Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Sapt Esmarnam
Front matter
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तुति- नाद गुरुपरणेन्दुरीपति. भी भी इन्दरनगरस्पमैनधेता बरपाठशाकिरणभूनाः पति- श्रीरसागः परिनारमागधीभावामपरतगटानुगामिपटनीय- सप्तस्मरणानो संस्कृत पादुरसिंगममागधीपपदविवरणपतिपदाहिन्दीभाषा- सर्वसागरमाहानजननोचिततर भापमापनि देगनेन प्रपन्दी- कतन्त्वभवानीपमालसहिसाबपण्टियम् एतरिटक्षणं धीमतां परिजलकार दीर्घायुरो भयान्विति मायामो भगत पीरागन्ः पन्यासपशोमुनिः ता. १२-१-०९
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1th friruar; 1:03.
I have made with rat pros rc we sinac
landit Sinirban Staros' SORT**SI
understand will let's le opt. el-c: gommage en
originality. The frasi Pardilu 19!:.. ****
witbio thin rench of s'i raat! ... the J-L.'1
Low read and underasp tros 12-sty and it ..
As far as I know this work is al weber et du
frums un naber Jala trek Thr trapslering * * !
off and in my opinion the tonef 10 pilna lepler
Leve Loon toro al autagnu* Ilut pu the 1.1.
is ao wimitable one and » ATW thas the arabot
festoncal much lubkyur pren Tir l'accinum!
Coppiruuus fertice to the Jain Community II *
coufid ut it will heartily welcome to Prxk.
1
SURAYAL FAISA
PISTUICT d4p SDS JII*t
VIIHD111
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INDORE.
10-10-1991.
I dare from '...: Shukrisha Sharma for the lust
two secºs lo sceri t3 be learned randol and takes
grat darlictorcat in the Study of Jain Shretmas. Ile has
mo'farin his 13-, Ir Isiuniem by commenting tpor.
Sapto Sanrion * I am got to say that the Commentary
Lc tos prepnul ! be Svuod rery weful to those who
Siud; Sapka Swansea Without a toreber. Maghadhi Versce
He becs explained in Suositut with some important Grato.
matical X06* and for the Soko of those who ars quo
ignorant of tho Soosent Language the purport of mehrerse
is gueu nu Iliadt alea I believe that the Jais Cuenimunity
is thankful to the learned Tandits for the cadenrours to
reoder Supra Smarına in a language which we understoon
1.5 os all llis stork shurts that be has thorough knon ledge of
Sanskrit Magadh and Hindi Languages In Conclusion
I pray Panditji to tako up some moro important works of
the Machadht languige and translats them inta Ilindi
po that tho Iliade kouwing public may appreciato the Sacro]
Jain La:cmtur
NG MODI,
B. A. D. L
MAGISTRATE
TYPOLE
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n श्री ॥
॥ सदस्याभ्यर्थम् ।।
. इह खलु परमदयालुभिः श्रीमत्सर्ववियेशानवर
ज्ञानिभिरनादिस्वाविधानिर्मितकामक्रोधादि महानिमिनि-
लाक्रान्तसंसरणाची पोनःपुन्येन निम-जहां तचरणो.
पायज्ञानपोतविकताना प्राणिनामपारमापकत्वेपि मध्य
ঘনংসগামসঃীবনমানসেমাধান
परतिसरीतरागचरणनिःश्रेणी रदपादि.
तदवलंपनेऽप्यविकातिमिरवता दयाशील urm
प्रवर्तकाचार्या महावीरगौतमर गमिप्रभाय आरान् तपा
प्यतिकालांतरितयेन सेप्पत्तंगापमान
तिमिरे अमता कानिधिदिदगनपुलतिलयः ::
रचोपभाः तो पाठिनतरपालभाषामयाना सापर.
शनासभरे इन्दुरनगरवासियामोनिका
.
W कायमानेन पड़वाक्यप्रमाणशालकृतपरिश्रमेण "नागर ...जातीयवोधकुलावतंसेन थ्रीपोनाथसूनुपण्डितश्रीकृष्ण शर्मणा सप्तस्मरणानां संस्कृतच्च्या हिन्दीमापायां गाथापदार्थः सर्वसाधारणज्ञानार्थ सरलहिन्दीभापायां भावार्थचन्यरचि. "ऋतेज्ञानान्ममोक्ष " इतिवचनानुसारेण नित्यसत- स्मरणपठनकर्तृणां सौकर्येण ज्ञानप्राप्ति यादितिहेतो रिन्दुरजैनश्वेताम्बरमुख्यपाठशालाध्यापकेनोक्त पण्डित- रेण कृतःपरिश्रमःसफलोभवेदिति सर्भव्यश्रावकै साथ सप्तस्मरणमवश्यं पठनीयमितिप्रार्थनापराःसदस्याः .4 ॥ श्रीगीतरागायनमः श्रीनंदिपेणसूरिविरचितमजितशान्ति स्तवनं प्रारभ्यते. (गाथा) (गाहा) आजिजिअसवभयं संतिं च पमंतसचगय. पावं ।। जयगुरु संतिगुणकरे दोषि जिणवरे पणि- चयामि ॥१॥ (छाया) जितसर्बभयं अजितं च प्रशांतसर्जगदपापं शांति च शान्तिगुणकरी जगद्गुरू (तो) द्वापि जिनसे ( अहं) प्रणिपतामि। (पदार्थ) (जिअ ) जीत लियेहैं (सबभय ) स
२
अजितशान्ति स्तानम् ॥
जिनने ऐसे (अजिअं) दूसरे तीर्थकर अजितनाथस्वामी
(च) और ( पसंत) अपुनर्भावसे निवृत्त होगाहें
(सब ) संपूर्ण (गय ) रोग और ( पावं) पाप जि.
नके ऐसे ( संति ) सोहलयें तीर्थंकर शान्तिनाथ स्वामी
( संतिगुणकरे ) विनोपशमरूपगुणको करने वाले
( जयगुरु ) जगतमें प्राणियोंको धर्मतत्वोपदेश करने
वाले ( दोवि) दोनो (जिणवरे ) जिनोंमें श्रेष्ट ऐसे
अजितनाथ और शान्तिनाथ स्वामीको (पणिवयामी )
वन्दन करता हूं।
(भावार्थ)
जीत लियेहँ सप्तविधभय जिन्होंने ऐसे दूसरे तीर्थकर
अजितनाथ स्वामी और निवृत्त होगए हैं संपूर्ण रोग और
पाप जिन्होंके ऐसे सोहल तीर्थकर शान्तिनाथ स्वामी
विनोंकी शांति करने वाले जगतमें जीवोंको धर्मोपदेश
करने वाले जिनोंमें श्रेष्ट ऐसे दोनो अजितनाथ और
शान्तिनाथ भगवानको मैं नन्दिपेग कवि बन्दनकरताहूं!
(इतिहास)
जिस समय दूसरे तीर्थकर अजितनाथ स्वामी अपनी
माता विजयादेवीके गर्भमैथे उस समय रानी विजया
अमितशान्ति स्तवनम् ॥
देवी अपने पति नितरानुराजाके साथ चोपट खेलने लगी
परन्तु परम प्रभावशाली पुत्र गर्भमें होनेसे जितशत्रु
विजयादेवीको न जीत सके इस हेतु पुत्रका नाम
अजित रखा।
शान्तिनाथ स्वामी सोहला तीर्थकर जिस समय अपनी
माता के गर्भमें आए उम समयसे जगतमें परममंगल
होनेलगा और नानाप्रकारके दिनों की शान्ति होनेगी
इस हेतु इन्होंका नाम शान्तिनाथ रखागया।
(गाथा)
(गाहा)
ववगयमंगुलभाचे तेहं विउलतवनिम्मल, मटाये।
निस्वममहप्प भाचे थोस्सामि मुदिसम्भाचे II
(छाया)
व्यपतगतमंगुलभावी विपुलापोनिर्भरगमानी निगम
ममहत्प्रभावों सुदृष्टसहायी तौ ( अजिनशान्तिनामानी )
अहे स्तोप्ये।
(पदार्थ)
(पगय) प्रनष्टहोगए हैं (मंगुल) अभिन
(माओ) परिणाम जिन्होंके (विउल) सिगन (तर)
भजितशान्ति नानम् ॥ द्वादशाविधतपसे ( निम्मल ) निर्मल होगयाहै (सहात्र) स्वभाव जिन्होंका (निरुवम ) अनुपमेय और ( मह) महानहै (प्पना) प्रभार जिन्होंका (मुदिह) केवल ज्ञान और दर्शन द्वारा भलीभांति देखलिये हैं ( सम्भावे ) विद्यमान जीवाजीवादिभाव जिन्होंने ऐसे (ते) वे प्रसिद्ध अजितनाथ और शान्तिनाथ भगवान को (हं ) में नन्दिपेण कधि (थोरसामि ) स्तुति करताहूं। (भावार्थ) नष्टहोगए है अशोभनपरिणाम जिन्होंक विस्तीर्ण द्वादशविध तपश्चर्यासे निर्मल होगयाहै स्वभाव जिन्हों- का अनुपमेय और महानहै प्रभाव जिन्होंका केवल ज्ञान और दर्शन द्वारा भलीभाँति जानलिये, विद्यमान जीवाजीवादिभाव जिन्होंने ऐसे वे प्रसिद्ध अजितनाथ और शान्तिनाथ स्वामीकी में स्तुति करताहूं । (श्लोकः) (सिलोगो) सबदुक्खप्पसंतीणं सवपावप्पसंतिणं । सया अजियसंतीणं नमो अजिअसतिणं ॥ ३ ॥ .
अजितशान्ति स्तवनम् ॥ (छाया) सर्वदुःख प्रशान्तिभ्यां सर्वपापप्रशान्तिभ्यां अजित- शान्तिभ्यां एतादृशाम्यां आजितशान्तिनाथाभ्यां सदा नमः अस्तु। अत्रं नमःशब्दयोगजचतुर्थ्यर्थप्राकृतत्वात् पष्टी द्विवचनस्य च बहुवचन सर्वत्र । सन्दुक्खप्पसंतीर्ण इत्यत्र पकारी लघुगुर्खा समासेचेति द्वित्वस्य पाक्षिक स्वात् ॥ द्वितीये चतुर्थे च पादे संतिणं पसंतिणं चेत्य. आर्पत्वात् दीर्घाभावः अन्यथाहि छन्दोगः स्यात् । (पदार्थ) (सब्य ) संपूर्ण ( दुवख ) वेद्यकर्म (प्पसंती) प्रशान्त होगयेहैं जिन्होंके अधवा (दुक्ख)(दुष्टानिखानि इन्द्रियाणि दुःखानि तेषां प्रशांन्तिः इष्टानिष्टविपयेषु ययोः ) दुष्ट इन्द्रियां इष्टअनिष्ट विषयोंसे (प्पसंतीणं) शांतहोगईहैं जिन्होंकी अथवा ( सव्यदुक्खप्पसंतीणं ) संपूर्ण योग्य जंतुओंकी दुःखप्रशान्ति होगईहै जिन्होंस (सब ) संपूर्ण ( पाव ) पाप (प्पसंतिण ) प्रशान्त होगए, जिन्होंके ( अजिय ) न जाती जानेवाली है (संतीण) शान्ति जिन्होंकी ऐसे ( अजियतंतिण) अजितदशान्ति स्तवनम् ॥ आजितनाथ और शान्तिनाथ स्वामीको (सयो ) निरंतर (नमो) नमस्कार होओ। (भावार्थ) संपूर्ण वेद्यकर्म प्रशान्तहोगए हैं जिन्होंके (अथवा ) संपूर्ण दुष्प्ट इन्द्रियां इष्ट अनिष्ट विषयों से निवृत हो- गईंह जिन्होंकी ( अथवा ) संपूर्ण योग्य जन्तुओंके दुःख निवारण कियेहैं जिन्होंने और संपूर्ण पाप नष्ट होगएहैं जिन्होंके और रागद्वेपादि द्वारा न जीती जाने वाली है शान्ति जिन्होंकी ऐसे अजितनाथ और शान्ति- नाथ स्वामीको मैं निरंतर नमस्कार करताहूं। (मागधिका छंदः) (मागहिआ) अजिअजिणमुहप्पवत्तणं तव पुलुित्तमनाम- कित्तणं । तहय धिइमइप्पवत्तणं तव य जिणुत्तम संति कित्तणं ॥४॥ (छाया) हे अजितजिन हे पुरुषोत्तम तत्र नामकीर्तनं सुख- प्रवर्तनं तथा च धृतिमतिमवर्तनं आस्ति हे जिनोत्तम- शांते तव च कीर्तनमपि तथैवास्ति ।
अजितशान्ति स्तवनम् ॥
(पदार्थ)
( अजिआजग ) हे अजितसंज्ञक जिनभगवन्
(पुरिसुत्तम ) हे पुरुषोत्तम ( तर ) आपका (नाम-
किचणं ) नामस्मरण ( मुह) सुखका (प्परतणं)
प्रवर्तकहै ( तहय ) और वैसेही (घिइ) स्वारस्य
लक्षण धृति और ( मइ ) प्रज्ञालक्षग मतिका
(प्पवचणं) प्रवर्तक है (च) और (जिणुत्तम)
जिनोम श्रेष्ट (संति) हे शान्तिनाथस्वामी ( तब )
आपकाभी ( कितणं ) नाम स्मरग वेसाही है।
(भावार्थ)
हे पुरपोचम अजित संज्ञक जिनभगवन् और हे
जिनोंमें श्रेष्ट शान्तिनाथ भगवन् आप दोनोंका नाम-
मरण संपूर्णसुखका प्रवर्तक है और वैसेही स्वास्थ्यलक्षग
गृति और प्रज्ञालक्षणमतिका भी प्रवर्तक है।
(आलिंगनकंछंदः)
(आलिंगणयं)
फिरिआपिहि संचिअकम्मफिलेस विमुक्सपरं ।
अजिअ निधि च गुणहिं महामुणिसिद्धिगये ॥
अजिअस्स य संतिमहामुणिणोपिय संतिका
संययं मम निव्वुइकारणयं च नमसणयं ॥ ५ ॥
अनिकालिनानम् ।।
(छाया)
क्रियाविधिसंचितकमीशविमुक्तिकरं अनि च गुणैः
निचितं महामुनिसिडिग पवाद अजितन्य मानि-
महामुनेभ नमस्यनकं सततं मम शांतिकरं निनि-
कारणकाच भवतु।
(पदार्थ)
(किरिआ ) कायिक्यादि क्रियाक (विधि)
भेदोंसे ( संचित्र) इकडे कियेहुर ( कम्म) भानावर.
णादिकर्म और (किलेन) कपायोंसे (विमुखयरं )
अत्यंत प्रथक् करनेवाला (अजितं ) तीतरसंबधी
अन्यदेवोंको वन्दनजनित पुण्यसे नीताजानेवाला (च)
और (गुणेहिं ) सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और चारित्रा-
दिगुणों से (निचि) व्याप्त ( महामुनि) श्रेष्टमुनियों की
(सिद्धि) अणिमादि अष्टसिद्धियोतक (गयं) पहुंचा हुआ
ऐता (अजिअस्स ) अजितनाथस्वामीको ( य ) और
( संतिमहामुगिणोविन ) शान्तिनाथ महामुनिकोनी
(नमंसणयं ) नमस्कार ( सययं ) निरंतर (मम) मेरी
(संतिकरं ) पीडाको शान्तिकरनेवाला (च) (निवुइ )
मोक्षका ( कारणयं ) प्रसिद्धकारण होओ।
अजितशान्ति स्तानम् ।। (भावार्थ) कायित्यादि क्रियाओंके भेदाले इकठेकिये हुए ज्ञाना- वरणादिकर्म और कपायोंसे अत्यन्त जुदाकरनेवाला और तीांतरसंबधी अन्यदेवोंको वन्दनसे उत्पन्नहुए पुण्यसे न जीवाजानेवाला और सम्यग्ज्ञानदर्शन चारित्रादि गुणोंसे व्याप्त और श्रेष्टमुनियोंकी अणिमादि अष्टसिद्धियोतक पहुंचाहुआ ऐसा अजितनाथ स्थानीको और शान्तिनाथ महामुनिको कियाहुआ नमस्कार निरंतर मेरी पीडा की शान्तिकरनेवाला और मेरेमोक्षका करनेवाला होओ। (मागधिकाउँदः) (मागहिआ) पुरिसाजइदुक्खवारणं जइस विमग्गह मुक्स- कारणं । अजिअं संर्तिच भावजओ अभयको सरणं पवज्झहा ॥६॥ (छाया) हे पुरुषाः यदि दुःखवारणं रिमायध यदि च साल्प कारण विमार्गपथ (तदा) अजितं शांति च भारतः दारगं प्रगाछत (यतः एतीही) अभयकरी खः ( परजहा ) इति दीर्घमापदान् ।
अनितशान्ति स्तवनम् ॥ (पदार्थ) (पुरिसा) हे भव्यजियो (जइ ) यदि (दुक्खवारण) दुःखोंकानाश (जइअ) और यदि (सुक्खकारण) सुख का कारण (विमगह) शोधनकरना चाहतेहो तो (अजि) अजितनाथ स्वामीको (च) और (संति) शान्तिनाथ स्वामीको ( भावओ ) भक्तिसे (सरगं) शरण (पर- झहा ) जाओ (क्योंकि ये दोनोंही ) ( अभयकरे ) अभयके करनेवाले हैं। (भावार्थ) हे भव्यजीवो यदि तुम अपने दुःोका नाश और सुखकीप्राप्ति चाहतेहो तो अजितनाथ स्वामको और शान्तिनाथस्वामीको भाक्तिपूर्वक शरण जाओ क्योंकि वे दोनोंही अभयके करनेवाले हैं। (संगतकंछंदः) (संगययं) अरइइतिमिरविरहिअ मुवरयजरमरणं । सुरअसुर- गरलभुवगवइपयय पणिवइ | अजिअमहम- विअसुनयनयनिउणमभयकरं । सरणमुवसरिअ. भुविदिविज महिमं सपयमुवणमे ॥ ७॥ . :
भजितमानित सपनन् ।
(अया)
अतिरतिनिमिगविरहितं उपग्वजगमरणं मुगमुग्गराड
मुजगपतिययनप्रणिपतिनं मुनयनयनिपुर्ण अभयकर
अपिर मुविजनिश्जिमाहितं अजित शरणं टपमृत्य सततं
उपनमे।
(पदार्थ)
( अ ) असंयममें अगी (7) मयमम पनि
(तिमिर ) अज्ञान इनसे (विगह ) गत (उपग्य)
निश्चह ( जामरणं ) जग और मग्ण जिना (गुरु)
देर ( अनुर ) अगुग्युमार (गट ) सरगंमार
(भुग) नागकुमार के (ER) पनि
(पयय ) सम्यप्रकारे ( पमिदों) मिया
है जिनको अधना (गुर ) । ( अपुर) मग
(गगर ) योनिमा ( गुनग ) ( पा) farmer
इन्होंय ( यह) स्वामी उनग (पयर ) सम्बया
(पणिरहों) नमागे, ( गार on
नगमादि सामयाँ (नप)मागे ()
पार ( अभपरं ) समय (AON)
भी (भुरिग ) मनु पाप (क) गाति i)
अजितशान्ति स्तवनम् ॥
७
पूजित ऐसे ( अजिअ ) अजितनाथस्वामीको (सरणं)
शरण ( उबसरिअ) जाकर (अहं) मैं ( सययं)
निरंतर ( उत्रणमे ) नमस्कार करताहूं।
(भावार्थ)
असंयममें अरति संयममें रति और अज्ञान इनसे
रहित, निवृत्त जरा और मरण जिनका, देव, अमुरकुमार,
मुपर्णकुमार, और नागकुमार, इन्होकेपति इन्द्रने सम्यक्
प्रकारसे प्रणिपात कियाह जिनको, अथवा देव, भन्नपात,
प्योतिक, व्यार, विद्याधर इन्होंके स्वामीने भले कारसे
नमस्कार किया जिनको, शोभन नैगमादि नयाँको
स्वीकारकरवाने में चतुर, अभयकरनेवाले, मनुष्योसे और
देग्नानामि पृशित, ऐसे अजितनाथ स्वामीको शरणागत
होकर में निरंतर नमरकारकरताहूं ।
(सोपानकछंदः)
(मेवाणय)
नं च जिणुनममुनमनितमसमपरं । अनवमदया
गंनिविमुनिममाहिनिहिं ॥ मंनिअरं पणमामि
दमुनम नित्थयां ! मंनिमाण मम गति समादियां
दिनः ॥८॥
अजितशान्ति स्तनम् ।। (छाया) उत्तमनिरतमसर (सत्व ) घरं आर्जनमार्दवक्षांतिवि. मुक्तिसमाधिनिर्वि शान्तिकरं दमोत्तमतीर्थकरं ते जिनोत्तम शातिमुनि प्रणमामि ( सः ) शान्तिमुनिः मम समाधि वर दिशतु । (पदार्थ) ( उत्तम ) श्रेष्ट ( नित्तम ) कांक्षारहित ( सच ) सत्र ( सत्त ) भावयज्ञको (धरं ) धारणकरनेवाले ( अजर ) आर्जन गायाभाव ( मद्दय ) मार्द निर. हंकारता (संति ) क्षमा (पिमुत्ति) निलोभता (समाहि) समाधि इनके (निहि ) निधि-खजीना ( संतिअरं ) आपत्तियोंके उपशमको देनेवाले ( (दम) इन्द्रिय- निग्रहसे ( उत्तम ) प्रधान (नित्य ) तीर्थ ( यरं ) करनेवाले (त) उन प्रसिद्ध (जिगुत्तम) सामान्यविलियों मैंट ऐसे (संतिमुर्णि) शान्तिमुनिको ( पणमामि ) प्रणामकरताहूं ( सैति) शान्तिनाथस्वामी ( मम ) मुझे (समाहिवर) प्रधान चिचकी सस्थताको (दिउस) देखें। (भावार्थ) श्रेष्ट तथा कांक्षारहित भाश्यज्ञको धारगकरनेवाले मायामार निरहंकारता क्षमा निर्लोभना और समाधि इन्होंने .
अजितशान्ति स्तवनम् ॥ निधि आपत्तियोंकी शान्तिको देनेवाले इन्द्रियनिग्रहहारा प्रधानतीर्थको करनेवाले ऐसे उन प्रसिद्ध सामान्यकेवलियों में श्रेष्ट शान्तिमुनिको प्रणामकरताहूं. वे शान्तिनाथ स्वामी मुझे प्रधान चित्तको स्वस्थता देखें। (चेष्टकच्छंदः) (वेट् डउ) सावत्थिपुवपत्थिवं च वरहत्थिमत्थयपसत्यवि. त्थिन्न संथिअंथिरसरिच्छवच्छं मयगयलीलायमाण वरगंधहत्थिपत्थाणपत्थि संथवारिहं । हथिहत्य- बाहुं धंतकणगस्यगनिरवहय पिंजरं पवरलक्षणो- वचियसोम्मचारुरुवं । सुइसुहमणाभिरामपरम- रमणिज वरदेवदुंदुहिनिनायमहुरयरसुभगिरं।। ९॥ (छाया) श्रावस्तीपूर्वपार्थिवं च वरहस्तिमस्तकप्रशस्तपिस्ती संस्थितं स्थिरसदृक्षवक्षसं मदकललीलायमानवर गंधहस्ति प्रस्थानप्रस्थितं संस्तबाह हस्तिहस्तया ध्मातकनकरुचक- निरुपहतपिंजरं प्रवरलक्षणोपचितसौम्यचाररूपं श्रुति मुखमनोऽमिरामपरमरमणीयबरदेवदुंदुभिनिनादमधुरतरशुम गिरम् ।
जिशान्ति स्तनम् ॥
(पदार्थ)
(सात्वि) अयोध्याके ( पुन्न) दीक्षामहणके पहिले
(पस्थिय ) गजा (च) पादपूरणे (वर) श्रेष्ट
(हत्धिमत्स्य ) हाथोकेमन्तक समान (पसत्य) प्रशस्त
और (विस्थित ) विस्तीर्ण है (संथिों) शुभसंस्थान
जिनका (विर ) कठोर और ( सरिन्छ ) अविषम है
(ब) वक्षस्थल जिनका ( मयगय ) मदयुक्त और
(लोलायमाग ) लीलाकरनेवाले ( वरगंधहत्थि) श्रेष्ट
गंधगजके ( पत्थण ) गमनके समानहै (पस्थिों)
चरणोंकीगति जिनकी (संधव ) स्तुतिके (अरिहं) योग्य
(हत्यि) हाथीकी ( हत्य) सूंडके समान, ( बाहुं)
मुजा जिनकी (धंत ) स्वतपेहुए ( कणा ) सोनेके
(रुयग ) आभूषणके समान (निरुवय ) स्वच्छ है
(पिंजरं ) पीतवर्ण जिनका (पवर ) येष्ट (लक्खण)
चक्रांझादि चिन्होंसे ( उपचिय ) युक्त और (सोम्म)
दर्शनीय (चार) मनोहरदै (पं) रूप जिनका (सुइ)
कानोंको ( मुह ) सुखदेनेवाली (मणाभिराम ) मनको-
आव्हाददेनेवाली ( परमरमगिज ) अत्यन्तरमणीय (वर)
श्रेष्ट ऐसी ( देवदंदुहि ) देशकी दुंदभिक (निनाय )
अजितशान्ति स्तवनम् ॥
नादके समानहै ( महुरयर ) अत्यन्तमधुर ( सुभगिरं )
शुभवाणी जिनकी।
(भावार्थ)
दीक्षाग्रहणके पहिले अयोध्यापुरीके गजा श्रेष्टगजके
मस्तकसमान प्रशस्त और विस्तीर्णहै शुभसंस्थान
जिन्होंका, कठोर और समानहै वक्षस्थल जिन्होंका
मदोन्मत्त और लीलाकरनेवाले श्रेष्टगंधगजके गमनके
समानहै चरणोंकीगति जिन्होंकी, स्तुतियोग्य, हाथीकी
सूडकेसमानहै भुजा जिन्होंकी अत्यन्त तपेहुएसोनेके
आभूपणसमानहै स्वच्छपीतवर्ण जिन्होंका, श्रेष्टचक्रांकुशादि
चिन्होंसेयुक्त और दर्शनीयहै मनोहररूप जिन्होंका,
कानोंको सुखदेनेवाली और मनको आल्हाददायक
अत्यन्त रमणीय और श्रेष्ट ऐसी देवोकी दुंदुभिके नाद
समानहै अतिमधुर शुभवाणी जिन्होंकी।
(रासलुधकछंदः)
(रासलुद्ध)
अजिअं जिआरिंगणं जिअसव्वभयं भवोहरिई।
पणमामि अहं पयउ पापसमेउ मे भयवं ॥ १० ॥
निशान्तिनम् ॥
(नया)
जिनागिणं जितसर्वमयं (अधम पुनरुक्तिदोषपरिहा-
रा) जारभन्यभाग भोपरिघु एतादृशं अजितं प्रयतः
अहं प्रणमामि (सः ) भागान मे पापं प्रशमयतु ।
(पदार्थ)
(जिअ ) जीतेहैं (अगिणं) अष्टकर्मरूपशा
समुदाय जिन्होंने (जिअ) संज्ञिपंचेन्द्रियजीयोंको
(समय) श्रवणकेयोग्य ऐश्वर्यजिन्होंक (भयोह)
संसारके प्रवाहके (रि) शत्रु ऐसे (अजिअं)
अजितनाथस्वामीको ( अहं ) में (पयउ ) मन वचन
कायसे ( पगमामि ) नमस्कार करताहूं वह (भयत्र)
भगगन (मे) मेरे ( पा) पापको ( पसमेउ)
मएकरो।
(भावार्थ)
जीतेह अष्टकर्मरूपशत्रुओंके समुदाय जिन्होंने संक्षि-
पंचेन्द्रियजीवोंको श्ररणयोग्यहै परम ऐश्वर्य जिन्होंका
संसारप्रवाहकेशत्रु ऐसे अजितनाथस्वामीको में मन.
वचनकाय से प्रणामकरताई वे अजितनाथभगशन मेरे
पापाको नष्टकरो।
ममितशान्ति स्तवगन् । (वेष्टकच्छन्दः) (वेइढउ) कुरुजणवयहत्यिणाउरनरीसरो पदमं तई महा- चकवट्टिभोए महप्पभावो जो बाहत्तरि पुरखरसहस्स- वरनगरनिगमजणवयवई बत्तीसारायवरसहस्साणु- आयमग्गो चउद्दसवरस्यण नवमहानिहि चउसट्टि सहस्सपवरजुर्वइणसुंदरवई चुलसीहयगयरहसय सहस्ससामी छन्नाइगामकोडिसामी आसीजो भारहम्मिभयवं ॥११॥ (छाया) यः प्रथमं कुरुजनपदहस्तिनापुरनरेश्वरः ततः महाचक्र वर्तिमोगः (आसीत् ) महाप्रभावः यः भारतक्षेत्रे भगवान् पुरवरद्वासप्ततिसहस्रवरनगरनिगमजनपदपतिः द्वात्रि शद्राजवरसहस्रानुयातमार्गः चतुर्दशवररत्ननवमहानिधि चतुःपाटिसहस्रप्रवरयुवतीनां सुन्दरपतिः चतुरशीतिहयगज रथशतसहस्रस्वामी पग्णवतिग्रामकोटिस्वामी आसीत् । (पदार्थ) (पढम) प्रथम (कुरुजगवय) कुरुदेशमै (हस्थिणाउर) हस्तिनापुरके (नरीसरो) राजाथे (तउ) अनंतर -
man
(माहि) मार्गचकराके (मार) राय पर
उपभोगविया (महापभाको ) उमवास, आत्माको
अनुजन करनेवाले (भवा) भागन ( भारमि)
भागक्षेमे (पाहतरि) महाचर (सहस्स) हज़ार (पुर)
पगले (वर) भ्रष्ट (बग्नगर) उराम गजपुर (जिसमेंटर.
मगतादी उस नगर कहना) (निगम) पनिकमहामनोंके
ग्धान (जगण्य) देशाविशेरके (4) पति (पचीसाराय.
परमहरम ) तीसहजार श्रेष्ट गनाओं से ( अशुआय)
अनुपात (मगो) मार्ग जिन्होंका (उद्दस) चौदह
(पररयग) श्रेष्टरलॉक (न३) नो (महानिहि) महानिधियों
के (पसहि सहम्स) चासटहजार (पर) सुंदर
(ण) युवतियोंके (मुंदर ) मनोहर (बई) पति
(चुलसी) चायनी ( सय ) सो (सहरस) हजार अर्थात्
घोगसी शाय (ह्य ) घोडे ( गय ) हाथी (रह) रथ
इन्हॉकस्वामी (ससदकोडि) उन्नुकोट (गाम ) गार्योदे,
(सामी) अधिपति ( आसीत ) होते हुए।
(भावार्थ)
प्रथम पुरदेशमें हस्तिनापुरके राजाय अनंतर मना.
पावचीक भोगीका उपभोगरतेहुए उत्सघोंसे आत्मानु-
भजितशान्ति स्तवनम् ॥ रंजनकरनेवाले मुंदरोलियोंसे श्रेष्ट बहोचरहजारनगरांक वणिकथानोंके और देशविशेषोंके पति वचीसहजार मुकुटधारी राजाओंसे अनुयातहै मार्गजिन्होंका चौदह श्रेष्ट रन नो महानिवि और चौंसटहजार अत्यन्तसुंदर युवतियों के मनोहरपति चोरासीलाख हाथी घोडे और स्थोंके अधिपति छानवेकोट गायोंके स्वामी ऐसे भारतक्षेत्र में भगवान होतेहुए। (रासानंदितकंछंदः) (रासानंदिअयं) (युगलं)॥ तं सन्तिं संतिकरं संतिणं सव्व- भया । संति थुणामि जिणं संति विहेउमे ॥१२॥ (छाया) शान्तिं स्वान्तिकरं सर्वभयात संतीर्ण एतादृशं तू शान्ति जिनं मे शान्तिं विधातुं स्तौमि । ( पदार्थ) (संति ) मूर्तिमान उपशम (संतिक ) अपने मोक्षलक्षणसामीप्यको (२) देनेवाले ( सव्वभया) सम्पूर्णको भयहै जिससे ऐसे मृत्युसे (संतिण) तिरेहुए और स्वभक्तोंको तिरानेवाले ऐसे (तं) उन प्रसिद्ध মিয়য়ারি হল । (जिणे ) जिनभगरान् (संति ) शान्तिनाथस्वामीकी (मे) मेरे ( संति ) उपसगोंके नाशको (बिहेउ) करनेकेलिये ( धुणामि ) स्तुतिकरताहूं। (भावार्थ) मूर्तिमान उपशम मोशलक्षणस्वसामीप्यको देनेवाले सकलभयकारफमृत्युसे तिरेहुए और स्वभक्तोंको तिराने चाले ऐसे उन प्रसिद्ध जिनभगवान शान्तिनाथस्वामीकी मेरे दुःखोंके नाशकेहेतु मैं स्तुतिकरताहूं। (चित्रलेखाछंदः) (चित्तलेहा) इस्खाग विदेहनरीसर नरवसहा मुणिवसहा । नवसारपससिसकलाणण विगयतमा विहुयरया ॥ अजिउत्तमतेअगुणेहि महामुणिअमिअबला । वि. उलकुला पणमामि ते भवभयमुरण जगसरणा मम सरणं ॥ १३॥ (छाया) हे ऐनाक हे विदेहनरेश्वर हे नरपन हे मुनिवृषभ हे नवशारदसकलशयानन (भाषायां सकलशब्दस्य पानिपात आपसात ) अथवा नवशारदशशिसालानन
२२
अजित शान्ति स्तवनम् ॥
(शारदशशिवत् सकलं दीप्तिसहित आननंयस्य) हे
विगततमः हे विधूतरजः हेगुणैः उत्तमतेजःहे महामुन्यमित
चल हे विपुलकुल हे अजित तुभ्यं अहं प्रणमामि हे
भवभयमूरण हे जगच्छरण (वं) मम शरणं असि ।
( पदार्थ)
( इक्खाग) हे इक्ष्वाकुकुलोद्भव (विदेहनरीसर)
हे विदेहजनपदाधिपति ( नरवसहा ) हे मनुष्योंमें श्रेष्ट
(मुणिवसहा) हे मुनियोंमें श्रेष्ट (नव) उदयमान (सारय)
शरत्कालिक (सकल) सोलहकलाओंसे परिपूर्ण (ससि)
चन्द्रमाके समानहै ( आणण ) मुखजिनका (विगय)
मष्टहोगयाहै (तम) अज्ञानरूप अंधकार जिनका (पिहुय)
धुलगए हैं (रज) कर्मरूप दोष जिनके (गुणोह) सद्गुणों से
( उत्तमतेअ ) श्रेष्ट, तेज जिनका (महमुणि)
महामुनियाँसमी (आमिअपला ) अत्यन्त अधिक है बल
जिनका (विउलकुला) विस्तीर्णही वंशजिनका (अजिअ)
हे आजितनाथस्वामी (ते) आपको (पणमामि) में
नमस्कारकरताहूं (भवमय) सांसारिक भयको ( मूरण)
नष्टकरनेवाले (जगसरण) हे जगतको आश्रयदेनेवाले
( मम ) मेरे ( सरण ) रक्षक हो ।
म् ॥ (भावार्थ) लोरोटिनगरक नरपति, हे मनुष्यों में श्रेय मुनियाँम उचम, हे शन्दकालिक उदयहोने दाद, सोयापासपरिपूर्ण पांदके समान मुखबाले, हे अमानरुपअंधकास रहित, धुन्टगयेह यदकर्मरूपरज जिनके, सगुणोंगे श्रेष्ट वेज मिना, महामुनियोंसे भी अन्यन्त अधिक है पलजिनका, विस्तीर्णहे यश जिनका, गे हे अजिनाथस्वामी में आपको नमस्कारफरताई हे सांसारिकजन्ममरणरूपभयको नाराहरनेवाले हे जगतको आप्रवदेनशाले आप मेरे संरक्षकहो । (नाराचकल्छंदः) (नारायः) देवदाणविंदचंदमूखंद हतुरजिष्टपरमल रूप धंतरम्पपट्टसयमुद्धनिद्धधवलदंतपंति संति सनिकित्तिमुनिजुत्तिगुत्तिपवर दित्ततेअवंद धेअ सूचलोअभाविअप्पभावणे. पइस मे समा. हिं ॥ १४॥ (माया) हे देवदानवेन्दचन्दसूर्यवन्य हे हृष्टतुष्टज्येष्टपरमलपितरूप
अजितशान्ति स्तवनम् ।।
हे मातरूप्यपट्टश्रेयशुद्धस्निग्धघकलंदतपत्रे हे शक्ति
कीर्तिमुक्तियुक्तिगुप्ति प्रकर हे दीप्ततेजोवृन्द हे ध्येय हे
सर्वलोकमावितप्रभावज्ञये हे शान्ते मे समायें प्रदिश।
(पदार्थ)
( देव दाणविद ) देव और दानवोंके इन्द्रसे
(चन्द) द्वादशचंद्रोसे (सूर ) द्वादश सूर्योसे (वंद)
वंद्य (छ) रोगरहित (तह) प्रीतिको उत्पन्नकरनेवाला
(जिठ ) अति प्रख्यात ( परमलह ) अत्यन्तसुंदरहै
(रूब) रूपजिनका (धत ) देवीप्यमान (रूप्प )
चान्दिके ( पठ्ठ) पात्रके समान (सेय) धन (सुद्ध)
निर्मल (निड ) अरुक्ष (धवल ) सफेद (दंतपंति )
दांतोंकीपंक्तिहै जिनकी ( सत्ति ) सामर्थ्य (किति)
कीर्ति (मुचि) निर्लोभता ( जुचि ) न्याययुक्तवचन
(गुति ) रक्षण इन्हेंसि (पर) श्रेष्ट ( दित्त )
देदीप्यमान (ते) तेजके (बंद) समूह (भ)
घ्यानकेयोग्य ( सच ) सम्पूर्ण ( लोग ) लोगोंसे
(मावित्र) ज्ञात (पभाव ) माहास्यसे । (अ)
जाननेलायक ( संति ) हे शान्तिनाथस्वामी (मे) मुझे
(समाहिं ) अंतःकरणको स्वस्थता (पइस ) देओ।
भनिगशातिनम् ॥ (भाषा) देव और दानवोंके इन्दसे द्वादश सूर्योसे और द्वादश चन्द्रमाओंसे धन्दना कियेगए, रोगरहित, प्रीतिको उपन करनेगला अतिप्रख्यात और परमसुन्दर है स्वरूप जिनका, पेदीप्यमान चांदीके पानसमान धन निर्मल अरुक्ष और सफेद है दांतोंकी पंक्तियां जिनकी, शक्तिसे कीतिसे निमितासे न्याययुक्त यचनोंसे अत्यन्त श्रेष्ट, प्रकाशमान तेजकेसमूह रूप, ध्यानकेयोग्य, सब लोगोंमें प्रख्यात महास्यसे जाननेलायक, ऐसे हे शान्तिनाथस्थामी, आप मुझे अन्तःकरणकी स्वस्थता देओ। (कुसुमलताउंदः) । कुसुमलया । ॥ युगलं॥ विमलससिकलाइरेअसोग्मं । वितिमिरसूरकराइ- रेअतेअं॥ तिअप्सवइगणाइरेअख्खं । धरणिधाप्प पराइरेअसारं ॥ १५॥ (छाया) विमल शशिकलातिरेकसीभ्यं शितिमिरसूर्यकरातिरेश- तेजसं विदशपतिगणातिरेकरूपं धरणिधरप्रवरातिरेकसारम।
अजितशान्ति स्तवनम् ॥
(पदार्थ)
(विमल) निर्मल (ससिकला ) चन्द्रकलासे भी
( अरेज) आधिक है (सोम्म) सौंदर्य जिनका
( वितिमिर ) मेघरहित (सूरकर ) सूर्यकिरणांसे भी
(अइरेअ) अधिकहै (तेअं) तेज जिनका (तिअसवइ)
इन्द्रोंके (गण) समुदायसे नी ( अइरेअ ) अधिक है
(स्वं) स्वरूप जिनका (धरणियर) पर्वती (प्पवर )
श्रेष्ट जो मेरुपर्वत उससे भी ( अइरेअ ) अधिक है
(सारं ) स्थिरता जिनकी ।
( भावार्थ)
निर्मल चन्द्रकलासे भी आधिकतर है सौंदर्य जिनका,
मेघरहित सूर्यकिरणोंसे भी अधिकतर है तेज जिनका,
देवताओंके पति इन्द्रादिकों के समूहसे भी अधिक है
स्वरूपजिनका, पर्वतोंमें श्रेष्टतम सुमेरुपर्वतसे भी अधिक
है स्थिरता जिनकी।
(भुजंगपरिरिंगितछंदः)
(भुअगपरिरिंगिअं)
सत्तेज सया अजिअं सारीरेअ चले अजिथे।
अलिशान रनम् ॥ गरसेंजमेज अजिों एस अहं थुणामि जिणं अंजि॥ १६ ॥ (छाया) सत्ये सदा अजित शारीरे चले अजितम् तपःसंयमे अजितं ( एतादृशं ) अजित जिनं एपः अहं स्तोमि ।। (पदार्थ) (स) व्यवसायमें (सया) निरंतर (अजिभ) न जीते जानेवाले ( सारीरअ) शरीरके (यले ) बलमें ( अजिन) न जीते जानेवाले (तर) यारह प्रकार के तपमें और (सेजमे) सतरह प्रकारके संयम (आज) न जीतेजानेवाले ऐसे (जिणं ) जिनभगवान (अजि) अजितनाथ स्वामीकी (एस) यह (अहं) में (थुणामि) स्तुति करताहूं। (भावार्थ) उद्योगमें सर्वकाल न किसीसे जीते जानेवाले देह संबंधी चलमें भी न किसीसे जीतेजानेवाले बारह प्रकार के तप और सतरह प्रकारके संयममें भी अजित ऐसे जिनमगरान अजितनाथ स्वामीकी यह मैं स्तुति करताहूं।
२८ अजिनशान्ति मानन् । (सिजितकलंदः) । सिनिययं ।। सोम्मगुणेहिं पायइ नतं नवसारयमसी । ने. मगुणेहि पावइनतं नवसरयरखी ॥ स्वगुणेहि पावइनतं तिअसगणबई । सारगुणहि पावइनतं धरणिधरवई ॥१०॥ (छाया) नवशारदशशी सौम्यगुणैः तं न प्राप्नोति नवशरद्रविः तेजोगुणः तं न प्राप्नोति त्रिदशगणपतिः रूपगुणः तं न प्राप्नोति धरणिधरपतिः सारगुणैः तं न प्राप्नोति । (पदार्थ) (नव ) उदयहोनेवाला ( सारय ) शादऋतु संबंधी ( ससी ) चांद (सोम्नगुणेहि ) आल्हादकत्वादि गुणोंसे (तं) आजितनाथ स्वामीको (न) नहीं (पावइ) प्राप्त होसकता ( नव ) नया (सरय) शरत्काल संबंधी (वी) सूर्य (तेअगुणेहि ) प्रचंडतापादि गुणस (त) अजितनाथ स्वामीको (न) नहीं (पावइ ) प्राप्त होसकता (तिअस ) देवताओंके (गग ) समुदायका (वई) पति इन्द्र (रूव गुणहि ) सौंदर्यादि गुणों .
रविशन्ति स्तनम् ॥
(d) अजितनाथ स्वामीको (न) नहीं ( पाइ)
प्राप्त होतकता ( घरणिधर ) पतीका (ई) पति
सुमेरुपर्वत ( सारगुणेहिं ) स्थैर्यादि गुणोंसे (त)
अजितनाप स्वामीको (न) नहीं (पावइ) प्राप्त
होसकता।
{ भावार्थ)
उदय होनेवाला शरदस्तुका चांद अपने आल्हादकः
स्वादि गुणोंसें अजितनाथ स्वामीकी यरायरी नहीं कर
समता, नया शरतत्कालिक सूर्य अपने प्रचण्ड तापादि
गुणोंसे अजितनाप स्वामी की पराधरी नहीं करसकता,
देवोंका पति इन्द्र भी अपने सौंदर्यादि गुणोंसे अजित.
नाय स्वामी की घरापरी नहीं करसकता, तथा पर्वतोंका
स्वामी मेरुपर्वत भी अपने निश्चलतादि गुणोंसे अजित
नाथ स्वामी की बराबरी नहीं करसकता ।
(ललितकंछंदः)
(ललिअयं)
तिथवरपबत्तयं तमरयरहियं धीरजणथुअमि
चुअकालिकलुसं । संतिसुहपवत्तयं, तिगरणपयओं
संति महं महामुणिं सरणमुवणमे ।। १०॥.
अजित शान्ति स्तवनम् ॥ (छाया) । तीर्थवरप्रवर्तकं तमोरजोरहितं . धीरजनस्तुताचिंतं युतकलिकलुपं शांतिसुखप्रवृत्तदं (अथवा ) शांतिसुख प्रवृत्तकं त्रिकरणः (मनोवाकायैः) प्रयतः अहं महामुनि शान्तिं शरणं उपनमे. (शांतिसुखप्रवृत्तान् दयते पाल- यति स शान्तिसुखप्रवृत्चदः तम्) (पदार्थ) (तिस्थवर ) सकल तीर्थोसें श्रेष्ट तर्थिको (पवत्तयं) प्रवृत्त करनेवाले (तम ) तमोगुण और (रय) रजोगुण से ( रहिय ) रहित (धरिजण ) पण्डितजनों से (थुअधिों) स्तुति कियेगये और पुप्पोंसे पूजित (चुअ) नष्ट होगयाहै (कलिकलुसं ) पैर और 'मनका मेलापन जिनका (संतिसुह) मोक्षसुखमें (पवत्त) लगेहुए जोंको (य) पालन करनेवाले ऐसे (महामुर्णि) महामुनि ( संति ) शान्तिनाथ स्वामी को (तिगरण) मन वचन कायसे (पयओ) पवित्र होकर ( सरणं) शरण ( उपणमे ) जाताहूं। (भावार्थ) श्रेष्ट चतुर्वण संघको प्रवृत्त करनेवाले, तमोगुण और सजिनशाना सपना ॥ रजोगुगसे गहत, पग्रितजनीने याणीसे स्तुति की है जिनकी मोशमुखाचा, लोगोंको रक्षण करनेवाले से महामुनि शान्तिनाथ स्वामीको मन वचन कायसे उत्कंठित होकर में शरण जाताहूं। (किसलयमालदः) । किसलएमाला । विशेषकं ।। विणओणयसिरसइअंजलिरिसिगणसंथुअंथिमिों विहाहिवधणवइनरवड्युपमहिअनिअंबहुसो अइ- रुग्गय सरपदिवायरस महिअ सप्पभंतवसा गगणं. गणविदरणसमुइअचारणवंदिअं सिरसा ।। १९ ११ (छाया) विनयापनतशिरोरचितांजलि अपिगणसंस्तुतम् स्तिमितं शिशुधाधिपधनपतिनरपतिभिः क्रमेण स्तुतं महितं बहुशः अनितं. तपसा अचिरोदतशरदिशकारसमधिकस्वप्रमं शिरसा गगनांगणविरहणसमुदितचारणवंदितम् । (पदार्थ) (विणभोणय ) विनयसे शुरुहुए (सिर ) मस्तकों पर (२६) रचित हैं (अंजलि) अंजलि जिन्होंने
३२
भजितशान्ति स्तवनम् ।।
(रिसिंगण) ऐसे ऋपियोंके समुदायने (संयु) स्तुतिकी
है जिनकी, (थिमिभं) निश्चयसे (विचुहाहित ) इन्द्र
(घणवइ) घनदादिलोकपाल और ( नरवइ ) राजाओंने
(थुय ) स्तुति की है जिनकी ( महि) पूजा की है
जिनकी (बहुसो ) अनेकपार ( अचिों) पुष्पादिकों
से अर्चनाकी है जिनकी, (तबसा) तपभार्यासे (अइरुग्णय)
तत्काल उगाहुआ ( सरयदिवायर ) शरतकालिक सूर्य
से ( समहिअ ) अधिकहै ( सप्पभं ) स्वकीय कान्ति
जिनकी, (सिरसा ) मस्तकसे (गगणंगण ) भाकाश
में (विरहण ) संचारसे (समुइभ) समुक्ति (चारण)
जंघाचारणादि मुनियोंने ( वदिभ) वन्दन किया है
जिनको ।
(भावार्थ)
विनयमे शुरेहुए मस्तकों पर अंजलियां रख प्रापियों
ने ग्नुति की है जिनकी, देवाधिपति इन्दने अपनी
धनीहारा निधयपूर्वक स्तुति की है जिनसी, धनदादि
टोपालने प्रगानादिकों से पूना की है जिनकी, और
गाने पुमादि न्यास अनेकार अर्चना की है
सनरी सोनार स्यानागरबाट
भाजतातान्ति स्थानम् ॥ के सूर्य से भी अधिक है स्वकान्ति जिनकी, आकाश में विहार करनेशले अंपाचारणादि मुनियोंने स्वमस्तक से वंदना की है जिनको। (सुमुखंउंदः) । मुमुहं ॥ असुरगरलपरिवदि किनरोरगणमं सिगदेव कोडिसपसंथुयं समणसंचपरिवदिरं ॥२०॥ (छाया) असुरगरुड परिवदितं किन्नरोग नमस्थितं देवकोटिशत संरतुतं श्रमणसंघपरिवदितम् । (पदार्थ) ( असुर ) असुरकुमार (गरल ) सुपर्णकुमारादि भवनवाती देवताओने (परि) आसपसआकर (वैदिक) वंदन किया है जिनको, (किनरोग ) किलर निकाय और व्यंजरनिकाय जातीके देवताओने (णमंति) नमन किया जिनको, (देवकोडिसय) त्सोकोट देवताओं ने (संधुयं ) स्तुति कीहैं जिनकी, ( समग ) साधुओं ने और (संघ) श्राक भाविकाओंने (परिमंदिरं) नयन रियाह जिनका. ( समणसंधः साधुसमुदाय)
अजितशान्ति स्तवनम् ॥
(भावार्थ)
असुरफुमार सुपर्णकुमार और भवनासी देवताओंने
आसपास आकर वंदनकिया है जिनको, किन्नरनिकाय
और व्यंतरनिकाय के देवताओंने नमस्कार किया है
जिनको, सोकोट देवताओंने तथा साधु साध्वी श्रावक
श्राविकाओं ने स्तुति की है जिनकी ।
(विद्युद्धिलसितच्छंदः)
। विजविलसि॥
अभयं अणहं अरयं अरुजं अजिअं अजिअं
पयओ पणमे ।। २१ ॥
(छाया)
अनयं अनां अरतं अराजं अजितं अजित पदतः
प्रणमामि ( पदतः पादयो आधादित्यात्तस् )।
(पदार्थ)
( अनय ) सतावमय रहित ( अगई ) पापरहिम
(अरयं ) आसक्तिरहित (अगज) रोगरहित (अजि।)
कामक्रोधादि शत्रुओंसे अनभिभूत एसे (अजि)
सामी के ( पयओ) मगाम ( पणमे)
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শনিবার দুপৰু ৷৷
आये हुए, (संसभमो ) जलदीसे (अरण ) आकाशसे
उतरने से (वखुमिअ ) संचलित (लुलिअ ) लुलित
(चल) चंचल ऐसे (कुंडल) कानके आभूपग
( अंगय) पाहुभूपण (किरीड) मुकुटों से ( सोहंत)
शोभायमान है ( मउलिनाला ) शिरपंक्ति जिन्होंकी ।
(भावार्थ)
श्रेष्ट विमान सुन्दर सोनेकेरय और घोडे इत्यादि
वाहनों से शीघ्रही आये हुए और जलदी आकाश से
टरनेसे चलायमान लुलित और चंचल ऐसे कुण्डल
बाहुभषण और मुकूटों से शोभायमान है शिः पंक्ति
जिन्होंकी।
(रत्नमालाच्छंदः)
रयणमाला
जं मुरमंचा सासुरसंघा वेरविउत्ता भत्तिमुजुत्ता
आयरभसिअसं भमपिहिममुठमुषिन्हिमसव्य-
बलोचा । उनमकंचणस्यणपसविसभामुरभूपणभा
मुरिगंगा गायममोणय भनिवसागय पंजलिये
मिअमीमपणामा ॥ २३ ॥
EिIRATRE
(माया)
पर पियुना भारी मयुगाः आदरभावित संभ्रमपिडित
गुष्टुमुकिरिमासयोधाः ক্যামবিলা-
स्वरभषणमारयनिदा गानसमानाभारवगतमांजलि.
प्रक्निशिप्रगामा: Vaarसासुरसंघाः सुरसंपाः
प्रति
(पदार्थ)
(रविडसा) शतासे रहित (भचिमुजुचा )
सद्भात सहित (आयर ) पायोपचारसे ( भासिज )
भाषित ( संभम ) सत्वर (विडिअ ) मिलेहुए (स)
अपर्य ( मुविम्हि ) आमर्पयुक्त है ( सन्चक्लोषा)
सम्पूर्ण वाहनादि समुशाय जिन्होंफा, (उजम) देदीप्यमान
(पंच) मुरण और ( रयण ) ग्लोसे (परुविध)
कियहुए ( भासुर ) प्रकाशमान (भूसण ) अलंकारोंसे
( भासुर ) मुशोभित है ( अंगा) अंग जिन्होंके
गाय ) गात्रसे ( समोणय ) सम्यक् नमेहुए और
(मारी ) भाक्तिके (यसागप) यशीभूत ( पंजलि )
साटपर स्थापित किएहुए मुफलाति हस्तयुगलहारा
पिसिभ किया है (ससिपणामा ) मस्तपसे प्रणाम
अजितशान्ति स्तयनम् ॥ जिन्होंने, ऐसे ( सासुरसंघाः) अमुर देवताओंके संघ के साथ ( सुरसंवा ) सुर देवताओंके संघ । (भावार्थ) • वैरभावसे रहित, भक्तिपूर्वक बाह्योपचारसे भूपित सत्वर मिलेहुए अत्यन्त आश्चर्ययुक्त हैं सैन्य समुदाय जिन्होंके, उत्तम सुवर्णमय और रत्नजटित देदीप्यमान अलंकारों से सुशोभित हैं अंग जिन्होंके, शरीरसे भली भांति झुके हुए अत्यन्त प्रेमके वशीभूत होकर हाथजोड किया है प्रणाम जिन्होंने ऐसे असुर देवता और सुर देवताओं का संघ । (क्षिप्तकच्छंदः) ॥ खित्तिअं॥ चंदिळण थोऊण तो जिणं तिगुणमेव य पुणो पयाहिणं । पणमिऊण य जिणं सुरासुरा पमुइआ सभवणाई तो गया ॥ २४ ॥ (छाया) (ते) सुरासुरा जिनं पंदित्वा च (वाग्भिः) स्तुत्वा ततः त्रिगुणं प्रदक्षिणं ( कृत्वा ) ( स्वस्थानगम- नावसरे ) पुनरपि (तं) जिनं प्रणम्य प्रमुदिताः सन्तः ततः स्वभवनानि गताः।
भतिशान्ति स्तनम् ॥ ( पदार्थ) (सुरासुरा) सुर और असुर देशा (जिणं) जिनभगवानको ( यदिऊण ) चन्दन कर (थोऊण ) पाणी से स्तुति कर (तो) अनंतर (तिगुणमेव) तीनही ( पयाहिणं) प्रदक्षिणा (कर) (य) और (पुणो) फिर (जिर्ण) जिनभगवान फो (पणमिऊण) प्रणामकर ( पमुआ) अत्यन्त हर्षित होकर (तो) अनंतर ( सभवणाई ) स्वभवनको (गया) गए। (भावार्थ) और असुर देवता जिन भगवान को वंदन कर और वाणीसे स्तुति कर अनंतर तीन प्रदक्षिणा कर अपने अपने घर जानेके समय फिर भगानको प्रगार कर अत्यन्त हर्पित हो अपने अपने पर गए । (क्षिप्तकंछंदः) ॥ खित्तयं ॥ तं महामुणिमहंपिपंजली रागदेसभयमोह वजिअं । देवदाणव नरिंदबंदिशं संति मुत्तम. महातवं नमे ॥ २५॥ ..
गतिमानम् ॥
---
(सागा)
गगवेगमयमोहनि देवदानानगेन्द्रशान्नित उत्तम मा
तासं तं महामुनि शान्तिनायं अहमपि प्रांजलि:
सन् नमे |
(पदार्थ)
(राग) प्रीति (दम) द्वेष (भय) टर ( मोह ) अज्ञान
इन्होंस (पजि) रहित (देश) देता (दान) और दानर
(नदि) राजाओं मे (दि) नमस्ता अथर (देवदाना-
नरिंद) अलोकवासी अधोलोकवासी मध्यलोम्यासी जीवों
के (संदिअं) कारागृह को नाश करनेवाले (उत्तममहात)
उचम और दीम तपार्यावाले ( महामुणि) महामुनि
(संति) शान्तिनाथ स्वाम.को ( अहवि ) में भी
(पंजली) हाथजोडकर (नमे) नमस्कार करताहूं।
(भावार्थ)
रागद्वेपभय और मोहसे रहित, देवदानव और राजाओं
ने नमस्कार किया है जिनको, अथवा तीनों लोक के
जीवोंके संसाररूप कारागृह को तोडनेवाले, श्रेष्ठ तथा दधि
तपोबलधारी महामुनि शान्तिनाथ स्वामी को मैं भी
हाथ जोडकर नमस्कार करताहूं!.:; ..,
११
अजितान्ति सागम् ॥
(चतुर्भिकलाप)
(दीपकंछंदः)
॥ दीवयं ॥
अंबरंतर विआरणिआर्हि ललिअहंसबहुगामिणि
आहि । पीणसोणथणसालणिआहिं सकलकमल.
दललोआणिआहे ।। २६ ॥
(छाया)
अंबरंतरपिहारिणीभिः ललितहंसवधुगामिनीभिः पीन
श्रोणिस्तनशालिनीभिः सकटकमलदललोचनाभिः ।
(पदार्थ)
( अंबरंतर ) आकाशमार्गमें ( विआराणिआहिं ) .
संचार करने वाली ( ललिअ ) सुन्दर ( हंसबहू ) इंस
पक्षी की स्त्री के समान ( गामिणिआहिं ) गमन करने
बाली (पीग) पुष्ट ( सोण ) नितंब और ( थण )
तनों से ( सालणिआहिं ) शोभायमान (सकल)
पूर्ण (कमलदल) कमलपत्रके समान हैं (लोआणिआहिं)
व जिन्होंके।
(भावार्थ)
आकाश मार्ग में संचार करनेवाली, सुन्दर हंस पक्षी
Pravah
१२ भनिगानिमानम् ॥ की स्त्री के समान गमन कग्नंगली, मांसल नितंय और. रतनों से शोभायमान, सम्पूर्ण कमलपत्र के समान है नेत्र जिन्होंने ऐसी। (चित्रासराछंदः) चित्तासरा॥ पीणनिरंतरथणभरविणमिअगायलयाहि । मणि कंचणपसिदिलमेहलसोहिअसोणितडाहि ॥ वर- खिसिणिनेउग्मानिलयवलयविभूसाणआहिं रहकरचउरमणोहरसुंदरदंसाणिआहि ॥ २० ॥ (छाया) पाननिरंतरस्तनभरक्निमितगारलताभिः मणिकांचन प्रशिथिलमेखलशोभितश्रोणीतटामिः वरकिंकिणीनूपुर सत्तिलकवलयाविभूषणाभिः रतिकरचतुरमनोहरसुंदर. 1. दर्शनाभि । (पदार्थ) (पीण ) मांसल (निरंतर ) अन्तररहित (थण ) स्तनोंके (भर) भारसे (विणमिअ) नन, (गायलयाहि) गावलता जिन्होंकी ( मणि) हीरेमाणिक और (कंचण) सोनेके ( पसिढिल ) प्रशिथिल ( मेहल) मेखलाओंसे
अमितान्ति सनम् ॥
(सोहअ) मुशोभित हैं ( सोगितडाह) नितंबतट
जिन्होंके (वर) श्रेष्ट (सिखिणि) पावोंके धूपरे और
( नेउर) नूपुर (सचिलय) सुन्दर तिलक ( वलय)
कंकण इसादि हैं (विभूमाणिआहि ) आभूपग जिन्होंके
( रइकर ) प्रीति उत्पनकरनेवाले (चर) चतुरों के
(मगोहर ) मनको आकर्षग करनेवाले (संदर)
रमणीय है ( दसणिआहि ) दर्शन जिन्होंके ।
(भावार्थ)
मांसल अन्तररहित स्तनोंके भारसे नम्र है गाला
जिन्हों की हारे माणिक और सोनेके प्रविधिल मेखलाओं
से सुशोभित है नितंबाट जिन्होंके, सुन्दर पारि
घूघरे, नपुर, उत्तमतिलक और करुण इत्यादि आभूपग
है जिन्होंके. प्रीति उत्पन करनेवाले, चतुर पुरषों के
अन्तःकरण को आकर्षग करनेवाले और असन्तरमणीय
है दर्शन जिन्होंके।
(नाराचकउंदः)
। नारायजओ।
देवमुंदरी हिं पायवादिआई वदिआ प जस्म से
मुक्किमकमा अपणो भिडाएहि मंडणोदुणप
अजितशान्ति स्तवनम् ॥ गारगाह केहि केहि वि अवंगतिलयपत्तलेहनाम एहिं चिल्लएहि संगयं गयाहिं भत्तिसंनिविठ्ठवंदणा गयाहिं हुँति ते वंदिआ पुणो पुणो ॥ २८ ॥ (छाया) कैकरप्यपांगतिलकपत्रलेखनामभिः चिल्लगैः मण्डनो दुणप्रकारकैः संगताड़काभिः पावृन्दाभिः 'देवसुदरीभिः यस्य तौ सुविक्रमौ क्रमौ वन्दितौ च भक्तिसन्निविष्टबन्द- नागताभिः ( देवसुन्दरीभिः) आत्मनः ललाटकैती क्रमी पुनःपुनर्वन्दिनौ भवतः (चिछगैः चित्तं लगन्तीति चिल्लगाः तैः चिल्लगैः अतिरम्यरित्यर्थः) । (पदार्थ) ( केहि केहि ) वे अपूर्व (वि) भी ( अवंग) नेत्रोंमें काजलकी रचना (तिलय ) तिलक (पत्तलेह) कस्तूरी की स्तनोंपर विशेष रचना इत्यादि (नामएहि ) नाम हैं जिन्होंके (चिल्लरहि ) अतिरम्य (मण्डण ) आभूपोंकी ( उदुण ) रचनाओं के ( पगारएहिं) प्रकार से (संग) युक्त (अंगयाहिं ) शरीर जिन्हों का ऐसी (पाय ) शरीर के अथवा आभूषगोंके किरणो के (यदिआदि) समुदाय है जिन्होंपर एसी (मुंदरीदि) ---
अजितशान्ति स्तवनम् ।।
१५
देवांगनाओंसे (जस्स) जिनभगवानके (ते) वे प्रसिद्ध
(सुविधमा ) अत्यन्त पराक्रमशाली ( कमा ) चरण
(वन्दिआ) बन्दना कियेगए (य) और ( भाचे )
अत्यन्त प्रेमसे (संनिवि ) व्याप्त ( बंदण) नमस्कार
के हेतु ( आगयाहिं ) आई हुई देवांगनाओं से
( अप्पणो) अपने (निडालहि ) प्रशस्त ललाटासे
(ते) वे चरण ( पुणो पुणो ) वारयार (बन्दिमा )
वन्दित ( हुन्ति ) होतेहैं।
(भावार्थ)
अपूर्व अपांग तिलक और पत्रलेख इलादि नामों से
विख्यातरचनाओंसे और आभूपोंकी रचनाओंके प्रकार
से भर्पित है शरीर जिन्होंके और आभूषणोंके फिरणोंसे
मण्डित ऐसी देवाड़नाओंने जिनभगवान के पराक्रम शाली
चरणोंको वन्दन किया आर अत्यन्त प्रेमसे प्रपूरित
नमस्कारके हेतु फिर आईहुई देवांगनाओंने उन चरणों
को बारबार नमस्कार किया।
(नंदितकलंदः)
मंदिअयम् ॥
तमहं जिणचंदं आजि जिअमोहं भुपसल
किलेसं पयओ पणमामि ।। २९ ॥
भजितशान्ति
स्तवनम्
U
(छाया)
जिनचन्द्र जितमोहं धुतसर्वक्लेशं तं अजितं प्रयतःअहं
प्रणमामि ।
(पदार्थ)
(जिणचंदं ) सामान्य केवलियों में चांदके समान
(जियमोहं ) जीतलिये हैं सांसारिकमोह जिनने (धुय)
घोडाले हैं ( सव्व ) सम्पूर्ण (किलेसं ) क्लेश जिनने
ऐसे (तं) प्रसिद्ध (अजिअं) अजितनाथ स्वामी
को ( पयओ) पवित्र होकर ( अहं) में (पणमामि)
नमस्कार करताहूं।
(भावार्थ)
सामान्य केवलियोंमें चांदके समान जीतालिये हैं
सांसारिक मोह जिनने घोडालेह सम्पूर्ण क्लेश जिनने ऐसे
वे प्रसिद्ध अजितनाथ स्वामीको में पवित्र होकर नमस्कार
करता।
(भासुरकंछंदः)
युगलं
थुयवंदिअस्सा रिसिगणदेवगणेहिं तो देववहर्हि
पयओ पणमिअस्सा । जस्स जगुत्तमसासणयस्सा
भत्निवसागयापिडिअयाहिं देववरच्छरसा बहुयाहिं
सुरवसइ गुणपण्डिअयाहिं ॥३०॥
নিয়ে যান ॥
१७
(छाया)
भक्तिवशागतपिडितकाभिः देववरासंबहुकाभिः सुरवर
रतिगुणपण्डितकाभिः देवरभूमिः प्रयत का पदयोः प्रणतकरय
जास्यजगदुचमशासनस्य तौ (कमी) ऋषिगणदेवगणैः
स्तुतवन्दिती।
( पदार्थ)
(भचिवसागय ) भक्तिवाहोकर देवलोकसे माकर
(पिंडिअयाहिं ) मिलीहुई ( देवयर ) नृत्यकलाम श्रेष्ट
देव और ( अश्चरसा ) अपसराओंका (यहुयाहि)
समुदायोंसे ( सुखर ) श्रेष्ट देवताओंकी (द) प्रीति
के उत्पादक (गुण) गुणोंमें (पंडिआह) निपुण
( देववहहिं ) देशंगनाओंसे ( पयओ ) सम्यक् अधा
( चरणोंमें ) ( पणमिअरसा ) नमस्कृत ऐसे (जरस)
मोक्षके हेतु ( जम्) जगतमें ( उत्तम ) श्रेष्टहै
(सासणयरसा ) शासन जिनका ऐसे ( अरसा जिन
भगवान के (तो) वे प्रसिद्ध चरण (रिसिगण)
अपिगों से और ( देवगणोहिं ) देवगणों से (य)
स्तुति कियेगए और ( वैदि) वंदना रियगए
अजितशान्ति स्तवनम् ॥ (भावार्थ) गान और चादनकला में निपुण, देवोंके साथ भाक्त- चश होकर देवलोक से आकर मिलीहुई अप्सराओंसे, और श्रेष्ट देवताओंकी प्रीतिको बढ़ानेवालेगुणोंमें पण्डित, ऐसी देवाङ्गनाओंसे सम्यक् नमस्कृत और मोक्षसुखकें हेतु जगतमें श्रेयह शासन जिनका ऐसे जिनभगवानके चरण ऋषि और देवगोंसे पंदन कियेगए और स्तुति कियेगए। (नाराचकछंदः) ॥ नारायउ॥ वंससद्द तंतितालमेलिए तिउक्खराभिरामसद्द- मीसए कएअ सुइसमाणणेअ सुद्धसजगीअपाय- जालघंटिआहिं | वलयमेहलाकलावनेउराभिराम सहमीसए कए अ देवनट्टिआर्हि हावभाव- विन्भमपगारएहिं।।नचिऊण अंगहारएहि वंदिआ य 'जस्स ते सुविकमा कमा त यं तिलोय 1 सच सत्त संतिकारयं । पसंतसन्चपावदोप मेसहं नमामि संत्ति मुत्तमं जिणं !! ३१ !!
अजितशान्ति स्तवनम् ॥ १९ (छाया) वंशशब्दतंत्रीतालमिलिते त्रिपुष्कराभिरामशब्दभित्रके कृते चश्रुतिसमानने कृते शुक्ष्पट्जगीतपादजालघटिकामिः उपलक्षित यलयमेखलाकलापनपुराभिरामशब्दमिश्रके कृते (सति) हावभावविभूमप्रकारकैः अङ्गहारैः नर्तित्वा देवनर्तकीभिः यस्य ती मुविक्रमौक्रमी वन्दिती तं त्रिलोकसर्वशान्तिकारकं प्रशान्तसर्वपापदाप उचम जिनं शान्तिनामानं एप अहं नमामि । (पदार्थ) (स सह) यांसुरी की धनि (तति) वीणा और (ताल ) तालसे (मेलिए) मिलेहुए (तिउक्खर ) आतोचवाय, दर्दुरट, और मुरज इन्होंके मुखके (अभिराम ) मधुर (सद्द ) शब्द से (मीसए) मिश्रित (कए) किंयेसते (अ) और (मुई) संगीत शास्त्रोक ध्रुतियोंका (पमाणणे) सभीकरण कियेसते (अ) और ( सुध) शुद (सज्ज) पहज- स्वरसे (गीअ) गीतकेसाथ (पायजालपटिआदि) वोंमें किंकिणियाओंसे उपलक्षित और (घट्य) कंकण मेहला ) कंदोरा (कलाव) भूपण, और ( नेउर)
भनितशामिन
स्तमनमू
नूपुर इन्होंके (अभिराम ) मनोहर (सह) शब्दसि
(मीसए ) मिश्रित (कए ) कियेसते (म) और
(हाव ) बहुतकाम विकार (भाव) थोडा विकाराभिप्राय
(विभम ) विलास ये हैं ( पगारएहिं) प्रकार जिसमें
ऐसे ( अंगहारएहिं ) अंगविक्षेपोंसे (नञ्चिऊण) नाचकर
( देवनाढिआहिं ) देवताओं के सामने नाचनेवाली
देवांगनाओंसे ( जस्स ) जिनभगवानके ( सुविक्रमा)
अत्यन्त पराक्रमशाली (ते) वे प्रसिद्ध (कमा ) चरण
(बंदिआ) वन्दन कियेगए (तयं )वे प्रसिद्ध (तिलोय)
तीनों लोकर्मे ( सब्ब ), सम्पूर्ण ( सच ) जीवोंको
( संतिकारयं) विघ्नोपशम करनेवाले ( पसंत ) नष्ट
होगये हैं ( सन्य ) सब ( पाव ) पापरूप ( दोस)
दोष जिनके ( उत्तमं ) श्रेष्ट (जिणं ) जिनभगवान
( संति ) शान्तिनाथस्वामी को (एस ) यह ( अहं)
मैं ( नमामि ) नमस्कार करताहूं।
(भावार्थ)
घंसी सतार और तालसे मिलेहुए और आतोदवाय
दर्दुरट और मुरज इन्हों की मधुर ध्वनिसे मिश्रित
संगीत शास्त्रोक्त श्रुतियोंका समीकरण कियेसते शुद्ध
अजितशान्ति स्तवनम् ॥ घट्जस्वर से गीतके साथ पार्वोकी किंकिगियोंके शब्दसे मितेहुए कंकण नूपुरंआदि आभूषणों के मधुर शब्दसे मिश्रित , हावभावस्टाक्षादिपूर्वक अंगविक्षेपोंसे युक्त नृत्यकर देवनतकिाने अत्यन्त पराक्रमशाली जिनभगवान के चरणकमलों को नमस्कार किया ये प्रसिद्ध तीनों लोक जीवोंके विघ्नोंको नाशकरनेशले पाप दोपसे रहित ऐसे श्रेष्ट जिनभगशन शान्तिनाथ स्वामीको में भी नमस्कार करताहूं। (ललितकंछंदः) रलिअयम् ॥ त्रिभिर्विशेषकम् ॥ छत्रचामरपड़ागजूरजवमंडिआ ज्झयवरमगर तुरय सिरियच्छमुलंरणा । दीवसमुद्दमंदरदिसा. गयसोहिया सस्थिअवसहसीह सिखिच्छा लंछणा॥१२॥ (छाया) उत्रचामरपताकायूपयरमाप्टिताः जवरमारतुरंग श्रीरत्ससुलाम्सनाः द्वीपसमुद्रमन्दर-दिग्गजशोभिताः स्वस्तिमापसिंहधीवृक्षलाग्नाः ।
अजितशान्ति स्तानम् ॥
(पदार्य)
(छत्र) छत्र ( चामर ) चामर ( पड़ाग) पताका
(जूर ) स्तंभ (जब) यर इत्यादि चिन्होंसे (मंडिआ)
शोभित (झयवर ) श्रेष्श्वज (मगर) मकर (तुरय)
अश्व (सिखिच्छ ) श्रीवत्स इत्यादि है ( मुलंछगा)
सुलांछन जिन्होंमें ( दीव ) द्वीप (समुद्द) समुद्र
(मंदर) सुमेरुपर्वत (दिसागय ) दिग्गज इन्होंसे
(सोहिआ ) शोभित ( सत्थिा ) स्वस्तिक ( वसह)
वृषभ (सीह ) सिंह (सिरि ) लक्ष्मी (वच्छ ) वृक्ष
इत्यादि ( सुलंछणा) लक्षण हैं जिन्होंमें ।
(भावार्थ)
छत्र चामर पताका स्तंभ यव श्रेष्टध्वज मकर अश्व
श्रीवत्स द्वीप समुद्र सुनेरुपर्वत दिग्गज स्वस्तिक वृषभ
सिंह लक्ष्मी वृक्ष इत्यादि चिन्होंसे सुशोभित ।
(वानवासिकछंदः)
॥ वाणवासिआ॥
सहावलट्टा समपइट्टा अदोसदुद्दा गुणेहि जिहा।
पसाय सिट्टा तवेण पुट्ठा सिरीहिं इट्टा रिसीहिं
जुट्टा ॥ ३३ ॥
अजितशान्ति स्तवनम् ॥
५१
(छाया)
स्वभावलष्टाः शमप्रतिष्टाः अदोपदुष्टाः गुणैः जेष्टाः
प्रसादश्रेष्ठाः तपसा पुष्टाः श्रिया इशः ऋषिभिः जुष्टाः ।
(पदार्थ)
(सहाव ) स्वभाव से (लहा) शोभायमान (सम)
शान्तिसे (पइट्टा) युक्त अथवा (असमप्रतिधा-निरूपम
है ख्याति जिन्होंकी) (अदोसदुहा) पम्यरागादिको
से विकाररहित ( गुणेहि ) सद्गुणोंसे (जिहा) पड़े
( पसाय) निर्मलतासे (सिहा) श्रेष्ट ( तयेग)
तपोपलसे (पुट्ठा ) पुष्ट (सिहं ) लक्ष्मीसे (a)
पूजित (रिसीहि ) प्रपियोंसे ( जुटा) सेव्यमान ।
(भावार्थ)
स्वभावसे शोभायमान शान्तियुक्त वेपम्य रागादिकोंसे
विकाररहित सद्गुणों से युक्त निर्मलतासे श्रेष्ट तपथासे
पुष्ट लक्ष्मीसेपूजित ऋषियोंसे सेव्यमान ।
(अपरांतिकारंदः)
।। अपरांतिया ॥
ते तयेण धुपसव्वपापया सबलोहिअमूल
पावया । संयुया अजिससंतिपयया इंतु मे सिर.
सुहाणदायया ॥ ३४॥
अमितशान्ति स्तवनम् ॥
(छाया)
तपसा धुतसर्चपापकाः सर्वलोकहितमलप्रापका: ते
अजितशान्तिपादाः संस्तुताः ( सन्तः) मे शिवसुखानां
दायकाः भवन्तु (संस्तुताः शंसुखहेतुस्तुतं येपां)।
( पदार्थ)
(तवेण ) तपश्चर्यासे (धुय) नष्ट होगए हैं (सव्य)
सम्पूर्ण ( पावया ) पातक जिन्होंके (सर्व) सम्पूर्ण
(लोअ ) लोकके ( हिअ ) मोक्षात्यहितके (मूल)
ज्ञानदर्शन चरित्ररूप मूलको ( पावया ) प्राप्तकराने
वाले (ते ) पूर्वोक्त ( अजिअ ) अजितनाथ स्वामी के
और ( संति ) शान्तिनाथ स्वामी के (पायया) चरण
( संस्तुताः) सम्यक् वर्णन कियेसते (संस्तुता) सुख
हेतुक स्तवनहै जिन्होंका (मे) मुझे (सिव) मोक्षरूप
(सुहाण) मुखके (दायया ) देनेवाले (हंतु ) होओ।
(भावार्थ)
तपोबलसे प्रनष्टहोगए हैं सम्पूर्ण · पातक जिन्होंके
सम्पर्ण लोकके मोक्षास्यहितके ज्ञानदर्शन चारित्ररूप
मूलको प्राप्तकरानेवाले. सुखहेतुक रतवनहै जिन्होंका
ऐसे भजितनाथ और शान्तिनाथ स्वामीके चरण मुझे
मोक्षरूप सुख देनेवाले होओ।
.
,
..
अजितशान्ति स्तनम् ॥ (गाया छंदः) । गाहा।। एवं तववलविउलं. थुअंमए अजिअसति जिण जुयलं वगयकम्मरयमलं गई गयं सासयां विमलां ॥ ३५ ॥ (छाया) तपोयल विपुलं व्यपगतकर्मरजोमलं शाश्वती विमलो गतिं गतं ( एतादृशं) अजितशान्तिजिनयुगलं मया एवं स्तुतम् । (पदार्थ) (तपयल ) तपोवलसे (पिउलं ) विशाल (वरगय) नष्टहोगयाहै ( कम्म ) ज्ञानावरणादि आठ कर्म और (स्यमलं ) यध्यमान कर्मोकामल जिन्होंका (सासयां) आघन्तरहित (विमला) कर्ममलसे रहित (गई) मोक्षरूप गतिको ( गयं ) पहुंचेहुए एसे ( अजिअसति जिणजुयलं) दोनो जिनभगशन अजितनाथ और शान्तिनाथस्वामी ( मए ) मुझसे ( एवं) इस प्रका (धुआं)रति कियेगये।
अजितशान्ति स्तवनम् ॥ (भावार्थ) तपोवलसे विशाल नष्ट होगया है ज्ञानावरणादि आठ वध्यमान काँका मल जिन्होंका आद्यन्तरहित निर्मल मोक्षास्य गतिको पहुंचेहुए ऐसे दोनों अजितनाथ और शान्तिनाथस्वामी की इस प्रकार मैने स्तुति की। (गाथाछंदः) ॥ गाहा ॥ तं बहुगुणप्पसाय मुक्खमुहेण परमेण अविसायं । नामेउमेविसायं कुणउअपरिसाविअपसायं ॥३६ ।। (छाया) बहुगुगप्रसादं परमेण मोक्षसुखेन अविषादं एतादृशं नन् जिनयुगलं मे विषादं नाशयतु च परिपदपि प्रसाद करोतु । बहुगुगानां प्रतादो नमल्यं यस्य अथवा बहुगुण प्रसादोऽनुग्रहो यम्य नन् (१) मदुतेर्गुणम्वीकरण- दूषगावर्धारणलक्षण मनुग्रहं मयि करोतु । (पदार्थ) (पदगुण) मानादि अनेक गुगौला (प्पशाय)
अजितशान्ति स्तवनम् ॥
५७
प्रसाद है जिन्होंको ( परमेग ) उत्तम (मुक्खसुहेण)
मोक्षमुखसे ( अविसायं ) विषादरहित (से) पूर्वोक्त
जिनयुगल ( मे ) मेरे ( विसायं ) खेदको (नासेउ)
नांशकरो (अ) और (परिसावि) सभाजननी (पसाय,
अनुग्रह (कुगउ ) करो।
(भावार्थ)
ज्ञानादि अनेक गुणों का प्रसाद है जिन्होंको सर्वोत्तम
मोक्षसुख होनेसे खेदरहित ऐसे पूर्वोक्त जिनयुगल मेरे
खेदको नाशकरो और इस स्तोत्रको मुननेवाले समाजन
भी मुझपर क्षमारूप अनुग्रह करो।
(गाथाछंदः)
तमोएउअनदि पावेजनंदिसेणमभिनंदि।परिसाइ
घिसुहनदि ममपदिसउसजमेनंदि ।। ३७ ।।
(छाया)
तत् (जिनयुगलं ) ( लोकानां ) नंदि मोदयतु
नंदिपेणच अभिनंदि प्रापयतु परिपदोऽपि सुखनंदि
दिशतु संयमे ममच नंदि दिशतु ।
५८ भजितशान्ति स्तवमम् ॥ (पदार्थ) (तं ) वह जिनयुगल (नंदि) हर्ष ( मोएउ) करो (अ) और (नंदिसणं) नंदिपेण कविको (अमिनंदि ) आनंदसमृद्धि ( पावेड ) प्राप्त कराओ ( परिसाइवि ) श्रोतृजनसभाको भी ( सुहनंदि) सुख- समृद्धि (दिसउ ) देओ (य) और ( मम ) मुझे (संजम ) सतरप्रकारके संयममें ( नंदि) आनंद (दिलउ ) देओ। (भावार्थ) वे अजितनाथ और शान्तिनाथ स्वामी सम्पूर्ण जीयों को और नंदिपेण कविको आनंद समृद्धि देओ. और श्रोत जनसभाको भी सुखसमृद्धि देओ और मुझे सतरह प्रकारके संयमोंमें आनंद देओ। (गाथाछंदः) ॥ गाहा ॥ पक्खिअचाउम्मासिअ संवच्छरिए अवस्स भणि अबो । सोयव्यो सब्बेहिं उपसग्ग निवारणो एसो ॥ ३८॥ (छापा) पाक्षिकचातुर्मासिकसांवत्सरिकेषु अवश्यं मणितत्या
अजितशान्ति स्तरनम् ।
सः श्रोतव्यः एपः अजिशान्तिस्तक उपसानिवारण:
(पदार्थ)
(पविख) पूर्णिमाको ( चाउम्मासिस) चातुर्मास
में ( संबछरिए ) संवत्सरके प्रतिक्रमणके दिन (अवरस)
अवश्य (भगिअन्वो) पठन करनाचाहिये और (सहि)
सोने ( सोयल्यो) श्रवणकरना चाहिये ( एसो) यह
स्तवन ( उसग्ग) विनोंका (निवारण) नाशकरने
वाला है।
(भावार्थ)
इस सम्पूर्ण किनोंको नाशकरनेवाले अजितनाथ और
शान्तिनाथ स्वामीक स्तवनको पूनमकेदिन घोमासेमें
और संस्त्सरके प्रतिकमणके दिन अपश्य सब श्रापकाने
पठनकरना चाहिये और श्रवणकरना चाहिये।
(गाथाउंदः)
जो पदइजोअनिसुणइ उभोकालंपि अजिम.
संतिसंचयं । नहु हुँति तस्स रोगा पुलुपना
चिनासंति ॥ ३९ ॥
अनितशान्ति स्तपनम् ॥
(छाया)
यः अजितशान्तिस्तव उभयकालं पठति निशृणोतिच
तस्य हु (निश्चितं ) रोगाः न भवन्ति पूर्वोत्पन्ना अपि
( रोगाः) नश्यन्ति ।
(पदार्थ)
(जो ) जो मनुष्य ( अजिअसंतिसंथयं ) अजित.
नाथ और शान्तिनाथ स्वामीक स्तवनको (उभओकालं)
प्रातःकाल और सायंकाल ( पढइ ) पठनकरताहै (अ)
और (निसुणइ ) श्रवणकरता है ( तस्स ) उसे
( रोगा ) शारीरिक पीडा (हु) निश्चयसे (न ) नहीं
(हुति ) होतीहै ( पुव्वुपन्ना ) पहिले पैदाहुए रोग
(पि ) भी ( विनासंति ) नष्ट होतेहैं ।
(भावार्थ)
जो मनुष्य अजितनाथ और शान्तिनाथ स्वामीके
स्तवनको प्रातःकाल और सायंकाल पठनकरताहै और
श्रवणकरताहै उसे शारीरिक पीडा निश्चयसे नहीं होती
और इस स्तवनके पठनारंभके पहिले पैदाहुए रोगभी
शान्त होजातेहैं।
अजिनशान्तिनमनन् । (गाथाउंदः) यवगयकफिकटमाणं वरगयनिझंतगगोमाण । वयगयपुणब्भवाणं नमोत्यु देवाहिंदेवाणं ॥ १० ॥ (छाया) व्यग फलिफापेभ्यः व्यपगनिनगगीयः व्यपारपुनर्भवम्यः देवाधिदयभ्यः नमः अग्नु । १ पदार्थ) (यगय ) नागया है ( परिमान) कलहसंयधि मनका मालिन्य (जनका ( यानि गगदीmji) a minima) मागया . ( ) . ( . (देगा देशणं) देवादिकाय } नमरवारहोगे। { भाषा) मारहोगया है पापी मन...! गए शगप जिन ना?' ऐसे देशधिदर साधMIRETRE512:।
भजितशान्ति स्तवनम् ॥ (गाथाछंदः) ॥ गाहा ॥ सन्वं पसमइ पावं पुषणंवइइ नमसमाणस्स । संपुन्नचंदवयणस्स कित्तणं अजिअसतिस्स ॥ ४ ॥ (छाया) संपूर्णचन्द्रवदनयोः अजितशान्तिनाथयोः कीर्तनं नमस्यमानस्य सर्व पापं प्रशमयति च पुण्यं वर्धयति । ( पदार्थ) (संपुन्न) संपूर्ण (चंद) चन्द्रके समान है (वयणरस) मुख जिन्होंका ऐसे ( अजिअ संतिरस ) आजतनाथ और शान्तिनाथ स्वामीका ( कित्तणं) कीर्तन (नमं समाणरस ) अजित शान्तिनाथ स्वामीको नमस्कार करने वाले पुरुषके ( सव्वं ) सब ( पा) पाप ( पसमइ) नाश करता है और (पुण्णं) पुण्यको (बड्ढइ) बढाता है। (भावार्थ) पूर्णचन्द्रके समान मुख है जिन्होंका ऐसे अजितशा- न्तिनाथ स्वामीका कीर्तन आजितशान्तिनाथ स्वामीको नमस्कार करनेवाले पुरुषके सत्र पाप नाश करता है और पुण्यको बढ़ाता है।
(गाया उंदः) गाहा नइ इच्छह परमपयं अहबा कित्ति सुवित्थडां सुवणे ।। ता तेलुकद्धरणे जिणवयणे मायर कुणह ॥ १२॥ (छाया) यदि परमपदं अथवा भुवने सुविस्तृता की इच्छप तदा त्रैलोक्योडरणे जिनवचने आदरं कुरुथ । (पदार्थ) (ज) यदि ( परमपर्य) मोक्षपद ( अहवा) अधा ( भुवणे ) जगतमें ( सुवित्थडा ) अतिविस्तीर्ण (किचि ) कीर्ति ( इच्छह ) चहाते हो (ना ) सो (तेलुकुद्धरणे ) लोकत्रयको उद्धार करने वाले (मिण- क्यणे ) जिन वचनमें (आयरं ) आदर (युगह ) (भावार्थ) हे भव्य जीवो यदि मोक्षपद की अभिलागहो अपना जगतमें अति विस्तीर्ण कीर्तिकी इप्या हो को तीन लोक को उद्धार करने वाले मिनभगाना आदर करो।
अजितशान्ति स्तवनम् ॥ (स्तोत्रसमामी मंगलश्लोकाः) ॥. सर्वमंगलमांगल्यं सर्वकल्याणकारणम् ॥ ॥ प्रधानं सर्वधर्माणां जैनं जयति शासनम्।४३. ॥ उपसः क्षयं यान्ति छिद्यन्ते विनवल्लयः ॥ मनः प्रसन्नतामेति पूज्यमाने जिनेश्वर ॥ ४॥ ॥ शिवमस्तु सर्वजगतः परहितनिरता भन्यतु भूतगणाः ।। दोपाः प्रयान्तु नाशं सर्वत्र सुखी भवतु लोकः ॥ ४५ ॥ ॥ स्मरणं यस्य सत्वानां तीव्रतापोपशांतये ।। ॥ उत्कृष्टगुणरूपाय तस्मै श्रीशान्तये नमः ॥३॥ इति श्रीनदिपेणमूरिविरचिरामजितशान्तिस्तवनमिन्दरजैन देताम्या पारशालामुख्याध्यापकचोवे कुटोन्दय श्रीगोपीनाथ. सूनुपण्डितकृष्णशर्मकृतसुवाविनी- . भ्याख्योपैतं समाप्तम् ॥
अथ जिनवल्लभसूरिकृतं
"उल्लासिक" स्तोत्रं प्रारभ्यते
श्रीमहावीरायनमः॥
॥ गाथा।
लासिकमनक्सनिग्गयपहादण्डच्छलेणगिणं ।।
रूणदिसन्तइन्चपयनिव्वाणमग्गावलिम् ।
इन्दुजलदंतकान्तिमिसई नीहन्तनाणकरू।।
होवि दुइज सोलस जिणे त्योस्सामि खेमंकरे ।।१।।
(छाया)
लासिक्रमनखनिर्गतप्रभादण्डछलेन बन्दारूणामङ्गिना
चाणमार्गावलि प्रकट दिशन्ताविध कुन्देन्दु जलदन्त
लभिपतो निर्यज्ज्ञानांकुरोसरी क्षेमारीद्वायपि
यिषोडशजिनी ( अजितशान्तिनामानी ) ( अहं)
उल्लासिक्क सांत्रम् ॥
(पदार्थ)
( उल्लासि ) देदीप्यमान ( क्रम् ) पावोंके (नक्स)
नखोंसे (निग्गय ) निकलीहुई (पहा ) कान्ति यह
ही मानो एक ( दण्ड) लकड़ी उसके (छलेण)
मिषसे ( वन्दारूण ) नमस्कारकरनेवाले ( अङ्गिणं)
प्राणियोंको (निव्वाण) मोक्षके ( मग्ग) मार्गकी
( आवलिं) श्रेणीको ( पयर्ड ) स्पष्टतासे ( दिसन्ती)
दिखलानेवालेके (इन्व) समान (कुन्द ) कुन्दके
पुष्प और (इन्दु ) चन्द्रमाके समान (उञ्जल)
स्वच्छ ( दन्त ) दांतोंकी ( कान्ति ) प्रभाके (मिसउ)
मिपसे (नीहन्तं ) निकला है (नाण ) ज्ञानके
( अंकुर ) अंकुरोंका ( उकेरे ) समुदाय जिन्होंसे
( खेमकरे ) सुखकरनेवाले (दोवि ) दोनोंकोनी
(दुइज्ज ) दूसरे और (सोलस ) सोलमें अजित
और शान्तिनाथ स्वामी को ( अहं) में जिनवछभसरि
(त्योस्सामि) स्तुति करताहूं.
(भावार्थ)
देदीप्यमान पायोंके नसाँसे निकलीहुइंकान्ति यहही
मानो एक लकड़ी उसके मिपसे नमस्कारकरनेवाले
प्राणियों को मोक्षके मार्गकी अंगीको स्पष्टतास दिखलाने
लासिक स्तोत्रम् ॥ वालेके समान कुन्दपुष्प और चन्द्रमाके समान स्वप्न दांतोंकी प्रभाके मिपसे मिला है शानके अंधुका समुदाय जिन्होंसे, सुखकरनेशले ऐसे दूसरे और सोल हवे अजितनाथ और शान्तिनाथ स्वामीकी मजिन वल्लभसूरि स्तुति करता हूं. चरमजलहिनीरं जो गिणिज जलीहिं ।। सयसमयसमीर जो जणिज्झा गईए । सयलनहयलं वा लंघए जो परहिं ।। अजियमहब संति सो समत्यो थुणेउम् ||२|| (छाया) घरमजलधिनीरं योऽअतिमिर्मिनुयात् क्षयरमय- समीर यो गत्या जयेत् साउनमस्तलं यः पदया लंपयेत् स अजितमा शान्ति खोतुं समर्थः । ( पदार्थ) (घरम), स्वयंभूरमणनामक (अलहि ), समुदने (नीरं ) जलको (जो) जोगनुप्प (अंजलीह) अंजलियोंसे (मिजिज) मारसचाह (रूपसमय) प्रलयकारक (समीर ) घायुको (सो) ...
'उल्लासिक स्तोत्रम् ॥
गईए ) गतिसे (जणिज्झा ) जीतसकता है (वा)
अथवा ( सहल) सकल (नहयलं.) आकाशतलको
(जो) जोमनुष्य (पहैि ) पावोंसे (लघर )
उल्लंघनकरसकताहै (मो) यह ही ( अजिअं )
अजितनाथस्वामीकी ( अहब ) अथवा ( संति )
शान्तिनाथस्वामीकी (थुणेउम् ) स्तुतिकरनेको (समत्थो)
समर्थ होता है.
(भावार्थ)
स्वयंभूरमणनामक समुद्रके जलको जो मनुष्य
अंजलियोंसे माप सकताहै प्रलयकालके वायुको जो
मनुष्य अपनी गतिसे जीतसकताहै अथवा संपूर्ण
आकाशतटको जो मनुष्य पावोंसे उल्लंघनकरसता है
वही मनुष्य अजितनाथ और शान्तिनाथ स्वामीकी
स्तुति करनेको समर्थ होताहै.
॥ गाथा ॥
तहवि हु बहुमाणुल्लासभत्तिन्भरेण ॥
गुणकणमपि कित्तेहामि चिन्तामणिय ।।
अलमहाअचिंता पंतसामत्यओसिम् ।।
फलह लहु सलं पंरिमं णिन्टिमं मे ॥३॥
लासिम स्तोत्रम् ॥
(छाया)
तथापि यहुमानोल्लासभक्तिभरेण गुणकणमपि चिन्ता
मणिमित्र कीर्तयिष्यामि अथवा अलं अनयोः अचिन्त्या
नन्तसामयतः मे सर्व वान्छितं लघु निश्चित
फलिष्यति.
(पदार्थ)
( तहति) तोभी (हु) प्रकट ( बहुमाण ) अन्तः
करणके प्रेमविशेषसे ( उल्लास ) बड़ीहुई (भचि)
प्रीतिके ( भरेण ) अतिशयसे ( गुणकणमवि ) गुणले.
शभी (चिन्तामणिन्च ) चिन्तामणिके समान (कित्ते.
हामि ) कीर्तनकरूंगा ( अहम ) अथवा (अलं) बस
इस विचारसे (ओसिं) इन्होंकी (भजित और
शान्तिनाथस्वामी की ) ( अचिंत ) विचारमें न आने-
चाली ( अणंत ) अन्त न होनेवाली (सामस्थ) शक्तिसे
(मे ) मेरे ( सव्वं ) सब ( वांछिअं) इच्छित (लह)
शीमही (गिच्छिों) निश्चयपूर्वक ( फलहइ )
पलीभूत होंगे,
(भावार्थ)
तोभी अन्तःकरणके प्रेमविशेषसे बढ़ी ईभक्ति के अति.
रायसे भगवानका गुणलेशभी चिन्तामणि के समान
उहासिक स्तोत्रम् ॥ कीर्तन करूंगा (जैसे चिन्तामाणिकी थोडीभी स्तुति करनेसे बहुत फलमिलताहै वैसेही भगवत्कीर्तन थोडाभी करनेसे बहुत फलदेनेवाला होताहै ) अथवा इस विचारसे क्या फलहै? इन अजितनाथ और शान्तिनाथ स्वामीकी विचारमें न आनेवाली अनन्तशक्तिसे मेरे सब यांछित शीघ्रही निश्चयसे फलीभूत होंगे. ॥ गाथा ॥ सयलजयहियाणं नाममित्तेण जाणं ॥ विहडइ लहु दुष्टानिदोघट्टघट्टम् ।। नमिग्सुरकिरीइग्विष्ट पायाविन्दे ॥ सययमजिअसंती ते जिणिन्दे भिवन्दे ॥४॥ (छाया) अहं नम्रसुरकिरीटोघृष्टपादारविन्दी तो अजितशान्ति नामानी जिनेन्द्री सततं अभियन्दे सकल जगडितयोः ययोः नाममात्रेण दुष्टानिष्टदोघट्टघट्ट लघु विघटते. (पदार्थ) (नमिर ) मन (मुर) देवताओं (किरीट) मुकुटोसे ( अग्घिट्ट) उत्तेजिाह ( पायारमिन्दे ) चरणकमलजिन्होंके ऐसे () ( अजिती)
V
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अजिमाघ मार मानिनाधावामी (निमि) जिने.
मामा ( मप) निगर (अभिमन्य) नमस्कार
पगाई (मयल) सरर (जय) जगत (हिआगं)
गिरे ( जाणं ) जिन अजिनाथ भीर
मानामांक (नाममिण) माममात्रा (6)
रना (अनि:) नियरियांगादिअनिष्टरूप (दोष)
हाधियोरे (प) समुदाय (ला) शीमही
(विदर) होजात.
(भारार्थ)
* তা মানুষ বলিন শাহ
जिन्दाक से प्रसि जिन्दगदान अजितनाथ और
निनाघमामीको निगर नमस्कार करणाई सरल
जगार दिन करनेवाले जिन शान्तिनाथ और अजित.
नाधरशमायेः नाममानसे दुखजनक प्रियवियोगादि
अनिष्टरुप हाधियोंके समुदाय सीमही दूर होजाते हैं.
॥ गाथा॥
पसरइ परकित्ती वाए देहदिशी ।।
विलसइ भुविमिती जायए मुप्पविती ।।
फुटपम्मतिनी होइ ममारटिनी।
जिगजुअपयभनी ही चिंतो समनी ॥५॥
८ उल्लासिंह स्तोत्रम् ॥ (छाया) जिनयुगपदभक्तिः ही अचिंत्योरुशक्तिः (अस्ति) (तप्रभाशत् ) वरकीर्तिः प्रसरति देहदीप्तिः वर्धते भुवि मैत्री विलसति सुप्रवृतिः जायते परमतृप्तिः स्फुरति संसारछितिः भवति. (पदार्थ) (जिगजुअ) दोनों जिन भगवानके ( पय) चर- णोंकी ( भत्ती ) भक्ति (ही) अत्यन्त आश्चर्य है कि (अचिन्त) बिचारमें न आनेवाली ( उरु ) भारीहै (सत्ती) प्रभाव जिसका ( उसके प्रभावसे ) (वरकिती) श्रेष्ट यश ( पसरह ) फैलता है (देहदित्ती) शरीरका तेज (बट्टए) बढ़ता है (भुषि) संसारमें (मिची) मित्रता (विलसइ) बढ़ती है ( सुपरित्ती ) अच्छा व्यापार ( जायए) होता है (परमतिची ) अत्यन्त. संतोष ( फुरइ) उल्लसित होता है ( संसारछित्ती) संसारका उच्छेद ( होइ ) होता है. (भावार्थ) अत्यन्त आशय है कि दोनों जिन भगवानके चागोंगी भक्ति चिनारमें न आनेवाली मारी शामिनी
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८ उल्लासिक स्तोत्रम् ॥ भु (छाया) जिनयुगपदभक्तिः ही अचिंत्योरुशक्तिः ( अस्ति (तत्प्रभावात् ) वरकीर्तिः प्रसरति देहदीप्तिः वर्धते मैत्री विलसति सुप्रवृतिः जायते परमतृतिः स्फुर। संसारछितिः भवति. (पदार्थ) (जिणजुअ ) दोनों जिन भगवानके ( पय ) च गोंकी ( भत्ती ) भक्ति (ही) अत्यन्त आचर्य है कि ( अचिन्त) बिचारमें न आनेवाली ( उरु) मारी (सत्ती) प्रभाव जिसका ( उसके प्रभावसे ) (वरकित्ती, श्रेष्ट यश ( पसरइ ) फैलता है (देहदिची) शरीरका तेज (वढए) बढ़ता है (भुषि) संसारमें (मिची) मित्रता (विलसइ ) बढ़ती है ( सुपपित्ती ) अच्छा व्यापार ( जायए) होता है ( परमतिची) अत्यन्त- संतोप ( फुरइ ) उल्लसित होता है (संसारछिची) संसारका उच्छेद ( होइ ) होता है. (भावार्थ) अत्यन्त आर्य है कि दोनों जिन भगानके चाणाकी भक्ति विचार न आनेवाली भारी शारीमती ।
सासिनतरम् ॥
है जिसके प्रभारसे श्रेष्टयश फैलता है शरीर का सेज
पड़ता है अछा व्यापार होता है अत्यन्त संतोष
होता है और संसारका उप्छेद ( भी ) होता है.
॥ गाया।
ललियपयपपारं भूरि दिवंगहारम् ॥
फुडगणरसभावोदारसिंगारसारम् ।।
मणिमिसरमणीजसणच्छेअभीया ॥
इवपुणपणिमंदा कासि नट्टोवयारम् ।। ६ ।।
(छाया)
यदर्शनच्छेदभीता इव प्रणमनमन्दाः अनिमिपरमण्यः
सलिलपदप्रचारं भूरिदिच्याङ्गहार स्फुटपनरसभावोदार
शृंगारसारं नृत्योपहारं अकार्पः
(पदार्थ)
(जईसण) भगवदशर्नके (च्छेअ) अन्तरायसे
(मीया ) डरी हुई ( २ ) ऐसी क्या ? (अणिमिस)
देवोंकी ( रमणी) अंगनाएं (पुणमगि) प्रणाम
फरनेमें ( मन्दा ) सुस्त ऐसी (ललिय ) रमणीय हैं
(पयपयारं ) चरणों केन्यास जिसमें (भूरि) बहुतसे
(दिन) मुन्दर है (अंगहारं ) अंगविक्षेप जिस
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राहसिक मात्रम् ॥
(पदार्थ)
पड़ता भव्य जीवो ( कया) की है (असेस ) सम्पूर्ण
होतात्रयम (संती ) शान्ति जिन्होंने (ते ) ऐसे उन
प्रसिद्ध ( अजिअसती ) अजितनाथ और शान्तिनाथ
स्वामीकी ( धुणह ) स्तुतिकरो. ( जाणि) जिन्होंकी
जर ) शोभायमान ( मुत्ती ) मूर्ति ( सरमस )
सहित ( परिरंभाभि ) आलिंगन का आरंभकरने-
ली (निबाणलच्छी ) मोक्षरूप लक्ष्मीके (पण)
सिल ( थप ) कुचोंके (पुसिर्णक ) कुंकुमके (पंक)
कसे (पिंगकियन्त्र ) पीली की हुई है क्या ? इस
हेतुसे ही ( कणक ) सोनेके ( स्य) रज समान
(पिसंगा) पाली मालुम होती है.
(भावार्थ)
हे भव्यजीवो की हे जगत्रयमें शान्ति जिन्होंने ऐसे
उन प्रसिद्ध अजितनाथ और शान्तिनाथ स्वामीको
स्तुति करो जिन्होंकी शोभायमानमूर्ति गसहित
आलिङ्गनका आरंभ करनेवाली मोक्षरूप लक्ष्मीके मांसल
कुचोपर लगेहुए कुंकुमके पंकसे पीली की हुई है क्या ?
इस हेतुसे ही सोनेके रज समान पाली मालुम होती है.
१२ उहासिक स्तोत्रम् ॥ ॥ गाथा ॥ बहुविहनयभंग वच्छणिचं अणिचम् ॥ सदसदणभिलप्पालप्पमेगं अणेगम् ॥ इय कुनयविरुद्धं सुप्पसिद्धं च जेसि ।। वयणमवयणि ते जिणे संभरामि ॥ ८॥ (छाया) तो जिनौ संस्मरामि ययोः बहुविधनयभंग कुनय- विरुद्ध सुप्रसिद्ध वचनं अवचनीयमस्ति ( यत्र ) वस्तु नित्यमनित्यं सदसत् अभिलप्यालप्यं एकमनेकञ्च (प्रतिपाद्यते) (पदार्थ) (ते) उन प्रसिह (जिणे ) जिनभगवानका (संमरामि ) स्मरण करताई (जेसि ) जिन्हाँका (यहु ) यहुत (विह ) प्रकारके ( नयभग ) नयभेद है जिसमें ( कुनय ) कुत्सितनयोंसे (विरदं ) मित (मुप्पसिद्ध) अत्यन्तप्रसिद्ध (यणं) वचन (अवयगिज) अपचनीय है (उसका पूरी तन्हासे वर्णन नहीं किया जासकता) (यन ) जिसमें (बलु) परतु' (णियं) नित्य (च) और (अणि) उहासिक स्तोत्रम् ॥ अनित्य (सद् ) बस्तुअस्तित्व (असद् ) वरत्वभाव ( अभिलप्प ) वर्णनकेयोग्य (अलप्पं ) वर्णन के योग्य (f) एकरचननिर्देश्य ( अग) अनेकवचन निदेश्य प्रतिपादन की जाती है. (भावार्थ) उन प्रसिद्ध अजितनाथ और शान्तिनाथ जिन भगवानको स्मरण करताई जिन्होंका बहुत प्रकारके नयभेद हैं जिसमें कुत्सितनयोंसे विरुद्ध अत्यन्त प्रसिद्ध वचन अवर्णनीय है जिसकचनमें वस्तु (व्यवहारनयसे) अनित्य और (निश्चय नयस ) नित्य वस्तुसहाय और अभाव वस्तुवर्णनीयर और अवर्णनीयत्व पत्रवचन निर्देश्यता और अनेकवचन निर्देश्यता भलीभांति प्रति- पादन की जाती है. पसरह निअलाए ताप मोहंधया । भमइ जय मसणं ताव मित्यत्तरपणम् ।। फरइ फुड फलंताणतणाणमुपूरो ।। पपड मजियसंतीझाणसूरो न जाय ॥९॥ (छाया) ताइन् प्रैलोक्ये मोहान्धकार प्रसरति सावत् अर
सल्लासिक स्तोत्रम् ॥
जगत् मिथ्यात्वच्छन्नं सत् भ्रमति यावत् स्फुटफलदनंत
ज्ञानशुपूर: अजितशान्तिध्यानसूरः प्रकट न स्फुरति.
(पदार्थ)
(तार ) तबतक (तिअलोए) तीनों लोकमै
(मोहन्धयारं ) मोहरूपअन्धकार ( पसरइ) फैलता
है (ताव ) तबतक (असणं ) धर्म अधर्मादि ज्ञान
शून्य ( जयं) जगत् (मित्यत्तधणं ) सम्यक्त्व के
आभावसे आच्छादित होकर (भमइ ) विपरीत प्रवृत्त
होता है (जाय ) जबतक ( फुडफलताणतणापा-
सुपूरो) स्पष्ट उल्लासको प्राप्त होनेवाला है अनंतज्ञान
यही मानो किरणोंका समुदाय जिसका ऐसा (अजिय.
संतीझाणसूरो) अजितनाथ और शान्तिनाथस्वामीका
शुमध्यानरूपसूर्य (पयर्ड) कर्मरूपरजके पटलसे न
टँकाहुवा ( न ) नहीं (पुरइ ) उदय होता.
(भावार्थ)
जबतक उहासको प्राप्त होनेवाला है अनंत ज्ञान
मानों किरणोंका समुदाय जिसका ऐसा अजि.
तनाथ और शान्तिनाय स्वामीका शुक्ध्यानरूपसूर्य
फर्मस्परजके पठलसे न हकाल्या होकर नही उदय
यह
स्लासिक स्तोत्रम् ॥ होता है तबतक तीनों लोकमें मोहरूप अन्धकार फेलता है और धर्माधर्मादिज्ञानशून्य जगत् सम्य. पत्यके अभावसे आच्छादित होकर विपरीत प्रवृत्त १७ होताहै. ॥ गाथा ।। अरिकरिहरितिण्डण्हग्युचोराहिवाही। समरडमरमारीरुद्दखुद्दोवसग्गा ॥ पलयमजिअसंतीकित्तणे झत्ति जंती। निविडतरतमोहा भस्करालंखियव ॥ १०॥ (छाया) अरिफरिहरितृप्योगाम्युचौराधिव्याधिसमरडमरमारी रौद्र- क्षुद्रोपसर्गाः अजितशान्तिकर्तिने सति निविड तरतमौघाः भास्करा लुखिता इस (रप्टष्टाइन) प्रगितिप्रलयं गछति. (पदार्थ) ( अरि) शत्रु (करि ) हाथी (हरि) सिंह (तिण्ह ) रुपा (उण्ह ) आतप (अम्बु) जल (चोर) गरकर ( आहि ) मनोव्यथा ( वाहि) शारीरिफपीडा समर ) संग्राम (डमर ) राजकृत उपद्रव (मारी)
उल्लासिम स्तोत्रम् ॥
महामारी ( रुखंदोबसग्गा ) भयानक क्रूराशयवाले
व्यंतरादिकृत उपद्रव ( अजिअ) अजितनाथस्वामीके
(संति ) शान्तिनाथस्वामीके (कित्तण) कीर्तन किये
सते ( भास्कर ) सूर्यसे ( लुखियब ) स्पर्श किये हुये
(निरिडतर ) अतिगाढ़ ( तमोहा ) अन्धकारके समूह
के समान (झत्ति ) शीग्रही ( पलयं ) नाशको
( जन्ती ) प्राप्त होते हैं.
(भावार्थ)
शत्रु हाथी सिंह तृपा उगता जलघात चोर मनोव्यथा
शारीरिकपीडा संग्राम राजकृत उपद्रव महामारी भयान-
कराशयवाले व्यंतरादिकृत उपद्रव ये सब अजितनाथ
और शान्तिनाथ स्वामीके कीर्तन से सूर्यसे स्पर्श किये
हुवे अतिगाढ अन्धकारके समूहके समान शीग्रही
नष्ट हो जाते हैं.
॥ गाथा ॥
' निचिअदुरिअदारुद्दित्तझाणाग्गिजाला।
परिगयमिवगौरं चिंतिअं जाणरुवं ।।
कणयनिहसरेहाकतिचोरं करिज्झा।
चिरथिरमिहलच्छि गादसंथंभिअव्व ॥११॥
Bal
.
(छाया.)
' ययोः निचितदुरितदारुदीहध्यानाग्निवालापरिगतमिव
गोरं कनकनिकपरेखाकान्तिचोर एतादृशं रूपं चिंतित
(सत् ) गादस्तिमितामिव चिरस्थिरां लक्ष्मी कुर्यात,
(पदार्थ)
(निचिभ) अनेक जन्मोंमें इकठे किये हुए
(दुरिअ ) दुष्टकर्मरूप ( दारु ) लकडियोंसे (उदित)
प्रदीप्तकी हुई (साण ) ध्यानरूप ( अग्गि ) अग्निकी
(जाला ) बालाओंसे मानों (परिगयमिव ) व्याप्त
किया है क्या ? ऐसा (गौरं ) उज्वल (कणयनिहस )
सोनेकी कसोटीपरकी (रहा ) रेखाकी ( कन्ति )
कान्तिको ( चोरं ) चुरानेशला ऐसा ( जाण) अजित.
माय और शान्तिनाथ स्वामीका (रूबं) रूप (चिंति)
चितन करने से (इह) इस जगत (गाढ)
अत्यन्त ( संबंभिमन) नियंत्रितकी हुई के सामान
(चिरथिरं ) निथल ऐसी (लचि) लक्ष्मीको
(फरिझा) करता है.
(भावार्थ)
अनेक जन्मोंमें इकहे किये हुऐ दुष्टकर्मरूप ला
योंसे प्रचलित की हुई ध्यान रूप अनि की सारी
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Nोम् ॥
संत्रा किये गए सौगोको (जलहि) समुद्रकी
(लहरि लहरियों में विवाग) पने पाले लोगों
यो (गुरि) दलान (ठियाण) पद किये हुए
लोगोंको (जलिभ) जलती हुई (जलण) दापिकी
(जाला) शालासि भर्तिगि भाणं ) आस्टिगित
रिये हुए लोगोंको ( सन्ति) शान्ति ( जणया)
उत्पात करता है.
(भावार्य)
शान्तिनाथ और अजितनाथ स्वामी का ध्यान घोर
अरण्य, एटे हुए लोगों और राजाओंसे संमस्त काये हुए
लोगोंको और समुद्री लहरियोंमें इयते हुए लोगोंको
और पं.दादानेमें यन्द किये हुए लोगोंको और जलती
हुई दाामि की मालाओंसे भालिंगित हुए लोगोंको
सीमही शान्ति उत्पन्न करता है-
हरिकरिपरिकिष्णं पकपाइफपुण्णं ।
सयलपुहविरज्ज अआिणसज्जं ।
तणमिव पडिलग्गं ने जिणा मुत्तिागं ।
चरणमणुपवण्णा इंतु ते मे पसण्णा ।। १२ ।।
२०
उहासिक स्तोपम् ॥
(छाया)
यो जिनी हरिकरिपरिकीर्ण पक्यपदातिपूर्ण आज्ञासजं
सकलपृथ्वीराज्यं पटलनं तृणमिव एदित्या मुक्तिमार्ग
चरणं अनुप्रपन्नी तो जिनी मे प्रसन्नी
भवताम्
(पदार्थ)
(हरि ) घोड़े और (करि) भद्रादिजातीय हाथियोंसे
( पशिकणं ) व्याप्त ( प ) शत्रुओंको रोकने लायक
( पाइक ) सिपाहीोसे (पुषणं ) भराहुआ ( आण )
राजाकी आज्ञाको ( सज्ज ) पालन करनेवाला
( सयल) सकल (पुहवि) पृथ्वीके (रजं)
राज्यको (पडिलग्ग) कपडेमें लगेहुए (तणमिय)
तिनके के समान (छडिअं) छोडकर (मुत्तिमम्गं)
मोक्षका मार्ग रूप (चरणं ) चारित्रका (अणुपवण्या)
अंगीकार करनेवाले ऐसे (जे ) जो प्रसिद्ध (जिणा)
शान्तिनाथ और अजितनाथस्वामी (ते) चे (मे)
मुझपर ( पसण्णा ) प्रसन्न (हुन्तु) होओ.
(भावार्थ)
( याहीकादिदेशों में पैदाहोनेवाले).घोडे और भद्रादि
से परिपूर्ण शूर सिपाहियों से भरेहुए
Eday
राजाज्ञाको भलीभांति पालनेगले संपूर्ण पृथ्वी के राज्यको
फपरे पर लगे हुए हणके समान छोडकर मोक्षक
मार्ग रूप चारित्रका अंगीकारकरनेवाले मसिद्ध
जिनभगवान अजितनाथ और शान्तिनाथस्वामी मुझपर
प्रसन होओ.
॥ गाथा॥
रणससिवयणाहिं फुलनिप्पलाहिं ।।
धणभरनमिरीहिं मुठिगिज्जोदरीहीं ।।
ललिअमुअलयाहि पीणसोणित्याहिं।
सय सुररमणीहिं वंदिआ जेसि पाया||१०॥
(छाया)
ययोः पादी क्षणशशिवदनामिः फुल्लनेत्रोत्पलाभिः
स्तनमरनम्रामिः मुष्टिप्रायोदरीमिः ललितमुजलताभिः
पीनभोणिस्थलीमिः सुररमणीमिः सदा वन्दिती
(पदार्थ)
(जसि) जिन अजितनाथ और शान्तिनाथ भावानके
(पाया ) चरण (छ) पूर्णिमाके (ससि ) चांदके
समान है (वयणाहिं ) मुख जिन्होंके (पुछ ) सदा
फूले हुए हैं (नित ) नेत्ररूपी ( उप्पलाहि.) कमल
.२२ उल्लासिक स्तोत्रम् ॥ जिन्होंके (थण ) स्तकने (मर) भारसे ( नमिरीहि ) भुकी हुई (मुहि) मुठीसे (गिजो) ग्रहण करने लायक ( उदरीहिं) उदर है जिन्होंके (ललिअ) सुंदर है (मुअलयाहि) मुजलता जिन्हों की (पीण) पुष्ट हैं ( सोगित्थणीहिं ) कटिपश्चाहाग जिन्होंके ऐसी (सुररमणीहिं) देवांगनाओंसे (सय) सदैव (वदिमा) वन्दन कियेगए. (भावार्थ) पूनमके चांदके समान है मुख जिन्होंके सदा प्रफुल्लित हैं नेत्ररूपी कमल जिन्होंके स्तनके भारसे सुकीहुई मुठ्ठीसे ग्रहणकरनेलायक है उदर जिन्होके सुन्दर हैं भुजलता जिन्होंकी पुष्ट है कटिपश्चादाग- जिन्होंके ऐसी देवांगनाओंसे जिन अजितनाथ और शान्तिनाथ भगवानके चरण सदा वन्दन किये गए हैं. ॥ गाथा ॥ अरिसकिडिभकुठग्गंठिकासाइसार ॥ खयजखणलूआसाससोसोदराणि ॥ नहमुहदसणच्छीकृच्छिकण्णाइरोगे । मह जिणजुअपाया स-पसाया हरन्तु ।। १५ ।।
अल्लासिक सत्रम् ॥ फा (राया) जिनयुगपादाः सप्रसादाः सन्तः मे अकिटिमकुष्टः संधिवासातिसारक्षपचरमणटूवश्वासशोपोदराणिनखमुस- दशनाशिक्षिरुणादिरोगान् हरन्तु (पदार्थ) ( सप्पसाया) प्रसस्तायुक्तऐसे (जिमजुअ) दोनोजिनभगवानके (पाया) चरण (मह) मेरे ( अरिस ) मरसे (किडिभ ) परका रोग (फुट) फोडकी बीमारी (गठि) गठिया ( कास ) खांसी रोग ( अइसार ) दस्तकी बीमारी (खय) क्षयरोग (जर) पुखार (पण) फोडेकी धीमारी (लूमा) पुनसियोंकी बीमारी ( सास ) दमकी भीमारी ( सोस ) कंठ और तालुशेप (उदराणि) पेटकी बीमारियां (नह) नखकी बीमारी (मुह ) मुखकी बीमारी ( दसण ) दांतकी बीमारी ( अच्छी ) आखकी बीमारी (कुच्छि) कोखकी धीमारी (कण्याइरोगे) कानके रोगादिकोंका (हरन्तु) नाश करो. (भावार्थ) प्रसमतायुक्त ऐसे दोनों जिनभगवानके चरण मेरे मरसोको परके रोगको कोडको गठिया रोगको खांसीके सल्लासिक सोत्रम् ॥ रोगको दस्तकी बीमारीको क्षेयको घरको फोड़ेकी धीमारीको फुनसियोकी बीमारीको श्वासरोगको कंठशोष और तालुशोपकी बीमारीयोको उदररोगको नखरोगको दन्तरोगको चक्षुरोगको काखकी बीमारीको और कानके रोगोंको और इनसे पृथक् भी तमाम बीमारीयोंको दूर करो, ॥ गाथा ॥ इय गुरुदुहतासे पख्खिए चाउमासे ।। जिणवरदुगथुत्तं यच्छरे या पवित्तं ।।. पदह सुणह सज्झाएह झाएह चिचे॥ कुणह मुणह विग्वं जेण घाएह सिग्यं ॥१६॥ (छाया) भो भन्याः यूयम् इदं पवित्रं जिनवरदिकरतानं गुगदुःखग्रासे पाक्षिक चातुर्मासे वा यसरे पठत शृणुन स्वाध्यायत ध्यायत चिचेकुरुत मन्या येन विन सीधं घातयत (पदार्थ) है भन्यजीवो तुम ( इय) इस (परि ) पनि (निगवादुग) दोनों मिन भगवान के (पुर्व)
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उल्लातिका स्तोत्रम् ॥ तित्थंकर सोलसम सन्तिजिणवलहसतह ।। कुरु मंगल मम हरसु दुरिअमखिलंपि । थुणंतह ॥ १७ ॥ (छाया) विजयाजितशत्रुपुत्र श्रीअजित जिनेश्वर तथा अचिरा- विश्वसेनतनय पंचमचक्रीवर पोडश तीर्थकर सतां वल्लभ शान्तिजिन इत्थं मम मंगलं कुरु आखिलं दुरितं हरस्व तथा रतुवतामपि (मंगलंकुरु अखिलं दुरितं हर) ( पदार्थ) (विजया ) विजयानाम्नीमाता और (जियसत्तु) जितशत्रु नामक पिता इन्होंके (पुत्त ) पुत्र ऐसे (सिरि ) शोभायुक्त ( अजिअ जिगेसर ) हे अजित- नामक जिन भगवन् (तह ) और ( अइरा ) अचि. रानाम्नीमाता (विससेण) विश्वसेन नामक पिता इन्होंके ( तणय ) पुत्र ( पंचम ) पांचवें (चक्रीसर) चक्रवर्ती (सोलसम ) सोलहवें (तित्यंकर ) तीर्थकर (संतह ) सत्पुरुषों के (वह) प्यारे (संतिजिण) हे शान्तिनाथ जिन भगवन् (ह्य ) पूर्वोत्तप्रकारसे ( मम) मेरे और (पिथुणंतह ) इसतवनको पठन
उल्लासिम स्तोत्रम् ॥
करनेवाले पुरुषों केभी (अखिलं) सम्पूर्ण (दुरिझं)
पापको [ हरमु] हरणकरो और ( मंगल ) कल्याण
(कुरु ) करो,
(भावार्थ)
विजया नाम्नी माता और जितशत्रु नामक पिताके
पुत्र ऐसे हे अजित जिन भगवन् और अचिरानाम्नी
माता तथा विश्वसेन नामक पिता के पुत्र पांच
चक्रवर्ती सोलहवें तीर्थकर सत्पुरुषोंके प्यारे ऐसे हे
शान्तिनाथ जिन भगवन् आप मेरे और इस स्तवनको
पठन करनेवाले भव्य जीवोंके पूर्वोक्त प्रकार संपूर्ण
चापाको हरण करो और मंगल करो
= লিনবিবিনিমন্যাস্কিলসদিনসম্মাহত
नाध्यापकचर्याचे कुटोदयश्रीगोपीनाथसून रावती इतमुबोधिनी
ध्यापयोपेत समाप्तम् ।
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अथ नमिऊणनामक स्मरणं प्रारभ्यते । ॥ श्रीवीतरागायनमः॥ आदी मंगलाविधानपुरःसरा मंगलगाया कन्यते । ॥ गाथा॥ नमिऊण पणयमुरगण चूडामणिकिरणरंजिभ उणिणो । चलणजुअलंमहाभय पणासणं संयवं (छाया) मुनेः प्रणतमुरगणचूडामणिकिरणजिनं महाभप. प्रगाशनं चरणयुगलं नवा संस्तवं पनि ॥१॥ (विवरणम् ) अहं मुनेः पार्धनाथस्वामिनः प्रगतमुरगगडामणि- गिरंजित प्रारेंगनताः ये मुरागां देवानां गगाः पनिनेपां चूडाः मुफुटानि तेषु मगपः सेतो. भ २ नमिऊणस्तोत्रम् ॥ रंजितं शोभितं महाभययप्रणाशनं रोगजलज्वलनादि पोडशमयेपुयानि अष्टमहाभयानितेषां प्रणाशकरी एतादृशं चरणयुगलं नमस्कृत्य संस्तवं वाम वर्णयामि ॥ १॥ ( पदार्थ) (मुगिणो ) पार्श्वप्रभुके (पणय ) नमस्कारकरने चाले ( सुरगण ) देवताओंके समूहके ( चूडा ) मुकुट में स्थित ( मणि) मगियोंकी (किरण) किरणोंसे (रजि) सुशोभित और ( महाभय) आठ महाभयों के (पणासगं) नाशकरनेवाले ऐसे (चलणजुअलं) चरणयुगलको (नमिऊण ) प्रणामकर (संघ) स्तवन को ( दुन्छं) वर्णन करताहूं ॥१॥ (भावार्थ) संस्तबके आरंममें मंगल कीर्तन पूर्वक मंगलगाधा कहते है। प्रणामकरनेवाले देवोंके मुकुटमणियोंकी किरणोंसे सशोभित और आठ महामयोंके नाशकरनेवाले से पार्धनमुके चरणयुगलको प्रणामकर में सावनको वर्णन करताहूं ॥१॥ ', नाममातोरन अयगाधापुगलेन पार्थस्वामिनो रोगमपनिशरण लक्षगोऽतिशयो ययते । ॥ गाथा ॥ सडियकरचरणनहमुह नियुहनासावित्रलाना कुटमहारोगानल फुलिंगनिदड्दमदंगा ॥२॥ तेतुहचलणाराहण सलिलंज सेपबुदिपच्यापा चणदवदवागिरिपा यवनपनापुणोलन्छि॥१॥ (छाया) (ये) विशी वरचरणनग्यमुपाः () मनाना- सिकाः (ये) विनष्टलावण्याः (ये ) युसमहारोगानर पुलिंगनिर्दग्धसांगाः से तव परगारानमहिला सेकस्तिष्ठायाः सन्तः पुनः पनवदग्धा, गिरिसदन इच (आरोग्यरूप) लक्ष्मी माताः (भवनित) uta (विवरणम् । शिश करचरणनसमग्र येान्त विवरण मुराः (परचरणनारमुरमिति माण्यवान् विहमे- पवचनन शापय समारो ) निमग्ननारा: निभग्ना'
नमिउणस्तोत्रम् ॥
कुरूपतांनीताः नासाः प्रागेन्द्रियाणि येषां विनष्टं भ्रष्टं
लावण्यं सौंदर्य येषां कुष्टरूपः महारोगः (कुष्टोरोगविशेषः)
सवअनलः अग्निः तस्य स्फुलिंगाः अग्निकणाः
तैर्निर्दग्धानि प्लुष्टानि सर्वांगानि अखिलेन्द्रियाणि येषां
ते तब भवनः चरणयोः पादयोः आराधनं पूजनं तदेव
तत्संबंधिवासलिलं तेनकृतःसेकः पूजनावशिष्टजलसेचन
इत्यर्थः तेनवर्दिताः एधिताः छायाः कान्तयो येषां
एतादृशाः सन्तः वनवेन आरण्यदावानलेन दग्धाः प्लुष्टाः
गिरिपादपाः पर्वतीयवृक्षा इव लक्ष्मी आरोग्यसंपत्ति प्राप्ताः
भवन्ति ।। २-३ ॥
( पदार्थ)
(सडिय) सहगए हैं (कर) हाय (चरण) पांव
(नह ) नख (मुह ) मुख जिन्होंके, (निबुङ)
पैठगई है ( नासा ) नासिका जिन्होंकी, (वित )
नष्टहोगया है ( लायन्ना ) लावण्य जिन्होंका, ( कुठ)
कोइरूप (महारोग) भारी व्याधि यही मानो (अनल)
अग्नि उसकी (फुलिंग ) चिनगारियोंसे (निहढ़)
जलगया है (सन्चंगा ) सम्पूर्ण अंग जिन्होंका (ते)
दे (तह ) आपके (चलणचरणोंकी (आराहण)
नमिऊगस्तोत्रम् ॥
सेवारूप ( सलिलंजलि ) जलपरित अंजलिके ( सेय
सेचनसे ( युटिअच्छाया ) हिंगतहै शोभा जिन्होंने
ऐसे होकर ( पुणो ) फिर ( वणव ) दावा-
नलसे ( दट्ठा ) जलेहुए (गिरिपायव ) पर्वतीयवृक्षोंके
(ब) समान (लच्छि) आरोग्यरूप संपदाको (पत्ता)
माप्त होतेहैं ॥ २३॥
(भावार्थ)
अब दो गाथाओंसे पार्श्वप्रभुका रोगभयनाशक
स्वरूपसे प्रभाव कथन करते हैं।
सडगरहै हाथपावनखमुखादि अवयव जिन्होंके, पेठ-
गईहै नासिका जिन्होंकी, प्रनष्टहोगयाह लावण्य जिन्होंका
कोड़रूपमहारोगसे उत्पन्नहुई हुई पीडा जनित संतापरूप
अग्निकी चिनगारियोंसे जलगयहि सारा शरीर जिन्होंका
ऐसे प्रागी भी आपके चरणोंकी आराधनारूप जल
पूरित अंजलीके सेचनसे बढ़गई है शरीरकी कान्ति
जिन्होंकी ऐसे होकर फिर बनके अग्निसे जलेहुए
पर्वतीयवक्षोंके समान आरोग्यरूप संपदा को प्राप्त
होतेहैं ॥ २३ ॥
नमिकणस्तोत्रम् ॥ . अथगाथाद्वयन पार्श्वस्वामिनो द्वितीयजलभयाप. हरणलक्षण माहात्यं वर्ण्यते । गाथा ॥ दुव्यायखुभियजलनिहि उपभडकल्लोलभीसणारावे संभंतभयविसंठुल निझामयमुक्वावारे ॥ ४॥ अविदलिअजाणवत्ता सणेणपावन्ति इच्छि. अंकूलं पासजिणचलणजुअलं निबंचिअ जे नमंतिनरा ॥५॥ (छाया) ये नराः पार्श्वजिनचरणयुगलं नित्यं नमन्ति चेत् ते दुर्वाताभितजलनिध्युहटकटोलभीपणारावे संभ्रांतभय. विसंष्टुलविव्हलनिर्यामकमुक्तव्यापारे अविदलितयान- पात्राः संतः क्षगेन इन्छिनं कूलं प्राप्नुवन्ति ॥ ४५ ॥ (विवरणम् ) ये नराः मानवाः पावजिनस्य पार्शस्वामिनः चरण- युगलं आंध्रदयं नित्यं निरंतरं नमन्ति वन्दन्ते चेत् अधारणाथै (तेन त एव नान्येइतिफहति) ते दुर्वातेन प्राक्लिपवनेन क्षुभिः क्षोभप्राप्तः यः जलनिधिः समुद्रः तम्य रहटाः उदागः कोलाः अर्मयः तः भीषगः मvita भयंकरः आरा शादः यस्मिन् संभांता प्राप्तसंपट- निवारणे संमूहुंचेतसः भयात् भीत्याः सिंधुलाः चिन्हलाः एतादृशाः निर्यामकाः नाविकाः तः मुक्तः परित्यक्तः व्यापारः व्यवसायः परिमन् एतादृशे महाजलाशये अनिदरितानि अभग्नानि यानपात्राणि पोताः येषा क्षणेन निमेपमात्रेण इन्छितं अभिलापितं फूलं तर प्राप्नुवन्ति ।। ४.५ ॥ (पदार्थ) ( ) जो (नरा) मनुष्य (पासजिण) जिनभगान् पाचप्रभुके ( चरणजुअलं) चरणयुगलको (निश्च) निरंतर (नमंति) नमनकरतेहैं (चित्र) अवधारणार्थे, (ते) ही ( दुब्वाय ) प्रतिकूल परनसे (खुभिय) क्षोभित ( जलनिहि) समुद्रकी ( उम्भड ) भारी (कलोल ) लहरियोंसे ( भासण ) भयंकरहै (आरा) शब्द जिसमें तथा ( संभंत ) घबराए हुए और (भय- विसंतुल ) मयते विव्हल ऐसे (निझामय ) मलाह लोगाने (मुक ) छोडदिया है (वाबारे) नावचलानेका व्यापार जिसमें ऐसे जलाशयमें भी ( अविदलि.) मुरक्षितह ( जाणवचा ) नौका जिन्होंकी ऐसे होकर, ट नमिऊणस्तोत्रम् ॥ (खणेण) क्षणभरमही (इच्छिअं) आमिलपित ( फूलं ) तीरको ( पावन्ति ) प्राप्तहोतेहैं ॥ १-५॥ . (भावार्थ) अब गाथा द्वयसे भगवानका जलभयनाशकवरूपसे दूसरा माहात्य कीर्तन करते हैं। जो मनुष्य पार्श्वप्रभुके चरणयुगलको नित्य नमस्कार करतेहैं वेही प्रतिकूल वायुसे क्षुभित समुद्रकी मोटी लहरियोंसे भयंकर है शब्दजिसमें और वर्तमान संकट के निवारणमें घबराएहुए और भयसे विव्हल मल्लाहओं ने छोडादियाहै नौकाचालनादिव्यापार जिसमें ऐसे समुद्र में भी सुरक्षित नोकावान् होकर जलदी ही इच्छित तटको पहुंच जातेहैं ॥ ४५ ॥ अथ गाथायुगलेन पार्श्वप्रभोः तृतीय दवानलभयाप- हारातिशयो वर्ण्यते । ॥ गाथा ॥ खरपवणुद्धअवणदव जालावलिमिलियसयल- दुमगहणे । उज्झंतमुद्धमयबहु भीसणखभीसणं मिवणे ॥६॥ जगगुरुणोकमजुअलं निवाविअसयलतिहु- ममिऊणस्तोत्रम् ॥ अणाभो ! संभरंतिमणुआ नकुणइजलपो. भयंतोस ॥७॥ (छाया) सरपयनोदतदनदश्व लावलिमिलिवसफलमगहने द घन्मुन्धमृगभीपणरवभषिणयने. अध्या दह्यान्तमुग्ध- मृगयाभीपणरवमीपणवने ये मनुजा निर्वापितसकल- त्रिभुवनाभोगं एतादृशं जगद्गुरोः क्रमयुगलं समाति तेषां बलनो भयं न करोति ।। ६-७ ॥ (विवरणम् ) खरः प्रचण्डः परनः वायुः तेन उद्धतः प्रसारितः पनवः दावानल: तस्य ज्वालाः अचिपः तास आशलि श्रेणिः तया मिलिताः संस्पृष्टा दह्यमानाः इत्यर्थः सालाः समग्राः इमाः वृक्षाः यस्मिन् सन् गहनं वनं तस्मिन् तथा दह्यमानाः प्लुप्यमाणशरीरावयवाः मुग्धाः सरलाः याः मृगवन्यः हरिप्यः तासां भीषणः भयंकरः रस आक्रंदा तेन भीपणं भयप्रदं वनं अरस्य सस्मिन् अथवा दग्धुं शक्यं दा धनं तस्य अन्तः मासानं यस्मिन् स दह्यान्तः दावाग्निः तेन मुग्धाः मुछिताः मृगाः दनपशा देषां बहुभीपणः अत्यन्तभयानयः रवः
आदः तेन भ.पगं भवन, वनं अगलं शामिन
माशेने ये मनुजाः नराः निषिनः आतिमनित
संतापशमनेन मुसीहतः सार्क मन जिनुनी
(प्रयागां मुधनानां सनहारः त्रिमुग्नं ) श्यं तस्य
आभागः स्थान (निाविनः सकलधिभुवनामोगः )
येन तत् तादृशं जगहुगेः जगदज्ञानतिमिरनिरोधकम्य
पार्शप्रमोः क्रमयुगलं क्रमयोः चरणयोः युगलं युग्नं
संम्मतिः स्मृतिपथनयन्ति तेषां पूक्तिजनानां चलनः
दवानरः भयं भीति न करोति ।। ६-७॥
(पदार्थ)
( खर ) प्रचण्ड ( परम ) वायुसे ( उद्धव ) फैले
हुए ( वणदर ) बनके अग्निकी (जाला ) ज्यालाओंकी
( आवलि ) पंक्तिसे (मिलिय) स्पकियेहु (सयल)
सम्पूर्ण ( दुम ) वृक्ष हैं जिसमें ऐसे ( गहणे ) बनने
और ( उझंत ) जस्तीहुई ( मुद्ध ) सरल (मयबदु )
हरणिों ( भीसण) भयंकर ( ख ) चिल्हाट से
(भीसर्गमि ) भयप्रद ऐसे (वणे) अरण्यमें अथवा
(उझंत ) वाग्निसे (मुद्ध) मुच्छित (नय) अरण्य
निवासी पशुओंके ( बहु ) अत्यन्त ( भीसण) भयंकर
नामउगम्तोत्रम् ॥
( स्व ) आकन्दसे ( भीसणमि ) भयप्रद ऐत
(वणे) बनमें (जे) जो ( महुआ ) मनुप
(निमाविअ ) आपत्तिजनित संतापको दृग्कर मुग्वी
कियाहै ( सयल ) समग्र (तिहुअणामोअं) त्रिभुवन
रूपस्थानको जिसने ऐसे ( जगगुरुणो ) जगद्गुरू
पार्थप्रभुरे ( कमजुअरं ) चरणयुगलका (संभाति )
स्मरणकरते हैं ( तेसि ) उन्होंको (जरगा ) दावाग्नि
( भयं ) भीति (न कुणद ) नहीं करता ।। ६-७ ।।
(भावार्थ)
अब दो गाथाओंगे भगगन दाशनालय, भयरा
नाशकरने है ऐसा भगवान्का महिमा पार ।
प्रचण्ड वायुसे पलेहुए दागनयी काराओं की
पंत्तियोंसे जलो हुई तमाम वृक्ष जिममें और ॥
हुई सरर हगिगयोंके भयप्रद विटाहटा नगर
अथरा दाग्निसे मुकिा अरण्यनिती शुभारं.
अत्यन्त भयंकर आऊन्दरी भारिमद बनो मात्र
संसारक संतापको दूरकर सुम्पी किया: निमुन जिला
ऐसे जगगुरू पार्थभगवान्ये, परगगुगा की मग
करते हैं उन्हें दानि भय नहीं करता ॥ ..॥
नमिणस्तोत्रम् ॥ अथ गाथायुग्मेन भगवतः पार्श्वप्रमोश्चतुर्थविषवर भयनिवारकत्वमहिमा दयते । ॥ गाथा ॥ विलसंतभोगभीसण फुरिआरुणनयणतरलजी- हाले । उग्गभुअंगंनवजलय सच्छहंभीसणा- यारं॥८॥ मन्नतिकीडसरिसं दूरपरिच्छूट विसम विसवेगा। तुहनामस्करफुडसिद्धगंत-गुरु आनरालोए ॥९॥ (छाया) नराः लोके तयनामक्षरस्फुटसिद्धमत्रेण गुरवः अत एवं दूरपरिठूनविपमविपरगाः संतः चिलसहोगीपग- स्फुरितारगनयनतरलजिव्हं नवजलदत्तदृशं भीपणाकारं ( भीपणाचारं ) वा एतादृशं उग्रभुजगं कीटसदृशं मन्यते ॥ ८९॥ (विवरणम् ) ये नराः मानवाः लोके भुक्ने तब भवतः नामाक्षराणि एव स्पुटः प्रथितः सिद्धमंत्रः तेन गुरका प्रभावशालिनः अतएव दूरं दूरतः परिछूनः परित्यक्तः विपमः मृत्युप्रदः विश्वेगः गरलप्रभावः यः ते विलसन् कान्तिमान् भोगः अमिजतोत्रम् ॥ फमा यस्य भीषणः भवतः रफुरिते चपले अरुणे रक्त नपने नेत्रे यस्य तरला चन्चला जिव्हा रतना यस्य ताशः नवः नूतनः जलदः मेघः तत्समानः भाषणः आकारः आकृतिः यस्य यहा भीषणः भयप्रदः आचारः आचरणं यस्य एतादृशं उप्रभुजंग प्रचण्डस कीटसदृशं तुन्यजन्तुसमानं मन्यते गणयन्ति ॥ ८९ ॥ (पदार्थ) ( नरा) मनुष्य (लोए ) इस लोकम (तुह ) आपके ( नामरकर ) नामाक्षर वहही मानो (फुड ) प्रस्थान और (सिद्ध ) सिद्ध ( मत ) गाण्डादिकमंत्र उससे ( गुरुआ ) प्रभावशाली होनेसे (दूर) अत्यन्त दूर और ( परिद ) चारोंओर टालादिया है (सिम) मृत्युप्रद ( सिदेगा ) विपका वेग जिन्होंने ऐसे होकर (विसंत ) चमकीला है ( भोग) शरीर जितका और ( मीसग ) भयंकर (पुरिभ) चपल और (अरुण) लाल, (नयन ) नेत्र जिसके और ( तरल) चंचल, (जीझालं ) जीभ जिसकी ( नजलय) नर अपके ( सटहें ) समान ( भीतग ) भयंकरहै ( आयारं ) आकार अधर क्षाचार जिसका ऐसे ( उग) पिकाल.
ना
minutriend
(गुग) सानो (शसिं) कीरामान (मति)
मानते है ॥ ८.१ ॥
(भावार्थ)
अय गायादयसे साविपनिवारस्तम्प
प्रभाव वर्गन करते हैं।
मनुष्य इस लोक आपके नामाक्षररूप प्रल्यात और
सिर गारुटमंत्रसे प्रभावशाली होकर मृत्युप्रद षिके वेग
को अत्यन्त दूर टालदेते हैं और चमकदार फणावाले
मुशोभि देहवाले चंचल और लालनेवाले चपल जिव्हा
वाले नये मेपके समान भयंकर आकृतिवाले विकाल
सर्पको कोडेकसमान मानते हैं ॥ ८-९ ॥
अथ गाथायुगलेन प्रमोः पञ्चमतस्करभय
निवारकत्वप्रभाशे वर्ण्यते ।
॥ गाथा ॥
अडवीसुभिल्लतकर पुलिंदसद्लसहभीमासु ।
भयविहुलवुनकायर उल्लूरिअपहियसत्थासु ॥१०॥
अविलुत्तविहवसारा तुहनाहपणाममत्तवावारा ।
वरगयविग्वासिग्छ पत्ताहिय इच्छिगंठाणं ॥ ११ ॥
नमिऊगम्तो गम् ॥ (छाया) मिल्लतस्करपुलिंदशालशन्दीमासु भयविव्हलविप. व्णाकारोन्तुष्ठितपधिकसार्थासु अटीपु हे नाथ तर प्रणाममात्रव्यापाराः अतएव अपिलुप्तविभवसाराः ते जनाः व्यपगतविघ्नाःसंतः शीघ्रं हदि इच्छित स्वानं प्राप्ताः भवन्ति ।। १०.११॥ (विवरणम् ) मिलाः आरण्यकाः तस्कराः चौराः पुलिन्दाः वनचर' जीशः (भिटाः पुलिन्दाश्च पनचरभेदाः) शार्दुला। सिंहाच तेषांशद्वाः तैमिासु भयमदासु भयेन भीत्या विव्हलाः व्याकुलीकृताः विषण्णाः दुःखिता अकात अभारमिः मिल्लः उस्लुष्ठिताः अपहतसर्वस्याः एतादृशाः पषिकसार्थाः अध्वगसंघाः यासु तथाविधासु अटचीपु गहनवनेपु हे नाथ हे स्वामिन् तब प्रणामएव प्रणाम मात्रं प्रणतिमानं तदेव व्यापारः येषां ते अतएव अधि. लुप्ताः अपरिहृताः विभवसाराः उत्कृष्टधनं येषां ते जनाः व्यपगता, निष्टाः विघ्नाः अन्तरायाः येषां ते शोध त्वरितं हदि अन्तःकरणे इच्छित अभिलपितं स्थान प्रदेश प्राप्ताः आसादितवन्तः भवन्ति ॥ १०.११ ॥ .
नमिउणस्तोत्रम् ॥ ( पदार्थ) ( भिल्ल ) भील ( तकर ) चौर ( पुलिंद ) बनचर जीव ( सहुल ) सिंहोंके (सह) मारोमारो आदिशन्दों से ( भीमासु ) भयंकर, ( भय ) उरसे ( बिहुल ) व्याकुल ( बुन्न ) दुःखित और ( अफायर ) निडर भीलोंसे ( उल्लूरिज) लूटलिये गए (पहिअसत्यासु) पथिकसमुदाय जिन्होंके विषय ऐसे ( अडवीसु ) गहन वनोंमें ( नाह ) हे नाथ (तुह ) आपको (पणाममत्त) प्रणाममान है ( बारा ) मारर जिन्हीका ऐसे होने सेही ( अपिलुत्त ) नल्टागयाहै (विहवसारा ) उत्कृष्टधन जिन्होंका ऐसे जन (सिग्धं ) जलदी ही ( वयगय ) विशेषतः नष्ट होगए हैं (विधा ) विन्न जिन्होंके ऐसे होकर ( हिय ) हृदयमें (इच्छियं ) अभिलपिता ( ठाणे ) स्यानो ( पत्ता ) प्राप्त होते हैं ॥ २०११ ॥ (भावार्य) अब दो गाथाओसे प्रभुका तस्करनयनितारणरूप अतिशय कथन को है। जमीन्द, चोर, बनमें संचारकरनेवाले जीव और सिंह
गमिउस्तोत्रम् ॥
इत्यादि प्राणियोंके मारो २ आदि शब्दोंसे भयंकर है,
और जिन्होंमें पथिकजन समूह निडर भीलोंसे लूटे गए
है तथा डरसे व्याकुल और दुखित होरहेहैं ऐसे गहन
पनोंमें हे नाथ आपको प्रणामकरतेही मनुष्योंका उत्कृष्ट
धन पच जाताहै और सम्पूर्ण विन नष्ट होकर जलदी
ही वे इच्छित स्थानको प्राप्त होजाते हैं ॥ १०-१६ ।।
अप गाथाद्वयेन प्रभोः सिंहभयनिरासकारकारूपं
पष्टमाहाल्यं वर्ण्यते।
|| गाथा ॥
पजलिआनलनयणं दूरवियास्यिमुहमहाकायं ।
नहकलिसधायविअलिअ गइन्दकुंभत्यलाभो ॥१२॥
पणयसतंभमपस्थिव नहमणिमाणिकपडिमपडि-
मस्स । तुहरयणपहरणधरा सीहं कुद्धपि न
गणंति ॥१३॥
(छाया)
हे प्रभो प्रणतससंभ्रमपार्थिवनखमणिमाणिक्यपतित
प्रतिमस्य तव वचनप्रहरणधराः मानवाः प्रज्वलितानल.
नयनं दूरविदारितमुख महाकाय नखकुलिशधातदिलित-
गजेन्द्रकुंमस्थलाभोगं एतादर्श सिंहं कुरमपि न
गणयन्ति ॥ १२.१३ ॥
नमिऊगस्तोगम् ॥
(विवरणम् )
हे प्रभो प्रणताः नमीभूताः ससंभ्रमाः आवरसहिताः
पार्थिवाः राजानः तेषां (प्रभोः) नखाः कररहाः एव
मणिमाणिक्यानि तेपु पतिताः याः प्रतिमाः प्रणतस.
संभ्रमपार्थिवानां नखमणिमाणिक्यपतितप्रतिमाः यस्मिन्
प्रणतससंभ्रमपार्थिवनखमणिमाणिक्यपतितमतिमः
तस्य तव वचनं आज्ञा एवं प्रहरणं शस्त्रं तस्य घराः
धारणकर्तारः ये मानवाः नराः प्रज्वलितः देदीप्यमानः
यः अनलः अमिःतहन्नयने नेत्रे यस्य तम् दूरात्
विदारितं मुखं वदनं येन तम महान् विशालः कायः
शरीरं यस्य तम् तथा नखाः एव कुलिशं वज्रं तैः घातः
प्रहारः तेन विदलितः चूर्णितः गजेन्द्रस्य प्रबलहस्तिनः
कुंभस्थलस्य गण्डस्थलस्य आभोगः विस्तारः येन तम्
सिंह क्रुद्धमपि न गणयंति न भयहेतुं मन्यन्ते ॥१२-१२॥
(पदार्थ)
हे प्रभो ( पणय ) प्रणामकरनेवाले ( ससंभम )
आदरसहित ( पत्थिव ) राजाओंकी (नहमाणिमाणिक)
प्रभुके नखरूप मणिमाणिक्योंमें (पडिअ) गिरी है
(पाडिमरस ) प्रतिमा जिनके विषय ऐसे (तुह) आपके
मामउगातारम॥
(बयण ) वचनरूप (पहरण ) शत्रको (पर
धारणकरनेवाले मानव ( पज्जलिअ) प्रचलित (जनन)
अमितमान, ( नयनं ) नेत्र जिसके (दूर ) इन्ही
(क्यिारिय ) फैलाया है ( मुहं ) मुख जितने (मह)
पड़ा है.( कायं ) शरीर जिसका ( नह) नना
( कुलिस ) वज्रके ( घाय ) प्रहारसे (वि)
चीरदिया है ( गइंद) गजेन्द्रहाधीके (इंनपट)
गण्डस्थलका ( आभोरं ) विस्तार जिसने न (5)
सिंहको ( कुपि ) कुडहोनेपरभी (न) नहीं (सनी)
गिनते हैं ॥ १२-१३ ॥
(भावार्थ)
अब दो गाथाओंमें पार्श्वभगवान् का निहन्य
निरासरूप प्रताप लिखते हैं।
हे प्रभो आपके नखरूप रत्नाने मदाहिन प्रणाम
करनेवाले राजाओंकी प्रतिमा प्रतिविदित होता, आपके
वचनरूप शस्त्रको धारण करनेत्रं भव्य
प्रज्वलित अग्नि तमान नेत्रवाले दूरसही ग्बान
फाडाहै मुख जसने, मोरे बसाले और
यत्र प्रहारसे छिन्न भिन्न करदिया है।
२०. नमिऊणस्तोत्रम् ॥ गण्डस्थल जिसने ऐसे सिंह को क्रुद्ध होनेपर भी तुच्छ गिनतेहैं ॥ १२-१३ ॥ अथ गाथायुगलेन प्रभोः सप्तम गजमयनिरास- कत्वातिशयो वर्ण्यते । ॥ गाथा ॥ ससिधवलदंतमुसलं दीहकरलालवइदिउच्छाहं । महुर्पिगनयणजुअलं ससलिलनवजलहराराव।।१४॥ भीमं महागइंदं अचासन्नपितेन विगणंति जे तुम्हचलणजुअलं मुणिवइतुंगंसमल्लीणा ॥ १५ ॥ (छाया) हे मुनिपते ये तर तुई चरणयुगलं सलीनाः ते शशिषवलदंतमुसलं दीर्घकरोल्लोलवर्धितोत्साहं मधुपिंगनयन युगलं ससलिलनवजलधरारावं भीमं महागजेन्द्रं अत्या- सन्नमपि न विगणयन्ति ॥ १४-१५ ।। (विवरणम् ) हे मुनिपते हे मुनिस्वामिन् ये मानवाः तव भवतः तुझे अत्युनतं चरणयुगलं चरणयोः पादयोः युगल युग्मं सँटीनाः समाश्रिताः ते शशिधवलदंतमुसलं शशी इन चन्द्र व धवली स्वप्छौ दन्तौ दशनी एवं मुसली
भाऊणस्तोत्र
मुरी यस्य तम् दीर्घकरोछोलबाधितोत्साहन दीर्घः आयतः
फरः शुण्डादण्डः तस्य उद्योलः चालन तेन वर्धितः
रादिगतः उत्साह उछासः यस्य तम् मधुपिंगनयन
युगलम् मधु माक्षिकं इन पिंगं पीतं नयनयोः नेनयो।
युगलं युग्नं यस्य तम् ससलिलनवजलधराराम सलिलेन
जन सहितः सचासौ नरजलधरः नूतनमेषः तस्य
आरायः शब्दः इव आरायो यस्य सः तम् भीमं भीषणं
महागजेन्द्र अर्जितकुंजरं अत्यासन्नमपि अतिसमीपरथ,
अपि न विगणयन्ति न कलयन्ति ।। १४-१५ ॥
(पदार्थ)
:-( मुणिवइ ) हे मुनिपते (जे) जो मनुष्य (तुम्ह)
आपके (तुंग) गुणांसे उन्नत (चलणजुअलं ) चरण
युगलका ( समल्लीणा ) सम्यक् आश्रय करलेतेहैं (ते)
ये मनुष्य ( ससि) चंद्रके समान (पवल) श्वेत
(तमुसलं ) देतद्वयरूप मुसलहै जिसको, (दीह )
लंबे (कर) शुंडादण्ड के ( उद्धाल) संचालनसे
(वढि ) पड़गया है (उच्चाह ) उत्साह जिसका
(महु ) शहदके समान (पिंग) पोली नयनजुअलं
दोनों आँखें जिसकी ( ससालल) जलसहित (न)
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मगिरणस्तोत्रम् ॥ २३ निजिय दप्पुद्धररिउ नरिंदनिवहा भडाजसं धवलं । पावंति पाव पसमिण पासजिणतुहप्प; भावेण ॥ १७॥ (छाया) हे पादजिन हे पापप्रशमन निर्जितदाँदुररिपुनरेन्द्र निवहनमः तीक्ष्णखड्गाभिघातापविद्धोडतकबंधे कुन्तचिनिनिमकार कलभमुक्तसीत्कारप्रचुरे समरे तब प्रभावेण धरलं यशः प्राप्नुवन्ति ॥ १६-२७ ।। (विवरणम्) हे पाजिन हे पार्थस्वामिन् हे पापप्रशमन हे पाप प्राणशक निर्जितदपांडुररिपुनरेन्द्र निवहभटाः हे र्पण गण उद्धराः विटंखलाः रिपुनरेन्द्राः विपक्षराजानः पां निवहः समुदायः निर्जितः पराजितः एतादृशः मुदायः यः ते भटाः शूराः तीक्ष्णखगाभिघातापविद्धोडु चंधे तदिणाः निशिताः खड्गाः कृपाणाः तः अभिघाताः राः तः अपविद्धं अनियंत्रितं यथारयात् तथा नाः नर्तितुं प्रवृताः कयंधाः मरतफराहितशरीरभागाः नन् फुन्तपिनिर्मिनकरिकलभमुक्तसीत्कारप्रचुरे कुन्ता - तैः विनिर्मिनाः पिदारिताङ्गाः करिफलभाः।
नमिऊणस्तोत्रम् ॥
ग्रजशावाः तः मुक्ताः परिच्युताः सीत्काराः कातरशब्दाः
तैः प्रचुरे परिपूरिते समरे संग्रामे तब प्रभावेण तव
प्रतापेन घवलं उज्वलं यशः ख्याति प्राप्नुवन्ति
लभते ॥ १६-१७ ॥
(पदार्थ)
(पासजिण) हे पार्वजिन ( पायपसमिण) हे
पापोंके प्रणाशक (निन्जिय ) जीतालिये हैं (दप्पुटर)
शूरताके गर्वसे अन्ध (रिउनरिंद) शत्रुराजाओं के
(निवहा ) समूह जिन्होंने ऐसे ( भडा ) शुरपुरुष
(तिक्खखग्ग ) तीक्षण खड्गोंके ( अभिग्याय) प्रहारों
से ( पविद्ध ) वैरोक ( उडुय ) इधर उधर नाचने
लगतेहैं ( कबंधे ) मस्तक रहित कपंच जिसमें (कुन्त)
भालोसे ( विणिभिन्न ) हिदेहएहैं अंग जिन्होंके ऐसे
(करिकलह ) हाथियोंके वचोंके ( मुशासिकार )
निकले हुरे सीत्कारोंसे ( पउरम्भि ) प्रपूरित ऐसे
( समामि) संग्राममें (तुह ) आपके (पभाषण)
प्रभावसे (घबई ) उम्पल ( जसं ) कीर्ति ( पावन्ति)
प्रान करतेहैं ।। १५.१७ ॥
नमि॥ २५ + (भावार्थ) अब गाया दयसे पादत्रप्रभुका आठवां संग्रामभय. विनाशनरूप महिमा कपन करतेहैं । हे पावनाय हे पापध्वंसक जीतलियेह शूरताके गर्वसे मदान्ध प्रतिपक्षी राजाओंके समुदाय जिन्होंने ऐसे शूरपुरुष तीक्ष्ण खड्गोंके प्रहारसे छिन्नहोनेकेकारण रोक पर उपर नाचने लगे, मस्तारहित पड जिसमें और भालोंसे छिदेहुए हाथियोंके पालकोंके मुख से निकले साकारोंसे प्रपूरित संग्राममें आपके प्रभावसे उज्वल यशको प्राप्त करते हैं ।। १५-१०॥ अधुना एकया गयया पूर्वोक्तारभयानिरासरत्य. महिमा वर्ण्यते। ॥ गाया। रोगजलजलणविसहरचोपरिमइंदगपरणभयाई। पासजिणनामसंकित्तणेण पसमांत सचाई ॥१८॥ (या) पायजिननामसंकीर्तनेन सर्वाणि रोगजलबलनविष- धरचोरारिमृगेन्दगजरणभयानि प्रशाम्यन्ति ।। १८ ॥
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(निपरगन)
नाविनमा जलजम अग्निम मजमर्ष
सरसरिरिपुभगं निभा गरिमा संमानमान्यट-
मपनि पारीजिनारम्य नामग्माणमात्रणव म्यमा
प्रशाम्यन्नि उपरानं यान्ति १८ ॥
(पदार्थ)
(पागनिग) पायजिनेश्वर (नामसंकित्तग)
नामहर्तिनसे ( सम्बाई ) सम्पूर्ण (रोग) कुष्टादिगंग
(जउ ) पानी ( जलण ) अग्नि (विसहर ) सर्प
(चोगरि ) तम्ममदिशत्रु ( मदन्द ) सिंह ( गय )
हाथी (रग) संग्राम एतत्संबन्धि (नयाई) सर्व
( भयाई) भय ( पतमन्ति) स्वयं ही शान
होते है१८॥
(भावार्थ)
अब एक गाथामे पूर्वोक्त अष्टमयनिवारण-
रूप आतिशय कहते हैं।
पार्वजिनेश्वरके नामकीर्तनसे रोगभय, जलभय,
आग्निमय, सर्पभय, चोरादिशत्रुभय, सिंहभय, करिभय
वथा संग्राममय ये आठ भय वयही शान्त होतेहैं ॥१८॥
ममिउणस्तोत्रम् ॥
अनया गाथया एतत्स्तोत्रमाहास्यं वर्ण्यते ।
॥ गाथा ॥
एवं महाभयहरं पासजिणिदस्स संपवमुआरं
भवियजणाणंदयरं कल्लाणपरंपरीनहाणं ।। १९ ।।
(छाया)
एवं महानयहरं पार्वजिनेन्द्रस्य उदार संस्तवं मन्य.
जनानंदकरं कल्याणपरंपरानिदानं चास्ति, अथवा भव्य.
जनानां कल्याणपरं परनिभानांच पंधकरं अस्ति men
(विवरणम् )
एवं पूर्वोक्ताष्टमहामयजनितानर्थप्रतिघातकत्वेनविश्रुतं
पामगवतः उदारं अल्पशन्दसंघातमपिमहसलमदायक
संस्तवन इदं नामिऊणाभिधस्तोत्रं भव्यजनानंदकरं भन्याः
मुक्गिमनयोग्याः ये जनाः प्राणिनः तेषां मोक्षपदानेन
आनंदकरं मुखकर कल्याणपरंपरानिदानं फायणरय
मंगलस्य परंपरा संततिः तस्याः निदानं आदिकारण प
आस्ति । अधरा भव्याः भगत्तयारसाः ये जनाः
मानाः तेषां कल्याणपरं मंगलैपदीक्षापरं तया परे
शयः तेपो निभाः फपटानि तेषां पंचरं नियंत्रक
अस्ति ॥१७॥
२८
नमिणरतीजन् ।।
(पदार्य)
( एवं ) इस पूर्वोक्तप्रकारसे ( महाभयहरं ) मोटे
मोका नाशकंरनेवाला ( पासजिणंदरस ) पार्श्वजिन.
भगवानका ( उआरं ) थोडेशन्दोंसे बहुतफलदेनेवाला
(संयवं ) नमिऊणनामकरतोत्र (भावियजण) भव्य
जनोंको ( आणंदयरं ) मोक्षसुखरूप आनंदकरनेवाला
और मंगलकी ( परंपर ) संततिका (निहाणं) आदि
कारण है अथवा ( भविजणाणं ) भव्यजनोंको
( कल्याणपरं ) मंगलदायक और, (परनिहाणं) शत्रुओं
के कपटोंको ( अंदयरं ) बांधनेवाला है ॥ १९ ॥
(भावार्थ)
इस एक गाथासे इस स्तोत्रका माहास्य
वर्णन करतेहैं।
यह महाभयनिवारक बहुफलदायक श्रीपाचप्रभुका
नमिऊणनामक स्तोत्र भव्यप्राणियोंको मोक्षसुख. देने
वाला और अत्यन्त मंगलकारक है इसके पठनसे
शत्रुओंने किये हुए मारणउच्चाटनादि . सब प्रयोग
व्यर्थ होते हैं ॥ १९ ॥
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२८
नमिउणस्तोत्रम् ॥
'(पदार्थ)
( एवं ) इस पूर्वोक्तप्रकारसे ( महाभयहरं ) मोटे
भोंका नाशकरनेवाला (पासजिणंदरस) पार्शजिन-
भगवानका ( उआरं ) थोडेशन्दोंसे बहुतफलदेनेवाला
(संथ ) नमिऊणनामकरतोत्र ( भावियजण ) भव्य
जनोंको ( आणंदयरं ) मोक्षसुखरूप आनंदकरनेवाला
और मंगलकी ( परंपर ) संततिका (निहाणं) आदि
कारण है अथवा ( भविजणाणं ) भन्यजनोंको
( कल्लाणपरं ) मंगलदायक और ( परनिहाणं) शत्रुओं
के कपटोंको ( अंदयरं ) बांधनेवाला है ॥ १९ ॥
(भावार्थ)
इस एक गाथासे इस स्तोत्रका माहाल्य
वर्णन करतेहैं।
यह महाभयनिवारक बहुफलदायक श्रीपार्शप्रभुका
नमिऊणनामक स्तोत्र भव्यप्राणियोंको मोक्षमुख. देने
वाला और अत्यन्त मंगलकारक है इसके पठनसे
शत्रुओने किये हुए मारणउच्चाटनादि सब प्रयोग
व्यर्थ होते हैं ॥१९॥
PART 1 ma सा गाधायुगरेन भवस्यानमाटमपूर्वक पायः पथ्यते। ॥ गाया। रापमपजसरसग्पस कुमुमिण दुसाउणसित. पीदास संजामुदोमुपंथे उसग्गे तहय स्य- जानु ।। २० ॥ जो पटइ जोज निमुणइ ताणं कइनो य माप. तुंगस पासो पावं पसमेउ सपल भुवणजिअ चलणी ॥२१॥ (छाया) राजमययक्षराक्षसकुरवप्नदुःशपुनसक्षपीडासु द्वयोः संप्पयोः पपि उपसर्गे तथाच रजनीपु य इदं स्तोत्र पठेन् शृणुयाहा तस्य ( स्तोत्र ) कर्तुर्मानतुंगस्य व पापं सकलमुवनातिचरणः पाप्रभुः प्रशमयतु ।। २.२१॥ (विवरणम् ) नृपतियक्षदानयकुरवप्नदुशपुनमहादिमयजनितपीडा- समये प्रामाले सायंकाले अरण्यादिमार्गगमनावसरे देवमनुष्य कृतोपतर्गसमये तथा च रागावपि यो जनः इदं "नमिऊण" नामकस्तोत्रं भरतया पठेत् शृणुवाहा ममिउणस्तोत्रम् ॥ तस्य, स्तुतिकर्तुमानतुंगाचार्यस्य चाखिलपापराशिमखिल- भुवनपूजितचरणकमलः पार्श्वदेवः प्रशमयतु ॥ २०-२१ ॥ (पदार्थ) (रायभय ) राजभय ( जवस ) यक्षभय (एक्सस) राक्षसभय ( कुसुमिण ) कुस्वप्नभय ( दुस्सउण) दुःशकुनभय (विख) अशुभग्रह इन्होंकी (पीडासु) पीडासमय, और ( दोसु संझासु ) प्रातःकाल और सार्यकाल में (पंथे ) अरप्यादिमार्गमे (उसग्गे) देव और मनुष्यकृत उपसा (तहय ) और चेसेही ( रयणीसु ) रात्रिओं में (जो) जो मनुष्य " इस स्तोत्रको" ( पढइ । पठनकरता है (जो अनिसुणइ) और जो भक्तिपूर्वक सुनताहै ( ताणं ) उन्होंके (य) और (कइणो) स्तोत्रकर्ता (माणतुंगरस) मानतुकाचार्य के ( पावं ) पापको (सयल ) सम्पूर्ण ( भुवणचिअ) लोकमै अर्चितह (चलणो) चरण जिनके ऐसे (पासो) पार्श्वभगवान (पसमेउ) नाशकरो ॥ २०२१ ।। (भावार्थ) राजमय यक्षमय राक्षसमय कुस्वप्नमय अशुभग्रहमय इन मयोंसे पीडितहोनेपर, प्रातःकाल सायंकालमें, भरण्यादिमयानक मार्गमे, देव और मनुष्यकृत संकट- नमिऊणस्तोत्रम् ॥ समयमें और रात्रिमें जो मनुष्य इस स्तोत्रको भक्तिपूर्वक पठन करताहै या श्रवण करताह उसके और मानतुंगाचार्य के पापका त्रिभुवनने पूजेहैं चरणकमल जिनके ऐसे पाचप्रमु नाशकरते हैं ॥ २०-२१ ॥ अनया गाथया पार्श्वभगवतोऽतिशयो वर्ण्यते । ॥ गाथा॥ उवसग्गंते कमग सुरग्मि ज्झाणाउ जो नसंच लिउ। सुरनराकार जुवइहि संयुउ जयउ पास जिणो ॥२२॥ (छाया) कमठासुरे उपसर्गफुर्वतिसति यः ध्यानात् न सन्चलितः ससुरनरकिन्नरयुवतीभिः संरतुतः पार्वजिनः जयतु ॥२२॥ (विवरणम् ) कमठासुरे कमठदैत्ये उपसर्ग उपद्रवं कुर्वति आचरति. सति यः पार्थदेवः ध्यानात् नियतविषयकचित्तका. ग्र्यात् न सञ्चालितः न स्खलितः स सुराः देवाः नराः भन्यजनाः किन्नराः गंधर्वाः युक्त्यः देवाङ्गनाः ताभिः रतुतः नुतः एतादृशः पावजिनः जयतु सर्शकण वर्तताम् ॥ २२ ॥ (पदार्थ) (कमठासुरम्मि) कमठाने ( उपसगते) नीमऊणस्तोत्रम् ॥ कियेसते (जो ) जोपाचप्रमु (झापाउ) ....... (न)न ( संचलिउ) चलायमानहुए (सुर ) देवता (नर) भन्यजीव (किन्नर) गंधर्व (जुवइहिं) देवाङ्गनाओंसे (संधुउ) स्तुतिकिएगए ऐसे (पासजिणो) पार्शप्रभु (जयउ ) विजयशालीहोवें ॥ २२ ॥ (भावार्थ) कमठासुरने अत्यन्त त्रास देने परभी जो पाचप्रमु अपने ध्यानसे न संचलितहुए और देवता भन्यजीव गंधर्व और देवाङनाओंसे स्तुतिकिएगए ऐसे भगवान् पार्वजिन विजयी होवें ॥ २२ ॥ ॥ गाथा॥ एअस्स मभयारे अारस अक्खरोहिं जो मंतो। जो जाणइ सो ज्झायइ परम पयत्यं फुडं पास ॥ २३ ॥ (छाया) एतस्य मध्यभागे अष्टादशाक्षरः (निर्मितः ) यःमंत्रः अस्ति तं ( मंत्र ) यः जानाति सः स्फुटं परमपदस्थं पाच ध्यायति ॥ २३ ॥ (विवरणम् ) एतस्य " नमिऊणाख्यास्तोत्रस्य " मध्यभागे "नमि.
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माम जगतम् ॥
(छाया)
यः संतुष्टददयेन पास्यरमरणं करोति तय
अष्टोचरशान्याधिभगा दूरेग नश्यन्ति ॥ २४ ॥
(विवरणम्)
गो जीवः संतुष्ट शान्त हदयं मानसं रोग पारस्य
पार्शनगातः स्मरणं ध्यानं करोति तस्य जीररय
अहोरासंग्यााव्याधिगमयानि दूत एक नश्यन्ति
माशं प्राप्नुयाल ॥ २४ ॥
( पदार्थ)
(it) जो जीव ( मंतुहिययेग) शाल अंतःकरण
में (पामह ) पार्शगुफा ( रामण) मरण (कुगर)
कला (नम्म) गहे ( अटुत्तरराग) एकरो-
आट (यादगय) व्याविभय (दाण) द्वारोही (नाग)
नदान है ॥ २४॥
(भावार्य)
गजब आदगडपान र मग
पाया म्परालाई पर परमाबाद यावियोग
दानाले भर दागी नवीन ॥ १ ॥
अप श्रीजिनदनमस्तितंजयान्यस्तोत्रं प्रारभ्यते. ॥ श्री पीतरागायनमः। तं जयउ जएतित्वं जमित्य तित्याहियेणवीरेण सम्मं पवतियं भवसत्तसंताणमुहजणयम् ॥ १॥ (छाया) तत् जगति तीर्थ जयतु बदन्न भन्यसत्संतानसुखजनक तीर्थाधिपेन धीरेण सम्यक् प्रवर्तितम् ( पदार्य) (त) यह प्रसिद्ध (जए ) जगतम (तित्थं) चतुर्थ संघ (जयड) विजयको प्राप्त होओ (जम् ) जो (इत्थ) इस जगतमें ( भन्न ) नव्य (सत्त) जायके (संताग) समूहको ( मुह ) मुख ( उणयम् ) पेदा करनेवाला (तिस्थाहिवेण) चतुर्विध संबकस्वामी (धोरण ) महावी. रस्वामीने (सम्म ) मलेप्रकारसे ( पचियम् ) स्थापन मंजगस्त (भावार्थ) जो चतुर्ग संघ इसजगतमें भम जीयों समूह मुख पदाकरनेवाला और ननुभि संबो स्वामी श्रीमहावी. रस्सामीने धममर्यादानुसार स्थापन किया हुआ यह संप रिजको प्रात होओ (गाया) नामिय सयलफिलसानियालेस्सा पसत्यमुह- लेम्मा मिसिद्धमाणतित्थरस, मंगले दिन्तुने रिहा ॥२॥ (साया) नावित गाट शाः निहा फुयाः प्राग्न शुभ लेदयाः न अन्तः श्रीवर्धमानतीधस्य मंगले दर ( पदा) (नामिय) नाहियों (मयाट) मामा ) हर्मजन्यजिन्होंने (निय ) नारी) व (ER) मादिसा तिहोंने (माय , मलिक योग ( मुर दमा ) भागाशि हिन्दी (२)निट (ia) भन्न गार (रिदमानियन ) श्रीमान राजय स्तर स्थापनकियेहुए चतुर्विध संघको (मंगल) कल्याण (दिन्तु ) देओ (भावार्थ) नाशकियेह सम्पूर्ण कर्मजन्य दुःख जिन्होंने नाशकी। खराय कृष्णादि लेश्या जिन्होंने और स्तुतिके योग्य, , शुभ शुक्लादिलेश्या जिन्होंकी ऐसे वे प्रसिद्ध अर्हन्त भगशन श्रीवर्धमान तीर्धकर भगवानने स्थापनाकयेहुए चतुर्धसंघको मंगल देओ (गाथा) निद्दकम्मवीआ.वीआपरमेटिणो गुणसमिद्धा,।। सिद्धा विजयपासिद्धा हणन्तु दुत्वाणि तित्थ- (छाया) निर्दग्धकर्मपीजाः गुणसमृदाः त्रिजगतप्रसिदाः द्वितीय परमेष्टिनः सिद्धाः तीर्थस्य दोस्थ्यानि मन्तु (पदार्थ) (निट) जलादिये हैं (कम्म) अष्टकर्मरूप (पीआ) धीजजिन्होंने (गुण) सद्गुणोंसे (समिद्धा ) व्याप्त (विजय ) तानाजगतमें ( पासिद्ध) विख्यात (पीआ तंजय स्तोत्र ॥ दुसरे ( परमोठिणो ) परमेष्टीभगवान (सिद्धा) सिद्धसंज्ञक (तित्थरस) चतुर्विधसंधके (दुत्थाणि) क्लेशोंको (हणन्तु) नाशकरो. (भावार्थ) जलदियेहैं अष्टज्ञानावरणदि कर्मरूप चीज जिन्होंने सद्गुणोंतेव्याप्त तीनो जगतमें विख्यात ऐसे दूसरे परमेष्टी भगवान सिद्ध संज्ञक चतुर्विधसंघके क्लेशोंको नाशकरो. (गाथा) आयारमायरंता पंचपयारं सया पया संता ॥ आयरिया तहतित्थं निहय कुतित्थं पयासन्तु ॥२॥ (छाया) (ज्ञानदर्शनचारित्र तपोवीयर्यादि) पञ्च प्रकार आचार (स्वयं)आचारन्तः तथा सदा (अन्येभ्यः) प्रकाशयन्तः भाचार्याः निहतकुतीय (एतादृशं) तथि प्रकाशयन्तु (पदार्थ) (पंचपयारं ) ज्ञान, दर्शन चारित्र, तप धार्य ये पांच हैं प्रकार जिसके ऐसे (आयारं ) आचारये (आयरता)
एंजय सत्र
६
स्वयं आचारण करनेवाले (तह) और (सया ) सदा
भन्यजीवोंके अर्ध (पयासन्त) प्रकाश करनेवाले ऐसे
(आयरिया) आचार्य (निहय) नाश किया है (कुतित्थ)
चौदादिकुतीर्थ जिसने ऐसे (तित्धं) चतुर्विधयको
(पयासन्तु ) धारो
(भावार्थ)
ज्ञान दर्शन चाग्नि तप वर्यि ये पांच हैं प्रकार जिसके
ऐसे आचारको स्वयं आचारण करनेत्राले और सदा
भव्यजीवोंकेअर्थ प्रकाश करनेवाले ऐसे तृतीय परमेष्टी
आचार्य भगवान नाश किया है घोडादि कुतार्थ जिसने
ऐसे चतुर्विधसंपको उद्यतकरो
(गाथा)
सम्ममुअवायगावायगायसिअवायवायगावाए।
पश्यणपाडणीयकए वर्णन्तु सवस्ससंघस्स। ५॥
(छाया)
येसम्यक् श्रुतवाचकाचकाच स्याबादवादकाः (चतुर्थ
परमोटिनः उपाध्यायाः) सर्वस्य संघस्य प्रवचनप्रत्य
नाकान् अपनयन्तु
६ तंजय स्तोत्र। (पदार्थ) (ए) वेप्रसिद्ध ( सम्म ) उत्तमप्रकारते (सुअ) द्वादशांगरूप सिद्धान्तके (वायगा )वाचक ( य ) और (वायगा) अनेक तत्वोंकेवाचक (बा) और (सिवाय) स्याद्वादके (वायगा) स्पष्टकरने वाले ऐसे चतुर्थ परमेष्टी उपाध्यायभगवान ( सन्बरस ) संपूर्ग (संघरस) चतुधिसंघके (पवयण ) उत्तम जिनशासनके ( पहिणी- यकए) प्रहेपियोंको ( वणिन्तु ) दूर करो- ( भावार्थ) चे प्रसिद्ध उत्तमप्रकारसे हादशांगरूप सिद्धान्तके वक्ता और अनेक तत्वों प्रकाशक और स्यादवादको स्पष्टकरने वाले ऐसे चतुर्थपरमेष्टी उपाध्याय नगवान सम्पूर्ण चतुर्विधमंधक जिनशामनामहोपयोंको को (गाथा) निवाण माहणनय मात्रणंजाणियमन्चमाहन्या।। तित्यप्पभावगाते हबन्नुपरमष्टिगोजणी ॥ ६ ॥ (छाया) निर्वागमापनोवनगाथनां जानिग साहाय्याः तार्मि- प्रमारकाः ने ( पचन ) परमेनिः जयिनः भानु राजय स्तर . (पदार्थ) (नियाण ) मोक्षके (साहण ) सायनमें ( उज्जय) लगेहुए ( साहणं ) साधुओं ( जणिय ) उत्पन्नकाह (सब ) सरत-हासे ( साहझा ) मदत जिन्होंने नित्य) चतुर्विधसंधक (प्पभागा ) प्रभावको विख्यातकरनेवाले ( ते ) ( परभेटिगो ) पन्चमपरभेष्टी भगवान (जइणो ) विजयी (हवन्तु ) होओ (भावार्थ) मोक्ष के साधनमें लगेहुद साधुओंको उत्पन्न केहि सब तन्हासे मदन जिन्होंने चतुर्विधसंघके प्रभाव को दिल्यत करनेगले २ पञ्चमपरमेष्टी भगवान विजयी होओ. (गाथा) जेणाणुगयं नाणं, निवाणफलंच चरणमविहवाई ।। तित्थरस देसणं ते मंगुलमवणे असिद्धियरम् ॥ ७॥ (अाया) येनानुगतंज्ञानं चचरणमपि निर्माणफलं भवति सिदिकर तत् तीर्थस्य दर्शनं मंगुलं अपनयतु (पदार्थ) (ग) जिससे (अणुगयं ) प्रातकियारा (नाणं) तंजय स्तोत्र ॥ ज्ञान (च) और (चरणमवि) चारित्रमी (निच्याणफलं) मोक्षहै फल जिसका ऐसा (हबई ) होता है (सिद्धियरं) सकलकार्य साधक (तं ) वह (तित्थस्स ) तीर्थ के (दसण ) दर्शन ( मंगुलं ) दुर्यानको (अवणे) दृरकरो (भावार्थ) जिससे प्रात कियाहुआ ज्ञान और चारित्र भी मोक्षफल रूप होताहै ऐसा वह सकल कार्य साधक तीर्थका दर्शन हमारे दुनिको दूरकरो (गाथा) निच्छम्मोसुअधम्मो समग्ग भब्यगिवग्गकयसम्मो गुणसुष्ट्रियस्स संघस्स मंगलं सम्मानह दिसउ ।। (छाया) • समप्रभन्याङ्गिवर्गकृतशर्मा निकाः श्रुतधर्मः गुण- मुस्थितस्य संघस्य मंगलं सम्यगिह दिशतु (पदार्थ) (समग्ग) संपूर्ण (भव्यांग) भव्यप्राणियोंके ( यग) समुदायको ( कय ) कियाहै ( सम्मो) सुसजिसने (निष्ठम्मो) कपटरहित (मुअधम्मो ) शारोक्त संजय स्तोत्र ॥ धर्म (गुण) ज्ञानादिगुणोंमें ( सुटियरस ) निरंतर रहेहुए ऐसे ( संघस्य ) चतुर्विधसंघको (इह ) इस जगतमें ( सम्म) सम्यक् प्रकारसे ( मंगर ) कल्याण दिसउ ) देओ. (भावार्थ) सम्पूर्ण भन्यमाणियोंके समुदायको कियाहै सुग्न जिसने ऐसा कपटरहित जनशास्त्रोक्तधर्म ज्ञानादि- गुणोंमें निरंतर रहेहुए ऐसे चतुर्विधसंपको इसजगत में मंगल देओ. (गाथा) रम्मोचरित्तधम्मो संपाविअभव्यसत्तसिवसम्मो ॥ नीसेस किलेसहो हबउ सया सपल संधस्स ॥५॥ (अाया) संप्रापितमव्यसत्याशिवशी रम्यः चरित्रधर्मः सकार- संघस्य सदा निःशेषरशहरः भवतु, (पदार्थ) (संपाधि) भले प्रकारसे प्राप्तकराया ( भव्यसत्य) भव्य प्राणियोंको (सिय ) मोक्षरूप ( सम्मो ) सुख जिसने ( गमो ) मन्दर (परिचयमो ) चारित्र रूपधर्म
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427tin अग्स ) प्राट किया हुआ (ममग्गरम्म) ममप्र (Iri- गस) धिमंघका (यमलं) र (गुणन्तु) कग. (भाषा) मोक्षगुममें आक: जिहाँका मानादिगुगॉय. समुदायको माहान ग श्री.मिद्राचायोनियमाचार्य মামনুন মানা যায় না। गुगाट पंग (गाथा) जियपडियाम्या जाग्या गोमुहमायंग गया, पमुग्या । मिश्मिरति महिना भयनयाना गि वितु ॥ ११ ॥ (गया) श्रीप्रामानि ति: PATTERE गांगmin गजमगुर मिति:: : Ariang. (पहा) (जिय) र (प) मा fini (जER () pr (1) पर. iindin(R) Marrii (ant karma (i) manusia (if ) fr(im:)
तनय स्तोत्र ॥ गोमुख नामकयक्ष (मायंग ) मातंग यक्ष (गयमुह ) गजमुखयक्ष ये यक्ष है ( पमुक्खा) मुख्यजिन्होंमें ऐसे (जक्खा ) सकल यक्ष (सिंबं) कल्याण (दिन्तु ) देओ. (भावार्थ) जीतेहैं भगवच्छासनप्रतिपक्षी जिन्होंने कीहै नम. स्कार करनेवालोंकी रक्षा जिन्होंने शोभायुक्त ब्रह्मशान्ति यक्षके साथ गोमुख, मातंग, गजमुखयक्ष है मुख्य जि. न्होंमे ऐसे सकलयक्ष भगवत् स्तुति करनेवाले भव्यजी बोको कल्याण देओ. (गाथा) अंबा पडिहयडिंवा सिद्धासिद्धाइआ पवयणस्स चक्केसरि वइरुट्टा संतिसुरादिसउ सुक्खाणि ॥ १२ ॥ (छाया) प्रतिहत डिंबा अंबा सिद्धा सिहायिका चक्रेश्वरी वैरोटया. शांतिसुरा प्रवचनस्य सौख्यानि दिशतु. ( पदार्थ) (पडिहय ) नाशकियेहै (डिंचा) उपसर्ग जिसने ऐसी ( अंबा ) नेभिजिन भगवानकी उपासिकादेवी (सिद्धा) वर्धमानस्वामीके शासनको रक्षासे प्रसिद्ध ऐसी (सिद्धाइया) h ++- संजय स्तोत्र सिमायिका देवी ( चकसरी ) चक्रेश्वरी ( वंइट्टा वैगेटया और । संतिसुरा ) शान्त देवता ये देव तापंचक ( पययणरस ) चतुर्वर्णसंघको ( सुश्खाणि मनोशंछित (दिसउ ) देओ, (भावार्थ) नाशकिये, सम्पूर्ण क्लेशादि जिसने ऐसी नेभिजिन भगवानकी उपासिका अंबादेवी, बईमानस्वामी के शासनक रक्षासे प्रसिद्ध सिद्धायिका चक्रेश्वरी, रोटया और शा न्तिसुरा ये देवता पंचक चतुर्वर्ण संघको मनोवांछित फल देओ. (गाथा) सोलसविज्झादेवी उदितुसंघस्समंगलंबिउलं । अच्छतासहिआउ विस्सुअमुअदेवयाइसमं ॥१३॥ (छाया) अचुप्तासहिताः विश्रुतश्नुतदेवतया समं पोडश विद्या देव्यः संघश्य विपुलं मंगलं ददत- (पदार्थ) (अछुत्ता सहिआउ) अच्छुप्ता देवी सहित (निमुभ) विख्यात ऐसी (मुअदेवआइ) श्रुतदेवताके (सम तंजय स्तोत्र ॥ साथ ( सोलस ) सोलह ( विझादेवी ) अधिष्टायिका विद्यादेवियां (संघस्स ) चतुर्विधसंघको ( मंगलं ) क- ल्याण (विउलं ) बहुत (दितु) देओ. (भावार्थ) अच्छुप्तादेवी सहित विख्यात श्रुतदेवताके साथ सोलह अधिष्ठायिका विद्यादेवियां चतुर्विघसंघको अत्यंत कल्याण देओ. (गाथा) जिणसासणकयरक्खा जक्खाचवीमसासणसुरावि' ।। सुहभावासंतावं तित्थत्ससयापणा संतु ॥ १४ ॥ (छाया) जिनशासनकृतरक्षाः यक्षाः च शुभभावाः चतुर्विशति' शासनसुराअपि सदा तीर्थरय संतापं प्रणाशयन्तु. (पदार्थ) (जिगसासण) जिनशासनमें उतन्न हुऐ हुऐ उपद्रव निवारण रूप (कयरखा) कोहै रक्षा जिन्होंने ऐसे (ज- क्खा) यक्ष और (सुहभावा) शुभहें भाव जिन्होंके ऐसी (चउपसि) चोवीस ( सासणसुग) जिनशासनकी अ.
संजय स्तंत्र॥ '१५ धिष्टायिका देवियां (वि)भी (सया) सदा (तित्थरस) चतुर्विधसंधक (संता) संतापको (पणासंतु) नाशकरो. (भावार्थ) जिनशासनमें उप्तन हुऐ हुऐ उपद्रव निवारण रूप कीहै रक्षा जिन्होंने और शुभहें भाव जिन्होंके ऐसी चोरीस जिनशासनकी अघिष्टायिका देवियां भी हमेश चतुर्विध संघके संतापको नाशकरो. (गाथा) जिणपवयणमिनिरया विरयाकुपहाउसवहासवे ॥ चेयावच्चकराविय तित्थस्स हवंतु संतिकरा ॥१५॥ (छाया) जिनप्रवचने निरताः कुपधात् सर्वथा विरताः सर्वे यावृत्करा थापि तीर्थस्य शांतिकरा : भवन्तु, (पदार्थ) (जिण पचयणमि ) जिनशास्त्रमें (निरया ) कियाहै आदर जिन्होंने ( कुपथाउ ) महिपक्य रूप निंदनीक मार्गसे ( सव्वहा ) सब प्रकारसे (विरया) जुदे (य) और ( सन्चे ) सब (वेयावच्चकरा ) यावच्च करने पाले (वि) भी (तित्यरस ) चतुधि संपतो (सन- करा) दुस्तिोपशमन करने वाले (हरन्तु ) होओ. (भार्थ) जिन शासमें किया है आवर जिन्होंने महिष रूप नितीक मार्गमे मर्गया जो और सप येयारण करने गाले भी नाभि संघाने युनिशमन करने वाले हाभा. (गाथा) जिणगमय मिद्ध मुमगा बाहिय भयाण जाणिग गाहाजी ।। गीयाई गीयजगी ग परिवारो गुहंदि सउ ॥१२॥ (खाया) বিনাদোন নিস मरिमर गीतामितियशाः गुrif]. (पदार्य) (गि समय) जिनगाव (निट) (gril) जो मान सौ( पहिय) TRA (Min) (ग) राम ( है (दमा) मायनिया) AATTA मामक व्यंतर और (गोपजसो ) उपर दिग्भव गीत. या गामक ल्पतर (सपरिवारो ) द्वादश भिगमन निकाय सहित (मुह) सुख (दिसउ ) देओ। (भावार्थ) जिनशासमें निषित सुमार्गानुसार आराधन में साव- पान ऐसे भन्य जीवोंको उसन किया है तीर्थ यात्रादि उत्सवमें सहाय जिनने ऐसे दक्षिणोचरभर गतिरति और गीतयश नामके व्यंतरहय दादाविषगंपर्च निकाय सहित चतुर्विध संघको सुख देओ । (गाथा) गिहि गुप्त खित्त जल थल वण पलप वास देव देवीउ । जिणसासणहिआणं दुहाणि सव्वाणि निहणंतु ।। १७ ॥ (छाया) प्रहगोरक्षेत्रजलरपलयनपर्वतयासिदेवदेव्यः जिन- शासनस्थितानां सर्वाणि दुःखानि निमन्तु । (पदार्थ) (मिहि) परमें (गुत) गोत्रमें (खित्त) क्षेत्रमें (जल), पालमें (थल) स्पलमें (वण) घनमें (पन्वय) पर्व
तमें (वास )निवास करने वाले ( दे देना और
(देवीउ) देवियां (जिग साराग) जिन शासनमें (विआग)
स्थित भन्य जीवों के (सवाणि) संपूर्ण (दुहागि) दुरा
(निलगंतु) करो।
(भावार्थ)
घरमें गोत्रमेंमें जलमे स्थालमें गनमें पानजस
करने वाले दो और देशि जिनशासन में स्थिामा
जी के पेश निवारण करो।
(गाथा)
दमदिमिपाला ससिनपालया नाम्गहा गनः
कराना ।। जगि गगह काल पाम पुलि अद्ध
परमेह, ।। १८॥
मह काल कंटीमपिजिन्य काला दि.
मन् मन्चल गई दिगन्तुगत्रणमयण ।। १५ ।।
(छाया)
माया: दोदिया नया: ।
मन मा काटा सिटी
नाट सनममी मग
संजय (पदार्थ) (सविसपालया) क्षेत्रपालोंके साथ (दसदिसपाला) दशदिपाल (सनविखत्ता ) सत्ताईस नक्षत्रोंके साथ- (नग्गहा ) नोग्रह (जोइणि ) योगिनी ( राहुग्गह) राहु नाम ग्रह ( कालपास ) कालपाशयोग (पुलिय) चुलिमयोग ( अपहोहिं ) अर्धमहर योगों के साथ ( सहबालगंट पाह) कालकंटक योग के . साथ ( सहित) भद्राके साथ (क्त्येहि ) वत्स सहित ( कालवेलाहिं ) कालवेलाके साथ ( सधे ) संपूर्ण . दिक्पालादि (सयरस) संपूर्ण (संघास) संफको (सन्बध) सर अर्थ सहित (मुह) मुख (दिसन्तु ) देओ। (भावार्थ) क्षेत्रपालकोंके साथ सत्ताईस नक्षत्रोंके साथ योगिनी राहुग्रह कालपाशयोग, युलिकयोग, अर्धप्रहरयोग काल. कंटक योग भद्रा वत्सयोग कालवेला इत्यादि योगोंक साथ दशदिवपाल और नवग्रह ये सब सम्पूर्ण संघको सय मनोगाधिन मुख देओ। (गाथा) भवणवइवाणमंतर जोइसवेमाणि यायजे देवा। धराणिदसक सहिया दलंतु दुरियाई तित्थस्सा॥२०॥ .
-- (छाया) (भमुगुमा गया पराभवाः) मानगपः (पिशादि- যথাসাঃ) শালগা: শাণিমানিয়াগ্যাস परराक्रमहिनाः (गन्ना) मीथंग दुग्लिानि दयन्तु । (पदार्थ) (भागण) यमुग्गुमागवि दस भयनपति (वागमंतर) पिशायादि सोला यानन्यंतर ( जोइस ) ज्योतिक (य) और (येमागिया ) मानिक (जे) जो (देव) देशा ( परमिंदसकसहिया ) धरणेद्रादि शकसहित होकर (तित्यस्स ) संप (दुरियाई) पापों को (दलंतु ) नाशकरो। (भावार्थ) अमुरकुमारादि दश भवनपति पिशाचादि सोलहवान व्यंतर जोतिष्क और वैमानिक देवता ये सब धरणेन्दादि शोकेसाथ संपके पापोंको नाशगये। (गाथा) चकंजस्सजलंतं गच्छइपुरर्ड पणासियतमोहं तंतिस्थस्स भगवऊँ नमो नमोवद्रमाणस्स ॥२१॥ 1 संजय ROM (छाया) प्रणाशिततमओघ तत् ज्वलचक्र यस्य पुरोग छति (तस्म) तीर्थकराय भगवते वर्तमानाय नमो नमोऽस्तु । (पदार्थ) (पणासिय) नाशमियाई (तमो ) अज्ञानरूप अपारका समूह जिसने (त) वह अपूर्व (जलंत) तेजसे देदीप्यमान (प) पर्नचक्र (जरस) जिन भगवान् फे (पुरउ) आगे (गच्छद) चलता है (उन) (तित्पस्स) तीर्थहर (भगवउ) भगवान् (बद्धमाणस्स) पर्वमानस्वामीको (नमो नमो) वारंवार नमस्कार होओ। (भावार्थ) अज्ञानरूप अंधकारको नाशकरनेवाला तेजसे देदीप्य. मान यह अपूर्व धर्मचक्र जिन भगवानके आगे चलता है उन तीर्थकर भगान वर्तमान स्वामीको यारंवार नमस्कार होओ। (गाथा) सो जपर जिणोवीरो जस्स जविसासग जए. जयद। सिद्धिपहसासणं कृपहनासणं पन्धमय- महणं ।। २२ ॥ .
२२
तजय तात्र।
(छाया)
स जिनवीरः जयतु यस्य सिद्धिपथशासनं कुपथ-
नाशनं सर्वभयमथनं शासन अद्यापि जगति जयति ।
(पदार्थ)
(सो) वे प्रसिद्ध (जिणोीरो ) जिनभगवान
महावीर स्वामी ( जयउ ) विजयको प्रातहोओ (जरस)
जिनभगवानका (सिद्धिपहसासणं) मुस्लिमार्गका उपदेशक
(कुपहनासण) मिथ्यावादी कुमार्गनाशक (सन्यमयमहणं)
संपूर्णमयविध्वंसक ( सासणं ) शासन (अजवि) सांप्रत
भी ( जए) जगतमें (जयइ) विजयको प्राप्त होता है ।
(भावार्थ)
वे प्रसिद्ध जिनभगवान महावीरस्वामी . विजयशाली
होओ. जिन परमेश्वरका मक्तिमार्गका उपदेशक
मिथ्यावादीकुमार्गनाशक संपूर्णमयविध्वंसक , शासन .
सांप्रत भी जगतम विजयको प्राप्त होता है।
(गाथा)
मिरिउसभमेण पमुहा हयभगनियहा दिगंतु
नित्यम्म । मब्याजिणाणंगणहारिणांणहं पंछियं
मुबं ॥ २३ ॥
संजय स्तोत्र॥
२३
(आया)
श्रीरुपनसेनप्रमुखाः हतभयनिवहाः सर्वजिनानां-
गणधारिणः तीर्थस्य अनघसवांछित दिशन्तु ।
(पदार्थ)
(सिरि) शोभायुक्त ( उसमसेण ). अपभसेन?
( पमुहा ) प्रमुख जिन्होंमें ( हय ) नष्टहुयाहै (मय)
संसारभयाँका (निवहा) समूह जिन्होंका ऐसे ( सब्ध )
सम्पूर्ण (जिगाणं) अपभ अजितादि तीर्थकरों के
(गणहारिणो ) गणधर (तित्थरस ) चतुर्विधसंघको
( अणहं ) अलंकित ( सय ) अखिल (वठिय)
अभिलपितमुख (दिसंतु) देओ।
(भावार्थ)
शोभायुक्त ऋषभसेनहै प्रमुख जिन्होंमें और नष्टहुआहै
संसारसंबन्धी भयसगृह जिन्होंका ऐसे सम्पूर्ण तीर्थंकरों के
१४५२ गणधर चतुर्विध संघको अकलंकित आखिल
अभिलाषित मुखदेओ।
(गाचा)
सिविद्धमापतित्थाहियेण तित्यसमाप्पियंजस्म
मुग्मंमुहम्मसामी दिसउ मुहं सयलसंघस्स ।।२।।
१०
तंजय स्तोत्र ॥
(छाया)
श्रीवईमानतीर्थाधिपेन तीर्थ समाप्ति सुधर्मस्वामी यस्य
सकलसंघरय सम्यक् सुखं दिशतु ।
(पदार्थ)
(सिरि ) शोभायुक्त (बदमाणतित्थाहिवेण) तीर्थके
अधिप वर्द्धमानस्वामीने (तित्थं ) चतुर्विधसंघरूपी
(समप्पियं ) समर्पितकिया (सुहम्मसामी) पंचमगणघर
सुधर्मस्वामी ( जस्स ) उस प्रसिद्ध (सलय ) सकल
( संघस्स ) संघको ( सम्म ) भलेप्रकार ( सुहं ) सुख
(दिसउ ) देओ।
(भावार्थ)
तीर्थके अधिप श्रीवईमान स्वामीने चतुर्विधसंवरूप
तीर्थ समर्पित किया. उस प्रसिद्ध संपूर्ण संघको पंचम
गणधर श्रीसुधर्मस्वामी भली भांति सुखदेओ।
(गाथा)
पपईभयाजे भद्दाणि दिसन्तु सयलसंघस्स।
इपरसुराविहुसम्म जिणगणहरकाहियकारिस्सार५||
(छाया)
भाद्रयाप्रकृत्योपलक्षिताः येजीपाइतासुराअपि सम्प:
Mirin l
নানালি सकरसंव माणि
दिगन्तु।
(पदार्थ)
( भरया ) पापरहित ( प ) प्रकृतिसेयुक्त (जे)
जो जीवहे थे और (यर ) दूसरे (सुगवि ) देवतामी
और ( सम्म ) सम्यक् प्रकारसे ( जिगगणहर ) जिन
गणपशेरे (कहिय ) कयनको (फारिस ) करने
पाले ( सपल ) संपूर्ण ( संघरस ) संघको (भाणि)
फस्याण (दिसन्तु) देओ।
(भावार्थ)
स्वमायसेही कल्याणकारी भन्यजीव और दूसरे देवता
भी जिनगणघरोंकी आज्ञाको सम्यक् पालनेवाले
संपूर्ण संघको कल्याण देओ।
(गाया)
इपजो पदइतिसंझं दुस्सझं तस्सनच्छिकिपि-
जए।जिणदत्ताणायहिउ मुनिहियटोमुहीहोर।।
(छाया)
यानरः इदं स्तोत्रं त्रिसन्यं पठति तस्य जगति किमिपि
.
• स्लो.
.
२६
तंजय स्तंत्र ॥
दुःसाध्यं नास्ति | जिनदत्चाज्ञायांस्थितः सुनिष्ठितार्थः सन्
सुखी भवति।
(पदार्थ)
( जो) जो मनुष्य ( इय ) इस स्तोत्रको (तिसंझ)
त्रिकाल ( पढ़इ) पठनकरताहै (तरस ) उसको (जए)
जगत (किंवि) कुछभी (दुरसझं) दुःसाध्य
(नच्छि ) नहीं है (जिण) जिनभगवानने (दत्त)
दीहुई ( अणाय ) आज्ञामें (ठिउ') स्थित पुरुष
( सुनिठियटो) सिद्धार्थ होकर (सुही ) मोक्षमुख
भागी (होइ) होता है।
(भावार्थ)
जो मनुष्य इस स्तोत्रको त्रिकाल पठनकरताहे उसको
जगतमें कुछभी दुःसाध्य नहींहै जिनभगवानकी आज्ञा
में स्थित पुरुषों की सब कामना परिपूर्ण होकर वे मोक्ष
सुखभागी होतेहैं।
इन्दरदेशीय जैनश्वेताम्बर मुख्यपाठशालाध्यापक
गोपीनाथस्नुपण्डित श्रीकृष्णशर्मठतसुबो-
पिनी व्याख्यासहितं जिनदतरिकृत
तंजपाख्यस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
॥धीचीतरागायनमः ॥
गुरुपारतन्त्र्य स्तोत्रम्
॥ गाथा ॥
॥ मयरहियंगुणगणरयण सायरंसायरंपणमिऊणं ।
॥ मुगुरुजणपारतंतं उबहिन्यथुणामितंचेच ॥१॥
(छाया)
आहे उपधिमिव मदरहितं गुणगणरत्नसागरं तं सु.
गुरुजनपारतंत्र्यं सायरं प्रणम्य रतबीमिचति (चेति
सदी समुघयावधारणार्थी ) प्रगम्य स्तथीमिचेति ॥ १ ॥
घः समुचये अन्यस्तोतव्यत्यागेन तमेवेत्यवधारणम् ।
उदधिपक्षे पदच्छेदाः मार हित मकरेभ्यो जलजन्तु
विशेषेभ्यो हित हितकारक गुणगणरलसाकारं गुणानां
शुलादिरोगापहारिणां ऋदिवृद्धिसौभाग्यादिजनकानांच
गणः ओपः सविधतेयेपुतानि गुणगुणरत्नानिच सा
लक्ष्मीम तयोः आकरः स्थानं तम् सातरं सातं सुखं गति,
ददातीति सातरम् ॥ १॥
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सके समान अनिमाले सहित शानादिगुणों समूह रुप रत्नॉकी रक्ष्मी लमदो देनेवाले से उगुरु मुधनानि शमुख आचाकि आम्नायको आदर पूर्वक नमस्कार कर स्तुति करता ॥१॥ ॥गाथा॥ निम्मटियमोहजोहा निहपरिरोहाएणहसंदेहा। एणयंगिरग्गदाविय मुहसंदोहासुरगगेहा ॥२॥ (सपा) निर्मधितमोहयोधाः निहतविरोधाः प्रणःसंदेहाः प्रण- तालियर्गदापितसुखसंदोहाः सुगुणगेहाः ।। २ ।। (पदार्थ) (निम्महिय ) नाटकिये हैं ( मोहजोह ) मोहरूप योधा जिन्होंने (पणह) नष्टकिये हैं (संदेहा ) हृदयके संदेह जिन्होंने (पणयंगि) प्रणाम करने वाले प्राणियोंके ( वग) समुदायको (दारिय) दीये है ( मुह ) सुखके (संदोहा) समूह जिन्होंने (सुगुण) उत्तीस श्रेष्ट गुणोंके (गेहा ) निवास स्थान ॥२॥ (भावार्थ)
४
गुरुपारतन्ध्यस्तोत्रम् ॥
हैं परस्पर वैरभाव जिन्होंने दूरकिये हैं हृदयके संदेह
जिन्होंने प्रणामकरने वाले प्राणियोंको दिऐ है सुख
बाहुल्य जिन्होंने और उचीस श्रेष्ट गुणों के निवास
स्थान ॥२॥
॥ गाथा ॥
पत्तसुजइत्तसोहा समत्यपरतित्विजणियसंखोहा।
पडिभग्गलोहजोहा दंसियसुमहत्यसत्योहा ।।३।।
(छाया)
प्राप्तसुयतित्वमाः समस्तपरतीर्थिजनितसंक्षोभाः
प्रतिमामलोमयोधाः दर्शितमुमहार्थशास्त्रीधाः ॥ ३॥
( पदार्थ)
( पच ) प्राप्तकीहै । मुगइच) उचम यतित की
(सोहा) शोमा जिन्होंने (समत्य ) सम्पूर्ण (परातिथि)
परतार्थ जोंको (जणिय ) उत्पन्न किया है (संसोहा)
संसोम जिन्होंने (पदिमाग ) नष्ट किया है (लोह)
लोमरूप (जोहा) योषा जिन्होंने (गिय ) पतलाया
है (सुमदत्य ) अत्यन्त गंगीर अर्थशाली ( सत्योहा )
दाब समुह जिन्होंने ॥३॥
যথাযোগ্য । (भावार्थ) प्राप्ती हे उत्तम यतित्वकी शोभा ' जिन्होंने सम्पूर्ण परतीर्घजनोंको उतार किया है संक्षोभ जिन्होंने नष्ट किया है लोमरूपयोधा जिन्होंने पतलाया है अत्यन्त गंभीर अर्थशाली शास्त्र समूह जिन्होंने ॥ ३॥ ॥ गाथा ॥ परिहरियसत्तवाहा हयदुहृदाहासिवंबतरसाहा ।। संपावियसुहलाहा खीरादहिणुब्बअग्गाहा ।।१।। (छाया) परिहतसतबाधाः हतदुःखदाहाः शिवानंतरशाखाः संभापितमुखलाभाः क्षीरोदधिरियागाधाः ॥ ४॥ (पदार्थ) (परिहरिय) नष्ट की है ( सत्त) जीवोंकी (पाहा) पीडा जिन्होंने (हय) मिटाया है (दुहदाहा) दुःखरूप दाह जिन्होंने (सिव ) मोक्षरूप (संवतरु ) आम्रवृक्षकी (साहा) शाखा समान (संपापिय ) सम्यक् प्रकारसे प्राप्त करवाया है। ( सुहलाहा ) वाश्चित मुसका लाभ :
गुस्सारतन्यरतोत्रम् ॥ ( सारोदहिणुब ) रसगुहसमान ( अग्गाहा) अगाध ॥४॥ (भावार्थ) दूरकीहै जीदोंडी पीटा जिन्होंने नष्ट किया है दुःखरूप दाह जिन्होंने नोक्षरूप आत्रवृक्षदी शाखा समान भलीभाँतिप्राप्तकरवागाह भन्यजीवोंको इच्छित सुखका लाभ जिन्होंने हारसमुद्रसमान अगाध ॥ ४ ॥ ॥ गाया। सगुणजणजाणियपुज्जा सज्जोनिवज्जगहिय ।। पबज्जा ॥ सिवसुहसाहपसज्जा भवगुरुगिरि- चूरणेवजा ॥ ५॥ (छाया) सगुणजनजनितपूजाः सद्योनिरवद्यगृहीतप्रव्रज्याः शिवसुखसाधनसज्जाः भवगुरुगिरिचूर्णनेवजाः ॥ ५ ॥ (पदार्थ) (सगुण ) सद्गुणोंसे युक्त ( जण) भन्यजीवोंने (जणि) की है ( पुज्जा ) पूजा जिन्होंकी ( सज्जो ) तत्काल (निरवज्ज) पापरहित (गहिय) अंगीकार की यै (परजा) प्रव्रज्याचारित्रदीक्षा गुरुपारापातोत्रम् ॥ जिन्होंने (सिंह) मोक्षसुखके ( साहण ) साधनमें (राजा) सावधान (भव ) संसाररूप (गुरगिरि ) भारी पर्वत को ( पूरणे ) नष्ट करने (वजा) के समान ॥५॥ (भावार्थ) सद्गुणोंसे बुक भव्यजानिकाह पूजा जिन्होंकी तलाल अंगीकार की है पापरहित चारित्रकी दीक्षा जिन्होंने मोक्षसुख के साधनमें सावधान संसाररूप भारीपर्वतको नर करनेमें इनके समान ॥५॥ || गाथा॥ मजसुहम्मप्पमुहा गुणगणनिवहांसुरिंदविहिय- महाताणतिसंझनाम नामनपणासह जियाणं ।। (छाया) गुणगणानिवहाः मुरेंद्रविहितमहाः (एतादृशाः) आर्यसुधर्मप्रमुखाः गणधराः सन्ति तेषां त्रिसंध्यं (स्मृतं) नाम जीवानां आमं न प्रणाशयतीति न अपितु प्रणाशयत्येव ॥ ६॥ (पदार्थ) (गुणगण) आचार्य के छचीस सद्गुणों के समुदाय को (निवहा ) निरंतर धारण करने वाले (सुरि ८ गुरुपारतव्यस्तोत्रम् ॥ देवोंके अधिपति इन्द्रनें (विहिय ) की है ( महां पूजा जिन्होंकी ऐसे ( अज्ज ) पूज्य (मुहम्म सुधर्म स्वामी हैं (प्पमुहा) मुख्य जिन्होंमें । गणघरोंका (तिसंझं) त्रिकाल (नाम) नामस्मन ( जियाणं ) जीवोंकी ( आमं ) व्याधियों (न पणासइ) नहीं प्रणाश करता (न) ऐ नहीं अर्थात् प्रणाश करताही है ।। ६.॥ (भावार्थ) आचार्यके छत्तीस गुणोंको निरंतर धारण करनेवाले देवाधिपति इन्द्रने की है पूजा जिन्होंकी, ऐसे पर पूज्य सुधर्मस्वामी प्रमुख गणधरोंका त्रिकाल नामस्मर जीयोंकी सकल आधिव्याधियोंको नष्ट करता है | ॥ गाथा॥ पडियजियजिणदेवो देवायरिदुरंतभवहारि सिरिनेमिचंदसूरि उजोयणसूरिणोसुगुरू ॥७॥ (छाया) .. प्रतिपन्नजिनदेवः देवाचार्यः दुरंतभवहारी श्रीनेमि चन्द्ररिः सुगुरुः उद्योतनसूरिः एतेत्रयः विजयंन्तामि सध्याहार्यम् ॥ ७॥ 194 गुदपारतास्तोत्रम्॥ (पदार्थ) (पडिवजिय ) अङ्गीकार किया है (जिणदेवो) जिनदेव जिनने ऐसे (देवायरि) देशचार्य ( दुरंत) दुष्ट है परिणाम जिसका ऐसे (भत्र ) संसारको (हारि ) हरण करने वाले (सिरिन मिचंदसूरि ) श्रीनेमिचन्द्रसूरि और ( सुगुरु ) अज्ञानरूप अंधकारको रोकनेमें समर्थ ऐसे ( उज्जोयणसरि ) उद्योतनसरि विजयको प्राप्त होओ ॥ ७ ॥ (भावार्थ) आत्मकल्याणके हेतु अङ्गीकार किया है जिनदेय जिनने ऐसे देशचार्य और दुष्ट है परिणाम जिसका ऐसे संसारको हरण करनेवाले श्रीनेमिचन्द्रसरि और अज्ञानरूप अंधकारको रोकने में समर्थ ऐसे उपोतन. सूरि विजयको प्राप्त होओ ॥ ७ ॥ ॥ अथ वर्धमानमूरिस्तुतिमाह ।। ॥ गाथा ॥ सिरिवद्धमाणमूरि पपडीकय मरिमंतमाहप्पो। पडिहयकसायपसरो समयसमंकृचमुहजण 11॥
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पुरमा (सपा) सरशी चीनिकरणसमयः जिनो निभलः युग. परमितामयासुगुमनाः (पपरणाचल दानी कमेनिगस समर्थ पाकी) ॥९॥ ( पदार्थ) (मुक्ष्मील) विश्यमुग्मलपट ( चोर ) वलसाधुलेश धारणकरवाले और विश्वस्तभक्त जनोंके जनसम्यक्त्र पाधिग्लोंगे असदुपदेशहारा चुरानेवाले ऐसे लिङ्गी साधुओंके ( चप्परग) द्वारा जिनराजसिद्धान्तोक्त युक्ति कारा पटासारसे मतवण्डनमें (पचलीसमर्थ (जिगमयमि) जिनत (निचलो) निघल (जुगपयर ) युगप्रवर मुधर्म स्वामीके ( सुद्ध सिद्धत ) निदोष अंगोपांगरूप सिलान्त निरंतर अभ्याससे (जाण) प्रसिद्ध और (पणय) प्रणाम करतह ( सुगुण) सद्गुणी ( जणो) जन जिनको ॥९॥ (भावार्य) पियमुखमें लंपट केवल साधु देपकोहि धारणकरने घाले. भरजनोंके जैनसम्यान योधिरनोंको अस. दुक्देशहाग चुरानेवाले ऐसे लिङ्गीसाधुओंके जिनराज.
गुहारराभ्यस्तोत्रम् ॥
सिद्धान्तोक्तयुक्तिपूर्वकबलाकारसे मतखण्डनमें समर्थ, और
जिनमतमें निभल, और युगप्रवर सुघर्मस्वामीके निवौंप
अडोगरूप सिद्धान्तके निरंतर अभ्याससे प्रसिर,
और प्रणाम करते हैं सद्गुणीजन जिनको ऐसे ॥९॥
॥ गाथा ॥
पुरउंदुलहमहिवालहस्स अणहिल्लवाडएपयर्ड ।
मुकाविमारिऊण सीहेणवदवलिंगिगया ॥ १० ॥
(छाया)
(येन) अनहिछपाटके दुर्लभमहीवछमस्य पुरतः विचार्य
सिंहेन गजा व प्रकटं लिंगिनः मुक्ताः ॥१०॥
(पदार्थ)
(अगहिवाडा) अनहिल पाटक नामा नगर,
(दुहमहिबाहहरत ) दुर्लभसंज्ञक गजार (पुर)
सामने (विभारिऊणं) पार प्रतिर फर
(साहेगनव्वगया) जैसे सिंह हाधियाँको चीरकर
फैक्दलाई यमेही (पया) मा लोगों के सामने
(दिगि) शिथिटाचारी साधु (गुहागिनती
मात्रा में हारगो॥ १ ॥
गुरुपारमा यस्तोत्रम् ॥
(भावार्थ)
अनहिलपाटकनामके नगरमें दुर्लभ संज्ञकराजाके
समक्ष श्री जिनदत्तसरिने शिथिलाचारी साधुओंसे वाद
प्रतिवाद किया, और जैसे सिंह हाथिओंसे सामनाकर
उन्हें चीरकर फेंकदेता है वैसेही जिनदत्चसूरिने शास्त्रार्थमें
उन शिथिलाचारियोंको पराजित किया ॥१०॥
॥ गाथा ।।
दशमच्छेरयनिसिविण्फुरंत सच्छन्दमूरिमयतिमि-
रम् । सूरेणवमूरिजिणे, सरेण इयमहियदोसेण ॥११॥
(छाया)
अहितदोपेण सूरिजिनेश्वरेण दशमाचयनिशिविरकुर-
रस्वछन्दस्मिततिमिरं सरेणेवहतम् ॥ ११ ॥
(पदार्थ)
(अहिय) नहीं प्रिय है (दोसैग) रागादि
दोप जिनको ऐसे (मरिजिणेसरेण) सूपिजिनेश्वराचार्यने
(दशमलेरयनिसी ) दशम असंयमारूप पूजा लक्षण-
आभर्यरूप रात्रि में (पिपुरन्त ) स्फुरायमाग
(साउन्दरारिमयतिमिरं) अपने इच्छानुसार चलनेवाले
शिथिलाचारियोंका मतरूप अन्धकार (सुरेणव)
सूर्यकेसमान (हयम् ) नष्ट किया ॥ १ ॥
गुरुपारतन्त्र्यातोत्रम् ॥ (भावार्थ) जैसे सूर्य रात्रिके अन्धकारको सत्वर नष्ट करता है वैसे ही रागादि दोपरहित सूरिजिनेश्वराचार्यने दशम असंयमीरूप पूजा लक्षण आश्चर्य रूप रानिमें स्फुरायमाण स्वच्छन्द शिथिलाचारियोंका मतरूप अन्धकारको शीव नष्ट किया ॥ ११ ॥ अथ जिनचन्द्रसरिस्तुति ग्लेपालंकारेगाह ॥ गाथा॥ मुकइत्तपत्र कित्ती पयडिअगुत्तीपसंतसुहमुत्ती । पहयपरखाइदित्ती जिणचन्दजईसरोमंती ॥ १२ ॥ (छाया) सुकवित्वप्राप्तकीर्तिः प्रकटितगुप्तिः प्रशान्तशुभमूर्तिः महतपरवादिदीतिः मंत्री जिनचन्द्रयतश्विरः नंदतात् ।।१२।। (पदार्थ) (मुकहत) सुकक्तिद्वारा (पत्तफिची) प्राप्त की है कीर्ति जिनने ( पयडिअ) प्रकट की है (गुत्ती) कायसंवरणादिरूप गुप्ति जिनने (परांत) मोधादिरूपायरहित ( सुह ) मंगलकारक है ( मुत्ती) सागर जिनका ( पहय ) निरस्त किया है ( परवाइ) गाman पर पादियोंका (दिली ) तेज जिनने (गंती गंगामा (नगगे) जिणचन्द्रयतश्विक कमाली दामओ ॥ १२॥ (भावार्थ) सुरविवहारा माकी है कीर्ति जिनने प्रकट की है मनोवादकाय गंवरणादिरूप गुप्ति जिनने शोधादिकपाय हित और मंगलकारक है मूर्ति जिनकी नष्ट किया है परयादियोंका रोग जिनने और मंत्रोंके आचार्य से जिनचन्द्रवतीवर विजय शाली होओ ॥ १२ ॥ अथ नवाइपतिकारकं श्रीमभयदेवरि गाथा- दयन वर्णयति ॥ गाथा ॥ पपडियनवरत्तत्थरयणकोसो पणासिय पउँसो। भवभीयमवियजणमणकयसंतोसो विगय दोसो।। १३ ॥ जुगपवरागमसार प्पस्वणा करणधुरोधणियं । सिरिअभयदेवसूरी मुणिपरोपरमपसमधरो ॥१६॥ (छाया) प्रकटितनवादसूत्रार्यरत्नकोशः মুহিবস। नरभीतभषिकजनमनाकृतसंतोष: विगतदोपः ॥ १३.
: गुरुप.रतन्त्र्योत्रम् ॥ युगप्रवरागमसारमरूपणाकरणबंधुरः अत्यर्थ मुनिप्रवरः परमप्रशमघरः श्रीअभयदेवसूरिः विजयते ॥ १४ ॥ (पदार्थ) ( पयडिय ) प्रकट किया है ( नवंग ) नागके (सुत्तत्य ) सूत्रार्थरूप ( रणयकोसो) रनोंका भाण्डार जिनने ( पणासिय ) उन्मूलित किया है (पउँसो) प्रहप जिनने ( भवभीय) संसारसे डरे हुए ( भरियजणमण ) भषिक जनोंके मनको (फयसंतोसी ) किया है संतोप जिनने (विगयदोसो) गए है समस्त दोष जिनके ( जुगपयरागम ) युगरे विषय प्रकृष्ट शास्त्रको धारण करनेशले ऐसे कालिक सरियोंके ( सार ) सिद्धान्तों का अनुसरण करनेवाली (परुनगा) चौथी पर्युषणादिकोंके (करण) आचरण से (धुरः ) मनोज्ञ (पणियं ) अत्यर्थ (मणिपगे) मुनियोंमें श्रेष्ट ( परम ) उत्कृष्ट ( पसम) शालिको (पो) धारण करनेवाले (सिरिअभयदेवगर्ग) श्रीमभयदेगरि विजयशाली होओ ॥ १३-१४ ॥ (भावार्थ) प्रक्यिाः नांगो गयायका मोका भागार गुशारतपरोत्रम् ॥ जिनने, उन्मूलित किया है प्रदेप जिनने, संसारसे डरे हुए भविक जनोंके मनको किया है संतोप जिनने, गए है समरत दोष जिनके, युग प्रकृष्ट शास्त्रको धारण करनेवाले, ऐसे कालिक सूरियोंके सिद्धान्तको अनुसरण करनेवाली चौथी पर्युषणादिकोंके आचरणसे मनोश, मुनियोंमें अत्यन्त श्रेष्ट, उत्कृष्ट शान्तिको धारण करनेवाले, ऐसे श्रीअभयदेवसूरि विजयशाली होमो ॥ १३.२४ ॥ अथ स्थगुरोः श्रीजिनवष्ठभसूरेः स्तुले सिंहप्रकृति गाथाहयेनाह. (गाथा) कयसावयसत्तासो हरियसारंगभग्गसंदेहो । गयसमय दप्पदलणो आसाइयपवरकवरसो।।५। भीमभवकाणणमि दंसियगुरुवयणरयणसंदोहो। नीसेससतगुरुमरीजिणवल्लहोजयः ॥ ११ ॥ छाया (भभुपक्षे) फुतश्रावकसत्याशः सारांगभमसंदेहः मतसमयदर्पदलनः आस्वादितपयरकाव्यरसः दर्शितगुरुवचनरचनसंदोहः निःशेपसत्वगुरुकः एमाशः रिजिनमः भीममर कानने हरिवि जयति गुरुपारतंन्यस्तोत्रम् ॥ (हरिपक्षे). कृतश्चापदसंत्रासः सारंगभमसंदेहः समदगजदार्पदल- आस्वादितप्रवरक्रव्यरसः दर्शितगुरुवदनरदन दो निःशेषसत्वगुरुकः (पदार्थ) (कय) परिपूर्णकी है (सावय) श्रावकोंकी (सन्तांसों शुभ आकांक्षा जिनने ( सारंग ) प्रधान आचारा अंगोंसे ( भगगसंदेहो) दूर कियाहै संवेह जिन (गय ) भ्रष्ट हुआहे ( समय ) सिद्धांत जिन्होंसे ऐसे चोरासी आचार्योंके (दप) अभिमानको ( दलणो नष्टकरनेवाले (आसाइय) आस्वादिन कियाह ( पदर सर्वासम ( कन्दरतो) काव्यग्स जिन्होंने (दलिय प्रकट कियाद (गुरुवयण) श्रीअभयदे सरिक गगनों ( रयण ) रचनाओंका (संदोहो ) समूह जिन्होंने (नसिस ) सम्पूर्ण ( सत्त ) जीकि (गुरुउ ) . नायकारको दुरकरनेवाले ऐरो ( मग निगाहो ) गर जिनकटम (भान ) मयंकर (काण ) मंगा. रूप कनमें (हान)निक समान (REar दायी।
Primary
(मिहाक्षे पदार्थः)
(कर) किराह (माश्य) जानसंगको (रातारा)
भप जिसन (साग) भूगोंक ( भगा ) भा फिगई
(मनो) जिसने (समय) मदोन्मन (गय)
हाधियोंके (दप्प ) दर्पका (दलणो) नाशकियाहै
जिसने (आताहय ) चाह ( पर ) नये ( फन्च)
मांसका ( सा ) रसजिसने (सीय) दिखाया
(गुरु) भाग (पदन ) मुखमैं ( रदन) दांतोंका
(संदहो) समूह जिसने (नीसेस ) सम्पूर्ण (सन)
पशुओंमें (गुरुओ ) पटा परो (हरिघ ) सिंहके समान
जिनयाममूरि विजयशाली है।
(भावार्थ)
परिपूर्ण किये है श्रावकोंके शुभ मनोरथ जिनने
प्रधान आचागदि अंगासे दूर किये हैं संदेह जिनने
भ्रष्ट हुआहे सिद्धान्त जिन्होंसे ऐसे चोरासी आचार्योंके
अभिमानका नाशकरनेशले आस्वादित कियाहै सर्वोत्तम
काव्यग्स जिनने प्रकट कोहे नवांगवृतिलक्षण श्रीअभय.
देवमरिक बचनों की रचना जिनने सम्पूर्ण जीवोंके
अज्ञानाधकारको दृरकरनेवाले ऐसे सरि जिन छन
गुरुपारतम्ध्यस्तोत्रम् ॥ (हरिपक्षे) कृतश्वापदसंत्रासः सारंगभग्नसंदेहः समदगजदर्पदलनः आस्वादितप्रवरकन्यरसः दर्शितगुरुवदनरदनदोहः निःशेपसत्वगुरुकः (पदार्थ) (कय) परिपूर्णकी है (सावय) श्रावकोंकी (सन्तासो) शुभ आकांक्षा जिनने ( सारंग ) प्रधान आचारादि अंगोंसे ( भग्गसंदेहो ) दूर कियाहै संदेह जिनने ( गय ) भ्रष्ट हुआहै ( समय ) सिद्धांत जिन्होंसे ऐसे चोरासी आचार्योंके ( दप्प ) अभिमानको ( दलणो) नष्टकरनेवाले (आसाइय) आस्वादित कियाहै (पर) सर्वोसम ( कदरसो ) काव्यरस जिन्होंने ( दसिय ) प्रकट कियाहै (गुरुवयण) श्रीमभयदे सूरिक वचनोंकी ( रयण) रचनाओंका ( संदोहो ) समूह जिन्होंने (नीसेस ) सम्पूर्ण ( सत्त) जीवोंके (गुरुउ) अज्ञा. नांधफारको दूरकरनेवाले ऐसे ( सूरी जिगवा हो ) सूरि जिनरलभ (भीम ) भयंकर (भत्रकाणगंमि ) संसार- रूप वनमें (हरिन) सिंहके समान (जयइ ) विज्ञा शाली है।
गुम्पारन यस्तोत्रम् ॥ (सिंहाक्षे पदार्थः) ( कय ) किगाह (साश्य ) जानवरोंको (सवासा) नय जिसने ( सारंग) मृगोंके ( भगग) भम कियेहै ( संदेहो ) शरीर जिसने (समय) मदोन्मत्त (गय) हाथियोंके ( दप्प ) दर्पका (दलणो) नाशकियाहै जिसने (आताइय) चखाह ( पर ) नये ( कन्ध ) मांसका ( रसो) रसजिसने (ईसीय ) दिखायाहै (गुरु) भारी (क्दन ) मुखमें ( रदन) दांतोंका (संदोहो ) समूह जिसने (नीसेस ) सम्पूर्ण (सत्त) पशुओंमें (गुरुओ ) बडा ऐसे (हरिब्ध ) सिंहके समान जिनवाछमसूरि विजयशाली है। (भावार्थ) परिपूर्ण किये है श्रावकोंक शुभ मनोरथ जिनने प्रधान आचारादि अंगोंसे दूर किये हैं संदेह जिनने भ्रष्ट हुआहै सिद्धान्त जिन्होंसे ऐसे चोरासी आचार्यों के अभिमानका नाशकरनेवाले आस्वादित कियाहै सर्वोत्तम काव्यरस जिनने प्रकट कीहै नशंगतिलक्षण श्रीअभय- देवसरिके वचनों की रचना जिनने सम्पूर्ण जीवोंके अज्ञानांवकारको दूरकरनेवाले ऐसे सूरि जिनम २० गुम्पारत-म्यम्तोत्रम् ॥ भयंकर संसार रूप बनमें सिंहके समान विजयशाली .. होओ। (सिंहपक्षे भावार्थः) कियाहै पशुओको भय जिसने मौके भम कियेई शरीर जिसने मदोन्मत्त हाधियोंक दर्पको दालन कियाई जिसने चरवाहे नूतन मांसकारस जिसने दिखाया अपने भारी मुवमें दांतोंका समूह जिसने सम्पूर्ण पशुओंग बड़े एसे सिंहके समान अथ गाथा टपेन राम्यत्र स्थगगे: जिनवाछभसूरेः सर्वोत्तम शरभीपश्येन श्लेपपूर्वकमाह ॥ ॥ गाथा॥ उपरिटियसन्चापो चउरणुउगप्पहाणसंचरणों। अमममयरायमहणो उद्दमुहोमहइजस्सकरो ॥१०॥ दंसिएनिम्मलनिच्चल दन्तगणोगणियसापउछ भ । गुग्रगिरिगुराउसरहुव्य मूरिजिणवलदोहोला (ठाया मभुपक्षे) उपरि स्थिासयरमः सानुानुयोगमपानरांगरणः भरा ममगजमहनः अराममदगगमपनीमा उ मुग्ोपायका
गोषम् ॥
समी
राधामाः पर्शित निर्मल निक्षलवान्तगणः
अगणितभावोधमयः गुरगिरिगुरतः जिनवछभसरिः
पारमा गभूत् ॥
(शरभपये)
उपरिरिधतसम्यग्णः चतुग्नुयोगप्रधानसंचरणः असम
मृगगजमधनः उर्जमुवोयरयकरः शोभते तथा भूतः
दर्शितनिर्मलनिधलदन्तगणः अगणितश्वापदोत्यभयः
गुगिरिगुरयः भाति हि शरभोऽपि तथैव सूरि जिनयछ
भोऽभूत् ॥ १७-१८ ॥
(पदार्थ)
(उपरिठिय)
आचार्योसे अत्युत्तम है
( सन् ) शोभायमान ( चरणो) चारित्र जिनका
(यउरणुउग) द्रव्यानुयोग १ कालानुयोग २ गणिता-
नुयोग ३ और धर्मानुयोग ४ इन चार अनुयोगसे
(प्पहाण) प्रधान है (संचरणो) प्रवर्तन जिनका
(असम) उत्कट है ( मय) मद जिन्होंका ऐसे
( राय ) राजाओंसे कियागया है (महणो ) पूजन
जिनका, अथवा (असम) क्रोध ( मय) गई और
(राय) राग इनका महणो) नाश करनेवाले
गुरुपारतन्ध्यरतोत्रम् ॥
( उट्टमुहो ) व्याख्यानके प्रस्तावमें ऊर्ध्वमुख (सहइ)
शोभायमान है ( जरस ) जिनका ( करो ) हात ऐसे
(दंसिय) दिखाया है (निम्मल ) पापरहित (निश्चल)
भली भांति व्रतके पालन में तत्पर ऐसा ( दन्तगगो)
मुनिसमूह जिनने, अगणिय नहीं गिना है
( सावउछ ) श्रावकोंका (भ3) अपेक्षा लक्षण भय
जिनने अथवा सुसाधुओंसे परिवृत होनेसे (अगणिय)
नहीं गिना है ( सायउछ ) मिथ्याती प्रारकोंका
( भउ ) भय जिनने, ( गुरु ) श्रेष्ट (गिरि) वाणीमें
( गुरुउ ) उत्कृष्ट, (सरटु ) अष्टापदके (ब) समान
(मूरि ) मरि ( जिणवाहो ) जिनबछम (होडा)
हुए अथवा थे ॥ १७-१८ ॥
(शरभपक्षे) पदार्थ
चार पांवर
(उपरि हिय) अर्घ देराम स्थित है (स)
विद्यमान (चाणो ) पांच जिसके, (चउरणुउग)
सम्बन्धमे (पहाग) प्रभान है
(संचरगो) संचार जिसमा (आम) असतारण
पटवाटे ( मयगय ) सिंहला (मरणो) ना करने
पाया, (महो) सीतापसी ना किया
Prurain (A) भायमान ( जर ) जिसका (क) VIE अर्थात् संसा, (पंसिय ) दिखाया है (निगर) ON और (निशल ) द ( दन्त ) दांगोवा (गो) समूह जिसने, (गणिय ) नहीं गिना (मास) श्वापदाका ( भ3) भय जिसने, (गुप) हे (गिरि ) पाक समान (गुराई) या ऐसा जो शरम उसके समान सरि जिनवछम ॥ १.१८॥ (भावार्थ) सब आयासि उत्तम चारित्रबारे, द्रव्यानुयोग ? पायानुयोग २ गणितानुयोग ३ और धर्मानुयोग । इन चार अनुयोगास प्रधान है प्रवर्तन जिन्होंका अत्यंत गर्व करनेवाले राजाओं कभी पृन्य अधा मोध गर्व और गग इनका नाश करनेवाले, व्यास्यानके रामय जिनका ऊंचा किया हुआ हात शोमता है ऐसे, मुक्तिमार्ग बनाकर जिनने पापरहित और प्रताचरणमें तत्सर ऐसे मुनि का रामह बतलाया, सुसाधुओंसे नित्य घिरे होने के कारण जिनको मिथ्या धाका कुछ भय नहीं था, प्रतिज्ञा पुरीकरनेके कारण जो . श्रेष्ट याणीके कथन में रष्ट थे, वे गरिजिनाम अष्टापद के समान हुए ॥ १-१०॥ (शरभपक्षे) भाव उपर किये हुए है पर जिसने, पार पायके सम्पन्धसे संभार मानेगला, यडे पराक्रमी सिंहको मारने गाला, अंगी उठानेसे जिसकी गुंड शोभापमान है, अपने शुभ और हट ऐसे गार पांगाको हिलाने पासा, जिसको किसी पशुका बिगुल गामही है और निगमा शगरपडे पहाडके गमान रोशन शुगर गिन॥ १०.१८॥ अथ विगम्यगुगंर्गुणोगारण यापन गति ॥ गाया। নাৰাগীৰ সাগৰীষণগাকাশনা) जगजिणवालणं गुरणातंगवहारदे ॥१९॥ (लागा) येन जिनाभन गरगा गया: गुगप्रमim पानगतमननः नताः न गया य॥ ( मनमः माम मरे प्रात: )..|| (पदार) (ग) पामें (R) ram nhữn:gin B २५ (पारस ) समय (पाण) माशनगे ( पीगिय ) सम्मोहित ६ (गणा ) मन जिन्हीके ऐसे (कया ) वि (भा) गमन भव्य जीव (जेग ) जिन (जिगवा देणं ) जिनबाटम (गुरुणा ) गुग्ने (सं) उन ( सव्वा ) मनययनकायसे ( बन्दे) नमस्कार परता ॥ १९॥ (भावार्थ) युगरे धीच श्रेष्ट सिद्धान्तरूप अमृत पिलाकर भन्य जीओके मनको सन्तुष्ट करनेवाले तोपदेशक जिनाभ मृरिको मनसे, पाणीसे और शरीरसेम नमस्कार करता ॥ ९ ॥ अथ गाथा दयेन सुधर्मस्वाम्यादिगुरुपारतम्य. मुपवर्ण्य सर्वसंघभारवहनक्षमरय गुगेरपर्पमाह । ॥ गाथा ॥ विप्फुरियपवरपवयण सिरोमणीचूदृयहस्वमाया जोमेसाणमेस बसहसत्ताणताणकरो ॥ २० ॥ सबरियाणमहीणं मुगुरुणपारतंतमव्यहइ जयद जिणदत्तरी सिरिनिल पणयमुणितिल ॥२१॥ समस्त गुरुपारतन्ध्यस्तोत्रम् ॥ (छाया) विस्फुरितप्रवरप्रवचनशिरोमणिः व्यूढदुहक्षमः यः शेषाणां शेष इव ( यः) समानांत्राणकरः सन् सहते, ( यः ) सच्चरितानां सुगुरुणामहीन पारतन्त्र्य मुहहति ( सः) श्रीनिलयः प्रणतमुनितिलकः जिनदत्वं सूरिः जयति ॥ २०.२१ ॥ ( पदार्थ) (विप्फुश्यि ) निकला है ( पवर ) श्रेष्ट ( पवयण) सिद्धान्त जिनसे ऐसे आचार्योंमें (सिरोमणी ) मस्तक के मणिके समान (बूढ ) धारण की है ( दुबह ) धारण करनेको कठिन ( खमो ) क्षमा जिनने, (जो) जो (सेसाणं ) तत्कालवी अन्य आचार्यो (सेमुव्य) शेषके समान अर्थात् पूज्य है, जो ( सच्चरियाण) उत्तम आचार वाले ( सुगुरुणं ) अपने श्रेष्ट गुरुओंका ( अहीणं) सम्पूर्ण ( पारतन्तं ) पारतन्त्र्य (उदवहइ) धारण करते हैं, वे (सिरि ) समस्त लक्ष्मीके ( निल) संस्थान और (पणय ) नमस्कार करनेवाले [ मुणि] साधुओंमें (तिल) तिलकके समान ऐसे ( जिण ) जिनौने (दत्त) ज्ञानादियणसियुक्त दिवाये हुए,
rraiyar
--
(मो) (पर) गुनीधीनि निगरपण हाग
ग
(पगार पाने अपना जिनस्चमरि' पद
नारा प्रस्ट पर दिया.)
(भारार्थ)
र मिसन मिला ऐसे आचार्यों के
मरमणिय गमान, धारण फग्नयो अत्यन्त कठिन
th मामाले, मालती आचामि परमपृश्य,
आगामें गत्पर से अपने सदगुराग पूर्ण पारतभ्य
धारण करनेयार ममग्न लक्ष्मीके संम्धान, नमसार
फरने वाले नापशेमधेट पसे जिनदाचारि विजयशादी
हो।
लागला परमोशागारीनापनूनु
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समागम् ॥
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२ सिग्यमवहर स्तोत्र ॥ ऐसे (थंभणपुर ) स्तंभनपुरमें (हिओ) रहनेवाले ( सिरिपासजिणो ) श्रीपाच जिनभगवान (वि) अन्तरायका ( सिग्धं ) जलदीसे ( अवहरउ ) नाशकरें ॥१॥ (भावार्थ) श्री महावीरप्रभुकी आज्ञाको पालनकरनेवाले चतुर्विध- संघके पापोंको नाश कियाहै जिनने ऐसे स्तंभनकपुरमें निवास करनेवाले श्रीपार्श्वजिनभगवान अन्तरायका सत्वर नाशकरें ॥१॥ ॥ गाथा॥ गोयममुहम्मपगुहा गणवइणोविहियभवसत्त- मुहा । सिरिवद्धमाणजिणतित्य, मुत्थयंते कुणंतु सया ॥२॥ (छाया) तेगौतममुधर्मप्रमुखाः रिहितभव्य सत्यमुपाः गणपतयः सदा श्रीवर्द्धमानाजनयिस्वस्थतां कुर्वन्तु ॥ २ ॥ (पदार्थ) (ते) ये प्रसिद, (गोयम ) गौतमयामी और (महम्म) सुधर्मस्वामी हैं ( पमुहा ) मुख्य जिमोंग सिमयहर स्तोत्र ॥ (निहिय) कियाहै ( भन्वसत्त ) भन्यजीवोंको (सुहा) सुख जिन्होंने ऐसे (गणवइणो) गणधर (सया) निरंतर (सिरिबदमाणजिण) श्रीमहावीरप्रभु जिनभगवानने स्थापनकिएहुए ( तित्य ) चतुर्विधसंघकी (सुत्थयं ) निरुपद्रवता ( चुणन्तु ) करें ॥ २ ॥ (भावार्थ) ये प्रसिद्ध गौतमस्वामी और सुधर्मस्वामी ममुख जिन्होंमे कियाहै भन्यजीवोंको मुख जिन्होंने ऐसे गणधर श्रीजिननगवान महावीरस्वामीने स्थापनरिएहुए चतुर्विध संघके उपद्रोंका नाशकरें ॥ २ ॥ ॥गाथा ॥ सफाइणोमुराजे जिणवेयापनकारिणोसन्ति । , अवहरियविग्यमंधा हवन्तु ते संघसन्तिकय ॥३॥ (छाया) ये अपहवविनसंघा: जिनवैयावृत्यकारिणः शादयः मुराः सन्ति ते संघशान्तिकराः भयन्तु ॥ ३ ॥ (पदार्थ) (जे) जो ( अवहरिय ) नष्ट होगए है (विग्यसंधा) अन्तरायोंके सम्रा जिन्होंके और (जिण) जिनः सिग्मवहर स्तोत्र ॥ करभगवानकी ( वयावच्च ) वैयावच्च (कारिणो ) करने थाले ( सकाइणो ) इन्द्रप्रमुख ( सुरा ) देवता (सन्ति) हैं ( ते ) वे (संघ) चतुर्विधसंघको ( सन्तिकरा) शान्तिसुखके करनेवाले (हवन्तु ) होओ ॥३॥ (भावार्थ) नष्टहोगएहैं अन्तरार्योंके समूह जिन्होंके और जिन- तीर्थकर भगवानकी यावच्च करनेवाले जो इन्द्रप्रमुख देवताहैं वे चतुर्विधसंघको शान्तिसुखके करनेवाले होओ ॥ ३॥ ॥ गाथा॥ सिस्थिभणयहियपाससामिपयपउमपणयपाणीण। निद्दलियदुरियविंदो धरणिंदो हरउ दुरि- याई ॥४॥ (छाया) श्रीस्तंभनकस्थितपार्श्वस्वामिपदपद्मप्रणतप्राणिणांनिर्दलित- दुरितवृंदः धरणेन्द्रः दुरितानि हरतु ॥ ४ ॥ (पदार्थ) (सिरि) शोभायुक्त (मणय ) स्तंभनकपुरमें (द्विय) यासकरनेवाले (पाससामि ) पाचमगवान सिग्दमवहर स्तोत्र ॥ ( पयपउम) चरणकमलको ( पणय ) प्रणाम करने वाले ( पाणीण) प्राणियोंके (निदलिय ) नाशकिए हैं (दुरियविदो ) कष्ट और पापोंके समुदाय जिनने ऐसे (धरणिदो) धरणेन्द्रभगवान (दुरियाई ) दुःखोंको (हरउ) नाशकरें ॥en (भावार्थ) श्रीयुक्त स्तंभनकपुरवासी पार्श्वभगवानके चरणकमल को प्रणामकरनेवाले प्राणियोंके नाशकियेह कष्ट और पापोंके समुदाय जिनने ऐसे धरणेन्द्रभगान दुःखोंको नाशकरें ॥४॥ ॥गाथा ॥ गोमुह-पमुस्ख-जक्खा पडिहयपडिवक्सपरख लक्खाते । कयसगुणसंघरस्खा हवन्तु संपत्त- सिवसुक्खा ।। ५॥ (छाया) प्रतिहतप्रतिपक्षपक्षलक्षाः संप्राप्तशिवसौख्याः ते गोमुखप्रमुखयक्षाः कृतसगुणसंघरक्षाः भवन्तु ॥ ५ ॥ (पदार्थ) (पडिहय) नाशकियेह (पडियाख) संघको उप
६
सिग्यमवहर स्तोत्र ॥
करनेवाले रियोंके ( पक्व ) पक्षोंके ( लक्खा) लक्ष
जिन्होंने (संपत्त) सम्यक् प्रकारसे पाएह (सिवसुक्खा)
कल्याणरूप सुख जिन्होंने (ते) वे प्रसिद्ध (गोमुह
पमुक्ख ) गोमुखयक्षहै प्रमुख जिन्होंमें ऐसे (जस्खा)
यक्ष ( कय ) कीहै ( सगुण ) ज्ञानादि गुणोतेयुक्त
( संब) चतुर्विधसंघकी ( रखा ) रक्षा जिन्होंने ऐसे
(हवन्तु ) होओ ॥ ५॥
( भावार्थ)
नाशकिएह संघको उपद्रवकरनेवाले रियोंके पक्षाके
लक्ष जिन्होंने, सम्यक् प्रकारसे पायाहै कल्याणरूप सुख
जिन्होंने ऐसे गोमुखप्रमुखादियक्ष ज्ञानादिगुणोंसेयुक्त
चतुर्विधसंघकी रक्षाकरने वाले होओ ॥५॥
॥ गाथा ॥
अप्पडिचकापमुहा जिणसासणदेवयायाजण-
पणया। सिद्धाइयासमेया हवंतु संघस्स विग्य-
हरा ॥६॥
(छाया)
जिनप्रणताः सिहायिकासमेताः च अप्रतिचकाप्रमुखाः
जिनशासनदेयता: संघस्य विनतराः भवन्त ॥६॥
सिमर स्तोत्र । (पदार्थ) (जिण) जिनभगवानको ( पणया) प्रणामकरने बाली (सिद्धाइया) सिद्धाइकानामकी महावीरस्वामीके शासनकी अधिष्ठात्री देवीके (समेया) साथ (य) और ( अप्पडिचका) अप्रतिचक्राहै (पमुहा) प्रमुख जिन्होंमें ऐसी (जिणसासणदेवया ) जिनशासनको अधिष्ठात्री देवियां ( संघरस ) चतुर्विधसंघके (दिग्धहरा) अन्तरार्योको हरणकरनेवाली ( होतु ) होओ॥ ६ ॥ (भावार्थ) जिनमगवानको प्रणामकरनेवाली महावीरस्यामीके सासनकी अधिष्टाइका सिडाइका नामकी देवीके साथ और अप्रतिचक्राहै प्रमुख जिन्होंमे ऐसी जिनशासनकी अविष्टाइका देवियां चतुर्विधसंघके अन्तरायोको हरण करनवाली होओ ॥ ६॥ ॥ गाथा॥ सफाएसासबउरपुरहिश्वद्धमाणजिणभनो । मि. खिंभसंतिजस्खो रक्सउसंपयरोण ।। ७ ॥ (छाया) समादेशात् (सचउर ) पुरस्थितः वर्द्धमानजिनमः श्रीब्रहशान्तियक्षः प्रचलन संघ रक्षतु 100 ट सिग्यमवहर स्तोत्र (पदार्थ) ( सकाएसा ) इन्द्रकी आज्ञासे ( सञ्चउरपुर ) सञ्चउरपुरमें (हिउ ) रहनेवाले (वमाणजिण) जिनभगवान महाशस्यामीके ( भो) भक्त (सिरि) शोभायुक्त (बभतंति ) ब्रह्मशान्तिनामक (जबखो) यक्ष ( पयत्तेण ) यापूर्वक (संघ) चतुर्विधसंघका ( रक्खउ ) रक्षणकरो ॥ ७ ॥ (भावार्य) इन्द्रकी आज्ञासे सचउरपुरमें रहनेवाले और जिन- भगवानमहावीरस्वामीके श्रीब्रह्मशान्तियक्ष चतुर्विधसंघको रक्षणकरो ॥ ७॥ ॥ गाथा ॥ क्खितगिहगुत्तसंताण देसदेवाहिदेवयाताउ । निव्वुइपुरपहियाणं भयाणकुणंतु सुक्खाणि ॥ ८॥ (छाया) याः क्षेत्रगृहगोत्रसंतानदेशदेवाधिदेवताः ताः मिचिपुर पथिकानां भव्यानां सौख्यानि कुर्वन्तु ॥८॥ (पदार्थ) (वित्त) क्षेत्र (निह) गृह (गुचसंताण ) हिमर स्त्र गोत्र संतान ( देस ) देश इनसंबंधी (देव) देता और ( अहिदेव ) अधिष्ठात्री देवता (ता) ये सब (निखुइपुर ) मोक्षरूप नगरके ( पहिया) पधिक (भल्याण ) भन्यजीवोंको ( मुस्खागि.) सनिवारग- रूपसुख (कुणन्तु ) करो ॥on (भावार्थ) क्षेत्रदेवता गृहदेयता गोत्र संतानदेवता देदेवता और इन्होंकी अधिष्ठात्री देवता ये सब मोक्षरूपनगरको जानेवाले पधिकजनोंको कानिशरणरूपसुख को l गाथा ॥ चफेसश्चिकधरा विहिपहरिताडिन्नकंधरापणियं । सिवसरणिलग्गसंघस्स सबहाहर विग्याणि ॥९॥ (छाया) विधिपथरिपूणां अत्यछिनकंधरा पक्रधरा घोस शिवसजिलंग्नसंघस्य विप्नानि सर्वधा हरतु ॥१॥ (पदार्थ) (विहिपह) जनक्रियाके मार्गके (रि) शगुओंकी (पणिय ) अपर्ध () कार्य है (पंधरा) गर्दन जिसने (चापरा) को पारगकरनेवाली
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पांदवेसमान (भमपदेशे) भयरहित भत्यन्तमतापशाली (निणी ) सामान्यपालियोंके प्यारे ( स्खमाणा) बगान (प) प्रभु (में) मेष (ख) गरये ॥ (भारार्थ) चतुर्विधसंपोस्वामी जिनेवरभगवान् मुंदरक्रियाशाली संघले साथ सामान्यकेलियामें चांदकेसमान भयरहित अत्यन्तप्रतापशन सामान्यकेलियों प्यारे ऐसे समान मनु मेरा रक्षणकरो ॥ १० ॥ || गाथा ॥ सोजयबद्धमाणो जिणेसरोणेसरबपतिमिरे । जिणचंदाभयदेवा पहुणोजिणवालहाजेय ॥ ११ ॥ (छाया) जिनेश्वरः (सरव्य ) आदिल इस हततिमिरः सः पटमानः जयतु ( तथा ) जिनचंद्राः अभयदेशः जिनभाः प्रभवः जयंतु ॥ ११॥ (पदार्थ) (जिणेसरो ) जिनेश्वरमगवान (णेसरब) सूर्यके समान (हयतिमिरः ) नष्टकियाहै अज्ञानरूपअंधकार
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(पदार्थ) ( अभय ) निर्भयता (देव) देवत्त और (पहर) प्रभुत्व को (दायगे) देनेवाले ऐसे (गुप) अशान रूपअन्धकार को रोकनेपाल (जिग) जिनमगानके (बह ) सुन्दर (पाए ) धरणीको (द) नमस्कार करलाई भथवा ( अभयदेव ) अभयदेवरिको (पहल) प्रमुत्व (पायगे देनेवाले ऐसे (गुर जिणापार) বা লিলষণৰ বীমা (ঘ) ৪ লাগা परताई. सही ( पदमाणनित्थरस ) घर्षमानरमामा साधका ( पुद्धिकर) परिकं हेतु ( जिगमन्द) मिन पन्द्रसरि और (जसर) जिनेशरपरिको () नमस्कार करताई ॥१२॥ (भावार्य) निर्भयता देवत्व और प्रभुत्वको नेपाली গমানাফেী থাই जिनभाशन বাঘাঁৰা না . अपार देवरिको दिया प्रगुल जिन्होंने गुप शिगपर रिक परोको गाकार पाता और time शामीने स्थापन वि.येहुए पधि लिए जिनपद और जिनेवा गरियो मगमावता सिम्यमंवहर स्तोत्र ॥ (गाथा) (जिणदत्ताणंसम्म मन्नति कुणति पारिति । मणसावयसावउसा जयंतु साहम्मियातविः ।।१३।। (छाया) ये जिनदत्ताज्ञां मनसा वचसा वपुषा सम्यक मन्यते ये च तां कुर्वन्ति ये च तां कारयन्ति तेऽपि साधर्मिकाः जयन्तु ॥ १३ ॥ ( पदार्थ) (जे) जो (जिण ) जिनभगवानने (दत्त) दी हुई ( आणं ) आज्ञाको (मणसा) मनसे (वयसा) वाणीसे (बउसा ) शरीरसे (सम्मं ) योग्य (मनंति) मानते हैं ( कुगंति ) करते हैं (कारिति ) कराते है ( तेवि ) भी ( साहामिया ) साधर्मिक (जयन्तु) विजयी होवो ॥ १४ ॥ (भावार्थ) जिन भगवानने दी हुई आज्ञाको जो मन वचन कायसे योग्य मानते हैं स्वयं आचरण करते हैं और अन्योंसे भी आचरण करवाते. है के साधर्मिक भी विजयी होओ ॥ १३ ॥ -
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उपसागहर स्तोत्रम् ॥
सादिकोंके विपका नाशकरनेशले अध्या मिय्यात्वरूप
विषको धारणकरनेवाले निथ्याथियोंके मिथ्यात्वरूप
विरको उन्मूलितकरनेवाले उपद्रवानिवृत्तिरूप मंगल
और सुखवृद्धिरूपकल्याणके निवासभूत ऐसे पार्शप्रभुको
भ वन्दनकरताई ॥१॥
(गाथा)
विसहरफलिंगमंतं फंठेधारेइजोसयामणुः । तस्स
गहरोगमारी दुजराजति उवसामं ॥ २ ॥
(छाया)
यः मनुष्यः सदा विषधररफुलिंगमंत्रं फंठे धारयति
तस्य महोगमहामारीदुष्टज्वराः उपशम यान्ति ॥ २ ॥
( पदार्थ)
(जो ) जो ( मणुउ ) गनुष्य (सिहरफुलिंगमंतं)
विषधररपुलिंग नामक अष्टादशाक्षरात्मकमंत्रयो ( सया)
निरंतर ( फंट ) कंटमें (धारेइ ) धारणकरता (तारा)
उसके (गह) सूर्यादिकमहरातदुःख (गेग) यामकुएजलो.
दरादिरोग ( मारी ) कॉलरा ऐगादि उपदर (
दुग)
ऐफाहिकादिदुष्टम्बर ( उत्साम ) नाशको (जी)
प्रातहोतेहैं ॥२॥
उमग्गास्तोत्रम् ॥ (भावार्थ) जो मनुष्य पिघरस्फुलिंगनामक अष्टादशाक्षर मंत्रकों निरंतर कंठमें धारणकरताहै, उसके सूर्यादिग्रहजन्य' दुःख कफकुष्टजलोदरादिरोग कॉलराप्लेगादि उपद्रव एकातरा पाली आदि दुष्टम्बर नाशको प्राप्तहोतेहैं ॥ २ ॥ (गाथा) चिटउदूरेमंतो, तुज्झपणामोवि बहुफलोहोइ । नरतिरिएसुविजीवा पावंतिनदुःखदोगचं ॥३॥ (छाया) विषधरस्फुलिंगमंत्रः दूरे तिष्टतु तव प्रणामोऽपि बहु- फलः भवति नरतियवपि जीवाः दुःखदौर्गत्यं न प्राप्नुवन्ति ॥३॥ (पदार्थ) (मंतः ) पिघरस्फुलिंगमंत्र तो ( दूरे ) दरही (चिट) रहो परंतु (तुझ )आपको (पणामोवि) प्रणाममी ( बहुफलो) आरोग्यधनधान्यादिसमृद्धिरूप फलको देनेवाला ( होइ) होता है ( नर) मनुष्य जाति और (तिरिएम) तिर्यग्जातिमें (0) मी उत्पन्न हुये हुए (जी) जीव (दुःख ) संकट उवसम्गहरस्तोत्रम् ॥ और (दोगचं ) दुर्गतिको (न) नहीं (पाति) प्राप्त होते हैं ॥३॥ (भावार्थ) विषधरस्फुलिंग मंत्रतो दूरही रहो परन्तु हे नाथ आ- पको फियाहुआ प्रगामभी आरोग्य धन-धान्यादि समृद्धि- रूप फलको देनेवाला होता है आपको वंदन करने वाले जीव पूर्वजन्मकृत प्रवलकर्मानुसार मनुष्ययोनिमें उत्पन्न हो वा तिर्यग्योनिमें उत्पन्न हों तो उन योनिमें उन्हें भी दुःख और दुर्दशा कमी प्राप्त नहीं होती ॥ ३ ॥ (गाथा) ।। तुहसम्मत्ते लद्धे चिंतामणिकप्पपायवन्भाहिए। ॥ पावन्तिभविग्घेणं जीवाअपरामरंठाणं ॥४॥ (छाया) चिन्तामणिकल्पपादपाभ्यधिके तव सम्यक्त्वे लम्धे सति जीवाः अजरामरस्थानं अविघ्नेन प्राप्नुवन्ति ॥ ४ ॥ (पदार्थ) (चिंतामणि ) चिन्तामणिरत्नसे और (कप्पाय. चम्महिए) कल्पवृक्षसे अधिक (तुह ) आपके ( सम्मचे ) सम्यक्त्वदर्शनको ( लद्धे ) प्राप्तकिये सते.
उखसम्गहरस्तोत्रम् ॥ . [ जीवा) भव्यजीव ( अयरामरं ) जरा और मृत्युसे रहित (ठाणे) स्थानको (अविग्घेणं ) निर्विप्नताले ( पावन्ति ) प्राप्त करलेतेहैं ॥ ४ ॥ (भावार्थ) चिन्तामणिालसे और कल्पवृक्षसे अधिक आपके सम्यक्त्वदर्शनको प्राप्तकरनेसे भन्यजीव जरा और मरणसेरहित स्थानको निर्विघ्नतासे प्राप्त करलो था (गाथा) इअसंथऊमहायस भत्तिम्भरनिम्भरेणहिअएण ॥ तादेवदिज्झबोहिं भवेभवेपासजिणचंद ॥५॥ (छाया) हे महायशः भक्तिमरनिर्भरणहृदयेन इति संस्तुबे तस्मात् हे देव हे पार्थजिनचन्द्र भवे भवे बोधिं देहि ॥५॥ (पदार्थ) (महायस) हे त्रैलोक्यव्यापककीर्तिमान् (मान) आत्यन्तिक प्रेमके ( भर ) समुदायसे (निप्मरेण ) प्रपूरित ( हिअएण) हृदयसे (इ. ) इसप्रकार आप. की ( संथउ ) स्तुतिकरताई (ता) इसहेतु ( देय) हे देव (पासजिणचंद) हे मिनीमें चांदके समान उदरागरस्तोत्रम् ॥ पार्श्वनाथस्वामि (भवे भो) जन्म जन्ममें (घोहिं) जिनधर्मकी प्राति (दिश) देओ ॥ ५॥ (भावार्थ) हे लोक्यव्यापककीर्तिमान् आपकी भक्ति के समूहसे प्रपूरित हृदयसे पूर्वोक्त प्रकार आपकी स्तुति करताहूं. इस हेतु हे सम्पूर्ण जिनामें चांदके समान पार्श्वप्रभु ! आप जन्मजन्ममें जिनधर्मप्राप्ति मुझे देओ ॥५॥ इति श्रीइन्दरमनधेतपम्वरपालामुख्याध्यापकाचीचेफुटापागोपीनाथसून पण्डितश्रीकृष्णकृत्तमुपोधिनीटीकासहितं पतामहास्तवन" माप्तम् ।।
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