Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
The Nirukta Of Yaska
Front matter
THE
VIDYABHAWAN SANSKRIT SERIES
57.
THE
NIRUKTA OF YASKA
(Critically edited with a comprehensive Introduction,
Hindi Translation, explanatory notes etc.)
CHAPTERS-1, 2, 3, 4 & 7 ONLY.
Ву
Prof. Uma Shankar Sharma "Rishi”.
Subityaratna, N. A. ( Goldledallist)
Lecturer in Sanskrit:
Patna College, Patna;
THE
CHOWKHAMBA VIDYA BHAWAN
Post Bor 69, Varanasi-1 (India)
PRESENTED BY
Ministry of Education
.fo... Ingla
Second Edition
1966
Price : 7-50
मङ्गलाचरणम् प्रणम्य पितरौ पूर्व सर्वानाचारवद्गुरून् । निरुक्तार्थप्रकाशाय वाड् मया व्यवसीयते ॥ १ ॥ उपकाराय साधूनामपकाराय चासताम् । सुन्याख्यायाधितो विद्वान्द्विविधां वृत्तिमीहते ॥ २॥ क निरुक्तसमो ग्रन्थः क पालो वयसा धिया । केवलं सच्चिदानन्दमाश्रयेऽहं सनातनम् ॥ ३ ॥ जम्बूमार्गाश्रमनिवसता दुर्गसिंहस्य वृत्ति दर्श दर्श मनसि निखिला शान्तिस्त्पद्यते मे । प्राप्तं किञ्चिन्नवलविदुषां शोधकार्यादपीह अन्थेऽस्मिस्तदथितमिदमालोक्यतामादरेण ॥४॥ 'नापि.' o FOREWORD Dr Tarapada Chowdhary, MA PhD (Lond) Head of the Department of Sanskrit, Patna University It is a Pleasure for me to write a few words regarding Shri Uma Shankar Sharma's Hindi translation of the Nirukta of Yaska It is a word for word translation and is therefore, expected to inspire the general reader and to be helpful to a research Scholar in understanding the linguistic problems of the then mind There are certain references to social and cultural matters as well Moreover Yaska is the first interpreter of Vedic hymns Shri Sharma is a serious student of the Vedic literature reconciling both the eastern and the western methods of its study I hope that his translation if completed will faithfully bring in his own Vernacular ample material for a study of several aspects of the Vedic Age I have also seen the outlines of his Introduction to the Nirulta which if carefully written, will also be a treasure of the Nirulta literature Patna 3-10-51 T Chowdhury ११ विषय सूची [क] श्राम निवेदन [ख] भूमिका १ भारतीय वाड्मय और वैदिर साहि य २ निघण्टु तथा निरुक्त ३ निरुक्त की विषय-वस्तु-प्रथम द्वितीय तृताय और चतुर्थ श्रध्याय ३४ २३ सप्तम अध्याय ८७ ४ यास्क का निर्वचन १०७ ११२ १२८ १३६ १४१ ५ निरुक्त और वैदिक वाडमय ६ निरुक्त और व्याकरण ७ निरक्त और भाषाविज्ञान ८ निर्वचन शास्त्र का इतिहास ९ निघण्टु और निरुत के टीकाकार १० प्रस्तुत प्रयास ११ निघण्टु पाठ (मूल निघण्ट) [ग] मृत निरुक्त अनुवाद विशेष टिप्पणी- १ प्रथम अध्याय . द्वितीय अध्याय ३ तृतीय अध्यार ४ चतुर्थ अध्याय सप्तम अध्याय [प] परिशिष्ट १५दिक मनों का पद्यानुवाद २ प्रमाण प्रथावरी ។ ६८ १०१ १-१२ 000000 , आत्म-निवेदन जिसके निवामोपम ये, श्रुतियां समस्त भूतल में, मधुमय अनन्त आभाय, भरती रहती प्रतिपल में। वह जगदीश्वर, मायागी, नूतन प्रमाश का दाता, करुणामय, दीन अकिंचन, जन का सदैव हो त्राता ।। और हिन्दी निरक्त ? नाम कुछ वेढगा-मा लगता है जरूर, पर क्या परेंगे, आनकल की हवा ही ऐसी यह चली है । लीजिए, हिन्दी पद, जिसका अर्थ है हिन्दी में ऋग्वेद, न कि हिन्दी का अपद ! सो भलेमानस, अगर आपको हिन्दी का निरक्त देखना है तो ५० रिशारीदास वाजपेयी जी की क्लम की करामात देसिए । यह है हिन्दी में निरक्त-उसके पढने का नया ढग, नई बातें और नया लेसक । वस, वन गई नई बात । टीका का अर्थ ? 'सर्वस्व हर सर्वस्य व भाच्छेदतत्पर'-सरों का सर कुछ हरण कर लो, चारी करने ( Plagtartsm ) में मत चूमो और काट छाँट ( अर्थात् छेद ) भी करते चलो। इसम भी सारी दुनिया की बातें जहां-तहाँ से लाकर भर दी है, कुछ टिप्पणियाँ जोड दी, थोड़ी भूमिका, और बन गई पुस्तक ! यही है इतिहाम, प्रेरणा, विपय- वस्तु विस्तार । निरस मेरे जीवन का मंगी? छानावस्था में इसके अनुसाद का बीजारोपण, नालंदा में गवेषणा करते हुए ( घराय नहीं, गरपणा का विषय चौद्ध-न्याय था, निर्देशक थे डा० सातकरी मुखोपाध्याय, जिन्होंने ठोक-पीट पर मुझे विकसित करन का पूरा प्रयास किया ) निम्तार तथा अन अध्यापन- साल में पल भून्न । काम किल, स्थान और परिवर्तनों के साथ साथ कार्य में प्रगति ।।
अनुनाद का कार्य क्तिना कठिन है, इसे भुक्तभोगी ही जान सस्ता है। कहाँ विक्रम पूर्ण सप्तम शती की भापा और कहाँ आज का युग-यही कारण है कि स्पष्टीकरण के लिए जहाँ तहाँ सैम्टों कोष्ठको का प्रयोग करना पड़ा । मूल-पाठ म वैदिर-उद्धरणों के स्थान सकेत न देकर अनुवाद म ही उसे दिया है । मेरा लक्ष्य है कि केवल अनुवाद पढकर ही पाठक यारक के विचारों से परिचित हा जायें। समूची पुस्तक में सामान्य वर्ग के पाठकों पर हा विशेष ध्यान रहा है । पाण्डित्यपूर्ण टीकायें तो बहुत-सी है। उनकी ओर भी जागरूकता उत्पन्न करन की चेष्टा की गयी है। जी हाँ, हिन्दी की ही चीज हो गई। हमारे गौरवोद्गारी गुर वेतरह नाराज है । मूल पाठ म सन्धिया को तोड दिया है, विराम चिह्नों का अत्यधिक प्रयोग किया है-निरक्त का पाठ ही आधुनिक वेश भूषा में सुसज्जित हो गया है । आप की इच्छा है तो सन्धि मिलाकर ही पढ़ें, समझे और समझायें ।। यह काम आसान है अपेक्षा त उसके कि सुश्लिष्ट, सन्धिपद्ध पदों को तोटा जाय ( आप 'दमा-दमन' और 'दमाद-मन' ही क्या जान ही रहे होंगे)। जहाँ तहाँ टिप्पणिया दी हैं जिनमें बहुत धृष्टता दिसार स्तिन लोगों के विचारा का सण्डन किया है। उनमें मूल की व्याख्या कम ही पायेंगे। उसके लिए भूमिका का तृतीय परिच्छेद अपलोग्नीय है। भूमिका नालन्दा में लिसी गई थी, यहाँ के पुस्तकालय में प्राप्स सारी सामग्रियों का उपयोग दिया गया है- इसम सन्देह नहीं। उसके बाद सरमे घड पुस्तकालय डा० सातस्टी मुखोपाध्याय (डिरेक्टर, नानालन्दा महाविहार ) के अप्रतिम ज्ञान का ग ऐसा प्राणी है कि नई जन्मों तर भी उनसे उऋण होने को नहीं। निघण्टु का मूल पाट एवं पैदिक मंत्रों या पद्यानुवाद भी माथ में लगा दिया है । पद्यानुनाद तो सीमित अक्षरों में होता है, उमरी कठिनाई क्या पहें, भापा की रक्षा होती नहीं, यही समझ लें कि अनुमाद भर हो जाता है । इमसे भी अच्छा अनुराद हो सकता था पर किशोरावस्था में दिये गये अनुवादों पर स्ल्म चलाने का साहस नहीं हुआ, ज्यों या त्यों दे दिया ।
'वन्दो प्रथम अमनन चरना' यद्यपि पद-पद पर असजन मिलते रहते हैं, किन्तु इस कार्य में व्याघात डालनालों का क्या कहना ? उन्हें दूर से ही प्रणाम कर विराम लेता हूँ। इसमें प्रोत्साहन देनेवालों की भी कमी नहीं । सर्वप्रथम मै मुगृहीत नाम- घेय, हिन्दी के मूर्धन्य आलोचक आचार्य नलिनविलोचन शर्मा जी का नाम लेनिन्होंने मेरी कृतियों पर मुझे बधाई दी है तथा निरक्त के कार्य में भी आशीर्वचन व्यक्त किये है। डा० वचन झा का भी म महतज्ञ नहीं जो जहाँ-तहाँ मेरा परिचय देते समय मेरे निरक्त एव विशेषतया इमकी भूमिका सम्पत्ति की चर्चा कर दिया करते है। यदि पाठकों न इसे पसन्द क्यिा तथा प्रकाशक वरवन्धुदय ( आदरणीय श्री मोहनदास तथा विट्टलदास जी गुप्त ) का वरद र साथ रहातो शीघ्रातिशीघ्र महत की अन्यान्य कृतिया का भी हिन्दा रूपान्तर (म्यारया के साथ ) उपस्थित करन म कुछ भी क्मर नहीं रहेगी। पोन्दिल (गया) वैशासीपूर्णिमा, २०१८ , -ऋषि' , (१३) भूमिका की विस्तृत-सूची परिच्छेद १- भारतीय-याडमय और वैदिक साहित्य वेद, संसार का प्रथम-साहित्य-उनी महत्ता-विभाजन-संहिता, ब्राह्मण, धारण्यक, उपनिषद्-संहितायों का संक्षिप्त वर्णन-उनसे सम्बद्ध ब्राह्मणादि की गणना-दाम-शिक्षा-प-व्याकरण-छन्द-ज्योतिष-निरुक्त अन्य वेदाङ्गों से भिन्नता। परिन्छेद २-निघण्टु तथा निरुक्त निघण्टु, वैदिक शब्दों का संग्रह-निरुत, उसी का भाष्य-निघण्टु और निरुत्त का विभाजन घण्टुक-राण्ड-~-पर्याय शब्दों का संग्रट--नगम काण्ड- कटिन-शब्दों का संग्रट-देवत-काण्ड-देवताओं के नामों का संग्रह-निरुक्त का परिचय-शैली-विचिन शब्दों का प्रयोग-निघण्टु अनेक थे-उनका लक्षण- वर्तमान-निघणु का रचयिता-निघण्टु और निरुक्त के रचयिता एक ही व्यक्ति नहीं थे-विरोधी तर्य और राण्डन-निष्कर्ष । परिच्छेद ३-निरुक्त की विषय-वस्तु [क] प्रथम अध्याय-इसकी तुलना-निषण्ट की रूपरेखा, प्रान्तरिक तथा बाह्य-पद भेद-नाम और श्राख्यात-उपसर्ग-निपात और उनके भेद-शब्द नित्य हैं या अनित्य ? पतअलि--स्फोटवाद-मोमासरों की युक्ति- प्लेटो-भाषा में मनुष्यों नीर देवताओं का ऐक्य-भावविहार-शब्दों का धातुज- सिद्धान्त-शाष्टायन और गार्ग-गार्य का पूर्वपक्ष -याक के उत्तर- सभी शब्दों से धातुज मानने के कुफल-सिद्धान्त की विशेषता-निरुक्त छ। उपयोगिता-मन्त्र निरर्थक हैं या रार्थ?--कोत्म का पूर्वपक्ष और याक का उत्तर [स] द्वितीय अध्याय-क्या द्वितीय अध्याय में ही निरक्त प्रारम्भ हुश्रा है? -निर्वचन के सिद्धान्त-शब्दों में परिवर्तन -मोन्ड या विचार-दिक और लौकिन शब्दोंश सम्बन्ध-टपभाषायें-अनुबन्ध-चतुष्टय और अधिकारी की जाँच--निघण्टुये शब्दों की व्याख्या-पाचायों के टवरण--'गो' के अर्थ- इतिहाम-पदा रूपम्। (४) [ग] तृतीय अध्याय-निघण्टु के द्वितीय तृतीय अध्यायों के शब्दों की व्यारया-त्त्परता औरस पुन को श्रेष्ठता-चशिष्ट का उपाख्यान-पुत्र का उत्तराधिकार-पुत्री का उत्तराधिकार-तर्व-भ्रातृहीन नारी का उत्तराधिकार- गर्तारुक् शब्द-पुत्री का उत्तराधिकार-निषेध-पचनन- कतिपय प्रातिपदिक हीन शब्द-उपमा-रक्षण-उमके वर्म तथा प्रचार-परमूला उपमा--- शब्दानुकृति-नैघण्टक काण्ड की समाप्ति । [4] चतुर्थ अध्याय-नगम या ऐपिदिक-काण्ड, इसकी विशेषता- जहा, निधा, दमूना, मूप-दुरुतन-तितर-भाष्य में उद्धरण-शुन्थ्यु के विभिन्न अर्थ-निपान-चिन्, नूच रच्छप च्यवन और इनरा इतिहास- रन और हर यम-यमी मवाद-अदिति और सवश्वरवाद–उदात्त और उसमा प्रयोग-प्रहेलिका माइनशी उत्पत्ति की परपना । [ड | समम अध्याय-देवता-विज्ञान-ऋचाओं के भेद-विपय-मन्त्र में देवता की पहचान-देवताओं के तीन भाग--विभानन को अन्य रीतियाँ- देवताओं से सम्बद्ध वस्तुए-एक्देववाद- बहुदेवयाद-सर्वश्वरवाद-धेनो थिम-स्वरूप विचार--मानवीकरण--उसकी विशेषतायें-अग्नि, जातवेदम, वैवानर-प्रारम्भिर विज्ञान । परिच्छेद ४-यास्क का निर्वचन निर्वचन का अर्थ-याधुनिक निर्वचन-इसका कठिनाइयां-व्यापक अध्य यन की अावश्यकना-यास्फ की विशेषता-यारक के ध्वनि नियम-यास्त के निर्वचन की विशेषतायें-यास्क के निर्दचनों के स्वरूप प-निर्वचनों की दुधिता और उसके कारण-निष्कर्ष। परिच्छेद ५-निरुक्त और येदिक् बाङ्मय निरुत्त का विसा घेदिय शामा से सम्बन्ध-विभिन्न सहिताओं के उद्ध रण-निरुक्त किसी एक चेद से सम्बद्ध नहीं है-यास्त की बहुइता-डा. सस्प-अयर्ववद-टा० स्कोड-उद्धरणों की सारणा-निरुक्त और वेदार्थ- वैदिक अर्थ करने के विभिन्न-सम्प्रदाय—मायण-दयानन्द- अरविन्द- भाषाविज्ञान-धारणा के अनुमार व्याख्या-निरत्त की व्याख्या शैली। परिच्छेद ६-निरुक्त और व्याकरण निरुक और व्याकरण में मम्बन्ध-व्याकरण की प्राचीनता-व्याकरण का १५ । भूमिका प्रथम-परिच्छेद भारतीय चाय और वैदिक-साहित्य [वेद, संसार का प्रथम साहित्य-उनको महत्ता-विभाजन- संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद-संहिताओं को संक्षिप्त वर्णन- उनसे सम्बद्ध ब्राह्मणादि को गणना-वेदाङ्ग-शक्षा-कल्पच्याकरण- उन्द-ज्योतिष-निरुक्त-अन्य वेदाङ्गों से भिन्नता । 'किसी देश की संस्कृति का पूरा ज्ञान हम उसके साहित्य से ही कर सकते हैं । जिस देश का साहित्य जितना प्रौड़, गम्भीर और विस्तृत होता है उसकी संस्कृति भी उतनी ही उच्च मानी जाती हैं। साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया है अर्थात् साहित्य द्वारा हम किसी जाति की सभ्यता, संस्कृति सम्पत्ति, उदारता आदि का सम्यक् ज्ञान पा सकठे हैं। भारतवर्ष की प्रतिष्ठा आज विश्व मे है अधिकांशतः वह उसके प्राचीन साहित्य पर ही अवल. ग्वित है। प्रायः सबों ने यह स्पष्ट रूप से स्वीकार कर लिया है कि संसार का सर्वप्रथम साहित्य भारत में ही वेदों के रूप में अवतीर्ण हुआ। वेदों पर भारतवर्ष को गौरव है और उनकी प्रतिष्ठा अशुग रखने के लिए उनसे संकड़ों वर्ष तक उन्हें मौसिक-रूप में रखा, प्रत्येक कम में उनका पाठ अनिवार्य हो गया, तथा 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' का स्वरोद्घोष भी किया गया । पोछे का समस्त भारतीय वाहमय किसी-न-किसी रूप में वैदिक-साहित की ऋणी है। धर्म, दर्शन, विज्ञान आदि विभिन्न विषयों को उत्पत्ति के लिए हम यदिक-साहित्य का ही बालोडन करते है । वेदों का अर्थ ही है जान पा समूह ( विद् ज्ञान), आज वेदों का अध्ययन विद्वान् लोग न केवल धर्म-कर्म १. मोइन-जो-दारो को अटिन शिनालिपि (सिन्ध, ४५०० ६० पू०) तथा रोपान कोई की हिवारत सिलसि (तु, १४००६० पू) को लोग वेदों से पूर्व मानते हैं। बेहरों का माल-१५०० ० ० ( मैक्समूटर), २०००० पू० (विन्तरनित्स), ४१...पू. (विटक सपा कोयरी), भौर २५००००० ( मदिनार चन्द्र दास) एक मानता " २.हिनि भू.
आदि के ज्ञान के लिए करते हैं प्रत्युत उनके आधार पर प्राचीन-सभ्यता, थार्यों की मूल-भाषा, मानव का इतिहास आदि विषयो का भी पता लगाते हैं। यद्यपि वेदो से 'मन्त्र बाह्मणात्मक. शब्दराशिद ' (आप० परि० ३१) के अनुसार केवल मन्त्रभाग और ब्राह्मण-भाग वा ही ग्रहण प्राचीन-आचार्यों ने किया है किन्तु उनका यह लक्षण केवल कर्मकाण्ड तक ही सीमित था, अतएव पाश्चात्त्य-गवेषको ने भाषा के आधार पर वैदिक और लौकिक सस्कृत का भेद देखकर वैदिक-भाषा मे लिखे गये समस्त साहित्य को 'वैदिक' नाम से अभिहित किया है। इस प्रकार वे वैदिक-साहित्य को चार खण्डो मे ( भाषा के अनुसार कालो में ) बांटते हैं-सहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् । सहिता- भाग में मन्त्रो का सग्रहमात्र है और ये सबसे अधिक प्राचीन हैं। ब्राह्मण-भाग मन्त्रो का याज्ञिक उपयोग बतलाता है, यह अधिकाशत: गद्य मे है । आरण्यको और उपनिषदो मे दार्शनिक-भावना उद्भत हुई है। इनमे अपियो के ईश्वर, ससार और जीव-सम्बन्धी आध्यात्मिक विचारो का गद्य-पद्यात्मक वर्णन है । सहिता-भाग के भी चार खण्ड हैं-ऋक् , यजुः, साम और अथर्व जिनमे प्रत्येक से सम्बद्ध ब्राह्मण-आरण्यक-उपनिषद् अलग-अलग हैं। उस समय तक लेवन-कला का आविष्कार न होने के कारण इन्हे कण्ठस्थ ही रखा गया और विभिन्न-कुलो मे भिन्न-भिन्न रूप से पाठ होने के कारण इनकी कई शाखायें हो गई । फिर भी प्रत्येक शाखा के अपने-अपने ब्राह्मणादि निश्चित थे। कालान्तर मे बहुत-सी शाखायें लुप्त हो गई। पतञ्जलि ने ऋग्वेद की २१, सामवेद की १०००, यजुर्वेद की १०१ और अथर्ववेद की ९ शाखाओ का उल्लेख किया है। इनमे प्रत्येक शाखा स्वतन्त्र रूप से वेद है । ऋग्वेद-मे ऋचामों का सग्रह है तथा समस्त वैदिक-साहित्य में यह सबसे बहा है । इसकी केवल एक शाक्ल-शाखा ही इस समय उपलब्ध है । अन्य सभी येदो मे इसके मन्त्र सगृहीत है। ऋग्वेद के विभाजन की दो प्रणाली है- अटक-अध्याय-वर्ग तथा मण्डल-मूक्त-अनुवाक । तदनुसार यह पाठ अष्टकों या दस मण्डलों में विभक्त है। पिछला विभाजन ऐतिहासिक है अतएव सभी आधुनिक-विद्वान् ऋग्वेद के उद्धरण देते समय इसी प्रणाली का आथय लेते हैं। ऋग्वेद के प्रथम तथा दराम मण्डल अर्वाचीन हैं जिसे भाषा, देवता आदि के आधार पर सिद्ध किया जाता है । फेवल ७५ मन्त्रों को छोडकर सामवेद- १.महामाभ्य-पृय ७१ (बम्बई)-एक्शनमध्वासाः स्तवमा सामवेदः, एकविंशतिथा बाईच्यं नवधायगे वेदः । (१८) - संहिता के सभी मन्त्र ऋग्वेद से लिये गये हैं जिनमें अधिकार नवम-मण्डल (सोमविषयक ) के हैं। सामदेव के पूर्वाचिन और उत्तराचिक दो भाग हैं जिनमें सभी मन्त्र सगीत के योग्य हैं। साम-गान में सात स्वरो का उपयोग होना है। यजुर्वेद के दो भेद है-शुक्ल एवं कृष्ण । शुक्ल यजुर्वेद मे फेवल मन्त्रों का संग्रह है विनियोग-वावयो का नहीं 1 इसकी सहिता वाजसनेयो- सहिना कहलाती है ( ४० अध्याय) जिसकी दो प्रधान शाखायें-माध्यन्दिन ( उत्तर भारत ) और काण्ड (दक्षिण ) हैं । कृष्ण-यजुर्वेद में मन्त्रों के साथ- साथ विनियोग-वाक्य भी हैं। इमरी चार शाखायें प्राप्त हैं-तत्तिरीय ( अष्टक-प्रश्न-अनुवाक में विभक्त), मंत्रायणी, काठक तथा कठ-बापिष्ठल सहितायें । दोनो यजुर्वेद प्रायः गद्य मे हैं जो दैदिक साहित्य का प्रथम गद्य है । अथर्ववेद मे यभिचार मन्त्र (मारण, मोहन आदि) सगृहीत हैं तपा यह बीस काण्डों में विभक्त हैं जिनके भीतर प्रमश. प्रपाठक, अनुवाद, मूक्त और मन्य सनिविष्ट हैं । इसके बारह सौ मन्त्र ऋग्वेद से लिये हुए हैं । इनमें प्रत्येक वेद के अपने अपने ब्राह्मण, वारण्यक पौर उपनिषद हैं जिनकी गगना कर दी जाती है- सहिता दाह्मण मारण्यक उपनिषद् १ ऐतरेय (१ऐतरेय १. ऋग्वेद २ कौपीतकि १२ पादपायन {२ कोपोतकि (१ सापडप (पवित) (१ तलवार २ तलवार २ छान्दोग्य १२ छान्दोग्य २ थाम आदि १ पदारण्यक (१वदारक (१०० अध्याय) २ ईश (संहिता में) १ तैत्तिरीय ततिरीय तत्तिरीय ४. पण यजुर्वेद २-३ मंत्रायणी और २ मैत्रायणी या पाठक ( सहिता मे) 1३ श्वेताश्वतर (४५ ५. अपवेद १. गोपय प्रश्न (पंप.पागा) २ मुभा (को.. १ऐतरेय २. सामदेव ३. शुक्ल यजुर्वेद / नप 18 २ १. इन सर भन्यो विश्वविमन के रिए देले- वहदेव उपाध्याय, दिक सारिप र सेमिरा भर दिस-याच्या विस 1 m दान पर हो सभी माना भीममम्मत।
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अभी तक य सभी अन्य पूर्णतया उपलब्ध नहीं हुए हैं तथापि इस
विपुलकाय साहित्य को देखकर हमे उस समय के ज्ञान एव परिश्रम पर
आश्चर्य करना पस्ता है। इन सबो को ठीक ठीक समझने एव तदनुसार
कार्य कलाप का सचालन करने के एि वेदाङ्ग ग्रन्थो की आवश्यकता होती
है जो शरीर के अङ्गो के समान ही वेद के अनिवाय भाग हैं। य अङ्ग है-
शिक्षा, कल्प, व्याकरण, छ द, ज्योतिष और निरुक्त । इन सबो का विभाजन
पाणिनि शिक्षा (४१-४२ ) मे इस प्रकार है-
छद पादौ वेदस्य हस्ती क्ल्पोऽय पठ्यते ।
ज्योतिपामयन Tथुनिरुक्त श्रोत्रमुच्यते ।। ४१॥
शिक्षा घ्राण तु वेदस्य मुख व्याकरण स्मृतम् ।
तस्मात्साङ्गमधीत्यैव ब्रह्मलोके महीयते ॥ ४२ ॥
(१) शिक्षा-स्वर, वण आदि के उच्चारण का नियम बतलाने वाली
विद्या ही शिक्षा है । उदात्त अनुदात्त तथा स्वरित इन तीनो स्वरो के उच्चारण
किस प्रकार से हो, इसे बतलाना ही शिक्षा का प्रधान काय है। स्वरो के
अल्प भेद से ही बडे बडे अनप हो जाते हैं जैसा कि हम इन्द्रशत्रु के वृत्तान्त
से जानते हैं। शिक्षा का अध्ययन एक प्रकार से आधुनिक ध्वनिविज्ञान
( Phonology ) का अध्ययन है जिसम उच्चारण के स्थान वर्ण, स्वर,
मात्रा (हस्व दोष नुत ) शुद्ध उच्चारण के नियम तथा सधि का अध्ययन
होता है । उच्चारण के लिए पाणिनि शिक्षा कहती है कि जिस प्रकार बिल्ली
अपने बच्चो को दात मे पकडती है, न तो दान ही गडने हैं और न गिरने
पा ही डर है--सतुग्न से उसी प्रकार अपरों का उच्चारण करें। उस
फाल म ध्वनि विज्ञान की इस प्रकार की उन्नति किम चषित नहीं करती ?
१ मन्त्री होन परतो वनो श मिथ्याप्रयुत्तो न तमर्थमाए ।
स वाग्वत्रा यजमान हिनस्ति यथा स्वरनोपरामाद ।। ( पा०शि०५२)
गुकाच ये वृत्रासुर कोद्रनाग के लिए यश करा रह थ। उहोंने र पढा-
पन्द्रशमूर्वपस्व स्वाहा । उनका अभिप्राय था
विद्रये नाक (3) तुम उत्पन्न
हो, बढा। ऐसी दशा में त पुरुष समान ( अन्न का अथर उनात्त) होना, मिन्नु भ्रमवश
उहोंने पूर्व पद के अनुसार स्वर रख लिया नो बाबीहि समाम में होता है। पान
अर्थ हुआ-इश (नाक) है जिसरे रस रह न ही मारा गया। रबर के लिए
देखें-पा० १० समासम्य (२२३), बहुत्रीही प्रया पूर्वपदा (६ारा )।
२ व्याधी यथा हरेदम दाम्या न च पीडयेद ।
मीना पतनभेदाभ्या तइदा प्रयानये ॥२५॥
शिक्षा के प्राचीनतम ग्रन्थ प्रातिशास्य के रूप मे मिलते है, जो सभी वेदो के भिन्न-भिन्न हैं जैसे-शौनक का प्रातिशाख्य, कात्यायन का शुक्लयजु:- प्रातिशारय, सामवेद का पुष्पसूत्र, तैत्तिरीय-प्रातिशाख्य तथा अधर्व-प्रीतिशाख्य आदि। इन सबो मे सूत्र के रूप मे उपयुक्त विषय समझाये गये हैं। शिक्षा-ग्रेन्यो मे पाणिनि तथा याज्ञवल्क्य की शिक्षायें बहुत प्रसिद्ध है जो श्लोकबद्ध हैं।' (२) कल्प-वैदिक-कर्मकाण्ड का विस्तार देखकर उसे सूत्रबद्ध करने की इच्छा से ही कल्प का आविर्भाव हुआ जिन्हे हम कल्पसूत्र कहते हैं। इसका अर्थ है--वेद मे विहित कर्मों की प्रमश व्यवस्थित कल्पना करनवाला शास्त्र शिक्षा की भांति ही ये प्रत्येक वेद और शाखा के लिए अलग-अलग हैं । ये तीन प्रकार के है-(क) श्रौत सूत्र जिनमे .श्रुति-प्रतिपादित दर्श- पूर्णमास आदि विविध यज्ञों का विधान किया गया है। वस्तुत. कल्पसूत्रों के ये हो पुष्ट अंग है । (ख) गृह्य-सूत्र जिनमे गृह्याग्नि मे होनेवाले यज्ञो तथा विवाह, श्राद्ध आदि सस्कारो का वर्णन है। (ग) धर्मसूत्र जिनमे चारों वर्णों तथा आश्रमो के कर्तव्य निर्दिष्ट हैं । मनु आदि की स्मृतियो के ये ही स्रोत हैं तथा हिन्दुओ के कानून भी ये ही हैं । ऋग्वेद के दो थोत ,और गृह्य- सूत्र हैं-आश्वलायन तथा शाङ ख्यायन । एक कौपीतक गृह्य-सूत्र भी प्रकाशित है किन्तु श्रौतसूत्र प्राप्त नहीं हुआ है.। शुक्ल यजुर्वेद के कात्यायन-धौतसूत्र तथा पारस्कर-गृह्यसूत्र प्रसिद्ध हैं। कृष्ण यजुर्वेद से सम्बद्ध कल्पसूत्र है- बौधायन, आपस्तम्ब, हिरण्यकेशी, वखानस, भारद्वाज तथा मानव । इनमें अधिकाश प्राप्त हैं। सामवेद के कल्पसूत्र हैं-आर्षेय-कल्पसूत्र, लाट्यायन, द्राह्मायण तथा जमिनीय-श्रौतसूत्र; गोभिल, खदिर तथा जैमिनीय-गृह्यसूत्र । अथर्ववेद के वैतान-श्रौतसूत्र तथा कौशिक गृह्यसूत्र मिले हैं। धर्मसूत्रो में -- १. उच्चारण का विश्लेषण करने के लिए आधुनिक युग में यन्त्र बन गये हैं किन्तु उस युग में इनके अभाव में भी शिक्षाकारों ने वर्गों के स्थान और यल जान लिये थे जो आज भी प्रायः मान्य है । देखें-Dr. Siddheswar Varma, Phonetic Obseriation of Ancient Hindus-21 Allen, Phonetics in Ancient India (Oxford University Press). २. विष्णुमित्र-प्रातिशाख्य को वर्गदयवृत्ति, पृ० १३-यो वेदविदिताना मंगा- मानुपूर्येण कल्पनाशास्त्रम् ।
गौतम ( साम), बौधायन, आपस्तम्ब, हिरण्यकेशी ( कृष्ण यजु ), वसिष्ठ और विष्णु (ऋग् ) उल्लेखनीय हैं । पल्प का एक चौथा प्रकार शुल्बसूत्र हैं जिसमे यज्ञवेदिका का निर्माण प्रकार वणित है जिसे रेखागणित से पूरा सम्बन्ध है। (३) व्याकरण-वैदिक साहित्य में आने वाले शब्दों का निर्माण, उनकी शुद्धता आदि का अध्ययन प्रकृति और प्रत्यय के सम्बन्ध द्वारा व्याकरण ही करता है। व्याकरण का निर्देश तो ऋग्वद काल से ही मिलने लगता है किन्तु तैत्तिरीय-सहिता ( ६।४७.३ ) म व्याकरण की उत्पत्ति की कथा दी हुई है। इन्द्र के द्वारा वाणी व्याकृत (प्रकृति-प्रत्यय विच्छिन्न ) हुई, अतएव इन्द्र हो आदि वैयाकरण हैं । किन्तु सम्प्रति इन्द्र गोमी नामक एक बौद्धाचार्य का प्रन्थ ऐन्द्र व्याकरण के नाम स प्राप्त है, प्राचीनतम इन्द्र का नही। ध्याकरण के कई परिभाषिक शब्द हमे गोपथ ब्राह्मण (११२४ ) में भी मिलते हैं। इस प्रकार क छिटपुट व्याकरण यास्क के निरुक्तकाल तक लिखे गये । व्याकरण के प्रयम परिपूण आषाय पाणिनि ने ही दस प्राचीन आचार्यों के नाम गिनाये हैं जिनमे कितने तो यास्क से भी प्राचीन हैं। पाणिनि ( समय ५०० ई० पू०) ने अपनी अष्टाध्यायी ने द्वारा तात्कालिक-भाषा को सयत किया । स्थान-स्थान पर वैदिक व्याकरण के विषय मे भी कुछ संकेत किया फिन्तु वह सतमात्र था । वस्तुत वैदिव्यावरण का सर्वांगीण व्याकरण अभी तक उपलब्ध नहीं हुआ। पाणिनि के बलाचे दूसरे प्रकार के कई वैयाकरण हुए हैं किन्तु इनके नियमो से भागे बढकर लिम्बनेवाला कोई नहीं हुआ। पाणिनि ( अष्टाध्यायी), कात्यायन (वार्तिक ) तया पतञ्जलि (महाभाष्य )-इन तीनो को मिलाकर 'विमुनि-पाकरण कहते हैं और इन आचार्यों की प्रामाणिक्ता भी उत्तरोत्तर अधिक है। इन्हें ही लेकर काशिका, कौमुदी आदि पीछ के ग्रन्थ लिखे गया (४) छन्द-वेद वे मन्त्रा के उच्चारण के लिए छन्दो का ज्ञान अत्यान यावश्यक है क्योकि वैदिक-साहितामो या अधिवास भाग र दोबद्ध है । मुख्य १ धर्मसूत्रों के वर्णन ये रिए देयें-Prof ' । hare History of Dharma Sastra lol I, Pp 12-70 मूत्र साहित्य का अध्ययन सन्तोषजनक नहीं हुआ है। लेखक इसका विस्तृत इनिहाय लिग रहा है जो चीर ही प्रकाशन होगा। २ भ्याकरण शास्त्र के विभिन्न आवायाँ मुथा अन्यों से परिचय के लिये देखें- Drs RBelalkar, Systems of Sanskrit Grammar तथा युधिष्ठिर मीमासम, म्यानराशाला निवास । (२) छन्दो के नाम तो हमे सहिताओ और ब्राह्मणो मे ही मिलने लगते हैं जिससे इस अग को प्राचीनता सिद्ध होती है किन्तु इसका प्रतिनिधि ग्रन्थ है पिङ्गलाचार्यकृत छन्द सूत्र जिसके प्रथम चार अध्यायो म वैदिक छन्दो का वर्णन है। छन्द का अर्थ है आवरण अर्थात् जो शब्दो का शावरण हो। पोछे सामान्य रूप से वेदा के लिए 'छन्द' शब्द का प्रयोग होने लगा जैसा कि पाणिनि अपनी अष्टाध्यायी मे बहुल छ दसि' का प्रयोग करते हैं। चूंकि वैदिक छन्दो मे सामान्य नियम का अभाव है इसलिए व्याकरण के अनियमित तथा असपत प्रयोगों को छान्दस अथवा आप प्रयोग कहते हैं। गुरु रघु की गणना से रहित, केवल अक्षरो की गणना पर ही वैदिक छन्द आधारित हैं। यास्क ने सक्षम अध्याय म छन्दो का निवधन किया है जिसे हम देखेंगे। प्रधान वैदिक छन्द हैं-गायत्री (८+2+८ अक्षर) अष्णिक (८+८+१२), अनुष्टुप (८ अक्षरो के चार चरण ), बृहती (८+८+१२२८), पक्ति (८ अक्षरों के पांच पाद), त्रिष्टुप् ( ११ अक्षरो के चार पाद) तथा जगती (१२ अक्षरो के चार पाद ) । इन छन्दो से ही लौकिक छन्दो का विकास हुआ है। (५) ज्योतिप 1-यज्ञ के सम्पादन करने का विशिष्ट समय जानने के लिए ज्योतिप की नितान्त आवश्यकता है । दिन, रात, ऋतु, मास, नक्षत्र, वर्ष आदि का ज्ञान बिना ज्योतिष के हो ही नहीं सकता। यह जीवन से इतना सम्बद्ध है कि अनजाने ही हम 'रात' 'दिन'-जैसे ज्योतिष के ही शब्दो का प्रयोग करते हैं । वैदिक सहिताओं मे ही काल के अनेक विभागों का वर्णन उपलब्ध होता है। ऋतुओ के नाम से वर्ष का बोध होता था जैसे-शरद शतम् - सौ घरद तक (सौ वर्ष तक यहाँ तक कि हमारा सुपरिचित 'वर्ष' भी वर्षा ऋतु के नाम पर ही बना है । वेदाङ्ग ज्योतिय नामका अन्य ही इसका प्रतिनिधित्व करता है जो ऋग्वेद और यजुर्वेद से सम्बद्ध है। इसमें लोगो मे तारकालिक ज्योतिविद्या का वर्णन है। पीछे के अन्य भी ज्योतिविद्या १ अभी तक छन्द शास्त्र के ग्रन्थ बहुत कम मिले है तथा अध्ययन भी नहीं । देवल आर्नरड ने वैदिक छन्द' ( Vedio Metre) नामक अन्य रिसा है। २ तुल्ना करें-वसन्ते माझगोऽग्निमादधीत, ग्रोभे राजन्य आदधीत, शरदिश्य मादधीत' (ले० प्रा० १०५ ) तथा 'प्रान जुहोनि, साय जुहोति' ( २२११३)। (२३) वे अमूल्य रत्न हैं जैसे--आर्यभटीय, सूय सिद्धान्त आदि । ज्योतिष का ही एक यग गणित है जिसे पूर्वकाल म बहुत ही समृद्ध किया गया था। (६) निरुक्त-वेदाङ्गो मे चौथा स्थान पाने पर भी निरुक्त अपनी कई विशेषतायें रखता है। इसमे मुख्यतया वैदिक शब्दो के अर्थ जानने की प्रक्रिया बतलाई जाती है जैसा कि सायण ने इसका लक्षण अपने ऋग्वेद- भाष्य की भूमिका में किया है-'अर्थज्ञान के लिए स्वतंत्र रूप से जहाँ पदो का समूह कहा गया है वही निरुक है ।'२ अर्थ चूंकि शब्द के अन्तरङ्ग से सम्बन्ध रखता है अतएव यह वहना कदाचित अनुचित न होगा कि अन्य वेदाङ्ग जहाँ वेद के वहिरङ्ग से हो सम्बन्ध रखते है, निरुक्त उसके अन्तरङ्ग से सम्बद्ध है। अन्य घेदाङ्ग प्राय सूत्रो मे हैं, किन्तु निरुक्त भाप्य- होली के गद्य में है जिससे अर्थावगम म वढी सहायता मिलती है। निरुक्त स्वयं निघण्टु नामक वैदिक कोश का भाष्य है तथा यास्क वा लिखा हुआ है । निघण्टु मे शब्द केवल गिना दिये गये हैं जो प्राय अमरकोश की शैली मे है। इन्ही शब्दो पर यास्क ने अपना विशेष ध्यान रखा है तथा उन अथं तक पहुंचने की चेष्टा की है। अर्थज्ञान के लिए वे उस शब्द से सम्बद्ध पातु तथा उसके अर्थ का आश्रय लेते हैं। यही निरुक्त की साधार-शिला है । निघण्टु वे पांच अध्यायो की व्याख्या यास्क ने बारह अध्यायो मे की है क्या पीछे दो अध्याय परिशिष्ट के रूप मे जोडे गये हैं । अन्य वेदाङ्ग जिस प्रकार प्रत्येक पैदिक पासा के अलग-अलग हैं उसी प्रकार यह अनुमान किया जाता है कि निरुक्त भी अलग अलग होंगे । प्रस्तुत-निरुक्त किस वेद का है- इस प्रश्न की विवेचना हम यथास्थान करेंगे। - १. विशेष अनुमोदन के लिए देखें-नैमिन्द्र शासी, भारतीय ज्योतिष, भामा म्भा 'भारतीय ज्योनिय मात्र या इतिहास'-उचर प्रदश सरकार का प्रकाशन । २. अर्थावबोधे निरपक्षन्या पदजायत्रोत तारतम्।
द्वितोय-परिच्छेद निघण्टु तथा निरुक्त [निघण्टु, वैदिक्-शब्दों का संग्रह-निरक्त उसी का भाष्य- निघण्टु और निरुक्त का विभाजन-नैघण्टुक काण्ड-पर्याय शब्दों का सग्रह नैगम-काण्ड-कठिन शब्दों का संग्रह-दैवत काण्ड-देवताओं के नामों का संग्रह-निरुक्त का परिचय-शैली-विचित्र-शब्दों का प्रयोग-निघण्टु अनेक थे-उनका लक्षण-वर्तमान निघण्टु का रचयिता-निघण्टु और निरक्त के रचयिता एक ही व्यक्ति नहीं थे- निरोधी तर्क और खण्डन- -निष्कर्ष।] ऊपर कहा जा चुका है कि निरुक्त मे यास्क ने निघण्टु मे गिनाये गये वैदिक शब्दो की व्याख्या की है। इस दृष्टि से निघण्टु बहुत महत्वपूर्ण है। डा. रमण सरूप निघण्टु के विषय मे कहते हैं कि 'निष्टु की रचना कोश रचना के अभी तक के सभी ज्ञात प्रयासो मे प्रथम है, भारत मे तो यह कोश-साहित्य के आरम्भ का ही द्योतक है।' साहित्य में जितने विसरे हुए शब्द हैं उन्हे एकत्र करके एक नियम से सजा देना उस प्राचीनकाल के लिये नई ही वस्तु थी। यह सत्य है कि निघण्टु वैदिक शब्दो का पूर्ण कोश नही-इसमे किसी भी देद के सारे शब्द गिनाये नहीं गये, तथापि योग-रचना के तात्कालिक सिद्धान्त को देखने पर उसे पूर्ण ही कहना पड़ेगा। जिस निघण्टु पर यास्क ने भाष्य की रचना की है वह पांच अध्यायो में बँटा है। प्रथम तीन अध्याय नैषष्टक काण्ड कहलात है और इनके शब्दो को व्याख्या यास्क न निक्त व द्वितीय तथा तृतीय अध्यायो मे की है। निघण्टु के इन अध्यायों मे कुल १३४१ शब्द परिगणित हैं जिनमें केवर २३० शब्दो की ही व्यास्या यास्क ने इन अध्यायो मे की है। इन १३४१ शब्दो म पर्यायवाची शब्द सगृहीत हैं जैसे-पृथिवी के २१ पर्याय शब्द, ११ जरना' अर्थवाली क्रियायें, १२ 'बहुत' के पर्याय आदि। इसकी रचना टीव अमर कांश की शरी में ही हुई है। यद्यपि इनमें कई छन्द वैदिक The Nighontu and the Nirukta, p 14. (२५) साहित्य भर मे नही आये है किन्तु वैदिक-वाङ्मय का अधिकाश विनष्ट हो जाने के कारण हम ऐसा नही कह सक्ते । तथापि यह कहने में कोई आपत्ति नहीं कि कितने शब्द ऐसे भी हैं जो निघण्टु मे जिस अर्थ मे गिनाये गये हैं, वेदो में उसी अर्थ में प्रयुक्त नहीं हुए हैं। यही कारण है कि अब कट्टर पण्डितो को भी निघण्टु की प्रामाणिकता मे सन्देह होने लगा है। प्रो. राजवाडे' ने पालोचनात्मक ष्टि से निघण्टु पर विचार करते हुए लिखा है कि तीनो अध्यायों में कई उत्तर-वैदिक शब्द हैं। इनकी गणना भी उन्होने करा दी है। इन अध्यायों मे सुबन्त-दाद प्रथम एकवचन में तथा क्रिया-पद वर्तमान- बालके प्रथमपुरुष एरवचन म निर्दिष्ट हैं। निघण्टु के चतुथ-अध्याय मे तीन खण्ड हैं जिनमे प्रमश ६२, ६४ तथा १३२ पद-अर्थात् बुल २७८ पद हैं। ये किसी के पर्याय नहीं, सभी शब्द स्वनन्त्र हैं। तीनो खण्डों को ध्यास्या यास्क ने निरुक्त ये चतुर्थ, पचम तथा पष्ठ अध्यायो मे की है। इस अध्याय को नंगम या ऐक्पदिक-मापद भी यहते हैं। इस काण्ड वे शब्द प्राय सन्दिग्ध और कठिन है। हा. बेलवलकर पहते है-'निघण्टु मामा वैदिक-दो की सूची के चतुर्थ अध्याय को, जिस पर यास्क मे निकृत नाम वो प्यारया लिखी है. ऐकपदिय कहते हैं क्योकि इसमें अज्ञात या सन्दिग्य मूलवाले २७८ पारद गिनाये गये हैं। इस बात की पात्या बारम्भ करते हुए पास्त्र भी कहते हैं-'अप पानि अनेकार्यानि एकान्दानि सानि अतोऽनुमिप्याम । अनव गतसस्वारश्च निगमान् । तत् 'ऐतपदिकम्' पामते' (नि. ४१)। इससे निवपं निकलता है कि पे नाम स्वतन्त्र है तथा अनेक वर्ष धारण करते है, स्वय विमी पर्याय नहीं। किन्तु माप ही साथ इमरी बनावट का पता लगाना भी रदिन है इमलिये इन्हे ऐकपदिय निगम ( उदाहरण या प्रयोग ) महते हैं। इस ये पद भिन्न भिन्न रूपों और विभक्तियों में हैं। राजया के अनुमार एर 'यूरो छोरगययाप गभी शवदिश। निघण्टु रापचम या अतिम अध्याय देवत-माम विक्ष्यान है। इन 8 खण्डों में जमा ३, १३, १६, ३२. २६ सपा ३१ पद हैं जो मिन भिन्न देवताओं के नाम हैं। मैं भी पर्याप नहीं, बात है, उनमें १.lasha'sNrutta,' :.. २. मण्डल पदमाग में प्रकाशित निरन भग ११.३० पर नजर सन्दर्भ मन्दिो-अनुवाद । (२६) विशेषता यही है कि इन नामो के द्वारा देवताओ की स्तुति प्रधानतया की जाती है। इन खण्डो के शब्दो की व्याख्या यास्क ने निरुक्त के सातवें अध्याय से बारहवें अध्याय तक का है । एक एक खण्ड की व्याख्या एक एक अध्याय मे हुई है । चूंकि इन अध्यायों में यास्क को पर्याप्त स्थान मिला है अतएव देवनाओ के विषय में यास्क ने पूर्ण प्रकाश डाला है। निघण्टु को व्याख्या यद्यपि बारहवें अध्याय में समाप्त हो जाती है किन्तु बाद के किसी लेखक ने इसमे दो अध्याय परिशिष्ट के रूप मे जोडकर कुल चौदह अध्याय बना दिये हैं। देवत-काण्ड के इम परिशिष्ट मे देवनाओ और यज्ञो के विषय मे लिया है तथा प्रसगत कतिपय दार्शनिक विषयो का भी विवेचन है । इसकी शैली भी निरुक्त से बिलकुल मिलती-जुलती है । इम देवत-काण्ड पर ही वैदिक धर्म और सस्कृति का इतिहास अवलम्बित है क्योकि वैदिक देवता- वाद पर आलोचनात्मक दृष्टि से विचार करने वाला कोई भी ग्रन्थ निरुक्त से प्राचीन नहीं । यही हम किसी जाति का अपने धर्म के विषय मे चिन्तन की प्रयम किरणें पाते हैं। यास्क ने निरुक्त मे निघण्टु के सभी शब्दो को व्याख्या नहीं की है- यह कार की उक्ति से सष्ट है । पर्यायवाची शब्दों वाले अध्यायो मे तो पूरे पर्याय के समूह (जैसे 'उदक' के १०० नामो ) मे केवल पिसी एक (जैसे 'उदक' ) शब्द की व्याख्या करके ही आगे बढ़ जाते हैं। फिर भी यह तथ्य है कि केवल निघण्टु के शब्दो का ही निर्वचन उन्होने नहीं किया, प्रसगत आये हुए कितने ही अन्य शब्दो का भी निर्वचन किया है जिनमे बहुत से संस्कृत-भाषा (वैदिक नही) के भी शब्द हैं। डा. सिद्धेश्वर वर्मा' की गणना के अनुसार निरुक्त मे कुल १२९८ निर्वचन हैं । जहाँ से निघण्टु फे शब्दो की व्याख्या आरम्भ होतो है उसके पूर्व याम्क ने अपने पास्त्र में प्रवेश करनेवालो के लिये बहुत ही विस्तृत भूमिका लिखी है । निधण्ट के प्रथम शब्द 'गो' की व्याख्या निरुक्त मे द्वितीय अध्याय के द्वितीय-पाद से पारम्भ होती है । तब तक का सरा अर्थात पूरा प्रथम अध्याय और द्वितीय अध्याय का प्रथम पाद केवल भूमिका ही है जिसमे पद क भेद, दो का धातुज-सिद्धान्त, निरुक्त की उपयोगिता, निर्वचन के नियम यादि विभिन्न उपयुक्त विषयो पर विचार किया गया है । यही दशा देवत-काण्ड के आरम्म २. तुल० तद यानि नामानि प्राधान्यस्तुतीना देवताना तदैव-मित्याचक्षते (नि० १) २. Dr. Siddheswar Varms, Etymologies ofYaska Prefae (२७) A सप्तम - दे में भी है । वैदिक देवताओं के नामो का निर्वचन करने के पूर्व यात अध्याय मे भूमिका के रूप मे देवताओ के स्वरूप, भेद, स्वभाव आदि का विश्लपण कर लेत हैं । भाष्य की भूमिका लिखने की इसी प्रणाली का अनुसरण पनजलि ने महाभाष्य मे किया है ( देखें-पस्पशाह्निक)। हम यहाँ सक्षेप म निरुरत को शैली पर विचार करें। निघण्टु के किसी राब्द को लेवर यास्त्र तुरन्त उसकी निरुक्ति करत हैं जैसे-'नय स्मात् ? नदनाः भवन्ति = शब्दवत्य ।' 'नदी' किस धातु से बना और क्यो उसे नदी हो रहते हैं ? उनर है-'नद्' धातु से, जिसका अर्थ है 'शब्द करना', 'नदी' बना है क्योकि नदियां जोरो की आवाज करती हैं ।' अब यास्क ऐसे सब्दो या प्रयोग दिखलाने के लिए या तो सीधे ही किसी का उद्धरण देंगे अथवा उसको भूमिका यांपते हुए इतिहास आदि का आश्रय लेंगे तब मचा का उद्धरण देंग। पभी सभी उस शब्द या वेवल निवचन करके भी आगे बढ जात है। अस्तु, ऋचा का उदरण देने के बाद उसका अन्वय श्यि हो बिना एक एक राद का प्रतिशब्द सरल सस्कृत में देते हैं । बीप. योप मे दादा वा नियंचन बरने पे लिए रुष भी जाते हैं। प्रतिसद-व्याया परने मे य पदपूरण करने वाले शब्दो को (हि, तु, नु आदि) को छोड देते हैं। कभी कभी सन्देहास्पद या विवादास्पद स्थानों मे (जैसे-वेदमन्त्री की मावता, भातुन सिद्धान आदि विषयों पर ) प्रवल पास्त्रार्थी पी भानि घटनर भारतीय दासनिर परम्परा के अनुमार, पूर्वपक्ष की स्थापना करते हुए, उमदा तीन युत्तियों से सडन परके अपन सिद्धान्त या प्रतिपादन परा है। अपन सिद्धान्तों में उल्लेम ये ममय मिन्न-भिन्न विचारीवाल विद्वानों में मत भी उन परते जान है जिसमे मातम पहना है कि यास्त्र में सच्चे वैज्ञानिक की या मा निवास परती है। इमो प्रगाली रामापूर्ण निरक्त की रचना हुई है। महाभाष्य को गली निरुक्त पी सी से बात पूछ मिली है । दाना म हो छोट हाटे वारा पा तथा समासहित एब्दों का प्रयाग हुआ है । fri - निहरु २२४ । २i chatterce and Datta, Introduction fo Indian Pilosophy, 7 - ३-२२३ दादी की निराम-पते धारयनिवा, मालिनि (८) जो मास्क यास्क के शब्द बहुत म्यानो पर सदेहास्पद तथा आधुनिक सस्कृतन के लिए क्लिट हैं । वुछ एसे गय का प्रयोग है जिह पोछ दूसरे अथ म लिया गया। कम गब्द का मतलब है अथ जसे 'गतिकर्मा धातु = पति अथवाला घातु । इसी तरह उपपा का अथ है-समीप जाकर परीक्षा करना (दुर्गाचाय) दखना आदि । पीछ चलकर इसका अय तिरस्कार हो गया। सप्तम अध्याय म'आशीर्वाद वा अथ है कामना । इस प्रकार कितने ही दाद अनात और अप्रत्याशित अर्थों में प्रयुक्त हैं इस दृष्टि से यास्क का अध्ययन अयविनान ( Semantics) के लिए वहा ही उपयोगी है। इस पर हम माग विप विचार करग । कहीं कहीं व भिन्न रूपवाली क्रियानो का प्रयोग किमी दूमरे ही अथ म करते है जसे-अप्रयिष्यत् = अप्रययत् , उपपिपाद यित्' व्यय की इतनी बडी क्रिया केवल 'उपपादयेत् अथ के लिए दी गई है (सन् प्रत्यय का प्रयोग निश्चय ही व्यय है । ) बहुत स्यानो पर ऐसे प्रयोग की असावधानी वे परिचायक हैं। इस प्रकार की व्याख्या द्वारा याक ने निघण्टु की महत्ता प्राय दहा दी है क्योंरि यारक के द्वारा प्रदगित मौलिक्ता होने पर भी निरुक्त की पृष्ठभूमि सो निघण्टु ही है। इस स्थान पर इन दोनो के ऐतिहासिक-पक्ष का विश्लपण करना आवश्यक है। यह बात निर्विवाद सत्य है कि निघण्टु अनेक थे। प्रत्येक में वैदिर गे पा को था जो सकलन करनेवाले की इच्छा के अनुसार अपनी विपता लिये हुए या । यतमान निघण्टु के अलावे यास्त ने स्वय एक अप निघण्टु मा समेत पिया है । यास्क के ११२० ३ उद्धरण से सिद्ध होता है कि निघण्टु व्यक्तिवाचा दाद नहा रितु जातिवाचक है। ये कहते हैं कि जिसम निम्नलिखित भार बातें हों वही निपटु है-(१) समानायक धातुमा का सग्रह (एनायत समानार्मागो घानव ) (२) एक हो अथवाल भिन- दारनामा गमह ( एतान्ति अस्य मत्तम्य सामघयानि ) (३) कई यो पान का साह (एनायनामर्षानाम् ६ मभिधानम् ) कौर ( दवताना में प्रधान तथा गौर नामों पा गग्रह (नघणमिद देवतासाम , प्रापान रम, तदय यो मात्र निपतति नंपन्य )प्रो. राजवाट तीमरे लगा को यतमान निपट रो मित हुए न पापर अनुमान करते हैं कि इन सपा पुक्त एर पिया। परतुन ऐरपदिव का- म ऐ शापा मद को कई अपवास भी है तपा पुछ पार को हटि स व सारवाले भी हैं-दोनो का मिश्रण निघण्टु में उचित नहीं। वर्तमान- निघण्टु के केवल तीन ही खण्ड हैं जिनका इन चारों से मेल दिखाने का प्रयास दुर्गाचार्य ने अपनी निरुक्त वृत्ति में किया है। ऐकपदिक-बाड के 'अवगत सस्कार' वाले शब्द इस चतुर्लक्षणी मे नही आते। अवश्य ही इन्ही लक्षाणो मे युक्त अन्य निघण्टु भी रहे होगे जिनमे लक्षण के अधाति और अनिव्याप्ति-दोप नहीं होगे। पुन', 'तान्यपि एपे समामनन्ति' (७।१५) कितने आचार्य देवनामो के ऐसे नामो की भी गणना (अपने निघण्टु मे ) कर लेते है। यह भी सिद्ध करता है कि निघण्टु कई थे। या ने निरुक्त है अारम्भ में ही निघण्टु का बहुवचन मे प्रयोग करके सम्भवत इसी तथ्य की ओर निर्देश दिया है। वे गन्दो के चार भाग करते हैं-नाम, यास्यात, उपमग और निपान । यतमान निघण्टु मे तो केवल नाम और आग्यान ही हैं, क्या उपमर्ग और निपातो का संग्रह रखनेवाला भी निघण्टु पा? वाचायं भगवद्दत ने भी कई प्रमाणो से सिद्ध किया है कि निघण्टु भनेर थे। निरक्त मे जिन प्राचीन आचायो (निरक्तकारों) का नाम पाया है वे सब निघण्टु को भी रचना बरनवाल थे। अपरिशिष्ट का ४८ वा परिशिष्ट भी निघण्टु ही है जिसे ये कौत्मव्य कृत मानते हैं। यहवता में घास के नाम के साथ-साथ गापूणि का भी उल्लेख धई बार हुआ है, इससे निश्चय ही उनका निघण्टु और निरक्त रहा होगा। पूना से उन्होंने पावपूणि के निपष्ट को प्रकाशित भी कराया है। इस प्रकार ये १५-२० निघण्टुओ के होने का अनुमान करते हैं। स. पक्ष्यण सरूप निघण्टु को एष व्यक्ति की रपना नहीं मानते किन्तु राजवाई ने इसरा सप्रमाण वपन लिया है। हा. वोहर मे लिखित प्रपो वा बाधार पर यह सिद्ध मरने की घर की है कि निरक्त था पूर्वपटर (१-६ पयाय) और उत्तरपट्न (७-१२) दो प्रथ दोनों पी सी भी भिन्न है अतएव निघण्टु में भी पहर देवन-सा नहीं रहा १ प्रो. राजवाई-Jaskas Niruktos -111 २.दिकाप्य निझाम, माग ,गद २॥ १.९. रामोविन्द त्रिवेदी, दिन त्य, पृ. २१७। ४.hun antrols' it the production of site idivn. deal, last thereast edicated outs ofa kixicorreration on jerla el 10 eral gererti ag" righ, and Nir.( 14132-6) होगा। याम्क ने स्वयं भी 'साक्षात्कृतधर्माण ऋषयो बमबु' (१।२०) वाले सन्दर्म के द्वारा भी निघण्टु के पारम्परिक रचयिताओं की ओर संकेत किया है। इसमे तो कोई सन्देह नहीं कि प्रस्तुत निघण्टु-जसा कोश प्रय परम्परा से प्राप्त होकर एक बार किसी व्यक्ति के द्वारा सकलित हुआ है। जिस प्रकार पाणिनि की अष्टाध्यायी परम्परा से प्राप्त कुछ नियमो, शब्दो और परिभाषाओ को ग्रहण करने पर भी पाणिनि की मौलिकता प्रदर्शित करती है उसी प्रकार निघण्टु के शब्दो का सकलन भी परम्परा से ही प्राप्त है किन्तु कोई एक व्यक्ति ही इसे वर्तमान रूप देने में समर्थ है। महाभारत ( मोक्षधम- पर्व, अध्याय ३४२, श्लोक ८६-८७ ) के अनुसार प्रजापति कश्यप इस निघण्टु के रचयिता हैं। कई विद्वान् महाभारत के उपर्युक्त श्लोकों को प्रमाण-कोटि मे नही लाते तथा कहते हैं कि निरुक्त और निघण्टु दोनों के रचयिता पास्क ही हैं । स्वामी दयानन्द ने इस मत का प्रतिपादन किया और आचार्य मगवद्दत्त जी ने इसके लिए कई प्रमाण दिये हैं। इनका कथन है कि जितने निरुक्तकार हैं व निघण्टु के भी प्रणेता हैं। यास्क को लगाकर कुल चौदह निरुक्तकार है- औपमन्यव, औदुम्बरायण, वाायणि, गाय, आग्रायण, शाकपूणि, ओणवाभ, तैटिकि, गालब, स्थौलाष्ठीवि, कोप्टुकि, कास्थक्य, १३ वा स्वय यास्क और १४वा शाकपूणि का पुत्र कोत्सव्य । इन सबो ने अपने-अपने निघण्टु बनाये और उसपर ही भाप्य लिखा। महपि-यास्क सबसे अन्त मे हुए इसलिए इन्हे सबों से पर्याप्त सहायता मिली । निघण्टु को यास्क-रचित मानने के लिए निम्न- लिखित प्रमाण हैं। (१) मधुसूदन सरस्वती अपने महिम्न-स्तोत्र की व्याख्या मे लिखते है-'एवं निघण्ट्वादयोऽपि वैदिकद्रव्यदेवतात्मकपदार्थपर्यायशब्दात्मका निरुक्तान्तभूता एव । तत्रापि निघण्टुसञ्जक. पञ्चाध्यायात्मको ग्रन्थो भगवता यास्केनव कृत.' अर्थात् पांच अध्यायों वाला निघण्टु यास्क का ही बनाया (२) सायणाचार्य ऋग्वेद-भाष्य की भूमिका में कहते हैं-'पश्चाध्याय- १.Shold-The Nirukta, p.6. २. इनमें से कुछ प्रमाणों के लिए मैं गुरुमण्डल-अन्यमाना से प्रकाशित निरुत माग १के भूमिका देखक के प्रति कृतज्ञ हूँ। ३. दलोक ७-त्रयो साहस्य योगः०, इस पर उन्होंने वही विस्तृत टीका रिसी है। (३१) तृतोय-परिच्छेद निरुत्त की विपय-वस्तु [क] प्रथम अध्याय [प्रथम अध्याय-इसमा तुलना-निघण्टु को रूपरेसा, आन्तरिक तथा बाह्य-पद भेद-नाम और आरयात-उपसर्ग-निपात और उनरे भेद-शद नित्य है या अनित्य ?-पतञ्जलि-स्फोटवाद- मीमासकों को युक्ति-प्लेटो-भाषा म मनुष्या और देवताआ फा ऐक्य-भार विकार-शब्दा या धातुन सिद्धान्त-शाकटायन और गाग्य-गार्य का पूर्वपक्ष-यास्स पे उत्तर--सभी शदा को धातुज मानने के युफल-सिद्धान्त को विशेषता-निरक्त की उपयोगिता- मन्त्र निरर्थय है या सायर ?-पौत्स या पूर्वपक्ष और यास्क का उत्तर ।] इम परिच्छ म हम निरत्त अतरग माग पा अर्थात उसरी विषय वस्तु का पालोचनारमा अध्ययन रग । गुविधा 4 vि प्रस्तुन मस्करण घे अध्यायों (प्रथम वतुप पलम) बाहो हम अग्ने अध्ययन म मे रराग । याग पत्र पर हम पाचग कि मम्पूण निसाना परिचय पान लिाइन अध्यायो पा ही अध्ययन पर्याप्त है। चकि निहत र तिीय अध्याय दितीय पार ग निघण्टु में पाया राम्यान बारम्भ हुआ। अतएप नब 14 निका की भूमिका ही वणित है-- यह हम ऊपर देम बार है। TिET पशिश बाप या वस्तुओं का गरम परे यास न वपन भनिनाम म पर्यान प्राला है और यह भी म प्रसार पुछ और गनन । वचता ही नहीं। निरसपा मारांश पली उमरा आपार घालि मोममित्रा मना थगिन है। निरुत्त प्रथम धध्याय की मुना सात-गागिर उनमोटि मानों की भूमिका ग की जा माना है। २ ममिलाय है-ममाप्य की परताहिर मिया गवार को गारीम मीमामा मामा रामानन ॥ ब्रह्ममूत्रमाध्य भूमिया (व. मू० १११) और मारण को ये माय भूमिकायें। जिस प्रकार 'दसियाका भयभूमिमग्र, माक ५० दर" सर । (१) इन सबों मे अपने प्रय का महत्त्व, विरोधियो का खडन, सारभूत सिद्धान्त आदि का प्रतिपादन है उसी प्रकार निरुक्त का प्रथम अध्याय भी इन सब बातों पर विचार करता है । यही नहीं 'लिरिकल वैलेडस्' की भूमिका की तरह यह अपने युग की निम्क्त विस्यक मान्यता पर भी प्रकाश डालता है। अस्तु. प्रथम अध्याय म जिन बातो का वर्णन है वे ये हैं-(१) निघण्ट पा लक्षण (२) पदा के भंद, (३) भाव के विकार, (४) शब्दो का धातुज सिद्धात और (५) निरुक्त की उपयोगिता । अब हम प्रमश इन पर विचार करें। . निरुक्त वा आरम्म यास्क ने 'समाम्नाय समाम्नात' से किया है। समाम्नाय का साधारण अय है सग्रह । पतञ्जलि अपने महाभाष्य मे 'अइ उम् आदि १४ शिव-मूवों को अक्षर समाम्नाय कहते हैं । वैदिक सहिताओ को आम्नाय कहते हैं, इस प्रकार 'सम्' उपमर्ग के प्रयोग से अर्थ होगा वैदिक- सहिनाओं (या माहित्य ) से लेकर किया गया सग्रह, चाहे वह अक्षरो का हो या शब्दों का हो। यही वाक्य निघण्टु और निक्त की अविच्छिन्नता का द्योतक है किन्तु इससे हम यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकते कि दोनों यास्क के ही बनाये हैं, क्योकि आओ यास्क कहत हैं-'इमं समाम्नाय 'निघण्टव' भावयते' अर्यात् इस समाम्नाय को लोग 'निघण्टु' कहकर पुकारते हैं । इमसे पता लगता है कि निघण्टु उस समय तक प्रचलित शब्द पा । 'निघण्टु' का व्युत्पत्ति जनित अर्थ है 'अयं वा द्योतक', 'वेदो से चुनकर जमा किया हुआ, या एक साथ कहा गया।' निघण्टु को मातरिक रूप रेखा वतलाकर यात इसकी वाह्य रूप रेखा अध्याय के अन म ( २०२०) देते हैं । यह रक्षण तर्कशास्त्र की कसौटी पर पसा जाने लायक नहीं रितु निघण्टु के विभागो का वर्णन इसमें अत्यन्त स्पष्टता से दिया गया है । निघण्टु मे पाँच विमाग होने चाहिये-(१) समानार्थक घातुओ का संग्रह (२) एक ही अर्थवाल भिन्न भिन्न शब्दों का सह, (३) पई अपों वाले शब्दा वा सग्रह. (४) देवताओ क मुम्य नामों १ सिरिल दैलेइम्' ( Lyrical Ballads) में कोटरिज और वर्डस्वर्थ की कवितायें सगृहोत है। इससे भूमिग्र वर्डस्वर्थ ने दिखो थानो रोमाकि साहित्य की प्रवृतियों पर प्रकार करता है मन प्रसमाई इसे सो रोमाटिष-युग को वालि (Lible of the toranties) रहत है। कान सन १७२८३०॥ (३५) का संग्रह तथा (५) देवताओ के गौण नामो का संग्रह । जिसमे केवल देवताओ के मुख्य नामो का सग्रह हो उसे 'दैवत' कहते हैं । इसके बाद पद-भेदो का वर्णन होता है। पद चार प्रकार के हैं-नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपात । इन्ही चारो भेदो को वैयाकरणो ने भी स्वीकार किया है भले ही पद के नाम पर पाणिनि ने दो ही भेद-सुबन्त और तिडन्त-माने हैं। निरुक्त के वाक्यो से मालूम पड़ता है कि ये भेद यास्क के समय काफी प्रचलित थे। नाम और आख्यात के लक्षणो मे यास्क ने क्रमश सत्त्व और भाव की चर्चा की है। दोनो शब्दो की उत्पत्ति समानार्थक धातुओं (अस् और भू) से हुई है, अतएव यह दिखलाने की चेष्टा हुई है कि नाम और थाख्यात में मौलिक-अन्तर नहीं, वेवल अवस्था ( degree ) का अन्तर है । जब तक त्रिया का क्रम चल रहा है तब तक उसे 'भाव' ही कहते हैं किन्तु पूर्ण हो जाने पर क्रिया 'सत्त्व' नाम से पुकारी जाती है । पढने का काम होते समय तो हम 'पठति' कहते हैं किन्तु काम के अन्त मे 'पाठ' नाम रखते हैं। पाणिनि के व्याकरण मे त्रिया की दोनो ही अवस्थाओ को 'भाव' कहते हैं जिराके स्वतः दो भेद हो जाते है-साध्यावस्थापन्न भाव जिसे निरक्तकार 'भाव' कहते हैं, तथा सिद्धावस्थापन्न-भाव जिसे निरक्तकार 'सत्य' कहते हैं । साहित्य-शास्त्र मे फेवल अन्तिम अवस्था को ही भाव कहते हैं--भाव. अन्तिमः विवार. । यास्क के अनुसार आख्यात और नाम के उदाहरण क्रमश ---'गच्छति' और 'गति.' हैं । उपसर्गों और निपातो का निश्चित लक्षण न तो यास्क ही दे पाये हैं और न पाणिनि हो । दोनों ने ही 'प्रतिपद-पाठ' करना ही सुलभ समना है । उपसर्ग पाणिनि के मत से २२ और यास्व के मत से २० हैं क्योकि पाणिनि ने निस्, निर् और दुस्, दुर् को अलग-थलग माना है। पाणिनि के मत से उपसगं द्योतक ही हैं अकेले उनका कोई अर्थ नही। यास्त ने शाक्टायन का मत उल्लेख करके इतना अवश्य किया है कि उपसगों के लगने से नाम और आख्यात मे अर्थ का क्या परिवर्तन होता है। इससे स्पष्ट कर दिया । यह सन्दर्भ उपसर्गो के अर्थ बोर इतिहास की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है । २. तुलना करें-'उपसर्गाः क्रियायोगे (पा० सू० १।४।५९) तथा 'न निर्मटाः उपसर्गा अर्थान् निराहुरिति शस्टायनः ..." तद् य एषु पदार्थ प्रादुरिमे, सनामाख्या- तयोरथविकरणम्' (नि. १५)। ऋग्वेद प्रातिशाख्य में मी २० हा उपसर्ग गिनाये गये है ( १२१६)। २. देखें-भूमिका का पाठ परिच्छेद। (३६) निपातो के तीन भेद माने गये हैं।--उपमार्थक, कर्मोपसंग्रह और पदपूरण । इन सबो के उदाहरण वैदिक-साहित्य से, विशेषतया ऋग्वेद से, दिये गये हैं । इन भेदो का कोई नियमित विभाग नही, उपमार्थक निपात पद पूरण भी हो सकते हैं, कर्मोपसग्रह भी, अथवा किसी अन्य अर्थ मे ही प्रयुक्त हो सकते हैं । उनका मुत्य अथ देखकर ही निर्धारण किया जाता है कि अमुक शब्द क्या है ।' कर्मोपसग्रह का लक्षण बहुत कुछ अस्पष्ट है। मेरा विचार है कि किसी लिपिकार के प्रमादवश कुछ शब्द इसमे वढा दिये गये हैं जिसे मैंने मूल निरुक्त की टीका मे स्पष्ट भी किया है। डा. गुणे इसका अनुवाद करते हैं---'जिसके आगमन ( अर्थात प्रयोग ) से अर्थों (विचारो) को पृथक्ता, सचमुच जानी जाय, किन्तु जो पृथक् स्थान या स्वतन्त्र उल्लेख के कारण साधारण गणना की तरह न हो, वही कर्मोपसग्रह, अर्थात् अर्थों या विचारो का योग करना या एकत्रीकरण, कहलाता है ।२ गुणे की आलोचना डा. लक्ष्मण स्वरूप और प्रो. राजवाडे ने की है। सम्भवत डा. सरूप तथ्य के अधिक निकट पहुंच सके हैं-'जिसके योग से विचारो का वस्तुत पार्थक्य जानें किन्तु गणना के समान का (पार्यक्य ) नही (अर्थात् अलग-अलग कर देने से होनेवाला पार्थक्य ) वही कर्मोपसग्रह (Conjunction) है । यास्क ने कुल चौदह निपात गिनाये हैं और प्रत्येक की पुष्टि प्रयोग द्वारा की है । पदपूरण का अर्थ है निरर्थक शब्द जो छन्द की पूर्ति के लिए आते हैं । इस स्थान पर मास्क ने गद्य को अमिताक्षर और पय को मिताक्षर ग्रन्थ कहा है। गद्य मे यदि पदपूरण के शद आये तो उन्हे वाक्यपूरण कहा जाता है । प्रधान १. तुर. प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति - विसी वस्तु का नाम उसके फर्म को देखकर देते हैं। वैसे ही, प्रधान शब्द या अर्थ देस कर ही किसी शब्द का निर्धारण होता है। 8. "Owing to whose adsent (ie, are ) separateness of the end (sepies or ideas ) 19 indeed known, but not as in simple enumeration Owing to semrate position or independent mention, that is कर्मोपसग्रह, ie, adding or putting together of the senses or ideas.' Indian Antiquar), Vol xle p 159 "That by whose addition separateness of potion 15 indeed recognized, but not as an eguneratire one, i, e on accognt of a separateness by Isolation is a Conjunction.' The Nirukla, English Translation by Dr. Sarup ब्राह्मण-ग्रन्थो में ये अधिक्ता से पाये जाते हैं। निपातों के विषय मे पाणिनि के सूत्र हैं--प्राग्रीपवरातिपाता, चादयोऽसत्त्वे, प्रादय (११४:५६-५८)। पद-भेद के सम्बन्ध में यास्क एक विवाद उठाते हैं कि शब्द नित्य हैं या अनित्य । यह विवाद केवल निरुक्त मे ही नहीं, व्याकरण, न्याय तथा पूर्व- भीमासा के ग्रन्थो मे भी उठाया गया है । किन्तु इनमे से प्रत्येक अपने सिद्धान्त पर अटल है। भिन्न-भिन्न तक देने पर भी बंधारण और मीमासक शब्द को नित्य मानते हैं, निरुक्तकार ( औदुम्बरायण ) और नैयायिक शब्द को अनित्य मानते है । औदुम्बरायण का कहना है कि सब्दो की सत्ता केवल इन्द्रियो तक ही है अर्थात् ये भनित्य ( अस्थायी ) हैं। ऐसा मानने पर पदो का भेद या प्रकृति-प्रत्यय का सयोग भी असिद्ध हो जायगा पयोकि भिन्न-भिन्न बाली मे उत्पन्न अक्षरो का योग असम्भव है । पनजलि भी ऐसी ही युक्ति से कार्य शब्द की व्याख्या करते हैं -शब्द अलग-अलग ध्वनियो से ही बनता है। दो ध्वनियों एक साथ उत्पन्न नहीं कर सकते । 'गो' शब्द मे गकार, औकार और विसर्ग के उच्चारण भिन्न-भिन्न कालो मे होते हैं। इसलिए ध्वनियां निश्चित रूप से नाशवान् है । अनित्य होने पर भी शब्दो से ही वस्तुओ का नामकरण होता है क्योकि ये व्यापक हैं तथा वस्तु-बोध कराने के अन्य मभी साधनों की अपेक्षा सरलतर हैं । यदि हम वस्तुओं को दिखाकर या हाथ-पैर से इशारा कर के उन वस्तुओ का बोध करावे तो कठिनाई होगी किन्तु गन्दो के द्वारा बोध कराने में कोई भी कठिनाई नही। लोबिक व्यवहार के लिए ही दादो का आश्रय लिया जाता है । पतञ्जलि ने 'सिद्ध शब्दार्थसम्बन्धे' वार्तिक पर विचार करते हुए कहा है कि शब्द और उसके द्वारा निर्दिष्ट वस्तु का सम्बन्ध नित्य है। पादो की वस्तुवोधक-शक्ति तो स्वाभाविक है किसी की उत्पन्न पी हुई नहीं। वस्तुएँ भी नित्य ही हैं, सक्षेप में यह है कि दाद, अयं और उन दोनों पा सम्बन्ध-ये सभी सिद्ध (नित्य ) है। यह नित्यता हमे लोविय-व्यवहार से ज्ञात होती है । वस्तुओ को देखकर लोग उनके बोध क लिए गद पा प्रयोग करते है, शब्द-रचना मे परिधम नहीं करना पडना । परिश्रम तो पेवल अनित्य बस्तुओ की ही रचना म करना पडता है, जैसे घडे की जरूरत होने पर हमे कुम्भकार के घर जाकर वहना पडता है- घटा बनाओ, मुझे जहरत है।' शब्द का प्रयोग करन के लिए हम वैयाकरण वे पास जापर १.महामाभ्य रा४।४। २. तुरुनाय-० सू11 ( ३८) कभी नही कहते हैं कि शब्द बनाइये, हमें प्रयोग करना है। लोग वस्तुमओ को देखते हैं तथा उनका बोध कराने के लिए शब्द का प्रयोग आरम्म कर देते हैं । यही भापा को उति का सिद्धात है। वयावरण लोग अथबोध कराने के लिए 'स्फोट' स्वीकार करते हैं। कोई पशब्द कई अक्षरो से बनता है जो क्षणिक होने के कारण न तो मिलकर ही अयवोध करा सकते हैं और न अलग अलग ही। इसलिए उहे अथ का स्फोटक (प्रकाशक ) स्फोट स्वीकार करना पड़ता है। इसे ही भर्तृहरि ने नित्य शब्द ब्रह्म कहा है जिसका विवर' रूप ही ससार से समस्त व्यवहार हैं। इस स्फोट (नित्य शब्द ) का ही प्रतिनिधित्व करनेवाला एक काय- (कामचलाऊ) शब्द होता है जिसकी सत्ता केवल व्यावहारिक दशा ( Practical world ) मे है, पारमाथि या वास्तविक दशा (World of Reality या Transcendental world ) म नहीं । इसे ही यास्क भी स्वीकार करते है । साराय यह है कि शब्द परमाथत नित्य है कितु व्यवहारत काय पाली म लिखे बौद्ध ग्रयो में भी 'सद्द (शब्द) स्वभाव का विचार किया गया है जा स्फोट स मिलता जुलता है। इससे निष्कप निकलता है कि स्फोरवाद का सिद्धात पास्त्र और बुद्ध के समय प्रचलिन था।" भीमासा दशन म दूसरी युक्तियो से श६ को नित्यता स्वीकार की गई Bhindarkar, Wilson Phulological Lectures p 291 २ दुलनोय-कि वर्गा समस्ता व्यस्ता वाऽर्थप्रत्यय नयन्ति १ नाद्य , वर्णाना क्षणिकाना सम्हासम्मवाद । नान्त्य , व्यसवणेभ्योऽर्थप्रत्ययामम्भवात् । न च व्याससमा साभ्याम य प्रकार समसीति । तस्मादांना वाचकत्वानुपपत्ती यालादर्थप्रतिपत्ति स सोर । सर्वदर्शनममद (अभ्यङ्कर-सवरण), १३३१३२ 1 ३ मतत्ततोऽन्यया प्रथा विवत इत्युदारित (वेदान्नसार)-परा शान जो वस्तुओं के त वन न बदलने पर भी उनके परिवर्तन को प्रतीति कराये वह विवत है। ४ देखिये वास्यपदोय ११-अनादिनिधन मा शम्दनत्त्व यदक्षरम् । विवनेयमावेन प्रक्रिया नगतो यन ।। ५ सोटवाद विवेचन निरिसित प्रथों में हुए है-पनपरि का महामान्य, मनहरिमा वाक्यपदीय ( काण्ड १), माधवाचार्य का सर्वदर्शनमग्रह (पाणिनि-दर्षन), को भट्ट का यारण भूग, नागेश का घुमन्ना और पोग्वार, PC Chanrirarty-1hiloonliy of Senskrit Grammar तथा डा. करिनदेव दिवदी पाप्रबन्ध (Thesis)-'अर्थविज्ञान और व्यारान। (३९) है। पाब्दो का उच्चारण शब्दमात्र के लिए नही, प्रत्युत अर्थवोध के लिए होता है । यदि शब्द नश्वर हो तो अर्यबोध हो ही नहीं सकता। शब्दो का सार्वजनिक यनुभव होता है ! एक ही शब्द का पई बार प्रयोग होने पर उसकी समानता या स्थिरता का भी अनुभव हम करते हैं। इसलिए शब्द नित्य हैं । डा. लक्ष्मण स्वरूप ने औदुम्बरायण के मत की तुलना प्लेटो के शब्द-क्षणिकवाद से की है। प्लेटो ने अपनी पुस्तक केटिलस (Cratylus ) मे कहा है-'क्रेटिलस | हम तकंपूर्वक यह भी नही कह सकते कि वस्तुत ज्ञान है, जब कि सभी वस्तुएँ परिवर्तन की दशा मे हैं और कोई भी चीज स्थिर नही है । २ सारारा पही है कि औदुम्बरायण शब्द को नित्य नहीं मानते जब कि यास्क कार्य (व्यवहार ) के लिए शब्द की नित्यता स्वीकार करते हैं जो स्फोटवाद की ओर का सकेत है। इस विचार के ही प्रसग मे यास्क एक आश्चर्यजनक बात बतलाते हैं कि किसी वस्तु का बोघ जिस नाम से मनुष्यो मे होता है उसी नाम से देवता लोग भी उन्हें समझते हैं। इन वाक्यो में मनुष्य की प्रधानता दिखलाई गई है। इससे पता लगता है कि यास्क भाषा की उत्पत्ति को देवी नहीं मानते । ऊपर पतन्जलि पा भी मन हम देख चुके हैं। इसके विपरीत प्लेटो कहते हैं कि देवताओ के द्वारा दिया गया नाम ही उचित और स्वाभाविक है । देवताओ और मनुष्यो के बीच दाद साम्य होने पर भी मनुष्यो का ज्ञान अनित्य है इसीलिए कर्म का सम्पादन करनेवाले मन्त्र वेदों में उल्लिखित हैं। यास्क ने जिस शैली मे-'पुरुषविद्यानित्यत्वात् कर्मसम्पत्तिमन्त्री वेदे' लिखा है उसे सूत्र-शैली कह सकते हैं । यास्क के समय सूत्रात्मक-शैली का प्रचलन आरम्भ हो गया था। इसके बाद यास्क ने 'भाव' का दार्शनिक विश्लेपण लिया है। क्रिया की उत्पत्ति से लेकर फल प्राप्ति तक जो अवस्थायें ( Stages) आती हैं उन्हे भाव का विकार कहा जाता है। ये छः है- उत्पत्ति, सत्ता, परिणाम, वृद्धि, १.० सू० १३१६१२-२३, Radhakrishnan, Indian Philosophy, Vol. IL P.390 २. 'Nor can we reasonably say, Crstylus, that there is knowledge at all, if everything is in a state of transition and there is nothing abading ' Jorett Dialogues of Plato, Vol I, Pp 387-8. ३. देखिये-भूमिका का सप्तम परिछेद । (४०) अपक्षय और विनाश ।' इन सबो को अच्छी तरह स्पष्ट किया गया है। भाव के विकारो का यह आत्यन्तिक विश्लेषण है क्योकि दूसरे स्थानो में केवल तीन ही विकार माने गये हैं जैसे-'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति, यत्प्रयन्त्यभिसविशन्ति' (ते. उ० २१)। राङ्कराचार्य ने ब्रह्मसून रे 'जन्मायस्य यत' (११११२) सूत्र पर भाष्य लिखते हुए जन्म, स्थिति और नाश के अन्तर्गत ही सवो का अन्तर्भाव किया है। बल्कि इन छ: विकारो को तो वे संसार की स्थिति मे ही समझते हैं । चतुर्ष-याद मे एक ऐसे विषय पर विवाद उठाया गया है जो निरुक्त की और आधुनिक भाषा-विज्ञान को भी आधार-सिला है। वह है-~-पाग्दो का धातुज-सिद्धान्त । इसका अभिप्राय है कि क्या सभी नाम धातुओ से बने होते हैं या स्वत निष्पन्न होते हैं। यास्क इस मत के पोषक है कि सभी सद आख्यातज हैं, जिसे सिद्ध करने के लिए ही सम्पूर्ण निरुक्त की रचना हुई है । अस्तु, इस विवाद में दो पक्ष हैं-एक पक्ष रहता है कि सभी नाम आख्यातों से उत्पन्न हैं। इस सिद्धान्त के प्रतिपादक हैं शास्टायन नामक बयाकरण और सभी निरुक्तकार। दूसरी ओर गम्यं तथा कुछ वैयाकरण ? हुए हैं कि सभी नाम थास्यातज नहीं है।' शाक्टापन बहुत पुराने और प्रसिद्ध व्याकरण है क्योकि इतका उल्लेख ऋग्वेद-प्रातिशाम्य, वाजमनेयि-प्रातिशास्र, अथर्व-प्रातिशाख्य तथा पाणिनि-सूत्रो मे भी हुआ है । इनके सिद्धान्त के अनुसार ही उणादि-सूत्रों की रचना हुई है जिसकी मूलमित्ति यही है कि सभी शब्दो की व्युत्पत्ति हो सकती है । सम्भव है कि पाकटायन ने उणादि सूत्रों की रचना प्रारम्भ कर दी हो जिसका १. उत्पत्तिसत्तापरिणामवृदिशया विनाराध इति प्रकाराः। भावस्य जन्मस्थितिसहनीना विकास तो सन पट् वदन्ति । २ तुल. शा. भा. १२-यास्कपरिपठितानां तु 'जायतेऽस्ति' इत्यादाना पहले तेरा जगर स्थितिकाले सम्माम्यमानस्वार मूलकारणात उत्पतिस्थितिनासरः जगनोन गृहीताः सुरिस्पारात। ३. तुरु. महामाय २३१ पर, प्रहतेस्तनदष्टेः मायसमुच्चयनादपि सेपाम् । पासविषेश सहक नैगमरूदिमवं हि मुमाधु ॥२॥ नाम १ भानुनमा निहले स्यारोस्टस्य च तोकम् । पत्र विपदासमुत्थ प्रत्ययः प्रतेश पम् ॥ २॥ (४१) आधुनिक-रूप बहुत पीछे दिया गया। डा. वेलवलकर उणादि-मूत्रो को पाणिनि की ही कृति मानते हैं किन्तु यह भ्रान्त-धारणा है। उनका यह तर्क कि पाणिनि की शब्दावली (जसे ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत, उदात्त, लोप, सम्प्रसारण और अभ्यास ) का प्रयोग उणादि-सूत्र में है, यह निष्कर्ष नही निकलने देता है क्योकि इन सज्ञाओ का प्रयोग बहुत पहले से ही होने लगा था, स्वयं यास ने ही इनमे से कुछ का प्रयोग किया है। गाग्यं भी प्राचीन वैयाकरण ही हैं जिनका उल्लेख यास्क और पाणिनि करते हैं। इनके मत से सहमति रखनेवाले पाणिनि और पतञ्जलि हैं जो उणादि को अव्युत्पन्न मानते हैं । दुर्गाचार्य ने गाग्यं को सामवेद का पद-पाठकार माना है । गाय का कहना है कि जिन शब्दो की व्युत्पत्ति हम व्याकरण की आज्ञा मानार कर सकें, अर्थात जर शब्द मे विद्यमान धातु का अर्थ शब्द के अर्थ से सामन्जस्य रखता हो, उसकी रचना भी हम व्याकरण के द्वारा सिद्ध कर सकें तभी किसी शब्द को व्युत्पन्न मानने का मे अधिकार है, अन्यथा सन्द अव्युत्पन्न हैं, जैसे--गो, अश्व, पुरुष, हस्ती। इस प्रकार वे व्युतान और भव्युसन्न दाब्दो को विभाजन-रेखा बनाकर अपने पक्ष की पुष्टि के लिए निम्नलिखित प्रमाण देते हैं । (१) यदि सभी नाम मास्यात से उत्पन्न होते तो नाम में विद्यमान घाख्यात से जिन-जिन वस्तुओं का सम्बना होता उन सबो का एक ही तरह का नाम होता, जैसे 'अश्व' मे अग्-धातु है जिसका अर्थ है तय करना; तो जो-जो चीजें ( सवारियां ) रास्ता तय करती उन सभी को 'अश्व' ही कहा जाता । इसके उत्तर में यास्क कहते हैं कि यह देखने में आता है कि एक क्रिया से सम्बद्ध सभी चीजों या व्यक्तियो मे से कुछ को तो क्रिया से सम्बन्ध - बताने वाला नाम दे देते हैं, कुछ को नहीं I इतक्ष का अर्थ है लकड़ी काटना.. अव सभी लकड़ी काटनेवालों को 'तक्षा' न कहकर बढ़ई को ही रहते हैं, उसी १. उणादि के कुछ सूत्र निश्चित रूप से पाणिनि के पूर्व लिप जा चुके थे। पाणिनि ने अपने 'तितुत्रनयसिमुमरकसेषु च' (१९) सूत्र में उगादि के कुछ प्रत्ययों का उस्लेस किया है। यह सिद्ध करता है कि कम से कम ये मूत्र तो पाणिनि के पूर्व हा से थे। पिर भी पाणिनि को दृष्टि में विशेष पदार्थ से निकले न होने के कारण ये अव्युत्पन्न है। वस्तुतः उगादि सूत्र पामिनि के सिद्धान्त के विरुद्ध है। पूर्वोक्त सूचना के रिये में अपने अनुमवान- गुरु टा. सातकदी मुखर्जी का बहुन कृता हूँ। २. Systems of Sanskrit Grammar, P.25 ३. निरुत्ता १२-१४ 1 (४२) अच्छा में यह शब्द रूढ हो गया। सभी घूमनेयालो को 'परिव्राजक' न कहकर देवल सन्यासियों को ही परिव्राजक कहते हैं। लौक्कि-परम्परा ही इसका निर्णय करती है। (२) यदि सभी नाम आल्यात से उत्पन्न होते तो जिन जिन नियागो से किसी वस्तु का सम्बन्ध होता, उन सभी के आधार पर उसका नाम पडना जैसे खम्भे को 'दरशया' कहते क्योंकि यह छेद मे सोती है, पहतीर धारण करने के कारण उसे 'सजनो' भी कह देते । इसके उत्तर मे मी यास्क यही कहेंगे कि वस्तु से सम्बन्ध रखनेवाली अनेक क्रियाओ में से कुछ को ही ऐमा सौभाग्य मिलता देखा जाता है कि उसके आधार पर ही वस्तु का नामकरण हो । सबों के आधार पर नामकरण न तो सम्भव ही है और न उचित ही । किसी प्रधान कर्म के आधार पर नाम रखते हैं (प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति)। (३) यदि नाम मे आख्यात मिल हो रहा है तो उसे ऐसा क्यो नही रहना चाहिये था कि वह व्याकरण की दृष्टि से भी शुद्ध होता और उसका अर्थ भी तुरत मालूम हो जाता, जैसे- पुरुष' मे यदि पुर+/शी पाते हैं तो हमसे तो शुद्ध नाम होता 'पुरिशय', 'तृण' की अपेक्षा अधिक शुद्ध होता 'तर्दन' कहना । परन्तु चूकि ऐसे नाम नहीं हैं इसलिए ये सब भव्युत्पन्न एव रूढ हैं । उत्तर यही है कि ऐकपदिक-काण्ड मे (जिसे अव्युत्पन्न शब्दो का संग्रह कहते हैं ) कुछ वृदन्त प्रत्ययो से बने शब्द है किन्तु प्रयोग मे कम आते हैं। ये आपकी कल्पना के अनुसार ही बने है जैसे-व्रतति, जागरूक इत्यादि। (४) सभी नामों मे आस्यात मानने से किसी शब्द का व्यवहार चल पड़ने पर उसके मूल के विषय में व्यर्य का विचार करना पड़ता है। मान लिया कि 'पृथिवी' को प्रय् धातु (फैलाना ) से निकला मानते हैं। अब बैठार सोचते रहिये कि पृथ्वी को किसने और कहां बैठार फैलाया? इस परिहास को पास्क बाहे हाथो लेते हैं और कहते हैं कि पृथ्वी देखने में तो पृयु (फैली हुई ) लगती है न' भले ही किसी ने उसे नहीं फैलाया हो। सभी चीजो का नाम देखकर ही देते हैं । (५) गाये फिर कहते हैं कि आपके शाकटायन तो एक तमाशा लगा देत हैं। वे जब देखते हैं कि एक धातु से व्युत्पत्ति करने में अयं अपगन हो रहा है, बनावट ध्यावरण-सम्मत नहीं है तब वे शब्द के टुकडो मे भी धातु को (४३) ।
पल्पना करने लगते हैं जैसे 'सत्य' शब्द की व्युत्पत्ति मे इ-धातु और अस् पातु. दोनो को ही नियुक्त कर लेते हैं। यास्क जवाब देते हैं कि यदि शाकटायन ऐसा करें और असगत अर्थ मे करें तो बुरा है, किन्तु यदि वे सगत अर्थ मे ही कर रहे हो तो कोई आपत्ति नही । सिद्धान्त का कोई दोष नही होता, व्यक्ति भले ही दोषी हो। (६) आप लोग यह भी मानते है कि क्रिया के पहले नाम पड़ जाता हैं किन्तु बाद मे होनेवाली क्रिया के आधार पर वह नाम कैसे पडेगा ? उत्तर मे कहा जा सकता है कि कुछ वस्तुओ का नाम तो बाद मे होनेवाली क्रिपा के आधार पर ही होता है, जैसे-बिल्वाद ( एक पक्षी का नाम ) । यह पक्षी जन्मते ही तो वेल का फल नहीं खाता पर इसका नाम उसी समय पड़ जाता है । 'लम्वचूडक' पक्षी की लम्बी चोटी बहुत बाद मे होती है पर इसे जन्मते समय भी लम्बचूडक ही कहते हैं । इस प्रकार निरुक्तकार सिद्ध करते हैं कि सभी शब्दो का निवंचन सम्भव है । आधुनिक भाषा विज्ञान का यह लक्ष्य है कि प्रत्येक शब्द के मूल का पता लगायें, उसे रूढ कहकर न छोड दें। इस दृष्टि से मास्क ने भाषाशास्त्रियों को रास्ता दिखलाया है । सत्य तो यह है कि यास्क ही प्रथम भाषाशास्त्री है । प्रो० मैक्समूलर इस सिद्धान्त के विषय मे लिखते हैं (याक मानते है कि ) प्रत्येक नाम आख्यात से निकला है और वे इसके विरोध मे उठाये गये विभिन्न तकों का समाधान भी करते है-यह वह सिद्धान्त है जिसपर पाणिनि का समस्त प्रस्थान अवलम्बित है और जो वस्तुत. भाधुनिक भाषा-विज्ञान का मूल है ।" यहाँ पाणिनि से मतलब है उणादि-इत्यादि को लेकर, क्योकि पाणिनि तो इस दृष्टिकोण से यास्क के विरोधी ही है । भाषा-विज्ञान यद्यपि शब्दो को धातु से निप्पन्न मानता है किन्तु सभी धातु आरयात (Verbal root) ही होंगे, यह स्वीकार नहीं करता। निर्वचनों के परिशिष्ट मे हम यह अच्छी तरह देखेंगे। शब्दो को आख्यातज मान लेने के कई कुपरिणाम है, जैसे-- १. ......... ( Yaska maintains that) every noun is derived from a rerbal root and meets the various objections raised against it, - a theory on which the whole system of Papini is based, and which is, in fact, the postulate of modern Philology.' History of Ancient Sanskrit Literature, p. 161. २ Vide, Dr. Siddheshwar Varma, Etymologles of Yaska, Chap II. (४४) । (१) स्वरों के परिमाण' का तिरस्कार-यास्क 'अघ' की व्युत्पत्ति करते हैं मा+हिन् से । वे यह नहीं विचार करते कि 'आ' किस प्रकार अपना परिमाण बदलकर 'अ' वन जायगा । वस्तुत 'रघ' किसी धातु मे नहीं बना । मूल भारत-यूरोपीय (Prototype Indo European ) भाषा का शब्द है-अघ् (agb) जिसका अर्थ है 'खगव'; अवेस्ता मे 'अग' = बुरा। (२) स्वरों के गुण का आत्यन्तिक-तिरस्कार-'मुद्गल' शब्द की व्युत्पत्ति की गई है-गिल से । 'इ' का परिवर्तन 'अ' में होना भाषा-विज्ञान के लिए एक समस्या ही है । 'श्मश्रु'श्मन् + श्रि अर्थात् 'इ' का परिवर्तन 'उ' मे । ध्वनि-नियमो का यह साक्षात् तिरस्कार है। (३) व्यञ्जन-सम्बन्ध का तिरस्कार-'कुल' शर/ज् से वर्ण-विपर्याय द्वारा निर्मित माना गया है अर्थात ज् और क्, र और ल परस्पर परिवर्तित होते हैं । क्या सभी जगह ऐसा ही होता है ? उसी प्रकार 'कृ'को कृन्त से निष्पन्न मानते हैं। (४) कभी-कमी प्रथम व्यञ्जन पर विशेष ध्यान देकर शेष व्यन्जनो को बिल्कुल छोड दिया गया है। 'ग्रावा' शब्द ग्रह, से बना है, 'व' के विषय में यास्क ने मौन धारण कर लिया है । (५) स्वर और व्यञ्जन दोनो का एक साथ भी तिरस्कार कर दिया है । अनस (गाडी ) की व्युत्पत्ति है 'आ+ नह'; यहाँ 'आ' का '' (गुणगत-भेद, स्वर का ) तथा 'ह' का 'स' मे परिवर्तन असम्भव ही है । (६) कभी कभी शब्द मे विद्यमान धातु से अधिक अक्षरो का धातु देकर यास्क व्यर्थ का परिश्रम करते है 'अन्धस्' की व्युत्पत्ति उन्होने दी है 'मा+ध्यै' जिसमे केवल 'घ' को ही आवश्यकता थी। भारत-यूरोपीय भाषा मे 'भन्योस् ( andho's ) = फूल । ये सभी दोप इसलिए आये हैं कि उन्होंने स्वत सिद्ध शब्दो मे (जो मू० भा० यू० मे क्रिया के रूप मे होकर सज्ञा और विशेषण के ही रूप में पे) १. एक ही वर्ग में कालगत भेद को परिमाण ( Quantity) कहते हैं जैसे अ-आ,ई इत्यादि में परिमागगत (Quantitative) भेद है। किन्तु विमिन्न-वर्गों के भेद को गुण (Quality) कहते हैं, जैसे अर, अ-उ, इ-उ आदि में गुणगत भेद (Qualitative difference) है। यह भेद यदि स्वामाविक हो तो उसे स्वर विकार (Ablast or Vowel Gradation) रहते हैं जैसे Sing, Sang, Sang डा० मुनातिकुमार चटनी इसे अपश्रुति कहते है (ODBL) । दैसिये-Taraporewala, Elements of the Science of Language. Chap VIII.
धातु खोजने वी चेष्टा की है। यह दोप धातुज-सिद्धान्त के श्रात्यन्तिक प्रयोग ये फलस्वरूप ही है । इन कमजोरियो के होते हुए भी यह सिद्धान्त बहुत महत्त्व रखता है क्योकि व्युत्पत्ति दिये गये कुछ शब्द भले ही हमें वैदिक सस्कृत मे न मिले पर भारत-यूरोपीय-भाषा के अन्य खण्डो मे मिलते है जमा कि डा० सिद्धेश्वर वर्मा का निरीक्षण है-'यह सिदान्न भले ही कई दशाओ मे हानिकारक हो, किन्तु एक ऐसी शान्तिप्रद विशेषता रखता है जिससे पता चलता है कि इसकी कई व्युत्पत्तियां उन शब्दो से सम्बन्ध रखती हैं जिनका सम्बन्ध या मूल प्राचीन-भारनीय-भाषा मे प्राप्य न हो, विन्तु दूसरी भारत-यूरोपीय भाषाओ मे प्राप्त है ।" प्रो० मैक्समूलर भी इस सिद्धान्न वी प्रशमा मे लिखते है--'मुझ सन्देह है कि इस समय भी, तुलनात्मक भापा- विज्ञान ने शब्दो वी उत्पत्ति पर जो भी नया प्रकाश डाला है उसके साथ भी, इस तरह के प्रश्न (शब्दो की उत्पत्ति के ) याम्फ की अपेक्षा अधिक सन्तोष- प्रद रूप से मरल क्येि जायेंगे। प्रथम-प्रध्याय में अब केवल एक ही विषय की विवेचना बच रही है और वह है निरक्त की उपयोगिता । यास्क के अनुसार निरुक्त कई विषयों के लिए उपयोगी है- (१) प्रारम्भ मे ही 'समाम्नाय समाम्नात , स व्यायातव्य.' लिखा है। इसका अभिप्राय है कि निघण्टु के शब्दों की व्याख्या करन। निरुक्त । याम है, अर्थात् निरुक्त भाष्य है। दुर्गाचार्य निरक्त को भाष्य कहते हैं। विन्तरनित्स (Winternatz ) यास्क पो प्रथम भाष्यकार मानते है तथा १ 'Bat the theory, however disastrous in many re-rects, his . palliating feature in the fart that most of the darnations relate only to those words for which relations or Oʻizin, thonyl not available in Old Indo Aryan are to be found in other Iudo European langus, es Etymologies oflaskar.. 'I doubt whether eren at preseat, with all the new lazbt whib Compimtire Philology has shes on the oʻzin of words, questions like the e could be disas«ed more satıska torily than they were by Washa' Hist of Anc Sit. Lit. p 168 Wirfernitz, Geschichte der Indischen Litteratur, Tol III,P39 (४६) पतञ्जलि को वे अपनी अलकृत शैली मे 'भाष्यकारों का राजकुमार' कहते है। इस प्रकार शब्दों का अर्थबोध कराना निरुक्त का प्रथम कार्य है। (२) 'इदमन्तरेण मन्त्रेषु अर्थप्रत्ययो न विद्यते'-चूँकि निरुक्त शब्दो के अर्थ का निर्णय करता है और यास्क उनका प्रयोग दिखलाने के लिए वैदिक- मन्त्रो का उद्धरण देकर उनकी व्याख्या करते हैं, इसलिए मन्त्रो के अयं का ज्ञान भी निरुक्त के द्वारा ही होता है । प्राय ६०० मन्त्रो की व्याख्या यास्क ने की है। वैदिक साहित्य भर मे मन्त्रो का अर्थ यदि कही हुआ है तो निरुक्त मे ही । आधुनिक अर्थकारो को यास्क से काफी सहायता मिली है। (३) निरुक्त एक विद्यास्थान ( Science ) है, प्राचीन काल के चौदह विद्यास्थानों में इसकी गणना है। यह व्याकरण का पूरक भी है क्योकि व्याकरण शब्दो की रचना ( बहिरङ्ग) को व्याख्या करता है तो निरुक्त उनके अर्थ ( अन्तरङ्ग) की खोज करता है। इसके लिए वह शब्दो की प्रकृति का पता लगाकर उसके अर्थ से सगति दिखाते हुए पूरे शब्द के अर्थ का अनुसन्धान करता है। नितु व्याकरण पर वह सर्वस्व अर्पण नहीं कर देता, क्योकि व्याकरण की बनावट ( शब्द सस्कार या वृत्तियां ) अपवाद ( विधाय) से भरी होती है । फिर भी व्याकरण और निरुता मे अविच्छिन्न सम्बन्ध है। (४) यज्ञ मे भी निरुक्त से काफी सहायता मिलती है क्योंकि इसके द्वारा ही "किस मन्त्र मे कौन देवता है'-इसका निणय किया जा सकता है और तभी किसी देवता को हविप देने के लिए किसी विशेष मन्त्र का उच्चारण सम्भव है । कभी-वभी किसी मन्त्र में कई देवता रहते हैं जिसका पता निरुक्त ही लगाता है कि किसे प्रधानता दी गई। इस गुण के कारण निरुक्त क्मकाण्ड और पूर्वमीमांसा का भी पूरक कहा जा सकता है । (५) 'इदमन्तरेण पदविभागो न विद्यते (ज्ञायते )-निरुक्त के द्वारा ही किसी पद को उसके विमिन्न-खण्डो मे बांट सकते हैं क्योकि अर्थ न जाननेवाला यह नही समझ सकता कि किसी पद मे एक ही शब्द है या दो शब्द, जैसे- १ तुलनाय-'पुरागन्यायमामासा धर्मशास्त्राइमिश्रिता। वेदा स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश ॥ (या० स्मृ०) अर्थात् पुराण, न्याय, मीमासा, धर्मशास्त्र, ६ वेदाङ्ग, ४ वेद - १४ विद्यास्थान हैं। २ न सस्कारमाद्रियेत, विशयवत्यो हि वृत्तयो भवन्ति । (नि०२।१) ३ देखिये भूमिका या पष्ठ परिच्छेद । ( ४७ ) .
'भवसाय पद्वते. परदाले भोजन के लिए, पवस = भोजन--इसमे अव धातु और सस प्रत्यय है दोनों मिलकर ही पद बनाते हैं इसलिए 'अवस' एक पद है जिसका चतुर्षी एकवचन मे रूप है-अवसाय ( - भोजन के लिए)। फिन्तु 'अवसाय अश्वान्' = घोडो को खोलकर--यहाँ अव उपसर्ग है, स्पो (खोलना ) पातु से ल्यप् प्रत्यय (पूर्वकालिक ) लगा है. इसलिए दो पद होने के कारण इसमे पद विभाग करना पड़ता है तथा पद पाठकार 'अवसाय ऐसा इसका पद पाठ करते हैं। एक ही तरह के पद में, कभी एक शब्द, फभी दो शब्द, हो जाते हैं, इसे तिरक्त न जाननेवाले नहीं समझ सकते हैं।' (६) अर्थज्ञान का महत्त्व भी इसके द्वारा जाना जा सकता है । ज्ञान की प्रशसा और अज्ञान को निन्दा होती ही है। वेदो का यथं बिना जाने हुए उन्हें केवल रट जाना निष्फल है। इसलिए निरुक्त का अध्ययन आवश्यक है। (७) अन्त में, हम आधुनिक भाषा विज्ञान की दृष्टि से निरुप की उपयोगिता पर विचार कर सकते हैं। यहाँ पर सक्षेप मे ही कहेगे । भापा- विज्ञान की एक शाखा है-अर्थविज्ञान (Semantics जिसकी ओर लोगो का ध्यान विगत गती वे अन्त में ही आकृष्ट हुआ जबकि श्रील (Michael Breal ) ने सन् १८९८ ई० मे अपना अन्य एसे द सिमन्तिक (ésse do Semantigue) फ्रेच मे लिखा। यास्क इस विज्ञान की नीव विक्रम के कई सौ वर्ष पूर्व दे चुके थे । अर्थ मे किस प्रकार का परिवर्तम होता है इसका निर्देश वे स्पष्टरूप से करते हैं जिसे हम यथास्थान (सप्तम परिच्छेद ) देखेंगे । डा. लक्ष्मण सरूप निरुक्त को 'ट्युत्पत्ति-विज्ञान, भाषाविज्ञान और अर्थविज्ञान का सबसे प्राचीन भारतीय ग्रन्थ' कहते हैं। फिर भी व्युत्पत्तिविज्ञान (Etymology) मे तो निरक्त की तुलना ही नहीं है। मन्त्रों के अर्थ के विषय मे यासक द्वारा उठाये गये एक और विवाद पर विधार कर लेना अयुक्त न होगा। मन्त्रो के यर्थ के सम्बन्ध में बहुत प्राचीन फाल से ही राङ्कायें उठायी जाने लगी थी। उनके दो पक्ष थे-एर तो लोकापत-मतवाले और दूसरे कर्मकाण्डी । लोकायत । चार्वाक) मत में लोग तो मन्त्रों को इसलिए अर्थ-हीन रहते थे कि इनमें कल-जरल बाते भरी 1 Vide-Siddheswar Varma, Eumologies of Yasko, Cup IV. and Skold The Nirakta, Nurulta and the Padalmas २. The Nigh. and the Nirukta, Sahttle, The oldest Indian Treatise on Ltymology. Philology and Lementies', पड़ी हैं वेदो को कोई सत्ता नहीं, इन्हे मानना व्यर्थ है। दूसरी ओर कर्मकाण्डियो का कहना था कि वेशे का कोई यर्थ नही किन्तु उनका पाठ अनिवार्य है, पाठ करने में अर्थ का ध्यान नहीं रहना, हम एक निष्ठा से पाठ करते हैं क्योकि यही हमारा धर्म है । इनके पक्ष की विवेचना सायणाचार्य ने अपनी ऋग्वेद-माप्य-भूमिका के स्वाध्याय-प्रकरण मे को, जिसमे 'पुरुषार्पा- नुशासन' (एक अप्राप्त ग्रन्य) से सूत्रो का उद्धरण देकर उन्होने निष्कर्ष निकाला है । माज के कर्मकाण्डी भी पाठ मात्र मे ही वेद की सत्ता समझते हैं किन्तु ऐसा नहीं कहा जा सकता कि वेदो के अर्थ मे उनका विश्वास नहीं है । यास्क के विपक्षी कौत्स हैं जिनका कहना है कि मन्त्र अर्थहीन हैं। ये ऊपर कहे गये दोनो पक्षों का समुचित प्रतिनिधित्व करते हैं । यास्क ने उनके प्रत्येक आक्षेप का सफल उत्तर दिया है जिसे पूर्वमीमासाकार जैमिनि ने अपने सूत्रो में ईपत्परिवर्तन के साथ ग्रहण कर लिया है। हम पहाँ उनका वर्णन करें- (१) वेद के शब्दो की योजना ऐसी है कि न तो उनके स्थान पर हम दूसरे पर्यायवाची शब्द रख सकते हैं और न ही उनके क्रम का परिवर्तन कर सकते हैं । सार्थक वाक्यो मे तो ऐसा सम्भव था। भले ही झाड-फूंक करने के निरर्थक-मन्त्रो मे ऐसा परिवर्तन सम्भव नहीं है। थोडा भी परिवर्तन किया कि मन्त्रो को कार्यकरी शक्ति नष्ट हुई। इसलिए वेद के मन्त्र भी निरर्थक हैं । यास्क इसके उत्तर मे कहते हैं कि ऐमा लोक में भी होता है। अपने दैनन्दिन-वार्तालाप मे हम ऐसे वाक्य भी बोल जाते हैं जिनके शब्द निश्चित होते हैं और स्थानच्युति नहीं सह सकते। इससे यास्क यह भली. भौति स्पष्ट कर देते हैं कि वैदिक भाषा से ही लौकिक-भाषा की उत्पत्ति हुई है । 'अर्थवन्त' शन्दसामान्यात्' के द्वारा तो वह इस पर पूरा जोर देते हैं कि दोनो भाषाओ मे शब्द की भी समानता रहती है । ज्ञात होता है कि वे भाषा के ऐतिहासिक विकाम से पूर्ण परिचित हैं । (२) यदि मन्त्र सार्थक होते तो ब्राह्मण-प्रथो के द्वारा उना प्रयोजन निश्चित करना व्यर्थ हो जाता । ब्राह्मणों में किसी मन्त्र का उद्धरण देकर यह लिखते हैं कि इसके द्वारा अमुक कार्य करे । मन्त्रो के द्वारा ही कार्य का स्पष्टीकरण हो जाने पर ब्राहाण अप द्वारा उसका पुन उल्लत निरर्थक हो १. तुलनीय-प्रयो वेदस्य करारी भण्डनिशाचराः। (४६) ४ हि० नि भू० है । यास्क इसे पावृत्तिमात्र कहकर छोड़ देते है किन्तु जैमिनि नै भिन्न-भिन्न उदाहरणो के लिए अलग-अलग सूत्र दिये है ।। (३) अर्थों की असगति भी वैदिर मत्रो की निरयस्ता सिद्ध करती है । बचेतन वस्तुओ से बात करना पागलपन ही है, किन्तु ऋषि कहत है- 'हे कुल्हाडी ! इसे हानि मत पहुंचाओ', 'हे ओपधि । इसे बचाओ।' याक इनका सन्तोषजनक उत्तर नहीं देते। वे कहते हैं कि इसमे वंदिक-वाक्य अहिंसा का प्रतिपादन करते हैं । यह उत्तर अभ्यासिदोष से दूषित है। सभी जड-पदार्थों के सम्बोधन से तो अहिंसा ही नहीं निकलती। महर्षि वापरायण का 'अभिमानिन्यपदेश ' (० सू० २०१५) या जैमिनि का अभिधानेs. पंवाद' अधिक सुन्दर उत्तर है । (४) वैदिक-मन्त्र इसलिए भी निरर्थक है कि वे आपस में ही विशेष करते हैं । कभी तो पृथ्वी मे वेवल एक हो रुद्र होने की बात करते है तो कमी हजारो रुद्रो को ला बैठाते है। कभी इन्द्र को जन्म से ही शत्रुहान महते हैं और कभी कहते हैं कि उन्होने एक साथ ही संकडों सेना जीत ली। यह क्या खेल है ? यास्क फिर लौरिक-प्रयोग के सामने सिर झुका देते हैं किन्तु जैमिनि इसे बालद्धारिक (Figurative) प्रयोग कहकर इसका पुरा स्वागत करते है। (५) वेद मे जानकार को भी पुन विधि बतलाने का नियम है ओ समय का ना करना ही है। यास्क कहते हैं कि ऐसी बात नहीं, यह अभिवादन है। गुरु के समक्ष हम कहते है-मैं, रामचन्द्र, थापका अभिवादन करता हूँ, यद्यपि गुरु इसे जान रहे है कि अभिवादक रामचन्द्र ही है। सम्मान देने के लिए ही ऐसा करने का विधान है । (१) अयं को असङ्गति का ही एक दूमरा उदाहरण है-अदिति को सब कुछ कहना, जैसे-वै ही स्वर्ग है, अन्तरिक्ष है। ऐसा तो संसार में भी कहते है कि पानी मे सब रस है । इसलिए यह असंगति नहीं है। (७) इसके अलावे कई मन्त्र अस्पष्ट अर्थवाले है। तो सबसे अच्छा है कि उन्हें निरर्थक ही समझ लिया जाय । यास्क कहते है कि मन्त्री के सू० १०२४१-४३ मन्त्राधिकरण । २. ऋग्वेद १८९१० अदितिधारदिनिरन्तरिक्षमदितिमाता स पिता स पुत्रः। विश्वे देवा अदितिः पञ्चजना अदितिर्जातमदिनिमित्वम् ।। (५०)
BHAVAN
अस्पष्ट लगने मे मन्त्र दोषी नही, उसे म समझनेवाला व्यक्ति ही दोषी है।
खम्भे का दोष नही कि अन्धा उसे न देखे और उससे टकरा जाय ।
इस प्रकार यास्क सिद्ध कर देते हैं कि मन्त्रों में अर्थ है और उसे जानने
के लिए निक्त की महायता अपेक्षित है 1.स्मरणीय है कि यास्क का ही विवेचन
लेकर जैमिनि ने अपने मन्त्राधिकरण' का निर्माण किया है। इस स्थान पर
यास्क के कुछ वाक्य सूत्र की शैली मे लिखे भी गये हैं।
ATIV
8440
73082
(MUMBAI-7.
.
LIOFAES
१. सू० १।२।३१-५३ इनका विचार सायश की ऋग्वेद-भाष्य भूमिका में भी है।
(ख) द्वितीय-अध्याय [द्वितीय अध्याय-क्या द्वितीय अध्याय से ही निरुक्त का आरम्भ हुआ है ?-निर्वचन के सिद्धान्त-शब्दों में परिवर्तन कोल्ड फा विचार-वैदिक और लौकिक शब्दों का सम्बन्ध-उपभापायें- अनुबन्ध-चतुष्टय और अधिकारी को जाँच-निघण्टु के शब्दों को व्याख्या-ऋचाओ के उद्धरण-गो' के अर्थ--इतिहास- वृत्र का रूपक I] हम जानते हैं कि द्वितीय अध्याय के प्रथम-पाद ता निरुक्त की भूमिया ही है और उसके द्वितीय पाद से ही निघण्टु भाष्य का वाम आरम्भ होता है। इसलिए इसके आरम्भिव-माग मे धुछ जानने और विचारने की बात दी हुई हैं । वे हैं-निवेचन यो शनि तथा आदर्श शिष्य को इसोटो जिसपर विद्यापी मो नितबाबध्यार बम मरे। द्वितीय-अन्याय का प्रारम्भ हुआ है अप निर्वधनम्' से, जैसा कि प्राचीन ग्रन्थों का भारम्भ हुआ करता है । प्रथम अध्याय ये आरम्भ में 'अ' का प्रपोप नहीं दिया गया है। निघण्टु भाप की भूमिका इतनी ही होनी चाहिये जितनी दिनीय-अध्याय म है। मीमे निबंधन की रीति स्पष्ट कर पी गई है। अतएव पुछ विद्वान् नि निरासने है विप्रथम-अध्यापको यास ने भूमिका के रूप मे रिखार पीछे से जोड़ दिया है, पाराम तो नियत का दिनीय-अध्याय में ही है। पर यह गिदान उपर में जितना वापर प्रतीत होता है, भीतर गे उतना ही मोपला है। प्रथम अध्याय में रिये गरे निर्वचनों का उन्नेस भागे के मध्यापों मे बहन रयान पर 'पूर्वमेय व्यापात.' बहर पिया गया है-यह तय इनानो राष्टरही है मि उन-उन स्थानी से निपने से पूर्व ही प्रथम-अध्याय लिया जा धुषा था। परिप्रम-अध्याय पीठ में जोहा गया होता तो या मम्भा नहीं था। पिर, 'पुषियी'-जो प्रधान पन की प्यास्या प्रथम अध्याय में ही है अन्यत्र बही मही । इमाए 'अयं मे बारम्भ न होने पर भी प्रथम अध्याय नियतका मारम्भिा-अपाय है। (५२) . . यास्क के निर्वचन की रीति निम्न प्रकार की है- (१) जब किसी शब्द में वर्तमान धातु का वही अर्थ हो जो उस दान का है, स्वर या बनावट वे सम्बन्ध में कोई आपत्ति नही हो, और व्याकरण शास्त्र की प्रक्रिया के द्वारा ही उसकी बनावट सिद्ध को जा सके, तब ऐसे शब्दो का निर्वचन सामान्यरीति से ही करें, जैसे-'धातु' की व्युत्पत्ति/पा (धारण करना) से (१।२०) की गई है। यहां तक निर्वचन की रीति व्याकरण से मेल रखती है तथा वैज्ञानिकता से सम्बद्ध है । निरुक्त की निरुक्तियों चा विचार हम यथास्थान करेंगे। (२) जय शब्द मे दिखलाई पडनेवाले धातु का अर्थ गब्द से भिन्न हो, या गद का अर्थ रखनेवाले धातु से रस शब्द की सिद्धि करने मे व्याकरण याधक हो तब हम उस शब्द के विभिन्न-रूपो की तुलना घातु के विभिन्न रूपो से करेंगे। कही पर भी समानता पा लेने पर निवंचन कर लें, जैसे-'राजा' की व्युत्पत्ति राज् ( शोमना ) से की जाती है क्योकि राजा भी राज्य में शोभते हैं ( राजन्ते ) (३) जब इस प्रकार की समानता न मिले तो अयं देखकर, धातु और शब्द में एक आध स्वर या व्यन्जन की भी समानता को आधार मानकर निवंचन कर दें, जमे-रूप' की व्युत्पत्ति है/रच् ( अच्छा लगना) से, जव कि दोनो मे केवल रकार और उकार को ही समानता है। यास्त्र के पिछले दोनों सिद्धान्त अवैज्ञानिकता की पृष्ठभूमि पर आधारित हैं। उनका सिद्धाल है कि कोई भी ध्वनि किसी ध्वनि के रूप में बदल सकती है, भले ही उनमें कोई स्वाभावित सम्बन्ध न भी हो। यह भाषा- विज्ञान पे ध्वनि सिद्धान्त के विरुध है। वैज्ञानिक-सिद्धान्त यह है कि कुछ निश्चित धनियाँ हो किसी निश्चित रूप में किसी निश्चित समय पर बदलती हैं। 'न मसारमाद्रियत' एक बहुत वही वैज्ञानिक मूल है। निर्वचन की अनिवार्यता पर य कहते हैं-'न स्वंय न नियात् ।' निबंधन परने में अपनी असमर्थता कभी न दिया, नही तो बहुत वडा अनपं होगा १ तर येषु परेषु स्वरसस्कारी समयों प्रादेशिकेन गुोन अन्वितो स्याताम् । सानि निम्यार। २ प्रधानन्बोय, भप्रादेशिक विसारे, अर्थनित्य परीक्षेत केनचिचिसामान्येन। २. मोरपनाने समान्पी अलमायाशीम यात ४. Soi, The Nirukta, P10. (५३) . तथा (१) घातु का पातुज मानने का सिद्धान्त ही मष्ट हो जायगा। इतना ही नहीं, शन्दो मे किस प्रकार का परिवर्तन होता है, यह भी देखें- के कुछ रूपो मे आदि-अक्षर ही बचता है और सभी अक्षर लुप्त हो जाते हैं, जैसे-+/दा=प्रत्त । इसमे (प्र 'त्' त) दा का केवल ६ ही त् के रूप मे अवशिष्ट है। (२) कही-कही आदि स्वर का लोप हो जाता है, जैसे / अस् का गुणवृद्धि से रहित स्थानो में-स्त , सन्ति । भाषाविज्ञान भी इसे स्वीकार रता है तथा आदि स्वर लोप ( Aphesis, Aphaeresis) कहता है । उदाहरण है-अपिनद्ध>पिनद्ध, अवगाह्म>वगाह्य, Esquire>Squire इत्यादि । महाभाष्य मे इसके लिए एक कारिका भी है--'वष्टि भागुरिरहलोपम. वाप्योरुपसर्गयो ।' कालिदास ने भी ऐसे कई प्रयोग किये है। (३) बही-कही घातु के अन्त्य-अक्षर का लोप हो जाता है. जैसे गम>गत , गत्वा । (४) कही-कही मध्यम स्वर ( उपधा ) का भी लोप हो जाता है ( Syncope ) जैसे- गम>जग्मतु , जग्मु, मे 'ग' के अकार का लोप । (५) ह्रस्व स्वर के बाद अनुनासिव-वणं रहने से दीर्घ-स्वर हो जाता है और आनुनासिक का लोप भी ( यास्क के शब्दो मे, उपधा-विकार) हो जाता है-राजन् >राजा, दण्डिन् >दण्डी । (१) वर्णलोप-दूसरे व्यञ्जन के पूर्व व्यजन का लोप,२ जैसे- तत्त्वा>तत्वा । (७) द्विवर्णलोप-त्र्यच>तृव । (र और यमा लोप) (८) शब्द के प्रथम व्यजन का विकार-द्युत >ज्योति । (१) दोनों ओर के व्यञ्जन परस्पर स्थान बदल सकते है. जैसे- Wश्चुत् >स्तुच्>स्तुक>स्तोक । इसे वर्ण-विपर्यय कहते है, जैसे-सिंह की गुत्पत्तिहिंस् से । (१०) अन्तिम व्यम्जन का विकार-(हकार का घू या ५ होना )-- वह>ओप. वह < वधू तथा म>मधु । 1. Vide, Dr. T. Chowdhury, Linguistic Aberrations in Kalidasa's Writings.p3. २. तुरनीय-झरो हरि सवर्गे (पा० सू० ८।४।६५)।
(११) अन्त स्थ-वर्ण रहने से सम्प्रसारण में भी विकार हो सकता है, जैसे-/अ>कति, प्रदुमदु । भाषा के परिवर्तन मे ये सभी विकार महायक होते हैं किन्तु ये अनियमित (Sporadic) हैं, किस स्थान मे होगे नियम बनाना बहा कठिन है। दुर्गाचार्य ने इन नियमो मे कुछ को चुनकर निरुक्त का लक्षण किया है'- वर्णागमो वर्णविपर्ययश्च दो चापरी वर्णविकारनाशी । घातोस्तदतिशयेन योगस्तदुच्यते पञ्चविष निरुतम् ॥ किसी शब्द का निवंचन करने के लिए ध्वनि विकार के ये सिदान्त भाषा- विज्ञान को भी मान्य है-(१) वर्णागम ( कई प्रकार के) (२) वर्ण- विपर्यय ( Metathesis), (३) वर्णविकार ( Change of Syllable), (४) वर्णनाश ( Elision of Syllable) और (५) अर्थ के अनुसार धातु से रूप की कल्पना करना ।' डा० स्कोल्ड कहते हैं कि यास्क के उदाहरण या अनुभव ( Observation) ठीक हैं किन्तु उनसे निकाले गये निष्कर्ष गलत हैं क्योकि दे अति यापक हैं।/गम से उपधा का लोप होने पर 'जग्मतु' बनता है- इसमें कोई सन्देह नही, किन्तु यह कहना कि सभी उपधाओ का लोप हो सकता है, गलत है। कारण यही है कि ये सभी ध्वनियां अनियमित रूप से विकृत होती हैं। यह स्थान यास्क के भाषा-शास्त्रीय ज्ञान का बहुत सुन्दर प्रदर्शन करने वाला है। इसी सम्बन्ध में वे सकेत करत हैं कि वैदिक धातुओं से सस्कृत-शब्द बनते हैं तथा सस्कृत के घातुओ से वैदिक-शब्द मी बनने है। यह उनके अनुभवों का आदर्श है। चूकि वैदिक भाषा से ही संस्कृत का विकास हुआ है, इसलिए यह कहना तो ऊपर से विरोधायक प्रतीत होता है कि सस्कृत-धातुओ से वैदिक शब्द बनते हैं। इसका यह अभिप्राय है कि जिन धातुओं से इन वैदिक शब्दो की व्युत्पत्ति होती है वे किया के रूप में वैदिक भाषा में प्रयुक्त नहीं होते, किन्तु सस्कृत-भाषा मे होते हैं। इसी प्रकार २. तुलनीय-मवेद् वर्णागमा हसो सिंहो वर्णविपर्ययात् । मूडोरमा वर्णविकले वर्णनाशात्पृषोदरम् ॥ २न विकारों स्था अन्य विकारों के लिए देखें-डा. मोलानाथ तिवारी का 'भाषा विशान'। 3. Biold, The Nirukta, p 182-Bis observations are correst but his conclasions are wrong be are they are too general' (५५) कुछ धातु एस भी हैं जो दिक-भाषा मे क्रिया के रूप में प्रयुक्त होते हैं, धीरे-धीरे उनका यह प्रयोग समाप्त हो जाता है तथा संस्कृत में उनसे बने चान्द भर ही प्रयोग के योग्य रह जाते है। शब्दो के प्रयोग, विकार आदि मे सबसे बड़ा अधिकारी सौकिक प्रयोग ही है। जनता शब्द का जैसा व्यवहार कर दे। यास्क पहले भी 'अर्थवन्त शब्द सामान्यात्' के द्वारा वैदिक और संस्कृत-भाषाओ का सम्बन्ध बतला चुके हैं। निघण्टु तथा प्रायः ६०० वैदिक- मन्त्रो की व्यारया करने वाले यास्क को यह पता लगाने में कठिनाई नही हुई होगी कि वैदिक से ही सस्कृत का विकास हुआ है। सस्कृत भाषा बोली जाती थी तथा इसकी उपभाषाओ में पारस्परिक मन्तर भी था जिसे मास्क भौर पतञ्जलि दोनो ने ही पहचाना है। यारा की दृष्टि भी क्तिनी तीक्ष्ण है ? धातु का प्रयोग लोग एक प्रान्त में करते है और उससे बने हुए दाब्द का दूसरे ही प्रदेश मे। शत्-क्रिया (= जाना ) का प्रयोग कम्बोज-देश में, और शव ( सज्ञा ) का प्रयोग बार्य लोग करते है । Ver (=काटना) प्राध्य-देश मे तथा 'पात्र' उदीप-देश में बोलते है । पतम्जलि भी ऐसी उपभाषाओ का नामोल्लेख करते है ( देखिये महाभाष्य १११) यास्त भायंदेश को प्राच्य और उदीच्य से भिन्न मानते है यद्यपि आयदेश फी भाषा से इन दानो देशो की भाषायें बहुत प्रभावित थी। यास्व क समय इन देशो की भापानी को लोग शिष्ट नहीं मानते थे। केवल आय-भाषा ही शिष्टो की भाषा थी जिसका अनुकरण अन्य भाषायें कर रही थीं। भाषाओं के क्षेत्रीय विभाजन का उल्लेख ब्राह्मण ग्रन्पों में भी प्राप्त होता है। अपने निर्वचनों के उपर्युक्त नियमो को या ने 'गुरपर्व' माना है अर्थात् उन पाब्दों में एक ही जोड है, एक बार मे सन्द से पातु तक पहुंच जाते है । तदिन और समाप्तो को अने पूर्व कहते है क्योकि इनका भोधा निर्वचन सम्भव नहीं। इनके लिए मारत ने दो और मिद्धान्त जोड दिये है- तद्धितान्त दान्दो को पहले तोड दें तर उनवा निर्वचन परें, जैसे - <</म् । समासो का भी इसी प्रकार निर्वचन पर अर्थात् विग्रह करके शब्दो को बलग-अरग कर लें, पश्चात् उन अवेले (एकपर्वकालं) । १. Dr LSarup, The Nighantu and the Nirukta, Eng Traute p.223 २.देसिया जीवियुमार चटर्जी--Indorirnar and Hindi, old Indo-Aryan शब्दो का निर्वचन करें जसे -राजपुरुष< राजा का पुरुष । इसके बाद इन दोनो शब्दो का अलग-अलग निर्वचन करें। इन नियमो का पालन यास्क ने पूर्णतमा किया है। प्राचीन-भारत में किसी शास्त्र के आरम्भ मे चार अनुबन्धो का ज्ञान करना बहुत जरूरी था। ये अनुबन्ध है--सम्बन्ध, अधिकारी, विषय और प्रयोजन ।' अधिकारी का निरूपण दिना किये हुए किसी भी शास्त्र का आरम्भ नहीं होता था। निघण्ट-जैसे अन्य का भाष्य पढाने के पहले अध्यापक को अपने शिष्य की परीक्षा कर लेनी चाहिये । इसीलिए यहाँ निवक्त के उपदेश के अधिकारी किसी योग्य शिष्य को चुनना जरूरी समझा गया है। योग्य शिष्य में ये गुण होने चाहिये-व्याकरण-ज्ञान, शिष्य बनकर पढने की इच्छा, निरुक्त को जानना (श्रद्धा रखना), मेघावी और तपस्वी होना । दोप ढूंढनेवाले, टेढे या असयमी शिष्य को निरुक्त न पढाये । गुरु का द्रोह कभी नहीं करना चाहिये, उन्हें माता-पिता समझे क्योकि गुरु अत्यन्त परिश्रम से अमर-विद्या का दान करते हैं। पढ़ने के बाद जो गुरु का सम्मान नहीं करते, विद्या भी उनका मान नहीं करती। इसलिए पवित्र और अप्रमादी, मेघावी और अद्रोही शिष्य को ही विद्या-दान करें। इस भूमिका के बाद से निघण्टु के शब्दो को व्यात्या आरम्भ हुई है। द्वितीय-अध्याय मे ही निघण्टु के प्रयम-अध्याय को समेट लिया गया है किन्तु प्रत्येक खण्ड (पर्यायो के समूह ) से प्रायः एक ही शब्द का निर्वचन किया गया है । निर्वचन की शैली हम देख ही चुके हैं। इसलिए यहाँ सामान्य-रूप मे ही वर्णन अपेक्षित है। 1 निघष्ट के प्रायः पचीस शब्दो के निर्वचन-क्रम मे १६ पूरी-पूरी ऋचायें उद्धृत की गई हैं और उनको व्याख्या भी की गई है। निघण्टु के शब्दो की व्याख्या करते हुए यास्क यह ध्यान में रखते है कि शब्दो के जितने भी अर्थ सम्भव हैं उन सवो तक व्युत्पत्ति क द्वारा ही पहुंच सकें और इस प्रकार कोई अर्थ छूटने न पाये। यदि शब्द के सम्बन्ध में कोई आख्यान आदि हो तो उसका उल्लेख करना भी यास्क नहीं भूल्ने । अथवा किसी शब्द का प्रयोग जिस ऋचा में हुआ है उस ऋचा से भी सम्बद्ध इतिहास का वर्णन ये कर देते हैं । कभी-कभी पूरी ऋचा लिखने के बाद उसके कनिपय चरणो को अलग- अलग उद्धन करके भी व्याख्या करते हैं। इस प्रकार से-थास्क शब्दों के १. सम्बन्धश्चाधिकारी च विश्यश्च प्रयोजनन् ।
ही बदलता है। हरेक पहलू पर पूर्ण विचार करते हुए आदर्श-व्याख्याकार के रूप में उपस्थिति होते है 'गो'-शब्द यद्यपि पृथ्वी के पर्याय मे पढा गया है, स्न्तुि इसका वर्ष- पशु विशेष भी है । पशु अर्थ वाले 'गो' शब्द के अर्थ कभी-कभी लक्षणा से भी लगते है। जैसे-गो-दुग्ध, गो-चर्म, गौ की तान, कफ आदि । सूर्य को तथा उसकी किरणो को भी गौ कहते है। इसका कारण प्रो० मैकडोनल (Macdonell ) ने बताया है कि सूर्य की किरणो को प्रात काल निकलती देखकर प्राचीन आर्यों की कल्पना होती थी कि गायें अपने रात्रिवास से निकलकर गोचर भूमि की ओर जा रही है। गायो के समान सूर्य भी रात में विथाम करता हुआ प्रतीत होता था। इसी प्राकृतिक समानता को देखकर 'गो' शब्द आदित्य के अर्थ में प्रचलित हो गया। अर्थ इस सम्बन्ध मे शाकपूणि का एक आख्यान आता है। ये समझते थे कि किसी भी मन्त्र के देवता को पहचान ले सकते है। उनके इस गवं पर दो चिह्नवाले देवता प्रकट हुए जिन्हे वे न पहचान सके । देवता ने स्वयं ही अपनी पहचान बता दी। एक दूसरे इतिहास का वर्णन है कि कुरुवंश मे ऋष्टिपेण के दो पुत्र थे-देवापि और शन्तनु । छोटे भाई शन्तनु ने अपना राज्याभिषेक करा लिया और देवापि तपस्या करने लगा। इस अधर्म के कारण रान्तनु के राज्य मे १२ वर्षों तक पानी नहीं बरसा। ब्राह्मणों ने उसके अधर्म की ओर सकेत किया। इसपर शन्तनु ने देवापि को राज्य लेने के लिये कहा किन्तु देवापि ने वेवल एक यज्ञ कराने को वचन दिया जिससे वर्षा हो। इस इतिहास से तात्कालिक-समाज का एक अच्छा चित्र उपस्थित होता है । पुराणों मे जिस वृत्र का इतनी अतिरजकता के साथ वर्णन हुआ है उसके विषय मे यास्क कहते है कि यह और कुछ नहीं, मेघ ही है। जल और प्रकाश के मिश्रण से जब वर्षा होती है तब मालूम होता है कि युद्ध हो रहा है जिसका वर्णन लोग करते हैं । मन्त्रों और ब्राह्मणों में उसे सौप मानते है । अपने बडे शरीर से उसने जल-प्रवाह रोक लिया, इन्द्र ने जब उसे वज़ से मारा तब जल प्रवाहित हुआ। इसकी वास्तविक्ता यह है-आकाश मे ..देखिये वाव्यप्रकार, २-मुरयायदा तयोगे रुदिनोऽय प्रयोजनात । Cr Metonymy-He drank the cup ( =mls in it) २. Taraporewala, Elements of the Science of Language, Sems. ntics या डा० भोलानाथ तिवारी का भाषाविज्ञान (अर्थविचार) देखें। (५८) मेघ लगे हुए हैं किन्तु वर्षा नहीं हो रही है मानो क्सिी ( = दृत्र ) ने पानी को रोक रखा है । अकस्मात बादल टकराते हैं और जोरो से बिजली कौंधती हुई गरजती है । यह हुआ इन्द्र का वच से मारना । सम्भव है कुछ देर बाद वर्षा होने लगे । लीजिये, सार मर गया, जल का प्रवाह चल पड़ा। यह बिलकुल सच है कि वेदो में जिसका रूपक बांधा गया, उपनिषदो ने जिमे शुद्ध-रूप मे पहचाना पुराणों में उसीका अतिरन्जन करके कपा लिस्ती गई। ऋषि-विश्वामित्र से सम्बद्ध एक और इतिहास है। वे सुदास् पंजवन के पुरोहित थे, उससे धन लेकर वे विपाशा और शुतुद्री के संगम पर आये। उनके पीछे-पीछे और लोग भी थे। ऋषि ने नदियो से अल्प जलवाली (चाह ) बनने के लिए प्रार्थना की । वेद के कुछ मन्त्रों के द्वारा (ऋ० ३३३३) दोनो का सवाद होता है। नदियां अस्वीकार करते करते भी मान जाती हैं। निघण्टु प्रथम अध्याय के अन्तिम तीन खण्डों का तो केवल निर्देश हो किया गया है। इस प्रकार दूसरे अध्याय (निरुक्त ) का अन्त होता है । (५९) (ग) तृतीय-अध्याय [निघण्टु के द्वितीय-तृतीय अध्याय के शब्दों की व्याख्या- तत्परता-औरस पुत्र को श्रेष्ठता-वशिष्ट का उपाख्यान-पुत्र का उत्तरा धिकार-पुत्री का उत्तराधिकार-तर्क-भ्रातृहोन नारो का उत्तराधिकार गरिक शब्द-पुत्रो का उत्तराधिकार निषेध--पंचजन- कतिपय प्रातिपदिक-हीन शब्द-उपमा--लक्षण-उसके कर्म तथा प्रकार- रूपकमूला उपमा-शब्दानुकृति-नघण्टुक काण्ड की समाप्ति ] | निरुक्त के दूसरे अध्याय मे निघण्टु के केवल प्रथम अध्याय की ही व्याख्या ( या नामोल्लेख मात्र समझें) की गयी है। स्मरणीय है कि निघण्ट के प्रथम अध्याय मे सत्रह खण्ड हैं। चूंकि निघण्टु के नघण्टुक-काण्ड मे नेवल तीन ही अध्याय है, इसलिए अभी भी दो अध्याय बच रहे है। अब इन दोनो अवशिष्ट अध्यायो मे विद्यमान शब्दों को व्याख्या निरुक्त के तीसरे अध्याय मे ही होती है और तीसरे अध्याय तक को नघण्टुक्-काण्ड को संज्ञा दी जाती है। स्थान थोडा है और शब्द काफी ( २२+३० खण्ड), इसलिए शैली जरा तेज हो गयी है । इसे यथास्थान मूल पुस्तक मे अस्ति क्यिा गया है। तीमरे अध्याय के प्रथम पाद भर मे यास्क एक बड़े मनोरंजक विषय का विवेचन करते है, जब कि अपत्य पद की व्याख्या होती है। इस विवेचना गे तात्कालिक समाज की व्यवस्था पर पूरा प्रकाश पडता है। यही नहीं यास्क स्मृतिकारों की क्या मे भी प्रवेश कर जाते हैं । अपत्य वा सामान्य अर्थ है संतान । वह पिता से पृथक् होकर फैलता है तथा उसके कारण पिता नरक में मही पडने । अव पुत्र के यनेक भेदो मे औरस पुत्र की श्रेष्ठता का वर्णन सुनें । एक वैदिक उपारयान है कि वशिष्ठ के सभी पुत्र मर गये। उन्होंने पुत्र की कामना से अग्नि की प्रार्थना को । अग्नि ने उनसे पूछा कि दत्तक, श्रोतक, कृत्रिम आदि पुत्रो मे पिसे चाहते हो। इसी बात पर वशिष्ठ ने औरस (आत्मज) पुत्र की श्रेष्ठता प्रमाणित की एव दूसरो के जनमे पुत्रों की निन्दा की। उसी प्रसग की ऋचायें यास्क उद्धृव करते हैं। दूसरे का पुत्र तो भी भी ग्रहण नहीं करना चाहिए। उसे जलदान का कोई अधिकार नहीं है। मुखों की यह धारणा है कि दूसरो का पुत्र अपना होकर रहेगा। वह तो (.६०) वहीं लौट जाता है जहाँ से आता है। उसे पैतृक-वश में रहने का अधिकार नहीं। किन्तु ब्राह्मण-ग्रन्थों मे हमे ऐसे उदाहरण मिलने हैं कि दूसरे का पुत्र दूसरे वंश मे जाकर पूरा अधिकार पाता है। उदाहरण के लिए, ऐतरेय- ब्राह्मण के शुन शेष को लें। यद्यपि वह आगिरस गोत्र का था किन्तु विश्वामित्र ने उसे अपने वश में ले लिया । यही नहीं, उसकी श्रेष्ठना स्वीकार न करने वाले अपने औरस (?) पुत्रो को भी शाप दे दिया जिससे वे आन्ध्र, पुलिंद, म्लेच्छ आदि सीमा पर रहने वाली जानियो में चले गये। इसके विपरीत पुन शेप को दैविक दायभाग, विद्या आदि उत्तराधिकार' भी मिलता है । आज की ही भांति उस समय भी अन्य बालको को अपने वश में ले आने की प्रथा प्रचलित थी। किन्तु जब औरत हो मिल जाये तब तो उनका प्रश्न ही नहीं उठता। वशिष्ठ को कतिपय विकल्पो के बीच पुत्र चुनना था इसीलिए स्वभावन उन्होंने औरस पुत्र की श्रेष्ठता प्रमाणित की है। मनस्मृति के अनुसार पुषो के बारह भेद हैं जिनमे ६ दायाद ( सम्पत्ति के उत्तराधिकारी) तपा ६ अदायाद हैं। निम्नलिखित पुत्र दायाद है- औरस, क्षेत्रज्ञ, दत्त, कृत्रिम, गूढोत्पन्न और अपविद्ध । इसके अलावे कानीन, सहोढ, त्रोत, पौनर्भव, स्वयदत्त और शोद्र-ये प्रकार के अदायाद हैं । इनमे प्रत्येक का विस्तृत वर्णन मनु ने नवम अध्याय के १६६ से १८० श्लोकों तक किया है। कुछ भी हो औरस पुत्र के अभाव मे ही इन अन्य प्रकार के पुत्रों को दायाद बनाया जाता है या उनको महत्ता स्वीकृत होती है। पुन:, इसी प्रसग मे दूसरा विवाद यह उठाता है कि पुत्र के समान पुत्री को भी उत्तराधिकार प्राप्त है या नहीं। कुछ आचार्यों के अनुसार पुत्री को भी उत्तराधिकार प्राप्त है। इस सम्बन्ध में दुर्गाचार्य कहते हैं कि पुत्री का पुत्र दौहित्र होना है, यदि किसी को पुत्र न हो तो पौत्र भी नहीं होगा किन्तु घोहित्र को ही पौत्र के रूप में वह प्रहण करेगा। इस प्रकार जब दोहित को पौत्र माना जा सकता सब पुत्री को भी पुत्र माना जाय । दुर्गाचार्य की यह उक्ति वही तक संगत है जब मनुष्य पुत्रहीन हो (जन कि दौहित्र को पौत्र का अधिकार मिल सकता है)। किन्तु पुत्री को उत्तराधिकार देने का मतलब है सभी अवस्थाओ मे, चाहे पुत्र रहे या नहीं, पुत्री को भी सम्पत्ति का समान अधिकार प्राप्त है। किन्तु ऐतिहासिक दृष्टि से विचार करें तो . १.देसिर २० मा०७३। २. मनु०९।१५८-६०।
आर्य-जातियो मे, पुत्र के रहने पर, पुत्री को कभी भी सम्पत्ति का भाग नहीं मिला: हाँ, दोहित्र को अधिकार तभी मिलता था जब पौत्र न हो । पुत्र के रहते हुए पुत्री को उत्तराधिकार देना मुसलमानों में प्रचलित है। दुर्गाचार्य का दूसरा तर्क है कि पुत्र और पुत्री के उत्पादन की विधि (प्रक्रिया ) एक समान है तथा उन दोनो के सस्कारो मे कोई अन्तर नही है', एव ही मत्र दोनो के सस्कार-कार्यों में प्रयुक्त होते हैं । यह तकं मूल की अतिरजना ही है । इस मत के पक्ष मे तथा विपक्ष में भी प्रमाण मूल म ही उद्धृत किये गये हैं । यास्क ने मनु का उद्धरण देकर पुत्री के उत्तराधिकार को पुष्ट करने की चेष्टा की है। मनुस्मृति मे वह श्लोक तो प्राप्त नहीं होता, किन्तु उस विचार के साथ साम्प रखने वाले निम्नलिखित प्रलोक मिलते हैं ( मनुस्मृति, नवम अध्याय)- यर्थयात्मा तथा पुत्र पुत्रेण दुहिता समा। तस्यामात्मनि तिष्ठन्त्यां कथमन्यो धन हरेत् ॥ (१३.) पौत्रदौहित्रयोर्लोके न दिशेपोऽस्ति धर्मत । तयोहि मातापितरौ सम्भूतौ तस्य देहत ॥ (१३३) पौत्रदौहित्रयोर्लो के विशेषो नोपपद्यते । दौहित्रोऽपि घमुत्रनं सतारयति पौत्रवत् ॥ (१३९) किन्तु ये विपान उस अवस्था के हैं जब मनुष्य को पुप न हो। पुष न होने पर दौहित्र को ही उत्तराषिक र दे क्योकि उसकी माता भी उस मनुष्य की देह से ही उत्पन्न है। दूसरी ओर मंत्रायणी सहिता की दुहाई देते हुए आचार्य लोग कहते है कि पुत्री को कोई अधिकार नहीं । 'पुमान् दायाद अदायादा स्त्री-पुत्र उत्तराधिकारी है. पुत्री नही । यही कारण है कि जन्म होते ही पुत्री को फेंक देने है, पुत्र को नहीं फेंकते । भारतवर्ष मे विगत शताब्दी तक कुछ जातियों में (विशेषतया राजपूतो मे ) लडकियो को फैक्ने की प्रथा पी जिसे बाद मे ब्रिटिदा-सरकार ने अवैध घोषित कसे रोका । लहवियों का दान भी होता है ( जमीदारी प्रथा म हाल त दासियों को दहेज मे दिया जाता था) उनकी १ यैरव मन्त्र येनैव च विधानेन पुषगर्भ आधीयने, सेरेव मन्वैस्तेनैव च विधानेन दुहितगर्मोऽपि । येनैव हि विधानेन पुत्रजनने रेत उत्पच्यने, सेनैव हिदुनि- जननेऽपि । तत्रैव सति रेत उत्सर्गविध्यविपात्प्रजननयशाविशेषासाविशपेग, मिथुना पुरुपा त्रियश्च, उभयेऽपि दायादा इत्येवमेके धर्मविदो मन्यन्ते-(नि.)। (६२) । विक्रो भी होती है ( यह प्रथा तो अब तक है ) । इन सबों से मालूम होता है कि पुत्रियो को सामाजिक-अधिकार से वचित कर दिया गया था, तभी तो दान, विनय और अतिसर्ग जैसे अभिशाप इनके सिर पर वर्तमान थे। एक तीसरा पक्ष है जो इन दोनो विरोधी मतो को मिलाते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि वही स्त्री पिता की सम्पत्ति की उत्तराधिकारिणी हो सकती है जो भ्रातृहीन हो । यही रीति आज भी है ( यदि पिता ने भी जीवन काल मे इसकी स्वीकृति दी हो तो और भी अच्छा । )-आर्यजाति में सदा से ऐसी परिपाटी रही है। जिस स्त्री का भाई नही होता वह अपने पुत्र को ही पिता के धन का अधिकारी बनाती है तथा पिता के घर पर ही अधिक ध्यान रखती है । पिता की सद्गति के लिए वह सचेष्ट रहती है । पति-कुल के कल्याण से अधिक चिन्ता उसे पितृकुल की लगी रहती है क्योकि वह यह समझती है कि पिता की रक्षा का मार, उनको सम्पत्ति को रक्षा का भार, पिण्डदान इत्यादि का भार तो और किसी पर नही, उसी पर ( या उसके पुत्र पर) तो है-यही अभिप्राय है कि अभ्रातृका नारी पितृकुल मे लौट जाती है। ऐसी स्त्री से विवाह करना निषिद्ध है, ऐसी स्त्री अपने पिता के लिए पुत्र का कार्य करती है । भ्रातृहीन स्त्री से विवाह का निषेध मनु भी करते हैं- यस्यास्तु ने भवेद्माता न विज्ञायत वा पिता । नोपयच्छेत ता पुत्रिकाधर्मशङ्कया ।। ( ३१११) इस प्रसंग मे एक ऋचा उद्धृत की गई है जिसका एक अश है-'जायेव पत्य उशती सुवासा.'। यह चरण ऋग्वेद के कई मत्रो मे है। यहाँ कपा की तुलना भ्रातृहीन स्त्री से की गई । भ्रातृहीन स्त्री जैसे अपने पितृकुल मे लौट जाती है क्योंकि उसे अपने पिता का सारा काम-काज संभालना पडता है. उसी प्रकार ऊपा भी अपने प्राकृतिक नियम का पालन करने के लिए प्रतिदिन प्रातकाल लौट आती है। यहाँ चार उपमायें दी गई हैं-(१) ऊषा मनुष्यों के पास भ्रातृहीन स्त्री की तरह लौटती है. (२) यह धन लाने के लिए उस स्त्री के समान जाती है जो रंगमच पर बारूढ होती है। (३) पति की कामना करनेवाली सुन्दर वस्नो रो अलंकृत स्त्री के समान तथा (४) हंसनेवाली- मुस्कुरानेवाली म्मी की तरह ऊपा अपने रूप का प्रदर्शन करती है। 'गर्ताक शाद की व्याख्या में यास्क दाक्षिणात्य की नारी का उल्लेख करने लगते हैं । यह नारी चूत-भवन मे धन प्राप्त करने के लिए जाती है। 'गतं' का अर्थ दुर्ग करते हैं वह फलक जिस पर पासे फेंके जाते हैं। प्राज्ञः उपमा के विषय मे निरक्तकार बडे प्रवीण प्रतीत होते हैं। निघण्टु (३।१३ ) मे उपमा के कुछ वैदिक उदाहरणो को सग्रहीत किया गया है । उन्ही की व्याख्या के प्रसग में काव्यशास्त्र ( विशेषतया अलङ्कार-शास्त्र ) फी सर्वप्रथम उद्भावना यास्क ने की है। यास्त भी अपने पूर्ववर्ती आचार्म गायं वे ऋणी है जिन्होने उपमा का लक्षण किया है। उनके अनुसार उपमा के रक्षण मे तीन तत्त्व होते हैं-(१) दो वस्तुओ मे प्राकृतिक भेद होना, (२) उनके धर्म का उल्लेख, (३) उन धर्मों में उनरा परस्पर साध्य होना । मुग्व धौर पन्द्र दोनो एक ही वस्तु नही, किन्तु दोनो में समता है । यही उपमा वा बीज है। उपमा की यही परिभाषा पिछले ममस्त बालगरिको ने स्वीकार की है। यद्यपि वाव्यप्रकाश (१०१) में 'साथम्यं मुपमा भेदे' पटवर इसका बसा ही लक्षण दिया गया है सवारि अन्य बलकारो से पार्थस्य दिखलाने के लिए वियनाय ने माहित्यारंग मे उपमा के लक्षण में उपाधियां लगा दी है- साम्म दाच्यमवयम्य वाक्य उपमादयो । उपमा में दो तरह ये वर्म होते है-१) बहे गुण से छोटे गुण पी उपमा, या प्रसिद्ध वस्तु म अमिट की उपमा, (२) छोटी परतु से बडे गुण की उपमा । मामान्यत ऐगा देपा जाता है किन्तु बालकारिप लोग इनमे दोष निकालो है। उपमेय को यपेया उपमान यदि जाति, प्रमाण पा धर्म में न्यून हो तो दीनस्व-साप, अधिर हो तो पधिर-दोष होता है। हास्य-रम की रमनाओं में या इसका प्रयोग परत है जो 'यापने पणाल गमान सहन साहम दिपाया', 'यह मूर्य चिनगारी से गमान पर रहा है। यहां पडे गुणवारे पो उपमा छोटे गुणवाली वस्तु मे दी गई है। निघण्टु में उसमा रे नाम में पारद उदाहरण दिए गये है पो दिक- पन्यों है। माम उपमाओ के मामान्य विवेचन में कम मे चार प्रसार रूप देखते हैं । ये है-गर्मोनमा भनोरमा, पारमा और गिडोपमा। इनमें बमोगमा 'पपा से जानी जाती है क्योकि ययामा मानन्ध गीधे मं मे है। उदाहरण मे-'यथा वातो पावन या समुद्र एजनि' दिया गया है। मनोरमा में 'भूत' (वह बैगा हो गया है) वा प्रयोग रहता है जंग- १.रायगएप(वामन).-११ । २. पारेख युभिः सहम परम पम् रविपरित समानुरय पारित।
. . मेपो भूतः = मेंड हो गया । यह रूपक के रूप मे है । उसी प्रकार 'दारुभूतो मुरारि.' इत्यादि प्रयोग हैं। रूपोपमा भी वैसी ही होती है किन्तु इसमे 'रूप' शब्द का प्रयोग होता है जमे-हिरण्यरूप: स्वर्ण के समान । इसी तरह 'वणं' का प्रयोग होने पर वर्णोपमा भी हो सकती है जैसे-हिरण्य- वर्णः। 'था' प्रत्ययर से भी रूपोपमा ही मानी जाती है। सिद्धोपमा का अर्थ है ऐसी वस्तु से उपमा देना जिसका मानदण्ड स्थिर या सिद्ध हो चुका है । इसका वाचक है 'वत जसे-ग्राह्मणवत् , वपलवत् । दुर्गाचार्य ने इनके उदाहरण में 'बाह्मणवद अघीते' दिया है । ब्राह्मण का अध्ययन एक मानदण्ड के रूप में सिद्ध है इसलिए अधिक पढनेवाले को 'बाह्मगवत् • पढ़नेवाला' कहते हैं । 'वृपलवत् आक्रोशति' कहते हैं क्योकि निन्दा करने मे वृषल एक ही है, उसे निन्दको का मानदण्ड सिद्ध करते हैं । यही सिद्धोपमा वा रहस्य है। इस परिच्छेद मे हम उपमाओं के निम्नलिखित वाचा शब्द पाते हैं-दव, यथा, न, चित , नु, आ, मन, रूप, वर्ण, वत् , तथा। इनमे अधिकार का विवेचन निरुक्त के प्रथम अध्याय में निपातों के वर्णन के क्रम में हो - गया है। चतुर्थ-पाद के आरम्भ मे भी अलवारशास्त्र-विषयक विवेचना हुई है। ऊपर तो उन उपमाओ वो विवेचना हुई जिनमे उपमाओं के वाचकादि विद्यमान रहते हैं जैसे-अग्नि न ये (जो लोग अग्नि के समान ), किन्तु ऐसी भी उपमायें हैं जिनके शब्द लुप्त रहते हैं, भेद बिल्कुल नहीं रहता। इन्हे अलकारशास्त्र में रूपक-अलकार वहते हैं। वस्तुन यास्क का यह १.निघण्टु ३।१३।१०। २. प्रकारवचने थाल ( पा० सू० ५।२६२३)। ३. तेन तुल्य क्रिया चेदतिः (पा० सू०१।११५)। ४. महिनाथ ने मेघदून ( ११४८ ) में 'एक मुक्तागुणमिव भुव.' श्लोक को म्याख्या करते हुए निरुत्तकार वा उस्लेख किया है तथा उनीभ्रान्ति मी दिसलाई है । वे कहते है- (निरुत्तकारः) तर तोरमा, यत्र वशदस्य दर्शनम-इति श्वशन्ददर्शनादापि उपमेव पनि राम'। क्या निरुतवार मल्लिनाथ के अनुनार मेवदूत के अलदारों पर मी अनुसंधान कर रहे थे ! उस इलोक में उत्प्रेक्षारहार हे सही, परन्तु निरुत्कार को क्यों पसोटटाया गया। यास्क के समय में तो उत्प्रेशका विचार मी नहीं उठा था। मरिनाथ जमे चतुखो प्रतिभावाले टीकाकार के मुप से पालरातिकम दोष (Pallacy of Arkr chronism ) से युक्त वाक्य शोमा नहीं देना । या ये कोई दूसरे ही निरत्तकार इस सप्य को भोर मेरा ध्यान माइष्ट करने के लिए मैं अपनी शिल्या गुरगुलदास (पटना शालेज)मा का हूँ। (६७) विवेचन अत्यन्त प्राथमिक दशा ( Primitive Stage) का द्योता है, उपमामूलक अन्य अलकार भी उपमा के ही अन्तर्गत माने जाते थे। इस विषय पर एक पृथक् गवेषणात्मक निबन्ध (Research Paper) से पावश्यकता है । एक दूसरे पर इस तरह की यस्तु का आरोग्ण दो फार्यों के लिए हो सकता है-निन्दा के लिए या प्रशसा के लिए। निन्दा के लिए 'श्वा' और 'काक' का प्रयोग होता है, प्रशंसा के लिए व्याघ्र और सिंह का। दुर्ग इसकी व्याख्या मे कहते हैं कि सिंहो देवदत्त' ( देवदत्त ही सिंह है ) मे ऐसी कोई बात नहीं कि सिंह ही देवदत्त है, प्रत्युत देवदत में शूरता आदि सिंह ने कतिपय गुण हैं । यह वाक्य उसी अभिप्राय को व्यक्त करता है क्योकि इसमे उपमा 4 वाचकादि विना कहे हुए स्वयमव स्पष्ट है। चचलता होने पर कुत्ता तथा धृष्टता होने पर कार पहते हैं। पाणिनि ने 'उमित व्याघ्रादिभि सामान्याप्रयोगे' में ऐसे ही कुछ दाद गिनाये हैं जैसे-व्याघ, सिंह, क्ष, चन्दन, वराह, हस्तिन् , आदि। स्मरणीय है रि इन पदों को उत्तरपद म रसबर उपमित ( = उपमानोत्तरपद ) धारय समास मनाया जाता है। इसी प्रसग मे यास्क ने भाषाविज्ञान के एक प्रश्नान्दोराति-पर कुछ प्रकाश राला है। कुछ प्राचार्य उस समय भी ध्वनि की अनुभूति से रादमी उत्पत्ति मानते पे । आधुनिक भाषाशास्त्र में प्रो० मैक्समूलर ने इसे प्रस्तावित दिया था। यास्मा पहना है कि पक्षियो का नाम बहुधा इसी प्रकार से परता है । इसके विरु: बोपमन्यव का कहना है कि मानुति ( Onomatopoena) से दो की उत्पत्ति नही होती। ऐमी दशा में पार आदि पदो की प्युराप्ति होगी। इस प्रकार या पुस्पति और मापुतत्ति दोनो पक्षों को स्वीकार करते प्रतीत होते है क्योरि औपमन्यवर सिद्धान्त रे अनुगार बार की निक्ति (Etymology ) भी करते है और दूसरी ओर इसम शम्दानुगति भी मानन है। यह टोर है कि सभी समः इसी प्रकार नहीं बमो, फिर भी प्रापर भापा म रा तरह बनाए राम्द रहते है, इसमे कोई सन्दह नहीं। उदाहरण रिए हम पार, निर, परपर, सपना, लाल, Hiss (er भी पुरवार) मादि पद से मरते है। वस्तुतः या की यह मूग व रामपी है। एप परिस्छ मे ही बादचे पन्द्रह समुदायों माम देवर २९ में समुदाय में वर्तमान शम्द-युग्मों की माझ्या विस्तारपूर्वर की गई तपा प्ररथर सम्म (६८) का नामोल्लेख करते हुए उसका उदाहरण प्रदर्शित है । ये सन्द-युग्म प्राय एक ही अर्थ के हैं। इनमै सर्वनाम, सज्ञा तथा क्रिया भी हैं और वे भी विभिन्न रूपो में। कोई तृतीया बहुवचन मे तो कोई प्रपमा मे; कोई लट् में कोई लोट् मे। फिर भी अर्थ के अनुसार ये बैठाये गये प्रतीत होते हैं । अन्त मे द्यावापृथिवी की महिमा का वर्णन करते हुए अध्याय की समाप्ति की गई है। तृतीय अध्याय के साथ साथ निरुक्त और निघण्टु का नघण्टुक-काण्ड भी समाप्त हो जाता है। , (६९) (घ) चतुर्थ-अध्याय [नगम या ऐकपदिक काण्ड, इसकी विशेषता-जहा, निधा, दमूना, मूप-'कुरतन'-'तित'–भाप्य में उद्धरण- -'शुन्ध्यु' के विभिन्न अर्थ-निपात-जूचित्, नूच-कच्छप-च्यवन और इनका इतिहास-रज और हरः-यम-यमो सवाद-अदिति और सश्वर- वाद-उदात्त और उसका प्रयोग-प्रहेलिका मंत्र--इनकी उत्पत्ति की कल्पना।] निरुक्त वे चतुपं अध्याय से लेबर पष्ठ अध्याय तक को नंगम काण्ड यते है क्योंकि इन अध्यायों मे निघण्टु ये चतुर्थ अध्याय (नंगमा परी व्याम्या हुई है । निघण्टु वे चतुर्थ अध्याय मे स्वतत्र गन्दो का सकलन हुआ है। पहले तीन अध्यायो की भानि पर्यायवाची शब्द उसमे नही । ‘स्यता होने के कारण ही इस ऐक्पदिश (एक-एव पद पृथक् पृथय हो) काण्ड भी कहते हैं । ये पाद ऐमे है कि इनकी बनावट का पता नही रगता। दूसरे इनके पान्दो मे अनेक अर्थ भरे हैं जब विपर्यायशनी सम्दों में एक ही अर्थ ये लिए अनेक वाद होते है। यह विचारणीय है कि इस का? म पारश प्रत्येक नो प्यारया परते है, पहले की तरह पूरे वग रो पल किमी एक पद पा लेबर ही नहीं बढ़ जाते । कारण स्पष्ट है कि यदि यहाँ प्रत्पर गन्द पो ध्यास्या नहीं की गई तो निरुक्त पा एप ही मिद नहीं होगा। पर्यायवाची शब्दावी यास्या पातो वस्तुन प्रश्न ही नहीं उठता क्योकि उना अपं तो स्पष्ट है;et, पुत्ति जान लेनी चाहिए । दूगरी और ऐवपदिक काण्ड के गम न चल दिनत्र हैं, प्रत्युत इन सस्वार (formation ) भी अनवगत या अशान है। ऐगी लागे प्रम पम की व्याख्या मिया दूगरा कोई उपाय नहीं कि हम उनके अर्थ पान गर्ने । ये अपं भी पई है। अन दुर्गाचार्य ने याक पी जी विषय लोक दिया है- वितीयं हि महमानमपि समेतोजवीन् । इप्टं हि विदुषी शेरे ममाग यामधारणम् ।। अनि ऋषि ने, न मा यधिक विस्तार कान दाद गरेर गे भी रहा है क्योंकि समार में विद्वानों का अभीष्ट रहता है कि ममाग एवं राग दोनों शैलियों को अपनावें। दूसरे तीसरे अध्यायो मे यास्क ने समास (सक्षेप) शैली ग्रहण की है क्योकि पर्यायवाची शब्दो के पूरे वर्ग से एक-दो दाब्दो की व्यास्पा ही काफी समझने है। यह सोनाग्य भी उन्ही शब्दो को मिलना है जिनके अर्थ मे या रचना मे कुछ विशेषता रहती है। चतुर्थ अध्याय से यास्क की शैली व्यासप्रधान हो गई है और वे प्रत्येक शब्द की व्याख्या करने लगते हैं। नंगम काण्ड की शैली का परिचय दुग इन शब्दो मे देते हैं- तत्व .पर्यायशब्देन व्युत्पत्तिश्च द्वयोरपि । निगमो निर्णयश्चेति व्याख्येय नगमें पदे ।। अर्थात नगमकाण्ड मे शब्द का उल्लेख, उसका पर्याय, दोनो को व्युत्पत्ति, शब्द का वैदिक उदाहरण, निर्णय-ये ही विषय इप्स काण्ड की व्याख्या म गाते है । स्मरणीय है कि ये हो विषय अन्य काण्डो के भी हैं। इस लक्षण के द्वारा कोई विशेषता नही बतलाई जाती। जहा, निधा आदि शब्दों की व्याख्या यास्क ने एक-एक करके की है। जहा का अभिप्राय है जघान ( मारा), याम्क इस हन् से निष्पन्न द्वित्व किया हुआ लिट् लकार का रूप मानते हैं । यद्यपि हा ( छोडना ) से भी इस शब्द के निष्पन्न होने की सम्भावना है और ऐसे प्रयोग वैदिक-साहित्य मे प्राप्त भी है किन्तु याम्क ने उसे छोड दिया है । यहुत सम्भर है कि यह 'नही' (हा+लिट् प्रथम पुरुष एक वचन-आत औ णल ) का विकल्प रूप हो क्योकि वैदिक भाषा मे बहुधा औकारा त रूप आकारान्त भी मिलते हैं । तुलना करें-प्रियो-प्रिया, शुचौ शुचा। अत जहाँ-जहा वैकल्पिक रूप हो सक्ने हैं । निधा' शब्द तो निघा (नीचे रखना) से बना है जिसमें किसी को आपत्ति नहीं । इसका अर्थ है जाल ( पाशसमुह ) । नेगम काण्ड का चमकता हुआ थादश शिताम' शब्द की व्याख्या मे देखा जा सकता है । यास्क ने अपने थलावे दूसरे-दूसरे आचार्यों के भत भी इसमें दिये हैं । (१) यास्क के अनुसार 'शिताम' का अर्थ है हाप का अगला भाग, (२) शापूणि इसका अय योनि लेते है, (३) तैटीकि इसे यकृत मानते हैं और (४) गालव इसे चर्वी (श्वेतमास ) मानते हैं। दुर्ग का कहना है कि पशु के बाहरी और भीतरी दो अवदान (आ) हैं. नितम्य (ोणी), और मकन्य. सादि बाहरी अग हैं जब वि जोमा हृदय, यकृत (जिगर) आदि भीतरी अंग हैं। यास्क के द्वारा दिये गये उद्धरण मे योगी - (७१) अन्त मे और पाश्वं दोनो बाहरी अग हैं अत यह सिद्ध है कि शिताम वा अयं कोई बाहरी लग ही होगा जसे हाथ का अगला भाग । इस तरह दुगं ने यास का पक्ष लिया। अब शाकपूणि वे अर्थ ( योनि ) का समाधान घरते हैं । 'पाश्वतः श्रोणित शितामत' में एक के बाद दूमरे 8 वा वर्णन किया जा रहा है । श्रोणो वे बाद का प्रदेश गुद प्रदेश है जिसे शिताम या योनि बहा गया है । सिताम का अर्थ योनि लेने पर 'शिताम' की व्युत्पत्ति विप् (व्यात करना) से करते हैं ( जो पुरोष से व्याप्त हो, जिसका मास शिथिल हो) विन्तु विपित को शुद्ध व्युत्पत्ति वि./सो ( खुला होना ) से मानना ठीक है। दुर्गाचार्य को स्वीकार करना पडता है कि 'शिताम' की रचना कठिन है तथा इसका अर्थ भी अनिश्चित है। उन्होंने अनवगति के दस प्रभार भी बतलाये हैं जिनके नाम मूलप्रन्थ मे देखे जा सरते है। जैसे 'शिवाम' ये अर्थ को जानना कठिन है वैसे ही वेद में कई दशब्द है जिनके विभाग को, स्वर को, या क्रम आदि को जानना कठिन है । 'मेहना' ऐसा ही शब्द है जिसके विभाग के विषय में सदेह है। या तो यह मह (पूजा करना ) से बना है या मे ( मुझे ) ह (यहाँ) ना (मही)- इन तीन पृषक पदों का सयोग है। इस वर्ग वा पांच पद है 'दमूनाः'। इसके कई अर्थ सम्भव है-दपाबुद्धि वाला, दान की प्रवृत्ति वाला, सयम रखने वाला । ये सभी अर्थ या तो दम् या दा से आते हैं, किन्तु याक फा दूसरा भी विकल्प है-'दमस्' - घर, अत दमूना - घर मे प्रवृत्त । घर के अर्थ में 'दमस्' का प्रयोग वैदिक साहित्य में तो है ही ( तुल० वर्धमान स्वे दमे-ऋ० ११॥६), साथ ही साथ अन्य भारोपीय भाषाओ में भी इसका प्रयोग है जैसे-लटिन Domus लंगरेजी Domestic यहाँ यह ध्यान रखना है कि यूरोपीय भाषाओ पा हस्व अ, ए. सो मारत ईरानी वर्ग में 'अ' हो जाते है अत दोमस से दमस होता है । मूष' शब्द मुप् ( चुराना ) से बनता है क्योकि चूहे अन्न चुरा लेते है । इसीसे सस्कृत मे भूपिक यना है । मूप बहुत प्राचीन शब्द है क्योकि इसके समानान्तर द भारोपीय-परिवार में प्राय सर्वत्र मिलते है। देखिये-ग्रीक Mys, लैटिन Mus (मूम), जर्मन Maus, ऐं. सं. Mus, वह्रवचन मे Mys, अंगरेजी Mouse, बहु • Mice मूप का १Cf. Dr Batakrishna Ghosh, Ling. Intro. to Skt. chap II २ Chamber's Compact Dictionary, 1934 p 410. (७२) प्रयोग दिखलाने वाली ऋचा पक्ति छन्द मे है जिसमे एक अनूठी घटना का वर्णन है । त्रित नाम के कोई ऋषि किसी कुएँ मे गिर पडे। दोनो ओर की इंटो के गिरने से वे कट पाने लगे। जैसे अपनी सपत्नियो को देखकर कोई स्त्री अपने पति को तंग करती है उसी प्रकार ये ऋपि भी दुःख पाने लगे, पोडा इन्हें चारो ओर से खाने लगी मानो चूहे तेल, घी आदि मे लिपटी हुई अपनी पूंछ को खाते हैं । पहले ऋषि ने इन्द्र को पुकारा, पर कोई उत्तर न मिलने पर द्यावापृथिवी को कहने लगे कि तुम्ही लोग साक्षी हो, मेरी दशा पर ध्यान दो। 'कुरुतन' में यास्क 'न' प्रत्यय को स्वार्थ (निरर्थक) मे मानते हैं, वेद में वस्तुत. लोट् मध्यमपुरुष बहुवचन मे त, तन, पन ये तीन प्रत्यय लगते हैं । 'तितउ' चलनी को या छन्ने ( Filter ) को कहते हैं। यास्क के समय मे चमड़े से ढंकी हुई, तिल के समान छोटे-छोटे छेदो वाली चलनी का प्रयोग था । इसके प्रयोग के लिए दी गई ऋचा ऋग्वेद के विद्या-सूक्त मे है (२०७१ ) । इसका अर्थ है कि जैसे सत्तू को चलनी पवित्र करती है, समस्त विकारो को दूर कर देती है उसी प्रकार विद्वान् लोग अपनी वाणी को मन से पवित्र करने के वाद व्यवहार मे लाते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि दाणो की कर्कशता, निन्दाप्रियता आदि मन के द्वारा दूर कर दी जाती है जब कि उन दोषो के परिणाम पर विचार किया जाता है। एक शास्त्र पढने वाले लोग परस्पर समान तन्त्र की मित्रता को पहचानते हैं। उनमे पारस्परिक ज्ञान-प्रकर्ष की जानकारी रहती है। ऐसा होने पर ही वे लोग मन में सोच-विचार कर भाषा का प्रयोग करते हैं जिससे उनकी वाणी शोभावतो बन जाती है । पतञ्जलि ने महाभाष्य के प्रारम्भ मे ही व्याकरण- मास्त्र (शब्दानुशासन ) के आनुपगिक प्रयोजनों का विवरण करते समय उद्धरण दिया है और इसके द्वारा व्याकरण पढ़ने का फल दिखलाया है । अपनी स्वामाविक गति में यास्क लोघ (लोमी), शीर (अग्नि ) आदि पाब्दों की व्यास्या करते हुए 'अनसत' शब्द के प्रयोग दिखलाने के लिए एक ऋचा का उद्धरण देते हैं जिसमे 'शुन्ध्यु' आता है। शुन्ध्यु' के वई अपं हैं- (१) आदित्य, (२) पक्षी, (३) जल । इन सभी अर्थों मे/शुध् का ही प्रयोग है । अनसत् का अभिप्राय 'अग्न बाँटने वाली माता' है जो प्रातः काल में ऊपा की तरह ही अपने पुत्रों को जगाती है। प्रथम अध्याय मे ही निपातो का स्थान दिखलाया जा चुका है। इनके (७३) १ जिनके अर्थ 'पुराना और नया' हैं। भाषा-विज्ञान की दृष्टि से 'नु' 'नू' तया 'न', 'नवीन', 'नूनन' आदि शब्दो की सत्ति एक ही है तथा इनके समाना- स्तर रूप यूरोपीय भाषाओं में भी मिलते है। देखिये-ग्रीक Nya, लेटिन Nunc. ऐ० सं० Nu तथा संस्कृत में 'नूनम्' । 'नव' के लिए ग्रीक Neos, सैटिन Novus, ऍ० सं० Niwe, neowe अंगरेजी Now, new. इसके बाद 'दावने' और 'अपार' राब्दो की व्यास्या हुई है। निघाष्ट्र मे इसका यही कम है किन्तु निरुक्त के वैदिक उद्धरण मे उनका क्रम उलट दिया गया है. पहले 'अपार', तब 'दावने' । इस पर दुर्गाचार्य कहते हैं कि निघण्टु और निरुक्त विभिन्न व्यक्तियो की रचना है क्योकि यदि दोनो एक ही की कृति होती तो अपने ही क्रम का उल्लपन मास्क को करते ? पह हमारे द्वितीय-परिच्छेद मे प्रतिपादित विषय का पोपण है । अस्तु कगार के कई अर्थ हैं । म्ल अर्थ तो 'असीम' है किन्तु दूसरे भी अथं हैं जैसे---आदित्य, समुद्र, कच्छप ( कछुआ)। 'कच्छप' को यास्क तीन भागो मे बांटते हैं क (ख)–छ (छद)-प/पा)। किन्तु भापा-विज्ञान की दृष्टि से यह गलत है क्योकि यह वश्वप7 कश17 कच्छप होकर बना है, कम से इसका कोई सम्बन्ध नहीं। सस्कृत-भाषा में तालव्य यों की उत्पत्ति ( Palatalisation ) बहुत बाद मे हुई है। श् का छ से घना सम्बन्ध है क्योकि पर सामान्यत च्छ बन जाता है । अत छ् या च की उत्पत्ति मे ए (मूलतः स्) का बडा हाथ है। च्यवन ( च्यवान ) एक वैदिक अपि पे जिन्हे वृद्ध होने पर अश्विनीकुमारी ने पुन युवक बना दिया था। इसी समेत को लेकर पुराणो मे च्यवन की कथायें गढी गयी । बाणभट्ट ने हपंचरित में भी च्यवन का पूर्वपुरप के रूप में वर्णन किया है। लोकोक्ति एव इम समेत के आधार पर ध्यग्न का माधम लोग गया जिले के देवकुण्ड (देवकुल ? --अपभ्रश -- देकुर ) में मानते हैं । बाणभट्ट भी इसी के पास पोरू-बनतारा (प्रोनिकट ) के निवासी धे-ऐसा २. वही, पृ० ४२०, ४२५ । २. तेन शायतेऽन्येरेवायभृतिभिः समाम्नायः समाम्नानः, अन्य एव चायं माश्यकार इति । एको दि समाम्नान माग्य च कुनि प्रयोजनस्यामावादेक मन्त्रगतयोः पारानुक्रम नाभन्श्यता ३. देखिए-Butakrishna Ghosh, वही पृ०७४ (५४), कुछ लोग कहते हैं । यदि च्यवन वैदिक ऋषि थे तो कोकट (?) देश में कैसे आये । फिर भी वायुपुराण में कहा गया है- कोकटेषु गया पुण्या नदी पुष्पा पुन:पुना । च्यवनस्याथम पुण्य पुष्यं राजगृहं वनम् ॥ रजः और हर. ये दो नपुसक शब्द हैं तथा विभिन्न अर्थों में प्रयुक्त होने हैं जैसे-ज्योति, जल, लोक, रक्त तथा दिन किन्तु इन बयो को ज्ञापकता के विषय मे कोई व्युत्पत्ति नहीं दी है। इसी प्रकार अन्य पदो की व्याख्या के बाद यास्क 'विपुण' को व्याख्या करते हुए 'शिश्नदेवाः' शब्द का प्रयोग करते हैं जो लिंगपूजा की ओर सकेत है। फिर भी यास्क और दुगं यह नहीं स्पष्ट करते कि लिंगपूजा होती थी। इसका प्रधान अर्थ है जो ब्रह्मचारी नहीं, इन्द्रिय-सुख ही जिनका प्रधान लक्ष्य है। शिश्नदेव का अर्थ फिर भी यास्क को मालूम नहीं था। यूरोप में भी बहुत दिनो तक लोग लिंग की पूजा करते थे ( १८ वी सदी के मध्यतक) । समस्त विश्व मे ( विशेषतया आयरलैंड में ) लिंगपूजा के अवशेप प्राप्त हैं । आर्यों ने भारत के द्रविडो से लिङ्गमूजा सीखी। कुछ लोगो का कहना है कि मेपोल नृत्य तथा ईसा का क्रॉस भी लिङ्गपूजा के ही अवशेप है।' 'जामि' शब्द के प्रयोग को दिखलाने के लिए यास्क ऋग्वेद के प्रसिद्ध यम-यमी सवाद-सूक्त से एक ऋचा का उद्धरण देते हैं। इस सूक्त मे यम उदात्त चरित्रवाला पुरुष है जब कि उमी कुल की यमी उसे अपने प्रलोमनो में फंसाना चाहती है। यम अपने चरित्रबल का परिचय देते हुए उससे किसी अन्य को पति बनाने को कहता है। अगले युग मे ऐसी सम्भावना है कि भाई-बहन विवाह कर लें या एक कुल के मनुष्यो में ही विवाह हो पर वैदिक समाज-व्यवस्था ऐसी नहीं कि लोग समान गोग के साथ विवाह करें। इस सूक्त में कुछ मन्त्र यम के बोले हुए हैं, कुछ यमी के । इसी प्रकार ऋग्वेद मे और भी कई सवाद-सूक्त हैं जैसे-पुरूरवा-उवंशी संवाद (१०८५) और सरमा-पणि सवाद (१०।१३०)। इन सवाद-सूक्तों को डा० बोल्डनवर्ग 'आख्यान' के नाम से पुकारते हैं जपकि सिल्वा लेवी, श्रोदर, टंल यादि विद्वानो की दृष्टि मे ये वस्तुतः नाटक के ही बचे-खुचे रूप हैं । इनका प्रयोग यज्ञो में होता था। डा० विन्तरनित्स इन्हें लोकगीत काव्य (ballad) का १. देखिये-Encyclopaedia of Religion and Ethics, under Phallism २. द्रष्टव्य-५० बलदेव उपाध्याय, सरकत साहित्य का इतिहास (पचम सस्करण) पृ०३१४-१५।
नमूना मानते हैं। ये कुछ तो कयात्मक हैं तथा कुछ रूपकात्मक, अतः इनसे ही एक और महाकाव्य बने दूसरी ओर रूपक ।' इसके बाद चतुर्य-पाद मे अदिति को संसार मात्र ही कहा गया है। भूतकाल की समस्त वस्तुएं भी अदिति हैं तथा उत्पन्न होने वाली वस्तुएं भी। यह मन्त्र वैदिक सवेश्वरवाद का आदर्श उपस्थित करता है। पूरा विश्व ईश्वरमय है। भारत की ननिकता का मूल ही सर्वेश्वरवाद है। सभी जीवों मे, पेड़-पौधो में, पदार्थों मे अदिति का निवास मानने से ही अहिंसा की भावना पानी है, अपनी अनिवार्य आवश्यकताओं से संतुष्ट होकर किसी पदार्थ का अनावश्यक उपयोग बन्द कर देने से अपरिग्रह-भावना पाती है। इस प्रकार वैदिक ऋपियो ने ईश्वरमय जगत देखने की चेष्टा की थी। यह भावना कदाचित इसलिए हुई हो कि सभी पदार्थों (जैसे अग्नि, वायु, पत्थर, छुरा ) में अलग-अलग देवत्व की कल्पना की गई थी--सों का सकलन करने पर यह विचार उठा होगा। उदात्त और मनुदात्त के विषय मे यास्क के निरीक्षण ( observations) बड़े काम के हैं। वे कहते हे-तोत्रार्थतरमुदात्तम् , अल्पीयोऽर्थतरमनु दात्तम् । अभिप्राय यह है कि अधिक बल देने पर उदात होता है, कम चल देने पर अनुदात। वास्तव में इन दोनो स्वरो का यही रहस्य है। यह स्मरणीय है कि भाषा के प्रवाह मे बहुत-से शन्दो मे स्वर परिवर्तन (Accent-shifting) होना रहता है । इसके पर्याप्त उदाहरण हमें अंग्रेजी भाषा के इतिहास पे प्राप्त होते हैं । मध्यकाल रो भाधुनिक काल मे ही नही, गत १०० वर्ष पूर्व जो वलापाव-नियम (Accentuation) या वह आज नही है। किन्तु इसके मूल मे यही धारणा काम कर रही है कि महत्त्वपूर्ण होने पर किसी पर बलाघात दें, अन्यथा नहीं। यही कारण है कि अग्रेजी कविता मे बहुधा ऐसे वर्णों ( Syllables ) पर बलापात पडता ह जिसपर गद्य मे नहीं होता तथा कभी मुख्य शब्द भी कवि की इच्छा न होने से बलाघात नहीं ले पाते । निष्कर्ष यह है कि महत्त्वपूर्णता और उदात्त मे अधिक सम्बन्ध है। वेद में भी वाश्यादि की क्रिया मे उदात्त पहता है, बीच में नही। यह ध्यान में रखना चाहिये कि वाक्य के आदि में किया हम तभी रखो जब उसे महत्वपूर्ण सिद्ध करना लक्ष्य होगा। १. History of Indian Literature, Vol. pp. 103-103. २. देखिये-पा० २०८११२८ तिवतिकः ।
अन्त मे एक प्रहेलिका मत्र का विवेचन है जिसमे सख्या के आधार पर सूर्य और सदसर का वर्णन किया गया है-एक पहिये वाले रथ को (= सूर्य को) सात ( किरणें ) जोतती हैं या ले चलती हैं। सात नामोवाला घोडा इसे खींचता है। यह घोडा सूर्य ही है। सम्भव है पूरे भूमंडल को खींचने वाले सूर्य का अर्थ हो । उत्तराधं मे सवत्सर का वर्णन है । उस चक्र में तीन नाभि या ऋतुयें हैं, वह चक्र अजर-अमर तथा अप्रतिहत है जिसमें समस्त ससार निवास करते हैं । अत विश्व को पहेली के रूप में देखना और वर्णन करना वैदिक-युग मे भली-भांति बारम्भ हो गया था। इसके अन्य उदाहरण हैं जैसे-'चत्वारि शृङ्गा प्रयो अस्य पादा., तथा 'अष्टौ व्यख्यत् ककुम' आदि। यही नही, रूपक बांधकर भी वर्णन किये गये हैं जैसे पुरुषसूक्त मे ग्रीष्म को इन्धन तथा शरद् को हवि मानना। इन पहेलियो की विषयवस्तु तथा इनके विकास का अध्ययन मनोरञ्जक अनुसन्धान होगा। अमीर खुसरो सम्भवत हिन्दी का प्रथम पहेलीकार था। साराश यह है कि वेदों से ही भारत के सारे विषय आरम्भ होते हैं। भारतीय लोग इन्हे अपोस्पेय इसलिए मानते आये हैं कि कोई भी ज्ञान वेदो से बढकर या भिन्न नही हो सकता । कुछ भी पढ़ना हो, वेदो को उलटना ही पडेगा- यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत क्वचित् । - (ङ) सप्तम-अध्याय [सप्तम-अध्याय-देवता-विज्ञान-चाओं के भेद-विषय-- मन्त्र में देवता की पहचान-देवताओं के तीन भाग--विभाजन को अन्य रोतियाँ-देवताओ से सम्बद्ध वस्तुएँ-एफदेवपाद-पहुदेववाद-- सर्वेश्वरवाद-कैथेनोथिज्म-स्वरूप-विचार-मानवीकरण उसकी विशे- 'पनायें-अग्नि, जातवेदस् , वैश्वानर-प्रारम्भिक-विज्ञान !] प्रयम-अध्याय यदि निरुक्त साहित्य की भूमिका है तो साम-अध्याय वैदिक-वाड्मय के देवता-विज्ञान ( Theology ) की भूमिरा है । देवता की व्याख्या के पूर्व याम्फ देवताओ और मन्त्रो ने सम्बन्ध मे बहुत सुन्दर और प्रामाणिक ज्ञान देते हैं। प्रत्येक मन्त्र का कोई-न-कोई देवता होता है । जव किमी मन्त्र में कई देवताओ के नाम आयें तो उसमे जिसकी प्रधानता हो उसे ही मन्त्र-देवता मानते है । ऋग्वेद की सारी ऋचाओ को यारक तीन भागो मे बांटते हैं---- (१) परोक्षकृत ऋचायें वे हैं जिनमे अन्यपुरुष का प्रयोग हो, (२) प्रत्यक्षरून ऋचाओ में मध्यमपुरुप का तथा ( ३ ) आध्यात्मिक ऋचायो में उत्तमपुरुप का प्रयोग होता है अर्थात् देवता स्वय बोलते हैं। ऋचाओ पा यह वर्गीकरण अस्पन्त वैज्ञानिक है और पुरुषवाचक सर्वनाम ( Personal Pronoun ) के आधार पर किया गया है। ऋचाओ में वर्णित विषयो ( Subject-matter ) के सम्बन्ध में यास्क ने एक लम्बी सूची दी है--स्तुति, कामना, शपथ और अभिशाप, अवस्पा. विशेष, निन्दा और प्रसंसा आदि का वर्णन ऋचाओ के विषय है। सायण ने भी अपनी ऋग्वेद-भाष्य-भूमिका मे मन्त्रो के लक्षण करते समय उनके पदार्थों की गणना कराई है, जैसे-अनुष्ठान का स्मरण करानेवाले, स्तुतिवाले, अन्त मे 'वा' वाले ( स्वान्ता ); आमन्त्रण युक्त, प्रेरक, विचार करनेवाल, -परिदेवना ( शिकायत ) करनेवाले, प्रश्नार्यक, उत्तरवाचक आदि। इन पदापों का अन्त नही, इसलिए वे कहते हैं- प्रापयोऽपि पदार्थाना नान्त यान्ति पृथक्त्वशः। लक्षणेन तु सिद्धानामन्त यान्ति विपश्चितः ।।
. अर्थात् यदि पदार्थों का अलग-अलग वर्णन किया जाय, तो अन्त हो हो. नही सकता; बुद्धिमानो को चाहिये कि लक्षण से ही इनका बोध करें। गास्क भी इन पदार्थों के विषय मे आनन्त्य का ही संकेत करत हैं-'एवम् उच्चावचं. अभिप्राय: ऋषीणा मन्त्रदृष्टयो भवन्ति' (नि० ७.३)। किसी मन्त्र मे देवतायो को पहचानने के लिए यारक ने उपाय बतलाया है कि जब मन्त्र मे देवताओं का उल्लेख नहीं है तब उस मन्त्र को जिस देवता के यज्ञ या यज्ञ के भाग में प्रयुक्त करें उसी देवता से सम्बद्ध मानें । यदि यज्ञ का प्रसग न हो तो ऐमे सरक्षक-विहीन ( लावारिस ) मन्त्रो को प्रजापति-देवता का ( याज्ञिको के अनुसार ) या नराशंस वा (निरुक्तकारो के सम्प्रदाय के अनुसार ) समझें। नहीं तो अपने इष्ट देवता या देवतामो के समूह को ही ऐमे मन्त्रो का देवता समझें। यह भी जान लेना चाहिये कि अदेवता की स्तुति भी देवता के समान होती है इसलिए ऐसे मन्त्र तपापित प-देवताओ वे भी हो सरते हैं। मास्क ने देवताओ के तीन माग किये हैं--पृथ्वी के देवता भग्नि, अन्तरिक्ष के वायु या इन्द्र, स्वर्ग के सूर्य । यह विभाजन ऋग्वेद के एक मन्त्र ( १।१३९।११) पर आधारित है। इस प्रकार ये तीन ही प्रधान देवता हैं । यास्य का यह अभिप्राय नहीं कि और सभी देवता इन तीनों के ही विभिन्न-रूप हैं, किन्तु एक स्थान में रहनेवाले सभी देवताओ के रूप में साम्य रहता है । इस पर यास्क पूर्वपक्ष और उत्तरपक्ष लेकर विवाद करते है भौर निष्कर्ष निकालते हैं कि ये मनुष्यो के राज्य के समान हैं जहाँ राजा की प्रधानता होती है। उसी प्रकार जैसे पृथ्वी के बहुत-से देवताओ में अग्नि की प्रधानता है । इसका कोई विशेष अभिप्राय नहीं । प्रो० मैक्डोनल ने देवताओ के विभाजन के कुछ अन्य सिद्धान्तों का भी निर्देश किया है--ऐतिहासिक-वर्गीकरण जिसमे भारत-यूरोपीय सम्यता से लेकर वैदिक-युग तक के देवताओ के विकास के अनुसार काल-क्रम से १. तुलनीय-महाभाष्य (पम्पशाहिक ), उत्सर्ग और भपवाद पी रक्षण की भावश्यकता तथा प्रतिपदपाठ की कठिनाई। २.ये देवासो दिव्येवादश स्थ पृथिव्यामध्येकादश स्थ। अप्मुक्षितो महिनवादश स्थ ते देवा यामिम जुषध्वम् ।। अर्थात हे देवगण ! अपनी महिमा से आप स्वर्ग में ग्यारह है, पृथ्वी में भी ग्यारह है, अन्तरिम में रहनेवाले मो आप ग्यारह है, वे देवता इस यश की सेवा करें (भानन्द )। 8. Vedic Afythology, Strassburg, 1897, p. 18-19. (८०) . विभाजन किया जा सकता है। देवताओ की पारस्परिक-महत्ता के आधार पर भी उनका वर्गीकरण सम्भव है; अथवा जिस प्राकृतिक-आधार का दे प्रतिनिधित्व करते है उस नियम से भी वे विभक्त किये जा सकते है। इस अन्तिम वर्गीकरण को ही वे सबसे उत्तम समझते है तथा इसी का अवलम्बन उन्होने स्वय भी किया है। यास्क ने देवताओ के तीन भाग करके उनके विषय सम्बद्ध वस्तुओ के नाम भी गिना दिये है । ये वस्तुएँ केवल विशिष्ट देवता से ही सम्बन्ध नहीं रखती, प्रत्युत उप्त स्थान में रहनेवाले हरेक देवता के नाम मे भी वे ही वस्तुएं प्रयुक्त होती है । जैसे स्वर्ग मे रहनेवाले सूर्य के विषय की चीजें ही विष्णु के नाम मे भी दी जाती है क्योकि ये भी उसी स्थान के निवाप्ती है। केवल इतना ही नहीं, भिन्न भिन्न स्थानों में रहनेवाले देवताओ की चीजें भी परस्पर व्यवहृत होती है । अग्नि के विशेषण सूर्य, इन्द्र आदि मे भी लगाये १. प्रो मैकडोनल ने अपना पुस्तक 'पैदिक मिथॉलजी' में (पृ० १५-१३८ तक) देवताओं के सम्बन्ध में विस्तृत विचार किया है तथा उनका वर्गीकरण करके प्रत्येक विशेषता का वर्णन किया है । जिन देवताओं का वे वर्णन करते हैं वे हैं- (क) स्वर्ग के देवता-चो, वरुण, मित्र, सूर्य, सवित, पूषन् , विष्णु, विवस्वत , मादित्यगण, उपसू, अश्विन युगल । (ख) अन्तरिक्ष के देवता-इन्द, त्रित आप्त्य, अपानपात, मातरिश्चन् , अहिर्बुध्न्य, अज एकपाद, रुद्र, मरुद्गण, पर्जन्य आप । (ग) पृथ्वी के देवता-नदियाँ (सरस्वतो), पृथिवी, अग्नि, सोम । (प) भावात्मक (Abstract) देवता-सवित, धातु, त्वष्ट, धर्ट, विश्वकर्मा, प्रजापति, मन्यु, श्रद्धा, अदिति, दिति । (2) देवियों-उपस् , था, पुरन्धिः, धिषणा, इला, सररवनी, राका, पुदिन, इन्द्रागी, वरुणानी, अग्नायो, सूर्या, देवपलियाँ । (च) युग्म देवता-मित्रावरुणा, इन्द्रावरुणा धावापृथिवी (रोदसी), इन्द्रबायु, इन्द्रासी, इन्द्रायहरपति, दानिशु, रन्दापूषणा, सोगारुद्रा, अशापोगा। (छ) देवताओं के समूह-मरुद्रण (२१ या १८० द्रगण (सरया अनिश्चित आदित्यगण (७ या ८), विश्वे देवा. । (ज) छोटे देवता-ऋभुगग, अप्सरागण, गन्धर्वगण । (झ) रश करने वाले (rutelary) देवता-दास्तो पति, क्षेत्रस्य पति, उर्वरापति । इन देवताओं के विषय में अधिक जानने के लिए उपयुक्त पुस्तक देसना आवश्यक है। देवता विधान ( Theologs) का इसके समान मन्दर यौन दुर्लभ है। (१) ६हि०नि० भू० जाते है । यह देवताओ की परस्पर-समता पा धोता है और एकदैववाद की और सकेत करता है। एक्देववाद ( Monotheism ) और यहुदेववाद ( Polytheism) का विचार भी यास्क ने समुचित-रूप से किया है। वे कहते है-'महाभा- ग्यात देवताया. एक: आत्मा बहुधा स्तूयते ( नि०७४)।' यहाँ आत्मा का अर्थ है शरीर, क्योकि ये आगे चलकर बतलाते है कि दूसरे देवता इसी आरमा के विभिन्न यग है । सम्भव है कि पृथक्-पृथक कर्म करने के कारण ये नाम देवताओ के पडे हो क्योकि ऋग्वेद के प्रारम्भिव-भाग में प्रकृति के विभिन्न विभागो को सरक्षणता एक-एक देवता मे बांटी मालूम होती है। इससे कुछ विद्वान् इन स्थानो की तुलना यूनानदेश के प्राचीन प्रकृतिवाद ( Hellenism) से करते है। किन्तु यह कहना भ्रम है क्योंकि ऋग्वेद के वाक्य ही इसका खण्डन करते हैं जैसे--'एक सद् विप्रा बहुधा वदन्ति' (१।१६४।४६)। एक ही सत्त्व के विविध रूपो की स्तुति करने से हम उसे बहुदेववाद नहीं कह सकते । ईश्वर की एकता का सिद्धान्त जो आगे चलकर उपनिषदो के द्वारा शङ्कराचार्य के अद्वैत वेदान्त मे पुष्पित और फलित हुआ, निश्चित रूप से ऋग्वेद के अन्तिम अशो में ही मारोपिन हो चुका था। सर्वेश्वरवाद ( Pantheism ) के उदाहरण भी हम ऋग्वेद में पाते हैं, जैसे- अदितिद्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्र । विश्वेदेवा बदिति पञ्च जना अदितिर्जातमदितिजनित्वम् ।। (११८९१०) अर्गात अदिति स्वर्ग है, अदिति अन्तरिक्ष है, अदिति भाता है, वही पिता है, वही पुत्र है । सभी देवता और पञ्च-निवासी जन भी अदिति हैं, सभी उत्पन्न वस्तुएँ भी अदिति हैं, होनेवाली (भविष्य की) वस्तुएं भी अदिति ही है । इस ऋचा मे सम्पूर्ण संसार को हो अदिति के रूप में दिखलाया गया है । फिर हिरण्यगर्भ-मूक्त मे भी- प्रजापते ! न वदेतान्यायो विश्वा जातानि परि ता बभूव । यत्कामास्ते जुहमस्तन्नो वास्तु दय स्याम पतयो रयीणाम् ॥ (१०॥१२११०) (८२) अर्थात हे प्रजारते ! आपसे दूसरा कोई, सम्पूर्ण जीव के हार नहीं हुआ है। जो लिये कामना बुला रहे, वह होवे हम सभी लोग घन के स्वामी बन जावें।। इन उद्धरणों में ईश्वर को विश्वमय देखने को चेरा हुई है । देवतामो के सम्बन्ध मे प्रो• मैक्समूलर ( Max-Muller) का कहना है कि प्रत्येक स्थान पर किसी विशिष्ट देवता को ही प्रधान माना गया है, इस प्रकार सभी देवता अपने-अपने स्थान पर अन्य सभी देवताओ से ऊपर दिखाये गये है। इस विचित्र-मत को दे हिनोथिम या कथेनोथिज्म' कहते हैं। किन्तु इस मत की प्रखर आलोचना हिटने ( Whitney ) तथा हॉपकिन्स ( Hopkins) ने की है। वे कहते हैं कि देवताओं का वर्णन अन्य देवताओ से स्वतन्त्र और पृथक्, होकर नहीं हुआ है। बड़े बलवान् देवता भी पराधीन है --वरुण और सूर्य इन्द्र के अधीन हैं ( १११०११३); वरुण और अश्विन भी विष्णु के समक्ष विनत है { २११५६२४ वरुण, अयेमा और आदित्य भी सक्ति के आदेश का उल्लंघन नहीं कर सकते (२१३८९) ।दो देवनानो या कई देवताओं की स्तुति भी एक साथ होती है। इसलिए हिनोयिज्म केवल देखने मे ही लगता है, वस्तुत: ऐसी कोई बात नहीं । तथापि देवताओं के एकीकरण की ओर जानेवाली ऋग्वेदकालिक- प्रवृत्ति का निर्देश करने में यह पूर्ण सफल है । इस प्रकार यह निष्कर्ष निकलता है कि देवता के समूह वा वर्णन होने पर भी एक्त्व की ओर माद को धारा बह चली है। इस प्रकार की धारा को मैकडोनल बहुदेववादात्मक एकदेववाद ( Polytheistic Monoth. cism) कहते हैं । इसका अभिप्राय यह है कि पहले-पहल तो ऋग्वेद में अनेक देवताओ की मान्यता है किन्तु निष्कर्षत: एक ही देवता मानने की प्रवृत्ति आ गई चाहे वह पुरुष हो, प्रजापति या बाक् । इसके बाद देवताओं के स्वरूप का विचार होता है । कुछ लोग कहवे हैं कि ये मनुष्य के बागार के है क्योकि (१) इनके सम्बोधन चेतन-जीवो के समान हैं. (२) मनुष्यो के ही समान इनके अंग हैं, (३) उन्ही की वस्तुएँ १. Henotheism, Kathenotheism-The beliet in individual goda alternately regarded as the highest'. 3. Becotheisa is an sppearance not reality. (३) . भी ये प्रयोग मे लाते हैं और ( ४ ) मनुष्यो के कर्म भी इन देवताओ के हैं। इसके उत्तर मे यास्क कहते हैं कि ये सभी बातें तो अचेतन वस्तुओ के साथ भी पाई जाती हैं, केवल इनके आधार पर हम उन्हे मानवाकार नहीं मान सकते। फिर भी वे भीतर से सन्तुष्ट नहीं है क्योकि वे यह भी कहते है- 'अपि वा, उभयविधा स्यु.। आधुनिक-विद्वानो ने वैदिक-साहित्य का गम्भीर अनुशीलन करके इस विषय में कई निष्कर्ष निकाले हैं। देवताओ के मानवीकरण के विविध-रूप हमे वेदो मे प्राप्त होते हैं । जब प्राकृतिक-वस्तुओ के नाम पर ही वैदिर- देवताओ का नाम पडता है तब हम समझते हैं कि मानवीकरण अभी प्रकृतावस्था ( Primitive Stage ) में ही है जैसे-द्यो, पृथिवी, सूर्य, उपस् । इन देवताओ के वर्णन मे दो चीजें हैं-प्रकृति का उपादान और उनका शासन करनेवाला व्यक्ति । विन्तु जब दवताओ का नाम प्राकृतिक उपादानो के नाम से विच्छिन्न हो जाता है तब उच्चतर मानवीकरण की रूपरेखा हमे मिलती है । मरुद्गण का नाम वायु से अलग हो गया यद्यपि वैदिक ऋपि इनके सम्बन्ध से परिचित हैं। इस प्रकार के मानवीकरण की सत्ता मे हम कभी अविश्वास नहीं कर सकते । अब हमे देखना है कि इस वैदिक-मानवीकरण की क्या विशेषताएँ हैं। प्रो० मैकडोनल ने मानवीकरण को केवल छायात्मक ( Shadowy ) माना है क्योकि प्रकृति के कार्यों का ही आलवारिक-चित्रण किया गया है। देवताओ पर सिर, मुंह, आकृति, कपोल, आँख, केश, कधे, छाती, पेट, बाह, हाथ पैर आदि का आरोपण हुआ है। विशेषतया इन्द्र और मरुन्-जैसे युद्धप्रिय देवताओ के सिर, छाती और वाहु का वर्णन हुआ है। सूर्य की किरणें ही उनके बाहु हैं, अग्नि पी जीभ उनकी ज्वालायें हैं । कुछ देवताओ (जैसे उपस् ) के वस्त्र का भी वर्णन होना है। शस्त्र के विषय में इन्द्र वर्ष धारण करते हैं, और दूसरे देवता धनुप दाण। इनके चमकीले रथ भी हैं, सभी देवताओ के रथ तो घोडे खीचते हैं लेकिन पूपन् बकरो से ही काम चलाते हैं जिसवे बस्ते उन्हे 'अजाव' (बकरों से घोडे का पाम लेनेवाला) कहते हैं। देवताओ मे दया और क्रोध भी है जैसे कद मे । वृत्र को मारने मे { afas ---Blacdonell, Vedic Mythology ard A B Kieth, Rebgion and Philosophy of the Veda २ Vedic Mytholoss, p. 17. (८४) इन्द्र की शक्ति देखने लायक है। यज्ञ करनेवालों को देवता सहायता प्रदान करते हैं किन्तु कृपणो को दण्ड भी देते हैं। इनमे नैतिकता भी उच्चकोटि को है क्योकि सभी देवता अपने नियम के पक्के हैं, कभी धोखा नहीं देते । यह कहना अयुक्त नहीं है कि ये नैतिकता के सरक्षक (Guard of morality) हैं। पापो और अपराधो के साथ वरुण के क्रोध का पानुपातिक सम्बन्ध है । इन देवताओ को शक्ति और महिमा तो प्रसिद्ध ही है। इस प्रकार देवताओ के मानवीकरण का उपसंहार हम मैकडोनल के चाक्य से ही करें'--'वेद के सच्चे देवता उत्कृष्ट मनुष्य ही हैं जिन्हें मनुष्य को प्रवृत्तियां और वासनायें प्रेरित करती हैं, मनुष्य के समान जन्म लेकर भी ये अमर हैं।' अतएव वैदिक देवताओ को अतिमानव ( Superman) कहना असगत नहीं है। उपर्युक्त तीनो देवताओं से सम्बद्ध वस्तुओं को गणना कराने के प्रसङ्ग मे यास्क ने कुछ मुख्य शब्दो का निर्वचन किया है जैसे-मन्त्र, छन्द, ऋक् आदि। छन्दो पर कुछ विस्तार-पूर्वक विचार किया गया है और वेद के प्रायः सभी छन्दो के नामो का निर्वचन हुआ है । इसी प्रकार देवत-काण्ड की भूमिका के रूप मे पूरे तीन पादो का उपयोग किया गया है। चतुर्थ पाद से निभण्ड के देवत-काण्ड ( पचम अध्याय ) मे गिनाये गये नामो को ध्याख्या आरम्भ होती है। चूंकि निघण्ट के पञ्चम अध्याय के केवल प्रथम-खण्ड की व्याख्या करना यास्क को निरुक्त के सप्तम-अध्याय मे अभीष्ट है इसलिए केवल तीन देवताओ की व्याख्या उन्होने इस स्थान पर की है। वे हैं- अग्नि, जातवेदस् और वैश्वानर । इन सबो पर उनका विचार बहुत विस्तृत है । तीनों ही देवताओं की घ्याख्या के क्रम मे पहले देवता का वे निर्वाचन करते हैं। उसके बाद वैदिक-ऋचायें उद्धृत करके उनका प्रयोग दिखलाते हैं तथा यह सिद्ध करते हैं कि ऊपर के दोनो ज्योतिष्पुब्ज, विद्युद् और सूर्य भी इन नामो से पुकारे जाते हैं। अभिप्राय यह है कि जैसे अग्नि यों तो एक ही देवता का नाम है किन्तु विद्युत् और सूर्य का उल्लेख भी लाक्षणिक रूप १. Ibid p 2-The true gods of the Veda axeglorified human beings, insçired with humaa motises and passions, bora like men, but immortal २. विशेष विवरण के लिए देखें मेरा लेख-ऋग्वेद में मानवीकरण' पटना कालेज पत्रिका. मई, १९५९ (८५) से इस नाम के द्वारा हो जाता है। अन्त में वै निवपं निकालते हैं कि सूक्तों मे सम्बोधित तथा हवि पानेवाले इसो पार्थिव ( भौतिक) अग्नि (Fire) को क्रमस: अग्नि, जातवेदस् और वैश्वानर रहते हैं। इन नामो से कारी ज्योतिनुज कभी-कभी ही मूक्तो मे संबोधित किये जाते हैं या हवि पाते हैं । वैश्वानर के विषय में यास्क ने बहुत वहा विवेचन किया है तथा कई मनोरमक बातें उद्धृत की है । बिजली और सूर्य से अग्नि किस प्रकार निकलनी है इसका यज्ञानिक वर्णन किया है जो उस समय के प्रारम्भिक पदार्थ-विज्ञान का परिचायक है । याक कहते हैं कि जब किसी ठोस वस्तु पर बिजली गिरती है तब उस उमय तक यह अपना ही गुण लिये रहती है जबतक ठहर नहीं जाती। उसके अपने गुण का अभिप्राय है-जल में प्रज्वलिन होना और ठोस वस्तु मे बुझ जाना। किन्तु जब यह स्थिर हो जाती है तब पार्थिव-अग्नि का गुण ग्रहण कर लेनी है जो ठोस में प्रज्वलित होना और जल मे वुझ जाना है। वस्तुस्थिति जो भी हो परन्तु विद्युत् से अग्नि का सम्बन्ध स्थापित करना कुछ कम नहीं है । सूर्य से भी अग्नि का सम्बन्ध दिखलाया गया है। जब सूर्य उत्तरायण मे होते हैं तय काँसा या मणि को साफ करके उनकी किरणो के सामने सूखे गोबर के पास (किन्तु बिना स्पर्श कराये हुए) रखे तो वह जलने लगेगा। वस्तुत: किसी पीतल की तश्तरी मे किरणो को एकत्र करके काला कपडा रखने पर वह जलने लगता है। प्राय सप्तम-शती ई० पू० के प्रारम्भिक- विज्ञान को देखकर किसे आश्चर्य न होगा? यह देखना चाहिये कि यास्क की प्रतिभा कितनी सर्वतोमुखी थी। वैश्वानर का वर्णन जिस पाइित्य-प्रकर्ष के साथ उन्होने किया है वह उसकी विलक्षण-वदुषो का परिचायक है । वैश्वानर को सूर्य के रूप मे सिद्ध करने के लिए जितने तर्क दिये गये है उनके खण्डन मे यह स्पष्ट हो जाता है कि यास्क का अध्ययन क्तिना विस्तृत था। ( २६॥
- । चतुर्थ-परिच्छेद यास्क का निर्वचन [निर्वाचन का अर्थ-आधुनिक निर्वचन-इसको कठिनाइयाँ- व्यापक अध्ययन की आवश्यकता-यारक की विशेषता-यास्क के ध्वनि नियम-यास्क के निर्वचन को विशेपत्तायें यास्क के निर्वचनों के स्वरूप-निर्वचनो को दुर्बोधता और उसके कारण-निष्कर्ष । ] निरुक्त निववन का ही शास्त्र है । इसम शब्दों का इतिहाम इस ढग से प्रस्तुत किया गया है कि उनमे सन्निहित धातु का पता लग जाय और धातु के अर्थ के आधार पर ही शब्द का अर्थ निर्धारित किया जाय । धातु से शब्द का अयं या तो साक्षात् रूप से चला आ सकता है ( वाच्यार्थ). या अलकारों की सहायता लेनी पड सकती है। पास्क ने मिवंचन की दोनों रीतियों का ही आयय लिया है । निर्वचन की अनिवार्यता के विषय मे यास्क कहते है कि हमे कमी भी अपनी असमर्थता दिखलानी नहीं चाहिये (न स्वेव न निघूपात--२२१). किन्तु पास्का के निधन और आधुनिक निर्वचन ( Etymology) का एक मौलिक अन्तर यह है कि यास्क अपने निर्वचनो में शब्दो को निश्चित रूप से आख्यातन (of verbal origin) मानते हैं जब कि आधुनिक भाषा विज्ञान का निर्वचन-शास्त्र सभी शब्दों को आख्यातज नहीं मानार उनकी उत्पत्ति का वहां तक का इतिहास खोजता है जहाँ तक जाने के लिए अभी तक साधन प्राप्त हुए हैं । उदाहरणत: सस्कृत के किसी शब्द की तुलना अवेस्ता, पीक, गॉथिक, वुल्गेरियन, तोखारियन आदि प्राचीन भाषाओं में प्राप्य शबो से करते हुए प्राचीनतम भारत-यूरोपीय मूल भाषा ( Prot type Indo-European ) मे उसकी सत्ता खोजना ही निवंचन है। अब भा. यू० मूलमाषा मे वह दाद धातु के रूप म या संस्था के रूप में ही हो- भापा विज्ञान इसकी चिन्ता नहीं करता। हो, यदि साध्य हो तो अर्थ । १. Etymology-ग्रीक मापा वा etymo3 = सत्यना, logos - विज्ञान-सत्यती का विहान अर्थात् शब्दों की उत्पत्ति और अर्थश सही पता एगाने वारा विधान ! (७) निर्वचन के लिए यास्क ने जो सामान्य सिद्धान्त दिये हैं उनकी आलोचना करने के समय हम देख चुके हैं कि यास्क ने उदाहरण ठोक दिये है विन्तु सिद्धान्न नही ।' उनकी बाधारशिला है कि कोई भी ध्वनि किसी ध्वनि के रूप में परिवर्तित हो सकती है। यह भाषाविज्ञान के ध्वनि-नियमो के विरुद्ध है। इसी बात को देखकर प्रो. राजवाडे-जैसे कुछ विद्वान् कहते हैं कि यास्क की व्युत्पत्तियो को ध्वनि-नियमों से कोई सम्बन्ध नही। डा. सिद्धेश्वर वर्मा ने इसकी कटु आलोचना करते हुए ध्वनि-नियमो से यास्क की अमिजता सिद्ध की है। यह सत्य है कि यास्क सब जगह ठीक नही किन्तु निम्नलिखित तथ्य तो उनकी वैज्ञानिकता स्वीकार करने के लिए हमे बाध्य ही करते हैं- (१) स्वर-विकार ( Ablaut ) के विभिन्न-रूपो से परिचय :-गुण- विकार-जैसे, 'एव' की व्युत्तति से, 'पय' की व्युतत्ति /वी से । वृद्धि-विकार--'आस्तेिय' की व्युत्पत्ति 'अदिति' से । सम्प्रसारण- 'पृथक्' की व्युत्पत्ति प्रथ् से । इसके अलावे अन्य प्रकार के स्वर-सम्बन्ध भी उन्होंने दिखलाये हैं। (२) कण्य और तालव्य-वर्गों के सम्बन्ध से परिचय :-'अङ्कस' की व्युत्पत्ति /अञ्च् (मुडना) से, 'मृग' की व्युत्पत्ति / मज् (जाना ) से । मूल भारत-यूरोपीय-भाषा मे इन दोनो प्रकार के वर्षों का सम्बन्ध हो चुका था, अन्तर यही है कि पास्क तालव्य-वर्ण से कण्ठच-वर्ण की उत्सत्ति मानते हैं जव कि भाषा-विज्ञान की दृष्टि से कण्ठय-वणं ही तालव्य-वर्गों को उत्सन्न करता है ।' पाणिनि के साथ भी यही दोष है क्योंकि वे भी 'चोः कु' सूत्र के द्वारा यास्क-मन का ही समर्थन करते हैं।- तथापि इन दोनो वर्गों के पारस्परिक सम्बन्ध को जानना मी क्या कम है ? (३)यजनों के दुहरे प्रयोगों से परिचय :-'स्कन्ध' की उत्पत्ति स्कन्द् से और 'उत्स' की उत्पत्ति /उन्द से मानना यह सिद्ध करता है कि दोनों का प्रयोग प्रचलित था और यास्क इनके पारस्परिक सम्बन्ध से अभिज्ञ थे। १ भूमिका का तृतीय परिच्छेद [ख]। २. Vide, Yaska's Nirukta, p.XLII. ३. तालव्य-वर्गों को उत्पत्ति के लिए देरों-Dr. Batakrishna Ghosh, Lingustic Introduction to Sanskrit, pp. 12-17. (.८९), (४)ल को र् वा आवस्मिक विकार मानना:-'पुलुकाम' की ध्याख्या 'पुरुकरम' से करते हैं। यह सिद्ध है कि र् और ल बहुत काल से मिले- जुले थे । मूल भारत यूरोपीय मापा मे ल था जो वैदिक युग मे बहुधा र हो गया, इसे रकारीकरण ( rhotacism) कहते हैं। उदाहरण हैं - अगुरि (40)--अङ्गुलि । रघुपदान (० )-लघुपतना । (५) स्वरो तथा व्पजनो का पारस्परिक सम्बन्ध -'भीके' अभ्यरने { इ<A ) पितु'</, 'स्तूप' < स्त्यैि, 'योवा'</ग। 'उपस्' को / उच्छ ( चमकना ) से निष्पन्न मानना भी भाषा-विशान को और का एक महत्वपूण पदा है (ए)। (६) वर्गों में द्विवचन ( Reduplication) से परिचय 'अजीग' को व्याख्या 'अमारी' करके की गई है अर्थात् /गू का द्वित्त हुआ है जिसमे कण्ठम 'ग्' तालव्य ज्' के रूप में परिवर्तित हो गया है। पुन 'जिगत्ति' को ग. गु या ग्रह से निष्पन्न मानार द्वित्व की पूर्व- कल्पना कर लेते हैं। (७) सन्धि के क्यिमों से परिचय -- 'अनुष्टुप्' की व्याग 'अनु'- पूर्वक /स्तुभ से हुई है अर्थात् दत्य 'स्' का परिवर्तन 'ए' में हो गया है क्योकि पूर्व मे उकार है। पाणिनि ने इसके लिए नियम बनाया है 'इको (८३१५७ ) जिसका अर्थ है इण् और फवर्ग के बाद स का प हो जाता है। ध्वनि परिवर्तन पे ये निरीक्षण यास्क वो सूक्ष्मदृष्टि के परिचायक हैं। इसलिए यह कहना ठीक नहीं कि पाक ध्वनि नियमो ( Sound laws ) से बिलकुल परिचित थे। यास्र केवल ध्वनि-शास्त्र से ही परिचित नहीं, अपितु निर्वचन पात्र में विभिन्न पहलुओं से भली भांति परिचित प्रतीत होते हैं। यह और मात । निशालिक गरेपणा वे अभाव में या विविध मानयोचित दोपो के फलस्वरूप उनके निर्वचन कई स्थानों पर निदोष नहीं कहला सकने तथापि इस क्षेत्र में उनकी समता कोई एक विद्वान कभी नही कर सकता। नीचे हा यासा की निरक्तियो की विशेषताओ पर प्रशालेंगे- १न सा निरीक्षणों या वर्णन हा सिद्धेश्वर वर्मा ये पन्ध परिमारनौज भार यारव' (Etymolognes of Yasla) अपार पर दिया गया है। परतुन इस परिच्छेद या आपार हो वह पुस्तक है।मेरम बहुमूल्य प्रय कानयामारा हूँ।
(१) यास्क को निर्वचन की धुन लगी है और वे 'न त्वेव न नियात्' कह कर सचेत कर देते हैं। प्रारम्भ मे ही 'निघण्टु सान्द का निवंचन करन में तत्पर हो जाना इसी धुन का फल है। ऋचाओं की व्याख्या करने के समय ऋचाओ मे आने वाले शब्दो तक ही यास्क की दृष्टि सीमित नहीं प्रत्युत उनके लिए दिये गये प्रतिशब्दो और उनसे भी सम्बद्ध शब्दो पर तक हाथ साफ करते हैं। फल होता है कि विषणातर मे भटक जाते हैं उदाहरण के लिए देखें-केवल 'मुहूर्त'-शब्द की व्याख्या करनी है-'मुहूर्त मुहु ऋतु । ऋतु अतगतिकर्मण । मुगु. = मूढ इव काल , यावदभीक्ष्य चेति । अभीक्षणम् अभिक्षण भवति । क्षण क्षणोते:- प्रातः काल. । 'काल कालयतेः गतिकर्मणः' (नि० २१२५)। 'मुह' और 'ऋतु' की व्याम्पा तो उनके २१२ (पूर्व पूर्वम् अपरमपर प्रविभज्य निर्बुपात ) के नियम के अनुकूल है पर 'अभीक्षण', 'क्षण', और 'काल कहाँ से टपक पडे ? इसी धुन के फलस्वरूप उन्होंने इन्द्र का चौदह तरह से निवंचन किया है (१०८) 'जातवेदस्' का छ प्रकार से (७॥१९) और 'अग्नि का पाच प्रकार से (७.१४)। (२) कुछ निर्वचन यास्क की स्थूल दृष्टि के भी द्योतक हैं । अर्ष की खीचातानी और ध्वनि को परेशानी दर्शनीय है। 'अन्न' को वे +/नम् से ( वस्तुत / अद् = खाना ) 'आशा' ( = दिशा ) को आ + सद् से, तथा 'इन' ( = स्वामी ) को /सन् से ( वस्तुत =/= जाना ) निष्पन्न मानते हैं । पाणिनि के अध्येता इन्हें भ्रान्त ही समझेंगे। (३) कही-कही तो यास्क इतने वैज्ञानिक हैं कि आधुनिक भाषा- विज्ञान भी आश्चर्यचकित हो जाता है। देखिये, 'महल' की उत्पत्ति 'महम्वत्' (शक्तिमान् ) से मानते हैं । मूल भा० यू० शब्द है Segheslokmto'm जिसका अर्थ है शक्तिशाली सो', ग्रीक chiltor -एक हजार । 'सहस्र' में 'सहस्' शक्ति के अर्थ मे है इसकी पुष्टि ग्रिम (Gramm), ब्रुगमैन ( Drugmana) तथा मोलेट ( Mellet ) ने की है। इसी प्रकार विशति ( ३३१०), श्रद्धा (९:३०), जरितृ (१७) आदि के निर्वचन मे भी उन्होने अपूर्वता दिखलाई है। आश्चर्य तो यह है कि 'जरिता=गरिता' लिखने के समय यास्क मू० भा० यू० भाषा के ध्वनि सिद्धान्त को भी जान रहे हैं। मू० भा० यू. मे ऐसा ही शब्द है guera (ग्वेरा-)= स्वर ऊँचा करना, प्राचीन भारतीय भाषा (Old Indo-Aryan ) मे भोष्ठ. कण्ठीय ( Labio Velar ) ग्व् (gu) सदैव एकार के पर में रहने पर शव (जाना ) का प्रयोग कम्बोज तालय (ज् ) हो जाता है-यह आधुनिक अनुसन्धान यास्क के मस्तिष्क में उत्पन्न प्रतीत होता है। (४) प्रादेशिक योलियों मे भी यास्क की रुचि काफी है। 'शसमान' की 'शसमान' व्याख्या देना प्रादेशिक परिवर्तन का द्योतक है जसे आज मगध के कतिपय क्षेत्रो मे आनुनासिक्ता घर कर गई है-इतिहाँस, बहतर (बहत्तर ), साँस (श्वास ) इत्यादि । मे और 'शव ( = लाश) का प्रयोग आयंदेश मे होता है । इनके ज्ञान से यास्क शब्दो के ठीक-ठीक इतिहास देने मे कुछ दूर तक अवश्य सफल हुए है यद्यपि उम समय यात्रादि की सुविधा न रहने के कारण अनेक बोलियो और भापाओ को जानना बहुत कठिन था। (५) यास्क अपनी सामथ्र्य भर आलस्य नहीं करते। सम्बद भा० यू० भापाओ मे समान-शब्द ढूंढने की कोई सुविधा न होने पर भी शब्दों की उत्पत्ति के निक्ट तक पहुंचने की उनकी चेष्टा स्तुत्य है, उन शब्दो का रूप भले ही प्राचीन भारतीय-भाषा (Old Indo-Aryan) मे न मिले । 'अक्षि' को / अञ्ज से निकालना क्या कम है ? देखें-मू• भा० यू० मे oqu (ओक्व ) = देखना । (६) शास्त्रकार की दृष्टि से यास्क पूर्णतया वैज्ञानिक विचार-धारा लिये हुए हैं। अपने विनारों के साथ-साथ दूसरो के विचारो की तुलना भी करते जाते हैं। भारतीयो की इस पद्धति से वे बहुत दूर हैं कि दूसरे मूर्ख हैं, मेरा कहना ही ठीक है। इस स्थिति में वैदिक-ध्यात्याकार सायणाचार्य का सिद्धान्त यास्क के समान ही है जो यहा' मरके अनेक मतो का उल्लंख करते हैं । विशयतया जिन स्थानों में सन्देह का अवकाश रहता है, यहाँ तो यास्क की उदारता दशनीय है । प्रकृत-विषय से सम्बन्ध रखने वाले सभी सिद्धान्तों का ये उल्लेख कर देते हैं। (७) यास्क आधनिक-भाषाविज्ञान के 'सम्पृक्ति-दोष' (Contamination ) नाम की प्रक्रिया से भी परिचित है क्योकि शब्दों से सम्बद्ध एक-सहा धातुओ का पता बताकर उन सभी के योगफल से भी पद की १. Vide Dr. Bata Krishra Ghosh, Linguistic Introduction to Sanskrit gp 15-6 and 1. Burrow, the Sanskrit Language, Sanskrit Thodology. Tor farther reference side--llackernagel's -Altindische Grammatik. (९२) निष्पत्ति का सङ्केत करते है, जैसे---- कुब्ज' की उत्पत्ति / बुज् (टेना होना) या / उब्ज (नीचे जाना) से मानते हैं। इससे यह अनुमान होता है कि 'कुब्ज' बनाने वाले इन दोनो धातुओ के सम्मावित समर्श से वे अवश्य परिचित थे। (८) निर्वचन करने का प्रधान साधन यास्त के लिए व्याकरण सम्मत घातु ही है । इसी कारण से वे 'जातवेदम्' का निर्वचन करते समय विद् के विभिन्न अर्थ (जैसे-जानना, हाना )लेकर इसके ६ निवंचन करते हैं। (९) विद्वानों के लिए अपेक्षित एकरूपता का अभाव यामल में खटकता है । इसके सिर पर क्याकरणो का भूत सवार रहता है कि जहाँ जमा देखा, अपने ही लिखे दूसरे अवतरण की चिन्ता न करके दूसरा ही अयं कर दिया। बापान्तमन्यु' का अर्य करते हैं आपातितमन्यु' (१२) और फिर दूसरी जगह 'पान्तम' का अर्थ है 'पानीयम्' (७१२५)। सायण मे भी यह दोष प्रचुर मात्रा में है। इसे देखकर ही यूरोपीय विद्वानो ने इनके विरुद्ध आन्दोलन उठाया है जिसे भारतीय पुराने पण्डिन प्रकरणानुकूल अर्थ बहार टाल देते हैं किन्तु प्राचीन शब्दो के अर्थ करने म भापा विज्ञान के महत्त्व को हम भूल नहीं सकते। - १ सम्मुक्ति दोप-(Contsmination)-ना वक्ता के मन में एक माय इा या अत्यन्त निकर होकर विचार भथा वाक्य विन्याम उपस्थित होने हैं तब दोनों एक दूमरे में विलीन होकर एक दूसरे को दूषित (भग्न ) र हालत है 'नसे-Camel (2) और Leonard , चीता) के सयाग से बनने वाला Camelespird र ऐना जन्नु है जिसमें कैर-सा गर्दन और चीते-सी छाप हो। वैम्बीन के विद्या brunch (Preskfast भोर larch दोनों का एक साथ भोजन) करते है। 'दुध मा तुम और उज् के सम्मृक्ति-दोष से हुआ है-यह यास्क से मन्या प्रतात होता है। मा के इस तथ्य का प्राविकार हो याक ने दिया ! अन्य उदाहरण है-Furaria, Tastime आदि । यह दोष वाक्यों में भा होता है विरूपतया जर विचार प्रवाह भगा प्रवाद की अपेक्षा अधिक वेग मे चलता है जैसे-न्द्रश्च मोम बिन हरपते-लित' दिवचन इन्द्र और वृहस्पति के कारण है, मल हा 'एन्ट' उसने संधा समन्ध नहीं रममा स्मरणीय कि साति दोर ये परम्प दोनों राष्ट्र भगुर र तामरेको उरत्र करत है। देखिये--Taraporewala, Elements of the Science of Language. re-9 और Ashutosh Jubilee lolane में मारपुरासस ऐश-Contamination in Langure. (९५) (१०) कही-कही यास्क अर्थ को खीचातानी करते हुए निवंचनो से रोल करने लगते है। देखिये-जब 'वृक' चन्द्रमा को कहते हैं तब उसका निर्वचन है-"विवृतज्योतिष्क' (केवल दूसरा '' और अन्तिम 'क' बचता है 1 ), विकृतज्योतिष्क, विक्रान्तज्योतिष्क । अब वही 'वृक' कुत्ते के अर्थ मे होगा--विकर्तनात् (वि+/कृत = काटना) सच तो यह है कि 'वृक' कोई भी अर्थ क्यो न धारण करे, यास्क वहाँ तक इसे तुरत पहुँचा देंग (५।२१-२२)। (११) निर्वचन के झोके मे यास्क अपनी कल्पना-शक्ति का अभाव दिखलाने लगते हैं। जहाँ रूपक और लक्षणा से अर्थ का परिवर्तन हुआ है, वहाँ भी अपनी निर्वचन-शक्ति का चमत्कार दिखा कर ही छोहते हैं ( भले ही कुछ स्थानो पर वे रूपकादि का भी सम्मान करते हैं ) जैसे-'अवनि' का पहला अर्थ है नदी, फिर रूपक से यह-अंगुली का अर्थ धारण कर लेती है परन्तु अंगुली के अर्थ मे भी यास्क इस शब्द की निरुक्ति करके ही छोडते हैं-'अवनय अङ्गुलयो भवन्ति अवन्ति, वर्माणि' (अव् = रक्षा करना, ३१९)। यह बात नहीं है कि यास्क अर्थ-परिवर्तन का कारण रूपक, लक्षणा, सादृश्य आदि को नहीं मानते। इसके लिए हम उनके 'पद' पाब्द की व्याख्या देखें (२७) । यथास्थान हम इसपर विचार करेंगे।' यास्क के द्वारा उपस्थापित निर्वचनो के सम्बन्ध मे पर्याप्त अध्ययन किय गये है और भाषाशास्त्रियों ने आधुनिक-अनुसन्धानो की कसौटी पर उन्हे कमने की चेष्टा की है। फलतः निर्वचनो के विश्लेषण करने पर वे निम्नलिखित निष्कर्ष पर पहुंचते हैं। ( १ ) यास्क के कुछ निर्वधन तो भाषा-शास्त्र को पूर्णतया स्वीकार हैं. जैसे-'अगस्' की उत्पत्ति /अञ्च (मुक्ना) से। मू. भा० यू० wank=झुकना, प्रीक-ankon = केहुनी। (२) कुछ निर्वचन ध्वनि को दृष्टि से स्वीकार हैं जिन्तु अर्थ की दृष्टि से अस्वीकार. क्योंकि आधुनिकतम अनुसन्धानों से उनके अर्थ गलन प्रमाणित हो चुके हैं । 'राजन्' की उत्पत्ति /राज् (चमकना) से मानना ठीक नहीं प्रत्युत मू० मा० यू० मे arig = निर्देश करना, तथा लैटिन मे १. देखिये-परिच्छेद ७, अर्थविधान । २. Dr. Varma, Etymologges of Yiska. m. 17-32. (९४) rer = राजा-ये शब्द हैं जिनसे 'राजन्' सम्बद्ध है। ध्वनि की दृष्टि से फिर भी उपर्युक्त निरुक्ति निदोष है । (३) कुछ निवंचन अंशतः स्वीकार हैं क्योंकि आधुनिक आलोचक के लिए ये अत्यन्त प्रावृत ( Primitive) हैं। यास्क 'उत्तर' को उत्पत्ति 'उद्धनतर' से मानते हैं। वे तुलनात्मक ( Comparative ) 'तर' प्रत्यय को जानते हैं जो 'उन्' उपसर्ग में भी लगा है किन्तु यहाँ सवर्णलोप ( Haplology) नहीं हुआ है। पुन, 'द्यु' की उत्पत्ति /द्युत् (चमकना ) से मानते हैं किन्तु वह वस्तुनः न्यु है, तकार व्यर्थ है। मू० भा० मू० में edu, dei= चमाना। (४) कुछ निवंचन निश्चित रूप से स्वीकार नहीं हैं, उनको स्वीनि के विषय मे सन्देह है, जैसे-उद्रिण- उदकवन्तम् । उद् = जल, मूल भा० न्यू०nd ग्रीक hudor = जल । 'भर' (संप्राम) की उत्पत्ति भ (धारण करना), से मू० भा० यू० •bher = धारण करना, ग्रीक phero = मैं धारण करता हूँ। यह निश्चित नहीं है कि समामायंक 'भर' भी ऐसे ही बना है। (५) कुछ निर्वधन सम्भवतः स्त्रोकार है तथापि अनुसन्धान की भावश्यक्ता है जैसे-'अप्नम् (रूप)/आप (पाना ) से; मू० भा० यू० wap = पहुँनना, लैटिन apiseor = मैं पहुँचता हूँ। सम्भव है कि 'अनस' का सम्बन्धमाप से हो जाय । (६) कुछ निर्वचन अत्यन्त प्राकत है जिसका कारण है माया युग । यह यात नहीं कि वे अवैशानिर हैं । 'सुरुच' को उत्पत्ति येवल से बनाकर रह गये हैं जब कि मू० मा० यू. मे sleuq% चमकना, पीक- १. सबर्ग लोप ( Haplology) का है दो समान धनियों (Syllables ) में एक का लोप होना जैसे शक्तिशाक्ति, परिधर शरिर, मधुइप > मदुप, Cordel leopard > Cameleopard, where ever > whererer til i TITI मेरे एक मायाममा ने मुझसे पूछा कि Haplors (शेजो) क्या है। इस पर मोट गिदै। मैंने पहा कि भार तो स्वयं Haploloryा रसाइरस नैयार करके ये है दम दूसरा स्मगशिरा । 'उदातर' में यदि सब सोपो हो सकारों का ओर से जाय, परन्तु इतिहास में ऐसा नहीं मा। उपस्ती में भी प्रत्यय ग सा का यर उदारन मे-य , निवन, मया, उत्तर, रितर, पर। ये किमान leukos = प्रकाश-ये शब्द भी मिलते है। यास्क पागे न बढ़ सके। कुछ निर्वचनो को प्राकृतता ( Primitiveness) ध्वनि की दृष्टि से है जैसे- 'दण्ड' की उसत्ति / दद् या /दम् से मानना । मू० भा० यू० मे शब्द है adel+ndo = फाडना, लटिन dolo = मैं काटता हूँ। यह बात यास्क में रूपविज्ञान की दृष्टि से भी है । इसका मुख्य कारण है सभी शब्दों को आख्यातज मानना । आज जिन शब्दो को निश्चित रूप से सज्ञा आदि माना र.या है यास्क उन्हे भी सज्ञा और विशेषण के मूल के रूप मे आख्यात समझ लेते हैं जैसे-'दीर्घ की उत्पत्ति / दाप से। यहां तक कि प्रत्ययो मे भी धातु की गन्ध उन्हें मिल जाती है-नृण = न + /नम् (नन् नतम् ) जबकि ऐसे शब्द 'म्न' प्रत्यय लगाकर बनते हैं जैसे-द्युम्न, सुम्न, निम्न ( देखिये, ह्विटने का सस्कृत-व्याकरण, नियम-सख्या १२२४ ) । 'क्षीर' की उत्पत्ति क्षर से मानने के समय वे यह नही देखते कि 'अ' से 'ई' कैसे बन जायगा । 'हिरण्य' की उत्पत्ति ह से मानते है जब कि मू० भा० यू० मे यह आख्यात नही, विशेषण है-sghel=पीला, helvus = पीला । कही-कही यास्क अक्षरो को शब्दो का सकोचन और शब्दो को वाक्यो फा सकोचन रामझ लेते हैं जैसे 'अग्नि' =V( अ ) + अ या दह. (ग) +/नी ( नि ) इस प्रकार तीन घातुओ से अग्नि के तीन अक्षर बने हैं । अशु = Vशम् (अ)+पा ()+ उ । पुत्र-पुद्+/त्रा या पुरु+त्रा, मृ० भा० यू. sput = युवा । अक्षरो मे शब्द का दर्शन करना भारतीय मस्तिष्क की विश्लेषणात्मक-प्रवृत्ति का द्योतक है । पास्क के कुछ निर्वचन लोक-निरुक्ति ( Folk etymology ) से प्रभावित हैं । ये निरुक्तियां उन्हे ब्राह्मण-ग्रन्थो, परम्पराओ, किंवदन्तियों और अपनी कल्पनाओ से प्राप्त होती हैं । 'अङ्गिरस्' की उत्पत्ति 'अङ्गार' से मानते हैं क्योकि अङ्गिरा के सम्बन्ध फी दन्तक्या ने निर्वचन को ही बदल दिया । मू० भा० यू० angiras, ग्रीक angellos = दूत । वैसे ही 'देवर' की व्युत्पत्ति द्वितीयवर' से मानते हैं जब कि यह शब्द मू० मा० यू० से ही चला आ रहा है-daiuer, ग्रीक daer = पति का भाई। उपर्युक्त निर्वचन का कारण है तात्कालिक समाज-व्यवस्था जिसमे एक पत्नी रामी भाइयों की सम्पत्ति समझी जाती थी। (८) कुछ निर्वचन गलत हैं जो अधिकाशत यास्क की असावधानी के परिचायक हैं। 'कितव' को व्युत्पत्ति 'वृतवान्' कहकर / से मानते हैं (९६) ( . ..
किन्तु, 'ऋ' को 'ई' करने वाली प्राकृत भाषा की प्रवृत्ति प्राचीन आर्यमापा (१५०० ई० पू०-५०० ई० पू०) मे नहीं आई थी। कुछ निर्वचनो मे व्याख्या की अशुद्धियाँ हैं जैसे देवापि-देव+बाप् (पाना) किन्तु 'मित्र' के अर्थ में 'आपि' का प्रयोग ऋग्वेद मे कई स्थानो पर आया है।' मू० भा० यू० *ipi = साथी ग्रीक Epios = मित्रवत् । इनमे से कुछ का सम्बन्ध दिखलाना यास्क के लिए सम्भव था यदि सावधानी रखते । (९) कुछ निर्वचन असम्भव हैं जैसे रश्मि'- यम् ?, 'कर्ज' पच् या/वश्च से। (१०) कुछ निर्वचन तो दुर्बोप हैं जिनके विषय मे कुछ भी कहना कठिन है। इसके कई कारण है-(क) निबंचन किये गये वैदिक शब्द स्वय भी सन्दिग्ध हैं क्योकि मा० यू० मापाओ मे उनको समता नहीं मिलती। सम्भव है कि वे मुण्डा-भाषा के शब्द हो। (ख ) यास्क की शुद्धि या अशुद्धि दिखलाने के लिए कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। हम नहीं कह सकते कि 'बाहाव' आ+ह से बना है कि नही। (ग) यास्क ने स्वय भी कई प्रकार के निर्वचन दिये हैं । जिससे ज्ञात होता है कि वे भी शुद्ध निर्वचन के विषय मे निश्चित नहीं हैं । (घ) कुछ निर्वचनो को मापा भी सन्देहात्मक है। (3) कही कहीं व्युत्पत्ति दी गई है किन्तु अयं नही । यदि अर्थ ही सन्दिग्ध है तो निर्वचन की परीक्षा करना कठिन ही है। (च) कुछ निर्वचनों के आधार ओ सन्दिग्ध हैं। (छ) कही तो ऐसी भ्रान्ति है यह कहना कठिन हो जाता है कि अमुक व्याख्या निवंचन है या व्याख्यामात्र । (ज) कुछ स्थानो पर जहां यास्क बिल्कुल स्पष्ट भी हैं तो भाषाविज्ञान के पास कोई साधन नहीं कि उनकी परीक्षा कर सके 'अक्र' आ+ क्रम से बना है कि नहीं-यह जांचना बहुत कठिन है । इस प्रकार यास्क के निर्वचनो का विभाजन करना सम्भव है। निर्वचन- शास्त्र मे वस्तुत. यास्क, अपने ही युग के लिये नहीं, अपितु अपने से बादवाले २. देखिये-Petersburg Forterbuch (1) २. सस्कृत में मुण्डा-शब्दों के वर्णन के लिए देखें मेरा लेय-Austro-Asiatio as a Source of Sanskrit Words, Journal of the Bihar Uorersity, 1960. अनार्य शब्दों के टिर T. Burrow का Sansknt Ianguage देखें। (९७) ७हि०नि० भू० युग के लिए भी अनुपम रत्न हैं। भाषाविज्ञान की प्रक्रियाओं से अभिज्ञ, प्राचीन-आर्यभाषा ममाने के एकमात्र महायर तमा अपने युग के विचारों का सद्भत प्रतिनिधित्व वरने वाले गास्क का निर्वचन पाणिनि का भी पप-प्रदर्शक रहा है और आपनि भाषाविज्ञान तो इन दोनो महपियों पर ही अवलम्बित है जो हमें बन्धकार में पथभ्र होने से बचावर उचित-मा पर लाते हैं । (९) पञ्चम परिच्छेद निरुक्त और वैदिक-वाङ्मय [निरुक्त का किसी बैदिक-शासा से सम्बन्ध-विभिन्न सहिताओं के उद्धरण-निरुक्त किसी एक वेद से सम्बद्ध नहीं है-यास्त की बहुज्ञता-डा० सरूप-अथर्ववेद -डा० स्कोल्ड-उद्धरणों की सारणो निरुक्त और वेदार्थ-वैदिक-अर्थ करने के विभिन्न सम्प्रदाय-सायण- दयानन्द-अरविन्द-भापाविज्ञान-धारणा के अनुसार व्यारया- निरक्त की व्याख्या शैली!] वेद का अङ्ग होने के कारण वैदिक वाङ्मय मात्र से निरुक्त का बहुत धना सम्बन्ध है । इस सम्बन्ध की पुष्टि के लिए ही प्रथम परिच्छेद मे वैदिक- साहित्य का सिंहावलोकन किया है। पव हम यह देखेंगे कि किन किन वैदिक-प्रयों के वाक्य निरुक्त म उधृत हैं तथा वैदिक-व्यास्था मे निरुक्त कहाँ तक सफल है। पों तो निरुक्त मे विभिन्न वैदिक-साहिताओ और ग्रन्यो से वाक्य उद्धृत किये गये हैं परन्तु उनमे प्रधानता ऋग्वेद की ही है। इसका कारण यह है कि निरुक्तकार जिस निघण्टु पर भाष्य लिखते हैं उसमै ऋग्वेद के शब्दो का ही सकलन हुआ है अतएव ऋग्वेद म ही उसके प्रयोगो को दिखलाना यास्क के लिए उचित था । निरुक्त के अधिकाश परिच्छेद ऋग्वेद की क्सिी चा से आरम्भ होते हैं जिसके बाद उन ऋचाओ की व्याख्या की जाती है। ये ऋचायें कही कही दूसरी जगह भी मिल जाती हैं परन्तु इन्हें प्राचीनता की दृष्टि से ऋग्वेद से ही उधृत मानना सगत है। किंतु केवल अन्य सहिताओ मे मिलने वाले वाक्य भी निरुक्त मे हैं । इस खीचतान के कारण निरक्त को किस वैदिक शाखा से सम्बद्ध मानें, यह निश्चय करना कठिन हो जाता है । फिर भी चूंकि अन्य वेदाङ्गो के प्रन्य भिन्न भिन्न-वैदिक शाखाओं के हैं, अतएव इसे भी किसी न किसी शाखा से सम्बद्ध मानना आवश्यक प्रतीत होता है। इस प्रश्न को समाहित करने मे रोंय ( Rota') का महना है कि निरक्त कृष्ण यजुर्वेद से, विशेषतया तैत्तिरीय शाखा से, सम्बर है। भाण्डारकर (९९) और गुणे (भा० अमि० अन्य ) कहते हैं कि यास्क स्वय यजुर्वेदी थे और उन्होने विभिन्न-सहिताओ से उद्धरण लिये हैं जिनमे तैत्तिरीय, मैत्रायणी और काठक-सहितायें मुख्य हैं । वेवर ( Weber ) के अनुसार निरुक्तकार काण्व शाखा से उद्धरण देते हैं। यजुर्वेद के उद्धरण के लिए वे वाजसनेयो- संहिता का आश्रय लेते हैं। इस प्रकार ये विद्वान् यजुर्वेद की कतिपय शाखाओ से यास्क का सम्बन्ध जोडते हैं। इनके तों के मूल मे यही बात है कि निरुक्त वेदाग है, किसी-न-किसी शाखा से अवश्य सम्बद्ध होगा। अन्य शाखाओ के भी अपने निरुक्त रहे होगे जो आज प्राप्त नहीं हैं । अब यह विचारना है कि क्या निरुक्त यस्तुत किसी शाखा से सम्बद्ध है । हमने ऊपर अन्य वेदाङ्गो से निरुक्त की विलक्षणता देख ली है।' निरुक्त स्वयं भी भाषा-विज्ञान नामक एक विलक्षण-शास्त्र का अध्ययन प्रस्तुत फरता है । भाषा-विज्ञान को किसी एक पुस्तक या भापा पर सीमित रहना नही पडता । उसे तो अनन्त भाषाओ, ग्रथो और शाखाओ के क्षेत्र मे स्वच्छन्द विचरण करना पडता है। कोई भी नियन्त्रण उसके लिए सम्भव नही । यही कारण है कि निरुक्त अन्य वेदागो से विलक्षण है, किसी एक शाखा के शब्दों तक इसे सीमित करना अनुचित है। यास्क स्वय भले ही कोई वेदी हो, यजुर्वेदी या ऋग्वेदी, परन्तु निरुक्त का सम्बन्ध है सभी वेदो से, उपनिषदो से और तात्कालिक साहित्य से। सक्षेप मे यह कहा जा सकता है कि अपने काल के अनुकूल निरुक्त वैदिक-भाषाविज्ञान का महा- निबन्ध ( Thesis ) है। इसलिए निरुक्त एक प्रकार से सभी वेदों का निरुक्त है । अन्य निरुक्तो की भी चली ऐसी ही रही होगी, वे भी सभी वेदो से उद्धरण देते होगे। यह तर्क यहाँ अनुचित प्रतीत होता है कि उस काल में कोई भी साहित्य किसी कुल और शाखा से सम्बद्ध था, क्योकि यास्त-जैसे और निघण्टुकार-जैसे वैज्ञानिकों का अभाव कभी नहीं रहता जो सभी शाखाओ और कुलो मे जाकर किसी विषय-विशेष का अध्ययन करके ससार को नवीन प्रकाश देते हैं । यास्त स्वय किस शाखाध्यायी कुल के थे-यह हमारा विषय ही नहीं। डा० स्कोल्ड का कथन है कि क्या यह सामान्य वैदिक-अध्ययन को कृति समझी जाय, या क्सिी वेद-विशेष की या वेदों के समूह की ? नही जानते कि किस शाखा से इसका सम्बन्ध है या पहले रहा होगा।" १. प्रथम-परिच्छेद का अन्तिम भाग । हम (१००) प्राय. सभी देद निरुक्त का स्रोत होने का गौरव रखते हैं। यह सब निश्चित है कि इस तथ्य के मूल मे कौन-सी बात है। डा. लक्ष्मणसरूप भी निरक्त के उद्धरणो से यास्क की बहुलता का परिचय देते हुए लिखते है-निरुक्तम उदाहरण देने के लिए दिये गये उद्धरणों से निष्कर्ष निकलता है कि यास्क ऋग्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, यजुर्वेद और उसके पदपाठ, तैत्तिरीय- सहिता, मैत्रायणी सहिता, काठक-सहिता, ऐतरेय-ब्राह्मण, गोपथ ब्राह्मण, कौपीतकि ब्राह्मण, शतपथ-ब्राह्मण, प्रातिशाख्यो को और कुछ उपनिषदो को जानते । इतने ग्रन्थों का उद्धरण देनेवाले ग्रन्थ को यदि हम वेद की किसी एक शाखा मे बांध दें तो अन्याय होगा । यह और बात है कि यास्क स्वयं किसी एक शाखा के ब्राह्मण होगे जिसकी छाप निरुक्त पर पडना आवश्यक है जैसे सायण ने कृष्ण-यजुर्वेद के भाष्य को प्राथमिकता देकर उसकी पुष्टि भी की है। अथर्ववेद के उद्धरण तो यास्क मे हैं परन्तु जिस समय निरुक्त मे वेदों वा निर्वचन होने लगा है अथर्व का नाम नहीं। बौद्ध-साहित्य मे भी त्रिवेदी का ही उल्लेख है। हाँ, छान्दोग्योपनिषद् मे अथर्व का नाम माया है किन्तु अलग सख्या देकर 'चतुर्थमायण' कहा है। इससे यह पता लगता है कि अथवं पहले एक स्वतंत्र ग्रन्थमात्र था जो वैदिक-सहिताओ की ही शैली मे सकलित किया गया था। अभिचार-प्रयोगो के कारण उसे वेद की सज्ञा नही मिली थी, यद्यपि उसे तुल्य समझा जाता था। फिर भी यास्क ने उसका उद्धरण अपनी बहुज्ञता का परिचय देने के लिए दिया है। यास्क के वैदिक उद्धरणो का विशेप अध्ययन डा. स्कोल्ड ने किया है १. Skold, The Nirukta, Chap- II, P 11.-... "whether it shoula be regarded as a work based on Vedic stadies ia general, studies of a special Veda, or group of Vedas We do not knor to which school it belongs or originally belonged.... Nearly all the Vedas share the hocour of being the source of the Nirukts" 2. L. Sarap Introduction to the Nirukta, p 45--The numerous exemplary quotation occuring in the Nirakta conclasiels show that Yasha know the Rigveda, *********** the prathtakhyas, and some of the Upanisads. इ. देखिये-सायग को ऋग्वेदमाभ्यभूमिका का प्रारम्भिक अंश। ४.निरुक्त ७.१२॥ (१०१) ... .. १ तथा अपने अन्य में उसकी सारणी भी दी हैं। उसीके प्राधार पर हम यहाँ एक आदर्श रखेंगे। यास्क के कुछ वैदिक उद्धरण वेवल निरक्त में ही उपलब्ध हैं। सम्भव है कि जहाँ से वै लिये गये हैं, वे ग्रन्य काल-कोर से नष्ट हो गये हो। जो वैदिक उद्धरण अन्यत्र प्रान है वे दो श्रेणियों में विभाजित किये जा सकते हैं-कुछ तो निरुक्त से मिलते-जुलते उद्धरण हैं परन्तु कुछ उससे थोड़ा अन्तर रखते हैं। आगे प्रथम-अध्याय के मिलते-जुलते उद्धरणो की विस्तृत सारणी देकर बाद मे एक सक्षिप्त-सारणी दी जाती है- प्रथम अध्याय [क ] केवल निरुक्त मे-२११० निट्वक्त्रासः, १११८ स्थाणुरयं २ [ख ] निरक्त और ऋग्वेद में-१४, १६, १७ नूनं, १७ प्रसीम, १४८, २९, १।१७ अवसायाश्वान्, १४१९, १०२० उत त्व ९ [ग 1 निरुक्त और ऋग्वेद खिल-१११ [५] निरुक्त, ऋग्वेद और यजुर्वेद मे-नि: + ऋ० + वाजस० २१७ इन्द्रं न त्वा, नि.+I+तेति+काठ० १२१७ अवसाय पढ़ते २ [0] निरुक्त, ऋग्वेद और सामवेद मे~१।२० अपवं न खा [1] निरुक्त, भग्वेद और अथर्ववेद में-११० एमेनं, १०१७ परो नित्या, १११७ अग्निरिव [छ ] निरुक्त, ऋग्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में-नि++सा + M० + तानसूत्र ( अथवं ) १।१० अयमु ते [ज ] निरुक्त, ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद मेनि० + ऋ० + मैत्रा. + १०१।१७ दूतो नित्या [2 ] निरुक्त, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद से---नि० + ऋ० + सा.* धाजति मंत्रा+काठक १२१५ पात सेना [A] निष्क्त और चारो वेदो मे-नि० + ऋ० + सा+वाज०+ ते.+में+का+त. दा.+० या + नृ० पू० तापनीयोपनि+ प्राप० श्रौतसूत्र १।२० मृगोन इन गिलते-जुलते उद्धरणो के अलावे प्रथम-अध्याय मे भिन्न-पाठोवाले भी दो उसरण है । इस सारणी का उद्देश्य यही है कि हमे ज्ञात हो जाय कि किस प्रकार निरक्त सभी देशो का निरुक्त है। अब हम सम्पूर्ण निरुक्त के उद्धरणो वा, 'वामावलोकन कर लें- १. पहले जैसा ही विस्तार के लिए देरों-Dr. SLold.,The Nirukta. (१०२) . १ P १ ...
अध्याय भित पाठ वाले योग मिलते जुगते उद्धरण २४ + २ १८ + ६ = २४ प्रथम द्वितीय तृतीय चतुर्थ पञ्चम ३३ १ =४२ + + ६ = ६२ पष्ठ c सप्तम + अष्टम + ९ नवम + -३९ २६ २७ दशम + ४४ + -४७ एकादश द्वादश + १४१ =५१४ डा. लक्ष्मण सरूप ने निरुक्त के विभिन्न प्रकार के शब्दो की सूची प्रकाशित की है जिसके अनुशीलन से पता लगता है कि निरुक्त के उद्धरणो को यदि उससे निकाल दिया जाय तो यास्क का लिखा अश बहुत ही पोडा रह जाता है। कुछ भी हो वैदिक-उद्धरणो का जितना प्रयोग नियत मे हुआ है उतना शायद ही किसी वेदाङ्ग मे होगा । अब हम देखें कि वैदिक शब्दो और वाक्यो के अर्थ प्रकाशन में निरुक्त का क्या स्थान है। यह मानी हुई बात है, किसी भी ग्रन्थ से बहुत दिनों तक के लिए सम्पर्क छूट जाने पर उसके अर्थ करने मे बडी कठिनाइयाँ होती हैं। इसलिए प्राचीन होने के कारण वेदो के अर्थ का निणय करना बहुत कठिन है। 'मुण्डे मुण्डे मतिभिना' के अनुसार आज अनेक अर्थ किये जा रहे हैं। अपनी समझ और पद्धति से जिसे जो मिला उसने वही अथ कर दिया। निरुक्त का काल वैदिक-काल की प्राय अन्तिम सीमा है। दिक- सहिताओ को बहुत समय हो गया पा, स्वय यास्क ने ही वैदिक अर्थ करनेवालो को विप्रतिपत्ति का उल्लेख किया है। उनके अनुसार वेदार्थ के ये सम्प्रदाय हैं-आधिदेवत, प्राध्यात्मिक, आख्यानसमय, ऐतिहासिक, नंदान, मरुक्त, परिग्राजक, पूव याज्ञिक, याशिः। इससे स्पष्ट है कि बाज की भांति (१०३) उस समय भी विभिन्न-आधार हो गये थे। फिर भी उनमे एक परम्परा प्राप्त धर्थ की रक्षा की गई है। यास्क वैदिक अर्थ करनेवाली में अत्यधिक सयत हैं, यह उनकी व्याख्याओं से पता लगता है। निर्वचन का ठीक-ठीक पता लगाने मे उन्होने भले ही मालस्य किया हो, किन्तु वैदिक व्याख्या मे तो उन्होंने समस्त प्राप्य साधनों का उपयोग किया है । ग्राह्मण-ग्रन्थो के अर्थ, परम्परा-प्राप्त अर्थ और निर्वचना- रमक अर्थ-सबो को समुचित स्थान दिया है। कहना नहीं होगा कि मास्क की व्याख्या ही सायण और आधुनिक भाषा-शास्त्रियो के अर्थ का मूल है। आज वेद-व्यास्या को चार प्रणालियां प्रचलित हैं- (१) सायणाचार्य की व्याख्या (१४वीं शती)- इसमे निरुक्त का ही नहीं, समस्त वैदिक-वाड्मय का उपयोग किया गया है और परम्परा से प्राप्त अर्थों का प्रकाशन किया गया है किन्तु इनकी व्याख्या में विदेशी लोग यह दोष निकालते हैं कि सभी स्थानी पर एक शब्द का एक ही अर्थ इन्होने नहीं किया है। कई अर्थ देने के कारण इनकी व्याख्या कोई निश्चित अर्थ नहीं देती। इस विषय मे यह कहना अनुचित न होगा कि सायण वैदिक-वाहमय के पूर्ण पण्डित थे, प्रकरण के अनुसार ही उन्होने बर्ष का परिवर्तन किया है । विकल्पाचं देने के दो कारण भुमारिल ने बतलाये हैं- ध्याख्यान्तर विकल्पस्य द्रमिष्टं निबन्धनम् । विकल्पापरितोपो वा व्याप्तिर्वा विषयान्तरे।। वस्तुत सायण ने वैदिक-साहित्य का जितना मन्पन किया उतना किसी भी विद्वान् ने नहीं किया है । राजनीति और सेना में भी भाग लेते सभी शास्त्रो को अपनी जिहा पर मचाते थे। बाज के गवेपको की भांति वे सूची- पण्डिता नही थे। फिर भी सायण परम्परा के प्रवाह मे पडकर कहीं-कहीं असम्भव अर्थ दे देते हैं। इसलिए पूर्णतया इन्ही पर आधारित होना कठिन है। (२) दयानन्द को व्याख्या-परम्परा बोर भाषा-विज्ञान दोनो के १. सूची पण्डित-~-आधुनिक अनुसन्धानों में सूची ( Index) री बहुत बड़ी आवश्यकता समझी जाती है जिससे शीघ ही इष्ट शब्द का रथान निवाल लिया जाता है। पहले के विद्वान् अन्य हो कण्ठस्थ रखते थे जिससे सूचिो भनावश्यक थीं, परन्तु आज प्रन्याधिक्य के कारण ऐसा करना पडता है। म्यम्य के रूप में गहा. १० रामावतार शर्मा गवेषकों को 'सूची पण्डित' कहते थे। (१०४) ही घोर विरोधी स्वामीजी ने शब्दो के यौगिक-अर्थ पर बहुत जोर दिया है और वेदो में ईश्वर का सन्देश, प्रार्थना आदि मानते हैं। इनका पूर्वाग्रह है कि वेदो में इतिहास नही। अग्नि का अर्थ लेते हैं-जगत् का प्रकाशक परमात्मा । एक नई दिशा को मोर सकेत करने पर भी स्वामी जी का अर्थ थालोचनाओ का पात्र हुना है। (३) अरविन्द को व्याख्या~याध्यात्मिक दृष्टिकोण से ये वेदो मे अध्यात्मवाद का सन्देश पाते हैं तथा वेदो को दार्शनिक-अन्य मानते हैं, न सो कर्मकाण्ड और न इतिहास । कपालि पास्त्री ने इनकी व्याख्या का अनुवाद सस्कृत में किया है जो बहुत मनोरञक है। वास्तव में वेदों में सर्वत्र आध्यात्मिक्ता की छाप नहीं है इसलिए यह व्याख्या सन्तोषजनक नहीं कही जा सकती। (४) आधुनिक भाषाविज्ञान के आधार पर व्याख्या-यह पद्धति अधिकतम सन्तोपप्रद है। किसी भी शब्द के विभिन्न स्थानों के अर्थों की तुलना की जाती है और यदि सम्भव हुआ तो भारत-यूरोपीय-मापा के अन्य • वगौ में उस शब्द की सत्ता किसी भी रूप में खोजी जाती है। तदनन्तर सम्माष्य अपं परिवर्तन को पूर्ण परीक्षा करके किसी शब्द का तात्कालिक अर्थ निकाला जाता है । टीकाकार भी पर्याप्त सहायक होते हैं। जैसे-'दमः' शब्द ऋग्वेद मे आता है. लेटिन में ऐसा ही 'दोमस्' (domus) पाब्द हैं, दोनों का वर्ष 'घर' है । सायण ने भी यही वर्षे दिया है। इस प्रणाली के प्रथम प्रवर्तक है रॉप जिन्होंने संस्कृत-जर्मन महाकोष ( Petersburg worterbuch ) का निर्माण अपने सहकर्मी भोटलिङ्क के साप किया। आधुनिक अनुसन्धानों से वेदों के अयं पर काफी प्रकार पडता है। प्रासमैन और गेल्टनर ने जर्मन-भाषा में समूचे ग्वेद का अनुवाद किया है जिसमे इन सभी अनुसन्धानो का पूर्ण उपयोग किया है। इतना होते हुए भो यह रीति अभी अधूरे अनुसन्धानों के कारण पूर्ण है। जब तक सभी वैदिक. अन्य न मिल जायं, भारतीय-परम्परा का सम्यक् गान न हो जाप, विभिन्न- प्रन्पों में विखरे वेदार्य का बालोचनात्मक अध्ययन नहीं दिया जाय, देवल भाषाशास्त्र के आधार पर वेदाय करना भूल है। यह कार्य एस व्यक्ति का नहीं, व्यक्ति-समूह का है। आपुर्णिमा विषयायोगिक-अपंगा प्रतिपारक है पर कि परम्परा हमे समर्ष की ओर से जाती है।पं. रामगोविन्द त्रिवेदी ने 'भडियोमा (१०५) बनीयसी' भले ही कह दिया हो परन्तु वैदिक युग मे शब्दो का जो अर्थ था उसकी प्राप्ति के लिए परम्परा कुछ दूर तक ही सफल हो सकती है पूर्णतया नही । कारण यह है कि वैदिक युग से वेदार्थ करनेवालो के युग मे बहुत अन्तर पड़ जाता है । यास्क ने भी व्याख्या तब आरम्भ की है जब लोग वेदाथं भूलने लगे हैं । फिर यास्क ने समूची वैदिक-सहिता की व्याखया नही पी है किन्तु जहाँ तक की है, परीक्षा मे उतना अश प्रायः खरा उतरता है । इस दृष्टि से यास्क वेदार्थ के प्रथम प्रकाशक हैं । यर्थ मे विभिन-मतो का होना स्वाभाविक है । हम साधारण-सी बात बोलते हैं उसीका कितने लोग तरह-तरह का अर्थ समझ लेते हैं । 'चत्वारि शृङ्गा०' की व्यास्यायें ही विभिन्न- प्रकार की दी हुई हैं--याज्ञिक अर्थ ( सायण ), व्याकरण का अर्थ ( पतञ्जलि ) साहित्यिक अर्थ ( राजशेखर ) और सूर्य का अर्थ (तैत्तिरीय ब्राह्मण )। यह वैसा ही है जैसे ब्रह्मसूत्र के कर्ता को एक ही अर्थ अभीष्ट था, अपने पूर्वाग्रह से खीचतान करके लोगो ने द्वैतवाद, अद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैत आदि विभिन्न- मत चलाये। कुछ भी हो वेदार्य मे निरुक्त का अपना स्थान है, प्राचीनता और वैज्ञा- निकता होने के कारण इराकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। वेद-व्याख्या की शैली भी हमे यास्ष ने दी है । ऋचाओ मे जिस कम से शब्द हैं उसी क्रम से मे उनका अथं देते जाते हैं. वाक्य-विन्यास (Syntax ) की चिन्ता नही करते । इसके आधार पर भाषाशास्त्र को एक अछूती शाखा वाक्य-विन्यास ( syntax ) पर अध्ययन किया जा सयता है। यह शैली पिछले युग में सर्वमान्य रही किन्तु उसमें मूल शब्द भी अन्वय के साथ लिखे जाने लगे। यास्क का एक उदाहरण लें- तत्सूर्यस्य देवत्व तन्महित्वं मध्या कोंविततं स जभार । यदेदयुक्त हरित' सघस्थादादात्री वासस्तनुते सिमस्मै । व्यारया-तत्सूर्यस्य देवत्व, तत् महित्व, मध्ये यत् मंणा ( = पा) क्रियमाणाना वितत संह्रियते । यदासो अयुक्त हरणान् आदित्यरश्मीन् ; हरित - अस्वान् इति वा, अथ रात्री वासस्ननुते सिमस्म । अपि वा, उपमा स्यात--रात्रीव वासः तनुते इति (४।११)। । (१०६) पष्ठ परिच्छेद निरुक्त और व्याकरण [निरुक्त और व्याकरण में सम्बन्ध-व्याकरण को प्राचीनता- व्याकरण का सम्प्रदाय प-निरुतमे व्याकरण के शब्द-पतञ्जलि और निरुक्त-उपसर्ग को वाचक्ता और द्योतकता का प्रश्न--प्रो० राजवाड़े के निरीक्षण-निफ।] यास्क ने निरुक्त को कहा है कि यह विद्यास्थान है, व्याकरण वा पूरक है। दो के समुचित अध्ययन के लिए भी दोनो की समान आवश्यकता है भयोकि दोनो वेदाङ्ग हैं । इस साहचर्य के कारण उनमे घनिष्ठ सम्बन्ध का होना अनिवार्य है। वे एक दूसरे के पूरक हैं, ठीक उसी प्रकार जमे माइत्य और योग, आगमन और नियमन तशास्त्र । व्याकरण यादो को शुद्धाशुद्धि का विचार करता है और शब्द रचना के लिये प्रकृति-प्रत्यय या विभाजन करता है जैसा कि तेत्तिरीय-श्राह्मण के इस वाक्य से मालूम होता है-वाग्वं पराची अध्याता अवदत ते देवा इन्द्रम- गुवन्-इमा नो वाच व्याकुविति. तामिन्द्रो मध्यतोऽवत्रम्प व्याकरोत् । तस्मादिय व्याकृता वागुद्यते' ( ते० स० ६।४७३)। पुन गब्दो के भेद, लिङ्ग, वचन, कारक आदि का विचार भी व्याकरण ही करता है। ये सभी पान के बहिरङ्ग है । पतञ्जलि ने व्याकरण के प्रयोजनो में शब्दानुशासन, वेदों की रक्षा, कह ( विचार ) धागम (वेदाध्ययन ), शब्दाधिकार में रघुना और बसन्देह की मुख्य माना है। बापानत निरुक्त के भी ऐसे ही काम हैं विन्नु वह एक डेग और आगे बढ़ार अर्थानुशासन भी करता है। व्याकरण जय पान्दो की शुद्धता की जांच शिष्ट प्रयोग (निपातनो मे ) और प्रति प्रत्यय के द्वारा पर लेता है तब निहत ही उसा अयं की ओर सईन परमा है। भाषा मे सद यदि यहिर है तो अथ अन्तरङ्ग । निरुत्त सभी राम्दो से पानु कोल्पना र मूल से लेकर वर्तमान अयं तर से दूने की चेटा परता है। चूंकि दारद और अप मे अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है दरिए धारण सौरभ शERE आधिाई, १.ससि बिसान, म्यारगम्य "रन्यम् (नि.१।१५)। .. - (१७) व्याकरण अपनी प्रकृति की शुद्धता और अर्थ की जांच के लिए निरुक्त पर निर्भर करता है । सच यह है कि अर्थ का ज्ञान निरुक्त के बिना नहीं हो सकता । धातुपाठ के सभी अयं निरुक्त की ही कृपा से हैं। दूसरी ओर निरुक्त उन धातुओ के लिए व्याकरण की हो सहायता लेता है परन्तु प्रत्ययो की आवश्यता इसे नहीं। वैसे कही-कही स्पष्टीकरण के लिए दे दें, यह दूसरी घात है। इतना होने पर भी निरुक्तकार यास्क व्याकारण को सर्वस्व नहीं मान लेते जसा कि वे कहते हैं-'न सवारमाद्रियेत । विशयवत्यो हि वृत्तयो भवन्ति' (२१)। व्याकरण के रूप बडे संशयारमक होते हैं इसलिए कई स्थानो पर उन्होने व्याकरण के धातुओं का उल्लघन किया है। यह हम ऊपर दिखा चुके हैं । ... ... ... यास्क के समय वैयाकरणो का एक पुष्ट सम्प्रदाय या-यह उनके उद्धरणो से स्पष्ट होता है । निरुक्तकार स्वय भी कई वैयाकरणो के नाम देते हैं जैसे- शाकटायन, गायं, गालव, शाकल्य । इनके नाम पाणिनि ने भी अष्टाध्यायी में दिये है । यदि वे दूसरे व्यक्ति नहीं हैं तो सचमुच ये आचार्य अत्यन्त प्राचीन हैं।' इन सभी वैयाकरणों तथा अन्य आचार्यों का पूरा उपयोग निरुक्त मे किया गया है। इनके पारिभाषिक-शब्द निरुक्त मे प्रचुरता से मिलते हैं । कुछ शब्द तो प्रातिशाख्यो (शिक्षाग्रन्थो ) से भी लिये गये हैं जैसे-सहिता, स्वर आदि । पाणिनि ने यास्क के कुछ दाम्दो को परिवर्तन के साथ दिया है- यास्क पाणिनि प्रेरणार्थक कारित णिजन्त क्रियासममिहार ... चकरीत यड्लुगन्त इच्छार्थक चिकीपित सन्नन्त इन शब्दावलियो से स्पष्ट होता है कि यास्क ने नाम रखने के लिए कृ के रूप को ही उपलक्षण मानकर उसका भूतकाल कर दिया है (क्तान्त ), इसी दौली में व्याकरण ने 'कृत' और 'कृत्य'-जैसे शब्दो को स्वीकार दिया है जो उपलक्षण का ही उदाहरण है। किन्तु पाणिनि-व्याकरण मे प्रत्यय की कल्पना करके उसके आधार पर नाम रखने की प्रणाली है जरो तिहन्त, सन्नन्त । यह विकासावस्था का द्योतक है । च्यावरण के पद-भेद यास्क ने भी लिये हैं-नाम, माल्यात, उपसर्ग और निपात । पीछे पलपर पाणिनि केवल दो ही भेद रखते हैं--सुबन्त और १. देखिये-युधिष्ठिर मीमांसक, व्याकरण शास्त्र का इतिहास । .. (१०८) ...
तिडन्त । निरुक्त मे व्याकरण के पारिभाषिक शब्द बहुत-से पड़े हुए हैं जिन पर स्वतंत्र रूप से अलग अलग विचार करना एक अन्य का विषय है।' ग्याकरण के कुछ शब्दों का तो उन्होने निर्वचन तक दिया है जिससे डा० बेलवलकर-जये कुछ विद्वान् निष्कर्ष निकालते हैं कि इन शब्दो को वे पारिभाषिक नहीं मानते होगे जैसे 'सर्वनाम' का निर्वचन है 'सर्वाणि नामानि यस्य, सर्वेषु भूनेषु नमति = गच्छति वा', किन्तु निर्वचन की धुन तो यास्क मे है हो । 'निपात' को भी तो वे 'उच्चावचेष्वर्थेषु निपनन्ति' रहते हैं। फिर चार पद भेद कहने का क्या अभिप्राय है ? यदि सर्वनाम को पारिभापिक- शब्द नहीं मानते तो 'स्व इति सर्वनाम अनुदात्तम्' क्यों कहते ! यह स्थान स्पष्ट करता है कि सर्वनाम कुछ खास शब्दों का संग्रह है जैसा पाणिनि भी मानते हैं । जिस प्रकार यास्क ने व्याकरण की शब्दावली का प्रयोग किया है उसी प्रकार पतअलि ने भी महाभाष्य मे निरुक्त के मसाले का खुलकर उपयोग किया है और कई स्थानों पर उनके वाक्य ज्यों-केन्यो उद्धृत किये हैं। कुछ उदाहरण १. मेरे पूज्य गुरु प्रसिद्ध वेदशा तारापद चौधुरी, एम० २०, पी० एच० सी० (सन्दन) निरुक्त में व्याकरण के शब्दों पर गवषणा ( Research ) कर रहे थे, किन्तु उनके असामयिक निधन (दीवारी, अक्टूबर ३१, १९५९) से यह कार्य अधूरा रह गया। उन्होंने मुझे अपनी शब्दावली की तालिगा दो यो। माशा है इसमे निरुक्त के राम्दों पर कारी प्रकाश पडेगा और इस विषय पर गवेषणा की प्रति बढ़ेगी- पदजात, नाम, पारयात, उपसर्ग, निपात, भाव, सत्व, वचन, क्मोपमग्रद, उप- बन्ध, पश्चमी, विवीया, चतुर्थी, प्रथमा, ( एक स्थान पर कम से भी विभचिया दी t) सर्वनाम, अनुदान, अनाम, द्रष्टव्यय, अनुदास प्रकृति, पदप्रकृति, सुवचन, स्वर, सस्कार, मारित, कृत, नामकरण, अवग्रह, सरिता, पातपत्ति, उपसष्ट, प्रादेशिक- विकार, मक्षर, वर्ग, विभक्ति, निवृच्चिस्थान, उपधा, ग्यापत्ति, वर्णोपजन, स्वर, अन्तस्थ, निमति, प्रति, विति, सरित, समास, एकपर्व, अनेकर, सारिन, पूर्ण प्रत, चरीत, पत्ता सख्या (1), अम्यस्त, निरुटोपध, अन्वादेश, प्रथमादेश, मनगर सरकार, निगम, वास्य, चिमौषित, निर्वासित पसा, तुप्तविक, प्रपम-मध्यम-उत्तम- पुरस, मनस्यानस्पटिहो. विमापित, गुरु, आदिनुप्त, सम्पाम, माम, तस्म हिनन्, तेन सरातम् । तस्यारस्यम् । इस हर हालिया से रपटोनारशिनिहत्त म्याकरता किरना है। इन. सदा के लिहास पर या निरक में माने नोट पर या इनकी उरमीयता पर अम्मा मनुसथान सकता है। (१०९) - - " " " - " " " (१) निरक्त शर महाभाष्य पड्भावविकारा भवन्ति इत्याह भगवान् वाायणिः। (२) उतत्व. पश्यन्न० (३) १११२- नाम खल्वपि धातुजम् -एवमा- माहुरक्ता. २।२- -शवतिर्गति कर्मा कम्बोजेवेव भाषितो भवति । ४११०- सक्तुमिव तितउना पुनन्तोः । १३१७- चत्वारि शृङ्गा त्रयो० । (७) १३१९- चत्वारि वापरिमिता पदानि । अतएव निरुक्त और व्याकरण मे घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है । दोनों एक दूसरे के पूरक हैं । निरुक्त का सर्व प्रथम उल्लेख अपने वर्तमान अर्थ में छान्दोग्योपनिषद् ( सप्तम अध्याय ) मे मिलता है तथा छ वेदाङ्गो के नाम हमे मुण्डकोपनिषद् ( ११५ ) मे मिलते है। फिर भी कालक्रम की दृष्टि से व्याकरण निरुत की अपेक्षा प्राचीनतर है क्योकि निरुक्त की व्युत्पत्तियो का स्रोत व्याकरण ही है जिसकी पूर्वस्थिति अावश्यक है। स्फोटवाद और क्रिया के छः विकारो का विवेचन हम कर ही चुके हैं :-- इन्हें भी यास्क ने बया करणो से ही लिया था। उपसगों के विषय मे भी दो पक्षोशाकटायन और गाय-का समन्वय यास्क ने अच्छी तरह किया है । शाक्टायन का मत है कि उपसर्ग का अवेले कोई अर्थ नही ( अर्थात् ये वाचक नहीं हैं ), वे केवल चिह्नमात्र हैं तथा प्रिया और सज्ञा में जुटकर उन्ही के छिपे हुए अर्थ का प्रकाशन कर देते हैं । दूसरी ओर गार्य वा मत है कि उपसर्ग वाचव हैं, अपना अर्थ रखते हैं तथा सज्ञा या क्रिया से मिलकर उनके यथं मे विकार ला देते हैं। यास्क' पाक्टायन के मत का उल्लेख परके गाय के पक्ष में भी उपसगों वा अर्थ देते हैं, पिस प्रकार का परिवर्तन कोन उपसगं करता है । प्रो. राजवाडे ने यास्क की व्याकरण-सम्बन्धी दो सावधानियों का निरीक्षण किया है । यास्क ने कर्मोपसंग्रह (Conjunction ) 'च' के विषय मे लिखा १. भूमिया या परिच्छेद ३ (क)। २. विशेष विवरण के लिए देखें-टा० कपिरदेव दिवेदी आचार्य, अर्थ दिशान और च्या रणदर्शन। (११०) है 'उभाम्या सम्प्रयुज्यते' अर्थात यह दोनो जुड़े हुए शब्दा के बाद आता है । वे इस नियम का पूर्ण रूप से पालन करते हैं जैसे-चर्म च श्लेष्मा च (२५), स्नाव च श्लेष्मा च ( २१५), विचिक्त्सिार्थीय च पदपूरण च (१५)। दूसरे, पाणिनि के अन्दादेश का पालन करने मे भी यास्क सावधान मालूम पडने हैं-'प्रयनात् पृथिवीया, १ एनामप्रथयिष्यत् ? (१९१३) आस्यम् अस्यते , आस्यन्दते एनत् अन्नम (११) इत्यादि। इस प्रकार हम देखते हैं कि निरुक्त व्याकरण का पूरक तो है ही, साथ ही साप व्याकरण के नियम भी इसम समुचित स्थान पाते हैं । वस्तुल दोनों सापेक्ष हैं, निरपेक्ष नही । १ भन्वादेश-'एल' शब्द को दुछ विमत्तियों में सकार के स्थान पर नरा हो जाता है। यह तब होता है जब उप्त अर्थ का उल्लेख पहले भी हो चुका हो जैसे- अनेक व्याकरणमौतन . एन एदोऽध्याय । देखिये सिमान्तकौमुदी-पर कार्य विधातु- नुराधस्य दन्तर विधातु पुनरूपाशनम् अन्वादेश । २ Rajnde, Yaska's NiruktaLII २ निरुत्त में म्यापरण शालीय पदों के मध्ययन के लिए ऐसा एक शोध-निवाब गिररिस सोसायी पत्रिका के रिस Grammatical Speculations of 10 नाम से सिमोझरी प्राशिवांगा।
सप्तम परिच्छेद निरुक्त और भापाविज्ञान [भापा-विज्ञान को नींव-इसको शाखायें-यारक का युग-- भाषायें और उपभापाय-भापा को उत्पनि-मनुष्य ही भापा का उत्पादक-धातु-सिद्धान्त-यास्क का सिद्धान्त और मनोविज्ञान- ध्वनि-विज्ञान-वरो के क्रम (Grades)-सम्प्रसारण-ध्वनि-परि- वर्तन-इसकी विभिन्न दिशायें-रूप-विज्ञान-सम्बन्ध-तत्त्व और अर्थ- तत्त्व -पदो के भेद-संज्ञा और क्रिया में सम्बन्ध तत्त--शब्द की रचना-कृदन्त-तद्धित-समास-अर्थ-विज्ञान-निरुक्त का आधार- अर्थ-परिवर्तन-वस्तुओं का नाम पड़ने का कारण-अर्थ-परिवर्तन के कारण-सादृश्य-वद्धित-प्रयोग–अर्थादेश-वास्य-विज्ञान-यास्क के वाक्यों की विशेषतायें-निर्वचन -भाषा का विकास।] हमारी समस्त क्रियाओ की मित्ति भाषा पर ही आधारित है जिसका साङ्गोपाङ्ग विवेचन करना भाषाविज्ञान का काम है। यद्यपि यूरोपीय-विद्वानो के मस्तिष्क से ही इसे आधुनिक-रूप मिला किन्तु यह कोई नवोन विज्ञान नहीं। हजारों वर्ष पूर्व ही इसकी नीव भारत और यूनान मे पड़ चुकी थी। इसे आधुनिक रूप में लाने का श्रेय भी सस्कृत-भाषा को ही है। सामान्य • भापविज्ञान का कोई भी ग्रंथ, चाहे वह सिद्धान्तों की विवेचना करे या इस विज्ञान के इतिहास का वर्णन करे, यास्क और पाणिनि के नामोल्लेख के बिना अपूर्ण ही रहेगा। इन दोनो के अध्ययनो से ही यूरोपीय-विद्वानो ने भाषा-विज्ञान के सिद्धान्तों की विवेचना करने को पाली पाई और अधिकारा वस्तुएं भी उन्हे इनमे मिल गई। भाषा-विज्ञान अपनी विश्लेपणात्मक-शक्ति के कारण विभिन्न शाखामो मे वंटा है जिनमे स्वतन्त्र रूप से भिन्न-भिन्न विषयों का अध्ययन किया जाता है । इसकी मुख्य शाखायें ये हैं-(१) ध्वनि-विज्ञान ( Phonology ) जिसमे ध्वनि की उत्पत्ति, श्रोता-वक्ता-सम्बन्ध, ध्वनि-विकास, ध्वनि-परिवर्तन आदि विषय आते हैं, (२) रूप-विज्ञान ( Morphology) जिसमें पन्दों के भेद, उनके विकार, रूप-परिवर्तन, समास को रचना भादि विषयो का विधार .. ( ११२) . यास्क के होता है, (३) अर्थविज्ञान (Semantics) जिसमे शब्दो के अर्थ, अर्थ- परिवर्तन और इसकी दिशायें, उनके कारण आदि विषयो का. अध्ययन किया जाता है, (४) वाक्य-विज्ञान (Syntax ) जिममे किसी वाक्य में शब्दो का स्थान-निर्धारण करके विभिन्न स्थान होने से अर्थ मेद आदि का विचार होता है । शब्दो का सम्बन्ध-तत्त्व किस प्रकार एक दूसरे से जुडता है इसका अध्ययन करना वाक्यविज्ञान का ही काम है ! इन मुरय शाखाओ से भी कई शाखायें निकली हैं जैसे (५) निर्वचन शास्त्र ( Etymology ) जिसमे पाब्दो की उत्पत्ति और इतिहास का पता लगाते हैं। हम आगे यास्क के निरुक्त को मापाविज्ञान की इन शाखाओ की कसौटी पर कस कर देखेंगे कि आधुनिक-अनुसन्धानों और यास्क के तात्कालिक ज्ञान मे क्या अन्तर है तथा पास्क ने भाषाविज्ञान के विकास में क्या सहयोग दिया है। युगपर दृष्टिपात करने पर हमे पता लगता है कि उनके समक्ष केवल दो ही भाषायें थी और वे भी एक ही परिवार की। वे हैं-वंदिक-माया और लौकिक-भाषा । पहली भाषा का केवल साहित्य वर्तमान था और दूसरी बोलचाल की भापायी । पहली को वे बहुघा 'निगम', 'छन्द', 'ऋक्' धादि नाम से पुकारते हैं तथा दूसरी को 'भाषा' ही कहते है। दोनो के पर्याप्त अध्ययन से याक मे ऐसी शक्ति आ गई है कि वे शब्दों के विषय मे अनु- सन्धान कर सकें। भाषा-विज्ञान ने वैदिक-मापा की भी उत्पत्ति मू० मा० यू० भाषा से मानी है किन्तु भौगोलिक और अन्यान्य कारणो से वहाँ तक पनना यास्क के लिए उस युग मे असम्भव था इसलिए वे वैदिक-भाषा तक ही बढ सके जिसे वे लौकिक भाषा का उद्गम-स्थान मानते हैं। और तो और, अपने प्रदेश मे ही सर्वत्र घूम-घूमकर उपभाषाओ को विभिन्नता का अध्ययन करना कठिन था । ऐसी स्थिति में यास्क ने अपने समक्ष विद्यमान भाषाओं को लेकर ही भापा-विज्ञान का अनुसन्धान प्रारम्भ किया है । यह भी सत्य है कि उस समय उपमाषायें पर्याप्त थी क्योंकि ब्राह्मण-मन्यो मे प्राच्य, उदीच्य आदि बोलियों के उल्लेख मिलते हैं। यास्क ने भी उपभाषाओ का उल्लेख किया है । अनुमान किया जाता है कि यह सूचना पा तो यास्क को यात्रियो से मिली होगी या परम्परा से प्राप्त हुई होगी, १.देखिये-अर्थवन्तः शम्दसामान्यात् । २. Vide, Dr suniti Kumar Chatterjee, Indo-Aryan and Hindi, Old Indo-Aryao. ( ११३) ८ हि०नि० ० ऐसी अवस्था मे ये उस समय नही बोली जाती होंगी । आर्य, कम्बोज, उदीच्य और प्राच्य देश की उपभाषाओ मे और कुछ अन्तर नही, केवल दो धातुओ और सज्ञाओं का हो-यह आश्चयं प्रतीत होता है। फिर भी यह स्वीकार करना पडेगा कि यास्क अपनी अल्प सूचना पर भी कितना ध्यान रखते हैं और उसे उचित स्थान देवर भाषाशास्त्री का कर्तव्य पूरा करते हैं। पाणिनि' और पतञ्जलि को उपभाषाओ के विषय मे काफी सूचना मिली मालूम पडती है क्योकि वे भारत के तात्कालिक भूगोल का अधिक ध्यान रखते हैं। युग को सीमायें देखकर ही हमे यास्क के सम्बन्ध मे कुछ कहने का अधिकार है । अपना मूल अध्ययन आरम्भ करने के पूर्व भाषाविज्ञान के एक घडे महत्त्वपूर्ण प्रश्न -भाषा की उत्पत्ति पर विचार कर लेना सामयिक प्रतीत होता है । वस्तुतः यह प्रश्न आरम्भ से ही विद्वानो को परीशान करता आ रहा है कि भापा वी उत्सत्ति कैसे हुई । विभिन्न लोगों ने अपनी-अपनी समझ के अनुसार इसके अलग-अलग समाधान दिये है। कुछ लोग भाषा को ईश्वर- कृत मानते हैं कुछ लोग वस्तुभो के प्रत्यक्षीकरण के समय की ध्वनि से, कुछ वस्तुओ के ही द्वारा की गई प्वनि और कुछ लोग विकासवाद से भाषा की उत्पत्ति मानते हैं। प्राचीन भारत और यूनान में ईश्वर को ही भाषा का स्रोत माना जाता था कि ईश्वर ने ही भापा बनाकर हमे दी है। सवृत का पर्याय शब्द 'देवमापा' इमी धारणा का द्योतक है। यास्क ने भी इस प्रश्न पर विचार किया है किन्तु स्पट्टतया अपने मत का उल्लेख नही दिया क्योंकि अपने मन की पूर्वकल्पना लेकर ही उन्होंने नियक्त वा प्रारम्भ किया है । इसका तात्पर्य है कि वे पाठकों से बाशा रखन हैं fr यास्व का अपना सिद्धान्त क्या है, इससे अभिज्ञ हैं । जहाँ-तहाँ विखरे हुए उनके याश्यों को देववर ही उनके सिद्धान्न पा हम अनुमान पर मक्ते हैं। निरक्त (१२) मे वे कहते हैं- अणीयरत्वाच्च शब्देन संजावरण व्यवहारा लो। तेषां मनुष्यवद्देवताभिधानम्।' इससा अभिप्राय यह है कि वस्तुओ का नाम ससार मे व्यवहार के लिए रखा गया है क्योकि वस्तुओं को पहचानने या १. पाणिनि पर स० सामुदेव दशरण अग्रवार ने अत्युत्तम अन्य प्रस्तुत किया है- 'पाणिनिकालीन मारतवर्ष जिसमें पाणिनिश सौरवृनिक अध्ययन पिया गया है। हमी को म्परेसा का ग्रन्य पतपलि पर टा. वैजनाथ पुरी ने लिया है। RC Dirine Theory, Buw bow Tbeory, Pooh ooh Theory, Dir, dong theory. Ye-ho-he Theori, Lrolution Theory retc Vide-Tarn. porewall, Elements of the Sicence of Language. (११४) बतलाने की यन्य प्रणालियां (जस सक्त करना, वस्तु को ही सामने रख देना आदि ) बहुत ही कष्टसाध्य हैं, शब्द ही सरलता से वस्तुओं का द्योतन कर सकते हैं इसलिए शब्द के द्वारा ही उनका नाम सुविधा के लिये रखा जाता है।' वस्तुओ के जो नाम मनुष्यो म रखे जात हैं, देवता भी उन शादी से ही तत्सम्बद्ध वस्तुओ को रामझ लेते हैं । इससे इतना तो स्पष्ट है कि वे देवी भाषा ( ईश्वर द्वारा बनाई गई भाषा) में विश्वास नहीं करते । भाषा का उत्पादक मनुष्य ही है। इस सम्बन्ध मे यह ध्यान देने की बात है कि 'देवभाषा' शब्द को व्याख्या उन्होने अच्छी तरह कर दी है। यदि भाषा का उत्पादन मनुष्य ही है, उसे बोलने वाला भी मनुष्य ही है तो सस्कृन को 'देवभाषा' क्यो कहत हैं। इस प्रश्न का समाधान यह है कि इमो मापा में देवता भी अर्थ ममझते हैं, मनुष्यो की प्रार्थना पर ध्यान देते हैं इसलिए इस देवमापा कहने मे अत्युक्ति नहीं । किन्नु याक के वाक्यो से यह पता चलता है कि वे किसी भाषाविशेष को ही देवताओ की वोधगम्य भाषा नहीं कहते । मामान्यरूप से दाद' मात्र को उन्होंने ऐसा कहा है। फिर भी यह अनुमान लिया जा सकता है कि यास्त के सामने एक ही भाषा-सस्कृत-मापा या लौकिक भाषा-होने के कारण उनका लक्ष्य एकमात्र इसी पर है। दूसरे, बाद में 'कमंसम्पति मन्त्र येदे' कहकर भी इसी का निर्देश दे करते हैं क्योंकि वेद म भी इसी भाषा का प्रयोग है। वस्तुत यह स्यान यास्क के समन्वय का परिचायक है जहाँ उन्हाने मनुष्य कृत भाषा मानकर भी 'देवमापा' की सगति वैठाई है। इतना ही नहीं दाद के धातुज-सिद्धान्त का विचार करते समय भी पुछ पतियां दे रख जान हैं जिनसे दादोसत्ति पर प्रकाश पडता है। निक्क्त (१।१४) में कहा है-'भवनि हि निप्पन्न भिव्याहारे योगरीष्टि' अर्थात् पिसी सद के बोलचाल में प्रचलित हो जाने पर ही उसकी व्युत्पत्ति देखी जाती है कि इस यस्तु का यह नाम क्यो पहा । 'पूपियो' को रति मे चाहे प्रिय (पैलना ) का म्पान न हो किनु उसी में मम्वट 'प्यु' (पला हा) पद तो है जिससे इसकी उत्पत्ति हो सकती है? क्रियायें ही पदा को उत्पन्न करती है अर्थात् कोई पद पिसी क्रिया से पहल सम्बर होता १. मुम्नाबर-दगी का बाप (१)- समन्धनन रन दादा भुवनत्रयम् । सीमापामोनिरासमार नदीया (१२५) है, भले ही लक्षणा, रूपक आदि कारणो से उनके अर्थ की विकृति हो जाय । निष्कर्ष यही निकलता है कि वे मनुष्य के द्वारा की जाने वाली प्रियाओ से ही शब्दो का सम्बन्ध मानते हैं। धातुओं पर विचार करते हुए मैक्समूलर ने कहा है कि इन धातुओ को तीन विशेषतायें हैं-(१) इनमे निश्चित ध्वनि होती है जो भाषा के ध्वनि-नियमो के अनुसार बदलती है, (२) प्रायः इन सबो मे ही मनुष्य के द्वारा की जाने वाली किसी क्रिया का अर्थ छिपा हुआ रहता है, (३) ये विचारो को व्यक्त करते हैं, वस्तुओ के मानसिक- संस्कार को नही। यास्क का इस सम्बन्ध मे अपना मन आधुनिक-भाषाविज्ञान की दृष्टि से सन्तोषजनक नहीं है क्योकि इस सिद्धान्त में ध्वनि से अर्थ का कोई सम्बन्ध नही दिखलाया गया है। यास्क की व्याख्या मनोविज्ञान की ओर सकेत करती है जैसा कि स्टाउट का कहना है-प्रत्यक्षीकरण बहुधा शारीरिक- गतियों से जुडा रहता है। इस प्रत्यक्षीकरण के बाद इटाओ की पूर्ति के लिये शरीर में चेप्टायें होती हैं और वे ही चेष्टाय उन वस्तुओ से जुड़ जाती हैं अर्थात उन वस्तुओं को देखकर शरीर मे पुन वैसी ही गनि उत्पन्न होती है । इसी क्रम से मनुष्य की ध्वनि भी उत्सन्न होकर ( चूंकि यह घेष्टा ही है ) वस्तुओं से सम्बद्ध हो जाती है। इस प्रकार भाषा उत्पन्न होती है। यास्क भी मनुष्य की त्रिपामो से ही शब्दो की उत्पत्ति मानते हैं परन्तु उचित साधनों के अभाव मे उमसे मानेन रद सके। तथापि उनकी देन भाषाविज्ञान के इतिहास में बहुत महत्त्वपूर्ण है । अब हम क्रमश. भाषाविज्ञान की पाखाओ पर निरुक्त रूपी फल की सगति बैठायें। यद्यपि निर्वचन के सिलसिले में बहुत कुछ कहा जा चुका है किन्तु उन पर पृथक्-रूप से विचार करना अयुक्त न होगा । (१) ध्वनिविज्ञान-शिक्षामन्यो में अक्षरों ये म, उच्चारण आदि का वहुन सुन्दर वर्णन किया गया है, याम्ब ने अनावश्यक समक्ष पर इन बातो का उल्लेख भी नहीं किया है विन्तु ध्वनि के कुछ मिद्धान्तों को इन्होंने प्रातिशामों से भी बागे बढ़ार दिया है । ध्वनिविज्ञान की शाखाओं में पाप के निरीक्षण अत्यन्त तथ्यपूर्ण हैं घोर आपनि अनुगन्यानों में अनुकूल है । भी एक शारीरिक १. Three Lectures on Science of Language, P..९. २.Stout, Manual of Prnchology, Book II, CisP5 ३ vide, Alles, Phonetics in Ancient India. (११६) (क) स्वरविकार ( अपश्रुति Ablaut) के जितने भी रूप संस्कृत- भाषा मे उपलटर हैं मयो का परिचय यास्क को है। हम यह जानते हैं कि संस्कृत भाषा मे केवल परिमाणात्मक (Quantitative) स्वरविकार होता है । एक ही स्थान से उच्चरित होने वाले स्वरों में पारस्परिक परिवर्तन होता है जो उच्चारण काल के आधार पर निश्चित होता है। ये विकार हैं-गुण, वृद्धि और सम्प्रसारण । यहाँ हम गुण और वृद्धि का निदान करते हैं- प्रथम ३ श्रम (grade) ऋ द्वितीय क्रम ( grade) ओ अर् तृतीय ऋम ( grade) औ आर इनम प्रथम क्रम को मूल-स्वर मू० मा० यू० मापा का ह्रसित-कम ('reduced' grade or 'Vollstufe') कहते हैं। द्वितीय क्रम पाणिनि का 'गुग है जिसे मू० भा० पू० का सामान्य म ( 'Normal grade) पहने हैं। तृतीय क्रम पाणिनि को 'वृद्धि' है ( Lengthened grade)। यास्क स्वर के इन सभी विकारो से परिचित हैं भले ही उनका नाम न दें। दिपक्षी जिसका निर्वचन है 'वेते. गतिकर्मण' अर्थात् वि<वेति । यही नहींएक जाह वे गुण का नाम भी लेते हैं-'शेव' इति सुखनाम । शिष्यते । यार. नामकरण | अलस्थान्तरोपलिङ्गी गुणः (१०।१७)। इसमे /शि मे 'शेव' हो जाना गुण के कारण कहते हैं। इसी प्रकार वृद्धि का क्रम रखत है-वानरः कस्मात् विश्वान् नरान् नयति (७१२१) जिसमें विश्य से 'वेश्व'-यनाया गया है। इसके बाद (२३ म) तो वृद्धि से बने पन्नों की भरमार हो कर दी है और यह भी स्पष्ट है कि उनके पारस्परिक सम्बन्ध को वे जानते भी थे। देखें-वधुत. (<विद्युत- ), श्रौत्तमिवानि (<उसम- ) मागानि (<भा.) सावित्राणि (< सवितृ.), पोरणानि (<पूपन्- ), यंगवा (<विष्ण-), माग्नेयेषु ((अग्नि-). आदित्य (अदिति-) इत्यादि। मार मो जातो यास ने एप स्थान पर हो प्रयोग किया है (१५)-अभिातौमि, स्तुन्या इममे मा यति, मूल और गुण विकार स्वर हैं। फिर-', ऐत्रि स्तोम- १.शिप (१० तु. ११t)-भामर भी परिदो दपि मन मे दूसरे से देखा। (१७) इति सत , रोल्यमाण.' द्रवति इति वा-~यहां भी मूल वृद्धि और गुण- विकार के स्वर हैं । ऋकार के क्रमो का भी कई जगह निदशन है जैसे- प्रत्युतः सर्वाणि भूतानि । तस्य वैश्वानरः (२१) अर्थात् .Vऋ से 'अर' (विश्वन् + अर ) बना है । पुन: 'पभस्य = वपितु' (७।२३ ), वर्णो वृणोते. (२॥३)-ये गुण-विकार है । 'आष्टिपेणः ऋप्टिपेणस्य पुत्र' (२०११)- ऋ का आर् ( वृद्धि का विकार है )। (ख) सम्प्रसारण की विधि से भी यास्क पूर्ण परिचित हैं । य, व, र जैसे अर्धस्वरो के स्थान मे इ, उ, ऋ, होना ही सम्प्रसारण है। आधुनिक भाषा-विज्ञान ने इसकी पृथक सत्ता मानी है। यास्क ने इसका लक्षण कुछ विचित्र-शब्दो में किया है-तद् यत्र स्वराद् अनन्तरान्तस्थान्तर्धातु भवति तद् द्विप्रकृतीना स्थानमिति प्रदिरान्ति ( २१२) जैसे- अब >अति. म्रिद् >मृदु, प्रथ्>पृयु, यज्>इष्टः इत्यादि । यासक सम्प्रसारण को द्विप्रकृति कहते हैं, इसकी व्याख्या मे दुर्गाचायं का कहना है कि सम्प्रसारण वाले धातुओ के दो रूप होते हैं--एक अपना (बिना सम्प्रसारण के ) और दूसरा सम्प्रसारण का, जैसे--/यज का अपना रूप है यष्टा, यप्टु, यष्टव्यम् और सम्प्रसारण-रूप है इप्ट, इष्टि, इष्टवान् इत्यादि । (ग) ध्वनि-परिवर्तन की विभिन्न रीतियो से यास्क का परिचित होना आश्चर्यजनक है । द्वितीय अध्याय के आरम्भ में ही उन्होने इन परिवर्तनो की दिशाओ का निर्देश किया है जिन्हे हम देख चुके हैं । आधुनिक भाषा-विज्ञान के अनुसार ये ध्वनि-परिवर्तन दो तरह के हैं-स्वयम् उत्पन्न ( unconditional ) और परोत्पन्न ( conditional ) 13 स्वयं ही उत्पन्न होनेवाले ध्वनि-परिवर्तन के विषय में पुछ कहा नहीं जा सकता। भाषा के प्रवाह में ये परिवर्तन हो जाते है, इनका कोई कारण नहीं दिया जा सकता। यद्यपि ये भी अकारण नहीं होते किन्तु परिवर्तन का कारण न जान सक्ने से ही इन्हे ऐसा कहना पड़ता है। संस्कृत 'अश्रु' हिन्दी मे 'आँसू' क्यो हो गया, कहना कठिन है। इसी तरह-मूल्य >मोल, हृदय>हिया, पुष्कर>पोखरा, १ 'रोल्यमाण" में यह होने के कारण अभ्यास को गुण हो गया है जैसा कि पाणिनि ने कहा है-गुणो यहलुको. (पा० सू० ७४४८२) २. ग्यणः सम्प्रसारणम् (पा० सू० १।११४५) ३ देसिए-Dr. P. D Guve, Introduction to Comparative Thilor logy PP 40-58. (०११८) पिण्ड>पेंडा । मू० भा० यू० भाषा के अ, (ह्रस्व ) एं और (ह्रस्व ) माँ मस्कृत मे 'अ' ही रह गये । दूसरी ओर पोत्पन्न ध्वनि-परिवर्तन के कारणो को जाना जा सकता है जैसे-वाग्यम्प को ( Physiological ) या प्रवणेन्द्रिय ( acoustic) को विभिन्नना, सादृश्य (Analogy ), स्वा- घात ( Accent ). भौगोलिक प्रभाव इत्यादि । यास्क ने यो तो दोनो प्रकार के परिवर्तनो के उदाहरण दिये हैं क्योकि बाज उनका अध्ययन किया जा चुका है परन्तु परिवर्तनों के लिए कोई कारण न देने से उन्हें 'स्वयमुत्पन्न' परिवर्तन मानें तो कोई आपत्ति नहीं। हा० स्कोल्ड ने यास्क के निबंचनो के सिद्धान्त की त्रुटि (?) दिखलाते हुए लिखा है कि मास्क के निरीक्षण ठीक हैं पर निष्कर्ष गलत । 'जामतु ' मे उपघालोप हुआ है-ठीक है। पर सब जगह उपघालोप होगा--यह कहना गलत है। यहाँ विदेशी विद्वान ने समझने में ही गलती की है। यास्क ने इन सिद्धान्तो को दृढ नियम नहीं माना, बल्कि ये निरीक्षण अनियमित परि- वर्तन ( Sporadsc change ) मे ही आते हैं। वे केवल यही कहते हैं- अथापि उपधालोपो भवति = कहीं कहीं उपघा का लोप देखते हैं, जैसे 'जागतु । मी तथ्य को भाषाविज्ञान मध्यस्वरलोप (Syncope) कहना है। इसका अभिप्राय यह नहीं है कि यास्क ने या भाषा-विज्ञान में इसे दृढ नियम बना दिया है कि सर्वत्र यही बान मिलेगी। सत्य तो यह है कि भाषा मे हुए परिवर्तनो की पाख्या करने की चेष्टा दोनो ने की है । यास्क भी भाषा विज्ञान के साथ-साथ ही स्वीकार करते हैं कि ये परिवर्तन देसे जाते हैं--भविष्य में भी होगे, इसमें सन्देह है। यहाँ आधुनिक शब्दावली का आवरण यास्क को दिया जाता है :- (ग) मादि स्वरलोप ( Aphesis )--यास्क कहते हैं--अपापि अस्ते. निवृत्तिस्थानेषु (Weak Terminations) आदिलोपो भवति, जैसे--- १. प्रो० युगमन (Brugmann) में इन दोनों प्रकार के परिवर्तनों को यों समझाया है-- Unconditional phonethe charge is the change wheb an In diridaal sound undergoes, without the determining inloence of the pirkular kiod of the acto pay sounds, or the accent, or the 14n_uage rhythm, while conditional change is wbere such influences -- take place " ० गुगे या पुसक (पृ० ४६) में उन्त । २. देखिये भूमिका, तृतीय परिच्छेद (ख)।
अस्>स्त:, सन्ति । यह लोप स्वराघात ( accent ) के कारण होता है क्योकि किसी स्वर पर विशेष बल ( Stress ) देने से दूसरे स्वर सुनोच्चारण हो जाते हैं, 'स्त:' पर जोर देना ही 'अ' के लोप का कारण है। अंग्रेजी मे esquire से squire होने का भी यही कारण है। कम-से-कम यास्क तो इस तथ्य से अवश्य परिचित थे। ( आ ) मध्यस्वरलोप ( Syncope )-~यास्क का 'उपधा-लोप' जैसे- गम् >जग्मतु , जग्मु.। दूसरे स्थानो मे भी यास्क ने ऐसे परिवर्तनों के उदाहरण दिये हैं । राजन् से राजा, दा से दित्सति आदि भी ऐसे ही परि- वर्तन के उदाहरण हैं। (इ) सवर्णलोप (Haplology)--यास्क ने जो 'धात्वादी एवं शिष्येते' कहकर 'प्रतम्, अवत्तम्' (/दा ) आदि उदाहरण दिये हैं ये इसी के हैं । 'प्रदत्त' 'अवदत' से समानता होने के कारण दकार का लोप हो गया है।' 'उत्तर' की व्याख्या मे उन्होने 'उद्धततर' कहा है। यद्यपि भाषाविज्ञान की दृष्टि से यह निर्वचन ठीक नहीं तथापि यह यास्क के सवर्णलोप के ज्ञान को प्रकाशित करता है। (ई) मध्यस्वरागम या म्वरभक्ति ( Anaptyxis)-यद्यपि बीच मे स्वर के आगमन से ही यह सम्बन्ध रखता है तथापि व्यजनों के आगमन में भी यही नाम देने की प्रणाली चल पड़ी है। यास्क इसे 'वर्णोपजन' कहते हैं जैसे- अस् >आस्थत् । किन्तु उनका दिया हुआ/भ्रस्ज से भरूजा का उदाहरण तो शुद्ध स्वरभक्ति है। अग्य उदाहरण है--स्वर्ण>सुवर्ण, प्रसाद परसाद। (उ) वर्णविपर्यय (Metathesis)-यास्क 'प्राद्यन्त विपर्यय' जिसके लिए वे उदाहरण देते हैं--/श्चुत् >से स्तोकः, सृज् > रज्जु, इस्>सिकता। (क) समीकरण ( Assimilation )-यास्क इसे 'आदि-विपर्यय' (जैसे पत् ज्योति ) के रूप में स्वीकार करते है यद्यपि इसके उदाहरण निरुक्त मे भरे पडे है। इसी के द्वारा वे विषमीकरण ( dissimilation) का भी उदाहरण दे देते हैं जैसे हन् >घन; भातव्यापत्ति मे पुछ ऐसे उदाहरण भी है--/गाइ,>गाषः । का १. तुलनीय-'अच उपसर्गातः (पा० सू०७४|४७) (१२० ) + (ऋ) महाप्राणीकरण (Aspiration)-अल्पप्राण का महाप्राण-वर्ग बनना जैसे- म>मघ । अन्य उदाहरण हैं-गृह>घर। (ऋ) अल्पप्राणीकरण ( Deaspiration )जैसे-/ भि>बिन्दु । इस नियम से अभ्यासस्थ वर्णों का अल्पप्राण होता है-भभूव >बभूव; हहार>जहार । यही नहीं, यास्क ध्वनि नियमो को ओर भी सङ्केत करते हैं । निर्वचनो के ध्वन्यात्मक-सिद्धान्त का विचार हम ऊपर कर हो चुके हैं। इसलिए उनको आवृति व्यर्थ है । यदि सभी निर्वचनो वा अध्ययन आधुनिक ध्वनि-विज्ञान की दृष्टि से किया जाय तो एक अच्छा अनुसघान हो सकता है । (२) रूपविज्ञान ( Morphology)-वाक्य शब्दो से बनते हैं। इसलिए शब्दो की रचना का भाषाविज्ञान में बड़ा महत्व है । शब्दो के निर्माण के बाद भी उनमें सम्बन्ध तत्व ( morpheme) की आवश्यकता होती है। मही तत्व वाक्य के सभी शब्दो को जोड़ता है और अर्थतत्वों का (semanterne) परस्पर-सम्बन्ध बतलाता है । सदोष मे हम यो फहें कि सम्बन्ध- सत्त्व से ही शब्दो को वाक्य मे स्थान मिलता है और इसके कारण ही वे रूप का परिवर्तन करते हैं 1 शब्दों के विभिन्न रूपो का अध्ययन करना ही रूपविज्ञान का कार्य है। चूंकि भाषा मे सबसे पहले शब्द ही हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं इसलिए अत्यन्त प्राचीन काल से ही मनुष्य इस पर ध्यान देता रहा है। व्याकरणशास्त्र की तो यही जड है। यास्क भी अपने समय के विकसित रूपविज्ञान का परिचय देते हैं। यास्क ने चार पद-भेद माने हैं जिनका वर्णन ऊपर हो चुका है । पदो के इन भेदो मे ही वे सभी शो को अन्तर्भूत कर लेते हैं। उपसर्गों और निपातो की तो अल्पसंख्या होने के कारण उन्होंने गणना भी करा दी है। तथापि विस्मयद्योतक कितने ही पशब्द छूट गये हैं जंस है, अये इत्यादि । रूप परिवर्तन के लिए यास्क का शब्द है 'व्यय' । १. तुरनीय-एकाचो बशी मष् झपन्तस्य रध्वो (पा० सू० ८।३७) २. तुलनीय-झटा जश् झशि (14३), यता जशोऽन्ते (३९), स्था अल्पप्रागीकरण का प्रेसमैन । सिद्धान्त जिसमें एक धातु में केवल एक ही महाप्रा की सत्ता स्वोरत है। देसिवे-मगरदेव शाली-भाषाविज्ञान या किसी अन्य पुस्तक में भी। २. सम्बन्ध-तत्व और अर्थ-नाव के लिए देखें-मोटानाय तिवारी के 'भाषाविद्यान' में रूपविचार। (११) रूपपरिर्तन होने वाले शब्दो को वे 'दृष्टव्यय' कहते हैं तथा इससे इतर शब्द अव्यय हैं। उपसर्ग और निपात तो अन्तिम भेद ( अव्यय ) मे ही आते हैं किन्तु भाषा मे प्रधान-स्थान रखने वाले शब्द हैं-संज्ञा (नाम) और क्रिया (आस्यात)। इनका रूप-परिवर्तन सम्बन्ध-तत्त्व के ही आधार पर होता है। सजा-शब्दो के प्रति सम्बन्ध-नत्त्व का प्रधान कार्य है-कारको, वचनो और लिङ्गो को प्रकट करना अर्थात् सज्ञा की विभक्तियो का निर्णय करना । झिपाओ के प्रति इसका प्रधान कार्य काल, वचन और पुरुप का द्योतन-मात्र है । यास्क सम्बन्ध-तत्त्व के इन सभी कार्यों से भली-भांति परिचित हैं क्योकि कई स्थलो पर उन्होंने विभक्तियो के नाम दिये है जैसे--निऋत्याः' शब्द में 'आ' होने के कारण वे इसे पञ्चमी या पष्ठी विभक्ति मे होने का भ्रम मानते है क्योकि दोनो विभक्तियो मे 'आ' प्रत्यय लगता है। पुनः, चतुर्थी मे ऐ' प्रत्यय का भी उल्लेख करते हैं।' बचनो का भी नाम वे जहाँ-नहीं देने हैं जैसे- (२०२४) अपि द्विवत् , अपि बहुवत् अर्थात् विश्वामित्र ने नदियो की स्तुति द्विवचन और बहुवचन मे की। क्रियाओ के सम्बन्ध-तत्व की स्पष्ट चर्चा नहीं है वेवल पुरुषों का उल्लेख उन्होने किया है। सप्तम-अध्याय मे ऋचाओ के भेद करते समय तीनो पुरुषो का क्रमश (प्रथम, मध्यम, उत्तम ) रल्लेख किया है। काल के विषय मे तो वे मौन हैं किन्तु उनके प्रयोग बतलाते हैं कि क्रिया के इस तत्त्व से भी वे अवश्य परिचित थे। यद्यपि वैदिक-युग मे कालो और लकारो के विषय में कोई निश्चित नियम नही था तथापि पाणिनि के कुछ ही पूर्व होने के कारण यास्क से इतनी अपेक्षा रखी हो जाती है। यास्क के समय व्याकरण-शास्त्र का इतना अधिक विकास हो चुका था कि इन सभी विषयों मे यास्क के ज्ञान पर सन्देह नहीं किया जा सकता। पाद की रचना के विषय मे तो याद आने क्षेत्र के एक ही हैं। ये स्पष्टतपा मानत हैं कि मम्मों की रचना दो तरह से होती है-ए तो धातु से निकले शन और दूसरे इन बने हुए शब्दो से बने शब्द। पहले की याक ने बयाकरणो के साय-ही-साथ 'कृ' नाम दिया है और दूसरा प्रकार 'तदिन' है। ऐसे तदितमन्दों के निवंचन मे वे अधिष सावधान है तथा १. 'दूओ नित्या दमारगाम-म्यर्था वा षष्ठयप्रेक्षा या आगारानम् । 'परी नित्या आ चच-वनुष्यप्रेक्षा ऐकारानन् (नि. ११७)। ( १२२) । . इनके लिए नियम देते हैं कि पहलै तद्धितांश निकाल लें तब शब्द का कृदंश निकाल कर निर्वचन करें। एण्डय' मे तद्धिताश है 'य' जिसका अर्थ होगा-योग्य होना, सम्पन्न होना (दण्ड के योग्य होना, दण्ड से सम्पन्न होना )। उसके निकलने पर 'दण्ड' रचना है जो दद् (धारण करना) से बनता है। ऐसे ही बाधिगण, कक्ष्या आदि शब्द हैं। इस प्रकार शब्द के निर्माण में कृदन्त ( Primary ) और तदित ( Secondary ) व्युत्पत्ति मानकर उन्होने भारत-यूरोपीय भाषाओं सबसे पहले रूप-विज्ञान का विचार प्रस्तुत किया है। इतना ही नहीं, शब्दों के मेल से बनने वाले समासों पर भी यास्क की दृष्टि रहती है जिनके विषय में वे कहते हैं कि ये भी पहले अलग-अलग कर लिये जाय तब समासस्थ-पदो का निर्वचन दिया जाय। इसके . उदाहरण दिखलाने के लिए उन्होने राजपुरुष, कल्याणवर्णरूप आदि शब्दो की व्युत्पत्ति दी है। भाषा की प्रारम्भिक अवस्था मे समासो को सत्ता शून्य-सी रहती है। इनमा अत्यधिक प्रयोग पविज्ञान और इसलिए मावा की प्रोदि का योतक है जैसा कि कादम्बरी, वासवदत्ता आदि संस्कृत के पिछले सपो मे हम पाते हैं। (३) अर्थविज्ञान (Semantics or Semasiology )-ध्वनि यदि शब्द का आवरण करने वाला चर्म है और रूप उसका शरीर, तो अर्थ उसके प्राण है जिसके बिना कोई भी शब्द निॉव या निरर्थक होता है। मद्यपि नियंचन को उपर्युक्त तीनों विज्ञानों की राहायता लेनी पड़ती है तथापि अर्थ-विज्ञान को ही आधारशिला पर निरुक्त टिका हुआ है। शब्दों पा अर्थ निकालने के लिए ही तो निरुक्त का इतना बडा प्रपञ्च है, इसलिए कोई सन्देह नहीं कि यूरोप में भले ही इसका ज्ञान पीछे हुआ, किन्तु भारत मे अर्थतत्त्व का वध्यपन यास्क से ही आरम्भ हो जाता है। बाद मे १. 'अथ तद्वितसमामेषु एकपर्दसु च अनेकवत च पूर्व पूर्वम् अपरमपर प्रविमन्य निम्यान । दण्यः पुरुषः । दण्डमहति वा, दण्डेन सम्वद्यते इति वा । दण्डो ददतेः धारयतिकर्मगः (निस) २. रूपविज्ञान से परिचय के लिए देखें--Taraporewala, El.of the Sc. of lang. pp. 158-191, अश्वा HOn to Parse नामक अन्य। ३. माइकेल मील का 'ऐसे द सिमंन्तिक (Essan de Semantigue, 1898) इस विषय का प्रथम ग्रन्य है।
वैयाकरणो, नैयायिकों और मोमासको ने तो दार्शनिक हथिकोण से इस पर विचार भारम्भ कर दिया और उसे प्रौढि पर पहुंचा दिया।' शब्दो के अर्थ का अध्ययन करते हुए हमे दो चीजें आकृष्ट करती हैं- किसी शब्द से किसी निश्चित अर्थ का ही बोध होना और अर्थ वा परिवर्तन । इन दोनो वा ही विचार याक ने किया है । इसमे पहला प्रश्न है कि कोई शब्द किसी निश्चित अर्थ का ही द्योतक क्यो है ? क्या कारण है कि पहाड को पर्वत' कहते हैं ? यास्क के सभी निर्वचन हो इस प्रश्न के उत्तर में लगे हुए हैं । शब्दो का सम्बन्ध क्रिया से है, क्रिया का ही अर्थ शन्द श्री धारण कर लेते है । भले ही इस सिद्धान्त के प्रतिपादन और व्यवहार में क्षपने हठ के कारण यास्क कई जगह त्रुटियों से भरे हैं तथापि यह कल्पना ही कोई कम महत्व नहीं रखती कि क्रिया योर सजा का पारस्परिक सम्बन्ध अर्थ में होता है । माग को 'अगिन' इसलिए कहते हैं कि यह अग्रणी है. यह में इसकी आवश्यक्ता आगे ही होती है। इसी प्रकार सबो का निर्वचन किया गया है । कहीं-कहीं पशब्दो के नाम पडने में लक्षणा भी सहायक होती है भले ही उसरे मूल में भी क्रिया ही काम करती है। अलकार मी (जैसे उपमा, रूपक ) सहायता करते हैं जिन्हें अयं-परिवर्तन के क्रम में हम देखेंगे। शब्दो का अर्थ-परिवर्तन भी एक सुस्थित तथ्य है। कभी-कभी तो कालत्रम से एक शब्द अपना बर्थ छोड देता है और दूसरा हो वयं धारण कर लेता है जैसे—'गा' का वैदिक-भाषा मे अर्थ है पशुमान, किन्तु सत्त मे 'हरिण' । कभी-कभी एक ही समय मे पब्द अपने अयं के अलावे दूसरे अर्थ भी धारण करते हैं जैसे- 'अधं' = अभिप्राय, प्रयोजन, धन आदि. 'कर' = किरण, हाय, संथादि । इस अवस्था में एक पद के अनेक अर्थ होते हैं । दोनो दशाओं में अर्थ का परिवर्तन कुछ कारणों से होता है। कभी- कभी हम देखते हैं कि एक ही वस्तु का बोध कराने के लिए सईद होते है जो वस्तु के विभिन्न गुणों के आधार पर बने होते हैं जैसे-हिमांशु, पान, इन्दु, चन्द्रमा, कुमुदवाय आदि। पानिव भाषाशास्त्री की भांति या को पता है कि कोई भी पर्यायवाची शब्द वस्तुप पर्यायवाची नहीं होता, वह विभिन्न गुणों के आधार पर ही बना है जैसे-'यो' का एक नाम 'गो' इनमत्रों से अविशन का परिचय पाने के लिए-(R)'.c Cistrar vartr. Linguistic Speculations of the Hindus alk (स) १० पिस्दैव द्विवेदी, 'अर्थ विहान और व्याकरण न देखें। (१२४) है जो उसमे रहने वाले प्राणियो की गति का बोध कराता है, तो 'पृथिवी' से उसका विस्तार मालूम होता है । इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि एक ही वस्तु का द्योतन करने के लिए कितने भी नाम क्यो न हो, सूक्ष्मदृष्टि से देखने पर सबो म अर्थ का अन्तर मिल ही जायगा ।' भाषा-विज्ञान ने जो अर्थ-परिवर्तन को तीन दिशायें निर्धारित की है, यास्क उनके विषय मे कुछ नहीं कहते किन्तु. अयं परिवर्तन के कारणो पर तो स्थान-स्थान पर प्रकाश डालते हैं। उनके विचार से उपमा ( सादृश्य ), रूपक और तातित प्रयोग ही अर्थ परिवर्तन के मुख्य कारण हैं। एक सादृश्य लें-कक्ष्या' घोडे की रस्मी है जो उसके कक्ष ( काँख) से बंधी रहती है । इसी घोडे की कांच के सादृश्य से मनुष्य को काँख भी 'कक्ष' कहलाती है।' फिर देखें, पशु के चार पाद (पर) होते हैं उनके सादृश्य से ही पाद का अर्थ 'चौथाई हिस्सा भी हो गया। कितनी सुन्दर व्याख्या तादित प्रयोग के लिये 'गो' के विभिन्न पाब्दार्थ अच्छे उदाहरण होगे। 'गो' का अर्थ है पृथ्वी और उसी प्रकार इसका अर्थ गाय भी होता है। गाय से सम्बद्ध अर्थों का यदि यह बोध करावे तो उसे ताचित प्रयोग कहेंगे।" गो के अर्थ हो जायेंगे-गोदुग्ध, सोम चुलाने के लिए गोचर्म, गौ को तान, कफ आदि । गो को ताँत का प्रयोग धनुष मे होने के कारण धनुप भी 'गो' कहा जाता है। यही नहीं, अर्थादेश ( Transference of Meaning) का प्रभाव भी देखने में आता है जब 'गो' से सूर्य, चन्द्रमा और सभी प्रकार को किरणों का बोध होने लगता है। है देखिये-Dr Bita Krishna Ghosh, Linguistic Introduction to Sanskrit, pp 23-35 २ कभी-कभी अर्थ में मोचन ( Speeralheation) होता है मे--'ग' (पशु' वैदिक भाषा में,-'इरिण' सम्कृत में ), 'मुर्घ' ( = 'पक्षी' अवेस्ता में,- 'मुर्गा' हिन्दी)। कभी कमी अर्थ में विस्तार (Generalisation) होता है जैमे-'परश्च । ( आने वाला परसों-सस्कृत में ; बीना और आनेवाला दोनों परसों-हिन्दी में)। पभो-कभी अर्थ का पूरा परिवर्तन (Transference) हो जाता है-ग्राम्य ( - ग्राम- पासी>मून), देवाना प्रिय ( देवताओं का प्रिय >मूर्स)। ३. उत्सामान्या मनुश्यका । वाहुमूलसामान्यादश्वस्य (नि० २।२)। ४. पशुपारप्रति प्रभागपाद (निस)। ५ सुलना करें-Syerda he, Metonymy नाम: अलदार (rigures of Sree h) (१२५) सप्तम-अध्याय मे जातवेदस् और वैश्वानर के वास्तविक अर्थ के अन्वेषण मे यास्क बहुत बडी विवेचना करने लगते हैं तथा आधुनिक अनुसंधान के नियमो का प्रयोग करते हुए पार्थिव-अग्नि को ही इनका वास्तविक अर्थ मिद्ध करते है। समूचे निरुक्त का मन्थन करने पर अर्थ-विज्ञान सम्बन्धी बहुत से गुथ्य हमारे समक्ष उपस्थित होते है जिनकी विवेचना यो लिए पर्याप्त स्थान की अपेक्षा है । तथापि यह कहा जा सकता है कि यास्क के काल मे अर्थ-विज्ञान का इतना उत्कर्ष हमे आश्चर्य मे डाल देता है। न्याय-व्याकरण आदि शास्त्रो में भौतिक-जगत से उठकर इस पर दार्शनिक-विचार प्रस्तुत किया जाने लगा था । (४) वाक्य-विज्ञान (Syntax )-वाक्य भाषा की इकाई है क्यो. कि भाषा के लक्ष्य ( विचारो का आदान-प्रदान ) की पूर्ति करनेवाले वाक्य ही होते हैं । फिन्तु किसी वाक्य मे वर्ता, कर्म, क्रियादि का स्थान कहाँ रहता है तथा उनमे बल किस प्रकार पडता है-इन सबों का समुचित अभ्ययन अभी तक नहीं किया गया है। प्रत्येक भाषा के वाक्यों की अपनी रचना होती है. अपना क्रम होता है जो कालश्रम से बदलता रहता है। पालि की वाक्य रचना संस्कृत से भिन्न है, लैटिन वाक्य-रचना की गन्ध भी अग्रेजी मे आने पर उसमे लैटिनपना ( Latinism ) मालूम होने लगता है। आधुनिक हिन्दी कथा-साहित्य की वाक्य-रचना कुछ और ही है जिसमे प्रियायें प्राय बीच मे बा रही हैं । वाक्य-विज्ञान की दृष्टि से यास्त्र का अध्ययन करना बहुत मनोरन्जक है क्योकि वैदिक-मन्त्रो को व्याख्या में ये अपनी विशेपतायें प्रस्ट परते है। विशेषतया निम्नलिखित ध्यान मे देने योग्य है- (क) वैदिक-मन्त्रो की व्याख्या मे शन्दो के प्रम मे यास्य सामान्यतया परिवर्तन नहीं करते, कोई शब्द कही भी आ सकता है यहाँ तक कि विशेष्य और विशेषण के बीच मे क्रिया भी छोड़ देते है। परन्तु जहाँ उन्हे स्वतन्त्र. रूप से लिखने का अवकाश मिलता है वे सस्कृत वाक्य-विन्यास की ही रीति अपनाते हैं किन्तु रियायें प्राय. अन्त मे नही रहती जैसे-'तमूचुः ब्राह्मण ; स सन्तनुः देवापिविशशिश राज्येन' (२०१०) (ख) वैदिक मन्त्रों मे उपसर्ग और क्रिया को पृथक्ता सर्वविदित है विन्तु यास्क के काल में इनका साहचर्य आवश्यक प्रतीत होता है । यही कारण है कि मन्नो की व्याख्या में वे मन्त्रस्य उपसर्ग और त्रिया को एक साथ वर देते है जैसे नि० १।१७ मै मात्र थे 'प्रति..... दुहीयत्' को 'प्रतिदुग्धाम' में बदल देते है । (१२६) (ग) वैदिक-मापा मे जहां निरर्थक ( ? ) निपात पद-पूरण और वाक्य. पूरण के रूप मे हुआ करते हैं, वहां यास्क के युग में इनकी निरर्थकता सिद्ध कर दी जाती है। स्वयं यास्क मन्त्र-व्याख्या के समय ऐसे निपातो को छोड़ देते हैं। अपनी भाषा मे यास्क इनका प्रयोग न करके केवल सार्थक और बल प्रदान करने वाले निपातों (जैसे-एव, अपि) का ही प्रयोग करते हैं । (घ) 'इनि' का प्रयोग ये सस्कृत के अनुसार उद्धरण के बाद करते हैं। (ड) यास्क के वाक्य अत्यन्त ही सरल होते हैं। सयुक्त और ससृष्ट वाक्यों का प्रयोग ये बहुत ही कम करते हैं। निर्वचन-शास्त्र (Epymology ) भी भाषा-विज्ञान का अनिवार्य अग है यद्यपि इसकी पृथक् कोई सत्ता नही । ध्वनिविज्ञान, रूपविज्ञान और अर्थ. विज्ञान के सम्मिलित प्रयोग से ही व्युतत्तियां होती है। हम अलग अध्याय मे निर्वचनो का विचार विस्तार-पूर्वक कर चुके हैं अतएव यहाँ पुन. आवृत्ति करना पिष्ट पेप मात्र होगा भाषा के इन तत्त्वो की तुलना करने पर उनके विकास का पता लगता है। यास्क भाषा के विकास से परिचित हैं क्योंकि वे वैदिक और सस्कृत दोनों भाषाओ के शब्दो को समान मानते हैं (अवन्तः शब्दसामान्यान् २।१६) । यास्क जानते हैं कि सस्कृत-मापा मे दाब्दो के अर्थ मे विकारा हो गया है जो वैदिक-काल मे नही था। डा. लक्ष्मणसरूप कहते हैं कि निघण्टु के व्यापाता और प्रायः ६०० वैदिक-मन्त्रो के टीकाकार होकर यास्क वैदिक और लौकिक-भाषाओ के घनिष्ठ सम्बन्ध को ममझने मे कभी असफल नहीं हुए होंगे। वैदिक-मापा को संज्ञायें लौक्वि-भापा को श्यिाओं से बनती है-इस विरोधी वाक्य का अभिप्राय यह है कि वैदिक काल में व मान्द सज्ञारूप में प्रयुक्त होते पे जब कि सस्कृत-युग मे सज्ञारूप मे न रहकर पियारूप.मे बदल गये। उसी प्रकार कितने शब्द क्रियारूप में थे, संज्ञारूप. मे आ गये-क्रिया का अर्थ नष्ट हो गया। मापा के परिवर्नन और विकासका अधिक स्पष्ट उदाहरण मिलना उम युग से असम्भव ही है। १DEL.Sarun The Nighantu and the Nirukta, P. 223. २.देखिये-Dr.P D. Gure को पुस्तक 'माषाविहान' (Introduction to Comparatire Philology ) # Charge of largus,e 'Larguage is always 2n a state of tax! (१२) .
. अष्टम-परिच्छेद निर्वचन-शास्त्र का इतिहास [ भारत और यूनान-वैदिक-संहिता में निर्वचन--ब्राह्मण-ग्रन्थ-- निरुक्तकारों के सम्प्रदाय-यास्क-अन्य आचार्य-पाणिनि-उणादि- सूत्र-निर्वचन की प्रणालो-यूनान -प्लेटो साहश्यवाद-धेक्स- आधुनिकयुग-ध्वनिविज्ञान का अध्ययन-१८वीं शती का निर्वचन-- २० वीं शती-कोट ।] प्रो० मैक्समूलर कहते हैं-"समूचे प्रसार के इतिहास मे केवल दो ही राष्ट्र हैं जिन्होने स्वतन्त्र रूप से बिना एक दूसरे से सहायता लिये, तर्कशास्त्र और व्याकरण--इन दो विज्ञानो पर विचार किया; ये दोनो है-यूनानी और हिन्दू ।" वे फिर कहते हैं-"जब कि यूनान में उसके एक बड़े दाशं. निका के विचार (जैसा कि केटिलस् मे अभिव्यक्त है ) निर्वचन-शस्त्र को बाल्यावस्था प्राट करते है, भारत के ब्राह्मणो ने निर्वचन-शास्त्र के कुछ महत्व- पूर्ण प्रश्नों का समाधान अत्यन्त गम्भीरतापूर्वक कर लिया था। कहने का अभिप्राय यह है कि यूनान और भारत दोनो स्थानों में निर्वचन पर स्वतन्त्र विचार किये गये थे परन्तु मारतवर्ष की प्रौढता कुछ और ही थी, वह यूनान में नहीं। भारत अपने प्राचीनतम साहित्य में ही निवेचन का सोत करता है और उसी समय राजाओं की उत्पत्ति पातु से मानी जाने लगी है । प्रस्तुम- अध्याय में हम मारत और यूनान के स्वतन्त्र अध्ययन को चर्चा करेंगे। (१) भारत-यद्यपि भाषा के सम्बन्ध में चिन्तन की प्रथम धारा ऋग्मेद में हमे मिलती है क्योकि व्याकरण, भाषा, सरस्वती आदि के विषय मे उसमे पर्यात सकेत किये गये हैं, स्तिनी ऋचाओ में शब्दार्थ के रूप में निर्वधन दिये भो गये है, तथा यजुर्वेद को तैत्तिरीय-पासा में शब्द का द्विधाकरण हम देख हो चुके हैं। तथापि तिवचन-शास्त्र का पूर्ण-विकार देखने के लिए तो हमे ब्राह्मण-प्रत्यो को ही सुरक्षित करना पड़ेगा। ब्राह्मणों 1. Max Muller, History of Ancient Sanskrit Literature, v 138. २.२ 163. १. देखें-Dr. Fatahsur ba, Vedic Etymologles. (१२) का लक्षण ही है-'हेतुनिर्वचन निन्दा०' अर्थात् निर्वचन करना भी ब्राह्मणो के लक्षण हैं । आश्चर्य तो यह है कि ब्राह्मणो के निर्वाचन ध्वनि, रूप, अर्थ बादि का पूरा विचार रखते हैं, उनमे त्रुटि प्राय नही है। यास्क ने भी कुछ शब्दो के प्रमाण के लिए ब्राह्मणो के वाक्य उद्धृत किये है। यह स्मरणीय है कि ब्राह्मणो के निवंचनों को उद्धृत करने के बाद यास्क 'इति विज्ञायते' अवश्य लिखते हैं । 'शक्वरी' शब्द को व्युत्पत्ति के लिए ब्राह्मणो मे कहा है-'तद् याभि• वृत्रम् अशकद् हन्तु तत् शक्वरीणा शक्वरीत्वम् इति विज्ञायते' (नि० ११८) अर्थात् 'शक्करी' शब्द /शक से बना है और इसका अर्थ है 'जिसकी सहायता (उच्चारण ) से वृत्र मारा जा सका। फिर 'अक्षि' की व्युत्पत्ति /अ = 'प्रकाश करना' से मानी गई है-'तस्मादेते ( = आखें ) व्यक्ततरे इव भवत. इति ह विज्ञायते' (१९) अर्थात् आँखे समूचे शरीर की अपेक्षा अधिक व्यक्त होती है । 'तृव' (एक राक्षस मेघ) की उत्पत्ति / (कना) से या वृत् (होना) से बतलाने वाले भी वाक्य हैं-'यदवृणोत् तद् वृत्रम्य वृत्रत्वमिति विज्ञायते, यदवर्तत तद वृषस्व नुवत्वमिति विज्ञायते' (नि० २०१७) । ब्राह्मण-प्रन्यो के निर्माण काल के बाद से ही निरुक्तकारो के सम्प्रदाय चल पडते हैं जिनमे औपमन्यव, आग्रायण, और्णवाम बादि के नाम बडे सम्मान से यास्क भी लेते हैं । इन आचार्यों ने भी ग्रन्य-रचना अवश्य ही की होगी जिनके अभाव मे इस समय कुछ भी निर्णय करना कठिन है कि इनके निवंचन कसे थे। यास्क के द्वारा उद्धृत इनके मतों से तो ज्ञात होता है कि ये भी यास्क से कम नहीं थे। निरुक्त के बाघार पर इनका धच्छा अध्ययन हो सकता । ब्राह्मण ग्रन्थो का निर्माण काल हमे न्यूनतम ११०० ई० पू० मानना ही पडेगा जिसके बाद से इन आचार्यों को परिपाटी यारक तक चलती है । ४०० वर्षों की इस अवधि मे जो कुछ अनुसन्धान या स्वतन्त्र चिन्तन हुआ उन सथो का उपयोग यास्क ने कर लिया है। इन छिटपुट आचार्यों के बाद भारतीय व्युत्पत्ति-शास्त्र के इतिहास मे एक ऐसे ज्वलन्त नक्षत्र का उदय होता है जिन्होंने न केवल पहले के, अपितु बाद में भी अन्य आचार्यों से बढकर काम किया और जो अपने सर्वाङ्गपूर्ण निरुक्त की रचना करके सर्वापहारी काल के कोप से भी सुरक्षित रह सके । उस युग के अन्य ग्रन्य अपनी गौणता के कारण अप्राप्य हैं जब कि यास्क १. देखें, मेरा निवन्ध-Predecessors of Yaska in Etymology. (१२९) ९ हि०नि० भू० . - के निरुक्त की कई प्रतिलिपियां मिली। लोक-स्वीकृति से बढकर और बही समालोचना क्या हो सकती है ? यास्क के काल के विषय मे विद्वानो मे बहुत मतभेद है क्यो कि इनका काल अधिकाशतः पाणिनि के कालनिर्णय पर ही आधारित है । गोल्डस्टूकर का सिद्धान्त कि यास्क से पाणिनि प्रत्नतर है अब पूरा खण्डित हो चुका है, पाणिनि से पहले यास्क थे इसमे कोई सशय नहीं है। अस्तु, मैक्समूलर, वेबर,२ कीया यादि विद्वान् पाणिनि का काल ३५० ई०पू० मानते हैं जब कि भाण्डारकर, विन्तरनित्स आदि अन्य भारतीय विद्वानो के साथ इन्हे ५०० ई०पू० मानते हैं। डा. वेलवल्कर" इन सबों की परीक्षा करके ७०० ई० पू० तक पहुंचते हैं। दूसरी ओर युधि- प्ठिर मीमांसक तथा सत्यव्रत-जैसे कुछ विद्वान् तो २७०० ई० और २४०० ई० पू० तक पहुंचते हैं। सचमुच भारतीय साहित्य के इतिहास में कालनिर्णय करना वडा कठिन है। यूरोपीय-विद्वानो को ताकिक-बुद्धि भी असफल हो जाती है । आज पाणिनि का सर्वमान्य काल है ५००ई० पू० । शंली और भाषा की दृष्टि से यास्क को पाणिनि के थोडा पहले प्राय: ७०० ई० पू० में विद्यमान मानना समीचीन है। पास्क और पाणिनि के बीच में फिर कुछ वयाकरण आते हैं जो व्युत्पत्ति का स्पर्श करते हैं किन्तु काल उन्हें नगण्य समझ कर भूल जाता है। पाणिनि के आविर्भाव रो नियंचन-शास्त्र मे एक नया जीयन या जाता है और पदों का साङ्गोपाङ्ग अध्ययन आरम्म हो जाता है। जिन यातों में यास्क हमे भ्रमात्मक शान देते हैं पाणिनि उन्हें स्पष्ट कर देते है। इनके धातुओं और प्रत्ययों में शम्द-निर्माण की अनोखी शक्ति है जिसके आधार पर प्रचलित शब्दों की प्युत्पत्ति की जाती है । पाणिनि की व्युत्पत्तियो मे ध्वनि, रूप और अयं का अद्भुत सामजस्य है जिसे भाषाविज्ञान सर्वथा स्वीकार परता है। स्वरों और व्यजनों के पारस्परिक सम्बन्ध मे पाणिनि पूर्ण परिचित हैं और विशेषतया इनपी अष्टाध्यायी के अध्ययन से ही यूरोप में भाषाविज्ञान के 1 १.History of Anrseat Sanskrit Literature, २. History of Indian Literature. ३. History of Sanskrit Literatore. Y. Geschichte der Indische Litteratar, Vol 111. ५.Systems of Sansl.nt Grmwar, क्षेत्र मे क्रान्ति पहुंची। यहाँ तक कि भाषाविज्ञान ने पाणिनि के कुछ दाब्दों को (जैसे गुण, वृद्धि, सम्प्रसारण ) ज्यो के त्यो स्वीकार कर लिये हैं। उणादि-मूत्र भी पाणिनि से ही सम्बद्ध हैं यद्यपि ये दूसरो के लिखे हुए हैं जिनमे पाणिनि के छो. हुए शब्दो की व्युत्पत्ति दी गई है। उणादि की प्रक्रिया ही ऐसी है जो शब्दो को धातुज मानती है। इस प्रक्रिया से हम सभी शब्दो की व्युत्पत्ति कर सकते हैं चाहे वह उणादि-सूत्रो के अधिकार मे नहीं आया हुआ शब्द भी क्यों न हो। इसके लिए नियम है- सज्ञासु धातुरूपाणि प्रत्ययाश्च ततः परे । कार्याद विद्यादनबन्धमेतच्छास्त्रमुणादिषु ॥ अर्थात् शब्दो मे पहले प्रकृति की कल्पना करें, फिर प्रत्यय की। कार्यों को देख कर प्रकृति और प्रत्यय मे अनुबन्ध लगा दें। यही उणादि का नियम है । इस प्रकार इस पद्धति ने निर्वचन-शास्त्र को एक नया रास्ता दिखलाया जिससे न केवल संस्कृत के, अपितु अन्य भाषाओ के शब्दो को भी सस्त के अनुसार व्युत्पन्न किया जाने लगा। इससे निर्वचन-शास्त्र की वैज्ञानिकता क्षीण होने लगी। पाणिनि की परिपाठी इतनो वैज्ञानिक थी कि इसके बाद कुछ भी जोडना व्यर्थ था । फल यह हुआ कि पाणिनि की टीका-टिप्पणी मे ही बाद के विद्वानों ने थम व्यय किया। दूसरे सम्प्रदाय वालों ने चेष्टा भी की है तो पिप्ट पेपण के लिए ही । भारतीय इतिहास में निवंचन शास्त्र का स्वर्णयुग इस प्रकार समास हो गया और नवीन-जागृति ( Renaissance) तक के लिए सारा काम बन्द हो गया । (३) यूरोप-यूनान के दार्शनिकों ने भाषा के सम्बन्ध मे पर्याप्त विचार किया था। किन्तु उनके सिद्धान्त भारत की तरह उनत नहीं थे। सबसे पहले प्रामाणिक ढंग से सुकरान (४६९ ई० पू०-३९९ ई० पू०) १. उगादि सूत्रों के शैथिल्य के विषय में एक प्रसग चलना है। किसी पण्डित ने पारसी के मिया, मुलक और मोलना सदों को मी उगादि से सिद्ध कर दिया। /मा (नापना) में उगादि के कल्पित डिया, हुलुक और डोलना प्रत्यय जोड दिये गये। '४' इसरिए लगाया गया है कि मा धातु के 'आ' (टि) का रोप, टिव-प्रत्यय होनेसे, हो जाय (डित्त्वसामोदमस्यापि ट टोप.)। उक्ति यों है- उगादि से जो प्रत्यय लिये, दियाँ, इनकदोलना। मा थानु से सिद्ध किया, मियों, मुलुक, मोटना।।
सारश्य- ने शब्द और उसके अर्थ के पारस्परिक सम्बन्ध का पता लगाया है। उनका कथन है कि वस्तु और शब्द मे स्वाभाविक नही, किन्तु एक माना हुआ सम्बन्ध है । इसके बाद उनके शिष्य प्लेटो ( ४२९ ई० पूर्व-३४७ ई० पू०) ने अपने क्रेटिलस् (Cratylus मे तात्कालिक भाषा-सम्बन्धी मान्यताओ का प्रदर्शन किया है। उस समय सादृश्यवादियो और उनके विरोधियो मे (Analogists and Anomalists) सघर्ष चल रहा था।' वादी कहते थे कि भाषा स्वाभाविक है तथा मूलत क्रमबद्ध है। इनके अनुसार शब्दो का मूल तथा उनका अर्थ शब्दो के रूप में ही है। इसी की खोज करने को वे घ्युतत्ति ( Etymology ) कहते थे। उदाहरणत उनके अनुसार 'मृगचर्म' इसलिए कहा जाता है कि यह चमडा है और मृग का है । यहाँ तक तो वे ठीक थे परन्तु अ-योगिक शब्दो की व्युत्पत्ति करने मे गलती कर बैठते थे। 'स्वर्ग' की व्युत्पत्ति वे करते थे 'चीजों को ऊपर की ओर देखना प्लेटो ने क्रेटिलस् मे इन मतो की हंसी उडाई है तथा व्युत्पत्ति का वास्तविक अर्थ दिया है कि जो शब्दो का अयं और भाव प्रकट कर दे। इससे अधिक वे व्युत्तत्ति से कुछ भी नही समझते । अन्य के समादो में उन्होंने अपने मत का समर्थन किया है किन्तु ये भी व्युत्पत्ति की शिव दशा मे ही हैं। अरस्तू ( ३८५ ६० पू०-३२२ ई० पू०)न भी प्लेटो के कार्य आगे की थोर बढाया परन्तु तात्कालिक यूनानी वट्टरता के कारण सफल न हो सके । कारण यही था कि यूनानी लोग भूल से दूमरी भाषायो वे पाद भले ले लें परन्तु अध्ययन केवल आनी भाषा पा ही करते थे जिससे शुद्ध प्युम्पत्ति देने में (विशेषतया विदेशी रामो की) पटिनाई होती थी। ईसा पो दूमरी पाती मे थे पम ( Thrax ) नामक विद्वान् हुए जिन्होने यूनानी भाषा का प्रथम च्यावरण रिम्बा । यद्यपि दे यावरण ये तथापि व्युतत्ति के भी प्रसग यत्र तत्र दिये हैं जो उल्लेखनीय नही। बाद मे लेटिन. व्यारणो मे भी इस पर जोर नहीं दिया गया। सच तो यह है, यूरोप भर में वेवल अनुमान पर ही व्युत्पतियां दी जाने रगों और यह दशा १८ वी राती सा रही जद तर पुिनर्जागरण का प्यार पान्दोग्न मही हो गया। (४) आधुनिक युग-अठारहवी गली में यूरोप में भाषा के माइन्य -Bloomfield, Language.p 4 . Exegelopaela Britanni, Vol , pp. 790-1. ( १३२ ) मे बहुत बडी क्रान्ति हुई। विभिन्न भाषा-भाषी अपने व्यापारिक सम्बन्धो को लेकर मिलने-जुलने लगे तथा एक दूसरे को भाषा समझने लगे। यहाँ तक कि पृथ्वी का प्रत्येक भाग छाना जाने लगा। इसी सिलसिले में भारत- यूरोप का सम्बन्ध भी स्थापित हुआ। पारम्परिक भाषाओं के आदान-प्रदान से शब्दो के अध्ययन में सुविधा हुई और इसके लिए दूसरे भी वैज्ञानिक- साधन उपलब्ध हुए । इस प्रकार शब्दो के मूल पर विचार करने का समय मिला और व्युत्पत्ति शास्त्र ने एक नयी दिशा पकडी। ध्वनि-विज्ञान के अध्ययन से शब्दो मे परस्पर सम्बन्ध दिखाना सरल हो गया कि शब्दों का प्रयम रूप खोजा जाय । इस प्रकार शब्द के इतिहास का पता लगाना ही निवंचन.की इतिश्री समझी गयी। इताली भाषा के 'दोना' ( Donna = स्त्री) को लैटिन भाषा के 'दॉमिना' (Domina = भद्र महिला) से निष्पन्न सिद्ध करना ही निर्वचन हो गया। निवंचनात्मक अनुसन्धान का अर्थ हो गया-ध्वनि के सिद्धान्तो के आधार पर शब्दो के रूपो की शुष्क- सूची तैयार करना ! इसी युग की देन मे श्लेगल, रेस्क, निम, बॉप, रॉय आदि विद्वान् आते हैं। रॉय ने भोटलिङ्ग की सहायता से सस्कृत-जर्मन महाकोश तैगर किया है जिसमे शब्दो को व्युत्पत्ति पर भी अच्छा प्रकाश हाला है । यह ग्रन्थ अपने विषय का एक ही है तथा आजतक इसका प्रति- द्वन्दी नहीं निकल सका भले ही इसे प्रकाशित हुए १०० वर्ष हुए । चीसवी शती के पदार्पण के साथ-साथ कई नये विज्ञानो की उत्पत्ति हुई तथा निर्वचन का अर्थ भी बदलने लगा। अब निर्वचन का पता लगाने का अभिप्राय हुआ-किसी शब्द से सम्बद्ध संस्कृति, सभ्यता, इतिहास, भूगोल शादि का पता लगाना जिन-जिन स्थितियो में शब्द का परिवर्तन हुआ। उपर्युक्त 'दॉमिना' से दोना' को उत्पत्ति मानने मे तुस्कानो-प्रदेश का अध्ययन करना पड़ेगा जो 'होल्ने निल नुमोवों' ( dolce stil nuovo ) की काव्यधारा का जन्मस्थान है जिस धारा मे स्त्रियो को समस्त पार्थिव सौन्दर्य और देवस्व का प्रतीक समझा जाता था। इसके प्रभाव से वंसा परिवर्तन हुआ। वर्तमान शती की इस प्रवृत्ति ने ही भाषा के आधार पर प्रागति- हासिक अनुसंधान ( Linguisitc Palaeontology ) का जन्म दिया। Collier's Encyclopaedia, Vol 7, P 469. २ वही। (१३३) निर्वचन-शास्त्र का इतिहास स्कीट (Skeat) के नामोल्लेख के बिना अधूरा हो रहेगा। इन्होने अंग्रेजी-भाषा के शब्दो का निर्वचनात्मक कोश तैयार किया है जिसकी भूमिका में निवंचन करने के दस सिद्धान्तो का वर्णन किया है जिनमे मुस्य ये हैं--(१) शब्दो का पहला रूप और प्रयोग का पता लगा लें, कालक्रम का ध्यान रहे । (२) भूगोल और इतिहास पर भी दृष्टि रहे क्योंकि शब्द उधार भी लिये जाते हैं (३) ध्वनि के नियमो को देखते रहे, विशेषतया आय-भाषाओ के व्यकजन-सम्बन्ध और स्वर को न भूलें। (४) शब्द के पूरे अश की व्युत्पत्ति होनी चाहिये । ( ५ ) परस्पर असम्बद्ध भाषाओ मे केवल रूप की समानता पर न दौडे । (६) जब दो भाषाओ मे शब्द अत्यन्त समान हो तब समझें कि एक ने दूसरे से उधार लिया है । इसके अलावे स्कीट ने स्वतन्त्र रूप से भी अग्रेजी-निर्वचन-शास्त्र पर पुस्तक लिखी है। खेद है कि भारतीय-मापाओ में किसी पर भी ऐसा अध्ययन प्रस्तुत नहीं हुआ। टर्नर का नेपाली कोश अपने ढग का अनूठा ही है किन्तु उस एक अन्य के आभारी हम कहाँ तक रहेगे ? आवश्यक्ता इस बात की है कि सस्कृत या हिन्दी का निवंचनात्मा-कोश तैयार हो जिसमे शब्द के मूल-रूप के साथ-साथ परिवर्तन करनेवाली परिस्थितियों का उल्लेख हो। इस महान कार्य से भारतीय भाषा-विज्ञान के एY अस्पृष्ट अग की पूर्ति हो जायगी। अपने निर्वचन-परिशिष्ट में हम कुछ ऐमा करेंगे। (१३४) नवम-परिच्छेद निघण्टु और निरुक्त के टीकाकार [स्कन्दस्वामी (५०० ई०)देवराज ( १३००)-इनको विशेष ताय-दुर्गाचार्य-(१३००-५० ई.)-इनका दुष्य-स्थान-काल. निरूपण-महेश्वर (१५:० ई०)-आधुनिक विद्वानों के कार्य-रॉय- सामग्रमी-सरूप-कोल्ड-राजवाडे-सिद्धेश्वर वर्मा-निरुत के मुद्रित-संस्करण।] हम जानते हैं कि निघण्टु वैदिक-शब्दों का सङ्ग्रह है और निरुक्त उसी पर भाष्य है । शब्दकोश व्याख्या की आवश्यक्ता तो होती ही नहीं और उसके भाष्य की व्याख्या भी क्या होगी? निरुक्त स्वय. व्याघ्या-रूप में है, तथापि भारतीय मस्तिष्क कभी भी किसी अन्य को निर्यास्पान नहीं देख सकता है चाहे वह अन्य सरलतर क्यों न हो। हितोपदेश की व्याख्यायें भी क्या नहीं हैं। यही कारण है कि निघण्टु और निरुक्त पर भी टीकायें ही नही, तथा कषित भाष्य लिखे गये । इनका सक्षिप्त वर्णन किया जाता है । (क) स्कन्दस्वामी (५०००)-निरुक्त की उपलब्ध-व्याख्याओ में इनकी व्याख्या समसे प्राचीन है । इन्होने अत्यन्त सरस पान्दों में निरुक्त के घारह अध्यायों की व्याख्या की है। इनको प्यास्या दुर्गापार्य को टीका के समान विस्तृत तथा निरुक्त के प्रत्येक शब्द का उद्धरण देनेशाली नहीं है। निषक्त के प्राचीनतम अयं का ज्ञान पाने के लिए यह टीका सर्वोत्तम है। सन्दस्वामी का काल हा. लक्ष्मण सम्प ने सप्रमाण सिद्ध किया है।' स्कन्दम्वामी स्वय हरिस्वामी के गुरु थे। हरिस्वामी ने पातपय ब्राह्मण की टीका लिया है और ये मालवापिपति के पहा धर्माध्यक्ष थे। ये रिखते हैं- य. सम्राट हाव सोमस्यास्तपर्व अतिम् । म्यास्यां खाध्यापयन्मा स्मादस्वाम्यस्ति में गुरु ॥ इमसे पता चलता है कि सन्द ने शरद् दी म्याच्या भी लिपी थी। हस्लिामी ने अपना समय बलिवर मे दिया है निमा संसोधन परके स. 1. Dr Carginatha Jhs Commemoration lolans fr 399-401. (१२५) सरूप निष्कर्ष यही निकालने हैं कि • मालव-देश मे उस समय कोई विक्रम नही अपितु हरिस्वामी का अभीष्ट राजा यशोधर्मा था जिसका क्षिलालेख भी मिलना है। उन्होने सिद्ध किया है कि हरिस्वामी ने अपनी टीका ५३८ ई० मे लिखी थी जिसके कुछ पहले- -या तो पांचवी शती के अन्त मे या छठी शती के आदि मे स्कन्दस्वामी रहे होंगे। ( ख ) देवराज-यज्वा ( १३०० ई०)-निघण्टु को व्याख्याओ मे एक- मात्र इनकी व्यारया ही उपलब्ध है । इन्होने निघण्टु के पदो को व्याकरण की कसौटी पर कस कर रखा है जिसके लिए इन्होंने पाणिनि और भोज के व्याकरणो से सहायता ली है। सभी शो फो सिद्ध कर दिया गया है। पदो की व्याख्या में इन्होने स्थान स्थान पर आचार्यों के नामो का उल्लेख किया है जिससे इनके काल निर्णय मे बडी सहायता मिलती है। इन्होने अपनी व्याख्या के आरम्भ मे एक छोटी सी भूमिका भी दी है जिसमे अपने पूर्ववर्ती आचार्यों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए उनके नाम भी लिये हैं। निघण्टु के पाठ के सशोधन पर भी इन्होने काफी प्रयत्न किया है क्योंकि ये लिखते हैं कि वेङ्कटायं के पुत्र माधव के ऋग्वेद-भाष्य' की विविध-अनुक्रमणियो से मिलाकर, वहुत तरह के कोशों को देखकर, निघण्टु का पाठ सशोधन किया है । यह इनकी वैज्ञानिकता का सूचक है । भूमिका मे एक स्थान पर ही इन्होने निम्नलिखित.पूर्वाचार्यों का उल्लेख किया है-(१) स्कन्दस्वामी की निरुक्त-टीका ( २ ) वेदभाष्य-स्कन्दस्वामी भवस्वामी, राहदेव, श्रीनिवास, माघवदेव, उवटभट्ट, भास्कर मिथ, भरतस्वामी (३) पाणिनि-व्याकरण (४) उणादि-वृति (५) निघण्टु-व्याख्या--- क्षीरस्वामी, अनन्ताचार्य (६) भोजराज का व्याकरण (७) कमल नयन वा निखिल-पद-सस्कार। इस सूची में दुर्गाचार्य-जैसे विख्यात टोकावार का नाम न होना मूचित करता है कि देवराज दुर्गाचार्य से पूर्ववर्ती हैं । ये भोज का नाम भई घार लेते हैं तथा व्याकरण की एक 'देव' नामक पुस्तक का भी बहुधा उल्लेख करते हैं । इन्होने किसी पातु-वृत्ति ( सायण-माधव की नहीं) ये भी उद्धरण २.सा. स्वमग सरूप-सम्पादित (ऋगर्षदीपिका) मान्य, भाग-१-४, मन्य भाग भारत के विमाजन-काल में नष्ट हो गये। २.निघण्टुटोस (गुरुमण्डल प्रन्थमाण), ५.४।
जहां तहां दिये हैं। हरदत्त (११०० ई.) को पदमजरी ( काशिका की व्याख्या ) का उद्धरण इन्होंने 'एतग्वा' ( अश्वनाम ) शब्द को ध्याख्या में दिया है। ये मरतस्वामी के वेदभाष्य का उल्लेख करते हैं और सायण ने अपने वेदभाष्य में म्वय ही देवराज का उल्लेख किया है। सायण का समय चूंकि १४वीं शती है इसलिए इनके कुछ पहले प्राय. १३०० ई० में अवश्य वर्तमान रहे होगे। (ग) दुर्गाचार्य ( १३००-५०)-निरुक्त का तात्पर्य समझने में ये सबसे अधिक सहायक है। उसकी विस्तृत व्याख्या मे इन्होंने अपने पाण्डित्य का पूरा प्रकर्ष दिखलाया है । स्थान-स्थान पर दार्शनिफ-विवेचना में भी इनकी अद्भुत गति देखने में आती है। इस टीका की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्होने निरुक्त के प्राय सभी शब्दो को अपनी व्याख्या में उद्धृत किया है इससे निरुक्त का पाठ ठीक करने में इनसे बहुत बड़ी सहायता मिलती है। इनकी भाषा यद्यपि सामान्यतया बहुत सरल है किन्तु दार्शनिक- विवेचना के स्थान पर आदर्श दानिक भाषा का प्रयोग करना भी ये जानते हैं । इनकी वृत्ति अपने क्षेत्र में अद्वितीय है। उन वैदिक मन्त्री को, जिन्हे निरुक्त मे अशन उद्धृत किया गया है, ये अपनी टीका मे पूर्णत उद्धृत करके समूचे की व्याख्या करते हैं। दुर्गाचार्य ने केवल १२ अध्यायो पर ही व्याख्या लिखी थी क्योकि पुरानी पाण्डुलिपियों मे इतना ही अश मिलता है। परि. गिष्ट की व्याख्या किसी ने बाद मे जोड दी है। दुर्गाचार्य की वृत्ति की पुष्पिका (Colophon ) मे लिखा मिलता है-- "ऋज्वया निरुक्तवृत्ती जम्बूमार्गाश्रमनिवासिन. आचार्यभगवदुर्गसिंहस्य कृती"-जिससे सभी विद्वानो ने सिद्ध किया है कि काश्मीर के जम्मू प्रदेश के निवासी तथा सन्यासी थे। इनका गोत्र वासिष्ठ था तथा ये कापिष्ठल- सहिता के अध्येता थे क्योंकि निरुक्त ( ४११४ ) मे स्थित ऋग्वेद (३१५३१२३) की ऋचा की व्याख्या ये नहीं करते और कहते हैं-"यस्मिनिगमे एप शब्दः (%D 'लोघम्' ) सा वसिष्ठपिणी ऋक् । यह च कापिष्ठलो वासिष्ठ । अतस्ता न निवोमि ।" अर्यान् मैं कापिष्ठल वासिष्ठ हूँ, जिस ऋचा में 'लोष'-शब्द है वह वसिष्ठ की निन्दा करने वाली है इसलिए उसकी व्याख्या नहीं करता Belvalkar, Systems of Sanskrit Grammar २. निघण्टुरीका (गु० म०प्र०), पृष्ठ-१६३, विशाखापादशम्दी ३. भदकमकर-सम्पादित निरुक्तपत्ति, पृ० ३८१। (१३७) हूँ। सायणाचार्य ने उपर्युक्त ऋचा की व्याख्या मे निम्नलिखित टिप्पणी दी है-"पुरा खलु विश्वामित्रशिष्यः मुदाः नाम राजपिरासीत् । स च केन• चितारणेन वसिष्ठद्वेष्योऽभूत् । विश्वामित्रस्तु शिष्यस्य रक्षार्थमाभिमग्भि. वसिष्ठमशपत् । ता ऋचो वसिष्ठा न शृण्वन्ति ।" अर्थात पूर्वकाल मे विश्वा- मित्र के शिष्य सुदास नाम के राजपि थे। किसी कारण से वसिष्ठ उनके द्वैप. पात्र हो गये । विश्वामित्र ने गिध्य की रक्षा के लिए इन ऋचामों रो वसिष्ठ को शाप दिया । इन ऋचाओ को वसिष्ठ के गोत्र वाले नहीं सुनते । इनकी ऋज्वर्थवृत्ति की सबसे प्राचीन पाण्डुलिपि १३८७ ई० को मिली है तथा यह वोड्ले ( ऑक्सफोर्ड ) पुस्तकालय मे सुरक्षित है। कीथ ने इस तिथि को सत्य माना है। यह पाण्डुलिपि भृगुक्षेत्र (बम्बई-राज्य )' मे लिखी गयी थी । इस आधार पर डा० सरूप ने अनुमान किया है कि पाण्डुलिपि को जम्मू से बम्बई जाने मे ५० वर्ष तो अवश्य ही लगे होंगे, अतएव दुर्गाचार्य का समय १४वी शती का आरम्भ मानना चाहिए। या तो ये देवराज के समकालीन थे या कुछ बाद मे हुए होगे । (घ) महेश्वर ( १५०० ई.)-इन्होने भी निरुक्त पर टीका लिखी है जो खण्डश. प्राप्त हुई है । स्कन्द और महेश्वर को टोकाओ को पाण्डुलिपियो सुधार कर डा० सरूप ने तीन भागो में प्रकाशित कराया है। महेश्वर ने निरुक्त के टोकापार के रूप में किसी बर्वरस्वामी का उल्लेख किया है जो स्कन्दस्वामी को छाडकर कोई दूसरे नहीं। दुर्गाचार्य का उल्लेख में पूर्व- टीकाकार के रूप मे करते हैं । दुर्ग को पूर्वत्व-प्राप्ति के लिए १५० वर्ष का अवकाश देना पर्याप्त है । इस आधार पर इनका आविर्भावकाल १५०० ई. के यासपास होना चाहिए। इनके अलावे निघण्टु घोर निरुक्त के अन्य अनेक टीकाकारो के उल्लेख मर मिलते है, उनके कोई ग्रन्थ प्राप्त नहीं हैं। सम्भव है ससार के अज्ञात कोने में वे टोकायें मिल जायं जिनसे शोधकर्ता विद्वानों का उपचार हो । (6) आधुनिक विद्वानों के कार्य ( १८००-१९६० )-यूरोप मे सस्कृत के प्रचार होने से तथा मापा-विज्ञान का व्यापक अध्ययन किये जाने से निरुक्त की उपयोगिता समझो गयो। सबसे पहले रॉथ ने जर्मन भाषा मे १. आधुनिक भडौंच, पेरिप्टस् नामक रोमन-पुस्तक में इमे बेरिगाजा ( BAry. gaza) कहा है। २.देखिये-Dr.LSup, The Nigh, and the Nir. PP.25-32 (१३) निरुक्त की भूमिका और अनुवाद प्रकाशित किया। भाषा-विज्ञान के ताका. लिक-अध्ययन का इस भूमिका में पूरा उपयोग किया गया है तथा अनुवाद अत्यधिक परिश्रम से किया होने से रॉथ की योग्यता के अनुकूल है । रॉथ की जर्मन-भूमिका का अंग्रेजी-अनुवाद प्रो० मैकोशान ने किया जो बम्बई विश्वविद्यालय से १९१९ ई० मे प्रकाशित हुआ था। विगत-शती के अन्तिम चरणो मे बंगाल के प्रसिद्ध वैदिक-विद्वान् पं. सत्यवत सामश्रमी ने अत्यन्त परिश्रम करके निरुक्त के सुन्दर सस्करण निकाले थे। इनका 'निरुक्ता- लोचन' भी प्रतिभा का परिचायक है। वर्तमान शती के निरुक्त के अध्येताओ मे डा० लक्ष्मण-सरूप का नाम अमर रहेगा । इन्होंने १९१६ ई० से १९२० ई. तक ऑक्सफोर्ड मे रह कर प्रो० मैकडोनल के अधीन निरुत-विषयक गवेषणा की जिस पर इन्हे डी. फिल० की उपाधि मिली। यही नहीं, उन्होने अपने जीवन का अधिकाश निरुक्त मे लगा दिया । सन् १९२० ई. में ऑक्सफोर्ड से ही उनकी निरक्त- भूमिका (An Introduction to Nirukta) निकाली जिसमे निघण्टु और निरुक्त के कर्तृत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने यास्क का काल और भाषाविज्ञान मे उनका स्थान निर्धारित किया था। १९२१ मे लन्दन स निरुक्त का अंग्रेजी-अनुवाद इन्होने विशिष्ट टिप्पणियो के साथ प्रकाशित फराया । यद्यपि इस अनुवाद मे कितने ही विवादास्पद-स्थल हैं किन्तु यह अपने ढग का अनूठा ही है। पुनः १९२७ ई० में पजाब विश्वविद्यालय से उन्होने अनेक हस्तलिखित-ग्रन्थो के आधार पर निघण्टु और निरुक्त का पाठ ठोककर प्रकाशित कराया । यह संस्करण इनके अद्भुत परिश्रम का परिचायक है। दो वर्षों के बाद ही निरुक्त की सूचियाँ और परिशिष्ट प्रकाशित हुए । इसके बाद तीन भागों में इन्होने पञ्जाब-विश्वविद्यालय से ही स्कन्दस्वामी और महेश्वर की टोकायें प्रकाशित कराई ( १९२८, ३१, ३४ )। अपने छिट- पुट लेखो के द्वारा भी इन्होने निरुक्त को काफी सेवा की है। उघर जर्मनी में स्कोल्ड में निरुक्त का अध्ययन आरम्भ किया तथा अपना प्रबन्ध ( Thesis) लुण्ड ( Lund ) से १९२६ ई० मे प्रकाशित कराया । इसमे इन्होने निरुक्त के पाठ सशोधन पर सुझाव, कुछ ऐतिहासिक १.RN. Daudekar, Vedic Bibliography P60. २. Dr.LSarup Commemoration Volume. (Sarun Bharati) (१३९) प्रश्न, निरुक्त के वैदिक उद्धरण आदि की विवेचना के बाद यास्क के निर्वचनों की वर्णानुक्रम से सूची बना दी है। पूना के प्रो. राजवाडे ने भी निरुक्त पर अच्छा काम किया है । सन् १९३५ ई० म सम्पूर्ण निरुक्त का मराठी अनुवाद प्रकाशित करने के बाद निरुक्त का प्रथम भाग ( तथाकथित ) सन् १९४० ई० मे पूना से प्रकाशित कराया। इसमे निरुक्त की सामान्य भूमिका, निघण्टु तथा निरुक्त (१४अध्याय) का मूल, अग्रजी मे तीन अध्यायो पर विस्तृत आलोचनात्मक टीका पचीस सूचियाँ आदि है । वस्तुत एक ही पुस्तक में इतनी वस्तुयें कही नही मिल सकती इसलिए प्रो० राजवाड का सस्करण अनुसघान करने वाले विद्वाना क लिए बहुत उपयोगी है। होशियारपुर स डा० सिद्धेश्वर वर्मा का प्रय यास्क वे निवचन' ( Etymologies of Yaska) प्रकाशित हुआ है जिसमे विश्लेषणात्मक विधि स यास्क के निवचनो की परीक्षा की गई है । भाषा विज्ञान की दृष्टि से यह प्राय लिखा गया है तथा यास्क का महत्त्व वहुत ऊंचा कर देता है। विद्वानों में इस ग्रथ का मूल्य बहुत अधिक है। इधर हाल मे घोविष्णुपद भट्टाचाय का भी एक न य निरुक्त पर निकला है।' निरुक्त के विभिन्न सस्करणो मे दुर्गाचाय की टीकायें प्रकाशित हुई हैं जिनमे वेङ्कटेयर प्रस और बम्बई सस्कृत प्राकृत पुस्तकमाला के सस्करण अच्छे हैं । दुगाचाय की टीका के आधार पर ही प. मुकुद झा वक्शी ने भी सस्कृत टीका लिखी है जो निणय सागर प्रस स प्रकाशित है । हिदी मे दुर्गा चाय के आधार पर प. सीताराम शास्त्री ने अपना विशाल भाष्य उपाया है । मिहिरघद्र पुगरणा ने भी निरुक्त की अच्छी टीका की है। इस प्रकार भारतीय प्रकाशको और विद्वानो ने मा उत्तम प्रकाशनो और रचनाओ द्वारा निरुक्त के क्षत्र मे प्रशसनीय काय किया है। Yaska s Mirolta and the Scence of Etymology (An Ilislarical and Critical Survey) by Bishaapada Battacharya दशम-परिच्छेद प्रस्तुत प्रयास [अंग्रेजो और संस्कृत टोकायें-हिन्दी-भाष्य-उसको अनु- पयोगिता-संक्षिप्त संस्करण की आवश्यकता-अनुवाद-कार्य-कठि- नाइयाँ-मूलपाठ-धन्यवाद ज्ञापन-क्षमा-याचना।] अभी तक नियक्त के बोसों सस्करण विभिन्न स्थानों से निकल चुके हैं किन्तु वे सभी लोगों के लिए ममान रूप से लामदायक नहीं। दुर्गाचार्य और मुकुन्द झा की टीकायें (जो इस समय सुलभ हैं ) सस्कृत में होने के कारण उनका उपयोग केवल सस्कृतज्ञ लोग ही कर सकते हैं । डा. लक्ष्मणसरूप का अनुवाद और मूल-सस्करण अवश्य उपयोगी है किन्तु आज दुर्लभ हो गया है। फिर केवल अंग्रेजी जानने वालो के लिए ही वह उपयोगी है। प्रो० राजवाडे की अग्रेजी-टीका इतनी विस्तृत है कि उसमे से तथ्य निकलना धैर्य का काम होगा, वस्तुतः उसमे निष्कर्ष कम निकाला गया है, विवेचना अधिक की गई है। अनुसन्धान-प्रिय व्यक्तियो के लिए तो ये ग्रन्थ अत्यन्त उपयुक्त हैं किन्तु सामान्य पाठको के लिए नहीं। हिन्दी मे आचार्य सीताराम शास्त्री का भाष्य निकला है जो अपनी विशालता के साथ-साथ विषय-वस्तु की दृष्टि से भी काफी समृद्ध है। यह विशालता प्रो. राजवाडे के निरुक्त जैसी नहीं। राजवाडे ने तो अपनी आलो- चनात्मक-दृष्टि का पूर्ण-परिमय दिया है जिससे उनकी पति-पक्ति में अनु- सधान चलता रहता है-पूरी टीका मे ये स्वयं खडे हैं मानो पढाते जा रहे हो। दूसरी ओर शास्त्री जी ने दुर्गाचार्य का अक्षरस अनुगमन तो किया है.ही, भारतीय पण्डितो मे सहज प्राप्य विषयान्तर में जाने की प्रवृत्ति भी इनमे खूब है; आलोचनात्मक दृष्टिकोण तो इनसे छू भी नही गया है। कतिपय रूढियां खटकती ही हैं, भाषा की शुद्धि पर भी ध्यान नहीं दिया गया है। एम. ए. में पड़ने के समय तथा कुछ छात्रों को पढ़ाने के समय मैंने इसका भी विधिवत् अध्ययन किया था, किन्तु जब बहुत-सी व्यर्थ की बातें आने लगी तो परेशान हो उठा । प्रस्तुत कार्य-सम्पादन का विचार उसी समय सूत्ररूप में पड गया या। यह टीका बहुत पाण्डित्यपूर्ण है किन्तु उचित सयम का इसमे अभाव है। (१४१) आज निरुक्त का पर्याप्त अध्ययन हो रहा है। सामान्य पाठको मे भी यह प्रवृत्ति देखने में आ रही है कि जरा देखें तो, निरुक्त मे क्या है ? कसे लोग इसे भापा-विज्ञान का प्रथम अन्य मानते हैं ? हिन्दी-भाषा मे कोई ऐसा सस्करण नही जो पाठको को इस जिज्ञासा को शान्त करे। कई विश्वविद्यालयो म भी यह पाठय प्रन्य है और अनुवाद या व्याख्या के प्रश्न आते हैं। आज पो वैज्ञानिक-युग मे लोगो को इतना समय कहाँ कि धंयपूर्वक एक विस्तृत टीका पढे और छ महीने के बाद एक पक्ति का निष्कर्ष निकाल सकें। यद्यपि यह कहना ठीक है कि "सत्य छोटा ही होता है परन्तु इसे पान को विधि बडी लम्बी होती है"' फिर भी सयत-भाषा में विपय को समझा देना आज की मांग है । इसी विचार से प्रेरित होकर मैंने प्रस्तुत कार्य मे हाथ लगाया । दिसम्बर, १९५८ म मैंने निरुक्त या अनुवाद आरम्भ किया तथा दूसरे ही महीन म प्रथम, द्वितीय और सतम अध्याय का अनुवाद पूरा हो गया । युछ दिनो तव वह यो ही पड़ा रहा। समय निकाल कर उसे परिष्कृत पिया सथा-क्वल अनुवाद को ही मूल वंदिर-मन्त्रो के साप प्रकाशित करने या इच्छा की। अन मैंने मई महीने (१९५९) म पोखरा सस्कृत सीरीज आफ्मि के अध्यक्ष श्री कृष्णदास जो गुप्त से भेंट की जिन्होने परामरा दिया frइमम मूल भी दिया जाय तो अच्छा रह। पटने पावर विविध कार्यों में य्यस्त हो जाने में यह काम महीनों बन्द रहा । दुर्गापूजा के थमाश में ममय निकालार मैंने मूल, अनुवाद (परिष्कार के साथ ) और स्थान+थान पर विशिष्ट प्यास्यात्मक टिप्पणियो देवर पाण्डुलिपि तैयार पर दो। अनुवादा का काम बहा पठिन है, जिसे भुराभोगी ही समझ सकता है। वेदाङ्गो का शाब्दिक अनुवाद वरना तो और भी दुपार है। उसपर भी निरुक्त म पाट-भेद र कारण तपा पात्रयों के अपूर्ण होने के कारण प्यास्याओं में हो विभेद है. अनुवादर को पद पक्ष पर टकार माता पटना है। प्रस्तुम भनुवाद म अग्यधिक बोप्टो प्रयोग इसे भली-भाति सिटमा। मम पारिभाषित मर ज्यों सा रसने की यपासम्म पटा की गयी है. वही ही छाडे मोटो म उनो अप भी दिय गय है। विवादास्पद स्पल पर टिप्पणिया है नहीं तो दल अनुसार ही दिया गश है। मरा नाम भी उन्ही पारों की श्रेणी में रखना चाहिय जादुम्ह स्थानों की टीम में 'सष्टमेन' पर Truth is a' Its tes little let the press to attaia it It ever Jogervat (१४२) पार कर जाते हैं और मभी लोगो के समझने लायक स्थान में अपने पाण्डित्य का पूरा प्रकर्ष दिखलाने लगते हैं। अस्तु, अनुबाद को शाब्दिक ( literal ) बनाने में कुछ उठा नही रखा है । इसलिए जो बातें मूल मे नही उन्हे देने के लिए ( यदि अर्थ स्पष्ट नहीं हो रहा हो तभी) बडे कोष्ठो का प्रयोग हुआ है, भाव समझाने के लिए या शब्दों का अर्थ देने के लिए छोटे कोष्ठ ही प्रयुक्त हुए हैं। वैदिक मन्त्री के अनुवाद मे बडी सावधानी से काम लिया गया है। पहले तो मैंने उनका पद्यानुवाद किया था जिन्हे परिशिष्ट मै दिया गया है परन्तु बाद मे छात्रो की उपयोगिता का ध्यान रखकर ऋचाओ का अन्वय करके मूल शब्द को कोष्ठ में रखते हुए हिन्दी अनुवाद अलग-अलग शब्दो का दिया गया है। श्राशा है इससे विशेष सुविधा रहेगी। प्रत्येक शब्द का अर्थ अलग-अलग भी हो गया और पूरे मन्त्र का शाब्दिक-अनुवाद भो । कुछ स्थानो को छोड़ कर मैंने दुर्ग की व्याख्या का ही अवलम्बन किया है। मन्त्रो के अनुवाद मे कही-कही विदेशी विद्वानो का भी आश्रय लिया गया है जिसे उचित समझकर भारतीयता- प्रेमी पण्डित लोग कृपया मुझे क्षमा करेंगे। निरुक्त के दा प्रकार के विभाजन है-महाराष्ट्र सस्करण और गुर्जर- सम्करण । पहले में अध्याय को सीधे परिच्छेदों मे ही बार दिया गया है किन्तु गुर्जर सस्करण मे अध्याय पहले पादो मे बेटे हैं तब परिच्छेदों मे दोनो सस्करणों के परिच्छेद आगे-पीछे होते ही रहते हैं । मैंने गुर्जर पाठ से पाद क्रम और महाराष्ट्र-पाठ से परिच्छेद-क्रम लिया है । आधुनिक उद्धरणों मे महाराष्ट्र- पाठ का ही आश्रय लिया जाता है। प्रस्तुत-सस्करण मे खिचडी के द्वारा दोनों की उपयोगिता समझी जा सकती है । निरुक्त का पाठ मैंने प्रो. राज वाहे के अनुसार रखा है, पथासम्भव अर्थ के स्पष्टीकरण के लिए विभिन्न विराम चिह्नो का भी प्रयोग किया गया है । मूल के सन्धियुक्त पदों को यथा. साध्य तोडने की चेष्टा रही है किन्तु इतता हो कि 'सहितकपदे नित्या." उल्लघन न हो। ग्रन्थ रचना के मूल प्रेरक श्री महताब अली एम० ए० को घयवाद देना मेरा प्रथम क्तय है । इन्होने अपनी एम० ए० परीक्षा (सात) के लिए १ पूरा इलोक यों है-सहितकपदे नित्या नित्या धातूपसर्गयो । नित्या समासे वाक्ये तु सा दिवशामपेक्षते ।। (१४३) का -- है परन्तु - मुझसे वेद और व्याकरण पढते समय सदा प्रेरित किया है। इसके बाद अपनी शिष्या दीपाली मल्लिक (पष्ठवर्ष संस्कृत, पटना विश्वविद्यालय ) का भी मैं पूरा कृतज्ञ हूँ जिसने निरुक्त का अपना पूरा पाठपाश मुझसे पढार मुझे अधिकाधिक अध्ययन करने का अवसर दिया 1 अनुवाद के बाद भी 'आपका निरुक्त कब छप रहा है ?" इत्यादि वाक्यो से उसने बहुत उत्साहित किया है जिससे यह कार्य इतना शीघ्र हो सका। यद्यपि वह धनबाद की ही उसे पुन घन्यवाद देना मेरा अपना क्त्तव्य है। अपने असूयको का भी मैं यम कृतज्ञ नही हूं जिन्होने निन्दा और कटु आलोचना द्वारा अपनी तो हानि की किन्तु मेरा उत्साह द्विगुणित कर दिया । अपने पूज्य-गुरु स्वर्गीय डा० तारापद चौधुरी, एम् ए., पी. एच डी. (लन्दन ) का किन शब्दो में स्मरण करूं? यदि वे इसे प्रकाशित देखते । निरुक्त के पूर्वाचार्य तो ग्रन्य के सर्वस्व है ही, सब कुछ तो उन्ही का है, मैंने केवल सजा दिया है। नव-नालन्दा-महाविहार के पुस्तकालय-कर्मचारियो का भी मै आमारी हूं जिन्होने उपयुक्त पुस्तके देकर भूमिका और परिशिष्ट को संवारने में काफी सह्योग दिया है । अपने पूज्य भाई ५० मुरली मनोहर शर्मा पा भी मैं उनको विविध-सहायताओ के लिए वृतज्ञ हूँ। मनुष्य त्रुटियों का भाण्डार है। कितनी सावधानी रखने पर भी इस पुस्तक में भी हजारो युटियाँ होगी। मैं सभी विद्याप्रेमियो से करबद्ध-प्रार्थना करता हूँ कि वे मरी इस तुच्छ कृति को एक बार आलोचनात्मक दृष्टि से देख कर गलतियो की सूचना अवश्य दें। वस्तुत , इसमे जो भी गुण हैं, पूर्वाचार्यों के हैं। हां, भूलें सब मेरी ही हैं। यदि मेरी इस प्रथम वृति से पाठरों मे अधिक जानने की रुचि जागृत हुई और कुछ भी सहायता मिली तो में अपना परिश्रम सफल समझंगा तथा शीघ्र ही अन्य अध्यायो को खण्डश. प्रकाशित कराऊंगा। अन्त मे कालिदास की कमनीय कविता अपना वक्तव्य समाप्त करता हूं- पुराणमित्येव म साथ सर्व न चापि पाव्य नवमित्यवद्यम् । सन्तः परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते परप्रत्ययनेयबुद्धि.॥ ॥ॐशान्ति शान्तिः शान्ति.॥ । (१४४ ) १ निघण्टु-पाठः [निरुक्त के द्वितीय अध्याय के द्वितीय पाद से निघण्टु के शब्दो को व्याख्या हुई है, अत. पाठकों को सुविधा के लिए मूल निघण्टु-पाठ दिया जा रहा है। बीच में इनसे निरुक्त के सम्बन्ध को समझाया जायगा । प्रत्येक नाम को व्युत्पत्ति देवराज यज्वा ने को है।] प्रथमोऽध्यायः ॐगी ग्मा । ज्मा।क्ष्मा। क्षा। क्षमा। क्षोणी । क्षितिः। अवनि । उ: । पृथ्वी। मही । रिप । अदितिः । ळा । निति । भू । भूमि । पूपा । गातु । गोत्रा । इत्येकविंशति पृथिवीनामधेयानि ॥१॥ हेन । चन्द्रम् । रुक्मम् । अय । हिरण्यम् । पेश । कृयनम् । लोहम् । कनकम् । काञ्चनम् । भर्म । अमृतम् । महत् । दत्रम् । जातरूपम् । इति पञ्चदश हिरण्यनामानि ॥२॥ अम्बरम् । वियत् । व्योम् । पहिः। धन्य । अन्तरिक्षम् । आकाशम् । बाप । पृथिवी। भूः। स्वयम्भू । माया। पुष्परम् । सगर आवरम् । इति पोळशान्तरिक्षनामानि ॥ ३ ॥ स्व । पृपिन । नाक । गौ । विष्टप् । नमः । इति पटसाधारणानि ॥ ४॥ सेदप । किरणा । गाव । रश्मय । अभीशवः। दीधितयः । गभस्तय । वनम् । उना । दसव । मरीचिरा । मयूखा । सम ऋषय । माध्या सुपर्णा । इति पञ्चदश रश्मिनामानि ॥ ५ ॥ आता आया । उपरा । माष्ठा । काष्ठा । योम । ककुभ । हरित । इत्यष्टौ दिङ्नामानि ॥ ६॥ श्यावी । क्षपा। शर्वरी । अक्तु । उ । राम्या । यया । मम्पा। दोपा। नता। तम । रज : असिवनी । पयस्वती । नमस्वनी । धृताची । शिरिणा। मोकी। शोकी। ऊप । पय । हिमा । वस्वी। इति प्रयोविंशति रात्रि- नामानि ।। ७11 विभावरी । मनरी । मास्वनी । मोदती । चित्रामथा । अर्जुनी । वाजिनी । १. प्रथमाध्यायान्तांतानि पदानि तु निरुत्तस्य दिनीयाध्याय एव नाममाइ, वर्ग- मुक्षिरस्य ग्यास्यावानीवि गुभोमिरवयम् । (१४५) १०हि०नि० भू० -- । वाजिनीवती । सुम्नावरी । अहना । द्योतना । श्वत्या । अरूपी । सूनना । सूनूतावती । सूनृतावरी । इनि पळश उपोनामानि ॥८॥ वस्नो । द्य । भान । वासरम ! स्वसराणि | ध्र स । घम । घृण । दिनम् । दिवा । दिवदिव । द्यविद्यवि । इति दस अहर्नामानि ॥ ९ ॥ अद्रि । ग्रावा । गोत्र । वल । अश्न । पुरुभोजा । वलिशान ! अ मा । पवत । गिरि । व्रज । चर । वराह । पाम्बर । रोहिण । रैवत । फलिंग । उपर । उपल । चमस । अहि । अभ्रम् । बलाहक । मेघ । इति । प्रोदन । वृधि । वृत्र । असुर । को। इति HिTमेघनामानि ॥१०॥ श्लोक । धारा । ळा। गौ । गौरी । गाधर्वी । गभीरा । गम्भीरा । म द्रा । म द्राजनी। धागी । वाणी। वाणीची। वाण । पवि । भारती। धमनि । नळो । मेळि । मेना । सूर्या । सरस्वती । निवित् । स्वाहा। वग्नु । उपब्दि । मायु । काकुन् । जिह्वा । घोप । स्वर । रात । स्वन । ऋक । होला । गी । गाथा। गण । धना। गना । विपा । नना। कशा । धिपणा । नौ । अक्षरम् । मही। अदिति । शची। वाक । अनुष्ट्रप । धनु । घल्गु । गल्दा । सर । सुपर्णी । वकुरा । इति सप्तपञ्चाशत् वारनामानि ।।११।। अण । क्षोद । क्षय नभ । अम्म | कद धम् । सलिलम् । वा । चनम् । पतम् । मधु । पुरीपम् । पिप्पला । क्षीरम । विषम । रेत । कश । ज म । बवूकम । बुसम । तृपया । ववु रम । सुक्षम । घरुणम् । सुरा । अर रि दानि ! ध्वस्म वत् । जामि । आयुधानि । क्षप । अहि । अक्षरम् । स्रोत । मृप्ति । रस । उदकम् । पय । सर । भपजम । सह । गव । यह । ओज । सुखम् । क्षत्रमा आवय | शुभम् । यादु । मनम् । भवनम् । भविष्यत् । आप । महत । प्योम । या । मह । सीम् । स्वृतीकम् । सतीनम् । गहनम् । गभीरम् । गम्भरग। ईम । अन्नम्। हवि । सन । सदनम्। ऋतम । योनि । ऋतस्य योनि । म पम । नीरम। रयि । सत । पूणम । सबम । अक्षितम । यहि । नाम ! सपि । अप । पवित्रम् । अमतम । ६६ । हेम । स्व । सर्गा । गम्बरम् । अवम । दप् । अम्बु । तोयम । तूयम । वृीटम । शुक्रम । तेज । म्वधा । वारि । जलम । जलापम । इदम । इत्येष रातमुटकनामानि ।। १२ ॥ अवनय । यध्या छि सीरा । सोया । 2 1 धुनय । वक्षगा । खादोमा । रोष । हरित । सरित । अग्रुव 1 मम । वव । हिरण्यवर्णा । रोहित ! मत । अग । सिधर । धुल्या । वय । ( १४६) जाना ।
उध्य । इरावत्य । पार्वत्य । सवन्य । ऊर्जस्वत्य । पयस्वत्य | तरस्वत्य । सरस्वत्यः । हरस्वत्य । रोषस्वत्य । भास्वत्य । अजिरा । मातर । नद्य । इति समपिरात नदीनामानि ॥ १३ ॥ बय । हप. । अर्का । बाजी। सति । बह्नि । दधिका । दक्षिकावा । एतव । एतश: पंद्व | दोगह । औच्च श्रवस । ताक्ष्य । याशु । द्रन । अरुप । माश्वत्व । अन्यथय । श्यनास । सुपर्णा । पतङ्गा । नर हार्या- णम् । हसाम । अश्वा । इति पविशति अश्वनामानि ।। १४ ।। हरी इन्द्रस्य । रोहितोऽग्ने । हरित आदित्यस्य । रासभावश्विनो । अजा पूष्ण । पृपत्य मरुताम् । अहग्यो गाव उपसाम् । श्यावा सवितु । विश्वमा वृहस्पते । नियुत वायो । इनि दश आदिप्टोपयोजनानि ।। १५ ।। नागते । नापते। भ्राश्यति । दीदयति । शोचनि । मदते । भन्दत । रोचते । ज्योनते । द्योतते । शुमत् । इति एकादश ज्वलतिकर्माण ॥१६॥ जमत । कल्मीकिनम् । जन्मणाभवन् । मल्मलाभवन् । अपि. शोचि । तप । तेज । हर । हणि 1 शहागि २ । इति एकादश ज्वलतो नाम- यानि ॥१७॥ पूर्णसस्या ४१४ (१७) द्वितीयोऽध्यायः अप । अन्न । दस । वेप । वैप । विष्टवी । यतम् । क्रम । पक्षणम् । शाकम । तु । करणानि । परासि । परिन् । करन्ती । चक्रत् । कत्वंम् । कौ । तव । कृत्वी। धी.। शची। शमी । शिमी । शक्ति । शिल्पम् । इति पड्विाति धर्मनामानि ॥ १ ॥ तुक् । तोकम् । तनय । तोक्म । तवम । सैष । अप्न । गय । जा । अपत्यम् । यहु । सूनु । नपात् । प्रजा। बीजम् । इति पञ्चदश अपत्य- मामानि ॥२॥ मनुप्या निर । धवा । जन्नव । विश 1 क्षितय । कृष्टय । चर्पणय । महप । हरय । मर्या । मा । मर्ता । दाता । तुवंशाः । दृह्मव । आयवः । यदवः । अनव । पूरव । जगत । तस्युपः । पञ्चजना' । विवस्वन्तः । पृतनाः । इति पञ्चविंशति मनुष्यनामानि ॥ ३ ।। आयती। च्यवाना। अभी। अप्नवाना। बिनड्ग़ौ । गमस्ती। करनौ । वाहू । भुरिजी । क्षिपस्ती। दशवरी। भरिये। इति द्वादश बाहु नामानि ॥४।। अग्रुवः। य । क्षिपः। विश । शर्माः । रशनाः। धीतयः । अथर्य। विप । कक्ष्या । अवनयः । हरितः । स्वसारः। जामय । सनाभय । पोवत्राणि । योजनानि । घुर । शाग्वाः। अभीशवः। दीधितयः। गमस्तय । इति द्वाविंशति अगुलिनामानि ॥ ५ ॥ वश्मि । उश्मसि । वेति । वेननि । वेसति । वाञ्छति । वप्टि 1 वनोति । जुषते । यति । आ चके । उशिक । मन्यते । छ.(सत् । चाकनत् । चकमानः । कनति । कानिपत् । इति अप्टादश कान्तिकर्माण ॥६॥ अधि । वाज । पय । श्रवः। पृक्षः। पितुः। सुत । सिनम् । अव । क्षु। पासिः। EMI kळा । इपम् । उक्। रसः । स्वधा । अर्क । क्षम नेम । ससम् । नमः । आयुः । मूनता । ब्रह्म । वर्ष | फोलालम् । यशः । इति अष्टाविंशतिः अननामानि ।।७।। १ दितीयाध्यायगतानि पदानि निरुक्त तृतीयाध्यायस्य प्रथमदितीयपादयोरेव यणितानि। . 1 (१४) . . आ वयति । भवंति । बमस्ति । वेति । वेवेष्टि। अविष्यन् । बप्सति । भसयः । बब्याम् । हरति । इति दश अत्तिकर्माणः ॥८॥ ओजः । पाजः । शवः । तवः । तरः । वक्षःसधः । बाधः । नम्णम् । सविपी । शुष्मम् । शुष्णम् । दक्षः । वीर्छ । च्यात्नम् । शूपम् । सहः। यहः । वधः । वर्ग: । वृजनम् । वृक् । मग्मना । पौंस्यानि । धर्णसिः । द्रविणम् । स्पन्नासः । शम्वरम् । इति अाविंशतिः वलनामानि ॥१॥ मघम् । रेक्श: । रिक्यम् । वेदः। वरिवः। श्वात्रम् । रलम् । रयिः । क्षत्रम् । भगः। मीळहुम् । गयः । द्युम्नम् । इन्द्रियम् । वसु । रायः। राषः । भोजनम् । तना । नृणम् । बन्धुः । मेधा। यशः । ब्रह्म । द्रविणम् । धवः । वत्रम् । वृतम् । इति अष्टाविंशतिरेव पननामानि ॥१०॥ अज्या । उता। स्त्रिया । अही। मही। अदितिः। इळा । जगती। शायरी।इति नव गोनामानि ॥११॥ रेळो । हेळो। भामते । भणीयते । भ्रीणाति । भ्रपति । दोषति । धनु- प्यति । कम्पते । भोजते । इति दश कृष्यतिकर्माणः ॥ १२ ॥ हेळ: । हरः । हणिः। त्यजः । भामः । एहः । हरः। सपुषी। जूणिः । मन्युः । व्यथिः । इहि एकादश कोपनामानि ॥ १३ । वर्तते । अयते । लोटते । लोठते स्यन्दते । कसति । सति । स्यमति । त्ति । नसते । अति । इचोतति । प्वंसति । धेनति । पाटि । भुरष्यति । शयति । कालयति । पेलयति । कण्टति । पिस्यति । बिस्यति । मिस्पति । प्रवते लवते । च्यवते । पते । मयते । नवते । सोदति ।मक्षति । सक्षति । म्यक्षति । सति । ऋच्छति । तुरीयति । चतति । अतति । गाति । इपक्षसि । सति । स्मरति। रहति । यतते। भ्रमति । प्रगति । रजति । लजति । क्षिपति । धमति । मिनाति । ऋषति । ऋणोति । स्वरति । सिसति । वेषिष्टि। योपिष्टि । रिणाति । रोयते । रेजति । दयति । दम्नोति । युध्यति । पन्यति । अश्पति । प्रायसि । दीयते । तकति । दोयति । ईषति । फगाति । हनति । अदति । मर्दति । ससृते । नसते । हयति । इयति । इते। खसे । जयति । स्वाति । गन्ति । आ गनीगन्ति । जङ्गन्ति । जिन्वति । जसति । गमति । प्रति । प्राति । प्रपति । वहते । रगयति । जेहते । य: कति । शुम्पति । साति । वाति । याति । इपति । द्वाति । दूळति । एजति । जमति । जवति । वति । अनिति। पवने । हनि। सेति । अगन् । अजगन् । जिगाति। पनि। इन्वति । ट्रमति । दवति । वेति । हपन्ताद। एति । जगाया। अयुषः । इति नावितशतं गतिकर्माणः॥ १४ ॥ - (१४९) 1 नु । मछु । द्रवत् । ओपम् । जीराः। जूणिः । शाः । शूधनासः । दीमम् । तृषु । तूयम् । तूणि: । बजिरम् । भुरण्युः । शु। आशु । प्राशुः । तूतुजः । तूतुजानः । तुज्यमानास: । अचाः । साचीवित् । धुगत् । तात् । तरणिः । वातरहाः । इति पड्विंशति: क्षिप्रनामानि ॥ १५॥ तलित । आसात् । अम्बरम् । तुवंशे । अस्तमोके । आके । उपाके । बकि । अन्तमानाम् । अवमे । उपमः । इति एकादा तिनामानि ॥१६॥ रणः । विवाक् । विवादः । नदनः। भरे । आपन्दे । आहवे। भाजी। पुतनाज्यम् । अभोके । समीके । ममसत्यम् । नेमधिता । सद्धाः। समितिः । समनम् । मोळहे । पृतनाः । स्पृधः। मृधः । पृत्सु । समत्सु । समयें । सम. रणे । समोहे । समिधे । सभ्य । मगे। संयुगे । सगथे। सगमे । वृत्रतूड़ें। पृक्षे । आपो। शूरसाती। वाजसातौ । ममनीषे । खले । खजे। पोस्ये । महाधने । वाजे। अज्म । सप । सयत् । सेवतः । इति षट्चत्वारिंशत सग्रामनाम ॥१७॥ इन्वति । नक्षति । आधाणः । पानट् । आ । थापानः । अपात् । नत् । भानहो । अनुते । इति दश व्यानिकर्माण ॥ दन्नोति । श्नयति । वरनि । पूर्वति । दृणक्ति । वृश्चति । पृष्यति । कृन्तति । प्रयमिति । नमते । यति । स्तृणाति । म्नेहयनि । यातयति । स्पुरनि। स्पुनि । निवपातु । प्रतिरति । विधात: । पानिपत । सदिर। पासण्डल । दृणाति । रम्णाति । शृणाति । सानाति । तृोळ । ताहि । निमोयो । निवयनि । मिनानि । मिनोनि। शमनि । इति पत्रिपात बघ. पर्माणः॥१९॥ दिएन । नेमिः । हेमिः । नम । पविः । गृः। वरः। षः । वय। अ: । रमः। दृष्टिः । तुरुनः । निम्म । मेनिः। अधिनि । सायरः। परपः। इति मादायनामानि ॥२०॥ स्यति । पायते । अनि । गति । इति वायारिऐश्वनामानि ॥२१॥ राष्ट्री। अपः। युयान । न २ । इनि नामानि ॥२॥ पूर्णसम्दा ५१ (१०) तृतीयोऽध्यायः उरु । तुवि । पुरु। भूरि । शश्वत् । विश्वम् । परीणसा । व्यानशिः । शतम् । सहस्रम् । सलिलम् । कुवित् । इति द्वादश बहुनामानि ॥२॥ ऋहन् । ह्रस्वः । निधृष्वः । मायुकः । प्रतिष्ठा । कृधु । वनक । दभ्रम् । अर्भकः । क्षुल्लकः । अल्प: । इति एकादश । ह्रस्वनामानि ॥ २ ॥ महत । प्रघ्नः । ऋष्वः । बृहत् । उक्षितः । तवसः । तविप'। महिषः । अभ्यः । भुक्षाः । उक्षा । विहायाः। यह्वः। क्वक्षिय । विवक्षते। अम्भृणः । माहिनः । गभीरः । ककुह' । रभसः । ब्राधन् । विरप्शी। अद्भुतम् । वहिष्ठः। बर्हिपत् । इति पञ्चविंशतिः महन्नामानि ।। ३ ।। गयः । कृदरः। गतः। हम्यंम् । अस्तम् । पस्त्यम् । दुरोणे । नीळम् । दुर्गा । स्वसराणि । अमा । दमे । कृत्तिः । योनिः । सम । शरणम् । वरूथम् । छदिः । छदिः । छाया । शर्म । अज्म । इति द्वाविंशतिः गृहनामानि ॥ ४ ॥ इरज्यति । विधेम । सपर्यति । नमस्यति । दुवस्यति । ऋनोति । ऋद्धि । ऋच्छति । सपति । विवासति । इति दया परिचरणकर्माणः ॥ ५ ॥ शिम्बाता । तरा। शातपन्ता । शिल्गुः । स्यूमरम् । शैवृधम् । मयः । सुगम्यम् । सुदिनम् । शूषम् । शुनम् । शम्मम् । भेषजम् । जलापम् । स्योनम् । सुम्नम् । शेवम् । शिवम् । शम् । कम् । इति विशतिः सुखनामानि ।। || निणिक । वनिः । वर्षः। वपुः । अमतिः । अप्स' । प्सुः । अप्नः । पिष्टम् । पेशः । कृशनम् । मरुत् । अर्जुनम् । ताम्रम । अरुपम् । शिल्पम् । इति पोहश रूपनामानि ॥७॥ अप्रेमा । अनेमा । अनेद्यः । अनवद्यः । अनभिशस्त्यः । उअध्यः । सुनीयः। पाकः । वामः । वयुनम् । इति दश प्रशस्यनामानि ॥ ८ ॥ केतुः । केनः । चेतः। चित्तम् । ऋतुः । असु । धीः । शची। माया । वयुनम् । अभिस्या । इति एकादश प्रज्ञानामानि ।। ९॥ वट् । यत् । सका। श्रद्धा । इत्या । ऋतम् । इति पट् सत्यनामानि ॥om चिक्यत् । चाकनद । आवक्ष्म । चष्टे । विच? । विचर्षणि: । विश्वचर्षणिः । अबचाकरान् । इति अष्टो पश्यतिकर्माणः ॥११॥ १. तृतीयाध्यायगतानि पदानि निस्के तृतीयाध्यायेऽन्त्यपादयोन्यारयातानि । ( १५१)
विपरिषद । विप.
हिक्म् । नुक्म् । सुकम् । आहिकम् । आकीम् । नकिः । मःि। नकीम् ।
आकृतम् । इति नव उत्तराणि पदानि सर्वपदसमाम्नानाय |१२ ॥
दमिव । इद यथा। अग्निनं ये। चतुरश्चिदमानात् । ब्राह्मणा व्रत
चारिणः । वृक्षस्य नु ते पुरहूत वयाः । जार आ भगम् । मेपो भूनोऽभि यन्नयः ।
तपः । तद्वर्णः । तद्वत् । तथा । इनि उपमाः ॥ १३ ॥
अचति । गायति । रेभति । स्तोमति । गूधयति । गृणाति । जरते ।
ह्वपते । नदति । पृच्छति । रिहति । धमति । वृणयति । कृपण्यति । पनस्पनि ।
पनायते । बल्गूयति । मन्दते । भन्दरेति । छन्दति । उदयते । रामानः ।
रजयति । रजयति । शंसति । स्तौति । योति । रौति । नौति । भनति ।
पणायन । पणते । सपति । पक्षाः। महयति । वाजयति । पूजयति ।
मन्यते । मदति । रसति । स्वरति । वेनति । मन्द्रयते । जल्पति । इति पतु-
प्रचत्वारियादतिर्माणः ।। १४॥
विप्रः । विधः । मृत्सः । धीरः । वेनः । वेधाः । १५ ऋभु । मवेदाः ।
पविः । मनीषी । मन्धाता । विधाता। विपः । मनश्चित् ।
भ्ययः । आके निर। उचिज. । पोस्तासः । प्रातयः । भाय: । मनुषाः।
धापतः । इति पतुविशति: मेधाविनामानि ॥ १५ ॥
रैमः । जरिता । कारु: । नदस्तामुः। पीरिः। गौः । मूरिः। माः।
छन्दः । स्तुर । र: 1 कृपण्यु. । इति प्रयोदय स्तोतृनामानि ॥ १६ ॥
यन. । वेनः । पवरः । मेरः । विदषः । मायः । मवमम् । होत्रा।
दिः । देवनामा । मनः । विष्णुः।। प्रशापतिः । पर्मः। इति पचास
यजनामानि ॥१७॥
भरताः । पुरवः वापरः। वृत्तवाहियः । यतषः । मरतःसबाय: ।
देवयः । निजी विमामानि ॥ १८ ॥
महे । यापि । मामहे । हरिपि । अधि । मिमिति । मिमोहि ।
रिरिति । रिहा पीरगन् । याहारः । यपि। पुप्पनि । मदेमहि । मनाः
महे । मायोनि महा पाप्यारर्माणः ॥१९॥
हानि । दानिशमनारानि । गमनि । पशि 1 Tणानि गिनि।
पुति महते । निदानरांगः ॥२०॥
पग्मिदा पवाय यामिति चम्बार: मध्येघनाराज ॥२१॥
तिलिपिदिकर्माजी ॥ २२॥
कृपः । कातुः । कर्तः । वनः । काटः । खातः । अवत:। क्रिविः । सूदः । उत्सः । ऋश्यदात् । कारोतरात् । कुशयः । केवटः । इति चतुर्दश कूपनामानि । तृः। तक्या । रिमा । रिपुः। रिक्वा । रिहायाः । तायुः । तस्करः । वनमुः। रश्चित् । मुपोवान् । मलिम्लुचः । अघशंसः । वृकः । इति चतुर्दश स्तेननामानि ॥ २४ ॥ निण्यम् । सस्३ः । सनुतः। हिरुक् । प्रतीच्यम् । अपीच्यम् । इति निर्णी- तान्तहितनामधेयानि ॥ २५ ॥ आके । पराके । पराचः। आरे। परावतः। इनि पञ्च दूरनामानि ॥२६॥ प्रत्नम् । प्रदिवः । प्रवयाः । सनेमि । पून्यम् । मह्नाय । इति षट् पुराण- नामानि ॥२७॥ नयम् । नूलम् । नूतनम् । नव्यम् । इदा । इदानीम् । इति पडेव नव. नामानि ॥ २८ ॥ प्रपित्त्वे । अभीके । दभ्रम् । अर्भकम् । तिरः। सतः । त्वः । नेमः। ऋक्षाः । स्तृभिः । वम्रीभिः । उपजिबिका । कदरम् । कृदरम् । रम्भः । पिनाकम् । मेना । ग्नाः । शेषः। वैतसः। अया । एना। सिपक्तु । सचते । भ्यसने । रेजते । इति पविशतिः द्विशः उत्तराणि नामानि ।। २९ ॥ स्वधे । पुरन्धी । धिपणे । रोदसी । कोणी । अम्भसी। नमसी। रजसी । सदमी। सद्मनी । घृतवती । बहुले । गभीरे । गम्भीरे । ओण्यो । चम्बो। पाश्वो । महो । उौं । पृथ्वी । अदिती । अहो । दूरे अन्वे 1 अपारे २ । इति सतुविशतिः द्यावापृथिव्योः नामधेयानि ॥ ३०॥ पूर्णसंख्या-४१० 1 - हिक्म् । नुक्म् । सुक्म् । आहिरम् । आकोम् । नकि । मकि । नकीम् । आकृतम् । इति नव उत्तराणि पदानि सर्वपदसमाम्नानाय ॥ १२ ॥ इदमिव । इद यथा । अग्निनं ये। चतुरश्चिदमानाद । ब्राह्मणा व्रत चारिण । वृक्षस्य नु ते पुरहूत वया । जार आ भगम् । मेपो भूतोऽभि पनप । सदप । तद्वण । तद्वत् । तथा । इति उपमा ॥ १३ ॥ अचति । गायति । रेभति । स्तोमति । गूधयति । गृणाति । जरते । ह्वयत । नवनि । पृच्छति । रिहति । घमति । कृपयति । कृपण्यति । पनस्यति । पनायत । वल्गूयति । मदते । भदरेति । छदति । उदयते । पाशमान । रज्जयति । रनयति । दासति । स्तौति । योति । रीति । नोति । भनति । पणापनि । पणते । सपति । पपृभाः। महयति । वाजयति । पूजयति । मयते । मदनि । रसति । स्वरति 1 देनति । म दयते । जल्पति । इति चतु एचवारिशदचतिवर्माण ॥ १४ ॥ विप्र । विर । गृत्स । धीर 1 वेन । वेधा । ३ । ऋभु । मवेदा । पवि । मनीषी । म पाता । विपाता । दिप । माश्चित् । विपश्चित् । विप पत्र । आवेनिन । उशिम । रोस्तास । बद्धातप । भय । मनुषा । थापन । इति पतुविशति मेषाविनामानि ॥ १५ ॥ । जरिता । कार । नद 1 सामु । पीरि। गो । मूरि उन्द । स्तुप । १८ । कृपयु । इति त्रयोदश स्तोसृनामानि ॥ १६ ॥ या । देन । बदर । मेष । विदप । मार्य घटि । दयनाता । मम । विष्णु ।।3। प्रमापति । धम । ति पदरा यशनामानि ॥१७॥ भरना । पुरष पापत । वृत्तसहिए । पतष । मरत । साध । देवया । इति हो सिमामानि ॥ १८ ॥ ईमह । यामि । मह । मि। ग्घि । पूधि । मिमि । मिमीहि । रितिरिहि । पीपरन् । यता परिप। शुष्पति । मदेमहि । ममा महे । मायते । निमम यानाराज ॥१९॥ हानि । दाना दाममा राति । रामनि । पति । पृानि मिति । मुस्तनि । महते । रक्षिामार्मा ॥..॥ परिषद पवम्ब ! सम्मातिर इतियार पारमाण ॥२१॥ story दिसतिपुराणौ ॥ २२ ॥ मा । । मवनम् । होत्रा।
कूपः । कातुः । कर्तः। वत्रः । कारः । खातः । अवतः। क्रिविः। सूतः । उत्सः । ऋश्यदात् । कारोतरात् । कुशयः। केवरः । इति चतुदंश कूपनामानि । तृः। तवा । रिमा । रिपुः । रिक्वा । रिहाया: । तायुः । तस्करः । वनर्गः। रश्चित् । मुपीवान् । मलिम्लुचः । अयशंसः । वृकः । इति चतुर्दशा स्तेननामानि ॥ २४ ॥ निण्यम् । सस्वः । सनुतः। हिरुक् । प्रतीच्यम् । अपीच्यम् । इति निर्णी- तान्तहिननामधेयानि ।। २५ ॥ आके । पराके । पराचः। आरे । परावतः । इति पञ्च दूरनामानि ॥२६॥ प्रत्नम् । प्रदिवः । प्रवयाः । सनेमि । पूर्यम् । अह्नाय । इति षट् पुराण- नामानि ॥ २७ ॥ नवम् । नत्नम् । नूननम् । नव्यम् । इदा । इदानीम् । इति पडेव नव. नामानि ॥२८॥ प्रपित्त्वे । अभीके । दभ्रम् । अर्भकम् । तिरः। सतः । त्व: । नेमः। ऋक्षाः । स्तृभिः । वम्रीमिः । उपजिह्विका । कदरम् । कृदरम् । रम्मः । पिनाम् । मेना । ग्नाः । शेपः । तसः। अया । एना। सिपक्तु । सचते । भ्यसने । रेजते । इति पवियतिः द्विशः उत्तराणि नामानि ॥ २९॥ स्वधे । पुरन्धी । धिषणे । रोदसी । क्षोणी । अम्भसी । नमसी। रजसी । सदमी। सपनी। घृतवती । बहुले । गभीरे । गम्भीरे । ओग्यो। चम्वो। पायी । मही । उवर्षी 1 पृथ्वी । अदिती । अहो । दूरे मन्ते । अपारे २॥ इति चतुर्विधतिः द्यावापृषिव्योः नामधेयानि ॥३०॥ पूर्णसंख्या-४१. ( १५३) चतुर्थोऽध्यायः जहा । निधा । शिताम । मेहना । दमूनाः । मूषः। इविरेण । कुरुतन । जठरे । तितउ । शिप्रे। मध्या । मन्दू । ईन्तिास: । कायमानः । लोम् । शीरम् । विद्रधे । द्रुपदे। तुम्वति । नसन्ते । नरन्त । आहनसः । असत् । इष्मिणः । वाहः ! परितकाय! । सुविते । दयते । नचित् । नूच ! दावने । अकूपारस्य । शिशीते । सुतुकः। सुप्रायणा: । अप्रायुवः । च्यवनः । रजः । हरः । जुहुरे। व्यन्तः । क्राण : ! वाशी । विपुणः । जामिः । पिता । शयोः । अदितिः । एरिरे । जसुरि. । जरते । मन्दिने । गौः । गातुः । दंसयः । तूनाव । चयसे । वियुते । ऋधक । अस्याः अस्य । इति द्विषष्टिः पदानि ॥ १॥ सस्निम् । वाहिष्ठ, । दूतः। वावशानः । वार्यम् । अन्धः । असपचन्ती । वनुष्यति । तरष्यति । भन्दनाः । आहनः । नदः। सोमो अक्षाः । श्वायम् । अतिः । हासमाने । पड्भिः। ससम् । द्विता । व्राः। वराहः। स्वसराणि । शर्याः । अर्कः । पविः । वक्षः । धन्य । सिनम् । इत्था । सचा। चित् । आ। द्युम्नम् । पवित्रम् । तोदः । स्वञ्चाः । शिपिविष्टः। विष्णुः । प्राणि. । पृथुजयाः । अपर्युम् । काणका । अध्रिगुः । आङ्गपः । आपान्तमन्यु । मशा। उर्वशी । वयुनम्। वाजपस्त्यम् । वाजगन्ध्यम् । गध्यम् । गधिता | कौरयाणा तौरयाण । अह्रयाण । हग्याण । आरितः। बन्दी। निष्पपी । तूर्णाशम् । धुम्पम् । निचुम्पुण । पदिम् । पादुः । वृक । जोपवाकम् । कृत्ति । श्वघ्नी । समस्य । कुटस्य । चर्षणि. । पाम्ब । केपयः । तूतुमा कृपे । असत्रम् । वावुदम् । धीरिटे । अच्छ परि । ईम् । सीम् । एनम् । एनाम्। सृणिः । इति चतुरुत्त रम अशीतिः पदानि ।।२।। आशुशुक्षणिः । आगाभ्य. । काशि: 1 कुणारुम् । अलातृणः । सललकम् । पपयम् । विहः । वीरुधम् । नक्षद्दामम् । अस्कृधोयुः । निशम्भाः । वृवदुक्थम् । ऋदरः । ऋदूपे । पुलुकामः । असिन्यती । वपना। भाऋजीनः । रुजानाः। जूणिः । ओमना । उपलप्रक्षिणी। उपसि । प्रकलयित् । अध्ययज्वा । ईक्षे । घोणस्य । अस्मे । पाथः । सीमनि । सप्रथाः। विदथानि । प्रायन्तः । आशी: १. चतुर्थान्यायगतानि त्रीगि सण्डानि निरुक्त क्रमशचतुर्थश्मषष्ठाध्याय ग्यारयानानि ।
अजीगः । अमूरः रायमानः। देवो देवाच्या कृपा। विजामातुः। ओमामः । सोमानम् । अनवायम् । किमोदिने । अमवान् । अमोवा। दुरितम् । अथा। अमत्तिः । श्रुटी। पुधिः । शत् । रिशादसः । सुदनः । मुविदरः । आनुपक । तुर्वाणि । गिणसे । अमूत्त मूत्तै 1 सम्यक् । यादृश्मिन् । जारयायि ! अप्रिया । चनः । पचता । शुरुध. । अमिनः । जज्झतीः । अप्रतिकुतः। शायदानः । मृपः । सुशिप्रः ।।। रसु । द्विवर्हाः। 'अक्र । उराणः। स्तियानाम् । स्तिपाः । जबारु । जरूथम् । कुलिशः । तुजः। वहगा। उतनुष्टिम् । इलीविशः । पियेघाः । भूमिः । विलितः। तुरीपम् । रास्पिनः । ऋजति. 1 ऋजुनीती। प्रतवमू । हिनोत । चोप्कूयमान. | नोकूमते । सुमत् । दिविष्टिपु । दूतः । जिन्वति । अमत्रः । ऋनीवमः । अनशरातिम् । अनर्वा । असामि । गन्दया । जल्हवः । बकुः। वैनाटान् । अभिधेतन । अंहुरः । इत । वाताप्यम् । चावन् । रथयति । अमत्राम् । माधवः । अनवनवः । सदान्वे । शिरिम्बिठ.। पराशरः । क्रिविदंती । करुनी । दनः । शरारुः । इदयुः । कोक्टेषु । वुन्द. । गृन्दम् । पिः । उल्बम् । ऋवीसम् । इति त्रयस्त्रिशतानि पदानि ।। ३ ।। पूर्णसम्या-२७९ ज्या । इषु । अश्वाजनी। पञ्चमोऽध्यायः अग्नि । जातवेदा । वैश्वानर । इति त्रीणि पदानि ॥ १ ॥ (निरु०७) द्रविणोदा । इध्म, । तनूनपात । नराशस । ळ । यहि । द्वार । उपासानता । देण्या होतारा । तिस्रो देवी । त्वा । वनस्पति । स्वाहाकृतय । इति त्रयोदा पानि ।। २॥ (नि०८) अश्व । शकुनि । मण्डूका । अक्षा । ग्रावाण । नाराशस । रथ । दुभि । इषुधि । हस्तघ्न । अभाव । धनु । उलूग्वलम् । वृषभ । द्रुपण । पितु । नद्य । आप | औषधय । रात्रि । अरण्यानी । श्रदा । पृथिवी । अप्वा। अग्नायी। उलू खलमुसले । हविर्षाने । द्यावापृथिवीं । विपाट छुतुद्री । आत्री । शुनासीरौ । देवी जोष्ट्री। देवी ऊर्जाहती। इति पटत्रिंशत् पदानि ॥ ३ ॥ (नि०९) वायु । वरुण । रुद्र । इद्र । पज य । बृहस्पति । ब्रह्मणस्पति । क्षत्रस्य पति । वास्तोष्पति । दाचस्पति । अपा नपात । यम । मित्र । क । सरस्वान् । विश्वकर्मा । ताक्ष्य । मयु दधिक्रा । सविता। त्वष्टा । वात । अग्नि । वेन । असुनीति ! ऋत । इदु । प्रजापति । अहि । अहिवु घ्य । सुपण । पुरूरवा । इति द्वात्रिंशत् पदानि ॥ ४ ॥ (नि० १०) प्रयेन । सोम । चन्द्रमा । मृत्यु | विश्वानर । विधाता। मरुत । रुद्रा । ऋषभ । अङ्गिरस । पितर । अथर्वाण । भृगव । आप्त्या । अदिति । सरमा । सरस्वती । वाक । अनुमति । राका । सिनीवाली । कुहू । यमी । उवशी । पृथिवी । इद्राणी । गौरी। गौ । धनु । अघ्या । पध्या ! स्वस्ति । उपा । इळा । रोदसी । इति पट्त्रिंशत् पदानि ॥ ५ ॥ (नि० ११) अश्विनी । उपा । सूर्या । वषाकपायी। सरप्यू । यष्टा । सविता । भग । सूय । पूपा । विष्णु । विश्वानर । वरुण । केशी। केशिन । वृषाकपि । यम । अज एकपात । पृथिवी । समुद्र 1 अथर्वा । मन सप्तऋपय । देवा । विश्वेदेवा । साध्या । वसव । वाजिन । देवपाय २ इति एकत्रिशत् पनि ।। ६ ।। (नि०१२) पूणस -१४८ एवमादित १७६७. घाता। । दध्यह। आदित्य । (१५६ ) ॥ श्री ॥ हिन्दी-निरुक्त प्रथम अध्याय प्रथम-पाद । समाम्नाय समानात । स व्यास्थातव्य । तमिम समा- नाय 'निवण्टव इत्याचक्षते। निघण्ण्व कस्मात् ? निगमा इम भवन्ति-छन्दोभ्य समाहत्य समाहत्य समाम्नाता । त निगन्तव एव सन्तो निगमनात् निघण्टव उच्यन्ते इत्योपमन्यव । अपि वा, आहननादेव स्यु । समाहता भवन्ति । यद्वा, समाहृता भवन्ति ।। [शब्दा का ] समाम्नाय ( सग्रह सकलन ) सकलिन हुआ जिसकी ध्याख्या करनी चाहिये। इस सग्रह को [ कुछ लोग] निघण्टु कहते हैं । "निघण्टु कैसे [ कहलाया ] ? ये [ शब्द ] अथ बसलानेवाले (निTB) हैं-वेदो से घृन चुनकर जमा किय गये हैं । य अथ बतलानेवाले (निगातु) ही बनकर व्युत्पत्ति (निगमन ) से 'निघण्टु कहलाय-यह ओपन यव का विचार है । अथवा, मा+ हन् (विमाजिन करना ) से बना है क्योंदि [ सभी शब्द ] समाहत ( साथ साथ कह गये या विभाजित किये हुये ) हैं। अथवा जमा किये जाने ( सम् आह) के कारण [इह निघण्टु कहत हैं] । विशेष-समाम्नाय = निघण्टु क पाचा अध्याय जिनम वैदिक गद सलिते हैं। किसी गन्द की व्युत्पत्ति देने के समय या प्राय करते हैं जिसका अथ है किस धातु से और क्यों ? "निघण्टुब्द की व्युत्तत्ति तीन तरह से करते हैं - (१) निगम>निगमयित (निग)>निगतुते कस्मात् का प्रयोग २ हिन्दी-निरुक्त निघण्टु = अर्थ बतलानेवाला । (२) सम आहन् >समान्तृ>समाहन्तु निघण्टु = जमा किया हुआ। ( ३ ) सम् आ ह>समाहत्तुं'>समाहत्तुं> निघण्टु चुना हुआ। दुर्गाचार्य ने अपनी व्याख्या मे व्युत्पत्ति की इन तीन अवस्थामओ को प्रमश प्रत्यक्षवृत्ति, परोक्षवृत्ति और अतिपरोक्षवृत्ति कहा है। प्रत्यक्षवृत्ति की अवस्था में पातु स्पष्ट रहता है जैसे-निगमयितः परोक्षवृत्ति की अवस्था मे वह सामान्य-प्रयोग से अलग हो जाता है जैसे--निगन्तु; अति. परोक्षवृत्ति को अवस्था मे धातु का पता ही नहीं लगता जैसे-निघण्टु । 'छन्दोभ्यः' का प्रयोग बतलाता है कि निरुक्त मे केवल वैदिक-शब्दों की व्याख्या हुई है ॥ व्रज्या तद्यान्येतानि चत्वारि पदजातानि नामाख्याते चोपसर्गनिपा- ताश्च, तानोमानि भवन्ति–तत्रैतन्नामाख्यातयोर्लक्षण प्रदिशन्ति-- भावप्रधानमास्यातम् ; सत्त्वप्रधानानि नामानि । तद्यत्र उभे, भाव- प्रधाने भवत. । पूर्वापरीभूत भावमाख्यातेनाचष्टे, व्रजति पचती- त्युपक्रमप्रभृति अपवर्गपर्यन्तम् । मूर्त सत्त्वभूतं सत्त्वनामभि., पक्तिरिति । अद. इति सत्त्वानामुपदेश. । गौरश्व. पुरुषो हस्तीति, भवतीति भावस्य, आस्ते शेते व्रजति तिष्ठति इति ॥ इन्द्रियनित्यं वचनमौदुम्बरायण. ॥ १ ॥ पद के जो घार भेद-नाम और आख्यात, उपसर्ग और निपात-हैं धे इस प्रकार हैं-पहले नाम और आख्यात के लक्षण कहते हैं-जिनमे भाव (क्रिया ) प्रधान हो वह आख्यात तथा जिनमे सत्त्व (सिद्ध त्रिया) प्रधान हो वे नाम हैं । जब [ किसी वाक्य मे ] दोनों मिलते हैं, तब भाय की प्रधानता मानी जाती है। पूर्वापर के क्रम से होनेवाले भाव को आख्यात नाम से पुकारते हैं जैसे चलता है, पकाता है जिनमे भारम्भ से लेकर अन्त मक का [ कयन ] है। ठोस अर्थात सिद्ध क्रिया ( सत्त्व ) के रूप में परिणत [ माव ] को मत्त्व नाम से [ पुकारते हैं ] जैसे ग्रन्या (गमन ) पति (पाक)। 'अद.' (वह ) से वस्तुओं का ( या मिद्ध त्रिया का निर्देश होता है । [विशेपत तो] गौ, अश्व, पुष्प, हस्ती भाव का [निर्दे]-- होता है; है, सोता है, चलता है, वैटता है । श्रौदुम्बरायण के मत से परामद पो सत्ता इन्द्रियो तर ही है। ) सामान्य प्रथम अध्याय विशेष --यास्क शब्दो के चार हो भेद स्वीकार करते हैं । इन भेदो का उल्लेख पहले-पहल निरुक्त मे हो हुआ है । पाणिनीय-व्याकरण ने भी इन्हे स्वीकार कर लिया है। 'भाव' का अर्थ है क्रिया, जैसे-पढ़ना; 'सत्त्व' का अर्थ है पूरी की गई क्रिपा, पाठ। पाणिनि का सिद्धावस्थापन भाव ही सत्त्व है किन्तु वह ठोम रूप में परिणत हो जाय । यह स्मरणीय है कि दोनों ही अवस्थाओं मे-चाहे आख्यात हो या नाम--प्रारम्भ से लेकर अन्त तक होनेवाली क्रिया की व्यवस्था होती है जैसे 'व्रजति' (जाता है ) मे पर बढ़ाना, हाथ फेंकना आदि से लेकर लक्ष्य तक पहुंचने तक का संग्रह होता है। किन्तु जब ये ही क्रियायें मूत रूप ग्रहण कर लेती हैं, सिद्ध हो जाती है, एकाकार हो जाती हैं तब नाम कहलाती हैं जैसे-पाठ, लेख, गमन आदि । साधारणतया इन्हें ही लोग भाव कहते हैं । वस्तुओं को सामान्य रूप से हम 'वह' कह देते हैं, किन्तु इनके विशेष उदाहरण हैं-गो आदि । इसी तरह 'भाव' को भी सामान्य रूप से कह देते हैं कि-होता है । किन्तु विशेष उदाहरण तो 'आस्ते, शेते' आदि हैं। अन्तिम वाक्य के लिये आगे देखें ॥१॥ तत्र चतुष्टव नोपपद्यते । अयुगपदुत्पन्नाना वा शब्दानामि- तरेतरोपदेश. । शास्त्रकृतो योगश्च । व्याप्तिमत्वात्तु शब्दस्य । अणीयस्त्वाच्च शब्देन सज्ञाकरण व्यवहारार्थ लोके । तेपा मनुष्य- वद् देवताभिधानम्। पुरुपविद्यानित्यत्वात् कर्मसम्पत्तिमन्त्रो वेदे ॥ इस प्रकार ये चारो (पद-भेद) असिद्ध हो जाते हैं, एक साप उत्पन न होनेवाले शब्दो का परस्पर सम्बन्ध [ भी असिद्ध हो जाता व्याकरण मे कहा गया प्रकृति और प्रत्यय का सयोग [ भी असिद्ध हो जाता है। ] किन्तु शब्द व्यापक होने के साथ-साथ सरलतर है इसलिए शब्द से ही [ वस्तुओ का ] नामकरण लोक मे व्यवहार के लिये होता है। इनके अर्थ मनुष्यों के समान ही देवताओ के लिए भी हैं। पुरुषो के ज्ञान के अनित्य होने के कारण कर्म का फल बतलानेवाले मन्त्र वेद मे हैं । विशेप-औदुम्बरायण का मत है-शब्द अनित्य हैं क्योंकि ये इन्द्रियों से निष्पन्न होते हैं । चूंकि सभी दार्शनिक इन्द्रियों को अनित्य मानते हैं इसलिए उनपर आश्रित शब्द भी अनित्य ही होगे । तब तो उपर्युक्त चारों पद-भेद बेकार ही हो जायेंगे, अनित्य शब्दो का भेद करना व्यर्थ है: फिर कई शब्दो का मेल नही हो सकता क्योकि वे भिन्न-भिन्न समयों पर उत्पन्न होते हैं तथा ४ - हिन्दी निरुक्त नष्ट हो जाते हैं । प्रकृति और प्रत्यय भी अनित्य है, इसलिए इनका व्याकरण मे लिखा हुआ सयोग भी नही होगा । किन्तु शब्दो और अर्थों की पृथक सत्ता वक्ता और श्रोता दोनो के मन में रहती है, शब्द के सुनने पर वही अर्थ जागृत हो जाता है, भले ही उस समय तक शब्द की सत्ता में रहे । यही सिद्धान्त 'स्फोट' कहलाता है जिसके अनुसार शब्द नित्य हैं ( विशेष विवरण के लिए देखें-सर्वदर्शन-सग्रह मे पाणिनि दर्शन । )-अर्थात् शब्द व्यापक हैं । शब्द केवल वस्तुओ के प्रतीक हैं जो लौकिक व्यवहार के लिए दिये गये है कि वस्तुओ का बोध हो सके । देवता की भाषा भी मनुष्यो के ममान ही है । जिस वस्तु के लिए जो सकेत दिया जाता है वह मनुष्यो और देवताओ दोनों के लिए है । जब देवता मनुष्यो की भाषा समझते ही हैं तो उनकी स्तुति किसी शब्द से कर सकते हैं ? नहीं, फल देनेवाले स्तोत्र या मन्त्र वेदो मे ही हैं-उनसे ही स्तुति करने पर फल प्राप्त हो सकता है क्योंकि मानवीय ज्ञान नित्य नही है । पड़ भावविकारा भवन्तीति वार्ष्यायणि ।जायतेऽस्ति विपरि- णमते वर्धतेऽपक्षीयते विनश्यतीति । जायते इति पूर्वभावस्यादि- माचष्टे। नापरभावमाचष्टे-न प्रतिषेधति । अस्तीत्युत्पन्नस्य सत्त्वस्यावधारणम्।विपरिणमते इत्यप्रच्यवमानस्य तत्त्वाद्विकारम् । वर्धते इति स्वाङ्गाभ्युच्चयम् । सायौगिकाना वार्थानाम् । वर्धते विजयेनेति वा, शरीरेणेति वा । अपक्षीयते इति एतेनैव व्यारयात प्रतिलोमम् । विनश्यतीत्यपरभावस्यादिमाचष्टे । न पूर्वभावमाचष्टे, न प्रतिषेधति ॥ २ ॥ वार्ष्यायणि का मत है कि क्रिया के छ रूप हैं-जन्म लेना, होना, बदलना, वढना, घटना और नष्ट होना । (१) 'जन्म' से पूर्व प्रिया (जन्म) का बोध होता है. बागेवाली क्रिया ( = अस्ति ) का नही, फिर [आगेवाली क्रिया से ] उसे कोई विरोध भी नहीं। (२) होना' से उत्पन्न वस्तु की सत्ता मालूम होती है । (३) 'बदलना' से अपनी प्रवृति न छोड़ने वाली वस्तु के परिवर्तन का बोध होता है। (४) बटना से अपने अगो (जैसे हाय, पर ) या युक्त अर्थों (जैसे स्वर्ण, धान्य ) की वृद्धि का बोध होता है जैसे-विजय से बढ़ता है, शरीर से बढता है । (२) 'घटना' की प्रथम अध्याय व्याख्या तो इसी से हो गई, वह इसका उलटा है । (६) 'नास' से आगे आनेवाली (अन्तिम) क्रिया (नाश) के आरम्भ का बोध होता है, पूर्व क्रिया ( घटना ) का नही, किन्तु उस [ पूर्व क्रिया ] का विरोध भी नहीं होता ॥ २ ॥ विशेप-क्रियाओ की भिन्न-भिन्न अवस्थायें हैं किन्तु उपर्युक्त छ: अवस्थाओ मे ही सबो का अन्तर्भाव हो जाता है। पूर्वभाव = दो क्रियाओ के सम्बन्ध दिखलाने पर जो क्रिया पहली हो, जैसे-जायते और अस्ति के सम्बन्ध के समय-'जायते' पूर्वभाव है भोर 'अस्ति' अपर-भाव । पुन अपक्षय और विनाश के सम्बन्ध मे 'अपसप' पूर्वभाव है, 'विनाश' अपर भाव । पहली क्रिया पूर्वभाव और दूसरी अपर-भाव कही जानी है ॥ २॥ अतोऽन्ये भावविकारा एतेषामेव विकारा भवन्तीति ह स्माह। ते यथावचनमभ्यूहितव्या । न निर्वद्धा उपसर्गा अर्थानिराहु- रिति शाकटायन" | नामाख्यातयोस्तु कर्मोपसंयोगद्योतका भवन्ति । उच्चावचा पदार्था भवन्तीति गार्ग्य । तद्य एषु पदार्थः प्राहुरिमे तन्नामाख्यातयोरर्थविकरणम् । इनके अलावे क्रिया की जो भी अवस्यायें हैं ये इन्ही के रूप हैं-ऐसा कहा गया है । ये वाक्य के अनुसार खोज लिये जाय । शाकटायन का मत नाम-आख्यात मे ] अलग होने पर उपसर्ग अर्थ का निश्चय नहीं कर सकते । लेकिन नाम और आरूपात का [ अन्य ] अर्थ से सयोग वतलाते हैं । गाग्यं का मत है कि इन पदो ( उपसगों) के बहुत तरह के अर्थ हैं। तब इनमे जो 'अर्थ का होना' कहा गया है वह नाम और आख्यात के अर्थों का परिवर्तन मात्र हैं। विशेष-वचनः = वाक्य । निरुक्त मे 'कर्म' का मतलब प्राय 'अर्थ' होता है । कर्मो सयोग = नये अर्थ से सम्बन्ध; सज्ञा और क्रियाओं मे उपसर्गों के योग से नये अर्थ का आगमन होता है, यह परिवर्तन शब्द मे ही होता है उपसर्ग मे नहीं । उपमर्ग यह धोतिन करते हैं कि ऐसा परिवर्तन हुमा है-वे अर्थ के वाचक नही । कहा भी है- उपसण घावों बलादन्यत्र नीयते । । प्रहाराहारसहारविहारपरिहारवत् । उपसर्गों के द्योतकत्व-पक्ष के विवेचन के लिये,महाभाष्य देखें-'उपसर्मा क्रिया- योगै' सूत्र पर ( भूमिका देखें)। आगे जो उपसर्गों के अर्थ कहे जायेगें उनका .
m हिन्दो-निरुक्त मतलब यही है कि संजा और क्रियाओ का वैसा ही अर्थ परिवर्तित होगा। गाग्यं का मत है कि पद होने के कारण उपसर्गों का अर्थ अवश्य है ॥ आ इत्यर्वागर्थे । प्र परा इत्येतस्य प्रातिलोम्यम् । अभीत्याभि- मुख्यम् । प्रतीत्येतस्य प्रातिलोम्यम् । अति-सु इत्यभिपूजितार्थे । निर्दुरित्येतयोप्रातिलोम्यम् । नि अव इति विनिग्रहार्थीयो । उत् इत्येतयो. प्रातिलोम्यम् । समित्येकीभावम् । वि अप इत्येतस्य प्रातिलोम्यम् । अनु इति सादृश्यापरभावम् । अपीति संसर्गम् । उप इत्युपजनम् । परीति सर्वतोभावम् । अधीत्युपरिभावम् । ऐश्वर्यं वा । एवमुच्चावचानर्थान् प्राहु. । ते उपेक्षितव्याः ॥ ३ ।। आ-'इघर' के अर्थ मे; प्र, परा-इसका उलटा ( उघर), अभि-सामने; प्रति-इसका उलटा ( उलटे ); अति, सु-आदर के अर्थ मे; निर, दुर्-इसका उलटा (निरादर ); वि. अव-'नीचे' के अर्थ मे, उत्-इसका उलटा (ऊपर); सम्-एक साथ; वि. अप-इसका उलटा ( अलग ); अनु 'समान' और 'पीछे होना', अपि-ससर्ग; उप-समीप; परि-चारो ओर; अधि-'ऊपर होना' या सबसे ऊँचा । इस प्रकार भिन्न-भिन्न अर्थ बतलाते हैं। उनपर ध्यान देना चाहिये ।।३।। विशेप-उपेक्षितव्या-समीप जाकर देखना चाहिये। बाद में इसका अर्थ तिरस्कार हो गया है । परन्तु निरुक्त मे यह पुराने अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । माखो के अत्यन्त निकट रहने से अनादर होता ही है, इस प्रकार यह अर्थ भाया । (देखें-Poona Orientalist के जनवरी ५९ का अङ्क, सत्यवतजी फा लेख-Semantics in Sanskrit.)॥ ३ ॥ द्वितीय-पाद अथ निपाता. । उच्चावचेष्वर्थेषु निपतन्ति । अप्युपमार्थे । अपि कर्मोपसग्रहायें। अपि पदपूरणा । तेपामेते चत्वार उपमार्थे भवन्ति। अब निपातों का [ वर्णन होगा ] । ये विभिन्न अर्थों में आते हैं । कुछ सो उपमा के अर्थ में हैं, वृछ सयोजक (Conjunction ) के अर्थ में और कुछ वेवस पर पूरा करनेवाले हैं। इनमें ये चार (निपात ) उपमा के अर्थ प्रथम अध्याय ७ । विशेष-निपातो ( Particles) के तीन भेद हुए--(१) उपमार्थक (२) कोपसंग्रहार्यक (३) पदपूरणार्थक । अभी चार उममार्थक निपातो का उदाहरण दिया जा रहा है। पिछले दोनो का उदाहरण इसके बाद देंगे। इवेति भाषायां चान्वध्यायं च । 'अपिरिव' । 'इन्द्र इव' इति । नेति प्रतिपेधार्थीयो भापायाम् । उभयमन्वध्यायम् । 'नेन्द्र देवममंसत' इति प्रतिवेधार्थीय. । पुरस्तादुपचारस्तस्य यत्प्रति- पेति । 'दुर्मदासो न सुरायाम्' इत्युपमार्थीय. । उपरिटादुपचा- रस्तस्य येन उपमिमीते । (१)-भाषा ( सस्कृत) और वेद दोनो मे [ यह उपमार्थक है ] जैसे-अग्नि-सा (ऋ० १०१८४१२), इन्द्र-सा (ऋ० १०।१७३।२), (२) न- भाषा मे निषेधार्यक, किन्तु वेद मे दोनो ( निषेध + उपमा ) है-(अ) इन्द्र देव को नहीं माना ( ऋ० १०।०६।१ )-यहाँ निषेधार्थक है; जब निषेध करता है तब इसका प्रयोग पहले होता है। (आ) शराब पिये मतवालो के समान (ऋ० पा२।१२)-पहां उपमार्थक है। जिससे उपमा दी जाती है (वाचक) उसका प्रयोग बाद में होता है । विशेष -अम्बध्याय = स्वाध्याय की पुस्तक (वेद) मे । जब 'न' का अर्थ उपमा होता है तब पान्द के बाद रखा जाता है जैसे-मृगो न, इन्द्रो न । विन्तु जब निषेध करता है तब शब्द के पहले रखा जाता है जैसे-न मृग., न जायते । चिदित्येषोऽनेककर्मा । 'आचार्यश्चिदिदं ब्रूयात्' इति पूजायाम् । आचार्य. आचारं ग्राहयति । आचिनोति अर्थात् । आचिनोति बुद्धिमिति वा । 'दधिचित्' इत्युपमा। 'कुल्मापाश्चिदाहर' इत्यवकुत्सिते । कुल्मापा. कुलेषु सीदन्ति ॥ 'नु' इत्येपोऽनेककर्मा । 'इदं नु करिष्यति' इति हेत्वपदेशे। 'कथ नु करिष्यति' इत्य- नुपृष्टे। 'नन्वेतदकात्'ि इति च। अयाप्युपमाथें भवति । 'वृक्षस्य नु ते पुरुहूत ! वयाः । वृक्षस्य इव ते पुरुहूत ! शाखा.। वया. शाखाः वेते. । वातायना. भवन्ति । शाखा खशया. शक्नोतेवा।। (३) चित्-इसके अनेक अर्थ है-'मान्य आचार्य यह बोले -यहाँ सम्मान का अर्थ है । भाषायं आधार (परम्परागत उपदेश ) ग्रहण कराता है, 21 । हिन्दी निरुक्त अर्थों का चयन करता है या बुद्धि का चयन करता है (क्रमशः बढाता है)। 'दही-सा'-यही उपमार्थक है। 'कुलयियो ( एक अन्न ) को लाओ'--यहाँ निन्दार्थक है । 'कुल्माप कुलो मे नष्ट होते हैं । (४) नु-इसके अनेक अर्थ हैं। 'क्योकि इसे करेगा'---यहाँ कारण देने के लिए है । 'कैसे करेगा? यहाँ दुबारा पूछने के अर्थ मे है । 'चूंकि यह तो किया ही होगा।'-यह भी उसी अर्थ में । यह (न) उपमा के अर्थ मे भी होता है जैसे-'हे बहुत प्रकार से बुलाये गये ( इन्द्र ), तुम्हारी शाखायें वृक्ष सी हैं ( ऋ० ६।२४.३ )।' वया - शाखायें, Vवा (बहना ) से । ये हवा के घर है । शाखा = आकाश (ख) मे शायम करने वाली, अथवा शक से। विशेप-याक निर्वचन के अत्यन्त प्रेमी हैं। निपानो के उदाहरण में आनेवाले शब्दो को भी नहीं छोडते। उनका निवचन (व्युत्पत्ति से अथ का पता लगाना etymology ) करना ही चाहिए। आचार्य शब्द या तो/चर से या चि से बना है। यारक को विचार-शृखला पर भी ध्यान दें-नु के उदाहरणवाली ऋचा मे 'वया:' शब्द आया है, उसका प्रतिशब्द दिया 'शाखा'। अब शाखा का निर्वचन करना आवश्यक हो गया । 'शाखा' वर्ण-विपर्यय ( Merathesis ) का फल हो सकता है, स ( आकाश ) मे रायन करने वाला-पीशर से दाख बनकर 'शाखा' हुआ हो। इस प्रकार के विषयान्तर यास्क मे वहुन हैं जिन्ह व अपने निर्वाचन प्रेम का प्रदर्शन करने के लिए लाये हैं। अथ यस्य आगमात् अर्थपृथक्त्वम् अह विज्ञायते, न तु औद्देशिकमिव, विग्रहेण पृथक्त्वात्, स कर्मोपसग्रह. । अयं सयोजक ( (कर्मोपसग्रह conjunction) उसे कहते हैं, जिसके थागमन से वस्तुओ का अलग-अलग होना निश्चित रूप से मालूम हो, किन्तु यह (पार्थक्य ) सामान्य-गणना के समान [ स्पष्ट नहीं रहता ], बल्कि [ समास के पदो को ] अलग-अलग करन पर हो पृथक् मालूम।पडता है । रिशेप-कर्मोपसग्रह निपातो का दूसरा भेद है. इसके उदाहरण है-- वा इत्यादि । दुर्गाचाय का कथन है कि समास के भिन्न-भिन्न पदो मे जिससे पाथक्य मालूम हो, यह पापय स्पष्ट रूप से कहा नहीं गया हो किन्तु विप्रह करन पर अलग मालूम हो-वही कर्मोपसग्रह है । डा. गुणे महते हैं कि चूंकि निपातों के तीन ही भेद हैं इसलिए कर्मोपसंग्रह में दे सभी निपात आ जात है प्रथम अध्याय जो उपमार्थक या पदपूरण नहीं है । इसलिए वे 'अर्थपृथवत्व' का अर्थ करते हैं-- तरह तरह के अर्थ (a variety of senses), किन्तु वस्तुओ को साधारण गणना के समान नहीं । उनमे प्रत्येक का अलग अलग उल्लेख हुआ है । 'न तु० पृथक्त्वात्' की मति बैठाना कठिन है । सम्भवत यही अर्थ है कि किसी समास मे वस्तुओ का पार्थक्य औद्देशिक ( उद्दिष्ट ) रहना है वस्तुत' कहा नहीं जाता। हो सकता है प्राचीन पाण्डुलिपि मे यह अश मूल के बगल में किसी अध्यापक द्वारा लिख दिया गया हो जिसे लेखक ने मूल ही समझकर जोड दिया हो- क्योकि कर्मोपस ग्रह की परिभाषा तो पहले वाक्य में ही पूरी हो जाती है। 'च' इति ममुच्चयार्थ. । उभाभ्या संप्रयुज्यते । 'अह च त्व च वृत्रहन्' इति । एतस्मिन्नेवाथे 'देवेभ्यश्च पितृभ्य आ' इति आकार । 'वा' इति विचारणार्थे । 'हन्ताहं पृथिवीमिमा निद- धानीह वेह वा' इति । अथापि समुच्चयार्थे भवति ॥ ४ ॥ (१)च-जोडने के अर्थ मे दोनों राब्दों के बाद में प्रयुक्त होता है। जैसे-हे वृत्र को मारनेवाले । तुम और मैं-(ऋ० १६२।११) । (२) आ- इसी ( जोडने के ) अयं मे जैसे-देवनाओं और पितरो के लिए (ऋ० १०. १६।११) । (३) वा-सन्देह के अर्थ में जैसे-कहाँ रखू मही को मैं, यहाँ पर या वहाँ इसे ' (ऋ० १०.११९।९)। यह जोडने के अर्थ मे भी होता है 'वायुर्वा त्वा मनुर्वा त्वा' इति । 'अह' इति च, 'ह' इति च,- विनिग्रहार्थीयौ, पूर्वेण सप्रयुज्यते । 'अयम् अह इद करोतु, अयमि- दम्' । 'इद ह करिष्यति, इद न करिष्यति' इति । अथापि उकार. एतस्मिन् एवार्थे उत्तरेण । 'मृपा इमे वदन्ति, सत्यम् उ ते वदन्ति' इति । अथापि पदपूरण. । 'इदमु', 'तदु' इति । तुम्ह वायु या मनु-(मंत्रा० स० १११११) 1(४५) रुकावट के अयं. वाले अह' और 'ह' पहले शब्द के बाद प्रयुक्त होते हैं जैसे-एक इसे ही करे, एक उस करे । इसे करेगा, उसे नहीं। (६) उ-इसी अर्थ में अन्तिम [शब्द ] के बाद प्रयुक्त होता है । जैसे-य भूठ बोलत हैं। वे सच । यह पद- पूरण भी है जैसे-यह. वह । .
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हिन्दी निरुक
'हि' इत्येपोऽनेककर्मा । 'इद हि करिष्यति' इति हेत्व.
पदेशे। 'कथ हि करिष्यति' इति अनुपृष्टे । 'कय हि व्याकरिष्यति'
इति असूयायाम् । 'किल' इति विद्याप्रकर्ये । 'एव किल' इति ।
अयापि 'न' 'ननु' इत्येताभ्या सप्रयुज्यते अनुपृष्टे । 'न किलैवम्',
'ननु विल एवम्' । 'मा' इति प्रतिषेधे । 'मा कार्पो.'। 'मा
हापी' इति च । 'सल' इति च । सलु कृत्वा' । 'खल कृतम्' ।
अयापि पदपूरण । 'एव सलु तद्भूव' इति ।
(७) हि-इसके अनेक अपं हैं। पारण देने मे, जैसे-पयामि से
परेगा । दुवारा पूछने में जमे-मे परेगा? tel में, जैसे-मे परेगा?
(८) रिल-निश्चय करने के लिय, जस-ऐमा हो । यह 'न' भोर 'मनु' बार
प्रयुक्त होन से प्रश्नवापर हो गता है जैसे-या ऐमा नहीं (९)-
निषध व रिए. जी - मन परो, मत हो। (१०) सातु-दगी मप में. जैसे-
म परम, नही दिया। यह भी कभी पदपूरण भी (निरपर, वल पद की
पूर्ति र विस) होता है अंग-वह ऐमा हुमा ।
'शव' ति पिचिपिन्नार्थीयो भाषायाम्। 'शश्वत् एवम्'
इति अनुपुटे। 'एर दावत् इति अम्बयपृष्टे । 'नूनम्' इति
विचिीन्मार्थीयो भाषायाम् । उभयम् अन्यध्यायम् । मिचिपि-
लायित्र परपूरणः ॥ अगम्य इन्द्राय हविनिरय मगदपः
मप्रमिलाचार । मन्द एल्य पग्देिवयानर ॥५॥
प्रथम अध्याय ११ कई जगह हैं । इसका शाब्दिक अर्थ होगा-देने की इच्छा की । परिदेवय'चके- शिकायत को । तुल० गीता--तत्र का परिदेवना ( २१२८॥५॥ तृतीय-पाद न नूनमस्ति नो श्व., कस्तद्वेद यदद्भुतम् । / अन्यस्य चित्तमभिसचरेण्यम्, उताधीतं विनश्यति ।। (न) न तो (नूनम् ) आज (अस्ति) है, (म) और न ( श्वः) कल ही होगा; ( यत् ) जो (अद्भुतम् ) नही हुआ है, (तत) उसे (क:) कौन ( वेद ) जानता है ? (अन्यस्य ) दूसरे का (चित्तम् ) मन (अभि- सचरेण्यम् ) अत्यन्त चलायमान है. जिससे ( अधोतम् ) सुनिश्चित वस्तु (उत) भी (विनश्यति ) समाप्त हो जाती है - उसे भूल जाते हैं '(ऋ० १६१७०।१)। विशेप -इस ऋचा मे दो छन्दो का मेल है-प्रथम, द्वितीय और चतुर्थ चरणों मे अनुष्टुप् ( ८ अक्षर ), किन्तु तृतीय चरण मे जगती (११ अक्षर) है । प्रथम चरण के 'भव:' को छन्द के लिए 'शुअ.' पढना होगा । 'नूनम्' का सम्बन्ध आधुनिक विद्वान् 'नु' ( Now ) से मानते हैं, यद्यपि मास्क 'नूनम्' अद्यतनम् (भाज) कहते हैं । न नूनमस्ति अद्यतनम् । नो एव श्वस्तनम् । अद्य अस्मिन् द्यवि । 'द्यु.' इत्यह्नो नामधेयम् । द्योतते इति सतः । श्व. उपा- शंसनीय. काल. । ह्य. हीन. काल.। कस्तद्वेद यदद्भुतम् क. तद वेद, यद् अभूतम् १ इदमपि इतरत् ‘अद्भुतम्' अभूतमिव । अन्यस्य चित्तम् अभिसचरेण्यम्=अभिसचारि । अन्य. नानेय. । चित्त चेततेः । उताधीतं विनश्यति इति-अपि आध्यातं विनश्यति । आध्यातम् अभिप्रेतम् ॥ अथापि पदपूरण. ॥ ६ ॥ न नूनमस्ति=(न) आज ( है ), न ( आगामी) कल हो । अद्य = इस दिन मे । 'शु' दिन का पर्याय है और/युत् (चमकना) से बना है। श्व = आशा करने योग्य ममय (शस्) । ह्यःहैन (बीता हुआ) समय । क: तद्वेद यदद्भुतम् = जो अभूत ( वस्तु ) है उसे कौन जाने ? यह १२ हिन्दी-निरुक्त दूसरा 'अद्भुत' ( विचित्र ) भी अभूत (नही हुआ) के ही समान है। दूसरे का मन अभिसचरेण्य = चलायमान है। अन्य = न लाने योग्य (/नी)। 'चित्' चित्त (जामना ) से । उत अधीत विनश्यति = ध्यान की गई ( वस्तु) भी नष्ट हो जाती है। ध्यान की गई = इच्छा की गई। [ 'नूनम' कभी-कभी ] पदपूरण भी होता है जैसे---|| ६ ॥ विशेष-उपर्युक्त ऋचा की व्याख्या यास्क ने की है जिसमे प्रधान लक्ष्य निर्वचन ( प्रकृति वतलाकर अथं निकालना ) है। अद्भत-अ+ /भू = नही हुभा है । इसके बाद अद्भूत के तत्कालीन अर्थ पर भी विचार करते हैं--- 'विचित्र' अर्थवाला अद्भुत भी अभूत ( अपूर्व) ही है। किमी अपूर्व वस्तु को ही विचित्र कहते हैं । अर्थविज्ञान ( Semantics ) की दृष्टि से इन पक्तियो पर ध्यान दें। अभिसचरेण्य-/च+वैदिक प्रत्यय वेन्य (पा० ३।४।१४) । 'सचरणीय' सस्कृत रूप है। नून सा ते प्रति वर जरित्रे, दुहीयदिन्द्र दक्षिणा मयोनी । शिक्षा स्तातृभ्यो माति धग्भगो ना, बृहद्वदेम विदथे सुवीराः ।। ( इन्द्र ) हे इन्द्र । ( ननम् ) अभी (ते) तुम्हारा (सा) यह (मघोनी ) उत्तम ( दक्षिणा ) पुरस्कार ( जरिये ) गायक को ( वर ) वरदान ( प्रति दुहीयत् ) प्रदान परे, दोहन करे। (स्तोतृभ्यः ) स्तुति करनेवालों के लिए ( शिक्ष ) लाभप्रद मनो, (भा ) भाग्य (नः ) हमसे ( मा अति पक) दूर न हो; हम ( सुवीरा ) और पुरुषो से युक्त होकर (विदथे ) (दहत ) महान् दाद ( वदेम ) बोलें ।। (ऋ० २।१६।९)। विशेप-उपर्युक्त अनुवाद जर्मन विद्वान् गेल्डनर के अनुमार है, यास्क को व्याख्या इसके बाद मिलेगी। प्रति दुहीयत्-दिक भाषा मे उपसग 'धातु को छोड़कर कहीं भी रह सकता है दुह-दूहना । HिME-शिक्ष' वा छन्द के लिए दीर्घ सा ते प्रतिदुग्धा वर जरिये। वरो वरयितव्यो भवति । जरिता गरिता। दक्षिणा । भवोनी-मयवती । मघमिति धन- नामधेयम्। महते. दानरमण.1 दक्षिणा दक्षते.समर्धयति कर्मण. । व्युद्ध समर्धयति इति । अपि वा प्रदक्षिणागमनात् दिशमभिप्रेत्य। दिक् हस्तप्रकृति । दक्षिणो हस्तो दक्षते. उत्साहकर्मण.।दाशतेर्वा स्यात् दानकर्मण. । हस्तो हन्ते. । प्रागु. हनने ॥ मे यम प्रथम अध्याय १३ । । वह ( दक्षिणा ) तुम्हें-गायक को–वर दे (दोहन करे)। दर चुनने के लायक होता है (W)जरिता = गानवाला । मघोनी-मघ से युक्त मघ = धन जो दानार्थक / मह से बना है। दक्षिणा दक्ष् सेपमृद्ध करना । जो ऋद्धिहीन को समृद्ध करे । अथवा [ वायें से ] दायें जान के कारण दिशा को लक्ष्य करके बना हो । दिशा की उत्पत्ति हाय से ही हुई है। दक्षिण हस्त-उत्साहाथक/दक्ष से या दानार्थक/दाश् से बना है । हस्त/हन् ( मारना ) से बना है क्योंकि मारने मे तेज है। देहि स्तोतृभ्य कामान् । मा अस्मान् अतिदही मा अस्मान् अतिहाय दा । भगो नोऽस्तु । वृहद् वदेम स्वे वेदने । भगो भजते । बृहत् इति महतो नामधेयम् । परिवृढ भवति । वीर- वन्त । कल्याणवीरा. वा। वीरो वीरयति अमिनान् । वेतेर्वा स्याद् गतिकर्मण । वीरयते ।। स्तुति करनेवालो को काम ( इष्ट वस्तु) दो। हमे मत जलाओ। हम छोडते हुए [ किसी दूसरे को ] मत दो। हमारा कल्याण हो। हम अपने घर मे जोरों से बोलें। भग/भज् (पूजन ) से बना है । बहत = महान , क्योकि परिवृढ ( मजबूत ) है । [सुवीरा = ] पुषवाले या कल्याणकारी पुत्र- वाले । वीर शत्रुओं को छिन्न भिन्न करता है (वि+Vईर) या गत्यर्थक वी से, या वीरय ( वीर-सा काम करना) से बना है। 'मीम्' इति परिग्रहार्थीयो वा । पदपूरणो वा। 'प्र सीमा- दित्यो असृजत् । प्रासृजत् इति वा । प्रासृजत् सर्वत इति वा । 'वि सीमत सुरुचो वेन आव' इति च । व्यावृणोत् सवत आदित्य । सुरुच आदित्यरश्मय सुरोचनात् । अपि वा, 'सीम' इत्येतत् अनर्थकम् उपवन्धम् आददीत पञ्चमीकर्माणम् । सीम्न सीमत -सीमात-मर्यादात । सीमा-मर्यादा, विपीव्यति देशा- विति ॥ 'त्व' इति विनिग्रहार्थीय सर्वनाम अनुदात्तम् । अर्वनाम इत्येके ॥ ७॥ (१३) सीम्-सर्वत्र के अथ मे या पदपूरण होता है जैसे-अदिति का पुत्र (वरुण ) तेजी से जाय ( ऋ० २।२८।४)। सेजी से जाय सुदपूरण होने पर) या-सर्वत्र मेजी से जाय (दोनों अर्थ सम्भव है ) 1 चमकनेवाले आदित्य ने १४ हिन्दो निरुक सर्वत्र खोर दिया (मंत्रा० स० २१७४१५ ) = आदित्य ने सब खोल दिया । आदित्य की किरणें अधिक चमकने के कारण 'मुरुच' हैं । अथवा 'सीम' शब्द अपादान ग्रहण करनेवाले [तः ] प्रत्यय ( उपरन्ध ) को बिना किसी विशेष अर्थ (वार्य मे हो ) लगाता है । सीमन्-पीम-सीमा-मादा से । सीमा मर्यादा, क्योंदि दो देशो को अलग करती है . वि+/पिवु ) 1(१४) २५- सावट के अर्थ में अनुदात्त सर्वनाम है, कुछ लोग इसे 'भाषा' का पर्याय मानते हैं ।।७।। विशेप-'च' से लेकर 'सीम' ता तेरह वर्मोपसंग्रह हैं। बौदहवा सर्वनाम है। ऋचा व पोपमास्ते पुपुष्वान्, गायय त्वो गायति शकरीषु । ब्रह्मा यो वदनि जातविद्या यशस्य मात्रा वि मिमीत उ त्व. ॥ (५) ए( पुपुष्वान् ) पोषण करनेवाला पुरोहित (ऋषाम् ) ऋथाओं की (पोपम् ) वृद्धि करने में (प्रास्ते ) लगा है। (व ) एक दूसरा पुराहिल (दाकारी) परी नामा छन्दों में ( गायत्रम् ) गायत्री दमो = गेप छन्द मो ( गापार ) गाता है। (व ) एष दूसरा पुरोहित ( ब्रह्मा ) मा है, जो (जातविद्याम) ममय-समय पर समाधान (पति) मनमा है । ( उ ) और (१) एप पुरोटिन तो (यस्य) 1 (मात्राम) परिमाण विमिमीन नापमा है- सम्पादन विशेष-पुवान--पुर+शिद (पमा प्रायय ) - पोर चारों पायो में माता (भादेव ) उगाता (गा) हा (4) सपा कार्य (पशु) 1 उIn है। गमे यह म गम Hि ऋगारेगमप शमी येद विमान पे । या प्रयोजन धार होरा साह यिाया। oth । पोजिनीन पदोघाण गायत्री बनाएर माता गाता है। की ऋविश्र्मणा विनियोगम् जाचष्टे। प्रचाम पर. पोषम् आने पुपुष्यान-होता। ऋग-अयनी। गायषम् यो गायति बरगे-शाना । गायन गायो नुनिश्मंग । मात्र मन गानोते. । 'नद यानि प्रमाद् हनु न मरीणा सावर्गियन् नि किने।
प्रथम अध्याय । । इस प्रकार याज्ञिको के कार्यों का विभाजन कहा गया है। एक पोषण करनेवाला ऋचाओं की वृद्धि में लगा हुआ है-वह होता है। ऋक - पूजा का साधन (अर्थ)। एक शरियो (छ पाद वाली ऋचाओ) में गायत्री छ द का गान करता है-वह 'उद्गाता है । 'गायत्र' स्तुति अर्थवाले/ग से बना है । शक्करी ऋचाएं शक से । 'जिनके द्वारा वृत्र राक्षस माग जा सका यही शरियो की विशेषता है-यह मालूम होता है । रिशेप-निरुक्त में ब्राह्मण ग्रयो के बहुत से वाक्य उद्धृत हैं जो निर्वचन से सम्म रखते हैं। विज्ञायते' के द्वारा जिनने उद्धरण हैं वे ब्राह्मण ग्रयो के हो हैं । ब्राह्मणो के ये ही विषय हैं- हेतुनिर्वचनं निन्दा प्रशसा सरायो विधि । परक्रिया पुराकल्पो व्यवधारणकल्पना ॥ ( श० मा० ॥) ब्रह्मा एको जाते जाते विद्या वदति । ब्रह्मा सर्वविद्य । सर्व वेदितुम् अर्हति । ब्रह्मा परिवृढ श्रुतत । ब्रह्म परिवृढ सर्वत । यज्ञस्य मात्रा विमिमीते एक अध्वर्यु । अवर्यअध्वरयु । अध्वर युनक्ति । अध्वरस्य नेता । अध्वर कामयते इति वा । अपि वा अधीयाने 'यु' उपबन्ध । अध्दर इति यज्ञनाम । ध्वरति हिंसाकर्मा । तत्प्रतिपेध ॥ एक बहार' है जो प्रत्येक कठिन प्रसङ्ग का समाधान बतलाता है । बहा मर्वज्ञ है सब कुछ जान सकता है । 'ब्रह्मा' वेदों में पूरा कुशल है। ब्रह्म सब से बडा (परिवृढ ) है । एक अध्वयु' है जो यज्ञ का परिमाण नापता है (सम्पन करता है ) । अध्वयुप्रध्वरयु (र के अ का लोप)-अध्वर को जोडने. वाला । अध्वर का नेता या अध्बर की कामना करनेवाला ( क्या प्रत्यय)। अथवा अध्ययन के अथ मै यु' प्रत्यय लगा है। मध्वर' मश का पर्याय है। चिरहिंसा करना, इसका निपेष (अहिंसा) ॥ निपात इत्येके । तत्कथम् अनुदात्तप्रकृति नाम स्यात् ? दृष्ट- व्यय तु भवति । 'उत ल सख्ये स्थिरपीतमाहु' इति द्वितीया- याम् । 'उतो त्वस्मै तन्व विससे' इति चतुर्थ्याम् । अथापि प्रथमा- बहुवचने ॥ ८॥ कुछ लोगो क अनुसार [ख] निपात है । नही वो सरा-शब्द किस प्रकार अनुदास हो माता है । फिर भी इस (त्व का) रूप-परिवर्तन देखा जाता है , १६ हिन्दी निरुक्त जैसे-मित्रता के विषय मे कुछ को स्थिर होकर ( अर्थ ) ज्ञान करनेवाल कहते हैं ( ऋ० १०७१।५)-यहां द्वितीया मे । कुछ के लिये वह दारीर फैलाती है (ऋ० १०७१।४)--यहाँ चतुर्थी मे। प्रथमा बहुवचन मे भी होता है-॥ ८॥ विशेप-चूंकि रूप-परिवर्तन होनेवाली संज्ञाओ मे अन्तिम स्वर उदात्त होता है परन्तु 'त्व' अनुदात्त है इसलिए यह अवश्य ही निपात (अव्यय) होगा, तथापि इसका रूप परिवर्तन देखा गया है। इसलिए यह कहना कठिन है कि यह सर्वनाम ( अनुदात्त ) है कि निपात । दोनो ऋचाओ की व्याख्या आगे देखें (नि० ११९-२०)॥८॥ अक्षण्वन्त. कर्णवन्त. सखायो मनोजवेष्वसमा बभूवु. । आदघ्नास उपकक्षाम उ त्वे ह्रदा इव सात्वा उ त्वे ददृश्रे॥ ( अक्षण्वन्त ) आंग्व से युक्त और (कणवन्तः) कान से युक्त (सवाय ) मित्रगण ( मनोजवेषु ) बुद्धि के वेग मे = शान में (असमाः) बराबर नही ( बभूवु ) हुए ( उ त्वे ) और कुछ तो ( आदनास.) मुंह तक जलवाले (हृदा इव तालाब के समान, कुछ ( उपकक्षासः) काख तक जलवाले [तालाब के समान] तथा ( उ त्वे ) कुछ लोग ( स्नात्वाः) स्नान करने योग्य [ तालाब के समान ] (दहश्रे) दिसलाई पटे। (ऋ० १०७१।७)। विशेप-जिस प्रकार तालाबो को गहराई भिन्न-भिन्न होती है-रिसी मे भरमुंह पानी, किसी मे शाखमर, किसी में वेवल स्नान परमे ही योग्य--- उसी प्रकार विद्वानों को बुद्धि भी भिन्न-मिन्न है अर्थात् वे बुद्धि ये वेग में विषम हैं । सखा का अर्थ यहाँ रधि है जो पई प्रकार है--उत्तम, मध्यम और अधम । अक्षिमन्त. कर्णवन्तः मखाय । 'अक्षि' चष्टेः। अनक्त. इति आग्रायण. । 'तस्मादेने व्यक्ततरे इव भवत' इति ह विज्ञायते । 'कर्ण.' कृन्तते. । निकृत्तद्वारो भवति । ऋच्छते इति आग्रायण.। अच्छन्ति इव, मे उदगन्तामिति ह विज्ञायते । बाप से युक्त और कान से युक्त मित्रगण । 'यशिप (मामा) से थना है । घामायण कहते है कि अज (प्रभावित करना) से बना है । इमरिये ये [आर्य समूचे परीर को पेश ] अधिक ध्यात-गी होती है यह प्रथम अध्याय मालूम होता है । 'कर्ण न ( काटना) से बना है। इसका द्वार कटा हुआ होता है । आपापण कहते है कि ऋच्छ (जाना ) से बना है, क्योंकि [ शब्द कानों में ] जाते हुए-मे मालूम पडने हैं या ये कान ही आकाश में जाते हैं---यह गालम होता है ।। मनसा प्रजवेषु असमाः वभूवुः । आस्यदघ्नाः अपरे । उप- कक्षदघ्नाः अपरे । आस्यम् अस्यतेः । आस्यन्दते एनत् अन्नम् इति वा । दनं दध्यतेः स्रवतिकर्मणः । दस्यतेः वा स्यात् । विदस्ततरं भवति । प्रस्नेयाः ह्रदा इव एके प्रस्नेया ददृशिरे। सानाहाः । ह्रदो हादतेः शव्दकर्मणः । ह्लादने. वा स्यात् शीतोभावकर्मणः ।। मन ( बुद्धि ) के वेग मे समान नहीं हुए। दूसरे केवल मुंह ( आम्य) मार (दम) हो थे। कुछ लोग कांच भर थे। 'आस्थ अस् (फोना) से बना है। या अन्न इममे वहता है (आ/स्यन्द)। 'दन/द से बना है जिसका अर्थ है-बहना। या /दस् (धोग ) मे बना है क्योकि विशेषनया क्षीणतर ( दस्ततर) होता है %3 ( सीमित कर देना ) 1 नहाने लायक कुछ लोग तालाब के समान नहाने लायक दिखे। स्नान के योग्य । 'हृद/हाद = शब्द करना से या 'शीतल करना' अभं वाले /हाद मे बना है । विशेप-आदन - यास्यदध्न । दप्न = मात्र । स्नात्वा = स्नान योग्य । अयापि समुच्चयार्थे भवति । 'पर्याया इव त्वदाश्विनम्' ! आश्विनं च पर्यायाश्च इति ॥ अथ ये प्रवृत्ते भय अमिताक्षरेषु ग्रन्येषु वाक्यपूरणाः आगच्छन्ति, पदपुरणास्ते मिताक्षरेयु । अनर्थकाः । कम् ईम् इत् उ इति ।। ९॥ [ यह 'व' ] जोडने के अर्थ में भी होता है जैसे- [एक मा मे] याश्विन को पर्याय-मा गाते हैं ( कौपी० प्रा० १४४)। आश्विन को और पर्यायों को। अयं बतलाने हुए असीमिन अक्षरों के सण्डो में ( गद्य मे) जो वाक्य की पूर्ति करने के लिये आते हैं वे सीमित अक्षरो वाले [पच में ] पद की पूर्ति करते हैं । ये निरया होते हैं । जैसे-वम् ईम्, इत् और उ॥९॥ विशेप-निपातो के तीसरे भेद-पदमूरण-के विषय में कहा जा रहा है। अन्य = सण्ड । अमिताभर - गद्य जिममे बई असर रहते हैं। कोई मीमा नहीं । मिताधार=निश्चित अक्षरोका पद्य ॥१॥ २हिनि ११८ हिन्दी निरुक निष्टुक्नासश्चिदिन्नरो भूरितोका वृकादिव । बिभ्यस्यन्तो ववाशिरे शिशिर जीवनाय कम् ।। ( नि त्वक्त्रास ) दिना वस्त्र के (नर ) मनुष्य (चित् इत् ) ही (भूरितोका: ) बहुत सन्तान वाले वनकर (वृकात् इव ) मानो भेडिये से ( बिभ्यस्यन्त ) डरते हुए ( क्वाशिरे ) रोने-चिल्लाने लगे कि (शिशिरम्) शिशिर ऋतु ( जीवनाय ) जीवन दान वरे ( कम्)-। विशेष-'कम्' पदपूरण है। गरीब आदमी जाडे मे कपडे न रहने पर रोते हैं मानो भैडियो से डरकर रो रहे हो।। शिशिर जीवनाय । शिशिर शृणाते शनाते वा । 'एमेन सृजता सुते' । आसृजत एन सुते । 'तमिद्वर्धन्तु नो गिर' । त वर्धयन्तु नो गिर स्तुतय । गिरो गृणाते.। 'अयमु ते समतसि' । अय ते समतसि। इवोऽपि दृश्यते । 'सुविदुरिव' । 'सुविज्ञायते इव' । अथापि 'न' इति एप 'इत्' इत्येतेन सप्रयुज्यते परिभये ॥ १० ।। शिशिर जीवन के लिये [ हो ] । 'शिशिर' / या शम् (मारना) से । ( आ ईम् एनम् ० ) निचोडने पर इसे बहने दो (ऋ० १।९।२)। उसे हमारी स्तुतियां बढायें (ऋ० ९।६१।१४)। गिर:=स्तुतियाँ । 'गिर'/] (स्तुति) से । यही [ वह सोम ] है जिस पर तुम गिरते हो (ऋ० १।३०।४) । 'इव' भी [ पद पूरण के रूप मे ] देखा जाता है जैसे- उन्होने जाना ( काठकस ८।१३)। मालूम होते हैं ( काठरस ६२)। इसके अलावे 'न' के साथ 'इत्' भय दिखाने में आता है ॥१०॥ हविभिरेके स्वरित. सचन्ते सुन्वन्त एके सवनेषु सोमान् । शचीर्मदन्त उत दक्षिणाभिर्नेज्जिह्मायन्त्यो नरक पताम ॥ (एके ) कुछ लोग ( हविभि ) हवि के द्वारा (इत ) यही से (स्व ) स्वग ( सच-त ) पाते हैं, (ए) कुछ लोग तो ( सवनेषु) सोम चुभाने के समय में ( सोमान् ) सोमो को (सुचान ) आते चुआत [ स्वर्ग पाते ६ ] । (उन ) पिर (दक्षिणाभि ) दान स (ची ) शक्तियो को ( मदन्तः) प्रसन्न करम [ कहती हैं वि] (जिह्मायन्त्य ) पाप करते-करते (नरक) नरक म (न इत् ) कही न ( पताम) गिर पड़ें। (खिल २४११) ।
प्रथम अध्याय विशेप-असुरो की पत्निपो की यह उक्ति है । प्रो. राजवाडे का कहना है कि यार ने देवल अन्तिम चरण ही उद्धृत क्यिा होगा क्योकि उतने अश को ही व्याख्या आमे करते हैं। एताम' में 'उपसवादाशङ्कयोश्च (पा० मू० ३।४८ ) मूत्र के अनुसार आशा के अर्थ में लेट् लकार हुआ है (देखें सिद्धान्तकौमुदी, वैदिकी प्रक्रिश का तृतीय अध्याय)। नरक नि अरकम् । नोचै.गमनम् । न अस्मिन रमणं स्थानम् अल्पम् अपि अस्ति इति वा । अथापि 'न च' इत्येप 'इत्' इत्येतेन संप्रयुज्यते अनुपृष्टे । 'न चेत्सुरा पिवन्ति' इति । सुरा सुनोते. । एवम् उच्चावचेषु अर्येषु निपतन्ति । ते उपेक्षितव्याः ॥ ११ ॥ नरक- नि अरमनीचे जाना। अघवा जिसमे रमणीय स्थान थोडा भी नहीं । 'न च' के बाद हत्' मिलने से दुवारा पूछने के अर्थ मे आता है जैसे--- यदि वे सुरा न पीते हो तब ? 'सुरा/मु (चुमाना ) स. इसी प्रकार भिन्न भिन्न अपर्षों में आते हैं। इन पर ध्यान देना चाहिये ॥११॥ विशेष-यहां शम्दभेद का प्रकरण समाप्त हुआ ॥११॥ चतुर्थ-पाद इति इमानि चत्वारि पदजातानि अनुक्रान्तानि नामाख्याते चोपसर्गनिपाताश्च । तम नामानि आख्यातजानि इति शाकटायन. नैरुतममयश्च । न सर्वाणि इति गायं. वैयाकरणाना चैके ॥ इस प्रकार में चार पर भेद बनाये गये-नाम और मास्यान, उपसर्ग और निपान । सापटायन और निस्तारोका मत है कि सभी नाम आयात से उत्पन्न हैं। गाय और कुछ कारणों का मत है कि सभी [ नाम आत्यात स उत्सन्न ] नहीं है । विशेर-यावरण पाणिनि भी स्वीकार करते है मिमी नाम (प्राति. पदिर ) पातुओं में उत्पन्न नहीं । प्रातिपदिक की मिटि के लिए ये दो मूत्र रसते हैं (१) पातु से न उत्पन्न होने वारे प्रातिपदिक्षों में गिरे-प्रयंवदधातुर. प्रत्यय प्रापिदिकम ( १९२४५) तथा (२) पातु मे उपन्न होन बान कुछ प्रातिपतिए-सिमासाच ( ११२१४६)। भार पता fral को उगति पातु से सारा पा सभी धानु कियापक ही नहीं। EिRIो मुहासिक प्रेमी है हो।
२० ... हिन्दी-निरक तद् यय स्वरसंस्कारौ समर्थौ प्रादेशिकेन गुणेन अन्वितौ स्याता "संविज्ञातानि तानि । यथा गौ अश्व. पुरुष. हस्तीति। अथ चेत्सर्वाणि आस्यातजानि नामानि स्यु., य. कश्च तत्कर्म कुर्यात् सर्व तत्सत्त्व तथा आचक्षीरन् । य. कश्च अध्वानम् अश्नु- वीत, अश्व. स वचनोय. स्यात् । यत् किञ्चित् तृन्द्यात् तृण तत् । अथापि चेत् सर्वाणि आस्यातजानि नामानि स्यु., यावद्भिः भावे. सप्रयुज्येत तावद्भय' नामधेयप्रतिलम्भ. स्यात् । तत्र एव स्यूणा दरशया च आसञ्जनी च स्यात् ॥ १२ ॥ तो जहाँ स्वर ( उदात्तादि ) और बनावट अथं से युक्त होकर अपने अधीनस्थ अर्थसम्बन्धी (प्रादेशिक ) विकार (गुण) से सम्बद्ध हो [वे नाम थाख्यातज हैं, जहां वे सम्बद्ध नही ये नाम] रूढ हैं जैसे गो, अश्व, पुरुष, हस्ती। [गार्य कहते हैं कि] (१) यदि सभी नाम आरयात से उत्पन्न होते तो जो चीज भी दह काम करती, उसे वैसा ही कहते । जो कोई भी अध्य ( मार्ग) का अशन (पार ) करता उसे 'अश्व' यह देते ।। जो कुछ भी तोडी जाती उसे 'तृण' कहते ।।। पुन (२) यदि सभी नाम आख्यात से उत्पन्न होते तो जिन-जिन क्रियाओं से कोई वस्तु सम्बद्ध होती उन-उन क्रियाओं के थापार पर उसका नामकरण होता । खम्भ (स्थूणा ) यो दर शया (छेद में सोनेवाली ), या आसजनी (शहतीर धारण करनेवाली ) कहते ।। ॥ १२ ॥ विशेष-प्रथम वाक्य मे निश्चित रूप से कुछ शब्द छूट गए हैं जिनका अनुवाद काल्पनिक रूप से कोष्ठो के बीच किया गया है। सविज्ञात = रूढ जैसे गो आदि, जिसमे धातु का पता नही । ये शब्द याख्यातज नहीं हैं। किन्तु वाक्य का प्रथम खण्ड आस्यातज शब्दो का निर्देश करता है। अतएव 'स्याता' और 'सविज्ञातानि' के बीच कुछ शब्द छूटे हैं ! दुर्गाचार्य ने अपनी व्याख्या में ऐसा ही किया है : कर्ता, कारक, पाचक आदि शब्दो मे धातु स्पष्ट है, स्वर और बनावट सरल है, धातु का भी वही अर्थ है जो शब्द का-अतएव ये शब्द धातु से उत्पन्न हैं। किन्तु गौ, पुरुप आदि शब्द ऐसे नही, व रुढ हैं। प्रदेश = क्षेत्र, अर्थात पाब्द का अपने क्षेत्र के ही अपने अधीनस्थ धातु जैस/ और कारक का सम्बन्ध प्रादेशिक है क्योंदि दोनो समान अर्थ रखन हैं । कुछ लोगो क अनुमार 'प्रदेश' का अर्थ व्याकरण या लक्षणशास्त्र है । यह से सम्बन्ध, प्रथम अध्याय २१ अर्थ रखने पर ( प्रादेशिक गुण = व्याकरण-सम्मत विकार ) भी दुर्गाचार्य को व्याख्या ठीक ही है । प्रो० मैक्समूलर उक्त वाक्य को पूर्ण मानते हुए कहते हैं कि याक गौ इत्यादि उदाहरण आस्यातज शब्दों के देते हैं परन्तु यह विचार गलत है। प्रो० रॉप लिखते हैं--पाय तथा कुछ वैयाकरण केवल उन्हीं शब्दो को आख्यातज मानते हैं जो स्वर और बनावट से युक्त हैं तथा किसी व्याख्यात्मक धातु (प्रादेशिक गुण ) से सम्बद्ध हैं, इसके विरुद्ध गो आदि शब्द य?च्छा से उत्सन्न हैं । डा० गुणे रॉय के इस विचार से सहमत हैं तथा छूटे हुये शब्दों के लिए एक प्रस्ताव रखते हैं यास्क इसके बाद गाय के विचारों का पूर्ण उद्धरण देकर उसका खण्डन करेंगे । १४ वे परिच्छेद मैं उद्धरण देने समय 'स्याता' के बाद 'सर्व तत् प्रादेशिकम् मिलना है, मम्भव है कि यह खंड छूट गया हो। इसके बाद गायं अपने विरोधी का मत खण्डित करते हैं ॥१२॥ मर्थ अथापि य एषा न्यायवान् कामनामिक. संस्कार., यथा चापि प्रतीतार्थानि स्यु., तथा एनानि आचक्षीरन । पुरुष पुरिशय. इति आचक्षीरन् । अष्टा इति अश्वम् । तदनमिति तृणम् । अथापि निष्पन्ने अभिव्याहारे विचारयन्ति-प्रथनात् पृथिवी इति आहु.। क एनाम् अप्रथयिष्यत् १ किमाधार. चेति ? पुन. (३) इनमे जो व्याकरण के नियमो से युक्त. किसी [ समानार्थक ] क्रिया से उत्पन्न, नाम की बनावट ( सना शब्द की रचना ) है तथा जिनका तुरत मालूम हो जाय--उन्हें (नामो को ) लोग उन (धातुओ) के अनुसार ही पुकारते । 'पुष्प' को लोग पुरि-शय कहते | 'सश्त्र' को अटा कहते ! 'तृण' को तदन कहने । पुन (४) किसी शब्द के व्यवहार मे चल पड़ने पर लोग उसकी उत्पत्ति पर विचार करते हैं-अप (फैलाना) से पृथिवी चनी । तो इ2 किमन लाया ? और कहाँ बैठकर ? विशेप-न्याय = ध्याकरण के नियम । 'कर्म (क्रिया) से निकला नाम. कमनाम, उसमें उम्पन्न = कामनामिक संस्कार'-गं । उसी अर्थाने पातु से बने शब्द की बनावट, जैसे, पुरुष-पुर में शयन करनेवाला = पुर्+शी से "पुरुष' को बनावट । तब तो पुरिशय का भी अर्थ होता ! अश्न और अटा दोनों/अ ( साना ) से बने हैं । तदंन और तृग- तृद (सोडना बाचक्षीरत् %3D/चशिष्+विधिलिए कहते !
२२ हिन्दी-निरुक्त अय अनन्वितेऽर्थे, अप्रादेशिके विकारे, पदेभ्य. पदेतरान्ि सचस्कार शाकटायन । एते. कारितं च यकारादि च अन्त- करणम् । अस्ते. शुद्ध च सकारादि च । अथापि सत्त्वपूर्वो भाव. इति आहु । अपरस्मात् भावात् पूर्वस्य प्रदेशो न उपपद्यते इति । तत् एतत् न उपपद्यते ॥ १३ ॥ (५) अर्थ के असगत होने पर और बनावट व्याकरण-सम्मत (या अधीनस्थ धातु से सम्बद्ध ) न होने पर, शाकटायन, कई [ आरयात- ] शब्दो से किसी शब्द के भिन्न भिन्न खण्डो की बनावट करते हैं। [ 'सत्य' की बनावट मै ]/इ (जाना ) के प्रेरणार्थक रूप (णिजन्त ) यकार को अन्त मे रखा। अस् ( होना ) के मूल रूप के सकार को आदि मे रखा । (६ ) इसके अलावे, कहा गया है कि क्रिया के पहले ही नाम पड जाता है। इसलिए बाद में होने वाली क्रिया के आधार पर नामकरण नहीं होता। इस प्रकार यह { सिद्धान्त कि 'त्रिया से नाम पडता है' ] उचित नही ।। १३ ॥ विशेष 1-शाकटायन नामक, निरुक्त के प्रणेता जब देखते हैं कि शब्द और उसमे वर्तमान धातु दोनो का अर्थ असगत है तव एक हा शब्द, मे कई पातुओ की स्थिति समझते है जैसे 'सत्य' मे / अस् और /इ। पास्क के ध्याकरण सम्बन्धी पारिभाषिक शब्दो के लिय, देखिए, भूमिका ॥ १३ ।। यथो हि नु वै एतत् । तद् यत्र स्वरसस्फारौ समर्थी-प्रादे- शिकेन गुणेन अन्वितौ स्याता सर्व प्रादेशिकम् इति । एव सति अनुपालम्भ एप भवति । यह जो कहा सो देखें-जहां स्वर और बनावट अथ से युक्त होकर, अपने अधीनस्थ अर्थ सम्बन्धी (प्रादेशिक ) विकार (गुण ) से सम्बद्ध हो दे सारे शब्द थाख्यात से निकले (प्रादेशिक ) है । इस प्रकार तो यह [ हमारे सिद्धान्त से ) उल्टा नही ही हुआ। विशेष-ययो एतत्' का प्रयोग यास तब करते है जब पूर्वपक्ष का मत स्थापित करते हैं । इसका अर्थ होगा-'इस क्रम से जो कहा कि', इसके बाद ये पूर्वपक्ष का पूरा वाक्य रखते हैं । इसलिए १२ वें परिच्छेद मे निश्चित रूप से पही अश होगा जिसे लेखा अपनी असावधानी से छेड गया है। इस मत से यास्क का कोई विरोध नहीं, क्योकि जहाँ वारक, पाचक-जैसे शब्दो की ही - प्रथम अध्याय २३ T व्युत्पत्ति पूर्वपभी के मन से मम्भव है, यास्क के मत से । मभी शब्द व्युत्पन्न हैं । कारक, पाचक-जैसे शब्दो को तो ये व्युत्पन्न मानते ही हैं। अत केवल 'प्रदेश' (व्युत्पन्न होने वाले शब्दो का क्षेत्र) लेकर ही मनभेद है । यथो एतत् । य क. च तत्कर्म कुर्यात् सर्व तत् सत्त्वं तथा आचक्षीरन् इति। पश्याम. समानकमणा नामधेयप्रतिलम्भम् एकेपा, न एकेपाम् । यथा तक्षा परिव्राजक. जीवन. भूमिज इति । एतेन एव उत्तर. प्रत्युक्त.॥ यह जो कहा कि 'जो चीज भी वह काम करतो उमे वैसा ही कहते' (परि० १२); [ इस सिद्धान से ] देखते हैं कि कुछ समानार्थक शब्दो का नामकरण होता है, कुछ का नही, जमे-तक्षा ( लकडी काटनेवाला-बढ़ई ), परिव्राजक ( घूमनेवाला, सन्यासी ). जीवन (जीनेवाला, ईग्व का रस), भूमिज (भूमि से उत्सन्न, मगलग्रह) । इसी से दूसरे आक्षेप का समाधान हुआ । विशेष 1-इन वाक्यों मे यास्क गार्य के आक्षेत्रो का उत्तर दे रहे हैं। 'तक्षा' का वास्तविक अर्थ हुआ 'लकडी काटनेवाला' पर रूढ अर्थ है-बढई । सभी लकडी काटरेवालो को 'तक्षा' नहीं कह सकते । उत्तर=मागे का आक्षेप- देखें परि० १२-जिन जिन क्रिया मो से कोई .॥ यथो एतत् । यथा चापि प्रतीतार्थानि स्युस्तथा एनानि आचक्षीरन् इति । सन्त्यल्पप्रयोगा. कृतोऽपि ऐकपदिका. । यथा व्रतति., दमूना., जाट्य., आटणार , जागरूक., दविहोमी इति । जो कहा कि "जिनका अर्थ तुरत मालूम हो जाय, उन ( नामो को) लोग (धातुओं के ) अनुकूल कहो' (परि० १३)-इस तरह के कृदन्त से बने मान्न तो प्रयोग में कम आनेवाले हैं तथा ऐकादिक-काण्ड मे गिनाये गये हैं जैसे-वाति दमूना, जाटय ( जरावाला ), आगार (घूमनेवाला ), जागरूक ( जागने वाला ), दविहोमी ( कलछी से होम करनेवाला)। विशेष-पे उदाहरण ऐसे हैं जिन्हें ऐक्पदिक काण्ड में गिनाया गया है जहाँ प्राय सभी शब्द कठिन तया अनियमित हैं । व्रतति-वरणाच्च सयनाच्च सननाउन (नि०६।२८)। दमूना-दामना वा, दानगना. वा, दाममना वा, अरि वा-दम इति गृहनाम, तम्मना स्यात् (नि. ४४) । दुग के भनुसार मै मभी शब्द नियम के अनुकूल निष्पन्न है तथा स्पट अयं वाले हैं।
हिन्दी निरुत यथो एतत् । निष्पन्ने अभिव्याहारे अभिविचारयन्ति इति । भवति हि निष्पन्ने अभिव्याहारे योगपरोष्टिः । प्रथनात् पृथिवी- त्याहु., क. एनाम् अप्रथयिष्यत् किमाधारश्च इति । अथ वै दर्शनेन पृथु., अप्रथिता चेत् अपि अन्यैः । अथापि एवं सर्व एव दृष्टप्रवादाः उपालभ्यन्ते । यह कहा कि किसी शब्द के व्यवहार मे चल पड़ने पर लोग उसकी उत्पत्ति पर विचार करते हैं' क्योकि व्यवहार होने पर ही शब्द के निर्माण की जांच होती है । प्रिय ( फैलाना ) से पृथिवी बनी तो इसे किसने फैलाया और कहाँ बैठकर देखने मे तो यह फैली हुई लगती है न ? भले ही किसी ने इसे नहीं फैलाया हो। इसके अलावे, सभी लोग तो देखकर ( दृष्ट) नाम देने वाले (प्रवाद ) पाये जाते हैं । विशेष-योगपरीष्टि = शब्द-निर्माण पर विचार । दृष्ट-प्रवाद - वस्तुओ को देखकर नाम देने वाले लोग । अनुभव के बाद ही नाम दिये जाते हैं । यथो एतत् । पदेभ्य पदेतरार्धान् सचस्कार इति । यः अनन्विते अर्थे सचस्कार स तेन गर्य. । सा एपा पुरुषगर्दा ।। यह कहा कि 'कई [ आख्यात शब्दो से किसी शब्द के भिन्न-भिन्न खण्चो को बनावट करते हैं। जो असम्बद्ध अर्थ मे बनावट करते हैं वे उस तरह की बनावट के द्वारा निन्दनीय हैं। यह [ व्युत्पत्ति करनेवाले ] पुष्प को निन्दा है ।। यथो एतत् । अपरस्मात् भावात् पूर्वस्य प्रदेश. न उपपद्यते इति । पश्यामः पूर्वोत्पन्नाना सत्त्वानाम् अपरस्मात् भावात् नामधेय-प्रतिलम्भमेकेपा न एकेषाम् । यथा बिल्वाद. लम्बचूडक. इति । विल्व भरणात् वा भेदनात् वा ॥ १४ ॥ यह कहा कि 'बाद मे होनेवाली त्रिया के आधार पर पूर्व में [ होनेवाले शब्द का ] मामकरण नहीं होता', यहाँ देखते हैं कि पूर्व मे होनेवाली वस्तुओं का नामकरण दाद मे होनेवाली क्रिया के थाधार पर कुछ दशाओ में होता है, कुछ में नहीं। जैसे-बिल्वाद, लम्बचूडक । 'विल्व/भ (भरण) या भिद् ( फोड़ना) से बना है ।। १४ ।।
प्रथम अध्याय विशेष-प्रदेश = नामकरण। विल्वाद = वेल का फल खानेवाला एक पक्षी । लम्वचूड-यद्यपि इस पक्षी की लम्बो चोटी बहुत बाद में होती है फिर भी इसे लम्बचूइक कहते हैं । यही सन्दो का आख्यातनवाद समाप्त हो गया । यास्क का निष्कर्ष है कि समी शब्द आख्यात से उसन्न हैं । ( देखिय भूमिका) ॥ १४ ॥ पञ्चम-पाद अथापि इदमन्तरेण मन्त्रेषु अर्यप्रत्ययो न विद्यते । अर्यम् अप्रतियतो नात्यन्तं स्वरसस्कारोद्देशः । तदिद विद्यास्थानम् । व्याकरणस्य कात्य॑म् । स्वार्थसाधकं च । यदि मन्त्रार्थप्रत्ययाय, अनर्थकं भवति इति कौत्स.। अनर्थका हि मन्त्रा.! तदेतेन उपेक्षितव्यम् । इस (निरुक्त) के विना मन्त्रो मे अर्थ का बोध नहीं होता। अयं का भान नहीं रखनेवाला निश्चित रूप से स्वर और बनावट का निर्णय नहीं कर सकना । यह (निरुक्त) एक विद्यास्थान है, व्याकरण का पूरक सपा अपने कार्य (वेद-याख्या ) का भी सापक है । कौत्स कहते हैं कि पदि [निरुक्त] मन्त्र का अर्थबोध कराने के लिए है तो व्यर्थ है क्योकि मन्त्र स्वय अयं से रहित हैं । इस [निरुक्त] के द्वारा इसका निर्णय देखें। विशेष- अथापि' का प्रयोग बतलाता है कि निरुक्त का कोई अन्य प्रयोजन भी है-वह है 'शब्दो का निर्वचन करना' जिसका वर्णन होने जा रहा है । उद्देश = निर्णय । विद्यास्थान कुल चौदह हैं- पुराणन्यायमीमासाधर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः । वदा स्थानानि विद्याना धर्मस्य च चतुर्दश । (या स्मृ० ११३) अर्थान् ४ वेद, ६ अङ्ग, पुराण, न्याय, मोमासा और धर्मशास्त्र । मीमामा दर्शन के मन्त्राधिकरण ( १०२१३१-११२१५३ ) मे पूर्वपक्ष से सम्भवत. कौत्स या उनके मनवादी ही दोलने हो । आगे हम उनके मतों की तुलना सूत्रों से करेंगे। नियतवाचोयुक्तय., नियतानुपूर्व्याः भवन्ति । अथापि ब्राह्म- णेन रूपसम्पन्ना. विधीयन्ते । 'उरु प्रथस्व' इति प्रथयति । 'प्रोहाणि' इति प्रोहति । अथापि अनुपपन्नार्था. भवन्ति । 'ओपये जायस्व एनम् । 'स्वपिते मा एनं हिसीः' इत्याह हिंसन् ॥
२६ हिन्दी निरुक्त (१) निश्चित शब्दो की योजना हुई है ( - उनके स्थान पर दूसरे गन्द नही रख सकते ) और (२) उनका कम भी निश्चित है । (३) इसके अलारे ब्राह्मगो के द्वारा उनके प्रयोजन (रूप) निश्चित किये जाते हैं। 'धागे ओर फैलाओ' (म० स० ॥१९) तो फैलाता है ( म० स० ६।१।१)। 'ठेलं' ता ठेरता है । ( ४ ) इसके अलावे उनके अर्थ असगत है-'हे औषधि । इस बचाओ' (मं० स० ३।९।२। काठ० २६॥३)। मारते हुए कहता है- हे बुल्हाडी, इसे मारो मत'॥ विशेप-जैमिनि अपन मीमासा-दर्शन के मन्त्राधिकरण मे इन तो को सून के रूप मे उपस्थित करते हैं-(१) और ( २) के लिए वे 'वाक्य- नियमात' (१।२।३२), (३) के लिये 'तदयंशास्त्रान' (१।२१३१), तथा (४) के लिये 'अचेतने अर्थवन्धनान्' ( १।२।३५ ) सूत्र देते हैं । विशेष विवरण के लिए इन पर शवरभाष्य या सायण को ऋग्वेदभाष्यभूमिका देखें। अयापि विप्रतिपिद्धार्था भवन्ति । 'एक एव रुद्रोऽवतस्थे न द्वितीय.'x'असख्याता सहस्राणि ये रुद्रा अधि भूम्याम्' । 'अशनु- रिन्द्र जज्ञिपे'x'शतं सेना अजयत्साकमिन्द्र.' इति । अथापि जानन्त सप्रेष्यति । असये समिध्यमानायानुब्रूहि' इति । अथापि आहु. अदिति सर्वमिति --'अदितिौरदितिरन्तरिक्षम्' इति । तदुपरिष्टात् व्याख्यास्याम.। अथापि अविस्पष्टार्था. भवन्ति । अम्यक् , यादृश्मिन् , जारयायि, काणुका इति ॥ १५ ॥ (५) इसके अलावे विरोधी अर्थवाले भी हैं-'एक ही रुद्र या दूसरा नहीं' और 'जो असख्य, हजारो रुद्र पृथ्वी पर हैं '(मै० स० २।९।९)। हे इन्द्र, तुम शत्रुहीन उत्पन्न हुए हो' (ऋ० १०११३३।२ ) और 'इन्द्र ने सेकडो शत्रुमेना ए साथ जीन लों' (ऋ० १०११०३।१)। (६) पुन , जानकार वो ही विधि बतलाते हैं- [अध्वर्यु सर्वज्ञ होता को कहता है कि 'अग्नि के लिए सामिधेनी ऋचायें पदो (म० स० १।४।११)। (७) यह भी पहा है कि अदिति सब कुछ है-'अदिति स्वर्ग है, अदिरि अन्तरिक्ष है (ऋ० १८९४१०) । इसकी व्याख्या बाद मे करेंगे (नि. ४॥२३ )। (८) पुन { मन्त्र ) अस्पष्ट अर्थवाले हैं जैस-अम्यक् , याश्मिन, जारयायि, पाणुका ॥ १५॥ । वे प्रथम अध्याय N विशेष -इन तर्कों के लिये जैमिनि निम्नलिखित मूत्र देते हैं-(५) के लिये 'अर्थविप्रतिषेधान'( ११२२३६), (६) के लिये 'बुद्धशास्त्रात्' (१।२१३३), (७) के लिये वही 'अर्थविप्र०', (८) के लिये 'यविज्ञेयात्' (१।२।३८ ) । उत्तरपक्ष बब आरम्भ होगा जिसम प्रत्येक तकं काटा जायगा ।। १५ ।। अर्थवन्त शब्दसामान्यात् । 'एतद्वै यज्ञस्य समृद्ध, यद्रूप- समृद्ध, यत्कर्म क्रियमाणम् ऋग्यजु वा अभिवदतीति च ब्राह्मणम्' । 'क्रीळन्तौ पुत्रैनप्तृभि' । यथो एतत् । 'नियतवाचो- युक्तयो, नियतानुपूर्व्या भवन्ति' इति । लोकिकेषु अपि एतत् । यथा-इन्द्रासी, पितापुत्रौ इति । यथो एतत् । 'ब्राह्मणेन रूप- सम्पन्ना. विधीयन्ते' इति । उदितानुवाद स भवति । यथो एतत् । 'अनुपपन्नार्था भवन्तिः इति। आम्नायवचनाहिंसा प्रतीयेत ॥ [ लौकिक और वैदिक वाक्यो में ] शब्द की समानता होने के कारण वे ( मन्त्र ) अर्थयुक्त हैं । 'यज्ञ की पूणता यही है कि प्रयोजन बतलाये जाने पर पूर्ण होते हैं तथा किये जाने वाले कग का वर्णन ऋग या यजु करते हैं'- ऐसा भी ब्राह्मण में कहा है ( गोपथ ब्रा० २।२।६ या २।४।२)। [ विवाह का प्रयोजन बतलानेवाला मन्य है-] बेटो और पोतो के साथ तुम दोनो खेलते हुए".." (१०१८६४२)। (१-२) यह जो कहा कि निश्चित शब्दो की योजना हुई और उनका क्रम भी निश्चित है ।' ऐमा तो लोक मे भी देखते हैं जैमे-इन्द्राग्नी, पितापुत्रो। (३) यह जो बहा कि 'ब्राह्मणो के द्वारा उनके प्रयोजन (रूप) निपिचत होते हैं।' यह कहे हुए की आवृत्ति है। [ तुल० जै. गुणान पुन श्रुति ११२१४१, परिसख्या ११२।४२, अर्थवादो वा ॥२१४३ ] । (४) यह जो कहा कि 'उनके अर्थ असगत हैं'। इसमे वेद के वाक्य से अहिंसा का ज्ञान हो सकता है [ तुल० अभिधानेऽयंवाद १।२।४६] । यथो एतत् । 'विप्रतिषिद्धार्था भवन्ति' इति । लौकिकेषु अपि एतत् । यथा असपत्नोऽयं ब्राह्मण । अनमिनो राजा इति । यथो एतत् । 'जानन्त सप्रेष्यति' इति । जानन्तम् अभिवादयते।
२८ हिन्दी निरुक्त जानते मधुपर्क प्राह । यथो एतत् । 'अदितिः सर्वमिति' । लौकिकेषु अपि एतत् । यथा-सर्वरसाः अनुप्राप्ताः पानीयम् इति । यथो एतत् । 'अविस्पष्टार्था. भवन्ति' इति । नैप स्थाणो. अपराध. यदेनम् अन्धो न पश्यति । पुरुषापराधः स भवति । यथा जानपदीपु विद्यात. पुरुषविशेपो भवति । पारोवर्यवित्सु तु खलु वेदितृषु भूयोविद्य. प्रशस्यो भवति ॥ १६ ॥ (५) यह जो कहा कि विरोधी अर्थवाले हैं', ऐसा तो लौकिक वाक्यो जं. में भी है जैसे-यह ब्राह्मण शनुहीन है, यह राजा शत्रुहीन है। [ तुल. गुणादविप्रतिषेधः स्यात् रा२।४७ ] । (६) यह कहा कि 'जानकार को ही विधि बलाते हैं, यह जानकार का अभिवादन है । जाननेवाले के सामने ही (विवाह मे ) 'मधुपक' कहा जाता है। [ तु० सपकर्मणो गर्हानुपलम्भ सकारत्वात १।२।५५ ] । (७) यह कहा कि 'अदिति सब कुछ है, ऐसा लौकिक वाक्यों मे भी है जैसे-पानी मे सब रस प्राप्त हैं। (८) यह कहा कि 'अस्पष्ट अर्थवाले हैं। यह सूखे वृक्ष का दोप नही कि उसे अन्धा नहीं देख पाता । यह उस व्यक्ति का हो दोष है। जैसे- मनुष्यो ये साधारण कामो मे ( जानपदी ) शान के कारण मनुष्यो में अन्तर होता है [ वैसे ही वेद मे भी अर्थज्ञान के विषय मे मनुष्यों मे भेद होता है, सभी वेद नही समझ सकते ] । परम्परा से ज्ञान पानेवाले लोगो मे तो अधिक विद्यावाला ही प्रशसनीय होता है। [ तु० सत. परमविज्ञानम् १।२०४९ ] ॥ १६ ।। विशेप-मधुपर्क = दही और मधु का घोल जिसे पुरोहित, ब्रह्मचारी, राजा, आचार्य, ससुर या जामाता को देते हैं। मधुपर्क देनेवाले यो 'मधुपर्क' शब्द का उच्चारण तीन वार करना पड़ता है ( आश्व गृह्य ० ११२४७ ) । पारोवयं = पर+अदर-प्राचार्य की परम्परा । दुर्गाचार्य कहते है कि कौत्स के सभी तकों का उत्तर यास्क ने अच्छी तरह से दिया है। वे कहते हैं- इति प्रभिन्नेषु परस्य हैतषु स्वपक्षसिद्धावुदिते च कारणे । अवस्थिमा मन्त्रगणस्य सार्थता तदर्थमेतत्खलु शास्त्रमधवत् ।।
- को कहीं ( ऋ० १०.१६४४१)। चतुर्थी के ययं का नियन्ट समीप हो जाने को सहिता कहते हैं या पदों के म्यादा समय कहते हैं ( ऋवप्राति०२।१)। [ वेद को] मर्ग में पद ही है।[पद के बिना की। प्रथम अध्याय पष्ठ-पाद अथापि इदमन्तरेण पदविभागो न विद्यते। 'अवसाय पढते रुद्र मुळ' इति । पद्वत् अवसम् । गावः पथ्यदनम् । अवते: गत्यर्थस्य । असो नामकरणः । तस्मात् न अवगृह्णन्ति । 'अवसायाश्वान्' इति । स्यतिः उपसृष्टो विमोचने। तस्मात् अवगृह्णन्ति ॥ पुनः. इस (निरुक्त) के बिना [ सन्धिबद्ध ] पदो का विभाग नहीं होता । 'हे रुद्र ! पैरवाले भोजन पर कृपा करो' ( ऋ० १०११६९१) । परों से युक्त भोजन = गायें, जो रास्ते का भोजन हैं । गति-अर्थवाले / अव से 'अस' प्रत्यय लगा जो सना बनाता है। इसीलिए [पद-कार ] इसका ग्रहण नही करते । 'घोडो को खोलकर' ( ऋ० ११०४१)। उपसर्ग के साथ ( उपमृष्ट )Nसो छोड़ने के अर्थ में होता है, इसलिए [ पद-विभाग को ] ग्रहण करते हैं। विशेष-पहले उदाहरण में 'यवसाय' एक पद है, पद-पाठ करनेवाले यही पद-विभाग नही मानते क्योकि उसकी व्युत्पत्ति है/अ + अस । किन्तु दूसरे उदाहरण में 'अव' और 'साय' अलग पद माने गये हैं । निरुक्त जाननेवाला ही पदो का विभाग कर सकता है। 'दूतो निऋत्या इदमा जगाम' इति । पञ्चम्ययंप्रेक्षा दा पायर्थप्रेक्षा वा। आ.कारान्तम् । 'परो नित्या आ चन्द इति । चतुर्थ्यर्थप्रेक्षा । ऐकारान्तम् । पर. संनिकपः महितः । पदप्रकृतिः संहिता । पदप्रकृतीनि सर्वचरणानां पार्षदानित 'निति से, या निति का दूत आया' (ऋ० १०११६ या षष्ठी के अर्थ का निर्देशक 'प्रा.' है (निति + छा); क् मूल २८ हिन्दी निरुत जानते मधुपर्क प्राह । ययो एतत् । 'अदितिः सर्वमिति' । लौक्केिषु अपि एतत् । यथा-सर्वरसाः अनुप्राप्ताः पानीयम् इति । यथो एतत् । 'अविस्पष्टार्थाः भवन्ति' इति । नैप स्थाणोः अपराध. यदेनम् अन्धो न पश्यति । पुरुषापराधः स भवति । यथा जानपदीय विद्यात. पुरुषविशेपो भवति । पारोवयंवित्सु तु खलु वेदितृषु भूयोविद्यः प्रशस्यो भवति ॥ १६ ॥ (५) यह जो कहा कि विरोधी अर्थवाले हैं', ऐसा तो लौकिक वाक्यों मे भी है जैसे-यह ब्राह्मण शत्रुहीन है, यह राजा शत्रुहीन है। [ तुल० ० गुणादविप्रतिषेधः स्यात् १।२।४७ ] । (६) यह कहा कि 'जानकार को ही विधि वालाते हैं, यह जानकार या अभिवादन है । जाननेवाले के सामने हो (विवाह मे ) 'मधुपक' हा जाता है । [ तु० सपकमणो गर्हानुपलम्भ. सस्कारत्वात् १।२।५५ ] । (७) यह कहा कि 'अदिति सब कुछ है', ऐसा लौकिक वाक्यों में भी है जैसे-पानी मे सब रस प्राप्त हैं । (८) यह कहा कि 'अस्पष्ट अर्थवाले हैं। यह सूखे वृक्ष का दोष नही कि उसे अन्धा नही देख पाता । यह उस व्यक्ति का ही दोष है। जैसे-- मनुष्यो के साधारण कामो मे ( जानपदी ) ज्ञान के कारण मनुष्यो मे अन्तर होता है [ वैसे ही वेद मे भी अर्थज्ञान के विषय मे मनुष्यों मे भेद होता है, सभी वेद नही समझ सक्ते ] । परम्परा से ज्ञान पानेवाले लोगो में तो अधिक विद्यायाला ही प्रशसनीय होता है। [ तु० सतः परमविज्ञानम् २२१४९ ] ॥ १६॥ विशेप-मधुपर्क = दही और मघु वा धोल जिसे पुरोहित, ब्रह्मचारी, राजा, आचार्य, ससुर या जामाता को देते हैं । मधुपर्क देनेवाले को 'मधुपर्क' शब्द का उच्चारण तीन बार करना पढना है ( आश्३० गृह ० १।२४७ ) । पारोवयं । पर+अवर-आचार्य की परम्परा । दुर्गाचार्य कहते है कि कौत्स के सभी तकों का उत्तर यास्क ने अच्छी तरह से दिया है। वे कहते हैं- इति प्रभिन्नेषु परस्य हेतुपु स्वपक्षसिद्धावुदिते च कारणे । अवस्थिमा मन्त्रगणस्य सार्थता तदर्थमेतत्खलु शास्त्रमर्थवत् ।।
प्रथम अध्याय पठ-पाद अथापि इदमन्तरेण पदविभागो न विद्यते । 'अवसाय पद्वते रुद्र मुळ' इति । पद्वत् अवसम् । गाव. पथ्यदनम् । अवते: गत्यर्थस्य । असो नामकरण. । तस्मात् न अवगृह्णन्ति । 'अवसायाश्वान्' इति । स्यति. उपसृष्टो विमोचने । तस्मात् अवगृह्णन्ति ॥ पुनः, इस (निरुक्त ) के बिना [ सन्धिबद्ध ] पदो का विभाग नही होता । "हे रुद्र । परवाले भोजन पर कृपा करो' ( ऋ० १०.१६९।१) । परो से युक्त भोजन = गायें, जो रास्ते वा भोजन हैं । गति अथवाले / अव से 'अस' प्रत्यय लगा जो सजा बनाता है। इसीलिए [पद-कार] इसका ग्रहण नहीं करते। 'घोडो को खोलकर' ( ऋ० ११०४)। उपसर्ग के साथ (उपसृष्ट)/सो छोड़ने के अथ में होता है, इसलिए [ पद-निभाग को ] ग्रहण करते हैं। विशेष-पहले उदाहरण मे 'अवसाय' एव पद है, पद पाठ करनेवाले यहाँ पद विभाग नहीं मानते क्योंकि उसकी व्युत्पत्ति है अ + अस । किन्तु दूसरे उदाहरण में 'अव' और 'साय' अलग पद माने गये हैं । निरुक्त जाननेवाला ही पदो का विभाग कर सकता है । 'दूतो निऋत्या इदमा जगाम' इति । पञ्चम्यर्थप्रेक्षा वा पच्यर्थप्रेक्षा वा। आ.कारान्तम् । 'परो निऋत्या आ चक्ष्व' इति । चतुर्थ्यर्थप्रेक्षा । ऐकारान्तम् । पर सनिकर्ष सहिता। पदप्रकृति. सहिता | पदप्रकृतीनि सर्वचरणाना पार्पदानि ।। 'निति से, या निति वा दूत आया' (ऋ० १०.१६५।१ )। पचमी या पप्ठी के अयं का निर्देष 'पा' है (निनि+मा)। 'पोछे-निनि को रहो (ऋ० १०११६४१ )। चतुर्थों पे अयं का निराक ऐ' है । अत्यन्त समीर हो जान को महिना कहते हैं या पनी वे स्वाभाविक रसको सहिता कहते हैं (पप्रानि० २.१)। [पदको ] मभी शाखाओं के प्रातिसारया में र मूल में पद ही है। [ पर बिना ऋो ध्याच्या असम्भव है। ] तद् एतेन । हिन्दी-निरुक्त विशेष 1-चरण = वेद की शाखायें, उन विभिन्न सारण। पापंद- प्रातिशारय अपात् वैदिक पदपाठ का नियम बतलानेवाला ग्रन्थ । 'सहिता' की पहठी परिभाषा पाणिनि (१।४।१०९) म भी है जिसे उन्होने ऋक्प्रातिशास्य से लिया है। अयापि याज्ञे देवतेन वहव. प्रदेशा भवन्ति उपेक्षितन्यम् । ते चेद ब्रूयु -'लिङ्गज्ञा अन स्म.' इति । 'इन्द्र नत्वा शवसा देवता वायु पृणन्ति' इति । वायुलिङ्ग च इन्द्रलिङ्ग च आसेये मन्ने। 'असिरिव मन्यो त्विपित सहस्व' इति । तथा असि मान्यवे मन्ने । त्विपित ज्वलित । विपिरिति अपि अस्य ।। दीप्तिनाम भवति । अथापि ज्ञानप्रशसा भवति अज्ञाननिन्दा च ॥१७॥ इसके अलाव यज्ञकम म देवताओ के विषय में बहुत-सी विधियाँ ( प्रदेश ) होती हैं। उन्हें इस (निरुक्त ) के द्वारा देखें। वे (निरुक्त के ज्ञाता) कहते है कि हम इस विषय म ( देवताओ के ) चिह्न पहचानते हैं । 'तुम्हे बल के कारण देवता लोग इन्द्र सा या वायु सा पूजते हैं' (ऋ० ६।४७ ) । यहाँ अग्नि के मत्र में वायु और इन्द्र के चिह्न हैं। हे मन्यु (क्रोध देव ), प्रज्वलित होकर अग्नि सा विजय पाओ ( ऋ० १०.८४१२)-उसी प्रकार मन्यु के मत्र में अग्नि [ का चिह्न है ] । विपित =ज्वलित । विपि' भी इसी से होता है जो दीप्ति का पर्याय है। इसके अलावे ज्ञान की प्रशसा और अज्ञान को निन्दा होती है ॥ १७ ॥ स्थाणुरय भारहार किलाभूदधीत्य वेद न विजानाति योऽर्थम् । योऽर्थज्ञ इत्सकल भद्रमश्नुते नाकमेति ज्ञानविधूतपाप्मा । (य ) जो ( वदम् ) वेद को ( अधीत्य ) पढ़कर ( अर्थम् ) अर्थ (न विजानाति ) नही जानता, ( अय ) यह (स्याणु ) सूखा वृक्ष ( विल) बस (भारहार ) भार ही ढोनेवाला ( अभूत) हुआ । (य अर्थज्ञः ) जो अप जाननेवाला है (सकलम् ) समूचे (इत् ) ही (भद्रम् ) कल्याण को ( अश्नुते ) पाता है, वह (ज्ञानविधूतपाप्मा) शान से पापो को धोकर (नाम् )स्वम (एति ) जाता है । यद् गृहीतमविज्ञात निगदेनेव शब्द्यते । अनसाविव शुष्कधो न तज्ज्वलति कहिचित् ॥
प्रथम अध्याय ३१ (पद) जिसे (गृहीनम् ) पाया = रट लिया, पर (अविज्ञातम् ) समझा नहीं, वह केवल (निगदेन ) शब्द से (एव) ही (शब्द्यते ) ध्वनित्त होता है । (तन ) वह (शुष्कंध ) सूम्बी लकडी ( अनग्नी इव ) से अग्निहीन स्थान में ( कहिचित् ) कभी (न) नही ( ज्वलति ) जलनी । विशेष-जिसे केवल रट लिया गया है उसका फल पाउमात्र मे ही है बाद में नहीं इसलिए अर्थज्ञान आवश्यक है। स्थाणु. तिष्ठते. । अर्थ. अर्ते. । अरणस्थ. वा ।। १८ ॥ स्थाण स्था (वैठाना ) से अबV (जाना ) से या अर+स्था से बनना है। १८ ॥ उत त्व. पश्यन्न ददर्श वाचमुत त्व. शृण्वन्न शृणोत्येनाम् । उतो त्वस्मै तन्व विसो जायेव पत्य उशती सुवासा. ॥ (उत ) और (त्व ) कुछ तो ( पाचम् ) पाणो को (पश्यन् ) देखते हुए भी ( न ) नहीं ( ददर्श ) देखते; (उत रव ) और कुछ ( एनाम् ) इसे (शृण्वन् ) सुनते हुए भी (न शृणोति ) नहीं सुनते । ( उतो लस्म ) और फुध को तो पह (तापम् ) शरीर ( विसने) खोल देती है, दिखाती है, (उसाती ) कामना करने वाली (सुवास! ) सुन्दर कपडे पहने हुए (जाया इत्र ) पत्नी जमे (पत्ये पति को [ शरीर दिखाती है । ] (ऋ० १०७१।४) । विशेष -इस मन में कई स्वरभङ्गियां हैं-गणोतिएनाम, तुम, तनुम पड़े। तभी घर को रक्षा सम्भव है । विसले मृज-छोड देना, खोल देना । अपि एक पश्यन् नं पश्यति वाचम्। अपि च शृण्वन् न शृणोति एनाम् । इति अविद्वांसम् आह अर्द्धम् । अपि एकस्मे तन्वं विसले इति स्वम् आत्मानं विवृणुते ज्ञानम् । प्रकाशनम् अर्यस्य आह अनया वाचा। उपमा उत्तमया वाचा । जाया इव पत्ये कामयमाना सुवासा ऋतुकालेषु । यथा म एनां पश्यति स शृणोति। इति अर्यज्ञप्रशंसा । तस्य उत्तरा भयसे निर्वचनाय ॥ १९ ।। वाणी को देगते हुए भी नहीं देखते, और इमे सुनने हुए भी नहीं गुनो-मबापे में पुख+ विषय में कहा है। और बुरे लिये परीर सोर देती है अर्थात् मान भरने आप को प्रकाशित कर देग है-इस वावर से अयं का INन हमसाया गया है। यतिम यायय से उपमा वनलाई गई है। जी इच्छा करती हुई गुषमा पनी ऋतुराल में पति को परीर मोती - ३२ हिन्दी-निरुक्त । जैसे वह इसे ( पत्नी को ) देखता है और सुनता है। यह अयं जानने वाले की प्रशसा है । इसके बाद की ऋचा स्पष्टतर उदाहरण के लिए है ।।१९।। विशेपयहां पर प्रत्येक पक्ति के लिए यास्क की टिप्पणो (Comments) ध्यान देने योग्य है ॥ १६ ॥ उत त्व सख्ये स्थिरपीतमाहुतेन हिन्वन्त्यपि वाजिनेषु । अधेन्वा चरति माययैष वाच शुश्रु वाँ अफलामपुप्पाम्॥ (उत ) और ( ख ) कुछ को । सरथे ) वाणी को मित्रता के विषय मे (स्थिरपीतम् ) सुनिश्चित ज्ञान वाला (आहु ) कहते है, (एव ) उसे ( वाजिनेषु ) कठिन शब्द के स्थानो म ( अपि ) भी (न ) नही ( हिन्वन्ति ) हरा सकते । ( एप ) दूसरे ये लोग ( अधेन्वा ) झूठी गाय की ( मायया ) माया से ( चरति ) चलते हैं, ये (अफला) फलरहित ( अपुष्पाम् ) फूल- रहित ( वाच ) वाणी को ( शुश्रवान् ) सुने हुए होते हैं । (ऋ० १०।७१।५) । विशेप-सभी प्राचीन व्याख्याकारी के अनुसार इस ऋचा में आषा अर्थज्ञ की प्रशसा करता है, याचा अर्थ न जाननेवाले को निन्दा करता है। परन्तु श्रीराजयाडे एक सुझाव देने हैं कि पूरी ऋचा मे झूठे कवि का वर्णन है । सरय = कवि का कम। स्थिरपित =जिसका ज्ञान स्थिर है, नई सृष्टि मे अप्तमर्थ । वाजिन = कवियो की सभा । कुछ कवि अपने कर्म मे स्थिर ज्ञान वाले हैं, नई कविता की रचना नहीं कर सकते इसलिए सभाओ मे लोग उन्हे नहीं भेजते ।। अपि एक वाक्सख्ये स्थिरपीतम् आहु. रममाण विपीता- र्थम् । देवसस्य रमणीय स्थाने इति वा । विज्ञानार्थ य न आ- प्नुवन्ति वाग्ज्ञेयेषु बलवत्सु अपि । अधेन्वा हि एप चरति मा- यया वाक्प्रतिस्पया। न अस्मै कामान् दुग्धे वाक् दोह्यान् देव- मनुष्यस्थानेषु। यो वाचं श्रुतवान् भवति अफलाम् अपुष्पाम् इति। अफला अस्मै अपुष्पा वाक् भवति इति वा । किश्चित्पुष्पफला इति वा। अयं वाच. पुष्पफलमाह। याज्ञदेवते पुष्पफले । देवताध्यात्मे वा॥ वचन से मित्रता के विषय में (जमे कवितादि) कुछ लोगों को पिरपीन अर्थात् रमा करनेवाला या अर्थ जानने वाला कहा गया है। प्रथा देवता को मित्रता से युक्त रमणीय स्थान (देवलोक ) मे। अयं जाननेवार की . - प्रथम अध्याय . समानता [दूसरे लोग ] वचन के द्वाराज्ञेय कठिन-[ स्थलो ] ममी नहीं कर सकते । यह (दूसरा ) पेनु हीन होकर भाषा से पाणी के भ्रम मे पलता है। देवो और मनुष्यों के बीच दुही जानवाली (दी जानेवाली) कामनाओं को, दाणी, ऐसे व्यक्ति को प्रदान नहीं करती। जो फल और फूल से रहित वाणी' को सुने हुए होता है, या वाणी उसके लिए फल और फूल से रहित हो जाती है । अपवा थोडा फूल फल वाली हो जाती है। वाणी के अर्थ को फूल- फल कहा गया है । यन और देवता के ज्ञान क्रमश फूट और फल हैं अथवा देवनाजान और आत्मनान हो [ फूल फल है ।। साक्षात्कृतधर्माण ऋपयो बभूवु । ते अवरेभ्य. असा- क्षात्कृतधर्मभ्य उपदेशेन मन्त्रान् सप्रादु । उपदेशाय ग्लायन्त अवरे बिल्मग्रहणाय इम ग्रन्य ममानासिंयु. । वेद च वेदाङ्गानि च । विल्म - भिल्मम् । भासनमिति वा । ऋषिगण धर्म का माक्षात्कार किये हुए थे। उहान धर्म का साक्षात्कार न किये हुए दूसरे लोगो को उपदेश द्वारा मत्र दिय । उपदेश [ की रक्षा ) म कष्ट पाते हुए उन दूसरे लोगों ने वर्गीकरण क लिये यह ग्रन्थ, वेद और वेदाग बनाये । बिल्म = भिल्म (भेदन ) या भामन ( चमकना) | विशेष-डा. वेलवलकर इन पत्तियों से व्याकरण शास्त्र की तीन अवस्थाओ का निर्देश करते हैं। देखिये-Systems of Sanskrit Crammar पृष्ठ ६ ('Three Periods of intellectual development') "एतावन्त समानकर्माणो घातव' । धातु दधाते. । 'एता- वन्ति अस्य सत्त्वस्य नामधेयानि' । 'एतावताम् अर्थानाम् इदम् अभिधानम् । नैघण्टकमिद देवतानाम । प्राधान्येन इदमिति । तत् अन्यदेवते मन्त्र निपतति नैघण्टुक तत् । 'अश्व न त्वा वारवन्तम्' 1 अश्वमिद त्वा वालवन्तम् । वाला. दशवारणार्थी भवन्ति । दशो दाते.॥ "इतने धातु समान पवार है घातुपा (चारण) से। इतने नाम इस वस्तु के है', 'इतनी वस्तुओं का यह नाम है-यह देवता के नाम से सम्बद्ध नघण्टुक है। यहां देवता का नाम ] प्रानतया होता है। जब दूसरे देवता वाले मन्त्र में आता है वह भी नैप ही है। जैसे-[ है अग्नि बालवाल घोडे वे ममान' (ऋ० १॥२॥१) । वाल दर से बचाने वाले हैं । दशदा (कारना ) से ॥ ३हिनि । ३४ हिन्दी-निरुत्तः दिशेप-यद्यपि नघण्टुव का लक्षण यास्क देते हैं परन्तु यह कहीं मिलता नहीं, कही तो देवता मुख्य रहते हैं, कही दूसरे के मन्त्र में स्थान पाते हैं ? उपर्युक्त मन्त्र मे अग्नि के मन्त्र में 'अश्व' आ गया है। अश्व के मुख्य गुण (केश होना ) अग्नि के गुण हो गये हैं ॥ 'मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः' । मृगः इव भीमः कुचरः गिरिष्ठाः । मृगः माRः गतिकर्मणः । भीमः विभ्यति अस्मात् । भीष्मः अपि एतस्मादेव ! कुचर. इति चरति कर्म कुत्सितम् । अथ चेत् देवताभिधानं, क अयं न चरति इति । गिरिठाः गिरि- स्थायी । गिरि.पर्वतः । समुद्गीर्णो भवति । पर्ववान् पर्वतः । पर्व पुनः पृणाते. प्रीणातेः वा । अर्घमारापर्व देवान् अस्मिन् प्रीणन्ति इति । तत्प्रकृति इतरत् सन्विसामान्यात् । मेघस्थायी । मेयोऽपि गिरिः एतस्मात् एव ॥ 'मृग-सा भयकर, कुचर और पहाड पर बैठनेवाला' ( ऋ० १०॥१८०२ )। 'मृग' गति अर्थवाले /माज से । 'भीम' - जिससे डरे (भी), भीष्म भी इसी से । कुचर = बुरे ढंग से चलना । यदि देवता का अर्थ ले तो वहीं यह नही चलना'-[ यह निांदन होगा ] : गिरिष्ठा:- गिरि पर बैठने वाला। गिरि = पर्वत क्योकि ऊबड़-खाबड (समुद्र ) होता है । पर्वत = पर्व (सधि) युक्त । 'पर्व'/ ( मरना ) या प्री (प्रसन्न करना ) से । अर्घमास१ % जिसमे देवताओं को प्रसन्न करें। इसी के आधार पर अन्य (अर्थ) सपोग को समानता के कारण होते हैं : [ देवता-पक्ष में ]-मैच पर बैठने वाला; मेघ भी इसी कारण से मिरि कहलाता है। तद यानि नामानि प्राधान्यस्तुतीनां देवतानां तद् दैवतम् इति आचक्षते । तद् उपरिटात् व्याख्यास्यामः । नघण्टुकानि नगमानि इह इह ॥ २० ॥ जो नाम प्रधान स्तुतिवाने देवनायो के हैं, उसे देवन पहने है। उसरी व्याख्या बाद में करेंगे (नि.७.१२ अध्याय ), यहाँ पर नघण्टुनः और नगम के नामों को [ पाख्या करेंगे ] ॥२०॥ विशेष-अध्याय के अल मे १६ शद की दिशक्ति हुई ॥ २० ॥ इति निस्कने प्रथमोऽध्यायः॥ से .
द्वितीय अध्याय प्रथम-पाद अथ निर्वचनम् । तदयेषु पदेषु स्वरसंस्कारौं समर्थों प्रदि। शिकेन गुणेन अन्वितौ स्याताम् , तथा तानि निद्रूयात् । अर्थ अनन्विते अय, अप्रादेशिके विकारे अर्यनित्य. परीक्षेत केनचित् वृत्तिसामान्येन । अविद्यमाने सामान्येऽपि अक्षरवर्णसामान्यात नियात् । न तु एव न नियात् । न संस्कारम् आद्रियेत । विशयवत्य. हि वृत्तय. भवन्ति । यथार्थ विभक्ती. सनमयेत् ।। अब नियमन प्रारम्भ होता है। तो जिन शब्दों में स्वर और बनावद अर्थ से युक्त होकर, अपने अधीनस्थ अयं मम्बन्धी (प्रादेशिक ) विकार से सम्बद्ध हो, उनषा निर्वचन उसके अनुसार ही करें(१)। किन्तु [ शब्द मे दिखलाई पडनेवाले पातु का] अर्थ असगत होने पर या [ शब्द का अर्थ रखनेवाले धातु मे उस पार की व्युरपक्ति करने में ] विकार ( आतरिक परिवर्तन ) में व्यारण-सम्मम न होने पर किसी रूप (धातु का या शम्द का ) की समानता से अर्थ की सत्ता आँच लें (२)। इस प्रकार की समानता न मिलने पर किसी स्वर या व्याजन की समानता देखकर निर्वचन करें (३)। मिन्सु ऐसा न हो कि नियंत्रन ही न फरें। व्यावरण की युतत्ति या सहारा न लें क्योंकि (सगा या निया को बनावट ) सन्देहात्मा होते हैं। [ऋचाओं को मारा के समय ] अथ के अनुसार विभक्तिया को बदल दें। विशेष-नियंचनपत्ति द्वारा मयं बतलाना; 'राम' शब्द की प्युपत्ति है/रम् +धम् (N), रितु नियंचन है 'रमन्ने योगिनो यस्मिन्'-इसम पातु के साथ अर्थ का भी ज्ञान हो जाता है याक निर्वचन करने के लिए तीन निधन यतलाने है (१) याग, पा आदि गायों का निर्वचन ही गाधारण गोनि से ही समय है। ( २ ) समोसमी जो पातु सद में दिवाई पहना है गमा अर्थ कार में नहीं, जमे 'हार' हस् ( मन्वित ययं । बमोनमी ऐमा होता है कि मि धातु मे उसका मयं है उस धातु मे उक्त गान पोति करने में मारा गया पहुंचाना में 'मन' मलि (SE.
। - हिन्दो निरक्त देशिक विकार )-ऐसी दशाओ मे हम दोनो के रूपो की तुलना परेंगे कि कही समानता है या नहीं जैसे हन् से निघण्टु बना क्योकि 'हन्' का कहीं कहीं "ध्' भी होता है। (३) यदि ऐमा अवसर भी न मिले तो एकाघ अक्षर (स्वर) या वर्ण (व्यजन ) की समानता देखकर भी निर्वचन करें। जैसे 'शृग' का निर्वचन /शम् (मारना) से केवल 'श' को समानता पर । इन तीन नियमो का पालन यास्क सदा करते हैं। निर्वचन न करना अपनी मूखता प्रकट करना है-आखिर निरुक्त है किस लिए? कभी-कभी वैदिक मत्रो मे ऐसी विभक्तियाँ मिलती हैं जिनका कार्य सस्कृन मे दूसरी विभक्तियां करती हैं । उन्हे तदनुसार बदल देना चाहिए । यहाँ यास्क भाषा के परिवर्तन का सकेत कर रहे हैं । इसी प्रकार 'स तस्मै कथयति' का अनुवाद 'वह उससे कहता है' करते हैं । यास्क का यह अपूर्व अनुभव ( Observation ) है । इसीक अनुसार वे 'हृत्यु' को 'हृदयानि' कर देने हैं। प्रत्तम् अवत्तम् इति धात्वादी एव शिष्यते । अथापि अस्ते. निवृत्तिस्थानेषु आदिलोपो भवति-स्त सन्तीति । अथापिअन्त- लोपो भवति–गत्वा गतमिति । अथापि उपधालोपो भवति- जग्मतु., जग्मु इति। अथापि उपधाविकारो भवति-राजा दण्डी इति । अथापि वर्णलोपो भवति-तत्त्वा यामि' इति । अयापि द्विवर्णलोप -तृच इति। अथापि आदिविपर्ययो भवति-ज्योति, घन., विन्दु, वाट्य इति । अयापि आद्यन्तविपर्ययो भवति- स्तोकक., रज्जुः, सिकता., त' इति । अयापि अन्तन्यापत्ति. भवति ॥ १ ॥ 'प्रत' और 'अवत्त' में धातु () या पहला अक्षर (६) ही बचना है। गुण और वृद्धि से रहिन म्यानो मे (Weak terminations)/अर का पहला अक्षर तुम हो जाता है-ता, मनि। हीं पर अतिम असर T लोप होता है-गत्वा, गतम् ( गम्)। कहीं आधा पार होता है- जग्मतु (गये ) जामु (गो शह) ( गम् के '' वा शोर)। वही उपपा में परिवर्तन होता है-(रान में ) गजा, (दण्डिन् में ) दण्डी । वहीं यगं कागेर भी होता है-नत्वा यामि (स्वामथे 'म' का, या ना साप ) दोषों का भी लोग होता है -नृच (वन र मौर बामोर)! धादि वर्ण का भी परिवर्तन होता है-ज्योति (). घर:(हिन}, द्वितीय अध्याय - बिन्दु (भिद्) वाध्य (विट)। आदि और अस्त-दोना का भी परिवतन ( Metathesis ) हाता है-स्ताप (Vत) रज्जु (मृज), सिकता (/कस्) त',(वृत)। वहीं अन्त का भी परिवतन होता है ! विशेष प्रत्त = प्र+/दात - प्रदद्त - प्रदत = प्रत्त । देखिय पाणिनि० 'दो दरो. '(७।४।४६ ) तथा 'अच उपसर्गात त' (७४।४७)। निवृत्ति- स्थान - जहाँ गुण और वृद्धि न हो, धातु मूलावस्या म हो। आधुनिक भाषा- विज्ञान म इस Weak Termination कहते हैं । उपधा : अतिम से पूर्व- यण ( Peaultimate) सम्म 'अ'। उपधाविकार-राजन भ 'ज' मा 'अ' दोष हो जाता है--राजा । धगलोप--दुग कहते हैं कि 'यायामि' के चा' का लोप हुमा, परन्तु 'चा' म दो दण हैं । निरुक्त के एक प्राचीन टीशकार महमर कहते हैं कि 'तनित्वा' के नि' का लोप हुआ, परंतु यहाँ भी वही बात है। मेरा विचार है कि या तो 'तत + त्वा' के एक त् का लोप हुआ (तत्या) भयदा लाम' चे 'म्' का । वर्ण का अर्थ कार ध्यान लिया है , उसका भी निर्वाह हो जाता है । आद्य तविषयप---श्वत् + च् +उ+त् स क उ त् (विपयय) म् + उक्-स्तु स्तोक । मृग मर्नु रस्जु रज्जु । ये सभी परिवर्तन Sporadic Changes के अ वर्गत आते हैं ( देखिये, भूमिका ) ॥१॥ ओष , मेव , नाथ , गाव, वधू , मधु इति । अयापि वर्णोप- जन --आस्थत्, द्वार, भरूजा इति ॥ तद् यन स्वरात् अनन्त- रान्त स्यान्तर्यातु भवति, तद द्विप्रकृतीना स्थानमिति प्रदि- शन्ति । तत्र मिद्धायामनुपपद्यमानायाम् इतरया उपपिपादयिपेत् । तनापि एके अल्पनिप्पत्तय भवन्ति । तद् यथा एतत्-ऊति, मृदु, पृथु, पृपत, कुणारुम् इति । में मोघ (4) मेष (मिह । नाप ( नह) गाय, (गाह.) वधू (बह ), मप (मद )। यही वर्ण का आगमन भी होता है-प्रास्थत (स् म प का आगमन ), द्वार (Va, मरूमा (प्रज)। जहाँ स्वर में प्रवाहित अन स्प वा (घर) पातु के भीतर है, वह दो पानिवाले (गप्रसारण ) 7 स्थान है-रेमा पहने हैं। जर fसर पानु अमिट हो ना हर किमी दूसरे (पातु) में उमरी पुरसति करें। - , ८ हिन्दीनिरुक्त वहाँ भी कुछ शन्द मल्प-परिवर्तनवाले हैं जैसे, कति (अन) मृदु (घद), पृथुः (प्रथ् ), पृषत (प), कुणारु ( क्वण ) । विशेप-द्विप्रकृति स्थान - सप्रसारण जिसमे 'य् य र ल्' का 'इ ऋल' हो जाता है । जब धातु मे स्वर के अनन्तर कोई अन्त स्थ वर्ण आये तो उसका दो प्रकार का रूप हो जाता है----यज से यष्टा, यष्ट तथा / इज् से इष्ट , इष्टि./यज मे य ( अन्त स्थ ) और अ (स्वर ) के बीच में कोई व्यवधान नहीं । यह लक्षण अतिव्याप्ति दोष से दूपित है क्योकि याच्, यम्, रम् आदि सम्प्रसारण की प्रक्रिया से रहित घातुओ मे भी यह हो जायगा। उपपिपादयि- पेत्-सन् प्रत्यय व्यर्थ है परन्तु यह उस युग का व्यवहार रहा होगा ।। अथापि भापिकेभ्यः धातुभ्यः नैगमाः कृतः भाष्यन्ते । दुमूनाः क्षेत्रसाधाः इति । अथापि नैगमेभ्य. भापिका. । उष्णं घृतमिति । अथापि प्रकृतय एव एकेषु भाष्यन्ते, विकृतम. एकेपु । शवति.गतिकर्मा कम्बोजेष्वेव भाष्यते । कम्बोजाः कम्बलभीजाः। कमनीयभोजा वा । कम्बलः कमनीयो भवति । विकारम् अस्य आर्येषु भापन्ते । शव इति । दाति. लवनार्थे प्रात्र्येषु । दात्रम् उदीच्येषु । एवम् एकपदानि नियात् । कभी-कभी सस्कृत ( भाषा ) के धातुओं से वैदिक कृदन्त बनते हैं जैसे- दमूना ( दम्), क्षेत्रसाधा (साध्) । कभी वैदिक (धातुओ) से संस्कृत के अदल बनते हैं जैसे-उष्ण ( उप जमाना ), पून (पन नाश, अमक)। इसके सम्मान प्रकृति को एक स्पान बोलने हैं, विकृति को दूसरे स्थान में। गति अर्थवाला शिव् कम्बोज देश में बोला जाता है। सम्बोज = कम्बल का उपभोग करने वाले, कमनीय द्रव्यों का उपभोग करते। वाले । पश्चल कमनीय ( सुन्दर ) होता है। इससे बन शब्द को (विकृति) भार्यदेश में बोलते हैं-शब ( मत देह)। उसी प्रकार का बाटना, देश में और 'दा' को उदीच्य-देश में बोलते हैं। इस प्रकार एक पदवाले बान्दोका निर्वचन करें। अथ तद्धितसमासेषु एकपर्वमु च अनेकपर्वसु च पूर्व पूर्वम्, अपरम् अपर पविभज्य नियात् । दण्ड्यः पुरपः । दण्डमर्हति इति वा । दण्डेन संपद्यते इति वा । दण्डो ददते. धारयतिकमंग.!
द्वितीय अध्याय - 'अक्रूरो ददते मणिम्' इति अभिभाषन्ते । दमनात् इति औपम- न्यवः । 'दण्डमस्य आकर्यत' इति गर्दायाम् ॥ एक या अनेक सन्धि ( प ) वाले तद्धित या समास मे पहले पूर्ववाले (3 तदित या समास ) का दण्ड करें, याद मे उनका निर्यपन करें। जैसे-- (तद्धित )-दाइप पुरुष =दण्ड के योग्य, या दण्ड से युक्त । 'दण्ड/दन - धारण करना, से बना है । लोग बोलते भी है-अकूर मणि धारण करता औपमन्यव के मत से दम् (वाना ) है। निन्दा मे कहते हैं--'इसका दण्ड छीन ली। कक्ष्या रज्ज. अश्वस्य । वन्दा सेवते। कक्षो गाहते. । क्सः इति नामकरण. । स्याते: वा । अनर्थक अभ्यासः । किम् अस्मिन् ख्यानमिति ? कपुतेः वा । तत्सामान्यात् मनुष्यकक्ष । बाहुमूल सामान्यात् अश्वस्य ॥ २॥ कक्ष्या घोडे की रस्सी, क्योंकि कांख में लगी रहती है । कक्ष' गाह से यना, 'क्स' नाम बनानेवाला प्रत्यय है। अथवा ख्या से बना है जिसमें द्वित्व ( अभ्यास) निरयंक है (ख्वाखा-कण्या-कक्ष्या)। या "इसमे क्या कहना ?" से बना हो । या क्षु ( खुजलाना ) से। इसी की समानता से मनुष्य की कोख होती है । बाहुओं के मूल को समानता के कारण बाद का [भी कक्ष होता है-उसमे रहने वाली 'कक्ष्या"] ॥ २॥ राज्ञ. पुरुप. राजपुरुष । राजा राजतेः । पुरुषः पुरिपादः, पुरिशयः, पूरयते. वा । 'पूरयति अन्तः' इति अन्तरपुरुषमभि- प्रेत्य । यस्मात्सर नापरमस्ति किंचिद्यस्मानाणीयो न ज्यायोऽस्ति किंचित् । वृक्ष इव स्तन्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेद पूर्ण पुरुपेण सर्वम् ॥ इत्यपि निगमो भवति । राजा का पुरुष-राजपुरुष । राजा राज् (शोभना) से. 'पुष्प - पुर (राशि में बनेवाला, पुर में शयन करने वाला, या पूरय (पूरा करना) से बना है । जब व्यक्ति को लक्ष्य करके कहा जाता है तब बहने हैं 'जो भीतर को भर देता है। जिससे ऊंचा या नोदा कुछ नहीं है, जिससे • छोटा या बडा कुछ नहीं है। स्वर्ग में जो वृक्ष के समान स्थिर होकर बला हिन्दो-निरुक्त ठहरा है, उसी पुरुष के द्वारा यह समूचा ( विश्व ) मरा हुआ है।" ( श्वेता उप० ३।९)-यह उदाहरण भी है ।। विश्वकद्राकर्ष । वि इति, चकद्र इति श्वगतौ भाप्यते । द्राति इति गतिकुत्सना । कद्राति इति द्रातिकुत्सना । 'चकद्राति' कद्रातीति सत अनर्थकोऽभ्यास । तदस्मिन् अस्तीति विश्वकद्र ।। [विश्वकद्रमाकर्षति इति विश्चकद्राकर्ष ।] कल्याणवर्णरूप. । कल्याणवर्णस्य इवास्य रूपम् । कल्याण कमनीय भवति । वर्णो वृणोते. । रूप रोचते ॥ - । - 'विश्चकद्राकर्ष' [का निर्वचन]-वि, 'श्चकन्द्र' का प्रयोग कुत्ते की गति के अर्थ मे होता है । 'दाति' गति को निन्दा, 'कद्राति'='द्राति' को निन्दा । 'कद्राति से निरर्थक द्वित्व ( अभ्यास ) करके 'चकद्राति' बना । यह ( अत्यन्त कुत्सित गति ) जिसमे है वह-विश्वकद्र । | उसे आकृष्ट करनेवाला विश्चक- दावर्ष = नगररक्षक 1 कल्याण वर्णरूप-कल्याणवर्ण के समान जिसका रूप हो। कल्याण = कमनीय (मुन्दर)। 'वणं' /दू (चुनना) से और 'रूप'/रुच ( अच्छा लगना) से ।। विशेष-पास्क ने एक आदर्श रखा कि तद्धित और समास का किस प्रकार निर्वचन करें । तद्धितान्त के नमूने हैं-दण्डय' और 'कक्ष्या' । समास के नमूनो मे 'राजपुरुप' दो पदो का, 'कल्पागधर्णरूम' तीन पदोका, विश्चक द्राक्प' तद्धित और समास दोनो का उदाहरण है । दुर्गाचार्य के अनुसार वि और चन्द्र दोनो कुत्ते की गति बतलाते हैं किन्तु यास्क वा यह मत नही । 'वि' तद्धित वा चिह्न है, पहले होने के कारण 'वि' को पहल लिखा गया है, वस्तुत शब्द में तो *यह तब जुड़ा है जब 'तदस्मिन्०' कहकर तद्धित निर्देश किया गया है। वैदिक भाषा मे चई शब्दो के आदि मे स(स)कार था जो दाद मे लुप्त हो गया, इसो उदाहरण कुछ शब्दों मे मिलते हैं । 'श्चद्र' वैसा ही शब्द है, रचन्द्र (= चमकना, तुल० हरि श्चन्द्र ), स्पश्य (= देखना, तुल० स्परा-चर, Eog Spy = गुप्तचर) बाद मे ये चक्र, चन्द्र, पश्य हो गये। ये भी Sporadic changes के उदाहरण हैं। एवं तद्धितसमासान् निवूयात् । नैकपदानि निबूयात् । न अवै-
द्वितीय अध्याय
याकरणाय । न अनुपसन्नाय । अनिदविदे वा । नित्य हि अवि-
ज्ञातु विज्ञाने असूया । उपसन्नाय तु निर्वयात् । यो वा अल
विज्ञातु स्यात् । मेवाविने, तपस्विने वा ॥३॥
इस प्रकार तद्धित और समास का निर्वचन करें। अकेले पदों का (विना
प्रकरण जाने हुए) निर्वचन करें। व्याकरण न जानने वाले के सामने शिष्य
(बनकर न आनेवाले के सामने और इसे ( निरुक्त ) न जाननेवाले के सामने भी
[निर्वचन ] न करें क्योकि अनानी पुरुष विनान मे सदा दोष खोजता है ।
शिष्य बनकर मानवाले के सामने निवचन करें, या जो जानने में समय हो,
मेधावी हो, 'या तपस्वी हो ।। ३ ।।
विद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम गोपाय मा शेवधिटेऽहमस्मि ।
असूयकायानृजवेऽयताय न मा ब्रूया वीर्यवती तथा स्याम् ॥
य आतृणत्यवितथेन कर्णावदु ख कुर्वन्नमृत सप्रयच्छन् ।
त मन्येत पितर मातर च तस्मै न द्रुह्येत्कतमच्चनाह ।।
अध्यापिता ये गुरु नाद्रियन्ते विप्रा वाचा मनसा कर्मणा वा।
यथैव ते न गुरोर्मोजनीयास्तथैव तान्न भुनक्ति श्रुत तत् ।।
यमेव विद्या सुचिमप्रमत्त मेधाविन ब्रह्मचर्योपपन्नम् ।
यस्ते न द्रुहोकतमञ्चनाह तस्मै मा ब्रूया निधिपाय ब्रह्मन् ॥ इति।
एके वार विद्या ब्राह्मण से बोलो-'मेरी रक्षा परो, मैं तुम्हारी निधि
(घन )हूं, दोप खोजनेशाले टेड व्यक्ति या असयमी को भुपे न दो, जिसमे
मैं बलयती बनू। जो सत्य ( अवितप) के द्वारा, [ दुख को ] दुस नहीं
समझते हुए अमृत दान करते हुए, दोनों कान सोरते हैं, उहें माता पिता
समशे, उनसे कभी देष न करे। जो ब्राह्मग पाये जाने के बाद मन, वचन या
म से गुरु का आदर नही परते, पिस प्रकार वे लोग गुरु ये दारा माननीय
नहीं, सुना हा मान भी उन्हें नहीं मानता है (= वे भान नहीं पाने )।
जिसे तुम पवित्र, प्रमाद न करनेवाला, मेघावी और ब्रापर्य से युक्त समझो
(विया), जो कभी तुमसे टेप न करे, है महान् ! ऐम निधि-पालक को ही
मुझे दो।'
निषि शेवधिरिति ॥ ४ ॥
४२ हिन्दी-निरुक निषिरोवधि।।४।। विशेप-Bloomfield साहब अपने Vedic Concordance नामा अन्य में प्रथम श्लोक का स्थान 'संहितोपनिषद् पाह्मण' में बतलाते हैं। मनु ने इसी की छाया ली है- विद्या ब्राह्मणमेश्याह रोधिस्तेऽस्मि रक्ष माम् । धमूयाय मा मा दास्नया स्या वीर्यवतमा ॥ (मनु० २।११४) य आवणोत्यवितयं दाणा थषणावुभो। (ए माता स पिता जप त न हद कदाचन ।। में लोक अन्न परिवर्तन ये साप वसिष्ठयमस्मति (२।१४-१५) में भी हैं l पुन, द्वितीय-पाद अयातोऽनुक्रमिप्याम । गौ इति पृथिव्या नामधेयम् । यत् दूरगता भवति । यत् च अस्या भूतानि गच्छन्ति । गाते. वा। ओकारो नामकरण. । अथापि पशुनाम इह भवति । एतस्मादेव । अथापि अम्या ताडितेन कृत्स्नवत् निगमा भवन्ति । 'गोभि. श्रीणीत मत्मरम्' इति पयम । मत्सरः सोमः । मन्दते: प्तिकर्मणः । मत्सरः इति लोभनाम । अभिमत्तः एनेन धनं भवति । पय. पिवते. वा, प्यायते. वा। क्षीर क्षरतेः, पसे था-ईरो नामकरणः । उशीरम् इति यया ॥ अब हम मा वर्णन मंगे। (१) यी-पदियो । पर्याप हैर दूर कर (पं)। याममे गमी जी ने (1) पाल (पाना) में 'ओम बनाने वाला प्रत्यय नाहै। गरमा यह (गाद) पशु त पर्याय है. यह भी मी (धातु) में बना है। ये पर सो (गो) (7 गामदारे दार प्रयोग भी योग-'गो (-) में गोम पो मिण ( ९४४) यह प का अर्थ है । मगर : गोम मिश/भ मे दमा है । ममर' गोर पप है। गी (लो) IT परे मरदार रहा है (14) J, माया पाना): hr (हना) द्वितीय अध्याय ४३ या/मा (खाना) में; ईर' माम बनाने वाला प्रत्यय है, जिस प्रकार 'उधीर' (खस) बनता है। विशेष--वस्तुत: निशक्त यही रो बारम्भ होता है क्योकि निघण्टु के दाब्दों की व्याख्या यही मे आरम्भ होती है । यास्क निर्वचन की धुन में इतने मतवाले हो जाते हैं कि विषय-वस्तु से बहुत दूर भटक जाते है । गौ का निर्वचन करते हुए--'मत्सर' का दो तरह से निवंचना ,पय' 'तीर'-जैसे शब्दो का नियंचन करना निश्चय ही विषयान्पर है। किन्तु यदि वे ऐसा नहीं करते तो बहुत कम शब्दो का ही निवंचन हम जान पाते। 'अंशु दुहन्तो अभ्यासतेगवि' इत्यभिपवणचर्मण । अंशुःशम् अष्टमात्र. भवति । अननाय शं भवतीति वा । चमं चरतेः वा। उधृतं भवतीति वा । अथापि चर्म च श्लेष्मा च । 'गोभिः संनदो असि वोळयस्व'-इति रथस्तुतो। अथापि स्नाव च ग्लेप्मा च । गोभिः संनदा पतति प्रसूता'-इति इषु स्तुतो । ज्या भपि गौः उच्यते। गव्या चेत् ताद्धितम् । अय चेत् न गम्मा--मपति इपून इति ॥ ५ ॥ 'सोम को निचोडते हुए गो (-1) पर बैठे' ( ऋ० १०१९४९)- यहाँ (सोम ) नेवासे धमाँ का (अपं है)। अंश-व्याप्त होते ही (मट गर) मुसा होता है (म+म), पा जीवन के लिए मुसा है ( अन् +पाम् )। 'च' घर ( चलना ) या उत्-पूर्वक चतु (काटना) से बना। [गोपाद से ] चमडे और इफ का भी [ बोध होता है ] । जैसे- 'गोमि पम और कफ] से दद हो गये हो, यभेद्य यनों (ऋ० ६।४।२६)- यह रप का वर्णन है। [गो पद से ] तति और कफ का भी [गोप होता है ] जरी-गो के सात और कफ) से न होकर छोड़ने हो उहा है (ऋ० ६१७५१११/-यह वाण का चपन । पनुप की रस्सी को भी गो' पढे है। यदि यह गोरे बात से बनी है तो तदिता ममा [मो-गो के ata से बनी रस्मो]। यदि गो के तात से बनी (गभ्या) नहीं तो [म गो' शनिमा होगा-] को वापों को प्रेरित करे॥५॥ 'वृक्षे वृक्षे नियता मीमयहीस्ततो क्य प्रपटान पूरुपाद.।' (ोगो नुर पर R (निया) यी हुई (ो सो . । से हिन्दो निरुक्त (मीमपत्) शब्द करती है (ततः ) तब (पूरुषादः) मनुष्यो के भोजनस्वरूप (वय )पक्षी (प्रपतान् ) गिरते हैं- (लेट् लकार) (ऋ० १०।२७।२२)। वृक्षे वृक्षे धनुपि धनुपि । वृक्षो व्रश्चनात् । नियता मीम- यत् नौ । शब्दं करोति। मीमयति. शब्दकर्मा । ततो वयः प्रपतन्ति पुरुपान् अदनाय । विः इति शकुनिनाम. । वेतेः गति- कर्मणः । अथापि इषुनाम इह भवति । एतस्मादेव ।। वृक्षे वृक्षे = हरेक घनुष में । 'वृक्ष' प्रश्च् (छेदना) से। बंधकर गौ (धनुष की डोरी) मीमयत् = शब्द करती है /मि = आवाज करना । तब पक्षिगण ( वय ) मनुष्यो के खाने के लिए गिरते हैं। विपक्षी का पर्याय है ।वी = जाना, से । यहाँ ( गौशब्द ) 'वाण' का पर्याय है। इसी धातु बना है। आदित्योऽपि गौ. उच्यते । 'उतादः परुषे गवि', पर्ववति । भास्वति इति औपमन्यव । अथापि अस्य एको रश्मिः चन्द्रमसं प्रति दीप्यते । तद् एतेन उपेक्षितव्यम्। आदित्यतः अस्य दीप्तिः भवतीति। 'सुपुम्णः सूर्यरश्मिश्चन्द्रमा गन्धर्वः' इत्यपि निगमो भवति । सोऽपि गौ उच्यते । 'अत्राह गोरमन्वत' इति ।, तदुपरिष्टात् व्याख्यास्यामः । सर्वेऽपि रश्मय. गाव उच्यन्ते ॥६॥ आदित्य भी 'गो' कहलाता है जैसे-'वह उस चमकीले मण्डल में (ऋ० ६॥५६॥३)। [पहप ] 'सन्धियुक्त' या औपमन्यव के विचार से चमकीला'। उसी एक किरण चन्द्रमा की ओर चमकती है, उसे देखें। आदित्य से ही उसकी दीप्ति होती है। 'सुखद, सूर्याकरण गन्धर्व चन्द्रमा है' (यजु० वा० स० १०४०) यह उदाहरण भी है। वह (चन्द्रमा ) भी गौ कहलाता है जैसे-'चन्द्रमा से समझा' ( ११८४।१५)-इसकी व्याख्या बाद में करेंगे (निरु० ४.२५)1 सभी किरणें 'गो' कहलाती हैं।॥ ६॥ ता वां वास्तून्युश्मसि गमध्ये यत्र गावो भूरिशृङ्गा अयासः । अनाह तदुरुगायस्य वृष्ण. परमं पदमव भाति भूरि ।। (वा) तुम दोनों के (ता = तानि) उन ( वास्तूनि ) घरो पर (गमध्य ) .
४५ --- । । द्वितीय अध्याय जाना ( उम्मसि ) हम चाहते हैं. (यय ) जहाँ (भूरिशृङ्गाः) बहुत कान्ति- वाली तथा (अयासः,) गतिशील (गावः) किरण है। (अत्र मह) यहाँ (उरगायस्य ) विशाल गतिवाल (वृष्णः ) वृषम : विष्णु का (तत्) वह' (परमं) सुन्दर (पदम् ) स्थान (भूरि ) अच्छी तरह. (अवमाति) चमकता है ।। (ऋ११५४.६ ) । तानि वां वास्तूनि कामयामहे गमनाय । यत्र.गावः भूरि- शृङ्गाः बहुशृङ्गाः । भुरि इति वहुनो नामधेयम् । प्रभवति इति सतः। शृङ्गं श्रयतेः वा, शृणातेः वाः, शनातेः वा, शरणाय उद्गमिति वा। शिरसो निर्गतम् इति वा । अयासः अयनाः । तत्र तद् उरुगायस्य विष्णोः महागतेः परमं पदं परार्ध्यस्थम् अव- भाति भूरि । पादः पद्यतेः । तन्निधानात् पदम् । पशुपादप्रकृतिः प्रभागपादः । प्रभागपादसामान्यात् इतराणि पदानि । एवमन्ये- पामपि सत्वानां सन्देहाः विद्यन्ते । तानि चेत् समानकर्माणि समाननिर्वचनानि । यथार्य निर्वक्तव्यानि ॥ तुम दोनो के उन निवास स्थानो को जाने की इच्छा [ हम ] करते हैं, जहाँ किरणे अत्यन्त कान्तियुक्त हैं। भूरि-बहुत, जो प्रभूत हो()। 'ग'- मि (व्हरना) ” (मारना ) या शिम ( मारना ) से बना है। अथवा शरण (रक्षा) के लिए निकला हो (+गम् ), या सिर से निकला हो । अयास: = गतिशील (Vइ) वहा उरुगाय = विशाल गतिकाले, विष्णु का, परम - सबसे ऊँचा, पद अच्छी तरह सबो पर चमकता है। 'पादपद् ( जाना ) से, उसीसे 'पद' भी बना है। पशु के पाद (पर) के बाधार पर 'भाग' (टुकडा ) अर्यवाला 'पाद' होता है। 'भाग' अर्थवाले पाद से अन्य अर्थवाले 'पद' भी बनते हैं। इसी प्रकार दूसरी वस्तुओं के भी सन्देह हैं। यदि उनके अयं समान हैं तो निर्दचन भी समान होंगे। भिन्नार्थक होने पर निर्वचन भी भिन्न होगे । अर्थ अनुसार ही निर्वचन करें। इति इमानि एकविंशतिः पृथिवीनामधेयानि अनुकान्तानि । तत्र निऋति. निरमणात् । ऋच्छतेः कृच्छापत्तिः इतरा । सा पृथिव्या सन्दिह्यते । तयोः विभागः । तस्या. एपा भवति ॥७॥ 1 ४६ हिन्दी निरुक्त पृथिवी के ये इक्कीस नाम क्रमशः वणित हैं। (२) उनमे मिति' नि/रम ( रमण करना) से बना है। यदि 'दुख (कृच्छ ) का आगमन (आपत्ति ) अर्थ हो तो ऋ से बना है। इस (अर्थ) का पृथिवी से सन्देह हो जाता है। इन दोनो (अर्थों ) का विभाग करें, उग (निऋति) को यह ( ऋचा ) है। य ई चकार न सो अस्य वेद य ईं ददर्श हिरुगिन्नु तस्मात् । स मातुर्योना परिवीतो अन्तर्वहुप्रजा निऋतिमा विवेश । (य) ओ (ईम् ) इसे (चकार) उत्पन्न करता है, (स ) वह ( अस्य) इसे ( न येव ) नहीं जानता; (यः ) जो (ईम् ) इसे (ददर्श ) देखता है, (तस्मात् ) उससे (हिरु ) छिपा हुआ (इत् नु) ही है। (स.) वह (मातु ) माता को, उत्पन्न करने वाले की (योनी) योनि में ( मन्त.) मीतर से (परिवीत ) घिरा हुआ है, (बहुप्रजा) बहुत सन्तानो से युक्त होकर (नितिम ) दुःख मैं ( मा विवेश ) प्रवेश करता है ।। (ऋ० १११६४१३२) । विशेप-गैल्डनर का मत है कि इस ऋचा में प्राणवायु' का वर्णन है, रॉथ तथा हाँग के अनुसार मेघ के गर्जन का वर्णन, उपू सन और हेनरी के अनुसार सूर्य का वणन, और दुर्गाचार्य बहु-सन्तान का वर्णन समझते हैं। यास्क मेघ काही अर्थ लेते हैं बहुप्रजा कृच्छम् आपद्यते इति परिव्राजका.। वर्षकर्म इति नैरुक्ता । य ई चकार इति । करोति-किरती सन्दिग्धौ वर्षकर्मणा।न सोऽस्य वेद मध्यम । स एवास्य वेद मध्यमी, यो ददर्श आदित्योपहितम् । स मातु योनौ । माता अन्तरिक्षम् । निर्मीयन्ते अस्मिन् भूतानि । योनि =अन्तरिक्षम् । महान् अवयव, परिवीत वायुना । अयमपीतरो योनि एतस्मादेव । परियुतो भवति । वहुप्रजा. भूमिमापद्यते वर्षकर्मणा ।। बहुत सन्तानवाले दुख मे गिरते हैं-यह परियाजको ( एक मम्प्रदाय ) का क्यन है । निरुतकार कहते हैं कि वर्षा का अर्थ है। जो इसे (वर्षा को) परता है-वर्षा 'कै अर्थ मे [ 'चार' क्रिया से ]V ( करना ) तथा/ (बिखेरना)का सन्देह हो जाता है। यह मध्यम [-मेघ से नहीं जानता द्वितीय अध्याय है, जो सूर्य के द्वारा छिपाये गये को देखता है। वह मात्रा को योनि मे- माता = अन्तरिक्ष, क्योकि इसमे जीबो का निर्माण होता है। यानि = अन्तरिक्ष क्योकि [ वह विश्व का ] एक बड़ा सवयव ( खण्ड, यु) है, वायु से घिरा है। यह दूसरा योनि-शब्द भी इसी से बना है क्योकि घिरा हुआ होता है । चहुन सन्तानों से युक्त (जलबिन्दु ) वर्षा के अर्थ से भूमि पर गिरते हैं। शाकपूणि. संकल्पयाचने सर्वा देवता जानामि इति । तस्मै देवता उभयलिङ्गा प्रादुर्वभूव । ता न जज्ञे । ता प्रपच्छ । विविदिपाणि त्या इति । सा अस्मै एतामृचम् आदिदेश । एषा मद्देवतेति ॥ ८॥ भाकपूणि ने गर्द किया कि मैं सभी [ मन्त्र के ] देवताओ को जानता हूँ। उनके लिए दो चिह्न राले देवता उत्पन्न हुए । उनको वे न जान सके तो उनसे पूछा----मैं आपको जानना चाहमा हूँ। उन्होने यह ऋचा कही कि इसका देवता मैं हूँ॥८॥ अयं स शिक्ते येन गौरभोवुता मिमाति मायुं ध्वसनावधिश्रिता। सा चित्तिभिनि हि चकार मयं विद्युद्भवन्ती प्रति वविमीहत ।। ( अर्थ स ) वही (शिक्ते ) आवाज करता है (येन) जिसके द्वारा (अमिऽवृता) के जाने पर (सनी) वर्षा करनेवाने मेध पर (अधिधिता) बैठी हुई (गो.) अन्तरिम की वाणी (मायु) घोर शब्द (मिमाति ) करती है । (सा) उसने (चितिमि.) गर्जनरूपी कर्म से ( मत्य हि) मनुष्य को (निचकार ) झुका दिया, (विद्युत् ) विजली ( भवन्ती) होकर (वत्रिम) अपने रूप को (प्रति औहत ) सच लिया है ।। (ऋ० ११६४।२९)। अयं स शब्दायते येन गो. अभिप्रबुना, मिमाति मायुम् शब्द करोति । मायुमिव आदित्यमिति वा। वाक् एपा माध्य- मिका । ध्वसने मेघे अविश्रिता । सा चित्तिभि. - कर्मभिः नोचै. निकरोति मर्त्यम् । विद्युद्भवन्ती प्रत्यूहते वबिम् । वद्रि. इति रूपनाम । वृणोतीति सत । वर्पण प्रच्छाद्य पृथिवी पुनरादत्ते ॥ ९॥ वही आवाज करता है जिसके द्वारा धनि प्रेरित हुई और मायु मिमानि - आवाज करती है या मायु के समान = आदित्य । मह म यस्याने वाली ध्वनि है जो वसन अर्थात् मेघ पर बढ़ी हुई है। यह चितिमि = कमों से, मनुष्य को . B૮ 'हिन्दी-निरुक्त नीचे कर देती है; बिजली बनकर ववि को खींच लेती है। वति = रूप । (ढंकना ) से । वर्षा से पृथ्वी को ढंक कर पुनः ( वर्षा को ) लेती है ॥ ९ ॥ तृतीय-पाद हिरण्यनामानि उत्तराणि पञ्चदश । 'हिरण्यं' कस्मात् १ ह्रियते आयम्यमानमिति वा, हियते जनात् जनमिति वा, हितरमणं भवतीति वा, हृदयरमणं भवति इति वा, हर्यतेः वा स्यात् प्रेप्साकर्मणः ॥ इसके बाद के पंद्रह नाम हिरण्य के हैं। (३) हिरण्य' करें ? गढे जाने पर ले जाते हैं ( ह+यम् ), या एक आदमी से दूसरे थादमी तक के जाते हैं, या हित के लिए रमणकारी होता है (धा+/रम् ), या हृदय के लिए रमणकारी है, या 'इच्छा' अर्थवाले /हयं से बना है । अन्तरिक्षनामानि उत्तराणि पोडश । 'अन्तरिक्षं' कस्मात् ? अन्तरा क्षान्त भवति, अन्तरा इमे इति वा, शरीरेषु अन्तः अक्षय- मिति वा । तय समुद. इत्येतत् पार्थिवेन समुद्रेण सन्दिह्यते · समुद्रः कस्मात् ? समुद्भवन्ति अस्मात् आपः, समभिद्रवन्ति एनम् आपः, संमोदन्ते अस्मिन् भूतानि, समुदको भवति, समुनत्तीति वा ॥ इसके बाद के सोलह नाम अन्तरिक्ष के हैं। (४) 'अन्तरिक्ष कैसे ? बीर मे ( अन्तरा) तथा पृथ्वी के पास (क्षा + अन्त ) है, या दोनों (स्वगं और पृथिवी ) के बीच मे हैं, या शरीर के बीच में हैं और अक्षय है। इन (नामों) भी है जिसका भ्रम पापिय समुह ( सागर ) में हो जाता है। (५) 'समुद्र' कसे ? इससे जल निकलता है ( सम् उत्VE), या जल इमी में जाता है ( सम् अमि दि), या इममें जीव मोद मानते है ( मुद), या जलयुक्त है, या भिगा देना है (Vउन्द्)। तयोः विभागः । तत्र इतिहाममाचक्षते । देवापिः च आष्टिपेण शंतनुश्च कौरव्यौ भ्रातरी वभूवतुः। स गंतनुः कनीयान् अभिपेचयां- चक्रे । देवापिः तपः प्रतिपेदे । तत. शंतनो. राज्ये द्वादश वर्षाणि देवो न ववर्ष। तमूचुः ग्राह्मणा.-'अधर्मः त्वयाऽचरितः, ज्येउं भातरम् अन्तरित्य अभिषेचितम्। तस्मात् ते देवो न वर्षति इति । में - द्वितीय अध्याय ४९ स शंतनुः देवापि शिशिक्ष राज्येन । तमुवाच , देवापि:--'पुरो- हितः ते असानि, याजयानि च त्वा' इति । तस्य एतत् वर्ष- कामसूक्तम् । तस्य एषा भवति ॥१०॥ [समुद्र के ] इन दोनो (बों ) का विभाग करें। इसमे एक इतिहास कहते हैं-कुरुवंश मे ऋष्टिपेण के दो पुत्र देवापि और शन्तनु हुए। छोटे भाई शन्तनु ने अपना अभिषेक करा लिया और देवापि तपस्या करने लगा। इससे शान्तनु के राज्य में बारह वर्ष तक पानी नहीं बरसा । ब्राह्मणो ने उससे कहा-- 'तुमने अधर्म किया है, बड़े भाई को छोड कर तुमने अभिषेक करा लिया। इसीसे तुम्हारे यहाँ पानी नहीं बरसता ।' सन्तनु ने देवापि को राज्य लेने को कहा । देवापि ने उत्तर दिया-'मैं तुम्हारा पुरोहित रहूंगा और तुम्हें यज्ञ कराऊंगा'। उसी के विषय मे वह वर्षकाम-गूक्त है । उगकी यह (ऋचा) है ।। आटिपेणो होत्रमृपिनिपोदन्देवापिर्देवसुमति चिकित्वान् । स उत्तरस्मादधरं समुद्रमपो दिव्या असृजद्वा अभि ।। ( आटिपेणः ) ऋरिषेण के पुत्र, ( ऋपि. ) ऋषि ( देवापि.) देवापि, जो (देवसुमति ) देवताओ की भक्ति (चिक्विान् ) जानने वाले थे, (होत्रम) होता के स्थान पर (निपादन ) बैठे। (सः) उन्होंने ( उत्तरस्मात् ) ऊपर से (अधरं ) नीचे की ओर (समुद्रम् ) समुद्र को, अर्थात् ( दिव्याः) स्वर्ग के और ( वा.) वर्षा वाले ( अप: ) जल को (अभि अमृगन् ) छोडा ।। (ऋ० १०॥९८५)। आटिपेणः ऋष्टिपेणस्य पुत्रः, इपितसेनस्य इति वा । सेना सेश्वरा, समानगतिः वा । पुत्रः पुरु बायते, निपरणाद्वा! 'पुत्' नरकम्, ततः वायते इति वा । होत्रम् ऋपिः निपीदन् । ऋपिः दर्शनात् , 'स्तोमान् ददर्श' इति औपमन्यव. 1 'तद् यद् एनान् तपस्यमानान् ब्रह्म स्वयंभु अभ्यानपत् , तद् ऋषीणाम् ऋपित्वम्' इति विज्ञायते । देवापिः देवानाम् आप्त्या, स्तुत्या च प्रदानेन च। देवसुमति देवानां कल्याणी मतिम् । चिकित्वान-चेतनावान् । स उत्तरस्मादधरं समुद्रम् । उत्तरः उद्धततरो भवति । अवरः अघः' अरः । अव:-न धावति, इति ऊवंगतिः प्रतिपिद्धो। तस्योत्तरा भूयसे निर्वचनाय ॥ ११ ॥ ४हि०नि० हिन्दी-निरुक्त बाटिपेण = ऋष्टिपेण का पुत्र, या इपितसेन ( सेना भेजनेवाले ) का। सेना = स्वामी ( इन ) से युक्त या समान गति ( इन ) वाली। पुत्र सब जगह बचाने वाला ( पुरु /त्रा), या पिण्डदान करने से (नि/)। 'पुत्' नरक है, उससे बचाने वाला होता के स्थान पर ऋपि बैठे। अपि श् ( देखना ) से। औपमन्यव के मत से 'स्तोमो को देखने वाला' । 'ऋपियो का ऋषित्व इसी में है कि तपस्या करते समय इनके पास स्वय उत्पन्न होने वाला बदा (वेद) आया'--यह मालूम होता है (ते. आ० २१)1 देवापि- देवताओ को प्रात होने के कारण, स्तुति और दान के कारण । देवसुमति = देवताओं को कल्याणकारिणी बुद्धि को। चिकित्वान् =ज्ञान से युक्त । उसने ऊपर से नीचे की ओर समुद्र वो। उत्तर = उद्धततर ( उच्चतर ); अधर = नीचे (अध ) जान वाला (अर ) । अध = जो न दोडे, इस प्रकार ऊपर की गति का निषेध होता है। उसके बाद की ऋचा स्पष्टतर उदाहरण के लिए है ।। यद्देवापि शंतनवे पुरोहितो होत्राय वृतः कृपयनदीघेत् । देवश्रुत वृष्टिनि रराणो वृहस्पतिर्वाचमस्मा अयच्छत् ॥ ( यत् ) जब ( होत्राय ) होता के स्थान के लिए ( 1 ) चुने जाने पर (पुरोहित ) पुरोहित ( देवापि ) देवापि ने ( शतनवे ) शतनुपर (पृपयन् ) कृपा परके ( अदीधेत् ) ध्यान रिया, तब ( रराण ) दानी (यहस्पति.) गृहस्पति ने ( देवश्रुत ) देवताओ के सुनन योग्य और (घृष्टिनि) वर्षा पो याचना करने वाले [ देवापि को देखकर ] ( अस्म ) उस (वायम् ) स्तुति (अयच्छत् ) प्रदान की। (ऋ० १९८७) । शंतनु । शं तनो ! अन्तु इति वा, शमस्मै तन्वा. अस्तु इति वा । पुरोहित । पुर. एन दधति। होगाय वृतः । कृपाय- माणः । अन्वध्यायत् । देवश्रुतम् देवा एवं शृण्वन्ति । वृष्टिवनि- वृष्टियाचिनम् । रराण -राति अभ्यस्तः । बृहस्पति. ब्रह्मा आसीत् । सोऽस्मै वाचमयच्छन् । 'वृहत्' उपययातम् ॥१२॥ धमनु-हे परीर, कल्याण हो, या उमरे शरीर को कल्याण मिले । पुरोहित-जिसे आगे रखते हैं। होना ये मम के लिए चुने जाने पर, करते हुए, ध्यान भरने लगे। देवश्रुनः = देवता इमे मुनते है . वृष्टिवनि = वर्षा मांगने वाले को रापः-/ग (देना) अभ्यास (हित्व) हो गया है। .
द्वितीय अध्याय बृहस्पति ब्रह्मा थे। उन्होने उसे ( देवापि को) स्तुति प्रदान की। बृहत् की च्यास्या हो चुकी है (निरु० १२७)॥ १२ ॥ विशेष-वैदिक भाषा का 'शतनु' शब्द महाभारत में 'शातनु' हो गया क्योकि तब लोग 'शतनु' का अर्थ नहीं समझने लगे और शातनु को अपेक्षाकृत शुद्ध शब्द समझा गया। इसे भापा विज्ञान मे Folk etymology ( लोक- निरुति ) कहते हैं । रराण में - रा+कानच् ( दानशील) ॥१२॥ चतुर्थ-पाद साधारणानि उत्तराणि पट् दिवश्च आदित्यस्य च । यानि त्वस्य प्राधान्येन, उपरिष्टात् तानि व्याख्यास्यामः । आदित्यः कस्मात् १ आदत्ते रसान् , आदते भासं ज्योतिपाम् , आदीप्तो भासा इति वा । अदितेः पुत्र' इति वा अल्पप्रयोगं तु भस्य एतद् आर्चाभ्याम्नाये । सूक्तभाक्-'सूर्यमादितेयम्' ।। इसके बाद के छः नाम दिद् और आदिरप के लिए समान हैं, किन्तु जो प्रधान रूप से इन ( आदित्य ) के हैं उनकी व्याख्या बाद में करेंगे (निरु. १२२१२-२८(६) आदित्य' कैसे ? रसो को लाता है (मा-/दा), ज्योति:- पुजो का प्रकाश लाता है, या प्रकाश से आदीप्त है। या अदिति का पुत्र है। ऋचाओं से पूरे संग्रह (ऋग्वेद ) मे इसका प्रयोग बहुत कम है। केवल एक 'सूर्य को जो अदिति का पुत्र है' (ऋ० १८८११)॥ एवमन्यासाम् अपि देवतानाम् आदित्यप्रवादाः स्तुतयो भवन्ति । तद् यथा एतत्-मित्रस्य, वरुणस्य, अर्यम्गः, दक्षस्थ, भगस्य, अंशस्य इति । अथापि मित्रावरुणयोः-'आदित्या दानुनस्पती' । दानपती । अयापि मित्रस्य एकस्य । 'प्रस मित्र म? अस्तु प्रयस्वान् यस्त आदित्य शिक्षति व्रतेन ।' इत्यपि निगमो भवति । अथापि वरुणस्य एकस्य-~- 'अथा वयमादित्य व्रते तव' । व्रतमिति कर्मनाम । निवृत्तिकर्म वारयति इति सतः । इदमपि इतरत् व्रतमेतस्मादेव । वृणोति इति सतः । अन्नमपि व्रतमुच्यते--यद आवृणोति शरीरम् ॥ १३ ॥ . मूक्त मे- - स्वर हिन्दी-निरुक्त इसी प्रकार दूसरे देवताओ की भी स्तुतियां आदित्य के नाम से होती हैं जैसे-मित्र, वरुण, अर्थमा, दक्ष, भग और अश की। मित्रावरुण की भी होती है जैसे--'दोनो आदित्य दान के अधिकारी हैं' (ऋ० २१४१६)-दोनो दान के स्वामी ( हैं ) । अकेले मित्र को भी [ स्तुति होती है ]–'हे मित्र, वह मनुष्य अनयुक्त हो जाय, हे आदित्य ! जो तुम्हे व्रत के द्वारा पूर्ण करे।' (ऋ० ३।५९४२)-यह उदाहरण है। अकेले वरुण की भी-'हे आदित्य तुम्हारे व्रत मे अब हम" ( ऋ० १।२४।१५)। व्रत = कर्म, निषिद्ध कर्म से वारण करनेवाला । यह दूसरा व्रत भी इसीसे होता है- वृ ( ढेंकना ) से । अन्न भी वन कहलाता है क्योकि शरीर को ढंके रखता है ॥ १३ ॥ र आदित्यो भवति । सु अरणः । सु ईरणः । स्वृतो रसान्, स्वृतो भासं ज्योतिपाम्, स्वृतो भासा इति वा । एतेन द्यौ. व्याख्याता ॥ पृश्निः आदित्यो भवति । प्राश्नुते एनं वर्णः इति नैरुक्ताः । संस्प्रष्टा रसान् , सस्प्रटा भासं ज्योतिपाम् , संस्पृष्टो भासा इति वा । अथ द्यौः । संस्पृटा ज्योतिभिः पुण्यकृद्धिश्च ॥ नाक: आदित्यो भवति । नेता भासाम् , ज्योतिपां प्रणयः । अथ द्यौः । 'कम्' इति सुखनाम। तत् प्रतिपिद्धं प्रतिपिध्येत । 'न वा अमुं लोकं जग्मुपे किंचनाकम्' । न वा अमुं लोकं जग्मुपे किंचन असुखम् । पुण्यकृतो हि एव तत्र गच्छन्ति । आदित्य को (७) स्वर् कहते हैं। सुअर ( जाना ) से, या सु/ई (नाश ) से । यह रस लेने को ठीक से जाता है, ज्योति पुजो के प्रकाश तक जाता है, या प्रकाश द्वारा पाया गया (सु ऋ)। इसीसे धो के सम्बन्ध की भी व्याख्या हो जाती है। आदित्य को (८) पृश्नि भी कहते हैं । रग इसे पकड लेता है यह निरुक्तकारी का मत है । रसो का स्पर्श करनेवाला, ज्योनि पुजो के प्रकाश का स्पर्श करनेवाला, या स्वय ही) प्रकाश द्वारा स्पृष्ट (छुपा गया)। द्यौ के सम्बन्ध मे, ज्योति से या पुण्य करने वालों से सस्पृष्ट । आदित्य को (९) नाक भी कहते हैं। प्रकाश को ले जानेवाला है (नी), या ज्योति:पुन्जो को उत्पन्न करनेवाला (प्र-/नो)। यो के सम्बन्ध = सुख, इसके निषेध (दुःख ) का उलटा । 'उस लोक तक जाने .
द्वितीय अध्याय ५३. वाले को कुछ भी दुःख (अ, असुद) नही' (काठक सं० २१।२)पुण्य- करनेवाले ही वहां जाते हैं । गौः आदित्यो भवति । गमयति रसान्, गच्छति आन्तरिक्षे। अय द्यौः-यत् पृथिव्या अधि दूरंगता. भवति । यच्च अस्यां ज्योतीपि गच्छन्ति । विष्टप् आदित्यो भवति । आविष्टो रसात् , आविटी भासं ज्योतिपाम्, आविष्टो भासा इति वा । अय द्यौः । आविष्टा ज्योतिभिः पुण्यवृद्भिश्च ॥ नभ. आदित्यो भवति । नेता भासाम , ज्योतिपां प्रणयः। अपि वा, 'भनः एव स्याद् विप- रोतः । न 'न भाति' इति वा । एतेन द्यौः व्याख्याता ॥ १४ ॥ आदित्य को (१०) गौ कहते हैं। रस का गमन कराता है, अन्तरिक्ष में जाता है (/गम्) । घो के सम्बन्ध मे-जो पृथ्वी के उपर बहुत दूर तक गया है और जिसमे ज्योति पुरज जाते हैं। आदिस्य को (११) विप् कहते हैं। रसो मे धुमा हुआ है (/विश् ). ज्योति पुजों के प्रकाश मे धुसा हुआ है, या प्रकार द्वारा ( स्वयं हो) धाविष्ट (या ) है । धौ के सम्बन्ध में-ज्योतिःपुन्नों और पुष्प करनेपाली के द्वारा आविष्ट ( घिरा)। आदित्य को (१२) नम भी रहते हैं प्रकार को ले जानेवाला (/नी), ज्योति पुस्जो को सत्पन्न करनेवाला । अथवा 'मन' (चममना ) ही उलट गया है, या 'नही माता है'--ऐसा नही है । इमीसे धो को ज्याच्या हो गई ॥१४॥ . । पश्चम-पाद रश्मिनामानि उत्तराणि पञ्चदश। रश्मि. यमनात् । तेपामा- दित. साधारणानि पत्र अश्वरश्मिभिः ॥ दिड नामानि उत्तराणि अटी । दिश. कस्मात् ? दिशतेः, आमदनात् , अपि वा अन्या. नात् । तन 'काठाः' इति एतद् अनेकम्य अपि सत्वस्य नाम भवति । काग दिशो भवन्ति । क्रान्त्या स्थिता भवन्ति । कागः उपदिशो भवन्ति-इतरेतरं कान्या स्थिता भवन्ति । आदित्योऽपि काठा उच्यते । प्रान्ता भवति । आज्यन्तो काटा उच्चते।
। . हिन्दी-निरुक्त क्रान्त्वा स्थितो भवति । आपोऽपि काठाः उच्यन्ते । क्रान्त्वा स्थिता भवन्ति । इति स्थावराणाम् ॥ १५ ॥ इसके बाद के पन्द्रह नाम रश्मि के हैं । (१३) रश्मि यम् (नियत्रण) से । इनमें प्रथम पांच नाम घोडे को लगाम के लिए भी समान हैं। इसके बाद के पाठ नाम दिशाओ के हैं। (१४) दिशा कैसे ?/दिश (दिखाना ) से, या आ-/सद् ( निकट वैठना ) से, या अभि/अश् ( व्याप्त) से। उन ( नामो) मे 'काष्ठा' भी है जो अनेक वस्तुओ का नाम है । (१५) 'काष्ठा' दिशा को कहते हैं क्योकि चलकर स्थिर होती है (क्रम् + स्था ) । 'काष्ठा' उपदिशाओ को भी कहते हैं क्योकि [वे ] एक दूसरे को छूकर ( क्रान्ता) स्थिर होती हैं। 'काष्ठा' आदित्य को भी कहते हैं क्योकि चलकर स्थिर होता है । 'काष्ठा' वाण की नोक ( आजि + अन्त ) को भी कहते हैं क्योकि चलकर स्थिर होती है । 'काष्ठा' जल को भी कहते हैं क्योंकि [ जलाशय में ] जाकर स्थिर होता है। यह स्थावर (जल ) के विषय में हुआ ॥ १५ ।। अतिष्ठन्तीनामनिवेशनानां काठाना मध्ये निहित शरीरम् । वृत्रस्य निण्य विचरन्त्यापो दीर्घ तम आशयदिन्द्रशत्रुः ॥ (अतिष्ठन्तीनाम् ) कभी न ठहरनेवाले और ( अनिवेशनानाम् ) कभी न रुकने वाले ( काष्ठानां ) जल के ( मध्ये ) बीच मे (शरीर) गरीर (निहित) छिपा था। (आपः) जल (वस्य ) वृत्र के निण्य ) गुप्त स्थान पर (विचरन्ति ) घूमते हैं, ( इन्द्रशत्रु ) इन्द्र के द्वारा विनाश किया जानेवाला [ ] (दीर्घ) घोर (तमः ) अन्धकार मे (बाशयत् ) सोया था। (ऋ० १॥३२॥१०॥ अतिउन्तीनाम् अनिविशमानानाम् इति अस्थावराणाम्। काठाना मध्ये निहितं शरीरम् । मेघः शरीरम् । शरीरं शृणातेः, शम्नाते. वा । वृत्रस्य निण्य-निर्णामम् । विचरन्ति-विजानन्ति आप इति । दीर्घ द्राघते. । तम. तनोते. । आशयत् आशेते. । इन्द्रशत्रु:- ईन्द्रोऽस्य शमयिता वा, शातयिता वा । तस्मात् इन्द्रशत्रु.॥
द्वितीय अध्याय . - न ठहरनेवाले और न बैठनेवाले-यह अस्थावर ( जल ) के विषय में । जल के बीच मे रखे हुए शरीर को 'शरीर' - मेघ । शरीर, शृ ( फाहना), या शम् (मारना ) से । वृत्र के निण्य को झुकने के स्थान को जल, विचरन्ति = जानते हैं । दीपं द्राथ् ( योग्य होना ) से, तम् । सन् (विस्तार) से, आशयत् = सोया (शो)। इन्द्रशत्रु इन्द्र जिसका दामन करनेवाला या विनाशक है । इमसे 'इन्द्र शत्रु वना (शम् या शत् ) ॥ तको वृत्रः १ मेघ इति नैरुक्ताः । अपां च ज्योतिपश्च मिश्रीभावकर्मणः वर्षकर्म जायते । तत्र उपमान युद्धवर्णा भवन्ति । अहिवत् तु खलु मन्यवर्णा, ब्राह्मणवादाश्च । विवृद्धया शरीरस्य स्रोतांसि निवारयांचकार । तस्मिन् हते प्रसस्यन्दिरे आपः । तदभिवादिनी एपा ऋग्भवति ।। १६ ॥ यह वृत्र कोन है ? निष्क्तकारो के मत से 'मेघ' है। जल और प्रकाश का मिश्रण होने पर वर्षा होती है. ऐसा होने पर पक के द्वारा युद्ध का वर्णन होता है। किन्तु मंत्रों के वर्णनो तथा ब्राह्मण की पामो में तो उसे साप माना गया है। [ उसने ] शरीर के फैलाव से जल-प्रवाह रोक लिया। उसके मारे जाने पर जल प्रवाहित हुए। उसका वर्णन ( उल्लेख) करनेवाली यह ऋमा है ॥१६॥ दासपनोरहिगोपा अतिउनिरुद्धा आपः पणिनेव गावः । अपां विलमपिहितं यदासीदवनं जघन्वा अप तद्ववार ॥ (पगिना) पणि के द्वारा (गावः) गोमो (इव ) के समान (हास- पत्नीः) दास की पत्तियों के रूप में (अहिगोगः) गोप के द्वारा दिये गये (आ:) जल (निस्टा:) हक हुए (अनियन ) स्पिन ये। ( बपा) जाल का (विसं ) सोत ( यद) जो (अपिहित ) ाि हुप्रा (आसीन् ) पा. (स) से (पत्र) ष को (जयपान ) मारने वाले ने (अप पवार ) मुक रदिया। (ऋ. १६३२९११)। दागपनो:-दानाधिपल्पः । दासो दस्पते., उपदामति फार्माणि । अहिगोपाः भतिजन्महिना गुप्ताः । अहिः अपनात् । एति अन्तरिसे । अमपि इतरोहिः एतस्मादेव । निहसितो-
.
५६
हिन्दी-निरुक्त
पसर्गः आहन्तीति । निरुद्धा आपः पणिनेव गाव: । पणिः वणिक्
भवति । पणिः पणनात् । वणिक पण्यं नेनेक्ति । अपां विलमपि-
हितं यदासीत् । विलं भरं भवति । विभः । वृत्रं जघ्निवान
अपववार तत् । वृत्रो वृणोतेः वा । वर्ततेः वा, वर्धतेः वा । 'यद
अवृणोत् तत् वृत्रस्य वृत्रत्वम्' इति विज्ञायते । 'यद् अवर्तत तत्
वृत्रस्य वृत्रत्वम्' इति विज्ञायते ॥ १७ ॥
दासपत्नी = दासो की रक्षा करने वाली । 'दास'दस से क्योकि वह कामों
को समाप्त करता है (उप /दस्) । यहिगोपा =अहि के द्वारा गुा । 'अहि'/इ
(जाना ) से, क्योकि अन्तरिक्ष मे जाता है। यह दूसरा 'अहि' (सांप ) भी
इसीसे बना है या आ + हत् ( मारना ) से उपसर्ग को ह्रस्व करके बना
है। पणि दारा गौओ के समान जल रुके हुए । पणि = दणिक पण
(व्यवहार ) से । बनिया विक्री की चीजो को (पण्य ) साफ करके रखता
है ( पिज्)। जल का जो छेद रुका हुमा था। दिल = भर ( जल से
भरा), म ( भरना ) से । वृत्र को मारनेवाले ने उसे खोल दिया।
'वृत्र'/ (ढंकना ) से, वृत् (वर्तमान ) से, या वृध् ( बढना) से।
'त्र की विशेषता यही है कि उसने ढंक दिया'- यह मालूम होता है। वह
वर्तमान था वह भी वन की विशेषता है'-ऐसा मालूम होता है ।। १७ ।।
विशेष-बिल' को व्युत्पत्ति/भ से यास्क करते हैं । के दो अर्थ
है-(१) धारण करना जो जुहोत्यादि गण का है-वित्ति, (२) भरण
करना जो भ्वादिगण का है-भगति । यास्क भरण अर्थ वाले /भ से ही 'बिल'
की व्युत्पत्ति करते हैं तथापि इसका रूप विभति' देते हैं । सम्भवत. यह तत्का•
लीन प्रयोग हो । वृत्र के निवचन मे दुर्गाचार्य का पाठ है-'यदवर्तयत् ( उसने
लगाया): कही-कही 'यदवर्धयत्' ( उसने बढ़ाया )-यह पाठ भी है ।। १७ ।।
पष्ट-पाद
रात्रिनामानि उत्तराणि अयोविंशतिः। रात्रिः कस्मात् ?
प्ररमयति भूतानि नक्तंचारीणि । उपरमयति इतराणि ध्रुवी-
करोति । राते: वा स्यात् दानकर्मणः । प्रदीयन्ते अस्याम् अव-
श्यायाः। उपोनामानि उत्तराणि पोडश । उपाः कस्मात् ? उच्छति
इति सत्याः । रात्रेः अपरः कालः । तस्याः एपा भवति ॥१८॥
. द्वितीय अध्याय इसके बाद के तेईस नाम रात्रि के है। (१६ ) 'रात्रि' कैसे ? रात मे चलनेवाले जीवों को प्रसन्न करती है (प्र-/रम्) 1 दूसरे [ जीवो ] को स्थिर करती है ( उप रम्) प्रव बनाती है । या/रा-देना, से बना है क्योंकि • इसमें योस दी जाती है । इसके बाद के सोलह नाम उपा के हैं। (१७) 'उपा' कैसे ? चूंकि भगाती है ( उच्छ)-रात का पिछला पहर'। उसकी यह (ऋचा) है ॥१८॥ इदं श्रेष्ठ ज्योतिषां ज्योतिरागाचित्रः प्रकेतो अजनिष्ट विभ्वा । यथा प्रसूता सवितुः सवाय एवा रात्र्युपसे योनिमारेक् ।। (ज्योतिपा ) सभी प्रकाशो मे (श्रेष्ठं) श्रेष्ठ ( इदं) यह (ज्योति.) प्रकाश ( आ अगात् ) पाया, (चित्रः) बहुरंगी, (प्रकेतः ) चमकीला पौर (रिभ्वा ) सर्वत्र फैला [प्रकाश ] ( अजनिष्ट ) निकला। (यथा) जिस प्रकार ( सवितुः } सविना को. (सवाय ) उत्पन्न करने के लिए [ उपा] (प्रसूना ) उत्पन्न हुई (९) नसी प्रकार (रात्री) रात्रि ने ( उपसे ) उपा के लिए ( योनिम्) स्थान (आरं) साझी किया = राणि उपा को उत्पन्न करती है । ( ऋ० १।११।१)॥ विशेष--एक-एवम् का मलोप । वैदिक भाषा मे मलोप के बहुत उदाहरण हैं। सम्भवत: भारोपीय मूल भाषा ( Indo-European proto-type) में ये 'म' न रहे हों । तुल० तुभ्य (म), त्वा (म)। एव का छान्दम-दीघं- एवा । आरक् = रिच (रिक्त) से । इदं श्रेष्ठं ज्योतिपां ज्योतिरागमत् । चित्रम् । प्रकेतनं प्रज्ञाततमम् । अजनिष्ट । विभूततमम् । यथा प्रसूता सवितुः प्रसवाय रात्रिः आदित्यस्य । एवं रात्री उपसे योनिम् अरिचत् स्थानम् । लीयोनि. अभियुतः एनां गर्भः । तस्याः एपा भवति ।। ज्योतियो में श्रेष्ठ यह ज्योति आई । सुन्दर, प्रकेतन = सबसे अधिक ज्ञान, और सबसे अधिक व्या, उत्सन्न हुई है। जैसे रात्रि सविना के प्रमद के लिये उत्पन्न हुई है = आदित्य को [ जन्म देने के लिए]। उसी प्रकार उपा ने रात्रि के लिए योनि = स्थान साली क्यिा । स्त्रीयोनि-जिसमे गर्भ मिलता है ( अभि /मु)। उसकी यह दुमरी (= ऋचा ) है ।। १९॥ रुशद्वत्सा रुशती श्वेत्यागादारैगु कृष्णा सदनाच्चस्या.। समानबन्धु अमृते अनूची द्यावा वर्ण चरत आमिनाने ॥
- हिन्दी-निरुक्त ( रुशद्वत्सा ) चमकीले पुत्र वाली, ( रुशती) स्वयं चमकीली ( श्वेत्या) उजली [ उपा] ( अगात् ) आई, (कृष्णा) काली (रात ) ने ( अस्या: ) अपने ( सदनानि ) स्यानो को (उ) सचमुच (आरक् ) खाली कर दिया । (ममानबन्धू ) एक तरह का परिवार वाले, ( अमृते) अमर (अनूची) एक दूसरे के पीछे चलने वाले, ( द्यावा ) दोनो दिन [ और रात ] ( वर्ण) रंग को ( आमिनाने ) बदलते हुए ( चरत ) चला हैं (ऋ० ११११३॥२) ॥ रुशद्वत्सा सूर्यवत्सा । रुशत् इति वर्णनाम, रोचते. ज्वलति कर्मण. । सूर्यम् अस्या वत्समाह । साहचर्यात् , रसहरणात् वा। रुशती श्वेत्या आगात् । श्वेत्या श्वेतते.। अरिचत् कृष्णा सदनानि अस्या.। कृष्णवर्णा रात्रि. । कृष्णं कृष्यते , निकृष्टो वर्ण. । अथ एने सस्तौति-समानवन्धू-समानवन्धने । अमृते- अमरणधर्माणौ । अनूची अनूच्यो इतरेतरमभिप्रेत्य । द्यावा वर्ण चरत. । ते एव, द्यावौ । द्योतनात् । अपि वा द्यावा चरत.= तया सह चरत इति स्यात् । आमिनाने अन्योन्यस्य अध्यात्म कुर्वाणे ॥ रुशद्वत्सा = मूर्य-रूपी पुत्रवाली । रुशत् = रग, 'जलना' अर्थवाले रुच से । मूर्य को इसका पुत्र कहा गया है-माथ-साथ चलने के कारण या रस-हरण करने के कारण । धमक्ती हुई उजले रगवाली आई । श्वेत्या- श्वित (जलना ) से। काले रगवाली ने अपने स्थान खाली कर दिये = वाले रगवाली रात ने। कृष्ण = कृष् (खीचना ) से, निकृष्ट वर्ण। अब इन दोनों की स्तुति करता है । समानबन्धू = एक तरह का बन्धन (परिवार) वाले। अमृते = नहीं मरने का घमवाले। अनूची = एक दूसरे के पीछे जानेवाली । दोनो द्यो (स्वर्ग) प्रकाश पर चलते हैं। वे दोनो (उपा-रात्रि) हो यो हैं, प्रकाशित होने के कारण । अपवा, धावा चरतः = द्यो वे साथ घरते हैं-यह भा हो सकता है। आमिनाने = एक दूसरे की आत्मा (शरीर) में निवास करते हुए। अहर्नामानि उत्तराणि द्वादश । अह. कस्मात् १ उपाहरन्ति अस्मिन् कर्माणि। तस्यैपनिपातो भवति–वैवानरीयायामृचि ॥ इसके बाद के बारह नाम 'अहः' (दिन) के हैं। (१८) 'अहः वैसे ? । - - द्वितीय अध्याय ५९ . . इसमे कामो को पूरा करते हैं ( उप आह)। वैश्वानरीय ऋचा मे उसका यह प्रयोग हुआ है ।। २० ॥ अहश्च कृष्णमहरर्जुनं च विवर्तेते रजसी वेद्याभिः । वैश्वानरो जायमानो न राजावातिरज्ज्योतिपासिस्तमांसि ।। (कृष्ण) काला ( अर्जुन च) और उजला (अहः) दिन [ = दिन-रात] ( वैद्याभिः ) अखड नियम से ( रजसी) दोनो समार मे.( विवर्तते) विकल्प से आते है। (जायमान.) बढनेवाले ( राजा) राजा (न) के समान (वैश्वानरः) वैश्वानर नाम के (अग्निः ) अग्नि ने ( ज्योतिषा) अपने प्रकाश से (तमासि ) अन्धकार को (अब अतिरत् ) भगा दिया । ( ऋ० ६।९।१ ) । अहश्च कृष्णं-रात्रिः। शुक्लं च अहः अर्जुनम् । विवर्तते रजसी । वेद्याभिः वेदितव्याभिः प्रवृत्तिभिः । वैश्वानरः जायमान इव उद्यन् आदित्यः । सर्वेपां राजा । अवाहन अमिः ज्योतिपा तमांसि । काला दिन = राधि । अर्जुन == उजला दिन। दोनो रंगवाले (? दुर्ग) विकल्प से चलते हैं । वेद्याभि. = जानने योग्य , प्रवृत्तियो ( कर्मों ) के द्वारा। उसन्न होते हुए के समान वैश्वानर = उगते हुए सूर्य। सभी ज्योति पुजो के राजा । अग्नि ने प्रकाश द्वारा अन्धकार को हटा दिया । मेघनामानि उत्तराणि निशत् । मेघः कस्मात् ? मेहतीति सतः । आ 'उपर उपल' इत्येताभ्यां साधारणानि पर्वतनामभिः । उपरः उपलः मेघो भवति । उपरमन्ते अस्मिन् अभ्राणि । उपरता आप इति वा । तेपाम् एपा भवति ॥ २१ ॥ इसके बाद के तीस नाम मेघ के हैं । (१९) मेघ कैसे ? मिह ( सोचना) से । उपर और उएल तक [गिनाये गये नाम ] पवन के लिए भी समान हैं। उपर या उपल मेघ को कहते हैं, जिसमें बादल खेलते हैं (उप रम् ). या [जिसमें ] जल प्रसन्न होता है ( उप /रम् )। उसकी यह (ऋचा) है ।। २१ ।। देवानां माने प्रथमा अतिउन्कृन्तत्रादेषामुपरा उदायन् । त्यस्तपन्ति पृथिवीमनूपा द्वा ब्रूकं वहतः'सुरोपम् ।। (देवाना) देवताओं के ( माने ) बनने के समय ( प्रथमा ) सबसे पहले - ६० हिन्दो-निरुक्त (मतिष्ठन् ) बन गये, (एपा) इनके ( कृनत्रात् ) छेद से ( उपराः) जल ( उत् आयन् ) निकल आये। (त्रयः) तीन मिलकर ( अनूपा ) अपने-अपने नियम से ( पृथिवीम् ) पृथ्वी को (तपनि ) गर्म करते हैं, और (टा) दो तो (पुरीषम) प्रसन्न करने वाला (बबूक ) अल ( वहत ) लाते हैं । (ऋ० १०१२७२३)। देवाना निर्माणे प्रथमा अतिष्ठन्-माध्यमिका देवगणा. । प्रथम इति मुख्यनाम । प्रतमो भवति । विकर्तनेन मेघानाम् , उदक जायते । त्रयस्तपन्ति पृथिवीमनूपाः । पर्जन्यो वायुः आदित्य , शीतोष्णवर्षे ओषधी पाचयन्ति । अनूपाः-अनुवन्ति लोकान् स्वेन स्वेन कर्मणा । अयमपि इतर. अनूप. एतस्मादेव । अनूप्यते उदकेन । अपि वा, 'अन्वाप्' इति स्यात् । यथा प्राक् इति । तस्य अनूप. इति स्यात् । यथा प्राचीनम् इति । द्वा बृबूक वहत पुरीपम् । वाय्वादित्यौ उदकम् । बृबूकम् इति उदकनाम । ब्रवीते. वा शब्दकर्मण.। भ्रशते वा। पुरीप पृणाते वा पूरयते वा ॥ २२ ॥ देवताओ रे निर्माण के समय मध्यस्थान वाले देवता (मेघ) पहले बने । प्रथम मुख्य, प्रकृष्टतम (प्रतम)। इन मेघो के कटने से ( कृन्तनात कृत् ) जल उत्पन्न होता है। तीन अनुप मिलकर पृथ्वी को गर्म घरते हैं - पर्जन्य वर्षा से, वायु पीत से धौर आदित्य गर्मी से पौधो को पकाते हैं। ये अनूप है क्योकि संसार को अपने-अपने कम से अनुग्रहीत करते हैं (अनुवा)। यह दूसरा अनूप ( = पानी से भरा क्षेत्र, दियारा) भी इसी से बना है क्यो कि पानी से अनुगृहीत रहता है । अथवा अन्वाप ( जल से घिरा ) हो जैसे प्राक् पाद बनता है। उसीसे 'प्राचीन' शब्द की तरह अतूप हो गया। दो प्रसन्न करने वाले व्यूक लात है-वायु और सूर्य जल को। 'बुक' जल का पर्याय है। / बोलना, या भ्रा (गिराना ) से। पुरोप/पू या पूरम् ( भरना) से बना है ॥ २२ ॥ विशेष -'अनूप' शब्द की व्युत्पत्ति मे यास्म की कल्पना विचित्र है। सादृश्य ( Analors ) रामाश्रय लेने हैं । जैसे, प्राय : प्राचीन. = अन्वा : अनूप । परनु साम्य ठीक नहीं है क्योकि जहाँ अन्दा अनूप बनते समय वे द्वितीय अध्याय - था का उ हो जाता है प्राक से प्राचीन बनने में ऐसा कोई परिवर्तन नहीं होता। इसके बदले में उन्हे अन्वन से अनूची का उदाहरण देना चाहिए था। अनूपम् = जलप्रायस्थान (अमर) २११०) पाणिनि के सूत्रों के अनुसार (६।३।९७-९८) थप का द्वि, अन्त', प्रति और सम् के बाद ईप आदेश होता है, किन्तु अनु के बाद अप । बबूब-जल, गड्ढा बादि ( मो० वि० ) ॥ २२ ॥ सप्तम-पाद वाड्नामानि उत्तराणि सप्तपश्चाशत् । वाक् कस्मात् ? वः । तत्र सरस्वती इत्येतस्य नदीवत् देवतावत् निगमा भवन्ति । तद् यद् देवतावद् , उपरिष्टात् तद् व्याख्यास्यामः । अथ एतन्नदीवत् ॥ २३ ॥ इसके बाद के सतायन नाम वाक् के हैं। (२०) वाक् कसे ?/वच् (बोलना ) से । उन ( नामो ) में 'सरस्वती' का नदी और देवता के भी अर्थ में प्रयोग हुआ है। देवता वाले अयं को प्यारूपा बाद मे करेंगे (१४॥२६)। यह नदी के अर्थ मे। इयं शुष्मेभिबिसखा इवारुजत्सानु गिरीणा तविषेभिमिभिः । पारावतघ्नीमवसे सुवृक्तिभि. सरस्वतीमा विवासेम धीतिभिः ॥ (इय) यह नदी (विसला ) कमल की इंटी तोडने वाले ( इव) के समान (शुष्पैः) अपने बल के द्वारा तया ( तविपेभिः) बलशाली (मिभिः) लहरों के द्वारा (गिरीमा ) पहाडो की ( गानु ) चोटी को ( अरजत् ) तोडती है। (अवसे) रक्षा के लिए (सुक्तिभि.) अच्छी तरह से बनाई गई (धीतिभि ) स्तुतियों द्वारा (पारावतघ्नी) दोनों विनारी को तोड़ने वाली, या बहुत दूर के स्थानो को भी नष्ट करने वाली (सरस्वतीम् ) सरस्वती नदी की (आ विवासम ) पूजा करें। ( ० ६६०२ )। इयं शुष्मैः शोपणैः। शुष्ममिति बलनाम। शोषयतीति सतः। विस विस्यतेः भेदनकर्मण वृद्धिकर्मण.वा। सानु समुच्छ्रितं भवति । समुन्नन्न मिति वा । महद्भिः ऊर्मिभिः । पारावतघ्नी- पारावारघातिनीम् । पारं परं भवति । भवारम् अवरम् । भव- नाय । सुप्रवृत्ताभिः स्तुतिभि. सरस्वती कर्मभिः परिचरेम।
स १२ हिन्दी निरुक्त यह गुम = शोपक (बल) के द्वारा । शुष्म = बल क्योकि [शत्रुओ को] सुखाता है (शिप)। बिस बिस = भद करना, बढाना से । सानु ऊंचा (सम उत/धि) या प्ररित ( सम् उत/नुद् ) होता है। बडी लहरो से । पारावतघ्नी = आर पार को तोडने वाली । पार-दूसरा, भवार = अवर (नीचे)। रक्षा के लिए अच्छी तरह बनाई गई स्तुतियो से सरस्वती की सेवा (हम) कम से करें। उदकनामानि उत्तराणि एकशतम् । उदक कस्मात् ? उन- त्तीति सत । नदीनामानि उत्तराणि सप्तत्रिंशत् । नद्य कस्मात् ? नदना भवन्ति-शब्दवत्य । बहुलम् आसा नैघण्टुक वृत्तम् । आश्चर्यम् इव प्राधान्येन । ततिहासम् आचक्षते-'विश्वामिन ऋषि सुदास पैजवनस्य पुरोहितो वभूव।' विश्वामित्र सर्वमिन । सर्वं ससतम् । सुदा कल्याणदान । पैजवन पिजवनस्य पुत्र , पिजवन पुन स्पर्धनीयजवो वा अमिश्रीभावगति वा । वित्त गृहीत्वा विपाट्छुतुद्रयो सभेदम् आययो। अनुययुरितरे । स विश्वामिन नदी तुटाव-गाधाभवत इति ।' अपि द्विवत् , 'अपि बहुवत् । तद्यत् द्विवत् , उपरिष्टात् तद् व्यास्यास्याम । अथ एतद् बहुवत् ।। २४ ॥ इसके बाद के एक सौ नाम उदय के हैं । (२१) उदक कैसे 'उद (भिगाना ) से। इसके बाद के संतीस नाम नदी के है । ( २२ ) नदी कसे ? नाद करने वाली = दाब्दयुक्त । बहुत जगह इनका अप्रधान स्थान है। प्रधानता देनवाले स्थान तो बाश्चय के समान (कम) हैं। यहाँ एका इतिहास कहते हैं- विश्वामित्र ऋषि सुदास पैजवन के पुरोहित बने । विश्वामित्रपके मित्र स4 समृत ( व्याप्त इम)। सुदा = कल्याणदाता । एजबन = पिजवन के पुत्र फिर पिजयन = स्पधनीय वेग ( जब ) वाल या जिमकी गति किसी से न मिल । तो व (विश्वामित्र ) धन लेकर विपाल और शुतुद् के सगम पर आय दूसरे लोग उनके पीछ पीछ गय विश्वामित्र ने नदियो की स्तुति की- अल्प जल याली हा जायो। द्विवचन मे और बहुवचन म मी [स्तुति की ] द्विवचन वाल को ध्याश्या दाद में होगी ( ९३९) । यहाँ बहुवचन वार की ।। २४ ।।
द्वितीय अध्याय रमध्व मे वचसे सोम्याय ऋतावरीरुप महूर्तमेवै । प्र सिन्धुमच्छा वृहती मनीपावस्युरलॅ कुशिकस्य सूनु । (ऋतावरी )ह सदा बहन वालो' (मे ) मेरे ( सोम्याय ) सोम वे समान (वचसे ) वचन सुनने के लिए (एवं ) अपनी गतियों से (महूत्तम् ) क्षण भर ( उपरमध्वम्) रुक जाओ। (बृहती ) बड़ी ( मनीषा ) लालसा से (अवस्पु ) सहायता का इच्छुक मैं (कुगिस्य) कुनिक राजा का (सून ) पुन (सि घु) सिघु के पास ( अच्छ) ही (प्रअह्र बुलाता है। ( ऋ० ६॥३३॥५)। उपरमध्व मे वचसे। सोम्याय सोमसपादिने। नता- वरी । ऋतवत्य ऋतमिति उदकनाम । प्रत्यृत भवति । मह- तम् । एव = अयने , अवने वा । महूर्त =मुहु ऋतु, ऋतु अर्ते गतिकर्मण । महु =मूढ इव काल , यावत् अभीक्ष्ण चेति । अभीक्षणम् अभिक्षण भवति । क्षण क्षणोते , प्रक्ष्णुत काल । काल कालयते गतिकर्मण । प्राभिह्वयामि सिन्धुम् । वृहत्या महत्या । मनीपया = मनस ईपया, स्तुत्या, प्रज्ञया वा। अव- नाय । कुशिकस्य सूनु । कुशिको राजा बभूव । क्रोशते शब्दकर्मण , क्रशते वा स्यात् प्रकाशयतिकर्मण , साघु विक्रोश- यिता अर्थानामिति वा । नद्य प्रत्यूचु ॥ २५ ॥ मरे वचन के लिए न जाओ । सोम्य = सौम दने वाल (वचन)। शतावरी:- ऋत से युक्त । ऋत = जल, क्योंकि (देशा की) ओर जाना है । मुक्त्त भर । एवं = गनियो से () या सहायताओ से (द)। मुहूत %D Tीघ्र (मुह ) ऋतु । 'ऋतु / = जाना से । मुह = मूढ के समान समय (सीघ्र) अभीक्षण जसा। अभी ण = अमिशण (क्षण का ओर)। क्षणक्षण (मारना ) से = अच्छी तरह तज मिया हुआ समय वालचालय = जाना से । सिधु फो युरता हूँ। [वती= 1 बहत्या: वही मनीषा ( मनोपया ) मन की ईषा (गठि) से = स्तुति या बुद्धि से । रक्षा के लिए । कुलिक का पुत्र । कुशिर राजा थे। Vा (चिल्लाना ) से या 'प्रशन अय पाल/ग से पन का सम्यक वचन देने वाला।
- ६४ हिन्दो-निरुक्त नदियों ने उत्तर दिया ।। २५ ।। इन्द्रो अस्माँ अरदद्वजवाहुरपाहन्वृत्रं परिधि नदीनाम् । देवोऽनयत्सविता सुपाणिस्तस्य वयं प्रसवे याम उर्वीः ।। ( वचबाहुः ) बाहुओ मे वष धारण करने वाले ( इन्द्रः ) इन्द्र ने ( नदी- नाम) नदियो को ( परिधि ) घेरने वाले (वृत्रं ) वृत्र से (अपाहन ) माग, और ( अस्मान् ) हमे (अरदत ) खोदा। ( सुपाणिः ) सुन्दर हापो वाले सविता ) सविता ( देव.) देवता [ हमे ] ( अनयत् ) लाये (वयं) हम लोग ( तस्य ) उनके (प्रसवे ) उत्पन्न की हुई ( उवाः) चारो तरफ ( यामः) जाती । ( ३।३३।६)। इन्द्रः अस्मान् अरदत् वज्रबाहुः । रदतिः खनतिकर्मा । अपाहन वृत्रं परिधि नदीनाम्-इति व्याख्यातम् । देवोऽनयत् सविता । सुपाणि =कल्याणपाणिः । पाणिः पणायतेः पूजाकर्मणः । प्रगृह्य पाणी देवान् पूजयन्ति । तस्य वयं प्रसवे याम उर्वीः । उर्व्यः ऊर्णोतेः । वृणोते. इति औणवाभः । प्रत्याख्याय अन्ततः आशुश्रुवुः ॥ २६ ॥ वबाहु इन्द्र ने हमे खोदा । रद् = खोदना । नदियो को चारो ओर से रोकने वाले (परिधि ) तुत्र को मारा-यह स्पष्ट है । सविता (प्रसव करने वाले-इन्द्र) देव लाये । सुपाणि = कल्याणकर हाथो वाले। 'पाणि/पणा- म् = पूजा करना, से । हाथ जोड़ कर ही देवताओ की पूजा करते हैं। उनके प्रसव मे ( आदेश से ) हम चारो ओर ( घेर कर ) जाती हैं। 'उर्वी' /कर्ण (घेरना ) से; और्णवाम के मत से / (टकना ) से । [नदियो ने ] थस्वीकार करवे अन्त मे पचन दिया ॥२६॥ आ ते कारो शृणवामा वचांसि ययाथ दूरादनसा रथेन । नि ते नसै पीप्यानेव योपा मर्यायेव कन्या शश्वचै ते ।। (कारो) हे गायक ! (ते ) तुम्हारे ( वचासि ) वचनो को ( आशृणवाम) हम सुनेंगी। (अनसा ) गाडी से और ( रपेन) रथ से (दूरात् ) दूर से (ययाथ ) आये हो । (ते ) तुम्हारे प्रति (पीप्याना) दूध पिलानेवाली ( योपा इव ) स्त्री के समान, मैं ( नि नं ) झुकती हूँ। ( मर्याय) मनुष्य द्वितीय अध्याय ६५ के प्रनि (या इव ) कन्या जैसी मैं (ते ) तुम्हारा (साश्व) बालिङ्गन करनी हूँ। ( ऋ० ३।३३।१०)॥ विशेष-'ययाय' के अर्थ के विषय मे विभिन्न मन हैं । यास्क और दुर्ग 'जाओ' अथ लेने है-~गाडी से जाओ = पार करो। फिर 'दूरात्' से अलग वाक्य की कल्पना भी करते हैं-~-क्योकि दूर से आये हो। यह विचित्र मालूम पडता है । सायण 'ययोथ' = यत दूरात् आगत अपि । गेल्डनर ने आ' उपसग को 'यया' के साथ मानकर 'बाये हो' अथ किया है। 'शव' के अर्थ मे यास्क परिष्वजनाय लिखते हैं कि नु 'नस और 'शश्वर्य' दोनो व्याकरण की दृष्टि से समान हैं, दोनो ही क्रिया है । अथ होगा-~-मैं 'झुस्ती ', और 'आलिंगन करती हूँ, अत इसे तुमु नयंक ( Infinitive ) मानना भ्रम है ।। आशृणवाम ते कारो वचनानि। याहि, दुरात् , अनसा रथेन च । निनमाम ते पाययमाना इव योपा पुत्रम् । मर्याय इव कन्या परिष्वजनाय । निनमे इति वा ॥ गायक हम तुम्हारे वचन पूरा करेंगी। शस्ट और रथ से तुम जाओ, क्योंकि दूर से [ आये हो-दुर्ग सायण ] (दूर) पिलानेवाली स्त्री जैसे पुत्र के प्रति [ झुकतो है ], वैसे ही (हम) तुम्हारे प्रति झुकती हैं। मनुष्य के प्रति कन्या जैसे आलिंगन के लिए [ झुकती है ] ; झुकती हूँ'-भी सम्भव है (एकवचन मे)॥ अश्वनामानि उत्तराणि पड्विंशति । तेपामष्टा उत्तराणि वहुवत् । अश्व कस्मात् ? अश्नुते अध्वानम्। महाशनो भवति इति वा । तर दधिका इत्येतत् 'दधत् कामति' इति वा, दधत् नन्दतीति वा । दधत् आकारी भवति इति वा । तस्य अश्ववद् देवतावच्च निगमा भवन्ति । तद् यद् देवतावद् , उपरिष्टात् तद् व्याख्यास्याम । अथ एतद् अश्ववत् ॥ २७ ॥ इसके बाद वे छब्बीम नाम अश्व के हैं, जिनम पिछले आठ नाम बहुवचन में प्रयुक्त होने है। (२३) 'अश्व' कमे' रास्त का, तय (अध्व+अश) या अधिक भोजन (? गति ) वाला।' उन (नामों) मे दधिक्रा' भी है-पारण करने चला है या धारण करके हिनहिनाता है। ५हि०नि० - करता है - हिन्दी निरक या धारण करने पर अच्छे बारा (मुन्दर) लगता है। मा ए घोर देवता-दोनो श्यों में प्रयोग होता है। जो देवता अवाला है उसी माग बाद मे परेंगे ( १०३१) । यह 'अश्व' अपंवाला है ॥ २७ ॥ उतस्य वाजी क्षिणि तुरण्यति ग्रीवायां बद्धो अपिकक्ष आननि । अतुं दधिका अनु मन्तयीत्वत् पयामदास्पन्वापनीफणत् ।। ( उस ) और (प) यह (पानी) पोहा (प्रोवायां) परदन मे. (पि. ri) में और ( भागनि ) मद में ( 4 ) यंध आने पर (नि) गोरे प्रहार ग (तुरपरि ) नेज दोडा है, (ग) पोहा (प.) पानीपनि । (प्रमा) मर लामा (म्) सगे। (मन) मोरों को ( पारनोरम) मी गे पार रखा है। (Trim.m)" अपि ग पाजी वजनान् क्षेपणम् अनु पूर्णगरनुते अप्पा- नम् । प्रायाया बर । ग्रीरा गिरते. या, गृणातेः पा, गृहातेः या । 'अपिाले 'आमनि' इति पाग्यातम् । प्रतुं दधिरा. । गर्म या प्रजा या । अनु गमगोत्यन् ---तनोते. पूर्वया प्रत्या निगमः । पपामग्लानि बुटिलानि । पथा. पतो. या, पदोः या पन्यते. वा। अद. अयो। आपनीमा पनि परो. परीताराम् ॥ mमर(41) . . TRALIATE HU. ग... (TRIPAT) M. It ( मा.का.(mn) traire - (r) . पति को : MPlant-1-24Tier ( Miral try | . Ver Ve(m) re (HP Errns (. rry- Tri-(RERAPH firm r. VIR (1) Trinirer rest n-Mere-:-" Pr: ramrri Mirror द्वितीय अध्याय ६७ (जाना ) का यह मे। पङ को पाक करीत कहते हैं। दुर्ग धातु को छ. अवस्यायें दिखलाते है- प्रकृत्यन्तः सनन्तश्च यइन्तो यलुगेव च । ण्यन्तः प्यन्तसनन्तश्व पड्विघो धातुरुच्यते ।। -- दश उत्तराणि आदिष्टोपयोजनानि-इति आचक्षते साह- चर्यज्ञानाय । ज्वलतिकर्माण. उत्तरे धातव. एकादश । तावन्ति एव उत्तराणि ज्वलतो नामधेयानि नामधेयानि ॥ २७ ॥ इसके बाद के दस नार्मों में साहमर्य-ज्ञान के लिए उनके उपयोग का भी क्या हुआ है । उसके बाद के ग्यारह घातु 'जाना' अर्थवाले हैं। उसके वाद के उतने ही नाम ज्वलन' के हैं ॥ २८ ॥ ॥ इति निरुरते द्वितीयोऽध्यायः ।।
तृतीय अध्याय प्रथम-पाद - कर्मनामान्युत्तराणि पड्विंशति (निय० २।१ ) । कर्म कस्मात् ? क्रियते इति सत । अपत्यनामान्युत्तराणि पञ्चदश (निघ० २।२ ) अपत्य कस्मात् ? अपतत भवति । नानेन पतति इति वा । तद् यथा 'जनयितु प्रजा' एवमर्थीये ऋचौ उदाहरिष्याम ॥१॥ इसके बाद के छब्धीस नाम मं के हैं । कर्म कैसे ? जो किया जाय ()। बाद के पन्द्रह नाम अपत्य के हैं । अपत्य कसे ? [पिता से ] अलग होरर फैलता है (तिन् ), अथवा इसके कारण [ पिता नर म ] नहीं पड़ता है (पित् ) 1 तो जिससे 'सन्तान उत्पन्न करने वाले (पिता) की' [सिद्ध हो], ऐसे अर्थवाली दो ऋचाओ का उदाहरण देंगे ॥१॥ विशेष-दुर्गाचार्य कहते हैं कि ज्वलन (द्वितीय अध्याय ) के नामो थे बाद कर्म के नाम इसलिए आए है कि अग्नि ( ज्वलन ) में हमारे सभी कर्म निष्पन्न होते है, जैसे यज्ञ आदि । म क वाद ही अपत्य आता है क्योकि सभी पो म मुख्य है पुत्रोत्पादन । दुर्ग की कल्पना बढी ही मनोरञ्जन है । एवम• ये = इस अर्थवाली (दि. ३०)-यह 'ऋचौ' (द्वि० व० ) का विशेषण है। परिपद्य हरणस्य रेक्णो नित्यस्य राय पतय. स्यामा न शेपो अग्ने अन्यजातमस्त्यचेतानस्य मा पयो वि दुक्ष. ।। ( अरणस्य ) दूसरे परिवार की ( रेवण ) सम्पत्ति (परिपा हि) त्याग देने के योग्य है, [ हम लोग ] (नित्यस्य ) चिरस्यायो ( राय ) धन के (पतय ) स्वामी ( स्याम ) बनें । ( अन्यजातम् ) दूमरे या जमा हुआ पुत्र (शेप न ) पुत्र, नहीं है, वह तो (अचेतानस्य ) अज्ञानी के लिए वसा (अस्ति) होता है, ( अग्ने ) हे अग्ने । (पथ ) हमारे मार्ग को (मा वि दुक्ष ) दूषित मत करो (ऋ० ७४७)।
तृतीय अध्याय विशेप के अनुसार इन ऋचाओ में वसिष्ठ और अग्नि का सबाद वर्णित है । वशिष्ठ ने अग्नि से पुत्र मांगा क्योकि वसिष्ठ के सभी पुत्र मारे गये थे। अनि ने उत्तर दिया कि खरीदा हुआ. कृत्रिम या दत्तक पुत्र ले लो। वसिष्ठ ने उक्त ऋचा म इन पुत्रो को निरथकता दिखाकर औरस पुत्र को ही पुत्र बतलाया और कहा कि हे अग्ने | मेरे माग को दूषित मत करो। परिहर्त्तव्य हि नोपसर्तव्यम् । अरणस्य रेषण । अरण अपार्णो भवति । रेवण इति धननाम-रिच्यते प्रयत । 'नित्यस्य राय पतय स्याम' । पित्र्यस्येव धनस्य । 'न शेपो असे अन्य- जातमस्ति' । शेप इत्यपत्यनाम-शिष्यते प्रयत । अचेतय- मानस्य तत्प्रमत्तस्य भवति । मा न पथो विद्दुप इति । तस्योत्तरा भूयसे निर्वचनाय--॥ २ ॥ परिहार करना चाहिय । अर्यात पास नहीं जाना चाहिए। अपरिचित का धन । अरण = ऋण ( जलदानसम्बध) से रहित [ = दूसरे वश मे उत्पन्न ] । रेवण = घन क्योदि मरने के समय से इस छोड जाते हैं। हम लोग नित्य ( स्थायी ) सम्पत्ति के स्वामी बनें, जिस प्रकार पंतृक सम्पत्ति के स्वामी बनते हैं ] । हे अग्नि | दूसरे का जमा हुआ पुत्र नहीं है। पप - अपत्य (सतान ) क्योकि मरनेवालो की यह [ सम्पत्ति ] यही रह जाती है। वह (अपत्य) केवल मजानिया या पागलो का ही होता है (ये रोग हो पत्तक आदि पुत्र को अप य समझते हैं ) । हमारे माग को द्रषित मत करो। इसके चाद की [ ऋचा ] और अधिक स्पष्ट व्याख्या के लिए है ॥ २ ॥ न हि प्रभायारण सुशेवोऽन्यादर्या मनसा मन्तवा उ । अधा चिदोक पुनरित्स एत्या ना वाज्यभीपाळेतु नव्य ।। (अरण ) दुसरे परिवारवाला (सुगाव ) सुखदायक होन पर भी (अयादय ) दूसरे के पेट मे उत्प न होने के कारण (न हि प्रभाय ) मही ग्रहण करना चाहिये एमा (मनसा ) मन में भी नहीं (म तवं उ) सोचना चाहिय । ( अघी बयोति (स इत् ) वह (पुन ) फिर (ओ.क. चित) अपर घर को हो (एति ) लौट जाता है (न ) हमारे पास (वाजी ) वीर (अभीपाट ) गत्रुनो का दमन करनेवाला (नध्य ) नवी? [ पुत्र ] (मा एतु) आपे ( ऋ० ७४८) । ।
उत्पन। हिन्दी निरुक्त न हि ग्रहीतव्योऽरण सुसुखतमोऽपि अन्योदर्य । मनसाऽपि न मन्तव्य —'ममायम्' इति । अथ स ओक पुनरेव तदेति यत आगतो भवति । ओक इति निवासनामोच्यते । एतु नो वाजी वेजनवान् । अभिषहमान सपत्नान् । नवजात । स एव पुन इति ॥ अर्थता दुहितृदायाचे उदाहरन्ति । पुनदायाद्ये इत्येके ॥३॥ दूसरे के पेट से उत्प न, दूसरे कुलवाला अच्छा सुख देने पर भी ग्रहण न करें। मन मे भी नही समझ कि यह मरा । ( क्योकि ) वाद में वह उसी घर मे लौट जाता है जिससे आता है। ओक निवास का पर्याय है। वीर या वेगवान् हमारे पास आय । शत्रुओ का दमन करनेवाला नया वही ( वास्तविक्ष) पुत्र है। अब आग की ऋचा को ( कुछ लोग ) पुत्री का उत्तराधिकार दिखाने के अय मे लेते हैं कुछ लोग पुत्र का उत्तराधिकार दिखलाने म॥ ३ ॥ शासवह्निर्दुहितुर्नप्त्य गाद् विद्वाँ ऋतस्य दीधिति सपर्यन् । पिता यन दुहितु सेकमृञ्जन्त्स शग्म्येन मनसा दधन्वे ॥ (ऋतस्य ) यज्ञ के ( दीधिति ) विधान को (सपयन् ) आदर भाव से देखते हुए (विद्वान् ) शनी, ( वह्नि ) वहन परनवाला पति (शासह ) घोषित करता है कि वह ( दुहितु ) पुत्री से ( नप्त्य ) नाती या दौहित्र ( गात् ) पायेगा (यत्र ) जहाँ (पिता) पिता (दुहितु सेकम् ) पुत्री के लिए पति (ऋजन् ) खोजता है वहाँ (म्यन मनमा) शात मन स ( सदध वे ) अपने को रखता है। (ऋ० ३।३१।१ और ऐ० प्रा० ६।१८।२)। प्रशास्ति वोढा सन्तानकर्मणे दुहितु पुप्रभावम् ! दुहिता दुहिता, दूरे हिता, दोग्धेर्वा । नप्तारमुपागमत् दोहित पौत्रमिति। विद्वान् । प्रजननयज्ञस्य, रेतसो वा, अङ्गादगात्सम्भूतस्य, हद- यादधिजातस्य, मातरि प्रत्युतस्य, विधान पूजयन् । अविशेपेण मिथुना पुना दायादा इति । बहन करनेवाला (पति) सनानोचित धम के लिए पुत्री स्वीकार करता है (= पुत्री का पुत्र का अधिकार प्राप्त है कि वह स तान वा काम करे ) दोहता = जिसका हित करना कठिन है जो दूर पर हितकर का पुत्र होना D तृतीय अध्याय होती है या दूहती रहती है ( दुइ)। उसने नाती पाया है अर्थात् दुहिता का पुत्र (दोहित) भी पौत्र ही है। वह ज्ञानी है। प्रजनन रूपी यज्ञ के या प्रत्येक अग से उत्पन्न, हृदय से निकले हुए और माता मे प्रविष्ट हुए रेतस् (वीर्य) के विधान को सम्मानभाव से देखते हुए [ वह स्वीकार करता है ] । बिना भेद-भाव के दोनो सन्तानों (पुत्र और पुत्री) को उत्तराधिकार प्रान है । निशेप-दुर्ग ने और यास्क ने भी ऋचा के पूर्वाधं की ही व्याख्या की है। इसमे पुत्री का अधिकार पुत्र-सा दिखलाया गया है। दुहिता का निर्वचन बडा मनोरन्जक है-दुहिता = जिसकी भलाई करना या जिसे प्रसन्न करना कठिन है। कितनी भी भलाई की जाय इन्हे प्रसन्न करना कठिन है। दूरे हिताः पिता से दूर रहने पर ही पिता का कल्याण है। दुह - पिता से बराबर धन दहती रहती हैं । ऐतरेय ब्राह्मण की व्याख्या मे सायण ने उद्धरण दिया है- सम्भवे स्वजनदु.खकारिका सम्प्रदानसमयेऽर्थहारिका । यौवनेऽपि बहुदोपकारिका दारिका हृदयदारिका पितु ॥ वस्तुत दुहिता का सम्बन्ध बहुत प्राचीन भाषाओं से है---प्रोक Thuga. ther, अवेस्ता dugbeter और dugedar, जर्मन Tochter, पुरानी अग्रेजी (0 E ) dohtor, अग्रेजी daughter. प्राचीन भाषाओ मे है , घु और म् का परिवर्तन बहुत सामान्य था। तदेतद् ऋक्श्लोकाभ्यामभ्युक्तम्- अङ्गादङ्गात्सम्भवसि हृदयादधिजायसे। आत्मा वै पुननामासि स जीव शरद. शतम् ॥ इति । अविशेषेण पुनाणा दायो भवति धर्मतः । मिथुनाना, विसर्गादौ मनु स्वायम्भुवोऽप्रवीत् ॥ इसी (बात) को ऋचा और श्लोक में कहा है-तुम प्रत्येक अग से उत्पन्न होते हो तया हृदय से निकले हुए हो, तुम पुत्र नाम को हमारी (अपनी ) आत्मा ही हो, तो एक सौ शरद-ऋनुमो (वर्षों) तक जीचिन रहो (कोपो० आ० ४११)। 'दोनो हो मन्लानो (पुत्र और पुत्री) का, विना भेद-भाव के, धर्म के अनुसार, उत्तराधिकार होता है-ऐसा स्वायभुव ( अपने प्रार उत्पन्न होने वाले बहक्षा के पुत्र) मनु ने , मृष्टि (विसर्ग) के थारम्भ में कहा था। . , .
हिन्दी-निरुक्त विशेष-पद्यपि दुर्गाचार्य ने 'मिथुन' का अर्थ युग्म =पुत्र-पुत्री किया है किन्तु प्रथम ऋचा में पुत्र की प्रधानता प्रदर्शित किये जाने के कारण प्रतीत होता है कि मियुन' का अर्थ 'जुड़वाँ ( twin ) पुत्र' होगा जिसमे दोनो को समान अधिकार दिया जाता है ! राजवाडे का यह सुझाव उचित नही जंचता क्योंकि यास्क ने पुत्र-पुत्री दोनो के उत्तराधिकार के प्रसग मे इसका उद्धरण दिया है । पुत्री के अधिकार निषेध के लिए तो बाद मे 'न दुहितर इत्येके' दिया ही है । इन दोनो उद्धरणो में पहला तो ऋचा है, दूसरा लोक । यह श्लोक मनुस्मृति मे नही मिलता। न दुहितर इत्येके । 'तस्मात्पुमान् दायादः अदायादा स्त्री' इति विज्ञायते । 'तस्मात् स्त्रिय जातां परास्यन्ति न पुमांसम्' इति च । स्त्रीणा दानविक्रयातिसर्गाः विद्यन्ते न पुंसः। पुंसोपी- त्येके, शौन शेपे दर्शनात् । अभ्रातृमतीवादः इत्यपरम् । ( अमूर्या यन्ति जामय. सालोहितवाससः)। 'अभ्रातर इव योपास्तिन्ति हतवत्मनः ॥', अभ्रातृका इव योपा. तिष्ठन्ति सन्तानकर्मणे पिण्डदानाय हतवान. । इति अज्ञातृकाया. अनिर्वाह. औपमिकः । तस्यो- तरा भूयसे निर्वचनाय ॥ ४ ॥ दुछ लोगों के अनुमार पुत्री को [उत्तराधिकार नही मिलना 1 'इसलिए पुरण उत्तराधिकारी है, म्बी उत्तराधिरागिणी नहीं (मंत्रा. पं. ४६४) यह मालूम होता है। और यह भी कि सन्न होते ही स्त्री को तिन करते फेंग देने) ३. पुरुप पो नहीं' (दही) स्त्रियों का ही दान, विषय और परित्याग दोग है. पुरुषो या नहीं। दुल लोगों के अनुसार पुरषो पा भी [दान-श्रादि] हा है योनि शुगर को पया में देते हैं। पृछ लोगों बनुसार यह (स्त्री का उत्तराधिकारभिदान्त) भाई में रहित स्त्रियों में लिए है । (लाल वस्त्र पहनने वाली मम पिया माहियो मान जाती है); अपने मागं ३ क जाने पर वे आई में दिन स्त्रियों समान रहती है (अपम११०१)। वे गन्नानोवादन नया दिन के मार्ग म जाने पर, माई से रहित स्त्रियो के मपान, रहते हैं। इस तरह उसमा नारा तृतीय अध्याय . अक्त किया है कि भ्रातृहीन (स्त्री) से विवाह न करें। इसके बाद की ऋचा इसे अधिक स्पष्ट करती है ॥ ४॥ विशेष--'उत्पन्न होते ही स्त्री को फेंक देते हैं। इस वाक्य की व्यारूपा मे दुर्गाचाय नै स्त्री पुरुष को मिट्टी का तथा काठ का पात्र माना है। हवन म मिट्टी के पात्र को फेंक देते हैं किन्नु काठ के पात्र को फेंकते नही उससे हवन करते हैं । स्त्रियो का दान तथा विक्रय वाहिक' शुल लेकर होता है। इस प्रसग मे सुभद्राहरण नामक ग्रथ का उद्धरण दिया गया है- विक्रय चाप्यपत्यस्य मतिमान् कोऽनुमस्यते । स्वल्लो वापि वहुर्वापि विक्रयस्तावदेव सः॥ अनिमग = परित्याग ( अनिना हि परित्याग उदा दान मृजेर्मतम् )। शुन शेप की क्या ऐतरेय ब्राह्मग म दी हुई है ।* भ्रातृरहित स्त्रियो के विषय में यास्क का कहना है कि इन्हें धनाधिकार अवश्य है परन्तु इनमे विवाह करना निपिद्ध है क्योकि इनकी तुलना उन व्यक्तियो से की गई है जिनका माग सन्तान तथा पिण्डदान के विषय मे बिलकुल हका हुआ है ।। ४ ।। अभ्रातेव पुस एति प्रतीची गर्तारुगिव सनये धनानाम् । जायेव पत्य उशती सुवासा उपा हनव नि रिणोते अप्स ॥ ( अभ्राता इव ) जैसे भाई से रहित स्त्री (पुस.) मनुष्य की (प्रतीची ) थोर (एति ) जाती है, ( धनाना 'सनये ) धन की प्राप्ति के लिए (गोरुक ३) गर्न '- समाभवन के खम्भे पर, रगमच पर चढ़ने वालो-नृत्य करनवाली • पुत्रहीन हरिश्चन्द्र ने नारद के परामर्श से वरुण की उपासना द्वारा पुत्र पाया जिममा नाम रोहित था। वरुण ने पूर्वप्रतिशा के अनुसार रोहित की बलि मांगी परन्तु हरिश्चन्द्र 'बचा है', 'दोन उगने दीजिये' 'कवच धारण करने दें' आदि बहानों से टालते गये। अन्त में रोहित वन में चला गया और हरिश्चन्द्र को जलोदर रोग हो गया। इन्द्र को प्रेरणा से ६ वर्ष तक रोहित वन में धूमता रहा। अन्त में एक भूसे ब्राह्मण अजीगत के तीन पुत्रों में निचले सुन शेप को १०० गायों के बदले सरीद लाया और उससे वरुण को बलि देने के लिए घर आकर यश करने लगा। यश में शुन शेष को बाँधने और मारने के लिए भी अनौगर्न ने एक-एक सौ गायें पाई। गुन शेष देवताओं की स्तुति करके छूट गया । उस दिन के यश का ऋपि बना तथा सोम चुआने की नइ विधि का उमने आविचार भी किया। अनीगतं की लस चेटा पर मो विश्वामित्र ने उसे अपना पुत्र बना लिया। विवामित्र के विरोध करने वाले पुत्र म्लेच्छ) आध्र आदि हुए (ऐ० ब्रा०७३)। .
हिन्दी-निरुक्त स्त्री के समान, (सुवासाः) सुन्दर वस्त्र धारण किये हुए और (पत्ये उशती) पनि की कामना करने वाली ( जाया इव ) पत्नी के समान त्या (हना इव) हंगने वाली स्त्री के समान ( उपा ) ऊपा ( अप्सः ) अपने रूप को, छाती को (निरिणीते ) फैलाती है ( ऋ० १।१२४।७)। अभ्रातृकेव पुस पितॄन् एति अभिमुखो सन्तानकर्मणे पिण्ड- दानाय, न पतिम् । गर्तारोहिणी इव धनलाभाय दाक्षिणाजी। गतं. सभास्थाणु । गृणाते.। सत्यसंगरो भवति । तं तत्र या अपुत्रा, या अपतिका सा आरोहति । ता तत्राः आघ्नन्ति । सा रिक्थ लभते ॥ सन्तानो पत्ति या पिण्डदान के लिए, भाई से रहित स्त्री से पुरुषो के पाग अर्थात् पितृवश को ओर जाती है पति की ओर नहीं। दक्षिण-देश मे उत्पन्न तया धनप्राप्ति के लिए गर्न (मभाभवन के खम्भे) पर चढ़ने वाली म्त्री के समान । गत्तं = 'सभाभवन का स्तम्भ' /ग (बुलाना ) से । इस (स्थान ) में किय गये व्यवहार मच्चे होत हैं । जो पुत्रहीन या पतिहीन होती है यह उम (खम्भे ) पर चढनी है. उमे लोग पासो से (dice) मारत हैं और वह धन पाती है । विशेप-भाई से हित स्त्री पति का कल्याण नही परती, अपने पितृवंश म ही लौट जाती है। दुर्ग के अनुसार दक्षिण मे प्रथा है कि पून-स्थान में पुत्रहीन या पतिहीन स्त्री जाती है । (अपना हा सवार र) वह सम्भे पर घढ़ती है उसे लक्ष्य कर लोग पासे पंरते हैं तथा उसे कुछ पैसे मिल जाते हैं। इस सम्भे ये अधीन रिये गये व्यवहार सच्चे होते है ऐसा कोई नहीं रहता कि पासा यहाँ गिरा, यही नहीं। दाक्षिणात्री-दक्षिण में दाक्षिणा, उनमे उसन- दाक्षिणाजा । यही शद मायण ने लिया है। वर्तमान दाक्षिणाजी अशुद्ध है। श्मशानमञ्चयोऽपि गर्त उच्यते । गुरते. । अपगूणों भवति । श्मशान-श्मशयनम्। श्म शरीरम्। गरीरशृणाते. शम्नाते. या । श्मथु लोम । श्मनि थित भवति । लोम लुनाते. वा। लीयते था। 'नोपरस्याविष्कुर्यात् । यदुपरस्याविष्कुर्यात् गतंठा स्यात् प्रमायुको यजमान.'-रत्यपि निगमो भवति । रयोऽपि गतं. उच्यते । मृगाते. स्तुतिकर्मणः । म्नुतनम यानम् । 'आ रोहयो वरण मित्र गत्तम्-त्यपि निगमो भवति ।
. तृतीय अध्याय श्मशान के समूह को भी गतं कहते हैं, गुर (तैयार होना) से, क्योकि [ यहां के निवासी मृत पुरुषो के स्वागत मे ] तैयार रहते हैं । श्मशान = श्म (शरीर ) का शयन (शान्ति ) स्थान । श्म = शरीर । 'शरीर' शृ (जलाना) याशिम ( नष्ट करना) से ( देखिये, निरुक्त २०१६)। श्मश्रु = रोम क्योकि प्रम ( शरीर ) मे आश्रित होता है । लोम-Vलू (काटना) या ली ( मटा होना) से। ( गतं का अर्थ 'श्मशान' है) इसका उदाहरण यह है-'पजस्तम्भ के निचले भाग को खोलना नही चाहिये; वह प्रमादी यजमान जो यज्ञस्तम्भ के निचले भाग ( उपर ) को खोले वह श्मशानस्य ( गर्ते स्था ) बनेगा।' रय को गर्त कहते हैं, गृ = 'स्तुति करना' से। यह ऐमी गाडी है जिसकी स्तुति सबसे अधिक हुई है । इसका वैदिक-उदाहरण है- 'हे वरुण और मित्र ! गतं (रय ) पर आप दोनो चढे ।' (ऋ० ५।६२।८) । विशेप -यास्फ की निर्वचन प्रियता तथा विषयान्तर-गमन-प्रवृत्ति यहाँ पराकाष्ठा पर पहुंची हुई है। इसी के फलस्वरूप-गतं, श्मशान, शरीर, श्मश्रु, लोम-जैसे शब्दो की व्याख्या हो गई है। दुर्ग इसे 'प्रसक्तानुप्रसक्त' ( सम्बद्ध शब्दो से सम्बद्ध ) कहते हैं। जायेव पत्ये कामयमाना सुवासा. ऋतुकालेषु । उपा. हसनेव दन्तान् विवृणुते रूपाणि । इति चतस्र. उपमाः । 'नाभ्रा- श्रीमुपयच्छेत् । तोकं ह्यस्य तद् भवति' इति अभ्रातृकायाः उपयमनप्रतिपेयः प्रत्यक्ष., पितुश्च पुत्रभावः । पिता यत्र दुहितु. अप्रत्तायाः रेत.सेकं प्राजयति सन्दधात्यात्मानं संगमेन मन- सेति ॥ अर्थतां जाम्या. रिक्थप्रतिपेधे उदाहरन्ति । ज्येष्ठं पुत्रि- कायाः इत्येके ॥५॥ ऋतुकाल आने पर जैसे सुन्दर वस्त्र धारण करने वाली, पति की कामना करती हुई पत्नी [ अपने रूप को फैलाती है ] 1 हंसती हुई ( नारी) जैसे दांत [ की छटा] दिखाती है वैसे ही ऊपा अपने रूप को खोलती है। इस प्रकार चार उपमायें हैं। माई से रहित स्त्री से विवाह न करें, क्योंकि उसमे उत्पन्न पुत्र उत्त [स्त्री के पिता ] से सम्बन्ध रखता है-इस प्रकार भ्रातृहीन स्त्री से विवाह का निपेष तथा पिता का [अपनी पुत्री को] पुत्र ममझना सुस्पष्ट है । • तुलना करें-मनु. ३१११, यावरक्य. १६५३ । .
" हिन्दी-निरुक्त
पिता जब अपनी अविवाहित लडकी का पति (रेतस् का सिंचन करने वाला)
चुनता है तो अपनी आत्मा को वह शान्त (सगम, शगम्य) मन स धारण
करता है ( अर्थात् वह पुत्रहीनता के कष्ट से मुक्त हो जाता है क्योकि पुत्री
का पुत्र तो उसी के वश का होगा)।
अब कुछ लोग निम्नलिखित ऋचा को पुत्री के उत्तराधिकार निषेध के
स्प मे रखते हैं । कुछ लोग कहते हैं कि नियुक्त की गई पुत्री को [ धन का ]
बडा भाग मिल ॥ ५॥
न जामये तान्वो रिक्थमारैक्चकार गर्भ सनितुनिधानम् ।
यदी मातरो जनयन्त वह्निमन्य कर्ता सुकृतोरन्य ऋन्धन् ।
( तान्द ) शरीर से उत्पन्न अपने पुत्र ने ( जामये) अपनी बहन को
(रिक्यम्) उत्तराधिकार-धन (न) नहीं
आरक् ) दिया; उसने उसके
( गभम् ) गर्भ को ( सनितुः ) उसके पति के (निधानम् ) भाण्डार-गृह के
रूप ग (चार) बना दिया है । ( यदी ) जब ( मातर ) मातायें (ह्निम)
सन्तान को (जनयन्त ) उत्पन्न करती हैं तब उन ( सुकृतो ) पुण्यकर्ताओं
म ( अन्य ) एक तो ( पा) काम करने याला [ होता है और ] (अन्य )
एक (अन्धन् ) लाभ उठान वाला [ होता है ] ( ऋ० ३।३१।२)।
विशेष-
[-इरा मत्र में पुत्री वा अधिकार-निषेध दिखाया है अर्थात पुत्री
को पिता की सम्पत्ति म कोई भाग नही मिरता यदि अपने शरीर का उत्पन्न
पुत्र भी हो । यद्यपि मातायें दोनों तरह की सन्तान को समान रूप से उत्सा
परती हैं तथापि उनम एर वसा (पुत्र) होता है. दूमरी पुत्री को राज सजा
कर (ऋन्धन्) दूसरे र यहाँ भेज देते है । मेल्टनर ने 'सनिता' या अय विजेता
(पाणिग्रहण करो वाला
न जामये भगिन्यै। जामि -अन्येऽम्या जनयन्ति जाम्
अपत्यम् । जमते वा स्याद् गतिरमण । निर्गमनमाया भवति ।
तान्य आत्मज पुत्र । रिक्य प्रारिचर-प्रादात् । चवार एना
गर्भनिधानी सनिनु हस्तग्राहस्य । यदिह मातर
अजनयन्त
वहिल-पुत्रम् । अनि च श्रियम् । अन्यतर सन्तानसर्ना
भाति पुमान दायाद । अन्यतर अर्थयित्वा जामि. प्रदीयते
लिया है।
परस्मै॥६॥
तृतीय अध्याय जामि अधर वहन के लिए नहीं। जामि = जिसमे दूसरे लोग 'जा' अर्थात् संतान उत्पन्न करें। या 'जाना' अर्थ दाले जम् से । उमे प्राप [पति के यहाँ ] बाहर ही जाना पडता है । तान्व=अपना पुष । ( उसने ) धन को छोडा या दिया । जस ( वह्न ) को सनिता अर्थात् पाणिग्रहण करने वाले (पनि ) के द्वारा गर्भ धारण करने योग्य बनाया ( अर्थात् उसका पालन- पोपण किया)। जब माताओ ने वह्नि अर्थान् पुत्र को और अवह्नि अर्थात् पुत्री से उत्पन्न किया, उनमें एक उत्तराधिकारी पुरुष-संतान अपनी मन्नानो को बढाने वाली है. दूसरी स्त्री सनान (जामि) पालन-पोषण करके दूसरे को दे दी जाती है ॥ ६॥ द्वितीय-पाद मनुष्यनामानि उत्तराणि पञ्चविंशतिः (निघ० २१३)। मनुष्याः कस्मात् ? मत्वा कर्माणि सोव्यन्ति । मनस्यमानेन सृष्टाः । मनस्यति. पुनर्मनस्वीभावे । मनोः अपत्यम् , मनुपो वा । तत्र 'पञ्चजना' (२।३।२३) इत्येतस्य निगमा भवन्ति ॥७॥ इसके बाद के पच्चीस नाम 'मनुष्य' के हैं । 'मनुष्य' कैसे बना ? चूंकि वै समझ कर (/मन ) कामों से मम्वन्धं पर हैं (इपितु)। बुद्धिमान (सटा) के द्वारा ये बनाये गये हैं। पुन , 'मनस्यति' का प्रयोग बुद्धिमान् होने के अपं में ही होता है। मनु का या मनुस का पुत्र । उन (नामो) मे 'पञ्चजना.दाद के वैदिक उद्धरण है ॥ ७॥ तदद्य वाच. प्रथमं मसोय येनासुरां अभि देवा असाम । ऊर्जाद उत यशियामः पञ्चजनाः मम होनं जुपध्वम् ॥ (तत्) तो ( अब | भाउ (प्रयम) पहले (धाच.) वचन को (ममीय) सोचनं (पेन ) जिस यपन से ( देवाः) हम देवता लोग (असुरान् । अपुरोको (मि माम ) पराजित कर लेंगे। (ऊ) हे यश के मन तानेवाले ( ) और (यशियात.) या करने वाले पवित्र (पञ्चजना.) मनुभो ! (मम ) मैरे (होत्र) यम को (जुगध्यम.) सेवा परी (ऋ. १mar) हिन्दी निरुक्त तदद्य वाच. परमं मसोय, येन असुरान् अभिभवेम देवा. । असुरा. असुरता. स्थानेषु, अस्ता. स्थानेभ्यः इति वा । अपि वा, 'असु.' इति प्राणनाम । अस्त. शरीरे भवति, तेन तद्वन्तः । 'मोर्दैवानसृजत तत्सुराणा सुरत्वम् । असोरसुरानसृजत तदसु. राणामसुरत्वम्'--इति विज्ञायते । ऊर्जाद उत यज्ञियास. । अन्नादाश्च यज्ञियाश्च । ऊ इति अन्ननाम, ऊर्जयति इति सतः । पक्कं सुप्रवृक्णमिति वा ॥ [ मैं ] आज उस वचन ( सामय्यं ) को मरसे बहा समझता हूं. जिससे हम देवता असुरों को परास्त करें। असुर = जो किसी जगह ठीक से ठहरे ( अ- मुरम् ) या सभी जगहो से भगाये जाते हैं (अस् )। अथवा 'असु' प्राण का पर्यायवाची है, जो शरीर मे डाला गया हो। उस (प्राण ) से युक्त [ असुर है ] । देवताओं का सुरव इसी में है कि [ब्रह्मा ने ] देवों को अच्छी चीज ( सु) से उत्पन्न किया, राक्षस लोग असुर हुए क्योकि इन्हे सराव पीजो ( अ-मु) रो उत्सन किया'-यह मालूम होता है ।* यशान साने वाले और पवित्र-अर्थात् अनमक्षक और यज्ञपा (पयित्र )। = अन्न का एक नाम है क्योकि यह बल प्रदान करता है। पक जाने पर विभाजन के योग्य होता है (पच् +/वश्च ) । विशेप-'असुर' पे विषय में की गई पल्पनायें सारी निरस है क्योकि यह प्राचीन पद है 'असुर' देवता के अयं मे भी पाया है। वस्तुन. उमा प्राचीन-अयं वही पा । तुलना परें अवेस्ता-Ahura Mazda = परमेश्वर । अपने निरुक्त (२।१ ) में रहे गये निवं धन-सिद्धान्त 'वेनचिद् वृत्तिमामा- ग्यन' वा प्रयोग यास्क यहाँ का पदमी युगपत्ति मे करने लगे हैं । पच् का एक है 'पर' जिममे कमाया है नया बरच रो र लिया बस . पुन. दाबन ग4111 पञ्चजना मम होनं जुपच्यम् । गन्धर्वा. पितरो देवा अमुरा रक्षामि दत्येके । चत्वारो वर्णाः, निपादः पश्चम. इत्यो पमन्यव. । निषादः कस्मात् ? निपदनो भवति । निपण्णमस्मिन् • दुना करें-सिरोम-२३४ा।
तृतीय अध्याय ७९ पापकमिति रुक्ता । 'यत्पाञ्चजन्यया विशा' । पञ्चजनोनया विशा । पञ्च पृक्ता सख्या-स्त्रीपुनपुसकेषु अविशिष्टा ।। हे पांच जनो । मरे यज्ञ की सेवा करो। कुछ लोगो के अनुसार ग घव पितृगण, देवता, असुर और राक्षस । औपमय के अनुसार चारो वण और पांचों निपाद । निषाद केमे बना? प्राणियों के वध से जीता है या निरुत्त कारो के अनुसार उसमे पाप टिका रहता है पांच जनों की जाति के द्वारा जब '(ऋ० ८०६३।७)। पाच जनो से युक्त जाति ( विग) द्वारा । पञ्च पृक्त ( समुक्त पा स्पिर) सध्या है क्योकि स्त्रीलिंग पुल्लिंग तथा नपुसकलिंग म एक समान हो रहती है । बाहुनामानि उत्तराणि द्वादश ( निघ० २।४ )। बाहू कस्मात् ? प्रवाधते आभ्या कर्माणि । अङ्गुलिनामानि उत्तराणि द्वाविंशति (निय० २।५ ) । अङ्गुलय कस्मात् ? अग्रगामिन्यो भवन्ति इति वा, अग्रगालिन्यो भवन्ति इति वा, अग्रकारिण्यो भवन्ति इति वा, अङ्कना भवन्ति इति वा, अञ्जना भवन्ति इति वा । अपि वा अभ्यञ्चनादेव स्यु । तासामेपा भवति ॥८॥ बाद के बारह नाम बाहु के हैं। वाहु कसे ? इनसे ( कोई आदमी ) काम करता है। बाद के बाईस नाम अगुलि के हैं । अंगुलियां कैसे ? चूकि से आग जाने वाली हैं या आगे [जल] गिरान वाली हैं या आगे काम करने वाली हैं या वे चिह्न देती हैं या मुहती हैं (Vबज) या शोभा बढ़ाने के धारण हों ( अञ्च ) । उनकी यह [ऋचा ] है ॥ ८॥ दशावनिभ्यो दशकक्ष्येभ्यो दशयोक्नेभ्यो दशयोजनेभ्य । दशाभीशुभ्यो अर्चताजरेभ्यो दश धुरो दश युक्ता वहस्य । (दशावनिभ्य ) दस रक्षकों वाले (दगावक्ष्येभ्य ) दस कमरवदों वाल (दायोक्त्रभ्य ) दस जोतने की रस्सियों वाले (दायोजनम्य । दस प रनो बाल (शामीशुभ्य ) दस लगामों वाल (दा युक्ता ) जोठे जाने पर इस तथा (दापुर ) दस घुरियों को रथचक्र के मध्यभाग को-(वहस्य ) धारण करने वाल (अजरेभ्य ) अमर व्यक्तियों की (बचत) अचना करो ऋ० १०१९४७)॥
हिन्दी-निरुक्क विशेप-उपर्युक्त मन्त्र मे रथ के विभिन्न अंगा के नाम आये हैं जो निघण्टु के अनुसार अंगुलियो के पर्याय है। सम्भव है, दाम-मण्डल को नमनिव-पली में संकलित किया गया यह मत्र भी रहस्यात्मक हो-रय फी पलना ( Imagery ) देर ईश्वर के विभिन्न-कमो का निदर्शन हो। अवनय. अडलय. भवन्ति-अवन्ति कर्माणि । कश्याः प्रकाशयन्ति कर्माणि 1 योक्त्राणि योजनानि इति व्यात्यातम् । अभीराव. = अभ्यस्नुवते कर्माणि। दश घुरो दश युक्ता वहद्भव। धू. धूर्वते. वधकर्मणः । इयमपि इतरा घूः एतस्मादेव । विहन्ति' वहम् , धारयते वा॥ अवनि का अप है गुलियो पोरिये काम पराती है (म) । पस्यायें (अमरबन्द, या अगली ) पामो को प्रमाणित करती है (ग)। 'यो पा अभिप्राय 'वा' रखा गया है। अभी गु = काम मंगाम से है । गोरने पर दम. तपादन परियों को पारण परम पाहणे पो..""" यथार पूर्व, गे, यह दूसरे अपंगला पू' (जोने का Tin) यो पशु मयमा है पोरि[ बहन ने पारे पाणी थे ये बी पट, (WEF) या [ घोह या मेल को धारण रा है ()। कान्तिमर्माण. उत्तरे धातयोटादश (निप० २०६ ) । अन- नामानि उत्तराणि अटाविशति (निप० २।७) । अन्न सम्मात् ? आनत भूतेभ्यः । अतेवा। अतितामांग. उत्तरे पातको दा (निप० २१८)। वरनामानि उत्तराणि अाति- गति (निप० २१९ ) । वर पम्मात् ? भरं भवनि, विभनं. । धननामानि उत्तगणि अशानितिरेव (निप० २०१०) । धन पम्मात् ? धिनोति ति मत.। गोनामानि उतराणि पर (निय० २०११ ) । ध्वनिफर्माणः उन धातदो दा (निय. २०१२)। प्रोपनामा युनराणि पादरा (निय० २६१३)। गतिमोगः उत्तरे धानको द्वानियतम् (निय० २।१४)। शिवनामानि 'मणि पविगति (निय० २०१५)। क्षित पन्मा ? मशिनी पियं । अनिानामानि तृतीय अध्याय १ उत्तराणि एकादश (निघ० २११६) । अन्तिक कस्मात् ? आनीतं भवति। सनोमनामानि उत्तराणि पट्चत्वारिंशत् (निघ० २०१७)। सग्राम कस्मात् ? सङ्गमनाद् वा, सङ्गरणाद् वा । सङ्गतौ नामौ इति वा। तन'खले' (३८ तम) इत्येतस्य निगमा. भवन्ति ॥९॥ बार के अठारह धातु 'इच्छा' यथं वाले हैं। उसके बाद अठाईस अन्न के पर्याय हैं । अन्न कमे' जीवो के पास लाया गया है (निम) या/अद् (खाना) से। बाद के दस धातु 'भोजन' अर्थ वाले हैं। बाद के अठाईस नाम बल के हैं । बल कैसे यह भरण पोषण करता है /म ( धारण करना) से । बाद के अठाईस नाम धन के हैं । धन कैसे ? यह प्रसन्न करता है (धि)। बाद के नौ नाम गौ के हैं । 'क्रोध' अथं वाले वाद के दस धातु हैं। बाद के ग्यारह नाम क्रोध के हैं। वाद के एक सौ बीस धातु गत्यथक हैं । बाद के छब्बीस नाम 'शीघ्रता' (क्षि) के हैं । क्षिप्र कसे? चूंकि बीच का अवकाश (प्रपं.).छोटा होता है । बाद वाले ग्यारह नाम निकट के हैं । अन्तिक कसे ? चूकि यह पास मे लाया हुआ होता है । वाद के छियालिस नाम सग्राम के हैं। सग्राम कैसे एक साथ जाने से या एक साथ पुकारने से (17). मा एक साय दो गांव आते हैं । उन ( नामो ) मे खले के वैदिक उद्धरणं हैं ॥१॥ विशेप-यास्क की तत्परता इन पक्तियां मे स्पष्ट है। केवल नाम गिनाते चले जा रहे हैं मानो कोई वैपाकरण तद्धित पढा रहे हों। १२ मूचियो मैं ( २।६-२०१७ ) केवल दो चार नामो की ही व्याम्या उन्हें अच्छी लगी । न जाने 'खले' शब्द का कहाँ से थोडा पुण्य निकल आया कि इस पर वैदिक उद्धरण टूटा गया ॥ ९॥ अभीदमेको अस्मि निप्पाळभी द्वा किमु य करन्ति । खले न पनि प्रति हन्मि भूरि कि मा निन्दन्ति शत्रवोऽनिन्द्रा ।। (एक ) मैं अकेले ही ( इदम् ) इस शत्रु पर (अमि अस्मि ) विजय पाता हूँ, (निपाट् ) अपराजेय होकर (दा)दो शत्रुओं को भी ( अमि) हराता हूँ। (त्रय ) तीन भी ( किमु) क्या ( करन्ति ) कर सकते हैं (सले ) सप्राम म (पपात् म) पुपाल क समान (भूरि) अच्छी तरह (प्रति हन्मि) दबाता हूँ। (अनिद्रा ) इद्र से रहित (शत्रद ) शनुगण (क) या (हिन्दी)मेरी निक्षा कर सकते हैं । ( 0mns) अभिभवामि इदमेकम् एक । अस्मि नि पहमाण सपत्नान् । अभिभवामि द्वो। कि मा त्रय कुर्वन्ति ? ६हि०नि० 7 , ८२ हिन्दी-निरुक्त अकेले ही मैं इस एक (शत्रु ) को परास्त करता हूँ। सभी शत्रुओ को दवाने वाला हूँ। दो को भी हराता हूं। तीन भी मेरा क्या कर सकते हैं ? एक इता संख्या । द्वौ द्रुततरा सख्या । त्रयः तोर्णतमा संख्या । चत्वारः चलिततमा सस्या। अटो अश्नोते. । नव न वननीया, न अवाप्ता वा । दश दस्ता, घटार्था वा। विशति. द्विर्दशतः । शत दश दशत.। सहस्रं सहस्वत् । अयुतं प्रयुत नियुतं तत्तद् अभ्यस्तम् । अर्बुद. मेघो भवति । अरणम् अम्बु, तद्द. । अम्बुमद् भवति इति वा । अम्बुमद भाति वा । स यया महान् वहुः भवति वर्णन तदिवाव॒दम् ॥ एक = गई हुई संख्या (इ)। दो = दूर तक दौडने पाली सस्या (दु)। त्रि = सबसे अधिक पार जाने वाली सख्या (/)। चतु:- सबसे अधिक चलने वाली सख्या । अष्ट = व्याप्त करगे ( अ ) से । नव= 'जो पाने योग्य न हो (न / चन् ) या पायी हुई न हो। दश क्षीण (/दस ) या जिसका प्रयोजन [ कई संम्याओ मे ] देखा जाय । विशति - दो बार दश होने से। शत-दस बार दश होने से। सहस्र-बल से युक्त (सख्या) । अयुत ( दस हजार ), प्रयुन ( एक लाख ), नियुत ( दस लाख)-- एक उसी ( दस ) की आवृत्ति (गुणा ) करने पर बनता है । "अर्बुद' मेघ है । अरण = जल, उस देनेवाला । अथवा जल होने के कारण । या जल के समान प्रतीत होता है। वह ( मेघ ) जैसे वर्षा करने के समय वडा समूह बन जाता है वैसे ही अबुद ( एक करोड़) की सख्या भी।। विशेप-इन सत्याओ पर यास्क ने व्यर्थ अपनी वल्पनाशक्ति का दुरुपयोग किया जिसके कारण वे हास्यास्पद हो जाते है । वस्तुत भारत-यूरोपीय सभी भाषाओं में कम से कम दस तक की सख्यायें इसी रूप में है । हाँ, अपनी ध्वनि सबों की है- संस्वृत अवेस्ता ग्रोक लैटिन ऐं. सं० अग्रेजी एवं սով` one द्वि duo duo twa ( tu) two नि थि tres thred three चतुर् qoattuor fcoer four के बाद एक, अम्बु ) से युक्त eis treis tettares तृतीय अध्याय ८३ , पट sex Six SLX सप्तन ensea mine tyn ten पश्चन् पचन् penta quinque fif five hex हान् hepta Septem seofa seven अन अतन् okto octo cahta cight नवन् नवन् Dovem nigon दान दसन deka decem सहन की व्युत्तत्ति यास्त ने विलकुल ठीक को है (खिय भूमिका ) 1 इन सरूपाप्रा का उल्लख निम्नलिखित उद्धरणों में देखें- एका च दश च । दश च शत च। शन च सहस्र च । महल चायुत च । अयुत च प्रयुत च। प्रयुत च नियुत च । नियुत चावुद च । अर्बुद च समुद्रश्च । मध्य च अन्तश्च परार्धश्च । ( काठक स० १७.१०) एका च शत च सहस्र च अयुत च नियुत च प्रयुत च अर्बुद च न्यर्बुद च ममुद्रश्च मध्य च अतश्च पराघश्च (त० स० ४।४।११) इस प्रकार बहुत प्राचीन काल से ही भारत म सरपा (विशतया दामिक प्रणाली ) का प्रचलन या क्योकि ये सरयायें एक दूसरी सदगुणी हैं ।। 'खले न पान्प्रति हन्मि भूरि । सले इव पनि प्रतिहन्मि भूरि । सल इति सग्रामनाम । सलते वा स्खग्ने वा । अय मपोतर सर एतस्मादेव । समास्कन भवति। कि मा निन्दन्ति शनवोऽनिन्द्रा'। ये इन्द्र न विदु । इन्द्रो हि अहमस्मि, अनिन्द्रा इतरे इति वा ॥ समाम म पुपाल समान अच्छी तरह दवाना हूँ २ सल - सग्राम। गल (गिरना ) से या स्पल (मारना ) म । यह दूसरे अपवाग सल (पोखर) भी इमी स बरा है क्योंकि [विखरे यत्रों से ] मरा हुआ होता है । पारदरहित पत्रु मरो निनपर गकते हैं? [बदरहित= } जा को नहीं जानते। अथवा में और दूसरे अनिष्ट है-यह अप भी हो सकता है। विशेष-भूषा की गया ये बीच म सदा की विवपना र नेम स्पास्मार पर यहां पापाश है।
हिन्दो-निरुक्त व्याप्तिकर्माण. उत्तरे धातवो दश ( निध० २०१८ ) 1 तंत्र द्वे नामनी । आक्षाण. आश्नुवानः । आपान. आप्नुवानः । वध कर्माण: उत्तरे धातव. त्रयस्त्रिंशत् (निव० २११९)। तत्र 'वियात.' इत्येतद् वियातयते इति वा, वियातय इति वा। 'आखण्डल प्रहूयसे' । आखण्डयित. । 'तडित्' इति अन्तिकवधयो. संसृष्टकर्म, ताडयतीति सत. ॥ १० ॥ वाद के दस घातु 'व्याप्त करना' अर्थ वाले हैं। इनमे दो नाम ( सज्ञा, क्रिया नहीं ) हैं-आक्षाण-व्या करने वाला। आपान-पाने वाला । बाद के तेंतीस धातु वधायक हैं। उनमे 'वियात' या तो 'वह दवाता है' इससे, या 'दयाओ' ( लोट् ) इससे बना है । 'हे टुकडा करने वाले ! तुम्हे बुलाया जाता है' (ऋ० ८।१७।१२, साम० २१७६, अथर्व० २०१५।६)। हे खण्ड ( टुकडा ) करने वाले । 'तडित्' निकट और यध का सम्मिलित अर्थ रखता है, क्योकि यह मारता है ॥१०॥ त्वया वयं सुधा ब्रह्मणस्पते स्पार्हा वसु मनुष्या ददीमहि । या नो दूरे तडितो या अरातयोऽभि सन्ति जम्भया ता अनप्नस.॥ (ब्रह्मणस्पते ) हे स्तुतियो के स्वामी । (त्वया सुध्धा ) आप-जैसे प्रगति प्रदान करने वाले के द्वारा (वय मनुष्याः ) हम मानवगण (पाही ) स्पृहा या इच्छा करने के योग्य ( वसु ) धनो को ( ददीमहि) पायें; (या अरातय ) जो शत्रु या कृपण लोग (नो दूरे ) हमसे दूर ( या तडित.) और जो निष्ट (अभिसन्नि ) हैं (ता अननस ) उन रूपहीन = न देखने योग्य [ शत्रुओ को ] (जम्भय ) चबाओ । (ऋ० २।२३।९ ) । त्वया वयं सुवर्धयित्रा ब्रह्मणस्पते ! स्पृहणीयानि वसूनि मनुष्येभ्य. आददीमहि । याश्च दूरे तडितो याश्च अन्तिके । आरातय. = अदानकर्माणो वा, अदानप्रज्ञा. वा । जम्भय ताः अनप्नस. । अप्नः इति स्पनाम। आप्नोति इति सत. । विद्युत् तडिद् भवतीति शाकपूणिः । सा हि अवताडयति । दूराञ्च दृश्यते । अपि तु इदम् अन्तिकनाम एवाभिप्रेतं स्यात् । 'दूरे चित्सन्तळि. दिवाति रोचसे' । दूरेऽपि सन् अन्तिके इव सन् दृश्यसे इति ॥
तृतीय अध्याय हे स्तुतियो के स्वामी। आप-जैसे वृद्धि देनेवाने के द्वारा, हम सर्दा के योग्य घन मनुष्यो से पायें । जो शत्रु दूर हैं जो और निकट हैं। अरातिदानियो को दान से रोकनेवाले, या ( वय ) दान देने को बुद्धि न रखने वाले । इन्हे चबाकर स्परहित कर दो। 'अप्नस' रूप का पर्याय है, क्योंकि यह पाता है Wआप = किसी पर ठहरना )। बिजली को भी तडिन् कहते हैं--ऐसा शाक्पूणि का मत है, क्योंकि यह चीरती है और दूर से ही दिखलाई पड़ती है । अथवा यह 'निकट' के ही पर्यायरूप मे इष्ट हो। 'दूर होने पर भी मानों निकर के समान चमकते हो' ( ऋ० ११९४७ ) अर्थात् दूर हो, फिर निकट होने के समान दिखलाई पडते हो। वज्रनामानि उत्तराणि अष्टादश (निघ० २।२०) । वज्र कस्मात् १ वर्जयतीति सत.। तर कुत्स. इत्येतत् कृन्तते । ऋपि. कुत्सो भवति–कर्ता स्तोमानामिति औपमन्यवः । अनाप्यस्य वधकमैव भवति । तत्सख इन्द्र शुष्ण जघानेति । ऐश्वर्यकर्माण. उत्तरे धातवश्चत्वार (निघ० २।२१ ) ईश्वरनामानि उत्तराणि चत्वारि (निघ० २।२२)। तन इन इत्येतत् सनित ऐश्वर्यग इति वा, सनितम् अनेन ऐश्वर्यम् इति वा ॥ ११ ॥ इसके बाद अठारह वज के नाम हैं । वन कसे ? चूंकि यह [ प्राणियो को जीवन से ] अलग करता है (Vवृज) । उन नामो में 'कुत्स' पूत ( काटना ) से बना है । 'कुत्स एक ऋषि का भी नाम है, स्तोत्रों का कर्ता (बनाने वाला )-रेसा बोपमन्यव कहते हैं। इसमे भी इनका 'वध' अर्थ ही होता है क्योकि उनके मित्र इन्द्र सूखा (अकाल, अनावृष्टि ) का नाश करत है । बाद के चार धातु ऐपवय ( उन्नति ) अथ वाले हैं। उसके बाद चार ईश्वर ( अधिकारी) के नाम हैं। उन (नामो) मे 'इन' [का अथ है ] जो उन्नति से भरा हो या जिसने [ दुसरे मे ] उन्ननि भर दी है ॥११॥ यना सुपर्णा अमृतस्य भागमनिमेष विदथाभिस्वरन्ति । इनो विश्वस्य भुवनस्य गोपा स मा धीर. पाकमना विवेश ॥ (यत्र) जहाँ ( सुपर्ण) सुदर पखवाले ( अनिमेषम) बिना रुके हुए- पलक दिना गिराय ( विदया) स्तुति के द्वारा ( अमृतस्य भागम् ) जल या अमृत के हिस्से को ( अभि सन्ति ) बुलाते हैं; (इन ) जो,स्वामी (विश्वस्य भुवनस्य ) समूचे संसार का (गोपा ) रक्षक है, (स ) वह (धीर) तृतीय अध्याय १ तृतीय पाद बहुनामानि उत्तराणि द्वादश ( ३।१ ) । वहु कस्मात् ? प्रभवतीति सत. । ह्रस्वनामानि उत्तराणि एकादश ( ३१२ )। ह्रस्वो ह्रसते. । महन्नामानि उत्तराणि पञ्चविंशति. ( ३३ )। महान् कस्मात् ? मानेन अन्यान् जहाति इति शाकपूणि. । मंहनीयो भवतीति वा । तन 'ववक्षिय 'विवक्षसे' इत्येते वक्तवा, वहतेर्वा साभ्यासात् । गृहनामानि उत्तराणि द्वाविंशतिः (३।४)। गृहा. कस्मात् ? गृह्णन्ति इति सताम् । परिचरणकर्माण. उत्तरे धातवो दश (३५)। सुखनामानि उत्तराणि विशति. ( ३२६)। सुखं कस्मात् ? सु हित खेभ्य. । खं पुन. खनते. । रूपनामानि उत्तराणि पोडश ( ३७) । रुप रोचते.॥ इसके बाद वारह 'बहु' के पर्याय हैं। 'बहु' कैसे? चूंकि अधिक परिमाण मे उत्पन्न होता है । बाद ये बारह नाम 'ह्रस्व' के है । ह्रस्व हस् (घटना) से । बाद के पचीस पर्याय 'महत्' ( बडा ) क हैं। 'महान' से ? शाकपूणि कहते हैं कि जो अभिमान के कारण दूसरों को छोड़ देता है (मान+/हा)। या आदरणीय होता है (मह)। उनमे 'ववक्षिय' और 'विवक्षसे' ये दो पारद हैं जो वच् (बोलना) या वह ( ढोना) से अभ्यास (दित्व ) करके बने हैं । बाद के बाईस नाम ' गृह' के हैं । 'गृह' मे' तंकि ये सबों को पकडते हैं । वाद के दस धातु 'सेवा' (परिचर्या ) अयं वाले हैं। बाद के बीस सुघ के पर्याय हैं । 'मुख' कसे? कि इन्द्रियों के लिए (ख) लाम दायक है। 'स' तो खन् (सोदना ) से बना है। रूप के सोलह पर्याय बाद में हैं। 'रूप' रुच् (धमकना) से । प्रशस्यनामानि उत्तरागि दश ( ३६८)। प्रज्ञानामानि उत्तरागि एकादश (३९) सत्यनामानि उत्तराणि पट् (३।१०)। मत्यं कस्मात् ? मत्सु तायते, मत्प्रभवं भवति इति वा । अटो उत्तराणि पदानि ( ३११) पश्यति कर्माणो धातव , चायतिप्रभृतीनि च नामानि आमिश्राणि'। नमोतराणि पदानि ( ३३१२) मर्वपदममाम्नानाय । अथात. उपमा.। 'यत् ८८ हिन्दी-निरुक्त अतत् तत्सदृशम्' इति गायः । तदासां कर्म ज्यायसा वा गुणेन प्रख्याततमेन वा कनीयांसं वा अप्रस्यातं वा उपमिमीते । अयापि कनीयसा ज्यायासम् ॥ १३ ॥ याद के दस 'प्रशसनीय' के पर्याय हैं। बाद के ग्यारह पर्याय बुद्धि के हैं। बाद के छह पर्याय सत्य के हैं। 'सत्य' कसे? यह अच्छे लोगो मे फैलता है या अच्छे लोगो से उत्पन्न होता है । वाद के आठ पद 'देखना' अर्थवाले धातु हैं और 'चायति' आदि (धातु) नाम (सना ) मे मिले हुए हैं । बाद के नौ पद सभी प्रकार के पदो के सरलन के लिए है। अब इसलिए उपमायें [ कही जाती हैं ]। गाय का कहना है कि जब [एक वस्तु ] दूसरी वस्तु से भिन्न हो किन्तु योडा सादृश्य रहे [ तब उपमा होती है ] । तब, इनका यह काम है कि किसी बडे गुण के द्वारा या प्रसिद्ध गुण के द्वारा किसी छोटी या अप्रसिद्ध वस्तु की उपमा दी जाय । इसके अलावे छोटी वस्तु के द्वारा भी बडी वस्तु की [ उपमा दी जाती है ] ॥ १३ ॥ विशेप-अलदारो के इतिहास के अध्ययन मे यह स्थल बहुत सहायक है । यास्क ने उपमा की बिलकुल ठोर परिभाषा उद्धृत की है । उपमा मे दो भिन्न पदार्थों की तुलना किसी एक समान गुण को ही लेकर की जाती है । तुलना करें- (१) साम्यं वाच्यमबधम्यं वाक्यक्य उपमा द्वयोः ( साहित्यदर्पण १०)। (?) A simile consists in giving formal expression to the likeness said between two different objects or events (J C Neisfield, English Grammar, P. 393) इस प्रकार उपमा की परिभाषा प्राच्य और पाश्चात्य दोनो देशो मे समान आधार पर ही दी गई है ।। १३ ।। तनूत्यजेव तस्करा वन रशनाभिर्दशभिरभ्यधोताम् । (वनर्ग) वन जानेवाले तया (तनुत्य जा ) पारीर की बाजी लगाने वाले (तस्करा इत्र) दो चोरो के समान (दशभिः ) दस — रशनाभि ) रस्सियों या अँगुलियो से ( अभ्यधीताम् ) सुरक्षित किया है (ऋ० १०४१६) " तनुत्यक् = तनूत्यक्ता । वन = वनगामिनौ। असिमन्थनौ वाहू तस्कराभ्याम् उपमिमीते । तस्कर.-तत्करोति यत्पापक- मिति नैरुक्ता. । तनोतेर्वा स्यात् । सन्ततकर्मा भवति । अहो- रातकर्मा वा। 'रशनाभिर्दशभिरभ्यधीताम्'। अभ्यघाताम् । ज्यायास्तत्र गुणोऽभिप्रेत. ॥ १४ ॥ to exist तृतीय अध्याय तनूरयक-गरीर को छोड़ने वाले (प्राणों की बाजी लगाने वाले )। वन = वन जाने वाले। ऐसे तस्करों से अग्निमन्थन करनेवाले वाह की दुलना की गई है। तस्कर, जो पार है उसे ही करता है-यह निरुतकारो का कथन है। या त्न् (फैलना) से बना हो क्योकि इसके काम कई तहर के होते हैं या दिन-रात दोनो ही समय काम करता है । दस गुलिया से सुरक्षित किया है-[ सुरक्षापूर्ण स्थान में ] रस दिया है। इस तरह अधिक गुण का क्यन है ।। १४ ॥ विशेप-इसमे अधिकगुणवाले को उपमा छोटी चीज से दी गई है। अग्नि उत्पन्न करने वाले दोनों हाय पवित्र हैं जिनको तुलना घोरों से की गई है। पद्यपि दोनो में बहुत भेद है फिर भी सादृश्य है कि जैसे चोर वन में अपने अधीन पयिक को बांधकर रख देते हैं वैसे ही दोनो हाय भी दो लकड़ियों को बांधकर यग्नि उत्पन्न करते हैं ॥ १४॥ कुह स्विद्दोपा कुह वस्तोरश्विना कुहाभिपित्वं करतः कुहोपतु.। को वा शयुना विधवेव देवरं मयं न योपा कृणुते सघस्थ आ । (अश्विना ) हे दोनों अश्विन् ! (दोरा) रात मे (कुह स्विद् ) कहा पे, (वस्तो ) दिन मे (कुह) कहाँ थे! ( अभिपित्वं ) अपने यावश्यक कार्य जैसे स्नान भोजनादि (मुह ) कहाँ (करतः ) आपने क्यिा ? (कुह ऊपतुः) कहाँ ठहरे थे? (सधम्प था) निवासस्थान मे (वा) तुम दोनो को (शत्रा) शम्या पर (कः) कौन (कृणुते ) ले जाता है ? (देवर विधवा इव ) जैसे देवर को विधा या ( मयं योषा न ) मनुष्य को पली [शय्या पर ले जाती है ] ( १०४०।२) क स्वित् रात्री भवयः ? क दिवा ? क अभिप्राप्ति कुरुथ.? क वसय.? को वा शयने विधवेव देवरम् (देवरः कस्मात् ? द्वितीयो यर उच्यते )। विधवा विधातृका भवति । विधवनाद वा विधा- वनाद चा इति चर्मशिरा. । अपि था, 'धव.' इति मनुष्यनाम । तद्वियोगात् विधवा । देवरो दीयतिकर्मा । मर्यो मनुप्य. मरण- धर्मा । योपा यौतेः । आकुरते सहस्थाने ॥ रात में रहा है। दिन में कहाँ ? मरने नियमं कहा किया? हो रहते हैं ? देकर को विषया के समान, भार दोनो की शम्पा,पर कौन? (देवर के मह दुपा पर कहा है 1) पिता सरसा से रहित D हिन्दी निरुक्त (विघा) होती है अथवा कापने के कारण (वि/धू) चर्मशिरा के अनुसार दिौडने के कारण (वि धाम् ) । अथपा 'a' - मनुष्य, उससे वियुक्त होने के कारण विधवा । देवर - सेलने वाला। मयं मनुष्य जिसका धर्म (लक्षण ) मरना है । योपा (स्त्री) यु ( जोडना) से । निवास-स्थान मे रखता है। विशेष--कोष्ठाकित खण्ड निश्चित रूप से प्रक्षेप है क्योंकि 'देवर' शब्द की दो -युत्पत्तियों का पृयक होना अस गत है । दुर्ग भी इसकी व्यख्या नहीं करते । विधवा, देवर, मयं भोर योपा का निर्वचन यास्क ने क्रम से दिया है, फिर उतना पहले देवर वा चला जाना असम्भव प्रतीत होता है। विधवा' को विधवा मानना लौकिक व्युत्पत्ति ( Folk Etymology ) का द्योतक है। वस्तुत यह शब्द अपने इसी रूप में अन्य समान भाषाओ गे है--ग्रीक entheos, लटिन Viduo, Viduus, zia Wittwe šo to (o e) Widae, अग्रेजी Widow 'पर' पृथक कोई शब्द नही पा किन्तु इसी युतत्ति से एक नया शब्द यन गया । इसकी पुष्टि मे 'माधव' ( मा लक्ष्मी का घव = पति ) मिल गया जो वस्तुत मधुरो निष्पन्न रूप मा। तभी अमरकोश मे 'धन प्रिय पनि भता' (२०६।३५ ) तथा 'पति शाखि नरा धा( ३।३।२०७) मिलते है । विधवा के काँगने का अर्थ है पनि की मृत्यु से बाद, उसका सरक्षकहीन होने पर दौडना भी स्वाभाविक है। अथ निपाता (३।१३) । पुरस्तादेव व्याख्याता (१।४-११) यथेति कर्मोपमा- 'यथा यातो यथा वन यथा समुद्र एजति ।' 'भ्राजन्तो अग्नयो यथा। 'आत्मा यक्ष्मस्य नश्यति पुरा जोवगृभो यया ।' आत्मा अततेर्वा, आप्तेर्वा । अपि वा, आप्त. इव स्याद् यावद व्याप्तिभूत.। 'असिन ये नाजसा रुक्मवक्षस ।' अमिरिव ये भ्राजस्वन्तो रुक्मवक्षस. ॥१५॥ अब निपानी का वर्णन है कि इनकी व्याख्या पहले ही हो चुकी है (निरुक ११४-११) । 'यथा' से कम की उपमा [ समझी जाती है ] जैसे- 'जो वायु, असे पन, जो समुद्र हिरते है' (ऋ० ५७८।८), 'जमे चमरने- तृतीय अध्याय ९१ वाली बग्नि' (ऋ० १०५०।३ ); क्षयरोग की आत्मा (जीवन) पहले ही समाप्त हो जाती है जैसे पकडे गये प्राणी का [ जीवन बिना मारे ही समाप्त हो जाता है ]' (ऋ० १०।९।११)। 'आत्मा' / अत् ( चलना ) से या Vथाप ( पाना ) से । अपना इसे 'आप्त' ( पाया हुआ) इसलिए कहा जाय कि यह व्यापक है। 'स्वर्ण के समान छाती वाले वे (सभी ) चमक के कारण अग्नि के समान हैं' (ऋ० १०७८२ )। वे जो अग्नि के समान चमकनेवाले तया सोने की छातीवाले ( मरुद्गण ) हैं ॥ १५ ॥ चतुरश्चिद्ददमानाद्विभौयादा निधातो.। न दुरुक्ताय स्पृहयेत् ॥ (आ निधातोः) जब तक वह [ पासों को ] न रखे तबतक ( चतुर ) चार [ पासो ] को ( ददमानात ) धारण करनेवाले व्यक्ति से (चित ) जमे (विभीयात् ) डरना चाहिये. ( दुरुक्ताय ) कठोर भाषण की (न स्पृहयेत् ) इच्छा नहीं करनी चाहिये । (ऋ० ११४१९) चतुरोक्षान् धारयतः इति तद्यथा कितवात् विभीयात् , एव- मेव दुरुक्ताद विभीयात् । न दुरुक्ताय स्पृहयेत् कदाचित् ॥ 'आ' इत्याकारः उपसर्ग. पुरस्तादेव व्यास्यात. (नि० ११३) । अथापि उपमार्थे दृश्यते-'जार आ भगम्' । जार इव भगम् । आदि- त्योऽत्र जार उच्यते, रात्रे रयिता। स एव भासाम्। तथापि निगमो भवति--'स्वसुर्जार. शृणोतु नः' इति । उपसमस्य स्व- सारमाह, साहचर्यात् रसहरणाद्वा । अपि त्वयं मनुष्यजार. एवाभिप्रेत. स्यात् । स्त्रीभगः तथा स्यात् , जिस प्रकार पार पासों को धारण करनेवाले जुम्राही (पिनव) से डरते है, येसे ही कटु वाणी से डरें। क्टु वाप [ बोलने के लिए ] कभी उत्सुक भजतेः ।। - 'आ' उपसर्ग की व्याख्श पहले ही हो चुकी है। इसे उपमा के श्रई में भी देखते है-जैसे भोक्ता अपनी भोग वस्तु पर" (ऋ० १०१११६)। अपनी भोग-परतु [ पर जाने वाले ] भोसा रे गमान । यो पाश्यि ही भौता (आर) है, राधिका भोता वही प्रमाया भी [ोता। ऐसे बंदिश उतरण भी -बहन स भोला हमारी (प्रार्थना) मुने' ९२ हिन्दी निरुक्त (ऋ० ६।५५।५)। ऊषा को इसकी वहन कहा है, साथ चलने के कारण, या रस लेने के कारण। अयवा यह मानव-प्रेमी ही कहा गया हो, उस दशा में स्त्री का उपभोग समझा जाय, भज् ( उपभोग करना ) से [भग बना है] ॥ मेपः इति भृतोपमा । 'मेपो भूतोऽभि यन्नय.' । मेपो मिपते., तथा पशु. पश्यते । अमिरिति रूपोपमा। 'हिरण्यरूप. स हिरण्यसदृगपानपात्सेदु हिरण्यवर्णः ।' हिरण्यवर्णस्येवास्य रूपम् । 'था' इति च (निव० ३।१३।१२) 'त प्रत्नथा पूर्वथा विश्वमथा' प्रत्ने। इव, पूर्वे इव, विश्वे इव, इमे इव इति । 'अयम्' एततरोऽमुष्मात् । 'असौ' अस्ततर. अस्मात् । अमुथा = यथा असो इति व्याख्यातम्। वत् इति सिद्धोपमा । ब्राह्मणवत्, वृषलवत् ब्राह्मणा इव, वृपला इव इति ॥ १६ ॥ मेष (भेंड ) इत्यादि मे भून ( रूप परिवर्तन ) को उपमा है-'भेंड का रूप बनाकर तुम आये हो' ( ऋ० ८।२०४०)। मेप /मित् ( पलक गिराना) से, उसी प्रकार पशु पश् ( देखना ) से । अग्नि इत्यादि मे रूप ( आकार ) की उपमा है-'सोने के आकार का सोने के समान चमकनेवाला तथा सोने के रग का, जल का पुत्र बैठा है' ( ऋ० २१३५।१०)। सोने के समान उसका रूप है । 'था' भी [ उपमा दिखाने के लिए आता है ]-प्राचीन के समान, पहले के समान, सबके समान तथा इनके समान उसे [ दूहते हो ] (ऋ० ५।४४।१)। प्राचीनो-सा, पहले वालो सा, सबो-सा. इव (यजमानो)। सा । 'अयम्' (यह ) = जो उससे निकटतर (/) है। 'असो' ( वह ) = जो इससे दूरतर ( अस् ) है । अमुथा = जैमा वह--इसकी व्याख्या होती है । 'बत् सिद्ध (पूरे वाम ) को उपमा है-माह्मणवत्, वृपलवत् = ब्राह्मग- सा, निन्दनीय व्यक्ति-सा ॥ १६ ॥ विशेप-यार अपनी धुन मे 'असो' और 'अयम्' जैसे सर्वनामों का भी निर्वचन करने से नहीं चूक्ते । सिद्ध का मतलब है कार्यसिद्धि जसे वह ब्राह्मण के समान पढना है। प्रियमेधवदत्रिवनातवेदो विरूपवत् । अङ्गिरस्वन्महिनत प्रस्कण्वस्य श्रुधी हवम् ।। (महिवन ! हे बडे नियमो वाले ! (जातवेद ) सभी जीव तुम्हारी सम्पत्ति के रूप में हैं, प्रियमेघ के समान, अत्रि के समान, विरूप के समान तृतीय अध्याय - तथा अगिरा के समान, प्रस्वाद-ऋषि की (हवम् ) प्रार्थना (श्रुधी) सुनो (ऋ० ११४५॥३॥ प्रियमेघ.—प्रिया. अस्य मेधा.। यथैतेपाम् ऋषीणाम्। प्रस्क- पवस्य शृण ह्वानम् । प्रस्कण्व -कण्वस्य पुन, कण्वप्रभव । यथा प्राग्रम्। अचिपि मृगु.सम्बभूव । मृगु मृज्यमानो न देहे। अङ्गारेषु अङ्गिराः । अङ्गारा. अङ्कना.। 'अत्रैव तृतीयम् ऋच्छत' इत्यूनु.। तस्मात् अत्रिः । न त्रय. इति । विखननात् वैखानसः। भरणात् भरद्वाज । विरूप =नानारुप. । महिबत =महाव्रतः इति ॥१७॥ प्रियमेध=जिसे यज्ञ प्रिय हैं। जैसे इन ऋषियों की प्रार्थना सुनी ], वैसे ही प्रस्कण्व की प्रार्थना सुनो। प्रसव = कण्व का पुत्र, पप्प से उत्पन्न (प्रभव+क)। जैसे 'प्राण' बनता है (प्र+अग्र)। मगु ज्वालाओं से निकले । मुगु-भूजे जाने पर भी (भन ) जो न जले। यगारो से अगिरा [निकले ] । अगार = अक ( चिह्न) देने वाले । उन्होंने कहा- तीसरे व्यक्ति को यहीं खोजो'. इसी से 'अत्रि' (अत्र+तृतीय) दना। अथवा जो चीन नहीं है (अ+नि)। अच्छी तरह खोदने के कारण 'वैखानस' । मरण (पालन, V) करने से 'भरद्वाज । विरूप कई प्रकार का। महिवन = बडे प्रों वाला ॥१७॥ चतुर्थ-पाद अय लुप्तोपमानि अर्योपमानि इत्याचक्षते । सिंह. व्यानः इति पूजायाम् । श्वा काक. इति कुत्लायाम् । काक इति शब्दानुकृतिः। तदिन शकुनिषु बहुलम् । न शब्दानुकृति विद्यते-इत्यौपमन्यव । काक असमालयितव्यो भवति। तित्तिरि तरणात् । तिलमायचिन. इति वा । कपिज्जल कपिरिव जोणं., कपिरिव जयते । ईपत्ति- गलो वा । कमनीय शब्द पिज्जयति इति वा । श्वाध्यायी, शवो. वा स्यात् गतिश्मंग । श्वसितेा । सिंहः महनात् , हिमा विपरीतस्य । सम्पूर्वस्य या हन्ते । सहाय हन्ति इति वा। व्यानः प्याभागान् । पादाय हन्ति इति वा ॥ १८ ॥ .
६४ - हिन्दी-निरुक्त अब उन ( पदो) का वर्णन करते हैं जिनके अर्थ से उपमा दी जाती है तथा जिनमे उपमा के वाचक (जमे इव, यया, वत् आदि) लुप्त रहते हैं। सम्मान के अर्थ में सिंह, व्याघ्र से [ उपमा दी जाती है ] । कुत्ता, कौआ से निन्दा के अर्थ मे । 'काक' यह [ कौए के ] शब्द का अनुकरण है। यह विधि पक्षियो [ के नाम देने मे ] बहुधा देखी जाती है । औपमन्यव का गिद्धान्त है कि शब्दानुकरण ( Onomatopocia ) होता ही नहीं इसलिए काक वह है जो भगाने के लायक हो ( कल् ); तित्तिर' फुदकने के कारण (/), अथवा जिसमे तिल के आकार के ही चित्र ( छाप ) बने हो । 'कपिजल' ( francolin partridge) कपि के समान जीणं ( वर्वाद ), या बन्दर जैसा तेज दौडता है (/जद ), या थोडा भूरा होता है, या कमनीय शब्द बोलता है। कुत्ता ( वा ) तेज चलने वाला ( आशु /या), या गत्यर्थक/ शव से, या सांस लेने से। 'सिंह' दमनशक्ति के कारण (सिह ) या /हिस ( मारना ) उलट करके बना हो। या सम-पूर्व हन् से या जमा करके भारता है। व्याघ्र' सूधने के कारण (वि आ./प्रा) या अलग करके मारता है ।। विशेप--अब तक उपमा के उन भेदो से याक भिडे थे जिनमे वाचक शब्द रहते हैं, अब ये लुभवाचक पदो का वर्णन कर रहे हैं । शब्दो को उत्पत्ति मे शब्दानुकरण का बहुत बड़ा हाथ है इममे कोई सन्देह नही। पास्क को यह मालूम था किन्तु उस सिद्धान्त का भी खण्डन करने वाले औपमन्यव हैं जो पक्के नैरक्त हैं । तुलना करें-मैक्समूलर का शब्दानुकरण सिद्धान्त । शव---तुल. शवतिर्गतिकर्मा कम्बोजेष्वेव भाष्यते, विकारमस्यायेंषु शव इति ।' (नि० २२२) 'सिंह' पर पाणिनि-मत है- भवेद्वर्णागमाद्धसो सिंही वर्णविपर्ययात् । गूढोरमा वर्णविकृतेवर्णनाशात्पृषोदरम् ॥ अर्चतिकर्माण. उत्तरे धातव चतुश्चत्वारिंशत् (३।१४)। मेधा- विनामानि उत्तराणि चतुर्विशति (३।१५) । मेधावी कस्मात् ? मेधया तद्वान् भवति। मेघा मती धीयते। स्तोतृनामानि उत्तराणि अयोदश ( ३।१६)। यज्ञनामानि उत्तराणि पश्चदश (३।१७) । यज्ञ. कस्मात् ? प्रस्यात यजतिकर्म इति नैरुता । याच्नो भवति इति वा। यजुरुन्नोभवति इति वा । बहुवृष्णाजिन. इत्यौपमन्यवः । यजूपि एन नयन्ति इति वा । ऋत्विङ्नामानि उत्तराणि अष्टी ।
तृतीय अध्याय ६५ (३।१८) । ऋत्विक् कस्मात् ? ईरण । ऋग्यष्टा भवति इति शाकपूणि । ऋतुयाजी भवतीति वा । दाद के चौआलीस धातु पूजाधक है । वाद के चौबीस, मेघावो के पर्याय है। मेधावी कसे ? चूकि उस मेघा से युक्त होता है । मेधा = जिसे बुद्धि मे धारण करें। बाद के तेरह नाम स्तोता के है। वाद के प द्रह नाम यज्ञ के है । यन कैसे ? निरुतभार कहते है कि यह विग्यात पूजा का काम है । अथवा [देवता] इमकी याचा करते हैं, अथवा यजु के मत्रो से छिड का जाता है। औपमन्यव के अनुसार-बहुत से काले मृगचर्मों वाला । अथवा यजु क मन्त्र इसका निर्देशन करते है । बाद के आठ नाम ऋत्विक के है। ऋत्यिक कैसे ? [यज्ञ का] बढ़ाने वाला । शाकपूणि के अनुसार यह ऋग्वेद के द्वारा यज्ञ कराता है । अथवा उचित समय पर यज्ञ कराता है। याच्याकर्माण उत्तरे धातव सप्तदश (३।१९)। दानकर्माण उत्तरे धातवो दश (३।२०) अध्यषणाकर्माण उत्तरे धातवश्चत्वार (३३२१)। स्वपितिसस्तीति द्वौ स्वपितिकर्माणो (३३२२) । कूप- नामानि उत्तराणि चतुदश (३।२३)। कूप कस्मात् ? कुपान भवति । कुप्यते वा । स्तेननामानि उत्तराणि चतुर्दश एव(३।२४)। स्तेन कस्मात् ? सस्त्यानमस्मिन् पापकमिति नेरुका । निर्गीता- न्तर्हितनामधेयानि उत्तराणि पट् (३६२५)। दूरनामानि उत्तराणि पञ्च (३।२६) दूर कस्मात् ? द्रुत भवति । दुरय वा । पुराण- नामानि उत्तराणि पट (३।२७) । पुराण कस्मात् ? पुरा नव भवति । नवनामानि उत्तराणि पडेव (३३२८)। नव कस्मात् ? आनीत भवति ।। १९॥ वाद के सत्रह धातु मांगना' अथ वाले हैं । 'देना' अथवाले बाद के दस धातु है। बाद के चार धातु विनम्न प्राथना (entreaty ) अय वाले है । 'सोना' अथवाले दो धातु स्वपिति' और सस्ति' है। बाद के चौदह नाम कप के है। कूप कैसे ? इससे पानी पीना कठिन है (कु+/पा ) या Vकुप् (त्रोध परना) से। बाद के पौदह ही नाम चोर के है। स्तेन स ? नियतारी के अनुसार इसम पाप ठहरता है । याद फे छह नाम निश्चित किय गये तया छिपे हुए के हैं। बाद के पर्याय दूर के हैं। दूर से? चूंकि यह हिन्दी निरुक्त खीचा हुआ है (द) या जहाँ पहुँचना कठिन है (द/इ) बाद के छह नाम पुराण (प्राचीन ) के हैं। पुराण से पहले नया था। बाद के छह हो नाम नवीन व है । नव कस ? चूवि तुरत का लाया हुआ है ॥ १९॥ द्विश नामानि उत्तराणि ( ३।२९)। प्रपित्वे-अभीके इत्यासन्नस्य । प्रपित्वे-प्राप्ते, अभीके अभ्यते । 'आपित्वे न प्रपित्वे यमागहि', 'अभीके चिदु लोकनृत्' इत्यपि निगमी भवत ॥ दभ्रम्-अभंगम् इत्यल्पस्य। दभ्र दन्नोते । सुदम्भ भवति । अर्भवम् अपहृत 'उपाप मे परामृश मा मे दभ्राणि मन्यथा', 'नमो महद्भ्यो नमो अर्भवेभ्य' इत्यपि निगमी भवत ॥ तिर-मत इति प्राप्तम्य । तिर तीर्ण भवति, सत मसत भवति । 'तिरश्चिदयंया परि वर्तिर्यातमदान्या', 'पात्र भिन्दन्मन एति रक्षस' इत्यपि निगमी भवत ॥ भवति।
- हुया तृतीय अध्याय हरतेः विपरीतात् , धारयतेः वा स्यात् । उद्धृतं भवति । ऋघ्नोतेः वा स्यात् । ऋद्धतमो विभागः । 'पोयति त्वो अनु त्यो गृणाति', 'नेमे देवा नेमेसुराः'- इत्यपि निगमौ भवतः ॥ ऋक्षाः-स्तृभिः इति नक्षत्राणाम् । नक्षत्राणि नक्षतेः मतिकर्मणः। 'नेमानि क्षत्राणि' इति च ब्राह्मणम् । ऋक्षाः उदीर्णानि इव ख्यायन्ते। स्तृभिः तीर्णानि इव ख्यायन्ते। 'अमी य ऋक्षा निहितास उच्चा', 'पश्यन्तो द्यामिव स्तृभि.' इत्यपि निगमौ भवतः ॥ (७-८) 'स्व' और 'नेम' आधा के अर्थ मे। त्व = पूरा फैला नही । नेम = पूरा नहीं लाया हुआ हो । अर्घ ह ( हरण करना) को उलटने पर; या धारण करने से चूंकि यह निकाला हुआ होता है ( उत् ५)। या /ऋथ् ( बढाना ) मे क्योकि यह [एक के सभी ] विभागों में बड़ा है । 'आधे लोग निन्दा करते हैं, आधै प्रशसा' (ऋ० १।१४७०२ ); 'आधे देवता हैं बाधे राक्षस' ( मंत्रा० सं० १११९)-ये वैदिक उद्धरण हैं । (९-१०) 'ऋक्षा.' और 'स्तृभिः' नक्षत्रों के अर्थ मे । नक्षत्र गत्यर्थक नस् से । ब्राह्मण- वाक्य भी है-'ये ( तारे ) स्वर्ण (क्षत्र ) नही है । 'ऋक्ष' ( तारे ) उठे हुए मालूम पड़ते हैं। 'स्तृभिः' ( तारे ) [आकाश मे] विखरे हुए दिखाई पड़ते हैं। ये तारे जो ऊंचा पर रखे गये हैं...' ऋ० १०२४१० 'मानों तारों से मरे आकाश को देखते हुए (ऋ० ४७१३)-ये वैदिक उद्धरण हैं ।। वम्रोभि:-उपजिबिकाः इति सीमिकानाम् । वनयः वमनात् । सीमिकाः स्यमनात् । उपजिलिकाः उपजिव्रवः । 'यदत्त्युपजिबिका यदृम्रो अतिसर्पति' इत्यपि निगमो भवति ।। ऊर्दरं-कृदरं इति आवपनस्याऊदरम् उद्दीर्ण भवति । ऊर्जे दीर्णमिति वा । 'तमूर्दरं न पृणता यवेन'–इत्यपि निगमो भवति । तम् ऊदरमिव पूरयति यवन । कृदरं कृतदरं भवति । 'समिद्धो अञ्जन्कृदरं मतीनाम्' इत्यपि निगमो भवति ॥ २० ॥ (११-१२) 'वनीभिः' और 'उपजिह्विा.' चीटियों के अर्थ मे । 'वम्रो' ७ हि०नि० हिन्दी निरुक्त वमन करने कारण । सीमिका रेंगने के कारण । उपजिहिकार संघने वाली। 'जब चीटी खाती है, जब चीटी चलती है' ( ऋ० ८.१०२।२१)--यह वैदिक उद्धरण है । (१३-१४) 'उदर' और कृदर' अग्नमडार के अथ मे । उदर = ऊपर की ओर कटा हुआ या अन्न के लिए कटा हुआ । 'जो से अन्नभडार की भांति उसे भरो' (ऋ० २।१४।११)-यह वैदिक उदाहरण है। उसे अग्नागार की तरह जो से भरता है । कृदर = जिसमे छेद किया हुआ हो। 'जलने पर बुद्धि के अनभडार को प्रकाशित करते हुए।' (म० स० ३।१६।२)-यह उदाहरण है ॥ २०॥ रम्भ-पिनाकम् इति दण्डस्य । रम्भ आरभन्ते एनम् । 'आ त्वा रम्भं न जित्यो ररम्भा'-इत्यपि निगमो भवति । आरभामहे त्वा जीर्णा. इव दण्डम् । पिनाक प्रतिपिनष्टि एनेन । 'कृत्तिवासा. पिनाकहस्तोऽवततधन्वा'--इत्यपि निगमो भवति ॥ मेना-सा इति त्रीणाम् । स्त्रिय स्त्यायते. अपनपण- कर्मण । मेना =मानयन्ति एना । सा.= गच्छन्ति एना । 'अमेनाँश्चिन्जनिवतश्चकर्थ', 'मास्त्वाकृन्तन्नपसोऽतन्वत' इत्यपि निगमौ भवत ॥ (१५-१६) 'रम्भ' और 'पिना' डण्डे के अर्थ म । रम्भ - पकहते हैं । 'बूढे जैसे लाठी को [ पकहते हैं ] वैसे ही तुम्हें हमने पडा है (ऋ० ८।४५।२०)--यह वैदिक उद्धरण है। हम तुम पर आश्रित है जैस कमजोर [ आदमी ] हण्डे पर। पिनाच ( हड्डी ) = जिससे पीस दे ( नाश कर दे )। चमडे को पहने हुए, हाथ मे त्रिशूल लिये, तथा न झुरने वारा धनुष लिये हुए' ( काठक स. ९१८)-यह वैदिक उद्धरण है। (१७३१८) 'मेना और ग्ना' स्त्रियो के अथ म । स्त्री त्य- 'लजाना' से। मना = लोग जिसे ( एना ) माने। ग्ना = जिसके पाम लोग जाय ( गम् ) । 'पत्नीहीन को भी तुमने सपत्नीक कर दिया है (ऋ० १३१॥२) स्त्रियों ने तुम्हें पारा, मनिष्ठों न पाया' (मै० स० १।९।४) वैदिर उदाहरण हैं | शेप -वैतम इति पुस्प्रजननस्य । शेप शपते स्पृशति- कर्मण । वैतस वितस्त भवति । 'यस्यामुशन्त प्रहराम शेपम्','त्रि' स्म माह्न नथयो वैतमेन'-इत्यपि निगमी भरत. ॥ अया-एना इसे लोग तृतीय अध्याय १९९ इत्युपदेशस्य। 'अया ते अग्ने समिधा विधेम' इति स्त्रिया. । 'एना वो अग्निम्' इति नपुसकस्य । “एना पत्या तन्व स सृजस्व'-इति पुस ॥ (१९-२०) 'शेप' और वैतस' पुरुष के जननेन्द्रिय के अर्थ मे। शेप 'छूना' अर्थ वाले शप् से । वनस मुरझाया हुआ होता है। [ पुत्र की ] कामना करते हुए हम जिसमे शेप का प्रहार करें' (ऋ० १०८५।३७ ), उर्वशी पुरूरवा से कहती है-] 'तुमने दिन में तीन बार मुझ पर वैतस ( इन्द्रिय ) का प्रहार किया है' (ऋ० १०।९५५)-ये वैदिक उदाहरण हैं । (२१-२२) अया' और एना' उल्लेख करने के अर्थ मे। हे अग्ने । इस (अया) समिधा से हम तेरो पूजा करें (ऋ० ४।४।१५)-यहाँ स्त्रीलिंग (समिधा ) मे । 'हे अग्ने । हमारे पास इसके द्वारा (एना) (ऋ० ७.१३।१)- यहाँ नपुसकलिंग म। 'इस ( एना) पति से अपने शरीर को मिलाओ' (ऋ० १०।०५।२७)-यहाँ पुलिंग मे ।। सिपक्त-सचते इति सेवमानस्य । ‘स न सिपक्तु यस्तुर'। स न सेवता यस्तुर | 'सचस्वा न स्वस्तये । सेवस्व न. स्व- स्तये । स्वस्ति इत्यविनाशिनाम । अस्ति. अभिपूजित स्व- स्तीति ॥ भ्यसते-रेजते इति भयवेपनयो । 'यस्य शुष्माद्रोदसी अभ्यसेताम्', 'रेजते अग्ने पृथिवी मखेभ्य'-इत्यपि निगमौ भवत ॥ द्यावापृथिवीनामधेयानि उत्तराणि चतुर्विशति ( ३।३०)। तयोरेषा भवति ॥ २१ ॥ (२३-२४) 'सिषक्तु' और सचते' सेवा के अर्थ मे । 'जो तेज (तुर ) है वह हमारी सेवा करे' (ऋ० १६१८०२) जो पटु है वह हमारी सेवा करे। अपने कल्याण के लिए सेवा करो ( ऋ० १३०९)-अपने कल्याण के लिए सेवा करो। 'स्वस्ति' अविनाश का पर्याय है-सम्मान के साथ रहना, अच्छी तरह (सु) रहता है ( अस्ति)। ( २५-२६ ) भ्यसते' और 'रेजते' भय और कम्पन के पर्याय हैं। जिसकी सांस स स्वग और पृथ्वी डर गये' (ऋ० २।१२।१) हे अग्ने । बडे बडे ( मरुतो सो, पृथ्वी कापती है' ( ऋ० ६६६।९)-ये वैदिक उद्धरण हैं।
१०० हिन्दी-निरक्त बाद के चौबीस नाम द्यावापृथिवी के हैं। उनके विषय में यह (ऋचा ) है-! २१ ॥ कतरा पूर्वा कतरापरायो कथा जाते कवय को वि वेद । विश्व त्मना विभृतो यद्ध नाम विवर्तेते अहनो चक्रियेव ।। (अयो = अनयो ) इन दोनो म (कतरा पूर्वा ) कौन पहल की और ( कतरा अपरा) कौन बाद की है ? ( कवय ) हे ऋपियो । (क्था = क्थ) कैसे ( जाते ) ये उत्पन्न हुई (क विवेद ) कौन जानता है ? (विश्व यद् ह नाम ) सभी चीजो को वे (मना = आत्मना ) अपने से (विभूत ) धारण करती हैं, ( अहनी ) दोनो दिन ( चक्रिया इव ) चक्के के समान (विवतते ) घूमते हैं । (ऋ० १३१८५१)। कतरा पूर्वा, कतरा अपरा, एनयो । कय जाते ? कवयः । क एते विजानाति ? सर्वम् आत्मना विमृतो यद् ह एनयो कर्म । विवत्तते च एनयो अहनी अहोराने चक्र्युक्ते इव । इति द्यावापृथिव्यो महिमानम् आचष्टे आचष्टे ॥ २२ ॥ इन दोनो म कौन पहली है कौन दाद की? से उत्पन्न हुई? हे ऋपि अच्छी तरह कौन जानता है ? जो कुछ इनर काम हैं उन सवो को अपने स धारण करती हैं इन दोनो दिन अथात रात और दिन नको ये समान घूमते हैं । इस प्रकार स्वग और पृथ्वी की महिमा का वणन हुआ है । ॥ इति निरुवते तृतीयो ध्याय ॥ गण ।
चतुर्थ-अध्याय प्रथम-पाद ॐ एकार्थमनेकशब्दम्-इत्येतदुक्तम् । अथ यानि अनेका- नि एकशब्दानि तानि अतोऽनुक्रमिष्याम., अनवगतसंस्का- राश्च निगमान् । तत् 'एकपदिकम्' इत्याचक्षते । जहा ( निघ० ४।१।१ ) जघानेत्यर्थ.॥ ऊपर उस [ सग्रह ] की व्याख्या हुई है जिसमें एक समान अर्थ धारण करने वाले अनेक दाब्द हैं ( = पर्यायवाची)। अद हम उन ( पदो) की घाख्या करेंगे जिनमे एक शब्द के अनेक अर्थ है तथा ये ऐसे वैदिक सन्द हैं जिनकी रचना (प्रकृति-प्रत्यप द्वारा बनावट ) मालूम नहीं। इस (संग्रह) को लोग ऐक्पदिक' [ --काण्ड ] (या नंगम काण्ड) कहते हैं । 'जहा' = मारा (हन +ल्टि)॥१॥ विशेप-निघण्णु के प्रथम तीन अध्यायो मे पर्यायवाची शन्दों का संग्रह है जिसकी व्यास्या मक्षित-दर से यास्क ने निरुक्त के दूसरे और तीसरे अध्ययों में कर दी। उसे नघण्टुर काण्ड कहते हैं । निघण्टु के चतुर्थ अध्याय में स्वतत्र माग्दो का संग्रह है जिसमें प्रत्येक पाद के अनेक अय है तथा प्राय ऐसे शब्द हैं जिनके सस्कार ( Formation ) कठिन हैं । प्रत्येक पद के स्वनत्र होने के कारण इस पार को ऐकादिक कहते हैं और इसके पदों को व्याया निकक के चतुर्य, पञ्चम और पष्ठ अध्यायो में हुई है । नघण्टुक-काण्ड के दाम Synonym तया नंगम (ऐकदिल )- वे शब्द Homonym कहलाते हैं ।। १ ॥ को नु मर्या अमियित. सवा ससायमत्रवीत् । जहा को अम्मदीपते ॥ (म ) है मनुष्यों ! (को नु) मि (मदा ) मित्र ने (अनीत) बहा है मि[ मैंने ] ( अमिथित ) उभिन हुए गिना, बिना कुछ कहे ही (सपापम् ) अपने मित्र को (जहा) मार गण? (को) र्शन (अम्मा ) हमारे पास मे (ई) भागता है' (३.८३७)1, मर्या. इति मनुप्यनाम । मर्यादाभियान • वा स्यात् ।
7 . १०२ हिन्दी-निरुक्त [ मर्यादा = मयें. आदीयते । ] मर्यादा--मर्यादिनो. विभाग । मेथति आक्रोशकर्मा । अपापक जघान कमह जातु ? कोऽस्म- भीत. पलायते ? 'मयं मनुष्य का पर्याय या मर्यादा (सोमा) का नाम है । मर्यादा%D जिसे मनुष्प निश्चित करें। मर्यादा = दो सीमित स्थानो का विभाग [ करने वाली रेग्वा ] / मेथ् = उतेजित करना, चिल्लाना। किस निरपराध को मैंने कमी भी मारा है ? मुझसे डरकर कोन भागता है विशेष-मत्र के देवता का कहना है कि बिना किसी अपराध के मैंने किसी को नहीं मारा, पापी को ही मैं मारता हूँ। यदि शाप भी शीघ्र निष्पाप हो जायं तो नही मारूंगा। पाप न करनेवाल नहीं भागते-दुग 'जहा' मे/हन या हा ( छोडना ) की सम्भावना है किन्तु निरुक्तकार/हन ही लेते हैं। निधा (२) पाश्या भवति । यन्निधीयते । पाश्या = पाशसमूह । पाश. पाशयते । विपाशनात् ॥ २ ॥ निधा : जाल ( पाश्या ) जिसे [ नीचे ] रखा जाय । पाश्या = जालों का समूह । पाश/पर ( बाँधना) से, क्योकि बांधा जाता है ॥२॥ वय सुपर्णा उप सेदुरिन्द्र प्रियमेधा ऋपयो नाधमाना । अप ध्वान्तमूणुहि पूर्षि चक्षुर्मुमुग्ध्यस्मानिधयेव वद्वान् ॥ (सुपर्णा ) सुन्दर पहवाले (वय ) पक्षियो के समान (प्रियमधा । यज्ञो के प्रमी, ( नाधमाना ) याचना करते हुए ( ऋषय ) ऋषिगण ( इन्द्रम् ) इन्द्र के पास ( उपसेदु ) पहुंचे । (ध्वान्तम् ) के हुए स्थान को (अप जणुहि ) खोल दो (चक्षु ) बसि । धि) भर दो, ( अस्मान् ) हमारे-जैसे { निधया इव ) मानो जाल से ( बद्धान ) बंधे हुए लोगों को {ममुग्धि ) छोड दो ( ऋ० १०७३।११) ॥ चे. बहुवचनम् । सुपर्णा. सुपतना आदित्यरश्मय । उपसेदु. इन्द्र याचमाना । अपोर्णहि आध्वस्त चक्षु. । चक्षु. ख्याते. वा, चष्टे. वा। पूधि = पूरय, दैहि इति वा । मुञ्च अस्मान् पाशैरिव बद्धान ॥ वय - वि (पक्षी) का बहुवचन । मुपर्ण अर्थात अच्छी तरह पडने वाली सूर्य की किरणें । इन्द्र के पास याचना करती हुई पहुंची। हमारी घिरी हुई दृष्टि को खोल दो। चक्षु-स्या (जानना ) याचक्ष ( देखना) मैं। वय.
. । चतुर्थ अध्याय पूधि r= पूरा करो, या दे दो। मानो जालो से बंधे हुए हम लोगो को छोड़ दो। 'पावतः श्रोणित: शितामतः' । पार्श्व पशुमयम् अङ्ग भवति। पशु. स्पृशतेः। संस्पृष्टा पृष्ठदेशम् । पृष्ठं स्पृशतेः । संस्पृ- पम् अङ्गैः। अङ्गम् अङ्गनात् , अञ्चनाद्वा। श्रोणि: श्रोणतेः गतिचलाकर्मणः । श्रोणिः चलतीव गच्छतः । दोः शिताम (३) भवति । दोः द्रवतेः । योनि. शिताम इति शाकपूणिः । विपितो भवति । श्यामतः यकृत्तः इति तैटीकिः । श्यामं श्यायतेः । यकृत् यथा कथा च कृत्यते। शितिमांसतः मेदस्त. इति गालवः । शिति: श्यतेः । मांसं माननं वा, मानसं वा। मनः अस्मिन् सीदति इति वा ।'मदः मेद्यतेः ॥ ३ ।। पंसुली से, कमर से और बाहुओं से (वाजस० स० २१६४३ का खण्ड)। पसुली का भाग अर्थात् सन्धियुक्त शरीर । पशु (पुंसुली, सन्धि ) स्पृश् (छूना ) से, क्योकि पीछे के भाग को छूना है। 'पृष्ठ' /स्पृश से, क्योंकि यह वागेर [ के अन्य भागो] से छुआ जाता है । अग/अज् ( चिह्नित होना ) या /अञ्च ( झुकना ) से । 'श्रीणि, 'आगे बढना' अर्थ वाले /श्रोण से, क्योकि चलने हुए (व्यक्ति ) की कमर ( नितम्ब ) आगे बढती हुई-सी प्रतीति होती है । शिताम = बाहु (दोः)। दो / (दोडना ) से । शाकपूणि के अनुसार शिताम = योनि, क्योंकि खुली हुई होती है । सैटीकि के अनुसार श्याम-वण होने के कारण इसका अर्थ यकृत् ( Liver ) है। श्याम श्य ( धनीभवन ) से ( = घना रंग)। यकृत् जिस किसी तरह कटता है ( बिना यत्न के-दुर्ग)। गालव के अनुसार काला मास होने के कारण इसका अर्थ मैद (चर्वी) है। शिति- शो ( = तेज करना, पजाना ) से । मास-माननीय ( = आदरणीय व्यक्ति के लिए दिया जाय-दुर्ग) या चिन्तनीय (मन मे आनन्द लिया जाय- दुर्ग ) । अथवा मन इसमे नष्ट हो जाता है । मेदस् । मिद् (मोटा होना) से ।। विशेष-दुर्गाचार्य ने इस प्रसग मे दस प्रकार के अनवगम (अर्थात् पदो के संस्कार आदि को न जानना ) दिखलाये हैं । वे हैं-(१) पदजाति ( Kinds of words) को न जानना जैसे 'स्व' नाम है कि निपात ? (२) अभिधेय ( meaning ) जैसे शिताम। (३) स्वर ( accent ) जैसे बने न वा यो। (४) सस्कार (formation ) जैसे ईन्तिासः । (५)गुण (Quality ) जैसे करूलती। (६) विभाग (Internal division) जसे-महना (मे-हना)।
१०४ हिन्दी निरुक्त (७) म ( order ) उपरमध्व मे वचसे । (८) विक्षेप (Exclusion) द्यावा न पृथिवी । ( १ ) अध्याहार ( Inclusion ) दानमनसो नो मनुष्यान् । (१०) व्यवधान ( Intervention ) वायुश्च नियुत्वान । इस प्रकार वैदिक पदो की व्याख्या मे ये दस प्रकार की कठिनाइयां आती हैं जिन्हें बौद्ध भाषा मे Ten unknowables कहा जा सकता है ॥३॥ यदिन्द्र चित्र मेहनास्ति त्वादातमद्रिव । राधस्तन्नो विदद्वस उभयाहस्त्या भर ।। ( इन्द्र ) है इन्द्र । ( यत् ) जो कुछ भी (चित्र ) चुनने योग्य तथा ( मेहना ) प्रशसनीय धन है ( अद्रिव ) हे वचपारिन् । ( त्वादातम् ) तुम दे दो। विदद्वसो हे धन को जानने वाले । (उभयाहस्त्या) दोनो हाथो से (तत् राघ) उस धन को (न) हमे (आ भर) ला दो। (ऋ० ५।३९।१ ) । विशेष-'चित को महना का विशेषण मानना ठीक नही, उसमे सर्वानदात्त होने से उसे सम्बोधन मानकर 'इन्द्र का विशपण लेना ठीक है । स्वादातम्- 'त्वया दातव्यम् का समास । अद्रिव - अद्रि + मतुप्-सम्बोधन में अद्रिवन् 'मतुवसो रु सम्बुद्धौ छ दसि (पा० सू० ८।३।१ ) से अद्रिय । विदद्वसु-मक- डोनल का Governing compound सम्बोधन मे विदद्वसो ॥ यदिन्द्र चायनीय महनीय धनमस्ति । यत् मे इह नास्ति इति वा नीणि मध्यमानि पदानि । त्वया न तद् दातव्यम् । अद्रिवन् । अद्रि आदृणाति एनेन । अपि वा–अत्ते स्यात् । 'ते सोमाद 'इति ह विज्ञायते । राध इति धननाम । रानुः वन्ति एनेन। तन त्व, वित्तधन | उभाभ्या हस्ताभ्याम् आहर । उभो समुब्धो भवत ॥ । जो कुछ भी सु दर और आदरणीय धन है। अथवा में तीन मध्यम पद हो-जो मुझ यहाँ नही है (मे ह ना), आप हम वह दे दें। है वच धारण करने वाल ! अद्रि अर्थात् जिसस [इंद्र पहाडो को तोहता है । अथवा / अद् (खाना ) से, वे सोम के खान वाले हैं (ऋ० १००९) यह मालूम भी है । राध धन का पर्याय है क्योकि इसी स लोग प्राप्त करत हैं। हे घन के ज्ञाता विहीं तुम हमारे लिए दोनो हाथो स रामा । उभय = जा मरे हुए हो ( उम् ॥ .
चतुर्थ अध्याय
दमूना, (४) दममना. वा, दानमना वा, दान्तमना वा ।
अपि वा, दम इति गृहनाम, तन्मना स्यात् । मन मनोते ॥४॥
दमूना: = दया की बुद्धि से युक्त दान करने की बुद्धि वाला या सयम को
प्रवृत्ति वाला । अथवा, दम = घर, अत एवं उसी में प्रवृत्त । मन' मन्
(सोचना) से !! ४॥
जुष्टो दमूना अतिथिर्दुरोण इम नो यज्ञमुप याहि विद्वान् ।
विश्वा अग्ने अभियुजो विहत्या शन यतामा भरा भोजनानि ॥
(बग्ने ) हे अग्ने । (जुष्ट ) सेवित होकर ( दमूना ) अपना घर समझ
कर, या दया भाव से युक्त होकर (दुरोणे) निवास स्थान मे ( अतिथि )
अतिथि के रूप मे (विद्वान् ) ज्ञान युक्त होकर (न ) हमारे (इम यज्ञम्)
इस यज्ञ मे ( उपयाहि ) आओ। (विश्वा ) सभी ( अभियुज ) शत्रुसैनाओं
को ( विहत्य ) नष्ट करके (शयताम् ) शत्रु बनाने वालों का ( भोजनानि )
अन्न या धन (आभर = हर) ले आओ - छीन लाओ। (ऋ० ५।४।५)॥
अतिथि अभ्यतितो गृहान् भवति । अभ्येति तिथिषु पर-
कुलानि इति वा, गृहाणि इति वा। दुरीण इति गृहनाम ।
दुरवा भवन्ति = दुस्तर्पा । इम नो यज्ञमुपयाहि विद्वान् ।
सर्वा अग्ने । अभियुज विहत्य ३ नूयताम् आहर भोजनानि ।
विहत्य अन्येपा बलानि शत्रणा भवनादाहर भोजनानि इति वा
धनानि इति वा ॥
अतिथि = जो घरों में जाता है (बत् ) अथवा जो [निश्चित ] तिथियो
मे दूसरो के परिवार मे या घरो म जाता है (Vइ+तिथि) । दुरोण = घर
क्योंकि जिसे सतुष्ट करना कठिन है (दु/अव ) या जिसे संभालना ( देख
भाल करना ) कठिन है । जानते हुए हमारे इस यज्ञ म आओ। हे अग्ने ।
सभी अभियुक्तों को मार कर
शत्रु बनने वालो के भोजन । ) छीन
लाओ = हमारे शत्रुमा का बल ( सना ) नष्ट करके, शत्रुओं के घर से भोजन
या धनमो
विशेप-दुर्गाचाय घर की कठिनाई पर उद्धरण देते हैं-
'कुटुम्बतन्त्राणि हि दुर्भराणि ।'
मूप (६)। मूपिका इत्यर्थ । मूपिका पुन मुष्णाते ।
मूपोऽप्येतस्मादेव ॥ ५ ॥
हिन्दी निरुक्त मूष = मूपिक (चूहा } 1 अध मूपिक-/मुप् (चुराना) रो । मूप भी इसी (मुष ) से ॥ ५॥ स मा तपन्त्यभित सपत्नीरिव पर्शव । भूपो न शिश्रा व्यदन्ति माध्य स्तोतार ते शतक्रतो वित्त मे अस्य रोदसी । (माम ) मुझे ( अभित ) चारो और से ( सपत्नी इव ) सपलियो के समान (पराव ) इंटे ( सतपत्ति ) सत्ताप दे रही हैं। (शतक्रतो) हे दात शक्ति वाले इन्द्र । (ते ) तुम्हारी (स्तोतार ) स्तुति करन वाले (मा) मुय को ( आध्य = आधय ) मानसिक चिन्तायें (व्यात ) खा रही हैं (मूप शिश्ना न ) जैसे चूग सूते को [ खा जाता है ] । ( रोदसी ) ह स्वग और पृथ्वी । (मे) मेरी ( अस्य ) इस [ अवस्था ] को ( वित्तम् ) दोनो जान लो। (ऋ० १.१०५५८) सतपन्ति माम् अभित सपल्य इव इमा पर्शव कूप- पर्शव । मूपिका इव अस्नातानि सूत्राणि व्यदन्ति । स्वाङ्गाभि- धान वा स्यात् । शिश्नानि व्यदन्ति इति । सतपन्ति मा आध्य. कामा स्तोतार ते शतक्रतो । वित्त मे अस्य रोदसी जानीत मेऽस्य द्यावापृथिव्यौ इति ॥ नित कूपे अवहितमेतत्सूक्त प्रति- बभो। तन ब्रह्म इतिहासमिश्रम् ऋड्मिश्र गाथामिश्र च भवति । नित तीर्णतमो मेधया बभूव । अपि वा-सख्यानाम एवाभिप्रेतम् । एकतो द्वित त्रित इति यो बभूवु ॥ ६॥ ये इंटें अर्थात् कुएं को इटें सपलियों ( सौतिनो) के समान मुझ चारो ओर से कष्ट देती हैं । जिस प्रकार चूहे चर्वीदार (था अन्न से युक्त = अन्न मिश्राणि) सूतो को खा जाते हैं। या अपने अग का ही नाम हा-शिश्न अर्थात् अपने बगो को खाते हैं । उसी तरह हे शत शक्ति वाल स्वामिन् । तुम्हारी स्तुति करने वाले मुझको चि तायें या इच्छायें षष्ट देती है। हे रोदसी ! दुर्गाचार्य-कुछ पक्षियों का स्वभाव है कि वे अपनी पूँछ यो हो साझाते हैं, उसी प्रकार चूहे मा स्निग्ध वस्तुओं ( तेल, पी) के माण्ड में पूंछ टोल कर उसे निकालने पे बाद खाते हैं। शिश्न-५छ । - .
. इपिरेण ते मनसा सुतस्य चतुर्थ अध्याय १०७ मेरी इस दशा को जानो हे स्वर्ग और पृथ्वी'... । कुएं में गिरे हुए त्रित [-नामक ऋषि ] को यह सूक्त प्रत्यक्ष हुआ था। इसके सम्बन्ध मे इतिहास से युक्त, ऋचा से युक्त तथा गाया (= ब्राह्मण ग्रन्थो के पद्य ) से युक्त स्तुति (ब्रह्म ) है। त्रित बुद्धि मे बहुत तीक्ष्ण थे (ति)। अथवा [ 'त्रित' में ] सख्या विशेष का अर्थ हो । एक से दो से, तीन स इस तरह तीन हुए (एकत , द्वित और त्रित ये तीन भाई थे-दुर्ग)॥६॥ भक्षीमहि पित्र्यस्येव राय । सोम राजन्प्र ण आयूँपि तारीरहानीव सूर्यो वासराणि ॥ (इपिरेण ) गतिशील ( मनसा ) मन से (ते ) तुम्हारे लिए ( सुतस्य) चुलाय गय सोम का ( पिठ्यस्म) पंत्रिक (राय ) धन (व) के समान (भक्षीमहि ) हम ग्रहण करें। (सोम राजन ) हे राजा सोम । (न ) हमारी ( आयूपि ) आयु. को, जीवन को ( प्रतारी ) बढाओ ( वासराणि) ग्रीष्मकाल के ( अहानि ) दिनों को (सूर्य इव ) जैसे सूर्य [ बढाता है ] । (ऋ० ८।४८७)। ईपणेन वा, एपणेन वा, ऋपणेन वा । ते मनसा सुतस्य भक्षोमहि पित्र्यस्येव धनस्य । प्रवर्धय च न. राजन् ! 'अहानीव सूर्यो वासराणि' -वासराणि-वेसराणि, . विवासनानि गमनानीति वा ॥ कुरुतन ( ८) इति । अनर्थका उपजना. भवन्ति-कर्तन, हन्तन, यातन इति ॥ जठरम् (उदर ) भवन्ति । जग्धमस्मिन ध्रियते, धीयते वा ।। ७ ॥ [ गतिशील = ] तेज, शक्तिशाली या सुबुद्ध । ऐसे मन से तुम्हारे लिए चुलाय गये सोम का भोग ( हम ) पंत्रिक-धन के समान करें। हे राजा सोम । हमारी आयु बढाओ। जैसे ग्रीष्मकाल के दिनो को सूय । वासर = विविध रूप से घरने वाल ( रात मे ठढ और दिन में गर्म पड़ने से ) । या चमकने वाल ( दुग-नाश करने वाले ) या जान वाल (विस्तृत)। कुरुतन ( करो)। इन सबों में ('न' का) आगम व्यर्थ ही हुआ है जैसे-तंन (करो), हन्तन (मारो), यातन (जाओ)। जठर-पेट क्योकि खायो हुइ चीज इसम रखी जाती है () या जमा की जाती है (Vा॥७॥ विशेप-कुस्तन' आदि के लिए पा. सू. ७१।४५ देखें--'तप्तनप्तनय- आयूपि सोम ॥ १०८ हिन्दी-निरुत नाश्च । इन सबों गे 'तन' प्रत्यय लाकर 'कुलान', तन से 'वतंत' (गुण हो जाने के कारण-सार्वधातुवमपित ) इत्यादि ।।७।। मरुत्वाँ इन्द्र वृपभो रणाय पिवा सोममनुप्वधं मदाय । आ सिञ्चस्व जठरे मध्व ऊमि त्वं राजासि प्रदिवः सुतानाम् (मस्त्वान ) मस्तो से युक्त और ( वृपभः ) वर्षा करने वाला ( इन्द्रः) इन्द्र ( रणाय ) युद्ध के लिए है (मदाय ) आनन्द के लिए ( अनुस्वधम् ) थाम्न अर्थात् भाजन के बाद ( सोमम् ) सोम (पिय) पी लो। (जठरे ) पेट म ( मध्व ) मधु को (मिम् ) तरंग ( आमिञ्चस्व ) सोच दो, ढाल दो; (त्वम् ) तुम (प्रतिवः) पहले के दिनो मे ( सुतानाम् ) उत्पन्न किये हुए सोमो के भी ( राजा असि ) राजा हो । ( ऋ० ३।४७३१) । मरुत्वान्-इन्द्र. । मद्भि तद्वान् । वृपभो वार्पिता अपाम् । रणाय-रमणीयाय सग्रामाय । पिव सोमम् । अनुष्वधम् अन्व- नम्। मदाय-मदनीयाय जैत्राय । आसिञ्चस्व जठरे मधुन. ऊर्मिम् । मधु सोमम् --इत्योपमिकम् । माद्यते. । इदमपि इतरत् मधु एतस्मादेव । त्व राजासि पूर्वेष्वपि अहःसु सुतानाम् ॥८॥ मरुत्वान् इन्द्र = मरुतों के साथ या उनस युक्त । वृषभ = जल बरसाने चाले । रण अर्थात् रमणीय (/रम् ) सग्राम के लिए 1 सोम पी लो । अन्न के बाद = भोजन के बाद । मद अर्थात् आनन्ददायक विजय के लिए । पेट में मधु को तरग (प्रवाह, डालो। मधु अर्थात् सोम को-यह औपमिद (आनन्द देने में दोनों समान हैं ) है मद् मे । अर्थ---मदिरा ] भी इसी से बना है। पूर्वकाल के दिनो मे भी चुलाय हुए सोमो के तुम राजा हो [ इसलिए तुम्हारा सोमपान करना सर्वथा समुचित है-दुर्ग] ॥ ८॥ द्वितीय-पाद तितउ (१०) परिपवन भवति । ततवद्वा । तुन्नवहा तिलमायतुन्नम् इति वा ॥ ९ ॥ तितउ+पवित्र करने वाली ( चलनी)। चमडे (तत ) ढंकी हुई, पा छेद ( तुम्न ) से युक्त । अथवा तिल से समान छैदवाली ॥ ९ ॥ . यह दूसरा मधु [ का
वे
चतुर्थ अध्याय
१०९
सक्तमिव तितउना पुनन्तो यत्र धोरा मनसा वाचमकत ।
अत्रा सखायः सख्यानि जानते भद्वैपां लक्ष्मीनिहिताधि वाचि ॥
(तित उना ) चलनी के द्वारा ( सकतुमिव ) सत्त के ममान (पुनन्तः)
पवित्र करते हुए ( यत्र ) जहाँ ( धीराः ) बुद्धिमान् लोग (मनसा ) मन के
द्वारा ( वाचम् ) वाणी को [ पवित्र ] (अन) करते हैं। (अत्र) वहाँ
(सखायः ) मित्र लोग ( सख्यानि ) मित्रता को ( जानते ) पहचानते हैं
(एषाम् ) इनकी ( अधि वाचि) वाणी मे (भद्रा) कल्याण करने वाली
(लक्ष्मीः ) लक्ष्मी, शोमा ( निहिता) रहती है । ( ऋ० १०.७१२)"
विशेप -इस मंत्र का व्याकरण में वहा महत्वपूर्ण स्थान है । पतञ्जलि ने
महामाष्य के पस्पशाह्निक मै इसका उद्धरण देकर व्यास्या की है । ऋग्वेद में यह
विद्या-सूक्त मे है । इसमे विद्वानों की प्रशंसा की गयी है । मित्र का अभिप्राय है
एक समान शास्त्र पढने वाले जैसे वैयाकरणों के मित्र वैयाकरण, नैरुत्तो के नैवक्त ।
एक दूसरे के विज्ञान-प्रापं ( मित्रता ) को भली-मॉति जानते हैं । निरुक्त की
व्याख्या नीचे देखें।
सक्तुमिव परिपवनेन पुनन्तः। सक्तः सचतैः। दुर्वावो
भवति । कसतेः वा स्याद् विपरीतस्य । विकसितो भवति । यत्र
धोरा मनसा वाचमकृषत प्रज्ञानम् । धीराः प्रज्ञानवन्त: ध्यान-
वन्तः । तत्र सखायः सख्यानि संजानते, भद्वैपां लक्ष्मीनिहि-
ताधि वाचि ॥
मानों चलनी से
सत्तू को पालते हुए । 'सक्तु सच् (सट जाना) से,
इसे धोना कठिन है । अपवा क्स् (धमकना ) से वर्ण-विपर्यय द्वारा हो
गया हो क्योकि यह पूरा खिला हुआ होता है। जहाँ बुद्धिमान् लोग मन के
द्वारा वाणी अर्थात् शान को पालते हैं । धीर-ज्ञानयुक्त, विचारक । वहाँ मित्र
लोग मित्रता को पहचानते हैं । इनकी वाणी में कल्याणी घोमा निहित है ।
भद्रं भगेन व्याख्यातम् ( ३३१६) भजनोयम् , भूतानाम्
अभिद्रवणीयम् । भवत् रमयति इति वा, भाजनवद्वा। लक्ष्मीः
लाभाद्वा, लक्षणाद्वा, लप्स्यनाद्वा, लाञ्छनाद्वा, लपतेः वा स्यात्
प्रेप्साकर्मणः। लग्यतेः वा स्यादाइलेपकर्मणः । लन्नतेर्वा स्याद-
दलाघाकर्मणः॥ शिप्रे (११) इत्युपरिटाद् न्याख्यास्याम.
(६।१७)॥१०॥
११० हिन्दी निरुक्त 'भद्र' को व्यारया 'मग' (ऐश्वर्य ) से हो गई है ( देखिये, निरु. ३१६), जिममे आनन्द मिले, जिसे प्राणी प्राप्त करें। या उपस्थित होकर आनन्द दे, या अपने [कृपा-] पात्रो के पास रहे ( भ./भू+/दु.भू+रम, भिज् ) लक्ष्मी ( चिह्न) लाभ होने से, निर्देश करने से, पाने की इच्छा से, या चिह्न वरने से । या इच्छार्थक /लप से, या 'सटना' अर्थ वाले लम् से, या 'प्रशसा न करना' अर्थ वाले लज्ज से (= जिनके पास लक्ष्मी रहती है वे अपनी प्रशसा नहीं करते हैं)॥ 'शि की व्याख्या बाद मे ( ६।१७) होगी॥ १० ॥ तत्सूर्यस्य देवत्वं तन्महित्वं मध्या कर्ताविततं सं जभार । यदेदयुक्त हरित. सधस्थादादात्री वासस्तनुते सिमस्मै ॥ (सूर्यस्य ) सूर्य का (तत्) यही ( देवत्वम् ) देव-भाव है, (तत्) यही ( महित्व ) महिमा है कि (कतों ) कार्य के ( मघ्या) बीच में ही (विततम् ) चागे ओर फैले हुए [ प्रकाश को-सायण, अन्धकार को- आधुनिक-मत ] ( स जभार ) समेट लेता है, नष्ट कर देता है। (यदा इत् ) जब उसने ( सघस्थात् ) पृथ्वी से, अश्वशाला से ( हरितः) प्रकाश को, घोडो को ( अयुक्त ) खीच लिया. जोत लिया (आत ) तभी (रात्री ) रात्रिदेवी ( सिमस्मै ) सबो के लिए ( वासः ) अपने कपड़ों को ( तनुते ) फैलाने लगी, फैला रही थी। (ऋ० ११११५।४) विशेष-उपयुक्त मत्र की व्यारया में भारतीय ( सायण ) और आधुनिक मत (विदेगी ) मे पर्याप्त अन्तर है । सायण और यास्क इसे सायंकाल का वर्णन मानते हैं-ससार मे होने वाले अनन्त कमों के बीच मे ही सूर्य सन्ध्या मे अपनी फैली हुई किरणो को समेट लिया करते है । जब वे अपनी किरणो को पृथ्वी ( सहस्थ ) से हटा लेते हैं तो रात्रि का आवरणात्मक-कार्य आरम्भ हो जाता है । सायण का कथन है कि जब वे रथ ( सहस्थ ) से घोडों को अन्यत्र बाप देते हैं ( अयुक्त) तय रात्रि होती है । इसके विरुद्ध आधुनिक-विद्वान् प्रस्तुत मन्त्र के पहले और बाद के मत्रों के सादृश्य से ( १।११५॥३ और ५) इसमें प्रात:काल का वर्णन मानते हैं-अधिकार के प्रसार कार्य के बीच मे ही सूर्य ने सारे अन्धकार को नष्ट कर दिया ( सजहार ) । अस्तबल से जब उन्होंने धोडो को रय मे जोत दिया उस समय रात्रि अपना काय कर रही थी। 'अयुक्त' का अर्थ जो सायण ने 'अन्यत्र युक्तान् करोति' किया है, यह वस्तुतः खोच-तान चतुर्थ अध्याय १११ ( far fetchedress ) है, इसे सीधा 'जोत दिया' के यर्थ मे ही लेना ठीक है। रॉय ने भी सायण का ही अर्थ लिया है । तत्सूर्यस्य देवत्वं तन्महित्वं मध्ये यत्कर्मणा क्रियमाणानां विततं संहियते । यदासौ अयुक्त हरणान् आदित्यरश्मीन् । हरितः अश्वान् इति वा । अथ रात्री वासः तनुते सिमस्मै । वेसरम् अहः अवयुवती सर्वस्मात् । अपि वा उपमार्थे स्यात् । रात्रीव वास. तनुते इति । तथापि निगमो भवति–'पुनः समव्यद्विततं वयन्ती' । समनात्सीत् ॥ ११ ।। सूर्य का देवत्व इसीमे है, यही महिमा है कि किये जाते कर्मों के बीच मे उन्होने ( समस्त ) फैली हुई [ वस्तु ] का सहार कर लिया है (= सिकोड लिया)। जब उन्होने रस-हरण करने वाली आदित्य-किरणो को जोत लिया, या हरित =पोडो को । अव रात्रि सबो के लिए वस्त्र फैलाती है। चमकने वाले दिन-दिन को सबो से पृथक कर देती हुई .1 अथवा तुलना के अर्थ मे यह प्रयुक्त हुआ है-रात्रि के समान ही वह अपना वस्त्र (किरणें) फैलाता है। वैदिक प्रयोग भी है--'फैली हुई ( वस्तु) को चुनती हुई उसने फिर बुना' (ऋ० २१३८।४ ) अर्थात् उसने सग्रह कर लिया ॥ ११ ॥ इन्द्रेण सं हि दृक्षसे संजम्मानो अविभ्युषा । मन्दु समानवर्चसा ॥ ( अविभ्युषा ) भयरहित [गण ] के साथ ( सजग्मान ) जाते हुए, (हिं ) वास्वव मे ( इन्द्रेण ) इन्द्र के साथ ( सक्षसे ) दिखलाई पड़ते हो। तुम दोनो ( मन्दू ) आनन्दयुक्त तथा ( समानवचंसा = सौ ) समान वल वाले हो ( ऋ० १६७)। इन्द्रेण हि संदृश्यसे, संगच्छमानः अविभ्युपा गणेन (१३) मदिष्णू युवा स्थ. । अपि वा, 'मन्दुना तेन' इति स्यात् । समान- वर्चसा इत्येतेन व्याख्यातम् ॥ १२ ॥ निर्भय गण (मस्तों) के साथ जाते हुए, इन्द्र के साथ दिखलाई पडने हो। तुम होतों यान• माह से पुरल हो। अथपास' म के सम्प' इस प्रकार का अर्थ हो। 'समानवर्चमा' (तुल्य बल के साथ )-इसकी भी वही गति है । [ मन्दू-इसका वैकल्पिक अर्थ है मन्दुना ( तृतीमा ए० व०)। इममे मन्दु+टा होने से 'सुपा मुनुपूर्व सवर्णाच्छयाहाहमायाजाल' (पा० ११२ हिन्दी निरक्त मू० ७॥१॥३९) के द्वारा पूर्व सवर्ण होवर 'मन्दू' हो गया है। मादुना माद- गणेन ( टुर्ग ) ] ॥ १२ ॥ ईन्तिास सिलिकमध्यमास सं शूरणासो दिव्यासो अत्या । हमा इव श्रेणिशो यतन्ते यदाक्षिषुदिव्यमममश्वा ॥ (ईन्तिासः ) सुनिमित अन्त भाग वाले या विशाल नितम्ब वाले तथा ( सिलिकमध्यमास ) सिकुडी हुई अर्थात् पतली कमर वाले, (शूरणास ) वीरता से भरे हुए, (दिव्यास ) दिव्यशक्ति सम्पन्न ( अत्याः) दौडाहे ( श्रेणिश ) पक्ति मे बँधे हुए ( हसा: इव ) हसों के समान ( स यतन्ते) एक साथ प्रयास करते हैं, ( यदा ) जव कि ( अश्वा ) घोडो ने (दिव्यम्) देवी ( अगमम् ) मार्ग को ( अक्षिपु ) पाया है । ( ऋ० १६१६३।१०)। ईन्तिा -समीरितान्ता [सुसमीरितान्ता], पृथ्वन्ता वा। सिलिकमध्यमा = समृतमध्यमा, शीपमध्यमा. वा । अपि वा, शिर आदित्यो भवति, यत् अनुशेते सर्वाणि भूतानि, मध्ये च एपा तिउति । इदमपीतरत् शिर. एतास्मादेव । समाश्नितानि एतत् इन्द्रियाणि भवन्ति । ‘स शूरणासो दिव्यासो अत्या' । शूर -शवते गतिकर्मण. । दिव्या. दिविजा.। अत्या अतना ॥ सुनिर्मित अन्तभाग वाले = निकले [अच्छी तरह या विशाल नितम्ब से युक्त ( =सूर्य के घोडो का पिछला भाग विशाल है)। सुघटित कमर वाले = जिनकी फमर सिकुडी है या जिनका प्रधान बीच में रहता है ( = सूर्य या प्रधान घोडा)। अथवा, शिर से सूर्य का मतलब है क्योंकि सभी जीवो मे [ प्राण रूप में ] यह निवास करता है और उनके बीच मे रहता है। यह दूसरा शिर ( मनुष्य का) इसी तरह बना है क्योकि सभी इन्द्रिया इसी पर आश्रित हैं । 'वीरतायुक्त दिव्य दौडाहे (दौडने वाले ) एक साथ' । शूर गत्यर्षक / शु से । दिव्य = स्वर्ग में उत्पन्न । अत्या = ६ = दौडाहे (अ)। 'हसा इव श्रेणिसो यतन्ते' । हसा हन्ते., नन्ति अध्वानम् । श्रेणिश इति श्रेणि श्रयते.। समाश्रिता भवन्ति। यदा अक्षिपु- यदा आपन । दिव्यम् अज्मम् अजनिम्-आजिम् । अश्वाः । निकले हुए %3D . चतुर्थ अध्याय ११३ अस्त्यादित्यस्तुतिः अश्वस्य । आदित्यादश्वो निस्तष्ट इति । 'सुरा- दश्वं वसवो निरतष्ट' । इत्यपि निगमो भवति ॥ १३ ॥ 'पक्ति में बंधे हप्तो के समान वे प्रयास करते हैं। हसहन् ( मारना) से, ये रास्तो को समाप्त करते हैं । श्रेणो मे बंधकर । श्रेणि/थि (मिलाना) से, ये मिली हुई रहती है । जब पहुंचे = जब पाया । दिव्य अज्म - मार्ग, क्षेत्र को घोडो ने । सूर्य की स्तुति अश्व की ही स्तुति है । सूर्य से अश्व निमित हुआ है । 'हे वसुओ! तुमने घोडे को सूर्य से बनाया' ( ऋ० ३।९।२)- यह भी उदाहरण वेद मे है ।। १३ ॥ विशेष-उपर्युक्त मंत्र मे सूर्य के घोडो का वर्णन है। उनकी किरणो को हो वेद मे घोडा कहा गया है । इन घोडो के आकार का वर्णन करने के बाद इनके 1 दिव्य-मार्ग पर चलने का उल्लेख किया गया है। कायमानो वना त्वं यस्मातरजगन्नपः। न तत्ते अग्ने प्रभूपे निवर्तन, यद्रे सन्निहाभव. ॥ ( यत) जब ( त्वम् ) तुम ( वना-नि ) जगलो को, लकडियो को (कायमान ) चाहते हुए ( अपः मात: ) जलरूपी माताओं के पास (अजगन् ) गये हो, (अग्ने ) हे अग्नि । ( ते ) तुम्हारा (तत् निवर्तनम् ) वह लौटना (प्रभूपे ) भूलने योग्य (न ) नही ( यत् ) जव कि (दूरे सन् ) दूर होकर भी (इह ) यहाँ ( अभव ) चले आते हो। (ऋ० ३।९।२) । विशेप-अग्नि की उत्पत्ति वनो रो भी होती है, जल रो भी (वास की)। निवर्तन = विद्युत् के रूप मे लौटना, जल से निकलने वाले अग्नि ( वैद्युत) का यज्ञ मे परणि-मन्यन से उत्पन्न हो जाना। कायमानः (१५) चायमानः, कामयमान. इति वा, वनानि । त्वं यत् मातृः अपः अगमः, उपशाम्यन् । न तत् ते अग्ने ! प्रमृष्यते निवर्तनं दूरे यत्सन् इह भवसि जायमानः ॥ कायमान = देखते हुए, या जगलों को इच्छा करते हुए । तुम जब जल. रूपी माताओं के पास गये = बुझ गये । हे अग्ने । तुम्हारा वह लौटना भला नही जाता जब कि दूर रहने पर भी उसन्न होकर यहां पहुंच जाते हो। 'लोधं नयन्ति पशु मन्यमाना.' = लुब्धम् ऋपि नयन्ति पशुं मन्यमानाः । 'शीरं पावकशोचिपम्' पावकदीप्तिम् । अनुशायिनम् इति वा, आशिनम् इति वा ८ दि०नि० ११४ हिन्दी-निरुत 'पशु समक्ष पर, लोभी को वे ले जाते हैं (ऋ० ३५३।२३ )-पश समझ कर लोभी अघि को ले जाते हैं । 'पवित्रकारक ज्वाला वाले अग्नि को (८।१०२।११)। जिसका प्रकाश पवित्र है, यह सबो में शयन करता है या सबो को ध्याप्त करता है । विशेष--पहले मन्त्र की पूरी ऋचा का उद्धरण देकर दुर्ग कहते हैं कि "यस्मिन् निगमे एप सन्द सा पमिष्ठद्वेपिणो ऋक् । मह च कापिष्ठलो वासिष्ठ । अतस्ता न निद्रवीमि ।' इससे दुर्गाचार्य के वश का कुछ पता मिलता है । देखिये-भूमिका ॥ १४ ॥ कनीनकेव विद्रधे नवे द्रुपदे अर्भके । वधू यामेषु शोभते ॥ ( नवे ) नवीन तथा ( विद्रधे ) छेदो से युक्त, (अर्भके ) छोटे ( द्रुपदे) लकडी के आसन पर बैठी ( कनीनव ) गुडियो के ममान ( पामेषु ) रास्तो मे (बभ्रू) भरे घोडे ( शोभते ) दोभते हैं । ( ऋ० ४।३२।२३ ) । कनीनके कन्यके । कन्या कमनीया भवति । केयं नेतव्या इति वा ( कमनेनानीयते इति वा )। कनते. वा स्यात् कान्ति- कर्मणः । कन्ययो. अधिछानप्रवचनानि सप्तम्या एकवचनानि इति शाकपूणिः । विद्धयोः दारुपाद्वोः । दारु दणातेः वा, द्रूणातेः वा । तस्मादेव द्र। नवे नवजाते । अर्भके = अद्धे । ते यथा तदधिष्ठानेषु शोभेते एवं वधू यामेषु शोभेते । वध्वो. अश्वयो. संस्तवः। दो गुडियायें ( dolls) = दो कन्यायें । कन्या = जिसकी कामना की जाय (कम् ) । अथवा 'इसे किस व्यक्ति को दिया जाय'--इससे बना हो । (अथवा, कामना करने वाले पति के द्वारा लायी जाती है ) । अयता 'धमत्रता अर्थवाले/कन से बना हो । शाक्पूणि का कहना है कि [ उपर्युक्त मन्त्र मे ] दोनों कन्याओ के भासन से सम्बद्ध पाब्द (= विद्रये, नये, द्रुपदे, अके--- दुर्ग ) सप्तमी के एक्वचन में हैं । विभूपिन पाठासनों पर । दाइ (पाडना ) से याद ( मारना) से। इसी धातु से '' भी बना है। नव-मधोत्पन्न । अभी जो वहा न हो। वे जसे अपने आसनो पर दोमती हैं वैसे ही भूरे घोडे रास्तो मे शोभने है। यह दो भूरे घोड़ों का सम्मिलित वर्णन है इदं च मे दादिद च मेऽदादिति ऋपि. प्रमंस्याय आह-सुवा- स्त्वा अघि तुग्वनि' । सुवास्तु. नदी । तुग्व (२०) तीर्थ भवति ।
चतुर्थ अध्याय ११५ तूर्णमेतदायान्ति । 'कुविनंसन्ते मरुतः पुनर्न' । पुनः न. नमन्ते मरुतः । नसन्त (२२) इति उपरिटाद ( निरु० ७.१७) व्याख्यास्यामः । 'ये ते मदा आहनसो विहायसस्तेभिरिन्द्रं चोदय दातवे मधम्'। ये ते मदा. आहननवन्तः वचनवन्तः तैः इन्द्रं चोदय दानाय मघम् ॥ १५ ॥ "मुझे यह दिया, मुझे यह दिया- इस प्रकार की गणना करके ऋषि ने कहा-'सुवास्तु-नदी के तट पर '(ऋ० ८।१९।३७ । सुवास्तु एक नदी है । 'तुम्' तट को कहते हैं क्योकि लोग इसके पास शोध आने हैं (दान करने के लिए-दुर्ग)। 'मरुदण सम्भवन हमारे लिए फिर झुकें (ऋ०५८.५) - हमारे लिए महद्गण फिर झुकने हैं । 'नसान' की व्याख्या बाद मे (७।१७) में करेंगे। 'जो तुम्हारे पास मानन्दप्रद, मोहक (आहनस गैसने योग्य ) और महान् ( सोम) है उससे इन्द्र को धन देने के लिए प्रेरित करो' (ऋ० ९५५) । तुम्हारे पास जो मादक, वाहनन मे युक्ता - उगने वाले (मोहक) [ सोम हैं ] उनसे इन्द्र को धन देने के लिए प्रेरित करो ॥ १५ ॥ उपो अदशि शुन्ध्युवो न वक्षो नोधा इवाविरकृत प्रियाणि । अग्रसन्न ससतो वोधयन्ती शश्वत्तमागात्सुनरेयुपीणाम् ॥ [ऊया ] ( गुन्ब्युव.) शुद्ध करने वाले आदित्य के ( प न ) वक्षस्थल के समान ( उप उ अश) दिवनाई पडी। (नोया) गायक (इव) के समान उसने (प्रियाणि प्रिय वस्तुएं (आविः अकृत ) दिखायी हैं । (अममत् न) अन्न बांटनेवाली स्त्री के समान ( ससत. ) सोये हुए लोगो को (कोषयनी) जगाती हुई (पुन ) फिर (एयुपीणाम् ) आनेवाली सभी देवियो में (शश्वत्तमा) सबसे अधिक नियम का पालन करनेवाली (आगात्) आयी है। (ऋ० १५१२४।४) । उपादशि । शुन्च्युवः । शुन्ध्युः आदित्यो भवति । शोधनात् । तस्यैव वक्ष. भासः । अध्यूढम् । इदमपि इतरद् वक्षः एतस्मा- देव । अध्यूढ काये । शकुनि. अपि गुग्ध्यु. उच्यते, शोधनादेव । उदकचरो भवति । आपोऽपि शुन्ध्यवः उच्यन्ते। शोधनादेव । नोधाः ऋपि. सवति । नवनं दधाति । स यथा स्तुत्या कामा- नाविष्कुरुते, एवमुपा रूपाण्याविष्कुरुते । असद-अम अन्नं भवति । अप्रसादिनी इति वा, अग्रसानिनी इति बर। 'ससतो गगनावाली अचा यों है (दुर्ग)--अदान्मे पौरुदत्स्यः पञ्चाशत सदस्युर्वधूनाम् । महियो अर्य. सत्पवित(०८०१३३६) हिन्दी-निरुक्त वोधयन्ती शश्वत्तमागात् पुनरेयुषीणाम् ।' स्वपती बोधयन्ती शाश्वतिकतमा आगात् पुनः आगामिनीनाम् ॥ दिखलायी पड़ी । पवित्र करने वाले के । शुन्घ्यु = आदित्य, शुद्ध करने से उसी के वक्षःस्थल अर्थात् ज्योति के समान । जो ( ज्योति ) काफी बढी हुई है। यह दूसरे अर्थवाला (छाती) वक्ष भी इसी से बना है। जो शरीर में निकला हुआ है । (Vवह ) । पक्षी को भी शुग्घ्यु कहते हैं, शुद्ध करने से । यह जल मे चलता है (अर्थात् बहुत शुद्ध रहता है-दुर्ग) जल को भी शुन्ध्यु कहते हैं, शुद्ध करने से ही । 'नोघा' ऋषि को कहते हैं ज्योकि स्तुति धारण करता ( बनाता ) है। जैसे स्तुति के द्वारा वह अपनी इच्छाओ का प्रदर्शन करता है, उसी तरह ऊपा अपने हर का आविष्कार करती है। अघसद् = 'अद्म' अन्न को कहते हैं, जो अन्न पर बैठे या बन्न प्राप्त करे ( माना या स्त्री)। सोये हुए लोगो को जगाती हुई फिर आनेवाली सभी देवियों मे सर्वाधिक नियम का पालन करनेवाली (जपा ) आयी है । विशेष-अप्रसद् = अन्न बांटनेवाली माता। जैसे प्रात काल माता अपने पुत्रो को दूध, अन्न आदि देने के लिए जगाती है वैसे ही ऊपा भी जगाती हुई आती है । अन्तिम में 'ससतो.' इत्यादि मूल ऋचा का उद्धरण देकर यास्य ने उसके शब्दो के प्रतिशब्द दिये हैं। मैंने दोनो का अलग-अलग अनुवाद निरर्थक समझकर छोट दिया है। 'ते वाशीमन्त इष्मिण.' । ईपणिनः इति वा। एपणिनः इति वा । आर्पणिनः इति वा । 'वाशी' इति वाङ नाम ( निघ० १११११११ ) वाश्यते इति सत्या.। 'वे लोग बुद्धि से युक्त और इच्छाओ से युक्त है' ( ऋ० १८७६), शक्तिमान् , या इच्छा से युक्त, या सबो का साक्षात्कार करनेवाले । वाशी वाणी क्योकि इसे बोला जाता है । (वाश = चिल्लाना; तुलनीय-विभ्यस्यन्तो i. शिरे'-नि० २१०)। 'शंसावाध्वयों प्रति मे गृणीहीन्द्राय वाहः कृणवाव जुष्टम्। अभिवहनस्तुतिम् । अभिपवणप्रवादां स्तुति मन्यन्ते । ऐन्द्री त्वेव शस्यते । परितक्म्या (२७) इत्युपरिटाद व्यास्यास्यामः (निरु० ११२५) हे अध्ययों ! ( मे प्रति गृणीहि ) मेरे सामने गान गाओ, हम दोनो उमकी प्ररासा करें (साव ), इन्द्र के लिए प्रिय स्तुनि (बाहः) की रचना कर (ऋ० ३५९३ ) । कुछ लोग इसे आवाहन की स्तुति मानते है, दूसरे हो गोम पोसने का वर्णन समझते हैं । तथापि यह इन्द्र की स्तुति के रूप मे है । 'परितकाया' की व्याख्या वाद मे होगी ।। १६॥
%D चतुर्थ अध्याय विशेष---अभिवहन = बुलाकर ले आना, स्तोत्र हो देवताओ को लाता है। अभिपवण प्रवाद = सोम पीसने के विषय मे। तृतीय-पाद सुविते ( २८)। सु इते । सुते । सुगते प्रजायामिति । वा । 'सुविते मा घा.' इत्यपि निगमो भवति । दयति. (२९) अनेककर्मा । 'नवेन पूर्वं दयमाना. स्याम'---इत्युपदयाकर्मा । 'य एक इद्विदयते वसु'-इति दानकर्मा वा विभागकर्मा वा। 'दुर्वर्तुीमो दयते वनानि'---इति दहतिकर्मा । दुर्वर्तु दुर । 'विदद्वसुर्दयमानो वि शत्रून्'---इति हिंसाका । सुविते % सु+इते, या मूने अर्थात् सुन्दर ढङ्ग स जाना, या उत्पन करना । 'सुन्दर स्थान म मुझे धारण करो' (मैत्रा० स० १।२।७, ३० स० १।२।१०।२)- यह भी वैदिक उद्धरण है । 'दयति' के अनेक अर्थ हैं । 'नय से हम प्राचीन की रक्षा करते रहें'-(मैत्रा० स० ४।१३।७) यहाँ रक्षा के अर्थ मे । 'अकेले ही जो धन का वितरण करता है (ऋ० ११८४७)-यहां दान या विभाजन के अर्थ में । 'वह अवारणीय तथा भयकर बनकर वनों को जलाता है' (ऋ. ६६५)-यहाँ जलाने के अर्थ में । दुर्वर्तु = जिस्का वारण करना कठिन है । 'धन को जाननेवाला अपने शत्रुओ का नाश करते हुए (ऋ० ३।३४१)- यहाँ हिंसा के अय मे ॥ सुता इन्दव. प्रातरित्वना सजोपसा पिवतमश्विना तान । अयं हि वामूतये वन्दनाय मा वायसो दोपा दयमानो अवुवुधत् ।। प्रात काल मे आनेवाले तथा ममान वल (जोष ) वाले, हे अश्विन युगल ! ये सोम पोसे गये हैं, इन्हें पी लें। यह आप दोनों की रक्षा और वन्दना करन के लिए है, प्रात काल (दोपा) मे उडनवाले ( दयमान ) कौए ने मुझे जगा दिया है। विशेष-इस ऋचा का स्थान नहीं मिल सका है किन्तु यह भी स्वर के चिन्हों के साथ पाया गया है जैस ऋग्वेद के अन्य उद्धरण । सम्भव कि ऋग्वेद की लुम वाकल शाखा मे यह हो। दयमान. इति ।। भूचित् (३०) इति निपात. पुराणनवयो । जैसे सुदिते गुन्द में भिन्न धातुओं से शुष्द का सुण्ड करके अनेक अर्थ किये गये है, उस प्रभार दयति में नशे । यह पातु ही अनेकारक है। 'एकप्रतिवाय शम्दोऽनेकायों भवतीत्येतस्य विशेषस्यापद्यतनार्थमुदाहरति'-दुर्ग। .
११८
हिन्दी-निरुक्क
न च (३१) इति च । 'अद्या चिन्न चित्तदपो नदीनाम्' । अद्य च
पुरा च तदेव कर्म नदीनाम्। 'नू च पुराच सदनं रयीणाम्'-अद्य
च पुरा च सदनं रयीणाम्। रयिः इति धननाम। रातेःदानकर्मण.॥
प्यमान = ( उसे हुए)। 'नू चित्र' निपात है तथा पुराने और मये में
अधों में आता है। "नू' भी वैसा ही है। 'आज और पहले भी नदियो।
यही पर्म (अप.) है' (ऋ० ६।३.१३)नू पहले ) । 'धनो नामानिक
और प्राचीन निवासस्थान' (ऋ० १९६७)-(नू = बाज)। रयि धन,
रादेना, से॥१७॥
'विद्याम तस्य ते वयमवूपारस्य दावने'--विद्याम तस्य ते
वयम् अकुपरणस्य दानस्य ।
हम तुम्हारे उग असीम दान को जाने (३.५३३९१२, सा. २०५२)।
अपारस्य = जिसमा पारावार न हो। दान - दान । विधाग- पाये।
आदित्योऽपि रूपार उच्यते, अपारो भवति = दूर-
पार । ममुद्रोऽपि आपार उच्यते, अरूपारो भवति = महा-
पार. । कच्चपोऽपि अपार उच्यते, अपार.
= न यूपमृच्छति
इति । कन्छ
कच्ठं पाति । कच्छेन पाति इति वा । बन्टेन
पियति इति वा। फच्छ. = सच्छ., पच्छद.। अयमपीतरी
नदीपच्छ. एतम्मादेव । यम् = उदकम् । तेन छाद्यते ।।
पूर्वको भी मार रहते हैं, वह अमुसित (Ter) [माग को कर
परता (4 मीम १. उमे पार काटिन) गमुनी
करो . है. उगी भीमा (HI) fair मा भार
(TRY) Prem मन (HI)
Peter tanARIK मी बोट दाग(
मह गुनगर) याराम पोनर ((T
माया) = REFRI (याम ) (tv
r) मग मी पायी।
=". am font (१)।
'शिजीने के रस मिनिटे' = निम्न गुनं रानी
विनिमयणाय । रम. - रशिवयम् अस्मान् । समिक्षणोति
नि या । गगी नक्षोनि का। 'अग्नि. मुरगुनुवे नि
स.' । गुरनतुरने नि या । गुजा. मुनगेमिः ति
था। 'गुनाया अग्मिन्यः विधयन्नाम्' । मुप्रगगनाः ॥ १८॥
चतुर्थ अध्याय ११६ 'राक्षसो के विनाश के लिए अपनी दोनो सोगों को तेज करते हैं। (ऋ० ५।२९)-वही अर्थ । रक्ष -जिससे अपनी रक्षा करनी चाहिए. या जो एकान्त मे ( रहस् ) आक्रमण करे ( क्षण), या जो रात में पहुंचे (निक्ष)। 'बलवान अग्नि दलवान् अश्वो के द्वारा '(ऋ० १०१३३९)-तेज (अग्नि) तेज (घोडो) के द्वारा, या सुन्दर सन्तान (स्वण)* वाले (अग्नि ) सुन्दर कुल मे उत्पन्न (घोडो) के साथ । 'तेज चलने वाले (लोग ) इस यज्ञ मे विश्राम करें' (पा० स० २८५) सुन्दर (या तेज ) गति वाले । १८ ।। देवा नो यथा सदमिवृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवे- दिवे। (यथा ) जिससे (न ) हमारे लिए ( देवा ) देवता लोग (सदम् इत) सदा ही ( दिवेदित ) प्रतिदिन (अप्रायुर ) बिना प्रमाद किये हुए तथा (रक्षितार ) रक्षा करते हए (वृधे ) वृद्धि करने मे ( असन् ) लग जायें- लेट् लकार ( ऋ० ११८९१ ) ॥ देवा. न. यथा सदा वर्धनाय स्यु । अप्रायुवः अप्रमाद्यन्त , रक्षि तारश्च अहनि अहनि । जिससे देवगण हमारी निरन्तर वृद्धि करें। अप्रायुव = बिना भूल-चूक वे प्रतिदिन रक्षा करें। च्यवन. ( ३८) ऋपि भवति, च्यावयिता स्तोमानाम् । 'च्यवानम्' इति अपि अस्य निगमा. भवन्ति- 'युव च्यवान सनय यथा रय पुनर्युवान चरथाय तक्षथु ।' युवा च्यवानं, सनय = पुराण, यथा रथ पुन, युवानं चरणाय ततक्षयु.। युवा-प्रयोति कर्माणि । तक्षति. करोतिकर्मा । च्यवन एक ऋपि का नाम है जो स्तोत्रों का संग्रह करने वाले हैं। 'च्यवान' के रूप में भी इस पाब्द क वैदिक प्रयोग हैं-'आप दोनों ने वृद्ध च्यवान को फिर युवक बना दिया है रथ की तरह उ ह चरने लायक कर दिया है' (० १०.३९४) । सनय = पुराने । (शेप वही अथ)। युवा = जो कार्यों का मिश्रण ( सम्पादन इयु) करता है । तिम् = करना । रज. ( ३९) रजते. । ज्योति. रज. उच्यते । उदक रज. उच्यते । लोका. रजासि उच्यन्ते । असृगहनी रजसी उच्यते । ( रजासि चित्रा वि चरन्ति तन्यव–इत्यपि निगमो भवति)। • ममिको सन्तान स्वर्ण है-तुष्ट. हिरण्यरेता मशि, अग्नेरपस्य प्रथम मुर्गन् । किये १२० हिन्दो-निरुक्त हरः (४०) हरतेः । ज्योतिः हरः उच्यते । , उदकं हरः उच्यते । लोका हरांसि उच्यन्ते । ( असृगहनी हरसी उच्यते । 'प्रत्यग्ने हरसा हरः शृणीहि'-इत्यपि निगमो भवति ।) रजस/रज् ( रंगना ) से । प्रकाश को रज कहते हैं, जल को रजस् कहते हैं सभी लोकों को रज कहते हैं । रक्त तथा दिन को भी रज कहते हैं । [ रग-बिरगे और गरजने वाले लोक विभिन्न दिशाओ में जाते है (ऋ० ५। ६३।३) यह वैदिक उद्धरण है । ] हर/ह ( ले लेना ) से । प्रकाश को हर कहते हैं जल को हर करते हैं, लोको को हर कहते हैं। [ रक्त तथा दिन को भी हर कहते है । 'हे अग्ने, इस प्रकाश को अपने प्रकाश से मिला दो' (० १०८७२५)-यह भी वैदिक उद्धरण है । ] 'जुहुरे वि चितयन्त.' = जुह्विरे विचेतयमानाः । व्यन्तः ( ४२ ) इत्येप अनेककर्मा । 'पद देवस्य नमसा व्यन्त.'-इति पश्यतिकर्मा । 'वीहि शूर पुरोळाशम्'-इति खादतिकर्मा । 'वीतं पानं पयस उस्रियाया.'-अश्नीतं पिबतं पयस. उसि. यायाः । उस्रिया इति गोनाम । उस्राविण्य. अस्या भोगाः । (उस्रा इति च )॥ 'ज्ञानियो ने यस विया' (ऋ० ५१९।२ ) अर्थात् यथार्थ ज्ञानवालों ने या दिया। ध्यन्न:' के अनेक अर्थ है । 'देवता के चरण को नमस्कार के द्वारा देखते हुए..." (ऋ०६१।४)-यहाँ देखने के अर्थ मे। हे वीर, इस दिये हुए पदार्थ (पुरोहास ) को स्वीकार करो' (ऋ० ३।४१३) -यहाँ खाने के अर्थ म : 'गाय का दूध खाओ. पीओ' (ऋ० १.१५४४)- (वहीअ) उनिया - गाय क्योकि इससे भोग्य पदार्थ निकलते हैं । (उसा का भी वही अर्थ है )॥ 'त्वामिन्द्र मतिभि. मुते सुनीथासो वसूयय. । गोभिः प्राणा अनूपत ॥ गोभि. कुर्वाणाः अस्तोपत । हे इन्द, युद्धि साथ मोम पीसने ये याद गुग्दर स्तुति करने वाले (मुनीया ) और धन के इच्छुक (यमूयय ) लोगों ने वाणी । तुम्हारी स्तुति की है । वाणी का [ प्रयोग करते हुए स्तुति की। 'आ तू पिश्च हरिमी द्रोपस्थे वाशोभिस्तक्षताश्मन्म- योभिः ।' आसिश्च हरि द्रो. उपस्थे । द्रुममयस्य । हरिः सोमो हरितवर्णः । अयमपीतरो हरि एतस्मादेव । 'वाशीभिस्तक्षता- दमन्मयोभि.'। वाशीभि. अरममयीभि. इति वा । वाग्भिः इति वा ॥
। चतुर्थ अध्याय १२१ 'सोम को काष्ठात्र के मध्य में गिराओ, इसे पत्थर की सिल पर तैयार करो' (१०१०१०१०)। सुनहले रस (सोम ) को लकहियो की गोद में चुमओ । जो लकडी का बना हो । हरि = सोम, हरे रंग का। हरि का यह दूसरा अर्थ (वन्दर ) भी इसी से आया है 18 'पत्थर की सिल पर ( या छेनी से) इमे तैयार करो (काटो)'-पत्यर की सिल से, या स्तुतियो से । 'स शबंदर्यो विषुणस्य जन्तोर्मा शिश्नदेवा अपि गुझत न.॥' स उत्सहता यो विपुणस्य जन्तो. विपमस्य । मा शिश्नदेवा. । अब्रह्मचर्या । शिश्न श्नयते । अपि गुऋतं न. । सत्य वा यज्ञ वा ॥ १९ ॥ 'वही स्वामी सभी जीवों की रक्षा करे, लिङ्ग की पूजा करने वाले हमारे यज्ञ मे न आवे' ( ऋ० ७,२१५)। वह विभिन्न अर्थात दुष्ट ( विषम ) जीवो पर शासन करे । लिङ्ग को देवता समझने वाले, अनाचारी-शिश्न /स्नय् (छेदना ) मे लोग हमारे ऋत अर्थात् सत्य या यज्ञ में प्रवेश न करें ॥ १९ ॥ मा घा ता गच्छानुत्तरा युगानि यन जामय. कृणवनजामि । उप बवृहि वृषभाय बाहुमन्यमिच्छस्व सुभगे पति मत् ॥ (घ) निश्चय ही (ता) वे (उत्तरा आगामी (युगानि) युग ( आ. गच्छान् ) आवेंगे ( यत्र ) जब (जाय ) स्वजन भी ( अजामि) परजन या अज्ञात-जसा (कृणवन् ) व्यवहार करेंगे । (सुभगे ) हे मुन्दरि, (बाहुम् ) अपनी बाहो को (वृपमाय ) अपने पति के लिए ( उप चवहि- उपधेहि ) नरिया यना दो और (मन् , मेरे अलावे ( अन्यम् ) दूसरे ( पतिम् ) पनि को ( इच्छम्प ) चाहो । (ऋ० १०।१०।१०) । विशेष-ऋग्वेद के प्रसिद्ध यम यमी सवाद-सूक्त का यह मत्र है। यमी ने यम से रनिको याचना की, तो यम ने अस्वीकार करते हुए कहा कि यह पुग ऐमा नहीं, यह सो सत्ययुग है । एक युग आवेगा जब भाई बहन विवाह कर लेंगे। ६म लिए, हे सुदरि, मुश पति मत बनाओ। मैं तुम्हारे मुल पा ही है। दूसरे मुपका पति पुनो। ऋग्वेद भी सामाजिक व्यवस्था पर इम मर से प्रस्ता प्रास पहना है । विशी-विद्वान् म मुक्त को नाटा आदि रूप मानने हैं। आगमिप्यन्ति तानि उत्तराणि युगानि यत्र जामय.परिप्यन्ति अजामिकर्माणि । जामि अतिरेक्नाम । चालिशस्य वा । अम- • नाना रग रोने के कारण बन्दर को हरिकीरा दुर्गवद ने रामापा के नाम से सरण दिया-विमममम्या पहिल्यमा।
१२२ हिन्दी-निरुक मानजातीयस्य वा मिः उपजन । उपधेहि वृपभाय बाहुम् । अन्यमिच्छस्व सुभगे पति मत्-इति व्याख्यातम् ॥ २० ॥ बाददाले ऐसे युग आवेंगे जब बहनें बहनों के न करने योग्य काम करेंगी। जामि = पुनरुक्ति, या मूर्ख, या दूसरी जाति । 'मि' प्रत्यय है । उस पति के लिए बाहो को तकिया बनायो । मेरे अलावे किसी दूसरे को पति बनाओ- यह स्पष्ट है ॥ २० ॥ विशेष-वालिश = मूखं जो धर्मादि कार्यों में बालकों के समान सोया रहता है । असमान=किसी की बहन दूसरे व्यक्ति के लिए परजाति की ही होती है । धौमें पिता जनिता नाभिरत्र वन्धुर्मे माता पृथिवी महीयम् । उत्तानयोश्चम्वोयॊनिरन्तरता पिता दुहितुर्गर्भमाधात् ।। (द्यो.) स्वर्गलोक ( मे ) मेरा ( पिता, जनिता ) पिता अर्थात् उत्पन्न करने वाला है, (बत्र ) यहाँ पर ( नाभिः बन्ध.) नाभि या गर्भ सम्बन्धी बन्धु लोग हैं. (इय) यह (मही) बडी (पृथिवी ) पृथ्वी ( मे ) मेरी ( माता ) माँ है । (उत्तानयो) फैले हुए दोनो (चम्बो:) कटोरो अर्थात गोलादों ये ( अन्तः) बीच मे (योनि) गर्भाशय है , (अत्र) यहाँ (पिता) पिता ने (दुहितु ) पुत्री को (गर्भम) गर्भ (आधा) धारण कराया । (ऋ० ११६४।३३)। द्यौः मे पिता (४७)-पाता वा, पालयिता वा । जनयिता। नाभिः अत्र बन्धुमें माता पृथिवी महती इयम् । बन्धुः सम्बन्ध- नात् । नाभि. सन्नहनात् । नाभ्या सन्नद्धा गर्भा जायन्ते-इत्याहुः। एतस्मादेव ज्ञातीन् सनाभयः इति आचक्षते, सवन्धवः इति च । ज्ञाति. संज्ञानात्। 'उत्तानयोश्चम्बोनिरन्त.'-उत्तानः उत्तताना, ऊर्ध्वतानो वा । तत्र पिता दुहितुः गर्भ दधाति पर्जन्यः पृथिव्याः॥ स्वर्ग मेरा पिता अर्थात् रक्षा (पा ) या पालय है, वही उत्पन्न करने वाला है । यही गर्भ मे मम्बन्ध रखनेवाले ( नामि ) यधु लोग है, यह बड़ी पृथ्वी मेरी मां है; 'बन्धु' एक साथ बंधे होने के पारण और 'नाभि' एष बन्धन में होने के कारण (निह) कहा गया है कि गर्भ [ मे रहने वाले याचे ] नाभि (नाल ) से बंध हुए उत्पन्न होत है। गी में निकट सम्बन्धियो को गनाभि ( ममान नाभि पा यन्यनवाले ) अपया राबध कहते हैं । शानि भन्छी तरह जानने के कारण । गर्मागय दोनों फैले हुए बटोरों (गोला) में बीच में है । उत्तान =चारों और पंग हश्रा, ऊपर ता पापा । यहाँ पिता पुत्री को गर्भ देता है अर्थात् मेघ पृथ्वी को[गर्म देता है ]" १२३ -- चतुर्थ अध्याय [ शंयुः (४८) सुखंयुः ] 'अथा नः शं योररपो दधात' रपो रिप्रम् इति पापनामनी भवतः । शमनं च रोगाणां, यावनं च भयानाम् । अथापि शंयुः वार्हस्पत्यः उच्यते । 'तच्छ्योरावृणीमहे गातुं यज्ञाय गातुं यजपतये' -इत्यपि निगमो भवति। गमनं यज्ञाय गमनं यज्ञपतये॥ [ शान्ति का इच्छुक या सुख का इच्छुक 1] 'अब हम लोगो को पाप- रहिन शान्ति और सुख प्रदान कीजिये (ऋ० १०।१५।४) । 'रपस्' और 'रिप्र' दोनो पाप के पर्याय हैं। (संयु) रोगों को शान्त करनेवाला (शम्) और भय से बचानेवाला (/)। बृहस्पति के वंशज को भी शयु कहते हैं-- 'यज्ञ मे जाने के लिए, यशपति के पास जाने के लिए हम शयु की प्रार्थना परसे हैं' (मंत्रा० ४।१३।१०. ० सं० २६१२, १० मा० १।९।१।२६)--यह वैदेर-प्रयोग है । यज्ञ में जाना, यज्ञपति के पास जाना ॥ २१ ॥ चतुर्थ-पाद अदितिः (४९) अदीना । देवमाता ॥ २२ ॥ अदिति -जो दीन म हो, देवताओ की माता ॥ २२ ॥ अदिति:रदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः । विश्वेदेवा अदितिः पञ्चजना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम् ।। पदिति स्वर्ग है, अदिति यन्तरिक्ष है, अदिति माता है. यह पिना है. यह पुत्र है । सारे देवता तथा पाँच जन ( जातिया) भी अदिति है, सभी उत्पन्न पार्थ अदिति है तथा होनेवाले ( भावी) पदार्य भी अदिति है। (ऋ. १1८1१०, वा० स०२५।२३, अय० ७६७)। इत्यदितेः विभूतिमाचष्टे । एनानि अदीनानि इति वा । 'यमेरिरे भृगवः'-एरिरे (५०) इति ईति उपसृष्टः अभ्यस्तः ॥२३॥ इम प्रसार अदिति की महिमा का चयन है, अथवा ये ममी वस्तुयें अ-दीन (मर) हैं। जिसे भगुवशियों ने उटाया' (पृ. ११४३४)। एरिरे' द में /रि (उzाना) मरा (दिर) तथा ['बा'] उपमग लगा है। विशेष--'एरिरे' मे दो कार अभ्याप्त से नहीं आये है। रिलबार मे '' (भारमने भापकर यहाधन को विभक्ति) स्थान में इरे' प्रादेश हो जाता है । देखिये पा० मूरिटस्तसयोगि १) उत स्मैनं वसमपि न तायुमनु मोशन्ति शितगो भरेषु । नोचायमानं जसुरि न श्येनं ययश्वाच्या पगुमय पूपम्।।
१२४ हिन्दी निरुक्त लोग (उन म्म) और ( एनम् ) इस इद्र को (विनय ) मनुष्य (भरेप) युद्धो म ( अनुक्रोति ) पुकारते हैं (वस्त्राव तायु न) से वस्त्र चराने वाले चोर को [ पुकारते है ], या ( नीचायमान ) नीचे आते हुए और ( जसुरि ) सुले हुए (श्यन न ) बाज को जैसे [ पुरारते हैं ] ( अच्छा च) अथवा ( पशुमत् ) पशुयुक्त (यब ) प्रशसनीय (यूथम्) युण्ड को [ पुकारत हैं ] । (ऋ ४॥३८॥५) । अपि स्म एन वरूसमथिमिव = वसमाथिनम् । वस वस्ते । तायु इति स्तेननाम । सस्त्यानम् अस्मिन्पापरमिति नैरुत्ता । तस्यते वा स्यात् । अनुक्रोशन्ति क्षितय सग्रामेषु । भर इति सग्रामनाम । भरते वा, हरते वा । नीचायमानम् -नीचे अय- मानम् । नीचे =निचित भवति । उच्चै -उचित भवति । जस्त- मिव श्येनम् । श्येन शसनीय गच्छति । श्रवश्वाच्छा पशुमन्च यूथम् । प्रवच अपि पगुमश्च यूथम् । प्रशसा च यथ च । धन च यूथ च इति वा । यूथ यौते , समायुत भवति । और उस वस्त्रगघि अर्थात पर पुराने दाल के समान । वस्त्र/या (पहरना) स । तायु पोर पा पर्याय है क्योंकि मम पाप भरे हुए सस है-रामा निस्तारों का बहमा है। प्रधवासम (मात करना) हो। माय लोग पो म उम पुपारन है। मर युट ना पर्याय । (पारण परमा ) पाह (हरण परना) गे । नीचापमा = नीचे की ओर जाना । नीम %Dमीच की ओर जाता। उम उपर की ओर जाना। हो (जात) धानमा।' पन = प्रशमनीय गरो पल । अया पमा प्रसनीय र पा [पृकारन है ] । प्रागनीय १ ममूर पो। प्रामा त गयो। या धन मया समगे। यूथ / (नाना) में पोनिया (मा)ो॥ 'इन्धान एन जरते म्याधी' गृणाति । मन्दी (५३) मदने म्नुतिमंग । 'प्र मन्दिन पितुमदचंता वर 'प्राचंत मन्दिो रितुमद् वच । गी (५४) व्यायान ॥ २४ ॥ प्रति र मृर यदि चारा मनुष्य उमरी है १ नुन र काम मारने पर घर ना Pramtir NP बागियर - का.म्ल -TE I TI मन्द चतुर्थ अध्याय १६५ (ऋ० १०४५।१ )= प्रशसा करता है। मन्दी (प्रशंस्य ) स्तुत्यर्थक / से । 'प्रशंसनीय ( इन्द्र ) की अनयुक्त वाणी में स्तुति करो' (ऋ० ११०१०१)। [ वही अर्थ । ] गौ की व्यास्या हो चुकी है ।। २४ ।। 'अत्राह गोरमन्वत नाम त्वष्टुरपीच्यम् । इत्था चन्द्रमसो गृहे ॥' अब ह गोः सममंसत आदित्यरश्मयः स्वं नाम अपीच्यम् भपगतम्। अपचितम्-अपिहितम्-अन्तहितम्।अमुत्र चन्द्रमसो गृहे।। 'सचमुच इस स्थान पर [ लोगो ने ] किरणों को (गो.) सूर्य से पृथक (अपीच्यम् ) ही समझा है; यहाँ पर चन्द्रमा के घर मे (ऋ० १९८४१५) । इस स्थान पर सचमुच गौ अर्थात् सूर्यकिरणो को अपने रूप मे पृथक् या असम्बद्ध समझे । हटाया हुआ, अलग या छिपा हुआ । वहाँ चन्द्रमा के घर मे ।। गातुः (५५) व्याख्यातः ( ४।२१) [ 'गातुं कृण्वन्नुपसो जनाय'-इत्यपि निगमो भवति ] ॥ सयः (५६) कर्माणि । दंसयन्ति एनानि । 'कुत्साय मन्मन्नह्यश्च सयः' इत्यपि निगमो भवति ।। 'स तूताव नैनमश्नोत्यंहतिः । स तुताव ।नैनम् अंहतिः अश्नोति । अंहतिः च, अंहः च, अंहुः च हन्ते निरूढोपधात् विपरीतात् ॥ 'गातु' की व्याख्या हो चुकी है (निरुक्त ४।२१)। [ 'उपाओ ने मनुष्य मे गति ( उत्सम ) कर दी' (ऋ० ४।५११)-यह भी वैदिक-प्रयोग है। दंसयः = कार्य, क्योकि लोग इन्हे समाप्त करते हैं (/दस् ), 'किसान के लिए कामो को (कृषि कर्म को), [ सफल ] समझते हुए मेघ में निवारा करने वाले ( अह्य ) [जल को तुमने छोडा (ऋ० ११३८०१)- यह भी वैदिक उद्धरण है । वह बढता है, उसके पाम पाप नहीं पहुंचता ( ध्यान करता )-(ऋ० १०९४४२)। यह यहता है। उसके पास पार नहीं पहुंचता है । अनि, यह और सह पादहन से बने हैं जिसमे उपपा को (हन के को) निकाल कर [ हन् वर्षों का ] पियंप कर दिया जाना है (= हन> ब>मन्ह > अम् = अह)" विशेष-भूनाथ = सुताय/तु (बदना)। देखिये- तुनादीनां दीर्घो:- भ्यासस्य (पा०म० ६१७) | निस्दोध = जिसको साधा निकन चर्या हो। 'पारमुपधातो निश्प्य वादो करवा, नोहमारनकारी विग्यपि भान:-दुगं । 'यहस्पते चयस इत्तियारम्'-यहस्पते यत् चातयसि देव- पीयुम् । पोयतिः हिसायार्मा ॥ वियुते (५९) द्यावापृयियी।
१०६ हिन्दी-निरुक्त वियवनात् । 'समान्या वियुते दूरे अन्ते'। समान समानमात्रं भवति । मात्रा मानाद् । दूर व्यारयातम् (३३१९)। अन्त. अतते. ॥ ऋधक (६०) इति पृथग्भावस्य प्रवचन भवति । अथापि ऋध्नोत्यर्थे दृश्यते-~-'ऋधगया ऋधगुताशमिष्ठा.' ऋनुवन् अयाक्षीः ऋध्नुवन अशमिष्ठा. इति च ॥ 'हे बहस्पते । आप हिंसक का विनाश करते हैं। (ऋ० ११९०५)%3D हे बृहस्पते, जब आप देवताओ के हिंसक ( यज न करनेवाले, स्वभोग प्रधान व्यक्ति) को मारते है । /पीय = मारना । वियुते = द्यावापृथिवी क्योकि एक दूसरे से पृथक है । एक ही तरह से स्वर्ग और पृथिवी दूर पर समाप्त होते हैं ( ऋ० 31५४१७ ) । समान = जिसकी नाप ( मात्रा) एक समान हो । मात्रा = जो नापी जाय । 'दूर' की व्याख्या हो चुकी है (निरुक्त ३।१९)। अन्त / अन् ( चलना ) से ।। 'ध' भिन्नता दिखलाने के अर्थ मे होता है। वृद्धि के अर्थ में भी इसका प्रयोग देखा जाता है-'समृद्ध होकर तुमने यज्ञ किया ( अया ) और समृद्ध होकर [ यज्ञ की ] शान्ति की' (वा. स० ८५२०, कपि० स० ३।१०) = समृद्ध होते हुए यज्ञ किया; समृद्ध होते हुए ही थम पिया। अस्या ( ६१ ) इति च अस्य ( ६२ ) इति च उदात्तं प्रथमादेशे, अनुदातम् अन्वादेशे । तीव्रार्थतरम् उदात्तम् । अल्पी- योऽर्थतरम् अनुदातम्॥ 'अस्या ऊ पु ण उप सातये भुवोऽहे मानो ररिवाँ अजाश्व [श्रवस्यतामजाव]-अस्यै न सातये उपभव । अहेळमान. अनुध्यन् । ररिवान् राति. अभ्यस्त. । 'अजाश्व' इति पूपणमाह अजाश्व । अजा.- अजना.।। 'अस्याः' और 'अस्य' इन दोनो में, पहली बार कहने के समय, उदात्त. स्वर होता है. दूसरी बार बहने के समय (द्वितीय-प्रयोग ) अनुदात्त स्वर होता है ! अधिक बल दिये गये अर्थ मे उदात्त तथा म बल दिये गये अर्थ में अनुदात्त होता है । 'बकरे की सवारी करने वाले [ है पूपन् ], इसे पाने के लिए, श्रोध न करते हुए और दान करते हुए हमारे पास आत्री' १. दुर्गाचार्य ने इस को दिखलाने के लिए निम्न मचा देकर व्याख्या मोहै- रदिन्द्र दिवि पाय वापरया से एदने या वासि । अतो नो यमनमे नियुत्वान्सनोपा पाहि गिवेगो मरहि। (४४०11) .
- चतुर्थ अध्याय १२७ (ऋ० १४१३४) [हे अजाश्व, कीर्तिमान बनो ] | इसे पाने के लिए हमारे पास आओ । अहैडमान = त्रोध न करते हुए। ररिवान् ( दयालु) में गि (देना ) का अभ्यास हुआ है । 'प्रजाश्व' यह पूपा को कहा गया है.-.-३ करे को घोडा (वाहन ) समझने वाले । बकरे ही उनके दौडाहे ( अज्) हैं । विशेष-प्रथमादेश = किसी शब्द का पहले-पहल प्रयोग। अन्वादेश = एक बार प्रयोग कर लेने के बाद दूसरी बार का प्रयोग । उपर्युक्त उदाहरण मे 'अस्या' का दूसरा वर्ण (Syllable ) उदात्त है तथा इसे ऋग्वेद की रीति से अस्याः लिखेंगे। अगले उदाहरण में दोनों वर्ण अनुदात्त होने से अस्याः होगा। अथ अनुदात्तम् । 'दीर्घायुरस्या यः पतिर्जीवाति शरदः शतम्' । दीर्घायुः अस्याः यः पतिः, जीवतु स शरदः शतम् । शरद-शृता अस्याम् ओषधयो भवन्ति, शोर्णाः आपः इति वा । अस्य इति अस्याः इत्येतेन व्याख्यातम् ॥ २५ ॥ अध अनुदात्त [ 'अस्था.' का उदाहरण लें ]-'उसका पति जो दीर्घायु है, सौ शरद् ऋतुओं सक जीवित रहे' ( ऋ० १०८५।३९)-वही अपं । पर जिसमे पौधे पक जाते हैं या जल वढा रहता है । 'अस्या.' से ही *अस्य' की भी व्याख्या हो गई। अस्य वामस्य पलितस्य होतुस्तस्य भ्राता मध्यमो अस्त्यनः । तृतीयो भ्राता घृतपृष्ठो अस्यात्रापश्यं विश्पति सप्तपुत्रम् ॥ (अस्य ) इस ( वामस्य ) भद्र और (पलितस्य ) पालन करनेवाले (होनु') होता का. (तस्य) उसका ( मध्यमः भ्राता) मंझला भाई (अपनः अस्ति ) विद्युत है; ( अस्य ) इसके ( तृतीयो भ्राता) तीमरे भाई को (घृतपृष्ठः) पीठ घी की बनी है, (अत्र ) यहाँ ( समत्रम् ) सान पुओं वाले (विश्पतिम् ) संसार के स्वामी को ( अपश्यम् ) मैंने देखा ( ऋ० ११६४१) अस्य वामस्य वननीयस्य । पलितस्य पालयितुः । होतु:- ह्वातन्यस्य । तस्य भ्राता मध्यमोऽस्ति अशनः । भ्राता भरतेः हरतिकर्मणः । हरते भागम् । मतव्यः भवति इति वा । तृतीयो जाता घृतपृडः अस्य अयमतिः। तयापश्यं मवस्य पातारं वा पालयितार वा विपतिम् । सप्तपुयं = सप्तमपुमम् । सर्पणपुरम् इति या ।सप्त सप्ता संख्या। मप्त आदित्यररमयः इति वदन्ति ॥२६॥ माम बन गम्माननीय वा पनि वर्षात पान करने वा भारदा मर्या पुराने पोय ( पुष्प)रा। विपत उगरा मंगला माई १२८ हिन्दी निरुक्त. है । भ्राता/भृ = हरण करना, से। वह [पतृक सम्पत्ति का ] एक भाग ले, लेता है। या भरण-पोषण करने लायक है। इसका तीसरा भाई घी की पीठ वाला है-यह अग्नि है। वहां पर मैंने सबो की रक्षा या पालन करने. वाले ससार के स्वामी को देखा है । सात पुत्र वाले = सातवें पुत्र वाले को या सर्वतोगामी पुत्रो वाले । सप्त = बढी हुई ( सृषु ) सरया । कहते हैं कि सूर्य की सात किरणें हैं ॥ २६ ।। सप्त युञ्जन्ति रथमेकचक्रमेको अश्वो वहति सप्तनामा । बिनाभि चक्रमजरमन यत्रेमा विश्वा भुवनाधि तस्थु.॥ (एकवक रथम् ) एक पहिये वाले रय को ( सप्त) सात [ किरणें ] (युञ्जन्ति ) जोतनी है, ( सप्तनामा ) सात नामो वाला (एक: अश्व.) एक घोडा (यति ) उसे खीचता है । (चक्रम् ) पहिया (त्रिनाभि ) तीन माभियो वाला, (अजरम् ) अनश्वर और (अनवम् ) अप्रतिहत है (यत्र) जहाँ ( इमा-नि ) ये ( विश्वा-नि ) सारे ( भुवना नि) ससार ( अघि तस्यु ) उहरे हैं । (भ० १११६४०२)॥ सप्त युञ्जन्ति रथम् एकचक्रम् = एकचारिणम् । चक्रं चकते. वा, चरते. वा, कामते. वा। एक. अश्व. वहति सप्तनामा 3 आदित्य. । सप्त अस्मै रश्मय. रसान् अभिसनामयन्ति । सप्त एनम् ऋपय स्तुवन्ति इति वा । इदमपीतरत् नाम एतस्मात् एव । अभिसनामात् ॥ सातो एक पहिये वाले रथ को अर्थात् एक (पहिये ) पर चलने वाले (रप) को जोतते हैं । पक्र/चक् ( हटाना ) से, या घर ( चलना ) या/क्रम ( जाना ) से। सात मामो वाला एक घोडा सोचता है अर्थात आदित्य । इसके लिए सात किरणे रसो को ले आती हैं। अथवा सात ऋषि इसकी स्तुति करते हैं। यह दूसरे अर्थ वाला 'नाम' भी इसी से बना है (नम् ) क्योषिलोचा जाना है। विशेष-नाम अभिसनामात्-नाम ( सज्ञा ) भी अपने अर्थ का योध पराने के लिए निपापद वे मुख्य या गोण अधं मे लिया जाता है-दुगं ।। सवत्सरप्रधानः उत्तरोऽर्च. निनाभि चक्रम् । ऋतु. सवत्सरः- ग्रीष्म., वर्षा., हेमन्त इति । संवत्सरः संवसन्तेऽस्मिन् भूतानि । ग्रीष्मः = ग्रस्यन्ते अस्मिन् रमा. ! वर्षा. = वपंति आसु पर्जन्य.। १. रायते वाय मन्त्रे-वायु, आदित्य, अमिः इत्येव परिसरयाय वायोस्तुती- योऽग्निर्मवति-दुर्ग चतुर्थ अध्याय १२९ हेमन्त. हिमवान् । हिमं पुनः हन्तेः वा, हिनोतेः वा। अजरम्= अजरगवर्माणम् । अनवम् = अप्रत्युतम् अन्यस्मिन् । यत्र इमानि सर्वाणि भूतानि अभिसंतिष्ठन्ते, तं संवत्सरं सर्वमात्राभिः स्तौति ।। ऋचा के उत्तरार्ध मे सवत्सर की प्रधानता है-तीन नाभियोवाला पहिया अर्थात् तीन ऋतुओं वाला वर्ष = ग्रीष्म, वर्षा, हेमन्त । संवत्सर = जिसमे सभी जीव एक साथ निवास करते हैं । ग्रीष्म = जिसमे रसो को खींचा जाय । वर्षा = जब मेघ बरसे। हेमन्त = हिम से भरा हुआ। हिम भी हन् (मारना) से या हि (शीघ्रता करना ) से। अजर = जिसका न नाश होना धर्म है अनवं = दुमरे पर आश्रय न लेने वाला । जहाँ ये मारे जीव ठहरते हैं, उस संवत्सर की सब तरह से स्तुति करता है- 'पञ्चारे चक्रे परि वर्तमाने'-इति पञ्चर्तुतया । पञ्चर्तवः संवत्सरस्य इति च ब्राह्मणम् । हेमन्तशिशिरसमासेन । 'पळर आहुर्पितम्'-इति पड़तुतया । अराः प्रत्युताः नाभौ। पट् पुनः सहतेः । 'द्वादशारं न हि तज्जराय', 'द्वादशप्रधयश्चक्रमेकम्'- इति मासानाम् । मासाः मानात् । प्रधिः प्रहितः भवति ।। 'पाच अराओं ( Spokes ) वाले पहिये के चल पडने पर..' ( ऋ० १।१६४५१३)-यहाँ पाँच ऋतुप्रो के होने से । ब्राह्मण मे भी कहा है-वर्ष मे पाच ऋतुयें हैं ( तुल० ऐ. वा० ११, २० प्रा० १।३।५।१)-हेमन्त और शिशिर को एक मानने पर । 'छह अराओं वाले ( रय ) मे ही अपित किया हुआ कहते हैं ( म० ११६४।१२)-यहां छह ऋतुओं होने से । अराये (घुरे ) नाभि मे अन्लमूत हैं । पद / सह ( सहना ) से । 'वह बारह भराओं वाला कभी नष्ट होने को नहीं है' (ऋ० १।१६४०११ ), 'बारह धुरे और एक पहिया ..( ऋ० १११६४।४८)-इनमे मासो का वर्णन है। मास नापने के कारण (/मा)। [ महीने वर्ष को नापते हैं ] प्रधि (धुरा) यह सुरक्षित होता है। 'तस्मिन्त्साकं त्रिशता न शङ्कवोऽपिताः पटिनं चलाचलास।' पष्टिः च ह वै त्रीणि च शतानि संवत्सरस्य अहोरात्रा इति च ब्राह्मणम् । समासेन ॥ ९हिनि १३० हिन्दी-निरुक्त उसमे एक साथ ही मानो तीन सौ छउँ ( Spokes) और एक दूसरे के पीछे चलनेवाली साठ अधिक ( छ. ) रखी गई हैं' (ऋ० १।१६४।४८ } ब्राह्मण मे भी कहा है कि साठ और तीन सौ दिन ( ३६० दिन ) एक वर्ष में होते हैं । [ दिन और रात को ] एक में लिया जाता है ।। विशेप--तस्मिन् + साकम् = तस्मिन्सायम् । देखिये पा० मू० 'नश्व' (८।३।३०) जिसके अनुसार पदान्त न के बाद स होने से घुट (घ-त् ) का श्रागम हो जाता है । अग्रेजी में इसे ( Clide sound ) कहते हैं । Chumle> humble, लैटिन-humilis इत्यादि । यहाँ बीच मे b आया है । वेद मे चान्द्रवर्ष के ३६० दिनो की गणना का उल्लेख महत्त्वपूर्ण है। 'सप्त शतानि विंशतिश्च तस्थु.' । 'सप्त च वै शतानि विशतिश्च संवत्सरस्य अहोरात्रा' इति च ब्राह्मणम् । विभागेन विभागेन ।॥ २७ ॥ 'सात सौ और वीस हुए थे' (ऋ० १।१६४११) । ब्राह्मण मे भी है (ऐ० २०१७)-सात-सौ-बीस दिन और रात साल मे होते हैं ।' [ यहाँ दिन और र त ] अलग-अलग लिये गये हैं ॥ २७ ॥ विशेष-अध्याय के अन्त में विभागेन' की तिरुक्ति हुई है ।। २७ ।। ॥ इति निरुक्ते चतुर्थोऽध्यायः ।। ...
- हिन्दी-निरुक्त सप्तम अध्याय प्रथम-पाद अथातो दैवतम् । तत् यानि नामानि प्राधान्यस्तुतीना देवतानां तत् दैवतमिति आचक्षते । सा एपा देवतोपपरीक्षा । यत्काम ऋपि यस्या देवतायाम् आर्थपत्यम् इच्छन् स्तुति प्रयुक्ते,... तद्देवत. स मन्त्रो भवति । ता त्रिविधा. ऋच.-परोक्षकृताः, प्रत्यक्षकृता., आध्यात्मिक्य. च । तत्र परोक्षकृता. सर्वाभि. नामविभक्तिभि युज्यन्ते, प्रथमपुरुपैश्च आस्यातस्य ॥ १ ॥ अब देवन-काण्ड [आरम्भ होता है] । जिन नामो मे मुख्यरूप से देवताओं का वर्णन है [ उनका सग्रह ] देवत' कहलाता है। आगे ( इस काण्ड मे ) देवताओं की पूरी परीक्षा ( वर्णन ) है। [किमी मत्र मे ] कोई कामना लेकर, कोई ऋपि, जिस देवता का प्रधान अर्थ चाहता हुआ, स्तुति करता है--उमी देवता का वह मात्र होता है । तो, ये ऋचायें ( मन्त्र ) तीन तरह की हैं-परोक्षत कही गई, प्रत्यक्षत कही गई और स्वय कही गई। (१) परोक्षत कही गई ऋचायें नाम की सभी विमक्तियो मे तथा क्रिया के प्रथम (= अन्य ) पुरुष मे रहती हैं जैसे-॥ १॥ 'इन्द्रो दिव. इन्द्र ईशे पृथिव्या.' । 'इन्द्रमिद् गाथिनो वृहत्' 'इन्द्रेणैते तृत्सवो वेविपाणा.' । 'इन्द्राय साम गायत' । 'नेन्द्र:- इते पवते धाम किंचन' । 'इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्र वोचम्' । 'इन्द्रे कामा अयसत' इति ॥ 'इन्द्र स्वर्ग और पृथ्वी पर शासन करते हैं' (ऋ० १०८९१०)। 'गायक गण इन्द्र की उच्च स्वर से .." (ऋ० १७१)। 'इन्द्र के साथ ये (ऋ. १८१५)। 'इन्द्र के लिए साम गायो' ( ऋ०८ ९८१) । इन्द्र के बिना कोई ज्योनि स्थान पवित्र नहीं (ऋ० १६९४६), 'मैं अब इन्द्र के वीरों को पहूंगा' ( ऋ० १।३।१)। 'इन्द्र मे कामनायें स्थिर हैं। कर्मठतृत्सुगम .."
२ हिन्दी निरक्त विशेष-इन उद्धरणो मे प्रथमा, द्वितीया आदि मे उदाहरण दिखाकर परोक्ष मे कही गई ऋचाओ का स्पष्टीकरण हुआ है । अथ प्रत्यक्षकृता मध्यमपुरुषयोगाः । त्वमिति च एतेन सर्व- नाम्ना । 'त्वमिन्द्र बलादधि' । 'वि न इन्द्र मृधो जहि' इति । अथापि प्रत्यक्षकृता. स्तोतारो भवन्ति, परोक्षकृतानि स्तोत- व्यानि । 'मा चिदन्यद्वि शसत' । 'कण्वा अभि प्र गायत' । 'उप प्रेत कुशिकाश्चेतयध्वम्' इति । (१) प्रत्यक्षत कही गई ऋचायें मध्यमपुरुप मे होती हैं = 'तुम' सर्वनाम से सयुक्त रहती हैं जैसे-'हे इन्द्र, तुम बल से उत्पन्न..." (ऋ० १०.१५३।२) 'हे इन्द्र हमारे शत्रुओ को मारो' ( ऋ० १०॥१५२१४ ) । कहीं कही स्तुति करनेवाले प्रत्यक्षत कहे जाते हैं और स्तोतव्य वस्तुएं परोक्षत कही जाती हैं जैसे- दूसरो की स्तुति मत करो' (ऋ० ८।१५); 'हे कण्ववशवाले, गाओ' (ऋ० ११३७१) हे कुशिको, पहुँचो, सावधान रहो' (ऋ० ३१५३।११) ॥ अथ आध्यात्मिक्य उत्तमपुरुपयोगा, अहमिति च एतेन सर्वनाम्ना । यथा एतत्-'इन्द्रो वैकुण्ठ' । लवसूक्तम् । वागा. म्भृणीयम् इति ॥ २॥ (३) स्वय कही गई ऋचायें उत्तम पुरुष में होती हैं = मैं' सर्वनाम से सयुक्त रहती हैं जैसे-'इन्द्रो वैकुण्ठ ' से आरम्भ होमवारा सूक्त ( ऋ० २०४८), लव सूक्त ( १०१११९) वागाम्भृणीय-सूक्त ( १०३१२५) ॥२॥ विशेप-इन मृक्तों मे मत्र के देवता स्वय बोलते है। उदाहरण के लिए वागाम्भणीय सूक्त ( 'वाक्सूक्त' या 'देवीसूक्त' ) ले-अह रुद्रभियंसुभिश्चरामि । परोक्षकृता प्रत्यक्षकृताश्च मन्त्रा. भूयिष्ठा , अल्पश आध्या• मिका । अथापि स्तुतिरेव, नाशीर्वाद – 'इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्रवोचम्' इति यथा एतस्मिन् सूक्ते। अथापि आशीरेव, न स्तुति.-'सुचक्षा अहम् अक्षीभ्या भूयासम्, सुवर्चा मुग्वेन, सुश्रुत् कर्णाभ्यां भूयासम्' इति । तदेतत् बहुलम् आध्वर्यवे याज्ञेषु च मन्यु। ।
सप्तम अध्याय परोक्षत: और प्रत्यक्षन. कही गई ऋचायें बहुत अधिक हैं, स्वयं कही गई ऋचायें बहुत कम हैं। (१) [ किमी ऋचा मे देवता की ] स्तुति ही होती है, कामना[ का वर्णन ] नही जमे-'मैं अब इन्द्र के वीर कर्मों वो कहूंगा' (ऋ० १।३२।१ )। इम ( मंत्रवाले ) सूक्तगे। (२) कहीं-कही कामना ही रहती है, स्तृति नही जैसे-'मैं आँखो से अच्छी तरह देखू. मुख से सुन्दर ज्योतिबाला वर्ने, कानो से अच्छी तरह मुनू" ( मानव गृ० १।९।२५ ) । ऐमा अधिकाशनः यजुर्वेद में और याशिक- मंत्रों में होता है। अथापि शपयाभिशापौ-'अद्या मुरीय यदि यातुधानो अस्मि'। 'अवा स वीरैर्दशभिवियूयाः' इति । अथापि कस्यचिद् भावस्य आचिस्यासा–'न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि' । 'तम आसीत्तमसा गूळ हमने' । अथापि परिदेवना कस्माञ्चिद् भावात्—'सुदेवो अद्य प्रपतेदनावृत्' । 'न विजानामि यदि वेदमस्मि' इति । अथापि निन्दाप्रशंसे-केवलायो भवति केवलादी'। 'भोजस्येदं पुष्क- रिणीव वेश्म' इति । एवम् अक्षसूक्ते द्यूतनिन्दा च कृषिप्रशंसा च । एवम् उच्चावचैः अभिप्रायैः ऋषीणां मन्यदृष्टयः भवन्ति ॥ ३ ॥ (३)कही-यही पप साना और अभिशाप देना भी रहता है-'यदि मैं मायावी राक्षम हूँ तो न हो मरू (ऋ० १०४।१५); 'नहीं तो उसके म पीर पुत्र अलग हो जायें = मर जाये (३०७।१४।१५)। (४) नहीं नहीं मिमी मवस्या विशेष के वर्णन की इच्छा रहती है-'उस यमय न मुस्यु पी और न अमरता' (कृ. ११२९२); "पहले केवल अधकार से अन्यार ािहमा पा(ऋ० १०१२९३)। (५) महीनही मिी अवस्था विशेष से मान उसन्न होता है-'ये मुन्दर देवता मात्र ऐसा कि फिर न लौटे' (ऋ० १९५१४); 'मैं नहीं जान पाम यही (इ. ११९३७) । (4) कहीही निन्दा भोर प्रसा रहती है मे-ऐना चाराला हामा पो (१.११); पिणनेवास (सानो) का पर .
हिन्दी-निरुक्त मानों कमलो से भरा सरोवर है (१०७।१०)। इसी प्रकार अक्ष-सूक्त ( १०.३४ ) मे चूत को निन्दा और कृषि की प्रशसा हुई है। इस प्रकार मंत्र के विषय मे ऋपियो को एप्टि भिन्न-भिन्न अभिप्रायो से रहती है ।। ३ ॥ तत् ये अनादिष्टदेवता. मन्त्राः, तेषु देवतोपपरीक्षा। यद्दे- वतः स यज्ञो वा यज्ञानं वा, तद्देवता. भवन्ति । अथान्यन यज्ञात्-प्राजापत्या. इति याज्ञिकाः, नाराशंसा. इति नैरता.। अपि वा, सा कामदेवता स्यात्, प्रायोदेवता वा । अस्ति हि आचारो बहुल लोके–देवदेवत्यम् , अतिथिदेवत्यम् , पितृद- वत्यम् । याज्ञदेवतो मन्य इति । अपि हि, अदेवता. देवतावत् स्तूयन्ते । यथा, अश्वप्रभृतीनि ओपधिपर्यन्तानि । अयारि अटी द्वन्द्वानि ॥ जिन मत्रो में देवता पा लेरा नही, न बता का निर्णय पर है। जिन देवा वा पा हो, या या या प भी होउही देवता के ये {मत्र) होते हैं। या गे भिन्न पामो ग-याको पगार प्रजापति [ मर) देवना होते हैं, समयारों में अनुमार नाम । अपाये feer या देवतामो ये महके ( } | मार मारमष या प्रहार देखने में रिदेवास. अतिथि on और नियों में om पवित्र वारा दी जा ] .मत्र उग देवता का dि fry arth, शिनु अ.देवता को नामि को देय ना मा nir-धोरेर भोपाय नक (face ५६०१.२०) बाट भी निघ. ५१६।२९.१६) " मन मन्येत आगनून व अर्थान् देवनानाम् , दृश्यम् एनद् भवति । माहाभाग्यात् देवनापा. ए.आत्मा कपा स्तूयते । एरस्य आत्मन अन्ये देवा. प्रत्यमानि भवन्ति । अनि पा, मवाना प्रतिभूमभि प्रापय. ग्नुवन्ति त्यात् । प्रति सावनाम्यान इतनरजन्मान. भवन्ति । नाय , जन्मान., आत्मजन्मान. । मामा पापा घ गति, मारमा अश्व, भारमा आयुयम् , आमा पा.मा गांदेश्य देवम्य ॥ ४ ॥ प्रत्यक्ष - सप्तम अध्याय ५ । - कोई देवता-विषयक अयं को विलक्षण न मान ले, यह तो प्रत्यक्ष रूप से देखने की चीजे है-देवता की बडी महिमा के कारण एक ही आत्मा की स्तुति ( वर्णन ) भिन्न-भिन्न प्रकार से होती है । अन्य देवता एक ही आत्मा के भिन्न भिन्न अंग हैं । अथवा, जैसा लोग कहते हैं-वस्तुओं (नामों) की प्रकृति (धातु ) की विभिन्नता के कारण और उसकी सर्वव्यापकता के कारण ऋषि गण स्तुनि करते हैं। वे एक दूसरे से जन्म पाते हैं (जैसे-दक्ष > अदिति > दम), वे एक दूसरे की प्रकृति ( उत्पत्तिस्थान ) हैं। उनका जन्म कम से भी और आत्मा से भी होता है। आत्मा ही इनका रय है, आत्मा शस्त्र है, आत्मा वाण है-आत्मा ही देवताओ का सब कुछ है ॥ ४ ।। द्वितीय-पाद तिस्र. एव देवता.-इति नरुक्ता.। अग्नि. पृथिवीस्थानः वायुर्वा इन्द्रो वा अन्तरिक्षस्थानः, सूर्यो धुस्थान. । तासां माहा- भाग्यात् एकैकस्या. अपि वहूनि नामधेयानि भवन्ति । अपि वा, कर्मपृयक्त्वात् । यथा होता, अध्वर्यु.. ब्रह्मा, उद्गाता इति, अपि एकस्य सतः । अपि वा, पृथगेव स्यु., पृथक् हि स्तुतयः भवन्ति । तथा अभिधानानि ।। निरुक्तकारों के मन से तीन ही देवना है-(१) पृथ्वी में रहनेवाली अग्नि, (२) अन्तरिक्ष में रहनेवाला वायु या इन्द्र, (३) स्वर्ग में रहनेवाला मूयं । इनको बढी महिमा के कारण इनमे प्रत्येक के बहुत से नाम हैं । अथवा कर्म अलग-अलग होने के कारण.-जैसे एक को ही होता, अध्वर्य, ब्रह्मा और उद्गाता कहते हैं । अथवा, ये अलग-अलग ही हैं क्योंकि स्तुनियाँ और उनके नाम भी अलग-अलग हैं। यथो एतत्-'कर्मपृथक्त्वात्' इति, वहवोऽपि विभज्य कर्माणि कुयुः । तन संस्थानकत्वं, संभोगैकत्व च उपेक्षितव्यम् । यथा, पृथिव्या मनुष्या., पशवो, देवाः इति स्थानकत्वं संभोग- कत्व च दृश्यते । यथा, पृथिन्या. पर्जन्येन च, वाय्वादित्याभ्या च संभोग.। अग्निना च इतरस्य लोक्स्य । तन एतत् नरराष्ट्रमिव ॥५॥ यह जो कहा कि परमं अलग-अलग होने के कारण [एक के बनेर नाम है ] सो बहुत से लोग भी सो आप म यौटकर ये हो ना कर सकते हैं ?
हिन्दा-निरुक ऐसी दशा में उनके अधिकार क्षेत्र और भोग क्षेत्र की समानता देखनी चाहिए जैम मनुष्यो, पशुप्रो और देवताओ का पृथ्वी-विषयक अधिकार-साम्य और भोग-साम्य देखते हैं । पुन मेघ द्वारा पृथ्वी का भोग, वायु और आदित्य के साथ [ दखते हैं ], R•तु दूमरे लोर का [ भोग ] अग्नि के साथ । वहाँ ये सभी मनुष्यों के राज्य के समान ही है ।। ५ ॥ अय आकारचिन्तन देवतानाम् । पुरुषविधा. स्यु इत्ये- कम् । चेतनावद्वत् हि स्तुतयो भवन्ति, तथा अभिधानानि । अथापि पौरुषविधिकै. अङ्ग. सस्तूयन्ते–'ऋष्वा त इन्द्र स्थवि- रस्य वाहू' । 'यत्सगृभ्णा मघवन् काशिरित्ते'। अथापि पौरप- विधिकै. द्रव्यसयोगै-'आ द्वाभ्या हरिभ्यामिन्द्र याहि' । 'कल्या- णी॥या सुरण गृहे ते' । अयापि पौरुपविधिक कर्मभि -'अद्धीन्द्र पिव च प्रस्थितस्य' । 'आश्रुत्वर्ण श्रुधी हवम्' । अब देवताओम स्वरूप का वणन होगा। पुछ लोगो के विचार से ये मनुष्य के समान है क्योकि (१)दनकी स्तुतियां और सम्बोधन भी चतन जीवो के समान होते हैं । पुन , (२) इनकी स्तुतियां मनुष्यों के मङ्गों से ( इन्हे ) सयुक्त पर होती है जैसे-'ह इन्द्र, बलवान वे ये तुम्हारे हाथ अच्छ है' (ऋ० ६।४७८), 'ह धनपति, जिस [ धावा-पृथिवी ] को सुमन पारा है ये तेरी पाई है ( ऋ० ३१३०५)। पुन , (३) मनुष्यों की वस्तुओ से मयुक्त बसे [शको स्तुतियां ही है ] महद, दो पोडा पर आयो' (१० २।१८।४), 'तुम्हारे पर म मृन्दरी स्त्री और रमणीय वस्तु है (. ३।५।६ ) । पुन ( ४ ) मधुप्पो ये कामों से सयुक्त पर [ स्तुति होती है। --'इस रसे ( गाम ). को, ६६, पिया मानो तुप' (० १११६७), 'हे गुनन या पानवार, मरी आवाज गुना' ( ऋ० ११.९॥ अपुरुषविधा म्यु-इत्यपरम् । अपि तु यद् दृश्यते, ॥ ६ ॥ अपुरुषविध तत् । यया, अग्नि, वायु,, आदित्य , पृथिवी, चन्द्र- मा. इति ॥ पुछ लोगों व विचार - [ना ] मनुष्यों में ममान नहीं है कोरि (नो विपय म) जो दसत ॥ ६॥ मनुष्यों मिान 0-4, थायु, आदिम TT पदमा स्यादि।
सतम अध्याय - यथो यथो एतत्---'चेतनावद्वत् हि स्तुतयो भवन्ति' इति, अचे- तनानि अपि एव स्तूयन्ते यथा-अक्षप्रभृतीनि ओपधिपर्यन्तानि ।। यथो अतत्-'पौरुषविधिक. अङ्गैः सस्तूयन्ते' इति, अचेतनेषु अपि एतद् भवति–'अभिक्रन्दन्ति हरितेभिरासभि.' इति प्राव- स्तुतिः । यथो एतत्- 'पौरुपविधिकै. द्रव्यसयोगै' इति, एतदपि तादृशमेव-'सुखं रथ युयुजे सिन्धुरविनम्' इति नदीस्तुति. । एतत्-'पौरुपविधिकै. कर्मभिः' इति एतदपि तादृशमेव- 'होतुश्चित्पूर्वे हविरद्यमाशत' इति ग्रावस्तुति. एव ।। यह जो कहा कि 'चेतन के समान स्तुनियाँ होती है', बैंसी तो अचेतन की भी स्तुतियां होती हैं जैसे-पासे से सकर थोपधि तक की (निघण्ट ५॥३४-२२)। (२) यह जो कहा कि 'इनकी स्तुतिया मनुष्यों के अङ्गो से सयुक्त परके होती है येसी तो अचेवन को भी होती हैं जैसे-'अपने हरे मुंह से चिल्लाते हैं। ( १०९४.२ )-यह पापाण की स्तुति है । (३) यह जो कहा कि 'मनुष्यो की वस्तुओं से सयुक्त करके [ स्तुतियाँ होती है । सो सो यहाँ ( अचेतन में) भी है जैसे-'सिन्धु ने घोड़े । गुखप रप णोता' ( ऋ० १७५९)-यह नरी की स्तुति है। (४) यह जो कहा कि 'मनुष्यो के धामो से सयुक्त करके [ स्तुतिया होती हैं ]. सीहो तो यहाँ भी है जैसे-'होता के हो सामने भोज्य हदि साया' (ऋ. १०९४२) यह भी पापान की स्तुति है। अपि वा, उभयविधा. स्युः । अपि वा, अपुरुषविधानाम् एष सता कर्मात्मान. एते स्युः । यथा, यजो यजमानस्य। एप चास्यानसमय. ॥७॥ अया 2 ( देवता ) दोनों तरह के है अपना ये मनुष्यों मे न पाई जानेवाली पिकवादिस्तुओं ] के बम रे रूप में हमे-47 यम्मान एम.स्वरूप है। यह मा रण में प्रयोग मोगों का है ॥७॥ तृतीय-पाद तिसः एव देवता. इत्युचं पुरस्तात् । तासां मरिसाहवयं . जो कुछ दृष्टि पर्जन्य. हिन्दो-निरुक्त व्याख्यास्यामः । अथ एतानि अग्निभक्तीनि-अयं लोक., प्रातः सवनम् , वसन्तः, गायत्री, त्रिवृत् स्तोमः, रथन्तरं साम, ये च देवगणाः समानाताः प्रथम स्थाने, अग्नायी पृथिवी इळा इति स्त्रियः । अथास्य कर्म-वहनं च हविपाम् , आवाहनं च देवता- नाम् । यच्च किंचिद् दाष्टिविषयकम् , अग्निकर्म एव तत् ॥ पहले कहा जा चुक है कि तीन ही देवता हैं। हम उनके विभाग ( Jurisdiction ) और सहचरों की व्याख्या करेंगे। (१) अग्नि के ये विभाग हैं-यह लोक ( पृथ्वी ), प्रात काल का सबन, वसन्त ऋतु, गायत्री छन्द, तीन दार का स्तोम (प्रार्थना ), रथन्तर नाम का साम, प्रथम स्थान म गिनाये गये देवता-गण; अग्नायी, पृथ्वी, इला--ये स्त्रियाँ । इनके काम है-हवि पहुंचाना और देवताओ को बुलाना विषयक है, वह अग्नि का ही काम है। अथास्य सस्तविका. देवा-इन्द्रः सोम., वरुण, ऋतव. । आग्नावैष्णव च हविः । न तु ऋक् संस्तविको दशत- यीषु विद्यते । अथापि आग्नापौष्ण हवि., न तु संस्तव.। तत्र एता विभक्तस्तुतिम् ऋचम् उदाहरन्ति ॥ ८॥ इनके साथ स्तुति किये जाने वाले देवता ये है-इन्द्र, सोम, वरुण, पर्जन्य, ऋतुएँ । अग्नि और विष्णु को सयुक्त हवि देते हैं, किन्तु [ संयुक्त ] स्तुति की ऋवा [ ऋग्वेद के ] दस भागों मे कही नही । इसी प्रकार अग्नि और पूपा को भयुक्त हवि देते हैं, किन्तु वैसी स्तुति नहीं है। इनकी अलग-अलग स्तुति ऋचा का उदाहरण देते हैं ॥८॥ पूपा त्वेतश्च्यावयतु प्र विद्वाननष्टपशुभुवनस्य गोपाः । स त्वैतेभ्य. परि ददत्पितृभ्योऽग्निर्देवेभ्य. सुविदत्रियेभ्यः ।। ( अमष्टपशु ) जिसके पशु नष्ट नहीं होते, ( भुवनस्य गोपा ) पृथ्वी पा ओ पालक है, (विद्वान् ) वह ज्ञानी (पूपा ) पूषा नाम देवता (वा) तुम्हें (इन.) यहाँ से (प्रच्यावयतु ) चुत करे। (स ) यह ( अग्नि ) अग्नि देवना ( वा ) तुम्हें ( एरेभ्य ) इन (पितृभ्य ) पितरा वो, और ( सुविधा त्रियेभ्यः ) सुन्दर न देने वाले ( देवेन.) देवताओ यो ( परिददत् ) दे दे। (१० १०॥१७३) दिखानेवाली - ह सप्तम अध्याय + . पूपा त्वा इत प्रच्यावयतु, विद्वान् , अनपशु, भुवनस्य गोपा इति । एप हि सवषा भूताना गोपायिता आदित्य । 'स त्वैतेभ्य परि ददत्पितृभ्य' इति साशयिक तृतीय पाद । पूषा पुरस्तात् , तस्य अन्वादेश --इत्येकम् । अग्नि उपरिष्टात् , तस्य प्रकीर्तना-इत्यपरम् । अग्नि देवेभ्य सुविदत्रियेभ्य । सुविदत्र धन भवति । विन्दते वा एकोपसर्गात् , ददाते वा स्यात् दयुपसर्गात् ॥९॥ पूपा तुम्हें यहाँ से च्युत करे वह नानी है उसके पशु नष्ट नहीं हुए हैं, वह ससार का रक्षक है । वह आदित्य ही सभी जीवो का पालक है । वह तुम्हे इन पितरों को दे दे -यह तीसरा पाद सदिग्घ है। पूपा वा नाम पहले आ चुका है इसमे उही का बाद म उल्लेख है-यह एक मत है। दूसरा मन कि अग्नि का नाम बाद में आता है उही का उल्लेख यहाँ है । अग्नि उदार देवताओ को [ तुम्ह दे दें ] । विदत्र = धन । एक उपसग ( मु ) के बार/ विद् ( पाना ) से, या दो उपसगौ ( सु वि) के बाद/दा ( देना ) से बना है । अथ एतानि इन्द्रभक्तीनि-अन्तरिक्षलोक, माध्यन्दिन सवनम् , ग्रीष्म , निष्टुप् , पञ्चदश स्तोम , वृहत् साम, ये च देवगणा समाम्नाता मध्यमे स्थाने याश्च स्त्रिय । अथास्य कर्म-रसानुप्रदान, वृत्रवध , या च का च वलकृति इन्द्रकर्म एव तत् । अथ अस्य सस्तविका देवा --अग्नि , सोम, वरुण, पूपा, बृहस्पति , ब्रह्मणस्पति , पर्वत, कुत्स , विष्णु, वायु । अथापि मित्र वरुणेन सस्तूयते । पूष्णा रुद्रेण च सोम । अग्निना च पूपा । वातेन च पर्जन्य ॥ (२) य इद्र के विभाग हैं-अतरिक्षलो दोपहर वा ( माध्यदिन ) सवन ग्रीष्म ऋतु त्रिष्टुप छ द पद्रह बार का स्तोम बृद्दत नाम का साम मध्य स्थान मे गिनाये गये देवगण और स्त्रियो। इन काम है-रस दान परना और न को मारना । ओ कुछ बल का काम है वह राहा काम है । इनके साथ स्तुति किये जाने वाल देवता ये हैं-अग्नि मोम २९ग पूरा यहम्पति ब्रह्मणस्पति पवत कुरा विष्ण और घायु । पुन मित्र की सानि बाग के साथ होती है सोम की पूषा और रस के साप पा को अग्नि के साप और पजय की वास के साय॥१०॥ - वर्षा , जाती है। हिन्दो निरुक्त अथ एतानि आदित्यभक्तीनि--असौ लोक., तृतीरासवनम् , जगती, सप्तदश स्तोम , वैरूपं साम, ये च देवगणा. समाम्नाता. उत्तमे स्थाने, याश्च स्त्रिय.। अथास्य कर्म-रमा- दान, रश्मिभिश्च रसधारणम् , यच्च किंचित् प्रवह्नितम् आदि- त्यकर्म एव तत् । चन्द्रमा वायुना सवत्सरेण इति सस्तव. ॥ ( ३ ) ये आदित्य के विभाग हैं-वह लोक ( स्वर्ग ), तीसरा ( साय ) सवन वर्षा ऋतु जगती-छन्द, सतरह वार का स्तोम वरूप नाम का साम, उरम स्थान में गिनाये गये देवता और स्त्रियाँ । इनके काम है-रस प्रहण करना और फिरणो से उसे धारण करना । जो कुछ गुप्त अथ है, वह आदित्य या ही काम है। इनकी स्तुति चन्द्रमा, वायु और सवत्सर के साथ की एतेषु एव स्थानव्यूहेपु ऋतुच्छन्द स्तोमपृष्ठस्य भक्तिशेपम् अनुकल्पयीत । शरत् , अनुष्टुप् , एकविंश. वैराज साम---इति पृथिव्यायतनानि । हेमन्त , पङ्क्ति., त्रिणवः स्तोम , शाकर साम- -इति अन्तरिक्षायतनानि। शिशिर , अतिच्छन्दा, श्रयस्त्रिंश स्तोम , रैवतं साम–इति धुभक्तीनि ॥ ११ ॥ स्थान के इन्ही विभागो मे ऋतु, छन्द स्तोम-भाग [ आदि ] के अपशिण अशो का विभाजन कर लें जैसे-दारद् ऋतु, अनुष्टुप् छन्द, इक्कीस धार का स्तोम, वैराज नामक माम–य पृथ्वी के विषय हैं। हेमन्त ऋतु पति-उद, सत्ताईस ( ३४९) य र का स्तोम, पावर नामक साम-ये अन्तरिक्ष के विषय हैं । शिविर अतिच्छन्दा छन्द, तैतीस वार का स्तोम, रेवत नामक साम-य स्वग से सम्बद्ध हैं ।। ११ ॥ विशेष- [-स्थान तो तीन ही है-पृथ्वी, अन्तरिक्ष, स्वर्ग विन्तु ऋतु, छत स्नोम केवल तीन हो नही, छ. हैं उन्हें भी किसी प्रकार इन्ही तीन स्थानों में भतर्भूत करना है इसलिए यास्य ने वाकी बचे हुए ऋतु, छ द आदि का भी विभाजन समान एप से कर दिया है ॥ ११ ॥ मन्ना मननात् । छन्दासि छादनात् । यजुः यजते । साम समितम् ऋचा ! अस्यते वा । ऋचा सम मेने-इति नैदाना.. गायनी गायते तिक विपरीता । 'गायतो स्तोम., . ऋतु, सप्तम अध्याय ११ मुखात् उदपतत्' इति च ब्राह्मणम् । उष्णिक उत्स्नाता भवति । स्निह्यतेः वा स्यात् कान्तिकर्मणः । उप्णोपिणी इव-इति औप- मिकम् । उष्णीपं स्नायते. ॥ मत्र/मन् (चिन्तन ) से; छन्द /छद् (विचारो को ढंकना, सीमित करना) से; यजु/यज् ( पूजा ) से; साम, ऋचा द्वारा समान रूप से सीमित होने के कारण (सम्/मा):या/अस् ( फेंकना) से। वैदिक-उन्दो में निष्णात (नैदान ) लोगो का कहना है-इसे ऋचा के समान समझा' । गायत्री/गै = 'स्तुति करना' से, या निगम ( तीन बार जानेवाली ) उलट पर बनी हो । ग्राह्मण में कहा है-'गाते गाते [ ब्रह्मा के ] मुख से गिर पड़ी' । उष्णिक ऊपर से स्नान किये हुए' ( उत/स्ना); या/स्निह = 'सोभा' से । उपमा के विचार से-मानों पगडी से सयुक्त (उष्णोपिगी) है। उणीप (पगडी) स्नैि ( ढंकना ) से ॥ ककुप ककुभिनो भवति । ककुप् च कुन्ज. च कुजते. वा, उज्जतेः वा । अनुष्टुप् अनुष्टोभनात् । 'गायत्रीमेव त्रिपदां सती चतुर्थेन पादेन अनुष्टोभति'--इति च ब्राह्मणम् । वृहती परि- वर्हणात् । पंक्तिः पञ्चपदा । त्रिष्टुप् स्तोभति उत्तरपदा । का तु विता स्यात् ? तीर्णतमं छन्दः । त्रिवत् वजः। तस्य स्तोभनी इति वा । 'यत् निः अस्तोभत् तत् त्रिष्टुभः त्रिष्टुप्त्वम्' इति विज्ञायते ॥ १२ ॥ पाप भानन्द से युक्त (कुभिनी) है, 'कु' और 'कुम्ज' दोनों कुन् (4) या/उज् (वाना ) से। 'अनुष्टुर' अनु/स्तुम् (पीछे स्तुति परना) से। ब्राह्मण मे रहा है-'यह ( अनुदा ) तीन चरणो यारी गायत्री का, अपने चौथे घरण से सपन परते हुए, अनुगमन करता है। वहतो' मानी परिधि गरण (बह ) पनि' पाप पार होने के कारण । विन्टुप् । उत्तर-वर स्तुति (Vतुम ) कारण। परन्तु इस वियना या है? यह गा तेज पद है (1) अपदा, तीन मावरण वा यस को (Vतुम् ) जो तीन गार स्तुति की, वही पिदुरी शिमा-गहमागम होता है।॥ १२ ॥ जगती गततम छन्द । जलचरगतिः या, 'जल्गल्यमानः भगुगा' गाह्मणम् । विराट् मिराजनार वा, पिराध- १२ हिन्दी-निरुक्त नात् वा, विप्रापणात् वा । विराजनात् संपूर्णाक्षरा, विराधनात् अनाक्षरा, विप्रापणात् अधिकाक्षरा। पिपीलिकमध्या इत्यौप- मिकम् । पिपीलिका पेलतेः गतिकर्मण. ॥ जगती सबसे अधिक दूर तक गया हुआ छन्द है ( गम् ), या जलचर की गतिवाला है। ब्राह्मण मे कहा है-'[ब्रह्मा ने] सृष्टि की इच्छा न रखने हुए इसे बनाया' । 'विराट' वि / राज् ( अधिकार ) से, वि/राध् (विरोध) से, या वि प्राप् (विस्तार ) से। अक्षरो के पूरे होने पर वि/राज से. उनके कम होने पर वि/राध से और उनके अधिक होने पर वि प्र/आप से। उपमा की दृष्टि से इसे पिपीलिक मध्या (जिसके बीच मे अक्षर उसी प्रकार कम हो जैसे चीटी का बिचला भाग) कहते हैं । 'पिपीलिका' /पेल = 'जाना' से ।। इति इमा. देवताः अनुक्रान्ता -सूक्तभाजः, हविर्भाजः, ऋग्भाजश्च भूयिष्ठा । काश्चित् निपातभाजः ॥ अथ उत अभि- धान सयुज्य हविश्वोदयति-~-इन्द्राय वृध्ने, इन्द्राय अंहोमुचे इति । तानि अपि एके समामनन्ति, भूयांसि तु समाम्नानात् । यत् तु सविज्ञानभत स्यात् प्राधान्यस्तुति, तत् समामने ॥ अथ उत कर्मभिः ऋपि, देवता. स्तौति-वृत्रहा, पुरन्दर इति । तानि अपि एके समामनन्ति, भूयासि तु समाम्नानात् । व्यञ्जनमात्रं तु तत् तस्याभिधानस्य भवति । यथा ब्राह्मणाय बुभुक्षिताय ओदनं देहि, स्नाताय अनुलेपन, पिपासते पानीयम् इति ॥१३॥ इस तरह इन देवताओ का वर्णन हुआ। सूक्तद्वारा सम्बोधित, हवि को पानेवाले तथा ऋचाओ द्वारा सम्बोधित ( देवता ) सबसे अधिक हैं। कुछ आकस्मिक (निपात = बम)प से भी गित है। कही-कहीं उनके नाम से मयुक्त परके हवि देते हैं जैसे-वृत्र को मारने वाले इन्द्र के लिए, दुख मे बचानेवाले इन्द्र के लिए। कुछ लोग इनका भी साह कर लेते हैं, किन्तु ये सग्रह किये जाने से अधिक है। मैं उसका ही संग्रह करता हूँ जो ( नाम ) रुट हो गया है और जिम दारा मुन्त्य रूप से स्तुति की जाती है। देवताओं के विशेषों का सम्ह नही बगा)। पुन, ऋषिगण देवताओं की स्तुति उन बम का उल्लेख रिसे हए परले - सप्तम अध्याय . १३ हैं जैसे-वृत्र को मारनेवाला, पुर का नाशक ( = इन्द्र)। कुछ लोग इनका "भी संग्रह कर लेते हैं, परन्तु ये सग्रह किये जाने से अधिक हैं । ये (विशेषण) उनके नाम का केवल प्रकाशन करते हैं जैसे-भूखे ब्राह्मण को भात दो, नहाये हुए को अनुलेपन ( तेल आदि), प्यासे को पानी ॥ १३ ॥ चतुर्थ-पाद अथातः अनुक्रमिष्यामः । अग्निः पृथिवीस्थानः, तं प्रथम व्याख्यास्यामः । अग्निः कस्मात् ? अग्रणीः भवति, अग्रं यज्ञेषु प्रणोयते, अङ्ग नयति संनममानः। अक्नोपनः भवति-इति स्थौलाठीविः । न क्नोपयति = न स्नेहयति । त्रिभ्य आख्यातेभ्यः जायते-इति शाकपूणिः । इतात् , अंक्तात् दग्धात् वा, नीतात् । स खलु एतेः अकारम् आदत्ते, गकारम् अनक्तेः वा दहते. वा, नो परः । तस्य एपा भवति । अब हम क्रमश. वर्णन करेंगे । अग्नि का स्थान पृथ्वी में है. उसकी ध्यारया पहले करेंगे । ( १ ) 'अग्नि' कैसे ? ये अग्रणी ( नेता ) हैं (नी) यज्ञो मे सबसे पहले लाये जाते हैं. कोई वस्तु दो जाने पर उसे अपना अंग बना लेते हैं । स्थौलाष्ठीवि कहते हैं कि ये शोषक हैं ( 4-वनुप् ) । नही भिंगाते, स्निग्य नही करते । शाक्पूणि कहते हैं कि [ यह शब्द ] तीन क्रियाओ से बना है- VE ( जाना), अञ् ( चमकना ) या दह् ( जलाना ), और /नी (ले जाना ) से 1 /5 से अकार, अञ्ज या /दह ( दग्य ) से गकार और सबसे अन्तिम वर्ण/नी से बना है । यह उनको (ऋचा ) है ।। १४ ॥ अग्निमीळे पुरोहितं, यजस्य देवमृत्विजम्।होतारं रत्नधातमम्। (पुरोहितं) पुरोहित स्वरूप, ( यज्ञस्य ) यज्ञ के ( देवम् ) देवता, (ऋत्विजम् ) ऋत्विज - समय पर यज्ञ करानेवाले. (स्नधातमम् ) सबसे अधिक धन देनेवाले (होतारम् ) हवन करनेवाले ( अग्निम् ) अग्नि को ( ईले) नमस्कार करता हूं। (ऋ० १११)। अग्निम् ईळे=अग्नि याचामि । ईलिः अध्येपणाकर्मा, पूजा- कर्मा वा । पुरोहितः व्याख्यातः। यज्ञ. च। देवः दानाद वा, दीपनाद वा द्योतनाद् वा, धुस्थानो भवति इति वा । यो देवः, सा देवता । होतारं ह्वातारम् । जुहोतेः होता इति और्णवाभः । .
- १४ हिन्दी निरुक्त रत्नधातमम् रमणीयाना धनानां दातृतमम् । तस्य एपा अपरा भवति ॥ १५ ॥ अग्निम् ईले = अग्नि से मांगता हूँVई = आराधना या पूजा । पुरोहित ( २।१२) और यन ( ३३१९) की व्यारया हो चुकी है । 'देव' दा ( देना }, -दीप ( चमकना ) या/द्युत् ( जलना ) से । अथवा स्वर्ग मे स्थान होने के कारण । जो देव है वही देवता भी है । होतार = बुलानेवाले को । पौर्णवाभ के मत से होता हु ( यज्ञ करना ) से बना है। रत्नधानम = रमणीय धनो के सबसे बडे दाता को । उनकी यह दूसरी ( ऋचा) है ॥ १५ ॥ अग्नि पूर्वेभिपिभिरीडयो नूतनैरुत । स देवा एह वक्षति । ( अग्नि ) अग्नि (पूर्वमि.) प्राचीनकाल के ( उत ) और ( नूतनः ) नये (ऋषिभि ) ऋषियो के द्वारा ( ईडय ) पूजनीय हैं (स ) वे ( देवान् ) देवताओं को ( इह ) यहाँ ( आवक्षति ) ले आवें। (ऋ० ११२) । अग्नि. य पूर्वे. ऋषिभि ईडितव्य. वन्दितव्य, अस्माभिः च नवतरै, स देवान् इह आवहतु इति । स न मन्येत, अयमेव इति, अपि एते उत्तरे ज्योतिपी 'अग्नी' उच्यते । ततो नु मध्यम.॥ १६ ॥ अग्नि जो पूर्वकालिक ऋपियो वे इंहितम्य = वादनीय हैं, और हम-जैस नवीन [ ऋपियों ] के भी। वे देवताओ को यहां लायें। कोई यह न समझे कि फेवल यही (पापिय ) अग्नि [ 'अग्नि' बहलाता ] है । बल्कि ये कार के दोनो ज्योति पुञ्ज (विजली और सूर्य ) मी 'अग्नि' बहलाते हैं। तो [ यह ऋचा ] मध्यम (अग्नि = बिजली) की है ।। १७ ॥ अभि प्रवन्त समनेव योपा क्ल्याण्य. स्मयमानासो अग्निम् । घृतस्य धारा. समिधो नसन्त ता जुपाणो हर्यति जातवेदा ॥ (समना ) एक समान वुद्धि या मनवाली, (कल्यास ) मुदरी तथा (स्मयमानास ) मुस्कुराती हुई (पोषा) स्त्री (इव) ये समार [बिजरिया) (अग्निम् ) अग्नि को (अमि प्रवन्त ) उदान करें, या उनके प्रति । (घृतस्य) घी की (चारा ) धारायें ( समिध ) समिधाओं से (नगर) मिल जाय, (ता रहें (जुषाण ) पीता हया ( जातवेदा ) जातवेद नामर अग्नि (हयंदि) प्रसन्न होता है। (ऋ० १६८८)। अभिनमन्त समनस श्व योपाः। ममनं समननात् पा, 'अग्नि.'
सप्तम अध्याय संमाननात् बा । 'कल्याण्यः स्मयमानासो अग्निनम्" इत्यौपमि- कम् । घृतस्य धाराः = उदकंस्य धाराः। समिध. नसन्त । नसतिः आप्नोतिकर्मा वा, नमतिकर्मा वा । 'ता जुपाणो यति जातवेदा' हयंतिः प्रेप्सांकर्मा, अभियंति इति ।। समान मन वाली स्त्रियो के समान ( वे ) झुकें। समन = साथ-साथ सौम लेनेवाली ( सम् अन् ) या साथ-साथ सोचनेवाली ( सम् मन् ) 'सुन्दरी' मुस्कुराती हुई [ स्त्रियो.के समान ] अग्नि के प्रति यह उपमा है । घृत की धारायें = जल की धारायें। समिधा ( लकडी ) से मिले।नम् = 'पाना' या 'झुक्ना' । 'उनका आनन्द लेता हुआ, जीवरूपी धन धारण करने वाला ( जातवेद) देव प्रसन्न होता है ।' हर् = पाने की इच्छा अर्थात् वह बार-बार पाने की इच्छा करता है ।। 'समुद्रामिर्मधुमाँ उदारत्' इति आदित्यम् उक्तं मन्यन्ते । समुद्रादह्येपोऽभ्यः उदेति'-इति च ब्राह्मणम् । अथापि ब्राह्मण भवति-'अग्निः सर्वा. देवताः' इति । तस्य उत्तरा भूयसे निर्वचनाय ॥ १७ ॥ 'सागर से है मधुमय तरग उठ आई' ( ऋ० ४.५८।१ )--यहाँ शादित्य का वर्णन मानते हैं । ब्राह्मण वाक्य भी है-'यह समुद्र और जल से निकलता हैं। कौपी० प्रा० २५६१ । और भी ब्राह्मण-वाक्य है-'अमि सभी देवता हैं' ( ऐ० वा०६।३ इत्यादि ) । इसके बाद की [ ऋचा ] स्पष्टतर उदाहरण के लिये है ॥ १७ ॥ इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गस्त्मान् । एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्नि यमं मातरिश्वानमाहुः ॥ [ लोग उसे ] इन्द्र, मित्र, वरुण या अग्नि कहते हैं, और वह दिम्प गरुत्मान् सुन्दर पंखो से युक्त है । एक ही सत्व को ऋषिगण बहुत प्रकार से पहते हैं-अग्नि, यम और मातरिश्वा वह्ते हैं । (ऋ० ११६४४४६) इममेव अग्नि महान्तम् आत्मानम् , एकम् आत्मानं बहुधा मेधाविनो वदन्ति इन्द्रं मित्रं वरुणम् अग्नि दियं च गरुत्म- न्तम् । दिव्यः = दिविज.। गरत्मान् गरणवान् । गुर्वात्मा, १०हिनि०, अ०७ 3D हिन्दी निरुक्त महात्मा इति वा । यस्तु सूक्त भजते, यस्मै हकि निरुप्यते, अयमेव स अग्नि. । निपातमेव एते उत्तरे ज्योतिषी एतेन नाम- धेयेन भजेते ॥ १८ ॥ इसी महान खात्मा को, ए आत्मावाले अनि को मेघावी रोग नाना प्रकार से पुकारते हैं-इन्द्र, मित्र, वरुण तथा दिन्य गरुत्मान । दिव्य = स्वर्ग मे उत्पन्न । गरुत्मान् = प्रार्थना (V) से युक्त, गुरु आत्मावाला या महात्मा जो सूक्त पाता है ( = जिसके लिए सूक्त है ) तथा जिसे हवि मिलता है वह यही ( पार्थिव ) अग्मि है । ये ऊपर के दोनों ज्योति पुज (सूर्य और विद्युत्) । • इस नाम से कभी कभी ही पाते हैं ।। ८॥ पश्चम पाद जातवेदा कस्मात् ? जातानि वेद । जातानि वा एन विदु । जाते जाते विद्यते इति वा । जातवित्तो वा-जातधन । जातविद्यो वा जातप्रज्ञान । 'यत् तत् जात. पशून् अविन्दत तनातवेदसो जातवेदस्त्वम्'---इति ब्राह्मणम् । 'तस्मात् सर्वान ऋतून पशव. अग्निम् अभिसर्पन्ति'-इति च । तस्य एपा भवति ॥ १९ ॥ (२) जातवेदा से ? सभी उत्पन्न वस्तुओं को जानता है, या राम यस्तुएँ उसे जानती है. या वह प्रत्यक उत्पन्न वस्तु में विद्यमान है, या उत्पन्न वस्तुएं ही उसके लिए वित्त = धन है, या न वस्तुएँ उसके लिए विद्या= ज्ञान हैं । श्राह्मण में कहा है-'उगने जन्म लेते ही पशुओ को पाया, यही जातवेदा की विशेषता है" (नाम. ११८२) यह भी कहा है ( मंत्रा स. १८२ ) कि 'इसीलिए ममो ऋतुओं में पशुगण अग्नि के पास जाते है। उसकी यह ( ऋचा ) है ॥ १९ ॥ प्र नूनं जातवेदसमश्व हिनोत वाजिनम् । इद नो वहिरासदे ।। (नून ) सचमुच (वाजिन ) बलशाही (अश्य ) घोडा के (जातवेदमम ) जातवेद को ( न ) हमारे (१८) स (बहि ) पुश पर (बामदे ) बैठने के लिए (हिनीन) प्ररित करो। (ऋ. १०।१८८1१) प्र हिप्न जातवेदम कर्ममि , समश्नुवानम् । अपि वा, उप- मार्थे म्यान-अवमिन जातवेदगम् इति । इद नो बर्हि आमीदतु समान में बना हो क्योंकि सभी जीवों को व्याप्त करता है--उसी से वायानर हुआ। सप्तम अध्याय १७ इति ॥ तदेतत् एकम् एव जातवेदसं गाया तृचं दशतयोषु विद्यते । यत्तु किचित् प्रासेयं तत् जातवेदसानां स्याने युज्यते ॥ जातवेद को अपने कर्मों से प्रेरित करो, जो सर्वव्यापक है (भा) अथवा, उपमा के अर्थ मे है-घोडे के समान जातवेद को । हमारे इस कुशासन वर बैठे। [ ऋग्वेद के ] दश खण्डो मे, जातवेदा को सम्बोधिन, तीन चरणो वाली गायत्री (छन्द) का यह एक ही मत्र है। जो कुछ अग्नि का है, वह जातवेद के स्थान में भी ठीक-ठीक वैठना है ।। स न मन्येत अयमेव असि. इति । अपि एते उत्तरे ज्यो- तिपी जातवेदसौ उच्यते । ततो नु मध्यम.-- अभि प्रवन्त समनेव योपा.' इति । तत्पुरस्तात् व्याख्यातम् । अथ असी आदित्यः-'उदुत्यं जातवेदसम्' इति । तत् उपरिष्टात् व्याख्या- स्यामः । यस्तु सूक्तं भजते, यस्मै हवि. निरप्यते, अयमेव स अग्निः जातवेदाः । निपातमेव एते उत्तरे ज्योतिपी एतेन नाम- । धेयेन भजेते ।। २० ॥ मध्यम- कोई यह न सोचे कि केवल यही अग्नि [ जातवेदा कहलाते हैं ], बल्कि कार के दोनों ज्योति पुञ्ज भी जातवेदा कहलाते हैं। [ यह ऋचा बग्नि ( विजली ) की है-'समान मन वाली स्त्रियो के समान वे झुकें ( ऋ० ४१५८८) । इसकी व्याख्या ऊपर हो गई है (७.१७)। अब वह मादित्य--- 'उस जातवेदस् को ऊपर'""( ऋ० १५०१)इसकी व्याश्या नीचे होगी ( १२६१५ ) । जो सूक्त पाना है, जिसे हवि मिलता है. वह यही (पार्थिव ) अग्नि जातवेदा है। कार के ये दोनों ज्योति पुञ इस नाम से कभी-कभी ही पात्रे हैं ॥ २० ॥ पष्ट-पाद वैश्वानर. कस्मात् ? विश्वान् नरान नयति । विश्वे एनं नराः नयन्ति इति वा । अपि वा, विश्वानर एव स्यात्, प्रत्युतः सर्वाणि भूतानि । तस्य वैश्वानरः । तस्य एपा भवति ।। २१ ॥ (३) वैश्वानर कसे ? सभी मनुष्यों को ले जाता है. या इसे ही सभी मनुष्य से जाते हैं। अथवा "विश्वान् + अर' ( सबको व्याप्त करने वाला) उसकी यह (ऋचा) है ॥ २१ ।।
१६ हिन्दी-निरुक्त महात्मा इति वा । यस्तु सूक्त भजते, यस्मै हकि निरुप्यते, अयमेव स अग्नि । निपातमेव एते उत्तरे ज्योतिषी एतेन नाम- धेयेन भजेते ॥१८॥ इसी महान् यात्मा को ए आत्मावाले अग्नि को मेघावी लोग नाना प्रकार से पुकारते हैं-इन्द्र, मित्र वरुण तथा दिष्य गरुत्मान । दिव्य = स्वर्ग मे उत्पन्न । गरुत्मान् = प्रार्थना (VT) से युक्त, गुरु आत्मावाला या महामा जो सूक्त पाता है ( = जिसके लिए सूक्त है ) तथा जिसे हवि मिलता है वह यही ( पार्थिव ) अग्नि है। ये ऊपर के दोनो ज्योति पुन (सूर्य और विद्युत)। . इस नाम से कभी कभी ही पाते हैं ॥ ८ ॥ पश्चम-पाद जातवेदा कस्मात् ? जातानि वेद । जातानि वा एन विदु । जाते जाते विद्यते इति वा । जातवित्तो वा-जातधन । जातविद्यो वा-जातप्रज्ञान । 'यत् तत् जात पशून् अविन्दत तनातवेदसो जातवेदस्त्वम्' इति ब्राह्मणम्। 'तस्मात् सर्वान् ऋतून पशव अग्निम् अभिसर्पन्ति'-इति च । तस्य एपा भवति ॥ १९ ॥ (२) जातवेदा कसे ? सभी उत्पन्न वस्तुओं को जानता है, या सन वस्तुएँ उसे जानती हैं, या वह प्रत्येक उत्पन्न वस्तु में विद्यमान है, या उत्पन्न वस्तुएं ही उसके लिए वित्त = धन है, या सन्न वस्तुएं उसके लिए विद्या ज्ञान है । प्राह्मण मे कहा है- उसने ज म लेते ही पशुओ को पाया, यही जातवेदा की विशेषता है' (त्रा०म० ११८०२) यह भी कहा है (मंत्रा स. १।८।२) दि इसीलिए ममी ऋतुप्रों में पशुगण अग्नि के पास जाते है। उमकी यह ( ऋचा ) है ॥ १९ ॥ प्र नून जातवेदसमश्व हिनोत वाजिनम् । इद नो बहिरासदे ।। (नून ) सचमुच (वाजिन ) बलशाली (व) घोरा के (जातवेदमम् ) जातवेद को (न ) हमारे (इद) इस (यहि ) पुष पर ( बामदे ) बैठने के लिए (प्रहिनो प्रेरित रो। (ऋ० १०।१८८०१) प्रदिप्त जातवेदम कर्ममि , ममश्नुवानम् । अपि वा, उप- मार्थे म्यात्-अश्वमिव जातवेदसम् इति । इद नो यहि भासीदतु समान सम्म अध्याय १६ 3प्रधानता का वणा मैं वृषभ र्यात जल बरसाने वाले की, महीत्व करूंगा । पूरव' = पूनि के योग्य वर्षा की कामनावाले एसे मनुष्य, जिस वृत्रहण = मेघनाक की सच ते = सेवा करते हैं। दस्यु/दस = नारा से क्योंकि इसम रस नष्ट हो जाते हैं तथा यह [ मेघ अपने प्रभाव से ] कामो को ना कर देता है । उस, अग्नि वैश्वानर न मारकर काष्ठा = जल को हिलाया शम्बर =मेघ को फाड डारा॥ अथ असौ आदित्य —इति पूर्वे याज्ञिका । एपा लोकाना रोहण, मानाना रोह आन्नात । रोहात् प्रत्यवरोह चिकीपित । ताम् अनुकृति होता आग्निमारते शस्त्र, वैश्वानरीयेण सूक्तेन प्रतिपद्यते । मोऽपि न स्तोत्रियम् आद्रियेत। आग्नेयो हि भवति । तत आगच्छति मध्यस्थाना देवता रुद्र च मस्तश्च । तत अग्निम् इहस्थानम् । अत्रैव स्तोनिय शसति ॥ प्राचीन याशिको के मत स वह भादित्य ही है। कहा गया है कि लोकों फे वृद्धि प्रम स सयन ( सोम चुआना) का भी वृद्धिक्रम होता है। वृद्धि के म ने बाद ह्राम का प्रम (प्रत्यवरोह ) भी कहा जाता है। यशवर्ता (होता ) इस क्रम ( अनुनि ) को अग्नि और मरुन वे आवाहन [ के ममय ] में शानर गूत के द्वारा सम्पप करना है। यह भी स्तोत्र पर अधिक बल म दे ययोकि यह अमि का है। वह मध्यम स्थान १ देवता-रुद्र और मरण पर आता है तब इम ससार में स्थित अग्नि पर आता है। यही वह स्तोत्र-पाठरता है। अयापि वैश्वानरीयो द्वादशकपाला भरति । एतस्य हि द्वादशविध कर्म । अथापि ब्राह्मण भवति-अनौना आदित्यो:- ग्निर्वैश्वानर' इति । अथापि निवित् सौर्यवैश्वानरी भवति- 'आ यो द्या भात्या पृथिवीम्' इति । एप हि द्यावापृथिन्यो आभा- सयति । अयापि छान्द मिक सूत सौर्यवैश्वानर भवति-दिवि पृष्टो अरोचत इति एप हि दिनि पृप्टोअरोचत इति । अयापि हविणान्तीय मूल मौर्यवैश्वानर भवति । पुन यंत्र नर को [हरि ] मारह पात्र में मिलता उमरे भारह तरह मे पाम है। गा मा पाह्मण धार भी-यह मारिष ही अग्नि गार है (म.पं० २०१२)। तुन, fifa(तही ।
. हिन्दो निरुक्त वैश्वानरस्य सुमतौ स्याम राजा हि कं भुवनानामभिश्रीः । इतो जातो विश्वमिदं वि चष्टे वैश्वानरो यतते सूर्येण ॥ (वैश्वानरस्य ) वैश्वानर वी ( सुमतौ ) भक्ति या श्रद्धा मे ( स्याम) हम सब रहे, जो ( राजा ) राजा है तथा (भुवनाना) सभी जीवो का ( अभिश्री. ) आश्रय-स्थान है (हिव)४।( इतो ) इस स्थान से (जात ) उत्पन्न होकर ( इद ) इस ( विश्व ) पूर्व पृथ्वी को ( वैश्वानरः) वैश्वानर नामक अग्नि ( विचष्टे ) देखता है तथा ( सूर्येण ) सूर्य के साथ ( यतते ) चलता है । ( ० १९८१)॥ इतो जात सर्वमिदम् अभिविपश्यति । वैश्वानरः संयतते सूर्येण । राजा य सर्वेपा भूतानाम् आश्रयणीय , तस्य वय वैश्वा- नरस्य कल्याण्या मतौ स्याम । तत्क. वैश्वानर ? मध्यम' इति आचार्या । वर्षकर्मणा हि एनं स्तौति ॥ २२ ॥ इस ( ससार ) से उत्पन्न होकर वह इस सारे विश्व का निरीक्षण करता -है, वैश्वानर सूर्य के साथ चलता है । जो राजा और सभी जीवो या आश्रय है, उस वैश्वानर की कल्याण करनेवाली इच्छा मे हम रहे। तो यह वैश्वानर कौन-सा है ? आचार्यों का पहना है कि यह मध्यम-स्थान या अग्नि है क्योकि वर्षा के अर्थ से मिलाकर इसकी स्तुति होती है ।। २२॥ प्रनू महित्व वृपभस्य वोच य पूरवो वृत्रहण सचन्ते । पैश्वानरो दस्युमग्निर्जघन्वाँ अधूनोत्काठा अव शम्बर भेत् ।। (नु ) अब [ मैं ] ( वृषभस्य ) वृप के समान बलवान् की (महित्वं ) महिमा (प्र वोचम् ) कहता हूं, (य) {जिस (वृत्रहण ) वृषनाशव की (पूरव ) पूर्ति चाहनेवाले लोग ( सचन्ते ) सेवा करते हैं, (वैश्वानर ) वैश्वानर नाम के ( अग्नि: ) अग्नि ने ( दस्यु ) दस्यु को ( जपावान् ) मारपर ( काष्ठा ) जल को ( अधूनोत् ) हिला दिया तथा (शम्बरं ) मेघ को (अध भेत) फाड दिया । ( ऋ० ११५९६६ ) ।। प्र प्रवीमि तत् महित्व-महाभाग्यम् , वृपभस्य-वपितु अपाम् , य पूरवः पूरयितव्या मनुष्याः, सचन्ते सेवन्ते वर्षकामा । दत्युः दस्यतेः क्षयार्थात् । उपदस्यन्ति अस्मिन् रसा., उपदासयति कर्माणि । तम् अग्नि. पैश्वानरो घ्नन् अवाधूनोत् अप काष्ठा. । अभिनत् शम्बरं-मेघम् ॥ वृत्रहण मेघहनं, सप्तम अध्याय २१ सावित्राणि वा, विना स्पर्श कगये धारण करता है, तब वह जलना है। तभी यह (अनि) उसन्न होता है । कहा भी है-'वैश्वानर सूर्य के साथ चरता है (०१ ९८१)1 कोई अपने आपके साथ नहीं जा सकता है, दूमरे के साथ ही कोई जा सकता है । इस लोक में अमि को प्रज्जलिन करता है, इसकी किरणें उस रोक (स्वर्ग) से प्रकट होती हैं। यहाँ से इसकी ज्वालायें [प्रकट होती हैं ]-दोनो प्रशासो वा ससर्ग देखकर ही [ ऋषि ने ] ऐसा कहा है ।। अथ यानि एतानि औत्तमिकानि सूक्तानि, भागानि वा, पोष्णानि वा, वैष्णवानि वा, तेपु वैश्वानरीया. प्रवादा. अभविष्यन् । आदित्यकर्मणा च एनम् अस्तोप्यन्-इति उदेपि, इति अस्तमेपि, इति विपर्यपि इति ॥ [ यदि वैश्वानर स्वर्ग के देवता या सूर्य होते ] तो उत्तम स्थान वाले देताओं-सविता, पूषा या विष्णु-रे जितने सूक्त या अश होते उनमें यंश्वानर की बातें अवश्य रहनी । सूर्य के अर्थ के माय इनकी स्तुनि भी होती जमे-उगते हो, अस्त होते हो, घूमत हो । आग्नेयेपु एव हि सूक्तेषु वैश्वानरीया. प्रवादा. भवन्ति । भसिकर्मणा च एनं स्तौति । इति दहसि, इति वसि, इति पचसि इति । यथो एतत्-'वर्षकर्मणा हि एनं स्तौति' इति, अस्मिन् अपि एतत् उपपद्यते । 'समानमेतदुदकमुच्चैत्यव चाहभि.। भूमि पर्जन्या जिन्वन्ति दिवं जिन्वन्त्यग्नयः ॥ इति सा निगदव्याख्याता ॥ २३ ॥ वल अग्नि के सूक्तों में ही बंधानर की गर्ने हैं और अग्नि वे अर्थ के साथ इनकी स्तुति होती है जलाते हो, ले जाते हो, पाते हो। यह जो कहा कि 'वर्षा के अर्थ से इनकी स्तुति होती है, वह बात तो इम (अग्नि ) में की भात है-'यह जल (एतत उदाम ) दिन के समान है ( अहमि ममाम् ), भी उठा है ( उच्चा एनि) कभी गिरता (अब प ) है, मैप पुष्पों में प्राण सा हैअग्नि स्वर्ग में' (ऋ० १११६४०५१) यह तो पाठ से ही स्पट है ॥२३॥ विशेष- रम सम्ये याम्यान का निप्पर यही है रिदानर देवल इसी पाणिव अति को रहते हैं, न विजरीमो और न सूर्य को । मे पार में इस निराकरण होगा।
हिन्दी निरुक्त स्तुति ) भी सूर्यरूपी वश्वानर के लिए है-'जो स्वर्ग को और पृथ्वी को प्रकाशित करता है (निवित् ८)1 द्यावापृथिवी को यही चमकाता है। छान्दोमिक सूक्त (वा० स० ३३।९२) भी सूर्यरूपी वैश्वानर के लिए है । 'यह स्वर्ग मे तभी शोभित हुआ' (आश्व० श्री० ८।१०)। वह सचमुच ही तब स्वर्ग मे शोभित हुआ। पेय-हवि का सूक्त ( हविप्पान्तीय-सूक्त, ऋ० १०॥ ८८४) भी सूर्यरूपी वैश्वानर का ही है । अयमेव अग्नि वैश्वानर-इति शाकपूणि.। विश्वानरौ एते उत्तरे ज्योतिपी। वैश्वानर अयम् , युत् ताभ्या जायते । कथ नु अयम् एताभ्या जायते इति ? यन वैद्युत. शरणम् अभि- हन्ति, यावदनुपात्तो भवति, मध्यमधर्मा एव तावत् भवति । उदकेन्धन , शरीरोपशमन. । उपादीयमान. एव अय सपद्यते- उदकोपशमन , शरीरदीप्ति । पाकपूणि के मत से यही (पार्थिव ) अग्नि वैश्वानर है ये ऊपर के ज्योति पुञ्ज भी वैश्वानर ही है । यह ( अग्नि ) वैश्वानर है क्योंकि उन दोनो से उत्पन्न होता है । यह उनसे कैसे उत्पन्न होता है ? जर विद्युत् रूपी अग्नि किसी निवास स्थान पर (शरण ) गिरता है तो जवनक किसी पर ठहरता नहीं, तबतक मध्यम स्थान का (विजली ) गुण लिये रहता है-जल मे जलता है, किसी ठोस वस्तु में बुझ जाता है । किसी वस्तु पर ठहरने के बाद ही यह ( अग्नि ) उत्पन्न होता है-तव यह जल मे बुझने वाला और वस्तु जलनेवाला बन जाता है ।। अथ आदित्यात् । उदीचि प्रथमसमावृत्ते आदित्ये कस वा मणि वा परिमृज्य प्रतिस्वरे यत्र शुष्कगोमयम् असस्पर्शयन् धार- यति, तत् प्रदीप्यते । स. अयमेव मपद्यते। अथापि आह- 'वैश्वानरो यतते सूर्येण' इति । न च पुन. आत्मना आत्मा सय- तते । अन्येन एव अन्य सयतते । इत इमम् आदधाति । अमुत. अमुप्य रश्मय. प्रादुर्भवन्ति । इत अस्य अचिप । तयो भासो ससङ्ग दृष्ट्वा एवमवक्ष्यत् ॥ आदित्य से भी [अग्नि निवरता है ] । आदित्य जन उत्तर दिशा में पहले पहल पाता है तब कोई आदमी कासा या मगि (=पई धरातल्वारी) को साफ करके उसकी किरणों को सामने मूख गोवरयाले स्थान में, उसमे मे - सप्तम अध्याय २३ सोर्यवैश्वानर भवति' इति, पात्र खेण्डोकपालो ) मे होता है, तो पात्रो का सम्बन्ध व्याख्या से नहीं क्योकि सूर्य के एक पात्र-खण्ड भी हैं, पांच भी। (३) यह जो कहा कि 'ब्राह्मण वाक्य है'. तो ब्राह्मण बहुत-से विभागो का वर्णन करते हैं जमे-पृथ्वी वैश्वानर है, सवत्सर वैश्वानर है, ब्राह्मण ( जाति ) वश्वानर है ।। यथो एतत्-'निवित् सौर्यवैश्वानरी भवति' इति, अस्येव सा भवति-'यो विड्भ्यो मानुपीभ्यो दीदेत्' इति । एष हि विड्यो मानुपीभ्यो दीप्यते । यथो एतत्-'छान्दोमिक अस्यैव तत् भवति-'जमदसिभिरा- हुत' इति । जमदग्नय प्रजमिताग्नय. वा, प्रज्वलिताग्नय वा। ते अभिहुत भवति । यथो एतत्-'हविष्पान्तीय सूक्तं सौर्यवै- श्वानर भवति' इति अस्य एव तत् भवति ॥ २४ ॥ (४) यह जो कहा कि 'प्रासा वाक्य ( निवित ) सूर्यरूपी वैश्वानर के हैं', वे वाक्य तो इसी ( अग्नि ) के है जैस- 'जो मनुष्य जाति के लिए चमका' (निवित् ८)। यह ( अग्नि ) ही मनुष्य जाति के लिए चमकना है । (५) यह जो कहा कि 'छान्दोमिक-सूक्त ( वाज० स० ३३१९२ सूर्यरूपी वैश्वानर का है'. वह तो इसी ( अग्नि ) का है जैसे—'चमरते हुए अग्नि से हवन किया गया' (पाश्च० श्रौत० ८।१ ) जमदग्निप्रजमित ( अधिक मात्रा में उत्पन्न ) अग्नि या प्रज्वलित मग्नि । उन्ही के द्वारा इसे आहुति दी जाती है । (६) यह जो कहा कि 'हविप्पान्तीय-सूक्त (ऋ० १०८८४ ) सूर्यरूपी वैश्वानर का है', वह तो इसी ( अग्नि ) का है-॥ २४ ॥ हविष्पान्तमजर स्वविदि दिविस्पृश्याहुत जुष्टमग्नौ । तस्य भर्मणे भुवनाय देवा धर्मणे क स्वधया पप्रथन्त॥ (अजर ) अविनाशी, (जुष्ट ) सुन्दर या सेव्य ( पान्त ) तथा पीने योग्य (हवि ) हवि, (स्वविदि ) सूर्य को जानने वाले तपा (दिविस्पृमि) स्वर्ग को छने वाले ( अग्नी ) अग्नि में (माहुतम् ) पड गया है. ( दवा ) देवतायो ने (सस्य ) उसक ( भमणे ) पालन के लिय (भुवनाय) अस्तित्व के लिए तथा (घमणे ) धारण करने के लिए, उस ( स्वपया ) अन्न से (पप्रयत) पाया। (ऋ० ११८८१) हवि यत् पानीयम् , अजर सूर्यविदि दिपिस्पृशि अभिहुत जुष्टम् अग्नी । तस्य भरणाय च, भवनाय च, धारणाय च, हिन्दो निरुक्त सप्तम-पाद कृष्ण नियान हरय सुपर्णा अपो वसाना दिवमुत्पतन्ति । त आववृत्रन्सदनादृतस्यादिघृतेन पृथिवी व्युद्यते ॥ (कृष्ण) काले (नियान ) रास्ते से ( सुपर्णा ) सुन्दर पखोवाने (हरय ) घोडे (अप ) जल को (वमाना ) ढोते हुए (दिवम् ) स्वर्ग पी और (उत्पतन्ति ) उहते है । ( ते ) वे ( ऋतस्य ) जल के ( सदनात् ) स्थान से (थाववृत्रन् ) मुड गये ( आदित ) तभी ( घृतेन ) जल से (पृथिवी) पृथ्वी ( व्युद्यते ) भीग जाती है । (ऋ० १११६४।४७)। कृष्ण निरयण राति आदित्यस्य । हरय सुपर्णा =हरणा' आदित्यरश्मय. । ते यदा अमुत अर्वाञ्च पर्यावर्तन्ते सहस्थानात उदकस्य आदित्यात् , अथ घृतेन उदकेन पृथिवी व्युद्यते । घृत- मिति उदकनाम । जिघर्त मिञ्चतिकर्मण । अथापि ब्राह्मण भवति- 'अग्नि वा इतो वृष्टि समीरयति, धामच्छद् दिवि भूत्वा वर्षति, मरुत सृष्टा वृष्टि नयन्ति, यदा असो आदित्य अग्नि रश्मिभि पर्यावर्तते, अथ वर्षति' इति ।। कृष्ण निरयण = आदित्य की गत । मुन्दर पतो वाले घोडे सूर्य की किरणों या हरण करनेवाले । ये जब उदा वे निवारा-स्था से = आदित्य के पास से उलटा लौटते हैं, तब धृत = जल से पृथ्वी भीग जाती है। घृत = जल./% 'सोचना' से । ब्राह्मण , भी कहा है-अग्नि यहाँ से वृष्टि भेजता है, वह (वृष्टि) आवाश में स्थान को ढंक कर बरसती है (मेघ), मरण छोड़ी हुई वृष्टि को ले जाते हैं जब वह आदित्य अग्नि को अपनी किरणो रो घेर रेता है तप वर्षा होती है' (वाठा स० ११११० ॥ यथो एतत्-‘रोहात् प्रत्यवरोह चिकीर्पित.' इति, आम्ना- यवचनात् एतत् भवति । यथो एतत्---'वैश्वानरीयो द्वादश- कपालो भवति' इति, अनिर्वचन कपालानि भवन्ति, अस्ति हि सौर्य एककपाल पञ्चपालश्च ! यथो एता-'ब्राह्मण भवति' इति, बहुभक्तिवान ब्राह्मणानि भवन्ति-पृथिवी वैश्वानर, सवत्सरो वैश्वानर ,'बाह्मणो वैश्वानर' इति । (१) यह जो पहा रि वृद्धिम क व ६ ह्रासका कहा जाता है, यह हो वेद वे वापयो से होता है । (२) यह जो कहा 'वंदवानर वा [ हवि ] बारह - सप्तम अध्याय मायामू तु यज्ञियानामेतामपो यत्तूणिश्चरति प्रजानन् ॥ (नक्तम् ) रात मे (अग्नि ) अग्नि (भुव मूर्षा) पृथ्वी का सिर (भवति ) बना रहता है, ( प्रात ) प्रात काल मे ( उद्यन् ) उगते हुए (सूय ) सूय के रूप मे (जायते ) निकलता है, ( यज्ञियानाम् ) पवित्र लोगो को (एना) इस ( मायाम् ) माया को ( उ तु) तो [ देखो । ] ( यत् ) जिसे (प्रजानन् ) जानकर (तूणि ) शीघ्र ही (अप ) काम को ( चरति ) कर डालता है । (ऋ० १०१८८६ )॥ मूर्धा मूर्तम् अस्मिन् धीयते । मूर्धा य सर्वेषा भूताना भवति नक्तम् अग्नि , तत सूर्य जायते प्रात उद्यन स एव । प्रज्ञा तु एता मन्यन्ते यज्ञियाना देवाना, यज्ञसम्पादिनाम् । अप यत् कर्म चरति प्रजानन् । सर्वाणि स्थनानि अनुसचरते त्वर- माण । तस्य उत्तरा भूयसे निर्वचनाय ॥ २७ ॥ मूर्धा = जिसमे शरीर धारण किया जाय ( मूछ + /घा)। रात मे जो अग्नि सभी जीवो का सिर वाता है तब वही सुबह मे उदीयमान सूय के रूप में निकलता है। इसे यनिय अर्थात् यज सम्पन्न करने वाल देवताओ की प्रना ( बुद्धि ) मानने हैं । अप = जिस कम को, वह जानकर करता है, शीघ्रता वह सभी स्थानो मे जाता है। उसके बाद की ( ऋचा ) स्पष्टतर उदा- हरण के लिये है ।। २७ ।। स्तोमेन हि दिवि देवासो अग्निमजीजनञ्छक्तिभी रोदसिप्राम् । तमू अकृण्वन् नेघा भुवे क स ओषधी पचति विश्वरूपा ॥ (स्तोमैन ) स्तुति के द्वारा (दिदि । स्वग मे ( देवास ) देवताओ ने (क्तिभि ) अपनी शक्ति से (रोदसि प्राम् ) द्यावा पुथिो को पूर्ण करने वाल (अग्निम् ) अग्नि को ( यजीजनन् ) उत्पन्न किया। (तम उ) उसे (भुवे ) रहने के लिये ( त्रेधा) तीन तरह का ( अकृण्वन् ) बनाया, (स ) पह (विश्वरूपा ) न ना प्रकार की (ओपधी ) वनस्पतियों को ( पचति ) पपाता है। (ऋ० १०1८८।१० स्तोमेन हि य दिवि देवा अग्निम् अजनयन् । शत्तिभि कर्मभि । द्यावापृथिव्यो आपूरणम् ।तम् अकुर्वन् धामावाय- पृथिव्याम् , अन्तरिक्षे, दिवि इति शाकपूणि । 'यदस्य दिवि ॥
२४ हिन्दी निरुक्त एतेभ्यः सर्वेभ्यः कर्मभ्यः इमम् अग्निम् अन्नेन अपप्रर्थन्त इति । अथापि आह ।। २५ ॥ जो हवि पेय है, अनश्वर है. मोदकारी (जुष्ट ) है. सूर्य के ज्ञाता एव स्वर्ग को छूने वाले अग्नि मे दिया जाता है। उसके पालन, अस्तित्व (/भू ), तथा धारण के लिए-दन सभी कर्मों के लिए इस अग्नि को [ देवताओ ने ] अन्न से फैलाया। और भी कहा है ।। २५ ॥ अपामुपस्थे महिपा अगृभ्णत विशो राजानमुप तस्थुऋग्मियम् । आ दूतो अग्निमभरद्विवस्वतो वैश्वानर मातरिश्वा परावतः ।। ( अपाम् ) जल की (उपस्थे) गोद मे.(महिला) बड़े लोगो ने (अगृभ्णत) उसे पकडा; (विश ) जातियाँ ( ऋग्मियम् ) सम्मानयुक्त (राजानम् ) राजा के सामने ( उप तस्यु ) बैठी थी । ( मातरिश्वा ) मातरिश्वा नाम वा (दूत ) दूत (वैश्वानर ) वैश्वानर नाम के (अग्निम्) अग्नि को (परावत ) बहुन दूर से (विवस्वत ) सूर्य के पास से ( आ अभरत ) ले आया है । (ऋ० ६।८।४) । अपाम् उपस्थे उपस्थाने । महति अन्तरिक्षलोके आसीनाः, महान्त. इति वा । अगृह्णत माध्यमिकाः देवगणाः। विशः इव राजानम् उपतस्थु. । ऋग्मियम्=ऋग्मन्तम् इति वा, अर्चनीयम् इति वा । आहरत् यं दूतः देवानां विवस्वतः = आदित्यात् । विवस्वान-विवासनवान् । प्रेरितवत., परागताद्वा । अस्य अग्नेः वैश्वानरस्य मातरिश्वानम् आहर्तारम् आह । मातरिश्वा-वायु., मातरि अन्तरिक्षे श्वसिति, मातरि आशु अनिति इति वा । अथ एनम् एताभ्यां सर्वाणि स्थानानि अभ्यापादं स्तौति ॥ २६ ।। जल के उपस्थ = गोद मे, महान् अन्तरिक्ष लोक में आसीन, अथवा, बडे । मध्य स्थान वाले देवताओ ने पाडा । वे राजा के आगे प्रजा के समान ठहर गये । अग्मिय : ऋचाओ से युक्त या पूजनीय । जिसे देवताओं का दूत, चमकने वाले धादित्य के पास से लाया है । विवस्वान् = ( अन्धकार ) भगाने वाला । प्रेरित करने वाले से या बहुत दूर से । मातरिश्वा को इम बैश्वानर अग्नि का आहर्ता (लाने वाला ) पहा गया है। मातरिश्वा =वायु. क्योषि 'मातर' = अन्तरिक्ष में सांस लेता है या अन्तरिक्ष में शीघ्र ( पाशु) असता है (यन ) । अब इन दोनों ऋचाओं के द्वारा, सभी स्थानों को घ्याम धरने के लिए, इसकी स्तुति करता है ॥ २६ ॥ मूर्धा भुवो भवति नक्तमग्निस्तत. सूर्यो जायते प्रातरुद्यन् ।
हिन्दी-निरुक्त
परिशिष्ट-१
वैदिक मन्त्रों का पद्यानुवाद
प्रथम अध्याय
पृ० ११-न नूनमस्तिक
न आज भी था कल भी नहीं है, अभूत बातें जन कौन जाने ?
मस्तिष्क है चचल दूसरो का; विनाश है निश्चित वस्तु का भी ।
पृ० १२-नून सा ते०
हे इन्द्र, तुम्हारा है उत्तम जो दान,
गायक को उससे कर दो वर-प्रदान ।
दो लाभ गायको को, हमसे मत दूर
हो भाग्य, यज्ञ मे बोलें, हम सब शूर ।।
पृ०१४-ऋचां स्वा०
वह पोषक, वृद्धि ऋचाओ की करता है,
शववरी पदों में गान एक गाता है।
ब्रह्मा विभ्रम का समाधान बतलाता,
घध्वर्यं यश का पूरा काम कराता ।।
पृ०१६-अक्षण्वन्तः
वे आँख कान से युक्त मित्रगण सारे,
हैं बुद्धिवेग में हुए विषम बेचारे ।
मूंह तक या कांखो तक ही वे हैं केवल,
दीखते नहाने योग्य झील-से वे सब ।।
पृ. १८-निष्टक्वासः०
व निर्वसन हो दीनजन, बहुपुत्र हो, वृक से यथा-
डरते हुए रोने लगे-'हो शिशिर जीवन-हित यथा ।
पृ.१८-हरिभिरेके
हवि देखकर, कुछ तो, स्वर्ग यही से पाती,
पुछ सवन-काल मे मोम चुलाकर जाती।
फिर समुद शक्तियों को करके, दानों से,
करती कि नरक मे पड़े नहीं पापों से IP
हिन्दी निरुक्त अस्ति उपमानस्य सप्रत्यर्थे प्रयोग. । 'इहेव निधेहि' इति यथा । सुपये =सुपतना., एता रानय वसते, मातरिष्वन् । ज्योति वर्णस्य । तावत् उपदधाति यज्ञम् आगच्छन् ब्राह्मण. होता, अस्य अग्ने. होतु. अवर. निपीदन् । जबतक ऊपा का प्रकाश (अ) या प्रतिदर्शन होता है। उपमान चाचक ( 'न' ) का प्रयोग 'सम्प्रति' ( इस समय ) के अर्थ मे हुआ है जैसे- इह इव निधेहि ( ठीक यहाँ रखो ) । सुपर्णी - सुन्दर रीति से गिरनेवाली ये राते, ह मातरि भवन् । दण की ज्योति पहनती है। तबतक यश मे थाया हुआ, इस अग्निरूपी होता के नीचे बैठा हुआ ब्राह्मणरूपी होता उसे धारण करता है । होतृजप तु अनग्निवैश्वानरीय. भवति । 'देव सवित । एत त्वा वृणते अग्नि होत्राय सह पित्रा वैश्वानरेण' इति । इम- मेव अग्नि सवितारम् आह-सर्वस्य प्रसवितारम् । मध्यम वा उत्तम वा पितरम् । यस्तु सूक्त भजते, यस्मै हवि निरुप्यते, अयमेव स अग्नि वैश्वानर. 1 निपातमेव एते उत्तरे ज्योतिपी एतेन नामधेयेन भजेते भजेते ।। ३१ ।। लेकिन होता का पाठ वैश्वानर के लिए है जो अग्नि मही-है देव वह तुम्हें अर्थात् अनि को, यज्ञ के लिए, पिता वैश्वानर के साथ चुनना है' (बाश्व० थो०१३)। इसी अग्नि को सविता कहा गया है- सबो को प्रसन्न करने वाले, मध्यम या उत्तम स्थान वाले पिता को। जो सूक्त पाता है और जिसे हवि मिलता है, वह यही ( पार्थिव ) अग्नि वैश्वानर है। इस नाम से ऊपर के ज्योति पुञ्ज कभी कभी ही [ सूक्त और हवि ] पाते है । विशेष-विरोधियों के तकों का निराकरण करने के बाद पास्क इस निणय पर पहुंचते हैं कि 'वैश्वानर' तीनो अग्नि को कहते हैं-पायिव अग्नि बिजली नशा सम । विन्तु मुक्त और हषि पारे सला अनि ही बयानर है ४३१, इति निरुक्ते सप्तमोऽध्याय ॥ सवित ।
वैदिक मन्त्रों का पद्यानुवाद जिसे विचारो शुचि, १प्रमादी; मेधा लिये हो वह ब्रह्मचारी । द्रोही कभी भी न हुआ तुम्हारा; बह्मन । मुझे दो निधिपाल को ही ॥ पृ०४४-ता वां वास्तू० इच्छा है तेरे उस घर पर जाने की, किरणे चमकीली बहुत, जहाँ गतिधारी । हाँ, वही विष्णु जो बड़े चरणवाला है, उसका उत्तम पद अच्छा चमक रहा है। पृ०४६-य ईम० उसके कर्ता ने नही उसे है जाना, उससे छिपने पर भी परन्तु है माना । वह मातृयोनि मे घिरा हुआ अन्दर से, बहु सन्तानो से युक्त मिला धरती से ।। पृ०४७-अयं स० उसकी ध्वनि है जिससे ढंककर यह वाणी, होवर के मेघारूढ, घोर-रव परती। निज गर्जन से तो झुका दिया है नर को, बिजली बनकर के सोच लिया निज छवि को ।। प्र०४९-आर्टिपेगो. ऋष्टिषण के पुत्र महात्मा होता के पद पर आये, नाम दिव्य देवापि देवता-भत्तिज्ञान रखनेवाले । ऊपर से नीचे को उनने सागर महा ! उडेल दिया, स्वर्गलोष से वर्षावाले जल को मानो ठेल दिया ।। पृ०५०-यध्यापिः० पातनु परपर कृपा पुरोहित वे देवापि वने होता चुने गये जब, तब तो उनन ध्यान दिया कुछ मत्रों का। तभी बृहस्पति दानविशारद, देवो के सुनने लायक, वर्षा करनेवाली स्तुति के उनके लिए बने दाया ।। पृ०५४-अतिष्ठन्ती जो अस्थिर है, जिसका न रोध होना है, ऐसे जल में ही योष पारीर पहा है। पल पत्रदत्य को हिपी जगह पर पस्ता, वह इन्द्रा यह अन्यार में सोता ॥ ११ वि०नि० २ हिन्दी-निरुक्त पृ० ३०-स्थाणुरयं० वह शुष्क वृक्ष-सा भार वहन करता है, पढकर वेदो अर्थ न जान सका है। अर्थों का ज्ञाता सभी सुफल है पाता, धो पाप, ज्ञानसे, स्वर्गलोक वह जाता ॥ पृ०३०-यद् गृहीत. याद किया पर सका न जान, शब्दो तक ही होता पाठ । नही कही है जलता आज, आग विना यो सूखा काठ ।। पृ०३१-उत त्वा० वाणी को लखकर भी न एक लसता है, उसको सुनकर भी नहीं एक सुनता है । लेकिन कुछ वो तो है वह देह दिखाती, पति को सु-वसन पत्नी ज्यो इच्छा लानी ।। पृ० ३२-उत त्वं० (प्राचीन अर्थ ) वाणी-सगति मे कुछ अर्थश कहाते, कोई न पठिन पद मे भी उन्हें हराने माया से, झूटी गौ-सा यह चलता है फल फूल हीन वाणी ही यह सुनता है ।। द्वितीय अध्याय पृ. ३९-यस्मात्परं० (श्वेताश्वतर० ३९) जिससे ऊँची नीची युछ चीज नहीं है. जिससे छोटा या बहा नहीं कोई है । स्वर्ग मे वृक्ष-मा स्थिर होपर ठहरा है यह सारा उगी पुरुष से पूर्ण हुआ है। पृ.४१-विद्याह ०(४ श्लोक) विद्या भी ब्राह्मग पास योगी-रक्षा परो में निधि है तुम्हारी। परापवादी, सल या बुरे दो; न दो मुझे वीर्यवती धनूं मैं ।। जो गम्य द्वारा युग कर्ण सो; न दुम पाते, समरम्ध देने । माता-पिता तो ममझे उन्हें ही; द्रोही न होना उनका पदामि। गये पढ़ाये गुरु रो न माने; जो वित्र, वाणी मन मं में भी। से रने वे गुरु के यमान्य; न मानती है अति भी उन्हें स्यों ।।
वैदिक मन्त्रों का पद्यानुवाद पृ०६४-इन्द्रो अम्मा खोदा हमे वजगरी बाहुवाले इन्द ने, मारा वृक्ष को जो नदियो को घेर डाले था। लाये दियाणि देव हमे यही सविता, जिनमे प्रसूत हम चारों ओर जाती हैं । पृ०६४-मा ते कारो हे स्तोत्रकार ! हम सुनें तुम्हारी वाणी. गाडी, रय से तुम दूर-देश से बाये । मैं दूध पिलानेवाली स्त्री-सी झुक्ती, नर का नारी-सा, आलिंगन तब करनी ।। पृ०६६ उत स्य. (मूल ऋचा में एक 'ई' काट दें) यह घोडा चावुक देख दौडने लगता, जब मुंह, गरदन, उर में लगाम है पडना । संचित अपने बल को घोडा यह करता, झटपट राहो के मोड पार वर जाना ॥ तृतीय अध्याय प०६८-परिपद्य सम्पति दूसरे कुल को त्याज्य रही है. स्वामी हो तो हम बने बिन्तन धन के । हे अग्नि, अन्य का जन्मा पुत्र न होता, दूषित न करो श्य, भूसं भने य लेना ॥ पृ०६९-न हिममाया० हो अन्य पेट वा मुखद पिन्तु परल पा. लेना नरमी, होवे विचार नहि मन का। वह तो अपने ही परमोटा जाता, दो हमे विजेता और मुसुर नासा ।। १.७०-शासदिक पोपित करता है वाहपृषी से पुत्र उमे होगा, जान रहा बह. प्रावि-निगम ने सर्व विधान से मान रहा। हो रिता मानी पुषी किए गोरने पर पाया.. भरने मन को ताला बहनाम्नि पारण सा॥
हिन्दी निरुक्त पृ०५५-दासपत्नी० दास के कलत्र-स्वरूप, छिपे सो से, पणि द्वारा गौमओ से, जल रुके हुए थे। जल के इस रोके गरे नये सोते को, खोला है उसने, मार वृत्र योद्धा को ।। पृ०५७-इदं श्रेष्ठ ज्योतियो वीच यह श्रेष्ठ ज्योति है आयी, बहुरगी, चमकीली, विशाल यह छायी। सविता घे ही प्रसवार्य प्रसून हुई थी, रजनी ने उपा-हेतु योनि साली की । पृ०५७-शद्वत्सा श्वेनमयी, चवमा करती दोभित पुत्रोवाली आयो । कृष्णमयी इसलिए जगह सचमुच खाली करके लापी । एम तरह वा बन्धन वाले अमर बने, आगे पीछे, आपम म तो रग बदलत अहोरात्र चलने जाते ।। पृ०५९-अहश्च कृष्ण उजला दिन वाली गत अपड नियम से, दोनो समारो में आत प्रम-गम से। वैश्वानर नामा अग्नि जन्म लेते ही, अपो प्रपात से हैं तम यो हरते ही। पृ०५६-देवानां माने देवो के बनने समय प्रगम बन छाये, इनो छदोग निकल सभी जल धाये। तीनो मिल पग से महि को उष्ण बनाते, दोनों प्रसन्न करने वाला जल लाते।। पृ०६१-इर्य शुप्मेभिः यह तो अपने बल मे, बलशाली लहरो से तोड रही, पवन को घोटी को, मानों वमल-मूल हो योद रही। रक्षा के ही हेतु मुनिमित नुनियो के द्वारा हम सप, गरस्वती की पूजा कर ले, उमय तटों को जो नाश" पृ०६३-रम मम मोम-सहा वचनों को गुनो हो तुम, हे मर वाहिनी, निज गतियों से क्षण तुम । पर बडी ल मि. पाम पाया हूँ, में दुशिष पृष रक्षा को इला रहा है।
वैदिक मन्त्रों का पद्यानुवाद पृ०८-कुह स्वित् हे अश्विन् ! तुम रात कहां थे? दिन मर भी तुम कहाँ रहे ? कहाँ नहाया-खाया तुमने, और कहाँ पर थे ठहरे ? कौन तुम्हें अपने वासस्थल मे शय्या पर ले जाता ? जैसे देवर को विधवा या ले जाती पति को महिला । पृ०९१-चतुर० जब तक न रसे वह चारो; पासो को, तब तक डरते । त्यो ही सज्जन कटुवचनों, की इच्छा कमी न करते ॥ पृ०१००-कतरा० इनमें है पहली कौन, कौन है पीछे ? है ऋषियो ! जाने कौन, हुई ये कैसे ? धारण करती सारी चीजें अपने से, दोनों दिन मानो घूम रहे पहिये-से ॥ चतुर्ध-अध्याय पृ० १०१-कोनु मर्या भाइयो, 'मित्र को मैंने; होकर अखिन ही मारा' । हैं कौन मित्र यह कहते, अब भाग रहे क्यो हमसे ? पृ० १०२-यया सुप० मुन्दर पंखोवाले पक्षी-भांति यज्ञ में प्रेम रखे, ऋषिगण करते हुए प्रापंना इन्द्रदेव के पास गये। देव, खोल दो ढंको जगह वो, हम सब को पाखें भर दो, बंधे जाल में मानों हम सब, देव, जरा बापन हर लो। पृ० १०४-यदिन्द्र हे इन्द, चयन के योग्य प्रशंसाप्रद जो, धन रणा, वचपारिन् ! वह सब तुम दे दो। तुम भहारों का ज्ञान रमे हो, पन से दोनों हापों से दंय, दिये ही थानो। पृ० १०५-जुष्टो दमूना० या मार से मेरित हर अनिपिनो घर में पायो. अभिव, दुम जानरार हो, इस शस्पल में प्रायो। सभी पत्रुसेनाओं से विनाश घर जायो, बने शत्रु हमारे, उनमा मर हर मारो।
याज्ञिक हो तुम, हिन्दी निरुक्त पृ०७३-अभ्रातेव० जैसे भाई से होना नारी मनुष्य की ओर चली, धन पाने के लिए या कि योई खम्भे पर चढी हुई। पति को करती हुई कामना सुन्दरवसना नारी-सो, हंसती सी ऊपा भी मानो रूप मनोरम फैलाती ॥ पृ०७६-न जामये तन से निकले हुए तनय ने दिया बहन को भाग नही, किन्तु गर्भ को उसके पति का बना दिया भडार सही। जब मातायें सुकृती सन्तानो को करती हैं उत्पन्न, एक काम उनमे करती है, एक लाभ से है सम्पन्न । पृ०७७-तदद्य वाचं० सो आज सोच लेता उपाय हूं पहले, हम देव लोग असुरो को जीतें जिससे । हे पचलोक, तुम यज्ञशेप को साते. मेरा भी यज्ञ रचाते ॥ १०७९-दशापनिभ्यो० दस रक्षक से युक्त और दस कमरबन्द रखनेवाल, दरा जोती रम्सी वाले हैं जो दस ही वन्धनवाले । दम लगामयाले अमरो की पूजा Rटपट ही र लो, दरा धुरियों को धारण करते, जोते जाने पर दस जो।। पृ०८६-अभीदमेको मैं हूँ बजेय, इसपर पर्याप्त अकेला, दो और तीन भी या पर सवते मेरा? में तृण ही तरह उसे पी सागर मे, क्या इन्द्रहीन रिपु मुझे दोष डालेंगे ? पृ०८४-वया वयं है स्तोत्रनाय, तुम वृद्धि परो, तुमसे हम, मानवाण सिन धन-गमूह पा जायें। दूर या पि है निकट नत्रुगण मेरे, उन छिनो कपणे दौर में पौरे ॥ पृ.५-या मुपर्णा को मुमर अपनी स्तुतियों से सगातार बुवात । मेरे समोर गे नाय नुवन का पारक, थापा अपव-मी बुद्धि लिये वह नायर ।। अब अमृतम्या पमों वाले, वैदिक मन्त्रों का पद्यानुवाद पृ०११३-कायमानो चाहते हुए तुम ईन्धन, जलमातृ-निकट हो जाते । हे अग्नि, तुम्हारा आना, हम भूल नहीं हो सकते । जिससे कि दूर होकर भी, तुम यहाँ चले हो पाते ।। पृ० ११४-कनीनकेव० जव नये और छेदोंवाले, छोटे भासनपर लकडी के । बैठी गुड़ियों से वे भूरे, घोडे राहो मे पोम रहे । पृ० ११५-उपो अदर्शि० उपा शुद्ध करने वाले आदित्य वक्ष-सी दीख पड़ी, स्तुतिकर्ता की भांति वस्तुएँ प्रिय उसने सामने रखी। अन्नदायिका माता-सी सोये बच्चो को जगा रही, आयी, आनेवाली देवीगण में नियम बहुत रखती ।। पृ० ११७-इमे सुता० पृ. १२०-त्वामिन्द्र० पृ०१२१-आ पाता ये गये चुलाये सोम, इन्हे तो पो लो, हे अश्विन , प्रातः मे आ, सम यल वाले । यह तव रक्षा-वन्दन के लिए रखा है, प्रात: उड़ते कौए ने जगा दिया है । हे इन्द्र, ध्यान से पीसा; यह सोम, प्रार्थना करते । धन के इच्छुक लोगो ने तेरी स्तुति की वाणी से । निश्चय ही वे आगामी युग आवेगे, जव स्वकुल लोग परकुल की भांति बनेंगे अपनी बाहों को पति के लिए विटा दो, सुभगे, पर, कोई मुझे छोड़ पति मांगो ॥ पृ. १२२ चौमे पिता० स्वर्गलोक है पिता हमारा, सोदर बन्ध यहाँ रहते, यह विशाल है माता मेरी पृथ्वी सोग जिसे पहले । हए स्टोरों के ही बीच पहा है गर्भाशय, यहां पिता ने दुहिता को ही धारण गर्न कराया है। पक्षिति स्वर्ग है, अन्तरिक्ष भी, माता, पिता, वही लदन । चमी देवता पाप निवासी, अदिति भूत-भायी है उन ॥ १. १२३-अदिति हिन्दी निरुक्त पृ० १०६-सं मां० चारों ओर दे रही हैं कष्ट मुझे इंटें ये, मानो हो सपत्नी; इन्द्र, शतशक्तिवाले हो । चूहा सूत खाता त्यों ही खातीं मुझे व्याधियाँ तेरे स्तुतिकर्ता बो; विचारो स्वर्ग-पथिवी ! पृ० १०७-इपिरेण. गतिशील बुद्धि से तुमने जिसे चुलाया, पैतृक धन-सा ही भोग करें हम सारा । हे राजन्, सोम, हमारी भायु बढाओ, ज्यो ग्रीष्मकाल के दिन को सूर्य बढ़ाता। पृ० १०८-मरुत्वाँ मरुतो के साथी, वर्षा करने वाले, तुम रण रचते, इन्द्र, पियो तुम सोम, मोद के लिए, बाद मे भोजन के । मधु की सुन्दर जमि बहा दो, जरा हमारे उदरो मे, सोमों के तुम राजा, जिन्हे चलाया पहले के दिन मे ।। पृ० १०९-सक्तुमिव० सत्तू को चलनी से पवित्र हैं करते, त्यो बुद्धिमान मन से वाणी को करते । है, मित्रो को मित्रता यहाँ दिख जाती, इनकी वाणी मे शुम लक्ष्मी बस जाती ।। पृ० ११०-तत्सूर्यस्य० यही सूर्य का देवभाव है, यही आपकी है महिमा, जिसने फैले अन्धकार को वीच राह मे हर डाला। जभी अस्तबल से उसने अपने घोडो को जोन लिया, तभी रात्रि का वस्त्र सबो के लिये वही या फैल रहा । पृ० १११-इन्द्रेण. निर्भय के सँग मे जाते, तुम इन्द्र साथ दिग्वलाते । तुम दोनों मोद मनाते, सचमुच समान वलयाले । पृ० ११२-इन्निासः० जिनके नितम्ब सुविशाल, पमर पतली है, जो दिव्य शक्ति-सम्पन्न वीर दौडाहे । श्रेणीवद्ध हसरी वे घोडे पा लेते दिव्य मार्ग को है जय ।। घरने हैं " " " " " प्रमाण-ग्रन्थावली संस्कृत १. वैदिक सहिताः (पूना, बम्बई )। २. नितम् (दुर्गवृतिसमेतम् --बम्बई खेमराजप्रकाशितम् ) ३. भदकमकरसम्पादितम् । ४. निरुतालोचनम्-सत्यवतसामग्रमीप्रणीतम् । ५ पाणिनीया शिक्षा। ६ निरुक्तस्य स्कन्दमहेश्वरप्रणीते टीके (डा. लक्ष्मणसरूपपकाशिते ) ७. महाभाष्यम् (पूना), वाराणसी ( चौसम्बा)। ८ चतुर्वेदमाष्यभूमिकासंग्रहः (बलदेव उपाध्यायः ) । चौसम्मा ९. ब्रह्मभूयशाङ्करभाष्यम् ( निर्णयसागरीयम् ।। १० काशिका (चौखम्बाप्रकाशिता)। ११. सिद्धान्तकौमुदी ( है) १२. मीमांसासूत्रम् (शवरभाष्ययुतम्-आनन्दाश्रमीयम् ) हिन्दी १. वैदिक साहित्य और सस्कृति -५० बलदेव उपाध्याय । २. वैदिक साहित्य-प. रामगोविन्द त्रिवेदी । ३. हिन्दी निरुक-पं० सीताराम शास्त्री। ४. सस्कृत का भाषाशास्त्रीय अध्ययन-रा. भोलाशंकर व्यास । ५ भाषाविज्ञान-मोलानाथ तिवारी । ६ व्याकरणशास्त्र का इतिहास-युधिष्ठिर मीमासक । अँगरेजी 1 L Sarup-Introduction to the Nirukta ( 1920) 2. -The Nirukta, Eng Trans.( 1921) -The Nighante and the Nirukta. 4Skold - The Nirukta, Lund, 1926. 5. Siddhesvar Varma-Etymologies of,Yaska. -6. Phonetic Observations of Ancieat Hindus. " 3 . " १२ हिन्दी निरक्त पृ० २४-अपामुपस्थे० जल के सटंक में पकडा बडे सुरों ने, थे लोग गये सम्मान्य नृपति के आगे। अग्नि को दूत है सूर्य पास से साया, दूर से मातरिश्वा भी वैश्वानर को। पृ० ४-मूर्धा भुवो० पृथ्वी का मस्तक अग्नि, निशा में बनता, होकर प्रभात मे सूर्य वही उग पाता । यह तो पवित्र लोगो की सुन्दर माया, रख ज्ञान शीघ वे सभी कार्य कर पाते ।। पृ० २५-स्तोमेन अग्नि को स्वर्ग में देतो ने स्तुतियो से, उपजाया स्वविनि जो बल से भरते । रहने को तीन तरह से उसे बनाया, वह सभी तरह के पौधो को उपजाता । प्र०२६-यदेदेन० जव धारण किया इसे पवित्र देवो ने, स्वर्ग मे यदिति के पुत्र, सूर्य को मानो। जव गमनशील जोडे जान्न हुए हैं, ये सभी लोव को सदा देखते ही हैं ।। पृ. २७-यत्रा वदेते करते हैं जहाँ विवाद बडे श्रो' छोटे, जानता को है हम याज्ञिक लोगो में । वे ही समर्थ है मित्र, मोद पूर्वा ही, करते जो यज्ञ, बता सकता क्या कोई ? | पृ००७-यान्मारक जब तक उपा के सुप्रकाश को पहने, है मातरिश्व सूदर पखोवाला है। जब तक रखना है, यज्ञ पास मे जाकर, राह्मण, होता से निम्न भाग में रहकर ।। .
7 Rajwade - Yāska's Nirukta, Poona, ( 1940 ) 8. Ganganatha Jha Commemoration Volume 9 Encyclopaedia Britannica, Vol 8. 10 Collier's Encyclopaedia, Vol. 7 11 Taraporcwala - Elements of the Science of Language 12 PD Gune, Introduction to Comparative Philology Poona, 1950, 13 Bata Krishna Ghosh, Linguistic Introduction to Sanskrit 14 Skeat, Principles of English Etymology XS Bloomfield-Vedic Concordance 16 -Languge 1933 17 Louis Cray. Foundations of Language 1937, 18 P C, Chakravarty-Linguistic Speculations of the Hindus 19 Philosophy of Sanskrit Grammar 20 Otto Jesperson-Origin and Development of Language 21 - Philosophy of Grammar. 22, S K Belvalkar-Systems of Sanskrit Gr12 23 RGBhandarkat Wilson Philological Lectures 24 S K Chatterjce, indo Aryan and Hindi 25 K C Chatterjee - Tochascal Terms of Sapskrit Grammys 26 Max Muller History of Ancient Sanskrit Literature 27 Macdonell--History of Sanskrit literature 28 -Vedie Mythology 29 M Winiernitz-History of Indian Literature, Yol 1 (Eng Trans ) 30, Bishnupada Bhattacharyz-Yaska's Nirukta, 1958 31 Monter Viliams--A Sanskrit Dictionary. 32 Macdonell & Keith-Vedic Index 33 R. N Daodekar ---Vedic Dibliograpy >