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Parmarth Patravali Bhag-ii

Jaidayal Goyandka · 2011/03

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परमार्थ अन्धमाराका १५ या पुष्प
परमार्थ-पत्रावली
[द्वितीय भाग]
DHOK000000000000000000000000
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लेगा-
जयदयाल गोयन्दका
-

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ॐ
परमार्थ-ग्रन्थमालाका या पुष्प
15600000000000000000000
परमार्थ-पत्रावली
[द्वितीय भाग]
जयदयाल गोयन्दका
%
21

--
मुद्रक तथा प्रकाशक
।
घनश्यामदास जालान
गीताप्रेस, गोरखपुर
संवत् १९९७ वि० प्रथम बार ५२५०
मूल्य चार आनामात्र
मिलनेका पता-
गी
प्रे
स, गो
ख
पु
र

-- श्रीहरि प्रकाशकका निवेदन आज परमार्थ-पत्रावलीका द्वितीय भाग प्रेमी पाठकोंके सम्मुख उपस्थित करते हुए हमें बडा आनन्द हो रहा है । सन्तोषकी बात है कि प्रथम भागको जनताने बडे प्रेम ओर उत्साहसे अपनाया तथा आढर किया है । कुछ ही वर्षोंमें उसके तीन सस्करी प्रकाशित हो गये। श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दकाके पत्रोंमें सक्षेपत उपादेय विषयोंका कितना सरल और सुन्दर विवेचन रहता है-- यह बतानेकी आवश्यकता नहीं है । जिज्ञासुओंकी परमार्थविषयक रुचि एव सत्सग-प्रेमको बढाने तथा आन्तरिक जिज्ञासाकी पूर्ति करनेमें इन पत्रोंद्वारा बहुत सहायता मिलती है, इसलिये परमार्थ- प्रेमियोंका इसकी ओर झुकार होना स्वाभाविक है । लोगोंके इस परम लाभकी ओर दृष्टि रखकर ही यह द्वितीय भाग प्रकाशित किया गया है। इसमें ८० पत्रोंका सग्रह हुआ है। वर्मप्रेमी वधुओंसे प्रार्थना है कि वे इस नतीन सहसे लाभ उठावें। प्रकाशक

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श्रीहार
विषय-सूची
परन०
पृष्ठ-सरया
१
१२
२५
४२
१--सत्रह महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
२-श्रद्धा, भक्ति एव प्रेमकी उत्पत्तिके उपाय
३-चौतीस प्रभोंका उत्तर
४-गीतासम्बन्धी प्रश्नोत्तर
-विभिन्न प्रश्नोत्तर
६-बीमारीमें साधनाकी प्रेरणा
७-जपकी उत्तम निधि
८-जीवात्मासम्बन्धी प्रमोत्तर
९-विकारोंके नाशके उपाय
१०-भगवत्प्राप्तिमें पुरुषार्थकी प्रधानता
११-निरन्तर भजन ध्यान होने के उपाय
१२-भगवदर्य व्यपहार
१३-चेतावनी
२४-वहा प्रकृति भेद
१५-सच्ची सलाह
१६-ध्यान
४९
५४
५६
५७
५९
६०

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(७) पृष्ठ-सरया १०५ १०६ १०८ १०९ ११२ ११३ पन-न ४३-रास्ता सुधरनेका उत्तम उपाय ४४-नाममें प्रेम कैसे हो? ४५-भगवान्में मन लगनेके उपाय ४६-सतत भगवत्स्मरणका उपाय ४७-सत्सङ्ग-प्राप्ति ४८-भगवनातिकी सुलभता ४९-निरन्तर ध्यान और महापुरुषोंके दर्शनका फल ५०-भजनसे पापनाश ५१-नामजपकी प्रधानता ५२-धनकी तुच्छता ५३-मनको स्थिर करनेके उपाय ५४-नाम-जप ही सार है ५५-प्रेमका आविर्भाव कैसे हो? ०६-ममत्वरहित समर्पण ५७-सकल्प-त्याग ५८-भगवत्स्मृतिमें भूल न होनेका उपाय ५९-योग और योगी ६०-सत्सङ्गकी आवश्यकता ६१-मनुष्य-जन्मका कर्तव्य ६२-नाम-जपसे भगवमाप्ति ६३-चेतावनी ६४-मूर्सकी परिभाषा ६५-आत्माल्याणके विचार ६६-सत्सङ्गका प्रभाव ६७-विपके नाशका उपार ६८-भगवान् प्रेमके वशीभूत हैं। १२१ १२२ १२५ १२८ १४४ १४७ १५१ १५४

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श्रीपरमात्मने नमः परमार्थ-पत्रावली द्वितीय भाग [१] आपका ३० तारीखको १८-१-१९३४ सन्का कृपापत्र मिला था, कई प्रकारके कार्योंकी भीड एवं अस्वस्थता आदि कारणोंसे पत्र लिखनेमें विलम्ब हो गया, इसके लिये क्षमा करें। आपने प्रश्नोंके सम्बन्धमें कुछ बातें पूछौं सो बड़े आनन्द- की बात है, इसके लिये क्षमा नहीं मॉगनी चाहिये और न उत्तरके लिये टिकट ही भेजना चाहिये। आपका शङ्कानिवारणार्थ पूछना उचित हो है, इसमें नास्तिक माननेकी कौन-सी बात है। किसीको भी नास्तिक समझ लेना समझदार मनुष्यके लिये उचित नहीं है। आपके प्रश्नोंका उत्तर क्रमश. निम्नलिखित है- १-नाम-जप ओर ध्यानके सम्बन्धमें पूछा सो मेरी समझसे नाम-जप और ध्यानसे अवश्य ही आत्माका उत्थान होता है। मनुष्य जिसका नाम उच्चारण करता है, उसीका स्वरूप उमे याद आता है और वह जैसी वस्तु होती है, बेसा हो उसका असर पड़ता है। जब कामी पुरुष स्त्रीको याद करता है, तो उसके मनमें कामका विकार प्रत्यक्ष उत्पन्न होता प० भा०२-१ [१

AD
:-
का
परमार्थ-पत्रावली
देखा जाता है, तव विज्ञानानन्दधन परमात्माके चिन्तनसे ज्ञान
और आनन्दको वृद्धि होनेमें क्यों शङ्का करनी चाहिये ?
भगवान्के नाम-जप और ध्यानसे समस्त पापोंका नाश होकर
परमपदकी प्राप्ति होती है ऐसा विश्वास करना ही चाहिये।
प्रत्यक्षमें भी ध्यान और नाम-जप करते समय स्फुरणाका
अभाव और आनन्दकी प्राप्ति होती ही है। शास्त्रप्रमाण तो
वहुत हैं । पातञ्जलयोगदर्शनमें सूत्र है-
'तस्य वाचकः प्रणवः ।"
'तज्जपस्तदर्थभावनम्
उस परमात्माका वाचक अर्थात् नाम ॐ है, उस ॐ
जप और उसके अर्थकी भावना अर्थात् परमात्माके खरूपका
चिन्तन करना।
'ततः
प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च ।'
इससे विघ्नोंका अभाव और परमात्माकी प्राप्ति भी हो
जाती है । श्रीमद्भगवद्गीतामें भगवान् कहते हैं-
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् ।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ।।
जो
पुरुष 'ॐ' इस एक अक्षररूप ब्रहाका उच्चारण करता
हुआ और ( उसके अर्थस्वरूप) मुझको चिन्तन करता हुआ
शरीरको त्याग कर जाता है वह परमगतिको प्राप्त होता है।
गोस्वामी तुलसीदास, ज्ञानदेव, समर्थ रामदास आदि
अनुभवी सन्त भी अपने अनुभवसे नाम-महिमाकी घोषणा करते
२]

द्वितीय भाग
हैं। आधुनिक कालके भी अच्छे-अच्छे पुरषोंने नामसे लाभ
होना अपने अनुभवसे बतलाया है। मैं अपने अनुभवके
सम्बन्धमें क्या लियूँ, इतना ही काफी है कि मुझको तो इससे
शान्ति मिली है।
२-सगुण परमात्माके दो भेद है, एक सगुण निराकार
और दूसरा सगुण साकार । सत्त्व, रज, तम-इन तीनों
गुणोंका कार्य यह दृश्यप्रपञ्च जय कारणमें लय हो जाता है
तव वह गुणमयी प्रकृति विज्ञानानन्दघन परमात्माके जिस
अंशम स्थित रहती हे वही निराकार सगुण ब्रह्म है। इस
निराकार सगुण ब्रह्मका संसारके नाश होनेपर भी नाश नहीं
होता । इसीको गीता (८।२०) में सनातन अव्यक्त कहा हे--
परस्तस्मात्त
भागोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातन ।
य स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ।।
उस अव्यक्तसे भी अति परे दूसरा अर्थात् विलक्षण जो
सनातन अव्यक्तभाव है, वह परम दिव्य पुरुष सय भूतोंके नष्ट
होनेपर भी नष्ट नहीं होता।
यह कोई नियमकी बात नहीं है कि सगुण वस्तु साकार
हो हो। आकाश निराकार है और सर्वत्र व्याप्त है परन्तु
उसमें शब्द-गुण वर्तमान है।
आकाशमें स्थित जल निराकार रहता है, वही चादलके
रूपमें आता है और वहीं जल, वर्फ इत्यादिके रूपमें आ जाता
है। निराकार रूपमे भी जलके गुण रहते है, परन्तु उसका
आकार नहीं दीखता । तथापि वहाँ जलका अस्तित्व मानना
[३

परमार्थ-पत्रावली
ही होता है। अतएव सगुण अव्यक्त ब्रह्मको सर्वत्र व्याप्त
कहनेमें और समस्त संसार उसमें लीन होता है यह कहने में
कोई 'वदतो व्याघात दोष नहीं आता।
३-भगवान् पुरुपविशेप हैं, पर वे अल्प नहीं हैं।
योगदर्शनमें कहा है--
क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः' (१।२४)
क्लेश ( अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और मरणभय ),
कर्म (शुभ, अशुभ और मिश्रित), विपाक (सुख-दुःख )
और आशय (वासना) के संसर्गसे रहित पुरुषविशेष
(पुरुषोत्तम ) का नाम ईश्वर है।
श्रीमद्भगवद्गीतामें स्वयं भगवान् कहते हैं-
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादणि
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ।।
यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥
(१५ । १८-१९)
नाशवान् जडवर्गले तो सर्वथा अतीत हूँ और (मायामें
स्थित ) अविनाशी जीवात्मासे भी उत्तम हूँ। इसलिये मैं
लोकमें और वेदमें पुरुषोत्तम (नामसे ) प्रसिद्ध हूँ। हे भारत!
इस प्रकार तत्त्वसे जो ज्ञानी पुरुष मुझको पुरुषोत्तम जानता
है, वह सर्वज्ञ पुरुष सब प्रकारले निरन्तर मुझको ही
भजता है
४-भगवान्को कोई उत्पन्न नहीं करता, वे स्वयं प्रकट
४]
चोत्तमः ।
स
मैं

द्वितीय भाग होते है। यद्यपि लोकदृष्टिसे मनुष्याकारमें भगवान् श्रीराम एवं श्रीकृष्ण माता-पितासे प्रकट होते-से दोपते है परन्तु वास्तवमें वे अपने आप ही अवतीर्ण होते है । गीतामें कहा है-- अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् । प्रकृति स्वामधिष्ठाय सम्भपाम्यात्ममायया ॥ (४।६) में अविनाशीस्वरूप अजन्मा होनेपर भी तथा सय भूतप्राणियोंका ईश्वर होनेपर भी अपनी प्रकृतिको अधीन करके योगमायासे प्रकट होता है। ५-समस्त संसार उस सगुण अव्यक्त परमेश्वरके सकाश- से प्रकृतिसे ही प्रकट होता है तथा अपने कारण प्रकृतिमें ही लीन हो जाता है और प्रकृति परमेश्वरमें स्थित रहती है। ६-आपने लिसा कि परमेश्वर यदि अवतीर्ण हो गया तो फिर प्रकृतिके कार्यको कोन सँभालता है। सो, प्रकृतिका कार्य सदा सँभालनेवाले प्रभु ही सँभालते है। ये समस्त भूतोंके ईश्वर रहते हुए ही देशविशेपमें अवतीर्ण होते है और साकार- निराकार दोनों रूपोंमें स्थित रहते हुए हो सय कार्य सँभालते हे । एक देशम प्रकट होनेपर अन्य देशोंमें उनका अभाव नहीं होता । जैसे अग्नि अव्यक्तरूपसे सभी जगह ब्याप्त है परन्तु वही व्यक्तरूपसे एक जगह या एक ही साथ अनेक जगह प्रकट हो सकता है। इससे न तो उसकी व्यापकतामें कोई बाधा आती है न शक्तिहीमें न्यूनाधिकता होती है । जय प्राकृत अग्नि- के लिये ही ऐसा सम्भव हे, तव सर्वत्र व्यापक, सर्वशक्तिमान् परमात्माके लिये तो शंकाकी बात ही कौन-सी है? [५ परमार्थ-पत्रावली ७-भगवान्के अवतारका एक उद्देश्य, 'दुष्टोंका विनाश' 'विनाशाय च दुष्कृताम्' भी है। इसीलिये भगवान्ने जरासन्ध- को पहली ही बारमें न मारकर उसे वार-वार आक्रमण करनेका मौका दिया, जिससे बार-चार दुष्टोंका नाश हो ! इसमें और भी अनेक हेतु हो सकते हैं। ईश्वरकी क्रियाका सम्पूर्ण उद्देश्य साधारण मनुष्योंकी समझमें नहीं आ सकता। ८-श्रुति, स्मृति, पुराण, इतिहास आदिकी बातें श्रद्धा- पूर्वक माननी चाहिये । इनमें जहाँ परस्पर मतभेद दीख पड़े वहाँ इतिहास, पुराण आदिकी अपेक्षा स्मृतिको और स्मृतिकी अपेक्षा श्रुतिको अधिक बलवान् समझना चाहिये । जहाँ श्रुतियोंमें भी विरोध हो, वहाँ दोनोंको ही प्रमाण मानना उचित है । हाँ, रहस्य समझनेके लिये विचारपूर्वक विरोधका निराकरण करके दोनों- का समन्वय करना चाहिये। नहीं तो, जितनी वात समझमें आवे उतनी ही काममें लानी चाहिये। सभी बातें प्रत्यक्ष प्रमाणद्वारा सिद्ध नहीं हो सकतीं। भौतिक विज्ञानमें भी अनुमान और आप्तवाक्योंको स्थान है। शास्त्रोंके न माननेसे हम महापुरुषोंद्वारा उपदेश किये गये ज्ञानले वञ्चित रह जाते हैं और मानकर तदनुसार आचरण करनेसे परमपदकी प्राप्ति होती है। ९-मैं नहीं कह सकता कि मैंने परमेश्वरको देखा है, परन्तु मेरा पूर्ण और दृढ़ विश्वास है कि परम श्रद्धा और अनन्य प्रेमसे परमेश्वरकी उपासना करनेपर उनके प्रत्यक्ष दर्शन हो सकते हैं । गीतामें भगवान्ने कहा है-- ६]

द्वितीय भाग
वन या शम्य अहमेयोऽर्जुन।
नगर्नु नष्टु च तलेन प्रोष्टु च परंतप ॥
मर्मगया ।
हे श्रेष्ठ नपवाले मर्जुन ! अनन्यमक्तिरे द्वारा इस प्रकार
प्रत्यक्ष देमके लिये, तत्त्वमे जानने के लिये नया प्रवेश करने के
लिये भी शस्य ।
१०-परमेश्वरका साक्षात् दर्शन होनेपर. अनि म्मृनियों में
जो लक्षण सतगये है, २ उस दर्शपम था जाते हैं । यथा--
मियो दियान्विश्विद्यन्ने
क्षीरन्त স্মায कर्माणि तरिमन्नाटे पगपरे ।।
(मु० उ००11८)
उस पगर (पारण-कार्यरूप)का साक्षात्कार पर
नेगर दम जोरी हदयग्रन्यि टूट जाती है। सार संशय नष्ट
हो जाने जर इमर कर्म क्षीण हो जाते ।।
शिर निम्न मारे अन्दर ये उपयुक्त लक्ष घट जाय,
उन्धीको परमेश्वर मानना चानिये । भगवानफा निगवार गरुप
मो अनुमान ही ममम मा, यह फही है। परन्तु
मापारम्प भनीन्छारे अनुमार प्रस्ट रना है।
मन जिम कप भगनानापाना चााना ६.
भगवान्
उमाकपाट होर उमेशन दी।
11Hৰ নাম লগা গান । বলা বা
मार निराम मंया पाना- दोनों ही परममा
प्रामाधम मालीवानी वग्ने नाशिभगवानगी
[.

परमार्थ-पत्रावली
नाम-जपको तोतेकी रटन्तके समान समझनेम तो भगवानके
नाम-जपके रहस्यको न समझना ही हेतु है।
१२-जिसके पालनसे इस लोक और परलोक, परमहित
हो, वही परमहित है, उसका नाम परमधर्म है, वही शास्त्रका
विधिवाक्य है और वही ईश्वरकी आज्ञा और इच्छाह । ईश्वरकी
इच्छा जाननेके तीन साधन हैं-
(क) श्रुति-स्मृतिके विधिवाक्य, (ब) महापुरुषों के
वचन और आचरण, (ग) शुद्ध हृदयकी स्फुरणा।
सबसे पहले मनुष्यको ईश्वरकी आजारूप शास्त्रोंके विधि
वचनोंको ईश्वरकी इच्छा समझकर तदनुकूल आचरण करना
वाहिये। शास्त्रोंमें विरोधाभास प्रतीत हो और उनका रहस्य
समझमें न आवे तो महापुरुषोंसे पूछकर शंकाओंका समाधान
करना चाहिये और उनके आशानुसार चलना चाहिये ।
महापुरुष
वे ही हैं, जिनमें गीता अ० १२ श्लोक १३ से १९
तकके और गीता अ० १४ श्लोक २२ से २५ तकके लक्षण
मिलते हों। सहापुरुषोके वचनोंमें भी शंका होनेपर या ऐसे
महापुरुषोंके न मिलनेपर एकान्तमें बैठकर पक्षपातरहित हो,
शुद्ध, श्रद्धामय हृदयसे भगवान्से प्रार्थना करनी चाहिये और
उन्हींसे मार्ग पूछना चाहिये । इस प्रकार हृदयस्थ ईश्वरसे
प्रश्न करनेपर हृदयमें जिस भावका उदय हो, उसोको ईश्वरकी
इच्छा समझकर तदनुसार आचरण करना चाहिये।
१३-परमात्मा परमदयालु होनेके साथ ही परमकठोर भी
हैं। परन्तु उनकी कठोरतामें भी दया भरी है। जैसे दयालु
८]

द्वितीय भाग
न्यायकारी राजा अपनी प्रजाके हितके लिये दण्डका विधान
करता है, इसी प्रकार परमेश्वर भी जीवोंको पापके फलस्वरूप
दण्ड देते है । इसमें ऊपरसे निष्टरता प्रतीत होती है परन्तु
वास्तवमें परमहित भरा है । अथवा जैसे स्नेहमयी माता
अपने प्यारे बच्चेको धुरे आचरणसे हटानेके लिये मारती है,
इसी प्रकार भगवान भी जीवोंके साथ दयापूर्ण कठोर वर्ताव
करते है । राजा और माताके द्वारा तो असावधानी, घुद्धिकी
मन्दता एवं स्वार्थसे कहीं भूल भी हो सकती है, परन्तु
परमदयालु, न्यायकारी, सर्वश और सर्वशक्तिशाली भगवान्के
द्वारा तो जो कुछ होता है सो सव हमारे हित के लिये ही होता
है। शास्त्र भी इसमें प्रमाण हैं। शास्त्रों में जगह-जगह भगवान्को
परमदयालु और सर्वशक्तिमान् बतलाया है। (गीता ५।२९)
युक्तिसे भी यही सिद्ध होता है।
१४-'परमोच्चशिपर' मनगढन्त यान नही है। सर्वोच्च
स्थिति और सर्वोत्तम परमधामका नाम ही 'परमोच्चशियर' है।
जिसको मनुप्य
सबसे उच्च ध्येय समझते हैं, जिसको मोक्ष या
कल्याण कहते है, वही परमोच्चशियर है। गीतामें भगवान्ने
.
अध्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहु परमा गतिम्
य प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परम मम ।।
(८।२१)
'जो अव्यक्त अक्षर ऐसे कहा गया है, उसी अक्षर नामक
अव्यक्तभावको परमगति कहते हैं तथा जिस सनातन
[९
.

1
-
परमार्थ-पत्रावली
अव्यक्तभावको प्राप्त होकर मनुष्य वापस नहीं लौटत हैं वह
मेरा परमधाम है।'
साधन करनेपर ही इसका प्रत्यक्ष होता है इसमें कोई
सन्देह नहीं है।
१५-'देव' शब्दसे शास्त्रोक्त ८ वसु, ११ रुद्र: १२ आदित्य,
प्रजापति और इन्द्र ये ३३ देवता प्रधान माने जाते हैं। इनके
अतिरिक्त अन्य भी अनेकों देवता हैं। इनकी पूजा या इनके
निमित्त होम आदि करना चाहिये । भगवानने यज्ञ करनेकी
आज्ञा देते हुए कहा है-
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
परस्परं भावयन्तः
श्रेयः
परमवाप्स्यथ ॥
(गीता ३ । ११)
तुमलोग इस यज्ञद्वारा देवताओंकी उन्नति करो और वे
देवतालोग तुमलोगोंकी उन्नति करें। इस प्रकार आपसमें उन्नति
करते हुए परमकल्याणको प्राप्त होओगे।
१६-'पित' शब्दसे जीवित या परलोकगत पिता, पितामह,
प्रपितामह, माता, पितामही, प्रपितामही आदि हैं । इसलिये
जीवित पितरोंकी सेवा-शुश्रूषा करनी चाहिये और परलोकगत
पितरोंके हितार्थ उनकी आत्माको शान्तिके लिये ब्राह्मण -भोजन,
श्राद्ध, तर्पण, व्रत, जप, दान, होम, ईश्वरप्रार्थना आदि करने
चाहिये।
१७-परमेश्वरके सर्वव्यापी, निराकार, विज्ञानानन्दघन
१०]

द्वितीय भाग
म्वरूपको ही आदि बतलाया गया है। इसका विस्तारसे वर्णन
देगना हो तो गीताप्रेससे प्रकाशित 'भगवान् क्या है " नामक
पुस्तिकामे देग सकते है । श्रद्धा और प्रेमसे होनेवाले मनोमाञ्चित
शास्त्रानुकूल साफारदर्शन भी अवास्तविक नहीं है।
आपने लिया कि मेरे लिखनेने पुरा नहीं मानना चाहिये।
सो इसमें घुरामाननेकी कोई भी यात नहीं है। जचे जेमी यात
अवश्य ही पूछनी चाहिये । आपके प्रश्नोंके उत्तर अपनी
साधारण घुद्धिके अनुसार मक्षेपमें दिये गये है।
अन्धमाके सम्बन्ध मेग यह निवेदन है कि यद्यपि
विरुयुक्त श्रजा ही उत्तम है, परन्तु फिनना हो कि क्यों न
हो मागिर विश्वास करना ही पड़ता दे। विशाल किये गिना
न तो संसारमें आजनक फाम चला और न आगे चल दी
सपना ।
यापने लिगा कि 'जो प्रत्यय प्रमाणद्वारा-दिनानद्वारा
सिद्ध नहीं घट समय ई-ऐसा हमारा सिद्धान्त दे।' मेरी
साधारण समनके अनुमार प्रेमा मानना युक्तियुक्त नहीं है।
प्रत्यारे अतिरित युक्ति और शारनप्रमाण मी बरले पुत्पाद्वारा
माने गये और उन मानना ही नाहिये। पूर्वमें होनेवाले
माय ममी महामामाने प्रत्यमा अनुमान और गागमादि
নাই না।
प्रक्षालन प्रगति (योग)

[२] आप सरकारी नौकरी छोड़कर व्यापार-क्षेत्रमें आ गये हैं सो वहुत उत्तम है । आपने स्वामीजी श्रीयोगानन्दजीसे शिव- मन्त्रकी दीक्षा ली तो वहुत अच्छा किया। उनकी यङ्गभाषा होनेके कारण उनके उपदेशोसे आप विशेष लाभ नहीं उठा सके एवं उनकी आज्ञाका समीचीनरूपसे पालन नहीं कर सके, इसमें प्रधानतया श्रद्धा और प्रेमकी कमी ही कारण है। इसलिये उनको असन्तुष्ट रहना उचित ही है। अव उनका शरीर शान्त हो गया यह शोककी बात है, किन्तु कोई उपाय नहीं। उनके बताये हुए उपदेशको काममें लानेकी कोशिश करनी चाहिये । आपने लिखा कि गुरु-मन्त्र, इष्ट-मन्त्र तथा गायत्री मन्त्र- का जप करता रहता हूँ किन्तु श्रद्धा-भक्ति एवं प्रेमकी कमी होने के कारण काम-क्रोधादि पड्पुि चित्तको चञ्चल करते रहते हैं । इनकी निवृत्ति और श्रद्धा, भक्ति एवं प्रेमकी उत्पत्तिके लिये उपाय पूछा सो ठीक है । वास्तवमें तो भगवान्का सञ्चा भक्त ही इनका उपाय बतला सकता है। मैं तो एक साधारण मनुष्य हूँ तथापि आपके प्रेमके कारण अपनी साधारण बुद्धिके अनुसार कुछ लिखता हूँ, त्रुटियोंके लिये क्षमा करेंगे। भगवान्के गुण, प्रेम, रहस्य और प्रभावकी वातें भगवान्के प्रेमी भक्तोंसे सुनकर मनन करनेसे, भगवान्का प्रभाव जाननेसे १२] द्वितीय माग भगवान्में श्रद्धा उत्पन्न होती है और उस श्रद्धासे प्रेम नथा भक्तिकी वृद्धि होती है। भगवान्के नामफा जप और स्वरूपका ध्यान एवं स्वार्थको त्यागकर दुखी जीवोंकी सेवा करनेसे एवं न्यायोपार्जित व्यसे सगृहीत आहार करनेसे अन्त करण पवित्र होता है, तब श्रद्धा, भक्ति एव प्रेमकी वृद्धि होती है। इनकी वृद्धि होनेसे निपया. सक्तिका नाश हो जाता हे और विषयासक्तिके नाश हो जानेपर काम-क्रोधादि पड्पुि कभी उत्पन्न नहीं होते । गोस्वामी तुलसीदासजीने उत्तरकाण्टमें कहा है- खल कामादि निकट नहिं जाहीं । बसह भगति जाके उर माहीं ।। रामभगति मनि उर बस जार्के । दुख लालेम न मपर्नेहुँ ताकें । गरल सुधासम अरि हित होई । तेहि मनि बिनु सुख पाव न कोई ।। नवद्वीप जाकर श्रीगौराङ्ग महाप्रभुके मन्दिरमें भजन- कीनन करनेकी इच्छा प्रकट की सो उत्तम वात है। भगवान के प्रेमी भक्त जहाँ हों, वहीं सब तीर्थ वास करते है और जहाँ उनके प्रेमी भक्त भगवान्के गुणोंका कीर्तन करते है वहाँ तो भगवान् स्वय विराजमान रहते हैं। भगवान्ने कहा है- नाह बमामि वैकुण्ठे योगिना हृदये न च । मद्भता यत्र गायन्ति तन तिष्ठामि नारद ।। इसलिये सत्पुरुषोंका सग अवश्यमेव करने की चेष्टा करनी चाहिये। सत्पुरुपोंकी महिमा श्रीमद्भागवत, रामायणादि ग्रन्थों में जगह-जगह गायी है। [

परमार्थ-पत्रावली
भवद्विधा भागवतास्तीर्थीभूताः स्वयं विभो ।
तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तःस्थेन गदाभृता ।।
(श्रीमद्भा० १ । १३ । १०)
'हे स्वामिन् ! आप-सरीखे भगवद्भक्त स्वयं तीर्थरूप हैं ।
(पापियोंके द्वारा कलुपित हुए) तीर्थोको आपलोग अपने
हृदयमें स्थित भगवान् श्रीगदाधरके प्रभावसे पुनः तीर्थत्व प्राप्त
करा देते हैं। तुलसीदासजीने कहा है--
बिनु सतसंग न हरिकथा तेहि विनु मोह न भाग।
मोह गएँ विनु रामपद होइ न दृढ़ अनुराग ॥
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग ।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग ॥
आपने लिखा कि प्रेममें मग्न होकर अश्रुपात करते हुए
भक्तोंको देखकर भी प्रेम एवं अश्रुपात नहीं होते इसके लिये
भगवान्से प्रार्थना भी की गयी परन्तु कुछ नहीं हुआ सो ठीक
है। आपको अपने दोष और अपराधोंका खयाल करके भगवान्के
शरण होकर करुणाभावयुक्त गद्गद वाणीसे पुनः पुनः भगवान्-
की स्तुति और प्रार्थना वैसे ही करनी चाहिये जैसे उत्तरकाण्डमें
विरहके समय भरतजीने की है-
जौ करनी समुझै प्रभु मोरी । नहिं निस्तार कलप सत कोरी ।।
जन अवगुन प्रभु मान न काऊ । दीनबंधु अति मृदुल सुभाऊ ।।
मोरे जियँ भरोस दृढ़ सोई । मिलिहहिं राम सगुन सुभ होई ।।
बीतें अवधि रहहिं जौ प्राना । अधम कवन जग मोहि समाना॥
१४]

द्वितीय भाग
इस घोर कलिकालमें सबसे उत्तम भगवान्के भजनकी
महिमा शाखोंमें गायी गयी है इसलिये ध्यानसहित भगवान्के
नाममा श्रद्धा और प्रेमपूर्वक निष्कामभावसे नित्य-निरन्तर जप
करनेकी कटिबद्ध होकर प्राणपर्यन्त चेष्टा करनी चाहिये ।
कलिजुग केवल नाम अधारा । सुमिरि सुमिरि भव उतरहु पारा ।।
कलिजुग सम जुग आन नहिं जो नर कर बिस्वास ।
गाइ राम गुन गन विमल भर तर बिनहिं प्रयास ।।
हरेनाम हरेर्नाम हरेर्नामव
केवलम् ।
कलो नास्त्येर नास्त्येव नास्त्येन
नास्त्येन नास्त्येन गतिरन्यथा ।।
ढो वातनको भूल मत, जो चाहत कन्यान ।
'नारायन' एक
मोतको, दूजे श्रीभगवान॥
'कविरा' सूता क्या करे, जागो जपो मुरारि ।
एक दिना है सोना, लम्बे पोर पसारि ॥
'कबीर' नौवत आपनी, दिन दस लेटु बजाय ।
यह पुरपट्टन यह गली, वहुरि न देखो आय ।।
जब ही नाम हृदय चो, भयो पापको नास ।
मानो चिनगी अग्निकी, परी पुराने घास ॥
रामनाम मनिदीप बरु, जीह देहरी द्वार।
'तुलसी' भीतर बाहेरहुँ, जी चाहसि उजिआर॥
भगवान्ने गीतामें कहा है-
अनन्यचेता सतत यो मा स्मरति नित्यश ।
तस्याह सुलभ पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिन ।।
(८।१४)

परमार्थ-पत्रावली
'हे अर्जुन ! जो पुरुष मुझमें अनन्यचित्तसे स्थित हुआ
सदा ही निरन्तर मुझको स्मरण करता है, उस निरन्तर मुझमें
युक्त हुए योगीके लिये मैं सुलभ हूँ अर्थात् सहज ही प्राप्त हो
जाता हूँ।'
मय्यावश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे ‘युक्ततमा मताः ।।
(१२ । २)
'सुझमें मनको एकाग्र करके निरन्तर मेरे भजन-ध्यानमें
लगे हुए जो भक्तजन अतिशय श्रेष्ठ श्रद्धासे युक्त हुए मुझ
सगुणरूप परमेश्वरको भजते हैं, वे मुझको योगियों में भी अति
उत्तम योगी मान्य हैं । अर्थात् उनको मैं अति श्रेष्ठ मानता हूँ।'
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ।।
(९।३०)
'यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भक्त
हुआ मुझको निरन्तर भजता है वह साधु ही मानने योग्य है
क्योंकि वह यथार्थ निश्चयवाला है।'
सुन्दरदासजी कहते हैं-
सन्त सदा उपदेस वतावत, केस सबै सिर सेत भये हैं।
तू ममता अजहूँ नहिं छाँड़त, मौतहु आय संदेश दये है
आज कि काल चलै उठि मूरख, तेरे ही देखत केते गये है।
'सुन्दर' क्यो नहिं राम सम्हारत, या जगमें कहु कौन रये हैं।
।
१६]

[३]
१-'कल्याण' देखकर आपने 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय'
मन्त्रका जप आरम्भ किया, दैनिक चार-पाँच हजारतक करने
लग गये थे और अव दस हजार करते हैं सो अच्छी बात है।
जहॉतक हो सके संख्या बढ़ानेकी कोशिश करनी चाहिये।
याजतक पचीस लाख मन्न-जप आप कर चुके सो बहुत
आनन्दको वात है।
जप करते समय साथमें श्रीविष्णुभगवान्का ध्यान
फरनेकी कोशिश आप करते है, किन्तु ध्यान न लगकर विषयोंका
प०भा०२-२-
[१७

परमार्थ-पत्रावली ही चिन्तन होता है। विषयोंका चिन्तन न होकर भगवान्का ध्यान होनेका उपाय पूछा सो ठीक है। भगवानके ध्यानको सर्वोत्तम समझकर निष्काम-भावसे विशेष तत्पर होकर करनेसे विपयोंका चिन्तन छूट सकता है। विपयोंमें दोप, दुःख एवं घृणा-दृष्टि करनेसे और वैराग्यवान् पुरुषोंका सग करनेसे भी विषयोंका चिन्तन छूट सकता है। उपर्युक्त अभ्यास करनेसे हो सब पापोंका एवं क्लेशोंका नाश होकर परमानन्द और परमशान्तिको प्राप्ति हो सकती है । मुझे श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरु न समझकर अपना एक साधारण मित्र समझना चाहिये । २-भगवान्की प्राप्तिके लिये. भजनका ठेका करनेवाला सच्चा भक्त इसलिये नहीं है कि वह भगवत्-प्रेम और भजनके रहस्यको नहीं समझता । जो समझता है उसे टेका करनेकी क्या आवश्यकता है ? भजन तो केवल भगवान्में अनन्यप्रेम होनेके लिये ही करना चाहिये । अनन्य-प्रेम हो जानेपर भगवान् स्वयं ही मिले विना नहीं रह सकते । इसीसे अनन्यप्रेम भगवान्के मिलापसे भी बढ़कर है । इस रहस्यको समझनेवालेका भजन, साधन, श्रद्धा, प्रेम उत्तरोत्तर बढ़ता रहता है । ३-विषयोंकी अभिलाषा एवं मोह और अन्तःकरणकी अशुद्धि आदि दोषोंकी वृद्धि मन्त्र जपका परिणाम समझना बहुत ही अनुचित एवं भूल है। उपर्युक्त दोप तो मनमें सदा ही रहते हैं । कभी छिपे हुए रहते हैं और कभी प्रकट होकर उन रूप धारण कर लेते हैं। यदि उस समय आप भजन न करते तो सम्भव है उनका प्रकोप और भी अधिक होता। १८]

द्वितीय भाग
४-ईश्वरके भजन विना जो समय गया उसके लिये
पश्चात्ताप करना और व्यर्थ गया समझना तो उचित ही है।
किन्तु उसके लिये प्राणत्याग करना उचित नहीं, प्राण त्यागकी
तो कभी इच्छा ही नहीं करनी चाहिये भविष्यमें व्यर्थ समय न
चिताना ही सच्चा पश्चात्ताप है । समयको अमूल्य समझकर
कटिबद्ध होकर भजन-ध्यान करनेसे मूलसहित विषयासक्तिका
नाश हो जाता है।
५-भगवान्के भक्तोंमें प्रेम होनेका और सासारिक लोगोंसे
प्रेम हटने का उपाय पूछा सो इसके लिये भगवान्से प्रार्थना
करनी चाहिये।
६-पुस्तक पढते समय मन दूसरी तरफ जाता हो तो
पुस्तकम लिखी हुई बातको समझनेमें मन लगाना चाहिये ।
जिस विषयको पुस्तक हो यदि उसको समझनेकी लगन हो तो
मन उसमें जरूर लग जाना चाहिये । काम, क्रोध, लोभ, मोह
आदि अवगुण, अन्त करण जैसे जैसे शुद्ध होगा, वैसे-वैसे
हटते जायेंगे, इसके लिये भी भगवान्से प्रार्थना करते रहना
चाहिये।
७-जपका महत्त्व नहीं समझनेके कारण और साधनमें
शान्ति और आनन्दका अनुभव नहीं होनेके कारण एवं पापोंकी
अधिकताके कारण भजन करनेमें आलस्य और भजनमें अरुचि
उत्पन्न होती है, अत अच्छे पुरुपोंझा सङ्ग करके जपका महत्त्व
समझना चाहिये । श्वासके साथ जप करनेका अभ्यास करनेसे
चित्तको शान्ति मिल सकती है। जपका अभ्यास करते करते
[१९

परमार्थ-पत्रावली
अन्तःकरण शुद्ध होनेसे जपमें रुचि बढ़ सकती है । जवनक
रुचि न हो तबतक विश्वास करके ही जप करते जाना चाहिये।
८-आसन लगाकर ईश्वरका ध्यान करनेकी चेष्टा करें,
उस समय जप नहीं छोड़ना चाहिये । जप करते-करते ही
ध्यान करनेकी चेष्टा करनी चाहिये । जप होता रहनेसे मनमें
दूसरी फुरना कम होगी। फिर भी अगर मन दूसरी जगह जाय
तो बार-बार वहींसे हटाकर भगवान्में लगानेका अभ्यास
करना चाहिये।
९-भगवान् के भजन-ध्यानके रहस्यको समझनेका उपाय
पूछा सो रहस्य जाननेवाले सजन पुरुषोंका सङ्ग करना चाहिये
और इस विपयकी पुस्तकोंको पढ़नेका अभ्यास करना चाहिये,
फिर अभ्यास करते-करते अन्तःकरण शुद्ध होनेसे रहस्य
समझमें आ सकता है।
१०-ौका अनुष्ठान करते समय भगवान्को याद
रखनेका उपाय पूछा सो हरेक कार्य करते समय भगवान्को
अपने साथ समझकर उनकी आज्ञाका पालन करनेके लिये कर्म
करनेका अभ्यास करनेलेही ऐसा हो सकता है। ऐसा अभ्यास
करना बहुत ही अच्छा है । अभ्यास करते-करते ही भगवान्की
कृपासे ऐसा स्वभाव बन सकता है कि फिर अनायास भगवान्-
का स्मरण रह सके ।
११-मान, बड़ाई, प्रतिष्ठाको कलङ्कके समान समझनेका
उपाय पूछा सो इनसे होनेवाली हानिका विचार करनेसे,
२०]

द्वितीय भाग भगवान्के भजन साधनमें इनको वाधक समझनेसे और चार- वार इस तरहका विचार रसनेसे ऐसा हो सकता है।. १२-जो वात प्रकाशित की जाती है, उसका क्षय हो जाता है। इस तत्त्वको समझ लेनेसे अच्छे कामोंको प्रकाशित करनेकी प्रवृत्ति हट सकती है और घुरे कामोंको प्रकट करनेकी इच्छा हो सकती है। १३-संसारी नाच-गानमें प्रेम होनेके कारण उनमें नींद नहीं आती परन्तु उससे स्वास्थ्यमें बहुत हानि होती है और भजन-सत्सङ्गमें प्रेम होनेपर उनमें भी नींद नहीं सताती और स्वास्थ्यमें हानि भी नहीं होती। भगवान्के प्रेमी पुरुपोंका सग करनेमे, अन्त करण शुद्ध होनेसे और भगवान्की शरण लेकर भजनका अभ्यास करनेसे भगवान्में प्रेम हो सकता है। १४-अपना विगाड़ करनेवालेपर भी क्रोध नहीं करना चाहिये । मनको समझाना चाहिये कि चुरा या बिगाड़ दूसरेके फरनेसे नहीं होता। यह तो प्रारन्धसे होता है, फिर किसीका क्या दोप है ? सय भगवान्के स्वरूप है, फिर में क्रोध किसपर करूँ ? अपना अहित करनेवालेसे बदला लेनेकी इच्छासे उसका बुरा करनेकी चेष्टामें अपना ही नुकसान होता है। मनमें पुरी भारना करनेसे अन्तःकरण मैला होता है, इसलिये ऐसा नहीं करना चाहिये। १५-जुया सेलना बहुत बुरा है। इससे भजनमें बाधा [२१ परमार्थ-पत्रावली पड़ती है, पाप बढ़ता है, इजत चली जाती है, कोई विश्वास नहीं करता, भगवान् भी नाराज होते हैं। जुथा खेलकर नल और युधिष्ठिर-जैसे बड़े-बड़े राजालोगोंको भी पश्चात्ताप करना पड़ा है। अतः अपने मनमें दृढ़ नियम करना चाहिये कि जुआ कभी भूलकर भी नहीं खेलूंगा। १६-सत्य बोलनेका नियम एक दफे दूट गया तो फिर वैसा ही नियम लेना चाहिये और भगवानले उसको सुरक्षित रखनेके लिये प्रार्थना करनी चाहिये । मनमें ऐसा दृढ़ विश्वास करना चाहिये कि भगवान्की कृपासे अब मैं इस नियमका ठीक- ठीक पालन कर सकूँगा। १७-जुपमें जीतकर उस धनको धर्मके काममै लगानेकी इच्छा करना वैसा ही है जैसे पहले शरीरमें कीचड़ लगाना और फिर उसको धो डालनेकी इच्छा करना । ऐसे घनसे कभी धर्म नहीं बढ़ता, वह तो पापको ही बढ़ानेवाला होता है। १८-समयका विभाग पूछा सो दिन-रात चौबीस घण्टेमें रात्रिमें छः घण्टे सोना चाहिये । सवेरे और सन्ध्या शौच, स्नान, भोजनादि शरीर-निर्वाहकी क्रियामें छः घण्टे लगाने चाहिये। जीविका चलानेके लिये न्यायसे द्रव्योपार्जनमें छः घण्टे लगाने चाहिये और एकान्त भजन-ध्यानमें छः घण्टे-ऐसा करना ठीक है । दूसरे काम करते समय भी भजन-ध्यान करनेकी कोशिश रहनी चाहिये। सात्विक पदार्थ खानेका अभ्यास करना चाहिये और २२] द्वितीय भाग राजस, तामस पदार्थोंका त्याग करना चाहिये। इसका विस्तार शास्त्रोंमें लिया हे। १९-ईश्वरमे प्रार्थना करनेसे भगवान् स्वयं ही सद्गुरुकी प्राप्ति करा सकते है । यही विश्वास करके प्रार्थना करते रहना चाहिये। २०-सोलह नामवाले मन्त्रके साढ़े तीन करोड़ मन्त्रका जप करनेसे भगवान् नि सन्देह मिल जाते हैं-ऐसा शास्त्रों में लिखा हे और विश्वासपूर्वक निष्कामभावसे करनेसे ऐसा होना सम्भव भी है, पर मैने करके नहीं देखा है। २१-माता-पिताकी आज्ञाकी पावत पूछा सो और सव कामों में तो माता पिताका हुक्म पूरा-पूरा मानना चाहिये, परन्तु वे यदि भजन-ध्यानके लिये मना करते हो तो यह बात नहीं माननी चाहिये । क्योंकि यह माननेमें उनका भी नुकसान है । उनको शान्तिपूर्वक समझाना चाहिये, सेवा करके प्रसन्न करना चाहिये । उनका सामना नहीं करना चाहिये ओर कड़ा जवाब भी नहीं देना चाहिये । उनका भी भजन-ध्यानमें प्रेम हो, ऐसी कोशिश करनी चाहिये । स्वयं जो भजन-ध्यान करे वह उनसे छिपाकर गुप्तभावसे करनेका अभ्यास डालना चाहिये, परन्तु भजन-ध्यान नहीं छोड़ना चाहिये । यदि वे इसके लिये गाली दे या शाप दे तो उसे शान्तिसे सुन लेना चाहिये। उससे कुछ भी हानि नहीं होसकती। इसमें प्रद्वादका उदाहरण याद कर लेना चाहिये । परन्तु खयाल रहे कहीं अभिमानमें [२३

।
परमार्थ-पत्रावली
आकर या अठा प्रहाद बनकर उनका अपमान न कर बैट।
माता-पिताका अपमान करना और उनको कदी जचान करना
बहुत बुरा है। बहुत सट पढ़नेपर भी भजन-ध्यान नहीं
छोड़ना चाहिये । यही तो परीक्षाका मौका है। अगर इसमें फेल
हो गये तो फिर क्या है?
२२-शास्त्र-ग्रन्य देखते समय मानाके पूछने पर अट नहीं
बोलना चाहिये. बल्कि चुप रह सकते हैं या किसी दुसरे समय
पुलक देख सकते हैं । इठ बोलनेकी कोई जरूरत नहीं। बुट
बोलनेस पाप जरूर होता है और कोई फायदा भी नहीं होना।
बात तो सच्ची ही कहनी चाहिये । उसके लिये गाली सुननी पढ़े
या नुकसान सहना पड़े तो कुछ दर्ज नहीं। आपने मांस-भक्षण
छोड़ दिया, यह बहुत ही अच्छा काम किया। इस नियमका
दृढ़तापूर्वक पालन करना चाहिये।
२३-कभी भूलकर या दृमरेकी आमासे भी मांस भक्षणके
कार्यमें किसी प्रकारसे भी सहायता नहीं देनेका ही खयाल
रखना चाहिये।
है,
२४-आपके मनमें जो शद्धा उठे माप खुशीसे पूछ सकते
। परन्तु अधिक विस्तार नहीं करना चाहिये क्योंकि मुझे
समय बहुत कम मिलता है । इसलिये, उत्तर देनेमें विलम्ब हो
सकता है । जवाब बहुत जल्दीमें लिखा गया है।
२४]

. [४] गीता-शास्त्र बड़ा ही गहन है, बड़े रहस्यका विषय है । इसका अभ्यास करते-करते नये-नये भाव पैदा होते रहते है, इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं । ऐसा होना इस ग्रन्थके अनुरूप ही है । आपके प्रश्नोंका उत्तर क्रमसे लिखा जाता है। १-भगवदर्पण-चुद्धिमें मोयुक्त कर्तापनका अभिमान नहीं रहता, अभिमानशून्य निर्दोष क पनमात्र रहता है, वह भी साधन करते-करते अन्तमें समाप्त हो जाता है। 'अहङ्कार- विमूढात्मा' में जो कर्तापनका अभिमान बताया गया है यह मोहपूर्ण है और यहाँ विषय भी अज्ञानका ही है । अर्पण अपनी वस्तु की जाती है। यही क्यों, भूलसे अपनी मानी हुई दूसरेकी वस्तुको, जिसकी है उसे दे देना क्या अर्पण नहीं है ? क्या [२५ परमार्थ-पत्रावली न मिटनेवाले कर्मजन्य बीमारियोंका भोग करते दिखलायी पड़ रहे हैं । कर्मजन्य रोग पूर्वकौंके ही फल हैं और वे सभी अवस्थामें हो सकते हैं। अतः सेवा या ओषधि उपचारकी कमी मृत्युका कारण नहीं हो सकती । सेवा और ओपधिका पूर्ण प्रवन्ध रहते हुए भी मनुष्योंकी मृत्यु होती है । वास्तवमें तो मृत्यु किसी रोगके वहानेसे ही आती है यह ठीक नहीं है क्योंकि विना वीमारीके भी वहुत-से मनुष्योंकी मृत्यु होती देखी जाती है । मृत्युका कारण तो पूर्वके भारी पाप ही हैं । अज्ञानीजन बाहरी कारणोंको ही अपनी मृत्युके निमित्त मान लेते हैं। प्र०-ईश्वरने अन्य शारीरिक अवयवोंके अनुसार आत्माको भी दृश्य वस्तु क्यों नहीं बनाया ? इससे जिनको आत्माके अस्तित्वमें प्रमाणकी आवश्यकता थी, उन्हें प्रत्यक्ष प्रमाण मिल जाता? उ०-आत्मा अनादि, चेतन, नित्य, सनातन और ईश्वरका अंश है। इसको किसीने बनाया नहीं है। यह स्वतःसिद्ध सदासे बना हुआ ही है। यदि ईश्वरके द्वारा आत्मा बनाया जाता तो यह प्रश्न हो सकता था, अमूर्त आत्माके लिये यह प्रश्न ही युक्तियुक्त नहीं है। आत्माके अस्तित्वमें तो प्रत्यक्ष ही प्रमाण है। जीवित और मृत मनुष्यका अन्तर ही आत्माका स्पष्ट द्योतक है । दूसरे शारीरिक अवयवोंकी तरह आत्मा दृश्य वस्तु नहीं हो सकती। क्योंकि शारीरिक अवयव अनित्य, नाशवान्, जड एवं विकारी हैं, पर अन्यक्त आत्मा इनसे अत्यन्त विलक्षण, नित्य, चेतन ३४] द्वितीय भाग ओर निर्विकार है। इसलिये वह इस अनित्य चर्म-चलुओंसे दिसलायी पडनेयोग्य नहीं हो सकती। प्र-बिल्ली, चूहे, कौवे और कुत्ताको क्या अधिकार है कि वे आकर चुपचाप हमारे दूध, घी और अन्य साद्य-पदार्थीको सा या पी जायें ? क्या यह चोरी नहीं है ? वे इन चीजोंको अलमारी आदिमें रखनेका व्यर्थ परिश्रम मनुष्योंसे करवाते हैं। मच्छर ओर सॉप जिनको हम कोई नुकसान नहीं पहुँचाते, हमें क्यों उँसते है ? और हमारी बीमारी और मृत्युके कारण क्यों वनते है ? प्राय देखा जाता है कि सॉप चारपाई पर चढ जाते है और वेचारे निर्दोष मनुष्यको काट खाते हैं । यदि सॉपोंको भगवान् भेजते हैं, तो क्या यह भगवान्के हाथी अचानक घात नहीं है ? और क्या भगवान्के लिये यह लज्जाका कारण नहीं है? यह तो सभी जानते हैं कि मक्खियाँ बहुत-से संक्रामक रोगोंकी कारण है, उन्हें हमारी सुन्दर कटोरियों और आरामकी वस्तुओंपर बेठने एवं उन्हें संक्रमण करनेका क्या अधिकार है ? यदि भगवान्ने उनको रचा हे तो उन्हें इनके भोजनका प्रवन्ध भी करना चाहिये, यह तो दिन-दहाड़े डकैती हे कि वे मनुष्योंका भोजन सा जाये? उ०-चिल्ली, चूहे कोरे कुत्ते आदि जीवोंको भी दूध, घी, अन्न आदिके खाने-पीनेका अधिकार है। इनके लिये व्यवस्था करना मनुष्यका ही कर्तव्य है, पर मनुप्योंने अपने कर्तव्यका त्याग कर दिया है । इसीलिये वेचारे इन जीवोंको इस प्रकारको क्रिया करनी पड़ती है । मनुप्यकी भॉति ये जीव स्वयं खाय- पदार्थों का उपार्जन नहीं कर सकते, न इनके पास वैसे साधन [३५ परमार्थ-पत्रावली ही हैं, ये धर्मज्ञानहीन हैं, इसीलिये इनके यह कर्म चोरीमें शामिल नहीं किये जा सकते । इनके पालनरूप अपने इस कर्तव्य- च्युत होनेके कारण ही मनुष्योंको अलमारी आदिमें वस्तुओंकी रक्षा करनेके लिये परिश्रम उठानेकी आवश्यकता पड़ती है। परम दयालु, न्यायकारी ईश्वरकी प्रेरणासे ही प्रायः मच्छर और साँप हमारे पूर्व-पापोंके कारण हसलोगोंको डॅसते हैं तथा बीमारियोंकी उत्पत्ति और मौत आदिके हेतु भी हमारे पूर्वके पाप ही हैं । इसमें किसीका दोष नहीं है। जैसे न्यायकारी राजा अपराधीको उसके हितके लिये दोषानुसार ही अपने कर्म- चारियोद्वारा जेल या फाँसी देता है। किन्तु राग-द्वेषसे रहित होनेके कारण राजा दोषी नहीं है। वैसे ही ईश्वर मनुप्योंको उनके हितके लिये अर्थात् उन्हें पापमुक्त करनेके लिये पूर्वकृत पापोंके अनुसार साँपादिके द्वारा दण्ड भुगताते हैं, परन्तु दोषी नहीं हैं। चोरी, डकैती, खून आदि करनेवाले अपराधीके किये हुए अपराधोंको तो हमलोग प्रत्यक्ष देखते हैं, इसलिये न्यायकारी राजा एवं राजकर्मचारियोंपर हमारे मनमें दोषकी आशङ्का नहीं होती । किन्तु साँप आदिसे से जानेवाले मनुष्यको निर्दोषी समझकर साँप आदि एवं ईश्वरपर जो दोष लगाया जाता है यह हमारा भ्रम है । क्योंकि हम उसके पूर्वकृत पाप-कर्मोंसे अनभिज्ञ हैं । अतएव निश्चय समझना चाहिये कि ईश्वरके द्वारा निर्दोषीको कभी दण्ड नहीं दिया जा सकता। पर यहाँके न्यायालयोंकी भाँति, ईश्वरके न्यायालयसे दण्डकी सूचना पहले नहीं दी जाती और ईश्वर अन्तर्यामी हैं , द्वितीय भाग इसलिये यहॉका न्याय निर्धान्त होता हे | राग द्वेपरहित नि स्वार्थ ईश्वरके किये हुए प्रत्येक विधान पद पदपर परम दया भरी हुई है। इसलिये उसके कृत्यमें अचानक घात या लजाकी कोई आशङ्का ही नहीं हो सकती । मक्खियोके प्रश्नका ना इसी उपर्युक्त उत्तरसे अपने आप ही समाधान हो जाता है तथा कुत्ता, दिल्ली और मन्गदि जीवोंके दृशान्तसे भी समझ लेना चाहिये। प्र०-क्या भगवान् हमें अहिसा सिसलाते है ? यदि हाँ, तो उन्होंने सिंह, चीता, वाघ, मगरमच्छ आदि हिंसक जीवोंको क्या बनाया और अब तो यह सभी जानते है कि प्रत्येक वनस्पतिम प्राण हे । अतएव यदि हम गेहूँ, जौ और चावल इत्यादि खाते हैं तो हम भी उसी प्रकार हत्या करते है जिस प्रकार वे मांसाहारी जीव करते है। क्या आप मुझसे सहमत है? उ०-ईश्वर सर्वदा अहिंसाका ही उपदेश देते है । जीयाँके पापोंका दण्ड देनेके लिये ईश्वरने हिंसक जीवोंकी रचना की है। यत ये जीव टोपी नहीं होते । पशु होनेके कारण इन्हें शान भी नहीं है इसलिये भी इनको पाप नहीं लगता । परन्तु मनुष्योंके लिये यह नियम लागू नहीं हो सकता, उन्हें मासाहार करनेसे पाप लगता है । क्योंकि मनुप्यको अपने कर्तव्यका ज्ञान हे और मनुष्य जाति मासाहारके लिये नहीं बनायी गयी । यद्यपि गेहूँ, चावल आदि खाद्य पदार्थो में भी हिसा हे पर मासाहारीकी अपेक्षा बहुत ही कम है । क्योंकि पशु आदि जीवों की हत्याम गेहूँ, चावल आदि पौधोके नाशकी अपेक्षा वटुत ही ज्यादा तकलीफ होती है। इसीलिये हमारे शास्त्रकाराने इस हिसायी [३७ परमार्थ-पत्रावली निवृत्ति के लिये पञ्चमहायज्ञादि प्रायश्चित्त बतलाये है (गीता ३।१३ ) । इन प्रायश्चित्तोको न करनेवालाक लिये ही यह हिंसा लागू पड़ती है। प्र०-क्या मनुप्यकी आयु एक निश्चित वस्तु है या यह स्वास्थ्य-सम्बन्धी नियमोपर चलनेसे बढ़ायी जा सकती है ? उ०-पूर्वकृत काँस बने हुए प्रारब्धके अनुसार मनुष्यको आयु निश्चित की हुई ही होती है। परन्तु नये बलवान कर्मोसे आयु घट-बढ़ भी सकती है। योगी योगके साधनाद्वारा इच्छा- मृत्युतककी सामर्थ्य प्राप्त कर सकते है और अज्ञानीजन क्रोधके वश होकर अकालमें भी मृत्युको प्राप्त हो जाते हैं । किन्तु ब्रह्मचर्यादि नियमांका पालन करनेवाला अकालमृत्युको नहीं प्राप्त होता। प्र०-क्या कोई ऐसा (अनुभवपूर्ण) प्रमाण है जिससे यह सिद्ध हो सके कि स्वर्ग और नरक भी हमारी पृथिवी या अन्य किसी ग्रहके अनुसार ही भौतिक लोक हैं ? उ०-स्वर्ग और नरक इस पृथिवीकी भाँति ही भौतिक लोक है । इसके लिये शास्त्र प्रमाण हैं और वह श्रद्धापर हो निर्भर है । प्रत्यक्ष एवं अनुभवपूर्ण बलवान युक्ति नहीं है जिसके द्वारा यह सब प्रत्यक्षकी भाँति दिखलाये जायँ । अतएव शास्त्र-प्रमाणको ही प्रमाण मानना चाहिये क्योंकि शास्त्रके रचयिता ऋषि-मुनि प्रायः सभी त्रिकालज्ञ अनुभवी थे। Karan ३८] [६] पत्र मिला, आप क्षयप्रधान रोगांसे ग्रसित है, इसके लिये पथ्य और ओपधिकी ओर विशेष ध्यान देना चाहिये । शरीरके असमर्थ होनेके कारण आपको दूसरोंसे सेवा करवानी पड़ती है, इसके लिये मनमे दु ख एवं ग्लानि नहीं रखनी चाहिये । ऐसी अवस्थामें इसका कोई उपाय न रहनेके कारण मनमें चिन्ता रसनेसे क्या फायदा है ? अब आपको ईश्वर- सरण नहीं भुलाना चाहिये । पूर्वकी ईश्वर-विस्मृतिका पश्चात्ताप न कर अब विशेप चेष्टासे भगवत्-सरणमें रात-दिन लग जाना चाहिये । यही उसका असली पश्चात्ताप है। आपने लिसा, रोगने मेरी ऑखे सोल दी सो अच्छी बात हे पर जवतक साधनमें ढीलापन हे तबतक ऑसें नहीं खुली ही समझनी चाहिये । पर, अब तो जोरसे साधनमें लगना चाहिये। क्योंकि एक तो आप कष्टसाध्य शारीरिक रोग फंसे है और दूसरे मानसिक रोग तो लगे ही हुए है, इस हालतमें शरीरका कोई भरोसा नहीं है । अत जवतक प्राण है, आत्म- हितके लिये कटिबद्ध होकर लग जाना चाहिये । रोगसे ग्रसित होनेकी वजहसे आप दोनों वक्त सन्ध्या नहीं कर सकते, एक वक्त ही करते है, सो भी ठीक है । इस [३९

[७]
पहले आपका दो वर्ष पूर्व एक पत्र आया था, कदाचित्
हमने उसका जवाव भी दिया था। वह आपको मिला या नहीं,
मालूम नहीं। आप प्रसन्न होंगे। आपका साधन कैसे चल रहा
? कल्याण आप वरावर पढ़ते होंगे।
आप श्रीसियारामजीका जप करते होंगे। जपकी विधि
आपके गुरुजीने जो आपको बतलायी है उसीके अनुसार करना
चाहिये। मैं गुरु होनेके योग्य अधिकारी नहीं हूँ। मैं एक
साधारण मनुष्य हूँ। आपके प्रेमके कारण मैं आपको मित्रकी
४२]

द्वितीय भाग
हैसियतसे राय देता हूँ कि सबसे उत्तम विधि 'प्रेम' है।
इसलिये स्वार्थको त्याग कर, श्रद्धापूर्वक, प्रेममें मुग्ध होकर
सियारामका जाप करना चाहिये। यही सबसे उत्तम विधि
है। यदि प्रेम न हो तो प्रेमके लिये निकामभावसे सियारामका
जप नित्य-निरन्तर करनेकी चेष्टा करनी चाहिये । इससे
अन्त करण शुद्ध होकर भगवान्का प्रभाव जाना जा सकता है।
प्रभाव जाननेसे भगवान्में श्रद्धा और श्रद्धासे प्रेम होना
स्वाभाविक ही है।
आपके मिलनेकी इच्छा थी पर मिलना हुआ नहीं, इसमें
प्रारब्ध ही प्रधान हेतु है।
इस कार्य में सद्गुरुको अवश्य ही आवश्यकता है, पर वे
मिलते है भगवान्की दयासे । यो तो भगवान्की दया सवपर
है ही, परन्तु उनको वह दया भगवान्के शरण होनेसे ही
फलती है। अत सद्गुरुकी प्राप्तिके लिये भगवान्से एकान्तम
प्रेमभरी हुई गद्गद वाणोद्वारा सविनय प्रार्थना करनी चाहिये ।
सद्गुरुकी प्राप्तिके अभावमें शास्त्र भी गुरु ही है। अतएव
सत् शास्त्रोंका विचार नित्यप्रति करना चाहिये, क्योंकि इस
समय इसके अभ्यासमें सब प्रकारकी सुगमता है।
आपने जरसे सियारामका जप करना आरम्भ किया
तपने आपका सियाराममें प्रेम बढ़ा होगा, अध्यात्मविषयक
उन्नति हुई होगी।
भगवानके जिस नाम-रूपमें रुचि होती है, उसके लिये
उस समय उसके नामका जप और उसीके स्वरूपका ध्यान
[३

परमार्थ-पत्रावली आपको ज्ञानी मान लेना भी भूल है, क्योंकि मान होनेके बाद उसमें माननेवाला कोई नहीं रहता। मतपत्र आपका जिज्ञासु- भाव ही युक्तियुक्त सिद्ध होता है। प्रश्नोंका उत्तर प्र०-अज्ञानसे उत्पन्न हुई स्वार्थ-धुद्धिका नाश होकर परमा- रमाकी प्राप्ति होनेके लिये क्या उपाय है ? उ०-निष्कामभावसे किये जानेवाले भगवन्नामके जप और भगवत्-स्वरूपके व्यानरूपी उपासनासे मल-विक्षेपका नाश होकर भगवान् एवं भगवान् के भक्तोंकी परम दयासे तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता है और उस तत्त्वज्ञानसे अविद्यासहित राग- द्वेषादि सम्पूर्ण क्लेशोंका एवं सम्पूर्ण कोंमें स्वार्थ-बुद्धिका अत्यन्त अभाव हो जाता है और परमात्माके स्वरूपकी प्राप्ति भी हो जाती है। योगदर्शनके सूत्र है- तस्य वाचकः प्रणवः । तज्जपस्तदर्थभावनम् । प्रत्यक्चेतनाविगमोऽप्यन्तरायाभावश्च । प्र०-क्या जीवात्मा और प्रकृति ये दोनों परमेश्वरके* सकाशसे बने हैं ? उ०-ऐसा कहना उचित नहीं है, क्योंकि जीवात्मा और प्रकृति दोनों अनादि माने गये हैं। * उस परमेश्वरका नाम ओकार है । उस परमेश्वरके नामका जप और उसके स्वरूपका मनन करना चाहिये । उस परमेश्वरके नाम-जप और स्वरूप-मननसे सम्पूर्ण विन्नोंका नाश और परमात्माकी प्राप्ति भी हो जाती है। ४६] - ततः

द्वितीय भाग
प्रकृति पुरुप चैर निधनादी उभावपि ।
(गीता १३ । १९)
अर्थात् प्रकृति और पुरुष दोनोंको ही अनादि जानो
ये ईश्वरके सकाशसे भी बने नहीं, इसीलिये ईश्वर
इनसे बिल्कुल निरपेक्ष है। ईश्वर फल भोगनेके लिये गुण और
कौके
अनुसार अच्छी ओर घुरी योनियों के साथ जीवात्माका
सम्बन्ध जोड देता है। किन्तु निरपेक्ष होने एवं कर्तापनके
दोपसे रहित होनेके कारण ईश्वर करता हुआ भी अकर्ता
समझा गया है।
चातुर्वर्ण्य मया सृष्ट गुणकर्मविभागा ।
तत्य कर्तारमपि मा विद्वयकर्तारमव्ययम् ॥
(४।१३)
जाह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र-इन चार वर्णीका
समूह, गुण और कमकि विभागपूर्वक मेरेद्धारा रचा गया है।
इस प्रकार उस सृष्टि-रचनादि कर्मका कर्ता होनेपर भी मुझ
अविनाशी परमेश्वरको तू वास्तव में अकर्ता ही जान ।
प्र०-जीवात्माके साथ अनादिकालसे अमानका जो यह
सम्बन्ध है इसको विनानानन्दधन परमात्मा जानते हैं, ऐसा
मेरा अनुभव है । अद्वैत-सिद्धान्तसे क्या यह वात टीक है ?
उ०-नहीं। अद्वैत सिद्धान्तसे विमानानन्दधन परमात्मा-
की दृष्टिमें तो अज्ञान है ही नहीं । जिनको अमानका सम्बन्ध
भासता है उन्हींकी दृष्टिमें मान हे और उन्हीं लिये वह
अनादि-सान्त है । अद्वेत-सिद्धान्तसे तो जीवात्माके साथ
[४७

हैं परमार्थ-पत्रावली अज्ञानका सम्वन्ध वास्तवमें है ही नहीं। अध्यारोप माना गया है। प्र०-जीवात्मा और परमात्मा जब विजातीय वस्तु तो फिर एक कैसे हो जाते हैं ? उ०-जीवात्मा, परमात्मा विजातीय नहीं हैं। इसीलिये परमात्माको प्राप्त होनेके बाद यानी परमात्मामें तद्रूप होनेके वाद जीवात्मा पुनः वापस नहीं आता। जीवात्मामें जवतक अज्ञान है तभीतक वह परमात्मामें तद्रूप नहीं हो सकता। किन्तु ईश्वरकी भक्ति करनेसे अन्तःकरण पवित्र होकर ईश्वर- की दयासे जब उसे परमात्मतत्त्वका साक्षात् ज्ञान हो जाता है तब उस ज्ञानके प्रतापसे अज्ञानका नाश होकर परमात्मामें तद्रूपताको प्राप्त हो जाता है यानी परमात्मामें मिल जाता है। फिर इस जीवात्माकी परमात्मासे अलग सत्ता ही नहीं रहती। अज्ञानके कारण अनादिकालसे जीवात्मा उस परमात्मासे पृथक-सा हो रहा है। इसीलिये इसकी जीव संज्ञा है। कारणरूप अविद्याके नाश होनेपर इसकी जीव-संज्ञाका भी नाश हो जाता है इसलिये अविद्या यानी मायाको अनादि-सान्त वतलाया गया है। जैसे सिन्दूरसे निकाला हुआ पारा पारेमें मिलकर तद्रूपताको प्राप्त हो जाता है फिर वह सिन्दूर नहीं बनता, वैसे ही मायासे छूटकर पवित्र हुआ जीव, शुद्धविज्ञानानन्दधन परमात्माको प्राप्त होकर पुनः जीव- भावको नहीं प्राप्त होता। ४८]

4
[९]
पत्र दो आपके मिले, जपाय देनेमें मेरे प्राय ही देरी हो
जाया करती है।
प्रश्नोंका उत्तर
प्र०-काम-क्रोधके कारण साधन प्राय बहुत कम होता
है। इसलिये इनके नाशमा उपाय लिखें।
उ०-विश्वासपूर्वक कटिवद्ध होकर भजन, ध्यानका साधन
करनेकी चेष्टा करनी चाहिये। फिर काम क्रोधका आप ही नाश
हो सकता है।
प्र०-घर मफल्प अधिक बाधक हो रहे है ? क्या
किया जाय?
३०-अभ्यासके द्वारा उन संकल्पोंके त्याग करनेकी कोशिश
करनी चाहिये।
प्र०-धर्म-प्रचार, समाज सुधार, धनोपार्जन-इन तीन
कारणांसे विद्याका अभ्यास करनेकी रुचि प्रबल हो रही है।
उ०-यह उचित ही है। तीनों हेतुओंसे विद्या सोसनेकी
वृत्ति नीतिकी दृष्टिसे अनुचित नहीं है।
प्र०-प्रभुसे क्या मॉगना चाहिये ?
उ०-प्रभुका प्रेमसहित अनन्यचिन्तन मॉगना चाहिये।
प्र०-साधनके विषय में परापर पूछ ताछ करनी चाहिये ।
उ०-समय कम मिलनेके कारण एवं स्वभावकी ढिलाईसे
पत्र देने में विलम्ब हो जाता है, नहीं तो पूछनेमें कोई सकोच
नहीं है।
[४२
१० भा०२-४

परमार्थ-पत्रावली प्र०-साधनके लिये कड़ाई करनी चाहिये। उ०-स्वभावकी नरमी एवं अनधिकार समझकर आपपर कड़ाई नहीं की जा सकती अतएव आपको ही अपने ऊपर कड़ाई करनी चाहिये। प्र०-जीवकी इतनी सामर्थ्य नहीं कि वह प्रमाद छोड़कर विना किसी प्रकारकी उत्तेजना पाये ही अपने लक्ष्य-पथपर अग्रसर होता जाय। उ०-इसके लिये सत्य-कवीरकी साखीसें वर्णित कवीर- दासजीकी चेतावनीकी तरफ खयाल करनेसे बहुत मदद मिल सकती है। प्र०-अध्यात्म-जगत्में इसीलिये एक मार्ग-प्रदर्शकके संकेत और तत्त्वावधानकी आवश्यकता और उपयोगिता भी एक विशेष स्थान रखती है। उ०-मार्गदर्शक बहुत पुरुप हो चुके हैं और हैं भी । जिनमें जिनकी श्रद्धा है उनके लिये वही मार्ग-प्रदर्शक बन सकता है । मार्गदर्शकोंकी कमी नहीं है किन्तु श्रद्धा और प्रेमकी आवश्यकता है। प्र०-भगवान्की विस्मृति और भोगोंकी अनवरत उपासना- ने इस अभिमानी ब्राह्मणको बहुत दूर ला गिराया है। उ०-कोई चिन्ता नहीं इसके लिये विचारपूर्वक परमेश्वरके स्वरूपका ध्यान और उनके नामका जप करनेके लिये कोशिश करनी चाहिये । अथवा हठसे ही कोशिश करनी चाहिये, ऐसा करनेसे सब कुछ हो सकता है। ५० ] द्वितीय भाग प्र०-शिश्नोदरपरायण प्रमादीका उद्धार अपने बलपर होना परम कठिन है। उ०-इसके लिये ईश्वरको शरण लेनी चाहिये । ईश्वरके नामका जप, स्वरूपका ध्यान और उनकी आशाका पालन करना तथा उनके विधानपर खुश रहना ईश्वरको शरण है। प्र०-विपयोंके संग और सेवनसे अन्तःकरण मलिन होता जा रहा है। उ०-यदि यह वात आपको समझमें आ गयी हो तो विचार- पूर्वक विपयसग और सेवनका त्याग करना चाहिये । विचारसे त्याग न हो तो हठसे भी त्याग करना उत्तम है। प्र०-सत्सगकी अभिरुचि पूर्वापेक्षा न्यून प्रतीत हो रही है। उल-इसके लिये श्रद्धालु पुरुपोंका सग एवं महापुरुपोंके प्रेम, रहस्य, गुण ओर प्रभावकी यातोंका श्रवण और विवेचन करना उत्तम है। प्र०-देहाध्यास अधिक बढ़ा हुआ है। उ०-इसके लिये दो ही उत्तम उपाय है- (१) अभिमानको छोड़कर निष्काम प्रेमभावसे ईश्वरकी अनन्य शरण होना। (२) गीता अ० १४ । १९ के अनुसार द्रष्टा (सामी) होकर इस शरीर ओर शरीरके कर्मको आत्मासे पृथक् देखनेका अभ्यास करना। प्र०-मान-चड़ाईके प्रदीप्त दीपक मन पतंग होकर उत्साह- से जलना चाहता हे ऐसी परिस्थितिमें आपको और सुहृद् भगवान्को छोड़कर किसके सामने पुकार करूँ ?

परमार्थ-पत्रावली
उ०-मान-बदाईको प्रदीत दीपक समन्नने में ही भी कमी है
अतएव इलको प्रदीन दीपकके सदृश अच्छी तरह समझने की
कोशिश करनी चाहिये, फिर मन जलकर मरना नहीं चाहेगा।
इलको समझतेके लिये एकान्तमें करुणभावन रोकर ईश्वरसे
प्रार्थना करनी चाहिये।
प्र०-मद्रापुरुषोम आरम्भमें जो श्रद्धा दीरवती थी वह इस
समय उस रूपमें नहीं दीखती, इसका कारण भी शायद
साधनकी फर्मा और विषय-सेवनकी अधिकता ही होगी।
उ०-सबसे बढ़कर महापुरुप नो परमेश्वर ही हैं। उनमें
निष्कामभावसे प्राप्त हुई सच्ची श्रद्धाका क्षय नहीं होना चाहिये।
यदि कमी नजर आती हो तो उसके मूलमें कोई कामनाका होना
सम्भव है। भगवान्के भक्तोंमें श्रद्धाकी कमी होने कारण
भगवानके भक्तोस गुणोंकी तारतम्यताका देखना एवं विषयासक्त
और नास्तिक पुरुषोंका संग तथा पूर्वकृत पापकी वासनाएँ,
साधनकी कमी और विषय-भोगीका सेवन इत्यादि अनेक हेतु
हो सकते हैं।
प्र०-दूसरोंके दोप पहाट बनकर मेरी वाणोके आलोच्य
विषय हो रहे हैं, उनकी निन्दामें रस मालूम देता है।
उ०-दूसरोंके दोष और अपने गुणोंकी आलोचनासे जो
आनन्द होता है उसको मृत्युके समान समझकर उसका विषके
तुल्य त्याग करना चाहिये, नहीं तो भारी पतन होना
सम्भव है।
-
५२ ]

[१०] आपका पत्र मिला, श्रीनारायणको प्राप्तिमें पुरुषार्थ ही प्रधान है। परन्तु लोगोंको इस यातका विश्वास न होनेके कारण वे धनके लिये तो पुरुषार्थ करते है, परन्तु भगवान के लिये नहीं करते । मनुष्य जितनी चेष्टा धनके लिये करता है उतनी यदि भगवान के लिये करे तो अवश्य भगवान्की प्राप्ति हो सकती है। धन तो प्रारब्ध होनेपर ही मिल सकता है, पुरुषार्थसे मिलता तो अबतक सभी धनवान् हो गये होते, क्योंकि धनवान् बननेके लिये तो प्रायः सभी लोग जी-तोड़ चेष्टा करते है। ससारमें बहुतेरे मूल्के पास भी धन देखा जाता है और घुद्धिमान् धनके अभावमें दुस उठाते देखे जाते है। किसीको वहुत चेष्टा करनेपर भी धन नहीं मिलता और किसीको विना ही चेटाके धनकी प्राप्ति हो जाती है। इससे यह मालूम होता है कि धनकी प्राप्ति प्रारब्धके अधीन है। परन्तु भगवानकी प्राप्ति तो पुरुषार्थके ही अधीन हे। इतनपर भी लोग भगवान के लिये पुरुषार्थ न करके धनके लिये करते हैं। इससे बढ़कर क्या मूर्तता हो सकती है ? इस वातपर विचार करके श्रीभगवान्की प्राप्तिके लिये भजन, ध्यान, सेवा, सत्संगरूपी पुरुषार्यमें निष्काम भावसे अधिक-से-अधिक समय लगाना चाहिये । यदि दूकानका काम भी निष्कामभावसे, प्रभुका ही समझकर किया जाय तो यह भी भगवत्प्राप्तिके लिये किया जानेवाला पुरुषार्थ ही समझा जायगा । हाँ, लोभसे किया जाय तो दूसरी बात है। [५३ [१३] आपका पत्र मिला, भगवान्की प्राप्तिके लिये श्रीगीताजीका अर्थसहित अभ्यास करना चाहिये । निष्कामभावसे सब साइयोकी सेवा करनेसे भी अन्तःकरणकी शुद्धि होकर बहुत ही शीघ्र श्रीभगवान्की प्राप्ति हो सकती है। मनसे सवका हित चाहना भी सेवा है और लवको श्रीभगवान्की भक्तिमें लगानेकी चेष्टा करना तो परम सेवा है। इन बातोंसे भगवान् वहुत प्रसन्न होते हैं, अतएव निष्कामभावसे इस विषयकी दलाली करनी चाहिये, अर्थात् लोगोंको भगवान्के भजन-ध्यानमें लगाना चाहिये। आपको विचार करना चाहिये। समय बहुत थोड़ा रह गया है। अब भी नहीं चेतेगे तो फिर कव चेतेंगे? फिर कौन-सी वस्तु आपके काम आवेगी ? जव शरीर ही आपका नहीं है तब स्त्री, पुत्र, घर और धनकी तो बात ही क्या है ? वहाँ तो केवल भगवान्का प्रेम ही काम आता है, और कोई भी चीज काम नहीं आती। संसारके लोग सब अपने मतलवमें लगे हैं। यो समझकर उस परमप्रेमी, दीनदयालु भगवान्के शरण होकर केवल उसीसे प्रेम करना चाहिये । अपने प्राणोंसे भी अधिक उससे प्रेम करना चाहिये । प्राण भले ही चले जायँ, परन्तु उसके प्रेममें कभी कलङ्क न लगने पाये। आपको बारम्बार विचार करना चाहिये, आप किसलिये आये थे, यहाँ क्या करना चाहिये और आप क्या कर रहे हैं। ५६ ] [१४] आपका पत्र मिला वेदान्तके सिद्धान्तसे ब्रह्म सच्चिदानन्द- धन अनादि और अनन्त है । निर्मल आकाशके किसी एक अंशमें बादलकी भॉति उसी ब्रह्मके एक अंशमें प्रकृति यानी माया है, वह माया जड एवं विकारी है इसीलिये अनित्य है। ब्रह्मके जिस अंशमें माया है उसको मायाविशिष्ट ईश्वर कहते है। उसीका संकेत सर्वज्ञः सर्वेश सर्वव्यापी सर्वान्तर्यामी आदि नामोंसे किया गया है । उस ईश्वरका जो अंश है उसकी जीव संशा है । ये जीव नाना ओर अनन्त हैं। उस परमेश्वरका अंश होनेपर भी मायाके साथ सम्बन्ध रहने के कारण जीव-संज्ञा मानी जाती है। यह मायाका सम्बन्ध अनादि और सान्त है। उस मायाके अविद्या यानी अज्ञान- अंशसे जीव मोहित हो रहे हैं । उस अविद्याके अंशको ही कारण-शरीर कहते है । उसका बाघ विद्या यानी शानसे होता है। अज्ञानके विध्वंस होनेपर बुद्धिजनित वह ज्ञान भी स्वतः ही शान्त हो जाता है। जैसे ईधनको जलाकर अग्नि स्वत' शान्त हो जाती है वैसे ही ज्ञान भी अमानका नाश करके स्वत' शान्त हो जाता है । फिर यह जीव मायासे रहित हुमा कैवल्य- अवस्थाको प्राप्त हो जाता है । अर्थात् सच्चिदानन्द परमात्मामें तद्रूपताको प्राप्त हो जाता है। वह ज्ञान निष्काम कर्म और ईश्वरकी भक्तिसे होता है। [ ५७

।
परमार्थ-पत्रावली
वह सर्वव्यापी ईश्वर इस चराचर संसारका ज्ञाता,
नियन्ता और मालिक है। इस संसारकी रचना उस चेतन
ईश्वर और जड प्रकृतिके संयोगसे हुई है।
मयाव्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते॥
(गीता ९ । १०)
अर्थात् हे अर्जुन ! मुझ अधिष्ठाताके सकाशसे (यह
मेरी) माया चराचरसहित सर्व जगत्को रचती है और इस
(उपर्युक्त) हेतुसे ही यह संसार आवागमनरूप चक्रमें घूमता
है। जडवर्ग यानी जीवोंके शरीर तो प्रकृतिका विकार है। उस
शरीरमें जो चेतनता है वह ईश्वरका अंश है।
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
(गीता १५ । ७)
अर्थात् इस देहमें यह जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है।
ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुखरासी ।।
वह परमेश्वर जिसमें व्यापक, जिसका ज्ञाता, खामी और
अन्तर्यामी है उसका नाम चराचर संसार है । चर उन
प्राणियों के नाम हैं जो चल-फिर सकते हैं । जैसे मनुष्य, पशु,
पक्षी, कीट, पतङ्गादि । अचर उन प्राणियोंके नाम हैं जो स्थिर
रहते हैं-वनस्पत्यादि।
*
५८ ]

[१५] तुमको मेरी अपेक्षा भी श्रीभगवान्में बहुत अधिक प्रेम करनेकी आवश्यकता है। उसके लिये तो प्राणपर्यन्त चेष्टा होनी चाहिये। मुझसे अधिक प्रेम न भी हो तो कोई हर्ज नहीं है। परन्तु जिनका श्रीनारायणदेवमें प्रेम नहीं है, उनके लिये महान् हानिकी वात हे । अतएव श्रीमगवान्में पूर्ण प्रेम होनेके लिये प्राणपर्यन्त चेया करना तुम्हारा काम है। ऐसी चेष्टा करनेपर भी प्रेम न हो, सो नहीं । पहले तुम्हारा सत्संगमें कैसा प्रेम था, उस समय तुम सत्संगके सामने रुपयेको कुछ भी नहीं समझते थे, न शरीरको तकलीफकी ही परवा करते थे। अवतो उससे भी बहुत ज्यादा प्रेम सत्संगमें होना चाहिये और सत्संगसे भी बहुत ज्यादा प्रेम भगवानमें होना चाहिये। सत्संगमें जो प्रेम है सो भगवान्के लिये ही है, इससे उसको भी भगवान्में ही समझना चाहिये। प्राण भले ही चले जायें, परन्तु भगनान्के मिलने उपाय करनेमें देर नहीं होनी चाहिये। भगवान के विछोहमें चीतनेवाला एक पल भी युगके समान लगना चाहिये । ध्रुव, प्रह्लाद और गोपियोंकी जैसी चेष्टा थी, वैसी ही हो, तव धीभगवान्के मिलने के लिये प्राणपर्यन्त चेष्टा समझी जा सकती है। M [५९ [१६] आपका पत्र मिला, भगवान्में अनन्यप्रेम होनेके लिये अभ्यास ही प्रधान है। इसलिये ध्यानका अभ्यास खूब मन लगाकर करना चाहिये। ध्यानके समान इस संसारमें कुछ भी नहीं हैं। ध्यान श्रीप्रेमभक्ति प्रकाश नामक पुस्तकमें देखना चाहिये । ध्यान तेज होनेके लिये सत्संग, भजन और अर्थसहित श्रीगीताजीका अभ्यास करना चाहिये। निष्कामभावसे लोकसेवा करनेसे भी पापोका नाश होकर भगवानमें प्रेम हो सकता है। निराकारके ध्यानकी बात भी समझनी चाहिये । जहाँ- जहाँ मन जाय वहाँ-वहाँ सच्चिदानन्धन परमात्माको परिपूर्ण- रूपसे व्याप्त देखना चाहिये। ऐसा समझना चाहिये कि एक नित्य-शुद्ध-बोधस्वरूप परमात्मा सर्वत्र समभावसे परिपूर्ण हैं। उस परमात्माके सिवा अन्य जो कुछ भी भासता है, वह समस्त उस सच्चिदानन्दधन परमात्माका ही सङ्कल्प है। वास्तवमें उस नित्य, चेतन, सबके अधिष्ठानरूप परमात्माके सिवा अन्य कुछ भी नहीं है। इस प्रकार सदा सर्वदा एक परमात्मा वासुदेव- भगवान्को ही, सर्वत्र समानभावले, व्याप्त देखते रहना चाहिये। ऐसा करते करते जब अभ्यास दृढ़ हो जाता है, तब उस साधक पुरुषकी निरन्तर सच्चिदानन्दधन परमात्मामें ही एकीभावसे स्थिर स्थिति हो जाती है। ६० ]

[१७]
तुमने लिखा कि दूकानका काम अधिक देखना पड़ता है
जिससे भजनमें और भी अधिक भूल हो जाती है सो ठीक है।
भजन-ध्यानको स्थितिमें सावधान रहते हुए जितना काम हो
सके, करना चाहिये । कामसे डरना नहीं चाहिये।न कामको
छोड़ना ही चाहिये । भजनन्यानमें प्रेम होनेपर उस मनुष्यको
काम स्वयं ही छोड़ देता है। संसारके फामसे प्रेम छोडकर
भगवान्में प्रेम करना चाहिये । फिर संसारका फाम चाहे
-

, परमार्थ-पत्रावली जितना हो, कुछ हर्ज नहीं फलासक्तिको छोड़कर निष्काम- भावसे भगवानके नामका जप और स्वरूपका ध्यान करते हुए ही प्रसन्न सनसे भगवान्के लिये काम करना चाहिये । जो कुछ संसार प्रतीत होता है वह भी भगवान्की लीला है। अगवान् ही लीला कर रहे हैं। उनकी रुचिके अनुसार ही लीलावत् ही काम करना चाहिये । मालिककी इच्छासे ही सव काम होते हैं । अतः मालिक जैसा करें, उसीमें प्रसन्न रहना चाहिये । उसके विपरीत इच्छा ही नहीं करनी चाहिये । और काम करते समय भी मनमें अप्रसन्न होना ठीक नहीं। इससे मालिक अकर्मण्य समझता है, शरणागतिमें दोष आता है और वह निष्काम कर्म भी नहीं समझा जाता । अपने मनके अनुसार इच्छा करना ही शरणागतिमें दोष लगाना है। इसलिये अपनी इच्छाको सर्वथा छोड़कर जिससे स्वामी प्रसन्न हो वही काम स्वामीके लिये लीलामात्र मानकर करना चाहिये। जो मनुष्य कामको लीलामात्र समझ लेगा वह कामसे कभी घबरायेगा नहीं ! जो मनुष्य स्वामीके कामको झंझट समझकर उससे जी चुराता है वह अकर्मण्य समझा जाता है । जो लीलामात्र कामको सच्चा समझता है, स्वामी उसे मूर्ख मानता है और जो कामको वास्तवमें ही स्वप्नवत् ( लीलामात्र) समझता है, मालिक उसीको अपना, ज्ञानी भक्त समझता है। और तुमने लिखा कि मैंने अभी समयको अमूल्य नहीं समझा। सो ठीक है । समयको अमूल्य जान लेनेपर निरन्तर भजन, ध्यान होते रहनेमें संसारके काम कुछ भी अड़चन नहीं डाल सकते।

द्वितीय भाग जिन मनुष्योंकी शरीरमें आसक्ति हे, यदि उनके जेल या फॉसीके योग्य कोई मुकद्दमा लग जाय तो संसारके सय काम करते हुए भी वे उसके चिन्तनको नहीं भूल सकते। जिस किसी उपायसे उस मुकदमेसे छुटकारा हो उसीको वे सर्वोत्तम मानते हैं। इसीलिये उसको भूलते नहीं। इसी प्रकार जो यमराजके द्वारा दी जानेवाली फॉसी (मृत्यु) के मुकदमेको समझ लेता है, वह भी जबतक उससे छुटकारा नहीं पा लेता, तवतक छुटकारेके लिये प्रयत्न करता रहता है । जिसे यह विश्वास है कि मुझपर चौरासी लास वार शूली चढानेका मुकद्दमा चल रहा है, अर्थात् चौरासी लास योनियोंम जन्म लेकर मरना पड़ेगा, जबतक इस मुकद्दमेसे छुटकारा न हो जाय, तबतक क्षणभरके लिये भी उसे चेन नहीं पड़ता। जैसे धनका लोभी चलते फिरते सय काम करते हुए भी निरन्तर इसी चिन्तामें रहता है कि कैसे धन मिले। जैसे दुष्ट स्वभावके कारण नीच परपुरुषमें मासक्त दुराचारिणी सीका चित्त सावधानीके साथ घरका काम-काज करते हुए भी निरन्तर परपुरुपके चिन्तनमें लगा रहता है और यह अपना भेद भी किसी प्रकार प्रकट नहीं होने देती है। इसी प्रकार निरन्तर गुप्तरूपसे तथा लगनके साथ श्रीनारायण- का प्रेमपूर्वक स्मरण करना चाहिये । जो नारायणको छोड़कर ससारसे प्रीति करता है, वह तो अपने ही हाथों अपना गला काटता है। [६३ ? [१८] तुमने लिखा कि 'निरन्तर भगवान्का चिन्तनसहित जप हो सके ऐसी कोई व्यवस्था होनी चाहिये सो ठीक है। यदि तुम्हारे मनमें ऐसी चाह होती है तो बड़ी उत्तम बात है ! फिर देर क्यों हो रही है ? जिसको किसी वस्तुकी इतनी प्रवल चाह होगी, वह तो उसीके परायण हो जायगा ! फिर ऐसा होने देर क्या है ? परन्तु अभी पूरी चाह नहीं हुई है । इस चाहके लाथ जो सांसारिक वस्तुओंकी चाह भी लगी हुई है वही इसमें बाधक है। जो भगवान्को सर्वोत्तम समझ लेगा, वह सभी समय एकमात्र भगवान्की ही चाह करेगा। अन्य वस्तुकी बाहको मनमें स्थान ही न देगा | सर्वोत्तम वस्तुके बदले कोई बुरी चीज कैसे ले सकता है ? अगवान्का भजन-ध्यान अमूल्य हीरे-माणिक्य हैं और सांसारिक भोग-पदार्थ काँच-पत्थर ! इस बातको जो समझ लेगा वह भजन-ध्यानरूप हीरे-माणिक्यको छोड़कर काँच-पत्थर- रूप विषय-भोगका व्यवहार कैसे करेगा? जो ऐसा करेगा, वह तो महा मूर्ख ही समझा जायगा! भजन अधिक होनेका उपाय पूछा--सो भगवान्के नाम- जपको सर्वोत्तम समझ लेनेपर भजन अधिक हो सकता है। भगवान्के नामकी महिमा तथा प्रभाव जाननेपर भी भजन अधिक हो सकता है और वह जाना जाता है सत्संगले । अतः सब लोग एकत्र होकर भगवान्की चर्चा करें तो बड़ा उत्तम है। सत्संग ही सार है। ६४] [१९] आपने लिखा--'मुझसे नाम-जपमें बहुत भूले होती है, यह मेरे पुरुषार्थकी ही त्रुटि है।' सो पुरुपार्थकी त्रुटि नहीं रखनी चाहिये । भजनका रहस्य और प्रभाव जान लेनेपर तो त्रुटि रहती ही नहीं। परन्तु अभी तो विश्वास करके ही नाम- जपका तीव्र अभ्यास करना चाहिये। आपने लिपा कि--'समय बीत रहा है !' सो समय तो बीतेगा ही, जिसका समय भगवान्के भजन-ध्यानके विना चीत रहा है वही शोचनीय है । जो समय भजन-ध्यानमें चीता, वह तो चीता नहीं, वह तो वना रह गया । जो समय विना भजनके जाता हे उसीके लिये पछताना पड़ता है। इसलिये सर्वकालमें निरन्तर मगवान्का स्मरण बना रहे इसके लिये प्राणपर्यन्त चेष्टा करनी चाहिये । इस प्रकार दृढतापूर्वक चेष्टा होगी तो अवश्य कम भूलें होंगी। इस प्रकार प्रबल चेष्टा करनेपर भगवान्में प्रेम होगा ही। बहुत दिनोंतक प्रसन्न मनसे भजनका तीव्र अभ्यास करनेपर ही भगवन्नाम जपमें प्रेम हो सकता है। भजन प्रेमपूर्वक न भी हो तो भी निरन्तर हो, ऐसी चेष्टा दृढताके साथ करनी चाहिये । समय अमूल्य हे, उसे अमूल्य काममें ही विताना चाहिये । फिर कोई हानि नहीं ! यहुत सावधान रहना चाहिये । मृत्यु पहलेसे किसीको सूचना नहीं देती । ऐसा जानकर सब समय एकमात्र नारायणके भजनका आश्रय लेना चाहिये । सच्चिदानन्द भगवान्का चिन्तन होते हुए जिसकी मृत्यु होगी, उसके लिये कोई हानि नही है। फिर एक पलके लिये भी आप कालका विश्वास करके भजन क्यों छोड़ते है? [६५ ५० भा० २-५ [२०] आपने लिखा कि 'दूकानका काम देखनेमें तथा लोगोंसे वात- चीत करने में भगवत्-विस्मृति हुए विना नहीं रहती।' सो ठीक है । निरन्तर अटल स्थिर स्थिति न हो जाय तबतक ऐसा हो सकता है। इसके लिये उपाय पूछा, सो भजन-ध्यान करते हुए काम करनेका अभ्यास ही उपाय है। और सत्संग तथा अन्धोके द्वारा भगवद्विपयका विचार करते रहना चाहिये। भगवान्की स्मृति तथा सत्संग और सद्ग्रन्थोंके द्वारा भगवान्के भजन, ध्यान, वैराग्य तथा ज्ञानकी और भगवान्के प्रेम, प्रभावको वात, उनके गुणानुवाद तथा सुहृद्-स्वभावकी कथाएँ सुनने एवं पढ़नेसे भगवान्में प्रेमसहित श्रद्धा हो सकती है । तव भगवान्का यथार्थ प्रभाव जाना जा सकता है; और तभी निरन्तर सर्वकालमें ध्यानसहित नामका जप हो सकता है। -- ६६]

[२१]
तुमने लिखा कि 'मेरा आना नहीं हुआ, इसमें मेरे प्रेमका
ही अभाव समझना चाहिये ।' सो ऐसा मानना उचित
नहीं, का तो मुझसे बहुत ही कम मिलना होता हे तो
क्या उनका प्रेम कम समझना चाहिये । पूर्वकालमें भी जिनका-
जिनका परस्पर मिलना कम होता था तो इससे उनका प्रेम कम
थोड़े ही समझा जाता था। अपनेतोसाधारण मनुष्य है, साक्षात्
श्रीभगवान्के साथ अर्जुनका बहुत ही अधिक प्रेम था। लोगों के
देखने में भगवानसे अर्जुनका मिलना बहुत ही कम होता था,
परन्तु क्या इससे उनका प्रेम कम समझा जा सकता हे ? न
मिलनेमें केवल प्रेमका अभाव हो सो वात नहीं है, और भी कई
कारण हो सकते हैं।
[७
.

परमार्थ-पत्रावली
तुमने लिखा--'ऐसा क्या प्रतिबन्ध है जिससे तुम्हारे
पास रहना नहीं होता।' सो प्रतिबन्ध हो तो क्या हर्ज है। मेरे
पास रहनेकी तुम्हारी इतनी जिद्द क्यों है ? मेरे पास रहनेसे
ही लाभ होता तो मेरे पास रहनेवाले सभीको ही लाभ होना
चाहिये था।
पहले तुम कहा करते थे कि, 'लगातार छः मास यदि
तुम्हारे पास रहना हो जाय तो भगवानकी प्राप्ति हो जाय ।'
परन्तु तुम तो इससे भी अधिक मेरे पास रह चुके ! अतः भाई!
भगवत्प्राप्ति तो भगवान्के भजन, ध्यानके तीव्र अभ्यास करनेसे
ही हो सकती है। और वह नारायणके आश्रयपर पुरुपार्थ करनेसे
सभी जगह हो सकती है।
हर समय भगवान्के समीप रहनेकी उत्कण्ठा रखनी
चाहिये । भगवान्के पास नित्य रहनेमें उत्कण्ठा ही प्रधान हेतु
है। उत्कण्ठा तीव्र होनेपर कोई भी प्रतिवन्धक नहीं रह सकता।
'निरन्तर मेरे पास रहनेके लिये क्या पुरुषार्थ करना
चाहिये' इसका उपाय पूछा, सो मैं यह नहीं लिख सकता।
भगवान्की कृपासे ही सब बातोंका सुयोग लगा करता है ।
सुयोग प्राप्त हो जानेपर भी जो नहीं चेतते वे तो निरे पशु ही
समझे जाते हैं। मनुष्य होकर कुछ तो विचार करना चाहिये
कि मेरा क्या कर्तव्य है और मैं क्या कर रहा हूँ !
६८]

[२२] आपने लिखा कि--'एक पल या एक श्वास भी भगवान के स्मरण किये विना न जाने पावे, इसके लिये क्या चेष्टा करनी चाहिये" सो इसके लिये भगवान्के गुणानुवाद, प्रभाव, स्वरूप, भक्ति और वैराग्यको बातें सुननी और पढनी चाहिये । इसके सिवा दूसरा कोई सरल उपाय नहीं है । ऊपर लिसे अनुसार करनेसे भगवान में प्रेम होनेपर निरन्तर ध्यानसहित निष्काम स्मरण रह सकता है। जो समयकी कीमत जान लेता है, उसका एक पल या एक भी श्वास व्यर्थ कैसे जा सकता हे ? जो समय विना भगव- चिन्तनके जाता है वह तो धूल्म ही जाता है । ( व्यर्थ ही नए होता है) इस प्रकार समझनेवालेके द्वारा एक पल या एक श्वास भी धूलमें कैसे मिलाया जा सकता है ? भगवान की कृपा, दया हम सभीपर सदा ही पूर्ण वनी हुई है । इस वातको जो जान लेगा, यह भगवान्को कभी न । भूल सकेगा। D [६९ [२३] आपका पत्र मिला । जो समयके महत्वको जानता है, वह कमी कालके द्वारा नहीं मारा जाता। क्योंकि वह कभी कालका विश्वास ही नहीं करेगा । उसको काल धोखा कैसे दे सकता है ? जो कालको अच्छी तरह नहीं जानता, वही कालके धोखेमें आता है। उसीको काल नाश कर देता है । काल अचानक आता है। जैसे चूहेको विल्ली पकड़ती है, मौत भी उसी प्रकार अचानक आ पकड़ती है, ऐसा जानना चाहिये। अतः जो सब समय भगवान् नारायणके चिन्तनकी शरण रक्खेगा, एक पल भी उसे नहीं छोड़ेगा और भगवान के नाम-रूपका चिन्तन करते हुए ही मरेगा वह तो भगवान्को ही प्राप्त होगा। वह मृत्युरूपी संसारसागरमें कभी न इवेगा। उसको मृत्यु कभी नहीं मार सकेगी। वही पुरुप धन्यवादका पात्र है जिसका अनन्य प्रेम होनेके कारण हर समय एकमात्र भगवान्में ही ध्यान रहता है यानी जिसको निरन्तर भगवान्का ही स्मरण रहता है, उसको फिर जीवन्मुक्तिसे भी क्या प्रयोजन है ? वह तो दर्शन करने योग्य है। उसके दर्शनसे तो पापी भी पापमुक्त हो जाता है । उसके जरिये कितने ही पुरुष जीवन्मुक्त हो जाते हैं, फिर उसके अपने जीवन्मुक्त होनेकी तो आवश्यकता ही नहीं रहती। उसे तो सर्वकालमें निरन्तर एकमात्र भगवान्का प्रेमपूर्वक चिन्तन होता रहे, इसके अतिरिक्त और कुछ भी चाह नहीं होनी चाहिये। ७०] . [२४] आपने लिखा कि 'समय बहुत व्यर्थ जाता है, भजन बहुत ही कम होता है' सो व्यर्थ समय किस- लिये जाता है ? विषयी पुरुषोंका सग और विषयोंका चिन्तन अधिक होता होगा । भगवान्में प्रेम कम होनेके कारण ही भजन कम होता है। भगवान्में प्रेम होनेके लिये भगवान के गुणानुवादको यात सत्संग तथा शास्त्रोद्वारा सुननी तथा पढ़नी चाहिये । इस प्रकार अभ्यास करनेसे भगवान्का प्रभाव जाना जा सकता है, जिससे संसारसे वैराग्य होकर भगवान्में प्रेम हो सकता है। तव ऐसा होनेपर अपने-आप ही भजन अधिक होगा। दिन बीत रहे है, गया हुआ समय पीछा नहीं आता। शरीर एक दिन अवश्य मिट्टीमें मिल जायगा, इसका कोई उपाय नहीं है । जव शरीर ही अपना नहीं है, फिर औरकी तो चात ही क्या है ? जो कुछ भी पदार्थ है, सवका नाश होनेनाला है । श्रीनारायणदेव ही सच्चे आनन्दरूप है, उन्हींकी शरण लेनी चाहिये । श्रीभगवान के दर्शन हुए विना संसारके जालसे कभी छुटकारा नहीं होगा । श्रीनारायणका मिलन प्रेमके अधीन हे । इसलिये जैसे भी हो शीघ्र श्रीनारायणमें पूर्ण प्रेम हो, बहुत जल्दी वैसी चेष्टा करनी चाहिये । तुम्हारे पास जो कुछ भी है वह सब कुछ नारायणदेवकी प्राप्तिके लिये लगा देना चाहिये, फिर तो नारायण हाजिर ही है। [७१

[२५]
आपका पत्र मिला। आपसे अपने पिताजीकी आज्ञाका पालन
और उनकी सेवा भलीभाँति बनती है या नहीं ? नारायणके
नामका जप और उनके स्वरूपका ध्यान हर समय काम करते
हुए भी बना रहे ऐसा उपाय करना चाहिये । करीब दो या
तीन घटेका समय भजन-ध्यानके लिये अलग नियत रखना
चाहिये । इस कामके लिये अवकाश अवश्य निकालना चाहिये।
सत्सङ्गकी चेष्टा करनी चाहिये । शास्त्र तथा भगवद्भक्ति-
सम्बन्धी ग्रन्थोंको पढ़ना भी सत्सङ्ग ही समझा जाता है।
भजन-ध्यानमें आनन्द आनेपर तो विना ही चेष्टाके हो सकता
है, अभी तो एक बार वुद्धिके निश्चयसे और जबर्दस्तीसे ही भजन
करना चाहिये । भजन करते-करते ही आनन्द आता है और
तभी भजनका मर्म जाना जा सकता है !
-
७२]

[२६]
आपने लिसा--'निरन्तर भजन ध्यान हो, ऐसी कड़ी बात
लिखनी चाहिये ।' सो ठीक है। परन्तु बातोंसे भजन ध्यान
होता तो कभीका हो जाता । संसारसे वैराग्य होनेपर निरन्तर
भजन-ध्यान हो सकता है। परमात्मामें प्रेम होनेपर संसारसे
आप ही वैराग्य हो जाता है । भगवान्के गुणानुवाद, उनके
स्वभाव, सामर्थ्य और प्रेमकी वात पढने सुननेसे भगवान्का
मर्म जानकर भगवान्में प्रेम होता हे, नय संसारके भोग अच्छे
नहीं लगते । एकमात्र भगवान्के मिलनेकी ही बारम्बार
उत्तेजना होती है। तभी निरन्तर भजन व्यान होता है।
समय बीता जा रहा है, गया हुआ समय किसी प्रकार
भी लौटकर नहीं आता । ऐसा जानकर समयको अमूल्य
काममें ही बिताना चाहिये । ऊँचे से-ऊँचे काममें ही समय
लगाना चाहिये । आप जिस कामके लिये संसारमें आये थे,
उस कामको पहले पूरा करके ही फिर दूसरे कामको देखना
चाहिये । एक भगवान्के विना आपका मच्चा सुहृद् और कोई
नहीं है, ऐसा जानकर निरन्तर भजन-ध्यान करना चाहिये ।
utican
[७३
.

-
[२७]
तुमने लिखा कि 'परमात्मामें मन लगे ऐसा उपाय होना
चाहिये' सो मेरा भी यही लिखना है कि इसके लिये जल्दी
होनी चाहिये । परन्तु आप उपाय न करें तब क्या उपाय हो ?
जिसे परमात्मामें मन लगानेकी चिन्ता होगी वह उसके लिये
वड़ी तत्परताके साथ उपाय करेगा और उसीका उपाय भी
सफल होगा।
.
७४]

।
[२८]
भजन, ध्यान, सत्सङके लिये सचेष्ट रहनेसे, थोड़ा बहुत
मजन-ध्यान हो सकता है। अधिक भजन तो बहुत दिनोंतक
विशेष तत्परताके साथ हर समय अभ्यास करनेपर ही होता
हे । अत मनुष्यको विचार करना चाहिये, कि मैं किसलिये
आग हैं, में कौन है? मेरा क्या कर्तव्य है और में कर
क्या रहा है ? मे जो कुछ करता हूँ वह सब ठीक है या नहीं ?
जिससे हमारा परम कल्याण हो, हमें वही करना चाहिये ।
में जो कुछ करता है वह यदि ठीक नहीं है, तो फिर वही करना
चाहिये जो ठीक हो । मूल्यवान् से मूल्यवान् काममें ही
समय लगाना चाहिये । भजन, ध्यान और सत्सङ्गके समान
ससारमें कोई भी मूल्यवान पदार्थ नहीं है।
[७५

[३०]
भगवान की स्मृति अधिक रहनका उपाय पूछा, सो वह
संसारस बैगग्य और भगवान में प्रेम होनेले रह सकती है।
केवल बातें लिख देनेने कुछ नहीं हो सकना धारण करनेसे
ही होगा।
सन्संग पवं सद्रन्थोंद्वारा भगवद्भजनः भक्ति, ध्यान,
वैराग्य तथा शानकी बातें एवं भगवान के प्रभाव और
गुणानुवादकी वात प्रेमसहित सुनने-पढ़नेसे भगवान्में
७८ ]

द्वितीय भाग
श्रद्धा प्रेम होनेपर भगवान्की स्मृति बहुत ही अधिक रह
सकती है।
इस प्रकार साधन करनेसे अन्त करण शुद्ध होकर
प्रेमपूर्वक निष्कामभारसे निरन्तर भगवान्का स्मरण हो सकता
है। फिर भगवान्की प्राप्ति तो हुई ही पडी है। उनको फिर
भगवान्के मिलनेकी गर्ज भी नहीं रहती, भगवान ही उनके
पीछे-पीछे फिरते है।
सञ्चिदानन्दमय सगुणरूप भगवान् श्रीकृष्णकी मनमोहिनी
मूर्तिको अपने हृदयसे कभी विसारना नहीं चाहिये, पर उसके
रहस्यको जाने चिना इस प्रकार वन नहीं पड़ता। और जब
श्रीनारायणके परम रहस्यको कोई जान लेता है तो फिर उसके
लिये भगवान्के स्वरुपको भुलाना सम्भव नहीं। फिर उसको
सब जगह वासुदेव भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र ही भासित होते है
जैसे गोपियाको होते थे।
उस मोरमुकुटधारी, वशीविहारीको माधुरी मूर्ति और
मीठी वाणीमें जब एक बार सुरति समा जाती है तो फिर वह
लोटकर नहीं आती। चित्त उसीमें फंस जाता है। भगवान्
श्रीकृष्णके अतिरिक्त उसे किसी औरफा मान ही नहीं रहता।
तव वह प्रेमी भक्त यानन्दमय हो जाता है। उसके लिये
नारायणके सिवा और कुछ भी नहीं रहता।
[७९

+
[३१]
आपने लिखा कि 'भगवान्की स्मृति बहुत ही कम रहती
है,' सो भगवान्की स्मृति रहनेके विपयमें .... के पत्रमें लिखा
इधर आपका समय ठीक नहीं बीतता, इसका कारण आप
ही जान सकते हैं । मैं इतनी दूरसे कैसे अनुमान लगा सकता
या तो आपके सांसारिक झंझट अधिक रहते होंगे अथवा
भगवद्भक्तांका संग कम होता होगा। प्रधान तो ये दो ही कारण
अनुमान किये जाते हैं । आपसे बहुत पीछे जो लोग साधनमें
लगे थे वे भी आपसे आगे बढ़ गये । शुरुशुरूमें आपकी बड़ाई
अधिक हो गयी थी, उसे सुनकर आपको कहीं कुछ अभिमान
८०]

द्वितीय भाग
तो नहीं हो गया क्योंकि आपके भजनकी बहुत ही
प्रशंसा किया करता था। जो हुया सो हुआ, अब भी चेत
जायें तो कुछ नहीं बिगड़ा है । अव भी सर यात धन
सकती है!
बहुत-से पुरुषोंका बहुत उत्तम और तेज साधन देखकर
भी आपको उत्साह क्यों नहीं होता? यदि कहें कि 'कुछ तो
होता है' परन्तु वह कुछ नहीं, जय कि आप उस उत्साहके
अनुसार कार्य नहीं करते तब फिर नाममात्रके उत्साहसे क्या
होता हे ? फिर भी न होनेसे तो उत्तम ही है, परन्तु यह उन
लोगोंसे आगे बढा देनेवाला उत्साह नहीं है। आपको यदि
भगवद्विपयपर पूरा विश्वास है तो फिर एक पलकी भी देर
आप क्यों कर रहे हे ? संसारको यदि स्वप्नतुल्य मिथ्या समझते
है, तो फिर इस मिथ्या जगत्के लिये अपना अमूल्य समय
क्यों व्यर्थ गॅवा रहे हैं? संसार पूर्णरूपसे मिथ्या न समझमें
आवे तो भी यह क्षणभगुर तो प्रत्यक्ष ही देसनेमें आता है।
एक श्रीनारायणको छोड़कर कोई भी ऐसी वस्तु ससारमें नहीं
है, जो नित्य हो । फिर शरीरकी तो बात ही क्या है । एक दिन
इस शरीरका अवश्य ही नाश होना है। अत इस शरीरके
भस्म होनेसे पहले-पहले ही जो कुछ करना हो, कर लेना
चाहिये । एक पलका भी विलम्ब क्यों करते हैं आपको किस
वस्तुकी आवश्यकता है ? जिसके लिये आप जीवनके
अमूल्य
समयका अमूल्य काममें उपयोग नहीं करते ।
[८१
प० भा० २-६-

[३२]
सच्चिदानन्दधन परमात्मासे भिन्न जो कुछ भी भासता
है, वह है नहीं। इस प्रकार समझकर, जो कुछ भी चिन्तनमें
आता है उसका खयाल छोड़कर जो बच रहे उसको अचिन्त्य
सच्चिदानन्द समझकर उसी में स्थित होना चाहिये । इस प्रकार
अधिक अभ्यास करनेपर अचिन्त्यके ध्यानकी स्थिति हो सकती है।
जलमें वर्फकी तरह अपने शरीरको आनन्दमें डुबोकर
शरीरको ढहा दे । फिर आनन्द-ही-आनन्द रह जाता है। इस
प्रकार ध्यान करनेसे सच्चिदानन्दके स्वरूपमें स्थिति हो
सकती है।
श्रीसच्चिदानन्दघनका भाव अर्थात् होनापना और शरीर
जो
कुछ
भी चिन्तनमें आ जाता है
अभाव अर्थात् दृश्यमात्र कुछ है ही नहीं इस प्रकारका दृढ़
निश्चय, ऐसा होनेसे एक सच्चिदानन्दके अतिरिक्त सवका
अभाव होकर परम आनन्दमय एक सच्चिदानन्दधन ही सर्वत्र
अभिन्नरूपसे रह जाता है, वही परमपद है, वही परब्रह्म है
और वही अमृत है।
जो मनुष्य ध्यानके मर्मको जान लेता है, विना ही चेष्टाके
उसका ध्यान हर समय बना रहता है। जवतक ध्यान करने में
कोई परिश्रम मालूम होता है तबतक ध्यानका मर्म ही नहीं
जाना गया। ध्यानका मर्म जान लेनेपर तो फिर ध्यानमें
आनन्द-ही-आनन्द है। उस आनन्दमयका ध्यान अपने-ही-आप
होता रहता है । वह तो फिर कुछ भी नहीं चाहता।
तथा
उन सबका अत्यन्त
८२

[३३]
आपका पत्र मिला। कृपा, दया तो भगवान्को सबपर सदा
ही बनी है। उन्हींको कृपासे सब कुछ बनता हे । परन्तु उनकी
वह कृपा भजन किये बिना समझमें नहीं आती। और कृपाका
प्रभार जाने पिना कृपाको प्रतीति नहीं होती, तर उद्धार भी
कैसे हो? विश्वास ही सार है। विना विश्वासके नारायणमें
प्रेम नहीं होता, पिना प्रेमके नारायण मिलते नहीं और
नारायणके मिले विना संसारसे उद्धार होनेका और कोई भी
उपाय नहीं है।
जिस पातसे एक दो दिन भी भगवानमें कुछ प्रेम होता
हो, उसी यातको निरन्तर सुनने, पढनेको चेप्रा करनी चाहिये।
जब दिन-रात निष्काम प्रेमभावसे जप होने लगे फिर तो मनुप्य
किसी प्रकारसे भी संसारके लोममें नहीं फंस सकता। क्योंकि
जय भगवान्के प्रेमका सच्चा लाभ प्रत्यक्ष दीसने लगता है तव
भजन अपने-ही-माप होने लगता ह । फिर विशेष चेष्टा नहीं
करनी पस्ती । उस योरका आनन्द नहीं जाना जाय तभीतक
भजन करना कठिन हो रहा है।
पिछले पाप तो समीके यहुन ही किये हुए होते है, परन्तु
भगवान के नाम जपके प्रतापसे वे सभी पाप भस्म हो जाते हैं।
फिर कुछ भय नहीं रहता । भजन होता रहे तो कोई चिन्ताकी
यात नहीं।
जर ही नाम दृदय धरयो, भयो पापको नास ।
जैसे चिनगी अग्निकी, परी पुराने घास ।।
[८३

परमार्थ-पत्रावली
पिछले पापोंकी कौन जाने और जाननेकी आवश्यकता
भी नहीं । भगवन्नामजपसे वे सभी नाश हो जाते हैं। इसलिये
बहुत तत्परतासे नाम-जप ही करना चाहिये । कलियुगमें
नामजपके समान और कोई भी उपाय नहीं है। एकमात्र
भगवन्नामजप ही सार है । इसलिये जिस उपायसे नामजप हो
सके पूरी चेष्टासे उसीमें लग जाना चाहिये । रामायणमें
कहा है-
कलिजुग केवल नाम अधारा । सुमिरि मुमिरि भव उतरह पारा ॥
यदि भगवन्नामका जप नहीं होता है तो आपका भगवान्में
विश्वास ही नहीं है। यही समझना चाहिये। नहीं तो और
क्या कारण समझा जाय ? अतः एक वारं विश्वास करके
भगवान्के नामका जप और ध्यान करना चाहिये । फिर
सांसारिक लोभ नहीं रह सकेगा । आप सांसारिक आनन्दको
आनन्द मान रहे हैं, इसीसे आप उसमें फंस रहे हैं। आपको
विचार करना चाहिये कि संसारमें आकर मैंने क्या किया ?
पशुमें और मुझमें क्या अन्तर है ? खाना, सोना और विषयभोग
तो पशु भी करते हैं, फिर पशुसे अधिक आपको क्या आनन्द
मिला ? इस प्रकार विचारकर देखनेसे मालूम होगा कि हमारा
जन्म लेना व्यर्थ ही हुआ; केवल दस महीने माताको बोझ ही
ढोना पड़ा । अब भी चेत जायँ । नहीं तो पीछे पछतानेसे कुछ
भी नहीं बनेगा । अन्तमें भगवान्के भजन विना कोई भी काम
नहीं आवेगा। सब यहीं रह जायगा, शरीर भी साथ नहीं
जायगा, फिर औरकी तो बात ही क्या है ?
?
८४]

[३४]
तुमने लिखा कि 'भाईजी ! मेरा तो कुछ जोर नहीं है' सो
ऐसा नहीं लिपना चाहिये । जहाँ प्रेम है वहाँ बहुत जोर है।
तुमने लिया कि 'पूर्ण इच्छा होनेपर मिलाप होना स्क
नहीं सकता' सो ठीक है । मिलना भले ही देरसे हो, प्रेम
अधिक बढ़ाना चाहिये, प्रेम ही प्रधान है।
अपना सभी समय निरन्तर प्रेमपूर्वक भगगनके नामजप
और ध्यानमें बीते, सारा पुरुषार्थ लगाफर वही चेष्टा करनी
चाहिये । एक क्षणकी भी जोगिम नहीं रसनी चाहिये । फालका
जरा भी विश्वास नहीं करना चाहिये।
---
[८५

[३५]
-
आपने लिखा कि 'डाकगाड़ीमें जानेसे जैसे जल्दी पहुँचा
जा सकता है, इसी प्रकारका कोई उपाय होना चाहिये।' सो,
जो मनुष्य उपाय होना चाहेगा, वह तो उसीके अनुसार चेष्टा
भी करेगा ही। मेरा लिखना भी ऐसा ही है कि यह उपाय
जल्दी होना चाहिये, नहीं तो पीछे पछतानेसे कुछ भी नहीं
बनेगा । चेटा करनेसे उपाय होनेमें क्या विलम्ब है ? सत्सङ्ग
और भजन कम होता है, इसमें पुरुषार्थकी ही कमी समझनी
चाहिये । चाहे जितने भी सांसारिक काम हों, भगवान्के नाममें
प्रेम होनेपर भजनमें भूल अधिक नहीं हो सकती । काम करते
हुए ही नामजपको यादगारी अधिक रहे, वही चेष्टा करनी
चाहिये।
८६]

द्वितीय भाग
दूकानके आदमियोका तथा सांसारिक लोगोंका संग
करनेसे भजन कम होता हो तो उनका संग कम करना चाहिये।
जब भगवान्में पूर्ण प्रेम और विश्वास हो जायगा तव तो चाहे
जितना विषयी मनुष्योंका संग हो, फिर भगवान्की स्मृति
भूली नहीं जा सकती। भजन और सत्संग अधिक होनेपर ही
विश्वास और प्रेम हो सकता है। इसलिये भजन-सत्संगकी
ही विशेष चेष्टा करनी चाहिये।
कृपा-दया तो भगवान्की सभीपर सदा ही पूर्ण रहती है।
उसे जान लेनेपर मनुप्य भगवान्को कभी भूल नहीं सकता।
जान लेनेपर उसका चिन्तन किस प्रकार छोडा जा सकता है ?
आपने लिखा-'किसी समय तो मुकद्दमेका काम
लीलामात्र दीसने लगता हे ।' तब तो बहुत ही आनन्दकी घात
है, फिर तो उस मुकदमेकी चिन्ता भी नहीं रहनी चाहिये
और
एकमात्र नारायणका ही भजन होना चाहिये । मुकद्दमेका
चिन्तन मुकद्दमेके दिन ही होना चाहिये । अथवा किसी समय
याद भले ही आ जाय, परन्तु विशेष चिन्तन न हो। जिनको
मुकद्दमेका भय होता है, उनको यह निरन्तर जलाता रहता
है। नारायणमें मन लगानेके लिये मुकद्दमेकी तरह मृत्युको
याद रखना चाहिये । सबसे बड़ा मामला तो नारायणके घर
है, उसका न्याय करनेवाले भगवान् आप है। उनका छोटा
हाकिम यमराज हे । यमराजकी अदालतमें नहीं जाना पड़े वही
चेष्टा करनी चाहिये । शरीरको लेकर मुकद्दमा चल रहा
है, आप कहते है यह मेरा है, पर असलमें यह आपका
है नहीं । आपके पास क्या प्रमाण है ? कुछ भी है
[८७
.

परमार्थ-पत्रावली
नहीं । सुकद्दमा हो ही रहा है। आखिर इस शरीररूपी
मकानको अवश्य खाली कर देना पड़ेगा । प्रसन्नतासे छोड़ देंगे
तो आपकी लायकी है, नहीं तो वेइजती होगी। शरीर आपका
है नहीं। आपके पास इसका कोई प्रमाण भी नहीं है कि शरीर
मैं हूँ और शरीर मेरा है । जो जीवित रहते हुए ही शरीरका
आश्रय त्याग देता है, शरीरको मुर्दके समान समझ लेता है
वही उत्तम है, वही जीवन्मुक्त है। इस शरीरको पहलेसे ही
मुर्देके समान समझकर इसमेंसे अपनेपनका भाव निकालकर
जो पुरुष एकमात्र नारायणमें अपनेपनका भाव कर लगा
उसीकी पेश आवेगी। नहीं तो वेइजती होगी। शरीर तो छोड़ना
ही पड़ेगा । इसलिये पहले ही इसमें अभिमान छोड़ देना अच्छा
है। जबतक शरीर है उतने समयतक इससे काम लेना चाहिये।
एक दिन तो अवश्य ही इसे खाली करना पड़ेगा। जबतक
आपका इसपर अधिकार है अच्छ तरह शीघ्रतासे इससे काम
ले लेना चाहिये । इसमेंसे भजन, ध्यान, सत्सङ्गरूपी अमृत तो
निकाल लेना चाहिये, जिससे वादमें पछताना न पड़े।
भगवान्के भजन, ध्यान तथा सत्सङ्गाके विना 'मैं और
मेरा' यह भाव नाश होना कठिन है। भगवान्का भजन बहुत
कीमती है, यही तुम्हारे काम आवेगा । समय बड़ा अमूल्य है
इस प्रकारका अवसर मिलना बहुत ही कठिन है, जो ऐसा
समझेगा वह तो अपने अमूल्य समयको अमूल्य काममें
वितावेगा।
कोड़े लगानेवाला मैं कौन हूँ ? इस प्रकार नहीं लिखना
चाहिये । कोड़े तो गुरु लगा सकते हैं। यदि कोड़े लगवाने-
८८]

द्वितीय भाग
को आवश्यकता हो तो रिसी सच्चे निष्काम प्रेमी गुरुकी शरणमें
जाना चाहिये । शरण भी ऐसी हो कि कुछ भी हो सय गुरुके
आशानुसार ही करे । प्राण भले ही चले जायें, अपने प्रणको
नहीं छोडना चाहिये।
प्रेमपूर्वक भजनमें ऐसा मन हो जाय कि शरीरका ज्ञान ही
न रहे । तव आनन्द-हो-आनन्द है। भजन-सत्सङ्ग कम होनेमें
आलस्य ही विशेष कारण जान पड़ता है। काम करते हुए
अधिक भजन होना तभीतक कठिन है जबतक प्रेम कम है।
सत्सङ्ग तो महीनेभरके लिये भले ही न हो परन्तु सत्सङ्गमें
प्रेम होना चाहिये । यदि पूर्ण श्रद्धा, प्रेम और निष्कामभाव हो
तो सत्सह तो एक पलका भी बहुत है।
आपके ससुरालका हाल जाना। इस विषयमें आपको
ससुरका पक्ष नहीं करना चाहिये । माता-पिता जो कहें उसी
प्रकार करना चाहिये । आपके पिताजीकी आत्मा दुखी हो तो
आपको अपने ससुरके पास भी नहीं जाना चाहिये। यदि आपके
ससुरालवालोंके हितके लिये वहाँ जाना आवश्यक हो और
उसमें आपके पिताजी आदिका भी हित होता हो तो आप अपने
पिताजीसे प्रार्थना करके उनसे आशा लेकर अपने ससुरके पास
जा सकते है । वे आशा न दें तो कोई उपाय नहीं।
आपने लिसा कि 'मैं निष्काम होकर चले! ऐसा विचार
है। मामलेका सुख-दु स कुछ मानूं नहीं।' सो ऐसा हो तो फिर
चिन्ता ही क्या है?
[८९

- [३६] तुम्हारा पत्र मिला, धारणाकी वात जानी । भजन, ध्यान-- का तीव्र अभ्यास करनेसे हृदय शुद्ध होता है, तभी सच्ची धारणा होती है। पूर्ण प्रेम तो भगवान्में ही होनेका उपाय करना चाहिये । वह भजन, ध्यान, सत्सङ्गके तीव्र अभ्यास करनेसे अन्तःकरण शुद्ध होनेपर प्रभुके प्रभाव जाननेसे ही होता है ।। ९०] द्वितीय भाग प्रेमकी यात जानी । में तो तुम्हारे प्रेमके अनुसार पूरा पत्र- व्यवहार भी नहीं कर सकता। इस चार बहुत ही कम पत्र लिख सका । मिलने की बात भी जानी। प्रेम रहे तो मिलना भले ही कम हो कोई हर्जकी बात नहीं है। मेरे साथ प्रेम वढनेकी वात पूछी सो इसका उत्तर में कुछ नहीं लिख सकता। क्योंकि वर्तमानमें तुम्हारा जो प्रेम है उसे देखते मुझे कलकत्ते जानेमें उन क्यों होना चाहिये था। भजन-सत्सद्का अभ्यास अधिक होनेसे भगवान्के ध्यानकी स्थिति वढ सकती है । तुमने अपना साधन कमजोर लिखा, इसका क्या कारण है ? तुम्हारे साधनको कौन कम करवा रहा है ? तुम किसके दवावसे या मूर्खतासे अथवा कुसगसे किस हेतुसे साधन कम कर रहे हो ? एक भगवान्के विना तुम्हारा और कोई भी नहीं है । तुमको ऐसी क्सि वस्तुकी आवश्यकता है, जिसके लिये तुम भगवान्-सरीसे प्रिय मित्रके प्रेम-चिन्तनको छोडकर मिथ्या, क्षणभङ्गुर ससारके चिन्तनमें अपने अमूल्य समयको बिता रहे हो ? संसारका काम निष्काम- भावसे अनासक्त होकर करना चाहिये। एक पल भी तुम्हें व्यर्थकी बातोंमें तथा काममें नहीं बिताना चाहिये । भगवान्को छोड़कर अन्तमें कोई भी तुम्हारा साथी नहीं है। ऐसा जानकर उस नारायणको एक पलके लिये भी नहीं छोडना चाहिये।

परमार्थ-पत्रावली जाती है। परन्तु संसारके सझमें मनको भय भी किस बातका है ? सर्वत्र एक श्रीसच्चिदानन्द ही तो पूर्णरूपसे विराजमान हो रहे हैं । इस प्रकार बहुत अधिक अभ्यास दृढ़ हो जानेपर सर्वत्र एक नारायण-ही-नारायण भासित होने लगते हैं। पहले आपको ध्यानकी बात लिखी थी, उनमें ध्यान नं०२ वाली स्थिति यदि रहे तो काम करते हुए भी कोई अड़चन नहीं। स्फुरणा भी भले ही हो, कोई हानि नहीं है । संसारका अभाव और सच्चिदानन्दघनका भाव (होनापना) देखते रहना चाहिये, फिर कोई हर्ज नहीं । संसारका सङ्ग भले ही हो, संसारको अनित्य समझना चाहिये । सभी जगह एक नारायण ही पूर्ण- रूपसे विराजमान हो रहे हैं। उनके विना जो कुछ भी भासित होता है सो है नहीं। सारे संसारको एक सत्-चित्-आनन्दके द्वारा व्याप्त- परिपूर्ण समझना चाहिये जैसे वर्फका ढेला जलसे व्याप्त है इसी प्रकार आनन्दघनसे सारा संसार व्याप्त है । इस प्रकार समझता रहे तो फिर संसारका चाहे जितना सङ्ग हो, कोई हानि नहीं। भक्तिके भावसे संसारके काम करते हुए इस तरह समझना चाहिये कि जो कुछ भी है वह सब केवल भगवान्के सङ्कल्पमात्रसे बना हुआ है, सारा संसार लीलामात्र है, भगवान्की फुलवाड़ी है । इसमें भगवान् प्रसन्न हों, उसी प्रकार लीलाकी भाँति कार्य करना चाहिये । जो कुछ भी है सब एक नारायणका सङ्कल्पमात्र है; ऐसा समझकर जो नारायणकी राजीके अनुसार काम करता है वह इसमें लिपायमान नहीं होता। - ९४]

द्वितीय भाग
जो सभी वस्तुओंको नारायणकी समझकर अहवारसे रहित
होकर सय कुछ नारायणके लिये ही करता है, उसीपर नारायण
प्रसन्न होते है।
इस प्रकारका भाव हो जानेपर भले ही संसारका सन
होता रहे। कोई हानि नहीं। यह शरीर भी नारायणका है। काम
भो नारायणका है । नारायणी आनानुसार नारायणके लिये,
फल और आसक्तिको छोड़कर जो नारायणके इच्छानुसार
करता है वह इस ससारके सनमें रहकर भी इससे वैसे ही लिप्त
नहीं होता जैसे जलमें रहकर कमल जलसे अलग ही रहता है।
आपने लिसा कि ध्यान करते समय आनन्दकी भी इच्छा
नहीं रहे, फेवल निरन्तर ध्यान ही होता रहे ऐसी इच्छा रहती
है, सो आनन्दकी इच्छा रहे, तो भी कोई हर्ज नहीं है । भगवान्
के ध्यानकी तथा नामके जपकी लालसा बनी रहे तो भी उत्तम
ही है, इसमें भगवान्से कुछ मॉगना नहीं है।
नाम-जप भगवान् के ध्यानसहित हो वह बहुत उत्तम है।
केवल ध्यान हो, या केवल नामका जप हो और व्यर्थ स्फुरणा न
हो तो भी कुछ अड़चन नहीं। परन्तु ध्यानके साथ नामका जप
होता रहे तो बहुत ही उत्तम है।
फेवल सत्-चित् आनन्दका ध्यान हो और शरीरका भी
ज्ञान न रहे, पेसे समयमें नामका जप यदि अपने आप ही छूट
जाय तो कोई हानि नहीं। किन्तु निद्रा, आलस्य नहीं आना
चाहिये।

[३८] तुमने लिखा कि मुझे चिन्ता वास्तवमें ता नहीं होनी चाहिये, परन्तु मायाका प्रभाव इतना बलिष्ट है कि चिन्ता, राग- द्वेषादि एवं सुख-दुःख हुए विना नहीं रहते, बलात्कारसे हो जाते हैं, सो ठीक है । यह सब त्रिगुणात्मक मायाका ही कार्य है। इसका उपाय पूछा सो निष्काम प्रेम और गुप्तभावसे ध्यान- सहित निरन्तर नामका जप ही प्रधान उपाय है। गीतामें भी कहा है- दैवी ोपा गुणमयी मम माया दुरत्यया । मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तन्ति ते ॥ (७ | १४) भाई, माया तो अति दुस्तर ही है, परन्तु भगवानकी शरण लेनेके बाद वह दुस्तर नहीं रह जाती। भगवत्का भजन- ध्यान ह उससे तरनेका एकमात्र उपाय है। भगवान्का आसरा लेकर भी हम यदि मायाको दुस्तर ही मानते हैं तो हमने भगवान्का प्रभाव ही कहाँ जाना ? इसलिये भगवान्की शरण भली प्रकार लेनी चाहिये । पीछे कोई चिन्ता नहीं। यो तो हरिके नामका प्रभाव सदा हो है, परन्तु कलियुगमें वशेष है, सो प्रकट ही है। इस समय हरिनामके विना मायासे तरना वास्तवमें कठिन है । गोस्वामी तुलसीदासजीने भी ? 1 कहा है- 4 हरिमाया कृत दोष गुन बिनु हरिभजन न जाहिं । भजिअ राम सब काम तजि अस बिचारि मन माहिं ।। ९६]

[३९]
और तुमने लिखा कि जबतक शरीरमें अहभाय और
संसारमै सत्ताकी प्रतीति रहती है तबतक मनुष्य विना मुए
ही अपने ऊपर भार मान लेता है, सो ठीक ही है ।
तुमने लिया कि अन्त करण शुद्ध हुए विना इन सबको
मिथ्या मानना असम्भव है, सो भी ठीक है। अन्त करणको
शुद्धिके लिये हरिके नामका जप, परमेश्वरके स्वरूपका
यान और सत्सग प्वं निष्काम कर्म आदि उपाय शासमें
लिग्वे हैं।
नाम-जपके साथ, शरीरसे पृथक् होकर, यह शरीर में नहीं,
यह शरीर में नहीं, इस प्रकार वारम्वार मनन करनेसे भी शरीरमें
अहभावका अभार हो जाता है।
एक सच्चिदानन्द सर्वव्यापक परमात्मा होनेपनेका भाव
और उसके पिना और सयका अभार देखनेसे तथा ससारको
मिथ्या, म्यानवत् कल्पित देखनेका अभ्यास करनेसे भी संसारकी
मत्ता और शरीरम अहंभारका अभाव हो सकता है।
[०७
प० भा. -७

[४०]
-
आपने हर समय भगवन्नाम याद रहनेका उपाय पूछा,
सो भगवान्में प्रेम और संसारके प्रति तीव्र वैराग्य होनेसे
भगवान्की स्मृति हर समय हो सकती है। इसके लिये भी
भगवान्के नामका जप प्रसन्नतापूर्वक करनेका अभ्यास करनेकी
पूरी चेष्टा करनी चाहिये । चेष्टा करना ही वास्तविक उपाय है।
समयको अमूल्य समझना चाहिये और बहुत उत्साहके साथ
भगवान्की ओर लगना चाहिये । संसारका चिन्तन भगवान्की
प्राप्तिमें बहुत बड़ा बाधक एवं अपने लिये घातक है, ऐसा
जाने । संसारका चिन्तन करते हुए जो मरेगा उसको संसारको
ही प्राप्ति होगी और जो भगवान्का चिन्तन होते हुए मरेगा
उसे भगवान् ही प्राप्त होंगे ऐसा जान लेनेपर कौन मूर्ख
भगवान्को भूलेगा। जो भगवान्को छोड़ संसारका चिन्तन
करता है उसको मूर्ख समझना चाहिये।
can
९८]

[४१]
आपने लिसा कि भगवान्का भजन निरन्तर हो ऐसा
अभ्यास जल्दी होना चाहिये, सो यही ठीक है। मापके अन्दर
इस प्रकारको इच्छाका होना बहुत ही उत्तम एवं प्रशंसाके
योग्य है। इस प्रकारको तीव्र इच्छा रहनेसे निरन्तर अभ्यास
रहना कोई वडी बात नहीं। आपने लिखा कि भूल वहुत पड़ती
है, सो ठोक ही है । संसारका अभ्यास बहुत दिनोंसे करते
आये है, इसीसे भूल पड़ती है। यह भूल यदि आपको सहन
न होगी तो अपने-आप कम हो सकती है। जातक भगवान्में
पूर्ण प्रेम नहीं होगा तबतक भूलका सर्वथा मिटना सम्भव नहीं।
आपने लिसा कि भगवान के चरणों में प्रेम होना चाहिये, सो
मेरा भी लिसना है कि यह अवश्य होना चाहिये। आपके अन्दर
इस प्रकारकी इच्छा रहेगी तो फिर अधिक ढील होने कोई
कारण नहीं दिखायी देता । भगवान्के गुणोंकी बातें पढने-
सुननेसे तथा भजन-ध्यानका विशेष चेतापूर्वक तीन अभ्यास
करनेसे भगान्में प्रेम होकर चिन्तन हर समय हो सकता है।
आपने लिया कि भगवान्के स्वरूपका ध्यान रखते हुए नामका
जप होना चाहिये, सो सत्संगके अभ्याससे उसका प्रभाव
जान लेनेसे ऐसा हो सकता है। भजन च्यानको सबसे उत्तम
माना जाय तभी भजन ध्यान हो सकता है । भजनको सच्चे
मनसे सर्वोत्तम मान लेनेके बाद दूसरा चिन्तन अपने आप
कम होने लगेगा, सोमी थोदे ही दिन होगा! संसारका चिन्तन
जय आपके मनको अच्छा नहीं लगेगा तवं भगवान्का ही
[ ९९

परमार्थ-पत्रावली
पतिकी ओर देखती हुई पतिके इच्छानुसार सव काम
करती है, उसी भाँति उस भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र
मोरमुकुटधारी, वंशीवटविहारीकी माधुरी मूर्तिको अपने
नेत्रों के सामने देखता हुआ काम करता रहे । जहाँ-जहाँ
नेत्र जाय वहाँचहाँ ही श्रीवासुदेव श्यामसुन्दरकी मूर्तिकी
भावना करे। और जहाँ-जहाँ मन जाय वहाँ-वहाँ भी
आनन्दमय भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रकी मूर्तिका चिन्तन
करते हुए, मनको भगवान्में रखते हुए सांसारिक काम
करता रहे । ज्यों पतिव्रता स्त्री अपने पतिमें मन रखते
हुए संसारका काम करती है उस प्रकार करनेसे साधन
परिपक्व हो जाता है।
उसे एक श्रीकृष्ण भगवान्के सिवा और कुछ नहीं
भासता और वह आनन्दमें ऐसा मगन हो जाता है कि उसे
आगे जाकर अपने शरीरका भी भान नहीं रहता। वह गोपियों-
की भाँति मुग्ध हो जाता है । भगवान् बड़े प्रेमी हैं । जो ऐसे
भगवान्की दोस्ती छोड़कर सांसारिक तुच्छ स्त्री और अपने
शरीरका दास होकर उनमें प्रेम करता है, वही पशु है। समय
बीता जा रहा है। जो भी कुछ सांसारिक वस्तुएँ देखनेमें
आती हैं, सब नाशवान् हैं, ऐसा जानकर इनसे प्रेम छोड़कर
सत्यस्वरूप भगवान्से ही प्रेम करना चाहिये । क्योंकि
भगवान् तो केवल प्रेम ही चाहते हैं।
१०२]

[४३]
आपका पत्र मिला। सासारिक व्यसन चाहे जितनाप्रपल
हो, कोई टरकी बात नहीं, यदि प्रेमपूर्वक निरन्तर नारायणके
नामका जप होता रहे । रास्ता सुधरनेका इससे बढ़कर और
क्या उपाय है?
भगवान्के गुणानुवाद ओर उनके प्रभावकी याते
सत्संगद्वारा सुनने की चेष्टा करनी चाहिये। फिर पूर्वसस्कार
चाहे जितने बलवान् हो, श्रीनारायण नामके निरन्तर जपके
प्रभावसे पूर्वके समस्त चुरे सस्कार नष्ट हो सकते हैं। परन्तु
भजन हुए बिना कुछ भी उपाय नहीं है । भजन न होनेमें
सत्संग, प्रेम आर पुरुषार्थका अभाव ही प्रधान कारण समझा
जाना है । पुरुषार्थहीना भगवान् भी उद्धार नहीं कर सकते ।
अथवा नाशवान् क्षणभगुर संसारको सगति अधिक होती
[१०३

परमार्थ-पत्रावली
होगी। इसके सिवा दुसरा कारण तो मेरी समझमें कुछ
नहीं आता।
सत्संग तो सभी जगह प्राप्त हो सकता है, परन्तु होता
है खोज करनेपर । प्रचल इच्छा हो और तदनुसार पुरुषार्थ
किया जाय तो सत्संग अवश्य प्राप्त हो सकता है। अपने आप
घर बैठे ही सत्संगका मिलना तो उत्तम प्रारब्ध होनपर ही
सम्भव है।
भगवान में प्रेम हो जानपर तो सांसारिक प्रम अपने आप
ही कम हो जाता है। सांसारिक प्रेमको हटानेके लिये कोई
दूसरा लाधन नहीं करना पड़ता । अन्तःकरण भगवान्के भजन,
ध्यान और सत्संगने शुद्ध हो सकता है। यदि भगवानके
नामका जप और स्वरूपका ध्यान निरन्तर प्रेमपूर्वक निष्काम
भावसे और गुतरूपसे होता रहे तो. उसके अपने अन्तःकरणकी
तो बात ही क्या, उस पुरुषके दर्शनमात्रसे दर्शन करनेवालोंके
पाप नाश हो जाते हैं। अधिक क्या लिखा जाय
कलियुगमें भजनके समान उत्तम साधन मेरी समझमें
तो कुछ भी नहीं है। यदि आपको विश्वास हो तो यही चेष्टा
करनी चाहिये कि जिससे निरन्तर केवल भजन ही हो।
भजनके प्रतापले ध्यान और प्रेम सब कुछ निष्कामभावसे आप
ही हो सकते हैं । पूर्वमें जितने भक्त हो चुके हैं सव भजनके ही
प्रतापसे हुए हैं।
.
१.०४]

[४४]
तुमन लिखा कि कीर्तनम विशेष प्रेम किस प्रकार हो-
सो कीर्तन करनेसे ही कीर्तनमें प्रेम होता है और कीर्तन
अधिक सत्संगसे होता है।
व्यर्थ के काममें भले ही चित्त चलायमान रहे. बुद्धि भी
चाहे परान रहे, परन्तु प्रेम ओर ध्यानसहित यदि नारायणके
नामका जप निरन्तर होता रहे तो सारे दोपोंका नाश होकर
स्वयं नारायण दर्शन दे सकते है। श्रीनारायण तो प्रेमके हो
अघीन है।
तुमने लिखा कि मुझे कोई एक 'मन्त्र' बताइये । सो
गायत्री मन्नका तो स्नान आदि करके शुद्धतापूर्वक एक
आसनसे ही जप करना चाहिये । मेरी समझमें जिनकी प्रभुके
निराकाररूपमें भक्ति है उनके लिये ॐ मन्त्रका जप उत्तम है।
मन्त्र-जप करनेवाले विष्णुभक्तके लिये एकान्तमें 'ॐ नमो
भगवते वासुदेवाय' और सय समय 'राम' नामका जप उत्तम
है। जिनकी भक्ति शिवजीमें है उन पुरुपोंके लिये एकान्तमें
ॐ नम शिवाय' और सर्वकालम 'शिव' नामका जप उत्तम
है । सब अवतारोंमें जिन पुरुषोंकी भक्ति है उनके लिये 'हरे
गम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण
कृष्ण हरे हरे ।' सदा सर्वदा इस मन्त्रका जप उत्तमोत्तम
समझा जाता है।
[१०.

[४५]
आपने भगवान्में मन लगनेका उपाय पूछा, सो जाना।
सत्संग एवं भजनका बहुत चेष्टाके साथ अभ्यास होनेपर
भगवान्में मन लग सकता है । इसमें अभ्यास ही प्रधान उपाय
है । वास्तव अभ्यास होनेसे जव अन्तःकरणका मल नाश
१०६ ]
हो

द्वितीय भाग जाता है तब भगवान्में प्रेम होता है। जब भजनकी कीमत मालूम हो जाती है और भजनकी सबकी अपेक्षा बहुमूल्यता जान ली जाती है तव भजनको छोड़कर दूसरा काम होता नहीं, भगवान्से अतिरिक्त दूसरी जगह मन लगता नहीं। यदि संसारके काम होते है तो भजनके साथ ही होते है। भजन एक अमोलक वस्तु है, भजनके समान कोई वस्तु नहीं है। इस प्रकारका विश्वास होनेपर भजन अधिक होने लगता है। इस प्रकारका विश्वास भी भगवान्की कृपा, सत्संग ओर भजन होनेसे ही होता है। आपने लिसा कि आपकी और हमारी बात अलग-अलग नहीं है सो ऐसा प्रेम हो तो भी संसारका व्यवहार तो मर्यादा- के अनुसार ही होना चाहिये । प्रेम दूसरी चीज है, जहाँ लेन- देनके व्यवहारका प्रेम हे वहाँ संसारका प्रेम है और जहाँ विशुद्ध भावसे भगवद्विपयको लेकर प्रेम है वही असली प्रेम है। आपने लिखा कि ससारका काम अच्छा लगता है सो भले ही लगता रहे, भजनको कीमती समझकर हर समय करते रहना चाहिये । विश्वासपूर्वक हर समय भगवान्को सरण रसनेको बहुत चेष्टा रखनी चाहिये । भगवान्का मर्म जान लेनेके बाद भगवान्के भजनके वरावर ओर कुछ नहीं मालूम होता, फिर तो विना चेष्टाके ही भजन हुआ करता है। [१०७

[४८]
समय बीता जा रहा है। जो समयको अमूल्य जान लेगा
वह एक पल भी व्यर्थ काममें नहीं बितायेगा। भगवत्-चिन्तनके
विना जो किसी दूसरे काममें समय बिताया जाता है वहीं
व्यर्थ है। जिसको भगवान के नाम और ध्यानमें आनन्दरूपी
अमृतका रस मिलने लगता है वह उसको छोड़ नहीं सकता।
आनन्दमयके ध्यानमें कुछ कष्ट नहीं है । ध्यान तो बड़ी
प्रसन्नताके साथ अनायास ही होता रहता है। भगवान्की
प्राप्तिके साधनमें कुछ कष्ट नहीं है, भूलसे कष्ट मालूम होता
है, भगवान्की प्राप्तिका साधन तो बहुत ही सुलभ है।
-
११०]

[४९]
अब तुम्हारा भजन-ध्यान कैसा बनता है ? तुम्हें सावधान
होकर एक पलक भी जहाँतक वन सके भजन-ध्यानके बिना
नहीं जाने देना चाहिये । जबतक संसारमें आकर निरन्तर
ध्यानका साधन नहीं किया, तबतक कुछ नहीं किया। जिसे
संसारका चिन्तन करते समय मृत्यु मारेगी वह ससारमें
चकर लगाता फिरेगा ओर भगवान् के भजन-ध्यानमें जिसके
प्राण जायेंगे उसको भगवत्प्राप्ति होगी। इससे सब समय
भगवान्के नामका जप ओर भगवान् के स्वरूपका ध्यान करना
चाहिये । कुछ भरोसा नहीं कि मृत्यु किस समय आ जाय ।
जो जीते ही श्रीभगवानमें युक्त है उनकी तो बात ही क्या
हे । वे तो जीवन्मुक्त है, उनके तो दर्शन ही लाभदायक है ।
पेमे पुरुषांश मिलना तो भगवान्की कृपासे ही होता है।
उनसे मिलनेके बाद कुछ बाकी नहीं रह जाता । जिस दिन ऐसे
पुरुष मिल जायेंगे उसी दिन उनके समान होनमें कोई शहा
नहीं है। जबतक वैसा नहीं होता, तबतक उनका मिलना हुआ
ही नहीं, साधारण मनुष्योंके साथ ही मुलाकात हुई।
[११

५०] आपका पत्र मिला । पिछले पाप चाहे जितन हों, कोई चिन्ता नहीं । निरन्तर निष्कासभावसे सजन होना चाहिये। फिर पिछले सब पाप भजनके प्रतापसे नाश हो सकते हैं- जब ही नाम हृदय धरयो, भयो पापको नास । मानी चिनगी अग्निकी, परी पुराने घास ।। कलिजुग केवल नाम अधारा । सुमिरि सुमिरि भव उतरहु पारा ।। कृपा-दयाकी वात नहीं लिखनी चाहिये । कृपा-दया तो कृपासिन्धुकी लवके ऊपर बनी ही है। समय बीता जा रहा है, असली कमाईको नहीं छोड़ना चाहिये। शरीर, भोग तथा संसारको मिथ्या जानकर उनका आसरा छोड़कर श्रीनारायण- का आश्रय लेना चाहिये । संसारके काममें थोड़ा समय विताना चाहिये । पेट तो अपना पशु भी भरते ही हैं, उत्तम उसीको समझना चाहिये कि जो दूसरेके हितके लिये अपने प्राण भी देनेके लिये तैयार है। सभी लोग स्वार्थमें डूवे पड़े हैं। चेतना चाहिये । मनुप्यके शरीरका असली फल प्राप्त करना चाहिये। ११२ ] । .

[५१] आपने लिसा कि आये, पोछ नामजपकी चेष्टा ज्यादा हो रही है सो नामजपकी चेष्टा ज्यादा रहनी ही चाहिये। आपने लिखा कि ध्यानके वास्ते जर बेठता है तच अनेकों प्रकार. की फुरना' होने लगती है सोश्रद्धा भक्तिसहित नामका जप और मनसे सगुण भगवानका व्यान हो, इसकी चेष्टा करनी चाहिये, फिर कोई हर्ज नहीं। यापने लिया कि वैराग्यके लिये विवेक पूर्वक विचारका अभ्यास ज्यादा करनेकी चेष्टा करता हूँ सो ठीक है। विचारसे भी वैराग्य होता हे परन्तु भजन, ध्यान, सत्संग- [१३ प० भा०२-८ परमार्थ-पत्रावली का तीन अभ्यास करनेसे शीघ्र ही तीन वैराग्य हो सकता है। आपने लिखा कि फुरना ज्यादा रहनेके कारण सन स्थिर नहीं होता, जिससे ठीक-ठीक ध्यान नहीं हो पाता । एकमात्र नामजपके आधारसे ही रहता हूँ सो ठीक है। निरन्तर प्रेम- सहित एकमात्र नामके जपका आधार रहनेपर तो सब बातें आप ही हो सकती हैं। केवल प्रेमसहित नामजपका अभ्यास होनेके लिये ही शास्त्र और सत्संगके अभ्यासकी चेष्टा करनी चाहिये। फिर कोई चिन्ता नहीं। ध्यान और वैराग्य उसके अधीन है। . जो कुछ हो उसीमें आनन्द मानना चाहिये । सब प्रभुकी दृष्टिके सामने होता है, उसमें अपने मनको मैला करना मालिक- का तिरस्कार करना है और मालिककी शरणमें कलंक लगाना है। सब कुछ मालिकका है, ऐसा समझना चाहिये। स्वामी अपनी वस्तुको चाहे जिस प्रकार वरते, सव उसीका है। मैं भी उलीका हूँ, मेरा तो कुछ है ही नहीं। ऐसा मानकर हर समय आनन्दमें मन्न रहते हुए प्रेमसहित निरन्तर श्वासद्वारा नासका जप होता रहे ऐसी चेष्टा करनी चाहिये। नामके जपके साथ-साथ भगवान्की मोहिनी मूर्ति याद आनेके लिये विशेष चेष्टा रखनी चाहिये । उसको अपने मनसे और नेत्रोंसे कभी न भूले, हर समय अपने सामने देखता हुआ प्रसन्नचित्तसे आनन्दमें ही मग्न होता रहे। -- ११. ]

[५२]
चिट्ठी भेजी सो पहुँच गयी है । तुम भी तो मेरे मित्र ही
हो, पर भाई ! वनसे तुम्हारी तृप्ति नहीं होती, तब क्या उपाय
हो ? तुम्हारी भूसका कुछ पता नहीं लगता । तुम्हारे पास इतने
रुपये है कि तुम उनका व्याज भी नहीं सर्च कर सकते, फिर भी
काम बढाते जाते हो, यह दुःखका मूल है। अधिक धन लेकर
क्या करोगे ? सब लोग वनको यहीं छोड़कर चले जाते है।
तुम्हारे साथ भी कुछ नही जायगा । इसलिये जल्दी ही सचेत
हो जानेको आवश्यकता हे । यदि तुम इस समय भी चार-छ'
घटेका समय भजनके लिये नहीं निकाल सकते तो पीछे ऐसा
मौका कव मिलेगा?
तुम्हारा यह लिपना कि 'आपकी नजर रहनेसे सब कुछ
ठीक हो सकता है केवल लिसनामात्र है। मेने तो बहुत चार
लिसा और कहा, पर तुम उसे ध्यान नहीं लाते तो मेरा क्या
वश है ? मनुष्यकी 'नजर' किस काम आवेगी ? नजर तो केवल
भगान्की चाहिये ओर वह सवपर बहुत अच्छी है ही, परन्तु
कोई इसपर ठीक ठीक विश्वास करे तव तो।
[ ११५

परमार्थ-पत्रावली तुम मुझे अपना मालिक बनाते हो और अपनी देख-रेखका भार सुझपर सौंपते हो सो भाई ! इस प्रकार लिखने और कहने- मात्रसे कुछ भी काम नहीं बनेगा । यदि तुम मेरे भरोसे रहकर भजन नहीं करोगे तो मुझे तो इसका परिणाम पीछे पछताना ही नजर आता है । भजन ही तुम्हारा उद्धार कर सकता है। मुझमें कोई सामर्थ्य नहीं है । यदि तुम संसारके दुःखरूपी जाल- से निकलकर सच्चे और पूर्ण आनन्दकी प्राप्ति करके सदाके लिये सुखी होना चाहते हो तो सनसे सब कुछ छोड़कर केवल भगवान्के नाम-जप, ध्यान और सत्सङ्गमें सदाके लिये अपनेको लगा दो । यदि मनुष्य धीरे-धीरे संसारके सब विपयोंसे प्रेस करना छोड़कर एकमात्र आनन्दस्वरूप भगवान्की भक्ति में लग जाय तो बेड़ा पार हो सकता है । यह बहुत बड़ी चिन्ताकी बात कि तुम्हारे-सरीखा मित्र भी इन वातोंको सुनी-अनसुनी कर दे। भगवान्में ऐसी लौ लगानी चाहिये कि शरीरकी सुधि भी न रहे । यदि सव समय एक-सी लगन लगी रहे तोउद्धार होना कौन बड़ी बात है ? भगवान् कहते हैं कि जो हर समय उनमें लौ लगाये रहता वह अन्तमें उन्हीं में समा जाता है- जैसी लौ प्रथमहिं लगी तैसी ही रहि जाय । जाके हिरदै लौ बसै सो मोहि माहिं समाय ॥ अतः आनन्दस्वरूपको छोड़कर तुम क्यों दुःखरूप संसारमें हर समय लौ लगाते हो ? यदि तुम्हें विश्वास है तो किस लिये मिथ्या रुपयों में मन्न हो रहे हो ? मग्न तो केवल भगवान में होना ११६ ] Alto है,

द्वितीय भाग
चाहिये और ऐसा होना चाहिये कि मन उन्हींक आनन्दमै रम
जाय, उनके सिवा और कुछ भासे ही नहीं-
और सुरति बिसारि सन लो लगि रहे असग ।
आर जार कासे कहूँ मन रातो हरि रग॥
तात्पर्य यह कि मनके आनन्दरूपमें रम जानपर वह स्वय
भी आनन्दरूप हो जाता है। फिर दुस तो स्वप्नमें भी नहीं
भासता । जिस पुरुषका मन इस प्रकार भगवान्में रम जाता
है, उसको अपना सारा कुटुम्ब और बन झंझट मालूम होने
लगता है, फिर पीछे झझट चढानेवाले कामकाज भी आप-से-
आप कम होने लगते हैं।
,
रुपयों में प्रेम होनस रात-दिन रपये पैदा हों, इस प्रकारको
चेष्टा तथा उसी विषयको स्फुरणाएँ हुआ करती है, जो मनुष्य
को चेन नहीं लेने देती। इसी प्रकार भगवान्में प्रेम होनेसे ओर वे
किस प्रकार मिले. इसी विषयका चिन्तन होनेसे भगवान्की ही
स्फुरणा होने लगती है। सो इसका विशेष व्यान रखना चाहिये।
भजनका अभ्यास हर समय करते रहना चाहिये, चाह
इससे कोई नाराज ही क्यों न हो । नहीं नो पीछे बहुत पछताना
पड़ेगा । कोई दूसरा काम नहीं आवेगा । यह सारा ममार एक
दिन भम्म हो जानवाला है-
हाड जरे यो लाकडी कम जर या धाम ।
मर जग पता देवि के भयो कवीर उदाम ।।
[७

परमार्थ-पत्रावली एक दिन सवकता यही हाल होगा। काल. अपने आगमन- की किसीको सूचना नहीं देते, वे तो प्रतिक्षण मुँह चाये खड़े हैं। भगवान्ने आठ पहर चौसठ घड़ी हमें रुपये कमाने और पेट भरनेके लिये नहीं भेजा है, चौरासी लाख योनियोंक भोगोंको भोगनेके उपरान्त बड़ी कठिनाईसे यह मनुप्य-शरीर हमें मिला है । अतः मनुष्यजन्मका वास्तविक उद्देश्य समझकर जगत्के मिथ्या प्रपञ्चोंको छोड़ देना चाहिये और उस उद्देश्यकी सिद्धिम प्राणपणसे लग जाना चाहिये- जीवन मरन विचारि के कोरे काम निवार । जिन पंथा तोहि चालना सोई पंथ सँभार ।। , इसलिये भाई! यदि तुमसे भगवानके भजनका पुरुषार्थ नहीं हो सका तो पीछे बहुत पछताना पड़ेगा। अन्तसमयमें भगवान् के सिवा कोई दूसरा तुम्हारी सहायता नहीं कर सकेगा। संसारके दुःखरूपी समुद्र में डूब रहे हो, यदिइससे उद्धार पाना है तो भगवान्को भजो । फुरसत न मिलनेका वहाना न करो। यहाँ किसीको फुरसत नहीं मिलती, परन्तु मरनेके समय सबको फुरसत मिल जाती है। समय वहुत तेजीसे बीतता चला जा रहा है, स्मृत्यु नजदीक है, उसे कोई एक पलके लिये भी नहीं टाल सकता। केवल भजन ही सहारा है। इसलिये तन-मनसे भजन करनेमें लग जाओ। , .११८ ] [५३] आपने मनको स्थिर करनेका उपाय पूछा सो ठीक है। भगनान्के नामका जप, ध्यान ओर सत्सर आदि करनेसे तथा संसारके ऐश-आराम, म्याद योर शोकीनीसे पैराग्यका अभ्यास करनेसे मन स्थिर हो सकता है । कुछ उपाय नीचे लिग्वे जाते है- १-मन जहाँ-जहाँ जाय, वहाँ-वहाँ भगवान्के स्वरूप- चिन्तनका अभ्यास करना चाहिये। २-अथना मन जहाँ-जहाँ जाय, यहाँ चहॉग्ने गांचकर भगवान स्वरूपमें लगाना चाहिये। [११९ परमार्थ-पत्रावली ३-लत्सङ्गकी बातोंको चहुत उत्तम और अनमोल समझकर मनको उन्हीं में लगाना चाहिये। ४-भगवान्के नासका जप मुँहसे या श्वासद्वारा लगातार करनेका अभ्यास करना चाहिये । ५-संसारमें जितनी भी वस्तुएँ दीखती हैं, सब नाशवान् हैं। इस प्रकारकी धारणा करनेसे भी वैराग्य होकर मन स्थिर हो सकता है। ६-संसार और शरीर सव क्षणभंगुर हैं; भोग सभी रोगरूप हैं तथा अन्तमें ग्लानि तथा दुःख उत्पन्न करनेवाले हैं. इस प्रकार समझनेसे भी जगत्से वैराग्य होकर मन स्थिर हो सकता है। ७-अथवा अपनी जो सबसे प्यारी वस्तु हो; उसमे भगवान्की भावना करके मनको स्थिर करनेका अभ्यास करना चाहिये। और भी कई प्रकारके उपाय हो सकते हैं। इनमेंसे एक उपाय भी अच्छी प्रकार कर लिया जाय तोमन स्थिर हो सकता है और भगवान के भी दर्शन हो सकते हैं । इसलिये किसी-न- किसी उपायका अवलम्बन अवश्य करना चाहिये । जो मनुष्य- शरीर पाकर अपना एक पल भी व्यर्थके काममें विताता है. वह अपने बहुमूल्य रत्नको धूलमें मिला देता है। १२०]

[५]
मनुष्यको प्रतिक्षण भगवान्का भजन-ध्यान करना चाहिये।
प्रत्येक ममय ध्यानपूर्वक नाम-जप करना ही सार है।
रग बोले रामजी रोम
महजे ही धुनि होत ह मोई सुमिरन मार ||
रोम रकार।
इस प्रकारका स्मरण हृदयमे हर समय होता है। यदि
उसमें मन लगा रहे तो फिर आनन्द-ही-आनन्द है । तथा
हृदयम विना ही जपे जाप हो रहा है, उसमें मन लग जाय तो
फिर क्या कहना है । भीतर जप तो हो ही रहा है उसकी ओर
व्यान रखना चाहिये।
अजपा सुमिरन घट विष दीना सिरजनहार ।
ताही मों मन लगि रहा कहें कनीर विचार ॥
निष्कामभावसे जितना ही अधिक ध्यान और जप हो,
उतना ही अधिक करनेकी चेष्टा करनी चाहिये । यही असली
माम है।

- [५५] आपने पूछा कि हर समय प्रेमका आविर्भाव किस प्रकार हुआ रहे सो ठीक है। भगवान्के गुण, प्रभाव, नाम एवं स्वरूपके स्मरणसे ऐसा हो सकता है । यही नहीं, बहुत अधिक अभ्यास होनेसे तो निरन्तर प्रेम रह सकता है । किसी वस्तुका आविर्भाव तो उसके पूर्वकालमें तिरोभाव होनेपर ही होता है सो प्रेमका तिरोभाव होने ही क्यों दिया जाय ? जो प्रेम निरन्तर बना रहता है, उसीकी महिमा है । अतः प्रेमको अक्षुण्ण बनाये रखनेका अभ्यास करना चाहिये। आपने लिखा कि जिस प्रेमसे स्वयं श्रीभगवान् ही संत- रूपमें दर्शन दें, वह प्रेस किस प्रकार हो सो ऐसा प्रेम ध्यान- १२२.]

. द्वितीय भाग सहित भगवन्नाम-जप तथा सत्सगके तीव अभ्याससे हो सकता है। विश्वासपूर्वक चेष्टा करनेसे ही अभ्यास बढ़ता हे। अपनेमें पुरुषार्यको न्यूनताका अनुमान करके निराश नहीं होना चाहिये । बल्कि उसके परायण होकर उसके लिये पूरी चेष्टा करनी चाहिये । सचिदानन्दधन भगवान्का ध्यान निरन्तर बना रहे, इस प्रकारको कामना मल ही रहे, कोई हर्ज नहीं । इस तरहको इच्छा तो साधन बढानेम हेतु हे । जबतक निरन्तर साधन नहीं होने लगता तयतफ इस प्रकारकी उत्कण्ठा अवश्य रहनी चाहिये । प्रेमसहित भगवान् के ध्यानकी तीन लालसाका नाम ही उत्कण्ठा है। भगवान्में प्रेम और संसारसे तीन चराग्य होनेके बाद तो विना चेष्टा किये ही भगवान्के ध्यानमें निरन्तर स्थिति रहती है। परन्तु प्रेम ओर बेराग्यके लिये सत्संग और भजनकी तीन चेष्टा ही उपाय है। जितना समय ऊपर लिखे हुए साधनोंके करनेमें चीतता हे, वही सर्वोत्तम है । संसारके कामोंमें मन लगाकर बिताये टुप समयको तो धृलमें गया समझना चाहिये । और ऐसा समझनेसे ही साधनमें उत्तेजना हो सकती है। माधनके लिये उत्तेजना होना ही साधनमें वृद्धिका हेतु है । भगवान् सच्चिदानन्दरूपसे सर्वत्र पूर्ण हो रहे हैं, परन्तु ऐसा विश्वास न होनेके कारण ही वे प्राप्त होकर भी अप्राप्त-से दीखते है। विश्वास न होनेका कारण अनादिकालीन अविद्या ही है। फिली समय सत्सग, भजन आर ध्यानके प्रतापसे श्रीभगवान के सच्चिदानन्दरूपकी क्षणिक प्रतीति हो जानेपर [१०३ परमार्थ-पत्रावली भी फिर भूल जानका कारण पूछा सो इसका कारण पहलेका असत् अभ्यास और विषयासक्ति ही है । उसको सुधारनेके लिये भजन, ध्यान और सत्संगका तीन अभ्यास करना चाहिये । तभी संसारकी आसक्ति और रमणीयताकी अनुभूति क्षीण हो सकती है। भगवान्में मन लगानका उपाय पूछा सो प्रेम होनेसे ही मन लग सकता है। प्रेम उत्पन्न होनेके लिये सबसे प्रथम श्रद्धा विश्वासपूर्वक भजन और सत्संगकी चटा करनी चाहिये । चेष्टाकी वृद्धि होनेपर मन अपने आप ही रम सकता है। भगवान्का भजन-ध्यान करते हुए संसारका काम करनेमें भूल हो जानेकी वात आपने लिखी सो ठीक है। बहुत सावधानी- से भजन-ध्यानका अभ्यास करना चाहिये । काम भले ही थोड़ा हो । जबतक परिपक्व साधन निरन्तर नहीं होने लगता तवतक भूलें होती ही हैं। साधन तेज करनेका उपाय भजन- सत्संगकी तीव्र उत्कण्ठा ही है। जिस प्रेमके आगे प्राणोंका मूल्य कुछ भी नहीं है, उसके मर्मको जाननेका आपने उपाय पूछा सो वैसा प्रेम उत्पन्न होनेसे ही उसका मर्म जाना जा सकता है। प्रेमकी उत्कण्ठा रखनेसे ही प्रेमकी वृद्धि होती है। पहले तो विश्वासके आधारपर ही प्रेम करना पड़ता है, पीछे जैसे-जैसे मर्म जाना जाता है, वैसे-वैसे प्रेम बढ़ता जाता है। १२४ ]

[५६]
श्रीनारायणदेव और उनके भक्तोंक वही चीज काममें आ
सकती है, जिसमें फिसीका ममत्व न हो। जबतक किसी
चीजपर फिसीका ममत्व बना रहता है, तबतक वह भगवान्के
अर्पण नहीं हो सकती। जन संसारका एक साधारण सत्पुरप भी
किसी दूसरेको वस्तुको काममं नहीं लाता, तव भगवान् किस
तरह काममें ला सकते है ? यद्यपि सन कुछ भगवान्का ही है,
[१२०

परमार्थ-पत्रावली
परन्तु जबतक मनुष्य किसी वस्तुपरसे अपना अधिकार हटा
नहीं लेता तवतक श्रीनारायणदेव उसे स्वीकार नहीं करते।
जैसे कभी किसी भले आदमीके घरमें कोई पक्षी अंडादे
देता है तो जबतक अंडा फोड़कर उसके बच्चे उड़ नहीं जाते
एवं जबतक वह पक्षी उस घासलेस अपना सम्बन्ध रखता
तबतक वह भला आदमी उस जगहपर अपना अधिकार नहीं
जमाता । यद्यपि वह लोकष्टिमें सब प्रकारसे अपने उस
मकानका मालिक है, उसका मकानपर पूरा अधिकार है, फिर
भी वह उस स्थानको अपने अधिकारमें नहीं लेता।
इस प्रकार जव एक साधारण दयालु पुरुष भी दूसरेके
अधिकारमै गयी हुई अपनी वस्तुको अपने अधिकारमें नहीं
लेता, तब श्रीनारायणदेव और उनके मर्मको जाननेवाले उनके
प्रेमी भक्त कर ऐसी किसी वस्तुको अपने उपयोग एवं अधिकारमें
ले सकते हैं ? अर्थात् कभी नही ले सकते । जब उस पक्षीके
बच्चे उड़ जाते हैं तथा वह पक्षी भी उस घोंसलेको छोड़कर
चला जाता है, तव मकानमालिक उस जगहको काममें लेता
है । पक्षीके उड़ जानेपर मकानमालिक चाहे तो उसके घोंसलेकी
लकड़ियोंको भी काममें ला सकता है, क्योंकि अव उस पक्षीका
उस घर और घोंसलेमें ममत्वभाव नहीं रह गया। चाहे घरका
मालिक अव उस घोसलेमें आग ही क्यों न लगा दे, उस पक्षीको
उसके ऐसा करनेसे कोई सुख-दुःख नहीं होगा। इसी प्रकार
जब कोई मनुष्य ममता छोड़कर भगवान्की किसी वस्तुको
१२६ ]

द्वितीय भाग भगवान्के अर्पण कर देता है, तव श्रीनारायणदेव बहुत हर्पके साथ उस वस्तुको अपने काममें ले लेते है। . भगवान्के भकॉसी भी ऐसी ही बात है, क्योंकि भक्त तो अपने मालिकके अनुसार ही चलते है । जो स्वामीकी आना और रुचिके अनुसार चले, यही तो भक्त है। ऐसे ही भकॉके लिये श्रीनारायणदेव अपना सर्वस्व अर्पण कर देते हैं जैसा कि श्रीगीताजीके अध्याय ४, लोक २१ में लिखा है। जो भक्त अपना सर्वस्य भगवान के अर्पण कर देता है, श्रीनारायणदेव भी अपना सर्वम्व उसके अर्पण कर देते है। फिर भी भक्तको यह भाव कदापि नहीं रखना चाहिये कि अपना सब कुछ दे देनेपर श्रीनारायणदेवका सर कुछ मुझे मिल जायगा । ऐसा भाव रसनेवाला श्रीनारायणदेवका निप्कामी अतिप्रिय भक्त नहीं समझा जाता। उसे तो यही भाव रखना चाहिये कि श्रीनारायणदेवका सर्वस्व में नहीं चाहता। मेरी तो यही प्रार्थना है कि श्रीनारायणदेव मुझको तथा अपनी सर वस्तुओंको अपना- लें, इसके अतिरिक्त में उनसे मुक्ति भी नहीं मांगता । इसपर यदि कोई कहे कि किसलिये तुम ऐसी प्रार्थना करते हो, तो उसका उत्तर यही है कि केवल प्रेमके लिये । इसपर भी कोई पूछे कि प्रेम किसलिय चाहते हो तो उसका उत्तर भी यही होना चाहिये कि प्रेमके लिये ही प्रेम चाहता हूँ, और किसी वस्तुके लिये नहीं। [१२७ [५७] आपने भजन-सत्सङ्गके पुरुषार्थकी न्यूनता लिखी, सो उसका कारण समझना चाहिये। भगवान् और शास्त्रों में विश्वास होतेले तथा भजन-सत्सङ्गाको सर्वोत्तम समझनेसे ही भगवत्- प्राप्तिके पुरुषार्थकी वृद्धि होती है। आपने लिखा कि भीतरके सङ्कल्प बहुत उठते हैं इतने उठते हैं कि उनका कुछ ठिकाना १२८ ]

द्वितीय भाग
नहीं, मो ठीक है। सङ्करपके त्यागसे ही सङ्कल्पका नाश हो
सकता है। जो कुछ सङ्कल्प उठे उसको मिथ्या जानकर उसका
तिरस्कार कर देना चाहिये अर्थात् व्यर्थ समझकर उसे छोड़
देना चाहिये । ससारको ओरसे हर समय बेपरवा रहना
चाहिये । संसारके सदरप अर्थात् चिन्तनको प्रतिक्षण भुलानेकी
चेया करनी चाहिये और आनन्दमूर्ति भगवान के दिव्य स्वरूपको
चित्तम जमाये रहना चाहिये । इससे सङ्कल्पोंका नाश तो होगा
ही, भगवानकी स्मृति भी सदा बनी रहेगी, जो भगवत्माप्तिका
प्रधान सावन है।
आपने पहले लिखा था कि 'आपकी चिट्ठी पढ़कर आनन्द
तो बहुत हुआ, किन्तु आपकी लिग्यो वातें मुझे लगी नहीं।' सो
ठीक है । परन्तु आपको मेरी वातासे आनन्द हुआ, यह भी केसे
समझा जाय
? सञ्चा आनन्द तो उसीको समझना चाहिये जो
किसी धातको धारण करनेसे होता है। आपने आनन्दको पात
लिसी, सो आपकी कृपा हे। धारण भी उन्हींकी यात होगी,
जिनकी आशाओंको कोई टाल नहीं सकता। में तो यापकी कृपा
ओर प्रेमक कारण जो मनमे आता है, लिस देता है और
इसीलिये आपको मेरी चातोसे आनन्द भी आता है। यदि
आपकी प्रीति न होती तो आपको मेरा पत्र पढनेसे आनन्द ही
नहीं आता।
-
आप जिस कामके लिये आये है, उसे जल्दी पूरा करना
चाहिये । समय चीता जा रहा है। जो समय भगवान्के ध्यानमें,
[१२९
प० भा०२-२-

परमार्थ-पत्रावली नाम-जप, तथा सत्सङ्गम वीतता है, वही रहता है। जो समय संसारके कामों में जाता है, वह व्यर्थ बीत जाता है। आपको एक पल भी संसारके मिथ्या कामांमें नहीं लगाना चाहिये। यदि संसारका काम शरीरसे करना ही पड़े तो भगवान्के नामका जप और स्वरूपका ध्यान करते हुए ही करना चाहिये। प्रतिदिन ऐसी ही चेष्टा करनी चाहिये और चेष्टा भी बहुत जोरकी होनी चाहिये। आजतक जितनी चेष्टा की, उससे बहुत अधिक चेष्टा करनी चाहिये । ऐसी आदत डाल लेनी चाहिये कि भगवान्के ध्यानके विना एक पल भी न रहा जाय तथा उसके अतिरिक्त और कोई बात अच्छी न लगे । आँख और कान भगवान्की ही बात देखें- सुने, मन भगवान्के भजन, ध्यान और सत्सङ्गमें ही रमा रहे. तथा संसारके अन्य सब कााँले विरक्ति हो जाय-ऐसी चेष्टा बरावर करते रहना चाहिये । भय, सोच, मान और वड़ाई, सब कुछ छोड़कर एकमात्र ध्यानसहित नारायणके नामकी ही शरण लेनी चाहिये । वही आपका है। वाकी सब तो मिथ्या है, कल्पित है, स्वप्नवत् है । ध्यान ऐसा होना चाहिये कि शरीरका भी ज्ञान न रहे। आपको एकान्तमें निरन्तर साधन करनेके लिये पर्याप्त समय मिलता है या नहीं? मेरे एक मित्र तो कहते थे कि उन्हें कलकत्तेमें भी करीव १४ घण्टे एकान्तमें साधनके लिये मिल जाते हैं। १३० ] [५८] भगवानको स्मृतिमें भूलें अधिक होती हैं, इसका उपाय तो तीव अभ्यासको चेष्टा ही है। और भगवान्में प्रेम बढानेका उपाय पूछा, सो भगवान्के गुणानुवादको बॉचनेसुनने, कहने और उसके लक्षण, आशय, प्रभावकी ओर लक्ष्य करनेसे भगवान्में प्रेम-भाव वढ सकता है । भजन-ध्यान और सत्सङ्ग- का तीव अभ्यास करनेसे भी भगवान में प्रेम वढ सकता है। भजन-सत्सङ्ग अधिक हो, इसके लिये तीव्र इच्छाकी ही आवश्यकता है। किसी वस्तुको पानेकी तीव्र इच्छा होती है, तो उसके लिये प्रयत्न और चेष्टा स्वाभाविक ही अधिक होती है। जिसको रपयोंकी आवश्यकता होती है, वह रुपयोंका ही चिन्तन और रुपयों के लिये ही तन मनसे चेष्टा एवं प्रयत्न करता है। उसके मनमें हर समय प्राय इसी बातको चिन्ता रहती है कि रपये किस प्रकार पदा हो ! वह रुपया पैदा करने के विचारमें अपने तन-मनको अर्पण कर देता है। इसी प्रकार जिनको भगवान्से मिलनेकी इच्छा होती हे उनके मन-बुद्धि ऊपर लिपे अनुसार भगवान्को अर्पित हो जाते हैं। कोई आदमी अधिक बीमार होता है ओर वैद्य कहता है कि अमुक वस्तुके प्रयोगसे रोगी बच सकता है, तब उस वस्तुके लिये जैसी चेष्टा होती है, वैसी ही चेष्टा भजन और सत्सहके लिये होनी चाहिये । तीव्र इच्छा [१३१ एरमार्थ-पत्रावली होनेले ही तीन चेष्टा होती है और तीन चेष्टा होनसे ही वस्तु- की प्राप्ति होती है । संसारकी मिथ्या वस्तुएँ तो चेष्टा करनेपर भी शायद न मिले और मिल जानेपर भी उनसे रोगीको लाभ हो या न हो; परन्तु भजन और सत्सङ्गके लिये जो चेष्टा की जाती है, वह अवश्य सफल होती है। भजन-सत्सङ्गरूपी औपधका लगातार बहुत दिनोंतक सेवन करनेसे जन्म-मरण- रूपी बीमारीका अवश्य नाश होता है । सत्की चेष्टा कभी व्यर्थ नहीं जाती। जपम भूल होनेकी बात लिखी, सो जपका अधिक अभ्यास करनेसे ही जपको भूल मिटती है। प्रेमके विना भी प्रसन्न मनले जपका अभ्यास करते रहनेसे आगे चलकर प्रेम- सहित जप भी हो सकता है। जप जिस समय निरन्तर होने लगता है, उस समय प्रेमसहित ही होता है। वैराग्य होनेसे भी विना चेष्टा किये ही जप और ध्यान निरन्तर होने लगते हैं और भजन, ध्यान, सत्सङ्गले वैराग्य भी होता है। भगवत्की स्मृति हर समय बनी रहे, ऐसी इच्छा भी भगवान के निरन्तर चिन्तनमें हेतु है। जप करते समय ध्यानको बलात्कारसे बढ़ानेका अभ्यास करना चाहिये। वैला अभ्यास करनेसे जपके साथ ध्यानकी वृद्धि और संसारकी वासनाका क्षय हो सकता है। सत्ता और आसक्तिसे रहित स्फुरणा हो तो कोई हर्जकी वात नहीं है। संसारकी सत्ता और उसके प्रति आसक्तिके नाशके उपाय जप, ध्यान और सत्सङ्ग है, अतः उसके लिये तीन अभ्यासकी आवश्यकता है। भगवानके नामकी याद हर १३२ 1 द्वितीय भाग समय बनी रहनी चाहिये। ऐसा अभ्यास होनेपर आगे चल- कर संसारसे वैराग्य तथा भगवान्के स्वरूपमें स्थिति भी हो सकती है। श्रीपरमात्मदेवकी कृपा तो सदा सयपर है ही, जो ऐसा निश्चय कर लेता है, वही भगवानकी कृपाका पात्र है। उसको भगवान् शीघ्र ही मिल जाते हैं। क्योंकि भगवान्के विना मिले उसको चैन ही नहीं पड़ती। संसार और शरीरको मिथ्या तथा नाशवान् देखनेसे और सर्वव्यापी परमात्माको आनन्द- स्वरूप देखनेसे भी वैराग्य हो सकता है। संसारसे यदि वेराग्य हो जाय तो ससारका चिन्तन कम हो सकता है और संसारको मिथ्या, कल्पित तथा दुस्वरूप देखनेसे संसारके प्रति वैराग्य हो सकता है। प्रेमका उपाय लिखा ही जा चुका है। भगवान्के स्वरूप- फा चिन्तन, भगवन्नामका जप तथा सत्सङ्ग ही प्रेम उत्पन्न करनेके उपाय है । जपके लिये जितनी अधिक चेष्टा होगी। उतना ही अधिक वह हमसे वन पड़ेगा। जो आदमी भगवान्को सर्वश, सर्वान्तर्यामी, दयासिन्धु तथा चिना ही कारण हित करनेवाला जानता है, वह कभी उनसे किसी यातके लिये प्रार्थना नहीं करेगा। यदि प्रार्थना करेगा भी तो केवल प्रेमभावसहित उनके निरन्तर चिन्तनके लिये ही करेगा। हर समय नाम-स्मरणका अभ्यास हो जानेपर पीछे बहुत समयतक ध्यानकी स्थिति भी रह सकती है। भगवानको याद [ १३३

परमार्थ-पत्रावली
रखते हुए ही संसारका काम हो, ऐसी चेष्टा करनी चाहिये।
संसारके कामोंसे भजन-ध्यान बहुत ही उत्तम और अनमोल
है इसलिये संसारके कामों में चाहे जितना हर्ज हो जाय, किन्तु
संसारके कामोंके लिये भजन-ध्यानमें हर्ज नहीं करना चाहिये।
ऐसी पक्की धारणा हो जानेपर संसारका काम करते हुए भी
भजन-ध्यान हो सकता है। संसारके काम नदीके प्रवाहके
ससान हैं । इसमें पड़कर जो पुरुष भगवान्के चरणरूपी नौका-
को ध्यानद्वारा पकड़ लेता है अथवा भगवान्के नामरूपी नौका-
के रस्सेको पकड़ लेता है, वही इसमें डूबनेसे वच सकता
पर जो नदीके प्रवाहमें वह जाता है, उसकी बहुत दुर्दशा
होती है।
दिन बीते जा रहे हैं, आपको मनमें विचारना चाहिये-
'मैंने इस संसारमें आकर क्या किया? इसी प्रकार यदि और
लमय भी चीत गया तो जल्दी कैसे काम बनेगा? समयको
अनमोल समझकर अनमोल कासमें ही लगाना चाहिये । मरनेके
बाद संसारके रुपये और भोग किस काम आवैगे? असली
वस्तु तो वही है, जो भगवान्से अधिकाधिक प्रेम करावे
सोनेके और पत्थरके पहाड़ोमें क्या अन्तर है? शरीर भी मिट्टी में
मिल जानेवाला है। ऐसा जानकर इस शरीरसे पूर्ण लाभ
उठाना चाहिये । भगवान्के भजन-ध्यानके विना एक पल भी
क्यों जाय ? अतः एक-एक पलका हिसाव रखते हुए उसे
भजन-ध्यानमें लगाना चाहिये।
१३४]

[५९] आपका पत्र यथासमय मिल गया था किन्तु समय न मिलनेके कारण उत्तर देनेमें विलम्ब हुमा तदर्थ क्षमा करें। गीता अध्याय ८ श्लोक २३ से २५ का उत्तर विस्तारपूर्वक तो कभी आपसे भेंट होनेपर ही दिया जा सकता है किन्तु संक्षेपमै लिग्वता। (१) निष्काम कर्मयोगी चाहे जिस देश-कालमै मृत्युको प्राप्त हो, उसका पुनरागमन नहीं होता । यहाँ रात्रि, कृष्णपक्ष, दक्षिणायन आदि शब्द कालके वाचक नहीं है, बल्कि उस मार्गके अभिमानीदेवतामोके वाचक है, क्योंकि गीता ८।२७ में इसी प्रकरणम 'एति' शब्द मार्गका वाचक आया है। यदि रात्रि आदिको काल- बाचक शन्द ले लें तो २४ श्लोकमें अग्नि , ज्योति और २५ वें श्लोकमें धूम शन्द फालके वाचक नहीं हो सकते । वह अग्नि', ज्योतिः, अह आदि देवताओंके द्वारा परमधामको पहुँचाया जाफर मुक्त हो जाता है। [१३५ .

- परमार्थ-पत्रावलो. (२) क-आवागमनसे छूटनेवाले योगीके लक्षण-योगमार्गके दो भेद हैं, एक भक्तिप्रधान कर्मयोग, दुसरा कर्मप्रधान कर्मयोग । भगवत्-प्राप्त कर्मप्रधान कर्मयोगाके लक्षण गीता २ । ५५ से ७२ तक और भक्तिप्रधान कर्मयोगीके लक्षण गीता १२ । १३ से १८ तक देखना चाहिये। ख-आवागमनसे छुड़ानेवाले साधनरूप योगके लक्षण- कर्मप्रधान कर्मयोगके लक्षण गीता२।४५ ले.५१ तक और भक्तिप्रधान कर्मयोगके लक्षण गीता ८७से १० तक, १२ । ६ से १० तक और १८१५६से ६६ तक विस्तार- पूर्वक देख सकते हैं । जब यह अवस्था परिपक्व हो जाती है, तब गीता १६ । १ से ३ में जो देवी सम्पदाके लक्षण लिखे हैं वे उसमें आकर परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है। ग-संसारमें पुनरागमन प्राप्त होनेवाले योग और योगीके लक्षण- ऐसे योग और योगीके लक्षण गीता २ ! ४२ से ४४ तक, ७।२० से २३ तक, ८१२५ और ९ । २०- २१ में देखना चाहिये। (३) दोनों मागोंके जाननेवाले योगीके लक्षण और गति- दोनों मार्गीको जाननेवाला योगी वही है जो दोनों से श्रेष्ट एक अपुनरागमनके मार्गमें चलता है। उसके लक्षण ८१२० से २२ तक और गतिका प्रकरण गीता ८।२३ से २८ तकमें देखना चाहिये। १३६ ] -

द्वितीय भाग
(४) योग और योगीका स्वरूप--
फल और आसक्तिको त्यागकर भगवदाझानुसार
भगवत्प्राप्तिके लिये यश, दान, तप और सेवादि
कर्म एवं जप, ध्यान, पूजादि उपासनारूप कर्मोंका
फरना कर्मयोगका स्वरूप है और ये कर्म जिसमें ही वह
कर्मयोगी है।
(५) योग, भक्ति, ज्ञान आदि किसी भी मार्गसे भगवत्प्राप्त
पुरुपका, भगवत्प्राप्ति (कल्याण) होनेके उत्तर
कालमें अर्थात् जीवन्मुक्त होनेके बाद पुनर्जन्म नहीं
होता, चाहे वह किसी भी देश और कालमें मरे,
क्योंकि देश और कालादिसे उसका कोई सम्बन्ध
नहीं रहता।
(६) सकाम कर्म और सकाम उपासना करनेवाला पुनरा-
गमनको प्राप्त होता है । निष्काम कर्म और उपासना
करनेवाला पुनरागमनको प्राप्त नहीं होता । गीता
५ । १२ । यदि अन्त समयमे उसका चित्त योग, ज्ञान
या भक्तिके साधनसे विचलित हो जाता है तो यह
योगभ्रष्ट होने के कारण पुनरागमनको प्राप्त होता है,
किन्तु पुन जन्मान्तरमें उसी साधनमें तत्पर होकर
परम पदको प्राप्त हो जाता है । यही भगवान्का
आशय प्रतीत होता है। गीता ६।४० से ४५तकका
अर्थ देखना चाहिये।
[१३७

[६]
तुमने लिखा 'मेरा चित्त बहुत व्याकुल है। दशा बहुत
खराव है। ऐसी दशा कभी नहीं हुई। आगे क्या दशा होगी
कुछ समझमें नहीं आता।' सो भैया! जो हुआ सो तो हो चुका ।
अव तो चेतना चाहिये । अब तो तुम इस चातको भलीभाँति
जान ही गये कि लत्संगके विना भजन-ध्यान होना कठिन है
और भजन-ध्यान हुए विना दशा बिगड़ जाती है। अतएव अब
तुम्हें भजन-ध्यान-सत्संगके लिये ही चेष्टा करनी चाहिये । सत्-
शास्त्रोंका स्वाध्याय भी एक तरहसे सत्लंग ही है । अतएव
जवतक सत्संगकी व्यवस्था न हो तबतक सद्ग्रन्थोंका अभ्यास
करना चाहिये।
१३८]

.
[६१]
भाई ! तुमको जिस कामके लिये मनुष्यशरीर मिला है
उसको इस तरह भुलाना नहीं चाहिये । प्रथम तो मनुष्यका
जन्म ही बहुत कठिन है, फिर द्विजवर्ण तथा माता, पिता,
भाई, स्त्री, बच्चे और व्यापार आदि सबका मनके अनुकूल
होना
तो बड़े ही भाग्यकी बात है। आवश्यकतानुसार घरमकान
तथा रपये भी हैं। इस समय भी तुम आत्माके उद्धारका उपाय
नहीं करोगे तो फिर कब करोगे? इस प्रकारको अनुकूल
व्यवस्था सदा नहीं रहेगी। इसलिये जबतक मृत्यु दूर है,
शरीर आरोग्य है और सय व्यवस्थाएँ भी ठीक हैं, तभीतक जो
कुछ उत्तम कर्म करना हो, बहुत शीघ्रतासे कर लेना चाहिये
जिससे पोछे पछताना न पड़े। उपर्युक्त व्यवस्था में दो चार बाते
कम-ज्यादा हो जायें, अनुकूल न रहे, तो कोई हर्ज नहीं, परन्तु
अर गाफिल नहीं रहना चाहिये। अब तुम सासारिक विषयों में
फिस वातको और अनुकूलता चाहते हो ? तुम्हें ऐसी किस
चीजकी कमी है, जिसकी पूर्ति करके तुम अपने कल्याणके
लिये चेया करोगे? संसारमें एक श्रीभगवान्को छोड़कर और
कोई भी तुम्हारा नहीं है। माता, पिता, भाई,स्त्री, पुत्र, मकान, धन
सभी नाशवान् हैं। इनका सग बहुत ही थोड़े दिनोंका है।
इनमेंसे कुछ भी तुम्हारे साथ नहीं जायगा। और तो क्या,
तुम्हारा यह शरीर भी यहीं रह जायगा।
[१३९

[६३]
समय बीता जा रहा है । गया हुआ समय फिर हाथ
नहीं आता। इसलिये जबतक स्वास्थ्य ठीक है, मृत्यु दूर है।
तभीतक जो कुछ करना है सो कर लेना चाहिये। जिससे पीछे
पश्चात्ताप न करना पड़े । संसारकी दृष्टिसे इस समय तुम्हारे
२४४]

द्वितीय भाग
सब कुछ ठीक है । इससे अधिक ठीक और क्या होनेवाला
है ? इस समय भी तुम न चेतोगे तो फिर का चेतोगे?
एक भगवान्को छोड़फर तुम्हारा और कोई भी नहीं है।
अतएव उस परमप्रेमी भगवान्को एक क्षणके लिये भी नहीं
भूलना चाहिये । तन, धन आदि कोई भी वस्तु साथ नहीं
जायगी । इन सबको देकर बदलेमें साथ जानेवाली वस्तुको
सरीद लेना चाहिये। यानी शरीरको भगवान्के भजन, ध्यान,
सेवा, सत्संगमें लगाना चाहिये । रुपयोंको परोपकारमें लगाना
चाहिये । रुपयोंसे जव अधिकार छिन जायगा तव पछतानेसे
कुछ भी काम नहीं होगा । मनुष्यजन्मको सफल बनाना ही
मनुष्यत्व है । मनुष्यजन्ममें ही आत्माका सुधार और उद्धार हो
सकता है। अन्य किसी भी योनिमें नहीं हो सकता। इस
प्रकार समझकर अपना उद्धार शीघ्र हो जाय इसके लिये
कटिबद्ध होकर प्राणपर्यन्त चेष्टा करनी चाहिये । समयको
अमूल्य समझकर अमूल्य काममें ही उसे लगानेकी चेष्टा रखनी
चाहिये । और कुछ न बन सके तो हर समय ध्यानसहित
श्रीभगवान्के नामका निष्काम प्रेम-भावसे निरन्तर जप फरनेके
लिये तो अवश्य ही विशेष चेष्टा करनी चाहिये । नामजपके
प्रतापसे, भगवत्कृपासे बहुत जल्दी आत्माका सुधार और उद्धार
हो सकता है।
Atomin
[ १५५
५० भा०२-१०-

[६४] चिन्ता, शोक, भय कभी नहीं करना चाहिये । यदि मनुष्य करता है तो वह मूर्ख है । सांसारिक भोग-विलास, धन, स्त्री, पुत्रकी वृद्धि देखकर जो प्रसन्न होता है वह भी मूर्ख है और लांसारिक वस्तुकी हानि देखकर जो चिन्ता करता है वह भी मूर्ख है। सर्वत्र भगवान्की दया समझकर हर समय प्रसन्न रहना चाहिये । सांसारिक वस्तुओंके हानि-लाभमें भगवान्की लीला देखे, बहुत खुशी हो और पद-पदपर भगवान्- की दया देखे । शरीरमें किसी प्रकारको वीमारी होनेसे उसे तपस्या समझकर 'मैं तप कर रहा हूँ' ऐसा समझे और खूब प्रसन्नचित्त रहे । भगवान्ने दया करके भजन, ध्यान,भगवत्प्राप्ति- के लिये मनुष्यशरीर दिया है। सांसारिक भोग-विलासमें इसे नहीं खोना चाहिये । पापीसे पापी हो तब भी भगवान्के भजन, ध्यानसे वह पापसे छूटकर भगवानको प्राप्त हो जाता है। हमसे जो कुछ भी अच्छा काम होता है वह भगवान्की दयाले होता है और जो वुरा कर्म होता है वह हमारे स्वभाव-दोषसे होता है, ऐसा समझकर बुरा कर्म कभी नहीं करना चाहिये । हर समय भजन, ध्यान, सत्संग और सेवाके लिये कटिवद्ध होकर चेष्टा करना ही मनुष्यका कर्तव्य है। १४६ ]

[६५]
पत्र आपका मिला, अर आपकी क्या इच्छा हे ? आपको
किस बातकी जरूरत है आपको तो अब केवल अपने कल्याणके
लिये ही चेष्टा करनी चाहिये । मान-अपमानके बोझ भारको
अलग छोड़कर, जिस कामके लिये आपका संसारमें आना
[१४७

परमार्थ-पत्रावली
हुआ है, उस कामको ही करनेके लिये तत्पर हो जाना चाहिये
और विचारना चाहिये कि क्या करनेसे कल्याण हो सकता
है ? में जो कुछ करता हूँ इससे कितने समयमै कल्याण हो
सकता है ? जो इस तरहका विचार करता है वही धुद्धिमान्
है, परन्तु जो ऐसी बात अपने मनमें नहीं लांत उन्हें पीछे
पछताना पड़ेगा। जद आप यहाँले कृच कर जायँगे तब इस
संसारमै आपका कुछ भी सम्बन्ध नहीं रह जायगा और न
कोई वस्तु आपके काम ही आवेगी । यह शरीर भी आपके
काममें नहीं आवेगा । क्योंकि यह आपका नहीं
उस समय तो एक श्रीनारायणदेवका भजन-ध्यान ही यदि
लाधन किया गया होगा तो काममें आवेगा । या
उत्तम काममें यदि आपने कुछ रुपये भगवदर्थ लगाये
होंगे अथवा इस शरीरले कित्लीका उपकार किया गया
होगा तो वह काममै आवेगा । इसलिये आपले प्रार्थना है अब
तो आप अपने जीवनके शेप समयको उत्तम-से-उत्तम काममें
विता सके, ऐसी आपको चेष्टा करनी चाहिये, जिससे पीछे
पश्चात्ताप नहीं करना पड़े । आप इस समय संसारके जालमें
फंसे हुए हैं, इसलिये साधनकी विशेष चेष्टा करके इस संसार
के मायाजालसे जल्दी निकलनेका उपाय करना चाहिये।
१४८ ]

[६६]
पत्र आपका मिला, सत्सगका प्रभाव जान लेना चाहिये,
फिर कोई चिन्ताको वात नहीं है। इस संसारमें पलभरके
सत्सकके समान त्रिलोकीका राज्य भी कोई चीज नहीं है।
किन्तु खेद तो यह है कि आप लोग जिस प्रकार रुपयोंका
प्रभाव जानते हैं वैसा सत्सङ्गका नहीं जानते, क्योंकि जैसा
आप लोगोंगा रुपयों में प्रेम है, वैसा भगवान्में नहीं है। फिर
श्रीपरमात्मादेवमें प्रेम हुए विना सत्सङ्ग भजनमें कैसे प्रेम हो ?
आप लोग समझते हैं, रुपयोंसे सब कुछ हो सकता है, यह
विल्कुल भूल हे । रुपयोंसे भगवान् कभी नहीं मिल सकते।
भगवानकी बात तो दूर रही भगवान्के प्रेमी भक्तोंसे भी
रुपोंके द्वारा मुलाकात नहीं हो सकती । यदि मुलाकात होती
है तो प्रेमसे ही होती है । प्रेमके अधीन तो श्रीनारायणदेव
म्वय रहते हैं, फिर दूसरेकी तो बात ही क्या है ? संसारमें
[१४९

परमार्थ-पत्रावली प्रेमके समान कुछ भी नहीं है। किन्तु प्रेमके प्रभाव और मर्मको कोई प्रेमी ही जानता है। भगवत्-विषयक प्रेममें बहुत आकर्षण- शक्ति है, किन्तु एक बार लगनेकी जरूरत है । जबतक मनुष्य अगवान्के प्रभावको श्रीनारायणदेवके प्रेमके मर्मको नहीं जानता है, तबतक वह कैसे जान सकता है कि भगवान् क्या वस्तु हैं ? श्रीनारायणदेवके प्रेममें जो मग्न हो जाता है, उसके लिये तो नारायणदेव स्वयं तैयार रहते हैं, फिर उसके लिये त्रिलोकीका राज्य भी क्या चीज है ? क्योंकि त्रिलोकीके स्वामी ही प्रेमवश उसके सामने हाजिर हैं ! अपने भक्तके अधीन हैं । फिर उसके लिये क्या पानेले वाकी रह गया ? भाई, इस प्रकारकी बातोंको जानकर यदि विश्वास कर लिया जाय तो फिर इस काममें अपनेको लगा देनेमें कोई बड़ी बात नहीं मालूम पड़ेगी और संसारके रुपयोंका रोजगार तुच्छ मालूम होने लग जायगा। अले ही कोई नीतिके अनुसार संसारका रोजगार करता भी रहे किन्तु प्रेम तो उसका एकमात्र भगवान्में ही होना चाहिये। भगवत्प्रेसीका भले ही सब कुछ नाश हो जाय परन्तु उसको इस वातकी चिन्ता नहीं होती क्योंकि उसका प्रेम तो संसारके इन नाशवान् तुच्छ क्षणभङ्गुर पदार्थों में होता नहीं, उसको तो ये सब प्रत्यक्ष ही नाश हुए दीखते हैं। तब उसका इनमें प्रेम कैसे हो? जोसंसारके भोगोंमें आनन्द मानकर उनके लिये मर रहे हैं, वे महामूर्ख हैं, ऐसा भगवान्के भक्त और विरक्त लोग कहते हैं । क्योंकि उन्हें तो संसारके सब भोग फीके ही लगते हैं। १५० ]

[६७]
पत्र आपका मिला, भगवान्के भजन-ध्यान करते समय
अपने चित्तम रिसेपका होना लिसा सो टीक है । वह निक्षेप
नामके जपमा तीन अभ्यास ओर विषयोंमे दोपहष्टि करके
वैराग्य करनेसे मिट सकता है क्योंकि शरीर और रुपयांकी
आसक्ति ही निक्षेप होने में प्रधान कारण है। शरीर और रपये
नाशवान् पदार्थ है, ऐसा चार चार विचार करनेपर चित्त
परमात्माम लग सकता हे । संसारके सम्पूर्ण पदार्थोको और
[१५१

परमार्थ-पत्रावली शरीरको नाशवान् और क्षणभङ्गुर समझना चाहिये । भजन- ध्यानके लिये आपने फिर जोरसे चेष्टा करनेकी बात लिखी सो बहुत आनन्दकी बात है । आप-जैसे समझदार व्यक्तिको स्त्री, पुत्र, शरीर और रुपयोंके प्रेममें फंसकर अपने अमूल्य समयका एक क्षण भी वृथा नहीं गँवाना चाहिये । क्योंकि ये सब अनित्य होनेके कारण वास्तवमें तो हैं ही नहीं, यदि हैं भी तो विवेकदृष्टिले दुःखरूप ही हैं। परमात्माकी प्राप्तिमें ये सव साधक नहीं हैं बल्कि बाधक ही हैं । किन्तु ये सब ईश्वरमें लगा देनेपर साधक भी हो सकते हैं। पर सबसे ऐसा होना सहज नहीं। स्त्री पुत्र, धनकी तो बात ही क्या है शरीर भी अपने साथ जानेवाली वस्तु नहीं है, इस प्रकारका विचार करके जो मनुष्य इनसे प्रेम नहीं करता वही सुखी होता है। मनुष्य जब उस सच्चिदानन्दघन परमात्माके ध्यानमें सुग्ध हो जाता तब उस समय उसे त्रिलोकीका राज्य भी तुच्छ प्रतीत होता है। किन्तु इसे जानकर भी मनुष्य इन तुच्छ भोगोंमें फँस जाते हैं, यह बड़े आश्चर्यकी बात है! है अच्छे पुरुषोंका सत्संग मिलनेपर साधन तेज हो सकनेकी बात आपने लिखी लो ठीक है। यद्यपि अच्छे पुरुषोंका सत्संग बड़े भाग्यसे मिलता है किन्तु कोशिश करनेसे कुछ भी दुर्लभ नहीं है। आराम और रुपयोंकी कोई परवा न हो तब तो अच्छे पुरुषोंसे बहुत दफा मिलना हो सकता है। इसके लिये आप विशेष चेष्टा क्यों नहीं करते हैं ? आपको इस विषयमें विचार करना चाहिये। आप तुच्छ धनके लिये समय और १५२] द्वितीय भाग धनका व्यय करके तो दूर-दूरकी यात्रा करते हैं तथा शारीरिक परिश्रम उठाते हैं किन्तु आप विज्ञानानन्दघन परमात्माके ध्यानरूपी धनके लिये क्यों नहीं यथोचित परिश्रम करते? यह यात समझमें नहीं आती। यदि इसका हेतु मान यड़ाई-प्रतिष्ठा है तो आपको विचार करना चाहिये कि वह मान-चढ़ाई-प्रतिष्ठा हमारे किस काम आवेगी ? यदि शरीरके परिश्रमकी कोई बात हो तो फिर शरीर है ही किसलिये यदि भज्ञान हेतु है तो उसको विवेकविवारके द्वारा नाश करना चाहिये, नहीं तो बहुत भारी पश्चात्तापका सामना करना पड़ेगा। यदि रुपयोंकी हानि या व्यय इसमें कारण हो तो विचार करना चाहिये फिर वे इकट्ठे किये हुए रुपये आपके किस काम आयेंगे । यदि कुटुम्ब या व्यापार आदिको सुव्यवस्था करनेके कारण सत्संगमें जाना नहीं होता, तब तो आपको विचार करना चाहिये कि इन सबसे चढ़कर जो आपका प्रधान कार्य है, उसकी सुव्यवस्था क्या आपको नहीं करनी है ? जगह, जमीन, मुकद्दमा, मकान, कुटुम्ब आदिकी सुव्यवस्था तो आपके परलोक सिधारनेके बाद भी आपके उत्तराधिकारी कर सकते है, किन्तु आपके कल्याणकी व्यवस्था आपके परलोक सिधारनेके बाद आपको छोड़कर और किसीसे होनेकी नहीं है। अतएव जबतक शरीर आरोग्य हे और मृत्यु दूर हे इसी समय आपको जो करना है उसे अति शीघ्रतासे अपनी आत्माके कल्याणके लिये जोरोंके साथ चेणा कर लेनी चाहिये। . [१५३ में [६८] आपके प्रेमके अनुसार पत्र नहीं लिख पाता है. फिर भी आप पत्र देते ही रहते हैं, यह आपकी बढ़ी कृपा है। समयपद मेरे पत्र न देनेके दोषको आप दोष नहीं समझत यह आपके प्रेम और भावकी बात है। श्रीभगवान्के विषयको लेकर जो प्रेम है वह भगवान्के साथ ही प्रेम है। आपके पिताजी वीमार है उनकी आज्ञा विना उन्हें छोड़कर आपका आना ठीक नहीं है। इधर मैं भी कई कारणोंसे नहीं आ सकता । इस प्रकार हमलोगों न मिलनेमें कुछ प्रारब्ध भी कारण समझा जा सकता है। परन्तु श्रीनारायणदेचके साथ यदि प्रेम किया जावे तो उनके मिलनमें प्रारब्ध कुछ भी बाधा नहीं पहुँचा सकता। आपको पहले भी लिखा गया था और फिर लिखा जाता है कि श्रीनारायणदेयके साथ पूर्ण प्रेम हो, इसी चातकी चेष्टा करनी चाहिये। संसारमें श्रीसगवान्के प्रेमके समान कुछ भी नहीं है। श्रीपरमात्मादेव ही प्रेमके मर्मको अच्छी तरह जानते हैं। उनके साथ प्रेम हो जानेपर उन्हें आना ही पड़ता है। कोई भी उन्हें रोकनेवाला नहीं है। श्रीनारायणदेव प्रेमके आधीन हैं। प्रेमके मर्मको जो कोई जानता है, वही प्रेममें चिक जाता है। श्रीनारायणके जो प्रेमी भक्त हैं उनसे नारायणका वियोग नहीं सहा जाता और इस कारण नारायणदेवको उनके पास आना ही पड़ता है। आप लोग जवतक श्रीभगवान्का वियोग सह रहे हैं तभीतक भगवान्का वियोग हो रहा है। जिस दिन आप लोग श्रीभगवानके वियोगसे गोपियोंकी भाँति विह्वल हो जावेंगे उसी दिन १५४] द्वितीय भाग भगवान्को आप लोगोंके पास तुरन्त ही आना पड़ेगा । यदि मेमके द्वारा श्रीनारायणदेवको जीतना चाहें तो और भी अधिक प्रेमकी जरूरत है। जो घड़ा प्रेमी होता है वह तो करणासे विरल होकर भगवानसे आनेके लिये भी प्रार्थना नहीं करता। उन भक्तोंके मनमें ऐसा भाव होता है जो प्रेमके अधीन हे तथा प्रेमके मर्मको भलीभॉति जाननेवाला है वह प्रेमीके हाथ प्रेममें विक जानेके लिये सदा तैयार रहता है। वह अपने प्रेमी के पास गये विना एक पलक भी नहीं रह सकता । यही समझफर प्रेमी कभी भगवानको धुलानेकी प्रार्थना नहीं करता क्योंकि वह जानता हे कि भगवान् अन्तर्यामी है और प्रेमके मर्मको समझनेवाले है तथा प्रेमके अधीन है । फिर वह फिसलिये खुशामद करे ? दूसरी वात वह यह सोचता है कि इतना प्रेमी होकर भी वह तुम्हारा वियोग सह रहा है फिर तुम्हारे लिये इतना वियोग सहना कुछ भी बड़ी बात नहीं होनी चाहिये। क्योंकि तुम तो प्रेमके मर्मको उतना जानते ही नहीं। इसलिये इस विषयमें तुमको शूरवीरता रखनी चाहिये । श्रीभगवान्की शूरवीरताको देखकर भी तुमको शूरवीरता करनी चाहिये। तुम प्रेम करते रहोगे और प्रार्थना नहीं करोगे तो अन्तमें हारकर उनको दर्शन देना ही पड़ेगा। इस विषयमें भगवान् इतने शूरवीर नहीं है । यदि तुम खुशामद फरोगे तो वे ओर ज्यादा सुशामद करावंगे । इसलिये विशेष खुशामद करनेकी जरूरत नहीं। बल्कि उनसे उल्टी खुशामद करवानी चाहिये। यदि तुम्हारा निष्कामभावसे तीव्र प्रेम होगा तो तुम फरायोगे ओर धके भी मारोगे तो भी चे आयंगे ही। उलटी खुशामद

[६९]
आपने लिखा कि जल्दीसे काम बन जाना चाहिये, सो
ठीक है । निरन्तर भजन-ध्यान होनेपर जल्दीसे काम बन सकता
है। यदि काम देरसे भी बने तो कोई हर्ज नहीं किन्तु निष्काम
प्रेमभावसे निरन्तर भजन-ध्यानका साधन तो होते ही रहना
१५६]
2..

द्वितीय भाग
चाहिये । संसारमें श्रीभगवानके निष्काम भजन-ध्यानके समान
और कुछ है ही नहीं। ऐसा भजन-ध्यान सत्संगसे हो सकता
है । उस सत्संगका रहस्य जानना चाहिये। यह जानना चाहिये
कि सत्संग कहते किसे हैं ' सत्संगका मर्म जान लेनेके बाद
मनुष्य उसको कभी नहीं छोड़ सकता। क्योंकि सत्संगके
सामने संसारमें और कोई चीज उसे अच्छी लगती ही नहीं।
सत्संगी पुरुषोंके दर्शनसे भी बहुत कुछ लाभ होता है। फिर
सत्संगकी तो बात ही क्या है ? सत्सगद्वारा जो किसी-किसीको
विशेष लाभ नहीं दिखायी देता इसका कारण यही है कि वे
सत्संगको जैसा चाहिये वैसा उत्तम नहीं समझते हैं। यदि
सत्संगको सबसे उत्तम मोर उसका तत्व समझकर श्रद्धा
और प्रेमके साथ सत्संग किया जाय तो सत्संग छोड़कर
जाना नहीं बनता। शरीर भले ही नाश हो जाय पर जातक
शरीरमें माण हे, तबतक सत्संगके अतिरिक्त दूसरा काम
उससे किस तरह हो सकता है ? क्योंकि जिन पुरुपोंको
श्रीनारायणदेवके दर्शन हो चुके हैं। उन्हींक सगका नाम सत्संग
है । अब विचार करनेकी बात है कि ऐसे पुरुषोंका यदि किसीको
संग प्राप्त हो जाय तो फिर वह उनका संग जान-बूझकर
छोड़ सकता है ? भगवान्के साधारण भक्तोंका मिलना भी
साधारण सत्संग है और उसके अनुसार ही लाभ होता है।
[१५७

[७०] आपने जो हरदम ध्यान बने रहनेका उपाय पूछा सो श्रीभगवान्में पूर्ण प्रेम होनेसे ही हरदम उनका ध्यान वना रह सकता है। क्योंकि जिस वस्तुमें प्रेम होता है उसका अपने- आप ही बारंवार चिन्तन होता है। श्रीनारायणदेवका भजन करनेसे पापोंका नाश हो जाता है, भगवान्में प्रीति उत्पन्न होती है और जहाँ श्रीभगवान्में सच्चा प्रेम हुआ कि अपने आप ही निरन्तर उनका ध्यान बना रहने लग जाता है। पूर्वजन्म तथा इस जन्मका किया हुआ पाप ही कष्टसाध्य बीमारी है। उसके नाशके लिये श्रीभगवान्के नामका जप ही असली ओपधि यानी बूटी है। और श्रीभगवान्का भक्त ही सच्चा वैद्य है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और संसारके विपयभोगोंका त्याग इत्यादि और भी जो बहुतसे उत्तम आचरण हैं, वे पथ्य हैं। उपर्युक्त ओपधिका सेवन करनेसे जो रुचि पैदा होती है वह श्रद्धा है । और जो प्राणोंका आधार श्रीभगवान्का ध्यान है, वही जीवनको रक्षा करनेवाला अन्न है, आरोग्यतारूपी सुख है, वही अमृत है, वही अनामयपदकी प्राप्ति है । उपर्युक्त ओपधि बहुत ही तेज है, यदि पथ्य-परहेज न भी हो तो भी कोई हर्ज- की वात नहीं, इस ओपधिका सेवन वरावर होते रहना चाहिये। यदि किसी समय कोई कुपथ्य हो जाय तो समयपर वैद्यसे सलाह भी लेते रहना चाहिये। फिर तो कोई भी चिन्ता नहीं है। १५८] [७१] आपने लिया कि 'मैं संसारके जालमें बहुत फॅस रहा हूँ सो ठोक हे । संसारके मोहको जाल समझ लेनेके याद फिर जान-बूझकर कोई भी उसमें फँसना नहीं चाहता है । मनुष्य संसारके नाशवान् भोगोंमें अज्ञानके कारण आनन्द तथा सञ्चा सुख समझता है किन्तु जन उसे संमारके मोहजालका ज्ञान हो जाता हे तव उसे ससारके सभी पदार्थ प्रत्यक्ष क्षणभंगुर दीखने लग जाते है तथा उस समय भूलसे संसारके पदार्थों में जो आनन्द भासता था, वह सय दुसरूप भासने लग जाता है। इसकी पहचान यह है कि जब एकमात्र सच्चे प्रेमी नारायणदेवके भजन-ध्यान तथा सत्संगके समान कुछ भी अच्छा न लगे तब समझना चाहिये कि संसारका मोह अय जालरूपले प्रत्यक्ष दीसने लग गया है। विचार करनेकी बात है कि मोहजालको जानकर फिर कौन उसको फाँसीमें फंसेगा? किन्तु मनुष्यों असान भरा हुआ है इसलिये उसको मोहजाल भी सुखरूप भासता है। अन' भजन-ध्यान एवं सत्संगका साधन सूच जोरके साथ निकामभावसे फरना चाहिये । ऐसा होगा तो मोहजाल- से छूटना कोई भी बड़ी बात नहीं है। [१५९

[७२ ]
आपका पत्र मिला, मानापमानको समान समझकर तथा
सवको भगवान्का स्वरूप जानकर निकामभावसे सबकी सेवा
करनी चाहिये। फिर भगवत्कृपासे अपने-आप ही भगवान्में
प्रेम हो सकता है । भगवद्भाव होनेपर किसीपर क्रोध भी नहीं
आ सकता, क्योंकि भगवान्पर किसीको क्रोध नहीं माना
चाहिये । यदि क्रोध आवे तो ऐसा समझना चाहिये कि वहाँ
भगवद्भाव नहीं है। अपने चित्तमें कभी किसीपर उद्वेग
नहीं होना चाहिये । कोई भी परिस्थिति हो, उसीमें आनन्द
मानना चाहिये, क्योंकि जो कुछ भी होता है मालिककी आज्ञासे
ही और मालिकके अनुकूल ही होता है। फिर यदि सब कुछ
मालिकके अनुकूल ही होता है तो अपनेको भी मालिकके अनुकूल
ही बनना चाहिये। यह निश्चय रखना चाहिये कि भगवान्की
विना इच्छा कुछ भी नहीं हो सकता। उनकी आज्ञाके विना
एक पत्ता भी नहीं हिल सकता । जो ऐसा समझता है वह
मालिककी राजीमें राजी रहनवाला सब समय आनन्दमें मग्न
रहता है।
१६०]

[७३]
आपने लिसा कि 'मेरा चित्त खराब रहता है, कुछ
उपदेशको चात लिखिये' सो उपदेशकी बात लिसनेमाला में कोन
हूँ? कुछ शास्त्रांकी बातें लिखी जाती है यदि आपको इनसे
लाभ मालूम हो तो इन्हें काममें लाना चाहिये।
आप अपने मनको प्रसन्न रखनेके लिये कोई उचित उपाय
तो करते ही नहीं हैं फिर आपका मन सराव नहीं रहेगा नो
[१६१
१० मा०२-११
-

परमार्थ-पत्रावली कैसा रहेगा ? संसारके अन्य पदार्थ या रुपये प्रथम तो प्रारब्धसे मिलते हैं और यदि मिल भी जायँ तो वे सर्वथा क्षणभंगुर एवं नाशवान् हैं । और जब संसारके सारे पदार्थ नाशवान् हैं तव उनसे आनन्द कैसे मिल सकता है ? यदि एक क्षणके लिये आप उनके मिथ्या आनन्दको 'सच्चा आनन्द मान भी ले तो भी आपको यह विचार तो करना ही चाहिये कि जिन पदार्थो के संयोगमें जितना आनन्द है, उनके वियोगमें उससे भी बहुत अधिक दुःख होगा। संसारके पदार्थों के साथ तो अवश्य वियोग होता ही है। उनमें आनन्द तो बिल्कुल है ही नहीं, बल्कि विचार करनेसे उनमें दुःख-ही-दुःख है। लोगोंने भूलसे सूर्खतावश उनमें आनन्द मान रक्खा है। यही कारण है कि लोग इन पदार्थोके मोहमें पड़कर अपना अनमोल समय विता रहे हैं । सच्चा और एकमात्र आनन्द तो यादिपुरुप श्रीनारायण- देवके दर्शनले ही प्राप्त होता है। श्रीपरमात्मदेवसे मिले विना मनुष्यको लची शान्ति नहीं मिल सकती। प्रेसके विना श्रीभगवान् नहीं मिलते और भजन-ध्यानके साधन तथा सत्संगके विना भगवान्में प्रेम नहीं होता है इसलिये यदि आपको सच्चे आनन्दकी इच्छा है तो श्रीभगवान्के भक्तोंका सत्संग और भजन-ध्यानरूप भगवान्के दर्शन करानेवाले उपायमें लगना चाहिये। GANES-

[७४]
आपने मनको वशमें करनेके उपाय पूछे सो ठीक हे । मनको
वश करनेके बहुत-से उपाय हैं, उनमें कुछ लिखे जाते है।
(क) जहाँ जहाँ मन जाय, वहीं वहीं श्रीपरमात्माके स्वरूपको
देखना चाहिये।
(स) जहाँ-जहॉ मन जाय यहॉचहॉसे उसे खींचकर श्रीभगवान्के
ध्यानमें लगाना चाहिये।
[१६३

परमाथ-पत्रावला (ग) एकतार श्वासद्वारा लम्बे स्वरसे नामका जप करना चाहिये । तार नहीं टूटने देना चाहिये। (घ) संसारको नाशवान् और क्षणभङ्गुर समझकर एक नित्य सत्य चेतन आनन्दघनका ही चिन्तन करना चाहिये । और सवको भूल जाना चाहिये। (ङ) सत्-चित्-आनन्द-धनमें एकीभावसे स्थित हुआ, सम्पूर्ण संसारका द्रष्टा होकर फिर इस दृश्यको भूल जाना चाहिये । तव शेपमें एक परमात्मा ही रह जाते हैं। गीता अध्याय १४ श्लोक १९ के अनुसार या गीता अध्याय ६ श्लोक २४, २५ तथा २९ के अनुसार साधन करनेसे मन बहुत जल्दी वशमें हो सकता है। और भी बहुत-से उपाय हैं। भगवान के प्रेममें मग्न हो जानेसे भी मनका नाश हो सकता है, अथवा वह अपने अधीन हो सकता है। उस समय भी मनमें संसारकी भी स्फुरणा नहीं होती। आपने पूछा कि भगवान्में बहुत जल्दी प्रेम होनेके कौन- कौन-से उपाय हैं ? सो ये हैं- (१) निष्कामभावसे भगवान्के नामका निरन्तर जप और स्वरूपका ध्यान करनेकी चेष्टा करना । (२) भगवान्के गुण, प्रभाव और मर्म (तत्त्व) की कथा भगवान्के भक्तोद्वारा सुनना, पढ़ना और कथन करना। (३) भगवान्के आज्ञानुसार निष्कामभावसे सब कर्म भगवान्के लिये ही करना। १६४] 1 .

द्वितीय भाग (४) मनमें भगवान्के मिलनेकी तीव्र इच्छा रखना और उनके नाम-गुणोंको सुनकर आनन्दमग्न होना । इन उपायोंका अवलम्बन करनेसे भगवान्में बहुत जल्दी प्रेम हो सकता है। और भी बहुत-से उपाय है। प्रेम होनेसे भगवान् मिल सकते है। और अनन्य प्रेमसे तो बहुत ही जल्दी मिल सकते है। आपने लिखा कि साधनके लिये बहुत अच्छा मौका मिला है सो तो ठीक ही है। परन्तु ऐसा मानते हुए भी आप तेज साधन करनेके लिये विशेष परिश्रम क्यों नहीं करते है ? आपने लिया कि यदि चोचमें मृत्यु आ जायगी तो मनकी मनमें ही रह जावेगी, सो चहुत ठीक है। यदि इस तरह सच्चा विश्वास हो तो फिर एक पल भी भूल नहीं होनी चाहिये । ऊँचे-से-ऊँचे साधनके लिये निरन्तर भजनसहित श्रीपरमात्म- देवका ध्यान करना चाहिये । ऐसा करते करते शेपमें एक सत्- चित्-आनन्द धन ही रह जाता है। उस समय और किसीका चिन्तन नहीं रह जाता। इससे बड़ा और ऊँचा कोई दूसरा साधन मुझे मालूम नहीं है। ऐसे ध्यानके लिये पहले सय वार्त लिखी जा चुकी हैं । उनका पालन करनेसे भगवान् बहुत जल्दी मिल सकते हैं। भगवान्की प्राप्तिके बाद भला शान्तिम किस प्रकार त्रुटि रह सकती है ? श्रीसगुण भगवान्की प्राप्तिके लिये भी समयका कुछ नियम नहीं है । यदि अनन्य प्रेमसे भगवान्के ध्यानमें मग्न हो जाय तो एक ही दिन भगवान् मिल सकते हैं। भगवान्की [१६५ परमार्थ-पत्रावली ओरसे उनके मिलनेमें तो ढील है ही नहीं, साधककी ढीलसे ही भगवान्के मिलनेमें ढील हो रही हैं। आपने लिखा कि भगवानके न मिलनेसे मनमें धैर्य नहीं है, सो यह लिखना ठीक वनता नहीं है क्योंकि जिस दिन मनमें धैर्य नहीं होगा, जिस दिन श्रीभगवान्के विना नहीं रहा जायगा उस दिन तो भगवान्को आना ही होगा। जबतक आप भगवानका वियोग सहन कर रहे हैं, तभीतक उनका वियोग हो रहा है। जिस समय आप भगवान्के मिले बिना एक क्षण भी नहीं ठहर सकेंगे तथा विछोहके कारण आपका मन मछलीकी तरह तड़फड़ाने लगेगा फिर भगवान्की ओरले देर हो ही नहीं सकती। भगवान्को प्रकट होना ही होगा । भगवान् सब जगह विराजमान हैं। कहीं दूरसे उनको आना नहीं पड़ता। उत्कण्ठा होनेपर वे सब जगह दीखने लग जाते हैं, किन्तु यह तभी होता है जब उपर्युक्त साधनोंको करनेके लिये मनुष्य कटिवद्ध हो जाता है। इन साधनोले ऊँचा कोई साधन है ही नहीं। आपने अपनेमें सामर्थ्यका अभाव बतलाया सो ठीक है, किन्तु भगवान्के शरणागत होनेसे उनकी कृपासे आप ही ऊँचे-से-ऊँचे साधन करनेकी शक्ति आ जाती है। इस बातपर विश्वास होना चाहिये। आपने लिखा कि भगवान्की कृपाकी स्फुरणा मुझे विशेष होती है, लो यह बड़े आनन्दकी बात है। आप भगवान्को पतित- पावन समझते हैं, सो ठीक है, परन्तु जो पतित होता है वह तो किसीसे भी घृणा नहीं करता, चाहे कोई चमार हो, चाहे कुत्ता हो, वह अवसर मिलनेपर उनकी भी सेवा बहुत प्रेमसे करने लग जाता है। सभी जीवोंको भगवान्का स्वरूप समझकर द्वितीय भाग सयकी निष्कामभावसे सेवा करने लगता है। उसका शरीरमें अहंभाव नहीं रह जाता । यदि कुछ भी अहंभाव रहा तो वह अपनेको सबसे नीचा कैसे समझे? और उसका पतितपावन भगवान् किस प्रकार उद्धार करें ? आपने जो लिसा कि कोई ऐसा साधन होना चाहिये, जिससे भगवान् बहुत जल्दी मिले, यदि जल्दी न मिले तो अन्तकालमें जरूर मिलें और यदि अन्तकालमें भी नहीं मिले तो दूसरे जन्ममें तो जरूर ही मिलें, सो ठीक है। परन्तु आपको इतनी हिम्मत नहीं हारनी चाहिये। अन्तकालके करारपर भी नहीं रहना चाहिये, फिर दूसरे जन्मकी तो बात ही कौन है? आपको तो इसी जन्ममें बहुत जल्दी मिलनेकी कोशिश करनी चाहिये। यदि आप दूसरे जन्मके भरोसे रहेंगे तो फिर इस जन्ममें भगवान् कैसे मिल सकेंगे और भगवान्के मिले विना धेर्य नहीं होता तथा मनको चैन नहीं पड़ती, इस प्रकारका आपका लिखना कैसे बन सकता है ? आपके मनमें भगवान्के मिलनेकी उत्कण्ठा होगी तो आपको एक पल भी युगके समान लगेगा । भगवान्के लिये काम छोड़नेकी कोई जरूरत नहीं बल्कि भगवान्में मन लगाकर काम करना चाहिये। काममें भले ही हर्ज होजाय परन्तु श्रीभगवान्के भजन-ध्यानमें हर्ज नहीं होना चाहिये। संसारका काम छोड़नेस भगवान् उतना प्रसन्न नहीं होते है जितना मुरयवृत्तिसे भगवान् के नामका जपसहित ध्यान करते हुए गीणवृत्तिसे संसारका काम करनेमे प्रसन्न होते हैं। इसलिये आपको चाहिये कि श्रीपरमेश्वरका ध्यान करते हुए संसारका काम करनेका अभ्यास करें। इस प्रकार यदि काममें कुछ हर्ज भी होता होतो [१६७ । परमार्थ-पत्रावली ध्यान नहीं छोड़ना चाहिये। भगवान्काध्यान रखते हुए ही जितना बन सके उतना काम करना चाहिये। यदि भगवान्के ध्यानको निरन्तर बनाये रखते हुए काममें भी कोई हर्ज नहीं हो तो और भी अच्छी बात है। पहले आपको मना किया गया था कि आप मेरी बड़ाई न लिखा करें, मेरी बढ़ाई करनेसे क्या लाभ होगा? फिर भी आप मेरी झुठी बढ़ाई लिखते हैं, मैं ऐसी हालतमें प्रेमवश ही आपको पत्रका उत्तर लिख रहा हूँ। अब आगेसे फिर कभी ऐसा नहीं लिखना चाहिये। आपने लिखा कि आपके आज्ञानुसार काम करनेका विचार है, ऐसा भी नहीं लिखना चाहिये। श्रीभगवान्के साक्षात्कार होनेका साधन लिखा गया है । उनके अनुसार यदि आप साधन करेंगे तो बहुत जल्दी भगवत्प्राप्ति हो सकती है। श्रीभगवान्के मिलनेके बाद तो आप-से-आप आनन्दमें निरन्तर मग्न रहनेकी स्थिति प्राप्त हो जाती है। आपने लिखा कि पहले ही इस योग्य चन जावें तब दूलरा काम करें, सो ठीक है । ऐसा समझकर ही भगवत्प्राप्तिवाले काममें आपको कटिबद्ध होकर लगना चाहिये। क्योंकि जिस कामके लिये संसारमें आना हुआ है उस कामको जरूर ही बनाना चाहिये । इस कामको मुख्यरूपसे बनाते हुए ही शरीरनिर्वाहके लिये संसारके कामोंकी चेष्टा करनी चाहिये। संसारके काममें हर्ज हो तो भले ही हो, परन्तु श्रीपरमात्माकी माप्तिवाले काममें कदापि हर्ज नहीं होना चाहिये। १६८]

[७५]
आपने वैराग्य, भक्ति और प्रेमको वातोंके लिये लिखा सो
घड़े आनन्दकी बात है । आपके भजन-सत्सङ्गका साधन कैसा
होता है ? शास्त्रोंका अभ्यास कैसा होता है ? लिखिये-
(१) संसारके सारे भोगोंको मिथ्या जानकर, केवल
शरीरनिर्वाहके लिये अन्न-वस्त्र जो कुछ भी मिल जाय उसीमें
[१६९
-

परमार्थ-पत्रावली निर्वाह करना चाहिये । ऐश-आराम, स्वाद-शौकीनी आदि इन्द्रियोंके सारे भोगाको विपवत् त्याग देना चाहिये। संसारके सारे भोग मिथ्या हैं । यदि मिथ्या न दोखे तो क्षणभङ्गुर और अन्तमें दुःख देनेवाले तो है ही। ऐसा समझकर भोगांसे उपराम होना चाहिये । ये विषय-भोग कल्याण-मार्गमें बहुत ही हानि पहुँचानेवाले हैं, ऐसा मानकर इन्हें मनसे छोड़ देना चाहिये । (२) श्रीपरमेश्वरमें ऐसा प्रेम करना चाहिये, जिससे चित्तले कभी भी उनके स्वरूपका ध्यान न छूटे। जिस प्रकार कामीको स्त्रीम, लोभीको रूपयास प्रेम होता है, उसी प्रकार हमारा परमेश्वरमें प्रम होना चाहिये। एकमात्र परमेश्वर ही प्रेस करने लायक हैं। भगवान् भजन करनेवालके पाप, अवगुण और जाति नहीं देखते, केवल प्रेम ही देखते हैं। वे सबके साथ लमानभावसे वर्ताव करते हैं ऐसा जानकर उन भगवान्को कभी नहीं भूलना चाहिये । जो भगवान्के मर्मको जान लेता है, उसका भजन-ध्यान कमी नहीं छूट सकता । उसको भगवान्के नासका जप और उनके स्वरूपके ध्यानके समान और कुछ भी दिखायी नहीं देता है। भगवान्के नामका जप, स्वरूपका चिन्तन, उनके गुणानुवादका कीर्तन तथा भगवान्की मानसिक पूजा; नमस्कार और उनके चरणोंकी सेवा, एवं भगवान्को मालिक, प्रेमी, परम सखा समझकर प्रेमसहित सब कुछ समर्पण कर देना ही उनकी उत्तम भक्ति है। १७०]

[७६]
भाई ! आप कई बार बीमार पड़े, बहुत तकलीफ पा
चुके फिर भी आपको चेत नहीं होता। तय क्या लिखा जाय,
यदि शरीरपात हो जाय तो फिर भगवान्के विना और कौन
है? यदि भगवान्में प्रेम श्रद्धा-भक्ति नहीं हुई तो बहुत ही
मुश्किल है । ऐसा विचारकर श्रीनारायणदेव में शीघ्र प्रेम करना
चाहिये । ससारमें तथा शरीर और संसारके भोगोंमें आपका
इतना प्रेम क्यों है ? यह कुछ भी समझमें नहीं आता।
इस अमार संसारके नाशवान् तथा क्षणभङ्गुर भोगोंमें
आप किसलिये फंस रहे है १ शरीर भी थापके साथ नहीं
जायगा, तव भोग कैसे जा सकते है ? स्त्री-पुत्र तो कभी साथमें
जा ही नहीं सकते। आजतक वे किसीके साथ गये भी नहीं।
जिन पुरुपोंका इन विपय-भोगोंमें प्रेम होता है, उनकी अन्तम
इनमें वासना रह जाती है, इस कारण संसारमें उनका जन्म
होता है । परन्तु जो श्रीपरमात्मदेवका चिन्तन करते हुए
मरते है वे उन्हींको प्राप्त होते है । ऐसा शास्त्रका नियम है और
श्रीभगवान्की आज्ञा है। इस बातपर जिनका पूरा विश्वास
हो जाता है वे फिर एक पल भी भगवान्को कैसे भूल सकते
है ? ऐसा जिनका विश्वास है उनको धन्यवाद है । आपका
सह होते कितने दिन हो गये आपको विचार करना चाहिये।
यदि भारम्भसे ही आप लगातार साधन करते तो आपका
अबतक बहुत ऊँचा दर्जा हो गया होता । आजतक आपने क्या
साधन किया ? इसी तरह आगे भी करते रहेंगे तो आपके
[१७१

परमार्थ-पत्रावली
लिये ठीक नहीं है, इसलिये अब तो आपको चेतना ही चाहिये।
यद्यपि आपको लत्सङ्गका भरोसा है तथापि सत्सङ्गका यह
सिद्धान्त नहीं मानना चाहिये कि भजन, ध्यान भले ही न हो
परन्तु उद्धार अपने-आप हो ही जायगा। सत्सङ्गसे तो साधन
और भी तेज होना चाहिये । सत्सङ्गके भरोसे यदि साधन
ढीला हो जाय तो समझना चाहिये कि सत्सङ्गका उद्देश्य ही
समझमें नहीं आया। जिल सत्सङ्गके प्रतापसे संसारले उद्धार
पानेका विश्वास हो, उसके लिये कितनी चेष्टा होनी चाहिये,
उसकी चातका कितना आदर करना चाहिये ? सत्सङ्गसे केवल
उद्धारमात्र मान लें, परन्तु उसकी थोड़ी बातोंकी भी इज्जत
नहीं की जाय तो समझना चाहिये कि कथनमात्रसे ही सत्सङ्गको
उत्तम माना है। असल में यह मनका धोखा है ! आपको इस
घातपर विचार करना चाहिये कि यदि आप सत्सङ्गका प्रभाव
अच्छी तरह जान जाते तो फिर एक पलके लिये भी आपसे
सत्सङ्ग छोड़ा नहीं जा सकता।
सत्सङ्गके कारण यदि संत-महात्माओंके लक्षण आपमें
आ गये होते, तो फिर चाहे कैसा भी फौजदारीका मामला
क्यों न हो आपको घबराहट बिलकुल नहीं होती। इस तुच्छ
मामलेकी तो बात ही कौन है। यमराजवाले मामलेकी भी
विलकुल चिन्ता नहीं होती! इन सब बातोपर विचार करके,
आलस्य और आसक्तिको त्यागकर आपको श्रीनारायणके प्रेममें
लगना चाहिये । शरीरकी और नाशवान् भोगांकी परवा
छोड़कर एक भगवानसे मिलनेकी ही उत्कण्ठा होनी चाहिये।
१७२]

[७७] ईश्वरविषयक आपके तीनों प्रश्न बड़े ही महत्त्वपूर्ण हैं। इनका उत्तर लिखने में मै अपनेको अयोग्य और असमर्थ ही पाता हूँ। फिर भी आपके प्रेमके लिये अपनी साधारण घुद्धिके अनुसार यत्किञ्चित् लिखनेका साहस कर रहा हूँ। आपका प्रश्न हे कि माता, पिता, स्त्री, पुत्रकी भाँति साकार ईश्वरके प्रत्यक्ष दर्शन किस प्रकार हो सकते हैं ? इस प्रश्नका साधारण विवेचन गीताप्रेससे प्रकाशित तत्त्व-चिन्तामणि भाग २ में किया गया है । आप उस पुस्तकमें देख सकते है । इसके सिवा अपनी धुद्धिके अनुसार कुछ लिख भी रहा हूँ। विशुद्ध प्रेम ही ईश्वरके प्रत्यक्ष दर्शनका प्रधान उपाय है। यह प्रेम किस प्रकार होता है, इसका विवेचन करना चाहिये। [१७३ परमार्थ-पत्रावली सबसे प्रथम यह विश्वास होना आवश्यक है कि ईश्वर है और वह सुहृद्, सर्वशक्तिमान, सर्वान्तर्यामी, परमदयालु, प्रेममय, सर्वज्ञ, आनन्ददाता है एवं साक्षात् सर्वत्र विराजमान है । जबतक इस प्रकारका विश्वास नहीं होता तबतक मनुप्य परमात्मासे मिलनेका अधिकारीही नहीं है। पवित्र अन्तःकरण होनेसे ही मनुप्य अधिकारी हो सकता है। निष्कामभावसे किये हुए भजन-ध्यान, सेवा-सत्सङ्ग मनुष्य के हृदयको पवित्र करते हैं और पवित्र हृदय होनेपर ही मनुष्य अधिकारी भी बनता है । ईश्वरका जान भी उसके अधिकारी बननेके साथ-ही- साथ बढ़ता रहता है । इस प्रकार जब मनुष्यको ईश्वरका भली प्रकार ज्ञान हो जाता है यानी ईश्वरको वह भलीभाँति तत्त्वसे जान लेता है तब ईश्वरसे वह जिस रूपमें मिलना गहता है भगवान् उसी रूपमें उसे दर्शन देते हैं । वे सर्वव्यापी परमात्मा सच्चिदानन्दरूपसे तो सर्वदा वर्तमान हैं ही पर भगवान्के रहस्यका ज्ञाता भगवद्भक्त जिस सगुण साकार चिन्मय मूर्तिले मिलनेकी इच्छा करता है उसी मोहिनी मूर्तिमें वह नटवर अपने प्रेमी भक्तसे मिलता एवं बात करता है। इसमें प्रधान कारण प्रेम और पूर्ण विश्वास है जिसको विशुद्ध श्रद्धा भी कहा जाता है। इसकी भगवान्ने गीतामें स्थान-स्थानपर प्रशंसा की है। योगिनामपि सर्वेषां मद्भतेनान्तरात्मना। श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥ (गीता ६ । ४७) १७४] द्वितीय भाग हे अर्जुन ! सम्पूर्ण योगियों में भी जो श्रद्धावान् योगी मेरेमे लगे हुए अन्तरात्मासे मुझको निरन्तर भजता है, वह योगी मुझे परम श्रेष्ठ मान्य है। मय्यावश्य मनो ये मा नित्ययुक्ता उपासते । अद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मता ॥ (गीता १२१२) हे अर्जुन ! मुझमें मनको एकाग्र करके निरन्तर मेरे भजन-ध्यानमें लगे हुए जो भक्तजन अतिशय श्रद्धासे युक्त हुए मुझ सगुणरूप परमेश्वरको भजते है वे मुझको योगियोंमें भी अति उत्तम योगी मान्य है, अर्थात् उनसे मैं मतिश्रेष्ठ मानता हूँ । वे सर्वव्यापी सञ्चिदानन्दघन प्रभु सगुण साकारस्पसे किस प्रकार प्रकट होते हैं ? इस रहस्यको यथार्थतासे भगवान्- का परम श्रद्धालु अनन्य प्रेमी पूर्ण भक्त ही जानता है। क्योंकि यह इतना गम्भीर और रहस्यपूर्ण विषय है कि अन्तःकरणकी पवित्रताके विना साधारण मनुष्योंकी घुद्धिमें आना सम्भव नहीं। पर जो परमेश्वरका नित्य-निरन्तर स्मरण करते हैं उनके लिये भगवान्का यह रहस्य समझना पूर्णतया सहज है। यद्यपि साधु-महात्मा और शास्त्रने इस तत्वको समझाने लिये बहुत प्रयत्न किये है पर करोड़ोंमें कोई एक विरला ही पुरुष इस तत्त्वको समझ पाता है । भगवान्ने गीतामें कहा है- आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन- माश्चर्यबद्वदति तथैव चान्य । आश्चर्यरचैनमन्य शृणोति श्रुत्वाप्येन वेट न चैत्र कश्चित् ।। (२१२९) [१७० परमार्थ-पत्रावली आपका दूसरा प्रश्न है कि ईश्वरमें तर्करहित श्रद्धा किस अभ्यालसे हो सकती है? उस परम प्यारेकी मनमोहिनी मूर्तिका साक्षात् दर्शन करनेवाले एवं उसके तत्त्वको भलीभाँति जाननेवाले पुरुषोंद्वारा ईश्वरके गुण, प्रेम और प्रभावकी वातोंको प्रेमसे सुनने एवं समझनेसे ईश्वरमें तर्करहित विशुद्ध श्रद्धा उत्पन्न हो सकती है। यदि ऐसे महात्माओंसे मिलना न हो तो प्रेम और श्रद्धासे परमेश्वरकी प्राप्तिका प्रयत्न करनेवाले साधक पुरुषोंका सत्संग करना चाहिये एवं उनसे ईश्वरविषयक गुण, प्रेम और प्रभावकी चर्चा करनी चाहिये । ऐसा करनेसे भी भगवान्में श्रद्धा और भक्ति बढ़ती है । यदि इस प्रकारके उच्च श्रेणीके साधकका संग भी न मिले तो मनुष्यको जिनमें ईश्वरके प्रेम, प्रभाव, गुण और तत्त्वकी वातें लिखी हो एवं जो ईश्वर या महापुरुपोंद्वारा रचे हुए हों ऐसे शास्त्रोंका विचारपूर्वक प्रेमसे अध्ययन करना चाहिये। सम्पूर्ण शास्त्रोंमें ईश्वरतत्त्वके ज्ञानके लिये श्रीमद्भगवद्गीताके समान दूसरी पुस्तक नहीं है। महाभारतमें लिखा है- गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः । या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता ।। गीता सुगीता करने योग्य है अर्थात् श्रीगीताजीको भली प्रकार पढ़कर अर्थ और भावसहित अन्तःकरणमें धारण कर लेना मुख्य कर्तव्य है, जो कि स्वयं श्रीपद्मनाभ विष्णु भगवान्के .१७८] द्वितीय भाग मुसारचिन्दसे निकली हुई है, फिर अन्य शास्त्रोंक विस्तारसे क्या प्रयोजन है? गीताके अध्ययनसे भी ईश्वरमें पूर्ण श्रद्धा हो सकती है। यदि इन अन्यों समझनेकी बुद्धि भी न हो तो उन परम पिता परमात्माले नित्यप्रति एकान्तमें सच्चे हृदयसे विनयभावपूर्वक गद्द होकर प्रेमसहित विशुद्ध श्रद्धा होनेके लिये प्रार्थना करनी चाहिये । उस दयासागरके सामने की हुई सच्चे हृदयकी प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं होती । इस अभ्याससे परमात्मामें तर्क- रहित पूर्ण श्रद्धा हो सकती है। विना श्रद्धाके ईश्वरतत्वका ज्ञान हो ही नहीं सकता वरं उत्तरोत्तर उसका पतन हो सम्भव है। जेसे गीतामें लिया है- अधदपाना परतप। अप्राप्य मा निवर्तन्ते मृत्युमसारवर्मनि ।। (९३) है परंतप ! इस तत्त्वज्ञानरूप धर्ममें श्रद्धारहित पुरुष मुझको न प्राप्त होकर मृत्युरूप संसारचक्रम भ्रमण करते है। मत. ईश्वरतत्वक जानने के लिये श्रद्धाको परम आवश्यकता है। क्योंकि श्रद्धासे ईश्वरके तत्त्वका मान होकर परम शान्तिको प्राप्ति होती हे। गीनाम लिया है- श्रद्धाल्लिभते ज्ञान तत्पर सयतेन्द्रिय । ज्ञान लन्या परा गान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥ (१३९) [१७२ पुरुषा धर्मस्यास्य परमार्थ-पत्रावली हे अर्जुन ! जितेन्द्रिय तत्पर हुआ श्रद्धावान् पुरुष ज्ञानको प्राप्त होता है, ज्ञानको प्राप्त होकर वह तत्क्षण भगवत्प्राप्तिरूप परम शान्तिको प्राप्त हो जाता है। इसलिये ईश्वरमें अनन्य श्रद्धा होनेके लिये कटिबद्ध चित्तसे प्राणपर्यन्त चेष्टा करनी चाहिये। उपर्युक्त चार साधनोंमेंसे किसी एकका या अधिकका जो जितना अभ्यास करेगा उसकी उतनी ही श्रद्धा बढ़ेगी एवं उस परमपिता परमेश्वरसे उतना ही अधिक प्रेम होगा। सभी साधनोंका पालन करनेसे शीघ्र ही ईश्वर में तर्करहित श्रद्धा हो सकती है एवं आदर और प्रेमसे किया हुआ अभ्यास अन्तः- करणको पवित्र करके वहुत श्रद्धा वढ़ा देता है। आपका तीसरा प्रश्न है- सीयराममय सब जग जानी। करौं प्रनाम जोरि जुग पानी ॥ ऐली सच्ची भावना कैसे हो? उपर्युक्त साधनोंका प्रेम और आदरसे जितना अधिक अभ्यास किया जाता है उतना ही शीघ्र मनुष्यका हृदय पवित्र हो जाता है । हृदय पवित्र होनेके साथ-ही-साथ परमेश्वरमें श्रद्धा बढ़ती है। श्रद्धाकी वृद्धिसे परमेश्वरमें सर्वदा दृढ़ भावना बढ़ती है । भावनाके दृढ़ होनेसे सर्वत्र ईश्वरका प्रत्यक्ष दर्शन होने लगता है । उस समय वह सर्वव्यापी परमेश्वर सीयराम- मय देखनेवालोंको सीयराममय एवं केवल राममय देखनेवालेको राममय दिखलायी पड़ने लगता है। १८०]

[७८]
श्रीभगवान्की भक्ति करनेसे ज्ञान आप ही हो सकता है।
चैराग्य चित्त शुद्ध होनेपर होता है। वह भी भगवान्की भक्ति
करनेसे चित्त शुद्ध होकर हो जाता है । यो भकिसे ज्ञान-वैराग्य
आप ही हो सकते हैं। भागवतमें लिखा है भक्ति माता है और
मान-चैराग्य दोनों भक्तिके पुत्र हैं। मक्ति सदा जवान रहती है
ओर ज्ञान बेराग्य वृद्ध हो गये । अतएव श्रीभगवानकी भक्तिके
लिये विशेप कोशिश करनी चाहिये । श्रीभगवान्की भक्ति और
शरण एक ही वस्तु है । शरणका साधारण स्वस्प यह है-
(१) श्रीभगवान्के अनुकूल होना और उनकी इच्छाके
अनुसार चलना।
(२) श्रीभगवान्के नाम, रूप ओर गुणोंको हर समय
याद रखना।
(३) जो कुछ सुय या दुःख प्राप्त हो उसमें मानन्द
मानना । उसमें भगवान्की दया समझना और उनका किया
दुआ विधान समझकर प्रसन्न रहना । मन मलिन न करना।
[१८१

परमार्थ-पत्रावली (४) अपने कल्याणके लिये श्रीभगवान्पर ही निर्भर रहना । कुछ भी चिन्ता नहीं करना। श्रीभगवान्पर पूरा विश्वास रखना और अपनेको उनके चरणोंकी शरणम समझना। निर्भयता, धीरता, गम्भीरता, सन्तोप, शान्ति और प्रसन्नता आदि गुण शरणापन्न पुरुषमें स्वाभाविक आ जाते हैं। वन सके तो दोनों समय ठीक समयसे सन्ध्या, दो या तीन माला रोज गायत्रीजाप, कम-से-कम एक अध्याय गीताका अर्थसहित पाठ, सात या चौदह माला सोलह नामवाले 'हरे राम' मन्त्रका जाप और 'प्रेमभक्ति' के अनुसार नित्यप्रति भगवान्की पूजा, ध्यान, स्तुति ये सब आपको नित्य-नियमपूर्वक करने चाहिये। भोजन-वस्त्रका संयम, व्यापारमें सत्य भापण, लोभ-कपट- का त्याग, सबके साथ स्वार्थ छोड़कर विनयपूर्वक प्रेमभरा सद् वर्ताव करनेकी चेष्टा रखनी चाहिये। सदाचार, संयम, सेवा और साधन-ये चार सकार धारण करनेसे मुक्तिमें कुछ भी शङ्का नहीं है । वहुत जल्दी कल्याण हो सकता है। इन्द्रियों और मनको विषयोंसे रोकनेको संयम, दुखी जीवोंको हर प्रकारसे मदद करनेको सेवा, सत्पुरुषोंद्वारा आचरित और कहे हुए मार्गको सदाचार और भजन, ध्यान, सत्संग, शास्त्रके अभ्यास आदिको साधन समझना चाहिये। इन्हींका विस्तार चाहे जितना कर सकते हैं। सूत्ररूपसे बातें लिखी गयी हैं । ये अमृत हैं, इनको काममें लानेसे मुक्ति सहजमें १८२] द्वितीय भाग ही हो जाती है। ये बातें लोगोंको भलीभॉति समझाने और स्वय अच्छी तरह काममें लानेकी है। इनसे बढकर कुछ भी नहीं है । इनसे अपार सन्तोप, शान्ति और आनन्दकी प्राप्ति हो सकती है। भगवान्को यादमे भूल ज्यादा पड़े तो उसका उपाय तीन अभ्यासकी चेष्टा करना ही है । और भगवान्में प्रेम बढ़नेका उपाय पूछा सो आपको पहले लिसा ही था । भगवान्के गुणा- नुवाद पढने, सुनने और कहनेसे एवं उसके गुण, आशय और प्रभावकी तरफ खयाल करनेसे भगवानमें प्रेम बढ़ सकता है। तथा भगवान्का भजन, ध्यान और सत्पुरुपोंका सग करनेसे भगवान्मे प्रेम बढ़ सकता है। भजन और सत्संग ज्यादा होनेमे तीव्र इच्छाकी जरूरत है। जिस वस्तुको तीव इच्छा होती है उसके लिये प्रयन ओर चेष्टा भी बहुत अधिक होती है। जिसे रुपयोंकी जरूरत होती है वह रुपये पैदा करनेके वक्त उन्हींका चिन्तन ओर उन्हीके लिये तन-मनसे चेष्टा करता है। उसके मनमें प्राय हर समय यही चिन्ता रहती है कि रपया किस प्रकारमे पैदा हो । रुपया कमानेके विचारमें वह अपने मन-बुद्धिको अर्पण कर देता है। इसी प्रकार जिनको भगनान्से मिलनेकी इच्छा होती है उन्हें अपने मन घुद्धिको भगवान्में अर्पण करना पड़ता है तथा भजन, ध्यान और सत्सग जो भगवान्के मिलनेके उपाय हैं उनके लिये तीन इच्छा हो जाती है। तीव्र इच्छा होने पर उनके लिये उपाय तथा चेटा भी तीन होती है। कोई यादमी ज्यादा चीमार होता [१८३ परमार्थ-पत्रावली है और वैद्य कहता है कि अमुक वस्तुके आनेसे बच सकता है, उस समय उस वस्तुके लिये जितनी अधिक चेष्टा होती है वैसी ही चेष्टा भजन, ध्यान और सत्संगके लिये होनी चाहिये । तीव्र इच्छा होनेसे ही तीव्र चेष्टा होती है और तीव्र चेष्टा होनेसे वस्तुको प्राप्ति होती है। मिथ्या सांसारिक वस्तु तो चेष्टा करनेपर भी शायद न मिले और मिलनेपर रोगीको उससे आराम भी हो या न हो परन्तु भजन-सत्सङ्गके लिये चेष्टा करनेसे चेष्टा जरूर सफल होती है । और भजन-सत्सङ्गरूपी ओपधिके श्रद्धापूर्वक दीर्घकालतक सेवन करनेसे भगवान्में प्रेम होकर जन्म-मरणरूपी चीमारीका जरूर नाश हो जाता है। सत्यकी चेष्टा कमी व्यर्थ नहीं जाती। जपमें भूल होने की बात लिखी सो जपके अधिक अभ्यास करनेसे जपकी भूल दूर हो सकती है। विना प्रेमके भी प्रसन्न मनस जप करनेका अभ्यास डालनेसे आगे चलकर प्रेमसहित जप हो सकता है और जिस समय जप निरन्तर होता है उस समय प्रेमसहित ही होता है। वैराग्य होनेसे तो जप ध्यान विना ही चेटाके निरन्तर होता है और भजन, ध्यान, सत्सङ्गसे ही वैराग्य होता है । 'भगवान्को स्मृति हर समय बनी रहनी चाहिये' ऐसी तीव्र इच्छा ही निरन्तर भगवञ्चिन्तन होने में हेतु है। जप करते समय संसारकी स्फुरणा हो तो उसकी जगह जबरदस्ती भगवत् विपयकी स्फुरणा करनेका अभ्यास करना चाहिये । ऐसा अभ्यास करनेसे जपके साथ ध्यानकी वृद्धि और संसारकी वासनाका भी क्षय हो सकता है। यदि सत्ता और आसक्तिरहित स्फुरणा हो तो कुछ हर्ज नहीं । सांसारिक १८४]

द्वितीय भाग
सत्ता और आसक्तिके नाश होनेके लिये जप और सत्सङ्गके
तोत्र अभ्यासकी जरूरत है। भगवान् के नामकी याद हर वक्त
बनी रहनी चाहिये, फिर अधिक अभ्यास होनेसे ससारमें
वैराग्य तथा भगवान्के म्वरूपमै स्थिति भी हो सकती है।
श्रीपरमात्मदेवकी तो सदा सर्वदा सभीके ऊपर कृपा है,
जिसे ऐसा निश्चय हो जाता है वही भगवान की कृपाका पात्र
है। उसे फिर भगवान् शीघ्र ही मिल जाते हैं क्योंकि चिना
मिले उनको चैन नहीं पड़नी है । संसार और शरीरको
मिथ्या नाशवान् देखनेसे ओर सर्वव्यापी परमात्माको नित्य
आनन्दस्वरूप देखनेसे भी वैराग्य हो सकता है। परमात्माके
स्वरूपका चिन्तन, नामका जप और सत्सङ्ग ही प्रेम होनेका
मुख्य उपाय है। जो आदमी भगवानको सर्वज्ञ, अन्तर्यामी,
दयासिन्धु तथा विना ही कारण हित करनेवाला जानेगा वह
तो कभी किसी भी चातके लिये भगवान्से प्रार्थना नहीं करेगा।
यदि प्रार्थना करेगा तो प्रेमभावसहित निरन्तर चिन्तन होता
रहे' इसी यात के लिये करेगा। हर समय नामके स्मरणका
अभ्यास हो जानेसे फिर वहुत समयतक ध्यानकी स्थिति भी
रह सकती है । भगवान्को याद रखते हुए ही सासारिक काम
हो ऐसी चेष्टा रखनी चाहिये । संसारके कामोसे भजन ध्यानको
बहुत ही उत्तम और अमूल्य समझना चाहिये । संसारके कामम
चाहे जितना हर्ज हो पर कामकी नुकसानीके लिये भजन ध्यान.
को नहीं छोड़ना चाहिये । इस प्रकार पकी धारणा होनेसे
संसारके कामाको करते हुए भी भजन-प्यान हो सकते है ।
संसारके काम मानो नदीका प्रवाह है । जो पुरुष
यानके
द्वाग
[१८५

परमार्थ पत्रावलो
भगवञ्चरणरूपी नोजाका आश्रय ग्रहण कर लेता है तथा
भगवन्नामम्पी नौकाक रस्सको पकड़ लेता है वह बत्र जाता
है और जो नीके प्रवाहमें यह जाता है उसकी बहुत बुरी
दशा होती है।
x
x
x
भजन-सत्सङ्ग ज्यादा होनले अन्तःकरण शुद्ध होगा.
फिर धारणा होने में दर नहीं होगी । फिर संसारकी कामना
नहीं रह सकती, लो आपकी चेटा है ही फिर भी इसके लिये
और अधिक चेष्टा करनी चाहिये । इस काममें अभ्यास ही
प्रधान है। दिन बीत जा रहे है । अपने मनमें विचारना चाहिये
कि मैंने इस संसारमें आकर क्या किया और क्या करना
चाहिये।' इसी तरह यदि और भी समय बीतेगा तो फिर कैसे
जल्दी कामयाबी होगी । समयको अमूल्य काममें विताना
चाहिये। फिर संसार, रुपये तथा ये भोग किस काम आवेंगे।
वस्तु तो वही है जो भगवानमें अधिक प्रेम करावे । उसके
सिवा वाकी सब मिथ्या है। सोने और पत्थरके पहाड़ोंमें क्या
फर्क है । कोई भी साथ जानेवाला नहीं है । शरीर भी मिट्टीमें
मिलनेवाला है ऐसा जानकर इस शरीरले पूर्ण लोभ उठाना
चाहिये । भगवान्के भजन-ध्यान विना एक पल भी व्यर्थ नहीं
जाने देना चाहिये। क्योंकि भगवान्के सिवा सभी कुछ अनित्य
और असत् है, अनित्य और असत्के लिये अपना अमूल्य जीवन
हाथसे कभी नहीं गँवाना चाहिये।
.]

२ [७९] सविनय प्रणाम। आपका पत्र मिला | आप जो कभी-कभी प्रश्न लिख भेजते है, यह मेरे लिये बड़े सौभाग्यकी बात है। इसमें कट मानने या नाराज होनेकी क्या बात है। बल्कि यह तो आपकी कृपा है जो आप मुझसे पूछते है, क्योंकि इसी बहाने मुझे भी भगवत्- चर्चाका लाभ प्राप्त हो जाता है। वेतन कम होनेके कारण आपके घरका खर्च संकोचके साथ चलता है और ऋण चुकानेमें पेसा विल्कुल ही नहीं दिया जाता, अवश्य ही यह विचारणीय प्रश्न है। मेरी समझमें ऋण- मुक्तिके लिये ईश्वरसे प्रार्थना करनेमें कोई दोप नहीं है। बल्कि किसी मनुष्य और देवतासे प्रार्थना करनेकी अपेक्षा भगवान्से प्रार्थना करना उत्तम हे । किन्तु इस ऋणसे भी बढकर एक [१८७

परमार्थ-पत्रावली
निष्कामभावसे अपना धर्म पालन करनेसे मुक्ति प्राप्त होती है।
अतएव जो मनुष्य निष्कामभावसे अपने धर्मका पालन करता
है वह अवश्य ही निःश्रेयसको प्राप्त करता है।
गीताके १८ वे अध्यायके ४२ वें श्लोकमें शम, दम, तप
इत्यादि ब्राह्मणके कर्म बतलाये गये हैं। ये गुण तो ब्राह्मणों में
स्वभावसिद्ध होने ही चाहिये । इनके अलावा आजीविका यादिक
सम्बन्धमें, जिसका गीतामें जिक्र नहीं है, मनु आदि महर्पियाने
जो कुछ बतलाया है उसे करनेकी चेमा करनी चाहिये।
ब्राह्मणांके लिये मनुमहाराजने छः कर्म बतलाये हैं-
अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा ।
दानं प्रतिग्रहं चैव
ब्राह्मणानामकल्पयत् ।।
'विद्या पढ़ना, विद्या पढ़ाना, यज करना, यज्ञ कराना,
दान देना और दान लेना-ये छः कर्म ब्राह्मणोंके हैं।'
इनमें विद्या पढ़ना, यज्ञ करना और दान देना, ये भात्माके
उद्धारके लिये सामान्य धर्म है । शेष तीन--विद्या पढ़ाना: यज्ञ
कराना और दान लेना--ये कर्म जीविकासे सम्बन्ध रखते हैं।
इन तीनोंमें विद्या पढ़ाकर और यज्ञ कराकर धन लेनेकी अपेक्षा
याचना करना निन्ध समझा गया है। किन्तु जो दान अपने-
आप विना माँगे प्राप्त हो और लेनेवाला केवल अपनी
आवश्यकताके अनुसार ले तो वह दान अमृतके समान है ।
शिलोवृत्ति इन सवसे भी उत्तम है। किन्तु आजकल उसकी
परिपाटी नष्ट हो गयी है। उन वृत्तियोंमें रहना असम्भव-सा
है । अतएव यज्ञ कराकर, विद्या पढ़ाकर और विना याचना
१९०]

.
,
द्वितीय भाग
किये यजमानकी दी हुई दाक्षिणाके रूपमें धन लेकर जीविका
चलाना ब्राह्मणके लिये सबसे उत्तम है। यदि ऐसा न हो सके
तो चिना मांगे आवश्यकतानुसार दान ग्रहण करना भी
आपके लिये उत्तम है।
आजकल घोर कलिकाल पृथ्वीपर विराज रहा है। ऐसे
सङ्कटकालमै सम्भव है, इन ब्राह्मणोचित कायकि द्वारा निर्वाह न
हो सके । अतएव मनु आदि ऋषि-महर्पियोंने आपत्तिकालका
भी धर्म बताया है। उसको ग्रहण करनेमें भी कोई आपत्ति
नहीं । शास्त्रों में बतलाया गया है कि यदि ब्राह्मणका कार्य
ब्राह्मणवृत्तिसे न चले तो वह क्षात्रवृत्ति या वैश्यवृत्तिका
अवलम्बन कर सकता है । देशको जो वर्तमान स्थिति है, उसमे
क्षात्रवृत्तिका भी पालन करना कठिन है । अतएव सब तरहसे
विचार करनेपर इस आपत्तिकालमें आपके लिये वैश्यवृत्ति
ग्रहण करना उत्तम मालूम होता है। किन्तु व्यापार करने के
लिये आपके पास धन नहीं है । इसलिये इसके लिये अच्छा
होगा कि नौकरी न करके किसीकी दूकानमें अपना हिस्सा रय
लें, हिस्सा कामका ही हो और उसका परिमाण दूकानके
मालिकके साथ यथोचित निश्चित कर लिया जाय।
आपने लिया कि मैं दान लेनेकी अपेक्षा नौकरी करके
निर्वाह करना उत्तम समझता हूँ। यह यात आपने अपने
स्वभाव मोर युक्तिके अनुसार ही लिखी है और एक दृष्टिमे
उमे ठोफ भी कहा जा सकता है। किन्तु सच पूछिये तो
धर्मशास्त्रके अनुसार और मनु आदि ऋषि-महर्पियाँके
[१९१

परमार्थ-पत्रावली विचारानुसार नौकरी भिक्षावृत्तिसे भी नीची है। ब्राह्मणके लिये नौकरीको अपेक्षा भिक्षावृत्ति ही उत्तम है। वर्तमान समयमें भिक्षावृत्तिका प्रचलन उठ गया है, लोग इसका महत्त्व भूल गये हैं। और इस वृत्तिका आश्रय लेनेवाले लोग दूषित परान्न खानेके कारण गिरी हुई अवस्थामें दिखलायी देते हैं। इसीसे युक्ति बतलाती है कि इसकी अपेक्षा तो नौकरी करके ही पेट पालना उत्तम है। पुराने समयमें ब्राह्मणलोग जो दान लेते थे, जो भिक्षा ग्रहण करते थे, उसका लक्ष्य दाता या यजमानका कल्याण करना होता था । उनका ध्यान इसी बातपर रहता था कि दाता और यजमानका कल्याण हो, व इसके द्वारा अपने निर्वाहकी वात नहीं सोचते थे । इसीसे उस समयमें यह वृत्ति युक्तिले भी नौकरीकी अपेक्षा श्रेष्ट मालूम होती थी। परन्तु आज भाव वदल गया है और इसलिये उसकी उपयोगिता भी नष्ट हो गयी है । अगर भाव ठीक हो जाय तो वह वृत्ति आज भी श्रेष्ठ ही है। आपको शम, दम, तप इत्यादि स्वाभाविक धर्मोको करते हुए माता, पिता, स्त्री, पुत्र आदिका पालन तथा अपने निर्वाहके लिये न्यायसङ्गत उपायोंसे धन पैदा करनेकी कोशिश नित्य निरन्तर भगवान्को ध्यानमें रखकर करते रहना चाहिये । यही तो भगवान्ने गीतामें अर्जुनसे कहा था- तस्मात् सर्वेषु कालेपु मामनुस्मर युख्य च । मय्यर्पितमनोवुद्धिर्मामेवेप्यस्यसंशयम् । १९२]

पत्र
[८०]
आपका यथासमय मिल गया था। मैं कई
दिनोंतक बाहर दौरेपर था, इधर स्वास्थ्य भी कम ठीक है, ऐसे
ही कारणोंसे उत्तर देनेमें विलम्ब हो गया है, आशा है कि आप
कृपया क्षमा करेंगे। आपके प्रश्नोंका उत्तर इस प्रकार है-
(१) ब्रह्मचर्यकी रक्षाके लिये आप जो प्रयत्न कर रहे हैं सो
ठीक ही है। स्वप्नद्वारा हानि होती है सो माहार और
विचारादिकी अशुद्धि ही इसमें मुख्य कारण समझा
जाता है। आपको अपने आहार-विचारादि विषयमें
[१९३
५० मा०२-१३

परमार्थ-एमावली फिर विचार करना चाहिये। क्योंकि शास्त्रोंमें कामकी उत्पत्तिका मूल संकल्प ही बताया गया है- काम जानामि ते मूलं सङ्कल्पात् किल जायसे सङ्कल्पे तु मया त्यक्त कथं त्वं जायरने पुनः ॥ श्रीशङ्कराचार्यजीका कथन है- कामस्य विजयोपायं सूक्ष्मं वक्ष्याम्यहं सताम् । संकल्पस्य परित्याग उपायः सुलभो मतः ।। सङ्कल्पानुदये हेतुर्यथा भूतार्थदर्शनम् । अनर्थचिन्तनं चाभ्यां नावकाशोऽस्य विद्यते ॥ (सर्ववेदान्तसिद्धान्तसारसंग्रह ६२, ६७) इसलिये शुद्ध संकल्पसे ही इसका नाश होता है। रात्रिमें शयन करते समय श्रीगीताजीके श्लोकोंका पाठ करते हुए और उनके अर्थका चिन्तन करते हुए सोना चाहिये । इससे रात्रिके लंकल्प पवित्र रहते हैं। विषयों में वैराग्य, उपरामता और हर समय ईश्वर-चिन्तन करते रहनेसे दिनके संकल्प पवित्र रहते हैं। (२) आप छः घण्टे भजनमें बैठते हैं सो वहुत उत्तम है। मनकी उधेड़-घुन मिटानेके लिये गायत्रीका जप करते समय मन्त्रके अर्थका ध्यान वार-बार करना चाहिये। प्रत्येक मन्त्र जपके समय अर्थकी आवृत्ति करते रहना चाहिये । अथवा गायत्री मन्त्रको कागज या दफ्तीपर लिखकर सामने टाँग दिया जाय और जपते समय बार- बार उसे पढ़ा जाय एवं मनमें अर्थका ध्यान किया जाय । १९४] है द्वितीय भाग अथवा अपने मानसिक इष्टदेवके मस्तकपर मनके द्वारा मन्त्रको चन्दनसे लिखकर वारचार पढ़ा जाय । इन साधनोंसे भी मनका एकाग्र होना सम्भव है। (३) भजन करते समय दो प्रधान विघ्न उपस्थित होते है (१) निद्रा, (२) स्फुरण (विक्षेप) अर्थात् मनमें नयी नयी उधेड वुनका बार-बार उठना । इन दोनोंको मिटानेके लिये दूसरे प्रश्नके उत्तरमें लिये उपार्यो अनुसार मन्त्र और उसके अर्थका ध्यान करना चाहिये । इससे ये विप्न दूर होकर मन टिक सकता है। (४) भजन करनेसे कोई व्याधि नहीं होनी चाहिये, यह आपका विश्वास ठीक है। यदि काकतालीय न्यायवत् फिसीके कुछ हो भी जाती हो तो उसे भजनका परिणाम न समझकर भजन करनेवालेको इसका कोई विचार नहीं करना चाहिये। क्योंकि सभीको कोई तकलीफ देखने में नहीं आती है। (") आत्मामें प्रसन्नता, उत्साह और एकाग्रताके साधन इस प्रकार है-पद-पदपर अपने ऊपर ईश्वरकी पूर्ण दयाका दर्शन करनेसे उत्साह और प्रसन्नता उत्तरोत्तर वढती जाती है। प्रत्येक सुख और दुखकी प्राप्तिमें उस सुप- दुपको ईश्वरका विधान समझनेसे उत्साह और प्रसन्नता रहती है। और ज्यों-ज्यों उत्साह एव प्रसन्नता चढती जाती है त्याही त्यों ईश्वरकी दयाका रहस्य भी अधिकाधिक समझमें आता है। चित्तको एकाग्रताके [१९५ परमार्थ-पत्रावली (१३) सिद्धियाँ अनन्त हैं। उनमें आठ मुख्य हैं-अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व । इनका वर्णन योगदर्शनके तीसरे पादमें, भागवत एकादश स्कन्धौ और हठयोगप्रदीपिका आदिमें है । इस समय इनकी जानकारीवाले सिद्ध योगी देखनेमें नहीं आते । इनकी प्राप्तिका उपाय इनके जाननेवाले योगियोद्वारा तत्पर होकर साधनके लिये कोशिश करनेसे ही प्राप्त होना सम्भव है। कल्याणमार्गमें चलनेवाले पुरुपोंके लिये सिद्धियाँ बाधक बतायी गयी हैं। इसलिये परमार्थ के साधकको इस झंझटमें नहीं पड़ना चाहिये । मुझको इनका कुछ भी अनुभव नहीं है। (१४) सुपुम्नानाडीका विषय बड़ा गहन है। शास्त्रोंमें भिन्न- मिश प्रकारसे इसका वर्णन मिलता है । इस विषयमें योगदर्शनके प्रथम पादमें 'विशोका वा ज्योतिष्मती' सूत्रकी व्याख्या (व्यासभाष्य) देखनी चाहिये। प्रश्नोपनिषद् पर्व और भी योगविषयक शास्त्रोंमें यह विपय आया है। सुपुम्नानाडी परम शान्ति और परमानन्दको देनेवाली है। इसके द्वारा परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है। पत्रद्वारा इसका साधन समझाना कठिन है। (१५) अच्छे योगियों और महात्माओंके दर्शन अधिकतासे कहाँ होते हैं इसका मुझे पता नहीं है । प्रथम तो योगी और महात्मा होते ही कम है। जो हैं, उनका भी मिलना १९८]

द्वितीय भाग
कठिन हे और मिलनेपर पहचानना भी कठिन है।
उत्तरायण्डमें एवं गंगाकिनारे ऐसे पुरप सुने जाते है।
श्रद्धा होनेपर भगवान् और महापुरुषोंकी दयासे उनके
दर्शन होते है।
(१६) ब्रह्मज्ञानको प्राप्ति होनेका उपाय पूछा सो श्रोत्रिय मोर
ब्रह्मनिष्ठ पुरुपोंकी सेवा और संगसे, एवं परमेश्वरकी
नित्य निरन्तर प्रेमपूर्वक अनन्यमकि करनेसे परमेश्वरकी
दयासे ब्रह्मज्ञानकी प्राप्ति होती हे । गीताके इन श्लोकोंको
समझनेकी चेप्टा करनी चाहिये-
प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपटेश्यन्ति ते ज्ञान ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिन ॥
(४ | ३४)
मच्चित्ता मदनप्राणा बोधयन्त परस्परम् ।
कथयन्तश्च मा नित्य तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥
तेपा सततयुक्ताना भजता प्रीतिपूर्वकम् ।
ददामि बुद्धियोग त येन मामुपयान्ति ते ॥
तेयामेनानुकम्पार्थमहमज्ञानज तम ।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥
(१०१९-११)
इस प्रकार आपके प्रश्नोंका उत्तर है । और कुछ पूछना
हो तो निसंकोच पूछनेकी रुपा करेंगे।
[१९९

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Parmarth Patravali Bhag-ii

Author
Jaidayal Goyandka
Title
Parmarth Patravali Bhag-ii
File name
Parmarth Patravali Bhag-ii
Text
OCR done
Citation
1940
Published
2011/03
Publisher
Gorakhpur, Geeta Press
Language
Sanskrit
Pages
182
Library
Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Classification
Devotional
DLI number
550685
Barcode
4990010031501.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
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