकृत सर्ग हैं जोकि कहा गया है उसमे अत्यन्त रूप से कवियो के द्वारा प्रमुक्ति प्राप्त की जाती है ।।१३४॥ प्रकरण ६५-सृष्टि वर्शन सूत सुमहदास्यान भवता परिकीर्तितम् । प्रजाना मनुभि साद देवानामृपिभि. सह ।।१ पितृगन्धर्वभूताना पिशाचोरगरक्षमाम् । दत्याना दानवाना च यक्षाणामेव पक्षिणाम् ॥२ मृधि वर्णन ] [ ४६६ अत्यतानि कर्माणि रिधिमान्धम्म निश्चय । विचियान पयायोगा जन्म चाग्र यमनुत्तमम् ॥३ तत्वय्यमानमस्माक भवता लक्षणया गिरा। मन क्णय सोते प्रीपात्याभूतसम्भवम् ॥४ एवमाराध्य ते सूत सत्कृत्य च महर्षय । पप्रच्छ: समिण. सर्वे पुन सर्गप्रवर्तनम् ॥५ पथ सूत महाप्राज्ञ पुन सर्ग प्रपत्स्यते । वन्धेपु मम्प्रलीनेपु गुणमाम्ये तमोमये ॥६ विकारस्वविमृप्टेपु ह्यव्यक्ते चात्मनि स्थिते । अप्रवृत्ती ब्रह्मणस्तु महामायुज्यगम्तदा । पथ प्रपत्म्यते समस्तन प्रा हि पृच्छताम् ॥७ ऋपिया ने कहा-हे मूतजी ! महान् माम्यान का वर्णन किया है जिममै मनुमो के साथ प्रजाओ का तथा ऋपियो माय देयो का पूरा वर्णन है । इस पास्यान म पितृ-गन्धर्व-भूत-पिशाच-उरग-राक्षम-दत्य-दानव-यक्ष और पक्षियों के प्रत्यद्भुत कर्मों का वर्णन भी दिया गया है । इसमे प्रापन विधि स युक्न धर्म का भी निश्चय बनाया है। इसमे विचित्र वयानो के याग हैं तथा श्रेष्टनम अग्रय जन्म का भी वर्णन किया है ।।१-२-३।। हे मौत । आपता अपनी अतीव दलदा मुन्दर वाणी स मन तथा पानी को पाम मुग मप्र(मुन्न करते हुए सभी कुछ का वर्णन वरव ममस्त प्राणियो का प्रमन्नता प्रदान किया करते है ॥४॥ इस प्रकार में उन महर्षिया ने मूतजी का ममाराधन एव भनी भौति सन्कार करके पुन उन मत्रधारिया ने सर्ग व प्रवर्तन के विषय म उनमे पूछा या ॥ मूतजी । प्रापतो महान् पण्डित हैं । यह गर्ग फिर वंग होगा क्योकि समस्त बन्ध जब प्रलीन होनात हैं और इस तमोमय में गुणो वो समता हाजाया करती है ? समस्त विकार नो उम समय मे विमृष्ट रहते ही नहीं है क्योंकि यह अव्यक्त प्रात्मा म ही स्थित हाजाया करता है । महान् मायुज्य को प्राप्त होन पर ब्रह्म की प्रवृनि उम समय में होती ही नहीं है फिर यह मग कसे होता है ? हम मद यही प्रापम पूछना चाहते हैं सो पाप कृपा करके वर्णन कर दीजिये ॥६-७॥ ?
४७० ] [ वायु पुगएँ एवमुक्त स्ततः सूतस्तदासौ लोमहर्पण. । व्यास्यातुमुपचकाम पुन सर्गप्रवर्तनम् ॥ अह वो वर्तयिष्यामि यथा सर्गः प्रपत्स्यते । पूर्ववत्स तु विज्ञ य समासात निवोधद IRE दृष्ट चैवानुमेयञ्च तकं वक्ष्यामि युक्तितः । तस्माद्वाचो निवर्तन्ते ह्यप्राप्य मनसा सह ।।१० अव्यक्तवत् परोक्षत्वाद् ग्रहण तदुरासदम् । विकार. प्रतिसंदृष्ट गुणसाम्ये निवर्तते ॥११ प्रधान पुरुपाणाञ्च साधरणव तिष्ठति । धर्माधम्मी प्रलीयेते अव्यक्ती प्राणिना सदा ॥१२ सन्वमात्रात्मको घर्मो गुणसत्त्वे प्रतिष्ठितः। तमोमात्रात्मकोऽधर्मो गुरणे तमसि तिष्ठति ॥१३ अविभागवतावेतो गुणसाम्यस्थितावुभौ । सर्वकार्ये वुद्धिपूर्व प्रधानस्य प्रपत्स्यते ॥१४ इस प्रकार से महर्पियो के द्वारा जब सूतजी से कहा गया तो वे लोम हर्षण पुन. सगं की प्रवृत्ति का वर्णन करने का प्रारम्भ करने लगे थे ॥६॥ हे ऋषियो। मैं पाप सबको बतलाता हूँ कि यह सर्ग किस प्रकार से प्रवृत्त हमा करता है। यह पूर्व की भांति ही जानने के योग्य है । अत यहाँ पर अतीव सक्षेप में इसे समझलो ॥६॥ यह दृष्ट तथा अनुमान करने के योग्य है । मैं युक्ति से तर्क को बतलाता हूँ। वहां से मन के साथ वाणी भी निवृत्त हो जाया करती है और किसी की भी पहुच नही होती है ॥१०॥ अव्यक्त की ही भाति वह परोक्ष वस्तु है और रसका ग्रहण करना मत्यन्न पटिन है । गुणो की साम्यावस्था प्रति सहुष्ट हो जाने पर वह विकारो से पुन निवृत्त होती है ॥११॥ पुरुषो के साधम्यं से ही प्रधान स्थित होता है। प्राणियो के धर्म भौर अधर्म भव्यक्त होकर सदा प्रलीन हो जाया करते हैं ॥१२॥ सत्त्वमात्रा स्मक एक धर्म गुण सत्त्व में प्रतित्ति रहा करता है। तमोमात्रात्मक मधर्म तमोगुरा में स्थित रहा करता है ||१३|| ये दोनो गुण-साम्य में स्थित रहने [ ४७१ सृष्टि वर्णन] हुये उस समय में विभाग से रहित होते हैं। प्रधान के समस्त कार्य में बुद्धि पूर्वक ही प्रवृत्त होंगे ॥१४॥ अबुद्धिपूर्व क्षेत्रज्ञ अधिष्ठास्यति तान् गुणान् । एव तानभिमानेन प्रपत्स्येत पुरस्तदा ।।१५ यदा प्रवत्तितव्यन्तु क्षेत्रक्षेत्रज्ञयो यो.। भोज्यभोक्तृत्वसम्बन्ध प्रपत्स्येते युतावुभौ ।।१६ तस्माच्छरणमव्यक्त साम्ये स्थित्वा गुणात्मकान् । क्षेत्रज्ञाधिष्ठित तच्च वैपम्य भजते तु तत् ॥१७ तत प्रपत्स्यते व्यक्त क्षेत्रक्षेत्रज्ञयो योः । क्षेत्रज्ञापिति सत्व विकार जनयिष्यति ॥१८ मदाद्य विशेपान्त चतुर्विशगुणात्मकम् । क्षेत्रज्ञस्य प्रधानस्य पुरुषस्य प्रपत्स्यते ।।१६ ब्रह्माण्डे प्रथम सोऽथ भविता चेश्वर पुन । ततो ज्ञेयस्य कृत्स्नस्य सर्वभूतपति शिव ॥२० ईश्वर सर्वमुक्ताना ब्रह्मा ब्रह्ममयो महान् । आदि देव प्रधानस्यानुग्रहाय प्रवक्ष्यते ॥२१॥ यह क्षेत्रज्ञ बिना ही बुद्धि के योग किए हुए उस समय उन गुणो म प्रधिहित रहा करता है । इस प्रकार से उस समय म उन गुणो को पहले प्रवृत्त कराया जाता है ॥१५॥ जिस समय म क्षेत्र और क्षेत्र इन दोनो को प्रवृत्त करना होता है तो ये दोनो ही भोज्य और भोता इसके सम्बन्ध की प्राप्ति क्यिा करते हैं ।।१६। इसके गुण स्वरूपो को साम्यावस्था में स्थित करके वह शरण प्र यक्त क्षेत्रज्ञ मे अधिषित होता है और वही जब विषमा. वस्या को प्राप्त होते हैं तो क्षेत्र और क्षेत्रह दोनों का व्यक्त स्वरूप हो जाता । क्षेत्रज्ञ मे अधिष्ठित स व विकार को उत्पन्न क्यिा करता है ॥१७-१८॥ महत्तत्त्व से प्रारम्भ करके निमेष के अन्त पर्यन्त और चौबीम गुणो के स्वरूप वाता क्षेत्रज्ञ पुरप का और प्रधान का रूप हो जाया करता है ॥१६॥ इम ब्रह्माण्ड में यह प्रयम होता है । इसके अनम्नर फिर ईश्वर होता है। इसके ४७२ ] { वायु पुराण पश्चात् इस मम्पूर्ण ज्ञेय ( जानने के योग्य ) का समस्त भूतो का स्वामी शिव होता है ॥२०॥ समस्त भक्ती का ईश्वर महान् ब्रह्ममय ब्रह्मा है। यह प्रधान के अनुग्रह के लिये आदि देव कहा जायगा ॥२१॥ अनाद्यो स्वयमुत्पन्नावुभौ सूक्ष्मो तु तो स्मृतो । अनादिसयोगयुती सर्व क्षेत्रज्ञमेव च ॥२२ अवुद्धि पूर्वक युक्तो मराको तु वरी तदा। अप्रत्ययमनाद्य च स्थितावुदवमप्स्यश ॥२३ प्रवृत्ते पूर्वत पूर्व पुन सर्गे प्रपत्स्यते । अज्ञागुण प्रवर्त्तन्त रज सत्वतमात्मकम् ।।२४ प्रवृत्तिकाले रजसाभिपन्नमहत्वभूतादिविशेष्यताञ्च । विशेषता चेन्द्रियताच यान्ति गुणावसाने पतिभिर्मनुप्या ॥२५ सत्याभिध्यायिनस्तस्य घ्यायिन सग्निमित्तकम् । रज सत्वतमा व्यक्ता विधारण परस्परम् ॥२६ आद्यन्त सप्रपत्स्यन्ते क्षेत्रतज्ज्ञास्तु मर्यश । ससिद्धकार्य करणा उत्पद्यन्तऽभिमानिन ॥२७ सर्वे सत्वा प्रपद्यन्ते एव्यक्तात्पूर्वमेव च । प्रसूत या च मुवहा साधिकाश्चाप्यसाधिका ।।२८ ये दोना प्रनाथ हैं और स्वयमुत्पन्न होने वान है तथा मूधम कहे गय हैं एवं अनादि मयोग से युक्त हैं यह सव क्षेत्रन ही है ॥२२॥ य प्रबुद्धि पूर्वा उस समय मदार घर हैं तया अप्रत्यय एव अनाथ उदय में स्थित रहा करते हैं ।।२३।। पूर्व से श्री पूर्व मगं २ प्रवृत्त हान पर ये युक्त प्रकृति को प्राण होन वाले होते हैं। प्रज्ञागुणों के द्वारा रममावतमात्मा हार प्रवृत होत है। ॥२४॥ प्रवृत्ति रे कान में रजोगुण ये अभिन्न मारव भूगार विशेषता तया नियता और इद्रियता को मनुप्प गुगोपवमान में परियों पे गाय प्राप्त होते हैं ॥२५।। सत्य में अभिभ्यायी उगरे निमिता पायो । पा रज-गव मोर तम परस्पर में विधर्मा होते है । मारिऔर मन में गव क्षेत्र मौर मेवा हो जात है। यमित पापं वाराण पभिमार या सृष्टि वर्णन ] उत्पन्न होत हैं ॥२७।। समस्त सत्व पहले ही अव्यक्त से प्रतिपन्न होते हैं । जो कि सुवहासाधिका पोर अमाधिकाग्रो का प्रसव करती है ।।२।। ससरन्तस्तु ते सर्वे स्थानप्रकरण सह । कार्याणि प्रतिपत्स्यन्ते उत्पद्यन्ते पुन पुन. ॥२६ गुणमात्रात्मकाच व पधिम्मों परस्परम् । पारप्सन्तीह चान्योन्य वरेणानुग्रहेण च ॥३० सर्ने तुल्याः प्रसृष्टार्थ सईदी यान्ति विनियाम् । गुणास्त प्रतिधावते तस्मात्तत्तस्य रोचते ॥३१ गुणारते यानि सर्वाणि प्राक् हप्टे प्रतिपेदिरे। तान्येव प्रतिपद्यन्ते सृष्टमाना पुन पुनः ॥३२ हिंस्राहिंस्र मृदुकरे धर्माधर्मावृतानृते । तद्भाविता प्रपद्यन्ते तस्मात्तत्तस्य रोचते ॥३३ महाभूतेषु नानात्वमिद्रियार्थेषु मूत्तिषु । विप्रयोगाश्च भूताना गुणेभ्य सप्रवर्तते ।।३४ इत्येप वो मया ख्यात पुनः सगं समासत । समासादेव वक्ष्यामि ब्रह्मरणोश्य समुद्भवम् ॥३५ वे सब सत्त्व स्थान और प्रकरणो के साथ यहाँ ससरण करते हुए पुन - पुन उत्पन्न होते हैं और कार्यों को प्राप्त किया करते हैं ॥२६॥ यहाँ पर वे सब परस्पर मे गुणमात्र म्वरूप वाले धर्म और अधर्म को वर तथा अनुग्रह से प्रारम्भ किया करते हैं ॥३०॥ सव तुल्य हैं और प्रसृष्ट होने के लिये सर्ग के मादि विक्रिया को प्राप्त हुमा करते हैं । उनके प्रति गुण धावन किया करते हैं। जो-जो जिमको रुचता है वे गुण सृष्टि से पूर्व जो थे उन सबको प्राप्त हो जाते हैं और वे ही सृष्टमान होते हुए पुन पुन प्रतिपन्न होते हैं ॥३१-३२शा हिंस्र- पहिल, मृदु-क्रूर, धर्म-अधर्म, और पावृत तथा अन्त मे तत्तत् भावो से भावित होते हुए जो जिसको रुचता है प्रपन्न हुआ करते हैं ।।३३।। इन्द्रियार्थ मूत्तियो में मौर महाभूतो मे नानात्व होता है । भूतो के विप्रयोग गुणो से सवृत्त हुआ करते
४७४ ]
[ वायु पुराण
है ||३४॥ यह मैंन मधेष से पुन सर्ग का वर्णन कर दिया है। अब सभेर स
ही ब्रह्म 7 समुद्भव पहूंगा ।।३।।
मध्यक्ताकारणात्तस्मानित्यात्सदसदात्मकात् ।
प्रधानपुरुपाभ्यान्तु जायते च महेश्वरः ॥३६
स पुन सम्भावयिता जायते ब्रह्मस शित ।
मृजते स पुनर्लोकानभिमानगुणात्मवान् ॥३७
अहङ्कारस्तु महतस्तस्माद्भूतानि चात्मन ।
युगपत् सम्प्रवर्तन्ते भूतान्येवेन्द्रियाणि च ।
भूतभेदाश्च भूतेभ्य इति मर्गः प्रवर्तते ॥३८
विस्तरावयवरतेपा यथाप्रज्ञ यथाथु तम् ।
कीर्तित वो यथा पूर्व तथैवाभ्युपधार्यताम् ।।३६
एतच्छ्र त्या नैमिषेयास्तदानी लोकोत्पनि सस्थिति च व्ययञ्च ।
तस्मिन् सनेऽवभृथ प्राप्य सुद्धाः पुण्य लोकमृषयः प्राप्नुवन्ति ॥४०
यथा यूय विधिवदेवतादीनिष्ट्वा चैवावभृथ प्राप्य शुद्धा ।
त्यक्त्वा देहानायुपोऽन्ते कृतार्थान्पुण्याल्लोकान्प्राप्य यथेष्ट चरिष्यथ४१
एते ते नैमिषेया इष्ट्वा सृष्ट्वा च वै तदा ।
जग्मुश्वावभृथस्नाता स्वर्ग सर्वे तु सत्रिण ॥४२
सत् भोर असत् स्वरूप वाले तथा नित्य उस अव्यक्त कारण से और
प्रधान पुरुषो से महेश्वर समुत्पन्न होते हैं ॥३६॥ वह फिर सम्भावयित ब्रह्मा
सज्ञा वाला होता है और वह अभिमान गुणात्मक लोको का सृजन किया करता
है ॥३७॥ महत् तत्व से अहङ्कार उत्पन्न होता है और उस अहसार से भूतो की
तन्मात्राऐ उत्पन्न होती हैं और फिर एक ही साथ भूत तथा इन्द्रियाँ समुत्पन्न
हुश्रा करते हैं । भूतो से भूतो के भेद होते हैं -इस प्रकार से यह सर्ग प्रवृत्त
हुमा करता है ।।३८। उनका विस्तरावयव मैंने अपनी बुद्धि के अनुसार भोर
जैसा कुछ सुना था उसके अनुसार तुम्हारे सामने कह दिया है। जैसा पहिले
कहा था वैसा ही इमे.समझ लेना चाहिए।।३६।। नैमिपारण्य के निवास करने
वाले पियो ने उस समय यह श्रवण करके जिसम लोको की उत्पत्ति-
-
मृष्टि वर्णन ] मग्धिति मोर उपसहति थी उम ग ग प्रधभृर को प्राप्त करने शुद्ध होने वाले ऋषिगण परम पुएप लोक को प्राप्त होते हैं ।।४। जिस प्रकार से माप लोग विधि-विधान के माय देवता भादि का यजन करके भोर अवभृय को प्राप्त शुदहुए मायु के अन्त मदेहो का परित्याग करके जिना द्वारा सभी गयों को प्राप्ति कर ली गई है और सफल हो चुके हैं फिर परम पुण्य लोगों को हि वरके यथेष्ट विचरण करेंगे ॥४१॥ ये सब नैमिषारण्य वामी मुनिगण पजन पौर मृजन करके उस समय मे अवभृय स्नान करने वाले मब सत्री स्वर्ग नारका चने गप थे।॥४२॥ विप्रास्तथा यूयमपि चेष्टा बहुविधंखे । प्रायुपोऽन्ते ततः स्वर्ग गन्ताराऽथ द्विजोत्तमा ॥४३ प्रक्रिया प्रथमे पादे कथावस्तुपरिग्रह । अनुपङ्ग उपोद्धात उपसहार एव च ॥४४ पवमेतच्चतुष्पाद पुराण लोकमम्मतम् । उवाच भगवान् साक्षाद्वायुलोकहिते रत ॥४५ नमिपे सत्रमासाय मुनिभ्यो मुनिसत्तमा । तत्प्रसादादसदिग्ध भूनोत्पत्तिलयानि च ॥४६ प्राधानिकोमिमा मृष्टिं तयवेश्वरकारिताम् । सम्यविदित्वा मेघावो न मोहमधिगच्छति ॥४७ इद यो ब्राह्मणो विद्वानितिहास पुरातनम् । शृणुयान्द्रावयेदापि तथाध्यापयतापि च ४८ स्थानेषु स महेन्द्रस्य मोदते शाश्वती समा। ब्रह्मसायुज्यगो भूत्या ग्रहाणा सह मोध्यते ITE हे विप्रोतमो । है विनगण ! इसी प्रकार में भी भाप मोग भी बहुत प्रभार मयो रा परन परके भार के पन्तु में स्वर्गलोर में पले मापोगे ॥४३|| पुराण में प्रपम पार में बया घातु का परिग्रह होता है पार फिर मापद-उपोत तथा उपहार होता है |MR प्रकार में यह पार पायो बामा पुराण मोर गम्मत होता है । लोर-हित में रत रहने
[ वायु पुराण
वाने भगवान वासुदेव ने साक्षात् यह कहा है ॥४५।। नैमिष क्षेत्र में मुनिगण
से किये हुए सत्र को प्राप्त करके हे मुनि श्रेयो। वहाँ उनके प्रसाद से सन्देह
रहित हो जाता है और भूतो की उत्पत्ति तथा लय यह प्राधानिको अर्थात्
प्रधान से होन वानी सृष्टि तथा ईश्वर के द्वारा कराई हुई सृष्टि का भली भांति
ज्ञान प्राप्त करके मेधावी पुरुष फिर भी पोह को प्राप्त नहीं होता है ॥४६
४७॥ कोई विद्वान् ब्राह्मण इस पुरातन इतिहास का श्रवण करता है अथवा
किसी को प्रवण कराता है या इसे को पढा देता है वह फिर महेन्द्र के स्थानी
में भनेक वर्षों तक मोद प्राप्त किया करता है तथा ब्रह्म सायुज्य को प्राप्त करने
वाला होर ब्रह्मा के साथ मोक्ष को प्राप्त हो जायगा ।।४८-४६।।
तेपा कौत्तिमता कीत्ति प्रजेशाना महात्मनाम् ।
प्रययन्पृथिवीशाना ब्रह्मभूयाय गच्छति ॥५०
घन्य यशस्यमायुष्य पुण्य
वेदैश्च
सम्मतम् ।
कृष्णद्वैपायनेनोक्त पुराण ब्रह्मवादिना ।।११
मन्वन्तरेश्वराणा च य कीति प्रथयेदिमाम् ।
देवतानामृपीणाञ्च भूरिद्रविणतेजसाम् ।
स समुच्यते पाप पुण्यश्च महदाप्नुयात् ॥५२
यश्चेद भावयेद्विद्वान्सदा पर्वणि पर्वणि ।
धूतपाप्मा जितस्वर्गो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥५३
यश्चेद श्रावयेच्छ्राद्ध ब्राह्मणान्पादमन्तत ।
अक्षय सार्वकामीय पितृ स्तच्चोपतिष्ठति ।।५४
यस्मात्पुरा ह्यमन्तीद पुराण तेन चोच्यते ।
निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापं प्रमुच्यते ॥५५
तर्थव त्रिषु वर्णेषु ये मनुष्या प्रधानत ।
इतिहासमिम श्रुत्वा धर्माय विदधे मतिम् ॥५६
यावन्त्यस्य शरीरेषु रोमकूपाणि सर्वश ।
सावत्कोटि सहस्राणि वीणा दिवि मोदते
ब्रह्मसायुज्यगो भूत्वा देवतै सह मोदते ।।५७
सृष्टि वगंन ] [ ४७७ उन वीति वाले महात्मा प्रजानो के ईच और पृथिवी के स्वामियो को कोत्ति का विस्तार करते हुए वह ब्रह्म भूय अर्थात् ब्रह्म के हो स्वरूप प्राप्त करने के लिये हो जाया करता है ॥५०॥ ब्रह्मवादी श्रीकृष्ण द्वैपायन के द्वारा मथित यह पुराण परम सत्य है नया प्रति पुरायमय है । यह आयु के प्रदान करने पाला-या बढाने वाला और वेदो के द्वारा सम्मत है ॥५१॥ मन्वन्तरो के ईश- अधिक द्रविण तथा तेज वाले देवता और पि वर्ग कौत्ति को जो प्रथित किया करता है वह सब प्रकार के पापो से मुक्त हो जाता है एव महान् पुण्य को प्राप्त विधा करता है ॥५२॥ जो विद्वान् इसको पर्व-पर्व पर इसका यावरण कराता है वह पापो को नष्ट करने वाला और स्वर्ग से भी जीत लेने वाला सह्य के महश ही होजाता है ॥५३॥ और जो इसको श्राद्ध मे अन्त का पाद ही ब्राह्मण को श्रवण कराता है वह अभय समस्त कामनामो से पूर्ण पितरो को करके स्वय भी वहां पर स्थित हा करता है ॥५४॥ जिसके द्वारा यह पुराण हिंने कहा जाता है और जो इसके निरक्त को आनता है वह सम्पूर्ण पापो से प्रभुक्त होजाता है ।।५।। इसी प्रकार से तीनो वर्गों में प्रधानतया जो मनुष्य इस पुनीत पुराण का श्रवण करके धर्म के लिये अपनी मनि करता है उसके शरीर में जितने रोगो के छिद होने है उतने ही सहम कोटि र्प पर्यन्त यह दिवलोक में रहकर भोद प्राह किया करता है 11५७॥ सर्वपापाहर पुण्य पवित्रच यशस्वि च। ब्रह्मा ददो शास्त्रमिद पुराण मातरिश्वने ॥५८ तस्माञ्चोशनसा प्राप्त तस्माचापि वृहस्पति । बृहस्पतिस्तु प्रोवाच सवित्रे तदनन्तरम् ॥५६ सविता मृत्यवे प्राह मृत्युश्चन्द्राय वं पुन । इन्द्रश्चापि वसिष्ठाय सोऽपि सारस्वताय च ॥६० सारस्वतस्त्रिधाम्ने च विधामा च भरद्वते । शरदतस्त्रिविष्टाय सोऽन्तरिक्षाय दत्तवान् ।।६१ वपिणे चान्तरिक्षो में सोऽपि प्यारणाय च । अग्याएको धनञ्जये सच प्रदात्कृतञ्जये १२ -- --- [ वायु पुराण कृतञ्जयात्तृञ्जयो भरद्वाजाय सोऽप्यथ । गौतमाय भरद्वाज सोऽपि निर्गन्तरे पुन ॥६३ नियंन्तरस्तु प्रोवाच तथा वाचवाय च । स ददौ सोमशुष्माय स ददौ तृणविन्दवे ।।६४ समस्त पापो का हरण करने वाला-परम पुण्यमय-पविन भोर या से परिपूर्ण शास्त्र ब्रह्माजी ने वायुदेव के लिये प्रदान किया था ॥५८।। उस वायु देव से इसे उशना कवि ने प्राप्त किया था मोर भार्गव शुत्र से इसकी प्राप्ति बृहस्पति ने की थी। फिर वृहस्पति ने सविना देव को इसको बताया था और इमके मनन्तर सविता ने मृत्यु देव को कहा था। मृत्युदेव न चन्द्रदेव को बताया पा। इन्द्रदेव न यसि मुनि को कहा था तथा वसिष्ठ ने सारस्वत को बताया था १५६-६०॥ सारस्वत ने विधामा को इसे बनाया था और फिर विधामा ने धारद्वान् को इसको सुनाया था। दारद्वान ने त्रिविष्ट को और त्रिविष्ट ने इसका शान अन्तरिक्ष को दिया था। अन्तरिक्ष ने वर्षों को इस पुराण का ज्ञान प्रदान किया था और वर्षी ने अय्यारुण को बताया था पय्यारण ने धनम्ञप को और धनन्जय ने पृतञ्जय को इमा मान दिया था ॥६१-६२॥ कृतजय से तृण. जय ने प्रास किया था तथा तृणजय से भरद्वाज मुनि ने इसे पाया था। भरद्वाज ने गौतम को प्रदान किया और निरंतर दो प्रदान किया था। नियंन्तर ने इसका शा वाजधव को प्रदान किया था। उसने फिर इसे मोमशुष्म यो दिया था। सोमशुष्म ने घृणविन्दु को प्रदान किया था ॥६३-६४।। तृणविन्दुस्तु दक्षाय दक्ष प्रोवाच शक्तये । आपते पगारश्चापि गर्भस्थः श्रुतवादिनम् ॥६५ पराशराजानुवर्णस्तस्माद्द्व पायन प्रभु । द्वैपायनात्युनश्चापि मया प्राम द्विजोत्तमा ॥६६ मया के तत्सुन प्रोक्त पुत्रायामितबुद्धये । इत्येव वाचा ब्रह्मादिगुम्पा समुदारहता ॥६७ नमस्वायश्चि गुरव प्रयत्नेन मनीपिमि । धन्य यरास्यमायुष्य पुण्य रायिंगाधरम् ॥३८ मृष्टि वर्णन ] पापघ्न नियमेनेद श्रोतव्य ब्राह्मण सदा। नाशुचौ नापि पापाय नाप्यमवत्सरोपिते ॥६६ नाथद्दधानाविदुषे नापुत्राय कथञ्चन । नाहिताय प्रदातव्य पवित्रमिदमुत्तमम् ।।७० अव्यक्त वै यस्य योनि वन्ति व्यक्त दह कालमनागतञ्च । ह्नि वन चन्द्र सूयौ च नेने दिश थारे प्राणमाहुश्च वायुम् ।।७१ वाचो वेदाश्चान्तरिक्ष शरीर क्षिति पादौ तारका रोमकूपान् । सर्वाणि चाङ्गानि तथैव तानि विद्यास्सर्वा यस्य पुच्छ वदन्ति ७२ त देवदेव जनन जनाना सर्वेषु लोकेपु प्रतिष्ठितञ्च । वर वरारणा वरद महेश्वर ब्रह्माणमादि प्रयतो नमस्ये ।।७३ तृणविन्दु ने इसको दक्ष को श्रवण कराया था। दक्ष ने शक्ति को दिया था तथा शक्ति से गर्भ में ही स्थित परागर ने इसका श्रवण किया था।॥६॥ पराशर मे जानुकरण ने तथा जानुकण से हूँ पायन ने इसका जन प्राप्त किया था और हे द्विजोत्तमो । द्वैपायन महर्षि से मुझे इसके ज्ञान प्राप्त करने का सौभाग्य मिला था ६६॥ वाशपायन न कहा-मैंने फिर इस पुराण रल का ज्ञान प्रमित बुद्धि पुत्र को प्रदान किया था । इसी प्रकार से यह ब्रह्मादि गुरु वर्ग के द्वारा वाणी से यह पुराण कहा गया है । मनीपिया को समस्त गुरु वर्ग को सव प्रथम प्रणाम करना चाहिए यह पुराण परम धन्य है- यश तथा आयु के प्रदान करने वाला परम पुण्यमय और सम्पूण प्रर्यों का साधन है ॥६७- ६८॥ यह पुराण पापो के नाश करने वाला है। ब्राह्मणों को इसका श्रवण नियम पूर्वक सवदा करना चाहिए। यह परम पवित्र व अन्युत्तम पुराण है । इसका श्रवण प्रशुचि-पापी और ऐमा जो एक वर्ष से कम पाम म रहा हो कभी भी उसका श्रवण नहीं कराना चाहिए। जो श्रद्धालु न हो-विद्वान् न हो तथा पुत्र रहित हो एव अहित हो उसे किसी भी प्रकार से इसका श्रवण नहीं करावे ॥१७॥ जिसकी योनि अव्यक्त है तथा देह को व्यक्त और काल को ९ अन्तर्गत कहते हैं । वह्नि को मुख-चन्द्र और सूर्य को नेत्र-दिशानों को श्रात तथा वायु को प्राण कहा गया है । वेदो को जिसको वाणी तथा मन्तरित को
४.]
[ वायु पुराण
पारीर-क्षति को चरण एवं तारकों को रोमकूप बताया गया है। उसके अग्प
भी सम्पूर्ण मङ्ग भी उसी प्रकार के जानन चाहिए और सभी हिसक पुच्छ कहे
जाते हैं उस देव को प्रोजनो का जन्म स्थान है और सब लोगों में प्रतिक्षित
है। वरो मे भी वरदान देने वाले ग्रादि ब्रह्मा महेश्वर को प्रसन्न होकर नमस्कार
करता हूँ |७१-७२ ७३३
प्रकरण ६६ ट्याम संशय वर्णन
सूत सूत महाभाग त्वया भगवता सता ।
व्यासप्रसादाधिगतशास्त्रसम्बोधनेन च ।।१
अष्टादशपुराणानि सेतिहासानि चानघ ।
उपक्रमोपसहार विधिनोक्तानि कृत्स्नश र
पुराणप्वेषु बहवो धर्मास्ते विनिरूपिता ।
रागिणाध विरागाणा यतीना ब्रह्मचारिणाम् ।
गृहस्थाना वनस्याना स्त्रीशूद्राणा विशेषत ॥३
याहारणक्षत्रियविदा ये च सद्दरजातय !
गङ्गाद्या या महानद्यो यजक्ततपासि च ॥४
अनेकविधदानानि यमाश्व नियम सह ।
योगधर्मा बहुविधा सास्या भागवतास्तथा ।।५
भक्तिमार्गा ज्ञानमार्गा वैराग्यानिलनीरजा ।
उपासन विधिश्चोक्त कमंसशुद्धिचेतसाम् ॥६
ब्राह्म शेव वैष्णव च सौर शाक्त तथाहतम् ।
पड़ दर्शनानि चोक्तानि स्वभावनियतानि च ॥७
शौनक प्रादि ऋपियो ने कहा-हे सूतजी । प्राय तो महान भाग वा
है मापने भगवान् व्यास देव से भली भांति ज्ञान पूर्वक परम उनकी कृपा
प्रसाद से इस गान का अध्ययन किया है हे निष्पाप । मापने मष्टादश पुराए
ग्याम मशय वर्णन ] [४८१ तथा इतिहास सम्पूर्ण उपक्रम एवं उपमहार पूर्वक वर्णन किये हैं ॥१-२॥ इप पुराणो मे आपने बहुत-से धर्मों का निरूपण किया है उनमे रागियो के विरागो के यतियो के-ब्रह्मचारियो के-गृहस्थो के-वानप्रस्थो क और विशेष रूप से रियो फे तथा शूद्रो के धर्मों का पापने निरूपण किया है ॥३।। जो बाहाण- क्षत्रिय मोर वैश्य द्विजातियाँ मर जो सङ्कर जातियां है-गङ्गा आदि महा नदियाँ और यज्ञ, बल तप प्रभृति हैं । अनेक प्रकार के दान-यम और नियम तथा बहुन तरह के योग धर्म-सौख्य धर्म एव भागवत धर्म हैं। भक्ति मार्ग और शान मार्ग जोकि वैराग्य अनिल नीर में उत्पन्न होने वाले हैं । इन सबका मापने वर्णन किया है तथा कर्मों की मशुद्धि से समन्वित चित्त वालो की उपासना की विपि का मापके द्वारा वर्णन किया गया है ॥३.४.५-६।। आपने ब्राह्म-शव- वैष्णव-शात्त-सौर तथा अर्हत इन स्वभाव से नियत छ दर्शनो को वहा है ।।७।। एतदन्यच्च विविध पुराणेषु निरूपितम् । अत पर क्मिप्यस्ति न वा बोद्धव्यमुत्तमम् ।। न ज्ञायेत यदि व्यासो गोपायेदथ वा भवान् । अत्र न सशय छिन्धि पूर्ण पौराणिको यत शृणु शौनक वक्ष्यामि प्रश्नमेन सुदुर्लभम् । अतिगोप्यतर दिव्यमनाख्येय प्रचक्षते ॥१० पराशरसुतो व्यास कृत्वा पौराणिकी कथाम् । सर्ववेदार्थ घटिता चिन्तयामास चेतसि ।।११ वर्णाश्रमवता धर्मो मया सम्यगुदात्त । भुक्तिमार्गा बहुविधा उक्ता वेदाविरोभतः ।।१२ जीवेश्वरब्रह्मभेदो निरस्त. सूत्रनिर्णये। निरूपित पर ब्रह्म श्रुतियुक्तविचारतः ॥१३ प्रक्षर परम ब्रह्म परमात्मा पर पदम् । यदर्थं ब्रह्मचर्यादिवानप्रस्थयतिव्रतम् ॥१४ यह सब तथा अन्य अनेक प्रकार के विपयो का पुराणो में आपने निम्- पछ भी -वे ये
४८२]
[ वायु पुराण
रहता है l यह नही जाना जाता है कि पास महपि अयवा मापने इमम
गेन दिया है। यहा पर माप हगर गगय का छेदन कीजिए क्योकि पूर्ण
पौराणिक हैश्री मूजी ने यहा-हे गौना ! पाप ध्यान पूर्वक श्रवण
परो में हम मुदुर्लभ प्रश्न या उत्तर देता है। भनि गोप्य तम वस्तु माम्येय नहीं
होती है ॥१०॥ पगार मुनि य पुत्र महपि शाम देव ने समस्त वो के अर्थ म
घटित पौरागिरी रथारा सम्पादन करक फिर चित्त मचिन्तन दिया या
॥११॥ मैंने वो तया प्राथमी के पालन करने वाले लोगो के धर्म को भली
भाति क्थन किया है और वेद के भविरोष रखते हुए बहुन प्रकार के मुक्ति के
मागों का भी निरूपण कर दिया है ॥१२॥ मूत्र के निर्णय म जीव ईश्वर भोर
ब्रह्म का भेद निरस्त किया है और श्रुति मे युक्त विचार द्वारा पर ब्रह्म का
निरूपण किया है ||१३॥ परम ब्रह्म पक्षर है और परमात्मा ही परम पद होता
है जिससे प्राप्त करने के लिये ही ब्रह्म वर्य मे मादिलेर वानप्रस्थ एव यति के
धन कहते हैं ।।१४॥
प्राचरन्ति महाप्राज्ञा धारणाञ्च पृथग्विधाम् ।
प्रासन प्राणरोधञ्च प्रत्याहारश्च धारणा ॥१५
ध्यान समाधिरेनानि यमंश्च नियम सह ।
भ्रष्टाङ्गानि यदर्थश्च चरन्ति मुनिपुङ्गवा ॥१६
यदर्थ कर्म कुर्वन्ति वेदाज्ञामात्रतत्तरा ।
परार्पणधिया सम्यग् निप्कामा कलिलोस्मिता ॥१७
यज्ज्ञप्तये निराकत्तु पापाचरणमात्मन ।
गङ्गादितीर्थचर्याणि निपेवन्ते शुचिव्रता ॥१८
तद्ब्रह्म परम शुद्धमनाद्यन्तमनामयम् ।
नित्य सर्वग स्थाणु कूटस्थ कूटवजितम् ।।१६
सर्वेन्द्रियचराभाय प्राकृतेन्द्रिय वर्जितम् ।
दिकाताद्यनवच्छिन नित्य चिन्मात्रमव्ययम् ॥२०
अध्यास्त सर्पवद्यत्र विश्वमेतत्प्रकाशते ।
विश्वस्मिनपि चान्वेति निर्विकारश्च रज्जुवत् ।।२१
व्याम मशय वगन 1 [४३ आदि महार भौति महान् पण्डित लोग धारणा को पृथत् प्रभार पा प्राचरण विया करते हैं । मुनियों में श्रेष्ठ लोग यम और नियमो के माय प्रामन-प्राणरोध-प्रत्याहार- पा रणा-ध्यान-समाधि-इन माठ अङ्गो को गिमके लिय किया वरते हैं ॥१५- १६॥ वेद को केवल माजा में ही परायण रहने वाले परापण की बुद्धि म कलिलोमिन और निष्काम होते हुए भली भांति जिसवे निये वर्म किया करते हैं ।। १७॥ जिसको ज्ञप्ति (ज्ञान) के लिय शुचि अन वाल कर अपनी प्रात्मा के पाप के मावरगो वा निराकरण करने के लिये गङ्गा तीथा का पाचरग और सेवन रिया करते हैं ॥१८॥ वह ब्रह्म परम शुद्ध प्रादि- अन्त से रहित-अनामय-नित्य-सब मे रहने वाला-स्थाणु-कूटस्थ-बूटवजित- सर्वेन्द्रिय चराभास-प्राकृत इन्द्रियो से वजित-दिशा और बाल अादि ने अन- वच्छिन्न-नित्य-चिन्मात्र अर्थात् ज्ञान स्वरूप-अव्यय और सर्पवत् अध्यास्त है जिसमे यह विश्व प्रकाशित होता है और इस विश्व म भी निर्विकार रज्जु की अनुगमन किया करता है॥१६-२०.२१॥ सम्यग्विचारित यद्वत्फेनोमिबुवुदोदकम् । तथा विचारित ब्रह्म विश्वस्मान पृथग्भवेत् ।।२२ सर्व ब्रह्म व नानात्व नास्तीति निगमा जगु । यस्माद्भवन्ति ब्रह्माण्डकोटयो न भवन्ति च ।।२३ यदुन्मेपनिमेपाभ्या जगता प्रल्योदयौ। भवेता या परा शक्तिर्यदाधारतया स्थिता ।।२४ यस्मिन्निद यतश्चद येनेद यदिद स्मृतम् । यदज्ञानाजगद्भाति यस्मिन् ज्ञाते जगन्न हि २५ असत्य यज्जड दुखमवस्त्विति निरूपितम् । विपरीतमतो यद्व सच्चिदानन्दमूर्तिकम् ॥२६ जीवे जाग्रति विश्वास्य स्वप्ने यत्तैजस स्मृतम् । सुपुको प्राज्ञसज्ञ तत्सर्वावस्थासु सस्मृतम् ॥२७ यच्चधुपा चक्षुरथ थोत्रागा धाममस्ति च । स्वप त्वचा रसन तस्य प्राण प्रारणस्य यद्विदु ।।२८ १८४ } [ वायु पुराण भली भानि विचार रियामा यर पेन की तरफ पारे उदा के बुर. बुदे की भांति होता है। उसी तरह से बिमारित ब्रह्म इन विश्व में पृषक नहीं होता है ।।२२।। यह गम्पूर्ण प्रा ही है, नानात्व नहीं है.ऐमा निगमो ने गान लिया है पर्थात् वेदी ने बताया है। जिगसे परोडों प्रयागड हा करते हैं और नहीं भी होते हैं ॥२३॥ जिगरे उन्मेष तथा निमेपो में प्रर्थान् नेत्र के पलको में मोरने सपा भूदने में ही इन समस्त जगतोउदय तथा प्रलय हुमा करते हैं। को रि परम प्राधारमी गति है जिग प्राधार को ग्रहण कसे यह स्थिन है ।।२। यह जिममें है-जिसमें यह है-जिगर द्वारा यह है और जो यह कहा गया है। जिगरे अजान मे यह जगह प्रतीत होता है अर्थात् दिखलाई देता है भोर निराशात होनाने पर पनि जिमका पूर्णतया ज्ञान प्राप्त पर सेने पर यह जगन् युध भी नही है ॥२५॥ जो अमरय है यही जड एव दुख म्वरूप होना है-ऐसा निम्पण किया गया है।सरे विपरीत जो है वह सत्-चित् पौर मानन्द ये स्वरूप वाला होता है ॥२६॥ जीन के जाग्रत् होने पर वह विश्व नाम वाला है और स्वप्न में जो संजम बताया गया है। मुक्ति की दवा मे प्राश मना वाला होता है वह सभी अवस्थामी में सस्मृत पिया गया है ॥२७॥ जो चाभों का घशु है-श्रोत्री का पात्र है-रवनामो का स्वक् रमना का रस और प्राण या भी प्राण पहा गया है ॥२८॥ बुद्धिर्ज्ञानेन च प्राणः क्यिाशक्त्या निरन्तरम् । यन्नेशिरे समभ्येतु ज्ञातु च परमार्थत ॥२६ रज्जावहिर्मरौ वारि नीलिमा गगने यथा । असद्विश्वमिद भाति यस्मिन्नज्ञानकल्पितम् ॥३० घटावच्छिन्न एवाय महाकाशो विभिद्यते । कार्योपाधिपरिच्छिन्न तद्वद्यज्जीवसनिकम् ॥३१ मायया चित्रकारिण्या विचित्रगुणशीलया। ब्रह्माण्ड चित्रमतुल यस्मिन् भिताविवापितम् ॥३२ घावतोऽन्यानतिक्रान्त वदतो वागगोचरम् । वेदवेदान्तसिद्धान्तविनिर्णीत तदक्षरम् ।।३३ [ वायु पुराण गोलोरवासी भगवानक्षरात्पर उच्यते । तस्मादपि पर कोऽसौ मीयते थ तिमि सदा ॥३८ उद्दिष्टी वेद वचनैविगेपो ज्ञायते क्यम् । थु तेर्योन्मया बोध्य. परतस्त्वक्षरादिति ॥३६ श्रत्यर्थे सरायापनो व्यास. सत्यवतीसुत । विधारयामाम चिर न प्रपेदे यथातथम् ।।४० विचारयन्नपि मुनि पि वेदार्थनिश्चयम् । वेदो नारायण: साक्षाद्यम मुद्यन्ति सूरय ॥४१ तथापि महतीमात्ति मता त्दृदयतापिनीम् । पुनर्विचारयामास व प्रजामि करोमि किम् ।।४२ पश्यामि न जगत्यस्मिन्सर्वज्ञ सर्वदर्शनम् । अज्ञात्वाऽन्यतम लोके सन्देह विनिवत्तकम् ।।४४ इस प्रकार से चिन्मात्र ( वेवल ज्ञान स्वरुप ) गुणो से रहित तथा भेद से वजित ब्रह्म में जो कि गोलोव की सजा वाले मे कृपा द्वीप्यमान होना है- ऐसा मैंने श्रवण किया है ॥३६।। इससे परे कुछ भी निगम और पागमो मे भी मही है । तोभी निगम परात्पर अक्षर से भी पर गोलोक मे नित्य निवास करने वाले भगवान हैं-ऐमा कहा जाता है । श्रुतियो के द्वारा सदा उससे भी परे यह कौन है-यह सदा गाया जाता है ॥३७॥ वेद के वचनो के द्वारा जो उद्देश्य है वह विशेष कैसे जाना जाता है अथवा "परतोऽक्षरात्" इस प्रश का श्रति का अर्थ अन्य प्रकार से जानना चाहिये । इस प्रकार से सत्यवती के मात्मज व्यामदेव ने इस श्रृति के अर्थ में सशय को प्राप्त होकर अधिक समय तक विचार किया था किन्तु नोभी यथार्थ अर्थ को प्राप्त नहीं होसके थे ।।३५-३६- ४०॥ श्री सूतजी ने कहा-इस तरह बहुत समय तक विचार करते हुए भी व्याम मुनि वेद के अर्थ का निश्चय नही कर सके थे । वेद तो साक्षात् नारायण भगवान् का स्वरूप है जहाँ पर बडे २ महामनीषी भी मोह को प्राप्त होजाया करते हैं ॥४१॥ सरपुरुषो के हृदय को ताप पहुंचाने वाली बड़ी भारी प्राति (पीडा ) को वे प्राप्त होकर फिर विचार करने लगे थे कि अब इस हृदय के - व्यास साय वर्णन ] [ ४७ सशय को निवारण करने के लिये मैं सिये समीप में जाऊँ मोर क्या उपाय करूं ॥४२॥ इस जगत् में मैं ऐमा सर्वज्ञ और सब कुछ को देखने वाला किसी को भी नहीं देखता हूँ । इस तरह अन्य किसी को भी लोक मे इस अपने सदेह को निवृत्त कर देने वाला न देखकर उन्होने तपस्या करने का ही निर्णय विया था ॥४३॥ मेरो कुहरिणी गत्वा चचार परम तप । यत्र कार्तस्वरस्फूर्जज्योत्नाम्लनिरन्तरजा 11४४ सदा प्रवाधते दिष्वक्तम स्तोम दृशन्तुदम् । चकास्ते यत्र परम वान्तारमतिमुन्दरम् ।।४५ नानाद्र मलताकुञ्जकूजत्पक्षिनिनादितम् । शुत्पिपासाभयकोयतापालानिविवजितम् ॥४६ जलाशयंबहुविध पद्मिनीमण्डमण्डितं । जातरूपशिलानद्धतटसञ्चारपक्षिभि ।।४७ युक्तमम्भोज पवन सेव्यमान समन्तत । शिवरध्यासितम्भावहिलं मत्त्ये समुज्झितम् ।।४८ निर्जन दिव्यलतिकाप्रियखण्डविराजितम् । शुकै पारावत र रुन्मदमत्तकोक्लिम् ।।४६ उत्पतत्पद्यरजसा पाटलामोददिड मुसम् । तत्रापि काञ्चनी दिव्या गुह्या परमशोमना ॥५. फिर व्याम मुनि ने मेरु पर्वत की गुफा म जाकर परम उप्र तप किया म जहाँ पर सुवर्ण को स्फुरित ज्योरग्ना के ममूह से निरन्तर पूर्ण प्रकार रहा रता है ॥४४॥ भोर सदा ही नेत्रो को पीडा देन वाला पारा मोर फैला हुमा अन्धकार पा समुदाय प्रयाधित होता है। जहाँ पर वन अत्यन्त मुन्दर स्वरूप प्राशित होता रहता है ॥४५॥ उम वन मे अनक प्रकार के वृक्ष तथा लताएं सुशोभित हैं और उन पर पक्षियो का कलरव हुपा करता है जो बहुत ही श्रुति प्रिय है । वह वन भूग-प्यारा-भय-क्रोध-ताप और ग्लानि से रहित हैं ॥४६॥ वहाँ बहन से अनेक प्रकार के मुन्दरतम जलाशय हैं जिनमे समलिनी ४८८] वायु पुराण क समूहा की सुपमा छाई हुई है और सुवण की शिलाना स उनके तटा का निर्माण हो रहा है तथा वहा अनेक पक्षियो का सञ्चार बराबर होता रहा करता है ।।४७॥ वह वन पक्षियों की मिश्रित वायु से सव्यमान है तथा कल्याण प्रद भावो में युक्त और हिंसक जीवो से रहित है ॥४८॥ वहाँ एकदम निजन स्थान है और वह परम दिव्य लताओ के द्वारा अत्यन्त शोभायमान है जहा शुक और पारावत अत्यन्त सुदर हैं और मत्त कोक्लिो की मधुर ध्वनि श्रवण गोचर हुआ करती है ।।४।। सभी दिशाओ में पयो की पराग उडकर फैली हुई पाटलवण एव मुगध दिखाई देती है और प्राण को परम प्रामोद प्राप्त होता है । उसम भी सुवरण की एक मत्यन्त दिव्य और अधिक शोभा से युक्त गुफा है ॥५०॥ ता प्रविश्य जिताहारो जित चित्तो जितासन मस्मार वदाश्चतुरस्तदेकाग्रमना मुनि ॥५१ त्रयी जगाम शरदा शतस्य स्मरतोऽस्य हि। प्रादुरासस्ततो वेदाश्चत्वारश्चारुदर्शना ॥५२ स्फुरत्पद्मलागाक्षा जटामुकुटधारिण । कुशमुष्टिकराम्भोजा मृगत्वड मण्डितासका ॥५३ स्वर पोडशभि क्लुप्त वदना प्रणवान्तरा। क्चवर्गोवर्वर्ण पञ्चावयवपाणयः ॥५४ पवर्गदक्षजरणा वामपादास्तवगंत । तेपामन्तस्थवर्णाभो येपा कुक्षिद्वयात्मको ॥५४ नाभिनिद्रा वान्ता मोदरा यरलवो वचा । अग्निदक्षाशरचिरा धराग्रीवा भृतासका ॥५६ अन्तस्थसन्धिसस्थाना सरीवाग्विजम्भिता । भपश्यन्मयुरामेपा हृदयाम्माजकल्पिताम् ॥५७ हरेभंगवत माक्षादाविर्भावस्थली हि सा। वाशीमपश्यद् भ्रू मध्ये मालामाधारसस्यिताम् ॥५८ ध्यास साय वर्णन [ ४९ उस गिरि गुफा मे व्यास मुनि ने प्रवेश दिया था मौर माहार-चित्त तथा मामन मो जीत कर वहाँ पर मुनि ने मत्पन्त एवान मन करके चारों पदों के प्रथा भली भांति स्मरण क्यिा या ॥५३॥ इस प्रकार से स्मरण करते हुए मुनि को सीन सौ वर्ष व्यतीत हो गये थे इमक अनन्तर वहा पारो घेदो का प्रादुर्भाव हुमा था जिसका दर्शन परम सुन्दर था ।।५।। ये चारो मूतिमान वेद कमल के समान मुन्दर नत्रो से युक्त थे तथा मस्तक पर बटा एव मुकुट धारण करने वाले थे। उनके हम्त कमलों में पुगापो का पुञ्ज था मोर गधे पर मृगछाला पड़ी हुई थी॥५३॥ पोडश स्वरो से उनके मुख कप्त थे जिनके मध्य में प्रणय था। ववगं और चवर्ग से उत्पन्न होने वाले वों के द्वारा उनके पांचो भवयव और हाप ये ॥५४॥ घ वर्ग से उनका दाहिना परण पा और तयगं से वाम पाद की रचना थी। उनकी दोनो क्षियो पन्त स्थ ( य र ल व ) पों स युक्त थीं ॥५५।। नाभि निद्रा पाने-कान्त (मुन्दर । पृष्ठ (पीठ) पाले-मोदर तथा पर सव च (1) वाले थे। पग्नि दशांश स परयन रवि-परा की ग्रीवा (गरदन ) वाले मौर बन्यो वाले पे ।।१६।। पन्नस्यों से मन्धिया के संस्थान म समन्विन पे तथा वैगरी वाणी से विजम्मित हाने पार । इनके हृदय मम स बल्पित मपुरा को ध्यास मुनि ने देगा था ॥५७॥ वह मथुरा भगवान् हरि की गाथात् प्रविर्भाव होने की स्यसी पी। भृटिया र मध्यम पापार म सरिया माया स्वरूपिणी को सथा नानीपुरी दिमाया ॥५॥ लिङ्गदेगे तत पाथीमवन्तो नाभिमण्डने । घण्टस्था द्वारवामपा प्रयाग प्रारपग तया ॥५९ सम्यापसध्ययोस्तेषा गङ्गाऽपि यमुना नदी। मध्ये सरस्वती माता गयाक्षेत्र तयानने ॥६० हनुग्रीवर्वामध्यगत प्रभासक्षेत्रमुत्तमम् । बदधिममेतेषां ब्रह्मरम्म ददगंह ॥६१ पौण्डयननेपालपीठ नयनयोयुंगे। पोठ पूर्णगिरिनाम सनाटे ममहस्पन ॥६२ ४६० ] [ वाय पुराण कण्ठे च मथुरापीठ काञ्चीपीठ काटिस्थितम् जालन्धर तथा पीठ स्तनदेशेष्वदृश्यत ॥६३ भृगुपीठ कर्णदेशे ह्ययोध्या नासिकापुटे । ब्रह्मरन्ध्र स्थित ब्राह्म शव सीमन्तसोमनि ॥६४ लिङ्ग देश मे काञ्चीपुरी को पौर नाभि मण्डल में प्रवन्तीपुरी को देखा था। एठ देश मे सस्थित द्वारका को तथा प्राणो में गमन करने वाले प्रयाग का दर्शन किया था ॥५६॥ उन वेदो मे पाई और दाहिनी भोर म गङ्गा तथा यमुना नदी को देखा था। उनके मध्य मे सरस्वती नदी थी मोर मुम्ब के देश मे साक्षात् गया क्षेत्र था ॥६॥ ठोडी और ग्रोवा ( गरदन ) के मध्य में रहने वाला उत्तम प्रभाम क्षेत्र या । इनके ब्रह्मरन्ध्र मे वदर्याश्रम था जिसका स्पष्ट तप व्यास मुनि ने दर्शन किया था ।।६१॥ दोनो देसो मे पोएड वर्धन नेपाल पीठ था और ललाट मे पूर्ण गिरिनाम वाला पीठ देखा था ॥२॥ कण्ठ मे मथुरा पीठ तथा कटि प्रदेश मे काञ्ची पीठ था । तथा जाल घर पीठ स्तन देश मे दिखाई दिया था ॥६३॥ कर्ण देश मे भृगुपीठ मोर नामिका देश मे अयोध्या पीठ था । ब्रह्मरन्ध्र में ब्राह्म पीठ था और सीमान्त की सीमा मे शव पीठ था ॥६॥ शाक्त जिह्वान धिपण प्रणव हृदयाम्बुजे । सौर चक्षु प्रदेशस्थ वौद्धञ्छायासु सङ्गतम् ॥६५ सौत्रामणि कण्ठदेशे पशुबन्धमथोरसि । वाजपेय कटितटे ह्यग्निहोत्र तयानने ॥६६ अश्वमेध कटितटे नरमेधमथोदरे । राजसूय शिरोदेशे आवसथ्य तथाऽधरे ॥६७।। ऊवो दक्षिणाग्निञ्च गार्हपत्य मुखान्तरे । हव्य थु तो मन्त्रभेदास्तथा रोमस्ववस्थितान् । भृत्यैरिव महाराज पुराणायमिश्रितं ॥६८ सहिताभिश्च तन्त्रंश्च पृथक्पृथगुपासितान् । वर्म ज्ञानोपासनाभिर्जनानुग्रहकारकान् ॥६६
घास संशय वर्णन ]
[ ४६१
दृष्ट्वा सुविस्मितमना मुनि कृप्यो बभूव तान् ।
ब्रह्मतेजोमयान्दिव्यास्तपतोऽर्कानिव च्युतान् ।
ज्वलतोऽग्नीनिवोदन्किोटीन्दुसमदर्शनान् ।।७०
शाक्त पीठ जिह्वा के अग्र भाग में स्थित था तथा हृदय कमल में
वैष्णव पीठ था । सौर पीठ चा प्रदेश में स्थित था तथा बौद्ध छायाप्रो मे
सङ्गत था ॥६५॥ कण्ठ प्रदेश में सौत्रामणि उर मे पशुबन्ध-कटितट मे बाज
पेय तथा प्रानन मे अग्नि होत्र था ।।६३॥ कटितट मे प्रश्व मेध-उदर में नरमेध
शिरोदेश में राजमूष तथा प्रघर मे पावसथ्य था ।।६७॥ ऊपर के प्रोष्ट में
दक्षिणाग्नि-मुग्व के अन्दर में गार्हपत्य अग्नि-ध्रुति मे ( कान मे) हव्य तथा
रोमो मे अवस्थित मन्त्र भेदो को दसा था। न्याय मिथित पुराणो मे इस
भाँति सेवित थे जैसे भृत्यो के द्वारा कोई महाराज हो ॥६८॥ सहितानो के
पौर तन्त्रो के द्वारा पृथक् २ समुपासित एव फर्म, ज्ञान प्रो उपासनाओ के
द्वारा जनो पर अनुग्रह करने वाले उन वेदो को देख कर कृष्ण द्वैपायन मुनि
अत्यन्त विस्मित मन वाले हो गय थे । वे ब्रह्म तेज से परिपूण-परम दिव्य-मूर्य
के ममान तपे हुए - जलती हुई मनि के
एवं करोडो चन्द्रोक
समान दिखलाई देने वाने थे ।।७६-७०॥
ववन्दे सहसोत्याय दण्डवत्पतितो मुनि ।
कृतार्थोऽह कृतार्थोऽह कृतार्थोऽहमितीरयन् १७१
अद्य ने सफल जन्म अद्य मे सफल मन ।
अद्य मे सफलञ्चार्यद्भवन्तोऽक्षिगोचरा ।।७२
अलौकिक लौकिकञ्च यत् किञ्चिदपि विद्यते ।
न तद्वोऽविदित वेद्य भूत भव्य भवञ्च यत् ।।७३ ।
न प्रवृत्तिफला यूय दर्शयन्तोऽपि तान्सदा ।
यदृच्छाकरसङ्कोचविधानायेह रागिणाम् ॥७४
प्रपञ्चस्यापि मिथ्यात्वे ब्रह्मत्वे वा विधीतरौ।
न मृषारागविषयौ तत्सकोचविधिक्षयो 1१3५
तुल्य उद
४६२ ] [ वायु पुराण अतो लोकहितनून परमार्थ निरूपणे। स्वोक्ता स्वर्गादिविषया नश्वरा इति निन्दिता ॥७६ अधिकारिविभेदेन वर्मज्ञानोपदेशत । त्रात सर्व जगन्न न शब्दब्रह्मात्समूतिभि ॥७७ इम प्रकार के स्वरूप वाले उनका दर्शन प्राप्त कर व्यास मुनि सहसा उठ कर सडे हो गये और दएड की भाति पड कर उनकी बन्दना की थी तया व्यास मुनि अपने मुख से दण्डवत् प्रणाम करते हुए यह कहते जा रहे थे-मैं कृतार्थ होगया-मैं सफल होगया और पूर्ण मनोरथ वाला हो गया हूं ॥७१॥ माज मेरी सम्पूर्ण प्रायु सफल हो गई कि माप मेरी प्रांसो के समक्ष मे प्रत्यक्ष रूप से गोचर होगये हैं ॥७२॥ आपके लिए कुछ भी अविदित नहीं है। भूत- भव्य और वत्त मान सभी भापको वेद्य हैं ॥७३॥ उन सब को सर्वदा देखते हुए भी आप लोग प्रवृत्ति फल वाले नहीं हैं । क्यो कि इस मसार मे रागी पुरुष यहच्छा कर सङ्कोच से विधान करने वाले होते हैं ।।७४।। इस प्रपञ्च के मिथ्यात्व होने पर भी तथा ब्रह्मत्व मे विघि निषेध ठमके सङ्कोच विधि और क्षय मृपाराग के विषय नहीं हैं ॥७॥ मतएव लोकहितों के द्वारा परमार्थ के निरूपण में अपने से कहे हुए स्वर्गादि के विषय नारावान् हैं इस लिए निन्दित होते हैं ॥७६।। शब्द ब्रह्म की मूत्ति वाले मापने अधिकारी के भेद से कर्म और ज्ञान के उपदेश के द्वारा इम सम्पूर्ण जगत् की निश्चय ही रक्षा की है ।।७७॥ अतोऽह प्रष्टुमिच्छामि भवन्तश्च कृपालव । कर्मणा फलमादिष्ट सर्ग कामकचेतसाम् ॥७८ ईशापितधिया पुसा कृतस्यापि च कर्मण । चित्तशुद्धिस्ततो ज्ञान मोक्षश्च तदनन्तरम् I७६ मोक्षो ब्रह्म क्यमित्येव सच्चिदानन्दमेव यत् । सर्व समाप्यते तस्मिज्ञाते यदि कृताकृतम् ॥८० यन्नि मग चिदाकाश ज्ञानरूपमस वृतम् । निरीहमचल शुद्धमगुरण व्यापक स्मृतम् ।।८१ व्यास संशय वन ] [ ४६३ विकारेषु विनश्यत्सु निविकार न नश्यति । यथान्धतमसा व्याप्तलोकस्य रविरोजसा ।1८२ लोहस्येव मरिणस्तद्वदरणिश्वानले यथा । यदाभासेन सा सत्ता प्रतिपद्य विजृम्भते ।।८३ जीवेश्वरादिरूपेण विश्वाकारेण चाप्यहो। तस्यामपि प्रलीनाया कूटस्थञ्च यदेकलम् ।।८४ भवद्भिरेव निर्णीत तत्तथैव न सशय. । तथापि मम जिज्ञासा वर्तते केवल हदि १५ अतोऽपि परम किञ्चिद्वर्तते किल वा न वा । तवदन्तु महाभागा भवन्तस्तत्त्वदर्शना ॥६६ यदि माप मेरे ऊपर कृपालु हैं तो मैं प्रापसे अब यह ही पूछना चाहता कि कर्मा का फल मादिष्ट किया है और कामना से पूर्ण चित्त बालो का सगं बताया है । ईश्वर म समर्पित बुद्धि वाले मानवो रे किये हुए कर्म से भी चित्त की शुद्धि होती है फिर इसके अनन्तर ज्ञान होता है और इसके पश्चात् मोक्ष होता है ।।७८-७६॥ मोक्ष ब्रह्म वे साथ ऐक्य को ही कहा जाता है जोकि सत्-चित् और प्रानन्द स्वरूप है । जो भी कुछ कृत तथा प्रकृत है वह उसके ज्ञात करने पर सभी कुष समाप्त हो जाता है ।०। जो सङ्ग रहित-चिदा. काश-ज्ञानस्वरूप वाला-पसवृत-निरीह-प्रचल-शुद्ध-बिना गुण वाला और ध्यापक कहा गया है ।।१।। समस्त विकारो के विनष्ट होजाने पर भी वह विकार रहिन है अतएव नष्ट नहीं होता है । वह तो इस प्रकार है जैसे अन्ध- कार से व्याप्त लोक वे लिये प्रोज से रवि होता है ।।८२॥ लोहे को मणि की भांनि और मनल मे भरणि के ममान वह होता है । जिम प्राभाम से वह सत्ता को प्राप्त होकर विजृम्भित है ॥२॥ यह जीद और ईश्वर के स्वरूप में विश्व का साकार होता है । इसके भी प्रलीन होजाने पर एक कूटस्थ रहता है ||८५॥ यह सभी कुछ मापने निर्णय किया है और वह उसी प्रकार का ही है, मापने इस क्थन मे कुछ भी मशय नहीं है । तो भी मेरे हृदय मे केवल एक जिनामा होती है ।।८।। वह जिज्ञासा यही है कि इससे भी ४६४ ] [ वायु पुराण मागे कुछ है या नहीं है । है महान् भाग वालो ! आप यही कृपा कर मुझे बताइये क्योकि आप तो तत्त्वा के पूर्ण ज्ञाता हैं ॥८६॥ यच्छव फलमेवेह जनुपो मे कृतार्थता। एव अवन्तमनध व्यास सत्यवतीसुतम् । साधु साध्विति सङ्कीयं प्रत्यू निगमा वच ॥८७ साधु साधु महाप्राज्ञा विष्णुरात्मा शरीरिणाम् । अजोऽपि जन्म सम्पद्य लोकानुग्रहमीहसे ।।८८ अन्यथा ते न घटते ससारकर्मबन्धनम् । अस्पृष्टो मायया देव्या कदाणिज्ज्ञानगूया ॥८६ विपि स्वेच्छया रूप स्वेच्छयव निगृहसे । सम्मत्सम्मत एवार्थो भवता सम्प्रदर्शित ६० पुराणेवितिहासेषु सूत्रेप्वपि च नेकधा । अक्षर ब्रह्म परम सर्वकारणकारणम् ।।६१ तस्यात्मनोऽप्यात्म भावतया पुष्पस्य गन्धवत् । रसवद्वा स्थित रुपमवेहि परम हि तत् ।।९२ अनुभूत तदम्माभिजति प्राकृतिके लये। अक्षरात्परतस्तस्माद्यत्पर देवलो रस । न च तत्र वयशक्ता शब्दातीते तदात्मका: ut यहाँ इमाथवण परना ही मेरे जीवन यापन है मौर गये बरने में मेरे जन्म की सफलता होगी। इस प्रकार म बोलने वाले मपरहिन सत्यवती पुष प्यास महर्षि से साधु-मायु (अच्छा-मया)-यह कहार निगमो ( वेदो) ने वचन कहे थे ॥5॥ वेदा ने कहा- बहुन भन्दा है माप महान् प्राश है प्रौर दारीर धारियों के विष्णु प्रात्मा है । माप प्रजन्मा होकर भी जम धारण कर लोगों के मनुग्रह की इच्छा करते हैं । अन्यथा मापको इम सगार पाकर्म वचन परित नहीं होता है - ज्ञान में गृह माया देवी से प्रापष्ट माप अपनी ही इच्छा से स्वरूप को धारण करते हैं और स्वेन्या मे ही उगे निहित किया करते हैं। हमारे मम्मन को अयं है वही मापने भी प्रदान
प्रलयादि पुन सृष्टि वर्णन ]
[ ४६५
किया है ।1८६-60 पुराणो मे--इनिहासो में और सूत्रो में भी एक ही प्रकार
से नहीं बताया गया है । अक्षर परम ब्रह्म है और सब कारणो का भी कारण
है ॥६१॥ प्रात्मा स्वरूप उसके भी प्रात्म भावना से पुष्प को गन्ध की भौति
अथवा रस के समान वह परम रूप स्थित रहता है-ऐसा उसे जान लो ।।२।।
प्राकृतिक लय के होजा पर हमने अनुभव किया है। उम अक्षर से परे केवल
रस ही होता है । शव्दात्मक हम शम्दातीत उसमें पहुंचने को समर्थ नहीं
160
हैं
प्रकरण ६७-गया माहात्म्य
अत ऊर्ध्व प्रवक्ष्यामि गयामाहात्म्यमुत्तमम् ।
यच्छत्वा सर्वपापेम्यो मुच्यते नात्रसशय ॥१
सनकाद्य महाभागैर्देवपिः स च नारद ।
सनत्कुमार पप्रच्छ प्रणम्य विधिपूर्वकम् ।।२
सनत्कुमार मे ब्रू हि तीर्थ तीर्थोत्तमोत्तमम् ।
तारक सर्वभूताना पठता शृण्वता तथा ॥३
वक्ष्ये तीर्थवर पुण्य श्राद्धादौ सर्वतारकम् ।
गगतीर्थ सर्वदेशे तीर्थेभ्योऽप्यधिक शृणु ।।४
गयासुरस्तपस्तेपे ब्रह्मणा व्रतवेऽथित ।
प्राप्तस्य तस्य शिरसि शिला धर्मो ह्यधारयत् ॥५
तत्र ब्रह्माऽकरोद्याग स्थितश्वापि गदाधर ।
फ्ल्गुतीर्थादिरूपेण निश्चलार्थमहनिशम् ।
गयासुरस्य विप्रेन्द्रब्रह्माद्य दैवतं सह ॥६
कृतयज्ञो ददौ ब्रह्मा ब्राह्मणेभ्यो गृहादिकम् ।
श्वेतकल्पे तु वाराहे गयायागमकारयत् ॥७
गयानाम्ना गया ख्याता क्षेत्र ब्रह्माभिकाक्षितम् ।
काक्षन्ति पितर पुत्रानरकाद्भय भीरवः ॥
[ वायु पुगण वायुदेव ने पढ़ा-दमये भागे मैं पद प्रत्युत्तम गया का माहात्म्य पनाता है। जिसका श्रवण पर मानव समस्त पापों से विमुक्त हो जाता है । इसमें पुष भी सराय नहीं है ॥१॥ तत्री ने कहा-सनकादि महान् भाग वालो से युक्त देवर्षि नारद ने सनरकुमार से विधि के साथ प्रणाम पर पूछा था ॥ नारदजी ने कहा है मनरकुमार मुझे आप समस्त तीर्यों मे सर्वोत्तम जो तीर्थ हो उसे बनामो। जो ममस्त प्राणिया वा पान या यत्रा करने पर उद्धार करने वाला हो ॥३॥ सनस्तुमार ने कहा-मैं समस्त तीर्थो म श्रेष्ठ परम पुण्यमय और श्राद्ध मादि म मयको तार देने वाला गया तीर्थ को बनाता हूँ यह गया तीर्थ है पोर मब देश में सम्पूर्ण नीयों से भी प्रथिर है। इसका तुम लोग श्रवण परो । ब्रह्मा के द्वारा प्रार्थित गयासुर ने क्तु के लिये तपश्चर्या की थी। प्राप्त होने वाले उमके गिर पर धर्म ने शिला को धारण किया था ।।५।। वहाँ पर ब्रह्मा ने याग पिया था और गदापर भी वहां पर स्थित थे । तीर्थ मादि के स्वरूप से वह महनिा निश्चित प्रर्य वाला था। विप्रेड ब्रह्मादि देवों के साथ यज्ञ करने वाले ब्रह्मा ने ब्राह्मणो को गृह प्रादि प्रदान किये थे। वाराह श्वेत पल्प मे गया याग कराया गया था ॥६७॥ ब्रह्मा के द्वारा अभिशामित यह क्षेत्र गया के नाम से गया-यह स्यात हुआ था। पितृगण पुत्र नरक के भय से भीरु होते हुए इसकी इच्छा किया करते हैं ।।। गया यास्यति य पुत्र स नखाता भविध्यति । गयाप्राप्त मत दृष्ट्वा पितृणामुत्सवो भवेत् । पद्भधामपि जल स्पृष्ट्या सोऽस्मभ्य कि न दास्यति । । गया गत्वानदाता य पितरस्तेन पुत्रिण । पक्षत्रयनिवासी च पुनात्यासतम कुलम्। नो चेत्पञ्चदशाह वा सप्तरात्रि विरात्रिवम् ।।१० महाकल्पकृत पाप गया प्राप्य विनश्यति । पिण्ड दद्याच्च पित्रादेरात्मनोऽपि तिलविना ॥११ ब्रह्महत्या सुरापान स्तेय गुर्बगनागम । पाप तत्सङ्गज मर्व गयाश्राद्धाद्विनश्यति ॥१२ गया माहात्म्य ] [ ४६७ प्रात्मजोऽप्यन्यजो वापि गयाभूमौ यदा तदा। यन्नाम्ना पातयेत्पिण्ड त नयेद् ब्रह्म शाश्वतम् ॥१३ ब्रह्मज्ञान गयाधाद गोगृहे मरण तथा। वास पूसा बुरुक्षेत्र मुक्तिरेषा चतुविधा ॥१४ जो पुत्र गया को जायेगा वह ही हमारा पाता अर्थात् उद्धार करने घाला होगा। गया में प्राप्त होने वाले अपने पुत्र को देखकर पितरो को बहुत ही उत्सव होता है प्रांत वडा पालाद हुमा करता है। अपने पैरो से भी जल का स्पर्श करसे वह हमको क्या नहीं देगा जो गया में जाकर मन को दान करने वाला है स्तृिगण उमो मे पुत्र वाले हुमा करते हैं। जो तीन पक्ष तक वहाँ निवास करने वाला होता है वह अपने सात कुलो को पवित्र का दिया घरता है । अन्यथा पन्द्रह दिन तर सात रात्रि पर्यन्त भयवा तीन रात्रि तक ही वहां निवास करने मे गया में प्रात होपर रहन वाले का महाबल्य कृत पाप भी विनष्ट हो जाया करता है। गिलो के बिना भी अपने पितृगण को वहाँ को दिया करता है वह ब्रह्म हत्या-मुरापान-स्तेय (बोरी)-गुरु पत्नी का गमन और सत्सङ्ग रो समुत्पत सम्पूर्ण पाप गया ३ श्राद्ध से नष्ट हो जाते हैं ।।१०- ११-१२।। प्रात्मज हो या अन्यज भी हो जिस-किसी भी समय में गया की भूमि से जिमके नाम मे पिण्ड का पातन करता है वह उसको शाश्वत ब्रह्म को प्राप्त रा देना है ॥१३॥ ब्रह्म का ज्ञान-गया का श्राद्ध-गो के गृह में मृत्यु पोर कुरु- क्षेत्र में निवास ये चार प्रकार की पुरुषो की मुक्ति बताई गई है ॥१४॥ ब्रह्मज्ञानेन कि कार्य गोगृहे मरणेन किम् । वासेन नि कुरक्षेत्रे यदि पुत्रो गया व्रजेत् ॥१५ गयाया सर्वकालेपु पिण्ड दद्या द्विपक्षण.। अधिमासे जन्मदिने चारतेऽपि गुरुशुनयो ॥१६ न त्यक्तव्य गयाश्राद्ध सिंहस्थेऽपि वृहस्पतो। तथा देवप्रमादेन प्रहतेषु वएपुच । पुन वर्माधिकारी च श्राद्ध ब्रह्मलोकभाक् ॥१७ Ye६ ] [ वायु पुराण यायुदेव ने कहा-हमरे मागे मैं अब प्रत्युत्तम गया मा माहात्म्य मताता हूँ। जिसका श्रवण कर मानव समस्त पापों से विमुक्त हो जाता है । इसमे कुछ भी समय नहीं है ॥१॥ गूतजी ने कहा-गनबादि महान् भाग वालो से युक्त देवपि नारद ने सनत्कुमार से विधि के साथ प्रणाम कसे पूछा या ॥२॥ नारदजी ने कहा-हे मनरकुमार मुझे आप समस्त तीर्थो म सर्वोत्तम जो तीर्थ हो उसे बतायो । जो ममस्त प्राणियो का पान या श्रवण करन पर उद्धार करने वाला ही ॥३मनस्तुमार ने कहा-मैं समस्त तीर्थों मे धेठ परम पुण्यमय और बाद मादि में मयको तार देने वाला गया तीर्य को बताता हूँ। यह गया तीर्थ है पोर मब देश में मापूरी नीयों से भी अधिक है। इसका तुम लोग श्रवण करो ब्रह्मा के द्वारा प्रापित गयामुर ने बतु के लिये तपश्चर्या की थी। प्राप्त होने वाल उमो शिर पर धर्म ने शिला को पारण किया था १५॥ यहाँ पर ब्रह्मा ने याग किया था और गदाधर भी वहां पर स्थित थे । फ्ल्गु तीर्थ मादि के स्वरूप से वह महनिग निश्चित पर्ष वाला था। विप्रेट ब्रह्मादि देवो के साप यज्ञ करने वाले ब्रह्मा ने ब्राह्मणो को गृह मादि प्रदान दिये थे । वाराह श्वेत कल्प में गया याग कराया गया था ॥६-७॥ ब्रह्मा के द्वारा मभिकाभित यह क्षेत्र गया के नाम से गया-यह स्यात हुमी था। पितृगण पुत्र नरक के भय से भीर होते हुए इसकी इच्छा किया करते हैं ।।८।। गया यास्यति य पुत्र स नखाता भविष्यति । गयाप्राप्त मुत दृष्ट्वा पितृणामुत्सदो भवेत् । पद्भधामपि जल स्पृष्ट्वा सोऽम्मभ्य किं न दास्यति । ६ गया गत्वानदाता य पितरस्तेन पुत्रिण । पक्षत्रयनिवासी च पुनात्यासम्म कुलम् । नो चेत्पञ्चदशाह वा सप्तरात्रि विरात्रिकम् ॥१० महाकल्पकृत पाप गया प्राप्य विनश्यति । पिण्ड दद्याच्च पित्रादेरात्मनोऽपि तिलविना ॥११ ब्रह्महत्या सुरापान स्तेय गुबगनागम । पाप तत्सङ्गज सर्व गयाश्राद्धाद्विनश्यति ॥१२ पुन वर्माधिकारी च थापद ग्रह्मलोक भाक् ॥१७ गया माहारम्प ] [ ४६७ पात्मजोऽप्यन्यजो वापि गयाभूमो यदा तदा। यनाम्ना पातयेपिण्ड त नये ग्रह्म शाश्वतम् ॥१३ ब्रह्मज्ञान गयाबाद गौगृहे मरणं तपा। वास पुसा पुरुक्षेत्र मुतिरेपा चतुम्विधा ।।१४ जो पुष गया की जायेगा वह ही हमारा त्राता मर्यात उसार परने वाला होगा। गया में प्राप्त होन याने अपने पुत्र को देवार पितरो को बहुत ही उन्मय होता है पर्यात बडा माल्हाद हुमा करता है । अपन परी से भी जल या स्पर्ग पसे यह हमाो क्या नहीं देगा ॥६जो गया में जाकर पन्न यो दान करने वाला है स्तृिगण उमी गे पुत्र वाले हमा करते हैं। जो तीन पक्षा सा वहाँ निवाम वरने वाला होता है वह अपने मात कुलो यो पवित्र कर दिया करता है । मन्यथा पन्द्रह दिन ता सात रात्रि पर्यन्न भयवा तीन रात्रि तर हो यहाँ नियाम करने मे गया में प्राप्त हार रहन वाले का महावर न पाप भी विनष्ट हो जाया करता है । निलो के बिना भी अपने पितृगण को वहां जो दिया करता है वह ब्रह्म हत्या-मुरापान-स्तेय (बोरी)-गुरु पत्नी का गमन मौर ममग रो समुत्पन्न सम्पूर्ण पाप गया ये पाद मे नष्ट हो जाते हैं ॥१.. ११-१२॥ मात्मज हो या अन्यज भी हो जिम-दिमी भी समय मे गया की भूमि में जिम नाम में पिएड का पातन करता है वह उमको शाश्वत प्रम को प्राप्त करा देता है ।।१३।। ब्रह्म का ज्ञान-गया का धाद-गौ के गृह में मृत्यु पोर युए- क्षेत्र में निवाम ये चार प्रकार की पुरुषों की मुक्ति बताई गई है ॥१४॥ ब्रह्मज्ञानेन वि कार्य गोगृहे मरणेत किम् । वासेन वि कुरक्षेत्रे यदि पुत्रो गया प्रजेत् ॥१५ गयाया सर्वकालेपु पिण्ड दद्याद्विचक्षण. । अधिमासे जन्मदिने चास्तेऽपि गुरुशुकयो ॥१६ न त्यक्तव्य गयाश्चाद सिंहस्थेऽपि वृहस्पती । तथा देवप्रमादेन प्रहतेषु व्रणेषु च ।
४६८ ] [पायु पुराण सकृद्गयाभिगमन सपिण्डस्य पातनम् । दुर्लभ किं पुननित्यमस्मिन्नेव व्यवस्थिति. प्रमादाम्रियते क्षेत्रे ब्रह्मादेमुक्तिदायके । ब्रह्मज्ञानाद्यथा मुक्तिलभ्यते नाम सरायः ॥१६ वोटकादिमृतानाच पितृणां तारणाय च । तस्मात्मव्वंप्रयत्नेन वर्तव्य सुविचक्षणः ॥२० ब्रह्मप्राल्पितान्विप्रान्हव्यकव्यादिनाऽचंयेत् । तैस्तुष्टस्तोषिताः स; पितृभिः सह देवता ॥२१ ब्रह्म जान से क्या प्रयोजन है और गो के घर में मृत्यु होने से भी या लाभ है तथा कुरुक्षेत्र के धाम में निवाम से भी कोई मिति नहीं होती है यदि पुत्र गया मे जाकर श्राद्ध करता है । पर्य यह है कि गया में पुर श्राद्ध करने में पूर्णतया मदति हो जाती है ॥१५॥ गया में विद्वान पुरुष को गमी ममयो मे पिण्ड दान परला पाहिए । चाहे मरिमाग हो मा जन्म दिन हो मोर मी ही गुरु और गुर का पस्त भी होगपा हो गभी कानों में पिएर दान मरना चाहिए ॥१६॥ सिंह राधि पर दृढम्पति ये स्पिट होने पर भी गया में जाार धाड का स्याग नहीं करना चाहिये । देव के प्रमार मे प्रहत होने नया पणों पे होने पर भी भार परने वाला पुन वा अधिकारी मोर प्रापोर पागेवन ने वाला होता है ।।१७। एपवार गया मे मभिगमन ररना पौर एक्वार पिएका पातन परना ही इतना घेवसार होता है fr उमे पिर पुष भी दुरंभ नहीं है भोर निरय ही इस व्यवस्थिति हो तो बहना ही गया है ॥१॥प्रसारिको मुनि देने वाले क्षेत्र में प्रमाद से ही मृतु हो जाती है तो गि प्रसार ब्रह्म शान मे मोश हो मी ही मुनिहोनी-गाँध भी मेसर नहीं है १ कोटामा मृनों को और पितृगण को तरण किये सम्पूर्ण प्रयतो दाग मुखिय सग पुपा पो गरा पार रनाही पाहिये २० सप्रासित विवाहप-माद्विारा नरना गाए। उन रिमोटोर मे मग पितरों के गाय देना परम ताकिलो भाग [ ४६९ गया माहात्म्य ] मुएडन चोपवासश्च सर्वतीर्थेष्वय विधि. । वर्जयित्वा कुरुक्षेत्र विशाला विरजा गयाम् ॥२२ दण्ड प्रदर्शयेद्भिक्षुर्गया गत्वा न पिण्डदः । दण्ड न्यस्ता विष्णुपदे पितृभि सह मुच्यते ।।२३ न दण्डी किल्विप धत्ते पुण्य वा परमार्थत । प्रत सर्वा क्रिया त्यक्त्वा विष्णु ध्यायति भावुक ।।२४ सन्यसेत्सर्वकर्माणि वेदमेक न सन्यसेत् । मुण्ड कुर्याच पूर्वेऽस्मिन्पश्चिमे दक्षिणोत्तरे ।।२५ साद्ध क्रोशद्वय मान गयेति ब्रह्मणेरितम् । पञ्चकोश गयाक्षत्र क्रोशमेक गयाशिर ॥२६ तन्मध्ये सर्वतीर्थानि त्रैलोक्ये यानि सन्ति वै। श्राद्धकृद्यो गयाक्षत्रे पितृणामनृणो हि सः॥२७ शिरसि श्राद्धवृद्यस्तु कुलाना शतमुद्धरेत् । गृहाच्चलितमात्रेग गयाया गमन प्रति । स्वर्गा रोहणमोपान पितृणाञ्च पदे पदे ॥२८८ समस्त तीर्थों में मुण्डन तथा उपवास करने की विधि है किन्तु कुरुक्षेत्र और विरजा विशाला गया का त्याग करके ही यह विधि होती है ॥२२॥ भिक्षु को गया में जाकर दण्ड का प्रदर्शन करना चाहिए और पिण्ड नहीं देना चाहिए । विष्णु पद मे दण्ड के व्यस्त करने ही से वह पितृगण के साथ मुक्त जाता है ।।२३॥ दण्डी को कोई पाप नही होता है और परमार्थ से उसे भी नही होता है । अतएव समस्त क्रियानो का त्याग करके भावुक को विष्णु का ध्यान करना ही श्रेयस्कर हे ॥२४॥ समस्त कर्मों का तो मन्यासी को त्याग पर देना चाहिये किन्तु एक वेद का त्याग नहीं करना चाहिये । पूर्व दिशा मे मुण्ड करे और पश्चिम तथा दक्षिणोतर मे ढाईकोम तक गया दा मान होता 'है-ऐमा ब्रह्मा ने कहा है । गा का पांच कोम तक क्षेत्र है और एक कोस पर्यन्त गया का शिर होता है ॥२५-२६॥ उमके मध्य मे समस्त तीर्थ हैं जोकि इस प्रैलोक्य मे हैं । गया के क्षेत्र मे जो पार करने वाला पुरुप है वह पितरो हो पुण्य [ वायु पुराण के ऋण मे मुक हो जाया करता है ॥२७॥ जो शिर मे श्राद्ध करता है वह अपने सौ कुलो का उद्धार किया करता है । जब वह घर से गया को चलना भारम्भ करता है उसी समय से पितरो के स्वर्गारोहण का काय प्रारम्भ करता है और उसके ए २ कदम चलने में स्वग का सोपान बन जाता है ॥२८॥ पदे पदेऽश्वमेधस्य यत्फल गच्छतो गयाम् । तस्फतञ्च भवे नून समन नात्र सराय ॥२९ पायसे नापि चरुणा सक्तुना पिष्टकेन वा । तरदुल फलमूलाय गयाया पिंडपातनम् ॥३० तितकल्केन खडेन गुडेन सघृतेन वा । केवलेनव दना वा ऊर्जेन मधुनाऽथ वा ॥३१ पिण्याक सघृत खड पितृभ्योऽक्षयमित्युत । इज्यते वात्तव भोज्य हविप्या न मुनोरितम् ॥३२ एकत सव्ववस्तूनि रसवन्ति मधूनि हि । स्मृत्वा गदाधराड ध्र यज फल्गुतीर्थाम्बु चैक्त ॥३३ पिंडासन पिंडदान पुन प्रत्यवनेजनम् । दक्षिणा चान सङ्कल्पस्तीयथाद्ध ध्वय विधि ॥३४ नावाहन न दिग्बधो न दोपो दृष्टिसम्भव । सकारुण्येन पत्त च्य तीथ थाद्ध विचक्षण ॥३५ गया को गमन करने वाले के एक एक पद म अश्वमेय यन का फल प्राप्त होता है। उसको मम्पूण फन अवश्य ही मिलता है-इसमे कुछ भी माय नहीं है ॥२९॥ पायस से-चरु-मत्तू-तण्डल और फन मूलादि के द्वारा गया म पिण्ड का पातन करना चाहिए ॥३०॥ तिलों का कल्क-बांड गुड और घृत प्रथया केवल दही या उध्व मधु के द्वारा पिण्ड पालन करे। 'पण्याक तथा सघृत खांड पितरो को वहा अक्षय होता है। भयदा ऋतु का मुनीरित हविष्यान भो से यजन किया जाता है ॥३१३२। एक पौर रसवाती समस्त वस्तुयें तथा मधु बने भोर गदाधर पे चरण कमल का स्मरण करके एक और फगुनी कान रक्खे ॥३३॥ पिएडामन पिरडदान और फिर
गया माहात्म्य
!
प्रत्यवने जन-दक्षिणा और अन्य का सङ्कल्प करे-यह ही तीर्थों के श्राद्धा में
विधि होती है ॥३४॥ वहाँ पर न तो कोई प्रावाहन ही होता है और न
दिग्बन्ध किया जाता है। दृष्टि से उत्पन्न होने वाला भी दोष बहा नही होता
है। विचक्षण पुरुषा को कारुण्य के सहित तीर्थ श्राद्ध करना चाहिए ||३५||
अन्ययावाहिता काले पितरो यान्त्यमु प्रति ।
तीर्थ सदा वसन्त्येते तस्मादावाहन न हि ॥३६
तोथं श्राद्ध प्रयच्छद्भि पुस्पै फलकाइ क्षिभि ।
काम क्रोध नया लोभ त्यत्क्वा कार्या क्रियानिशम् ॥३७
ब्रह्मधार्यकभोजी च भूशायी सत्यवायचि ।
सर्वभूतहिते रक्त स तीर्थ फलमश्नुते ॥३८
तीर्थान्यनुसरन्धीर पापण्ड पूव्वंतस्त्यजेद् ।
पाप ड स च विज्ञेयो यो भवेत्कामकारत ॥३९
ती पु ये नरा धीरा कर्म कुर्वन्ति तद्गता ।
यदा ब्रह्मरिंदो वेद्य वस्तु चानन्यचेतस ।
प्रविशन्ति परेशाध्य ब्रह्म ब्रह्मपरायणा ॥४०
पास्ते वैतरणी नाम नदी रैलोक्यविधता।
साऽवतीर्ण गयाक्षेत्रे पितृणा तारणाय वै ।
स्नातो गोदो वैतरण्या बि सप्तकुलमुद्धरेत ॥४१
तथाऽक्षयवट गत्वा विप्रान्सन्तोपयिष्यति ।
ब्रह्मकल्पितान्विप्रान्हव्यकध्यादिनार्च येत् ।
तैस्तुष्ट स्तोपिता सर्वा पितृभि सह देवता ।।४२
गयाया न हि तत्स्थान यत्र तीर्थ न विद्यते।
सान्निद्धय सब्बतीर्थाना गयातीय ततो वर ॥४३
मीने मेपे स्थिते मूर्य कन्याया कामुके घटे ।
दुर्लभ त्रिषु लोकेषु गयाया पिंडपातनम् ॥४४
मकरे वर्तमाने च ग्रहणे चन्द्रसूर्यायो ।
दुर्लभ दिपु लोकेषु गयाथाद्ध सुदुल्लभम् ।।४५
५०२ ] [ दायु पुराण गयाया पिंडदानेन यत्फल लभते नर । न तच्छक्य मया वक्तु कल्पकोटिशतैरपि ॥४६ अन्य स्थानो मे आवाहन किए हुए हो पितृगण श्राद्ध करने वाले के समीप पाया करते हैं किन्तु तीर्थ मे तो ये सर्वदा ही निवाम किया करते हैं प्रतएव वहा इनका आवाहन नही किया जाता है ॥३६|| तीयों में श्राद्ध देने वाले पुरुष जो फल की प्राकामा रग्दत्ते हैं उनको काम-क्रोध और लोभ का त्याग करके ही निरन्तर था की क्रिया करनी चाहिए ॥३७॥ ब्रह्मचारी-एक बार भोजन करने वाला-भूमि पर शयन करन वाला-सत्यवक्ता-पवित्र तथा ममस्त प्राणियो के हित में रति रखने वाला पुरुष तीर्थ के फल को प्राप्त किया करता है ॥३८॥ तीर्थों का अनुसरण करने वाले वीर पुरप को चलन के पहले ही से पापण्ड का याग करना चाहिए। जो कामना की भावना से किया जाता है वही पापण्ड समझना चाहिए ॥३६॥ जो पुरुष परम धीर होकर वहा तीर्थों मे पहुच कर अपना तीर्थोचित मं किया करते है जिस तरह ब्रह्म के ज्ञाता लोग प्रनन्य चित्त होते हुए जानने के योग्य वस्तु में ब्रह्म में जो कि परिशास्य है, ब्रह्म परायण होकर प्रवेश किया करते हैं उमी भांति तीर्थों के सेवी को भी करना चाहिए ॥४०॥ जो तीनो लोको मे प्रसिद्ध वैतरणी नदी है वह गया के क्षेत्र में पितरो के तारने के लिए अवतीर्ण हो जाती है । गोद अर्थात् गो का दान करने वाला वैतरणी में स्नान करके अपने इक्कीस कुलो का उद्धार कर देता है ॥४१॥ उसी भांति अक्षय पर जाकर विप्रो को सन्तोप देना चाहिए। ब्रह्म कल्पित विप्रो को हव्य कन्यादि से अचंन करे । तुष्ट हुए उनके द्वारा समस्त देवगण पितरो के साथ तोपित हो जाया करते हैं ॥४२॥ गया में ऐमा कोई भी स्थान नहीं है जहा कोई तीर्थ न विराजमान ही । वहा गया में तो सभी तीयों का सानिध्य होता है अतएव वह परम श्रेष्ठ तीर्थ है ॥४३॥ भीन- मेष-कन्या-धन और कुम्भ पर सूर्य के स्थित होने पर गया मे जाकर पिण्ड का पातन करना तीनो लोको मे दुर्लभ कार्य होता है ।।४|| मकर के वर्तमान होने पर तया चन्द्र एव सूर्य के ग्रहण के समय में गया में श्राद्ध वरना तीनो लोको में परम दुर्लभ कार्य है ।।४५।। गया मे पिंड दान करने से जिम फल की [ ५०३ गया माहास्य । प्राप्ति मानव किया करता है उसको मैं कल्प कोटि शत के समय में भी वर्णन नही पर सकता हूँ ॥४६॥ यज्ञञ्चक्रे गयो राजा वह्वन्ने बहुदक्षिणम् । यत्र द्रव्य समूहाना सख्या वतुन शक्यते ॥४७ प्रशसन्ति द्विजास्तप्ता देशे देशे सुपूजिता । गय विष्ण्वादयस्तुष्टा वर यू हीति चाबु वन् ।।४८ गयस्तान्प्रार्थयामास ह्यभिशप्ताश्च ये पुरा । ब्रह्मणा ते द्विजा पूता भवन्तु ऋतुपूजिता ॥४६ गयापुरोति मन्नाम्ना ख्याता ब्रह्मपुरी यथा । एवमस्तु वर दत्त्वा चान्तर्दधु सुरा ।।५० सनत्कुमार जी बोले-नारदजी । किसी समय राजा गय ने बहुत मन्त्र और बड़ी-बडी दक्षिणाम्रो वाले इतने यज्ञ किये दि उनम रचं होने वाले द्रव्य की संख्या की गणना पर सकना सम्भव नहीं ॥४७॥ देश-देश के ब्राह्मण भली प्रकार पूजे जाकर और पूण तृप्त होकर वहां से गये भौर सर्वत्र राजा गय की प्रशमा करते रहे । राजा क इस महान पुण्य कार्य से सन्तुष्ट होकर विष्णु प्रादि देवगणो ने राजा से दर मांगने को कहा ।।४८॥ राजा ने उनसे प्रार्थना की कि यदि माप बर देना चाहत हैं तो गया के जिन ब्राह्मणो को प्राचीन काल में ब्रह्माजी ने शाप दिया था उन्ह उमे मुक्त कर दीजिये और वे यज्ञो मे पूजित होकर पवित्र हो जाये ॥४६॥ यह गया पुरी मेरे नाम पर ब्रह्मपुरी की तरह पवित्र मौर विख्यात हो जाय । देवगण 'ऐमा ही' कहकर उनकी प्रार्थनाओ को स्वीकार करके अन्तर्धान होगये ॥५०॥ यत्र तत्र स्थितो देवा मृपयाऽपि जितेन्द्रियाः। आद्य गदाधर घ्यायछाद्धपिण्डादिदानत ॥५१ कुलाना शतमुद्धृत्य ब्रह्मलोक नयेत् पितृन् । गया गयो गया दित्यो गायत्री च गदाधर ॥५२ गया गयासुरश्चं व पडेते मुक्तिदायका । गयाख्यानमिद पुण्य य पठेत्सतत नरः ।।१३
]
[पायु पुराण
॥५६
शृणुयाच्या यस्तु स याति परमा गतिम् ।
पाठयेता गयाख्यान विप्रेभ्य पुण्यामर ॥५४
गयाश्राद्ध कृत तेन कृन तेन सुनिश्चितम् ।
गयाया महिमानच ह्यम्यसेद्य समाहित ॥५५
तेनेष्ट राजमूयेन मश्वमेधेन नारद ।
लिसेद्वा लेखयेद्वापि पूजयेद्वापि पुस्तकम् ।
तस्य गेहे स्थिरा लक्ष्मी
सुप्रसन्ना भविष्यति
इस पुरी में स्थान-स्थान पर दवतामो के अतिरिक्त जितेन्द्रिय ऋषि भी
विराजमान है । मादि गदाधर देव का ध्यान करके यहाँ याद और पिण्डदान
परने वाला सौ पोतियो का उद्धार करके उनको स्वर्ग वा अधिकारी बना दता
है । गयागय, गयादित्य गायत्री, गदाधर, गया और गयासुर-ये , 'गया'
म मुक्ति प्रदान करने वाल हैं । इस पुण्यदायक गयाख्यान को जो व्यक्ति सदा
पढ़ना रहता है ।।५१-५२ ५३॥ अथवा जो पुण्यशाली इसे श्रद्धापूर्वक मुनता
है और ब्राह्मणो से इसका पाठ कराता है वह निश्चिन रूप म गया श्राद्ध
करता है । जो मनुष्य मन्त करण से महातीर्थ गया की महिमा का चितन
करता है हे नारद, वह मानो राजमूय और प्रश्वमेघ यज्ञो का मनुशन हो कर
लता है । जो गयाख्यान की पुस्तक का स्वय लिखता है अथवा दूसरे स लिसाता
है या पुस्तक की पूजा करता है । उसके घर म लक्ष्मी जी स्थिर मोर प्रसन्न
रहती हैं ॥५४ ५५-५६॥
"वायुपुराण का चतुर्थ चरण (उपसहार) मे गयामाहात्म्य समाप्त"
।। वायु पुराण समाप्त ॥